UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 16 इनहेरिटेन्स

UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 16 इनहेरिटेन्स are part of UP Board Solutions for Class 12 Computer. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 16 इनहेरिटेन्स.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Computer
Chapter Chapter 16
Chapter Name इनहेरिटेन्स
Number of Questions 18
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 16 इनहेरिटेन्स


बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
इनहेरिटेन्स का प्रयोग कर नवनिर्मित क्लास को क्या कहते हैं?
(a) पेरेण्ट क्लास
(b) बेस क्लास
(c) डिराइब्ड क्लास
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(c) डिराइब्ड क्लास

प्रश्न 2.
विजिबिलिटी मोड कितने प्रकार के होते हैं?
(a) दो
(b) तीन
(c) चार
(d) पाँच
उत्तर
(b) तीन प्रकार के–पब्लिक, प्रोटेक्टेड तथा प्राइवेट

प्रश्न 3.
किसी कोड की विजिबिलिटी को किसके द्वारा प्राप्त किया जा सकता है?
(a) पॉलीमॉरफिज्म द्वारा
(b) एनकैप्सूलेशन द्वारा
(c) इनहेरिटेन्स द्वारा
(d) ‘a’ और ‘c’ दोनों
उत्तर
(c) इनहेरिटेन्स द्वारा

प्रश्न 4.
दो वेस क्लास से एक डिराइड क्लास बनाई जाए, तो यह किसका प्रकार है?
(a) हाइब्रिड इनहेरिटेन्स
(b) सिंगल इनहेरिटेन्स
(c) मल्टीपल इनहेरिटेन्स
(d) हाइरारकिकल इनहेरिटेन्स
उत्तर
(c) मल्टीपल इनहेरिटेन्स

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से कौन-सा इनहेरिटेन्स का प्रकार नहीं है?
(a) सिंगल
(b) पैरेण्ट
(c) मल्टीपल
(d) मल्टीलेवल
उत्तर
(b) पेरेण्ट

प्रश्न 6.
एक बेस क्लास से एक से अधिक चाइल्ड क्लास बनाने की प्रक्रिया किस इनहेरिटेन्स का उदाहरण है?
(a) हाइरारकिकल
(b) मल्टीपल
(c) मल्टीलेवल
(d) हाइब्रिड
उत्तर
(a) हाइरारकिकल

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
डिराइड क्लास क्या होती है?
उत्तर
इनहेरिटेन्स में हम एक क्लास से दूसरी क्लास को इनहेरिट कर सकते हैं। इस प्रकार इनहेरिट क्लास में पहली क्लास के गुण उपस्थित होते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ अन्य गुण भी होते हैं। इनहेरिट हुई क्लास को ही डिराइब्ड क्लास कहते हैं।

प्रश्न 2.
विजिबिलिटी मोड के नाम लिखिए।
उत्तर
विजिबिलिटी मोड के नाम इस प्रकार हैं।

  • public एक्सेस स्पेसीफायर
  • protected एक्सेस स्पेसीफायर
  • private एक्सेस स्पेसीफायर

प्रश्न 3.
पब्लिक एक्सेस स्पेसीफायर क्या है?
उत्तर
पब्लिक स्पेसीफायर में बेस क्लास के सभी पब्लिक डाटा डिराइव्ड क्लास में पब्लिक ही रहते हैं। इसी प्रकार प्राइवेट और प्रोटेक्टेड डाटा भी डिराइब्ड क्लास में सामान्यत: प्राइवेट और प्रोटेक्टेड ही रहते हैं।

प्रश्न 4.
मल्टीपल इनहेरिटेन्स क्या है?
उत्तर
मल्टीपल इनहेरिटेन्स में एक से अधिक बेस क्लास की सहायता से एक डिराइब्ड क्लासे बनाई जाती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न ।

प्रश्न 1.
इनहेरिटेन्स पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2011)
उत्तर
पहले से बनी क्लास के गुणों को सम्मिलित कर एक नई क्लास का निर्माण करना इनहेरिटेन्स (Inheritance) कहलाता है। इसमें पुरानी क्लास को बेस क्लास (Base class) या पैरेण्ट क्लास (Parent class) कहते हैं। तथा नवनिर्मित क्लास को डिराइव्ड क्लास (Derived class) या चाइल्ड क्लास (Child class) कहते हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 16 इनहेरिटेन्स img-1

प्रश्न 2.
इनहेरिटेन्स का प्रयोग करने से क्या-क्या लाभ होते हैं?
उत्तर
इनहेरिटेन्स द्वारा निम्नलिखित लाभ होते हैं।

  1. इनहेरिटेन्स का प्रयोग करने से कोड ज्यादा लम्बा नहीं होता।
  2. इससे एक ही कोड को दोबारा प्रयोग किया जा सकता हैं।
  3. इनहेरिटेन्स के द्वारा कोड को आसानी से मैनेज किया जा सकता है।
  4. यह मेमोरी में स्पेस को बचाता है।

प्रश्न 3.
इनहेरिटेन्स के किन्हीं दो प्रकारों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2012)
उत्तर
इनहेरिटेन्स मुख्य रूप से पाँच प्रकार सिंगल, मल्टीपल, मल्टीलेवल, हाइरारकिकल व हाइब्रिड के होते हैं। किन्हीं दो इनहेरिटेन्स पर संक्षिप्त टिप्पणी नीचे दी गई है।
मल्टीलेवल इनहेरिटेन्स जिस प्रकार सिंगल इनहेरिटेन्स में एक बेस क्लास से एक डिराइब्ड क्लास बनाई जाती है। कभी-कभी डिराइब्ड क्लास से भी एक अन्य क्लास बनाई जा सकती है अर्थात् डिराइब्ड क्लास पुनः एक बेस क्लास की तरह कार्य करे, तो इस प्रकार के इनहेरिटेन्स को मल्टीलेवल इनहेरिटेन्स कहते हैं।
हाइरारकिकल इनहेरिटेन्स यह सिंगल इनहेरिटेन्स का विकसित रूप है। हाइरारकिकल इनहेरिटेन्स में हम एक बेस क्लास से एक से अधिक डिराइड क्लास बना सकते हैं।

प्रश्न 4.
मल्टीपल इनहेरिटेन्स तथा मल्टीलेवल इनहेरिटेन्स में भेद कीजिए। (2015,14,08)
उत्तर
मल्टीपल इनहेरिटेन्स तथा मल्टीलेवल इनहेरिटेन्स में अन्तर इस प्रकार है
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 16 इनहेरिटेन्स img-2

प्रश्न 5.
हाइरैरकिकता इनहेरिटेन्स की व्याख्या, संक्षेप में कीजिए। उदाहरण देकर समझाइए। (2017)
उत्तर
यह सिंगल इनहेरिटेन्स का विकसित रूप है। सिंगल इनहेरिटेन्स में जहाँ हम एक बेस क्लास से एक डिराइव्ड क्लास बनाते हैं। वहीं हाइरारकिकल इनहेरिटेन्स में हम एक बेस क्लास से एक से अधिक डिराइब्ड क्लास बना सकते हैं।

उदाहरण
class A
{
protected:
int x, Y;
public:
void get()
{
cout<<"\n Enter two values \n"; cin>>x>>y;
}
};
class B:public A
private:
int m;
};
class C:public A
{
private:
int n;
};

लघु उत्तरीय प्रश्न ।।

प्रश्न 1.
बेस क्लास तथा डिराइड क्लास को समझाने हेतु एक प्रोग्राम लिखिए।
उत्तर
#include<iostream.h>
class Rectangle //Base class
{
protected:
float length, breadth;
public:
void Input()
{
cout<<"Enter length: "; cin>>length;
cout<<"Enter breadth: "; cin>>breadth;
}
};
class Area : public Rectangle//Derived class
{
public:
float calc()
{
return length*breadth;
};
void main()
{
cout<<"Enter data for find area\n";
Area a;
a. Input();
cout<<"Area = "<<a.calc()<<" square metre\n\n";
}

आउटपुट
Enter data for find area
Enter length: 5
Enter breadth: 2
Area = 10 square metre

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उदाहरण सहित मल्टीलेवल इनहेरिटेन्स मल्टीपल इनहेरिटेन्स की व्याख्या कीजिए। (2016)
उत्तर
मल्टीलेवल इनहेरिटेन्स जिस प्रकार सिंगल इनहेरिटेन्स में एक बेस क्लास से एक डिराइव्ड क्लास बनाई जाती है। कभी-कभी डिराइब्ड क्लास से भी एक अन्य क्लास बनाई जा सकती है अर्थात् डिराइब्ड क्लास पुनः एक बेस क्लास की तरह कार्य करे, तो इस प्रकार के इनहेरिटेन्स को मल्टीलेवल इनहेरिटेन्स कहते हैं।

उदाहरण
#include<iostream.h>
class Person
{
protected:
char name;
public:
void get1()
{
cout<<"Enter your Name\n"; cin>>name;
}
};
class Emp: public Person
{
protected:
int basic;
public:
void get2()
{
cout<<"Enter your Basic\n"; cin>>basic;
}
};
class Manager: public Emp
{
protected:
int deptcode;
public:
void display()
{
cout<<"Name is "<<name;
cout<<"\nBasic "<<basic;
}
};
void main()
{
Manager obj;
obj.get1();
obj.get2();
obj.display();
getch();
}

आउटपुट
Enter your Name
H
Enter your Basic
25000
Name is H
Basic 25000

मल्टीपल इनहेरिटेन्स इस प्रकार के इनहेरिटेन्स में एक से अधिक बेस क्लासेज की सहायता से एक डिराइव्ड क्लास बनाई जाती है।

#include<iostream.h>
class Expdet
{
protected:
char name;
public:
void expr()
{
cout<<"Enter your Name"<<end1; cin>>name;
}
};
class Saldet
{
protected:
int salary;
public:
void sal()
{
cout<<"Enter your Salary"<<end1; cin>>salary;
}
};
class Promotion : public Expdet, public Saldet
{
public:
void promote()
{
if (salary> = 20000)
cout<<"PROMOTED FOR HIGHER GRADE";
else
cout<<"CANNOT BE PROMOTED";
}
};
void main()
{
Promotion obj;
obj . expr();
obj . sal();
obj . promote();
}

आउटपुट
Enter your Name
J
Enter your Salary
23000
PROMOTED FOR HIGHER GRADE

प्रश्न 2.
इनहेरिटेन्स क्या है? इसके कितने प्रकार होते हैं? संक्षेप में समझाइए। (2007)
अथवा
इनहेरिटेन्स से आप क्या समझते हैं? इसके विभिन्न रूपों का वर्णन कीजिए। (2007)
अथवा
इनहेरिटेन्से से क्या आशय है? इसके विभिन्न प्रकारों को समझाइए। (2011)
उत्तर
पहले से बनी क्लास के गुणों को सम्मिलित कर एक नई क्लास का निर्माण करना इनहेरिटेन्स कहलाता है। इसमें पुरानी क्लास को बेस क्लास (Base class) या पेरेण्ट क्लास (Parent class) कहते हैं तथा नवनिर्मित क्लास को डिराइव्ड क्लास (Derived class) या चाइल्ड क्लास (Child class) कहते हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 16 इनहेरिटेन्स img-3

इनहेरिटेन्स के प्रकार ये पाँच प्रकार के होते हैं, जो निम्न हैं। (i) सिंगल इनहेरिटेन्स इनहेरिटेन्स के इस प्रकार में एक बेस क्लास से केवल एक डिराइब्ड क्लास बनाई जाती है। डिराइव्ड क्लास, बेस क्लास के समस्त या कुछ गुणों का प्रयोग कर सकती हैं।

प्रारूप
class derived_class : acces_mode
base_class
{
// body of derived class
};

(ii) मल्टीपल इनहेरिटेन्स इस प्रकार के इनहेरिटेन्स में एक से अधिक बेस क्लास की सहायता से एक डिराइब्ड क्लास बनाई जाती है।

प्रारूप
class derived_class: access_mode
base_class1, access_mode base_class2
{
// body of the derived class
};

(iii) मल्टीलेवल इनहेरिटेन्स जिस प्रकार सिंगल इनहेरिटेन्स में एक बेस क्लास से एक डिराइब्ड क्लास बनाई जाती है। कभी-कभी डिराइब्ड क्लास में भी एक अन्य क्लास बनाई जा सकती हैं अर्थात् ड्रािइड क्लास पुनः एक बेस क्लास की तरह कार्य करें, तो इस प्रकार के इनहेरिटेन्स को मल्टीलेवल इनहेरिटेन्स कहते हैं।

प्रारूप
class derived1:access_mode base_class
{
//body of the derived1 class
};
class derived2:access_mode derived1
{
//body of the derived2 class
};
M
M
class derivedN:access_mode derivedN-1
{
//body of the derived class
};

(iv) हाइरारकिकल इनहेरिटेन्स यह सिंगल इनहेरिटेन्स का विकसित रूप है। सिंगल इनहेरिटेन्स में जहाँ हम एक बेस क्लास से एक डिराइब्ड क्लास बनाते हैं, वहीं हाइरारकिकल इनहेरिटेन्स में हम एक बेस क्लास से एक से अधिक डिराइब्ड क्लास बना सकते हैं।

प्रारूप
class derivedi: access_mode base_class
{
//body of the derived1 class
};
class derived2:access_mode base_class
{
//body of the derived2 class
};
:
:
class derivedN:access_mode base_class
{
//body of the derived class
};

(v) हाइब्रिड इनहेरिटेन्स हाइब्रिड का अर्थ होता है-मिला-जुला। उपयुक्त इनहेरिटेन्स के प्रकारों में से किन्हीं दो अथवा दो से अधिक प्रकारों को मिलाकर हाइब्रिड इनहेरिटेन्स का निर्माण किया गया है।

प्रारूप
class derivedl:access_mode base_class
{
//body of the derivedi class
};
M
class derivedN:access_mode base_class
{
//body of the derived class
};
class derivedN+1:access_mode
derived1,...., access mode derivedN
{
//body of the derivedN+1 class
};

प्रश्न 3.
विजिबिलिटी मोड (लेबल्स) का वर्णन कीजिए तथा इनहेरिटेन्स में उनके उपयोग बताइट। (2010)
अथवा
private, protected तथा public सदस्यों में भेद कीजिए। (2008)
उत्तर
विजिबिलिटी मोड इनहेरिटेन्स के प्रकार को समझने से पहले विजिबिलिटी मोड को समझना होगा। विजिबिलिटी मोड यह बताता है कि बेस क्लास के कौन-कौन से मैम्बर्स डिराइव्ड में एक्सेस (Access) होंगे।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 16 इनहेरिटेन्स img-4
public एक्सेस स्पेसीफायर इस एक्सेस स्पेसीफायर के प्रयोग करने से बेस क्लास के सभी मैम्बर्स डिराइव्ड क्लास में उसी प्रकार प्रयोग में लाए जाते हैं, जिस प्रकार वे बेस क्लास में डिक्लेयर हैं।
प्राइवेट मैम्बर को डिराइब्ड क्लास में सीधे एक्सेस नहीं किया जा सकता।

protected एक्सेस स्पेसीफायर प्रोटेक्टेड एक्सेस स्पेसीफायर में, बेस क्लास के सभी प्राइवेट मैम्बर्स डिराइब्ड क्लास में प्राइवेट ही रहते हैं और प्रोटेक्टेड मैम्बर्स भी प्रोटेक्टेड ही रहते हैं, लेकिन बेस क्लास के सभी पब्लिक मैम्बर डिराईव्ड क्लास में प्रोटेक्टेड होते हैं।

private एक्सेस स्पेसीफायर प्राइवेट एक्सेस स्पेसीफायर में, बेस क्लास के सभी प्राइवेट मैम्बर्स डिराइब्ड क्लास में प्राइवेट ही रहते हैं और बेस क्लास के सभी प्रोटेक्टेड और पब्लिक मैम्बर डिराइब्ड क्लास में प्राइवेट बन जाते हैं।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 16 इनहेरिटेन्स will help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 16 इनहेरिटेन्स, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 6 HTML बेसिक

UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 6 HTML बेसिक are part of UP Board Solutions for Class 12 Computer. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 6 HTML बेसिक.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Computer
Chapter Chapter 6
Chapter Name HTML बेसिक
Number of Questions Solved 26
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 6 HTML बेसिक

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
वेब पेज निर्माण के लिए किस प्रोग्रामिंग भाषा का उपयोग किया जाता है? [2017]
(a) HTML
(b) HLL
(c) C++
(d) WORDSTAR
उत्तर:
(a) HTML

प्रश्न 2
HTML को किसने विकसित किया था?
(a) डेनिस रिची
(b) कार्ल सन
(c) विंट कर्फ
(d) टिम बर्नर्स ली
उत्तर:
(d) टिम बर्नर्स ली

प्रश्न 3
किसी वेबसाइट का पहला पेज़ क्या कहलाता है?
(a) टॉपिक पेज
(b) होम पेज
(c) अन्य पेज
(d) अन्तिम पेज
उत्तर:
(b) होम पेज

प्रश्न 4
किसी वेबसाइट में कितने होम पेज होते हैं? [2015]
(a) 1
(b) 2
(C) 3
(d) 4
उत्तर:
(a) 1

प्रश्न 5
किसी वेब पेज के बैकग्राउण्ड को कलर देने के लिए किस टैग का प्रयोग होता है?
(a) <BODY>
(b) <HTML>
(c) <HEAD>
(d) <CENTER>
उत्तर:
(d) <BODY>

प्रश्न 6
निम्न में से कौन-सा टैग कमेण्ट को दर्शाता है?
(a) <Comment>
(b) /Comment/
(C) <!–…–>
(d) <! Comment>
उत्तर:
(c) <!–…–>

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
HTML डॉक्यूमेण्ट को सेव करने के लिए किस एक्सटेन्शन का प्रयोग होता है?
उत्तर:
HTML डॉक्यूमेण्ट को सेव करने के लिए .htm या .html एक्सटेन्शन का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 2
टैग का कार्य बताइए। [2017]
उत्तर:
टैग का प्रयोग HTML वेब पेज बनाने में किया जाता है।

प्रश्न 3
<TITLE> टैग को समझाइए। 
उत्तर:
किसी डॉक्यूमेण्ट को टाइटल देने के लिए <TITLE> टैग का प्रयोग किया जाता है। इसे <HEAD> तथा </HEAD> टैग्स के अन्तर्गत लिखा जाता है।उदाहरण:
<HEAD> <TITLE> WELCOME PAGE </TITLE> <HEAD>

