UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 7 Nationalism

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 7 Nationalism (राष्ट्रवाद)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
राष्ट्र किस प्रकार से बाकी सामूहिक सम्बद्धताओं से अलग है?
उत्तर-
राष्ट्र जनता को कोई आकस्मिक समूह नहीं है। लेकिन यह मानव समाज में पाए जाने वाले अन्य समूहों अथवा समुदायों से अलग है। यह परिवार से भी अलग है। परिवार तो प्रत्यक्ष सम्बन्धों पर आधारित होता है जिसका प्रत्येक सदस्य दूसरे सदस्यों के व्यक्तित्व और चरित्र के विषय में व्यक्तिगत जानकारी रखता है। यह जनजातीय, जातीय और अन्य सगोत्रीय समूहों से भी अलग है। इन समूहों में विवाह और वंश परम्परा सदस्यों को आपस में जोड़ती है। इसलिए यदि हम सभी सदस्यों को। व्यक्तिगत रूप से भी नहीं जानते हों तो भी आवश्यकता पड़ने पर हम उन सूत्रों को खोज निकाल सकते हैं जो हमें आपस में जोड़ते हैं। लेकिन राष्ट्र के सदस्य के रूप में हम अपने राष्ट्र के अधिकांश सदस्यों को सीधे तौर पर न कभी जान पाते हैं और न ही उनके साथ वंशानुगत नाता जोड़ने की आवश्यकता पड़ती है। फिर भी राष्ट्र हैं, लोग उनमें रहते हैं और उनका सम्मान करते हैं।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार से आप क्या समझते हैं? किस प्रकार यह विचार राष्ट्र राज्यों के निर्माण और उनको मिल रही चुनौती में परिणत होता है?
उत्तर-
शेष सामाजिक समूहों से अलग राष्ट्र अपना शासन अपने आप करने और अपने भविष्य को तय करने का अधिकार चाहते हैं। दूसरों शब्दों में, वे आत्म-निर्णय का अधिकार मानते हैं। आत्म-निर्णय के अपने दावे में राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से माँग करता है कि उसके पृथक् राजनीतिक इकाई या राज्य के दर्जे को मान्यता और स्वीकार्यता दी जाए। अक्सर ऐसी माँग उन लोगों की ओर से आती है जो दीर्घकाल से किसी निश्चित भू-भाग पर साथ-साथ रहते आए हों और उनमें साझी पहचान का बोध हो। कुछ मामलों में आत्म-निर्णय के ऐसे दावे एक स्वतन्त्र राज्य बनाने की उस इच्छा से भी जुड़े होते हैं। इन दावों का सम्बन्ध किसी समूह की संस्कृति की संरक्षा से होता है।

प्रश्न 3.
हम देख चुके हैं कि राष्ट्रवाद लोगों को जोड़ भी सकता है और तोड़ भी सकता है। उन्हें मुक्त कर सकता है और उनमें कटुता और संघर्ष भी पैदा कर सकता है। उदाहरणों के साथ उत्तर दीजिए।
उत्तर-
विगत दो सौ वर्षों की अवधि में राष्ट्रवाद एक ऐसे सम्मोहक राजनीतिक सिद्धान्त के रूप में हमारे समाने आया है जिसे इतिहास रचने में योगदान किया है। इसने उत्कृष्ट निष्ठाओं के साथ-साथ गहन विद्वेषों को भी प्रेरित किया है। इसने जनता को जोड़ा है तो विभाजित भी किया है। इसने अत्याचारी शासन से मुक्ति दिलाने से सहायता की तो इसके साथ वह विरोध, कटुता और युद्धों का कारण भी रहा है। साम्राज्यों और राष्ट्रों के ध्वस्त होने का यह भी एक कारण रहा है। राष्ट्रवादी संघर्षों ने राष्ट्रों और साम्राज्यों की सीमाओं के निर्धारण-पुनर्निर्धारण में योगदान किया है। आज भी दुनिया का एक बड़ा भाग विभिन्न राष्ट्र राज्यों में बँटा हुआ है। हालाँकि राष्ट्रों की सीमाओं के पुनर्संयोजन की प्रक्रिया अभी समाप्त नहीं हुई है और वर्तमान राष्ट्रों के अन्दर भी अलगाववादी संघर्ष साधारण बात है। राष्ट्रवाद विभिन्न चरणों से गुजर चुका है। उदाहरण के लिए, 19वीं सदी के यूरोप में इसने कई छोटी-छोटी रियासतों के एकीकरण से वृहत्तर राष्ट्र-राज्यों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। वर्तमान जर्मनी और इटली का गठन एकीकरण और सुदृढ़ीकरण की इसी प्रक्रिया के माध्यम से हुआ था।

लेटिन अमेरिका में बड़ी संख्या में नए राज्य भी स्थापित किए गए थे। राज्य की सीमाओं के सुदृढ़ीकरण के साथ स्थानीय निष्ठाएँ और बोलियाँ भी निरन्तर राष्ट्रीय निष्ठाओं एवं सर्वमान्य जनभाषाओं के रूप में विकसित हुईं। नए राष्ट्रों के लोगों ने एक नवीन राजनीतिक पहचान प्राप्त की, जो राष्ट्र-राज्य की सदस्यता पर आधारित थी। विगत सदी में हमने देश को सुदृढ़ीकरण की ऐसी ही प्रक्रिया से गुजरते देखा है। लेकिन राष्ट्रवाद बड़े-बड़े साम्राज्यों के पतन में हिस्सेदार भी रहा है। यूरोप में 20वीं सदी के आरम्भ में ऑस्ट्रियाई-हंगेरियाई और रूसी साम्राज्य तथा इनके साथ एशिया और अफ्रीका में ब्रिटिश, फ्रांसीसी, डच और पुर्तगाली साम्राज्य के विघटन के मूल में राष्ट्रवाद ही था। भारत तथा अन्य पूर्वी उपनिवेशों के औपनिवेशिक शासन से स्वतन्त्र होने के संघर्ष भी राष्ट्रवादी संघर्ष थे। ये संघर्ष विदेशी नियन्त्रण से स्वतन्त्र राष्ट्र-राज्य स्थापित करने की आकांक्षा से प्रेरित थे।

प्रश्न 4.
वंश, भाषा, धर्म या नस्ल में से कोई भी पूरे विश्व में राष्ट्रवाद के लिए साझा कारण होने का दावा नहीं कर सकता। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर-
साधारणतया यह माना जाता है कि राष्ट्रों का निर्माण ऐसे समूह द्वारा किया जाता है जो कुल या भाषा अथवा धर्म या फिर जातीयता जैसी कुछेक निश्चित पहचान का सहभागी होता है। लेकिन ऐसे निश्चित विशिष्ट गुण वास्तव में हैं ही नहीं जो सभी राष्ट्रों में समान रूप से मौजूद हों। कई राष्ट्रों की अपनी कोई एक सामान्य भाषी नहीं है। कनाड़ा का उदाहरण लिया जा सकता है। कनाडा में अंग्रेजी और फ्रांसीसी भाषा-भाषी लोग साथ रहते हैं। भारत में भी अनेक भाषाएँ हैं जो विभिन्न क्षेत्रों में और भिन्न-भिन्न समुदायों द्वारा बोली जाती हैं। बहुत से शब्दों में उन्हें जोड़ने वाला कोई सामान्य धर्म भी नहीं है। नस्ल अथवा कुल जैसी अन्य विशिष्टताओं के लिए भी यही कहा जा सकता है। राष्ट्र बहुत सीमा तक एक काल्पनिक समुदाय होता है, जो अपने सदस्यों के सामूहिक विश्वास आकांक्षाओं और कल्पनाओं के सहारे एक सूत्र में बँधा होता है। यह कुछ मान्यताओं पर आधारित होता है जिन्हें लोग उस समग्र समुदाय के लिए तैयार करते हैं, जिससे वे अपनी पहचान बनाते हैं। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि वंश, भाषा, धर्म या नस्ल में से कोई भी पूरे विश्व में राष्ट्रवाद के लिए साझा कारण होने का दावा नहीं कर सकता।

प्रश्न 5.
राष्ट्रवादी भावनाओं को प्रेरित करने वाले कारकों पर सोदाहरण रोशनी डालिए।
उत्तर-
राष्ट्रवादी भावनाओं को प्रेरित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं-

  1. साझे विश्वास – राष्ट्र विश्वास के माध्यम से बनता है। राष्ट्रवाद समूह के भविष्य के लिए सामूहिक पहचान और दृष्टि का प्रमाण है, जो स्वतन्त्र राजनीतिक अस्तित्व का आकांक्षी है।
  2. इतिहास – राष्ट्रवादी भावनाओं को इतिहास भी प्रेरित करती है। राष्ट्रवादियों में स्थायी ऐतिहासिक पहचान की भावना होती है। यानी वे राष्ट्र को इस रूप में देखते हैं जैसे वे बीते अतीत के साथ-साथ आने वाले भविष्य को समेटे हुए हैं।
  3. भू-क्षेत्र – राष्ट्रवादी भावनाएँ एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती हैं। किसी विशिष्ठ भू-क्षेत्र पर दीर्घकाल तक साथ-साथ रहना और उससे जुड़े साझे अतीत की यादें लोगों को एक सामूहिक पहचान का बोध कराती हैं।
  4. साझे राजनीतिक आदर्श – राष्ट्रवादियों की साझा राजनीतिक दृष्टि होती है कि वे किस प्रकार का राज्य बनाना चाहते हैं। शेष बातों के अलावा वे लोकतन्त्र, धर्म निरपेक्षता और उदारवाद जैसे मूल्यों और सिद्धान्तों को भी स्वीकार करते हैं।

प्रश्न 6.
संघर्षरत राष्ट्रवादी आकांक्षाओं के साथ बरताव करने में तानाशाही की अपेक्षा लोकतन्त्र अधिक समर्थ होता है। कैसे?
उत्तर-
लोकतन्त्र में कुछ राजनीतिक मूल्यों और आदर्शों के लिए साझी प्रतिबद्धता ही किसी राजनीतिक समुदाय या राष्ट्र का सर्वाधिक वांछित आधार होती है। इसके अन्तर्गत राजनीतिक समुदाय के सदस्य कुछ दायित्वों से बँधे होते हैं। ये दायित्व सभी लोगों के नागरिकों के रूप में अधिकारों को पहचान लेने से पैदा होते हैं। अगर राष्ट्र के नागरिक अपने सहनागरिकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को जान और मान लेते हैं तो इससे राष्ट्र मजबूत ही होता है। लोकतन्त्र राष्ट्रवाद की भावना को समझता है। तथा उसी की आधारशिला पर टिका हुआ है इसलिए तानाशाही की अपेक्षा लोकतन्त्र संघर्षरत राष्ट्रवादियों से अच्छा बरताव करता है।
प्रश्न 7.
आपकी राय में राष्ट्रवाद की सीमाएँ क्या हैं?
उत्तर-
राष्ट्रवादी अधिकतर स्वतन्त्र राज्य को अधिकार के रूप में मानने लगते हैं। लेकिन यह सम्भव नहीं कि प्रत्येक राष्ट्रीय समूह को स्वतन्त्र राज्य प्रदान किया जाए। साथ ही, यह सम्भवतः अवांछनीय भी होगा। यह ऐसे राज्यों के गठन की ओर ले जा सकता है जो आर्थिक और राजनीतिक क्षमता की दृष्टि से अत्यन्त छोटे हों और इससे अल्पसंख्यक समहों की समस्याएँ और बढ़े। हमें राष्ट्रवाद के असहिष्णु और एक जातीय स्वरूपों के साथ कोई सहानुभूति नहीं रखनी चाहिए।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से किसने राष्ट्रवाद की समालोचना प्रस्तुत की थी?
(क) रवीन्द्रनाथ टैगोर
(ख) महात्मा गांधी
(ग) जवाहरलाल नेहरू :
(घ) बंकिमचन्द्र चटर्जी
उत्तर-
(क) रवीन्द्रनाथ टैगोर।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीयता के विकास में बाधक तत्त्व नहीं है
(क) अशिक्षा
(ख) धर्म-निरपेक्षता
(ग) जातिवाद
(घ) साम्प्रदायिकता
उत्तर-
(ख) धर्म-निरपेक्षता।

प्रश्न 3.
“राष्ट्रीयता सामूहिक भावना का एक रूप है, जो विशिष्ट गहनता, समीपता तथा महत्ता से एक निश्चित देश से सम्बन्धित होती है।” यह कथन किसका है?
(क) लॉस्की
(ख) गार्नर
(ग) जिमर्न
(घ) ब्राइस
उत्तर-
(ग) जिमर्न।

प्रश्न 4.
“अन्तर्राष्ट्रीयता एक ऐसी भावना है जिसके अनुसार व्यक्ति केवल अपने राज्य का ही सदस्य नहीं है, बल्कि विश्व का एक नागरिक है।” यह मत किसका है?
(क) गोल्ड स्मिथ
(ख) जोसेफ इमैनुअल
(ग) बार्कर
(घ) शूमां
उत्तर-
(ग) बार्कर।

प्रश्न 5.
अन्तर्राष्ट्रीयता के मार्ग का बाधक तत्त्व है
(क) विश्व-बन्धुत्व की भावना
(ख) उग्र राष्ट्रवाद
(ग) अन्तर्राष्ट्रीय कानून
(घ) वैज्ञानिक प्रगति
उत्तर-
(ख) उग्र राष्ट्रवाद।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राष्ट्रीयता के मार्ग में उत्पन्न होने वाली दो बाधाएँ लिखिए।
उत्तर-
(i) साम्प्रदायिकता की भावना तथा
(ii) जातीयता एवं प्रान्तीयता की भावना।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीयता के दो तत्त्व बताइए।
उत्तर-
(i) भौगोलिक एकता तथा
(ii) सांस्कृतिक एकता।

प्रश्न 3.
राष्ट्रीयता के विकास में दो बाधक तत्त्व लिखिए।
उत्तर-
(i) भाषावाद तथा
(ii) क्षेत्रवाद।

प्रश्न 4.
राष्ट्रवाद अथवा राष्ट्रीयता के दो दोष लिखिए।
उत्तर-
(i) सैन्यवाद को जन्म तथा
(ii) युद्ध को प्रोत्साहन।

प्रश्न 5.
राष्ट्रीयता के दो लाभ बताइए।
उत्तर-
(i) देशप्रेम की प्रेरणा तथा
(ii) बन्धुत्व की भावना का विकास।

प्रश्न 6.
राष्ट्रवाद का अध्ययन क्यों आवश्यक है?
उत्तर-
राष्ट्रवाद वैश्विक मामलों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, इसलिए राष्ट्रवाद का अध्ययन आवश्यक है।

प्रश्न 7.
‘बास्क’ कहाँ है?
उत्तर-
‘बास्क’ स्पेन में स्थित है। यह स्पेन को एक पहाड़ी क्षेत्र है।

प्रश्न 8.
आत्म-निर्णय का दावा क्या है?
उत्तर-
आत्म-निर्णय के दावे में राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से माँग करता है कि उसके पृथक् इकाई या राज्य के दर्जे को मान्यता और स्वीकार्यता दी जाए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राष्ट्रिक जाति और समुदाय से क्या आशय है?
उत्तर-
लार्ड ब्राइस के अनुसार, राष्ट्रिक जाति की भावना वह अनुभूति या अनुभूतियाँ हैं जो व्यक्तियों के एक समूह को उन बन्धनों के प्रति सजग बनाती हैं जो पूरी तरह से न तो राजनीतिक होते हैं, न धार्मिक और जो उन व्यक्तियों को ऐसे समाज के रूप में संगठित करने देते हैं जो या तो राष्ट्र होता है। या राष्ट्र होने की क्षमता रखता है।
‘राष्ट्रीय समुदाय’ शब्द का उपयोग एक ऐसे समाज को व्यक्त करने के लिए किया जाता है जिसमें राष्ट्रीय भावना का अभी निर्माण ही हो रहा हो और जिसमें एक राष्ट्र की तरह रहने की इच्छा की कमी

प्रश्न 2.
हमारे लिए राष्ट्रवाद क्यों आवश्यक है?
उत्तर–
जहाँ तक भारत का सम्बन्ध है, राष्ट्रवाद हमारे लिए आवश्यक है। हमारा अस्तित्व ही राष्ट्रीयता पर निर्भर करता है, यह हमारे जीवन-मरण का प्रश्न है। यद्यपि अपने सारे दुर्भाग्यों के लिए विदेशियों को जिम्मेदार ठहराना मूर्खता है, फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं कि अंग्रेजों की लम्बी गुलामी ने हममें बहुत-सी बुराइयाँ उत्पन्न कर दी हैं जिनका वास्तविक उपचार आत्म-निर्णय है। भये, कार्यरता और कपट जैसी बुराइयों को राजनीतिक राष्ट्रीयता ही दूर कर सकती है।

प्रश्न 3.
राष्ट्रीयता के मार्ग की बाधाओं को दूर करने के उपायों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
राष्ट्रीयता के मार्ग में आने वाली बाधाओं को निम्नलिखित उपायों से दूर किया जा सकता है

  1. संकुचित भावनाओं का त्याग और देश-प्रेम या देशभक्ति की प्रबल भावना का विकास किया जाना चाहिए।
  2. देश के विभिन्न भागों में भावनात्मक, साहित्यिक तथा सांस्कृतिक सम्पर्क बढ़ाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए।
  3. शिक्षा का व्यापक स्तर पर प्रचार तथा प्रसार किया जाना चाहिए तथा शिक्षा व्यवस्था का समुचित प्रबन्ध होना चाहिए।
  4. देशभर में परिवहन तथा संचार के साधनों का पर्याप्त विकास किया जाना चाहिए।
  5. देश के सभी क्षेत्रों का सन्तुलित आर्थिक विकास किया जाना चाहिए।
  6. संकीर्ण हितों तथा स्वार्थपूर्ण मनोवृत्तियों पर आधारित राजनीति को नियन्त्रित किया जाना चाहिए।
  7. देश में सुदृढ़ तथा न्यायपूर्ण शासन व्यवस्था स्थापित की जानी चाहिए।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किसी राष्ट्र के स्वतन्त्र और सम्प्रभु बन सकने से पूर्व उसमें क्या योग्यताएँ होनी चाहिए?
उत्तर-
किसी राष्ट्र के स्वतन्त्र और सम्प्रभु बन सकने से पूर्व उसमें निम्नलिखित बातों का होना आवश्यक है-

  1. उसमें अपनी सम्पत्ति की व्यवस्था करने और अपने प्राकृतिक साधनों तथा अपनी पूँजी का विकास कर सकने की क्षमता होनी चाहिए।
  2. उसे अच्छे कानून बनाने चाहिए और न्याय की उचित व्यवस्था करनी चाहिए। राज्य क्षेत्रातीतन्यायालयों की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
  3. उसे एक उपयुक्त ढंग की सरकार स्थापित करनी चाहिए।
  4. उसे व्यापार करने देने, कर्ज अदा करने और यात्रा की अनुमति देने का अथवा कर्त्तव्य स्वीकार करना चाहिए।
  5. उसे अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। उसे राजदूतों को अपने यहाँ आमन्त्रित करना चाहिए, विवादों में मध्यस्थताएँ स्वीकार करनी चाहिए और सन्धियाँ करनी चाहिए आदि। उसके पास ऐसे नागरिक होने चाहिए जो गौरव के साथ अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में उसका प्रतिनिधित्व कर सकें।
  6. जब तक युद्धों का होना जारी है तब तक उसे विदेशी आक्रमणों से अपनी रक्षा करने में समर्थ होना चाहिए।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीयता तथा अन्तर्राष्ट्रीयता के सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
वर्तमान में राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता के मध्य सम्बन्ध को लेकर दो विरोधी विचार प्रचलित हैं। पहले मत के विद्वानों का कहना है कि राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता परस्पर विरोधी हैं। उनका तर्क है कि राष्ट्रीयता व्यक्ति को अपने देश के प्रति श्रद्धा भाव रखने के लिए प्रेरित करती है, जबकि अन्तर्राष्ट्रीयता का आधारभूत सिद्धान्त विश्वबन्धुत्व की स्थापना करना है। लेकिन यह मत भ्रामक और असंगत प्रतीत होता है। वास्तव में राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता परस्पर विरोधी नहीं हैं। राष्ट्रीयता तभी अन्तर्राष्ट्रीयता के मार्ग में बाधक बनती है, जबकि उसका अन्धानुकरण किया जाए तथा उसके उग्र रूप को ग्रहण किया जाए। उदार राष्ट्रीयता अन्तर्राष्ट्रीयता की पोषक और विश्व-शान्ति की समर्थक है। भारत का पंचशील सिद्धान्त इस सन्दर्भ में उदाहरणस्वरूप लिया जा सकता है।

इस प्रकार राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता एक-दूसरे की परस्पर पूरक हैं। यही मत अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है, क्योंकि राष्ट्रीयता ही अन्तर्राष्ट्रीयता का प्रथम चरण है। गांधी जी के अनुसार, “मेरे विचार से राष्ट्रवादी हुए बिना अन्तर्राष्ट्रवादी होना असम्भव है। अन्तर्राष्ट्रीयता तभी सम्भव हो सकती है, जबकि राष्ट्रीयता एक यथार्थ बन जाए।”

प्रश्न 3.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने राष्ट्रवाद की आलोचना किस प्रकार की है?
उत्तर-
अनेक विचारक राष्ट्रवाद के बहुत बड़े प्रशंसक और भक्त हैं। वे इसमें अच्छाइयाँ-हीअच्छाइयाँ पाते हैं। पर दूसरे लोगों का कहना है कि राष्ट्रवाद से अनेक बुरे परिणाम निकले हैं। इन लोगों का विश्वास है कि राष्ट्रीयता अपने वर्तमान रूप में अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सद्भावना की सबसे बड़ी शत्रु है। राष्ट्रवाद पर अपने निबन्ध में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने नि:संकोच राष्ट्रवाद को बुरा कहा है। वह उसे ‘समूची जाति का सामूहिक और संगठित स्वार्थ’, ‘आत्मपूजा’, ‘स्वार्थी उद्देश्यों के लिए राजनीति और व्यवसाय का संगठन’, ‘शोषण के लिए संगठित शक्ति’ आदि कहते हैं।

राष्ट्रवाद पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर की समालोचना
“राष्ट्रवाद हमारा अन्तिम आध्यात्मिक मंजिल नहीं हो सकता मेरी शरणस्थली तो मानवता है। मैं हीरों की कीमत पर शीशा नहीं खरीदूंगा और जब तक मैं जीवित हूँ देशभक्ति को मानवता पर कदापि विजयी नहीं होने दूंगा” यह रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था वे औपनिवेशिक शासन के विरोधी थे और भारत की स्वाधीनता के अधिकार का दावा करते थे वे महसूस करते थे कि उपनिवेशों के ब्रितानी प्रशासन में ‘मानवीय सम्बन्धों की गरिमा बरकरार रखने की गुंजाइश नहीं है। यह एक ऐसा विचार है। जिसे ब्रितानी सभ्यता में भी स्थान मिला है। टैगोर पश्चिमी साम्राज्यवाद का विरोध करने और पश्चिमी सभ्यता को खारिज करने के बीच फर्क करते थे। भारतीयों को अपनी संस्कृति और विरासत में गहरी सभ्यता होनी ही चाहिए लेकिन बाहरी दुनिया से मुक्त भाव से सीखने और लाभान्वित होने का प्रतिरोध नहीं करनी चाहिए।

टैगोर जिसे ‘देशभक्ति’ कहते थे, उसकी समालोचना उनके लेखन का स्थायी विषय था। वे देश के स्वाधीनता आन्दोलन में मौजूद संकीर्ण राष्ट्रवाद के कटु आलोचक थे। उन्हें भय था कि तथाकथित | | भारतीय परम्परा के पक्ष में पश्चिम की खारिजी का विचार यहीं तक सीमित रहने वाला नहीं है। यह अपने देश में मौजूद ईसाई, यहूदी, पारसी और इस्लाम समेत तमाम विदेशी प्रभावों के खिलाफ आसानी से आक्रामक भी हो सकता है।
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प्रश्न 4.
राष्ट्रीयता अथवा राष्ट्रवाद के प्रमुख गुणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद के गुण राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं-

1. देशप्रेम की प्रेरणा- राष्ट्रीयता की भावना लोगों में देशप्रेम का भाव उत्पन्न करती है और उन्हें देश के हित के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए प्रेरित करती है। यह प्रेरणा राष्ट्रीय पर्वो के आयोजन, राष्ट्रगान तथा राष्ट्रीय गीतों, नाटकों आदि से और अधिक व्यापक होती है।

2. राजनीतिक एकता की स्थापना में योगदान- राष्ट्रीयता की भावना राजनीतिक एकता की स्थापना में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है। राष्ट्रीयता से प्रेरित होकर ही विभिन्न जातियों व धर्मों के | लोग एकता के सूत्र में संगठित हो जाते हैं और एक शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण करते हैं।

3. राज्यों को स्थायित्व- राष्ट्रीयता राज्यों को स्थायित्व भी प्रदान करती है। राष्ट्रीय चेतना के आधार पर निर्मित राज्य अधिक स्थायी सिद्ध हुए हैं।

4. उदारवाद को प्रोत्साहन- राष्ट्रीयता आत्म-निर्णय के सिद्धान्त को मान्यता देती है। इसलिए राष्ट्रीयता मानवीय स्वतन्त्रता को स्वीकार कर उदारवादी दृष्टिकोण को बढ़ावा देती है।

5. सांस्कृतिक विकास- राष्ट्रीयता देश के सांस्कृतिक विकास को प्रोत्साहित करती है। प्राचीन यूनान के महाकवि होमर, फ्रांस के दान्ते तथा वोल्तेयर, इंग्लैण्ड के टेनीसन, शैले, टामस पेन, जर्मनी के हीगल और भारत के मैथिलीशरण गुप्त आदि ने राष्ट्रीयता से प्रेरित होकर ही साहित्यिक रचनाएँ की हैं।

6. आत्म-सम्मान की भावना- राष्ट्रीयता व्यक्ति में आत्म-सम्मान की भावना उत्पन्न करती है। और उसे आत्म-गौरव को सँजोने की प्रेरणा देती है।

7. विश्वबन्धुत्व की पोषक- राष्ट्रीयती व्यक्ति के दृष्टिकोण को व्यापक बनाकर अन्तर्राष्ट्रीय मैत्री और सहयोग को प्रोत्साहित करती है। इस प्रकार राष्ट्रीयता विश्वबन्धुत्व की पोषक भी है; उदाहरणार्थ-भारत का पंचशील सिद्धान्त ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’का पोषक है।

8. आर्थिक विकास में योगदान- राष्ट्रीयता राष्ट्र के आर्थिक विकास को भी प्रोत्साहित करती है। | राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित होकर ही व्यक्ति अपने राष्ट्र को आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न बनाने के लिए एकजुट होकर कार्य करते हैं।

प्रश्न 5.
बास्क राष्ट्रवादी आन्दोलन के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-
बास्क स्पेन का एक पहाड़ी और समृद्ध क्षेत्र है। इस क्षेत्र को स्पेनी सरकार ने स्पेन राज्यसंघ के अन्तर्गत स्वायत्त क्षेत्र का दर्जा दे रखा है, लेकिन बास्क राष्ट्रवादी आन्दोलन के नेतागण इस स्वायत्तता से सन्तुष्ट नहीं हैं। वे चाहते हैं कि बास्क स्पेन से अलग होकर एक स्वतन्त्र देश बन जाए। इस आन्दोलन के समर्थकों ने अपनी माँग पर जोर डालने के लिए संवैधानिक और हाल तक हिंसक तरीकों का इस्तेमाल किया है।
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बास्क राष्ट्रवादियों का कहना है कि उनकी संस्कृति स्पेनी से बहुत भिन्न है। उनकी अपनी भाषा है, जो स्पेनी भाषा से बिल्कुल नहीं मिलती है। हालाँकि आज बास्क के मात्र एक-तिहाई लोग उस भाषा को समझ पाते हैं। बास्क क्षेत्र की पहाड़ी भू-संरचना उसे शेष स्पेन से भौगोलिक तौर पर अलग करती है। रोमन काल से अब तक बास्क क्षेत्र ने स्पेनी शासकों के समक्ष अपनी स्वायत्तता का कभी समर्पण नहीं किया। उसकी न्यायिक, प्रशासनिक एवं वित्तीय प्रणालियाँ उसकी अपनी विशिष्ट व्यवस्था के जरिए संचालित होती थीं।

आधुनिक बास्क राष्ट्रवादी आन्दोलन की शुरूआत तब हुई जब उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में स्पेनी शासकों ने उसकी विशिष्ट राजनीतिक-प्रशांसनिक व्यवस्था को समाप्त करने की कोशिश की। बीसवीं सदी में स्पेनी तानाशाह फ्रैंको ने इस स्वायत्तता में और कटौती कर दी। उसने बास्क भाषा को सार्वजनिक स्थानों, यहाँ तक कि घर में भी बोलने पर पाबन्दी लगा दी थी। ये दमनकारी कदम अब वापस लिए जा चुके हैं। लेकिन बास्क आन्दोलनकारियां को स्पेनी शासक के प्रति सन्देह और क्षेत्र में बाहरी लोगों के प्रवेश का भय बरकरार है। उने विरोधियों का कहना है कि बास्क अलगाववादी एक ऐसे मुद्दे का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं जिसका समाधान हो चुका है।

प्रश्न 6.
‘एक संस्कृति-एक राज्य के विचार को त्यागने के पश्चात राज्यों के लिए क्या आवश्यक हो जाता है?
उत्तर-
एक संस्कृति-एक राज्य के विचार को त्यागते ही यह आवश्यक हो जाता है कि ऐसे तरीकों के बारे में विचार किया जाए जिसमें विभिन्न संस्कृतियाँ और समुदाय एक ही देश में फल-फूल सकें। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अनेक लोकतान्त्रिक देशों ने सांस्कृतिक रूप से अल्पसंख्यक समुदायों की पहचान को स्वीकार करने और संरक्षित करने के उपायों को प्रारम्भ किया है। भारतीय संविधान में धार्मिक, भाषाई और सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों की संरक्षा के लिए विस्तृत प्रावधान किए हैं।

विभिन्न देशों में समूहों को जो भी अधिकार प्रदान किए गए हैं, उनमें सम्मिलित हैं-
अल्पसंख्यक समूहों एवं उनके सदस्यों की भाषा, संस्कृति एवं धर्म के लिए संवैधानिक संरक्षा के अधिकार। कुछ प्रकरणों में इन समूहों को विधायी संस्थाओं और अन्य राजकीय संस्थाओं में प्रतिनिधित्व का अधिकार भी होता है। इन अधिकारों को इस आधार पर न्यायोचित ठहराया जा सकता है कि ये अधिकार इन समूहों के सदस्यों के लिए कानून द्वारा समान व्यवहार एवं सुरक्षा के साथ ही समूह की सांस्कृतिक पहचान के लिए भी सुरक्षा का प्रावधान करते हैं। इसके अलावा, इन समूहों को राष्ट्रीय समुदाय के एक अंग के रूप में भी मान्यता देनी होती है। इसका आशय यह है कि राष्ट्रीय पहचान को समावेशी रीति से परिभाषित करना होगा जो राष्ट्र-राज्य के सदस्यों की महत्ता और अद्वितीय योगदान को मान्यता प्रदान कर सके।

यह आशा की जाती है कि समूहों को मान्यता और संरक्षा प्रदान करने से उनकी आकांक्षाएँ सन्तुष्ट होंगी, फिर भी हो सकता है, कि कुछ समूह पृथक् राज्य की माँग पर अडिग रहें। यह विरोधाभासी भी प्रतीत हो सकता है कि जहाँ दुनिया में भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया जारी है वहाँ राष्ट्रीय आकांक्षाएँ अभी भी बहुत सारे समूह और मनुष्यों को उद्देलित कर रही हैं। ऐसी माँगों से लोकतान्त्रिक तरीके से निपटने के लिए यह आवश्यक है कि सम्बन्धित देश अत्यन्त उदारता व दक्षता का परिचय दें।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राष्ट्रीयता किसे कहते हैं? राष्ट्रीयता का निर्माण किन तत्त्वों से होता है?
या
राष्ट्रीयता की परिभाषा दीजिए तथा इसके विभिन्न पोषक तत्वों की विवेचना कीजिए।
या
राष्ट्रीयता के विकास में उत्तरदायी तत्त्वों का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर-
राष्ट्रीयता का अर्थ एवं परिभाषाएँ
‘राष्ट्रीयता’ शब्द अंग्रेजी भाषा के ‘नैशनलिटी’ (Nationality) शब्द का हिन्दी अनुवाद है, जिसका उत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘नेशियो’ (Natio) शब्द से हुई है। इस शब्द से जन्म और जाति का बोध होता है। राष्ट्रीयता एक सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक भावना है, जो लोगों को एकता के सूत्र में बाँधती है। इसी भावना के कारण लोग अपने राष्ट्र से प्रेम करते हैं। इस प्रकार राष्ट्रीयता एक भावात्मक शब्द है। इसी भावना के कारण लोग अपने देश पर संकट आने की स्थिति में अपने तन, मन और धन का बलिदान करने से भी पीछे नहीं हटते हैं। जे० एच० रोज के अनुसार, “राष्ट्रीयता हृदयों की वह एकता है, जो एक बार बनने के बाद कभी खण्डित नहीं होती है।”

राष्ट्रीयता की पूर्ण एवं सम्यक परिभाषा करना एक कठिन कार्य है; किन्तु कुछ विद्वानों ने इसे स्पष्ट रूप से परिभाषित करने का प्रयास किया है। इन विद्वानों की परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

जिमर्न के अनुसार, “राष्ट्रीयता सामूहिक भावना का एक रूप है, जो विशिष्ट गहनता, समीपता तथा महत्ता से एक निश्चित देश से सम्बन्धित होती है।”

ब्लंश्ली के अनुसार, “राष्ट्रीयता मनुष्यों का वह समूह है, जो समान उत्पत्ति, समान जाति, समान भाषा, समान परम्पराओं, समान इतिहास तथा समान हितों के कारण एकता के सूत्र में बँधकर राज्य का निर्माण करता है।”

गिलक्राइस्ट के अनुसार, “राष्ट्रीयता एक आध्यात्मिक भावना या सिद्धान्त है, जिसकी उत्पत्ति उन लोगों में से होती है, जो साधारणत: एक जाति के होते हैं, जो एक भूखण्ड पर रहते हैं तथा जिनकी एक भाषा, एक धर्म, एक इतिहास, एक जैसी परम्पराएँ एवं एक जैसे हित होते हैं तथा जिनके राजनीतिक समुदाय और राजनीतिक एकता के एक-से आदर्श होते हैं।”

डॉ० बेनीप्रसाद के अनुसार, “राष्ट्रीयता की निश्चित परिभाषा करना कठिन है। परन्तु यह स्पष्ट है कि ऐतिहासिक गतिविधियों में यह पृथक् अस्तित्व ही उस चेतना का प्रतीक है, जो सामान्य आदतों, परम्परागत रीति-रिवाजों, स्मृतियों, आकांक्षाओं, अवर्णनीय सांस्कृतिक सम्प्रदायों तथा हितों पर आधारित है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं, “राष्ट्रीयता एक ऐसी भावना है, जिसके कारण एक देश के लोग एकता के सूत्र में बँधे रहते हैं और जो अपने देश एवं देशवासियों के प्रति संभावपूर्वक रहने की प्रेरणा देती है।”

राष्ट्रीयता के प्रमुख निर्माणक तत्त्व
राष्ट्रीयता के निर्माण अथवा राष्ट्रीयता की भावना के विकास में अनेक तत्त्व सहायक होते हैं। उनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-

1. भौगोलिक एकता- भौगोलिक एकता राष्ट्रीय एकता की प्रेरणा-स्रोत है। जब लोग समान भौगोलिक परिस्थितियों में रहते हैं तो उनकी आवश्यकताएँ एवं समस्याएँ भी समान होती हैं। अत: वे लोग मिल-जुलकर समान ढंग से अपनी समस्याएँ सुलझाने हेतु एकजुट होते हैं। इसके परिणामस्वरूप उनमें एकता की भावना उत्पन्न होती है, यह भावना ही कालान्तर में राष्ट्रीयता का प्रतीक बनती है। परन्तु इस सन्दर्भ में यह उल्लेखनीय है कि भौगोलिक एकता राष्ट्रीयता को एक सहायक तत्त्व है; अतः इसे अनिवार्य तत्त्व नहीं माना जाना चाहिए।

2. भाषा की एकता- राष्ट्रीयता के विकास में भाषा की एकता भी महत्त्व रखती है। समान भाषा-भाषी देशों में समान विचार एवं समान साहित्य का सृजन होता है। उनके समान रीति-रिवाज एवं समान रहन-सहन के कारण उनमें समान राष्ट्रीयता की भावना का उदय होता है। भाषा की एकता भी राष्ट्रीयता का एक अनिवार्य तत्त्व नहीं है; उदाहरणार्थ-कर्नाटक प्रान्त के नागरिक कन्नड़ भाषा बोलते हैं; तमिलनाडु के निवासी तमिल बोलते हैं और भारत के अधिकांश उत्तर-मध्य क्षेत्र में हिन्दी बोली जाती है। अत: इस आधार पर हम यह नहीं कह सकते कि भारत में राष्ट्रीयता का अभाव है।

3. संस्कृति की एकता- सांस्कृतिक एकता राष्ट्रीयता के मूल्यवान तत्त्वों में से एक है। संस्कृति के अन्तर्गत एक निश्चित भू-भाग के व्यक्तियों का साहित्य, रीति-रिवाज, प्राचीन परम्पराएँ इत्यादि सम्मिलित होती हैं। समान संस्कृति के आधार पर समान विचार, समान आदर्श तथा समान प्रवृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं, जिससे राष्ट्रीयता के निर्माण में सहायता मिलती है।

4. समान ऐतिहासिक परम्पराएँ- ऐतिहासिक घटनाओं एवं स्मृतियों का भी राष्ट्रीयता के विकास में काफी महत्त्व होता है। विजय और पराजय की स्मृतियाँ, सामाजिक विकास के आदर्श, सांस्कृतिक उत्थान-पतन का संकलित इतिहास राष्ट्रीयता के विकास में पर्याप्त सहायक होता है। सम्राट अशोक, अकबर और शिवाजी आदि का गौरव गाथा पढ़ने से समस्त भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना का संचार होता है।

5. धार्मिक एकता- धार्मिक एकता भी राष्ट्रीयता के निर्माण तथा विकास में वृद्धि करती है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि धार्मिक भिन्नता के कारण अनेक देशों में कितना अधिक रक्तपात हुआ है। धार्मिक भिन्नता के आगे राष्ट्रीयता की भावना दुर्बल पड़ जाती है, जिसके परिणामस्वरूप दो भिन्न धर्मावलम्बी राष्ट्रों के मध्य युद्ध होते हैं। इसीलिए प्रसिद्ध विद्वान रैम्जे म्योर ने लिखा है, “कुछ मामलों में धार्मिक एकता राजनीतिक एकता के निर्माण में शक्तिशाली योग देती है, जबकि कुछ दूसरे मामलों में धार्मिक भिन्नता उसके मार्ग में अनेक बाधाएँ उपस्थित करती है।”

6. राजनीतिक एकता- समान राजनीतिक व्यवस्था के अन्तर्गत रहने वाले लोग भी एकता का अनुभव करते हैं। इसके अतिरिक्त वे समान राजनीतिक व्यवस्था के परिणामस्वरूप मानसिक एकता का भी अनुभव करते हैं, जो आगे चलकर राष्ट्रीयता के निर्माण में सहायक होती है। इसके साथ ही कठोर विदेशी शासन भी राष्ट्रीयता के निर्माण में सहायक सिद्ध होता है।

