UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 22 Industries

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 22 Industries (उद्योग धन्धे) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 22 Industries (उद्योग धन्धे).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 22
Chapter Name Industries (उद्योग धन्धे)
Number of Questions Solved 49
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 22 Industries (उद्योग धन्धे)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भारत के औद्योगिक विकास पर एक निबन्ध लिखिए। [2010]
उत्तर

पंचवर्षीय योजनाओं में औद्योगिक विकास
Industrial Development in Five Year Plans

स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत सरकार ने देश के औद्योगीकरण के लिए ठोस कदम उठाये। 6 अप्रैल, 1948 ई० को औद्योगिक नीति प्रस्तावित की गयी जिसको उद्देश्य “देशवासियों को शिक्षा एवं सार्वजनिक सुविधाएँ विकसित करके देश के प्राकृतिक संसाधनों का विकास एवं देशवासियों का जीवन-स्तर ऊँचा उठाना था।
पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान उद्योगों का विकास निम्नलिखित प्रकार से हुआ –
प्रथम एवं द्वितीय पंचवर्षीय योजनाओं में उद्योग – प्रथम योजना कृषि-प्रधान थी। द्वितीय योजना में देश में समाजवादी अर्थव्यवस्था विकसित करने के लिए उद्योगों पर विशेष बल दिया गया। लोहा-इस्पात, भारी रसायन, उर्वरक, इंजीनियरिंग तथा मशीन निर्माण उद्योगों की स्थापना पर विशेष ध्यान दिया गया। परिणामतः वर्ष 1960-61 में औद्योगिक सूचकांक (वर्ष 1950-51 में = 100) बढ़कर 194 हो गया। अनेक औद्योगिक नगर स्थापित हुए।

तृतीय एवं वार्षिक योजनाओं में उद्योग – तृतीय योजना में कृषि तथा उद्योग के मध्य सन्तुलन लाने का प्रयास किया गया; अतः उद्योगों के क्षेत्र में धीमी प्रगति हुई जो वार्षिक योजनाओं के दौरान स्थिरप्रायः हो गयी। धीमी औद्योगिक प्रगति के अनेक कारण थे-भारत-पाकिस्तान युद्ध, वर्ष 1965-67′ के अकाल, विदेशी सहायता बन्द होना आदि। केवल ऐलुमिनियम, मोटर-वाहन, विद्युत ट्रांसफार्मर, सूती वस्त्र, मशीन उपकरण, चीनी, जूट तथा पेट्रोलियम उत्पादों के उत्पादन लक्ष्य ही पूरे किये जा सके। इस्पात, उर्वरक तथा औद्योगिक रसायनों के उत्पादन में बहुत गिरावट आयी।

चौथी योजना में उद्योग – इस अवधि में औद्योगिक उत्पादन तथा पूँजी निवेश दोनों ही कम रहे। लौह धातु, पेट्रोलियम तथा पेट्रो-रसायन उद्योगों में तो पूँजी निवेश सन्तोषजनक रहा, किन्तु इस्पात, अलौह धातुओं, उर्वरक, चीनी तथा कोयले में कमी रही। औद्योगिक इकाइयों में क्षमता के अनुरूप उत्पादन नहीं हो सका, किन्तु मिश्र धातुओं, ऐलुमिनियम, टायर, पेट्रोल शोधन, इलेक्ट्रॉनिक्स; मशीनी उपकरण, ट्रैक्टर, विद्युत उपकरण सम्बन्धी उद्योगों की प्रगति सन्तोषजनक रही।

पाँचवीं योजना में उद्योग – पाँचवीं योजना में आधारभूत उपभोक्ता तथा निर्यात सम्बन्धी उद्योगों को विशेष महत्त्व दिया गया। खाद्यान्नों, उर्वरकों तथा पेट्रोलियम के मूल्यों में तीव्र वृद्धि के कारण उद्योगों पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा। औद्योगिक योजनाओं में तदनुसार संशोधन करना पड़ा। सार्वजनिक क्षेत्र में । 39,303 करोड़ में से हैं 10,201 करोड़ (लगभग 26%) खनिज व उद्योगों के लिए प्रावधान किया गया।

छठी योजना में उद्योग – इस योजना में सार्वजनिक क्षेत्र के कुल १ 97,500 करोड़ में से है 20,407 करोड़ (लगभग 21%) का प्रावधान बड़े उद्योगों कोयला, पेट्रोलियम तथा खनिजों के लिए किया गया। छठी योजना में उत्पादक इकाइयों का पूर्ण क्षमता उपभोग, उपभोक्ता, पूँजीगत व अन्य पदार्थों के उत्पादन की वृद्धि का लक्ष्य रखा गया। ऐलुमिनियम, जिंक, सीसा, थर्मोप्लास्टिक, पेट्रो-रसायन, विद्युत उपकरण, मोटर वाहन, उपभोक्ता पदार्थों के उत्पादन लक्ष्य प्राप्त हुए किन्तु कोयला, इस्पात, अलौह धातुओं, सीमेण्ट, टेक्सटाइल, जूट, व्यापारिक वाहन, रेल वैगन, चीनी आदि का उत्पादन लक्ष्य से कम रहा। छठी योजना की निम्नलिखित प्राविधिक उपलब्धियाँ उल्लेखनीय हैं-500 मेगावाट शक्ति उत्पादन की इकाई का आरम्भ, 500 मेगावाट टब-जेनरेटर तथा बॉयलर का उत्पादन, 800 cc वाली (कम पेट्रोल खपत वाली) मारुति कार, 1,350 टने प्रतिदिन क्षमता का उर्वरक प्लाण्ट आदि। इस्पात, इलेक्ट्रॉनिक आदि के क्षेत्र में भी विशेष उपलब्धियाँ प्राप्त की गयीं।

सातवीं योजना में उद्योग – इस अवधि में सार्वजनिक क्षेत्र के कुल १ 1,80,000 करोड़ में से 30% ऊर्जा पर, 11% बड़े व मध्यम उद्योगों पर तथा 1.5% छोटे व घरेलू उद्योगों पर व्यय करने का प्रावधान किया गया। इस योजना में समेकित विकास द्वारा उपभोक्ता उद्योगों, प्राविधिक सुधार, इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों के विकास द्वारा निर्यात में वृद्धि तथा रोजगार के पर्याप्त अवसर विकसित करने के उद्देश्य निर्धारित किये गये। सातवीं योजना में औद्योगिक क्षेत्र में 8.7% वार्षिक वृद्धि की दर निश्चित की गयी।
आठवीं योजना में उद्योग – इस अवधि में सभी क्षेत्र के उद्योगों में सुधार हुआ। विनिर्माण के 17 क्षेत्रों में उच्च वृद्धि दर्ज की गयी। 5.7% की वार्षिक वृद्धि दर निर्धारित की गयी।

नौवीं योजना में उद्योग – इस योजना में उद्योगों तथा खनिजों के लिए है 69,972 करोड़ का प्रावधान किया गया जो कुल आयोजना व्यय का 8% से अधिक था। उद्योगों में उदारीकरण तथा वैश्वीकरण को बढ़ावा दिया गया तथा विदेशी पूँजी विनिवेश को उदार बनाया गया। कम्प्यूटर, सॉफ्टवेयर, इलेक्ट्रॉनिक, संचार, परिवहन उपस्कर आदि उद्योगों को अधिक प्रोत्साहन दिया गया। मोटर वाहन उद्योग में विशेष रूप से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को भारत में उद्योग स्थापित करने का अवसर दिया गया।

दसवीं योजना में उद्योग – इस योजना में ग्रामीण तथा लघु उद्योगों में नीतिगत सुधार तथा लघु उद्योग को चरणबद्ध रूप में आरक्षण देना, बिजली-कोयला तथा संचार विधेयकों को लागू कराना, सूचना प्रौद्योगिकी का विकास आदि प्राथमिकताएँ निर्धारित की गयी हैं।
ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में उद्योग – इस योजना में निर्माण के सिलसिले में योजना आयोग ने संवृद्धि में सभी राज्यों तथा समाज के सभी वर्गों को उचित भागीदारी देने की बात कही है तथा Inclusive growth की अवधारणा सामने रखी है। इसी सन्दर्भ में सबकी पहुँच बुनियादी सेवाओं तक बनाने पर जोर दिया गया है। सबको शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ पेयजल आदि प्राप्त होना चाहिए। इसके अतिरिक्त अन्य चुनौतियाँ भी निर्धारित की गयी हैं; जो निम्नलिखित हैं –

  • कृषि क्षेत्र के विकास में गत्यात्मकता लाना
  • विनिर्माण के क्षेत्र को प्रतिस्पर्धात्मक बनाना
  • मानव संसाधनों को विकसित करना
  • पर्यावरण की सुरक्षा आदि।

बारहवीं पंचवर्षीय योजना में उद्योग – भारत की 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) के निर्माण की दिशा का मार्ग अक्टूबर, 2011 में उस समय प्रशस्त हो गया जब इस योजना के दृष्टि पत्र (दृष्टिकोण पत्र/दिशा पत्र/Approach Paper ) को राष्ट्रीय विकास परिषद् (NDC) ने स्वीकृति प्रदान कर दी। 1 अप्रैल, 2012 से प्रारम्भ हो चुकी इस पंचवर्षीय योजना के दृष्टि पत्र को योजना आयोग की 20 अगस्त, 2011 की बैठक में स्वीकार कर लिया गया था तथा केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् ने इसका अनुमोदन 15 सितम्बर, 2011 की अपनी बैठक में किया था। तत्कालीन प्रधानमन्त्री डॉ० मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में राष्ट्रीय विकास परिषद् की नई दिल्ली में 22 अक्टूबर, 2011 को सम्पन्न हुई इस 56वीं बैठक में दिशा पत्र को कुछेक शर्तों के साथ स्वीकार किया गया। राज्यों द्वारा सुझाए गए कुछ संशोधनों का समायोजन योजना दस्तावेज तैयार करते समय योजना आयोग द्वारा किया जायेगा। 12वीं पंचवर्षीय योजना में वार्षिक विकास दर का लक्ष्य 9 प्रतिशत है।

इस लक्ष्य को प्राप्त करने में राज्यों के सहयोग की अपेक्षा तत्कालीन प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने की है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कृषि, उद्योग व सेवाओं के क्षेत्र में क्रमश: 4.0 प्रतिशत, 9.6 प्रतिशत व 10.0 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि प्राप्त करने के लक्ष्य तय किये गये हैं। इनके लिए निवेश दर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की 38.7 प्रतिशत प्राप्त करनी होगी। बचत की दर जीडीपी के 36.2 प्रतिशत प्राप्त करने का लक्ष्य दृष्टि पत्र में निर्धारित किया गया है। समाप्त हुई 11वीं पंचवर्षीय योजना में निवेश की दर 36.4 प्रतिशत तथा बचत की दर 34.0 प्रतिशत रहने का अनुमान था। 11वीं पंचवर्षीय योजना में वार्षिक विकास दर 8.2 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था। 11वीं पंचवर्षीय योजना में थोक मूल्य सूचकांक (Wholesale Price Index) में औसत वार्षिक वृद्धि लगभग 6.0 प्रतिशत अनुमानित था, जो 12वीं पंचवर्षीय योजना में 4.5-5.0 प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य है। योजनावधि में केन्द्र सरकार का औसत वार्षिक राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3.25 प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य इस योजना के दृष्टि पत्र में निर्धारित किया गया है।

प्रश्न 2
उद्योग के मुख्य केन्द्रों का उल्लेख करते हुए भारत में लोहा तथा इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण के कारकों की विवेचना कीजिए।
या
भारत के लौह-इस्पात उद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(क) स्थानीयकरण के कारक, (ख) वितरण। [2013]
या
भारत में लोहा-इस्पात उद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(क) उद्योग का महत्त्व, (ख) स्थानीयकरण के कारण, (ग) उद्योग के प्रमुख क्षेत्र। [2008, 14, 15]
या
भारत में लौह तथा इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण के कारकों की विवेचना कीजिए तथा दो प्रमुख उत्पादन केन्द्रों का वर्णन कीजिए। [2008]
या
भारत में लौह-अयस्क के उत्पादन एवं वितरण का वर्णन कीजिए। [2014, 15, 16]
उत्तर

भारत में लोहा-इस्पात उद्योग का विकास
Development of Iron-steel Industry in India

लोहा-इस्पात उद्योग वर्तमान युग में एक आधारभूत उद्योग है जिसके उत्पाद अन्य सभी उद्योगों एवं वस्तुओं के निर्माण में आवश्यक होते हैं। इसी उद्योग से देश के औद्योगिक विकास की नींव पड़ती है।
भारत में लोहा गलाने, ढालने तथा इस्पात तैयार करने का कार्य अति प्राचीन काल से किया जा रहा है, परन्तु पश्चिमी देशों में आधुनिक ढंग के उद्योग स्थापित हो जाने से भारतीय लोहे के कुटीर उद्योग को बड़ा धक्का लगा तथा भारत निर्यातक से आयातक देश बन गया। सर्वप्रथम 1874 ई० में पश्चिम बंगाल में झरिया कोयला क्षेत्र में कुल्टी नामक स्थान पर बाराकर लौह कम्पनी की स्थापना की गयी। 1889 ई० में इस कारखाने पर बंगाल लोहा-इस्पात कम्पनी का अधिकार हो गया था। इसके बाद 1907 ई० में झारखण्ड के सांकची नामक स्थान पर प्रसिद्ध व्यवसायी श्री जमशेद जी टाटा द्वारा टाटा आयरन एवं इस्पात कम्पनी (TISCO) की स्थापना की गयी।

इसके पश्चात् 1918 ई० में एक और कारखाना पश्चिम बंगाल में भारतीय लोहा-इस्पात कम्पनी के नाम से आसनसोल के निकट हीरापुर में स्थापित किया गया। 1937 ई० में बर्नपुर में स्टील कॉरपोरेशन ऑफ बंगाल की स्थापना की गयी। वर्तमान में कुल्टी, हीरापुर एवं बर्नपुर के कारखाने भारतीय लोहा और इस्पात कम्पनी (IISCO) के अधिकार में हैं। 1932 ई० में दक्षिणी भारत के मैसूर नगर में मैसूर लोहा और इस्पात कारखाने की स्थापना की गयी। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद भारत में लोहा-इस्पात उद्योग का विकास तीव्र गति से किया गया। दूसरी पंचवर्षीय योजना में तीन नये कारखाने स्थापित करने के लिए ‘हिन्दुस्तान स्टील कम्पनी’ की स्थापना की गयी।

इस कम्पनी के तत्त्वावधान में 10-10 लाख टन की क्षमता के तीन कारखाने भिलाई, राउरकेला एवं दुर्गापुर में स्थापित किये गये तथा TISCO एवं IISCO की उत्पादन क्षमता क्रमशः 20 लाख टन और 10 लाख टन इस्पात बनाने की निर्धारित की गयी। तीसरी पंचवर्षीय योजना में एक नया कारखाना बोकारो में खोलने का लक्ष्य निर्धारित किया गया। चौथी पंचवर्षीय योजना में सलेम, विजयनगर एवं विशाखापट्टनम् में तीन नये कारखाने स्थापित करने का प्रस्ताव किया गया। 1978 ई० में सार्वजनिक क्षेत्र की इस्पात इकाइयों के लिए ‘स्टील ऑथोरिटी ऑफ इण्डिया’ की स्थापना की गयी जिसके अधिकार में TISCO को छोड़कर अन्य पाँचों इकाइयाँ हैं।

भारत में लोहा-इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण के लिए उत्तरदायी भौगोलिक कारक
Geographical Factors of Localisation of Iron-steel Industry in India

लोह्म-इस्पात उद्योग मूलत: कच्चे माल पर आधारित उद्योग है। बाजार की निकटता का इस पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है। इसके स्थानीयकरण में अग्रलिखित कारक सहायक हैं –
(1) लौह-अयस्क एवं कोयले की एक-दूसरे के निकट प्राप्ति – इस उद्योग में लोहा एवं कोयला कच्चे माल के रूप में सबसे अधिक प्रयुक्त किये जाते हैं, जो दोनों ही भारी पदार्थ हैं। भारत के झारखण्ड राज्य में कोयला तथा निकटवर्ती राज्य में ओडिशा में लौह-अयस्क निकाली जाती है। इस प्रकार दोनों खनिज पदार्थों के लगभग एक ही स्थान पर उपलब्ध होने के कारण यहाँ लोहा-इस्पात उद्योग की स्थापना में बहुत सुविधा रही है।

(2) अन्य खनिज पदार्थों की सुलभता – लोहा-इस्पात उद्योग में लौह-अयस्क तथा कोयले के अतिरिक्त मैंगनीज, डोलोमाइट तथा चूना-पत्थर आदि अधात्विक खनिज प्रयुक्त किये जाते हैं। भारत में ये पदार्थ भी बिहार एवं ओडिशा राज्यों में ही पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं।

(3) सस्ती एवं सुलभ जल-विद्युत शक्ति – लोहा-इस्पात कारखानों में भारी-भारी मशीनों के संचालन के लिए तथा भट्टियों में लौह-अयस्क को पिघलाने के लिए शक्ति संसाधन के रूप में सस्ती जल-विद्युत शक्ति सुलभ होनी चाहिए। भारत ने जल-विद्युत के उत्पादन में पर्याप्त प्रगति की है। अतः लोहा-इस्पात उद्योग को सस्ती जल-विद्युत शक्ति सुगमता से मिल जाती है।

(4) स्वच्छ जल की आपूर्ति – लोहा-इस्पात उद्योग के लिए काफी मात्रा में स्वच्छ जल की भी आवश्यकता होती है। कारखानों के समीप ही सदावाहिनी नदियाँ इस उद्योग को स्वच्छ जल प्रदान करती हैं।

(5) विस्तृत बाजार – भारत एक विकासशील देश है। यहाँ नये-नये कारखाने, बाँध एवं भवननिर्माण के अनेक कार्य निरन्तर क्रियान्वित किये जा रहे हैं, जिनमें लौह-इस्पात की भारी माँग रहती है। भारत लोहा-इस्पात के सामान का निर्यात भी करता है। पर्याप्त माँग होने के कारण यहाँ लोहा-इस्पात उद्योग का विकास तीव्र गति से हुआ है।

(6) सस्ते एवं कुशल श्रमिक – लोहा-इस्पात उद्योग में कार्य करने के लिए पर्याप्त संख्या में सस्ते एवं कुशल श्रमिकों की आवश्यकता होती है। सघन जनसंख्या के समीपवर्ती भागों में लोहा-इस्पात केन्द्र स्थापित किये जाने के कारण इस उद्योग को पर्याप्त संख्या में सस्ते एवं कुशल श्रमिक आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। भारत में श्रमिकों को कुशल तथा प्रशिक्षित करने के लिए भी अनेक संस्थान खोले गये हैं।”

(7) परिवहन के सस्ते एवं सुलभ साधन – लोहा-इस्पात एक भारी पदार्थ है। इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने, मशीनों को लाने, कच्चा माल एकत्र करने तथा तैयार माल को बाहर भेजने में सस्ते परिवहन साधनों की आवश्यकता पड़ती है। भारत में ये साधन सुलभ एवं सस्ते हैं; अत: लौह-इस्पात उद्योग की स्थापना में इनसे बड़ी सहायता मिली है।

(8) पर्याप्त पूँजी – लोहा-इस्पात उद्योग में बड़े-बड़े संयन्त्र लगाने आवश्यक होते हैं। इनके स्थापन के लिए अरबों रुपयों की आवश्यकता होती है। भारत के साहसी उद्योगपतियों ने इस उद्योग के लिए पर्याप्त पूँजी जुटाकर इस उद्योग की स्थापना में बहुत सहयोग दिया है। भारत सरकार भी इस उद्योग को पर्याप्त अनुदान एवं आर्थिक सहायता प्रदान करती है।

(9) सरकारी संरक्षण एवं सहायता – भारत में लोहा-इस्पात के अधिकांश कारखाने सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित किये गये हैं जिन्हें सरकार ने संरक्षण एवं संहायता प्रदान की है, जिससे लोहा-इस्पात उद्योग की स्थापना में बहुत प्रोत्साहन मिला है।

भारत में लोहा-इस्पात का उत्पादन तथा वितरण
Production and Distribution of Iron-steel in India

भारत में लोहा-इस्पात उद्योग का महत्त्वपूर्ण स्थान है। भारत में जमशेदपुर के इस्पात कारखाने को छोड़कर शेष सभी इस्पात केन्द्र सार्वजनिक क्षेत्र में हैं। देश में इस्पात पिण्डों की स्थापित क्षमता 200 लाख टनं वार्षिक है, जबकि इनका वास्तविक उत्पादन 180 लाख टन है। भारत में लोहा और इंस्पात । तैयार करने वाली इकाइयों का विवरण अग्रलिखित है –

(1) टाटा आयरन एण्ड स्टील, कम्पनी (TISCO) – भारत में यह एक बड़ा तथा महत्त्वपूर्ण लोहा-इस्पात का कारखाना है जो कि अकेला ही निजी क्षेत्र में है। यह एशिया महाद्वीप का सबसे बड़ा इस्पात कारखाना है। यह कारखाना झारखण्ड राज्य के सिंहभूम जिले में कोलकाता-नागपुर रेलमार्ग पर कोलकाता से 240 किमी उत्तर-पश्चिम में झारखण्ड राज्य के सांकची (जमशेदपुर) नामक स्थान पर 1907 ई० में प्रसिद्ध उद्योगपति जमशेद जी टाटा द्वारा स्थापित किया गया था। इसके उत्तर में स्वर्ण रेखा और पश्चिम में खोरकाई नदियाँ प्रवाहित होती हैं।

इस कारखाने में लोहे की सलाखें, गर्डर, रेल के डिब्बे, पहिये एवं पटरियाँ, चादरें, स्लीपर तथा फिश प्लेटें बनाई जाती हैं। इसके निकटवर्ती भागों में टिन प्लेट, कास्ट लोहे की पटरियाँ, इंजीनियरिंग
और मशीन कम्पनी, फाउण्ड्री, कृषि के उपकरण, रेलवे इन्जन तथा विद्युत तार के उद्योग-धन्धे स्थापित किये गये हैं। इस कारखाने की उत्पादन क्षमता प्रतिवर्ष 40 लाख टन इस्पात की है।
स्थानीयकरण के कारक – इस इस्पात केन्द्र को अनेक भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं, जो निम्नलिखित हैं –

  1. इस कारखाने के लिए लोहा पार्श्ववर्ती गुरुमहिसानी की पहाड़ियों से प्राप्त होता है जो यहाँ से लगभग 100 किलोमीटर दूर हैं।
  2. कोयला झरिया की खानों से मिलता है, जो केवल 160 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं।
  3. चूना 320 किलोमीटर की दूरी से आता है, विशेषकर विरमित्रापुर, हाथीबारी, बिसरा, कटनी और बाराद्वार से।
  4. पागपोश की डोलोमाइट की खानें यहाँ से 480 किलोमीटर दूर हैं तथा उत्तम श्रेणी का मैंगनीज और अन्य रासायनिक पदार्थ निकट ही प्राप्त हो जाते हैं। क्वार्ट्जाइट एवं क्रोमाइट वाली शैलें भी यहाँ मिलती हैं।
  5. लोहा इस्पात के लिए मीठे और स्वच्छ जल की आवश्यकता पूर्ति के लिए नदियों के जल को बड़े हौजों में एकत्रित कर लिया जाता है। स्वर्णरेखा नदी की बालू मिट्टी लोहा ढालने के लिए उपयुक्त है।
  6. जमशेदपुर का कारखाना दक्षिणी-पूर्वी रेलमार्ग द्वारा कोलकाता तथा मुम्बई से जुड़ा है, जहाँ निर्मित माल सुविधापूर्वक भेजा जा सकता है।
  7. कोलकाता के निकट अनेक इन्जीनियरिंग उद्योग स्थित हैं जहाँ विभिन्न प्रकार के लोहे की खपत होती है। यहाँ श्रमिक न केवल संथाली लोग हैं वरन् बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के लोग भी हैं।

(2) भारतीय लोहा एवं इस्पात कम्पनी (IISCO) – इस कम्पनी के तीन कारखाने हैं—पहला बर्नपुर में, दूसरा कुल्टी में तथा तीसरा हीरापुर में स्थापित किया गया है। यह कम्पनी भारत में सबसे अधिक लोहा ढलाई का कार्य करती है। 1952 ई० से इन तीनों कारखानों को भारतीय लोहा एवं इस्पात कम्पनी के अधीन कर दिया गया है। 1976 ई० से यह कम्पनी भारत सरकार के अधिकार में है। हीरापुर में केवल लोहे की ढलाई का कार्य किया जाता है। इसकी उत्पादन क्षमता 13 लाख टन ढलवाँ लोहा वार्षिक की है। यहाँ से ढलवाँ लोहा कुल्टी की इकाई को इस्पात निर्माण के लिए भेज दिया जाता है। जिसकी उत्पादन क्षमता 10 लाख टन वार्षिक इस्पात की है। बर्नपुर में इस्पात की ढलाई की जाती है। यहाँ नल एवं रेलवे स्लीपर तैयार किये जाते हैं। भविष्य में इस कारखाने की उत्पादन क्षमता 23 लाख टन किये जाने का प्रस्ताव है।

(3) विश्वेश्वरैया आयरन एण्ड स्टील लिमिटेड (VISL) – इस कारखाने की स्थापना 1923 ई० में कर्नाटक राज्य के शिमोगा जिले में भद्रावती नामक स्थान पर भद्रा नदी के किनारे की गयी थी। 1961 ई० से यह कारखाना कर्नाटक राज्य तथा भारत सरकार के संयुक्त स्वामित्व में है। प्रारम्भ में इस कारखाने का उद्देश्य केमानगुण्डी एवं बाबाबूदन की खानों से लौह-अयस्क प्राप्त करना था जो कि इसके अधिकार क्षेत्र में है। इन खानों से प्रति वर्ष 250 लाख टन लौह-अयस्क प्राप्त की जाती है। इस कारखाने की वार्षिक उत्पादन क्षमता एक लाख टन ढलवाँ लोहा तथा 2 लाख टन इस्पात पिण्ड तैयार करने की है। भविष्य में इसकी उत्पादन क्षमता 3 लाख टन इस्पात तैयार किये जाने का प्रस्ताव है।

(4) राउरकेला इस्पात संयन्त्र (Rourkela Steel Plant) – हिन्दुस्तान स्टील लिमिटेड का यह कारखाना कोलकाता-मुम्बई रेलमार्ग पर कोलकाता से 431 किमी दूर स्थित है। जर्मनी की सहायता से प्रथम धमन भट्टी 1959 ई० से प्रारम्भ की गयी थी। यहाँ पर अधिकतर चपटे आकार की वस्तुएँ, अलग-अलग मोटाई की प्लेट, चादरें, पत्तियाँ, टिन की चादरें आदि बनाई जाती हैं। इस कारखाने की उत्पादन क्षमता बढ़ाकर 35 लाख टन कर दी गयी है।

(5) भिलाई इस्पात संयन्त्र (Bhilai Steel Plant) – हिन्दुस्तान स्टील लिमिटेड का यह कारखाना मध्य प्रदेश में भिलाई नामक स्थान पर रायपुर से 21 किमी दूर पश्चिम में दुर्ग-रायपुर रेलमार्ग पर सन् 1955 में स्थापित किया गया था। इस कारखाने की स्थापना रूस के सहयोग से की गयी है। यहाँ पर इस्पात का उत्पादन सन् 1959 से प्रारम्भ किया गया है। इस कारखाने में रेलों में प्रयुक्त अनेक प्रकार का सामान-छड़े, स्लीपर, शहतीर, लोहे की कतरनें आदि तैयार की जाती हैं। वर्तमान समय में इस कारखाने की उत्पादन क्षमता 25 लाख टन से बढ़ाकर 50 लाख टन कर दी गयी है।

(6) दुर्गापुर इस्पात संयन्त्र लिमिटेड (Durgapur Steel Plant Ltd.) – हिन्दुस्तान स्टील लिमिटेड का यह कारखाना पश्चिम बंगाल राज्य में दामोदर नदी-घाटी में कोलकाता-आसनसोल रेलमार्ग पर कोलकाता के उत्तर-पश्चिम में 160 किमी दूर दुर्गापुर में ब्रिटिश सरकार के सहयोग से सन् 1956 में स्थापित किया गया था। यहाँ इस्पात का उत्पादन सन् 1962 से प्रारम्भ किया गया था।
अधिकांशतः इस कारखाने में पहिये, धुरे, पटरियाँ, छड़े, इस्पात की कतरनें, बिलेट आदि का निर्माण किया जाता है। इस कारखाने की वार्षिक उत्पादन क्षमता 16 लाख टन इस्पात तथा 3.6 लाख टनं ढलवाँ लोहे की है।

(7) बोकारो इस्पात संयन्त्र (Bokaro Steel Plant) – चतुर्थ पंचवर्षीय योजना में लोहा-इस्पात का एक नया कारखाना 1964 ई० में रूस के सहयोग से झारखण्ड के बोकारो नामक स्थान पर स्थापित किया गया था। इसकी प्रारम्भिक क्षमता 40 लाख टन इस्पात उत्पादन की थी जिसे भविष्य में 60 लाख टन तक बढ़ाया जा सकेगा। इसमें 1972 ई० से उत्पादन प्रारम्भ हो गया है।

निर्यात व्यापार – भारत ने लोहा-इस्पात के निर्यात में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। इस्पात का भारी सामान अब रूस को भी निर्यात किया जाने लगा है। भारतीय इस्पात के अन्य प्रमुख ग्राहक न्यूजीलैण्ड, मलेशिया, बांग्लादेश, कुवैत, ईरान, श्रीलंका, म्यांमार, तंजानिया, संयुक्त अरब अमीरात, कीनिया आदि देश हैं। भारत लगभग 15 लाख टन इस्पात के विशेषीकृत उत्पादों को विदेशों से आयात भी करता है, परन्तु देश से इस्पात निर्यात की भावी सम्भावनाएँ वृद्धि की ओर व्यक्त की जा सकती हैं।

प्रश्न 3
भारत में सीमेण्ट उद्योग की अवस्थिति एवं विकास के कारकों की विवेचना कीजिए।
या
भारत में सीमेण्ट उद्योग के स्थानीयकरण के कारकों की विवेचना कीजिए तथा इसके उत्पादन के प्रमुख केन्द्रों का उल्लेख कीजिए। [2011]
या
भारत में सीमेण्ट उद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(क) स्थानीयकरण के कारक, (ख) प्रमुख केन्द्र, (ग) व्यापार। [2013, 16]
या
भारत में सीमेण्ट उद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए –
(क) स्थानीयकरण के कारक, (ख) उत्पादन, (ग) उद्योग के प्रमुख केन्द्र। [2013, 16]
उत्तर

सीमेण्ट उद्योग का विकास
Development of Cement Industry

भारत में संगठित रूप से सीमेण्ट तैयार करने का श्रेय चेन्नई को जाता है, जहाँ सन् 1904 में समुद्री सीपियों से सीमेण्ट बनाने का प्रयास किया गया था, परन्तु इसमें पूर्ण सफलता नहीं मिल सकी। इस उद्योग का वास्तविक विकास वर्ष 1912-13 में हुआ, जबकि मध्य प्रदेश में कटनी, राजस्थान में लखेरी-बूंदी तथा गुजरात में पोरबन्दर में तीन कारखाने स्थापित किये गये। इनमें सन् 1914 से उत्पादन प्रारम्भ हुआ। देश में इस उद्योग की प्रगति का श्रेय एसोसिएटिड सीमेण्ट कम्पनी (ए०सी०सी०), कंक्रीट एसोसिएशन ऑफ इण्डिया एवं सीमेण्ट मार्केटिंग कम्पनी को दिया जा सकता है।

सीमेण्ट वर्तमान युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए सीमेण्ट उद्योग का विकास अति आवश्यक है। यह अनेक उद्योगों के विकास की कुंजी है। भारत संसार का सातवाँ बड़ा सीमेण्ट उत्पादक देश है। इस उद्योग में लगभग 90,000 व्यक्ति कार्यरत हैं। सन् 2012 में सीमेण्ट उत्पादन 210 मिलियन टन हुआ।

सीमेण्ट उद्योग के स्थानीयकरण के भौगोलिक कारक
Geographical Factors of Localisation of Cement Industry

(1) कच्चा माल – सीमेण्ट उद्योग में अधिकांशतः भारी वस्तुओं-चूने का पत्थर, जिप्सम तथा कोयले का उपयोग अधिक किया जाता है। अतः इन्हें ढोने में अधिक व्यय करना पड़ता है। इसी कारण सीमेण्ट उद्योग कच्चे पदार्थों की प्राप्ति के निकटवर्ती स्थानों पर स्थापित किया जाता है। भारत में कोई भी सीमेण्ट कारखाना चूना-पत्थर की खानों से 50 किमी से अधिक दूरी पर स्थित नहीं है। अब सीमेण्ट बनाने के लिए धमन भट्टी का कचरा भी प्रयुक्त किया जाने लगा है।

(2) ऊर्जा – इस उद्योग के लिए ऊर्जा की बहुत आवश्यकता होती है। तमिलनाडु के सीमेण्ट कारखानों को छोड़कर देश के अन्य सभी कारखानों द्वारा यही कोयला काम में लाया जाता है। अब जलविद्युत शक्ति का भी प्रयोग किया जाने लगा है।
(3) पर्याप्त जल।
(4) सस्ता तथा कुशल श्रम – मध्य प्रदेश एवं झारखण्ड राज्य सीमेण्ट उद्योग के लिए सर्वाधिक उपयुक्त क्षेत्र हैं, क्योंकि यहाँ पर कोयला एवं चूने का पत्थर लगभग स्थानीय रूप से उपलब्ध हो जाते हैं। इन क्षेत्रों से पश्चिम बंगाल एवं बिहार के औद्योगिक क्षेत्र भी दूर नहीं पड़ते। कोसी, दामोदर एवं महानदी नदियों की घाटियों में विकसित बहुमुखी परियोजनाओं से सस्ती जल-विद्युत शक्ति प्राप्त हो जाती है।
(5) सस्ते एवं कुशल श्रमिक।
(6) परिवहन के साधन।
(7) पूँजी की उपलब्धता।
(8) सरकारी नीति।
गुजरात, राजस्थान तथा कर्नाटक में कच्चा माल उपलब्ध है।
उपर्युक्त भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए सीमेण्ट उद्योग का स्थापन मुख्यत: राजस्थान के पूर्व से लेकर उत्तरी मध्य प्रदेश होता हुआ झारखण्ड तक विस्तृत एक पेटी के रूप में फैला है।

सीमेण्ट का उत्पादन एवं वितरण
Production and Distribution of Cement

सीमेण्ट उद्योग का वितरण विकेन्द्रित है। अधिकांश कारखाने देश के पश्चिमी तथा दक्षिणी भागों में विकसित हुए हैं, जबकि सीमेण्ट की अधिकांश माँग उत्तरी एवं पूर्वी क्षेत्रों में अधिक है। तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, गुजरात, बिहार, राजस्थान, कर्नाटक एवं आन्ध्र प्रदेश राज्य देश का 74% सीमेण्ट उत्पन्न करते हैं, जबकि कुल उत्पादित क्षमता का 86% भाग इन्हीं राज्यों में केन्द्रित है। निम्नलिखित राज्यों का सीमेण्ट उत्पादन में महत्त्वपूर्ण स्थान है –
(1) मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ – मध्य प्रदेश राज्य देश का 15% सीमेण्ट उत्पन्न करता है। यहाँ सीमेण्ट के 8 विशाल कारखाने हैं। कटनी, कैमूर, सतना, जबलपुर, दुर्ग, बनमोर एवं दमोह में प्रमुख कारखाने हैं। इस राज्य में सीमेण्ट के 5 नये कारखाने प्रस्तावित हैं। यहाँ कोयला झारखण्ड से तथा शेष कच्चा माल स्थानीय रूप से उपलब्ध है।’. ”

(2) तमिलनाडु – इंसे राज्य को सीमेण्ट के उत्पादन में दूसरा स्थान है। यहाँ पर सीमेण्ट के 7 कारखाने हैं जो बड़े आकार के हैं तथा देश का 12% सीमेण्ट उत्पन्न करते हैं। चूना-पत्थर की पूर्ति स्थानीय क्षेत्रों के साथ-साथ कर्नाटक एवं आन्ध्र प्रदेश सज्यों से भी की जाती है। तुलुकापट्टी, तिलाईयुथू, : तिरुनलवेली, डालमियापुरम, राजमलायम, संकरी दुर्ग एवं मधुकराई प्रमुख सीमेण्ट उत्पादक केन्द्र हैं।

(3) आन्ध्र प्रदेश – आन्ध्र प्रदेश में सीमेण्ट के 18 कारखाने हैं, जो गुण्टूर, कर्नूल, नालगोण्डा, मछलीपट्टनम्, हैदराबाद एवं विजयवाड़ा में केन्द्रित हैं। इस राज्य की सीमेण्ट उत्पादन क्षमता 45 लाख टन तक पहुँच गयी है।
(4) राजस्थान – सीमेण्ट के उत्पादन में राजस्थान राज्य का चौथा स्थान है। यहाँ अरावली पहाड़ियों में चूने-पत्थर के पर्याप्त भण्डार हैं। यहाँ सीमेण्ट उत्पादन के 10 कारखाने हैं, जो लखेरी (बूंदी), सवाईमाधोपुर, चित्तौड़गढ़, चुरू, नीम्बाहेड़ा एवं उदयपुर में हैं।
(5) बिहार – इस राज्य में सीमेण्ट के 10 बड़े कारखाने हैं। सभी कारखाने कोयला एवं चूना-पत्थर क्षेत्रों के समीप पड़ते हैं। डालमियानगर, सिन्द्री, बनजारी, चायबासी, खलारी, जापला एवं कल्याणपुर प्रमुख केन्द्र हैं। बिहार राज्य में सीमेण्ट के दो कारखाने और लगाये जाने प्रस्तावित हैं।

(6) कर्नाटक – इस राज्य में बीजापुर, भद्रावती, गुलबर्गा, उत्तरी कनारा, तुमुकुर एवं बंगलुरु . प्रमुख सीमेण्ट उत्पादक केन्द्र हैं। यहाँ सीमेण्ट उत्पादन के 8 बड़े संयन्त्र स्थापित किये गये हैं।

