UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi छन्द

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name छन्द
Number of Questions 12
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi छन्द

छन्द का अर्थ है-‘बन्धन’। ‘बन्धनमुक्त’ रचना को गद्य कहते हैं और बन्धनयुक्त को पद्य। छन्द प्रयोग के कारण ही रचना पद्य कहलाती है और इसी कारण उसमें अद्भुत संगीतात्मकता उत्पन्न हो जाती है। दूसरे शब्दों में, मात्रा, वर्ण, यति (विराम), गति (लय), तुक आदि के नियमों से बँधी पंक्तियों को छन्द कहते हैं।
छन्द के छः अंग हैं-

  1. वर्ण,
  2. मात्रा,
  3. पाद या चरण,
  4. यति,
  5. गति तथा
  6. तुक

(1) वर्ण-वर्ण दो प्रकार के होते हैं—(क) लघु और (ख) गुरु। ह्रस्व वर्ण | अ, इ, उ, ऋ, चन्द्रबिन्दु UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi छन्द img 11] को लघु और दीर्घ वर्ण ( आ, ई, ऊ, अनुस्वार (.), विसर्ग (:)] को गुरु कहते हैं। इनके अतिरिक्त संयुक्त वर्ण से पूर्व का और हलन्त वर्ण से पूर्व का वर्ण गुरु माना जाता है। हलन्त वर्ण की गणना नहीं की जाती। कभी-कभी लय में पढ़ने पर गुरु वर्ण भी लघु ही प्रतीत होता है। ऐसी स्थिति में उसे लघु ही माना जाता है। कभी-कभी पाद की पूर्ति के लिए अन्त के वर्ण को गुरु मान लिया जाता है। लघु वर्ण का चिह्न खड़ी रेखा I’ और दीर्घ वर्ण का चिह्न अवग्रह ‘δ’ होता है।

(2) मात्रा-
-मात्राएँ दो हैं-ह्रस्व और दीर्घ। किसी वर्ण के उच्चारण में लगने वाले समय के आधार पर मात्रा का निर्धारण होता है। ह्रस्व वर्ण (अ, इ, उ आदि) के उच्चारण में लगने वाले समय को एक मात्राकाल तथा दीर्घ वर्ण आदि के उच्चारण में लगने वाले समय को दो मात्राकाल कहते हैं। मात्रिक छन्दों में ह्रस्व वर्ण की एक और दीर्घ वर्ण की दो मात्राएँ गिनकर मात्राओं की गणना की जाती है।

(3) पाद या चरण–प्रत्येक छन्द में कम-से-कम चार भाग होते हैं, जिन्हें चरण या पाद कहते हैं। कुछ ऐसे छन्द भी होते हैं, जिनमें चरण तो चार ही होते हैं, पर लिखे वे दो ही पंक्तियों में जाते हैं; जैसे—दोहा, सोरठा, बरवै आदि। कुछ छन्दों में छ: चरण भी होते हैं; जैसे-कुण्डलिया और छप्पय।

(4) यति ( विराम)-कभी-कभी छन्द का पाठ करते समय कहीं-कहीं क्षणभर को रुकना पड़ता है, उसे यति कहते हैं। उसके चिह्न ‘,’ ‘I’ ‘II’, ‘?’ और कहीं-कहीं
विस्मयादिबोधक चिह्न !’ होते हैं।

(5) गति ( लय)-पढ़ते समय कविता के कर्णमधुर प्रवाह को गति कहते हैं।

(6) तुक-कविता के चरणों के अन्त में आने वाले समान वर्गों को तुक कहते हैं, यही अन्त्यानुप्रास होता है।
गण-लघु-गुरु क्रम से तीन वर्षों के समुदाय को गण कहते हैं। गण आठ हैं-यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण, संगण। ‘यमाताराजभानसलगा’ इन गणों को याद करने का सूत्र है। इनका स्पष्टीकरण अग्रलिखित है
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छन्दों के प्रकार-छन्द दो प्रकार के होते हैं—(1) मात्रिक तथा (2) वर्णिक। जिस छन्द में मात्राओं की संख्या का विचार होता है वह मात्रिक और जिसमें वर्गों की संख्या का विचार होता है, वह वर्णिक कहलाता है। वर्णिक छन्दों में वर्गों की गिनती करते समय मात्रा-विचार (ह्रस्व-दीर्घ का विचार) नहीं होता, अपितु वर्गों की संख्या-भर गिनी जाती है, फिर चाहे वे ह्रस्व वर्ण हों या दीर्घ; जैसे-रम, राम, रामा, रमा में मात्रा के हिसाब से क्रमश: 2, 3, 4, 3 मात्राएँ हैं, पर वर्ण के हिसाब से प्रत्येक शब्द में दो ही वर्ण हैं।

मात्रिक छन्द

1. चौपाई [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 18]
लक्षण (परिभाषा)-चौपाई एक सम-मात्रिक छन्द है। इसमें चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। अन्त में जगण (I δ I) और तगण (δ δ I) के प्रयोग का निषेध है; अर्थात् चरण के अन्त में गुरु लघु (δ I) नहीं होने चाहिए। दो गुरु (δ δ), दो लघु (I I), लघु-गुरु (I δ) हो सकते हैं।
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2. दोहा [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]

लक्षण (परिभाषा)—यह अर्द्धसम मात्रिक छन्द है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके पहले और तीसरे (विषम) चरणों में 13, 13 मात्राएँ और दूसरे तथा चौथे (सम) चरणों में 11, 11 मात्राएँ होती हैं। अन्त के वर्ण गुरु और लघु होते हैं; यथा–
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3. सोरठा [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]

लक्षण (परिभाषा)-यह भी अर्द्धसम मात्रिक छन्द है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके पहले और तीसरे चरण में 11 तथा दूसरे और चौथे चरण में 13 मात्राएँ होती हैं। यह दोहे का उल्टा होता है; यथा—
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4. कुण्डलिया [2009, 11, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
लक्षण (परिभाषा)-कुण्डलिया एक विषम मात्रिक छन्द है जो छ: चरणों का होता है। दोहे और रोले को क्रम से मिलाने पर कुण्डलिया बन जाता है। इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। प्रथम चरण के प्रथम शब्द की अन्तिम चरण के अन्तिम शब्द के रूप में तथा द्वितीय चरण के अन्तिम अर्द्ध-चरण की तृतीय चरण के प्रारम्भिक अर्द्ध-चरण के रूप में आवृत्ति होती है; यथा—
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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1 नीचे लिखे पद्यों में निहित छन्द का नाम और परिभाषा (लक्षण) लिखिए-
प्रश्न (क)
बरबस लिये उठाइ उर, लायहु कृपानिधान ।
भरत राम को मिलनि लखि, बिसरे सबहि अपान ।।
उत्तर
दोहा

प्रश्न (ख)
अबहूँ मया दिस्टि करि, नाह निठुर! घर आउ ।
मंदिर ऊजर होत है, नव कै आइ बसाउ ।।
उत्तर
दोहा

प्रश्न (ग)
नील सरोरुह स्याम, तरुन अरुन बारिज नयन ।
करउ सो मम उर धाम, सदा छीर सागर सयन ||
उत्तर
सोरठा

प्रश्न (घ)
राम नाम मनि दीप धरि, जीह देहरी द्वार ।।
तुलसी भीतर बाहिरौ, जो चाहसि उजियार ||
उत्तर
दोहा

प्रश्न (ङ)
मंगल सगुन होहिं सब काहू। फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू ।।
भरतहिं सहित समाज उछाहू। मिलिहहिं रामु मिटहि दुख दाहू ।।
उत्तर
चौपाई

प्रश्न (च)
निरखि सिद्ध साधक अनुरागे। सहज सनेहु सराहन लागे ।।
होत न भूतल भाउ भरत को। अचर सचर चर अचर करत को ।।
उत्तर
चौपाई

प्रश्न (छ)
राम सैल सोभा निरखि, भरत हुदन अति प्रेम ।।
तापस तप फलु पाइ जिमि, सुखी सिखों नेम् ।।
उत्तर
दोहा

प्रश्न (ज)
सकल मलिन मन दीन दुखारी ।।
देखीं सानु आन अनुसारी ।।
उत्तर
चौपाई

प्रश्न (झ)
समुझि मातु करजब सकुचाही। करत कुतरक कोटि मन माही ।।
रामु लखनु सिय सुनि मन जाऊँ। उठि जनि अनत जाहिं ताजि ठाऊँ ।।
उत्तर
चौपाई

प्रश्न (ञ)
मंगल भवन अमंगलहारी। उमा सहित जेहिं जपत पुरारी ।।
उत्तर
चौपाई

[ संकेत-छन्दों की परिभाषा (लक्षण) के लिए ‘छन्द’ प्रकरण के अन्तर्गत सम्बन्धित छन्द का अध्ययन करें।]

प्रश्न 2
निम्नलिखित में कौन-सा छन्द है ? मात्राओं की गणना करके अपने कथन की पुष्टि कीजिए–
(i) नील सरोरुह स्याम, तरुन अरुन वारिज नयन |
करहु सो मम उर धाम, सदा छीर सागर सयन ।।
(ii) ज न होत जग जनम भरत को। सकल धरम धुर धरनि धरत को ।
(iii) मो सम दीन न दीन हित, तुम समान रघुवीर ।
अस बिचारि रघुबंस मनि, हरहु बिषम भवभीर ।।
(iv) यह वर माँगउ कृपा निकेता | बस हृदय श्री अनुज समेता ।।
(v) मंत्री गुरु अरु बैद जो, प्रिय बोलहिं भय आस ।।
राज, धरम, तन तीनि कर, होई बेगिही नास ||
(vi) कौ कुबत जग कुटिलता, तर्जी न दीन दयाल ।।
दुःखी होहुगे सरल हिय, बसत त्रिभंगीलाल ।।
(vii) श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि ।
बरनउ रघुवर, विमल जस, जो दायक फल चारि ।।
(viii) सुनि केवट के बैन, प्रेम लपेटे अटपटे ।
बिहँसे करुणा ऐन, चितै जानकी लखन तन ।।
(ix) रकत ढुरा आँसू गरा, हाइ भएउ सब संख।
धनि सारस होइ गरि मुई, पीउ समेटहि पंख ।।
(x) बतरस-लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय ।
सह करै भौहनि हँस, दैन कहें नटि जाय ।।
उत्तर
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प्रश्न 3
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए—
(क) सोरठा, दोहा और चौपाई छन्दों में से किसी एक का उदाहरण लिखकर उसका लक्षण
बत
(ख) दोहा और सोरठा का अन्तर स्पष्ट करते हुए सोरठा का उदाहरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
1. चौपाई [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 18]
लक्षण (परिभाषा)-चौपाई एक सम-मात्रिक छन्द है। इसमें चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। अन्त में जगण (I δ I) और तगण (δ δ I) के प्रयोग का निषेध है; अर्थात् चरण के अन्त में गुरु लघु (δ I) नहीं होने चाहिए। दो गुरु (δ δ), दो लघु (I I), लघु-गुरु (I δ) हो सकते हैं।
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2. दोहा [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]

लक्षण (परिभाषा)—यह अर्द्धसम मात्रिक छन्द है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके पहले और तीसरे (विषम) चरणों में 13, 13 मात्राएँ और दूसरे तथा चौथे (सम) चरणों में 11, 11 मात्राएँ होती हैं। अन्त के वर्ण गुरु और लघु होते हैं; यथा–
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3. सोरठा [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]

लक्षण (परिभाषा)-यह भी अर्द्धसम मात्रिक छन्द है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके पहले और तीसरे चरण में 11 तथा दूसरे और चौथे चरण में 13 मात्राएँ होती हैं। यह दोहे का उल्टा होता है; यथा—
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UP Board Solutions for Class 12 Geography Practical Work Chapter 3 Topographical Sheets

UP Board Solutions for Class 12 Geography Practical Work Chapter 3 Topographical Sheets (धरातलीय भू-पत्रक) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Practical Work Chapter 3 Topographical Sheets (धरातलीय भू-पत्रक).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography (Practical Work)
Chapter Chapter 3
Chapter Name Topographical Sheets (धरातलीय भू-पत्रक)
Number of Questions Solved 16
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Practical Work Chapter 3 Topographical Sheets (धरातलीय भू-पत्रक)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
धरातलीय भू-पत्रक से क्या अभिप्राय है? भारतीय भू-पत्रकों में संख्यांकन किस प्रकार किया जाता है तथा इनमें कौन-कौन से विवरण दिये रहते हैं?
उत्तर

धरातलीय भू-पत्रक
Topographical Sheets

धरातलीय भू-पत्रक किसी क्षेत्र विशेष के धरातलीय स्वरूपों का विस्तृत रूप से प्रदर्शन करते हैं। इन्हें स्थलाकृतिक मानचित्र (Topographical maps) भी कहते हैं। टोपोग्राफी (Topography) ग्रीक भाषा का शब्द है जो टोपो (Topo) तथा ग्राफीन (Graphein) दो शब्दों के संयोग से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ किसी स्थान-विशेष का पूर्ण विवरण देना है। अतः धरातलीय पत्रक विस्तृत मापकों पर बनाये गये वे मानचित्र हैं जो कि विधिपूर्वक भू-मापन के पश्चात् बनाये जाते हैं तथा प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक भू-आकृतियों का विस्तृत प्रदर्शन करते हैं। इन मानचित्रों में विभिन्न विवरण परम्परागत अथवा रूढ़ चिह्नों (Conventional signs) की सहायता से प्रकट किये जाते हैं।

धरातलीय पत्रकों के अध्ययन से किसी भी क्षेत्र में मानवीय तथा प्राकृतिक पर्यावरण के सम्बन्धों का ज्ञान भली-भाँति हो जाता है। यदि भू-पत्रक में परिवहन मार्गों का जाल बिछा हुआ है, जनसंख्या के भी संकेन्द्रण हैं, पक्के आवासों की अधिकता है तथा विभिन्न उद्योगों के लक्षण भी स्पष्ट दिखलाई पड़ते हैं, तो इससे निष्कर्ष निकलता है कि वहाँ औद्योगिक अर्थव्यवस्था होगी। इसके विपरीत जिन भू–पत्रकों में पगडण्डियाँ, खेत, झोंपड़ियाँ, कच्ची मिट्टी से निर्मित आवास आदि का बाहुल्य होता है, तो वह ग्रामीण अर्थव्यवस्था अथवा कृषि अर्थव्यवस्था को प्रकट करते हैं। भू-पत्रकों के अध्ययन से मानव एवं पर्यावरण के सम्बन्ध स्पष्ट हो जाते हैं तथा उनका विश्लेषण करना भी सुगम हो जाता है।

भारतीय भू-पत्रकों में संख्यांकन
Numbering in Indian Topographical Maps

भारतीय भू-पत्रकों का प्रकाशन भारतीय सर्वेक्षण विभाग (सर्वे ऑफ इण्डिया) द्वारा किया जाता है। इस विभाग की स्थापना सन् 1767 में की गयी थी। इसके प्रथम डायरेक्टर जनरल मेजर जेम्स रैनेल थे। आजकल भारतीय सर्वेक्षण विभाग एशिया महाद्वीप का सबसे बड़ा सर्वेक्षण विभाग है। इसका प्रमुख कार्यालय हाथी बड़कला, देहरादून (उत्तराखण्ड) में स्थित है। इस विभाग के द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय भू-पत्रक माला के अनुसार भारत एवं समीपवर्ती देशों के लिए कुल 136 भू-पत्रकों का प्रकाशन किया गया है। इन भू-पत्रकों का सूचकांक 1 से 136 तक किया गया है जो भारत तथा उसके समीपवर्ती देशों को घेरते हैं। म्यांमार देश को छोड़कर इन भू-पत्रकों की संख्या 92 रह जाती है। ये संख्याएँ पत्रकों की सूची संख्या (Index number) कहलाती हैं। प्रत्येक भू-पत्रक का मापक 1: 10,00,000 है। एक भू-पत्रक का विस्तार 4° अक्षांश तथा 4°देशान्तरों में है।
UP Board Solutions for Class 12 Geography Practical Work Chapter 3 Topographical Sheets 1
प्रत्येक भू-पत्रक को 16 वर्गों में विभाजित किया गया है जिन्हें अंग्रेजी भाषा के A से P अक्षरों तक प्रकट किया जाता है। प्रत्येक भाग 1° अक्षांश तथा 1° देशान्तर को प्रकट करता है। अतः इन्हें 1 अंश भू-पत्रक भी कहा जाता है। इनका मापक 1 इंच बरोबर 4 मील होता है। पुन: प्रत्येक अंश पत्रक को 16 उपविभागों में बाँटते हैं तथा प्रत्येक भाग का संख्यांकन 1 से 16 तक होता है। इस प्रकार प्रत्येक अंश चित्र 15 मिनट अक्षांश एवं 15 मिनट देशान्तर को प्रकट करता है। इनका मापक एक इंच बराबर एक मील होता है जिस कारण इन्हें एक इंच भू-पत्रक भी कहा जाता है। उदाहरण के लिए,63 (K/12) का अभिप्राय 63वाँ पत्रक है। फिर उसका K अंश लेते हैं तथा पुन: Kअंश का 12वाँ भाग लेते हैं। यही मिर्जापुर भू-पत्रक कहलाता है। इससे स्पष्ट होता है कि मिर्जापुर भू-पत्रक 63 (K/12) का निर्धारण किस प्रकार किया गया है। (चित्र संख्या 3.2 एवं 3.3)। इस प्रकार प्रत्येक भू-पत्रक को उसमें स्थित बड़े नगर से सम्बोधित किया जाता है।
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भू-पत्रकों में प्रस्तुत किये जाने वाला विवरण
Representing of Description Topographical Sheets

भू-पत्रकों का अध्ययन करने से पूर्व निम्नलिखित बातें ध्यान में रखी जानी चाहिए –

  1. धरातलीय बनावट सम्बन्धी तत्त्वों का ज्ञान।
  2. सांस्कृतिक स्थलाकृतियों की स्थिति तथा उनका वितरण।
  3. भौतिक एवं सांस्कृतिक पर्यावरण के तथ्यों का पारस्परिक सम्बन्ध।

अतः भू-पत्रक मानचित्रों में निम्नलिखित तथ्यों का विवरण अंकित रहता है –
(1) प्रारम्भिक सूचनाएँ एवं पत्रक का परिचय – भू-पत्रक का परिचय निम्नलिखित उपशीर्षकों के अन्तर्गत दिया जाता है –

  • राज्य का नाम तथा पत्रक में प्रदर्शित किये गये क्षेत्र का विस्तार अर्थात् अक्षांशीय एवं देशान्तरीय विस्तार तथा जनपदों के नाम।
  • सर्वेक्षण का वर्ष तथा प्रकाशन तिथि।
  • पत्रक संख्या।
  • उत्तर दिशा निर्धारण के लिए चुम्बकीय दिक्मान की भिन्नता।
  • पत्रक का मापक।
  • पत्रक का विस्तार एवं क्षेत्रफल।

(2) धरातल अथवा उच्चावच एवं जल-प्रवाह प्रणाली – इसके अन्तर्गत धरातल की विभिन्न विशेषताओं एवं उनके प्रकारों का अध्ययन किया जाता है। समोच्च रेखा अन्तराल, ढाल के प्रकार, विशिष्ट ऊँचाई के स्थान, जल-प्रवाह प्रणाली के प्रकार, नदियों के मार्ग तथा उनकी विशेषताएँ तथा अन्य जल-स्रोतों का अध्ययन सम्मिलित है।

(3) प्राकृतिक वनस्पति – भू-पत्रक में प्राकृतिक वनस्पति को हरे रंग से एवं सांस्कृतिक वनस्पति को पीले रंग से प्रदर्शित किया जाता है। प्राकृतिक वनस्पति में उसके प्रकार एवं क्षेत्र निर्धारित किये जाते हैं। कृषि के अन्तर्गत कृषि-योग्य भूमि, फसलों की विविधता का अध्ययन करते हैं। प्राकृतिक वनस्पति एवं जलवायु घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित होते हैं। अतः वनस्पति का अध्ययन करने से पूर्व जलवायु को भी भली-भाँति समझ लेना चाहिए।

(4) सिंचाई के साधन – विभिन्न जल-स्रोतों को भू-पत्रकों में परम्परागत चिह्नों की सहायता से प्रदर्शित किया जाता है। इनकी सहायता से सिंचाई साधनों का ज्ञान हो जाता है। यदि स्थान-विशेष पर जल-स्रोत उपलब्ध नहीं हैं तो पत्रक का अध्ययन कर ज्ञात कर लिया जाता है कि यहाँ पर्याप्त वर्षा होती है या सिंचाई साधनों का विस्तार नहीं किया जा सका है अथवा कृत्रिम साधनों से सिंचाई की जाती हैं।

(5) आवागमन के साधन – भू-पत्रकों द्वारा उस प्रदेश के आवागमन के साधनों के विषय में विस्तृत जानकारी उपलब्ध हो सकती है, क्योंकि इन्हें पत्रकों में परम्परागत चिह्नों द्वारा प्रकट किया जाता है। आवागमन के साधनों में सड़क, रेलमार्ग, पगडण्डियाँ, जलमार्ग आदि मुख्य हैं।

(6) प्रमुख उद्योग-धन्धे – यद्यपि भू-पत्रकों से उद्योग सम्बन्धी कोई प्रत्यक्ष जानकारी उपलब्ध नहीं होती है, परन्तु अन्य तथ्यों के अध्ययन से इनकी विस्तृत जानकारी उपलब्ध हो सकती है। यदि भू-पत्रक कृषि क्षेत्र को प्रकट करता है, तो वहाँ पर कृषि उपजों पर आधारित उद्योग-धन्धे विकसित मिलेंगे। इसी प्रकार पशुचारण, खनिज पदार्थ, वन्य उपजों आदि के अध्ययन से विभिन्न उद्योगों के विषय में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

(7) बसाव एवं जनसंख्या – बसाव एवं जनसंख्या का वर्णन बस्तियों के आकार, प्रकार, नगरों की स्थिति, जनसंख्या ग्रामीण है अथवा नगरीय, जनसंख्या की सघनता आदि का अध्ययन कर किया जा सकता है। ग्रामीण एवं नगरीय बस्तियों के वितरण द्वारा जनसंख्या की सघनता के विषय में अनुमान लगाया जा सकता है।

(8) सभ्यता एवं संस्कृति – भू-पत्रक मानचित्रों में परम्परागत चिह्नों द्वारा; जैसे–मन्दिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा, पैगोड़ा, अस्पताल, स्कूल, रेलवे स्टेशन, निरीक्षण भवन, धर्मशालाएँ आदि प्रकट की जाती हैं। इन चिह्नों का अध्ययन कर उस क्षेत्र-विशेष की सभ्यता एवं संस्कृति का सहज ही ज्ञान प्राप्त कर लिया जाता है। इन पत्रकों में कुछ ऐतिहासिक महत्त्व के चिह्न; जैसे—किला, युद्धस्थल, राजधानी आदि भी अंकित रहते हैं जिससे उस क्षेत्र की ऐतिहासिकता की जानकारी प्राप्त हो जाती है।

उपर्युक्त सभी तथ्यों के सामूहिक अध्ययन से उस क्षेत्र के आर्थिक विकास के विषय में जानकारी प्राप्त हो जाती है। इस प्रदेश के भावी आर्थिक विकास के लिए कुछ सुझाव भी दिये जा सकते हैं कि वहाँ किन तथ्यों में प्रगति की जाए तथा जिन साधनों की कमी है, उनमें वृद्धि की जाए। इस प्रकार भू-पत्रक मानचित्र किसी देश अथवा प्रदेश के अध्ययन के लिए अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

प्रश्न 2
परम्परागत या रूढ़ चिह्न किन्हें कहते हैं? भू-पत्रकों में किन-किन रंगों का प्रयोग किया जाता है? इन चिह्नों द्वारा कौन-कौन से विवरण प्रदर्शित किये जाते हैं?
उत्तर

परम्परागत या रूढ़ चिह
Conventional Signs

भू-पत्रकों में विभिन्न प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक लक्षणों को दर्शाने के लिए सांकेतिक अथवा परम्परागत या रूढ़ चिह्नों का प्रयोग किया जाता है। इन चिह्नों को प्रत्येक देश के सर्वेक्षण विभाग द्वारा निर्धारित एवं प्रमाणित किया जाता है। इन्हें Conventional Signs भी कहा जाता है। इन चिह्नों की सूची भू-पत्रक के नीचे सांकेतिक सन्दर्भ में दी होती है। अत: ऐसे चिह्न जिनका प्रयोग भू-पत्रकों में विभिन्न स्थलाकृतिक विवरण दिखलाने में किया जाता है, परम्परागत या रूढ़ चिह्न कहलाते हैं। इन चिह्नों के भू-पत्रकों में प्रयोग से उनका अध्ययन सरल तथा सुगम हो जाता है। इनके द्वारा मानचित्रों में अधिकाधिक विवरण प्रदर्शित किये जा सकते हैं। इन चिह्नों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है –

  • भौतिक स्थलाकृतियों को प्रदर्शित करने वाले चिह्न तथा
  • सांस्कृतिक स्थलाकृतियों को प्रदर्शित करने वाले चिह्न।

कुछ प्रमुख परम्परागत रूढ चिह्न
Some Famous Conventional Signs

भू-पत्रक मानचित्रों में परम्परागत अथवा रूढ़ चिह्नों का प्रदर्शन अग्रलिखित है –
(1) मन्दिर, (2) गिरजाघर (चर्च), (3) मस्जिद, (4) छतरी, (5) गुरुद्वारा, (6) ईदगाह, (7) पैगोडा, (8) सर्वेक्षित ग्राम, (9) किला, (10) सर्वेक्षित किला, (11) युद्धस्थल, (12) कब्रिस्तान, (13) तेल का कुआँ, (14) पक्का कुआँ, (15) निशानेबाजी का क्षेत्र, (16) हवाई अड्डा, (17) सर्वेक्षित हवाई पट्टी, (18) कच्चा कुआँ, (19) झरना, (20) पाइप लाइन, (21) पक्का तालाब, (22) अत्यधिक गहरा तालाब, (23) दलदल, (24) नदी का प्रवाह मार्ग, (25) सदावाहिनी नदी, (26) पक्का बाँध, (27) कच्चा बाँध, (28) बड़ी दोहरी रेलवे लाइन, (29) बड़ी इकहरी रेलवे लाइन, (30) छोटी दोहरी रेलवे लाइन, (31) छोटी इकहरी रेलवे लाइन, (32) पावर लाइन, (33) बैलगाड़ी को मार्ग, (34) पगडण्डी, (35) रज्जू मार्ग (रोप वे), (36) नदी के तल में सड़क, (37) नदी के ऊपर सड़क का पुल, (38) बाग, (39) घास, (40) खजूर के पेड़, (41) बाँस, (42) समोच्च रेखाएँ, (43) खण्ड रेखाएँ, (44) अनुमानित ऊँचाई
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का त्रिकोणमिति स्टेशन, (45) ऊँचाई सहित बैंच मार्क, (46) सर्किट हाउस, (47) डाक बंगला, (48) रेस्ट हाउस, (49) पुलिस स्टेशन, (50) पोस्ट ऑफिस, (51) तारघर, (52) सुरक्षित वन, (53) निरीक्षण बँगला (नहर), (54) शासकीय बस्ती, (55) आदिवासी बस्ती, (56) कच्ची सड़क, (57) घण्टाघर, (58) रेलवे लाइन के ऊपर सड़क, (59) सड़क के ऊपर रेल पथ, (60) सड़क पर पुल, (61) प्रान्तीय सीमा रेखा, (62) अन्तर्राष्ट्रीय सीमा रेखा, (63) जनपद सीमा रेखा, (64) तहसील सीमा रेखा, (65) प्रकाश-गृह।

भू-पत्रकों में प्रयोग होने वाले रंग
Colours Used in Topographical Sheets

भारतीय सर्वेक्षण विभाग ने भू-पत्रकों में परम्परागत चिह्नों के साथ-साथ विभिन्न प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक लक्षणों के प्रदर्शन हेतु कुछ रंगों को निर्देशित किया है, जिनको प्रयोग निम्नलिखित है –

  1. नीला रंग-सागर, महासागर, नदी, तालाब, झील आदि भू-आकृतियों के प्रदर्शन के लिए।
  2. लाल रंग-सड़कों, पगडण्डियों, मकानों, इमारतों आदि के प्रदर्शन के लिए।
  3. पीला रंग-कृषि प्रदेशों के प्रदर्शन के लिए।
  4. काला रंग-रेलवे लाइन, सीमा एवं नामांकन के लिए।
  5. हरा रंग-पेड़-पौधों, वनस्पति, जंगल, बाग आदि के प्रदर्शन के लिए।
  6. कत्थई रंग–समोच्च रेखाओं के प्रदर्शन के लिए।
  7. भूरा रंग–पर्वतीय छायाकरण दिखाने के लिए।

प्रश्न 3
1″ = 1 मील पर बने किसी भू-पत्रक (Topo-sheet) का निम्नलिखित शीर्षकों में वर्णन कीजिए जिसका आपने अध्ययन किया हो –
(अ) उच्चावच
(ब) जल-प्रवाह प्रणाली
(स) मानव बस्तियाँ
(द) यातायात के साधन।
उत्तर

भू-पत्रक संख्या 53[latex]\frac { J }{ 3 } [/latex] अथवा देहरादून भू-पत्रक
53[latex]\frac { J }{ 3 } [/latex]Topographical Sheet or Dehradun Topographical Sheet

सामान्य परिचय – भू – पत्रक संख्या 53[latex]\frac { J }{ 3 } [/latex] उत्तराखण्ड राज्य के जनपद देहरादून एवं टिहरी गढ़वाल को प्रदर्शित करता है। इस भू-पत्रक का मापक 1 इंच =1 मील अथवा इसकी प्रदर्शक भिन्न 1/63,360 है। इस भू-पत्रक का विस्तार 30° 15 उत्तरी अक्षांश से 30°30 उत्तरी अक्षांश तथा 78° पूर्वी देशान्तर से 78° 15 पूर्वी देशान्तर के मध्य है। यह भू-पत्रक सन् 1913-14 एवं पुनः 1937-38 में प्रकाशित किया गया है। इस भू-पत्रक का चुम्बकीय अन्तराल [latex]\frac { { 1 }^{ \circ } }{ 2 } [/latex] पूरब सन् 1938 है। इस भू-पत्रक के उत्तर में भू-पत्रक संख्या 53[latex]\frac { J }{ 2 } [/latex], दक्षिण में 53[latex]\frac { J }{ 4 } [/latex], पूर्व में 53[latex]\frac { J }{ 7 } [/latex] तथा पश्चिम में 53[latex]\frac { F }{ 15 } [/latex] है।

(अ) उच्चावच – इस भू-पत्रक का उत्तरी-पूर्वी भाग टिहरी गढ़वाल जिले में तथा शेष देहरादून जिले में सम्मिलित है। सम्पूर्ण भू-पत्रक एक पहाड़ी प्रदेश है। इस प्रदेश के उत्तर भाग में लघु या हिमाचल हिमालय श्रेणी उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व दिशा में विस्तृत है। इसके दक्षिण-पश्चिम में शिवालिके श्रेणियों का विस्तार है। इस प्रदेश में समोच्च रेखाएँ बड़ी विषम हैं जिनके अध्ययन से पता चलता है कि यह प्रदेश पर्वत-शिखरों से भरा पड़ा है। इन श्रेणियों की औसत ऊँचाई 2,250 मीटर है। लघु हिमालय श्रेणी में अनेक ऊँची चोटियाँ हैं जिनमें तोपटिब्बा सर्वोच्च पर्वत-शिखर है जिसकी ऊँचाई 2,613 मीटर है।

अन्य उच्च शिखरों में बेरॉसखण्ड-2,598 मीटर तथा उटियानों-2,519 मीटर ऊँची है। लघु हिमालय एवं शिवालिक श्रेणियों के मध्य दून घाटी विस्तृत है जो 35 किमी लम्बी तथा 25 किमी चौड़ी है। इस घाटी के सहारे शिवालिक श्रेणियों की तलहटी में देहरादून नगर स्थित है। इस देश में अनेक छोटी-बड़ी नदियों का जाल बिछा हुआ है। उत्तरी-पूर्वी भाग में टिहरी गढ़वाल जिले का क्षेत्र बड़ा ही दुर्गम है जिसमें अनेक ऊँची श्रेणियाँ तथा गहरी तंग घाटियाँ स्थित हैं। पत्रक के उत्तरी-पश्चिमी भाग में पर्वतों की रानी अर्थात् मसूरी नगर स्थित है।

(ब) जल-प्रवाह प्रणाली – इस भू-पत्रक के धरातल पर अनेक नदियों का जाल बिछा है। उत्तरी भाग़ की जल-प्रवाह प्रणाली बड़ी ही जटिल एवं विषम है। टिहरी गढ़वाल जिले की जल-प्रवाह प्रणाली और भी अधिक जटिल है। उच्च शिखरों के ढालों पर प्रवाहित होती हुई असंख्य छोटी-छोटी धाराएँ तीव्र अपवाह प्रणाली का निर्माण करती हैं। ये नदियाँ अपनी घाटियों का अपरदन कर उन्हें गहरी एवं तंग बनाकर बड़ी-बड़ी कन्दराओं का निर्माण करने में लगी हैं। जैसे ही इन नदियों का अपवाह मार्ग दून घाटी में पहुँचता है, इनकी घाटियाँ चौड़ी हो जाती हैं। यहाँ पर प्राकृतिक जलाशयों का अभाव पाया जाता है। देहरादून से 8-10 किमी की दूरी पर सहस्रधारा एक प्राकृतिक प्रपात है, जहाँ अनेक छोटी-बड़ी धाराएँ आकर मिलती हैं। इसके निकट ही गन्धक का जल-स्रोत है। इस पत्रक के सुदूर पश्चिम में मसूरी के निकट प्रसिद्ध कैम्पटी प्रपात स्थित है। इस प्रदेश में निम्नलिखित तीन नदियाँ महत्त्वपूर्ण हैं –
देहरादून पत्रक
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(1) सोंग नदी – इस भू-पत्रक के उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र में टिहरी गढ़वाल तथा देहरादून जनपदों की सीमा के सहारे-सहारे सोंग नदी सबसे बड़ी तथा चौड़ी है। बादल इसकी प्रमुख सहायक नदी है। सोंग-बादल के मिलन स्थल से लगभग 1.5 किमी की दूरी पर इससे बल्दी नदी मिलती है। इसके बाद यह नदी दक्षिण की ओर अपने प्रवाह मार्ग का निर्माण करती है।
(2) टोंस नदी – यह नदी मसूरी के समीप से निकलकर दक्षिण की ओर देहरादून नगर के मध्य से प्रवाहित होती है। ब्राह्मी, नलौता, भीतरली एवं कुआरकुली इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं। यहाँ से यह पश्चिम की ओर प्रवाहित हो जाती है।
(3) अगलर नदी – यह इस प्रदेश की तीसरी प्रमुख नदी है। इसका प्रवाह प्रदेश टिहरी गढ़वाल जंनपद में है। यह पूरब से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है। पश्चिम की ओर नून इसकी प्रमुख सहायक नदी है। यह क्लाउड एण्ड शिखर से निकलकर दक्षिण की ओर प्रवाहित होती हुई देहरादून के पश्चिम से। होकर आगे निकल जाती है।

(स) मानव बस्तियाँ – पत्रक का अधिकांश भाग पहाड़ी होने के कारण इसे एक पिछड़ा क्षेत्र कहा जा सकता है। उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में बहुत ही कम बस्तियाँ विकसित हुई हैं। केवल पहाड़ी ढलानों पर छोटे-छोटे गाँव देखे जा सकते हैं। इन क्षेत्रों में छोटे-छोटे सीढ़ीदार खेत बनाकर कृषि की जाती है। दून घाटी का आर्थिक विकास सबसे अधिक हुआ है। यहाँ पर बस्तियों एवं जनसंख्या के संकेन्द्रण। विकसित हुए हैं। देहरादून इस भू-पत्रक का सबसे बड़ा एवं महत्त्वपूर्ण नगर है। इस नगर में पक्के मकान, सड़कें तथा उद्योग-धन्धे विकसित हुए हैं। देहरादून नगर के समीपवर्ती भागों में अनेक कस्बे एवं केन्द्रीय ग्राम विकसित हैं जिनमें रामगढ़, राजपुर, शमशेरगढ़, कालागढ़ तथा भाजना प्रमुख हैं। मसूरी दूसरा बड़ा नगर है। टिहरी नगर का भी विकास किया जा रहा है।

(द) यातायात के साधन – दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र, ढालू, घाटियाँ, असमतल एवं ऊबड़-खाबड़ धरातल होने के कारण इस भू-पत्रक के धरातल पर यातायात साधनों की कमी है तथा उनका विकास भी कम ही हो पाया है। भू-पत्रक के उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र में रेल तथा सड़क मार्ग, दोनों का ही अभाव है। इस क्षेत्र में पगडण्डियों के मार्ग अधिक विकसित हुए हैं जिनसे होकर दुर्गम एवं बीहड़ पहाड़ी क्षेत्रों को पार किया जाता है। भू-पत्रक के दक्षिणी-पश्चिमी भाग में सड़क तथा रेलमार्गों का विकास हुआ है। प्रमुख यातायात मार्गों का विवरण निम्नलिखित है –

(1) रेलमार्ग – यहाँ केवल एक रेलमार्ग है जो उत्तरी रेलवे द्वारा संचालित किया जाता है। यह रेलमार्ग देहरादून को ऋषिकेश, हरिद्वार, लक्सर, सहारनपुर होता हुआ दिल्ली से जोड़ता है। लक्सर जंक्शन की सहायता से देहरादून सीधे कोलकाता से जुड़ा हुआ है। देहरादून इस रेलमार्ग का अन्तिम स्टेशन है।
(2) सड़क मार्ग – देहरादून पक्की सड़कों द्वारा प्रदेश के अन्य नगरों से जुड़ा हुआ है। देहरादून को तथा सहारनपुर, चकरौता, विकास नगर, ऋषिकेश, मसूरी आदि नगरों को पक्की सड़कों द्वारा जोड़ा गया है। इस भू-पत्रक में तीन कच्ची सड़कें भी हैं, जो निम्नलिखित हैं–

  • रायपुर से थानों हतनाल
  • हर्रावाला से मियाँवाला
  • अनारवाला से सतन गाँव।

मौखिक परिक्षा : सम्भावित प्रश्न

प्रश्न 1
धरातलीय भू-पत्रक से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
ऐसे मानचित्र जिनमें प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक स्थलाकृतियों का चित्रण सांकेतिक चिह्नों की सहायता से दीर्घमापक पर किया जाता है, धरातलीय भू-पत्रक कहलाते हैं।

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प्रश्न 2
धरातलीय भू-पत्रकों का प्रकाशन किस विभाग द्वारा किया जाता है?
उत्तर
धरातलीय भू-पत्रक मानचित्रों का प्रकाशन भारतीय सर्वेक्षण विभाग, देहरादून द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 3
भारतीय सर्वेक्षण विभाग का प्रधान कार्यालय कहाँ पर स्थित है?
उत्तर
भारतीय सर्वेक्षण विभाग का मुख्यालय हाथी-बडकला, देहरादून, उत्तराखण्ड राज्य में स्थित है।

प्रश्न 4
भारतीय भू-पत्रक किस मापक पर बने हैं?
उत्तर
भारतीय भू-पत्रक 1 इंच = एक मील के मापक अर्थात् प्र० भि० 1/63, 360 पर निर्मित किये गये हैं।

प्रश्न 5
धरातलीय भू-पत्रकों का विस्तार बताइए।
उत्तर
प्रत्येक धरातलीय भू-पत्रक 4° अक्षांश तथा 4° देशान्तरों को प्रकट करता है।

प्रश्न 6
भारतीय भू-पत्रकों की संख्या कितनी है?
उत्तर
भारतीय भू-पत्रकों की संख्या 136 है। म्यांमार को छोड़कर 92 भू-पत्रक भारत के ऊपर से गुजरते हैं।

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प्रश्न 7
इन भू-पत्रकों का मापक क्या है?
उत्तर
इन भू-पत्रकों का मापक 1 : 10,00,000 है।

प्रश्न 8
भारत एवं उसके समीपवर्ती देशों की श्रृंखला के मानचित्र किस मापक पर तैयार किये गये हैं।
उत्तर
इन मानचित्रों का प्रथम संस्करण 1 : 20 लाख मापक पर तथा द्वितीय संस्करण 1: 10 लाख मापक पर निर्मित किये गये हैं।

प्रश्न 9
भारत एवं उसके समीपवर्ती देशों की मानचित्र माला में कौन-कौन से देश सम्मिलित हैं।
उत्तर
इनमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान, भारत, बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमार, भूटान एवं श्रीलंका आदि देश सम्मिलित हैं।

प्रश्न 10
परम्परागत चिह्नों (Conventional Signs) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
भू-पत्रक मानचित्रों में प्रदर्शित संकेत चिह्नों को परम्परागत चिह्न कहते हैं।

प्रश्न 11
भू-पत्रक मानचित्रों की क्या उपयोगिता है?
उत्तर
भू-पत्रक मानचित्रों की निम्नलिखित उपयोगिता है –

  1. सैनिक संचालन एवं युद्ध मोर्चे की तैयारी में ये भू-पत्रक उपयोगी होते हैं।
  2. किसी क्षेत्र-विशेष के प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक लक्षणों की सूक्ष्म जानकारी उपलब्ध होती है।
  3. क्षेत्र विशेष की भावी आर्थिक विकास योजनाओं को क्रियान्वित करने में सहायक होते हैं।

प्रश्न 12
भू-पत्रक मानचित्रों में लाल रंग का प्रयोग किसका प्रदर्शन करता है?
उत्तर
भू-पत्रक मानचित्रों में लाल रंग का प्रयोग सड़कों, पगडण्डियों तथा मानवीय बस्तियों के प्रदर्शन के लिए किया जाता है।

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प्रश्न 13
भू-पत्रक मानचित्रों में काले रंग का क्या उपयोग है?
उत्तर
भू-पत्रक मानचित्रों में काला रंग रेलवे लाइन, सीमांकन तथा नामांकन के लिए प्रयुक्त किया जाता है।

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UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 2 Theories of the Functions of the State

UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 2 Theories of the Functions of the State (राज्य के कार्यों के सिद्धान्त) are part of UP Board Solutions for Class 12 Civics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 2 Theories of the Functions of the State (राज्य के कार्यों के सिद्धान्त).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Civics
Chapter Chapter 2
Chapter Name Theories of the Functions of the State (राज्य के कार्यों के सिद्धान्त)
Number of Questions Solved 21
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 2 Theories of the Functions of the State (राज्य के कार्यों के सिद्धान्त)

विस्तृत उत्तीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1.
राज्य के आवश्यक एवं ऐच्छिक कार्यों का वर्णन कीजिए। [2014, 16]
उत्तर
राज्य के कार्य
प्रत्येक युग के विचारकों का ध्यान राज्य की प्रकृति तथा उसके कार्यक्षेत्र पर अवश्य गया है। सभी ने अपने समय की परिस्थितियों एवं ज्ञान के आधार पर राज्य के कार्यों का वर्णन किया है। देशकाल की परिस्थितियों के अनुसार राज्य के कार्य परिवर्तित होते रहते हैं। प्रारम्भिक समय में राज्य द्वारा केवल वे ही कार्य किए जाते थे, जिनको करना राज्य के अस्तित्व हेतु नितान्त आवश्यक था। लेकिन वर्तमान काल में राज्य द्वारा किए जाने वाले कार्यों में अत्यधिक वृद्धि हो गई है। उसके कार्यों को एक सीमा में बाँधकर उनकी सूची तैयार करना असम्भव है। फिर भी राज्य द्वारा वर्तमान में जो कार्य किए जाते हैं उन्हें दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-
(अ) राज्य के आवश्यक अथवा अनिवार्य कार्य तथा
(ब) राज्य के ऐच्छिक अथवा सामाजिक कार्य।

(अ) राज्य के आवश्यक अथवा अनिवार्य कार्य
अनिवार्य कार्यों का तात्पर्य ऐसे कार्यों से है जिनका सम्पादन करना प्रत्येक राज्य के लिए नितान्त आवश्यक है। इन कार्यों को रोकने से अथवा इन कार्यों के सम्पादन में असफल होने पर राज्य का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। राज्य के आवश्यक कार्य निम्नलिखित हैं-

1. बाहरी आक्रमणों से देश की सुरक्षा करना – देश की सुरक्षा करना प्रत्येक राज्य का अनिवार्य कार्य है। यदि राज्य इस कार्य को नहीं करे तो उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। इस कार्य के लिए राज्य को जल, नभ तथा स्थल सेना रखनी पड़ती है। इसके साथ-साथ उसको अन्य राज्यों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाने का प्रयास करना पड़ता है, जिससे आपातकाल | में आवश्यकता पड़ने पर उनसे सहायता प्राप्त की जा सके।

2. आन्तरिक शक्ति एवं सुव्यवस्था की स्थापना करना – राज्य का प्रमुख कार्य अपने क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत शान्ति एवं सुव्यवस्था की स्थापना, नागरिकों के जीवन तथा सम्पत्ति की रक्षा, आन्तरिक उपद्रवों का दमन और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की रक्षा करना है। मैकाइवर के शब्दों में राज्य केवल शान्ति एवं व्यवस्था का प्रबन्ध ही नहीं करता है। राज्य का कर्तव्य है कि वह सर्वसाधारण की सुरक्षा एवं उनके व्यक्तित्व के पूर्ण विकास में सहयोग दे।” इसके लिए राज्य को अपराध निश्चित करने तथा दण्ड देने की व्यवस्था करनी पड़ती है।

3. न्याय का समुचित प्रबन्ध करना – देश में शान्ति की स्थापना पुलिस तथा सेना के बल पर ही नहीं हो सकती, बल्कि इसके लिए राज्य को कानून का उल्लंघन करने वालों को उचित दण्ड देने के लिए एक कुशल एवं स्वतन्त्र न्यायपालिका की व्यवस्था भी करनी पड़ती है।

4. अधिकार तथा कर्तव्यों का निर्धारण करना – नागरिक के अधिकार तथा कर्तव्यों की सीमा का निर्धारण करना और उन्हें विभिन्न प्रकार की राजनीतिक सुविधाएँ प्रदान करना भी राज्य का अनिवार्य कार्य है। वर्तमान लोकतन्त्रीय युग में नागरिकों के अधिकार तथा कर्तव्यों का अत्यधिक महत्त्व है।

5. परिवार में कानूनी सम्बन्ध स्थापित करना – राज्य का यह भी कर्तव्य है कि वह कानून का निर्माण कर पारिवारिक जीवन को सुखी तथा सामुदायिक जीवन को सुसंगठित करे। अतः पति-पत्नी, माता-पिता और बच्चों के बीच कानूनी सम्बन्ध स्थापित करना भी उसका अनिवार्य कार्य है। इसके अन्तर्गत सम्पत्ति के क्रय-विक्रय और ऋण के लेन-देन इत्यादि के कानून सम्मिलित हैं।

6. मुद्रा की व्यवस्था करना – राज्य का एक आवश्यक कार्य मुद्रा की व्यवस्था करना है। किसी देश की अर्थव्यवस्था वहाँ की मुद्रा-व्यवस्था पर विशेष रूप से आधारित होती है। मुद्रा के बिना राज्य का कार्य नहीं चल सकता। वर्तमान प्रत्येक देश में धन का अधिकांश लेन-देन बैंकों द्वारा किया जाता है और बैंकों पर सरकार का कठोर नियन्त्रण है।

7. कर संग्रह करना – राज्य के कार्यों को सम्पादित करने के लिए प्रचुर धनराशि की आवश्यकता | होती है। धन के अभाव में राज्य एक क्षण भी नहीं चल सकता है। धन-प्राप्ति के लिए राज्य अनेक प्रकार के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर लगाता है। इस प्रकार कर लगाना और वसूल करना राज्य का एक अनिवार्य कार्य है।

(ब) राज्य के ऐच्छिक अथवा सामाजिक कार्य
राज्य के वे कार्य ऐच्छिक कहलाते हैं जिनको राज्य यदि सम्पादित न भी करे तो राज्य का अस्तित्व समाप्त नहीं होगा, लेकिन व्यक्तियों के नैतिक, सामाजिक, मानसिक एवं आर्थिक कल्याण की वृद्धि हेतु ऐसे कार्य आवश्यक होते हैं। मानव जीवन को सुखी, सुन्दर एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए राज्य निम्नलिखित ऐच्छिक अथवा सामाजिक कार्य करता है-