7. जातीय एकता- जातीय एकता भी राष्ट्रीयता के विकास में सहायक होती है। एक जाति के लोग समान संस्कारों एवं रीति-रिवाजों आदि के कारण एक संगठन में बंधे रहते हैं, जिनके परिणामस्वरूप उनमें एकता की भावना का उदय होता है।

8. सामान्य आर्थिक हित- आधुनिककाल में राष्ट्रीयता के निर्माण में आर्थिक तत्त्व सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व माना जाता है। भारत के परिप्रेक्ष्य में रोजगार प्राप्त करने में सभी का सामान्य आर्थिक हित है। अत: इस दिशा में किए जाने वाले प्रयास राष्ट्रीय एकता के प्रयास के अन्तर्गत आते हैं।

9. अन्य तत्व- समान सिद्धान्तों में आस्था, सामान्य आपदाएँ, युद्ध लोकमत एवं सामूहिक एकता की चेतना भी राष्ट्रीयता के विकास में सहायक सिद्ध होती है। सामान्य आपदाओं; जैसे-गुजरात में आए भूकम्प और तमिलनाडु तथा अण्डमान द्वीप समूह में आए सुनामी समुद्री लहरों के तूफान के समय सभी क्षेत्रों से की गई सहायता इस बात का प्रतीक है कि हमारे अन्दर राष्ट्रीयता की भावना विद्यमान है।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि राष्ट्रीयता भावात्मक एकता का प्रतीक होती है। राष्ट्रीयता की भावना के कारण ही व्यक्ति राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण तथा बलिदान की भावना प्रकट करता है। राष्ट्रीयता का निर्माण विभिन्न तत्त्वों के मिश्रण से होता है। इनमें सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक परम्पराओं की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। राष्ट्रीयता की भावना के कारण ही भारत अंग्रेजी दासता से स्वतन्त्र हुआ। तथा यहूदियों ने यहूदी राष्ट्रीयता की भावना से आप्लावित होकर अपने स्वतन्त्र राष्ट्र की स्थापना की।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय भावना के विकास में बाधक तत्त्वों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
राष्ट्रीय भावना के विकास में बाधक तत्त्व
राष्ट्रीय भावना के विकास में निम्नलिखित तत्त्व बाधक हैं-

1. अज्ञानता और अशिक्षा- राष्ट्रीयता के निर्माण में प्रमुख बाधक तत्त्व अज्ञानता और अशिक्षा हैं। शिक्षा के अभाव में व्यक्ति का दृष्टिकोण संकुचित हो जाता है और वह राष्ट्रहित के स्थान पर व्यक्तिगत हित को सर्वोपरि समझने लगता है। इस कारण ऐसे संकुचित दृष्टिकोण वाले व्यक्ति राष्ट्रीयता के विकास में बाधक सिद्ध होते हैं।

2. आवागमन के अच्छे साधनों का अभाव- आवागमन के अच्छे साधनों के अभाव में देश के विभिन्न भागों में रहने वाले लोगों के बीच सम्पर्क स्थापित नहीं हो पाता है। इस सम्पर्क के अभाव में उस पारस्परिक एकता का जन्म नहीं हो पाता है, जो राष्ट्रीयता का मूल आधार है। परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से अब विकसित एवं विकासशील देशों में आवागमन के अच्छे साधनों , का अभाव नहीं रह गया है।

3. साम्प्रदायिकता की भावना- किसी वर्ग-विशेष द्वारा अपने स्वार्थों को महत्त्व देना और दूसरे वर्ग या वर्गों के हितों की उपेक्षा करना या उन्हें नीचा दिखाने की प्रवृत्ति साम्प्रदायिकता कहलाती है। साम्प्रदायिकता से द्वेष, शत्रुता, फूट, मतभेद आदि की भावनाएँ पनपती हैं, जो राष्ट्रीयता की प्रबल विरोधी हैं।

4. जातिवाद तथा भाषावाद- सम्प्रदायवाद के समान ही जातिवाद और भाषावाद भी राष्ट्रीयता के विकास में बाधक हैं। जातिवाद विभिन्न जातियों के मध्य कटुता और घृणा का भाव उत्पन्न करता है। तथा भाषावाद लोगों में एकता की भावना को खण्डित करता है। इस कारण विभिन्न जाति व भाषायी लोगों में राष्ट्रीयता की भावना विकसित नहीं हो पाती है।

5. क्षेत्रीयता की भावना- क्षेत्रीयता की भावना राष्ट्रीयता के विकास के लिए घातक है। इस | भावना के कारण एक क्षेत्र में रहने वाले लोग अन्य या दूसरे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों से घृणा करने लगते हैं। इसी कारण पंजाबी, बंगाली, मराठी, सिन्धी जैसी धारणाएँ विकसित होती हैं, जो राष्ट्रीयता के विकास को अवरुद्ध कर देती हैं। भारत में नए-नए राज्यों का उदय उग्र क्षेत्रवाद की भावना के ही परिणाम हैं।

6. पराधीनता- पराधीनता सभी बुराइयों की जड़ है। पराधीन व्यक्ति अपने देश या राष्ट्र के लिए न कुछ सोच सकता है और न कुछ कर सकता है। इसलिए पराधीनता राष्ट्रीयता के मार्ग की सबसे बड़ी अवरोधक है।

7. देशभक्ति की भावना का अभाव- जिस देश के नागरिकों में देश-प्रेम का अभाव होता है, उस देश में राष्ट्रीयता का विकास होना असम्भव है। ऐसा देश अल्प समय में ही दूसरे देश के अधीन होकर अपनी स्वतन्त्रता खो बैठता है।

प्रश्न 3.
राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद के विभिन्न दोषों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद के दोष
राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद की पराकाष्ठा कभी-कभी विश्व-शान्ति के लिए खतरा बन जाती है। इसीलिए राष्ट्रीयता में कुछ दोष भी हैं, जिनका विवरण निम्नलिखित है-
1. विश्व-शान्ति के लिए घातक- संकीर्ण और उग्र राष्ट्रीयता विश्व शान्ति के लिए घातक होती है। उग्र राष्ट्रवाद से प्रेरित होकर ही बीसवीं शताब्दी में जर्मनी ने सम्पूर्ण मानव जाति को दो-दो विश्व युद्धों की विभीषिकाएँ झेलने को विवश कर दिया था।

2. सैन्यवाद और युद्ध को प्रोत्साहन- राष्ट्रीयता का उग्र रूप सैन्यवाद और युद्ध को प्रोत्साहन देता है। इतिहास साक्षी है कि उग्र राष्ट्रीयता से प्रेरित होकर ही फ्रांस तथा जर्मनी अनेक बार युद्धरत हुए और दोनों देशों को जन-धन की अपार क्षति उठानी पड़ी।

3. साम्राज्यवाद का उदय- उग्र राष्ट्रीयता की भावना देशवासियों को अंहकारी तथा स्वार्थी बना देती है और वे अपने राष्ट्र को ही विश्व शक्ति के रूप में देखना चाहते हैं। इस मनोवृत्ति का परिणाम साम्राज्यवादी विस्तार के रूप में प्रकट होता है। उन्नीसवीं शताब्दी में साम्राज्यवाद के विकास का एक प्रमुख कारण राष्ट्रवाद भी था।

4. छोटे-छोटे राज्यों का संगठन- उग्र राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित होकर कभी-कभी छोटे-छोटे राज्य बन जाते हैं और उनमें आपसी द्वेष के कारण देश की एकता को खतरा उत्पन्न हो जाता है। मध्यकाल में यूरोप में अनेक छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना उग्र राष्ट्रीयता का ही परिणाम थी।

5. व्यक्ति का नैतिक पतन- संकीर्ण राष्ट्रीयता व्यक्ति को स्वार्थी और अंहकारी बना देती है। वह इतना पतित हो जाता है कि मानव जाति को समूल नष्ट करने की दिशा में प्रवृत्त हो जाता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी ने संकीर्ण राष्ट्रीयता से प्रेरित होकर यहूदियों पर भयानक अत्याचार किए थे।

6. अन्तर्राष्ट्रीयता के विकास में बाधक- राष्ट्रीयता की मान्यता है-‘एक राष्ट्र एक राज्य’, लेकिन राष्ट्रीयता का यह सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीय के प्रतिकूल है। राष्ट्रीयता की भावना के कारण ही विभिन्न राष्ट्रों का दृष्टिकोण अन्य राष्ट्रों के प्रति संकीर्ण तथा उपेक्षित-सा हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग और सद्भावना का विकास अवरुद्ध हो जाता है। और अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में अनेक समस्याएँ उत्पन्न होने लगती हैं।

प्रश्न 4.
राष्ट्रीय आत्म-निर्णय का अधिकार क्या है?
उत्तर-
आत्म-निर्णय के अधिकार के दावे के रूप में राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से माँग करता है कि उसके पृथक् राजनीतिक इकाई या राज्य के दर्जे को मान्यता और स्वीकार्यता प्रदान की जाए। अक्सर ऐसी माँग उन लोगों की तरफ से आती हैं जो दीर्घकाल से किसी निश्चित भू-भौग पर साथ-साथ रहते आए हों और जिनमें साझी पहचान को बोध हो। कुछ प्रकरणों में आत्म-निर्णय के दावे एक स्वतन्त्र राज्य बनाने की इच्छा से भी जुड़े होते हैं। इन दावों का सम्बन्ध किसी समूह की संस्कृति की संरक्षा से होता है।

दूसरी तरह के बहुत-से दावे उन्नीसवीं सदी के यूरोप में सामने आए, उस समय ‘एक संस्कृति-एक राज्य की मान्यता ने जोर पकड़ा। परिणामस्वरूप पहले विश्वयुद्ध के पश्चात् राज्यों की पुनर्व्यवस्था में ‘एक संस्कृति-एक राज्य के विचार को प्रयोग में लाया गया। वर्साय की सन्धि से बहुत-से छोटे नवे स्वतन्त्र राज्यों का गठन हुआ लेकिन उस समय उठाई जा रही आत्म-निर्णय की सभी माँगों को सन्तुष्ट करना वास्तव में असम्भव था। इसके अतिरिक्त ‘एक संस्कृति-एक राज्य की माँगों को सन्तुष्ट करने से राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन हुए। इससे सीमाओं के एक ओर से दूसरी ओर बहुत बड़ी जनसंख्या का विस्थापन हुआ। इसके परिणामस्वरूप लाखों लोग अपने घरों से उजड़ गए और उस जगह से उन्हें बाहर धकेल दिया गया जहाँ पीढ़ियों से उनका घर था। बहुत सारे लोग साम्प्रदायिक हिंसा के भी शिकार हो गए।

अलग-अलग सांस्कृतिक समुदायों को अलग-अलग राष्ट्र राज्य प्राप्त हुए, इसे ध्यान में रखकर सीमाओं में परिवर्तन किया गया। इस प्रयास के कारण मानव जाति को भारी मूल्य चुकाना पड़ा। इस प्रयास के बाद भी यह सुनिश्चित करना सम्भव नहीं हो सका कि नवगठित राज्यों में केवल एक ही नस्ल के लोग रहें। वास्तव में अधिकतर राज्यों की सीमाओं के अन्दर एक से अधिक नस्ल और संस्कृति के लोग रहते थे। ये छोटे-छोटे समुदाय राज्य के अन्दर अल्पसंख्यक थे और अक्सर हानिकारक स्थितियों में रहते थे। इस विकास का सकारात्मक पक्ष यह था कि उन बहुत सारे राष्ट्रवादी समूहों को राजनीतिक मान्यता प्रदान की गई जो स्वयं को एक अलग राष्ट्र के रूप में देखते थे और अपने भविष्य को निश्चित करने तथा अपना शासन स्वयं चलाना चाहते थे। लेकिन राज्यों के भीतर अल्पसंख्यक समुदायों की समस्या यथावत् बनी रही।

जब एशिया एवं अफ्रीका औपनिवेशिक प्रभुत्व के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे, तब राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलनों ने राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार की भी घोषणा की। राष्ट्रीय आन्दोलनों का मानना था कि राजनीतिक स्वाधीनता राष्ट्रीय समूहों को सम्मान एवं मान्यता प्रदान करेगी और साथ ही वहाँ के लोगों के सामूहिक हितों की रक्षा भी करेगी। अधिकांश राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन राष्ट्र के लिए न्याय, अधिकार और समृद्धि प्राप्त करने के लक्ष्य से प्रेरित थे। हालाँकि यहाँ भी प्रत्येक सांस्कृतिक समूह जिनमें से कुछ पृथक् राष्ट्र होने का दावा करते थे, के लिए राजनीतिक स्वाधीनता तथा राज्यसत्ता सुनिश्चित करना लगभग असम्भव साबित हुआ। इस क्षेत्र के अनेक देश जनसंख्या के देशान्तरण, सीमाओं पर युद्ध और हिंसा की चपेट में आते रहे। इस प्रकार, यहाँ राष्ट्रीय राज्य विरोधाभासी स्थिति में दिखाई देते हैं जिन्होंने संघर्षों की बदौलत स्वाधीनता प्राप्त की, लेकिन अब वे अपने भू-क्षेत्रों में राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार की माँग करने वाले अल्पसंख्यक समूहों का विरोध कर रहे हैं।

वास्तव में आज दुनिया की सभी राज्य सत्ताएँ इस दुविधा में फँसी हैं कि आत्म-निर्णय के आन्दोलनों से , कैसे निपटा जाए और इसने राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के अधिकार पर सवाल उत्पन्न कर दिए हैं। बहुत-से । लोग यह अनुभव करने लगे हैं कि समाधान नए राज्यों के गठन में नहीं वरन् वर्तमान राज्यों को अधिक लोकतान्त्रिक और समतामूलक बनाने में हैं। समाधान यह सुनिश्चित करने में है कि अलग-अलग सांस्कृतिक और नस्लीय पहचानों के लोग देश में समान नागरिक और मित्रों के समान सह अस्तित्वपूर्वक रह सकें। यह न केवल आत्म-निर्णय के नए दावों के उभार से उत्पन्न होने वाली समस्याओं के समाधान के लिए वरन् सुदृढ़ और एकताबद्ध राज्य बनाने के लिए आवश्यक होगा। जो राष्ट्र-राज्य अपने शासन में अल्पसंख्यक समूहों के अधिकारों और सांस्कृतिक पहचान का सम्मान नहीं करते उनके लिए अपने सदस्यों की निष्ठा प्राप्त करना कठिन होता है।

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 6 Citizenship

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 6 Citizenship (नागरिकता)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Political Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 6 Citizenship (नागरिकता).

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता के रूप में नागरिकता में अधिकार और दायित्व दोनों शामिल हैं। समकालीन लोकतान्त्रिक राज्यों में नागरिक किन अधिकारों के उपभोग की अपेक्षा कर सकते हैं? नागरिकों के राज्य और अन्य नागरिकों के प्रति क्या
दायित्व हैं?
उत्तर-
समकालीन विश्व में राष्ट्रों ने अपने सदस्यों को एक सामूहिक राजनीतिक पहचान के साथ-साथ कुछ अधिकार भी प्रदान किए हैं। नागरिकों को प्रदत्त अधिकारों की सुस्पष्ट प्रकृति विभिन्न राष्ट्रों में भिन्न-भिन्न हो सकती है, लेकिन अधिकतर लोकतान्त्रिक देशों ने आज उनमें कुछ राजनीतिक अधिकार शामिल किए हैं। उदाहरणस्वरूप, मतदान अभिव्यक्ति या आस्था की आजादी जैसे नागरिक अधिकार और न्यूनतम मजदूरी या शिक्षा पाने से जुड़े कुछ सामाजिक-आर्थिक अधिकार अधिकारों और प्रतिष्ठा की समानता नागरिकता के बुनियादी अधिकारों में से एक है।

प्रश्न 2.
सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए तो जा सकते हैं लेकिन हो सकता है कि वे इन अधिकारों का प्रयोग समानता से न कर सकें। इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
सभी नागरिकों को समान अधिकार और अवसर देने पर विचार करना और सुनिश्चित करना किसी सरकार के लिए सरल नहीं होता। विभिन्न समूह के लोगों की आवश्यकताएँ और समस्याएँ अलग-अलग हो सकती हैं और एक समूह के अधिकार दूसरे समूह के अधिकारों के प्रतिकूल हो सकते हैं। नागरिकों के लिए समान अधिकार का आशय यह नहीं होता कि सभी लोगों पर समान नीतियाँ लागू की दी जाएँ, क्योंकि विभिन्न समूह के लोगों की आवश्यकताएँ भिन्न-भिन्न हो सकती हैं। अगर उद्देश्य केवल ऐसी नीति बनाना नहीं है जो सभी लोगों पर एक तरह से लागू हों बल्कि लोगों को अधिक बराबरी पर लाना है तो नीतियों का निर्माण करते समय विभिन्न आवश्यकताओं और दावों का ध्यान रखना होगा।

प्रश्न 3.
भारत में नागरिक अधिकारों के लिए हाल के वर्षों में किए गए किन्हीं दो संघर्षों पर टिप्पणी लिखिए। इन संघर्षों में किन अधिकारों की मॉग की गई थी?
उत्तर-
झोपड़पट्टी वाली का आन्दोलन – भारत के प्रत्येक शहर में एक बड़ी जनसंख्या झोपड़पट्टियों और अवैध कब्जे की जमीन पर बसे लोगों की हैं। यद्यपि ये लोग अपरिहार्य और उपयोगी काम अक्सर कम मजदूरी पर करते हैं फिर भी शहर की शेष जनसंख्या उन्हें अवांछनीय अतिथि के रूप में देखती है। उन पर शहर के संसाधनों पर बोझ बनने या अपराध करने का आरोप लगाया जाता हैं।

गन्दी बस्तियों की दशा अत्यन्त दयनीय होती है। छोटे-छोटे कमरों में बहुत-से लोग हुँसे रहते हैं। यहाँ न निजी शौचालय होता है, न जलापूर्ति और न सफाई व्यवस्था। गन्दी बस्तियों में जीवन और सम्पत्ति असुरक्षित होते हैं। झोपड़ी-पट्टियों के निवासी अपने श्रम से अर्थव्यव्सथा में महत्त्वपूर्ण योगदान करते हैं। अन्य व्यवसायों के बीच ये फेरीवाले, छोटे व्यापारी, सफाई कर्मी या घरेलू नौकर, नल ठीक करने वाले या मिस्त्री होते हैं। झोपड़-पट्टियों में बेत-बुनाई या कपड़ा-हँगाई-छपाई या सिलाई जैसे छोटे व्यवसाय भी चलते हैं।

झोपड़-पटिटय अपने अधिकारों के प्रति जागरूक और संगठित हो रही हैं। उन्होंने इसके लिए आन्दोलन भी चलाए और अदालतों में दस्तक भी दी है। उनके लिए वोट देने जैसे बुनियादी राजनीतिक अधिकार का प्रयोग करना भी कठिन हो जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने मुम्बई की झोपड़-पट्टियों में रहने वालों के अधिकारों के बारे में समाजकर्मी ओल्गा टेलिस की जनहित याचिका (ओल्गा टेलिस बनाम बम्बई नगर निगम) पर 1985 में एक महत्त्वपूर्ण निर्णय दिया। याचिका में कार्यस्थल के निकट रहने की वैकल्पिक जगह उपलब्ध नहीं होने के कारण फुटपाथ या झोपड़-पट्टियों में रहने के अधिकार का दावा किया गया था। अगर यहाँ रहने वालों को हटने के लिए मजबूर किया गया तो उन्हें आजीविका भी गॅवानी पड़ेगी। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संविधान की धारा 21 में जीने के अधिकार की गारण्टी दी गई है, जिसमें आजीविका का अधिकार शामिल है। इसलिए अगर फुटपाथवासियों को बेदखल करना हो तो उन्हें आश्रय के अधिकार के अन्तर्गत पहले वैकल्पिक जगह उपलब्ध करानी होगी।

टिहरी विस्थापितों का आन्दोलन – टिहरी गढ़वाल में टिहरी बाँध के बनने से टिहरी शहर डूब गया। इसके विस्थापितों के लिए सरकार ने जो व्यवस्थाएँ की थीं वे अपर्याप्त थीं। उचित मुआवजे की माँग और उचित आवास की माँग ने जीने के अधिकार का रूप धारण कर लिया। एक बड़ा आन्दोलन चला। अन्तत: सरकार ने सभी को उनके अधिकारों के अन्तर्गत राहत प्रदान की।

प्रश्न 4.
शरणार्थियों की समस्याएँ क्या हैं? वैश्विक नागरिकता की अवधारणा किस प्रकार उनकी सहायता कर सकती है?
उत्तर-
जब हम शरणार्थियों या अवैध अप्रवासियों के विषय में सोचते हैं तो मन में अनेक छवियाँ उभरती हैं। उसमें एशिया या अफ्रीका के ऐसे लोगों की छवि हो सकती है जिन्होंने यूरोप या अमेरिका में चोरी-छिपे घुसने के लिए दलाल को पैसे का भुगतान किया हो। इसमें जोखिम बहुत है लेकिन वे प्रयास में तत्पर दिखते हैं। एक अन्य छवि युद्ध या अकाल से विस्थापित लोगों की हो सकती है। इस प्रकार के बहुत से दृश्य हमें दूरदर्शन पर दिखाई दे जाते हैं। सूडान डरफर क्षेत्र के शरणार्थी, फिलीस्तीनी, बर्मी या बंगलादेशी शरणार्थी जैसे कई उदाहरण हैं। ये सभी ऐसे लोग हैं जो अपने ही देश या पड़ोसी देश में शरणार्थी बनने के लिए मजबूर किए गए हैं।

हम यह मान लेते हैं कि किसी देश की पूर्ण सदस्यता उन सबको उपलब्ध होनी चाहिए, जो सामान्यतया उस देश में रहते और काम करते हैं या जो नागरिकता के लिए आवेदन करते हैं। वैसे अनेक देश वैश्विक और समावेशी नागरिकता को समर्थन करते हैं लेकिन नागरिकता देने की शर्ते भी निर्धारित करते हैं। ये शर्ते साधारणतया देश के संविधान और कानूनों में लिखी होती हैं। अवांछित आगंतुकों को नागरिकता से बाहर रखने के लिए राज्य सत्ताएँ शक्ति का प्रयोग करती हैं।

अनेक प्रतिबन्ध, दीवार और बाड़ लगाने के बाद आज भी दुनिया में बड़े पैमाने पर लोगों का देशान्तरण होता है। अगर कोई देश स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता और वे घर नहीं लौट सकते तो वे राज्यविहीन और शरणार्थी हो जाते हैं। वे शिविरों में या अवैध प्रवासी के रूप में रहने के लिए विवश किए जाते हैं। अक्सर वे कानूनी रूप से काम नहीं कर सकते या अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा नहीं सकते या सम्पत्ति अर्जित नहीं कर सकते। शरणार्थियों की समस्या इतनी गम्भीर है कि संयुक्त राष्ट्र ने शरणार्थियों की जाँच करने और सहायता करने के लिए उच्चायुक्त नियुक्त किया हुआ है।

विश्व नागरिकता की अवधारणा अभी साकार नहीं हुई है। फिर भी इसके आकर्षणों में से एक यह है कि इससे राष्ट्रीय सीमाओं के दोनों ओर की उन समस्याओं का मुकाबला करना सरल हो सकता है। जिसमें कई देशों की सरकारों और लोगों की संयुक्त कार्यवाही आवश्यक होती है। इससे शरणार्थियों की समस्या का सर्वमान्य समाधान पाना सरल हो सकता है या कम-से-कम उनके बुनियादी अधिकार और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है चाहे वे किसी भी देश में रहते हों।

प्रश्न 5.
देश के अन्दर एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में लोगों के आप्रवासन का आमतौर पर स्थानीय लोग विरोध करते हैं। प्रवासी लोग स्थानीय अर्थव्यवस्था में क्या योगदान दे सकते हैं?
उत्तर-
प्रवासी लोग अपने श्रम से अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान करते हैं। अन्य व्यवसायों के बीच ये प्रवासी फेरीवाले, छोटे व्यापारी, सफाईकर्मी या घरेलू नौकर, नल ठीक करने वाले या मिस्त्री होते हैं। प्रवासी लोग अपने रहने के स्थान पर बेत-बुनाई या कपड़ा-हँगाई-छपाई, कपड़ों की सिलाई जैसे छोटे कारोबार भी चलाते हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 6 Citizenship 1
यदि ये प्रवासी लोग किसी नगर के जीवन से चले जाएँ या अपनी सभी आर्थिक गतिविधियाँ बन्द कर दें तो लोगों की क्या दशा होगी उसे उपर्युक्त चित्र के माध्यम से भली-भाँति समझा जा सकता है।

प्रश्न 6.
भारत जैसे समान नागरिकता देने वाले देशों में भी लोकतान्त्रिक नागरिकता एक पूर्ण स्थापित तथ्य नहीं वरन एक परियोजना है। नागरिकता से जुड़े उन मुद्दों की चर्चा कीजिए जो आजकल भारत में उठाये जा रहे हैं?
उत्तर-
भारत स्वयं को धर्मनिरपेक्ष और लोकतान्त्रिक राष्ट्र राज्य कहता है। स्वतन्त्रता आन्दोलन का आधार व्यापक था और विभिन्न धर्म, क्षेत्र और संस्कृति के लोगों को आपस में जोड़ने के कृत संकल्प प्रयास किए गए। यह सही है कि जब मुस्लिम लीग से विवाद नहीं सुलझाया जा सका, तब 1947 ई० में देश का विभाजन हुआ। लेकिन इसने उस राष्ट्र राज्य के धर्मनिरपेक्ष ओर समावेशी चरित्र को बनाए रखने के भारतीय राष्ट्रीय नेताओं के निश्चय को और सुदृढ़ ही किया जिसके निर्माण के लिए वे प्रतिबद्ध थे। यह निश्चय संविधान में सम्मिलित किया गया।

भारतीय संविधान ने बहुत ही विविधतापूर्ण समाज को समायोजित करने का प्रयास किया है। इन विविधताओं में से कुछ उल्लेखनीय हैं-
इसने अनुसूचित्र जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे भिन्न-भिन्न समुदायों, पूर्व में समान अधिकार से वंचित रही महिलाएँ, आधुनिक सभ्यता के साथ मामूली सम्पर्क रखने वाले अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह के कुछ सुदूरवर्ती समुदायों और कई अन्य समुदायों को पूर्ण और समान नागरिकता देने का प्रयास किया।
इसने देश के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित विभिन्न भाषाओं, धर्म और रिवाजों की पहचान बनाए रखने का प्रयास किया। इसे लागों को उनकी निजी आस्था, भाषा या सांस्कृतिक रिवाजों को छोड़ने के लिए बाध्य किए बिना सभी को समान अधिकार उपलब्ध कराना था। संविधान के जरिए आरम्भ किया गया यह अद्वितीय प्रयोग था दिल्ली में गणतन्त्र दिवस परेड में विभिन्न क्षेत्र, संस्कृति और धर्म के लोगों को सम्मिलित करने के राजसत्ता के प्रयास को प्रतिबिम्बित करता है।

नागरिकता से सम्बन्धित प्रावधानों का उल्लेख संविधान के तीसरे भाग और संसद द्वारा बाद में पारित कानूनों में हुआ है। संविधान ने नागरिकता की लोकतान्त्रिक और समावेशी धारणा को अपनाया है। भारत में जन्म, वंश परम्परा, पंजीकरण, देशीकरण या किसी भू-क्षेत्र के राज क्षेत्र शामिल होने से नागरिकता प्राप्त की जा सकती है। संविधान में नागरिकों के अधिकार और दायित्वों का उल्लेख है। यह प्रावधान भी है कि राज्य को नस्ल/जाति/लिंग/जन्मस्थल में से किसी भी आधार पर नागरिकों के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए। धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों को भी संरक्षित किया गया है। इस प्रकार के समावेशी प्रवाधानों ने संघर्ष और विवादों को जन्म दिया है। महिला आन्दोलन, दलित आन्दोलन या विकास योजनाओं से विस्थापित लोगों का संघर्ष ऐसे लोगों द्वारा चलाए जा रहे संघर्षों के कुछ उदाहरण हैं, जो मानते हैं कि उनकी नागरिकता को पूर्ण अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। भारत के अनुभवों से संकेत प्राप्त होते हैं कि किसी देश में लोकतान्त्रिक नागरिकता एक परियोजना या लक्ष्यसिद्धि का एक आदर्श है। जैसे-जैसे समाज बदल रहे हैं, वैसे-वैसे नित-नए मुद्दे भी समाने आ रहे हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘कर्तव्य के उचित क्रम-निर्धारण का नाम ही नागरिकता है।’ यह कथन किसका है।
(क) ए० के० सीयू को
(ख) सुकरात का
(ग) प्लेटो का
(घ) डॉ० विलियम बॉयड का
उत्तर-
(घ) डॉ० विलियम बॉयड का।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से नागरिक का सामाजिक अधिकार चुनिए
(क) मताधिकार
(ख) शिक्षा का अधिकार
(ग) चुनाव लड़ने का अधिकार
(घ) न्याय प्राप्त करने का अधिकार
उत्तर-
(ख) शिक्षा का अधिकार।

प्रश्न 3.
निम्नांकित में कौन विदेशी है?
(क) राजनीतिक अधिकार प्राप्त
(ख) सैनिक
(ग) राजदूत
(घ) राज्य का सदस्य
उत्तर-
(ग) राजदूत।

प्रश्न 4.
किन देशों में सम्पत्ति खरीदने पर वहाँ की नागरिकता प्राप्त हो जाती है?
(क) भारत
(ख) बांग्लादेश
(ग) दक्षिणी अमेरिका के कुछ देश
(घ) पाकिस्तान
उत्तर-
(ग) दक्षिणी अमेरिका के कुछ देश।

प्रश्न 5.
आदर्श नागरिकता का तत्त्व नहीं है
(क) कर्तव्यपरायणता
(ख) जागरूकता
(ग) शिक्षा
(घ) साम्प्रदायिकता
उत्तर-
(घ) साम्प्रदायिकता।

प्रश्न 6.
“शिक्षा, जो आत्मा का भोजन है, स्वस्थ नागरिकता की प्रथम शर्त है।” यह कथन किसका है?
(क) अब्राहम लिंकन का
(ख) सुकरात का
(ग) बाल गंगाधर तिलक को
(घ) महात्मा गांधी का
उत्तर-
(घ) महात्मा गांधी का।

प्रश्न 7.
आदर्श नागरिक के मार्ग में बाधा है
(क) अशिक्षा व अज्ञानता
(ख) अच्छा स्वास्थ्य
(ग) संयुक्त परिवार
(घ) निर्धन मित्र
उत्तर-
(क) अशिक्षा व अज्ञानता।

प्रश्न 8.
आदर्श नागरिक का गुण नहीं है
(क) सच्चरित्रता
(ख) आत्म-संयम
(ग) उग्र-राष्ट्रीयता
(घ) अधिकार-कर्तव्य का ज्ञान
उत्तर-
(ग) उग्र-राष्ट्रीयता।

प्रश्न 9.
आदर्श नागरिकता के मार्ग में बाधा नहीं है
(क) साम्प्रदायिकता
(ख) अशिक्षा
(ग) निर्धनता
(घ) राष्ट्र के प्रति सम्मान की भावना
उत्तर-
(घ) राष्ट्र के प्रति सम्मान की भावना।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित में से कौन-सा तत्त्व आदर्श नागरिकता के मार्ग में बाधक नहीं है।
(क) निर्धनता
(ख) अनुशासन
(ग) अशिक्षा
(घ) स्वार्थपरता
उत्तर-
(ख) अनुशासन।

प्रश्न 11.
किसी राज्य में निवास करने वाले विदेशी के सम्बन्ध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
(क) वह राज्य में भूमि का क्रय नहीं कर सकता
(ख) उसकी जान-माल की सुरक्षा के लिए राज्य उत्तरदायी नहीं है।
(ग) राज्य उसे अल्पकाल के लिए निवास करने की अनुमति दे सकता है।
(घ) वह अपने राज्य के प्रति निष्ठा रखता है।
उत्तर-
(ख) उसकी जान-माल की सुरक्षा के लिए राज्य उत्तरदायी नहीं है।

प्रश्न 12.
किसी देश में विदेशी को निम्नलिखित में से कौन-से अधिकार प्राप्त नहीं हैं ?
(क) राजनीतिक अधिकार
(ख) सामाजिक अधिकार
(ग) धार्मिक अधिकार
(घ) व्यापारिक अधिकार
उत्तर-
(क) राजनीतिक अधिकार।

प्रश्न 13.
आदर्श नागरिकता के मार्ग में प्रमुख बाधा क्या है ?
(क) औद्योगीकरण
(ख) शहरीकरण
(ग) साक्षरता
(घ) निर्धनता
उत्तर-
(घ) निर्धनता।

प्रश्न 14.
संसद में भारतीय नागरिकता अधिनियम कब पारित हुआ ?
(क) 1950 ई० में
(ख) 1952 ई० में
(ग) 1955 ई० में
(घ) 1960 ई० में
उत्तर-
(ग) 1955 ई० में।

प्रश्न 15.
“दि फिलॉस्फी ऑफ सिटिजनशिप” नामक पुस्तक के लेखक हैं
(क) एफ० जी० गोल्ड
(ख) अल्फ्रेड जे० शॉ
(ग) डॉ० ई० एम० ह्वाइट
(घ) वार्ड
उत्तर-
(ग) डॉ० ई० एम० ह्वाइट।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नागरिकता प्राप्त करने के दो तरीके बताइए।
या नागरिकता प्राप्त होने की कोई दो स्थितियाँ बताइए।
उत्तर-
1. जन्म द्वारा तथा
2. देशीयकरण द्वारा।

प्रश्न 2.
भारत में नागरिकता के लोप होने के कोई दो कारण लिखिए।
या नागरिकता खोने के दो आधार बताइए।
उत्तर-

  1.  विदेश में सरकारी नौकरी करने पर तथा
  2.  सेना से भागने पर।

प्रश्न 3.
आदर्श नागरिक के विषय में लॉर्ड ब्राइस की परिभाषा लिखिए।
उत्तर–
“एक लोकतन्त्रीय (आदर्श) नागरिक में बुद्धि, आत्म-संयम तथा उत्तरदायित्व होना चाहिए।’

प्रश्न 4.
कोई दो स्थितियाँ बताइए जिनमें केन्द्रीय सरकार नागरिक की नागरिकता समाप्त कर | सकती है।
या एक भारतीय स्त्री की नागरिकता का लोप हो गया है। इसके दो सम्भावित कारणों का |’ उल्लेख कीजिए।
उत्तर-

  1.  देशद्रोह करने पर तथा
  2.  लम्बे समय तक देश से अनुपस्थित रहने पर।

प्रश्न 5.
आदर्श नागरिकता के चार तत्त्व बताइए।
उत्तर–
आदर्श नागरिकता के चार तत्त्व हैं—

  1.  कर्तव्यपरायणता,
  2.  प्रगतिशीलता,
  3.  व्यापक दृष्टिकोण तथा
  4.  जागरूकता।

प्रश्न 6.
भारतीय संविधान में समस्त नागरिकों के लिए कैसी नागरिकता की व्यवस्था की गयी है?
उत्तर-
भारतीय संविधान में समस्त नागरिकों के लिए इकहरी नागरिकता की व्यवस्था की गयी है।

प्रश्न 7.
नागरिक के दो प्रमुख कर्तव्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर–
नागरिक के दो प्रमुख कर्तव्य हैं—

  1.  राज्य के प्रति भक्ति एवं
  2.  राज्य के कानूनों का पालन करना।

प्रश्न 8.
विदेशी किसे कहते हैं ?
उत्तर–
विदेशी वह व्यक्ति है जो अपना देश छोड़कर किसी कारणवश अन्य देश में रहने लगा हो। उसे उस देश के सामाजिक अधिकार प्राप्त होते हैं, राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं होते।

प्रश्न 9.
विदेशियों का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर–
विदेशियों को तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

  1.  स्थायी विदेशी,
  2.  अस्थायी विदेशी तथा
  3.  राजदूत।

प्रश्न 10.
आदर्श नागरिकता के मार्ग में सहायक दो प्रमुख तत्त्व बताइए।
उत्तर-
आदर्श नागरिकता के मार्ग में सहायक दो प्रमुख तत्त्व हैं-

  1.  स्वतन्त्र प्रेस तथा
  2.  स्वस्थ राजनीतिक दल।

प्रश्न 11.
“शिक्षा श्रेष्ठ नागरिक जीवन के वृत्त-खण्ड की आधारशिला है।” यह कथन किस विद्वान् का है ?
उत्तर-
यह कथन डॉ० बेनी प्रसाद नामक विद्वान् का है।

प्रश्न 12.
नागरिकों के कौन-से दो मुख्य प्रकार होते हैं ?
उत्तर-
नागरिकों के दो मुख्य प्रकार हैं-

  1.  जन्मजात नागरिक तथा
  2.  देशीयकरण से नागरिकता प्राप्त नागरिक।

प्रश्न 13.
भारत में नागरिकता अधिनियम कब बनाया गया?
उत्तर-
भारत में नागरिकता अधिनियम 1955 ई० में बनाया गया।

प्रश्न 14.
भारत का प्रथम नागरिक कौन है?
उत्तर-
भारत का राष्ट्रपति भारत का प्रथम नागरिक माना जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नागरिक की विभिन्न परिभाषाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
‘नागरिक’ की परिभाषाएँ
प्राचीन यूनानी विचारक अरस्तु ने नागरिक की परिभाषा इन शब्दों में की थी, “एक नागरिक वह है, जिसने राज्य के शासन में कुछ भाग लिया हो और जो राज्य द्वारा प्रदान किए गए सम्मान का उपभोग कर सके।”
भले ही तत्कालीन परिस्थितियों में अरस्तु की उपर्युक्त परिभाषा सटीक रही हो, लेकिन अरस्तू की यह परिभाषा आधुनिक काल में अपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि आज नगर-राज्यों का स्थान विशाल राज्यों ने ले लिया है। फलतः ‘नागरिक’ शब्द का अर्थ भी बहुत अधिक व्यापक हो गया है। आधुनिक विद्वानों ने ‘नागरिक’ शब्द की परिभाषा निम्नलिखित प्रकार से दी है ।
लॉस्की के अनुसार, “नागरिक केवल समाज का एक सदस्य ही नहीं है, वरन् वह कुछ कर्तव्यों का यान्त्रिक रूप से पालनकर्ता तथा आदेशों का बौद्धिक रूप से ग्रहणकर्ता भी है।”
गैटिल के अनुसार, “नागरिक समाज के वे सदस्य हैं, जो कुछ कर्तव्यों द्वारा समाज से बँधे रहते हैं, जो उसके प्रभुत्व को मानते हैं और उससे समान रूप से लाभ उठाते हैं।”
सीले के अनुसार, “नागरिक उस व्यक्ति को कहते हैं, जो राज्य के प्रति भक्ति रखता हो, उसे सामाजिक तथा राजनीतिक अधिकार प्राप्त हों और जन-सेवा की भावना से प्रेरित हो।”

प्रश्न 2.
किसी देश के नागरिक को कितनी श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं? संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर-
किसी देश के नागरिक को निम्नलिखित चार श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं

1. अल्प-वयस्क नागरिक- ये एक निश्चित आयु से कम आयु के व्यक्ति होते हैं। ऐसे नागरिकों को समस्त प्रकार के अधिकार प्राप्त होते हैं, लेकिन निर्धारित आयु के पूर्व वे अपने राजनीतिक अधिकारों का उपयोग नहीं कर सकते। भारत में 18 वर्ष की आयु से कम के व्यक्ति इस श्रेणी
में आते हैं।

