UP Board Solutions for Class 12 Geography Practical Work Chapter 4 Field Study

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography (Practical Work)
Chapter Chapter 4
Chapter Name Field Study (क्षेत्रीय अध्ययन)
Number of Questions Solved 1
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Practical Work Chapter 4 Field Study (क्षेत्रीय अध्ययन)

विस्तृत उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1
क्षेत्रीय अध्ययन से क्या अभिप्राय है? क्षेत्र का चयन उसके लिए आवश्यक उपकरण तथा क्षेत्रीय आख्या तैयार करने की विधि समझाइए।
उत्तर

क्षेत्रीय अध्ययन का अर्थ
Meaning of Field Study

क्षेत्रीय अध्ययन का प्रमुख उद्देश्य भूगोल के विद्यार्थियों को किसी क्षेत्र की वास्तविक भौगोलिक परिस्थितियों से परिचित कराना है। ऐसी बहुत-सी जानकारियाँ हैं जिन्हें पुस्तकों में तो पढ़ लिया जाता है, परन्तु उनके वास्तविक तथा प्राकृतिक स्वरूप के विषय में कोई ज्ञान उपलब्ध नहीं होता। उदाहरण के लिए, यदि हम मेरठ जनपद के किसी ग्राम का क्षेत्रीय सर्वेक्षण करें तथा उसकी जनसंख्या के आँकड़े, शिक्षा, व्यवसाय तथा यातायात साधनों के आँकड़े स्वयं एकत्र कर अपने अनुभव एवं पर्यवेक्षण के आधार पर इन आंकड़ों का विश्लेषण कर एक रिपोर्ट तैयार करें तो हमें उस ग्राम के विषय में एक अच्छी भौगोलिक जानकारी प्राप्त हो सकती है। इससे अन्य लोग भी लाभान्वित हो सकते हैं। इन एकत्रित किये गये आँकड़ों को सांख्यिकीय आरेखों-रेखाचित्र, दण्डाकृति तथा चक्राकृति आदि के द्वारा प्रदर्शित कर सकते हैं। इन आरेखों के द्वारा हम उस ग्राम की एक भौगोलिक आख्या प्रस्तुत कर सकते हैं। इस प्रकार के अध्ययनों को क्षेत्रीय अध्ययन के नाम से पुकारा जाता है।

भौतिक दृष्टिकोण से हमें धरातल पर बहुत-से परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं, अर्थात् किसी प्रदेश को धरातलीय दृष्टिकोण से पर्वतीय, पठारी एवं मैदानी भागों में विभाजित किया जा सकता है। प्रत्येक भौतिक प्रदेश की प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों में अन्तर पाया जाता है। इन प्रदेशों की धरातलीय बनावट, जल-प्रवाह प्रणाली, जलवायु दशाएँ, मिट्टी, प्राकृतिक वनस्पति, अधिवास, व्यावसायिक संरचना, कृषि एवं उसके ढंग, सामाजिक रीति-रिवाज आदि तथ्यों में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है। क्षेत्रीय सर्वेक्षण के द्वारा हम इन प्रदेशों की विभिन्नताओं का अध्ययन कर सकते हैं तथा दो विभिन्न प्रदेशों के मध्य तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत कर सकते हैं।

इसके दूसरी ओर यदि किसी कस्बे अथवा नगर का अध्ययन किया जाये तो विद्यार्थियों को उनकी अनेक समस्याओं के विषय में जानकारी उपलब्ध हो सकती है। वे उसके प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक संसाधनों से परिचित हो सकेंगे। भूगोल का विद्यार्थी जिस क्षेत्र विशेष में निवास करता है, कम-से-कम उसे उस क्षेत्र के आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक लक्षणों का ज्ञान भली-भाँति होना चाहिए। प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक पर्यावरण तथा इन दोनों के पारस्परिक सम्बन्धों के ज्ञान के लिए भौगोलिक पर्यटन अत्यन्त आवश्यक है। इन तथ्यों का अध्ययन एवं जानकारी उस क्षेत्र का भ्रमण करके ही प्राप्त की जा सकती है।

क्षेत्र का चयन
Selection of Field

भौगोलिक अध्ययन बड़े विस्तृत होते हैं। क्षेत्रीय अध्ययन के लिए निम्नलिखित में से किसी भी निकटवर्ती क्षेत्र का चयन किया जा सकता है –

  1. पर्वतीय क्षेत्र
  2. पठारी क्षेत्र
  3. ग्रामीण बस्ती
  4. नगरीय बस्ती
  5. औद्योगिक नगर
  6. धार्मिक केन्द्र
  7. बाजार केन्द्र
  8. डेल्टाई प्रदेश
  9. बहुउद्देशीय योजना
  10. मरुस्थलीय प्रदेश

इस प्रकार किसी भी एक इकाई का चयन क्षेत्रीय अध्ययन के लिए किया जा सकता है।

क्षेत्रीय अध्ययन के लिए आवश्यक उपकरण
Required Apparatus for Field Study

किसी इकाई के क्षेत्रीय अध्ययन के लिए निम्नलिखित उपकरण आवश्यक होते हैं –

  1. अभ्यास-पुस्तिका अथवा नोट बुक
  2. ड्राइंग उपकरण-पेन, पेन्सिल, रबड़, मापक, आलपिन, गोंद, ब्लेड आदि
  3. ड्राइंगशीट, ट्रेसिंग पेपर, ग्राफ पेपर आदि
  4. फीता एवं जरीब
  5. कैमरा एवं दूरबीन
  6. अधिकतम एवं न्यूनतम तापमापी
  7. चुम्बकीय दिक्सूचक-दिशा निर्धारित करने के लिए
  8. ऊँचाई ज्ञात करने का यन्त्र एल्टीमीटर तथा
  9. ठहरने एवं खाने का सामान–टेण्ट, बाल्टी, जग, गिलास आदि।

क्षेत्रीय आख्या तैयार करने की विधि
Method of Preparing the Fields Data

क्षेत्रीय सर्वेक्षण करने के पश्चात् उसकी सारगर्भित रिपोर्ट भी तैयार करनी आवश्यक होती है। यह रिपोर्ट कम-से-कम 10 पृष्ठ की अवश्य ही होनी चाहिए। एकत्रित किये गये आँकड़ों को सारणीबद्ध कर लिया जाता है। सारणीबद्ध किये गये आँकड़ों को विभिन्न विधियों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है, अर्थात् इन सूचनाओं को आरेखों, लेखाचित्रों की सहायता से ड्राइंग कागज एवं ग्राफ पर प्रदर्शित करना होता है। रिपोर्ट का विवरण निम्नलिखित शीर्षकों के आधार पर दिया जाना चाहिए –

  1. क्षेत्र या प्रदेश की स्थिति, विस्तार एवं सामान्य परिचय।
  2. धरातलीय बनावट एवं जल-प्रवाह प्रणाली।
  3. जलवायु दशाएँ।
  4. प्राकृतिक वनस्पति एवं मिट्टी की संरचना।
  5. पशुपालन एवं कृषि।
  6. यातायात एवं संचार के साधन।
  7. मानव अधिवास।
  8. सामाजिक एवं सांस्कृतिक दशाएँ।
  9. जनसंख्या एवं उसकी विशेषताएँ, समस्याएँ तथा उनका समाधान।
  10. भावी विकास हेतु सुझाव।

उपर्युक्त शीर्षकों के आधार पर रिपोर्ट तैयार करने के साथ-साथ सारणीबद्ध किये गये आँकड़ों को ड्राइंगशीट पर मानचित्रों, चित्रों तथा आरेखों द्वारा प्रदर्शित करना चाहिए। क्षेत्र में खींची गयी फोटो को भी साथ में संलग्न करना चाहिए, जिससे रिपोर्ट को सबलता प्राप्त होगी। क्षेत्र के आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास हेतु कुछ सुझाव देना भी आवश्यक है। इससे अध्ययन रिपोर्ट की उपयोगिता का ज्ञान प्राप्त होता है।

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UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 11 Environmental Pollution Problems and Remedies

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 11 Environmental Pollution Problems and Remedies (पर्यावरण प्रदूषण-समस्याएँ एवं निदान) are part of UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 11 Environmental Pollution Problems and Remedies(पर्यावरण प्रदूषण-समस्याएँ एवं निदान).

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Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 11
Chapter Name Environmental Pollution Problems and Remedies
(पर्यावरण प्रदूषण-समस्याएँ एवं निदान)
Number of Questions Solved 38
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 11 Environmental Pollution Problems and Remedies (पर्यावरण प्रदूषण-समस्याएँ एवं निदान)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
पर्यावरण-प्रदूषण से क्या आशय है? पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य कारणों तथा नियन्त्रण के उपायों का उल्लेख कीजिए।
या
पर्यावरण प्रदूषण की क्या अवधारणा है? प्रदूषण को रोकने के लिए उपचारात्मक उपायों का वर्णन कीजिए। [2013]
या
प्रदूषण रोकने के विभिन्न उपायों की विवेचना कीजिए। [2016]
उत्तर
पर्यावरण-प्रदूषण का अर्थ
पर्यावरण प्रदूषण का सामान्य अर्थ है हमारे पर्यावरण का दूषित हो जाना। पर्यावरण का निर्माण प्रकृति ने किया है। प्रकृति-प्रदत्त पर्यावरण में जब किन्हीं तत्त्वों का अनुपात इस रूप में बदलने लगता है। जिसका सामान्य जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना होती है, तब कहा जाता है कि पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। उदाहरण के लिए-यदि पर्यावरण के मुख्य भाग वायु में ऑक्सीजन के स्थान पर किसी अन्य विषैली गैस या गैसों का अनुपात बढ़ जाए तो यह कहा जाएगा कि वायु-प्रदूषण हो गया है। पर्यावरण के किसी भी भाग के प्रदूषित हो जाने को पर्यावरण-प्रदूषण कहा जाता है। यह प्रदूषण जल-प्रदूषण, वायु-प्रदूषण, ध्वनि-प्रदूषण तथा मृदा-प्रदूषण के रूप में हो सकता है।

पर्यावरण-प्रदूषण के कारण
आधुनिक विश्व के सम्मुख पर्यावरण-प्रदूषण एक अत्यन्त गम्भीर समस्या है। वायु, जल और भूमि का प्रदूषण जिन कारणों से हुआ है उनका उल्लेख यहाँ संक्षेप में किया जा रहा है-

1. औद्योगीकरण
वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा के विकास एवं अनुसन्धानों के कारण पर्यावरण में प्रदूषण उत्पन्न हुआ है। औद्योगीकरण की प्रवृत्ति के फलस्वरूप जंगल काटे जा रहे हैं, पहाड़ों को समतल किया जा रहा है, नदियों के स्वाभाविक बहाव को मोड़ा जा रहा है, खनिज पदार्थों का अन्धाधुन्ध दोहन हो रहा है, इन सबके फलस्वरूप पर्यावरण प्रदूषित होता है। औद्योगिक चिमनियों में रात-दिन निकलने वाले धुएँ से वायु प्रदूषण हो रहा है, कल-कारखानों से निकलने वाला कचरा और गन्दा पानी नदियों के जल में मिल रहा है. जिसके फलस्वरूप नदियों का जल-प्रदषित होता जा रहा है। इस तरह औद्योगिक विकास से प्रदूषण निरन्तर बढ़ रहा है।

2. वाहित मल
शहरों के मकानों से निकलने वाला मलमूत्र सीवर पाइप के द्वारा नदी, तालाबों और झीलों में डाल दिया जाता है। जो उनके जल को प्रदूषित कर देता है।

3. घरेलू अपमार्जक
घरों, अस्पतालों आदि की सफाई में विभिन्न प्रकार के साबुन, विम, डिटरजेण्ट पाउडर आदि प्रयुक्त होते हैं जो नालियों के द्वारा नदियों, तालाबों और झीलों आदि में मिल जाते हैं। अपमार्जकों के फलस्वरूप कार्बन डाइऑक्साइड और कार्बन अम्ल उत्पन्न होते हैं और जल को प्रदूषित करते हैं।

4. कूड़े-करकट और मृत जीवों का सड़ना
कूड़े-करकट के ढेर और मृत जीवों से जो दुर्गन्ध उठती है उससे वायु प्रदूषित हो जाती है। लाशों के सड़ने में अमोनिया गैस वायु और जल दोनों को ही प्रदूषित करती है।

5. प्रकृति का अनुचित शोषण
अपने भौतिक विकास हेतु मानव प्रकृति का बेदर्दी से शोषण कर रहा है। वह जंगलों को उजाड़ रहा है, पर्वतों को समतल बना रहा है और खनिज पदार्थों का निरन्तर दोहन कर रहा है, जिसके फलस्वरूप सूखा, बाढ़ और भू-स्खलन की समस्या उत्पन्न हुई है। वनों की अन्धाधुन्ध कटाई से वातावरण में कार्बन ड्राई-ऑक्साइड की सान्द्रता निरन्तर बढ़ रही है।

6. रासायनिक तत्त्वों का वायुमण्डल में मिश्रण
निरन्तर उत्पन्न होने वाले धुएँ से रासायनिक तत्त्व वायुमण्डल में मिल रहे हैं, कार्बन मोनो-ऑक्साइड निरन्तर मानव को सता रही है और इसके फलस्वरूप दम घुटने लगता है और उल्टी आने लगती है। सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन की वायुमण्डल में अधिक मात्रा होने पर फेफड़ों की बीमारियाँ और आँखों में जलन उत्पन्न होती है। वायुमण्डल में रासायनिक गैसों की अधिक मात्रा के कारण अम्लीय वर्षा का भय भी बना रहता है।

7. स्वतः चल-निर्वातक
जेट-विमान, ट्रेन, मोटर, ट्रैक्टर, टैम्पों आदि रात-दिन दौड़ते हैं। पेट्रोल, डीजल और मिट्टी के तेल के धुएँ से अनेक प्रकार की गैसें उत्पन्न होती हैं, जो वातावरण में फैलकर वायु को प्रदूषित करती हैं।

8. कीटनाशक पदार्थ
कीटनाशक पदार्थ चूहों, कीड़े-मकोड़ों और जीवाणुओं को मारने के लिए खेतों और उद्यानों के पौधों पर छिड़के जाते हैं। डी०डी०टी०, फिनॉयल, क्लोरीन, पोटैशियम परमैगनेट का प्रभाव हानिकारक होता है। इनके छिड़काव से मछलियाँ मर जाती हैं, भूमि की उर्वरा-शक्ति कम हो जाती है और सूक्ष्म जीव जो पर्यावरण को सन्तुलित रखते हैं, समाप्त हो जाते हैं।

9. रेडियोधर्मी पदार्थ
नाभिकीय अस्त्रों के विस्फोटों के फलस्वरूप जल, थल और वायु सभी में रेडियोधर्मी पदार्थ प्रवेश कर जाते हैं और पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि करते हैं।

पर्यावरण-प्रदूषण के नियन्त्रण के उपाय :
पर्यावरण प्रदूषण अपने आप में एक गम्भीर समस्या है तथा सम्पूर्ण मानव जगत के लिए चुनौती है। इस समस्या के समाधान के लिए मानव-मात्र चिन्तित है। विश्व के प्राय: सभी देशों में पर्यावरण प्रदूषण के नियन्त्रण के लिए अनेक उपाय किये जा रहे हैं। वास्तव में भौतिक प्रगति तथा पर्यावरण-प्रदूषणे दो सहगामी प्रक्रियाएँ हैं। इस स्थिति में यदि कहा जाए कि हम औद्योगिक तथा भौतिक क्षेत्र में अधिक-से-अधिक प्रगति भी करते रहें तथा साथ ही हमारा पर्यावरण भी प्रदूषित न हो, तो यह असम्भव है। हमें पर्यावरण प्रदूषण को समाप्त नहीं कर सकते, हद-से-हद पर्यावरण-प्रदूषण को नियन्त्रित कर सकते हैं अर्थात् सीमित कर सकते हैं। पर्यावरण-प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं-

1. औद्योगिक संस्थानों के लिए कठोर निर्देश जारी किये गये हैं कि वे पर्यावरण
प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए हर सम्भव उपाय करें। इसके लिए आवश्यक है कि पर्याप्त ऊँची चिमनियाँ लगाई जाएँ तथा उनमें, उच्च कोटि के छन्ने लगाए जाएँ। औद्योगिक संस्थानों से विसर्जित होने वाले जल को पूर्णरूप से उपचारित करके ही पर्यावरण में छोड़ा जाना चाहिए। यही नहीं ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए जहाँ-जहाँ सम्भव हो ध्वनि अवरोधक लगाये जाने चाहिए। औद्योगिक संस्थानों के आस-पास अधिक-से-अधिक पेड़ लगाये जाने चाहिए।

2. वाहन भी पर्यावरण
प्रदूषण के मुख्य कारण है। अतः वाहनों द्वारा होने वाले प्रदूषण को भी नियन्त्रित करना आवश्यक है। इसके लिए वाहनों के इंजन की समय-समय पर जाँच करवाई जानी चाहिए। ईंधन में होने वाली मिलावट को भी रोकना चाहिए। कुछ नगरों में CNG चालित वाहनों को इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे भी पर्यावरण-प्रदूषण को नियन्त्रित करने में योगदान मिलेगा।

3. जन
सामान्य को पर्यावरण के प्रदूषण के प्रति सचेत होना चाहिए तथा जीवन के हर क्षेत्र में प्रदूषण को रोकने के हर सम्भव उपाय किये जाने चाहिए। पर्यावरण-प्रदूषण वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति की समस्या है। अत: इसे नियन्त्रित करने के लिए प्रत्येक व्यक्तिं को जागरूक होना चाहिए। पर्यावरण प्रदूषण के प्रत्येक कारण को जानने का प्रयास किया जाना चाहिए तथा उसके निवारण का उपाय किया जाना चाहिए।

प्रश्न 2
जल प्रदूषण से आप क्या समझते हैं ? इसके मुख्य कारणों, हानियों तथा नियन्त्रित करने के उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
जल प्रदूषण : पर्यावरण प्रदूषण का एक मुख्य रूप या प्रकार है-जल प्रदूषण। जल के मुख्य स्रोतों में दूषित एवं विषैले तत्त्वों का समावेश होना जल प्रदूषण कहलाती है। यह भी आज के युग की गम्भीर समस्या है। इसका अत्यधिक बुरा प्रभाव मानव-समाज, प्राणि-जगत तथा वनस्पति जगते पर पड़ता है। जल प्रदूषण के कारणों, हानियों तथा इसे नियन्त्रित करने के उपायों का विवरण निम्नवर्णित है।

जल प्रदूषण के कारण
जल प्रदूषण के निम्नलिखित कारण हैं:

  1. औद्योगीकरण जल प्रदूषण के लिए सर्वाधिक उत्तरदायी है। चमड़े के कारखाने, चीनी एवं ऐल्कोहॉल के कारखाने कागज की मिलें तथा अन्य अनेकानेक उद्योग नदियों के जल को प्रदूषित करते हैं।
  2. नगरीकरण भी जल प्रदूषण के लिए उत्तरदायी है। नगरों की गन्दगी, मल व औद्योगिक अवशिष्टों। के विषैले तत्त्व भी जल को प्रदूषित करते हैं।
  3. समद्रों में जहाजरानी एवं परमाणु अस्त्रों के परीक्षण से भी जल प्रदषित होता है।
  4. नदियों के प्रति भक्ति-भाव होते हुए भी तमाम गन्दगी; जैसे-अधजले शव और जानवरों के मृत शरीर तथा अस्थि विसर्जन आदि भी नदियों में ही किया जाता है, जो नदियों के जल प्रदूषण का एक प्रमुख कारण है।
  5. जल में अनेक रोगों के हानिकारक कीटाणु मिल जाते हैं, जिससे प्रदूषण उत्पन्न हो जाता है।
  6. भू-क्षरण के कारण मिट्टी के साथ रासायनिक उर्वरक तथा कीटनाशक पदार्थों के नदियों में पहुँच जाने से नदियों का जल प्रदूषित हो जाता है।
  7. घरों से बहकर निकलने वाला फिनायल, साबुन, सर्फ एवं शैम्पू आदि से युक्त गन्दा पानी तथा शौचालय का दूषित मल नालियों में प्रवाहित होता हुआ नदियों और झीलों के जल में मिलकर उसे प्रदूषित कर देता है।
  8. नदियों और झीलों के जल में पशुओं को नहलाना, मनुष्यों द्वारा स्नान करना व साबुन आदि से गन्दे वस्त्र धोना भी जल प्रदूषण का मुख्य कारण है।

“जल प्रदूषण की हानियाँ
जल प्रदूषण की हानियों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है।

  1. प्रदूषित जल के सेवन से जीवों को अनेक प्रकार के खतरों का सामना करना पड़ता है।
  2. जल प्रदूषण से अनेक बीमारियाँ; जैसे-हैजा, पीलिया, पेट में कीड़े, यहाँ तक कि टायफाइड भी प्रदूषित जल के कारण ही होता है। राजस्थान के दक्षिणी भाग के आदिवासी गाँवों में गन्दे तालाबों का पानी पीने से “नारू’ नाम का भयंकर रोग होता है। इन गाँवों के 6 लाख 90 हजार लोगों में से 1 लाख 90 हजार लोगों को यह रोग है।
  3. प्रदूषित जल का प्रभाव जल में रहने वाले जन्तुओं और जलीय पौधों पर भी पड़ रहा है। जल प्रदूषण के कारण मछली और जलीय पौधों में 30 से 50 प्रतिशत तक की कमी हो गयी है। जो व्यक्ति खाद्य-पदार्थ के रूप में मछली आदि का उपयोग करते हैं, उनके स्वास्थ्य को भी हानि पहुँचती है।
  4. प्रदूषित जल का प्रभाव कृषि उपजों पर भी पड़ता है। कृषि से उत्पन्न खाद्य-पदार्थों को मानव व पशुओं द्वारा उपयोग में लाया जाता है, जिससे मानव व पशुओं के स्वास्थ्य को हानि होती है।
  5. जल, जन्तुओं के विनाश से पर्यावरण असन्तुलित होकर विभिन्न प्रकार के कुप्रभाव उत्पन्न करता

जल प्रदूषण को नियन्त्रित करने के उपाय
जल की शुद्धता और उपयोगिता बनाए रखने के लिए प्रदूषण को रोकना आवश्यक है। जल प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए निम्नलिखिते, उपाय प्रयोग में लाए जा सकते हैं

  1. नगरों के दूषित जल और मल को नदियों और झीलों के स्वच्छ जल में मिलने से रोका जाए।
  2. कल-कारखानों के दूषित और विषैले जल को नदियों और झीलों के जल में न गिरने दिया जाए।
  3. मल-मूत्र एवं गन्दगीयुक्त जल का उपयोग बायो-गैस बनाने या सिंचाई के लिए करके प्रदूषण को | रोका जा सकता है।
  4. सागरों के जल में आणविक परीक्षण न कराए जाएँ।
  5. नदियों के तटों पर शवों को ठीक से जलाया जाये तथा उनकी राख भूमि में दबा दी जाए।
  6. पशुओं के मृतक शरीर और मानव शवों को स्वच्छ जल में प्रवाहित न करने दिया जाए।
  7. जल प्रदूषण रोकने के लिए नियम बनाए जाएँ तथा उनका कठोरता से पालन किया जाए।
  8. नदियों, कुओं, तालाबों और झीलों के जल को शुद्ध बनाए रखने के लिए प्रभावी उपाय काम में लाए | जाएँ।
  9. जल प्रदूषण के कुप्रभाव तथा उनके रोकने के उपायों की जनसामान्य में प्रचार-प्रसार कराया जाए।
  10. जल उपयोग तथा जल संसाधन संरक्षण के लिए राष्ट्रीय नीति बनायी जाए।

प्रश्न 3
भारत में पर्यावरण-प्रदूषण का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए। पर्यावरण संरक्षण के सरकारी उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
भारत में पर्यावरण-प्रदूषण भारत में पर्यावरण-प्रदूषण की समस्या लगातार बढ़ रही है। सबसे प्रमुख समस्या जल-प्रदूषण की है। इसके बाद नगरीय क्षेत्रों में वायु और ध्वनि-प्रदूषण की समस्या है। लगभग सभी नदियाँ प्रदूषण की समस्या से ग्रस्त हैं और देश में उपलब्ध जल का लगभग 70 प्रतिशत भाग प्रदूषित है। लगभग सभी नदियों में कारखानों को गन्दा पानी छोड़ा जाता है साथ ही मल-मूत्र भी मिलता रहता है। दामोदर नदी में दुर्गापुर और आसनसोल में स्थित कारखानों से छोड़े जाने वाले अवशिष्टों और मल आदि के मिलने से फिनोल, सायनाइड, अमोनिया आदि विषैले तत्वों की मात्रा बढ़ गयी है। हुगली नदी का जल और अधिक प्रदूषित है। गंगा जल में स्वयं शुद्ध होते रहने की क्षमता है परन्तु इसका जल भी प्रदूषित हो गया है। कानपुर और वाराणसी में इसका जल बहुत अधिक प्रदूषित है। भारत में वायु-प्रदूषण भी निरन्तर बढ़ रहा है।

भारतीय वायुमण्डल में लगभग 40 लाख टन सल्फर एसिड, 70 लाख टन कार्बन-कण, 10 लाख टन कार्बन मोनो-ऑक्साइड, नाइट्रोजन-ऑक्साइड आदि गैसों का सम्मिश्रण है। बड़े नगरों; जैसे-कोलकाता, मुम्बई, चेन्नई, दिल्ली, कानपुर, अहमदाबाद आदि की वायु बहुत अधिक प्रदूषित है। कोलकाता सबसे अधिक प्रदूषित शहर है। यहाँ की वायु. में सल्फर डाइ-ऑक्साइड और धूल कणों की मात्रा सबसे अधिक है। कोलकाता शहर लगभग 1300 टन प्रदूषक तत्त्व वायुमण्डल में छोड़ता है। भारत में ध्वनि प्रदूषण भी बढ़ रहा है। बढ़ती हुई जनसंख्या, नगरीकरण की प्रवृत्ति और स्वचालित वाहनों की बाढ़ से ध्वनि प्रदूषण की समस्या बढ़ती जा रही है। फलस्वरूप लोगों की श्रवण-क्षमता घटती जा रही है, नींद गायब हो रही है और स्नायुविक रोग बढ़ रहे हैं। भारत में मृदा-प्रदूषण, भू-प्रदूषण और भू-स्खलन आदि की समस्याएँ भी हैं। थार का रेगिस्तान देश के अन्दरुनी हिस्सों में बढ़ रहा है, हिमालय वीरान हो रहा है, भूमि की उर्वरा-शक्ति कम हो रही है, जलवायु बदल रही है और सूखा एवं बाढ़ का प्रकोप निरन्तर बढ़ रहा है।

पर्यावरण संरक्षण के सरकारी उपाय
सन् 1990 के बाद केन्द्र तथा राज्य सरकारों ने देश में पर्यावरण संरक्षण हेतु अनेक उपाय किये हैं, जिनमें प्रमुख निम्नलिखित हैं

  1. केन्द्र सरकार ने विशेषज्ञों, विद्वानों तथा प्रशासनिक अधिकारियों के लिए पर्यावरण सम्बन्धी शिक्षण और प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था की है।
  2. पर्यावरण और वन मन्त्रालय ने पर्यावरण संरक्षण हेतु अनेक अनुसन्धान तथा विकास कार्यक्रम
    चलाये हैं। मई, 2000 तक लगभग 108 परियोजनाओं पर कार्य हो चुका है।
  3. केन्द्र सरकार ने देश के कुछ वनों को संरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया है। इन संरक्षित क्षेत्रों में शिकार खेलना तथा वृक्षों को काटना दण्डनीय अपराध है। उत्तर प्रदेश में दुधवा का वन्य क्षेत्र इसका उदाहरण है।
  4. सरकार ने पर्वतीय क्षेत्रों में अनेक विकास कार्यक्रम आरम्भ किये हैं, जिनसे पर्यावरण संरक्षण
    को अत्यधिक प्रोत्साहन मिल रहा है।
  5. पर्यावरण निदेशालय ने ‘राष्ट्रीय पर्यावरण जागरूकता, अभियान आरम्भ किया है। इस अभियान में गैर-सरकारी संगठनों, शिक्षण संस्थाओं तथा सरकारी विभागों के प्रस्ताव भी आमन्त्रित किये
    गये हैं।
  6. अप्रैल 1995 से देश के चार महानगरों-कोलकाता, मुम्बई, चेन्नई और दिल्ली में हरित ईंधन योजना चलाई जा रही है। इसके अन्तर्गत वाहनों में सीसा रहित पेट्रोल का उपयोग अनिवार्य कर दिया गया है।
  7. गंगा नदी तथा अन्य जलाशयों को गन्दगी से मुक्त रखने के लिए सरकार के निर्देशन में देश भर में 270 योजनाएँ चल रही हैं।
  8. सरकार ने पर्यावरण संरक्षण कार्यक्रमों को प्रोत्साहन देने के लिए इन्दिरा गाँधी पर्यावरण पुरस्कार, राष्ट्रीय पर्यावरण फैलोशिप आदि पुरस्कार योजनाएँ लागू की हैं।
  9. सरकार ने केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड तथा राज्य प्रदूषण बोर्ड की स्थापना की है। इन संस्थाओं का प्रमुख कार्य प्रदूषण नियन्त्रण कानूनों को कठोरतापूर्वक लागू करना तथा पर्यावरण सम्बन्धी प्रयासों की समीक्षा करना है।
  10. सरकार ने वृक्षारोपण को प्रोत्साहन देने के लिए वर्ष 1997-98 से फ्लाई ऐश सुधार योजना लागू की है। इस योजना के अन्तर्गत रिक्त भूमि पर वृक्ष लगाये जाते हैं।
  11. स्वयं सेवी संस्थाएँ तथा राज्य सरकारें पर्यावरण संरक्षण के कार्य में महत्त्वपूर्ण योग दे रही हैं।
  12. वन संरक्षण, वृक्षारोपण, चिपको आन्दोलन, वन महोत्सव आदि कार्यक्रमों से भी पर्यावरण संरक्षण को विशेष प्रोत्साहन मिला है।
  13. उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 1997-98 में एक सचल पर्यावरणीय प्रयोगशाला स्थापित की है, जिसका कार्य घटनास्थल पर जाकर पर्यावरण विरोधी कार्यों की जाँच करना है।
  14. जन-जागरण कार्यक्रम के अन्तर्गत जनता को वायु, जल, ध्वनि, मृदा आदि प्रदूषणों से उत्पन्न खतरों से अवगत कराया जा रहा है और उन्हें पर्यावरण-शिक्षा ग्रहण करने की सुविधाएँ प्रदान की जा रही हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
पर्यावरण के वर्गीकरण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
अध्ययन की सुविधा तथा प्रभावों की भिन्नता को ध्यान में रखते हुए सम्पूर्ण पर्यावरण को निम्नलिखित वर्गों में वर्गीकृत किया गया है-
1. प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण
पर्यावरण के इस वर्ग के अन्तर्गत हम उन समस्त प्राकृतिक शक्तियों एवं कारकों को सम्मिलित करते हैं जो मनुष्य को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। इस स्थिति में पृथ्वी, आकाशवायु, जल, वनस्पति तथा समस्त जीव-जन्तु प्राकृतिक पर्यावरण (Natural Environment) के ही घटक हैं। प्राकृतिक पर्यावरण ही पर्यावरण का मुख्यतम’ घटक है तथा पर्यावरण का यही घटक मानव-जीवन को सर्वाधिक प्रभावित करता है। वास्तव में प्राकृतिक पर्यावरण का निर्माण मनुष्य ने नहीं किया है तथा न ही मनुष्य प्राकृतिक पर्यावरण को पूरी तरह से नियन्त्रित कर पाया है। सामान्य रूप से, पर्यावरण के अन्तर्गत प्राकृतिक पर्यावरण के जनजीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का ही विस्तृत अध्ययन किया जाता है।

2. सामाजिक पर्यावरण
पर्यावरण का द्वितीय घटक सामाजिक पर्यावरण (Social Environment) कहलाता है। सामाजिक पर्यावरण का निर्माण मनुष्य ने स्वयं किया है। पर्यावरण के इस बटक में सम्पूर्ण सामाजिक ढाँचे को सम्मिलित किया जाता है। इसलिए इसे सामाजिक सम्बन्धों का पर्यावरण भी कहा जाता है। इसके मुख्य अंग हैं–परिवार, आस-पड़ोस, रिश्ते-नाते, खेल के साथी, समूह एवं समुदाय तथा विद्यालय।।

3. सांस्कृतिक पर्यावरण
पर्यावरण का तीसरा मुख्य घटक है–सांस्कृतिक पर्यावरण (Cultural Environment)। सांस्कृतिक पर्यावरण में मनुष्य द्वारा निर्मित वस्तुओं एवं परिवेश को सम्मिलित किया जाता है। सांस्कृतिक पर्यावरण के दो पक्ष स्वीकार किए गए हैं, जिन्हें क्रमशः भौतिक सांस्कृतिक पर्यावरण तथा अभौतिक सांस्कृतिक पर्यावरण कहा जाता है। मनुष्य द्वारा विकसित किए गए समस्त भौतिक एवं यान्त्रिक साधन भौतिक सांस्कृतिक पर्यावरण में तथा इससे भिन्न धर्म, संस्कृति, भाषा, लिपि, रूढ़ियाँ, प्रथाएँ, विश्वास, कानून आदि अभौतिक सांस्कृतिक पर्यावरण में सम्मिलित माने । जाते हैं।

