UP Board Solutions for Class 2 Maths गिनतारा Chapter 8 आकार-प्रकार

UP Board Solutions for Class 2 Maths गिनतारा Chapter 8 आकार-प्रकार

  • जो वस्तुएँ गेंद जैसी गोल आकार की होती हैं, उन्हें गोला कहते हैं।
  • जो वस्तुएँ माचिस के आकार की होती हैं, उन्हें घनाभ कहते हैं।
  • जिस घनाभ की लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई बराबर होती है, उसे घन कहते हैं।
  • जो वस्तुएँ पेंसिल जैसी आकार की होती हैं, उन्हें बेलन कहते हैं।
  • जोकर की टोपी के आकार की वस्तुओं को शंकु कहते हैं।
  • किसी वस्तु का जो भाग दिखाई देता है या जिसे छू सकते हैं, उस भाग को वस्तु का पृष्ठ कहते हैं।
  • वस्तुओं में दो पृष्ठ होते हैं- चौरस पृष्ठ और वक्र पृष्ठ।

अभ्यास

प्रश्न 1.
अपने आस-पास पता करो और लिखो-
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 2 Maths गिनतारा Chapter 8 आकार-प्रकार 1

प्रश्न 2.
सोचो और लिखो-
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 2 Maths गिनतारा Chapter 8 आकार-प्रकार 2

कितना सीखा?

प्रश्न 1.
सौरभ के पास कहानी की 4 किताबें हैं। हर किताब में 15 कहानियाँ हैं। कुल कितनी कहानियाँ हैं?
हल:
UP Board Solutions for Class 2 Maths गिनतारा Chapter 8 आकार-प्रकार 3
अतः सौरभ के पास कुल 60 कहानियाँ हैं।

प्रश्न 2.
गुणा करो-
हल:
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UP Board Solutions for Class 2 Maths गिनतारा Chapter 8 आकार-प्रकार 8

प्रश्न 3.
एक थाली में 25 बेर हैं। 5 बच्चों ने बराबर-बराबर बेर खाए। एक बच्चे ने कितने बेर खाए?
हल:
UP Board Solutions for Class 2 Maths गिनतारा Chapter 8 आकार-प्रकार 9
अतः एक बच्चे ने 5 बेर खाए।

प्रश्न 4.
80 गोलियाँ 4 लड़कों में बराबर-बराबर बाँटी गईं। हर एक को कितनी गोलियाँ मिलीं?
हल:
UP Board Solutions for Class 2 Maths गिनतारा Chapter 8 आकार-प्रकार 10
अतः हर लड़के को 20 गोलियाँ मिलीं।

प्रश्न 5.
12 × 6
UP Board Solutions for Class 2 Maths गिनतारा Chapter 8 आकार-प्रकार 11

10 × 9
UP Board Solutions for Class 2 Maths गिनतारा Chapter 8 आकार-प्रकार 12

11 × 5
UP Board Solutions for Class 2 Maths गिनतारा Chapter 8 आकार-प्रकार 13

प्रश्न 6.
पूरा करो (पूरा करके)-
हल:
UP Board Solutions for Class 2 Maths गिनतारा Chapter 8 आकार-प्रकार 14

UP Board Solutions for Class 2 Maths गिनतारा Chapter 8 आकार-प्रकार 15

UP Board Solutions for Class 2 Maths गिनतारा Chapter 8 आकार-प्रकार 16

प्रश्न 7.
नीचे दी गई वस्तुओं में से गोलाकार, घनाभाकार, बेलनाकार और शंक्वाकार वस्तुओं को अलग-अलग छाँटो और लिखो- गेंद, पेंसिल, माचिस, बॉक्स, गोली, कीप, बेलन, ईंट, साबुन की टिकिया, पीपा, तम्बू, फुकनी, मेज, मुँह देखने का शीशा, किताब, पेन, बाँसुरी।
उत्तर:
गोलाकार – गेंद, गोली।
धानाभाकार – माचिस, बॉक्स, ईंट, साबुन की टिकिया, मुँह देखने का शीशा, किताब, मेज
बेलनाकार – पेंसिल, बेलन, पीपा, फॅकनी, पेन, बाँसुरी
शंक्वाकार – कीप, तम्बू

UP Board Solutions for Class 2 Maths Gintara

UP Board Solutions for Class 2 Hindi Kalrav Chapter 1 जिसने सूरज चाँद बनाया

UP Board Solutions for Class 2 Hindi Kalrav Chapter 1 जिसने सूरज चाँद बनाया

जिसने सूरज चाँद बनाया शब्दार्थ

जिसने = जिस ईश्वर ने
चमकाया = रोशनी दी
महकाया = खुशबू दी
चहकाया = बोलना सिखाया
जगत् = संसार, दुनिया
गुण = अच्छी बातें
शीश = सिर

UP Board Solutions for Class 2 Hindi Kalrav Chapter 1 जिसने सूरज चाँद बनाया

जिसने सूरज ………………………………………… शीश झुकायें।

अर्थ – जिस ईश्वर ने सूरज और चाँद बनाया है तारों में रोशनी दी है फूलों में खुशबू पैदा की है चिड़ियों को बोलना सिखाया है सारी दुनिया को बनाया है हम उस भगवान के गुण गाते और आदर से उसके सामने सिर झुकाते हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 7 Psychological Experiments

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 7 Psychological Experiments (मनोवैज्ञानिक प्रयोग) are part of UP Board Solutions for Class 11 Psychology. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 7 Psychological Experiments (मनोवैज्ञानिक प्रयोग).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 7
Chapter Name Psychological Experiments
(मनोवैज्ञानिक प्रयोग)
Number of Questions Solved 2
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 7 Psychological Experiments (मनोवैज्ञानिक प्रयोग)

नोट – कक्षा 11 के नवीनतम पाठ्यक्रम में दो प्रयोगों को लिखने का प्रावधान है। ये प्रयोग हैं –

  1. प्रत्यक्षीकरण में तत्परता तथा
  2. अवधान विस्तार। दोनों प्रयोगों का प्रारूप निम्नवर्णित है।

प्रश्न 1.
‘प्रत्यक्षीकरण में तत्परता सम्बन्धी प्रयोग का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
प्रयोग – प्रत्यक्षीकरण में तत्परता

  1. प्रयोग का शीर्षक – प्रत्यक्षीकरण में तत्परता
  2. दिनांक – 02.01.2018
  3. वार या दिन – सोमवार
  4. समय – 10:45 प्रातः
  5. स्थान – कानपुर
  6. प्रयोज्य या विषय-पात्र का नाम – कु० अनिता गर्ग
  7. विषय-पात्र की आयु – 17 वर्ष
  8. प्रयोगकर्ता – रघुबीर शर्मा
  9. विषय-पात्र की शारीरिक एवं मानसिक दशा – सामान्य रूप से स्वस्थ एवं प्रसन्नचित्त।

प्रयोग की निर्धारित समस्या – प्रत्यक्षीकरण पर व्यक्ति की तत्परता के प्रभाव को ज्ञात करना या जानना।

प्रयोग की ओवश्यक सामग्री – स्टॉप वाच, दो भिन्न शब्द-सूचियाँ, जिनमें भिन्न-भिन्न दस-दस शब्द हैं। इन शब्द-सूचियों को तैयार करते समय इस बात का ध्यान रखना आवश्यक होता है कि प्रत्येक शब्द में कुल पाँच अक्षर ही हैं। इस प्रकार से चुने हुए शब्दों के अक्षरों को आगे-पीछे करके अव्यवस्थित रूप में लिख लिया जाता है। दोनों शब्द-सूचियों को अलग-अलग कागजों पर अव्यवस्थित रूप में लिख लिया जाता है। इसके अतिरिक्त कागज की एक अन्य शीट भी ली जाती है। जिसमें एक खिड़की कटी होती है, जिसमें से केवल एक ही शब्द दिखाई देता है।

चुने गये शब्दों की प्रथम सूची – प्रयोग के लिए पाँच अक्षर वाले शब्दों की प्रथम सूची में निम्नलिखित दस शब्दों को सम्मिलित किया जा सकता है। ये शब्द परस्पर सम्बद्ध नहीं हैं, बल्कि भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से सम्बन्धित हैं –

  1. NRATT (Train)
  2. URGAS (Sugar)
  3. RHMAC (March)
  4. TVOES (Stove)
  5. NEGER (Green)
  6. NEFIK (Knife)
  7. LUCOD (Cloud)
  8. OTOTH (Tooth)
  9. MPSAT (Stamp)
  10. GLVEO (Glove)

चुने गये शब्दों की द्वितीय सूची – प्रयोग के लिए पाँच अक्षर वाले शब्दों की द्वितीय सूची में केवल उन्हीं शब्दों को सम्मिलित किया गया है जिनका सम्बन्ध किसी-न-किसी रूप में विद्यालय से है। इस वर्ग के दस शब्द निम्नलिखित हो सकते हैं –

  1. CHIDL (Child)
  2. LOSOT (Stool)
  3. SCSLA (Class)
  4. HNBEC (Bench)
  5. HCKLA (Chalk)
  6. ICAHR (Chair)
  7. RDOBA (Board)
  8. LETAB (Table)
  9. PREPA (Paper)
  10. ELRCK (Clerk)