1. शिक्षा की व्यवस्था – मानवीय व्यक्तित्व के विकास में शिक्षा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसके अभाव में व्यक्ति के व्यक्तित्व का पूर्ण विकास असम्भव है। अतः वर्तमान में शिक्षा का प्रबन्ध करना राज्य का महत्त्वपूर्ण कार्य समझा जाता है। इसी कारण राज्य प्रारम्भिक शिक्षा का संचालन करते हैं। राज्यों द्वारा नि:शुल्क तथा अनिवार्य प्रारम्भिक शिक्षा की व्यवस्था भी की जाती है। नागरिकों की मानसिक चेतना के विकास के लिए राज्य पुस्तकालयों तथा प्रयोगशालाओं इत्यादि की स्थापना करता है।

2. सफाई एवं स्वास्थ्य रक्षा का प्रबन्ध – सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुव्यवस्था, सफाई एवं चिकित्सा इत्यादि का प्रबन्ध राज्य ही करता है। संक्रामक रोग एवं महामारियों को रोकने के लिए राज्य कानून बनाता है तथा नगरों एवं ग्रामों की सफाई का प्रबन्ध करता है। राज्य नागरिकों की चिकित्सा हेतु अस्पतालों की स्थापना करता है जहाँ नि:शुल्क अथवा उचित मूल्य पर चिकित्सा का प्रबन्ध रहता है।

3. सामाजिक सुधार – समाज सुधार हेतु प्रयास करना राज्य का एक नैतिक कर्तव्य है। प्रत्येक देश के सामाजिक जीवन में कुछ ऐसी कुरीतियाँ एवं रूढ़ियाँ प्रचलित रहती हैं जो सामाजिक जीवन के विकास का मार्ग अवरुद्ध करती हैं। उदाहरणार्थ, भारत में कुछ समय पहले बालविवाह, छुआछूत, साम्प्रदायिकता इत्यादि का बोलबाला था लेकिन सरकार ने इन सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने की दिशा में कठोर प्रयास किए हैं। इसके फलस्वरूप बाल-विवाह एवं छुआछूत को समाप्त करने में तो भारत सरकार कुछ सीमा तक सफल रही है लेकिन साम्प्रदायिकता एवं जातीयता का जहर अभी तक समाज में व्याप्त है।

4. बेकारी का उल्मूलन – बेकारी चोरी, लूट तथा अन्य असामाजिक प्रवृत्तियों को जन्म देती है। अत: प्रत्येक राज्य का यह कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों को रोजगार दे। इसके लिए राज्य नए कल-कारखानों एवं उद्योगों की स्थापना करता है।

5. निर्धन, वृद्ध एवं अपाहिजों की सुरक्षा – राज्य में कुछ ऐसे भी व्यक्ति होते हैं जो वृद्ध, रोगी, अपाहिज अथवा असहाय होने के कारण स्वयं अपनी आजीविका नहीं कमा सकते। राज्य का यह कर्तव्य है कि वह ऐसे लोगों की सहायता करे। इसी उद्देश्य को पूरा करने हेतु राज्य निर्धन-गृह, अन्धाश्रम, मानसिक चिकित्सालय, अनाथालय इत्यादि का प्रबन्ध करता है। राज्यों द्वारा वृद्ध तथा असहायों को उनकी जीवन रक्षा हेतु आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है।

6. उद्योग-धन्धों का विकास – देश की आर्थिक स्थिति को मजबूती प्रदान करने के लिए आवश्यक है कि अधिकाधिक उद्योग-धन्धों का विकास हो। इस बारे में राज्य का यह कर्तव्य है कि बड़े उद्योगों का वह स्वयं अधिग्रहण करके तथा छोटे एवं कुटीर उद्योगों को आर्थिक सहायता प्रदान करके प्रोत्साहित करे। इसके लिए राज्य को वित्तीय सहायता, औद्योगिक अन्वेषण केन्द्रों की सहायता तथा वैज्ञानिक शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना चाहिए।

7. कृषि का विकास-कृषि – प्रधान देशों की उन्नति तब तक नहीं हो सकती जब तक कि कृषि का विकास ने हो। अतः राज्य को कृषि की उन्नति की ओर भी ध्यान देना पड़ता है। इसके लिए सिंचाई का प्रबन्ध, श्रेष्ठ बीज, उत्तम खाद, कृषि सम्बन्धी नवीन तकनीक एवं उपकरणों की व्यवस्था तथा आपातकाल में किसानों की आर्थिक सहायता इत्यादि की व्यवस्था राज्य ही करता है।

8. श्रमिकों का कल्याण – श्रमिकों के हितों की रक्षा करना राज्य का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। पूँजीपति वर्ग श्रमिकों का शोषण न कर सके इसके लिए कारखाना कानून तथा श्रम कानूनों द्वारा सरकार पूँजीपतियों पर नियन्त्रण रखती है। काम के अधिकतम घण्टे, न्यूनतम पारिश्रमिक, श्रमिकों की दशा में सुधार तथा प्रबन्धक एवं श्रमिकों के मध्य होने वाले विवादों के निष्पादन हेतु राज्य नियमों की रचना करता है।

9. यातायात एवं संचार – साधनों का विकास – यातायात तथा संचार-साधनों के अभाव में कोई भी देश आर्थिक प्रगति नहीं कर सकता। यही कारण है कि प्रत्येक राज्य रेल, डाक एवं तार, टेलीफोन, रेडियो, दूरदर्शन इत्यादि साधनों का अधिकतम विकास करता है।

10. ललित कला, साहित्य एवं विज्ञान को प्रोत्साहन – राष्ट्र के निर्माण में ललित कला, साहित्य एवं विज्ञान का महत्त्वपूर्ण स्थान है। अतः प्रत्येक राज्य उन्हें प्रोत्साहित करता है।

11. मनोरंजन का प्रबन्ध – यह कहा जाता है कि श्रम के पश्चात् आराम एवं मनोरंजन जीवन को दीर्घायु बनाते हैं। मनोरंजन से जहाँ एक ओर शिथिल अंगों में स्फूर्ति का संचार होता है। वहीं दूसरी ओर शरीर को आवश्यक कार्य करने हेतु ऊर्जा प्राप्त होती है। अतः राज्य नागरिकों के मनोरंजन के लिए समुचित व्यवस्था करता है। वर्तमान में नागरिकों के स्वस्थ मनोरंजन हेतु राज्य पार्क, सार्वजनिक स्थल, सिनेमा, चिड़ियाघर, साहित्य परिषद् एवं खेल के मैदान इत्यादि की व्यवस्था करता है।

12. मादक पदार्थों पर नियन्त्रण – मादक पदार्थों, जैसे—शराब, गाँजा, भाँग, तम्बाकू, सिगरेट इत्यादि पर रोक लगाना भी राज्य का आवश्यक कर्तव्य हैं। जो राज्य इनकी उपेक्षा करते हैं, वहाँ के नागरिकों के स्वास्थ्य एवं चरित्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और राज्य पतन की ओर उन्मुख हो जाता है। अतः राज्य को नागरिकों के कल्याणार्थ मादक पदार्थों की बिक्री पर पूर्ण नियन्त्रण रखना चाहिए।

13. राष्ट्रीय विकास योजनाओं का निर्माण – वर्तमान में राज्य का एक महत्त्वपूर्ण ऐच्छिक कार्य राष्ट्रीय विकास की योजनाओं का निर्माण करके उन्हें क्रियान्वित करना है।

सभ्यता के विकास के साथ-साथ मानव जीवन की जटिलता बढ़ती जा रही है जिसके फलस्वरूप राज्य के कार्यों की सूची लम्बी तथा विशाल होती जा रही है। यहाँ महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि राज्य के ऐच्छिक तथा अनिवार्य कार्यों में अन्तर केवल मात्रा का है, प्रकार का नहीं। जो कार्य किसी राज्य द्वारा आज ऐच्छिक समझे जाते हैं वे ही कल अनिवार्य कार्यों की श्रेणी में भी आ सकते हैं। इस प्रकार राज्य के कार्यों का क्षेत्र दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है।

राज्य के कार्य-क्षेत्र सम्बन्धी सिद्धान्त
राज्य के कार्यों के सम्बन्ध में अनेक सिद्धान्तों को प्रतिपादन हो चुका है। इसका मुख्य कारण यह है कि राज्य के उचित कार्य-क्षेत्र के सम्बन्ध में विद्वानों में एकमत का अभाव है। प्राचीनकाल में व्यक्ति के हित और राज्य के हित को समान समझा जाता था। जॉन लॉक का मत था कि राज्य के कार्य-क्षेत्र की सीमाएँ व्यक्ति के प्राकृतिक और जन्मजात अधिकारों द्वारा निर्धारित होती हैं। इस मत के आधार पर यूरोप में हस्तक्षेप न करने का सिद्धान्त प्रचलित हुआ। हरबर्ट स्पेन्सर ने इस सिद्धान्त के आधार पर ही व्यक्तिवादी विचारधारा का प्रतिपादन किया। यह कहा जाने लगा, “राज्य व्यक्ति के लिए है, न कि व्यक्ति राज्य के लिए।” कालान्तर में आदर्शवाद, अराजकतावाद, समाजवाद आदि विचारधाराएँ विकसित होकर राज्य के कार्य-क्षेत्र का निर्धारण अपने-अपने सिद्धान्तों के अनुकूल करने लगीं। बीसवीं शताब्दी में कल्याणकारी राज्य की भावना का विकास हुआ। इसने राज्य के कार्य-क्षेत्र का व्यापक विस्तार कर दिया।

भारतीय विचारकों ने पाश्चात्य विचारकों से बहुत पहले ही कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को साकार रूप प्रदान किया था। मनु ने प्राचीनकाल में ही राज्य के कार्यों का निर्धारण कर दिया था। कालान्तर में कौटिल्य ने भी राज्य के कार्यों की सीमाओं का निश्चित किया था। लेकिन भारतीय विचारकों को दृष्टिकोण राजतन्त्रात्मक प्रणाली से प्रभावित था, जबकि आज विश्व के अधिकांश राज्यों में लोकतन्त्रात्मक प्रणाली स्थापित है। यही कारण है कि इक्कीसवीं शताब्दी के इस प्रारम्भिक दौर में लोक-कल्याणकारी राज्य की श्रेष्ठता स्थापित हो चुकी है।

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प्रश्न 2.
राज्य के कार्यों के सम्बन्ध में व्यक्तिवादी दृष्टिकोण का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। [2014]
या
राज्य के कार्यों का व्यक्तिवादी सिद्धान्त क्या है? इसकी विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [2007]
या
व्यक्तिवाद से आप क्या समझते हैं ? इसके गुण एवं दोषों की विवेचना कीजिए।
या
“राज्य एक आवश्यक बुराई है।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं? अपने विचारों के पक्ष में तीन तर्क दीजिए। [2007, 09]
या
व्यक्तिवाद की विशेषताएँ बतलाइए तथा समाजवाद से इसका अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2011, 2013]
या
“राज्य एक अनिवार्य बुराई है।” इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
व्यक्तिवादी सिद्धान्त
व्यक्तिवादी सिद्धान्त के समर्थक व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर सर्वाधिक बल देते हैं। उनके अनुसार, राज्य के कार्य तथा कानून व्यक्ति की स्वतन्त्रता को प्रतिबन्धित करते हैं; अतः राज्यों के कार्यों की संख्या न्यूनतम होनी चाहिए। राज्य को व्यक्ति के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
इस सिद्धान्त के समर्थक एडम स्मिथ, जे०एस० मिल, हरबर्ट स्पेन्सर आदि थे। फ्रीमैन के शब्दों में, “सबसे अच्छी सरकार वह है जो सबसे कम शासन करती है।’

एक अन्य लेखक के अनुसार, “राज्य एक अनिवार्य बुराई है।” अर्थात् यह एक ऐसी बुराई है। जिसे व्यक्ति विवश होकर अपनाता है; अतः इसे अधिक कार्य नहीं सौंपे जाने चाहिए।

बेन्थम के शब्दों में, “व्यक्ति के हित को समझे बिना समुदाय के हित की कल्पना करना कोरी बकवास है।”
व्यक्तिवादियों के अनुसार, “राज्य एक अयोग्य संस्था है।”

स्पेन्सर के शब्दों में, “विधानमण्डलों के अँगूठा टेक, अशिक्षित तथा अनुभवहीन सदस्यों ने अतीत में अनेक भयंकर भूलें करके समाज को हानि पहुँचाई है। अतः भविष्य में उन पर कोई विश्वास नहीं किया जाना चाहिए।

व्यक्तिवादी मत के अनुसार राज्य का कार्यक्षेत्र
व्यक्तिवादी चाहते हैं कि राज्य के कार्यक्षेत्र को अधिक-से-अधिक सीमित कर दिया जाये। स्पेन्सर के मतानुसार, “व्यक्ति का स्थान समाज तथा राज्य के ऊपर होना चाहिए और राज्य को केवल वही कार्य करने चाहिए जिन्हें व्यक्ति नहीं कर सकता। उनके अनुसार राज्य के केवल निम्नलिखित तीन कार्य होने चाहिए-

1. आन्तरिक शान्ति और व्यवस्था करना – राज्य की आन्तरिक शान्ति और व्यवस्था अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य है। राज्य में नागरिकों को घूमने-फिरने, सभा करने, मिलने-जुलने, आजीविका प्राप्त करने इत्यादि के अनेक अधिकार होते हैं, परन्तु समाज में अनेक ऐसे व्यक्ति होते हैं जो इन अधिकारों के प्रयोग में बाधा उत्पन्न करते हैं। इससे लोगों का जीवन व सम्पत्ति खतरे में पड़ जाती है। ऐसे असामाजिक तत्वों का दमन कर शान्ति और व्यवस्था बनाये रखना राज्य का प्रधान कर्तव्य है, इसीलिए राज्य पुलिस और सेना की सहायता से समाज में शान्ति और व्यवस्था का प्रबन्ध करता है। राज्य अपराधों, उपद्रव, लूटमार, चोरी-डकैती, विद्रोह आदि को रोकता है।

2. देश की बाहरी आक्रमणों से रक्षा करना – कभी-कभी एक राज्य दूसरे राज्य पर आक्रमण कर उस पर आधिपत्य स्थापित करने का प्रयास करता है। आत्म-रक्षा प्रत्येक राज्य का प्रमुख कार्य होता है। बाहरी आक्रमणों से रक्षा करने की दृष्टि से राज्य शक्तिशाली जल, थल तथा वायु सेना आदि रखता है। इस प्रकार बाह्य आक्रमण से देश की रक्षा करना राज्य का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसके अभाव में उसका अस्तित्व ही समाप्त हो सकता है।

3. न्याय और दण्ड की व्यवस्था करना – समाज में शान्ति और व्यवस्था बनाये रखने के लिए न्याय की उत्तम व्यवस्था का होना भी अनिवार्य है। न्याय की समुचित व्यवस्था से ही दुर्बल और असहाय व्यक्ति के अधिकार सुरक्षित रह पाएँगे और प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करेगा। इसलिए न्याय का प्रबन्ध करना भी राज्य का अनिवार्य कार्य है। न्याय के साथ दण्ड भी सम्बद्ध है। दण्ड का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं होना चाहिए, उसका उद्देश्य अपराधी का सुधार होना चाहिए।

व्यक्तिवाद की विशेषताएँ
व्यक्तिवादी सिद्धान्त की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. यह सिद्धान्त राज्य की सर्वव्यापक शक्ति का विरोध करता है।
  2. यह सिद्धान्त इस बात में विश्वास नहीं करता कि राज्य के अपने निजी व्यक्तित्व और अपने निजी उद्देश्य हैं। व्यक्ति स्वयं साध्य है और राज्य साधन।
  3. व्यक्तिवादी राज्य की निरंकुशता तथा असीमितता में विश्वास नहीं करते।
  4. यह सिद्धान्त ‘लैसिस फेयर’ (Laissez Faire) के नाम से पुकारा जाता है, जिसका अभिप्राय है कि मनुष्य को जो वह चाहे करने दो।
  5. व्यक्तिवादी चाहते हैं कि राज्य को मनुष्य के जीवन से अलग रहना चाहिए।
  6. व्यक्तिवादियों के मतानुसार, राज्य का कार्य मनुष्य की स्वतन्त्रता की रक्षा करना, अपराधी को दण्ड देना और बाहरी शत्रु से देश की रक्षा करना है, अर्थात् राज्य का कार्य मनुष्य की रक्षा करना है न कि उनके व्यक्तित्व के विकास में सहायता करना।
  7. व्यक्तिवादियों के अनुसार, राज्य का अस्तित्व मानव-स्वभाव की निर्बलता का कारण है।
  8. स्वतन्त्रता व्यक्तिवाद की आधारशिला है। यह सिद्धान्त राज्य को व्यक्तियों की स्वतन्त्रता की रक्षा करने के लिए केवल पुलिस संगठन का कार्य देना चाहता है। राज्य को ऐसी कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए जिससे मनुष्य के व्यक्तित्व के स्वतन्त्र विकास में कोई बाधा उत्पन्न हो।
  9. व्यक्तिवादियों के अनुसार, “राज्य एक अभिशाप है, क्योंकि वह व्यक्तिगत स्वतन्त्रता छीनता है तथा एक ऐसी संस्था है जो बुरी होते हुए भी समाज से अराजकता और अव्यवस्था दूर करने के लिए आवश्यक है।

व्यक्तिवाद के पक्ष में तर्क (गुण)
व्यक्तिवादी सिद्धान्त के समर्थन में निम्नलिखित तर्क दिये जा सकते हैं-

1. नैतिक तर्क – व्यक्तिवाद के समर्थन में नैतिक तर्क यह है कि प्रत्येक व्यक्ति का अपना अलग व्यक्तित्व तथा विशेषता होती है। अत: यह आवश्यक है कि राज्य सभी व्यक्तियों को समान न समझे, अपितु प्रत्येक व्यक्ति को उसकी इच्छा के अनुसार अपनी शिक्षा, व्यवसाय तथा मनोरंजन आदि कार्यों को करने की स्वतन्त्रता होनी चाहिए। मिल ने कहा है कि व्यक्तिगत जीवन में राजकीय हस्तक्षेप व्यक्ति के आत्म-विश्वास को नष्ट कर देता है, उसकी उत्तरदायित्व की भावना को कमजोर बनाता है तथा चारित्रिक विकास को अवरुद्ध कर देता

2. आर्थिक तर्क – एडम स्मिथ, माल्थस, मिल, रिकाड आदि अर्थशास्त्री इस विचारधारा के सम्बन्ध में यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि व्यक्ति अपने हानि-लाभ तथा आर्थिक हितों को स्वयं ही भली प्रकार समझता है। अतः राज्य को व्यक्ति के आर्थिक जीवन में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

3. ऐतिहासिक तर्क – व्यक्तिवादी अपने मत के समर्थन में ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। उनका कहना है कि व्यक्ति के आर्थिक तथा सामाजिक जीवन में राज्य का हस्तक्षेप सदैव हानिकारक रहा है। राज्य ने मूल्य पर नियन्त्रण किया तो चोर-बाजारी बढ़ी, उत्पादन अपने हाथ में लिया तो भ्रष्टाचार बढ़ा और धार्मिक जीवन में हस्तक्षेप से क्रान्तियाँ हुईं। अतः राज्य को हस्तक्षेप न करने की नीति का ही पालन करना चाहिए।

4. प्राणिवैज्ञानिक तर्क – स्पेन्सर ने व्यक्तिवाद के समर्थन में नया तर्क प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, यह प्राकृतिक नियम है कि सभी प्राणी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते हैं। उस संघर्ष में योग्य तथा सबल प्राणी ही जीवित रहते हैं तथा शेष नष्ट हो जाते हैं। अयोग्य और निर्बल व्यक्तियों के नष्ट होने से एक उन्नत और शक्तिशाली राज्य का निर्माण सम्भव होता है। स्पेन्सर ने यहाँ तक कहा कि राज्य को निर्धन, अपाहिज व अनाथों की रक्षा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह जैविक नियमों के विरुद्ध है। राज्य को अपनी ऊर्जा योग्य व्यक्तियों के विकास के लिए लगानी चाहिए, क्योंकि वे ही समाज में रन के रूप में होते हैं।”

5. व्यावहारिक तर्क – व्यक्तिवादी विचारधारा के समर्थकों का कहना है कि व्यावहारिक दृष्टि से : राज्य में सभी कार्यों को सम्पन्न करने की योग्यता नहीं होती, क्योंकि राज्य के कर्मचारी लगन और प्रतिबद्धता से कार्य नहीं करते और मन्त्री प्रायः अनुभवशून्य होते हैं। इसके अतिरिक्त अनेक समस्याएँ स्थानीय प्रकृति की होती हैं तथा कुछ ऐसे कार्य होते हैं जिन्हें देरी किये बिना सम्पन्न करना आवश्यक होता है। इन्हें व्यक्तिगत स्तर पर जितनी जल्दी निपटाया जा सकता है, सरकारी स्तर पर उतना शीघ्र नहीं।

व्यक्तिवादी सिद्धान्त की आलोचना (दोष)
व्यक्तिवादी सिद्धान्त की आलोचना निम्नलिखित आधारों पर की जाती है-

1. व्यक्ति और समाज की गलत कल्पना – वास्तविकता यह है कि “मनुष्य स्वभाव से ही एक सामाजिक प्राणी है। समाज से उसका अटूट सम्बन्ध है। समाज तथा राज्य के बिना मनुष्य अपना विकास नहीं कर सकता। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि व्यक्तिवादी विचारधारा गलत धारणा पर आधारित है।

2. स्वतन्त्रता का भ्रामक अर्थ – वस्तुतः राज्य अपने कानूनों द्वारा स्वतन्त्रता का अपहरण नहीं करता, अपितु उसकी रक्षा करता है। अतः यह कहा जा सकता है कि व्यक्तिवादियों की स्वतन्त्रता विषयक धारणा गलत मान्यताओं पर टिकी है।

3. राज्य को अनिवार्य बुराई कहना गलत – अरस्तू ने लिखा है कि राज्य की उत्पत्ति मनुष्य की रक्षा के लिए हुई है और श्रेष्ठ जीवन की प्राप्ति के लिए ही वह स्थिर है। अतः राज्य एक आवश्यक बुराई नहीं, अपितु एक सकारात्मक अच्छाई है।

4. राज्य मानव की उन्नति में बाधक नहीं – राज्य मनुष्यों की सर्वांगीण उन्नति के लिए। समुचित अवसर तथा सुविधाएँ प्रदान करता है। मानव-समाज ने राज्य की छत्रछाया में ही पर्याप्त आर्थिक व वैज्ञानिक उन्नति की है। इसलिए राज्य मानव-उन्नति में बाधक नहीं है। अरस्तु के अनुसार, “राज्य समस्त विज्ञानों, समस्त कलाओं, समस्त गुणों तथा समस्त पूर्णता में सहायक है।”

5. राज्य को हस्तक्षेप आवश्यक – राज्य के अभाव में प्रत्येक व्यक्ति अपने हित व स्वार्थ की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील होगा। उसका ऐसा प्रयत्न दूसरे व्यक्ति के ऐसे ही प्रयत्नों में बाधक हो सकता है जो परस्पर संघर्ष को जन्म देगा। इसलिए व्यक्तिवादियों का यह मत गलत है कि राज्य का हस्तक्षेप अनावश्यक है।

6. लोकतन्त्रीय युग में व्यक्तिवाद अनावश्यक – व्यक्तिवाद का जन्म निरंकुश राज्यों की प्रतिक्रिया-स्वरूप हुआ था। वर्तमान युग में लोकतन्त्र के उदय तथा लोक-कल्याणकारी राज्य की धारणा के उद्भव से ऐसी परिस्थिति नहीं है; अतः आज यह सिद्धान्त अमान्य है।

7. व्यक्तिवादी तर्क अमानवीय – लीकॉक ने कहा है कि “यदि शक्ति को ही जीवित रहने की कसौटी मान लिया जाए तो एक समृद्ध और सबल चोर समाज में प्रशंसा का पात्र होगा और एक भूखा कलाकार घृणा का।” इस प्रकार शारीरिक शक्ति बौद्धिक बल पर हावी हो जाएगी, जिसे जंगल-राज कह सकते हैं; अतः व्यक्तिवादी सिद्धान्त अमानवीय है।

निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि यद्यपि व्यक्तिवादी सिद्धान्त वर्तमान समय में प्रभावहीन हो गया है, तथापि इस सिद्धान्त का महत्त्व इस दृष्टिकोण से आवश्यक है कि राज्य की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को सुरक्षित रखना चाहिए। वस्तुतः व्यक्तिवाद व्यक्ति की गरिमा एवं स्वतन्त्रता पर बल देती है। गार्नर के शब्दों में, “व्यक्तिवादियों ने व्यक्ति के महत्त्व को विश्व के समक्ष रखा है।”

व्यक्तिवाद और समाजवाद में अन्तर

1. विचारधारा – व्यक्तिवादी सिद्धान्त के समर्थक व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर बल देते हैं। उनके अनुसार, राज्य के कार्य तथा कानून व्यक्ति की स्वतन्त्रता को प्रतिबन्धित करते हैं; अत: राज्य के कार्यों की संख्या न्यूनतम होनी चाहिए। वे राज्य को एक आवश्यक बुराई मानते हैं। । दूसरी ओर समाजवादी विचारधारा के अनुसार राज्य के द्वारा वे सभी कार्य किये जाने चाहिए जो व्यक्ति और समाज की उन्नति के लिए आवश्यक हों। इस विचारधारा के अनुसार राज्य के कार्यों की कोई सीमा नहीं है तथा सामाजिक जीवन के प्रायः सभी कार्य राज्य के कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत आ जाते हैं।

2. कार्यक्षेत्र – व्यक्तिवादी चाहते हैं कि राज्य के कार्यक्षेत्र को अधिक-से-अधिक सीमित कर दिया जाए। स्पेन्सर के मतानुसार, “व्यक्ति का स्थान समाज तथा राज्य के ऊपर होना चाहिए। और राज्य को केवल वही कार्य करने चाहिए जिन्हें व्यक्ति नहीं कर सकता।” उनके अनुसार राज्य के केवल तीन निम्नलिखित कार्य होने चाहिए-

  • आन्तरिक शान्ति और व्यवस्था करना,
  • देश की बाहरी आक्रमणों से रक्षा करना तथा
  • न्याय और दण्ड की व्यवस्था करना।

दूसरी ओर समाजवादी समानता को अपना आदर्श मानकर चलते हैं और राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में अधिकाधिक स्थापित करने के लिए निम्नलिखित बातों पर विशेष बल देते हैं-

  • समाज की आंगिक एकता,
  • समाज में प्रतियोगिता के स्थान पर सहयोग,
  • पूँजीवाद का अन्त तथा
  • उत्पादन के साधनों पर सामाजिक स्वामित्व।

उद्योगों के प्रति दृष्टिकोण
व्यक्तिवादी विचारधारा राज्य के कार्यों को न्यूनतम कर देना चाहती है तथा उद्योगों को व्यक्तियों के लिए पूर्ण रूप से खुला रखना चाहती है। वह उद्योगों की स्थापना, संचालन तथा विकासे में राज्य का हस्तक्षेप नहीं चाहती। वह खुली प्रतियोगिता में विश्वास रखती है तथा एक प्रकार से पूँजीवाद की समर्थक है।
दूसरी ओर समाजवादी विचारधारा पूँजीवाद की घोर विरोधी होने के कारण भूमि और उद्योगों पर व्यक्तिगत स्वामित्व के अन्त की माँग करती है। यह विचारधारा उत्पादन के समस्त साधनों पर सामाजिक स्वामित्व स्थापित करना चाहती है। समाजवादी विचारधारा के अनुसार वैयक्तिक उद्योग वैयक्तिक लूटमार है और व्यक्तिगत सम्पत्ति को सामाजिक अथवा सामूहिक सम्पत्ति का रूप देना ही उचित है।
अतः निष्कर्षतया कहा जा सकता है कि उद्योगों के निजीकरण की प्रवृत्ति समाजवादी विचारधारा के प्रतिकूल है।

प्रश्न 3.
लोक-कल्याणकारी राज्य की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए। यह समाजवादी राज्य से किस प्रकार भिन्न है? [2010]
या
लोक-कल्याणकारी राज्य की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2010, 12, 16]
या
लोक-कल्याणकारी राज्य की परिभाषा दीजिए। इसके प्रमुख उद्देश्य क्या हैं? [2011, 15]
या
लोक-कल्याणकारी राज्य का अर्थ है? इसके मुख्य कार्यों का वर्णन कीजिए। [2008]
या
लोक-कल्याणकारी राज्य से आप क्या समझते हैं। भारत में लोक-कल्याणकारी राज्य की स्थापना में कहाँ तक सफलता मिली है?
या
कल्याणकारी राज्य के कार्यों का उल्लेख विस्तार से कीजिए। [2013, 14]
या
लोक-कल्याणकारी राज्य की अवधारणा बताइए तथा इसके तीन महत्त्वपूर्ण कार्यों का उल्लेख कीजिए। [2013]
या
लोक-कल्याणकारी राज्य की अवधारणा क्या है ? इसके मुख्य उद्देश्यों का परीक्षण कीजिए। [2008, 12, 13]
उत्तर
लोक-कल्याणकारी राज्य
लोक-कल्याणकारी राज्य की धारणा वर्तमान युग की देन है। सामान्य शब्दों में, लोककल्याणकारी राज्य एक ऐसा राज्य है जो व्यक्ति के विकास व उसकी उन्नति के लिए सतत प्रयत्नशील रहता है।
विभिन्न विद्वानों द्वारा लोक-कल्याणकारी राज्य का अर्थ विभिन्न परिभाषाओं के द्वारा स्पष्ट किया गया है। इस सम्बन्ध में कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नवत् हैं-

  1. केण्ट के अनुसार, “लोक-कल्याणकारी राज्य वह राज्य है जो अपने नागरिकों के लिए व्यापक समाज-सेवाओं की व्यवस्था करता है।
  2. पण्डित नेहरू के शब्दों में, “सबके लिए समान अवसर उपलब्ध कराना, अमीरों व गरीबों के बीच का अन्तर मिटाना, जीवन-स्तर को ऊपर उठाना, लोक-कल्याणकारी राज्य के आधारभूत – ‘तत्त्व हैं।”
  3. अब्राहम लिंकन के अनुसार, “कल्याणकारी राज्य वह है जो अपनी आर्थिक व्यवस्था का संचालन आय के अधिकाधिक समान उद्देश्य के वितरण से करता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं का विश्लेषण करने पर स्पष्ट हो जाता है कि “जो राज्य आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक आदि सभी क्षेत्रों में जनता के कल्याण के लिए अधिक-से-अधिक कार्य करता है, उसे लोक-कल्याणकारी राज्य कहते हैं। एक लोक-कल्याणकारी राज्य नागरिकों की स्वतन्त्रता और समानता का पोषक होता है। वह व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और समानता के बीच सन्तुलन बनाये रखने में सहायक होता है तथा पारस्परिक सहयोग को महत्त्व प्रदान करता है।”

लोक-कल्याणकारी राज्य के लक्षण या विशेषताएँ या उद्देश्य
लोक-कल्याणकारी राज्य की उपर्युक्त धारणा को दृष्टि में रखते हुए इस प्रकार के राज्य के प्रमुख रूप से निम्नलिखित लक्षण बताये जा सकते हैं-

1. आर्थिक सुरक्षा की व्यवस्था – लोक-कल्याणकारी राज्ये प्रमुख रूप से आर्थिक सुरक्षा के विचार पर आधारित है। हमारा अब तक का अनुभव स्पष्ट करता है कि शासन का रूप चाहे कुछ भी हो, व्यवहार में राजनीतिक शक्ति उन्हीं लोगों के हाथों में केन्द्रित होती है, जो आर्थिक दृष्टि से शक्तिशाली होते हैं। अतः राजनीतिक शक्ति को जनसाधारण में निहित करने और जनसाधारण के हित में इसका प्रयोग करने के लिए आर्थिक सुरक्षा की व्यवस्था नितान्त आवश्यक है। लोक-कल्याणकारी राज्य के सन्दर्भ में आर्थिक सुरक्षा का तात्पर्य निम्नलिखित तीन बातों से लिया जा सकता है-

(i) सभी व्यक्तियों को रोजगार – ऐसे सभी व्यक्तियों को, जो शारीरिक और मानसिक दृष्टि से कार्य करने की क्षमता रखते हैं, राज्य के द्वारा उनकी योग्यतानुसार उन्हें किसीन-किसी प्रकार का कार्य अवश्य ही दिया जाना चाहिए। जो व्यक्ति किसी भी प्रकार का कार्य करने में असमर्थ हैं या राज्य जिन्हें कार्य प्रदान नहीं कर सका है, उनके जीवनयापन के लिए राज्य द्वारा बेरोजगार बीमे की व्यवस्था की जानी चाहिए।

(ii) न्यूनतम जीवन-स्तर की गारण्टी – एक व्यक्ति को अपने कार्य के बदले में इतना पारिश्रमिक अवश्य ही मिलना चाहिए कि उसके द्वारा न्यूनतम आर्थिक स्तर की प्राप्ति की जा सके। न्यूनतम जीवन-स्तर से आशय है-भोजन, वस्त्र, निवास, शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएँ। लोक-कल्याणकारी राज्य में किसी एक के लिए अधिकता के पूर्व सबके लिए पर्याप्तता की व्यवस्था की जानी चाहिए।

(iii) अधिकतम समानता की स्थापना – सम्पत्ति और आय की पूर्ण समानता न तो सम्भव है और न ही वांछनीय; तथापि आर्थिक न्यूनतम के पश्चात् होने वाली व्यक्ति की आय का उसके समाज सेवा सम्बन्धी कार्य से उचित अनुपात होना चाहिए। जहाँ तक सम्भव हो, व्यक्तियों की आय के न्यूनतम और अधिकतम स्तर में अत्यधिक अन्तर नहीं होना चाहिए। इस सीमा तक आय की समानता तो स्थापित की ही जानी चाहिए कि कोई भी व्यक्ति अपने धन के आधार पर दूसरे का शोषण न कर सके।

2. राजनीतिक सुरक्षा की व्यवस्था – लोक-कल्याणकारी राज्य की दूसरी विशेषता राजनीतिक सुरक्षा की व्यवस्था कही जा सकती है। इस प्रकार की व्यवस्था की जानी चाहिए कि राजनीतिक शक्ति सभी व्यक्तियों में निहित हो और ये अपने विवेक के आधार पर इस राजनीतिक शक्ति का प्रयोग कर सकें। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु निम्नलिखित बातें आवश्यक हैं-

(i) लोकतन्त्रीय शासन-लोक – कल्याणकारी राज्य में व्यक्ति के राजनीतिक हितों की साधना को भी आर्थिक हितों की साधना के समान ही आवश्यक समझा जाता है; अतः एक लोकतन्त्रीय शासन-व्यवस्था वाला राज्य ही लोक-कल्याणकारी राज्य हो सकता है।
(ii) नागरिक स्वतन्त्रताएँ – संविधान द्वारा लोकतन्त्रीय शासन की स्थापना कर देने से ही राजनीतिक सुरक्षा प्राप्त नहीं हो जाती। व्यवहार में राजनीतिक सुरक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए नागरिक स्वतन्त्रता का वातावरण होना चाहिए, अर्थात् नागरिकों को विचार अभिव्यक्ति और राजनीतिक दलों के संगठन की स्वतन्त्रता प्राप्त होनी चाहिए। इन स्वतन्त्रताओं के अभाव में लोकहित की साधना नहीं हो सकती और लोकहित की साधना के बिना लोक-कल्याणकारी राज्य, आत्मा के बिना शरीर के समान होगा।

पूर्व सोवियत संघ और वर्तमान चीन आदि साम्यवादी राज्यों में नागरिकों के लिए नागरिक स्वतन्त्रताओं और परिणामतः राजनीतिक सुरक्षा का अभाव होने के कारण उन्हें लोक कल्याणकारी राज्य नहीं कहा जा सकता।

3. सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था – सामाजिक सुरक्षा का तात्पर्य सामाजिक समानता से है। और इस सामाजिक समानता की स्थापना के लिए आवश्यक है कि धर्म, जाति, वंश, रंग और सम्पत्ति के आधार पर उत्पन्न भेदों का अन्त करके व्यक्ति को व्यक्ति के रूप में महत्त्व प्रदान किया जाए। डॉ० बेनी प्रसाद के शब्दों में, “सामाजिक समानता का सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि प्रत्येक व्यक्ति के सुख का महत्त्व हो सकता है तथा किसी को भी अन्य किसी के सुख का साधनमात्र नहीं समझा जा सकता है। वस्तुत: लोक-कल्याणकारी राज्य में जीवन के सभी पक्षों में समानता के सिद्धान्त को प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए।

4. राज्य के कार्यक्षेत्र में वृद्धि – लोक कल्याणकारी राज्य का सिद्धान्त व्यक्तिवादी विचार के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया है और इस मान्यता पर आधारित है कि राज्य को वे सभी जनहितकारी कार्य करने चाहिए, जिनके करने से व्यक्ति की स्वतन्त्रता नष्ट या कम नहीं होती। इसके द्वारा न केवल आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सुरक्षा की व्यवस्था वरन् जैसा कि हॉब्सन ने कहा है, “डॉक्टर, नर्स, शिक्षक, व्यापारी, उत्पादक, बीमा कम्पनी के एजेण्ट, मकान बनाने वाले, रेलवे नियन्त्रक तथा अन्य सैकड़ों रूपों में कार्य किया जाना चाहिए।”

5. अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की भावना – इन सबके अतिरिक्त एक लोक-कल्याणकारी राज्य, अपने राज्य विशेष के हितों से ही सम्बन्ध न रखकर सम्पूर्ण मानवता के हितों से सम्बन्ध रखता है और इसका स्वरूप राष्ट्रीय न होकर अन्तर्राष्ट्रीय होता है। एक लोक-कल्याणकारी राज्य तो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ अर्थात् ‘सम्पूर्ण विश्व ही मेरा कुटुम्ब है’ के विचार पर आधारित होता है।

लोक-कल्याणकारी राज्य के कार्य
परम्परागत विचारधारा राज्य के कार्यों को दो वर्गों (अनिवार्य और ऐच्छिक) में विभाजित करने की रही है और यह माना जाता रहा है कि अनिवार्य कार्य तो राज्य के अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए किये जाने जरूरी हैं, किन्तु ऐच्छिक कार्य राज्य की जनता के हित में होते हुए भी राज्य के द्वारा उनका किया जाना तत्कालीन समय की. विशेष परिस्थितियों और शासन के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है, लेकिन लोक-कल्याणकारी राज्य की धारणा के विकास के परिणामस्वरूप अनिवार्य और ऐच्छिक कार्यों की यह सीमा रेखा समाप्त हो गयी है और यह माना जाने लगा है। कि परम्परागत रूप में ऐच्छिक कहे जाने वाले कार्य भी राज्य के लिए उतने ही आवश्यक हैं जितने कि अनिवार्य समझे जाने वाले कार्य। लोक-कल्याणकारी राज्य के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं-

1. आन्तरिक शान्ति और व्यवस्था करना – राज्य की आन्तरिक शान्ति और व्यवस्था अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य है। राज्य में नागरिकों को घूमने-फिरने, सभा करने, मिलने-जुलने, आजीविका प्राप्त करने इत्यादि के अनेक अधिकार होते हैं, परन्तु समाज में अनेक ऐसे व्यक्ति होते हैं जो इन अधिकारों के प्रयोग में बाधा उत्पन्न करते हैं। इससे लोगों का जीवन में सम्पत्ति खतरे में पड़ जाती है। ऐसे असामाजिक तत्वों का दमन कर शान्ति और व्यवस्था बनाये रखना राज्य का प्रधान कर्त्तव्य है, इसीलिए राज्य पुलिस और सेना की सहायता से समाज में शान्ति और व्यवस्था का प्रबन्ध करता है। राज्य अपराधों, उपद्रव, लूटमार, चोरी-डकैती, विद्रोह आदि को रोकता है।

2. देश की बाहरी आक्रमणों से रक्षा करना – कभी-कभी एक राज्य दूसरे राज्य पर आक्रमण कर उस पर आधिपत्य स्थापित करने का प्रयास करता है। आत्म-रक्षा प्रत्येक राज्य का प्रमुख कार्य होता है। बाहरी आक्रमणों से रक्षा करने की दृष्टि से राज्य शक्तिशाली जल, थल तथा वायु सेना आदि रखता है। इस प्रकार बाह्य आक्रमण से देश की रक्षा करना राज्य का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसके अभाव में उसका अस्तित्व ही समाप्त हो सकता है।

3. न्याय और दण्ड की व्यवस्था करना – समाज में शान्ति और व्यवस्था बनाये रखने के लिए। न्याय की उत्तम व्यवस्था का होना भी अनिवार्य है। न्याय की समुचित व्यवस्था से ही दुर्बल और असहाय व्यक्ति के अधिकार सुरक्षित रह पाएँगे और प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करेगा। इसलिए न्याय का प्रबन्ध करना भी राज्य का अनिवार्य कार्य है। न्याय के साथ दण्ड भी सम्बद्ध है। दण्ड का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं होना चाहिए, उसका उद्देश्य अपराधी का सुधार होना चाहिए।

4. वैदेशिक सम्बन्धों का संचालन – आज के युग में प्रत्येक देश दूसरे देशों के साथ कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित करता है। वह दूसरे देशों में अपने राजदूत भेजता है और दूसरे देशों के राजदूतों को अपने देश में रखता है। आपसी झगड़ों को मध्यस्थता द्वारा सुलझाने का प्रयत्न करता है। दूसरे देशों के साथ सांस्कृतिक एवं आर्थिक समझौते करके राज्य अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देता है। इस कार्य का महत्त्व आजकल इतना अधिक हो गया है कि प्रत्येक राज्य में इसके लिए एक पृथक् विभाग की स्थापना हो गयी है।

5. मुद्रा का प्रबन्ध करना – गैटिल तथा कुछ अन्य विचारकों ने राज्य के आवश्यक कार्यों के अन्तर्गत मुद्रा प्रबन्ध को भी स्थान दिया है। वास्तव में मुद्रा विनिमय का सर्वोत्तम माध्यम, है। मुद्रा के द्वारा ही राज्य अपनी आर्थिक नीति को सुनियोजित करता है। मुद्रा के द्वारा ही आन्तरिक तथा वैदेशिक व्यापार को प्रोत्साहन मिलता है; अतः राज्य उचित व प्रगतिशील मुद्रा-प्रणाली की व्यवस्था करता है।

6. कर लगाना.एवं वसूल करना – राज्य की आय के अनेक स्रोत होते हैं। इन स्रोतों में कर संग्रह प्रमुख है। राज्य करों की रूपरेखा, उनका अनुपात तथा दरें निश्चित करता है। वह निर्धारित करता है कि किससे कितना कर लेना चाहिए। कर-निर्धारण तथा कर (संग्रह) का सम्पादन किन लोगों द्वारा किस रूप में होना चाहिए, यह कार्य भी राज्य द्वारा निश्चित किया जाता है।

7. शिक्षा का प्रबन्ध करना – शिक्षा राष्ट्रीय विकास की आधारशिला होती है। शिक्षा की इस महत्ता के कारण सभी सभ्य राज्य शिक्षा, विकास तथा संगठन का प्रयास करते हैं। इस कार्य की पूर्ति के लिए राज्य विद्यालय, प्रयोगशाला, शोधशाला, वाचनालय, संग्रहालय इत्यादि की व्यवस्था करता है। इसके लिए राज्य स्वतः शिक्षण संस्थाएँ स्थापित करता है, उनका संचालन करता है तथा राज्य के नागरिकों द्वारा संचालित शिक्षण संस्थाओं को अनुदान देता है।

8. स्वास्थ्य-रक्षा एवं सफाई का प्रबन्ध करना – राष्ट्र के पूर्ण विकास के लिए उसके नागरिकों को स्वस्थ होना परम आवश्यक है। जिस राज्य के नागरिक स्वस्थ नहीं होते, उस राज्य का विकास नहीं हो पाता। अतः राज्य नागरिकों के स्वास्थ्य एवं सफाई की ओर पूरा ध्यान देता है। यह बीमारियों की रोकथाम करता है, खाद्य-पदार्थों में मिलावट को रोकता है। एवं हानिकारक वस्तुओं के प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगाता है। एक अच्छे राज्य का यह कर्तव्य है। कि वह अपने नागरिकों के स्वास्थ्य एवं स्वच्छता की ओर पूरा ध्यान दे। अच्छे चिकित्सालयों की स्थापना करे, जहाँ नि:शुल्क उपचार और चिकित्सा की व्यवस्था हो।

9. सामाजिक कुरीतियों का निवारण करना – प्राय: प्रत्येक समाज में अनेक कुरीतियाँ प्रचलित होती हैं। ये समाज के स्वरूप को विकृत कर देती हैं। इनके कारण सामाजिक प्रगति में बाधा पहुँचती है। राज्य को इन कुरीतियों के उन्मूलन का प्रयास करना चाहिए। स्वाधीन भारत की सरकार ने भारतीय समाज में फैली हुई अनेक कुरीतियों; जैसे-बाल-विवाह, सती–प्रथा, दहेज-प्रथा, छुआछूत आदि को कानून द्वारा दूर करने का अच्छा प्रयास किया है।

10. उद्योग-धन्धों तथा व्यापार का विकास करना – राज्य के ऐच्छिक कार्यों में उद्योग-धन्धों तथा व्यापार का विकास भी सम्मिलित है। वास्तव में किसी राष्ट्र के आर्थिक विकास के द्वारा ही समाज की चहुंमुखी प्रगति हो सकती है। इसलिए राज्य को चाहिए कि वह उद्योग-धन्धों तथा व्यापार का समुचित विकास करे, जिससे कि राष्ट्रीय आय में वृद्धि हो और लोगों का जीवन-स्तर ऊँचा उठे। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक समझौते करना, व्यापारियों तथा उत्पादकों को आर्थिक सहायता देना, कुछ उद्योगों को स्वयं चलाना, अधिक आयात कर लगाना आदि अनेक उपाय राज्य को अपनाने चाहिए।

11. यातायात एवं संचार के साधनों का विकास करना – यातायात एवं संचार के साधन किसी राष्ट्र की शिराओं या धमनियों की भाँति होते हैं। समुचित आवागमन एवं संचार के साधनों के बिना कोई राष्ट्र अपनी उन्नति नहीं कर सकता। इसलिए प्रत्येक राज्य रेल, तार, डाक, वायुयान, नौका-परिवहन इत्यादि का विकास करता है। स्वतन्त्र भारत की सरकार ने विगत वर्षों में इस दिशा में स्तुत्य कार्य किये हैं। इन साधनों के विकास से आर्थिक उन्नति तथा राष्ट्रीय प्रगति को बड़ा सम्बल मिला है।

12. बेकारी का अन्त करना – प्रायः प्रत्येक समाज में बेरोजगार लोग होते हैं। एक उन्नत और सभ्य राज्य बेरोजगार व्यक्तियों को रोजगार देने का प्रयास करता है। इसलिए वह नये उद्योगधन्धों एवं आजीविका के नये स्रोतों की स्थापना करने का प्रयास करता है। कुछ राज्य बेरोजगार युवकों को बेरोजगारी भत्ता भी देते हैं।

13. कृषि और ग्रामों का विकास करना – प्रायः प्रत्येक राष्ट्र में किसी-न-किसी सीमा तक कृषि-कार्य किया जाता है। कृषि के उत्पादन पर ही बहुत कुछ राष्ट्र की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति अवलम्बित होती है। अतएव प्रत्येक राज्य कृषि के विकास का पूरा प्रयास करता है। इस कार्य के लिए राज्य सिंचाई के साधनों का विकास, अच्छे बीज, खाद तथा आधुनिक कृषि-यन्त्रों की व्यवस्था करता है तथा फसल की रक्षा के लिए कीटनाशक दवाइयाँ उपलब्ध कराता है। साथ ही कृषि-उपजों की उचित मूल्य पर खरीद भी करता है। इसके अतिरिक्त ग्रामों में सुधार और कृषकों के जीवन-स्तर को ऊँचा उठाना भी राज्य का कार्य है।

14. मनोरंजन के साधनों की व्यवस्था करना – मनोरंजन को मनुष्य के जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसके बिना स्वस्थ और सफल जीवन सम्भव नहीं है। इसलिए राज्य मनोरंजन के स्वस्थ साधनों का प्रबन्ध करता है। वह पार्क-बगीचे, खेल-कूद के मैदान, रेडियो, दूरदर्शन, नाट्य-गृह आदि की व्यवस्था करता है। लेकिन राज्य को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि मनोरंजन के साधनों में अश्लीलता का प्रवेश न होने पाये।