प्रश्न 2
जल-प्रदूषण का अर्थ एवं मुख्य स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
जल-प्रदूषण का अर्थ
वर्तमान युग में जल-प्रदूषण की समस्या अत्यन्त गम्भीर है और अनेक बीमारियों का कारण प्रदूषित जल’ ही है। जल में दो भाग ऑक्सीजन और एक भाग हाइड्रोजन होता है, इसके साथ उसमें अनेक खनिज तत्त्व, कार्बनिक-अकार्बनिक पदार्थ और गैसें घुल जाती हैं। यदि जल में घुले हुए पदार्थ आवश्यकता से अधिक मात्रा में एकत्रित हो जाते हैं अथवा कुछ ऐसे पदार्थ मिल जाते हैं, जो साधारणतया जल में उपस्थित नहीं रहते तो जल प्रदूषित हो जाता है। प्रदूषित जल का उपयोग मानव, जीव-जन्तु, पेड़-पौधों और सभी वनस्पतियों के लिए हानिकारक होता है। जल-प्रदूषण के स्रोत–अनेक प्रकार के पदार्थ जल को प्रदूषित कर देते हैं। यहाँ जल को प्रदूषित करने वाले स्रोतों का उल्लेख संक्षेप में किया जा रहा है

  1. जल-प्रदूषण का प्रमुख स्रोत मल-मूत्र, औद्योगिक बहिस्राव, उर्वरक और कीटनाशक पदार्थ हैं। सीवर पाइप, घरेलू कूड़ा-करकट और कारखानों से निकले हुए अवशिष्टों का जल में विलय होने से जल प्रदूषित हो जाता है।
  2. तेल एवं तैलीय पदार्थ भी जल-प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। जलयानों के अवशिष्ट, तेल के विसर्जन, खनिज तेल के कुओं के रिसाव के फलस्वरूप जल-प्रदूषण में वृद्धि होती है।
  3. जल का तापीय प्रदूषण भी समस्या का एक स्रोत है। विभिन्न कारखानों के संयन्त्रों में प्रयुक्त | रिऐक्टरों के ताप को कम करने हेतु नदी अथवा झील के जल का प्रयोग किया जाता है और तत्पश्चात् जल पुनः नदी अथवा झीलों में छोड़ दिया जाता है। इस गर्म जल के फलस्वरूप तापीय प्रदूषण होता है।
  4. रेडियोधर्मी अवशिष्टों से भी जल-प्रदूषण होता है। नाभिकीय विस्फोटों के फलस्वरूप रेडियोधर्मी विशिष्ट जल और जलाशयों में मिल जाते हैं और ये अधिक नुकसान पहुँचाते हैं।
  5. मृत जीवों की लाशों को जलाशय में फेंकने के फलस्वरूप जल, दुर्गन्ध एवं प्रदूषणयुक्त हो जाता है।
  6. जल में विभिन्न रोगों के जीवाणुओं का समावेश हो जाने से भी जल प्रदूषित हो जाता है।

प्रश्न 3
जल-प्रदूषण का जनजीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है? इसे रोकने के उपायों का भी उल्लेख कीजिए।
या
जल प्रदूषण की समस्या के निवारण हेतु अपनाए जाने वाले उपायों का वर्णन कीजिए। [2016]
उत्तर
जल-प्रदूषण का जनजीवन पर प्रभाव
जल-प्रदूषण का मानवे, जीव-जन्तुओं और वनस्पतियों पर अत्यधिक बुरा प्रभाव पड़ेता है। प्रदूषित जल मानव-स्वास्थ्य हेतु हानिकारक होता है। आंत्रशोध, पेचिस, पीलिया, हैजा, टाइफाइडऔर अपच आदि रोग दूषित जल के फलस्वरूप ही होते हैं। गन्दे जल से नहाने से विभिन्न प्रकार के चर्मरोग हो जाते हैं। दूषित जल का प्रभाव मानव के साथ ही जल-जीवों पर भी पड़ता है। मछलियों, कछुओं, जलीय पक्षियों और जलीय पादपों का जीवन खतरे में पड़ जाता है। यदि जल में ऑक्सीजन की मात्रा घट जाती है और सल्फेट, नाइट्रेट और क्लोराइड आदि की मात्रा बढ़ जाती है तो जलीय जन्तुओं और पादपों के जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है।

जल-प्रदूषण रोकने के उपाय-जल में शुद्धता की प्रक्रिया प्रकृति ही करती रहती हैं परन्तु फिर भी जल-प्रदूषण को रोकने के उपाय किये जाने चाहिए। कारखानों से निकलने वाले जहरीले अवशिष्ट पदार्थों और गर्म जल को जलाशयों में नहीं फेंका जाना चाहिए। मल-मूत्र आदि को जलाशय में नहीं गिराया जाना चाहिए इन्हें बस्तियों से दूर गड़ों में गिराया जाना चाहिए। कूड़ा-करकट, मरे जानवर और लाश नदी, तालाब अथवा झील में न फेंककर उन्हें जला दिया जाना। चाहिए। पेयजल के स्रोतों को दीवार बनाकर बाह्य गन्दगी से दूर रखना चाहिए। जनसामान्य को । जल-प्रदूषण के कारणों, दुष्प्रभावों और इनके रोकथाम की जानकारी प्रदान की जानी चाहिए। समय-समय पर नदी, तालाब और कुओं के जल का परीक्षण किया जाना चाहिए।

प्रश्न 4
वायु-प्रदूषण का अर्थ एवं मुख्य स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
अर्थ: मानव और सभी जीवों के लिए स्वच्छ वायु आवश्यक है। वायुमण्डल में विभिन्न गैसें एक निश्चित मात्रा एवं अनुपात में होती हैं। जब किन्हीं कारणों से उनकी मात्रा और अनुपात में परिवर्तन हो जाता है तो वायु प्रदूषित हो जाती है। ‘विश्व-स्वास्थ्य संगठन ने वायु-प्रदूषण के अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा-“वायु प्रदूषण उन परिस्थितियों तक सीमित रहता है जहाँ वायुमण्डल में दूषित पदार्थों की सान्द्रता मनुष्य और पर्यावरण को हानि पहुँचाने की सीमा तक बढ़ती है। वायु-प्रदूषण के स्रोत–वायु-प्रदूषण मुख्य रूप से मानव की गतिविधियों के फलस्वरूप होता है। औद्योगीकरण, नगरीकरण तथा ईंधन चालित वाहनों में होने वाली वृद्धि वायु-प्रदूषण के मुख्य कारण हैं।

वायुमण्डल में विभिन्न प्रकार की गैसें कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनो-ऑक्साइड, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, ओजोन आदि निश्चित मात्रा और अनुपात में हैं। रेलगाड़ी, मोटर, कार, टैक्ट्रर, टैम्पो, जेट विमान और पेट्रोल एवं डीजल से चलने वाली मशीनों और लकड़ी, कोयला, तेल आदि के जलने से निकलने वाले धुएँ से वायु प्रदूषण उत्पन्न होता है। कभी-कभी प्रकृति भी वायु-प्रदूषण का कारण बनती है। ज्वालामुखी विस्फोट, कोहरा, आँधी-तूफान आदि भी वायु प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। इसके अतिरिक्त वस्तुओं के सड़ने-गलने के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाली दुर्गन्ध से भी वायु-प्रदूषण में वृद्धि होती है। वनों अर्थात् पेड़ों की अन्धाधुन्ध कटाई के कारण भी वायु में गैसों का सन्तुलन बिगड़ रहा है तथा वायु प्रदूषित हो रही है।

प्रश्न 5
वायु-प्रदूषण का जनजीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है? इसे रोकने के उपायों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर
वायु-प्रदूषण का जनजीवन पर प्रभाव
वायु प्रदूषण का प्रभाव मानव और अन्य जीवों तथा पेड़-पौधों सभी पर पड़ता है। वायु-प्रदूषण से मानव का स्वास्थ्य खराब हो जाता है। खाँसी, फेफड़ों का कैंसर, एक्जिमा आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं, रक्तचाप बढ़ जाता है, आँखों के रोग उत्पन्न हो जाते हैं, चर्मरोग और मुँहासे आदि उत्पन्न हो जाते हैं। वायु-प्रदूषण और रासायनिक गैसों से पेड़ों की पत्तियाँ और नसें सूख जाती हैं। भारत में कोयला खानों में मजदूरी करने वाले लोग फुफ्फुस रोग से ग्रस्त हो जाते हैं। मानव की भाँति ही अन्य जीवों का श्वासतन्त्र और केन्द्रीय-नाड़ी संस्थान वायु-प्रदूषण से प्रभावित होता है।

बादल, वर्षा और तापक्रम पर भी वायु-प्रदूषण का प्रभाव पड़ता है। वाय-प्रदषण रोकने के उपाय-वांय-प्रदषण को रोकने के लिए व्यापक पैमाने पर कार्य किया। जाना चाहिए। कारखानों को आबादी से दूर स्थापित किया जाना चाहिए, उनकी चिमनियों को ऊँचा रखा जानी चाहिए और उनमें विशेष फिल्टर लगाया जाना चाहिए। भोजन पकाने के लिए कोयला, लकड़ी का प्रयोग कम किया जाना चाहिए, धुआँरहित ईंधन का प्रयोग किया जाना चाहिए, स्वचालित वाहनों की धूम्रनलिका में छन्ना लगाना आवश्यक है। अधिक धुआँ देने वाले वाहनों को नष्ट कर दिया जाना चाहिए। गोबर, कूड़ा-करकट को आबादी से दूर किसी गड्ढे में डालकर मिट्टी से ढक दिया जाना चाहिए।

प्रश्न 6
ध्वनि-प्रदूषण का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
ध्वनि प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? [2013]
उतर
अर्थ: आधुनिक युग में ध्वनि प्रदूषण भी मानव स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल रहा है। वातावरण में विभिन्न प्रकार के ध्वनि वाले ध्वनि-यन्त्रों से शोर बहुत अधिक बढ़ गया है और यह शोर का बढ़ना ही ध्वनि-प्रदूषण कहलाता है। ध्वनि की तीव्रता के मापन की इकाई डेसीबेल है। सामान्य रूप से 85 डेसीबेल से अधिक ध्वनि का पर्यावरण में व्याप्त होना ध्वनि-प्रदूषण माना जाता है। कारखानों की मशीनों से थोड़े-थोड़े अन्तराल पर बजने वाले सायरन, विमान, रेडियो, लाउडस्पीकर, टै फलस्वरूप जो शोर उत्पन्न होता है, वह ध्वनि-प्रदूषण है।

ध्वनि-प्रदूषण के स्रोत
ध्वनि-प्रदूषण के प्राकृतिक और भौतिक दो तरह के स्रोत हैं। प्राकृतिक स्रोतों के अन्तर्गत बादलों की गड़गड़ाहट, बिजली की कड़क, समुद्र की लहरें, ज्वालामुखी विस्फोट की आवाज और झरनों को पानी गिराना आदि आते हैं। भौतिक स्रोतों के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के सायरन, इंजनों, ट्रकों, मोटरों, वायुयानों, लाउडस्पीकरों और टेपरिकॉर्डर आदि की आवाज आदि आते हैं।

ध्वनि-प्रदूषण का जनजीवन पर प्रभाव
ध्वनि-प्रदूषण का मानव-जीवन और उसके स्वास्थ्य तथा कार्य-क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। विभिन्न परीक्षणों से यह ज्ञात हुआ है कि सामान्यत: शान्त कमरे में 50 डेसीबेल ध्वनि होती है। 100 डेसीबेल ध्वनि असुविधापूर्ण और 120 डेसीबेल से ऊपर कष्टदायक होती है। ध्वनि-प्रदूषण के फलस्वरूप श्रवण-शक्ति का ह्रास होता है, नींद में बाधा उत्पन्न होती है, नाड़ी सम्बन्धी रोग उत्पन्न होते हैं, मानव की कार्यक्षमता घटती है, जीव-जन्तुओं के हृदय, मस्तिष्क और यकृत को हानि पहुँचती है। ध्वनि-प्रदूषण से रक्त चाप भी बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त अत्यधिक शोर से व्यक्ति के स्वभाव तथा व्यवहार पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

ध्वनि-प्रदूषण को रोकने के उपाय
कोई जाग्रत समाज ही ध्वनि-प्रदूषण को रोक सकता है। इसके हेतु औद्योगिक प्रतिष्ठानों को आबादी से दूर रखा जाना चाहिए और औद्योगिक शोर को कम करने का प्रयास किया जाना चाहिए। मशीनों का सही रख-रखाव किया जाना चाहिए और अत्यधिक ध्वनि करने वाले कल-कारखानों में कार्य करने वाले श्रमिकों को कर्णबन्धनों को लगाना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। लाउडस्पीकरों और ध्वनि विस्तारक बाजों का वाल्यूम कम रखा जाना चाहिए। मोटर, ट्रक, वाहनों में उच्च ध्वनि करने वाले हॉर्न नहीं लगाये जाने चाहिए। विमानों को उतारने और चढ़ाने में कम-से-कम शोर उत्पन्न किया जाना चाहिए और जेट विमानों के निर्गम पाइप ऊपर आकाश की ओर मोड़े जाने चाहिए।

प्रश्न 7
मृदा-प्रदूषण का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
अर्थ: मृदा अथवा मिट्टी में तरह-तरह के लवण, खनिज तत्त्व, कार्बनिक पदार्थ, गैसें और जल निश्चित मात्रा और अनुपात में होते हैं। यदि उनकी मात्रा और अनुपात में परिवर्तन हो जाता है तो उसे मृदा-प्रदूषण कहा जाता है।

मृदा-प्रदूषण के स्रोत
वायु तथा जल के प्रदूषण से मृदा-प्रदूषण होना नितान्त स्वाभाविक है। जब प्रदूषित जल भूमि पर फैलता है तथा प्रदूषित वायु का प्रवाह होता है तो मृदा-प्रदूषण स्वतः ही हो जाता है। इसके अतिरिक्त भी विभिन्न कारणों से मृदा-प्रदूषण में वृद्धि हो रही है। जनसंख्या वृद्धि के फलस्वरूप खाद्य पदार्थों की माँग प्रतिदिन बढ़ती जा रही है और भूमि की उर्वरता को बढ़ाने के लिए मिट्टी में विभिन्न प्रकार के उर्वरक डाले जाते हैं। अनवरत रासायनिक खादों का प्रयोग मृदा-प्रदूषण की समस्या उत्पन्न कर देता है। इसी तरह फसलों को कीड़ों और र्जीवाणुओं आदि से बचाने के लिए डी०डी०टी०, गैमेक्सीन, एल्ड्रीन और कुछ अन्य कीटनाशकों का अत्यधिक छिड़काव मृदा-प्रदूषण उत्पन्न करता है। कल-कारखानों से निकले हुए विभिन्न प्रकार के रासायनिक तत्त्व भी मृदा-प्रदूषण करते हैं। साथ ही भूमि क्षरण भी मृदा प्रदूषण उत्पन्न करता है।

मृदा-प्रदूषण को जनजीवन पर प्रभाव
मृदा-प्रदूषण का जनजीवन पर अत्यधिक व्यापक प्रभाव पड़ता है। कीटनाशक और कवकनाशक विषैली दवाओं के छिड़काव से शनैः-शनैः भूमि की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है और कुछ समय बाद फसलों की वृद्धि रुक जाती है। मानव-मल का खुले भू-भाग पर निष्कासन और निक्षेपण होने से पर्यावरण दूषित हो जाता है। भूमि पर कूड़ा-करकट, सड़ी-गली वस्तुओं और मरे जानवर फेंक देने से मिट्टी दूषित हो जाती है और परिणामस्वरूप अनेक बीमारियाँ फैल जाती हैं। भू-क्षरण भी भू-प्रदूषण की स्थिति उत्पन्न करता है। भू-क्षरण के कारण मिट्टी की उपजाऊ परत जल और हवा आदि के द्वारा बह जाती है और बंजर भूमि शेष रह जाती है। फलस्वरूप खाद्यान्नों का उत्पादन कम होने लगता है।

मृदा-प्रदूषण को रोकने के उपाय
मृदा-प्रदूषण को रोकने के लिए फसलों पर छिड़काव करने वाली कीटनाशक दवाओं को सीमित प्रयोग करना चाहिए। रासायनिक खादों का प्रयोग सीमित मात्रा में ही किया जाना चाहिए। औद्योगिक कचरे और कूड़ा-करकट को आबादी से दूर ले जाकर जमीन के अन्दर । दबा देना चाहिए। कृषि फार्मों में चक्रानुसार विभिन्न फसलों की खेती की जानी चाहिए। भू-क्षरण और मृदा-अपरदन को रोकने के समुचित उपाय किए जाने चाहिए। भू-स्खलन से होने वाले मृदा-क्षरण को कम किया जाना चाहिए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
‘पर्यावरण के अर्थ को स्पष्ट कीजिए। [2011]
या
पर्यावरण का व्युत्पत्ति अर्थ क्या है?
उत्तर
‘पर्यावरण की अवधारणा को स्पष्ट करने से पूर्व पर्यावरण’ के शाब्दिक अर्थ को स्पष्ट करना आवश्यक है। ‘पर्यावरण’ के व्युत्पत्ति अर्थ को स्पष्ट करते हुए हम कह सकते हैं कि ‘पर्यावरण शब्द दो शब्दों अर्थात ‘परि’ और ‘आवरण’ के संयोग या मेल से बना है। ‘परि’ का अर्थ है चारों ओर तथा आवरण का अर्थ है—‘घेरा’। इस प्रकार पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ हुआ चारों ओर का घेरा। इस प्रकार व्यक्ति के सन्दर्भ में कहा जा सकता है कि व्यक्ति के चारों ओर जो प्राकृतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक शक्तियाँ और परिस्थितियाँ विद्यमान हैं, उनके प्रभावी रूप को ही पर्यावरण कहा जाता है।

प्रश्न 2
पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
प्रकृति-प्रदत्त पर्यावरण में जब किन्हीं तत्त्वों का अनुपात इस रूप में बदलने लगता है। जिसका जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका होती है, तब कहा जाता है कि पर्यावरण-प्रदूषण हो रहा है। पर्यावरण के भिन्न-भिन्न भाग या पक्ष हैं। इस स्थिति में पर्यावरण के विभिन्न पक्षों के अनुसार ही पर्यावरण प्रदूषण के विभिन्न पक्ष निर्धारित किये गये हैं। इस प्रकार पर्यावरण प्रदूषण के मुख्य प्रकार हैं-

  1. वायु-प्रदूषण
  2. जल-प्रदूषण
  3. मृदा-प्रदूषण तथा
  4. ध्वनि-प्रदूषण।

प्रश्न 3
पर्यावरण-प्रदूषण को रोकने में ओजोन परत की भूमिका बताइए। [2008, 15]
उत्तर
हमारे वायुमण्डल में ओजोन की परत एक छतरी के रूप में विद्यमान है तथा हमारे वायुमण्डल के लिए एक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करती है। यह ओजोन परत सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी पर सीधे आने से रोकती है। इसके साथ-ही-साथ ओजोन गैस अपनी विशिष्ट प्रकृति के कारण हमारे पर्यावरण के विभिन्न प्रदूषकों को नष्ट करने का कार्य भी करती है। अनेक घातक एवं हानिकारक जीवाणुओजोन के प्रभाव से नष्ट होते रहते हैं। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि पर्यावरण-प्रदूषण को रोकने में ओजोन परत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। **

प्रश्न 4
पर्यावरण-प्रदूषण का जन-स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
पर्यावरण-प्रदूषण का सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव जन-स्वास्थ्य पर पड़ता है। पर्यावरण के भिन्न-भिन्न पक्षों में होने वाले प्रदूषण से भिन्न-भिन्न प्रकार के रोग बढ़ते हैं। हम जानते हैं कि वायु प्रदूषण के परिणामस्वरूप श्वसन तन्त्र से सम्बन्धित रोग अधिक प्रबल होते हैं। जल-प्रदूषण के परिणामस्वरूप पाचन-तन्त्र से सम्बन्धित रोग अधिक फैलते हैं। ध्वनि प्रदूषण भी तन्त्रिका-तन्त्र, हृदय एवं रक्तचाप सम्बन्धी विकारों को जन्म देता है। पर्यावरण-प्रदूषण को व्यक्ति के स्वभाव एवं व्यवहार पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यही नहीं निरन्तर प्रदूषित पर्यावरण में रहने से व्यक्ति की औसत आयु घटती है तथा स्वास्थ्य का सामान्य स्तर भी निम्न ही रहता है।

प्रश्न 5
व्यक्ति की कार्यक्षमता पर पर्यावरण-प्रदूषण का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
पर्यावरण-प्रदूषण का व्यक्ति की कार्यक्षमता पर अनिवार्य रूप से प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। हम जानते हैं कि पर्यावरण-प्रदूषण के परिणामस्वरूप जन-स्वास्थ्य का स्तर निम्न होती है। निम्न स्वास्थ्य स्तर वाला व्यक्ति ने तो अपने कार्य को ही कुशलतापूर्वक कर सकता है और न ही उसकी उत्पादन-क्षमता ही सामान्य रह पाती है। ये दोनों ही स्थितियाँ व्यक्ति एवं समाज के लिए हानिकारक सिद्ध होती हैं। वास्तव में प्रदूषित वातावरण में भले ही व्यक्ति अस्वस्थ न भी हो, तो भी उसकी चुस्ती एवं स्फूर्ति तो घट ही जाती है। यही कारक व्यक्ति की कार्यक्षमता को घटाने के लिए पर्याप्त सिद्ध होता है।

प्रश्न 6
आर्थिक जीवन पर पर्यावरण-प्रदूषण का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
व्यक्ति, समाज तथा राष्ट्र की आर्थिक स्थिति पर पर्यावरण-प्रदूषण का उल्लेखनीय प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वास्तव में यदि व्यक्ति का सामान्य स्वास्थ्य का स्तर निम्न हो तथा उसकी कार्यक्षमता भी कम हो तो वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समुचित धन कदापि अर्जित नहीं कर सकता। पर्यावरण प्रदूषण के कारण व्यक्ति अथवा उसके परिवार के सदस्य रोग ग्रस्त हो जाते हैं। इस स्थिति में रोग के उपचार के लिए भी पर्याप्त धन खर्च करना पड़ जाता है। इससे व्यक्ति एवं परिवार का आर्थिक बजट बिगड़ जाता है तथा व्यक्ति एवं परिवार की आर्थिक स्थिति निम्न हो जाती है।

प्रश्न 7
जल प्रदूषण के किन्हीं दो कारकों की व्याख्या कीजिए। [2016]
उत्तर
जल प्रदूषण के दो कारक निम्नलिखित हैं
1. घरों से बहकर निकलने वाला फिनायल, साबुन, सर्फ एवं शैम्पू आदि से युक्त गन्दा पानी तथा शौचालय का दूषित मल नालियों में प्रवाहित होता हुआ नदियों व झीलों के जल में मिलकर उसे दूषित कर देता है।
2. नदियों व झीलों के जल में पशुओं को नहलाना, मनुष्यों द्वारा स्नान करना व साबुन से गन्दे वस्त्र धोने से भी जल प्रदूषित होता है।

निश्चित उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1
‘पर्यावरण की एक स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर
“पर्यावरण वह सब कुछ है जो किसी जीव अथवा वस्तु को चारों ओर से घेरे होता है और उसे प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।”
-जिसबर्ट

प्रश्न 2
पर्यावरण-प्रदूषण का अर्थ एक वाक्य में लिखिए।
उत्तर
पर्यावरण में किसी भी प्रकार की हानिकारक अशुद्धियों का समावेश होना ही पर्यावरण-प्रदूषण कहलाता है।

प्रश्न 3
पर्यावरण-प्रदूषण के चार मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर

  1. औद्योगीकरण
  2. नगरीकरण
  3. ईंधन से चलने वाले वाहन तथा
  4. वृक्षों की अन्धाधुन्ध कटाई।

प्रश्न 4
पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य रूपों या प्रकारों का उल्लेख कीजिए- [2014]
उत्तर
पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य रूप या प्रकार हैं-

  1. वायु-प्रदूषण
  2. जल-प्रदूषण
  3. मृदा-प्रदूषण तथा
  4. ध्वनि-प्रदूषण।

प्रश्न 5
साँस की तकलीफ किस प्रकार के प्रदूषण से होती है? [2012, 16]
उत्तर
साँस की तकलीफ मुख्य रूप से वायु-प्रदूषण के कारण होती है।

प्रश्न 6
कारखानों की चिमनियों से धुआँ उगलने पर किस प्रकार का प्रदूषण होता है?
उत्तर
कारखानों की चिमनियों से धुआँ उगलने पर होने वाला प्रदूषण है- वायु-प्रदूषण।

प्रश्न 7
प्रदूषण की समस्या किस शिक्षा के माध्यम से दूर की जा सकती है ? [2014]
उत्तर
प्रदूषण की समस्या पर्यावरण शिक्षा के माध्यम से दूर की जा सकती है।

प्रश्न 8
आधुनिक वैज्ञानिक युग में विश्व की सबसे गम्भीर समस्या क्या है ? [2011]
उत्तर
आधुनिक वैज्ञानिक युग में विश्व की सबसे गम्भीर समस्या है पर्यावरण प्रदूषण की समस्या।

प्रश्न 9
ध्वनि मापन की इकाई क्या है ?
उत्तर
डेसिबल (db)।

प्रश्न 10
पर्यावरण के किस रूप का निर्माण मनुष्य ने नहीं किया ?
उत्तर
प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण का निर्माण मनुष्य ने नहीं किया है।

प्रश्न 11
क्या वर्तमान औद्योगिक प्रगति के युग में पर्यावरण प्रदूषण को पूर्ण रूप से समाप्त करना सम्भव है?
उत्तर
वर्तमान औद्योगिक प्रगति के युग में पर्यावरण-प्रदूषण को केवल नियन्त्रित किया जा सकता है, पूर्ण रूप से समाप्त नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 12
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य-

  1. मनुष्य का अपने पर्यावरण से घनिष्ठ सम्बन्ध है।
  2. व्यक्ति के सामान्य जीवन पर पर्यावरण का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
  3. ईंधन से चलने वाले वाहन वायु प्रदूषण में वृद्धि करते हैं।
  4. ध्वनि-प्रदूषण से आशय है पर्यावरण में ध्वनि या शोर का बढ़ जाना।

उत्तर

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए-

प्रश्न 1
पर्यावरण का जनजीवन से सम्बन्ध है [2016]
(क) औपचारिक
(ख) घनिष्ठ
(ग) अनावश्यक
(घ) कोई सम्बन्ध नहीं
उत्तर
(ख) घनिष्ठ

प्रश्न 2
विश्व पर्यावरण दिवस कब मनाया जाता है? [2012]
(क) 26 जनवरी को
(ख) 5 जून को
(ग) 4 जुलाई को
(घ) 11 जुलाई को
उत्तर
(ख) 5 जून को

प्रश्न 3
वर्तमान औद्योगिक एवं नगरीय क्षेत्रों की मुख्य समस्या है या आधुनिक वैज्ञानिक युग में विश्व की गम्भीर समस्या है [2008]
(क) निर्धनता की समस्या
(ख) बेरोजगारी की समस्या
(ग) भिक्षावृत्ति की समस्या
(घ) पर्यावरण प्रदूषण की समस्या
उत्तर
(घ) पर्यावरण प्रदूषण की समस्या

प्रश्न 4
पर्यावरण-प्रदूषण की दर में होने वाली वृद्धि के लिए जिम्मेदार है
(क) फैशन की होड़
(ख) औद्योगीकरण
(ग) संस्कृतिकरण
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ख) औद्योगीकरण

प्रश्न 5
पर्यावरण-प्रदूषण का प्रभाव पड़ता है
(क) जन-स्वास्थ्य पर।
(ख) व्यक्तिगत कार्यक्षमता पर
(ग) आर्थिक जीवन पर
(घ) इन सभी पर
उत्तर
(घ) इन सभी पर

प्रश्न 6
प्रदूषण की समस्या का मुकाबला करने के लिए जो सर्वाधिक उपयोगी सिद्ध हो सकती है, वह है [2007, 11]
या
प्रदूषण की समस्या दूर करने के लिए सबसे उपयोगी है। [2016]
(क) सामान्य शिक्षा
(ख) पर्यावरण-शिक्षा
(ग) तकनीकी शिक्षा.
(घ) स्वास्थ्य शिक्षा
उत्तर
(ख) पर्यावरण-शिक्षा

प्रश्न 7
हमारे देश में पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम कब पारित किया गया?
(क) 1966 में
(ख) 1976 में
(ग) 1986 में
(घ) 1996 में
उत्तर
(ग) 1986 में

प्रश्न 8
भारत में पर्यावरण विभाग की स्थापना कब की गई? [2008]
(क) 1 नवम्बर, 1980
(ख) 1 नवम्बर, 1880
(ग) 1 नवम्बर, 1990
(घ) 1 नवम्बर, 1986
उतर
(घ) 1 नवम्बर, 1986

प्रश्न 9
विश्व वन्य जीव कोष की स्थापना हुई [2009]
(क) 1962 ई० में
(ख) 1965 ई० में
(ग) 1972 ई० में
(घ) 1975 ई० में
उत्तर
(क) 1962 ई० में

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 13
Chapter Name Problem of Expansion of Education
(शिक्षा के प्रसार की समस्या)
Number of Questions Solved 24
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UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 13 Problem of Expansion of Education (शिक्षा के प्रसार की समस्या)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
शिक्षा के प्रसार के एक महत्त्वपूर्ण उपाय के रूप में दूरगामी शिक्षा का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए। साथ ही दूरगामी शिक्षा-व्यवस्था के उद्देश्य व विशेषताओं का भी वर्णन कीजिए।
उत्तर :
दूरगामी शिक्षा-शिक्षा के प्रसार का एक उपाय
यह सत्य है कि गत कुछ दशाब्दियों से हमारे देश में शिक्षा के प्रसार की दर सराहनीय रही है, परन्तु आज भी देश की जनसंख्या का एक बड़ा भाग विभिन्न कारणों से शिक्षा प्राप्त करने से वंचित ही है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए शिक्षा के प्रसार के लिए विभिन्न प्रयास किये जा रहे हैं। इन प्रयासों में ही एक प्रभावकारी प्रयास है-दूरगामी शिक्षा (Distance Education) की व्यवस्था। दूरगामी शिक्षा के अर्थ, उद्देश्य तथा महत्त्व आदि का सामान्य परिचय निम्नलिखित है।

दूरगामी शिक्षा का अर्थ
सामान्य शिक्षाप्रत्यक्ष-शिक्षा होती है, जिसके अन्तर्गत शिक्षक तथा शिक्षार्थी आमने-सामने बैठकर शिक्षा की प्रक्रिया को सम्पन्न करते हैं। दूरगामी शिक्षा आमने-सामने की प्रत्यक्ष शिक्षा नहीं है। दूरगामी शिक्षा वह शिक्षा है जिसके अन्तर्गत देश के किसी भी भाग में रहने वाले और किसी भी प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने के इच्छुक शिक्षार्थियों को शिक्षा ग्रहण करने का उपयुक्त अवसर प्राप्त हो जाती है। इस शिक्षा-प्रक्रिया के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के सम्प्रेषण-साधनों का अधिक-से-अधिक प्रयोग किया जाता है तथा खुले अधिगम की परिस्थितियों के सृजन को प्राथमिकता दी जाती है।

दूरगामी शिक्षा के अर्थ एवं प्रक्रिया को प्रो० होमबर्ग ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “दूरगामी शिक्षा की प्रक्रिया में छात्रों की शिक्षण संस्थानों में जाकर शिक्षकों के सामने कक्ष में बैठकर व्याख्यान सुनने की आवश्यकता नहीं है और न ही शिक्षण संगठनों की शिक्षा-व्यवस्था के समान नियमित रूप से सम्मिलित होना पड़ता है अपितु दूरगामी शिक्षा में खुले अधिगम को सम्प्रेषण माध्यमों अथवा शिक्षा तकनीकी द्वारा सम्पादित किया जाता है।” शिक्षक का व्याख्यान छात्रों के घरों तक सम्प्रेषण माध्यमों द्वारा पहुँचाया जाता है।

दूरदर्शन की सहायता से शिक्षक ही छात्रों के पास पहुँचकर शिक्षण-प्रदान करता है। इसके अन्तर्गत शिक्षक-शिक्षार्थी के अन्त:क्रिया एकपक्षीय ही होती है। दूरगामी शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य खुले अधिगम के लिए परिस्थिति उत्पन्न करना है। इस कथन द्वारा स्पष्ट है कि दूरगामी शिक्षा-व्यवस्था, शिक्षा ग्रहण करने की एक सुविधाजनक व्यवस्था है तथा निश्चित रूप से शिक्षा के प्रसार में सहायक है। हमारे देश में शिक्षा के प्रसार की आवश्यकता को ध्यान में रखकर तथा दूरगामी शिक्षा-व्यवस्था को सफल बनाने के लिए सन् 1979 ई० में राष्ट्रीय ओपन स्कूल की स्थापना की गई थी। इससे शिक्षा के प्रसार में उल्लेखनीय योगदान प्राप्त हुआ है।

दूरगामी शिक्षा-व्यवस्था के उद्देश्य
विश्व के प्रायः सभी देशों में दूरगामी शिक्षा-व्यवस्था को लागू किया जा रहा है। दूरगामी शिक्षा-व्यवस्था को लागू करने के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं

  1. दूरगामी शिक्षा-व्यवस्था का एक प्रमुख उद्देश्य समाज के उन व्यक्तियों को शिक्षा ग्रहण करने के अवसर सुलभ करना है जो किन्हीं कारणों से पहले उपयुक्त शिक्षा प्राप्त न कर पाये हों।
  2. उच्च शिक्षा प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्तियों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अवसर उपलब्ध कराना।
  3. किसी भी व्यवसाय में संलग्न व्यक्तियों को उनकी रुचि तथा आवश्यकता के अनुसार शिक्षा अर्जित करने का अवसर उपलब्ध कराना।
  4. सीखने तथा ज्ञान प्राप्ति के इच्छुक व्यक्तियों के ज्ञान में अधिक – से – अधिक विस्तार करना।
  5. किसी भी शिक्षार्थी को उसकी रुचि के अनुरूप नूतन ज्ञान उपलब्ध कराना।
  6. समाज के पिछड़े वर्ग के व्यक्तियों को समाज का उपयोगी एवं योग्य नागरिक बनने में सहायता प्रदान करना।
  7. दूरगामी शिक्षा-व्यवस्था का एक अन्य उद्देश्य शिक्षा प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्तियों को उन भाषाओं और विषयों में दक्षता प्राप्त करने का अवसर प्रदान करना है, जिनमें नियमित संस्थागत शिक्षा के अन्तर्गत उत्पन्न होने वाली समस्याओं के कारण दक्षता प्राप्त करने का अवसर प्राप्त न हो सकता हो।

दूरगामी शिक्षा की विशेषताएँ
दूरगामी शिक्षा – व्यवस्था के अर्थ एवं उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए इस शिक्षा-व्यवस्था की निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख किया जा सकता है

  1. दूरगामी शिक्षा-व्यवस्था को व्यावहारिक रूप में लागू करने में दूरदर्शन, आकाशवाणी तथा अन्य जन-संचार माध्यमों को इस्तेमाल करने पर विशेष बल दिया जाता है।
  2. इस शिक्षा-व्यवस्था के अन्तर्गत सम्प्रेषण के माध्यमों तथा अधिगम की प्रक्रिया में आपसी समन्वय स्थापित करके विभिन्न शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति की जाती है।
  3. इस शिक्षा-व्यवस्था के माध्यम से वांछित अधिगम स्वरूपों के लिए विभिन्न प्रकार की परिस्थितियाँ उत्पन्न की जाती हैं।
  4. इस शिक्षा-व्यवस्था में शैक्षिक नियोजन, मूल्यांकन तथा अधिगम सम्बन्धी परिस्थितियों की व्यवस्था प्रणाली उपागम के आधार पर की जाती है।
  5. इस शैक्षिक व्यवस्था के अन्तर्गत कुछ निर्धारित बहुमाध्यमों की सहायता से शिक्षक ही शिक्षार्थियों से सम्पर्क स्थापित करता है।
  6. इस शैक्षिक व्यवस्था के अन्र्तगत खुले अधिगम की परिस्थितियाँ विकसित की जाती हैं तथा शिक्षार्थियों को स्वतन्त्रतापूर्वक अध्ययन की सुविधा उपलब्ध करायी जाती है।
  7. इस शैक्षिक व्यवस्था के माध्यम से शिक्षक की भूमिका को अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास किया जाता है।
  8. दूरगामी शिक्षा व्यवस्था के अन्तर्गत खुले विद्यालय, खुले विश्वविद्यालय तथा पत्राचार प्रणाली आदि को अपनाया जाता है तथा उन्हें अधिक उपयोगी बनाया जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1
दूरगामी शिक्षा के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
विभिन्न दृष्टिकोणों से दूरगामी शिक्षा को आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता है। दूरगामी शिक्षा निम्नलिखित रूप से महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।

  1. दूरगामी शिक्षा की समुचित व्यवस्था देश में शिक्षा के अधिक-से-अधिक प्रसार में सहायक सिद्ध हो रही है।
  2. शिक्षा के क्षेत्र में नवीन प्रवर्तनों को प्रयुक्त करने में भी दूरगामी शिक्षा सहायक सिद्ध होती है।
  3. देश की जनसंख्या की वृद्धि तथा शिक्षा के प्रति बढ़ते रुझान के परिणामस्वरूप देश में विद्यमान औपचारिक शिक्षण संस्थाओं ( विद्यालय तथा कॉलेज आदि ) के प्रवेश के इच्छुक छात्रों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में छात्रों के प्रवेश की गम्भीर समस्या का सामना करना पड़ रहा है। इस समस्या का मुकाबला करने में भी दूरगामी शिक्षा से विश्लेष सहायता प्राप्त हो रही है।
  4. छात्रों में विद्यमान वैयक्तिक भिन्नता से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान में भी दूरगामी शिक्षा से विशेष सहायता मिलती है।
  5. दूरगामी शिक्षा का एक मुख्य महत्त्व एवं लाभ उन व्यक्तियों के लिए है जो किसी निजी कार्य या व्यवसाय में संलग्न हैं। दूरगामी शिक्षा की सुविधा उपलब्ध होने पर ऐसे व्यक्ति भी अपनी इच्छानुसार शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। इस व्यवस्था से शिक्षा के प्रसार में भी वृद्धि होती है।
  6. दूरगामी शिक्षा-व्यवस्था उने व्यक्तियों के लिए भी लाभदायक तथा महत्त्वपूर्ण है जो अपनी शैक्षिक योग्यता को बढ़ाने के इच्छुक होते हैं।
  7. दूरगामी शिक्षा-व्यवस्था के माध्यम से शिक्षा ग्रहण करना विशेष रूप से सरल तथा सुविधाजनक है क्योंकि इस व्यवस्था के अन्तर्गत शिक्षार्थी को उसके अपने स्थान पर ही शिक्षा प्राप्त करने के अवसर उपलब्ध होते हैं। शिक्षार्थी को आने-जाने तथा यातायात की असुविधाओं का सामना नहीं करना पड़ता।
  8. दूरगामी शिक्षा की सुचारु व्यवस्था से लोगों में विभिन्न प्रकार की व्यावसायिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक योग्यताओं, क्षमताओं तथा गुणों के विकास में विशेष सहायता प्राप्त होती है।
  9. दूरगामी शिक्षा की व्यवस्था सुलभ हो जाने से समाज के अनेक व्यक्तियों को आत्म-विकास के अवसर उपलब्ध हुए हैं।
  10. दूरगामी शिक्षा का एक उल्लेखनीय महत्त्व एवं लाभ यह है कि इस व्यवस्था ने शिक्षा के जनतन्त्रीकरण में विशेष योगदान दिया है अर्थात् इस शिक्षा ने सभी को शिक्षा प्राप्त करने के समान अवसर उपलब्ध कराने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

प्रश्न 2
शिक्षा के प्रसार के लिए राज्य द्वारा क्या-क्या प्रयास किये जा रहे हैं?
उत्तर :
देश की बहुपक्षीय प्रगति के लिए शिक्षा का अधिक-से-अधिक प्रसार होना अति आवश्यक है। इस तथ्य को ध्यान में रख़ते हुए राज्य द्वारा अनेक प्रयास किये जा रहे हैं। सर्वप्रथम हम कह सकते हैं। कि राज्य द्वारा शिक्षा के महत्त्व एवं आवश्यकता से सम्बन्धित व्यापक प्रचार किया जा रहा है। जन-संचार के सभी माध्यमों द्वारा साक्षरता एवं शिक्षा के महत्त्व का व्यापक प्रचार किया जा रहा है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अलग से ‘राष्ट्रीय साक्षरता मिशन’ की स्थापना की गयी है। शिक्षा के व्यापक प्रसार के लिए भारतीय संविधान में 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए नि:शुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान किया गया।

शिक्षा के प्रसार के लिए राज्य द्वारा ग्रामीण एवं दूर-दराज के क्षेत्रों में शिक्षण-संस्थाएँ स्थापित की जा रही हैं। शिक्षा के प्रति बच्चों को आकृष्ट करने के लिए उन्हें विभिन्न प्रकार के प्रलोभन एवं सुविधाएँ भी प्रदान की जा रही हैं; जैसे कि दिन का भोजन देना, मुफ्त पुस्तकें एवं वर्दी देना तथा विभिन्न छात्रवृत्तियाँ प्रदान करना। राज्य द्वारा अनुसूचित एवं पिछ्ड़ी जातियों के बालक-बालिकाओं को शिक्षित करने के लिए अतिरिक्त प्रयास किये जा रहे हैं। तकनीकी शिक्षा के प्रसार के क्षेत्र में भी राज्य द्वारा अनेक प्रयास किये जा रहे हैं। समय – समय पर राज्य सरकारों एवं केन्द्र सरकार द्वारा शिक्षा के प्रसार के लिए व्यापक अभियान चलाये जा रहे है; जैसे कि ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड तथा ‘चलो स्कूल चलें’ आदि।

प्रश्न 3
शैक्षिक स्तर के उन्नयन व सुधार के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए? [2007, 08, 10, 11]
उत्तर :
शैक्षिक स्तर के उन्नयन व सुधार के उपाय
भारत में शिक्षा के स्तर; विशेष रूप से प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाने व उसमें सुधार लाने के लिए अग्रलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं

  1. पूर्व-प्राथमिक व प्राथमिक कक्षाओं से ही शिक्षा के स्तर में सुधार के प्रयत्न किए जाएँ। अगर इस स्तर पर शिक्षार्थी अनुशासित हो जाए और शिक्षा के महत्व को समझ ले तो अगले स्तरों पर शिक्षा का स्तर अपने आप ही अच्छा हो जाएगा।
  2. शिक्षा की दिशा एवं व्यवस्था पहले से ही निश्चित की जाए।
  3. पाठ्यक्रम सुसंगठित एवं छात्र/छात्राओं के लिए उपयोगी हो।
  4. विद्यालयों में छात्रों की बढ़ती हुई संख्या पर नियन्त्रण रखा जाए तथा आवश्यकतानुसार नए विद्यालय खोले जाएँ।
  5. अध्यापकों को उचित वेतन तथा सुविधाएँ प्रदान की जाएँ। उनकी सभी उचित माँगों पर सहानुभूति से विचार किया जाना चाहिए।
  6. परीक्षा या मूल्यांकन प्रणाली में सुधार हो। प्रश्न-पत्रों में वस्तुनिष्ठ ढंग के प्रश्न सम्मिलित किए जाएँ, विद्यालय में ही परीक्षा ली जाए तथा शिक्षार्थियों के सामूहिक अभिलेख रखे जाएँ।
  7. पर्याप्त संख्या में निर्देशन एवं परामर्श केन्द्र खोले जाएँ, जहाँ छात्रों की योग्यता एवं अभिरुचि की जाँच हो और तदनुकूल उन्हें शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था की जाए।
  8. समाज के लोगों तथा छात्रों की धारणा शिक्षा के प्रति अच्छी हो।
  9. राज्य एवं समाज के द्वारा शिक्षा के अच्छे अवसर प्रदान किए जाएँ।
  10. समय-समय पर गोष्ठियों, सेमिनार आदि का आयोजन किया जाए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1
शिक्षा के प्रसार से क्या आशय है?
उत्तर :
शिक्षा के प्रसार से आशय है :
देश के नागरिकों को शिक्षित होना। विकासशील देशों में शिक्षा के प्रसार की प्रक्रिया चल रही है, कहीं तेज तथा कहीं धीमी। केवल साक्षरता ही शिक्षा के प्रसार का मानदण्ड नहीं है। इससे भिन्न यदि हम कहें कि स्नातक स्तर की शिक्षा या इससे भी उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति को ही शिक्षित व्यक्ति माना जाये तो यह भी उचित नहीं है। वास्तव में शिक्षित होने का मानदण्ड सापेक्ष है।

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि जो व्यक्ति अपनी दैनिक जीवन की सामान्य गतिविधियों, व्यावसायिक अपेक्षाओं तथा सम्बन्धित कार्यों को करने की समुचित योग्यता प्राप्त कर लेता है, उसे शिक्षित माना जा सकता है। निःसन्देह शिक्षित होने के लिए साक्षरता एक अनिवार्य शर्त है। हमारे देश में शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करना अभी शेष है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि शिक्षा के प्रसार की प्रक्रिया चल रही है तथा इसकी दर भी पूर्ण रूप से सन्तोषजनक नहीं है। शिक्षा के प्रसार की गति एवं दर में वृद्धि करना आवश्यक है।

प्रश्न 2
शिक्षा में अपव्यय से क्या आशय है?
उत्तर :
शिक्षा में अपव्यय शिक्षा में अपव्यय की समस्या को अर्थ यह है कि किसी भी स्तर की शिक्षा को पूर्ण करने से पूर्व ही उसे छोड़ देना। उदाहरण के लिए, प्राथमिक शिक्षा की निर्धारित अवधि 4-5 वर्ष होती है। यदि ऐसे में कोई छात्र कक्षा 2 तक ही शिक्षा ग्रहण करने पर विद्यालय छोड़ दे तो इसे शिक्षा में अपव्यय ही कहा जाएगा। इसी प्रकार स्नातक स्तर की शिक्षा के लिए, तीन वर्ष की अवधि निर्धारित है। यदि कोई छात्र/छात्रा केवल एक या दो वर्ष की शिक्षा ग्रहण करने के बाद कॉलेज को छोड़ दे तो यह भी शिक्षा में अपव्यय ही है।

अपव्यय का तात्पर्य उन छात्रों पर व्यय किए हुए समय, धन एवं शक्ति से है जो किसी स्तर की शिक्षा पूर्ण किए बगैर अपना अध्ययन समाप्त कर देते हैं। शिक्षा में अपव्यय की प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप शिक्षा के प्रसार की प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। हमारे देश में शिक्षा के प्रायः सभी स्तरों पर अपव्यय की समस्या देखी जा सकती है। विभिन्न कारणों से अधूरी शिक्षा छोड़ देने की प्रवृत्ति लड़कों की तुलना में लड़कियों में अधिक पायी जाती है। यह प्रवृत्ति नगरीय क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक पायी जाती है।

प्रश्न 3
शिक्षा के अवरोधन के कारण बताइए।
उत्तर :
शिक्षा के अवरोधन के कारण निम्नलिखित हैं

  1. दोषपूर्ण शिक्षण विधि एवं परीक्षा प्रणाली का होना।
  2. विद्यालयों में छात्रों का नियमित उपस्थित न होना।
  3. कक्षा में संख्या से अधिक छात्रों का होना।
  4. रुचि के अनुरूप विषयों का न होना।
  5. अनुपयुक्त पाठ्यक्रम होना।
  6. विद्यालयी व्यवस्था का ठीक न होना।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1
हमारे देश में शिक्षा के प्रसार की दर किस काल में सर्वाधिक हुई है?
उत्तर :
हमारे देश में स्वतन्त्रता-प्राप्ति के उपरान्त के काल में शिक्षा के प्रसार की दर सर्वाधिक हुई

प्रश्न 2
वर्तमान भारत में शिक्षा-प्रसार का स्वरूप गुणात्मक/परिमाणात्मक है। [2015]
उत्तर :
वर्तमान भारत में शिक्षा-प्रसार का स्वरूप परिमाणात्मक है।

प्रश्न 3
शिक्षा के असन्तोषजनक प्रसार के लिए जिम्मेदार दो मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
शिक्षा के असन्तोषजनक प्रसार के लिए दो मुख्य कारण जिम्मेदार हैं

  1. शिक्षा में अपव्यय तथा
  2. शिक्षा में अवरोधन।

प्रश्न 4
शिक्षा में अपव्यय से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
शिक्षा में अपव्यय का तात्पर्य उन छात्रों पर व्यय किए हुए समय, धन एवं शक्ति से है जो किसी स्तर की शिक्षा पूर्ण किये बिना अपना अध्ययन समाप्त कर देते हैं?

प्रश्न 5
शिक्षा में अवरोधन से क्या आशय है?
उत्तर :
शिक्षा में अवरोधन का अर्थ है-छात्र को शिक्षा के क्षेत्र में नियमित रूप से प्रगति न करना अर्थात् निर्धारित अवधि में किसी कक्षा में परीक्षा पास करके अगली कक्षा में न पहुँच पाना।

प्रश्न 6
प्राथमिक शिक्षा के प्रसार में प्रमुख बाधा दोषपूर्ण शिक्षा प्रशासन/धन की प्रचुरता है। [2015]
उत्तर :
प्राथमिक शिक्षा के प्रसार में प्रमुख बाधा दोषपूर्ण शिक्षा-प्रशासन है।

प्रश्न 7
राष्ट्रीय ओपन स्कूल की स्थापना कब की गयी थी? [2009]
उत्तर :
राष्ट्रीय ओपन स्कूल की स्थापना सन् 1979 में की गयी थी।

प्रश्न 8
‘दूरगामी शिक्षा से क्या आशय है?
उत्तर :
दूरगामी शिक्षा वह शिक्षा है जिसके अन्तर्गत देश के किसी भी भाग में रहने वाले और किसी भी प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने के इच्छुक शिक्षार्थियों को शिक्षा ग्रहण करने का उपयुक्त अवसर प्राप्त हो जाता है।

प्रश्न 9
शिक्षा के महत्त्व के व्यापक प्रचार के लिए सरकार द्वारा किये गये एक प्रयास का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
राष्ट्रीय साक्षरता मिशन’ की स्थापना।

प्रश्न 10
राष्ट्रीय शिक्षा दिवस कब मनाया जाता है? [2015, 16]
उत्तर :
भारत में राष्ट्रीय शिक्षा दिवस 11 नवम्बर को मनाया जाता है।

प्रश्न 11
राष्ट्रीय साक्षरता मिशन किस आयु-वर्ग के निरक्षरों के लिए चलाया गया? [2016]
उत्तर :
15 से 35 वर्ष के निरक्षरों के लिए।

प्रश्न 12
भारतीय संविधान में शिक्षा के प्रसार के लिए क्या मुख्य प्रावधान किया गया है?
या
भारतीय संविधान की धारा – 45 में शिक्षा सम्बन्धी किस तथ्य का उल्लेख है? [2012, 14]
उत्तर :
भारतीय संविधान में शिक्षा के प्रसार के लिए 6 से 14 वर्ष के बालकों के लिए अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान किया गया है।

प्रश्न 13
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. हमारे देश में निरन्तर शिक्षा का प्रसार हो रहा है।
  2. राज्य सरकार द्वारा बालिका शिक्षा को अधिक प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

उत्तर :

  1. सत्य
  2. सत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1
शिक्षा के प्रसार को विशेष महत्त्व दिया गया है-
(क) मध्य काल में
(ख) ब्रिटिश शासनकाल में
(ग) स्वतन्त्रता-प्राप्ति के उपरान्त काल में
(घ) प्रत्येक काल में
उत्तर :
(ग) स्वतन्त्रता-प्राप्ति के उपरान्त काल में

प्रश्न 2
शिक्षा के क्षेत्र में अपव्यय की समस्या का कारण है
(क) सामान्य निर्धनता
(ख) शीघ्र जीविकोपार्जन की आवश्यकता
(ग) शिक्षा के पाठ्यक्रम का उपयुक्त न होना
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर :
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 3
शिक्षा के प्रसार के लिए ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड आरम्भ हुआ था
(क) सन् 1987-88 में
(ख) सन् 1988-89 में
(ग) सन् 1990-91 में
(घ) सन् 1991-92 में
उत्तर :
(ग) सन् 1990-91 में

प्रश्न 4
भारत में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना हुई (2014)
(क) सन् 1948 में
(ख) सन् 1953 में
(ग) सन् 1966 में
(घ) सन् 1986-88 में
उत्तर :
(घ) सन् 1986-88 में

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi अलंकार

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name अलंकार
Number of Questions 12
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi अलंकार

काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्त्वों को अलंकार कहते हैं-काव्यशोभाकरान् धर्मानलङ्कारान् प्रचक्षते। अलंकार Alankar के दो भेद होते हैं—(क) शब्दालंकार तथा (ख) अर्थालंकार।

जहाँ काव्य की शोभा का कारण शब्द है, वहाँ शब्दालंकार और जहाँ शोभा का कारण उसका अर्थ है, वहाँ अर्थालंकार होता है। जहाँ काव्य में शब्द और अर्थ दोनों का चमत्कार एक साथ विद्यमान हो, वहाँ ‘उभयालंकार’ (उभय = दोनों) होता है। | काव्य में स्थान-मनुष्य स्वभाव से ही सौन्दर्य-प्रेमी है। वह अपनी प्रत्येक वस्तु को सुन्दर और सुसज्जित देखना चाहता है। अपनी बात को भी वह इस प्रकार कहना चाहता है कि जिससे सुनने वाले पर स्थायी प्रभाव पड़े। वह अपने विचारों को इस रीति से व्यक्त करना चाहता है कि श्रोता चमत्कृत हो जाए। इसके साधन हैं उपर्युक्त दोनों अलंकार। शब्द और अर्थ द्वारा काव्य की शोभा-वृद्धि करने वाले इन अलंकारों का काव्य में वही स्थान है, जो मनुष्य (विशेष रूप से नारी) शरीर में आभूषणों का।।

शब्दालंकार और अर्थालंकार में अन्तर-शब्दालंकार में यदि काव्य में चमत्कार उत्पन्न करने वाले शब्द-विशेष को बदल दिया जाए तो अलंकार समाप्त हो जाता है, किन्तु अर्थालंकार में यदि काव्य में चमत्कार उत्पन्न करने वाले शब्द के स्थान पर उसका पर्यायवाची दूसरा शब्द रख दिया जाए तो भी अलंकार बना रहता है; जैसे-‘कनक-कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय’ में कनक शब्द की सार्थक आवृत्ति के कारण यमक अलंकार है। पहले ‘कनक’ का अर्थ ‘स्वर्ण’ और दूसरे का ‘ धतूरा’ है। यदि ‘कनक’ के स्थान पर उसका कोई पर्यायवाची शब्द रख दिया जाए तो यह अलंकार समाप्त हो जाएगा। इस प्रकार अलंकार शब्द-विशेष पर निर्भर होने से यहाँ शब्दालंकार है।

अर्थालंकार में शब्द का नहीं, अर्थ का महत्त्व होता है; जैसे—सुना यह मनु ने मधु गुंजार, मधुकरी का-सा जब सानन्द।

इसमें ‘मधुकरी का-सा’ में उपमा अलंकार है। यदि ‘मधुकरी’ के स्थान पर उसका ‘भ्रमरी’ या अन्य कोई पर्याय रख दिया जाए तो भी यह अलंकार बना रहेगा; क्योंकि यहाँ अलंकार अर्थ पर आश्रित है, शब्द पर नहीं। यही अर्थालंकार की विशेषता है।

प्रश्न 1
शब्दालंकार से आप क्या समझते हैं ? इसके भेदों का उदाहरणसहित वर्णन कीजिए।
उत्तर
शब्दालंकार और उसके भेद जहाँ काव्य की शोभा का कारण शब्द होता है, वहाँ शब्दालंकार होता है। इसके निम्नलिखित भेद होते हैं-

1. अनुप्रास [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]

लक्षण (परिभाषा)—बार-बार एक ही वर्ण की आवृत्ति को अनुप्रास कहते हैं; जैसे-
तरनि-तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये।( काव्यांजलि: यमुना-छवि) स्पष्टीकरण-यहाँ पर ‘त’ वर्ण की आवृत्ति हुई है। अत: अनुप्रास अलंकार है।
भेद-अनुप्रास के पाँच भेद हैं–(1) छेकानुप्रास, (2) वृत्यनुप्रास, (3) श्रुत्यनुप्रास, (4) लाटानुप्रास और (5) अन्त्यानुप्रास।
(1) छेकानुप्रास–जहाँ एक वर्ण की आवृत्ति एक बार होती है अर्थात् एक वर्ण दो बार आता है, वहाँ छेकानुप्रास होता है; जैसे-इस करुणा-कलित हृदय में, अब विकल रागिनी बजती। (काव्यांजलि: आँसू)
स्पष्टीकरण-उपर्युक्त पंक्ति में ‘क’ की एक बार आवृत्ति हुई है। अत: छेकानुप्रास है।

(2) वृत्यनुप्रास–जहाँ एक अथवा अनेक वर्षों की आवृत्ति दो या दो से अधिक बार हो, वहाँ वृत्यनुप्रास होता है; जैसे-

चारु चन्द्र की चंचल किरणें,
खेल रही हैं जल थल में ।।

स्पष्टीकरण–यहाँ ‘च’ और ‘ल’ दो से अधिक बार (तीन बार) आया है। अत: वृत्यनुप्रास है।
छेकानुप्रास और वृत्यनुप्रास में अन्तर–एक वर्ण की एक बार आवृत्ति होने पर छेकानुप्रास होता है, जब कि वृत्यनुप्रास में एक अथवा अनेक वर्षों की दो अथवा दो से अधिक बार आवृत्ति होती है; जैसे–‘हे जग- जीवन के कर्णधार!’ में ‘ज’ वर्ण की एक बार आवृत्ति होने से छेकानुप्रास है और ‘फैल फूले जल में फेनिल’ में ‘फ’ वर्ण की दो बार तथा ‘ल’ वर्ण की तीन बार आवृत्ति होने से वृत्यनुप्रास है।

(3) श्रुत्यनुप्रास-जहाँ कण्ठ, तालु आदि एक ही स्थान से उच्चरित वर्गों की आवृत्ति हो, वहाँ श्रुत्यनुप्रास होता है; जैसे—
रामकृपा भव-निसा सिरानी जागे फिर न डसैहौं । (काव्यांजलि: विनयपत्रिका)
स्पष्टीकरण–इस पंक्ति में ‘स्’ और ‘न्’ जैसे दन्त्य वर्णो (अर्थात् जिह्वा द्वारा दन्तपंक्ति के स्पर्श से उच्चरित वर्षों) की आवृत्ति के कारण श्रुत्यनुप्रास है।
(4) लाटानुप्रास–जहाँ एक ही अर्थ वाले शब्दों की आवृत्ति होती है, किन्तु अन्वय की भिन्नता से अर्थ बदल जाता है, वहाँ लाटानुप्रास होता है; जैसे-

पूत सपूत तो क्यों धन संचै ?
पूत कपूत तो क्यों धन संचै ?

स्पष्टीकरण–यहाँ उन्हीं शब्दों की आवृत्ति होने पर भी पहली पंक्ति के शब्दों का अन्वय ‘सपूत’ के साथ और दूसरी का ‘कपूत के साथ लगता है, जिससे अर्थ बदल जाता है। (पद्य का भाव यह है कि यदि तुम्हारा पुत्र सुपुत्र है तो धन-संचय की आवश्यकता नहीं; क्योंकि वह स्वयं कमाकर धन का ढेर लगा देगा। यदि वह कुपुत्र है तो भी धन-संचय निरर्थक है; क्योंकि वह सारा धन व्यसनों में उड़ा देगा।) इस प्रकार यहाँ लाटानुप्रास है।।
(5) अन्त्यानुप्रास-यह अलंकार केवल तुकान्त छन्दों में ही होता है। जहाँ कविता के पद या अन्तिम चरण में समान वर्ण आने से तुक मिलती है, वहाँ अन्त्यानुप्रास होता है; जैसे-

बतरस-लालच लाल की, मुरली धरी लुकाई।
सौंह करै भौहनु हँसै, दैन कहैं नटि जाइ ॥( काव्यांजलि: भक्ति एवं श्रृंगार)

स्पष्टीकरण-यहाँ दोनों पंक्तियों के अन्त में ‘आइ’ की आवृत्ति से अन्त्यानुप्रास है।

2. यमक [2010, 11, 12, 13, 14, 16, 17, 18]

लक्षण (परिभाषा)-जब कोई शब्द या शब्दांश अनेक बार आता है और प्रत्येक बार भिन्न-भिन्न अर्थ प्रकट करता है, तब यमक अलंकार होता है; जैसे-

कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय ।
वा खाये बौराय जग, या पाये बौराय ॥

स्पष्टीकरण-यहाँ ‘कनक’ शब्द दो बार आया है और दोनों बार उसके भिन्न-भिन्न अर्थ हैं। पहले ‘कनक’ का अर्थ ‘धतूरा है और दूसरे का ‘सोना’। अतः यहाँ यमक अलंकार है।
भेद-यमक अलंकार के दो मुख्य भेद होते हैं—
(1) अभंगपद यमक–जहाँ दो पूर्ण शब्दों की समानता हो। इसमें शब्द पूर्ण होने के कारण दोनों शब्द सार्थक होते हैं; जैसे-‘कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय ।’
(2) सभंगपद यमक–यहाँ शब्दों को भंग करके (तोड़कर) अक्षर-समूह की समता बनती है। इसमें एक या दोनों अक्षर समूह निरर्थक होते हैं; जैसे-

पच्छी पर छीने ऐसे परे पर छीने वीर,
तेरी बरछी ने बर छीने हैं खलन के ।। (काव्यांजलिः छत्रसाल प्रशस्ति)

3. श्लेष [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17]

लक्षण (परिभाषा)–-जब एक ही शब्द बिना आवृत्ति के दो या दो से अधिक अर्थ प्रकट करे, तब श्लेष अलंकार होता है; जैसे-

चिरजीवौ जोरी जुरै, क्यों न सनेह गैंभीर।
को घटि ए वृषभानुजा, वे हलधर के वीर ॥

स्पष्टीकरण-यहाँ ‘वृषभानुजा’ तथा ‘हलधर’ शब्दों के दो-दो अर्थ हैं-
वृषभानुजा = वृषभानु + जा = वृषभानु की पुत्री (राधा)।
वृषभ + अनुजा = बैल की बहन (गाय)।
हलधर = (1) बलराम, (2) बैल। इस प्रकार यहाँ ‘वृषभानुजा’ में श्लेष अलंकार है।
यमक और श्लेष में अन्तर-जब एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आकर भिन्न-भिन्न अर्थ देता है तो यमक कहलाता है और जब एक शब्द बिना आवृत्ति के ही कई अर्थ देता है तो श्लेष कहलाता है। यमक में एक शब्द की आवृत्ति होती है और श्लेष में बिना आवृत्ति के ही शब्द एकाधिक अर्थ देता है।

प्रश्न 2
अर्थालंकार किसे कहते हैं ? इसके भेदों का उदाहरणसहित वर्णन कीजिए।
उत्तर
अर्थालंकार और उसके भेद जहाँ काव्य की शोभा का कारण अर्थ होता है; वहाँ अर्थालंकार होता है। इसके निम्नलिखित भेद होते हैं-

1. उपमा [2010, 11, 12, 13, 15, 16, 17]

लक्षण (परिभाषा)—उपमेय और उपमान के समान धर्मकथन को उपमा अलंकार कहते हैं; जैसे
(1) मुख चन्द्रमा के समान सुन्दर है।
(2) तापसबाला-सी गंगा कले।
उपमा अलंकार के निम्नलिखित चार अंग होते हैं-
(1) उपमेय–जिसके लिए उपमा दी जाती है; जैसे-उपर्युक्त उदाहरणों में मुख, गंगा ।।
(2) उपमान-उपमेय की जिसके साथ तुलना (उपमा) की जाती है; जैसे-चन्द्रमा, तापसबाला।
(3) साधारण धर्म-जिस गुण या विषय में उपमेय और उपमान की तुलना की जाती है; जैसे–सुन्दर (सुन्दरता), कलता (सुहावनी)।।
(4) वाचक शब्द–जिस शब्द के द्वारा उपमेय और उपमान की समानता व्यक्त की जाती है; जैसे—समान, सी, तुल्य, सदृश, इव, सरिस, जिमि, जैसा आदि।
ये चारों अंग जहाँ पाये जाते हैं, वहाँ पूर्णोपमालंकार होता है; जैसा उपर्युक्त उदाहरणों में है।
भेद-उपमा अलंकार के चार भेद होते हैं—(क) पूर्णोपमा, (ख) लुप्तोपमा, (ग) रसनोपमा और (घ) मालोपमा।
(क) पूर्णोपमा-[ संकेत-ऊपर बताया जा चुका है।

(ख) लुप्तोपमा–जहाँ उपमा के चारों अंगों (उपमेय, उपमान, साधारण धर्म और वाचक शब्द) में से किसी एक, दो या तीन अंगों का लोप होता है, वहाँ लुप्तोपमा अलंकार होता है। लुप्तोपमा अलंकार निम्नलिखित चार प्रकार का होता है-

  1. धर्म-लुप्तोपमा–जिसमें साधारण धर्म का लोप हो; जैसे-तापसबाला-सी गंगा ।
    स्पष्टीकरण-यहाँ धर्म-लुप्तोपमा है; क्योंकि यहाँ ‘सुन्दरता रूपी गुण का लोप है।
  2. उपमान-लुप्तोपमा–जिसमें उपमान का लोप हो; जैसे-
    जिहिं तुलना तोहिं दीजिए, सुवरन सौरभ माहिं।।
    कुसुम तिलक चम्पक अहो, हौं नहिं जानौं ताहिं ॥
    सुन्दर वर्ण और सुगन्ध में तेरी तुलना किस पदार्थ से की जाए, उसे मैं नहीं जानता; क्योंकि तिलक, चम्पा आदि पुष्प तेरे समकक्ष नहीं ठहरते।।
    स्पष्टीकरण–यहाँ उपमान लुप्त है; क्योंकि जिससे तुलना की जाए, वह उपमान ज्ञात नहीं है।
  3. उपमेय-लुप्तोपमा–जिसमें उपमेय का लोप हो; जैसे–
    कल्पलता-सी अतिशय कोमल ।।
    स्पष्टीकरण-यहाँ उपमेय-लुप्तोपमा है; क्योंकि कौन है कल्पलता-सी कोमल-यह नहीं बताया गया है।।
  4. वाचक-लुप्तोपमा–जिसमें वाचक शब्द का लोप हो; जैसे-
    नील सरोरुह स्याम, तरुन अरुन वारिज-नयन ।
    स्पष्टीकरण-यहाँ वाचक शब्द ‘समान’ या उसके पर्यायवाची अन्य किसी शब्द का लोप है; अत: इसमें वाचक-लुप्तोपमा अलंकार है।