(7) गुजरात – गुजरात राज्य में सीमेण्ट के 10 कारखाने हैं। सीमेण्ट उद्योग का प्रारम्भ इसी राज्य से किया गया था। चूना-पत्थर और समुद्री सीपों का उपयोग यहाँ पर सीमेण्ट बनाने में किया जाता है। सिक्का (जामनगर), अहमदाबाद, राणाबाव, बड़ोदरा, पोरबन्दर, सेवालिया, ओखामण्डल एवं द्वारका प्रमुख सीमेण्ट उत्पादक केन्द्र हैं। यहाँ 20 लाख टन सीमेण्ट का वार्षिक उत्पादन किया जाता है।

(8) अन्य राज्य – हरियाणा में सूरजपुर एवं डालमिया-दादरी; केरल में कोट्टायम; उत्तर प्रदेश में चुर्क एवं चोपन; ओडिशा में राजगंगपुर एवं हीराकुड; जम्मू-कश्मीर में वुयाने तथा असम में गुवाहाटी अन्य प्रमुख सीमेण्ट उत्पादक केन्द्र हैं। सन् 1985 के बाद से उत्तर प्रदेश राज्य में लघु संयन्त्रों की स्थापना की ओर विशेष ध्यान आकर्षित हुआ है तथा यहाँ94 लघु संयन्त्र स्थापन की अनुमति प्रदान की जा चुकी है।

भारत में सीमेण्ट उद्योग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ कुल उत्पादन क्षमता का 84% सीमेण्ट का ही उत्पादन किया जाता है। सन् 1965 में इस उद्योग के विकास एवं विस्तार हेतु सीमेण्ट निगम की स्थापना की गयी थी। इस निगम का प्रमुख कार्य कच्चे माल के नये क्षेत्रों का पता लगाना तथा इस उद्योग से सम्बन्धित समस्याओं को हल करना था। निगम द्वारा मन्धार (मध्य प्रदेश) तथा करकुन्ता (कर्नाटक) में सीमेण्ट के कारखाने स्थापित किये गये हैं। बोकाजन (असम), पॉवटा साहिब (हिमाचल प्रदेश), अलकतरा एवं नीमच (मध्य प्रदेश), तन्दूर, अदिलाबाद एवं येरागुन्तला (आन्ध्र प्रदेश) तथा बरूवाला (उत्तर प्रदेश) केन्द्रों में नवीन सीमेण्ट कारखाने स्थापित किये गये हैं।

व्यापार Trade

स्वतन्त्रता-प्राप्ति के समय देश में सीमेण्टे का उत्पादन बहुत कम था परन्तु तब से अब तक उसके उत्पादन में निरन्तर प्रगति हुई है। भारत समय-समय पर विदेशों को सीमेण्ट का निर्यात भी करता रहा है। यह निर्यात मुख्यतः पश्चिमी एशियाई देशों को हुआ है। कुछ वर्षों पूर्व तक हम अपनी आवश्यकता का भी सीमेण्ट उत्पादित नहीं कर पाते थे परन्तु अब हम सीमेण्ट उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गए हैं। सन् 1997-98 में भारत ने 42.5 लाख टन, सन् 2001-02 में 51.4 लाख टन तथा सन् 2012 में 210 मिलियन टन सीमेण्ट विदेशों को निर्यात किया था। उत्तम क्वालिटी के कारण भारतीय सीमेण्ट ने बंगलादेश, इण्डोनेशिया, मलेशिया, नेपाल, म्यांमार, अफ्रीका तथा पश्चिमी व दक्षिणी एशिया के देशों के बाजार में महत्त्वपूर्ण स्थान बनाया है।

प्रश्न 4.
भारत में चीनी उद्योग के स्थानीयकरण के कारकों एवं विकास का विवरण दीजिए।
या
भारत में चीनी उद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए –
(क) उत्पादन की प्रवृत्ति, (ख) उत्पादक क्षेत्र। [2011]
या
भारत में चीनी उद्योग का भौगोलिक विवरण निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत दीजिए –
(अ) स्थानीयकरण के कारक, (ब) वितरण प्रतिरूप। [2007, 10]
या
भारत में चीनी उद्योंग के स्थानीयकरण के कारकों की विवेचना कीजिए तथा उद्योग के दो प्रमुख केन्द्रों का विवरण दीजिए। [2008]
या
भारत में चीनी उद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(क) स्थानीयकरण के कारक, (ख) उद्योग के प्रमुख केन्द्र। [2014, 16]
उत्तर
चीनी उद्योग कृषि पर आधारित भारत का दूसरा सबसे बड़ा संगठित उद्योग है। सन् 1982 से भारत का इस उद्योग में विश्व में प्रथम स्थान है। इस उद्योग में ₹ 1,250 करोड़ की पूँजी लगी है तथा इससे 2.86 लाख लोगों को रोजगार प्राप्त होता है। इसके साथ ही देश के लाखों किसानों एवं श्रमिकों को गन्ना उत्पादन से आजीविका प्राप्त होती है।

भारत में चीनी उद्योग का विकास – भारत में चीनी उद्योग का वास्तविक विकास 20वीं शताब्दी से आरम्भ होता है। सन् 1931 तक इसका विकास काफी मन्द रहा, परन्तु इसके बाद सरकार ने चीनी के आयात पर नियन्त्रण लगाकर इस उद्योग के विकास को प्रोत्साहन दिया। सन् 1951 में भारत में चीनी की 138 मिलें थीं जिनकी उत्पादन क्षमता 15 लाख टन थी, परन्तु उत्पादन केवल 11 लाख टन ही हो पाया। वर्तमान में भारत में 453 चीनी मिलें हैं जिनमें 134 निजी क्षेत्र में, 67 सार्वजनिक क्षेत्र में तथा 252 सहकारी क्षेत्र में हैं। इसके बाद इस उद्योग को तीव्र गति से विकास हुआ, जिसकी
प्रगति निम्नलिखित तालिका से स्पष्ट हो जाती है –
तालिका : चीनी उत्पादन की प्रगति
UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 22 Industries 1

चीनी उद्योग के स्थानीयकरण के भौगोलिक कारक
Geographical Factors of Localisation of Sugar Industry

भारत में चीनी उद्योग के लगभग 65% कारखाने उत्तर प्रदेश एवं बिहार राज्यों में केन्द्रित हैं, जहाँ से कुल चीनी उत्पादन का लगभग दो-तिहाई भागे प्राप्त होता है। इस उद्योग के स्थानीयकरण के निम्नलिखित कारण हैं –

  1. गंगा नदी-घाटी की उर्वरा-शक्ति अधिक है जहाँ पर कांप मिट्टी में बहुत ही कम व्यय में गन्ने का उत्पादन भारी मात्रा में किया जाता है।
  2. गन्ना तोल में घट जाने वाला पदार्थ है; अत: इसके अधिकांश कारखाने गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में स्थापित किये गये हैं।
  3. चीनी उद्योग में शक्ति की प्राप्ति गन्ने को पेरने से प्राप्त खोई से की जाती है। उत्तरी भारत में तराई क्षेत्र से लकड़ी भी प्राप्त हो जाती है।
  4. शुद्ध जल की प्राप्ति नहरों अथवा नलकूपों द्वारा प्राप्त कर ली जाती है।
  5. गंगा घाटी के सघन बसे होने के कारण पर्याप्त संख्या में कम मजदूरी पर श्रमिक उपलब्ध हो जाते हैं।
  6. संघने जनसंख्या के कारण पर्याप्त मात्रा में चीनी की आवश्यकता पड़ती है; अत: स्थानीय रूप से बाजार की सुविधा उपलब्ध हो जाती है।
  7. उत्तरी भारत में गन्ना उत्पादन के लिए पर्याप्त सिंचाई की सुविधाएँ हैं।
  8. उत्तरी भारत में गन्ना ही एक प्रमुख व्यापारिक एवं नकदी फसल है। यहाँ गन्ना उत्पादक क्षेत्र रेल एवं सड़क मार्गों द्वारा जुड़े हैं। इस प्रदेश में कोई भी चीनी मिल गन्ना उत्पादक क्षेत्रों से 20 किमी से अधिक दूरी पर स्थित नहीं है।

दक्षिणी भारत में चीनी उद्योग की स्थापना के भौगोलिक कारक
Geographical Factors for Establishment of Sugar Industry in South India

देश में चीनी उद्योग अब धीरे-धीरे दक्षिणी भारत की ओर पलायन कर रहा है। दक्षिण भारत में इस उद्योग के विकसित होने के अग्रलिखित कारक उत्तरदायी रहे हैं –

  1. दक्षिणी भारत में उत्तरी भारत की अपेक्षा गन्ने का प्रति हेक्टेयर उत्पादन अधिक होता है तथा इसमें रस की मात्रा भी अधिक होती है।
  2. समुद्री जलवायु के कारण दक्षिणी भारत में गन्ना उत्पादन के लिए भौगोलिक परिस्थितियाँ उत्तरी भारत की अपेक्षा अधिक अनुकूल हैं।
  3. दक्षिणी भारत के अधिकांश कारखाने अपने ही कृषि फार्मों पर गन्ने का उत्पादन करते हैं; अतः कच्चे माल के रूप में गन्ने की प्राप्ति सुगम रहती है।
  4. दक्षिणी भारत की चीनी मिलें गन्ना पेराई के मौसम के बाद मूंगफली से तेल निकालने का कार्य करती हैं; अत: इन्हें दोहरा लाभ प्राप्त होता है।

भारत में चीनी उत्पादक राज्य
Sugar Producing States in India

भारत में निम्नलिखित राज्य चीनी के उत्पादन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं –
(1) महाराष्ट्र – महाराष्ट्र राज्य ने चीनी के उत्पादन में पिछले कुछ वर्षों से भारी प्रगति की है। चीनी के उत्पादन में इसका प्रथम स्थान है। यहाँ 100 चीनी मिलें हैं जिनमें देश की लगभग 35% चीनी उत्पादित की जाती है। गोदावरी, प्रवरा, मूला-मूठा, नीरा एवं कृष्णा नदियों की घाटियों में चीनी मिलें केन्द्रित हैं। मनमाड़, नासिक, पुणे, अहमदनगर, शोलापुर, कोल्हापुर, औरंगाबाद, सतारा एवं सांगली प्रमुख चीनी उत्पादक जिले हैं।

(2) उत्तर प्रदेश – इस राज्य का चीनी के उत्पादन में द्वितीय स्थान है। इस प्रदेश में 105 चीनी मिलें हो गयी हैं। उत्तर प्रदेश में उपयुक्त भौगोलिक परिस्थितियों के कारण ही चीनी मिलों का केन्द्रीकरण हुआ है। यह राज्य देश की 24% चीनी का उत्पादन करता है यद्यपि अभी भी यहाँ देश का सर्वाधिक गन्ना उगाया जाता है। यहाँ चीनी उत्पादन के निम्नलिखित तीन क्षेत्र प्रमुख हैं –

  • ऊपरी गंगा-यमुना दोआब – पश्चिमी उत्तर प्रदेश का यह क्षेत्र राज्य की एक-तिहाई चीनी तैयार करता है। यहाँ पर अधिकांश चीनी की मिलें रेलमार्गों के सहारे-सहारे स्थित केन्द्रों में स्थापित हुई हैं। सृहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, गाजियाबाद एवं बुलन्दशहर जिले प्रमुख चीनी उत्पादक हैं।
  • तराई क्षेत्र – तराई क्षेत्र पश्चिम में बिजनौर जिले से लेकर पूर्व में देवरिया जिले तक विस्तृत है। देवरिया, गोरखपुर, बस्ती, गोंडा, रामपुर, पीलीभीत, बहराइच एवं बिजनौर जिले प्रमुख चीनी उत्पादक हैं।
  • मध्यवर्ती एवं अन्य क्षेत्र – रुहेलखण्ड, फैजाबाद, कानपुर एवं लखनऊ मण्डलों में इस क्षेत्र का विस्तार है। सीतापुर, हरदोई, मुरादाबाद, फैजाबाद, एटा, कानपुर, शाहजहाँपुर, बरेली एवं इलाहाबाद प्रमुख चीनी उत्पादक जिले हैं।

(3) कर्नाटक – चीनी के उत्पादन में कर्नाटक राज्य का तीसरा स्थान है। यहाँ पर चीनी उद्योग के 27 केन्द्र हैं जिनमें देश की 9% चीनी उत्पन्न की जाती है। बेलगाम, मांडया, बीजापुर, बेलारी, शिमोगा एवं चित्रदुर्ग महत्त्वपूर्ण चीनी उत्पादक जिले हैं।
(4) तमिलनाड – इस राज्य का चीनी के उत्पादन में चौथा स्थान है जहाँ 22 चीनी मिलें हैं। यहाँ देश की लगभग 8% चीनी उत्पादित की जाती है। मदुराई, उत्तरी एवं दक्षिणी अर्काट, कोयम्बटूर एवं तिरुचिरापल्ली प्रमुख चीनी उत्पादक जिले हैं।

(5) आन्ध्र प्रदेश – यहाँ पर चीनी की 32 मिलें हैं जो प्रमुखत: प्रदेश के उत्तरी भागों में स्थित हैं। पूर्वी एवं पश्चिमी गोदावरी, कृष्णा, विशाखापट्टनम्, निजामाबाद, मेंडक, हास्पेट, बोबीलो, अनाकापाले, सामलकोट, पीठापुरम्, हैदराबाद, विजयवाड़ा और चित्तूर जिलों में चीनी के कारखाने स्थापित हुए हैं।

(6) बिहार – बिहार भारत का एक महत्त्वपूर्ण चीनी उत्पादक राज्य है जहाँ देश की 5% चीनी का उत्पादन किया जाता है। यहाँ चीनी की 29 मिलें हैं जो विशेष रूप से सारन, चम्पारन, दरभंगा, मुजफ्फरपुर आदि उत्तरी जिलों के गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में केन्द्रित हैं। पटना, गया, शाहाबाद जिलों में भी चीनी का उत्पादन किया जाता है।

(7) अन्य उत्पादक राज्य – चीनी उत्पादक अन्य राज्यों में गुजरात, हरियाणा, पंजाब, केरल, . मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं पश्चिम बंगाल मुख्य हैं।
व्यापार – भारत चीनी का निर्यातक देश है और विश्व के चीनी निर्यात व्यापार में भारत 0.6% का हिस्सा रखता है। देश की आवश्यकता को पूरी करने के उपरान्त केवल 2 लाख टन चीनी निर्यात के लिए शेष बचती है, परन्तु निर्यात की मात्रा घटती-बढ़ती रहती है।

प्रश्न 5
भारत के सूती वस्त्र उद्योग की विवेचना निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(i) स्थानीयकरण के कारक, (ii) उद्योग के क्षेत्र, (iii) कोई दो समस्याएँ। [2009]
या
भारत में सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण का विवरण दीजिए। [2008]
या
भारत में सूती वस्त्रोद्योग के स्थानीयकरण के कारक बताइए तथा इस उद्योग के दो प्रमुख केन्द्रों का उल्लेख कीजिए। [2009, 11]
या
भारत में सूती वस्त्र उद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(अ) स्थानीयकरण के कारक, (ब) प्रमुख केन्द्र। [2014, 16]
उत्तर

भारत में सूती वस्त्र उद्योग का विकास
Development of Cotton Textile Industry in India

सूती वस्त्र उद्योग भारत का एक प्राचीन उद्योग है। यह एक ऐसा उद्योग है जिसने लगभग सौ वर्ष पूर्व भारत में औद्योगीकरण का आधार प्रस्तुत किया था। देश का यह सबसे बड़ा उद्योग है। सन् 1854 में प्रथम भारतीय सूती वस्त्र कारखाना मुम्बई में स्थापित किया गया तथा भारतीय वस्त्र उद्योग प्रारम्भ हुआ। सन् 1900 तक भारत में 193 मिलें खुल चुकी थीं। सन् 1945 में 417 मिलें हो गयी थीं जिनमें 10.2 करोड़ तकुएँ तथा2 लाख करघे कार्य कर रहे थे। सन् 1947 में विभाजन के फलस्वरूप देश के 15 कारखाने तथा 73% कपास उत्पादक क्षेत्र पाकिस्तान में चले जाने के कारण 402 मिलें ही भारत में रह गयी थीं।

सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण के कारक
Factors of Localization of Cotton Textile Industry

सूती वस्त्र उद्योग के लिए कपास एक शुद्ध कच्चा माल है जो निर्माण प्रक्रिया में अपना अस्तित्व नहीं खोता। इसी कारण सूती वस्त्र उद्योग का स्थापन केवल कच्चे माल के क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहा। इसका स्थापन उन क्षेत्रों में भी हो गया है जहाँ पर इस उद्योग के लिए अन्य सुविधाएँ; जैसे—बाजार, श्रमिक, शक्ति-संसाधन, रासायनिक पदार्थ आदि पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते हैं। इसी कारण यह उद्योग बाजार की समीपता से प्रभावित होता है न कि कच्चे माल की निकटता से। भारत में सूती वस्त्र उद्योग की स्थापना में निम्नलिखित कारक उत्तरदायी रहे हैं –

(1) कपास के रूप में शुद्ध कच्चे माल की स्थानीय प्राप्ति – सूती वस्त्र उद्योग के लिए कच्चे माल के रूप में पर्याप्त मात्रा में कपास की आवश्यकता होती है। यह कच्चा माल इस उद्योग को आसानी से उपलब्ध हो जाता है। प्रायद्वीपीय पठार की लावा निर्मित काली मिट्टी के क्षेत्र में देश का सर्वाधिक कपास उत्पादन किया जाता है। महाराष्ट्र, गुजरात तथा पंजाब राज्य मिलकर देश के कुल उत्पादन का 55% से भी अधिक कपास का उत्पादन करते हैं। कपास के अन्य महत्त्वपूर्ण उत्पादक राज्य हैं-आन्ध्र प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान, कर्नाटक आदि। तमिलनाडु राज्य में कपास के आर्थिक उत्पादन तथा पायकारा परियोजना से सस्ती जल-विद्युत की उपलब्धता के कारण देश की संर्वाधिक (439) मिलों की स्थापना की गयी है, जिनमें से अधिकांश केवल सूत का ही निर्माण करती हैं। इसके अतिरिक्त उत्तम रेशे की कपास मिस्र, सूडान एवं संयुक्त राज्य अमेरिका से भी आसानी से उपलब्ध हो जाती है।
(2) आर्द्र जलवायु का होना।
(3) पर्याप्त संख्या में सस्ते एवं कुशल श्रमिकों की प्राप्ति।
(4) कपास उत्पादक क्षेत्रों का देश के अन्य भागों से तीव्रगामी परिवहन साधनों द्वारा जुड़ा होना।
(5) शक्ति-संसाधनों के रूप में जल-विद्युत शक्ति का पर्याप्त विकास तथा कोयले की उपलब्धि।
(6) सघन जनसंख्या के कारण पर्याप्त खपत तथा विदेशों में भी भारी माँग।
(7) उद्योग के लिए रासायनिक पदार्थों की सुलभता।
(8) सरकारी संरक्षण एवं अनुदानों की उपलब्धि।
(9) विदेशी सूती वस्त्रों पर भारी आयात कर का लगाया जाना।
(10) विदेशों से मिलों के लिए मशीनों एवं उपकरणों का आयात।
(11) निर्यात व्यापार से विदेशी मुद्रा की प्राप्ति।

इस प्रकार यह उद्योग कच्चे माल के उत्पादन क्षेत्रों में ही सीमित न रह सका, बल्कि बाजार एवं शक्ति जैसी सुविधाओं ने वस्त्र उद्योग के कारखानों को अपनी ओर आकर्षित किया है। दिल्ली, कानपुर व कोलकाता जैसे महानगरों में यह उद्योग इन्हीं कारणों से पनपा है। देश में सूती वस्त्रों की अधिक माँग होने के कारण सघन जनसंख्या ने यह उद्योग गंगा के मैदान में भी आकर्षित किया है, जबकि यहाँ पर कच्चे माल का उत्पादन नगण्य ही है। कपास के व्यापार ने ही मुम्बई के सूती वस्त्र उद्योग को विकसित करने में सुविधा प्रदान की है।

भारत में सूती वस्त्रों का उत्पादन एवं वितरण
Production and Distribution of Cotton Textile in India

सूती वस्त्र उद्योग भारत का एक विकेन्द्रीकृत उद्योग है। महाराष्ट्र एवं गुजरात राज्य सूती वस्त्र उद्योग में अग्रणी हैं। देश में सूती वस्त्र उत्पादक राज्यों का विवरण निम्नलिखित है –
(1) गुजरात – गुजरात भारत में प्रथम बड़ा सूती वस्त्र उत्पादक राज्य है, जहाँ सूती वस्त्रों की 120 मिलें हैं। इस राज्य द्वारा देश के एक-तिहाई सूती वस्त्रों का उत्पादन किया जा रहा है। अहमदाबाद सूती वस्त्र उद्योग की राजधानी है, जहाँ पर 72 मिलें केन्द्रित हैं। इसे ‘भारत का मानचेस्टर’ कहा जाता है। राजकोट, मोरवी, बीरमगाँव, कलोल, नवसारी, भावनगर, अंजार सिद्धपुर, नाडियाड, सूरत, भड़ौंच, पोरबन्दर एवं बड़ोदरा अन्य प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं।

(2) महाराष्ट्र – इस राज्य का सूती वस्त्र उत्पादन में दूसरा स्थान है, जहाँ 112 मिलों में वस्त्रों का उत्पादन किया जाता है। देश के एक-चौथाई सूती वस्त्र इसी राज्य में तैयार किये जाते हैं। अकेले मुम्बई महानगर में ही सूती वस्त्र की 62 मिले हैं। इसी कारण इसे ‘सूती वस्त्रों की राजधानी’ कहा जाता है। महाराष्ट्र राज्य के इस उद्योग में 3 लाख से अधिक श्रमिक कार्य करते हैं। बरसी, अकोला, अमरावती, वर्धा, शोलापुर, पुणे, ठाणे, हुबली, सतारा, कोल्हापुर, जलगाँव, सांगली, बिलमोरिया, नागपुर, आलमेनेर इस उद्योग के अन्य प्रधान केन्द्र हैं। यहाँ पर लट्ठा, मलमल, वॉयले, छींट, चद्दर, सूटिंग एवं शर्लिंग, धोतियाँ आदि अनेक प्रकार के रंगीन कपड़ों का निर्माण किया जाता है।

(3) पश्चिम बंगाल – पश्चिम बंगाल राज्य का देश के सूती वस्त्र उत्पादन में तीसरा स्थान है। इस राज्य में बाजार की सुविधा (जनाधिक्य) ने इस उद्योग को आकर्षित किया है। यहाँ सूती वस्त्र की 45 मिले हैं। यहाँ पर कुछ प्रमुख अनुकूल भौगोलिक सुविधाएँ पायी जाती हैं; जैसे-शक्ति संसाधनों के रूप में रानीगंज एवं झरिया की खानों से कोयला; कोलकाता पत्तन की निकटता से मशीनें मँगाने की सुविधा, पूँजी एवं अन्य व्यापारिक सुविधाएँ, सघन जनसंख्या के कारण उपभोक्ता बाजार की सुविधा, वस्त्र उद्योग के अनुकूल जलवायु आदि, परन्तु कपास देश के अन्य भागों से आयात की जाती है। श्यामनगर, पानीहाटी, कोलकाता, सिरामपुर, मौरीग्राम, शिवपुर, पाल्टा, फूलेश्वर, लिलुआ, रिशरा, बेलघरिया, घुसरी प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं।

(4) उत्तर प्रदेश – सूती वस्त्र के उत्पादन की दृष्टि से इस राज्य का चौथा स्थान है। सम्पूर्ण प्रदेश में मिलों की संख्या 41 है। कानपुर इस उद्योग का प्रमुख केन्द्र है जहाँ सूती वस्त्र की 14 मिलें हैं तथा यह उत्तरी भारत को मानचेस्टर’ कहलाता है। यहाँ गंगा घाटी में छोटे रेशे वाली कपास उगायी जाती है; अत: मोटा कपड़ा ही अधिक बनाया जाता है। मुरादाबाद, वाराणसी, आगरा, बरेली, अलीगढ़, मोदीनगर, हाथरस, सहारनपुर, रामपुर, इटावा, लखनऊ आदि अन्य प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं। उत्तर प्रदेश में बाजार एवं यातायात की सुविधाओं के कारण इस उद्योग का विकास हुआ है।

(5) तमिलनाडु – भारत में सूती वस्त्र की मिलें तमिलनाडु राज्य में सबसे अधिक मिलती हैं। जिनकी संख्या 215 है, परन्तु उत्पादन की दृष्टि से इस राज्य का देश में पाँचवाँ स्थान है। यहाँ सूती वस्त्र उद्योग का विकास पायकारा जल-विद्युत परियोजना से सस्ती जलशक्ति की प्राप्ति, कपास का स्थानीय उत्पादन, पर्याप्त श्रमिक तथा उपभोक्ता सुविधाओं के कारण हुआ है। कोयम्बटूर इस राज्य की वस्त्र राजधानी है, जहाँ 105 सूती वस्त्र की मिले हैं। अन्य प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र मदुराई, सलेम, चेन्नई, पेराम्बूर, तिरुचिरापल्ली, रामनाथपुरम्, तूतीकोरिन, तंजौर, काकीनाडा एवं तिरुनेलवेली हैं।

(6) मध्य प्रदेश – मध्य प्रदेश राज्य में वर्धा एवं पूर्णा नदियों की घाटियों में पर्याप्त मात्रा में कपास का उत्पादन किया जाता है। आदिवासी जनसंख्या की अधिकता के कारण श्रमिक पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हो जाते हैं। रामकोला एवं तातापानी की खानों से कोयले की प्राप्ति तथा चम्बल परियोजना से सस्ती जलविद्युत शक्ति की प्राप्ति होती है। रतलाम, इन्दौर, ग्वालियर, देवास, निमाड़, सतना, भोपाल, उज्जैन, बुरहानपुर, अचलपुर एवं जबलपुर प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं। यहाँ पर सूती वस्त्रों की 24 मिलें हैं।

(7) अन्य राज्य – आन्ध्र प्रदेश में 21, कर्नाटक में 32, केरल में 26, राजस्थान में 19, पंजाब में 9, ओडिशा में 5, बिहार में 6, दिल्ली में 4, असोम में 2 तथा गोआ में 1 सूती वस्त्र की मिलें हैं।

निर्यात व्यापार – भारत से सूती कपड़े का निर्यात मुख्यतः अदन, म्यांमार, सूडान, कीनिया, तंजानिया, ऑस्ट्रेलिया, इण्डोनेशिया, पाकिस्तान, श्रीलंका, सिंगापुर, इराक, ईरान, सीरिया, थाईलैण्ड, अरब देश, रूस, ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, नेपाल, नाइजीरिया, बांग्लादेश आदि देशों को किया जाता है। देश के कुल निर्यात का 90 से 92 प्रतिशत कपड़ा मोटा एवं मध्यम श्रेणी का होता है जिसे आयातक देश पुनर्निर्यात के लिए मॅगाते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका व रूस भारतीय सूती वस्त्र के प्रमुख ग्राहक हैं।
सूती वस्त्रोद्योग की समस्याएँ – सूती वस्त्रोद्योग की प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं –

  1. भारत में उत्तम किस्म की लम्बे और मुलायम रेशे वाली कपास का अभाव है। अधिकतर राज्यों में घटिया किस्म की कपास ही उगायी जाती है, जिससे उत्पादन भी घटिया ही होता है।
  2. उत्पादन प्रक्रिया में आज भी अधिकांश कारखानों में उत्पादन प्रक्रिया में परम्परागत तकनीकी का ही प्रयोग हो रहा है जिससे उत्पादित माल को अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है।
  3. भारतीय सूती मिलों की मशीनें पुरानी व निम्न स्तर की हैं जो आये दिन खराब होती रहती हैं, जिससे उत्पादन कम होता है।
  4. भारतीय सूती वस्त्र महँगा और घटिया होने के कारण विदेशी वस्त्रों की टक्कर में नहीं टिक पाता है।
  5. भारतीय मिलों में काम करने वाले मजदूरों को उचित पारिश्रमिक नहीं दिया जाता, जिससे वे अपनी माँगों को लेकर हड़ताल कर देते हैं और उत्पादन कई दिनों तक बन्द रहता है।

प्रश्न 6
भारत में कागज उद्योग के दो प्रमुख केन्द्रों के नाम बताइए तथा उनमें इस उद्योग के स्थानीयकरण के भौगोलिक कारकों की विवेचना कीजिए।
या
भारत में कागज उद्योग के स्थानीयकरण को प्रभावित करने वाले कारकों तथा वितरण का वर्णन कीजिए।
उत्तर

भारत में कागज उद्योग का विकास
Development of Paper Industry in India

कागज आधुनिक सभ्यता का मूलाधार है। ऐसा माना जाता है कि ईसा से 300 वर्ष पूर्व कागज निर्माण की कला का विकास सर्वप्रथम चीन में हुआ था। भारत में कागज का निर्माण अति प्राचीन काल से
कुटीर उद्योग के रूप में किया जा रहा है जिसके प्रमुख केन्द्र कालपी, मथुरा एवं सांगानेर तथा आरवल में थे। आधुनिक ढंग का प्रथम प्रयास 1716 ई० में ट्रंकुबार (चेन्नई के समीप) नामक स्थान पर किया गया, परन्तु इसमें असफलता हाथ लगी। 1840 ई० में हुगली नदी के किनारे सिरामपुर में भी असफलता ही मिली, परन्तु इस उद्योग का वास्तविक विकास तब हुआ जब 1879 ई० में लखनऊ में अपर इण्डिया पेपर मिल्स तथा 1881 ई० में पश्चिम बंगाल में टीटागढ़ पेपर मिल्स की स्थापना की गयी। इसके बाद कारखानों की संख्या में वृद्धि होती गयी। शिक्षा में प्रगति के साथ-साथ कागज की माँग में भी वृद्धि होती रही है; फलतः उत्पादन में भी वृद्धि हुई। वर्तमान में देश में कागज के 380 कारखाने कार्यरत हैं।

कागज उद्योग के स्थानीयकरण को प्रभावित करने वाले भौगोलिक कारक
Geographical Factors Affecting to Localisation of Paper Industry

भारत में कागज उद्योग परम्परागत कच्चे माल (वन-आधारित लकड़ी) से मुक्त है, क्योंकि बाजार का 62% कागज गैर-परम्परागत कच्चे माल से तैयार किया जाता है। इनमें कृषि-कचरा एवं पुनः उपयोग में आने वाला कागज सम्मिलित है। देश में कागज उद्योग को निम्नलिखित भौगोलिक सुविधाएँ
उपलब्ध हैं –
(1) कच्चा माल – कागज उद्योग की स्थापना में कच्चे माल का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। कागज बनाने में सवाईघास, गन्ने की खोई,फटे-पुराने चीथड़े, रद्दी कागज, बाँस तथा कोमल लकड़ी प्रयुक्त की जाती है। भारत के तराई क्षेत्र में कागज उद्योग में प्रयुक्त की जाने वाली घास अधिक उगती हैं। इनसे लगभग 9% लुग्दी तैयार की जाती है। उत्तर प्रदेश तथा महाराष्ट्र में गन्ने की खोई पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है जिससे लगभग 4% लुग्दी तैयार की जाती है। पश्चिम बंगाल तथा दक्षिणी भारत में बाँस की लुगदी से कागज बनाया जाता है। यह कागज मोटा और घटिया किस्म का होता है। भारत में कोमल लकड़ी के वृक्ष कम उगते हैं; अत: केवल घास से ही कागज बनाया जाता है। अल्प मात्रा में लुगदी पश्चिमी यूरोपीय देशों से आयात की जाती है।

(2) स्वच्छ जल – कागज उद्योग के लिए स्वच्छ जल की आवश्यकता बहुत अधिक होती है। कागज उद्योग में प्रयुक्त पदार्थों को गलाने व साफ करने में स्वच्छ जल उपयोग में लाया जाता है। यही कारण है कि यहाँ पर अधिकांश कारखानों की स्थापना नदियों के किनारे पर की गयी है।
(3) रासायनिक पदार्थ – कच्चे माल के साथ-साथ कागज उद्योग में अनेक प्रकार के रासायनिक पदार्थों की आवश्यकता होती है। विभिन्न पदार्थों का रंग उड़ाने के लिए ब्लीचिंग पाउडर, गन्धक, सोडाएश, कॉस्टिक सोडा, क्लोरीन गैस, अमोनियम सल्फेट, चूना तथा नमक आदि की आवश्यकता होती है। ये सभी पदार्थ भारत में पर्याप्त मात्रा में स्थानीय रूप से उपलब्ध हैं।

(4) शक्ति संसाधन – कागज उद्योग में चालक शक्ति के रूप में जल-विद्युत अथवा ताप विद्युत- शक्ति (कोयला) की आवश्यकता होती है। कोयला एक भारी पदार्थ है; अत: उसे दूरवर्ती स्थानों तक ले जाने में कठिनाई तथा अधिक व्यय करना पड़ता है। भारत में जल-विद्युत के उत्पादन में कमी होने के कारण, कागज के कारखानों में उत्पादन बहुत घट गया है। पश्चिम बंगाल में अनेक कारखाने जल-विद्युत के अभाव में बन्द हो गये हैं या आंशिक रूप से चल रहे हैं। वर्तमान समय में 125 कागज मिलें इसी कारण बन्द पड़ी हैं अथवा आंशिक रूप से चल रही हैं। अत: इस उद्योग के विकास में पर्याप्त सस्ती जल-विद्युत शक्ति की अत्यन्त आवश्यकता है।

(5) सस्ते एवं कुशल श्रमिक – कागज की मिलों में कार्य करने के लिए अधिक संख्या में सस्ते एवं कुशल श्रमिकों की आवश्यकता होती है। भारत में प्राचीन काल से ही कागज उद्योग कुटीर उद्योग के रूप में चलाया जाता रहा है; अतः कुशल तथा अनुभवी श्रमिक यहाँ पर्याप्त संख्या में सुगमता से उपलब्ध हो जाते हैं। भारत की सघन जनसंख्या इस उद्योग को सस्ते श्रमिक उपलब्ध करा देती है।

(6) परिवहन के साधन – कागज की मिलों तक कच्चा माल लाने तथा तैयार कागज को बाहर भेजने के लिए परिवहन के सस्ते एवं सुगम साधनों की आवश्यकता पड़ती है। यही कारण है कि भारत में कागज के कारखाने प्रायः रेलवे लाइनों, नदियों अथवा सड़कों के सहारे-सहारे स्थापित किये गये हैं।

(7) पर्याप्त माँग – भारत में कागज की खपत बहुत अधिक है। इस विशाल देश में विद्यालयों तथा कार्यालयों के लिए कागज की पर्याप्त माँग रहती है। भारत का कागज उद्योग देश की माँग की पूर्ति (केवल 90%) भी नहीं कर पाता है।
(8) सरकारी सहायता एवं संरक्षण – भारत सरकार ने कागज उद्योग को सन् 1982 से संरक्षण प्रदान किया है जिसके फलस्वरूप इस उद्योग में आशातीत प्रगति हुई है। इसके अतिरिक्त सरकार कागज उद्योग को वित्तीय सहायता भी प्रदान करती है।

भारत में कागज का उत्पादन एवं वितरण
Production and Distribution of Paper in India

कागज के उत्पादन की दृष्टि से भारत का विश्व में बीसवाँ स्थान है। कागज एक विस्तृत उद्योग है। देश का 70% से भी अधिक कागज का उत्पादन पश्चिम बंगाल, आन्ध्र प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं मध्य प्रदेश राज्यों से प्राप्त होता है। कागज के उत्पादन का कुछ भाग हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, केरल एवं गुजरात राज्यों से प्राप्त होता है। प्रमुख कागज उत्पादक राज्यों का विवरण निम्नवत् है –
(1) पश्चिम बंगाल – पश्चिम बंगाल राज्य देश का लगभग 20% कागज उत्पन्न कर प्रथम स्थान बनाये हुए है। इस राज्य में कागज की 19 मिले हैं। टीटागढ़, रानीगंज, नैहाटी, त्रिवेणी, कोलकाता, काकिनाड़ा, चन्द्रहाटी (हुगली), आलम बाजार (कोलकाता), बड़ा नगर, बांसबेरिया तथा शिवफूली कागज उद्योग के प्रमुख केन्द्र हैं। टीटागढ़ में देश की सबसे बड़ी कागज मिल है जिसमें बाँस का कागज निर्मित किया जाता है।

(2) महाराष्ट्र – यह दूसरा बड़ा कागज उत्पादक राज्य है। यहाँ पर 14 कागज एवं 3कागज-गत्ते के सम्मिलित कारखाने हैं जो देश का लगभग 13% कागज का उत्पादन करते हैं। यहाँ पर कोमल लकड़ी की लुगदी विदेशों से आयात की जाती है। इसके अतिरिक्त बाँस, खोई एवं फटे-पुराने चिथड़ों का उपयोग कागंज बनाने में किया जाता है। गन्ने की खोई एवं धान की भूसी से गत्ता बनाया जाता है। पुणे, खोपोली, मुम्बई, बल्लारपुर, चन्द्रपुर, ओगेलवाडी, चिचवाडा, रोहा, कराड़, कोलाबा, कल्याण, वाड़ावाली, काम्पटी, नन्दुरबार, पिम्परी, भिवंडी एवं वारसनगाँव कागज उद्योग के प्रधान केन्द्र हैं। बल्लारपुर एवं सांगली में अखबारी कागज की मिलें भी स्थापित की गयी हैं।।

(3) आन्ध्र प्रदेश – कागज के उत्पादन में आन्ध्र प्रदेश राज्य का देश में तीसरा स्थान है, जहाँ देश का 12% कागज तैयार किया जाता है। कागज उद्योग के लिए बॉस इस राज्य का प्रमुख कच्चा माल है; अतः यहाँ पर यह उद्योग इसी कच्चे माल पर आधारित है। सिरपुर, कागजनगर, तिरुपति तथा राजमहेन्द्री प्रमुख कागज उत्पादक केन्द्र हैं।

