UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi कहानी Chapter 4 बहादुर

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name बहादुर
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi कहानी Chapter 4 बहादुर

बहादुर – पाठ का सारांश/कथावस्तु

(2018, 16)

‘दिलबहादुर’ से ‘बहादुर’ बनने की प्रक्रिया ‘दिलबहादुर लगभग 12-13 वर्ष का एक पहाड़ी नेपाली लड़का है, जिसके पिता की युद्ध में मृत्यु हो चुकी है और उसकी माँ बहुत गुस्सैल स्वभाव की है। माँ की पिटाई की वजह से वह घर से भाग कर एक मध्यम वर्गीय परिवार में नौकर बन जाता है, जहाँ गृहस्वामिनी निर्मला बड़ी उदारता के साथ उसके नाम से ‘दिल’ शब्द हटाकर उसे सिर्फ बहादुर पुकारती है। अब स्वतन्त्र ‘दिलबहादुर’ नौकर ‘ बहादुर’ बन गया।

परिश्रमी एवं हँसमुख बहादुर
बहादुर अत्यन्त परिश्रमी लड़का है, जो अपनी मेहनत से पूरे घर को न केवल साफ़ सुथरा रखता है, बल्कि घर के सभी सदस्यों की सभी आवश्यकताओं को पूरा करता है। उसके आने से परिवार के सभी सदस्य बड़े ही आरामतलबी एवं कम्पोर या आलसी बन गए हैं। इतना काम करने के बावजूद वह हमेशा हंसत। रहता है। सना और हंसाना मानो उसकी आदत बन गई थी। वह रात में सोते समय कोई-न-कोई गीत अवश्य गुनगुनाता है।

किशोर की बदतमीजी
निर्मला का बड़ा लड़का किशोर एक बिगड़ा हुआ लड़का था, जो शान-शौकत तथा रोय से रहना पसन्द करता था। उसने अपने सारे काम बहादुर को सौंप दिए। यदि बहादुर उसके काम में थोड़ी-सी भी लापरवाही करता, तो वह बहादुर को गालियाँ देता। छोटी-छोटी गलती पर वह बहादुर को पीटता भी था। बहादुर पिटाई खाकर एक कोने में चुपचाप खड़ा हो जाता और कुछ देर बाद घर के कामों में पूर्ववत् जुट जाता।

एक दिन किशोर ने बहादुर को ‘सुअर का बच्चा’ कह दिया, जिससे उसके स्वाभिमान को ठेस पहुँची और उसने किशोर का काम करने से मना कर दिया। उसने लेखक के पूछने पर रोते हुए कहा कि-”बाबूजी, मैया ने मेरे मरे बाप को क्यों लाकर खड़ा किया?” इतना कहकर वह रो पड़ा।

निर्मला के रिश्तेदार द्वारा चोरी का आरोप लगाना
धीरे-धीरे निर्मला के व्यवहार में भी अन्तर आने लगा और अब उसने बहादुर के लिए रोटियाँ सेंकनी बन्द कर दीं। वह भी बहादुर पर हाथ उठाने लगी। मारपीट एवं गालियों के कारण बहादुर से गलतियाँ एवं भूलें अधिक होने लगीं। एक दिन निर्मला के घर उसके रिश्तेदार अपने परिवार के साथ आए। चाय-नाश्ते के बाद बातचीत के दौरान अचानक रिश्तेदार की पत्नी ने अपने ग्यारह रुपये घर में खो जाने की बात कही। सभी ने बहादुर पर ही शक किया। बहादुर के लगातार मना करने के बावजूद उसे डराया, धमकाया एवं पीटा गया, चूंकि बहादुर पर लगा यह आरोप झूठा था, इसलिए वह लगातार इससे इनकार करता रहा। अन्त में लेखक ने भी उसे पीटा।

बहादुर के प्रति घरवालों का कटुतापूर्ण व्यवहार
इस घटना के बाद से घर के सभी सदस्य बहादुर को सन्देह की दृष्टि से देखने लगे और उसे कुत्ते की तरह दुत्कारने लगे। बहादुर भी बहुत ही खिन्न रहने लगा। अब उसके अन्दर परिवार के लोगों के प्रति अपनापन नहीं रहा। अन्दर से वह बड़ी बेचैनी एवं बन्धन महसूस करता था।

बहादुर का घर से भाग जाना
एक दिन उसके हाथ से सिल छूटकर गिर गई और उसके दो टुकड़े हो गए। पिटाई के डर तथा लोगों के क्रूर एवं असभ्य व्यवहार से तंग आकर वह अपना सारा सामान घर में ही छोड़कर कहीं चला गया। वह अपना भी कोई सामान लेकर नहीं गया। निर्मला, उसके पति एवं किशोर को उसकी ईमानदारी पर विश्वास हो गया था। वे जानते थे कि रिश्तेदार के रुपये उसने नहीं चुराए थे। सभी बहादुर पर स्वयं द्वारा किए गए अत्याचारों के लिए पश्चाताप करने लगे।

‘बहादुर’ कहानी की समीक्षा

(2018, 17, 16, 14, 13, 11, 10)

श्री अमरकान्त द्वारा रचित ‘बहादुर’ कहानी एक मध्यमवर्गीय परिवार के जीवन से सम्बन्धित समस्याओं पर आधारित है। इसमें एक बेसहारा पहाडी लड़के की मार्मिक कथा का वर्णन है। कहानी के तत्वों के आधार पर प्रस्तुत कहानी की समीक्षा इस प्रकार हैं-

कथानक
इस कहानी की कथावस्तु में मध्यम वर्गीय परिवार की साधारण सी लगने वाली कई बातों के माध्यम से मानवीय करुणा को प्रदर्शित किया गया है। आरम्भ से अन्त तक यह कहानी बहादुर के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं। सहजता, रोचकता, संक्षिप्तता कहानी की विशेषता है तथा यह एक यथार्थवादी कहानी भी है।

बहादुर एक बेसहारा पहाड़ी नेपाली लड़का है। उसके पिता की मृत्यु हो चुकी है और उसकी माँ उसे हमेशा मारती रहती हैं, जिससे तंग आकर वह घर से भाग जाता है और एक मध्यम वर्गीय परिवार में घरेलू नौकर के रूप में नौकरी करने लगता है। वह हँसमुख, ईमानदार और परिश्रमी लड़का है। निर्मला, जो गृहस्वामिनी है, बहादुर का पूरा ध्यान रखती हैं। निर्मला का बड़ा लड़का किशोर बहादुर पर पूरी तरह आश्रित है। इसके बावजूद वह ज़रा-जरा सी बात पर बहादुर को गालियाँ देता है तथा पीटता है। कुछ दिन बाद निर्मला का व्यवहार भी बहादुर के प्रति बदल जाता है। एक दिन किशोर ने बहादुर के पिता को सम्बोधित कर गाली दे दी, जो बहादुर को बहुत बुरी लगी और उस दिन उसने न तो कोई काम किया और न ही खाना खाया। एक दिन निर्मला के घर कुछ रिश्तेदार आए, उन्होंने बहादुर पर ग्यारह रुपये चोरी करने का आरोप लगाया तथा इसी के लिए निर्मला के पति ने बहादुर की पिटाई कर दी। इस घटना से बहादुर बहुत आहत हो गया और वह चुपचाप घर छोड़कर चला गया। उसके जाने के बाद घर वालों को उसकी कमी महसूस हुई और बाद में सभी लोग पश्चाताप करने लगे। इस प्रकार यह कहानी एक अल्पवयस्क नौकर के मनोविज्ञान को भी प्रकट करती है।

पात्र और चरित्र-चित्रण
प्रस्तुत कहानी का सर्वाधिक प्रमुख पात्र एवं नायक बहादुर है, जिस पर पूरा कथानक टिका हुआ है। इस चरित्र के महत्व का अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि इस चरित्र के आधार पर ही कहानी का शीर्षक रखी गया है। उसके स्वभाव में कुछ ऐसी सरसता, भोलापन, करुणा एवं वेदना है, जिसके कारण उसे नज़रअन्दाज़ करना असम्भव है। अन्य पात्रों में निर्मला जो पर की स्वामिनी है, निर्मला का पति व निर्मला का पुत्र किशोर जोकि बिगड़ा हुआ | नवयुवक है तथा नौकर को हीन दृष्टि से देखता है।

कथोपकथन या संवाद
इस कहानी के संवाद अत्यन्त सरल, संक्षिप्त, स्वाभाविक, स्पष्ट, रोचक, सार्थक तथा गतिशील हैं। ये पात्रों के अनुकूल तथा सटीक हैं। संवाद संक्षिप्त तथा स्वाभाविक कथोपकथन पर आधारित हैं।

देशकाल और वातावरण
कहानी में देशकाल और वातावरण का भी ध्यान रखा गया है। कहानी में निम्न तथा मध्यम वर्गीय परिवार के लिए सजीव तथा स्वाभाविक वातावरण का चित्रण किया गया है। नौकर पर रोब जमाना, उससे जी तोड़ काम कराना, उसे बात-बात पर बार-बार पीटना, गाली देना आदि घटनाओं ने पारिवारिक वातावरण को मार्मिक बना दिया है।

भाषा-शैली
प्रस्तुत कहानी में अमरकान्त नै सरल, स्वाभाविक और सामान्य बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया है तथा चित्रात्मक शैली का भी प्रयोग किया गया है। भाषा कथा के अनुरूप है, जिसमें अन्य भाषाओं के शब्द भी लिए गए हैं, जैसे-शरारत, ओहदा, किस्सा, ज़रा आदि उर्दू शब्द है। लोकोक्तियों तथा मुहावरों का भी प्रयोग हुआ है; जैसे–माथा ठनकना, नौ दो ग्यारह होना, पंच बराबर होना आदि। इसके अतिरिक्त इसमें वर्णनात्मक, काव्यात्मक और आलंकारिक शैली का प्रयोग किया गया है।

उद्देश्य
यह कहानी निम्न एवं मध्यमवर्गीय समाज के मनोविज्ञान के वास्तविक चित्र को प्रदर्शित करती है। इस कहानी के माध्यम से वर्ग भेद मिटाने को प्रोत्साहन दिया गया है, जो मानवीय सहानुभूति के आधार पर ही मिट सकता है।

शीर्षक
कहानी का ‘बहादुर’ शीर्षक आकर्षक व मुख्य पात्राधारित है। अमरकान्त जी की कहानी के शीर्थक व्यक्ति विशेष से सम्बन्धित हैं। सम्पूर्ण कहानी की कथावस्तु घटनाएँ ‘बहादुर’ के इर्द-गिर्द घूमती हैं। ‘बहादुर’ कहानी का शीर्षक अत्यन्त सरल, संक्षिप्त एवं रोचक है, जो पाठक के मन में कौतूहलता उत्पन्न करता है। अतः शीर्षक की दृष्टि से ‘बहादुर’ कहानी सफल व सार्थक है।

‘बहादुर’ का चरित्र-चित्रण

(2017, 16, 14, 13, 11, 10)

अमरकान्त द्वारा लिखित कहानी ‘बहादुर’ में मुख्य रूप से चार पात्र हैं-लेखक या निर्मला का पति, निर्मला, पुत्र किशोर तथा पहाड़ी नौकर दिलबहादुर, जिसे निर्मला ने केवल बहादुर नाम दे दिया था और यही बहादुर कहानी का नायक हैं। बहादुर के चरित्र की अनेक विशेषताएँ हैं, जिन्हें निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर देखा जा सकता है-

