UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 6 महामना मालवीयः

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name महामना मालवीयः
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 6 महामना मालवीयः

अवतरणों का सन्दर्भ अनुवाद

(1) महामनस्विनः ……………………………………… सम्मानभाजनमभवत् । [2017]
युवकः मालवीयः ………………………………………… सम्मानभाजनमभवत् ।। [2009]
महामनस्विनः ………………………………………………….. मनांसि अमोहयत् ।।
महामनस्विनः मदनमोहन………………………………………………………… कर्तुं प्रेरितवन्तः । । (2013)

[ महामनस्वी = बहुत बुद्धिमान्, दृढ़-निश्चयी। आरब्धवान् = आरम्भ किया। प्राविवाक = वकील। विधिपरीक्षा = कानून की परीक्षा।]

सन्दर्भ-यह गद्यखण्ड हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘महामना मालवीयः’ नामक पाठ से उद्धृत है।
[ विशेष—इस पाठ के सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा। ]
अनुवाद–महामना (महा बुद्धिमान्) मदनमोहन मालवीय का जन्म प्रयाग के प्रतिष्ठित (सम्मानित) परिवार में हुआ था। इनके पिता पण्डित ब्रजनाथ मालवीय संस्कृत के प्रतिष्ठित विद्वान् थे। इन्होंने प्रयाग में ही संस्कृत पाठशाला, राजकीय विद्यालय एवं म्योर सेण्ट्रल महाविद्यालय में शिक्षा प्राप्त करके यहाँ ही राजकीय विद्यालय में पढ़ाना आरम्भ किया। युवक मालवीय अपने प्रभावपूर्ण भाषण से मनुष्यों का मन मोह लेते थे। इसलिए इनके मित्रों ने इन्हें वकील की पदवी प्राप्त करके देश की उच्चतर सेवा करने को प्रेरित किया। उसी । के अनुसार इन्होंने कानून की परीक्षा उत्तीर्ण करके प्रयाग में उच्च न्यायालय में वकालत आरम्भ कर दी। कानून के उत्कृष्ट ज्ञान, मधुर वार्तालाप एवं उदार व्यवहार से ये शीघ्र ही मित्रों एवं न्यायाधीशों के सम्मानपात्र बन गये।

(2) महापुरुषाः ……………………………………. नात्यजत् । [2012, 15, 18]
महापुरुषाः …………………………………………. अध्यक्षपदमलङ्कृतवान् । [2009, 12, 16]

[ नियतलक्ष्यान्न (नियतलक्ष्यात् + न) = निश्चित उद्देश्य से नहीं। नात्यजत् (न + अत्यजत्) = नहीं छोड़ा। ]
अनुवाद–महापुरुष सांसारिक प्रलोभनों में फंसकर (अपने) निश्चित लक्ष्य से कभी विचलित नहीं होते। देश-सेवा में अनुरक्त यह युवक उच्च न्यायालय की सीमाओं में (बँधकर) न रह सका। पण्डित मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपतराय जैसे अन्य राष्ट्रीय नेताओं के साथ वे भी देश के स्वतन्त्रता संग्राम में उतरे। दिल्ली में कांग्रेस के तेईसवें अधिवेशन के अध्यक्ष पद को इन्होंने सुशोभित किया। ‘रॉलेट ऐक्ट’ के विरोध में इनके ओजस्वी भाषण को सुनकर अंग्रेज शासक भयभीत हो उठे। बहुत बार जेल में डाले जाने पर भी इसे वीर ने देशसेवा का व्रत नहीं छोड़ा।

(3) हिन्दी-संस्कृताङ्ग्लभाषासु …………………………………………….. अभिधातुमारब्धवन्तः । [2017]
अस्य निर्माणाय ………………………………………………………………….. मालवीयः ।
हिन्दी-संस्कृताङ्ग्लभाषासु ……………………………………………… प्रतिमूर्तिरिव विभाति । [2014, 16]
शिक्षयैव देशे समाजे ………………………………………………… मनीषिमूर्धन्यः मालवीयः । [2013,18]

[अचायत = माँगा। अभिधातुम् = सम्बोधित कर।] । पछि ,
अनुवाद-इनका हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओं पर समान अधिकार था। हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान की उन्नति के लिए ये निरन्तर प्रयत्न करते रहे। शिक्षा द्वारा ही देश और समाज में नवीन प्रकाश का उदय होता है, इसलिए श्री मालवीय ने वाराणसी में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की। इसके निर्माण के लिए इन्होंने लोगों से धन माँगा और लोगों ने इस महान् ज्ञानयज्ञ में इन्हें प्रचुर धन दिया। इनके द्वारा बनवाया हुआ यह विशाल विश्वविद्यालय भारतीयों की दानशीलता और श्री मालवीय के यश की प्रतिमूर्ति की भाँति सुशोभित हो रहा है। साधारण स्थिति का मनुष्य भी महान् उत्साह, बुद्धिमत्ता एवं पुरुषार्थ से असाधारण कार्य करने में सक्षम होता है, यह बुद्धिमानों में श्रेष्ठ मालवीय जी ने दिखा दिया। इसी कारण लोगों ने इन्हें महामना की उपाधि से पुकारना आरम्भ कर दिया।