15. श्रमिकों के हितों की रक्षा करना – आज का युगे औद्योगिक युग है। ऐसे युग में औद्योगिक संस्थानों में काम करने वालों की संख्या काफी है। प्रायः पूँजीपति अनेक प्रकार से श्रमिकों का शोषण करते हैं। इसलिए प्रत्येक प्रगतिशील राज्य श्रमिकों के काम के घण्टे, उनकी छुट्टियाँ, वेतन-भत्ता, अवकाश इत्यादि से सम्बन्धित श्रम कानूनों का निर्माण करता है, जिनके द्वारा श्रमिक मिल-मालिकों के अत्याचारों तथा शोषण से बच जाते हैं। इसके अतिरिक्त राज्य श्रमिकों के मनोरंजन का प्रबन्ध करता है और उनके हितों की हर सम्भव दृष्टि से सुरक्षा करता है।

16. कला, साहित्य तथा विज्ञान की उन्नति में सहयोग करना – किसी भी राष्ट्र की प्रगति । उसकी कला, साहित्य और विज्ञान की उन्नति पर ही निर्भर करती है। अतः प्रत्येक राज्य को यह परम कर्तव्य है कि वह देश की विविध कलाओं, सभी भाषाओं के साहित्य और विज्ञान की उन्नति में सहयोग प्रदान करे, जिससे कलाकार, साहित्यकार और वैज्ञानिक प्रोत्साहित होकर देश के विकास में अपना अधिकाधिक योगदान दे सकें।

17. सामाजिक कल्याण के अन्य कार्य करना – उपर्युक्त ऐच्छिक कार्यों के अतिरिक्त कतिपय राज्य अन्य प्रकार के सामाजिक कल्याण के कार्य करते हैं। वे महिलाओं के कल्याण, शिशुओं के कल्याण, अपाहिजों के कल्याण, वृद्धों के कल्याण इत्यादि के लिए कानून का निर्माण कर उनको आवश्यक सुविधाएँ देने का प्रयास करते हैं। अनेक राज्यों में अपंग व्यक्तियों को कृत्रिम अंग, रोजगार में वरीयता तथा वृद्धों को पेंशन देने की व्यवस्था होती है। भारत सरकार ने भी सामाजिक कल्याण को निश्चित गति तथा दिशा देने का प्रयास किया है।

निष्कर्ष-राज्य के उपर्युक्त कार्यों के विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि राज्य के कार्यों का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। आज के युग में राज्य के कार्यों की सीमा में मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन आ गया है। सभ्यता के विकास के साथ ही राज्य के कार्यों में भी वृद्धि होती जा रही है। वास्तव में, राज्य का उद्देश्य सारे समाज का कल्याण करना होना चाहिए।

क्या भारत कल्याणकारी राज्य है ?
भारत में प्राचीन काल से ही कल्याणकारी राज्य के आदर्श को अपनाया जाता रहा है। कौटिल्य ने अपने ग्रन्थ ‘अर्थशास्त्र में इस आदर्श का दृढ़ समर्थन किया था। चन्द्रगुप्त मौर्य, सम्राट् अशोक, शेरशाह सूरी तथा अकबर आदि सभी प्रजा के कल्याण को प्रमुखता देते रहे।
1947 ई० में स्वतन्त्र होने के बाद भारत के संविधान-निर्माताओं ने संविधान में भारत को कल्याणकारी राज्य घोषित किया और कल्याणकारी राज्य के सभी प्रमुख तत्त्वों को संविधान में स्थान दिया। संविधान की अग्रलिखित विशेषताओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत एक कल्याणकारी राज्य है-

  1. संविधान द्वारा नागरिकों को स्वतन्त्रता तथा समानता प्रदान की गयी है।
  2. संविधान में नागरिकों के मूल अधिकारों का उल्लेख करके नागरिकों को सर्वांगीण उन्नति में समान अवसर प्रदान किये गये और संविधान में राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों का उल्लेख तो एक प्रकार से कल्याणकारी राज्य के तत्वों की घोषणा-पत्र है।
  3. पंचवर्षीय योजनाओं के द्वारा आर्थिक व सामाजिक क्षेत्र में जन-कल्याण व विकास के अनेक कार्य सम्पन्न हुए हैं।
  4. आर्थिक लोकतन्त्र की स्थापना के लिए सरकार द्वारा महत्त्वपूर्ण कदम उठाये गये हैं। गरीबी व बेकारी दूर करने की दिशा में सरकार प्रयासरत है।
  5. शिक्षा, समाज-कल्याण व स्वास्थ्य-सुधार के क्षेत्र में सराहनीय प्रयास किये गये हैं।

व्यक्तिवादियों के अनुसार, “व्यक्ति साध्य है और राज्य साधन।” लोक-कल्याणकारी राज्य को सर्वमान्य लक्ष्य आर्थिक-सामाजिक न्याय की प्राप्ति होता है। इस दृष्टि से वर्ष 1971-76 के काल में लोक-कल्याण की दिशा में राजाओं के प्रिवीपर्स की समाप्ति, जोत की अधिकतम सीमा का निर्धारण, शहरी सम्पत्ति का समीकरण आदि कदम उठाये गये। वस्तुत: आर्थिक सुरक्षा तथा समानता की दिशा में अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है।
निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि वास्तविक लोक-कल्याणकारी राज्य की स्थापना से भारत अभी भी बहुत दूर है। इस सम्बन्ध में तीव्र गति से ठोस प्रयत्न किये जाने की आवश्यकता है।

कल्याणकारी राज्य व समाजवादी राज्य में भिन्नता
समाजवाद एवं लोक-कल्याणकारी राज्यों में प्रमुख रूप से निम्नलिखित दो अन्तर हैं-

  1. लोक-कल्याणकारी राज्य प्रमुख रूप से आर्थिक सुरक्षा के विचार पर आधारित है। आर्थिक सुरक्षा से तात्पर्य सभी व्यक्तियों को रोजगार, न्यूनतम जीवन-स्तर की गारण्टी एवं अधिकतम आर्थिक समानता से है।
    समाजवादी राज्य आर्थिक समानता पर बल देता है यद्यपि समानता का यह विचार प्राकृतिक विधान और प्राकृतिक व्यवस्था के विरुद्ध है। समाजवाद का आर्थिक समानता का विचार पूँजीवाद के अन्त में निहित है।
  2. समाजवाद राज्य को अधिकाधिक कार्य सौंपना चाहता है। समाजवाद राज्य के कार्यक्षेत्र को व्यापक करना चाहते हैं। इसके विपरीत कल्याणकारी राज्य को वे सभी जनहितकारी कार्य सौंपना चाहते हैं जिनके करने से व्यक्ति की स्वतन्त्रता नष्ट नहीं होती। लोक-कल्याणकारी राज्य नागरिक स्वतन्त्रताओं के हिमायती हैं।

UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 2 Theories of the Functions of the State

प्रश्न 4.
मनु का राजत्व सिद्धान्त क्या था? उसके अनुसार राज्य के किन्हीं चार कार्यों की विवेचना कीजिए। [2009, 10]
या
मनु और कौटिल्य की राज्य के प्रति क्या अवधारणा थी? तर्कसंगत विवेचना कीजिए। [2012]
या
राज्य के कार्यों के सम्बन्ध में मनु के दृष्टिकोण की विवेचना कीजिए। [2011]
या
राज्य के कार्यक्षेत्र से सम्बन्धित मनु के विचार लिखिए। मनु के अनुसार राजा निरंकुश क्यों नहीं हो सकता है? [2013]
उत्तर
प्राचीन विचारकों- मनु, शुक्र, बृहस्पति और कौटिल्य आदि ने राज्य के कार्यों और राजा के कर्तव्यों पर विस्तार से विचार किया है। सामान्य रूप से उन्होंने प्राचीन भारत के राजनीतिक चिन्तन में राज्य को व्यापक कार्यक्षेत्र प्रदान किया है।
मनु का राजत्व सिद्धान्त
राज्य के कार्यक्षेत्र और राजा की शक्तियों के प्रसंग में आचार्य मनु के राजनीतिक चिन्तन की निम्नलिखित दो बातें प्रमुख हैं-

(क) मनु ने सदैव इस बात पर जोर दिया है कि राजा द्वारा कर्तव्यपालन किया जाना चाहिए और राजा का सर्वोच्च कर्तव्य है—प्रजा-पालन। मनु के शब्दों में, “राजा को अपनी प्रजा के प्रति पिता के समान व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि प्रजा का पालन करना राजा का श्रेष्ठ धर्म है और प्रजा-पालन द्वारा शास्त्रोक्त फल को भोगने वाला राजा धर्म से युक्त होता है।”

(ख) उसने राजा को निरंकुश शक्तियाँ प्रदान नहीं कीं, वरन् राजसत्ता को सीमित किया है। मनु के अनुसार, राजा को समझना चाहिए कि वह धर्म के नियमों के अधीन है। कोई भी राजा धर्म के विरुद्ध व्यवहार नहीं कर सकता, धर्म राजाओं और जनसाधारण पर एकसमान ही शासन करता है। इसके अतिरिक्त, राजा (राजनीतिक प्रभु) जनता के भी अधीन है। वह अपनी शक्तियों के प्रयोग करने में जनता की आज्ञा-पालन की क्षमता से सीमित होता है। सालेटोर के अनुसार, “मनु ने निस्सन्देह यह कहा है कि जनता राजा को गद्दी से उतार सकती है और उसे मार भी सकती है, यदि वह अपनी मूर्खता से प्रजा को सताता है।”

राज्य के कार्यक्षेत्र के सम्बन्ध में मनु के चिन्तन की महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उसने मानवमात्र के कर्तव्यों और स्वधर्म-पालन पर बल दिया है जिसे अपनाकर सम्पूर्ण मानव-जाति सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सकती है। मनु ने ऐसी कानूनी पद्धति तथा राजधर्म का वर्णन किया है। जिसमें सभी वर्गों के व्यक्तियों के कर्तव्यों की व्याख्या की गयी है।

मनु के अनुसार राज्य के कार्य
मनु ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ‘मनुस्मृति’ में राज्य के कार्यों पर समुचित विचार किया है। मनु के अनुसार, राज्य के प्रमुख रूप से निम्नलिखित कार्य हैं-
1. बाहरी आक्रमण से देश की रक्षा करना – मनु के मत से राज्य का सर्वप्रमुख कार्य बाहरी आक्रमण से देश की रक्षा करना है। मनु के अनुसार, राजा को चाहिए कि वह सेना को तैयार रखे, सैनिक शक्ति का प्रदर्शन करता रहे और अपने गुप्तचरों की सहायता से शत्रु की कमजोरियों का ज्ञान प्राप्त करे। उसे अप्राप्त को पाने की इच्छा और प्राप्त भूमि की रक्षा करनी चाहिए। राजा को राज्य की सुरक्षा के लिए स्वयं पहाड़ी दुर्ग में निवास करना चाहिए, क्योंकि वह सभी दुर्गों में श्रेष्ठ होता है।

2. आन्तरिक शान्ति स्थापित करना – मनु यह मानते थे कि समाज के अराजक तत्त्व आन्तरिक शान्ति भंग करने का कारण बन सकते हैं, इसलिए राज्य का एक प्रमुख कार्य दण्ड-शक्ति के आधार पर दुष्टों को नियन्त्रण में रखना है। राज्य के द्वारा उनके प्रति बहुत कठोर व्यवहार किया जाना चाहिए। राज्य को भ्रष्ट व्यक्तियों, जुआरियों तथा धोखेबाजों को दण्डित करना चाहिए और गलत ढंग से चिकित्सा करने वालों पर भारी जुर्माना किया जाना चाहिए। मनु के अनुसार, वैश्यों और शूद्रों को अपने कर्तव्यों का सुचारु रूप से पालन करने के लिए विवश करना भी राज्य का कार्य है। मनु इस बात पर भी बल देता है कि स्त्रियों की सम्पत्ति को हथियाने वाले व्यक्तियों को राज्य द्वारा कठोर दण्ड दिया जाना चाहिए।

3. विवादों का निर्णय (न्यायिक कार्य) करना – राज्य का एक प्रमुख कार्य लोगों के आपसी विवादों का निर्णय करना और विभिन्न समुदायों के बीच होने वाले झगड़ों का निपटारा करना है। इस हेतु न्यायालयों का गठन किया जाना चाहिए ताकि जनसाधारण को निष्पक्ष न्याय सुलभ हो सके। राज्य को इन सभी विवादों का निर्णय धर्म-विधानों का ध्यान रखकर करना चाहिए। मनु के अनुसार, “जिस सभा (न्यायालय) में असत्य द्वारा सत्य पीड़ित होता है उसके सदस्य ही पाप से नष्ट हो जाते हैं।”

4. राज्य का आर्थिक विकास और प्रगति करना – मनु राज्य का अन्य प्रमुख कार्य राज्य का आर्थिक विकास और प्रगति बताते हैं। मनु के अनुसार, “राजा अप्राप्त (न मिले हुए सोने, चाँदी, हीरे, जवाहरात, भूमि आदि) को दण्ड द्वारा (शत्रु को दण्ड देकर या जीतकर) पाने की इच्छा करे। प्राप्त (मिले हुए सोना आदि) द्रव्यों की देखभाल करते हुए रक्षा करे तथा रक्षित धन की वृद्धि करे और बढ़ाये गये (उन द्रव्यों) को सुपात्रों में दान कर दे।” (मनुस्मृति, 7:101)
इस प्रकार शासन की नीति चार सूत्री होनी चाहिए-

  • शक्ति और वैध उपायों द्वारा धन अर्जित करना,
  • धन का रक्षण करना,
  • धन में वृद्धि करना,
  • धन सुपात्रों को दान करना।

कर की व्यवस्था (Taxation) करना – राज्य में सभी व्यवस्थाओं के संचालन के लिए धन की आवश्यकता होती है, इसलिए मनु ने अनेक करों (Taxes) का सुझाव दिया है। मनु ने निम्नलिखित चार प्रकार के कर बताये है-

  • बलि-विभिन्न प्रकार के कर।
  • शुल्क–बाजार या हाट में व्यापारियों द्वारा बिक्री के लिए लायी गयी वस्तुओं पर चूँगी।
  • दण्ड-कर-जुर्माने।
  • भाग-लगान।

मनु द्वारा निर्दिष्ट कर-सम्बन्धी धारणा में उसकी बुद्धिमत्ता और लोक-कल्याणकारी प्रवृत्ति की झलक मिलती है। मनु राज्य की प्रगति के लिए राज्य द्वारा कर लिया जाना आवश्यक मानते हैं, किन्तु वे कर को उचित सीमा तक ही लिये जाने का समर्थन करते हैं। मनु के अनुसार, “कर न लेने से राजा के और अत्यधिक कर लेने से प्रजा के जीवन का अन्त हो जाता है।” अधिक कर का निषेध करते हुए मनु कहते हैं- जिस प्रकार बछड़ा और मधुमक्खी अपने खाद्य क्रमशः दुध और मधु थोड़ी-थोड़ी मात्रा में ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार राज्य को प्रजा से। थोड़ा-थोड़ा वार्षिक कर ग्रहण करना चाहिए। मनु का मत था कि कर इस प्रकार निर्धारित हो कि निर्धन जनता पर कर का बोझ कम पड़े और समृद्ध व्यक्ति अधिक कर का भार उठाये। मनु ने वस्तुओं के मूल्य पर नियन्त्रण रखने को राज्य का एक कर्तव्य माना।

5. स्थानीय स्वशासन संस्थाओं का प्रबन्ध करना – मनु राज्य द्वारा स्थानीय स्वशासन संस्थाओं का प्रबन्ध किये जाने का समर्थन करता है। उसने अपनी प्रशासनिक व्यवस्था के अन्तर्गत स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को महत्त्वपूर्ण माना है और स्थानीय विषयों का भार इन संस्थाओं को ही सौंपने का निर्देश दिया है।

6. असहाय व्यक्तियों की सहायता करना – मनु असहाय व्यक्तियों की सहायता करना भी राज्य का प्रमुख कार्य मानता है। उसके अनुसार, राज्य द्वारा सन्तानविहीन स्त्रियों, विधवाओं तथा रोगियों की देखभाल की जानी चाहिए और अवयस्कों की सम्पत्ति की रक्षा करनी चाहिए।

7. शिक्षा का प्रबन्ध करना – राज्य को शिक्षा की व्यवस्था भी करनी चाहिए तथा उसे शिक्षकों के हितों का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए। राज्य के द्वारा वेदों का अध्ययन और अध्यापन करने वाले ब्राह्मणों को दान देकर आर्थिक सहायता की जानी चाहिए।
इस प्रकार मनु ने राज्य के कार्यक्षेत्र को बहुत व्यापक माना है, किन्तु उसे निरंकुश नहीं बताया है। राजा धर्म के अधीन है। वह धर्म के विरुद्ध व्यवहार नहीं कर सकता। केवल मोटवानी का मत है, “मनु के निर्देशन में राज्य द्वारा बनाये जाने वाले अनेक कानून वर्तमानकालीन राजशास्त्र के विद्यार्थी को समाजवादी प्रतीत होंगे।”

वस्तुतः मनु द्वारा व्यक्त राज्य एक कल्याणकारी राज्य है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को बौद्धिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक विकास की सर्वोच्च अवस्था प्राप्त करने का अवसर मिलता है।

कौटिल्य की राज्य के प्रति अवधारणा तथा राज्य सम्बन्धी सप्तांग सिद्धान्त
कौटिल्य के अनुसार, राजा के द्वारा उपर्युक्त सभी कार्यों को सम्पादन लोकहित की भावना से ही किया जाना चाहिए।
कौटिल्य राजतन्त्र को शासन का एकमात्र स्वाभाविक और श्रेष्ठ प्रकार मानता है। वह राज्य के सात अंगों में राजा को सर्वोच्च स्थिति प्रदान करता है। इतना होने पर भी कौटिल्य का राजा निरंकुश नहीं है। उस पर निम्नलिखित कुछ ऐसे प्रतिबन्ध हैं जिनके कारण वह मनमानी नहीं कर सकता-.

1. अनुबन्धवाद – कौटिल्य के अनुसार, मनुष्यों ने राजा की आज्ञाओं के पालन की जो प्रतिज्ञा की उसके बदले में राजा ने अपनी प्रजा के धन-जन की रक्षा का वचन दिया था। इसीलिए राजा प्रजा के जन-धन को हानि पहुँचाने वाला कोई कार्य नहीं कर सकता। कौटिल्य का मत है कि राजा की स्थिति वेतन-भोगी सैनिकों के समान ही होती है, अर्थात् राजा राजकोष से निश्चित वेतन ले सकता है। उसे मनमाने ढंग से राज्य की सम्पत्ति को व्यय करने का अधिकार नहीं था।

2. धर्म और रीति-रिवाज – कौटिल्य के अनुसार, राजा के अधिकार धर्म और रीति-रिवाज सीमित थे और वह इनका पालन करने के लिए बाध्य था। उसे यह डर रहता था कि राजा द्वारा इन नियमों का उल्लंघन किये जाने पर जनता क्षुब्ध होकर स्वयं ही उसके जीवन का अन्त न कर दे। तत्कालीन जीवन में धर्म और परलोक की भावना बहुत प्रबल होने के कारण नरक को भये भी राजा को मनमानी करने से रोकता था।

3. मन्त्रिपरिषद् – राजा की शक्ति पर मन्त्रिपरिषद् का भी प्रतिबन्ध होता था। उसके अनुसार राजा और मन्त्रिपरिषद् राज्य रूपी रथ के दो चक्र हैं, इसीलिए मन्त्रिपरिषद् का अधिकार राजा के बराबर ही है। मन्त्रिपरिषद् राजा की शक्ति पर नियन्त्रण रख उसे मनमानी करने से रोकती थी।

4. राजा का व्यक्तित्व और उसकी शिक्षा – राजा का व्यक्तित्व तथा उसे प्रदान की गयी शिक्षा भी कौटिल्य के राजा की निरंकुशता पर अत्यन्त प्रभावशाली प्रतिबन्ध है। कौटिल्य ने राजा के लिए अनेक गुण आवश्यक बताये हैं और ऐसा सर्वगुणसम्पन्न राजा अपने स्वभाव से निरंकुश नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त कौटिल्य ने राजा की शिक्षा पर बल देकर उस पर ऐसे संस्कार डालने चाहे हैं कि वह लोकहित के कार्यों में लगा रहे। श्री कृष्णराव ने ठीक ही कहा है कि “कौटिल्य का राजा अत्याचारी नहीं हो सकता, चाहे वह कुछ बातों में स्वेच्छाचारी रहे, क्योंकि वह धर्मशास्त्र और नीतिशास्त्र के सुस्थापित नियमों के अधीन रहता है।”

प्रश्न 5.
राज्य के कार्यों से सम्बन्धित कौटिल्य के विचारों का विवेचन (उल्लेख) कीजिए। (2015)
या
आचार्य कौटिल्य द्वारा प्रतिपादित राज्य की अवधारण बताइए। कौटिल्य द्वारा प्रतिपादित राज्य सम्बन्धी सप्तांग सिद्धान्त का वर्णन कीजिए। [2010]
या
कौटिल्य के राजनीतिक विचारों का वर्णन कीजिए। [2014]
उत्तर
कौटिल्य ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ‘अर्थशास्त्र में राज्य के कार्यों और राजा के कर्तव्यों का विस्तार से उल्लेख किया है। कौटिल्य प्रजा के सुख को सर्वोपरि मानते हैं। यह उनकी विचारधारा का मूल आधार है। उन्होंने लिखा है-
प्रजा सुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हितो हितम्।
नात्मप्रिये हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्।।
(कौटिल्य अर्थशास्त्र 1:39)
[अर्थात् ‘प्रजा’ के सुख में राजा का सुख है, प्रजा के हित में राजा का हित है। राजा के लिए प्रजा के सुख से अलग अपना कोई सुख नहीं है, प्रजा का प्रिय और हित ही राजा का प्रिय और हित है।]
इसी आधार पर कौटिल्य राज्य के कार्यक्षेत्र तथा राजा के कर्तव्यों की विशद् विवेचना भी करता है। उनके अनुसार राज्य के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं-

1. वर्णाश्रम धर्म को बनाये रखना – कौटिल्य के अनुसार राज्य का एक प्रमुख कार्य वर्णाश्रम धर्म को बनाये रखना और सभी प्राणियों को अपने धर्म से विचलित न होने देना है। प्राचीन भारतीय जीवन के अन्तर्गत चार वर्षों और वर्णाश्रम धर्म की व्यवस्था को स्वीकार किया गया था। कौटिल्य का मत है कि “जिस राजा की प्रजा आर्य मर्यादा के आधार पर व्यवस्थित रहती है, जो वर्ण और आश्रमों के नियमों का पालन करती है और त्रयी (तीन वेद) द्वारा निहित विधान से रक्षित रहती है, वह प्रजा सदैव प्रसन्न रहती है और उसका कभी नाश नहीं होता।”

2. न्याय की व्यवस्था करना – स्वधर्म पालन योजना को कार्यान्वित करने के लिए न्यायव्यवस्था की स्थापना आवश्यक है। इसके दो क्षेत्र होते हैं-
(i) व्यवहार क्षेत्र तथा (ii) कण्टक शोधन क्षेत्र। पहले का सम्बन्ध नागरिकों के पारस्परिक विवादों से है और दूसरे का राज्य के कर्मचारियों व व्यवसायियों से है। निर्णय के लिए कौटिल्य राज्य को अनेक प्रकार के न्यायालयों की स्थापना का परामर्श देता है।

3. दण्ड की व्यवस्था करना – राज्य का दूसरा महत्त्वपूर्ण कार्य दण्ड की व्यवस्था करना है। दण्ड से अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति होती है, उसकी रक्षा होती है, रक्षित वस्तु बढ़ती है और बढ़ी हुई वस्तु का उपभोग होता है। समाज और सामाजिक व्यवहार भी दण्ड पर ही निर्भर होते हैं, इसीलिए दण्ड की व्यवस्था महत्त्वपूर्ण है। इस सम्बन्ध में राजा को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि दण्ड न तो आवश्यकता और औचित्य से अधिक हो और न ही कम। दण्ड देते समय राज्य को अपराधी की सामर्थ्य, अपराधी का वर्ण, अपराधी के सुधार आदि को ध्यान में रखना चाहिए। यथोचित दण्ड देने वाला राजा पूज्य होता है और केवल यथोचित दण्ड ही प्रजा को धर्म, अर्थ तथा काम से परिपूर्ण करता है। यदि दण्ड को उचित प्रयोग नहीं होता तो बलवान निर्बल को वैसे ही खा जाते हैं जैसे बड़ी मछली छोटी मछली को।

4. राज्य की सुरक्षा करना – राज्य का सर्वप्रथम कर्तव्य है कि वह अपनी रक्षा करे, क्योंकि यदि वह स्वयं अपनी रक्षा न कर सका तो वह नष्ट हो जाएगा। अपनी रक्षा हेतु राज्य को समुचित सेना, सुदृढ़ दुर्गों, पुलों आदि की व्यवस्था करनी चाहिए। षाडगुण्य नीति’ के अन्तर्गत राज्य को वैदेशिक सम्बन्धों के संचालन के लिए सन्धि, विग्रह (युद्ध), आसन (तटस्थता), यान (शत्रु पर आक्रमण करना), संश्रय (बलवान का आश्रय लेना) तथा दैवीभाव (सन्धि और युद्ध को एक साथ प्रयोग) को आधार बनाना चाहिए। अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के सफल संचालन हेतु राज्य को साम, दाम, दण्ड, भेद साधनों का अनुसरण करना चाहिए।

5. गुप्तचर की व्यवस्था करना – इस कर्त्तव्य के विधिवत् पालन हेतु राज्य के कर्मचारियों, व्यापारियों आदि के दैनिक व्यवहार पर गुप्तचर व्यवस्था के द्वारा नजर रखता है। विपत्ति के समय राज्य प्रजा की विभिन्न प्रकार से सहायता करता है, जो कि उसका परम कर्तव्य है।

6. लोकहित और सामाजिक कल्याण करना – कौटिल्य राजा को लोकहित और सामाजिक कल्याण के कार्य भी सौंपता है। इसके अन्तर्गत राजा दान देगा और अनाथ, वृद्ध तथा असहाय लोगों का पालन-पोषण करेगा। असहाय गर्भवतियों की उचित व्यवस्था करेगा और उनके बच्चों का पालन-पोषण करेगा। राज्य के अन्य भी कर्तव्य हैं; जैसे—कृषि के लिए बाँध बनाना, जल मार्ग, स्थल मार्ग, बाजार और जलाशय बनाना, दुर्भिक्ष के समय जनता की सहायता करना और उन्हें बीज देना आदि। जो किसान खेती न करके जमीन परती छोड़ देते हों, उनके पास से जमीन लेकर वह खुद किसान को देगा।
राजा के लोकहित और समाज-कल्याण सम्बन्धी इन राज्यों के उल्लेख में कौटिल्य की दूरदर्शिता ही झलकती है। कौटिल्य के अनुसार, खदानें, वस्तुओं के निर्माण, जंगलों में इमली की लकड़ी और हाथियों को प्राप्त करने तथा अच्छी नस्ल के जानवरों को पैदा करने के प्रबन्ध भी राज्य के ही कार्य हैं।

7. आर्थिक प्रबन्ध करना – कौटिल्य के अनुसार, राज्य की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होनी चाहिए और आर्थिक विषयों का प्रबन्ध सुव्यवस्थित रूप में होना चाहिए। राज्य के पास भरा-पूरा कोष और आय के स्थायी स्रोत होने चाहिए। इस सम्बन्ध में कौटिल्य का मत है कि राजा को प्रजा से उपज का छठा भाग लेना चाहिए तथा कोष में बहुमूल्य धातुएँ तथा मुद्राएँ पर्याप्त मात्रा में रखनी चाहिए। कौटिल्य का विचार है कि आवश्यक होने पर राज्य के द्वारा धनवानों पर अधिक कर लगाये जाने चाहिए और इस प्रकार एकत्रित की गयी धनराशि गरीबों में बाँट देनी चाहिए।

8. युद्ध करना – कौटिल्य के अनुसार, युद्ध करना राज्य का प्रमुख कार्य है। कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ का केन्द्र एक ऐसा विजिगीषु (विजय की इच्छा रखने वाला) राजो है जिसका उद्देश्य निरन्तर नये प्रदेश प्राप्त कर अपने क्षेत्र में वृद्धि करना है। कौटिल्य सभी आर्थिक और अन्य संस्थाओं की महत्ता इसी मापदण्ड से निश्चित करता है कि ये राज्य को किस सीमा तक सफल युद्ध के लिए तैयार करती हैं।
कौटिल्य के अनुसार, राजा के द्वारा उपर्युक्त सभी कार्यों को सम्पादन लोकहित की भावना से ही किया जाना चाहिए।

कौटिल्य राजतन्त्र को शासन का एकमात्र स्वाभाविक और श्रेष्ठ प्रकार मानता है। वह राज्य के सात अंगों में राजा को सर्वोच्च स्थिति प्रदान करता है। इतना होने पर भी कौटिल्य का राजा निरंकुश नहीं है। उस पर निम्नलिखित कुछ ऐसे प्रतिबन्ध हैं जिनके कारण वह मनमानी नहीं कर सकता-.

1. अनुबन्धवाद – कौटिल्य के अनुसार, मनुष्यों ने राजा की आज्ञाओं के पालन की जो प्रतिज्ञा की उसके बदले में राजा ने अपनी प्रजा के धन-जन की रक्षा का वचन दिया था। इसीलिए राजा प्रजा के जन-धन को हानि पहुँचाने वाला कोई कार्य नहीं कर सकता। कौटिल्य का मत है कि राजा की स्थिति वेतन-भोगी सैनिकों के समान ही होती है, अर्थात् राजा राजकोष से निश्चित वेतन ले सकता है। उसे मनमाने ढंग से राज्य की सम्पत्ति को व्यय करने का अधिकार नहीं था।
2. धर्म और रीति-रिवाज – कौटिल्य के अनुसार, राजा के अधिकार धर्म और रीति-रिवाज सीमित थे और वह इनका पालन करने के लिए बाध्य था। उसे यह डर रहता था कि राजा द्वारा इन नियमों का उल्लंघन किये जाने पर जनता क्षुब्ध होकर स्वयं ही उसके जीवन का अन्त न कर दे। तत्कालीन जीवन में धर्म और परलोक की भावना बहुत प्रबल होने के कारण नरक को भये भी राजा को मनमानी करने से रोकता था।

3. मन्त्रिपरिषद् – राजा की शक्ति पर मन्त्रिपरिषद् का भी प्रतिबन्ध होता था। उसके अनुसार राजा और मन्त्रिपरिषद् राज्य रूपी रथ के दो चक्र हैं, इसीलिए मन्त्रिपरिषद् का अधिकार राजा के बराबर ही है। मन्त्रिपरिषद् राजा की शक्ति पर नियन्त्रण रख उसे मनमानी करने से रोकती थी।

4. राजा का व्यक्तित्व और उसकी शिक्षा – राजा का व्यक्तित्व तथा उसे प्रदान की गयी शिक्षा भी कौटिल्य के राजा की निरंकुशता पर अत्यन्त प्रभावशाली प्रतिबन्ध है। कौटिल्य ने राजा के लिए अनेक गुण आवश्यक बताये हैं और ऐसा सर्वगुणसम्पन्न राजा अपने स्वभाव से निरंकुश नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त कौटिल्य ने राजा की शिक्षा पर बल देकर उस पर ऐसे संस्कार डालने चाहे हैं कि वह लोकहित के कार्यों में लगा रहे। श्री कृष्णराव ने ठीक ही कहा है कि “कौटिल्य का राजा अत्याचारी नहीं हो सकता, चाहे वह कुछ बातों में स्वेच्छाचारी रहे, क्योंकि वह धर्मशास्त्र और नीतिशास्त्र के सुस्थापित नियमों के अधीन रहता है।”

प्रश्न 6.
‘समाजवाद क्या है? यह किन सिद्धान्तों पर आधारित है? किन्हीं तीन सिद्धान्तों को विस्तार से समझाइए। (2007)
या
समाजवाद के मूल सिद्धान्तों की व्याख्या कीजिए। [2013]
या
समाजवाद के किन्हीं चार सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
समाजवादी विचारधारा की उत्पत्ति व्यक्तिवाद की प्रतिक्रिया के रूप में हुई और वर्तमान समय में यह विचारधारा बहुत अधिक लोकप्रिय है। समाजवाद का अंग्रेजी पर्यायवाची ‘Socialism’, *Socius’ शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ समाज और जैसा कि शब्द व्युत्पत्ति से ही स्पष्ट है। समाजवाद व्यक्तिवाद के विरुद्ध समाज के महत्त्व पर आधारित है। समाजवाद का आधारभूत उद्देश्य समानता की स्थापना करना है और इस समानता की स्थापना के लिए स्वतन्त्र प्रतियोगिता का अन्त किया जाना चाहिए। उत्पादन के साधनों पर सम्पूर्ण समाज का अधिकार होना चाहिए और उत्पादन व्यवस्था का संचालन किसी एक वर्ग के लाभ को दृष्टि में रखकर नहीं, वरन् सभी वर्गों के सामूहिक हित को दृष्टि में रखकर किया जाना चाहिए। समाजवाद की परिभाषा करते हुए रॉबर्ट ब्लैकफोर्ड ने कहा है कि समाजवाद के अनुसार भूमि तथा उत्पादन के अन्य साधन सबकी सम्पत्ति रहें और उनका प्रयोग तथा संचालन जनता द्वारा जनता के लिए ही हो।” इसी प्रकार फ्रेड बेमेल ने कहा है। कि “समाजवाद का अर्थ है व्यक्तिगत हित को सामाजिक हित के अधीन रखना।”

समाजवाद के अनुसार राज्य का कार्यक्षेत्र – राज्य के कार्यक्षेत्र के सम्बन्ध में समाजवाद का मत व्यक्तिवाद के नितान्त विपरीत है। इस विचारधारा के अनुसार राज्य के द्वारा वे सभी कार्य किये जाने चाहिए, जो व्यक्ति और समाज की उन्नति के लिए आवश्यक हों और क्योंकि व्यक्ति एवं समाज की उन्नति के लिए किये जाने वाले कार्यों की कोई सीमा नहीं है। अतः यह कहा जा सकता है कि सामाजिक जीवन के प्रायः सभी कार्य राज्य के कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत आ जाते हैं।

साधारणतया यह कहा जा सकता है कि समाजवादी विचारधारा के अनुसार राज्य को आन्तरिक एवं बाहरी सुरक्षा-व्यवस्था के साथ-साथ सार्वजनिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य का प्रबन्ध करना चाहिए। सभी व्यक्तियों के लिए स्वस्थ मनोरंजन का प्रबन्ध एवं अपाहिज और बूढ़े व्यक्तियों की सहायता की व्यवस्था करनी चाहिए।

समाजवाद व्यक्तिवादी विचारधारा और पूँजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध एक सशक्त विचारधारी और आन्दोलन है। यह समानता को अपना आदर्श मानकर चलता है और राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में अधिकाधिक समानता स्थापित करना चाहता है।

समाजवाद के सिद्धान्त
समाजवाद के प्रमुख सिद्धान्तों का अध्ययन निम्नलिखित रूपों में किया जा सकता है-

1. समाजवाद समाज की आंगिक एकता पर बल देता है- समाजवाद का आधारभूत विचार यह है कि व्यक्ति कोई एक अकेला प्राणी नहीं है, वरन् यह समाज के दूसरे व्यक्तियों से उसी प्रकार सम्बन्धित है, जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अंग परस्पर सम्बन्धित होते हैं।

2. समाजवाद प्रतियोगिता के स्थान पर सहयोग को प्रतिष्ठित करता है- समाजवाद का विचार यह है कि पूँजीवादी व्यवस्था में प्रचलित प्रतियोगिता से धनिक वर्ग को ही लाभ होता, है और श्रमिक वर्ग को हानि। प्रतियोगिता के कारण प्रत्येक व्यवसायी अपनी वस्तुओं को इतनी सस्ती बेचना चाहता है कि उसकी श्रेष्ठता बिल्कुल नष्ट हो जाती है; अतः समाजवाद जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रतियोगिता के स्थान पर सहयोग को प्रतिष्ठित करना चाहता है।

3. समाजवाद का ध्येय समानता है- समाजवाद वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में विद्यमान असमानता का अत्यन्त विरोधी है और यह नवीन समाज का निर्माण ऐसे सिद्धान्तों के आधार पर करना चाहता है कि उसमें वर्तमान समय में विद्यमान गम्भीर असमानता कम-से-कम हो जाए। योग्यता के अन्तर को तो समाजवादी भी स्वीकार करते हैं और वे यह भी मानते हैं कि पूर्ण समानता अनुचित, अनावश्यक और असम्भव है, किन्तु साथ ही उनका लक्ष्य एक ऐसे वातावरण का निर्माण करना है जिसमें प्रत्येक को उन्नति के समान अवसर प्राप्त हो सकें।

4. समाजवाद का उद्देश्य पूँजीवाद का अन्त है- समाजवाद व्यक्तिवादी विचारधारा तथा पूँजीवादी व्यवस्था के विरोध पर आधारित है। समाजवाद के अनुसार पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में कुछ लोग बहुत अधिक अमीर और कुछ लोग बहुत अधिक गरीब हो जाते हैं और इस प्रकार की आर्थिक विषमता से राष्ट्र की प्रगति रुक जाती है। पूँजीवादी व्यवस्था उपभोग और उत्पादन की दृष्टि से दोषपूर्ण है और इसमें कला तथा प्रतिभा का भी पतन हो जाता है। पूँजीवादी अर्थव्यवस्था आन्तरिक और अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में अशान्ति को जन्म देने वाली भी होती है। इस प्रकार समाजवाद के अनुसार वर्तमान समय की पूँजीवादी व्यवस्था दोषपूर्ण, जर्जर, अन्यायी व शोषक है और सम्पूर्ण समाज के हित में इस अर्थव्यवस्था का अन्त कर दिया जाना ही उचित है।

5. समाजवाद एक प्रजातान्त्रिक विचारधारा है- समाजवाद के सम्बन्ध में प्रमुख बात यह है। कि यह एक प्रजातान्त्रिक विचारधारा है। अनेक बार समाजवाद को साम्यवाद का पर्यायवाची मान लिया जाता है, जो नितान्त भ्रमपूर्ण है। पूँजीवाद के विरोध में परस्पर सहमत होते हुए भी समाजवाद और साम्यवाद परस्पर नितान्त विरोधी विचारधाराएँ हैं। इबन्सटीन (Ebenstein) के शब्दों में, “ये (समाजवाद और साम्यवाद) विचार और जीवन के दो नितान्त विरोधी ढंग हैं, उतने ही विरोधी जितने कि उदारवाद और सर्वाधिकारवाद।” इन दोनों विचारधाराओं में प्रमुख भेद साधनों के सम्बन्ध में है। साम्यवाद हिंसक साधनों को अपनाने के पक्ष में है, किन्तु समाजवाद का विचार है कि वांछित परिवर्तन प्रजातन्त्रात्मक और संवैधानिक साधनों से ही लाया जाना चाहिए। समाजवाद प्रजातन्त्रवादी विचार है और साम्यवाद सर्वाधिकारवादी।

6. समाजवाद उत्पादन के साधनों पर सामाजिक स्वामित्व के पक्ष में है- पूँजीवादी व्यवस्था का घोर विरोधी होने के कारण समाजवाद भूमि और उद्योगों पर व्यक्तिगत स्वामित्व के अन्त की माँग करता है और उत्पादन के समस्त साधनों पर सामाजिक स्वामित्व स्थापित करना चाहता है। समाजवादियों के अनुसार, “वैयक्तिक उद्योग वैयक्तिक लूटमार है और व्यक्तिगत सम्पत्ति को सामाजिक अथवा सामूहिक सम्पत्ति का रूप देना ही उचित है।

7. समाजवाद व्यक्ति की अपेक्षा समाज को प्राथमिकता देता है- समाजवाद का विचार है कि सम्पूर्ण समाज का सामूहिक हित अकेले व्यक्ति के हित से अधिक मूल्यवान है और आवश्यकता पड़ने पर समष्टि के हित में व्यक्ति के हित का बलिदान किया जा सकता है। इस सम्बन्ध में समाजवादियों का विचार है कि सामूहिक हित में व्यक्तिगत हित निहित होता है और सामूहिक हित की साधना से व्यक्तिगत हित की साधना अपने आप ही हो जाती है।

8. समाजवाद राज्य को एक सकारात्मक गुण मानता है- समाजवाद व्यक्तिवाद के इस कथन को अस्वीकार करता है कि राज्य एक आवश्यक दुर्गुण हैं और इसके विपरीत राज्य को एक ऐसी कल्याणकारी संस्था मानता है जिसका जन्म ही नागरिकों के जीवन को सभ्य और सुखी बनाने के लिए होता है। अधिकांश समाजवादी इतिहास से उदाहरण देते हुए कहते हैं कि राज्य संस्था चिरकाल से मानव-जाति की सेवा करती चली आ रही है और यदि इसने कहीं बल का प्रयोग किया भी है तो सामूहिक हित के लिए ही। इस प्रकार साधारणतया समाजवादी राज्य को एक जनहितकारी संस्था मानते हैं।

9. समाजवाद राज्य को अधिकाधिक कार्य सौंपना चाहता है- समाजवादी राज्य को एक कल्याणकारी संस्था मानते हैं और व्यक्ति को अधिकाधिक स्वतन्त्रता प्रदान करने के लिए राज्य के कार्यक्षेत्र को व्यापक करना चाहते हैं। समाजवाद के अनुसार, व्यक्तिवादी पुलिस राज्य समाज की पूरी-पूरी भलाई नहीं कर सकता और इस पुलिस राज्य में 99 प्रतिशत जनता पूँजीवादी शोषण से पिसकर अपने प्राण दे देगी। ऐसी स्थिति में गरीबों और मजदूरों के हित में राज्य के द्वारा आर्थिक क्षेत्र से सम्बन्धित अधिक-से-अधिक कार्य किये जाने चाहिए।

इस प्रकार, समाजवाद व्यक्तिवाद के विरुद्ध एक ऐसी प्रतिक्रिया है जिसके द्वारा वैयक्तिक हित के स्थान पर सामूहिक हित और प्रतियोगिता के स्थान पर सहयोग को प्रतिष्ठित करके, उत्पादन के साधनों पर सामाजिक नियन्त्रण के आधार पर आर्थिक समानता स्थापित कराने का प्रयत्न किया जाता है।

प्रश्न 7.
लोकतान्त्रिक समाजवाद की प्रमुख विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
या
पण्डित जवाहरलाल नेहरू के लोकतान्त्रिक समाजवाद पर एक लेख लिखिए।
उत्तर
‘लोकतन्त्रवाद’ और ‘समाजवाद’ के संयोग से जिस उदार समाजवाद की रचना हुई उसे ही लोकतान्त्रिक समाजवाद (Democratic Socialism) कहा जाता है। आज के युग में जबकि पश्चिमी पूँजीवादी लोकतन्त्र चीनी उग्र साम्यवाद से लोगों की आस्था समाप्त होती जा रही है, लोकतान्त्रिक समाजवाद दक्षिण और वाम दोनों ही विचारों को सामंजस्य करते हुए एक मध्यममार्गी समाजवाद का रूप ले रहा है। फ्रांस, इंग्लैण्ड, इटली और अब भारत में भी इसी प्रकार के समाजवाद का रूप विभिन्न राजनीतिक दलों के माध्यम से अभिव्यक्त हो रहा है। भारत में लोकतान्त्रिक समाजवाद ने पण्डित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में अपना रास्ता तय किया। कांग्रेस द्वारा समाजवादी व्यवस्था को अपना लक्ष्य घोषित कराने में नेहरू जी की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रही है।

पण्डित नेहरू का लोकतान्त्रिक समाजवाद

1. लोकतन्त्र के समर्थक – यद्यपि भारत में समाजवाद का प्रचार करने में कांग्रेसी समाजवादियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है, किन्तु वह नेहरू जी की भूमिका के सामने फीकी पड़ जाती है। जब वे इंग्लैण्ड में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे, तब वे वहाँ की लोकतन्त्र व्यवस्था से काफी प्रभावित हुए। उन्हें लोकतन्त्र में व्यक्ति की स्वतन्त्रता तथा विचार अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता ने काफी प्रभावित किया। वे रूस भी गये तथा वहाँ की समाजवादी व्यवस्था से भी वे बहुत अधिक प्रभावित हुए। वहाँ की वर्ग-विहीन समाज व्यवस्था से वे बहुत अधिक प्रभावित हुए। परन्तु उसके साधनों में उन्हें हिंसा-ही-हिंसा दिखायी दी। अतः उन्होंने माक्र्सवाद या साम्यवाद को ज्यों-का-त्यों स्वीकार न करके वर्ग-सहयोग एवं सामंजस्य पर बल दिया। इस प्रकार उन्होंने समाजवाद और लोकतन्त्र का मध्य मार्ग अपनाकर उसे ‘लोकतान्त्रिक समाजवाद का नाम दिया।

2. लोकतन्त्र समाजवाद को लाने का साधन – नेहरू जी ने लोकतन्त्र व समाजवाद को एक- दूसरे को पूरक माना है। वे लोकतन्त्र के प्रबल समर्थक होने के साथ-साथ समाजवाद के भी बड़े प्रशंसक थे। उनका कहना था कि भारत में जब तक समानता नहीं आयेगी, तब तक लोकतन्त्र की स्थापना सम्भव नहीं है। लोकतन्त्र के लिए आर्थिक एवं सामाजिक समानता आवश्यक है। एक ओर उच्च वर्ग तथा दूसरी ओर दलित वर्ग जब तक समान स्तर पर नहीं लाये जायेंगे तब तक लोकतन्त्र कदापि सम्भव नहीं है। वे समाजवाद को लाने के लिए लोकतन्त्र को प्रमुख साधन मानते थे।

3. संघर्ष एवं हिंसा का विरोध – यद्यपि नेहरू जी मार्क्स के सिद्धान्तों की बड़ी प्रशंसा करते थे, किन्तु वे अहिंसा द्वारा समाजवाद को भारत में लाना चाहते थे। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है। कि सामाजिक एवं आर्थिक लोकतन्त्र के अभाव में राजनीतिक लोकतन्त्र का कोई मूल्य नहीं होता, परन्तु इसके लिए वे संघर्ष एवं हिंसा को साधन नहीं बनाना चाहते थे। वे हिंसात्मक रवैये को एकदम ‘अवैज्ञानिक’, ‘तर्कहीन’ तथा ‘असभ्य’ समझते थे। उनकी धारणा यह थी कि समाज की प्रमुख समस्याओं का कोई भी समाधान हिंसा के द्वारा नहीं किया जा सकती। इसका स्पष्ट अर्थ यही निकलता है कि उन पर गाँधी जी का प्रभाव विशेष रूप से अधिक था। वे गाँधी जी द्वारा प्रतिपादित शान्तिपूर्ण उपायों में विश्वास रखते थे। उन्होंने स्पष्ट किया था कि राष्ट्रीय सम्पत्ति में वृद्धि करके तथा समाज में विद्यमान असमानताओं को कम करके सब लोगों को प्रगति के लिए समान अवसर प्रदान करने वाले समाजवादी लक्ष्य की प्राप्ति शान्तिपूर्ण संवैधानिक साधनों से ही होनी चाहिए।

4. लोकतन्त्र की प्रथम शर्त दरिद्रता, असमानता एवं अशिक्षा को समाप्त करना – नेहरू जी लोकतन्त्र के आर्थिक पक्ष के महत्त्व को स्वीकार करते थे। उनका विचार था कि स्वराज्य को यथार्थ रूप देने के लिए राष्ट्र के धन का समुचित एवं न्यायपूर्ण वितरण किया जाए तथा समाज में विद्यमान वर्ग विभेद को समाप्त किया जाए। शिक्षा के माध्यम से शिक्षित एवं अशिक्षित जनता के अन्तर को दूर किया जाए। दरिद्रता, असमानता एवं अशिक्षा को समाप्त करना वे लोकतन्त्र के लिए प्रथम शर्त मानते थे।