छल-कपट रहित भोला बालक
12-13 वर्ष का नेपाली बालक बहादुर बहुत ही भोला है और छल-कपट से कोसों दूर है। उसमें न तो किसी प्रकार की कृत्रिमता या बनावटीपन है और न ही किसी बात को छिपाने की कला। वह किसी भी बात का बिलकुल सच एवं स्पष्ट उत्तर देता है।

परिश्रमी
बहादुर अत्यन्त परिश्रमी लड़का है। वह घर के सभी सदस्यों के अधिश कार्यों को करता है और उन्हें करते हुए न कोई आलस्य दिखाता है और न कोई अनमनापन। वह बड़े ही प्यार एवं जिम्मेदारी के साथ अपने कार्यों को सम्पन्न करता है।

हँसमुख एवं मृदुभाषी
बहादुर हर समय हँसते रहने वाला लड़का है। वह किसी भी बात कहकर अपनी नैसर्गिक, स्वाभाविक हँसी जरूर हँसता है, जो सामने देखने सुनने वालों के हृदय को । झंकृत कर देती हैं। वह सभी लोगों के प्रश्नों का उत्तर बड़े ही मीठे स्वर में हँसकर देता है।

ईमानदार एवं सच्चा हृदय
गरीब होने के बावजूद भी बहादुर अत्यधिक ईमानदार बालक है, जिसे बेईमानी हूँ तक नहीं पाई है। उसके मन में कोई लालच नहीं है। घर में कहीं गिरे या पड़े पैसों को वह निर्मला के हाथों में रख देता है। वह घर छोड़कर जाते समय भी अपना सामान तक नहीं ले जाती हैं।

सहनशील एवं स्वाभिमानी
बहादुर बड़ा ही सहनशील बालक है। वह घर के सारे काम करने के बावजूद निर्मला की झाँट खाता रहता है। किशोर द्वारा भी कई बार बदतमीज़ियाँ की जाती हैं, जिन्हें वह थोड़ी देर में ही भूल जाता है और अपने काम में पूर्ववत् लग जाता है। एक बार किशोर द्वारा उसके पिता से सम्बन्धित गाली देने पर उसका स्वाभिमान जाग जाता है। वह किशोर का काम करने से इनकार कर देता है।

मातृ-पितृभक्त बालक
बहादुर का हृदय मातृभक्ति एवं पितृभक्ति की भावना से ओत-प्रोत हैं। माँ द्वारा पीटे जाने के कारण घर से भागा बहादुर माँ के पास जाना नहीं चाहता, लेकिन मात-पिता के प्रति अपने फर्ज को वह अच्छी तरह समझता है।। इसीलिए वह अपने कमाए पैसों को माँ को ही देना चाहता है। अपने पिता के प्रति प्रेम ने ही उसे किशोर का काम करने से मना करने हेतु प्रेरित किया।

व्यवहार कुशल
बहादुर बहुत व्यवहार कुशल बालक हैं। इसी व्यवहार कुशलता के कारण वह घर के सभी सदस्यों को अत्यधिक प्रभावित कर देता है। मोहल्ले के बच्चों को भी वह अपने गाने सुनाकर मोहित कर लेता है।

स्नेही बालक
वह निर्मला के अन्दर अपनी माँ की छवि देखता है। वह स्नेह का भूखा है। जब निर्मला उसका ध्यान रखती है, तो वह भी बीमार निर्मला का बहुत ध्यान रखता हैं। उसे निर्मला के स्वास्थ्य की बहुत चिन्ता है। इस प्रकार, बहादुर पाठकों के हृदय-पटल पर अपना अमिट चित्र अंकित कर देता है। पाठक उसे लम्बे समय तक याद रखते हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 1 मुक्तियज्ञ

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name मुक्तियज्ञ
Number of Questions Solved 6
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 1 मुक्तियज्ञ

कथावस्तु पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1.
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं पर प्रकाश डालिए। (2018)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य की पृष्ठभूमि संक्षेप में प्रस्तुत कीजिए। (2018)
अथवा
मुक्तियज्ञ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख कीजिए। (2018, 17, 16)
अथवा
“मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में ऐतिहासिक तथ्यों की प्रधानता है।” उदाहरण द्वारा स्पष्ट कीजिए। (2017)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य का कथासार अपने शब्दों में लिखिए। (2016)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य का कथानक, संक्षेप में लिखिए। (2018, 16)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य का कथानक/कथावस्तु / प्रतिपाद्य और / कथावस्तु दृष्टिकोण को संक्षेप में लिखिए। (2013, 12, 11, 10)
अथवा
“मुक्तियज्ञ गाँधी युग के स्वर्ण इतिहास का काव्यात्मक आलेख है।” पुष्टि कीजिए। (2014, 13, 11, 10)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के आधार पर गाँधीजी का भारत के लिए योगदान पर प्रकाश डालिए। (2011)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य द्वारा कवि सुमित्रानन्दन पन्त ने स्वतन्त्रता प्राप्ति से उपजी किन समस्याओं की ओर पाठकों का ध्यान आकृष्ट किया है? (2011)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में वर्णित प्रमुख राजनैतिक घटनाओं पर प्रकाश डालिए। (2014, 13, 12, 11)
उत्तर:
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा रचित ‘लोकायतन’ महाकाव्य का एक अंश है। इसमें वर्ष 1921 से 1947 तक के मध्य घटित भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की प्रमुख घटनाओं का वर्णन किया गया है। अंग्रेज़ शासकों ने नमक पर कर लगा दिया था। महात्मा गाँधी ने इसका विरोध किया। वे साबरमती आश्रम से चौबीस दिनों की यात्रा करके डाण्डी ग्राम पहुँचे और सागरतट पर नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा।

वह चौबीस दिनों का पथ ब्रत, दो सौ मील किए पद पावन।
स्थल-स्थल पर रुक, पा जन पूजन, दिया दीप्त सत्याग्रह दर्शन।”

इसके माध्यम से वे अंग्रेज़ों के इस कानून का विरोध करके जनता में चेतना उत्पन्न करना चाहते थे। उनके इस विरोध का आधार सत्य और अहिंसा था। गाँधीजी के इस सत्याग्रह से शासक क्षुब्ध हो गए और उन्होंने भारतीयों पर दमनचक्र चलाना आरम्भ कर दिया। गाँधीजी तथा अनेक नेताओं को जेल में डाल दिया गया। भारतीयों द्वारा जेलें भरी जाने लगीं। जैसे-जैसे दमनचक्र बढ़ता गया वैसे वैसे मुक्तियज्ञ भी बढ़ता चला गया। गाँधीजी ने भारतीयों को स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग के लिए प्रोत्साहित किया। सभी ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना प्रारम्भ कर दिया। वर्ष 1927 में भारत में ‘साइमन कमीशन’ आया, भारतीयों ने इसका बहिष्कार किया, जिस कारण साइमन कमीशन को वापस जाना पड़ा। वर्ष 1942 में गाँधीजी ने ‘भारत छोड़ो’ का नारा दिया। अब सब पूर्ण स्वतन्त्रता चाहते थे।

अंग्रेजों ने ‘फूट डालो’ की नीति अपनाकर ‘मुस्लिम लीग’ की स्थापना करा दी। मुस्लिम लीग ने भारत विभाजन की माँग की। वर्ष 1947 में भारत को पूर्ण स्वतन्त्र राष्ट्र घोषित कर दिया गया। अंग्रेजों ने भारत और पाकिस्तान के रूप में देश का विभाजन कर दिया। देश में एक ओर तो स्वतन्त्रता का उत्सव मनाया जा रहा था, वहीं दूसरी ओर विभाजन के विरोध में गाँधीजी मौन-व्रत धारण किए हुए थे। वे चाहते थे कि हिन्दू-मुस्लिम पारस्परिक वैर को त्यागकर सत्य, अहिंसा, प्रेम आदि सात्विक गुणों को अपनाएं और मिल-जुलकर रहें।। इस प्रकार ‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य देशभक्ति से परिपूर्ण, गाँधी युग के स्वर्णिम इतिहास का काव्यात्मक आलेख है। इसमें उस युग का वर्णन है, जब भारत में चारों ओर हलचल मची हुई थी, चारों ओर क्रान्ति की अग्नि धधक रही थी। कविवर पन्त ने महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व और कृतित्व के माध्यम से विभिन्न आदशों की स्थापना का सफल प्रयास किया है।

प्रश्न 2.
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2018)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य की विशेषताओं को संक्षेप में अपने शब्दों में लिखिए। (2017)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य की विशेषताएँ संक्षेप में लिखिए। (2017)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की समीक्षा कीजिए। (2013, 10)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खाण्डकाव्य की कथावस्तु की विशेषताएँ बताइए। (2014, 12)
अथना
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2017, 14)
अथवा
खण्डकाव्य के लक्षणों के आधार पर ‘मुक्तियज्ञ’ की समीक्षा कीजिए। (2010)
उत्तर:
पन्त जी द्वारा रचित ‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु की मुख्य विशेषताएँ निम्नांकित हैं।

1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि मुक्तियज्ञ’ के कथानक की पृष्ठभूमि अत्यधिक विस्तृत है। इसमें वर्ष 1921 से 1947 तक के भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन का इतिहास है। प्रमुख रूप से इसमें भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की मुख्य पटनाओं का वर्णन है। साथ ही तत्कालीन विश्व की महत्त्वपूर्ण पटनाओं; जैसे—द्वितीय विश्वयुद्ध, जापान पर गिराए गए अणु बमों आदि का भी उल्लेख हुआ है। इसकी व्यापकता को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इसकी कथावस्तु एक महाकाव्य में समाहित हो सकती थी, किन्तु पन्त जी ने बड़ी कुशलता से इस विशाल फलक को एक छोटे से खण्डकाव्य में समेट लिया है। अत: यह कहा जा सकता है कि आकार में लागु होते हुए भी ‘मुक्तियज्ञ’ में महाकाव्य जैसी गरिमा है। इसे लोकहित की दृष्टि से रचा गया है। कहीं भी काल्पनिक घटनाओं का वर्णन नहीं है। मुक्तियज्ञ की कथावस्तु का स्वरूप ऐतिहासिक है।

2. प्रमुख घटनाओं का काव्यात्मक वर्णन मुक्तियज्ञ’ सुनियोजित या सर्गबद्ध रचना नहीं है। इसमें वर्ष 1921 से 1947 तक की प्रमुख घटनाओं का वर्णन किया गया है। कथावस्तु में ऐतिहासिकता का ध्यान रखा गया है। ‘मुक्तियज्ञ’ से पूर्व जितने भी खण्डकाव्य लिखे गए, उन सभी में कथावस्तु इतिहास और पुराणों से ली गई है। यह पहला ऐसा खण्डकाव्य है, जिसमें पहली बार किसी कवि ने आधुनिक युग में घटित घटनाओं पर दृष्टि डाली। इस दृष्टि से इस खण्डकाव्य का विशेष महत्व है। इसमें कवि ने आधुनिक इतिहास से सामग्री ग्रहण की हैं।

3. गाँधीवाद की राष्ट्रीय विचारधारा को चिन्तन ‘मुक्तियज्ञ’ में गांधीवादी विचारधारा का चित्रण हुआ हैं। कथानक इतिहास पर आधारित है। कथा में भावात्मकता और काव्यात्मकता का सुन्दर मिश्रण है। इसमें सत्य, अहिंसा, नारी जागरण, आत्म स्वतन्त्रता, हरिजनोद्धार, नशाबन्दी आदि विचारधाराओं को सुन्दर काव्यात्मक रूप प्रदान किया गया है।

