UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi सूक्ति आधारित निबन्ध

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name सूक्ति आधारित निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi सूक्ति आधारित निबन्ध

1. जहाँ सुमति तहँ सम्पत्ति नाना/ससंगति (2018)
प्रस्तावना परमात्मा की सम्पूर्ण सृष्टि में मानव ही श्रेष्ठ माना जाता है, क्योकि मानव विवेकशील, विचारशील तथा चिन्तनशील प्राणी हैं। परमात्मा ने केवल मानव को ही बुद्धि अर्थात् चिन्तन शक्ति प्रदान की है। वह बुरा-भला सभी प्रकार का विचार करने में समर्थ है। समाज में उच्च स्थान प्राप्त करने के लिए मानव को नैतिक शिक्षा व सत्संगति की आवश्यकता पड़ती है। मानव को बाल्यावस्था से ही माता-पिता द्वारा अच्छे संस्कार प्राप्त होने चाहिए, क्योंकि बचपन के संस्कारों पर ही मानव का सम्पूर्ण जीवन निर्भर रहता है।

सत्संगति का अर्थ सत् + संगति अर्थात् अच्छे व्यक्तियों के साथ रहना, उनके आचार-विचार एवं व्यवहार का अनुशासन करना ही सत्संगति कहलाता है। सत्संगति मानव को ही नहीं अपितु पशु-पक्षी एवं निरीह जानवरों को भी दुष्प्रवृत्ति छोड़कर सदवृत्ति के लिए प्रेरित करती है।

सत्संगति की आवश्यकता मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह नित्य प्रति भिन्न भिन्न प्रकृति के व्यक्तियों के सम्पर्क में आता है। वह जिस भी प्रकृति के व्यक्ति के सम्पर्क में आता है, उसी के गुण-दोषों तथा व्यवहार आदि को ग्रहण कर लेता है। अतः मानव को बुरे लोगों की संगति से बचना चाहिए तथा सत्संगति अपनानी चाहिए, क्योकि सत्संगति ही मनुष्य को अच्छे संस्कार, उचित व्यवहार तथा उच्च विचार प्रदान करती है। बुराई के पंजों से बचने के लिए मानव को सत्संग की शरण लेनी चाहिए, तभी उसके विचार एवं व्यवहार श्रेष्ठ बनेंगे तथा उसका समाज में श्रेष्ठ स्थान बनेगा। यदि यह कुसंग में पड़ गया, तो उसका सम्पूर्ण जीवन विनष्ट हो जाएगा। अतः सत्संगति की महती आवश्यकता है।

सत्संगति से लाभ सत्संगति से मानव के आचार-विचार में परिवर्तन आता है और वह बुराई के मार्ग का त्याग कर सच्चे और अच्छे कर्मों में प्रवृत्त हो जाता है। इस निश्चय के उपरान्त उसे अपने मार्ग पर अविचल गति से अग्रसर होना चाहिए। सत्संगति ही उसके सच्चे मार्ग को प्रदर्शित करती है। उस पर चलता हुआ मानव देवताओं की श्रेणी में पहुंच जाता है। इस मार्ग पर चलने वाले के सामने धर्म रोड़ा बनकर नहीं आता है। अतः उसे किसी प्रकार के प्रलोभनों से विचलित नहीं होना चाहिए।

कुसंगति को प्रभाव सत्संगति की भाँति कुसंगति का भी मानव पर विशेष प्रभाव पड़ता है, क्योकि कुसंगति तो काम, क्रोध, लोभ, मोह और बुद्धि भ्रष्ट करने वालों की जननी है। इसकी संतानें सत्संगति का अनुकरण करने वाले को अपने जाल में फंसाने का प्रयत्न करती हैं। महाबली भीष्म, धनुर्धर द्रोण और महारथी शकुनि जैसे महापुरुष भी

इसके मोह जाल में फंस कर पथ विचलित हो गए थे। उनके आदर्शों का तुरन्त ही | हनन हो गया था। कुसंगति मानव के सम्पूर्ण जीवन को विनष्ट कर देती है। अतः प्रत्येक मानव को बुरे लोगों के सम्पर्क से बचना चाहिए।

उपसंहार अत: प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह चन्दन के वृक्ष के समान अटल रहे। जिस प्रकार से विषधर रात-दिन लिपटे रहने पर भी उसे विष से प्रभावित नहीं कर सकते, उसी प्रकार सत्संगति के पथगामी का कुसंगति वाले कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते हैं।

सत्संगति कुन्दन है। इसके मिलने से काँच के समान मानव हीरे के समान चमक उठता है। अतः उन्नति का एकमात्र सोपान सत्संगति ही है। मानव को सज्जन परुषों के सत्संग में ही रहकर अपनी जीवन रूपी नौका समाज रूपी सागर से पार लगानी चाहिए। तभी वह आदर को प्राप्त कर सकता है तथा समस्त ऐश्वर्यों के सुख का उपभोग कर सकता है। इसीलिए कहा गया है कि जहाँ सुमति तहँ सम्पत्ति नाना।।।

2. को न कुसंगति पाई नसाई (2016)
संकेत बिन्दु भूमिका, सूक्ति का अर्थ, कुसंगति का प्रभाव, उपसंहार।।

भूमिका को न कुसंगति पाई नसाई’ सूक्ति को समझने से पूर्व ‘कुसंगति’ शब्द का अर्थ समझना आवश्यक है। कुसंगति का अर्थ है-कुबुद्धि (बुरी संगत), दुर्भाव, कुरुचि आदि। कुबुद्धि के प्रभाव से व्यक्ति सदैव बुरी बाते ही सोचता है। और बुरे कार्यों में ही निमग्न रहता है। व्यक्ति को बुरी संगति मिलने से उसमें बुरी बुद्धि का विकास होता है तथा उसे अपने जीवन में निरन्तर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कुसंगति में फंसे व्यक्तियों का विकास सर्वथा अवरुद्ध हो जाता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं। वह अकेला नहीं रह सकता। बचपन से ही मनुष्य को एक-दूसरे के साथ मिलने-बैठने और बातचीत करने की इच्छा उत्पन्न हो जाती है। इसी को संगति कहा जाता है। बचपन में बालक अबोध होता है। उसे अच्छे बुरे की पहचान नहीं होती यदि वह अच्छी संगति में रहता है, तो उस पर अच्छे संस्कार पड़ते हैं और यदि उसकी संगति बुरी है तो उसकी आदतें भी बुरी हो जाती हैं।

सूक्ति का अर्थ कुसंगति के द्वारा व्यक्ति हीन-भावना से ग्रस्त होकर अपने मार्ग से विचलित हो जाता है। जिस व्यक्ति में कुबुद्धि, दुर्भाव आदि भावनाएँ | व्याप्त होती है उसे स्वयं ही घन, वैभव, यश आदि से हाथ धोना पड़ता है, जो व्यक्ति अपने हित के साथ अन्य लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए संगठित होकर कार्य नहीं करता उसे प्रत्येक क्षेत्र में असफलता ही प्राप्त होती है। सत्संगति में रहकर व्यक्ति योग्य और कुसंगति में पड़कर व्यक्ति अयोग्य बनकर समाज और परिवार दोनों में निरादर प्राप्त करता है। प्रस्तुत सूक्ति को कैकयी व मन्थरा के प्रसंग द्वारा उचित प्रकार से समझा जा सकता है। कैकयी राम को अत्यधिक प्रेम करती थी, किन्तु कैकयी को मंथरा द्वारा उकसाया गया जिससे कैकेयी अपनी दासी मन्थरा की बातों में आकर राजा दशरथ से दो वरदान माँगती हैं और प्रभु श्रीराम को अपने से दूर कर देती हैं। ठीक उसी प्रकार जब इनसान अपने जीवन में कुसंगति में रहता है, तो वह ईश्वर से कोसों दूर हो जाता है। कुसंगति ही इनसान के जीवन में दुःखों का भण्डार लाती है। कैकयी के जीवन में मन्थरा के कुसंग से विपत्तियाँ आई और उसका सब कुछ नष्ट हो गया।

कुसंगति को प्रभाव कुसंगति का मानव जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव प्रड़ता है। कुसंगति से सदा हानि होती है। मनुष्य को सतर्क और सावधान रहना चाहिए, क्योंकि कुसंगति काजल की कोठरी के समान है जिससे बेदाग बाहर निकलना असम्भव है। जीजाबाई की संगति में शिवाजी ‘छत्रपति शिवाजी’ बने, दस्यु रत्नाकर सुसंगति के प्रभाव से महामुनि वाल्मीकि बने, जिन्होंने रामायण नामक अमर काव्य लिखा। डाकू अंगुलिमाल, महात्मा बुद्ध के संगति में आकर उनका शिष्य बन गया और नर्तकी आम्रपाली का उद्धार हुआ। महाभारत के युद्ध में श्रीकृष्ण ने अर्जुन का स्वजनों के प्रति मोह भंग कर युद्ध के लिए तैयार किया। वहीं दूसरी ओर कुसंगति में पड़कर भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, कर्ण, दुर्योधन आदि पतन के गर्त में चले गए। ये सभी अपने आप में विद्वान् और वीर थे, लेकिन कुसंगति का प्रभाव इन्हें विनाश की ओर खींच लाया। विद्यार्थी जीवन में सत्संगति का विशेष महत्त्व है। वह जैसी संगति में रहते हैं स्वयं वैसे ही बन जाते हैं जैसे कमल पर पड़ी बूंद नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार कुसंगति व्यक्ति को अन्दर से कलुषित कर उसका सर्वनाश कर देती है। इसलिए कहा गया है कि “दुर्जन यदि विद्वान् भी हो तो उसका संग त्याग देना चाहिए।

उपसंहार मानव जीवन में संगति का प्रभाव अवश्य पड़ता है। कुसंगति उसे पतन के गर्त में ले जाती हैं और वहीं दूसरी ओर सत्संगति उसके उत्थान का मार्ग खोल देती है। सामाजिक प्राणी होने के कारण मनुष्य को दूसरों के साथ किसी न किसी रूप में सम्पर्क करना पड़ता है। अच्छे लोगों की संगति जीवन को उत्थान की ओर ले जाती है, तो बुरी संगति पतन का द्वार खोल देती है।

संगति के प्रभाव से कोई नहीं बच सकता। हम जैसी संगति में रहते हैं, वैसा ही हमारा आचरण बन जाता है। तुलसीदास का कथन है-

‘बिनु सत्संग विवेक न होई।

अतः मनुष्य का प्रयास यही होना चाहिए कि वह कुसंगति से बचे और सुसंगति में रहे। तभी उसका कल्याण हो पाएगा।

3. परहित सरिस धरम नहिं भाई (2018, 12, 11, 10)
अन्य शीर्षक वही मनुष्य है, जो मनुष्य के लिए मरे। (2012)
संकेत बिन्दु भूमिका, सन्देश देती प्रकृति, संस्कृति का आधार परोपकार, जगत-कल्याण के लिए कृत संकल्प, उपसंहार।।

भूमिका ‘परहित’ अर्थात् दूसरों का हित करने की भावना की महत्ता को स्वीकार करते हुए ‘गोस्वामी तुलसीदास’ ने लिखा है

“परहित सरिस धरम नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।”

इन पंक्तियों का अर्थ है-परोपकार से बढ़कर कोई भी उत्तम धर्म यानी कर्म नहीं | है और दूसरों को कष्ट पहुँचाने से बढ़कर कोई नीच कर्म नहीं हैं। हमारे संस्कृत ग्रन्थ भी ‘परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्’ अर्थात् दूसरों को हित पहुंचाना पुण्यकारक तथा दूसरों को कष्ट देना पापकारक है, जैसे वचनों से भरे पड़े हैं। वास्तव में परहित या परोपकार की भावना ही मनुष्य को ‘मनुष्य’ बनाती है। किसी भूखे व्यक्ति को खाना खिलाते समय या किसी विपन्न व्यक्ति की सहायता करते समय हृदय को जिस असीम आनन्द की प्राप्ति होती हैं, वह अवर्णनीय हैं, वह अकथनीय है।

सन्देश देती प्रकृति हमारे चारों ओर प्रकृति का घेरा है और प्रकृति अपने क्रियाकलापों से हमें परहित हेतु जीने का सन्देश देती है, प्रेरणा देती है। सूर्य अपना सारा प्रकाश एवं ऊर्जा जगत के प्राणियों को दे देता है, नदी अपना सारा पानी जन जन के लिए लुटा देती हैं। वृक्ष अपने समग्र फल प्राणियों में बाँट देते हैं, तो वर्षा जगत की तप्तता को शान्त, करती है। प्रकृति की परोपकार भावना को महान् छायावादी कवि पन्तजी’ ने निम्न शब्दों में उकेरा है-

“हँसमुख प्रसून सिखलाते पलभर है-
जो हँस पाओ।
अपने उर सौरभ से
जग का आँगन भर जाओ।”

संस्कृति का आधार परोपकार भारत सदैव से अपनी परोपकारी परम्परा के लिए विश्वप्रसिद्ध रहा है। यहाँ ऐसे लोगों को ही महापुरुष की श्रेणी में शामिल किया गया है, जिन्होंने स्वार्थ को त्यागकर लोकहित को अपनाया। यहाँ ऋषियों एवं तपस्वियों की महिमा का गुणगान इसलिए किया जाता है, क्योंकि उन्होंने ‘स्व’ की अपेक्षा ‘पर’ को अधिक महत्त्व दिया। छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद कामायनी’ में लिखते हैं-

औरों को हँसते देखो मनु, हँसो और सुख पाओ,
अपने सुख को विस्तृत कर लो सब को सुखी बनाओ।”

जगत-कल्याण के लिए कृत संकल्प भारत की भूमि ही वह पावन भूमि है, जहाँ बुद्ध एवं महावीर जैसे सन्तों ने जगत-कल्याण के लिए अपना राजपाट, वैभव, सुख, सब कुछ त्याग दिया। परोपकार की भावना से ओत-प्रोत होने के लिए आवश्यक है कि हम अपने जीवन में प्रेम, करुणा, उदारता, दया जैसे सदगणों को धारण करें। दिखावे के लिए किया गया परोपकार अहंकार को जन्म देती है, जिसमें परोपकारी इसके बदले सम्मान पाने की भावना रखता है। वास्तव में यह, परोपकार नहीं, व्यापार है। परोपकार तो नि:स्वार्थ भावना से प्रकृति के विभिन्न अंगों के समान होना चाहिए। राजा भर्तृहरि ने नीतिशतक में लिखा है-‘महान् आत्माएँ अर्थात् श्रेष्ठ जन उसी प्रकार स्वतः दूसरों का भला करते हैं; जैसे- सूर्य कमल को खिलाता है, चन्द्रमा मुदिनी को विकसित करता है तथा बादल बिना किसी के कहे जल देता है।

उपसंहार परोपकार करने से व्यक्ति की आत्मा तृप्त होती है और विस्तृत भी। उसका हृदय एवं मस्तिष्क अपने-पराये की भावना से बहुत ऊपर उठ जाता है। इस आत्मिक आनन्द की तुलना भौतिक सुखों से नहीं की जा सकती। परोपकार व्यक्ति को अलौकिक आनन्द प्रदान करता है। उसमें मानवीयता का विस्तार होता है और वह सही अर्थों में मनुष्य कहलाने का अधिकारी बनता है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने ठीक ही लिखा है-

मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे,
यही पशु प्रवृत्ति है कि आप-आप ही चरे।”

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 3 रश्मिरथी

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name रश्मिरथी
Number of Questions Solved 6
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 3 रश्मिरथी

कथावस्तु पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1.
“रश्मिरथी’ के कथानक में ऐतिहासिकता और धार्मिकता दोनों हैं।” इस कथन के आधार पर इस खंडकाव्य की विशेषताएँ लिखिए। (2018)
अथवा
“रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में उदान्त मानव मूल्यों का उदघाटन हुआ है।” स्पष्ट कीजिए। (2018)
अथवा
रश्मिरथी खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए। (2018)
अथवा
रश्मिरथी काव्य की कथावस्तु/कथासार अपने शब्दों में लिखिए। (2016)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की कथावस्तु /कथासार (विषय-वस्तु) संक्षेप में लिखिए। (2018, 16, 12, 11)
अथवा

‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख कीजिए। (2018, 17, 14)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के कथानक की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2014)
अथवा
‘रश्मिरथी’ के कथानक में ऐतिहासिकता और धार्मिकता दोनों हैं। तर्कसहित उत्तर दीजिए। (2014)
अथवा
रश्मिथी खण्डकाव्य की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए। (2016)
उत्तर:
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित है। सर्गानुसार संक्षिप्त कथावस्तु इस प्रकार है।

प्रथम सर्ग : कर्ण का शौर्य प्रदर्शन

कर्ण का जन्म कुन्ती के गर्भ से हुआ था और उसके पिता सूर्य थे। लोकलाज के भय से कुन्ती ने नवजात शिशु को नदी में बहा दिया, जिसे सूत (सारथि) ने बचाया और उसे पुत्र रूप में स्वीकार कर उसका पालन-पोषण किया। सूत के घर पलकर भी कर्ण महान् धनुर्धर, शूरवीर, शीलवान, पुरुषार्थी और दानवीर बना। एक बार द्रोणाचार्य ने कौरव व पाण्डव राजकुमारों के शस्त्र कौशल का सार्वजनिक प्रदर्शन किया।