भारत में लोकतान्त्रिक समाजवाद
यदि आज भारत की जनता ने लोकतान्त्रिक समाजवाद’ को अपना मान लिया है तथा ‘समाजवाद’ शब्द सम्माननीय एवं सुन्दर हो गया है और यदि इसका अर्थ ‘उग्र वर्ग-संघर्ष’ तथा ‘सर्वहारा वर्ग की अधिनायकता के स्थान पर ‘विकास’, ‘कल्याण तथा सामाजिक जीवन में ईमानदारी’, ‘पवित्रता’ एवं ‘अनुशासन’ लगाया जाने लगा है तो इसका श्रेय साम्यवादी दल, प्रजा समाजवादी दल अथवा समाजवादी दल को ही नहीं बल्कि पण्डित जवाहरलाल नेहरू को है। उन्होंने ही अपने प्रयासों द्वारा लोकतन्त्र एवं समाजवाद का समन्वय करके इस नवीन विचारधारा को जन्म दिया। यद्यपि वे मार्क्सवाद के सिद्धान्तों के पक्षपाती थे, किन्तु वे मार्क्सवादी या साम्यवादी नहीं थे। उन्होंने मार्क्सवाद के समाजवादी पक्ष को कुछ संशोधन कर स्वीकार किया है। उनके इन्हीं विचारों को भारत के संविधान की प्रस्तावना तथा नीति-निदेशक सिद्धान्तों में स्थान दिया गया है। शासन के द्वारा अपनायी गई पंचवर्षीय योजनाओं में लोकतन्त्रात्मक समाजवाद के लक्ष्यों के अनुरूप नीतियों का निर्माण किया गया। नेहरू जी का विचार था कि “नियोजित अर्थव्यवस्था द्वारा ही हम समाजवाद को प्राप्त कर सकते हैं; अतः हमारे देश में अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में आर्थिक नियोजन (Economic Planning) की नीति को अपनाया गया है। वास्तव में नेहरू जी का चिन्तनपूर्ण रूप से व्यावहारिक कहा जा सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (शब्द सीमा : 150 शब्द) (4 अंक)

प्रश्न 1.
समाजवादी राज्य की अवधारणा का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। [2007]
या
समाजवादी राज्य के कार्यों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। [2010]
उत्तर
समाजवाद की आलोचना
आधुनिक पूँजीवादी व्यवस्था के अन्त के लिए समाजवाद एक सुन्दर मार्ग प्रस्तुत करता है। समाजवाद ने व्यक्तिगत हित की अपेक्षा सामाजिक हित को उच्चतर स्थान प्रदान कर प्रशंसनीय कार्य किया है, किन्तु इन गुणों के होते हुए भी समाजवादी व्यवस्था दोषमुक्त नहीं है। इस व्यवस्था की प्रमुख रूप से निम्नलिखित आधारों पर आलोचना की जाती है-

1. उत्पादन क्षमता में कमी – यह मानव स्वभाव है कि व्यक्तिगत लाभ की प्रेरणा पर ही वह ठीक प्रकार से कार्य कर सकता है। समाजवादी व्यवस्था में उत्पादन कार्य राज्य के हाथ में आ जाने और सभी व्यक्तियों को पारिश्रमिक निश्चित होने के कारण कार्य करने के लिए प्रेरणा का अन्त हो जाता है और व्यक्ति आलसी बन जाता है। इसी कारण आर्थिक प्रगति रुक जाती है।

2. नौकरशाही का विकास समाजवादी –  व्यवस्था में सभी उद्योगों पर राजकीय नियन्त्रण होगा और उनका प्रबन्ध सरकारी अधिकारियों द्वारा किया जाएगा। सरकारी अधिकारियों के हाथ में शक्ति आ जाने का स्वाभाविक परिणाम नौकरशाही का विकास होगा। काम की गति शिथिल हो जाएगी, सरल-से-सरल काम देर से होंगे और घूसखोरी तथा भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन मिलेगा।

3. समानता की धारणा प्राकृतिक विधान के विरुद्ध – समाजवाद समानता, सबसे प्रमुख रूप में आर्थिक समानता पर बल देता है और आलोचकों के अनुसार समानता का यह विचार प्राकृतिक विधान और प्राकृतिक व्यवस्था के विरुद्ध है। प्रकृति के द्वारा व्यक्तियों को शारीरिक, मानसिक और नैतिक शक्तियाँ समान रूप में नहीं वरन् असमान रूप में प्रदान की गयी हैं और इसी कारण समानता स्थापित करने के किसी भी प्रयत्न में सफलता प्राप्त होमा बहुत अधिक सन्देहपूर्ण है।

4. राज्य की कार्यकुशलता में कमी – समाजवादी व्यवस्था में राज्य के कार्यक्षेत्र में बहुत अधिक विस्तार हो जाने के कारण राज्य की कार्यकुशलता में भी कमी हो जाएगी। समाजवादी व्यवस्था में सार्वजनिक निर्माण सम्बन्धी, उत्पादन, वितरण तथा श्रमिक विधान सम्बन्धी सभी कार्य राज्य द्वारा होंगे। आलोचकों का कथन है कि राज्य के हाथ में इतने अधिक कार्यों के आ जाने से एक भी कार्य ठीक प्रकार से सम्पन्न नहीं हो सकेगा।

5. मनुष्य का नैतिक पतन – सभी कार्यों को करने की शक्ति राज्य के हाथ में आ जाने से आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास, साहस और आरम्भक के नैतिक गुणों का व्यक्तियों में अन्त हो जाएगा। समाजवादी व्यवस्था में उसे अपने विकास की नवीन दिशाएँ और देशाएँ न प्राप्त होने के कारण वह हतप्रभ हो जाएगा और उसका नैतिक पतन हो जाएगा।

6. समाजवादी व्यवस्था अपव्ययी होगी – आलोचके यह भी कहते हैं कि समाजवादी व्यवस्था पूँजीवादी व्यवस्था से बहुत अधिक खर्चीली होगी। जब सरकार के द्वारा किसी प्रकार का कार्य किया जाता है तो एक छोटे-से काम के लिए अनेक कर्मचारी रखे जाते हैं और फिर भी यह कार्य सफलतापूर्वक नहीं हो पाता।

7. व्यक्ति की स्वतन्त्रता के अन्त का भय – समाजवाद के अन्तर्गत जब सरकार के द्वारा बहुत अधिक कार्य किये जाते हैं तो इस बात का भय रहता है कि व्यक्तियों के जीवन में सरकार के इस अत्यधिक हस्तक्षेप से उनकी स्वतन्त्रता का अन्त हो जाएगा।

प्रश्न 2.
व्यक्तिवाद और समाजवाद का अन्तर समझाइए। उद्योगों के निजीकरण की प्रवृत्ति इन दोनों में से किसकी अवधारणा के प्रतिकूल है? कारण का भी उल्लेख कीजिए। [2007]
उत्तर
व्यक्तिवाद और समाजवाद का अन्तर

1. विचारधारा – व्यक्तिवादी सिद्धान्त के समर्थक व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर बल देते हैं। उनके अनुसार, राज्य के कार्य तथा कानून व्यक्ति की स्वतन्त्रता को प्रतिबन्धित करते हैं; अत: राज्य के कार्यों की संख्या न्यूनतम होनी चाहिए। वे राज्य को एक आवश्यक बुराई मानते हैं। । दूसरी ओर समाजवादी विचारधारा के अनुसार राज्य के द्वारा वे सभी कार्य किये जाने चाहिए जो व्यक्ति और समाज की उन्नति के लिए आवश्यक हों। इस विचारधारा के अनुसार राज्य के कार्यों की कोई सीमा नहीं है तथा सामाजिक जीवन के प्रायः सभी कार्य राज्य के कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत आ जाते हैं।

2. कार्यक्षेत्र- व्यक्तिवादी चाहते हैं कि राज्य के कार्यक्षेत्र को अधिक-से-अधिक सीमित कर दिया जाए। स्पेन्सर के मतानुसार, “व्यक्ति का स्थान समाज तथा राज्य के ऊपर होना चाहिए।
और राज्य को केवल वही कार्य करने चाहिए जिन्हें व्यक्ति नहीं कर सकता।” उनके अनुसार राज्य के केवल तीन निम्नलिखित कार्य होने चाहिए-

  • आन्तरिक शान्ति और व्यवस्था करना,
  • देश की बाहरी आक्रमणों से रक्षा करना तथा
  • न्याय और दण्ड की व्यवस्था करना।

दूसरी ओर समाजवादी समानता को अपना आदर्श मानकर चलते हैं और राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में अधिकाधिक स्थापित करने के लिए निम्नलिखित बातों पर विशेष बल देते हैं–

  • समाज की आंगिक एकता,
  • समाज में प्रतियोगिता के स्थान पर सहयोग,
  • पूँजीवाद का अन्त तथा
  • उत्पादन के साधनों पर सामाजिक स्वामित्व।

उद्योगों के प्रति दृष्टिकोण
व्यक्तिवादी विचारधारा राज्य के कार्यों को न्यूनतम कर देना चाहती है तथा उद्योगों को व्यक्तियों के लिए पूर्ण रूप से खुला रखना चाहती है। वह उद्योगों की स्थापना, संचालन तथा विकासे में राज्य का हस्तक्षेप नहीं चाहती। वह खुली प्रतियोगिता में विश्वास रखती है तथा एक प्रकार से पूँजीवाद की समर्थक है।
दूसरी ओर समाजवादी विचारधारा पूँजीवाद की घोर विरोधी होने के कारण भूमि और उद्योगों पर व्यक्तिगत स्वामित्व के अन्त की माँग करती है। यह विचारधारा उत्पादन के समस्त साधनों पर सामाजिक स्वामित्व स्थापित करना चाहती है। समाजवादी विचारधारा के अनुसार वैयक्तिक उद्योग वैयक्तिक लूटमार है और व्यक्तिगत सम्पत्ति को सामाजिक अथवा सामूहिक सम्पत्ति का रूप देना ही उचित है।
अतः निष्कर्षतया कहा जा सकता है कि उद्योगों के निजीकरण की प्रवृत्ति समाजवादी विचारधारा के प्रतिकूल है।

प्रश्न 3.
राज्य से सम्बन्धित मनु व कौटिल्य के सप्तांग सिद्धान्त का वर्णन कीजिए।
या
आचार्य मनु द्वारा प्रतिपादित साप्तांग सिद्धान्त के अनुसार राज्य के किन्हीं दो अंगों के नाम लिखिए। [2012, 13]
उत्तर
भारत की प्राचीन राजनीतिक विचारधारा के अन्तर्गत मनु और कौटिल्य दो जाज्वल्यमान क्षेत्र हैं तथा इन दोनों की विचारधारा एक-दूसरे के बहुत अधिक समान है। मनुस्मृति (जिसे कि हिन्दू विधि की सम्पूर्ण व्यवस्था की आधारशिला माना जाता है।) के अन्तर्गत राज्य के सावयव स्वरूप (Organic form) की चर्चा की गई है; अर्थात् इसके राज्य की कल्पना जीवित जाग्रत शरीर के रूप में की गई है तथा राज्य को सप्तांगी माना गया है। मनुस्मृति के अनुसार, राज्य के सात । अंग इस प्रकार हैं—(1) स्वामी (राजा), (2) मन्त्री, (3) पुर, (4) राष्ट्र, (5) कोष, (6) दण्ड तथा (7) मित्र। मनुस्मृति में चारों दिशाओं में व्याप्त एक विशाल राज्य का चित्र खींचा गया है जिसके आधार पर सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है, अथवा यह सम्भावना की जा सकती है। कि इस ग्रन्थ की रचना के समय एक सुविशाल प्रदेश को राजनीतिक एकता प्राप्त हो चुकी थी। आचार्य कौटिल्य ने भी अपने ग्रन्थ ‘अर्थशास्त्र में राज्य के सप्तांग सिद्धान्त का वर्णन किया है। इस प्रकार कौटिल्य के अनुसार भी राज्य का निर्माण सप्त अंगों अथवा तत्त्वों से मिलकर हुआ है।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि राज्य की संरचना, प्रकार्यों एवं प्रकृति का अध्ययन एवं विश्लेषण करने के उद्देश्य से मनु एवं कौटिल्य दोनों ने राज्य की तुलना मानव शरीर से की है; अर्थात् उसे एक जीवित शरीर के रूप में निरूपित किया है तथा उसके सात अंग बताये हैं। राज्य के इन सात अंगों का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है-

1. स्वामी – मनु और कौटिल्य दोनों ने यह स्पष्ट किया है कि राज्य के समस्त अंगों में सबसे महत्त्वपूर्ण अंग स्वामी अथवा राजा है, परन्तु उसे निरंकुश व स्वेच्छाचारी नहीं, अपितु धर्म के अधीन माना गया है।

2. मन्त्री अथवा आमात्य – राजा की सहायता एवं उसे परामर्श देने के लिए मन्त्रिपरिषद् की व्यवस्था पर बल दिया गया है।

3. पुर अथवा दुर्ग – यह कहा गया है कि सैन्य शक्ति का प्रयोग पुर अथवा दुर्ग से ही भली भॉति सम्भव है। यह राज्य की सुरक्षा व्यवस्था का प्रतीक है। जिसका दुर्ग सुदृढ़ होता है उस राज्य को परास्त करना सरल नहीं है।

4. जनपद – जनपद में जनता तथा भूमि के भागों को सम्मिलित किया गया है।

5. कोष – राज्य की शक्ति एवं उसकी सुदृढ़ता के लिए एक धन-धान्य से पूर्ण राजकोष होना चाहिए तथा उसकी क्षमता इतनी होनी चाहिए कि वह आपातकाल में राज्य की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके।

6. दण्ड अथवा सेना – राज्य की सुरक्षा के लिए दण्ड अथवा सेना का विशिष्ट महत्त्व होता है। सुरक्षा एवं आक्रामक-नीति दोनों को अपनाने के लिए एक प्रशिक्षित, अनुशासित, राष्ट्रभक्त तथा निष्ठावान सेना होनी चाहिए।

7. मित्रराष्ट्र की शक्ति के लिए उसके मित्र – राष्ट्रों की संख्या अधिकाधिक होनी चाहिए। | इस प्रकार हम देखते हैं कि मनु तथा कौटिल्य की विचारधारा एक-दूसरे के बहुत-कुछ समान है तथा दोनों ने सप्तांग सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है।

UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 2 Theories of the Functions of the State

प्रश्न 4.
समाजवाद के विरोध में तर्क दीजिए।
उत्तर
समाजवाद के विरोध में तर्क निम्नवत् हैं-

  1. व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का अन्त – राज्य के कार्य-क्षेत्र का विस्तार व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अन्त का परिचायक है। योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था में सभी वस्तुएँ राज्य द्वारा नियन्त्रित होती हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति स्वतन्त्र होने के स्थान पर राज्य का गुलाम बन जाता है। हेयक ने उचित ही कहा है, “पूर्ण नियोजन का आशय पूर्ण गुलामी है।”
  2. पूर्ण समानता असम्भव – समाजवाद समानता पर आधारित विचारधारा है। प्रकृति ने समस्त व्यक्तियों को समान उत्पन्न नहीं किया। जन्म से कुछ व्यक्ति बुद्धिमान तो कुछ मूर्ख, कुछ स्वस्थ तो कुछ अस्वस्थ, कुछ परिश्रमी तो कुछ आलसी होते हैं। इन सभी को समान समझना प्राकृतिक सिद्धान्त की अवहेलना करना है। पूर्ण समानता स्थापित नहीं की जा सकती।
  3. कार्य करने की प्रेरणा का अन्त – व्यक्तियों को श्रम करने की प्रेरणा इस भावना से मिलती है कि वे व्यक्तिगत सम्पत्ति का संचय कर सकेंगे। समाजवादी व्यवस्था में उत्पादन एवं वितरण के साधनों पर राजकीय नियन्त्रण का परिणाम यह होता है कि व्यक्तियों में कार्य करने की प्रेरणा का अन्त हो जाता है।
  4. नौकरशाही का महत्त्व – समाजवाद में राज्य के कार्यों में बढ़ोतरी होने के कारण नौकरशाही का महत्त्व बढ़ता है तथा समस्त फैसले शासकीय कर्मचारियों द्वारा लिए जाते हैं। वह जन इच्छाओं एवं आवश्यकताओं की इतनी चिन्ता नहीं करते जितनी अपने स्वार्थों की। ऐसी परिस्थिति में भ्रष्टाचार बढ़ता है।
  5. समाजवाद से हिंसा को बढावा – समाजवाद अपने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु क्रान्तिकारी तथा हिंसात्मक मॉग को अपनाता है। वह शान्तिपूर्ण तरीकों में आस्था नहीं रखता। समाजवाद के द्वारा वर्ग-संघर्ष पर बल देने के परिणामस्वरूप समाज में विभाजन एवं वैमनस्यता की भावना फैलती है।
  6. उत्पादन का श्रेय श्रमिकों को देना त्रुटिपूर्ण – उत्पादन का श्रेय केवल श्रमिकों को देना न्यायसंगत नहीं है। उत्पादन में श्रम के अलावा पूँजी तथा संसाधन इत्यादि भी आवश्यक होते हैं तथा स्थूल रूप में इन सभी को पूँजी ही कहा जा सकता है।
  7. समाजवाद लोकतन्त्र विरोधी – समाजवाद की प्रवृत्ति जहाँ व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर अंकुश लगाती है, वहीं लोकतन्त्र का आधार ही व्यक्ति की स्वतन्त्रता है। लोकतन्त्र में व्यक्ति के अस्तित्व को अत्यन्त उत्तम स्थान प्राप्त है, जबकि समाजवाद में वह राज्यरूपी विशाल मशीन में एक निर्जीव पुर्जा बन जाता है।
  8. उग्र राष्ट्रीयता का विकास – समाजवाद किसी राष्ट्रीय सीमा पर विश्वास नहीं करता। वह विश्व के सर्वहारा वर्ग को एक झण्डे के नीचे इकट्ठा करना चाहता है तथा राष्ट्रीयता की भावना से ऊपर उठाकर श्रमिकों को राज्य से लड़ाना चाहता है। मार्क्स के अनुसार, “राज्य ने सदैव ही पूँजीपतियों, सामन्तों तथा शोषक वर्ग का साथ दिया है। आज राष्ट्रवाद प्रधान और समाजवाद गौण है।’

प्रश्न 5.
क्या भारत में कल्याणकारी राज्य की स्थापना की गई है। इसके पक्ष में किन्हीं दो तर्कों का उल्लेख कीजिए। [2012]
उत्तर
कल्याणकारी राज्य से तात्पर्य एक ऐसे राज्य से है जिसके अन्तर्गत सम्पूर्ण जनता का कल्याण किया जाता है, किसी वर्ग विशेष का नहीं। पं० नेहरू के अनुसार, “सबके लिए समान अवसर प्रदान करना, अमीरों और गरीबों के बीच अन्तर को समाप्त करना तथा जीवन-स्तर को उठाना लोक-कल्याणकारी राज्य के आधारभूत तत्त्व हैं। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक क्षेत्रों में विकास की सुविधाओं का ध्यान रखते हुए कल्याणकारी राज्य की स्थापना का प्रयत्न किया है। इसके पक्ष में दो तर्क इस प्रकार हैं-

  • भारत के संविधान में कल्याणकारी राज्य की स्थापना के लक्ष्य की पूर्ति को ध्यान में रखते हुए नीति-निदेशक तत्त्वों को सम्मिलित किया गया है। संविधान की प्रस्तावना में भारत के समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक क्रम प्रदान करने का निश्चय किया गया है।
  • लोक-कल्याणकारी कार्यक्रम को सुव्यवस्थित रूप देने की दृष्टि से पंचवर्षीय योजनाओं का निर्माण किया गया है, जिनके अनुसार भारतीय समाज और भारतीय नागरिकों के चतुर्मुखी विकास की दिशा में अनेक उपयोगी योजनाएँ क्रियान्वित की जा रही हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न (शब्द सीमा : 50 शब्द) (2 अंक)

प्रश्न 1.
समाजवाद के अनुसार राज्य का कार्यक्षेत्र बताइए।
या
समाजवादी राज्य के कार्यों का परीक्षण कीजिए। [2010]
उत्तर
राज्य के कार्यक्षेत्र का निर्धारण करने की दृष्टि से समाजवादी सिद्धान्त व्यक्तिवादी सिद्धान्त के ठीक विपरीत है। व्यक्तिवाद जहाँ राज्य के सीमित कार्यक्षेत्र पर बल देता है वहीं समाजवाद राज्य के उन समस्त कार्यों को सम्पादित करने को कहता है, जिनसे समाज की उन्नति सम्भव है। इसके अतिरिक्त समाजवाद की मान्यता है कि राज्य को उत्पत्ति एवं वितरण के साधनों पर नियन्त्रण रखकर स्वयं ही सार्वजनिक हित के कार्यों का सम्पादन करना चाहिए। अतः कहा जा सकता है कि समाजवाद के अनुसार प्रायः सामाजिक जीवन के समस्त कार्य राज्य के कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत आ जाते हैं। इस सम्बन्ध में गार्नर का यह कथन उचित ही है, “राज्य मानव विकास की सर्वोच्च संस्था है। उसका कार्यक्षेत्र व्यापक है। वह व्यक्ति के सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक एवं नैतिक सभी क्षेत्रों के हितों की अभिवृद्धि करती है।”

प्रश्न 2.
“लोक-कल्याणकारी राज्य न्यूनतम जीवन-स्तर की गारण्टी है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
उत्तर
प्रत्येक व्यक्ति को इतना पारिश्रमिक तो अवश्य ही मिलना चाहिए कि वह न्यूनतम जीवन-स्तर के अनुसार अपने जीवन-यापन हेतु आवश्यक सामग्री तथा सुविधाएँ प्राप्त कर सके। इस सम्बन्ध में अर्थशास्त्री क्राउथर ने लिखा है कि “नागरिकों को स्वस्थ जीवन व्यतीत करने हेतु पर्याप्त भोजन-व्यवस्था होनी चाहिए। निवास, वस्त्र इत्यादि के न्यूनतम जीवन-स्तर की ओर से उन्हें चिन्तारहित होना चाहिए। शिक्षा की उन्हें पूर्ण तथा समान अवसर प्राप्त होना चाहिए। उन्हें जीवन का आनन्द भोगने हेतु अवकाश एवं साधन मिलने चाहिए। बेरोजगारी तथा वृद्धावस्था के दु:ख से उनकी रक्षा करनी चाहिए।’

प्रश्न 3.
कौटिल्य के अनुसार राज्य को कौन-से लोकहितकारी कार्य करने चाहिए?
उत्तर
कौटिल्य ने राज्य को लोकहित तथा सामाजिक कल्याण के कार्य सौंपे हैं। लोक-कल्याण सम्बन्धी जिन कार्यों को राजा सम्पन्न करता है उनमें प्रमुख निम्नलिखित हैं|

  1. जीविकोपार्जन के साधनों का नियमन।
  2. चिकित्सालयों का निर्माण।
  3. वृद्ध, असहाय, अनाथ, विधवा, दुःखियों तथा रोगियों की सहायता।
  4. कृषि, पशुपालन, उद्योग, वाणिज्य इत्यादि का विकास।
  5. बाँधों का निर्माण, जलमार्ग, जलाशय, स्थलमार्ग एवं बाजार बनाना।
  6. दुर्भिक्ष के समय जनसाधारण की सहायता।
  7. पण्डितों का आदर एवं सम्मान।
  8. ज्ञान के अनुसन्धान कार्य में लगे आश्रमवासियों एवं विद्यार्थियों की रक्षा।
  9. आवश्यक होने पर धनवानों से अधिक कर वसूलकर गरीबों में वितरित करना।
  10. जंगलों की रक्षा करना।
  11. मानव के चारों उद्देश्यों अर्थात् धर्म, काम, मोक्ष एवं अर्थ की सिद्धि में सहायता करना।

प्रश्न 4.
आधुनिक राज्य के चार प्रमुख कार्यों का वर्णन कीजिए। [2013, 14]
उत्तर
आधुनिक राज्य के चार प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं-

  1. शान्ति एवं व्यवस्था की स्थापना,
  2. देश की बाह्य आक्रमण से सुरक्षा,
  3. अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की स्थापना,
  4. न्याय एवं दण्ड की व्यवस्था।

प्रश्न 5.
व्यक्तिवादी विचारधारा के अन्तर्गत गिलक्रिस्ट ने राज्य का कार्यक्षेत्र किस प्रकार निर्धारित किया है?
उत्तर
व्यक्तिवादी विचारधारा के अन्तर्गत गिलक्रिस्ट ने राज्य का कार्यक्षेत्र निम्नलिखित प्रकार से निर्धारित किया है

  1. देश में शान्ति एवं व्यवस्था बनाये रखना,
  2. राज्य एवं राज्य के नागरिकों की बाह्य शत्रुओं से सुरक्षा,
  3. नागरिकों की मानहानि से रक्षा,
  4. नागरिकों के जीवन, सम्पत्ति इत्यादि की सुरक्षा तथा
  5. अपराधियों का पता लगाकर उन्हें दण्डित करना।

प्रश्न 6.
व्यक्तिवाद की चार विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
व्यक्तिवादी सिद्धान्त की चार प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. व्यक्तिवाद राज्य को एक आवश्यक बुराई मानता है।
  2. व्यक्तिवाद राज्य को साधन मानता है।
  3. यह व्यक्ति को साध्य अथवा लक्ष्य मानता है तथा व्यक्तित्व के विकास पर बल देता है।
  4. व्यक्तिवाद व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर अत्यधिक बल देता है।

प्रश्न 7.
आर्थर स्लेशिंगर तथा गार्नर ने कल्याणकारी राज्य की क्या परिभाषा दी है?
उत्तर
आर्थर स्लेशिंगर के शब्दों में, “कल्याणकारी राज्य वह व्यवस्था है जिसके अन्तर्गत शासन अपने समस्त नागरिकों हेतु रोजगार, आय, चिकित्सा, शिक्षा, सहायता, सामाजिक सुरक्षा एवं आवास के कुछ स्तर स्थापित करने हेतु तैयार रहता है।”
गार्नर के मतानुसार, “कल्याणकारी राज्य का उद्देश्य राष्ट्रीय जीवन, राष्ट्रीय सम्पत्ति तथा जीवन में भौतिक तथा नैतिक स्तर को विस्तृत करना है।”

प्रश्न 8.
लोक-कल्याणकारी राज्य अपने कार्यक्षेत्र में कैसे वृद्धि कर लेता है?
उत्तर
लोक-कल्याणकारी राज्य की एक प्रमुख विशेषता है कि इसमें राज्य का कार्यक्षेत्र अत्यन्त व्यापक होता है। वस्तुतः यह सिद्धान्त व्यक्तिवाद के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया है और इस आदर्श पर आधारित है कि राज्य को वह समस्त कार्य करने चाहिए जिनके करने से व्यक्ति की स्वतन्त्रता नष्ट अथवा कम नहीं होती। इसी आधार पर एम०जी० हॉब्सन ने लिखा है कि राज्य ने एक डॉक्टर, एक नर्स, स्कूल मास्टर, व्यापारी, उत्पादक, बीमा एजेण्ट, मकान बनाने वाले मिस्त्री, नगर योजना तैयार करने वाले, रेलवे नियन्त्रक इत्यादि सैकड़ों अन्य लोगों के कार्यों के उत्तरदायित्व को स्वीकार कर लिया है।”

प्रश्न 9.
समाजवाद के दो गुणों का उल्लेख कीजिए। [2013]
उत्तर
समाजवाद की विचारधारा की उत्पत्ति व्यक्तिवाद की प्रतिक्रिया के रूप में हुई और वर्तमान समय में यह विचारधारा बहुत अधिक लोकप्रिय है। इसके दो गुण निम्नवत् हैं-

1. समाजवाद भ्रातृत्व तथा समाज-सेवा भाव को बढ़ाता है- समाजवादी राज्य समानता पर आधारित होगा। यह राज्य सामूहिक हानि-लाभ के विचार को ध्यान में रखते हुए भ्रातृत्व की ओर अग्रसर होगा। व्यक्तियों पर समाजवादी व्यवस्था को अपनाने का मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ेगा और इस बात की आशा की जा सकती है कि समाजवादी व्यवस्था में उनकी प्रवृत्ति व्यक्तिगत स्वार्थों की तुष्टि के स्थान पर सामूहिक हितों की साधना ही हो जाएगी।

2. समाजवाद एक न्यायपूर्ण तथा जनतान्त्रिक विचारधारा है- राजनीतिक क्षेत्र में समाजवाद जनतन्त्र के प्रति विश्वास व्यक्त करता है, क्योंकि राजतन्त्रीय या कुलीनतन्त्रीय व्यवस्था में अनिवार्य रूप से विद्यमान भेद समाजवाद को मान्य नहीं हैं। इसके अतिरिक्त समाजवाद उत्पादन पर ‘सामूहिक स्वामित्व’ और उसकी सामूहिक व्यवस्था का समर्थक है, जो पूर्णतया प्रजातान्त्रिक तथा न्यायोचित विचार है। वास्तव में प्रजातन्त्र और समाजवाद परस्पर पूरक हैं जिनमें से एक राजनीतिक समानता का प्रतिपादन करता है तो दूसरा आर्थिक समानता का। लैडलर के शब्दों में, “प्रजातान्त्रिक आदर्श का आर्थिक पक्ष वास्तव में समाजवाद ही है।”

प्रश्न 10.
धर्म-निरपेक्ष राज्य के दो लक्षण बताइए। [2012]
उत्तर

  1. धर्म-निरपेक्ष राज्य न तो धार्मिक होता है और न धर्म-विरोधी, अपितु वह धार्मिक संकीर्णताओं एवं वृत्तियों से बिल्कुल दूर धार्मिक मामलों में पूर्णतया तटस्थ होता है।
  2. धर्म-निरपेक्ष राज्य किसी धर्म विशेष को प्रधानता प्रदान नहीं करता। धर्म या सम्प्रदाय के नाम पर वह न तो किसी की सहायता करता है और न ही किसी नागरिक को सरकारी पद से वंचित करता है।

प्रश्न 11.
समाजवाद तथा लोक-कल्याणकारी राज्यों में दो अन्तर लिखिए। [2007, 10]
उत्तर
समाजवाद एवं लोक-कल्याणकारी राज्यों में प्रमुख रूप से निम्नलिखित दो अन्तर हैं-

1. लोक-कल्याणकारी राज्य प्रमुख रूप से आर्थिक सुरक्षा के विचार पर आधारित है। आर्थिक सुरक्षा से तात्पर्य सभी व्यक्तियों को रोजगार, न्यूनतम जीवन-स्तर की गारण्टी एवं अधिकतम आर्थिक समानता से है।
समाजवादी राज्य आर्थिक समानता पर बल देता है यद्यपि समानता का यह विचार प्राकृतिक विधान और प्राकृतिक व्यवस्था के विरुद्ध है। समाजवाद का आर्थिक समानता का विचार पूँजीवाद के अन्त में निहित है।

2. समाजवाद राज्य को अधिकाधिक कार्य सौंपना चाहता है। समाजवाद राज्य के कार्यक्षेत्र को व्यापक करना चाहते हैं। इसके विपरीत कल्याणकारी राज्य को वे सभी जनहितकारी कार्य सौंपना चाहते हैं जिनके करने से व्यक्ति की स्वतन्त्रता नष्ट नहीं होती। लोक-कल्याणकारी राज्य नागरिक स्वतन्त्रताओं के हिमायती हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
राज्य के कार्यो सम्बन्धी किन्हीं दो सिद्धान्तों के नाम बताइए। (2010)
उत्तर

  1. समाजवाद तथा
  2. व्यक्तिवाद।

प्रश्न 2.
राज्य के कार्यों को कितने भागों में बाँटा जा सकता है ? [2008]
उत्तर

  1. आवश्यक या अनिवार्य कार्य,
  2. ऐच्छिक कार्य।

प्रश्न 3.
राज्य के दो अनिवार्य कार्य लिखिए। [2008, 11, 186]
उत्तर

  1. आन्तरिक शान्ति और व्यवस्था को बनाये रखना तथा
  2. देश की बाह्य आक्रमणों से रक्षा करना।

प्रश्न 4.
राज्य के दो ऐच्छिक कार्य बताइए। [2016]
उत्तर

  1. शिक्षा का प्रबन्ध करना तथा
  2. उद्योग-धन्धों और व्यापार का विकास करना।

प्रश्न 5.
“राज्य एक आवश्यक बुराई है।” राज्य के बारे में यह विचारधारा किस सिद्धान्त से सम्बन्धित है? [2010]
उत्तर
व्यक्तिवाद से।

प्रश्न 6.
व्यक्तिवाद के किन्हीं दो समर्थकों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. जे०एस० मिल तथा
  2. हरबर्ट स्पेन्सर।

प्रश्न 7.
व्यक्तिवाद के दो गुण लिखिए।
उत्तर

  1. व्यक्ति को प्रमुखता तथा
  2. राज्य के कार्यों पर नियन्त्रण।

प्रश्न 8.
राज्य के व्यक्तिवादी सिद्धान्त के विरुद्ध दो तर्क दीजिए।
उत्तर

  1. राज्य का हस्तक्षेप आवश्यक है तथा
  2. राज्य एक आवश्यक बुराई न होकर सकारात्मक अच्छाई है।

प्रश्न 9.
राज्य की सम्प्रभुता को अस्वीकार करने वाले सिद्धान्त का नाम लिखिए।
उत्तर-
राज्य का व्यक्तिवादी सिद्धान्त।

प्रश्न 10.
आदर्शवाद के सिद्धान्त की दो मुख्य बातें बताइए। [2007]
उत्तर

  1. राज्य साध्य और व्यक्ति साधन है तथा
  2. राज्य का आधार शक्ति नहीं, इच्छा

प्रश्न 11.
समाजवाद के दो समर्थकों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. कार्ल माक्र्स तथा
  2. जयप्रकाश नारायण।

प्रश्न 12.
समाजवाद के दो लक्षण बताइए। [2012]
उत्तर

  1. व्यक्तिवाद का विरोध
  2. समानता का समर्थन।

प्रश्न 13.
समाजवाद के पक्ष में दो तर्क दीजिए। [2014, 16]
उत्तर

  1. यह न्याय पर आधारित है तथा
  2. यह अधिक लोकतन्त्रात्मक है।

प्रश्न 14.
समाजवाद के दो दोष लिखिए।
उत्तर

  1. सरकार की शक्ति में अधिक वृद्धि तथा
  2. धर्म का विरोध।

प्रश्न 15.
समाजवाद की कोई दो मान्यताएँ बताइए।
उत्तर

  1. व्यक्ति की अपेक्षा समाज को प्राथमिकता तथा
  2. उत्पादन के साधनों पर सामाजिक स्वामित्व।

प्रश्न 16.
लोक-कल्याणकारी राज्य की कोई एक परिभाषा लिखिए।
या
लोक-कल्याणकारी राज्य क्या है? [2014]
उत्तर
“लोक-कल्याणकारी राज्य वह राज्य है जो अपने नागरिकों के लिए विस्तृत मात्रा में नागरिक सेवाएँ प्रदान करता है।’

प्रश्न 17.
लोक-कल्याणकारी राज्य के दो कार्य लिखिए। [2010, 14]
उत्तर

  1. लोक-कल्याणकारी राज्य नागरिकों के न्यूनतम सामाजिक जीवन-स्तर को बनाये रखने का प्रयास करता है तथा
  2. लोक-कल्याणकारी राज्य सभी नागरिकों के लिए समान अवसर उपलब्ध कराकर धनी और निर्धन के मध्य अन्तर को कम करता है।

प्रश्न 18.
कल्याणकारी राज्य के दो उद्देश्य लिखिए।
उत्तर

  1. आर्थिक सुरक्षा तथा
  2. न्याय की व्यवस्था।

प्रश्न 19.
लोक-कल्याणकारी राज्य के दो लक्षण (विशेषताएँ) बताइए। [2014]
उत्तर

  1. यह व्यक्ति की आर्थिक सुरक्षा की व्यवस्था करता है तथा
  2. यह समाज की सर्वव्यापी उन्नति का प्रयास करता है।

प्रश्न 20.
कल्याणकारी राज्य के दो दोष लिखिए।
उत्तर

  1. यह सामाजिक सुरक्षा देकर कार्य कर सकने योग्य वृद्धों को निष्क्रिय बना देती है। तथा
  2. इससे सरकार की शक्ति में अधिक वृद्धि हो जाती है।

प्रश्न 21
कल्याणकारी राज्य के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर

  1. भारत तथा
  2. ग्रेट ब्रिटेन।

प्रश्न 22.
मनु के अनुसार राज्य के दो कार्य बताइए।
उत्तर

  1. बाह्य आक्रमण से देश की रक्षा तथा
  2. असहायों की सहायता करना।

प्रश्न 23.
कल्याणकारी राज्य में राज्य के कार्य बढ़ते हैं या घटते हैं?
उत्तर
कल्याणकारी राज्य में राज्य के कार्यों में अत्यधिक वृद्धि होती है।

प्रश्न 24.
सामान्य इच्छा (General will) के सिद्धान्त के प्रतिपादक का नाम बताइए।
उत्तर
रूसो।

प्रश्न 25.
मनु द्वारा बताये गये करों के प्रकार बताइए।
उत्तर

  1. बलि (विभिन्न प्रकार के कर),
  2. शुल्क (चुंगी),
  3. दण्ड (जुर्माना) तथा
  4. भाग (लगान)।

प्रश्न 26.
क्यों मनु की जनता राजा का विरोध कर सकती है?
उत्तर
मनु की जनता राजा का विरोध कर सकती है, उसे गद्दी से उतार सकती है और उसे मार भी सकती है, यदि वह अपनी मूर्खता से प्रजा को सताता है।

प्रश्न 27.
कौटिल्य द्वारा बताये गये राज्य के दो प्रमुख कार्य लिखिए।
उत्तर

  1. वर्णाश्रम धर्म को बनाये रखना तथा
  2. दण्ड की व्यवस्था करना।

प्रश्न 28.
कौटिल्य के अनुसार राज्य के अंगों की संख्या लिखिए। [2010]
उत्तर
कौटिल्य ने राज्य के सात अंग बताए हैं।

प्रश्न 29.
मनु द्वारा लिखित ग्रन्थ का नाम लिखिए। [2012]
उत्तर
मनु द्वारा लिखित ग्रन्थ का नाम है- मनुस्मृति।

प्रश्न 30.
कौटिल्य द्वारा लिखित ग्रन्थ का नाम बताइए। [2010]
उत्तर
कौटिल्य द्वारा लिखित ग्रन्थ का नाम है-अर्थशास्त्र

प्रश्न 31.
वैज्ञानिक समाजवाद का जनक कौन है ? (2007)
उत्तर
कार्ल मार्क्स को वैज्ञानिक समाजवाद का जनक माना जाता है।

प्रश्न 32.
‘व्यक्तिवाद’ की कोई एक परिभाषा लिखिए।
उत्तर
हम्बोल्ट ने व्यक्तिवाद की यह परिभाषा दी है, “व्यक्तिवाद व्यक्ति के हितों का समर्थक है। यह मनुष्य की क्षमताओं के पूर्ण विकास एवं उसके सभी अधिकारों का एक व्यक्ति होने के नाते उपयोग करने का समर्थन करता है।

प्रश्न 33.
व्यक्तिवाद सिद्धान्त के समर्थक किस बात पर सर्वाधिक बल देते हैं ?
उत्तर
व्यक्तिवाद सिद्धान्त के समर्थक व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर सर्वाधिक बल देते हैं।

प्रश्न 34.
आदर्शवादी विचारधारा की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर

  1. राज्य साध्य है, साधन नहीं तथा
  2. राज्य सर्वशक्तिमान तथा अनिवार्य है।

प्रश्न 35.
आदर्शवाद वे व्यक्तिवाद में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर
आदर्शवाद के अनुसार राज्य साध्य है, जबकि व्यक्तिवाद इसे साधन मानता है।

प्रश्न 36.
राज्य के समाजवादी सिद्धान्त के पक्ष में दो तर्क दीजिए। [2016]
उत्तर

  1. समाजवाद श्रमिकों एवं गरीबों के शोषण का विरोध करता है तथा
  2. समाजवाद श्रम तथा समाज सेवा पर अत्यधिक जोर देता है।

प्रश्न 37.
व्यक्तिवादियों के अनुसार, राज्य का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य कौन-सा है?
उत्तर
व्यक्तिवादियों के अनुसार राज्य का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य समाज में व्याप्त बुराइयों वे कुरीतियों को दूर रखना है।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

1. “वही सरकार सर्वश्रेष्ठ है जो सबसे कम शासन करती है।” यह कथन किसका है? [2014]
(क) हरबर्ट स्पेन्सर का
(ख) रिकार्डों का
(ग) फ्रीमैन का
(घ) माल्थस का

2. निम्नलिखित में से कौन आदर्शवादी विचारक है? [2012, 14]
(क) लॉक
(ख) हीगल
(ग) मिल
(घ) बेन्थम

3. मनु के अनुसार राज्य के कितने अंग हैं ? [2012]
(क) 4
(ख) 7
(ग) 8
(घ) 9

4. निम्नांकित में से कौन व्यक्तिवाद का प्रमुख समर्थक है?
(क) मैकाइवर
(ख) जे०एस० मिल।
(ग) बेन्थम
(घ) प्रो० विलोबी

5. निम्नलिखित में से कौन व्यक्तिवाद का प्रतिपादक है?
(क) सुकरात
(ख) हरबर्ट स्पेन्सर
(ग) टी०एच० ग्रीन
(घ) महात्मा गाँधी।

6. “प्रजा के सुख में ही राज्य का सुख है, प्रजाहित में ही राजा का हित है। राजा के लिए प्रजा के सुख से अलग कोई सुख नहीं।” यह कथन किसका है?
(क) मनु का
(ख) कौटिल्य का
(ग) सुकरात का
(घ) अरस्तू का

7. वैज्ञानिक समाजवाद का प्रतिपादक (जनक) कौन था?
(क) माओत्से तुंग
(ख) कार्ल माक्र्स
(ग) लेनिन
(घ) स्टालिन

8. “राज्य एक अनावश्यक बुराई है।” यह कथन किस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता है? [2007, 13]
(क) व्यक्तिवाद
(ख) अराजकतावाद
(ग) समाजवाद
(घ) आदर्शवाद

9. “वह सरकार सबसे अच्छी है, जो सबसे कम शासन करती है।” यह कौन-सी अवधारणा [2007, 10, 12, 15]
(क) आदर्शवादी
(ख) समाजवादी
(ग) व्यक्तिवादी
(घ) गाँधीवादी

10. राज्य एक आवश्यक बुराई है।’ यह किस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता है- [2010, 12, 13]
(क) समाजवाद
(ख) अराजकतावाद
(ग) व्यक्तिवाद
(घ) आदर्शवाद

11. ‘अर्थशास्त्र’ का लेखक कौन है ? [2009, 14]
(क) मनु
(ख) शुक्राचार्य
(ग) कौटिल्य
(घ) भीष्म

12. निम्नलिखित में से कौन समाजवादी चिन्तक नहीं है?
(क) जयप्रकाश नारायण
(ख) आचार्य नरेन्द्र देव
(ग) राममनोहर लोहिया
(घ) डॉ० बी०आर० अम्बेडकर

13. कौटिल्य के अनुसार, राज्य के कितने अंग होते हैं ? [2007, 08, 10, 12, 14]
(क) चार
(ख) पाँच
(ग) छः
(घ) सात

14. राज्यों के कार्यों का कौन-सा सिद्धान्त नागरिक की स्वतन्त्रता पर आधारित है? [2007, 08]
(क) आदर्शवाद
(ख) व्यक्तिवाद
(ग) साम्यवाद
(घ) फासीवाद

15. राज्य को अनिवार्य कार्य नहीं है- [2014]
(क) बाह्य आक्रमणों से रक्षा करना
(ख) मुद्रा का प्रबन्ध करना।
(ग) मनोरंजन की व्यवस्था करना
(घ) कर संग्रह करना

16. निम्नलिखित में से किस सिद्धान्त के अनुसार राज्य शोषण का यन्त्र है? [2014]
(क) व्यक्तिवाद
(ख) आदर्शवाद
(ग) साम्यवाद
(घ) फासीवाद

17. ‘ए ग्रामर ऑफ पॉलिटिक्स’ नामक पुस्तक के लेखक थे
(क) प्लेटो
(ख) हैरल्ड लॉस्की
(ग) ऐंजिल्स
(घ) कार्ल मार्क्स

18. निम्नांकित में से कौन-सा कल्याणकारी राज्य है?
(क) पाकिस्तान
(ख) चीन
(ग) ब्रिटेन
(घ) मोरक्को

उत्तर

  1. (ग) फ्रीमैन का,
  2. (ख) हीगल,
  3. (ग) 8,
  4. (ख) जे०एस० मिल,
  5. (ख) हरबर्ट स्पेन्सर,
  6. (ख) कौटिल्य का,
  7. (ख) कार्ल माक्र्स,
  8. (ख) अराजकतावाद,
  9. (ग) व्यक्तिवादी,
  10. (ग) व्यक्तिवाद,
  11. (ग) कौटिल्य,
  12. (घ) डॉ० बी०आर० अम्बेडकर,
  13. (घ) सात,
  14. (ख) व्यक्तिवाद,
  15. (ग) मनोरंजन की व्यवस्था करना,
  16. (घ) फासीवाद,
  17. (ख) हैरल्ड लॉस्की,
  18. (ग) ब्रिटेन।

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UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 4 Mughal Period: Jahangeer to Aurangzeb

UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 4 Mughal Period: Jahangeer to Aurangzeb (मुगलकाल- जहाँगीर से औरंगजेब तक) are the part of UP Board Solutions for Class 12 History. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 4 Mughal Period: Jahangeer to Aurangzeb (मुगलकाल- जहाँगीर से औरंगजेब तक).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject History
Chapter Chapter 4
Chapter Name Mughal Period:
Jahangeer to Aurangzeb
(मुगलकाल- जहाँगीर से
औरंगजेब तक)
Number of
Questions Solved
15
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 4 Mughal Period: Jahangeer to Aurangzeb (मुगलकाल- जहाँगीर से औरंगजेब तक)

अभ्यास

प्रश्न 1.
निम्नलिखित तिथियों के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख कीजिए
1. 1605 ई०
2. 1627 ई०
3. 1628 ई०
4. 1657 ई०
5. 1707 ई०
उतर:
दी गई तिथियों के ऐतिहासिक महत्व के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या-87 पर तिथि सार का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 2.
सत्य या असत्य बताइए
उतर:
सत्य-असत्य प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 87 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 3.
बहुविकल्पीय प्रश्न
उतर:
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 88 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 4.
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
उतर:
अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 88 व 89 का अवलोकन कीजिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“जहाँगीर में विरोधी गुणों का सम्मिश्रण था” विवेचना कीजिए।
उतर:
जहाँगीर का चरित्र एवं व्यक्तित्व अत्यन्त विवादास्पद था। कुछ इतिहासकार उसे लोकप्रिय तथा उदार शासक मानते हैं तो कुछ आलसी, निकम्मा, विलासी, धर्म-असहिष्णु तथा क्रूर व्यक्तित्व वाला। अनेक इतिहासकार उसे विरोधी गुणों का सम्मिश्रण मानते हैं। स्मिथ के अनुसार “जहाँगीर कोमलता और क्रुरता, न्याय तथा चंचलता, शिष्टता एवं बर्बरता, बुद्धिमत्ता एवं लड़कपन का अद्वितीय सम्मिश्रण था।” वस्तुत: व्यक्तित्व और शासक के रूप में जहाँगीर में अनेक गुण और दुर्बलताएँ थीं।

प्रश्न 2.
“जहाँगीर की दक्षिणी नीति का मूल्याकंन कीजिए।
उतर:
दक्षिण अभियानों में जहाँगीर पूर्णतया असफल रहा। नए दुर्गों के जीतने की बात तो दूर रही, पिता द्वारा विजित भू-भाग भी वह अपने अधीन न रख सका। जहाँगीर के समय में दक्षिण भारत की राजनीति पर मलिक अम्बर छाया हुआ था। उसकी मृत्यु के बाद ही अहमदनगर पर मुगलों का अधिकार हो सका।

प्रश्न 3.
नूरजहाँ के विषय में आप क्या जानते हैं?
उतर:
नूरजहाँ तेहरान के निवासी मिर्जा ग्यासबेग की पुत्री थी। उसका वास्तविक नाम महरुन्निसा था। महरुन्निसा का विवाह फारस के साहसी युवक अलीकुल बेग इस्तजलू के साथ हुआ। अलीकुल की हत्या के बाद महरुन्निसा ने जहाँगीर से विवाह कर लिया और उसे नूरमहल और नूरजहाँ की उपाधि मिली। नूरजहाँ ने मुगल राजनीति को प्रभावित ही नहीं किया था, अपितु स्वयं शासिका के रूप में प्रभावित हुई थी।