4. सरल अभिव्यक्ति ‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में गत तत्त्वों की सरल अभिव्यक्ति की गई है। कवि ने आलंकारिकता अथवा प्रतीकात्मकता को सहायता नहीं ली है, अपितु ऐतिहासिक तथ्यों की रक्षा के लिए सरलता का विशेष ध्यान रखा है। कवि ने काव्यालंकारों का प्रयोग नहीं करके इसे बोझिल होने से बचा लिया है। इस खण्डकाव्य की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें स्वतन्त्रता संग्राम की महत्त्वपूर्ण घटनाओं का समावेश किया गया है।

5. सफल कथावस्तु ‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु अत्यन्त विशाल है, जो एक खण्डकाव्य में समाविष्ट नहीं हो सकती। वर्ष 1921 से 1947 तक की घटनाओं को एक खण्डकाव्य में वर्णित नहीं किया जा सकता था, किन्तु पन्त जी ने इस काल की प्रमुख घटनाओं को काव्य के कथानक में इस प्रकार जोड़ा है कि सम्पूर्ण घटनाएँ हमारे सामने सजीव हो उठती हैं। इस प्रकार मुक्तियज्ञ खण्डकाव्य सत्य पर आधारित खण्डकाव्य है। इसमें महात्मा गाँधी । ने जो कुछ भी किया वह राष्ट्र, समाज और मानवता के कल्याण के लिए किया।

प्रश्न 3.
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के नामकरण या शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए। (2016, 15)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य की रचना के उद्देश्य /सन्देश पर प्रकाश डालिए। (2010)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में प्रतिपादित सामाजिक चेतना पर प्रकाश डालिए। (2011)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में अभिव्यक्त गाँधी दर्शन की आत्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि को स्पष्ट कीजिए। (2011)
उत्तर:

नामकरण की सार्थकता

‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य का सम्पूर्ण कथानक भारत के स्वतन्त्रता संग्राम से जुड़ा हुआ है। इसके नायक महात्मा गाँधी हैं, जो परम्परागत नायकों से हटकर हैं। इनका यही व्यक्तित्व भारतीय जनता को प्रेरणा और शक्ति देता है। भारत को स्वतन्त्र कराने के लिए इन्होंने एक प्रकार से यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें अनेक देशभक्तों ने हँसते-हँसते अपने प्राणों की आहुति दे दी, अपनी सर्वस्व बलिदान कर दिया। देश की मुक्ति के लिए चलाए गए यज्ञ के कारण ही इस खण्डकाव्य का नाम ‘मुक्तियज्ञ’ रखा गया, जो पूर्णतया सार्थक एवं उचित है।

मुक्तिया खण्डकाव्य का उद्देश्य

‘मुक्तियज्ञ’ एक उद्देश्य प्रधान रचना है। कवि इस रचना के माध्यम से मनुष्य को परतन्त्र भारत की भीषण परिस्थितियों से परिचित कराना चाहता है। इस उद्देश्य में कवि पूर्णतया सफल रहा हैं। कवि ने आधुनिक युग की घटना को खण्डकाव्य का विषय बनाया है। उनका उद्देश्य भावी पीढ़ी को देश की आजादी के इतिहास से परिचित कराना है, साथ ही गाँधी दर्शन की महत्त्वपूर्ण भूमिका को प्रदर्शित करना है। कवि ने पश्चिमी भौतिकवादी दर्शन और गाँधीवादी मूल्यों के बीच संघर्ष का चित्रण किया है और अन्त में गाँधीवादी जीवन मूल्यों की विजय का शंखनाद किया है।

कवि का उद्देश्य असत्य पर सत्य की विजय, हिंसा पर अहिंसा की विजय दिखाकर मानवता के प्रति सच्ची आस्था उत्पन्न करना है तथा जन-जन में विश्वबन्धुत्व और प्रेम की भावना का संचार करना है।

पन्त जी ने ‘मुक्तियज्ञ’ के माध्यम से लोक कल्याण का सन्देश दिया है। काव्य के नायक गाँधीजी क्रो लोकनायक के रूप में चित्रित कर जातिवाद, साम्प्रदायिकता और रंगभेद का कट्टर विरोध किया है। कवि का उद्देश्य केवल स्वतन्त्रता संग्राम के दृश्यों का चित्रण करना ही नहीं है वरन् कवि ने शाश्वत जीवन मूल्यों का भी उद्घोष किया है जो सत्य, अहिंसा, त्याग, प्रेम और करुणा की विश्वव्यापी भावनाओं पर आधारित हैं। गाँधीवादी दर्शन को माध्यम बनाकर कवि ने विश्वबन्धुत्व और मानवतावाद सम्बन्धी आदर्शों की स्थापना की है।

प्रश्न 4.
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य की राष्ट्रीयता और देशभक्ति की भावनाओं पर प्रकाश डालिए। (2016)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना का प्रतिपादन किया गया है।” इस कथन की विवेचना कीजिए। (2014, 13)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ में प्रतिपादित सामाजिक चेतना पर प्रकाश डालिए। (2011)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में राष्ट्रीय एकता तथा मानवमात्र का कल्याण निहित है।” इस कथन की विवेचना कीजिए (2018, 09)
उत्तर:
कवि ने आधुनिक युग की घटना को खण्डकाव्य का विषय बनाया है। उनका उद्देश्य भावी पीढ़ी को देश की आज़ादी के इतिहास से परिचित कराना हैं। साथ ही गाँधी दर्शन की महत्त्वपूर्ण भूमिका को प्रदर्शित करना है। कवि ने पश्चिमी भौतिकवादी दर्शन और गाँधीवादी मूल्यों के बीच संघर्ष का चित्रण किया है और अन्त में गाँधीवादी जीवन मूल्यों की विजय का शंखनाद किया है। पन्त जी ने ‘मुक्तियज्ञ’ के माध्यम से लोक कल्याण का सन्देश दिया है। काव्य के नायक गाँधीजी को लोकनायक के रूप में चित्रित कर जातिवाद, साम्प्रदायिकता और रंगभेद का कट्टर विरोध किया है।

कवि का उद्देश्य केवल स्वतन्त्रता संग्राम के दृश्यों का चित्रण करना ही नहीं है वरन् कवि ने शाश्वत जीवन मूल्यों का भी उद्घोष किया है, जो सत्य, अहिंसा, त्याग, प्रेम और करुणा की विश्वव्यापी भावनाओं पर आधारित है। कवि ने इस कृति काव्य में सत्य की असत्य पर विजय और अहिंसा की हिंसा पर विजय दर्शाकिर मानवता के प्रति सच्ची आस्था व्यक्त की है। इससे विश्वबन्धुत्व, प्रेम और सहयोग की भावना सशक्त होगी और विश्व में एकता स्थापित होगी। कवि का यह जीवन दर्शन भारतीय स्वतन्त्रता के आन्दोलन की पृष्ठभूमि में कवि ने गाँधीवादी दर्शन को माध्यम बनाकर विश्वबन्धुत्व और मानवतावाद सम्बन्धी आदशों की स्थापना की है। मुक्तियज्ञ’ का यह पवित्र धुआँ समस्त संसार की मानवता और सांसारिक प्रेम का विस्तृत स्वरूप, प्रहण कर लेता है।

“हिरोशिमा नागासाकी पर, भीषण अणुबम का विस्फोटन,
मानवता के मर्मस्थल का, कभी भरेगा क्या दुःसह व्रण।”

प्रश्न 5.
खण्डकाव्य की दृष्टि से मुक्तियज्ञ’ की समीक्षा कीजिए।
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ के वाक्य कौशल पर प्रकाश डालिए।
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ की भाषा-शैली की क्या विशेषताएँ हैं? (2010)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ की भाषा-शैली पर उदाहरण सहित प्रकाश डालिए। (2012, 11)
अथवा
“आकार की लघुता के बावजूद ‘मुक्तियज्ञ’ की आत्मा में एक महाकाव्य जैसी गरिमा है।” इस कथन की विवेचना कीजिए। (2011, 10)
अथवा
खण्डकाव्य के लक्षणों के आधार पर ‘मुक्तियज्ञ’ की समीक्षा कीजिए। (2010)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ की कथावस्तु खण्डकाव्य की दृष्टि से कितनी सफल है? स्पष्ट कीजिए। (2015)
अथवा
खण्डकाव्य के लक्षणों (विशेषताओं) का ध्यान रखते हुए सिद्ध कीजिए कि ‘मुक्तियज्ञ’ एक सफल खण्डकाव्य है। (2013, 12)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य की रचना में कवि की सफलता का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
किसी भी साहित्यिक रचना के काव्य-सौन्दर्य के दो प्रकार होते हैं।

  1. भावपक्ष
  2. शिल्पपक्ष अथवा कलापक्ष।

इन दोनों प्रकारों को दृष्टिगत रखते हुए ‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य का काव्य-सौन्दर्य निम्न प्रकार है । भावपक्षीय विशेषताएँ ‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य की भावपक्षीय विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं।

(i) वैचारिक प्रधानता सुमित्रानन्दन पन्त’ द्वारा रचित खण्डकाव्य ‘मुक्तियज्ञ’ विचार प्रधान खण्डकाव्य है। इसमें गाँधीदर्शन की विस्तृत व्याख्या की गई है। कवि ने गांधीजी के विचारों को बड़े ही सरल, सरस और रुचिकर ढंग से प्रस्तुत किया हैं। कवि ने गाँधीजी की विचारधारा को सत्य, अहिंसा, प्रेम, नारी-जागरण, हरिजनोद्धार, भारतीय कला और संस्कृति की रक्षा, अतिभौतिकता का विरोध, मदिरा के विरुद्ध आन्दोलन तथा स्वदेशी वस्तुओं के अपनाने और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के रूप में प्रस्तुत किया है। समस्त काव्य गम्भीरता से परिपूर्ण है। गाँधीदर्शन एवं भारत के स्वतन्त्रता-संग्राम के भावों को सरल ढंग से प्रस्तुत करते हुए उसका सम्बन्ध विश्व मानवतावाद से जोड़ा है; जैसे-

“प्रतिध्वनित होता जगती में, भारत आत्मा का नैतिक पण,
नई चेतना शिखा जगाता, आत्म-शक्ति से लोक उन्नयन।’

(ii) युग चित्रण कवि ने इस खण्डकाव्य में भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम का पूर्णरूपेण वर्णन किया है। गाँधीजी के पथ-प्रदर्शन में स्वाधीनता आन्दोलन, अंग्रेजों के अत्याचार और आखिर में भारतवासियों के द्वारा स्वराज्य-प्राप्ति, इन सभी घटनाओं का आदि से लेकर अन्त-पर्यन्त इस नाटक में वर्णन किया है।
डॉ. सावित्री सिन्हा के कथनानुसार-“आकार की लघुता के बावजूद ‘मुक्तियज्ञ’ की आत्मा में एक महाकाव्य जैसी गरिमा है।”

(iii) रस परिपाक सुमित्रानन्दन पन्त’ द्वारा रचित ‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य वीर रस प्रधान है। इसमें गाँधीजी एवं उनके अन्य सहयोगी लोगों के बलिदान एवं त्याग की साहस से युक्त कार्यों का वर्णन किया गया है। भारतवासियों द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध अहिंसात्मक संघर्ष में इन पंक्तियों में वीर रस दर्शनीय है।