प्रश्न 4
<BR> टैग का प्रयोग किसलिए किया जाता है?
उत्तर:
किसी पैराग्राफ या लाइन को ब्रेक करने के लिए <BR> टैग का प्रयोग किया जाता है। यह टेक्स्ट को अगली लाइन पर दर्शाता है।

प्रश्न 5
<BASEFONT> टैग में size एट्रिब्यूट का क्या उपयोग होता है? [2012]
उत्तर:
डॉक्यूमेण्ट में किसी टेक्स्ट का साइज बदलने के लिए <BASEFONT> टैग में size को एक नम्बर देकर दर्शाया जाता है। 
उदाहरण <BASEFONT size=2>

लघु उत्तरीय प्रश्न I (2 अंक)

प्रश्न 1
HTML क्या है? किसी वेब पेज के निर्माण में यह कैसे सहायक है? [2008]
अथवा
HTML पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। [2016, 14, 09]
अथवा
एच टी एम एल को समझाइए। [2017]
उत्तर:
HTML का पूर्ण रूप हाइपरटेक्स्ट मार्कअप लैंग्वेज है। इसे टिम बर्नर्स ली ने सन् 1990 के दशक के प्रारम्भ में स्विट्जरलैण्ड में वेब पेज को बनाने के लिए विकसित किया था।
यह एक इण्डीपेण्डेण्ट लैंग्वेज हैं। इसमें टैग के प्रयोग द्वारा कोडिंग की जाती है। HTML डॉक्यूमेण्ट को सेव करने के लिए .htm या .html एक्सटेंशन का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 2
वेब पेज का अर्थ समझाइए। [2007]
अथवा
वेब पेज का वर्णन कीजिए। [2010]
उत्तर:
ऐसा पेज जिस पर वेब सिस्टम की समस्त जानकारी उपलब्ध हो, उसे वेब पेज कहते हैं। एक वेब पेज पर किसी सर्वर का डाटा स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया जाता है। एक वेब पेज पर टेक्स्ट, चित्र, वीडियो, ग्राफिक्स अथवा हाइपरलिंक होते हैं।
वेब पेजों को निम्न श्रेणियों में विभक्त किया जाता है

  • होम पेज
  • मेन टॉपिक पेज
  • अन्य पेज

प्रश्न 3
वेबसाइट पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। [2008]
अथवा
वेबसाइट को समझाइए। [2018]
उत्तर:
एक वेबसाइट विभिन्न वेब पेजों के संयोजन से बनती है। किसी भी वेबसाइट का पहला पेज होम पेज कहलाता है, जो अन्य पेजों को भी लिंक करता है। वेबसाइट मुख्यतः निम्न प्रकार की होती है।

  1. पर्सनल वेबसाइट
  2. कमर्शियल वेबसाइट
  3. ऑर्गेनाइजेशन वेबसाइट

कुछ प्रमुख वेबसाइट के नाम इस प्रकार हैं।

  • www.amazon.com
  • www.microsoft.com

प्रश्न 4
वेब पेज निर्माण के विभिन्न तरीके लिखिए। [2011]
अथवा
वेब पेज बनाने के पदों को समझाइए। [2012]
उत्तर:
ऐसा डॉक्यूमेण्ट जिस पर वेब सिस्टम की सम्पूर्ण जानकारी उपलब्ध हो, उसे वेब पेज कहते हैं। वेब पेज को दो तरीकों से बनाया जा सकता है।

  • स्टैटिक पेज (Static page) किसी पेज के कण्टेण्ट को स्टैटिक रूप से दर्शाने के लिए स्टैटिक पेज का प्रयोग किया जाता है।
  • डायनैमिक पेज (Dynamic page) किसी पेज की वैल्यू या कण्टेण्ट को परिवर्तित करने के लिए डायनेमिक पेज का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 5
होम पेज का अर्थ बताइए। [2008]
अथवा
होम पेज को समझाइए। [2018]
उत्तर:
किसी वेबसाइट का पहला पेज होम पेज कहलाता है। यह विभिन्न लिंक को सम्मिलित करता है तथा अन्य पेजों तक जाने की अनुमति देता है। होम पेज यह दर्शाता है कि वेबसाइट किस प्रकार की है, किसी वेबसाइट की जानकारी उसके होम पेज से ही मिलती है। इसमें टेक्स्ट, इमेज, वीडियो, लिंक आदि सम्मिलित होते हैं।

प्रश्न 6
URL का वर्णन कीजिए। [2018]
उत्तर:
URL का यूनिफॉर्म रिसोर्स लोकेटर है। इण्टरनेट पर वेब एड्रेस किसी विशिष्ट वेब पेज की लोकेशन को पहचानता है। वेब एड्रेस को URL कहते हैं। URL इण्टरनेट से जुड़े होस्ट कम्प्यूटर पर फाइलों के इण्टरनेट एड्रेस को दर्शाते हैं;
जैसे – http://www.google.com/services/index.htm
जहाँ,
http                    –           प्रोटोकॉल आइडेण्टिफायर
WWW                –            वर्ल्ड वाइड वेब
google.com       –            डोमेन नेम
/services/          –            डायरेक्टरी
index.htm         –             वेब पेज

प्रश्न 7.
सर्च इंजन का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए। [2018]
उत्तर:
सर्च इंजन इण्टरनेट पर किसी भी विषय के बारे में सम्बन्धित । जानकारियों को देने के लिए प्रयोग होता है। यह एक प्रकार की ऐसी वेबसाइट होती है, जिसके सर्च बार में किसी भी टॉपिक को लिखते हैं, इसके बाद उससे सम्बन्धित सभी जानकारियाँ प्रदर्शित हो जाती हैं।

उदाहरण

  • Google – http://www.google.com
  • Yahoo – http://www.yahoo.com
  • Hotbot – http://www. hotbot.com
  • AltaVista – http://www. altavista.com

प्रश्न 8
वेब ब्राउजर का वर्णन कीजिए। [2017]
उत्तर:
वेब ब्राउजर एक सॉफ्टवेयर एप्लीकेशन है, जिसका प्रयोग वल्र्ड वाइड वेब के कण्टेण्ट को ढूंढने, निकालने व प्रदर्शित करने में होता है। ये प्रायः दो प्रकार के होते हैं।

  • टेक्स्ट वेब ब्राउजर इसमें टेक्स्ट आधारित सूचना को प्रदर्शित किया जाता है; जैसे – Lynx
  • ग्राफिकल वेब ब्राउजर यह टेक्स्ट तथा ग्राफिक सूचना दोनों का सपोर्ट करता है; जैसे – Mozilla firefox, Google chrome आदि।

लघु उत्तरीय प्रश्न II (3 अंक)

प्रश्न 1
HTML के वेब पेज या वेबसाइट की संरचना उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर:
<HTML>
<HEAD> 
<TITLE> <!...This section is used for the title...> </TITLE>
</HEAD> 
<BODY> <!...This section is used for all that you want to show on the page...) </BODY> 
</HTML>
उदाहरण
<HTML>
<HEAD>
<TITLE> Webpage </TITLE> 
</HEAD> 
<BODY> This is my home page. </BODY> </HTML>

प्रश्न 2
HTML में वेब पेज बनाने हेतु प्रयोग किए जाने वाले विभिन्न टैग्स का वर्णन कीजिए। [2009]
अथवा
HTML टैग की संक्षेप में व्याख्या कीजिए। [2016]
उत्तर:
HTML मे वेब पेज बनाने के लिए विभिन्न टैग्स का प्रयोग किया जाता है, इनमें से कुछ इस प्रकार हैं।

  1. <P> टैग पैराग्राफ बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है।
  2. <FONT> टैग फॉण्ट में स्टाइल, साइज देने के लिए प्रयोग किया जाता है।
  3. <CENTER> टैग का प्रयोग किसी टेक्स्ट को सेण्टर में दर्शाने के लिए। किया जाता है।
  4. <B><U> तथा <I> टैग्स फॉण्ट को बोल्ड, अण्डरलाइन तथा इटैलिक करने के लिए प्रयोग किए जाते हैं।
  5. <H1>…….<H6> टैग्स हैडिंग बनाने के लिए प्रयोग किए जाते हैं।
  6. <HR> टैग का प्रयोग डॉक्यूमेण्ट में हॉरिजॉण्टल लाइन क्रिएट करने के लिए किया जाता है।
  7. <BR> टैग का प्रयोग पैराग्राफ या लाइन को ब्रेक करने के लिए किया जाता है।
प्रश्न 3
निम्न वेब पेज का कोड लिखिए।
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 6 HTML बेसिक img-1
उत्तर:
<HTML>
<HEAD>
<TITLE>Web Page</TITLE>
</HEAD> 
<BODY> <FONT size="4" face="Calibri"> <H2 align="center">!! WELCOME!!</H2> </FONT><BR> 
<HR>
<CENTER> 
A web page or webpage is a document commonly written <BR> in HyperText Markup Language (HTML) <BR> that is accessible through the <BR> Internet or other network using an Internet browser. 
</CENTER> 
</BODY> 
</HTML>

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)

प्रश्न 1
HTML क्या है? विभिन्न HTML टैग्स के बारे में संक्षेप में बताइए। (2007)
उत्तर:
HTML का पूर्ण रूप हाइपरटेक्स्ट मार्कअप लैंग्वेज है। HTML को टिम बर्नर्स ली द्वारा सन् 1990 के दशक के प्रारम्भ में स्विट्जरलैण्ड में वेब पेज को बनाने के लिए विकसित किया गया था। यह एक प्लेटफॉर्म इण्डीपेण्डेण्ट लैंग्वेज है, जिसका प्रयोग किसी भी प्लेटफॉर्म में किया जा सकता है; जैसे-Windows, Linux, Macintosh इत्यादि।

HTML डॉक्यूमेण्ट को सेव करने के लिए .htm या .html एक्सटेंशन का प्रयोग किया जाता है।
HTML विभिन्न प्रकार के टैग्स को दर्शाता है।

  1. <HTML> यह किसी भी HTML प्रोग्राम का पहला टैग होता है। कोडिंग के प्रारम्भ में <HTML> तथा अन्त में </HTML> का प्रयोग किया जाता है।
  2. <HEAD> यह किसी वेब पेज के हैडर को दर्शाता है, जिसके लिए | इसका प्रारूप <HEAD>…. </HEAD> है।
  3. TITLE> यह वेब पेज के टाइटिल को सेट करता है और <HEAD> तथा </HEAD> के बीच लिखा जाता है।
  4. <BODY> किसी वेब पेज के टेक्स्ट अथवा ग्राफिक्स को <BODY> तथा </BODY> भाग के अन्तर्गत दर्शाता है।
    इस टैग के अन्तर्गत निम्न टैग्स सम्मिलित होते हैं।

    • <P>…./P> पैराग्राफ बनाने के लिए।
    • <B>…./b> टेक्स्ट बोल्ड करने के लिए।
    • <U>….</U> टेक्स्ट को अण्डरलाइन करने के लिए।
    • <i>…..</> टेक्स्ट को इटैलिक करने के लिए।
    • <BR> अगली लाइन में टेक्स्ट प्रिण्ट करने के लिए।
    • <Hn>… </Hn> हैडिंग बनाने के लिए, जहाँ n = 1 to 6

प्रश्न 2
एक वेब पेज का निर्माण आप कितने प्रकार से कर सकते है? किसी एक विधि को विस्तार से समझाइए। [2018]
उत्तर:
किसी भी डॉक्यूमेण्ट जिसमें वेब इन्फॉर्मेशन स्टोर होती है, उसे वेब पेज कहते हैं। वेब पेज को दो प्रकार से बनाया जा सकता है।

  • स्टैटिक पेज
  • डायनमिक पेज

स्टैटिक पेज
स्टैटिक वेब पेज प्रत्येक बार एक्सेस करने पर एक ही वैल्यू/कण्टेण्ट को दर्शाता है। स्टैटिक वेब पेज को फ्लैट पेज या स्टेश्नरी पेज भी कहा जाता है, जो यूज़र को उसी रूप में प्राप्त होता है, जिस प्रकार से यूजर ने स्टोर किया था। यह वेब पेज सभी यूजर्स को एकसमान सूचनाएँ उपलब्ध कराता है। इसके लाभ निम्नलिखित है।

  1. एक स्टेटिक वेब पेज के निर्माण में किसी भी प्रकार की प्रोग्रामिंग कौशल (Programming Skill) की आवश्यकता नहीं होती।
  2. इसके लिए किसी विशिष्ट होस्ट की आवश्यकता नहीं होती।
  3. इसे किसी वेब सर्वर या एप्लीकेशन सर्वर के बिना, केवल एक वेब ब्राउजर के द्वारा सीधे देखा जा सकता है।
उदाहरण
<HTML> 
<HEAD>
<TITLE>Static Page</TITLE>
</HEAD> 
<BODY> 
<H2><CENTER>Web Page</CENTER></H2> This is my Static Web Page... 
</BODY> 
</HTML>

आउटपुट
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 6 HTML बेसिक img-2

प्रश्न 3
वेब पेज एवं वेबसाइट से क्या तात्पर्य है? वेबसाइट की संरचना को समझाइए। [2006]
अथवा
वेबसाइट पर एक निबन्ध लिखिए। [2011]
उत्तर:
वेब पेज
वह पेज अथवा डॉक्यूमेण्ट जिस पर ‘वेब’ सिस्टम की सम्पूर्ण जानकारी उपलब्ध हो, उसे वेब पेज कहते हैं। एक वेब पेज पर किसी सर्वर का डाटा स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया जाता है। डाटा सामान्य टेक्स्ट, ग्राफिक्स, ऑडियो आदि के रूप में हो सकता है। एक वेब पेज, डाटा आदि के साथ लिंक भी सम्मिलित करता है। इन लिंक को हाइपरलिंक कहा जाता है। यही हाइपरलिंक यूजर को एक पेज से दूसरे पेज तथा किसी निर्धारित डॉक्यूमेण्ट पर जाने की सुविधा प्रदान करते हैं।

वेब पेज दो प्रकार के होते हैं-स्टैटिक तथा डायनैमिका स्टैटिक वेब पेज प्रत्येक बार एक्सेस करने पर एक ही वैल्यू/मैटर को दर्शाता है, जबकि डायनैमिक वेब पेज की वैल्यू/मैटर प्रत्येक बार बदल सकते हैं।
वेब पेजों को तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है।

  • होम पेज
  • मेन टॉपिक पेज
  • अन्य पेज

वेबसाइट
एक वेबसाइट वेब पेजों का संग्रह होती है, जिसमें सभी वेब पेज हाइपरलिंक द्वारा एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। वेबसाइट को उनके एड्रेस द्वारा एक्सेस किया जाता है। एक वेबसाइट पर दी गई जानकारी सामान्यतः आपस में सम्बन्धित होती है। वेबसाइट मुख्यत: निम्न प्रकार की होती है।

  1. पर्सनल वेबसाइट्स
  2. कमर्शियल वेबसाइट्स
  3. ऑर्गेनाइजेशन वेबसाइट्स।

वेब साइट की संरचना इसके लिए लघु उत्तरीय प्रश्न II का प्रश्न संख्या 1 का उत्तर देखें।

प्रश्न 4
वेब पेज में विषय-वस्तु को फॉर्मेट व हाईलाइट करने की प्रक्रिया का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए। [2007]
अथवा
वेब पेज में टेक्स्ट फॉर्मेटिंग तथा हाईलाइटिंग का वर्णन कीजिए। [2015, 18, 10]
अथवा
किसी वेब पेज में टेक्स्ट को कैसे हाईलाइट करते हैं?
अथवा
वेब पेज में टेक्स्ट फॉर्मेटिंग पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। [2012, 09]
अथवा
वेब पेज में टेक्स्ट को कैसे फॉर्मेट करते हैं? [2012]
उत्तर:
वेब पेज में विषय-वस्तु अर्थात् टेक्स्ट, इमेज आदि को फॉर्मेट व हाईलाइट करने के विभिन्न तरीके हैं। इनका विवरण इस प्रकार हैं।

  1. हैडिंग किसी वेब पेज पर महत्त्वपूर्ण शब्द को हाईलाइट करने के लिए हैडिंग का प्रयोग किया जाता है। HTML में, <H1> से लेकर <H6> तक हैडिंग दी गई है। यह किसी पेज की हैडिंग को व्यवस्थित करने का कार्य करती है।
  2. पैराग्राफ किसी पैराग्राफ द्वारा डॉक्यूमेण्ट को स्पष्ट रूप से दर्शाया जाता है। इसके लिए HTML, <P> टैग तथा <DIV> टैग का प्रयोग करता है तथा अगली लाइन से टेक्स्ट लिखने के लिए <BR> टैग का
    प्रयोग किया जाता है।
  3. फॉण्ट साइज HTML, फॉण्ट के चयन की सुविधा के साथ-साथ उसके साइज की अनुमति भी देता है। इसके लिए <FONT> टैग दिया जाता है। एक अन्य <BASEFONT> टैग फॉण्ट के बेसिक साइज को निर्धारित करता है। इसके लिए यह साइज से पहले + तथा – चिह्न का प्रयोग करता है।
  4. बैकग्राउण्ड कलर वेब पेज के बैकग्राउण्ड को कलर करके भी हाईलाइट किया जाता है। इसके लिए इस प्रारूप का प्रयोग करते हैं
    <BODY bgcolor =”color_name”>…….</BODY>
  5. टेक्स्ट को हाईलाइट करना यदि किसी पेज में किसी महत्त्वपूर्ण भाग व पंक्ति को सामान्य से अलग हाईलाइट करना हो, तो उसे तीन प्रकार से हाईलाइट किया जाता है।
    • बॉल्ड द्वारा किसी टेक्स्ट को गाढ़ा अर्थात् bold करके टेक्स्ट को हाईलाइट किया जा सकता है। इसके लिए <B> टैग का प्रयोग किया जाता है।
    • अण्डरलाइन द्वारा किसी टेक्स्ट को <U> टैग द्वारा अण्डरलाइन किया जा सकता है।
    • इटैलिक द्वारा किसी टैक्स्ट को<I> टैग द्वारा इटैलिक किया जा सकता है।
We hope the UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 6 HTML बेसिक help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 6 HTML बेसिक, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.


			

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 12 व्यक्ति के व्यक्तित्व पर बाल्यावस्था का प्रभाव

UP Board Solutions for Class 12  Home Science Chapter 12  पोषण एवं सन्तुलित आहार are part of UP Board Solutions for Class 12  Home Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 12  Home Science Chapter 12  पोषण एवं सन्तुलित आहार.