(4) मध्य प्रदेश – इस राज्य में वनों का विस्तार अधिक है। यहाँ बाँस एवं सवाई घास पर्याप्त मात्रा में उगती है। इस राज्य में इन्दौर, भोपाल, सिहोर, शहडोल, रतलाम, मण्डीद्वीप, अमलाई एवं विदिशा प्रमुख कागज उत्पादक केन्द्र हैं। नेपानगर में अखबारी कागज तथा होशंगाबाद में नोट छापने के कागज बनाने का सरकारी कारखाना स्थापित है।

(5) उत्तर प्रदेश – उत्तर प्रदेश राज्य का यह उद्योग शिवालिक एवं तराई क्षेत्रों में सवाई, भाबर एवं मूंज घास तथा बॉस की प्राप्ति के ऊपर निर्भर करता है। यहाँ देश का 4.3% कागज उत्पन्न किया जाता है। लखनऊ, गोरखपुर एवं सहारनपुर कागज उत्पादन के प्रमुख केन्द्र हैं। इनके अतिरिक्त मेरठ, मुजफ्फरनगर, उझानी, पिपराइच, मोदीनगर, नैनी, लखनऊ तथा सहारनपुर प्रमुख गत्ता उत्पादक केन्द्र हैं।

(6) कर्नाटक – इस राज्य में भद्रावती, बेलागुला तथा डांडेली केन्द्रों पर कागज की मिलें हैं।
(7) अन्य राज्य – भारत के अन्य कागज उत्पादक राज्यों में बिहार, गुजरात, ओडिशा, केरल, हरियाणा एवं तमिलनाडु प्रमुख हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार – भारत में कागज का उपभोग निरन्तर बढ़ता जा रहा है। अतः उत्पादन की कमी की पूर्ति विदेशों से कागज का आयात कर की जाती है। यह आयात नॉर्वे, स्वीडन, जापान, हॉलैण्ड, पोलैण्ड, जर्मनी, कनाडा आदि देशों से किया जाता है। भारत थोड़ी मात्रा में कागज का निर्यात भी करता है। यह निर्यात अफ्रीकी एवं दक्षिणी-पूर्वी एशियाई देशों को किया जाता है। वर्ष 2001-2002 में भारत ने ₹ 2,131 करोड़ मूल्य के कागज का आयात किया। इस आयात को देखते हुए यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भविष्य में कागज उत्पादन में आत्मनिर्भर होने के लिए देश के भीतर ही सम्भावित स्थानों पर कागज की मिलों का विस्तार किया जाना चाहिए।

प्रश्न 7
उत्तर प्रदेश के चमड़ा उद्योग का विवरण लिखिए।
उत्तर
चमड़ा उद्योग पूर्ण रूप से पशुओं पर आधारित उद्योग है। विश्व के लगभग एक-तिहाई पशु भारत में पाले जाते हैं। उत्तर प्रदेश राज्य में सर्वाधिक पशु पाले जाते हैं जिनसे खाल एवं चमड़ा पर्याप्त मात्रा में प्राप्त होता है। पशुपालन व्यवसाय में इस राज्य का भारत में प्रथम स्थान है। इसी कारण यहाँ चमड़ा उद्योग काफी प्रगति कर गया है। राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में चमड़ा एवं उससे निर्मित पदार्थों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उत्तर प्रदेश राज्य में यह उद्योग कुटीर उद्योग के रूप में विकसित हुआ है।
चमड़ा उद्योग का वर्गीकरण निम्नलिखित चार मुख्य विभागों में किया जा सकता है –

  • चाम एवं खालों का कमाना।
  • जूते बनाना।
  • यात्रा में काम आने वाले सामान।
  • मशीनों के पट्टे तथा उद्योगों में काम आने वाले यन्त्रों एवं उपकरणों का निर्माण।

उत्तर प्रदेश राज्य में चमड़े के लगभग 80 कारखाने हैं जिनमें चमड़ा पकाकर एवं कमाकर तैयार किया जाता है। कानपुर चमड़ा उद्योग का प्रधान केन्द्र है जहाँ इसके 25 कारखाने हैं। यहाँ जूते, चप्पल, सूटकेस, अटैचियाँ एवं सैनिक सामान बनाया जाता है। कानपुर में चमड़े की वस्तुओं को प्रोत्साहन देने हेतु (Finished Leather and Leather Manufacturers Council) की स्थापना की गयी है।

आगरा इस उद्योग का दूसरा बड़ा केन्द्र है, जहाँ इसके 25 कारखाने कार्यरत हैं। इनमें जूते, चप्पल अधिक बनाये जाते हैं। ये देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों को भी निर्यात किये जाते हैं। मेरठ खेल को सामान बनाने में देशव्यापी प्रसिद्ध केन्द्र है। यहाँ पर चमड़े से निर्मित खेल के सामान की पूर्ति देश भर में की जाती है। अन्य केन्द्रों में बरेली, अलीगढ़, इलाहाबाद एवं सहारनपुर प्रमुख हैं। यहाँ जूते विशेष रूप से बनाये जाते हैं।

उत्तर प्रदेश में जूते बनाने की 5 बड़ी इकाइयाँ हैं जिनमें कपूर एलन एण्ड कम्पनी, कानपुर; मॉडल इण्डस्ट्रीज, दयालबाग; आगरा तथा कर्जन शू फैक्ट्री, आगरा बहुत ही प्रसिद्ध हैं। प्रदेश में जितना चमड़ा बनता है उसका दो-तिहाई भाग जूता उद्योग में खप जाता है। वैसे तो यह उद्योग घरेलू स्तर पर छोटे-बड़े सभी नगरीय केन्द्रों में किया जाता है, परन्तु वृहत् स्तर पर पश्चिमी ढंग के जूते बनाने के केवल 5 कारखाने प्रदेश में स्थापित हैं, जबकि देश में कुल 15 कारखाने हैं। इस प्रदेश में निर्मित जूते, चप्पल, ब्रीफकेस, अटैचियाँ, खेल का सामान, सैनिक साज-सामान की माँग देश भर में रहती है।

जूता उद्योग के लिए आवश्यक कच्चा माल – जूता उद्योग के लिए आवश्यक कच्चा माल चाम एवं खाले हैं। प्रयोग करने से पहले इसे कमाया जाता है। देश में चमड़ा कमाने के 40 कारखाने हैं। इस व्यवसाय में १ 15 करोड़ की पूँजी लगी है। इनमें से लगभग 10% कारखाने उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित हैं। इन कच्ची खालों की उपलब्धि गाय एवं भैंसों से होती है, परन्तु देश के विभाजन के कारण कच्ची खालों की उपलब्धता में कुछ कमी आयी तथा खालों के कुछ केन्द्र पाकिस्तान में रह गये तथा खाल कमाने के कुछ कारखाने भारत में आये। चमड़ा कमाने के इस देशी उद्योग पर इस स्थिति का काफी प्रभाव पड़ा। भेड़-बकरियों की खाले अन्य कच्चा माल है जिसकी उपलब्धि आवश्यकता से भी अधिक है। अतः इनका विदेशों को निर्यात कर दिया जाता है।

चमड़ा कमाने में काम आने वाली वनस्पति में देश आत्मनिर्भर नहीं है। इस वनस्पति में बबूल की छाल एवं उसका सत महत्त्वपूर्ण है तथा इसका आयात पूर्वी अफ्रीका से किया जाता है। उत्तर प्रदेश राज्य में बबूल का उत्पादन उत्तरी-पश्चिमी भाग में किया जाता है। चमड़ा कमाने में काम आने वाली अन्य प्रमुख वनस्पति, आँवला एवं उसका सत, हर्र, बहेड़ा की छाल हैं। ये वनस्पति पदार्थ प्रदेश के शिवालिक की पहाड़ियों एवं दक्षिणी पठारी भागों में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। अन्य पदार्थों में चूना, सोडियम सल्फाइड, बोरिक एसिड, बाइक्रोमेट ऑफ सोडा, गन्धक का तेजाब मुख्य हैं। इनमें से अधिकांश वस्तुओं में देश आत्मनिर्भर है। इनके अतिरिक्त कॉड, हैरिंग एवं सील मछलियों का तेल भी काम में लाया जाता है। छाल एवं रासायनिक पदार्थों के अतिरिक्त ऐलुमिनियम, अण्डे की जर्दी एवं जैतून का तेल भी चमड़ा शोधन के काम में आता है। इस प्रकार अधिकांश चमड़ा कमाने के कच्चे पदार्थ देश में ही उपलब्ध हैं। कुछ रासायनिक पदार्थों का विदेशों से आयात किया जाता है। प्रदेश का यह उद्योग सफलता की ओर अग्रसर है।

भारतीय चमड़े की माँग प्रमुखतया ब्रिटेन 45%, जर्मनी 10%, फ्रांस 7% एवं संयुक्त राज्य अमेरिका 9% देशों में रहती है। इटली, जापान, बेल्जियम एवं पूर्ववर्ती यूगोस्लाविया अन्य प्रमुख आयातक देश हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भारतीय अर्थव्यवस्था में कुटीर उद्योगों की महत्ता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
भारतीय अर्थतन्त्र कृषि पर आधारित है। देश की 72% जनसंख्या गाँवों में बसती है तथा कृषि द्वारा आजीविका निर्वाह करती है। कृषि एक मौसमी व्यवसाय है, जिससे कृषकों को पर्याप्त रोजगार प्राप्त नहीं होता। अतएव कृषि पर आधारित कुटीर उद्योगों; जैसे-हथकरघा द्वारा सूती धागा तथा वस्त्र बनाना, खाद्य तेल प्रसंस्करण, गुड़, शक्कर बनाना, चटाई, बान, रस्सी आदि बनाना बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। इन उद्योगों से जहाँ ग्रामीण जनसंख्या को आजीविका के साधन प्राप्त होते हैं, वहीं अर्थतन्त्र में भी सुधार होता है। इसी प्रकार, नगरों में भी अनेक कुटीर उद्योग लोगों की पारिवारिक आय का साधन होते हैं। इनसे श्रमिकों को रोजगार की प्राप्ति होती है।

प्रश्न 2
भिलाई में लौह-इस्पात उद्योग के स्थापित होने के दो कारणों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
भिलाई में लौह-इस्पात उद्योग के स्थापित होने के दो कारण निम्नलिखित हैं –
(1) कच्चे लोहे की निकट उपलब्धता – इस कारखाने के लिए कच्चा लोहा बस्तर, करघाली व राजहरा की पहाड़ियों से उपलब्ध हो जाता है। इसके अतिरिक्त झरिया और बोकारो का मिश्रित कोयला धातुशोधन के उपयुक्त बनाया जाता है। कोरबा ताप शक्ति-गृह से 90,000 किलोवाट बिजली भी उपलब्ध होती है।

(2) चूना व डोलोमाइट की निकट उपलब्धता – इस कारखाने के लिए चुना निकट ही दुर्ग, रायपुर और बिलासपुर जिलों से प्राप्त हो जाता है। डोलोमाइट भी निकट ही भानेवर, कासोंदी, पारसोदा, खरिया, रामतोला और हरदी (बिलासपुर) और भाटापारा (रायपुर) से प्राप्त हो जाता है।

प्रश्न 3
भारत में लौह तथा इस्पात उद्योग के चार केन्द्रों का उल्लेख कीजिए।
या
बोकारो भारत के किस राज्य में स्थित है तथा यह किस उद्योग के लिए प्रसिद्ध है? [2010,14]
उत्तर
भारत में लौह तथा इस्पात उद्योग के चार केन्द्र निम्नलिखित हैं –

  1. राउरकेला इस्पात लिमिटेड – हिन्दुस्तान स्टील लिमिटेड के तत्वावधान में 1955 ई० में ओडिशा राज्य के सुन्दरगढ़ जिले में राउरकेला नामक स्थान पर जर्मनी की क्रुप्स डिमॉग कम्पनी के सहयोग से इस कारखाने की स्थापना की गयी थी। वर्तमान में इसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता 30.10 लाख टन इस्पात तैयार करने की है।
  2. भिलाई इस्पात लिमिटेड – इस कारखाने की स्थापना 1953 ई० में पूर्व सोवियत संघ की सहायता से छत्तीसगढ़ राज्य के भिलाई नामक स्थान पर की गयी थी। इस कारखाने पर भी हिन्दुस्तान स्टील लिमिटेड का अधिकार है। वर्तमान में इस कारखाने की वार्षिक उत्पादन क्षमता 40 लाख टन इस्पात तैयार करने की है।
  3. दुर्गापुर इस्पात लिमिटेड – हिन्दुस्तान स्टील लिमिटेड के तत्त्वावधान में इस कारखाने की स्थापना सन् 1956 में पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर नामक स्थान पर ब्रिटिश सरकार की सहायता से की गयी है। इस कारखाने की वार्षिक उत्पादन क्षमता 28 लाख टन है।
  4. बोकारो इस्पात लिमिटेड – चतुर्थ पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत सन् 1964 में पश्चिमी झारखण्ड के धनबाद जिले के बोकारो नामक स्थान पर इस कारखाने की स्थापना की गयी थी। इसके निर्माण में पूर्व सोवियत संघ की सरकार से सहायता ली गयी थी। इस कारखाने की उत्पादन क्षमता 40 लाख टन थी, जिसे बाद में 60 लाख टन तक बढ़ाया गया है।

प्रश्न 4
भारत में चीनी उद्योग के विकास की समस्याओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
भारत में चीनी उद्योग के विकास की प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं –

  1. भारत में गन्ने का लागत मूल्य अधिक है; अत: चीनी उत्पादन महँगा पड़ता है।
  2. चीनी की मिलों में पुराने उपकरण तथा मशीनें होने से उत्पादन कम होता है।
  3. चीनी उद्योग पर सरकार ने भारी कर लगा रखे हैं।
  4. श्रमिकों की हड़तालें भी चीनी उत्पादन में बाधक हैं।

प्रश्न 5
भारत के सूती वस्त्र उद्योग के किसी एक राज्य में स्थानीयकरण के कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
महाराष्ट्र – यहाँ 119 कारखानों में से 40 कताई मिल तथा 79 सम्मिश्रित कारखाने हैं। अकेले मुम्बई में 54 कारखाने स्थापित हैं। नागपुर, पुणे, वर्धा, अमरावती, अकोला, कोल्हापुर, शोलापुर एवं सांगली प्रमुख केन्द्र हैं। राज्य में सूती वस्त्रोद्योग के विकास में निम्नलिखित कारक उत्तरदायी रहे हैं –

  1. दक्कन लावा के मिट्टी क्षेत्र में कपास की खेती उत्तम होती है।
  2. मुम्बई पत्तन से मिस्र, अमेरिका आदि से कपास तथा यूरोप से मशीनरी आयात की सुविधा है।
  3. राज्य में सघन आबादी के कारण पर्याप्त श्रमिक उपलब्ध हैं।
  4. राज्य में उद्योग के पूर्वारम्भ के कारण श्रमिक कुशल हो गये हैं।
  5. मुम्बई नगर प्रमुख व्यापार केन्द्र होने के कारण पूँजी की सुविधा प्राप्त है।
  6. मुम्बई भीतरी भागों से रेलों एवं सड़कों द्वारा जुड़ा है।
  7. मुम्बई की आर्द्र जलवायु सूती वस्त्र बनाने के लिए उपयुक्त है। कारखानों के भीतर कृत्रिम नमी उत्पन्न करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
  8. जल-विद्युत एवं परमाणु विद्युत का विकास होने के कारण विदेशों से कोयलों के आयात की आवश्यकता नहीं पड़ती।
  9. अनेक प्रकार के विशिष्ट वस्त्र (लट्ठा, मलमल, वायल, छींट, सूटिंग, शर्लिंग, धोती, साड़ी, चादरें आदि) तैयार किये जाते हैं।
  10. उद्योग के पूर्वारम्भ के कारण मुम्बई को ‘सूती वस्त्रों की राजधानी’ (Cottonopolis) कहा जाता है।

प्रश्न 6
उद्योगों के स्थानीयकरण के लिए किन्हीं चार भौगोलिक कारकों का उल्लेख कीजिए
उत्तर
उद्योगों के स्थानीकरण के चार भौगोलिक कारकों का विवरण निम्नवत् है –

  1. कच्चे माल की उपलब्धता – किसी स्थान पर कच्चे माल की उपलब्धता वहाँ सम्बन्धित उद्योग के स्थानीयकरण का प्रमुख कारक है। ऐसा न होने पर कच्चा माल अन्यत्र दूरस्थ स्थान पर ले जाने में समय व धन का अपव्यय होता है। यही कारण है कि चीनी के उद्योग का उत्तर प्रदेश में, लौह-इस्पात उद्योग का झारखण्ड में, सूती वस्त्र उद्योग को महाराष्ट्र में स्थानीयकरण हुआ है।
  2. जलवायु – किसी भी उद्योग के लिए किसी स्थान पर उपयुक्त जलवायु होना भी स्थानीयकरण का कारक है। सूती वस्त्र उद्योग के लिए आर्द्र जलवायु आवश्यक है तो चीनी उद्योग के लिए उष्ण-आर्द्र। यही कारण है कि सूती वस्त्र उद्योग का महाराष्ट्र व गुजरात में स्थानीयकरण हुआ है।
  3. जल की उपलब्धता – अधिकांश विनिर्माण उद्योगों में जल की आवश्यकता बड़ी मात्रा में पड़ती है। सीमेण्ट उद्योग, कागज उद्योग, चीनी उद्योग ऐसे उद्योगों के उदाहरण हैं। ये उद्योग उन्हीं स्रोतों पर केन्द्रित हैं जहाँ जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है।
  4. श्रम-शक्ति की उपलब्धता – लगभग सभी उद्योगों में पर्याप्त तथा कुशल श्रम-शक्ति की आवश्यकता पड़ती है। किसी जल-विहीन या निम्नतम जनसंख्या घनत्व वाले स्थान पर उद्योगों के लिए श्रम-शक्ति का अभाव होता है। अन्य स्थानों से श्रम-शक्ति को लाकर बसाना महँगा व असुविधाजनक होती है। अत: उद्योगों के स्थानीयकरण में श्रम-शक्ति की उपलब्धता एक महत्त्वपूर्ण कारक है।

प्रश्न 7
भारत में सूती वस्त्रोद्योग के स्थानीयकरण के कोई चार कारक बताइए। [2007]
उत्तर
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 5 के अन्तर्गत ‘सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण के कारक शीर्षक देखें।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भारत की इस्पात नगरी किसे कहते हैं? उत्तर भारत के झारखण्ड राज्य के सिंहभूम जिले में सांकची (जमशेदपुर) नामक स्थान पर प्रसिद्ध उद्योगपति जमशेदं जी टाटा द्वारा स्थापित “टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी, जमशेदपुर को भारत की इस्पात नगरी कहा जाता है।

प्रश्न 2
सलेम का इस्पात संयन्त्र किस राज्य में है?
उत्तर
सलेम का इस्पात संयन्त्र भारत के तमिलनाडु के सलेम जिले में है।

प्रश्न 3
सीमेण्ट का सर्वाधिक उत्पादन करने वाला राज्य कौन-सा है?
उत्तर
भारत में सीमेण्ट का सर्वाधिक उत्पादन आन्ध्र प्रदेश राज्य (देश का 15%) में होता है।

प्रश्न 4
एशिया का सबसे बड़ा सीमेण्ट कारखाना कहाँ स्थित है?
उत्तर
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में चुर्क तथा चुनार कजराहट में स्थित है।

प्रश्न 5
भारत का सबसे बड़ा सूती वस्त्र उत्पादक राज्य कौन-सा है? उत्तर गुजरात भारत का सबसे बड़ा सूती वस्त्र उत्पादक राज्य है।

प्रश्न 6
‘उत्तरी भारत का मानचेस्टर’ किसे कहा जाता है?
उत्तर
उत्तर प्रदेश का कानपुर नगर सूती वस्त्र उद्योग का प्रमुख केन्द्र होने के कारण ‘उत्तरी भारत का मानचेस्टर’ कहा जाता है।

प्रश्न 7
भारत की सर्वाधिक सूती वस्त्र मिलें किस राज्य में स्थित हैं?
उत्तर
भारत में सर्वाधिक सूती वस्त्र मिलें तमिलनाडु राज्य में स्थित हैं।

प्रश्न 8
भारत का सर्वाधिक चीनी उत्पादक राज्य कौन-सा है?
उत्तर
उत्तर प्रदेश भारत का सर्वाधिक चीनी उत्पादक राज्य है।

प्रश्न 9
वर्तमान में भारत में कितनी चीनी मिलें हैं?
उत्तर
वर्तमान में भारत में 435 चीनी मिलें हैं।

प्रश्न 10
छत्तीसगढ़ के सीमेण्ट उद्योग के केन्द्रों के नाम लिखिए।
उत्तर
छत्तीसगढ़ में सीमेण्ट उद्योग केन्द्र हैं—जामुला, मंधार, तिलदा, मोदीग्राम, अलकतरा एवं रायगढ़।

प्रश्न 11
हिन्दुस्तान मशीन टूल्स के कारखाने कहाँ-कहाँ स्थित हैं?
उत्तर
‘हिन्दुस्तान मशीन टूल्स के कारखाने जलाहाजी, बंगलुरु, पिंजौर, कालामसेरी और हैदराबाद आदि स्थानों पर स्थित हैं।

प्रश्न 12
भारत में उत्पन्न होने वाले विभिन्न रेशमों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर
शहतूत का रेशम, टशर रेशम, मूंगा रेशम तथा ईरी रेशम।

प्रश्न 13
टशर रेशम क्या है? इसके प्रमुख उत्पादक राज्यों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर
यह शहतूत पर पाले गये कीड़ों से प्राप्त किया जाता है। यह रेशम कुछ घटिया किस्म का माना जाता है। इसके प्रमुख उत्पादक राज्य झारखण्ड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ हैं।

प्रश्न 14
पश्चिम बंगाल की कृषि पर आधारित प्रमुख उद्योग का नाम बताइए तथा उसके प्रमुख केन्द्रों के नाम लिखिए। [2008]
उत्तर
पश्चिम बंगाल में कृषि पर आधारित प्रमुख फसल जूट है। जूट उद्योग के प्रमुख केन्द्र टीटागढ़, शिवपुर, हावड़ा, श्यामनगर, बाटानगर, सियालदाह, बिरलापुर, बैरकपुर आदि हैं।

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प्रश्न 15
भिलाई भारत के किस राज्य में स्थित है तथा यह किस उद्योग के लिए प्रसिद्ध है? [2008, 14]
उत्तर
भिलाई भारत के छत्तीसगढ़ राज्य में स्थित है तथा यह इस्पात उद्योग के लिए प्रसिद्ध है, जो यहाँ सन् 1953 में पूर्व सोवियत संघ की सहायता से स्थापित किया गया था।

प्रश्न 16
गुजरात के सूती वस्त्र उद्योग के किन्हीं दो केन्द्रों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
गुजरात के सूती वस्त्र उद्योग के दो केन्द्र हैं-अहमदाबाद तथा सूरत।

प्रश्न 17
उद्योगों के स्थानीयकरण के लिए किन्हीं दो कारकों के नाम लिखिए। [2007]
उत्तर

  1. कच्चे माल की उपलब्धता तथा
  2. यातायात के साधनों की उपलब्धता।

प्रश्न 18
पश्चिम बंगाल के दो प्रमुख कागज उद्योग-केन्द्रों के नाम लिखिए। [2007]
उत्तर

  1. टीटागढ़ तथा
  2. रानीगंज।

प्रश्न 19
भारत के दो प्रमुख लौह तथा इस्पात संयन्त्रों के नाम बताइए। [2008, 09, 16]
उत्तर

  1. भिलाई इस्पात लिमिटेड तथा
  2. बोकारो इस्पात लिमिटेड।

प्रश्न 20
भारत में लौह-अयस्क भण्डार के दो प्रमुख राज्यों का उल्लेख कीजिए। [2014]
उत्तरं

  1. झारखण्ड तथा
  2. छत्तीसगढ़।

प्रश्न 21
भारत के सूती वस्त्र उद्योग के अधिक विकास वाले दो राज्यों के नाम लिखिए। [2008]
या
भारत के सूती वस्त्र उद्योग के दो केन्द्रों के नाम लिखिए। [2013]
उत्तर

  1. गुजरात तथा
  2. महाराष्ट्र।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1
भारत के जूट उद्योग का सबसे मुख्य क्षेत्र है –
(क) पश्चिम बंगाल में हुगली नदी का किनारा
(ख) उत्तर प्रदेश में शहजनता
(ग) बिहार में दरभंगा
(घ) मध्य प्रदेश में रायगढ़
उत्तर
(क) पश्चिम बंगाल में हुगली नदी का किनारा।

प्रश्न 2
भारत का सबसे बड़ा सूती वस्त्र उत्पादक राज्य है –
(क) महाराष्ट्र
(ख) गुजरात
(ग) बंगाल
(घ) मध्य प्रदेश
उत्तर
(ख) गुजरात।

प्रश्न 3
सूती वस्त्र उत्पादन में पूर्व का बोस्टन कहलाता है –
(क) गुजरात का अहमदाबाद
(ख) उत्तर प्रदेश का कानपुर
(ग) महाराष्ट्र का कोल्हापुर
(घ) पश्चिम बंगाल का कोलकाता
उत्तर
(क) गुजरात का अहमदाबाद।

प्रश्न 4
स्टील ऑथोरिटी ऑफ इण्डिया लि० की स्थापना किस वर्ष हुई?
(क) 1963 ई० में
(ख) 1971 ई० में
(ग) 1973 ई० में
(घ) 1976 ई० में
उत्तर
(ग) 1973 ई० में।

प्रश्न 5
भारत का लोहा-इस्पात कारखाना जो निजी क्षेत्र में स्थापित है –
(क) विशाखापट्टनम् स्टील प्लाण्ट
(ख) सलेम स्टील प्लाण्ट
(ग) टाटा आयरन एण्ड स्टील प्लाण्ट
(घ) दुर्गापुर स्टील प्लाण्ट
उत्तर
(ग) टाटा आयरन एण्ड स्टील प्लाण्ट

प्रश्न 6
निम्नलिखित केन्द्रों में से कौन लोहा-इस्पात उद्योग का केन्द्र नहीं है?
(क) बोकारो
(ख) रेनुकूट
(ग) भिलाई
(घ) राउरकेला
उत्तर
(ख) रेनुकूट।

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प्रश्न 7
निम्नलिखित में से भारत की कौन-सी लौह-इस्पात इकाई सबसे पुरानी है?
(क) भद्रावती
(ख) बोकारो
(ग) जमशेदपुर
(घ) दुर्गापुर
उत्तर
(ग) जमशेदपुर।

प्रश्न 8
निम्नलिखित इस्पात केन्द्रों में से कौन छत्तीसगढ़ राज्य में स्थित है?
(क) भिलाई
(ख) राउरकेला
(ग) दुर्गापुर
(घ) बोकारो
उत्तर
(क) भिलाई।

प्रश्न 9
पंजाब का कौन-सा नगर हौजरी उद्योग के लिए प्रसिद्ध है?
(क) गुरदासपुर
(ख) लुधियाना
(ग) अमृतसर
(घ) जालन्धर
उत्तर
(ख) लुधियाना।

प्रश्न 10
देश में रेशम उद्योग का सर्वाधिक स्थानीयकरण किस राज्य में हुआ?
(क) कर्नाटक
(ख) आन्ध्र प्रदेश
(ग) पंजाब
(घ) झारखण्ड तर
उत्तर
(क) कर्नाटक।

प्रश्न 11
टाटा का लोहा तथा इस्पात संयन्त्र स्थित है – [2010,14] 
(क) बिहार में
(ख) मध्य प्रदेश में
(ग) झारखण्ड में
(घ) छत्तीसगढ़ में
उत्तर
(ग) झारखण्ड में।

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प्रश्न 12
निम्नलिखित में से कौन-सा औद्योगिक नगर है? [2012]
(क) जमशेदपुर
(ख) वाराणसी
(ग) लखनऊ
(घ) मथुरा
उत्तर
(क) जमशेदपुर।

प्रश्न 13
भिलाई लौह-इस्पात संयन्त्र अवस्थित है – [2015, 16]
(क) मध्य प्रदेश में
(ख) झारखण्ड में
(ग) छत्तीसगढ़ में
(घ) ओडिशा में
उत्तर
(ग) छत्तीसगढ़ में।

प्रश्न 14
‘जमशेदपुर’ सम्बन्धित है – [2016]
(क) सूती वस्त्र उद्योग से।
(ख) चीनी उद्योग से
(ग) सीमेण्ट उद्योग से
(घ) लोहा एवं इस्पात उद्योग से
उत्तर
(घ) लोहा एवं इस्पात उद्योग से।

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UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 17 Population Education

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 17 Population Education (जनसंख्या शिक्षा) are part of UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 17 Population Education (जनसंख्या शिक्षा).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 17
Chapter Name Population Education (जनसंख्या शिक्षा)
Number of Questions Solved 42
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 17 Population Education (जनसंख्या शिक्षा)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
जनसंख्या शिक्षा से आप क्या समझते हैं? भारत में जनसंख्या शिक्षा की आवश्यकता एवं महत्त्व का भी उल्लेख कीजिए।
उतर
जनसंख्या शिक्षा की अवधारणा
जनसंख्या शिक्षा शिक्षाशास्त्र की एक नवीन अवधारणा है। इस अवधारणा की उत्पत्ति और प्रसार का प्रमुख कारण जनसंख्या की तीव्र गति से वृद्धि है। जनसंख्या की असाधारण वृद्धि ने विश्व के सम्मुख एक अत्यन्त भीषण समस्या उत्पन्न कर दी है। जनसंख्या की वृद्धि वैयक्तिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक पक्ष पर अपना दूषित प्रभाव डालती है। भारत में तो जनसंख्या इतनी तीव्र गति से बढ़ी है। कि हमारे प्रगति के सभी मार्ग अवरुद्ध हो गये हैं। कुछ समय पूर्व तक जनसंख्या शिक्षा की अवधारणा को व्यक्त करने के हेतु यौन शिक्षा, पारिवारिक जीवन शिक्षा आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता था। 1962 ई० के बाद कोलम्बिया विश्वविद्यालय के प्रो० वेलैण्ड ने जनसंख्या शिक्षा शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया। उसी समय से जनसंख्या शिक्षा’ शब्द का प्रयोग निरन्तर होता आ रहा है। अब जनसंख्या शिक्षा को अति आवश्यक एवं उपयोगी माना जाने लगा है। इसका कारण यह है कि शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर जनसंख्या शिक्षा के समावेश को आवश्यक माना जाने लगा है।

जनसंख्या शिक्षा की परिभाषा
अभी तक ‘जनसंख्या शिक्षा का कोई भी सर्वमान्य स्वीकृत अर्थ नहीं प्रस्तुत किया गया है और न ही उसकी कोई परिभाषा है। सबसे पहले इसकी व्याख्या सितम्बर, 1970 ई० में यूनेस्को की ओर से बैंकांक में आयोजित की जाने वाली ‘जनसंख्या शिक्षा संगोष्ठी में की गयी। उसमें कहा गया-“जनसंख्या शिक्षा एक शैक्षिक कार्यक्रम है, जिसमें परिवार, समाज, राष्ट्र एवं विश्व की जनसंख्या की स्थिति का अध्ययन किया जाता है। इस अध्ययन का उद्देश्य छात्रों में इस स्थिति के प्रति विवेकपूर्ण, उत्तरदायित्वपूर्ण दृष्टिकोण तथा व्यवहार का विकास करना है।”

डॉ० वी०के०आर०वी० राव ने जनसंख्या शिक्षा की परिभाषा इस प्रकार दी है-“जनसंख्या शिक्षा प्रमुख रूप से ऐसी प्रेरणा-शक्ति है जो हमारे परिवार की सीमा एवं परिवार नियोजन की आवश्यकताओं के प्रति उचित दृष्टिकोण उत्पन्न करती है और राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक विकास में सहायता प्रदान करती है। इसे यौन शिक्षा और परिवार नियोजन की जानकारी से निश्चित नहीं किया जाना चाहिए।” डॉ० राव का विचार है कि शिक्षा का सम्बन्ध मानवीय स्थितियों के विकास से भी है, क्योंकि सीमित परिवार अथवा परिवार की संख्या उसकी प्रगति अथवा सुधार के मार्ग को निश्चित करती है। | वीडरमैन के अनुसार, “जनसंख्या शिक्षा एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा छात्रों को जनसंख्या तत्त्व की प्रवृत्ति और उसकी व्याख्या, जनसंख्या की विशेषताओं, जनसंख्या में परिवर्तनों के कारणों, उसके परिणामों और इन परिवर्तनों से परिवार, समाज, देश एवं विश्व पर पड़ने वाले प्रभावों से अवगत कराया जाता है।

डॉ० चन्द्रशेखर का मत है, “जनसंख्या शिक्षा न तो यौन-शिक्षा है और न परिवार नियोजन की शिक्षा। जनसंख्या शिक्षा जनसंख्या वृद्धि, इसके वितरण एवं जीवन-स्तर से , उसके सम्बन्ध और उसके आर्थिक एवं सामाजिक परिणामों का अर्थशास्त्र एवं समाजशास्त्र है।” इस तरह जनसंख्या शिक्षा के माध्यम से छात्रों को विश्व, राष्ट्र, राज्य, स्थानीय और परिवार स्तर पर जनसंख्या के विविध पहलुओं से अवगत कराया जाता है। साथ ही उन्हें रहन-सहन के स्तर एवं आर्थिक और सामाजिक स्तर पर जनसंख्या वृद्धि के प्रभाव के सम्बन्ध में जानकारी प्रदान की जाती है। इस तरह जनसंख्या शिक्षा का अन्तिम लक्ष्य व्यक्ति को इस योग्य बनाना है कि वे जनसंख्या वृद्धि और उससे उत्पन्न समस्याओं को समझ सकें। उनमें यह संचेतना उत्पन्न हो जिससे वे विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हो सकें।

भारत में जनसंख्या शिक्षा की आवश्यकता और महत्त्व
2011 की जनसंख्या के अनुसार, भारत की जनसंख्या 121.02 करोड़ हो चुकी है। भारत में जनसंख्या विस्फोट के इस विकराल रूप ने जनसंख्या शिक्षा की आवश्यकता को अनिवार्य बना दिया है। जनसंख्या शिक्षा के उद्देश्य, जो “राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसन्धान प्रशिक्षण परिषद्” ने अपनी पुस्तिका में व्यक्त किये हैं, उनसे उसका महत्त्व स्पष्ट हो जाता है, इस प्रकार है-

  1. छात्रों को आधुनिक विश्व की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना के रूप में जनसंख्या वृद्धि की गति तथा
    कारणों के सम्बन्ध में ज्ञानं प्रदान करना।
  2. छात्रों को व्यक्ति, परिवार, समाज तथा विश्व के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा
    राजनीतिक जीवन पर जनसंख्या वृद्धि के पड़ने वाले प्रभावों से अवगत कराना।
  3. छात्रों को परिवार के आकार तथा रहन-सहन के स्तर के सम्बन्ध में बताना तथा कम आय वाले।
    परिवारों की कव॑िनाई बताकर उन्हें छोटा परिवार रखने हेतु प्रेरित करना।
  4. छात्रों को जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न होने वाली निम्नलिखित समस्याओं की जानकारी प्रदान करके उनमें जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण रखने के दृष्टिकोण का विकास करना-
    1. रोगों तथा दुर्भिक्षों की फैलना
    2. अपराधों एवं सामाजिक संघर्षों का बढ़ना,
    3. जन्म-दर एवं मृत्यु-दर में असन्तुलन
    4. देश की आवश्यकता तथा सुरक्षा में बाधा उत्पन्न होना
    5. भोजन, वस्त्र, मकान, रोजगार, शिक्षण संस्थाओं आदि का अभाव होना।

जनसंख्या शिक्षा के उपर्युक्त उद्देश्यों को एक राष्ट्रीय सेमिनार में इस प्रकार स्पष्ट किया गया-“जनसंख्या शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को यह समझने की योग्यता प्रदान करना होना चाहिए कि परिवार के आकार को नियन्त्रित किया जा सकता है, जनसंख्या का सीमा निर्धारण राष्ट्र में उत्तम जीवन को सुविधाजनक बना सकता है और परिवार का छोटा आकार प्रत्येक परिवार के सदस्य के जीवन-स्तर के उन्नयन में अतिशय योगदान दे सकता है।’ यहाँ हम भारत में जनसंख्या शिक्षा की आवश्यकता और महत्त्व की विवेचना करेंगे। भारत एक प्रगतिशील देश है जिसने लोकतान्त्रिक व्यवस्था को अपनाया है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद हमने विभिन्न क्षेत्रों में काफी प्रगति की है परन्तु जनसंख्या वृद्धि के फलस्वरूप हमारी प्रगति का सम्पूर्ण लाभ राष्ट्र को नहीं प्राप्त हो सका है। यद्यपि खाद्यान्न के क्षेत्र में हम आत्मनिर्भर हो चुके हैं परन्तु अन्य क्षेत्रों में हम काफी पिछड़े हुए हैं। ऐसी स्थिति में जनसंख्या पर नियन्त्रण रखना अत्यन्त आवश्यक है।

जनसंख्या शिक्षा द्वारा छात्र-छात्राओं में इस विचार का समावेश करके कि “छोटा परिवार सुखी परिवार” हम भावी नागरिकों को परिवार नियोजन के हेतु प्रेरित कर सकेंगे। यदि पाठ्यक्रम में जीवन और विज्ञान के अध्ययन को आवश्यक माना जाता है तो मानव जनसंख्या के अध्ययन को भी आवश्यक मानकर उसे पाठ्यक्रम में स्थान दिया जाना चाहिए। भारत में अनेक सामाजिक कुरीतियाँ व्याप्त हैं। संसार के उन्नत देशों की अपेक्षा भारत में विवाह की आयु बहुत कम है। इस कारण युवक और युवतियों को विवाह से पूर्व ही जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न होने वाली समस्याओं आदि की जानकारी प्रदान करना अत्यन्त आवश्यक है। जब युवक और युवतियाँ जनसंख्या शिक्षा के द्वारा पर्याप्त जानकारी उपलब्ध कर लेंगे तो जनसँख्या पर नियन्त्रण रखना आसान हो जाएगा। यह कहा जाता है कि किसी देश के स्वस्थ नागरिक ही देश के भविष्य को उज्ज्वल बना सकते हैं।