गूंज रहा रण शंख, गरजती, भेरी, उड़ता सुर धनु केतन।
ऊर्ध्व असंख्य पदों से धरती चलती, यह मानवता का रण।।”

इसके अतिरिक्त इस खण्डकाव्य में करुण एवं शान्त रस की भी सुन्दर व्यंजना देखने को मिलती हैं।

(iv) प्रकृति चित्रण का अभाव मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के रचयिता सुमित्रानन्दन पन्त’ प्रकृति के चतुर चितेरे हैं। वे प्रकृति के सुकुमार कवि हैं। उनकी प्रायः प्रत्येक रचना में प्रकृति का अनेक रूपों में वर्णन मिलता है। ‘मुक्तियज्ञ’ में प्रकृति चित्रण का पूर्णतया अभाव है या तो वे प्रकृति का वर्णन करना भूल गए या उन्हें अवकाश ही नहीं मिला, क्योकि ‘मुक्तियज्ञ खण्डकाव्य एक विचार एवं समस्या प्रधान रचना हैं।

कलापक्षीय विशेषताएँ इस खण्डकाव्य में सुमित्रानन्दन ‘पन्त’ जी के कला पक्षीय काव्य-प्रतिभा का उपयोग नहीं के बराबर हुआ है, फिर भी उनकी कलापक्षीय विशेषताओं के दर्शन निम्नलिखित प्रकार से कई रूपों में होते हैं। –

(i) भाषा ‘मुक्तियज्ञ’ में सुमित्रानन्दन पन्त’ जी ने संस्कृतनिष्ठ, खड़ी बोली और सरल हिन्दी का प्रयोग किया है। भाषा में अभिव्यक्ति की सरलता, बोधगम्यता और चित्रात्मकता के साथ-ही-साथ सरसता और सुकुमारता के भी दर्शन होते हैं। कवि द्वारा अनेक स्थलों पर कठिन शब्दावली का भी प्रयोग किया गया है, जिसके कारण कहीं-कहीं पर भाषा बोझिल सी हो गई है। भाषा माधुर्य, प्रसाद और ओज गुण युक्त है।

इस खण्डकाव्य की भाषा भावात्मक और दार्शनिक विचारों को अभिव्यक्त करने में पूर्णतया सक्षम है। यहाँ इससे सम्बन्धित एक उदाहरण दर्शनीय है।

झोंक आग में तन के कपड़े, गिरते पद पर पागल स्त्री-नर।
भेद कभी इतिहास कहेगा, कौन पुरुष चला युग-भू पर।”

(ii) शैली कवि ने ‘मुक्तियज्ञ’ की रचना में मूर्तशैली को अपनाया है, जो सीधी-सादी एवं अभिधा प्रधान है। इसमें गम्भीरता है, प्रौढ़ता है और साथ ही यह सरल भी है। इसमें कवि ने काल्पनिकता का समावेश नहीं किया है। खण्डकाव्य में कवि की दृष्टि कथन की शैली पर कम और कथ्य पर अधिक टिकी है। इनकी शैली में व्यंजना शैली का परिचय मिलता है। इससे सम्बन्धित एक उदाहरण दर्शनीय है।

“मुखर तर्क के शब्द जाल में भटक न खो जाए अन्त:स्वर,
गुरुता से सौजन्य, बुद्धि से, हृदय बोध था उनको प्रियतर।”

(iii) छन्द पन्त’ जी ने ‘मुक्तियज्ञ’ में ‘मुक्त’ छन्द का प्रयोग किया है। समस्त काव्य की रचना में कवि ने 16 मात्राओं की चार-चार पंक्तियों वाले छन्द का प्रयोग किया है। कवि ने कुछ स्थानों पर छन्द परिवर्तन भी किया है।

(iv) अलंकार ‘मुक्तियज्ञ’ में कवि की दृष्टि कथन पर कम और कथ्य पर अधिक होने के कारण अलंकारों का प्रयोग केवल विषय की स्पष्टता के लिए ही किया गया है। फिर भी कवि ने खण्डकाव्य में अनुप्रास, रूपक, उपमा, उत्प्रेक्षा, मानवीकरण आदि अलंकारों का प्रयोग किया है। एक ‘उपमा का उदाहरण दर्शनीय हैं-
“उन्नत जन वन देवदारु-से, स्वर्णछत्र सिर पर तारक नभ।
सौम्य आस्य, उन्मुक्त हास्यमय, प्रात: रवि-सा स्निग्ध स्वर्णप्रभ।।”
मानवीकरण का उदाहरण दर्शनीय है।
“जगे खेत खलिहान, बाग फड़, जगे बैल हाँसया हल विस्मित।
हाट बाट गोचर घर-आँगन, वापी पनघट जगे चमत्कृत।।”

इस प्रकार निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि ‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य की कहानी की पृष्ठभूमि अधिक विस्तृत है, फिर भी कवि ‘पन्त’ जी ने उसके प्रधान प्रसंगों को इस प्रकार से क्रमबद्ध किया है कि कहानी के क्रमिक विकास में कोई बाधा उत्पन्न नहीं हुई है। कवि द्वारा इस कृति में एक ही रस और एक ही छन्द का प्रयोग किया गया है। अतः इस दृष्टि से यह कृति खण्डकाव्य की सभी विशेषताओं से विभूषित है।

(v) उद्देश्य कवि का उद्देश्य असत्य पर सत्य की विजय, हिंसा पर अहिंसा की विजय दिखाकर मानवता के प्रति सच्ची आस्था उत्पन्न करना है तथा जन-जन में विश्वबन्धुत्व और प्रेम की भावना का संचार करना है।

चरित्र-चित्रण पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 6.
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के आधार पर नायक की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2018)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के आधार पर गाँधीजी के चरित्र की विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (2018)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के नायक के चरित्र पर प्रकाश डालिए। (2018)
अथवा
‘मुक्तिया’ खण्डकाव्य के आधार पर प्रधान पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2017)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्रांकन कीजिए। (2017)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के मुख्य पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2017)
अथवा
सिद्ध कीजिए कि राष्ट्रपिता गाँधी ‘मुक्तियज्ञ’ के पुरोधा हैं। (2017)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के नायक की विशेषताएँ बताइए। (2016)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ के आधार पर महात्मा गाँधी का चरित्रांकन/चरित्र निरूपण कीजिए। (2016)
अथवा
मुक्तियज्ञ खण्डकाव्य के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2018, 17, 16)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य का नायक कौन हैं? उसकी चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2016)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य की दृष्टि से महात्मा गाँधी का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2016)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के नायक कौन हैं? उनका चारित्रिक विश्लेषण कीजिए। (2014, 13, 12, 11, 10)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य के नायक महात्मा गाँधी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2015, 14)
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ के गाँधीजी इस सदी के महानायक हैं। इस कथन की पुष्टि कीजिए। (2012)
अथवा
“गाँधीजी राष्ट्र के लिए एक समर्पित व्यक्ति थे।” उक्ति पर प्रकाश डालिए।
अथवा
“व्यक्ति गाँधी का चित्रण कवि का ध्येय नहीं है-राष्ट्रपिता और राष्ट्रनायक गाँधी ‘मुक्तियज्ञ’ के मुख्य पुरोधा हैं।” इस कथन को ध्यान में रखते हुए गाँधीजी के व्यक्तित्व का विश्लेषण कीजिए।
अथवा
‘मुक्तियज्ञ’ में महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व का वही अंश उभारा गया है, जो भारतीय जनता को शक्ति और प्रेरणा देता है। इससे आप कहाँ तक सहमत हैं? (2011, 10)
उत्तर:
‘मुक्तियज्ञ’ खण्डकाव्य में गाँधीजी को नायक के रूप में चित्रित किया गया है। वह इस सदी के महानायक हैं। उन्होंने सत्य, अहिंसा, प्रेम, भाईचारे के महान् गुणों से विश्व और मानवता का कल्याण किया है, लोगों को परम सुख और सन्तोष प्रदान किया है। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

  1. सत्य-अहिंसा के पुजारी गाँधीजी सत्य और अहिंसा के महान् पुजारी थे। देश में जब चारों ओर हिंसा की अग्नि धधक रही थी, तब उन्होंने सत्य और अहिंसा का सहारा लिया। उन्हें पूर्ण विश्वास था कि बिना रक्तपात के भी स्वतन्त्रता प्राप्त की जा सकती है और इन्हीं अस्त्रों के बल पर गाँधीजी ने अंग्रेजों की नींव हिलाकर रख दी। कठिन-से-कठिन परिस्थितियों में भी वह अपने सिद्धान्तों पर अडिग रहे और अन्ततः उन्हीं के सिद्धान्तों पर भारत को स्वतन्त्रता प्राप्त हुई।
  2. दृढ़प्रतिज्ञ महात्मा गाँधी अपने निश्चय पर दृढ़ रहने वाले एक साहसी व्यक्ति थे। उन्होंने जिस कार्य को पूरा करने का संकल्प किया, उसे वह करके ही रहे। कोई बाधा-विघ्न उन्हें पथ से विचलित नहीं कर सकी। उन्होंने नमक कानून तोड़ने की प्रतिज्ञा को पूरा करके ही दिखाया।
  3. जननायक महात्मा गाँधी जन-जन के प्रिय नेता रहे हैं। उनके एक इशारे पर लाखों नर-नारी अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने के लिए तत्पर रहते थे। भारत की जनता ने उनका पूरा साथ दिया और उनके साथ आजादी की लड़ाई लड़कर अंग्रेजों से अपने आपको मुक्त कराया।
  4. समदर्शी महात्मा गाँधी सबको समान दृष्टि से देखते थे। उनके लिए न कोई बड़ा था, न कोई छोटा। उन्होंने देश से छुआछूत के भूत को भगाने के लिए अथक प्रयास किया। उनकी दृष्टि में कोई अछूत नहीं था।
  5. मानवता के पुजारी ‘मुक्तियज्ञ’ के नायक गाँधीजी ने अपना सम्पूर्ण जीवन मानव के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। उनका दृढ़ विश्वास था कि घृणा, घृणा से नहीं, अपितु प्रेम से मरती हैं। उनमें दया, करुणा, त्याग, संयम, विश्वबन्धुत्व एवं वीरता के गुण भरे हुए थे।
  6. जातिप्रथा के विरोधी गाँधीजी जातिप्रथा के कट्टर विरोधी थे। उनका मानना था कि भारत जाति-पाँति के भेदभाव में पड़कर अपना विनाश कर रहा है।

इस प्रकार ‘मुक्तियज्ञ’ के नायक गाँधीजी महान् लोकनायक, सत्य एवं अहिंसा के पुजारी, निर्भीक, दृढ़प्रतिज्ञ और साहसी पुरुष के रूप में हमारे सामने आते हैं। कवि ने उनमें सभी लोक कल्याणकारी गुणों का समावेश किया है।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi कहानी Chapter 3 लाटी

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name लाटी
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi कहानी Chapter 3 लाटी

लाटी – पाठ का सारांश/कथावस्तु

(2017)