(4) महामना ……………………………………………… क्वचित् ।।
महामना …………………………………………. उपस्थित एव । [2011]
महामना ………………………………………………… एवासीत् । [2011, 15]
अद्यास्माकम् ……………………………………………………: क्वचित् ।।
जयन्ति ते ……………………………………………….. क्वचित् ।। [2010, 12, 14]

पटु = कुशल। पीयमानान् = पीड़ितों को। कीर्तितनोः = यशरूपी शरीर से।]
अनुवाद–महामना विद्वान् वक्ता (भाषणकर्ता), धार्मिक नेता एवं कुशल पत्रकार थे, किन्तु इनका सर्वोच्च गुण जनसेवा ही था। जहाँ कहीं भी ये लोगों को दु:खित और पीड़ित देखते थे, वहीं शीघ्र उपस्थित होकर सब प्रकार की सहायता करते थे। प्राणियों की सेवा इनका स्वभाव ही था। आज हमारे बीच विद्यमान न होने पर भी महामना मालवीय अमूर्तरूप से अपने यश का प्रकाश फैलाते हुए घोर अन्धकार में डूबे मनुष्यों को सन्मार्ग दिखाते हुए स्थान-स्थान पर प्रत्येक मनुष्य के अन्दर उपस्थित हैं।
जनसेवा में लगे महापुरुष की जय हो, जिनके यशरूपी शरीर को कहीं भी बुढ़ापे और मृत्यु का भय नहीं है।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 5 सुभाषितरत्नानि

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 5 सुभाषितरत्नानि are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 5 सुभाषितरत्नानि.

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Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name सुभाषितरत्नानि
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 5 सुभाषितरत्नानि

श्लोकों का असदर्भ अनुवाद

(1) भाषासु मुख्या मधुरा ………………………………………. तस्मादपि सुभाषितम् ।। (2011, 13)

[ दिव्या=अलौकिक। गीर्वाणभारती = देववाणी (संस्कृत)। गीर्वाण = देवता। भारती = भाषा, वाणी। तस्मात् अपि =उससे भी अधिक।]
सन्दर्भ-यह श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘सुभाषितरत्नानि’ पाठ से अवतरित
[ विशेष—इस पाठ के सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।] अनुवाद-भाषाओं में संस्कृत सबसे प्रधान, मधुर और अलौकिक है। उससे (अधिक) मधुर उसका काव्य है और उस (काव्य) से (अधिक) मधुर उसके सुभाषित (सुन्दर वचन या सूक्तियाँ) हैं।

(2) सुखार्थिनः ……………………………………………… त्यजेत् सुखम् ।। [2011, 13, 17]

अनुवाद-सुख चाहने वाले को विद्या कहाँ और विद्या चाहने वाले (विद्यार्थी) को सुख कहाँ ? (इसलिए) सुख की इच्छा करने वाले को विद्या (प्राप्त करने की इच्छा) छोड़ देनी चाहिए अथवा विद्या चाहने वाले (विद्यार्थी) को सुख छोड़ देना चाहिए (आशय यह है कि विद्या बड़े कष्टों से प्राप्त होती है, इसलिए जो सुख की कामना वाले हैं, उन्हें विद्यार्जन की आशा छोड़ देनी चाहिए और यदि विद्या अर्जित करना चाहते हैं, तो सुख की इच्छा छोड़ देनी चाहिए)।

(3) जल-बिन्दु-निपातेन …………………………………”धनस्य च || [2016] |

[जल-बिन्दु-निपातेन = जल की एक-एक बूंद गिरने से पूर्यते = भरता है। ]
अनुवाद--जल की एक-एक बूंद गिरने से क्रमश: घड़ा भर जाता है। समस्त विद्याओं, धर्म और धन (को संग्रह करने) का भी यही हेतु (कारण, रहस्य) है (अर्थात् निरन्तर उद्योग करते रहने से ही धीरे-धीरे ये तीनों वस्तुएँ संग्रहीत हो पाती हैं। )।

(4) काव्य-शास्त्र-विनोदेन ……………………………………………….. कलहेन वा ।। [2015,17]

[ धीमताम् = बुद्धिमानों का।]
अनुवाद-बुद्धिमानों का समय काव्य और शास्त्रों (की चर्चा) के विनोद (आनन्द) में बीतता है और मूर्खा का (समय) बुरे शौकों में, सोने में या लड़ाई-झगड़े में (बीतता) है।

(5) न चौरहार्यं ………………………………………………… सर्वधनप्रधानम् ।। [2017]