2. मताधिकार रहित वयस्क नागरिक- ये वे नागरिक होते हैं जो निर्धारित आयु पूर्ण करने के बाद | भी शारीरिक एवं मानसिक अयोग्यताओं के कारण मत देने के अधिकार से वंचित कर दिये जाते हैं। उदाहरणार्थ-कोढ़ी, पागल, दिवालिया व देशद्रोही इत्यादि। इन्हें सिर्फ सामाजिक अधिकार प्राप्त होते हैं।

3. मताधिकार प्राप्त वयस्क नागरिक- इस श्रेणी में वे नागरिक आते हैं जो चारों शर्तों को पूरा करते हों, अर्थात् वे राज्य के सदस्य हों, उन्हें सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकार प्राप्त हों, उन्हें मताधिकार प्राप्त हो तथा उनमें राज्य के प्रति भक्ति-प्रदर्शन की भावना हो।

4.  देशीयकृत नागरिक- इस श्रेणी में वे नागरिक आते हैं जो पूर्व में किसी अन्य देश अथवा राज्य के नागरिक थे, लेकिन किसी देश में बहुत दिनों तक रहने एवं कुछ शर्तों को पूरा करने पर राज्य की ओर से उन्हें राजनीतिक एवं सामाजिक अधिकार दे दिये गये हों।

प्रश्न 3.
‘विदेशी पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
विदेशी वह व्यक्ति है जो अस्थायी रूप से उस राज्य में निवास करता है जिसका वह सदस्य नहीं है। कोई भी व्यक्ति किसी देश में विदेशी उस समय कहा जा सकता है जब वह अल्पावधि हेतु किसी कार्यवश अपना देश छोड़कर दूसरे देश में रहने के लिए आया हो। कोई व्यक्ति व्यापार करने, शिक्षा प्राप्त करने अथवा घूमने के लिए दूसरे देश में आता है और जितने समय तक अपना देश छोड़कर बाहर रहता है, उतने समय तक उस राज्य में विदेशी कहा जाता है। उसे उस देश के राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं होते तथा न ही वह उस राज्य के प्रति भक्तिभाव रखता है। वह उस राज्य के प्रति भक्तिभाव रखता है जिसका वह सदस्य है। इस प्रकार विदेशी वह व्यक्ति है जो सिर्फ सामाजिक अधिकारों का उपयोग करता है। एक विदेशी को जीवन एवं सम्पत्ति की रक्षा एवं कुछ सामान्य सामाजिक अधिकार प्राप्त होते हैं, लेकिन अन्य सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं होते। इन अधिकारों की प्राप्ति के बदले विदेशियों को सम्बन्धित देश के कानून का पूर्णतया पालन करना होता है।

प्रश्न 4.
नागरिकता प्राप्त करने के सन्दर्भ में जन्म-स्थान के सिद्धान्त का विवरण दीजिए।
उत्तर-
इस सिद्धान्त के अनुसार बालक की नागरिकता उसके जन्मस्थान के आधार पर निश्चित की जाती है। उदाहरणार्थ, यदि भारत के किसी नागरिक का बच्चा अर्जेण्टाइना की भूमि पर जन्म लेता है। तो वह बच्चा वहाँ का नागरिक माना जाएगा। लेकिन इसके विपरीत, यदि अर्जेण्टाइन के नागरिक का बच्चा भारत- भूमि पर अथवा अन्य किसी राज्य में जन्म लेता है तो वह स्वदेश की नागरिकता से वंचित रह जाएगा। यद्यपि यह सिद्धान्त अर्जेण्टाइना में प्रचलित है, लेकिन वहाँ की अपेक्षा यह इंग्लैण्ड में अधिक व्यापक है। वहाँ तो कोई बच्चा यदि इंग्लैण्ड के जहाज में भी पैदा होता है तो वह इंग्लैण्ड का नागरिक माना जाता है।
इस सिद्धान्त का सबसे बड़ा दोष यह है कि कोई दम्पति विश्व-भ्रमण के लिए निकले तो हो सकता है। कि उसकी एक सन्तान जापान में हो, दूसरी भारत में तथा तीसरी संयुक्त राज्य अमेरिका में। ऐसी दशा में जन्म-स्थान नियम के अनुसार तीनों बच्चे अलग-अलग देशों के नागरिक होंगे तथा उन्हें अपने माता-पिता के देश की नागरिकता प्राप्त नहीं होगी।

प्रश्न 5.
नागरिकता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
नागरिकता वह भावना है जो नागरिक में निवास करती है। यह भावना नागरिक में देशभक्ति को जाग्रत करती है और नागरिक को उसके कर्तव्य-पालन तथा उत्तरदायित्व निभाने के लिए सजग करती है। लॉस्की के कथनानुसार, “अपनी प्रशिक्षित वृद्धि को लोकहित के लिए प्रयोग करना ही नागरिकता , है।’ गैटिल के विचारानुसार, “नागरिकता किसी व्यक्ति की उस स्थिति को कहते हैं, जिसके अनुसार वह अपने राज्य में सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकारों का उपभोग कर सकता है तथा कर्तव्यों का पालन करने के लिए तत्पर रहता है।”

विलियम बॉयड के अनुसार, “भक्ति भावना का उचित क्रम-निर्धारण ही नागरिकता है।” डॉ० आशीर्वादी लाल के अनुसार, नागरिकता केवल राजनीतिक कार्य ही नहीं, वरन् एक सामाजिक एवं नैतिक कर्तव्य भी है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि नागरिक होने की दशा का नाम ही नागरिकता है। दूसरे शब्दों में, “जीवन की वह स्थिति, जिसमें व्यक्ति किसी राज्य का सदस्य होने के नाते समस्त प्रकार के सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकारों का उपभोग करता है, ‘नागरिकता (Citizenship) कहलाती है।”

प्रश्न 6.
स्थायी विदेशी तथा अस्थायी विदेशी में अन्तर बताइए।
उत्तर-
स्थायी विदेशी-ऐसे विदेशी जो अपना पूर्व देश छोड़कर किसी ऐसे देश में आ गये हों जहाँ वे स्थायी रूप से रहना चाहते हों तथा नागरिकता-प्राप्ति की शर्तों को पूरा कर रहे हों, स्थायी विदेशी कहलाते हैं। नागरिकता-प्राप्ति की प्रक्रिया द्वारा ये विदेशी उस देश के नागरिक बन जाते हैं। अस्थायी विदेशी–अस्थायी विदेशी विशेष कारण से अपना देश छोड़कर अल्पावधि हेतु दूसरे देश में आकर रहते हैं तथा अपना कार्य पूर्ण करके स्वदेश लौट जाते हैं। सामान्यतया इनका उद्देश्य शिक्षा, भ्रमण अथवा व्यापार होता है।

प्रश्न 7.
नागरिक तथा मतदाता में भेद बताइए।
उत्तर-
एक राज्य के अन्तर्गत नागरिक तथा मतदाता में भेद (अन्तर) होता है। एक राज्य के समस्त नागरिक मतदाता नहीं होते हैं। मतदाता कौन हो सकता है; यह राज्य के कानूनों द्वारा स्पष्ट किया जाता है। किसी भी देश के अन्तर्गत अवयस्क नागरिक को मतदान का अधिकार प्राप्त नहीं होता है। इसके अलावा, कतिपय राज्यों में धर्म, सम्पत्ति, लिंग एवं शिक्षा के आधार पर भी कुछ नागरिकों को मताधिकार से वंचित किया जाता है। किन्तु आधुनिक समय की प्रवृत्ति इस प्रकार के प्रतिबन्धों के प्रतिकूल है। संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत, इंग्लैण्ड, पाकिस्तान, फ्रांस इत्यादि संसार के अधिकांश राज्यों में समस्त वयस्क नागरिकों को मतदान का अधिकार प्राप्त है।

प्रश्न 8.
नागरिकता की चार विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-
नागरिकता की चार विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. राज्य की सदस्यता- नागरिकता की सर्वप्रथम विशेषता राज्य की सदस्यता है।
  2. सर्वव्यापकता- नागरिकता प्रत्येक उस व्यक्ति को प्राप्त होती है जो कि राज्य का निवासी हो, भले ही वह शहर में निवास करता हो अथवा किसी ग्राम में।
  3. राज्य के प्रति निष्ठा- नागरिकता में देशभक्ति का गुण होना परम आवश्यक है।
  4. अधिकारों का प्रयोग- नागरिकता व्यक्ति को राज्य की तरफ से अधिकार प्रदान करती है।

प्रश्न 9.
देशीयकरण द्वारा नागरिकता प्राप्त करने की चार शर्ते बताइए।
या भारतीय नागरिकता को प्राप्त करने की दो शर्ते बताइए।
उत्तर-
देशीयकरण द्वारा नागरिकता प्राप्त करने की चार शर्ते निम्नलिखित हैं

  1.  विदेशी ऐसे राज्य का नागरिक न हो जहाँ भारतीयों पर वहाँ की नागरिकता ग्रहण करने पर प्रतिबन्ध लगाया गया हो।
  2.  वह प्रार्थना-पत्र देने की तिथि से पूर्व न्यूनतम एक वर्ष से लगातार भारत में निवास कर रहा हो।
  3.  वह एक वर्ष से पूर्व, न्यूनतम 5 वर्षों तक भारत में रह चुका हो अथवा भारत सरकार की नौकरी में । रह चुका हो अथवा दोनों मिलाकर 7 वर्ष का समय हो, लेकिन किसी भी परिस्थिति में 4 वर्ष से कम समय न हो।
  4.  उसका आचरण अच्छा हो।

प्रश्न 10.
आदर्श नागरिकता के मार्ग में अशिक्षा कैसे बाधक है?
उत्तर-
शिक्षा तथा ज्ञान के अभाव में आदर्श नागरिकता की कल्पना करना व्यर्थ है। अशिक्षित एवं अज्ञानी व्यक्ति उचित व अनुचित में अन्तर नहीं कर पाते। वे अपने उत्तरदायित्व के बोध से अपरिचित रहते हैं। ऐसे व्यक्ति राजनीतिक तथा सार्वजनिक कर्तव्यों का निष्पादन अपनी समझ-बूझ के आधार पर न करके अन्य व्यक्तियों के बहकावे में आकर करते हैं। शिक्षा तथा ज्ञान के बिना व्यक्ति न तो अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकता है और न ही राष्ट्र के विकास में योगदान दे सकता है। मैकम ने तो यहाँ तक कहा है कि शिक्षा के बिना नागरिक अपूर्ण है।”

प्रश्न 11.
आदर्श नागरिकता के मार्ग में साम्प्रदायिकता कैसे बाधक है?
उत्तर-
साम्प्रदायिकता को आदर्श नागरिक की प्रबलतम शत्रु माना गया है। साम्प्रदायिकता की भावना से ही सामाजिक जीवन में कटुता पैदा हो जाती है तथा शान्ति नष्ट हो जाती है। कभी-कभी इसके वशीभूत होकर व्यक्ति अपने धार्मिक एवं राजनीतिक समुदायों को इतना अधिक महत्त्व देते हैं कि वे समाज एवं राज्य के हितों की अपेक्षा हेतु तत्पर हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में आदर्श नागरिकता की प्राप्ति असम्भव हो जाती है।

प्रश्न 12.
नागरिकता का लोप होने की किन्हीं पाँच स्थितियों का विवेचन कीजिए।
उत्तर-
नागरिकता का लोप
सामान्यतया निम्नलिखित स्थितियों में नागरिकता का लोप हो जाता है अथवा किसी व्यक्ति की नागरिकता समाप्त हो जाती है-

  1. विदेशी नागरिकता ग्रहण करने पर- यदि कोई व्यक्ति विदेश की नागरिकता ग्रहण कर लेता है, तो उसकी अपने देश की नागरिकता स्वत: ही समाप्त हो जाती है।
  2. विवाह द्वारा- यदि कोई महिला विदेशी पुरुष से विवाह कर लेती है, तो वह अपने देश की नागरिकता खो देती है।
  3. अनुपस्थिति के कारण- यदि कोई व्यक्ति अपने देश से लम्बी अवधि तक अनुपस्थित रहता | है, तो उसकी नागरिकता समाप्त हो जाती है।
  4. सेना से भागने पर- सेना से भागे सैनिक, देशद्रोही तथा घोर अपराधी भी नागरिकता से वंचित कर दिए जाते हैं।
  5. विदेशों में नौकरी करने से- यदि कोई व्यक्ति विदेश में नौकरी कर लेता है अथवा विदेशी नागरिकता ग्रहण कर लेता है, तो वह अपने देश की नागरिकता खो देता है।

प्रश्न 13.
सत्रहवीं से बीसवीं सदी के बीच यूरोप के गोरे लोगों ने दक्षिण अफ्रीका के लोगों पर अपना शासन कायम रखा। 1994 तक दक्षिण अफ्रीका में अपनाई गई नीतियों के बारे में नीचे दिए गए ब्योरे को पढिए।
श्वेत लोगों को मत देने, चुनाव लड़ने और सरकार को चुनने का अधिकार था। वे सम्पत्ति खरीदने और देश में कहीं भी आने-जाने के लिए स्वतन्त्र थे। काले लोगों को ऐसे अधिकार नहीं थे। काले और गोरे लोगों के लिए पृथक मोहल्ले और कालोनियाँ बसाई गई थीं। काले लोगों को अपने पड़ोस की गोरे लोगों की बस्ती में काम करने के लिए ‘पास लेने पड़ते थे। उन्हें गोरों के इलाके में अपने परिवार रखने की अनुमति नहीं थी। अलग-अलग रंग के लोगों के लिए विद्यालय भी अलग-अलग थे।
(i) क्या अश्वेत लोगों की दक्षिण अफ्रीका में पूर्ण और समान सदस्यता मिली हुई थी? कारण सहित बताइए।
(ii) ऊपर दिया गया ब्योरा हमें दक्षिण अफ्रीका में भिन्न समूहों के अन्तर्सम्बन्धों के बारे में क्या बताता है?
उत्तर-
(i) नहीं, अश्वेत लोगों को दक्षिण अफ्रीका में पूर्ण समान सदस्यता प्राप्त नहीं थी। वहाँ रंगभेद नीति इसका प्रमुख कारण था।
(ii) दक्षिण अफ्रीका में भिन्न समूह (गोर-काले) के अन्तर्सम्बन्ध ठीक नहीं थे। दोनों में आपस में गहरे मतभेद थे।

प्रश्न 14.
नागरिक के लक्षणों की संक्षेप में विवेचना कीजिए।
उत्तर-
नागरिक के निम्नलिखित लक्षण या विशेषताएँ होती हैं

  1.  वह राज्य का सदस्य हो।
  2.  वह राज्य की सीमा के अन्दर रहता हो, चाहे वह नगर-निवासी हो अथवा ग्रामवासी।
  3.  उसे सभी सामाजिक तथा राजनीतिक अधिकार प्राप्त हों।
  4.  वह राज्य की सम्प्रभुता को स्वीकार करता हो और राज्य में पूर्ण निष्ठा एवं भक्ति रखता हो।
  5.  उसे मताधिकार प्राप्त हो।
  6.  उसमें कर्तव्यपरायणता की भावना निहित हो।
  7.  वह राष्ट्र तथा समाज के प्रति पूर्ण निष्ठा तथा भक्ति की भावना से ओतप्रोत हो।

प्रश्न 15.
विश्व नागरिकता की संक्षेप में विवेचना कीजिए।
उत्तर-
विश्व नागरिकता की अवधारणा आधुनिक विचारकों की देन है। जिस प्रकार विश्व-राज्य व विश्व-बन्धुत्व की कल्पना की गई है, उसी प्रकार विश्व-नागरिकता का विचार भी विकसित हुआ है। विश्व-बन्धुत्व की कल्पना को साकार बनाकर विश्व नागरिकता के विचार को व्यावहारिक रूप प्रदान किया जा सकता है, परन्तु यह काल्पनिक अवधारणा यथार्थ के धरातल पर असम्भव ही प्रतीत होती है। विश्व नागरिकता का आशय ऐसी नागरिकता से है, जो सभी राष्ट्रों द्वारा मान्य हो। संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएँ विश्व नागरिकता की अवधारणा को व्यावहारिक रूप दे सकती हैं। राजनीतिक सम्बन्ध, शान्ति की इच्छा, आवागमन के साधनों का विकास, सांस्कृतिक एकता, विश्व-बन्धुत्व की भावना व मानवाधिकार, अन्तर्राष्ट्रीय कानून और अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के माध्यम से विश्व नागरिकता के आदर्श को प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की जा सकती है। नेहरू जी विश्व नागरिकता के प्रबल समर्थक थे।

प्रश्न 16.
आदर्श नागरिकता के महत्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
किसी भी देश की प्रगति का आधार वहाँ के नागरिक होते हैं। जिस देश के नागरिक आदर्श नागरिकता के गुणों से परिपूर्ण होते हैं, वह देश शीघ्र ही उन्नति के शिखर पर पहुँच जाता है। अरस्तू का कथन है, “श्रेष्ठ नागरिक ही श्रेष्ठ राज्य का निर्माण कर सकते हैं; अतः राज्य के नागरिक आदर्श होने चाहिए।” वास्तव में आदर्श नागरिकता ही राज्य के विकास का आधार बन सकती है। डॉ० आशीर्वादी के अनुसार, “नागरिकता का सम्बन्ध केवल राजनीतिक जीवन से ही नहीं है, वरन् । सामाजिक और नैतिक जीवन से भी है।”
एक आदर्श नागरिक के गुणों को व्यक्त करते हुए लॉर्ड ब्राइस ने लिखा है, “एक लोकतन्त्रीय नागरिक में बुद्धि, आत्म-संयम तथा उत्तरदायित्व की भावना होनी चाहिए।
इसी प्रकार डॉ० ह्वाइट ने लिखा है, “आदर्श नागरिक में तीन गुण; व्यावहारिक बुद्धि, ज्ञान और भक्ति; आवश्यक हैं।”

प्रश्न 17.
आदर्श नागरिकता की किन्हीं चार बाधाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
आदर्श नागरिकता के मार्ग की चार मुख्य बाधाएँ निम्नलिखित हैं

  1.  आदर्श नागरिकता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा अशिक्षा तथा निरक्षरता है।
  2.  संकीर्ण धार्मिक भावनाएँ तथा साम्प्रदायिकता की मनोदशा आदर्श नागरिकता के मार्ग को अवरुद्ध कर देती हैं।
  3.  संकीर्ण मनोवृत्तियों पर आधारित दलीय राजनीति भी आदर्श नागरिकता को कुंठित कर देती है।
  4.  पूँजीवाद के अनियन्त्रित विकास ने भी समाज को निर्धन तथा अमीर दो वर्गों में विभाजित कर दिया है। अतः निर्धनता भी आदर्श नागरिकता के लिए अभिशाप है।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नागरिकता का समानता और अधिकार से क्या सम्बन्ध है?
उत्तर-
नागरिकता केवल एक कानूनी अवधारणा नहीं है। इसका समानता और अधिकारों के व्यापक उद्देश्यों से भी घनिष्ठ सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध का सर्वसम्मत सूत्रीकरण अंग्रेज समाजशास्त्री टी० एच० मार्शल (1893-1981) ने किया है। अपनी पुस्तक ‘नागरिकता और सामाजिक वर्ग में मार्शल ने नागरिकता को किसी समुदाय के पूर्ण सदस्यों को प्रदत्त प्रतिष्ठा के रूप में परिभाषित किया है। इस प्रतिष्ठा को ग्रहण करने वाले सभी लोग प्रतिष्ठा में अन्तर्भूत अधिकारों और कर्तव्यों के मामले में समान होते हैं।

नागरिकता की मार्शल द्वारा प्रदत्त कुँजी धारणा में मूल संकल्पना ‘समानता’ की है। इसमें दो बातें अन्तर्निहित हैं। पहली यह कि प्रदत्त अधिकार और कर्तव्यों की गुणवत्ता बढ़े। दूसरी यह कि उन लोगों की संख्या बढ़े जिन्हें वे दिए गए हैं।
मार्शल नागरिकता में तीन प्रकार के अधिकारों को शामिल मानते हैं–नागरिक, राजनीतिक और सामाजिक अधिकार।
नागरिक अधिकार व्यक्ति के जीवन, स्वतन्त्रता और सम्पत्ति की रक्षा करते हैं। राजनीतिक अधिकार व्यक्ति को शासन प्रक्रिया में सहभागी बनने की शक्ति प्रदान करते हैं। सामाजिक अधिकार व्यक्ति के लिए शिक्षा और रोजगार को सुलभ बनाते हैं। कुल मिलाकर ये अधिकार नागरिक के लिए सम्मान के साथ जीवन-बसर करना सम्भव बनाते हैं।

मार्शल ने सामाजिक वर्ग को ‘असमानता की व्यवस्था के रूप में चिह्नित किया। नागरिकता वर्ग पदानुक्रम के विभाजक परिणामों का प्रतिकार कर समानता सुनिश्चित करती है। इस प्रकार यह बेहतर सुबद्ध और समरस समाज रचना को सुसाध्य बनाता है।

प्रश्न 2.
भारतीय नागरिकता किन आधारों पर लुप्त हो सकती है? कोई दो प्रकार बताइए।
उत्तर-
भारतीय नागरिक अधिनियम, 1955 नागरिकता के लोप के विषय में भी व्यवस्था करता है, चाहे वह भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 के अन्तर्गत प्राप्त की गई हो या संविधान के उपबन्धों के अनुसार प्राप्त की गई हो। इस अधिनियम के अनुसार नागरिकता का लोप निम्न प्रकार से हो सकता है

1. नागरिकता का परित्याग- कोई भी वयस्क भारतीय नागरिक जो किसी दूसरे देश का भी ‘ नागरिक है, भारतीय नागरिकता को त्याग सकता है। इसके लिए उसे एक घोषणा करनी होगी और उस घोषणा का पंजीकरण हो जाने पर उसकी भारतीय नागरिकता लुप्त हो जाएगी, किन्तु यदि ऐसी घोषणा किसी ऐसे युद्धकाल में की जाती है, जिसमें भारत एक पक्षकार हो, तो पंजीकरण को तब तक रोका जा सकता है, जब तक भारत सरकार उचित समझे। यह उल्लेखनीय है कि जब कोई पुरुष भारतीय नागरिकता का त्याग करता है, तो उसके साथ-साथ उसके अवयस्क बच्चे भी भारतीय नागरिकता खो देते हैं।

2. अन्य देशों की नागरिकता स्वीकार करने पर- यदि कोई भारतीय नागरिक अपनी इच्छा से  किसी दूसरे देश की नागरिकता स्वीकार कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता लुप्त हो जाती है। यह नियम उन नागरिकों के सम्बन्ध में लागू नहीं होता है, जो किसी ऐसे युद्धकाल में,
जिसमें भारत एक पक्षकार हो, स्वेच्छा से दूसरे देश की नागरिकता स्वीकार कर लेते हैं।

प्रश्न 3.
नागरिक और विदेशी में अन्तर लिखिए।
उत्तर-
नागरिक और विदेशी में अन्तर
UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 6 Citizenship 2
UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 6 Citizenship 3

प्रश्न 4.
नागरिक और राष्ट्र के सम्बन्ध की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
राष्ट्र राज्य की अवधारणा आधुनिक काल में विकसित हुई। राष्ट्र राज्य की सम्प्रभुता और नागरिकों के लोकतान्त्रिक अधिकारों का दावा सर्वप्रथम 1789 में फ्रांस के क्रान्तिकारियों ने किया था। राष्ट्र राज्यों का दावा है कि उनकी सीमाएँ केवल राज्यक्षेत्र को नहीं बल्कि एक अनोखी संस्कृति और साझा इतिहास को भी परिभाषित करती हैं। राष्ट्रीय पहचान को एक झण्डा, राष्ट्रगान, राष्ट्रभाषा या कुछ विशिष्ट उत्सवों के आयोजन जैसे प्रतीकों से व्यक्त किया जा सकता है।
अधिकतर आधुनिक राज्य स्वयं विभिन्न धर्मों, भाषा और सांस्कृतिक परम्पराओं के लोगों को सम्मिलित करते हैं।

लेकिन एक लोकतान्त्रिक राज्य की राष्ट्रीय पहचान में नागरिकों को ऐसी राजनीतिक पहचान देने की कल्पना होती है, जिसमें राज्य के सभी सदस्य भागीदार हो सकें। लोकतान्त्रिक देश साधारणतया अपनी पहचान इस प्रकार परिभाषित करने प्रयास करते हैं कि वह यथासम्भव समावेशी हो अर्थात् जो सभी नागरिकों को राष्ट्र के अंग के रूप में स्वयं को पहचानने की अनुमति देता हो। लेकिन व्यवहार में अधिकतर देश अपनी पहचान को इस प्रकार परिभाषित करने की ओर अग्रसर हैं, जो कुछ नागरिकों के लिए राष्ट्र के साथ अपनी पहचान व सम्बन्ध बनाए रखना अन्यों की तुलना में आसान बनाता है। यह राजसत्ता के लिए भी अन्यों की तुलना में कुछ लोगों को नागरिकता देना सरल कर देता है। यह अप्रवासियों का देश होने पर गौरवान्वित होने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका के बारे में भी वैसे ही सच है जैसे कि किसी अन्य देश के बारे में।

प्रश्न 5.
नागरिक अधिकार आन्दोलन के लिए मार्टिन लूथर किंग जूनियर की भूमिका की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
1950 का दशक संयुक्त राज्य अमेरिका के अनेक दक्षिणी राज्यों में काली और गोरी जनसंख्या के बीच व्याप्त विषमताओं के विरुद्ध नागरिक अधिकार आन्दोलन के उत्थान का साक्षी रहा है। इस प्रकार की विषमताएँ इन राज्यों द्वारा पृथक्करण कानून के नाम से विख्यात ऐसे कानूनों द्वारा पोषित होती थीं, जिनसे काले लोगों को अनेक नागरिक और राजनीतिक अधिकारों से वंचित किया जाता था। उन कानूनों ने विभिन्न नागरिक सुविधाओं; जैसे-रेल, बस, रंगशाला, आवास, होटल, रेस्टोरेण्ट आदि में गोरे और काले लोगों के लिए अलग-अलग स्थान निर्धारित कर रखे थे। इन कानूनों के कारण काले और गोरे बच्चों के स्कूल भी अलग-अलग थे।

इन कानूनों के विरुद्ध हुए आन्दोलन में मार्टिन लूथर किंग जूनियर अग्रणी काले नेता थे। उन्होंने इनके विरुद्ध अनेक अकाट्य तर्क प्रस्तुत किए। पहला, आत्म गौरव व आत्म-सम्मान के मामले में विश्व की प्रत्येक जाति या वर्ण का मनुष्य बराबर है। दूसरा, किंग ने कहा कि पृथक्करण राजनीति के चेहरे पर ‘सामाजिक कोढ़’ की तरह है क्योंकि यह उन लोगों को गहरे मनोवैज्ञानिक घाव देता है, जो ऐसे काननों के शिकार हैं।

किंग के तर्क दिया कि पृथक्करण की प्रथा गोरे समुदाय के जीवन की गुणवत्ता भी कम करती है। किंग इसे उदाहरणों द्वारा स्पष्ट करते हैं। गोरे समुदाय ने अदालत के निर्देशानुसार कुछ सामुदायिक उद्यानों में काले लोगों को प्रवेश की आज्ञा देने के बजाय उन्हें बन्द करने का फैसला किया। इसी प्रकार कुछ बेसबॉल टीमें टूट गईं क्योंकि अधिकारी काले खिलाड़ियों को स्वीकार नहीं करना चाहते थे। तीसरे, पृथक्करण कानून लोगों के बीच कृत्रिम सीमाएँ खींचते हैं और उन्हें देश के व्यापक हित के लिए एक-दूसरे का सहयोग करने से रोकते हैं। इन कारणों से किंग ने बहस छेड़ी कि उन कानूनों को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। उन्होंने पृथक्करण कानूनों के विरुद्ध शान्तिपूर्ण और अहिंसक प्रतिरोध का आह्वान किया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नागरिकता की परिभाषा देते हुए, नागरिक के प्रकार लिखिए।
या नागरिकता से आप क्या समझते हैं? नागरिक कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर-
नागरिकता की परिभाषा
नागरिकता उस स्थिति का नाम है, जिसके अन्तर्गत राज्य द्वारा व्यक्ति को नागरिक और राजनीतिक अधिकार प्रदान किए जाते हैं और व्यक्ति राज्य के प्रति विशेष निष्ठा रखता है। नागरिकता को निम्नलिखित शब्दों में परिभाषित किया जा सकता है
लॉस्की के अनुसार, “अपनी प्रशिक्षित बुद्धि को लोकहित के लिए प्रयोग करना ही नागरिकता है।”
गैटिल के अनुसार, “नागरिकता व्यक्ति की वह स्थिति है, जिसके कारण वह कुछ सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों का उपभोग करता है।
विलियम बॉयड के अनुसार, “भक्ति-भावना का उचित क्रम-निर्धारण ही नागरिकता है।’ नागरिकता की उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर स्पष्ट होता है कि नागरिकता जीवन की वह स्थिति है, जिसमें व्यक्ति किसी राज्य का सदस्य होने के नाते सभी प्रकार के सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों का उपभोग करता है तथा राज्य के प्रति उसके अपने कुछ कर्तव्य भी सुनिश्चित होते हैं। इस प्रकार नागरिक होने की दशा का नाम ही नागरिकता है।

नागरिक के प्रकार
प्रत्येक राज्य में दो प्रकार के व्यक्ति निवास करते हैं
1. नागरिक (Citizen) और
2. विदेशी (Alien)

1. नागरिक
किसी राज्य में चार प्रकार के नागरिक होते हैं-

  • अल्पवयस्क नागरिक- ये एक निश्चित आयु से कम के व्यक्ति होते हैं और इन्हें मताधिकार प्राप्त नहीं होता है। भारत में 18 वर्ष की आयु से कम के व्यक्ति इस श्रेणी में आते हैं।
  • वयस्क नागरिक- ये एक निश्चित आयु प्राप्त व्यक्ति होते हैं। भारत में यह आयु 18 वर्ष निर्धारित की गई है तथा इन्हें मताधिकार प्राप्त होता है।
  • नागरिकता-प्राप्त विदेशी- ये विदेशी होते हैं, परन्तु उन्हें कुछ शर्ते पूरी करने के पश्चात् नागरिकता प्राप्त हो जाती है।
  • मताधिकार-रहित वयस्क नागरिक- इस वर्ग के अन्तर्गत ऐसे व्यक्ति सम्मिलित किए जाते हैं, जिनकी आयु नागरिकता प्राप्त करने की निश्चित आयु अधिक होती है, परन्तु किन्हीं विशेष कारणों से इन्हें मतदान का अधिकार प्राप्त नहीं होता है।

2. विदेशी
विदेशी वे होते हैं, जो किसी अन्य देश के मूल निवासी होते हैं और कुछ विशेष कारणों से कुछ समय के लिए दूसरे राज्य में निवास करते हैं। विदेशी निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं

  • स्थायी विदेशी- ऐसे विदेशी, जो अपना देश छोड़कर अन्य देशों में जाकर बस जाते हैं और उसी देश की नागरिकता प्राप्त कर लेते हैं, ‘स्थायी विदेशी’ कहलाते हैं।
  • अस्थायी विदेशी अथवा विदेशी पर्यटक- ऐसे विदेशी, जो किसी विशेष कार्य के लिए कुछ समय के लिए दूसरे देश में जाते हैं और अपना कार्य पूरा करके स्वदेश लौट आते हैं, ‘अस्थायी विदेशी’ अथवा ‘विदेशी पर्यटक’ कहलाते हैं।
  • राजदूत एवं राजनयिक- ये विदेशी होते हैं, तथापि इन्हें अन्य विदेशियों की अपेक्षा अधिक | सुविधाएँ प्राप्त होती हैं। किसी अन्य देश में ये अपने देश का कूटनीतिक एवं राजनयिक प्रतिनिधित्व करते हैं।
    सम्बन्धों के आधार पर विदेशी निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं-
  • विदेशी शत्रु- शत्रु देशों में चोरी-छिपे घुसपैठ करने वाले विदेशी, विदेशी शत्रु’ कहलाते हैं। प्रायः शत्रु देशों से आने वाले विदेशियों की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी जाती है और उन पर अनेक प्रतिबन्ध भी लगा दिए जाते हैं।
  • विदेशी मित्र- मित्र राष्ट्रों से आने वाले विदेशी, विदेशी मित्र’ कहलाते हैं। ये विदेशी अतिथि के रूप में आते हैं।

प्रश्न 2.
नागरिकता को परिभाषित कीजिए। नागरिकता कैसे प्राप्त होती है तथा इसका किस प्रकार विलोपन होता है?
या नागरिकता की परिभाषा दीजिए और भारत में नागरिकता प्राप्त करने की विधियाँ बताइए।
या नागरिकता समाप्त होने की किन्हीं चार परिस्थितियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
नागरिकता का तात्पर्य किसी राज्य में व्यक्ति का नागरिक होने की स्थिति से है। यह उस वैधानिक या कानूनी सम्बन्ध का नाम है जो व्यक्ति को उस राज्य के साथ, जिसका वह सदस्य है, सम्बद्ध करता है।
1. लॉस्की के शब्दों में, “अपनी प्रशिक्षित बुद्धि का लोकहित में प्रयोग ही नागरिकता है।”
2. गैटिल के अनुसार, “नागरिकता व्यक्ति की उस अवस्था को कहते हैं जिसके कारण वह अपने राज्य में राष्ट्रीय और राजनीतिक अधिकारों का उपयोग कर सकता है और अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए तैयार रहता है।
इस प्रकार किसी राज्य और उसके नागरिकों के उन आपसी सम्बन्धों को ही ‘नागरिकता’ कहा जाता है जिससे नागरिकों को राज्य की ओर से सामाजिक और राजनीतिक अधिकार मिलते हैं। तथा वे राज्य के प्रति कुछ कर्तव्यों का पालन करते हैं।

नागरिकता प्राप्त करने की विधियाँ
नागरिकता प्राप्त करने की विधियों को निम्नलिखित दो भागों में विभक्त किया जा सकता है
1. जन्मजात नागरिकता की प्राप्ति तथा
2. राज्यकृत नागरिकता की प्राप्ति।

1. जन्मजात नागरिकता की प्राप्ति
जन्मजात नागरिकता निम्नलिखित तरीकों से प्राप्त होती है-

  • रक्त अथवा वंश सम्बन्धी सिद्धान्त- जन्मजात नागरिकता प्राप्त करने की प्रथम विधि रक्त सम्बन्ध है। इस सिद्धान्त के अनुसार बच्चे को जन्म किसी भी स्थान पर क्यों न हो, उसे अपने पिता की नागरिकता प्राप्त होती है। फ्रांस, इटली एवं स्विट्जरलैण्ड में इस सिद्धान्त को अपनाया गया है। यह सिद्धान्त न्यायसंगत और विवेकयुक्त है।
  • जन्म-स्थान सिद्धान्त- इस सिद्धान्त के अनुसार बच्चे की नागरिकता का निर्णय उसके जन्म-स्थान के आधार पर किया जाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार बच्चे को उसी देश की नागरिकता प्राप्त होती है, जिस देश की भूमि पर उसका जन्म होता है। अर्जेण्टाइना, इंग्लैण्ड तथा अमेरिका में नागरिकता का यह सिद्धान्त लागू है। यह सिद्धान्त नागरिकता का निर्णय करने में तो बहुत सरल है, किन्तु तर्कसंगत नहीं है।
  • दोहरा नियम- कई देशों में दोनों सिद्धान्तों को अपनाया गया है। इंग्लैण्ड, फ्रांस एवं अमेरिका में रक्त-सम्बन्धी सिद्धान्त तथा जन्म-स्थान सिद्धान्त दोनों प्रचलित हैं। दोहरे नियम के सिद्धान्त के अनुसार जो बच्चा अंग्रेज दम्पती से उत्पन्न हुआ हो, चाहे बच्चे का जन्म भारत में हो, अंग्रेज कहलाता है। उसे अपने पिता की नागरिकता प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त यदि किसी विदेशी की इंग्लैण्ड में सन्तान पैदा होती है, तो उसे इंग्लैण्ड की भी नागरिकता प्राप्त होगी।
    इस सिद्धान्त में यह दोष है कि एक बच्चा एक समय में दो देशों का नागरिक बन सकता है, किन्तु वयस्क होने पर वह यह निर्णय कर सकता है कि वह किस देश की नागरिकता को अपनाये और किसका परित्याग करे।

2. राज्यकृत नागरिकता की प्राप्ति
राज्यकृत नागरिकता नियमानुसार विदेशियों को प्रदान की जाती है। ऐसे व्यक्ति जिन्हें नागरिकता जन्मजात सिद्धान्त से प्राप्त नहीं होती, वरन् उस राज्य की ओर से प्राप्त होती है, जिसके कि वे मूल नागरिक नहीं हैं। यदि कोई व्यक्ति अपने देश को छोड़कर किसी दूसरे देश में बस जाती है और कुछ समय पश्चात् उस देश की नागरिकताको प्राप्त कर लेता है तो उस व्यक्ति को राज्यकृत नागरिकं कहीं जाता है। नागरिकता देना अथवा न देना राज्य पर निर्भर करती है।
इस सिद्धान्त के अनुसार नागरिकता की प्राप्ति निम्नलिखित रूपों में की जाती है

  • निश्चित समय के लिए- यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे देश में जाकर एक निश्चित अवधि तक निवास करे तो वह प्रार्थना-पत्र देकर वहाँ की नागरिकता प्राप्त कर सकता है। इंग्लैण्डे और अमेरिका में निवास की अवधि 5 वर्ष है, जब कि फ्रांस में 10 वर्ष। भारत में निवास की अवधि 4 वर्ष है।
  • विवाह- यदि कोई स्त्री किसी दूसरे देश के नागरिक से विवाह कर लेती है तो उसे अपने पति के देश की नागरिकता प्राप्त हो जाती है। भारत का नागरिक पुरुष यदि इंग्लैण्ड की नागरिक महिला के साथ विवाह कर लेता है तो उस महिला को भारत की नागरिकता प्राप्त हो जाती है। जापान में इसके विपरीत नियम है। यदि कोई विदेशी व्यक्ति जापान की नागरिक महिला से विवाह कर लेता है तो उस व्यक्ति को जापान की नागरिकता प्राप्त हो जाती है।
  • सम्पत्ति खरीदना- सम्पत्ति खरीदने से भी नागरिकता प्राप्त हो जाती है। ब्राजील, पीरू और
    मैक्सिको में यह नियम प्रचलित है। यदि कोई विदेशी पीरू में सम्पत्ति खरीद लेता है तो उसे वहाँ की नागरिकता प्राप्त हो जाती है।
  • गोद लेना- जब एक देश का नागरिक व्यक्ति किसी दूसरे देश के नागरिक बच्चे को गोद ले | लेता है तो गोद लिये जाने वाले बच्चे को अपने पिता के देश की नागरिकता प्राप्त हो जाती है।
  • सरकारी नौकरी- कई देशों में यह नियम है कि यदि कोई विदेशी वहाँ सरकारी नौकरी कर ले तो उसे वहाँ की नागरिकता मिल जाती है। उदाहरणस्वरूप, यदि कोई भारतीय इंग्लैण्ड में सरकारी नौकरी कर लेता है तो उसे इंग्लैण्ड की नागरिकता प्राप्त हो जाती है।
  • विद्वत्ता द्वारा- कई देशों में विदेशी विद्वानों को नागरिक बनने के लिए विशेष सुविधाएँ दी | जाती हैं। विदेशी विद्वानों के निवास की अवधि दूसरे विदेशियों के निवास की अवधि से कम | होती है। फ्रांस में वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों के लिए वहाँ की नागरिकता प्राप्त करने के लिए एक वर्ष का निवास हीं पर्याप्त है।
  • दोबारा नागरिकता की प्राप्ति- यदि कोई नागरिक अपने देश की नागरिकता छोड़कर दूसरे देश की नागरिकता प्राप्त कर लेता है तो उसे दूसरे देश का नागरिक माना जाता है, परन्तु यदि वह चाहे तो कुछ शर्ते पूरी करके पुन: अपने देश की नागरिकता भी प्राप्त कर सकता है।