Board UP Board
Class Class 12
Subject Home Science
Chapter Chapter 12
Chapter Name व्यक्ति के व्यक्तित्व पर बाल्यावस्था का प्रभाव
Number of Questions Solved 14
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 12 व्यक्ति के व्यक्तित्व पर बाल्यावस्था का प्रभाव

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
व्यक्तित्व की अवधारणा में निहित है।
या
व्यक्ति के व्यक्तित्व की पहचान कैसे करेंगे?
(a) यति याविक गुण
(b) व्यक्ति के बाम गुण
(c) की के आन्तरिक र बाह्न गुण
(d) उपरीका में से कोई नहीं
उतर:
(c) गत अक और बाहा गुम।

प्रश्न 2.
वंशानुक्म किस रूप में व्यक्तित्व को प्रभावित करता है?
(a) लिंग निर्धारण
(b) शारीरिक विशेषताएँ
(c) शैक्षिक प्रतिभा
(d) ये सभी
उतर:
(d) ये सभी

प्रश्न 3.
बाल्यावस्था मानी जाती हैं
(a) 1 से 6 वर्ष
(b) 6 से 12 वर्ष
(c) 13 से 18 वर्ष
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 6 से 12 वर्ष

प्रश्न 4.
व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले कारक है।
(a) परिवार का प्रभाव
(b) स्कूल का प्रभाव
(c) माता-पिता का प्रभाव
(d) ये सभी
उत्तर
(d) ये सभी

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
व्यक्तित्व का अर्थ बताते हुए परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
व्यसा की आतरिक एवं बाह्य विशेषताओं का समन्वित एवं संगठित रूप ही व्यक्तित्व है। आँपोर्ट के अनुसार, “कात के अन्दा न मनोदैहिक गुणों का
त्यात्मक संगठन है, जो परिवेश के प्रति होने वाली अपुर्व अभियोजना का निर्णय

प्रश्न 2.
श्रेष्ठ व्यक्तित्व की चार मुख्य विशेषताओं को बताएँ। (2013)
अथव 
सन्तुलित व्यक्तित्व की विशेषताएँ लिखिए। 
(2007)
उत्तर:
सन्तुलित एवं श्रेष्ठ व्यक्तित्व की मुख्य विशेषताएँ निम्न हैं।

  • उत्तम मानसिक स्वास्थ्य
  • उत्म शारीरिक स्वास्थ्य
  • संवेगात्मक सन्तुलन
  • सामाजिकता
  • उतम चरित्र
  • महत्ता के साथ-साथ सन्तोष हो

प्रश्न 3.
बालक के व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले दो मुख्य कारक कौन-कौन से हैं? 
(2012)
उत्तर:
बालक के व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले दो मुख्य कारक निम्न हैं।

  • वंशानुक्रम
  • पयावरण

प्रश्न 4.
व्यक्तित्व के विकास की विभिन्न अवस्था लिखिए। (2014)
उत्तर:
व्यक्तित्व के विकास को मात्र चार अवस्थाएँ हैं ।

  • शैशवावस्था
  • बाल्यावस्था
  • किशोरावस्था
  • प्रौढ़ावस्था

प्रश्न 5.
परिवार में बालक के व्यक्तित्व पर सर्वाधिक प्रभाव किसका पड़ता है। (2004)
उत्तर:
परिवार में बालक के व्यक्तित्व पर सर्वाधिक प्रभाव माता-पिता का पड़ता है। इसके अतिरिका यासक के अक्तित्व के विकास पर तावरण का भी प्रभव पड़ता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1. अच्छे व्यक्तित्व की क्या-क्या विशेषताएँ हैं? (2013)
उतर:
श्रेष्ठ व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ प्रेत तितत्व की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

  1. सुदुङ मानसिक स्वास्थ्य समस्छ मन, एक अच्छे व्यक्तित्व की अभिन्न विशेषता है। स्वस्थ मन से आशय व्यक्ति की बुद्धि सामान्य होने, सदैव प्रसन्नचित रहने एवं समुचित मानसिक शक्तियों से सम्पन्न रहने से है।
  2. उत्तम शारीरिक स्वास्थ्य एक अच्छे व्यक्तित्व के लिए अवश्यक है कि शारीरिक गठन आयु एवं लिंग आदि के समानुपाती हो तथा शरीर स्वस्थ एवं रोगमुक्त हो।
  3. सामाजिकता व्यक्ति समाज के साथ जितना अच्छा समायोजन करने की | रियत में होता है, उन्ह ही उसका अक्व श्रेष्ठ माना जाता है।
  4. संवेगात्मक सन्तुलन संवेगात्मक रूप से सन्तुलित होने का अभिप्राय है। कि व्यक्ति न तो अति संवेगी हो और न ही सग शून्य हो। श्रेष्ठ किवि के लिए संवेगों का विकास सन्तुलित रूप से होना आवश्यक हैं।
  5. अच्छे लक्ष्य श्रेष्ठ व्यमित्व के लिए साक्ष्य सदैव अच्छ, स्वस्थ एवं व्यावहारिक होने चाहिए।
  6. चरित्रवान व्यक्तित्व चारित्रिक गुणों; जैसे-झूठ न बोलना, धोखा । देना, कोरी न करना, बेईमानी न करना आदि से सम्पन्न व्यक्ति का व्यक्तित्व उत्तम माना जाता है।
  7. सन्तोषी एवं महत्वाकांक्षी श्रेष्ठ व्यक्तित्व के लिए सन्तोष एवं महत्वाकांक्षा के बीच सन्तुलन स्थपित होना आवश्यक है। व्यक्ति को निरन्तर प्रगति को और प्रयत्नशील रहना चाहिए, किन्तु अपने प्रयत्नों में असफल होने पर भी उसे दुःख, चिन्ता या भग्नाशी का शिकार नहीं होना चाहिए।

प्रश्न 2. आनुवंशिकता से आप क्या समझते हैं? (2008, 10)
उतर:
आनुवंशिकता से आशय आनुवंशिक बालकों के किच के निर्माण एवं विकास को प्रभावित करती है। आनुवंशिकता का अग्रेजी शब्द हेरेरैडिटी (Heredity) होता है। तैटिन भाषण से निर्मित इस शब्द का आशय उस पूँजी से है, जो बच्चों को माता-पिता से उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त होती है अर्थात् आनुवंशिकता का अर्थ व्यक्तियों में पढ़ी-दर-पीढ़ी संधारित होने वाले शारीरिक, बौद्धिक तथा अन्य व्यक्तित्व सम्बन्धी गुणों से है। इस मान्यता के अनुसार बरु मा सन्तान के विभिन्न गुण एवं लक्षण अपने माता-पिता के समान होते हैं।

उदाहरणस्वरूप गोरे माता-पिता की सतान अधिकांशतः गोरी ही होती है। इस प्रकार हम कह सो हैं कि प्रजनन की प्रक्रिया के माध्यम से संचारित होने ने जैविकोय एवं अन्य गुणों से आनुशक माना जाता है। आनुवंशिकता के यह जीन्स होते है। आनुबंशिक के ही परिणामस्वरूप विभिन्न पीढ़ियों में समानता होती हैं।

प्रश्न 3.
टिप्पणी लिखिए बयों के विकास में खेल का महत्व। 
(2006, 13)
उत्तर:
खेल का बच्चों के सर्वांगीण विकास में बहुत योगदान है, क्योंकि खेलने से बच्चों के शरीर के सभी अगों का सही प्रकार से विकास होता है। इसके अतिरिक्त खेलते समय बच्चे में स्वस्थ प्रतिस्पर्ला कसा, टीम भावना, सहयोग, त्याग, हार के समय भी मुस्कुराना, अनुशासन आदि गुणों का विकास होता है। परिणामत: बच्चे का उत्तम प्रकार का समाजौकाण होता है। जहाँ तक संवेगात्मक गुणों के विकास का प्रश्न हैं, खेलने से अच्चे का तनाव दूर होता है। एवं उसमें संवेगात्मक स्थिरता आती हैं। इस प्रकार कह सकते हैं कि बच्चों के विकास में खेल का अत्यन्त महत्व है।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)

प्रश्न 1.
व्यक्तित्व को परिवार तथा वातावरण वैसे प्रभावित करता है? विवेचना कीजिए। 
(2015)
अथवा
मनुष्य के व्यक्तित्व पर वातावरण किस प्रकार प्रभाव डालता है? (2008)
अथवा
ऊध बालक के व्यक्तित्व के विकास में आनुवंशिकता तथा पर्यावरण का क्या महत्त्व है? 
(2018)
अथवा
बालक के यक्तित्व को प्रभावित करने वाले तत्व वौन-कौन 
(2003, 06)
अथवा 
व्यक्तित्व निर्माण में किन कारकों का योगदान होता है? 
(2006, 08, 09, 14)
उत्तर:
बालक के व्यक्तित्व निर्माण में आनुवंशिकता एवं पर्यावरण को प्रमुख योगदान होता है। आनुवंशिकता के अन्तर्गत वे समस्त कारक निहित होते हैं, जो बालक को अपने माता-पिता तथा पूर्वजों से प्राप्त होते हैं। बालक के शारीरिक गुण तथा अन्य विभिन्न जन्मजात गुण आनुशिकता से ही निघांरित होते हैं।

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि बालक के व्यक्तित्व के विकास में आनुवंशिकता का विशेष महत्व होता है। पर्यावरण में आशय उन् समस्त बाहरी कारकों से है, जो जम के उपरान्त बालक के जीवन को प्रभावित करते हैं। ये कारण भी अनेक है तथा इनका बालक के ग्यक्तित्व के त्रिकास में अत्यधिक योगदान होता है। उत्तम पर्यावरण बालक के विकास में सहायक तथा प्रतिकूल पर्यावरण आधिक होता है।

व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले कारक

ऐसे अनेक कारक है, जो जातक के व्यक्तित्व निर्माण में प्रभाव डालते हैं। बालक के व्यक्तित्व पर प्रभाव टालने वाले तत्व निम्नलिखित हैं।
1. शारीरिक बनावट का प्रभाव व्यक्ति के व्यक्तित्व पर उसके। आ
कार का प्रभाव जाने कारक पड़ता है। यह देखा जाता है कि गोल मटोल आदमो हास्यप्रिय, आरामपसन्द एवं सामाजिक होते हैं, जबकि दुबले-पतले। माता-पिता का प्रमा आदमी संयमी होते हैं। व्यक्ति। अपर आ सकतात ज भाव के शारीरिक स्वास्थ्य को ध्यान। आर्थिक स्तेि का प्रमा में रखते हुए। अन्य व्यक्ति। भी उसके प्रति अपने व्यवहार प्रतिमान का निर्धारण करते हैं। भव्य एवं आकर्षक शारीरिक गठन वाले व्यक्ति के प्रति सम्मान क व्यवहार किया जाता है।

2. अन्त:स्रावी ग्रन्थियाँ ये प्रन्थियों अपना रस रक्त में छोड़ देती हैं एवं रक्त इसे सम्पूर्ण शरीर में ले जाता है। यदि ये प्रन्थियाँ पर्याप्त मात्रा में रक्त को अपना रस देना बन्द कर दें, तो शरीर, बुद्धि एवं भाव में परिवर्तन हो आता है। यदि पीयूष ग्रन्थि आदि अपना काम मन्द गति से करती है, तो व्यक्ति की। लम्बाई नहीं बढ़ती तथा वह बौना हो जाता है, यदि ये अन्य तीव्र गति से कार्य करती हैं, तो व्यक्ति या लम्या हो जाता है।

3. स्नायविक संगठन निरीक्षण द्वारा यह देखा गया है कि यदि जल्यावस्था में क्ति के मस्तिष्क को किसी प्रकार का आघात लगता है, तो उसके व्यक्तित्व में विभिन्न प्रकार के परिवर्तन आ जाते है। इसके साथ-साथ विशिष्ट प्रकार के स्नायविक संगठन का भी व्यक्तित्व पर उल्लेखनीय प्रभाव

4. माता-पिता का प्रभाव माता-पिता का भय बच्चों पर बहुत अधिक पड़ता है, जो माता-पिता कठोर स्वभाव के होते हैं एवं अपने बच्चों को अधिक प्यार नहीं करते, ऐसे बच्चों में अन्तर्मुखी प्रवृत्ति बढ़ जाती हैं। वे एकान्त में रहने लगते हैं तथा हमेशा कल्पनाशील रहते हैं, जो माता-पिता अपने बच्चों को अधिक प्यार करते हैं, उन बच्चों में आत्मनिर्भरता के गुणों का अभाव पाया जाता है, वे बच्चे परावलम्बी हो जाते हैं। इस प्रकार उपरोक्त दोनों प्रकार के बच्चों का व्यक्तित्व स्वाभाविक तथा सामान्य नहीं होता है। अत: माता-पिता को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बच्चों के प्रति किए गए आचरण में प्यार एवं नियन्त्रण का सन्तुलन बना रहे।

5. बालक के जन्म-क्रम का प्रभाव परिवार में बच्चा जब तक इकलौता रहता है, तो उसके अधिकार को छीनने वाला कोई नहीं होता और न कोई उसकी सुख-सुविधाओं में हिस्सा में आता है, इसलिए यह निर्दी हो जाता है। इससे भिन्न परिवार में सबसे छोटा बच्चा, बों परिवार में सभी का स्नेह प्राप्त करता है एवं उत्तरदायित्वों से मुक्त होता है, हमेशा सहायता के लिए दूसरे की और ही देखता है।

6. क्रीड़ा-समूह का व्यक्तित्व पर प्रभाव जब बच्चा चलने-फिरने योग्य हो आता है, तो वह अन्य बच्चों के साथ मिलता-जुलता है। खेलकूद के लिए बच्चों का एक क्लौड़ा समूह बन जाता है। में अपना अपना कार्य बाँट लेते हैं। कार्यों के आधार पर ही व्यक्तित्व का विकास होता हैं।

7. आर्थिक स्थिति का प्रमाण परिवार की आर्थिक स्क्यिति व्यक्तित्व विकास को प्रभवित करने में महत्वपूर्ण योगदान देती है। सामान्य रूप से यह देखा गया है। कि जे बालक आर्थिक अभाओं में पलते हैं, वे प्रायः अपराधी प्रवृत्ति के बन् आते हैं, जयके सम्पन्न परिवारों के बालकों का विकास सुचारु रूप से होता है।

प्रश्न 2.
“बाल्यावस्था अछी आदतों के निर्माण की उत्तम अवस्था है।” इस कधन की पुष्टि कीजिए। 
(2015, 18)
उत्तर:
बाल्यावस्था सामान्यतः 2 से 12 वर्ष तक मानी जाती है। इस अवस्था को अच्छी आदतों के निर्माण की उत्तम अवस्था माना जाता है, क्योकि इस अवस्था में बालक के व्यक्तित्व के सभी घरों का विकास स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होने लगता हैं। इस कथन की विवेचना निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत की जा सकती है
1. शारीरिक विकास बाल्यावस्था के दौरान बालकों को शारीरिक क्षमता बढ़ 
जाती है। वे कार्यों को स्वतन्त्र रूप से कर सकते हैं, लक्ष्यों का निर्धारण कर सकते है तथा यह को अपेक्षाओं को पूरा कर सकते हैं। इस अवस्था में बालक शौच एवं नींद जैसी प्राथमिक क्रियाओं पर नियंत्रण करना सीखता है। नियमित रूप से मल त्याग को आदत एवं समय पर सोना व जागना ऐसौ आदतें हैं, जो बाल्यावस्था में निरन्तर अभ्यास करने से जीवनभर के लिए स्थायी हो जाती हैं। इस अवस्था में बालक पेशीय कौशलों में भी प्रमुख उपलब्धियाँ प्राप्त करता है। इस अवस्था में हाथ, भुजा एवं शरीर में सभी, आँख को गति के साथ समन्वित होते हैं। यालक तेज दौड़ने, उतने, कूदने आदि में सक्षम रहता है। अत: इस अवस्था में बालक में अपने शरीर को चुस्त दुरत रखने एवं नियमित मायाम करने की आदत हाली जा सकती है।

2. मानसिक विकास सामान्यतः 7 से 11 वर्ष की आयु में बच्चे में किसी वस्तु की विभिन्न विशेषताओं का ध्यान देने की क्षमता किसित होती है। यह क्षमता बच्चे की इस बात को समझने में सहायक होती है कि चीजों को देखने या समझने के भिन्न-भिन्न तरीके होते हैं, इसके परिणामस्वरूप बच्चे दूसरों के दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करते हैं। चिन्तन अधिक सचीला हो गता है और समस्या समाधान करते समय बच्चे विकल्पों के बारे में सोच सकते हैं। स्पतः इस अवस्था में माता-पिता एवं शिक्षक बच्चों में अच्छी आदतों का विकास करने में अपिक सफल होते हैं, क्योंकि वे बच्चों के समक्ष तार्किक उदाहरण प्रस्तुत कर उन्हें अच्छी आदतों के लाभ का ज्ञान करा सकते हैं, जिससे बच्चा स्वयं उन आदतों का अनुकरण करने की ओर उन्मुख होता है।

3. सामाजिक-सांवेगिक विकास बच्चे में विकसित हो रहे स्वतन्त्रता के बोध के कारण वह कार्यों को अपने तरीके से करता है। बच्चे की इन स्वरित क्रियाओं के प्रति माता-पिता जिस प्रकार में प्रक्रिया करते हैं वह पहलाक्ति बोध या अपराध बोध को विकसित करता है। उदाहरणत: यदि उन्हें यह अनुभव कराया जाता है कि उनके प्रश्न अनुपयोगी हैं तथा उनके द्वारा खेले गए खेल मूर्खतापूर्ण हैं, तो सम्भव है कि बच्चों में स्वय के प्रति दोष भावना विकसित हो। अतः बच्चों में कुछ नया रचनात्मक करने की एवं पहल करने की आदत का विकास, उनके कार्यों के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया से हो मारा है।

बाल्यावस्था में सांवेगिक विकास का दूसरा पक्ष बच्चो के आत्मबोध से जुड़ा है। इस अवस्था में बच्चे स्वयं को सामाजिक समूहों के सन्दर्भ में देखना शुरू करते हैं; जैसे विद्यालय के संगत क्लब, पर्यावरण काय आदि का सदस्य होना। इसके अतिरिक्त बाल्यावस्था में बच्चे अपनी लिंग भूमिका के प्रति जागरुक होते है। अतः इस अवस्था में बालक में दूसरे समूह अथवा दूसरे लिंग के व्यक्ति के अस्तित्व को स्वीकार की मनोवृत्ति पैदा की जा सकती है। बम्नतः बाल्यावस्था में सामाजिक रूप से सने का संसार विस्तृत हो जाता है एवं इसमें माता-पिता के अतिरिक्त परिवार तथा पास-पड़ोस एवं विशालय के प्रौढ़ व्यक्ति भी सम्मिलित हो जाते हैं। सामाजिक-सांवेगिक विकास का यह चरण बालक में अनुकरण, सहानुभूति, धेिश महशीलता आदि के विकास को प्रसाहित करता है।

4. नैतिक विकास इस अवस्था में बालक माता-पिता अथवा समाज के नियमों के आधार पर अपने नैतिक र्को को विकसित करता है। बच्चे इन नियमों को स्वयं के नियमों के रूप में स्वीकृत करते हैं। दूसरों की स्वीकृति प्राप्त करने के लिए इन नियमों को आत्मसात् कर लिया जाता है। बच्चे इन नियमों को ऐसे सुनिश्चित दिशा-निर्देश के रूप में देखते हैं, जिनका अनुसरण किया जाना चाहिए।

उपरोका विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि बाल्यावस्था अच्छी आदतों के विकास की उत्तम अवस्था है।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 12 व्यक्ति के व्यक्तित्व पर बाल्यावस्था का प्रभाव help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12  Home Science Chapter 12 व्यक्ति के व्यक्तित्व पर बाल्यावस्था का प्रभाव, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 6 संक्रामक रोग : प्रसार तथा नियन्त्रण

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 6 संक्रामक रोग: प्रसार तथा नियन्त्रण are part of UP Board Solutions for Class 12 Home Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 6 संक्रामक रोग: प्रसार तथा नियन्त्रण.