[चौरहार्यं = चोरी के योग्य।]
अनुवाद–विद्यारूपी धन समस्त धनों में प्रधान (श्रेष्ठ) है; (क्योंकि) न तो चोर उसे चुरा सकता है, न राजा उसे छीन सकता है, न भाई बाँट सकता है, न यह बोझ बनता है; अर्थात् भार-रूप नहीं है और खर्च करने से यह निरन्तर बढ़ता जाता है (अन्य धनों के समान घटता नहीं )।

(6) परोक्षे ………………………………………………………… पयोमुखम् ।। [2009, 12, 14, 17]

[परोक्षे = पीठ पीछे। कार्यहन्तारम् = कार्य को नष्ट करने वाला (बिगाड़ने वाला)। पयोमुखम् = जिसके मुख (ऊपरी भाग) में दूध हो।]
अनुवाद-जो पीठ पीछे काम बिगाड़ने वाला हो, पर सामने मीठा बोलने वाला हो, ऐसे मित्र को उसी प्रकार . छोड़ देना चाहिए, जिस प्रकार विष से भरे घड़े को, जिसके ऊपरी भाग में दूध हो (छोड़ दिया जाता है।)।

(7) उदेति …………………………………………………… महतामेकरूपता ।। [2009, 16]

[ उदेति = उदित होता है। सविता = सूर्य। ताम्रः = ताँबे के समान लाल (रंग का)। एवास्तमेति (एवं + अस्तम् + एति) = ही अस्त होता है। महताम् = महापुरुषों का।]
अनुवाद-सूर्य उदित होते समय लाल होता है और अस्त होते समय भी लाल ही होता है। (इस प्रकार) सम्पत्ति और विपत्ति (दोनों स्थितियों) में महापुरुष एक रूप रहते हैं (अर्थात् सुख में हर्षित और दुःख में पीड़ित नहीं होते, अपितु समभाव से सुख और दुःख दोनों को ग्रहण करते हैं।)।

(8) विद्या विवादाय ……………………………………………. रक्षणाय || [2010, 14, 15, 17]

[ मदाय = घमण्ड के लिए।]
अनुवाद-खल (दुष्ट व्यक्ति) की विद्या वाद-विवाद के लिए, धन घमण्ड के लिए और शक्ति दूसरों को सताने के लिए होती है। इसके विपरीत साधु (सज्जन) की विद्या ज्ञान-प्राप्ति के लिए, धन दान के लिए और शक्ति (दूसरों की) रक्षा के लिए होती है।

(9) सहसा विदधीत …………………………………………………… सम्पदः ।। [2012]

[विदधीत = करना चाहिए। क्रियाम् = (किसी) काम को। अविवेकः = विचारहीनता। परमापदाम् (परम +आपदाम्) = भयंकर आपत्तियों का वृणुते = वरण करती है। विमृश्यकारिणम् = सोच-विचारकर काम करने वाले को। गुणलुब्धाः = गुणों पर लुभायी या रीझी। सम्पदः = लक्ष्मी।]
अनुवाद-सहसा (बिना विचारे यकायक) कोई काम नहीं करना चाहिए, (क्योंकि) विचारहीनता भयंकर आपत्तियों का घर है। जो व्यक्ति खूब सोच-विचारकर कार्य करता है, उसके गुणों पर रीझी हुई लक्ष्मी स्वत: ही उसका वरण करती है।

(10) वज्रादपि ………………………………………………….विज्ञातुमर्हति ।। [2010, 12, 17]

[ वज्रादपि (वज्रात् + अपि) = वज्र से अधिक। मृदूनि = कोमल। लोकोत्तराणाम् = असाधारण (महान्) पुरुषों के चेतांसि = चित्त (या मन) को। विज्ञातुम् = जानने में। अर्हति = समर्थ है।]
अनुवाद-असाधारण पुरुषों (महापुरुषों) के वज्र से भी अधिक कठोर और पुष्प से भी अधिक कोमल हृदय को भला कौन समझ सकता है ?

(11) प्रीणाति यः ………………………………………………. पुण्यकृतो लभन्ते ।। [2013, 15, 18]

[प्रीणाति = प्रसन्न करता है। भर्तुरेव (भर्तुः + एव) = पति का ही। कलत्रम् = स्त्री (पत्नी)। तन्मित्रम् (तत् + मित्रम्) = मित्र वही है। आपदि = आपत्ति में। समक्रियम् = एक-से व्यवहार वाला। जगति = संसार में।]
अनुवाद-जो अपने अच्छे चरित्र (सुकर्मो ) से पिता को प्रसन्न करे, वही पुत्र है। जो पति का हित (भलाई) चाहती हो, वही पली है। जो (अपने मित्र की) आपत्ति (दु:ख) और सुख में एक-सा व्यवहार करे, वही मित्र है। इन तीन (अच्छे पुत्र, अच्छी पत्नी और सच्चे मित्र) को संसार में पुण्यात्मा-जन ही पाते हैं। (अर्थात् बड़े पुण्यों के फलस्वरूप ही ये तीन प्राप्त होते हैं)।