प्रश्न 4.
शाहजहाँ की मध्य-एशियाई नीति का परीक्षण कीजिए।
उतर:
शाहजहाँ की मध्य-एशियाई नीति पूर्णत: विफल रहीं। शाहजहाँ का बल्ख व बदख्शाँ को विजित करने का सपना पूरा न हो सका अपितु मुगल साम्राज्य पर इसके प्रतिकूल प्रभाव पड़े। शाहजहाँ की मध्य एशियाई विजय-योजना में अपार धन की हानि हुई। इन युद्धों में मुगल सेना का विनाश तथा असफलता के कारण मुगलों की प्रतिष्ठा को गहरा धक्का पहुँचा साथ ही मुगलों तथा मध्य एशिया में मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का अन्त हो गया।

प्रश्न 5.
शाहजहाँ के काल में साहित्य और कला की क्या प्रगति हुई?
उतर:
शाहजहाँ के काल में साहित्य और कला उन्नति के उच्च शिखर पर थे। साहित्य और ललितकलाओं के दृष्टिकोण से शाहजहाँ का काल स्वर्णयुग कहलाने का अधिकारी है। ‘गंगाधर’ और ‘गंगालहरी’ के प्रसिद्ध लेखक जगन्नाथ पण्डित, शाहजहाँ के राजकवि थे। संस्कृत ग्रन्थों, भगवद्गीता, उपनिषद्, रामायण आदि का अनुवाद भी इसी काल में हुआ। शाहजहाँ द्वारा निर्मित दिल्ली का लालकिला, जामा मस्जिद, आगरा की मोती मस्जिद तथा आगरा की ही सर्वोत्कृष्ट कृति ताजमहल, शाहजहाँ के युग को स्वर्ण-युग प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं। शाहजहाँ का ‘मयूर सिंहासन’ जो बहुमूल्य पत्थरों से जड़ित था तथा जिसके बीचों-बीच विश्वप्रसिद्ध हीरा कोहिनूर जगमगाता था, उसके गौरव में चार चाँद लगाने के लिए पर्याप्त था।

प्रश्न 6.
शाहजहाँ द्वारा निर्मित चार प्रमुख इमारतों के बारे में लिखिए।
उतर:
शाहजहाँ द्वारा निर्मित चार प्रमुख इमारतें निम्नवत् हैं

  1. दिल्ली का लाल किला-शाहजहाँ ने आगरा और फतेहपुर सीकरी को छोड़कर दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया और यहाँ लाल पत्थरों से एक दुर्ग का निर्माण करवाया, जिसे लाल किला के नाम से जाना जाता है। इसके अन्दर की इमारतों में दीवान-ए-आम और दीवान-ए-खास प्रमुख हैं।
  2. जामा मस्जिद-लाल किले के सामने शाहजहाँ ने भारत की सबसे बड़ी मस्जिद का निर्माण कराया। इसमें दस हजार व्यक्ति सामुहिक रूप से नमाज अदा कर सकते हैं।
  3. मोती मस्जिद-आगरा के दुर्ग में शाहजहाँ ने शुद्ध संगमरमर से मस्जिद का निर्माण करवाया जो मोती मस्जिद के नाम से विख्यात है। यह संसार का सर्वोत्तम पूजा स्थल मानी जाती है।
  4. ताजमहल-शाहजहाँ की अमूल्य और सुन्दरतम कृति ताजमहल है। जो आगरा से यमुना नदी के तट पर संगमरमर से निर्मित है। ताजमहल का निर्माण उसने अपनी पत्नी मुमताज महल की स्मृति में बनवाया।

प्रश्न 7.
औरंगजेब ने हिन्दुओं के विरुद्ध कौन से कार्य किए?
उतर:
औरंगजेब ने हिन्दुओं को सरकारी नौकरियों से वंचित किया। हिन्दुओं के मंदिर और शिवालियों को तुड़वाकर मस्जिदें बनवा दी गई। सम्राट ने अनेक बार हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बना दिया। सिक्ख गुरु तेगबहादुर सिंह का इस्लाम स्वीकार न करने पर सिर कटवा दिया गया। दीपावली पर बाजारों में रोशनी करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। होली खेलने, मेलों तथा धार्मिक उत्सवों पर प्रतिबन्ध लगा दिया। हिन्दुओं को धर्म-यात्रा पर भी कर देना पड़ता था।

प्रश्न 8.
औरंगजेब की असफलता के चार कारणों का उल्लेख कीजिए।
उतर:
औरंगजेब की असफलता के चार कारण निम्नवत हैं

  • धर्मान्धता एवं असहिष्णुतापूर्ण नीति
  • पुत्रों को शिक्षित न बनाने का संकल्प
  • शासन का केन्द्रीकरण ।
  • राजपूत विरोधी नीति

प्रश्न 9.
मुगलों के पतन के कारणों की व्याख्या कीजिए।
उतर:
मुगलों के पतन के प्रमुख कारण निम्नवत हैं

  1. औरंगजेब का उत्तरदायित्व
  2. औरंगजेब के अयोग्य उत्तराधिकारी
  3. मुगलों में उत्तराधिकार के नियम का अभाव
  4. मुगल सामन्तों का नैतिक पतन
  5. जागीरदारी संकट
  6. मुगलों की सैन्य दुर्बलताएँ
  7. बौद्धिक पतन
  8. मुगल साम्राज्य का आर्थिक दिवालियापन
  9. नौसेना का अभाव
  10. मुगल साम्राज्य की विशालता और मराठों का उत्कर्ष
  11. दरबार में गुटबाजी
  12. नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण
  13. यूरोपवासियों का आगमन

प्रश्न 10.
औरंगजेब राष्ट्रीय एकता में कहाँ तक बाधक था?
उतर:
औरंगजेब के कट्टरपन, शंकालु प्रवृत्ति, गैर-मुस्लिम नीति ने देश में राजनीतिक, गैर-वफादारी और वैमनस्य को हवा दी, इससे राष्ट्रीय एकता को गहरा आघात पहुँचा। औरंगजेब ने हिन्दू मन्दिरों, मठों को तुड़वाकर हिन्दू जाति से शत्रुता मोल ली। यह नीति उसके साम्राज्य निर्माण में बाधक थी। गैर-मुस्लिम नीति से वह भारत जैसे देश में कभी भी सफल संचालनकर्ता नहीं बन सकता था और ऐसा हुआ भी। उसकी इन नीतियों ने राष्ट्रीय एकता को खण्डित कर दिया और सम्पूर्ण राष्ट्र में अराजकता, अव्यवस्था फैल गई।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जहाँगीर के शासनकाल की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख करते हुए उसकी प्रमुख उपलब्धियों का विवेचन कीजिए।
उतर:
जहाँगीर के शासनकाल की प्रमुख घटनाएँ निम्नलिखित थीं
1. खुसरो का विद्रोह-जहाँगीर के बादशाह बनने के उपरान्त सबसे पहली महत्वपूर्ण घटना उसके पुत्र खुसरो का विद्रोह थी। उदारतापर्वक आरम्भ किए हए साम्राज्य पर यह प्रथम आघात था। खुसरो दरबार में बड़ा लोकप्रिय था शक्तिशाली, मधुर-भाषी तथा चरित्रवान राजकुमार था। अकबर का खुसरो पर विशेष प्रेम था तथा विलासी और मद्यप जहाँगीर से असन्तुष्ट उसके अनेक दरबारी भी खुसरो को ही उसका उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। खुसरो की महत्वाकांक्षा अभी समाप्त नहीं हुई थी और वह सिंहासन प्राप्त करने के लिए उत्सुक था। जहाँगीर भी खुसरो से असन्तुष्ट था तथा उसे विश्वासपात्र नहीं समझता था। जहाँगीर ने खुसरो को आगरा के दुर्ग में रहने दिया किन्तु उस पर कड़ा पहरा लगा दिया। खुसरो इस अपमान को सहन नहीं कर सका और 6 अप्रैल, 1606 ई० को अकबर के मकबरे के दर्शन करने के बहाने वह दुर्ग से बाहर निकल पड़ा तथा मथुरा के आस-पास के प्रदेशों को लूटता हुआ, पानीपत जा पहुँचा। उधर शाही सेनाएँ शेख फरीद के नेतृत्व में खुसरो को पराजित करने के लिए चल पड़ी।

पानीपत में लाहौर का दीवान अब्दुर्रहीम; खुसरो से आकर मिल गया। खुसरो ने उसे अपना वजीर नियुक्त किया और लाहौर की ओर बढ़ा। मार्ग में वह अमृतसर से कुछ किलोमीटर दूर तरनतारन में सिक्खों के पाँचवें गुरु अर्जुनदेव की सेवा में उपस्थित हुआ। गुरु अर्जुनदेव ने उसे दो लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी और अपना आशीर्वाद भी दिया। खुसरो लाहौर जा पहुँचा किन्तु वहाँ के सूबेदार दिलावर खाँ ने किले के फाटक बन्द कर लिए। इस पर खुसरो ने लाहौर दुर्ग का घेरा डाल दिया, किन्तु इसी समय उसे सूचना मिली कि बादशाह स्वयं लाहौर के निकट आ पहुँचा है। इस पर भयभीत होकर खुसरो उत्तर-पश्चिमी प्रदेशों की ओर भागा। भैरोवल नामक स्थान पर पिता-पुत्र की सेनाओं में संघर्ष हुआ, जिसमें खुसरो की बुरी तरह पराजय हुई। सेना ने उसे पकड़ लिया तथा बन्दी बनाकर जहाँगीर के सम्मुख उपस्थित किया। जहाँगीर ने उसे कारावास में डलवा दिया तथा उसके सभी पक्षपातियों की बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी।

सिक्खों के गुरु अर्जुनदेव को भी सम्राट ने दरबार में बुलवाया तथा उनसे खुसरो की सहायता करने का कारण पूछा। गुरु अर्जुनदेव ने उत्तर दिया- “सम्राट अकबर के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए ही मैंने राजकुमार की सहायता की थी, इसलिए नहीं कि वह तेरा सामना कर रहा था। किन्तु जहाँगीर ने उनकी सारी जागीर छीनकर उन्हें जेल में डाल दिया, जहाँ अनेक यातनाएँ देने के उपरान्त उसने उन्हें मरवा डाला। गुरु के इस कार्य से जहाँगीर अत्यन्त कुपित हुआ। उसने गुरु को दो लाख रुपया जुर्माना देने तथा गुरुग्रन्थसाहिब में से कुछ गीतों को निकालने की आज्ञा दी, जिसे गुरु ने ठुकरा दिया, जिसके फलस्वरूप उन्हें मृत्युदण्ड दिया गया। सम्राट का यह कार्य विवेकशून्य था। सिक्ख विचार परम्परा के अनुसार जहाँगीर ने अपने हठधर्म के आवेश में आकर ही यह दुष्कृत्य किया। सम्भवत: यह आरोप निराधार है परन्तु यह बात सत्य है कि गुरु के वध से सिक्खों और मुगलों के बीच भेदभाव उत्पन्न हो गए, जिसके परिणामस्वरूप औरंगजेब के समय में विद्रोह की आग भड़क उठी।

2. प्लेग का प्रकोप-1616 ई० में जहाँगीर के काल में भयंकर प्लेग का प्रकोप हुआ और उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक फैल गया। आगरा, लाहौर तथा कश्मीर में इसका विशेष प्रकोप था। जहाँगीर ने लिखा है कि यह बीमारी चूहों के द्वारा फैली थी। रोग का इलाज न हो सकने के कारण गाँव-के-गाँव तबाह हो गए। आठ वर्ष तक यह रोग चलता रहा तथा इससे भीषण जन-क्षति हुई। जहाँगीर के शासनकाल की प्रमुख उपलब्धियाँ- यद्यपि जहाँगीर में अकबर जैसी सैनिक प्रतिभा नहीं थी तथापि उसने कुछ सैनिक अभियान भी किए। उसके समय की सबसे प्रमुख घटना थी- मेवाड़ पर विजय एवं दक्षिण में सैनिक अभियान। जहाँगीर के समय में मुगलों को सैनिक क्षति भी उठानी पड़ी। कंधार उनके हाथों से निकल गया। जहाँगीर के प्रमुख विजय अभियान निम्नलिखित थे
(i) मेवाड़ विजय-अकबर ने अपने समय में मेवाड़ को जीतने का निरन्तर प्रयत्न किया था, परन्तु वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सका। महाराणा प्रताप के पश्चात् उसके उत्तराधिकारी महाराणा अमर सिंह ने भी अपने पिता की नीति को ही जारी रखा। अकबर के पश्चात् सलीम जब जहाँगीर के नाम से सम्राट बना तो वह मेवाड़ को जीतने के लिए लालायित हो उठा। 1605 ई० में ही जहाँगीर ने अपने द्वितीय पुत्र परवेज और आसफ खॉ जफरबेग के नेतृत्व में 20,000 अश्वारोहियों की एक सेना मेवाड़ विजय हेतु भेजी। देबारी की घाटी में युद्ध हुआ जो अनिर्णायक रहा। इसी बची खुसरो के विद्रोह के कारण परवेज को सेना सहित वापस बुला लिया। दो वर्ष पश्चात् 1608 ई० में महावत खाँ के नेतृत्व में एक सेना फिर मेवाड़ के लिए भेजी गई। लेकिन वह भी विशेष सफलता हासिल न कर सकी। जहाँगीर ने 1609 ई० में मेवाड़ का नेतृत्व अब्दुल्ला खाँ के सुपुर्द किया।

अब्दुल्ला खाँ अभियान भी मुगलों को सफलता नहीं दिला सका। 1611 ई० में मऊ का राजा बसु भी मेवाड़ में विफल रहा। अत: 7 सितम्बर, 1613 में जहाँगीर स्वयं शत्रु पर दबाव डालने के उद्देश्य से अजमेर पहुँचा। मेवाड़ के युद्ध के संचालन का भार अजीज कोका और शाहजादा खुर्रम को सौंपा गया। इन दोनों के आपसी सम्बन्ध कटु थे। अतः अजीज कोका को वापस बुला लिया गया। अब केवल खुर्रम पर आक्रमण का पूर्ण उत्तरदायित्व था। खुर्रम ने मेवाड़ में बर्बादी मचा दी। राणा का रसद पहुँचाना भी कठिन हो गया। बाध्य होकर अमर सिंह ने संधि करने का निर्णय लिया। राणा ने अपने मामा शुभकर्ण एवं विश्वासपात्र हरदास झाला को सन्धि के लिए भेजा। जहाँगीर ने भी राजपूतों से संधि करना स्वीकार किया और 1615 ई० में निम्नलिखित शर्तों पर मुगल व मेवाड़ में संधि हो गई

  • राणा ने सम्राट जहाँगीर की अधीनता स्वीकार की।
  • बदले में जहाँगीर ने चित्तौड़ के किले सहित मेवाड़ का समस्त भू-प्रदेश राणा को लौटा दिया। शर्त यह रखी कि चित्तौड़ के किले की मरम्मत व किलेबन्दी न की जाएगी।
  • राणा को सम्राट के दरबार में उपस्थित होने के लिए बाध्य नहीं किया गया। यह निश्चय हुआ कि राणा का युवराज कर्ण अपनी एक हजार सेना के साथ मुगल सम्राट की सेवा में रहेगा।
  • अन्य राजपूत नरेशों की भाँति राणा को मुगलों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिए भी बाध्य नहीं किया गया।

इस प्रकार मेवाड़ और मुगलों का दीर्घकालीन संघर्ष समाप्त हुआ। कुछ लेखकों ने राणा अमरसिंह को अपने वंशानुगत शत्रु के समक्ष अपनी स्वाधीनता खो देने का दोषी ठहराया है। परन्तु यह आरोप सर्वथा निराधार है। मेवाड़ जैसी एक छोटी-सी रियासत के लिए साधन-सम्पन्न मुगल साम्राज्य से टक्कर लेना कहाँ तक सम्भव होता, उसे एक-न-एक दिन तो झुकना ही था। जैसा कि डॉ० ए०एल० श्रीवास्तव ने लिखा है कि “मेवाड़ परिस्थिति में शांति अपेक्षित थी और 1615 ई० की संधि में उसे वह शांति, सम्मान और गौरव के साथ मिली….. इस प्रकार संकटग्रस्त देश के लिए इतनी अपेक्षित शांति संग्रह के इस सुवर्ण अवसर को राणा अमरसिंह यदि उपयोग में न लाते तो यह अविवेकपूर्ण कार्य होता।’

(ii) बंगाल के विद्रोह का दमन-अकबर ने यद्यपि बंगाल विजय कर लिया था किन्तु अफगान शक्ति का वह पूर्णतया दमन नहीं कर सका था। अकबर की मृत्यु के उपरान्त 1612 ई० में अपने नेता उस्मान खाँ के नेतृत्व में उन्होंने पुन: विद्रोह किया। बंगाल के सूबेदार इस्लाम खाँ ने बड़ी वीरतापूर्वक शत्रुओं का सामना किया, फलस्वरूप युद्ध-भूमि में लड़ते-लड़ते उस्मान खाँ मारा गया। जहाँगीर ने पराजित अफगानों के साथ उदारता का व्यवहार किया तथा उन्हें अपनी सेना के उच्च पदों पर आसीन किया।

(iii) काँगड़ा विजय-उत्तर-पूर्व पंजाब में काँगड़ा की सुन्दर घाटी है जिस पर एक सुदृढ़ किला बना हुआ था। अकबर के समय में पंजाब के सूबेदार हसन कुली खाँ ने इसे जीतने का प्रयास किया था परन्तु वह असफल हुआ था। 1620 ई० में शाहजादा खुर्रम के नेतृत्व में राजा विक्रमाजीत ने इस किले का घेरा डाला और लगभग चार माह के घेरे के पश्चात् इस पर अधिकार कर लिया।

(iv) किश्तवार विजय (1622 ई०)- कश्मीर में किश्तवार एक छोटी-सी रियासत थी। यद्यपि कश्मीर मुगल साम्राज्य का अंग था, किन्तु किश्तवार में स्वतन्त्र हिन्दू राजा राज्य कर रहा था। जहाँगीर ने कश्मीर के सूबेदार दिलावर खाँ को किश्तवार विजय करने का आदेश दिया। यद्यपि हिन्दू वीरतापूर्वक लड़े किन्तु अन्त में उन्हें पराजित होना पड़ा और 1622 ई० में किश्तवार मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया गया।

(v) कंधार विजय-भारत के इतिहास में उत्तर-पश्चिमी सीमा का विशेष महत्त्व रहा है, क्योंकि प्राचीन काल से ही विदेशियों के आक्रमण सदैव इसी ओर से होते रहे। साथ ही कंधार प्राचीनकाल से व्यवसाय तथा व्यापार के दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। मुगल सम्राट कंधार के प्रति विशेष रूप से सजग थे। बाबर ने सर्वप्रथम 1522 ई० में कंधार पर विजय प्राप्त की थी। उसकी मृत्यु तक कंधार मुगल साम्राज्य में था। हुमायूं के समय में कंधार पर उसके भाई कामरान का अधिकार रहा, जिसके दुष्परिणाम हुमायूँ को जीवनभर भुगतने पड़े।

ईरान के शाह ने हुमायूं की सहायता करने का वचन इस शर्त पर दिया था कि वह कंधार ईरान के हवाले कर देगा, किन्तु कंधार विजय करके हुमायूँ ने उसे ईरान के शाह को लौटाने में टालमटोल की और उसे अपने अधीन ही रखा। उसकी मृत्यु के पश्चात् 1558 ई० में कंधार पर ईरान ने अधिकार कर लिया। अकबर से भयभीत होकर 1564 ई० में कंधार अकबर को सौंप दिया गया था। अकबर की मृत्यु के उपरान्त ईरान के सम्राट शाह अब्बास ने 1606 ई० में कुछ ईरानियों को कंधार पर आक्रमण करने के लिए भेजा किन्तु मुगल सेनापति शाहबेग खाँ ने उन्हें भगा दिया। टर्की से युद्ध में फंसे रहने के कारण इस समय शाह अब्बास पूरी शक्ति के साथ मुगलों से युद्ध करने में असमर्थ था।

1622 ई० में सुअवसर देखकर शाह ने कंधार का घेरा डाल दिया। कंधार का मुगल सेनापति 45 दिन घेरे में रहने के बाद परास्त हुआ। जहाँगीर ने शहजादा परवेज को कंधार पर आक्रमण करने का आदेश दिया, किन्तु आसफ खाँ के हस्तक्षेप से यह स्थगित कर दिया गया। नूरजहाँ खुर्रम को राजधानी से दूर रखना चाहती थी इसलिए उसने जहाँगीर द्वारा खुर्रम को कंधार जाने की आज्ञा दिलवा दी। परन्तु खुर्रम इस समय राजधानी से दूर नहीं रहना चाहता था अतः उसने सम्राट की आज्ञा का पालन करने से स्पष्ट इनकार कर दिया। दरबार के पड्यन्त्रों का लाभ ईरान के शाह अब्बास ने उठाया तथा कंधार पर अधिकार कर लिया। इससे मुगल साम्राज्य की प्रतिष्ठा पर गहरा आघात पहुँचा। जहाँगीर कंधार को पुन: प्राप्त नहीं कर सका।

(vi) अहमदनगर विजय-जहाँगीर के समय में दक्षिण भारत की राजनीति पर मलिक अम्बर छाया हुआ था। मलिक अम्बर बुहत फुर्तीला, संगठनशील और सैनिक योग्यता प्राप्त सरदार था। वह अहमदनगर के उन समस्त प्रदेशों पर पुनः अधिकार करने का प्रयास कर रहा था, जिन्हें अकबर के समय में मुगलों ने अधिगृहित कर लिया था। अत: 1608 ई० में जहाँगीर ने अब्दुर्रहीम खानखाना के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी, परन्तु अब्दुर्रहीम खानखाना मलिक अम्बर के विरुद्ध कोई सफलता प्राप्त न कर सका। इसके पश्चात् खान-ए-जहाँ लोदी तथा अब्दुल्ला खाँ को मलिक अम्बर के विरुद्ध युद्ध करने के लिए भेजा, लेकिन इन दोनों को भी मलिक अम्बर ने पराजित कर दिया।

अत: निराश होकर जहाँगीर ने एक बार पुनः अब्दुर्रहीम खानखाना को भेजा। इस दूसरे अभियान में बहुत सीमा तक खानखाना ने अपने सम्मान की सफलतापूर्वक रक्षा की, लेकिन उस पर विरोधी पक्ष से घूस लेने का आरोप लगाया गया, जिसके कारण नूरजहाँ के परामर्श के अनुसार 1616 ई० के प्रारम्भ में अहमदनगर अभियान हेतु खानखाना की जगह खुर्रम को नियुक्त किया गया। खुर्रम की शक्ति से भयभीत होकर मलिक अम्बर ने सन्धि कर ली। जहाँगीर ने खुर्रम की सफलता से खुश होकर उसे शाहजहाँ’ की उपाधि प्रदान की। खुर्रम (शाहजहाँ) और मलिक अम्बर की सन्धि अधिक दिन तक नहीं चली। 1620 ई० में मलिक अम्बर ने सन्धि का उल्लंघन कर खोए हुए प्रदेशों पर अपना अधिकार कर लिया। जहाँगीर को जब यह समाचार मिला तो उसने पुनः शाहजहाँ को अहमदनगर भेजा। शाहजहाँ ने मलिक अम्बर को सन्धि के लिए बाध्य किया। अन्त में 1626 ई० में मलिक अम्बर की मृत्यु के पश्चात् अहमदनगर पर मुगलों का अधिकार हो गया।

2. नूरजहाँ के मुगल राजनीति पर प्रभाव की विवेचना कीजिए।
उतर:
नूरजहाँका मुगल राजनीति पर प्रभाव
1. राजनीति में नूरजहाँ का प्रवेश – मई 1611 ई० में जहाँगीर से नूरजहाँ ने विवाह कर लिया। विवाह के बाद जहाँगीर, जो
आरम्भ से ही विलासी प्रवृत्ति का था, और भी विलासिता में डूब गया तथा राज्य की सम्पूर्ण बागडोर उसने इस महत्वाकांक्षी महिला के हाथ में छोड़ दी। राज्य जहाँगीर के नाम पर चलता था किन्तु वास्तविक शासक नूरजहाँ थी। नूरजहाँ के शासनकाल को, डॉ० बेनी प्रसाद के अनुसार दो भागों में विभाजित किया जा सकता है- प्रथम काल-1611 से 1622 ई० तक तथा द्वितीय काल-1622 से 1627 ई० तक।

(क) प्रथम काल (1611 से 1622 ई० तक) – नूरजहाँ के प्रभुत्व का प्रथम काल मुगल साम्राज्य के लिए लाभकारी सिद्ध हुआ। इस समय नूरजहाँ के गुट में दरबार के प्रभावशाली व्यक्ति सम्मिलित थे। स्त्री स्वभाव के अनुसार नूरजहाँ पक्षपात एवं गुटबन्दी की नीति की अनुयायी थी। इस काल में उसके गुट में उसका पिता ऐतमादुद्दौला, उसका भाई आसफ खाँ तथा शहजादा खुर्रम (आसफ खाँ का दामाद) सम्मिलित थे। यह गुट दरबार में सबसे प्रभावशाली था तथा 1611 से 1622 ई० तक राज्य की सम्पूर्ण बागडोर इस गुट के हाथ में रही थी।

(ख) द्वितीय काल (1622 से 1627 ई० तक) – नूरजहाँ के प्रभुत्व के प्रथम काल के समान, उसका द्वितीय काल गौरवपूर्ण व लाभकारी सिद्ध न हो सका। इसके विपरीत, यह काल षड्यन्त्रों, विद्रोहों तथा उपद्रवों का काल बन गया। इसका प्रमुख कारण नूरजहाँ की महत्वाकांक्षा थी। खुर्रम के बढ़ते हुए प्रभाव को देखकर नूरजहाँ उससे ईर्ष्या करने लगी थी तथा खुर्रम के विरुद्ध जहाँगीर के कान भरने लगी, परिणामस्वरूप खुर्रम ने बादशाह के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। नूरजहाँ को स्वामिभक्त सेवकों के प्रति भी संदेह रहता था तथा वह उनके उत्थान को भी सहन नहीं कर सकती थी। उसकी इस प्रवृत्ति के कारण ही महावत खाँ जैसे योग्य एवं स्वामिभक्त सेनापति को भी विद्रोह करने के लिए विवश होना पड़ा। इन दोनों विद्रोहों का परिणाम मुगल साम्राज्य के लिए बड़ा भयंकर तथा हानिकारक सिद्ध हुआ। अतः मुगल साम्राज्य षड्यन्त्रों, कुचक्रों तथा विद्रोहों का अड्डा बन गया। कंधार का मुगल हाथों से निकल जाना नूरजहाँ का सबसे हानिकारक परिणाम था।

2. राजनीतिक प्रभाव – राजनीतिक तथा शासन सम्बन्धी दृष्टिकोण से नूरजहाँ का मुगल साम्राज्य पर घातक प्रभाव पड़ा। 1611 से 1622 ई० तक वह अपने गुट का नेतृत्व करती रही। उसने अपने पक्षपातियों को उच्च-से-उच्च पद प्रदान किए तथा विरोधियों का विनाश किया। उसने योग्यता से अधिक रक्त-सम्बन्ध का ध्यान रखा तथा अपने पिता के परिवार को एक संगठित दल बना दिया। जब तक उसका पिता जीवित रहा, नूरजहाँ को सदैव उचित परामर्श देता रहता था। वह उसकी महत्वाकांक्षाओं को बढ़ने नहीं देता था, परन्तु 1622 ई० में अपने पिता एतमादुद्दौला की मृत्यु के उपरान्त नूरजहाँ पूर्णत: निरंकुश हो गई तथा उसने अपने अधिकारों का दुरुपयोग करना आरम्भ कर दिया।

नूरजहाँ अभी तक खुर्रम का पक्षपात करती आई थी, परन्तु जब नुरजहाँ ने शेर अफगन से उत्पन्न अपनी पुत्री लाडली बेगम का विवाह जहाँगीर के सबसे छोटे पुत्र शहरयार के साथ कर दिया तब खुर्रम के अनेक बार हिसार-फिरोजा की जागीर के लिए प्रार्थना-पत्र भेजने पर भी उसने यह जागीर शहरयार को दे दी। वास्तव में, नूरजहाँ शहरयार को जहाँगीर का उत्तराधिकारी बनाना चाहती थी, जिसका परिणाम खुर्रम के विद्रोह के रूप में प्रस्फुटित हुआ।

(क) खुर्रम का विद्रोह- जहाँगीर के चार पुत्र थे – खुसरो, परवेज, खुर्रम तथा शहरयार। खुसरो की मृत्यु के उपरान्त खुर्रम ही सबसे योग्य शहजादा था। शहरयार बिल्कुल अयोग्य तथा निकम्मा था तथा परवेज मद्यप एवं विलासी था। अतः सिंहासन के दो दावेदार थे- खुर्रम तथा शहरयार। खुर्रम ने अभी तक मुगल साम्राज्य की बड़ी सेवाएँ की थी। वह जहाँगीर का सबसे वीर तथा कुशल पुत्र था, किन्तु नूरजहाँ खुर्रम को अपने मार्ग का काँटा मानकर उसे मार्ग से हटाने के लिए उत्सुक थी। इसी समय ईरान के शाह ने कंधार पर अधिकार कर लिया। नुरजहाँ ने जहाँगीर से कहा कि कंधार विजय के अभियान का दायित्व खुर्रम को सौंप देना चाहिए परन्तु खुर्रम जानता था कि नूरजहाँ कंधार विजय के बहाने

उसे राजधानी से दूर हटा देना चाहती है, अत: उसने कंधार जाने से इनकार कर दिया। नूरजहाँ ने इसे सुअवसर मानकर जहाँगीर के कान भरने आरम्भ कर दिए कि खुर्रम विद्रोही है तथा उसने सम्राट की आज्ञा की अवहेलना की है। खुर्रम ने नूरजहाँ की इस नीति से कुपित होकर विद्रोह कर दिया। खुर्रम का यह सन्देह ठीक ही था कि उसकी अनुपस्थिति में शहरयार को उच्च पद दे दिए जाएंगे और उसे युद्ध-क्षेत्र में मरवा डाला जाएगा। डॉ० बेनी प्रसाद ने स्वीकार किया है कि शहजादा खुर्रम की अनुपस्थिति में, नूरजहाँ अवश्य अपने पशुतुल्य दामाद शहरयार को उन्नति देकर राजकुमार (शाहजहाँ) की स्थिति को नीचा कर देती। इसी डर के कारण खुर्रम को फारस वालों के विरुद्ध युद्ध न करके अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह करना पड़ा। इस प्रकार कंधार मुगल सम्राज्य से हमेशा के लिए निकल गया। इस हानि के लिए नूरजहाँ ही सबसे अधिक उत्तरदायी थी।

(ख) महावत खाँ का विद्रोह – खुर्रम के विद्रोह का दमन करके नूरजहाँ ने महावत खाँ की बढ़ती हुई शक्ति को रोकने का प्रयास किया। खुर्रम के विद्रोह करने के पश्चात् स्वामिभक्त महावत खाँ, परवेज का पक्षपाती बन गया था। नूरजहाँ ने महावत खाँ को काबुल का सूबेदार नियुक्त करके काबुल भिजवा दिया और उसके स्थान पर खाने जहाँ लोदी को परवेज का वकील नियुक्त कर दिया। यद्यपि परवेज इस आज्ञा का उल्लंघन करने को तेयार था लेकिन महावत खाँ तुरन्त काबुल की ओर रवाना हो गया। यह पूर्णत: सत्य है कि महावत खाँ को विद्रोही बनाने के लिए नूरजहाँ उत्तरदायी थी। इस प्रकार जिस व्यक्ति को साम्राज्य के शत्रुओं के विरुद्ध प्रयुक्त किया जा सकता था, वह स्वयं शत्रु बन गया। इस विद्रोह ने मुगल साम्राज्य की जड़े हिला दीं।

3. जहाँगीर की मृत्यु – 1620 ई० से जहाँगीर का स्वास्थ्य निरन्तर खराब होता जा रहा था। निरन्तर कश्मीर की यात्राएँ और वहाँ की जलवायु भी उसके स्वास्थ्य को ठीक नहीं कर सकी थी। मार्च, 1627 में वह स्वास्थ्य लाभ के लिए फिर कश्मीर गया, लेकिन उसके स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ। अत: वह पुनः लाहौर की तरफ गया, किन्तु रास्ते में ही उसकी तबीयत खराब हो गई और 7 नवम्बर, 1627 को 58 वर्ष की आयु में भीमवार नामक स्थान पर जहाँगीर की मृत्यु हो गई। लाहौर के निकट शाहदरे के सुन्दर बाग में उसे दफना दिया गया, जहाँ नूरजहाँ ने एक सुन्दर मकबरा बनवाया।

प्रश्न 3.
शाहजहाँ के शासनकाल में मुगल स्थापत्य कला पर क्या प्रभाव पड़ा?
उतर:
शाहजहाँ के शासनकाल में मुगल स्थापत्य कला पर प्रभाव- शाहजहाँ एक ‘शानदार’ सम्राट था तथा उसे भवन निर्माण कला से विशेष अनुराग था। यद्यपि उसके काल में सभी ललित कलाओं तथा साहित्य का पोषण हुआ किन्तु भारत में भवननिर्माण-कला का जितना विकास उसके काल में हुआ उतना और कभी नहीं हुआ। यद्यपि अकबर के समय में भी अनेक कलाकतियों का निर्माण हुआ किन्त सौन्दर्य के दष्टिकोण से शाहजहाँ के समय की कला ने उसके महान पितामह के समय की कला को भी पीछे छोड़ दिया।

अकबर द्वारा परिश्रमपूर्वक स्थापित साम्राज्य का वास्तविक उपभोग शाहजहाँ ने ही किया। यद्यपि स्वर्ण-युग का आरम्भ जहाँगीर के काल में ही हो गया था किन्तु कला-क्षेत्र में जहाँगीर नहीं वरन् शाहजहाँ का काल स्वर्ण युग माना गया है। परन्तु अनेक विद्वानों में इसमें मतभेद भी हैं। उसके काल की कलाकृतियाँ आज भी उसके समय के गौरव का गान कर रही हैं। विद्वानों के मत में शाहजहाँ यदि और कुछ निर्मित न करवाकर केवल ताजमहल ही निर्मित करवा देता तब भी उसका काल कला का स्वर्ण-युग ही माना जाता। शाहजहाँ के शासन काल में मुगल स्थापत्य कला में योगदान निम्नलिखित है

1. ताजमहल – ताजमहल शाहजहाँ की अमूल्य तथा सुन्दरतम कृति है, जिसे आगरा में यमुना के तट पर सफेद संगमरमर से निर्मित किया गया। ताजमहल का निर्माण उसने अपनी प्रिय पत्नी मुमताजमहल की स्मृति में करवाया था तथा इसी सुन्दर मकबरे में मुमताजमहल को दफनाया गया था। अन्त में शाहजहाँ की कब्र भी यहीं (मुमताजमहल की कब्र के समीप) बनाई गई। तत्कालीन इतिहासकार अब्दुल हमीद लाहौरी के अनुसार- “ताजमहल 50 लाख रुपये से 12 वर्ष में बनकर तैयार हुआ था। 1631 ई० में मुमताज की मृत्यु हुई तथा उसके एक वर्ष पश्चात् ही उसका निर्माण कार्य प्रारम्भ हो गया था। ट्रेवेनियर के अनुसार- “इस इमारत (ताजमहल) पर तीन करोड़ रुपया व्यय हुआ तथा 1653 ई० में 22 वर्ष पश्चात यह बनकर तैयार हुई। 20,000 श्रमिकों ने प्रतिदिन इस भवन के निर्माण में योगदान दिया। आज भी ताजमहल संसार की आश्चर्यजनक कलाकृतियों में अपना उच्च स्थान रखता है।

2. मुसम्मन बुर्ज – आगरा के दुर्ग में बादशाह ने कई संगमरमर के भवन बनवाए, जो उसके हरम की स्त्रियों के लिए थे। जहाँआरा तथा रोशनआरा के निवास के लिए भी उसने भवन बनवाए। इन्हीं भवनों के पास उसने मुसम्मन बुर्ज का निर्माण कराया, जो शुद्ध संगमरमर द्वारा निर्मित है तथा बहुमूल्य पत्थरों से अलंकृत है। यहीं पर ताजमहल को देखते-देखते सम्राट ने अपने प्राण त्यागे थे। इसके अतिरिक्त झरोखा-दर्शन, दौलतखाना-ए-खास उसकी अन्य इमारतें हैं, जो उसने आगरा के दुर्ग में निर्मित करवाई। जहाँआरा के कहने पर उसने एक बड़ा चौक तथा उसमें लाल पत्थरों की जामा मस्जिद निर्मित करवाई, जो 1648 ई० में, पाँच वर्ष में निर्मित हुई।

3. मोती मस्जिद – आगरा के दुर्ग में बादशाह ने एक छोटी-सी मस्जिद का निर्माण करवाया, जो शुद्ध संगमरमर की बनी है। तथा मोती मस्जिद के नाम से विख्यात है, क्योंकि मोती के समान सफेद पत्थरों द्वारा इसका निर्माण हुआ था। यह मस्जिद अपनी सादगी एवं सौन्दर्य के लिए विख्यात है तथा विद्वानों के मत में यह संसार का सर्वोत्तम पूजा-स्थल मानी जाती है।

4. जामा मस्जिद – लाल किले के सामने शाहजहाँ ने जामा मस्जिद का निर्माण करवाया, जो भारत की सबसे बड़ी मस्जिद मानी जाती है। यह लाल पत्थर की बनी है तथा 6 वर्ष में इसका निर्माण किया गया था। मस्जिद के चारों ओर सीढ़ियाँ बनी हैं तथा इसमें दस हजार व्यक्ति सामूहिक रूप से नमाज पढ़ सकते हैं।

5. शाहजहाँनाबाद – शाहजहाँ ने आगरा तथा फतेहपुर सीकरी को छोड़कर दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया तथा यमुना के किनारे उसने एक नवीन दिल्ली नगर का निर्माण कराया, जिसे उसने शाहजहाँनाबाद नाम दिया। यहाँ का किला लाल पत्थर द्वारा निर्मित है। इसके अन्दर की इमारतों में दीवान-ए-आम (जो लाल पत्थर द्वारा निर्मित है) तथा दीवान-ए-खास प्रमुख हैं। दीवान-ए-खास शुद्ध संगमरमर का बना है, जिसकी छतों पर सोने का बहुमूल्य तथा सुन्दर काम किया गया है। दीवान-ए-खास को वास्तव में पृथ्वी का स्वर्ग कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसमें संगमरमर की बनी एक ऊँची चौकी पर ‘मयूर सिंहासन’ रखा रहता था, जिसे ‘तख्त-ए-ताउस’ कहा जाता था। यह बादशाह की एक अनुपम कृति थी। दिल्ली के लाल किले की अन्य इमारतों में रंगमहल, मुमताजमहल तथा सावन-भादों प्रमुख हैं। सावन-भादों में सम्राट सावन व भादों के महीनों में विहार करता था।

6. जहाँगीर का मकबरा – लाहौर से चार मील दूर शाहदरा में शाहजहाँ ने अपने पिता का छोटा किन्तु भव्य मकबरा निर्मित करवाया।

7. मयूर सिंहासन – सुन्दरतम कलाकृतियों में, जिनका निर्माण शाहजहाँ के काल में हुआ, मयूर सिंहासन का उच्च स्थान है। इस सिंहासन के निर्माण में 14 लाख रुपये का सोना खर्च हुआ। इसकी लम्बाई सवा-तीन गज, चौड़ाई दो गज तथा ऊँचाई 5 गज थी। इस सिंहासन में 12 स्तम्भ तथा जवाहरातों से निर्मित दो मोर थे। सात वर्ष में यह बनकर तैयार हुआ।

1739 ई० में नादिरशाह ने जब भारत पर आक्रमण किया तो वह इस बहुमूल्य सिंहासन को अपने साथ ले गया। उपर्युक्त महत्वपूर्ण भवनों के अतिरिक्त शाहजहाँ ने कुछ अन्य कलाकृतियों का भी निर्माण करवाया। दिल्ली मे उसने निजामुद्दीन औलिया का मकबरा बनवाया, जिसमें संगमरमर का भी प्रयोग किया गया है। अजमेर में उसने एक मस्जिद तथा एक सुन्दर मकबरे का निर्माण कराया, जो शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के पश्चिम की ओर स्थित है। शाहजहाँ को सुन्दर उद्यानों से भी विशेष प्रेम था। उसने अपनी सभी इमारतों में सुन्दर उद्यान बनवाए। कश्मीर के शालीमार बाग तथा चश्मेशाही और लाहौर के शालीमार बाग उसी की देन हैं।

प्रश्न 4.
शाहजहाँ का शासनकाल मुगल शासन का स्वर्ण-युग था, पर उसमें पतन के चिह्नन भी थे।” इस कथन की विस्तार पूर्वक व्याख्या कीजिए।
या
शाहजहाँ के शासनकाल के पक्ष व विपक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिए।
उतर:
शाहजहाँ का राज्यकाल स्वर्ण-युग था अथवा नहीं, इस पर सब विद्वान एकमत नहीं हैं। बादशाह के समकालीन इतिहासकारों तथा विदेशी यात्रियों ने इस युग को स्वर्ण-युग कहकर सम्बोधित किया है। अब्दुल हमीद लाहौरी, खाफी खाँ, ट्रेवेनियर, वूल्जले हेग, हण्टर, लेनपूल तथा एलपिन्सटन आदि इतिहासकार इस युग को शान्ति, समृद्धि तथा साहित्य एवं कला का स्वर्ण-युग मानते हैं। दूसरी ओर पीटरमण्डी, बर्नियर और स्मिथ ने शाहजहाँ के युग का दूसरा पक्ष लिया है, जो अन्धकारपूर्ण है तथा उस पक्ष को ध्यान में रखकर शाहजहाँ के काल को स्वर्ण-युग नहीं कहा जा सकता। इन इतिहासकारों का कथन है कि यद्यपि शाहजहाँ का दरबार, उसकी कलाकृतियों तथा साहित्य की उन्नति की चकाचौंध में कोई भी व्यक्ति उस काल को स्वर्ण-युग मान सकता है। किन्तु यदि उस चकाचौंध से हटकर साधारण जनता की स्थिति का अध्ययन किया जाए तो यह युग स्वर्ण-युग के स्थान पर अन्धकार का युग कहलाने योग्य है।

इस प्रकार शाहजहाँ के काल के विषय में विद्वानों के दो विरोधी मत हैं
शाहजहाँ का युग स्वर्ण-युग था – अधिकांश विद्वानों ने शाहजहाँ के युग को स्वर्ण-युग की संज्ञा दी है। इनका मत है कि अकबर द्वारा स्थापित सुदृढ़, शक्तिशाली तथा सुव्यवस्थित विशाल साम्राज्य में शान्तिकालीन समृद्धि तथा गौरव के फूल शाहजहाँ के काल में ही विकसित हुए। इस मत के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए गए हैं
1. शान्ति और सुव्यवस्था का युग – शाहजहाँ के काल में अन्य सभी मुगल सम्राटों की अपेक्षा शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित रही। उसके आरम्भिक काल के दो-तीन विद्रोहों के अतिरिक्त उसका सम्पूर्ण राज्यकाल शान्तिपूर्ण था। राजपूत अभी तक मुगलों की अधीनता स्वीकार करते थे तथा मुगल सम्राटों के स्वामिभक्त थे। दक्षिण के शिया राज्यों ने मुगल सम्राट का संरक्षण स्वीकार कर लिया था। शाहजहाँ का साम्राज्य काफी विशाल था। सिन्ध से असम तक तथा अफगानिस्तान से गोआ तक उसका राज्य विस्तृत था। शाहजहां के काल में 30 वर्ष तक भीषण युद्धों से देश सुरक्षित रहा। शाहजहाँ अपनी प्रजा का पुत्रवत् पालन करता था। चोर तथा डाकुओं से सड़कें सुरक्षित थीं। यात्रियों की सुख-सुविधा का पूर्ण ध्यान रखा जाता था। व्यापार उन्नत अवस्था में था तथा देश में चारों ओर सुख तथा शान्ति स्थापित थी। लेनपूल का मत है- “शाहजहाँ अपनी उदारता और कृपा के लिए प्रसिद्ध था और इसी कारण वह अपनी प्रजा का बड़ा प्रिय था।”

2. सड़कों की व्यवस्था- मुगल राजधानी को सड़कों द्वारा प्रान्तों से जोड़ दिया गया था। एक सड़क पूर्व दिशा की ओर बंगाल को तथा पश्चिम की ओर पेशावर तक जाती थी, एक अन्य सड़क राजपूताना होकर अहमदाबाद तक और वहाँ से दक्षिण को पहुँचती थी। एक अन्य सड़क मालवा से बुरहानपुर तक और वहाँ से दक्षिण को पहुँचती थी। इन सड़कों के दोनों ओर छायादार वृक्षों के अतिरिक्त सरायें बनवाई गई थी, जिससे यात्रियों को आवागमन की सुविधा प्राप्त हो गई थी। सड़कों की सुरक्षा की ओर भी पूरा-पूरा ध्यान दिया गया था, जिससे व्यापारी और यात्री निडर होकर अपना-अपना कार्य करते रहें। चोर-डाकुओं से इन सड़कों की सुरक्षा-व्यवस्था के लिए ‘फौजदार’ नियुक्त होते थे।

शाहजहाँ ने मार्गों को सुरक्षित करने का यथासम्भव प्रयत्न किया। इसके लिए उसने जगह-जगह सरायें बनवा दीं और यात्रियों की सुविधा के लिए उन सरायों में उचित व्यवस्था कराई गई। मनूची लिखता है- “सम्पूर्ण मुगल साम्राज्य में प्रत्येक मार्ग पर यात्रियों के लिए बहुत-सी-सरायें बनी हुई हैं। प्रत्येक सराय एक दुर्ग मालूम होती है क्योंकि प्रत्येक सराय के चारों ओर ऊंची-ऊँची दीवारें और बुर्ज हैं तथा बड़े-बड़े दरवाजे हैं। प्रत्येक सराय में हाकिम नियुक्त हैं, जो यात्रियों के सामान की सुरक्षा करवाते हैं और सामान सँभालने की चेतावनी देते हैं।”

3. समान न्याय का युग – शाहजहाँ न्यायप्रिय सम्राट था तथा न्याय के क्षेत्र में उसने अपने पूर्वजों की नीति का ही अनुसरण किया। वह अन्यायियों तथा अपराधियों को कठोर दण्ड देने में तथा निष्पक्ष न्याय करने में बिल्कुल नहीं हिचकता था। मनूची ने भी सम्राट की न्यायप्रियता की मुक्त-कण्ठ से प्रशंसा की है। सर्वप्रधान न्यायाधीश स्वयं सम्राट होता था। सम्राट प्रारम्भिक मुकदमों तथा अपीलों दोनों को सुनता था। प्रान्तीय अदालतों के निर्णय की अपीलें भी सम्राट सुनता था। केन्द्र में न्याय हेतु सम्राट को सलाह देने के लिए ‘काजी-उल-कुजात’ और प्रान्तों में ‘काजी’ तथा ‘मीरअदल’ होते थे। शाहजहाँ राजद्रोहियों को बन्दी बनाकर ग्वालियर, रणथम्भौर और रोहतास इत्यादि दुर्गों में भेज देता था।

4. समृद्धि का युग – समृद्धि तथा गौरव के दृष्टिकोण से शाहजहाँ का काल, मुगलकाल के चरमोत्कर्ष का काल था। देश में शान्ति एवं सुव्यवस्था के कारण समृद्धि स्थापित हो चुकी थी। सूबों से केन्द्र सरकार को अत्यधिक आय होती थी। भूमि उपजाऊ होने के कारण भूमि-कर 45 करोड़ रुपये वार्षिक राजकोष में एकत्रित होता था। भूमि-कर के अतिरिक्त अन्य कर भी थे तथा आय, व्यय से कहीं अधिक होने के कारण राजकोष धन से भरा रहता था। नकद रुपयों के अतिरिक्त, बहुमूल्य पत्थर, हीरे, जवाहरात, मोती असंख्य संख्या में कोष में एकत्रित थे। मुर्शिद कुली खाँ के भूमि-सुधारों ने शाहजहाँ की भूमि-कर की आय, अकबर की आय से डेढ़ गुनी कर दी थी।

शाहजहाँ ने किसानों और कृषि की ओर ध्यान दिया था। उसने कश्मीर में बहुत-से अनुचित करों को समाप्त कर दिया। सिंचाई की समुचित व्यवस्था के लिए उसने नहरों के निर्माण कार्य को प्रोत्साहन प्रदान किया। जागीर-प्रथा को, जो अकबर के समय में हटा दी गई थी, शाहजहाँ ने पुनः आरम्भ किया। साम्राज्य का 7/10 भाग जागीरदारों के सुपुर्द कर दिया गया था और सरकारी लगान एक-तिहाई से बढ़ाकर उपज का आधा कर दिया गया था। इसका परिणाम यह हुआ कि सरकारी आय तो बढ़ गई परन्तु किसानों को बहुत कष्ट हुआ।