Board UP Board
Class Class 12
Subject Home Science
Chapter Chapter 6
Chapter Name संक्रामक रोग : प्रसार तथा नियन्त्रण
Number of Questions Solved 50
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 6 संक्रामक रोग : प्रसार तथा नियन्त्रण

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
संक्रामक रोगों का संक्रमण किनके द्वारा होता है? (2010)
(a) वायु द्वारा
(b) भोजन तथा जल द्वारा
(c) कीटों द्वारा
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 2.
डी.पी.टी. का टीका किन-किन रोगों की रोकथाम के लिए लगाया जाता है? (2004,06)
(a) सिर दर्द
(b) पैर में सूजन
(c) डिफ्थीरिया, कुकुर खाँसी, टिटनेस
(d) आँख दुखना
उत्तर:
(c) डिफ्थीरिया, कुकुर खाँसी, टिटनेस

प्रश्न 3.
शरीर की रोगों से संघर्ष करने की शक्ति को कहते हैं?
(a) नि:संक्रमण
(b) रोग-प्रतिरोधक क्षमता
(C) उदभवन अवधि
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) रोग-प्रतिरोधक क्षमता

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन-सा पदार्थ रासायनिक नि:संक्रामक नहीं है? (2006)
(a) चूना
(b) ब्लीचिंग पाउडर
(c) पोटैशियम परमैंगनेट
(d) जलाना
उत्तर:
(d) जलाना

प्रश्न 5.
ठोस नि:संक्रामक है। (2006)
(a) फिनायल
(b) फार्मेलीन
(C) डी.डी.टी.
(d) चूना
उत्तर:
(d) चूना

प्रश्न 6.
छोटी माता का रोगाणु कारक है।
(a) वायरस
(b) जीवाणु
(c) प्रोटोजोआ
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) वायरस

प्रश्न 7 .
किस जीवाणु द्वारा क्षय रोग फैलता है? (2003, 07)
(a) क्यूलेक्स
(b) बैसिलस
(c) वायरस
(d) अमीबा
उत्तर:
(b) बैसिलस

प्रश्न 8.
मक्खियों द्वारा कौन-सा रोग फैलता है? (2004)
(a) चेचक
(b) हैजा
(c) टायफाइड
(d) मलेरिया
उत्तर:
(b) हैजा

प्रश्न 9.
मलेरिया रोग फैलता है। (2006, 11)
(a) चूहे द्वारा
(b) मच्छर द्वारा
(C) मक्खी द्वारा
(d) तिलचट्टा द्वारा
उत्तर:
(b) मच्छर द्वारा

प्रश्न 10.
टायफाइड रोगी को रोग के पश्चात् किस प्रकार का भोजन देना चाहिए? (2018)
(a) तरल
(b) अर्द्धतरल आहार
(c) सामान्य आहार
(d) इनमें से सभी
उत्तर:
(b) सामान्य आहार

प्रश्न 11.
हैजा के जीवाणु का नाम है? (2018)
(a) वायरस
(b) विब्रियो कॉलेरी
(c) कोमा बैसिलस
(d) साल्मोनेका टाइफी
उत्तर:
(b) विब्रियो कॉलेरी

प्रश्न 12.
कौन-सा रोग दूषित जल से फैलता है? (2018)
(a) हैजा
(b) मियादी बुखार
(c) अतिसार
(d) ये सभी
उत्तर:
(b) हैजा

प्रश्न 13.
पागल कुत्ते के काटने से कौन-सा रोग हो जाता है? (2013)
(a) मलेरिया
(b) रेबीज.
(c) फाइलेरिया
(d) प्लेग
उत्तर:
(b) रेबीज

प्रश्न 14.
रेबीज रोग का कौन-सा लक्षण है? (2010, 13)
(a) उल्टी होना।
(b) पानी से डरना
(C) दस्त होना
(d) जाड़े से काँपना
उत्तर:
(b) पानी से डरना

प्रश्न 15.
प्लेग रोग फैलता है। (2007)
(a) चूहे द्वारा
(b) मच्छर द्वारा
(C) मक्खी द्वारा
(d) तिलचट्टे द्वारा
उत्तर:
(a) चूहे द्वारा

प्रश्न 16.
निम्न में से कौन-सा हिपेटाइटिस सर्वाधिक खतरनाक होता है?
(a) B
(b) C
(C) D
(d) G
उत्तर:
(d) B

प्रश्न 17.
निम्न में से मस्तिष्क में सूजन आने का कौन-सा विशिष्ट लक्षण है?
(a) मलेरिया का
(b) डेंगू का
(C) इन्सेफलाइटिस का
(d) पीत ज्वर
उत्तर:
(c) इन्सेफलाइटिस का

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक, 25 शब्द)

प्रश्न 1.
संक्रामक रोग क्या हैं? (2006)
उत्तर:
विभिन्न रोगाणुओं (जीवाणु, विषाणु, कवक तथा प्रोटोजोआ आदि) के कारण होने वाले रोग ‘संक्रामक रोग’ कहलाते हैं। इनको संक्रमण विभिन्न माध्यमों द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में होता है।

प्रश्न 2.
संक्रामक रोगों की उदभवन अवधि से क्या आशय है?
उत्तर:
शरीर में रोगाणुओं के प्रवेश तथा रोग के लक्षण प्रकट होने के मध्य जो अन्तराल होता है, उसे रोग की उद्भवन अवधि अथवा सम्प्राप्ति काल कहते हैं।

प्रश्न 3.
संक्रामक रोग किन-किन माध्यमों द्वारा फैलते हैं? (2006)
उत्तर:
संक्रामक रोग जल एवं भोजन, वायु, रोगवाहक कीटों, चोट अथवा घाव, रोगी के प्रत्यक्ष सम्पर्क अथवा यौन सम्बन्धों के माध्यम से फैलते हैं।

प्रश्न 4.
किन्हीं पाँच संक्रामक रोगों के नाम बताइए। (2016)
उत्तर:
क्षय रोग, हैजा, टाइफाइड, अतिसार, रेबीज आदि संक्रामक रोग हैं।

प्रश्न 5.
जल द्वारा संवाहित होने वाले रोग कौन-कौन-से हैं? (2012)
उत्तर:
जल के माध्यम से फैलने वाले मुख्य रोग हैं-टायफाइड, हैजा, अतिसार, पेचिश, पीलिया आदि।

प्रश्न 6.
निःसंक्रमण एवं निःसंक्रामक शब्दों का अर्थ स्पष्ट कीजिए। (2011,16)
उत्तर:
रोगाणुओं को नष्ट करने की प्रक्रिया को ‘नि:संक्रमण’ कहते हैं। नि:संक्रमण के लिए अपनाए जाने वाले पदार्थों को ‘नि:संक्रामक’ कहा जाता है।

प्रश्न 7.
जीवाणुओं द्वारा फैलने वाले दो रोगों के नाम लिखिए। (2014)
अथवा
उन बीमारियों के नाम लिखिए, जो जीवाणुओं के कारण होती हैं।
उत्तर:
जीवाणुओं द्वारा फैलने वाले रोग हैं-हैजा, क्षय रोग, अतिसार, प्लेग आदि।

प्रश्न 8.
क्षय रोग का कारण लिखिए। (2006)
उत्तर:
क्षय रोग माइक्रोबैसिलस ट्यूबरकुलोसिस नामक जीवाणु के संक्रमण के कारण होता है।

प्रश्न 9.
बी.सी.जी. का टीका किस रोग की रोकथाम के लिए लगाया जाता है?
उत्तर:
बी.सी.जी. का टीका क्षय रोग (टी. बी.) की रोकथाम के लिए लगाया जाता है।

प्रश्न 10.
मलेरिया रोग का कारण लिखिए। (2004)
उत्तर:
मलेरिया नामक रोग ‘प्लाज्मोडियम’ नामक परजीवी प्रोटोजोआ के कारण होता है। इसका संक्रमण मादा ऐनाफ्लीज मच्छर के माध्यम से होता है।

प्रश्न 11.
मलेरिया रोग में किस प्रकार का भोजन देना चाहिए? (2007)
उत्तर:
मलेरिया रोग में हल्का, सुपाच्य तथा पर्याप्त कैलोरीयुक्त भोजन दिया जाना चाहिए।

प्रश्न 12.
पागल कुत्ते के काटने से उत्पन्न रोग के दो लक्षण लिखिए। (2009)
उत्तर:
पागल कुत्ते के काटने से उत्पन्न रोग (हाइड्रोफोबिया) के लक्षण हैं।

  • तीव्र सिरदर्द, तीव्र ज्वर तथा गले एवं छाती की पेशियों के संकुचन से पीड़ा होती है।
  • गले की नलियों के अवरुद्ध होने से तरल आहार ग्रहण करने में कठिनाई तथा रोगी को जल से भय लगता है।

प्रश्न 13.
कुत्ते के काटने के दो प्राथमिक उपचार लिखिए। (2003)
उत्तर:
कुत्ते के काटने के दो प्राथमिक उपचार हैं।

  • कटे हुए स्थान को कार्बोलिक साबुन एवं स्वच्छ जल से भली प्रकार धोएँ।
  • एण्टीसेप्टिक औषधि का लेप लगाएँ।

प्रश्न 14.
अतिसार के रोगी को कैसा भोजन देना चाहिए? (2009)
उत्तर:
अतिसार के रोगी को तरल, हल्का एवं सुपाच्य भोजन देना चाहिए।

प्रश्न 15.
जोड़ों में दर्द एवं लसीका वाहिनियों में सूजन किन-किन रोगों के प्रमुख लक्षण है?
उत्तर:
जोड़ों में दर्द एवं लसीका वाहिनियों में सूजन क्रमश: डेंगू एवं हाथीपाँव रोग के लक्षण हैं।

प्रश्न 16.
एल्फा विषाणु जनित रोग का नाम बताते हुए इसके संवाहक का नाम भी बताइट
उत्तर:
चिकनगुनिया रोग का कारक एल्फा विषाणु होता है, जिसका संवहन एडीज एजिप्टी एवं एल्बोपिक्टस मच्छर द्वारा होता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक, 50 शब्द)

प्रश्न 1.
संक्रामक रोगों की रोकथाम के सामान्य उपाय क्या हैं? (2012)
उत्तर:
संक्रामक रोगों के उपचार की तुलना में नियन्त्रण एवं बचाव के उपाय अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि संक्रामक इसकी रोगों का प्रसार एक साथ असंख्य व्यक्तियों को प्रभावित करता है। इसके अतिरिक्त इसकी रोकथाम के उपायों को व्यापक स्तर पर होना भी अतिआवश्यक है। व्यक्तिगत भागीदारी के साथ-साथ सार्वजनिक प्रयास दोनों ही समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।

संक्रामक रोगों की रोकथाम के सामान्य उपाय

संक्रामक रोगों की रोकथाम के कुछ सामान्य उपाय निम्नलिखित हैं।

  1. स्वास्थ्य विभाग को सूचित करना किसी भी व्यक्ति को संक्रामक रोग होने की स्थिति में उसकी सूचना निकट के स्वास्थ्य अधिकारी अथवा चिकित्सक को अवश्य देनी चाहिए, जिससे समय रहते रोग के प्रसार को रोका जा सके।
  2. रोगग्रस्त (संक्रमित) व्यक्ति को अलग रखना संक्रामक रोगों को फैलने से | रोकने के लिए विशेषकर वायुवाहित (एयर-बॉर्न) रोगों के मामले में, संक्रमित व्यक्तियों के उपचार की अलग से विशेष व्यवस्था की जानी चाहिए, जिससे रोगी का समुचित उपचार भी हो जाए एवं अन्य स्वस्थ व्यक्ति भी संक्रमण से बच जाए।
  3. रोग-प्रतिरक्षा के उपाय संक्रामक रोगों की रोकथाम का महत्त्वपूर्ण उपाय शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को विकसित करना है। नियमित रूप से शुद्ध जल एवं पौष्टिक भोजन का सेवन, विभिन्न रोगों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है। वर्तमान में विभिन्न संक्रामक रोगों से बचने तथा रोग प्रतिरक्षा शक्ति के विकास हेतु टीके भी उपलब्ध हैं। सभी स्वस्थ व्यक्तियों को ऐसे टीके लगाना अतिआवश्यक है।

प्रश्न 2.
रोग-प्रतिरोधक क्षमता से आप क्या समझते हैं? (2011)
अथवा
टिप्पणी लिखिए-रोग-प्रतिरोधक क्षमता (2018, 12)
उत्तर:
रोग-प्रतिरोधक क्षमता
हमारा शरीर अधिकांश बाह्य कारकों से स्वयं अपनी रक्षा कर लेता है। शरीर की विभिन्न रोगकारक जीवों से लड़ने की क्षमता, जो उसे प्रतिरक्षी-तन्त्र के कारण मिली है, रोग-प्रतिरोधक क्षमता कहलाती है। रोग-प्रतिरोधक क्षमता दो प्रकार की सेती है ।

1. सहज प्रतिरक्षा सहज प्रतिरक्षा एक प्रकार की अविशिष्ट रक्षा है, जो जन्म के समय से ही मौजूद होती है। वस्तुतः हमारे शरीर में सभी प्रकार के संक्रमणों के विरुद्ध कुछ अवरोध (बैरियर) कार्य करते हैं, इन्हें ‘अविशिष्ट प्रतिरक्षी तन्त्र’ (Non-Specific Defense Mechanism) कहते हैं। ये अवरोध चार प्रकार के होते हैं ।

  • शारीरिक अवरोध (फीजिकल बैरियर) शरीर पर त्वचा मुख्य अवरोध है, जो बाहर से रोगाणुओं के प्रवेश को रोकती है।
  • कायिकीय अवरोध (फिजियोलॉजिकल बैरियर) आमाशय में अम्ल, मुँह में लार, आँखों के आँसू ये सभी रोगाणुओं की वृद्धि को रोकते हैं।
  • कोशिकीय अवरोध (सेल्युलर बैरियर) रक्त में उपस्थित श्वेत रुधिर कणिकाएँ, न्यूट्रोफिल्स एवं मोनोसाइट्स रोगाणुओं का भक्षण करती हैं।
  • साइटोकाइन अवरोध विषाणु संक्रमित कोशिकाएँ इण्टरफेरॉन नामक प्रोटीनों का स्रावण करती हैं, जो असंक्रमित कोशिकाओं को और आगे विषाणु संक्रमण से बचाती है।

2. उपार्जित प्रतिरक्षा उपार्जित प्रतिरक्षा रोगजनक विशिष्ट रक्षा है। हमारे शरीर का जब पहली बार किसी रोगजनक (रोगाणु) से सामना होता है, तो शरीर निम्न तीव्रता की प्राथमिक अनुक्रिया (रेस्पॉन्स) करता है। बाद में उसी रोग से सामना होने पर बहुत ही उच्च तीव्रता की द्वितीय अनुक्रिया होती है।
उपार्जित प्रतिरक्षा भी दो प्रकार की होती है।

  • सक्रिय प्रतिरक्षण (Active Immunity) हमारे शरीर के रक्त में मौजूद दो विशेष प्रकार के लसीकाणु प्रतिरक्षी अनुक्रियाएँ करते हैं। ये हैं-बी लसीकाणु और टी-लसीकाणु। बी-लसीकाणु हमारे शरीर में एण्टीबॉडीज उत्पन्न करते हैं, जबकि टी-लसीकाणु एण्टीबॉडीज उत्पन्न करने में बी-कोशिकाओं की सहायता करती है।
  • निष्क्रिय प्रतिरक्षण (Passive Immunity) जब शरीर की रक्षा के लिए बने-बनाए प्रतिरक्षी (एण्टीबॉडीज) सीधे ही शरीर को दिए जाते हैं, तो यह निष्क्रिय प्रतिरक्षा कहलाती है।

प्रश्न 3.
चेचक (बड़ी माता) रोग का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
चेचक कारक एवं प्रसार वेरियोला वाइरस नामक विषाणु इस रोग का कारक है। ये विषाणु वायु के माध्यम से व्यक्ति के श्वसन-तन्त्र में प्रवेश करते हैं। परम्परानुसार इसे ‘शीतला रोग’ की संज्ञा भी दी जाती है।
उद्भवन काल सामान्यत: इस रोग के लक्षण संक्रमण से 10 से 12 दिन की अवधि के अन्तराल पर प्रकट होते हैं। लक्षण रोग के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं।

  1. तीव्र ज्वर के साथ, सिर व कमर में दर्द होता है।
  2. जी मिचलाना एवं वमन की शिकायत हो सकती है।
  3. लक्षण स्पष्ट होने पर आँखें लाल हो जाती हैं तथा मुँह आदि पर लाल दाने निकल आते हैं। चेचक के दाने लाल रंग के होते हैं, बाद में इनमें तरल द्रव भर जाता है।
  4. रोग के ठीक होने की प्रक्रिया में 9-10 दिन बाद दाने मुरझाने लगते हैं एवं उनके स्थान पर पपड़ी-सी जम जाती है।