(12) कामान् ………………………………………………………….. वाचमाहुः || [2011]

[ कामान् = कामनाओं को। दुग्धे = दुहती है, पूर्ण करती है। विप्रकर्षति = हटाती है, नष्ट करती हैं। अलक्ष्मीम् = दरिद्रता को। सूर्त= उत्पन्न करती है। दुष्कृतम् = पापों को। मङ्गलानां मातरम् = कल्याणों की माता। धीराः = धैर्यवान्। सूनृताम् = सुभाषित। वाचम् = वाणी को।]
अनुवाद-जो (सुभाषित वाणी) इच्छाओं को दुहती है, दरिद्रता को दूर करती है, कीर्ति को जन्म देती है। (और जो) पाप को नष्ट करती है, (जो) शुद्ध, शान्त (और) मंगलों की माता है, (उस) गाय को धैर्यवान् लोगों ने सुभाषित वाणी कहा है।

(13) व्यतिषजति ………………………………………………… चन्द्रकान्तः ।। [2009]

[ व्यतिषजति – मिलती है (परस्पर प्रीति स्थापित करता है)। पदार्थान् = पदार्थों को। आन्तरः हेतुः = आन्तरिक कारण बहिसपाधीन (बहिः + उपाधीन) = बाह्य कारणों (या विशेषताओं) पर। पतङ्गस्योदये (पतङ्गस्य + उदये) = सूर्य के उदित होने पर। पुण्डरीकम् = कमल। हिमरश्मावुदगतेः (हिमरश्मौ + उदगतेः) = शीतल किरणों वाले चन्द्रमा के निकलने पर।]
अनुवाद-कोई आन्तरिक कारण ही पदार्थों को (आपस में) मिलाता है (या उनमें परस्पर प्रीति स्थापित करता है)। प्रीति (या प्रेम) निश्चय ही बाह्य कारणों (या विशेषताओं) पर आश्रित (निर्भर) नहीं होती। जैसे सूर्य के उदित होने पर ही कमल खिलता है और चन्द्रमा के निकलने पर ही चन्द्रकान्त-मणि द्रवित होती है।

(14) निन्दन्तु …………………………………………………… पदं न धीराः || [2009, 15, 18]

[ निन्दन्तु=निन्दा करें। नीतिनिपुणाः = लोकनीति (या लोकव्यवहार) में कुशल लोग। स्तुवन्तु = प्रशंसा करें। समाविशतु = आये| यथेष्टम् = स्वेच्छा से। युगान्तरे = युगों बाद न्याय्यात् पथः = न्याय के मार्ग से। पदम् = पग।]
अनुवाद–लोकनीति में कुशल लोग चाहे निन्दा करें, चाहे प्रशंसा; लक्ष्मी चाहे आये या स्वेच्छानुसार चली जाए। आज ही मरण हो जाए, चाहे युगों बाद हो, किन्तु धैर्यशाली पुरुष न्याय के मार्ग से एक पग भी विचलित नहीं होते। (अर्थात् कैसी भी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति हो, धैर्यशाली पुरुष न्याय के मार्ग से रंचमात्र भी नहीं हटते)।

(15) ऋषयो ……………………………………… निर्ऋतिः || [2014]

[ वाचमुन्मत्तदृप्तयोः = अहंकारी (दृप्त) और उन्मत्त (मतवाले) व्यक्तियों की वाणी को (वाचम्)।
राक्षसीमाहुः (राक्षसीम् + आहुः) = राक्षसी कहा है। योनिः = जन्म देने वाली। निऋतिः = विपत्ति।]
अनुवाद-ऋषियों ने उन्मत्त और अहंकारी पुरुषों की वाणी को राक्षसी कहा है, (क्योंकि) वह समस्त वैरों को जन्म देने वाली और संसार की विपत्ति का कारण होती है (अर्थात् अहंकार से भरी वाणी दूसरों के मन पर चोट करके शत्रुता को जन्म देती है और संसार के सारे झगड़े उस के कारण होते हैं)। 1

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 4 जातक-कथा

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Chapter Chapter 4
Chapter Name जातक-कथा
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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 4 जातक-कथा

अवतरणों का सन्दर्भ अनुवाद

उलूकजातकम् (उल्लू विषयक जातक-कथा)

(1) अतीते ……………………………………………… इत्यवोचन् । [2013,17]
ततः शकुनिगणाः …………………………………………. इत्यवोचन् ।
अतीते प्रथमकल्पे …………………………………………….. इति उक्तवन्तः ।

[ जातक = जन्म। जातक कथा = भगवान बुद्ध के पूर्वजन्मों की कथाएँ, जिनमें उन्होंने बुद्धत्व-प्राप्ति के लिए विभिन्न शीलों का अभ्यास किया था। अभिरूपम् = सुन्दर। सर्वाकारपरिपूर्णम् = समस्त सुलक्षणों से युक्त। चतुष्पदाः = पशु। सन्निपत्य = एकत्रित होकर। शकुनिगणाः = पक्षी। पुनरन्तरे (पुनः +
अन्तरे) = किन्तु (हमारे) बीच। ]