प्रयोग-विधि – प्रयोग प्रारम्भ करते हुए पहले चुने गये अव्यवस्थित शब्दों की प्रथम सूची को लिया जाता है। इसके साथ ही कागज की उस शीट को भी लिया जाता है जिसमें एक शब्द दिखाने वाली खिड़की कटी हुई है। शब्द सूची के ऊपर खिड़की वाली शीट को रखकर विषय-पात्र के सामने रखा जाता है तथा उसे खिड़की में से किसी एक अव्यवस्थित शब्द को दिखाया जाता है तथा उसे निर्देश दिया जाता है कि वह उस शब्द को व्यवस्थित रूप में बताये। विषय-पात्र को अपना उत्तर मौखिक रूप में ही देना होता है। प्रत्येक शब्द को केवल 30 सेकण्ड के लिए ही दिखाया जाता है। समय की सीमा निर्धारित करने के लिए स्टॉप वाच का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रकार एक-एक करके सभी दस शब्दों को विषय-पात्र को दिखाया जाता है तथा प्रत्येक बार विषय-पात्र द्वारा दिये गये उत्तर को नोट कर लिया जाता है। शब्दों की प्रथम सूची पूरी हो जाने के उपरान्त विषय-पात्र को कुछ विश्राम दिया जाता है। विश्राम के उपरान्त विषय-पात्र के सम्मुख चुने गये शब्दों की द्वितीय सूची को क्रमश: प्रस्तुत किया जाता है। इस सूची के शब्दों को दिखाने से पहले विषय-पात्र को सूचित कर दिया जाता है कि इस सूची में सम्मिलित सभी शब्द किसी-न-किसी रूप में विद्यालय के वातावरण से लिए गये हैं। इस सूचना को देने के उपरान्त प्रथम सूची के ही समान विषय-पात्र के सम्मुख एक-एक करके सभी दस शब्द 30-30 सेकण्ड के लिए प्रस्तुत किये जाते हैं। प्रत्येक उत्तर को नोट कर लिया जाता है। तथा उत्तर देने में लगे समय अर्थात् प्रतिक्रिया-काल को भी नोट कर लिया जाता है। यदि विषय-पात्र किसी शब्द का उत्तर नहीं दे पाता तो उसको प्रतिक्रिया काल 30 सेकण्ड ही मान लिया जाता है।

प्रदत्त निरूपण – उपर्युक्त प्रयोग से प्राप्त सभी परिणामों को निम्नलिखित तालिका में व्यवस्थित ढंग से लिख लिया जाता है –UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 7 Psychological Experiments 1

सावधानियाँ – प्रयोग में निम्नलिखित सावधानियों को ध्यान में रखा जाना आवश्यक होता है –

  1. विषय-पात्र को एक समय में केवल एक ही शब्द दिखाया जाना चाहिए।
  2. प्रयोग-स्थल का वातावरण पूर्ण रूप से शान्त तथा सुविधाजनक होना चाहिए।
  3. प्रतिक्रिया काल का मापन शुद्ध होना चाहिए।

परिणाम एवं निष्कर्ष – अव्यवस्थित शब्दों की दोनों सूचियों के प्रतिक्रिया काल का औसत मान ज्ञात किया तथा उनकी तुलना की गयी। इस तुलना से ज्ञात हुआ कि प्रथम सूची के शब्दों को व्यवस्थित करने में दूसरी सूची की तुलना में लगभग दो गुना समय लगा। इस परिणाम के आधार पर निष्कर्ष स्वरूप कहा जा सकता है कि प्रत्यक्षीकरण मर विषय-पात्र की तत्परता का प्रभाव अनिवार्य रूप से, पड़ता है।

प्रश्न 2.
पढ़ने में प्रत्यक्षीकरण या अवधान-विस्तार के प्रयोग का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

प्रयोग-पढ़ने में प्रत्यक्षीकरण या अवधान-विस्तार

  1. प्रयोगकर्ता का नाम – महेन्द्र
  2. प्रयोज्य का नाम – राकेश
  3. प्रयोज्य की आयु – 20 वर्ष
  4. प्रयोज्य की शारीरिक एवं मानसिक अवस्था – सामान्य
  5. दिनांक – 03.01.2018
  6. दिन – मंगलवार
  7. समय – प्रात: 9 बजे

प्रयोग की पृष्ठभूमि – एक साथ एक दृष्टि में व्यक्ति जितने अक्षर देख लेता है, वह उसका ‘पढ़ने में प्रत्यक्षीकरण’ या ‘अवधान-विस्तार’ कहलाता है। एक दृष्टि में जो व्यक्ति अधिक शब्द पढ़ लेता है उसकी पढ़ने की गति तीव्र होती है तथा जो कम शब्द पढ़ता है उसकी गति मन्द होती है। एक दृष्टि में व्यक्ति जितने निरर्थक अक्षर और सार्थक शब्दों को देख सकता है या पढ़ सकता है, उसे नापा जा सकता है। पढ़ने में प्रत्यक्षीकरण या अवधान-विस्तार के मापन के लिए टेचिस्टोस्कोप का निर्माण हैमिल्टन (Hamilton) ने किया तथा प्रयोग कैटेल (Cattle) ने 1885 ई० में किया।

समस्या – इंस प्रयोग में प्रयोगकर्ता के समक्ष निम्नलिखित समस्याएँ थीं –

  1. प्रयोज्य की, प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया को समझना।
  2. प्रयोज्य के सार्थक और निरर्थक शब्दों को पढ़ने की योग्यता की जाँच करना।
  3. प्रयोज्य के सार्थक और निरर्थक शब्दों के बोध विस्तार का निर्धारण करना।।

परिकल्पना – निरर्थक शब्दों की अपेक्षा सार्थक शब्दों को पढ़ने की क्षमता और बोध-स्तर अधिक होता है।

यन्त्र एवं उपकरण – टेचिस्टास्कोप, निरर्थक शब्दों की तीन सूचियाँ, सार्थक शब्दों की तीन सूचियाँ, कागज, पेन्सिल आदि।

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 7 Psychological Experiments 2UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 7 Psychological Experiments 3

तैयारी – प्रयोज्य को टेचिस्टास्कोप से इतनी दूरी पर बैठाया कि कार्ड पर दिखाये जाने वाले अक्षरों को वह आसानी से पढ़ सके। टेचिस्टोस्कोप में दो अक्षरों वाले सार्थक कार्ड को सबसे पहले लगाया।

निर्देश – सभी तैयारी करने के बाद प्रयोगकर्ता ने प्रयोज्य को निम्नलिखित निर्देश दिये

  1. सर्वप्रथम मैं आपसे सावधान कहूँगा’, ‘सावधान’ कहते ही आप अपना ध्यान यन्त्र की खिड़की पर लगाना और आरम्भ कहते ही एक कार्ड आपको खिड़की पर दिखाया जाएगा, जिस पर कुछ अक्षर लिखे होंगे, इन अक्षरों को आपको पढ़ना होगा।
  2. जब आप पहले कार्ड के अक्षरों को पढ़ लोगे तो उससे अधिक अक्षरों वाले कार्ड बारी-बारी से दिखाये जाएँगे।
  3. जब किसी कार्ड के अक्षर आप एक बार में सही नहीं पढ़ पाओगे तो उतने ही अक्षरों वाला। दूसरा कार्ड आपको दिखाया जाएगा। केवल तीन बार ही एक कार्ड दिखाया जा सकता है।
  4. जब आप एक ही तरह के तीन कार्ड नहीं पढ़ पाओगे तो प्रयोग समाप्त हो जाएगा। अन्त में आपसे अन्तर्दर्शन रिपोर्ट ली जाएगी।

वास्तविक प्रयोग – निर्देश देने के पश्चात् प्रयोगकर्ता ने प्रयोग प्रारम्भ किया। ‘प्रारम्भ’ कहते ही दो अक्षरों वाले सार्थक शब्द के कार्ड को टेचिस्टास्कोप की खिड़की में से दिखाया। प्रयोज्य ने उसे ठीक पढ़ दिया। इसके बाद क्रमश: एक-एक करके सभी कार्ड उसी प्रकार खिड़की में से दिखाये गये और प्रयोज्य ने उन्हें सही-सही पढ़ दिया। अन्त में आठ अक्षरों वाला सार्थक शब्द का कार्ड प्रयोज्य जब तीन बार में भी नहीं पढ़ सका तो यहीं पर प्रयोग रोक दिया।

इसके बाद प्रयोग का दूसरा भाग शुरू किया। अब पहले दो अक्षरों वाले निरर्थक शब्द का कार्ड लगाया। इसमें प्रयोज्य ने केवल पाँच कार्ड सही रूप से पढ़े। छठे कार्ड को प्रयोज्य नहीं पढ़ सका; अत: प्रयोग यहीं पर समाप्त कर दिया।

सावधानियाँ – प्रयोग करते समय निम्नलिखित सावधानियाँ रखी गयीं –

  1. टेचिस्टास्कोप को इतना ऊँचा रखा गया जिससे प्रयोज्य ठीक से कार्ड को देख सके।
  2. टेचिस्टास्कोप की खिड़की पर उचित प्रकाश की व्यवस्था की गयी।
  3. वातावरण शान्त रखा गया।

परिणाम – प्रस्तुत प्रयोग के परिणाम इस प्रकार प्राप्त हुए—प्रयोज्य ने सार्थक शब्दों में से सात अक्षरों वाले शब्दों को पढ़ा और निरर्थक शब्दों में वह पाँच अक्षर वाले शब्दों तक ही पढ़ सका। इस प्रकार प्रयोग के परिणाम से स्पष्ट है कि सार्थक शब्दों का उसका अवधान-विस्तार सात है और “निरर्थक शब्दों का अवधान विस्तार पाँच है।

अन्तर्दर्शन रिपोर्ट – प्रयोग समाप्त होते ही प्रयोज्य ने अपनी अन्तर्दर्शन रिपोर्ट में इस प्रकार कहा, “प्रारम्भ में मुझे काफी कठिनाई का अनुभव हो रहा था लेकिन कार्ड पर लिखे गये अक्षरों की संख्या कम होने के कारण मुझे पढ़ने में आसानी हुई। निरर्थक शब्दों को पढ़ने में सार्थक शब्दों की अपेक्षा अधिक कठिनाई का अनुभव हुआ।

निष्कर्ष – इस प्रयोग के आधार पर प्रयोगकर्ता ने निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले –

  1. निरर्थक शब्दों को पढ़ने में सार्थक शब्दों की अपेक्षा अधिक कठिनाई होती है।
  2. सार्थक शब्दों का अवधान-विस्तार, निरर्थक शब्दों की अपेक्षा अधिक होता है।
  3. इस प्रयोग में गैस्टाल्टवादियों द्वारा प्रतिपादित प्रत्यक्षीकरण में समग्रता का नियम प्रभावित करता है। इसी कारण प्रयोज्य गलती को नहीं समझ पाता।

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 7 School: As a Formal Agency of Education

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 7 School: As a Formal Agency of Education (विद्यालय: शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में) are the part of UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 7 School: As a Formal Agency of Education (विद्यालय: शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 7
Chapter Name School: As a Formal Agency of Education
(विद्यालय: शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में)
Number of Questions Solved 34
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 7 School: As a Formal Agency of Education (विद्यालय: शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विद्यालय का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। विद्यालय की आवश्यकता एवं उपयोगिता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