सभी दर्शक अर्जुन की धनुर्विद्या के प्रदर्शन को देखकर आश्चर्यचकित रह गए, किन्तु तभी कर्ण ने सभा में उपस्थित होकर अर्जुन को द्वन्द्वयुद्ध के लिए ललकारा। कृपाचार्य ने कर्ण से उसकी जाति और गोत्र के विषय में पूछा। इस पर कर्ण ने स्वयं को सूत-पुत्र बताया, तब निम्न जाति का कहकर उसका अपमान किया गया। उसे अर्जुन से द्वन्द्वयुद्ध करने के अयोग्य समझा गया, परन्तु दुर्योधन कर्ण की वीरता एवं तेजस्विता से अत्यन्त प्रभावित हुआ और उसे अंगदेश का राजा घोषित कर दिया। साथ ही उसे अपना अभिन्न मित्र बना लिया। गुरु द्रोणाचार्य भी कर्ण की वीरता को देखकर चिन्तित हो उठे और कुन्ती भी कर्ण के प्रति किए गए बुरे व्यवहार के लिए उदास हुई।

द्वितीय सर्ग: आश्रमवास

रश्मिरथी खण्डकाव्य के द्वितीय सर्ग का कथानक अपने शब्दों में लिखिए।  (2018, 17, 16)

राजपुत्रों के विरोध से दु:खी होकर कर्ण ब्राह्मण रूप में परशुराम जी के पास धनुर्विद्या सीखने के लिए गया। परशुराम जी ने बड़े प्रेम के साथ कर्ण को धनुर्विद्या सिखाई। एक दिन परशुराम जी कर्ण की जंघा पर सिर रखकर सो रहे थे, तभी एक कीड़ा कर्ण की जंघा पर चढ़कर खून चूसता-चूसता उसकी जंघा में प्रविष्ट हो गया। रक्त बहने लगा, पर कर्ण इस असहनीय पीड़ा को चुपचाप सहन करता रहा, और शान्त रहा। क्योकि कहीं गुरुदेव को निद्रा में विघ्न न पड़ जाए। जंघा से निकले रक्त के स्पर्श से गुरुदेव को निद्रा भंग हो गई। अब परशुराम को कर्ण के ब्राह्मण होने पर सन्देह हुआ। अन्त में कर्ण ने अपनी वास्तविकता बताई। इस पर परशुराम ने कर्ण से ब्रह्मास्त्र के प्रयोग का अधिकार छीन लिया और उसे श्राप दे दिया। कर्ण गुरु के चरणों का स्पर्श कर वहाँ से चला आया।

तृतीय सर्ग : कृष्ण सन्देश (2017, 15)

बारह वर्ष का वनवास और अज्ञातवास की एक वर्ष की अवधि समाप्त हो जाने पर पाण्डव अपने नगर इन्द्रप्रस्थ लौट आते हैं और दुर्योधन से अपना राज्य वापस माँगते हैं, लेकिन दुर्योधन पाण्डवों को एक सूई की नोंक के बराबर भूमि देने से भी मना कर देता है। श्रीकृष्ण सन्धि प्रस्ताव लेकर कौरवों के पास आते हैं। दुर्योधन इस सन्धि प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करता और श्रीकृष्ण को ही बन्दी बनाने का प्रयास करता है। श्रीकृष्ण ने अपना विराट रूप दिखाकर उसे भयभीत कर दिया। दुर्योधन के न मानने पर श्रीकृष्ण ने कर्ण को समझाया। श्रीकृष्ण ने कर्ण को उसके जन्म का इतिहास बताते हुए उसे पाण्डवों का बड़ा भाई बताया और युद्ध के दुष्परिणाम भी समझाए, लेकिन कर्ण ने श्रीकृष्ण की बातों को नहीं माना और कहा कि वह युद्ध में पाण्डवों की ओर से सम्मिलित नहीं होगा। दुर्योधन ने उसे जो सम्मान और स्नेह दिया है, वह उसका आभारी है।

चतुर्थ सर्ग : कर्ण के महादान की कथा

‘रश्मिरथी’ खंडकाव्य के चतुर्थ सर्ग का कथानक अपने शब्दों में लिखिए। (2008, 12)
जय कर्ण ने पाण्डवों के पक्ष में जाने से मना कर दिया, तो इन्द्र ब्राह्मण का वेश धारण कर कर्ण के पास आए। वह कर्ण को दानवीरता की परीक्षा लेना चाहते थे। कर्ण इन्द्र के इस छल-प्रपंच को पहचान गया, परन्तु फिर भी उसने इन्द्र को सूर्य के द्वारा दिए गए कवच और कुण्डल दान में दे दिए। इन्द्र कर्ण की इस दानवीरता को देखकर अत्यन्त लज्जित हुए। उन्होंने स्वयं को प्रवंचक, कुटिल और पापी कहा तथा प्रसन्न होकर कर्ण को ‘एकनी’ नामक अमोघ शक्ति प्रदान की।

पंचम सर्ग : माता की विनती (2013 10)

अथवा
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कुन्ती-कर्ण के संवाद की घटना का सारांश लिखिए। (2018)
अथवा
‘रश्मिरथी’ के पंचम सर्ग की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए। (2016)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के पंचम सर्ग में कुन्ती और कर्ण के संवाद का सारांश अपने शब्दों में लिखिए। (2010)

कुन्ती को चिन्ता है कि रणभूमि में मेरे ही दोनों पुत्र कर्ण और अर्जुन परस्पर युद्ध करेंगे। इससे चिन्तित हो वह कर्ण के पास जाती है और उसे उसके जन्म के विषय में सब बताती है। कर्ण कुन्ती की बातें सुनकर भी दुर्योधन का साथ छोड़ने के लिए तैयार नहीं होता है, किन्तु अर्जुन को छोड़कर अन्य किसी पाण्डव को न मारने का वचन कुन्ती को दे देता है। कर्ण कहता है कि तुम प्रत्येक दशा में पाँच पाण्डवों की माता बनी रहोगी। कुन्ती निराश हो जाती है। कर्ण ने युद्ध समाप्त होने के पश्चात् कुन्ती की सेवा करने की बात कही। कुन्ती निराश मन से लौट आती है।

षष्ठ सर्ग : शक्ति परीक्षण

श्रीकृष्ण इस बात से भली-भाँति परिचित थे कि कर्ण के पास इन्द्र द्वारा दी गई ‘एकघ्नी शक्ति है। जब कर्ण को सेनापति बनाकर युद्ध में भेजा गया तो श्रीकृष्ण ने घटोत्कच को कर्ण से लड़ने के लिए भेज दिया।

दुर्योधन के कहने पर कर्ण ने घटोत्कच को एकनी शक्ति से मार दिया। इस, विजय से कर्ण अत्यन्त दुःखी हुए, पर पाण्डव अत्यन्त प्रसन्न हुए। श्रीकृष्ण ने अपनी नीति से अर्जुन को अमोघशक्ति से बचा लिया था, परन्तु कर्ण ने फिर भी छल से दूर रहकर अपने व्रत का पालन किया।

सप्तम सर्ग : कर्ण के बलिदान की कथा (2011)

रश्मिरथी खण्डकाव्य के सप्तम सर्ग की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए। (2016)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के अन्तिम सर्ग की विवेचना कीजिए। (2014, 13)
कर्ण को पाण्डवों से भयंकर युद्ध होता है। वह युद्ध में अन्य सभी पाण्डवों को पराजित कर देता है, पर माता कुन्ती को दिए गए वचन का स्मरण कर सबको छोड़ देता है। कर्ण और अर्जुन आमने-सामने हैं। दोनों ओर से घमासान युद्ध होता है। अर्जुन कर्ण के बाणों से विचलित हो उठते हैं। एक बार तो वह मूर्छित भी हो जाते हैं। तभी कर्ण के रथ का पहिया कीचड़ में फंस जाता है। कर्ण रथ से उतरकर पहिया निकालने लगता है, तभी श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्ण पर बाण चलाने की आज्ञा देते हैं।

श्रीकृष्ण के संकेत करने पर अर्जुन निहत्थे कर्ण पर प्रहार कर देते हैं। कर्ण की मृत्यु हो जाती है, पर वास्तव में नैतिकता की दृष्टि से तो कर्ण ही विजयी रहता है। श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि विजय तो अवश्य मिली, पर मर्यादा खोकर।

प्रश्न 2.
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की सामान्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2018)
अथवा

‘रश्मिरथी’ में प्राचीन पृष्ठभूमि पर आधुनिक समस्याओं का निरूपण किया गया है। स्पष्ट कीजिए। (2016)
अथवा
‘रश्मिरथी’ की भाषा की स्वाभाविक सहजता पर अपने विचार प्रकट कीजिए। (2012)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की विशेषताएँ लिखिए। (2017)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2014, 13)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए। (2013)
अथवा
किन विशेषताओं के आधार पर ‘रश्मिरथी’ को उच्च कोटि का काव्य माना जाता है? (2013)
अथवा
“रश्मिरथी’ काव्य खण्ड में व्यक्ति की उदात्त एवं आदर्श भावनाओं की अभिव्यक्ति हुई है। इस कथन की सार्थकता पर प्रकाश डालिए। (2011)
अथवा
‘रश्मिरथी में कवि का मन्तव्य कर्ण के चरित्र के शीलपक्ष, मैत्री भाव तथा शौर्य का चित्रण करना है।” सिद्ध कीजिए। (2014, 11)
उत्तर:
राष्ट्रकवि रामधारीसिंह ‘दिनकर’ सदैव देशप्रेम एवं मानवतावादी दृष्टिकोण के समर्थक रहे हैं। रश्मिरथी’ खण्डकाव्य इसका अपवाद नहीं है। इस खण्डकाव्य की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

कथानक

‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य का कथानक ‘महाभारत’ के प्रसिद्ध पात्र कर्ण के जीवन प्रसंग पर आधारित हैं। इन प्रसंगों ने कर्ण के व्यक्तित्व को एक नई छवि प्रदान की है। कथानक का संगठन सुनियोजित प्रकार से किया गया है।

प्रसंगों का समय भिन्न-भिन्न है, लेकिन उन्हें इस प्रकार श्रृंखलाबद्ध किया गया हैं। कि कथा के प्रवाह में बाधा नहीं पड़ती और उसका क्रमबद्ध विकास होता है। कथा का अन्त इस प्रकार किया गया है कि वह कर्ण की विशेषताओं को विभूषित करते हुए समाप्त हो जाती है।

पात्र एवं चरित्र-चित्रण

इस खण्डकाव्य में कर्ण के उपेक्षित जीवन और उसकी चारित्रिक विशेषताओं पर ही प्रकाश डालना कवि का उद्देश्य रहा है। अन्य पात्रों का चुनाव इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर किया गया है।

कथानक में एक भी अनावश्यक पात्र को स्थान नहीं दिया गया है। कर्ण के चरित्र में वर्तमान युग के सामाजिक स्तर पर उपेक्षित व्यक्तियों एवं कुन्ती के रूप में समाज के नियमों से प्रताड़ित नारियों की व्यथा को स्वर दिया गया है। इस प्रकार इस खण्डकाव्य में पात्रों का चरित्र-चित्रण अत्यन्त स्वाभाविक ढंग से हुआ है।

कर्ण जैसे महान् गुणों से सम्पन्न. नायक को कवि ने मुख्य पात्र बनाया है। अन्य पात्रों का चित्रण कर्ण की चारित्रिक विशेषताओं को प्रकाशित करने के लिए किया गया है। सम्पूर्ण काव्य में वीर रस को ही प्रधानता दी गई है। छन्दों में अवश्य विभिन्नता है। आदर्शोन्मुख उद्देश्य के लिए लिखी गई इस रचना को सफल खण्डकाव्ये कहा जा सकता हैं।

‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य का उद्देश्य (2013)

‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के माध्यम से कवि ने उपेक्षित, लेकिन प्रतिभावान मनुष्यों के स्वर को वाणी दी है। यदि कर्ण को बचपन से समुचित सम्मान प्राप्त हुआ होता, जन्म, जाति और कुल आदि के नाम पर उसे अपमानित न किया गया होता तो वह कौरवों का साथ कभी भी नहीं देता। शायद तब महाभारत का युद्ध भी नहीं हुआ होता। कवि ने यह स्पष्ट किया है कि प्रतिभाएँ कुण्ठित होकर समाज को पतन की ओर अग्रसर कर देती हैं।

इस खण्डकाव्य में प्राचीन पृष्ठभूमि पर आधुनिक समस्याओं का निरूपण किया गया है। इसमें समाज में नारियों की मनोदशा का भी यथार्थ वर्णन किया गया है, साथ ही समाज में उनकी स्थिति पर भी प्रकाश डाला गया है। इस प्रकारे उद्देश्य की दृष्टि से भी यह एक सफल खण्डकाव्य है।

इस खण्डकाव्य में प्राचीन पृष्ठभूमि पर आधुनिक समस्याओं का निरूपण किया गया है। इसमें समाज में नारियों की मनोदशा का भी यथार्थ वर्णन किया गया है, साथ ही समाज में उनकी स्थिति पर भी प्रकाश डाला गया है। इस प्रकारे उद्देश्य की दृष्टि से भी यह एक सफल खण्डकाव्य है।

काव्यगत विशेषताएँ

प्रस्तुत खण्डकाव्य ‘रश्मिरथी’ की काव्यगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।
भावपक्षीय विशेषताएँ

1. वण्र्य विषय खण्डकाव्य की दृष्टि से यह एक सफल खण्डकाव्य है। इसके कथानक की रचना में कवि ने अपनी सूझबूझ का अच्छा परिचय दिया है। दिनकर जी की इस रचना का प्रमुख पात्र कर्ण है। वह समाज के उन व्यक्तियों का प्रतीक है, जो वर्ण-व्यवस्था पर आधारित अमानवीय क्रूरता एवं जड़ नैतिक मान्यताओं की विभीषिका के शिकार हैं।

वर्ण व्यवस्था, जाति-प्रथा, एवं ऊँच-नीच की भावना वर्तमान युग की ज्वलन्त समस्याएँ हैं। इन्हीं के कारण भारतीय समाज में योग्य एवं कर्मठ व्यक्तियों की उपेक्षा एक सामान्य बात है। कर्ण ऐसे ही पीड़ित एवं उपेक्षित जनों को आदर्श प्रतीक है।

2. प्रकृति चित्रण यद्यपि रश्मिरथी काव्य में प्रकृति चित्रण कवि का विषय नहीं है, तथापि पात्रों के चित्रण-वर्णन के दौरान यत्र-तत्र प्रकृति का चित्रण हुआ है, जो अत्यन्त सशक्त है; जैसे|

  • अम्बुधि में आकटक निमज्जित, कनक खचित पर्वत-सा।
  • हँसती थीं रश्मियाँ रजत से भरकर वारि विमले को।।
  • कदली के चिकने पातों पर पारद चमक रहा था।

3. रस निरूपण प्रस्तुत खण्डकाव्य में वीर रस की प्रधानता है। साथ ही करुण एवं वात्सल्य रस को भी स्थान दिया गया है। जहाँ कर्ण और कुन्ती का वार्तालाप हैं, वहाँ वात्सल्य रस देखने को मिलता है-

“मेरे ही सुत मेरे सुत को ही मारें,
हो क्रुद्ध परस्पर ही प्रतिशोध उतारें।’

कलापक्षीय विशेषताएँ। (2010)
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की कलापक्षीय विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं।

  1. भाषा-शैली रश्मिरथी खण्डकाव्य में अधिकतर संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग हुआ है। तद्भव शब्दों का भी प्रयोग दृष्टिगत होता है। वास्तव में, यह काव्य शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली में रचित काव्य है। कवि ने अपनी काव्यात्मक भाषा को कहीं भी बोझिल नहीं होने दिया है। सूक्तिपरकता का भी प्रयोग किया गया है। प्राचीन शब्दावली का प्रयोग किया है, जहाँ युद्ध, घटनाओं एवं परिस्थितियों को स्वाभाविक रूप देने का प्रयास किया गया है।
  2. छन्द एवं अलंकार कवि ने प्रत्येक सर्ग में अलग-अलग छन्द प्रयोग किए हैं। विषय, मानसिक परिस्थितियों तथा घटनाओं के संवेदनात्मक पक्ष को दृष्टि में रखते हुए इनका आयोजन किया गया है। अलंकारों में सहजता और संक्षिप्तता है, वे स्वाभाविक रूप से ही प्रयुक्त हुए हैं। वस्तुतः अलंकारों के प्रदर्शन के प्रति कवि की रुचि नहीं है। इस प्रकार भावात्मक एवं कलात्मक दृष्टि से रश्मिरथी’ खण्डकाव्य एक उत्कृष्ट रचना है। यह रचना वर्तमान युग के लिए अत्यन्त उपयोगी है, जो आधुनिक युग के
    समाज की बुराइयों को दूर करने का सन्देश देती है।
  3. उद्देश्य ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के माध्यम से कवि ने उपेक्षित, लेकिन प्रतिभावान मनुष्यों के स्वर को वाणी दी है। यदि कर्ण को बचपन से समुचित सम्मान प्राप्त हुआ होता तथा जन्म, जाति और कुल आदि के नाम पर उसे अपमानित न किया गया होता, तो वह कौरवों का साथ कभी भी नहीं देता। शायद तब महाभारत का युद्ध भी नहीं हुआ होता। कवि ने यह स्पष्ट किया है कि प्रतिभाएँ कुण्ठित होकर समाज को पतन की ओर अग्रसर कर देती हैं।