भारतीय नागरिकता प्राप्त करने की विधियाँ
निम्नलिखित विधियों में से किसी एक आधार पर भारतीय नागरिकता प्राप्त की जा सकती है

1. जन्म या वंश के आधार पर- 1992 ई० में संसद ने सर्वसम्मति से एक विधेयक पारित कर ‘भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955′ को संशोधित किया है। 1992 ई० के पूर्व भारत के बाहर जन्मे किसी व्यक्ति को रक्त-सम्बन्ध या वंश के आधार पर भारत की नागरिकता तभी प्राप्त होती थी, जब कि उसका पिता भारत का नागरिक हो। अब व्यवस्था यह की गयी है कि भारत से बाहर जन्मे ऐसे किसी भी व्यक्ति को भारत की नागरिकता प्राप्त होगी; जिसका पिता या माता, उसके जन्म के समय भारत के नागरिक हों। इस प्रकार अब नागरिकता के प्रसंग में बच्चे की माता को पिता के ‘समकक्ष स्थिति प्रदान कर दी गयी है।
2. पंजीकरण द्वारा- निम्नलिखित श्रेणी के व्यक्ति पंजीकरण के आधार पर नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं-

  •  जो व्यक्ति पंजीकरण के माध्यम से भारतीय नागरिकता प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें अब भारत में कम-से-कम 5 वर्ष निवास करना होगा। पहले यह अवधि 6 माह थी।
  •  ऐसे भारतीय जो विदेशों में जाकर बस गये हैं, भारतीय दूतावासों में आवेदन-पत्र देकर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकेंगे।
  •  विदेशी स्त्रियाँ, जिन्होंने भारतीय नागरिक से विवाह कर लिया हो, आवेदन-पत्र देकर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकेंगी।
  •  राष्ट्रमण्डलीय देशों के नागरिक, यदि वे भारत में ही रहते हों या भारत सरकार की नौकरी , कर रहे हों, आवेदन-पत्र देकर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं।

3. देशीयकरण द्वारा- देशीयकरण द्वारा नागरिकता तभी प्रदान की जाती है, जब कि सम्बन्धित व्यक्ति कम-से-कम 10 वर्ष तक भारत में रह चुका हो। पहले यह अवधि 5 वर्ष थी। ‘नागरिकता संशोधन अधिनियम, 1986′ जम्मू-कश्मीर तथा असम सहित भारत के सभी राज्यों पर लागू होता है।

4. भूमि विस्तार द्वारा- यदि किसी नवीन क्षेत्र को भारत में शामिल किया जाए तो वहाँ की जनता को भारतीय नागरिकता प्राप्त हो जाएगी। जैसे 1961 ई० में गोआ तथा 1975 ई० में सिक्किम को भारत में सम्मिलित किये जाने पर वहाँ की जनता को भारतीय नागरिकता प्राप्त हो गयी।

नागरिकता का लोप
जिस तरह नागरिकता को प्राप्त किया जा सकता है, उसी तरह कुछ स्थितियों में नागरिकता को खोया भी जा सकता है। निम्नलिखित स्थितियों में प्रायः नागरिकता का लोप हो जाता है

  1. लम्बे समय तक अनुपस्थिति- कई देशों में यह नियम है कि यदि वहाँ का नागरिक लम्बे समय तक देश से बाहर रहे तो उसकी नागरिकता समाप्त कर दी जाती है। उदाहरणस्वरूप, यदि कोई फ्रांसीसी नागरिक लगातार 10 वर्ष की अवधि से अधिक फ्रांस से बाहर रहे तो उसकी नागरिकता समाप्त कर दी जाती है।
  2. विवाह- महिलाएँ विदेशी नागरिकों से विवाह करके अपने देश की नागरिकता खो देती हैं।
  3. विदेश में सरकारी नौकरी- यदि एक देश का नागरिक अपने देश की सरकार की आज्ञा प्राप्त | किये बिना किसी दूसरे देश में सरकारी नौकरी कर लेता है तो उसे अपने देश की नागरिकता छोड़नी पड़ती है।
  4. स्वेच्छा से नागरिकता का त्याग- कई देशों की सरकारें अपने नागरिकों को उनकी इच्छा के अनुसार किसी देश का नागरिक बनने की आज्ञा प्रदान कर देती हैं। इस प्रकार के व्यक्ति अपनी जन्मजात नागरिकता त्यागकर अन्य देश की नागरिकता प्राप्त कर लेते हैं।
  5. सेना से भाग जाने पर- यदि कोई नागरिक सेना से भागकर दूसरे देश में चला जाता है तो | उसकी नागरिकता समाप्त हो जाती है।
  6. दोहरी नागरिकता प्राप्त हो जाने पर- जब किसी व्यक्ति को दो राज्यों की नागरिकता प्राप्त हो जाती है तब उसे एक राज्य की नागरिकता छोड़नी पड़ती है।
  7. देश-द्रोह- जब कोई व्यक्ति राज्य के विरुद्ध विद्रोह अथवा क्रान्ति करता है तो उसकी नागरिकता छीन ली जाती है, परन्तु देश-द्रोह के आधार पर उन्हीं नागरिकों की नागरिकता को छीना जा सकता है जो राज्यकृत नागरिक हों।
  8. गोद लेना- यदि कोई बच्चा किसी विदेशी द्वारा गोद ले लिया जाए तो बच्चे की अपने देश की नागरिकता समाप्त हो जाती है और वह अपने नये माता-पिता के देश की नागरिकता प्राप्त कर लेता है।
  9. विदेशी सरकार से सम्मान प्राप्त करना- यदि कोई नागरिक अपने देश की आज्ञा के बिना किसी विदेशी सरकार द्वारा दिये गये सम्मान को स्वीकार कर लेता है तो उसे उसकी मूल नागरिकता से वंचित कर दिया जाता है।
  10. पागल, दिवालिया अथवा साधु- संन्यासी होने पर- यदि कोई व्यक्ति पागल, दिवालिया अथवा साधु-संन्यासी हो जाता है तो उसका नागरिकता का अधिकार समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 3.
‘विश्व नागरिकता की अवधारणा क्या है? इसके समर्थन में क्या तर्क प्रस्तुत किए जाते है?
उत्तर-
हम आज एक ऐसे विश्व में रहते हैं जो आपस में जुड़ा हुआ है। संचार के इण्टरनेट, टेलीविजन, सेलफोन और सैटेलाइट फोन जैसे नए साधनों ने उन तरीकों में भारी बदलाव कर दिया है, . जिनसे हम अपने विश्व को समझते हैं। पहले विश्व के एक हिस्से की गतिविधियों की खबर अन्य हिस्सों तक पहुँचने में महीनों लग जाते थे। लेकिन संचार के नये तरीकों ने विश्व के विभिन्न भागों में घट रही घटनाओं को हमारे तत्काल सम्पर्क की सीमाओं में ला दिया है। हम अपने टेलीविजन के पर्दे पर विनाश और युद्धों को होते देख सकते हैं, इससे विश्व के विभिन्न देशों के लोगों में साझे सरोकार और सहानुभूति विकसित होने में सहायता मिली है।

विश्व नागरिकता के समर्थक तर्क प्रस्तुत करते हैं कि चाहे विश्व-कुटुम्ब और वैश्विक समाज अभी विद्यमान नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार लोग आज एक-दूसरे से जुड़ाव अनुभव करते हैं। उदाहरणार्थ-एशिया की सुनामी या अन्य बड़ी दैवी आपदाओं के पीड़ितों की सहायता के लिए विश्व के सभी हिस्सों से उमड़ा भावोद्गार विश्व-समाज की ओर उभार का संकेत है। हमें इस भावना को मजबूत करना चाहिए और एक विश्व नागरिकता की अवधारणा की दिशा में सक्रिय होना चाहिए। राष्ट्रीय नागरिकता की अवधारणा यह मानती है कि हमारी राज्यसत्ता हमें वह सुरक्षा और अधिकार दे सकती है जिनकी हमें आज विश्व में गरिमा के साथ जीने के लिए आवश्यकता है। लेकिन राजसत्ताओं के समक्ष आज अनेक ऐसी समस्याएँ हैं, जिनका मुकाबला वे अपने बल पर नहीं कर सकतीं।

विश्व नागरिकता की अवधारणा के आकर्षणों में से एक यह है कि इससे राष्ट्रीय सीमाओं के दोनों ओर की उन समस्याओं का समाधान करना आसान हो सकता है जिसमें कई देशों की सरकारों और लोगों की संयुक्त कार्यवाही आवश्यक होती है। उदाहरण के लिए, इससे प्रवासी और राज्यहीन लोगों की समस्या का सर्वमान्य समाधान पाना आसान हो सकता है या कम-से-कम उनके बुनियादी अधिकार और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है चाहे वे जिस किसी देश में रहते हों।

हम अध्ययन कर चुके हैं कि एक देश के भीतर की समान नागरिकता को सामाजिक-आर्थिक असमानता या अन्य समस्याओं से खतरा हो सकता है। इन समस्याओं का समाधान अन्ततः सम्बन्धित समाज की सरकार और जनता ही कर सकती है। इसलिए लोगों के लिए आज एक राज्य की पूर्ण और समान सदस्यता महत्त्वपूर्ण है। लेकिन विश्व नागरिकता की अवधारणा हमें याद दिलाती है कि राष्ट्रीय नागरिकता को समझदारी से जोड़ने की आवश्यकता है कि हम आज अन्तर्समबद्ध विश्व में रहते हैं। और हमारे लिए यह भी आवश्यक है कि हम विश्व के विभिन्न हिस्सों के लोगों के साथ अपने सम्बन्ध सुदृढ़ करें और राष्ट्रीय सीमाओं के पार के लोगों और सरकारों के साथ काम करने के लिए तैयार हों।

प्रश्न 4.
आदर्श नागरिक के गुणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
आदर्श नागरिक के गुण
महान् दार्शनिक अरस्तू का मत है कि “श्रेष्ठ नागरिक ही श्रेष्ठ राज्य का निर्माण कर सकते हैं, इसलिए राज्य के नागरिक आदर्श होने चाहिए।” आज का युग प्रजातन्त्र का युग है, जिसमें शासन का दायित्व वहाँ के नागरिकों पर होता है। अत: आदर्श नागरिकता ही राज्य के विकास का आधार है। एक आदर्श नागरिक में अग्रलिखित गुणों का होना आवश्यक है-

  1. उत्तम स्वास्थ्य- आदर्श नागरिक में उत्तम स्वास्थ्य का होना अनिवार्य है। अस्वस्थ व्यक्ति समाज पर भार स्वरूप होता है। वह न तो अपने व्यक्तिगत कर्तव्यों और न ही समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन कर सकता है।
  2. सच्चरित्रता- मनुष्य के व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में सच्चरित्रता का बहुत अधिक महत्त्व है। चरित्रवान् व्यक्ति ही आदर्श नागरिक बन सकता है, क्योंकि चरित्र द्वारा ही व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का सर्वोत्तम विकास कर सकता है।
  3. शिक्षा- शिक्षा आदर्श नागरिक जीवन की नींव है। गांधी जी ने कहा था कि “शिक्षा, जो आत्मा का भोजन है, स्वस्थ नागरिकता की प्रथम शर्त है। शिक्षा ही अज्ञान के अन्धकार का विनाश कर ज्ञान का प्रकाश करती है। अशिक्षित नागरिक कभी भी आदर्श नागरिक नहीं बन सकता।
  4. विवेक और आत्म-संयम- लॉर्ड ब्राइस के अनुसार, “विवेक आदर्श नागरिक का पहला गुण है।’ विवेक के आधार पर नागरिक अच्छे-बुरे का ज्ञान प्राप्त करता है तथा अपने कर्तव्यों और अधिकारों को भली प्रकारे समझ सकता है। आदर्श नागरिक का दूसरा गुण आत्म-संयम है, अर्थात् नागरिक में अपने हितों का परित्याग कर देने की स्थिति में आत्म-संयम की भावना होनी चाहिए।
  5. परिश्रमशीलता- परिश्रमशीलता वैयक्तिक विकास और सामाजिक प्रगति की आधारशिला है। इससे व्यक्ति में स्वावलम्बन की भावना उत्पन्न होती है। परिश्रमी व्यक्ति ही आदर्श नागरिक बनकर अपना, समाज का और देश का कल्याण कर सकता है।
  6. कर्तव्यपरायणता- श्रेष्ठ सामाजिक जीवन के लिए कर्तव्यपरायणता की भावना बहुत महत्त्वपूर्ण है। कर्तव्यपरायणता आदर्श नागरिक जीवन की कुंजी है।
  7. परोपकारिता- आदर्श नागरिक में परोपकार की भावना होनी आवश्यक है। समाज के असहाय, दीन-दुःखियों तथा अपाहिजों पर उपकार करना प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक कर्तव्य है।
  8. सहानुभूति और दया- सहानुभूति और दया की भावना भी आदर्श नागरिक के अनिवार्य गुण | हैं। ये ही व्यक्ति को दूसरों की सहायता करने के लिए प्रेरित करते हैं।
  9. मितव्ययिता- आवश्यक व्यय करना आदर्श नागरिक का एक महान् गुण होता है। जो व्यक्ति फिजूलखर्जी करता है, उसे अपने जीवन में अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अनावश्यक खर्च करने वाला व्यक्ति स्वयं तो कष्ट उठाता ही है, साथ ही परिवार, समाज व राष्ट्र को भी हानि पहुँचाता है; अतः आदर्श नागरिक में मितव्ययिता का गुण होना आवश्यक है।
  10. आज्ञापालन तथा अनुशासन- एक आदर्श नागरिक में आज्ञापालन और अनुशासन की भावना | होनी अनिवार्य है, तभी वह राज्य द्वारा बनाये गये कानूनों का निष्ठापूर्वक पालन कर सकेगा। और दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा दे सकेगा।
  11. जागरूकता- आदर्श नागरिक के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने अधिकारों के कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहे। आदर्श नागरिक को अपने परिवार, ग्राम, प्रान्त तथा राष्ट्र के हितों के प्रति जागरूक रहना चाहिए और उनके प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।
  12. प्रगतिशीलता- आधुनिक युग लोकतन्त्र का युग है; अत: यह आवश्यक है कि आदर्श नागरिक रूढ़ियों एवं कुरीतियों की उपेक्षा कर प्रगतिशील विचारों के अनुकूल आचरण करे।
  13. नि:स्वार्थता- आदर्श नागरिक को स्वार्थपरता से दूर रहना चाहिए तथा उसका अन्त:करण जन-कल्याण के उच्च आदर्शों से प्रेरित होना चाहिए।
  14. मताधिकार का उचित प्रयोग- आधुनिक प्रजातान्त्रिक युग में सभी वयस्क स्त्री-पुरुषों को मताधिकार प्राप्त है। इस अधिकार का उचित प्रयोग निष्पक्षता के साथ करना प्रत्येक आदर्श नागरिक का प्रथम कर्तव्य है। इस अधिकार के अनुचित प्रयोग से शासन में भ्रष्टाचार फैल सकता है और शासन-सत्ता अयोग्य व्यक्तियों के हाथ में पहुँच सकती है।
  15. देशभक्ति- आदर्श नागरिक का सर्वोच्च गुण देशभक्ति है। प्रत्येक आदर्श नागरिक में देशभक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी होनी चाहिए। संकट के समय देशभक्ति की भावना से प्रेरित होकर नागरिक अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए तत्पर हो जाता है।

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि आदर्श नागरिक में उपर्युक्त गुणों का होना आवश्यक है, क्योंकि आदर्श नागरिक ही समाज और देश को उन्नति के चरम शिखर पर पहुंचा सकते हैं।

प्रश्न 5.
भारतीय नागरिकता पर संक्षिप्त निबन्ध लिखिए।
या भारतीय नागरिकता अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
भारतीय नागरिकता
स्वाधीनता प्राप्ति से पूर्व भारत के नागरिक ब्रिटिश साम्राज्य के नागरिक कहलाते थे। लेकिन उन्हें वे सब अधिकार प्राप्त नहीं थे, जो उस समय एक अंग्रेज को प्राप्त थे। ब्रिटिश सरकार की अधीनता में भारतीयों को अनेक कठिनाइयों तथा असुविधाओं का सामना करना पड़ता था। अंग्रेज अधिकारी भारतीयों के साथ बड़ा अमानुषिक व्यवहार करते थे। भारतीयों की भाषण एवं प्रेस की स्वतन्त्रता पर भी अनेक प्रतिबन्ध लगे हुए थे। लेकिन 15 अगस्त, 1947 ई० के बाद भारतीयों को नागरिकता सम्बन्धी वे सभी अधिकार मिल गए जिनके माध्यम से वे देश के शासन प्रबन्ध में निर्णायक भूमिका निभाने लगे।

इकहरी नागरिकता
विश्व के सभी संघीय संविधानों में नागरिकों को दोहरी नागरिकता प्राप्त होती है-एक संघ सरकार की नागरिकता और दूसरी उस इकाई या राज्य (प्रान्त) की नागरिकता, जिसमें वह निवास करता है। लेकिन स्वतन्त्र भारत का संविधान संघात्मक होते हुए भी भारतीयों को इकहरी नागरिकता प्रदान करता है। इसका आशय यह है कि प्रत्येक भारतीय केवल भारत संघ का नागरिक, उस राज्य का नहीं जिसमें वह निवास करता है। भारतीय संविधान ने देश की अखण्डता को कायम रखने के लिए इकहरी नागरिकता की व्यवस्था को अपनाया है।

भारत का नागरिक होने का हकदार
भारतीय संविधान-निर्माताओं ने यह निश्चित नहीं किया था कि भविष्य में भारतीय नागरिकता किस प्रकार प्राप्त की जा सकती है तथा उसका लोप किस प्रकार सम्भव है। भारतीय संविधान में केवल यह वर्णित है कि 27 जनवरी, 1950 ई० को भारत के नागरिक कौन हैं। नागरिकता की प्राप्ति तथा उसके निर्णय और लुप्त होने के सम्बन्ध में संविधान ने भारतीय संसद को पूर्ण अधिकार प्रदान कर दिए हैं। इस प्रकार संविधान ने नागरिकता सम्बन्धी नियमों के निर्माण का एकाधिकार भारतीय संसद को सौंप दिया है।
भारतीय संविधान के लागू होने के समय नागरिकता सम्बन्धी सिद्धान्त निम्नवत् निर्धारित किए गए थे

  1. जन्म- भारत राज्य क्षेत्र में जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति को भारत संघ की नागरिकता प्राप्त होगी।
  2. वंश- वे सभी व्यक्ति भारत संघ के नागरिक माने जाएँगे, जिनके माता-पिता में से किसी एक ने भारत राज्य क्षेत्र में जन्म लिया है।
  3. निवास- वे सभी व्यक्ति भारत संघ के नागरिक होंगे, जो संविधान लागू होने के पाँच वर्ष पूर्व से भारत राज्य क्षेत्र के सामान्य निवासी थे।
  4. शरणार्थी- पाकिस्तान से भारत आने वाले व्यक्तियों में से वे व्यक्ति भारत संघ के नागरिक माने जाएँगे-(अ) जो 19 जुलाई, 1948 ई० से पूर्व भारत चले आए थे और जिनके माता या पिता का जन्म अविभाजित भारत में हुआ था। (ब) जो 19 जुलाई, 1948 ई० के बाद भारत
    आए हों और तत्कालीन भारत सरकार द्वारा पंजीकृत कर लिए गए हों।
  5. भारतीय विदेशी- भारत के संविधान में ऐसे भारतीयों को भी नागरिकों की श्रेणी में पंजीकृत करने का उल्लेख है जो भारत राज्य क्षेत्र के बाहर किसी अन्य देश में निवास करते हों। उनके लिए निम्नलिखित दो शर्ते हैं-(अ) वे या उनके माता-पिता अथवा पितामह-पितामही में से कोई एक अविभाजित भारत में जन्में हों। (ब) उन्होंने अमुक देश में रहने वाले भारतीय राजदूत के पास भारत संघ का नागरिक बनने के लिए आवेदन-पत्र दे दिया हो और उन्हें भारतीय नागरिक पंजीकृत कर दिया गया हो।

भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955
भारतीय संसद ने सन् 1955 में भारतीय नागरिकता अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम में भारतीय नागरिकता की प्राप्ति और उसके विलोपन के प्रकार को बताया गया है। इस अधिनियम के प्रावधान निम्नलिखित हैं–

भारतीय नागरिकता की प्राप्ति

  1. जन्म- उने सभी व्यक्तियों को भारत संघ की नागरिकता प्राप्त होगी, जिनका जन्म 26 जनवरी, 1950 ई० के बाद भारत राज्य क्षेत्र के किसी भी भाग में हुआ हो।
  2. पाकिस्तान से आगमन या प्रव्रजन- उन सभी व्यक्तियों को, जो 26 जुलाई, 1949 ई० के बाद भारते आए हों, भारत संघ की नागरिकता प्राप्त हो जाएगी, बशर्ते वे भारतीय नागरिकों के रजिस्टर में अपना नाम दर्ज करा लें और कम-से-कम एक वर्ष से भारत में अवश्य निवास | करते हों।
  3. पंजीकरण- विदेशों में निवास करने वाले भारतीय भारत सरकार के दूतावास में अपना नाम |पंजीकृत कराकर भारतीय संघ की नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं।
  4. विवाह- उन सभी विदेशी स्त्रियों को, जिन्होंने भारतीयों से विवाह किया है, भारत संघ की नागरिकता प्राप्त हो जाएगी।
  5. आवेदन-पत्र- कोई भी विदेशी व्यक्ति आवेदन-पत्र देकर भारत संघ का नागरिक बन सकता है, लेकिन शर्त यह है कि वह अच्छे आचरण का हो, संविधान में वर्णित किसी एक भाषा का ज्ञाता हो, भारत में स्थायी रूप से निवास करने की इच्छा रखता हो और कम-से-कम एक वर्ष | से भारत में लगातार रह रहा हो।
  6. निवास अथवा नौकरी- राष्ट्रमण्डल के सदस्य देशों के वे नागरिक जो भारत में रहते हों या भारत में नौकरी करते हों, तो वे प्रार्थना-पत्र देकर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकेंगे।
  7. भूमि विस्तार- यदि किसी नए प्रदेश को भारत में मिला लिया जाता है, तो वहाँ के निवासियों को भारतीय नागरिकता प्राप्त हो जाएगी।

भारतीय नागरिकता संशोधन अधिनियम, 1986 तथा 1992
भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 के प्रावधानों की सरलता का लाभ उठाकर जम्मू-कश्मीर, पंजाब और असम जैसे राज्यों में लाखों विदेशियों ने अनधिकृत रूप से भारत में प्रवेश कर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर ली। अतः केन्द्र सरकार ने भारतीय नागरिकता संशोधन अधिनियम, 1986 पारित करके नागरिकता सम्बन्धी प्रावधानों को कठोर बना दिया।

सन 1986 के संशोधन अधिनियम के अनुसार कोई भी विदेशी जब तक कम-से-कम 10 वर्ष तक भारत ‘राज्य-क्षेत्र का निवासी नहीं रहा होगा, भारतीय नागरिकता प्राप्त नहीं कर सकेगा। भारतीय नागरिकता सम्बन्धी प्रावधानों को जम्मू-कश्मीर तथा असम राज्यों पर भी लागू किया गया। इस संशोधन अधिनियम में यह शर्त भी जोड़ दी गई है कि भारत में जन्म लेने वाले व्यक्ति को भारतीय नागरिकता तभी प्राप्त होगी, जबकि उसके माता-पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक होगा।

सन् 1992 में भारतीय संसद ने नागरिकता से सम्बन्धित दूसरा संशोधन अधिनियम पारित होगा। इस संशोधन अधिनियम के अनुसार यह व्यवस्था की गई है कि विदेश में निवास कर रहे किसी भारतीय दम्पती के यदि कोई सन्तान उत्पन्न होती है, तो वह भारतीय नागरिक मानी जाएगी, बशर्ते कि दम्पती में से किस एक (पति या पत्नी) ने पहले से ही भारतीय नागरिकता प्राप्त कर रखी हो। इससे पूर्व केवल पति का ही भारतीय नागरिक होना अनिवार्य था।

प्रश्न 6.
आदर्श नागरिकता के मार्ग में आने वाली बाधाओं का वर्णन कीजिए तथा उन्हें दूर करने के सुझाव दीजिए।
या
आदर्श नागरिकता प्राप्त करने के मार्ग में कौन-कौन-सी बाधाएँ हैं? विवेचना कीजिए।
या
आदर्श नागरिकता के मार्ग की बाधाओं के निवारण के उपायों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
आदर्श नागरिकता के मार्ग में आने वाली बाधाएँ 
कोई भी नागरिक जन्म से ही एक आदर्श नागरिक के गुणों को लेकर पैदा नहीं होता, अपितु वह बड़ा होकर अपने जीवन में इन गुणों को विकसित करता है। परिवार, समुदाय, समाज और राज्य उसके लिए उन सुविधाओं को जुटाते हैं जिनसे वह एक आदर्श नागरिक बन सकता है। किन्तु कभी-कभी आदर्श नागरिक बनने के मार्ग में अनेक बाधाएँ उपस्थित हो जाती हैं, जिसके फलस्वरूप वह आदर्श नागरिक के गुणों से वंचित रह जाता है। ये बाधाएँ अग्रलिखित हैं

1. अशिक्षा और अज्ञानता- अशिक्षा ही अज्ञानता की जड़ है। अज्ञानी व्यक्ति में उचित और अनुचित का अन्तर कर पाने का विवेक नहीं होता। अशिक्षित व्यक्ति न तो अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकता है और न ही राष्ट्र की सेवा। अतः अशिक्षा व अज्ञानता व्यक्ति के आदर्श
नागरिक बनने के मार्ग में बाधा उत्पन्न करते हैं।

2. व्यक्तिगत स्वार्थ- यह आदर्श नागरिक के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है। स्वार्थी व्यक्ति अपने | स्वार्थ को सर्वोपरि मानता है और अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए समाज तथा राष्ट्र के हितों का भी बलिदान कर देता है। वह केवल अपने विषय में सोचता, कार्य करता और जीवित रहता है तथा किसी भी तरह अपने स्वार्थों की पूर्ति कर लेना ही सब कुछ मान लेता है; उदाहरणार्थ-व्यापारी के रूप में कालाबाजारी, सरकारी अधिकारी के रूप में रिश्वतखोरी
आदि। निजी स्वार्थों की प्रबलता ही कुछ मुद्राओं के लिए राष्ट्रीय हितों का सौदा कर लेती है।

3. निर्धनता अथवा आर्थिक विषमता- आदर्श नागरिकता के मार्ग में आर्थिक बाधाएँ प्रबल होती हैं। आर्थिक बाधाओं में दरिद्रता, बेरोजगारी तथा आर्थिक विषमता मुख्य हैं। भूखे व्यक्ति की नैतिकता और ईमान केवल रोटी बन जाती है। गम्भीर आर्थिक विषमताएँ उनमें वर्ग-संघर्ष की भावना उत्पन्न करती हैं, जिससे व्यक्ति अपने वर्ग के हित के लिए समाज के हित को अनदेखा कर देता है।

4. अकर्मण्यता- अकर्मण्यता अथवा आलस्य व्यक्ति को कार्य करने के प्रति उदासीन बना देता है। ऐसा व्यक्ति किसी प्रकार के कार्य करने में रुचि नहीं लेता और अपने कर्तव्य-पालन से दूर रहना चाहता है। इस प्रकारे अकर्मण्यता आदर्श नागरिकता की उपलब्धि में महान् दुर्गुण है।

5. साम्प्रदायिकता एवं जातीयता- अनेक बार व्यक्ति अपने सम्प्रदाय अथवा जातिगत स्वार्थों के वशीभूत होकर समाज और राज्य के हितों की भी अवहेलना करने लगता है। इसी भावना के कारण देश के अनेक भागों में भीषण रक्तपात तथा आत्मदाह जैसी घटनाएँ घटित हुई हैं। इस प्रकार की संकुचित भावनाएँ मनुष्य को आदर्श नागरिक नहीं बनने देतीं।

6. अनुचित दलबन्दी- आधुनिक प्रजातन्त्र का आधार दलीय व्यवस्था है। स्वस्थ दलीय परम्परा प्रजातन्त्रीय शासन की सफलता में सहायक होती है तथा जनसाधारण में राजनीतिक चेतना उत्पन्न करती है; किन्तु अनुचित दलबन्दी सारे वातावरण को विषाक्त कर देती है। यहाँ तक कि विभिन्न राजनीतिक दल अपने लाभ के लिए जातीय और साम्प्रदायिक भावनाओं को भड़काकर दंगे भी कराते हैं। ऐसे दूषित वातावरण में आदर्श नागरिकता की कल्पना भी असम्भव है।

7. सामाजिक कुप्रथाएँ और रूढ़िवादिता- कुछ सामाजिक कुप्रथाएँ भी आदर्श नागरिकता के मार्ग | में बाधा बन जाती हैं। भारतीय समाज में छुआछूत, जाति-पाँति का भेद, बाल-विवाह, दहेज-प्रथा, सती- प्रथा, विधवा-विवाह आदि ऐसी ही सामाजिक कुप्रथाएँ हैं।

8. उग्र-राष्ट्रीयता और साम्राज्यवाद- उग्र-राष्ट्रीयता के कारण नागरिक अपने राष्ट्र को ऊँचा समझते हैं तथा दूसरे राष्ट्रों से घृणा करते हैं। वे अपने राष्ट्र के क्षुद्र स्वार्थ के लिए पड़ोसी राष्ट्रों में साम्प्रदायिक वैमनस्य और आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं। इसके अतिरिक्त साम्राज्यवादी प्रवृत्ति भी आदर्श नागरिक जीवन की प्रबल शत्रु है। साम्राज्यवादी देश छोटे राज्यों को पराधीन कर लेते । हैं, जिसके कारण युद्ध होते हैं; उदाहरणार्थ-इराक की साम्राज्यवादी कार्यवाही के कारण इराक व बहुराष्ट्रीय सेनाओं में हुआ भीषण युद्ध।

आदर्श नागरिकता की बाधाओं को दूर करने के उपाय

आदर्श नागरिकता के मार्ग में आने वाली प्रमुख बाधाओं को निम्नलिखित उपायों द्वारा समाप्त किया जा सकता है

1. उचित शिक्षा को प्रसार- शिक्षा के प्रसार से व्यक्ति की बौद्धिक और सांस्कृतिक उन्नति होती है, अज्ञानता समाप्त होती है और उसमें विवेक जाग्रत होता है। शिक्षित व्यक्ति अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहता है। इसलिए शिक्षा के अधिकाधिक विकास से अज्ञानता को ।
दूर करके व्यक्ति को आदर्श नागरिक बनने में सहायता की जा सकती है।

2. निर्धनता का विनाश- ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए जिससे सभी व्यक्ति अपने भोजन, वस्त्र, निवास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें। ऐसा होने पर ही | वे अपने सार्वजनिक कर्तव्यों का सम्पादन कर सकते हैं। अतः आर्थिक विषमताओं का अन्त । | करके अधिकाधिके रूप में आर्थिक समानता स्थापित की जानी चाहिए।

3. नैतिकता का उत्थान- नागरिकों को उत्तम चरित्र ही राष्ट्र की अमूल्य निधि है। जिस देश के नागरिकों में नैतिक मूल्यों का समावेश होगा, उस देश का सर्वांगीण विकास होगा। व्यक्ति को निजी स्वार्थों का त्याग करके जनहित को सर्वोपरि मानना चाहिए।

4. समाज- सुधार और रूढ़िवादिता का अन्त-समाज में प्रचलित कुप्रथाओं को सरकार द्वारा . समाज-सुधारकों की सहायता से समाप्त किया जाना चाहिए। ऐसा करने पर ही आदर्श नागरिकता का विकास सम्भव है।

5. स्वतन्त्र और शक्तिशाली प्रेस- आदर्श नागरिकता के विकास के लिए स्वतन्त्र और शक्तिशाली प्रेस का होना बहुत आवश्यक है। विभिन्न घटनाओं और गतिविधियों की सही जानकारी नागरिकों को स्वतन्त्र रूप से विचार करने के लिए प्रेरित करती है, किन्तु ऐसा तभी सम्भव है जब प्रेस सरकारी नियन्त्रण से मुक्त हो।

6. स्वस्थ राजनीतिक दलों की स्थापना- देश में राजनीतिक दलों को संगठन विशुद्ध राजनीतिक व आर्थिक आधार पर किया जाना चाहिए। ऐसा होने पर राजनीतिक दल समाज व राष्ट्र के हितों को दृष्टि में रखकर काम करेंगे। ऐसे राजनीतिक दल ही नागरिकों को प्रत्येक विषय पर सार्वजनिक हित की दृष्टि से सोचने की दिशा में अग्रसर करेंगे।

7. विश्व-बन्धुत्व की भावना उग्र- राष्ट्रीयता तथा साम्राज्यवाद के दोषों से बचने के लिए विश्व बन्धुत्व की भावना को अपनाना अत्यन्त आवश्यक है। ‘जीओ और जीने दो’ तथा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ आदर्श नागरिकता के महान् सन्देश हैं, जो परस्पर सहयोग और सह-अस्तित्व की धारणा पर अवलम्बित हैं। इस भावना को अपनाकर एक आदर्श नागरिक अपने देश के विकास के लिए इस प्रकार कार्य करता है कि वह अन्य देशों की प्रगति में बाधक न हो।

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 5 Rights

UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 5 Rights (अधिकार)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Political Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 5 Rights (अधिकार).

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अधिकार क्या हैं और वे महत्त्वपूर्ण क्यों हैं? अधिकारों का दावा करने के लिए उपयुक्त आधार क्या हो सकते हैं?
उत्तर-
‘अधिकार’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के दो शब्दों ‘अधि’ और ‘कार’ से मिलकर हुई है। जिनका क्रमशः अर्थ है ‘प्रभुत्व’ और ‘कार्य’। इस प्रकार शाब्दिक अर्थ में अधिकार का अभिप्राय उस कार्य से है, जिस पर व्यक्ति का प्रभुत्व है। मानव एक सामाजिक प्राणी होने के नाते समाज के अन्तर्गत ही व्यक्तित्व के विकास के लिए उपलब्ध सुविधाओं का उपभोग करता है। इन सुविधाओं अथवा अधिकारों के उपयोग से ही व्यक्ति, अपने शारीरिक, मानसिक एवं नैतिक विकास का अवसर प्राप्त करता है। संक्षेप में, अधिकार मनुष्य के जीवन की यह अनिवार्य परिस्थिति है, जो विकास के लिए आवश्यक है तथा जिसे राज्य और समाज द्वारा मान्यता प्रदान की जाती है।
अधिकारों का दावा करने के लिए उपयुक्त आधार निम्नलिखित हो सकते हैं-

  1. सम्मान और गरिमापूर्ण जीवन बसर करने के लिए अधिकारों का दावा किया जा सकता है।
  2. अधिकारों की दावेदारी का दूसरा आधार यह है कि वे हमारी बेहतरी के लिए आवश्यक हैं।

प्रश्न 2.
किन आधारों पर यह अधिकार अपनी प्रकृति में सार्वभौमिक माने जाते हैं?
उत्तर-
17 वीं और 18वीं सदी में राजनीतिक सिद्धान्तकार तर्क प्रस्तुत करते थे कि हमारे लिए अधिकार प्रकृति या ईश्वर प्रदत्त हैं। हमें जन्म से वे अधिकार प्राप्त हैं। परिणामस्वरूप कोई व्यक्ति या शासक उन्हें हमसे छीन नहीं सकता। उन्होंने मनुष्य के तीन प्राकृतिक अधिकार चिह्नित किए। थे-जीवन को अधिकार, स्वतन्त्रता का अधिकार और सम्पत्ति का अधिकार। अन्य विभिन्न अधिकार इन बुनियादी अधिकारों से ही निकले हैं। हम इन अधिकारों का दावा करें या न करें, व्यक्ति होने के कारण हमें यह प्राप्त हैं। यह विचार कि हमें जन्म से ही कुछ विशिष्ट अधिकार प्राप्त हैं, बहुत शक्तिशाली अवधारणा है, क्योंकि इसका अर्थ है जो ईश्वर प्रदत्त है और उन्हें कोई मानव शासक या राज्य हमसे छीन नहीं सकता।

प्रश्न 3.
संक्षेप में उन नए अधिकारों की चर्चा कीजिए, जो हमारे देश में सामने रखे जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, आदिवासियों के अपने रहवास और जीन के तरीके को संरक्षित रखने तथा बच्चों के बँधुआ मजदूरी के खिलाफ अधिकार जैसे नए अधिकारों को लिया जा सकता है।
उत्तर-
वर्तमान में कुछ नए अधिकारों की चर्चा होने लगी है। उनमें प्रमुख हैं-
1. अपनी मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा पाने का अधिकार – यह अधिकार सांस्कृतिक अधिकारों के अन्तर्गत रखा जा सकता है। अब विभिन्न भाषा-भाषी राज्यों में यह माँग उठने लगी है कि बच्चों को प्राथमिक शिक्षा उनकी मातृभाषा में दी जाए, क्योंकि मातृभाषा को सीखने और उसके माध्यम से शिक्षा पाने का उन्हें पूर्ण अधिकार है।
2. अल्पसंख्यकों को शिक्षण संस्थाएँ खोलने का अधिकार – अपनी भाषा और संस्कृति की रक्षा और उसके विकास के लिए कुछ अल्पसंख्यक इस प्रकार की शिक्षण संस्थाओं को प्रारम्भ करने के लिए इसे अधिकार के रूप में मानने लगे हैं। भारत में यह सुविधा प्रदान की गई है।

प्रश्न 4.
राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों में अन्तर बताइए। हर प्रकार के अधिकार के उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर-
राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों में अन्तर
UP Board Solutions for Class 11 Political Science Political theory Chapter 5 Rights 4

प्रश्न 5.
अधिकार राज्य की सत्ता पर, कुछ सीमाएँ लगाते हैं। उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
अधिकार राज्य को कुछ विशिष्ट तरीकों से कार्य करने के लिए वैधानिक दायित्व सौंपते हैं। प्रत्येक अधिकार निर्देशित करता है कि राज्य के लिए क्या करने योग्य है और क्या नहीं। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति के जीवन जीने का अधिकार राज्य को ऐसे कानून बनाने के लिए बाध्य करता है। जो दूसरों के द्वारा क्षति पहुँचाने से उसे बचा सके। यह अधिकार राज्य से माँग करता है कि वह व्यक्ति को चोट या नुकसान पहुँचाने वालों को दण्डित करे। यदि कोई समाज अनुभव करता है कि जीने के अधिकार को आशय अच्छे स्तर के जीवन का अधिकार है, तो वह राज्य से ऐसी नीतियों के अनुपालन की अपेक्षा करता है, जो स्वस्थ जीवन के लिए स्वच्छ पर्यावरण और अन्य आवश्यक निर्धारकों का प्रावधान करे।

अधिकार केवल यह ही नहीं बताते कि राज्य को क्या करना है, वे यह भी बताते हैं कि राज्य को क्या कुछ नहीं करना है। उदाहरणार्थ, किसी व्यक्ति की स्वतन्त्रता का अधिकार कहता है कि राज्य केवल । अपनी मर्जी से उसे गिरफ्तार नहीं कर सकता। अगर वह गिरफ्तार करना चाहता है तो उसे इस । कार्यवाही को उचित ठहराना पड़ेगा, उसे किसी न्यायालय के समक्ष इस व्यक्ति की स्वतन्त्रता में कटौती करने का कारण स्पष्ट करना होगा। इसलिए किसी व्यक्ति को पकड़ने के लिए पहले गिरफ्तारी का वारण्ट दिखाना पुलिस के लिए आवश्यक होता है, इस प्रकार अधिकार राज्य की सत्ता पर कुछ सीमाएँ लगाते हैं।

दूसरों शब्दों में, कहा जाए तो हमारे अधिकार यह सुनिश्चित करते हैं कि राज्य की सत्ता वैयक्तिक जीवन और स्वतन्त्रता की मर्यादा का उल्लंघन किए बिना काम करे। राज्य सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न सत्ता हो सकता है, उसके द्वारा निर्मित कानून बलपूर्वक लागू किए जा सकते हैं, लेकिन सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न राज्य का अस्तित्व अपने लिए नहीं बल्कि व्यक्ति के हित के लिए होता है। इसमें जनता का ही अधिक महत्त्व है औ सत्तात्मक सरकार को उसके ही कल्याण के लिए काम करना होता है। शासक अपनी कार्यवाहियों के लिए जबावदेह है और उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि कानून लोगों की भलाई सुनिश्चित करने के लिए ही होते हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
“अधिकार वह माँग है, जिसे समाज स्वीकार करता है और राज्य लागू करता है। यह कथन किसका है?
(क) हॉलैण्ड
(ख) बोसांके
(ग) वाइल्ड
(घ) ऑस्टिन
उत्तर-
(ख) बोसांके।

प्रश्न 2.
“अधिकार कुछ विशेष कार्यों को करने की स्वतन्त्रता की उचित माँग है।” यह कथन किसका है?
(क) वाइल्ड
(ख) बेनीप्रसाद
(ग) श्रीनिवास शास्त्री
(घ) ग्रीन
उत्तर-
(क) वाइल्ड।

प्रश्न 3.
अधिकारों की उत्पत्ति के प्राकृतिक सिद्धान्त के समर्थकों में कौन नहीं है?
(क) हॉब्स
(ख) बर्क
(ग) रूसो
(घ) लॉक
उत्तर-
(ख) बर्क।

प्रश्न 4.
अधिकारों के सामाजिक कल्याण सम्बन्धी सिद्धान्त के समर्थक कौन हैं?
(क) बेन्थम
(ख) रूसो
(ग) रिची
(घ) लॉस्की
उत्तर-
(क) बेन्थम।

प्रश्न 5.
अधिकारों के वैधानिक सिद्धान्त के समर्थक हैं
(क) गिलक्राइस्ट
(ख) अरस्तू
(ग) हॉलैण्ड
(घ) जैफरसन
उत्तर-
(ग) हॉलैण्ड। .