विद्यालय का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of School)

शिक्षा के औपचारिक अभिकरणों में विद्यालय (School) मुख्यतम अभिकरण है। साधारण शब्दों में कहा जा सकता है कि बच्चों को शिक्षा प्रदान करने वाली व्यवस्थित संस्था को विद्यालय या स्कूल कहते हैं। विद्यालय शब्द विद्या + आलय दो शब्दों का संयोग है। आलय का शाब्दिक अर्थ स्थान है। इस प्रकार विद्यालय से अभिप्राय उस स्थान से हैं जहाँ विद्यार्थियों को विद्या प्रदान की जाती है। अंग्रेजी के स्कूल शब्द की व्युत्पत्ति यूनानी शब्द ‘Schola’ से हुई है, जिसका अर्थ है-अवकाश (Leisure)। प्रत्यक्ष रूप से तो विद्यालय और अवकाश के बीच कोई समानता या सम्बन्ध नहीं जान पड़ता, किन्तु इतना अवश्य है कि प्राचीन यूनान में अवकाश का उपयोग आत्म-विकास के लिए किया जाता था। आत्म-विकास का अभ्यास एक विशिष्ट एवं सुनिश्चित स्थान पर होता था, जिसे ‘अवकाश’ कहकर पुकारा गया। इस भाँति, अवकाश-आत्म-विकास (अर्थात् शिक्षा) में जुड़ गया। कालान्तर में अवकाश शिक्षा का समानार्थी बन गया। इस विचार के समर्थन में ए० एफ० लीच ने लिखा है, “वाद-विवाद या वार्ता के स्थान, जहाँ एथेन्स के युवक अपने अवकाश के समय को खेलकूद, व्यवसाय और युद्ध के प्रशिक्षण में बिताते थे, धीरे-धीरे दर्शन और उच्च कलाओं के स्कूलों में बदल गए। एकेडेमी के सुन्दर उद्यानों में व्यतीत किए जाने वाले अवकाश के माध्यम से विद्यालयों का विकास हुआ।”

अनेक शिक्षाशास्त्रियों ने विद्यालय की निम्नलिखित परिभाषाएँ प्रतिपादित की हैं

  1. जॉन डीवी के अनुसार, “विद्यालय एक ऐसा विशिष्ट वातावरण है जहाँ जीवन के कुछ गुणों और कुछ विशेष प्रकार की क्रियाओं तथा व्यवसायों की शिक्षा इस उद्देश्य से दी जाती है कि बालक का विकास वांछित दिशा में हो।”
  2. ओटावे के अनुसार, “विद्यालय को एक ऐसा सामाजिक आविष्कार मानना चाहिए जो समाज के बालकों के लिए विशेष प्रकार की शिक्षा प्रदान करने में समर्थ हो।’
  3. रॉस के अनुसार, “विद्यालय वे संस्थाएँ हैं, जिनको सभ्य मनुष्य के द्वारा इस उद्देश्य से स्थापित किया जाता है कि समाज में सुव्यवस्थित और योग्य सदस्यता के लिए बालकों की तैयारी में सहायता मिले।”
  4. टी० पी० नन के अनुसार, “विद्यालय को मुख्य रूप से इस प्रकार का स्थान नहीं समझा जाना चाहिए जहाँ किसी निश्चित ज्ञान को सीखा जाता है, वरन् ऐसा स्थान जहाँ बालकों को क्रियाओं के उन निश्चित रूपों में प्रशिक्षित किया जाता है जो इस विशाल संसार में सबसे महान् और सबसे अधिक महत्त्व वाली है।”

विद्यालय की आवश्यकता और उपयोगिता
(Need and Utility of School)

आज विद्यालय शिक्षा का एक आवश्यक, औपचारिक, शक्तिशाली एवं महत्त्वपूर्ण स्थान बन गया है। आधुनिक समाज में विद्यालये की आवश्यकता तथा उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए एस० बालकृष्ण जोशी लिखते हैं, “किसी भी राष्ट्र की प्रगति का निर्माण विधानसभाओं, न्यायालयों और फैक्ट्रियों में नहीं, बल्कि विद्यालयों में होता है।”

उपर्युक्त विवेचन से निष्कर्ष निकलता है कि शिक्षा का सविधिक तथा औपचारिक साधन विद्यालय, व्यक्ति और समाज, दोनों की ही प्रगति के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण, आवश्यक एवं उपयोगी है। किसी भी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व्यवस्था के अन्तर्गत इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। टी० पी० नन का कहना है, एक राष्ट्र के विद्यालय उसके जीवन के वे अंग हैं, जिनका विशेष कार्य है उसकी आध्यात्मिक शक्ति को दृढ़ बनाना, उसकी ऐतिहासिक निरन्तरता को बनाए रखना, उसकी भूतकाल की सफलताओं को सुरक्षित रखना और उसके भविष्य की गारण्टी करना।”

प्रश्न 2.
शिक्षा के एक मुख्य औपचारिक अभिकरण के रूप में विद्यालय के कार्यों का उल्लेख 
कीजिए।
विद्यालय के कार्यों की व्याख्या कीजिए। विद्यालय के चार प्रमुख कार्यों की व्याख्या कीजिए।
वैयक्तिक विकास के विचार से विद्यालय के कार्यों को लिखिए।
उत्तर:

विद्यालय के कार्य
(Functions of School)

विद्यालय के कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य निम्नलिखित हैं|

1.शारीरिक विकास- आधुनिक विद्यालयों का प्रमुख एवं प्रथम कर्तव्य बालक का शारीरिक विकास करना है। बालकों का मानसिक विकास, शारीरिक विकास पर ही निर्भर करता है। अत: बालकों को स्वच्छता व स्वास्थ्यवर्द्धन का विद्यालय के कार्य प्रशिक्षण प्रदान करने हेतु प्रत्येक विद्यालय अपने प्रांगण में खेलकूद और व्यायाम का समुचित प्रबन्ध रखता है। इसके अलावा आजकल विद्यालयों में बच्चों के लिए सन्तुलित आहार एवं चिकित्सा सेवा की व्यवस्था भी रहती है।

2. मानसिक विकास- विद्यालय का दूसरा औपचारिक कार्य प्रशिक्षण बालक का मानसिक एवं बौद्धिक विकास करना है। विद्यालय का । सामाजिक प्रशिक्षण वातावरण एवं क्रियाएँ इस प्रकार की हैं कि बालक में ज्ञान की भूख ” भावात्मक एवं सौन्दर्यात्मक जाग्रत हो और उसमें अधिक-से-अधिक जानने के लिए जिज्ञासा व प्रशिक्षण उत्सुकता पैदा हो। शिक्षा का एक विशिष्ट कार्य बालक की रुचि के नेतृत्व एवं नागरिकता के गुणों का अभिरुचि, योग्यता तथा आवश्यकताओं के अनुसार उसकी मानसिक विकास शक्तियों का विकास करना है। मानसिक रूप से विकसित बालक ही बौद्धिक उन्नति को प्राप्त कर भावी जीवन के मूल्यों का निर्माण कर सकता है।

3. नैतिक एवं चारित्रिक विकास- बालक में नैतिक-चरित्र विकसित करना विद्यालय का तीसरा औपचारिक कर्तव्य है। चारित्रिक विकास की दृष्टि से विद्यालय में इस प्रकार का वातावरण तैयार किया जाना चाहिए जिससे कि बालक में नैतिक मूल्यों का प्रादुर्भाव एवं विकास हो सके। शिक्षार्थियों का नैतिक विकास समाज के वातावरण पर निर्भर करता है। अत: विद्यालय को उपयुक्त सामाजिक वातावरण की रचना तथा उत्तम सामाजिक क्रियाओं की व्यवस्था में भी योगदान करना चाहिए। वस्तुत: सामाजिक वातावरण में सामाजिक क्रियाओं के माध्यम से ही बालकों में नैतिक गुण एवं आदर्श आचरण का विकास सम्भव है।

4. व्यावसायिक एवं औद्योगिक प्रशिक्षण- विद्यालय का एक महत्त्वपूर्ण कार्य यह है कि वह बालक को भावी जीवन में आत्मनिर्भर बनने के लिए व्यावसायिक एवं औद्योगिक प्रशिक्षण प्रदान करे। माध्यमिक शिक्षा की समाप्ति पर आधुनिक विद्यालय बालकों की रुचि एवं रुझान के व्यवसायों में उचित प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। विद्यालय ऐसे विभिन्न व्यवसायों की शिक्षा का प्रबन्ध करते हैं जो शिक्षार्थियों को आगे चलकर अपने निर्दिष्ट व्यवसाय को चुनने में सहायता दे सके और इस भाँति उन्हें जीविकोपार्जन के लिए तैयार कर सके। यही कारण है कि वर्तमान समय में व्यावसायिक और औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थाओं का महत्त्व उत्तरोत्तर बढ़ रहा है।

5. सामाजिक प्रशिक्षण- आधुनिक समय में यह विचारधारा परिपक्व एवं सर्वमान्य होती जा रही है । कि विद्यालय को सामुदायिक केन्द्र के रूप में कार्य करना चाहिए। सामाजिक पुनर्रचना के दायित्व का निर्वाह करने की दृष्टि से विद्यालय सामाजिक समारोहों, सामाजिक कार्यों तथा समाज-सेवा के माध्यम से बालकों को उचित सामाजिक प्रशिक्षण प्रदान करते हैं।

6. भावात्मक एवं सौन्दर्यात्मक प्रशिक्षण- बच्चों को भावात्मक एवं सौन्दर्यात्मक प्रशिक्षण प्रदान करना भी विद्यालय का एक प्रमुख औपचारिक कार्य हैं। आधुनिक विद्यालयों में संगीत सम्मेलनों, नाटकों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, वाद-विवाद प्रतियोगिताओं तथा चित्रकला प्रदर्शनियों का आयोजन कर शिक्षार्थियों को भावात्मक तथा सौन्दर्यात्मक परीक्षण दिया जाता है।