बचाव के उपाय इस रोग से बचाव हेतु निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं

  1. प्रत्येक व्यक्ति को समयानुसार चेचक का टीका अवश्य लगवा लेना चाहिए।
  2. रोगी की अलग व्यवस्था करनी चाहिए एवं स्वस्थ व्यक्तियों को उसके सम्पर्क में नहीं आने देना चाहिए।
  3. रोगी के बर्तन, बिस्तर तथा कपड़ों आदि को अलग ही रखना चाहिए तथा रोगी के ठीक होने पर उन्हें भली-भाँति नि:संक्रमित किया जाना चाहिए।
  4. रोगी के मल-मूत्र, थूक तथा उल्टी आदि को खुले में नहीं छोड़ना चाहिए तथा उनके विसर्जन की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।

प्रश्न 4.
खसरा नामक रोग का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
खसरा
कारण एवं प्रसार
यह एक विषाणु जनित रोग है। बच्चे इससे अधिक प्रभावित होते हैं। इसके विषाणु रोगी के गले के श्लेष्म तथा नाक के स्राव में विद्यमान रहते हैं तथा हवा में मिलकर संक्रमण का कारण बन जाते हैं।

उद्भवन काल
विषाणु के शरीर में प्रवेश करने से रोग के लक्षण उत्पन्न होने में सामान्यतः 10-15 दिन लगते हैं। कभी-कभी यह अवधि 20 दिन की भी हो सकती है
लक्षण इस रोग के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं।

  • व्यक्ति को ठण्ड के साथ बुखार आता है तथा बेचैनी महसूस होती है।
  • आँखें लाल हो जाती हैं तथा खाँसी, छींक आदि की तीक्ष्णता बढ़ जाती है।
  • धीरे-धीरे पूरे शरीर पर दाने निकल आते हैं तथा बुखार तीव्र हो जाता है।

बचाव के उपाय इस रोग से बचने के उपाय निम्नलिखित हैं।

  • खसरे से पीड़ित बच्चे को एक अलग हवादार कमरे में रखना चाहिए।
  • रोगी की नाक व मुँह से निकले स्राव को पुराने व स्वच्छ कपड़े से पोंछकर उसे जला देना चाहिए।
  • इधर-उधर थूकने की जगह केवल थूकदान का प्रयोग करना चाहिए। थूकने | वाले बर्तन में नि:संक्रामक पदार्थ डालना भी ठीक रहता है।
  • रोगी शिशु के वस्त्रों एवं खिलौनों को भी नि:संक्रामक पदार्थ से साफ करना आवश्यक है।
  • इस रोग से बचाव हेतु व्यक्तिगत स्वच्छता विशेषत: नाक व गले की सफाई विशेष महत्त्व रखती है।

उपचार इस रोग के विरुद्ध स्वाभाविक प्रतिरोधक क्षमता बहुत ही कम शिशुओं में होती है यद्यपि एक बार खसरा होने पर प्रतिरक्षक क्षमता उत्पन्न हो जाती है। तथापि भविष्य में इसके होने की सम्भावना को कम करने के लिए बच्चों को खसरे का टीका लगवाना अनिवार्य होता है। देखभाल में रोगी को अधिक गर्मी तथा अधिक ठण्ड से बचाना आवश्यक होता है, क्योंकि इस रोग के साथ निमोनिया होने का भी भय रहता है।

प्रश्न 5.
रेबीज नामक संक्रामक रोग के लक्षण, उदभवन काल एवं उपचार के उपायों पर प्रकाश डालिए।
अथवा
टिप्पणी लिखिए- कुत्ते का काटना (2018)
उत्तर:
रेबीज
रेबीज एक विषाणुजनित रोग है। इस रोग के विषाणु रोगी पशु (कुत्ता, गीदड़, बन्दर आदि) की लार में रहते हैं। अतः जब कोई रोगग्रस्त पशु मुख्यतः कुत्ता, गीदड, बन्दर किसी व्यक्ति को काटता है, तो उसकी लार में विद्यमान विषाणु स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं एवं व्यक्ति को रोगग्रस्त कर देते हैं।
लक्षण रेबीज के विषाणु रोगी व्यक्ति के केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र पर प्रभाव डालते हैं। इस स्थिति में निम्नलिखित लक्षण प्रकट होते हैं।

  • तीव्र सिरदर्द, तीव्र ज्वर तथा गले एवं छाती की पेशियों के संकुचन से पीड़ा होती है।
  • गले की नलियों के अवरुद्ध होने से रोगी को तरल आहार ग्रहण करने में – कठिनाई होती है तथा जल से भय लगता है।

उद्भवन काल प्रायः पागल कुत्ते के काटने पर 15 दिन की अवधि में रोग के लक्षण प्रकट होने लगते हैं, किन्तु कभी-कभी 7-8 महीने अथवा इससे भी अधिक समय तक इसका प्रभाव बना रह सकता है। सामान्यतः रोगग्रस्त या पागल कुत्ता काटने के बाद अधिकतम 15 दिन की अवधि में मर जाता है। अतः यदि कुत्ता मनुष्य को काटने के बाद भी जीवित रहे अथवा पागल न हो तो उसे रोगग्रस्त नहीं माना जाना चाहिए।
उपचार रोगग्रस्त पशु के काटने पर निम्नलिखित उपचार करने चाहिए

  • काटे गए स्थान को काबलिक साबुन एवं स्वच्छ जल से भली-भाँति धोना चाहिए।
  • घाव पर एण्टीसेप्टिक की औषधि का लेप लगाना चाहिए।
  • घाव पर पट्टी नहीं बाँधनी चाहिए, अपितु उसे खुला रखना चाहिए।
  • कुत्ते के काटने पर एण्टीरेबीज इंजेक्शन लगवाने भी अनिवार्य हैं।

प्रश्न 6.
प्लेग रोग पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
प्लेग
कारण एवं प्रसार यह रोग पाश्च्यूरेला पेस्टिस नामक जीवाणु से होता है। इसका संक्रमण चूहों पर पाए जाने वाले पिस्सुओं से होता है। प्लेग के जीवाणु पिस्सुओं के माध्यम से चूहों को संक्रमित करते हैं, जिससे चूहे मरने लगते हैं। तत्पश्चात् पिस्सुओं द्वारा मनुष्यों को काटने पर, ये जीवाणु व्यक्ति के रक्त परिसंचरण में शामिल हो जाते हैं एवं व्यक्ति को रोगग्रस्त कर देते हैं। इसके बाद व्यक्ति से व्यक्ति में संक्रमित होने वाला यह रोग महामारी का रूप धारण कर लेता है।
लक्षण इस रोग के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं।

  • प्लेग के विषाणु के आक्रमण के प्रारम्भ में ही व्यक्ति अति तीव्र ज्वर (107°F | तक) से ग्रस्त हो जाता है।
  • व्यक्ति की आँखें लाल हो जाती हैं एवं अन्दर फँसती हुई प्रतीत होती हैं।
  • कभी-कभी रोगी को दस्त तथा कमजोरी भी होने लगती है।.
  • रोगी की दशा गम्भीर होने पर उसकी बगल तथा जाँघों में कुछ गिल्टियाँ निकल आती हैं। इस दशा में उसकी मृत्यु भी हो सकती है।

बचाव के उपाय इस रोग से बचाव के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं।

  • इस रोग से बचाव के लिए घर तथा सार्वजनिक स्थलों को स्वच्छ रखना अत्यन्त आवश्यक है।
  • विषाणु से संक्रमित क्षेत्र में चूहों को समाप्त करके भी महामारी के प्रकोप | को नियन्त्रित किया जा सकता है।
  • प्लेग के प्रकोप के दिनों में नंगे पैर नहीं रहना चाहिए इससे रोगवाहक कीटों के काटने की सम्भावना बढ़ जाती है।
  • प्लेग का टीका लगवाना भी अनिवार्य है।
    उपचार प्लेग के लक्षण प्रकट होते ही रोगी को तुरन्त अस्पताल में भर्ती कर लेना चाहिए। इस रोग में अच्छी चिकित्सकीय सलाह एवं उपचार का विशेष महत्त्व होता है, अन्यथा रोगी की मृत्यु भी हो सकती है।

प्रश्न 7.
कुष्ठ रोग कैसे फैलता है? इस रोग के लक्षण, बचाव तथा उपचार के उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कुष्ठ रोग
कारण एवं प्रसार
माइकोबैक्टीरियम लैप्री नामक जीवाणु इस रोग का कारक है। ये जीवाणु रोगी व्यक्ति के शरीर के घावों में विद्यमान रहते हैं। अतः स्वस्थ व्यक्ति के रोगी के घावों के सम्पर्क में आने पर, ये जीवाणु स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर उसे संक्रमित कर सकते हैं।

लक्षण प्रारम्भ में रोगी के शरीर में सफेद रंग के दाग पड़ते हैं, जो क्रमश: घावों में बदल जाते हैं। रोगी में दो प्रकार के लक्षण प्रकट हो सकते हैं।

1. चकत्ते वाली त्वचा संवेदनाहीन हो जाए अथवा स्पर्श करने पर उसमें | असहनीय पीड़ा का अनुभव हो। इन स्थानों पर बने फफोले बाद में घाव में बदल जाते हैं। इन घावों से रक्त व मवाद निकलता है। हाथ-पैरों की अंगुलियाँ गलने लगती हैं। यह अवस्था संक्रमण-योग्य होती है।

2. त्वचा के सूखने पर, पहले लाल दाने बनते हैं, जो धीरे-धीरे सफेद रंग के हो जाते हैं। शरीर के बालों को स्वतः गिरना अन्य प्रमुख लक्षण है। इसके अतिरिक्त गले में गिल्टियाँ बनना, आवाज भारी एवं भद्दी होना, सिरदर्द आदि लक्षण दिखाई दे सकते हैं। यह अवस्था संक्रमण-योग्य नहीं होती।

बचाव के उपाय इस रोग से बचाव के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. रोगी को स्वस्थ मनुष्य के सम्पर्क में आने से बचना चाहिए।
  2. व्यक्तिगत स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
  3. रोगी के वस्त्रों को उबालकर धोना चाहिए इससे संक्रमण की आशंका कम | हो जाती है। रोगी द्वारा प्रयोग की गई वस्तुओं; जैसे-बर्तन आदि को नि:संक्रामक से धोना चाहिए।

उपचार कुष्ठ रोग पूर्णतः उपचार योग्य रोग है। सरकार द्वारा अनुदान प्राप्त अनेक अस्पतालों में इसका नि:शुल्क इलाज उपलब्ध कराया जा रहा है। आवश्यक है कि संक्रमण की प्रारम्भिक अवस्था में ही इसका निदान हो जाए, जिससे इस रोग को समय रहते ठीक किया जा सके। रोगी का सामाजिक समायोजन उपचार-प्रक्रिया का ही महत्त्वपूर्ण चरण है। अत: इस ओर ध्यान देना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 8.
पेचिश एवं अतिसार में क्या अन्तर है? (2007)
उत्तर:
पेचिश एवं अतिसार दोनों ही पाचन तन्त्र से सम्बन्धित संक्रामक रोग हैं। दूषित पेय जल एवं भोजन, संक्रमण के प्रमुख स्रोत हैं। घरेलू मक्खियाँ इन | रोगों को फैलाने में रोगवाहक का कार्य करती हैं।

इन समानताओं के बावजूद पेचिश एवं अतिसार में कुछ स्पष्ट अन्तर भी हैं, जो निम्न प्रकार हैं।

क्र.सं.

 पेचिश  अतिसार

1

पेचिश, मनुष्य की बड़ी आँत में पाए जाने वाले एण्टअमीबा हिस्टोलिटिका नामक प्रोटोजोआ एवं वैसीलरी  जीवाणु से होती है। अतिसार जीवाणु जनित रोग है। निरन्तर अपच रहने से भी अतिसार का रोग हो सकता है।

2

पेचिश रोग में मल के साथ आँव (श्लेष्म) एवं रक्त आता है। ज्वर, उदरीय पीड़ा एवं ऐंठन, पेचिश के अन्य लक्षण हैं। अतिसार के रोगी को भी निरन्तर जलीय दस्त होते रहते हैं, किन्तु पेचिश के इसमें मल के साथ आँव (श्लेष्म) एवं रक्त नहीं आता है।

3

पेचिश, बच्चों एवं बड़ों सभी को हो सकता है। अतिसार का संक्रमण मुख्य रूप से  प्राय: बच्चों को हुआ करता है।

प्रश्न 9.
अतिसार के कारण, लक्षण एवं उपचार लिखिए। (2007)
अथवा
डायरिया रोग के लक्षण और उपचार लिखिए।(2018)
उत्तर:
अतिसार के कारण
बार-बार दस्त आना अतिसार (Diarrhoea) कहलाता है। कुछ जीवाणु जैसे इश्चेरीचिया कोलाई, शिगेला आदि इसके प्रमुख कारक हैं। यह रोग दूषित जल एवं भोजन के माध्यम से फैलता है। यह रोग मुख्यत: बच्चों को होता है यद्यपि बड़े भी इससे संक्रमित हो सकते हैं। इसके संक्रमण के प्रसार में मक्खियाँ रोगवाहक का कार्य करती हैं।

अतिसार के लक्षण
इस रोग के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं।

  1. अत्यधिक दस्त के कारण निर्जलीकरण की स्थिति उत्पन्न होती है।
  2. सामान्यतः निर्जलीकरण की अवस्था में रोगी चिड़चिड़ा हो जाता है, आँखें अन्दर धंस जाती हैं, जीभ तथा गालों का अन्त: भाग सूख जाता है।
  3. शारीरिक भार में अचानक कमी, मन्द नाड़ी, गहरी साँसें इसके प्रमुख लक्षण हैं।

अतिसार के नियन्त्रण एवं उपचार के उपाय
अतिसार को नियन्त्रित करने के लिए निम्न उपाय किए जा सकते हैं।

  1. रोग के पूर्णरूपेण ठीक होने तक बिस्तर पर पूरा आराम आवश्यक है।
  2. निर्जलीकरण से रक्षा के उपाय किए जाने चाहिए। एक अच्छा जीवनरक्षक घोल, एक चम्मच चीनी तथा एक चुटकी नमक को 200 मिली जल में घोलकर बनाया जा सकता है। इसे मुख द्वारा दिया जाने वाला पुनर्जलीकरण विलयन (ORS) कहते हैं।
  3. थोड़ा आराम मिलने पर रोगी को हल्के, तरल एवं सुपाच्य भोज्य पदार्थ दिए जा सकते हैं।
  4. पानी को उबालकर ठण्डा करके रोगी को देना चाहिए।
  5. चिकित्सक की सलाहानुसार प्रतिसूक्ष्मजैविक दवाओं का प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 10.
डेंगू के लक्षण व उपचार पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
इस रोग के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं।

  1. ठण्ड लगने के बाद अचानक तेज बुखार चढ़ना।
  2. सिर मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द होना।
  3. आँखों के पिछले हिस्से में दर्द होना, जो आँखों को दबाने या हिलाने से और बढ़ जाता है।
  4. बहुत ज्यादा कमजोरी लगना, भूख न लगना और जी मिचलाना और मुँह का स्वाद खराब होना।
  5. गले में हल्का -सा दर्द होना।
  6. शरीर विशेषकर चेहरे, गर्दन और छाती पर लाल-गुलाबी रंग के रैशेज होना।

उपचार इस रोग से बचाव के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. यदि रोगी को साधारण डेंगू बुखार है, तो उसका इलाज व देखभाल घर पर की जा सकती है।
  2. डॉक्टर की सलाह लेकर पैरासिटामोल (क्रोसिन आदि) ले सकते हैं।
  3. इनसे प्लेटलेट्स कम हो सकते हैं।
  4. यदि बुखार 102 डिग्री फॉरनेहाइट से ज्यादा है, तो रोगी के शरीर पर ठण्डे पानी की पट्टियाँ रखें।
  5. सामान्य रूप से खाना देना जारी रखें। बुखार की हालत में शरीर कोऔर ज्यादा खाने की जरूरत होती है।
  6. मरीज को आराम करने दें।

किसी भी तरह के डेंगू में रोगी के शरीर में पानी की कम नहीं आने देनी चाहिए। उसे अधिक मात्रा में पानी और तरल पदार्थ (नींबू पानी, छाछ, नारियल पानी आदि) पिलाएँ, ताकि ब्लड गाढ़ा न हो और जमे नहीं। साथ ही मरीज को पूरा आराम करना चाहिए।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (5 अंक, 100 शब्द)

प्रश्न 1.
संक्रामक रोग किसे कहते हैं? इनके फैलने के कारण बताइट। (2009)
अथवा
संक्रामक रोग किसे कहते हैं? यह किस प्रकार फैलता है? बचाव के लिए क्या उपाय करने चाहिए? (2018)
उत्तर:
जब शरीर के एक या अधिक अंगों या तन्त्रों के प्रकार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और विभिन्न चिह्न एवं लक्षण प्रकट होते हैं, तो इस स्थिति को रोगग्रस्तता कहते हैं। रोगों के मुख्यत: दो प्रकार हैं।

1. संक्रामक रोग यह रोग हानिकारक सूक्ष्म जीवों (रोगाणुओं) के द्वारा होता है; जैसे-जीवाणु, विषाणु कवक एवं प्रोटोजोआ।
इन रोग कारकों का संचरण विभिन्न माध्यमों द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक होता है, इसलिए इन्हें संचरणीय रोग कहा जाता है; जैसे-हैजा, मलेरिया, टायफाइड, क्षय रोग, पोलियो, डिफ्थीरिया आदि।
2. असंक्रामक रोग यह रोग, रोगी से स्वस्थ व्यक्ति में स्थानान्तरिक नहीं होते हैं; जैसे–मधुमेह, कैंसर, हृदय रोग आदि।

संक्रामक रोगों का फैलना
अनेकानेक जीव जिसमें जीवाणु (बैक्टीरिया), विषाणु (वायरस), कवक (फंजाई), प्रोटोजोअन, कृमि (हेल्यिथ) आदि शामिल हैं, जो मनुष्य में रोग पैदा करते हैं। ऐसे रोगकारक जीवों को रोगजनक (पैथोजन) कहते हैं। रोगजनक हमारे शरीर में कई तरह से प्रवेश कर सकते हैं।
इनका संक्रमण मुख्यत: निम्नलिखित छः प्रकार से होता है।