आज संसार के सभी देश अपने नागरिकों के कल्याण, स्वास्थ्य और पूर्ण विकास के हेतु प्रयत्नशील हैं। भारत भी इस क्षेत्र में प्रयास तो कर रहा है परन्तु हमें सफलता तब तक नहीं प्राप्त हो सकती जब तक य के लोग जनसंख्या शिक्षा द्वारा जनसंख्या वृद्धि के कुप्रभावों से परिचित न हो जाएँ और जनसंख्या वृद्धि को रोकने के हेतु युद्ध-स्तर पर कार्यवाही की जाए। जनसंख्या की वृद्धि देश के आर्थिक और सामाजिक विकास में बाधक है। जनसंख्या वृद्धि के कारण ही भारतीय नागरिकों के रहन-सहन का स्तर ऊँचा नहीं उठ पा रहा है। जनसंख्या शिक्षा द्वारा छात्र-छात्राओं को इससे अवगत कराना आवश्यक हो गया है। जनसंख्या शिक्षा के अन्तर्गत केवल परिवार नियोजन आदि के विषय में ही नहीं बतलाया जाता है बल्कि इसके अन्तर्गत छात्रों को उन सभी बातों से अवगत कराया जाता है जो जनसंख्या से सम्बन्धित हैं। इनकी जानकारी प्राप्त करके छात्र-छात्राएँ कालान्तर में अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह भली-भाँति कर सकते हैं।

डॉ० लल्ला और डॉ० मूर्ति ने ठीक ही लिखा है-“कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति आधुनिक समय के सन्दर्भ में जनसंख्या शिक्षा के महत्त्व और आवश्यकता की उपेक्षा नहीं कर सकता।” भारत में जनसंख्या शिक्षा की विशेष आवश्यकता है। विकासशील भारत के पास सीमित संसाधन हैं। और सीमित संसाधनों से विशाल जनसंख्या का भरण-पोषण करना अत्यन्त कठिन है, फलस्वरूप जनसंख्या नियन्त्रण की विशेष आवश्यकता है। भारत में जनसंख्या शिक्षा परिवार को सीमित रखने के लिए अत्यन्त आवश्यक है, साथ ही जीवन की गुणवत्ता को बनाये रखने, जन्मदर और मृत्युदर को सन्तुलित रखने, परिवार को स्वस्थ-सुखी बनाने, माताओं को उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करने, बच्चों को कुपोषण से बचाने, निरक्षरता का उन्मूलन करने, बेरोजगारी की समस्या के समाधान, पर्यावरण प्रदूषण से बचने और देश के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए जनसंख्या शिक्षा अत्यन्त आवश्यक है। उत्पादन एवं उपभोक्ता के मध्य सन्तुलन स्थापित करने के लिए भी जनसंख्या शिक्षा की विशेष आवश्यकता है। इस शिक्षा के प्रति लोगों में संचेतना जाग्रत करना अत्यन्त आवश्यक है।

प्रश्न 2
भारत में जनसंख्या शिक्षा के कार्यक्रमों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
भारत में राष्ट्रीय जनसंख्या शिक्षा कार्यक्रम को 1 अप्रैल, 1980 से प्रारम्भ किया गया। शिक्षा की औपचारिक और अनौपचारिक पद्धतियों के साथ जनसंख्या शिक्षा को जोड़ा गया जिससे कि विद्यार्थियों और युवा पीढ़ी में जनसंख्या के प्रति एक स्वस्थ दृष्टिकोण का विकास हो सके। इस कार्यक्रम को सभी राज्यों और संघीय क्षेत्रों में चलाया जा रहा है। कार्यक्रम के संचालन हेतु केन्द्र सरकार ने एक उच्च अधिकार प्राप्त संचालन समिति का गठन किया है। देश की विभिन्न शिक्षण-संस्थाओं में जनसंख्या शिक्षा के प्रसार का दायित्व राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान प्रशिक्षण परिषद् के सुपुर्द किया गया। । विद्यालय स्तर पर यह एक अलग विषय के रूप में नहीं बल्कि विभिन्न विषयों के साथ सम्मिलित करके पढ़ाया जाता है। इस समय तक लगभग 16 लाख शिक्षकों को जनसंख्या शिक्षा में प्रशिक्षित किया गया है और श्रव्य-दृश्य साधनों के रूप में हिन्दी और अंग्रेजी भाषा में स्लाइडों को तैयार किया गया है, जिन्हें सभी राज्यों में वितरित किया गया है।

शिक्षकों के हेतु जनसंख्या शिक्षा नामक पुस्तक भी प्रकाशित की गयी है जिसमें बी०एड० के सेवा पूर्व शिक्षक प्रशिक्षण के हेतु पाठ्यचर्या सम्मिलित की गयी है। ‘यूनेपा’ (UNEPA) के सहयोग से भारत ने “मेरे बच्चे, मेरा भविष्य” नामक श्रव्य-दृश्य कार्यक्रम तैयार किया है। वर्तमान समय में 800 लाख छात्रों को जनसंख्या शिक्षा की जानकारी प्रदान की जा रही है। जनसंख्या शिक्षा पर राष्ट्रीय स्तर और राज्य स्तर पर लगभग 400 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। ‘राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसन्धान प्रशिक्षण परिषद् ने स्कूली पाठ्यचर्या में जनसंख्या शिक्षा के हेतु ‘प्लग प्वाइंट्स नामक दस्तावेज का प्रकाशन किया है जिसके आधार पर राज्यों और संघीय क्षेत्रों में पाठ्यचर्या निर्मित की गयी है।

साथ ही जनसंख्या शिक्षा से सम्बन्धित प्रदर्शनी, पोस्टर, निबन्ध लेखन प्रतियोगिता, कार्यशाला और सेमिनारों आदि का आयोजन भी किया जाता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग देश के कई विश्वविद्यालयों में जनसंख्या शिक्षा केन्द्रों और कॉलेजों की स्थापना कर रहा है। विभिन्न एजेंसियों से प्राप्त जनसंख्या शिक्षा सामग्री की एक निर्देशिका भी तैयार की गयी है जिसे जनसंख्या शिक्षा संस्थानों में वितरित किया गया है। जनसंख्या शिक्षा संस्थान कॉलेजों के नवयुवकों एवं समुदाय के लोगों हेतु प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहा है। स्कूली शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, उच्च शिक्षा, दस्तकारों एवं नागरिकों के हेतु व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम में जनसंख्या शिक्षा कार्यक्रम को भी जोड़ दिया गया है। अनौपचारिक शिक्षा केन्द्रों में भी जनसंख्या शिक्षा को जोड़ा गया है। जनसंख्या शिक्षा पर राष्ट्रीय स्रोत’ नामक पुस्तिका का प्रकाशन किया गया है जिसमें प्रारम्भिक शिक्षा के शिक्षकों के प्रशिक्षण हेतु जनसंख्या शिक्षा पाठ्यचर्या सम्मिलित की गयी है।

अन्तर्राष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान मुम्बई से जनसंख्या शिक्षा की मूल्यांकन रिपोर्ट प्राप्त करके आठवीं तथा नवीं पंचवर्षीय योजना में जनसंख्या शिक्षा कार्यक्रम और अधिक तेज करने का संकल्प रखा गया और 1986 ई० की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप जनसंख्या शिक्षा के प्रशिक्षण को ग्रहण करने के हेतु जिला शिक्षा और प्रशिक्षण संस्थान, अध्यापक शिक्षा कॉलेज और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् के साथ सक्रिय सहयोग स्थापित किया गया। प्रशिक्षण के लिए इलेक्ट्रॉनिक प्रचार माध्यमों के उपयोग को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। कुछ राज्यों में प्रौढ़ शिक्षा के साथ जनसंख्या शिक्षा कार्यक्रम को जोड़ा गया है। जनसंख्या शिक्षा में लगे राज्य संसाधन केन्द्रों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है और प्रशिक्षार्थियों को स्वास्थ्य, परिवार, कल्याण, रोग प्रतिरक्षण और जनसंख्या समस्याओं के प्रति जागरूक किया जा रहा है।

प्रश्न 3
जनसंख्या शिक्षा की समस्याओं का उल्लेख कीजिए तथा उनके समाधान के उपायों का भी वर्णन कीजिए।
था
जनसंख्या शिक्षा की क्या समस्याएँ हैं ? जनसंख्या शिक्षा के शिक्षण के लिए सुझाव दीजिए। [2007]
उत्तर
जनसंख्या शिक्षा की समस्याएँ
जनसंख्या शिक्षा की समस्याएँ अत्यन्त जटिल हैं। इसका कारण यह है कि जनसंख्या शिक्षा का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक और विस्तृत है। इसके अन्तर्गत जनसंख्या की वृद्धि की गति, वातावरण एवं स्वास्थ्य और व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र तथा विश्व पर पड़ने वाले । जनसंख्या शिक्षा की समस्याएँ उसके बहुमुखी प्रभावों का अध्ययन सम्मिलित होता है। इन तथ्यों । को टालने जनाधि पायों के छात्रों हेतु जनसंख्या शिक्षा एवं उनके समाधान के उपायों का उल्लेख यहाँ किया जा रहा है-

1. छात्रों हेतु जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी साहित्य की सम्बन्धी ज्ञान की कमी
हमारे देश में विभिन्न स्तरों के विद्यालयों में अध्ययनरत विद्यालयों में जनसंख्या शिक्षा छात्रों के हेतु जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी साहित्य का अभाव है। इस सम्बन्धी उपकरणों की कमी अभाव के फलस्वरूप उन्हें जनसंख्या वृद्धि के वास्तविक आँकड़े, जनसंख्या समन्थी शोधक तथा व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के जीवन के ऊपर इस वृद्धि के की कमी कुप्रभावों की पूर्ण जानकारी प्रदान नहीं की जा सकती है। इसी के फलस्वरूप विद्यालय स्तर पर जनसंख्या शिक्षा का प्रसार नहीं हो पा रहा है।

2. शिक्षकों में जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी ज्ञान की कमी
सभी स्तरों के विद्यालयों के शिक्षकों . में जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी ज्ञान का अनुभव है। प्रमुख रूप से इसके तीन कारण हैं-

  1. अभी तक जनसंख्या शिक्षा के सम्बन्ध में बहुत कम पुस्तकें लिखी गयी हैं। फलस्वरूप शिक्षकों को जनसंख्या शिक्षा की पर्याप्त सामग्री उपलब्ध नहीं हो पाती।
  2. सेवारत शिक्षकों को जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी ज्ञान प्रदान करने हेतु केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकारों, शिक्षा विभागों तथा विश्वविद्यालयों द्वारा कोई सुसंगठित योजना अभी पूरी तरह से संचालित नहीं की गयी है।
  3. महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों और शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं के पाठ्यक्रमों के अन्तर्गत जनसंख्या शिक्षा नामक विषय को स्थान नहीं दिया गया है। इन कारणों से सेवारत तथा नव-प्रशिक्षित शिक्षकों में जनसंख्या शिक्षा के समुचित ज्ञान के होने की आशा नहीं की जा सकती है। समुचित ज्ञान न होने के फलस्वरूप वे छात्रों को जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी बातों का ज्ञान प्रदान करने में असमर्थ रहते हैं।

3. विद्यालयों में जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी उपकरणों की कमी
भारतीय विद्यालयों में जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी उपकरणों का नितान्त अभाव है। ऐसा कदाचित कोई भी विद्यालय नहीं है जो जनसंख्या शिक्षा से सम्बन्धित सभी उपकरणों से पूरी तरह सुसज्जित हो। सामान्य शिक्षा के उपकरणों को संग्रह करने हेतु जितना प्रयास किया जाता है उसका शतांश प्रयास भी जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी उपकरणों को प्राप्त करने हेतु नहीं किया जाता। सम्भवतः इसका कारण यह है कि जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी उपकरणे अत्यन्त महँगे हैं। किन्तु यदि प्रतिवर्ष थोड़ा-थोड़ा धन व्यय करके इन उपकरणों की व्यवस्था की जाए तो इनके अभाव को दूर किया जा सकता है। परन्तु वास्तविक स्थिति यह है कि इस कार्य हेतु लेशमात्र भी ध्यान नहीं दिया जाता। परिणामस्वरूप भारतीय विद्यालयों में इनका नितान्त अभाव है और इनके अभाव में जनसंख्या शिक्षा का कार्यक्रम लागू करने में कठिनाई है।

4. जनसंख्या सम्बन्धी शोधकार्यों की कमी
भारत में जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी शोधकार्य अभी प्रारम्भकालीन है। इस कारण जनसंख्या के दुष्परिणामों को सही प्रकार से प्रसार नहीं है।

5. अशिक्षित एवं अर्द्धशिक्षित अभिभावकों द्वारा जनसंख्या शिक्षा का विरोध
भारत में बड़ी संख्या में अभिभावक अशिक्षित एवं अर्द्धशिक्षित हैं। एक अध्ययन के द्वारा यह स्पष्ट हुआ है कि ये अशिक्षित एवं अर्द्धशिक्षित अभिभावक विद्यालयों में जनसंख्या शिक्षा दिये जाने के प्रबल विरोधी हैं। उनका विरोध निम्नलिखित कारणों से है-

  1. वे यह मानते हैं कि जनसंख्या शिक्षा का सम्बन्ध यौन-शिक्षा से है। यदि विद्यालयों में इस शिक्षा की व्यवस्था की जाती है तो बालक-बालिकाओं के नैतिक चरित्र पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।
  2. उनकी यह मान्यता है कि जनसंख्या शिक्षा परिवार नियोजन को ही दूसरा रूप है, अतएव उनका विद्यालयी शिक्षा से कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए।
  3. उनकी यह भी धारणा है कि जनसंख्या शिक्षा का सम्बन्ध जनसंख्या विषयक तथ्यों एवं आँकड़ों से है। यह तथ्य और आँकड़े इतने कठिन हैं कि अल्प आयु में छात्र इन्हें आत्मसात नहीं कर सकेंगे।
  4. उनका यह भी विचार है कि जनसंख्या शिक्षा का विचार अन्य देशों से ग्रहण किया गया है और उनसे प्रभावित होकर ही इस शिक्षा को विद्यालयों में स्थान दिया जा रहा है, और इस कारण ऐसा किया जाना पूरी तरह से अनुचित है।

समस्याओं का समाधान

हम इस तथ्य से सहमत हैं कि भारत की जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि हो रही है जो भविष्य में विभिन्न प्रकार की समस्याओं की उत्पत्ति का कारण बनेगी। अतः जनसंख्या विस्फोट को रोकने के सम्बन्ध में जनसंख्या शिक्षा को एकमात्र-आशा की किरण माना जा रहा है। जनसंख्या शिक्षा के निम्नलिखित तथ्य जनसंख्या-विस्फोट का समाधान करने में सहायक सिद्ध हुए हैं
1. पर्याप्त एवं उपयुक्त साहित्य की व्यवस्था
भारतीय विश्वविद्यालयों में जनसंख्या शिक्षा के प्रसार को गति प्रदान करने के लिए पर्याप्त मात्रा में उपयुक्त साहित्य का निर्माण किया जाना चाहिए। इस साहित्य का निर्माण सरल एवं सुबोध भाषा वाली पुस्तकों के रूप में किया जाए जिससे कि प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों के छात्रों को जनसंख्या शिक्षा का अध्ययन करके ज्ञान प्रदान करने में किसी प्रकार की कठिनाई न हो। इसके साथ ही सामाजिक विज्ञान की पुस्तकों में जनसंख्या शिक्षा से सम्बन्धित पाठों को स्थान दिया जाना चाहिए।

2. शिक्षकों को जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी ज्ञान प्रदान करने की व्यवस्था
यदि शिक्षकों से यह आशा की जाती है कि वे छात्रों को जनसंख्या शिक्षा की शिक्षा दें तो स्वयं शिक्षकों को इस ज्ञान से सम्पन्न करने की पर्याप्त व्यवस्था की जाए। इस व्यवस्था में ५ शिक्षकों को जनसंख्या शिक्षा निम्नलिखित सुझाव दिये जा सकते हैं ।

  1. राज्यों अथवा शिक्षा विभागों द्वारा जनसंख्या शिक्षा के केन्द्र स्थापित किये जाने चाहिए और विद्यालयों द्वारा सेवारत अध्यापकों को इन केन्द्रों पर निश्चित अवधि तक रहने हेतु पूर्ण वेतन पर अवकाश दिया जाना चाहिए। इन केन्द्रों में अध्यापकों हेतु व्याख्यानों, विचार-गोष्ठियों एवं समाप्त करना अध्ययन की समस्त सुविधाओं का प्रबन्ध किया जाना चाहिए।
  2.  महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों और शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थाओं के पाठ्यक्रमों में जनसंख्या शिक्षा के विषय को सम्मिलित किया जाना चाहिए। यदि इन सुझावों को व्यावहारिक रूप प्रदान कर दिया जाए तो सेवारत और नव-प्रशिक्षित दोनों तरह के शिक्षकों को जनसंख्या शिक्षा का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त हो जाएगा और उसके द्वारा वे अपने छात्रों को लाभान्वित कर सकेंगे।

3. उपकरणों की व्यवस्था
विद्यालय प्रबन्धकों को यह समझना चाहिए कि जितने आवश्यक सामान्य शिक्षा के उपकरण हैं उतने ही आवश्यक जनसंख्या शिक्षा के उपकरण भी हैं। उन्हें जनसंख्या शिक्षा से सम्बन्धित उपकरणों की व्यवस्था हेतु निरन्तर प्रयत्नशील रहना चाहिए। इन उपकरणों में निम्नलिखित पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए

  1. जनसंख्या शिक्षा हेतु उपयोगी फिल्म और श्रव्य-दृश्य सामग्री।।
  2. छात्रों को अपने देश और विश्व की जनसंख्या सम्बन्धी जानकारी प्रदान करने वाले ग्राफ, चार्ट और प्रतिमान।

4. जनसंख्या सम्बन्धी शोधकार्यों की व्यवस्था
इसके लिए विद्वानों और सुशिक्षित व्यक्तियों को भी जनसंख्या वृद्धि के कुप्रभावों एवं दुष्परिणामों से भली-भाँति अवगत कराने हेतु जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी शोधकार्य की उत्तम व्यवस्था की जानी चाहिए। यह कार्य मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रश्नों से सम्बन्धित होने चाहिए-

  1. विद्यालयों में जनसंख्या शिक्षा के हेतु अनुकूल वातावरण का निर्माण किस तरह किया जा सकता है।
  2. शिक्षकों को जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी ज्ञान से पूरी तरह से सम्पन्न बनाने हेतु किस तरह के कार्यक्रम उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।
  3. विद्यालयों के प्रबन्ध समितियों तथा शिक्षा विभागों द्वारा जनसंख्या शिक्षा के प्रसार में कितना और किस तरह का योगदान दिया जा सकता है।
  4. साधारण जनता में जनसंख्या शिक्षा की आवश्यकता तथा उपयोगिता के सम्बन्ध में किन उपायों द्वारा अधिकाधिक विश्वास उत्पन्नकिया जा सकता है।

5. अभिभावकों के विरोध को समाप्त करना
विद्यालयों में जनसंख्या शिक्षा के कार्यक्रम को सफल बनाने हेतु, उसके प्रति अशिक्षित और अर्द्धशिक्षित अभिभावकों का विरोध समाप्त किया जाना चाहिए। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु दो उपाय किये जा सकते हैं

  1. पत्रिकाओं, समाचार-पत्रों, फिल्म प्रदर्शनी और विद्वानों के व्याख्यानों द्वारा जनसंख्या शिक्षा की धारणा का स्पष्टीकरण।
  2. विद्यालयों द्वारा जनसंख्या शिक्षा के दिवसों, समारोहों आदि का आयोजन किया जाये और उनमें अभिभावकों को आमन्त्रित करके उन्हें जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी बातों से अवगत कराया जाए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
जनसंख्या विस्फोट (Population Explosion) क्या है? भारत में जनसंख्या विस्फोट के कारणों का उल्लेख कीजिए।
या
देश में जनसंख्या विस्फोट हो रहा है। इसको रोकने में जनसंख्या शिक्षा किस प्रकार सहायक है? [2016]
या
भारत में जनसंख्या वृद्धि के क्या कारण हैं? [2012, 14]
या
भारत में जनसंख्या विस्फोट के क्या कारण हैं? [2012]
उत्तर
जनसंख्या विस्फोट से आशय है-जनसंख्या की वृद्धि की दर का अत्यधिक होना। हमारे देश में होने वाली जनसंख्या की वृद्धि को जनसंख्या विस्फोट की श्रेणी में ही रखा जाएगा। इसका प्रमाण यह है कि सन् 1951 ई० की जनगणना में भारत की जनसंख्या 36.1 करोड़ थी जो 2011 ई० में बढ़कर 121.02 करोड़ हो चुकी है। इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि हमारे देश में जनसंख्या वृद्धि की दर बहुत अधिक है। भारत में जनसंख्या विस्फोट के लिए विभिन्न कारक जिम्मेदार हैं। सर्वप्रथम हमारे देश में जन्म-दर बहुत अधिक है। इसका एक मुख्य कारण अशिक्षा तथा यौन-शिक्षा की जानकारी का अभाव है। हमारे देश में छोटी आयु में विवाह का प्रचलन है। इससे स्त्रियों का प्रजनन काल काफी लम्बा होता है। अतः अधिक सन्ताने उत्पन्न होने की गुंजाइश रहती है। इसके साथ ही गर्म जलवायु भी प्रजनन शक्ति की वृद्धि में सहायक होती है। हमारे समाज में बेटे को जन्म देना प्रायः अनिवार्य माना जाता है।

अतः बेटे की चाह में प्राय: तीन-चार अथवा इससे भी अधिक बेटियों को जन्म दे दिया जाता है। यही नहीं कुछ धार्मिक अन्धविश्वासों के अनुसार परिवार-नियोजन अर्थात् सन्तानोत्पत्ति को रोकना अनुचित तथा पाप माना जाता है। इस कारण भी जन्म-दर में वृद्धि होती है। इन विभिन्न कारणों से हमारे देश में आज भी जन्म-दर काफी अधिक है तथा यह कारक जनसंख्या विस्फोट का प्रबल कारक है। इसके अतिरिक्त आधुनिक चिकित्सा शास्त्र में हुई चमत्कारिक खोजों एवं उपचार के उपायों के कारण बाल-मृत्यु दर बहुत घट गयी है तथा व्यक्ति की औसत आयु में भी वृद्धि हुई है। इस कारक ने भी जनसंख्या विस्फोट में योगदान प्रदान किया है। देश में जनसंख्या की वृद्धि की अधिक दर को नियन्त्रित करने का एक प्रभावी उपाय है-जनसंख्या शिक्षा। जनसंख्या शिक्षा की समुचित व्यवस्था से निश्चित रूप से जनसंख्या वृद्धि की दर को घटाया ज़ा सकता है।

प्रश्न 2
‘नयी राष्ट्रीय जनसंख्या नीति, 2000’ का सामान्य परिचय दीजिए। या । भारतवर्ष की राष्ट्रीय जनसंख्या नीति, 2000 की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2011, 13]
उत्तर
भारत की जनसंख्या में निरन्तर होने वाली वृद्धि को ध्यान में रखते हुए इसे नियन्त्रित करना अनिवार्य माना जा रहा है। इस मुख्य उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए ‘नयी राष्ट्रीय जनसंख्या नीति-2000′ निर्धारित की गयी। ‘नयी राष्ट्रीय जनसंख्या नीति-2000′ की घोषणा फरवरी 2000 में भारत के प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा की गयी। इस जनसंख्या नीति में सर्वप्रथम कहा गया था कि सन् 2010 ई० तक जनसंख्या वृद्धि की दर को 2.1 प्रतिशत पर लाया जाएगा तथा सन् 2045 ई० में जनसंख्या वृद्धि रुक जाएगी अर्थात् जनसंख्या स्थिर हो जाएगी। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हर सम्भव उपाय किये जाएँगे। इस नीति को कार्यान्वित करने के लिए सरकार द्वारा विभिन्न निर्णय लिये गये हैं, जैसे कि-

  1. इस जनसंख्या नीति के अन्तर्गत पंचायतों/जिला परिषदों को जनसंख्या नियन्त्रण के लिए प्रेरित करने के लिए पुरस्कार प्रदान किये जाएँगे।
  2. इस नीति के अन्तर्गत ‘बाल-विवाह निरोधक अधिनियम’ तथा ‘प्रसव पूर्व लिंग परीक्षण तकनीकी निरोधक अधिनियम’ को कठोरता से लागू करने की घोषणा की गयी है।
  3. समाज के गरीबी की रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवारों के लिए स्वास्थ्य बीमा-योजना को लागू किया गया है। इसके अतिरिक्त बालिका शिशुओं के पालन-पोषण के लिए उसके माता-पिता को १ 500 की प्रोत्साहन राशि देने का भी प्रावधान है। |

नयी राष्ट्रीय जनसंख्या नीति’ सराहनीय है परन्तु कुछ विद्वानों ने इसकी व्यावहारिकता पर प्रश्न-चिह्न लगाया है। उनका कहना है कि 2010 तक जनसंख्या वृद्धि की दर को 2.1 प्रतिशत तक लाना सम्भव नहीं है। इसके अतिरिक्त इस नीति में न तो यौन-शिक्षा की बात कही गयी है और न ही अनिवार्य नसबन्दी का कोई प्रावधान है। अतः यह जनसंख्या नीति केवल सैद्धान्तिक है, व्यावहारिक नहीं।

प्रश्न 3
राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद् के अनुसार जनसंख्या शिक्षा के उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए।
या
जनसंख्या शिक्षा के चार उद्देश्य बताइए। [2010]
उत्तर
‘राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद् ने Population in Classroom नामक एक पुस्तिका प्रकाशित की थी। इसमें जनसंख्या शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्यों का उल्लेख किया गया है-

  1. छात्रों को आधुनिक विश्व की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना के रूप में जनसंख्या वृद्धि की गति तथा कारणों के सम्बन्ध में ज्ञान प्रदान करना।
  2. छात्रों को व्यक्ति, परिवार, समाज तथा विश्व के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक जीवन पर जनसंख्या वृद्धि के पड़ने वाले प्रभावों से अवगत कराना।
  3. छात्रों को परिवार के आकार तथा रहन-सहन के स्तर के सम्बन्ध में बताना तथा कम आय वाले परिवारों की कठिनाई बताकर उन्हें छोटा परिवार रखने हेतु प्रेरित करना।
  4. छात्रों को जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न होने वाली अग्रलिखित समस्याओं की जानकारी प्रदान करके उनमें जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण रखने के दृष्टिकोण का विकास करना-

(क) रोगों तथा दुर्भिक्षों का फैलना
(ख) अपराधों एवं सामाजिक संघर्षों का बढ़ना
(ग) जन्म-दर एवं मृत्यु-दर में असन्तुलन
(घ) देश की आवश्यकता और सुरक्षा में बाधा उत्पन्न होना तथा
(ङ) भोजन, वस्त्र, मकान, रोजगार तथा शिक्षण संस्थाओं आदि का अभाव होना।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
जनसंख्या शिक्षा में अध्यापक की भूमिका का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
नि:सन्देह जनसंख्या शिक्षा अत्यधिक आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण है। शिक्षा के इस प्रकार में शिक्षक द्वारा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी जाती है। शिक्षक को जनसंख्या शिक्षा की समुचित जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। उसका दायित्व है कि वह अपने छात्र-छात्राओं तथा समाज के व्यक्तियों को जनसंख्या सम्बन्धी विस्तृत जानकारी प्रदान करे। शिक्षक का दायित्व है कि वह छात्रों को जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न समस्याओं की विस्तृत जानकारी प्रदान करे तथा जनसंख्या वृद्धि को नियन्त्रित करने की आवश्यकता तथा उपायों की भी जानकारी प्रदान करे। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि शिक्षा के पाठ्यक्रम में जनसंख्या शिक्षा को अवश्य सम्मिलित किया जाना चाहिए। इस स्थिति में शिक्षक अपने दायित्व को भली-भाँति निभा सकेंगे।

प्रश्न 2
जनसंख्या की तीव्र वृद्धि के दो कुप्रभावों का उल्लेख कीजिए। [2009]
उत्तर
जनसंख्या की तीव्र वृद्धि को जनसंख्या विस्फोट के रूप में जाना जाता है। यह एक गम्भीर समस्या है तथा इसका बुरा प्रभाव जनजीवन के प्रायः सभी पक्षों पर पड़ता है। सर्वप्रथम यह स्पष्ट है कि इस स्थिति में देश के नागरिकों को मूलभूत सुविधाओं की अत्यधिक कमी महसूस होने लगती है। इसके अतिरिक्त दूसरा प्रतिकूल प्रभाव यह होता है कि देश में बेरोजगारी तथा निर्धनता की समस्याएँ प्रबल हो जाती हैं।

परश्न 3
जनसंख्या शिक्षा के क्षेत्र का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
जनसंख्या शिक्षा में निम्नलिखित तथ्यों को सम्मिलित किया जाता है-

  1. जनसंख्या की स्थिति के प्रति छात्रों में जागृति तथा उचित दृष्टिकोण विकसित करना।
  2. जनाधिक्य का जीवन की गुणवत्ता पर क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है? इसके सम्बन्ध में बताना।
  3. जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न सामाजिक, आर्थिक एवं पारिवारिक समस्याओं के सम्बन्ध में संचेतना का विकास करना।
  4. जनसंख्या-वृद्धि के कारणों एवं नियन्त्रण के उपायों की जानकारी प्रदान करना।
  5. जनसंख्या-वृद्धि का पर्यावरण, रोजगार, आवास, खाद्यान्न और शिक्षा पर क्या कुप्रभाव पड़ता है? इस सम्बन्ध में छात्रों को जानकारी प्रदान करना।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
जनसंख्या शिक्षा क्या है? [2009]
उत्तर
“जनसंख्या शिक्षा एक शैक्षिक कार्यक्रम है, जिसमें परिवार, समाज, राष्ट्र एवं विश्व की जनसंख्या की स्थिति का अध्ययन किया जाता है। इस अध्ययन का उद्देश्य छात्रों में इस स्थिति के
प्रति विवेकपूर्ण एवं उत्तरदायित्वपूर्ण दृष्टिकोण तथा व्यवहार का विकास करना है।”
                                                                                      -यूनेस्को द्वारा आयोजित जनसंख्या शिक्षा संगोष्ठी

प्रश्न 2
भारत जैसे विकासशील देशों की प्रमुख समस्या क्या है?
उत्तर
भारत जैसे विकासशील देशों की प्रमुख समस्या है जनसंख्या की वृद्धि की दर का अधिक होना।

प्रश्न 3
जनसंख्या-वृद्धि सम्बन्धी समस्या के समाधान के लिए किया जाने वाला शैक्षिक उपाय क्या है?
उत्तर
जनसंख्या-वृद्धि सम्बन्धी समस्या के समाधान के लिए किया जाने वाला शैक्षिक उपाय है। जनसंख्या शिक्षा की व्यवस्था करना।

प्रश्न 4
भारत में जनसंख्या सम्बन्धी स्थिति क्या है?
उतर
भारत में जनसंख्या-विस्फोट की स्थिति है।

प्रश्न 5
जनसंख्या विस्फोट से क्या आशय है?
या
जनसंख्या विस्फोट क्या है ? [2007, 11]
उत्तर
जनसंख्या विस्फोट का आशय जनसंख्या की वृद्धि की दर का अत्यधिक होना है।

प्रश्न 6
किस बच्चे को देश का एक अरबवाँ बच्चा घोषित किया गया ?
उत्तर
11 मई, 2000 को नई दिल्ली स्थित सफदरजंग अस्पताल में जन्म लेने वाली आस्था नामक बच्ची को देश को एक अरबवाँ बच्चा घोषित किया गया।

प्रश्न 7
भारत की नयी जनसंख्या नीति कब घोषित की गयी ?
उत्तर
भारत की नयी जनसंख्या नीति 15 फरवरी, 2000 को प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा घोषित की गयी।

प्रश्न 8
जनसंख्या वृद्धि को नियन्त्रित करने का शैक्षिक उपाय क्या है ?
उत्तर
जनसंख्या शिक्षा को लागू करना।

प्रश्न 9
जनसंख्या शिक्षा की अवधारणा को सर्वप्रथम किसने प्रस्तुत किया था ? उक्ट जनसंख्या शिक्षा की अवधारणा को सर्वप्रथम प्रो० स्लोन आर० वेलैण्ड ने प्रस्तुत किया था।

प्रश्न 10
2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या कितनी थी? [2014]
उत्तर
121 करोड़ से अधिक।

प्रश्न 11
ग्रामीण क्षेत्रों में जनता को जनसंख्या शिक्षा प्रदान करने का प्रमुख साधन क्या है?
उत्तर
दूरदर्शन तथा जनसंचार के अन्य माध्यम।

प्रश्न 12
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद् (NCERT) द्वारा प्रकाशित जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी पुस्तक का क्या नाम है?
उत्तर
Population in Classroom.