सन्दर्भ-यह गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘जातक-कथा’ पाठ के ‘उलूकजातकम्’ शीर्षक से उद्धृत है।
अनुवाद–प्राचीन काल के प्रथम कल्प में मनुष्यों ने एक सुन्दर, सौभाग्यशाली एवं समस्त सुलक्षणों से युक्त पुरुष को राजा बनाया। चौपायों (पशुओं) ने भी इकट्टे होकर एके सिंह को राजा बनाया। तब पक्षियों ने हिमालय प्रदेश में एक शिलातल पर इकड़े होकर कहा-“मनुष्यों में राजा दीख पड़ता है, वैसे ही चौपायों में भी, किन्तु हमारे बीच कोई राजा नहीं है। राजा के बिना रहना ठीक नहीं। (हमें भी) किसी को राजा के पद पर नियुक्त करना चाहिए। तब उन्होंने (राजा की खोज में) एक-दूसरे पर दृष्टि दौड़ाते हुए एक उल्लू को देखकर कहा ‘यह हमको पसन्द है।”

(2) अथैकः शकुनिः ……………………………………………… कृत्वा अगमन् ।
अथैकः शकुनिः ……………………………………………………… इत्याह ।
अर्थकः शकुनिः …………………………………………………….. धक्ष्यामः ।

[ आशयग्रहणार्थम् = मत (राय) जानने के लिए। त्रिकृत्वः = तीन बार। अवयत् = सुनाया (अर्थात् घोषित किया कि उल्लू को राजा बनाने में किसी को आपत्ति हो तो कहे)। तप्तकटाई = गर्म कड़ाही में। प्रक्षिप्ताः तिलाः इव =डाले गये तिलों के सदृश। धक्ष्यामः = भुन जाएँगे। विरुवन् = चिल्लाता हुआ। उदपतत् = उड़ गया। एनमवधावत (एनम् + अन्वधावत्) = इसके पीछे दौड़ा।]

सन्दर्भ-पूर्ववत्।
अनुवाद-इसके बाद एक पक्षी ने सबका मत जानने के लिए तीन बार सुनाया (घोषणा की)। तब एक कौआ उठकर बोला-“जरा ठहरो, इसका राज्याभिषेक के समय ही ( अर्थात् इस अतीव हर्ष के अवसर पर ही) ऐसा (भयानक) मुख है तो क्रुद्ध होने पर कैसा होगा ? इसके क्रुद्ध होकर देखने पर तो हम लोग गर्म कड़ाही में डाले गये तिलों की तरह जहाँ-के-तहाँ ही जल-भुन जाएँगे। ऐसा राजा मुझे अच्छा नहीं लगता। तुम लोगों का इस उल्लू को राजा बनाना मुझे ठीक नहीं लगता। इस समय के क्रोधहीन मुख को ही देखो, क्रुद्ध होने पर यह कैसा (विकृत) हो जाएगा ?” वह ऐसा कहकर ‘मुझे अच्छा नहीं लगता’, ‘मुझे अच्छा नहीं लगता’ चिल्लाता हुआ आकाश में उड़ गया। उल्लू ने भी उठकर उसका पीछा किया (या उसके पीछे भागा)। तब से ही दोनों एक-दूसरे के वैरी बन गये। पक्षी भी सुवर्ण हंस को राजा बनाकर चले गये।

नृत्यजातकम् (नृत्य-सम्बन्धी जातक-कथा)

(1) अतीते प्रथमकल्पे ……………………………………………… इत्यकथयत् ।
हंसराजः तस्यै …………………………………………………… इत्यभाषत ।।
अतीते ………………………………………………………. इत्यवोचत् । [2013]
अतीते ……………………………………………. दुहितरमादिदेश । [2018]
अतीते प्रथमकल्पे ……………………………………………. संन्यपतत् ।।
सा शकुनिसह्ये …………………………………………………………. इत्यकथयत् । [2010]

[वरमदात् (वरम् + अदात्) = वर दिया। आत्मनश्चित्तरुचितम् (आत्मनः + चित्त + रुचितम्) = अपना मनपसन्द (मनोनुकूल)। वृणुयात् = वरण करे। मणिवर्णग्रीवम् = नीलमणि के रंग की गर्दन वाले। चित्रप्रेक्षणम् = रंग-बिरंगे पंखों वाले। लज्जाञ्च (लज्जाम् + च) = और लज्जा को। प्रतिच्छन्न = बिना ढका (नंगा)। बर्हाणाम् = पंखों को। समुत्थाने = उठाने में। न अस्मै = इसे नहीं। गतत्रपाय = लज्जाहीन को (त्रपा = लज्जा), नष्ट हो गयी है लज्जा जिसकी वह, निर्लज्ज। ]