(ग) रसनोपमा–रसनोपमा अलंकार में उपमेय और उपमान एक-दूसरे से उसी प्रकार जुड़े रहते हैं, जिस प्रकार किसी श्रृंखला की एक कड़ी दूसरी कड़ी से; जैसे-

सगुन ज्ञान सम उद्यम, उद्यम सम फल जान ।
फल समान पुनि दान है, दान सरिस सनमान ॥

स्पष्टीकरण-उपर्युक्त उदाहरण में ‘उद्यम’, ‘फल’, ‘दान’ और ‘सनमान’ उपमेय अपने उपमानों के साथ शृंखलाबद्ध रूप में प्रस्तुत किये गये हैं; अतः इसमें रसनोपमा अलंकार है।
(घ) मालोपमा–जहाँ उपमेय (जिसके लिए उपमा दी जाती है) का उत्कर्ष दिखाने के लिए अनेक उपमान एकत्र किये जाएँ, वहाँ मालोपमा अलंकार होता है; जैसे-

हिरनी से मीन से, सुखंजन समान चारु ।
अमल कमल-से विलोचन तुम्हारे हैं ।।।

स्पष्टीकरण-उपर्युक्त उदाहरण में आँखों की तुलना अनेक उपमानों (हिरनी से, मीन से, सुखंजन समान, कमल से) की गयी है। अत: यहाँ पर मालोपमा अलंकार है।।

2. रूपक [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 18]

लक्षण (परिभाषा)–जहाँ उपमेय और उपमान में अभिन्नता प्रकट की जाए, अर्थात् उन्हें एक ही रूप में प्रकट किया जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है; जैसे-

अरुन सरोरुह कर चरन, दृग-खंजन मुख-चंद।
समै आइ सुंदरि-सरद, काहि न करति अनंद ॥

स्पष्टीकरण-इस उदाहरण में शरद् ऋतु में सुन्दरी को, कमल में हाथ-पैरों का, खंजन में आँखों का और चन्द्रमा में मुख का भेदरहित आरोप होने से रूपक अलंकार है। | भेद-रूपक अलंकार निम्नलिखित तीन प्रकार का होता है ।
(i) सांगरूपक-जहाँ उपमेय पर उपमान का सर्वांग आरोप हो, वहाँ ‘सांगरूपक’ होता है; जैसे-

उदित उदयगिरि-मंच पर, रघुबर बाल पतंग।
बिकसे संत सरोज सब, हरखे लोचन-भंग ॥

स्पष्टीकरण–यहाँ रघुबर, मंच, संत, लोचन आदि उपमेयों पर बाल सूर्य, उदयगिरि, सरोज, मूंग आदि उपमानों का आरोप किया गया है; अतः यहाँ सांगरूपक है।
(ii) निरंगरूपक-जहाँ उपमेय पर उपमान का आरोप सर्वांग न हो, वहाँ निरंगरूपक होता है; जैसे–
कौन तुम संसृति-जलनिधि तीर, तरंगों से फेंकी मणि एक।
स्पष्टीकरण-इसमें संसृति (संसार) पर जलनिधि (सागर) का आरोप है, लेकिन अंगों का उल्लेख न होने से यह निरंगरूपक है।
(iii) परम्परितरूपक-जहाँ एक रूपक दूसरे रूपक पर अवलम्बित हो, वहाँ परम्परितरूपक होता है; जैसे-
बन्दी पवनकुमार खल-बन-पावक ज्ञान-घन।
स्पष्टीकरण–यहाँ पवनकुमार (उपमेय) पर अग्नि (उपमान) का आरोप इसलिए सम्भव हुआ कि खलों (दुष्टों) को घना वन (जंगल) बताया गया है; अत: एक रूपक (खल-वन) पर दूसरा रूपक (पवनकुमाररूपी पावक) निर्भर होने से यहाँ परम्परितरूपक है।
उपमा और रूपक अलंकार में अन्तर–उपमा में उपमेय और उपमान में समानता स्थापित की जाती है, किन्तु रूपक में दोनों में अभेद स्थापित किया जाता है; जैसे-‘मुख चन्द्रमा के समान है’ में उपमा है, किन्तु ‘मुख चन्द्रमा है’ में रूपक है।

उत्प्रेक्षा और रूपक अलंकार में अन्तर–जहाँ पर उपमेय (जिसके लिए उपमा दी जाती है) में उपमान (उपमेय की जिसके साथ तुलना की जाती है) की सम्भावना प्रकट की जाती है, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है; जैसे-‘मुख मानो चन्द्रमा है। जहाँ उपमेय और उपमान में ऐसा आरोप हो कि दोनों में किसी प्रकार का भेद ही न रह जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है; जैसे-‘मुख चन्द्रमा है।

4. उत्प्रेक्षा [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 17, 18]

लक्षण (परिभाषा)-जहाँ उपमेय की उपमान के रूप में सम्भावना की जाए, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है; जैसे-

सोहत ओढ़ पीतु पटु, स्याम सलौने गात ।
मनौ नीलमनि-सैल पर, आतपु पर्यौ प्रभात ॥

स्पष्टीकरण-यहाँ पीताम्बर ओढ़े हुए श्रीकृष्ण के श्याम शरीर (उपमेय) की प्रात:कालीन सूर्य की प्रभा से सुशोभित नीलमणि पर्वत (उपमान) के रूप में सम्भावना किये जाने से उत्प्रेक्षा अलंकार है। ‘मनौ’ यहाँ पर वाचक शब्द है। इस अलंकार में जनु, जनहुँ, मनु, मनहुँ, मानो, इव आदि वाचक शब्द अवश्य आते हैं।
भेद-उत्प्रेक्षा अलंकार के निम्नलिखित तीन भेद होते हैं
(क) वस्तूत्प्रेक्षा–जब उपमेय (प्रस्तुत वस्तु) में उपमान (अप्रस्तुत वस्तु) की सम्भावना व्यक्त की जाती है, तब वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार होता है-

वहीं शुभ्र सरिता के तट पर, कुटिया का कंकाल खड़ा है।
मानो बाँसों में घुन बनकर शत शत हाहाकार खड़ा है।

स्पष्टीकरण–यहाँ पर घुन (प्रस्तुत वस्तु) में हाहाकार (अप्रस्तुत वस्तु) की सम्भावना की गयी है। अत: वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार है।
(ख) हेतूत्प्रेक्षा–जहाँ पर काव्य में अहेतु में हेतु की सम्भावना व्यक्त की जाती है, वहाँ हेतूत्प्रेक्षा अलंकार होता है–

विनय शुक-नासा का धर ध्यान
बन गये पुष्प पलास अराल।

स्पष्टीकरण–यहाँ पर ढाक के फूलों का वक्र आकार होना स्वाभाविक है। नायिका की नुकीली नाक की उससे सम्भावना की जाए यह हेतु नहीं है; परन्तु यहाँ उसे हेतु माना गया है, अतएव अहेतु की सम्भावना होने से हेतूत्प्रेक्षा अलंकार है।।

(ग) फलोत्प्रेक्षा–जब अफल में फल की सम्भावना की जाए वहाँ पर फलोत्प्रेक्षा अलंकार होता है-

नित्य ही नहाती क्षर सिन्धु में कलाधर है
सुन्दरि ! तवानन की समता की इच्छा से ।

यहाँ पर चन्द्रमा का प्रतिदिन क्षीरसागर में स्नान करने का उद्देश्य सुन्दरी के मुख की समता प्राप्त करने में निहित है। वास्तव में ऐसा नहीं है, परन्तु इस प्रकार की सम्भावना की गयी है। अत: यहाँ फलोत्प्रेक्षा अलंकार है।।

5. भ्रान्तिमान [2009, 10, 14, 15, 16, 18] |

लक्षण (परिभाषा)-जहाँ समानता के कारण भ्रमवश उपमेय में उपमान का निश्चयात्मक ज्ञान हो, वहाँ भ्रान्तिमान अलंकार होता है; जैसे—रस्सी (उपमेय) को साँप (उपमान) समझ लेना।

कपि करि हृदय बिचार, दीन्ह मुद्रिका डारि तब ।।
जानि अशोक अँगार, सीय हरषि उठि कर गहेउ ।

स्पष्टीकरण-यहाँ सीताजी श्रीराम की हीरकजटित अँगूठी को अशोक वृक्ष द्वारा प्रदत्त अंगारा समझकर उठा लेती हैं। अँगूठी (उपमेय) में उन्हें अंगारे (उपमान) का निश्चयात्मक ज्ञान होने से यहाँ भ्रान्तिमान अलंकार है।

6. सन्देह [2009, 10, 11, 13, 14, 15, 16, 17, 18]

लक्षण (परिभाषा)-जब किसी वस्तु में उसी के समान दूसरी वस्तु का सन्देह हो जाए और कोई निश्चयात्मक ज्ञान न हो, तब सन्देह अलंकार होता है; जैसे—

परिपूरन सिन्दूर पूर कैधौं मंगल घट।
किधौं सक्र को छत्र मढ्यो मानिक मयूख पट ।।

स्पष्टीकरण-यहाँ लाल वर्ण वाले सूर्य में सिन्दूर भरे हुए घट’ तथा ‘लाल रंग वाले माणिक्य में जड़े हुए छत्र’ का सन्देह होने से सन्देह अलंकार है।
सन्देह और भ्रान्तिमान में अन्तर–सन्देह अलंकार में उपमेय में उपमान का सन्देहमात्र होता है, निश्चयात्मक ज्ञान नहीं; जैसे-‘यह रस्सी है या साँप’। इसमें रस्सी (उपमेय) में साँप (उपमान) का सन्देह होता है, निश्चय नहीं; किन्तु भ्रान्तिमान में उपमेय में उपमान का निश्चय हो जाता है; जैसे—रस्सी को साँप समझकर कहना कि ‘यह साँप है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार का नाम लिखिए
प्रश्न (क)
मनो चली आँगन कठिन तातें राते पाय ।।
उत्तर
उत्प्रेक्षा

प्रश्न (ख)
मकराकृति गोपाल के, सोहत कुंडल कान ।
धरयो मनौ हिय धर समरु, यौढ़ी लसत निसान ।।
उत्तर
उत्प्रेक्षा।

प्रश्न (ग)
तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये ।
उत्तर
अनुप्रास।

प्रश्न (घ)
उदित उदयगिरि मंच पर, रघुवर बाल पतंग ।।
उत्तर
रूपक।

प्रश्न (इ)
घनानंद प्यारे सुजान सुनौ, यहाँ एक से दूसरो ऑक नहीं ।
तुम कौन धौं पाटी पढ़े हौ कहौ, मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं ।।
उत्तर
श्लेष।

प्रश्न (च)
का पूँघट मुख मूंदहु अबला नारि ।
चंद सरग पर सोहत यहि अनुहारि ।।
उत्तर
रूपक।

प्रश्न (छ)
पच्छी पर छीने ऐसे परे पर छीने वीर,
तेरी बरछी ने बर छीने हैं खलन के ।।
उत्तर
यमक।

प्रश्न (ज)
अनियारे दीरघ दृगनि, किती न तरुनि समान ।
वह चितवनि औरै कछु, जिहिं बस होत सुजान ।।
उत्तर
अनुप्रास।

प्रश्न (झ)
चरण कमल बंद हरिराई ।।
उत्तर
रूपक।

प्रश्न 2
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए
(क) उत्प्रेक्षा और उपमा अलंकार में मूलभूत अन्तर बताइए और उत्प्रेक्षा अलंकार का एक उदाहरण अपनी पाठ्य-पुस्तक से लिखिए।
(ख) श्लेष अलंकार का लक्षण लिखकर उदाहरण दीजिए।
(ग) सन्देह और भ्रान्तिमान अलंकारों में अन्तर स्पष्ट करते हुए उदाहरण दीजिए।
(घ) सन्देह और भ्रान्तिमान अलंकारों का अन्तर स्पष्ट कीजिए और दोनों में से किसी एक का उदाहरण लिखिए।
(ङ) उत्प्रेक्षा और रूपक अलंकार में मूलभूत अन्तर स्पष्ट कीजिए और अपनी पाठ्य-पुस्तक से उत्प्रेक्षा अलंकार का एक उदाहरण लिखिए।
(च) रूपक अलंकार के भेद लिखिए और किसी एक भेद का लक्षण और उदाहरण प्रस्तुत कीजिए।
(छ) सन्देह और भ्रान्तिमान में अन्तर बताइए। अपनी पाठ्य-पुस्तक से भ्रान्तिमान अलंकार का एक उदाहरण लिखिए।
(ज) ‘यमक’ अथवा ‘श्लेष अलंकार का लक्षण लिखिए और एक उदाहरण दीजिए।
(झ) ‘रूपक’ तथा ‘उपमा अलंकारों में मूलभूत अन्तर बताइए और दोनों में से किसी एक अलंकार का उदाहरण प्रस्तुत कीजिए।
(ञ) ‘उपमा’ अथवा ‘उत्प्रेक्षा’ अलंकार का लक्षण लिखकर एक उदाहरण दीजिए।
(ट) ‘अनुप्रास’ अथवा ‘उत्प्रेक्षा’ अलंकार का लक्षण लिखिए तथा उस अलंकार को एक उदाहरण दीजिए।
(ठ) ‘श्लेष’, ‘उपमा’ तथा ‘सन्देह अलंकारों में से किसी एक अलंकार की परिभाषा देते हुए उदाहरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर

श्लेष [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17]

लक्षण (परिभाषा)–-जब एक ही शब्द बिना आवृत्ति के दो या दो से अधिक अर्थ प्रकट करे, तब श्लेष अलंकार होता है; जैसे-

चिरजीवौ जोरी जुरै, क्यों न सनेह गैंभीर।
को घटि ए वृषभानुजा, वे हलधर के वीर ॥

स्पष्टीकरण-यहाँ ‘वृषभानुजा’ तथा ‘हलधर’ शब्दों के दो-दो अर्थ हैं-
वृषभानुजा = वृषभानु + जा = वृषभानु की पुत्री (राधा)।
वृषभ + अनुजा = बैल की बहन (गाय)।
हलधर = (1) बलराम, (2) बैल। इस प्रकार यहाँ ‘वृषभानुजा’ में श्लेष अलंकार है।
यमक और श्लेष में अन्तर-जब एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आकर भिन्न-भिन्न अर्थ देता है तो यमक कहलाता है और जब एक शब्द बिना आवृत्ति के ही कई अर्थ देता है तो श्लेष कहलाता है। यमक में एक शब्द की आवृत्ति होती है और श्लेष में बिना आवृत्ति के ही शब्द एकाधिक अर्थ देता है।

अर्थालंकार और उसके भेद जहाँ काव्य की शोभा का कारण अर्थ होता है; वहाँ अर्थालंकार होता है। इसके निम्नलिखित भेद होते हैं-

1. उपमा [2010, 11, 12, 13, 15, 16, 17]

लक्षण (परिभाषा)—उपमेय और उपमान के समान धर्मकथन को उपमा अलंकार कहते हैं; जैसे
(1) मुख चन्द्रमा के समान सुन्दर है।
(2) तापसबाला-सी गंगा कले।
उपमा अलंकार के निम्नलिखित चार अंग होते हैं-
(1) उपमेय–जिसके लिए उपमा दी जाती है; जैसे-उपर्युक्त उदाहरणों में मुख, गंगा ।।
(2) उपमान-उपमेय की जिसके साथ तुलना (उपमा) की जाती है; जैसे-चन्द्रमा, तापसबाला।
(3) साधारण धर्म-जिस गुण या विषय में उपमेय और उपमान की तुलना की जाती है; जैसे–सुन्दर (सुन्दरता), कलता (सुहावनी)।।
(4) वाचक शब्द–जिस शब्द के द्वारा उपमेय और उपमान की समानता व्यक्त की जाती है; जैसे—समान, सी, तुल्य, सदृश, इव, सरिस, जिमि, जैसा आदि।
ये चारों अंग जहाँ पाये जाते हैं, वहाँ पूर्णोपमालंकार होता है; जैसा उपर्युक्त उदाहरणों में है।
भेद-उपमा अलंकार के चार भेद होते हैं—(क) पूर्णोपमा, (ख) लुप्तोपमा, (ग) रसनोपमा और (घ) मालोपमा।
(क) पूर्णोपमा-[ संकेत-ऊपर बताया जा चुका है।

(ख) लुप्तोपमा–जहाँ उपमा के चारों अंगों (उपमेय, उपमान, साधारण धर्म और वाचक शब्द) में से किसी एक, दो या तीन अंगों का लोप होता है, वहाँ लुप्तोपमा अलंकार होता है। लुप्तोपमा अलंकार निम्नलिखित चार प्रकार का होता है-

  1. धर्म-लुप्तोपमा–जिसमें साधारण धर्म का लोप हो; जैसे-तापसबाला-सी गंगा ।
    स्पष्टीकरण-यहाँ धर्म-लुप्तोपमा है; क्योंकि यहाँ ‘सुन्दरता रूपी गुण का लोप है।
  2. उपमान-लुप्तोपमा–जिसमें उपमान का लोप हो; जैसे-
    जिहिं तुलना तोहिं दीजिए, सुवरन सौरभ माहिं।।
    कुसुम तिलक चम्पक अहो, हौं नहिं जानौं ताहिं ॥
    सुन्दर वर्ण और सुगन्ध में तेरी तुलना किस पदार्थ से की जाए, उसे मैं नहीं जानता; क्योंकि तिलक, चम्पा आदि पुष्प तेरे समकक्ष नहीं ठहरते।।
    स्पष्टीकरण–यहाँ उपमान लुप्त है; क्योंकि जिससे तुलना की जाए, वह उपमान ज्ञात नहीं है।
  3. उपमेय-लुप्तोपमा–जिसमें उपमेय का लोप हो; जैसे–
    कल्पलता-सी अतिशय कोमल ।।
    स्पष्टीकरण-यहाँ उपमेय-लुप्तोपमा है; क्योंकि कौन है कल्पलता-सी कोमल-यह नहीं बताया गया है।।
  4. वाचक-लुप्तोपमा–जिसमें वाचक शब्द का लोप हो; जैसे-
    नील सरोरुह स्याम, तरुन अरुन वारिज-नयन ।
    स्पष्टीकरण-यहाँ वाचक शब्द ‘समान’ या उसके पर्यायवाची अन्य किसी शब्द का लोप है; अत: इसमें वाचक-लुप्तोपमा अलंकार है।

(ग) रसनोपमा–रसनोपमा अलंकार में उपमेय और उपमान एक-दूसरे से उसी प्रकार जुड़े रहते हैं, जिस प्रकार किसी श्रृंखला की एक कड़ी दूसरी कड़ी से; जैसे-

सगुन ज्ञान सम उद्यम, उद्यम सम फल जान ।
फल समान पुनि दान है, दान सरिस सनमान ॥

स्पष्टीकरण-उपर्युक्त उदाहरण में ‘उद्यम’, ‘फल’, ‘दान’ और ‘सनमान’ उपमेय अपने उपमानों के साथ शृंखलाबद्ध रूप में प्रस्तुत किये गये हैं; अतः इसमें रसनोपमा अलंकार है।
(घ) मालोपमा–जहाँ उपमेय (जिसके लिए उपमा दी जाती है) का उत्कर्ष दिखाने के लिए अनेक उपमान एकत्र किये जाएँ, वहाँ मालोपमा अलंकार होता है; जैसे-

हिरनी से मीन से, सुखंजन समान चारु ।
अमल कमल-से विलोचन तुम्हारे हैं ।।।

स्पष्टीकरण-उपर्युक्त उदाहरण में आँखों की तुलना अनेक उपमानों (हिरनी से, मीन से, सुखंजन समान, कमल से) की गयी है। अत: यहाँ पर मालोपमा अलंकार है।।

2. रूपक [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 18]

लक्षण (परिभाषा)–जहाँ उपमेय और उपमान में अभिन्नता प्रकट की जाए, अर्थात् उन्हें एक ही रूप में प्रकट किया जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है; जैसे-

अरुन सरोरुह कर चरन, दृग-खंजन मुख-चंद।
समै आइ सुंदरि-सरद, काहि न करति अनंद ॥

स्पष्टीकरण-इस उदाहरण में शरद् ऋतु में सुन्दरी को, कमल में हाथ-पैरों का, खंजन में आँखों का और चन्द्रमा में मुख का भेदरहित आरोप होने से रूपक अलंकार है। | भेद-रूपक अलंकार निम्नलिखित तीन प्रकार का होता है ।
(i) सांगरूपक-जहाँ उपमेय पर उपमान का सर्वांग आरोप हो, वहाँ ‘सांगरूपक’ होता है; जैसे-

उदित उदयगिरि-मंच पर, रघुबर बाल पतंग।
बिकसे संत सरोज सब, हरखे लोचन-भंग ॥

स्पष्टीकरण–यहाँ रघुबर, मंच, संत, लोचन आदि उपमेयों पर बाल सूर्य, उदयगिरि, सरोज, मूंग आदि उपमानों का आरोप किया गया है; अतः यहाँ सांगरूपक है।
(ii) निरंगरूपक-जहाँ उपमेय पर उपमान का आरोप सर्वांग न हो, वहाँ निरंगरूपक होता है; जैसे–
कौन तुम संसृति-जलनिधि तीर, तरंगों से फेंकी मणि एक।
स्पष्टीकरण-इसमें संसृति (संसार) पर जलनिधि (सागर) का आरोप है, लेकिन अंगों का उल्लेख न होने से यह निरंगरूपक है।
(iii) परम्परितरूपक-जहाँ एक रूपक दूसरे रूपक पर अवलम्बित हो, वहाँ परम्परितरूपक होता है; जैसे-
बन्दी पवनकुमार खल-बन-पावक ज्ञान-घन।
स्पष्टीकरण–यहाँ पवनकुमार (उपमेय) पर अग्नि (उपमान) का आरोप इसलिए सम्भव हुआ कि खलों (दुष्टों) को घना वन (जंगल) बताया गया है; अत: एक रूपक (खल-वन) पर दूसरा रूपक (पवनकुमाररूपी पावक) निर्भर होने से यहाँ परम्परितरूपक है।
उपमा और रूपक अलंकार में अन्तर–उपमा में उपमेय और उपमान में समानता स्थापित की जाती है, किन्तु रूपक में दोनों में अभेद स्थापित किया जाता है; जैसे-‘मुख चन्द्रमा के समान है’ में उपमा है, किन्तु ‘मुख चन्द्रमा है’ में रूपक है।

उत्प्रेक्षा और रूपक अलंकार में अन्तर–जहाँ पर उपमेय (जिसके लिए उपमा दी जाती है) में उपमान (उपमेय की जिसके साथ तुलना की जाती है) की सम्भावना प्रकट की जाती है, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है; जैसे-‘मुख मानो चन्द्रमा है। जहाँ उपमेय और उपमान में ऐसा आरोप हो कि दोनों में किसी प्रकार का भेद ही न रह जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है; जैसे-‘मुख चन्द्रमा है।

4. उत्प्रेक्षा [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 17, 18]

लक्षण (परिभाषा)-जहाँ उपमेय की उपमान के रूप में सम्भावना की जाए, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है; जैसे-

सोहत ओढ़ पीतु पटु, स्याम सलौने गात ।
मनौ नीलमनि-सैल पर, आतपु पर्यौ प्रभात ॥

स्पष्टीकरण-यहाँ पीताम्बर ओढ़े हुए श्रीकृष्ण के श्याम शरीर (उपमेय) की प्रात:कालीन सूर्य की प्रभा से सुशोभित नीलमणि पर्वत (उपमान) के रूप में सम्भावना किये जाने से उत्प्रेक्षा अलंकार है। ‘मनौ’ यहाँ पर वाचक शब्द है। इस अलंकार में जनु, जनहुँ, मनु, मनहुँ, मानो, इव आदि वाचक शब्द अवश्य आते हैं।
भेद-उत्प्रेक्षा अलंकार के निम्नलिखित तीन भेद होते हैं
(क) वस्तूत्प्रेक्षा–जब उपमेय (प्रस्तुत वस्तु) में उपमान (अप्रस्तुत वस्तु) की सम्भावना व्यक्त की जाती है, तब वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार होता है-

वहीं शुभ्र सरिता के तट पर, कुटिया का कंकाल खड़ा है।
मानो बाँसों में घुन बनकर शत शत हाहाकार खड़ा है।

स्पष्टीकरण–यहाँ पर घुन (प्रस्तुत वस्तु) में हाहाकार (अप्रस्तुत वस्तु) की सम्भावना की गयी है। अत: वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार है।
(ख) हेतूत्प्रेक्षा–जहाँ पर काव्य में अहेतु में हेतु की सम्भावना व्यक्त की जाती है, वहाँ हेतूत्प्रेक्षा अलंकार होता है–

विनय शुक-नासा का धर ध्यान
बन गये पुष्प पलास अराल।

स्पष्टीकरण–यहाँ पर ढाक के फूलों का वक्र आकार होना स्वाभाविक है। नायिका की नुकीली नाक की उससे सम्भावना की जाए यह हेतु नहीं है; परन्तु यहाँ उसे हेतु माना गया है, अतएव अहेतु की सम्भावना होने से हेतूत्प्रेक्षा अलंकार है।।

(ग) फलोत्प्रेक्षा–जब अफल में फल की सम्भावना की जाए वहाँ पर फलोत्प्रेक्षा अलंकार होता है-

नित्य ही नहाती क्षर सिन्धु में कलाधर है
सुन्दरि ! तवानन की समता की इच्छा से ।

यहाँ पर चन्द्रमा का प्रतिदिन क्षीरसागर में स्नान करने का उद्देश्य सुन्दरी के मुख की समता प्राप्त करने में निहित है। वास्तव में ऐसा नहीं है, परन्तु इस प्रकार की सम्भावना की गयी है। अत: यहाँ फलोत्प्रेक्षा अलंकार है।।

5. भ्रान्तिमान [2009, 10, 14, 15, 16, 18] |

लक्षण (परिभाषा)-जहाँ समानता के कारण भ्रमवश उपमेय में उपमान का निश्चयात्मक ज्ञान हो, वहाँ भ्रान्तिमान अलंकार होता है; जैसे—रस्सी (उपमेय) को साँप (उपमान) समझ लेना।

कपि करि हृदय बिचार, दीन्ह मुद्रिका डारि तब ।।
जानि अशोक अँगार, सीय हरषि उठि कर गहेउ ।

स्पष्टीकरण-यहाँ सीताजी श्रीराम की हीरकजटित अँगूठी को अशोक वृक्ष द्वारा प्रदत्त अंगारा समझकर उठा लेती हैं। अँगूठी (उपमेय) में उन्हें अंगारे (उपमान) का निश्चयात्मक ज्ञान होने से यहाँ भ्रान्तिमान अलंकार है।

6. सन्देह [2009, 10, 11, 13, 14, 15, 16, 17, 18]

लक्षण (परिभाषा)-जब किसी वस्तु में उसी के समान दूसरी वस्तु का सन्देह हो जाए और कोई निश्चयात्मक ज्ञान न हो, तब सन्देह अलंकार होता है; जैसे—

परिपूरन सिन्दूर पूर कैधौं मंगल घट।
किधौं सक्र को छत्र मढ्यो मानिक मयूख पट ।।

स्पष्टीकरण-यहाँ लाल वर्ण वाले सूर्य में सिन्दूर भरे हुए घट’ तथा ‘लाल रंग वाले माणिक्य में जड़े हुए छत्र’ का सन्देह होने से सन्देह अलंकार है।
सन्देह और भ्रान्तिमान में अन्तर–सन्देह अलंकार में उपमेय में उपमान का सन्देहमात्र होता है, निश्चयात्मक ज्ञान नहीं; जैसे-‘यह रस्सी है या साँप’। इसमें रस्सी (उपमेय) में साँप (उपमान) का सन्देह होता है, निश्चय नहीं; किन्तु भ्रान्तिमान में उपमेय में उपमान का निश्चय हो जाता है; जैसे—रस्सी को साँप समझकर कहना कि ‘यह साँप है।

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UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 9 Group Tension

UP Board Solutions for UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 9 Group Tension (समूह-तनाव) are part of UP Board Solutions for Class 12 Psychology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12  Psychology Chapter 9 Group Tension (समूह-तनाव).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Psychology
Chapter Chapter 9
Chapter Name Group Tension
(समूह-तनाव)
Number of Questions Solved 50
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Psychology Chapter 9 Group Tension (समूह-तनाव)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
समूह-तनाव (Group Tension) से आप क्या समझते हैं? समूह-तनाव की उत्पत्ति के मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
या
समूह-तनाव से आप क्या समझते हैं? समूह तनाव के लिए उत्तरदायी कारकों को स्पष्ट कीजिए। (2008, 10, 15, 16)
या
समूह-तनाव के लिए उत्तरदायी चार कारणों के बारे में लिखिए। (2012)
उत्तर.