प्रश्न 13
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य-

  1. विश्व के अधिकांश विकासशील देशों में जनसंख्या की अधिकता की गम्भीर समस्या है।
  2. जनसंख्या शिक्षा के अन्तर्गत जनसंख्या सम्बन्धी समस्याओं का अध्ययन किया जाता है।
  3. स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाले युवक-युवतियों के लिए जनसंख्या शिक्षा अनावश्यक एवं व्यर्थ
  4. ‘राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग के अध्यक्ष के०सी० पंत हैं।
  5. नयी राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के अनुसार सन् 2045 तक जनसंख्या में स्थिरीकरण आ जाएगा।

उत्तर

  1. सत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. असत्य
  5. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए-

प्रश्न 1
“जनसंख्या शिक्षा परिवार के आकार के सम्बन्ध में वैज्ञानिक मनोवृत्ति विकसित करने के लिए प्रेरणाशक्ति प्रदान करती है।” यह कथन किसका है?
(क) डॉ० चन्द्रशेखर
(ख) डॉ० माल्थस
(ग) डॉ० वी०के०आर०वी०राव
(घ) डॉ० अमर्त्यसेन
उत्तर
(ग) डॉ० वी०के०आर०वी० राव

प्रश्न 2
जनसंख्या शिक्षा की आवश्यकता किस कारण से है?
(क) जनसंख्या की वृद्धि
(ख) जनसंख्या-नियन्त्रण
(ग) परिवार नियोजन
(घ) परिवार कल्याण
उत्तर
(ख) जनसंख्या-नियन्त्रण

प्रश्न 3
जनसंख्या शिक्षा का प्रमुख लक्ष्य है
(क) शिशु कल्याण
(ख) मातृ कल्याण
(ग) सीमित परिवार
(घ) सुखी जीवन
उत्तर
(ग) सीमित परिवार

प्रश्न 4
जनसंख्या शिक्षा का आरम्भ होना चाहिए
(क) माध्यमिक शिक्षा स्तर पर
(ख) प्राथमिक शिक्षा स्तर पर
(ग) व्यावसायिक शिक्षा स्तर पर
(घ) उच्च शिक्षा स्तर पर
उत्तर
(ख) प्राथमिक शिक्षा स्तर पर

प्रश्न 5
भारतीय जनसंख्या की प्रमुख विशेषता है
(क) जन्म-दर में वृद्धि
(ख) मृत्यु-दर में वृद्धि
(ग) महिलाओं की अधिक संख्या
(घ) साक्षरता का अधिक प्रतिशत
उतर
(क) जन्म-दर में वृद्धि

प्रश्न 6
भारत की जनसंख्या एक अरब कब हुई?
(क) 11 मई, 2000 में
(ख) 15 मई, 2000 में
(ग) 31 मई, 2000 में
(घ) 1 जुलाई, 2000 में
उत्तर
(क) 11 मई, 2000 में

प्रश्न 7
जनसंख्या की दृष्टि से भारत का विश्व में स्थान है
(क) प्रथम
(ख) द्वितीय
(ग) तृतीय
(घ) चतुर्थ
उतर
(ख) द्वितीय

प्रश्न 8
राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग का गठन कब हुआ?
(क) 15 जून, 1995 को
(ख) 20 मई, 1997 को
(ग) 11 मई, 2000 को
(घ) 1 जुलाई, 2000,को
उत्तर
(ग) 11 मई, 2000 को

प्रश्न 9
राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग के उपाध्यक्ष कौन हैं?
(क) यशवन्त सिन्हा
(ख) डॉ० हर्षवर्धन
(ग) नटवर सिंह
(घ) जी० टी० नानावती
उत्तर
(ख) डॉ० हर्षवर्धन

प्रश्न 10
विश्व जनसंख्या दिवस प्रतिवर्ष किस तिथि को मनाया जाता है? [2014]
(क) 4 जुलाई
(ख) 11 जुलाई
(ग) 10 दिसम्बर
(घ) 25 दिसम्बर
उत्तर
(ख) 11 जुलाई

प्रश्न 11
कौन-सा प्रान्त, भारत की जनगणना 2011 के अनुसार, सबसे अधिक जनसंख्या वाला
(क) उत्तर प्रदेश
(ख) बिहार
(ग) मध्य प्रदेश
(घ) राजस्थान
उत्तर
(क) उत्तर प्रदेश

प्रश्न 12
जनसंख्य शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है-  [2007]
(क) छात्रों और अध्यापकों को जनसंख्या वृद्धि के दुष्परिणामों से अवगत कराना
(ख) सांस्कृतिक विकास लाना
(ग) राजनैतिक उथल-पुथल पैदा करना
(घ) वैज्ञानिकं और तकनीकी विकास लाना
उत्तर
(क) छात्रों और अध्यापकों को जनसंख्या वृद्धि के दुष्परिणामों से अवगत कराना

प्रश्न 13
भारत में जनसंख्या शिक्षा पर प्रथम राष्ट्रीय कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ- [2008]
(क) 1984 ई० में
(ख) 1985 ई० में
(ग) 1980 ई० में
(घ) 1986 ई० में
उत्तर
(घ) 1986 ई० में

प्रश्न 14
भारत में जनगणना कितने वर्षों बाद की जाती है ? [2009, 15]
(क) 15 वर्ष बाद
(ख) 20 वर्ष बाद
(ग) 10 वर्ष बाद
(घ) 25 वर्ष बाद
उत्तर
(ग) 10 वर्ष बाद

प्रश्न 15
जनसंख्या-वृद्धि का मुख्य कारण है [2013]
(क) शिक्षा का विस्तार
(ख) स्वास्थ्य सेवाओं में वृद्धि
(ग) जनसंख्या विस्फोट
(घ) वृक्षारोपण
उत्तर
(ख) स्वास्थ्य सेवाओं में वृद्धि

प्रश्न 16
जनसंख्या शिक्षा का प्रमुख रूप से किससे सम्बन्ध है?
(क) परिवार नियोजन से
(ख) छोटे परिवार से
(ग) जनसंख्या की स्थिति से
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ग) जनसंख्या की स्थिति से

प्रश्न 17
जनसंख्या शिक्षा की अवधारणा को सर्वप्रथम किसने प्रस्तुत किया?
(क) बलेंसन ने
(ख) स्लोन आर० वेलैण्ड ने
(ग) मसियालस ने
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ख) स्लोन आर० वेलैण्ड ने

प्रश्न 18
जनसंख्या शिक्षा की प्रमुख समस्या है।
(क) अभिभावकों के विरोध की समस्या
(ख) अन्धविश्वास
(ग) अशिक्षा
(घ) ये सभी
उतर
(घ) ये सभी

प्रश्न 19
जनसंख्या शिक्षा का आरम्भ होना चाहिए
(क) माध्यमिक शिक्षा स्तर से
(ख) प्राथमिक शिक्षा स्तर से
(ग) व्यावसायिक शिक्षा स्तर से
(घ) उच्च शिक्षा स्तर से
उत्तर
(ख) प्राथमिक शिक्षा स्तर से

प्रश्न 20
जनसंख्या शिक्षा, भारत की दिन-प्रतिदिन बढ़ती आबादी के सन्दर्भ में
(क) अनावश्यक है
(ख) आवश्यक है
(ग) मंहत्त्वहीन है
(घ) अनुपयोगी है
उत्तर
(ख) आवश्यक है।

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UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 21 Effect of Environment on Indian Social Life

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 21 Effect of Environment on Indian Social Life (पर्यावरण का भारतीय सामाजिक जीवन पर प्रभाव) are part of UP Board Solutions for Class 12 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 21 Effect of Environment on Indian Social Life (पर्यावरण का भारतीय सामाजिक जीवन पर प्रभाव).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 21
Chapter Name Effect of Environment on Indian Social Life (पर्यावरण का भारतीय सामाजिक जीवन पर प्रभाव)
Number of Questions Solved 30
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 21 Effect of Environment on Indian Social Life (पर्यावरण का भारतीय सामाजिक जीवन पर प्रभाव)

विस्तृत उत्तीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
‘पर्यावरण की परिभाषा दीजिए। भारतीय जीवन पर भौगोलिक पर्यावरण के प्रत्यक्ष प्रभावों का विवेचन कीजिए। [2007]
या
भौगोलिक पर्यावरण किस प्रकार से सामाजिक जीवन को प्रभावित करता है? [2013]
या
पर्यावरण की परिभाषा दीजिए। भौगोलिक पर्यावरण के प्रत्यक्ष प्रभावों की विवेचना कीजिए। [2007, 12]
या
पर्यावरण को परिभाषित कीजिए। [2015]
या
पर्यावरण क्या है? सामाजिक जीवन पर पर्यावरण का प्रभाव बताइए। [2016]
उत्तर:
‘पर्यावरण’एक विस्तृत अवधारणा है, इसे अंग्रेजी में ‘एनवायरनमेण्ट’ (Environment) कहते हैं। पर्यावरण का हमारे जीवन से इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है कि पर्यावरण को स्वयं से पृथक् करना एक असम्भव-सी बात लगती है। सामाजिक मानव के विषय में पूर्ण अध्ययन करने के लिए यह आवश्यक है कि उसके पर्यावरण का अध्ययन किया जाये। यही कारण है कि समाजशास्त्र विषय के अन्तर्गत मनुष्य का अध्ययन पर्यावरण के सन्दर्भ में ही किया जाता है।

पर्यावरण का अर्थ एवं परिभाषाएँ
‘पर्यावरण’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है। ये शब्द हैं-‘परि’ और आवरण। ‘परि’ का अर्थ है चारों ओर’ तथा ‘आवरण’ का अर्थ है ‘घिरे हुए’ अथवा ढके हुए। इस प्रकार पर्यावरण का अर्थ हुआ – चारों ओर से घिरे हुए अथवा ढके हुए। दूसरे शब्दों में, ‘पर्यावरण’ शब्द का अर्थ उन वस्तुओं से है जो मनुष्य से अलग होने पर भी उसे चारों ओर से ढके या घेरे रहती है। संक्षेप में, वे सभी परिस्थितियाँ जो एक प्राणी के अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं तथा उसको चारों ओर से घेरे हुए अथवा ढके हुए हैं, उसका पर्यावरण कहलाती हैं। पर्यावरण को विभिन्न विद्वानों ने विभिन्न प्रकार से परिभाषित किया है। कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नवत् हैं

इलियट के मतानुसार, “चेतन पदार्थ की इकाई से प्रभावकारी उद्दीपन और अन्तक्रिया के क्षेत्र को पर्यावरण कहते हैं।”
रॉस के अनुसार, “कोई भी बाहरी शक्ति, जो हमें प्रभावित करती है, पर्यावरण होती है।” प्रो० गिलबर्ट के शब्दों में, “वह वस्तु जो किसी वस्तु को चारों ओर से घेरती एवं उस पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालती है, पर्यावरण है।

उपर्युक्त परिभाषाओं द्वारा यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि पर्यावरण से तात्पर्य उस ‘सब कुछ से होता है जिसका अनुभव सामाजिक मनुष्य करता है तथा जिससे वह प्रभावित भी होता है।

भारतीय सामाजिक जीवन पर भौगोलिक पर्यावरण के प्रभाव

भौगोलिक पर्यावरण को प्राकृतिक पर्यावरण’ (Natural Environment) अथवा ‘अनियन्त्रित पर्यावरण’ (Uncontrolled Environment) भी कहते हैं। इस प्रकार के पर्यावरण से तात्पर्य हमारे चारों ओर के प्राकृतिक वातावरण से है। मैकाइवर तथा पेज के अनुसार, “भौगोलिक पर्यावरण उन दशाओं से मिलकर बनता है जिन्हें प्रकृति ने मनुष्य के लिए प्रदान किया।” लैण्डिस ने कहा है कि, “इसमें वे समस्त प्रभाव सम्मिलित होते हैं जो यदि मनुष्य द्वारा पृथ्वी से पूर्ण रूप से हटा दिये जाएँ, तब भी उनका अस्तित्व बनी रहे।” भौगोलिक पर्यावरण का मानव-जीवन पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार से प्रभाव पड़ता है। भारतीय सामाजिक जीवन भी इस नियम का अपवाद नहीं है। भौगोलिक विभिन्नताओं के कारण ही हमारे देशवासियों की जीवन-शैली, प्रथाओं, परम्पराओं, खान-पान, वेशभूषा आदि में भी भिन्नता है। भौगोलिक पर्यावरण के भारतीय सामाजिक जीवन पर पड़ने वाले प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभावों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(क) प्रत्यक्ष प्रभाव

1. जनसंख्या पर प्रभाव – मनुष्य उन्हीं स्थानों पर रहना अधिक पसन्द करता है, जहाँ की जलवायु ऋतुएँ, भूमि की बनावट व जल इत्यादि की सुविधाएँ उत्तम हैं। बहुत अधिक गर्म और बहुत अधिक ठण्डे तथा अत्यधिक वर्षा वाले भागों में लोग रहना पसन्द नहीं करते। कहने का तात्पर्य यह है कि जहाँ भौगोलिक पर्यावरण अनुकूल होता है वहाँ जनसंख्या का घनत्व भी अधिक होता है तथा प्रतिकूल पर्यावरण वाले स्थानों पर जनसंख्या का घनत्व बहुत कम पाया जाता है। यही कारण है कि हमारे देश में गंगा-यमुना वाले क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है और उसकी अपेक्षाकृत रेगिस्तान और हिमालय आदि
क्षेत्रों में जनसंख्या कम पायी जाती है।

2. “आवास की प्रकृति अथवा मानव निवास पर प्रभाव – भौगोलिक पर्यावरण का ‘आवास’ की प्रकृति अथवा मनुष्य के निवास पर भी प्रभाव पड़ता है। बहुत अधिक गर्म प्रदेशों के लोग हवादार मकान बनवाते हैं; जैसे – भारत में बिहार, राजस्थान आदि प्रदेशों में। इसके विपरीत ठण्डे प्रदेशों में मकान ऐसे बनवाये जाते हैं जिनमें ठण्ड से बचाव किया जा सके। भारत के मैदानी प्रदेशों में गारा-मिट्टी और ईंटों के मकान बनाये जाते हैं, जब कि पहाड़ी क्षेत्रों में पत्थरों और लकड़ी के मकान बनाये जाते हैं।

3. वेशभूषा एवं खानपान पर प्रभाव – ठण्डी जलवायु वाले स्थानों के लोग अधिकांशतः मांसाहारी होते हैं तथा ऊनी वस्त्र धारण करते हैं, जब कि गर्म स्थानों के लोग अधिकांशतः शाकाहारी होते हैं और वर्ष में अधिक समय वे सूती वस्त्र धारण करते हैं। उदाहरण के लिए, कश्मीर में रहने वाले लोग मांस, मछली, अण्डा और इसी प्रकार के अन्य गर्म खाद्य-पदार्थों का सेवन अधिक करते हैं तथा चमड़े, खाल और ऊन से बने वस्त्रों का अधिक प्रयोग करते हैं। इसके विपरीत गर्म प्रदेशों; जैसे-राजस्थान, बिहार आदि के लोग सूती, हल्के व ढीले वस्त्रों का अधिक प्रयोग करते हैं तथा ठण्डे व शीघ्र पचने वाले खाद्य-पदार्थों का सेवन करते हैं।

4. व्यवसाय पर प्रभाव – मनुष्य के मूल व्यवसाय भी भौगोलिक पर्यावरण पर आधारित होते हैं। उदाहरणार्थ-भारत के हर प्रदेश में हर प्रकार की फसल उगाना जलवायु की विभिन्नता के कारण सम्भव नहीं है। अत: जिस प्रदेश में जो फसल पैदा नहीं होती, उस प्रदेश से वह कृषि-उपज जहाँ वह खूब पैदा करती हैं मँगाकर अपनी जरूरत पूरी करता है और इस प्रकार विनिमय व्यापार (Exchange Trade) का जन्म होता है।

5. आवागमन के साधनों पर प्रभाव – भौगोलिक पर्यावरण का प्रभाव आवागमन के साधनों पर भी पड़ता है। जिन स्थानों पर अति शीत के कारण भूमि तथा समुद्र बर्फ से ढके रहते हैं। वहाँ पर किसी भी प्रकार के आने-जाने के रास्ते बनाना सम्भव नहीं है। अधिक वर्षा वाले भागों में भी रेलवे ट्रैक या सड़कें नहीं बनायी जा सकतीं। मरुस्थलों में भी रेतीली भूमि होने के कारण सड़कें बनाना बहुत कठिन होता है। कुहरायुक्त वातावरण में वायुयान की उड़ान असम्भव है। इसीलिए समतल भूमि पर जहाँ वर्षा सामान्य होती है, मार्ग (सड़कें, रेलवे ट्रैक) बनाना बहुत आसान होता है। यही कारण है कि भारत के अनेक भागों में (जो कि अधिकांशतः मैदानी क्षेत्र हैं) आवागमन के साधन अधिक हैं। परन्तु पर्वतीय प्रदेशों में ऐसा नहीं है।

(ख) अप्रत्यक्ष प्रभाव

1. उद्योग-धन्धों पर प्रभाव  – अर्थशास्त्रीय उद्योगों के स्थानीयकरण का सिद्धान्त यही स्पष्ट करता है कि किसी भी विशेष उद्योग की स्थापना के लिए विशेष भौगोलिक पर्यावरण की आवश्यकता पड़ती है। लोहे के कारखानों का बिहार में अधिक मात्रा में होने का मुख्य कारण वहाँ कोयले की खानों का अधिक होना है। अहमदाबाद और मुम्बई में कपास की खेती अधिक होने के कारण वहाँ कपड़ा मिलों की अधिकता है। इसी प्रकार फिल्म उद्योग के लिए साफ आसमान, प्रकाश और स्वच्छ मौसम की आवश्यकता होती है। इसीलिए यह उद्योग मुम्बई में सबसे अधिक विकसित है।।

2. धर्म, साहित्य व कला पर प्रभाव – जिन वस्तुओं से मनुष्य अपने जीवन का निर्वाह करता है उसके प्रति उसके मन में श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है वह उनकी पूजा करने लगता है। उदाहरण के लिए, भारत के लोगों द्वारा गंगा, यमुना, सूर्य आदि की पूजा की जाती है। साहित्य पर भी पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है। उदाहरणार्थ-रेगिस्तानी क्षेत्र में रहने वाला साहित्यकार अपने साहित्य में ऊँट’ या खजूर के पेड़ों का वर्णन करते हुए मिलता है। इसी प्रकार समुद्री तट के निकटतम प्रदेश में रहने वाला चित्रकार जितनी अच्छी तरह समुद्र का चित्र चित्रित कर सकता है, उतना पहाड़ी इलाके में रहने वाला नहीं। रामायण, महाभारत आदि रचनाओं पर भी पर्यावरण का ही प्रभाव देखने को मिलता है।

3. समाज-जीवन पर प्रभाव – विभिन्न प्राकृतिक या भौगोलिक परिस्थितियों के कारण ही भिन्न-भिन्न रीति-रिवाजों का जन्म होता है। हमारे देश के विभिन्न प्रदेशों के रीति-रिवाजों, प्रथाओं, भोजन, साहित्य, कला आदि में जो विभिन्नताएँ विद्यमान हैं, उनके पीछे मूल कारण भौगोलिक अथवा प्राकृतिक पर्यावरण की विभिन्नता ही है।

4. सामाजिक संगठन पर प्रभाव – भौगोलिक पर्यावरण का सर्वाधिक प्रभाव सामाजिक संगठन पर पड़ता है। लीप्ले ने लिखा है कि ‘‘ऐसे पर्वतीय प्रदेशों में जहाँ खाद्यान्न की कमी होती है। वहाँ जनसंख्या की वृद्धि अभिशाप मानी जाती है और ऐसी विवाह संस्थाएँ स्थापित की जाती हैं जिनसे जनसंख्या न बढ़ पाये।” यही कारण है कि भारत में जौनसार बाबर में बहुत-से “भाइयों की केवल एक ही पत्नी होती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि भौगोलिक पर्यावरण का भारतीय सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्षों पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 2
भौगोलिक कारकों का मानव के सामाजिक जीवन पर कैसे प्रभाव पड़ता है.?
उत्तर:
कई भूगोलविदों ने भौगोलिक कारकों एवं सामाजिक संस्थाओं का सम्बन्ध प्रकट किया है। उदाहरण के लिए, जिन स्थानों पर खाने-पीने एवं रहने की सुविधाएँ होती हैं, वहाँ संयुक्त परिवार पाये जाते हैं और जाँ-इनका अभाव होता है, वहाँ एकाकी परिबार। जहाँ प्रकृति से संघर्ष करना होता है, वहाँ पुरुषप्रधान समाज होते हैं। इसी प्रकार से जहाँ जीविकोपार्जन की सुविधाएँ सरलता से मिल जाती हैं और कृषि की प्रधानता होती है, वहाँ बहुपत्नी प्रथा तथा जहाँ जीवन-यापन कठिन होता है, वहाँ बत्तिाप्रथा अथवा एक विवाह की प्रथा पायी जाती है। इसका कारण यह है कि संघर्षपूर्ण पर्यावरण में स्त्रियों का भरण-पोषण सम्भव न होने से कन्या-वध आदि की प्रथा पायी जाती है, जिससे उनकी संख्या घट जाती है। जिन स्थानों पर जीवन-यापन के लिए कठोर श्रम एवं सामूहिक प्रयास करना होता है, वहाँ सामाजिक संगठन सुदृढ़ होता है।

भारत के भौगोलिक पर्यावरण ने यहाँ के सामाजिक जीवन को प्रभावित किया है। खस एवं टोडा जनजातियाँ पहाड़ी भागों में निवास करती हैं, जहाँ परिवार को आर्थिक भरण-पोषण कठिनाई से होता है। उन्हें जीवन-यापन के लिए प्रकृति से घोर संघर्ष करना पड़ता है। इस संघर्ष में स्त्रियाँ और भी कमजोर होती हैं। अत: वहाँ जन्म के समय ही लड़कियों को मार देने की प्रथा पायी जाती है, जिसके कारण इन समाजों में पुरुषों की अधिकता एवं स्त्रियों की कमी पायी जाती है। इस विषम लिंग अनुपात के कारण यहाँ बहुपति विवाह की प्रथा विकसित हुई। दूसरी ओर उत्तरी भारत के मैदानी भागों में जीवन-यापन सरल है; इससे वहाँ लिंग-अनुपात लगभग समान है, अतः वहाँ एक विवाह प्रथा विकसित हुई और सम्पन्न लोग एकाधिक पत्नियाँ भी रखने लगे, जिनसे बहुपत्नी प्रथा का जन्म हुआ।

दक्षिणी भारत के पठारी क्षेत्र होने के कारण लोगों को दूर क्षेत्र तक गमन कठिन था। अत: उनका विवाह एवं नातेदारी का क्षेत्र अपने गाँवों या निकटवर्ती गाँवों तक ही सीमित रहा, जब कि उत्तरी भारत के मैदानी क्षेत्रों में विवाह एवं नातेदारी का विस्तार दूर-दराज के क्षेत्रों तक पाया जाता है। मैदानी क्षेत्रों में पुरुष का दबदबा अधिक होने से पितृसत्तात्मक परिवार व्यवस्था ने जन्म लिया। गारो, खासी और जयन्तिया जनजातियाँ जो कि मातृसत्तात्मक हैं, पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करती हैं। इनमें पुरुष जीवन-यापन की सुविधाएँ जुटाने, शिकार करने एवं जंगलों से कन्द-मूल-फल एकत्रित करने एवं कृषि के लिए अधिकांश समय तक घर से बाहर ही रहता है। ऐसी स्थिति में परिवार एवं बच्चों के पालन-पोषण का दायित्व महिलाओं पर आ जाता है, इससे परिवार में महिलाओं को प्रभुत्व स्थापित हुआ एवं मातृसत्तात्मक परिवार पनपे।

प्रश्न 3
सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण का भारतीय सामाजिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
सामाजिक जीवन केवल भौगोलिक पर्यावरण से ही प्रभावित नहीं होता, वरन् सामाजिकसांस्कृतिक पर्यावरण भी उसे प्रभावित करता है। सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण स्वयं मानव द्वारा निर्मित होता है। उसमें मानव द्वारा निर्मित भौतिक वस्तुएँ; जैसे—पेन, घड़ी, रेडियो, मकान, सड़क, मशीनें, कलाकृतियाँ, धार्मिक स्थल और हजारों-लाखों वस्तुएँ सम्मिलित हैं। अभौतिक वस्तुओं में सामाजिक संस्थाएँ, कला, विज्ञान, धर्म, विश्वास, परम्पराएँ, कानून और मानव का ज्ञान आदि आते हैं। भारत इन भौतिक एवं अभौतिक तथ्यों से निर्मित सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण की भूमि रहा है। यहाँ समय-समय पर आक्रमणकारियों के रूप में विभिन्न प्रजातियों, धर्मों एवं संस्कृतियों से सम्बन्धित लोग भी आते रहे हैं, जिन्होंने यहाँ के निवासियों की जीवन-विधि को प्रभावित किया है।

भारतीयों का खान-पान, रहन-सहन, परिवार, विवाह, नातेदारी की प्रथाएँ, आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन सदैव एक-से नहीं रहे हैं, वरन् समय के साथ-साथ बदलते रहे हैं। वैदिक काल, धर्मशास्त्र काल, मुगलकाल, अंग्रेजों के शासन के समय एवं स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद के सामाजिक जीवन में भिन्नताएँ पायी जाती हैं। वैदिक युग में वर्ण एवं आश्रम-व्यवस्था ने भारतीयों के जीवन को प्रभावित किया। उस समय धर्मशास्त्र काल में विभिन्न धर्म-ग्रन्थों की रचना की गयी। जिनमें परिवार, विवाह, शिक्षा, आर्थिक जीवन से सम्बन्धित विभिन्न नियमों का भी उल्लेख किया गया। इसी समय वर्णव्यवस्था ने कठोर जाति-व्यवस्था का रूप ले लिया और जाति ने भारतीय जीवन के प्रत्येक पक्ष को निर्धारित किया। स्त्रियों को भी अनेक अधिकारों से वंचित कर दिया गया।

मुगलकाल में विवाह व सती–प्रथा का प्रचलन बढ़ा तथा विधवा विवाहों पर रोक लगा दी गयी। अन्तर्जातीय एवं अन्तर्वर्गीय विवाहों पर भी रोक लगी। इस्लाम ने भारतीयों के सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक जीवन, खान-पान एवं पहनावे में कई परिवर्तन किये। अंग्रेजी काल में भारतीयों का जीवन पश्चिमी सभ्यता एवं संस्कृति से प्रभावित हुआ। उनके समय में सम्पूर्ण भारत एक राजनीतिक सत्ता के अधीन शासित हुआ, औद्योगीकरण की नींव रखी गयी, अनेक नवीन आविष्कार जो पश्चिम में हुए, उनसे भारतीय भी परिचित हुए। कृषि एवं उत्पादन के नये तरीके अपनाये गये। मशीनों का प्रचलन बढ़ा। अंग्रेजी शिक्षा-प्रणाली प्रचलित हुई, खान-पान एवं पहनावे में परिवर्तन आया। चुकन्दर, शलगम, मांस-मदिरा का प्रयोग बढ़ा। टेबल-कुर्सी पर बैठकर, काँटे-छुरी एवं क्रॉकरी के माध्यम से भोजन किया जाने लगा। पैण्ट, शर्ट, टाई एवं कोट का प्रचलन हुआ।

आजादी के बाद भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण में एक बार फिर परिवर्तन हुआ। एकाकी परिवार, अन्तर्जातीय विवाह, विलम्ब विवाह का प्रचलन बढ़ा, विधवा पुनर्विवाह होने लगे, नातेदारी का महत्त्व घटने लगा, धर्मनिरपेक्ष मूल्य पनपे। सार्वभौमिक शिक्षा प्रदान की जाने लगी। प्रजातान्त्रिक मूल्य स्थापित हुए। विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं एवं सामुदायिक विकास योजनाओं के माध्यम से ग्रामीण भारत एवं सम्पूर्ण भारत के सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक जीवन को उन्नत करने का प्रयास किया गया, जिसके फलस्वरूप वर्तमान में भारतीयों का जो सामाजिक जीवन है वह वैदिक काल एवं मध्यकाल से एकदम भिन्न दिशा की ओर अग्रसर हुआ। फिर भी धर्म एवं अध्यात्मवाद की प्रधानता, कर्म एवं पुनर्जन्म का सिद्धान्त, संयुक्त परिवार प्रणाली और जाति-प्रथा आज भी भारतीयों के सामाजिक जीवन का मूलाधार बने हुए हैं। स्पष्ट है कि भारतीयों के सामाजिक जीवन को प्रभावित करने में भौगोलिक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण ने पर्याप्त योगदान दिया।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
भौगालिक पर्यावरण मानव के अपराधी व्यवहारों को कैसे प्रभावित करता है ?
उत्तर:
अनेक अपराधशास्त्रियों का मत है कि भौगोलिक पर्यावरण का अपराधी प्रवृत्ति के व्यक्ति पर भी प्रभाव पड़ता है। गर्मियों में व्यक्ति के विरुद्ध एवं सर्दियों में सम्पत्ति के विरुद्ध अपराध अधिक होते हैं। उपजाऊ भूमि, अनुकूल वर्षा एवं प्राकृतिक साधनों की अधिकता होने पर अपराध कम होंगे और इसके विपरीत स्थितियों में अधिक। उत्तरी भारत के आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न होने के कारण यहाँ जनाधिक्य है। जनसंख्या के दबाव के कारण यहाँ चोरी, डकैती, बलात्कार, हत्या आदि अपराधों की घटनाएँ अधिक पायी जाती हैं। इनकी तुलना में दक्षिणी भारत शान्त क्षेत्र है।
इसी प्रकार जब भारत में अकाल पड़ता है तब भी अपराधों की दर में वृद्धि होती है तथा जब वर्षा पर्याप्त होती है, फसलों की पैदावार अच्छी होती है तो आर्थिक प्रवृत्ति के अपराध घट जाते हैं।

प्रश्न 2
भौगोलिक पर्यावरण किस प्रकार से सामाजिक जीवन को प्रभावित करता है ? [2009]
उत्तर:
भौगोलिक पर्यावरण सामाजिक जीवन को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों रूपों में प्रभावित करता है। कुछ भौगोलिकविदों का कहना है कि भौगोलिक दशाएँ ही मनुष्य के सम्पूर्ण सामाजिकसांस्कृतिक जीवन, विभिन्न संस्थाओं, मानवीय व्यवहारों एवं सभ्यता के स्वरूप का निर्धारण करती हैं। भौगोलिकविदों के मतानुसार

  1. जनसंख्या की रचना एवं घनत्व,
  2. व्यवसाय,
  3.  सामाजिक व्यवहार,
  4. मकान-निर्माण,
  5. भोजन,
  6. वेशभूषा,
  7. सामाजिक संस्थाओं (अर्थात् विवाह, अधिकार, विश्वास आदि),
  8. उद्योग-धन्धों,
  9. आवागमन के साधन,
  10.  कला व साहित्य इत्यादि पर भौगोलिक पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है।

इतना ही नहीं; कुछ विद्वानों (हंटिंग्टन, बकल, मॉण्टेस्क्यू, डेक्सटर आदि) ने तो यहाँ तक कहा है कि सभी मानवीय व्यवहारों; जैसे – मनुष्य की कार्यकुशलता, आत्महत्या, सम्पत्ति एवं व्यक्ति के विरुद्ध अपराध, मानसिक सन्तुलन, जन्म एवं मृत्यु-दर इत्यादि पर जलवायु तथा ऋतुओं का प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 3
पर्यावरण के प्रकार अथवा भेद बताइए। [2015]
उत्तर:
पर्यावरण के प्रकारों अथवा भेदों के विषय में विद्वानों ने विभिन्न प्रकार के मत व्यक्त किये हैं; जैसे(क) लैण्डिस (Landis) के अनुसार, पर्यावरण के तीन प्रकार हैं
(i) प्राकृतिक,
(ii) सामाजिक तथा
(iii) सांस्कृतिक।

(ख) ऑगबर्न एवं निमकॉफ के अनुसार पर्यावरण के दो प्रकार हैं
(i) प्राकृतिक तथा
(ii) मनुष्यकृत।।

(ग) गिलिन तथा गिलिन के अनुसार भी पर्यावरण के दो भेद हैं
(i) प्राकृतिक पर्यावरण तथा
(ii) सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण।

सामान्य आधार पर पर्यावरण को निम्नलिखित तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है

  1. भौगोलिक या प्राकृतिक पर्यावरण – इसमें प्रकृति प्रदत्त वस्तुएँ आती हैं; जैसे-स्थलमण्डल, जलमण्डल, वायुमण्डल इत्यादि। ये सभी अपनी-अपनी शक्तियों से अनेक क्रियाएँ करते हैं। जिससे पृथ्वी पर अनेक भौगोलिक दशाओं की उत्पत्ति होती है तथा ये सभी दशाएँ मानव के जीवन पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डालती हैं।
  2. सामाजिक पर्यावरण – सभी सामाजिक रीति-रिवाज, प्रथाएँ, परम्पराएँ, लोकाचार आदि सामाजिक पर्यावरण के अन्तर्गत आती हैं।
  3.  सांस्कृतिक पर्यावरण – किसी समाज का सांस्कृतिक पक्ष सांस्कृतिक पर्यावरण कहलाता है। इसके अन्तर्गत उन समस्त वस्तुओं का समावेश होता है जिनको निर्माण स्वयं मनुष्य ने किया है; जैसे-धर्म, नैतिकता, भाषा, साहित्य, प्रथाएँ, लोकाचार, कानून, व्यवहार-प्रतिमान इत्यादि। इस प्रकार के पर्यावरण को सामाजिक विरासत’ या ‘संस्कृति’ (Culture) भी कहते हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
भौगोलिक पर्यावरण का सामाजिक संगठन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
भौगोलिक पर्यावरण विविध प्रकार से सामाजिक संगठन को प्रभावित करता है। इसके प्रभाव प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में पड़ते हैं। सामाजिक संगठन पर पड़ने वाले इसके प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं

  1. भौगोलिक पर्यावरण जनसंख्या के घनत्व का निर्धारण करता है। अधिक जनसंख्या अथवा कम जनसंख्या सामाजिक जीवन को प्रभावित करती है।
  2. भौगोलिक पर्यावरण का खान-पान पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि भौगोलिक पर्यावरण अनुकूल होता है तो आर्थिक समृद्धि के कारण व्यक्तियों का खान-पान उच्च स्तर को होता है।
  3. भौगोलिक पर्यावरण धार्मिक विश्वासों को प्रभावित करता है। उदाहरणार्थ कृषि प्रधान देश होने के कारण यहाँ इन्द्र अर्थात् वर्षा के देवता की पूजा का विशेष महत्त्व होता है।
  4. भौगोलिक पर्यावरण मानव व्यवहार को प्रभावित करता है। भारत के विभिन्न राज्यों के रीति| रिवाज, खान-पान तथा साहित्य आदि में अन्तर पाए जाने का मूल कारण भौगोलिक पर्यावरण की विभिन्नता ही है।

प्रश्न 2
सांस्कृतिक पर्यावरण का मानव जीवन के आर्थिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
सांस्कृतिक पर्यावरण व्यक्तियों के आर्थिक जीवन को भी प्रभावित करता है। यदि सांस्कृतिक मूल्य आर्थिक विकास में सहायता देने वाले हैं तो वहाँ व्यक्तियों को आर्थिक जीवन अधिक उन्नत होगा। मैक्स वेबर के अनुसार, प्रोटेस्टेण्ट ईसाइयों की धार्मिक मान्यताएँ पूँजीवादी प्रवृत्ति के विकास में सहायक हुई हैं। इसीलिए प्रोटेस्टेण्ट ईसाइयों के बहुमत वाले देशों में पूँजीवाद अधिक है। यदि सांस्कृतिक मूल्य आर्थिक विकास में बाधक हैं तो व्यक्तियों के आर्थिक जीवन पर इनका कुप्रभाव पड़ता है तथा वे आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए रहते हैं।

प्रश्न 3
भौगोलिक पर्यावरण का मानसिक क्षमता पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
भौगोलिक पर्यावरण का मानसिक क्षमता पर प्रभाव के सन्दर्भ में हंटिंग्टन का मत है कि जब तापमान बहुत गिर जाता है तो मानसिक योग्यता की अधिक हानि होती है और जलवायु में शीघ्र पुनः परिवर्तन न हो तो इसमें निरन्तर कमी आती जाती है। यदि हवा में कुछ गर्मी आ जाए तो इसमें कुछ सुधार होता है, लेकिन हवी अधिक गर्म हो जाने पर मानसिक क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अत्यधिक गर्मी में शीत ऋतु की तुलना में भारतीयों की मानसिक क्षमता कम हो जाती है।

प्रश्न 4
प्रदूषण के प्रमुख दो सामाजिक प्रभावों को लिखिए।
उत्तर:
प्रदूषण मानव तथा अन्य जीवों के जीवन-चक्र पर हानिकारक प्रभाव डालता है। अत: यह मानव तथा समाज दोनों के लिए हानिकारक है। प्रदूषण के दो प्रमुख हानिकारक प्रभाव निम्नलिखित हैं

  1. मानव के जीवन-स्तर पर प्रभाव – मानव-जीवन पर प्राकृतिक सम्पदाओं का प्रभाव पड़ता है। यह प्राकृतिक सम्पदाएँ भूमि, पेड़-पौधे, खनिज-पदार्थ, जल, वायु आदि के रूप में मनुष्य को उपलब्ध हैं। प्रदूषण के कारण इन सभी पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। प्रदूषण के कारण फसलों, फलों, सब्जियों आदि पर बुरा प्रभाव पड़ता है, जलीय जीव (मछलियाँ आदि) नष्ट हो जाते हैं। इससे वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि हो जाती है तथा लोगों को आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ता है।
  2. प्राणियों के खाद्य-पदार्थों में कमी – वनों की अन्धाधुन्ध कटाई के परिणामस्वरूप जीव जन्तुओं को चारा तक उपलब्ध नहीं हो पा रहा है, जिस कारण हमें पशुओं से जो पदार्थ प्राप्त होते हैं, वे नष्ट होते जा रहे हैं।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
नगरीकरण से पर्यावरण प्रभावित होता है। (हाँ/नहीं)
या
जनसंख्या से पर्यावरण प्रभावित है। (हाँ/नहीं) [2015]
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 2
भौगोलिक पर्यावरण का प्रभाव प्रत्यक्ष भी होता है और …….. भी।
उत्तर:
अप्रत्यक्ष

प्रश्न 3
सभ्यता की वृद्धि के साथ भौगोलिक पर्यावरण का प्रभाव भी …….. जाता है।
उत्तर:
घटता।

प्रश्न 4
उस बाह्य शक्ति को क्या कहते हैं जो हमें प्रभावित करती है?
उत्तर:
पर्यावरण।

प्रश्न 5
किस विद्वान ने प्राकृतिक परिस्थितियों को धार्मिक व्यवहार से जोड़ने का प्रयास किया है।
उत्तर:
मैक्स मूलर।।

प्रश्न 6
‘भौगोलिक निर्णायकवाद’ की संकल्पना को किसने विकसित किया? [2008]
उत्तर:
बकल ने।

प्रश्न 7
“संस्कृति पर्यावरण का मानव निर्मित भाग है।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
हर्सकोविट्स का।।

प्रश्न 8
चिपको आन्दोलन किसने चलाया? [2009]
उत्तर:
सुन्दरलाल बहुगुणा ने।

प्रश्न 9
प्रदूषण की एक परिभाषा दीजिए। [2009]
उत्तर:
प्रदूषण हमारी वायु, मृदा एवं जल के भौतिक, रासायनिक तथा जैविके लक्षणों में अवांछनीय परिवर्तन है जो मानव जीवन तथा अन्य जीवों पर हानिकारक प्रभाव डालता है।

प्रश्न10
संस्कृति मानव……….वातावरण है। [2009]
उत्तर:
निर्मित।

प्रश्न 11
संस्कृति के दो प्रकार लिखिए। [2009]
उत्तर:
भौतिक एवं अभौतिक संस्कृति।

प्रश्न 12
सांस्कृतिक पर्यावरण की एक परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
हर्सकोविट्स के अनुसार, “सांस्कृतिक पर्यावरण के अन्तर्गत वे सभी भौतिक और अभौतिक वस्तुएँ सम्मिलित हैं जिनका निर्माण मानव ने किया है।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
“पर्यावरण किसी भी उस बाह्य शक्ति को कहते हैं जो हमें प्रभावित करती है।” यह परिभाषा किस विद्वान ने प्रस्तुत की है?
(क) जिसबर्ट
(ख) रॉस
(ग) मैकाइवर
(घ) डेविस

प्रश्न 2
प्रकृति द्वारा मनुष्य को प्रदत्त दशाओं से निर्मित पर्यावरण को क्या कहा जाता है?
(क) भौगोलिक
(ख) सामाजिक
(ग) सांस्कृतिक
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 3
निम्नलिखित में से किस विद्वान ने भौगोलिक निश्चयवाद का समर्थन किया है?
(क) बकल
(ख) लीप्ले
(ग) हटिंग्टन
(घ) ये सभी

प्रश्न 4
भौगोलिक पर्यावरण किन तत्त्वों से बनता है?
(क) मनुष्य
(ख) प्राकृतिक दशाएँ
(ग) धार्मिक विश्वास
(घ) प्रथाएँ

प्रश्न 5
वह कौन-सा सिद्धान्त है जो सम्पूर्ण मानवीय क्रियाओं को भौगोलिक पर्यावरण के आधार पर स्पष्ट करने का प्रयास करता है?
(क) भौगोलिक निर्णायकवाद
(ख) तकनीकी निर्णायकवाद
(ग) सांस्कृतिक निर्णायकवाद
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 6
हंटिंग्टन किस सम्प्रदाय का समर्थक है?
(क) भौगोलिक निर्णायकवाद
(ख) तकनीकी निर्णायकवाद
(ग) सांस्कृतिक निर्णायकवाद
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 7
भारतीय सरकार ने गंगा विकास प्राधिकरण’ की स्थापना किस सन में की थी?
(क) सन् 1984 में
(ख) सन् 1985 में
(ग) सन् 1986 में
(घ) सन् 1987 में

प्रश्न 8
पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। [2009]
(क) 5 जून को
(ख) 24 जून को
(ग) 6 जून को
(घ) 20 जून को

उत्तर
1, (ख) रॉस,
2. (ख) सामाजिक,
3. (घ) ये सभी,
4. (ख) प्राकृतिक दशाएँ,
5. (क) भौगोलिक निर्णायकवाद,
6. (क) भौगोलिक निर्णायकवाद,
7. (ख) सन् 1985 में,
8. (क) 5 जून को।

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UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 4 Social Control