सन्दर्भ–यह गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के जातक-कथा’ पाठ के नृत्यजातकम्’ शीर्षक से अवतरित है।
अनुवाद-प्राचीन काल में प्रथम कल्प में चौपायों (पशुओं) ने सिंह को राजा बनाया। मछलियों ने आनन्द मत्स्य (मछली) को एवं पक्षियों ने सुवर्ण हंस को (राजा बनाया)। उस सुवर्ण राजहंस की पुत्री हंसपोतिका (हंसकुमारी) अत्यधिक रूपवती थी। उस (हंसराज) ने उसे (हंसकुमारी को) वर दिया कि वह अपने मनोनुकूल पति का वरण करे। हंसराज ने उसे वर देकर हिमालय के पक्षियों के समुदाय को इकट्ठा कराया। विभिन्न प्रकार के हंस, मोर आदि पक्षीगण आकर एक विशाल शिलातल पर इकट्टे हुए। हंसराज ने पुत्री को
आदेश दिया कि (वह) आकर अपने मनपसन्द पति को चुने। उसने पक्षी समुदाय पर दृष्टि डालते हुए नीलमणि के रंग की गर्दन और रंग-बिरंगे (या विचित्र) पंखों वाले मोर को देखकर कहा कि यह मेरा स्वामी हो।’ मोर ने (यह कहते हुए कि) “आज भी तुम मेरा बल नहीं देखती हो’ (अर्थात् अभी तुमने मेरा पराक्रम देखा ही कहाँ है ?), बड़े गर्व से निर्लज्जतापूर्वक उस बड़े पक्षी समुदाय के बीच पंख फैलाकर नाचना शुरू किया और नाचते हुए नग्न हो गया। सुवर्ण राजहंस ने लज्जित होकर कहा-“इसे तो न (अन्दर का) संकोच है और न ही पंखों को उठाने में (बाहर की) लज्जा। इस निर्लज्ज को मैं अपनी पुत्री नहीं दूंगा।” यह मेरी पुत्री से विवाह योग्य नहीं है।

(2) हंसराजः ……………………………………….. अगच्छत् ।

[तदैव = उसी। परिषन्मध्ये (परिषत् + मध्ये)= सभा के बीच। भागिनेयः = भांजा। भागिनेयाय = भांजे के लिए।].

सन्दर्भ-पूर्ववत्।।
अनुवाद-हंसराज ने उसी परिषद् के बीच अपने भांजे हंसकुमार को पुत्री दे दी। मोर हंसपुत्री को न पाकर लजाकर उस स्थान से भाग गया। हंसराज भी प्रसन्न मन से अपने घर को चला गया।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 3 संस्कृतभाषायाः महत्त्वम्

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Chapter Name संस्कृतभाषायाः महत्त्वम्
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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 3 संस्कृतभाषायाः महत्त्वम्

अवतरणों का सन्दर्भ अनुवाद

(1) धन्योऽयम् …………………………………………….. महर्षिभिः ।। [2017]
धन्योऽयम् भारतदेशः ………………………………….‘भाषातत्त्वविदिभ । [2010]
अस्माकं रामायण …………………………………………..: दृष्टेरविषयः ।
धन्योऽयम् ………………………………………………. दृष्टेरविषयः। (2015)
धन्योऽयम् …………………………………………………… लिखितानि सन्ति । [2012, 13]

[ समुल्लसति = सुशोभित है। भव्यभावोद्भाविनी (भव्यभाव + उद्भाविनी) = उच्च भावों को उत्पन्न करने वाली। शब्द-सन्दोह-प्रसविनी = शब्दराशि को जन्म देने वाली। निखिलेष्वपि (निखिलेषु + अपि) = सारे ही। प्रथिता = प्रसिद्ध। दृष्टेरविषयः (दृष्टेः + अविषयः) =अज्ञात नहीं (दृष्टि से ओझल नहीं)। सम्यगुक्तमाचार्यप्रवरेण दण्डिना (सम्यक् + उक्तम् + आचार्यप्रवरेण दण्डिना) =आचार्यश्रेष्ठ दण्डी ने ठीक ही कहा है। वागन्वाख्याता (वाक् + अन्वाख्याता) = वाणी कही गयी है। ]

सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के संस्कृतभाषायाः महत्त्वम् शीर्षक पाठ से उधृत है।
[विशेष—इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]
अनुवाद-यह भारत देश धन्य है, जहाँ मनुष्यों के पवित्र मनों को प्रसन्न करने वाली, उच्च भावों को उत्पन्न करने वाली, शब्दराशि को जन्म देने वाली देववाणी (संस्कृत) सुशोभित है। (वर्तमान काल में) विद्यमान समस्त साहित्यों में इसका साहित्य सर्वश्रेष्ठ एवं सुसमृद्ध है। यही भाषा संसार में संस्कृत के नाम से भी प्रसिद्ध है। हमारे रामायण, महाभारत आदि ऐतिहासिक ग्रन्थ, चारों वेद, सारे उपनिषद्, अठारह पुराण तथा अन्य महाकाव्य, नाटक आदि इसी भाषा में लिखे गये हैं। भाषाविज्ञानियों ने इसी भाषा को सारी आर्यभाषाओं की जननी माना है। संस्कृत का गौरव, उसमें अनेक प्रकार के ज्ञान का होना तथा उसकी व्यापकता किसी की दृष्टि से छिपी नहीं (किसी को अज्ञात नहीं) है। संस्कृत के गौरव को ध्यान में रखकर ही आचार्यश्रेष्ठ दण्डी ने ठीक ही कहा हैसंस्कृत को महर्षियों ने दिव्य वाणी (देवताओं की भाषा) कहा है।

(2) संस्कृतस्य साहित्यं ………………………………………………….. सजायन्ते । [2011, 14, 16, 17, 18]
संस्कृतस्य साहित्यं …………………………………………………… नान्यत्र तादृशी ।

[ किं बहुना =और अधिक क्या। किञ्चिदन्यत् (किञ्चित् + अन्यत्) = और कोई नहीं )। अनसूया = किसी से ईर्ष्या (या द्वेष) न करना। सजायन्ते = उत्पन्न होते हैं।].

अनुवाद-संस्कृत का साहित्य सरस है और (उसका) व्याकरण सुनिश्चित है। उसके गद्य और पद्य में लालित्य (सौन्दर्य), भावों का बोध (ज्ञान कराने) की क्षमता और अद्वितीय कर्णमधुरता (कानों को प्रिय लगना) है। अधिक क्या, चरित्र-निर्माण की जैसी उत्तम प्रेरणा संस्कृत साहित्य देता है वैसी (प्रेरणा) अन्य कोई (साहित्य) नहीं। मूलभूत मानवीय गुणों का जैसा विवेचन संस्कृत साहित्य में मिलता है, वैसा अन्य कहीं नहीं। दया, दान, पवित्रता, उदारता, ईष्र्या (या द्वेष) रहित होना, क्षमा तथा अन्यान्य अनेक गुण इसके साहित्य के अनुशीलन (अध्ययन एवं मनन) से (मनुष्य में) उत्पन्न होते हैं।

(3) संस्कृतसाहित्यस्य …………………………………………….. गीर्वाणभारती’ इति । [2015]
इयं भाषा: ……………………………………………. गीर्वाणभारती’ इति ।
संस्कृतसाहित्यस्य ………………………………………….. श्रेष्ठा चास्ति । [2014]
संस्कृतसाहित्यस्य ……………………………………………….. सुरक्षितं शक्यन्ते । [2009, 10, 15]

[ सुष्टूक्तम् (सुष्ठ+ उक्तम्) = ठीक कहा गया है। गीर्वाणभारती (गीर्वाण = देवता, भारती = वाणी)। ]
अनुवाद-संस्कृत साहित्य के आदिकवि वाल्मीकि, महर्षि वेदव्यास, कविकुलगुरु कालिदास, भासभारवि-भवभूति आदि अन्य महाकवि अपने श्रेष्ठ ग्रन्थों द्वारा आज भी पाठकों के हृदय में विराजते हैं (अर्थात् उनके ग्रन्थों को पढ़कर पाठक आज भी उन्हें याद करते हैं)। यह भाषा हमारे लिए माता के समान आदरणीया और पूजनीया है; क्योंकि भारतमाता की स्वतन्त्रता, गौरव, अखण्डता एवं सांस्कृतिक एकता संस्कृत के द्वारा ही सुरक्षित रह सकती है। यह संस्कृत भाषा (विश्व की) समस्त भाषाओं में सर्वाधिक प्राचीन एवं श्रेष्ठ है। इसलिए यह ठीक ही कहा गया है कि ‘(सब) भाषाओं में देववाणी (संस्कृत) मुख्य, मधुर और दिव्य (अलौकिक) है।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 2 आत्मज्ञः एव सर्वज्ञः

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name आत्मज्ञः एव सर्वज्ञः
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 2 आत्मज्ञः एव सर्वज्ञः

अवतरणों का सन्दर्भ अनुवाद

(1) याज्ञवल्क्यो मैत्रेयीमुवाच ………………………….. उवाच-नेति।

[ उवाच = बोले। उद्यास्यन् अस्मि = ऊपर जाने वाला हूँ (इस गृहस्थाश्रम को छोड़कर ऊपर के आश्रम अर्थात् संन्यासाश्रम में जाने वाला हूँ)। अस्मात् स्थानात् = इस स्थान से (इस गृहस्थाश्रम से)। ततस्तेऽनया (ततः + ते + अनया) = तो तुम्हारा इस। विच्छेदम् = (सम्पत्ति का) बँटवारा। यदीयम् (यदि + इयम्) = यदि यह। तेनाहममृता (तेन + अहम् + अमृता) = उससे मैं अमर ]