प्रश्न 3.
“रश्मिरथी’ के प्रत्येक सर्ग में संवादात्मक स्थल ही सबसे प्रमुख है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए। (2011)
अथवा
“रश्मिरथी खण्डकाव्य की संवाद योजना बड़ी सशक्त है।” इस कथन पर अपने विचार व्यक्त कीजिए। (2012)
उत्तर:
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के संवादों में नाटकीयता के गुण विद्यमान हैं। यह नाटकीयता सर्वत्र देखी जा सकती है। इसमें सरलता, सुबोधता, स्वाभाविकता के साथ-साथ प्रभावशीलता भी देखने को मिलती है|

“उड़ती वितर्क-धागे पर चंग-सरीखी,
सुधियों की सहती चोट प्राण पर तीखी।
आशा-अभिलाषा भरी, डरी, भरमाई,
कुन्ती ज्यों-ज्यों जाह्नवी तीर पर आई।

कवि ने प्रभावशाली संवाद शैली का अनुसरण करते हुए वर्णनात्मक शैली की कमियों का निराकरण कर दिया है-

“पाकर प्रसन्न आलोक नया, कौरवसेना का शोक गया।
आशा की नवल तरंग उठी, जन-जन में नई उमंग उठी।”

सर्गों का क्रम भी कवि की रचनात्मक विशेषताओं को व्यक्त करता है। छन्द एवं अलंकार कवि ने प्रत्येक सर्ग में अलग-अलग छन्द प्रयोग किए हैं। विषय, मानसिक परिस्थितियों तथा घटनाओं के संवेदनात्मक पक्ष को दृष्टि में रखते हुए इनका आयोजन किया गया हैं। अलंकारों में सहजता और संक्षिप्तता हैं, वे स्वाभाविक रूप से ही प्रयुक्त हुए हैं। वस्तुतः अलंकारों के प्रदर्शन के प्रति कवि की रुचि नहीं हैं। इस प्रकार भावात्मक एवं कलात्मक दृष्टि से ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य एक उत्कृष्ट रचना है। यह रचना वर्तमान युग के लिए अत्यन्त उपयोगी है, जो आधुनिक युग के समाज की बुराइयों को दूर करने का सन्देश देती है।

चरित्र-चित्रण पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 4.
“कर्ण महान् योद्धा के साथ-साथ दानवीर भी है।” इस कथन के आधार पर कर्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2018)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के नायक के चरित्र की विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (2018)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र की चरित्रिक विशेषताओं को अपने शब्दों में प्रस्तुत कीजिए। (2018)
अथवा
रश्मिरथी के माध्यम से कवि दिनकर ने महारथी कर्ण के किन गुणों पर प्रकाश डाला है? अपने शब्दों में लिखिए। (2017)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण के चरित्र की विशेषताएँ बताइट।
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2017)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण के चरित्र पर प्रकाश डालिए। (2018, 16)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र की चारित्रिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (2016)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर नायक की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
अथवा
‘रश्मिरथी’ के कर्ण के व्यक्तित्व की उल्लेखनीय विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (2016)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर प्रमुख पात्र कर्ण के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र (नायक कर्ण) का चरित्र-चित्रण (चरित्रांकन/चारित्रिक मूल्यांकन) कीजिए। (2018, 17, 15, 14, 13, 12, 11)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के कर्ण दानवीर थे, परन्तु वह मानसिक अन्तर्द्वन्द्व से भी ग्रस्त थे। ऐसा क्यों? स्पष्ट कीजिए। (2011)
अथवा
कर्ण के चरित्र में ऐसे कौन-से गुण हैं, जो उसे महामानव की कोटि तक उठा देते हैं? (2012, 11)
अथवा
“रश्मिरथी खण्डकाव्य में उदात्त मानवीय चरित्र का उद्घाटन किया गया है। इस कथन की समीक्षा कीजिए। (2013)
उत्तर:
प्रस्तुत खण्डकाव्य ‘रश्मिरथी’ के आधार पर कर्ण के चरित्र की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

1. महान् धनुर्धर कर्ण की माता कुन्ती और पिता सूर्य थे। लोकलाज के भय से कुन्ती अपने पुत्र को नदी में बहा देती है, तब एक सूत उसका लालन-पालन करता है। सूत के घर पलकर भी कर्ण महादानी एवं महान् धनुर्धर बनता है। एक दिन अर्जुन रंगभूमि में अपनी बाणविद्या का प्रदर्शन करता है, तभी वहाँ आकर कर्ण भी अपनी धनुर्विद्या का प्रभावपूर्ण प्रदर्शन करता है। कर्ण के इस प्रभावपूर्ण प्रदर्शन को देखकर द्रोणाचार्य एवं पाण्डव उदास हो जाते हैं।

2. सामाजिक विडम्बना का शिकार कर्ण क्षत्रिय कुल से सम्बन्धित था, लेकिन उसका पालन-पोषण एक सूत के द्वारा हुआ, जिस कारण वह सूतपुत्र कहलाया और इसी कारण उसे पग-पग पर अपमान का बूंट पीना पड़ा। शस्त्र विद्या प्रदर्शन के समय प्रदर्शन स्थल पर उपस्थित होकर वह अर्जुन को ललकारता है, तो सब स्तब्ध रह जाते हैं। यहाँ पर कर्ण को कृपाचार्य की कूटनीतियों का शिकार होना पड़ता है। द्रौपदी के स्वयंवर में भी उसे अपमानित होना पड़ा था।

3. सच्चा मित्र कर्ण दुर्योधन का सच्चा मित्र है। दुर्योधन कर्ण की वीरता से प्रसन्न होकर उसे अंगदेश का राजा बना देता है। इस उपकार के बदले भावविह्वल कर्ण सदैव के लिए दुर्योधन का मित्र बन जाता है। वह श्रीकृष्ण और कुन्ती के प्रलोभनों को ठुकरा देता है। वह श्रीकृष्ण से कहता है कि मुझे स्नेह और सम्मान दुर्योधन ने ही दिया। अतः मेरा तो रोम-रोम दुर्योधन का ऋणी है। वह तो सब कुछ दुर्योधन पर न्योछावर करने को तत्पर रहता है।

4. गुरुभक्त कर्ण सच्चा गुरुभक्त हैं। वह अपने गुरु के प्रति विनयी एवं श्रद्धालु है। एक दिन परशुराम कर्ण की जंघा पर सिर रखकर सोए हुए थे तभी एक कीट कर्ण की जंघा में घुस जाता है, रक्त की धारा बहने लगती है, वह चुपचाप पीड़ा को सहता है, क्योकि पैर हिलाने से गुरु की नींद खुल सकती थी, लेकिन आँखें खुलने पर वह गुरु को अपने बारे में सब कुछ बता देता है। गुरु क्रोधित होकर उसे आश्रम से निकाल देते हैं, लेकिन वह अपनी विनय नहीं छोड़ता और गुरु के चरण स्पर्श कर वहाँ से चल देता है।

5. महादानी कर्ण महादानी है। प्रतिदिन प्रात:काल सन्ध्या वन्दना करने के पश्चात् वह याचकों को दान देता है। उसके द्वार से कभी कोई याचक खाली नहीं लौटा। कर्ण की दानशीलता का वर्णन कवि ने इस प्रकार किया है।

“रवि पूजन के समय सामने, जो भी याचक आता था,
मुँह माँगा वह दान कर्ण से, अनायास ही पाता था।”

इन्द्र ब्राह्मण का वेश धारण कर कर्ण के पास आते हैं। यद्यपि कर्ण इन्द्र के छल को पहचान लेता है तथापि वह इन्द्र को सूर्य द्वारा दिए गए कवच और कुण्डल दान में दे देता है।

6. महान् सेनानी कौरवों की ओर से कर्ण सेनापति बनकर युद्धभूमि में प्रवेश करता है। युद्ध में अपने रण कौशल से वह पाण्डवों की सेना में हाहाकार मचा देता है। अर्जुन भी कर्ण के बाणों से विचलित हो उठते हैं। श्रीकृष्ण भी उसकी वीरता की प्रशंसा करते हैं। भीष्म उसके विषय में कहते हैं

“अर्जुन को मिले कृष्ण जैसे,
तुम मिले कौरवों को वैसे।”

इस प्रकार कहा जा सकता है कि कर्ण का चरित्र दिव्य एवं उच्च संस्कारों से युक्त है। वह शक्ति का स्रोत है, सच्चा मित्र है, महादानी और त्यागी है। वस्तुतः उसकी यही विशेषताएँ उसे खण्डकाव्य का महान् नायक बना देती हैं।

प्रश्न 5.
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर श्रीकृष्ण का चरित्रांकन कीजिए। (2018, 17, 10)
अथवा
‘रश्मिरथी’ के आधार पर श्रीकृष्ण के विराट व्यक्तित्व को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
‘दिनकर’ जी द्वारा रचित ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर श्रीकृष्ण की चारित्रिक विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं।

1. युद्ध विरोधी एवं मानवता का पक्षधर ‘रश्मिरथी’ के श्रीकृष्ण युद्ध के प्रबल विरोधी हैं और मानवता के प्रति संवेदनशील हैं। उन्हें यह ज्ञात है कि युद्ध की विभीषिका मानवता के लिए कितनी दुखदायी होती है। पाण्डवों के वनवास से लौटने के पश्चात् श्रीकृष्ण कौरवों को समझाने के लिए हस्तिनापुर जाते हैं और युद्ध को टालने का भरसक प्रयत्न करते हैं, किन्तु हठी दुर्योधन नहीं मानता। कौरवों से पाण्डवों के लिए वे पाँच गाँव ही माँगते हैं। दुर्योधन के द्वारा अस्वीकार करने पर वे सोचते हैं कि वह कर्ण की शक्ति प्राप्त कर ही युद्ध में अपनी जीत की कल्पना कर रहा है। यदि कर्ण उसका साथ छोड़ दे तो यह युद्ध रोका जा सकता है। इस युद्ध को रोकने के लिए उन्होंने कर्ण से कहा-

यह मुकुट मान सिंहासन ले,
बस एक भीख मुझको दे दे।
कौरव को तेज रण रोक सखे,
भु का हर भावी शोक सखे।

2. निडर एवं स्फुटवक्ता श्रीकृष्ण निडर एवं स्फुटवक्ता अर्थात् बात को स्पष्ट कहने वाले हैं। वे युद्ध नहीं चाहते हैं। वे चाहते हैं कि कौरवों और पाण्डवों के मध्य सुलह हो जाए। इसके आधार पर उन्हें कायर नहीं कहा जा सकता। वे दुर्योधन को अनेक प्रकार से समझाने का प्रयास करते हैं, लेकिन वह मानने के लिए तैयार नहीं है, अपनी जिद पर अड़ा है, लेकिन जब वह उनके हित की दृष्टि से दी गई सलाह को नहीं मानती है तो वे कहते हैं कि-

तो ले अब मैं भी जाता है,
अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।

3. सदाचारी एवं व्यावहारिक श्रीकृष्ण सदाचारी एवं व्यावहारिक हैं। उनके सभी कार्य सदाचार एवं शील के परिचायक हैं। उनका उद्देश्य सदाचारपूर्ण समाज की स्थापना करना है और वे यही चाहते हैं कि सभी सदाचरण करें। वे सदाचार को ही जीवन का सार मानते हुए कहते हैं कि-

नहीं पुरुषार्थ केवल जाति में है,
विभा का सार शील पुनीत में है।

4. गुणवानों के पक्षधर ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के श्रीकृष्ण गुणवान व्यक्तियों के प्रबल समर्थक एवं प्रशंसक हैं। इस कारण वे अपने विरोधी के गुणों का भी सम्मान करते हैं। यद्यपि कर्ण कौरव पक्ष का योद्धा था फिर भी श्रीकण के मन में उसके गुणों के प्रति बहुत आदर है। वे उसका गुणगान करते नहीं थकते। उसकी मृत्यु के उपरान्त वे अर्जुन से उसके बारे में कहते हैं कि-

मगर, जो हो, मनुज सुवरिष्ठ था वह,
घनुर्धर ही नहीं, घमिष्ठ था वह।
वीर शत बार धन्य
तुझ-सा न मित्र कोई अनन्य।

5. कूटनीतिज्ञ ‘दिनकर’ द्वारा रचित ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के श्रीकृष्ण कूटनीतिज्ञ हैं। महाभारत के श्रीकृष्ण के चरित्र से उनके चरित्र की विशेषताएँ मिलती हैं, किन्तु इस खण्डकाव्य में उनके कूटनीतिज्ञ स्वरूप का ही चित्रण हुआ है। पाण्डवों की जीत का आधार उनकी कूटनीति ही थी। वे पाण्डवों की ओर से कूटनीति की चाल चलकर दुर्योधन की सबसे बड़ी शक्ति कर्ण को उससे अलग करने का प्रयास करते हैं। उनकी कूटनीतिज्ञता का पता इन पंक्तियों में उनके द्वारा कहा गया यह कथन स्पष्ट करता है–

कुन्ती का तू ही तनय श्रेष्ठ,
बलशील में परम श्रेष्ठ।
मस्तक पर मुकुट धरेंगे हम,
तेरा अभिषेक करेंगे हम,

6. अलौकिक गुणों से युक्त ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के श्रीकृष्ण महाभारत के श्रीकृष्ण की ही तरह अलौकिक गुणों से युक्त हैं। वे लीलामय पुरुष हैं, क्योंकि उनमें अलौकिक शक्ति विद्यमान है। जब वे दुर्योधन के दरबार में पाण्डवों के दूत बनकर जाते हैं, तो दुर्योधन उन्हें बाँधना चाहता है और कैद करना चाहता है, तो उस समय वे अपना लीलामय विराट स्वरूप दिखाते है-

हरि ने भीषण हुँकार किया,
अपना स्वरूप विस्तार किया,
डगमग-इगमग दिग्गज डोले,
भगवान, कुपित होकर बोले
जंजीर बढ़ाकर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

इस प्रकार उपरोक्त बिन्दुओं को दृष्टिगत रखते हुए हम कह सकते हैं कि श्रीकृष्ण निडर एवं स्फुटवक्ता, अलौकिक गुणों से युक्त होते हुए महाभारत के श्रीकृष्ण के चरित्र के समस्त गुणों को अपने अन्दर समाहित किए हुए हैं। इसके साथ-ही-साथ उनका चरित्र लोकमंगल की भावना से युक्त है। श्रीकृष्ण का यह स्वरूप कवि ने इस खण्डकाव्य में युग के अनुसार ही प्रकट किया है। इसके कारण उनके महाभारतकालीन चरित्र पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है-

प्रश्न 6.
“रश्मिरथी खण्डकाव्य के नारी-पात्र कुन्ती के चरित्र में कवि ने मातृत्व के भीषण अन्तर्द्वन्द्व की पुष्टि की है।” इस कथन की सार्थकता कीजिए। (2018)
अथवा
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कुन्ती के चरित्र की विशेषताएँ बताइए। (2016)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के प्रधान नारी (कुन्ती) पात्र का चरित्रांकन कीजिए। (2018, 16)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर कुन्ती के चरित्र की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2013, 12, 11)
अथवा
“कुन्ती के चरित्र में कवि ने मातृत्व के भीषण अन्तर्द्वन्द्व की सृष्टि की है।” इस कथन के आधार पर कुन्ती का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2010)
अथवा
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में प्रस्तुत कुन्ती के मन की घुटन का विवेचन कीजिए। (2011)
उत्तर:
कुन्ती पाण्डवों की माता है। सूर्यपुत्र कर्ण का जन्म कुन्ती के गर्भ से ही हुआ था। इस प्रकार कुन्ती के पाँच नहीं वरन् छः पुत्र थे। कुन्ती की चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं।

  1. समाज भीरू कुन्ती लोकलाज के भय से अपने नवजात शिशु को गंगा में बहा देती है। वह कभी भी उसे स्वीकार नहीं कर पाती। उसे युवा और धीरत्व की मूर्ति बने देखकर भी अपना पुत्र कहने का साहस नहीं कर पाती। जब युद्ध की विभीषिका सामने आती है, तो वह कर्ण से एकान्त में मिलती है और अपनी दयनीय स्थिति को व्यक्त करती है।
  2. एक ममतामयी माँ कुन्ती ममता की साक्षात् मूर्ति है। कुन्ती को जब पता चलता है कि कर्ण का उनके अन्य पाँच पुत्रों से युद्ध होने वाला है, तो वह कर्ण को मनाने उसके पास जाती है और उसके प्रति अपना ममत्व एवं वात्सल्य प्रेम प्रकट करती है। वह नहीं चाहती कि उनके पुत्र युद्धभूमि में एक-दूसरे के साथ संघर्ष करें। यद्यपि कर्ण उनकी बातें स्वीकार नहीं करता, पर वह उसे आशीर्वाद देती है, उसे अंक में भरकर अपनी वात्सल्य भावना को सन्तुष्ट करती है।
  3. अन्तर्द्वन्द्व ग्रस्त कुन्ती के पुत्र परस्पर शत्रु बने हुए थे, तब कुन्ती के मन में भीषण अन्तर्द्वन्द्व मचा हुआ था, वह बड़ी उलझन में पड़ी हुई थी कि पाँचों पाण्डवों और कर्ण में से किसी की भी हानि हो, पर वह हानि तो मेरी ही होगी। वह इस स्थिति को रोकना चाहती थीं, परन्तु कर्ण के अस्वीकार कर देने पर वह इस नियति को सहने के लिए विवश हो जाती है। इस प्रकार कवि ने ‘रश्मिरथी’ में कुन्ती के चरित्र में अनेक उच्च गुणों का समावेश किया है। और इस विवश माँ की ममता को महान् बना दिया है।

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UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 9 स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम पर्यावरण का प्रभावएवं 

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 9 स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम पर्यावरण का प्रभावएवं are part of UP Board Solutions for Class 12  Home Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 9 स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम पर्यावरण का प्रभावएवं.