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 4 Social Control (सामाजिक नियन्त्रण) are part of UP Board Solutions for Class 12 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 4 Social Control (सामाजिक नियन्त्रण).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 4
Chapter Name Social Control
(सामाजिक नियन्त्रण)
Number of Questions Solved 51
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 4 Social Control (सामाजिक नियन्त्रण)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
सामाजिक नियन्त्रण से आप क्या समझते हैं ?  इसके क्या उद्देश्य हैं? सामाजिक नियन्त्रण में धर्म की भूमिका पर प्रकाश डालिए। [2009, 10]
या
सामाजिक नियन्त्रण क्या है? धर्म सामाजिक नियन्त्रण को कैसे प्रभावित करता है? [2016]
या
सामाजिक नियन्त्रण में धर्म की भूमिका की विवेचना कीजिए। [2012, 13, 16]
या
धर्म से आप क्या समझते हैं? सामाजिक नियन्त्रण में धर्म की भूमिका की व्याख्या कीजिए। [2007, 10, 11, 13]
या
सामाजिक नियन्त्रण पर आत्म-नियन्त्रण के प्रभाव को दर्शाइए। [2017]
उतर:

सामाजिक नियन्त्रण का अर्थ

समाज एक व्यवस्था का नाम है। समाज का अस्तित्व तभी तक है जब तक उसमें व्यवस्था बनी रहती है। समाज के सदस्यों के व्यवहारों को नियन्त्रित करके ही यह व्यवस्था बनी रह सकती है। इस व्यवस्था के बनाने में कुछ शक्तियाँ प्रभावी होती हैं। वास्तव में, ये शक्तियाँ ही सामाजिक नियन्त्रण के रूप में जानी जाती हैं। समाज के प्रत्येक व्यक्ति का प्रयास रहता है कि वह अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए दूसरों के हितों को कुचल डाले। वह अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने में उचित-अनुचित का विचार न करके अव्यवस्था को जन्म देता है। सामाजिक नियन्त्रण ही वह शक्ति है जो उसे उच्छंखलता करने से रोकती है। जिस विधि से समाज के सदस्यों के व्यवहारों को सुव्यवस्थित तथा नियन्त्रित किया जाता है, उसे ही सामाजिक नियन्त्रण कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, समाज द्वारा व्यक्तियों एवं समूहों के सामान्य व्यवहारों पर जो नियन्त्रण लगाया जाता है, सामान्य रूप से उसे ही सामाजिक नियन्त्रण की संज्ञा दी जाती है। वास्तव में सामाजिक नियन्त्रण समाजीकरण का पालक व रक्षक है तथा मानव के

सामाजिक जीवन की एक अनिवार्य दशा है।

सामाजिक नियन्त्रण की परिभाषा सामाजिक नियन्त्रण का वास्तविक अर्थ जानने के लिए हमें इसकी परिभाषाओं पर दृष्टि निक्षेप करना। होगा। विभिन्न समाजशास्त्रियों ने सामाजिक नियन्त्रण को निम्न प्रकार से परिभाषित किया है|

मैकाइवर एवं पेज के अनुसार, सामाजिक नियन्त्रण का तात्पर्य उस तरीके से है जिससे सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था की एकता और उसका स्थायित्व बना रहता है। इसके द्वारा यह समस्त व्यवस्था एक परिवर्तनशील सन्तुलन के रूप में क्रियाशील रहती है।”

जोसेफ रोसेक के अनुसार, “सामाजिक नियन्त्रण उन नियोजित या अनियोजित क्रियाओं के लिए प्रयोग किया जाने वाला सामूहिक शब्द है जिससे व्यक्ति को समूह के मूल्यों एवं रीति-रिवाजों को सिखाया जाता है, उन्हें मानने का अनुरोध किया जाता है अथवा विवश किया जाता है।’

लुण्डबर्ग के अनुसार, “सामाजिक नियन्त्रण एक दशा है जिसमें व्यक्तियों को अन्य व्यक्तियों द्वारा कार्य या विश्वास के सामूहिक प्रमापों को मानने के लिए, जब अन्य आदर्श भी प्राप्त हों, विवश किया जाता है।

जॉर्ज एटबरी व अन्य के अनुसार, “सामाजिक नियन्त्रण से तात्पर्य उस तरीके से है जिससे समाज सामाजिक सम्बन्धों में एकरूपता एवं स्थिरता प्राप्त करता है।”

ऑगबर्न एवं निमकॉफ के अनुसार, “दबाव के वे प्रतिमान जो व्यवस्था एवं प्रस्थापित नियमों को बनाये रखने का प्रयत्न करते हैं, सामाजिक नियन्त्रण कहे जा सकते हैं।”

धर्म

धर्म कुछ अलौकिक विश्वासों और ईश्वरीय सत्ता पर आधारित एक शक्ति है जिसके नियमों का पालन व्यक्ति “पाप और पुण्य” अथवा ईश्वरीय शक्ति के भय के कारण करता है। धर्म एक आन्तरिक अलौकिक प्रभाव के द्वारा व्यक्ति और समूह के जीवन को नियन्त्रित करता है।

सामाजिक नियन्त्रण में धर्म की भूमिका तथा उद्देश्य या महत्त्व

सामाजिक जीवन में धर्म का महत्त्व बहुत अधिक है। यह व्यक्ति को बुरे कार्यों से बचाकर सामाजिक मूल्यों और आदर्शों की रक्षा करता है। सामाजिक नियन्त्रण के क्षेत्र में धर्म की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण रहती है। धर्म धार्मिक मूल्यों की सुरक्षा करके समाज को संगठित रखते हैं। धार्मिक नियमों को तोड़ना, पाप बटोरना है। धर्म के विरुद्ध जाकर ईश्वर को नाराज करना है। इन सब भावनाओं से अभिभूत मानव सामाजिक आदर्शों का पालन करके सामाजिक नियन्त्रण को एक सुदृढ़ आधार प्रदान करता है। सामाजिक नियन्त्रण की भूमिका के रूप में धर्म के महत्त्व को निम्नवत् प्रस्तुत किया जा सकता है

1. धर्म मानव-व्यवहार को नियन्त्रित करता है-धर्म मानव के व्यवहार को नियन्त्रित करने का महत्त्वपूर्ण अभिकरण है। अलौकिक सत्ता के भय से व्यक्ति स्वत: अपने व्यवहार को नियन्त्रित रखता है। धर्म का जादुई प्रभाव व्यक्ति को सत्य भाषण, अचौर्य, अहिंसक, दयावान, निष्ठावान तथा आज्ञाकारी बनने की प्रेरणा देकर सामाजिक आदर्शों के पालन में सहायक होता है। नियन्त्रित मानव-व्यवहार सामाजिक नियन्त्रण का पथ प्रशस्त करता है।

उदाहरणार्थ-ईसाइयों और मुसलमानों में पादरी और मुल्ला-मौलवी अपनेअपने अनुयायियों के सामाजिक जीवन के नियन्त्रक के रूप में कार्य करते हैं। वास्तव में, धर्म के नियमों के विरुद्ध आचरण ईश्वर की आज्ञा का उल्लंघन माना जाता है। वह पाप है। इससे व्यक्ति का न केवल इहलोक, वरन् परलोक भी बिगड़ जाता है। हिन्दुओं में व्याप्त जाति-प्रथा का आधार भी धर्म है, जो व्यक्ति के जीवन का सम्पूर्ण सन्दर्भ बन गयी है; अतः भारतीय राजनीति भी जातिवाद से कलुषित हो गयी है।

2. सामाजिक संघर्षों पर नियन्त्रण-समाज सहयोग और संघर्ष का गंगा-जमुनी मेल है। व्यक्तिगत स्वार्थ समाज में संघर्ष को जन्म देते हैं। धर्म व्यक्ति को कर्तव्य-पालन, त्याग और बलिदान के पथ पर अग्रसर करके व्यक्तिगत स्वार्थों को छोड़ने की प्रेरणा देता है। व्यक्ति के स्थान पर यह समष्टि के कल्याण की राह दिखाता है, जिससे संघर्ष टल जाते हैं। और सामाजिक नियन्त्रण बना रहता है।

3. सदगुणों का विकास-सभी धर्म आदर्शों और मूल्यों की खान होते हैं। धर्म का पालन व्यक्ति में सद्गुणों का बीज रोप देता है। व्यक्ति प्रेम, त्याग, दया, सच्चाई, ईमानदारी, अहिंसा और सहयोग आदि सद्गुणों का संचय करके सदाचरण द्वारा सामाजिक नियन्त्रण को अक्षुण्ण बनाये रखता है।

4. पवित्रता की भावना का उदय-धर्म पवित्रता की पृष्ठभूमि से उदित होता है। धर्म-पालन से मन में पवित्रता का भाव अंकुरित होता है। पवित्रता का यह भाव व्यक्ति को दुष्कर्म करने से बचाता है। अपवित्र कार्य सामाजिक मूल्यों का हनन कर विघटन उत्पन्न करते हैं। धर्म पवित्र भाव जगाकर सामाजिक नियन्त्रण में सहयोग देता है।

5. संस्कारों का उदय-धर्म संस्कार और कर्मकाण्डों की डोर से बँधा है। व्यक्ति विभिन्न संस्कारों की पूर्ति के लिए धर्माचरण करता है। इस प्रकार संस्कारों का निर्वहन करने वाला व्यक्ति स्वतः सामाजिक नियन्त्रण” बन जाता है।

6. सामाजिक परिवर्तन-की प्रक्रिया तीव्र होने के साथ ही सामाजिक टने लगता है। धर्म सामाजिक परिवर्तन पर अंकुश लगाकर सामाजिक, को, ये रखता है। धर्म मनुष्यों को सामाजिक आदर्शों को ग्रहण कर की प्रेरणा सांस्कृतिक धरोहर की सुरक्षा करता है। धार्मिक विश्वास सामाजिक नियन्त्रण में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

7. आर्थिक जीवन पर नियन्त्रण-आर्थिक क्रियाएँ सामाजिक अभिन्न अंग हैं। धनोत्पादन में व्यक्ति उचित-अनुचित भूल जाता है, परन्तु धर्म उसके आर्थिक जीवन पर भी अपना नियन्त्रण बनाये रखता है। हिन्दू दर्शन में भोग के स्थान पर त्याग का आदर्श है। हिन्दू धर्म भौतिक विकास के स्थान पर आध्यात्मिक विकास पर बल देता है। जैन धर्म ने अपरिग्रह का सिद्धान्त देकर त्याग का महत्त्व स्पष्ट किया है। मैक्स वेबर के अनुसार, प्रत्येक धर्म में कुछ ऐसे नैतिक नियम या आधारे होते हैं जो कि उस धर्म के मानने वाले समुदाय के सदस्यों की आर्थिक व्यवस्था को निश्चित करते हैं। सभी धर्म उचित ढंग से धन कमाने और व्यय करने की प्रेरणा देकर सामाजिक नियन्त्रण में सहयोग प्रदान करते

8. व्यक्तित्व के विकास में सहायक-व्यक्तित्व के विकास में धर्म का योगदान बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। धर्म व्यक्तित्व के सम्मुख जो आदर्श प्रस्तुत करता है वे सब उसे ज्ञान, धैर्य, साहस, दया, क्षमा आदि गुणों से विभूषित करते हैं। ये सब गुण व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में सहायक होते हैं। निराशा और कुण्ठाओं से ग्रस्त व्यक्ति समाज को विघटित करता है, जबकि प्रबुद्ध नागरिक सामाजिक नियन्त्रण को आधार स्तम्भ होता है।

9. अपराध पर नियन्त्रण-धर्म व्यक्ति में सद्गुणों का विकास करके अपराध बोध कराने में सहायक होता है। धर्म से अभिभूत व्यक्ति का अन्त:करण कभी भी उसे आपराधिक एवं समाज-विरोधी कार्य करने की अनुमति ही नहीं देता। धार्मिक नियमों के उल्लंघन मात्र से ही धर्मानुरागी व्यक्ति को अपराध बोध हो जाता है। धर्म अपराध पर नियन्त्रण लगाकर सामाजिक नियन्त्रण के कार्य में सहायता प्रदान करता है।

10. राजनीतिक क्रिया-कलापों पर नियन्त्रण-राजनीति और धर्म का सम्बन्ध अटूट है। धर्म राजा और राज्य का मार्गदर्शक होता है। धर्माचरण सत्तासीन व्यक्तियों का प्रथम कर्तव्य होता है। राजा धर्म के सिद्धान्तों के अनुरूप शासन चलाता है। राजा को पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। धर्म के सिद्धान्तों पर आधारित राज्य और राजनीति दीर्घगामी होते हैं। धर्म वह कवच है जो राजा और राज्य दोनों की सुरक्षा करता है। धर्म मूल्यविहीन राजनीति की आज्ञा नहीं देता। इस प्रकार धर्म सामाजिक आदर्शों का उल्लंघन करने वाली राजनीति एवं राजनेता पर अंकुश लगाकर सामाजिक नियन्त्रण को दृढ़ बनाता है। इस प्रकार भारतीय समाज में सामाजिक नियन्त्रण में धर्म की भूमिका का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। धर्म के सन्दर्भ को बिना ध्यान में रखे भारतीय समाज को समझना कठिन है।

प्रश्न 2
सामाजिक नियन्त्रण में राज्य की भूमिका पर एक संक्षिप्त निबन्ध लिखिए। [2008, 10, 11, 12, 13]
या
सामाजिक नियन्त्रण में राज्य की भूमिका की व्याख्या कीजिए। [2016]
उतर:

सामाजिक नियन्त्रण में राज्य की भूमिका

सामाजिक नियन्त्रण के अभिकरणों में राज्य सर्वशक्तिसम्पन्न सर्वोच्च अभिकरण है जो नियन्त्रण के क्षेत्र में अनेक प्रकार से अपनी भूमिका निभाता है। सामाजिक नियन्त्रण के रूप में राज्य की भूमिका निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट की जा सकती है

1. पारिवारिक जीवन पर नियन्त्रण-आधुनिक युग में राज्य परिवार पर अनेक प्रकार के नियन्त्रण लगाता है जो कि परिवार को विघटित होने से बचाने के लिए आवश्यक है। मैकाइवर एवं पेज के अनुसार परिवार को राज्य से अधिक कोई अन्य संस्था नियन्त्रित नहीं कर सकती। नियमों द्वारा राज्य विवाह की आयु, शर्त, अवधि और परिवार के स्वरूप का निर्धारण करता है। 1929 ई० में बाल विवाह पर नियन्त्रण लगे तथा आयु-सीमा निश्चित हुई। आज ‘हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955′ में संशोधन करके लड़की तथा लड़के के लिए आयु निर्धारित (लड़की के लिए 18 वर्ष और लड़के लिए 21 वर्ष) कर दी गई है। 1961 ई० में ‘दहेज विरोधी अधिनियम’ भी पारित हुआ। 1956 ई० में ‘हिन्दू उत्तर:ाधिकार अधिनियम’ द्वारा स्त्रियों को भी सम्पत्ति में हिस्सा मिलने लगा है। 1978 ई० के शिक्षा अधिनियम’ द्वारा प्राथमिक शिक्षा सार्वजनिक रूप से अनिवार्य कर दी गई है। इन सब अधिनियमों द्वारा राज्य परिवार को नियन्त्रित करता है।

2. आर्थिक व्यवस्था पर नियन्त्रण-जीवन-यापन और क्षुधापूर्ति के लिए विभिन्न आर्थिक साधनों का समाज में उपयोग किया जाता है। इस अर्थव्यवस्था पर राज्य जैसे प्रभुतासम्पन्न शक्ति का नियन्त्रण होना आवश्यक है। इससे ही अर्थव्यवस्था को संरक्षण मिलता है। इस उद्देश्य से अर्थव्यवस्था में सन्तुलन लाने के लिए राज्य आवश्यकतानुसार विशिष्ट उद्योगों का राष्ट्रीयकरण कर उन पर अपना नियन्त्रण रखता है। अनेक श्रम अधिनियमों द्वारा वेतन एवं पारिश्रमिक निश्चित करता है तथा राष्ट्रीय सम्पत्ति का समान वितरण भी राज्य की अनुपम विशिष्टता होती है। आर्थिक संकट के समय दैनिक आवश्यकता की वस्तुएँ उपलब्ध कराना तथा आर्थिक विकास में सहयोग देना राज्य का कर्तव्य है तथा असन्तुलन और अनियमितता पर नियन्त्रण करना भी इसी का अधिकार है।

3. सामाजिक क्रियाओं पर नियन्त्रण और निर्देशन-राज्य समाज के समक्ष एक नियमावली रखता है जिसमें अनेक प्रकार की सामाजिक क्रियाओं के नियन्त्रण एवं निर्देशन का वर्णन होता है। ये सभी सामाजिक उन्नति के लिए आवश्यक हैं। प्रचार द्वारा राज्य व्यक्ति को बताता है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। भारत में अखण्डता और एकता बनाए रखने के लिए साम्प्रदायिकता, भाषावाद, प्रान्तीयता, क्षेत्रीयता आदि के विरुद्ध प्रचार द्वारा नियन्त्रण रखकर राज्य समाज के हित में कल्याणकारी कार्य करता है। राज्य सामाजिक अधिनियमों को पारित करके कुप्रथाओं पर नियन्त्रण करता है। 1829 ई० में सती प्रथा निरोधक अधिनियम’ तथा 1955 ई० में ‘अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम द्वारा इन्हें (सती प्रथा तथा अस्पृश्यता को) सामाजिक अपराध घोषित किया गया है।

4. बाह्य आक्रमण से देश की रक्षा-राज्य का महत्त्वपूर्ण कार्य बाहरी आक्रमण से देश की रक्षा करना है; अत: इसके लिए अस्त्र-शस्त्र, सेना, पुलिस चौकियों, सड़कों एवं युद्धपोतों आदि का प्रबन्ध राज्य ही करता है जिससे आवश्यकता पड़ने पर तुरन्त इनका उपयोग किया सके। ऐसे समय में एवं शान्ति के समय भी समाज-विरोधी तत्वों की सक्रियता पर नियन्त्रण रखना राज्य का आवश्यक कार्य है।

5. आन्तरिक सुव्यवस्था और शान्ति बनाए रखना-प्रत्येक समाज में कुछ-न-कुछ समाज-विरोधी तत्त्व अवश्य होते हैं जिन पर नियन्त्रण रखकर राज्य देश की आन्तरिक सुव्यवस्था और शान्ति बनाए रखता है। इसके लिए राज्य कानून, पुलिस और सेना का भी सहयोग लेता है क्योंकि सामान्य स्थिति बनाए रखना आवश्यक है जिससे हड़ताल, तालाबन्दी, घेराव, साम्प्रदायिक दंगे इत्यादि न हो सकें।

6. मौलिक अधिकारों की रक्षा-किसी कल्याणकारी राज्य में मौलिक अधिकारों का संरक्षण करके समाज-विरोधी तत्त्वों को नियन्त्रित किया जाता है। ये मौलिक अधिकार ही जनता की स्वतन्त्रता के प्रतीक हैं। स्वतन्त्रता (भाषण, लेखन और विचारों की स्वतन्त्रता), शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने का अधिकार, सम्पत्ति और शिक्षा प्राप्ति का अधिकार आदि मौलिक अधिकार ही हैं। यदि कोई व्यक्ति इन अधिकारों को भंग करता है तो राज्य उसे कठोर दण्ड देता है तथा जिसके अधिकारों का हनन किया गया है उसे संरक्षण प्रदान
करता है।

7. कानून द्वारा नियन्त्रण-राज्य ने अपनी उत्पत्ति के समय ही अपने कार्यों की शक्ति कुछ नियमों व उपनियमों में निहित कर ली थी। वे आज्ञाएँ और आदेश ही कानून कहलाते हैं। जिनका पालन न करने पर दण्ड की व्यवस्था होती है जो सामाजिक नियन्त्रण में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है। दण्ड विधान दो प्रकार से सामाजिक नियन्त्रण रखता है–

  • अपराधियों पर कठोर दृष्टि रखते हुए उन्हें बन्दी बनाकर एवं उनका समाज से बहिष्कार करके तथा
  • दण्ड के भय द्वारा अपराध रोककर।

8. अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था का नियमन-राज्य राष्ट्रीय कार्य-व्यवहारों पर तो नियन्त्रण रखता ही है, साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय व्यवहारों पर भी नियन्त्रण लगाता है क्योंकि आज के इस प्रगतिशील युग में मानव का कार्य-क्षेत्र देश की सीमा से बाहर विदेशों तक हो गया है; अतः अन्तर्राष्ट्रीय व्यवहार विकसित हुए हैं। इनका प्रभाव आन्तरिक व्यवस्था पर भी पड़ता है; अत: संचार, उद्योग, यातायात, सांस्कृतिक आदान-प्रदान आदि को राज्य निर्देशित व नियन्त्रित रखता है।

मैकाइवर एवं पेज ने सामाजिक नियन्त्रण में राज्य की महत्ता के बारे में ठीक ही कहा है, “राज्य आवश्यक रूप से एक व्यवस्था उत्पन्न करने वाला संगठन है। यह व्यवस्था को बनाए रखने के लिए है; परन्तु नि:सन्देह यह केवल व्यवस्था-मात्र के लिए ही नहीं अपितु जीवन की उन समस्त सम्भावनाओं के लिए है जिनको सुव्यवस्था के आधार की अपेक्षा है। इस प्रकार सिद्ध होता है कि सामाजिक नियन्त्रण में सबसे प्रमुख औपचारिक अभिकरण राज्य ही है जो जनहित के लिए नियन्त्रण लगाता है।

प्रश्न 3
सामाजिक नियन्त्रण के अभिकरण के रूप में परिवार की भूमिका स्पष्ट कीजिए। [2008, 09, 10, 11, 12, 14, 16]
या
सामाजिक नियन्त्रण में प्राथमिक समूह की क्या भूमिका है ? [2010]
या
सामाजिक नियन्त्रण के किन्हीं दो अनौपचारिक साधनों की विवेचना कीजिए। [2010, 11]
या
परिवार सामाजिक नियन्त्रण का एक शक्तिशाली अभिकरण है।
टिप्पणी लिखिए। सामाजिक नियन्त्रण में परिवार की भूमिका स्पष्ट कीजिए। [2012, 13, 17]
या
सामाजिक नियन्त्रण के अभिकरण के रूप में परिवार का महत्त्व घट रहा है। इस कथन का मूल्यांकन कीजिए। [2012, 13]
उत्तर:
परिवार समाज की प्रथम इकाई है और सामाजिक नियन्त्रण का प्रमुख साधन है। सामजिक नियन्त्रण के क्षेत्र में कोई भी दूसरा समूह व्यक्ति के जीवन को इतना प्रभावित नहीं करता जितना कि परिवार। इसी आधार पर परिवार को सामाजिक नियन्त्रण का प्रमुख अभिकर्ता कहा जाता है। व्यक्ति के विकास में परिवार की अहम भूमिका है। परिवार ही व्यक्ति को समाज सम्बन्धी आदर्शों, रूढ़ियों और प्रचलित रीति-रिवाजों से परिचित कराती है। त्याग, बलिदान, सहायता, दया, सहनशीलता, धैर्य आदि की शिक्षा व्यक्ति को परिवार के माध्यम से ही प्राप्त होती है। परिवार व्यक्ति के बुरे कार्यों की निन्दा और अच्छे कार्यों की प्रशंसा करता है। परिवार की परिस्थितियाँ ही व्यक्ति को अच्छा या बुरा बना देती हैं। इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि सामाजिक नियन्त्रण में परिवार अहम भूमिका निभाता है। संक्षिप्त रूप में सामाजिक नियन्त्रण में परिवार की भूमिका का वर्णन निम्न प्रकार से है

1. शिक्षा द्वारा नियन्त्रण-परिवार शिक्षा की सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण तथा प्रभावशाली पाठशाला है। अनेक महापुरुषों का चरित्र-गठन उनके परिवार में ही हुआ है। इटली के प्रजातन्त्र के जन्मदाता मैजिनी का कथन है, “नागरिकता का प्रथम पाठ माता के चुम्बन और पिता के दुलार में ही सीखा जाता है।” अब्राहम लिंकन ने परिवार की महत्ता स्पष्ट करते हुए कहा है, जो कुछ भी मैं आज हूँ और जो कुछ भी बनने की आशा करता हूँ, वह सब कुछ मेरी देवीस्वरूप माता के कारण है।” परिवार में ही हम आत्म-संयम की अमूल्य शिक्षा प्राप्त करते हैं। हमारा सामाजिक विकास परिवार में ही होता है। यदि परिवार का नियन्त्रण शिथिल पड़ जाता है तो समाज में विघटने प्रारम्भ हो जाता है।

2. दण्ड-व्यवस्था द्वारा नियन्त्रण-व्यक्ति को अनुशासित और सामाजिक नियन्त्रण में रखने के लिए प्रत्येक परिवार में दण्ड की व्यवस्था होती है, जिसके भय से व्यक्ति सामाजिक नियन्त्रण में बँधा रहता है। परिवार कभी भी अपने सदस्यों को शारीरिक दण्ड नहीं देता और न ही उत्पीड़न का सहारा लेता है, बल्कि सहानुभूति के द्वारा सदस्यों पर नियन्त्रण लगाता है। साधारणतया, आलोचना, व्यंग्य तथा परिहास आदि साधनों के द्वारा ही सदस्यों को दण्डित किया जाता है और इस प्रकार उनके व्यवहारों पर नियन्त्रण लगाया जाता है।

3. यौन-व्यवहारों का नियन्त्रण-प्राणिशास्त्रीय कार्य के रूप में यौन-इच्छाओं की पूर्ति को एकमात्र साधन परिवार ही है। परिवार ही विवाह संस्कार के माध्यम से युवक-युवतियों को दाम्पत्य सूत्र में बाँधकर उन्हें यौन-इच्छाओं की सन्तुष्टि करने के अवसर जुटाता है। परिवार ही यह निश्चित करता है कि एक विशेष सदस्य का विवाह कब और किसके साथ तथा किस प्रकार हो। परिवार अपनी जाति में ही विवाह करने को बाध्य करता है। इस प्रकार परिवार विवाह सम्बन्धी नियन्त्रण लगाता है। इस प्रकार के नियन्त्रण के कारण व्यक्ति अनेक बुराइयों से बच जाता है तथा स्त्रियों को बुरी दृष्टि से नहीं देखता, जिससे समाज में व्यवस्था बनी रहती है।

4.समाजीकरण और सामाजिक नियन्त्रण-समाजीकरण के दृष्टिकोण से सामाजिक नियन्त्रण में परिवार का महत्त्वपूर्ण स्थान है। परिवार ही व्यक्ति को समाजीकरण करता है। वह समाजीकरण की प्रक्रिया के द्वारा व्यक्ति को सामाजिक नियमों के अनुकूल बनाता है। इस प्रक्रिया द्वारा व्यक्ति को सामाजिक आदर्शों, संस्कृति, परम्पराओं, रूढ़ियों आदि का ज्ञान प्राप्त होता है तथा वह आगे चलकर जीवन में इन सीखी हुई बातों को प्रयोग में लाता। है, जो सामाजिक नियन्त्रण में सहायक होती हैं।

5. सांस्कृतिक मूल्यों की शिक्षा द्वारा नियन्त्रण-प्रत्येक समाज की अपनी संस्कृति होती है। परिवार में उसी संस्कृति के अनुसार कार्य किये जाते हैं। उदाहरण के लिए भारतीय समाज में वृद्ध व्यक्तियों के सम्मान और संयुक्त परिवार व्यवस्था को अच्छा समझा जाता है। परिवार में व्यक्ति को इसी के अनुसार कार्य करने की शिक्षा दी जाती है। इस प्रकार वह वृद्ध व्यक्तियों तथा संयुक्त परिवार का आदर करना सीख जाता है। इस तरह सामाजिक जीवन संगठित बना रहता है। वास्तविकता तो यह है कि समाज में नियन्त्रण का अभाव तभी उत्पन्न होता है जब व्यक्ति अपने सांस्कृतिक मूल्यों के अनुसार कार्य नहीं करते। परिवार ही अपने सदस्यों को समाज के सांस्कृतिक मूल्यों से अवगत कराता है। इस प्रकार परिवार के सदस्य सांस्कृतिक प्रतिमानों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित करके सांस्कृतिक कार्य के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इससे सामाजिक संस्कृति के अस्तित्व के साथ-ही-साथ सामाजिक संगठन तथा नियन्त्रण बना रहता है।

6. सामंजस्य तथा सुरक्षा द्वारा नियन्त्रण-पारिवारिक जीवन में सुख, दु:ख, बीमारी, बेकारी आदि अनेक प्रकार की समस्याएँ जन्म लेती हैं। इन परिस्थितियों से सामंजस्य करने की प्रेरणा भी परिवार में ही दी जाती है। पारिवारिक समायोजन का यह कार्य व्यक्ति को विघटित होने से बचाता है।

7. सदस्यों की देख-रेख द्वारा नियन्त्रण-परिवार अपने सदस्यों की सामान्य देख-रेख करके यह विश्वास दिलाता है कि उनकी वास्तविक आवश्यकताएँ परिवार में ही पूरी हो सकती हैं। साथ ही परिवार व्यक्ति को इस प्रकार की शिक्षा भी देता है जो जीवन के लिए सबसे अधिक उपयोगी होती है। इससे व्यक्ति यह समझने लगता है कि उसका सामाजिक जीवन तभी प्रगतिशील बन सकेगा जब वह परिवार के आदर्शों का पालन करेगा। इस भावना ‘ के साथ ही व्यक्ति जीवन नियन्त्रण में बँध जाता है।

8. मानवीय गुणों का विकास द्वारा नियन्त्रण-परिवार बालक में अनेक मानवीय गुणों को विकसित करता है। मानवीय गुणों में प्रेम, सहयोग, दया, सहानुभूति, आत्म-त्याग, सहिष्णुता, परोपकार, कर्तव्यपालन तथा आज्ञापालन प्रमुख हैं। ये सभी ऐसे गुण हैं जिनके द्वारा व्यक्ति का जीवन स्वयं नियन्त्रित हो जाता है।

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि परिवार सामाजिक नियन्त्रण में प्रमुख भूमिका निभाता है। परिवार का नियन्त्रण अधिक स्थायी और प्रभावशाली सिद्ध होता है। संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि परिवार केवल सामाजिक नियन्त्रण में सहायता ही नहीं करता वरन् यह समाजीकरण की प्रक्रिया को भी सम्भव बनाता है।

सामाजिक नियन्त्रण के एक अभिकरण के रूप में परिवार के महत्त्व में कमी

यद्यपि सामाजिक नियन्त्रण के एक अभिकरण के रूप में परिवार की सदैव से ही महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। परन्तु औद्योगीकरण, नगरीकरण, लोकतन्त्रीकरण, शिक्षा का प्रसार, आर्थिक स्वतन्त्रता, व्यक्तिवादिता आदि कारकों के परिणामस्वरूप आज अनेक क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए हैं। इन परिवर्तनों का परिवार की संरचना पर भी प्रभाव पड़ा है, जिसके फलस्वरूप आज परिवार सामाजिक नियन्त्रण के अभिकरण के रूप में अपना महत्त्व खोता जा रहा है, क्योंकि इन सभी तथा अन्य और भी कई कारकों ने परिवारिक नियन्त्रण एवं बन्धनों को सर्वथा शिथिल कर दिया है।

उदाहरणार्थ-आज के परिवारों में पिता की शक्ति का ह्रास हुआ है। परिवारों में न तो पिता की आज्ञाओं को अन्तिम माना जाता है और न ही उसकी शक्ति को ईश्वरीय समझा जाता है; अतः एक ही परिवार के सदस्य पृथक्-पृथक् मार्गों पर चलकर अपने उद्देश्य की प्राप्ति करना चाहने लगे हैं। परिवार के सभी सदस्यों में एकमत का अभाव होता जा रहा है, किसी के ऊपर किसी को नियन्त्रण नहीं है। अब परिवार के सभी सदस्य अपनी इच्छा, दृष्टि, विचार तथा हित को ध्यान में रखकर कार्य करने लगे हैं। इन सभी बातों से स्पष्ट है कि वर्तमान युग में सामाजिक नियन्त्रण के अभिकरण के रूप में परिवार का महत्त्व घटता जा रहा है।

प्रश्न 4
औपचारिक तथा अनौपचारिक सामाजिक नियन्त्रण में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2010]
उत्तर:
औपचारिक तथा अनौपचारिक सामाजिक नियन्त्रण में निम्नलिखित अन्तर हैं

  1. औपचारिक नियन्त्रण में दण्ड देने का कार्य राज्य अथवा सरकार द्वारा किया जाता है, जबकि अनौपचारिक नियन्त्रण में दण्ड का स्रोत स्वयं समाज, समुदाय या समूह होता है।
  2. औपचारिक नियन्त्रण में नियमों को सोच-विचारकर बनाये जाने के कारण वे सुपरिभाषित व लिखित होते हैं, जबकि अनौपचारिक नियन्त्रण में नियम पूर्ण रूप से लिखित नहीं होते, अपितु सामाजिक अन्त:क्रियाओं के दौरान अपने आप स्पष्ट होते हैं।
  3. औपचारिक नियन्त्रण में नियमों को न मानने पर राज्य या अन्य किसी प्रशासनिक संगठन द्वारा व्यक्ति को निश्चित दण्ड देने की व्यवस्था होती है, अर्थात् व्यक्तियों के लिए नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। इसके विपरीत, अनौपचारिक नियन्त्रण में इस प्रकार दण्ड देने की कोई व्यवस्था नहीं होती है।
  4. औपचारिक नियन्त्रण मानव-व्यवहार के बाह्य पक्ष को अधिक प्रभावित करता है। दूसरी | ओर अनौपचारिक नियन्त्रण का विशेष सम्बन्ध व्यक्तित्व के आन्तरिक पक्ष से होने के कारण इसे व्यक्ति स्वयं स्वीकार कर लेता है।
  5. औपचारिक नियन्त्रण आधुनिक विशाल एवं जटिल समाजों की विशेषता है, क्योंकि ऐसे समाजों में व्यक्ति के अधिकांश व्यवहारों पर नियन्त्रण औपचारिक नियन्त्रण के साधनों; जैसे—दण्ड, भय, उत्पीड़न एवं शक्ति प्रदर्शन द्वारा सम्भव है। इसके विपरीत, अनौपचारिक नियन्त्रण का महत्त्व छोटे एवं सरल समाजों में अधिक होता है, क्योंकि इन समाजों के सदस्य अधिकांशतः प्रथा, परम्परा, धार्मिक नियम एवं रूढ़ियों द्वारा नियन्त्रित एवं निर्देशित होते हैं।
  6. औपचारिक नियन्त्रण में परिवर्तनशीलता का गुण पाया जाता है, अर्थात् इसमें आवश्यकताओं एवं परिस्थितियों के बदलने पर परिवर्तन होता रहता है, जबकि अनौपचारिक नियन्त्रण में परम्परागत व्यवहारों को बदलना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य होता है।
  7. औपचारिक सामाजिक नियन्त्रण सामाजिक मूल्यों के विपरीत भी हो सकता है, जबकि अनौपचारिक नियन्त्रण सदैव परम्परागत सामाजिक मूल्यों के अनुरूप ही होता है।
  8. औपचारिक नियन्त्रण से सम्बन्धित व्यवहार-संहिताएँ या नियम राज्य या अन्य प्रशासनिक संगठनों द्वारा बनाये जाते हैं। इसके विपरीत, अनौपचारिक नियन्त्रण में इन नियमों को समाज द्वारा निर्मित किया जाता है।
  9. औपचारिक नियन्त्रण का विकास योजनाबद्ध रूप से होता है, जबकि अनौपचारिक नियन्त्रण का विकास लम्बी अवधि में धीरे-धीरे स्वतः होता है।
  10. औपचारिक नियन्त्रण के प्रभावशाली साधन कानून, न्यायालय व पुलिस हैं, जिनके द्वारा नियमों का उल्लंघन करने पर व्यक्ति को निश्चित दण्ड देने की व्यवस्था की जाती है। दूसरी ओर, अनौपचारिक नियन्त्रण के प्रभावशाली साधन परम्पराएँ, धार्मिक नियम इत्यादि होते हैं जिनके द्वारा निश्चित दण्ड न देकर सामान्यत: व्यक्ति की सामाजिक निन्दा की जा सकती है अथवा जाति से निष्कासित किया जा सकता है।

प्रश्न 5
सामाजिक नियन्त्रण एवं समाजीकरण में सम्बन्ध स्थापित कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक नियन्त्रण एवं समाजीकरण में सम्बन्ध
1. सामाजिक संगठन में स्थायित्व लाना-सामाजिक संगठन को स्थायी बनाना सामाजिक नियन्त्रण का प्रमुख कार्य है। नियन्त्रण की व्यवस्था के द्वारा समाज में अनावश्यक परिवर्तनों को रोका जाता है तथा व्यक्तियों को मनमाने ढंग से कार्य करने की स्वतन्त्रता नहीं मिल पाती। इससे सामाजिक जीवन में स्थिरता का गुण उत्पन्न होता है।

2. परम्पराओं की रक्षा-
परम्पराएँ लम्बे अनुभवों पर आधारित होती हैं तथा इनका कार्य व्यवस्थित रूप से व्यक्तियों की आवश्यकताओं को पूरा करना होता है। सामाजिक संगठन को बनाये रखने में भी परम्पराओं की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। जब कभी भी परम्पराएँ टूटने लगती हैं, तब समाज में अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं। सामाजिक नियन्त्रण सभी व्यक्तियों को परम्पराओं के अनुसार व्यवहार करने का प्रोत्साहन देता है। इसी से संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित होती रहती है।।

3. समूह में एकता की स्थापना-
सामाजिक संगठन के लिए किसी भी समूह के सदस्यों में समान दृष्टिकोण तथा समान मनोवृत्तियों का होना अत्यधिक आवश्यक है। यही विशेषताएँ सामाजिक एकता का आधार हैं। सामाजिक नियन्त्रण एक समूह के सदस्यों को समान नियमों के अनुसार कार्य करना ही नहीं सिखाता बल्कि नियमों का उल्लंघन करने पर उन्हें दण्ड भी देता है। समान नियमों के अन्तर्गत कार्य करने से समान दृष्टिकोण का विकास होता है और इस प्रकार समूह में एकरूपता (Uniformity) बढ़ती है।

4. पारस्परिक सहयोग की प्रेरणा-
एक संगठित समाज के लिए इसके सदस्यों में पारस्परिक सहयोग का होना सबसे अधिक आवश्यक है। व्यक्तियों के व्यवहारों पर यदि कोई नियन्त्रण ने हो तो वे सदैव संघर्ष के द्वारा अपने स्वार्थों को पूरा करने का प्रयत्न करेंगे। इसके फलस्वरूप सम्पूर्ण सामाजिक जीवन अभियन्त्रित और विघटित हो सकता है। नियन्त्रण के द्वारा प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रस्थिति के अनुसार अपने विभिन्न दायित्वों का निर्वाह करता है। नियन्त्रण की व्यवस्था व्यक्ति को यह बताती है कि पारस्परिक सहयोग के द्वारा लक्ष्य को प्राप्त करना ही सभी के हित में है।