  • जल एवं भोजन के माध्यम से
  • वायु के माध्यम से
  • रोगवाहक कीटों के माध्यम से
  • चोट अथवा घाव के माध्यम से
  • प्रत्यक्ष सम्पर्क के माध्यम से
  • यौन सम्बन्धों के माध्यम से

1. जल एवं भोजन के माध्यम से रोगाणुओं से दूषित जल एवं भोजन को ग्रहण करने से ये रोगाणु व्यक्ति के शरीर में पहुँच जाते हैं; जैसे-हैजा, टायफाइड, पीलिया, अतिसार तथा पेचिश आदि रोगों का संक्रमण मुख्य रूप से संक्रमित जल एवं आहार के माध्यम से होता है। इन रोगों के व्यापक संक्रमण में संक्रामक रोगों का फैलना मक्खियों की सहायक भूमिका होती है। मक्खियों के मल  आदि रोगाणुयुक्त स्थानों पर बैठने से रोगाणु उनके साथ चिपक कर हमारे खाद्य पदार्थों तक पहुँच जाते हैं, जिसे खाने से रोग को संक्रमण हो जाता है।

2. वायु के माध्यम से दूषित अथवा संक्रमित वायु में श्वास लेने से विभिन्न रोगाणु वायु के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश कर रोगग्रस्त बना देते हैं। रोगग्रस्त व्यक्तियों के खाँसने, छींकने अथवा श्वसन क्रिया द्वारा साँस छोड़ने की क्रियाओं द्वारा वायु में रोगाणुओं की सान्द्रता बढ़ती जाती है।

इसी प्रकार रोगी व्यक्तियों के थूक व मल-मूत्र के उचित निस्तारण के अभाव में उनके रोगाणु वायु को दूषित करते हैं। यही दूषित वायु चेचक, छोटी माता, खसरा, तपेदिक (क्षय रोग), डिफ्थीरिया, काली खाँसी जैसे संक्रामक रोगों के प्रसार काकारण बनती है।

3. रोगवाहक कीटों के माध्यम से कुछ रोग विभिन्न कीटों के माध्यम से भी फैलते हैं, जैसे प्लेग का संक्रमण चूहों पर पाए जाने वाले पिस्सुओं के माध्यम से होता है। इसके अतिरिक्त मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया, पीत ज्वर, फाइलेरिया एवं पागल कुत्ते तथा कुछ अन्य पशुओं द्वारा काटने के परिणास्वरूप होने वाला हाइड्रोफोबिया नामक रोग इसी श्रेणी में आता है। रोगाणुयुक्त कीटों अथवा अन्य जीवों के काटने पर, रोगाणु रक्त के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और मनुष्य रोगग्रस्त हो जाता है।

4. चोट अथवा घावे के माध्यम से शरीर के किसी भी भाग में चोट लगने पर जब घाव बन जाता है, तब धूल, मिट्टी आदि में उपस्थित रोगाणु, घाव के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। टिटनेस इस प्रकार होने वाला प्रमुख रोग है।

5. प्रत्यक्ष सम्पर्क के माध्यम से कुछ रोग संक्रमित व्यक्तियों के प्रत्यक्ष सम्पर्क में आने से भी होते हैं। छूने अथवा स्पर्श के माध्यम से फैलने वाले मुख्य रोग हैं-दाद, खाज, खुजली तथा कुष्ठ रोग आदि।

6. यौन सम्बन्धों के माध्यम से लैंगिक क्रिया या यौन सम्बन्धों के द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में कई प्रकार के रोग फैलते हैं। सूजाक (Gonorrhoea), सिफिलिस, एड्स (AIDS), इसी प्रकार के यौन संचारित रोगों के उदाहरण हैं।

संक्रामक रोगों की रोकथाम के सामान्य उपाय
संक्रामक रोगों की रोकथाम के कुछ सामान्य उपाय निम्नलिखित हैं।

  1. स्वास्थ्य विभाग को सूचित करना।
  2. रोगग्रस्त व्यक्ति को अलग करना।
  3. रोग-प्रतिरक्षा के उपाय करना; जैसे-टीकाकरण।
  4. रोगवाहकों पर नियन्त्रण करना।
  5. रोगाणुनाशन के उपाय करना

प्रश्न 2.
नि:संक्रमण का क्या आशय है? निःसंक्रमण की भौतिक विधियों का सविस्तार वर्णन कीजिए।(2010)
अथवा
नि:संक्रमण से आप क्या समझते हैं? नि:संक्रमण की प्राकृतिक विधि लिखिए।(2014)
अथवा
निःसंक्रमण से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहित समझाइए। (2007)
अथवा
टिप्पणी लिखिए–भौतिक निःसंक्रमण। (2013)
उत्तर:
निःसंक्रमण का अर्थ
संक्रामक रोगों का कारण विभिन्न प्रकार के रोगाणु होते हैं। इन रोगाणुओं द्वारा रोग के प्रसार की प्रक्रिया ‘संक्रामकता’ कहलाती है। रोगों के उद्भवन एवं प्रसार को रोकने का सर्वोत्तम उपाय-सम्बन्धी रोगाणुओं को नष्ट करना तथा इन्हें बढ़ने से रोकना है। रोगाणुओं को नष्ट करने की प्रक्रिया को ही नि:संक्रमण (Disinfection) कहा जाता है। नि:संक्रमण की इस प्रक्रिया में प्रयुक्त पदार्थ नि:संक्रामक पदार्थ’ कहलाते हैं।
निःसंक्रमण की विधियाँ
नि:संक्रमण के लिए सामान्यतः तीन विधियों-भौतिक, प्राकृतिक एवं रासायनिक का प्रयोग किया जाता है। इन विधियों का सामान्य विवरण निम्नलिखित है।

भौतिक नि:संक्रमण

  • जलाना
  • वाष्प या भाप द्वारा
  • सूखी गर्म हवा द्वारा
  • उबालना

1. भौतिक निःसंक्रमण
इसके अन्तर्गत भौतिक उपायों द्वारा वस्तुओं को रोगाणुमुक्त किया जाता है। नि:संक्रमण हेतु निम्नलिखित चार भौतिक विधियों का प्रयोग किया जाता है।
(i) जलाना व्यर्थ एवं अनुपयोगी संक्रमित वस्तुओं को आग में जलाना श्रेयस्कर होता है। इस क्रिया से कीटाणुओं का पूर्ण नाश सम्भव होता है। यद्यपि इसके अन्तर्गत सभी संक्रमित वस्तुओं को जलाना सम्भव नहीं होता है कारण कि कुछ वस्तुओं को जलाने से हानिकारक गैसों का उत्सर्जन होता है, जो स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

(ii) वाष्प या भाप द्वारा वाष्प द्वारा। नि:संक्रमण भी एक उत्तम विधि है।  इससे वस्त्रों एवं अन्य वस्तुओं को नि:संक्रमित किया जा सकता है। इससे  कुछ ही समय में कीटाणु मर जाते हैं। यह विधि अस्पतालों में प्रयोग में लाई जाती है।

(iii) सूखी गर्म हवा द्वारा यह विधि अत्यधिक प्रभावी नहीं है। अतः यह कम प्रयोग में लाई जाती है यद्यपि चमड़े, शीशे, प्लास्टिक के बर्तन तथा रबड़ की वस्तुओं आदि के नि:संक्रमण में इसका उपयोग किया जाता है, क्योंकि ये वस्तुएँ अन्य प्रकार से नि:संक्रमित नहीं की जा सकती।

(iv) उबालना जिन संक्रमित वस्तुओं को नष्ट करना सम्भव नहीं है, उन्हें खौलते हुए पानी में (100° C पर) 20 से 30 मिनट तक उबालकर कीटाणुमुक्त किया जा सकता है। यदि उबलते जल में 2% सोडियम कार्बोनेट मिला दिया जाए, तो इसकी कीटाणुनाशक क्षमता और अधिक बढ़ जाती है। उबलते हुए जल में धातु के बर्तन भी नि:संक्रमित किए जा सकते हैं।

2. प्राकृतिक निःसंक्रमण
प्राकृतिक रूप से हमारे चारों ओर अनेक नि:संक्रामक कारक मौजूद रहते हैं। उदाहरणत: सूर्य से उत्सर्जित होने वाली पराबैंगनी किरणें बहुत ही सक्रिय कीटाणुनाशक हैं। जल शुद्धि में इनका उपयोग सर्वविदित है। सूर्य के प्रकाश की किरणों की गर्मी से भी अनेक रोगाणु मर जाते हैं। अत: वस्तुओं को समय समय पर धूप दिखाना आवश्यक है। इसी प्रकार शुद्ध वायु का अन्तर्ग्रहण भी शरीर के लिए लाभदायक है, क्योंकि ऑक्सीजन जीवाणुओं को नष्ट करने में सहायक होती है।

प्रश्न 3.
रासायनिक निःसंक्रमण किसे कहते हैं? रासायनिक । विसंक्रामक के नाम लिखिए।(2014)
उत्तर:
रासायनिक निःसंक्रमण
जब नि:संक्रमण की प्रक्रिया रासायनिक पदार्थों के माध्यम से सम्पन्न होती है, तो इसे रासायनिक नि:संक्रमण की संज्ञा दी जाती है। रासायनिक नि:संक्रामकों को अवस्था के आधार पर तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-तरल, गैसीय एवं ठोस नि:संक्रामक। इन तीनों प्रकार के नि:संक्रामकों के उदाहरण निम्नवत् हैं।

रासायनिक नि:संक्रमण

  • तरल रासायनिक नि:संक्राम
  • गैसीय रासायनिक नि:संक्रामक
  • ठोस रासायनिक निःसंक्रामक

1. तरल रासायनिक निःसंक्रामक तरल रासायनिक नि:संक्रामकों का प्रयोग सामान्यत: पानी में घोल बनाकर किया जाता है। इस वर्ग के मुख्य नि:संक्रामक निम्न हैं।

  • फिनॉयल यह कार्बोलिक अम्ल से  बनाया जाता है यद्यपि .  उससे अधिक प्रभावी  होता है। फिनॉयल मिश्रित जल के दूधिया घोल का प्रयोग, घर को कीटाणुमुक्त करने में किया जाता है। स्नानघर व शौचालय की सफाई में भी उपयोगी है।
  • कार्बोलिक एसिड यह कोलतार से निकलता है। सान्द्र कार्बोलिक एसिड त्वचा को जलाने वाला होता है। इसके घोल का प्रयोग वस्त्र आदि को नि:संक्रमित करने में किया जाता है।
  • फार्मेलिन यह एक तीव्र गन्ध वाला नि:संक्रामक है। यह आँखों में लगता है। इसका घोल शौचालय के कीटाणुओं को मारने में सहायक होता है। उपरोक्त के अतिरिक्त लाइजॉल एवं आइजॉल अन्य तरल नि:संक्रामक पदार्थ हैं। इनका इस्तेमाल कपड़ों आदि को रोगाणुमुक्त करने में किया जाता है।

2. गैसीय रासायनिक निःसंक्रामक सल्फर डाइऑक्साइड एवं क्लोरीन गैस प्रमुख रासायनिक नि:संक्रामक है। गन्धक को जलाने से बनने वाली सल्फर डाई-ऑक्साइड गैस से, कमरे की वायु को रोगाणुमुक्त किया जा सकता है। इसी प्रकार क्लोरीन जल तथा वायु को नि:संक्रमित करने में सक्षम है। नगरों में जल आपूर्ति विभाग द्वारा जल शुद्धि में इसका प्रयोग सामान्य है।

3. ठोस रासायनिक निःसंक्रामक ठोस रासायनिक नि:संक्रमिकों में प्रमुख है।

  • चूना यह जीवाणुओं को नष्ट करने वाला एक सस्ता रसायन है। दीवारों पर चूने की सफेदी का प्रयोग कीटाणुओं को नष्ट करने में सहायक है। फर्श, नाली तथा शौच आदि के स्थान पर चूने का छिड़काव उपयोगी होता है। घर के दरवाजे के सामने थोड़ी दूरी तक चूना बिछा देने से प्लेग के वाहक पिस्सू मकान में प्रवेश नहीं कर पाते।
  • ब्लीचिंग पाउडर यह पाउडरे, जल को रोगाणुमुक्त करने में सहायक होता है। इस पाउडर से क्लोरीन गैस निकलती है।
  • पोटैशियम परमैंगनेट यह नि:संक्रामक लाल दवा के नाम से जाना जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में कुओं एवं तालाबों के जल को कीटाणुरहित करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। फलों, सब्जियों एवं बर्तनों आदि को रोगाणुमुक्त करने में इसका घोल सहायक है।
  • कॉपर सल्फेट यह एक तीव्र कीटाणुनाशक पदार्थ है। इसे तूतिया या नीला थोथा भी कहा जाता है।

प्रश्न 4.
क्षय रोग के लक्षण व उपचार पर टिप्पणी लिखिए। (2018)
अथवा
क्षय रोग के फैलने के कारण, लक्षण, बचाव के उपाय तथा उपचार का वर्णन कीजिए। (2012, 14)
अथवा
वायु द्वारा कौन कौन-से रोग फैलते हैं? किसी एक रोग के लक्षण तथा रोकथाम के उपाय लिखिए। (2007, 11, 13)
उत्तर:
कुछ संक्रामक रोगों के रोगाणु वायु में व्याप्त रहते हैं तथा स्वस्थ व्यक्तियों के शरीर में श्वसन क्रिया द्वारा प्रवेश करते हैं। वायु के माध्यम से फैलने वाले मुख्य रोग हैं-क्षय रोग या तपेदिक, चेचक, खसरा, काली खाँसी, डिफ्थीरिया तथा इन्फ्लू एंजा आदि।

क्षय रोग (तपेदिक)
यह एक संक्रामक रोग है, जो माइक्रोबैसीलस ट्यूबरकुलोसिस नामक जीवाणु से होता है। इस रोग को ‘यक्ष्मा’ या ‘काक रोग’ भी कहते हैं। यह रोग शरीर के विभिन्न अंगों; जैसे-लसीका ग्रन्थियों, आँत, अस्थियों में प्रकट हो सकता है। यद्यपि इसके सर्वाधिक रोगी फेफड़ों के क्षय से पीड़ित होते हैं।
कारण
इस रोग के फैलने के सम्भावित कारण निम्नलिखित हैं।

  1. यदि रहने के स्थान पर शुद्ध वायु का अभाव हो एवं समुचित संवातन व्यवस्था न हो।
  2. पर्याप्त पौष्टिक भोजन उपलब्ध न हो।
  3. शारीरिक एवं मानसिक दुर्बलता के कारण प्रतिरोधक क्षमता का क्षीण होजाना।
  4. स्वस्थ व्यक्ति को रोगी के संसर्ग में होना। उल्लेखनीय है कि इस रोग केजीवाणु मुँह से थूकते समय या चूमने से प्रसारित होते हैं।
  5. रोगी द्वारा प्रयुक्त संक्रमित वस्तु का स्वस्थ मनुष्य द्वारा प्रयोग किया जाना।
  6. क्षमता से अधिक कार्य किया जाना।

लक्षण
क्षय रोग के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं।

  1. रोग के शुरुआत में ही थकान एवं कमजोरी का अनुभव होने लगता है। साँस जल्दी-जल्दी फूलने लगती है।
  2. हर समय हल्का-हल्का ज्वर रहने लगता है। रात को पसीना आता है।
  3. रोगी को बार-बार जुकाम व खाँसी होती रहती है। खाँसी में कफ (बलगम) | निकलता है। धीरे-धीरे बलगम के साथ रक्त भी आने लगता है।
  4. भूख लगनी बन्द हो जाती है। कमजोरी के कारण व्यक्ति की कार्यक्षमता घट जाती है।
  5. शरीर में खून की कमी से त्वचा पीली पड़ जाती है।
  6. फेफड़ों के प्रभावित होने की स्थिति में, छाती में दर्द रहने लगता है।

बचाव के उपाय
क्षय रोग से बचाव के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं।

  1. बच्चों को बी.सी.जी. (बैसिलस कैलमिटि ग्यूरीन) का टीका अवश्य लगाना चाहिए।
  2. व्यक्ति को नियमित रूप से व्यायाम करा चाहिए।
  3. प्रातः काल टहलना लाभप्रद है, इससे शुद्ध वायु फेफड़ों में प्रवेश करती है।
  4. व्यक्ति को नियमित रूप से शुद्ध जल एवं पौष्टिक आहार लेना चाहिए।
  5. इधर-उधर थूकने की जगह केवल थूकदान का प्रयोग करना चाहिए।
  6. घर, आस-पड़ोस एवं मौहल्ले में सार्वजनिक स्वच्छता के प्रति जागरुकता रहनी चाहिए।
  7. टी. बी. के रोगी के सम्पर्क में आने से बचना चाहिए। रोगी के थूक, वस्त्र, बर्तन, बिस्तर आदि से अलग रहना चाहिए।
  8. रोगी को टी. बी. के अस्पताल में भर्ती करा देना चाहिए।

उपचार
क्षय रोग के उपचार के प्रमुख बिन्दु हैं

  1. रोगी को शुद्ध वायु, जल एवं पौष्टिक आहार की उपलब्धता अत्यन्त आवश्यक है।
  2. चिकित्सक की सलाह से रोगी को ‘डॉट’ (DOTS) प्रणाली के अधीन स्वीकृत दवाओं का सेवन करना चाहिए। इस रोग के उपचार हेतु दवाओं का नियमित सेवन अत्यन्त आवश्यक है, अन्यथा रोग का जीवाणु दवाओं के विरुद्ध प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर सकता है। ऐसी स्थिति में टी. बी. को इलाज मुश्किल हो जाता है।
  3. गरम जलवायु क्षय रोग के रोगी के लिए ठीक नहीं होती। अतः रोगी को सम जलवायु में रखना चाहिए।