7. नेतृत्व एवं नागरिकता के गुणों का विकास- लोकतन्त्र की सफलता उत्तम नेतृत्व एवं नागरिकता पर निर्भर करती है। विद्यालय के वातावरण तथा गतिविधियों के अन्तर्गत ही बालक-बालिकाओं में श्रेष्ठ नेतृत्व के गुणों का विकास होता है। इसके अतिरिक्त विद्यालय ही बालकों को अपने कर्तव्य एवं अधिकार समझने की तथा उनका उचित उपयोग करने की शिक्षा प्रदान करते हैं। बालक को समाज में अपना योग्य एवं विशिष्ट स्थान बनाने का प्रशिक्षण भी विद्यालय द्वारा ही प्राप्त होता है। स्पष्टत: विद्यालय के प्रधान कर्तव्यों में आदर्श नागरिकता एवं नेतृत्व के गुणों का विकास भी सम्मिलित है।

8. मानव-मात्र का कल्याण- शिक्षा का एकमात्र अभीष्ट लक्ष्य मानव-मात्र का कल्याण करना है। शिक्षा की औपचारिक संस्थाएँ विद्यालय हैं। वस्तुत: विद्यालय ज्ञान के वे महान् प्रकाश-स्तम्भ हैं जो विचलित एवं भूले-भटके मनुष्यों को सत्य का मार्ग दिखाते हैं। ज्ञानयुक्त मानव ही सुखी, समृद्ध, शान्त एवं सम्यक् जीवन जी सकता है। सद्ज्ञान, त्याग, परोपकार एवं नि:स्वार्थ सेवा का भाव जगाता है। इस भॉति सद्ज्ञान एवं वास्तविक शिक्षा प्रदान कर विद्यालय मानव-मात्र का कल्याण करते हैं।

 

प्रश्न 3 घर तथा विद्यालय में सम्बन्ध स्थापित करने के मुख्य उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
घर एवं परिवार बालक की प्रथम पाठशाला है। घर में बालक की प्रारम्भिक शिक्षा की व्यवस्था होती है तथा शिक्षा को विस्तृत रूप प्रदान करने का कार्य विद्यालय द्वारा किया जाता है। इस स्थिति में बच्चों की शिक्षा की सुचारु व्यवस्था के लिए घर तथा विद्यालय में परस्पर अच्छे सम्बन्ध एवं सहयोग का होना अति आवश्यक है। इस सहयोगात्मक सम्बन्ध को स्थापित करने के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित उपायों या विधियों को अपनाना आवश्यक है|

1. अभिभावकों का सम्मेलन- समय-समय पर विद्यालय के घर तथा विद्यालय में सम्बन्ध प्रांगण में अभिभावकों के सम्मेलन आयोजित होते रहने चाहिए और स्थापित करने के उपाय उनमें सभी वर्गों के प्रतिनिधियों को आमन्त्रित किया जाना चाहिए,  ताकि उस बालक के माता-पिता, गुरुजनों तथा समाज के ‘प्रतिनिधियों को परस्पर मिलने का अवसर प्राप्त हो सके। सभी लोग प्रधानाचार्य का सहयोग एकत्र होकर बालकों की पढ़ाई-लिखाई तथा अनुशासन सम्बन्धी विद्यालय द्वारा आर्थिक दण्ड नहीं समस्याओं पर विचार-विमर्श कर सकते हैं और उनका उचित हल खोज सकते हैं। यदि गृह एवं समुदाय के लोग विद्यालय के लगन क्रिया-कलापों में रुचि प्रदर्शित कर सहयोग देंगे तो इससे शिक्षा की व्यवस्था सुन्दर बन सकेगी।

2. बालक की प्रगति-रिपोर्ट- विद्यालय को चाहिए कि वह घर सामायिक जीवन के केन्द्र से सम्बन्ध स्थापित करने हेतु समय-समय पर बालकों की प्रगति-रिपोर्ट अभिभावकों को भेजता रहे। उधर अभिभावकों को भी कर्तव्य है कि वे अपने बालक की पढ़ाई-लिखाई तथा चाल-चलन पर पूरा ध्यान दें और वस्तुस्थिति से शिक्षकों को लगातार अवगत कराते रहें। यदि बालक अध्ययन-कार्य में कम रुचि ले रहा है या अनुशासनहीन । हो रहा है तो अभिभावकों को तत्काल ही विद्यालय से सम्पर्क स्थापित कर समस्या का निराकरण करना चाहिए।

3. प्रधानाचार्य का सहयोग- समस्याग्रस्त बालक के अभिभावक की रिपोर्ट पर प्रधानाचार्य को तुरन्त ध्यान देना चाहिए। सम्भव है बालक स्कूल से घर जल्दी या बहुत देर में पहुँचता हो, गृहकार्य न करता हो, बुरी संगति का शिकार हो गया हो या कक्षा छोड़कर भाग जाता हो आदि। सभी दशाओं में शिकायत मिलने पर प्रधानाचार्य का कर्तव्य है कि वह बालक को सम्बन्धित शिक्षक के सामने बुलाकर उसके बारे में बातचीत करे, समझाए या दण्ड दे और भविष्य में उस पर पूरी निगाह रखें। इस प्रकार प्रधानाचार्य का सहयोग घर तथा विद्यालय को परस्पर जोड़ने में मदद देता है।

4. विद्यालय द्वारा आर्थिक दण्ड नहीं- आर्थिक दण्ड का प्रत्यक्ष भार बालक के माता-पिता पर पड़ता है, जिससे उन्हें परेशानी हो सकती है। अत: अधिकतम सहयोग लेने की दृष्टि से विद्यालय को चाहिए कि बच्चों को कभी भी आर्थिक दण्ड न दिया जाए। । 5. शिक्षक बालक के घर जाए-शिक्षा के विभिन्न साधनों के बीच तालमेल स्थापित करने की दृष्टि से समय-समय पर शिक्षक का बालक के घर जाना आवश्यक है। शिक्षकों को चाहिए कि वे समय निकालकर बालक के अभिभावकों से उनके घर सम्पर्क स्थापित करें, उनसे बालक की समस्या जाने और उनका यथोचित समाधान तलाश करें। सभी शिक्षा-मनोवैज्ञानिकों का मत है कि शिक्षक को समस्यात्मक बालक के घर अनिवार्य रूप से जाना चाहिए।

5. शिक्षकों की सत्यनिष्ठा एवं लगन- शिक्षक को विद्यालय के अन्तर्गत अपने कर्तव्य की पूर्ति अत्यन्त सत्यनिष्ठा, लगन एवं तत्परता के साथ करनी चाहिए। इससे बालकों तथा अभिभावकों पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है, जिसके परिणामत: वे शिक्षकों को अधिकाधिक सम्मान की दृष्टि से देखते हैं और उनसे सम्पर्क बनाकर प्रसन्न तथा प्रेरित होते हैं।

7. सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार- शैक्षिक अधिकारियों का बालकों के अभिभावकों तथा समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ प्रेम एवं सहानुभूतिपूर्ण तथा मानवीय व्यवहार होना चाहिए। शिक्षा के विभिन्न अभिकरणों का एक-दूसरे से उत्तम व्यवहार, विश्वास और सहयोग की दिशा में एक सार्थक कदम है।

8. सामाजिक कार्य- समाज सेवा, राष्ट्रीय सेवा योजना, श्रमदान, सफाई सप्ताह, बालचर संघ तथा प्रौढ़ शिक्षा आदि सामाजिक कार्य क्योंकि समाज के कल्याण की भावना से परिपूर्ण होते हैं; अत: अभिभावकों, शिक्षकों तथा शिक्षार्थियों को मिलकर इसमें भागीदारी करनी चाहिए। इस प्रकार के सामाजिक क्रियाकलापों से घर, विद्यालय तथा समुदाय के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध बनेंगे।

9. सामुदायिक जीवन के केन्द्र- विद्यालयों की स्थापना समुदाय द्वारा जनकल्याण की भावना से की जाती है; अतः विद्यालयों को सामुदायिक जीवन का सबल एवं सजीव केन्द्र होना चाहिए। इसके लिए विद्यालय के प्रांगण में प्रौढ़ शिक्षा, स्त्री शिक्षा, रात्रि पुस्तकालय एवं वाचनालय तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों की व्यवस्था की जा सकती है। परिवार एवं समुदाय द्वारा विद्यालय के साधनों का उपयोग एक स्वस्थ परम्परा को जन्म देता है, जिसके फलस्वरूप गृह, विद्यालय एवं समुदाय के सदस्यों के बीच गहन सूझ-बूझ तथा अन्तर्सम्बन्ध स्थापित होते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विद्यालय से आप क्या समझते हैं ? विद्यालय को एक प्रभावशाली अभिकरण बनाने के लिए आप क्या सुझाव देंगे ?
शिक्षा के अभिकरण के रूप में विद्यालय का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में बच्चों को औपचारिक रूप से शिक्षा प्रदान करने वाला मुख्यतम अभिकरण ‘विद्यालय’ (School) कहलाता है। विद्यालय शिक्षा का औपचारिक अभिकरण है। सभ्य मानव समाज ने अपनी सोच के बल पर विद्यालयों का विकास किया है। ओटावे के अनुसार, ‘‘विद्यालय को एक सामाजिक आविष्कार मानना चाहिए जो समाज के बालकों के लिए विशेष प्रकार की शिक्षा प्रदान करने में समर्थ है। इसी प्रकार रॉस ने स्पष्ट किया है, “विद्यालय वे संस्थाएँ हैं, जिनको सभ्य मनुष्य के द्वारा इस उद्देश्य से स्थापित किया जाता है कि समाज में सुव्यवस्थित और योग्य सदस्यता के लिए बालकों को तैयारी में सहायता मिले।”

स्पष्ट है कि बच्चों की व्यवस्थित शिक्षा में विद्यालय का विशेष महत्त्व है। अब प्रश्न उठता है कि विद्यालयों को शिक्षा का अधिक प्रभावशाली एवं उपयोगी अभिकरण कैसे बनाया जाए? इसके लिए प्रथम सुझाव यह है कि विद्यालय की अनुशासन व्यवस्था अति उत्तम होनी चाहिए। विद्यालयों का शैक्षिक वातावरण अधिक-से-अधिक सौहार्दपूर्ण, आदर्शपरक तथा मूल्यपरक होना चाहिए। विद्यालय में अध्यापकों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। अध्यापकों को पूर्ण निष्ठा एवं लगन से तथा दायित्वपूर्ण ढंग से अध्यापन कार्य । करना चाहिए। विद्यालय प्रबन्धन द्वारा शिक्षा के स्तर को हर प्रकार से उन्नत करने के सभी सम्भव उपाय किए जाने चाहिए।