5. मनोवृत्तियों तथा व्यवहारों में सन्तुलन-
सामाजिक संगठन के लिए यह आवश्यक है कि समूह में व्यक्तियों की मनोवृत्तियों तथा उनके विचारों में सन्तुलन हो। यदि हमारी मनोवृत्तियाँ रूढ़िवादी हों लेकिन व्यवहार आधुनिकता को महत्त्व देते हों, तो इससे न केवल व्यक्तिगत जीवन में तरह-तरह के तनाव उत्पन्न होते हैं, बल्कि सामाजिक व्यवस्था भी कमजोर पड़ जाती है। सामाजिक नियन्त्रण के द्वारा व्यक्ति की मनोवृत्तियों में इस तरह परिवर्तन किया जाता है कि वे व्यवहार के नये ढंगों के अनुकूल बन सकें। ऐसा सन्तुलन सामाजिक जीवन के लिए बहुत उपयोगी होता है।

6. मानसिक तथा बाह्य सुरक्षा-
व्यक्तियों को मानसिक तथा बाह्य सुरक्षा प्रदान करने के क्षेत्र में भी सामाजिक नियन्त्रण की भूमिका अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। मानसिक सुरक्षा का तात्पर्य यह है कि व्यक्तियों को यह विश्वास हो कि कोई भी व्यक्ति उनके हितों पर आघात नहीं करेगा, जबकि बाह्य सुरक्षा का अभिप्राय आजीविका तथा सम्पत्ति के क्षेत्र में सुरक्षा प्राप्त करना है। सामाजिक नियन्त्रण की व्यवस्था व्यक्ति की समाज-विरोधी प्रवृत्ति को दबाकर अनेक नियमों के द्वारा उसे समाज से अनुकूलन करना सिखाती है तथा ऐसे व्यवहार करने के लिए बाध्य करती है जो समाज द्वारा मान्यता प्राप्त हों। इसका तात्पर्य यह है कि समाज के आन्तरिक संगठन के लिए सामाजिक नियन्त्रण की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। इस आधार पर लैण्डिस ने यहाँ तक निष्कर्ष दिया है कि मनुष्य नियन्त्रण के कारण ही वास्तविक मानव है।

7. व्यक्तित्व का विकास-
सामाजिक नियन्त्रण के सभी कार्यों में व्यक्तित्व का समुचित विकास सम्भवत: सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। व्यक्तित्व के विकास के लिए सामाजिक गुणों की सीख तथा कुशलताओं का विकास आधारभूत हैं। सामाजिक नियन्त्रण के अभाव में व्यक्ति ने तो सामाजिक सीख के द्वारा उन गुणों को प्राप्त कर सकता है जो उसकी संस्कृति का अभिन्न अंग होते हैं और न ही उन क्षमताओं को विकसित कर सकता है जो विभिन्न प्रकार के आविष्कारों तथा समाचारों के लिए आवश्यक होते हैं। जिन समाजों में सामाजिक नियन्त्रण कमजोर होता है, वहाँ लोगों का व्यक्तित्व अपनी संस्कृति के अनुरूप नहीं होता। वास्तविकता यह है कि सामाजिक नियन्त्रण वैयक्तिक तथा सामाजिक सुरक्षा में वृद्धि करके पारस्परिक सहयोग तथा एकता को बढ़ाता है। इसके बाद भी किसी भी समाज में नियन्त्रण की व्यवस्था एक विशेष संस्कृति के अन्तर्गत ही कार्य करती है। यही कारण है कि अलग-अलग संस्कृतियों में सामाजिक नियन्त्रण की व्यवस्था के रूप में भी कुछ भिन्नता देखने को मिलती है।

प्रश्न 6
परम्परागत समाज में सामाजिक नियन्त्रण के अभिकरणों की भूमिका की विवेचना कीजिए। [2008, 11]
या
सामाजिक नियन्त्रण में कानून की भूमिका की विवेचना कीजिए। [2016]
या
कानून सामाजिक नियन्त्रण का अनौपचारिक साधन है या औपचारिक? स्पष्ट कीजिए। [2016]
उत्तर:
सामाजिक नियन्त्रण का अभिप्राय समाज की सम्पूर्ण व्यवस्था को इस तरह नियमित करना है जिससे पारस्परिक सहयोग में वृद्धि हो सके। वास्तव में, सामाजिक नियन्त्रण ही वह आधार है जिसके द्वारा सामाजिक परिवर्तन के सन्तुलन को बनाये रखा जा सकता है। परिवार, राज्य, शिक्षा संस्थाएँ, नेतृत्व, धर्म आदि सामाजिक नियन्त्रण के प्रमुख अभिकरण हैं, जबकि जनरीतियाँ, लोकाचार, नैतिकता, प्रथाएँ, कानून, जनमत, पुरस्कार, हास्य-व्यंग्य और दण्ड आदि इन अभिकरणों के साधन हैं। समाज में सामाजिक नियन्त्रण के अभिकरणों की भूमिका निम्नवत् है

1. परिवार-
सामाजिक नियन्त्रण में परिवार सबसे महत्त्वपूर्ण अभिकरण है। यद्यपि वर्तमान सामाजिक जीवन में इतने क्रान्तिकारी परिवर्तन हो गये हैं, लेकिन व्यक्ति को संस्कृति की शिक्षा देने और व्यवहार के नियम सिखाने में परिवार को महत्त्व आज भी सबसे अधिक मौलिक है। परिवार आरम्भिक जीवन से ही बच्चे को जनरीतियों, लोकाचारों और प्रथाओं की शिक्षा देता है, समाज की नैतिकता से परिचित कराता है। समय-समय पर अनजाने में भी भूल हो जाने पर उससे प्रायश्चित्त कराता है तथा अनेक पौराणिक गाथाओं और अनुष्ठानों के द्वारा धार्मिक विश्वासों को दृढ़ बनाता है। प्रेम और स्नेह स्वयं ही नियन्त्रण के प्रमुख साधन हैं जो केवल परिवार में ही सम्भव हैं। एक प्राथमिक समूह होने के कारण नियन्त्रण के क्षेत्र में भी परिवार का प्रभाव प्राथमिक ही होता है।

2. राज्य-
वर्तमान जटिल समाजों में राज्य सामाजिक नियन्त्रण का एक प्रभावपूर्ण अभिकरण
बन गया है। औद्योगीकरण, नगरीकरण और व्यक्तिवादिता के कारण आज मानव समूहों के बीच संघर्षों और तनावों में इतनी अधिक वृद्धि हो गयी है कि केवल वही सत्ता व्यक्तियों के व्यवहारों पर प्रभावपूर्ण नियन्त्रण रख सकती है जिसके पास शक्ति और दण्ड के विकसित साधन हों। राज्य इसी प्रकार एक सत्ता है जो प्रशासन, कानून, सेना, पुलिस और न्यायालयों के द्वारा व्यक्ति व समूह के व्यवहारों पर औपचारिक रूप से नियन्त्रण की स्थापना करती है। मैकाइवर का कथन है, कि “राज्य व्यक्ति में उन सभी क्षमताओं को उत्पन्न करता है। जो सामाजिक नियन्त्रण के लिए आवश्यक हैं।”

3. शिक्षण संस्थाएँ-सामाजिक नियन्त्रण के क्षेत्र में आज शिक्षण संस्थाओं का महत्त्व निरन्तर बढ़ता जा रहा है। शिक्षण संस्थाएँ व्यक्तित्व के आन्तरिक व बाह्य दोनों पक्षों को नियन्त्रित करती हैं। इन संस्थाओं में व्यक्ति के जीवन का वह भाग व्यतीत होता है जो सबसे अधिक तनावपूर्ण होता है। यह वह समय होता है जिसमें एक किशोर अपने आपको सबसे योग्य समझता है, जबकि वास्तव में, उसके अधिकतर कार्य अनुभव के अभाव में बहुत अनुत्तरदायी प्रकृति के होते हैं। इस काल का नियन्त्रण सम्पूर्ण जीवन को नियन्त्रित रखने और सन्तुलित व्यक्तित्व का निर्माण करने में बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। शिक्षण संस्थाओं के माध्यम से व्यक्ति के तर्क और विवेक में वृद्धि होने से वह स्वयं प्रत्येक व्यवहार के परिणामों को समझने लगता है। यही कारण है कि अशिक्षित समाज की अपेक्षा एक शिक्षित समाज कहीं अधिक नियन्त्रित और नियमबद्ध जीवन व्यतीत करता है।

4. नेता तथा नेतृत्व-महान नेताओं के विचार समाज को नियन्त्रित रखने में सदैव से ही महत्त्वपूर्ण रहे हैं। समाज के अधिकांश सदस्यों में स्वयं विचार करने और परिस्थिति के अनुसार कार्य करने की क्षमता नहीं होती। वे केवल दूसरों का अनुसरण ही करते हैं। ऐसी स्थिति में यह बहुत आवश्यक हो जाता है कि उचित नेतृत्व के द्वारा उनके व्यवहारों पर नियन्त्रण रखा जाए और उन्हें एक विशेष प्रकार से कार्य करने का निर्देश दिया जाए। यही कारण है कि जिस समाज में नेतृत्व स्वस्थ और संगठित होता है, वहाँ व्यक्तियों का जीवन भी उतना ही अधिक नियन्त्रित और सन्तुलित बना रहता है।

5. धर्म-धर्म सामाजिक नियन्त्रण का सदैव से ही एक प्रमुख अभिकरण रहा है। धर्म कुछ। अलौकिक विश्वासों और ईश्वरीय सत्ता पर आधारित एक शक्ति है जिसके नियमों का पालन व्यक्ति ‘पाप और पुण्य’ अथवा ईश्वरीय शक्ति के भय के कारण करता है। धर्म के नियमों का पालन व्यक्ति किसी मनुष्य के भय से नहीं करता बल्कि मनुष्य से कहीं उच्च अलौकिक शक्ति के भय से करता है। व्यक्ति यह विश्वास करते हैं कि धर्म के आदेशों और निषेधों का पालन न करना ‘पाप’ है और उनके अनुसार कार्य करना ‘पुण्य है। इस प्रकार धर्म एक आन्तरिक अलौकिक प्रभाव के द्वारा व्यक्ति और समूह के जीवन को नियन्त्रित करता है।

6. कानून-वर्तमान युग में कानून नियन्त्रण का सर्वप्रमुख औपचारिक (Formal) साधन है। यह परम्पराओं और काल्पनिक विश्वासों पर आधारित न होकर समाज की वर्तमान आवश्यकताओं के अनुसार होता है। इसका कार्य समूह के लिए उपयोगी व्यवहारों को करने का प्रोत्साहन देना और इनकी अवहेलना करने वाले लोगों को निश्चित दण्ड देना है। वर्तमान समाज में जहाँ अनेक धर्मों, मतों और सम्प्रदायों के व्यक्ति एक साथ रहते हैं, प्रथाएँ और लोकाचार आज अपर्याप्त सिद्ध हो रहे हैं। इस कमी को दूर करने और व्यवहार के नियमों को स्पष्ट रूप देने में कानून का महत्त्व सबसे अधिक है। एक लम्बे समय तक प्रचलित रहने के बाद प्रथाएँ और लोकाचार रूढ़ियों के रूप में बदल जाते हैं जिनको पुन: उपयोगी बनाना केवल कानूनों के द्वारा ही सम्भव होता है। कानून सभी समाजों में एक-से नहीं होते। आदिम समाजों में अधिकतर कानून अलिखित होते हैं, लेकिन इनकी अवहेलना करना सबसे अधिक कठिन होता है, जबकि सभ्य समाजों में ये पूर्णतया लिखित और स्पष्ट होने के बाद भी उतने अधिक प्रभावशाली नहीं होते। इसके बाद भी वर्तमान जटिल और परिवर्तनशील समाजों में कानून नियन्त्रण का सर्वप्रमुख साधन है। इसलिए रॉस (Ross) ने कानून को ‘सामाजिक नियन्त्रण की सबसे विशेषीकृत और पूर्ण साधन’ (Most specialized and highly finished means) माना है।

7. नैतिकता-सामाजिक नियन्त्रण के अनौपचारिक अभिकरण के रूप में नैतिकता का स्थान भी बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। उचित-अनुचित का विचार ही नैतिकता है। नैतिकता व्यक्ति को सदाचार का मार्ग दिखाती है। नैतिकता के व्यवहार के लिए कोई बाध्यता नहीं है। व्यक्ति कार्य के औचित्य-अनौचित्य पर विचार कर अपनी आत्मा की आज्ञा मानकर कर्तव्य का पालन करता है। नैतिकता की भावना सामाजिक नियन्त्रण को एक सुदृढ़ आधार प्रदान करती। है। नैतिकता के द्वारा व्यक्ति बुद्धि और तर्क की कसौटी पर उचित-अनुचित का निर्णय करना सीख जाता है। उसको सामूहिक व्यवहार नैतिकता के अनुरूप हो जाता है। सत्य का अनुपालन, हिंसा से बचाव, न्याय, दया, त्याग, सहानुभूति और सम्मान नैतिक आदर्श हैं। इनका अनुपालन करके व्यक्ति सामाजिक नियन्त्रण में स्वत: सहायक बन जाता है।

8. प्रथाएँ-प्रथाएँ सामाजिक नियन्त्रण का एक महत्त्वपूर्ण अनौपचारिक अभिकरण हैं। जनरीतियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती हुई जब समूह के व्यवहार का अंग बन जाती हैं तब उन्हें प्रथाएँ कहा जाता है। मनुष्य जन्म से ही अनेक प्रथाओं से घिरा रहता है। अत: उनकी अवहेलना करना उसकी शक्ति से बाहर है। बेकन ने प्रथाओं को ‘मनुष्य के जीवन के प्रमुख न्यायाधीश’ कहकर सम्बोधित किया है। प्रथाएँ मानव संस्कृति का अभिन्न अंग होती हैं। अतः मानव-व्यवहार उन्हीं के द्वारा निर्धारित होता है। प्रथाओं को सामाजिक स्वीकृति प्राप्त होती है। जाति में विवाह करना, जाति निषेधों का पालन करना, मृत्यु पर सम्बन्धी के यहाँ शोक प्रकट करना तथा मृत्युभोज देना आदि प्रथाएँ हैं। लोक-निन्दा के भय से सभी व्यक्ति इनका हृदय से पालन करते हैं। आदिम समाजों में प्रथाएँ सामाजिक नियन्त्रण को आज भी सशक्त अभिकरण बनी हुई हैं। व्यक्ति बिना तर्क आँख मूंदकर प्रथाओं का अनुपालन कर सामाजिक नियन्त्रण में सहायक बने रहते हैं।

प्रश्न 7
सामाजिक नियन्त्रण के अनौपचारिक साधन स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यह सच है कि आधुनिक जटिल और बड़े समाजों में औपचारिक साधनों के द्वारा सामाजिक नियन्त्रण स्थापित किया जाता है, लेकिन प्रत्येक समाज में नियन्त्रण के औपचारिक साधनों के साथ कुछ ऐसे अनौपचारिक साधनों को भी उपयोग में लाया जाता है जिनके द्वारा आत्म-नियन्त्रण को प्रोत्साहन दिया जा सके। नियन्त्रण के औपचारिक साधनों में जहाँ बाध्यता, दबाव और शक्ति का समावेश होता है, वहीं नियन्त्रण के अनौपचारिक साधने अपनी प्रकृति से सामाजिक होते हैं। इनका उद्देश्य शक्ति के द्वारा लोगों के व्यवहारों को प्रभावित करना नहीं होता, बल्कि लोगों में स्वेच्छा से सामाजिक मानदण्डों और मूल्यों के अनुसार व्यवहार करने की आदत को विकसित करना होता है।

इनका दूसरा उद्देश्य व्यक्तित्व के आन्तरिक पक्ष को अनुशासित बनाना होता है, क्योंकि अनौपचारिक साधनों के प्रभाव को व्यक्ति स्वेच्छा से स्वीकार करता है। यही कारण है कि समूह-कल्याण में वृद्धि करने के लिए औपचारिक साधनों की तुलना में सामाजिक नियन्त्रण के अनौपचारिक साधनों को महत्त्वपूर्ण समझा जाता है। सामाजिक नियन्त्रण के अनौपचारिक साधन मुख्यतः सरल और छोटे समाजों में अधिक प्रभावपूर्ण होते हैं, लेकिन जटिल और बड़े समाजों में भी इनका उपयोग करना उतना ही आवश्यक समझा जाता है। साधारणतया नियन्त्रण के अनौपचारिक साधन किन्हीं लिखित नियमों के द्वारा व्यक्ति के व्यवहारों को नियन्त्रित नहीं करते, लेकिन इनके अनुसार व्यवहार करना लोग अपना नैतिक कर्तव्य मानते हैं।

प्रथाएँ, परम्पराएँ, लोकाचार, नैतिक नियम, धार्मिक विश्वास, सामूहिक निर्णय, प्रशंसा, तिरस्कार आदि वे तरीके हैं जिनके माध्यम से नियन्त्रण के अनौपचारिक साधन समाज में एकरूपता लाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि नियन्त्रण के अनौपचारिक साधनों द्वारा नियमों का उल्लंघन करने वाले लोगों को दण्डित करते हैं, लेकिन यह दण्ड राज्य के द्वारा नहीं बल्कि समूह के द्वारा दिया जाता है। ऐसे दण्ड का उद्देश्य व्यक्ति के विचारों और व्यवहारों में रचनात्मक सुधार लाना होता है। समाज व्यक्ति से यह आशा करता है कि सामाजिक नियन्त्रण के अनौपचारिक साधनों के अनुसार वह अपनी प्रवृत्तियों और इच्छाओं को स्वयं नियन्त्रित करे। इसके बाद भी सामाजिक नियन्त्रण के अनौपचारिक साधनों की प्रकृति औपचारिक साधनों की तुलना में कम परिवर्तनशील होती है, क्योंकि यह साधन सामाजिक मूल्यों, सांस्कृतिक मानदण्डों तथा परम्पराओं के आधार पर व्यक्तिगत व्यवहारों को नियन्त्रित करते हैं। परिवार, धर्म, प्रचार, जनमत, पुरस्कार, हास्य तथा व्यंग्य आदि सामाजिक नियन्त्रण के कुछ प्रमुख अनौपचारिक साधन हैं।

प्रश्न 8
सामाजिक नियन्त्रण क्या है? समाज में नियन्त्रण का होना क्यो आवश्यक है? [2017]
उत्तर:
(सामाजिक नियन्त्रण के अर्थ के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 का आरम्भिक भाग देखें।)

सामाजिक नियन्त्रण की आवश्यकता एवं महत्त्व अथवा उद्देश्य

सामाजिक नियन्त्रण की आवश्यकता प्रत्येक देश-कोल परिस्थिति में महसूस होती रही है। सामाजिक नियन्त्रण निम्न उद्देश्यों की पूर्ति व महत्त्व की दृष्टि से रखा जाता है
1. सुरक्षा प्रदान करने के लिए अन्य व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा तथा व्यक्तियों के अनावश्यक हस्तक्षेप को रोकने के लिए सामाजिक नियन्त्रण की आवश्यकता पड़ती है। अतः सामाजिक नियन्त्रण का मुख्य उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति को अधिकतम सुरक्षा प्रदान करना

2. एकता की स्थापना
सामाजिक नियन्त्रण का दूसरा उद्देश्य व्यक्तियों के व्यवहार को अनुशासित करना है ताकि वे एक-दूसरे की सहायता करें तथा आपस में मिल-जुलकर रहे व कार्य करें। अनावश्यक परिवर्तन पर रोक सामाजिक नियन्त्रण के द्वारा बार-बार व जल्दीजल्दी होने वाले

3. अनावश्यक परिवर्तनों पर रोक
लगाई जाती है जिससे समाज में संगठन व व्यवस्था बनी रहे। इस प्रक्रिया के द्वारा व्यक्ति नियन्त्रित रहकर व्यवहार करता है तथा अपनी स्थिति व भूमिका में सन्तुलन व सामंजस्य बनाए रखता है।

4. परम्पराओं के प्रभाव को बनाए रखना
समाज में नियन्त्रण रखने के लिए परम्पराएँ अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं। ये परम्पराएँ समाज की पहचान होती हैं तथा समाज के लिए उपयोगी होती हैं। अतः सामाजिक नियन्त्रण के द्वारा इन परम्पराओं के प्रभाव को बनाए रखने का प्रयास किया जाता है।

5. सहयोग की भावना का विकास
संघर्ष किसी समस्या का समाधान नहीं, यह अपने
समाज के व्यक्तियों को समझाने के लिए सामाजिक नियन्त्रण रखा जाता है। सामाजिक नियन्त्रण की प्रक्रिया के द्वारा समाज के व्यक्तियों के मध्य सहयोग की भावना का विकास किया जाता है ताकि वे मिल-जुलकर रहें व समाज में व्यवस्था बनाए रखकर अपनी
आवश्यकताओं की पूर्ति करें।

6. कथनी और करनी में समरूपता लाना
सामाजिक नियन्त्रण के द्वारा व्यक्ति के विचारों व कथन को इस तरह निर्मित करने का प्रयास किया जाता है, जिससे कि वे सही सोचें तथा सही व्यवहार व क्रिया करें, ताकि समाज में एकता व व्यवस्था बनी रहे। अर्थात् सामाजिक नियन्त्रण के द्वारा समाज के सदस्यों की कथनी व करनी को समरूप तथा हितकारी बनाने का प्रयास किया जाता है।

7. प्राचीन व्यवस्था को बनाए रखना
समाज में चले आ रहे रीति-रिवाजों, प्रथाओं, रूढ़ियों, परम्पराओं, आदर्श-प्रतिमानों आदि के पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरण तथा अपनाने के कारण समाज में व्यवस्था बनी रहती है जिससे किसी समाज की प्राचीनता नष्ट नहीं होती तथा सदस्यों में अपनी प्राचीन धरोहरों के प्रति सम्मान बना रहता है। सामाजिक नियन्त्रण के द्वारा इस प्राचीन व्यवस्था को बनाए रखने का निरन्तर प्रयास किया जाता है।

8. व्यक्तियों का समाजीकरण करना
सामाजिक नियन्त्रण की प्रक्रिया के द्वारा व्यक्ति के व्यवहार को नियन्त्रित करने का प्रयास किया जाता है तथा इस कार्य में समाजीकरण की प्रक्रिया अपना सहयोग देती है। समाजीकरण के द्वारा व्यक्ति को आदर्शानुरूप व्यवहार करने की प्रेरणा दी जाती है ताकि वह सन्तुलित व्यवहार करे तथा असामाजिक क्रिया-कलापों से दूर रहे।

9. मनमाने व्यवहार पर रोक
सामाजिक नियन्त्रण के द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्ति के व्यवहार पर नियन्त्रण रखा जाता है तथा समाजोपयोगी व्यवहार करने पर प्रशंसा पुरस्कार व सहयोग आदि के द्वारा उसे पुरस्कृत किया जाता है तथा मनमाना व समाजविरोधी व्यवहार करने पर उसका बहिष्कार किया जाता है जिससे कि वह समाज में अव्यवस्था ना फैलाये। निन्दा व बहिष्कार से बचने के लिए व्यक्ति गलत व्यवहार करने से बचता है, जिससे कि समाज में नियन्त्रण व व्यवस्था बनी रहती है।

10. सामाजिक सन्तुलन की स्थापना
समाज में पाए जाने वाले आदर्शों एवं मूल्यों की रक्षा के द्वारा समाज में सन्तुलन स्थापित करने का प्रयास किया जाता है, जोकि सामाजिक नियन्त्रण की प्रक्रिया के द्वारा ही सम्भव हो पाता है। अगर समाज में नियन्त्रण रखने में आदर्श एवं मूल्यों का सहयोग न लिया जाए तो समाज में अव्यवस्था फैलने का खतरा रहता है, जिससे समाज को संगठन, सुरक्षा तथा विकास बाधित होता है।

11. अनुकूलन क्षमता का विकास समाज में निरन्तर होने वाले परिवर्तनों से व्यक्ति को अनुकूलन करने में सामाजिक नियन्त्रण बहुत सहयोग करता है। अगर व्यक्ति इन परिवर्तनों से सामंजस्य ना बैठा पाए तो सामाजिक संरचना व व्यवस्था के अस्त-व्यस्त होने की सम्भावना बनी रहती है। अत: सामाजिक नियन्त्रण अनुकूलन क्षमता का विकास करने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।

स्पष्ट है कि सामाजिक नियन्त्रण के द्वारा ही समाज में व्यवस्था बनी रहती है। अत: पुरानी पीढ़ी का हमेशा यह प्रयास रहता है कि नयी पीढ़ी अपने आदर्शों, रीति-रिवाजों व परम्पराओं का सम्मान करे तथा उन्हें आगे हस्तान्तरित करके सामाजिक नियन्त्रण की प्रक्रिया में अपना सहयोग दे।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
सामाजिक नियन्त्रण की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक नियन्त्रण में पायी जाने वाली विशेषताओं का वर्णन निम्नलिखित है

  1. सामाजिक नियन्त्रण एक सतत घटित होने वाली प्रक्रिया है।
  2. सामाजिक नियन्त्रण सार्वभौमिक प्रक्रिया है। कोई भी समाज ऐसा नहीं है जिसमें सामाजिक नियन्त्रण न होता हो।
  3. सामाजिक नियन्त्रण और आत्म-नियन्त्रण (Self-control) में अन्तर होता है। आत्म नियन्त्रण सदैव अन्तर्जनित होता है। व्यक्ति अपनी स्वेच्छा से अपने ऊपर नियन्त्रण लगाता है। अपना कानूनी हक होते हुए भी वह उसे त्याग सकता है। सामाजिक नियन्त्रण सदैव बाहरी दबाव होता है। वह बाध्यकारी होता है।
  4. समाज सामाजिक सम्बन्धों की व्यवस्था है। अतः वह अमूर्त है। वह स्वयं नियन्त्रण लागू करने नहीं आता। इसीलिए अन्ततोगत्वा, सामाजिक नियन्त्रण समाज के नाम में और समाज की ओर व्यक्ति या समूहों द्वारा अन्य व्यक्तियों और समूहों पर लगाया जाता है।
  5. सामाजिक नियन्त्रण तभी महसूस होता है जब कोई व्यक्ति समाज के किसी नियम का विरोध करता है या उसका उल्लंघन करता है; समाज द्वारा निर्देशित पथ से हटकर विपथगामी होता है।
  6. सामाजिक नियन्त्रण सामाजिक व्यवस्था की अनिवार्य दशा है।
  7. यह सामाजिक एकीकरण का प्रमुख साधन है।
  8. सामाजिक नियन्त्रण समाज में समरूपता और स्थायित्व बनाये रखता है।
  9. सामाजिक नियन्त्रण सामाजिक परिवर्तन लाने में भी सहायक है, क्योंकि वह परिवर्तनकारी शक्तियों को परिवर्तन के लिए उचित साधन और तरीके अपनाने के लिए बाध्य करता है।
  10. सामाजिक नियन्त्रण व्यक्ति को समाज के आदर्शों के अनुरूप व्यवहार करने के लिए प्रेरणा देता है।
  11. सामाजिक नियन्त्रण के अनेक साधन और अभिकरण हैं। 12. दण्ड और पुरस्कार दोनों का इस कार्य में समान महत्त्व होता है।

प्रश्न 2
सामाजिक नियन्त्रण में ‘नैतिकता’ एवं ‘प्रथाओं की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

सामाजिक नियन्त्रण में ‘नैतिकता’ एवं ‘प्रथाओं की भूमिका

नैतिकता-सामाजिक नियन्त्रण के अनौपचारिक अभिकरण के रूप में नैतिकता का स्थान भी बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। उचित-अनुचित का विचार ही नैतिकता है। नैतिकता व्यक्ति को सदाचार का मार्ग दिखाती है। नैतिकता की भावना सामाजिक नियन्त्रण को एक सुदृढ़ आधार प्रदान करती है। नैतिकता के द्वारा व्यक्ति बुद्धि और तर्क की कसौटी पर उचित-अनुचित का निर्णय करना सीख जाता है। सत्य का अनुपालन, हिंसा से बचाव, न्याय, दया, त्याग, सहानुभूति और सम्मान नैतिक आदर्श हैं। इनका अनुपालन करके व्यक्ति सामाजिक नियन्त्रण में स्वत: सहायक बन जाता है।

प्रथाएँ-धर्म की तरह प्रथाएँ भी सामाजिक नियन्त्रण का एक महत्त्वपूर्ण अनौपचारिक अभिकरण हैं। जनरीतियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती हुई जब समूह के व्यवहार का अंग बन जाती हैं, तब उन्हें प्रथाएँ कहा जाता है। मनुष्य जन्म से ही अनेक प्रथाओं से घिरा रहता है; अत: उनकी अवहेलना करना उसकी शक्ति से बाहर है। प्रथाएँ मानव संस्कृति का अभिन्न अंग होती हैं; अतः मानवव्यवहार उन्हीं के द्वारा निर्धारित होता है। प्रथाओं को सामाजिक स्वीकृति प्राप्त होती है। जाति में विवाह करना, जाति निषेधों का पालन करना, मृत्यु पर सम्बन्धी के यहाँ शोक प्रकट करना तथा मृत्युभोज देना आदि प्रथाएँ हैं। व्यक्ति बिना तर्क आँख मूंदकर प्रथा का अनुपालन कर सामाजिक नियन्त्रण में सहायक बने रहते हैं।

प्रश्न 3
सामाजिक नियन्त्रण में दण्ड की भूमिका पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
वर्तमान समय में कानून और दण्ड सामाजिक नियन्त्रण के प्रमुख साधन हैं। जब किसी समाज में धर्म का महत्त्व कम हो जाता है, परम्पराएँ और प्रथाएँ जीवन को नियन्त्रित करने में असफल हो जाती हैं तब कानून ही व्यक्ति के व्यवहारों को नियन्त्रित करते हैं और समाज-विरोधी व्यवहार करने वाले व्यक्तियों के लिए दण्ड की व्यवस्था करते हैं। दण्ड से व्यक्ति के समाजविरोधी कार्यों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है, समाज के अन्य व्यक्ति दण्डित व्यक्ति से शिक्षा लेते हैं तथा समाज-विरोधी कार्य करने से डरते व बचते हैं। इस प्रकार कानून व दण्ड व्यक्ति और समूह के व्यवहारों पर नियन्त्रण स्थापित करने वाले प्रभावी साधन हैं। यह कार्य न्यायालय और पुलिस की सहायता से होता है। दण्ड प्रक्रिया में व्यक्तिगत इच्छा और अनिच्छा पर कोई प्रश्न नहीं उठता। दण्ड प्रक्रिया में धनी, निर्धन, निर्बल और सबल सभी एक समान होते हैं।

प्रश्न 4
सामाजिक नियन्त्रण कितने प्रकार का होता है ? वर्णन कीजिए। [2011]
या
सामाजिक नियन्त्रण के दो प्रकार क्या हैं? [2016]
उत्तर:
सामाजिक नियन्त्रण के स्वरूप को लेकर समाजशास्त्री एकमत नहीं हैं। विभिन्न समाजशास्त्रियों ने इसे निम्नलिखित रूप में वर्गीकृत किया है
1. प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सामाजिक नियन्त्रण-प्रसिद्ध समाजशास्त्री कार्ल मॉनहीम ने सामाजिक नियन्त्रण को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सामाजिक नियन्त्रण के रूप में वर्गीकृत किया है। जब कोई नियन्त्रण व्यक्ति पर उसके निकटतम सदस्यों द्वारा लागू किया जाता है तब उसे प्रत्यक्ष नियन्त्रण कहा जाता है। प्रशंसा, आलोचना, दण्ड और पुरस्कार प्रत्यक्ष नियन्त्रण के ही उदाहरण हैं। माता-पिता, भाई-बहन, मित्र, पड़ोसी तथा अध्यापक प्रत्यक्ष नियन्त्रण के अभिकरण होते हैं। प्राकृतिक पर्यावरण अथवा अन्य समितियों द्वारा लागू किया गया नियन्त्रण अप्रत्यक्ष सामाजिक नियन्त्रण कहलाता है। अप्रत्यक्ष नियन्त्रण में नियन्त्रण का
स्रोत दूर होते हुए भी यह सम्पूर्ण समूह को नियन्त्रित बनाये रखता है।

2. चेतन और अचेतन सामाजिक नियन्त्रण-चार्ल्स कूले और एल०एल० बर्नार्ड ने सामाजिक नियन्त्रण को चेतन और अचेतन दो भागों में वर्गीकृत किया है। सोच-समझकर लागू किया गया नियन्त्रण चेतन’ नियन्त्रण कहलाता है। इस नियम में प्रथाएँ, कानुन और परम्पराएँ प्रमुख भूमिका निभाती हैं। सामाजिक अन्त:क्रियाओं द्वारा लागू किया गया नियन्त्रण अचेतन नियन्त्रण कहलाता है। धर्म, संस्कार, विश्वास और मानव का व्यवहार अचेतन नियन्त्रण में सहभागिता निभाते हैं। अचेतन सामाजिक नियन्त्रण के अभिकरण मानव व्यक्तित्व के अंग बन जाते हैं; अत: मानव उनका पालन स्वतः करने लगता है।

3. सकारात्मक और नकारात्मक नियन्त्रण-प्रसिद्ध समाजशास्त्री किम्बाल यंग ने सामाजिक नियन्त्रण को सकारात्मक नियन्त्रण और नकारात्मक नियन्त्रण के रूप में दो भागों में वर्गीकृत किया है। परम्पराओं, मूल्यों तथा आदर्शों द्वारा व्यवहार को नियन्त्रित करना सकारात्मक सामाजिक नियन्त्रण है। दण्ड के भय से व्यक्ति जब सामाजिक नियमों का पालन करता है, तो उसे नकारात्मक नियन्त्रण कहते हैं।

4. औपचारिक और अनौपचारिक सामाजिक नियन्त्रण-लिखित कानूनों और निश्चित नियमों द्वारा किया जाने वाला नियन्त्रण सामाजिक नियन्त्रण कहलाता है। राज्य, कानून, न्यायालय, पुलिस, प्रशासन, शिक्षा और जेल आदि अभिकरण औपचारिक नियन्त्रण में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। | प्रथाओं, परम्पराओं, लोकाचारों, विश्वासों, संस्कारों, धर्म, नैतिक आदर्शों, मित्र-मण्डली और परिवार द्वारा जो नियन्त्रण लागू किया जाता है उसे अनौपचारिक नियन्त्रण कहा जाता है। अनौपचारिक नियन्त्रण केवल प्राथमिक समूहों द्वारा ही लागू होता है।

प्रश्न 5
अनौपचारिक सामाजिक नियन्त्रण से आप क्या समझते हैं? [2013]
या
सामाजिक नियन्त्रण के दो अनौपचारिक साधनों का वर्णन कीजिए। [2010, 11, 15, 16]
उत्तर:
अनौपचारिक सामाजिक नियन्त्रण इस प्रकार के नियन्त्रण को व्यक्ति मन से स्वीकार करते हैं तथा इसमें शक्ति का प्रयोग नहीं किया जाता। इस प्रकार के नियन्त्रण में जनरीतियाँ, लोकाचार, प्रथाएँ, नैतिकता, धर्म, परिवार तथा क्रीड़ा समूह आते हैं। इनमें से दो साधनों का वर्णन इस प्रकार है।

  1. जनरीतियाँ मैकाइवर ने जनरीतियों को समझाते हुए कहा है, “जनीतियाँ व्यवहार करने की वे विधियाँ हैं जिन्हें समाज द्वारा मान्यता प्राप्त होती है। इन जनरीतियों का पालन व्यक्ति अचेतन रूप से करता है। इस प्रकार से किया जाने वाला पालन अनौपचारिक नियन्त्रण के अन्तर्गत आता है। अलग-अलग समाज की अलग-अलग जनरीतियाँ हो सकती हैं; जैसे—प्रत्येक समाज में अभिवादन करने के अलग-अलग तरीके पाये जाते हैं।
  2. लोकाचार लोकाचारों के अन्तर्गत उन जनरीतियों को शामिल किया जाता है, जिन्हें समूह के कल्याण के लिए आवश्यक मान लिया जाता है। इन लोकाचारों का पालन व्यक्ति स्वयं ही करता है। इनके पालन न करने की स्थिति में उसे समाज द्वारा बहिष्कार, निन्दा तथा शारीरिक दण्ड मिलने का भय रहता है। उपहास, तानों आदि के डर से भी व्यक्ति लोकाचारों का पालन करता है।

प्रश्न 6
सामाजिक नियन्त्रण में धर्म के किन्हीं दो कार्यों को स्पष्ट कीजिए। [2009, 133]
या
सामाजिक नियन्त्रण के साधन के रूप में धर्म की भूमिका पर प्रकाश डालिए। [2008]
उत्तर:
सामाजिक नियन्त्रण में धर्म की अहम भूमिका है। इसके दो कार्य निम्नलिखित हैं-
1. धर्म मानव-व्यवहार को नियन्त्रित करता है-धर्म मानव के व्यवहार को नियन्त्रित करने का महत्त्वपूर्ण अभिकरण है। अलौकिक सत्ता के भय से व्यक्ति स्वतः अपने व्यवहार को नियन्त्रित रखता है। धर्म का जादुई प्रभाव व्यक्ति को सत्य भाषण, अचौर्य, अहिंसक, दयावान, निष्ठावान तथा आज्ञाकारी बनने की प्रेरणा देकर सामाजिक आदर्शों के पालन में सहायक होता है। नियन्त्रित मानव-व्यवहार सामाजिक नियन्त्रण का पथ प्रशस्त करता है।