भूमिका
(Introduction)

मनुष्य को समूह में रहने वाले एक सामाजिक प्राणी के रूप में स्वीकार किया जाता है। प्रत्येक समाज में समूहों का निर्माण विभिन्न आधारों पर होता है; जैसे-धर्म, जाति, सम्प्रदाय, वर्ग, क्षेत्र, भाषा, व्यवसाय, आवास, आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक स्तर आदि। ‘तनाव’ (Tension) एक प्रकार की मानसिक अवस्था है, जो व्यक्ति और समूह दोनों में पायी जाती है। कोलमैन के अनुसार, “मनोवैज्ञानिक अर्थों में तनाव, दबाव, बेचैनी तथा चिन्ता की अनुभूति है।” सामाजिक विघटन की क्रिया में भीतरी तनावों के कारण समाज के अंग टूटकर अलग होने लगते हैं। और उनकी प्रगति रुक जाती है। समूहों के बीच इस स्थिति को ‘समूह-तनाव (Group Tension) कहते हैं।

समूह-तनाव का अर्थ
(Meaning of Group Tension)

समूह-तनाव उस स्थिति का नाम है जिसमें समाज का कोई वर्ग, सम्प्रदाय, धर्म, जाति या राजनीतिक दल-दूसरे के प्रति भय, ईर्ष्या, घृणा तथा विरोध से भर जाता है। ऐसी दशा में उन दोनों समूहों में सामाजिक तनाव उत्पन्न हो जाता है। इन समूहों में यह तनाव अलगाव की भावना के कारण उत्पन्न होता है, जिसके परिणामस्वरूप कोई समाज या राष्ट्र छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित हो जाता है। आज दुनियाभर के समाज इस प्रकार के समूह-तनाव के शिकार हैं, जिनके कारण मानव सभ्यता मार-काट, विद्रोह और युद्ध की त्रासदी से गुजर रही है। अमेरिका में अमेरिकन तथा हब्शी, दक्षिणी अफ्रीका में श्वेत और अश्वेत प्रजातियाँ, हिटलर के समय में जर्मन और यहूदी-इन समूहों के बीच तनाव विश्वस्तरीय समूह-तनाव के उदाहरण हैं। हमारे देश भारत में हिन्दू-मुसलमानों के बीच, उत्तरी एवं दक्षिणी भारतीयों के बीच, ऊँची और नीची जातियों के बीच, विभिन्न भाषा-भाषियों के बीच,
समूह-तनाव 177 राजनीतिक दलों के बीच तथा मालिकों व श्रमिकों के बीच अक्सर ही समूह-तनाव उत्पन्न हो जाता है। इन तनावे की परिस्थितियों से न केवल हमारी राष्ट्रीय एकता क्षीण होती है, अपितु राष्ट्रीय शक्ति का भी अपव्यय होता है।

समूह-तनाव के विभिन्न प्रकार अथवा रूप
(Different kinds of Group Tension)

भारत एक विशाल देश है जिसमें अनेक प्रकार की जातियाँ, सम्प्रदाय, वर्ग तथा विविध भाषा-भाषी लोग विभिन्न क्षेत्रों में निवास करते हैं। इन्हीं के आधार पर हमारे भारतीय समाज में समूह-तनाव के ये चार प्रमुख स्वरूप या प्रकार पाये जाते हैं-

  1. जातिगत समूह-तनाव,
  2. साम्प्रदायिक समूह-तनाव,
  3. क्षेत्रीय समूह-तनाव तथा
  4. भाषागत समूह-तनावे।

समूह-तनाव के कारण
(Causes of Group Tension)

समूह-तनाव के अनेक कारण हैं। जाति, वर्ग, धर्म, सम्प्रदाय, क्षेत्र, भाषा, संस्कृति तथा सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक स्थिति आदि विभिन्न आधारों को लेकर समूह निर्मित हो जाते हैं। इन समूहों के निहित स्वार्थ तथा क्षुद्र मानसिकता के कारण पारस्परिक द्वेष तथा विरोध पनपते हैं जिनसे समूह-तनाव उत्पन्न हो जाता है।
समूह-तनाव के विभिन्न कारणों को निम्नलिखित दो प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-
(1) वातावरणीय कारण
(2) मनोवैज्ञानिक कारण।

(1) वातावरणीय कारण (Environmental Causes)
समूह-तनाचे को जन्म देने वाले प्रमुख वातावरणीय कारण निम्नलिखित हैं –

(i) ऐतिहासिक कारण- अनेक ऐतिहासिक कारण समूह-तनाव के लिए उत्तरदायी रहे हैं। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर मुसलमान, ईसाई तथा अन्य सम्प्रदायों के लोग बाहर से हमारे देश में आये। मध्यकाल में मुसलमान आक्रान्ताओं ने शक्ति और हिंसा के बल पर यहाँ के निवासियों का धर्म-परिवर्तन किया स्थान-स्थान पर मन्दिर लूटे और गिराये तथा उनकी जगह मस्जिदें बनायी गयीं। समय के साथ-साथ घाव भरते गये और हिन्दू-मुस्लिम संस्कृतियों में समन्वय हुआ। ये दोनों जातियाँ भारत की आजादी के लिए एकजुट होकर लड़ीं, आजादी तो मिली किन्तु ‘फूट डालो और राज्य करो की नीति का प्रयोग करके अंग्रेज शासक जाते-जाते हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य का जहर सींच गये। अधिकांश राजनीतिक दल अपनी स्वार्थ-सिद्धि हेतु देश की अनपढ़, भोली तथा धार्मिक अन्धविश्वासों से ग्रस्त जनता को पूर्वाग्रहों तथा तनाव से भर देते हैं जिससे साम्प्रदायिक तनाव बढ़ता है और संवेदनशील इलाकों में दंगे भड़कते हैं। उत्तर प्रदेश में अयोध्या से सम्बन्धित रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद, ऐतिहासिक कारण का एक प्रमुख उदाहरण है।

(ii) भौतिक कारण— किसी भी देश के प्राकृतिक भू-भाग, वहाँ के निवासियों की शरीर-रचना, वेशभूषा, खानपानं इत्यादि किसी विशेष क्षेत्र की ओर संकेत करते हैं। पूरा देश पर्वत, नदियों, वन, पठार तथा रेगिस्तान आदि भौतिक परिस्थितियों के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों में बँटा है। एक क्षेत्र के निवासी स्वयं को दूसरे से अलग समझने लगते हैं। विभिन्नता से उत्पन्न यह पृथकता ही पूर्वाग्रहों का कारण बनती है जिसके फलस्वरूप सामूहिक तनाव पैदा होते हैं।

(iii) सामाजिक कारण- समूह-तनाव की पृष्ठभूमि में अनेक सामाजिक कारण क्रियाशील होते हैं। दो वर्गों या सम्प्रदायों के बीच सामाजिक दूरी उनमें ऊँच-नीच की भावना में वृद्धि करती है जिससे विरोध तथा तनाव का जन्म होता है। हिन्दू और मुसलमानों के रीति-रिवाज, प्रथाएँ, परम्पराएँ, खान-पान तथा पोशाक कई प्रकार से एक-दूसरे से भिन्न हैं। हिन्दू गाय को पवित्र तथा माँ के समान मानते हैं, किन्तु मुस्लिम समुदाय में ऐसा नहीं है। दोनों वर्गों की ये विभिन्नताएँ उनकी विचारधाराओं को विपरीत दिशाओं में मोड़ देती हैं, जिसके परिणामस्वरूप समूह-तनाव पैदा होता है तथा साम्प्रदायिक उपद्रव होते हैं।

इसी प्रकार हिन्दू समाज में ब्राह्मण सर्वोच्च तथा शूद्र निम्नतम सामाजिक स्थिति रखते । हैं। क्षत्रिय की अपेक्षा ब्राह्मण शूद्र को अपने से बहुत हीन तथा नीचा समझते हैं। प्रत्येक ऊँची स्थिति वाला वर्ग अपने से नीची स्थिति वाले वर्ग का शोषण एवं उत्पीड़न करता है। इससे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सामाजिक दूरी बढ़ती जाती है और पूर्वाग्रह उत्पन्न होते हैं। पूर्वाग्रहों के कारण विभिन्न समूहों में तनाव की दशाएँ पैदा होती हैं।

(iv) धार्मिक कारण- भारत विविध धर्मों का देश है। शायद यहाँ विश्व के सभी देशों से अधिक धार्मिक विभिन्नता देखने को मिलती है। धर्म को समझने का आधार वैज्ञानिक और विवेकपूर्ण न होने के कारण विभिन्न धर्मावलम्बियों में आपसी अविश्वास, द्वेष, भय, विरोध, सन्देह तथा घृणा का भाव उत्पन्न हो गया है। हर एक धर्मावलम्बी अपने धर्म-विशेष को सर्वश्रेष्ठ तथा दूसरों को निम्न कोटि का तथा व्यर्थ समझता है। एक धर्म के लोग दूसरे पर छींटाकशी तथा आरोप-प्रत्यारोप लगाते हैं। इससे पूर्वाग्रहों तथा अफवाहों को बल मिलता है जिससे उत्पन्न तनाव की परिस्थितियाँ साम्प्रदायिक संघर्षों में बदल जाती हैं।

(v) आर्थिक कारण- दुनियाभर में आर्थिक विषमता और शोषण के आधार पर दो सबसे बड़े वर्ग बने हैं-शोषक और शोषित। स्पष्टतः पूँजीपति लोग ‘शोषक वर्ग’ के अन्तर्गत आते हैं, जबकि श्रमिक या मजदूर लोग ‘शोषित वर्ग के अन्तर्गत। शोषक (पूँजीपति) वर्ग, शोषित (श्रमिक) वर्ग का हर प्रकार से शोषण करता है। श्रमिकों की खून-पसीने की कमाई का अधिकतम लाभांश पूँजीपति लोग चट कर जाते हैं। इससे दोनों वर्गों के मध्य मतभेद और तनाव पैदा होते हैं जिसकी चरमावस्था ही वर्ग-संघर्ष है।

(vi) राजनीतिक कारण– अनेक राजनीतिक समस्याओं तथा सत्ता हथियाने के उद्देश्य से विभिन्न राजनीतिक दल एक-दूसरे की कठोर-से-कठोर आलोचना किया करते हैं। प्रत्येक दल दूसरे दलों की प्रतिष्ठा गिराने तथा उन्हें असफल करने के इरादे से राजनीतिक षड्यन्त्र रचता है। इन सभी बातों को लेकर एक़ राजनीतिक विचारधारा वाला समूह दूसरे समूहों के खिलाफ आन्दोलन चलाता है। जिससे तनाव पैदा होता है। सरकार द्वारा जनता के किसी वर्ग विशेष को प्रश्रय, अतिरिक्त लाभ या सुविधाएँ देने से भी यह समूह-तनाव उत्पन्न होता है।

(vii) सांस्कृतिक कारण –  सांस्कृतिक अलगाव भी समूह-तनाव का एक विशेष कारण है। किसी समुदाय विशेष की संस्कृति के विभिन्न अवयव हैं-उसके रीति-रिवाज, प्रथाएँ, परम्पराएँ, कला, साहित्य, धर्म तथा भाषी इत्यादि। सांस्कृतिक भिन्नता के आधार पर एक वर्ग स्वयं को दूसरों से पृथक समझने लगता है जिसके परिणामस्वरूप समूह-तनाव उत्पन्न होता है जिसकी परिणति संघर्ष में होती है।

(2) मनोवैज्ञानिक कारण (Psychological Causes)

सामान्यतया लोगों की दृष्टि में धर्म, सम्प्रदाय, जाति, वर्ग, भाषा तथा संस्कृति आदि वातावरणीय कारण ही समूह-तनाव के लिए उत्तरदायी हैं, किन्तु सत्यता यह है कि इन कारणों के अतिरिक्त कुछ मनोवैज्ञानिक कारणों की भी विशिष्ट भूमिका समूह-तनाव बढ़ाने के लिए उत्तरदायी है। समूह-तनाव के लिए उत्तरदायी प्रमुख मनोवैज्ञानिक कारणों का वर्णन निम्नलिखित है –

(i) पूर्वाग्रह– पूर्वाग्रह या पूर्वधारणा (Prejudice) से तात्पर्य किसी व्यक्ति, समूह, वस्तु या विचार के विषय में पूर्णतया जाने बिना, उसके अनुकूल या प्रतिकूल, अच्छा या बुरा निर्णय पहले से ही कर लेने से है। जेम्स ड्रेवर के अनुसार, “निश्चित वस्तुओं, सिद्धान्तों, व्यक्तियों के प्रति अनुकूल या प्रतिकूल अभिवृत्ति को, जिनमें संवेग भी सम्मिलित रहते हैं, पूर्वाग्रह कहते हैं। कभी-कभी ऐसा होता है कि भले ही हमने किसी व्यक्ति, समूह, वर्ग या वस्तु की सत्यता जानने का प्रयास किया हो अथवा नहीं, लेकिन हम किन्हीं कारणों से उनके विषय में पहले ही एक धारणा बना लेते हैं। हमारी यह पूर्वधारणा या विचार किसी तर्क या विवेक पर आधारित नहीं होता और न ही हम उसके सम्बन्ध में तथ्यों की छानबीन ही करते हैं; हम तो उसके विषय में एक निर्णय धारण कर लेते हैं-यही पूर्वाग्रह या पूर्वधारणा है क्योकि सम्बन्धित व्यक्ति का समूचा व्यक्तित्व इन्हीं पूर्वधारणाओं या पूर्वाग्रहों से ओत-प्रोत रहता है। अतः वह इन्हीं से प्रेरित होकर व्यवहार प्रदर्शित करता है जो समूह-तनाव, साम्प्रदायिक दंगों, उपद्रवों तथा अन्तर्राष्ट्रीय अशान्ति को जन्म देती है। स्पष्टतः पूर्वाग्रह, समूह-तनांव का एक अति महत्त्वपूर्ण एवं मौलिक कारण है।

(ii) अभ्यनुकूलन- अभ्यनुकूलन (Conditioning) का सिद्धान्त पूर्वाग्रहों के निर्माण में सहायक होता है और इस प्रकार समूह-तनाव का एक प्रमुख कारण बनता है। व्यक्ति जब शुरू में कुछ व्यक्तियों या वस्तुओं से विशेष प्रकार के अनुभव प्राप्त करता है तो वह उन विशेषताओं का सामान्यीकरण कर लेता है और उसे जाति या वर्ग-विशेष की सभी वस्तुओं या व्यक्तियों पर लागू कर देता है। उदाहरणार्थ-किसी विशुद्ध आचरण वाले ब्राह्मण परिवार का एक बच्चा अण्डे के सेवन को निरन्तर एवं बार-बार अधार्मिक एवं पाप कहते सुनता है। लगातार एक ही प्रकार की बात सुनते-सुनते उसके मन पर अण्डे के बुरे होने की स्थायी छाप पड़ जाती है। अब वह प्रत्येक अण्डा खाने वाले को अधार्मिक या पापी समझेगा और उससे घृणा करेगा। इसी भाँति एक समूह-विशेष के लोग प्रायः अभ्यनुकूलित होकर दूसरे समूह के लोगों के प्रति द्वेष, घृणा या विद्रोह की भावना से भर उठते हैं, जिसके फलस्वरूप समूह-तनाव उत्पन्न होता है।

(iii) तादात्म्य एवं अन्तःक्षेपण- व्यक्ति जिस परिवेश के घनिष्ठ सम्पर्क में रहता है उससे सम्बन्धित वर्ग, जाति या समूह के अन्य लोगों से वह अपना तादात्म्य स्थापित कर लेता है और उनसे आत्मीकरण कर लेता है। समनर (Sumner) ने इसे ‘अन्त:समूह’ (In-group) कहकर पुकारा है और अन्य समूहों को बाह्य-समूह (Out-group) का नाम दिया है। इन अन्त:समूहों तथा बाह्य-समूहों के मध्य संघर्ष, पूर्वधारणा को जन्म देता है। तादात्म्य एवं अन्तःक्षेपण की क्रिया से बनी यह पूर्वधारणा या पूर्वाग्रह ही समूह-तनाव का कारण बनती है।

(iv) सामाजिक दूरी- समाज के विभिन्न वर्गों में सामाजिक दूरी का होना भी तनाव की उत्पत्ति का कारण है। जब एक समूह के किसी दूसरे समूह के साथ किसी प्रकार के सम्बन्ध नहीं होते और उसके साथ सामाजिक व्यवहार भी नहीं होते तो इसे सामाजिक दूरी का नाम दिया जाता है। जिन समूहों में सामाजिक दूरी कम होती है उनमें प्रेम, मित्रता तथा निकट के सम्बन्ध स्थापित होते हैं, किन्तु जिनमें यह दूरी अधिक होती है उनमें पारस्परिक वैमनस्य तथा तनाव बढ़ते हैं। सामाजिक दूरी के अधिक होने से विभिन्न समूहों में तनाव उत्पन्न होते हैं।

(v) भ्रामक विश्वास, रूढ़ियाँ और प्रचार– विभिन्न विरोधी सम्प्रदायों में एक-दूसरे के प्रति भ्रामक रूढ़ियाँ, विश्वास तथा प्रचार चलते रहते हैं। रूढ़ियों का आधार साधारण रूप से परम्पराएँ होती हैं जिनके माध्यम से भ्रान्तिपूर्ण पूर्वधारणाओं का निर्माण होता है और ये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में चलती जाती हैं। सामाजिक सम्पर्क के अभाव में इन रूढ़ियों तथा विश्वासों को दूर करना भी सम्भव नहीं होता। इसी के फलस्वरूप ये शनैः-शनैः तनाव का कारण बन जाते हैं। इसी प्रकार भ्रामक प्रचार भी तनाव के कारण । भारत-पाक युद्ध के दौरान पाकिस्तान भारत के विषय में भ्रामक प्रचार करता है जिससे भारत में रहने वाले हिन्दू-मुस्लिम सम्प्रदायों में एक-दूसरे के प्रति अविश्वास एवं विद्वेष बढ़े और भारत में गृहयुद्ध छिड़ जाए।

(vi) मिथ्या-दोषारोपण- एक समूह द्वारा दूसरे समूह पर झूठे और मनगढ़न्त आरोप लगाना मिथ्या-दोषारोपण कहलाता है। इनका कोई तार्किक या वैज्ञानिक आधार नहीं होता। एक समूह अपने प्रतिद्वन्द्वी समूह को नीचा दिखाने के लिए उस पर मिथ्या-दोषारोपण करता है। इसमें अफवाहें, कार्टून, व्यंग्य, आर्थिक भेदभाव, कानून द्वारा सामाजिक-आर्थिक-प्रतिबन्ध लगाना, सम्पत्ति का विनाश तथा बेगारी करना इत्यादि सम्मिलित हैं। मिथ्या-दोषारोपण की क्रियाएँ उस समय अधिक प्रभावकारी हो जाती हैं जब एक वर्ग को यह भय सताने लगता है कि दूसरा वर्ग उससे आगे बढ़ जाएगा या अधिक शक्तिशाली बन जाएगा। इस प्रकार के व्यवहारों में एक उच्च समूह के लोग अपनी चिन्ताओं, भग्नाशाओं, निराशाओं तथा मानसिक संघर्षों को प्रक्षेपण सुरक्षा प्रक्रिया द्वारा अभिव्यक्त करते हैं।

(vii) व्यक्तित्व एवं व्यक्तिगत विभिन्नताएँ– अध्ययनों से पता चलता है कि जिन लोगों में समायोजन दोष तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी असन्तुलन पाया जाता है उनमें पूर्वाग्रहों की मात्रा सामांन्यजनों की अपेक्षा अधिक होती है। कुण्ठिते, असहिष्णु, आतंकित, असुरक्षित और मानसिक अन्तर्द्वन्द्व एवं हीन-भावना ग्रन्थियों से युक्त व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत विशेषताओं को पूर्वाग्रहों की सहायता से प्रकट करते हैं। यदि किसी समूह का नेता व्यक्तित्व के असन्तुलन एवं पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है तो उस स्मूह का अन्य समूहों से समूह-तनाव लगातार बना रहता है। स्पष्टतः व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक विभिन्नताओं के कारण जो समायोजन के दोष पैदा होते हैं, उनसे समूह-तनाव जन्म लेते हैं।
वस्तुत: समूह-तनाव के लिए हमेशा कोई एक कारण उत्तरदायी नहीं होता, अक्सर एक या एक से अधिक वातावरणीय या मनोवैज्ञानिक कारण मिलकर समूह-तनाव उत्पन्न करते हैं।

प्रश्न 2.
पूर्वाग्रह (Prejudice) से क्यो आशय है? पूर्वाग्रहों के विकास की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए इन्हें दूर करने के उपायों का भी उल्लेख कीजिए।
या
समाज में विभिन्न प्रकार के पूर्वाग्रहों का विकास क्यों होता है? उन्हें दूर करने के लिए क्या उपाय कर सकते हैं?
या
पूर्वाग्रह समूह-तनाव को किस प्रकार बढ़ाते हैं? पूर्वग्रह को दूर करने की विधियों का वर्णन कीजिए।(2010, 12)
या
पूर्वग्रहित निर्णय का अर्थ स्पष्ट कीजिए। पूर्वाग्रहित निर्णयों के विकास के कारणों का वर्णन कीजिए। (2015)
या
पूर्वग्रहित निर्णय का अर्थ स्पष्ट कीजिए। पूर्वग्रहित निर्णयों को कम करने की विधियाँ लिखिए। (2017)
उत्तर.

भूमिका
(Introduction)

प्रत्येक व्यक्ति समाजीकरण की प्रक्रिया के अन्तर्गत समाज के अन्य व्यक्तियों तथा समूहों के प्रति सम्बन्धात्मकं या द्वेषात्मक या घृणात्मक प्रवृत्तियाँ विकसित करता है। व्यक्ति जिस समूह को सदस्य होता है, वह समूह उसे दूसरे समूहों के प्रति पूर्वाग्रही बना देता है। पूर्वाग्रह का प्रभाव इतना गहरा होता है कि व्यक्ति यह नहीं समझ पाता कि वह किन्हीं व्यक्तियों या समूहों के प्रति पूर्वाग्रही भी है। पूर्वाग्रह से ग्रस्त व्यक्ति को प्रत्येक विचार, भावना अथवा क्रिया पूरी तरह से सहज एवं स्वाभाविक प्रतीत होती है और वह अपने पूर्वाग्रहयुक्त व्यवहार को सामान्य व्यवहार समझता है। पूर्वाग्रह समूह-तनाव के लिए आधारभूत मनोवैज्ञानिक कारण है। पूर्वाग्रहों के विकास के साथ-ही-साथ समूह-तनाव का भी विकास होता है।

पूर्वाग्रह का आशय
(Meaning of Prejudice)

लैटिन भाषा का एक शब्द है प्रीजूडिकम (prejudicum) जिसका शाब्दिक अर्थ है-‘पूर्व निर्णयों पर आधारित निर्णय’। पूर्वाग्रह में किसी बात की जाँच या परीक्षा करने से पहले ही उसके सम्बन्ध में कोई निश्चित विश्वास और अभिवृत्ति बना ली जाती है, अर्थात् पूर्वाग्रह एक ऐसा निर्णय होता है जो तथ्यों के समुचित परीक्षण के पूर्व ही ले लिया जाता है। इस भॉति, पूर्वाग्रह को शीघ्रतापूर्वक लिया गया या अपरिपक्व निर्णय कहा जा सकता है। इसमें सन्देह नहीं कि पूर्वाग्रह अनुचित और अविवेकपूर्ण होते हैं। उदाहरण के तौर पर भारतीय समाज में प्रायः ऊँची जाति के लोग अनुसूचित जाति के लोगों को अस्पृश्य समझते हैं और उन्हें छूने से परहेज करते हैं। यह एक पूर्वाग्रह है। इसी प्रकार युद्धप्रिय कबीलों या समूहों में जन्म लेने वाले बालकों को इस भाँति पाला-पोसा और प्रशिक्षित किया जाता है कि उनमें शत्रु के प्रति द्वेषात्मक एवं घृणात्मक प्रवृत्तियाँ विकसित हो जाती हैं। बालकों की ऐसी प्रवृत्तियाँ एवं व्यवहार के प्रतिमान सहज, सामान्य तथा सामाजिक दृष्टि से स्वीकृत समझे जाते हैं। इतना ही नहीं बल्कि होता यह है कि जो बालक बड़े होकर इन प्रवृत्तियों/प्रतिमानों के अनुरूप व्यवहार नहीं करते, वे अपने समूह से बहिष्कृत और अपने समूह की सुरक्षा के प्रति खतरा समझे जाते हैं। समूह या कबीला इसके लिए उन्हें दण्ड भी दे सकती है। निष्कर्षतः व्यक्तिगत, समूहगत, पारस्परिक वृत्तियों एवं विश्वासों के आधार पर किसी समूह, समुदाय, सम्प्रदाय, वर्ग, क्षेत्र, मत-मजहब या भाषा के प्रतिकूल या अनुकूल जब कोई धारणा निर्मित कर ली जाती है तो उसे पूर्वाग्रह (Prejudice) कहते हैं।

पूर्वाग्रह की परिभाषा
(Definition of Prejudice)

पूर्वाग्रह को विभिन्न विद्वानों द्वारा निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया गया है
(1) क्रेच और क्रचफील्ड के अनुसार, “पूर्वाग्रह उन अभिवृत्तियों तथा विश्वासों को कहा जाता है जो व्यक्तियों को अनुकूल तथा प्रतिकूल स्थिति में रखते हैं। …………….. जातीय पूर्वाग्रह किसी अल्पसंख्यक, जातीय, नैतिक और राष्ट्रीय समूह के प्रति उन मनोवृत्तियों तथा विश्वासों को कहते हैं जो उस समूह के सदस्यों के लिए प्रतिकूल होते हैं।”

(2) जेम्स ड्रेवर के मतानुसार, “निश्चित वस्तुओं, सिद्धान्तों, व्यक्तियों के प्रति अनुकूल या प्रतिकूल अभिवृत्ति को, जिसमें संवेग भी सम्मिलित रहते हैं, पूर्वाग्रह कहते हैं।”
क्रेच एवं क्रचफील्ड तथा जेम्स ड्रेवर की उपर्युक्त दोनों परिभाषाओं में दो शब्दों का प्रयोग मिलता है, ये हैं-‘अभिवृत्ति’ और ‘विश्वास’। पूर्वाग्रह को समझने के लिए इन दोनों शब्दों से परिचित होना आवश्यक है।

अभिवृत्ति एवं विश्वास (Attitudes and Believes)-अभिवृत्ति एक मानसिक एवं स्नायविक तत्परता है जिसका प्रभाव व्यक्ति के समस्त व्यवहारों पर पड़ता है। इसी भाँति, प्रत्येक व्यक्ति का अपना अलग एक संसार होता है जिसमें अपनी देखी हुई तथा जानी हुई बातों के आधार पर वह कुछ विश्वासं निर्मित कर लेता है। विश्वास अच्छे-बुरे अथवा सही-गलत कुछ भी हो सकते हैं। किन्तु ये विश्वास उस व्यक्ति को एक सुनिश्चित व्यवहार प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

क्रेच तथा क्रचफील्ड ने अभिवृत्ति एवं विश्वास को इस प्रकार परिभाषित किया है-“व्यक्ति से सम्बन्धित समुदाय के कुछ पक्षों के प्रति प्रेरणात्मक, संवेगात्मक, प्रत्यक्षात्मक तथा ज्ञानात्मक प्रक्रियाओं के स्थायी संगठन को अभिवृत्ति कहते हैं।” तथा “व्यक्ति से सम्बन्धित समुदाय के कुछ पक्षों के प्रति प्रत्यक्षीकरण तथा ज्ञान के स्थायी संगठन को विश्वास कहा जाता है।”

पूर्वाग्रहों का विकास (पूर्वाग्रहों के विकास के कार्यकारी कारक)
(Development of Prejudices)

पूर्वाग्रहों के विकास में अनेक तत्त्व कार्य करते हैं, जिनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत है |

(1) अभ्यनुकूलन (Conditioning)- अभ्यनुकूलन पूर्वाग्रहों के विकास में एक महत्त्वपूर्ण अवयव है। इसके द्वारा विकसित पूर्वाग्रह अत्यन्त सरल प्रकार के होते हैं तथा इनको जल्दी ही दूर कर लिया जा सकता है। गार्डनर मर्फी नामक मनोवैज्ञानिक ने पूर्वाग्रह के निर्माण तथा विकास की प्रक्रिया में अभ्यनुकूलन का योगदान स्पष्ट किया है। मर्फी के अनुसार हम किसी धार्मिक रीति-रिवाज, समुदाय, भाषा या वर्ग के प्रति पूर्वाग्रहों से ग्रसित हो जाते हैं और इस भॉति निर्मित पूर्वाग्रह विकसित होकर व्यक्ति के सामान्य अनुभवों का अंग बन जाते हैं। उदाहरण के लिए—माना कोई बालक लम्बी-चौड़ी कद-काठी, दाढ़ी-मूंछ वाले किसी कुरूप तथा डरावने व्यक्ति को लड़ते हुए देख लेता है तो वह उससे भयभीत हो जाता है तथा बचने का प्रयास करता है। इस प्रकार उसके मन में यह विश्वास उत्पन्न हो जाता है कि ऐसे व्यक्ति क्रूर, निर्दयी तथा आततायी होते हैं। भविष्य में उसका यह आग्रह समूचे समुदाय या जाति पर लागू हो जाता है। इस प्रकार का पूर्वाग्रह अभ्यनुकूलन के कारण से ही विकसित हुआ।

(2) आत्मीकरण तथा अन्तःक्षेपण (Identification and Interjection)– किम्बाल यंग के मतानुसार, “आन्तरिक समूह तथा बाह्य समूह के पारस्परिक संघर्ष पूर्वाग्रहों को जन्म देते हैं।” मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि में अनेक प्रकार के समूहों की उपस्थिति-मात्र से ही पूर्वाग्रहों का जन्म नहीं होता, संघर्ष तो समूहों में भेदभाव के कारण उत्पन्न होता है। यदि सभी जातियों, सम्प्रदायों में आपसी भेदभाव नहीं है तो ऐसी दशा में पूर्वाग्रहों की उत्पत्ति नहीं होगी। वस्तुतः जब व्यक्ति अपने तथा बाहरी समाज के बीच अन्तर समझने लगता है तो यह अन्तर ही उस व्यक्ति में पूर्वाग्रहों को विकसित करता है ।

‘आत्मीकरण’ की प्रक्रिया के अन्तर्गत बालक स्वयं को अपने परिवार के अनुकूल ढालने का प्रयास करता है तथा परिवार के रीति-रिवाजों, प्रथाओं एवं परम्पराओं को आत्मीकृत कर लेना चाहता है जिसके परिणामस्वरूप उसके मस्तिष्क पर विभिन्न प्रकार के पूर्वाग्रहों का विकास समाज के विभिन्न समुदायों, वर्गों तथा जातियों के प्रति होने लगता है।

बड़ा होने पर बालक समाज की कई संस्थाओं; जैसे—स्कूल, धर्मस्थल, क्रीड़ास्थल तथा सामुदायिक क्लबोंके सम्पर्क में आता है और विविध अनुभव प्राप्त करता है। इसके फलस्वरूप उसके मन में विभिन्न धर्मों, वर्गों, जातियों, सम्प्रदायों, भाषाओं तथा क्षेत्रों के प्रति एक विशिष्ट पृष्ठभूमि और विचारधारा निर्मित हो जाती है। अब उसके सामने दो समाज होते हैं—एक अपना निजी समाज तथा दूसरा बाहरी समाज। दोनों समाजों के बीच वह एक अन्तर का बोध करने लगता है और इस प्रकार उसमें पूर्वाग्रह विकसित हो जाते हैं।

(3) व्यक्तिगत एवं सामाजिक सम्पर्क (Personal and Social Contact)- शुरू में बालक अपने माता-पिता तथा परिवारजनों के सम्पर्क में आता है। इस छोटे-से क्षेत्र में ही उसे प्राथमिक अनुभव होते हैं जो आयु वृद्धि के साथ-साथ पास-पड़ोस, गली-मुहल्ले, नगर और इस भाँति बाहरी समाज तक फैल जाते हैं। यहाँ बालक को दोनों ही प्रकार के अनुभव होते हैं कुछ खट्टे तो कुछ मीठे, कुछ प्रतिकूल तो कुछ अनुकूल। बाहरी समाज के व्यवहार से दुःख या पीड़ा महसूस होने पर बालक को कटु अनुभव होते हैं और वह उस समाज को अपने विरुद्ध समझकर उसके प्रति पूर्वाग्रह विकसित कर लेता है। सुखकारी अनुभव अनुकूल पूर्वाग्रहों की उत्पत्ति करते हैं तथा उन्हें विकसित करते हैं।

(4) सामाजिक दूरी (Social Distance)- सामाजिक दूरी का अभिप्राय है, एक समूह का दूसरे समूह से अलगाव अर्थात् उनमें पारस्परिक व्यवहार का अभाव और इस भॉति उनके बीच आपसी सम्बन्धों का न होना। सामाजिक दूरी रखने वाले समूहों के रीति-रिवाज, प्रथाएँ, परम्पराएँ, आस्थाएँ और सामाजिक व्यवहार भी पृथक् ही होते हैं। इससे आपसी तनाव बढ़ता है। प्रायः परस्पर विरोधी समूह एक-दूसरे को घृणा व सन्देह की दृष्टि से देखते हैं, एक-दूसरे को अपने से हीन मानते हैं, एक-दूसरे के विरुद्ध अफवाहें फैलाते हैं तथा घृणास्पद प्रचार करते हैं। इसके फलस्वरूप उनमें परस्पर तनाव उत्पन्न हो जाता है और संघर्ष प्रबल हो जाता है। भारतीय समाज में धार्मिक, साम्प्रदायिक, जातीय, क्षेत्रीय तथा भाषायी तनाव अक्सर दखने में आते हैं। इस प्रकार सामाजिक दूरी के आधार पर पूर्वाग्रहों का विकास होता है।

(5) व्यक्तित्व (Personality)- मनोवैज्ञानिक खोजों से ज्ञात हुआ है कि समाज में असन्तुलित व्यक्तित्व वाले तथा कुसमायोजित लोग, आम लोगों की अपेक्षा, पूर्वाग्रहों से अधिक ग्रस्त पाये जाते हैं। वस्तुत: ऐसे लोग अपनी मानसिक कुण्ठाओं, मनोविकारों, भय या असुरक्षा की भावना को पूर्वाग्रहों के मध्यम से प्रकट करते हैं और समाज में तनाव के बीज आरोपित कर देते हैं। ऐसे व्यक्ति यदि किसी समूह, समुदाय, क्षेत्र या मजहब के नेता हों तो वह सामूहिक तनाव सतत प्रबल होता जाता है। कुछ स्वार्थी नेता तथाकथित निम्न तथा उच्च जातियों के बीच भेदभाव उत्पन्न करके जातीय तनाव बढ़ा देते हैं। इस प्रकार व्यक्तित्व के कारण भी पूर्वाग्रहों का विकास होता है।

(6) मिथ्या-दोषारोपण (Scapegoating)– मिथ्या-दोषारोपण के माध्यम से एक समूह अपने विरोधी समूह के विरुद्ध झूठी तथा भ्रामक बातों को प्रचार करता है। इन आरोपों के पीछे कोई तर्क या वैज्ञानिक आधार नहीं होता। मिथ्या-दोषारोपण में एक समूह सम्भाषण, समाचार-पत्र, मंच, रेडियो तथा टी० वी० आदि के माध्यम से दूसरे समूह के विरुद्ध विरोधी प्रचार करता है। कभी-कभी तो यह आलोचना इतनी उत्तेजनापूर्ण एवं घृणित हो जाती है कि विरोधी समूहों में खुला व रक्तपातपूर्ण संघर्ष शुरू हो जाता है। स्पष्टतः मिथ्या-दोषारोपण पूर्वाग्रहों के विकसित होने का महत्त्वपूर्ण कारक हो जाता है।

(7) रूढ़ियाँ (Stereotypes)- प्रसिद्ध विद्वान् किम्बाल यंग के मतानुसार, “रूढ़ियाँ एक बेकार की धारणा हैं जो किसी समूह के ऐसे लक्षणों को व्यक्त करने के लिए बनायी जाती हैं, जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता।” रूढ़ियाँ ऐसी प्रतिमाएँ हैं जो व्यक्ति विशेष के मन में किन्हीं समूहों के प्रति दुराग्रह, द्वेष या घृणा के कारण निर्मित हो जाती हैं। रूढ़ियाँ आधारहीन व परम्परागत होती हैं। तथा भाषा एवं संस्कारों के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली होती हैं। किस्से, कथा एवं कहानियाँ इन रूढ़ियों को पोषित करते हैं। रूढ़ियों का सम्बन्ध क्योंकि मानसिक क्रियाओं; यथा-संवेगों व प्रेरणाओं से होता है; अत: ये मानव-जीवन पर सदैव किसी-न-किसी रूप में असर डालती हैं। रूढ़ियों से परिचालित मानव-व्यवहार पूर्वाग्रहों में रूपान्तरित तथा विकसित हो जाता है और समूह-तनावों का कारण बनता है।

पूर्वाग्रह दूर करने के उपाय
(Remedies for the Removal of Prejudices)

आधुनिक भारतीय समाज एक बहुलवादी एवं प्रतियोगितावादी समाज है, जहाँ व्यक्ति को पूर्वाग्रह की ओर ले जाने वाले कई रास्ते हैं और इन रास्तों पर चलने में कोई कठिनाई भी नहीं होती है। साथ ही, यह पूर्वाग्रहों की सार्वभौमिकता भी सामान्य है, किन्तु अनेक पूर्वाग्रह मानव-समाज के लिए अत्यन्त घातक हैं जिनका डटकर मुकाबला किया जाना चाहिए तथा जिन्हें दूर करने के भरसक एवं तत्काल कदम उठाये जाने चाहिए। ऐसे ही कुछ उपाय निम्नलिखित रूप में उल्लिखित हैं –
(1) सम्पर्क – मनोवैज्ञानिकों का विचार है कि विभिन्न समूहों के बीच पूर्वाग्रहों को कम करने के लिए उनमें परस्पर सम्पर्क वृद्धि अनिवार्य है। इसका सर्वोत्तम उपाय है कि सभी समूहों को एक-दूसरे के समीप लाया जाये और उन्हें ऐसी परिस्थतियों के अन्तर्गत रखा जाये कि सभी समूह परस्पर परिचित हों और उनमें मेल-मिलाप बढ़ सके। सम्पर्क वृद्धि के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है –

  1. पूर्वाग्रह को दूर करने के लिए समूह का प्रत्येक सदस्य विभिन्न परिस्थितियों (जैसे – कॉलेज या नौकरी) में बराबरी के स्तर पर प्रतिभागिता करे।
  2. सभी को यह ज्ञात हो कि वे एक समान लक्ष्य के लिए कार्य कर रहे हैं।
  3. इस प्रकार कार्य-समूह द्वारा सफलता प्राप्त करने पर पूर्वाग्रह समाप्त हो जाते हैं और घनिष्ठता विकसित होती है; अतः सफलता महत्त्वपूर्ण कारक है।
  4. समूह के सभी सदस्यों को विचाराभिव्यक्ति का पूरा अवसर मिलना चाहिए तथा उनकी निर्णय लेने में भागीदारी होनी चाहिए।

(2) शिक्षा- शिक्षा पूर्वाग्रहों को दूर करने का सशक्त साधन है। शिक्षित व्यक्ति बिना सोच-विचार किये किसी बात पर विश्वास नहीं करता, वह उसे पहले तर्क की कसौटी पर कसता है। इसके अतिरिक्त शिक्षा दूसरे समूहों के बारे में सूचनाएँ प्रदान करती है, जिसके फलस्वरूप लोगों में दूसरों के प्रति स्वीकृत्यात्मक भावनाएँ विकसित होती हैं। शोध अध्ययनों के निष्कर्ष बताते हैं कि अशिक्षित लोगों की तुलना में कॉलेज स्तर के शिक्षित लोगों में बहुत कम पूर्वाग्रह देखने में आये हैं।

(3) सामाजिक-आर्थिक समानता– समाज के विभिन्न वर्गों, समूहों या समुदायों में पारस्परिक तनाव एवं संघर्ष का एक प्रमुख कारण समाज में व्याप्त सामाजिक-आर्थिक विषमता है। सामाजिक संघर्ष का एक बड़ा कारण धनी एवं निर्धनों के बीच भारी विषमता है। अतः सामाजिक एवं आर्थिक सुधारों के द्वारा पूर्वाग्रहों को कम और दूर किया जा सकता है।

(4) भावात्मक एकता- भावात्मक एकता स्थापित कर भी पूर्वाग्रहों को एक बड़ी सीमा तक समाप्त किया जा सकता है। इसके लिए राष्ट्रीय उत्सवों तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। भावनात्मक एकता का पूर्वाग्रहों पर गहरा प्रभाव दृष्टिगोचर होता है।

(5) सन्तुलित व्यक्तित्व– असन्तुलित व्यक्तित्व के कारण भी पूर्वाग्रह पनपते हैं। असन्तुलित व्यक्तित्व तथा असमायोजन दोष के कारण अविश्वास उभरता है तथा दूषित अभिवृत्तियाँ जन्म लेती हैं। सन्तुलित व्यक्तित्व भग्नाशा, असहिष्णुता हीन-भावना तथा मानसिक संघर्ष को कम करता है और इस भाँति विरोधी समूहों पर दोषारोपण के अवसर कम होते जाते हैं।

(6) चेतना का स्तर- पूर्वाग्रह दूर करने का एक उत्तम उपाय है-चेतना जाग्रत करना। चेतना के जागरण से वैकल्पिक यथार्थों का निर्माण होता है तथा समूह के सदस्य अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों तथा उत्पीड़क प्रभावों के प्रति संवेदनशील बनते हैं। उनमें सामूहिक शक्ति, एकता की भावना तथा सामूहिक प्रतिरक्षा की भावना विकसित होती है।

प्रश्न 3.
समूह – तनाव को दूर करने के उपाय बताइए।
या
समूह-तनाव का निराकरण किस प्रकार किया जा सकता है? उदाहरण सहित विवरण दीजिए।
उत्तर.