प्रश्न 2 शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में विद्यालय का विकास कैसे हुआ है ?
उत्तर:

विद्यालय के विकास के कारक
(Points of Development of Schools)

शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में व्यवस्थित विद्यालयों का विकास सभ्यता के पर्याप्त विकास के बहुत बाद में हुआ है। शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में विद्यालय के विकास को प्रोत्साहन देने वाले मुख्य कारक निम्नलिखित हैं

1. पारम्परिक परिवार के स्वरूप में परिवर्तन- पारम्परिक रूप से परिवार का स्वरूप एवं आकार आज के एकाकी परिवार से नितान्त भिन्न था। परिवार बड़े एवं विस्तृत थे। इस प्रकार के परिवारों में बच्चों की सामान्य शिक्षा की समुचित व्यवस्था परिवार में ही हो जाती थी। परन्तु जब पारम्परिक परिवार ने क्रमशः एकाकी परिवार का रूप ग्रहण किया तो परिवार में बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था हो पाना असम्भव हो गया। अत: बच्चों की शिक्षा की सुचारु व्यवस्था के लिए व्यवस्थित विद्यालयों की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी। इसके अतिरिक्त सभ्यता के विकास के साथ-साथ शिक्षा भी अधिक विस्तृत, विशिष्ट एवं जटिल हो गई। इस प्रकार की शिक्षा की व्यवस्था घर पर सम्भव नहीं थी।

2. परिवार द्वारा दायित्वमुक्त होना- पारम्परिक रूप से बच्चों की शिक्षा का दायित्व परिवार का होता था, परन्तु वर्तमान सभ्यता के विकास के परिणामस्वरूप बच्चों की शिक्षा को सार्वजनिक एवं सामाजिक क्षेत्र का कार्य मान लिया गया। इसके साथ ही शिक्षा की व्यवस्था करने के लिए विद्यालय का विकास भी हुआ।

3. विद्यालय के विकास के आर्थिक कारण- विद्यालय के विकास के लिए कुछ आर्थिक कारक भी जिम्मेदार हैं। सभ्यता के विकास के साथ-साथ परिवार की आर्थिक समस्याएँ बढ़ने लगीं। इन दशाओं में बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था करना परिवार के लिए प्रायः असम्भव हो गया। अत: बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था के लिए विद्यालय का प्रादुर्भाव हुआ।

प्रश्न 3.
विद्यालय की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

विद्यालय की प्रमुख विशेषताएँ
(Main Characteristics of School)

शिक्षा के प्रमुख औपचारिक अभिकरण के रूप में विद्यालय की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं|

  1. विद्यालय एक औपचारिक अभिकरण है। इसका उद्देश्य छात्रों में आदर्श नागरिकों के गुणों को विकसित करना होता है। विद्यालय अपने आप में समाज की एक लघु संस्था है।
  2. विद्यालय एक सामाजिक ढाँचा है। इस व्यवस्था में छात्रों द्वारा विभिन्न विषयों को सीखने का तथा अध्यापकों द्वारा सिखाने का कार्य किया जाता है।
  3. औपचारिक अभिकरण होने के कारण विद्यालय की एक स्पष्ट तथा निश्चित नीति निर्धारित की जाती है जिसका पालन सभी पक्षों द्वारा किया जाता है।
  4. विद्यालय के कार्य सुचारु तथा नियमित रूप से सम्पन्न होते हैं।
  5. विद्यालय की एक अपनी संस्कृति होती है। यह सबके हित के लिए होती है तथा सभी पक्ष इसका पालन करते हैं।
  6. विद्यालय के माध्यम से सामूहिक ढंग से जीवन व्यतीत किया जाता है। इससे जुड़े सभी व्यक्तियों के लिए ‘मैं’ या ‘मेरे’ के स्थान पर ‘हम’ या ‘हमारे’ का भाव प्रबल होता है।
  7. विद्यालय की एक विशेषता यह है कि इस वातावरण में अनेक प्रकार की सामाजिक अन्तर्कियाएँ । सम्पन्न होती हैं। ये अन्तर्कियाएँ विभिन्न बालकों के मध्य, बालकों तथा अध्यापकों के मध्य, अध्यापक तथा अध्यापक के मध्य, अध्यापकों एवं प्रधानाचार्य के मध्य सम्पन्न हुआ करती हैं।

प्रश्न 4.
विद्यालय के सामान्य महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

विद्यालय का सामान्य महत्त्व
(General Importance of School)

विद्यालय के सामान्य महत्त्व का विवरण निम्नलिखित है|

  1. आधुनिक जीवन अत्यधिक जटिल होता जा रहा है। जनसंख्या, आवश्यकताओं तथा मूल्य-वृद्धि ने मनुष्यों को जीवन-व्यापार में असामान्य रूप से व्यस्त कर दिया है। लोगों के पास इतना समय नहीं रह गया है। कि वे अपने बच्चों की शिक्षा की देखभाल कर सकें। अत: शिक्षा सम्बन्धी अधिकतम दायित्व विद्यालय के पास आ गए हैं।
  2. अपने सुनिश्चित उद्देश्य तथा पूर्व-नियोजित शैक्षिक कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यालय बालक के व्यक्तित्व को व्यापक रूप से प्रभावित करता है। यहाँ बालक के व्यक्तित्व का सामंजस्यपूर्ण विकास होता
  3. विद्यालय में राज्य के लिए उपयोगी नागरिक के गुणों; जैसे-धैर्य, सहयोग, उत्तरदायित्व आदि का विकास होता है। वस्तुतः विद्यालय ही एकमात्र वह साधन है जिसके द्वारा शिक्षित नागरिकों का निर्माण सम्भव है।
  4. शिक्षा की प्रक्रिया सामाजिक है और विद्यालय एक प्रमुख सामाजिक संस्था है। विद्यालय में समाज की निरन्तरता और विकास के लिए सभी प्रभावपूर्ण साधन केन्द्रित होते हैं।
  5. विद्यालय राष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तान्तरित करने के अभिकरण हैं। इसके अतिरिक्त ये बालकों में बहुमुखी संस्कृति का विकास करने का महत्त्वपूर्ण साधन भी हैं।
  6. विद्यालय गृह एवं व्यापक विश्व को जोड़ने वाली कड़ी हैं। जैसा कि रेमॉण्ट का कथन है, “विद्यालय बाह्य जीवन के बीच की अर्द्ध-पारिवारिक कड़ी है जो बालक की उस समय प्रतीक्षा करता है, जब वह अपने माता-पिता की छत्रछाया को छोड़ती है।”

प्रश्न 5.
घर तथा विद्यालय में पाए जाने वाले सम्बन्ध का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

घर तथा विद्यालय का आपसी सम्बन्ध
(Relation between Home and School)

घर अथवा परिवार तथा विद्यालय के आपसी सम्बन्ध की आवश्यकता एवं महत्त्व को रॉस ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “यदि गृह एवं विद्यालय के बीच सहयोग या सामंजस्य स्थापित न किया जाए तो बालक का अत्यधिक अहित होगा। घर बालक का प्रथम विद्यालय है और विद्यालय एक प्रकार से घर का विस्तार है। शिक्षण संस्था के रूप में विद्यालय घर का स्थान नहीं ले सकता, परन्तु इन दोनों के बीच विशेष सहयोग होता है।” घर अथवा परिवार तथा विद्यालय के आपसी सम्बन्ध का संक्षिप्त विवरण निम्नवर्णित है

  1. घर तथा विद्यालय दोनों ही समाज की अभिन्न इकाइयाँ हैं तथा बालक के सर्वांगीण विकास के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं।
  2. बच्चों का जीवन घर एवं विद्यालय में ही व्यतीत होता है। बच्चा घर से विद्यालय जाता है तथा विद्यालय से घर के वातावरण में पुनः आ जाता है। इस प्रकार से घर तथा विद्यालय दोनों ही बच्चों के व्यक्तित्व के विकास में निरन्तर योगदान प्रदान करते हैं।
  3. बच्चे की शिक्षा की प्रक्रिया में विद्यालय तथा परिवार दोनों का योगदान होता है। विद्यालय द्वारा दिया गया गृह-कार्य आदि परिवार के सदस्यों की सहायता से पूरा होता है। विद्यालय की विभिन्न शैक्षिक गतिविधियों को सुचारु रूप से पूरा करने के लिए परिवार की सहायता अति आवश्यक होती है।

उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि घर अथवा परिवार तथा विद्यालय परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है। बच्चों की शिक्षा के दृष्टिकोणों से ये दोनों परस्पर पूरक हैं। घर शिक्षा का मुख्यतम अनौपचारिक अभिकरण है, जब कि विद्यालय शिक्षा का मुख्यतम औपचारिक अभिकरण है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्पष्ट कीजिए कि पारिवारिक परिस्थितियों में होने वाले परिवर्तन ने विद्यालय के विकास को प्रोत्साहन दिया है ?
उत्तर:
पारम्परिक रूप से घर या परिवार ही बच्चों को शिक्षा प्रदान करने का कार्य करता था, परन्तु सभ्यता के विकास के साथ-साथ परिवार की परिस्थितियाँ, कार्य-क्षेत्र एवं स्वरूप में उल्लेखनीय परिवर्तन होने लगा। इस स्थिति में घर-परिवार द्वारा बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था कर पाना कठिन हो गया। परिणामस्वरूप, बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था करने के लिए विद्यालय का विकास हुआ। एक अन्य पारिवारिक कारक ने भी विद्यालय के विकास में उल्लेखनीय योगदान प्रदान किया। यह कारक था शिक्षा का अधिक जटिल तथा विस्तृत हो जाना। इस प्रकार की शिक्षा की व्यवस्था कर पाना परिवार के लिए सम्भव नहीं था। अत: विद्यालय का प्रादुर्भाव एवं विकास हुआ।