प्रश्न 5.
टायफाइड रोग के कारण, लक्षण एवं रोकथाम के विषय में लिखिए। (2005, 09, 11)
अथवा
जल द्वारा फैलने वाले कौन कौन-से रोग हैं? उनमें से किसी एक रोग के कारण, लक्षण एवं बचने के उपाय लिखिए। (2014)
उत्तर:
टायफाइड (मोतीझरा)
जल के माध्यम से फैलने वाले मुख्य रोग हैं-टायफाइड, हैजा, अतिसार, पेचिश, पीलिया आदि। टायफाइड रोगी को एक निश्चित अवधि तक बुखार अवश्य रहता है, इसलिए इसे मियादी बुखार भी कहा जाता है।
कारण
यह रोग, मनुष्य की आन्त्र (छोटी आँत) में मिलने वाले साल्मोनेला टाइफी नामक जीवाणु से होता है। यह जीवाणु जल तथा भोजन के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश करता है। घरेलू मक्खी के मल पर बैठने से रोगाणु उनके साथ चिपक कर हमारे खाद्य पदार्थों तक पहुँच जाते हैं, जिसे खाने से रोग का संक्रमण हो जाता है। टायफाइड रोग की उद्भवन अवधि 4 से 10 दिन तक होती है।

लक्षण
व्यक्ति के शरीर में जीवाणु के सक्रिय होते ही रोग के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। इस रोग के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं।

  1. सिरदर्द तथा बुखार, जो दोपहर बाद अपने चरम पर होता है। संक्रमण के प्रथम सप्ताह के प्रत्येक दिन शारीरिक ताप (ज्वर) में वृद्धि होती जाती है।
  2. दूसरे सप्ताह में तेज ज्वर होता है, जो धीरे-धीरे तीसरे तथा चौथे सप्ताह में कम होता है।
  3. कुछ टायफाइड रोगियों के शरीर पर छोटे-छोटे सफेद रंग के मोती जैसे दाने भी निकल जाते हैं, इसलिए इस रोग को मोतीझरा भी कहते हैं।
  4. इस रोग से आँतें भी प्रभावित होती हैं। आँतों में सूजन तथा घाव हो जाते हैं।

बचाव के उपाय
इस रोग के रोकथाम के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं

  1. TAB-टीकाकरण से प्रतिरक्षण का प्रभाव तीन वर्षों तक रहता है। अतः समय-समय पर टीका लगवाते रहना चाहिए।
  2. व्यक्तिगत स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। कुछ भी खाने से पूर्व हाथों को अवश्य धोना चाहिए।
  3. टायफाइड के रोगी को अन्य व्यक्तियों से अलग रखना चाहिए, जिससे संक्रमण का प्रसार न हो। रोगी के बर्तन, बिस्तर तथा कपड़ों आदि को अलग ही रखना चाहिए तथा रोगी के ठीक होने पर उन्हें भली-भाँति नि:संक्रमित किया जाना चाहिए।
  4. रोगी के मल-मूत्र को खुले में नहीं छोड़ना चाहिए। मल विसर्जन व्यवस्था समुचित होनी चाहिए।
  5. दूध को उबालकर पीना चाहिए तथा पेय जल की शुद्धता सुनिश्चित होनी चाहिए।

उपचार
मियादी बुखार का व्यवस्थित उपचार सम्भव है, इसके लिए समुचित चिकित्सकीय परामर्श लेना आवश्यक है। उपचार के दौरान निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।

  1. रोगी को पूर्ण विश्राम देना चाहिए।
  2. रोगी को उबला हुआ पानी एवं हल्का-सुपाच्य आहार प्राप्त हो।
  3. रोगी को फलों का रस दिया जाना चाहिए।
  4. चिकित्सक द्वारा दी गई औषधियों को नियमित रूप से लिया जाना चाहिए।

प्रश्न 6.
हैजा रोग के उद्गम, फैलने की विधि, लक्षण एवं उपचार लिखिए। (2006)
अथवा
हैजा रोग के कारण, लक्षण व बचने के उपाय लिखिए। (2008, 13, 18)
उत्तर:
हैजा
यह एक अति तीव्र संक्रामक रोग है, जो प्रायः भीड़-भाड़ वाले स्थानों; जैसे-मेलों, तीर्थस्थानों आदि में अथवा बाढ़ जैसी आपदा के उपरान्त फैलता है। कभी कभी तो यह महामारी का रूप लेकर बहुत बड़े जन-समुदाय में फैल जाता है।

कारण एवं प्रसार
विब्रिओकॉलेरी नामक जीवाणु इस रोग का कारक है। ये जीवाणु पानी में अधिक पनपते हैं तथा अधिक गर्मी व अधिक ठण्ड में जीवित नहीं रह पाते। इन जीवाणुओं को संवहन मुख्य रूप से मक्खियों द्वारा होता है। मक्खी के मल, वमन आदि पर बैठने से रोगाणु उनके साथ चिपककर हमारे भोज्य पदार्थों तक पहुँच जाते हैं। ऐसे भोजन को ग्रहण करने से रोग का संक्रमण होता है। स्पष्टतः स्वच्छता में कमी से यह रोग बहुत तेजी से फैलता है। इस रोग का उद्भवन काल बहुत कम होता है। संक्रमण के पश्चात् कुछ ही घण्टों में यह विकराल रूप धारण कर लेता है।
लक्षण
रोग के प्रमुखलक्षण निम्नलिखित हैं

  1. जलीय दस्त जो सामान्तया वेदनामुक्त होता है।
  2. हैजे के रोगी को वमन (उल्टी) होती रहती है।
  3. कुछ ही घण्टों में भारी मात्रा में तरल की हानि जिससे निर्जलीकरण, पेशीय | ऐंठन तथा भार में कमी हो जाती है।
  4. चेहरे की चमक खत्म हो जाती है तथा आँखें अन्दर धंस जाती हैं।
  5. शरीर में जल की कमी से नाड़ी की गति धीमी हो जाती है। समय पर उपचार | न मिलने से रोगी की मृत्यु भी हो सकती है।

बचाव के उपाय
हैजे से बचने के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं।

  1. हैजे के टीके द्वारा प्रतिरक्षीकरण आवश्यक है, इसकी एक खुराक का प्रभाव लगभग छ: माह तक रहता है।
  2. हैजा प्रभावित क्षेत्रों में उबले हुए जल का प्रयोग महत्त्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त भोजन ठीक से पका हुआ एवं शुद्ध होना चाहिए। हैजे के प्रसार की स्थिति में, बाजार में उपलब्ध कटे हुए फल अथवा बिना ढकी मिठाइयों आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।
  3. हैजा प्रभावित क्षेत्रों में तालाब, नदी तथा कुएँ के पानी को नि:संक्रमित किया जाना चाहिए।
  4. व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक स्वच्छता के लिए विशेष प्रयास किए जाने चाहिए, | जो हैजा से बचाव के लिए आवश्यक है। रोगी के मल-मूत्र, वमन तथा थूक आदि के निस्तारण की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। स्वच्छता मक्खियों से बचाव का कारगर उपाय है।
  5. हैजे का प्रकोप बढ़ने पर भीड़-भाड़ वाले स्थानों में जाने से बचना चाहिए।
  6. जीवनरक्षक घोल (नमक, चीनी, ग्लूकोज, सोडियम बाइकार्बोनेट तथा पोटैशियम क्लोराइड का जलीय विलयन) का अविलम्ब प्रयोग करना चाहिए। इस विलयन को पीते रहने से निर्जलीकरण रुक जाता है।

उपचार
अनुभवी चिकित्सक की सलाह के साथ निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं।

  1. प्रारम्भिक अवस्था में रोगी को प्याज का अर्क (रस) तथा अमृतधारा जैसी दवा दी जा सकती है।
  2. रोगी को पर्याप्त आराम मिलना चाहिए।
  3. निर्जलीकरण से बचने के उपाय करने चाहिए।
  4. रोगी को ठोस भोज्य पदार्थ नहीं देना चाहिए। थोड़ा आराम होने पर सन्तरे | का रस, जौ- का पानी तथा थोड़ा पानी मिलाकर गाय का दूध दिया जा सकता है।

प्रश्न 7.
मलेरिया रोग फैलने के कारण, लक्षण, बचने के उपाय एवं उपचार लिखिए।(2010)
अथवा
मलेरिया किस मच्छर से फैलता है? कोई चार लक्षण लिखिए। (2018)
अथवा
मलेरिया रोग के कारण, लक्षण व रोकथाम के उपाय लिखिए। (2016)
अथवा
टिप्पणी लिखिए-मलेरिया रोग के कारण व लक्षण। (2018)
उत्तर:
मलेरियो मलेरिया मच्छर द्वारा फैलने वाला संक्रामक रोग है। गर्म देशों (Tropical Countries) तथा नमी वाले क्षेत्रों में इसका प्रकोप अधिक होता है। कारण
मलेरिया का कारक प्लाज्मोडियम नामक परजीवी प्रोटोजोआ है। प्लाज्मोडियम की विभिन्न जातियाँ (वाइवैक्स, मेलिरिआई और फैल्सीपेरम) विभिन्न प्रकार के मलेरिया के लिए उत्तरदायी हैं। इनमें से प्लाज्मोडियम फैल्सीपेरम द्वारा होने वाला रोग सबसे गम्भीर है और यह घातक भी हो सकता है।

यह रोगवाहक मादा ऐनाफ्लीज मच्छर के काटने से होता है, जो मनुष्य का खून चूसती है। जब मादा ऐनाफ्लीज मच्छर किसी संक्रमित व्यक्ति को काटती है, तब परजीवी उसके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और आगे का परिवर्धन वहाँ होता है। ये परजीवी मच्छर में बहुसंख्यात्मक रूप से बढ़ते रहते हैं और जीवाणुज (स्पोरोजाइट्स) बन जाते हैं। जीवाणुज, परजीवी का संक्रामक रूप है।

जब मच्छर किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटता है, तो जीवाणुज मच्छर की लार ग्रन्थियों से व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाता है। प्रारम्भ में परजीवी यकृत में अपनी संख्या बढ़ाते रहते हैं और फिर लाल रुधिर कणिकाओं पर आक्रमण करते हैं। विभिन्न जाति के परजीवी, मनुष्य के यकृत तथा रक्त में भिन्न-भिन्न जीवन चक्र चलाते हैं। ये चक्र 24, 48 तथा 72 घण्टों में समाप्त होते हैं। इन्हीं के अनुसार रोग भी कई रूपों में होता है।

लक्षण
जब परजीवी लाल रुधिर कणिकाओं पर आक्रमण करते हैं, तो लाल रक्त कणिकाओं के फटने के साथ ही एक टॉक्सिक पदार्थ हीमोजोइन निकलता है, जो ठिठुरन एवं प्रत्येक तीन से चार दिन के अन्तराल पर आने वाले तीव्र ज्वर के लिए उत्तरदायी होता है। सिरदर्द, मिचली, पेशीय वेदना तथा तीव्र ज्वर मलेरिया के प्रमुख लक्षण हैं। मलेरिया के प्रत्येक आक्रमण के तीन चरण होते हैं।
1. शीत चरण सर्दी तथा कपकपी महसूस होती है।
2. उष्ण चरण तीव्र ज्वर, हृदय की धड़कन तथा श्वास की गति में वृद्धि होती है।
3. स्वेदन चरण पसीना आता है तथा ताप ज्वर सामान्य स्तर तक कम हो जाता है। मलेरिया के प्रकोप से मुक्त होने के बाद व्यक्ति कमजोर हो जाता है रुधिर की कमी हो जाती है। यकृत तथा प्लीहा का बढ़ जाना मलेरिया के अन्य प्रभाव हैं।

बचाव अथवा रोकथाम के उपाय

मलेरिया मच्छर के काटने से संक्रमित व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्ति तक फैलता है, इसलिए मच्छर के काटने से बचाव ही मलेरिया की रोकथाम का एकमात्र उपाय है। इसके लिए कुछ उपाय निम्नलिखित हैं।

  1. खिड़की व दरवाजों पर महीन जाली लगवाएँ, जिससे घरों में मच्छरों का प्रवेश रोका जा सके।
  2. मच्छर भगाने या मारने वाले रसायन का प्रयोग किया जा सकता है।
  3. मच्छरदानी में सोएँ।
  4. ठहरे हुए पानी पर मिट्टी के तेल का छिड़काव करना चाहिए, जिससे मच्छरों के लार्वा मर जाएँ अथवा लार्वाभक्षक मछली (उदाहरणतः गेम्बुसिया, ट्राउट, मिनोस) और बत्तख इत्यादि के प्रयोग से भी लार्वा नियन्त्रण किया जा सकता है।
  5. कीटनाशक दवाओं के छिड़काव से मच्छरों को मारना।
  6. मच्छरों के प्रजनन स्थानों को नष्ट करना।

उपचार
मलेरिया से पीड़ित व्यक्ति के उपचार के लिए कुनैन (सिनकोना वृक्ष की छाल से प्राप्त) नामक औषधि का प्रयोग किया जाता है। चिकित्सक की सलाह से कुछ अन्य औषधियाँ भी ली जा सकती हैं; जैसे-पैल्युड्रिना।
मलेरिया के रोगी को पूर्ण विश्राम एवं हल्का व सुपाच्य भोजन दिया जाना चाहिए।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 6 संक्रामक रोग: प्रसार तथा नियन्त्रण help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 6 संक्रामक रोग: प्रसार तथा नियन्त्रण, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 7 गन्दी बस्तियाँ तथा उनसे उत्पन्न खतरे

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 7 गन्दी बस्तियाँ तथा उनसे उत्पन्न खतरे are part of UP Board Solutions for Class 12  Home Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 7 गन्दी बस्तियाँ तथा उनसे उत्पन्न खतरे.

Board UP Board
Class Class 12
Subject Home Science
Chapter Chapter 7
Chapter Name गन्दी बस्तियाँ तथा उनसे उत्पन्न खतरे
Number of Questions Solved 18
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 7 गन्दी बस्तियाँ तथा उनसे उत्पन्न खतरे

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
गन्दी बस्तियों की उत्पत्ति का उत्तरदायी कारण
(a) निर्धनता
(b) औद्योगीकरण
(c) शहरी मकानों का अभाव
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 2.
भौतिक साधनों का अभाव सर्वाधिक होता है।
(a) बड़े मुहल्लों में
(b) बड़े उद्योगों में
(c) गन्दी बस्तियों में
(d) बड़े नगरों में
उत्तर:
(c) गन्दी बस्तियों में

प्रश्न 3.
गन्दी बस्तियों में रहने वाले व्यक्ति वंचित रहते हैं।
(a) धन से
(b) अच्छे घर से
(c) स्वास्थ्य सुविधाओं से
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 4.
गन्दी बस्तियों की मुख्य समस्याएँ
(a) सुविधाओं का न होना
(b) नैतिकता का ह्रास
(c) कुपोषण
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 5.
गन्दी बस्तियों की समस्या का समाधान है।
(a) इन्हें नष्ट कर देना चाहिए।
(b) इनको विकसित ही नहीं होने देना चाहिए
(c) इनके सुधार के अधिक उपाय किए जाने चाहिए
(d) समस्या का समाधान जरूरी नहीं
उत्तर:
(e) इनके सुधार के अधिक उपाय किए जाने चाहिए

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक, 25 शब्द)

प्रश्न 1.
गन्दी बस्तियों से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
गन्दी बस्तियों (स्लम) से आशय ऐसे लोगों के निवास स्थान से है जिनकी आर्थिक स्थिति दयनीय होती है। यहाँ गरीबी, भूखमरी तथा दरिद्रता का वास होता है, जो केवल यहाँ के रहने वाले लोगों के लिए ही नहीं वरन् सम्पूर्ण मानव जाति के स्वास्थ्य, सामाजिक एवं नैतिक विकास में अवरोध उत्पन्न करती है।

प्रश्न 2.
गन्दी बस्तियों की उत्पत्ति का कोई एक मुख्य कारण क्या है?
उत्तर:
गन्दी बस्तियों की उत्पत्ति को एक प्रमुख कारण दरिद्रता अथवा निर्धनता है। इन बस्तियों में रहने वाले लोग श्रमिक वर्ग तथा निम्न आय वर्ग समूह के होते हैं। इनके पास भौतिक साधनों का सर्वथा अभाव होता है।

प्रश्न 3.
क्या औद्योगीकरण स्लम एरिया के लिए उत्तरदायी कारण है?
उत्तर:
गन्दी बस्तियों की उत्पत्ति का एक प्रमुख कारण औद्योगीकरण एवं नगरीकरण भी है। शहरों में प्रायः बड़ी इमारतों के निर्माण तथा औद्योगिक कारखानों में काम करने होते हैं, जिसके कारण वहाँ काम करने वाले मजदूर इन शहरों के आस-पास ही झोपड़ियाँ बना लेते हैं। जहाँ किसी भी तरह की आवश्यक सुविधाएँ नहीं होतीं, केवल गन्दगी ही होती है। यहाँ पानी, बिजली, शुद्ध वायु आदि की कोई व्यवस्था नहीं होती।

प्रश्न 4.
मलिन बस्तियों (Slums) की प्रमुख समस्याएँ क्या हैं? (2018)
उत्तर:
मलिन बस्तियों में सुविधाओं का अभाव, रोगों का प्रसार, कुपोषण एवं नैतिक आचरण का ध्यान सदैव रहता है।

प्रश्न 5.
गन्दी बस्तियों में सर्वाधिक कुपोषण से ग्रसित लोग रहते हैं? संक्षेप में बताइट।
उत्तर:
इन बस्तियों में स्वच्छ व सन्तुलित आहार के अभाव में यहाँ कुपोषण के शिकार लोगों की संख्या भी अधिक होती है। जन्म से ही बच्चों को स्वच्छ वातावरण न मिलने से वह कुपोषित हो जाते हैं। पीलिया, घेघा, पतलापन तथा पोलियो जैसी घातक बीमारियों से ग्रसित होते हैं।

प्रश्न 6.
राष्ट्रीय विघटन को कौन प्रोत्साहित करता है?
उत्तर:
जब समाज में शराब पीने वाले, जुआ खेलने वाले लोगों को तथा पारिवारिक विघटन को प्रोत्साहन मिलने लगता है तब यही सामाजिक विघटन राष्ट्रीय विघटन को प्रोत्साहित करता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक, 50 शब्द)

प्रश्न 1.
गन्दी बस्तियों से होने वाली कोई दो हानियाँ बताइए।
उत्तर:
गन्दी बस्तियों में गन्दगी का ही साम्राज्य होता है, जिससे रोगों का विस्तार ही नहीं होता है बल्कि इससे समाज को निम्नलिखित हानियाँ पहुँचती हैं।
1. पारिवारिक विघटन आवास की समस्या के कारण जो भी व्यक्ति (श्रमिक) इन गन्दी बस्तियों में रहता है उसे अपने परिवार से दूर रहना पड़ता है, क्योंकि आर्थिक तंगी के कारण वह अपने परिवार को साथ नहीं रख सकता। अतः धीरे-धीरे वह अपने परिवार से दूर हो जाता है।