Board UP Board
Class Class 12
Subject Home Science
Chapter Chapter 9
Chapter Name  स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम पर्यावरण का प्रभावएवं
Number of Questions Solved 15
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 9 स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम पर्यावरण का प्रभावएवं

बहुविकल्पीय प्रश्न  (1 अंक)

प्रश्न 1.
लोगों को स्वास्थ्य के सभी पहलुओं से अवगत करना कहलाती है
(a) जन शिक्षा
(b) स्वास्थ्य शिक्षा
(c) भौतिक शिक्षा
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) स्वास्थ्य शिक्षा|

प्रश्न 2.
स्वास्थ्य शिक्षा में सम्मिलित हैं
(a) पर्यावरण
(b) शारीरिक स्वास्थ्य
(c) सामाजिक स्वास्थ्य
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 3.
स्वास्थ्य शिक्षा में सहायक संस्थाएँ मानी जाती हैं
(a) परिवार
(b) विद्यालय
(c) नगर निगम
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 4.
परिवार नियोजन केन्द्रों में किस सन्दर्भ में जानकारी दी जाती
(a) बाल शिशु सुरक्षा
(b) प्राथमिक चिकित्सा
(c) जनसंख्या वृद्धि
(d) मातृ शिशु सुरक्षा
उत्तर:
(c) जनसंख्या वृद्धि

प्रश्न 5.
यूनिसेफ का मुख्य कार्यालय है   (2018)
(a) पेरिस में
(b) न्यूयार्क में
(C) टोकियो
(d) हनोई में
उत्तर:
(b) न्यूयार्क में

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न 1 अंक, 25 शब्द

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य शिक्षा किसे कहते हैं?
उत्तर:
जन सामान्य को स्वास्थ्य के सभी पहलुओं से अवगत कराना ही स्वास्थ्य शिक्षा कहलाती है। यह एक ऐसा साधन है, जिससे कुछ विशेष शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों की सहायता से लोगों को स्वास्थ्य सम्बन्धी ज्ञान तथा व्याधियों से बचने के उपायों का प्रसार किया जा सकता है।

प्रश्न 2.
स्वास्थ्य शिक्षा का मुख्य उद्देश्य क्या है? (2018)
उत्तर:
लोगों के स्वास्थ्य को उत्तम बनाना एवं स्वास्थ्य नियमों से अवगत कराना। स्वास्थ्य शिक्षा मुख्य उद्देश्य है। इसके तहत, राज्य, जिलों व अन्य स्तरों पर स्वास्थ्य शिक्षा इकाइयों की संगठनात्मक व्यवस्था और प्रचालन हेतु दिशा-निर्देश प्रदान किया जाता है।

प्रश्न 3.
व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए किन नियमों का पालन करना चाहिए? (2018)
उत्तर:
व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए स्वस्थ परिवेश के साथ प्रतिदिन स्नान, शरीर के वस्त्रों की सफाई, दाँतों, आखों की सफाई तथा नाखूनों आदि को काटना चाहिए।

प्रश्न 4.
प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र क्या है? (2018)
उत्तर:
यह स्वास्थ्य केन्द्र ग्रामीण जनता को स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमों की जानकारी देने, रोगों से बचाव, स्वच्छता, शिशु की देखभाल तथा गर्भवती स्त्रियों को पोषण से सम्बन्धी जानकारी प्रदान करते हैं। यह केन्द्र निःशुल्क होते हैं।

प्रश्न 5.
राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के नाम बताइए, जो जनस्वास्थ्य के कार्यक्रमों में सहायक हैं।
उत्तर:
जनस्वास्थ्य से सम्बन्धित संस्थाए निम्नलिखित हैं- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), यूनीसेफ (UNICEF), केयर (CARE) तथा रेडक्रॉस सोसायटी (Red Cross Society) आदि।

प्रश्न 6.
केन्द्रीय स्वास्थ्य ब्यूरो की स्थापना कब की गई?
उत्तर देश में स्वास्थ्य शिक्षा से सम्बन्धित जागरूकता लाने के लिए सरकार द्वारा वर्ष 1956 में केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्रालय के अन्तर्गत केन्द्रीय स्वास्थ्य ब्यूरो की स्थापना की गई।

लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक, 50 शब्द)

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य शिक्षा को विकसित करने के लिए केन्द्रीय स्वास्थ्य ब्यूरो द्वारा कौन-कौन से उद्देश्य बताए गए हैं?
उत्तर:
देश में स्वास्थ्य शिक्षा को विकसित करने और बढ़ावा देने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केन्द्रीय स्वास्थ्य ब्यूरो ने निम्नलिखित उद्देश्य बताए हैं।

  • स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मन्त्रालय की योजनाओं, कार्यक्रमों और उपलब्धियों की व्याख्या करना।
  • स्वास्थ्य व्यवहार, स्वास्थ्य शिक्षा प्रक्रियाओं और साधनों के लिए सन्दर्शिका तैयार करना और शोध आयोजित करना।
  • विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं और कार्यक्रमों से सम्बन्धित स्वास्थ्य शिक्षा सामग्री को तैयार करके टाइप कराकर वितरित करना।।
  • प्रमुख स्वास्थ्य और समुदाय कल्याण कर्मियों को स्वास्थ्य शिक्षा और शोध की विधियों में प्रशिक्षित करना, प्रशिक्षण के लिए प्रभावशाली विधि और प्रशिक्षण के साधन विकसित करना।
  • विद्यालय के छात्रों हेतु स्वास्थ्य शिक्षा के लिए विद्यालयों और शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों की सहायता करना।
  • राज्य, जिला और अन्य स्तरों पर स्वास्थ्य शिक्षा इकाइयों की संगठनात्मक व्यवस्था और प्रचालन हेतु दिशा निर्देश प्रदान करना।
  • स्वास्थ्य शिक्षा कार्य में लगी आधिकारिक और गैर-आधिकारिक एजेन्सियों को तकनीकी सहायता प्रदान करना और उनके कार्यक्रमों को समन्वित करना।

प्रश्न 2.
सरकारी स्वास्थ्य विभाग द्वारा कौन-कौन सी संस्थाएँ संचालित होती हैं? संक्षेप में समझाइए।
उत्तरे:
देश में स्वास्थ्य शिक्षा से सम्बन्धित जागरूकता लाने के लिए सरकार द्वारा वर्ष | 1956 में केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्रालय के अन्तर्गत केन्द्रीय स्वास्थ्य ब्यूरो की स्थापना की गई, अन्य संस्थाएँ निम्नलिखित हैं।

1. केन्द्रीय स्वास्थ्य संगठन केन्द्रीय स्वास्थ्य ब्यूरो का गठन वर्ष 1957 में किया गया, जिसमें स्वास्थ्य शिक्षा का प्रचार करने के लिए तीन अलग-अलग विभाग बनाए गए।

  1. प्राथमिक स्कूलों के लिए कार्य करने वाले
  2. माध्यमिक विद्यालयों के लिए।
  3. शिक्षा प्रशिक्षण विद्यालयों के लिए

2. राज्य स्वास्थ्य विभाग वर्ष 1959 में केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्रालय के प्रस्ताव से 13 राज्यों में राज्य स्वास्थ्य ब्यूरो स्थापित किए गए, जिनके मुख्य कार्य हैं।

  1. चिकित्सालय परिवार नियोजन केन्द्र तथा स्वास्थ्य केन्द्र स्थापित करना।
  2. स्वास्थ्य शिक्षा हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रम चलाना।
  3. क्षेत्र विकास खण्डों में स्वास्थ्य केन्द्र स्थापित करना।

3. जिला स्वास्थ्य विभाग प्रत्येक जिले में एक स्वास्थ्य विभाग होता है तथा नगर के सभी अस्पताल इसी के अन्तर्गत आते हैं

4. नगर परिषद् स्वास्थ्य विभाग इस विभाग का मुख्य कार्य नगर में फैलने वाली बीमारियों को रोकना है। यह विभाग नगर में स्वास्थ्य सुरक्षा के कार्य करता है; जैसे-साफ-सफाई, शुद्ध पेयजल, संक्रामक रोगों की रोकथाम आदि।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (5 अंक, 100 शब्द)

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य शिक्षा से क्या आशय है? स्वास्थ्य शिक्षा के उददेश्य तथा शिक्षा में सहायक संस्थाओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
स्वास्थ्य शिक्षा क्या है? स्वास्थ्य शिक्षा में कौन-कौन सी सस्थाएँ सहायक हैं?
उत्तर:
जन सामान्य को स्वास्थ्य के सभी पहलुओं से अवगत कराना ही स्वास्थ्य शिक्षा कहलाती है। यह एक ऐसा साधन है, जिससे कुछ विशेष शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों की सहायता से लोगों को स्वास्थ्य सम्बन्धी ज्ञान तथा व्याधियों से बचने के उपायों का प्रसार किया जा सकता है।
स्वास्थ्य शिक्षा के उद्देश्य
स्वास्थ्य शिक्षा के अन्तर्गत पर्यावरण, शारीरिक स्वास्थ्य, सामाजिक स्वास्थ्य तथा बौद्धिक स्वास्थ्य इत्यादि सभी को सम्मिलित किया जाता है। स्वास्थ्य शिक्षा के द्वारा ही व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह ऐसा बर्ताव करता है, जो स्वास्थ्य की उन्नति, रख-रखाव तथा उसकी पुनर्घाप्ति में सहायक हो।
देश में स्वास्थ्य शिक्षा को विकसित करने और बढ़ावा देने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केन्द्रीय स्वास्थ्य ब्यूरो ने निम्नलिखित उद्देश्य बताए हैं।

  • स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मन्त्रालय की योजनाओं, कार्यक्रमों और उपलब्धियों की व्याख्या करना।
  • स्वास्थ्य व्यवहार, स्वास्थ्य शिक्षा प्रक्रियाओं और साधनों के लिए सन्दर्शिका तैयार करना और शोध आयोजित करना।
  • विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं और कार्यक्रमों से सम्बन्धित स्वास्थ्य शिक्षा सामग्री को तैयार करके टाइप कराकर वितरित करना।।
  • प्रमुख स्वास्थ्य और समुदाय कल्याण कर्मियों को स्वास्थ्य शिक्षा और शोध की विधियों में प्रशिक्षित करना, प्रशिक्षण के लिए प्रभावशाली विधि और प्रशिक्षण के साधन विकसित करना।
  • विद्यालय के छात्रों हेतु स्वास्थ्य शिक्षा के लिए विद्यालयों और शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों की सहायता करना।
  • राज्य, जिला और अन्य स्तरों पर स्वास्थ्य शिक्षा इकाइयों की संगठनात्मक व्यवस्था और प्रचालन हेतु दिशा निर्देश प्रदान करना।
  • स्वास्थ्य शिक्षा कार्य में लगी आधिकारिक और गैर-आधिकारिक एजेन्सियों को तकनीकी सहायता प्रदान करना और उनके कार्यक्रमों को समन्वित करना।

स्वास्थ्य शिक्षा में सहायक संस्थाएँ
स्वास्थ्य शिक्षा के सन्दर्भ में निम्नलिखित संस्थाओं का सहयोग है।
1. परिवार इसे बच्चे की प्रथम पाठशाला माना जाता है। परिवार द्वारा बच्चे को स्वास्थ्य की जानकारी तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमों का ज्ञान होता है।

2. विद्यालय बालक पारिवारिक वातावरण से निकलकर विद्यालय में प्रवेश करता है, जहाँ उसे स्वस्थ रहने के तरीकों का ज्ञान होता है। विद्यालय में बालक को शारीरिक व्यायाम तथा रोगों से बचाव हेतु शिक्षा दी जानी चाहिए, जिससे स्वास्थ्य की रक्षा होती है।

3. चिकित्सालय नगरों में सामान्य चिकित्सालय खोले गए हैं, जहाँ प्रशिक्षित नर्स तथा डॉक्टर होते हैं, जो विशेष रूप से लोगों को स्वास्थ्य शिक्षा के विषय में जानकारी देते हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ शुद्ध व सन्तुलित भोजन तथा टीका लगवाने की प्रेरणा दी जाती है।

4. प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र यह स्वास्थ्य केन्द्र ग्रामीण जनता को स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमों की जानकारी देने, रोगों से बचाव, स्वच्छता, शिशु की देखभाल तथा गर्भवती स्त्रियों को पोषण सम्बन्धी जानकारी देते हैं। यह केन्द्र नि:शुल्क होते हैं।

5. नगर निगम के स्वास्थ्य केन्द्र यह केन्द्र शहर में स्वच्छता का ध्यान रखते हैं। इसका मुख्य कार्य सड़क एवं गलियों के किनारे डी.डी.टी.का छिड़काव व चूना डलवाना, कूड़ा-करकट हटवाना तथा रोगों से बचाव हेतु टीके लगवाना आदि हैं।

6. परिवार नियोजन केन्द्र देश के लगभग सभी गाँव, कस्बे तथा शहरों में परिवार नियोजन केन्द्र बनाए गए हैं, जहाँ जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगाने सम्बन्धी जानकारी दी जाती है। अन्य संस्थाएँ स्वास्थ्य संगठनों में अन्य छोटी-बड़ी संस्थाएँ निम्नलिखित हैं।

  1. प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र
  2. मोबाइल अस्पताल
  3. मातृ शिशु कल्याण केन्द्र
  4. प्रसूति रक्षा केन्द्र
  5. बाल शिशु रक्षा केन्द्र
  6. औद्योगिक केन्द्र

राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय एवं गैर-सरकारी स्वास्थ्य संगठन
स्थानीय स्वास्थ्य संगठनों के अतिरिक्त कुछ राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय एवं गैर-सरकारी स्वास्थ्य संगठन भी हैं, जिनका सम्बन्ध स्वास्थ्य शिक्षा से है। इनमें विश्व स्वास्थ्य संगठन,यूनीसेफ, केयर, रेडक्रॉस सोसायटी तथा खाद्य एवं कृषि संगठन प्रमुख हैं, जो निम्न हैं।
1. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) यह संगठन विश्वभर में स्वास्थ्य रक्षा हेतु विशेष लोगों को प्रशिक्षण देता है, जिससे स्वास्थ्य रक्षा के कार्यों में सहायता मिले। यह अपने दस्यदेशों को उनके स्वास्थ्यसेवाओं, शोध व स्वास्थ्य कार्यक्रमों का विकास में प्रोत्साहन देता है।

2.यूनिसेफ (UNICEF) यह संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ के सहयोग सेवर्ष 1946 में स्थापित की गई। इस संस्था के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं।

  1. माताओं व शिशुओं को रोगों से बचाना
  2. बच्चों की शिक्षा, पोषण व स्वास्थ्य सम्बन्धी सहायता देना
  3. विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ मिलकर स्वास्थ्य व सुरक्षा केसन्दर्भ में कार्य करना।

3. केयर (CARE) यह संस्था बालकों की पोषण सम्बन्धी सभी आवश्यकताओं को पूर्ण करने हेतु समाधान करती है।

4. रेडक्रॉस सोसायटी (Red Cross Society) यह स्वास्थ्य सम्बन्धी एक स्वतन्त्र संगठन है, जो लगातार अपनी सेवाएँ देता है।

5. खाद्य एवं कृषि संगठन यह संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ की एक शाखा है। यह संस्था मनुष्य के सामाजिक स्तर को बढ़ाने का कार्य, पोषण की सुविधा देने तथा ग्रामीण लोगों कीदशा सुधारने का कार्य करती है। इन सभी संगठनों ने स्वास्थ्य के नियमों में सुधार लाने के सुधारात्मक आन्दोलन चलाए हैं, जिससे जनसुरक्षात्मक कार्यों में वृद्धि हुई है।

प्रश्न 2.
स्वास्थ्य के लिए, स्वास्थ्य शिक्षा के अन्तर्गत मुख्य रूप से क्या सुझाव दिए जा सकते हैं? (2018)
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा से आशय
जन सामान्य को स्वास्थ्य के सभी पहलुओं से अवगत कराना ही स्वास्थ्य शिक्षा कहलाती है। यह एक ऐसा साधन है, जिससे कुछ विशेष शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों की सहायता से लोगों को स्वास्थ्य सम्बन्धी ज्ञान तथा व्याधियों से बचने के उपायों का प्रसार किया जा सकता है।