कथानायक कप्तान जोशी की पत्नी को क्षय रोग हो जाना
कथानायक कप्तान जोशी अपनी पत्नी ‘बानो’ से अत्यधिक प्रेम करते हैं। विवाह के तीसरे दिन ही कप्तान को युद्ध के लिए बसरा जाना पड़ा, तब बानो सिर्फ 16 वर्ष की थी। अपने पति की अनुपस्थिति में बानो ने 7-7 ननदों के ताने सुने, भतीजों के कपड़े धोए, ससुर के होज विने, पहाड़-सी नुकीली छतों पर 5-5 सेर उड़द पीसकर बड़ियाँ बनाई आदि। उसे मानसिक प्रताड़ना भी दी गई कि उसका पति जापानियों द्वारा कैद कर लिया गया है और वह कभी नहीं आएगा। यान इन सब कारणों से निरन्तर पुलती रही और क्षय रोग से पीड़ित होकर चारपाई पकड़ लेती है।

कप्तान का पत्नी के प्रति अगाध प्रेम
कप्तान अपनी पत्नी ‘बानो’ से अत्यधिक प्रेम करता है। जब वह दो वर्ष बाद लौटकर घर आता है, तो उसे पता चलता है कि घर वालों ने बानों को क्षय रोग होने पर सैनेटोरियम भेज दिया है। वह दूसरे दिन ही वहाँ पहुँच गया। उसे देखकर बानो के बहते आँसुओं की धारा ने दो साल के सारे उलाहने सुना दिए। सैनेटोरियम के डॉक्टर द्वारा बानो की मौत नज़दीक आने की स्थिति में कमरा खाली करने का उसे नोटिस दे दिया गया। कप्तान ने भूमिका बनाते हुए बानों से कहा कि अब यहीं मन नहीं लगता है। कल किसी और जगह चलेंगे। वह दिन-रात अपनी पत्नी की सेवा में बिना कोई परहेज एवं सावधानी बरते लगा रहता था।

बानो द्वारा आत्महत्या का प्रयास करना
बानो समझ गई कि उसे भी सैनेटोरियम छोड़ने का नोटिस मिल गया है, जिसका अर्थ हुआ कि अब वह भी नहीं बचेगी। कप्तान देर रात तक बानो को बहलाता रहा, उससे अपना प्यार जताता रहा। जब कप्तान को लगा कि बानों सो गई, तो वह भी सोने चला जाता है। सुबह उठने पर बानो अपने पलंग पर नहीं मिली। दूसरे दिन नदी घाट पर बानो की साड़ी मिली। कप्तान को जब लाश भी नहीं मिली, तो उसने समझा बानो नदी में डूबकर मर गई।

‘लाटी’ के रूप में ‘बानो’ का मिलना
जब कप्तान को पूरा विश्वास हो गया कि बानो अब इस दुनिया में नहीं है, तो घर वालों के जोर देने से उसने दूसरा विवाह कर लिया। दूसरी पत्नी प्रभा से उसे दो बेटे एवं एक बेटी है और वह भी कप्तान से अब मेजर हो गया है। लगभग 16 वर्ष बाद नैनीताल में वैष्णवियों के दल में उसे ‘लाटी’ मिलती है, जो यथार्थ में ‘बानो’ थी। अधेड़ वैष्णवियों के बीच बानों जब ‘लाटी’ के रूप में मिलती है, तो मेजर उसे पहचान लेता है। पता चलता है कि गुरु महाराज ने अपनी औषधियों से उसका क्षय रोग ठीक कर दिया था, लेकिन इस प्रक्रिया में उसकी स्मरण शक्ति और आवाज़ दोनों चली गईं। अब न तो वह बोल पाती है और न ही उसे अपना अतीत याद है। वह वैष्णवियों के दल के साथ चली जाती है और मेजर स्वयं को पहले से अधिक बूढ़ा एवं खोखला महसूस करता है।

‘लाटी’ कहानी की समीक्षा

(2018, 17)

सुप्रसिद्ध लेखिका शिवानी ने अपनी कहानियों में भावात्मक और सामाजिक – आर्थिक समस्याओं से जुझती-टकराती नारी को बड़े रोचक एवं मार्मिक रूप से अभिचिंत्रित किया है। शिवानी द्वारा रचित ‘लाटी’ कहानी एक घटना प्रधान मार्मिक कहानी है। यह कहानी महिला त्रासदी पर आधारित है। इसमें बताया गया है कि एक सोलह वर्षीया खूबसूरत लड़की ससुराल में किस तरह सास-ननद के तानों और अत्यधिक काम के बोझ तले दबकर क्षय रोग (टी. बी) का शिकार हो जाती है। कहानी की समीक्षा इस प्रकार हैं—

कथानक
‘लाटी’ कहानी का कथानक मध्यम वर्गीय पहाड़ी परिवार से सम्बन्धित है। कथानक में नई नवेली दुल्हन बानो के जीवन की त्रासदी को उकेरा गया है, जिसके पति कप्तान जोशी विवाह के तीसरे दिन ही उसे छोड़कर युद्ध भूमि में चले जाते हैं और दो वर्षों के बाद लौटते हैं।

इन दो वर्षों में बानो ने सास-ननद के ताने सुने, सास के व्यंग्य-बाण सहे। ससुराल में काम के बोझ तले दबकर सन्त्रास भरी ज़िन्दगी जीने के कारण वह क्षय रोग का शिकार हो जाती है और उसे गोठिया सैनेटोरियम में भर्ती कर दिया जाता है। अब कप्तान आता है और उसे पता चलता है कि बानो क्षय रोग की शिकार है, तो वह मानों के पास रहकर उसकी जी जान से सेवा करता है, किन्तु एक दिन डॉक्टर से घर ले जाने के लिए कहते हैं, क्योंकि अब उसका इलाज सम्भव नहीं है।

कप्तान उसे घर लाने की जगह भुवाली में किराए के मकान में ले जाना चाहता है, किन्तु वह रात में ही नदी में कूदकर आत्महत्या का प्रयास करती हैं। कप्तान को जब नदी किनारे उसकी साड़ी मिलती है, तो वह उसे मृत समझकर घर लौट आता है। और एक वर्ष बाद वह दूसरा विवाह कर लेता है।

उधर, बानो को एक सन्त बचा लेता है और उसका क्षय रोग भी ठीक कर देता है, लेकिन इस प्रक्रिया में उसकी आवाज़ और स्मृति दोनों चली जाती हैं। 16 वर्ष बाद अपनी पत्नी के साथ नैनीताल में घूमने के दौरान एक दिन भुवाली में चाय की दुकान पर कप्तान, जो अब मेजर बन चुका है, की भेंट लाटी से होती है।

मेजर उसे पहचान लेता है, लेकिन बानो उसे नहीं पहचानती। मेजर उसे स्वीकार नहीं कर सकता, क्योंकि उसकी ज़िन्दगी अब काफी आगे बढ़ गई है। अब उसके बच्चे काफी बड़े हो गए हैं और पत्नी बानो जैसी भोली नहीं है। इस प्रकार ‘लाटी’ कहानी एक महिला की त्रासद भरी ज़िन्दगी की कारुणिक कहानी है। इस कहानी के माध्यम से यह बताया गया है कि महिला ही महिला के शोषण का मुख्य कारण है। पति के बिना स्त्री की ससुराल में कोई इज्जत नहीं होती। उसे शारीरिक-मानसिक यातनाओं का शिकार होना पड़ता है।

पात्र और चरित्र-चित्रण
पात्रों की दृष्टि से यह एक सन्तुलित कहानी है। कहानी के सभी पत्रि कथानक के विकास में सहायक हैं। कप्तान जोशी, बानो (लाटी), नेपाली भाभी, प्रभा एवं वैष्णवी इसके मुख्य पात्र हैं, लेकिन लेखिका ने बानो (लाटी) एवं कप्तान जोशी के चरित्र को विशेष रूप से संवारा है। इस कहानी में कप्तान जोशी का चरित्र अत्यधिक अन्तर्धन से भरा हुआ है। नेपाली भाभी के चरित्र के माध्यम से कथानक को गतिशील बनाया गया है। कहानी में सभी पात्रों की सृष्टि सौददेश्य की गई है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि पात्र एवं चरित्र-चित्रण की दृष्टि से ‘लाटी’ एक सफल कहानी है।

कथोपकथन या संवाद
इस कहानी में संवादों की भरमार नहीं है, लेकिन जो भी हैं, वे सभी अत्यन्त प्रभावपूर्ण, भावात्मक पात्रों के चरित्र पर प्रकाश डालने वाले और रोचक हैं। कहानी के संवाद संक्षिप्त, सरल, सारगर्भित, स्वाभाविक, स्पष्ट, सार्थक और गतिशील हैं। पात्रों के चरित्र के अनुसार सटीक हैं।

देशकाल और वातावरण
आलोच्य कहानी में देशकाल और वातावरण को ध्यान हर जगह रखा गया है। कहानी की पृष्ठभूमि पहाड़ी क्षेत्र की हैं। अतः पहाड़ी शब्द; जैसे-‘युद्धज्यू’, ‘तिथण’ आदि का प्रयोग पहाड़ी वातावरण बनाने के लिए किया गया है। सैनेटोरियम के वातावरण में भी लेखिका ने पहाड़ी चित्रों को साकार कर दिया है।

भाषा-शैली
प्रस्तुत कहानी में शिवानी ने सामान्य बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया है। पहाड़ी वातावरण सृजित करने के लिए यथास्थान पहाड़ी शब्दों का प्रयोग किया गया है। अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू, अरबी-फारसी, तत्सम, तद्भव, देशज, आँचलिक सभी प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया गया है। आधुनिक सभ्य समाज की इंग्लिश भाषा का एक उदाहरण देखिए-” चलो डार्लिग, पहाड़ का इंटीरियर घूमा जाए। भूवाली चले”… “इसी दुकान में आज एकदम पहाड़ी स्टाइल से कलई के गिलास में चाय पिएँगे हनी।” लेखिका ने शैली के रूप में चित्रात्मक, वर्णनात्मक, हास्य व्यंग्यात्मक, सूत्रात्मक तथा सबसे अधिक भावात्मक शैली का प्रयोग किया है।

उद्देश्य
कहानी का उद्देश्य मध्यम वर्गीय समाज में पति के बिना अकेली रहने वाली पत्नी के जीवन की त्रासदी को दिखाना है। लेखिका ने यह भी सन्देश दिया है कि महिला ही महिला का शोषण करती है। उन्हें अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना चाहिए तथा इसमें यह भी बताया गया है कि क्षय रोग असाध्य नहीं है। परिजनों के सहयोग और प्रेम से रोगी को बचाया जा सकता है—

शीर्षक
प्रस्तुत कहानी का शीर्षक ‘लाटी’ बानो (लाटी) के जीवन की व्यथा को अभिव्यक्त करने में पूर्णतः सफल है, क्योंकि सम्पूर्ण कहानी बानो (लाटी) के इर्द-गिर्द घूमती है। अतः कहानी का शीर्षक चरित्र प्रधान है। अपनी संक्षिप्तता, गौलिकता व कौतूहलता के चलते ‘लाटी’ शीर्षक पाठक के मन में आरम्भ से अन्त तक जिज्ञासा का प्रतिपादन करता है।

बानो (लाटी) का चरित्र-चित्रण

(2018, 17, 14, 13)

सुप्रसिद्ध लेखिका शिवानी की कहानी ‘लाटी’ में बानो मुख्य स्त्री पात्र है, जो बाद में ‘लाटी’ के नाम से जानी जाती है। बानो कप्तान जोशी की पहली पत्नी है, जिससे कप्तान अगाध प्रेम करता है। बानो के चरित्र की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