प्रश्न 6.
“अपने कर्तव्य का पालन करो, अधिकार स्वतः तुम्हें प्राप्त हो जाएँगे।” यह किसका कथन |
(क) महात्मा गांधी
(ख) बेनीप्रसाद
(ग) श्रीनिवास शास्त्री
(घ) ग्रीन
उत्तर-
(क) महात्मा गांधी।

प्रश्न 7.
लॉस्की के अधिकार सम्बन्धी विचार उनकी किस कृति में मिलते हैं?
(क) दि ग्रामर ऑफ दि पॉलिटिक्स
(ख) पॉलिटिक्स
(ग) रिपब्लिक
(घ) लॉज
उत्तर-
(क) दि ग्रामर ऑफ दि पॉलिटिक्स। |

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अधिकार किसे कहते हैं?
उत्तर–
अधिकार वह माँग है, जिसे समाज स्वीकार करता है और राज्य क्रियान्वित करता है।

प्रश्न 2.
अधिकारों की एक परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
डॉ० बेनीप्रसाद के अनुसार, “अधिकार वे सामाजिक दशाएँ हैं, जो मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक हैं।”

प्रश्न 3.
अधिकारों के दो भेद बताइए।
उत्तर-
(i)सामाजिक अधिकार,
(ii) राजनीतिक अधिकार।

प्रश्न 4.
दो मूल अधिकारों के नाम लिखिए।
उत्तर-
(i) समानता का अधिकार,
(ii) स्वतन्त्रता का अधिकार।

प्रश्न 5.
अधिकार के किन्हीं दो तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर–
अधिकार के दो तत्त्व निम्नवत् है।
(i) सार्वभौमिकता और
(ii) राज्य का सरंक्षण।

प्रश्न 6.
अधिकारों का कौन-सा सिद्धान्त सर्वाधिक सन्तोषप्रद है?
उत्तर-
अधिकारों का आदर्शवादी सिद्धान्त सर्वाधिक सन्तोषप्रद है।

प्रश्न 7.
दो मानवाधिकारों को लिखिए।
उत्तर-
(i) स्वतन्त्रता का अधिकार
(ii) समानता का अधिकार।

प्रश्न 8.
नागरिक का एक राजनीतिक अधिकार बताइए।
उत्तर–
नागरिक का एक राजनीतिक अधिकार है-मतदान का अधिकार।

प्रश्न 9.
कानूनी अधिकार कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर-
कानूनी अधिकार दो प्रकार के होते है।
(i) सामाजिक अधिकार तथा
(ii) राजनीतिक अधिकार।

प्रश्न 10.
कानूनी अधिकार के सिद्धान्त के दो समर्थकों के नाम लिखिए।
उत्तर-
(i) बेन्थम,
(ii) ऑस्टिन।

प्रश्न 11.
लॉक द्वारा बताए गए किन्हीं दो प्राकृतिक अधिकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
(i) स्वतन्त्रता का अधिकार,
(ii) सम्पत्ति का अधिकार।

प्रश्न 12.
विदेशियों को राज्य में प्राप्त होने वाले कोई दो अधिकार लिखिए।
उत्तर-
(i) जीवन रक्षा का अधिकार,
(ii) पारिवारिक जीवन व्यतीत करने का अधिकार।

प्रश्न 13.
नागरिक के दो प्राकृतिक अधिकार बताइए।
उत्तर-
(i) जीवन का अधिकार,
(ii) सम्पत्ति का अधिकार।

प्रश्न 14.
अधिकारों के समाज कल्याण सम्बन्धी सिद्धान्तों का समर्थन किस विचारक ने किया है?
उत्तर–
अधिकारों के समाज कल्याण सम्बन्धी सिद्धान्तों का समर्थन लॉस्की ने किया है।

प्रश्न 15.
अधिकारों के आदर्शवादी सिद्धान्त के समर्थक किन्हीं दो विचारकों के नाम बताइए।
उत्तर-
थॉमस हिल ग्रीन एवं बोसांके।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किन्हीं चार महत्त्वपूर्ण सामाजिक अधिकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर–
व्यक्ति के चार महत्त्वपूर्ण सामाजिक अधिकार निम्नलिखित हैं

  1.  जीवन-सुरक्षा का अधिकार- प्रत्येक मनुष्य को जीवन का अधिकार है। यह अधिकार | मौलिक तथा आधारभूत है, क्योंकि इसके अभाव में अन्य अधिकारों का अस्तित्व महत्त्वहीन है।
  2.  समानता का अधिकार- समानता का तात्पर्य है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्यक्ति के रूप में व्यक्ति का समान रूप से सम्मान किया जाए तथा उसे उन्नति के समान अवसर प्रदान किए जाएँ।
  3.  स्वतन्त्रता का अधिकार- स्वतन्त्रता का अधिकार व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में अपरिहार्य है। स्वतन्त्रता के अधिकार के आधार पर व्यक्ति अपनी इच्छा से बिना किसी बाह्य बन्धन के अपने जीवन के विकास का ढंग निर्धारित कर सकता है।
  4.  सम्पत्ति का अधिकार- समाज में व्यक्ति वैध तरीकों से सम्पत्ति का अर्जन करता है। अत: उसे यह अधिकार होना चाहिए कि वह स्वतन्त्र रूप से अर्जित किए हुए धने का उपयोग स्वेच्छा से अपने व्यक्तित्व विकास के लिए कर सके।

प्रश्न 2.
अधिकारों के महत्त्व की संक्षिप्त विवेचना कीजिए।
उत्तर–
अधिकारों का महत्त्व निम्नलिखित दृष्टियों से है

  1.  व्यक्तित्व के विकास के लिए अधिकार बहुत ही आवश्यक हैं।
  2.  अधिकार समाज और राष्ट्र की उन्नति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  3.  अधिकार प्रजातन्त्र का आधार हैं। प्रो० बार्कर के अनुसार, “व्यक्ति के अधिकारों के स्पष्ट दर्शन से ही स्वतन्त्रता का विचार एक वास्तविक अर्थ प्राप्त करता है। उसके अभाव में स्वतन्त्रता एक खोखली या निरर्थक एवं व्यक्तिवाद एक काल्पनिक वस्तु रह जाता है।”
  4.  अधिकार सुदृढ़ एवं कल्याणकारी राज्य की स्थापना में सहायक हैं।
  5.  सच्चे अर्थों में किसी नागरिक से अधिकारों के अभाव में आदर्शवादिता की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

प्रश्न 3.
अधिकारों के अस्तित्व के लिए समाज की स्वीकृति आवश्यक है। इस कथन की समीक्षा कीजिए।
उत्तर-
यह बात सर्वमान्य है कि व्यक्ति अपने अधिकारों का प्रयोग सामाजिक पृष्ठभूमि में करता है। अधिकारों की अवधारणा के मूल में यह बात स्पष्टयता परिलक्षित होती है कि व्यक्ति अधिकारों का प्रयोग अपने हित में करने के साथ-साथ सामाजिक हितों में भी करे। जब तक कोई अधिकार समाज द्वारा स्वीकृत नहीं है, तब तक वह अस्तित्वहीन ही रहता है; उदाहरणार्थ-नागरिक को अपनी इच्छानुसार जीवन-यापन करने का अधिकार दिया गया है, लेकिन साथ-ही-साथ उसका यह कर्तव्य भी बन जाता है कि उसकी यह स्वेच्छा सामाजिक एवं नैतिक मानदण्डों को पूरा करती है कि नहीं। यदि आपके अधिकार सामाजिक व नैतिक मर्यादा का उल्लंघन करते हैं, तो इन्हें सामाजिक स्वीकृति नहीं दी जा सकती। इस पर अधिकारों के अस्तित्व के लिए समाज की स्वीकृति आवश्यक है। समाज कभी भी व्यक्ति के जुआ खेलने, मद्यपान करने, वेश्यावृत्ति करने तथा दूसरे का अहित करने के अधिकार को मान्यता प्रदान नहीं करता है। समाज केवल उन्हीं अधिकारों को स्वीकृति प्रदान करता है जो समाज में सहयोग, भाई-चारे तथा सामंजस्य की भावना को सुदृढ़ करते हैं।

प्रश्न 4.
मानव गरिमा पर काण्ट के क्या विचार थे?
उत्तर–
अन्य प्राणियों से अलग मनुष्य की एक गरिमा होती है। इस कारण वे अपने आप में बहुमूल्य हैं। 18वीं सदी के जर्मन दार्शनिक इमैनुएल काण्ट के लिए इस साधारण विचार का गहन अर्थ था। • उनके लिए इसका आशये था कि प्रत्येक मनुष्य की गरिमा है और मनुष्य होने के नाते उसके साथ इसी के अनुकूल व्यवहार किया जाना चाहिए। मनुष्य अशिक्षित हो सकता है, गरीब या शक्तिहीन हो सकता है। वह बेईमान अथवा अनैतिक भी हो सकता है फिर भी वह एक मनुष्य है और न्यूनतम ही सही, प्रतिष्ठा पाने का अधिकारी है। काण्ट के लिए लोगों के साथ गरिमामय बरताव करने का अर्थ था उनके साथ नैतिकता से पेश आना। यह विचार उन लोगों के लिए एक सम्बल था जो लोग सामाजिक ऊँच-नीच के विरुद्ध मानवाधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे थे।

दीर्घ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किन्हीं चार राजनीतिक अधिकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
नागरिकों के चार प्रमुख राजनीतिक अधिकार निम्नलिखित हैं

  1.  मतदान का अधिकार- लोकतान्त्रिक शासन-व्यवस्था में नागरिकों को प्रदत्त मतदान का अधिकार अन्य अधिकारों में सबसे महत्त्वपूर्ण है। इस अधिकार द्वारा नागरिक अपने प्रतिनिधियों को निर्वाचित करके विधायिकाओं में भेजते हैं।
  2.  निर्वाचित होने का अधिकार– प्रत्येक नागरिक को निर्वाचित होने का अधिकार प्राप्त होता है। जब तक नागरिकों को यह अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता है तब तक वे शासन-संचालन में भाग नहीं ले सकते हैं। इस अधिकार की प्राप्ति की लिंग, जाति, सम्प्रदाय, धर्म आदि का कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।
  3.  सार्वजनिक पद ग्रहण करने का अधिकार-  प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योग्यता, क्षमता तथा अनुभव के आधार पर सरकारी पद प्राप्त करने का समान अवसर एवं अधिकार होना चाहिए। इसमें किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं करना चाहिए।
  4.  प्रार्थना-पत्र देने का अधिकार- इस अधिकार के आधार पर नागरिक असुविधा, कष्ट अथवा असामान्य परिस्थितियों में प्रार्थना-पत्र द्वारा राज्य का ध्यान अपनी समस्याओं की ओर आकृष्ट कर सकते हैं।

प्रश्न 2.
मौलिक अधिकार क्या हैं? मौलिक अधिकारों का महत्त्व लिखिए।
उत्तर–
वे अधिकार, जो मानव-जीवन के लिए मौलिक तथा आवश्यक हैं तथा जिन्हें संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किया जाता हैं तथा संविधान में प्रदत्त प्रावधानों के अन्तर्गत इनकी सुरक्षा की भी व्यवस्था होती है, ‘मौलिक अधिकार’ कहलाते हैं।

मौलिक अधिकारों का महत्त्व

  1.  मौलिक अधिकार प्रजातन्त्र के आधार स्तम्भ हैं। ये व्यक्ति के सामाजिक, आर्थिक तथा नागरिक जीवन के प्रभावात्मक उपयोग के एकमात्र साधन हैं। मौलिक अधिकारों द्वारा उन आधारभूत स्वतन्त्रताओं तथा स्थितियों की व्यवस्था की जाती है जिसके अभाव में व्यक्ति उचित रूप से अपना जीवनयापन नहीं कर सकता है।
  2.  मौलिक अधिकार किसी व्यक्ति विशेष, वर्ग अथवा दल की तानाशाही को रोकने का प्रमुख साधन हैं। मौलिक अधिकार सरकार एवं बहुमत के अत्याचारों से व्यक्ति की, विशेष रूप से अल्पसंख्यकों की रक्षा करते हैं।
  3.  मौलिक अधिकार व्यक्ति की स्वतन्त्रता तथा सामाजिक नियन्त्रण के मध्य उचित सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास करते हैं।
  4.  मौलिक अधिकार नागरिकों को न्याय तथा उचित व्यवहार की सुरक्षा प्रदान करते हैं। ये राज्य के बढ़ते हुए हस्तक्षेप तथा व्यक्ति की स्वतन्त्रता के मध्य उचित सन्तुलन स्थापित करते हैं।

प्रश्न 3.
राजनीतिक अधिकारों से क्या तात्पर्य है? प्रमुख राजनीतिक अधिकार कौन-से हैं?
उत्तर-
राजनीतिक अधिकार
डॉ० बेनीप्रसाद के अनुसार, “राजनीतिक अधिकारों का तात्पर्य उन व्यवस्थाओं से है, जिनमें नागरिकों को शासन कार्य में भाग लेने का अवसर प्राप्त होता है अथवा नागरिक शासन प्रबन्ध को प्रभावित कर सकते हैं।” राजनीतिक अधिकार के अन्तर्गत निम्नलिखित अधिकारों की गणना की जा सकती है|

  1.  मत देने का अधिकार- अपने प्रतिनिधियों के निर्वाचन के अधिकार को ही मताधिकार कहते हैं। यह अधिकार लोकतन्त्रीय शासन प्रणाली के अन्तर्गत प्राप्त होने वाला महत्त्वपूर्ण अधिकार है। और इस अधिकार का प्रयोग करके नागरिक अप्रत्यक्ष रूप से शासन प्रबन्ध में भाग लेते हैं। आधुनिक लोकतान्त्रिक राज्यों में विक्षिप्त, दिवालिये और अपराधियों को छोड़कर अन्य वयस्क नागरिकों को यह अधिकार प्राप्त है। सामान्यतया 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके भारतीय नागरिकों को मताधिकार प्राप्त है।
  2.  निर्वाचित होने का अधिकार- मताधिकार की पूर्णता के लिए प्रत्येक नागरिक को निर्वाचित होने का अधिकार भी प्राप्त होता है। निर्धारित अर्हताओं को पूरा करने पर कोई भी नागरिक किसी भी राजनीतिक संस्था के निर्वाचित होने के लिए चुनाव लड़ सकता है।
  3.  सरकारी पद प्राप्त करने का अधिकार- व्यक्ति का तीसरा राजनीतिक अधिकार सरकारी पद प्राप्त करने का अधिकार है। राज्य की ओर से नागरिकों को योग्यतानुसार उच्च सरकारी पद प्राप्त करने की सुविधा होनी चाहिए। इस अधिकार के अन्तर्गत किसी भी नागरिक को धर्म, वर्ण तथा जाति के आधार पर सरकारी पदों से वंचित नहीं किया जाएगा। डॉ० बेनीप्रसाद के अनुसार, “इस अधिकार का यह अर्थ नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति को सरकारी पद प्राप्त हो। जाएगा, वरन् इसका यह अर्थ है कि उन सभी व्यक्तियों को सरकारी पद की प्राप्ति होगी, जो उस पद को पाने की योग्यता रखते हैं।”
  4.  आवेदन-पत्र देने का अधिकार- प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार भी प्राप्त होना चाहिए कि | वह आवेदन-पत्र देकर सरकार का ध्यान अपनी समस्याओं की ओर आकर्षित कर सके।
  5.  विदेशों में सुरक्षा का अधिकार- राज्य को चाहिए कि वह अपने उन नागरिकों, जो विदेशों में जाते हैं, की सुरक्षा की समुचित व्यवस्था करे।

प्रश्न 4.
अधिकारों के तत्त्व अथवा लक्षणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
अधिकार के तत्त्व अथवा लक्षण
अधिकार के अनिवार्य तत्त्वों, लक्षणों अथवा विशेषताओं का वर्णन निम्नलिखित हैं

  1.  अधिकार समाज द्वारा स्वीकृत होते हैं- अधिकार के लिए समाज की स्वीकृति आवश्यक है। जब किसी माँग को समाज स्वीकार कर लेता है, तब वह अधिकार बन जाती है। प्रो० आशीर्वादी लाल के अनुसार, “प्रत्येक अधिकार के लिए समाज की स्वीकृति अनिवार्य होती है। ऐसी स्वीकृति के अभाव में अधिकार केवल कोरे दावे रह जाते हैं।”
  2.  सार्वभौमिक– अधिकार सार्वभौमिक होते हैं अर्थात् अधिकार समाज के सभी व्यक्तियों को समान रूप से प्रदान किए जाते हैं। अधिकारों की सार्वभौमिकता ही कर्तव्यों को जन्म देती है।
  3.  राज्य का संरक्षण- अधिकारों को राज्य का संरक्षण मिलना भी अनिवार्य है। राज्य के संरक्षण में ही व्यक्ति अपने अधिकारों का समुचित उपभोग कर सकता है। बार्कर के शब्दों में, “मानव चेतना स्वतन्त्रता चाहती है, स्वतन्त्रता में अधिकार निहित हैं तथा अधिकार राज्य की माँग करते हैं।”
  4.  अधिकारों में सामाजिक हित की भावना निहित होती है— अधिकारों में व्यक्तिगत स्वार्थ के साथ-साथ सार्वजनिक हित की भावना भी विद्यमान होती है।
  5.  कल्याणकारी स्वरूप- अधिकारों का सम्बन्ध मुख्यतः व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास से होता है। इस कारण अधिकार के रूप में केवल वे ही स्वतन्त्रताएँ और सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं, जो व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास हेतु आवश्यक होती हैं। इस प्रकार अधिकारों का स्वरूप कल्याणकारी होता है।
  6. समाज की स्वीकृति- अधिकार उन कार्यों की स्वतन्त्रता का बोध कराता है जो व्यक्ति तथा समाज दोनों के लिए उपयोगी होते हैं। समाज की स्वीकृति का यह अभिप्राय है कि व्यक्ति अपने अधिकारों का प्रयोग समाज के अहित में नहीं कर सकता।

प्रश्न 5.
राज्य के विरुद्ध विद्रोह करने के अधिकार को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
राज्य के विरुद्ध विद्रोह का अधिकार
राज्य के प्रति निष्ठा एवं भक्ति रखना और राज्य की आज्ञाओं का पालन करना व्यक्ति का कानूनी दायित्व होता है। अतः व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध विद्रोह का कानूनी अधिकार तो प्राप्त हो ही नहीं सकता, परन्तु व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध विद्रोह का नैतिक अधिकार अवश्य प्राप्त होता है। शासन के अस्तित्व का उद्देश्य सामान्य जनता का हित सम्पादित करना होता है। जब शासन जनता के हित में कार्य न करे, तब व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध विद्रोह का केवल नैतिक अधिकार ही प्राप्त नहीं है, वरन् । यह उसका नैतिक कर्त्तव्य भी है। इस सम्बन्ध में सुकरात का मत था कि यदि व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध विद्रोह करने का अधिकार है तो राज्य द्वारा प्रदान किए गए दण्ड को भी स्वीकार करना उसका कर्तव्य है। व्यक्तिवादी तथा अराजकतावादी विचारकों ने व्यक्ति द्वारा राज्य का विरोध करने के अधिकार का समर्थन किया है। गांधी जी के अनुसार, “व्यक्ति का सर्वोच्च कर्तव्य अपनी अन्तरात्मा के प्रति होता है।” अत: अन्तरात्मा की आवाज पर राज्य का विरोध भी किया जा सकता है। राज्य के विरुद्ध विद्रोह करने के सम्बन्ध में यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इस अधिकार का प्रयोग राज्य एवं समाज के हित से सम्बन्धित सभी बातों पर विचार करके तथा विशेष परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए। लोकतान्त्रिक राज्यों में नागरिकों को शासन की आलोचना करने एवं अपना दल बनाने का भी अधिकार होता है। लोकतान्त्रिक देशों में राज्य के प्रति विरोध का अधिकार जनता की इस भावना से परिलक्षित होता है कि वह राज्य के प्रति अपना दायित्व निष्ठापूर्वक न निभा रहे प्रतिनिधियों को आगे सत्ती का अवसर प्रदान नहीं करती।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अधिकार की परिभाषा देते हुए उसका वर्गीकरण कीजिए।
या
अधिकार से क्या तात्पर्य है? अधिकार के प्रकार लिखिए।
उत्तर-
अधिकार मुख्यतया हकदारी अथवा ऐसा दावा है जिसका औचित्य सिद्ध हो। अधिकार की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं
ऑस्टिन के अनुसार, “अधिकार व्यक्ति की वह क्षमता है, जिसके द्वारा वह अन्य व्यक्ति अथवा व्यक्तियों से कुछ विशेष प्रकार के कार्य करा लेता है।”
ग्रीन के अनुसार, “अधिकार मानव-जीवन की वे शक्तियाँ हैं, जो नैतिक प्राणी होने के नाते व्यक्ति को अपना कार्य पूरा करने के लिए आवश्यक हैं।”
बोसांके के अनुसार, “अधिकार वह माँग है, जिसे समाज स्वीकार करता है और राज्य क्रियान्वित करता है।”
हॉलैण्ड के अनुसार, “अधिकार किसी व्यक्ति की वह क्षमता है, जिससे वह अपने बल पर नहीं, अपितु समाज के बल से दूसरों के कार्यों को प्रभावित कर सकता है।”
प्रो० लॉस्की के अनुसार, “अधिकार सामाजिक जीवन की वे परिस्थितियाँ हैं, जिनके अभाव में सामान्यतः कोई व्यक्ति अपने उच्चतम स्वरूप को प्राप्त नहीं कर सकता।”
गार्नर के अनुसार, “नैतिक प्राणी होने के नाते मनुष्य के व्यवसाय की पूर्ति के लिए आवश्यक शक्तियों को अधिकार कहा जाता है।”
श्रीनिवास शास्त्री के अनुसार, “अधिकार समुदाय के कानून द्वारा स्वीकृत वह व्यवस्था, नियम या रीति है, जो नागरिक के सर्वोच्च नैतिक कल्याण में सहायक हो।”
डॉ० बेनीप्रसाद के अनुसार, “अधिकार वे सामाजिक दशाएँ हैं, जो मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक हैं।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि-

  1.  अधिकार सामाजिक दशाएँ हैं।
  2.  अधिकार व्यक्ति के विकास के लिए आवश्यक तत्त्व हैं।
  3.  अधिकारों द्वारा ही व्यक्तिगत और सामाजिक प्रगति सम्भव है।
  4.  अधिकारों को समाज स्वीकार करता है और राज्य लागू करता है।

अधिकारों का वर्गीकरण (रूप अथवा प्रकार)

साधारण रूप से अधिकारों को निम्नलिखित रूपों अथवा प्रकारों के अन्तर्गत वर्गीकृत किया गया है

  1.  प्राकृतिक अधिकार- प्राकृतिक अधिकार वे अधिकार हैं, जो प्राकृतिक अवस्था में मनुष्यों को प्राप्त थे। परन्तु ग्रीन ने प्राकृतिक अधिकारों को आदर्श अधिकारों के रूप में माना है। उसके | अनुसार, ये वे अधिकार हैं, जो व्यक्ति के नैतिक विकास के लिए आवश्यक हैं और जिनकी प्राप्ति समाज में ही सम्भव है।
  2.  नैतिक अधिकार- ये वे अधिकार हैं, जिनका सम्बन्ध मानव के नैतिक आचरण से होता है। इनका स्वरूप अधिकारों की अपेक्षा कर्तव्य-पालन में अधिक निहित होता है।
  3.  कानूनी अधिकार- कानूनी अधिकार वे हैं, जिनकी व्यवस्था राज्य द्वारा की जाती है और जिनका उल्लंघन कानून द्वारा दण्डनीय होता है। लीकॉक के अनुसार, “कानूनी अधिकार के विशेषाधिकार हैं, जो एक नागरिक को अन्य नागरिकों के विरुद्ध प्राप्त होते हैं तथा जो राज्य की सर्वोच्च शक्ति द्वारा प्रदान किए जाते हैं और (उसी के द्वारा) रक्षित होते हैं।”

कानूनी अधिकार दो प्रकार के लेते हैं
(i) सामाजिक या नागरिक अधिकार (social or Civil Rights) तथा
(ii) राजनीतिक अधिकार (Political Rights)।

प्रश्न 2.
सामाजिक या नागरिक अधिकारों को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
सामाजिक या नागरिक अधिकार
सामाजिक या नागरिक अधिकार राज्य के प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के प्राप्त होते हैं। मुख्य सामाजिक अधिकार निम्नलिखित हैं

  1.  जीवन-रक्षा का अधिकार- प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन की सुरक्षा चाहता है। यदि व्यक्ति को जीने का अधिकार प्राप्त न हो या उसके जीवन की सुरक्षा न हो, तो उस दशा में उसका सामाजिक जीवन कष्टदायी हो जाएगा। वह प्रत्येक क्षण अपने जीवन की सुरक्षा के लिए चिन्तित रहेगा और समाज के किसी भी कार्य में अपना योगदान नहीं कर सकेगा। भारत के परिप्रेक्ष्य में इस अधिकार को मौलिक अधिकारों (अनु० 21) के अन्तर्गत विशेष महत्त्व की स्थिति प्रदान की गई है।
  2.  सम्पत्ति का अधिकार- सम्पत्ति व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति का एक प्रमुख साधन है, . | इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार उसका उपभोग करने का अधिकार प्राप्त होना। चाहिए। इस अधिकार के अन्तर्गत व्यक्ति को सम्पत्ति अर्जित करने, खरीदने, बेचने और उसका उपभोग करने का अधिकार है। यूनानी विचारक अरस्तू का मत था कि सम्पत्ति व्यक्ति के लिए उतनी ही आवश्यक है, जितनी कि परिवार या कुटुम्ब की आवश्यकता। इसके विपरीत कुछ विद्वानों का मत है कि सम्पत्ति ही सब कष्टों की जननी है। उनके अनुसार सम्पत्ति पूँजीवादी व्यवस्था को जन्म देती है और समाज में वर्ग-संघर्ष उत्पन्न करती है। अत: समाज में सम्पत्ति का न्यायपूर्ण वितरण होना आवश्यक है। सम्भवतः इसी दृष्टिकोण को देखते हुए भारत के संविधान में सम्पत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की श्रेणी से पृथक् कर दिया गया है।
  3.  शिक्षा का अधिकार- शिक्षा मानवे व्यक्तित्व के विकास की आधारशिला है। समाज और राष्ट्र का विकास शिक्षित व्यक्तियों पर ही आधारित है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार होना चाहिए।
  4.  धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार- मनुष्य की आध्यात्मिक प्रगति के लिए धर्म जीवन का एक अनिवार्य तत्त्व है। प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी धर्म का अनुयायी होता है। अतः राज्य को धर्मनिरपेक्ष रहकर प्रत्येक व्यक्ति को धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार प्रदान करना चाहिए। जैसा कि रूसो को कथन है, “जब तक उनके सिद्धान्त नागरिकता के कर्तव्यों के प्रतिकूल न हों, व्यक्ति को उन सभी धर्मों के प्रति सहिष्णु होना चाहिए, जो दूसरों के प्रति सहिष्णु है।”
  5.  लेखन एवं विचाराभिव्यक्ति को अधिकार- राज्य को चाहिए कि वह प्रत्येक व्यक्ति को लेखन, भाषण और विचाराभिव्यक्ति का अधिकार प्रदान करे। इस अधिकार द्वारा व्यक्ति का मानसिक विकास सम्भव होता है, लेकिन मनुष्य को यह अधिकार कानून की सीमा के अन्तर्गत ही प्रदान किया जाना चाहिए।
  6.  सभा करने व संगठन बनाने का अधिकार- मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह एकाकी जीवन व्यतीत नहीं कर सकता है; अतः उसे सभा करने या समुदाय बनाने का अधिकार प्राप्त होना चाहिए। लेकिन इस अधिकार का उपभोग राज्य के कानूनों की सीमा के अन्तर्गत ही होना चाहिए।
  7.  आवागमन का अधिकार- इस अधिकार के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को राज्य की सीमा के अन्तर्गत स्वतन्त्रतापूर्वक ऐक स्थान से दूसरे स्थान को जाने की सुविधा प्राप्त होनी चाहिए। गिलक्राइस्ट के अनुसार, स्वतन्त्रतापूर्वक घूमने के अधिकार के अभाव में जीवन का कोई भी अर्थ नहीं है।
  8.  पारिवारिक जीवन व्यतीत करने का अधिकार- परिवार सामाजिक जीवन की आधारशिला है; अतः प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार पारिवारिक जीवन व्यतीत करने को अधिकार भी प्राप्त होना चाहिए। परन्तु इस अधिकार का यह अर्थ कदापि नहीं है। कि परिवार समाज की नैतिक सीमाओं का उल्लंघन करे और परिवार के सदस्यों को दुराचार की शिक्षा दे। ऐसी स्थिति में किसी व्यक्ति के पारिवारिक जीवन में भी राज्य द्वारा हस्तक्षेप किया जा सकता है।
  9.  मनोरंजन का अधिकार- प्रत्येक व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक श्रम करने के उपरान्त मनोरंजन की आवश्यकता होती है। अत: व्यक्ति को अवकाश के समय मनोरंजन का अधिकार भी प्राप्त होना चाहिए।
  10.  सांस्कृतिक अधिकार- इस अधिकार के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार प्राप्त है कि वह अपनी भाषा एवं साहित्य को अध्ययन व विकास कर सके। अल्पसंख्यकों के लिए यह अधिकार बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।
  11.  व्यवसाय की स्वतन्त्रता का अधिकार- व्यवसाय की स्वतन्त्रता का अभिप्राय है कि प्रत्येक व्यक्ति को इस बात की स्वतन्त्रता हो कि वह अपनी इच्छा तथा योग्यतानुसार व्यवसाय का चयन कर सके।

प्रश्न 3.
अधिकारों से सम्बन्धित प्राकृतिक सिद्धान्त और वैधानिक सिद्धान्त के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-
अधिकारों को प्राकृतिक सिद्धान्त
हॉब्स, लॉक तथा रूसो आदि विद्वानों ने अधिकारों के प्राकृतिक सिद्धान्त का समर्थन किया है। यह सिद्धान्त अति प्राचीन है। इसके अनुसार अधिकार प्रकृति-प्रदत्त हैं और वे व्यक्ति को जन्म के साथ ही प्राप्त हो जाते हैं। व्यक्ति प्राकृतिक अधिकारों का प्रयोग राज्य के उदय के पूर्व से ही करता आ रहा है। राज्य इन अधिकारों को न तो छीन सकता है और न ही वह इनका जन्मदाता है। टॉमस पेन के अनुसार, “प्राकृतिक अधिकार वे अधिकार हैं, जो मनुष्य के अस्तित्व को स्थायित्व प्रदान करने के लिए आवश्यक हैं।” इस दृष्टिकोण से अधिकार असीमित, निरपेक्ष तथा स्वयंसिद्ध हैं। राज्य इन अधिकारों में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
आलोचना- इस सिद्धान्त में कतिपय दोष निम्नलिखित हैं-

  1.  यह सिद्धान्त अनैतिहासिक है, क्योंकि जिस प्राकृतिक व्यवस्था के अन्तर्गत इन अधिकारों के प्राप्त होने का उल्लेख किया गया है, वह काल्पनिक है।
  2.  ग्रीन का मत है कि समाज से प्रथक् कोई भी अधिकार सम्भव नहीं है।
  3.  यह सिद्धान्त राज्य को कृत्रिम संस्था मानता है, जो अनुचित है।
  4.  प्राकृतिक अधिकारों में परस्पर विरोधाभास पाया जाता है।
  5.  यह सिद्धान्त कर्तव्यों के प्रति मौन है, जबकि कर्त्तव्य के अभाव में अधिकारों का अस्तित्व सम्भव नहीं है।

अधिकारों का कानूनी या वैधानिक सिद्धान्त

इस सिद्धान्त के प्रवर्तक बेन्थम, हॉलैण्ड ऑस्टिन आदि विचारक हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकार राज्य की इच्छा का परिणाम है और राज्य ही अधिकारों का जन्मदाता है। यह सिद्धान्त प्राकृतिक सिद्धान्त के विपरीत है। व्यक्ति राज्य के सरंक्षण में रहकर ही अधिकारों का प्रयोग कर सकता है। राज्य ही कानून द्वारा ऐसी परिस्थितियों को उत्पन्न करता है, जहाँ कि व्यक्ति अपने अधिकारों का स्वतन्त्रतापूर्वक प्रयोग कर सके। राज्य ही अधिकारों को मान्यता प्रदान करता है। यह सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि अधिकारों का अस्तित्व केवल राज्य के अन्तर्गत ही सम्भव है।
आलोचना—इस सिद्धान्त में कतिपय दोष निम्नलिखित हैं-

  1.  इस सिद्धान्त से राज्य की निरंकुशता का समर्थन होता है।
  2.  राज्य नैतिक बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
  3.  अधिकारों में स्थायित्व नहीं रहता है।

प्रश्न 4.
अधिकारों के ऐतिहासिक और समाज कल्याण सम्बन्धी सिद्धान्तों को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
अधिकारों का ऐतिहासिक सिद्धान्त
इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकारों की उत्पत्ति प्राचीन रीति-रिवाजों के परिणामस्वरूप होती है। जिन रीति-रिवाजों को समाज स्वीकृति दे देता है, वे अधिकार का रूप धारण कर लेते हैं। इस सिद्धान्त के समर्थकों के अनुसार, अधिकार परम्परागत हैं तथा सतत् विकास के परिणाम हैं। इसके अतिरिक्त इनका आधार ऐतिहासिक है। इंग्लैण्ड के संवैधानिक इतिहास में परम्परागत अधिकारों का बहुत अधिक महत्त्व रहा है।
आलोचना- इस सिद्धान्त के आलोचकों का मत है कि अधिकारों का आधार केवल रीति-रिवाज तथा परम्पराएँ नहीं हो सकतीं, क्योंकि कुछ परम्पराएँ तथा रीति-रिवाज समाज के कल्याण में बाधक होते हैं। अत: इस दृष्टि से यह सिद्धान्त तर्कसंगत नहीं है।

अधिकारों का समाज-कल्याण सम्बन्धी सिद्धान्त
जे०एस० मिल, जेरमी बेन्थम, पाउण्ड तथा लॉस्की आदि ने इस सिद्धान्त का समर्थन किया है। इस सिद्धान्त का प्रमुख लक्ष्य उपयोगिता या समाज-कल्याण है। प्रो० लॉस्की के अनुसार, “अधिकारों का औचित्य उनकी उपयोगिता के आधार पर आँकना चाहिए। इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकार वे साधन हैं, जिनसे समाज का कल्याण होता है। लॉस्की का मत है, “लोक-कल्याण के विरुद्ध मेरे अधिकार नहीं हो सकते; क्योंकि ऐसा करना मुझे उस कल्याण के विरुद्ध अधिकार प्रदान करता है। जिसमें मेरा कल्याण घनिष्ठ तथा अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।”
इस सिद्धान्त की निम्नलिखित मान्यताएँ हैं

  1.  अधिकार समाज की देन हैं, प्रकृति की नहीं।
  2.  अधिकारों का अस्तित्व समाज-कल्याण पर आधारित है।
  3.  व्यक्ति केवल उन्हीं अधिकारों का प्रयोग का सकता है, जो समाज के हित में हों।
  4.  कानून, रीति-रिवाज तथा अधिकार सभी का उद्देश्य समाज-कल्याण है।
    आलोचना- यह सिद्धान्त तर्कसंगत और उपयोगी तो है, किन्तु इसका सबसे बड़ा दोष यह है कि यह सिद्धान्त समाज-कल्याण की ओट में राज्य को व्यक्तियों की स्वतन्त्रता का अपहरण करने का अवसर प्रदान करती है, लेकिन समीक्षात्मक दृष्टि से यह दोष महत्त्वहीन है।

प्रश्न 5.
अधिकारों का आदर्शवादी सिद्धान्त क्या है? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
अधिकारों का आदर्शवादी सिद्धान्त
इसे सिद्धान्त की मान्यता है कि अधिकार वे बाह्य साधन तथा दशाएँ हैं, जो व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक होती हैं। इस सिद्धान्त का समर्थन थॉमस हिल ग्रीन, बैडले, बोसांके आदि विचारक ने किया है।
इस सिद्धान्त की अग्रलिखित मान्यताएँ हैं

  1. अधिकार व्यक्ति की माँग है।
  2.  यह माँग समाज द्वारा स्वीकृत होती है।
  3.  अधिकारों का स्वरूप नैतिक होता है।
  4.  अधिकारों का उद्देश्य समाज का वास्तविक हित है।
  5.  अधिकार व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक साधन हैं।