समूह-तनाव के निवारण की विधियाँ
(Measures to Remove the Group Tension)

आज हमारे देश में समूह-तनाव की समस्या ने गम्भीर रूप धारण कर लिया है। इसे दूर करने के लिए उन सभी कारणों का निवारण करना होगा जो तनाव की उत्पत्ति एवं विकास के लिए उत्तरदायी हैं। समूह-तनाव की समाप्ति के लिए अभी तक कोई प्रभावशाली मनोवैज्ञानिक उपाय नहीं खोजे जा सके हैं, अत: सामान्य रूप से परम्परागत विधियों से समूह-तनाव को कम करने का प्रायस किया जाता है। समूह-तनाव पारिवारिक वातावरण में जन्म लेते हैं। पड़ोस, विद्यालय तथा खेल के मैदान में इन्हें शक्ति मिलती है तथा साम्प्रदायिक राजनीतिक दलों, पुस्तकों, समाचार-पत्रों तथा भाषणों द्वारा इनका पोषण किया जाता है।

विभिन्न प्रकार के समूह-तनावों के निवारण हेतु निम्नलिखित सामान्य उपाय काम में लाये जाते हैं –

(1) व्यक्तित्व का सन्तुलित विकास (Harmonious Development of Personality)- समूह तनाव को दूर करने के लिए जीवन के प्रारम्भिक चरण से ही व्यक्तित्व का सन्तुलित विकास आवश्यक है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, व्यक्तित्व का सन्तुलन बिगड़ने से मानसिक स्वास्थ्य खराब होता है जिससे संघर्ष और तनाव जन्म लेते हैं। व्यक्तित्व का सन्तुलित विकास व्यक्ति को पूर्वाग्रहों या पूर्णधारणाओं से मुक्त रखता है और वह जीवन के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण अपनाने में सफल होता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए मानसिक स्वास्थ्य, विज्ञान के प्रचार-प्रसार, समायोजन दोषों के उपचार तथा निर्देशन-सेवाओं के विस्तार की अत्यधिक आवश्यकता है।

(2) उचित शिक्षा (Proper Education)– उपयुक्त शिक्षा समूह-तनावों को दूर करने का सबसे प्रभावशाली माध्यम है। शिक्षा की कमी और बाह्य समूहों के प्रति अज्ञानता के कारण विभिन्न वर्गों के बीच तनाव बढ़ते हैं। शिक्षा की रूपरेखा इस प्रकार तैयार की जानी चाहिए कि विभिन्न क्षेत्रों या प्रान्तों के निवासी एक-दूसरे की भाषा, संस्कृति, बोल- चाल, रहन-सहन और भावनाओं को उचित सम्मान दे सकें; वे संकीर्णता के स्थान पर उदार दृष्टिकोण अपना सकें। प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री के०जी० सैन्यदेन का मत है कि समूह-तनाव की रोकथाम के लिए बालकों के लिए विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों तथा सम्प्रदायों को मूल्यवान बातों की शिक्षा की व्यवस्था की जाए ताकि वे एक-दूसरे की संस्कृति, धर्म तथा सम्प्रदाय को भली-भाँति समझ सकें।

पाठ्यक्रम पुस्तकें तथा मनोरंजन सम्बन्धी साहित्य का चयन करते समय बालकों के संवेगात्मक तथा उचित विकास व अभिवृत्ति निर्माण का ध्यान रखा जाये। शिक्षक पूर्वाग्रहों से मुक्त हों तथा स्वस्थ-सन्तुलित व्यक्तित्व वाले हों। उन्हें चाहिए कि बालकों को आपसी घनिष्ठ मित्रता के लिए प्रोत्साहित करें। विद्यालयों में प्रजातान्त्रिक नियमों तथा विश्व-बन्धुत्व की भावना को समर्थन मिलना चाहिए। वस्तुत: एक-दूसरे के प्रति सहिष्णुता, सद्भाव, प्रेम एवं अच्छी सोच पैदा करने वाली शिक्षा ही समूह-तनाव को कम कर सकती है।

(3) सामाजिक सम्पर्क (Social Contact)— समूह-तनाव का एक प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण कारण सामाजिक दूरी है। सामाजिक दूरी को कम करने के लिए समाज में स्थित विभिन्न समूहों को एक-दूसरे के अधिकाधिक निकट सम्पर्क में लाने का प्रयास किया जाना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि विभिन्न धर्मों, सम्प्रदायों, वर्गों तथा जातियों के व्यक्तियों को परस्पर मिलजुलक्रः कार्य करने एवं सास्कृतिक अवसरों पर व्यक्तिगत रूप से सम्पर्क साधने का अवसर प्रदान किया जाए। अध्ययन एवं अनुभव बताते हैं कि जिन नगरों में सामाजिक सम्पर्क बढ़ता है, वहाँ समूह-तनाव में निरन्तर कमी आती जाती है।

(4) व्यापक आदर्श एवं लक्ष्य (Wide Ideals and Goals)- समूह-तनाव का एक मुख्य कारण यह है कि सामान्यतया विभिन्न जातियों, वर्गों, सम्प्रदायों, अलग-अलग प्रान्तों में रहने वाले विभिन्न भाषा-भाषियों के परस्पर विरोधी आदर्श एवं लक्ष्य होते हैं। इनसमेहों की अभिवृत्ति, विश्वासों तथा संवेगों को किसी उच्च आदर्श तथा व्यापक लक्ष्य की ओर मोड देने से आपसी भेदभाव तथा संकीर्णता समाप्त होगी; अतः पूरे समाज में ऐसे व्यापक आदर्शों और लक्ष्यों की स्थापना की जानी चाहिए जो सर्वमान्य हों और जिन्हें प्राप्त करने में सभी लोग प्रयत्नशील हों।

(5) सामाजिक सुधार (Social Reformation)– सामाजिक सुधार समूह-तनावों को दूर करने में एक पर्याप्त सीमा तक सहायक होते हैं। इसके लिए समाज के विभिन्न समूहों के सामाजिक दोषों, कुरीतियों, गलत प्रथाओं व परम्पराओं और अन्धविश्वासों में सुधार लाना परम आवश्यक है। समाज सुधार कार्यक्रमों से सामाजिक जागृति आती है, आपसी भेदभाव दूर होते हैं तथा स्वस्थ समझ-बूझ पैदा होती है।

(6) आर्थिक सुधार (Economic Reformation)- प्रायः देखा गया है कि विभिन्न समूहों की आर्थिक समस्याओं से समूह-तनाव का जन्म होता है। अत: आर्थिक विषमता दूर करने की दृष्टि से सम्बन्धित वर्गों या समूहों की आर्थिक दशा में सुधार वांछित है। आर्थिक उन्नति के लिए कृषि तथा उद्योग-धन्धों को बढ़ावा मिलना चाहिए तथा उत्पादित सामग्री का विवेकपूर्ण तरीकों से वितरण किया जाना चाहिए। अर्थशास्त्रियों का सुझाव है कि आर्थिक दशा में सुधार से समूह-तनाव कम होंगे।

(7) वैधानिक सुधार (Legal Reformation)– समूह-तनाव को समाप्त करने के लिए विधि (कानून) की भी सहयता ली जा सकती है। ऐसे विचारों, कार्यक्रमों, प्रथाओं तथा परम्पराओं पर कानूनी रोक लगा देनी चाहिए जो जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रीयता तथा साम्प्रदायिक उन्माद बढ़ाते हों। इस प्रकार की भावनाओं को प्रोत्साहित करने वालों तथा अफवाहें फैलाने वालों को कठोर दण्ड दिया जाना एवं इनके विरुद्ध जनमत तैयार करना भी आवश्यक है। कानून का सहारा लेकर छुआछूत को कम किया जा सकता है; इससे सामाजिक सम्पर्को में वृद्धि होगी। भारतीय संविधान द्वारा पिछड़े लोगों, अछूतों, अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा आदिवासियों के लिए सरकारी नौकरियों में स्थान सुरक्षित किये गये हैं।

(8) युवकों का संगठन (Youth Organization)- राष्ट्रीय स्तर पर युवकों के ऐसे संगठन निर्मित किए जाएँ जिनमें विभिन्न जातियों, वर्गों, सम्प्रदायों, क्षेत्रों, भाषा-भाषियों तथा धर्मों के लोग एक साथ एकत्र होकर सामूहिक कार्यों में भाग ले सकें तथा एक-दूसरे से सद्भाव बढ़ा सकें। भारतीय विश्वविद्यालयों में प्रत्येक वर्ष मनाए जाने वाला ‘युवक समारोह’ (Youth Festival) इसी आशय से निर्मितँ एक संगठन है।

(9) स्वस्थ साहित्य का निर्माण (Formation of Health Literature)– साहित्य एक प्रबल एवं प्रभावशाली माध्यम है। इसका उपयोग समूह तनाव कम करने हेतु किया जाना चाहिए। समूह-तनाव को रोकने के लिए दो कदम उठाने होंगे-एक, समूह-तनाव को प्रोत्साहित करने वाले साहित्य पर प्रतिबन्ध लगाने होंगे तथा दो, स्वस्थ साहित्य का सृजन किया जाना चाहिए ताकि लोगों में उदारता, सहयोग, मैत्री तथा विश्वबन्धुत्व की भावनाओं का उदय एवं विकास हो सके।

(10) सामाजिक समायोजन में वृद्धि (Increasing Social Adjustment)- समूह-तनाव में कमी लाने के लिए सामाजिक समायोजन में अधिक-से-अधिक वृद्धि आवश्यक है। विभिन्न समाजसेवी संस्थाओं तथा सरकारी संस्थानों का कर्तव्य है कि वे सामाजिक कुसमायोजन (Social Mal-adjustment) को दूर करने के लिए अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह करें तथा लोगों के संवेगात्मक विकास को सन्तुलित बनाए रखने के लिए निरन्तर प्रयास करें। एक समूह से दूसरे समूहों के प्रति भय, कुण्ठा, राग-द्वेष, क्रोध, घृणा, द्वेष, सन्देह तथा विरोध’को निकालने हेतु समाज में अनुकूल वातावरण तैयार किया जाना आवश्यक है।

(11) स्वस्थ प्रचार (Healthy Propaganda)- आधुनिक काल की जनतान्त्रिक शासन प्रणालियों में प्रचार का विशेष महत्त्व है। विभिन्न प्रचार साधनों तथा जनसंचार का उपयोग सकारात्मक अभिवृत्तियों, विश्वासों, पूर्वाग्रहों, मूल्यों, मतों तथा विचारों के निर्माण में किया जाना चाहिए। इसके साथ-साथ, भ्रामक एवं दूषित प्रचार पर पाबन्दी भी लगनी चाहिए। समूह-तनाव के विरुद्ध सफल प्रचार वह है जिसमें पहले से मौजूद विश्वासों तथा अभिवृत्तियों को सहारा लिया जाता है एवं उन्हें शनैः-शनैः बदलने की कोशिश की जाती है।

इसके विपरीत, नकारात्मक प्रचार से अन्धविश्वास, भ्रामक एवं गलत तथ्य जनता तक पहुँचते हैं, जिससे गलतफहमियाँ उत्पन्न होती हैं और समूहों में तनाव व संघर्ष का जन्म होता है; अतः भ्रामक एवं गलत प्रचार पर रोक लगाई जानी चाहिए तथा साम्प्रदायिक उन्माद बढ़ाने वाले प्रचारकों को कठोर दण्ड दिया जानी चाहिए। समूह-तनाव के निवारण के लिए राष्ट्रव्यापी स्वस्थ जनमत निर्माण आवश्यक एवं लाभकारी है। इसके लिए वांछित प्रचार-तन्त्र में पत्र-पत्रिकाओं, सम्पादकों, रेडियो, टी० वी०, सिनेमा, सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनीतिक नेताओं तथा आदर्श शिक्षकों की सेवाएँ महत्त्वपूर्ण हैं।

(12) समूह-तनाव पर अनुसन्धान (Research work on Group Tension)समूह- तनाव पर अंकुश लगाने के लिए विशेष अध्ययनों तथा अनुसन्धानों की आवश्यकता है। इसके लिए देश-विदेश के लिए मनोवैज्ञानिकों, समाजशास्त्रियों व विभिन्न विषयों के विद्वानों तथा विचारकों को अथक प्रयास करने होंगे। इस दृष्टि से समूह-तनावों के विविध स्वरूपों, कारणों तथा उन्हें दूर करने के उपायों पर अनुसन्धान कार्य की आवश्यकता है।

प्रश्न 4
जातिवाद से क्या आशय है? जातिवाद के मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए। जातिवाद को कैसे समाप्त किया जा सकता है?
या
जातिवाद से आप क्या समझते हैं? जातिवाद के क्या कारण हैं? इन्हें दूर करने के आवश्यक उपाय क्या हैं?
या
जातिवाद के कारण लिखिए। जातिवाद से उत्पन्न तनाव को कैसे रोका जा सकता है?
उत्तर

जातिवाद का अर्थ
(Meaning of Casteism)

भारत में जातिवाद प्राचीनकाल की वर्ण-व्यवस्था के विचार से जुड़ा है। सर्वमान्य रूप से विभिन्न वर्गों में विभाजित प्राचीन भारतीय समाज में वर्गीकरण का आधार वर्णाश्रम व्यवस्था थी, जिसके अन्तर्गत समाज को चार वर्गों (वर्गों) में विभक्त किया गया था—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। तत्कालीन भारतीय मनीषियों ने इन चारों वर्षों के कार्य भी निर्धारित कर रखे थे-ब्राह्मण अध्ययन-अध्यापन का कार्य, क्षत्रिय शासन तथा राज्य की सुरक्षा सम्बन्धी कार्य, वैश्य व्यापार सम्बन्धी कार्य तथा शूद्र सेवा के कार्य करते थे। ये कार्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तान्तरित होते चलते थे। शनैः-शनै: यह वर्ण-व्यवस्था ही जाति-प्रथा में बदल गयी। जाति-व्यवस्था के अन्तर्गत समूची भारतीय समाज जातियों तथा उपजातियों में विभाजित हुआ। इस भाँति, भारत में जातिवाद की उत्पत्ति हुई जो धीरे-धीरे विकसित होकर ज्वलन्त प्रश्नचिह्न के रूप में उभरी है।

“जातिवाद किसी एक जाति या उपजाति के सदस्यों की वह भावना है जिसमें वे देश, अन्य जातियों या सम्पूर्ण समाज के हितों की अपेक्षा अपनी जाति या समूह के सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक हितों या लाभों को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।’ ब्राह्मणवाद, वणिकवाद, कायस्थवाद, जाटवाद और अहीरवाद आदि-आदि जातिवाद के विषवृक्ष के ही कडुए फल हैं। वस्तुतः यह एक जाति या उपजाति-विशेष के प्रति अन्धी सामूहिक निष्ठा है जो अपने हितों की रक्षा में अन्यों को बलिवेदी पर चढ़ा देती है।

जातिवाद के कारण।
(Causes of Casteism)

आजकल भारतीय समाज में जातिवाद अपनी गहरी और फैली हुई जड़ों के साथ स्थायित्व धारण कर चुका है। इसके दूषित परिणाम मानव जीवन के सभी पक्षों को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं जिससे समाज छोटे-छोटे खण्डों में विभाजित होता जा रहा है। जातिवाद के विकास के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

(1) अपनी जाति की प्रतिष्ठा की एकांगी भावना- जातिवाद के विकास में एक जाति-विशेष की अपनी जाति के लिए प्रतिष्ठा की एकांगी भावना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कारण है। प्रायः अपनी जाति की प्रतिष्ठा के विचार से लोग उसे पूरे समाज से पृथक् मान लेते हैं तथा उसकी झूठी प्रतिष्ठा का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करते हैं। किसी जाति-विशेष के सदस्य अपनी जाति के हितों को सुरक्षित रखने के लिए अच्छे-बुरे, उचित-अनुचित, वैधानिक-अवैधानिक सभी तरह के प्रयास करते हैं। अपनी जाति के लिए अन्ध-भक्ति और झूठी प्रतिष्ठा की भावना से प्रेरित होकर लोग अन्य जातियों के प्रति गलत पूर्वाग्रह तथा घृणा के विचार से ग्रस्त हो जाते हैं। इन सभी बातों से समाज में जातिवाद बढ़ता है।

(2) व्यक्तिगत समस्याओं का समाधान- लोग अपनी व्यक्तिगत समस्याओं को हल करने के लिए भी जातिवाद का सहारा लेने लगे हैं। अपनी समस्याओं के समाधान हेतु एक जाति के लोग अपनी ही जाति के अन्य लोगों से सहायता लेने के लिए तत्पर और प्रयत्नशील हुए । इस प्रकार : जातिगत भावनाओं के माध्यम से लोग एक-दूसरे के अधिक निकट आने लगे तथा सम्पर्क साधने लगे। अपनी जाति का हवाला देकर भावप्रवणता (Sentiment) उत्पन्न करके लोगों ने जातिवाद को बढ़-चढ़कर फैलाया।

(3) विवाह सम्बन्धी प्रतिबन्ध– विवाह सम्बन्धी प्रतिबन्धों के कारण सामाजिक सम्बन्ध जाति के अन्तर्गत ही सीमित हो जाते हैं। हमारे देश में हिन्दू विवाह के नियमों के अनुसार जातिगत अन्तर्विवाह (Caste Endogamy) के कारण एक जाति के सभी सदस्य स्वयं को एक वैवाहिक समूह समझने लगे। इसमें अन्र्तर्जातीय विवाह को निषिद्ध माना गया था और प्रत्येक जाति का सदस्य इस बात के लिए बाध्य था कि वह अपनी ही जाति-समूह से जीवन-साथी का चुनाव करे। कुछ जातियों में तो सिर्फ उपजातियों के अन्तर्गत ही विवाह सम्भव है। इन सब बातों के फलस्वरूप लोगों में जातिवाद की प्रबल भावना का विकास हुआ।

(4) आजीविका में सहायता- आजीविका की समस्या समाज के प्रत्येक व्यक्ति के साथ जुड़ी है। देश में बेकारी की समस्या अपनी चरम सीमा पर है। वर्तमान परिस्थितियों में योग्य से योग्य व्यक्ति भी उपयुक्त रोजगार की तलाश में भटक रहा है। नौकरी पाने के लिए ‘जुगाड़’ शब्द प्रचलित हो गया है, जिसके सहारे आसानी से काम हो जाता है। नौकरी पाने और देने में लोगों ने जुगाड़ की दृष्टि से जातिवाद का आश्रय प्राप्त किया और अपनी जाति के प्रभावशाली लोगों तथा उच्चाधिकारियों को जाति के नाम पर प्रभावित करके नौकरी पाने की चेष्टा करने लगे। इससे लोगों को सफलता भी मिली जिससे जातिवाद की भावना बढ़ती गयी।

(5) नगरीकरण तथा औद्योगीकरण– बीसवीं शताब्दी की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देन नगरीकरण एवं औद्योगीकरण हैं। विशाल नगरों में या उनके आस-पास बड़े-बड़े औद्योगिक संस्थान स्थापित हुए जिससे वहाँ का सामाजिक जीवन काफी जटिल हो गया है। महानगरों में एक-दूसरे से सहायता पाने और करने की दृष्टि से एक ही जाति के लोग एक-दूसरे के समीप आये और अधिकाधिक संगठित होने लगे। इस प्रकार सुरक्षा और उन्नति के विचार से नगरीकरण तथा औद्योगीकरण की पृष्ठभूमि में जातिवाद की प्रक्रिया व्यापक हुई।

(6) यातायात तथा प्रचार के साधनों का विकास- यातायात तथा प्रचार के साधनों द्वारा नगरों में बिखरे हुए जातीय सदस्य पुनः परस्पर सम्बन्ध स्थापित करने लगे और संगठित हो गये। अपनी जाति की उन्नति के लिए जाति-विशेष के सदस्यों ने अपनी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारम्भ किया, उन्हें पर्याप्त सहयोग मिला और अन्ततः जातीयता के नाम पर देश के विभिन्न भागों के लोग अपनी ही जाति के लोगों से सम्पर्क साधने लगे।

जातिवाद को समाप्त करने के उपाय
(Measures to Remove Casteism)

जातिवाद हमारी मानवता के नाम पर कलंक है और मानव समाज के लिए एक बहुत बड़ा अभिशाप है। प्रमुख समाजशास्त्री, मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक तथा विचारक इस बात पर एकमत हैं कि जातिवाद का अन्त किए बिना मानव सभ्यता को एक सूत्र में बाँधना कठिन है। जातिवाद को समाप्त करने के उपाय निम्नलिखित हैं –

(1) शिक्षा की समुचित व्यवस्था — जातिवाद की संकीर्ण विचारधारा को रोकने का सर्वशक्तिमान साधन और उपाय शिक्षा की समुचित व्यवस्था करना है। विद्यार्थियों को इस प्रकार शिक्षित किया जाना चाहिए कि जातिवाद के विचार उनके मस्तिष्क को जरा भी न छू सकें और उनके मत छुआछूत तथा भेदभाव से सर्वथा दूर रहें। इसके लिए पाठ्यक्रम, शिक्षण विधियाँ, पाठ्य-सहगामी क्रियाएँ तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि को इस प्रकार नियोजित किया जाए कि विद्यार्थियों में नवीन मनोवृत्तियाँ तथा आदर्श व्यवहार के प्रतिमान विकसित हो सकें। इसके अतिरिक्त शिक्षा के माध्यम से जातिवाद के विरुद्ध स्वस्थ जनमत भी विकसित करना होगा।

(2) साहित्य-सृजन- जातीयता की भावना एवं पूर्वाग्रहों के विरुद्ध गीत, कहानियाँ, नाटक, उपन्यास, निबन्ध तथा लेख लिखकर साहित्य का सृजन किया जाना चाहिए। इस साहित्य में जातिवाद के दुष्परिणामों को उजागर करते हुए मानव-समाज की एकता की भावना को समर्थन देना होगा। इससे शिक्षित वर्ग में जातिवाद का विकार कम किया जा सकता है।

(3) अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन– अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन देने से जातिवाद को समाप्त किया जा सकता है। अन्तर्जातीय विवाह के अन्तर्गत अलग-अलग जातियों के युवक और युवती जीवन-भर के लिए स्थायी वैवाहिक बन्धन में बंध जाते हैं जिससे सामाजिक दूरी रखने वाले दो परिवारों को भी एक-दूसरे के समीप आने का मौका मिलता है। यही नहीं, दोनों परिवारों के सम्बन्धीगण भी स्वयं को एक-दूसरे के नजदीक महसूस करने लगते हैं। इससे विविध जातियों के मध्य सामाजिक सम्बन्धों का एक जाल-सा निर्मित होने लगता है और विभिन्न जातियों में एक-दूसरे के प्रति समझ-बूझ और लगाव पैदा होने लगता है।

(4) सांस्कृतिक विनिमय– प्रत्येक जाति और उपजाति की संस्कृति न्यूनाधिक रूप से दूसरी जातियों और उपजातियों की संस्कृति से भिन्न अवश्य होती है। धर्म, साहित्य, कला, भाषा, विश्वास, आस्थाएँ तथा आचार-विचार की दृष्टि से एक जाति के लोग दूसरी जाति से अलगाव महसूस करने लगते हैं। स्पष्टतः सांस्कृतिक भिन्नता बढ़ने पर जातिगत भिन्नता को बढ़ना स्वाभाविक है; अतः विभिन्न जातियों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान द्वारा समान एवं अच्छे आचरण के बीज बोए जी सकते हैं। ये बीज प्रेम, सहानुभूति, भ्रातृत्व-भाव एवं सहयोग के रूप में पुष्पित-पल्लवित होंगे।

(5) सामाजिक-आर्थिक समानता– विभिन्न जातियों के मध्य सामाजिक-आर्थिक विषमता के कारण भी स्वार्थपूर्ण एवं एकांगी भाव पैदा हो जाते हैं जिससे समूह-तनाव और संघर्ष विकसित होते हैं। यदि अलग-अलग जातियों के सामाजिक रीति-रिवाजों, त्योहारों, प्रथाओं तथा आयोजनों को , एक-समान धरातल पर मिल-जुलकर मनाया जाए; सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध सभी जातियों के लोग एकजुट होकर संघर्ष करें तथा एक-दूसरे के प्रति सामाजिक सम्मान व प्रतिष्ठा व्यक्त करें तो लोगों के मन में जातीय आधार पर घुली कड़वाहट दूर हो सकती है। इसी प्रकार सामाजिक क्षेत्र के आर्थिक क्षेत्र से घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। आर्थिक विषमताएँ, प्रतिद्वन्द्विता, विद्वेष, प्रतिस्पर्धा, वैमनस्य, तनाव तथा वर्ग-संघर्ष को जन्म देती हैं। देश की सरकार को चाहिए कि वह आर्थिक समानता के सत्प्रयासों से जातिवाद की तीव्रता को प्रभावहीन बनाए।

(6) ‘जाति’ शब्द का कम-से- कम प्रयोग -किसी विचार को बार-बार सुनने से न चाहते हुए भी उसका प्रभाव पड़ता ही है। यदि आज की पीढ़ी के बच्चे ‘जाति’ शब्द का अधिक प्रयोग करेंगे तो वे जिज्ञासा एवं अभ्यास के द्वारा इसे आत्मसात् कर लेंगे। इस शब्द के अंकुर भविष्य में जातिवाद के घने
और विस्तृत वृक्ष के रूप में आकार लेंगे। अतः ‘जाति’ शब्द का कम-से-कम प्रयोग किया जाना चाहिए ताकि जातिवाद के विचार को कोई प्रोत्साहन ही न मिल सके और धीरे-धीरे इसका अस्तित्व ही मिट जाए।

(7) कानूनी सहायता – कानून की सहायता लेकर भी जातिवाद पर अंकुश लगाया जा सक्रा है। हमारे देश में प्रायः लोग अपने नाम के साथ जाति लिखते हैं, इस पर कानूभी रोक लगाकर जातिगत अभिव्यक्ति को हतोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके अलावा जातिवाद की संकीर्ण एवं तुच्छ मानसिकता को प्रश्रय देने वाले या इसका प्रचार करने वालों को कठोर दण्ड दिया जाना चाहिए।

(8) जातिवाद के विरुद्ध प्रचार–जन- सामान्य की मनोवृत्ति में परिवर्तन लाने की दृष्टि से प्रचार-तन्त्र का उपयोग किया जाना चाहिए। जातिवाद के अंकुर लोगों के मस्तिष्क में हैं। सिर्फ बाहरी दबाव से जातिवाद की समस्या समाप्त होने वाली नहीं है, इसके लिए लोगों की अभिवृत्ति और विश्वास पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालने होंगे। यह स्वस्थ एवं उचित प्रकार के माध्यम से सम्भव है जिसके लिए समाचार-पत्र, पत्रिकाओं, सिनेमा, टी० वी०, सभाओं तथा प्रदर्शनों आदि का सहारा लिया जा सकता है।

प्रश्न 5.
साम्प्रदायिकता से क्या अभिप्राय है? हमारे देश में साम्प्रदायिक तनाव के क्या कारण हैं? इन्हें दूर करने के लिए आप किन उपायों का सुझाव देंगे? [2015]
या
समूह-तनाव के लिए उत्तरदायी सम्प्रदायवाद के कारणों की विवेचना कीजिए | (2009)
या
साम्प्रदायिकता से सामूहिक तनाव बढ़ता है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
सम्प्रदायवाद के कारणों पर प्रकाश डालिए। (2018)
उत्तर.