प्रश्न 2.
बच्चों की शिक्षा की सुव्यवस्था के लिए घर तथा विद्यालय में समुचित सहयोग की 
आवश्यकता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बच्चों की शिक्षा की सुव्यवस्था के लिए घर तथा विद्यालय के बीच समुचित सहयोग अति आवश्यक है। वास्तव में घर बच्चों की शिक्षा की प्रथम पाठशाला है तथा उनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर-परिवार द्वारा शुरू की जाती है। शिक्षा की इस प्रक्रिया को विस्तृत, व्यवस्थित तथा विशिष्ट रूप प्रदान करने का कार्य विद्यालय द्वारा किया जाता है। विद्यालय द्वारा बच्चों को शिक्षित करने के कार्य में परिवार द्वारा महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान किया जाता है। बच्चे की पारिवारिक समस्याओं के निवारण में शिक्षक द्वारा समुचित योगदान दिया जा सकता है। इसी प्रकार से बच्चे को विद्यालय सम्बन्धी समस्याओं के समाधान में भी परिवार को सहयोग आवश्यक होता है। वर्तमान समय में विद्यालय की शिक्षा पर्याप्त व्यय-साध्य हो गई है। यह खर्च परिवार द्वारा ही वहन किया जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि बच्चों की शिक्षा की सुव्यवस्था के लिए घर तथा विद्यालय में समुचित सहयोग अति आवश्यक है।

प्रश्न 3.
आपके विचारानुसार घर तथा विद्यालय में आवश्यक सहयोग कैसे स्थापित किया जा 
सकता है?
उत्तर:
बच्चों की सुचारु शिक्षा के लिए घर-परिवार तथा विद्यालय के बीच में समुचित सहयोग होना। अति आवश्यक है। इस प्रकार का सहयोग स्थापित करने के लिए विद्यालय के शिक्षकों तथा बच्चों के अभिभावकों के बीच निकटता के सम्बन्ध एवं नियमित सम्पर्क बना रहना अति आवश्यक है। इस सम्पर्क के लिए विद्यालय द्वारा शिक्षक-अभिभावक संघ की स्थापना की जानी चाहिए तथा इस संघ की समय-समय पर बैठक होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त शिक्षकों को भी कभी-कभी बच्चों के घर जाना चाहिए। शिक्षकों का दायित्व है कि वे बच्चों की शैक्षिक, अनुशासनात्मक तथा व्यक्तिगत गतिविधियों से उनके अभिभावकों को अवगत कराते रहें। इन सभी उपायों द्वारा घर तथा विद्यालय के बीच आवश्यक सहयोग स्थापित किया जा सकता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शाब्दिक दृष्टिकोण से विद्यालय के अर्थ को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘विद्यालय’ शब्द ‘विद्या’ तथा ‘आलय’ दो शब्दों के योग से बना है। इस प्रकार से विद्यालय का अर्थ है–विद्या या ज्ञान का घर।

प्रश्न 2 ‘विद्यालय की एक संक्षिप्त परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
“विद्यालय वे संस्थाएँ हैं, जिनको सभ्य मनुष्य के द्वारा इस उद्देश्य से स्थापित किया जाता है कि समाज में सुव्यवस्थित और योग्य सदस्यता के लिए बालकों की तैयारी में सहायता मिले।” –रॉस

प्रश्न 3.
“विद्यालय को एक ऐसा सामाजिक आविष्कार मॉनना चाहिए जो समाज के बालकों के लिए
विशेष प्रकार की शिक्षा प्रदान करने में समर्थ हो।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री ओटावे का है।

प्रश्न 4.
कोई ऐसा कथन लिखिए जो विद्यालयों के महत्त्व एवं उपयोगिता को स्पष्ट करता हो?
उत्तर:
“किसी भी राष्ट्र का निर्माण तथा प्रगति विधानसभाओं, न्यायालयों तथा फैक्ट्रियों में नहीं, बल्कि विद्यालयों में होता है।” एस० बालकृष्ण जोशी

प्रश्न 5. विद्यालय शिक्षा का किस प्रकार का अभिकरण है ?
उत्तर:
विद्यालय शिक्षा का मुख्यतम औपचारिक अभिकरण है।

प्रश्न 6.
आधुनिक युग के विद्यालयों के व्यवस्थित गठन से पूर्व बच्चों की शिक्षा का दायित्व किस सामाजिक संस्था का था ?
उत्तर:
आधुनिक युग के विद्यालयों के व्यवस्थित गठन से पूर्व बच्चों की शिक्षा का दायित्व परिवार का था।

प्रश्न 7.
परिवार ने अपने आपको बच्चों की शिक्षा के दायित्व से मुक्त क्यों कर लिया?
उत्तर:
परिवार के आकार एवं स्वरूप के परिवर्तित हो जाने तथा शिक्षा के जटिल एवं विस्तृत हो जाने के कारण परिवार ने अपने आपको बच्चों की शिक्षा के दायित्व से मुक्त कर लिया।

प्रश्न 8.
विद्यालय के चार मुख्य कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • छात्रों का शारीरिक एवं मानसिक विकास करना,
  • छात्रों का नैतिक एवं चारित्रिक विकास करना,
  • व्यावसायिक एवं औद्योगिक प्रशिक्षण प्रदान करना तथा
  • नेतृत्व एवं नागरिकता के गुणों का विकास करना।

प्रश्न 9.
बच्चों की शैक्षिक-व्यवस्था के दृष्टिकोण से घर तथा विद्यालय के सम्बन्ध को स्पष्ट 
कीजिए।
उत्तर:
बच्चों की शैक्षिक-व्यवस्था के दृष्टिकोण से घर तथा विद्यालय परस्पर पूरक हैं।

प्रश्न 10.
बच्चों के सर्वांगीण विकास के उद्देश्य की पूर्ति के लिए घर एवं विद्यालय का क्या दायित्व है?
उत्तर:
बच्चों के सर्वांगीण विकास के उद्देश्य की पूर्ति के लिए घर एवं विद्यालय में पूर्ण सहयोग होना चाहिए।

प्रश्न 11.
“विद्यालय को वास्तव में घर का विस्तृत रूप होना चाहिए।”
उत्तर:
ऐसा किसने कहा? उत्तर जॉन डीवी ने।

प्रश्न 12.
घर एवं विद्यालय में समुचित सहयोग बनाए रखने का मुख्यतम उपाय बताइट।
उत्तर:
घर एवं विद्यालय में समुचित सहयोग बनाए रखने के लिए विद्यालय के शिक्षकों तथा बच्चों के अभिभावकों में निरन्तर सम्पर्क स्थापित होना चाहिए।

प्रश्न 13.
“शिक्षालय न तो ज्ञान की दुकान हैं और न अध्यापक उसके विक्रेता।” प्रस्तुत कथन किसका है ?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन जॉन एडम्स का है।

प्रश्न 14 शिक्षा के अभिकरण की दृष्टि से विद्यालय और समाज में क्या अन्तर है ?
उत्तर:
विद्यालय शिक्षा का प्रमुख औपचारिक अभिकरण है, इससे भिन्न समाज शिक्षा का एक अनौपचारिक अभिकरण है।

प्रश्न 15 निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. विद्यालय शिक्षा का मुख्यतम अनौपचारिक अभिकरण है।
  2. व्यक्ति की शैक्षिक योग्यता का प्रमाण-पत्र विद्यालय द्वारा ही दिया जाता है।
  3. घर बालक की प्रथम पाठशाला है तथा विद्यालय घर का ही विस्तृत रूप है।
  4. बच्चों की शिक्षा के दृष्टिकोण से धर एवं विद्यालय का परस्पर सहयोग अनावश्यक एवं व्यर्थ है।
  5. बच्चों की सुचारु शिक्षा-व्यवस्था के लिए सभी विद्यालयों में अभिभावक-शिक्षक संघ होना अति आवश्यक है।

उत्तर:

  1. असत्य,
  2. सत्य,
  3. सत्य,
  4. असत्य,
  5. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए
प्रश्न 1.
“विद्यालय बाह्य जीवन के बीच एक अर्द्ध-पारिवारिक कड़ी है, जो बालक की उस समय प्रतीक्षा करता है जब वह अपने माता-पिता की छत्रछाया को छोड़ता है।” यह कथन किसका है?
(क) जॉन डीवी का
(ख) रेमॉण्ट का।
(ग) फ्रॉबेल का।
(घ) टी० पी० नन का

प्रश्न 2.
आधुनिक युग में विद्यालय के विकास का कारक है
(क) परिवार के आकार एवं स्वरूप में परिवर्तन
(ख) शिक्षा का जटिल एवं विस्तृत हो जाना
(ग) शिक्षा-व्यवस्था को सामाजिक दायित्व स्वीकार करना
(घ) उपर्युक्त सभी कारण :

प्रश्न 3.
विद्यालय से आशय है
(क) यह शिक्षा का मुख्य अनौपचारिक अभिकरण है।
(ख) यह शिक्षा का मुख्य औपचारिक अभिकरण है।
(ग) यह शिक्षा का व्यावसायिक अभिकरण है।
(घ) यह शिक्षा का अनावश्यक अभिकरण है।

प्रश्न 4.
विद्यालय की विशेषता नहीं है।
(क) बालक के बहुपक्षीय विकास में योगदान प्रदान करना
(ख) बालक की शैक्षिक योग्यता का प्रमाण-पत्र प्रदान करना
(ग) आजीवन शिक्षा की प्रक्रिया का परिचालन करना
(घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ।

प्रश्न 5.
घर एवं विद्यालय के आपसी सम्बन्ध को स्पष्ट करने वाला कथन है
(क) घर एवं विद्यालय दो नितान्त भिन्न संस्थाएँ हैं।
(ख) घर पालन-पोषण करता है, जबकि विद्यालय शिक्षा की व्यवस्था करता है।
(ग) घर तथा विद्यालय परस्पर पूरक संस्थाएँ हैं।
(घ) घर एवं विद्यालय परस्पर विरोधी संस्थाएँ हैं।

प्रश्न 6.
घर तथा विद्यालय में सहयोग स्थापित करने का उपाय है
(क) प्रत्येक विद्यालय में शिक्षक-अभिभावक संघ स्थापित करना
(ख) विद्यालय के विभिन्न उत्सवों में अभिभावकों को आमन्त्रित करना
(ग) शिक्षकों का अभिभावकों से निरन्तर सम्पर्क रहना
(घ) उफ्र्युक्त सभी उपाय