आलोचना- इस सिद्धान्त के कतिपय दोष निम्नलिखित हैं

  1.  यह सिद्धान्त व्यावहारिक नहीं है; क्योंकि व्यक्तित्व का विकासे व्यक्तिगत पहलू है तथा राज्य एवं समाज जैसी संस्थाओं के लिए यह जानना बहुत कठिन है कि किसके विकास के लिए क्या आवश्यक है।
  2.  यह व्यक्ति के हितों पर अधिक बल देता है तथा समाज का स्थान गौण रखता है। अतः व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए समाज के हितों के विरुद्ध कार्य कर सकता है।
  3.  मानव-जीवन के विकास की आवश्यक परिस्थितियाँ कौन-सी हैं, इनका निर्णय कौन करेगा तथा ये किस-किस प्रकार उपलब्ध होंगी-इन बातों का स्पष्टीकरण नहीं होता है। अतः इस सिद्धान्त की आधारशिला ही अवैज्ञानिक है।
    निष्कर्ष- अध्ययनोपरान्त हम कह सकते हैं कि अधिकारों का आदर्शवादी सिद्धान्त ही सर्वोपयुक्त है, क्योंकि यह इस अवधारणा पर आधारित है कि अधिकारों की उत्पत्ति व्यक्ति के व्यक्तित्व | के सर्वांगीण विकास के लिए है। राज्य तथा समाज तो केवल व्यक्ति के अधिकारों की सुरक्षा तथा व्यवस्था करने के साधन मात्र हैं। व्यक्ति समाज के कल्याण में ही अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकता है।

प्रश्न 6.
मानवाधिकार क्या है? मानवाधिकार प्राप्ति की दिशा में क्या कार्य हो रहे हैं?
उत्तर-
विगत कुछ वर्षों से प्राकृतिक अधिकार शब्द से अधिक मानवाधिकार शब्द का प्रयोग हो रहा है। मानवाधिकारों के पीछे मूल मान्यता यह है कि सभी लोग मनुष्य होने मात्र से कुछ चीजों को पाने के अधिकारी हैं। एक मानव के रूप में प्रत्येक व्यक्ति विशिष्ट और समान महत्त्व का है। इसका अर्थ यह है कि आन्तरिक दृष्टि से सभी समान हैं। सभी एक आन्तरिक मूल्य से सम्पन्न होते हैं और उन्हें स्वतन्त्र रहने तथा अपनी पूरी सम्भावना को साकार करने का अवसर मिलना चाहिए। इस विचार का प्रयोग नस्ल, जाति, धर्म और लिंग पर आधारित वर्तमान असमानताओं को चुनौती देने के लिए किया जाता रहा है।
अधिकारों की इसी समझदारी पर मानव अधिकार सम्बन्धी संयुक्त राष्ट्र घोषणा-पत्र बना है। यह उन दावों को मान्यता देने का प्रयास करता है, जिन्हें विश्व समुदाय सामूहिक रूप से गरिमा और आत्म-सम्मान परिपूर्ण जीवन जीने के लिए आवश्यक मानता है।

सम्पूर्ण विश्व के उत्पीड़ित जन सार्वभौम मानवाधिकार की अवधारणा का प्रयोग उन कानूनों को चुनौती देने के लिए कर रहे हैं, जो उन्हें पृथक् करने वाले और समान अवसरों तथा अधिकारों से वंचित करते हैं। वे मानवता की अवधारणा की पुनर्व्याख्या के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिससे वे स्वयं को इसमें सम्मिलित कर सकें।

कुछ संघर्ष सफल भी हुए हैं, जैसे दास प्रथा का उन्मूलन हुआ। लेकिन कुछ अन्य संघर्षों में अभी तक सीमित सफलता ही प्राप्त हो सकी है। लेकिन आज भी अनेक ऐसे समुदाय हैं, जो मानवता को इस प्रकार परिभाषित करने के संघर्ष में लगे हैं जो उन्हें भी सम्मिलित करे।
विविध समाजों में जैसे-जैसे नए खतरे और चुनौतियाँ उभरती आई हैं, वैसे-वैसे ही उन मानवाधिकारों की सूची निरन्तर बढ़ती गई है जिनका लोगों ने दावा किया है। उदाहरणार्थ, हम आज प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा की आवश्यकता के प्रति बहुत सचेत हैं और इसने स्वच्छ हवा, शुद्ध जल, सुदृढ़ विकास जैसे अधिकारों की माँगें पैदा की हैं। यद्ध अथवा प्राकृतिक संकट के समय अनेक लोग विशेषकर महिलाएँ, बच्चे या बीमार जिन परिवर्तनों का सामना करते हैं उनके विषय में नई जागरूकता ने आजीविका के अधिकार, बच्चों के अधिकार और ऐसे अन्य अधिकारों की माँग भी पैदा की है। ऐसे दावे मानव गरिमा के अतिक्रमण के प्रति नैतिक आक्रोश का भाव प्रकट करते हैं और वे समस्त मानव समुदाय के लिए अधिकारों के प्रयोग और विस्तार के लिए एकजुट होने का आह्वान करते हैं।

प्रश्न 7.
अधिकार जनसाधारण पर क्या जिम्मेदारियाँ डालते हैं? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
अधिकार न केवल राज्य पर यह जिम्मेदारी डालते हैं कि वह विशिष्ट प्रकार से काम करे बल्कि जनसाधारण पर भी जिम्मेदारी डालते हैं। उदाहरण के लिए, टिकाऊ विकास का मामला लें। हमारे अधिकार हमें याद दिलाते हैं कि इसके लिए न केवल राज्य को कुछ कदम उठाने हैं, बल्कि हमें भी इस दिशा में प्रयास करने हैं। अधिकार हमें बाध्य करते हैं कि हम अपनी निजी आवश्यकताओं और हितों के विषय में ही न सोचें, वरन कुछ ऐसी चीजों की भी रक्षा करें, जो हम सबके लिए लाभदायक हैं। ओजोन परत की रक्षा करना, वायु और जल प्रदूषण कम-से-कम करना, नए वृक्ष लगाकर और जंगलों की कटाई रोककर हरियाली बनाए रखना, पारिस्थितिकीय सन्तुलन बनाए रखना आदि ऐसी चीजें हैं, जो हम सबके लिए अनिवार्य हैं। ये जनसाधारण के लाभ की बातें हैं, जिनका पालने हमें अपनी और भावी पीढ़ियों की रक्षा के लिए भी अवश्य करना चाहिए। आने वाली पीढ़ियों को भी । सुरक्षित और स्वच्छ दुनिया प्राप्त करने का अधिकार है, इसके बिना वे बेहतर जीवन नहीं जी सकतीं।

अधिकार यह भी जिम्मेदारी डालते हैं कि हम अन्य लोगों के अधिकारों का भी सम्मान करें। टकराव की स्थिति में जनसाधारण को अधिकारों को सन्तुलित करना होता है। उदाहरणार्थ, अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार किसी को भी तस्वीर लेने की अनुमति देता है, लेकिन अगर कोई व्यक्ति अपने घर में नहाते हुए किसी व्यक्ति की उसकी अनुमति के बिना तस्वीर ले ले और उसे इण्टरनेट में डाल दे, तो यह गोपनीयता के अधिकार का उल्लंघन होगा।
नागरिकों को अपने अधिकारों पर लगाए जाने वाले नियन्त्रणों के बारे में भी ध्यान देना होगा। अद्यतन एक विषय जिस पर बहुत अधिक चर्चा हो रही है। यह बढ़ते प्रतिबन्धों से सम्बन्धित है। ये प्रतिबन्ध कई सरकारे राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर लोगों की नागरिक स्वतन्त्रताओं पर लगा रही हैं। नागरिकों के अधिकारों और भलाई की रक्षा के लिए आवश्यक मानकर राष्ट्रीय सुरक्षा बनाए रखने का समर्थन किया जा सकता है।

लेकिन किसी बिन्दु पर सुरक्षा के लिए आवश्यक मानकर थोपे गए प्रतिबन्ध अपने-आप में लोगों में अधिकारों के लिए खतरा बन जाएँ तो? क्या आतंकी बमबारी की धमकी का सामना करते राष्ट्र को अपने नागरिकों की आजादी छीन लेने की आज्ञा दी जा सकती है? क्या उसे केवल सन्देह के आधार पर किसी को गिरफ्तार करने की अनुमति मिलनी चाहिए? क्या उसे लोगों की चिट्ठियाँ देखने यो फोन टेप करने की छूट दी जा सकती है? क्या सच कबूल करवाने के लिए उसे यातना देने का सहारा लेने दिया जाना चाहिए? ऐसी स्थितियों में यह सवाल उत्पन्न होता है कि सम्बद्ध व्यक्ति समाज के लिए खतरा तो नहीं पैदा कर रहा? गिरफ्तार लोगों को भी कानूनी सलाह प्राप्त करने का आज्ञा और दण्डाधिकारी या न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए। नागरिक स्वतन्त्रता में कटौती करने के प्रश्न पर अत्यन्त सावधान होने की आवश्यकता है क्योंकि इनका आसानी से दुरुपयोग किया जा सकता है। सरकारें निरकुंश हो सकती हैं और वे उन उद्देश्यों की ही जड़ खोद सकती हैं जिनके लिए सरकारें बनती हैं—यानी लोगों के कल्याण की। इसलिए यह मानते हुए भी कि अधिकार कभी सम्पूर्ण-सर्वोच्च नहीं हो सकते, हमें अपने एवं दूसरों के अधिकारों की रक्षा करने में चौकस रहने की आवश्यकता है क्योकि ये लोकतान्त्रिक समाज की बुनियाद का निर्माण करते

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UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 6 Perception

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 6 Perception (प्रत्यक्षीकरण) are part of UP Board Solutions for Class 11 Psychology. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 6 Perception (प्रत्यक्षीकरण).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 6
Chapter Name 6 Perception
(प्रत्यक्षीकरण)
Number of Questions Solved 50
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 6 Perception (प्रत्यक्षीकरण)

दीर्घ उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रत्यक्षीकरण (Perception) से आप क्या समझते हैं? प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया में निहित क्रियाओं का भी उल्लेख कीजिए।
या
प्रत्यक्षीकरण को परिभाषित कीजिए।

उत्तर :

प्रत्यक्षीकरण का अर्थ
(Meaning of Perception)

प्रत्यक्षीकरण एक जटिल मानसिक प्रक्रिया है। यह ज्ञानार्जन से सम्बन्धित मानसिक प्रक्रियाओं में विशेष महत्त्व रखती है। ‘संवेदना’ किसी उद्दीपक का प्रथम प्रत्युत्तर है और प्रत्यक्षीकरण’ प्राणी की संवेदना के पश्चात् का द्वितीय प्रत्युत्तर है जो संवेदना से ही सम्बन्धित होता है। वातावरण में उपस्थित किसी उद्दीपक से मिलने वाली उत्तेजना एक संवेदनात्मक प्रत्युत्तर के रूप में अस्तित्व रखती है जिसका प्रथम प्रत्युत्तर संवेदना और द्वितीय प्रत्युत्तर प्रत्यक्षीकरण की शक्ल में प्रस्तुत होता है।

प्रत्यक्षीकरण की परिभाषा
(Definition of Perception)

प्रत्यक्षीकरण को निम्न प्रकार परिभाषित किया जा सकता है –

  1. कॉलिन्स तथा डुवर के कथनानुसार, “प्रत्यक्षीकरण किसी वस्तु का तात्कालिक ज्ञान है या संवेदना द्वारा सभी ज्ञानेन्द्रियों का ज्ञान है।”
  2. वुडवर्थ के मतानुसार, “प्रत्यक्षीकरण विभिन्न इन्द्रियों की सहायता से पदार्थ अथवा उनके आधारों का ज्ञान प्राप्त करने की क्रिया है।”
  3. स्टेगनर के अनुसार, “बाहरी वस्तुओं और घटनाओं का इन्द्रियों के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया ही प्रत्यक्षीकरण है।”
  4. मैक्डूगल के अनुसार, “उपस्थित वस्तुओं के बारे में सोचना ही प्रत्यक्षीकरण करना है। एक वस्तु तभी उपस्थित कही जाती है जब तक उससे आने वाली शक्ति (उत्तेजना) हमारी ज्ञानेन्द्रियों को प्रभावित करती रहती है।”

प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया
(Process of Perception)

प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया का स्पष्टीकरण प्रस्तुत करते हुए हम कह सकते हैं कि ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से प्रथम संवेदना, जो किसी वस्तु, प्राणी या घटना के विषय में प्राप्त होती है-मस्तिष्क में एक संस्कार को जन्म देती है। यह संस्कार प्रथम संवेदना का संस्कार होता है। जब वह वस्तु एक बार फिर से तत्सम्बन्धी ज्ञानेन्द्रिय पर प्रभाव डालती है तो मस्तिष्क पूर्व संस्कार के आधार पर दोनों अनुभूतियों की पारस्परिक समानताओं तथा विषमताओं की व्याख्या प्रस्तुत करता है और इस भाँति तुलना द्वारा वस्तु से प्राप्त अनुभूति की पहचान का प्रयत्न करता है। परिणामस्वरूप, प्रथम-संवेदना को उसका वास्तविक अर्थ मिल जाता है और यह अर्थपूर्ण संवेदना ही प्रत्यक्षीकरण है। उदाहरणार्थ–कोई बच्चा एक स्नेहपूर्ण कोमल आवाज पहली बार सुनता है। यह उसके लिए संवेदना है। किन्तु जब बच्चा वही आवाज दूसरी बार सुनता है तो उसकी तुलना अपनी माँ की पहली आवाज से करता है। फलस्वरूप वह दोनों आवाजों में गहरी समानता पाता है और उस आवाज का अपनी माँ की आवाज के रूप में प्रत्यक्षीकरण करता है।

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 6 Perception 1

प्रत्यक्षीकरण की क्रियाएँ
(Actions of Perception)

प्रत्यक्षीकरण वर्तमान वस्तु से प्राप्त संवेदना को अर्थ प्रदान करने का कार्य करता है। अर्थ प्रदान करने में निम्नलिखित मुख्य क्रियाएँ पायी जाती हैं –

(1) संग्राहक क्रियाएँ – संग्राहक क्रियाएँ प्रथम मुख्य क्रियाएँ हैं जो विभिन्न संग्राहकों या ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से सम्पन्न होती हैं। प्रत्येक सम्बन्धित ज्ञानेन्द्रियाँ उत्तेजना को ग्रहण करके उसे स्नायु-संस्थान के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचाती हैं। मस्तिष्क में इस प्रथम ज्ञान अर्थात् संवेदना की अनुभूति होती है जिसके पश्चात् प्रत्यक्षीकरण होता है।

(2) प्रतीकात्मक क्रियाएँ – प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया की द्वितीय मुख्य क्रियाएँ प्रतीकात्मक क्रियाएँ हैं जिनके माध्यम से अन्य क्रियाओं का प्रतिनिधित्व किया जाता है। प्रतीक (Symbol)’को देखकर उससे सम्बन्धित अनुक्रिया का अनुभव होने लगता है। ‘मोहन’ यह शब्द किसी व्यक्ति का प्रतीक बनकर उनका प्रतिनिधित्व करता है। इसी प्रकार रसगुल्ले को देखकर उससे सम्बन्धित स्वाद का अनुभव होने लगता है, इमली को देखकर मुँह खट्टा हो जाता है।

(3) भावात्मक क्रियाएँ – तीसरी महत्त्वपूर्ण क्रियाएँ भावात्मक क्रियाएँ हैं। हम जानते हैं कि विविध वस्तुओं के प्रत्यक्षीकरण द्वारा भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के मन में भिन्न-भिन्न प्रकार की भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। भावनाएँ व्यक्ति से व्यक्ति तक परिवर्तित होती जाती हैं। उदाहरण के लिए-मन्दिर में रखे शिवलिंग को आस्तिक श्रद्धा एवं भक्तिभाव से प्रणाम करते हैं, नास्तिक उसके लिए एक पत्थर का भाव रखता है।

(4) एकीकरण क्रियाएँ – इस चौथी क्रिया के अन्तर्गत वर्तमान संवेदना का पूर्व संवेदनाओं के साथ एकीकरण कर देते हैं। प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया में एकीकरण का सोपान अत्यन्तावश्यक है जो मस्तिष्क में सम्पन्न होता है।

(5) विभेदीकरण क्रियाएँ – कभी-कभी प्राप्त संवेदना को अन्य संवेदनाओं से पृथक् भी करना पड़ता है; जैसे-बच्चे अपने पिता के स्कूटर का हॉर्न सुनकर उसकी तुलना या विभेदीकरण अन्य आवाजों से करते हैं और इस प्रकार उसे दूसरी आवाजों से अलग कर लेते हैं।

प्रश्न 2.
प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करने वाले कारकों को उदाहरणों सहित वर्णन कीजिए।
या
प्रत्यक्षीकरण के निर्धारक तत्त्वों की भली-भाँति व्याख्या कीजिए।
या
प्रत्यक्षीकरण के प्रमुख निर्धारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करने वाले कारक
या प्रत्यक्षीकरण के निर्धारक तत्त्व
(Factors Affecting Perception)

प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करने वाले कारकों तथा उसके निर्धारक तत्त्वों की व्याख्या करने से पूर्व इस बात पर विचार करना आवश्यक है कि प्रत्यक्षीकरण किस तरह का मनोवैज्ञानिक प्रक्रम है-जन्मजात या अर्जित ? वस्तुतः इस विवाद को लेकर कई विचार सम्मुख आते हैं। गेस्टाल्टवादियों के अनुसार, प्रत्यक्षीकरण का सम्बन्ध केन्द्रीय स्नायु-संस्थान की जन्मजात विशेषताओं से है। हेब्ब (Hebb) नामक मनोवैज्ञानिक के अनुसार, प्रत्यक्षात्मक संगठन (Perceptual Organization) केन्द्रीय स्नायु संस्थान की संरचना से प्रभावित होकर स्वत: निर्धारित होता है। साहचर्यवादी विचारकों की दृष्टि में प्रत्यक्षीकरण प्रक्रम, अनुभवों पर आधारित है। प्रत्यक्षीकरण के निर्धारक तत्त्वों के विषय में कई मत अवश्य हैं, किन्तु यह निर्विवाद है कि ये निर्धारक तत्त्व प्रत्यक्षीकरण को स्वतन्त्र रूप से प्रभावित नहीं करते बल्कि विशिष्ट दशा में कई कारकों की अन्त:क्रियाएँ प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करती हैं। प्रत्यक्षीकरण के मुख्य निर्धारक तत्त्वों अथवा कारकों को निम्त्नलिखित रूप से प्रस्तुत किया जा सकता है –

(1) प्रत्यक्षीकरण पर सन्दर्भ का प्रभाव – व्यक्ति प्रत्येक उद्दीपक का प्रत्यक्षीकरण किसी-न-किसी सन्दर्भ में करता है। इस प्रकार सन्दर्भ, प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करता है। यह प्रभाव दो प्रकार का हो सकता है

(अ) अन्तःइन्द्रिय सन्दर्भ – जब उद्दीपक और उद्दीपक का सन्दर्भ दोनों एक ही ज्ञानेन्द्रिय क्षेत्र में होते हैं तो इस तरह का सन्दर्भ प्रत्यक्षीकरण उद्दीपक के लिए पृष्ठभूमि का कार्य करता है। इस दशा को अन्त:इन्द्रिय सन्दर्भ का प्रभाव कहा जाता है। यह दशा प्रत्यक्षीकरण में भ्रम भी पैदा कर सकती है।

(ब) अन्तःइन्द्रिय सन्दर्भ – इस अवस्था में प्रत्यक्षीकरण उद्दीपक ज्ञानेन्द्रिय के एक क्षेत्र में तथा उद्दीपक ज्ञानेन्द्रिय के दूसरे क्षेत्र में होता है। यह दशा अन्त:इन्द्रिय सन्दर्भ कहलाती है और प्रत्यक्षीकरण को अर्थपूर्ण ढंग से प्रभावित करती है।

(2) प्रत्यक्षीकरण पर अभिप्रेरणा का प्रभाव – अभिप्रेरणा से सम्बन्धित व्यवहार का कुछ-न-कुछ लक्ष्य या उद्देश्य होता है। व्यक्ति इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सक्रिय हो उठता है तथा हर सम्भव प्रयास करता है। निश्चय ही, अभिप्रेरणा व्यक्ति की मानसिक क्रियाओं पर असर डालती है। और इस भाँति अभिप्रेरणा से प्रत्यक्षीकरण का निर्धारित होना भी स्वाभाविक है। अभिप्रेरणा का प्रत्यक्षीकरण पर प्रभाव निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट होता है

(अ) प्रात्यक्षिक सतर्कता – प्रात्यक्षिक सतर्कता की प्रघटना में प्राणी का उद्दीपक पहचान सीमान्त कम हो जाता है। प्रायः प्राणी को कुछ खास उद्दीपकों के प्रति अतिरिक्त रूप से तत्पर पाया जाता है। कभी-कभी यह तत्परता इतनी ज्यादा हो जाती है कि प्राणी उद्दीपक के प्रति उस स्थिति में भी अनुक्रिया प्रकट करने लगता है, जबकि उद्दीपक अस्पष्ट हो और उसमें प्रत्यक्षीकरण के आवश्यक गुण भी न हों।

(ब) प्रात्यक्षिक सुरक्षा – प्रात्यक्षिक सुरक्षा की प्रघटना के अन्तर्गत, जब प्रयोज्यों के सम्मुख कोई दु:खदायी उद्दीपक लाया जाता है तो सामान्य या उदासीन उद्दीपकों की अपेक्षा इन उद्दीपकों की पहचान सीमान्त बढ़ जाती है।

(स) उद्दीपक-गुण – मनोवैज्ञानिक प्रयोग के सम्बन्ध में यह परिकल्पना सत्य सिद्ध हुई कि उदासीन उद्दीपक के प्रत्यक्षित आकार की अपेक्षा प्रयोज्यों को मूल्यवान उद्दीपक का प्रत्यक्षित आकार बड़ा प्रतीत होगा। दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि उद्दीपक-गुणों के प्रत्यक्षीकरण पर अभिप्ररेणा का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है।

(द) उद्दीपक-चयन – मनोवैज्ञानिक प्रयोगों से पता चला है कि प्रत्यक्षीकरण के सम्बन्ध में उद्दीपक के चयन पर अभिप्रेरणा का प्रभाव पड़ता है। एक परीक्षण में मुखाकृति के अर्धाशों (Half Parts) को जोड़कर प्रस्तुत किया गया। इन अर्धाशों में से एक को पुरस्कृत किया गया था और दूसरे को दण्डित। प्रयोज्यों ने पुरस्कृत अर्धाश का प्रत्यक्षीकरण अधिक किया।

(3) प्रत्यक्षीकरण पर तत्परता या सेट का प्रभाव – वातावरण में बहुत से उद्दीपक उपस्थित रहते हैं। अनुभव में आता है कि अक्सर प्राणी विशेष उद्दीपकों के प्रति प्रत्यक्ष/परोक्ष रूप से अधिक तत्पर रहता है या कम तत्पर रहता है। यह तत्परता, जिसे सेट (Set) भी कहा जाता है, प्रयोज्य के उन उद्दीपकों के प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करती है। प्रत्यक्षीकरण पर तत्परता या सेट का प्रभाव दो प्रकार से देखा जा सकता है

(अ) पहचान के आधार पर – प्रत्यक्ष निर्देशों के माध्यम से पहचान के आधार पर सेट के अध्ययन से ज्ञात हुआ कि इस आधार पर बने सेट प्रत्यक्षीकरण पर प्रभाव डालते हैं। पोस्टमैन एवं बूनर के अनुसार, जब प्रयोज्यों में निर्देशों के आधार पर एक सेट निर्मित होता है, उस समय पहचान अधिक सुविधाजनक होती है, किन्तु जब इसी आधार पर एक से अधिक सेट बनते हैं तो पहचान मुश्किल व दुविधापूर्ण हो जाती है। |

(ब) आकृति-पृष्ठभूमि के आधार पर – लीपर नामक मनोवैज्ञानिक ने सेट से सम्बन्धित एक प्रयोग द्वारा सिद्ध किया कि आकृति एवं पृष्ठभूमि से सम्बद्ध निर्देशों के आधार पर निर्मित सेट प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करते हैं। बूनर द्वारा किये गये अध्ययन के निष्कर्षों से भी पता चलता है कि आकृति के रंग के सम्बन्ध में बना सेट रंग प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करता है।

(4) प्रत्यक्षीकरण पर अधिगम का प्रभाव – अधिगम अर्थात् सीखना प्रत्यक्षीकरण प्रक्रम को विशेष रूप से प्रभावित करता है। प्रत्यक्षपरक तादात्मीकरण (Perceptual Identification) अधिगम के कारण ही होता है और अधिगम क्रियाएँ प्रत्यक्षीकरण का शोधन एवं परिमार्जन करती है। यह भी ज्ञात होता है कि व्यक्ति के दीर्घकालीन अनुभव तथा अभ्यास प्रत्यक्षीकरण को महत्त्वपूर्ण ढंग से प्रभावित करते हैं।

(5) प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करने वाले अन्य कारक – प्रत्यक्षीकरण प्रक्रम को प्रभावित करने वाले कुछ अन्य कारक निम्नलिखित हैं

(i) परिचय – व्यक्ति को उन उद्दीपकों या संगठनों का प्रत्यक्षीकरण आसानी से होता है जिनसे वह भली प्रकार परिचित होता है; जैसे–परिचित, रिश्तेदार का प्रत्यक्षीकरण भीड़ के अन्य लोगों के बीच सरलता से हो जाता है।

(ii) पूर्व – अनुभव-जिस व्यक्ति में पूर्व-अनुभवों की अधिकता होती है, वह कम अनुभव वाले व्यक्तियों की अपेक्षा वातावरण में मौजूद उद्दीपकों का शीघ्र और बेहतर प्रत्यक्षीकरण कर लेता है। उदाहरण के लिए—प्रौढ़ व्यक्ति बच्चे की अपेक्षा शीघ्र व अधिक प्रत्यक्षीकरण करता है।

(iii) रंग – आकृति एवं पृष्ठभूमि के रंगों में जितना अधिक विरोध या अन्तर होता है, आकृति एवं पृष्ठभूमि का प्रत्यक्षीकरण उतना ही अधिक स्पष्ट होता है। काली पृष्ठभूमि पर सफेद बिन्दी एकदम साफ चमकती है।

(iv) आकार – बड़े आकार की उत्तेजनाओं को प्रत्यक्षीकरण छोटे आकार की उत्तेजनाओं की अपेक्षा शीघ्र और अधिक होता है।

(v) चमक – यदि आकृति व पृष्ठभूमि की चमक में अधिक अन्तर होगा तो आकृति एवं पृष्ठभूमि का अधिक स्पष्ट प्रत्यक्षीकरण होगा।

(vi) अवधि – प्रदर्शनकाल भी प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करता है। लम्बी अवधि के लिए उपस्थित उद्दीपक को हम सरलता से प्रत्यक्षीकरण कर लेते हैं।

(vii) मानसिक तत्परता – मानसिक तत्परता भी प्रत्यक्षीकरण पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव रखती है। माना, माँ अपने बच्चे के आने की प्रतीक्षा कर रही है तो दरवाजे पर कोई भी आहट बच्चे के आने का संकेत देती है।

(viii) अभिवृत्ति – अभिवृत्ति भी उद्दीपकों के प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करती है; जैसे-एक दल के लोग अभिवृत्ति (ऋणात्मक) के प्रभाव में विरोधी दल के लोगों का भ्रष्ट व अनैतिक लोगों के रूप में प्रत्यक्षीकरण करते है।

उपर्युक्त विवरण में सभी कारक परस्पर जटिल अन्त:क्रिया के कारण सक्रिय होते हैं तथा परिपक्व व्यक्तियों के प्रत्यक्षीकरण में अधिक स्पष्ट होते हैं।

प्रश्न 3.
प्रत्यक्षीकरण में गैस्टाल्ट सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
या
प्रत्यक्षीकरण के सम्बन्ध में गैस्टाल्टवादियों के सिद्धान्त क्या हैं?
या
प्रत्यक्षीकरण का क्या अर्थ है? प्रात्यक्षिक संगठन के नियमों का वर्णन कीजिए।
या
प्रत्यक्षीकरणात्मक संगठन के नियमों को विस्तार से लिखिए। आकृतियों में समानता और समीपता के आधार पर प्रत्यक्षीकरण के संगठन की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :

गैस्टाल्टवादी मनोविज्ञान
(Gestalt Psychology)

मनोविज्ञान मानव के स्वभाव व व्यवहार का विधिवत् अध्ययन करता है। 1912 में जब व्यवहारवादी विचारधारा (Behaviourists) के मनोवैज्ञानिक जे० बी० वाटसन अमेरिका में व्यवहारवाद का आन्दोलन चला रहे थे, उन्हीं दिनों जर्मनी में व्यवहारवाद के विरुद्ध प्रत्यक्षीकरण के माध्यम से मानव स्वभाव को समझने के लिए एक नवीन विचारधारा का जन्म हो रहा था, जिसे गैस्टाल्टवाद या गैस्टाल्टवादी मनोविज्ञान (Gestalt Psychology) का नाम दिया गया है। मैस्टाल्ट मनोविज्ञान का प्रारम्भ तीन मनोवैज्ञानिकों-मैक्स वरदाईमर (Max warthiemer), वोल्फगैंग कोहलर (Wolfgang Kohler) तथा कर्ट कोफ्का (Kurt Koffka) द्वारा किया गया।

गैस्टाल्ट का अर्थ-गैस्टाल्ट’ शब्द का अर्थ है किसी वस्तु का आकार, प्रकार या स्वरूप। पूर्ण को जर्मन भाषा में गैस्टाल्टन (Gestaltan) कहते हैं और अंग्रेजी भाषा में गैस्टाल्ट’ (Gestalt) कहते हैं। गैस्टाल्टवादियों के अनुसार, किसी भी उत्तेजना का प्रत्यक्षीकरण (Perception) उसके पूर्णरूप में होता है तथा वस्तु का वास्तविक रूप उसके पूर्ण में ही दृष्टिगोचर होता है। यही कारण है कि इस विचारधारा के अनुयायी वस्तु के पूर्णरूप को लेकर चलते हैं तथा उसे ही सही एवं वास्तविक प्रत्यक्षीकरण स्वीकार करते हैं। ये मनोवैज्ञानिक इस अवधारणा को स्वीकार नहीं करते कि प्रत्यक्षीकरण संवेदनाओं तथा पूर्व अनुभवों का योग होता है। यदि किसी सुन्दर बच्चे के चेहरे का उदाहरण लें तो वह अपने पूर्णरूप में सुन्दर दिखाई देता है। यदि बच्चे की आँख, नाक, होंठ, कान, गाल, मस्तक आदि को अलग-अलग करके देखें तो वह सुन्दरता विलुप्त हो जाती है। कारण यह है । कि सुन्दरता चेहरे के समस्त अंगों में निहित होने के बावजूद भी पूर्णरूप में देखने पर ही दिखाई पड़ती है, अंश या भागों में देखने पर नहीं। वस्तुत: चेहरा इन समस्त अंगों का योग ही नहीं है, वह तो इनका एक विशेष संगठन है और इस विशेष संगठन में ही बच्चे के चेहरे की सुन्दरता को रहस्य छिपा है।

प्रत्यक्षीकरण का गैस्टाल्ट सिद्धान्त (Gestalt Theory of Perception) – गैस्टील्ट सिद्धान्त के अनुसार, किसी वस्तु का प्रत्यक्षीकरण संश्लेषणात्मक विधि के द्वारा पहले होता है, बाद में उसका प्रत्यक्षीकरण विश्लेषणात्मक ढंग से होता है। कोई वस्तु हमें सर्वप्रथम अपने संश्लेषित या पूर्णरूप में दिखाई देती है। धीरे-धीरे, जैसे-ही-जैसे वस्तु के प्रत्यक्षीकरण के चिह्न घटते जाते हैं, वैसे-ही-वैसे उसके अंग-प्रत्यंग (भागों) का प्रत्यक्षीकरण विश्लेषित या आंशिक रूप में होता है। किसी भव्य इमारत को देखने पर उसका प्रत्यक्षीकरण सम्पूर्ण रूप में किया जाता है, उसके विभिन्न हिस्सों में नहीं। पहली एक दृष्टि में उसके हिस्सों को अलग-अलग करके नहीं देखा जाता। किन्तु शनैः-शनै: जब उसको कई बार देखा जाता है तो हम उसके किसी भी हिस्से का प्रत्यक्षीकरण करने लगते हैं, यथार्थ या वास्तविक प्रत्यक्षीकरण वस्तु के विभिन्न हिस्सों या अंगों का योग न होकर उस संगठन द्वारा होता है जिसमें विषय-वस्तु संगठित रहती है। यदि उस विषय-वस्तु के विभिन्न अंगों का संगठन परिवर्तित हो जाए तो प्रत्यक्षीकरण में भी परिवर्तन आ जाएगा।

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 6 Perception 2

संगठन के नियम
(Laws of Organisation)

अपने मत के समर्थन में गैस्टाल्टवादियों ने संगठन के कुछ नियम प्रतिपादित किये हैं। वे नियम इस प्रकार हैं –

1. समग्रता का नियम (Law of wholes) – समग्रता का नियम प्रत्यक्षीकरण सम्बन्धी एक महत्त्वपूर्ण नियम है जिसके अनुसार प्रत्यक्षीकरण में समग्र परिस्थिति का प्रत्यक्ष एक साथ होता है। ज्ञान के क्षेत्र में अनेक उत्तेजक तत्त्व स्वयं को विविध प्रकार के आकारों में संगठित कर लेते हैं। जर्मनी भाषा में ये आकार गैस्टाल्टन (Gestaltan) कहलाते हैं। हमारे मस्तिष्क पर इन संगठित आकारों का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है और इन्हीं का हम प्रत्यक्षीकरण करते हैं। क्योंकि ज्ञान क्षेत्र में सर्वप्रथम हमें समग्र ही दिखाई पड़ता है, अत: बड़े शब्दों के बीच हुई अक्षरों की गलतियाँ अक्सर हम नहीं देख पाते और गलतियों के बावजूद भी शब्द को पूर्णरूप में ही पढ़ते हैं।

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 6 Perception 3

उपर्युक्त चित्र में कुल 12 फूल हैं हम जिनका प्रत्यक्षीकरण चार-चार के समूह में करते हैं। कारण यह है कि चार-चार फूल मिलकर एक समग्र या इकाई बना रहे हैं।

2. आकृति और पृष्ठभूमि का नियम (Law of Figure and Background) – इस नियम के अनुसार किसी आकृति या दूसरी उत्तेजनाओं का प्रत्यक्षीकरण हम एक पृष्ठभूमि में करते हैं। चित्रकला में आकृति और पृष्ठभूमि नियम का विशेष ध्यान रखा जाता है। उदाहरण के लिए कुछ चित्र ऐसे होते हैं जो सिर्फ पृष्ठभूमि के विरोधी रंग के कारण उभर आते हैं। फिल्म देखते समय हम लोग अलग-अलग दृश्यों के साथ संगीत की अलग-अलग पृष्ठभूमि पाते हैं। पृष्ठभूमि की वजह से आकृति (उत्तेजना) का प्रत्यक्षीकरण प्रभावित होता है।

निर्धारक नियम
(Determining Laws)

गैस्टाल्टवादियों ने संगठन के नियमों के अलावा आकृति और पृष्ठभूमि के निर्धारक नियम भी प्रतिपादित किये हैं। ये नियम निम्नलिखित हैं –

(1) समीपता का नियम (Law of Proximity) – देश-काल की किसी पृष्ठभूमि में उन दशाओं, वस्तुओं, पदार्थों तथा प्राणियों का प्रत्यक्षीकरण शीघ्रता से होता है जो अपनी समीपता के कारण एक इकाई या आकृति का रूप धारण कर लेती हैं। इसके विपरीत, अनियमित तथा दूर-दूर बिखरे तत्त्वों का प्रत्यक्षीकरण आसानी से नहीं होता। बगीचे के उन पौधों का प्रत्यक्षीकरण शीघ्र व सरलता से होता है जो एक-दूसरे के समीप तथा समूह में होते हैं। बगीचे के बाहर खड़े एकाकी पौधे के प्रत्यक्षीकरण में देर लगती है।

(2) निरन्तरता का नियम (Law of Continuity) – उने उत्तेजनाओं का शीघ्र प्रत्यक्षीकरण कर लिया जाता है जो अनवरत रूप से निरन्तर या लगातार आती हैं। इस प्रकार की उत्तेजनाएँ किसी ज्ञानेन्द्रिय को ज्यादा देर तक तथा पूर्णरूप से प्रभावित करती हैं। उदाहरण के लिए स्कूटर के रुक-रुककर बजने वाले हॉर्न की अपेक्षा लगातार और निरन्तर बजने वाले हॉर्न का प्रत्यक्षीकरण शीघ्र होता है।

(3) समानता का नियम (Law of Similarity) – समानता प्रत्यक्षीकरण का एक महत्त्वपूर्ण नियम है। समान आकृति वाली उत्तेजनाओं का प्रत्यक्षीकरण शीघ्र कर लिया जाता है। वस्तुतः नाड़ी-तन्त्र में उन्हीं उत्तेजनाओं (वस्तुओं या व्यक्तियों) की आकृति बनती है जो वातावरण में समान रूप से पायी जाती हैं यानि जिनके विभिन्न अंगों में अधिक समानता दृष्टिगोचर होती है।

(4) सजातीयता का नियम (Law of Homogeneity) – गैस्टाल्ट मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, किसी पृष्ठभूमि में एक ही जाति के उत्तेजक या विभिन्न वस्तुएँ पहले दिखाई पड़ती हैं। एक ही दीप्ति के प्रकाश अथवा एक ही तीव्रता की ध्वनियों का प्रत्यक्षीकरण पृष्ठभूमि की अपेक्षा शीघ्रता से होता है। वसन्त ऋतु में फलते-फूलते टेसू के फूलों से लदे पेड़ों को देखकर प्रायः जंगल में आग का, भ्रम हो जाता है। ऐसा इसे कारण होता है क्योंकि एक ही जाति के ढेर सारे फूलों का प्रत्यक्षीकरण इनके एकसमान रंग की दीप्ति के कारण होता है।

(5) तत्परता का नियम (Law of Readiness) – वस्तु या उत्तेजना के संगठन पर मानसिक तत्परता का भी प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति जिस चीज का प्रत्यक्षीकरण करने के लिए तत्पर होता है उसे वह जल्दी देख अथवा सुन लेता है। उदाहरण के लिए परीक्षार्थी प्रश्न-पत्र में पहले उन प्रश्नों का प्रत्यक्षीकरण करता है जिनके आने की उम्मीद थी, दूसरे प्रश्नों का प्रत्यक्षीकरण वह बाद में करता है।

(6) आच्छादन का नियम (Law of Closure) – कई बार उत्तेजनाएँ रिक्त स्थान (Gaps) छोड़ देती हैं जिन्हें मानव मस्तिष्क द्वारा स्वयं पूरा कर लिया जाता है। यह प्रक्रिया आच्छादन अंग के प्रभाव के कारण है। जब हम कोई ऐसी आकृति देखते हैं जिस का कोई अंग अपूर्ण है तो हम उस अपूर्णता की ओर ध्यान न देकर आकृति का प्रत्यक्षीकरण पूर्ण रूप में ही करते हैं।

(7) प्रेरणा का नियम (Law of Motivation) – किसी व्यक्ति में कार्यरत प्रेरक अपने से सम्बन्धित उत्तेजनाओं तथा तत्त्वों का प्रत्यक्षीकरण पहले करने की दृष्टि से व्यक्ति को प्रेरित करता है। रिक्शा चलाने वाली सवारियों का प्रत्यक्षीकरण अन्य राहगीरों की अपेक्षा शीघ्र करेगा, जबकि पान वाला पान खाने वालों का।