स्वास्थ्य शिक्षा के द्वारा जनसाधारण को यह समझने का प्रयास किया जाता है कि उसके लिए क्या स्वास्थ्यप्रद और क्या हानिप्रद है तथा इनसे साधारण बचाव कैसे किया जाए। संक्रामक रोगों; जैसे- चेचक, क्षय और विसूचिका इत्यादि के टीके लगवाकरे हम कैसे अपनी सुरक्षा कर सकते हैं। स्वास्थ्य शिक्षक ही जनता से सम्पर्क स्थापित कर स्वास्थ्य शिक्षा द्वारा आवश्यक नियमों का उन्हें ज्ञान कराता है।

स्वास्थ्य शिक्षा से सम्बन्धित सुझाव
1.स्कूलों एवं कॉलेजों के स्तर पर

  • व्यक्तिगत स्वास्थ्य एवं पारिवारिक स्वास्थ्य की रक्षा हेतु लोगों को । स्वास्थ्य के नियमों की जानकारी कराने के लिए स्वास्थ्य शिक्षा को स्कूल व कॉलेजों के पाठ्यक्रम में जोड़ना आवश्यक है।
  • संक्रामक रोगों की अधिकता तथा रोग निरोधक के मूल तत्त्वों का ? विद्यार्थियों को बोध कराया जाना चाहिए।
  • स्वास्थ्य रक्षा के सामूहिक उत्तरदायित्व को वहन करने की शिक्षा देना। इस प्रकार से स्कूलों में स्वास्थ्य शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्र आगे चलकर सामुदायिक स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्यों में निपुणता से कार्य कर सकते हैं तथा अपने एवं अपने परिवार के लोगों की स्वास्थ्य रक्षा हेतु उचित उपायों का प्रयोग कर सकते हैं। यह देखा भी गया है कि इस प्रकार से स्कूलों में स्वास्थ्य शिक्षा से सम्पूर्ण देश की स्वास्थ्य रक्षा में प्रगति हुई है।

2. सामान्य जनता को स्वास्थ्य सम्बन्धी सूचना देना यह कार्य मुख्य रूप से स्वास्थ्य विभाग का है, परन्तु अनेक ऐच्छिक स्वास्थ्य संस्थाएँ एवं अन्य संस्थाएँ जो इस कार्य में रुचि रखती हैं, सहायक रूप से कार्य कर सकती हैं। इस प्रकार की स्वास्थ्य शिक्षा का कार्य आजकल रेडियो, समाचार-पत्रों, भाषणों, सिनेमा, प्रदर्शनी तथा पुस्तिकाओं की सहायता से यथाशीघ्र सम्पन्न हो रहा है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी उपकरणों का भी प्रयोग करना चाहिए, जिससे अधिक-से-अधिक जनता का ध्यान स्वास्थ्य शिक्षा की ओर आकर्षित हो सके। इसके लिए विशेष प्रकार के व्यवहार कुशल और शिक्षित स्वास्थ्य शिक्षकों की नियुक्ति करना श्रेयस्कर है।

3. स्वास्थ्य शिक्षा सम्बन्धी केन्द्र स्वास्थ्य से सम्बन्धित शिक्षा देने के लिए विभिन्न स्थानों पर केन्द्रों की स्थापना की जानी चाहिए। इन केन्द्रों के माध्यम से स्वास्थ्य विशेषज्ञ निम्नलिखित सहायता प्रदान कर सकते हैं।

  • प्रत्येक रोगी तथा प्रत्येक घर जहाँ चिकित्सक जाता है, वहाँ किसी-न-किसी रूप में उसे स्वास्थ्य शिक्षा देने की हमेशा आवश्यकता पड़ती है।
  • रोग के सम्बन्ध में रोगी के भावात्मक विचार तथा अन्धविश्वास को दूर करना।
  • रोगी का रोगोपचार, स्वास्थ्य रक्षक तथा रोग के समस्त रोगनिरोधात्मक उपायों का ज्ञान कराना।
  • अपने ज्ञान से रोगी को पूरा विश्वास दिलाना, जिससे रोगी अपनी तथा अपने परिवार की स्वास्थ्य रक्षा के हेतु उनसे समय-समय पर सलाह ले सकें।
  • रोग पर असर करने वाले आर्थिक एवं सामाजिक प्रभावों का भी रोगी को बोध कराए तथा एक चिकित्सक, उपचारिका, स्वास्थ्य चर तथा इस क्षेत्र में कार्य करने वाले स्वयंसेवकों की कार्य सीमा कितनी है, इसका भी लोगों को बोध कराना अत्यन्त आवश्यक है।

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UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 21 परिवार कल्याण एवं परिवार नियोजन

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Board UP Board
Class Class 12
Subject Home Science
Chapter Chapter 21
Chapter Name परिवार कल्याण एवं परिवार नियोजन
Number of Questions Solved 19
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 21 परिवार कल्याण एवं परिवार नियोजन

बहुविकल्पीय प्रश्न ( 1 अंक)

प्रश्न 1.
जनसंख्या विस्फोट के क्या कारण हैं? (2008, 12, 13)
(a) अशिक्षा
(b) खराब स्वास्थ्य/गरीबी
(c) विकास के साधनों की कमी
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) अशिक्षा

प्रश्न 2.
जनसंख्या विस्फोट के क्या परिणाम है? (2008)
(a) अशिक्षा
(b) खराब स्वास्थ्य
(c) विकास के साधनों की कमी
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

प्रश्न 3.
जनसंख्या दिवस मनाया जाता है। (2014)
(a) 9 जुलाई को
(b) 11 जुलाई को
(C) 15 जुलाई को
(d) 20 जुलाई को
उत्तर:
(b) 11 जुलाई को

प्रश्न 4.
परिवार नियोजन द्वारा किस समस्या का समाधान हो सकता है? (2014, 18)
(a) जनसंख्या नियन्त्रण
(b) देश के विकास में वृद्धि
(c) माँ तथा शिशु की मृत्यु में कमी
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

प्रश्न 5.
परिवार नियोजन कार्यक्रम सफल क्यों नहीं हो पाते हैं? (2013)
(a) यौन शिक्षा की कमी
(b) निर्धनता के कारण
(c) अज्ञानता
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक, 25 शब्द)

प्रश्न 1.
परिवार कल्याण की अवधारणा से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
परिवार कल्याण से आशय उस दृष्टिकोण से है, जिसके अन्तर्गत परिवार से सम्बन्धित सभी पक्षों को अधिक उत्तम बनाने का प्रयास किया जाता है। इसके अन्तर्गत परिवार की बहुपक्षीय उन्नति एवं प्रगति के लिए हरसम्भव उपाय एवं प्रयास किए जाते हैं।

प्रश्न 2.
वर्ष 2011 की जनगणना के समय भारत की जनसंख्या क्या थी?
उत्तर:
वर्ष 2011 की जनगणना के समय भारत की जनसंख्या 121.02 करोड़ थी, जो निरन्तर बढ़ रही है।

प्रश्न 3.
भारतीय समाज में जनसंख्या वृद्धि के प्रमुख कारण क्या हैं?
उत्तर:
कम आयु में विवाह, संयुक्त परिवार प्रणाली, पुत्र सन्तान की अनिवार्यता, अज्ञानता, गर्म जलवायु, गर्भ निरोधक उपायों की सीमित जानकारी आदि कारक भारतीय समाज में जनसंख्या वृद्धि के लिए उत्तरदायी हैं।

प्रश्न 4.
परिवार नियोजन से क्या आशय है?
उत्तर:
पूर्व निर्धारित कार्यक्रमानुसार नियोजित रूप से परिवार के आकार को सीमित रखना ही परिवार नियोजन है।

प्रश्न 5.
भारत के सन्दर्भ में परिवार को सीमित रखने की आवश्यकता का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर:
भारत में जनसंख्या वृद्धि की दर को नियन्त्रित करने के लिए परिवार को सीमित रखना आवश्यक है।

प्रश्न 6.
परिवार को सीमित रखने से बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
परिवार को सीमित रखने से बच्चों का पालन-पोषण एवं बहुपक्षीय विकास उत्तम हो सकता है।

प्रश्न 7.
परिवार नियोजन कार्यक्रम की सफलता हेतु कोई दो प्रभावी उपाय लिखिए।
उत्तर:
परिवार नियोजन कार्यक्रम की सफलता हेतु कोई दो प्रभावी उपाय निम्नलिखित हैं।

  1. परिवार नियोजन सुविधाओं का विस्तार एवं सम्बन्धित भ्रान्तियों का निराकरण आवश्यक है।
  2. परिवार नियोजन करने वाले दम्पत्तियों को प्रोत्साहनस्वरूप कुछ विशेष सुविधाएँ मिलनी चाहिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक, 50३ब्द)

प्रश्न 1.
“जनसंख्या वृद्धि रोजगार के अवसरों के बीच असन्तुलन का कारण है।” समझाइए। (2011)
उत्तर:
रोजगार एक व्यक्ति एवं परिवार के सामान्य जीवन-निर्वाह के लिए प्राथमिक आवश्यकता है। अत: रोजगार के अवसरों तक पहुँच किसी भी देश के नागरिकों का मौलिक अधिकार है। नागरिकों के इसी अधिकार को सुनिश्चित करने हेतु सरकार द्वारा नियमित रूप से, विभिन्न उपलब्ध संसाधनों एवं देश की औद्योगिक व्यावसायिक प्रगति को ध्यान में रखकर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाते हैं।

वस्तुत: हमारे देश में औद्योगिक एवं व्यावसायिक प्रगति पर्याप्त सन्तोषजनक है, परन्तु देश की जनसंख्या वृद्धि दर अधिक होने के कारण, उपलब्ध रोजगार के अवसर कम प्रतीत हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जनसंख्या आधिक्य की स्थिति में सभी व्यक्तियों को शिक्षा के समान स्तरीय अवसर उपलब्ध नहीं हो पाते हैं।

अत: रोजगार के इच्छुक व्यक्ति कुशल प्रशिक्षण के अभाव में, रोजगार के अवसरों की माँग को पूरा करने में असमर्थ होते हैं। इस प्रकार रोजगार के उपलब्ध अवसरों तथा रोजगार के इच्छुक व्यक्तियों के बीच उत्पन्न असन्तुलन की स्थिति बेरोजगारी की समस्या को जन्म देती है।

प्रश्न 2.
जनसंख्या विस्फोट के नियन्त्रण के उपाय बताइए।
उत्तर:
जनसंख्या वृद्धि या जनसंख्या विस्फोट पर नियन्त्रण
जनसंख्या वृद्धि एक गम्भीर राष्ट्रीय समस्या है। समाज तथा राष्ट्र की प्रगति एवं समृद्धि के लिए इस समस्या का समाधान अति आवश्यक है। इसके निवारण हेतु जन्म-दर को घटाना अनिवार्य हो गया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु विभिन्न प्रयास करने आवश्यक हैं। कुछ महत्त्वपूर्ण प्रयासों का विवरण निम्नलिखित है।

  1. जनसंख्या नियन्त्रण हेतु सर्वप्रथम शिक्षा का प्रसार आवश्यक है। विद्यालय शिक्षा के अन्तर्गत जनसंख्या शिक्षा को सम्मिलित करके भावी पीढ़ी को छोटे परिवार की महत्ता समझायी जा सकती है। शिक्षित व्यक्ति अन्धविश्वासों एवं मिथ्या धारणाओं से मुक्त होते हैं तथा वे नियोजित परिवार के महत्त्व को समझते हैं।
  2. इसके अतिरिक्त बाल-विवाह तथा कम आयु में होने वाले विवाहों को रोकना चाहिए। यह उपाय प्रजनन दर को कम करने में सहायक हो सकता है।
  3. छोटे परिवार के महत्त्व एवं लाभों के प्रति जन-जागरूकता का प्रसार करना चाहिए तथा देश के सभी नागरिकों को स्वेच्छा से परिवार नियोजन के साधनों को अपनाने के लिए प्रेरित करना चाहिए। इस दिशा में छोटे परिवार वाले व्यक्तियों को विभिन्न प्रोत्साहन दिए जा सकते हैं, जैसे कि वेतन में वृद्धि, बच्चे के शिक्षा-शुल्क में छूट आदि। उल्लेखनीय है कि जनसंख्या नियन्त्रण के प्रति जागरूकता विकसित करने के लिए प्रतिवर्ष 11 जुलाई को ‘विश्व  जनसंख्या दिवस’ मनाया जाता है।

प्रश्न 3.
परिवार नियोजन की आवश्यकता को समझाइए।
उत्तर:
परिवार नियोजन की आवश्यकता
भारत एक विकासशील देश है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त, विशेषकर वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद से, हमारे देश में तीव्र वैज्ञानिक एवं आर्थिक प्रगति हुई है, परन्तु उत्पादन वृद्धि दर में हुई इस उल्लेखनीय प्रगति का समुचित लाभ देश की जनता को प्राप्त नहीं हो पा रहा है। परिणामस्वरूप आज भी हमारे देश में निर्धनता एवं निम्न जीवन-स्तर की समस्या विकराल रूप धारण किए हुए है। इस विरोधाभासी स्थिति का एक प्रमुख कारण जनसंख्या वृद्धि दर का अत्यधिक होना है। अत: देश के विकास एवं जनता के कल्याण हेतु आवश्यक है कि देश की जनसंख्या को बढ़ने से रोका जाए।

दूसरे शब्दों में, जन्म-दर को घटाने का प्रयास किया जाए, यही परिवार नियोजन का मुख्य उद्देश्य है, इसके साथ-साथ परिवार कल्याण अर्थात् समग्र पारिवारिक जीवन को उत्तम बनाने के लिए भी परिवार नियोजन अर्थात् परिवार को सीमित रखना आवश्यक है।

प्रश्न 4.
परिवार नियोजन कार्यक्रम की सफलता में प्रमुख बाधाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
परिवार नियोजन कार्यक्रम की सफलता में प्रमुख बाधाएँ निम्नलिखित हैं।
1. अशिक्षा एवं जनसहयोग का अभाव – अशिक्षा एवं अज्ञानता के कारण परिवार नियोजन कार्यक्रमों को अपेक्षित जन सहयोग नहीं मिल पाता है। वस्तुतः अशिक्षित या अल्प-शिक्षित लोग रूढ़ियों एवं पूर्व-धारणाओं के प्रभाव के कारण सन्तानोत्पत्ति को ईश्वर की देन के रूप में स्वीकार करते हैं। वे लोग परिवार नियोजन के लाभों को पहचानने एवं उत्तम भविष्य की कल्पना करने का दृष्टिकोण विकसित नहीं कर पाते हैं।

2. यौन-शिक्षा का अभाव- यौन शिक्षा के अभाव के कारण भी । परिवार नियोजन कार्यक्रम के प्रति अपेक्षित जागरूकता उत्पन्न नहीं हो पाई है।

3. निर्धनता-
 निर्धनता की स्थिति में, कुछ लोग परिवार नियोजन के साधनों को प्राप्त करने में असफल रहते हैं। यद्यपि सरकार द्वारा निरोध आदि के नि:शुल्क वितरण की व्यवस्था की गई है, किन्तु नसबन्दी करवाने जैसी सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं है।

4. शत-प्रतिशत अचूक उपायों को उपलब्ध न होना- भारत की वृहद जनसंख्या की तुलना में, परिवार नियोजन के शत-प्रतिशत अचूक उपाय पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं। यह स्थिति परिवार नियोजन कार्यक्रम की पूर्ण सफलता में बाधक है।

5. ग्रामीण क्षेत्रों में परिवार नियोजन सुविधाओं एवं प्रचार का अभाव- भारत के ग्रामीण एवं दूर-दूराज के क्षेत्रों में परिवार नियोजन के व्यवस्थित केन्द्रों की पूर्ण उपलब्धता सुनिश्चित नहीं है। इस स्थिति में ग्रामीण क्षेत्रों में परिवार नियोजन कार्यक्रम की लोकप्रियता सीमित ही है।

प्रश्न 5.
परिवार नियोजन कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए कोई दो सूझाव दीजिए। (2018)
अथवा
परिवार नियोजन कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए सुझाव दीजिए। (2014)
उत्तर:
परिवार नियोजन कार्यक्रम की सफलता हेतु सुझाव
भारत जैसे विकासशील देशों में परिवार नियोजन कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए निम्नलिखित उपाय एवं प्रयास किए जा सकते हैं।

1. जन-जागरूकता- परिवार नियोजन के महत्त्व एवं आवश्यकता का अधिक-से-अधिक प्रचार किया जाना चाहिए, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी अत्यधिक आवश्यकता है। इसके लिए जनसंचार के यथासम्भव सभी माध्यमों; जैसे- रेडियो, दूरदर्शन, समाचार-पत्र, पोस्टर्स, नुक्कड़ नाटक, कठपुतली का खेल आदि का अधिक-से-अधिक प्रयोग किया जाना चाहिए।

2. समाज के प्रतिष्ठित व्यक्तियों से सहयोग- परिवार नियोजन कार्यक्रम को सफल बनाने की दिशा में, देश के धार्मिक नेताओं, जन-प्रतिनिधियों, समाज-सुधारकों, बुद्धिजीवियों, अभिनेताओं आदि को जन-साधारण के समक्ष स्वयं अपना आदर्श स्थापित करना चाहिए।

3. परिवार नियोजन सुविधाओं का विस्तार तथा सम्बन्धित भ्रान्तियों का- निराकरण परिवार नियोजन सुविधाओं का अधिक-से-अधिक विस्तार तथा सर्वसुलभता सुनिश्चित होनी चाहिए। सभी क्षेत्रों में जन्म नियन्त्रण के सस्ते एवं सुविधाजनक उपकरणों एवं औषधियों को सर्वसुलभ कराया जाना चाहिए। इसके साथ ही नसबन्दी ऑपरेशनों के विषय में जनता में व्याप्त भ्रान्तियों एवं अकारण भय का निराकरण किया जाना चाहिए।