प्रश्न 7.
औपचारिक शिक्षा का प्रमुख साधन है
(क) घर
(ख) समाज
(ग) राज्य
(घ) विद्यालय

प्रश्न 8.
विद्यालय शिक्षा के किस अभिकरण के उदाहरण हैं ?
(क) औपचारिक अभिकरण
(ख) अनौपचारिक अभिकरण
(ग) निरौपचारिक अभिकरण
(घ) निष्क्रिय अभिकरण

प्रश्न 9.
विद्यालय के महत्व को दर्शाने वाला कथन है
(क) विद्यालय में ढीला-ढाला अनुशासन होता है।
(ख) विद्यालय एक विस्तृत संस्था है।
(ग) विद्यालय का घर-परिवार से कोई सम्बन्ध नहीं है।
(घ) विद्यालय घर तथा समाज को जोड़ने वाली कड़ी है।
उत्तर:

1. (ख) रेमॉण्ट का,
2. (घ) उपर्युक्त सभी कारण,
3. (ख) यह शिक्षा का मुख्य औपचारिक अभिकरण है,
4. (ग) आजीवन शिक्षा की प्रक्रिया का परिचालन करना,
5. (ग) घर तथा विद्यालय परस्पर पूरक संस्थाएँ हैं,
6. (घ) उपर्युक्त सभी उपाय,
7. (घ) विद्यालय,
8. (क) औपचारिक अभिकरण,
9. (घ) विद्यालय घर तथा समाज को जोड़ने वाली कड़ी है।

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 9 Local Bodies: As an Agency of Education

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 9
Chapter Name Local Bodies: As an
Agency of Education
(स्थानीय संस्थाए: शिक्षा के
अभिकरण के रूप में)
Number of Questions Solved 15
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 9 Local Bodies: As an Agency of Education (स्थानीय संस्थाए: शिक्षा के अभिकरण के रूप में)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्थानीय संस्थाओं से आप क्या समझते हैं? स्थानीय संस्थाओं के महत्त्व को भी स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
आज के युग में किसी भी राष्ट्र की केन्द्रीय या राज्य सरकार के पास स्थानीय (अर्थात् क्षेत्र विशेष की) समस्याओं के समाधान हेतु समय नहीं होता। ग्राम, कस्बे और नगर की स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय संस्थाओं; जैसे—ग्राम पंचायत, टाउन एरिया या नोटीफाइड एरिया कमेटी, जिला परिषद् या नग़रमहापालिका आदि के माध्यम से किया जाता है। स्थानीय संस्थाएँ अन्य मामलों के साथ-साथ अपने क्षेत्र से जुड़े शिक्षा सम्बन्धी मामलों के विषय में स्वविवेकानुसार निर्णय लेने तथा कार्य करने की पूर्ण स्वतन्त्रता रखती हैं।

स्थानीय संस्थाओं का अर्थ
(Meaning of Local Bodies)

स्थानीय संस्थाओं का तात्पर्य ऐसी संस्थाओं से है जिनका सम्बन्ध किसी स्थान (या क्षेत्र) विशेष से हो और जिनका प्रबन्धं उस स्थान विशेष के निवासियों द्वारा ही किया जाए। स्थानीय संस्थाएँ स्थानीय स्वशासन (Local Self-Government) के अन्तर्गत आती हैं। स्थानीय स्वशासन में स्थानीय जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों को क्षेत्र के शासन-प्रबन्ध में भाग लेने का अवसर मिलता है। इस शासन द्वारा नगर, कस्बे या ग्राम में रहने वाले लोगों को अपने स्थानीय मामलों को अपनी आवश्यकता तथा इच्छा के अनुसार प्रबन्ध करने की स्वतन्त्रता होती है।

स्थानीय संस्थाओं का महत्त्व
(Importance of Local Bodies)

स्थानीय संस्थाओं के महत्त्व का वर्णन निम्नलिखित आधारों पर किया जा सकता है

  1. स्थानीय लोगों का शासन से सम्बन्ध-आधुनिक समय में विश्व के अधिकांश देशों में प्रतिनिध्यात्मक लोकतान्त्रिक शासन-पद्धति प्रचलित है। इस पद्धति के अन्तर्गत स्थानीय लोगों का शासन से सीधा सम्बन्ध नहीं होता। वे स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से समस्याओं का कार्यभार हल्का शासन से सम्बन्ध रखते हैं।
  2. समस्याओं का कार्यभार हल्का स्थानीय संस्थाएँ, केन्द्र और राज्य सरकारों से सम्बद्ध छोटी-छोटी समस्याओं की जिम्मेदारी स्वयं अपने ऊपर लेकर उनका कार्यभार हल्का कर देती हैं।
  3. शक्ति का विकेन्द्रीकरण-उत्तम ढंग से शासन-कार्य चलाने के लिए शासन-शक्ति का अधिकाधिक विकेन्द्रीकरण होना चाहिए। यह विकेन्द्रीकरण सिर्फ स्थानीय संस्थाओं द्वारा ही किया जा सकता
  4. स्थानीय विषयों का कुशल प्रबन्ध-केन्द्र या प्रान्त की सरकारों को न तो स्थानीय विषयों/समस्याओं की जानकारी होती है और न ही वे इनमें खास दिलचस्पी रखती हैं। यही कारण है कि वे स्थानीय विषयों का प्रबन्ध कुशलता से नहीं कर पातीं। स्थानीय व्यक्ति एक तो उस क्षेत्र विशेष के वातावरण तथा समस्याओं से भली-प्रकार परिचित होते हैं और साथ ही वहाँ के विकास में रुचि भी रखते हैं। अत: स्थानीय मामलों का प्रबन्ध स्थानीय संस्थाओं के हाथ में ही रहना श्रेयस्कर है।
  5. शिक्षा साधन के रूप में-शिक्षा साधन के रूप में स्थानीय संस्थाएँ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वे अपने-अपने क्षेत्रों में बालक-बालिकाओं की शिक्षा का दायित्व सँभालती हैं। स्थानीय निकायों द्वारा प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक की व्यवस्था की जाती है। इसके लिए उन्हें राज्य सरकार से आर्थिक सहायता प्राप्त होती है।

टॉकविल ने स्थानीय संस्थाओं का महत्त्व बताते हुए लिखा है, “नागरिकों की स्थानीय संस्थाएँ स्वतन्त्र राष्ट्रों की शक्ति का निर्माण करती हैं। जो महत्त्व विज्ञान की शिक्षा के लिए प्रयोगशालाओं का है वही स्वतन्त्रता का पाठ पढ़ाने के लिए नगर सभाओं का है। एक राष्ट्र स्वतन्त्र सरकार की पद्धति भले ही स्थापित कर ले, किन्तु स्थानीय संस्थाओं के बिना उसमें स्वतन्त्रता की भावना नहीं आ सकती।’

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नगरीय क्षेत्रों में स्थानीय संस्थाओं के शैक्षणिक कार्यों का सामान्य विवरण दीजिए।
उत्तर:

नगरीय क्षेत्रों में स्थानीय संस्थाओं के शैक्षणिक कार्य।
(Educational Functions of Local Bodies in Urban Areas)

नगरीय क्षेत्रों की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए बड़े नगरों में नगरपालिका, नगर महापालिका या नगर निगम बनाए गए हैं। उपनगरों या कस्बों के लिए टाउन एरिया कमेटी एवं नोटीफाइड एरिया कमेटी हैं। इन प्रशासनिक इकाइयों की शासन-व्यवस्था हेतु अधीक्षक के अन्तर्गत विशेष विभागों को संगठन बनाया गया है। इन संस्थाओं के शैक्षणिक कार्य निम्न प्रकार हैं

  1. नगरों की स्थानीय संस्थाएँ प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना करती हैं। ये शासन की शिक्षा नीति के अन्तर्गत बालक-बालिकाओं के लिए माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा का प्रबन्ध भी करती हैं।
  2. 6 – 14 वर्ष आयु वर्ग के समस्त बालक-बालिकाओं को अनिवार्य तथा निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करने के लिए अभिप्रेरित और विवश करती हैं। ‘
  3. राज्य सरकार द्वारा प्राप्त आर्थिक सहायता को विभिन्न शिक्षा संस्थाओं में वितरित करने की व्यवस्था करती हैं।
  4. निजी शासन-प्रबन्ध के अन्तर्गत संचालित विद्यालयों में योग्य एवं प्रशिक्षित अध्यापकों की नियुक्ति करती हैं।
  5. नगरों की स्थानीय संस्थाएँ समय-समय पर विभिन्न विद्यालयों के क्रियाकलापों का शिक्षा विभाग के अधिकारियों द्वारा निरीक्षण कराती हैं।
  6. ये प्राथमिक तथा जूनियर हाईस्कूल स्तर पर परीक्षाओं का संचालन कर परीक्षा परिणाम घोषित कराती हैं।
  7. शैक्षिक प्रचार-प्रसार की दृष्टि से उपयुक्त स्थानों पर सार्वजनिक पुस्तकालय तथा वाचनालय खोलती हैं, उनकी देखभाल करती हैं तथा उन्हें आर्थिक सहायता भी देती हैं।
  8. प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम के अन्तर्गत रात्रि-पाठशालाएँ तथा प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र स्थापित करने हेतु धन प्रदान करती हैं।
  9. ये संस्थाएँ चलचित्र, प्रदर्शन और प्रतियोगिताओं के माध्यम से जनता में शिक्षा के अधिकाधिक प्रचार-प्रसार की व्यवस्था करती हैं।
  10. राज्य सरकार की शैक्षिक-नीतियों का अनुपालन करते हुए स्थानीय स्तर पर सभी के लिए श्रेष्ठ एवं हितकारी शिक्षा का प्रबन्ध करती हैं।

प्रश्न 2.
ग्रामीण क्षेत्र में जिला-परिषद के मुख्य शैक्षणिक कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

जिला-परिषद के शैक्षणिक कार्य
(Educational Functions of District Councils)

नगरीय क्षेत्रों की भाँति ग्रामीण क्षेत्रों में जिला- परिषदें शिक्षा की व्यवस्था करती हैं। प्रत्येक जिले में शिक्षा के सुप्रबन्ध तथा विकास हेतु एक शिक्षा विभाग स्थापित किया गया है जो जिला विद्यालय निरीक्षक तथा उपविद्यालय निरीक्षक की सहायता से शिक्षा का प्रबन्ध करता है। जिला परिषद् के शैक्षणिक कार्य इस प्रकार हैं|