(8) संगति या सम्बद्धता का नियम (Law of Symmetry) – गैस्टाल्ट मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, व्यक्ति किसी वस्तु अथवा उद्दीपक को उसके पूर्ण रूप में देखने की प्रवृत्ति रखता है। वह वस्तु की सम्बद्धता या संगति पर ध्यान देता है तथा छोटी-मोटी असम्बद्धताओं या विसंगतियों पर ध्यान नहीं देता। वस्तुतः संगति की वजह से समस्त उत्तेजना के अंग संगठित हो जाते हैं जिससे उनका सम्पूर्ण प्रत्यक्षीकरण हो जाता है। कमरे की दीवारों को प्रत्यक्षीकरण इसी संगति या संम्बद्धता के कारण है।

(9) अनुभव का नियम (Law of Experience) – प्रत्यक्षीकरण पर पहले अनुभव का भी । प्रभाव पड़ता है। जिन वस्तुओं अथवा उत्तेजनाओं को व्यक्ति को पहले से अनुभव रहता है उनका प्रत्यक्षीकरण वह शीघ्र करता है। यह इस कारण से होता है क्योंकि प्रत्यक्षीकरण करने वाला व्यक्ति पृष्ठभूमि की अन्य वस्तुओं की अपेक्षा उस वस्तु-विशेष से अधिक परिचित होता है।

(10) मनोवृत्ति का नियम (Law of Attitude) – व्यक्ति की मनोवृत्ति भी उसकी उत्तेजना के प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करती है, क्योंकि व्यक्ति अपनी आन्तरिक प्रवृत्ति के अनुसार ही वस्तु का प्रत्यक्षीकरण करता है। उपवन में सैर कर रहे विभिन्न लोग अपनी मनोवृत्ति के अनुकूल ही फूल-पौधों का प्रत्यक्षीकरण करेंगे। माली उन्हें उगाने की विधि, मिट्टी की दशा तथा उर्वरकों की दृष्टि से; कवि या लेखक सौन्दर्यानुभूति की प्रवृत्ति से तथा युवती फूल के सौन्दर्य से आकर्षित होकर उसका प्रत्यक्षीकरण करेगी।

प्रश्न 4.
भ्रम अथवा विपर्यय (nlusion) से क्या आशय है? भ्रम की प्रकृति को स्पष्ट कीजिए तथा इसके कारणों का भी उल्लेख कीजिए।
या
भ्रम क्या है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
या
विपर्यय या भ्रम के कारणों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :
प्रत्यक्षीकरण में हम किसी उत्तेजना या वस्तु-विशेष के यथार्थ का बोध करते हैं, किन्तु मिथ्या या त्रुटिपूर्ण प्रत्यक्षीकरण भ्रम कहलाता है। उदाहरण के लिए एक व्यक्ति अपनी ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से घर के किसी प्रकोष्ठ में रस्सी का प्रत्यक्षीकरण करता है। व्यक्ति को यह यथार्थ ज्ञान हो जाता है कि यह रस्सी है। वह घर में आते-जाते, सुबह-शाम रस्सी का प्रत्यक्ष बोध करता है। एक दिन रात के अन्धेरे में इसके विपरीत घटना घटी और वह रस्सी को साँप समझ बैठा और चीखकर दौड़ पड़ा। व्यक्ति प्रत्यक्षीकरण यहाँ भी कर रहा है, किन्तु यह यथार्थ या वास्तविक नहीं है। यह विपरीत अर्थात् विपर्यये (उल्टा) प्रत्यक्षीकरण है और इसी कारण भ्रम है।

विपर्यय अथवा भ्रम का अर्थ
(Meaning of Illusion)

विपर्यय अथवा भ्रम (Ilusion) त्रुटिपूर्ण प्रत्यक्षीकरण का दूसरा नाम है। प्रत्यक्षीकरण की क्रिया में संवेगात्मक अनुभव को उचित अर्थ प्रदान किया जाता है, किन्तु जब हम अपनी संवेदनाओं को त्रुटिपूर्ण या गलत अर्थ प्रदान कर देते हैं तो हमें विपर्यय (भ्रम) हो जाता है। इसे भाँति, प्रत्यक्षीकरण सम्बन्धी कोई भी त्रुटि विपर्यय के अन्तर्गत शामिल की जा सकती है। हालाँकि ऐसी त्रुटियाँ सामान्यतया होती रहती हैं, किन्तु ‘विपर्यय’ या ‘भ्रम’ शब्द का प्रयोग हम केवल उस दशा में ही करते हैं, जबकि निरीक्षण के दौरान कोई अनोखी तथा बड़ी त्रुटि हो गयी हो। भ्रम किसी स्वप्नावस्था का नाम नहीं है, क्योकि इसमें प्रत्यक्ष वस्तु सामने विद्यमान है। यह कल्पना भी नहीं है। यह तो मिथ्या या भ्रामक प्रत्यक्ष है। नींद से जागने पर अक्सर आदमी सवेरे को शाम या शाम को सवेरा समझ लेता है।

विपर्यय या भ्रम की प्रकृति स्थायी नहीं होती। यह एक क्षणिक और नितान्त अस्थायी प्रक्रिया है। जैसे ही व्यक्ति को उत्तेजक की सच्चाई का ज्ञान प्राप्त होता है, वैसे ही व्यक्ति को अपनी त्रुटि का आभास हो जाता है और उसका भ्रम दूर हो जाता है।

विपर्यय या भ्रम के प्रकार
(kinds of Illusion)

विपर्यय या श्रम साधारणतया दो प्रकार के होते हैं –

  1. व्यक्तिगत विपर्यय या भ्रम तथा
  2. सामान्य विपर्यय या भ्रम।

(1) व्यक्तिगत विपर्यय या भ्रम (Personal Illusion) – व्यक्तिगत विपर्यय या भ्रम वे हैं जो सभी व्यक्तियों में एकसमान नहीं होते। ये व्यक्ति से व्यक्ति में बदलते रहते हैं। हर एक व्यक्ति ऐसे भ्रम को अनुभव ही करे, यह अनिवार्य भी नहीं है अर्थात् इन्हें कोई अनुभव कर पाता है। अनुभव का स्वरूप भी भिन्न-भिन्न होता है। ये भ्रम क्षणिक प्रकृति के होते हैं तथा जल्दी ही दूर हो जाते हैं। उदाहरण के लिए—कुछ व्यक्ति अन्धेरे में रस्सी को साँप समझ सकते हैं, किन्तु जिस किसी ने साँथे । को देखा-सुना नहीं है, वह अन्धेरे में साँप को भी रस्सी ही समझ बैठेगा। यदि किसी ने कभी भूत के बारे में नहीं सुना है तो उसे कोई विचित्र आकृति भूत का भ्रम नहीं दे सकती।

(2) सामान्य विपर्यय’ या भ्रम (General Illusion) – सामान्य विपर्यय सार्वभौम (Universal) होते हैं। यही कारण है कि इन्हें सार्वभौमिक विपर्यय भी कहते हैं। ये दुनिया भर के सभी लोगों को समान रूप से होते हैं। इनका स्वरूप पर्याप्त रूप से स्थायी होता है। इसी कारण वास्तविकता जान लेने पर भी ये भ्रम ही रहते हैं। ऐसे भ्रमों से मुक्ति पाने के लिए अत्यधिक प्रयास करने पड़ते हैं। सामान्य विपर्यय को निम्नलिखित उदाहरणों के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है –

(i) गतिभ्रम – गतिभ्रम सामान्य या सार्वभौमिक विपर्यय का एक अच्छा उदाहरण है जिसे ‘फाई-फिनोमिना’ (Phi-Phenomena) कहते हैं। इसका प्रमाण सिनेमाघर में मिलता है। सिनेमा की रोल में थोड़े-थोड़े फासले पर किसी अभिनेता के सैकड़ों-हजारों चित्र होते हैं। रील को प्रोजेक्टर से चलाने पर पर्दे पर व्यक्ति अभिनय करता दीख पड़ता है। अभिनेता वास्तव में पर्दे पर अभिनय नहीं कर रहा है, किन्तु गति भ्रम के कारण यह सजीव जान पड़ता है। शादी-ब्याह, नुमाइश या मेले के अवसर पर बिजली के बल्बों को जला-बुझाकर गतिभ्रम कराया जाता है। कभी चक्र घूमता जान पड़ता है तो कभी बल्बों की माला चलती हुई महसूस होती है।

(ii) अक्सर किसी बस या गाड़ी से यात्रा करते समय नेत्र बन्द कर लेने से अनुभव होता है कि बस या गाड़ी उल्टी दिशा में चल रही है।
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 6 Perception 4
(iii) इसी प्रकार किसी वाहन से सफर के दौरान हर एक व्यक्ति अनुभव करता है कि दोनों ओर के मकान, पेड़-पौधे या विभिन्न वस्तुएँ। विपरीत दिशा में भागे जा रहे हैं। टेलीफोन के खम्भों पर खिंचे तार भी ऊपर-नीचे चलते अनुभव होते हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 6 Perception 5

(iv) म्यूलर-लापर विपर्यय (Muller-Lyer Illusion) – म्यूलरलायर विपर्यय या भ्रम को संलग्न चित्र में दिखाया गया है। चित्र को देखकर हर एक व्यक्ति यही बतायेगा कि अ ब रेखा ब स रेखा से बड़ी है जबकि अ * ब रेखा, ब स के एकदम बराबर है। अ सिरे पर अ अ, ब सिरे पर ब ब” तथा स सिरे पर स स रेखाओं के कारण यह भ्रम उत्पन्न होता है।

(v) जुलनर का भ्रम (Zullner’s Illusion)प्रायः हम लोग किसी वस्तु पर देर तक ध्यान केन्द्रित करके अ > तथा उसका विश्लेषण करके ही उसका प्रत्यक्षीकरण कर सट पाते हैं। जब ऐसा करना सम्भव नहीं होता तथा विरोधी उत्तेजनाओं को हम वस्तु से पृथक् नहीं कर पाते तो हमें संलग्न चित्र में प्रदर्शित भ्रम के सदृश विपर्यय हो जात्रा है। अब, सद, यर तथा ल व-ये चार खड़ी समान्तर रेखाएँ हैं, किन्तु तिरछी काटने वाली छोटी रेखाओं के कारण समानान्तर महसूस नहीं होती।
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 6 Perception 6

(vi) हैरिंग का विपर्यय (Herring’s Illusion) – संलग्न चित्र में हैरिंग द्वारा प्रस्तुत एक ज्यामितीय आकृति दिखाई गयी है जिसमें अब और स द दो समान्तर पड़ी रेखाओं को कुछ रेखाएँ इस प्रकार काट रही हैं कि ये समानान्तर नहीं जान पड़तीं।

विपर्यय के कारण
(Causes of Illusion)

निःसन्देह किसी वस्तु का मिथ्या प्रत्यक्षीकरण या झूठी भ्रान्ति ही विपर्यय अथवा भ्रम है और इसके अन्तर्गत ऐसी वस्तु का प्रत्यक्षीकरण किया जाता है जो वास्तविक वस्तु से सर्वथा भिन्न है। किन्तु, ऐसा होता क्यों है ? इस प्रश्न के उत्तर की खोज में कई सिद्धान्त प्रतिपादित किये गये हैं। इन सिद्धान्तों के आधार पर ही विपर्यय या भ्रम के मुख्य कारण अग्रलिखित रूप से प्रस्तुत हैं –

(1) पूर्वधारणा या पूर्वानुभव (Preconception) – आमतौर पर लोगों को अपने पुराने अनुभवों या पूर्वधारणाओं के कारण भ्रम पैदा हो जाता है। किसी विषय-वस्तु के सन्दर्भ में पूर्वधारणाओं के कारण प्रत्यक्षीकरण विकृत होकर विपर्यय को जन्म देता है। उदाहरणार्थ-किसी मकान में कभी एक स्त्री का कत्ल कर दिया गया था। यह बात फैल गयी कि रात के समय उस स्त्री का प्रेत मकान में आता है। इस बात को जानकर कोई व्यक्ति यदि उस मकान में रात व्यतीत करे त सम्भव है कि उसे रात में किसी आवाज से प्रेत का भ्रम हो जाये या कोई आकृति भूत जैसी दिखाई पड़े। यह भ्रम सोने वाले व्यक्ति की पूर्वधारणा के कारण होगा।

(2) आशा (Expectation) – प्रायः हम किसी वस्तु या घटना की आशा करते हैं। इस आशा के अनुकूल तथा इसके कारण विपर्यय या भ्रम हो जाते हैं। देखने में आता है कि परीक्षा में किसी प्रश्न के आने की आशा में छात्र उससे मिलते-जुलते किसी अन्य प्रश्न का उत्तर लिख देते हैं। यदि अकेले सफर कर रहे यात्री को आशा हो कि आज डाकू मिलेगा तो सामान्य आदमी को देखकर भी वह भयभीत हो उठेगा। यह भ्रान्त दशा आशा के कारण है।

(3) आदतें (Habits) – यदा-कदा व्यक्ति आदतों के कारण भ्रम का शिकार हो जाता है। यदि हम किसी वस्तु को विशेष रूप में देखने की आदत रखते हैं तो उसी तरह की दूसरी वस्तुएँ देखने पर हमें पहली वस्तुओं का ही बोध होगा। यदि किसी परिचित को एक विशेष पोशाक में देखने की आदत है तो किसी अन्य को उसी पोशाक में देखकर परिचित व्यक्ति का भ्रम होगा।

(4) ज्ञानेन्द्रिय दोष (Defects of Sense Organs) – कुछ विपर्यय या भ्रम ज्ञानेन्द्रिय दोष के कारण उत्पन्न होते हैं। ज्वर से पीड़ित व्यक्ति को खाने की सभी वस्तुएँ कड़वी या नमकीन लगती हैं, पीलिया (Jaundice) का रोगी प्रत्येक वस्तु को पीला पाता है तथा सुनने का दोषी अद्भुत आवाजें सुना करता है।

(5) नेत्रगति (Eye Movement) – विपर्यय या भ्रम में नेत्रगति की विशेष भूमिका है। चित्रानुसार अ ब रेखा पर स द रेखा लम्बवत् खड़ी है। हालाँकि अ ब और स द आपस में समान लम्बाई की हैं लेकिन अ ब, से स द लम्बी महसूस होती है। यह भ्रम हमें अपनी ज्ञानेन्द्रियों की विशेषताओं के कारण होता है।

(6) नवीनता (Novelty) – नवीनता के कारण भी व्यक्ति को विपर्यय होता है। अक्सर किसी परिस्थिति या वस्तु में परिवर्तन के कारण कोई नवीनता उत्पन्न होने से उसके विषय में भ्रम उत्पन्न हो जाता है। जब हम किसी शहर में एक लम्बे समय बाद आते हैं तो वहाँ किसी खास गली या मुहल्ले के नये मकानों को देखकर उस स्थान-विशेष के बारे में भ्रम हो जाता है।

(7) संवेग (Emotion) – संवेगावस्था में व्यक्ति को बहुधा भ्रम होते हैं। संवेग की दशा में व्यक्ति असामान्य हो जाता है और गलत प्रत्यक्षीकरण करने लगता है। चोर या डाकू की आशंका से उत्पन्न भय की संवेगावस्था में दरवाजे या छत पर होने वाली जरा-सी आहट भी चोर या डाकू की उपस्थिति का भ्रम करा देती है।।

(8) उत्तेजनाओं का विरोध (Contrast of Stimuli) – दो विपरीत गुणों वाली उत्तेजनाओं के सम्मुख आने पर व्यक्ति को उसकी वास्तविकता के विषय में भ्रम हो जाता है। लम्बा व्यक्ति यदि ठिगने व्यक्ति के साथ चले तो ठिगना और अधिक ठिगना दिखाई देगा, किन्तु यदि ठिगना, ठिगने व्यक्तियों के ही साथ चलेगा तो इतना ठिगना नहीं लगेगा। यदि एक साथ बनी चाय को तीन प्यालों में डालकर उन तीन व्यक्तियों को पिलायी जाये जिनमें से एक ने पहले मिठाई खाई हो, दूसरे ने नमकीन और तीसरे ने कुछ भी न खाया-पिया हो, तो मिठाई खाने वाला चाय को कम मीठी (या फीकी), नमकीन खाने वाला अपेक्षाकृत अधिक मीठी तथा बिना कुछ खाये-पिये चाय पीने वाला व्यक्ति उसे वास्तविक रूप से मीठा बतायेगा। ऐसा वस्तुओं के विरोधी गुणों के कारण है।

(9) सम्भ्रान्ति (Confusion) – सम्भ्रान्ति से अभिप्राय है–किसी आकृति के किसी भाग का अशुद्ध या मिथ्या प्रत्यक्षीकरण। किसी आकर्षक वस्तु को देखकर हम उसके सम्पूर्ण रूप में इतना खो जाते हैं कि उसके भागों की कमी पर ध्यान ही नहीं देते। अक्सर सुन्दर आकृति से सम्भ्रान्ति का विपर्यय या भ्रम पैदा हो जाता है।

(10) समग्रतो की प्रवृत्ति (Tendency towards whole) – प्रत्यक्षीकरण में समग्रता की प्रवृत्ति पायी जाती है। किसी चित्र या दृश्य के विभिन्न रूप समग्र के गुणों पर निर्भर होते हैं। इनका अर्थ भी समग्र के अर्थ पर आधारित होता है। बादलों को ध्यानपूर्वक देखने पर उसमें कई प्रकार की आकृतियाँ दिखाई पड़ती हैं, क्योंकि बादल को समग्र रूप से देखा जाता है।

(11) परिदृश्य (Perspective) – किसी भी वास्तविक वस्तु में ये सभी माप पायी जाती हैं–लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई अथवा गहराई आदि, किन्तु वस्तु के चित्र में सामान्यतया सिर्फ लम्बाई और चौडाई ही दिखाई पड़ती है। परिदृश्य त्रिमिति (Three Dimensional) होता है। इसी कारण त्रिमित्याकार चित्रों को देखकर वे वास्तविक जैसी लगती हैं, किन्तु यह भ्रम है त्रिमित्याकार फिल्मों को एक विशेष प्रकार का चश्मा लगाकर देखा जाता है और उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि जैसे फिल्म की चीजें हमारे सिर पर आ रही हों। ऐसे भ्रम परिदृश्य के कारण हैं।

उपर्युक्त विभिन्न कारणों से भ्रम या विपर्यय होती है। भ्रम कभी किसी एक कारण या अनेक कारणों से भी हो सकता है। यह बात ध्यान रखने योग्य है कि इस प्रकार के भ्रमों को निर्मूल या निराधार भ्रम से अलग समझा जाता है।

प्रश्न 5.
विभ्रम (Hallucination) से क्या आशय है? विभ्रम के मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
या
एक निराधार प्रत्यक्षीकरण के रूप में विभ्रम का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा उसके कारणों को भी स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :

विभ्रम का अर्थ
(Meaning of Hallucination)

संवेग की अवस्था में प्रत्यक्षीकरण की दशाएँ असामान्य हो जाती हैं, किन्तु संवेग की अवस्था समाप्त हो जाने पर प्रत्यक्षीकरण पुनः सामान्य रूप से होने लगता है। प्रत्यक्षीकरण की असामान्य दशाओं में विभ्रम का अध्ययन महत्त्वपूर्ण है।

विपर्यय अथवा भ्रम की तरह से विभ्रम भी एक त्रुटिपूर्ण प्रत्यक्षीकरण है। भ्रम और विभ्रम के बीच अन्तर यह है कि भ्रम बाह्य उत्तेजक का गलत प्रत्यक्षीकरण करने से उत्पन्न होता है जबकि विभ्रम बाह्म उत्तेजक की अनुपस्थिति (अभाव) के प्रत्यक्षीकरण करने से पैदा होता है। इस प्रकार से विभ्रम, वस्तुतः निर्मूल या निराधार प्रत्यक्षीकरण है। जब हम किसी ऐसी वस्तु को देखते हैं जो सचमुच में नहीं है, ऐसी गन्ध को सँघते हैं जो वातावरण में नहीं है और ऐसी ध्वनि को सुनते हैं जो पैदा नहीं हुई तो यही विभ्रम कहलायेगा। उदाहरण के तौर पर–रेगिस्तान में दूर-दूर तक कहीं पानी नहीं है, किन्तु प्यासे हिरन को कुछ दूर पानी का स्रोत होने का निर्मूल प्रत्यक्षीकरण हो जाता है। प्यासा हिरने पानी की चाह में जैसे ही आगे बढ़ता जाता है, पानी का स्रोत वैसे ही पीछे हटता जाता है। रेगिस्तान में पानी का पूर्ण अभाव है तथापि प्राणी को पानी का प्रत्यक्षीकरण हो रहा है-यह विभ्रम हुआ।

साधारणतया ऐसा माना जाता है कि विभ्रम असामान्य व्यक्तियों में होते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार, विभ्रम वे अनुभव हैं जिनमें प्रतिमाओं को प्रत्यक्ष समझ लिया गया है। उनकी दृष्टि में विभ्रम एक स्मृति प्रतिमा (Memory Image) है जिसे संवेदना को स्वरूप प्रदान किया गया है। यह हमारे पूर्व-अनुभव पर निर्मित होती है तथा वर्तमान में सत्य लगती है। रस्सी को साँप समझना यही विपर्यय अथवा भ्रम है तो कुछ भी न होने पर साँप देख लेना विभ्रम है। यद्यपि मनुष्य को श्रवण विभ्रम अधिक होते हैं लेकिन विभ्रम हमारी किसी भी ज्ञानेन्द्रिय आँख, नाक, कान, त्वचा, जिह्वा आदि को हो सकते हैं।

विभ्रम के कारण
(Causes of Hallucination)

विभ्रम की असामान्य स्थिति उत्पन्न करने वाले प्रमुख कारण अग्रलिखित हैं –

(1) मानसिक रोग – विभ्रम सामान्य व्यक्ति की अपेक्षा एक मानसिक रोगी को अधिक मत्रा में होते हैं। इसमें मानसिक रोगों में से प्रमुख रोग हैं-हिस्टीरिया, शिजोफ्रेनिया और न्यूरिस्थीनिया आदि। इन रोगियों को विभिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ होती हैं; यथा-वह आकाश में उड़ा चला जा रहा है, उसके कान में तरह-तरह की आवाजें सुनाई पड़ रही हैं, उसकी नाक टेढ़ी हुई जा रही है या हाथ मुड़ रहा है आदि। इस भाँति मानसिक रोग भी विभ्रम के कारण हैं।

(2) तीव्र कल्पना शक्ति – तीव्र कल्पना शक्ति वाले लोग अधिकांशतः कल्पना-जगत् में खोये रहते हैं। ऐसे लोग गहन कल्पनाएँ करते-करते स्वयं को उसी काल्पनिक परिस्थिति में पहुँचा देते हैं। वे वास्तविक विषय-वस्तु की अनुपस्थिति में भी उसका निराधार, किन्तु वास्तविक प्रत्यक्षीकरण करने लगते हैं। यह बात अलग है कि यह प्रत्यक्षीकरण सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए वास्तविक होता है जो कल्पनाएँ कर रहे हैं।

(3) दिवास्वप्न – जब व्यक्ति चेतना (जाग्रत) अवस्था में बैठे-बैठे स्वप्न देखता है तो इसे दिवास्वप्न देखना कहते हैं। जागते हुए भी ऐसे व्यक्ति अपने मन की आँखों से कोई दूसरा ही नजारा देख रहे होते हैं। वे उसमें इतने लवलीन रहते हैं कि उन्हें वह नजारा एकदम सच जान पड़ता है। यह दिवास्वप्न के कारण विभ्रम की स्थिति है।

(4) अचेतन मन – अचेतन मन की इच्छाएँ विभ्रम का कारण बनती हैं। फ्रॉयड के अनुसार, व्यक्ति की अपूर्ण इच्छाएँ अन्ततोगत्वा अचेतन मन में चली जाती हैं। कोई तीव्र एवं शक्तिशाली इच्छा अचेतन रूप से व्यक्ति पर प्रभाव डाल सकती है और वहीं से उसके व्यवहार को संचालित कर सकती है। अचेतन मन में बसी यह प्रबल इच्छा विभ्रम उत्पन्न कर सकती है।

(5) मादक द्रव्य – मादक द्रव्यों का सेवन करने वाले लोग भी विभ्रम का शिकार हो जाते हैं। मादक द्रव्य यथा शराब, अफीम, भाँग, गाँजा तथा चरस आदि के सेवन से चेतना शक्ति प्रभावित होती है। इस अवस्था में या तो चेतना शक्ति समाप्त हो जाती है या कमजोर पड़ जाती है और विभ्रम उत्पन्न करती है। एक शराबी को सरलता से विभ्रम हो जाते हैं।

(6) चिन्तनशील प्रवृत्ति – अधिक विचारशील एवं चिन्तनशील व्यक्ति भी विभ्रम के शिकार होते हैं। ऐसे व्यक्ति निरन्तर एक ही बात सोचते रहते हैं और उसी से सम्बन्धित प्रत्यक्ष करने लगते हैं। जो विभ्रम के कारण है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संवेदन का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया में संवेदना (Sensation) का विशेष महत्त्व है। वास्तव में अभीष्ट संवेदना के आधार पर ही प्रत्यक्षीकरण होता है। संवेदना के अभाव में प्रत्यक्षीकरण हो ही नहीं सकता। अब प्रश्न उठता है कि संवेदना से क्या आशय है अर्थात् संवेदना किसे कहते हैं? वास्तव में, जब कोई व्यक्ति या जीव किसी बाहरी विषय-वस्तु से किसी उत्तेजना को प्राप्त करता है, तब वह जो अनुक्रिया करता है, उसे ही हम संवेदना कहते हैं। सभी संवेदनाएँ इन्द्रियों द्वारा ग्रहण की जाती हैं। सैद्धान्तिक रूप से संवेदना सदैव प्रत्यक्षीकरण से पहले उत्पन्न होती है, परन्तु व्यवहार में संवेदना को ग्रहण करना तथा प्रत्यक्षीकरण सामान्य रूप से साथ-साथ ही होते हैं। संवेदनाएँ आँख, नाक, कान, जिल्ला तथा त्वचा नामक पाँच ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से ग्रहण की जाती हैं। प्रत्येक विषय की संवेदना विशिष्ट होती है। इस विशिष्टता के कारण ही प्रत्येक विषय का प्रत्यक्षीकरण अलग रूप में होता है। संवेदनाएँ अनेक प्रकार की होती हैं; जैसे-आंगिक संवेदनाएँ, विशेष संवेदनाएँ तथा गति संवेदनाएँ।

प्रश्न 2.
आंगिक संवेदनाओं के अर्थ एवं प्रकारों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
प्राणियों द्वारा ग्रहण की जाने वाली एक मुख्य प्रकार की संवेदनाएँ, आंगिक संवेदनाएँ हैं। इन संवेदनाओं का सम्बन्ध प्राणियों की कुछ आन्तरिक अंगों की विशिष्ट दशाओं से होता है। आंगिक संवेदनाएँ इन्द्रियों के माध्यम से ग्रहण नहीं की जातीं। आंगिक संवेदनाओं के मुख्य उदाहरण हैं – खुजली अथवा पीड़ा, बेचैनी, वेदना, पुलकित होना तथा भूख एवं प्यास। आंगिक संवेदनाओं के तीन वर्ग या प्रकार निर्धारित किये गये, जिनका सामान्य परिचय निम्नलिखित है –

(अ) निश्चित स्थानवाली आंगिक संवेदनाएँ-जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस प्रकार की आंगिक संवेदनाओं का शरीर में निश्चित स्थान होता है अर्थात् व्यक्ति या जीव यह स्पष्ट रूप से जान लेता है कि संवेदना शरीर के किस अंग या भाग से सम्बन्धित है। उदाहरण के लिए—खुजली अथवा दर्द की संवेदना निश्चित स्थाने वाली आंगिक संवेदना होती है।

(ब) अनिश्चित स्थान वाली आंगिक संवेदनाएँ—इस वर्ग में उन आंगिक संवेदनाओं को सम्मिलित किया जाता है, जिनकी उत्तेजना का स्थान शरीर में स्पष्ट रूप से जाना नहीं जा सकता। इस प्रकार की मुख्य संवेदनाएँ हैं-बेचैनी, वेदना तथा आनन्दित अथवा पुलकित होने की संवेदनाएँ।

(स) अस्पष्ट स्थान वाली आंगिक संवेदनाएँ-तीसरे वर्ग या प्रकार की संवेदनाओं को अस्पष्ट स्थान वाली आंगिक संवेदनाएँ कहा जाता है। इस प्रकार की आंगिक संवेदनाओं के स्थान को शरीर में स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं किया जा सकता। भूख तथा प्यास की संवेदनाएँ इसी प्रकार की आंगिक संवेदनाएँ हैं।

प्रश्न 3.
विशेष संवेदनाओं के अर्थ एवं प्रकारों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
प्राणियों द्वारा अपनी इन्द्रियों के माध्यम से जिन संवेदनाओं को ग्रहण किया जाता है, उन संवेदनाओं को विशेष संवेदनाएँ कहा जाता है। विशेष संवेदनाओं का सम्बन्ध बाहरी विषय-वस्तुओं से होता है अर्थात् इन संवेदनाओं की उत्पत्ति बाहरी विषय-वस्तुओं से होती है। हम कह सकते हैं कि बाहरी विषय-वस्तुओं से उत्पन्न होने वाली उत्तेजनाओं के प्रति होने वाली अनुक्रिया को विशेष । संवेदनाएँ कह सकते हैं। हम जानते हैं कि बाहरी विषय असंख्य हैं; अत: उनसे सम्बन्धित विशेष संवेदनाएँ भी असंख्य हैं। विशेष संवेदनाएँ विभिन्न इन्द्रियों के माध्यम से ग्रहण की जाती हैं; अतः पाँच इन्द्रियों से सम्बन्धित संवेदनाओं को ही पाँच प्रकार की विशेष संवेदनाओं के रूप में वर्णित किया जाता है, जो निम्नलिखित हैं –

(अ) दृष्टि संवेदेनाएँ – आँखों अथवा नेत्रों के माध्यम से ग्रहण की जाने वाली संवेदनाओं को दृष्टि संवेदनाएँ कहा जाता है। इस प्रकार की संवेदनाओं के लिए जहाँ एक ओर बाहरी जगत की वस्तुएँ आवश्यक हैं, वहीं साथ-ही-साथ प्रकाश का होना भी एक अनिवार्य कारक है।

(ब) घ्राण संवेदनाएँ – नाक से ग्रहण की जाने वाली संवेदनाओं को घ्राण संवेदनाएँ कहते हैं। इस वर्ग की संवेदनाओं के विभिन्न प्रकार की गन्ध ही उत्तेजना की भूमिका निभाती है। सामान्य रूप से दो प्रकार की गन्ध मानी जाती है अर्थात् सुगन्ध तथा दुर्गन्ध।

(स) श्रवण संवेदनाएँ – उन विशेष संवेदनाओं को श्रवण संवेदनाएँ माना जाता है, जो कानों के माध्यम से ग्रहण की जाती हैं। इस वर्ग की संवेदनाओं को हम ध्वनि तरंगों के माध्यम से ग्रहण करते हैं।

(द) स्पर्श संवेदनाएँ – त्वचा द्वारा ग्रहण की जाने वाली संवेदनाओं को स्पर्श संवेदनाएँ कहते हैं। स्पर्श संवेदनाओं का क्षेत्र काफी व्यापक है तथा हम विभिन प्रकार का ज्ञान इन्हीं संवेदनाओं के माध्यम से प्राप्त करते हैं। सामान्य रूप से स्पर्श संवेदनाओं के माध्यम से हम कोमलता एवं कठोरता, छोटे-बड़े एवं ऊँचे तथा गर्म एवं ठण्डे का ज्ञान प्राप्त करते हैं।

(य) स्वाद संवेदनाएँ – जीभ द्वारा ग्रहण की जाने वाली विशेष संवेदनाओं को हम स्वाद संवेदनाएँ कहते हैं। इन संवेदनाओं के लिए विभिन्न वस्तुओं के अलग-अलग स्वाद ही उत्तेजना होते हैं। जीभ के भिन्न-भिन्न भागों से भिन्न-भिन्न स्वादों की जानकारी प्राप्त होती है।

प्रश्न 4.
गति संवेदनाओं के अर्थ एवं प्रकारों को स्पष्ट कीजिए।
उतर :
गति से सम्बन्धित संवेदनाओं को गति संवेदना के नाम से जाना जाता है। सामान्य रूप से शरीर के जोड़ों, कण्डराओं तथा मांसपेशियों के माध्यम से गति संवेदनाओं को ग्रहण किया जाता है। गति संवेदनाओं के मुख्य उदाहरण हैं-खिंचाव, तनाव तथा सिकुड़न। गति संवेदनाओं की अनुभूति जहाँ एक ओर शरीर की विभिन्न मांसपेशियों के तथा स्नायु तन्तुओं द्वारा होती है, वहीं दूसरी ओर पूरी त्वचा का भी गति संवेदनाओं से सम्बन्ध होता है। ये संवेदनाएँ अग्रलिखित तीन प्रकार की होती हैं –

(अ) स्थिति से सम्बन्धित गति संवेदनाएँ – प्रत्येक व्यक्ति का अनुभव है कि यश-कदा बैठे-बैठे ही व्यक्ति की भुजाओं या जंघाओं की मांसपेशियों में एक विशेष प्रकार की कम्पन्न या गति होने लगती है। इस गति के लिए न तो अंगों को हिलाया जाता है और न ही फैलाया जाता है। इस प्रकार की संवेदनाओं को स्थिति से सम्बन्धित गति संवेदनाएँ कहते हैं।

(ब) स्वच्छन्द गति संवेदनाएँ – गति संवेदनाओं का एक प्रकार या रूप है–स्वच्छन्द गति संवेदनाएँ। इस प्रकार की गति संवेदनाएँ उस समय अनुभव की जाती हैं, जब शरीर के अंगों को मुक्त रूप से इधर-उधर हिलाया जाता है।

(स) प्रतिरुद्ध गति संवेदनाएँ – शरीर के विभिन्न मांसपेशियों के माध्यम से अनुभव की जाने वाली एक प्रकार की गति संवेदनाओं को प्रतिरुद्ध गति संवेदनाएँ कहा जाता है। जब हम किसी वस्तु पर दबाव डालते हैं, या भारी वस्तु को उठाते हैं, तब अनुभव की जाने वाली संवेदना को प्रतिरुद्ध गति संवेदना कहते हैं।

प्रश्न 5.
संवेदना तथा प्रत्यक्षीकरण में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
संवेदना तथा प्रत्यक्षीकरण में अन्तर
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 6 Perception 7 UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 6 Perception 8

प्रश्न 6.
प्रत्यक्षीकरण पर संवेग का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
संवेग एक भावनात्मक मनोवैज्ञानिक अवस्था है और प्रत्यक्षीकरण किसी उत्तेजक (वस्तु, घटना या व्यक्ति) का बाद का ज्ञान है। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में अनेकानेक संवेगों की अनवरत अनुभूति करती है; जैसे-क्रोध, भय, प्रेम, घृणा, शोक, हर्ष तथा आश्चर्य इत्यादि की अनुभूतियाँ। संवेग मनुष्य के व्यवहार से सम्बन्धित एक जटिल अवस्था है जो मनुष्य के विभिन्न मनोवैज्ञानिक अवयवों को प्रभावित करती है। संवेग का प्रत्यक्षीकरण पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि कोई व्यक्ति किसी विशिष्ट संवेग की अवस्था में है तो वह अपने सम्मुख उपस्थित उत्तेजक अर्थात् वस्तु, घटना या व्यक्ति को यथार्थ एवं सही-सही प्रत्यक्षीकरण नहीं कर सकता। यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक शोक संतप्त है तो ऐसी संवेगावस्था में वह शुभ विवाह की मधुर शहनाई का भी कर्कश एवं पीड़ादायक संगीत के रूप में प्रत्यक्षीकरण करेगा। भले ही क्रोधित व्यक्ति के सामने दुनिया के स्वादिष्टतम व्यंजन परोस दिये जाएँ उसे तो वे स्वादहीन ही अनुभव होंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि समस्त शक्तिशाली संवेग यथार्थ प्रत्यक्षीकरण के प्रति विपरीत कारक समझे जायेंगे और जितनी ही प्रबल संवेगावस्था होगी उतना ही गलत प्रत्यक्षीकरण भी हो सकता है। वस्तुत: सही प्रत्यक्षीकरण के लिए संवेगमुक्त एवं तटस्थ मानसिक दशा एक पहली शर्त है। मोटे तौर पर, जिस रंग का चश्मा व्यक्ति लगायेगा सामने की वस्तु भी उसी के अनुसार दिखाई देगी। संवेगावस्था तो एक रंगीन चश्मा है और प्रत्यक्षीकरण दीख पड़ने वाली वस्तु। स्पष्ट प्रत्यक्षीकरण के लिए व्यक्ति की भावनाएँ किसी संवेग से रँगी न हों, अन्यथा संवेग प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित किये बिना नहीं रह सकेगा।

प्रश्न 7.
भ्रम (विपर्यय) तथा विभ्रम में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
भ्रम (विपर्यय) तथा विभ्रम में अन्तर