सन्दर्भ-हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ में संकलित यह गद्यांश’ आत्मज्ञ एव सर्वज्ञः’ पाठ से उद्धृत है।
अनुवाद-(ऋषि) याज्ञवल्क्य ने (अपनी पत्नी) मैत्रेयी से कहा-“मैत्रेयी! मैं इस स्थान (गृहस्थाश्रम) से ऊपर (संन्यासाश्रम में) जाने वाला हूँ, तो मैं तेरा इस (अपनी दूसरी पत्नी) कात्यायनी के साथ विच्छेद ((सम्पत्ति का बँटवारा) कर दें।” मैत्रेयी बोली-“यदि इस धन से सम्पन्न सारी पृथ्वी मेरी हो जाए तो क्या मैं उससे अमर हो सकती हूँ ?’ याज्ञवल्क्य ने कहा-“नहीं।’

(2) यथैवोपकरणवतां जीवनं ………………………… अमृतत्व साधनम्।

[ यथैवोपकरणवताम् (यथा + एव + उपकरणवताम्) = वैसा ही जैसा धनिकों को। उपकरण = साधन उपकरणवताम् = साधनसम्पन्नों (या धनिकों का)। नाशास्ति (न + आशा + अस्ति) = आशा नहीं है। ]

सन्दर्भ-पूर्ववत्।।
अनुवाद–“जैसा साधनसम्पन्नों (धनिकों) का जीवन होता है, वैसा ही तुम्हारा भी जीवन होगा। धन से अमरता की आशा नहीं है।” (जैसे सभी धनवान् लोगों का अध्यात्म की ओर ध्यान ही नहीं है, वैसी ही तुम भी हो।) (तब) उस मैत्रेयी ने कहा–“जिससे मैं अमर न हो सकें, उसे (लेकर) क्या करूंगी?” भगवान् (आप) जो केवल अमरता (की प्राप्ति) का साधन जानते हो, वही मुझे बताएँ।” याज्ञवल्क्य बोले-“तू (पहले भी) मेरी प्रिया रही है और (इस समय भी) प्रिय बोल रही है (मुझे अच्छी लगने वाली बात कह रही है)। आ बैठ, तुझसे अमृतत्व (अमरता-प्राप्ति) के साधन की व्याख्या करूंगा।”

(3) याज्ञवल्क्य उवाच ……………………… विदितं भवति।
याज्ञवल्क्य उवाच …………………… सर्वं प्रियं भवति। | [2015]

[ कामाय = कामना के लिए (इच्छापूर्ति के लिए)। निदिध्यासितव्यः = ध्यान करने योग्य। ]

सन्दर्भ-पूर्ववत्।
अनुवाद-याज्ञवल्क्य बोले-“अरी मैत्रेयी! पति की इच्छापूर्ति के लिए (नारी को) पति प्रिय नहीं होता, अपनी ही इच्छापूर्ति के लिए पति प्रिय होता है। (अपने स्वार्थ से ही वह पति को चाहती अथवा प्रेम करती है।) अरी न ही, पत्नी की इच्छापूर्ति के लिए (पति को) पत्नी प्रिय होती है, (वरन्) अपनी इच्छापूर्ति के लिए पत्नी प्रिय होती है। न ही अरे, पुत्र या धन की कामना से पुत्र या धन प्रिय होता है, (वरन्) अपनी ही कामना (पूर्ति) के लिए पुत्र या धन प्रिय होता है। न ही सभी की कामना से सब प्रिय होते हैं, (वरन्) अपनी ही कामना (की पूर्ति) के लिए सब प्रिय होते हैं।” (आशय यह है कि मनुष्य जो कुछ भी कामना इस संसार में करता है, वह दूसरों के सुख के लिए नहीं, अपितु अपने ही सुख के लिए, अपनी ही आत्मा की तृप्ति के लिए करता है। मनुष्य का एकमात्र लक्ष्य दूसरे किसी को सुख देना नहीं, केवल अपने को ही सुख देना है। इस प्रकार आत्म-तृप्ति के लिए ही पति, पत्नी, पुत्र, सम्बन्धी का हित चाहना अथवा उन्हें सुख देना नहीं, केवल अपने को ही सुख देना है। इस प्रकार आत्म-तृप्ति के लिए ही पति, पत्नी, पुत्र, सम्बन्धी आदि प्रिय होते हैं।) इसलिए हे मैत्रेयी! आत्मा ही देखने योग्य है, देखने के लिए (अर्थात् यदि देखना हो तो उसके लिए वह) सुनने योग्य है, मनन करने योग्य है और ध्यान करने योग्य है। निश्चय ही आत्म-दर्शन से (आत्मा के स्वरूप के ज्ञान से) इस सबका ज्ञान हो जाता है।”

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