साम्प्रदायिकता का आशय
(Meaning of Communalism)

साम्प्रदायिकता का दूसरा नाम ‘धार्मिक उन्माद या मजहबी जनून भी है। सम्प्रदायवाद का एक कलुषित कारनामा यह भी है कि इसने मजहब या सम्प्रदाय को ‘धर्म’(Religion) का एक पर्यायवाची बना दिया है। दुनिया के सभी मनुष्यों को एक ही धर्म है और वह है – मानवता (Humanity)। मजहब या सम्प्रदाय के सन्दर्भ में कहा गया है ‘मजहब में अक्ल का दखल नहीं है, किन्तु धर्म तो सद्ज्ञप्ति, सविवेक तथा सदाचरण पर आधारित होता है। इस प्रकार धर्म और सम्प्रदाय को अलग-अलग करके देखा जाना चाहिए। धर्म के प्रति आकर्षण एवं आस्था मानव-मात्र को प्रेम, बन्धुत्व एवं सहयोग के पथ पर आरूढ़ करते हैं, किन्तु साम्प्रदायिक सिद्धान्त उनमें मार-काट एवं पशु-प्रवृत्ति का बीजारोपण करते हैं।

साम्प्रदायिकता की भावना के प्रबल हो जाने की स्थिति में अपने सम्प्रदाय से सम्बन्धित सभी बातें अच्छी एवं महान प्रतीत होती हैं तथा अन्य सम्प्रदायों की सभी बातों को हीन एवं बुरा माना जाने लगता है। इस स्थिति में विभिन्न सम्प्रदायों के मध्य प्राय: एक प्रकार की पृथकता या अलगाव की भावना का विकास होने लगता है तथा यही भावना अनेक बारं पारस्परिक विरोध का रूप भी ग्रहण कर लेती है। इस प्रकार का विरोध बढ़ जाने पर शत्रुता एवं संषर्घ को रूप ग्रहण कर लेता है। यह दशा अन्ध-साम्प्रदायिकता की दशा होती है। इस प्रकार की दशाओं में ही साम्प्रदायिक दंगे हुआ करते हैं। वास्तव में साम्प्रदायिकता में अन्धविश्वासों, पूर्वाग्रहों एवं पक्षपात के तत्त्वों की बहुलता होती है। साम्प्रदायिकता व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र के लिए हानिकारक एवं इनकी प्रगति में बाधक कारक है। राष्ट्र की प्रगति के लिए साम्प्रदायिकता का पूर्ण रूप से उन्मूलन होना अति आवश्यक है।

साम्प्रदायिक तनाव के कारण
(Causes of Communal Tension)

सम्प्रदायवाद एवं साम्प्रदायिकता के विशद् अध्ययन से साम्प्रदायिक तनाव के अनेक कारण ज्ञात होते हैं। सभी कारणों का तो यहाँ वर्णन नहीं किया जा सकता, कुछ मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

(1) ऐतिहासिक कारण – भारत में साम्प्रदायिक संघर्ष तथा तनाव कोई नयी बात नहीं है। इतिहास के झरोखे से देखने पर इसका सम्बन्ध शताब्दियों पूर्व मुगलों के आक्रमण से जुड़ता है। वस्तुतः मुसलमान लोग विदेशी आक्रान्ताओं के रूप में भारत आये और उन्होंने तत्कालीन आर्यों की सम्पत्ति लूटकर यहाँ भारी मार-काट मचाई। इस भाँति, साम्प्रदायिक तनाव की शुरुआत मुसलमानों के भारत पर आक्रमण के साथ ही हो गयी थी। भारत के मूल निवासी अर्थात् हिन्दुओं के मन में मुसलमानों के प्रति विदेशीपन का भाव स्थायी रूप धारण कर गया और मुसलमान सदा के लिए अत्याचार और अन्याय के प्रतीक बन गये। स्पष्टतः वर्तमान साम्प्रदायिकता का विषे भारत में मुसलमानों के साथ आया। हिन्दू-मुसलमानों में पहले से ही एक-दूसरे के प्रति पूर्वाग्रह बन चुके हैं, जिन्हें साम्प्रदायिक तनाव के लिए उत्तरदायी कहा जा सकता है।

(2) सांस्कृतिक कारण – विभिन्न सांस्कृतिक कारणों से भी साम्प्रदायिक तनाव उत्पन्न होते हैं। हिन्दू संस्कृति के अनेक प्रतीक, मुस्लिम संस्कृति के प्रतीकों से न केवल भिन्न हैं अपितु विरोधी भी हैं। गो-हत्या, सिर पर चोटी रखना, जनेऊ धारण करना तथा मूर्ति पूजा आदि को लेकर दोनों सम्प्रदायों में भारी मतभेद हैं। इसके अतिरिक्त रहन-सहन, खान-पान, उठना-बैठना, पूजा की पद्धति तथा अन्य सांस्कृतिक क्षेत्रों में भी पर्याप्त अन्तर विद्यमाने हैं। इन विभिन्न सांस्कृतिक अन्तरों के कारण दोनों सम्प्रदायों के मध्य तनाव और संघर्ष पैदा होते रहते हैं।

(3) भौतिक कारण – सामाजिक-सांस्कृतिक समानता के आधार पर विभिन्न समुदायों के लोगों ने भारत में अपनी अलग-अलग बस्तियाँ बनाकर रहना पसन्द किया। सभी समुदायों का रहन-सहन तथा खान-पान का तरीका अलग-अलग होने से अनेक नगरों में हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख तथा ईसाई लोग पृथक् बस्तियाँ या कॉलोनी बनाकर रहते हैं। इस अलगाववादी प्रवृत्ति से तनाव और संघर्ष का होना स्वाभाविक ही है।

(4) सामाजिक एवं आर्थिक कारण- हिन्दू तथा मुसलमान सम्प्रदायों के सामाजिक रीति-रिवाज, प्रथाएँ, पहनावा, रहन-सहन, धर्म, विचार तथा साहित्य में एक-दूसरे से पर्याप्त अन्तर हैं। इससे दोनों में पारस्परिक तनाव पैदा होना स्वाभाविक है। इसके अतिरिक्त ये दोनों सम्प्रदाय आर्थिक आधार पर भी एक-दूसरे से अलग हैं। स्पष्टतः सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से पृथकता के कारण साम्प्रदायिक विद्वेष, तनाव एवं संघर्ष जन्म ले लेते है।

(5) संजनीतिक कारण- कुछ राजनीतिक दल नियमों, सिद्धान्तों, कर्तव्यों तथा राष्ट्रीय हितों की परवाह किए बिना, अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए साम्प्रदायिक तनाव को प्रोत्साहन देते हैं। ये दल अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति हेतु अक्सर विभिन्न सम्प्रदायों के बीच नासमझी तथा अफवाहों के मध्याम से तनाव एवं संघर्ष को प्रेरित करते हैं, उन्हें आपस में लड़ाकर स्वयं वाहवाही लूटते हैं और अपना चुनावी उल्लू सीधा करते हैं। हाल ही में, रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को साम्प्रदायिक रंग देकर विभिन्न राजनीतिक दल अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं।

(6) मनोवैज्ञानिक कारण विभिन्न सम्प्रदायों में एक- दूसरे के प्रति विरोधी पूर्वाग्रहों (अर्थात् एक-दूसरे के लिए घृणा व विद्वेष) के कारण अनबन तथा तनाव की स्थिति बनी रहती है। स्पष्टतः एक-दूसरे के प्रति पहले से बनी हुई पूर्वधारणाएँ ही तनाव का कारण बनती हैं। साम्प्रदायिक लोगों में बिना किसी स्पष्ट कारण या विवेक के ही अन्य सम्प्रदायों के प्रति घृणा के मनोभावे उत्पन्न हो जाया करते हैं। एक हिन्दू अकारण ही एक मुसलमान को देशद्रोही तथा एक मुसलमान अकारण ही एक हिन्दू को काफिर समझ बैठता है। स्पष्टतः साम्प्रदायिक तनावों की पृष्ठभूमि में मनोवैज्ञानिक कारण काफी सक्रिय तथा महत्त्वपूर्ण कहे जा सकते हैं।

साम्प्रदायिक तनावों को दूर करने के उपाय
(Measurse to Remove Communal Tensions)

साम्प्रदायिकता राष्ट्रीय अखण्डता तथा एकता की जड़ में हलाहल (विष) के समान है। यह एक सम्प्रदाय के लोगों के मन में आतंक, असुरक्षा, सन्देह, घृणा तथा नकारात्मक मनोवृत्ति का बीजारोपण कर उसे अकारण ही अन्य सम्प्रदाय का आजन्म शत्रु बना देती है। मनुष्य; मानव-प्रेम और विश्व-बन्धुत्व पर आधारित अपने सर्वव्यापी एवं सार्वभौमिक धर्म ‘मनुष्यता का परित्याग कर, साम्प्रदायिकता की क्षुद्र एवं संकीर्ण भावधारा को अपना लेता है, जिससे उसकी बौद्धिक एवं आत्मिक मुक्ति का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। इन सभी तथ्यों के आधार पर निर्विवाद कहा जा सकता है कि साम्प्रदायिकता एवं उससे जन्मे तनावों को आमूल उखाड़ फेंकना होगा। साम्प्रदायिक तनावों को अग्रलिखित उपायों से दूर किया जा सकता है –

(1) इतिहास की नवीन व्याख्या तथा उसका प्रचार– राष्ट्रीय इतिहास के सृजन एवं प्रचार-प्रसार के लिए इतिहास को नयी दृष्टि एवं नयी व्याख्या देनी होगी। निस्सन्देह भारत का इतिहास मुगलकाल से ही साम्प्रदायिक तनावों के प्रमाण प्रस्तुत करता है, किन्तु यदि उन पुरानी बातों तथा दृष्टान्तों को ही बार-बार दोहराया जाएगा। तो इससे साम्प्रदायिक तनाव कम नहीं होंगे। इसके लिए इतिहास के ऐसे प्रसंगों पर बल दिया जाना चाहिए जिनसे एक-दूसरे के प्रति मैत्री भाव तथा सहयोग का परिचय मिले। उदाहरण के तौर पर, बच्चों को बताना होगा कि भारत की आजादी के लिए हिन्दू और मुसलमान दोनों कन्धे-से-कन्धा मिलाकर लड़े और दोनों ने भारत-माँ की रक्षा हेतु अपने प्राण उत्सर्ग किए। कांग्रेस और आजाद हिन्द फौज के सेनानी इसके साक्षात् प्रमाण । भारत की सेना का योद्धा वीर अब्दुल हमीद पाकिस्तान के खिलाफ लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुआ।

(2) सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना– साम्प्रदायिक तनावों में कमी लाने की दृष्टि से विभिन्न सम्प्रदायों के बीच सामाजिक दूरी को समाप्त कर सुमधुर एवं प्रगाढ़ सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना करनी होगी। इसके लिए आवश्यक है कि अल्पसंख्यकों के नाम पर चलने वाली समस्त शिक्षण संस्थाएँ बन्द हों तथा सभी सम्प्रदाय के बालकों की सम्मिलित शिक्षण संस्थाओं में एकसमान पढ़ाई-लिखाई हो। एक सम्प्रदाय के लोग अन्य सम्प्रदायों के शादी-विवाह, सहभोज तथा अन्य आयोजनों में सम्मिलित हों। सभी सम्प्रदाय एक-दूसरे की धार्मिक व सामाजिक भावनाओं का सम्मान करें तथा सभी के धार्मिक स्थलों की मर्यादा व प्रतिष्ठा का पूरा ध्यान रखा जाए।

(3) सांस्कृतिक विनिमय- सांस्कृतिक विनिमय के माध्यम से भी साम्प्रदायिक तनावों व संघर्षों का वेग कम किया जा सकता है। इसके लिए विभिन्न सम्प्रदायों के मिश्रित सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए। सम्मिलित पर्व व त्योहारों; जैसे-—ईद, दीपावली व होली आदि को उत्साह से मनाना चाहिए। इससे विभिन्न सम्प्रदायों की मिथ्या धारणाएँ, भ्रामक प्रचार तथा आपसी नासमझी समाप्त होती है और वे कटुता भूलकर एक-दूसरे के अधिक नजदीक आते हैं।

(4) राष्ट्रीयता का प्रचार- उल्लेखनीय रूप से भारत एक धर्म-निरपेक्ष राज्य है; अत: साम्प्रदायिक तनावों को समाप्त करने तथा साम्प्रदायिक सद्भाव उत्पन्न व विकसित करने के उद्देश्य से राष्ट्रीयता का प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए। इसके लिए विभिन्न राष्ट्रीय पर्वो को मिल-जुलकर धूमधाम से मनाना चाहिए। जब विभिन्न सम्प्रदायों के लोग अपने राष्ट्र के प्रति एक समान निष्ठा तथा आस्था के भाव रखेंगे, तभी साम्प्रदायिकता की क्षुद्र भावना का प्रभाव कम हो सकेगा।

(5) राजनीतिक उपाय– विभिन्न साम्प्रदायिक दलों पर कानूनी रोक लगा देनी चाहिए तथा उनके नेतृत्व को मनमानी करने से रोक देना चाहिए। जो लोग कानून की अवज्ञा करें, उन्हें कठोर दण्ड दिया जाए। चुनाव आदि राजनीतिक गतिविधियों में साम्प्रदायिकता को साधन के रूप में प्रयोग करने वाले दलों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही की जाए। समस्त राजनीतिक दलों के घोषणा-पत्रों से साम्प्रदायिकता के पक्ष में प्रकाशित उद्घोषणाओं को हटवा दिया जाए। साम्प्रदायिक तनाव एवं संघर्षों के समर्थन में प्रकाशित सामग्री, पत्र-पत्रिकाओं तथा जनसंचार के माध्यमों पर कड़ा प्रतिबन्ध लगाया जाए। इन सभी राजनीतिक उपायों से साम्प्रदायिकता के विरुद्ध जनमत तैयार हो सकता है।

(6) भौगोलिक एवं आर्थिक प्रयास– विभिन्न सम्प्रदायों के मध्य स्थित अलगाववादी प्रवृत्तियों को हताश करने के लिए सभी सम्प्रदायों के लोगों को एक ही कॉलोनी में बसने हेतु प्रोत्साहित किया जाए। एक ही सम्प्रदाय द्वारा बसाई गई बस्तियाँ मोहल्ले या कॉलोनियाँ समाप्त करने के प्रयास हों तथा सभी को एक साथ मिलकर रहने के सम्पर्क कार्यक्रम शुरू हों। इसी प्रकार आर्थिक विषमता के दोष को दूर करने की दृष्टि से श्रमिकों को उचित पारिश्रमिक व लाभांश दिलाया जाए। उनके कार्य की दशाओं में सुधार हो, शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था के साथ-साथ ही उनके तथा परिवारजनों के जीवन की सुरक्षा का प्रबन्ध भी हो।

(7) मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं उपाय— मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी कुछ आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण कदम उठाकर साम्प्रदायिक तनावों में कमी लाई जा सकती है। सर्वप्रथम, अल्संख्यकों को आश्वस्त करके उन्हें विश्वास में लेना होगा। उनके मन से भय, घृणी तथा असुरक्षा की भावनाओं को दूर करना होगा। स्वस्थ्य प्रचार के माध्यम से भ्रामक एवं निराधार विश्वासों को प्रभावहीन बनाना होगा। विभिन्न सम्प्रदायों की एक-दूसरे के प्रति मनोवृत्ति बदलने के लिए ठोस एवं सक्रिय कदम उठाने होंगे। तभी वे सब एक राष्ट्रीय धारा में सम्मिलित हो सकेंगे।

(8) शिक्षा– साम्प्रदायिक तनावों व संघर्षों का अन्त करने के लिए शिक्षा की समुचित व्यवस्था करनी होगी। शिक्षा से उदारता व विनम्रता आती है, वैज्ञानिक चिन्तन विकसित होता है तथा अन्धविश्वास व रूढ़ियाँ मिट जाती हैं। शिक्षितजनों को धार्मिक कट्टरपंथी अपने चंगुल में नहीं फँसा सकते। शिक्षा समाज को सम्पन्नता तथा समृद्धि की राह पर ले जाती है। एक शिक्षित, सम्पन्न एवं समृद्ध समाज साम्प्रदायिक विनाश से कोसों दूर रहता है। वस्तुतः साम्प्रदायिकता के उन्मूलन का एक सहज एवं कारगर उपाय शिक्षा ही है।

प्रश्न 6.
भाषावाद से आप क्या समझते हैं? भाषागत तनाव के कारण बताइए तथा उसके निवारण के उपाय भी बताइए।
या
भाषागत तनाव को रोकने के लिए क्या उपाय किये जाने चाहिए?
या
भाषावाद के किन्हीं दो कारणों के बारे में लिखिए। (2014)
या
भाषावाद के निराकरण के कोई चार उपाय लिखिए। (2013)
उत्तर

भाषावाद
(Linguism)

भाषा मन के भावों के अभिव्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम है। भाषागत समानता विभिन्न व्यक्तियों को एक-दूसरे की ओर आकर्षित करती है, जबकि भाषागत भिन्नता के कारण लोग पृथकता या अलगाव महसूस करते हैं। यही कारण है कि एक ही भाषा बोलने वाले दो अपरिचित व्यक्ति भी शीघ्र ही एक-दूसरे से अपनी बात कह सकते हैं तथा पारस्परिक निकटता बना लेते हैं। इससे भिन्न दो भिन्न भाषा-भाषी अपनी बात न तो कह सकते हैं और न ही समझ सकते हैं–निकट होते हुए भी वे एक-दूसरे से अलग रहते हैं। वास्तव में, भाषा में एकीकरण की प्रबल क्षमताएँ पाई जाती हैं। हमारा देश एक बहुभाषायी देश है। इससे जहाँ एक ओर हमारे देश की सांस्कृतिक समृद्धि हुई, वही कुछ समस्याएँ। भी उम्पन्न हुई हैं। भाषाओं की विविधता के कारण उत्पन्न होने वाली मुख्यतम समस्या है–भाषावाद का प्रबल होना।

भाषावाद का अर्थ
(Meaning of Linguism)

कोई भी सिद्धान्त, मत, विचार या माध्यम समाज के लिए उस समय तक हानिकारक नहीं है जब तक कि वह ‘वाद’ (ism) की शक्ल नहीं ले लेता; ‘वाद’ बनते ही वह समस्या बनकर उभरता है। अत: भारत में भाषाओं की विविधता साहित्य एवं संस्कृति के बहुआयामी विकास की दृष्टि से एक अच्छी एवं प्रशंसनीय बात कही जा सकती है, किन्तु यदि भाषाओं की विविधता ‘वाद’ का रूप लेती है तो इसे एक गम्भीर समस्या कहा जाएगा भाषावाद के अन्तर्गत एक भाषा वाला अपनी भाषा को सर्वोत्कृष्ट मानकर अन्य भाषाभाषियों को हीन समझकर उनकी उपेक्षा करता है।

वह अपनी भाषा बोलने वालों का | ही पक्षपात करता है तथा अपनी भाषा को मान्यता दिलाने के लिए उचित-अनुचित साधनों का प्रयोग भी करता है। ऐसी दशा में कहा जा सकता है कि वह व्यक्ति भाषावाद से ग्रस्त है। जब एक भाषा बोलने वाले यह अनुभव करते हैं कि उन पर दूसरी भाषा जबरदस्ती लादी जा रही है तो इससे तनाव उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार भाषावाद के कारण दो भाषाओं में विरोध उत्पन्न होता है। उदाहरणार्थ-हिन्दी के राष्ट्रभाषा बनने पर अहिन्दी भाषी वर्गों; विशेष रूप से दक्षिण के लोगों ने हिन्दी भाषा का प्रबल विरोध किया। दक्षिण भारतवासियों का विचार है कि हिन्दी उन पर लादी जा रही । है। वे हिन्दी भाषा के प्रयोग के विरुद्ध तनाव से भर उठते हैं और संघर्ष के लिए तत्पर हो उठते हैं। असम में बंगाली के खिलाफ आन्दोलन होते हैं। पंजाब प्राप्त के पंजाब एवं हरियाणा में विभाजन के समय पंजाबी व हिन्दी भाषा के समर्थकों तथा प्रचारकों में तनाव रहा। ये सभी भाषावाद से प्रेरित तनाव एवं संघर्षात्मक परिस्थितियों के उदाहरण हैं। भाषावाद की समस्या ने राष्ट्र की एकता और प्रतिष्ठा को खतरे में डाल दिया है।

भाषावाद के कारण
(Causes of Linguism)

भारत में भाषावाद की जटिल समस्या विभिन्न परिस्थितियों एवं कारकों का परिणाम है। ये बहुतायत में हो सकते हैं और उन सभी का यहाँ विवेचन सम्भव नहीं है। भाषावाद की उत्पत्ति एवं विकास सम्बन्धित प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

(1) ऐतिहासिक कारण – भारत में भाषावाद के कारण उत्पन्न तनाव एवं संघर्ष एक लम्बे और प्राचीन इतिहास से जुड़े हैं; अतः भाषावाद का ऐतिहासिक पक्ष भी एक महत्त्वपूर्ण कारक को जन्म देता है। हम जानते हैं कि किसी भी क्षेत्र में भाषा का उद्भव एवं विकास एक ही देन में या अल्पकाल में ही नहीं हो गया। प्रत्येक भाषा का हजारों-हजार वर्षों पुराना इतिहास है और आज वे अपने क्षेत्र के वातावरण के साथ इस प्रकार घुल-मिल गयी हैं जिस प्रकार फूल में उसकी सुगन्ध निहित होती है। स्वाभाविक रूप से किसी भी क्षेत्र के निवासियों को अपनी भाषा के साथ ऐसा भावनात्मक एवं सांवेगिक सम्बध बन जाता है कि वे उसकी उपेक्षा तथा दूसरी भाषा की मान्यता सहन नहीं कर पाते। ब्रिटिशकाल में शासन द्वारा भारतीयों पर अंग्रेजी एक अनिवार्य भाषा के रूप में लाद दी गयी, जिसे दक्षिणवासियों ने पर्याप्त रूप से अपना लिया। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया गया। दुर्भाग्यवश दक्षिण में हिन्दी का प्रचलन बहुत कम था; अतः उन्हें सीखने के लिए एकदम नये सिरों से प्रयास करना पड़ा, जबकि वे अंग्रेजी को आत्मसात् कर उस भाषा को अच्छी प्रकार जान। चुके थे। न तो उन्होंने हिन्दी को ग्रहण करना चाहा और न अंग्रेजी को छोड़ना चाहा। अतः हिन्दी को लेकर भाषागत एवं सांस्कृतिक आधार पर विरोध, तनाव एवं संघर्ष ने जन्म लिया। इन्हीं दशाओं ने प्रबल रूप धारण कर भाषावाद को विकसित किया।

(2) भौगोलिक कारण- देश के विभिन्न क्षेत्र भौगोलिक सीमाओं द्वारा परिसीमित होकर एक-दूसरे से अलग हो गये। अलग-अलग क्षेत्रों की अलग-अलग भाषाएँ विकसित हुईं। प्रत्येक क्षेत्र के साहित्य तथा संस्कृति में वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों; यथा-नदियों, पर्वतों, वन, स्थानीय कृषि तथा पशुओं की अभीष्ट छाप दृष्टिगोचर होती है; अतः क्षेत्र की स्थानीय भाषा के साहित्य के प्रति वहाँ के निवासियों में अपनत्व की भावना पैदा होना स्वाभाविक है। इन दशाओं में अन्य भाषाओं तथा भाषाभाषी समूहों के प्रति उदासीनता, विरोध तथा घृणा का भाव उत्पन्न होना भी स्वाभाविक हो।

(3) राजनीतिक कारण– अनेक राजनीतिक दल अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों की सिद्धि हेतु भाषावाद को प्रेरित तथा ‘प्रोत्साहित करते हैं। विशेषकर चुनावों के समय कुछ राजनीतिक नेता लोग वोट प्राप्त करने की दृष्टि से अल्पसंख्यक भाषा-भाषियों की भावनाओं व संवेगों को उभारकर तनाव एवं संघर्ष उत्पन्न करा देते हैं जिससे जन-धन की हानि होती है। क्योंकि ये लोग भाषा को मुद्दा बनाकर उखाड़-पछाड़ कर राजनीतिक प्रपंच रचते हैं; अत: एक विशेष भाषा से प्रेम व लगाव रखने वालों का उन्हें समर्थन मिल जाता है जो उनके निर्वाचन काल हेतु सर्वाधिक उपयोगी कहा जा सकता है।

(4) सामाजिक कारण- भाषावाद के जन्म और विकास के कुछ सामाजिक कारण भी हैं। जिस समाज की मान्यताएँ जिस भाषा में स्थान पाती हैं, उस समाज में उस भाषा को भरपूर सम्मान मिलता है। उस समाज के सदस्य उस भाषा से तो विशेष लगाव रखते हैं, किन्तु अन्य भाषाओं से, जिनसे उनकी मान्यताओं का कोई सरोकार नहीं है, घृणा करने लगते हैं। भाषावाद इसी सामाजिक प्रक्रिया का एक दुष्परिणाम है।

(5) आर्थिक कारण- यदि किसी देश की सरकार खासतौर से एक भाषा-भाषी समूह को प्रोत्साहन देने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करती है तो अन्य भाषा-भाषी समूह उस भाषा से विद्वेष एवं घृणा का भाव रखने लगते हैं। ऐसी परिस्थितियों में भाषावाद को बल मिलता है।

(6) मनोवैज्ञानिक कारण- भाषावाद की पृष्ठभूमि में व्यक्ति की संकीर्ण आत्मसम्मान की भावना निहित होती है, जिसके परिणामस्वरूप लोग अपनी भाषा को अच्छा तथा अन्य भाषाओं को बुरा बताने लगते हैं। किसी भाषा के जानने तथा प्रयोग करने वालों की उस भाषा से भावनात्मक एवं संवेगात्मक सहानुभूति हो जाती है। भाषा व्यक्ति के अवधान को केन्द्रित करती है; अतः एक भाषा के ज्ञाता व प्रयोग करने वाले एक-दूसरे के जल्दी सम्पर्क में आते हैं, लेकिन उनमें दूसरी भाषा वालों के प्रति । वैसी भावनात्मक या सांवेगिक अनुरक्ति नहीं होती। इससे भाषावाद का उद्भव एवं विकास होता है।

भाषीवाद के निवारण के उपाय
(Measures to Remove Linguism)

भाषावाद के विभिन्न कारणों का विवेचन करने के उपरान्त भाषावाद को समाप्त करने के उपायों की खोज करनी होगी। इस तनाव से संघर्ष की परिस्थितियाँ देश की एकता व अखण्डता के लिए। विषाक्त एवं हानिकारक हैं। यदि भाषावाद का विष देश में इसी प्रकार संचरित होता रहा तो जल्दी ही देश हजारों भाषाओं के नाम पर टुकड़ों में बँट जाएगा; अतः भाषावाद का उन्मूलन अनिवार्य है। इसके प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं –

(1) राष्ट्रीय भाषा का विकास एवं राष्ट्रीय समर्थन- सम्पूर्ण राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधने की दृष्टि से एक राष्ट्रीय भाषा का विकास होना आवश्यक है। इसके लिए देश-भर के लोगों को एक राष्ट्रीय भाषा के सिद्धान्त को मान्यता प्रदान करनी होगी। लोगा अनिवार्य रूप से एक राष्ट्रीय भाषा की आवश्यकता अनुभव करें तथा विदेशी भाषा के स्थान पर एक स्वदेशी भाषा को समर्थन देने के लिए प्रेरित व तत्पर हों। राष्ट्रीय भाषा के चुनाव की समस्या पर विचार करना यहाँ हमारा उद्देश्य नहीं है, किन्तु उल्लेखनीय रूप से यह भाषा समूचे देश की सम्पर्क भाषा हो जिसे अधिक-से-अधिक संख्या में लोग समझते, बोलते तथा प्रयोग करते हों। जनसमर्थित राष्ट्रीय भाषा का विकास एवं प्रयोग राष्ट्र को एकता एवं अखण्डता की ओर अग्रसर करेमा।

(2) क्षेत्रीय भावनाओं को सम्मान एवं प्रोत्साहन- हम जानते हैं कि विभिन्न भौगोलिक, सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक कारणों से एक क्षेत्र-विशेष के निवासी अपनी भाषा को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं तथा उसके प्रति अथाह प्रेम एवं लगाव प्रदर्शित करते हैं; अतः क्षेत्रीय भाषाओं की उपेक्षा नहीं की जा सकती। विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय भाषाओं को मान्यता प्रदान करने के साथ-साथ उन्हें राजकीय कार्यों में भी प्रयोग करने की छूट दी जानी चाहिए। इससे क्षेत्रीय विकास प्रोत्साहित होगा तथा स्थानीय लोगों में आत्म-स्वाभिमान पैदा होगा। स्पष्टत: भाषावाद तथा भाषावाद तनावों का अन्त करने के लिए क्षेत्रीय भाषाओं में प्रतिष्ठा का ध्यान रखना होगा।

(3) साम्प्रदायिकता एवं क्षेत्रवाद का विरोध- साम्प्रदायिकता एवं क्षेत्रवाद के बन्धन भाषावाद को उकसाकर इसे राष्ट्रीय एकता के पैरों की बेड़ियाँ बना देते हैं। भाषावाद की समस्या का अन्त करने के लिए साम्प्रदायिक एवं क्षेत्रीय आधार पर उपजी विकृतियों तथा विषमताओं को नष्ट करना होगा। अत: साम्प्रदायिक एवं क्षेत्रीय भावनाओं का एक साथ मिलकर पुरजोर विरोध किया जाना चाहिए।

(4) सांस्कृतिक विनिमय- सांस्कृतिक विनिमय के माध्यम से भी भाषावाद का निवारण सम्भव है। इसके लिए विभिन्न भाषाओं के साहित्य का अन्य भाषाओं के अनुवाद करने कार्य के को। प्रोत्साहित किया जाए। बहू-भाषी कवि सम्मेलनों, दूरदर्शन के कार्यक्रमों, सिनेमा, नाटक आदि के माध्यम से विभिन्न भाषा-भाषी समूहों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान की व्यवस्था करनी चाहिए। भिन्न-भिन्न भाषा-भाषी समूहों के कलाकारों, साहित्यकारों, रंगकर्मियों, पत्रकारों, लेखकों तथा कवियों को पारस्परिक सम्पर्क के अवसर प्रदान किए जाने चाहिए।

(5) राजनीतिक उपाय- भाषागत तनावों से बचने के लिए ऐसे राजनीतिक दलों पर कठोर नियन्त्रण की आवश्यकता है जो अपने स्वार्थों की सिद्धि हेतु विभिन्न भाषा-भाषी समूहों को शिकार बना लेते हैं। भाषायी तनाव व विद्रोह भड़काने वाले राजनीतिक एजेण्टों को पकड़कर दण्डित किया जाना चाहिए।

(6) सही सोच का प्रचार-प्रसार- देशवासियों में इस सोच का प्रचार किया जाना चाहिए कि भाषा तो अभिव्यक्ति का माध्यम है। स्वार्थ-सिद्धि का साधन बनाकर इसका दुरुपयोग करना अक्षम्य अपराध है। सभी भाषाएँ समान रूप से प्रतिष्ठित एवं मान्य हैं किसी भी भाषा का महत्त्व कम नहीं है। अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में अंग्रेजी हो या हिन्दी या किसी ग्रामीण अचंल में बोली जाने वाली ऐसी भाषा जिसे लिपिबद्ध भी नहीं किया जा सकता–सभी को बराबर महत्त्व है; अतः भाषा को लेकर विवाद नहीं है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जातिगत समूह-तनाव से क्या आशय है?
उत्तर
भारतीय समाज में अनेकानेक जातियों का उद्भव और विकास हुआ है तथा उनके अपने-अपने विचार एवं दृष्टिकोण निर्मित हुए हैं। विचारों और दृष्टिकोण में पर्याप्त अन्तर की घाई ने उनके मध्य सामाजिक दूरी को अत्यधिक बढ़ा दिया। इसके परिणामस्वरूप जातियों में ऊँच-नीच को भेदभाव उभरने लगा। किसी जाति-विशेष के लोग पूर्वाग्रहों तथा अज्ञानता के कारण निज जाति के प्रति अन्ध-भक्ति तथा अन्य जातियों के प्रति संकुचित दृष्टिकोण से भर गये जिससे मानवता का व्यापक दृष्टिकोण आहत हुआ। काका कालेलकर ने उचित ही कहा है, “जातिवाद एक अबाधित, अन्ध समूह-भक्ति है जो कि न्याय, औचित्य, समानता और विश्वबन्धुत्व की उपेक्षा करती है।” जातिवाद की संकुचित विचारधारा ने सामाजिक सम्बन्धों में संकीर्णता, विरोध, पक्षपात, प्रतिद्वन्द्विता तथा पारस्परिक घृणा के बीज बो दिये, जिससे देश के प्रत्येक भाग में जातीय तनाव उत्पन्न हो गया। समय के साथ-साथ जातिगत भावना ने जातिगत सामूहिक तनाव को उग्र एवं स्थायी बनाया है।

प्रश्न 2
जातिवाद के दुष्परिणामों का उल्लेख कीजिए। (2017) 
या
जातिवाद के कोई दो दुष्परिणाम लिखिए। (2018)
उत्तर
जातिवाद के विस्तार से किसी जाति-विशेष के सदस्यों को तो लाभ होता है, किन्तु वहीं दूसरी ओर जातिवाद की उन्नति से समूचे देश और समाज की हानि भी होती है। यदि जातिवाद एक जाति की स्वार्थ-सिद्धि का प्रभावशाली यन्त्र है तो सम्पूर्ण मानव जाति के लिए सबसे बड़ा अभिशाप भी है। जातिवाद के अनेक दुष्परिणामों में से कुछ निम्नलिखित रूप में हैं

(1) राष्ट्रीयता एकता में बाधा– जातिवाद फैलने से राष्ट्र विभिन्न स्वार्थी समूहों में बँट जाता है। जिनका एकमात्र लक्ष्य अपने-अपने हितों की पूर्ति तथा स्वार्थों की सिद्धि होता है। इसके परिणामस्वरूप भिन्न जातियों के मध्य समूह-तनाव एवं संघर्ष उत्पन्न होते हैं जिससे राष्ट्र की शक्ति कमजोर पड़ती है। स्पष्टत: जातीयता के आधार पर विभाजन के फलस्वरूप राष्ट्र की एकता को खतरा पैदा होता है तथा राष्ट्रीय विकास का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है।

(2) राष्ट्रीय क्षमता का ह्रास- जातिगत भावना पक्षपात को प्रोत्साहित करती है। पक्षपात राष्ट्र के मानवीय संसाधनों के उचित उपयोग में बाधक है। कम योग्य और कम क्षमता वाले व्यक्ति अधिक योग्य एवं अधिक क्षमतावान व्यक्तियों का स्थान ले लेते हैं जिससे राष्ट्र की सक्षम मानव ऊर्जा उचित अवसरों की तलाश में अपनी शक्ति और समय को व्यर्थ करती है। इस भाँति जातिवाद बढ़ने से राष्ट्रीय क्षमता और क्रियाशीलता को निरन्तर ह्यास होता है।