खाफी खाँ लिखता है- “यद्यपि अकबर एक महान विजेता तथा नियम-निर्धारक था किन्तु राज्य की सीमाओं के सुप्रबन्ध तथा आर्थिक स्थिति और राज्य के विविध विभागों के सुशासन की दृष्टि से भारतवर्ष में शाहजहाँ के समकक्ष रखा जाने वाला अन्य कोई शासक नहीं हुआ।

5. व्यापार की उन्नति का युग – शाहजहाँ के काल में व्यापार की भारी उन्नति हुई। भारत तथा एशिया के विभिन्न भागों में व्यापारिक सम्पर्क स्थापित थे, जिससे भारत को अत्यधिक लाभ होता था। इस समय सुसंस्कृत अभिरुचि की वस्तुओं का निर्माण भारत में बहुतायत से होता था। कलमदान, शमादान, रेशमी वस्त्र, सती-ऊनी वस्त्र, कालीन, अफीम, लाख आदि अनेक वस्तुएँ बाहर जाती थीं, जिनके बदले में सोना भारत में आता था। बंगाल और बिहार में सूती कपड़े बनाने का इतना अधिक कार्य होता था कि ये प्रदेश ‘कपड़ों का देश के समान दृष्टिगोचर होते थे। कपड़े की रँगाई तथा छपाई का कार्य बहुतायत से होता था तथा भारत के बने कपड़े यूरोप में विलास की सामग्री समझे जाते थे।

6. प्रजा के साथ पितृ तुल्य व्यवहार – तत्कालीन विदेशी यात्रियों एवं इतिहासकारों का मत है कि शाहजहाँ अपनी प्रजा का पालन इस प्रकार करता था जैसे कोई पिता अपनी सन्तान का। शाहजहाँ यद्यपि ‘शानदार’ सम्राट था परन्तु वह कठोर परिश्रमी भी था तथा राज्य के कार्यो की वह स्वयं देखभाल करता था, जिसके कारण उसकी प्रजा सुख, शान्ति तथा समृद्धि का अनुभव करती थी। दुर्भिक्ष पीड़ितों की रक्षा के लिए किए गए बादशाह के प्रयत्न उसकी प्रजावत्सलता के ज्वलन्त प्रमाण हैं।

अब्दुल हमीद लाहौरी के कथनानुसार- “उसने सत्तर लाख रुपये का लगान माफ कर दिया तथा भोजनालयों में भूखों को मुफ्त भोजन की व्यवस्था की। बादशाह ने 50,000 रुपये अहमदाबाद में दुर्भिक्ष पीड़ित जनता में बाँटने की आज्ञा प्रदान की। उसने प्रजा के हित के लिए एक नहर का निर्माण करवाया तथा सिंचाई के लिए अन्य नहरें बनवाई।” लेनपूल ने लिखा है- “शाहजहाँ अपनी उदारता और दया के लिए विख्यात था और इसीलिए वह अपनी प्रजा का इतना अधिक प्रिय बन गया था।”

7. साहित्य तथा भवन-निर्माण कला – कला तथा अन्य ललितकलाओं की उन्नति का युग- शाहजहाँ का काल साहित्य तथा ललितकलाओं के दृष्टिकोण से पूर्णतया स्वर्ण-युग कहलाने का अधिकारी है। उसके विपक्षी भी उसके काल की कलाकृतियों को देखकर मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकते। शाहजहाँ द्वारा निर्मित दिल्ली (शाहजहानाबाद) का लाल किला तथा उसमें दीवान-ए-आम और दीवान-ए-खास, दिल्ली की जामा मस्जिद, आगरा की मोती मस्जिद तथा आगरा की ही सर्वोत्कृष्ट कृति ताजमहल, शाहजहाँ के युग को स्वर्ण-युग प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं। दिल्ली, लाहौर और कश्मीर के बगीचे, उसके पौधों, फूलों और नहरों के प्रति प्रेम को प्रदर्शित करते हैं। इसके साथ ही अलीमर्दन खाँ 98 मील लम्बी रावी नहर काटकर लाहौर लाया और नहर-ए-शाहाब या पुरानी फिरोज नहर, जो मिट्टी से भर गई थी, को न केवल साफ किया गया, बल्कि नहर-ए-बहिश्त के नाम से इसे 60 मील से भी अधिक लम्बा कर दिया गया।

शाहजहाँ की सर्वश्रेष्ठ कृति आगरा में यमुना के तट पर बनी हुई ताजमहल नाम की इमारत है, जिसे उसने अपनी प्रिय पत्नी मुमताजमहल की स्मृति में बनवाया था, जिसकी मृत्यु 7 जून, 1631 ई० को बुरहानपुर में हुई थी। यह उसके दाम्पत्य-प्रेम कथा का अमर प्रतीक है। ताजमहल के अतिरिक्त उसके द्वारा निर्मित आगरा की अनेक इमारतें उसके अलंकृत स्वभाव एवं श्रेष्ठ अभिरुचि का परिचय देती हैं, जिनमें मोती मस्जिद, मुसम्मन बुर्ज आदि इमारतें अपना अद्वितीय स्थान रखती हैं। शाहजहाँ ने अपने कला-प्रेम के लिए अत्यधिक धन व्यय किया, जो उसकी समृद्धि, गौरव तथा शासन का सजीव प्रमाण है। जनता पर कर वृद्धि किए बिना ही सम्राट ने इतनी गौरवपूर्ण इमारतों का निर्माण करवाया।

(क) लेखन-कला – इस काल में चित्रकला की प्रगति के साथ-साथ लेखन-कला का भी काफी विकास हुआ। तत्कालीन हस्तलिखित पाण्डुलिपियों के अवलोकन से यह प्रमाणित होता है कि शाहजहाँ के शासनकाल में लोग लेखन कला में कितने सिद्धहस्त थे। मुहम्मद मुराद शिरीन इस समय का कुशल हस्त-लेखक था।

(ख) चित्रकला – शाहजहाँ को स्थापत्य-कला के साथ-साथ चित्रकला का भी शौक था। सम्राट के अतिरिक्त आसफ खाँ व शहजादे दाराशिकोह को भी चित्रकला से बहुत प्रेम था। इस काल के प्रमुख चित्रकारों में मीर हाशिम, अनूपमित्र तथा चित्रमणि विशेष उल्लेखनीय हैं। इस काल के चित्रों में हस्तकौशल अधिक तथा शैली एवं भावों की विविधता कम पाई जाती है। इसके साथ ही इन चित्रों में स्वाभाविकता तथा मौलिकता का अभाव पाया जाता है।

(ग) कला की उन्नति – शाहजहाँ का ‘मयूर सिंहासन’ अथवा ‘तख्त-ए-ताऊस’ जो बहूमूल्य पत्थरों से जड़ित था तथा जिसके बीचों-बीच विश्वप्रसिद्ध हीरा कोहिनूर जगमगाता था उसके गौरव को चार चाँद लगा देने के लिए पर्याप्त था। मयूर सिंहासन इस काल की सुन्दर कृति थी।

(घ) संगीत कला – शाहजहाँ की संगीत में अत्यधिक अभिरुचि थी। वह स्वयं एक अच्छा संगीतज्ञ था और उसने अपने
दरबार में अनेक संगीतज्ञों को संरक्षण प्रदान किया था। उसके समय में वाद्य-कला के क्षेत्र में उन्नति हुई थी। सुखसेन, एयाज और सूरसेन बीन बजाने में पारंगत थे। शाहजहाँ का ध्रुपद राग के प्रति विशेष अनुराग था। लाल खाँ नामक संगीतकार ध्रुपद राग का विशेष गायक था। हिन्दू गायकों में जगन्नाथ को श्रेष्ठ स्थान प्राप्त था। वह एक उच्चकोटि का गायक था, जिसे सम्राट का कृपापात्र होने का सौभाग्य प्राप्त था।

(ङ) साहित्य – शाहजहाँ के शासन में साहित्य की भी बहुत उन्नति हुई थी। फारसी इस युग में राष्ट्रभाषा का स्थान रखती थी। इस समय फारसी दो शाखाओं में बंटी हुई थी। पहली शाखा विशुद्ध फारसी की थी और दूसरी शाखा भारतीय फारसी से सम्बन्धित थी। भारतीय फारसी भाषा के जन्मदाता अबुल फजल थे। इतिहास के अलावा काव्य-रचना भी इस काल में प्रमुख रूप से हुई। दरबारी इतिहासकार अब्दुल हमीद लाहौरी लिखता है कि गंगाधर तथा ‘गंगालहरी’ के प्रसिद्ध लेखक जगन्नाथ पण्डित, शाहजहाँ के राजकवि थे। कसीदों के लिखने का भी बहुत प्रचलन था। इस काल का एक महान शायर मिर्जा मुहम्मद अली था, जिसको ‘साहब’ का तखल्लुस प्राप्त था। गद्य साहित्य की भी उन्नति इस काल में बहुत हुई थी।

अनेक सुन्दर पत्र भी इस काल में लिखे गए थे। संस्कृत ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद शहजादा दारा के प्रोत्साहन से हुआ था। भगवद्गीता, उपनिषद् तथा रामायण आदि का अनुवाद भी इसी काल में हुआ। औषधिशास्त्र, खगोल विद्या तथा गणित की भी बहुत प्रगति हुई थी। अताउल्ला इस काल का बहुत बड़ा गणितज्ञ था और मुल्ला फरीद विख्यात खगोल विद्या विज्ञानी था। हिन्दी काव्य एवं साहित्य के विकास के प्रति शाहजहाँ उदासीन न रहा। सुन्दर श्रृंगार, सिंहासन बत्तीसी, और बारहमासा के रचयिता प्रसिद्ध कवि सुन्दरदास उपनाम के महाकवि ‘राय’ थे। हिन्दी के सामयिक सर्वश्रेष्ठ कवि चिन्तामणि भी सम्राट के विशेष कृपापात्र थे। संस्कृत और हिन्दी के प्रकाण्ड विद्वान कवीन्द्र आचार्य सरस्वती तथा उन्हीं की कोटि के अन्य संस्कृत
विद्वानों से शाहजहाँ का दरबार अलंकृत था।

स्वर्ण युग के विपक्ष में तर्क – जब हम शाहजहाँ के काल के दूसरे पक्ष का अध्ययन करते हैं तो स्वर्ण की यह जगमगाहट फीकी पड़ जाती है तथा यह सन्देह होने लगता है कि क्या वास्तव में शाहजहाँ का काल स्वर्णकाल कहलाने का अधिकारी है। शाहजहाँ के काल के अन्धकारपूर्ण पक्ष का समर्थन अनेक इतिहासकारों ने किया है, जिनमें स्मिथ प्रमुख हैं। इन इतिहासकारों के मत में यह युग कदापि स्वर्ण युग कहलाने का अधिकारी नहीं है। अपने मत की पुष्टि में इन विद्वानों ने निम्नलिखित प्रमाण प्रस्तुत किए हैं

1. भारी करों का भार – शाहजहाँ को भवन निर्माण में अत्यधिक रुचि थी। उसने बहुमूल्य भवनों का निर्माण करवाया। उसका शानदार दरबार भी बहुमूल्य वस्तुओं से सुसज्जित रहता था। उसकी इन अभिरुचियों पर अपार धन व्यय हुआ। इसके अतिरिक्त उसकी विजय योजनाएँ; विशेषकर मध्य एशियाई नीति भी भारी अपव्यय का कारण बनी। इतना धन व्यय करने के लिए उसे जनता पर कर अधिक बढ़ाने पड़े तथा उसके अपव्यय का अधिकांश भार दरिद्र जनता को वहन करना पड़ा। एलफिन्स्टन तथा लेनपूल के मत में जनता को शाहजहाँ की मूल्यवान अभिरुचि की पूर्ति के लिए अपने परिश्रम से अर्जित धन का त्याग करना पड़ा होगा।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि शाहजहाँ का युग दरिद्र जनता के लिए स्वर्ण युग के विपरित अन्धकार युग था उसका दमन किया जाता था, सरकारी कर्मचारी उसे लूटते थे तथा जबरन कठोर परिश्रम करने पर विवश करते थे। गाढ़े खून की कमाई उन्हें राजकर के रूप में दे देनी पड़ती थी तथा गरीब व्यक्ति अधिकांशतः भूखों मरते थे। ऐसे युग को स्वर्ण युग कहना कदापि उचित प्रतीत नहीं होता है।

2. शाहजहाँ की धार्मिक नीति- यद्यपि शाहजहाँ ने औरंगजेब के समान धार्मिक अत्याचार तो नहीं किए तथापि उसके काल में धार्मिक पक्षपात का युग आरम्भ हो गया था। अनेक हिन्दुओं को लालच देकर बलात् मुसलमान बनाया गया था। हिन्दुओं के अतिरिक्त ईसाई भी उसकी असहिष्णुता के शिकार बन गए थे। कट्टर सुन्नी होने के कारण शियाओं के साथ उसका व्यवहार सहानुभूतिपूर्ण न था। विधर्मियों के प्रति उसकी असहिष्णुता इस बात से प्रकट होती है कि शियाओं को उसके दरबार में उच्च स्थान प्राप्त न था।

3. शिया राज्यों का विरोध- बीजापुर तथा गोलकुण्डा के राज्यों को वह इसलिए नष्ट कर देना चाहता था कि वे शिया राज्य थे। यदि शाहजहाँ तथा औरंगजेब ने इन राज्यों को जीतने का प्रयास न किया होता तो ये राज्य मराठों के विरुद्ध मुगल सम्राटों के सहायक होते तथा मराठों का उत्कर्ष असम्भव हो गया होता। इस प्रकार शिया राज्यों के पतन तथा मराठों के उत्कर्ष में भी शाहजहाँ का योगदान रहा और कालान्तर में यह कारक मुगल साम्राज्य के पतन का कारण बना।

4. शासन-व्यवस्था में शिथिलता- यद्यपि शाहजहाँ के काल में अधिकांशतः शान्ति विद्यमान थी किन्तु कुछ सूबों में सूबेदारों के अत्याचारों के कारण जनता की स्थिति शोचनीय थी। कर्मचारी रिश्वत लेते थे तथा प्रजा पर अत्याचार करके अधिक धन वसूल करते थे क्योंकि उन्हें अपने अधिकारियों को उपहार और भेंट देने के लिए धन की आवश्यकता पड़ती थी और वह धन जनता से ही प्राप्त किया जा सकता था। सम्राट शाहजहाँ स्वयं प्रजावत्सल तथा न्यायी सम्राट था।

परन्तु उसके काल में केन्द्र का अनुशासन ढीला पड़ने लगा था और प्रजा पर उसके कर्मचारियों द्वारा अत्याचार होते थे। शाहजहाँ के समय में बड़े-बड़े अमीरों का नैतिक एवं चारित्रिक पतन आरम्भ हो गया था जिससे उसकी सैन्य व्यवस्था का पतन हो गया था। उसके पास एक विशाल किन्तु अनुशासनहीन सेना थी जिसके कारण सेना पर अत्यधिक धन व्यय करके भी बादशाह अपनी विजय नीति में सर्वथा असफल रहा। उसके विलासी सैनिक तथा सेनापति मध्य एशिया एवं कंधार के दुर्गम प्रदेशों में रहने को प्रस्तुत नहीं थे। इसलिए सम्राट की मध्य एशियायी नीति असफल रही।

5. सामाजिक भेद-भाव – शाहजहाँ के काल में समाज के दो वर्गों- धनी वर्ग तथा निर्धन वर्ग- के मध्य एक भयंकर खाई उत्पन्न हो चुकी थी। कुछ लोग इतने धनी थे कि अपनी विलासिता पर वे मनमना धन व्यय कर सकते थे। दूसरी ओर, अधिकांश जनता भूख से व्याकुल थी। उनके पास न शरीर ढ़कने के लिए वस्त्र थे और न खाने के लिए अनाज। मिट्टी अथवा घास-फूस के झोंपड़े में निवास करने वाले ये दु:खी जन अथक परिश्रम करके भी अपने परिवार का भरण-पोषण करने में असमर्थ रहते थे। अमीरों की विलासिता को पूरा करने के लिए उन्हें अपनी आय का अधिकांश भाग कर के रूप में देना पड़ता था। सम्राट तथा उसके कर्मचारियों के अत्याचारों के कारण उनमें असन्तोष जाग्रत होने लगा था जिसका परिणाम औरंगजेब के काल में अनेक विद्रोहों के रूप में दृष्टिगोचर होता है। शाहजहाँ के काल में समाज का पतन आरम्भ हो चुका था तथा सामाजिक दशा को ध्यान में रखते हुए इस युग को स्वर्ण युग कदापि नहीं कहा जा सकता।

6. आर्थिक पतन – शाहजहाँ के युग में बाह्य जगमगाहट तथा वैभव ही देखने को मिलता है। इस काल मे यद्यपि बाह्य देशों से (विशेषकर मध्य एशिया, पश्चिम तथा यूरोप) व्यापारिक सम्पर्क स्थापित थे जिनसे भारत को आर्थिक लाभ होता था तथा राजकोष धन से भरा हुआ था तथापित मुगलकाल की आर्थिक दशा का पतन शाहजहाँ के काल में आरम्भ हो जाता है।

7. शाहजहाँ का दुर्बल चरित्र – शाहजहाँ के चरित्र पर अनेक शंकाएँ प्रकट की गई हैं। बर्नियर तथा मनूची इत्यादि विद्वानों ने उसे अत्यन्त कामातुर, विलासी और पाशविक वृत्ति का मनुष्य सिद्ध किया है। शाहजहाँ के चरित्र में निम्नलिखित दोष थे

(क) अपव्ययी – शाहजहाँ ने अपने दाम्पत्य प्रेम की स्मृति में ताजमहल बनवाया था। विद्वानों का मत है कि इतना धन दूसरों की भलाई के कार्यों में भी खर्च किया जा सकता था। इसी प्रकार मयूर सिंहासन के निर्माण में भी बहुत-सा धन व्यय हुआ था। लेनपूल का विचार है कि उसके शौक पूरे करने के लिए बहुत अधिक धन असहाय जनता से वसूल किया गया था।

(ख) अत्याचारी-  शाहजहाँ के चरित्र पर अत्याचारी होने का आरोप भी लगाया जाता है। उसने अपने सिंहासनारोहण हेतु अपने भाइयों का निर्ममतापूर्ण वध भी कराया था। शाहजहाँ ने ईसाइयों तथा सिक्खों पर भी अत्याचार किए थे।

(ग) व्यभिचारी – शाहजहाँ के चरित्र का यह भी एक गम्भीर दोष था, जिसके कारण उस युग को स्वर्णयुग मानने में संशय होता है। उस पर परनारी गमन का दोष लगाया गया है। यद्यपि यह दोष तत्कालीन समाज के राजवंशों के अधिकांश पुरुषों में दृष्टिगोचर होता है।

शाहजहाँ के अपव्ययी स्वभाव, उसकी महत्त्वाकांक्षी विजय-योजनाएँ, ऐश्वर्याशाली भवन तथा गौरवपूर्ण दरबार ने उसके पूर्वजों द्वारा संचित धन का सफाया कर दिया तथा निम्न एवं मध्यम वर्ग को करों के भार से लाद दिया। बर्नियर लिखता है- “गरीबों को इतने अधिक कर देने पड़ते थे कि उनके पास बहुधा जीवन की अनिवार्य आवश्यताएँ पूरी करने योग्य भी धन नहीं बच पाता था।” इस आर्थिक पतन का आरम्भ शाहजहाँ के काल में हुआ तथा औरंगजेब के काल में पूर्ण आर्थिक पतन के कारण मुगल साम्राज्य का पतन आरम्भ हो गया।

उपर्युक्त दो विरोधी विचारधाराएँ शाहजहाँ के युग के दो विरोधी पक्षों का प्रदर्शन करती हैं। कुछ विद्वानों के मत में शाहजहाँ का युग स्वर्णयुग था तथा कुछ विद्वान उसकी शासन-व्यवस्था के दोषों की ओर संकेत करते हैं। वास्तव में शाहजहाँ का काल मुगलकाल का स्वर्ण युग था। परन्तु चरमोत्कर्ष के उपरान्त पतन प्रकृति का शाश्वत नियम है; अतः उत्थान की अन्तिम सीढ़ी पर पहुँचकर शाहजहाँ के काल में ही मुगलकाल के पतन का बीजारोपण हो गया।

प्रश्न 5.
शाहजहाँ की मध्य-एशियाई नीति के परिणामों की विवेचना कीजिए।
उतर:
शाहजहाँ की मध्य-एशियाई नीति की सभी विद्वानों ने कटु आलोचना की है। कुछ के विचार में यह शाहजहाँ की महान भूल थी तथा कुछ इसे उसकी महत्त्वाकांक्षा का स्वप्नमात्र समझते हैं। यह नीति निरर्थक तथा असफल रही तथा मुगल साम्राज्य पर इसके घातक प्रभाव पड़े। शाहजहाँ की मध्य-एशियाई नीति के परिणाम निम्नलिखित हैं

1. अपार धन और जन की क्षति – शाहजहाँ की मध्य एशियाई विजय-योजना में अपार धन की क्षति हुई। केवल 2 वर्ष में 12 करोड़ रुपया व्यय हुआ, जिसका कारण राजकोष पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। इसके अतिरिक्त 500 सैनिक युद्धभूमि में खेत रहे तथा इसके दस गुने सैनिक बर्फ से ढके हुए कठिन मार्गों में खप गए। बल्ख के दुर्ग में एकत्रित पाँच लाख रुपये का अनाज तथा रसद का अन्य सामान शत्रुओं के हाथ चला गया। 50,000 रुपये नकद नजर मुहम्मद को तथा साढ़े बाईस हजार रुपये उसके राजदूत को भेंट में प्रदान किए गए। इसके बदले में एक इंच भूमि भी मुगलों को प्राप्त न हो सकी और न बल्ख की गद्दी पर शत्रु के स्थान पर कोई मित्र ही बिठाया जा सका।

2. मुगल प्रतिष्ठा को आघात- मध्य – एशियाई नीति की असफलता से मुगलों की प्रतिष्ठा को गहरा धक्का पहुँचा। मुगलों का विजेता के रूप में डींग मारना बन्द हो गया और ईरानी वीरता, साहस तथा सैनिक शक्ति की प्रतिष्ठा बढ़ गई। परिणामस्वरूप उत्तर-पश्चिमी भागों में वर्षों तक ईरानियों का भय बना रहा तथा 18वीं शताब्दी में नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली के आक्रमणों ने मुगल साम्राज्य के पतन को और भी अधिक निकट ला दिया।

3. मुगल सेना का विनाश तथा पतन – इन युद्धों में मुगलों की सर्वोत्तम सेनाओं का विनाश हो गया। सैनिक दृष्टिकोण से इस नीति द्वारा मुगलों को अपार क्षति पहुँची। उनकी सैनिक दुर्बलता का लाभ उठाकर भारत में नई-नई शक्तियों का उत्थान तथा उपद्रव आरम्भ हुए, जिनके दमन में औरंगजेब को आजीवन संलग्न रहना पड़ा। शाहजहाँ को उत्तर-पश्चिम में व्यस्त देखकर दक्षिण में मराठों ने अपनी शक्ति का विकास आरम्भ कर दिया। धीरे-धीरे उनकी शक्ति बढ़ गई कि वह मुगल साम्राज्य का पतन का एक महत्त्वपूर्ण कारण बनी।

4. मुगलों तथा मध्य – एशिया के सम्राटों में मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का अन्त- शाहजहाँ की मध्य एशिया सम्बन्धी नीति से उजबेग मुगलों से नाराज हो गए तथा सदैव के लिए उनके शत्रु बन गए। मुगलों ने आक्सस नदी के तटीय प्रदेशों को अपने अधीन बनाना चाहा किन्तु उजबेगों में उत्पन्न राष्ट्रीय भावना के कारण मुगल अपने प्रयत्नों में सर्वथा असफल रहे। फलस्वरूप शाहजहाँ के जीवनकाल के बचे हुए दिनों में भारत और फारस के सम्बन्ध सदैव कटु बने रहे और मुगलों के आत्मबल को अपार क्षति पहुंची।

प्रश्न 6.
शाहजहाँ के काल में हुए उत्तराधिकार के युद्ध पर प्रकाश डालिए। इस युद्ध में औरंगजेब की सफलता के कारणों की भी विवेचना कीजिए।
उतर:
उत्तराधिकार के लिए युद्ध- शाहजहाँ के जीवनकाल में ही उत्तराधिकार के लिए उसके पुत्रों में युद्ध आरम्भ हो गए थे। शाहजहाँ भयंकर बीमारी से ग्रस्त हो गया। अत: दारा ने शाहजहाँ के बीमार पड़ने के उपरान्त राज्य कार्य का भार संभाला तथा वह चाहता था कि बादशाह की बीमारी का समाचार भाइयों को ज्ञात न हो। परन्तु बादशाह की बीमारी का समाचार छुप न सका तथा सर्वप्रथम बंगाल में स्थित शाहशजा ने अपने को सम्राट घोषित किया, क्योंकि सभी को बादशाह की मृत्यु का विश्वास हो चुका था। इसी प्रकार गुजरात में मुराद ने अपने नाम से खुतबा पढ़वाया तथा अपने नाम के सिक्के ढलवाए। दारा को इन दोनों भाइयों का इतना भय नहीं था जितना कि औरंगजेब का।

औरंगजेब को दरबार में घटित होने वाली घटनाओं की सम्पूर्ण सूचना रोशनआरा से मिलती रहती थी। उसने आगरा जाने वाले मार्ग को बन्द कर दिया, जिससे उसकी तैयारियों की सूचना किसी को प्राप्त न हो सके तथा मीर जुमला के साथ मिलकर उसने सैनिक शक्ति बढ़ानी आरम्भ कर दी। उसने सम्पूर्ण तैयारियों के उपरान्त बीजापुर और गोलकुण्डा के सुल्तानों से मैत्री स्थापित कर ली। शुजा अथवा मुराद के समान उसने स्वयं को बादशाह घोषित नहीं किया वरन् उसने घोषणा की कि वह तो पाक मुसलमान है तथा मक्का में एक दरवेश का जीवन व्यतीत करना चाहता है और मक्का जाने से पूर्व अपने पिता के दर्शन करने दिल्ली जा रहा है।

1. मुराद के साथ गठबन्धन – औरंगजेब अपने भाइयों में सबसे बुद्धिमान था। वह जानता था कि मुराद व्यसनी तथा मूर्ख है। और उसकी सहायता सरलता से प्राप्त की जा सकती है। सर्वप्रथम उसने मुराद के इस कार्य की निन्दा की कि उसने स्वयं को बादशाह घोषित करके सूरत पर अधिकार कर लिया है। औरंगजेब ने मुराद को पत्र लिखा कि जब तक शाहजहाँ की मृत्यु की सूचना नहीं मिलती, उसका यह कार्य सर्वथा निन्दनीय है। तदुपरान्त गुप्त रूप से दोनों भाइयों ने समझौता किया कि दारा को मार्ग से हटाने के उपरान्त ये दोनों परस्पर राज्य का विभाजन कर लेंगे, जिसके अनुसार कश्मीर, अफगानिस्तान, सिन्ध तथा पंजाब मुराद को मिलेगा तथा शेष साम्राज्य पर औरंगजेब का अधिकार होगा।

औरंगजेब ने तो यहाँ तक कहा कि उसे राज्य की कोई इच्छा नहीं, वह तो फकीर बनना चाहता है, किन्तु दारा के समान काफिर के हाथ में राज्य की बागड़ोर छोड़ने से इस्लाम के प्रति गद्दारी होगी इसलिए वह दारा से युद्ध करना अपना कर्तव्य समझता है। इन चापलूसी-भरी बातों में मुराद फँस गया तथा उज्जैन के निकट दीपालपुर में दोनों भाइयों ने मिलकर शपथ ली कि साम्राज्य को विभाजित कर लिया जाएगा और धरमत नामक स्थान पर दारा की सेनाओं का सामना करने का निश्चय करके उन्होंने सैन्यबल के साथ धरमत के लिए प्रस्थान किया।

2. बहादुरपुर का युद्ध (24फरवरी, 1658 ई०) – जिस समय मुराद तथा औरंगजेब दारा के विरुद्ध युद्ध की योजनाएँ बना रहे थे, शाहशुजा ने स्वयं को बादशाह घोषित किया तथा एक विशाल सेना के साथ दिल्ली की ओर बढ़ा। मार्ग में बिहार के अनेक प्रदेशों को रौंदता हुआ 24 जनवरी, 1658 ई० को वह बनारस पहुँच गया। दारा चाहता था कि औरंगजेब का सामना करने से पूर्व ही वह शाहशुजा का अन्त कर दे; अतः उसने सर्वप्रथम अपने पुत्र सुलेमान शिकोह तथा राजा जयसिंह के नेतृत्व में एक सेना भेजी। दोनों सेनाओं में 24 फरवरी को बनारस से लगभग पाँच मील दूर बहादुरपुर नामक स्थान पर भीषण संग्राम हुआ, जिसमें शुजा बुरी तरह पराजित हुआ तथा अपनी जान बचाने के लिए बंगाल की ओर भाग गया।

3. धरमत का युद्ध (15 अप्रैल, 1658 ई०) – शाहशुजा की ओर सेनाएँ भेजकर ही दारा चुप नहीं बैठा, उसने कासिम खाँ तथा राजा जसवन्त सिंह के नेतृत्व में दूसरी विशाल सेना मुराद तथा औरंगजेब से युद्ध करने के लिए भेज दी। दारा ने राजा जसवंत सिंह को आज्ञा देकर भेजा था कि वह प्रयत्न करके युद्ध के बिना ही दोनों शहजादों को उनके प्रान्तों में वापस भेज दे, किन्तु यह प्रयास विफल रहा। अन्त में धरमत नामक स्थान पर दोनों पक्षों में भयंकर संग्राम हुआ, किन्तु अन्त में राजा जसवन्त सिंह पराजित हो रणक्षेत्र छोड़कर भाग खड़ा हुआ।

दारा ने सुलेमान शिकोह को बिहार से बुला भेजा, किन्तु वह देर से पहुँचा। तब तक मुगलों की सेनाएँ पराजित हो चुकी थीं। औरंगजेब को इस विजय से बहुत प्रोत्साहन मिला तथा उसे बड़ी मात्रा में अस्त्र-शस्त्र एवं अपार धन प्राप्त हुआ। इस विजय से औरंगजेब के सम्मान और शक्ति में काफी वृद्धि हो गई। यहाँ पर अपनी विजय के उपलक्ष्य में उसने एक छोटे-से-नगर फहेताबाद का निर्माण करवाया तथा चम्बल पार करके ग्वालियर की ओर बढ़ा। ग्वालियर के निकट सामूगढ़ के मैदान में उसने पुनः शाही फौजों से टक्कर लेने का निश्चय करके पड़ाव डाल दिया।

4. सामूगढ़ का युद्ध (29 मई, 1658 ई०) – इसी समय शाहजहाँ, जिसने आगरा से दिल्ली के लिए प्रस्थान कर दिया था, यह समाचार सुनकर वापस लौट आया। दारा औरंगजेब का पूर्ण विनाश करने की तैयारियों में संलग्न था। शाहजहाँ यह युद्ध नहीं चाहता था परन्तु वह दारा को रोकने में सर्वथा असमर्थ रहा। दारा 50,000 सैनिकों के साथ सामूगढ़ पहुँचा। दारा ने एक बड़ी भूल यह की कि अपने पुत्र सुलेमान शिकोह की प्रतीक्षा किए बिना ही वह आगरा से चल पड़ा। सुलेमान योग्य सेनापति था तथा शुजा को पराजित करके आगरा लौट रहा था।

दोनों भाइयों की सेनाओं में भीषण संघर्ष हुआ तथा औरंगजेब और मुराद बड़ी वीरतापूर्वक लड़े और शाही सेना का विनाश करने लगे। निराश होकर दारा अपना हाथी छोड़कर घोड़े पर सवार होकर लड़ने लगा। परन्तु उसके हाथी का हौदा खाली देखकर सैनिकों ने समझा कि दारा की मृत्यु हो गई और उसकी सेना में भगदड़ मच गई। औरंगजेब की पूर्ण विजय हुई तथा दारा की सेनाएँ भाग गई। अपनी इस पराजय से निराश होकर दारा तथा उसका पुत्र सुलेमान शिकोह आगरा की ओर बढ़े और रात्रि तक आगरा जा पहुँचे। औरंगजेब ने दारा के शिविर को लूटा तथा वहाँ से उसे काफी सम्पत्ति और बारूद प्राप्त हुई। मुराद इस युद्ध में घायल हो गया था। उसकी परिचर्या के लिए औरंगजेब ने कुशल जर्राह नियुक्त किए तथा उसे गद्दी प्राप्त करने की बधाई दी।

सामूगढ़ के युद्ध का अत्यधिक महत्त्व है। स्मिथ के अनुसार- “सामूगढ़ के युद्ध ने उत्तराधिकार के युद्ध का निर्णय कर दिया। इस युद्ध से लेकर शुजा की मृत्यु तक की घटनाओं ने यह सिद्ध कर दिया कि औरंगजेब शाहजहाँ का सबसे योग्य पुत्र तथा सिंहासन का वास्तविक अधिकारी है।”

5. औरंगजेब तथा मुराद का आगरा आगमन- सामूगढ़ के युद्ध में विजय प्राप्त करके साहस तथा उत्साह से भरे हुए। औरंगजेब और मुराद आगरा की ओर चल पड़े तथा नूर-ए-बाग नामक उद्यान में, जो आगरा के निकट ही था, उन्होंने पड़ाव डाल दिया। इस समय तक पराजित दारा के अधिकांश पक्षपातियों ने उसका साथ छोड़कर विजेता औरंगजेब का साथ देना आरम्भ कर दिया था तथा उससे क्षमा माँग ली थी। औरंगजेब ने उन्हें अपनी ओर मिलाकर शाहजहाँ से इस भीषण युद्ध के लिए क्षमा माँगी तथा साथ-ही-साथ दारा पर इस युद्ध का उत्तरदायित्व डाल दिया। शाहजहाँ ने आलमगीर नामक एक तलवार औरंगजेब के पास भेजी तथा उससे मिलने की इच्छा प्रकट की परन्तु औरंगजेब के मित्रों ने उसे परामर्श दिया कि वह शाहजहाँ को बन्दी बना ले। औरंगजेब को यह सलाह पसन्द आई।

6. शाहजहाँ का बन्दी बनाया जाना – औरंगजेब ने मुराद को आगरा के दुर्ग पर अधिकार करने के लिए भेजा। मुराद ने यमुना का पानी दुर्ग में जाने का मार्ग बन्द कर दिया। दुर्ग में स्थित सैनिकों ने थोड़ा-बहुत युद्ध किया परन्तु पानी के अभाव के कारण उन्होंने पराजय स्वीकार कर ली। औरंगजेब के हाथों शाहजहाँ द्वारा दारा को लिखा एक पत्र पड़ गया, जिसमें लिखा था कि वह दिल्ली के दुर्ग की सुरक्षा का पूर्ण प्रबन्ध रखे।

यह पत्र पढ़कर औरंगजेब का सन्देह पक्का हो गया कि बादशाह उसे धोखा देना चाहता है; अतः उसने बादशाह को बन्दी बनाकर आगरा के दुर्ग में स्थित मोती मस्जिद की एक छोटी-सी कोठरी में भेज दिया, जहाँ हिन्दुस्तान के शानदार बादशाह ने अपने जीवन के अन्तिम आठ वर्ष बड़े दु:ख एवं कष्ट में व्यतीत किए। अन्त में 22 जनवरी, 1666 ई० को उसकी मृत्यु के साथ ही उसके कष्टों का अन्त हो गया। मृत्यु के उपरान्त ताजमहल में मुमताजमहल की कब्र के निकट ही शाहजहाँ को भी दफना दिया गया।

7. मुराद का अन्त – शाहजहाँ को बन्दी बनाने के उपरान्त औरंगजेब राज्य का वास्तविक शासक बन बैठा था। वह दरबार में सिंहासन पर बैठता था तथा समस्त अमीर उसे अपना बादशाह मानते थे। जब मुराद को औरंगजेब की वास्तविक इच्छा का पता लगा तो उसने गड़बड़ करने का प्रयास किया, परन्तु औरंगजेब के सम्मुख मुराद जैसे मूर्ख को सफलता मिलनी असम्भव थी। औरंगजेब ने उसे मथुरा में भोजन के लिए आमन्त्रित किया तथा बढ़िया खाने और शराब के अत्यधिक सेवन से मुराद संज्ञाहीन होकर अपने भाई के हाथों बन्दी बना लिया गया। मुराद ने विरोध किया तथा औरंगजेब को उसकी शपथ याद दिलवाई, परन्तु औरंगजेब पर इसका कोई प्रभाव न पड़ा। यहाँ से मुराद को ग्वालियर के दुर्ग में भेज दिया गया तथा अपने दीवान अली नकी की हत्या के आरोप में उसे प्राणदण्ड दे दिया गया। 4 दिसम्बर, 1661 ई० को इस अभागे शहजादे ने बन्दीगृह में दम तोड़ दिया। वहीं दुर्ग में उसके शव को दफना दिया गया। इस प्रकार अपने विरोधियों का औरंगजेब ने एक-एक करके सफाया करना आरम्भ कर दिया।

8. दारा का अन्तिम प्रयास – देवराई का युद्ध तथा दारा का अन्त- सामूगढ़ के युद्ध के पश्चात दारा आगरा से दिल्ली की ओर चला गया था, जहाँ का राजकोष तथा दुर्ग उसके हाथ में था। परन्तु आगरा विजय से औरंगजेब की शक्ति अत्यधिक बढ़ गई तथा उसके पास धन और सेना का भी अभाव नही था; अत: उससे भयभीत दारा दिल्ली छोड़कर अपनी प्राणरक्षा के लिए पंजाब की ओर भाग गया। परन्तु औरंगजेब की सेना निरन्तर दारा का पीछा करती रही। इस समय दारा के मित्र भी उसके शत्रु हो गए थे तथा उन्होंने औरंगजेब का साथ देना आरम्भ कर दिया था। औरंगजेब ने राजा जसवन्त सिंह को भी प्रलोभन देकर अपनी ओर मिला लिया तथा अपनी प्रतिज्ञा भूलकर जसवन्त सिंह ने दारा को अकेला छोड़ दिया। अहमदाबाद के सूबेदार ने 20,000 सैनिकों से दारा की सहायता की तथा एक बार पुन: अपना भाग्य आजमाने के लिए दारा ने प्रयास किया। देवराई के दरें के ऊपर दारा तथा औरंगजेब की सेनाओं में अन्तिम मुठभेड़ हुई जिसमें दारा पुनः पराजित हुआ।

औरंगजेब दारा को पूर्णत: समाप्त करना चाहता था; अतः उसने दारा का पीछा किया। वहाँ से भागकर दारा मुल्तान होता हुआ मक्कर की ओर भाग गया और अन्त में वह दादर पहुँचा तथा वहाँ के बलूची सरदार मलिक जीवन खाँ से शरण माँगी, जिसे एक बार उसने प्राणदण्ड से बचाया था। परन्तु दारा के दुर्भाग्य ने उसका पीछा न छोड़ा। यहीं पर उसकी प्रिय पत्नी नादिरा बेगम की मृत्यु हो गई। उसकी अन्तिम इच्छा के अनुसार लाहौर में उसका शव दफना दिया गया। बलूची सरदार ने दारा की सहायता करने के बजाए उससे विश्वासघात किया तथा उसे औरंगजेब के सेनापति के हाथों सौंप दिया।

इस प्रकार 23 अगस्त, 1659 ई० को दारा और उसका पुत्र बन्दी के रूप में औरंगजेब के सम्मुख उपस्थित किए गए। दारा की यह दशा देखकर निर्दयी-से-निर्दयी व्यक्ति की आँखों में भी पानी भर आया। शाहजहाँ का सबसे प्रिय तथा विद्वान पुत्र धूल-धूसरित दशा में दरबार में उपस्थित था। दारा पर औरंगजेब ने काफिर होने का आरोप लगाया तथा उसके इशारे पर यह आरोप दरबार में सिद्ध कर दिया गया। औरंगजेब ने उसे तथा उसके पुत्र को एक हाथी पर बैठाकर सारे नगर में घुमाया और फिर उनकी हत्या करवा दी।

9. सुलेमान शिकोह का अन्त – दारा का पुत्र सुलेमान शिकोह शुजा से युद्ध करने गया हुआ था। इसी बीच दारा को औरंगजेब के साथ युद्ध करने के लिए जाना पड़ा। धरमत के युद्ध का समाचार सुनकर ही वह दिल्ली के लिए रवाना हो गया था, परन्तु मार्ग में कड़ा में उसे सामूगढ़ की पराजय का समाचार मिला। सुलेमान शिकोह ने अपने सेनापतियों को अपने पिता की सहायता करने के लिए कहा, किन्तु राजा जयसिंह ने स्पष्ट इन्कार कर दिया कि वह पराजित शहजादे की सहायता नहीं कर सकता; अत: सुलेमान इलाहाबाद से लखनऊ होता हुआ हरिद्वार तथा फिर पंजाब में अपने पिता की सहायता के लिए गया, किन्तु शाइस्ता खाँ उसका पीछा कर रहा था,

जिसने सुलेमान को गढ़वाल की ओर जाने के लिए बाध्य किया, जहाँ उसने एक हिन्दू सरदार के यहाँ शरण प्राप्त की। औरंगजेब ने, जो इस समय तक अन्य शत्रुओं का सफाया कर चुका था, सुलेमान शिकोह को समाप्त करने का प्रयास किया। सुलेमान ने लद्दाख की ओर भागने का प्रयास किया परन्तु शाही सेनाओं ने उसे पकड़कर बन्दी बना लिया और दिल्ली के सम्राट के सम्मुख उपस्थित किया। उसे ग्वालियर के दुर्ग में भेज दिया गया तथा उसको भोजन में पोस्ता मिलाकर दिया जाने लगा, जिससे उसकी मृत्यु हो गई।

10. शुजा का अन्त – अब औरंगजेब का एकमात्र शत्रु शुजा ही रह गया था। औरंगजेब ने अपने अभिषेक के उपरान्त शुजा को एक पत्र लिखा कि वह दारा से निपट ले, उसके बाद शुजा जो माँगेगा उसे वही मिलेगा। परन्तु शुजा अपने भाई को अच्छी तरह जानता था; अतः उसने युद्ध की तैयारी प्रारम्भ कर दी और जनवरी 1659 ई० में खजवा नामक स्थान पर दोनों पक्षों की सेनाओं में भीषण संघर्ष हुआ, जिसमें शुजा बुरी तरह पराजित हुआ तथा उसकी सेना का विनाश हो गया। शुजा निराश होकर पहले बंगाल और फिर अराकान की पहाड़ियों की ओर भागा। वहाँ पर उसने यहाँ के शासक को गद्दी से उतारने का पड्यन्त्र रचा, जिससे क्रुद्ध होकर अराकानवासियों ने उसकी हत्या कर डाली। इस प्रकार औरंगजेब के इस अन्तिम शत्रु का भी अन्त हो गया तथा उसने निष्कण्टक राज्य आरम्भ किया। जीवन के अन्तिम समय 1707 ई० तक औरंगजेब भारत का सम्राट बना रहा।

औरंगजेब की सफलता के कारण – लगभग दो वर्षों तक चले इस उत्तराधिकार के युद्ध में औरंगजेब को विजयश्री मिली। सामूगढ़ के युद्ध ने ही यह सिद्ध कर दिया था कि औरंगजेब ही मुगल साम्राज्य का वास्तविक उत्तराधिकारी है। कुछ विशेष कारण जो औरंगजेब की सफलता के आधार बने, निम्नलिखित हैं

1. शाहजहाँ का कमजोर प्रवृत्ति का होना – हालाँकि शाहजहाँ एक वीर व साहसी बादशाह था परन्तु उत्तराधिकारी चुनने के मामले में वह दुर्बल शासक सिद्ध हुआ। उसकी यह कमजोर प्रवृत्ति उसके वीर, विद्वान व साहसी पुत्रों की मृत्यु का कारण बनी। औरंगजेब ने अपनी राह के काँटे अपने सभी भाइयों का एक-एक करके सफाया कर दिया। रोगग्रस्त बादशाह ने दारा को समस्त राज्य-कार्यों का कार्यभार सौंपकर एक बड़ी भूल की थी। इससे उसके अन्य पुत्र नाराज हो गए। बादशाह ने अपनी समस्त शक्ति का उपयोग नहीं किया और उसके पुत्र आपस में लड़ते रहे।

2. औरंगजेब की सैन्य क्षमता – औरंगजेब महत्वाकांक्षी युवक था। वह सैन्य कुशलता में अपने सभी भाइयों की अपेक्षा श्रेष्ठ था। उसने अपने पिता के शासनकाल में अनेक बार अपनी सैनिक प्रतिभा का परिचय दिया था। उसने कूटनीति से अपने वीर परन्तु मूर्ख भाई मुराद को अपनी ओर मिला लिया और अपने अन्य भाईयों के विरुद्ध उसकी वीरता का फायदा उठाया। औरंगजेब योग्य सेनापति व कुशल राजनीतिज्ञ था। उसने दारा के विरुद्ध अपनी मुस्लिम सेना को भड़का दिया कि दारा एक काफिर है, वह इस्लाम को नहीं मानता। उसकी इस नीति से मुगल सेना के साथ-साथ अन्य मुस्लिम दरबारी भी दारा के विरुद्ध हो गए। औरंगजेब का सैन्य संचालन भी दारा के विपरीत अत्यन्त कुशल था। उसके तोपखाने की गोलीबारी ने दारा को भयभीत कर दिया। अन्तत: दारा पराजित हो गया।

3. दारा की भयंकर भूलें – दारा ने कुछ भयंकर भूलें भी कीं, जिसका परिणाम उसकी पराजय के रूप में परिणत हुआ। धरमत के युद्ध के पश्चात उसने अपने पुत्र सुलेमान शिकोह, जो एक कुशल सेना नायक था, की प्रतीक्षा नहीं की और अकेला युद्ध के लिए निकल पड़ा। उसकी दूसरी भूल सामूगढ़ के युद्ध में औरंगजेब की सेना को विश्राम करने का अवसर देना थी। यद्धभूमि में घायल हाथी के हौदे को छोड़कर घोड़े पर सवार होना भी उसकी एक अन्य भल थी, जिससे उसकी सेना उसे मृत मानकर भाग खड़ी हुई। ये सभी भूलें दारा की सैनिक क्षमता की कमजोरियों को सिद्ध करती हैं, जिसका भरपूर लाभ औरंगजेब ने उठाया।

4. औरंगजेब का कट्टरपन व दारा की उदारता – औरंगजेब कट्टर सुन्नी मुसलमान था और उस समय अधिकांश देशों में धर्मान्धता की अधिकता थी। भारत के अधिकतर मुसलमान भी धर्मान्ध थे। अत: औरंगजेब ने इस धर्मान्धता का लाभ उठाया और धर्म-सहिष्णु दारा के विरुद्ध सभी मुसलमानों को भड़का दिया। अत: औरंगजेब समस्त मुस्लिम वर्ग का पक्षपाती बन गया। वे उसे ही अपना बादशाह मानने लगे और दारा, जो कि सभी धर्मों का आदर करता था, को काफिर मानने लगे तथा उससे घृणा करने लगे, जिसका औरंगजेब ने भरपूर फायदा उठाया।

प्रश्न 7.
औरंगजेब के चरित्र का मूल्यांकन कीजिए। मुगल साम्राज्य के पतन के लिए वह किस प्रकार उत्तरदायी था?
उतर:
औरंगजेब के चरित्र का मूल्यांकन
लेनपूल के अनुसार – “औरंगजेब को अपने जीवन में भयंकर असफलता देखनी पड़ी, परन्तु उसकी असफलता बड़ी शानदार थी। उसने अपनी आत्मा को समस्त संसार के विरुद्ध खड़ा कर दिया और अन्त में संसार को विजय प्राप्त हुई। उसने अपने लिए कर्तव्य का एक मार्ग निश्चित किया और यह मार्ग व्यावहारिक था अथवा नहीं इसकी चिन्ता किए बिना वह उस पर दृढ़तापूर्वक अग्रसर होता गया।”