मोहक एवं भोला व्यक्तित्व
16 वर्षीया किशोरी बानो का व्यक्तित्व अत्यन्त मोहक एवं भोला है, जिससे कप्तान जोशी उसकी ओर आकर्षित हो जाते हैं और अन्ततः दोनों विवाह के बन्धन में बँध जाते हैं। बानो के मोहक एवं भोले व्यक्तित्व के कारण ही कप्तान जोशी उससे अत्यधिक प्यार करते हैं एवं अन्त समय तक उसकी इच्छा पूरी करने की कोशिश करते हैं।

त्यागमयी एवं पतिव्रता
बानों का विवाह मात्र 16 वर्ष की उम्र में ही हो गया और विवाह के तीन दिन बाद ही उसके पति कप्तान जोशी युद्ध के लिए बस चले गए। वह पूरे दो वर्ष बाद घर लौटे तब तक बानो त्यागपूर्वक पतिव्रत धर्म का निष्ठा के साथ पालन करती रही और अपने पति की प्रतीक्षा में उसने स्वयं को घर के कामों में झोंक दिया।

परिश्रमी एवं सहनशील
बानो बड़ी ही परिश्रमी एवं सहनशील युवती है, जो अपने पति की अनुपस्थिति में अनेक कामों को अंजाम देकार तथा कष्ट सहकर सिद्ध करती है। वह घर के अनेक काम करने के अलावा घर के लोगों के व्यंग्य बाण भी सहती है, लेकिन मुख से कुछ नहीं कहती। इसी कारण वह मन-ही-मन घुटती रहती है।

क्षय रोग की शिकार
मन-ही-मन घुटते रहने तथा पति के आने में देरी होने से उत्पन्न मानसिक तनाव के कारण वह क्षय रोग से पीड़ित हो जाती है। क्षय रोग होने पर उसके ससुराल वाले उसे घर से निकाल कर सैनेटोरियम भेज देते हैं।

अत्यन्त भावुक प्रकृति
बानो अत्यन्त भावूक प्रकृति की युवती है। पति के युद्ध में जाते समय वह उसके पैरों में पड़ जाती है। उसकी पलकें भीग जाती हैं और उसका गला भर आता है। इसी तरह, दो वर्ष बाद पति के वापस आने पर वह सैनेटोरियम में भर्ती है। पति को देखकर उसकी तरल आँखें खुली ही रह गईं, फिर आँसू टपकने लगे। बानो के बहते आँसुओं की धारा में दो साल के सारे उलाहने सुना दिए।

पतिव्रता
अपने कष्टमय जीवन एवं क्षय रोग से तंग आकर तथा इसके कारण होने वाली परेशानियों से पति को मुक्त करने के लिए वह अपने जीवन को समाप्त करने का निर्णय लेती है और नदी में कूद जाती हैं।

अपनी परेशानियों से अधिक उसे अपने पति की परेशानियों की चिन्ता है। वह ऐसा करके अपने पति को दुःख से मुक्ति प्रदान करना चाहती है। इस प्रकार, बानो (लाटी) का चरित्र अत्यन्त भावपूर्ण एवं संवेदनशील हैं, जो पाठकों के हृदय को झकझोर देता है।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi कहानी Chapter 2 पंचलाइट

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Class Class 12
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Chapter Chapter 2
Chapter Name पंचलाइट
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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi कहानी Chapter 2 पंचलाइट

पंचलाइट – पाठ का सारांश/कथावस्तु

(2018, 17, 15, 14, 12)

पेट्रोमैक्स यानी पंचलैट की खरीददारी
गाँव में रहने वाली विभिन्न जातियाँ अपनी अलग-अलग टोली बनाकर रहती हैं। उन्हीं में से महतो टोली के पंचों ने पिछले 15 महीने से दण्ड–जुर्माने के द्वारा अमा पैसों से रामनवमी के मेले से इस बार पेट्रोमैक्स खरीदा। पेट्रोमैक्स खरीदने के बाद बचे र 10 रुपये से पूजा की सामग्री खरीदी गई। पेट्रोमैक्स यानी पंचलैट को देखने के लिए टोले के सभी बालक, औरतें एवं मर्द इकट्ठे हो गए और सरदार ने अपनी पत्नी को आदेश दिया कि वह, इसके पूजा-पाठ का प्रबन्ध करे।

पंचलैट को जलाने की समस्या
महतो टोली के सभी जन ‘पंचलैट’ के आने से अत्यधिक उत्साहित हैं, लेकिन उनके सामने एक बड़ी समस्या यह आ गई कि पंचलैट जलाएगा कौन? क्योंकि किसी भी व्यक्ति को उसे जलाना नहीं आता था। महतो टोली के किसी भी घर में अभी तक ढिबरी नहीं जलाई गई थी, क्योंकि सभी पंचलैट की रौशनी को ही सभी ओर फैली हुआ देखना चाहते थे। पंचलैट के न जलने से पंचों के चेहरे उतर गए। राजपूत टोली के लोग उनका मज़ाक बनाने लगे, जिसे सबने धैर्यपूर्वक सहन किया। इसके बावजूद पंचों ने तय किया कि दूसरी टोली के व्यक्ति की मदद से पंचलैट नहीं जलाया जाएगा, चाहे वह बिना जले ही पड़ा रहे।

टोली द्वारा दी गई सजा भुगत रहे गोधन की खोज
गुलरी काकी की बेटी मुनरी गोधन से प्रेम करती थी और उसे पता था कि गोधन को पंचलैट जलाना आता है, लेकिन पंचायत ने गोधन का हुक्का पानी बन्द कर रखा था। मुनरी ने अपनी सहेली कनेली को और कनेली ने यह सूचना सरदार तक पहुँचा दी कि गोधन ‘पंचलैट’ जलाना जानता है। सभी पंचों ने सोच विचार कर अन्त में निर्णय लिया कि गोधन को बुलाकर उसी से ‘पंचलैट’ जलवाया जाए।

गोधन द्वारा पंचलैट जलाना
सरदार द्वारा भेजे गए छड़ीदार के कहने से नहीं आने पर गोधन को मनाने गुलरी काकी गई। तब गोधन ने आकर ‘पंचलैट’ में तेल भरा और जलाने के लिए ‘स्पिरिट’ माँगा। ‘स्पिरिट’ के अभाव में उसने गरी (नारियल के तेल से ही पंचलैट जला दिया। पंचलैट के जलते ही टोली के सभी सदस्यों में खुशी की लहर दौड़ गई। कीर्तनिया लोगों ने एक स्वर में महावीर स्वामी की जय ध्वनि की और कीर्तन शुरू हो गया।

पंचों द्वारा गोधन को माफ़ करना
गोधन ने जिस होशियारी से ‘पंचलैट’ को जला दिया था, उससे सभी प्रभावित हुए थे। गोधन के प्रति सभी लोगों के दिल का मैल दूर हो गया। गोधन ने सभी का दिल जीत लिया। मुनरी ने बड़ी हसरत भरी निगाहों से गोधन को देखा। सरदार ने गोधन को बड़े प्यार से अपने पास बुलाकर कहा कि-“तुमने जाति की इज्जत रखी है। तुम्हारा सात खून माफ है। खूब गाओं सलीमा का गाना।” अन्त में गुलरी काकी ने गोधन को रात के खाने पर निमन्त्रित किया। गौधन ने एक बार फिर से मुनरी की ओर देखा और नज़र मिलते ही लज्जा से मुनरी की पलकें झुक गई।

‘पंचलाइट’ कहानी की समीक्षा

(2018, 17, 13, 12, 11)

ग्रामीण क्षेत्र के जीवन से सम्बन्धित प्रस्तुत कहानी से गाँव की रूढ़िवादिता, सरलता एवं अज्ञानता के बारे में स्पष्ट संकेत मिलता है। ‘पंचलाइट’ फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की आंचलिक कहानी है। यह कहानी ग्रामीण जीवन पर आधारित है। इसमें ऑचलिक परिवेश के आधार पर पात्रों का चित्रण किया गया हैं। इसकी समीक्षा इस प्रकार है

कथानक
प्रस्तुत कहानी में फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ ने पैट्रोमैक्स (जिसे गाँव वाले ‘पंचलाइट’ कहते हैं) के माध्यम से ग्रामवासियों की मनोस्थिति की वास्तविक झलक प्रस्तुत की है। यह कहानी घटनाप्रधान है, जिसमें बताया गया है कि आवश्यकता किस प्रकार मनुष्य के बड़े से बड़े दिग। संस्कार तथा निषेध को भी अनावश्यक सिद्ध कर देती है, जैसा गोधन के साथ हुआ। महतो टोली के पंच पेट्रोमैक्स खरीद तो लाते हैं, किन्तु उसे जलाना नहीं जानते। उनके लिए यह अपमान की बात हो जाती है कि उनका ‘पंचलाइट’ पहली बार किसी दूसरी टोली के सदस्यों द्वारा जलाया जाए। इस समस्या को समाधान मुनरी बताती है, क्योंकि उसका प्रेमी गौधन ‘पंचलाइट जलाना जानता है।

‘पंचायत’ ने गौधन का हुक्का-पानी बन्द कर रखा है, किन्तु जाति की प्रतिष्ठा को बचाए रखने के लिए गोधन को पंचायत में आने की अनुमति दे दी जाती हैं। वह ‘पंचलाइट’ को स्प्रिट के अभाव में गरी (नारियल के तेल से ही जला देता है। अब गोधन पर लगे सारे प्रतिबन्ध हटा लिए जाते हैं और उसे इछानुसार स्वतन्त्र आचरण करने की भी छूट मिल जाती है।

पात्र तथा चरित्र-चित्रण
प्रस्तुत कहानी चूँकि आंचलिक कहानी है। अतः इस कहानी के केन्द्र में अंचल-विशेष या क्षेत्र विशेष हैं, कोई पात्र या चरित्र केन्द्र में नहीं है। इसके बावजूद ‘पंचलाइट’ कहानी का सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं प्रमुख पात्र गोधन है। कहानीकार ने कुछ पात्रों के चरित्रों की रेखाएँ उभारने की कोशिश की है। प्रस्तुत कहानी में सरदार, दीवान, मुनरी की माँ, गुलरी काकी, फुटंगी झा आदि एक वर्ग के पात्र हैं, जबकि गोधन, मुनरी दूसरे वर्ग के। कहानी के सभी पात्र जीवन्त प्रतीत होते हैं। उनके माध्यम से ग्रामवासियों की मनोवृत्तियों का परिचय बड़े ही यथार्थ रूप में प्राप्त होता है। लेखक को ग्रामीण समूह के चरित्र को उभारने में विशेष सफलता मिली है।

कथोपकथन या संवाद
प्रस्तुत कहानी के संवाद रोचक, सरल, स्वाभाविक और संक्षिप्त हैं। अनावश्यक संवाद नहीं हैं। संवादों के माध्यम से बिहार के ग्रामीण अंचल की भाषा का प्रयोग, संवादों की स्वाभाविकता, संवादों के माध्यम से ग्रामीण जीवन की अशिक्षा, विवादिता, अज्ञानता पर प्रकाश डालकर जीवन्त वातावरण निर्मित किया गया है। जैसे मुनरी ने चालाकी से अपनी सहेली कनेली के कान में बात डाल दी-‘कनेली। चिगों, चिव चिन …..’ कनेली मुस्कुराकर रह गई–’गोधन तो बन्द है।’ मुनरी बोली-‘तू कह तो सरदार से। गोधन जानता है ‘पंचलाइट’ बालना।’ केनेली बोली, ‘कौन, गोधन? जानता है बालना? लेकिन ….’ इस प्रकार इस कहानी के संवाद पात्र एवं परिस्थिति के अनुकूल हैं। कथाकार ने उनका चरित्र चित्रण मनोवैज्ञानिक आधार पर किया है।