4. योग्य चिकित्सकों की व्यवस्था- परिवार नियोजन कार्यक्रमों में योग्य चिकित्सकों एवं शल्य चिकित्सकों की व्यवस्था की जानी चाहिए। इससे लोगों में विश्वास उत्पन्न होगा तथा वे नियोजन सम्बन्धी उपाय अपनाने में जोखिम का अनुभव नहीं करेंगे। नसबन्दी ऑपरेशनों में दूरबीन विधि को अधिक अपनाया जाना चाहिए।

5. शिक्षा का विस्तार- अन्धविश्वासों के निराकरण एवं परिवार नियोजन के महत्त्व की जानकारी प्रदान करने हेतु शिक्षा के अधिकाधिक प्रसार के साथ-साथ यौन शिक्षा की भी समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (5 अंक, 100 शब्द)

प्रश्न 1.
जनसंख्या विस्फोट एक राष्ट्रीय समस्या है, इसके क्या परिणाम हैं? (2006)
अथवा
जनसंख्या वृद्धि की हानियाँ लिखिए। (2007)
अथवा
जनसंख्या विस्फोट के परिणाम लिखिए। (2013)
उत्तर:
जनसंख्या विस्फोट-एक राष्ट्रीय समस्या
जनसंख्या विस्फोट से अभिप्राय है-जनसंख्या वृद्धि की दर का अत्यधिक होना। हमारे देश में जनसंख्या वृद्धि दर निरन्तर कम होने के बावजूद (1991 के पश्चात् से) अभी भी जनसंख्या विस्फोट की श्रेणी में है तथा यह एक गम्भीर राष्ट्रीय समस्या है। जनसंख्या वृद्धि की इस उच्च दर ने देश के पूर्ण सम्भावित विकास के प्रयासों को प्रायः विफल कर दिया है।

जनसंख्या समस्या के कारण सीमित संसाधनों में आवास, पोषण, शिक्षा, चिकित्सा, सुरक्षा तथा रोजगार के क्षेत्र में बढ़ती हुई आवश्यकताओं की पूर्ति कर पाना असम्भव हो रहा है। अतः जनसंख्या विस्फोट को राष्ट्रीय समस्या स्वीकार करते हुए, इसके समाधान के ठोस उपाय किए जाना अपरिहार्य हो गया है।

जनसंख्या विस्फोट के परिणाम
जनसंख्या वृद्धि के परिणामों अथवा हानियों का विवरण निम्नलिखित है।

  • निर्धनता में वृद्धि
  • भुखमरी
  • जीवन-स्तर को निम्न होना
  • स्वास्थ्य स्तर का निम्न होना
  • कृषि योग्य भूमि को बँट जाना
  • वैयक्तिक विघटन
  • पारिवारिक विघटन
  • सामाजिक विघटन

1. निर्धनता में वृद्धि निर्धनता व्यापक अर्थ में विकास के अवसरों का अभाव जनसंख्या विस्फोट है। उल्लेखनीय है कि भारत जैसे के परिणाम विकासशील देश में, जहाँ संसाधन सीमित होते हैं, जनसंख्या आधिक्य निर्धनता में वृद्धि का कारण बनता है।

2. भुखमरी- निर्धनता के साथ-साथ भुखमरी की समस्या भी उठ खड़ी होती है। खाद्यान्न उत्पादन के सीमित होने की स्थिति में यदि जनसंख्या तेजी से बढ़ती है, तो निश्चित रूप से लोगों को आवश्यकता से कम मात्रा में खाद्य-सामग्री उपलब्ध होती है। यह दशा प्राय: भुखमरी एवं अभाव की समस्या का रूप ले सकती है।

3. जीवन-स्तर का निम्न होना- तीव्र जनसंख्या वृद्धि के कारण सम्बन्धित समाज के लोगों का जीवन-स्तर सामान्यत: निम्न होता जाता है। जन-सामान्य को आवास, पोषण, शिक्षा, चिकित्सा एवं परिवहन सम्बन्धी सुविधाओं की कमी का सामना करना पड़ता है।

4. स्वास्थ्य स्तर का निम्न होना- जनसंख्या वृद्धि की स्थिति में, रहन-सहन के निम्न स्तर का प्रभाव जन-सामान्य के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। पौष्टिक एवं सन्तुलित आहार की अनुपलब्धता एवं स्वास्थ्यवर्द्धक आवास सुविधाओं का अभाव स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ उत्पन्न करता है। स्वास्थ्य स्तर निम्न होने पर विभिन्न संक्रामक एवं अभावजनित रोग विकराल रूप धारण कर लेते हैं।

5. कृषि योग्य भूमि का बँट जाना- कृषि योग्य भूमि एक सीमित संसाधन है। जनसंख्या में वृद्धि होने पर, इस भूमि का बँटवारा होता जाता है तथा भूमि छोटे-छोटे टुकड़ों में बँटकर अनार्थिक जोतों का रूप ले लेती है और भारत | जैसे कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था वाले देश को अनाज की कमी की गम्भीर
समस्या का सामना करना पड़ता है।

6. वैयक्तिक विघटन- जनसंख्या विस्फोट की स्थिति समाज में अनेक अभावों को जन्म देती है। निर्धनता तथा बेरोजगारी की परिस्थितियों में वैयक्तिक विघटन की दर भी बढ़ने लगती है। अनेक व्यक्ति अपराधों, मद्यपान तथा | आत्महत्या जैसी प्रवृत्तियों के शिकार होने लगते हैं।

7. पारिवारिक विघटन- वैयक्तिक विघटन का प्रभाव, पारिवारिक संगठन पर पड़ना स्वाभाविक है। अभाव की परिस्थितियों में पारिवारिक कलह तथा
तनाव में भी वृद्धि होने लगती है।

8. सामाजिक विघटन- व्यक्ति समाज की मूल इकाई है। अत: वैयक्तिक एवं पारिवारिक विघटन की स्थिति में समाज को प्रभावित होना स्वाभाविक है। इस स्थिति में सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था विघटित होने लगती है तथा भ्रष्टाचार जैसी समस्याएँ सामाजिक संस्थाओं पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं।

प्रश्न 2.
परिवार नियोजन से क्या आशय है? परिवार नियोजन की मुख्य विधियों का उल्लेख कीजिए। (2003)
अथवा
टिप्पणी लिखिए-परिवार नियोजन। (2006)
अथवा
“समाज के लिए परिवार कल्याण एवं परिवार नियोजन सुझाव ही नहीं, चेतावनी है।” क्यों? इस ज्वलन्त समस्या का निराकरण आप कैसे करेंगी? (2007, 10)
उत्तर:
परिवार नियोजन से आशय
नियोजन का अभिप्राय एक ऐसी व्यवस्था से होता है, जिसमें कुछ निश्चित लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं और इन लक्ष्यों को एक निश्चित अवधि में पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार प्राप्त किया जाता है। परिवार के सन्दर्भ में नियोजन का प्रमुख रूप परिवार नियोजन है। मूल रूप से परिवार नियोजन का आशय परिवार के आकार को सीमित रखने से है, यद्यपि आधुनिक परिस्थितियों में इसे विस्तृत अवधारणा के रूप में स्वीकार किया जा रहा है, जिसका अन्तिम लक्ष्य सम्पूर्ण परिवार का कल्याण है।

इस रूप में परिवार नियोजन का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है, इसमें परिवार को सीमित रखने के साथ-साथ सन्तानहीन को मातृत्व का लाभ दिलाना एवं माता व शिशु दोनों की देखभाल सुनिश्चित करना आदि सम्मिलित हैं। उपरोक्त विवरण को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि, “हमारे समाज के लिए परिवार कल्याण एवं परिवार नियोजन सुझाव ही नहीं, चेतावनी है।”

परिवार नियोजन की विधियाँ
आधुनिक समय में पुरुषों-स्त्रियों के लिए परिवार नियोजन के विभिन्न भौतिक साधन प्रचलित हैं। परिवार नियोजन के मुख्य साधनों का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है

परिवार नियोजन की विधियाँ
( पुरुषों के लिए)

  • कण्डोम
  • नसबन्दी है।

1.कण्डोम (निरोध) यह रबड़ की थैली के समान होता है, जिसे पुरुष सहवास से पूर्व अपने लिंग पर धारण कर सकता है। यह गर्भधारण से बचाव का कारगर उपाय है। कण्डोम के प्रयोग से यौन संक्रमण से होने वाले रोगों से भी बचा जा सकता है।

2. नसबन्दी- यह एक छोटा-सा ऑपरेशन होता है, इस ऑपरेशन में डॉक्टर कुछ नसों को काटकर बाँध देता है। इससे शुक्राणु वीर्य में नहीं आ पाते और स्त्री के गर्भ ठहरने की आशंका नहीं रहती है। इस उपाय द्वारा अवांछित गर्भ से सदा के लिए मुक्ति मिल जाती है। अतः नसबन्दी तभी करानी चाहिए, जब पति-पत्नी अन्तिम रूप से और सन्तान न करने का निर्णय ले लें।

( स्त्रियों के लिए)

  • लूप
  • नसबन्दी
  • डायाफ्राम
  • झागदार गोलियाँ
  • ओरल पिल्स

1. लूप यह प्लास्टिक का बना हुआ एक छोटा-सा छल्ला होता है, जिसे डॉक्टर द्वारा स्त्री की बच्चेदानी में एक सरल विधि से रख दिया जाता इस पूरी प्रक्रिया में स्त्री को किसी प्रकार की पीड़ा नहीं होती। जब तक बच्चेदानी में रहता है, तब तक स्त्री को गर्भ ठहरने की आशंका नहीं। जेली और क्रीम रहती। इस उपाय से पति-पत्नी के संसर्ग में भी किसी प्रकार की बाधा नहीं आती है। इस प्रकार यह गर्भ निरोध की सरल एवं विश्वसनीय विधि है।

2. नसबन्दी- यह ऑपरेशन स्त्रियों के लिए भी होती है, इसे कभी भी कराया जा सकता है। इस ऑपरेशन के बाद भी स्त्री को मासिक धर्म पूर्व की भाँति नियमित रूप से होता है। इससे पति-पत्नी के सहवास में भी कोई अन्तर नहीं अतिा है। वर्तमान में दूरबीन विधि द्वारा भी स्त्रियों की नसबन्दी सम्भव है, इसके तुरन्त बाद स्त्री को घर भेज दिया जाता है तथा इससे कोई परेशानी नहीं होती।

3. डायाफ्राम- यह मुलायम रबड़ की टोपी के समान होता है, जो गर्भाशय के | मुँह को ढक देता है, जिससे गर्भ ठहरने की सम्भावना नहीं रहती।

4. जेली और क्रीम- ये वस्तुएँ एक ट्यूब में आती हैं। इसके साथ लगाने की पिचकारी भी आती है, जिससे जेली या क्रीम को बच्चेदानी के मुँह तक पहुँचा दिया जाता है। ये ऐसी औषधियों से युक्त होती हैं, जो शुक्राणुओं को गर्भाशय में जाने से रोकने का कार्य करती हैं।

5. झागदार गोलियाँ इन गोलियों में विद्यमान दवाई शुक्राणुओं को नष्ट करने में सक्षम होती है। सहवास के पूर्व स्त्री द्वारा ये गोलियाँ पानी में गीली करके योनि में रख ली जाती हैं। इन गोलियों से उत्पन्न होने वाला झाग शुक्राणुओं को निष्क्रिय कर देता है। इन गोलियों का प्रयोग यद्यपि सरल होता है, किन्तु ये गोलियाँ डायाफ्राम या जेली की भाँति पूर्णरूपेण सफल नहीं होती हैं।

6. ओरल पिल्स गर्भनिरोधक गोलियाँ मुख से ग्रहण की जाती हैं; जैसे–माला डी आदि। ये गोलियाँ प्रतिदिन या निश्चित समय पर लेने से गर्भ ठहरने का भय नहीं रहता, यद्यपि इनके प्रयोग से पूर्व चिकित्सक की सलाह अवश्य ले लेनी चाहिए। परिवार नियोजन के उपरोक्त उपायों में से किसी का भी प्रयोग करके परिवार को आदर्श परिवार बनाया जा सकता है।

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UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 5 जननतन्त्रः प्रारम्भिक क्रिया विज्ञान एवं अन्तः स्त्रायी ग्रन्थयाँ

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 5 जननतन्त्रः प्रारम्भिक क्रिया विज्ञान एवं अन्तः स्त्रायी ग्रन्थयाँ are part of UP Board Solutions for Class 12 Home Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 5 जननतन्त्रः प्रारम्भिक क्रिया विज्ञान एवं अन्तः स्त्रायी ग्रन्थयाँ.

Board UP Board
Class Class 12
Subject Home Science
Chapter Chapter 5
Chapter Name जननतन्त्रः प्रारम्भिक क्रिया विज्ञान एवं अन्तः स्त्रायी ग्रन्थयाँ
Number of Questions Solved 30
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 5 जननतन्त्रः प्रारम्भिक क्रिया विज्ञान एवं अन्तः स्त्रायी ग्रन्थयाँ

बहुविकल्पीय प्रश्न  (1 अंक)

प्रश्न 1.
बाह्य मादा जननांगों को सम्मिलित रूप से कहते हैं
(a) जघन उत्थान
(b) भग
(c) भगशेफ
(d) प्रकोष्ठ
उत्तर:
(b) भग

प्रश्न 2.
नर जनन अंगों से सम्बन्धित ग्रन्थि है
(a) प्रोस्टेट ग्रन्थि
(b) स्वेद ग्रन्थि
(c) एड्रीनल ग्रन्थि
(d) एपिडिडाइमिस
उत्तर:
(a) प्रोस्टेट ग्रन्थि

प्रश्न 3.
नर में शुक्राणुजनन किन नलिकाओं में होता है?
(a) अपवाही नलिका में
(b) शुक्रवाहिनी में
(c) शुक्रनलिका में
(d) स्खलन नलिका में
उत्तर:
(c) शुक्रनलिकाओं

प्रश्न 4.
वृषण की अन्तराली (लीडिंग) कोशिकाओं से स्रावित हॉर्मोन है
(a) टेस्टोस्टेरॉन
(b) एस्ट्रोजन
(c) FSH
(d) प्रोजेस्टेरॉन
उत्तर:
(a) टेस्टोस्टेरॉन

प्रश्न 5.
निम्न में से कौन मानव में मादी जनन तन्त्र का भाग नहीं हैं?
(a) अण्डाशय
(b) गर्भाशय
(c) शुक्रवाहिनी
(d) योनि
उत्तर:
(c) शुक्रवाहिनी

प्रश्न 6.
ग्राफियन पुटिका पाई जाती है
(a) स्तनधारियों के अण्डाशय में
(b) लसीका गाँठों में
(c) स्तनधारियों की प्लीहा में
(d) मेंढक के अण्डाशय में
उत्तर:
(a) स्तनधारियों के अण्डाशय में

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक, 25 शब्द)

प्रश्न 1.
लैंगिक जनन की इकाइयाँ क्या कहलाती हैं? केवल उनके नाम लिखिए।
उत्तर:
नर तथा मादा युग्मकों का संग्युमन लैंगिक जनन कहलाता है। दो युग्मों के संयुग्मन (fusion) से युग्मनज (Zygote) बनता है। समान युग्मकों को संयुग्मन (Isogzmy) कहते हैं।

प्रश्न 2.
अनिषेकजनन की परिभाषा उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर:
अनिषेकजनन (Parthenogenesis) निषेचन के बिना अण्डाणु से वृद्धि और विभाजन द्वारा वयस्क का निर्माण होना अनिषेकजनन कहलाता है। नर मधुमक्खी और ततैया में अनिषेकजनन होता है।

प्रश्न 3.
वृषण जालिका क्या है?
उत्तर:
वृषण जालिका (Rete testes) शुक्रजनन नलिकाएँ वृषण की भीतरी सतह पर नलिकाओं के एक घने जाल में खुलती हैं, इसे वृषण जालिका कहते हैं। इससे 5-20 शुक्र वाहिकाएँ निकलकर एपिडिडाइमिस वाहिका (Epididymis duct) में खुलती है। एपिडिडाइमिस या अधिवृषण के अन्तिम भाग से शुक्रवाहिनी निकलती है।

प्रश्न 4.
शुक्राणुजनन का क्या अर्थ है?
उत्तर:
वह प्रक्रिया, जिसके द्वारा वृषणों में शुक्राणुओं का निर्माण होता है, शुक्राणुजनन कहलाती हैं। वृषणों की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई शुक्रजंने नलिकाएँ होती हैं। यहीं पर शुक्राणु जनन होता हैं।

प्रश्न 5.
सर्टोली कोशिकाओं पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
वृषण की शुक्रजनन नलिकाओं (Seminiferous tubules) की जननिक एपीथीलियम में जनन कोशिकाओं के मध्य में स्थान-स्थान पर फूली हुई लम्बी सटली कोशिकाएँ पाई जाती हैं। ये शुक्राणुओं को पोषण प्रदान करती हैं।