खाफी खाँ ने औरंगजेब का मूल्यांकन करते हुए लिखा है – “तैमूर के वंशजों में ही नहीं वरन् सिकन्दर लोदी के पश्चात् दिल्ली के सभी शासकों में ऐसा कोई नहीं हुआ, जिसमें इतनी भक्ति, तपस्या तथा न्याय की भावना हो। साहस, सहनशीलता तथा ठोस निर्णयात्मक बुद्धि में कोई औरंगजेब की समता नहीं कर सकता था। किन्तु उसे शरा (नियम, कानून) में अत्यधिक श्रद्धा थी इसलिए वह दण्ड का प्रयोग नहीं करता था और बिना दण्ड के किसी देश की प्रशासन-व्यवस्था कायम नहीं रखी जा सकती। प्रत्येक योजना जो वह बनाता, निरर्थक सिद्ध होती और जो भी साहसिक कार्य वह अपने हाथों में लेता, उसके कार्यान्वित होने में बड़ी देर लगती और अन्त में उसका उद्देश्य पूरा न होता।”

प्रो० जे०एन० सरकार तथा के०के० दत्त के अनुसार – “औरंगजेब में बहुत-से उत्तम गुण थे, परन्तु वह एक सफल शासक न था। वह एक चतुर कूटनीतिज्ञ था, परन्तु कुशल राजनीतिज्ञ न था। सारांश यह है कि उसमें वह राजनीतिक प्रतिभा न थी, जो मुगल सम्राटों में केवल अकबर में पाई जाती है, जिसमें नई नीति को चलाने तथा ऐसे कानून बनाने की क्षमता थी, जो उस काम के तथा भावी पीढ़ी के जीवन तथा विचारों को बदल सकते थे।

राय चौधरी और आर०सी० मजूमदार के अनुसार – “अपनी शक्ति तथा चरित्र-बल के बावजूद औरंगजेब भारत के शासक के रूप में असफल सिद्ध हुआ। उसने यह नहीं समझा कि किसी साम्राज्य की महत्ता उसके अधिकाधिक जनसाधारण की प्रगति पर निर्भर है। अपनी धार्मिक उमंग की प्रबलता के कारण उसने जनता के महत्वपूर्ण वर्गों की उपेक्षा की और इस प्रकार अपने साम्राज्य की विरोधी शक्तियों को उभारा।।

बर्नियर के अनुसार – “औरंगजेब एक राजनीतिज्ञ, एक महान् सम्राट तथा अद्भुत प्रतिभा का धनी व्यक्ति था।” औरंगजेब को निश्चय ही मुगल साम्राज्य के पतन के लिए उत्तरदायी माना जा सकता है। यद्यपि पूर्ण रूप से नहीं तथापि मुगल वंश का पतन अधिकतर उसकी नीतियों का ही परिणाम था, क्योंकि वह किसी का भी हृदय जीतने में असफल रहा। औरंगजेब की निम्नलिखित नीतियाँ मुगल साम्राज्य के पतन के लिए उत्तरदायी हैं

1. राजपूत विरोधी नीति- केवल राजपूतों को ही नहीं वरन् अन्य सहायकों को भी अपनी अनुदार तथा संकीर्ण नीति के कारण औरंगजेब ने अपना विरोधी बना लिया। सिक्ख, जाट, बुन्देले, मराठे सभी उसकी नीति से असन्तुष्ट होकर मुगल साम्राज्य के विनाश के लिए प्रयासरत रहने लगे। मराठों ने दक्षिण में लूटमार मचा दी, जाटों ने मथुरा के आस-पास के प्रदेशों को उजाड़ा तथा गुरु गोविन्द सिंह के नेतृत्व में सिक्ख उसे जीवनभर परेशान करते रहे। इन विद्रोहों ने मुगल वंश का पतन निकट ला दिया।

2. दक्षिण – नीति की विफलता- औरंगजेब की दक्षिण-नीति ने राजकोष पर बुरा प्रभाव डाला। विशाल सेना होने के कारण आय का अधिकांश भाग केवल सेना पर व्यय होने लगा, जिससे अन्य दिशाओं में प्रगति अवरुद्ध हो गई। इसी कारण सम्राट शान्ति तथा व्यवस्था बनाए रखने में असफल रहा। दक्षिण में शिया राज्यों को जीत लेने के साथ ही विकासोन्मुख मराठा शक्ति का सामना करने के लिए मुगलों को संघर्षरत होना पड़ा। मराठों की छापामार रण-पद्धति के सम्मुख मुगलों की विशाल सेना कुछ भी नहीं कर सकती थी। मराठों की सेना मुगल सेना एवं उनके प्रदेशों को अवसर पाते ही लूट लेती थी। इस प्रकार मराठों ने मुगलों का पतन और भी सन्निकट ला दिया।

3. पुत्रों को शिक्षित न बनाने का संकल्प – यद्यपि औरंगजेब धर्मान्ध तथा अनुदार था तथापि उसमें योग्यता का अभाव नहीं था। उसके पिता ने उसे उच्चकोटि की शिक्षा प्रदान की थी तथा सम्राट बनने से पूर्व उसने शासन-प्रबन्ध का पर्याप्त अनुभव भी प्राप्त कर लिया था। इसलिए विद्रोहों तथा संकटों के उपरान्त भी उसने राज्य को अपने हाथ से नहीं जाने दिया। वह शंकालु प्रकृति का था तथा उसे भय था कि उसके पुत्र योग्य बनकर कहीं उसके विरुद्ध विद्रोह न कर दें, जैसा कि उसने स्वयं अपने पिता के विरुद्ध किया था। उसने केवल शहजादे अकबर को व्यवहारिक शिक्षा देने का प्रयास किया था। शहजादे अकबर के विद्रोह के पश्चात् अपने अन्य शहजादों के प्रति सम्राट और भी सतर्क हो गया तथा उसने उन्हें कभी भी कोई महत्वपूर्ण प्रशासनिक भार सँभालने का अवसर नहीं दिया। उसने अपने पुत्रों पर भी कभी विश्वास नहीं किया तथा 90 वर्ष की वृद्धावस्था में भी लकड़ी के सहारे चलकर वह स्वयं सैन्य संचालन करता था। उसकी इसी नीति के कारण अनुभव से वंचित उसके उत्तराधिकारी विशाल साम्राज्य को सँभाल पाने में असमर्थ रहे।

4. शासन का केन्द्रीकरण – शंकालु प्रकृति के कारण औरंगजेब ने शासन की बागडोर पूर्णतया अपने हाथ में रखी। दक्षिण की विजयों के कारण मुगल साम्राज्य काफी विशाल हो गया था तथा एक व्यक्ति और एक केन्द्र से उसका समुचित संचालन असम्भव हो गया था। सम्राट के स्वभाव के कारण सूबेदार अनुत्तरदायी हो गए तथा प्रजा पर अत्याचार करने लगे। उनके अधिकारों को छीनकर सम्राट ने शासन-व्यवस्था को दोषपूर्ण बना दिया। जब तक सम्राट शक्तिशाली रहा तब तक तो शासन सुचारु रूप से चलता रहा, परन्तु जैसे-जैसे वह वृद्ध होता गया उसकी कार्य करने की शक्ति क्षीण होने लगी तथा प्रान्तों पर से उसका अंकुश ढीला पड़ने लगा। दूरस्थ प्रान्तों के सूबेदार उसके नियन्त्रण से बाहर होने लगे तथा विद्रोह करने को तत्पर हो गए।

5. शासन-व्यवस्था की शिथिलता – यद्यपि औरंगजेब साम्राज्य के छोटे-छोटे कार्यों का निरीक्षण भी स्वयं करता था परन्तु वह देश में शान्ति और सुव्यवस्था स्थापित करने में असफल रहा। यद्यपि वह कुशल शासक था परन्तु उसकी यह धारणा बन गई थी कि वह स्वयं सबसे अधिक योग्य है। वह अपने बड़े-से-बड़े पदाधिकारी पर भी सन्देह करता था। ईर्ष्या और सन्देह की मात्रा उसमें इतनी प्रबल थी कि उसने सभी पर सन्देहपूर्ण दृष्टि रखनी आरम्भ कर दी थी। शासन-व्यवस्था में योग्य-से-योग्य व्यक्तियों के परामर्श की भी वह अवहेलना करने लगा था। इस सन्देहपूर्ण नीति का दुष्प्रभाव जनता पर पड़ा, जिससे शान्ति एवं समृद्धि का युग समाप्त हो गया।

6. धर्मान्धता एवं असहिष्णुता की नीति – सम्राट के रूप में औरंगजेब का आदर्श संकीर्ण एवं अनुदार था। वह मुसलमानों की रक्षा करना अपना कर्त्तव्य समझता था जबकि हिन्दुओं के प्रति उसकी नीति अत्याचारपूर्ण थी। वह बलपूर्वक इस्लाम धर्म का प्रचार करना अपना कर्तव्य समझता था। इस्लाम स्वीकार न करने पर वह हिन्दुओं को प्राणदण्ड तक दे देता था। भारत जैसे देश के लिए, जहाँ 80 प्रतिशत जनता हिन्दू थी, इस प्रकार की नीति अहितकर तथा घातक सिद्ध हुई। हिन्दुओं ने सम्राट के कठोर अत्याचार सहन किए,

परन्तु धर्म परिवर्तन के लिए वे तैयार नहीं हुए। सम्राट ने जितने अधिक अत्याचार किए, उतनी ही अधिक विद्रोह की प्रवृत्ति हिन्दुओं में उत्पन्न हुई। इस प्रकार औरंगजेब की नीति मुगल साम्राज्य के लिए घातक सिद्ध हुई। औरंगजेब ने हिन्दुओं के प्रति ही नहीं, शियाओं के प्रति भी अनुदारतापूर्ण नीति अपनाई तथा योग्य एवं प्रतिभाशाली शियाओं की सेवाओं से साम्राज्य को वंचित कर दिया। उसकी इस धार्मिक नीति का परिणाम यह हुआ कि उसकी मृत्यु के 10-15 वर्ष पश्चात् ही मुगल साम्राज्य टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया। औरंगजेब की इस धर्मान्धता का मुगल साम्राज्य पर अत्यन्त घातक प्रभाव पड़ा।

7. आर्थिक तथा सांस्कृतिक विकास का अन्त – औरंगजेब धर्म का अन्धा अनुयायी था तथा कुरान के अनुसार चलने के कारण ललित कलाओं का पोषण नहीं कर सकता था। उसे न संगीत में अभिरुचि थी, न चित्रकला में और न भवननिर्माण-कला में। फलतः इन सभी ललित कलाओं का पतन उसके काल में हो गया। विद्वान होने पर भी साहित्यकारों को आश्रय देने में उसकी रुचि नहीं थी। फलतः सांस्कृतिक विकास के क्षेत्र में अरुचि के कारण औरंगजेब का युग संस्कृति के पूर्ण पतन का युग था।

प्रश्न 8.
औरंगजेब की धार्मिक नीति की समीक्षा कीजिए।
उतर:
औरंगजेब की धार्मिक नीति के विषय में इतिहासकारों में गहरा मतभेद है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार उसने अकबर की धार्मिक सहिष्णुता की नीति को उलटकर साम्राज्य को हिन्दुओं की वफादारी से वंचित कर दिया। उनके अनुसार इसके फलस्वरूप जन-विद्रोह भड़क उठे, जिससे साम्राज्य की शक्ति क्षीण हो गई। लेकिन कुछ दूसरे इतिहासकारों का विचार है कि औरंगजेब पर नाहक दोषारोपण किया गया है। उनके अनुसार हिन्दू औरंगजेब के पूर्ववर्ती शहंशाहों की शिथिलता के कारण गैर-वफादार हो गए थे,

जिससे मजबूर होकर आखिरकार उसे कड़े कदम उठाने पड़े और मुसलमानों का समर्थन प्राप्त करने की खास कोशिश करनी पड़ी, क्योंकि साम्राज्य अंततः टिका हुआ तो उन्हीं के समर्थन पर था। परन्तु औरंगजेब के सम्बन्ध में लिखी गई हाल की कृतियों में एक नई दृष्टि उभरी है जिसमें कोशिश यह की गई है कि औरंगजेब की राजनीतिक एवं धार्मिक नीतियों का मूल्यांकन उस काल की सामाजिक, आर्थिक एवं संस्थागत घटनाक्रम के सन्दर्भ में किया जाए। इसमें कोई सन्देह नहीं कि औरंगजेब के धार्मिक विचार रूढ़िवादी थे।

औरंगजेब कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसका राजत्व सिद्धान्त इस्लाम का राजत्व सिद्धान्त था। औरंगजेब का प्रमुख लक्ष्य भारत को काफिरों के देश से इस्लाम देश बनाना था। औरंगजेब जीवनपर्यन्त इस उद्देश्य को न भूल सका और न कभी शासन नीति को इससे पृथक् रख सका। औरंगजेब का विश्वास था कि उससे पहले के सभी मुगलों ने सबसे गम्भीर भूल यह की थी कि उन्होंने भारत में इस्लाम की श्रेष्ठता को स्थापित करने का प्रयत्न नहीं किया था। उसके अनुसार यह इस्लाम को मानने वाले बादशाह का एक प्रमुख कर्तव्य था। इस व्यक्तिगत धारणा के अतिरिक्त परिस्थितियों ने भी औरंगजेब को धार्मिक कट्टरता की नीति अपनाने के लिए बाध्य किया था। परन्तु तब भी इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि औरंगजेब की धार्मिक कट्टरता की नीति का मुख्य आधार उसकी धार्मिक कट्टरता की स्वयं की धारणा थी।

औरंगजेब की धार्मिक नीति का विश्लेषण करते हुए हम सबसे पहले नैतिक और धार्मिक नियमों का जायजा ले सकते हैं-

  1. गायन पर प्रतिबन्ध- औरंगजेब ने दरबार में गायन बन्द करवा दिया और गायकों को पेंशन दे दी। लेकिन वाद्य-संगीत तथा नौबत (शाही बैण्ड) को जारी रखा गया। हरम में महिलाओं ने गायन जारी रखा और सरदार लोग भी गायन को प्रश्रय देते थे।
  2. सिक्कों पर कलमाखुदाई का निषेध- अपने शासनकाल के आरम्भ में औरंगजेब ने सिक्कों पर कलमा की खुदाई करने का निषेध कर दिया। उसका कहना था कि सिक्कों पर कोई पैर रख दे या एक हाथ से दूसरे हाथ में पहुँचने के क्रम में वह नापाक हो जाए, तो वह कलमा का अपमान है।
  3. झरोखा दर्शन पर प्रतिबन्ध- औरंगजेब ने झरोखा दर्शन की प्रथा भी बन्द कर दी क्योंकि इसे वह एक अन्धविश्वासपूर्ण रिवाज और इस्लाम के विरुद्ध मानता था।
  4. नौरोज पर प्रतिबन्ध- औरंगजेब ने नौरोज के त्योहार की मनाही कर दी क्योंकि वह जरथुस्त्री रिवाज था, जिसका पालन ईरान के सफावी शासक करते थे।
  5. मादक वस्तुओं पर प्रतिबन्ध- औरंगजेब ने भाँग का उत्पादन बन्द कर दिया। शराब पीने और जुआ खेलने को भी प्रतिबन्धित कर दिया।
  6. मुहतसिबों की नियुक्ति- औरंगजेब ने बड़े-बड़े नगरो में मुहतसिबों (धर्म निरीक्षकों) की नियुक्ति की। मुहतसिबों का कर्तव्य था कि वह देखें कि मुसलमान ठीक प्रकार से अपने धर्म का पालन करते हैं या नहीं। मुहतसिबों की नियुक्ति के पीछे औरंगजेब का यह आग्रह काम कर रहा था कि राज्य नागरिकों के नैतिक कल्याण के लिए भी जिम्मेदार है।
  7. तुलादान की समाप्ति- उसने शहंशाह के जन्मदिन पर उसे सोने या चॉदी अथवा अन्य कीमती वस्तुओं से तोलने का रिवाज भी बन्द करवा दिया। यह प्रथा छोटे सरदारों के लिए सिर का बोझ बन गई थी।

इसी प्रकार औरंगजेब ने सती प्रथा पर प्रतिबन्ध लगा दिया, वेश्याओं को शादी करने अथवा देश छोड़ देने के आदेश दिए। सादगी और मितव्ययिता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सिंहासन कक्ष को सस्ते और सादे ढंग से सजाने का हुक्म दिया। रेशमी कपड़ों को अस्वीकृत की दृष्टि से देखा जाता था। इसी प्रकार उसने पेशकारों और करोरियों के पद मुसलमानों के लिए आरक्षित करने की कोशिश की, लेकिन सरदारों के विरोध और योग्य मुसलमानों की कमी के कारण शीघ्र ही उसने इस नियम में संशोधन कर दिया। अब हम औरंगजेब की उन नीतियों का अवलोकन करेंगे, जिनसे दूसरे धर्मों के अनुयायियों के प्रति औरंगजेब के धर्माध व्यवहार का पता चलता है

1. सरकारी नौकरियों से हिन्दुओं को वंचित करना- औरंगजेब ने सरकारी नौकरियों में भी भेदभावपूर्ण नीति अपनाई। उसने एक आदेश जारी कर कहा कि खालसा में लगान वसूल करने वाले सभी मुसलमान हों तथा वायसराय और तालुकेदार अपने हिन्दू पेशकार और दीवानों को निकाल दें। प्रो० जदुनाथ सरकार का मत है कि औरंगजेब के शासनकाल में कानूनगो बनने के लिए मुसलमान बनना एक लोक-प्रसिद्ध कहावत हो गई थी।

2. मन्दिरों का विध्वंस- प्रो० जदुनाथ सरकार ने लिखा है कि औरंगजेब ने हिन्दू धर्म पर बड़े विषैले ढंग से आक्रमण किया। पहले तो उसने एक फरमान (1659 ई०) में यह जारी किया कि “पुराने मन्दिरों को नहीं तोड़ना चाहिए लेकिन कोई नया मन्दिर नहीं बनने देना चाहिए। किन्तु अप्रैल, 1669 में औरंगजेब का अन्तिम आदेश हुआ, जिसमें हुक्म दिया गया कि काफिरों के सब शिवालय और मन्दिर गिरा दिए जाएँ और उनकी धार्मिक प्रथाओं को दबाया जाए। इस कट्टरता के तूफान में काठियावाड़ का सोमनाथ मन्दिर, बनारस का विश्वनाथ मन्दिर, मथुरा का केशवराय मन्दिर तोड़ दिए गए और उनके स्थान पर मस्जिदें बनवा दी गईं। आमेर राज्य जो उसका व उसके पूर्वजों का मित्र रहा था, वहाँ के भी सब मन्दिर तोड़ दिए गए, उनकी मूर्तियों को मस्जिद की सीढ़ियों पर डलवा दिया ताकि पैरों तले रौंदी जा सकें।

3. जजिया कर का पुनः प्रचलन- बादशाह औरंगजेब ने 2 अप्रैल, 1679 को आदेश दिया कि कुरान के नियमों के अनुसार जिम्मी (गैर-मुसलमान) लोगों पर जजिया कर लगाया जाए। हिन्दुओं ने दिल्ली में इस कर का विरोध किया, परन्तु सुल्तान ने कोई ध्यान नहीं दिया। गौरतलब है कि 1564 ई० में अकबर ने इस घृणित कर को हटा दिया था और तब से एक शताब्दी से अधिक समय तक इसे किसी ने लागू नहीं किया था।

4. चुंगीसम्बन्धीभेदभावपूर्ण नीति – जजिया कर के अतिरिक्त हिन्दुओं से अन्य करों में भी भेदभाव किया जाता था। व्यापारिक माल पर मुस्लिमों के लिए 2.5% और हिन्दुओं के लिए 5% कर था। हिन्दुओं को धर्म-यात्रा पर भी कर देना पड़ता था।

5. बलात् धर्म परिवर्तन- सम्राट ने अनेक बार हिन्दुओं को बलपूर्वक धर्म-परिवर्तन करने के लिए भी बाध्य किया, अन्यथा उनको प्राणदण्ड देने की धमकी दी। जाट नेता गोकुल के परिवार को बलपूर्वक मुसलमान बना दिया। सिक्ख गुरु तेगबहादुर सिंह को इस्लाम स्वीकार करने के लिए अनेक यातनाएँ दी गई और अन्त में बादशाह के हुक्म से उनका सिर काट दिया गया।

6. हिन्दुओं के विरुद्ध नियम- औरंगजेब ने दीपावली पर बाजारों में रोशनी करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। होली खेलने, हिन्दू मेलों तथा धार्मिक उत्सवों पर प्रतिबन्ध लगा दिया। राजपूतों के अतिरिक्त अन्य जाति के हिन्दुओं के लिए हथियार लेकर अच्छी नस्ल के घोड़ों एवं पालकी पर चलने की प्रथा को बन्द कर दिया।

7. इस्लाम ग्रहण करने के लिए प्रलोभन- औरंगजेब ने मुसलमान बन जाने की शर्त पर हिन्दुओं को ऊँचे पद दिए जाने और कैद से छुटकारा पाने का प्रलोभन दिया। डॉ० एस० आर० शर्मा ने लिखा है कि “चाहे जो भी अपराध होता था, इस्लाम स्वीकार कर उसका प्रायश्चित हो सकता था।”

प्रश्न 9.
औरंगजेब मुगल साम्राज्य का अन्तिम शासक था, जिसकी मृत्यु से पहले ही विशाल साम्राज्य का विघटन प्रारम्भ हो गया था।”मुगल साम्राज्य के विघटन के लिए प्राप्त औरंगजेब को कहाँ तक उत्तरदायी मानते हैं।
उतर:
मुगल साम्राज्य के पतन मे औरंगजेब का उत्तरदायित्व- औरंगजेब को निश्चय ही मुगल साम्राज्य के पतन के लिए उत्तरदायी माना जा सकता है। यद्यपि पूर्ण रूप से नहीं तथापि मुगल वंश का पतन अधिकतर उसकी नीतियों का ही परिणाम था, क्योंकि वह किसी का भी हृदय जीतने में असफल रहा।

औरंगजेब की निम्नलिखित नीतियाँ मुगल साम्राज्य के पतन के लिए उत्तरदायी हैं–

1. राजपूत विरोधी नीति- केवल राजपूतों को ही नहीं वरन् अन्य सहायकों को भी अपनी अनुदार तथा संकीर्ण नीति के कारण औरंगजेब ने अपना विरोधी बना लिया। सिक्ख, जाट, बुन्देले, मराठे सभी उसकी नीति से असन्तुष्ट होकर मुगल साम्राज्य के विनाश के लिए प्रयासरत रहने लगे। मराठों ने दक्षिण में लूटमार मचा दी, जाटों ने मथुरा के आस-पास के प्रदेशों को उजाड़ा तथा गुरु गोविन्द सिंह के नेतृत्व में सिक्ख उसे जीवनभर परेशान करते रहे। इन विद्रोहों ने मुगल वंश का पतन निकट ला दिया।

2. दक्षिण-नीति की विफलता- औरंगजेब की दक्षिण-नीति ने राजकोष पर बुरा प्रभाव डाला। विशाल सेना होने के कारण आय का अधिकांश भाग केवल सेना पर व्यय होने लगा, जिससे अन्य दिशाओं में प्रगति अवरुद्ध हो गई। इसी कारण सम्राट शान्ति तथा व्यवस्था बनाए रखने में असफल रहा। दक्षिण में शिया राज्यों को जीत लेने के साथ ही विकासोन्मुख मराठा शक्ति का सामना करने के लिए मुगलों को संघर्षरत होना पड़ा। मराठों की छापामार रण-पद्धति के सम्मुख मुगलों की विशाल सेना कुछ भी नहीं कर सकती थी। मराठों की सेना मुगल सेना एवं उनके प्रदेशों को अवसर पाते ही लूट लेती थी। इस प्रकार मराठों ने मुगलों का पतन और भी सन्निकट ला दिया।

3. पुत्रों को शिक्षित न बनाने का संकल्प- यद्यपि औरंगजेब धर्मान्ध तथा अनुदार था तथापि उसमें योग्यता का अभाव नहीं था। उसके पिता ने उसे उच्चकोटि की शिक्षा प्रदान की थी तथा सम्राट बनने से पूर्व उसने शासन-प्रबन्ध का पर्याप्त अनुभव भी प्राप्त कर लिया था। इसलिए विद्रोहों तथा संकटों के उपरान्त भी उसने राज्य को अपने हाथ से नहीं जाने दिया। वह शंकालु प्रकृति का था तथा उसे भय था कि उसके पुत्र योग्य बनकर कहीं उसके विरुद्ध विद्रोह न कर दें, जैसा कि उसने स्वयं अपने पिता के विरुद्ध किया था। उसने केवल शहजादे अकबर को व्यवहारिक शिक्षा देने का प्रयास किया था। शहजादे अकबर के विद्रोह के पश्चात् अपने अन्य शहजादों के प्रति सम्राट और भी सतर्क हो गया तथा उसने उन्हें कभी भी कोई महत्वपूर्ण प्रशासनिक भार सँभालने का अवसर नहीं दिया। उसने अपने पुत्रों पर भी कभी विश्वास नहीं किया तथा 90 वर्ष की वृद्धावस्था में भी लकड़ी के सहारे चलकर वह स्वयं सैन्य संचालन करता था। उसकी इसी नीति के कारण अनुभव से वंचित उसके उत्तराधिकारी विशाल साम्राज्य को सँभाल पाने में असमर्थ रहे।

4. शासन का केन्द्रीकरण- शंकालु प्रकृति के कारण औरंगजेब ने शासन की बागडोर पूर्णतया अपने हाथ में रखी। दक्षिण की विजयों के कारण मुगल साम्राज्य काफी विशाल हो गया था तथा एक व्यक्ति और एक केन्द्र से उसका समुचित संचालन असम्भव हो गया था। सम्राट के स्वभाव के कारण सूबेदार अनुत्तरदायी हो गए तथा प्रजा पर अत्याचार करने लगे। उनके अधिकारों को छीनकर सम्राट ने शासन-व्यवस्था को दोषपूर्ण बना दिया। जब तक सम्राट शक्तिशाली रहा तब तक तो शासन सुचारु रूप से चलता रहा, परन्तु जैसे-जैसे वह वृद्ध होता गया उसकी कार्य करने की शक्ति क्षीण होने लगी तथा प्रान्तों पर से उसका अंकुश ढीला पड़ने लगा। दूरस्थ प्रान्तों के सूबेदार उसके नियन्त्रण से बाहर होने लगे तथा विद्रोह करने को तत्पर हो गए।

5. शासन-व्यवस्था की शिथिलता- यद्यपि औरंगजेब साम्राज्य के छोटे-छोटे कार्यों का निरीक्षण भी स्वयं करता था परन्तु वह देश में शान्ति और सुव्यवस्था स्थापित करने में असफल रहा। यद्यपि वह कुशल शासक था परन्तु उसकी यह धारणा बन गई थी कि वह स्वयं सबसे अधिक योग्य है। वह अपने बड़े-से-बड़े पदाधिकारी पर भी सन्देह करता था। ईष्र्या और सन्देह की मात्रा उसमें इतनी प्रबल थी कि उसने सभी पर सन्देहपूर्ण दृष्टि रखनी आरम्भ कर दी थी। शासन-व्यवस्था में योग्य-से-योग्य व्यक्तियों के परामर्श की भी वह अवहेलना करने लगा था। इस सन्देहपूर्ण नीति का दुष्प्रभाव जनता पर पड़ा, जिससे शान्ति एवं समृद्धि का युग समाप्त हो गया।

6. धर्मान्धता एवं असहिष्णुता की नीति- सम्राट के रूप में औरंगजेब का आदर्श संकीर्ण एवं अनुदार था। वह मुसलमानों की रक्षा करना अपना कर्तव्य समझता था जबकि हिन्दुओं के प्रति उसकी नीति अत्याचारपूर्ण थी। वह बलपूर्वक इस्लाम धर्म का प्रचार करना अपना कर्त्तव्य समझता था। इस्लाम स्वीकार न करने पर वह हिन्दुओं को प्राणदण्ड तक दे देता था। भारत जैसे देश के लिए, जहाँ 80 प्रतिशत जनता हिन्दू थी, इस प्रकार की नीति अहितकर तथा घातक सिद्ध हुई। हिन्दुओं ने सम्राट के कठोर अत्याचार सहन किए, परन्तु धर्म परिवर्तन के लिए वे तैयार नहीं हुए। सम्राट ने जितने अधिक अत्याचार किए, उतनी ही अधिक विद्रोह की प्रवृत्ति हिन्दुओं में उत्पन्न हुई। इस प्रकार औरंगजेब की नीति मुगल साम्राज्य के लिए घातक सिद्ध हुई। औरंगजेब ने हिन्दुओं के प्रति ही नहीं, शियाओं के प्रति भी अनुदारतापूर्ण नीति अपनाई तथा योग्य एवं प्रतिभाशाली शियाओं की सेवाओं से साम्राज्य को वंचित कर दिया। उसकी इस धार्मिक नीति का परिणाम यह हुआ कि उसकी मृत्यु के 10-15 वर्ष पश्चात् ही मुगल साम्राज्य टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया। औरंगजेब की इस धर्मान्धता का मुगल साम्राज्य पर अत्यन्त घातक प्रभाव पड़ा।

7. आर्थिक तथा सांस्कृतिक विकास का अन्त- औरंगजेब धर्म का अन्धा अनुयायी था तथा कुरान के अनुसार चलने के कारण ललित कलाओं का पोषण नहीं कर सकता था। उसे न संगीत में अभिरुचि थी, न चित्रकला में और न भवननिर्माण-कला में। फलतः इन सभी ललित कलाओं का पतन उसके काल में हो गया। विद्वान होने पर भी साहित्यकारों को आश्रय देने में उसकी रुचि नहीं थी। फलतः सांस्कृतिक विकास के क्षेत्र में अरुचि के कारण औरंगजेब का युग संस्कृति के पूर्ण पतन का युग था।

प्रश्न 10.
मुगल साम्राज्य के पतन के कारणों की समीक्षा कीजिए।
उतर:
मुगल साम्राज्य के पतन के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे

1. औरंगजेब का उत्तरदायित्व- औरंगजेब को एक राजा और राजनीतिज्ञ के रूप में असफल व्यक्ति कहा जा सकता है। चाहे-अनचाहे उसकी नीतियों ने मुगल साम्राज्य के विघटन और पतन की प्रक्रिया आरम्भ कर दी। उसकी धार्मिक नीति ने, जिसे उसने राजनीतिक और आर्थिक कारणों से प्रभावित होकर लागू किया था, बहुसंख्यक हिन्दुओं के मन में प्रतिक्रिया उत्पन्न कर दी। उसने अपनी धर्मान्धता का परिचय देते हुए हिन्दुओं पर जजिया कर लगाया, जिससे वे उसे केवल मुसलमानों का ही सम्राट मानने लगे और उसका विरोध करने की प्रवृत्ति उनमें तीव्र हो गई।

धर्म को ही आधार बनाकर जाटों, सतनामियों, सिक्खों, राजपूतों, मराठों, यहाँ तक कि दक्कन की शिया रियासतों ने भी क्षेत्रीय स्वतन्त्रता के लिए प्रयत्न आरम्भ कर दिए और मुगलों को परेशान करने लगे। इन शक्तियों को दबाने में औरंगजेब की शक्ति एवं प्रतिष्ठा नष्ट हो गई, फिर भी इन पर पूर्ण नियन्त्रण स्थापित नहीं किया जा सका। इस प्रकार हिन्दुओं का समर्थन और सहयोग खोना औरंगजेब की एक बहुत बड़ी राजनीतिक भूल थी। औरंगजेब की दूसरी बड़ी भूल राजपूतों का सहयोग खोना था। भारत में मुगल सत्ता के स्थाई स्तम्भ राजपूत ही थे।

किन्तु इस स्तम्भ को औरंगजेब ने अपनी राजनीतिक अदूरदर्शिता एवं धार्मिक कट्टरपन से खो दिया। इसी प्रकार औरंगजेब ने गुरु तेगबहादुर का वध करवाकर सिक्खों को मुगल साम्राज्य के विरुद्ध खड़ा कर दिया। औरंगजेब की दक्षिण-नीति ने भी मुगल साम्राज्य के पतन में योगदान दिया। उसने बीजापुर और गोलकुण्डा को मुगल साम्राज्य में मिलाने की बड़ी राजनीतिक भूल की। इन दोनों राज्यों की समाप्ति के बाद दक्षिण में मराठों पर से सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थानीय नियन्त्रण समाप्त हो गया। इस प्रकार मराठों को संगठित एवं शक्तिशाली होने का एक और अवसर मिल गया। औरंगजेब की दक्षिण की यह मूर्खतापूर्ण नीति करीब 25 वर्ष तक चलती रही। इस लम्बी अवधि के दौरान अपार धन, जन एवं सेना का ह्रास हुआ, साथ ही उत्तर भारत की शासन-व्यवस्था भी कमजोर पड़ गई। इस अवसर का लाभ उठाकर अनेक प्रान्तीय सुल्तानों ने अपने आप को स्वतन्त्र घोषित कर दिया।

2. औरंगजेब के अयोग्य उत्तराधिकारी- मध्ययुगीन साम्राज्य मात्र सम्राटों की योग्यता पर टिका रहता था, किन्तु दुर्भाग्य से औरंगजेब के बाद के मुगल सम्राट न तो योग्य थे और न चरित्रवान। वे अब तलवार से अधिक स्त्री और शराब को प्यार करने लगे थे। औरंगजेब का उत्तराधिकारी बहादुरशाह शाह-ए-बेखबर’ कहलाता था। डॉ० श्रीराम शर्मा के मतानुसार, “कामबख्श ने बन्दीगृह में मृत्यु-शैय्या पर इस बात का तो पश्चाताप किया कि तैमूर का वंशज जीवित ही पकड़ा गया। किन्तु जहाँदारशाह और अहमदशाह को अपनी रखैलों के बाहु-बन्धनों में फंसे हुए कर्तव्य-विमुख अवस्था में बन्दी बनाए जाने पर तनिक भी लज्जा नहीं आई।” इस प्रकार बहादुरशाह प्रथम से लेकर बहादुरशाह जफर तक के सभी शासकों में चारित्रिक, राजनीतिक, सैनिक अथवा प्रशासनिक क्षमता नहीं थी। ऐसी स्थिति में मुगल साम्राज्य का पतन होना स्वाभाविक था।।

3. मुगलों में उत्तराधिकार के नियम का अभाव- मुगलों में राजगद्दी के लिए उत्तराधिकार का कोई नियम न था। प्रसिद्ध लेखक अस्कीन के अनुसार, “तलवार ही उत्तराधिकार की एक मात्र निर्णायक थी। प्रत्येक राजकुमार अपने भाइयों के विरुद्ध अपना भाग्य आजमाने को उद्यत रहता था। औरंगजेब द्वारा किया गया उत्तराधिकार का युद्ध इसका उदाहरण है। वस्तुतः मुगलों में बादशाह के जीवनकाल में ही अथवा उसकी मृत्यु के पश्चात् गद्दी के महत्वाकांक्षी दावेदारों में संघर्ष हो जाता था। इस संघर्ष में मुगल अमीर, दरबारी, सूबेदार, जागीरदार, मनसूबदार यहाँ तक की महल की स्त्रियाँ तक भाग लेती थीं। इन संघर्षों से धीरे-धीरे मुगलों की प्रतिष्ठा, शक्ति, धन एवं जन की अपार क्षति हुई। इन संघर्षों ने मुगल साम्राज्य के पतन की पृष्ठभूमि तैयार कर दी।

4. मुगल सामन्तों का नैतिक पतन- मुगल सम्राट ही नहीं अपितु उनके सामन्तों का भी नैतिक पतन हो गया था। मुगल सामन्तों के जीवन में शराब, स्त्री, षड्यन्त्र, स्वार्थ, पद-लोलुपता का ही स्थान रह गया था। जदुनाथ सरकार के मतानुसार, कोई भी मुगल सामन्त एक या दो पीढ़ियों से अधिक समय तक अपना महत्व बनाए नहीं रख सका। यदि किसी सामन्त की वीरता के विषय में इतिहासकार ने तीन पृष्ठ लिखे तो उसके पुत्र के कार्यों का वर्णन केवल एक ही पृष्ठ में हुआ और उसके पौत्र का वर्णन केवल इस प्रकार के शब्दों में कि ‘उसने कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया’ समाप्त हो जाता।” अत: सामन्तों के उत्तरोत्तर नैतिक पतन ने मुगल साम्राज्य को काफी क्षति पहुँचाई।

5. जागीरदारी संकट- डॉ० सतीशचन्द ने मुगल साम्राज्य के पतन के लिए मनसबदारी और जागीरदारी प्रथाओं की असफलता को जिम्मेदार बताया है। उनके अनुसार औरंगजेब के समय से ही युद्धों, प्रशासन-व्ययों और बादशाह तथा अमीर वर्ग की बढ़ती हुई आवश्यकताओं की पूर्ति किया जाना कठिन हो गया था। आय का प्रमुख साधन भूमि थी, जो व्यय में वृद्धि के अनुपात में कम थी। अतः राज्य और प्रशासक वर्ग की आय और उनके व्यय के बीच अन्तर बढ़ता गया और जागीरदारी या मनसबदारी व्यवस्था के दोष सामने आने लगे। औरंगजेब की दक्षिण विजय ने इस संकट में और वृद्धि की। अब स्थिति यह हो गई कि जागीरे कम हो गईं और उनके माँगने वाले अधिक, जिससे जागीरदारी पाने वाले वर्ग में अच्छी जागीर प्राप्त करने की प्रतिद्वन्द्विता बढ़ गई। इस प्रतिद्वन्द्विता और संकट को एक अन्य प्रकार से भी बढ़ावा मिला।

कागजों में जागीरों से प्राप्त होने वाली आय को बहुत पहले से वास्तविक आय से अधिक दिखाया जाता रहा था। ऐसी स्थिति में जागीर प्राप्त वर्ग ने अच्छी आय वाली जागीरों को प्राप्त करने का प्रयत्न किया। इससे दरबार में दलबन्दी बढ़ने लगी। जागीरदारों ने भूमि को ठेकेदारों को देना शुरू कर दिया। ठेकेदार किसानों से अधिकतम लगान वसूलते थे। इससे किसानों ने लगान देना बन्द कर दिया और स्थानीय जमींदारों के माध्यम से विद्रोह कर दिया। अब मुगलों की आर्थिक, राजनीतिक और सैनिक-शक्ति टूटती चली गई क्योंकि यह सब भूमि से प्राप्त आय पर ही निर्भर था। प्रो० इरफान हबीब ने भी आर्थिक संकट को ही मुगल साम्राज्य के पतन के लिए उत्तरादायी माना है।

6. मुगलों की सैन्य दुर्बलताएँ- सैन्य दुर्बलताओं ने भी मुगलों के पतन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। मुगल सेना मनसबदारी व्यवस्था पर आधारित थी, परन्तु कालान्तर में यही व्यवस्था मुगल सेना की दुर्बलता का आधार बनी। उनकी सेना की स्वामिभक्ति सम्राट के प्रति नहीं रही। मुगल सेना में राष्ट्रीयता का भी सर्वथा अभाव था। मुगल सेना में अनुशासनहीनता एवं विलासिता भी प्रवेश कर गई थी। इसके अतिरिक्त गलत रणनीतियाँ, नौ सेना का अभाव, केवल मैदानी युद्धों में पारंगत होना, छापामार युद्ध से अनभिज्ञ होना इत्यादि कारणों ने मुगल सेना की क्षमता को नष्ट कर दिया। सर वूल्जले हेग ने लिखा है, “सेना की चरित्रहीनता ही साम्राज्य के पतन के मुख्य कारणों में से एक थी।’

7. बौद्धिक पतन- बौद्धिक पतन को भी मुगल साम्राज्य के पतन के लिए उत्तरदायी माना गया है। निश्चय ही मुगलों के अधिकांश शासनकाल में शिक्षा की व्यवस्था समुचित नहीं थी और जो थी भी वह समय के अनुकूल न रही। उसमें तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षा का पूर्णतः अभाव था और उदार मानवीय भावना के विकास में सहयोग देने में बहुत कमी थी। इस कारण प्रशासन में योग्य व्यक्तियों का अकाल सा पड़ गया। परिणामस्वरूप मुगल साम्राज्य पतन की ओर अग्रसर हो गया।

8. मुगल साम्राज्य का आर्थिक दिवालियापन- कोई भी साम्राज्य सम्राट की योग्यता, सेना की सुदृढ़ता और राजकोष में पर्याप्त धन पर निर्भर करता है। मुगल साम्राज्य के पास इन तीनों का ही अभाव हो गया था। शाहजहाँ ने भवन निर्माण आदि कार्यों में प्रचुर मात्रा में धन व्यय किया। औरंगजेब ने दक्षिण के दीर्घकालीन युद्धों में न केवल राजकोष को ही खाली किया बल्कि देश के व्यापार एवं उद्योगों को भी नष्ट किया। सर जदुनाथ सरकार के अनुसार, “एक बार तो मुगल जनानखाने में तीन दिन तक चूल्हे में आग नहीं जली। शहजादियाँ अधिक समय तक भूख सहन नहीं कर सकीं और पर्दे की परवाह न करते हुए महल से निकलकर शहर की ओर दौड़ पड़ीं।” जिस शासन की हालत इतनी गिर जाए, फिर वह अधिक समय तक किस प्रकार चल सकता था।

9. नौसेना का अभाव- नौसेना का अभाव अप्रत्यक्ष रूप से मुगल साम्राज्य के पतन के लिए उत्तरदायी कारण माना जाता है। नौसेना के अभाव से उत्पन्न दुर्बलता उस समय प्रकट हुई जब 16 वीं सदी में यूरोप के निवासी भारत आए और समुद्र पर अधिकार स्थापित करके उन्होंने भारत के विदेशी व्यापार पर नियन्त्रण स्थापित किया। व्यापारिक दृष्टि से यूरोपियनों पर निर्भरता ने भारतीय शासकों को उन्हें व्यापारिक सुविधाएँ देने के लिए बाध्य किया, जिससे अन्त में उनमें से एक को। (अंग्रेजों को ) भारत में राज्य स्थापित करने का अवसर मिला।

10. मुगल साम्राज्य की विशालता और मराठों का उत्कर्ष- औरंगजेब के काल में मुगल साम्राज्य का विस्तार बहुत विस्तृत हो गया था। एक व्यक्ति के लिए एक केन्द्र से इस विशाल साम्राज्य को सम्भालना मुश्किल था। औरंगजेब दक्षिण में मराठों से उलझकर असफल हो गया। मराठों के उत्कर्ष ने मुगल साम्राज्य को बौना और असहाय कर दिया और इसकी प्रतिष्ठा को धूल में मिला दिया। इस विशाल साम्राज्य में कुछ समय पश्चात् ही विभिन्न शक्तियाँ मुगल साम्राज्य से अलग हो गई और मुगल साम्राज्य का विघटन शुरू हो गया।

11. दरबार में गुटबाजी- औरंगजेब के पश्चात् मुगल दरबार आपसी गुटबन्दी का अड्डा बन गया। आसफजहाँ निजामुलमुल्क, कमरूद्दीन, जकरिया खाँ, अमीर खाँ और सआदत खाँ प्रमुख गुटों के नेता थे। इन गुटों में अक्सर युद्ध होते रहते थे। इस प्रकार जहाँ औरंगजेब के पूर्व दरबारियों और सरदारों जैसे महावत खाँ, अब्दुर्रहीम खानखाना, बीरबल, सादुल्ला खाँ, मीर जुमला आदि ने साम्राज्य के हितों की सुरक्षा की थी, वहीं बाद के सरदारों ने अपने स्वार्थ में अन्धा होकर बादशाह और साम्राज्य दोनों को क्षति पहुँचाई।

12. नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण- मुगल साम्राज्य की रही-सही प्रतिष्ठा को इन दोनों विदेशी आक्रमणकारियों ने समाप्त कर दिया। नादिरशाह ने 1739 ई० में मुगल सम्राट को दिल्ली में कैद कर लिया और दिल्ली को जमकर लूटा तथा राजकोष में जितना भी धन, हीरे-जवाहरात व वस्तुएँ थीं सब अपने साथ ले गया। बची-खुची इज्जत को अहमदशाह अब्दाली ने 1761 ई० में समाप्त कर दिया और पानीपत के तीसरे युद्ध में उसने मुगल साम्राज्य के साथ मराठों की प्रतिष्ठा को भी धूल में मिला दिया।

13. यूरोपवासियोंका आगमन- 1600 ई० में स्थापित ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भारत में व्यापार के नाम पर धीरे-धीरे अपने राजनीतिक पैर पसारने शुरू कर दिए। 18 वीं शताब्दी के मध्य तक कम्पनी ने यूरोप से आने वाली दूसरी शक्तियों को भारत से निकाल दिया। 1757 और 1761 ई० के क्रमश: प्लासी और बक्सर के युद्धों के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी बंगाल, बिहार और उड़ीसा (ओडिशा) की स्वामी बन गई। इस प्रकार अंग्रेजों के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव ने मुगल शक्ति और प्रतिष्ठा को नष्ट करना प्रारम्भ कर दिया और अन्तत: 1857 ई० में अंग्रेजों ने ही मुगलों के शासन का हमेशा के लिए अन्त कर दिया।

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UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 3 Medieval Indian Education

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 3
Chapter Name Medieval Indian Education (मध्यकालीन भारतीय शिक्षा)
Number of Questions Solved 43
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 3 Medieval Indian Education (मध्यकालीन भारतीय शिक्षा)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
मध्यकालीन शिक्षा से आप क्या समझते हैं? इस काल की शिक्षा की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
मध्यकालीन मुस्लिम शिक्षा की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
मध्यकालीन शिक्षा का अर्थ भारतीय इतिहास में शैक्षिक दृष्टिकोण से मध्यकाल नितान्त भिन्न काल था। इस काल में भारत में मुख्य रूप से विदेशी मुस्लिम शासकों का शासन था। इस शासन के ही कारण भारत में एक भिन्न शिक्षा प्रणाली को लागू किया गया जो पारम्परिक भारतीय शिक्षा-प्रणाली से नितान्त भिन्न प्रकार की थी। इस शिक्षा-प्रणाली को मुस्लिम शिक्षा-प्रणाली के नाम से भी जाना जाता है। वास्तव में इस शिक्षा का मुख्य उद्देश्य इस्लाम धर्म का प्रसार एवं प्रचार करना भी था। मध्यकालीन अथवा मुस्लिम शिक्षा का सामान्य परिचय डॉ० केई ने इन शब्दों में प्रस्तुत किया है, “मुस्लिम शिक्षा एक विदेशी प्रणाली थी जिसका भारत में प्रतिरोपण किया गया और जो ब्राह्मणीय शिक्षा से अति अल्प सम्बन्ध रखकर, अपनी नवीन भूमि में विकसित हुई।”

मध्यकालीन शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ
मध्यकालीन भारतीय शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं–
1. शिक्षा का संरक्षण-मध्यकाल में शिक्षा-व्यवस्था राज्य के संरक्षण या नियन्त्रण में थी। मुस्लिम शासकों ने भी शिक्षा के क्षेत्र में विशेष रुचि ली थी। उनके राज्य के विभिन्न भागों में मकतबों, मदरसों एवं पुस्तकालयों की स्थापना की गई। राज्य की ओर से छात्रों को छात्रवृत्तियाँ और शिष्यवृत्तियाँ भी दी गयी। इन सब सुविधाओं के कारण इस युग में शिक्षा का पर्याप्त प्रसार हुआ।

2. शिक्षा में व्यापकता का अभाव-
यद्यपि मध्यकाल में शिक्षा का प्रसार बहुत तेजी से हुआ, लेकिन उसमें व्यापकता का सर्वथा अभाव था। शिक्षा पर धार्मिक कट्टरता की छाप लगी हुई थी और शिक्षा की जो भी व्यवस्था थी, वह केवले नगरों में उच्च तथा मध्यम वर्गों के बालकों के लिए ही थी। फलतः जनसाधारण के बालकों के ज्ञानार्जन का कोई सुलभ साधन नहीं था।

3. शिक्षा के लौकिक पक्ष पर बल-
मुस्लिम शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य लौकिक यश, सुख तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति माना गया था। मुसलमानों को ध्यान लौकिक जीवन की ओर अधिक आकृष्ट था। अतः मुस्लिम शिक्षा में लौकिक पक्ष पर बहुत अधिक बल दिया गया और इसमें भारतीय आध्यात्मिकता का अभाव रखा गया।

4. प्रान्तीय भाषाओं की उपेक्षा–
मध्यकाल में अरबी और फारसी भाषा के माध्यम से शिक्षा दी। जाती थी। इस कारण प्रान्तीय भाषाओं की पूर्णत: उपेक्षा हो गई। उच्च पद के इच्छुक व्यक्तियों ने भी मातृभाषा की उपेक्षा करके अरबी और फारसी भाषा का अध्ययन किया।