2. सामाजिक विघटन गन्दी बस्तियों से व्यक्ति व परिवार ही नहीं, अपितु समाज की संरचना भी प्रभावित होती है तथा अनेक सामाजिक समस्याओं का जन्म होता है। व्यक्तिगत कार्यों की असफलता ही व्यक्ति के मस्तिष्क में निराशा उत्पन्न करती है। जहाँ वह स्वयं को उपेक्षित महसूस करता है। और समाज की अपेक्षा स्वयं को अधिक महत्त्व प्रदान करता है। जब समाज में सामाजिक मूल्यों एवं मान्यताओं की उपेक्षा की जाती है तो परम्परागत समाज का ढाँचा भी असन्तुलित हो जाता है, जिससे सामाजिक विघटन को प्रोत्साहन मिलता है।

प्रश्न 2.
गन्दी बस्तियों से व्याप्त समस्याओं को दूर करने हेतु कोई दो उपाय लिखिए।
उत्तर:
गन्दी बस्तियों का वातावरण अत्यधिक दूषित होता है, जिसके कारण वहाँ अनेक प्रकार की आर्थिक, सामाजिक एवं पारिवारिक समस्याएँ होती हैं, जिनका समाधान अत्यन्त आवश्यक है। इन बस्तियों की समस्याओं का समाधान निम्नलिखित उपायों द्वारा सम्भव है।
1. रोजगार सुविधाओं में वृद्धि गन्दी बस्तियों की समस्या का एक समाधान यह भी है कि गाँवों में जहाँ कृषि के अतिरिक्त अन्य कोई रोजगार नहीं है, रोजगार के अवसरों में वृद्धि की जाए। जो रोजगार नगरों में स्थापित किए जाते हैं, उन्हें गाँवों में स्थापित किया जाए। इससे ग्रामीण जनता को साधारण प्रयासों से ही रोजगार मिल जाएगा और वे रोजगार की तलाश में नगरों की ओर नहीं भागेंगे। इससे भी गन्दी बस्तियों की समस्या का समाधान करने में मदद मिल सकती है।

2. सामाजिक सुरक्षाओं का विस्तार ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक सुरक्षा और सुविधाओं की कमी है, इससे ग्रामीण व्यक्ति नगरों की ओर पलायन करते हैं। अत: यह आवश्यक है कि ग्रामीण जीवन को नगरों में प्राप्त होने वाली सुविधाओं से युक्त किया जाए। इन सुविधाओं में आवागमन और संचार के साधन, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएँ, सुरक्षा, मनोरंजन, पानी, प्रकाश आदि प्रमुख हैं। जब गाँव में ही व्यक्ति को उपरोक्त सुविधाएँ प्राप्त होने लगेगी तो वे नगरों की ओर आकर्षित नहीं होंगे और इस प्रकार गन्दी बस्तियों में रहने की समस्या का समाधान भी स्वतः हो जाएगा।

प्रश्न 3.
कृषि के विकास से गन्दी बस्तियों को और बढ़ने से रोका जा सकता है? इसके कौन-कौन से सुझाव दिए जा सकते हैं?
उत्तर:
कृषि में पर्याप्त पैदावार न होने के कारण ग्रामीण जनसंख्या नगरों की ओर पलायन करती है, जिससे गन्दी बस्तियों का विकास होता है। अत: इस समस्या के समाधान के लिए आवश्यक है कि कृषि व्यवसाय की उन्नति की जाए। भारत में कृषि-व्यवसाय की उन्नति के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं।

  1. कृषि की नई और कुशल रीतियों को अपनाया जाए।
  2. कृषि की भूमि के विभाजन और अपखण्डन पर रोक लगाई जाए।
  3. कृषि शिक्षा का प्रसार किया जाए।
  4. सिंचाई सुविधाओं में विस्तार किया जाए।
  5. कृषि अनुसन्धान कार्यों को प्रोत्साहित किया जाए।
  6. शासकीय कृषि फार्मों की स्थापना की जाए और इनकी सहायता में कृषकों में जागरूकता का प्रसार किया जाए।
  7. अच्छी किस्म के बीज और खाद तथा अच्छी नस्ल के बैलों का कृषि में प्रयोग किया जाए।
  8. विनाशकारी कीड़े-मकोड़ों पर रोक लगाई जाए।
  9. भूमि के कटाव को रोका जाए।
  10. फसलों की पद्धति में आवश्यकता के अनुसार परिवर्तन किया  जाए।

प्रश्न 4.
गन्दी बस्तियों में सुधार लाने के लिए कुछ पंचवर्षीय योजनाओं में कौन-से कार्यक्रम संचालित किए गए थे?
उत्तर:
भारत में आजादी के पश्चात् शहरों के चारों ओर या बीच में स्थिति इन बस्तियों में आन्तरिक सुधार लाने हेतु कुछ कार्यक्रम संचालित किए, जो इस प्रकार हैं।

  1. द्वितीय पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत 204 योजनाएँ बनाई गईं जिन पर 19 करोड़ की धनराशि का अनुदान दिया गया। यह अनुदान लगभग 58,000 परिवारों के लिए आवासीय सुविधा प्रदान करने हेतु दिए गए थे।
  2. तीसरी पंचवर्षीय योजना में गन्दी बस्तियों को हटाकर नए आवास बनाने का प्रावधान किया गया।
  3. कुपोषण तथा अन्धेपन को दूर करने तथा गर्भवती महिलाओं एवं शिशुओं को सन्तुलित आहार देने का भी प्रावधान बनाया गया।
  4. चौथी एवं पाँचवीं पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत गन्दी बस्तियों में मुख्य रूप से कलकत्ता की एक गन्दी बस्ती के सुधार के लिए धनराशि का प्रावधान किया गया था।

प्रश्न 5.
गन्दी बस्तियों से कौन-कौन सी समस्याएँ होती हैं? अथवी गन्दी बस्तियों की समस्याओं पर संक्षेप में टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
गन्दी बस्तियाँ समस्याओं की जननी होती हैं, वहाँ के लोग आजीवन समस्याओं से ही जूझते रहते हैं। इन बस्तियों की समस्याएँ निम्नलिखित हैं।
1. रोगों का प्रसार गन्दी बस्तियों में शुद्ध वायु एवं शुद्ध पेयजल न मिल पाने के कारण यहाँ रोगों का प्रसार रहता है। यहाँ के दूषित वातावरण के कारण मक्खी, मच्छर उत्पन्न होते हैं, जो भोजन को दूषित कर देते हैं। इस भोजन को ग्रहण करने वाला व्यक्ति हमेशा अस्वस्थ रहता है। हैजा, पेचिश, टी.बी. इत्यादि रोगों से पीड़ित यहाँ बहुत से लोग रहते हैं।

2. कुपोषण स्वच्छ व सन्तुलित आहार के अभाव में यहाँ कुपोषण के शिकार लोगों की संख्या भी अधिक होती है। जन्म से ही बच्चों को स्वच्छ वातावरण न मिलने से वह कुपोषित हो जाते हैं। पीलिया, घेघा पतलापन तथा पोलियो जैसी घातक | बीमारियों से ग्रसित होते हैं।

3. नैतिक आचरण का ह्रास बढ़ती बेरोजगारी एवं महँगाई के कारण इन बस्तियों के लोगों को भोजन नहीं मिल पाती। फलतः चोरी, डकैती, जेब काटना, गुण्डागर्दी इत्यादि अनैतिक आचरणों में वृद्धि होती है तथा नैतिक आचरण का पतन हो जाती है।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (5 अंक, 100 शब्द)

प्रश्न 1.
गन्दी बस्तियों से क्या आशय है? इसकी उत्पत्ति के लिए कौन-कौन से कारक उत्तरदायी है?
अथवा
गन्दी बस्तियों के विस्तार के लिए कौन-कौन से कारण जिम्मेदार है? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
गन्दी बस्तियों से आशय
गन्दी बस्तियों (स्लम) से आशय ऐसे लोगों के निवास स्थान से है जिनकी आर्थिक स्थिति दयनीय होती है। यहाँ गरीबी, भूखमारी तथा दरिद्रता का वास होता है, जो केवल यहाँ के रहने वाले लोगों के लिए ही नहीं वरन् सम्पूर्ण मानव जाति के स्वास्थ्य, सामाजिक एवं नैतिक विकास में अवरोध उत्पन्न करती हैं।

उत्पत्ति के कारण
गन्दी बस्तियों की उत्पत्ति के निम्नलिखित कारण है।
1. दरिद्रता/निर्धनता यह गन्दी बस्तियों की उत्पत्ति और विकास का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है। इन गन्दी बस्तियों में श्रमिक (मजदूर) और निम्न आय समूह वाले व्यक्ति रहते हैं। इनके पास भौतिक साधनों का सर्वथा अभाव होता है तथा इनके पास भरपेट भोजन का भी अभाव होता है।

2. मकानों का अभाव गन्दी बस्तियों में मकानों का सर्वथा अभाव होता है। यहाँ छोटी-छोटी कोठरियों या झुग्गियों में एक साथ कई-कई परिवार रहते हैं। इस तरह की बस्तियाँ नगरों के आस-पास अधिक पाई जाती है। नगरों में व्यवसाय एवं उद्योगों के कारण जनसंख्या का आकार बड़ा एवं भूमि छोटी हो जाती है। अत: यहाँ मकान बनाना आसान नहीं होता। मकान के अभाव में ही अधिकांश लोग विवश होकर गन्दे मकानों में रहने को मजबूर हो जाते हैं।

3. अज्ञानता गन्दी बस्तियों के उत्पन्न होने का एक प्रमुख कारण अज्ञानता भी है। यहाँ रहने वाले व्यक्तियों को स्वास्थ्य सुविधाओं, सफाई, बीमारियों और उनके विकास आदि के विषय में कोई ज्ञान ही नहीं होता।

4. औद्योगीकरण गन्दी बस्तियों की उत्पत्ति का एक प्रमुख कारण औद्योगीकरण एवं नगरीकरण भी है। शहरों में प्रायः बड़ी इमारतों के निर्माण होते हैं, जिसके कारण वहाँ काम करने वाले मजदूर इनके आस-पास ही झोपड़ियाँ बना लेते हैं। साथ-ही-साथ औद्योगिक कारखानों में काम करने वाले मजदूर भी इन कारखानों से सटे जगहों पर झोपड़ियाँ बनाते हैं। जहाँ किसी भी तरह की आवश्यक सुविधाएँ नहीं होतीं, केवल गन्दगी ही होती है। यहाँ पानी, बिजली, शुद्ध वायु आदि की कोई व्यवस्था नहीं होती।

5. जनसंख्या में वृद्धि जनसंख्या में होने वाले निरन्तर वृद्धि के कारण भी इन गन्दी बस्तियों का विकास होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती बेरोजगारी ने लोगों को शहरों की ओर पलायन करने को विवश कर दिया है जिसके कारण शहरी जनसंख्या में वृद्धि हुई। आर्थिक संसाधनों की कमी तथा रोजगार न होने की स्थिति में ज्यादातर लोगों को इन्हीं गन्दी बस्तियों में शरण लेनी पड़ती है। अतः शहरी जनसंख्या में वृद्धि हो रही है।
अन्य कारण उपरोक्त कारणों के अतिरिक्त कुछ ऐसे कारण भी हैं, जो इन बस्तियों की उत्पत्ति के लिए उत्तरदायी हैं; जैसे

  1. ग्रामीण रोजगार का अभाव
  2. गतिशीलता (देशान्तर गमन)
  3. प्राकृतिक आपदाएँ
  4. नगरों में सामाजिक सुरक्षा
  5. पारिवारिक कलह एवं सामाजिक बहिष्कार
  6. नगर नियोजन का आभाव

प्रश्न 2.
गन्दी बस्तियों से क्या हानियाँ हैं? इनके सुधार हेतु कौन-कौन से समाधान किए गए हैं? विस्तार से समझाइए।
अथवा
स्लम एरिया से कौन-कौन सी हानियाँ होती हैं? विस्तार से समझाइए।
उत्तर:
गन्दी बस्तियों में गन्दगी का ही साम्राज्य होता है, जिससे रोगों का विस्तार ही नहीं होता, बल्कि इससे समाज को हानि पहुँचती है; जैसे
1. व्यक्तिगत विघटन यह बस्तियाँ व्यक्तिगत जीवन को विघटित कर देती है, | क्योंकि यहाँ रहकर व्यक्ति सामान्य जीवनयापन नहीं कर सकता। मद्यपान, मादक द्रव्यों का सेवन, जुआ खेलना तथा आत्महत्या जैसी व्यक्तिगत विघटन की प्रमुख घटनाएँ यहाँ सर्वाधिक होती हैं।

2. पारिवारिक विघटन आवास की समस्या के कारण जो भी व्यक्ति (श्रमिक) इन गन्दी बस्तियों में रहता है, उसे अपने परिवार से दूर रहना पड़ता है, क्योंकि आर्थिक तंगी के कारण वह अपने परिवार को साथ नहीं रख सकता। अतः धीरे-धीरे वह अपने परिर से दूर हो जाता है।

3. सामाजिक विघटन गन्दी बस्तियों से व्यक्ति व परिवार ही नहीं, अपितु समाज की संरचना भी प्रभावित होती है तथा अनेक प्रकार की सामाजिक समस्याओं का जन्म होता है। व्यक्तिगत कार्यों की असफलता ही व्यक्ति के मस्तिष्क में निराशा उत्पन्न करती है। जहाँ वह स्वयं को उपेक्षित महसूस करता है और समाज की अपेक्षा स्वयं को अधिक महत्त्व प्रदान करता है। जब समाज में सामाजिक मूल्यों एवं मान्यताओं की उपेक्षा की जाती है तो परम्परागत समाज का ढाँचा भी असन्तुलित हो जाता है, जिससे सामाजिक विघटन को प्रोत्साहन मिलता है।

4. राष्ट्रीय विघटन जब समाज में शराब पीने वाले, जुआ खेलने वाले लोगों को तथा पारिवारिक विघटन को प्रोत्साहन मिलने लगता है, तब यही सामाजिक विघटन राष्ट्रीय विघटन को प्रोत्साहित करता है।

5. अज्ञानता को प्रोत्साहन अज्ञानता भी गन्दी बस्तियों का दुष्परिणाम है। यहाँ रहने वाले व्यक्ति आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं, जिससे उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं मिल पाती। यह बच्चे दिनभर बस्ती की गन्दी गलियों में घूमते रहते हैं, जिससे उनमें अज्ञानता का ही विकास होता है।

6. नैतिकता का ह्रास गन्दी बस्तियाँ नैतिकता को प्रभावित करती हैं। यहाँ रहने वाले व्यक्ति के समक्ष आर्थिक परेशानियाँ ही इतनी प्रबल होती हैं कि वे अन्य किसी बात पर नैतिक या अनैतिकता में भेद नहीं कर पाते। चोरी करनी, जुआ खेलना, शराब व सिगरेट पीना जैसी बुरी आदतें इनके लिए सामान्य बातें हैं। इन सबका परिणाम यह होता है कि व्यक्ति नैतिक पतन की ओर अग्रसर होता है।

7. स्वास्थ्य पर प्रभाव गन्दी बस्तियाँ लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव ही डालती हैं। यहाँ का वातावरण शुद्ध न होने के कारण अनेक प्रकार की भयंकर बीमारियाँ फैलती हैं, जो स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं।

गन्दी बस्तियों की समस्या के समाधान हेतु उपाय

गन्दी बस्तियों में व्याप्त समस्याओं के समाधान हेतु निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं।

1. जनसंख्या वृद्धि पर रोक इस समस्या के समाधान का सर्वप्रथम उपाय यह है कि बढ़ती हुई जनसंख्या पर रोक लगाई जाए। जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगा देने से ग्रामीण जनसंख्या में वृद्धि होगी। इससे गाँवों से नगरों की ओर भागने वाले व्यक्तियों की संख्या कम हो जाएगी।

2. रोजगार सुविधाओं में वृद्धि गन्दी बस्तियों की समस्या का एक समाधान यह भी है कि गाँवों में जहाँ कृषि के अतिरिक्त अन्य कोई रोजगार नहीं है, रोजगार के अवसरों में वृद्धि की जाए। जो रोजगार नगरों में स्थापित किए। जाते हैं, उन्हें गाँवों में स्थापित किया जाए। इससे ग्रामीण जनता को साधारण प्रयासों से ही रोजगार मिल जाएगा और वे रोजगार की तलाश में नगरों की ओर नहीं भागेंगे। इससे भी गन्दी बस्तियों की समस्या का समाधान करने में मदद मिल सकती है।

3. सामाजिक सुरक्षाओं का विस्तार ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक सुरक्षा और सुविधाओं की कमी है, इससे ग्रामीण व्यक्ति नगरों की ओर पलायन करते हैं, इसलिए ग्रामीण जीवन को नगरों में प्राप्त होने वाली सुविधाओं से युक्त किया जाए। इन सुविधाओं में आवागमन और संचार के साधन, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएँ, सुरक्षा, मनोरंजन, पानी, प्रकाश आदि प्रमुख हैं। जब गाँव में ही व्यक्ति को उपयुक्त सारी सुविधाएँ प्राप्त होने लगेंगी तो वे नगरों की ओर आकर्षित नहीं होंगे और इस प्रकार गन्दी बस्तियों में रहने की समस्या का समाधान भी स्वतः हो जाएगा।

4. कृषि की उन्नति कृषि में पर्याप्त पैदावार न होने के कारण ग्रामीण जनसंख्या नगरों की ओर पलायन करती है, जिससे गन्दी बस्तियों का विकास होता है। अत: इस समस्या के समाधान के लिए आवश्यक है कि कृषि व्यवसाय की उन्नति की जाए। भारत में कृषि व्यवसाय की उन्नति के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं ।

  1. कृषि की नई और कुशल रीतियों को अपनाया जाए।
  2. कृषि की भूमि के विभाजन और अपखण्डन पर रोक लगाई जाए।
  3. कृषि शिक्षा का प्रसार किया जाए।
  4. सिंचाई सुविधाओं को विस्तार किया जाए।
  5. कृषि अनुसन्धान कार्यों को प्रोत्साहित किया जाए।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 7 गन्दी बस्तियाँ तथा उनसे उत्पन्न खतरे  help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 7 गन्दी बस्तियाँ तथा उनसे उत्पन्न खतरे, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.