देशकाल और वातावरण
रेणु जी की कहानी ग्रामीण परिवेश की आँचलिक कहानी है। इस कहानी में बिहार के ग्रामीण अंचल का चित्र प्रस्तुत किया गया है। वातावरण की सजीवता पाठकों को आकर्षित करने वाली हैं। ‘पंचलाइट’ के माध्यम से ग्रामीणों के आचार-विचार, अन्धविश्वास आदि का भी चित्रण हुआ है। यद्यपि इस कहानी में वातावरण का वर्णन नहीं किया गया है, तथापि घटनाओं और पात्रों के माध्यम से वातावरण स्वयं जीवन्त हो उठता है।

भाषा-शैली
प्रस्तुत कहानी की भाषा बिहार के ग्रामीण अंचलों में बोली जाने वाली जन भाषा है। इस भाषा में स्वाभाविकता झलकती है। गाँव के लोग शब्दों का उच्चारण अशुद्ध करते हैं। उदाहरण के रूप में, टोले की कीर्तन मण्डली के मूलगेन ने अपने भगतिया पछकों को समझाकर कहा- देखो, आज ‘पंचलैट’ की रोशनी में कीर्तन होगा। बेताले लोगों से पहले ही कह देता हैं, आज यदि आखर धरने में छेद-वेद हुआ, तो दूसरे दिन से एकदम बैंकार।” रेणुजी ने इस कहानी में व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग किया है। उदाहरणस्वरूप ‘एक’ नौजवान ने आकर सूचना दी–राजपूत टोली के लोग हँसते-हँसते पागल हो रहे हैं। कहते हैं, कान पकड़कर ‘पंचलैट’ के सामने पाँच बार उठो बैठो, तुरन्त जलने लगेगा।” पूरी कहानी ग्रामीणों की अज्ञानता, अशिक्षा, रूढिवादिता पर व्यंग्य करती हुई आगे बढ़ती है।

उद्देश्य
प्रस्तुत कहानी में रेणु जी ने ग्राम सुधार की प्रेरणा दी है। इसके साथ-साथ, यह भी सन्देश दिया है कि आवश्यकता बड़े-से-बड़े संस्कार और निषेध को अनावश्यक सिद्ध कर देती है। इसी केन्द्रीय भाव के आधार पर कहानी के माध्यम से एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य को स्पष्ट किया गया है। गोधन द्वारा पेट्रोमैक्स जला देने पर उसकी सब गलतियाँ माफ कर दी जाती हैं। उस पर लगे सारे प्रतिबन्ध हटा दिए जाते हैं।

शीर्षक
‘पंचलाइट’ कहानी का शीर्षक अत्यन्त संक्षिप्त और आकर्षक है। ‘पंचलाइट’ शीर्षक की दृष्टि से यह एक उच्च स्तरीय कथा है, जिसमें एक घटना के माध्यम से सामाजिक सदियों को तोड़ते हुए दिखाया गया है। पंचलाइट शीर्षक कहानी के भाव, उददेश्य और विषय-वस्तु की दृष्टि से पूर्णतः सार्थक है। सम्पूर्ण कहानी शीर्षक के इर्द-गिर्द घूमती है। इस प्रकार यह कहानी शीर्षक की दृष्टि से सफल कहानी है।

गोधन का चरित्र-चित्रण

(2018, 17, 16, 14, 13, 12, 10)

रेणुजी की आंचलिक कहानी ‘पंचलाइट’ में ग्रामवासियों की मनःस्थिति की वास्तविक झलक दिखती हैं। इस कहानी का प्रमुख पात्र गोधन हैं, जिसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं-

युवक की स्वाभाविक प्रवृत्ति
गोधन युवा है, अतः उसके व्यक्तित्व में युवा वर्ग की कुछ स्वाभाविक प्रवृत्तियों निहित हैं। वह मनचला एवं लापरवाह युवक है। वह फिल्मी गाने गाता है। मुनरी से प्रेम करता है और बाहर से आकर बसने के बावजूद पंचों के खर्च के लिए उन्हें कुछ नहीं देता है। यह कहना अधिक उचित होगा कि वह एक अल्हड़ ग्रामीण युवा है।

गुणवान व्यक्तित्व
गोधन अशिक्षित है, लेकिन उसमें गुणों की कमी नहीं है। वह पूरे महतो टोले में एकमात्र ऐसा व्यक्ति है, जो पेट्रोमैक्स जलाना जानता है। वह अत्यन्त चतुर भी है। वह अपनी इस विशेषता को मुनरी को बता देता है, जो इसे सरदार तक पहुंचा देती है। गोधन इतना काबिल है कि वह बिना स्पिरिट के ही गरी (नारियल) के तेल से पेट्रोमैक्स जला देता है। इससे उसकी बौद्धिकता का भी पता चलता है।

स्वाभिमानी
गोधन स्वाभिमानी है, इसीलिए हुक्क-पानी बन्द करने के बाद जब छड़ीदार उसे बुलाने जाता है, तो वह आने से इनकार कर देता है। हुक्का पानी बन्द करने को अपना अपमान समझता है। जिस गुलरी काकी के कहने पर उसे सजा सुनाई गई थी, उन्हीं के मनाने पर वह ‘पंचलैट’ जलाने के लिए आता है।

अपने समाज की प्रतिष्ठा के प्रति संवेदनशील
गोधन अपने समाज की मान-प्रतिष्ठा के प्रति अत्यन्त संवेदनशील है। जिस समाज या पंचायत ने उसका हुक्का-पानी बन्द कर दिया था। उसी समाज की प्रतिष्ठा को बचाने के लिए वह अपने अपमान को भूल जाता है। बिना स्पिरिट के ही पंचलैट जलाकर वह अपने समाज, जाति एवं पंचायत की मान-प्रतिष्ठा की रक्षा करता है।

निर्भीक व्यक्तित्व
गोपन का व्यक्तित्व अत्यन्त निर्भीक है। वह किसी से बिना डरे मुनरी के प्रति अपने प्रेम को अभिव्यक्त कर देता है। इस प्रकार, कहा जा सकता है कि गोधन का चरित्र ग्रामीण लड़के से मिलता-जुलता होने के साथ साथ बौद्धिकता एवं विवेकशील भी है, जो उसे आधुनिकता की ओर ले जाती है।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi कहानी Chapter 1 खून का रिश्ता

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name खून का रिश्ता
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi कहानी Chapter 1 खून का रिश्ता

खून का रिश्ता – पाठ का सारांश/कथावस्तु

(2018, 13)

बाबूजी एवं वीरजी में वैचारिक मतभेद
आधुनिक दृष्टिकोण वाला वीरजी एम. ए पास नवयुवक है, जो सगाई, ब्याह आदि अवसरों पर धन की बर्बादी एवं किसी भी प्रकार के आडम्बर का विरोधी है, जबकि परम्परागत सोच वाले बाबूजी आडम्बर प्रिय एवं दहेज के समर्थक लगते हैं। पीरजी अपनी सगाई में किसी तरह का आडम्बर एवं दिखावा पसन्द नहीं करता है, इसलिए वह सदा रुपये में सगाई करने तथा सगाई में केवल बाबूजी के जाने के पक्ष में है, जबकि बाबूजी अपने धनी सम्बन्धियों को सगाई में ले जाने के पक्ष में हैं। वीरजी बाबूजी की बात का विरोध करते हुए अपनी बात पर अडिग रहते हैं।

चाचा मंगलसेन का तय हुआ जाना
जब बाबूजी ने पगड़ी खोल कर अपने सफ़ेद बालों की दुहाई देते हुए कुछ लोगों को साथ ले जाने की बात कही, तो वीरजी अपने चाचा मंगलसेन को बाबूजी के साथ गाने के लिए कहता है। मंगलसेन बाबूजी का चचेरा भाई है, जो फौज से रिटायर होने के बाद बाबूजी के साथ ही रहता है और घर का काम करता है। गरीब मंगलसेन को बाबूजी बात पर अपमानित करते हैं तथा उसे उचित सम्मान नहीं देते, जो वीरजी को बुरा लगता है। मंगलसेन को विश्वास था कि वह सगाई में ज़रूर जाएगा और उसका विश्वास साकार हो गया।

समधी जी द्वारा सगाई देना
बाजी और मंगलसेन तैयार होकर अपने होने वाले समधी के घर पहुंचे, जहां उन दोनों की खूब आवभगत हुई। सगाई देने के समय बादाम से भरे कितने ही थाल समधी जी द्वारा लाए गए पर बाबूजी ने केवल सवा रुपये लेने की ही बात कही। अन्त में समधी जी अन्दर से चाँदी का एक थाल लाए जिसमें चाँदी की तीन कटोरियों एवं चॉदी के तीन चम्मच रखे हुए थे। एक कटोरी में केसर, दूसरी में राँगला धागा और तीसरी में चाँदी का रुपया एवं चवन्नी रखी हुई थी।

वापस आने पर एक चम्मच गायब मिलना
थाली को अपने कन्धों पर रखकर मंगलसेन घर पहुँचा। वीरजी की माँ ने रुमाल हटाकर देखा कि चॉदी की कटोरियाँ तो तीन थीं, लेकिन चम्मच दो ही थे। सभी को आश्चर्य हुआ की तीसरा चम्मच कहाँ गया?