उदाहरणार्थ-ईसाइयों और मुसलमानों में पादरी और मुल्ला-मौलवी अपने-अपने अनुयायियों के सामाजिक जीवन के नियन्त्रक के रूप में कार्य करते हैं। वास्तव में, धर्म के नियमों के विरुद्ध आचरण ईश्वर की आज्ञा का उल्लंघन माना जाता है जो कि पाप है। इससे व्यक्ति का न केवल इहलोक, वरन् परलोक भी बिगड़ जाता है। हिन्दुओं में व्याप्त जाति-प्रथा का आधार भी धर्म है, जो व्यक्ति के जीवन का सम्पूर्ण सन्दर्भ बन गयी है; अतः भारतीय राजनीति भी जातिवाद से कलुषित हो गयी है।

2. सामाजिक संघर्षों पर नियन्त्रण-समाज सहयोग और संघर्ष का गंगा-जमुनी मेल है। व्यक्तिगत स्वार्थ समाज में संघर्ष को जन्म देते हैं। धर्म व्यक्ति को कर्तव्य-पालन, त्याग और बलिदान के पथ पर अग्रसर करके व्यक्तिगत स्वार्थों को छोड़ने की प्रेरणा देता है। व्यक्ति के स्थान पर यह समष्टि के कल्याण की राह दिखाता है, जिससे संघर्ष टल जाते हैं। और सामाजिक नियन्त्रण बना रहता है।

प्रश्न 7
सामाजिक नियन्त्रण के किसी एक औपचारिक अभिकरण की भूमिका की विवेचना कीजिए।
या
सामाजिक नियन्त्रण के साधन के रूप में शिक्षा का क्या महत्त्व है? [2010]
या
सामाजिक नियन्त्रण में शिक्षा की भूमिका को स्पष्ट कीजिए। [2015]
उत्तर:
शिक्षा सामाजिक नियन्त्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। शिक्षा सामाजिक नियन्त्रण का औपचारिक साधन है वह व्यक्ति का समाजीकरण करती है तथा उसमें आत्म-नियन्त्रण की शक्ति पैदा करती है। शिक्षा व्यक्ति में आदर्श नागरिकता के गुणों का विकास करती है ताकि वह राज्य के कानूनों का पालन कर सके। शिक्षा व्यक्ति की प्रस्थिति एवं भूमिका में सामंजस्य स्थापित करने में योग देती है। शिक्षा व्यक्ति के ज्ञान में वृद्धि करती एवं उसकी तर्क-शक्ति को बढ़ाती है। इससे व्यक्ति सामाजिक नियन्त्रण को समझने लगता है, समूह कल्याण की दृष्टि से उसे मानने लगता है। शिक्षा व्यक्ति का समाजीकरण कर उसे सामाजिक नियमों का ज्ञान कराती है। शिक्षा व्यक्ति की बौद्धिक शक्ति का विकास करती है। शिक्षित व्यक्ति ही उचित व अनुचित तथा अच्छे-बुरे में भेद कर सकता है। उचित व्यवहार करके ही हम सामाजिक नियन्त्रण बनाये रखने में योग दे सकते हैं। शिक्षा व्यक्ति को अतार्किक व्यवहारों से मुक्ति दिलाती है। शिक्षा व्यक्ति को आत्म-नियन्त्रण सिखाती है। व्यक्ति स्वयं पर नियन्त्रण रखकर सामाजिक नियन्त्रण में योग देता है। शिक्षा हमारी संस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित कर सामाजिक नियन्त्रण में योग देती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
सामाजिक नियन्त्रण के दो अनौपचारिक साधन लिखिए।
उत्तर:
सामाजिक नियन्त्रण के दो अनौपचारिक साधन निम्नलिखित है|

  • धर्म-धर्म सामाजिक नियन्त्रण का सदैव से ही एक प्रमुख अभिकरण रहा है।
  • परिवार-सामाजिक नियन्त्रण में परिवार सबसे महत्त्वपूर्ण अभिकरण हैं।

प्रश्न 2
सामाजिक नियन्त्रण में जाति-समूह की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जाति-समूह व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक के आचरण को नियन्त्रित करता है। हम क्या खाएँ, किसके साथ विवाह करें, क्या पहनें, किन जातियों के यहाँ भोजन व पानी स्वीकार या अस्वीकार करें, कौन-सा व्यवसाय करें, किन से छुआछूत बरतें आदि सभी बातें जाति द्वारा निर्धारित होती रही हैं। जाति के नियमों का पालन कराने के लिए जाति-पंचायत होती है। जाति के नियमों का उल्लंघन करने पर जाति-पंचायत व्यक्ति को जाति से बहिष्कृत कर सकती है अथवा उसको शारीरिक व आर्थिक दण्ड दे सकती है।

प्रश्न 3
सामाजिक नियन्त्रण के साधन से क्या तात्पर्य है ? इसके उदाहरण भी दीजिए। [2012]
उत्तर:
साधन से तात्पर्य किसी विधि या तरीके से है, जिसके द्वारा कोई भी अभिकरण या एजेन्सी अपनी नीतियों और आदेशों को लागू करती है। उदाहरण के लिए-प्रथा, परम्परा, लोकाचार आदि।

प्रश्न 4
सामाजिक नियन्त्रण से सामाजिक सुरक्षा कैसे प्राप्त होती है ?
उत्तर:
सामाजिक नियन्त्रण लोगों को मानसिक एवं बाह्य सुरक्षा प्रदान करता है। व्यक्ति को जब यह विश्वास होता है कि उसके हितों की रक्षा होगी तो वह मानसिक रूप से सन्तुष्ट एवं सुरक्षित अनुभव करता है। सामाजिक नियन्त्रण के द्वारा व्यक्ति की शारीरिक एवं धन-सम्पत्ति की रक्षा की जाती है।

प्रश्न 5
सामाजिक नियन्त्रण के अभिकरण से क्या तात्पर्य है ? इसके उदाहरण भी दीजिए। [2011, 12]
उत्तर:
अभिकरण का तात्पर्य उन समूहों, संगठनों एवं सत्ता से है, जो नियन्त्रण को समाज पर लागू करते हैं। नियमों को लागू करने का माध्यम अभिकरण कहलाता है। उदाहरण के लिए, परिवार, राज्य, शिक्षण आदि।

प्रश्न 6
सकारात्मक और नकारात्मक नियन्त्रण से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
सकारात्मक नियन्त्रण में पुरस्कार प्रदान कर अन्य लोगों को भी वैसा ही व्यवहार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। नकारात्मक नियन्त्रण में समाज-विरोधी कार्य करने वाले व्यक्ति को दण्डित किया जाता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
“धर्म अलौकिक शक्तियों पर विश्वास है।” यह किसका कथन है ?
उत्तर:
यह हॉबेल का कथन है।

प्रश्न 2
शिक्षा सामाजिक नियन्त्रण का औपचारिक साधन है/ ‘हाँ या नहीं लिखिए।
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 3
सामाजिक तथ्य की अवधारणा किसने दी ? [2008, 12, 16]
उत्तर:
सामाजिक तथ्य’ की अवधारणा दुर्चीम ने दी।

प्रश्न 4
“परिवार, सामाजिक नियन्त्रण का साधन है।” क्या यह सत्य है ? [2011, 16]
उत्तर:
हाँ, यह सत्य है। परिवार, सामाजिक नियन्त्रण का एक अनौपचारिक साधन है।

प्रश्न 5
सामाजिक नियन्त्रण के चार प्रमुख साधन एजेन्सियाँ बताएँ। [2011]
या
सामाजिक नियन्त्रण के दो अभिकरणों को उल्लेख कीजिए। [2015]
उत्तर:
सामाजिक नियन्त्रण के चार प्रमुख साधन निम्नलिखित हैं–

  • परिवार,
  • धर्म,
  • कानून तथा
  • दण्ड।

प्रश्न 6
‘सामाजिक नियन्त्रण की अवधारणा का प्रयोग पहली बार किसने किया ?
उत्तर:
सामाजिक नियन्त्रण की अवधारणा का प्रयोग पहली बार रॉस ने किया।

प्रश्न 7
सामाजिक नियन्त्रण के औपचारिक साधन कौन-कौन से हैं ? [2017]
उत्तर:
सामाजिक नियन्त्रण के औपचारिक साधनों में कानून, न्याय-व्यवस्था, पुलिस, प्रशासन, शिक्षा आदि आते हैं।

प्रश्न 8
सामाजिक नियन्त्रण के अनौपचारिक साधनों का उल्लेख कीजिए। [2017]
उत्तर:
सामाजिक नियन्त्रण के अनौपचारिक साधनों में जनरीतियाँ, प्रथाएँ, रूढ़ियाँ, धर्म, नैतिकता आदि आते हैं।

प्रश्न 9
मैरिज एण्ड फैमिली इन इण्डिया’ नामक पुस्तक के लेखक का नाम बताइए।
उत्तर:
मैरिज एण्ड फैमिली इन इण्डिया’ नामक पुस्तक के लेखक हैं-के० एम० कपाड़िया।

प्रश्न 10
‘सोशल कण्ट्रोल’ किसकी कृति है ? [2008]
उत्तर:
‘सोशल कण्ट्रोल’ जोसेफ रोसेक की कृति है।

प्रश्न 11
‘द साइकोलॉजी ऑफ सोसायटी’ नामक पुस्तक के लेखक का नाम बताइए।
उत्तर:
‘द साइकोलॉजी ऑफ सोसायटी’ नामक पुस्तक के लेखक हैं—मॉरिस जिन्सबर्ग।

प्रश्न 12
समाजशास्त्र सामाजिक व्यवस्था और प्रगति का विज्ञान है? यह कथन किसका है? [2017]
उत्तर:
आगस्त कॉम्टे।

प्रश्न 13
‘ह्वाट इज सोशियोलॉजी’ नामक पुस्तक किसने लिखी है? [2017]
उत्तर:
एलेक्स इंकलिस ने।।

प्रश्न 14
सामाजिक नियन्त्रण से धर्म के किन्हीं दो कार्यों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

  • मानव व्यवहार को नियन्त्रित करना तथा
  • सामाजिक संघर्षों पर नियन्त्रण करना।

प्रश्न 15
किस समाजशास्त्री ने सामाजिक नियन्त्रण को चेतन एवं अचेतन नियन्त्रण की श्रेणियों में विभाजित किया है? [2015]
उत्तर:
कूले तथा एल०एल० बर्नार्ड।

प्रश्न 16
सामाजिक नियन्त्रण के दो अभिकरणों के नाम बताइए।
उत्तर:

  • राज्य तथा
  • परिवार।

प्रश्न 17
सामाजिक नियन्त्रण का प्रमुख उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
सामाजिक नियन्त्रण का प्रमुख उद्देश्य सामाजिक सुरक्षा की स्थापना करना है।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
सामाजिक नियन्त्रण का उद्देश्य है
(क) व्यापार का विकास करना
(ख) व्यक्ति की राजनीतिक आवश्यकताओं की पूर्ति
(ग) सामाजिक सुरक्षा की स्थापना
(घ) मनुष्य को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना।

प्रश्न 2.
दुर्णीम के अनुसार सामाजिक नियन्त्रण का सबसे प्रभावशाली साधन क्या है ?
(क) राज्य
(ख) समुदाय
(ग) सामूहिक प्रतिनिधान
(घ) व्यक्ति

प्रश्न 3.
सर्वप्रथम किसने ‘सामाजिक नियन्त्रण’ शब्द का प्रयोग किया? [2017]
(क) रॉस
(ख) समनर
(ग) कॉम्टे
(घ) कुले

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से सामाजिक नियन्त्रण का अभिकरण नहीं, बल्कि एक साधन कौन-सा है?
(क) परिवार
(ख) राज्य
(ग) पुरस्कार एवं दण्ड
(घ) शिक्षा संस्थाएँ

प्रश्न 5.
रॉस ने सामाजिक नियन्त्रण में किसकी भूमिका को महत्त्वपूर्ण माना है ?
(क) सन्देह की
(ख) विश्वास की
(ग) भ्रम की
(घ) शंका की

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से कौन-सा सामाजिक नियन्त्रण का साधन नहीं है ?
(क) शिक्षा एवं निर्देशन
(ख) शक्ति एवं पारितोषिक
(ग) सामाजिक अन्तःक्रिया
(घ) अनुनय

प्रश्न 7.
सामाजिक नियन्त्रण का औपचारिक साधन कौन-सा है ?
(क) धर्म
(ख) परिवार
(ग) शिक्षा
(घ) प्रथाएँ

प्रश्न 8.
सामाजिक नियन्त्रण का औपचारिक साधन निम्न में से क्या है ? [2013, 17]
(क) जनरीतियाँ
(ख) कानून
(ग) प्रथाएँ
(घ) रूढ़ियाँ

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में सामाजिक नियन्त्रण का अनौपचारिक साधन है
(क) कानून
(ख) शिक्षा-व्यवस्था
(ग) परिवार
(घ) राज्य

प्रश्न 10.
सामाजिक नियन्त्रण का अनौपचारिक साधन कौन-सा है ?
(क) प्रथा
(ख) कानून
(ग) राज्य
(घ) शिक्षा

प्रश्न 11.
निम्नलिखित में से किसने प्रजाति चेतना’ की अवधारणा दी है? [2015]
(क) एल०एफ० वार्ड।
(ख) एफ०एच० गिडिंग्स
(ग) एम० जिन्सबर्ग।
(घ) आर०एम० मैकाइवर

प्रश्न 12.
‘सोसायटी’ पुस्तक किसने लिखी है? [2017]
(क) कुले
(ख) मैकाइवर एवं पेज
(ग) सोरोकिन
(घ) इमाइल दुखम

प्रश्न 13.
समाजशास्त्र का जनक किसे कहा जाता है? [2017]
(क) राधा कमल मुखर्जी
(ख) अगस्त कॉम्टे
(ग) एम०एन० श्री निवास
(घ) योगेन्द्र सिंह

उत्तर:
1. (ग) सामाजिक सुरक्षा की स्थापना, 2. (ग) सामूहिक प्रतिनिधान, 3. (क) रॉस, 4. (ग) पुरस्कार एवं दण्ड,
5. (ख) विश्वास की, 6. (ग) सामाजिक अन्त:क्रिया, 7. (ग) शिक्षा, 8. (ख) कानून, 9. (ग) परिवार,
10. (क) प्रथा, 11. (ख) एफ०एच० गिडिग्स, 12. (ख) मैकाइवर एवं पेज, 13. (ख) आगस्त कॉम्टे।

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 24 Foreign Trade

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 24
Chapter Name Foreign Trade (विदेशी व्यापार)
Number of Questions Solved 16
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 24 Foreign Trade (विदेशी व्यापार)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भारत के विदेशी व्यापार का विवरण निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत दीजिए –
(i) निर्यात, (ii) आयात, (ii) व्यापार की दिशा। [2014]
या
विदेशी व्यापार का क्या आशय है? भारत में आयात की जाने वाली वस्तुओं का उल्लेख कीजिए। [2008]
या
भारत के विदेशी व्यापार की प्रमुख विशेषताएँ बताइए। [2011, 12]
या
भारत का निर्यात व्यापार पर टिप्पणी लिखिए। [2008, 16]
या
भारत के विदेशी व्यापार की प्रवृत्तियों पर एक निबन्ध लिखिए। [2011]
या
भारत के आयात-निर्यात व्यापार की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए। [2011]
या
भारत से निर्यात की जाने वाली प्रमुख वस्तुओं का विवरण दीजिए। [2014]
उत्तर

भारत का विदेशी व्यापार
Foreign Trade of India

विदेशी व्यापार की वृद्धि मानवीय सभ्यता के विकास का मापदण्ड होती है। विदेशी व्यापार द्वारा देश में उत्पादित अतिरिक्त वस्तुओं की खपत दूसरे देशों में हो जाती है, जबकि आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति अन्य देशों से मँगाकर कर ली जाती है। इससे आर्थिक विकास में तीव्रता आती है तथा जीवन-स्तर में वृद्धि हो जाती है।

स्वतन्त्रता-प्राप्ति से पूर्व भारत का विदेशी व्यापार एक उपनिवेश एवं कृषि पदार्थों तक ही सीमित था। इसका अधिकांश व्यापार ग्रेट ब्रिटेन तथा राष्ट्रमण्डलीय देशों से ही होता था। देश से प्राथमिक उत्पादों का निर्यात किया जाता था, जबकि तैयार वस्तुओं का आयात किया जाता था। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद भारत के विदेशी व्यापार में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए हैं। आज देश के व्यापारिक सम्बन्ध लगभग सभी देशों से हो गये हैं। वर्तमान में भारत 180 देशों को लगभग 7,500 वस्तुओं से भी अधिक का निर्यात करता है, जबकि 6,000 से अधिक वस्तुएँ 140 देशों से आयात करता है। औद्योगिक एवं आर्थिक विकास की आवश्यकताओं ने आयात में भारी वृद्धि की है। उन्नत मशीनें, अलभ्य कच्चे माल, पेट्रोलियम पदार्थ, रासायनिक उर्वरकों आदि के आयात ने वर्तमान विदेशी व्यापार का सन्तुलन विपरीत दिशा में कर दिया है। वर्ष 2006-2007 में देश ने 5,638 अरब की वस्तुएँ विदेशों को निर्यात की थीं, अब यह बढ़कर 18,941 अरब हो गयी है। जबकि आयात १ 8,206 अरब का था, अब यह बढ़कर 27,141 अरब हो गया है।

भारत की प्रमुख आयातक एवं निर्यातक वस्तुएँ
Major Imports and exports of India

आयातक वस्तुएँ Importing Goods
भारत में आयात की जाने वाली वस्तुओं का विवरण निम्नलिखित है
(1) पेट्रोल एवं पेट्रोलियम उत्पाद – भारत के आयात में पेट्रोल एवं पेट्रोलियम उत्पादों का विशिष्ट स्थान है। यह आयात बहरीन द्वीप, फ्रांस, इटली, अरब, सिंगापुर, संयुक्त राज्य, ईरान, इण्डोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात, मैक्सिको, अल्जीरिया, म्यांमार, इराक, रूस आदि देशों से किया जाता है। वर्तमान समय में खाड़ी संकट के कारण पेट्रोल एवं पेट्रोलियम उत्पाद के मूल्य में और अधिक वृद्धि हुई है जिससे इसका आयात मूल्य बढ़ गया है।

(2) मशीनें – देश के आर्थिक एवं औद्योगिक विकास के लिए भारी मात्रा में मशीनों का आयात किया जा रहा है। इनमें विद्युत मशीनों का आयात सबसे अधिक किया जाता है। सूती वस्त्र उद्योग की मशीनें, कृषि मशीनें, बुल्डोजर, शीत भण्डारण, चमड़ा कमाने की मशीनें, चाय एवं चीनी उद्योग की मशीनें, वायु-संपीडक, खनिज उद्योग की मशीनें आदि अनेक प्रकार की मशीनों का आयात किया जाता है। मशीनें 46% ब्रिटेन से, 21% जर्मनी से, 14% संयुक्त राज्य अमेरिका से तथा शेष अन्य देशों; जैसे- बेल्जियम, फ्रांस, जापान एवं कनाडा आदि से आयात की जाती हैं।

(3) कपास एवं रद्दी रूई – भारत में उत्तम सूती वस्त्र तैयार करने के लिए लम्बे रेशे वाली कपास तथा विभिन्न प्रकार के कपड़ों के लिए रद्दी रूई विदेशों से आयात की जाती है। यह कपास एवं रूई मिस्र, संयुक्त राज्य अमेरिका, तंजानिया, कीनिया, सूडान, पीरू, पाकिस्तान आदि देशों से मँगायी जाती है।

(4) धातुएँ, लोहे तथा इस्पात का सामान – इन वस्तुओं का कुल आयातित माल में दूसरा स्थान है। ऐलुमिनियम, पीतल, ताँबा, काँसा, सीसा, जस्ता, टिन आदि धातुएँ विदेशों से अधिक मात्रा में मँगायी जाती हैं। इन वस्तुओं का आयात प्रायः ब्रिटेन, कनाडा, स्विट्जरलैण्ड, स्वीडन, संयुक्त राज्य अमेरिका, बेल्जियम, कांगो गणतन्त्र, मोजाम्बिक, ऑस्ट्रेलिया, म्यांमार, सिंगापुर, मलेशिया, रोडेशिया, जापान आदि देशों से किया जाता है।

(5) खाद्यान्न – देश में जनसंख्या की तीव्र वृद्धि तथा खाद्यान्न उत्पादन की कमी इसके आयात को आकर्षित करती है। परन्तु पिछले कुछ वर्षों से खाद्यान्न उत्पादन में आशातीत सफलता मिलने के कारण इनका आयात कम कर दिया गया है तथा देश निर्यात करने की स्थिति में आ गया है। थाइलैण्ड सदृश देशों को गेहूँ का मैदा निर्यात किया जा रहा है।

(6) रासायनिक पदार्थ – रासायनिक पदार्थों के आयात में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है। इसमें अमोनियम सल्फेट, नाइट्रेट ऑफ सोडा, सुपर फॉस्फेट, एसेटिक एसिड, नाइट्रिक एसिड, बोरिक एवं टार्टरिक एसिड, सोडा-ऐश, ब्लीचिंग पाउडर, गन्धक, अमोनियम क्लोराइड आदि वस्तुएँ मुख्य हैं। इनका आयात सं० रा० अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जर्मनी, जापान, बेल्जियम आदि देशों से किया जाता है। दवाइयों का आयात मुख्यतः ब्रिटेन, स्विट्जरलैण्ड, कनाडा एवं संयुक्त राज्य अमेरिका से किया जाता है।

(7) कागज व स्टेशनरी – देश में साक्षरता की वृद्धि तथा अन्य आवश्यकताओं के कारण कागज की माँग बढ़ रही है। इसका आयात नॉर्वे, स्वीडन, कनाडा, जर्मनी, फ्रांस, संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रिया, फिनलैण्ड एवं ब्रिटेन से किया जाता है।
अन्य आयातक वस्तुओं में विद्युत उपकरण, काँच का सामान, सूती वस्त्र, ऊनी वस्त्र, मोटरसाइकिलें, रबड़ का सामान, जूट एवं रेशमी वस्त्र मुख्य हैं।

निर्यातक वस्तुएँ Exporting Goods
भारत से निम्नलिखित प्रमुख वस्तुओं का निर्यात किया जाता है –

  1. जूट का सामान – भारत के निर्यात व्यापार में जूट का सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि इसके निर्यात से विदेशी मुद्रा का 35% भाग प्राप्त होता है। इससे निर्मित बोरे, टाट, मोटे कालीन, फर्श, गलीचे, रस्से, तिरपाल आदि निर्यात किये जाते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, अर्जेण्टीना, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, रूस, अरब गणराज्य आदि देश इसके मुख्य ग्राहक हैं।
  2. चाय – कुल चाय का 59% भाग ब्रिटेन को निर्यात किया जाता है, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका4%, रूस 12%, कनाडा 3%, ईरान 1%, अरब गणराज्य 6%, नीदरलैण्ड्स.2% तथा सूडान एवं जर्मनी अन्य प्रमुख ग्राहक हैं।
  3. चमड़ा – भारतीय चमड़े की माँग मुख्यतः ब्रिटेन 45%, जर्मनी 10%, फ्रांस 7% एवं संयुक्त राज्य अमेरिका 9% देशों में रहती है। अन्य ग्राहकों में इटली, जापान, बेल्जियम और यूगोस्लाविया आदि देश हैं।
  4. तम्बाकू – भारत द्वारा ब्रिटेन, जापान, पाकिस्तान, अदन, चीन, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों को तम्बाकू का निर्यात किया जाता है।
  5. तिलहन – भारत से विभिन्न प्रकार के तिलहन एवं तेलों का निर्यात किया जाता है। इसमें मूंगफली, अलसी, तिल एवं अरण्डी का तेल प्रमुख हैं। तिलहन के उत्पादन में कमी के कारण अब खली का निर्यात अधिक किया जाता है। ब्रिटेन, फ्रांस, संयुक्त राज्य अमेरिका, पाकिस्तान, इराक, कनाडा, इटली, बेल्जियम, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, हंगरी, सऊदी अरब, श्रीलंका, मॉरीशस आदि देश मुख्य आयातक हैं।
  6. लाख – लाख के आयातक ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका एवं ऑस्ट्रेलिया आदि देश हैं।
  7. सूती वस्त्र – भारत मोटा एवं उत्तम, दोनों ही प्रकार का कपड़ा निर्यात करता है। ईरान, इराक, सऊदी अरब, पूर्वी अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, दक्षिणी अफ्रीका, श्रीलंका, म्यांमार, पाकिस्तान, थाइलैण्ड, मिस्र, तुर्की, चीन, सिंगापुर, मलेशिया, इण्डोनेशिया इन वस्त्रों के प्रमुख ग्राहक हैं।
  8. मसाले – भारत में काली मिर्च, इलायची, सुपारी, हल्दी, अदरख आदि अनेक मसालों का निर्यात संयुक्त राज्य अमेरिका, स्वीडन, सऊदी अरब, ब्रिटेन, पाकिस्तान, श्रीलंका, चीन, इटली, डेनमार्क एवं कनाडा को किया जाता है।
  9. धातु-निर्मित वस्तुएँ – धातु-निर्मित वस्तुओं के अन्तर्गत देश से बिजली के पंखे, बल्ब, लोहे एवं ताँबे के तार, बैटरियाँ, धातु की चादरों से बने बरतन, सिलाई की मशीनें, रेजर, ब्लेड, कागज बनाने, प्लास्टिक की ढलाई करने, छपाई करने, जूता सीने, चीनी एवं चाय बनाने की मशीनें, मोटरगाड़ियाँ एवं उनके पुर्जे, ताले, साँकलें एवं चटकनियाँ, छाते, लोहे से ढालकर बनाई गयी वस्तुएँ, गैस-बत्तियाँ, रेगमाल आदि वस्तुएँ निर्यात की जाती हैं।

भारत से निर्यात की जाने वाली अन्य वस्तुओं में सूखे मेवे-कोजू एवं अखरोट, फल एवं तरकारियाँ, अभ्रक, मैंगनीज, ऊन, कोयला, कहवा, नारियल एवं उससे निर्मित पदार्थ, रासायनिक पदार्थ तथा ऊनी कम्बल आदि प्रमुख हैं।

भारत के विदेशी व्यापार की मुख्य विशेषताएँ
Main Characteristics of India’s Foreign Trade

भारत के विदेशी व्यापार की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
(1) अधिकांश भारतीय विदेशी व्यापार लगभग (90%) समुद्री मार्गों द्वारा किया जाता है। हिमालय पर्वतीय अवरोध के कारण समीपवर्ती देशों एवं भारत के मध्य धरातलीय आवागमन की सुविधा उपलब्ध नहीं है। इसी कारण देश का अधिकांश व्यापार पत्तनों द्वारा अर्थात् समुद्री मार्गों द्वारा ही किया जाता है।

(2) भारत के निर्यात व्यापार का 27% पश्चिमी यूरोपीय देशों, 20% उत्तरी अमेरिकी देशों, 51% एशियाई एवं ऑसिआनियाई देशों तथा 2% अफ्रीकी एवं दक्षिणी अमेरिकी देशों को किया जाता है। कुल निर्यात व्यापार का 61.1% भाग विकसित देशों (सं० रा० अमेरिका–17.4%, जापान-7.2%, जर्मनी–6.8% एवं ब्रिटेन-5.8%) को किया जाता है।
इसी प्रकार आयात व्यापार में 26% पश्चिमी यूरोपीय देशों, 39% एशियाई एवं ऑसिओनियाई देशों, 13% उत्तरी अमेरिकी देशों तथा 11% अफ्रीकी देशों का स्थान है।

(3) यद्यपि भारत में विश्व की 16% जनसंख्या निवास करती है, परन्तु विश्व व्यापार में भारत का भाग लगभग 10% से भी कम है, जबकि अन्य विकसित एवं विकासशील देशों का भाग इससे कहीं अधिक है। इस प्रकार देश के प्रति व्यक्ति विदेशी व्यापार का औसत अन्य देशों से कम है।
(4) भारत के विदेशी व्यापार का भुगतान सन्तुलन स्वतन्त्रता के बाद से ही हमारे पक्ष में नहीं रहा है। वर्ष 1960-61 तथा 1970-71 में भुगतानं सन्तुलन हमारे पक्ष में रहा है। वर्ष 1980-81 में घाटा 58.3 अरब था, वर्ष 1990-91 में यह घाटा १ 106.4 अरब तक पहुँच गया है। वर्ष 2013-14 में भारत के पास ₹8200 अरब से अधिक का विदेशी भुगतान शेष था। घाटे में वृद्धि का प्रमुख कारण आयात में भारी वृद्धि का होना है। आयात में भारी वृद्धि पेट्रोलियम पदार्थों के आयात के कारण हुई है।

(5) देश का अधिकांश विदेशी व्यापार लगभग 35 देशों के मध्य होता है, जो विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय समझौतों के आधार पर किया जाता है।
(6) भारत के विदेशी व्यापार में खाद्यान्नों के आयात में निरन्तर कमी आयी है, जिसका प्रमुख कारण खाद्यान्न उत्पादन में उत्तरोत्तर वृद्धि का होना है। वर्ष 1989-90 से देश खाद्यान्नों को निर्यात करने की स्थिति में आ गया है तथा उसने पड़ोसी देशों को खाद्यान्न निर्यात भी किये हैं।
(7) भारत अपनी विदेशी मुद्रा संकट का हल अधिकाधिक निर्यात व्यापार से ही कर सकता है; अतः उन्हीं कम्पनियों को आयात की छूट दी जाती है जो निर्यात करने की स्थिति में हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
विदेशी व्यापार का क्या अभिप्राय है? भारत से निर्यात की जाने वाली दो प्रमुख वस्तुओं का उल्लेख कीजिए। [2010]
उत्तर
विदेशी व्यापार – वह व्यापार जिसके माध्यम से एक देश की अतिरिक्त वस्तुएँ दूसरे देश में खपती हैं, विदेशी व्यापार कहलाता है। आयात व निर्यात विदेशी व्यापार के दो प्रमुख पहलू हैं। जब एक देश दूसरे देश से कोई वस्तु मँगाता है, उसे आयात कहते हैं। एक देश से दूसरे देश को भेजी जाने वाली वस्तु के व्यापार को निर्यात कहा जाता है।
भारत से निर्यात की जाने वाली दो प्रमुख वस्तुएँ हैं-सिले-सिलाए परिधान तथा अभियान्त्रिकी माल।

प्रश्न 2
भारत के विदेशी व्यापार की नवीनतम प्रवृत्तियाँ क्या हैं?
या
भारतीय विदेशी व्यापार की प्रवृत्तियों का वर्णन कीजिए। [2010, 15]
उत्तर
(1) आयातों की प्रकृति में परिवर्तन – पहले भारत में निर्मित माल का अधिक आयात किया जाता था, अब कच्चे (अशुद्ध) पेट्रोलियम, कच्चे माल तथा पूँजीगत वस्तुओं का आयात होने लगा है।

(2) गैर-परम्परागत वस्तुओं के निर्यात में वृद्धि – भारत परम्परागत निर्यात पदार्थों (खाद्य पदार्थ, चमड़ा, अभ्रक, मैंगनीज, लौह धातु) के अतिरिक्त साइकिलें, मशीनें, पंखे, इन्जीनियरिंग का सामान, मशीनरी, उपकरण, रेल के इंजन तथा उपकरण, इस्पात का फर्नीचर, चीनी, सीमेण्ट, हौज़री, फल, हस्त- निर्मित वस्तुओं आदि का निर्यात करने लगा है।

(3) विदेशी व्यापार की दिशा में परिवर्तन – विगत चार दशकों में भारत के विदेशी व्यापार की। दिशा में भारी परिवर्तन हुए हैं। 1960 के दशक में जहाँ ब्रिटेन तथा कॉमनवेल्थ के देशों तथा यूरोपीय संघ के देशों से अधिक व्यापार होता था, अब अल्पविकसित एशियाई तथा अफ्रीकी देशों तथा पेट्रोलियम उत्पादक देशों से आयातों में वृद्धि हुई है। आयातों के स्रोत के रूप में संयुक्त राज्य अमेरिका का वर्चस्व घट गया है, किन्तु निर्यातों में वृद्धि हुई है। सन् 1970 तक जहाँ रूस को अधिक निर्यात होते थे, 1991 ई० में उसके विघटन के बाद निर्यात एकदम घट गये हैं।

प्रश्न 3
भारत से निर्यात की जाने वाली दो प्रमुख वस्तुओं के नाम बताइए। वे किन-किन देशों को निर्यात की जाती हैं? [2008, 11]
उत्तर

  1. चाय – चाय भारत के प्रमुख निर्यातों में से एक है। ब्रिटेन भारतीय चाय का सबसे बड़ा ग्राहक है। इसके अतिरिक्त अमेरिका, ईरान, संयुक्त अरब गणराज्य, रूस, जर्मनी, सूडान आदि देशों को भारत चाय का निर्यात करता है।
  2. जूट – जूट भारत का परम्परागत निर्यात है। भारतीय जूट का सबसे बड़ा ग्राहक अमेरिका है। इसके अतिरिक्त क्यूबा, संयुक्त अरब गणराज्य, हांगकांग, रूस, ब्रिटेन, कनाडा, अर्जेण्टीना आदि देशों को भारत जूट का निर्यात करता है।

प्रश्न 4
भारत के विदेश व्यापार में अभिनव प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए। [2016]
उत्तर
भारत के विदेश व्यापार की अभिनव प्रवृत्तियाँ
भारत के विदेश व्यापार की अभिनव प्रवृत्तियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. विगत वर्षों में भारत का निर्यात व्यापार अपेक्षाकृत पूर्व वर्षों से बढ़ा है जो एक अच्छा संकेत है। भारत की निर्यात वस्तुओं में भी अब परिवर्तन देखा गया है। इनमें रेडीमेड गारमेण्ट्स, इलेक्ट्रोनिक्स उत्पाद, सॉफ्टवेयर और आभूषण आदि मुख्य हैं।
  2. उदारीकरण के दौर में आयात-निर्यात नीति में उदारवादी एवं मित्रवत् परिवर्तन लाकर जहाँ एक ओर भारतीय निर्यातों के लिए विस्तृत परिक्षेत्र तैयार किया गया है। वहीं विश्व व्यापार संगठन (WTO) को किए गए वादे के अनुरूप परिमाणात्मक नियन्त्रणों को भी समाप्त करने का दौर भारतीय अर्थव्यवस्था में तेजी से लागू कर दिया गया है।
  3. भारत सरकार ने देश के निर्यातों में वृद्धि के उद्देश्य से चार परम्परागत निर्यात संवर्द्धन क्षेत्रों (EPzs) को विशेष आर्थिक परिक्षेत्र (SEZs) में रूपान्तरित कर दिया है। कांडला (गुजरात), सान्ताक्रुज (महाराष्ट्र), कोच्चि (केरल) तथा सूरत (गुजरात) विशेष आर्थिक परिक्षेत्र इसमें सम्मिलित हैं।
  4. भारत का विदेश व्यापार अन्तर्राष्ट्रीय समझौतों के आधार पर किया जाता है। भारत का अधिकांश देशों से विदेश व्यापार होता है।
  5. भारत के अधिकांश आयात-निर्यात (व्यापार) देश के पूर्वी तथा पश्चिमी तट पर स्थित 13 बड़े पत्तनों द्वारा ही सम्पन्न किए जाते हैं।

प्रश्न 5
भारत के विदेशी व्यापार की चार विशेषताएँ लिखिए। [2013]
उत्तर
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 के अन्तर्गत ‘भारत के विदेशी व्यापार की मुख्य विशेषताएँ शीर्षक देखें।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
व्यापार के असन्तुलन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
जब किसी देश में निर्यात की अपेक्षा आयात अधिक होते हैं तब इसे व्यापार का असन्तुलन कहते हैं।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 24 Foreign Trade

प्रश्न 2
भारत के विदेशी व्यापार की दो नवीन प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर

  1. गैर-परम्परागत वस्तुओं के निर्यात में वृद्धि
  2. विदेशी व्यापार की दिशा में परिवर्तन।

प्रश्न 3
भारत में किस पदार्थ का आयात सबसे अधिक मूल्य का होता है?
उत्तर
भारत में पेट्रोलियम तथा इसके पदार्थों का आयात सर्वाधिक मूल्य का होता है।

प्रश्न 4
भारत के व्यापार असन्तुलन का क्या प्रमुख कारण है?
उत्तर
भारत को पेट्रोलियम, मशीनरी, रसायन आदि के आयात पर भारी विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है तथा निर्यात कम मूल्य के होते हैं जिससे व्यापार असन्तुलित हो जाता है।

प्रश्न 5
भारत की दो प्रमुख निर्यात वस्तुओं का वर्णन कीजिए। [2010, 15]
उत्तर

  1. हस्तनिर्मित सामान तथा सिले-सिलाए वस्त्र।
  2. कच्चे खाद्य पदार्थ।

प्रश्न 6
भारत में आयात की जाने वाली किन्हीं दो वस्तुओं के नाम लिखिए। वे किन-किन देशों से आयात की जाती हैं? [2010, 11]
उत्तर

  1. मशीनें – मशीनें मुख्यतः ब्रिटेन, जर्मनी तथा संयुक्त राज्य अमेरिका से आयात की जाती हैं।
  2. रासायनिक पदार्थ – इन्हें मुख्यत: संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस, इटली, जर्मनी तथा जापान से आयात किया जाता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1
जिन वस्तुओं के विश्व व्यापार में भारत का लगभग 10% भाग है, वे हैं –
(क) चावल
(ख) मसाले
(ग) बहुमूल्य रत्न
(घ) ये सभी।
उत्तर
(घ) ये सभी।

प्रश्न 2
मूल्य की दृष्टि से भारत सबसे अधिक आयात करता है –
(क) मोती का
(ख) पेट्रोलियम और लुब्रिकेट्स का
(ग) अनाजों का
(घ) अधात्विक खनिजों का।
उत्तर
(ख) पेट्रोलियम और लुब्रिकेट्स का।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 24 Foreign Trade

प्रश्न 3
निम्नलिखित में से भारत किस वस्तु का निर्यात नहीं करता है।
(क) समुद्री उत्पाद
(ख) चाय
(ग) मसाले
(घ) पेट्रोलियम।
उत्तर
(घ) पेट्रोलियम।

प्रश्न 4
भारतीय कॉफी का सबसे बड़ा खरीदार है।
(क) रूस
(ख) जापान
(ग) ऑस्ट्रेलिया
(घ) इटली।
उत्तर
(घ) इटली।

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