(3) प्रजातन्त्र के लिए खतरा– प्रजातन्त्र के मूलभूत सिद्धान्त हैं—स्वतन्त्रता, समानता तथा बन्धुत्व की भावना। इसके विपरीत जातिवाद असमानता, वर्ग-भावना, वैमनस्य, विद्वेष, पक्षपात तथा तनाव पर आधारित है। इससे प्रजातन्त्र को भारी खतरा पैदा हो गया है। के० एम० पणिक्करे ने उचित वही कहा है, “वास्तव में जब तक उपजाति तथा संयुक्त परिवार रहेंगे तब तक समाज का कोई भी संग्रठन समानता के आधार पर सम्भव नहीं है।”

(4) पक्षपात तथा भ्रष्टाचार को बढ़ावा- पक्षपात और भ्रष्टाचार ये दोनों विचार साथ-साथ चलते हैं। जातिवाद के कारण पक्षपात की भावना प्रोत्साहित होती है, उचित-अनुचित का विवेक समाप्त हो जाता है तथा अन्याय एवं अनैतिकता का बोलबाला हो जाता है। इससे निश्चय ही भ्रष्टाचार प्रेरित होता है जिससे समाज को हानि पहुँचती है।

प्रश्न 3.
साम्प्रदायिक समूह-तनाव से क्या आशय है? (2017)
उत्तर.
भारत विभिन्न सम्प्रदायों का देश है। यहाँ प्रमुख रूप से हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख और ईसाई–इन चार सम्प्रदायों के लोग रहते हैं, जिसकी वजह से इनसे सम्बन्धित साम्प्रदायिक विभिन्नता भी दृष्टिगोचर होती है। विभिन्न सम्प्रदायों के मध्य पाये जाने वाले विरोध एवं तनाव को साम्प्रदायिक तनाव कहते हैं। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के समय 1947 ई० में हुए साम्प्रदायिक दंगों ने इस साम्प्रदायिक तनाव को स्थायी बना दिया। तभी से हिन्दू और मुस्लिम दोनों सम्प्रदायों के लोग एक-दूसरे को सन्देह, घृणा तथा वैमनस्य की दृष्टि से देखने लगे। आज भी दोनों सम्प्रदायों में समूह-तनाव की स्थिति बनी हुई है। इसी प्रकार पंजाब समस्या ने हिन्दू और सिक्ख सम्प्रदायों के बीच सन्देह, विरोध एवं तनाव को वातावरण पैदा करने की कोशिश में है। ऐसा साम्प्रदायिक समूह-तनाव देश के विभिन्न नगरों; जैसे-मेरठ, अलीगढ़, आगरा आदि में साम्प्रदायिक उन्माद को बढ़ाकर साम्प्रदायिक दंगों में बदल देता है।

प्रश्न 4.
टिप्पणी लिखिए-भारत में साम्प्रदायिकता।
उत्तर
भारत हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई तथा पारसी इत्यादि अनेक सम्प्रदायों के अनुयायियों का निवास स्थान है, किन्तु इनमें से मुख्य सम्प्रदाय सिर्फ दो हैं — हिन्दू सम्प्रदाय तथा मुस्लिम सम्प्रदाय। विदेशी आक्रान्ताओं के रूप में मुसलमान शासकों ने भारत में प्रवेश किया तथा यहाँ की हिन्दू प्रजा पर अमानुषिक अत्याचार किये। हिन्दूजन उस अत्याचार, दमन और त्रासदी भरे काल को आज भी भुला नहीं सके हैं। इसके परिणामस्वरूप, हिन्दू और मुस्लिम सम्प्रदायों के बीच लम्बे समय से चली आ रही विरोध एवं प्रतिशोध की भावना आज भी समूह-तनाव और संघर्ष पैदा कर देती है।

आधुनिक काल में इन दोनों सम्प्रदायों के बीच सबसे बड़ा संघर्ष तथा तनाव भारत की स्वतन्त्रता-प्राप्ति एवं विभाजन की प्रक्रिया के दौरान हुआ था। देश दो टुकड़ों में बँट गयो-भारत और पाकिस्तान। इस विभाजन के परिणामस्वरूप हिन्दू और मुसलमानों में शताब्दियों पूर्व के पूर्वाग्रह जाग । उठे और दोनों सम्प्रदाय साम्प्रदायिक दंगों की भयंकर विभीषिका के शिकार हुए। हजारों बच्चों, बूढ़ों, युवक-युवतियों और वयस्कों का कत्ल हुआ और लाखों-करोड़ों लोग बेघर हो गये। सच तो यह है कि आज भी भारत के मुसलमान और हिन्दूजन एक-दूसरे से समायोजित नहीं हो पाये हैं। दोनों ओर ।

पूर्वाग्रहों तथा विरोधी भावनाओं के पलीते में आग लगाने वाली समस्याओं, घटनाओं, उन्मादी लोगों तथा दलों की भरमार है। जरा-सी चिंगारी छूते ही साम्प्रदायिक दंगों की ज्वाला प्रज्वलित हो उठती है। मेरठ, अलीगढ़, इलाहाबाद, मुरादाबाद, दिल्ली तथा गुजरात के कुछ नगर आदि कई संवेदनशील नगरों में अनेक बार सोम्प्रदायिकता की भयानक विभीषिका अपना कहर ढा चुकी है।

प्रश्न 5.
साम्प्रदायिकता का व्यक्तित्व के विकास पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर.
मनुष्य का व्यक्तित्व उसकी सभी शारीरिक, जन्मजात तथा अर्जित वृत्तियों का योग है। यह उनके परिवेश में स्थित विभिन्न कारकों के अन्त:कार्य से उत्पन्न व्यक्ति की आदतों, मनोवृत्तियों व गुणों का एक गतिशील संगठन है। मनुष्य का व्यक्तित्व उसके आरम्भिक काल से ही विकसित होने लगता बालक के मस्तिष्क की तुलना एक कोरी स्लेट से की गयी है जिस पर कुछ भी लिखा जा सकता है। साम्प्रदायिक वातावरण में रहने वाले बालक में आरम्भ काल से ही विभिन्न प्रकार की पूर्वधारणाएँ।

विकसित होने लगती हैं। पूर्वधारणा में पूर्व-निर्णय, भ्रान्तिपूर्ण विश्वास तथा राग-द्वेष के संवेग निहित होते हैं। विवेकहीन मान्यताओं तथा अन्धविश्वासों के आधार पर बने पूर्वाग्रह या पूर्वधारणाएँ बालक के व्यक्तित्व पर बुरा प्रभाव डालती हैं। दो विरोधी समुदाय के बालकों में विकसित प्रतिकूल अभिवृत्तियाँ छनमें द्वेष, तनाव तथा शत्रुता के भाव पैदा करेंगी।

अभिवृत्ति के आधार पर ही सामाजिक शत्रुता या मित्रता निर्मित होती है; अतः प्रतिकूल अभिवृत्ति के आधार पर निर्मित सामाजिक शत्रुता; साम्प्रदायिक तनाव एवं दंगे के समय; अपना कुप्रभाव दिखाती है। व्यवहार और अभिवृत्तियाँ पर्याप्त सीमा तक विश्वासों से सम्बन्धित हैं। हिन्दुओं को पुनर्जन्म में विश्वास है लेकिन मुसलमानों का नहीं। यह विश्वास उत्पन्न होने पर कि अमुक हमारे विरोधी और शत्रु हैं, साम्प्रदायिक भावना को बल मिलता है। यही कारण है कि बालक में विविध सम्प्रदायों के प्रति पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण निर्मित हो जाता है। यह दृष्टिकोण उसके व्यक्तित्व के विकास को बाधित करता है।

साम्प्रदायिकता एक क्षुद्र एवं संकुचित मानसिकता के कारण पैदा होती है। यह एक ओर मानव की बुद्धि को अपने बन्धनों में जकड़ लेती है और उसे विकास नहीं करने देती तथा दूसरी ओर यह मानव को समाज और वातावरण के विभिन्न अवयवों से उचित सामयोजन नहीं करने देती, जिससे मनुष्य का व्यक्तित्व असन्तुलन को प्राप्त होता है और उसके व्यक्तित्व का विकास रुक जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि साम्प्रदायिकता हर दृष्टिकोण से बुरी है तथा इसका व्यक्तित्व के विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 6.
सम्प्रदायवाद की रोकथाम के किन्हीं दो उपायों के बारे में संक्षेप में लिखिए। (2017)
उत्तर.
सम्प्रदायवाद की रोकथाम के लिए उपयोगी उपाय इस प्रकार हैं –

  1. मिश्रित सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए। इन कार्यक्रमों के आयोजनों से विभिन्न सम्प्रदाय एक-दूसरे के निकट आते हैं, उनकी अच्छाइयों का पता चलता है तथा अनेक प्रकार की मिथ्या धारणाएँ समाप्त होती हैं।
  2. साम्प्रदायिकता को नियन्त्रित करने के लिए व्यापक स्तर पर इसके विरुद्ध प्रचार किया जाना चाहिए। जन-संचार के सभी माध्यमों द्वारा साम्प्रदायिकता से होने वाली हानियों तथा इसके बुरे परिणामों को जन-साधारण तक पहुँचाना चाहिए।

प्रश्न 7.
क्षेत्रीय समूह-तनाव से क्या आशय है?
उत्तर.
भारत एक उप-महाद्वीप तथा विशाल भौगोलिक-राजनीतिक इकाई है जो विभिन्न क्षेत्रों में विभाजित है। प्रत्येक क्षेत्र की भौगोलिक सीमाओं, धर्म, संस्कृति एवं भाषा, रहन-सहन तथा सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक स्वार्थों ने उस क्षेत्र-विशेष के निवासियों के मन में अपने क्षेत्र की सुख-समृद्धि एवं प्रगति तथा अन्य क्षेत्रों के प्रति अलगाव की भावना को जन्म दिया। परिणामतः एक क्षेत्र के लोग अपने क्षेत्र वालों के प्रति प्रेम तथा दूसरे क्षेत्र वालों के प्रति विद्वेष, घृणा और विरोध की भावना रखने लगे।

किसी क्षेत्र-विशेष के लिए पक्षपात, अन्धभक्ति, निहित स्वार्थ, संकुचित मानसिकता तथा अन्य क्षेत्रों के प्रति उपेक्षा क्षेत्रवाद’ (Regionalism) को जन्म देते हैं। एक क्षेत्र के लोग अपनी माँगों के समर्थन.तथा अन्य के विरोध में आन्दोलन इत्यादि करते हैं, जिनकी परिणति हिंसात्मक दंगों में होती है।

इससे एक-दूसरे के प्रति घृणा बढ़ती है और लोगों में क्षेत्रीय तनाव उत्पन्न होने लगता है। क्षेत्रीयता के आधार पर बढ़ती हुई घृणा और पूर्वाग्रह; क्षेत्रीय समूह-तनाव को स्थायी बना देते हैं। हमारे देश में क्षेत्रीय आर्धार पर मुम्बई राज्य को गुजरात एवं महाराष्ट्र में और पंजाब को पंजाब एवं हरियाणा में विभाजित किया मैया है। समय-समय पर कुछ अन्य क्षेत्र भी अलग राज्य की मांग करते रहते हैं; इससे क्षेत्रीय समूह-तुनाव बढ़ रहा है और राष्ट्र की एकता को आघात पहुँचा रहा है।

प्रश्न 8.
भाषागत समूह-तनाव से क्या आशय है?
उत्तर.
भाषागत समूह-तनाव
भाषा भावाभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। इसमें एकीकरण की प्रबल शक्ति होती है। क्योंकि इसी के माध्यम से एक व्यक्ति दूसरे के सम्पर्क में आकर विचारों का आदान-प्रदान करता है। भारत में हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, मराठी, गुजराती, बंगाली, तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, कश्मीरी, सिन्धी तथा असमिया अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं। देश के संविधान में 22 भाषाओं को राष्ट्रीय महत्त्व देते हुए हिन्दी को राष्ट्रभाषा स्वीकार किया गया है।

अहिन्दी भाषा वर्गों ने हिन्दी भाषा का जबरदस्त विरोध किया। उन्हें हिन्दी भाषा का प्रभुत्व स्वीकार नहीं है। इसके बदले वे अंग्रेजी भाषा के प्रति पक्षपात दिखाते हैं। असम में असमी तथा बंगाली भाषाओं के आधार पर असन्तोष व्याप्त है। विभिन्न भाष्य-भाषी लोगों में सम्पर्क तथा भाषायी आधार पर राज्यों की स्थापना को लेकर काफी तनाव पाया जाता है। इससे आन्दोलन, राजनीतिक षड्यन्त्र तथा हिंसात्मक उपद्रव होते हैं।

भाषायी तनाव; संघर्ष और रक्तपात में बदलकर सैकड़ों-हजारों लोगों की जान तथा करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति तबाह कर देते हैं। इससे उत्पन्न देश के बंटवारे के विचार से राष्ट्रीय एकता खतरे में पड़ती है। सर्वविदित है कि गुजरात और महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक तथा आन्ध्र प्रदेश की स्थापना भाषायी तनावों का ही दुष्परिणाम है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेश, बंगाली भाषा के आधार पर पाकिस्तान से अलग हुआ। भाषागत समूह-तनाव किसी भी देश की अखण्डता और प्रभुसत्ता के लिए खतरनाक सिद्ध होते हैं।

प्रश्न 9.
पूर्वाग्रहों की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर.
पूर्वाग्रहों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. किसी भी वस्तु, व्यक्ति, समूह अथवा विचार के प्रति अनुकूल या प्रतिकूल अभिवृत्तियों तथा । विश्वासों के नाम पूर्वाग्रह है।
  2. किसी व्यक्ति, समुदाय, पदार्थ अथवा समाज के प्रति लिये गये पूर्व निर्णय या पहले से ही निर्मित आग्रह को पूर्वाग्रह रहते हैं।
  3. पूर्वाग्रहों का निर्माण व्यक्ति की मानसिक अभिवृत्तियों तथा संवेगों से होता है। इनके निर्माण में व्यक्तित्व के ज्ञानात्मक, प्रत्यक्षात्मक, प्रेरणात्मक तथा संवेगात्मक सभी पक्ष क्रियाशील होकर कार्य करती हैं।
  4. पूर्वाग्रह अच्छे भी हो सकते हैं और बुरे भी, अनुकूल भी हो सकते हैं और प्रतिकूल भी, सही भी हो सकते हैं और गलत भी; किन्तु इस बात का परीक्षण नहीं किया जा सकता कि ये पूर्वाग्रह किन तथ्यों या सत्य पर आधारित हैं।
  5. ज्यादातर पूर्वाग्रह भ्रम तथा आतंक उत्पन्न करने वाले होते हैं और सामुदायिक, धर्मगत, जातिगत या परम्परागत किसी भी प्रकार के हो सकते हैं।
  6. पूर्वाग्रह वंश परम्परागत तथा जन्मजात नहीं होते, अपितु ये अर्जित होते हैं। कोई भी व्यक्ति पूर्व निर्मित आग्रह को लेकर पैदा नहीं होता बल्कि उसमें अनुकूल या प्रतिकूल विश्वास एवं अभिवृत्तियाँ कट्टरवादियों द्वारा विकसित किये जाते हैं।
  7. पूर्वाग्रह लोगों के व्यक्तित्व के अभिन्न अंग बन जाते हैं जिसके फलस्वरूप समूह में व्यवहार सम्बन्धी दोष पैदा होने लगते हैं जो समूह-तनाव उत्पन्न कर देते हैं।
  8. समूह-तनाव सामुदायिक, जातीय तथा वर्ग-संघर्ष, सामाजिक संघर्ष तथा युद्ध की विभीषिका को जन्म देते हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतवर्ष में समूह-तनाव के विभिन्न रूप क्या हैं?
उत्तर
भारत एक विशाल देश है जिसमें अनेक जातियों, उपजातियों, सम्प्रदायों, वर्गों तथा भिन्न भाषा-भाषी लोग विभिन्न क्षेत्रों में निवास करते हैं। इस विविधता ने जहाँ एक ओर भारतीय समाज एवं संस्कृति को समृद्ध बनाया है, वहीं दूसरी ओर विभिन्न समूह तनावों को भी बल दिया है। हमारे देश में मुख्य रूप से चार प्रकार के समूह-तनाव पाये जाते हैं–

  1. जातिगत समूह-तनाव,
  2. साम्प्रदायिक समूह-तनाव,
  3. क्षेत्रीय समूह-तनाव तथा
  4. भाषागत समूह-तनाव।

प्रश्न 2.
रुढियुक्तियों को परिभाषित कीजिए (2009, 13)
या
रूढ़ियुक्तियों का अर्थ स्पष्ट कीजिए। (2017)
उत्तर.
किम्बाल यंग ने रूढ़ियुक्ति को इन शब्दों में परिभाषित किया है, “रूढ़ियुक्ति एक भ्रामक वर्गीकरण करने की धारणा है जिसके साथ पसन्द अथवा नापसन्द तथा स्वीकृति अथवा अस्वीकृति की प्रबल संवेगात्मक भावना जुड़ी होती है। इस प्रकार रूढ़ियुक्तियों काल्पनिक मत हैं, जो तर्क पर आधारित नहीं होते, बल्कि व्यक्ति की पसन्द अथवा नापसन्द पर आधारित होते हैं। रूढ़ियुक्तियों से सम्बन्धित कोई ठोस प्रमाण नहीं होता। रूढ़ियुक्तियाँ प्रायः पूर्वाग्रहों को जन्म देती हैं तथा इन्हीं पूर्वाग्रहों ले समाज में सामूहिक-तनाव उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 3.
समूह-तनाव-निवारण में शिक्षा की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
उत्तर.
समूह-तनाव-निवारण के विभिन्न उपायों में से सर्वाधिक उपयोगी एवं विश्वसनीय उपाय है—शिक्षा का प्रसार। वास्तव में समूह-तनाव की उत्पत्ति संकीर्ण दृष्टिकोण, पूर्वाग्रहों तथा अन्धविश्वासों आदि के कारण ही होता है। शिक्षा इन कारकों को समाप्त करने में सहायक होती है, शिक्षित व्यक्ति का दृष्टिकोण उदार एवं व्यापक होता है, वह पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर तटस्थ रूप से चिन्तन करता है तथा अन्धविश्वासों से मुक्त होती है।

इस स्थिति में समूह-तनावों की उत्पत्ति की सम्भावना कम हो जाती है। इसके अतिरिक्त शिक्षा ग्रहण करते समय भिन्न-भिन्न समूहों एवं वर्गों के बालक एक साथ रहते हैं तथा परस्पर निकट सम्पर्क में आते हैं। इससे भी विभिन्न समूहों में विद्यमान सामाजिक दूरी घटती है तथा समूह-तनाव की सम्भावना भी प्रायः नहीं रहती। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि समूह-तनाव के निवारण में शिक्षा की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।।

प्रश्न 4.
संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए-भारत की भाषाएँ।
उत्तर.
भारत एक विस्तृत एवं विशाल देश है। यहाँ कश्मीर से कन्याकुमारी तथा कच्छ’ से अरुणाचल प्रदेश तक अनेकानेक भाषाएँ बोली जाती हैं। यहाँ अनेक धर्म और सम्प्रदाय के लोगों के समान ही भिन्न-भिन्न भाषाएँ तथा उपभाषाएँ भी प्रचलित हैं। विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न मुख्य भाषाएँ बोली तथा लिखी जाती हैं, इनके अतिरिक्त सिर्फ बोलचाल में प्रयोग की जाने वाली विविध स्थानीय बोलियाँ हैं जो प्रत्येक 50 किलोमीटर के अन्तर पर बदल जाती हैं। इनका क्षेत्र सीमित है तथा इनका कोई साहित्य भी विकसित नहीं हैं। हमारे देश की मुख्य भाषाएँ-हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, मराठी, गुजराती, बंगाली, तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, असमी तथा कश्मीरी इत्यादि हैं। भारत के संविधान में हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित किया गया है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए |
1. समाज के विभिन्न अंगों के मध्य विकसित होने वाली सामाजिक दूरी के परिणामस्वरूप प्रबल | होने वाले तनाव को ………. कहते हैं।
2. एक समूह के अधिकांश लोगों द्वारा दबाव, बेचैनी एवं चिन्ता की अनुभूति …………….. कहलाती है। (2017)
3. दक्षिण अफ्रीकी में श्वेतों तथा अश्वेतों के मध्य पाये जाने वाला तनाव ……..
4. निश्चित विषय-वस्तुओं, सिद्धान्तों, व्यक्तियों के प्रति बिना कारण के अनुकूल या प्रतिकूल अभिवृत्ति को ………….. कहते हैं।
5. ब्रिट के अनुसार ……….. का अर्थ अपरिपक्व अथवा पक्षपातपूर्ण मत है। (2015)
6. किसी परिस्थिति में पक्षपातपूर्ण एवं अपरिपक्व मत …………. कहलाते हैं। (2013)
7. पक्षपात या पूर्वाग्रह ………. का कारण बनता है।
8. पूर्वाग्रह समूह-तेनावों को ………….. देते हैं।
9. पूर्वाग्रहों के कारण व्यक्ति का दृष्टिकोण ………. हो जाता है।
10. अपनी जाति को महान् तथा अन्य जातियों को हीन मानने के परिणामस्वरूप विकसित होने वाले तनाव को ……… कहते हैं।
11. ……….. के कारण ‘जातीय दूरी’ में वृद्धि होती है।
12. अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन देकर ………. को कम किया जा सकता है।
13. यातायात एवं प्रचार साधनों ने भी जातिवाद को ……….. दिया है।
14. हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, पारसी आदि समूहों के मध्य समय-समय पर उत्पन्न होने वाले तनाव को …….. कहा जाता है।
15. साम्प्रदायिक भावना की चरम परिणति प्रायः ………. के रूप में होती है।
16. सम्प्रदायवाद सामूहिक …………. का एक कारण हो सकता है। (2016)
17. सांस्कृतिक आदान-प्रदान से साम्प्रदायिक तनाव को ……………. किया जा सकता है।
18. क्षेत्रवाद ………. का एक रूप है।
19. भाषावाद ………. का एक रूप है।
20. नकारात्मक प्रभाव के रूप में भाषावाद ………. के लिए उत्तरदायी हो सकता है। (2018)
21. सभी प्रकार के समूह-तनाव को कम करने में ………… सहायक होता है। (2008)
22. किसी व्यक्ति या समुदाय पर गलत आरोप लगाकर तनाव उत्पन्न करने को ………….. कहा जाती है। (2008)
उत्तर
1. सामाजिक तनाव
2. समूह-तनाव
3. प्रजातीय तनाव
4 पूर्वाग्रह
5. पूर्वाग्रह
6, पूर्वाग्रह
7. समूह-तनाव
8. बढ़ावा
9. पक्षपातपूर्ण
10. जातिगत समूह-तनाव
11. जातिगत तनाव
12 जातिगत तनाव
13. बढ़ावा
14. साम्प्रदायिक तनाव
15 साम्प्रदायिक तनाव
16. तनाव
17, समाप्त
18. समूह तनाव,
19. समूह तनाव
20, क्षेत्रीय तनाव
21. शिक्षा को प्रसार
22 अफवाहें, दंगे फैलाना।

प्रश्न II. निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –
प्रश्न 1.
समूह-तनाव से क्या आशय है?
उत्तर.
समूह-तनाव उस स्थिति का नाम है जिसमें समाज का कोई वर्ग, सम्प्रदाय, धर्म, जाति या राजनीतिक दल; दूसरे के प्रति भय, ईर्ष्या, घृणा तथा विरोध से भर जाता है।

प्रश्न 2.
भारतीय समाज में मुख्य रूप से किस-किस प्रकार के समूह-तनाव पाये जाते हैं?
उत्तर.
भारतीय समाज में पाये जाने वाले समूह-तनाव के मुख्य रूप हैं-जातिगत समूह-तनाव, भाषागत समूह-तनाव, क्षेत्रगत समूह-तनाव तथा साम्प्रदायिक समूह-तनाव।

प्रश्न 3.
समूह-तनाव के सामान्य वातावरणीय कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर.
समूह-तनाव के सामान्य वातावरणीय कारण हैं-ऐतिहासिक कारण, भौतिक कारण, सामाजिक कारण, धार्मिक कारण, आर्थिक कारण, राजनीतिक कारण तथा सांस्कृतिक कारण।

प्रश्न 4.
समूह-तनाव के चार मुख्य मनोवैज्ञानिक कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर.

  1.  पूर्वाग्रह,
  2. भ्रामक विश्वास, रूढ़ियाँ और प्रचार,
  3. मिथ्या दोषारोपण तथा
  4. व्यक्तित्व एवं व्यक्तिगत भिन्नताएँ।

प्रश्न 5.
पूर्वाग्रह से क्या आशय है?
उत्तर.
पूर्वाग्रह एक ऐसा निर्णय होता है जो तथ्यों के समुचित परीक्षण के पूर्व लिया जाता है।

प्रश्न 6.
पूर्वाग्रह से छुटकारा पाने के मुख्य उपाय क्या हैं?
उत्तर.

  1. पारस्परिक सम्पर्क,
  2. शिक्षा,
  3. सामाजिक-आर्थिक समानता,
  4. भावात्मक एकता,
  5. सन्तुलित व्यक्तित्व तथा
  6. चेतना जाग्रत करना।

प्रश्न 7.
जातिवाद से क्या आशय है?
उत्तर.
जातिवाद किसी जाति या उपजाति के सदस्यों की वह भावना है जिसमें वे देश, अन्य जातियों या सम्पूर्ण समाज के हितों की अपेक्षा अपनी जाति या समूह के सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक हितों या लाभों को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

प्रश्न 8.
जातिवाद के मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर.

  1. अपनी जाति की प्रतिष्ठा की एकांगी भावना,
  2. व्यक्तिगत समस्याओं का समाधान,
  3. विवाह सम्बन्धी प्रतिबन्ध,
  4. आजीविका में सहायक,
  5. नगरीकरण तथा औद्योगीकरण,
  6.  यातायात तथा प्रचार के साधनों का विकास।

प्रश्न 9.
भारत में साम्प्रदायिक तनाव के चार मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर.

  1. ऐतिहासिक कारण
  2. सांस्कृतिक कारण,
  3. राजनीतिक कारण तथा
  4. मनोवैज्ञानिक कारण।

प्रश्न 10.
भाषावाद के निवारण के मुख्य उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर.

  1. राष्ट्रीय भाषा का विकास एवं राष्ट्रीय समर्थन,
  2. क्षेत्रीय भाषाओं को सम्मान एवं प्रोत्साहन,
  3. साम्प्रदायिकता एवं क्षेत्रवाद का विरोध,
  4. सांस्कृतिक विनिमय,
  5. राजनीतिक उपाय तथा
  6. सही सोच का प्रचार-प्रसार।,

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए –
प्रश्न 1.
“मनोवैज्ञानिक अर्थों में तनाव, दबाव, बेचैनी तथा चिन्ता की अनुभूति है।” यह कथन किस मनोवैज्ञानिक का है?
(क) जेम्स ड्रेवर
(ख) कोलमैन
(ग) क्रेच तथा क्रचफील्ड
(घ) बेलार्ड
उत्तर
(ख) कोलमैन

प्रश्न 2.
समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों या समूहों के बीच सामाजिक दूरी के बढ़ जाने की स्थिति को कहते हैं –
(क) सामूहिक संघर्ष
(ख) पारस्परिक सहयोग
(ग) समूह-तनाव
(घ) सामूहिक सौहार्द
उत्तर
(ग) समूह-तनाव

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में कौन समूह-तनाव का कारण है- (2012)
(क) शिक्षा
(ख) खेल
(ग) रूढ़ियुक्तियाँ
(घ) राष्ट्रीय पर्व
उत्तर
(ग) रूढ़ियुक्तियाँ

प्रश्न 4.
व्यक्तिगत, सामुदायिक, परम्परागत विश्वासों तथा वृत्तियों के आधार पर जब किसी सम्प्रदाय, धर्म, वर्ग, क्षेत्र या भाषा के प्रतिकूल या अनुकूल धारणा बना ली जाती है तो उसे क्या कहते हैं?
(क) सम्प्रदायवाद
(ख) समूह-तनाव
(ग) भ्रामक दृष्टिकोण
(घ) पूर्वाग्रह
उत्तर
(घ) पूर्वाग्रह

प्रश्न 5.
प्रबल जातिवाद की भावना के कारण विकसित होने वाले सामाजिक तनाव को कहते हैं –
(क) अनावश्यक तनावे
(ख) गम्भीर सामूहिक तनाव
(ग) जातिगर्त समूह-तनाव।
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ग) जातिगर्त समूह-तनाव।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से कौन-सा सामूहिक तनाव है जो केवल भारतीय समाज में ही पाया जाता
(क) भाषागत समूह-तनाव
(ख) धर्मगत समूह-तनाव
(ग) क्षेत्रगत समूह-तनाव
(घ) जातिगत समूह-तनाव
उत्तर
(घ) जातिगत समूह-तनाव

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में कौन जातिवाद का दुष्परिणाम नहीं है – (2015)
(क) भ्रष्टाचार
(ख) पक्षपात
(ग) समूह-तनाव
(घ) अन्तर्जातीय विवाह
उत्तर
(घ) अन्तर्जातीय विवाह

प्रश्न 8.
अपनी भाषा को उच्च तथा अन्य भाषाओं को हीन मानने से उत्पन्न होने वाले सामाजिक तनाव को कहते हैं –
(क) गम्भीर सामाजिक तनावे
(ख) क्षेत्रीय तनाव
(ग) भाषागत तनाव
(घ) साम्प्रदायिक तनाव
उत्तर
(ग) भाषागत तनाव

प्रश्न 9.
किस प्रकार के समूह-तनाव को कम करने का उपाय है-अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन?
(क) भाषागत समूह-तनाव
(ख) धर्मगत समूह-तनाव
(ग) जातिगत समूह-तनाव
(घ) क्षेत्रगत समूह-तनाव
उत्तर
(ग) जातिगत समूह-तनाव

प्रश्न 10.
हमारे देश में समय-समय पर होने वाले साम्प्रदायिक दंगों के पीछे मुख्य कारण होता है –
(क) जातिगत भावना
(ख) क्षेत्रीय भावना
(ग) साम्प्रदायिकता की भावना
(घ) विद्रोह की भावना
उत्तर
(ग) साम्प्रदायिकता की भावना

प्रश्न 11.
धर्मान्धता अथवा धार्मिक कट्टरता की भावना के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है-
(क) सामाजिक तनाव
(ख) धर्मगत समूह-तनाव
(ग) वर्गवाद
(घ) अनावश्यक तनाव
उत्तर
(ख) धर्मगत समूह-तनाव

प्रश्न 12.
जातिवाद के उग्र रूप धारण कर लेने पर होता है
(क) राष्ट्र की प्रगति
(ख) आर्थिक उत्थान्
(ग) भ्रष्टाचार का बोलबाला
(घ) समाज में सहयोग
उत्तर
(ग) भ्रष्टाचार का बोलबाला

प्रश्न 13.
साम्प्रदायिक तनाव को कम करने के लिए किया जाना चाहिए –
(क) राष्ट्रीयता का प्रचार
(ख) साम्प्रदायिक राजनीतिक दलों पर प्रतिबन्ध
(ग) मिश्रित कार्यक्रमों का आयोजन
(घ) ये सभी उपाय
उत्तर
(घ) ये सभी उपाय

प्रश्न 14.
मिश्रित सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन से कम किया जा सकता है –
(क) जातिगत समूह-तनाव
(ख) साम्प्रदायिक तनाव
(ग) भाषागत तनाव
(घ) हर प्रकार का समूह-तनाव
उत्तर
(घ) हर प्रकार का समूह-तनाव

प्रश्न 15.
अपने देश में भाषावाद को नियन्त्रित करने का उपाय है –
(क) व्यापक राजनीतिक प्रयास
(ख) राष्ट्रभाषा को सम्मान प्रदान करना
(ग) समस्त क्षेत्रीय भाषाओं को समान प्रोत्साहन
(घ) ये सभी उपाय
उत्तर
(घ) ये सभी उपाय

प्रश्न 16.
समूह-तनाव निवारण में सर्वाधिक सहायक कारक है –
(क) आर्थिक सुधार करना
(ख) शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार
(ग) आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार
(घ) कठोर कानून बनाना
उत्तर
(ख) शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार

प्रश्न 17.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की अलग राज्य की माँग किस विचारधारा का परिणाम है?
(क) जातिवाद
(ख) धर्मवाद
(ग) क्षेत्रवाद
(घ) अन्धविश्वास
उत्तर
(ग) क्षेत्रवाद

प्रश्न 18.
निम्नलिखित में से कौन समूह-तनाव को कम करता है?
(क) रूढूयाँ
(ख) पूर्वाह्न
(ग) अशिक्षा
(घ) समाज के सदस्यों के समान आदर्श और लक्ष्य
उत्तर
(घ) समाज के सदस्यों के समान आदर्श और लक्ष्य

प्रश्न 19.
निम्नलिखित कथनों में से कौन सही है? (2011)
(क) पूर्वाग्रह सीखे नहीं जाते।
(ख) पूर्वाग्रह असन्तोष प्रदान करते हैं।
(ग) पूर्वाग्रह सत्य पर आधारित होते हैं।
(घ) पूर्वाग्रह समूह-तनाव के लिए उत्तरदायी होते हैं।
उत्तर
(घ) पूर्वाग्रह समूह-तनाव के लिए उत्तरदायी होते हैं।

प्रश्न 20.
“सभी अश्वेत अच्छे बास्केटबॉल खिलाड़ी होते हैं।” यह कथन उदाहरण है- (2017)
(क) रूढ़ियुक्ति का
(ख) पूर्वाग्रह का
(ग) मिथ्यादोषारोपण का
(घ) संघर्ष का
उत्तर
(ख) पूर्वाग्रह का

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