मंगलसेन की तलाशी होना
चाँदी का एक चम्मच गायब हो जाने पर सभी को गरीब मंगलसेन पर सन्देह हुआ। मंगलसेन द्वारा बार-बार इनकार करने के बावजूद आँगन में उसे खड़ा कर उसकी तलाशी ली गई, तो उसकी जेब में मैला रुमाल, रीक्षियों की गल्ली, माचिस और छोटी-सी पेन्सिल के अलावा कुछ न मिला। तलाशी लिए जाने से मंगलसेन अत्यन्त अपमानित महसूस करने लगा। उसकी साँस फूलने लगी और वह खड़-खड़ा गिर गया। घर के नौकर सन्तू ने उसे छज्जे पर लिटा दिया।

गायब चम्मच का मिल जाना
ढोलक की आवाज़ सुनकर पड़ोस की महिलाएँ घर में इकट्ठा होने लगीं, तभी वीरजी का साला आकर चोंदी को चम्मच मनोरमा को देकर चला गया। दूसरी और सगाई में जाने सम्बन्धी मुद्दे पर सन्तू ने मंगलसेन से शर्त लगाई थी, जिसे वह हार चुका था। सन्तू कहता है कि तनख्वाह मिलने पर वह शर्त की। रकम मंगलसैन को दे देगा। इसी बिन्दु पर कहानी समाप्त हो जाती है, लेकिन खून का रिश्ता तार-तार हो जाता है। मंगलसेन को यह समझ नहीं आता कि सगाई में उसका जाना उसके लिए सम्मान का सूचक था या अपमान का. क्योंकि सगाई में जाने के कारण ही उस पर चोरी का आरोप लगाया गया और अपमानित करके उसकी तलाशी ली गई।

‘खून का रिश्ता’ कहानी की समीक्षा/विवेचना

(2018, 17, 14)

वर्तमान समाज में टूटते रिश्तों की वास्तविकता बताने वाली कहानी ‘खून का रिश्ता’ की समीक्षा इस प्रकार है।

कथानक/विषय-वस्तु
बाबूजी का बेटा वीरजी अपनी सगाई मात्र सवा रुपये में करवाना चाहता है और सगाई में केवल एक आदमी को भेजना चाहता है, परन्तु उसके माता-पिता अपने पुत्र की सगाई अपनी प्रतिष्ठा के अनुसार धूमधाम से करना चाहते है, किन्तु उनका बेटा ऐसा नहीं करने देता है। वीरजी के एक चाचा मंगलसेन वृद्ध एवं विकलांग है, जो अपने भतीजे की सगाई में जाने के सपने देखते हैं। उनका नौकर सन्तु जब उनसे कहता है कि बाबूजी आपको सगाई में नहीं ले जाएँगे, तो वे उदास हो जाते हैं, कि अन्ततः उनकी भाभी, वीरजी और बाबूजी उन्हें ले जाने के लिए तैयार हो जाते हैं।

उनके पास सगाई में जाने के लिए ढंग के कपड़े भी नहीं हैं। फिर उनकी भाभी ने घुला हुआ पाजामा, बाबूजी की एक पगड़ी देकर उन्हें समधी के यहाँ जाने के लिए तैयार किया। वहाँ जाकर उनका सपना पूरा हो गया। सगाई में समधी के यहाँ से चॉदी की तीन कटौरी और दो चम्मच देखकर वीरजी की माँ को गुस्सा आ गया। वे बोलीं-‘समधी जी ने तीन चम्मच दिए होंगे; किन्तु एक चम्मच कहाँ गायब हो गया? सबको मंगलसेन पर ही शक होता है कि उन्होंने ही हेराफेरी की है। बाबूजी ने उन्हें दण्ड देने की भी बात की। कुछ ही देर में वीरजी का साला एक चम्मच लाकर दे देता है। इस प्रकार मंगलसेन पर लगा आरोप झूठा साबित हो जाता है तथा खून का रिश्ता टूटते टूटते जुड़ जाता है। इस प्रकार कहानी का कथानक विचारोत्तेजक एवं यथार्थपूर्ण है। मानसिक अन्तर्द्वन्द्व का उन्मूलन कर देना भीष्म साहनी की चिन्तन कला का अद्भुत गुण है। कहानी में सजीवता तथा तारतम्यता विद्यमान है।

पात्र और चरित्र-चित्रण
‘खून का रिश्ता’ कहानी में मानवीय दृष्टिकोण से सामाजिक एवं पारिवारिक सम्बन्धों की विवेचना की गई है। यह एक प्रकार से चरि-प्रधान कहानी है, जिसमें मानव चरित्र की प्रतिष्ठा ही मुख्य विषय है। कहानी के प्रमुख पात्र के रूप में वीरजी की चिन्तन-शैली को आधुनिक भारतीय जागरूक नवयुवक के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो अपनी भावी ज़िन्दगी को सँवारने के लिए दहेज रहित विवाह का आश्चर्यजनक निर्णय लेता है। वीरजी की माँ एक स्वस्थ एवं सन्तुष्ट गृहिणी की भूमिका में हैं, जिनका चरित्र परिस्थितियों के साथ-साथ विकास पाता है। वह कभी खून के रिश्ते की गरिमा को पहचानती एवं महत्त्व देती हैं, तो कभी उसकी उपेक्षा भी करती हैं। प्रस्तुत कहानी में चरित्र की सूक्ष्मता एवं चारित्रिक भगिमाओं का वैशिय यानि विविधतापूर्ण चित्रण दर्शनीय है। कहानी में पात्रों की यथार्थता को मनोवैज्ञानिक दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है। चरित्र-चित्रण में विश्लेषणात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।

कथोपकथन अथवा संवाद
प्रस्तुत कहानी के संवाद पूर्ण नियन्त्रित तथा कौतूहल को उजागर करने वाले हैं। कथाकार ने इस कहानी में मुहावरों का प्रयोग करके संवादों को उत्कृष्ट बनाया है। वीरजी के दहेज विरोधी और माता-पिता के वात्सल्यपूर्ण चरित्र को उजागर करते संवाद है-” मैंने कह दिया, माँ! मेरी सगाई सवा रुपये में होगी और केवल बाबूजी सगाई डलवाने जाएँगे। जौ मंजूर नहीं हो तो अभी से “बस-बस, आगे कुछ मत कहना।” माँ ने झट से टोकते हुए कहा। फिर क्षुब्ध होकर बोली, “जो तुम्हारे मन में आए करो। आजकल कौन किसी की सुनता है। छोटा-सा परिवार और इसमें भी कभी कोई काम ढंग से नहीं हुआ। मुझे तो पहले ही मालूम था तुम अपनी करोगे……………………. ।”

देशकाल और वातावरण
कहानी में देशकाल और वातावरण में आँचलिक और स्थानीय रंग दिखता है। घटना और उससे सम्बन्धित परिस्थितियों का चित्रण सजीव रूप से तथा क्रमानुगत ढंग से किया गया है। समाज के टूटते सम्बन्धों का यथार्थ चित्रण वर्तमान वातावरण के परिप्रेक्ष्य में किया गया है। करुणा, आश्चर्य, प्रेम, वात्सल्य आदि की सरसता वातावरण के प्रभाव से सजीव हो गई है।

भाषा-शैली
भीष्म साहनी ने ‘खून का रिश्ता” कहानी को सरल एवं बोधगम्य भाषा द्वारा प्रभावशाली बनाया है। सूक्ष्म मानवीय सम्बन्धों को उजागर करने के लिए भाषा की सांकेतिकता से उसकी व्यंजना शक्ति बढ़ाई गई है। इस कहानी में शब्दों का चयन क्रियाओं के वेग और अन्तर्द्वन्द्व के विचार से किया गया है। इसमें अंग्रेजी और उर्दू शब्दों का भी प्रयोग किया गया है। कहानी की सभी शैलियों, शब्दों का चयन प्रभावशाली ढंग से किया गया है। इस कहानी में बाबूजी की शैली अधिकांश स्थानों पर ओजपूर्ण है। नौकर सन्तू की शैली मंगलसेन के प्रति व्यंग्य प्रधान है।

उद्देश्य
प्रत्येक कहानी के मूल में एक केन्द्रीय भाव होता है, जो कहानी को मौलिक आधार प्रदान करता है। यही कहानी का उद्देश्य कहलाता है। साहनी जी ने ‘खून का रिश्ता’ कहानी के माध्यम से दहेज उन्मूलन करने, मानवता तथा भाईचारे की भावना को सुदृढ़ करने आदि पर जोर दिया है। व्यक्ति की वैचारिकता में उदारता, ममत्व और समता भाव संचारित करना कहानी का मूल उद्देश्य है। इस कहानी में वीरजी की माँ द्वारा अपने बेटे की खुशी के लिए समस्त आदर्शों का त्याग करना पाठकों को चकित करने वाला है।

शीर्षक
इस कहानी का शीर्षक कथानुसार सटीक व संगत है। यह शीर्षक कहानी के भाव, विचार, उद्देश्य व कथावस्तु की दृष्टि से पूर्णतः सार्थक व तर्कसंगत है। सम्पूर्ण कथा शीर्षक के इर्द-गिर्द घूमती हैं। इस कहानी के शीर्षक में व्यापकता, प्रतीकात्मकता का गुण भी विद्यमान है। इसी के साथ इस कहानी का शीर्षक सरल, आकर्षक, मौलिक, नवीन व कौतूहलपूर्ण बन जाता है। इस प्रकार कहा जा सकता है। कि शीर्षक की दृष्टि से यह कहानी सार्थक सिद्ध होती हैं।

वीरजी का चरित्र-चित्रण

(2018, 17, 16, 14, 12)

मानवीय संवेदनाओं के कथा शिल्पी भीष्म साहनी की कहानी ‘खून का रिश्ता’ में वीरजी प्रमुख पात्र है, जिसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं।

शिक्षित युवक
वीरजी एक आदर्श नवयुवक है, जो सही अर्थों में शिक्षित हैं। वह नवयुवक घर परिवार के लगभग सभी सदस्यों का विरोध करता हुआ अकेला महज के विरोध विद्रोह करता है तथा सभी को अपना सुसंगत निर्णय मानने के लिए बाध्य करता है। उसके कहने पर ही निर्धन चाचा मंगलसेन उसके पिताजी के साथ समधी के घर सगाई लेकर जा पाते हैं।

आडम्बर एवं दहेज में विश्वास नहीं
वीरजी सही अर्थों में शिक्षित एवं समझदार नवयुवक है। वह अपने विवाह में किसी भी तरह का आज़म्बर या दिखावापन पसन्द नहीं करता है। वह दहेज के रूप में शगुन का सिर्फ सवा रुपया स्वीकार करता है। वह विवाह में फिजूलखर्ची से भी दूर राना चाहता है। यही कारण है कि वह केवल पिताजी को और उनके अत्यधिक आग्रह के बाद साथ में चाचाजी को सगाई में जाने देता हैं।

समानता की भावना का पोषक
वीरजी एक सहदय युवक है, जो अपने गरीब चाचा मंगलसेन को भी बराबर का सम्मान दिलवाता है। उसी की ज़िद का परिणाम होता है कि पिताजी को उसकी बात मानकर मंगलसेन को ले जाने के लिए राज़ी होना पड़ता है। वह धनी रिश्तेदारों की जगह गरीब मंगलसेन को अधिक प्राथमिकता देता है।

व्यवहार कुशल एवं मृदु भाषी
वीरजी एक व्यवहारकुशल युवक है और घर के सभी सदस्यों के प्रति उसका व्यवहार बड़ा ही मृदु है। वह अपने गरीब चाचा मंगलसेन को अत्यधिक सम्मान देता है तथा झुककर उनके पाँव छूता है।

अपनी संगिनी के प्रति स्नेहिल भावना
वीरजी अपनी होने वाली पत्नी प्रभा के प्रति अत्यन्त स्नेहयुक्त भावनाएँ रखता है। वह रुमाल को देखकर ही प्रभा के स्पर्श की कल्पना से पुलकित होने लगता है। वह चाहता है कि रुमाल को हाथ में लेकर चूम ले।

खून के रिश्तों का महत्त्व देने वाला
वीरजी खून के रिश्ते की विशेषता/पवित्रता को समझने वाला आधुनिक बौद्धिक युवक है। वह सभी बातों को बौद्धिक एवं तार्किक रूप से परखने के बाद भी परम्परा की उस मर्यादा को नहीं भूलता, जो बड़ों के प्रति छोटों का कर्तव्य है।

इसके अतिरिक्त, वह इस भावना एवं संवेदना से भी अच्छी तरह परिचित है कि पून के रिश्ते वाले चाचा मंगलसेन अपने भतीजे की शादी से सम्बन्धित क्या-क्या ख्याल रखते होंगे। यही कारण है कि वह अपनी सगाई में चाचा को भेजने की जिद करता है और सफल होता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि वीरजी एक शिक्षित युवक, आडम्बर एवं दहेज विरोधी, समानता की भावना का पोषक होने के साथ-साथ खून के रिश्तों को महत्त्व देता है। का हितेषी भी है।

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