5. निःशुल्क शिक्षा—इस काल में बालकों की शिक्षा पूर्णत: नि:शुल्क थी। विद्यार्थियों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए कोई शुल्क नहीं देना पड़ता था। उनकी पढ़ाई का पूरा व्यय धनी व्यक्तियों और शासकों को वहन करना पड़ता था।

6. परीक्षाएँ-
मुस्लिम काल में आजकल के समान सार्वजनिक परीक्षाओं का प्रचार नहीं था। शिक्षक वाद-विवाद और शास्त्रार्थ के द्वारा विद्यार्थियों को एक कक्षा से दूसरी कक्षा में भेजता था।

7. उपाधियाँ-मुस्लिम काल में छात्रों की शिक्षा समाप्ति के बाद उपाधियाँ प्रदान करने की व्यवस्था थी। धर्म की शिक्षा प्राप्त करने पर आलिम’ की उपाधि, तर्कशास्त्र और दर्शनशास्त्र की शिक्षा प्राप्त करने पर फाजिल की उपाधि और साहित्य का अध्ययन करने वाले छात्र को ‘कामिल’ की उपाधि दी जाती थी।

8. गुरु-शिष्य सम्बन्ध–
इस काल में भी गुरु को सम्मानपूर्ण स्थान प्राप्त होता था। शिष्य अपने गुरु का बहुत आदर करते थे, और गुरु अपने शिष्य को पुत्रवत् मानते थे। छात्रावासों में गुरु और शिष्य एक साथ रहते थे, जिसके फलस्वरूप दोनों में निकट सम्पर्क स्थापित रहता था।

9. अनुशासन और दण्ड–
इस काल में गुरु-शिष्य सम्बन्ध । शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ मधुर होने के कारण शिक्षकों के सामने अनुशासनहीनता की समस्या न थी, लेकिन अनुशासनहीन छात्रों को बेंत, कोड़े और चूंसे मारकर शारीरिक दण्ड दिया जाता था। इनका प्रयोग करने के लिए शिक्षकों को स्वतन्त्र छोड़ दिया गया था। कठोर दण्ड का प्रावधान होने के शिक्षा के लौकिक पक्ष पर बल कारण सामान्य रूप से अनुशासनहीनता की समस्या प्रबल नहीं थी।

10. छात्रावास-
मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों के लिए। छात्रावासों की व्यवस्था थी, जिनका व्यय भार धनी व्यक्ति उठाते इन छात्रावासों में शिक्षकों और विद्यार्थियों के सुख तथा आनन्द उपाधियाँ की अनेक सुविधाएँ प्रदान की जाती थीं।

11. स्त्री-शिक्षा-
परदा-प्रथा के कारण इस काल में स्त्री-शिक्षा की प्रगति प्राचीनकाल की अपेक्षा कम थी। निम्न वर्ग की बालिकाओं को शिक्षा का अवसर प्राप्त नहीं होता था, जब कि धनी तथा उच्च घराने में उत्पन्न हुई बालिकाओं की शिक्षा के लिए अनेक साधन थे। छोटी आंयु में मोहल्ले की बालिकाएँ एकत्र होकर मकतब जाती थीं और लिखना-पढ़ना सीख लेती थीं। सम्पन्न परिवार की बालिकाओं को घर पर व्यक्तिगत शिक्षकों द्वारा शिक्षा दी जाती थी। कुछ स्त्रियाँ साहित्य, धर्मशास्त्र, गृहशास्त्र, संगीत इत्यादि में निपुण थीं, जिनमें नूरजहाँ, रजिया बेगम, जहाँआरा, गुलबदन बेगम आदि प्रमुख हैं।

12. व्यावसायिक शिक्षा–
मध्यकाल में व्यावसायिक शिक्षा की ओर पर्याप्त ध्यान दिया गया था। जीविका उपार्जन सम्बन्धी शिक्षा के लिए मुहम्मद तुगलक ने अनेक कारखानों की स्थापना की थी, जो अकबर के समय दीवाने वयूतात के अधीन थे। इन कारखानों में चित्रकला, सुनारगिरी, वस्त्र बनाना, दरी और परदे बनाना, अस्त्र-शस्त्र बनाना, दर्जी का काम, जूते बनाना, मलमल तैयार करना आदि काम सिखाए जाते थे।

13. सैन्य शिक्षा-
राज्य के सैनिकों द्वारा बालकों को सैन्य शिक्षा दी जाती थी। इसके द्वारा वे देश में अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहते थे। इस युग में सैनिक विद्यालयों की स्थापना नहीं हो पाई थी। बालकों को गोली चलाने और हाथियों पर बैठकर युद्ध करने की शिक्षा दी जाती थी। |

14. ओषधिशास्त्र की शिक्षा–
मध्यकाल में ओषधिशास्त्र की शिक्षा को विशेष प्रोत्साहन दिया गया था। ओषधिशास्त्र की संस्कृत की पुस्तकों का फारसी भाषा में अनुवाद किया गया। अनेक मुस्लिम संस्थाओं में इस प्रकार की शिक्षा दी जाती थी।

15. ललित कलाओं की शिक्षा-
मध्यकाल में भवन-निर्माण कला, चित्रकला, नृत्यकला और संगीत के प्रशिक्षण के लिए अनेक सुविधाएँ प्राप्त थीं। इन सभी कलाओं को राजाओं एवं अमीरों का संरक्षण प्राप्त था। शाहजहाँ भवन-निर्माण कला में विख्यात था। जहाँगीर चित्रों का पारखी था और अकबर कुशल संगीतज्ञ था।

प्रश्न 2
मध्यकालीन शिक्षा के मुख्य गुणों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
मध्यकालीन शिक्षा के गुण
मध्यकालीन शिक्षा में निम्नांकित गुण थे
1. अनिवार्य शिक्षा-इस्लाम धर्म के अनुसार शिक्षा ईश्वर की प्राप्ति में सहायता करती थी, इसलिए शिक्षा को अनिवार्य स्वीकार किया गया था। बालिकाओं के लिए शिक्षा अनिवार्य नहीं थी।

2. धार्मिक एवं लौकिक शिक्षा को समेस्वय-इस युग की शिक्षा की प्रमुख विशेषता धार्मिक और लौकिक शिक्षा में समन्वय की स्थापना थी। शिक्षा के द्वारा बालकों को धार्मिक आचरण के लिए प्रेरित किया जाता था। शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य इस्लाम धर्म का प्रचार करना था। मुसलमान धर्म को केवल स्वर्ग-प्राप्ति का साधन नहीं मानते थे, लेकिन हिन्दू इसे सांसारिक सुख तथा समृद्धि-प्राप्ति का साधन मानते थे। इसीलिए धार्मिक भावना के साथ-साथ विद्यार्थियों के रहन-सहन और जीवन में भौतिक सुख-सुविधाओं को भी ध्यान में रखा जाता था। इस प्रकार ईश्वर की प्राप्ति का लक्ष्य रखते हुए भी विद्यार्थियों में सांसारिक भावना प्रधान रहती थी।

3. निःशुल्क शिक्षा-मध्यकाल में छात्रों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता था, वरन् पूर्णतया नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था थी।
4. शिक्षा संस्थाओं का उपयुक्त वातावरण- शिक्षा | मध्यकालीन शिक्षा के गुण संस्थाओं में छात्रों को अध्ययन के लिए उपयुक्त वातावरण मिलता अनिवार्य शिक्षा था। उन्हें शान्त, कोलाहलहीन व मनोरम स्थानों में बनवाया जाता था। धार्मिक एवं लौकिक शिक्षा का

5. व्यापक पापक्रम-मध्यकाल में बहुत विस्तृत व व्यापक समन्वय पाठ्यक्रम लागू किया गया था। छात्रों को साहित्य, भाषा, व्याकरण, निःशुल्क शिक्षा गणित, ज्योतिष, इतिहास, भूगोल, कानून, दर्शन, तर्कशास्त्र, कृषि, शिक्षा संस्थाओं का उपयुक्त चिकित्सा, अर्थशास्त्र इत्यादि विषय पढ़ाए जाते थे। वातावरण

6. व्यावहारिक शिक्षा-मध्यकाल में व्यावहारिक शिक्षा पर में व्यापक पाठ्यक्रम बहुत अधिक बल दिया गया था। बालकों को ऐसे विषयों का ज्ञान व्यावहारिक शिक्षा दिया जाता था, जो जीवन में उपयोगी होते थे।
पुरस्कार और छात्रवृत्तियों ।

7. पुरस्कार और छात्रवृत्तियाँ-इस युग में छात्रों के लिए हुचरित्र-निर्माण पुरस्कार और छात्रवृत्तियों की व्यवस्था की जाती थी, जिससे छात्र अविगत सके। पढ़ने के लिए अधिक-से-अधिक प्रोत्साहित हो सकें। सरस साहित्य को विकास

8. चरित्र-निर्माण-बालकों को ऐसी शिक्षा दी जाती थी, के इतिहास रचना : जिससे बालकों में नैतिकता का विकास होता था और उनका चरित्र आदर्श बनता था।
9. व्यक्तिगत सम्पर्क- मध्यकाल में शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच बहुत मधुर सम्बन्ध रहते थे, क्योंकि एक ही छात्रावास में शिक्षक और विद्यार्थी दोनों रहा करते थे।
10.सरस साहित्य का विकास-मध्यकाल में श्रृंगार रस को प्रधानता दी जाती थी। इस काल में इसी कारण सरस साहित्य और कलाओं को अत्यधिक प्रोत्साहन मिला।
11. इतिहास रचना-मुस्लिम शासकों में अपने समय का इतिहास स्वयं लिखने की प्रवृत्ति थी। अतः तत्कालीन बातों की जानकारी उनके विवरण से प्राप्त होती है।
12. विशिष्ट शिक्षाओं को प्रोत्साहन-मध्यकाल में सैनिक शिक्षा, संगीत, वास्तुकला, शिल्पकला जैसी विशिष्ट शिक्षाओं को विशेष प्रोत्साहन प्राप्त हुआ।

प्रश्न 3
मध्यकालीन भारतीय शिक्षा के मुख्य दोष बताइए।
उत्तर
मध्यकालीन शिक्षा के दोष
मध्यकालीन शिक्षा में निम्नलिखित दोष थे-
1. सांसारिकता की प्रधानत-मध्यकाल में विलासिता, मध्यकालीन शिक्षा के दोष ऐश्वर्य और सुख-सुविधाओं पर अधिक बल दिया गया था, सांसारिकता की प्रधानता। इसलिए विद्यार्थियों का ध्यान भी आध्यात्मिकता से हटकर सांसारिक भोग-विलास में लग जाता था।

2. धार्मिक कट्टरता-मध्यकाल में शिक्षा के द्वारा इस्लाम धर्म जनसाधारण की शिक्षा का अभाव के प्रचार पर ही बल दिया जाता था, इसलिए व्यक्तियों में धार्मिक अमनोवैज्ञानिकता कट्टरता फैलने लगी। इससे समाज में साम्प्रदायिक सौहार्द पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

3. शिक्षा-केन्द्रों का अस्थायित्व-विद्यालयों की स्थापना लेखन व पाठन में समन्वय का और संचालन का उत्तरदायित्व धनी व्यक्तियों के ऊपर निर्भर था। अभाव इस कारण धनी व्यक्तियों की मृत्यु के साथ ही प्राय: विद्यालय भी बन्द हो जाता था। इस कारण बालकों की शिक्षा व्यवस्थित रूप से नहीं चल पाती थी।

4. जनसाधारण की शिक्षा का अभाव-मध्य युग में धनी व्यक्ति ही विद्यालयों की स्थापना करते थे। इसलिए पर्याप्त संख्या में विद्यालयों का अभाव था। इस कारण जनसाधारण के बालकों को शिक्षा प्राप्त करने की सुविधा नहीं मिलती थी।

5. अमनोवैज्ञानिकता-इस युग में बालकों को मनोवैज्ञानिक ढंग से शिक्षा नहीं दी जाती थी, क्योंकि शिक्षा देते समय बालकों की व्यक्तिगत विशेषताओं को ध्यान में नहीं रखा जाता था।

6. नारी शिक्षा की उपेक्षा-मध्य युग में स्त्री की शिक्षा पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता था, जिससे समाज का एक महत्त्वपूर्ण वर्ग एवं भाग अविकसित रह जाता था। |
7. शारीरिक दण्ड की प्रधानता-इस युग में शिक्षक छात्रों को बड़ी निर्दयता के साथ शारीरिक दण्ड देते थे, जिससे उनकी रुचि अध्ययन की ओर नहीं हो पाती थी।

8. लेखन व पाठन में समन्वय का अभाव-इस युग में पहले बालकों को पढ़ना सिखाया जाता था और उसके पश्चात् उन्हें लिखने की शिक्षा दी जाती थी। इस प्रकार लेखन और पाठन में समन्वय का अभाव था।
9. अरबी-फारसी की प्रधानता-मध्यकाल में अरबी और फारसी भाषा को अधिक महत्त्व दिया जाता था और हिन्दी एवं अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की उपेक्षा की गई थी।

10. दोषपूर्ण पाठ्यक्रम-पाठ्यक्रम में धार्मिकता की प्रधानता और वैधानिकता का अभाव था। इस कारण असन्तुलित पाठ्यक्रम द्वारा बालकों को शिक्षा दी जाती थी। निष्कर्ष–उपर्युक्त विवेचन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि मध्यकालीन शिक्षा सामाजिक जीवन की वास्तविकताओं के अनुकूल नहीं थी। धर्म प्रधान शिक्षा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र का समुचित विकास करने में सक्षम नहीं थी। डॉ० युसूफ हुसैन ने ठीक ही लिखा है-“मध्यकालीन शिक्षा प्रणाली का मुख्य दोष यह था कि उसमें छात्रों के परिशुद्ध निरीक्षण तथा व्यावहारिक निर्णय प्रदान करने की क्षमता नहीं थी। यह बड़ी असभ्य, निर्जीव और पुस्तकीय थी।”

प्रश्न 4
प्राचीन व मध्यकालीन शैक्षिक विशेषताओं की तुलना निम्न बिन्दुओं के आधार पर कीजिए-
(i) शिक्षा का उद्देश्य,
(i) पाठ्यक्रम,
(ii) शिक्षा के केन्द्र।
उत्तर
(i) शिक्षा का उद्देश्य
1. प्राचीन काल में भारतीय समाज आदर्शवादी था जिसका मुख्य उद्देश्य ज्ञान तथा अनुभव को अर्जित करना था, जबकि इसके विपरीत मध्यकाल में भारतीय शिक्षा के उद्देश्यों की निर्धारण इस्लाम धर्म की मान्यताओं के अनुसार होने के कारण ज्ञान का अधिक-से-अधिक प्रसार करना था।
2. प्राचीन काल में भारतीय समाज धर्मप्रधान था जिस कारण भारतीय शिक्षा भी धार्मिकता की और उन्मुख थी। शिक्षा का उद्देश्य छात्रों में धार्मिक प्रवृत्ति तथा ईश्वर-भक्ति को विकसित करना था। इसके विपरीत मध्य काल में भारतीय शासृक मुसलमान थे और अधिकांश भारतीय जनता हिन्दू थी। अत: मुस्लिम शासकों ने भारत में इस्लाम धर्म के प्रचार व प्रसार हेतु शिक्षा को एक साधन के रूप में इस्तेमाल किया तथा इस्लाम धर्म के नियमों के अनुसार ही छात्रों में इस्लाम धर्म की प्रवृत्ति को गति देने हेतु शैक्षणिक गतिविधियों को प्रचलित किया।

(ii)पाठ्यक्रम
प्राचीन तथा मध्यकाल में पाठ्यक्रम को तीन वर्गों में विभाजित किया गया था—
1. प्राथमिक स्तर का पाठ्यक्रम
प्राचीन काल में प्राथमिक शिक्षा की समयावधि 6 वर्ष की होती थी तथा 6 से 11 वर्ष के आयु वर्ग के बालकों को प्राथमिक स्तर की शिक्षा हेतु सुयोग्य माना जाता था। प्राथमिक शिक्षा मौखिक होती थी जिसमें बालकों को वैदिक मन्त्रों के उच्चारण का अभ्यास कराया जाता था। इसके उपरान्त छात्र पढ़ना-लिखना व व्याकरण सीखते थे। प्राथमिक स्तर की शिक्षा में सामान्य या प्रारम्भिक भाषा विज्ञान, प्रारम्भिक व्याकरण, प्रारम्भिक छन्द शास्त्र तथा प्रारम्भिक गणित आदि विषय सम्मिलित थे।

मध्ये काल में प्राश्चमिक शिक्षा की आयु 4 वर्ष,4 माह तथा 4 दिन निर्धारित की गई थी। बालकों को इस आयु सीमा को प्राप्त करने के अवसर पर एक संस्कार या धार्मिक रस्म पूर्ण करनी होती थी; जिसे ‘बिस्मिल्लाह-खानी’ केहा जाता था। इस काल में प्राथमिक स्तर की शिक्षा मौखिक विधि द्वारा ही प्रदान की जाती थी। मौलवियों द्वारा सम्बन्धित विषय को निरन्तर अभ्यास द्वारा कंठस्थ करवा दिया जाता था। इसके साथ ही लकड़ी की तख्तीपर लेखन का अभ्यास भी करवाया जाता था। साधारण वर्ग के परिवारों के बच्चों को प्राथमिक स्तर पर मुख्य रूप से पढ़ने-लिखने तथा प्रारम्भिक अंकगणित की ही शिक्षा दी जाती थी। मौखिक रूप से कुरान शरीफ की आयतों को सही उच्चारण में कंठस्थ करवाया जाता था। इसके उपरान्त लेखन, व्याकरण तथा फारसी भाषा का ज्ञान प्रदान किया जाता था।

बच्चों के चरित्र-निर्माण तथा साहित्यिक बोध के विकास का भी समुचित ध्यान रखा जाता था। प्राथमिक शिक्षा के अन्तर्गत इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए महापुरुषों की कथाएँ तथा शेख सादी की ‘बोस्ताँ एवं गुलिस्ताँ’ जैसी पुस्तकों को पढ़ाया जाता था। इनके साथ-ही-साथ कुछ प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय प्रेमकाव्यों को भी रुचिपूर्वक पढ़ाया जाता था। इसे वर्ग के मुख्य काव्य-संग्रह थे-लैला-मजनू, युसूफ-जुलेखा तथा सिकन्दरनामा आदि। जहाँ तक शाही-परिवारों तथा कुछ सम्पन्न परिवारों के बच्चों की शिक्षा का प्रश्न है, उसकी अलग से व्यवस्था होती थी तथा उन्हें व्यक्तिगत रूप से महत्त्वपूर्ण विषयों का ज्ञान प्रदान किया जाता था।

2. उच्च स्तर का पाठ्यक्रम 
प्राचीनकालीन उच्चस्तरीय शिक्षा-प्राचीनकालीन भारतीय शैक्षिक-व्यवस्था में उच्चस्तरीय शिक्षा की अलग से व्यवस्था थी। इस शिक्षा को विशिष्ट शिक्षा के रूप में जाना जाता था। वर्ण-व्यवस्था की मान्यताओं के अनुसार केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य वर्ग के बालकों को ही उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त था। उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम में विविधता तथा विकल्प उपलब्ध थे। आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित करने के लिए छात्रों द्वारा वेद, वेदांग, पुराण, दर्शन, उपनिषद् आदि का अध्ययन किया जाता था। लेकिन ज्ञान अर्जित करने के लिए छात्रों द्वारा मुख्य रूप से भौतिकशास्त्र, भूगर्भशास्त्र, तर्कशास्त्र, इतिहास आदि विषयों का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता था। उच्चस्तरीय शिक्षा का स्वरूप भी मौखिक ही था। गुरु द्वारा दिए गए व्याख्यान के साथ ही चिन्तन, मनन, स्वाध्याय तथा पुनरावृत्ति के माध्यम से अर्जित ज्ञान को आत्मसात् किया जाता था। मध्यकालीन शैक्षिक व्यवस्था के अन्तर्गत उच्च-स्तरीय शिक्षा की अवधि सामान्य रूप से 10-12 वर्ष हुआ करती थी। इस काल में भी उच्च-स्तरीय शिक्षा के दो प्रकार के पाठ्यक्रमों की व्यवस्था थी। एक वर्ग के पाठ्यक्रम में धार्मिक विषयों की शिक्षा प्रदान की जाती थी तथा दूसरे वर्ग के पाठ्यक्रम में लौकिक विषयों की शिक्षा का प्रावधान था।

इसके साथ-ही-साथ इस्लाम धर्म के इतिहास, इस्लामी-कानून तथा इस्लामी सामाजिक मूल्यों एवं परम्पराओं का भी व्यवस्थित अध्ययन किया । जाता था। धार्मिक पाठ्यक्रम के अतिरिक्त लौकिक पाठ्यक्रम में सर्वप्रथम अरबी-फारसी भाषा साहित्य तथा व्याकरण का व्यापक अध्ययन किया जाता था। मध्यकाल के उच्च स्तर के मुख्य विषय थे-भूगोल, गणित, कृषि, अर्थशास्त्र, ज्योतिष, दर्शन घेवं नीतिशास्त्र, कानून तथा यूनानी-चिकित्सा पद्धति कहा जा सकता है। कि मध्यकालीन उच्च शिक्षा भी मौख़िक ही थी। सभी शिक्षक अपने विषय को व्याख्यान के रूप में प्रस्तुत करते थे तथा छात्र उसे सुनकर संमझ लेते थे। इसके अतिरिक्त संगीत, चित्रकला तथा चिकित्सा शास्त्र आदि विषयों की शिक्षा प्रदान करने के लिए प्रयोगात्मक विधि को भी अपनाया जाता था।

3. व्यावसायिक स्तर का पाठ्यक्रम
शिक्षा का एक पक्ष व्यावसायिक शिक्षा भी होता था। व्यावसायिक शिक्षा के आधार पर ही प्राचीन भारत अपने आर्थिक जीवन और वैभव का निर्माण करने में सफल हुआ था। अतः प्राचीनकालीन व्यावसायिक शिक्षा को मुख्य रूप से चार भागों में बाँटा था-सैन्य शिक्षा, वाणिज्य सम्बन्धी शिक्षा, चिकित्साशास्त्र सम्बन्धी शिक्षा, कला-कौशल सम्बन्धी शिक्षा तथा पुरोहित शिक्षा।

मध्यकालीन भारतीय शिक्षा का एक मुख्य उद्देश्य लौकिक उन्नति एवं प्रगति को निर्धारित करना था। अतः इस काल की शिक्षा-व्यवस्था में व्यावसायिक शिक्षा को भी समुचित महत्त्व दिया गया था। मध्यकालीन भारतीय शिक्षा-व्यवस्था में व्यावसायिक शिक्षा के रूप में मुख्य रूप से हस्तकलाओं की शिक्षा, चिकित्सा सम्बन्धी शिक्षा, सैन्य शिक्षा तथा ललित-कलाओं की शिक्षा की व्यवस्था की गयी थी।

(iii) शिक्षा केन्द्र
प्राचीन काल में शिक्षा के केन्द्र–टोल, चारण, घटिका, परिषद्, गुरुकुल, विद्यापीठ, विशिष्ट विद्यालय, मन्दिर, महाविद्यालय, ब्राह्मणीय महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय आदि थे। इसके विपरीत मध्य काल में शिक्षा के केन्द्र-मकतब, मदरसा, दरगाहें, खानकाहें, कुरान स्कूल, फारसी स्कूल, फारसी व कुरान स्कूल तथा अरबी भाषा के स्कूल आदि थे।

लघु उत्तेरीय प्रश्न

प्रश्न 1
मध्यकालीन शिक्षा के मुख्य उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
भारतीय शिक्षा के मध्यकाल को मुस्लिम अथवा इस्लामी शिक्षा का काल कहते हैं। 712 ई० से भारत पर मुसलमानों के आक्रमण आरम्भ हुए और प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली को नष्ट करने का प्रयत्न आरम्भ हो गया। 1206 ई० में भारत में मुस्लिम सत्ता की स्थापना हो गई। इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी, फिरोज तुगलक व औरंगजेब जैसे शासकों ने भारतीय शिक्षा-प्रणाली को समूल नष्ट करने का भरसक प्रयास किया। परिणामस्वरूप शिक्षा-प्रणाली का स्वरूप बिल्कुल बदल गया और भारत में एक नई शिक्षा-प्रणाली का विकास हुआ। इसे मध्यकालीन शिक्षा के नाम से जाना जाता है। मध्यकालीन शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे

  1. इस्लाम धर्म का प्रचार करना।
  2. ज्ञानार्जन करना।
  3. नैतिकता का विकास करना, यद्यपि इस काल की नैतिकता प्राचीनकाल से भिन्न थी।
  4. शिक्षा के द्वारा ऐसी राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण करना, जिससे इस्लामी शासन भारत में स्थायी रूप ले सके और उसके विरोधियों का शासन न हो सके।
  5. व्यक्ति का चरित्र-निर्माण करना।
  6. भौतिक उन्नति करना और सांसारिक वैभव प्राप्त करना।
  7. मुस्लिम सिद्धान्तों, कानूनों एवं सामाजिक प्रथाओं का विकास

प्रश्न 2
मध्यकालीन शिक्षा के सन्दर्भ में प्राथमिक शिक्षा तथा मकतब का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
मध्य युग की प्राथमिक शिक्षा सम्बन्धी प्रमुख बातें निम्नलिखित हैं
1. मकतब का अर्थ-इस युग में प्राथमिक शिक्षा मकतबों में दी जाती थी, जो अधिकतर मस्जिदों के साथ जुड़े होते थे। मकतब शब्द की व्युत्पत्ति अरबी भाषा के कुतुब’ शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है, ‘उसने लिखा। अतः मकतब लिखना-पढ़ना सीखने वाले स्थान को कहा जाता है। धनी लोग अपने बालकों की प्राथमिक शिक्षा का प्रबन्ध मौलवियों द्वारा घर पर ही करते थे।

2. प्रवेश-मकतब में बालकों को इस्लामी ढंग से एक प्रकार की रस्म पूरी कराकर प्रविष्ट किया जाता था। इस रस्म को ‘बिस्मिल्लाह’ कहते थे। बालक की चार वर्ष, चार माह और चार दिन की आयु पूरी करने पर बिस्मिल्लाह की रस्म पूरी की जाती थी। इस अवसर पर उसे कुरान की भूमिका, 55वां तथा 87वाँ अध्याय पढ़ाया जाता था। यदि बालक कुरान की आयतों को दोहराने में सफल नहीं होता था तो उसका बिस्मिल्लाह कहना ही पर्याप्त समझा जाता था।

3. पाठ्यक्रम-मकतबों के पाठ्यक्रम में विभिन्नता पाई जाती है। उन्हें लिपि का ज्ञान कराया जाता था और वर्णमाला कण्ठस्थ कराई जाती थी। बालकों को कुरान का तीसवाँ अध्याय पढ़ाया जाता था। सुन्दर लेख और उच्चारण की शुद्धता को विशेष महत्त्व दिया जाता था। पाठ्यक्रम में साधारण गणित, फारसी एवं व्याकरण की शिक्षा सम्मिलित थी। इसके अतिरिक्त बालकों को पैगम्बरों की कहानियाँ, मुस्लिम फकीरों की कथाएँ एवं फारसी कवियों की कुछ कविताओं का ज्ञान कराया जाता था। उन्हें लेखन, बातचीत का ढंग आदि व्यावहारिक बातों की भी शिक्षा दी जाती थी।

4. शिक्षण विधि-मकतबों में मौखिक शिक्षण विधि के प्रयोग से बालकों को शिक्षा दी जाती थी। बालकों को कलमा एवं कुरान की आयतें रटनी पड़ती थीं। कक्षा के सभी छात्र एक साथ पहाड़े बोलकर कण्ठस्थ करते थे। प्रेरम्भ में सरकण्डे की कलम से तख्ती पर लिखना सिखाया जाता था और बाद में कलम से कागज पर लिखना सिखाया जाता था।

प्रश्न 3
मध्यकालीन शिक्षा के सन्दर्भ में मदरसा तथा उच्च शिक्षा का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
मदरसा तथा उच्च शिक्षा का सामान्य परिचय निम्न प्रकार है|
1. मदरसा का अर्थ-मध्य युग में बालकों को उच्च शिक्षा मदरसों में दी जाती थी। मदरसा शब्द का निर्माण अरबी भाषा में ‘दरस शब्द से हुआ है, जिसका अर्थ है ‘भाषण देना। अत: मदरसा वह स्थान था, जहाँ भाषण दिए जाते हैं। मदरसे भी दो प्रकार के होते थे—प्रथम, वे जहाँ धार्मिक, साहित्यिक तथा सामाजिक शिक्षा दी जाती थी और द्वितीय, वे जहाँ चिकित्साशास्त्र और अन्यान्य प्रकार की शिक्षा दी जाती थी। मदरसों में छात्रों के रहने की भी व्यवस्था होती थी तथा वहाँ उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों को पर्याप्त सुविधाएँ उपलब्ध होती थीं। मदरसों का शैक्षिक वातावरण सराहनीय होता था क्योंकि शिक्षक-शिष्य सम्बन्ध घनिष्ठ तथा मधुर होते थे।

2. पाठ्यक्रम-मदरसों के पाठ्यक्रम को दो भागों में बाँटा जा सकता है

  • लौकिक शिक्षा-इसके अन्तर्गत अरबी साहित्य, व्याकरण एवं गद्य, इतिहास, गणित, दर्शनशास्त्र, नीतिशास्त्र, यूनानी शिक्षा, ज्योतिष, कानून आदि विषय सम्मिलित थे। |
  • धार्मिक शिक्षा-इसके अन्तर्गत कुरान, मुहम्मद साहब की परम्परा, इस्लामी कानून (शरीयत) तथा इस्लामी इतिहास की शिक्षा दी जाती थी।

3. शिक्षण विधि-मदरसों में भाषण की प्रधानता थी। छात्रों को स्वाध्याय की ओर प्रेरित करके ग्रन्थावलोकन का अभ्यास कराया जाता था। विद्यार्थियों को प्रयोगात्मक और सैद्धान्तिक दोनों प्रकार की शिक्षा दी जाती थी।

प्रश्न 4
भारतीय शैक्षिक विकास के सन्दर्भ में प्राचीन तथा मध्यकालीन शैक्षिक व्यवस्था में अन्तर स्पष्ट कीजिए। प्राचीनकाल और मध्यकाल की शैक्षिक विशेषताओं का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
भारतीय शैक्षिक विकास के इतिहास पर दृष्टिपात करते हुए प्राचीन तथा मध्यकालीन शैक्षिक व्यवस्था के निम्नलिखित अन्तरों का उल्लेख किया जा सकता है

  1. प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा-व्यवस्था का आधार हिन्दू वैदिक) धार्मिक एवं दार्शनिक सिद्धान्त ही थे। इससे भिन्न मध्यकालीन शिक्षा का विकास शुद्ध रूप से इस्लाम धर्म के सिद्धान्तों के आधार पर हुआ था।
  2. प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ज्ञान की प्राप्ति तथा आध्यात्मिक विकासे स्वीकार किया गया था। इससे भिन्न मध्यकालीन शिक्षा के अन्तर्गत भले ही ज्ञान प्राप्ति को समुचित महत्त्व प्रदान किया गया था परन्तु इस काल में शिक्षा का एक मुख्य उद्देश्य लौकिक जीवन को अधिक-से-अधिक सम्पन्न, समृद्ध एवं सुखी बनाना भी था।
  3. प्राचीन वैदिक परम्परा के अनुसार बालक की शिक्षा को आरम्भ करते समय उपनयन नामक संस्कार सम्पन्न किया जाता था। इससे भिन्न मध्यकाल में शिक्षा-आरम्भ के अवसर पर ‘बिस्मिल्लाह’ या ‘बिस्मिल्लाहखानी रस्म को सम्पन्न किया जाता था।
  4. प्राचीनकाल अथवा वैदिककाल में गुरुकुल ही मुख्य शिक्षण संस्थाएँ थी। इससे भिन्न मध्यकाल की मुख्य शिक्षण-संस्थाएँ मकतब तथा मदरसे थीं।
  5. प्राचीन भारतीय शैक्षिक मान्यताओं के अनुसार शिक्षा ग्रहण करने के काल में छात्रों के लिए सादा एवं सरल जीवन व्यतीत करना अनिवार्य था। उन्हें सामान्य रूप से जीवन की समस्त सुख-सुविधाओं से दूर रहना पड़ता था। इससे भिन्न मध्यकालीन प्रचलन के अनुसार मदरसों में शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों को जीवन की समस्त सुख-सुविधाएँ उपलब्ध हुआ करती थीं जिससे वे ऐश एवं आराम का जीवन व्यतीत करते थे।
  6. प्राचीनकालीन भारतीय शिक्षा शुद्ध रूप से हिन्दू धर्म-संस्कृति की समर्थक एवं पोषक थी। इनसे भिन्न मध्यकालीन शिक्षा की घनिष्ठ सम्बन्ध इस्लामिक धर्म-संस्कृति से था।
  7. प्राचीन भारतीय शिक्षा (वैदिक शिक्षा) का माध्यम संस्कृत भाषा थी, बौद्ध काल में यह स्थान पालि भाषा ने ले लिया था परन्तु मध्यकाल में फारसी भाषा को ही शिक्षा का मुख्य माध्यम बना लिया गया
    था।
  8. प्राचीनकालीन शैक्षिक व्यवस्था में कठोर एवं दण्ड पर आधारित अनुशासन का कोई प्रावधान नहीं था परन्तु मध्यकालीन शैक्षिक व्यवस्था के अन्तर्गत अनुशासन बनाए रखने के लिए शारीरिक दण्ड का भी प्रावधान था।

प्रश्न 5
बौद्धकालीन शिक्षा (बौद्ध शिक्षा) तथा मुस्लिम शिक्षा (मध्यकालीन शिक्षा) में अन्तर बताइए।
उत्तर
बौद्ध-शिक्षा तथा मुस्लिम अर्थात् मध्यकालीन भारतीय शिक्षा में मुख्य अन्तर इस प्रकार थे|

  1. बौद्ध-शिक्षा बौद्ध धर्म एवं दर्शन पर आधारित थी, जबकि मध्यकालीन शिक्षा इस्लाम धर्म की पोषक थी।
  2. बौद्ध-शिक्षा का माध्यम पालि भाषा थी, जबकि मध्यकालीन शिक्षा का माध्यम अरबी-फारसी भाषा थी।
  3. बौद्ध-शिक्षा में अनुशासन की कठोर व्यवस्था नहीं थी, जबकि मध्यकालीन शिक्षा में कठोर अनुशासन-व्यवस्था को लागू किया गया था। इसके लिए दण्ड का भी प्रावधान था।
  4. बौद्धकालीन शिक्षा बौद्ध मठों तथा कुछ अन्य संस्थानों के माध्यम से प्रदान की जाती थी, जबकि मध्यकालीन शिक्षा मकतबों, मदरसों तथा खागाहों के माध्यम से दी जाती थी।
  5. बौद्धकालीन शिक्षा प्रारम्भ करते समय प्रव्रज्या संस्कार सम्पन्न किया जाता था, जबकि मध्यकालीन शिक्षा ‘बिस्मिल्लाह-खानी’ नामक रस्में से प्रारम्भ होती थी।
  6. बौद्ध-शिक्षा का परम उद्देश्य निर्माण प्राप्ति था, जबकि मध्यकालीन शिक्षा में लौकिक उन्नति का अधिक महत्त्व दिया जाता था।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
मध्यकालीन भारतीय समाज एवं शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षक का क्या स्थान था ?
उत्तर
मध्यकालीन भारतीय समाज एवं शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षक की स्थिति को स्पष्ट करते हुए जाफर ने लिखा है, “शिक्षकों को समाज में उच्च स्थान था, यद्यपि उनका वेतन अल्प था, तथापि उनको सार्वजनिक सम्मान और विश्वास प्राप्त था।” भारतीय समाज में सदैव ही शिक्षक को समुचित सम्मान दिया जाता रहा है। मध्यकाल भी इसका अपवाद नहीं था। वास्तव में शिक्षा प्रदान करना एक महान् कार्य माना जाता था तथा यह सार्वजनिक धारणा थी कि शिक्षक चरित्रवान व्यक्ति होते हैं। डॉ० केई ने भी मध्यकालीन समाज में शिक्षक की स्थिति स्पष्ट करते हुए लिखा है, “शिक्षकों की सामाजिक स्थिति उच्च थी और वे साधारण तथा चरित्रवान मनुष्य थे, जिनको व्यक्तियों का विश्वास और सम्मान प्राप्त था।”

प्रश्न 2
मध्यकालीन शिक्षा व्यवस्था में अनुशासन एवं दण्ड की क्या स्थिति थी ?
उत्तर
शैक्षिक व्यवस्था के अन्तर्गत अनुशासन का विशेष महत्त्व है। अनुशासन बनाए रखने का एक प्रचलित उपायु दण्ड का प्रावधान भी है। मध्यकालीन शैक्षिक व्यवस्था के अन्तर्गत अनुशासन बनाए रखने के लिए कठोर शारीरिक दण्ड का प्रावधान था। इस काल की दण्ड-व्यवस्था को स्पष्ट करते हुए एडम ने लिखा है,“छात्र को मुर्गा बनाना, उसकी पीठ या गर्दन पर निश्चित समय के लिए ईंट या लकड़ी को भारी टुकड़ा रखना, उसे पैरों के बल वृक्ष की शाखा से लटकाना, उसे बन्द करना, उसे भूमि पर पेट के बल लिटाकर शरीर को निश्चित दूरी तक घसीटना शारीरिक दण्ड के कुछ उदाहरण थे। इस प्रकार के कठोर दण्डों के प्रावधान के कारण मध्यकाल में शैक्षिक अनुशासनहीनता की समस्या प्रायः गम्भीर नहीं थी।

प्रश्न 3
मध्यकालीन शिक्षा के केन्द्रों के बारे में लिखिए।
मध्यकालीन शिक्षण संस्थाओं के रूप में मकतब तथा ‘मदरसों का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर
मकतबों में मौखिक शिक्षण विधि के प्रयोग से बालकों को शिक्षा दी जाती थी। बालकों को कलमा एवं कुरान की आयतें रटनी पड़ती थीं। कक्षा के सभी छात्र एक साथ पहाड़े बोलकर कण्ठस्थ’ करते थे। प्रारम्भ में सरकण्डे की कलम से तख्ती पर लिखना सिखाया जाता था और बाद में कलम से कागज पर लिखना सिखाया जाता था। मध्य युग में बालकों को उच्च शिक्षा मदरसों में दी जाती थी। मदरसे भी दो प्रकार के होते थे—प्रथम, वे जहाँ धार्मिक, साहित्यिक तथा सामाजिक शिक्षा दी जाती थी और द्वितीय, वे जहाँ चिकित्साशास्त्र और अन्यान्य प्रकार की शिक्षा दी जाती थी। मदरसों में छात्रों के रहने की भी व्यवस्था होती थी और अन्य आवश्यक सुविधाएँ भी।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
मध्यकाल में भारत में किनका शासन था ?
उत्तर
मध्यकाल में भारत में मुख्य रूप से मुस्लिम शासकों का शासन था।

प्रश्न 2
मध्यकालीन भारतीय शिक्षा-प्रणाली को अन्य किस नाम से जाना जाता है ?
उत्तर
मध्यकालीन भारतीय शिक्षा-प्रणाली को ‘मुस्लिम शिक्षा के नाम से भी जाना जाता है।

प्रश्न 3
मुस्लिम काल में शिक्षा का प्रारम्भ किस संस्कार से होता था?
उत्तर
मुस्लिम काल में शिक्षा का प्रारम्भ बिस्मिल्लाह संस्कार से होता था।

प्रश्न 4
मध्यकालीन भारतीय शिक्षा-प्रणाली किस धर्म पर आधारित थी?
उत्तर
मध्यकालीन भारतीय शिक्षा-प्रणाली इस्लाम धर्म पर आधारित थी।

प्रश्न 5
मुस्लिम शिक्षा कितने स्तरों में विभाजित थी ?
उत्तर
मध्यकालीन भारतीय शिक्षा के मुख्य रूप से दो स्तर थे—

  1. प्राथमिक शिक्षा तथा
  2. उच्च शिक्षा।

प्रश्न 6
मध्यकाल में किन संस्थाओं में प्राथमिक शिक्षा प्रदान की जाती थी ?
उत्तर
मध्यकाल में प्राथमिक शिक्षा मकतबों में प्रदान की जाती थी।

प्रश्न 7
मकतब क्या है?
उत्तर
मकतब प्राथमिक स्तर की शिक्षा प्रदान करने वाली शिक्षण संस्थाएँ हैं।

प्रश्न 8
मध्यकाल में उच्च शिक्षा की व्यवस्था किन शिक्षण संस्थाओं में होती थी ?
उत्तर
मध्यकाल में उच्च शिक्षा की व्यवस्था मदरसों में होती थी।

प्रश्न 9
मध्यकालीन शिक्षा-प्रणाली में प्राथमिक शिक्षा के लिए मुख्य रूप से किस विधि को अपनाया जाता था ?
उत्तर
मध्यक़ालीन शिक्षा प्रणाली में प्राथमिक शिक्षा के लिए मौखिक विधि को अपनाया जाता था।

प्रश्न 10
मध्यकाल में भारतीय समाज में स्त्री-शिक्षा की क्या स्थिति थी ?
उत्तर
मध्यकाल में भारतीय समाज में स्त्री-शिक्षा की स्थिति दयनीय थी।

प्रश्न11
मध्यकालीन शैक्षिक-व्यवस्था के अन्तर्गत शिक्षक-शिष्य सम्बन्ध किस प्रकार के होते – थे?
उत्तर
मध्यकालीन शैक्षिक-व्यवस्था के अन्तर्गत शिक्षक-शिष्य सम्बन्ध मधुर तथा घनिष्ठ होते थे।
पारस्परिक स्नेह, सम्मान तथा कर्तव्यों का ध्यान रखा जाता था।

प्रश्न 12
भारत में मध्यकाल में शिक्षा के मुख्य केन्द्र कौन-कौन-से थे ?
या मुगलकालीन शिक्षा के प्रमुख चार केन्द्रों के नाम लिखिए।
उत्तर
भारत में मध्यकाल में शिक्षा के मुख्य केन्द्र-आगरा, दिल्ली, लाहौर, अजमेर, मुल्तान, मालवा, गुजरात तथा जौनपुर में थे।

प्रश्न 13
मध्यकालीन शिक्षा-व्यवस्था में उच्च शिक्षा के छात्रों को कौन-कौन-सी मुख्य उपाधियाँ दी जाती थीं?
उत्तर
मध्यकाल में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों को कामिल फाजिल तथा आलिम नामक उपाधियाँ दी जाती थीं।

प्रश्न 14
मध्यकाल में व्यावसायिक शिक्षा के कौन-कौन-से रूप प्रचलित थे ?
उत्तर
मध्यकाल में व्यावसायिक शिक्षा के प्रचलित मुख्य रूप थे—

  1. हस्तकलाओं की शिक्षा,
  2. चिकित्साशास्त्र की शिक्षा,
  3. सैन्य शिक्षा तथा
  4. विभिन्न ललित कलाओं की शिक्षा।

प्रश्न 15
मुस्लिम काल में प्राथमिक शिक्षा प्रारम्भ करने की क्या आयु थी?
उत्तर
मुस्लिम काल (मध्य काल) में बालक की प्राथमिक शिक्षा प्रारम्भ करने की आयु 4 वर्ष, 4 माह, 4 दिन थी।

प्रश्न 16
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य-

  1. मध्यकाल में शिक्षा का नितान्तै अभाव था।
  2. मध्यकाल में शिक्षा का आधार इस्लाम धर्म था।
  3. मध्यकाल में स्त्री-शिक्षा के लिए अलग से व्यापक व्यवस्था थी।
  4. मध्यकालीन शिक्षा का ऍकृ मुख्य उद्देश्य, लौकिक प्रगति एवं सुख-समृद्धि प्राप्त करना भी था।
  5. मध्यकालीन शिक्षा का मुख्य माध्यम फारसी भाषा ही थी।

उत्तर

  1. असत्य,
  2. सत्य,
  3. असत्य,
  4. सत्य,
  5. सत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए
प्रश्न 1
मध्यकालीन शिक्षा किस धर्म से प्रभावित थी ?
(क) इस्लाम धर्म
(ख) पारसी धर्म
(ग) यहूदी धर्म
(घ) अरबी धर्म
उत्तर
(क) इस्लाम धर्म

प्रश्न 2
मध्यकालीन शिक्षा का माध्यम कौन-सी भाषा थी ?
(क) तुर्की
(ख) अरबी
(ग) फ़ारसी
(घ) उर्दू
उत्तर
(ग) फारसी

प्रश्न 3
मध्यकालीन शिक्षा का आरम्भ किस संस्कार से होता है ?
(क) प्रव्रज्या
(ख) उपसम्पदा
(ग) उपर्नयन
(घ) बिस्मिल्लाह
उत्तर
(घ) बिस्मिल्लाह

प्रश्न 4
मुस्लिम काल में बिस्मिल्लाह रस्म अदा की जाती थी जब बालक हो जाता था
(क) 3 वर्ष, 3 माह, 3 दिने का
(ख) 4 वर्ष, 4 माहे, 4 दिन का
(ग) 5 वर्ष, 5 माह, 5 दिन का
(घ) 6 वर्ष, 6 माह, 6 दिन का
उत्तर
(ख) 4 वर्ष, 4 माह, 4 दिन का

प्रश्न 5
4 वर्ष, 4 माह, 4 दिन की आयु पर कौन-सा शिक्षा संस्कार होता है?
(क) उपनयन
(ख) प्रव्रज्या
(ग) बिस्मिल्लाह
(घ) उपसम्पदा
उत्तर
(ग) बिस्मिल्लाह

प्रश्न 6
मध्यकाल में प्राथमिक शिक्षा के केन्द्र थे ?
(क) मदरसा
(ख) मकतब
(ग) खानकाह
(घ) दरगाह
उतर
(ख) मकतब

प्रश्न 7
मध्यकालीन भारत में उच्च मुस्लिम शिक्षा के केन्द्रों को कहा जाता था?
(क) मकतब
(ख) मदरसा
(ग) खानकाह
(घ) दरगाह
उत्तर
(ख) मदरसा

प्रश्न 8
मध्यकाल में शिक्षा का प्रबन्ध व संरक्षण का दायित्व किस पर था?
(क) राज्य पर ,
(ख) मन्त्रिपरिषद् पुर
(ग) सुल्तान पर,
(घ) स्थानीय लोगों पर
उत्तर
(क) राज्य पर

प्रश्न 9
मध्यकाल में शिक्षा की प्रगति किस बादशाह के काल में सर्वाधिक हुई?
(क) फिरोज तुगलक
(ख) हुमायूं
(ग) शेरशाह
(घ) अकबर
उत्तर
(घ) अकबर

प्रश्न 10
मध्य युग में साहित्य में निष्णात छात्र को कहा जाता था
(क) आलिम
(ख) फाजिल
(ग) कामिल
(घ) स्नातक
उत्तर
(ग) कामिल

प्रश्न 11
तर्क और दर्शनशास्त्र में प्रबुद्ध छात्रों को क्या उपाधि दी जाती थी ?
(क) फाजिले
(ख) आलिम
(ग) मनसबदार
(घ) कामिल
उत्तर
(क) फाजिल

प्रश्न 12
“मुस्लिम शिक्षा एक विदेशी प्रणाली थी, जिसका भारत में प्रतिरोपण किया गया और जो ब्राह्मणीय शिक्षा से अति अल्प सम्बन्ध रखकर, अपनी नवीन भूमि में विकसित हुई।” यह कथन किसका है?
(क) डॉ० केई का
(ख) डॉ० जाकिर हुसैन का
(ग) डॉ० यूसुफ हुसैन का
(घ) इनमें से किसी को नहीं
उत्तर
(क) डॉ० केई का

प्रश्न 13
‘बिस्मिल्लाह संस्कार का सम्बन्ध है-
(क) वैदिक काल से
(ख) बौद्ध काल से
(ग) मुस्लिम काल से
(घ) ब्रिटिश काल से
उत्तर
(ग) मुस्लिम काल से

प्रश्न 14
मध्यकालीन (मुगलकालीन) शिक्षा के समय में महिला इतिहासकार कौन थीं?
(क) नूरजहाँ
(ख) रजिया बेगम
(ग) अब्बासी
(घ) गुलबदन बेगम
उत्तर
(घ) गुलबदन बेगम

प्रश्न 15
निम्नलिखित में से मध्यकालीन समय में कौन-सा शिक्षा का केन्द्र नहीं था ?
(क) आगरा
(ख) जौनपुर
(ग) मालवा
(घ) तक्षशिला
उत्तर
(घ) तक्षशिला

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