प्रश्न 6.
शुक्राणु में एक्रोसोम का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
शुक्राणु में एक्रोसोम से हायल्यूरोनिडेज एन्जाइम का स्रावण होता है, जो अण्डाणु की चाहा भित्ति के पाचन में सहायक हैं, जिसके कारण शुक्राणु अण्डाणु में सुगमता से प्रवेश कर पाता है।

प्रश्न 7.
मानव, स्त्री के एक अण्डाणु में कितने और किस प्रकार के गुणसूत्रं पाए जाते हैं?
उत्तर:
मानव, स्त्री के एक अण्डाणु में 28 गुणसूत्र उपस्थित होते हैं, जिसमें 22 कायिक गुणसूत्र और एक लिंग गुणसूत्र (Sex chromosome) ‘X’ होता है।

प्रश्न 8.
युग्मनज़ क्या है? इसमें गुणसूत्रों की संख्या कितनी होती है?
उत्तर:
शुक्राणु (n) और अण्डाणु (n) के संयोजन से युग्मनज का निर्माण होता  है। इसमें गुणसूत्रों की संख्या द्विगुणित (2n) होती है।

प्रश्न 9.
स्तनधारियों में निषेचन कहाँ होता है?
उत्तर:
नर शुक्राणु (n) व मादा अण्डाणु (n) युग्मकों के संयोजन को निषेचन कहते हैं। स्तनधारियों में निषेचन फैलोपियन नलिका में होता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक, 50 शब्द)

प्रश्न 1.
लैंगिक जनन से आप क्या समझते हैं? मानव शरीर में नर तथा मादा युग्मक कहाँ बनते हैं? पूर्णशक्त युग्मनज क्या है?
उत्तर:
लैंगिक जनन (Sexual reproduction) नर तथा मादा युग्मकों अर्थात् शुक्राणु और अण्डाणु का संयुग्मन लैंगिक जनन कहलाता है, जिसके फलस्वरूप युग्मनज़ बनता है। नर युग्मक का निर्माण वृषण (Testis) की शुक्रजनन नलिकाओं में होता है। मादा युग्मक (अण्डाणु) का निर्माण अण्डाशय की ग्राफिया पुटिका में होता है। एक युग्मनज, जिसमें वृद्धि एवं विभाजन द्वारा भूण
का निर्माण होता है, पूर्णशक्त युग्मनज कहलाता है।

प्रश्न 2.
नर मनुष्य में वृषण उदर गुहा के बाहर क्यों होते हैं?
उत्तर:
नर मनुष्य में वृषण शरीर से बाहर वृषण कोष (Scrotum) में उपस्थित होते हैं। वृषण कोष का तापमान शरीर के तापमान से 3°C कम होता है, जिस पर शुक्राणुओं का निर्माण होता है। शरीर का तापमान अधिक होने के कारण शरीर के अन्दर शुक्राणुओं का निर्माण सम्भव नहीं हैं। अतः जन्म के समय वृषण अपने मूल स्थान से हटकर वृषण कोष में आ जाते हैं।

प्रश्न 3.
शुक्रजनन नलिका की अनुप्रस्थ काट का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर:
शुक्रजनन नलिका (वृषण) की अनुप्रस्थ काट

Arihant Home Science Class 12 Chapter 5 1
प्रश्न 4.
शुक्राणुजनन क्या है? शुक्राणुजनन की विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शुक्राणुजनन (Spermatogenesis) वह प्रक्रिया, जिसके द्वारा वृषणों में शुक्राणुओं का निर्माण होता है, शुक्राणुजनन कहलाती है। यह प्रक्रिया लैंगिक हॉर्मोन्स द्वारा नियमित होती है। शुक्राणुजनन की प्रक्रिया निम्नलिखित तीन चरणों में पूर्ण होती है।
1. गुणन प्रावस्था (Multiplication Phase) शुक्रजनन नलिकाओं की जनन उपकला की कोशिकाओं में समसूत्री विभाजन द्वारा शुक्राणुजन कोशिकाओं या स्पर्मेटोगोनिया का निर्माण होता है। ये कोशिकाएँ द्विगुणित (27) होती हैं।

2. वृद्धि प्रावस्था (Growth Phase) शुक्राणुजन कोशिकाएँ पोषक पदार्थों का संचय करके प्राथमिक शुक्रकोशिका (Prirmiry spermatocytes) में रूपान्तरित हो जाती हैं।

3. परिपक्वन प्रावस्था (Maturation Phas) प्राथमिक शुक्रकोशिकाओं स्पमेंटोसाइट्स में अर्द्धसूत्री प्रथम विभाजन द्वारा अगुणित या द्वितीयक शुक्राणु कोशिकाओं का निर्माण होता है। यह अर्द्धसूत्री द्वितीय विभाजन द्वारा प्राक्शुक्राणु कोशिका या स्पर्मेटिड बनाती हैं।
अतः एक प्राथमिक शुक्राणु कोशिकाओं से चार प्राक्शुक्राणु कोशिकाओं का निर्माण होता है। शुक्र-कायान्तरण (Sperritiogenesis) द्वारा अचल प्राक्शुक्राणु परिपक्व से चल शुक्राणु बनता है।

प्रश्न 5.
मानव के शुक्राणु की संरचना का वर्णन कीजिए।
अथवा
मानव शुक्राणु का स्वच्छ नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर:
शुक्राणु की संरचना प्रत्येक शुक्राणु तीन भागों में विभेदित होता है।
1. शीर्ष (Head) शीर्ष प्रायः फूला हुआ, घुण्डीदार होता है, परन्तु अनेक जन्तु
जातियों में यह लम्बा, दण्डनुमा होता है। इसमें केन्द्रक स्थित होता हैं और केन्द्रक के चारों ओर थोड़ा-सा कोशिकाद्रव्य होता हैं। इसके शीर्ष पर गॉल्जीकाय की बनी एक्रोसोम नामक रचना टोपी की भांति की होती है।

2. मध्य खण्ड (Middle piece) यह केन्द्र शीर्ष से पतला, दण्डनुमा भाग होता
है, जो छोटी-सी ग्रीवा (Neck) द्वारा शीर्ष से जुड़ा रहता है। मध्य खण्ड में माइटोकॉण्डुिया उपस्थित होते हैं। माइटोकॉण्डूिया के आगे ग्रीवा में एवं पीछे दो तारक केन्द्र (Centrioles) उपस्थित होते हैं।

Arihant Home Science Class 12 Chapter 5 5

3. पुच्छ (Tail) पुच्छ प्रायः लम्बी, जाबुकनुमा और अत्यधिक गतिशील होती हैं।
पुच्छ द्वारा शुक्राणु तरल माध्यम में तैरता है।

प्रश्न 6.
मानव के स्त्रीजनन तन्त्र का नामांकित आरेखीय चित्र बनाइए।
उत्तर:

Arihant Home Science Class 12 Chapter 5 6

प्रश्न 7.
अण्डाशय की अनुप्रस्थ काट (TS) का एक नामांकित आरेख बनाइए।
उत्तर:

Arihant Home Science Class 12 Chapter 5 7

प्रश्न 8.
मानव अण्डाणु का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर:

Arihant Home Science Class 12 Chapter 5 8

प्रश्न 9.
यौवनारम्भ क्या है? इस अवस्था में बालक एवं बालिकाओं के शरीर में होने वाले परिवर्तनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
पुरुष में यौवनारम्भ का प्रारम्भ
यौवनारम्भ (Puberty) प्राणी के प्रजनन के योग्य हो जाने को यौवनारम्भ कहते हैं। पुरुष (बालक) में यौवनारम्भ 13-16 वर्ष की आयु में होता है।
वृषण द्वारा स्रावित टेस्टोस्टेरॉन (Testosterone) और एण्ड्रोस्टेरॉन (Androsterone) लिंग हॉर्मोन्स से यौवनारम्भ प्रेरित होता है, जिसके फलस्वरूप बालकों में निम्नलिखित लक्षण विकसित होने लगते हैं।

  1.  पुरुष की आवाज भारी होने लगती है और शरीर की लम्बाई में वृद्धि होती है।
  2. अस्थियाँ और मांसपेशियाँ अधिक सुदृढ़ हो जाती हैं, कन्धे भी चौड़े हो जाते हैं।
  3. दाढ़ी, पूँछ निकल आती हैं।
  4. मैथुन अंग शिश्न और वृषण कोष सुविकसित हो जाते हैं।
  5. शुक्रजनन नलिकाओं में शुक्राणुओं का निर्माण आरम्भ हो जाता है।

स्त्री में यौवनारम्भ का प्रारम्भ
बालिकाओं में, यौवनारम्भ लड़कों की अपेक्षा जल्दी प्रारम्भ हो जाता है। इनमें 12-13 वर्ष की आयु में आर्तव चक्र प्रारम्भ हो जाता है। एस्ट्रोजन (Ostrogen) और FSH हॉमन्स यौवनावस्था को प्रेरित करते हैं, जिसके फलस्वरूप बालिकाओं में निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं।

  1. बाह्य जननांगों और स्तनों का विकास होने लगता है।
  2. आर्तव चक्र (Menstrual cycle) और अण्डोत्सर्ग (Ovulation) का प्रारम्भ हो जाता है।
  3. चेहरे, जाँघ और नितम्बों पर वसा का संचय प्रारम्भ हो जाता है।
  4. श्रोणि मेखला (Pelvice girdle) फैलकर चौड़ी हो जाती हैं।
  5. स्वर तीव्र और मधुर होने लगता है।
  6. कक्षीय और जघन बालों का उगना।

प्रश्न 10.
हॉर्मोन्स का क्या महत्त्व है? (2001)
अथवा
हॉर्मोन्स क्या है? शरीर में इसका क्या महत्त्व है? (2018)
अथवा
मानव शरीर में हॉर्मोन्स के विभिन्न कार्यों को लिखिए2006)
उत्तर:
अन्त:स्रावी ग्रन्थियों द्वारा स्रावित रासायनिक यौगिकों को हॉर्मोन्स कहते हैं। ये ग्रन्थियों द्वारा सीधे रुधिर में मुक्त होकर शरीर के अन्य अंगों तक पहुँचते हैं। हॉर्मोन्स सक्रिय उत्प्रेरक के रूप में विभिन्न शारीरिक क्रियाओं का नियन्त्रण एवं समन्वये करते हैं। इनकी सूक्ष्म मात्रा ही विशेष अंगों की कायिकी को वातावरणीय दशाओं की आवश्यकतानुसार अनुकूलित करती है।
अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ, तन्त्रिका तन्त्र के नियन्त्रण में कार्य करती हैं, किन्तु इनका स्वयं तन्त्रिका तन्त्र पर भी नियन्त्रण होता है। इस प्रकार शरीर में विभिन्न तन्त्रों की क्रियाओं का परस्पर समन्वय सुनिश्चित होता हैं।

हॉर्मोन्स का महत्त्व अथवा कार्य
हॉर्मोन्स द्वारा शरीर में विभिन्न महत्त्वपूर्ण कार्य सम्पन्न किए जाते हैं, जो निम्नलिखित हैं।

  1. हॉर्मोन्स शरीर की कोशिकाओं के उपापचय का नियन्त्रण करके शरीर की कार्यात्मक क्षमता को बनाए रखते हैं। ये शरीर की समुचित वृद्धि एवं विकास को सुनिश्चित करते हैं। कुछ हॉमन्स, रक्त में ग्लूकोज, लवण, आयरन आदि की मात्रा को नियन्त्रित करते हैं एवं शरीर के अन्त: वातावरण के सन्तुलन की अवस्था को बनाए रखते हैं।
  2. कुछ हॉर्मोन्स हृदय स्पन्दन दर, श्वास दर आदि को नियमित रखते हैं।
  3. लिग हॉमन्स द्वारा प्रजनन से सम्बन्धित अंगों का विकास तथा उनको सम्पूर्ण क्रियाविधि पर नियन्त्रण का कार्य किया जाता है।
  4. आहारनाल के विभिन्न भागों की श्लेष्मिका से स्रावित हॉमोंन पाचक रसों के स्रावण को प्रेरित करते हैं।
  5. कुछ हॉर्मोन्स; जैसे-एड्रीनेलिन, शरीर को संकटकालीन परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार करते हैं। इस प्रकार हॉर्मोन्स की हमारे शरीर में विशेष भूमिका होती है। यदि इनका स्रावण समुचित रूप से न हो, तो शरीर कई कार्यात्मक रोगों (Functional diseases) से ग्रस्त हो जाता है।

प्रश्न 11.
पीयूष ग्रन्थि पर टिप्पणी लिखिए। (2002)
उत्तर:
पीयूष ग्रन्थि (Pituitary gland) एक नलिकाविहीन (अन्तःस्रावी) ग्रन्थि है। यह अग्र मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस की दीवार के पास, स्फेनॉइड हड्डी के गर्त में पाई जाती है। यह अन्य अन्त:स्रावी ग्रन्थियों के स्रावण को नियन्त्रित करती है। अत: इसे मास्टर ग्रन्थि भी कहा जाता है। ग्रन्थि के दो मुख्य भाग होते हैं- अग्न पिण्ड तथा पश्च पिण्ड। दोनों के मध्य एक संकरा मध्य पिण्ड होता हैं।

Arihant Home Science Class 12 Chapter 5 11

पीयूष ग्रन्थि के विभिन्न भागों से स्रावित हॉर्मोन्स के कार्य
ग्रन्थि के विभिन्न भागों से स्रावित हॉर्मोन्स के कार्य इस प्रकार हैं।

  1. वृद्धि हॉर्मोन्स, शरीर की उचित वृद्धि के लिए आवश्यक है। बाल्यकाल में इसके अल्पस्रावण से बौनेपन (Dwarfism) एवं अतिस्रावण से भीमकायता (Giantism) की समस्या उत्पन्न होती है। वृद्धिकाल के बाद अति स्रावण से शरीर बेडौल, भीमकाय एवं कुरूप हो जाता है। इस अवस्था को एक्रोमीगैली कहते हैं। थायरॉइड प्रेरक हॉमन्स, थायरॉइड ग्रन्थि की क्रियाशीलता को बनाए रखता है।
  2. ACTII (एड्रीनल कॉर्टेक्स ट्रॉपिक हॉर्मोन) हॉर्मोन्स, एड्रीनल ग्रन्थि के कॉर्टेक्स भाग को क्रियाशील बनाता है।
  3. इस ग्रन्थि से स्रावित हॉमन्स पुरुषों में शुक्राणुओं एवं स्त्रियों में अण्डजनन को प्रेरित करता है। ल्यूटिन प्रेरक हॉमन्स, स्त्री एवं पुरुष में लैंगिक हॉर्मोन्स के स्रावण को प्रेरित करता है।
  4. प्रोलैक्टिन या मैमोट्रॉपिक हॉर्मोन, गर्भकाल में स्तनों की वृद्धि तथा दुग्ध स्रावण को प्रेरित करता है।

वैसोप्रेसिन, वृक्क की वाहिनियों एवं कोशिकाओं में जल के अवशोषण को नियन्त्रित करता है एवं मूत्र की मात्रा को कम करता है, इसी कारण इसे मूत्र रोधी कहते हैं। ऑक्सीटोसिन, प्रसव के समय गर्भाशय को फैलने तथा प्रसव के पश्चात् गर्भाशय के सिकुड़ने को प्रेरित करता है। यह दुग्ध स्रावण को प्रेरित करता हैं।

विस्तृत उत्तर प्रश्न (5 अंक 100 शब्द)

प्रश्न 1.
नर जनन तन्त्र या पुरुष के जनन अंगों का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर:
नर जनन अंगों को निम्नलिखित तीन भागों में बाँट सकते हैं।

1. मुख्य जनन अंग इन अंगों में युग्मकों का निर्माण होता हैं।
(i) वृषण (Testis) वृषण एक जोड़ी होते हैं। ये उदर गुहा से बाहर वृषण कोष (Scrotal sac) में स्थित होते हैं। वृषण लगभग 4-5 सेमी लम्बा 2,5 सेमी चौड़ा व 3 सेमी मोटा होता है। वृषण अनेक कुण्डलित नलिकाओं के बने होते हैं, जो शुक्रजनन नलिकाएँ कहलाती हैं। शुक्रजनन नलिकाओं में शुक्राणुओं का निर्माण होता है।
Arihant Home Science Class 12 Chapter 5 5M 1

2. सहायक जनन अंग ये अंग जनन की प्रक्रिया में सहायक अंग होते हैं। इनका वर्णन निम्नलिखित हैं।
(i) अधिवृषण (Epididymis) ये लगभग 6 मीटर लम्बी, पतली तथा अत्यधिक कुण्डलित नलिका होती है, जो वृषण के अग्र पश्च तथा भीतरी भाग को ढकने में सहायक हैं। यह अति कुण्डलित होकर लगभग 4 सेमी लम्बी, चपटी, कोमा के आकार की संरचना बनाती हैं।

एपीडिडाइमिस में शुक्राणु का संग्रहण व परिपक्वन होता है। एपीडिडाइमिस के तीन भाग होते हैं-शीर्ष एपीडिडाइमिस (Caput epididymis), मध्य भाग या एपौडिडाइमिस काय (Corpus epididymis) तथा पुच्छ एपीडिडाइमिस (Cauda epididymis) से एक शुक्रवाहिनी निकलकर वृषण नाल से होती हुई उदरगुहा में प्रवेश करते हुए मूत्रमार्ग के अधर भाग में खुलती हैं।