  1. जिला-परिषद् अपने क्षेत्र के अन्तर्गत ग्रामों में आवश्यकतानुसार प्राथमिक तथा जूनियर हाईस्कूल खोलने की व्यवस्था करती है।
  2. यह इन विद्यालयों के लिए भवन, शिक्षण-सामग्री तथा अन्य साधनों का प्रबन्ध भी करती है।
  3. शिक्षा सम्बन्धी अपने दायित्वों की पूर्ति हेतु जिला-परिषद् को शिक्षा शुल्क लगाने का अधिकार प्राप्त
  4. परिषद् इन विद्यालयों के लिए शिक्षकों की नियुक्ति करती है तथा उनके वेतन आदि का प्रबन्ध करती
  5. विद्यालयों के अन्तर्गत खेलकूद एवं व्यायाम, सांस्कृतिक एवं पाठ्य सहगामी क्रियाओं तथा अन्य लाभकारी गतिविधियों का क्रियान्वयन भी परिषद् ही करती है। यह परीक्षा लेने का दायित्व भी निभाती है।
  6. जिला-परिषद् ग्रामीण अंचलों में प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम संचालित करती है तथा उनके लिए धन की व्यवस्था करती है।
  7. जिला परिषद् प्रदेश के शासन द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार ही शिक्षा की व्यवस्था करती है। शिक्षा व्यवस्था के निरीक्षण एवं मूल्यांकन कार्य में यह राज्य द्वारा नियुक्त अधिकारियों की मदद लेती है।
  8. जिला-परिषदें अपने विद्यालयों को शासन द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार ही वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं।

प्रश्न 3.
ग्रामीण स्थानीय संस्था ग्राम पंचायत के मुख्य शैक्षणिक कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

ग्राम पंचायत के शैक्षणिक कार्य
(Educational Functions of Gram Panchayat)

हमारे देश में पंचायती राज्य संशोधित अधिनियम (1954) के अनुसार, 250 से अधिक आबादी वाले प्रत्येक ग्राम में एक ग्राम सभा की व्यवस्था की गई है। इससे कम आबादी वाले ग्रामों को पास के ग्राम में मिलाने का प्रावधान है। कई गाँवों को मिलाकर जिस कार्यकारिणी का गठन होता है उसे ग्राम पंचायत कहते हैं। वस्तुत: ग्राम पंचायत ग्राम सभा की कार्यकारिणी समिति है जो निजी क्षेत्र की उन्नति हेतु विविध कार्यक्रमों की व्यवस्था करती है। ग्राम पंचायत के शिक्षा सम्बन्धी कार्य संक्षेप में इस प्रकार हैं

  1. मात्र ग्राम के अन्तर्गत शिक्षा प्रबन्ध तक सीमित रहने वाली ग्राम पंचायत, बालक-बालिकाओं के लिए प्राथमिक विद्यालय स्थापित कर उनका संचालन करती है।
  2. यह ग्रामवासियों के शैक्षिक विकास हेतु ग्राम पंचायत वाचनालय और पुस्तकालय खोलती है।
  3. ग्रामीण अंचल के लोगों को देश-विदेश के समाचार उपलब्ध कराने की दृष्टि से ग्राम में रेडियो तथा टी० वी० का प्रबन्ध करती है।
  4. अनपढ़ लोगों के लिए रात्रि पाठशालाएँ चलवाती है।
  5. ग्रामवासियों की शैक्षणिक प्रगति में सहायक विभिन्न कुटीर उद्योगों का प्रबन्ध करती है।
  6. शिक्षा के व्यापक प्रचार-प्रसार हेतु मेले, प्रदर्शनियाँ, चलचित्र, नाटक, सम्मेलन, व्याख्यान तथा समारोह आयोजित करती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्थानीय संस्थाओं का व्यवस्थित वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
किसी क्षेत्र-विशेष की शासन- व्यवस्था के लिए गठित की गई प्रशासनिक संस्था को स्थानीय संस्था (Local Body) कहा जाता है। स्थानीय संस्थाओं के वर्गीकरण का मुख्य आधार नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्र है। प्रथम वर्ग में हम उन स्थानीय संस्थाओं को सम्मिलित करते हैं जिनका गठन नगरीय क्षेत्र की व्यवस्था एवं समस्याओं के समाधान के लिए किया जाता है। इस वर्ग की स्थानीय संस्थाओं को पुनः दो वर्गों में बाँटा गया है। प्रथम वर्ग में उन स्थानीय संस्थाओं को सम्मिलित किया जाता है जो बड़े नगरों में गठित की जाती हैं। इस वर्ग की मुख्य स्थानीय संस्थाएँ हैं–नगरपालिका नगर महापालिका तथा नगर निगम नगरीय
क्षेत्र की दूसरे वर्ग की स्थानीय संस्थाएँ छोटे नगरों एवं कस्बों से सम्बन्धित हैं। इस वर्ग की स्थानीय संस्थाएँ हैं-टाउन एरिया कमेटी तथा नोटीफाइड एरिया कमेटी। ग्रामीण क्षेत्र की मुख्य स्थानीय संस्थाएँ दो हैं—जिला-परिषद् तथा ग्राम पंचायत।

प्रश्न 2.
शिक्षा के प्रसार में स्थानीय संस्थाओं का क्या योगदान है?
उत्तर:
स्थानीय संस्थाओं का एक मुख्य कार्य अपने क्षेत्र में शिक्षा की समुचित व्यवस्था करना है। इसके लिए स्थानीय संस्थाएँ अपने उपलब्ध साधनों एवं सुविधाओं के अनुसार शिक्षण संस्थाओं की स्थापना करती हैं। तथा उनका संचालन करती हैं। इसके अतिरिक्त ये स्थानीय संस्थाएँ अपने क्षेत्र में रहने वाले समस्त परिवारों को अपने बच्चों को विद्यालय भेजने के लिए प्रेरित भी करती हैं। इसके लिए प्रचार-कार्य तथा कुछ प्रलोभन भी दिए जाते हैं, जैसे कि बच्चों को मुफ्त पुस्तकें या वर्दी देना। बच्चों की शिक्षा के अतिरिक्त प्रौढ़ शिक्षा के प्रसार एवं प्रचार में भी स्थानीय संस्थाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्थानीय संस्थाओं से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
किसी क्षेत्र विशेष की प्रशासनिक व्यवस्था तथा समस्याओं के समाधान के लिए गठित की गई प्रशासनिक संस्थाओं को स्थानीय संस्था कहा जाता है।

प्रश्न 2.
“स्थानीय संस्थाएँ सरकार की दूसरे अंगों से बढ़कर जनता को लोकतन्त्र की शिक्षा देती हैं। वे जातियों को शिक्षित बनाती हैं, नागरिक के गुणों के लिए प्रारम्भिक पाठशालाओं का काम लेती हैं तथा जनता को वास्तविक स्वतन्त्रता का अनुभव कराती हैं।”-यह कथन किसका
उत्तर:
प्रस्तुत कथन लॉस्की का है।

प्रश्न 3.
स्थानीय संस्थाओं के गठन का एक मुख्य उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:
स्थानीय संस्थाओं के गठन का एक मुख्य उद्देश्य है–सत्ता का विकेन्द्रीकरण।

प्रश्न 4.
ग्रामीण क्षेत्र की मुख्य स्थानीय संस्था कौन-सी है?
उत्तर:
ग्रामीण क्षेत्र की मुख्य स्थानीय संस्था ग्राम पंचायत है।

प्रश्न 5.
छोटे उपनगरों अथवा कस्बों में स्थापित की जाने वाली स्थानीय संस्थाएँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर:
छोटे उपनगरों अथवा कस्बों में स्थापित की जाने वाली स्थानीय संस्थाएँ हैं-टाउन एरिया कमेटी तथा नोटीफाइड एरिया कमेटी।। प्रश्न 6 बड़े नगरों में स्थापित की जाने वाली स्थानीय संस्थाएँ कौन-कौन सी हैं? उत्तर:बड़े नगरों में स्थापित की जाने वाली स्थानीय संस्थाएँ हैं—नगरपालिका, नगर महापालिका तथा नगर निगम।।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य|

  1. किसी क्षेत्र विशेष की प्रशासन-व्यवस्था के लिए गठित प्रशासनिक संस्था को स्थानीय संस्था कहा जाता है।
  2. स्थानीय संस्थाएँ शैक्षणिक कार्यों में कोई उल्लेखनीय भूमिका नहीं निभातीं।
  3. ग्राम पंचायतों द्वारा प्रौढ़ शिक्षा की व्यवस्था के लिए रात्रि पाठशालाओं की व्यवस्था की जाती है।
  4. स्थानीय संस्थाएँ शिक्षा की व्यवस्था मनमाने ढंग से करती हैं।
  5. स्थानीय संस्थाओं के संचालन में जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती

उत्तर:

  1. सत्य,
  2. असत्य,
  3. सत्य,
  4. असत्य,
  5. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए
प्रश्न 1.
किसी क्षेत्र-विशेष की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए गठित संस्थाओं को कहते हैं
(क) नगरपालिका
(ख) ग्राम पंचायत
(ग) नोटीफाइड एरिया
(घ) स्थानीय संस्थाएँ

प्रश्न 2.
स्थानीय संस्थाएँ अपने क्षेत्र में शिक्षा की व्यवस्था करती हैं
(क) जैसे-तैसे
(ख) राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार
(ग) स्थानीय सम्पन्न परिवारों के मतानुसार
(घ) अधिक शुल्क लेकर

प्रश्न 3.
ग्राम पंचायत का निर्धारित शैक्षिक दायित्व नहीं है
(क) प्रौढ़ शिक्षा की व्यवस्था करना
(ख) प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था करना
(ग) ग्रामीण जनता को आवश्यक सूचनाएँ प्रदान करना
(घ) उच्च शिक्षा की व्यवस्था करना

उत्तर:

1. (घ) स्थानीय संस्थाएँ,
2. (ख) राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार,
3. (घ) उच्च शिक्षा की व्यवस्था करना।

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