(ii) शुक्रवाहिनी (Vas deferens) एपोडिडाइमिस से एक शुक्रवाहिनी निकलकर वृषण नाल से होती हुई उदरगुहा में प्रवेश करते हुए मूत्रमार्ग के अधर भाग में खुलती है।

(iii) शुक्राशय (Serminal vesicle) यह एक द्विपालित थैलीनुमा ग्रन्थिल संरचना होती है। इससे चिपचिपा द्रव स्रावित होता है, जो वीर्य का मुख्य भाग बनाता है तथा शुक्राणुओं का पोषण करता हैं।

(iv) शिश्न (Penis) यह मैथुन अंग है। यह वृषण कोषों के मध्य स्थित होता है। शिश्न के मध्य मूत्रमार्ग (Urethra) गुजरता है, जो शिश्न के अग्र छोर पर खुलता है। मूत्रमार्ग द्वारा ही वीर्य के साथ शुक्राणु बाहर निकलते हैं।

3. सहायक जनन ग्रन्थियाँ इन ग्रन्थियों का स्रावण जनन प्रक्रिया में सहायक है। वर्णन निम्नलिखित हैं।
(i) प्रोस्टेट ग्रन्थि (Prostate gland) यह ग्रन्थि मूत्रमार्ग के अधर तल पर स्थित होती है। यह अनेक पिण्डों (Lobules) की बनी होती है। इस ग्रन्थि से हल्का क्षारीय तरल स्रावित होता है। यह मूत्रमार्ग की अम्लीयता को नष्ट करता है, जिससे शुक्राणु सक्रिय बने रहते हैं।

(ii) काउपर्स ग्रन्थियाँ (Cowper’s glands) ये एक जोड़ी ग्रन्थियाँ होती हैं तथा मूत्रमार्ग के दाएँ व बाएँ ओर स्थित होती हैं। काउपर्स ग्रन्थियाँ मैथुन से पहले एक क्षारीय एवं चिकने द्रव का स्रावण करती हैं। यह मूत्रमार्ग की अम्लता को समाप्त करता है तथा योनि मार्ग को चिकना बनाकर मैथुन में सहायक है।

(iii) पेरीनियल ग्रन्थियाँ (Perineal glands) एक जोड़ी ग्रन्थियाँ मलाशय के पास स्थित होती हैं। इनसे स्रावित रसायन विशेष गन्ध प्रदान करता है।

प्रश्न 2.
अण्डाणुजनन क्या है? अण्डाणुजनन की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए। अण्डाणुजनन तथा शुक्राणुजनन में समानताएँ एवं असमानताएँ बताइए।
अथवा
युग्मकजनन किसे कहते हैं? शुक्रजनन एवं अण्डजनन का तुलनात्मक विवरण दीजिए। युग्मकों में गुणसूत्रों की संख्या के आधार पर युग्मकजनन के महत्व की विवेचना कीजिए।
अथवा
अण्डाणुजनन तथा शुक्राणुजनन में अन्तर लिखिए।
अथवा
युग्मकजनन की परिभाषा लिखिए। अण्डाणुजनन की क्रिया समझाइए। अण्डाणुजनन तथा शुक्राणुजनन में अन्तर बताइट।
उत्तर:
युग्मकजनन (Gametogenesis) युग्मकजनन एक जटिल प्रक्रम है, इसमें अर्द्धसूत्री और समसूत्री विभाजन द्वारा अगुणित (Haploid) युग्मकों (शुक्राणु/अण्डाणु) का निर्माण होता है।
अण्डाणुजनन (Oogenesis) अण्डाशय की ग्राफियन पुटिका (Graafian follicles) के निर्माण की प्रक्रिया, अण्डाणुजनन कहलाती है।
अण्डाणुजनन प्रक्रिया अण्डजनन की प्रक्रिया को तीन भागों में बाँटा गया है।
1. गुणन प्रावस्था (Multiplication Phase) अण्डाशय के निर्माण के समय ही प्राथमिक जनन कोशिकाएँ अण्डाशयी पुटिकाओं (0varian follicles) के रूप में एकत्रित हो जाती हैं, जिसमें से एक कोशिका अण्डाणु मातृ कोशिका (Egg mother cell) के रूप में विभेदित होती है।

2. वृद्धि प्रावस्था (Growth Phase) यह प्रावस्था बहुत लम्बी होती है। अण्डाणु मातृ कोशिका, अण्डाणु जनन कोशिका या ऊगोनियम (0ogonium) में विभेदित होकर वृद्धि प्रावस्था में प्रवेश करती हैं। यह अधिक मात्रा में पोषक पदार्थों को संचित करके आकार में वृद्धि कर लेती है। इसे पूर्व अण्डाणु कोशिका या प्राथमिक ऊसाइट (Primary 0OCyte) कहते हैं।

Arihant Home Science Class 12 Chapter 5 2

3. परिपक्वन अवस्था (Maturation Phase) ग्राफियन पुटिका के
परिपक्व होने के बाद इसमें उपस्थित प्राथमिक ऊसाइट (Primary 00cyte) में प्रथम अर्द्धसूत्री विभाजन होता है, जो असमान होता है, जिसके फलस्वरूप एक अगुणित द्वितीयक ऊसाइट (Haploid Secondary 00cyte) और एक छोटी लोपिकाओं (Polar body) का निर्माण होता है। ग्राफियन पुटिका के फटने से यह द्वितीयक अण्डाणु कोशिका मुक्त होकर फैलोपियन नलिका में प्रवेश कर जाती है। इसमें द्वितीय अर्धसूत्री विभाजन शुक्राणु के अण्डाणु में प्रवेश के पश्चात् होता है ।

शुक्राणुजनन और अण्डाणुजनन में अन्तर निम्नलिखित हैं

शुक्राणुजनन

अण्डाणुजनन

यह प्रक्रिया वृषणों में होती है। यह प्रक्रिया अण्डाशयों में होती है।
इसमें वृद्धि प्रावस्था छोटी होती है। वृद्धि प्रावस्था बहुत लम्बी होती है।
एक प्राथमिक शुक्राणु कोशिका से चार अगुणित शुक्राणुओं का निर्माण होता है। प्राथमिक अण्डाणु कोशिका से  केवल एक अगुणित निर्माण होता है।
स्पर्मेटिइस से थान्तरण द्वारा गतिशील शुक्राणुओं का निर्माण होता है। अचल आण्डाणु में कायान्तरण नहीं होता है।
दोनों अर्द्धसूत्री विभाजन शुक्राणु निर्माण  से पूर्व हो जाते हैं। दूसरा अर्द्धसूत्री विभाजन अण्डाणु में शुक्राणु के प्रवेश के बाद पूर्ण होता है।

शुक्राणुजनन और अण्डाणुजनन में समानताएँ

  1. दोनों क्रियाएँ तीन प्रावस्था में पूर्ण होती हैं- गुणन प्रावस्था, वृद्धि प्रावस्था और परिपक्वन प्रावस्था।
  2. दोनों क्रियाएँ जनदों की जनन उपकला कोशिकाओं में होती हैं।

युग्मकजनन का महत्त्व युग्मकजनन एक जटिल प्रक्रम है। इसमें अर्द्धसूत्री और समसूत्री विभाजन द्वारा अगुणित युग्मकों का निर्माण होता है। नर और मादा युग्मकों के निषेचन के समय समेकन (Fusion) से द्विगुणित युग्मनज का निर्माण होता है। युग्मकजनन और निषेचन के फलस्वरूप जीवधारी का गुणसूत्र प्रारूप निश्चित बना रहता है।

प्रश्न 3.
मादा जनन तन्त्र का वर्णन करते हुए मासिक चक्र की विभिन्न प्रावस्थाओं के सन्दर्भ में संक्षिप्त में लिखिए।
उत्तर:
मादा जनन तन्त्र इसके अन्तर्गत निम्नलिखित जनन अंग आते हैं।
1. अण्डाशय एक जोड़ी अण्डाशय उदरगुहा में स्थित होते हैं। अण्डाशय संयोजी ऊतक से बनी ठोस अण्डाकार संरचना (लगभग 3 सेमी लम्बा, 2 सेमी चौड़ा तथा 1 सेमी मोटा) होती है।
अण्डाशय में ग्राफियन पुटिकाएँ छोटे-छोटे दानों-जैसी रचनाओं के रूप में उभरी होती हैं। यहीं अण्डाणु का निर्माण होता है।

2. अण्डवाहिनी इसका प्रारम्भिक भाग अण्डाशय से सटी हुई झालरदार कीपनुमा संरचना अण्डवाहिनी मुखिका (Oviducal funnel) बनाता है, जो फैलोपियन नलिका में खुलती हैं। अण्डवाहिनी का प्रारम्भिक संकरा भाग फैलोपियन नलिका तथा पश्च भाग गर्भाशय कहलाता है। अण्डे का निषेचन फैलोपियन नलिका में होता है।

3. गर्भाशय दोनों अण्डवाहिनी मिलकर पेशीय थैलीनुमा एवं उल्टे नाशपाती के आकार की संरचना गर्भाशय में खुलती हैं। इसका सामान्य आकार 8 सेमी लम्बा, 5 सेमी चौड़ा तथा 2 सेमी मोटा होता है। गर्भाशय अत्यधिक फैल सकता है। गर्भावस्था में भ्रूण का रोपण गर्भाशय में होता हैं।

4. योनि यह लगभग 8 सेमी लम्बी नलिकारूपी संरचना होती है। मूत्राशय तथा योनि मादा जनन छिद्र द्वारा शरीर से बाहर खुलती है। मादा जनन छिद्र भाग की बाह्य सतह पर एक पेशीय संरचना क्लाइटोरिस होती हैं।

5. बार्थोलिन ग्रन्थियाँ ये योनि के पार्श्व में स्थित होती हैं। इनसे स्रावित तरल योनि को क्षारीय तथा चिकना बनाता है।

6. पेरीनियल ग्रन्थियाँ इनसे विशिष्ट गन्धवत् तरल स्रावित होता है, जो लैंगिक आकर्षण पैदा करता है।

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मासिक चूक (Menstrual Cycle)
व्यस्क स्त्रियों में एक माह की अवधि के दौरान गर्भाशय में चक्रीय परिवर्तन होते हैं, जिसे मासिक चक्र या आर्तव चक्र कहते हैं। मासिक चूक मासिक चूक की तीन अवस्थाएँ होती हैं।
1. क्रम प्रसारी अवस्था (Proliferative Phase) FSH, पुटिकाओं को एस्ट्रोजन के स्रावण के लिए प्रेरित करता है। इस अवस्था का अन्तराल 10-12 दिनों का होता हैं। यह पुटिकीय अवस्था (Follicular phase) भी कहलाती हैं।

2. स्रावित अवस्था (Secretory Phase) कॉर्पस ल्यूटियम, प्रोजेस्टेरॉन का स्रावण करती हैं। इस अवस्था का अन्तराल 12-14 दिन का होता है।

3. मासिक अवस्था (Menstrual Phase) यह पुराने मासिक चक्र की अन्तिम तथा नए मासिक चक्र की प्रारम्भिक अवस्था होती है। यदि अण्डाणु निषेचित नहीं होता है, तो कॉर्पस ल्यूटियम, प्रोजेस्टेरॉन स्तर में कमी के कारण नष्ट हो जाता है। एण्डोमीट्रियम के टूटने से रुधिर का स्राव होता है। यह स्राव लगभग पाँच दिन चलता है।
यह FSH, LH, एस्ट्रोजन तथा प्रोजेस्टेरॉन के द्वारा नियन्त्रित होता है। मासिक चक्र गर्भावस्था तथा दुग्ध स्रावण (Lactation) के दौरान नहीं होता है।

रजोनिवृत्त (Menopause)
इसमें अण्डोत्सर्ग तथ मासिक चक्र स्थायी रूप से रुक जाता है। यह 45 या 50 साल की आयु में होता हैं। इस अवस्था में स्त्री में जनन की क्षमता नहीं होती है।

प्रश्न 4.
नलिकाविहीन ग्रन्थियों पर टिप्पणी लिखिए। (2004)
अथवा
अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ क्या हैं? मानव शरीर में पाई जाने वाली अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के कार्यों का वर्णन कीजिए। (2016)
अथवा
मानव शरीर के विभिन्न अन्तः स्रावी ग्रन्थियों के नाम लिखिए। (2018)
उत्तर:
मानव शरीर में पाई जाने वाली ऐसी विशिष्ट ग्रन्थियाँ, जिनमें स्रावित पदार्थ को लक्ष्य स्थान तक ले जाने के लिए नलिकाएँ नहीं होती, नलिकाविहीन ग्रन्थियाँ कहलाती हैं। इन ग्रन्थियों को अन्त:स्रावी ग्रन्थि भी कहते हैं।
इनसे स्रावित पदार्थ, सीधे रक्त में मुक्त होकर शरीर के अन्य अंगों तक पहुँचता हैं। इन स्रावित पदार्थों को हॉमन्स कहते हैं। हॉमन्स रासायनिक यौगिक हैं, जो प्राणियों में विभिन्न शारीरिक क्रियाओं का नियन्त्रण एवं समन्वय करते हैं। ये उपापचय क्रियाओं, शारीरिक वृद्धि एवं विकास, लैंगिक लक्षणों एवं जनन आदि के नियन्त्रण में भाग लेते हैं।

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मानव शरीर में नलिकाविहीन/अन्त: स्रावी ग्रन्थियाँ
मानव शरीर में निम्नलिखित नलिकाविहीन ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं
1. पीयूष ग्रन्थि (Pituitary Gland) यह अग्र मस्तिष्क के ‘हाइपोथैलेमस’ की दीवार के पास, स्फेनॉइड हड्डी के गर्त में पाई जाती है। इसे मास्टर ग्रन्थि भी कहा जाता हैं, क्योकि यह अन्य अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के स्रावण को नियन्त्रित करती हैं। इसके साथ यह व्यक्ति के स्वभाव, स्वास्थ्य वृद्धि एवं लैंगिक विकास को भी प्रेरित करती है।

2. थायरॉइड ग्रन्थि (Thyroid Gland) यह दो पिण्डों की रचना है एवं श्वासनली के | दोनों ओर लैरिक्स (Larynx) के नीचे स्थित रहती हैं। इससे स्रावित थायरॉक्सिन, हॉर्मोन शरीर की उपापचयी क्रियाओं का नियमन तथा नियन्त्रण करता है।

3. पैराथायरॉइड ग्रन्थि (Parathyroid Gland) यह थायरॉइड ग्रन्थि के पीछे स्थित रहती हैं। इसके द्वारा स्रावित पैराथॉर्मोन नामक हॉमोंन रक्त में कैल्शियम तथा फॉस्फोरस की मात्रा का नियन्त्रण करता है। यह अस्थि एवं दाँतों के निर्माण में सहायक होता है।

4. थायमस ग्रन्थि (Thymus Gland) यह ग्रन्थि वक्ष में हृदय के सामने स्थित होती है। युवावस्था तक यह लुप्त हो जाती है। इस ग्रन्थि से स्रावित थायमोसिन हॉर्मोन, लिम्फोसाइट्स को भिन्न-भिन्न प्रकार के जीवाणुओं और एण्टीजन को नष्ट करने हेतु प्रेरित करता है।

5. अधिवृक्क ग्रन्थि (Adrenal Gland) यह ग्रन्थि प्रत्येक वृक्क (Kidney) के ऊपरी भाग पर स्थित होती है, इसका बाहरी भाग काँटेक्स व आन्तरिक भाग मेड्यूला कहलाता है। कॉर्टेक्स से स्रावित हॉमोंन उपापचयी नियन्त्रण, रक्त में लवण की मात्रा का नियन्त्रण एवं लैंगिक परिपक्वता आदि को नियन्त्रित करते हैं। मेड्यूला से स्रावित, एडीनलीन तथा नॉर एडीनेनीन हॉमन्स शरीर को संकटकालीन परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार करते हैं।

6. अग्न्याशय (Pancreas) यह एक मिश्रित ग्रन्थि है, इसका बहि:स्रावी भाग, अग्न्याशय रस स्रावित करता है। अग्न्याशय में विशिष्ट प्रकार की कोशिकाओं के समूह पाए जाते हैं, जिन्हें लैंगरहँन्स की द्वीपिकाएँ (Iglete of Langarhans) कहते हैं।
ये अन्त:स्रावी ग्रन्थि का काम करती हैं। इनसे स्रावित हॉर्मोन्स निम्नलिखित हैं

  • इन्सुलिन आवश्यकता से अधिक ग्लुकोज का ग्लाइकोजन में परिवर्तन करता है। इसकी कमी से शरीर से शर्करा की मात्रा मूत्र में आने लगती है, जिसे मधुमेह रोग कहते हैं।
  • ग्लूकैगॉन ग्लाइकोजन से ग्लूकोज को संश्लेषण करता है।

7. जनन ग्रन्थियाँ (Gonada) स्त्री में अण्डाशय (Ovary) तथा पुरुष में वृषण (Testha) विशेष हॉर्मोन्स स्रावित करते हैं, जिनसे लैंगिक लक्षणों का विकास होता है। स्त्रियों में एस्ट्रोजन एवं प्रोजेस्टेरॉन का स्रावण होता है, जबकि पुरुषों में टेस्टोस्टेरॉन स्रावित होता है।

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