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 6 Perception 9

प्रश्न 8.
रंग-प्रत्यक्षीकरण से क्या आशय है?
उत्तर :
रंगों के प्रत्यक्षीकरण से आशय है–सम्बन्धित विषय-वस्तु के रंग को देखना एवं पहचानना। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत रंगों के अन्तर का भी ज्ञान प्राप्त होता है। किसी भी वस्तु के रंग का निर्धारण उससे निगमित ‘प्रकाश-तरंगों द्वारा होता है अर्थात् रंग-प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया में प्रकाश-तरंगों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। वास्तव में, रंग अपने आप में कोई स्वतन्त्र या अलग। विषय-वस्तु नहीं है, जिसका हम प्रत्यक्षीकरण करते हैं बल्कि रंग का निर्धारण विषय-वस्तु से निकलने वाली प्रकाश-तरंगों की लम्बाई से होता है। भिन्न-भिन्न वस्तुओं से निकलने वाली प्रकाश-तरंगों की लम्बाई भिन्न-भिन्न होती है तथा इसी लम्बाई से ही वस्तु के रंग के स्वरूप का निर्धारण होता है। समस्त प्रकार की तरंगें प्रकाश के किसी मूल स्रोत से सम्बन्धित होती हैं। हमारे विश्व में प्रकाश का मुख्यतम एवं सबसे बड़ा स्रोत सूर्य है। इसके अतिरिक्त चाँद एवं तारे भी प्रकाश के प्राकृतिक स्रोत हैं। कृत्रिम स्रोतों में दीपक की लौ तथा विद्युत बल्ब को भी प्रकाश का स्रोत माना जा सकता है। हम जानते हैं कि जब विद्युत-धारा बल्ब के तार में प्रवाहित होती है तो वह प्रकाश में परिवर्तित हो जाती है। प्रकाश ही वह एकमात्र कारक है, जिसके माध्यम से हम बाहरी वस्तुओं को देखते हैं। बाहरी वस्तुओं को दिखाने वाला प्रकाश हमारी आँखों तक मुख्य रूप से दो प्रकार से पहुँचता है। अपने प्रथम रूप में प्रकाश की किरणें या तरंगें सीधे ही हमारी आँखों तक पहुँचती हैं। दूसरे रूप में प्रकाश की किरणें पहले किसी वस्तु पर पड़ती हैं तथा इसके उपरान्त उस वस्तु से परावर्तित होकर हमारी आँखें पर पड़ती हैं। भौतिक विज्ञान के अध्ययनों द्वारा ज्ञात हो चुका है कि प्रकाश की तरंगों की लम्बाई भिन्न-भिन्न होती है। जहाँ तक हमारी आँखों की प्रकृति का प्रश्न है तो यह सत्य है कि हमारी आँखें 4000 से 7800 8 तक की तरंग दैर्घ्य (1 ऍग्स्ट्रम = 10-10 मीटर) वाली प्रकाश-तरंगों को ही ग्रहण कर सकती हैं। हमारी आँखें इससे अधिक लम्बाई वाली तरंगों को सामान्य रूप से ग्रहण करने की क्षमता नहीं रखती। इसका कारण यह है कि एक सीमा से अधिक लम्बाई वाली प्रकाश-तरंगें प्रकाश के स्थान पर ताप की संवेदना देने लगती हैं। कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं, जिन पर किसी स्रोत से प्रकाश पड़ने पर वे हमें दिखाई देती हैं तथा उनके प्रभाव से अन्य वस्तुओं को भी देखा जा सकता है। इन वस्तुओं को प्रकाशमान वस्तुएँ कहा जाता है। वास्तव में ये वस्तुएँ प्रकाश का परावर्तन करती हैं। इससे भिन्न कुछ वस्तुएँ ऐसी भी होती हैं जिनमें न तो अपना प्रकाश होता है और न ही वे प्रकाश का परावर्तन ही कर पाती हैं। इन वस्तुओं को प्रकाशहीन वस्तुएँ कहा जाता है। इस प्रकार की वस्तुएँ हर प्रकार के बाहरी प्रकाश को अवशोषित कर लेती हैं। प्रकाश की तरंगों एवं विभिन्न वस्तुओं के गुणों का उल्लेख करने के उपरान्त हम कह सकते हैं कि किसी वस्तु के रंग का निर्धारण एवं प्रत्यक्षीकरण सम्बन्धित वस्तु से परावर्तित होने वाली प्रकाश-तरंगों की लम्बाई के आधार पर होता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
टिप्पणी लिखिए-संवेदना व प्रत्यक्षीकरण।
उत्तर :
संवेदना (Sensation) तथा प्रत्यक्षीकरण (Perception) में घनिष्ठ सम्बन्ध है तथा इन दोनों का अध्ययन साथ-साथ ही किया जाता है। संवेदना में प्राणी वस्तु का सिर्फ प्रथम ज्ञान ही अनुभव करता है, वस्तु का वास्तविक अर्थ वह नहीं समझ पाता। कोई व्यक्ति हरे-पीले रंग की गोल वस्तु देखता है, यह छूने में चिकनी और दबाने में रसदार है, सँघने पर उसकी विशेष गन्ध तथा जीभ द्वारा चखने पर तीव्र खट्टे स्वाद की संवेदना होती है। दृष्टि, स्पर्श, घ्राण एवं स्वाद की विभिन्न ज्ञानेन्द्रियों की अलग-अलग संवेदनाओं से उस वस्तु का सही अर्थ पता नहीं चलता। इसके लिए इन सभी संवेदनाओं को मिलाकर समन्वित तथा समष्टि रूप में देखा जायेगा तथा सभी संवेदनाओं के अर्थ की व्याख्या करनी होगी। इस व्याख्या में संवेदनाओं के साथ प्रत्यभिज्ञा (सदृश वस्तु देखकर किसी पहले देखी हुई वस्तु का स्मरण) का योगदान रहने से वस्तु का सम्पूर्ण ज्ञान हो जाता है। इसे प्रत्यक्षीकरण कहते हैं। यह प्रत्यक्षीकरण वर्तमान में घटने वाली घटना, किसी प्राणी अथवा किसी वस्तु का होता है।

प्रश्न 2.
प्रत्यक्षीकरण की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
प्रत्यक्षीकरण में निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं –

  1. प्रत्यक्षीकरण एक जटिल मानसिक प्रक्रिया है।
  2. इसके द्वारा हमें सम्पूर्ण स्थिति का ज्ञान होता है। हम किसी वस्तु या घटना को उसके अलग-अलग अंगों के रूप में नहीं वरन् सम्पूर्ण रूप में देखते हैं।
  3. प्रत्यक्षीकरण में सबसे पहले वस्तु या उत्तेजक उपस्थित होता है।
  4. यह उसैजक ज्ञानेन्द्रियों या संग्राहकों को प्रभावित करता है जिसके फलस्वरूप ज्ञानवाही स्नायुओं का प्रवाह शुरू होता है।
  5. यह स्नायु प्रवाह मस्तिष्क केन्द्र तक पहुँचता है और उत्तेजक की संबेदना अनुभव की जाती है।
  6. अब इस संवेदना में पूर्ण संवेदना के आधार पर अर्थ जोड़कर व्याख्या की जाती है और इस भॉति प्रत्यक्षीकरण हो जाता है।
  7. प्रत्यक्षीकरण के माध्यम से हम अपने चारों ओर की वस्तुओं में से उस वस्तु का चयन कर लेते हैं जिसका हमसे सम्बन्ध है स्वभावतः उसी की ओर हमारा ध्यान भी हो जाता है।
  8. प्रत्यक्षीकरण का आधार परिवर्तन है क्योंकि परिवर्तन की वजह से ही प्रत्यक्षीकरण होता है। हमारे चारों ओर उपस्थित विभिन्न वस्तुओं में से उस वस्तु का प्रत्यक्षीकरण शीघ्र होगा जो परिवर्तित हो रही है।
  9. प्रत्यक्षीकरण में संगठन की विशेषता पायी जाती है, और अन्ततः
  10. प्रत्यक्षीकरण में संवेदनात्मक पूर्व ज्ञान का अधिक समावेश रहता है।

प्रश्न 3.
व्यक्तिगत तथा सामान्य भ्रमों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
त्रुटिपूर्ण प्रत्यक्षीकरण को भ्रम या विभ्रम कहते हैं। भ्रम दो प्रकार के होते हैं—व्यक्तिगत भ्रम तथा सामान्य भ्रम। इन दोनों प्रकार के भ्रमों में कुछ मौलिक अन्तर होते हैं। व्यक्तिगत भ्रमों का स्वरूप भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के सन्दर्भ में भिन्न-भिन्न होता है। उदाहरण के लिए कम प्रकाश में किसी व्यक्ति द्वारा रस्सी को साँप समझ बैठना एक व्यक्तिगत भ्रम है। हो सकता है कि इसी परिस्थिति में कोई अन्य व्यक्ति भ्रमित न हों तथा रस्सी को रस्सी ही समझे। इससे भिन्न सामान्य भ्रम सार्वभौमिक होते हैं, अर्थात् इस प्रकार के भ्रमों की स्वरूप सभी व्यक्तियों के लिए एकसमान ही होता है। उदाहरण के लिए पानी में पड़ी छड़ टेढ़ी दिखाई देती है। यह एक सामान्य भ्रम है जो प्रत्येक व्यक्ति के लिए एकसमान होता है।

प्रश्न 4.
विभ्रम में संवेगों की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
सामान्यजनों में विभ्रम की उत्पत्ति संवेगों की प्रबलता के कारण होती है। कोई शक्तिशाली भय का संवेग हमारे अन्दर विभ्रम उत्पन्न कर सकता है; जैसे-श्मशान या कब्रिस्तान के मार्ग से गुजरते हुए हमें प्रेत या जिन्न को विभ्रम हो सकता है। संवेगावस्था में अयथार्थ तथा आत्मनिष्ठ प्रत्यक्षीकरण होता है और इस कारण विभ्रम उत्पन्न हो सकता है। इसके अतिरिक्त संवेग की दशा में आन्तरिक उद्दीपन होते हैं तथा अनायास ही शारीरिक परिवर्तन आते हैं जिनके कारण व्यक्तियों में विभ्रम की सम्भावना रहती है। संवेग की दशा में सामान्य कार्य-व्यापार अवरुद्ध हो जाते हैं तथा व्यक्ति का जीवन असन्तुलित हो जाता है जिसके फलस्वरूप उत्पन्न होने वाले विभ्रम असामान्य व्यवहार द्वारा अभिव्यक्त होते हैं। कभी-कभी यह असामान्यता पागलपन की दशा में बदल जाती है; अतः इसे दूर करने के लिए तत्काल उपाय वांछित हैं।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.
निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए। –

  1. किसी बाहरी विषय-वस्तु से प्राप्त होने वाली उत्तेजना के प्रति व्यक्ति द्वारा की जाने वाली अनुक्रिया को मनोविज्ञान की भाषा में …………………. कहते हैं।
  2. उद्दीपक द्वारा …………………. घटित होती है।
  3. संवेदना किसी उद्दीपक का प्रथम प्रत्युत्तर है और …………………. प्राणी की संवेदना के पश्चात् का द्वितीय प्रत्युत्तर है जो संवेदना से ही सम्बन्धित होता है।
  4. बाहरी विषय-वस्तुओं का इन्द्रियों के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया ही …………………. है।
  5. जब किसी संवेदना को अर्थ प्रदान कर दिया जाता है तब उसे …………………. कहते हैं।
  6. संवेदना को …………………. की कच्ची सामग्री माना जाता है।
  7. प्रत्यक्षीकरण एक …………………. मानसिक प्रक्रिया है, जब कि संवेदना एक सरल मानसिक प्रक्रिया है।
  8. प्रत्यक्षीकरण में समग्रता पर बल देने वाले मत को …………………. कहते हैं।
  9. वस्तुओं को समग्र रूप में देखने की प्रवृत्ति …………………. कहलाती है।
  10. जब समीप स्थित उद्दीपक नये रूप में संगठित हो जाए तो इसे प्रत्यक्षीकरणात्मक संगठन का …………………. नियम कहते हैं।
  11. संवेगावस्था में प्रत्यक्षीकरण पर …………………. प्रभाव पड़ता है।
  12. मानसिक तत्परता का प्रत्यक्षीकरण पर …………………. प्रभाव पड़ता है।
  13. त्रुटिपूर्ण प्रत्यक्षीकरण को …………………. कहते हैं।
  14. बिना किसी उद्दीपक के ही प्रत्यक्षीकरण होना …………………. कहलाता है।
  15. भ्रम एक गलत प्रत्यक्षीकरण है तथा विभ्रम …………………. ।
  16. किसी भी वस्तु के रंग का निर्धारण उससे निगमित …………………. द्वारा होता है।
  17. मानसिक रोगी प्रायः …………………. के शिकार हो जाते हैं।

उत्तर :

  1. संवेदना
  2. संवेदना
  3. प्रत्यक्षीकरण
  4. प्रत्यक्षीकरण
  5. प्रत्यक्षीकरण
  6. प्रत्यक्षीकरण
  7. जटिल
  8. गेस्टाल्टवाद
  9. समग्रता
  10. समीपता का
  11. प्रतिकूल
  12. अनुकूल
  13. भ्रम या विपर्यय
  14. विभम
  15. निराधार प्रत्यक्षीकरण
  16. प्रकाश तरंगों
  17. विमा

प्रश्न II.
निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
संवेदना का अर्थ एक वाक्य में लिखिए।
उत्तर :
किसी बाहरी विषय-वस्तु से प्राप्त होने वाली उत्तेजना के प्रति व्यक्ति द्वारा की जाने वाली अनुक्रिया को मनोविज्ञान की भाषा में संवेदना कहते हैं।

प्रश्न 2.
संवेदनाओं को ग्रहण करने वाले शरीर के अंगों को क्या कहते हैं ?
उत्तर :
संवेदनाओं को ग्रहण करने वाले शरीर के अंगों को ज्ञानेन्द्रियाँ कहते हैं।

प्रश्न 3.
हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर :
ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं – आँख, नाक, कान, जिल्ला तथा त्वचा।

प्रश्न 4.
संवेदनाओं के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं ?
उत्तर :
संवेदनाओं के मुख्य प्रकार हैं-आंगिक संवेदनाएँ, विशेष संवेदनाएँ तथा गति संवेदनाएँ।

प्रश्न 5.
प्रत्यक्षीकरण की एक स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
स्टेगनर के अनुसार, “बाहरी वस्तुओं और घटनाओं की इन्द्रियों के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया ही प्रत्यक्षीकरण है।”

प्रश्न 6.
कोई ऐसा कथन लिखिए जिससे संवेदना तथा प्रत्यक्षीकरण का सम्बन्ध स्पष्ट होता हो।
उत्तर :
रॉस के अनुसार, “संवेदना को सही अर्थ प्रदान करना ही प्रत्यक्षीकरण है।”

प्रश्न 7.
संवेदना तथा प्रत्यक्षीकरण में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर :
संवेदना किसी विषय-वस्तु का प्रथम अर्थहीन ज्ञान या अनुभूति है, जबकि प्रत्यक्षीकरण सम्बन्धित विषय-वस्तु का द्वितीयक अर्थपूर्ण ज्ञान है।

प्रश्न 8.
संवेगों का प्रत्यक्षीकरण पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
संवेगावस्था में तटस्थ एवं सही प्रत्यक्षीकरण सम्भव नहीं होता है।

प्रश्न 9.
प्रत्यक्षीकरण के विषय में गैस्टाल्टवाद की क्या मान्यता है?
उत्तर :
गैस्टाल्टवाद के अनुसार, किसी विषय-वस्तु का प्रत्यक्षीकरण पहले संश्लेषणात्मक विधि द्वारा होता है तथा बाद में उसका प्रत्यक्षीकरण विश्लेषणात्मक ढंग से होता है।

प्रश्न 10.
प्रत्यक्षीकरण के समग्रता के नियम से क्या आशय है?
उत्तर :
प्रत्यक्षीकरण के समग्रता के नियम के अनुसार प्रत्यक्षीकरण में किसी वस्तु के विभिन्न अंगों को अलग-अलग प्रत्यक्षीकरण नहीं होता बल्कि सम्पूर्ण वस्तु का प्रत्यक्षीकरण एक साथ होता है।

प्रश्न 11.
भ्रम या विपर्यय से क्या आशय है?
उत्तर :
त्रुटिपूर्ण या गलत प्रत्यक्षीकरण को भ्रम या विपर्यय कहते हैं; जैसे-रस्सी को साँप समझ लेना अथवा साँप को रस्सी समझ लेना।

प्रश्न 12.
भ्रम कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर :
भ्रम दो प्रकार के होते हैं –

  1. व्यक्तिगत भ्रम तथा
  2. सामान्य भ्रम।

प्रश्न 13.
विभ्रम (Hallucination) से क्या आशय है?
उत्तर :
यथार्थ विषय-वस्तु के नितान्त अभाव में होने वाले निराधार प्रत्यक्षीकरण को विभ्रम कहते हैं।

प्रश्न 14.
सामान्य रूप से किस वर्ग के व्यक्ति विभ्रम के अधिक शिकार होते हैं?
उत्तर :
सामान्य रूप से मानसिक रोगी विभ्रम के अधिक शिकार होते हैं।

प्रश्न 15.
भ्रम तथा विभ्रम में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर :
भ्रंम एक गलत या त्रुटिपूर्ण प्रत्यक्षीकरण होता है, जबकि विभ्रम एक निराधार प्रत्यक्षीकरण होता है।

प्रश्न 16.
रंगों का प्रत्यक्षीकरण किसके माध्यम से होता है?
उत्तर :
रंगों का प्रत्यक्षीकरण प्रकाश की तरंगों के माध्यम से होता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए –

प्रश्न 1.
प्राणी में अनुक्रिया प्रारम्भ करने के लिए क्या आवश्यक है?
(क) उद्दीपक
(ख) संवेग
(ग) रुचि
(घ) वातावरण

प्रश्न 2.
किसी बाहरी विषय-वस्तु की प्रथम अनुभूति को कहते हैं –
(क) प्रत्यक्षीकरण
(ख) प्रतिमा
(ग) संवेदना
(घ) कल्पना

प्रश्न 3.
किसी बाहरी विषय-वस्तु का सही ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया को कहते हैं
(क) संवेदना
(ख) प्रत्यक्षीकरण
(ग) स्मरण
(घ) संज्ञान

प्रश्न 4.
“संवेदना का सही अर्थ निकालना ही प्रत्यक्षीकरण है।” यह कथन किसका है?
(क) मैक्डूगल
(ख) वुडवर्थ
(ग) रॉस
(घ) बोरिंग

प्रश्न 5.
प्रत्यक्षीकरण विभिन्न इन्द्रियों की सहायता से पदार्थ अथवा उनके आधारों का ज्ञान प्राप्त करने की क्रिया है।” यह परिभाषा किसके द्वारा प्रतिपादित है?
(क) वुडवर्थ
(ख) स्टेगनर
(ग) कालिन्स एवं ड्रेवर
(घ) विलियम जेम्स

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से कौन प्रत्यक्षीकरणात्मक संगठन का नियम नहीं है?
(क) समीपता
(ख) समानता
(ग) अन्तर्मुखता
(घ) निरन्तरता

प्रश्न 7.
जर्मनी में व्यवहारवाद के विरुद्ध प्रत्यक्षीकरण के माध्यम से मानव स्वभाव को समझने के लिए जिस विचारधारा का जन्म हुआ, उसका नाम है –
(क) साहचर्यवाद
(ख) मनोविश्लेषणवाद
(ग) प्रयोजनवाद
(घ) गैस्टाल्टवाद

प्रश्न 8.
सेट प्रत्यक्षीकरण पर सकारात्मक प्रभाव डालता है, जब वह –
(क) एक हो
(ख) दो हो।
(ग) दो से अधिक हो
(घ) अनगिनत हो

प्रश्न 9.
किसी ‘आकृति के प्रत्यक्षीकरण के लिए क्या आवश्यक है?
(क) अधिगम
(ख) पृष्ठभूमि
(ग) चिन्तन
(घ) कल्पना

प्रश्न 10.
जब हम कोई ऐसी आकृति देखते हैं जिसका कोई अंग अपूर्ण है, परन्तु हम उस अपूर्णता की ओर ध्यान नहीं देते तथा आकृति का प्रत्यक्षीकरण पूर्ण रूप में ही करते हैं। ऐसा प्रत्यक्षीकरण के किस नियम के अनुसार होता है?
(क) निरन्तरता का नियम
(ख) आच्छादन का नियम
(ग) समीपता का नियम
(घ) सम्बद्धता का नियम

प्रश्न 11.
किसी भी संवेदना के गलत अर्थ प्रदान करने की प्रक्रिया को कहते हैं –
(क) संवेग
(ख) चिन्तन
(ग) भ्रम
(घ) विभ्रम

प्रश्न 12.
मन्द प्रकाश में आँगन के कोने में साँप को देखकर रस्सी समझ लेना क्या है?
(क) विभ्रम
(ख) प्रत्यक्षीकरण
(ग) भ्रम
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 13.
मन्द प्रकाश में गोल आकृति में रखी हुई रस्सी समझ लेना है –
(क) विभ्रम
(ख) प्रत्यक्षीकरण
(ग) भ्रम
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 14.
किसी बाहरी विषय-वस्तु के अस्तित्व के नितान्त अभाव की स्थिति में होने वाले प्रत्यक्षीकरणको कहते हैं –
(क) विशेष प्रत्यक्षीकरण
(ख) शुद्ध प्रत्यक्षीकरण
(ग) भ्रम या त्रुटिपूर्ण प्रत्यक्षीकरण
(घ) विभ्रम

प्रश्न 15.
निम्नलिखित में से किसमें उद्दीपक अनुपस्थित रहता है?
(क) संवेदना
(ख) विभ्रम
(ग) भ्रम
(घ) प्रत्यक्षीकरण

प्रश्न 16.
प्रबल संवेगावस्था में प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया
(क) सर्वोत्तम होती है।
(ख) दोषपूर्ण होती है।
(ग) यथार्थ होती है
(घ) सम्पन्न हो ही नहीं सकती

उत्तर :

  1. (क) उद्दीपक
  2. (ग) संवेदना
  3. (ख) प्रत्यक्षीकरण
  4. (ग) रॉस
  5. (क) वुडवर्थ
  6. (ग) अन्तर्मुखता,
  7. (घ) गैस्टाल्टवाद
  8. (ग) दो से अधिक हो
  9. (ख) पृष्ठभूमि
  10. (ख) औच्छिादन का नियम
  11. (ग) अम
  12. (ग) भ्रम
  13. (ग) प्रम
  14. (घ) विषम
  15. (ख) विश्रम
  16. (ख) दोषपूर्ण होती है।

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UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 12 Statistics in Psychology

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 12 Statistics in Psychology (मनोविज्ञान में सांख्यिकीय गणना) are part of UP Board Solutions for Class 11 Psychology. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 12 Statistics in Psychology (मनोविज्ञान में सांख्यिकीय गणना).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 12
Chapter Name Statistics in Psychology
(मनोविज्ञान में सांख्यिकीय गणना)
Number of Questions Solved 66
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 12 Statistics in Psychology (मनोविज्ञान में सांख्यिकीय गणना)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सांख्यिकी का अर्थ स्पष्ट कीजिए। सांख्यिकी को परिभाषित कीजिए।
या
सांख्यिकी से आप क्या समझते हैं? इसे परिभाषित करते हुए बताइए कि आप किस परिभाषा को उपयुक्त समझते हैं और क्यों?
या
“सांख्यिकी गणना का विज्ञान है।’ इस कथन की व्याख्या करते हुए समझाइए कि आपकी दृष्टि में सांख्यिकी की सही परिभाषा क्या होनी चाहिए?

उत्तर :

सांख्यिकी का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of Statistics)

‘सांख्यिकी अंग्रेजी शब्द ‘स्टैटिस्टिक्स (Statistics) का हिन्दी रूपान्तर है। अंग्रेजी भाषा का स्टैटिस्टिक्स (Statistics) शब्द लैटिन भाषा के ‘स्टेटस (Status), इटैलियन भाषा के ‘स्टैटिस्टा (Statista) या जर्मन भाषा के स्टैटिस्टिक’ (Statistik) शब्द से उत्पन्न हुआ है। इन सभी शब्दों का अर्थ राज्य (State) होता है। इस प्रकार प्रारम्भ में सांख्यिकी का प्रयोग राज्य विज्ञान के रूप में किया जता था। वास्तविक रूप में सांख्यिकी’ शब्द का प्रयोग करने का श्रेय जर्मन विद्वान् गॉटफ्रायड एकेनॉल (Gottfried Achenwall) को जाता है। उन्होंने 1749 ई० में सांख्यिकी को मानव ज्ञान की एक विशिष्ट शाखा के रूप में प्रयोग किया।

सांख्यिकी’ (Statistics) शब्द का दो अर्थों में प्रयोग होता है—एक ‘एकवचन’ में तथा दूसरा ‘बहुवचन’ में। एकवचन के अर्थ में ‘सांख्यिकी’ का प्रयोग एक विज्ञान के रूप में किया जाता है। बहुवचन के अर्थ में ‘सांख्यिकी का प्रयोग आँकड़ों, संख्याओं या समंकों के रूप में लिया जाता है।

अब हम ‘सांख्यिकी’ (Statistics) शब्द की परिभाषा का उपर्युक्त दोनों ही अर्थों में अध्ययन करेंगे।

बहुवचन के रूप में सांख्यिकी का अर्थ एवं परिभाषाएँ

बहुवचन के रूप में ‘साख्यिकी’ शब्द का अर्थ समंकों या आँकड़ों से है जो किसी विशिष्ट क्षेत्र से सम्बन्धित संख्यात्मक तथ्य होते हैं। जनसंख्या, शिक्षा, कृषि, स्त्री-शिक्षा, प्रौढ़-शिक्षा आदि से सम्बन्धित आँकड़े बहुवचन के रूप में होते हैं।

(1) गॉटफ्रायड एकेनवाल के अनुसार, “राज्य से सम्बन्धित ऐतिहासिक और विवरणात्मक महत्त्वपूर्ण तथ्यों का संग्रह ‘समंक’ है।”

(2) डॉ० ए० एल० बाउले के अनुसार, “किसी अनुसन्धान से सम्बन्धित तथ्यों का अंकात्मक विवरण ‘समंक’ होते हैं, जिन्हें एक-दूसरे के सम्बन्ध में रखा जा सकता है।”

(3) होरेस सेक्राइस्ट के अनुसार, “सांख्यिकी से हमारा तात्पर्य तथ्यों के उन समूहों से है जो अनेक कारणों से पर्याप्त सीमा तक प्रभावित होते हैं, जो संख्यात्मक रूप से व्यक्त किये जाते हैं, जिनकी गणना या अनुमान शुद्धता के एक उचित स्तर तक की जाती है तथा जिन्हें किसी पूर्व निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए क्रमबद्ध ढंग से संगृहीत किया जाता है तथा जिन्हें एक-दूसरे से सम्बन्धित करके रखा जाता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं में होरेस सेक्राइस्ट की परिभाषा ही सर्वश्रेष्ठ है। इस परिभाषा में समंकों की सभी विशेषताओं पर पूर्ण प्रकाश डाला गया है।

एकवचन अर्थात् विज्ञान के रूप में सांख्यिकी की परिभाषाएँ

एकवचन के रूप में ‘सांख्यिकी’ शब्द का प्रयोग एक विज्ञान की दृष्टि से किया जाता है। सांख्यिकी विज्ञान की परिभाषाओं को तीन भागों में विभक्त किया गया है –

(क) संकुचित परिभाषाएँ

प्रारम्भ में सांख्यिकी को एक राज्य-विषय के रूप में जाना जाता था; अतः प्राचीन परिभाषाएँ सांख्यिकी के केवल कुछ पहलुओं पर प्रकाश डालती है जो कि निम्नलिखित हैं

(1) बॉडिंगटन (Boddington) के अनुसार, “सांख्यिकी अनुमानों और सम्भावनाओं का विज्ञान है।” बॉडिंगटन की परिभाषा में सांख्यिकी के क्षेत्र को संकुचित कर दिया गया है। इन्होंने इसे केवल विज्ञान माना है, न कि विज्ञान और कला दोनों।

(2) डॉ० बाउले ने सांख्यिकी की तीन परिभाषाएँ दी हैं –

(i) “सांख्यिकी गणना का विज्ञान है।”
उपर्युक्त परिभाषा में सांख्यिकीय अनुसन्धान की अनेक विधियों में से केवल गणना विधि को महत्त्व दिया गया है, किन्तु केवल गणना ही सांख्यिकीय नहीं है। विशाल संख्याओं का तो मात्र अनुमान लगाया जाता है, उनकी गणना नहीं की जाती; अतः यह परिभाषा अधूरी है।

(ii) “सांख्यिकी को सही रूप में औसतों को विज्ञान कहा जा सकता है।”
प्रस्तुत परिभाषा में औसत पर बल दिया गया है। सांख्यिकीय विश्लेषण में न केवल औसत (मध्य) का प्रयोग होता है अपितु अपकिरण, विषमता, सह-सम्बन्धन आदि का भी प्रयोग किया जाता है; अतः यह परिभाषा भी अधूरी है।

(iii) “सांख्यिकी, सामाजिक व्यवस्था को सम्पूर्ण मानकर माप का विज्ञान है।”
डॉ० बाउले ने इस परिभाषा में सांख्यिकी को केवल सामाजिक संस्थाओं एवं उनके क्रिया-व्यवहार के मापन का विज्ञान कहा है। इस प्रकार गैर सामाजिक क्रियाएँ सांख्यिकी के क्षेत्र से बाहर कर सांख्यिकी का क्षेत्र अति संकुचित बना दिया गया है।

(3) पर्सन और हार्लोज के शब्दों में, “सांख्यिकी तथ्यों के समूह को प्रयोग में लाने का विज्ञान और कला है।”

प्रस्तुत परिभाषा में विश्लेषण की विधियों को स्पष्ट नहीं किया गया है।

(ख) विस्तृत परिभाषाएँ

(1) क्रॉक्स्टन और काउडेन के अनुसार, “सांख्यिकी को संख्यात्मक, समंकों के एकत्रीकरण, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण तथा निर्वचन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”

(2) प्रो० सैलिगमैन के अनुसार, “सांख्यिकी वह विज्ञान है जो किसी भी अनुसन्धान (जाँच) के क्षेत्र पर प्रकाश डालने के लिए संख्यात्मक आँकड़ों के संग्रहण, प्रस्तुतीकरण, वर्गीकरण, तुलना तथा निर्वचन की रीतियों का प्रयोग करता है।”

(3) लाविट के अनुसार, “सांख्यिकी वह विज्ञान है जो संख्यात्मक तथ्यों के संग्रह, वर्गीकरण तथा सारणीयन से सम्बन्ध रखता है जिसे घटनाओं की व्याख्या, विवरण और तुलना के लिए प्रयुक्त किया जा सके।

उपर्युक्त परिभाषाओं की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  1. सांख्यिकी की प्रकृति को स्पष्ट करें
  2. सांख्यिकी के उद्देश्य को स्पष्ट करें
  3. सांख्यिकी के विषय-क्षेत्र को स्पष्ट करें तथा
  4. सांख्यिकी, विज्ञान और कला दोनों है।

(ग) उपयुक्त परिभाषा

सांख्यिकी की उपयुक्त परिभाषा वही हो सकती है जिसमें निम्नलिखित विशेषताएँ हों –

  1. सांख्यिकी की प्रकृति को स्पष्ट करे
  2. सांख्यिकी के उद्देश्य को स्ट करे
  3. सांख्यिकी के विषय-क्षेत्र को स्पष्ट करे तथा
  4. सांख्यिकी की विभिन्न रीतियों को स्पष्ट करे।

अन्त में हम कह सकते हैं कि सांख्यिकी, विज्ञान एवं कला दोनों ही है जिसमें पूर्व-निश्चित उद्देश्यों के अनुसार सर्वेक्षणों, अध्ययनों एवं प्रयोगों आदि के आधार पर प्राप्त आँकड़ों का संकलन, वर्गीकरण, विवरण, विश्लेषण, तुलना एवं विवेचन किया जाता है। आँकड़ों के विश्लेषण को उद्देश्यों, तथ्यों के पारस्परिक सम्बन्ध को ज्ञात करना, तथ्यों की विशेषताओं को वर्णन करना, तथ्यों के सम्बन्ध में अनुमान लगाना, निष्कर्ष निकालना और भविष्य कथन करना है।

प्रश्न 2.
सांख्यिकी की प्रकृति स्पष्ट कीजिए।
या
सांख्यिकी विज्ञान है अथवा कला। स्पष्ट कीजिए।
या
सांख्यिकी विज्ञान एवं कला दोनों ही है।” स्पष्ट कीजिए।
या
सांख्यिकी एक विज्ञान नहीं है, वह एक वैज्ञानिक विधि है।” आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
उत्तर :
सांख्यिकी की प्रकृति
(Nature of Statistics)

सांख्यिकी की प्रकृति या स्वभाव जानने के लिए यह देखना होगा कि सांख्यिकी विज्ञान है या कला अथवा दोनों है। अत: सर्वप्रथम हमें विज्ञान और कला का अर्थ जानना जरूरी है।

विज्ञान का अर्थ (Meaning of Science) – विज्ञान, ज्ञान के क्रमबद्ध समूह को कहते हैं। साधारणत: निम्नलिखित शर्तों को पूर्ण करने वाले ज्ञान (विषय) को विज्ञान कह सकते हैं –

  1. जिस ज्ञान का क्रमबद्ध अध्ययन (Systematic Study) किया जाता हो।
  2. वह ज्ञाप्त जिससे कारण और प्रभाव (Cause and Effect) के सम्बन्धों की जानकारी मिलती है।
  3. जिस ज्ञान के अध्ययन के लिए स्वयं के नियम होते हैं।
  4. जिसके नियम सार्वभौमिक (Universal) होते हैं।
  5. जिसके नियमों के द्वारा भविष्यवाणी या पूर्वानुमान (Forecasting) किये जा सके।
  6. जिसका अन्य विज्ञानों से सम्बन्ध होता है।

कला का अर्थ (Meaning of Art)-यदि विज्ञान ज्ञान है तो कला क्रिया है। किसी कार्य को करना ही कला कहलाता है। कला विज्ञान का व्यावहारिक या प्रयोगात्मक पहलू (Practical Aspect) है। किसी विज्ञान के विभिन्न नियमों तथा सिद्धान्तों का प्रयोग और क्रियान्वयन ही कला कहलाता है।

‘विज्ञान’ और ‘कला’ का अर्थ समझने के बाद अब हमें यह देखना है कि सांख्यिकी विज्ञान है। या कला है अथवा दोनों।

सांख्यिकी एक विज्ञान के रूप में
(Statistics as a Science)

सांख्यिकी एक विज्ञान है, क्योंकि इसमें विज्ञान के ऊपर वर्णित सभी लक्षण या विशेषताएँ पायी जाती हैं। सांख्यिकी ज्ञान का क्रमबद्ध अध्ययन करती है। अध्ययन के लिए इसके अपने स्वयं के सिद्धान्त और पद्धतियाँ हैं। इसके अपने नियम हैं; जैसे—सम्भावना का नियम, जड़ता का नियम, सांख्यिकीय नियमितता का नियम आदि। ये नियम सार्वभौमिक तथा सार्वकालिक हैं। इन नियमों के द्वारा अध्ययन करके पुर्वानुमान या भविष्यवाणी की जा सकती है। सांख्यिकी में ‘कारण’ और ‘प्रभाव (Cause and Effect) में सम्बन्ध स्थापित करने की क्षमता है। सांख्यिकी के नियमों द्वारा किसी ‘कारण’ के ‘परिणाम’ का विश्लेषण और पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि सांख्यिकी एक विज्ञान है। इसमें विज्ञान होने के सभी लक्षण पाये जाते हैं।

सांख्यिकी एक कला के रूप में
(Statistics as an ‘Art’)

सांख्यिकी कला भी है। यह विभिन्न समस्याओं के समाधान की विधि बताती है। सांख्यिकीय समंकों को एकत्रित करना, उनका उपयोग करना आदि कला के स्वरूप को व्यक्त करते हैं। विभिन्न वर्गों पर मूल्यवृद्धि का जो प्रभाव पड़ता है, उसकी जानकारी मूल्य-निर्देशकों (Price Index) द्वारा की जाती है। यह सांख्यिकी का कला पक्ष ही है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक समस्याओं का विभिन्न सांख्यिकीय विधियों से अध्ययन करके आँकड़ों को बिन्दुरेखाओं (Graphs), चित्रों (Diagrams) एवं तालिकाओं द्वारा प्रदर्शित करना भी कला ही है। सांख्यिकी की विषय-वस्तु (Subject-matter) में व्यावहारिक सांख्यिकी का समावेश है।

विभिन्न सांख्यिकीय तथ्यों को तुलनीय बनाना तथा उनसे निष्कर्ष निकालना सांख्यिकी के कला पक्ष को स्पष्ट करते हैं।

सांख्यिकी विज्ञान और कला दोनों है।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि सांख्यिकी न केवल विज्ञान है, अपितु कला भी है। यह सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक दोनों प्रकार का विज्ञान है। अन्त में टिप्पेट के शब्दों में कह सकते हैं, सांख्यिकी विज्ञान और कला दोनों है। यह विज्ञान इसलिए है क्योंकि इसकी रीतियाँ मौलिक रूप से क्रमबद्ध हैं तथा उनका सर्वत्र उपयोग होता है और कला इसलिए है कि इसकी रीतियों का सफल प्रयोग पर्याप्त सीमा तक सांख्यिकी की योग्यता, विशेष अनुभव तथा उसके प्रयोग-क्षेत्र; जैसे—अर्थशास्त्र के ज्ञान पर निर्भर करता है।”

अन्त में, सांख्यिकी एक विज्ञान और कला दोनों है जिसमें किसी अनुसन्धान क्षेत्र से सम्बन्धित सामूहिक संख्यात्मके तथ्यों के संकलन, प्रदर्शन, विश्लेषण तथा निर्वचन की रीतियों का विधिवत् । अध्ययन किया जाता है।

सांख्यिकी एक वैज्ञानिक विधि है
(Statistics is a Scientific Method)

क्रॉक्सटन और काउडेन का यह विचार है कि सांख्यिकी स्वयं एक विज्ञान नहीं है, अपितु अनुसन्धान करने की एक वैज्ञानिक विधि है, ज्ञान-प्राप्ति का एक तरीका है। उपर्युक्त शीर्षकों के अन्तर्गत हम सांख्यिकी की प्रकृति को स्पष्ट करते हुए उल्लेख कर चुके हैं कि सांख्यिकी एक विज्ञान भी है और कला भी, परन्तु क्रॉक्सटन और काउडेन का मत भिन्न है। वे इसे विज्ञान नहीं मानते वरन् एक वैज्ञानिक विधि (तरीका) मानते हैं, क्योंकि सभी विषयों में अनुसन्धान के लिए सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग भरपूर तरीके से किया जाता है। अनुसन्धानकर्ता अपने-अपने निष्कर्षों को सांख्यिकीय विधियों से प्रदर्शित करते हैं; प्राप्त आँकड़ों का वर्गीकरण व निर्वचन करते हैं। जीवन के सभी क्षेत्रों अर्थात् सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, मनोवैज्ञानिक एवं प्राकृतिक क्षेत्रों में सांख्यिकीय विधियों का उपयोग किया जाता है। यही कारण है कि वॉलिस और रॉबर्स कहते हैं, “सांख्यिकी स्वतन्त्र और मूलभूत ज्ञान का समूह नहीं है, अपितु ज्ञान-प्राप्ति की रीतियों का समूह है।”

इस तरह इन विद्वानों के अनुसार, सांख्यिकी अर्थशास्त्र, भौतिकशास्त्र या रसायनशास्त्र आदि की तरह स्वयं एक स्वतन्त्र विशुद्ध विज्ञान नहीं है, अपितु ज्ञान-प्राप्ति की वैज्ञानिक विधि है। परन्तु अधिकांश विशेषज्ञ सांख्यिकी को एक विज्ञान मानते हैं; क्योंकि विज्ञान की सभी विशेषताएँ और लक्षण इसमें पाये जाते हैं।

प्रश्न 3.
मनोविज्ञान में सांख्यिकी की उपयोगिता प्रतिपादित कीजिए।
उत्तर :
आधुनिक समय में मानव-जीवन की सभी समस्याओं के अध्ययन तथा समाधान में सांख्यिकी की उपयोगिता है और जीवन के प्रत्येक मोड़ पर यह पथ-प्रदर्शक की तरह कार्य करती है। यही कारण है कि विद्वान् सांख्यिकी को ‘मानव-कल्याण का अंकगणित’ कहते हैं। वर्तमान में मानवजीवन का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जिसमें सांख्यिकी का उपयोग एवं महत्त्व न हो। सांख्यिकी के बढ़ते हुए महत्त्व एवं उपयोगिता के कारण टिप्पट (Tippet) ने कहा है, “सांख्यिकी प्रत्येक व्यक्ति को ‘प्रभावित करती है तथा जीवन को अनेक बिन्दुओं पर स्पर्श करती है।”

सामाजिक विज्ञानों की भाँति, मनोविज्ञान में भी सांख्यिकी का उपयोग दिन-प्रतिदिन विस्तार ले। रहा है। मनोविज्ञान की समस्याओं को समझने तथा उनके समाधान के लिए और मनोविज्ञान से सम्बन्धित शोध-कार्यों में सांख्यिकी का उपयोग अपरिहार्य हो गया है। मनोविज्ञान में सांख्यिकी की उपयोगिता की निम्नलिखित प्रकार विवेचना कर सकते हैं

मनोविज्ञान में सांख्यिकी की उपयोगिता
(Utility of Statistics in Psychology)

मनोविज्ञान में सांख्यिकी की उपयोगिता निर्विवाद, सार्वभौमिक तथा सार्वकालिक है। प्रायः सभी मनोवैज्ञानिक अध्ययनों, प्रयोग एवं शोध कार्यों में सांख्यिकी की भारी माँग है। सच तो यह है कि सांख्यिकीय विधियों के अभाव में ये कार्य हो ही नहीं सकते। मनोविज्ञान के क्षेत्र में सांख्यिकी की उपयोगिता के निम्नलिखित कारण हैं –

(1) आँकड़ों को सरल एवं बोधगम्य बनाना – मनोवैज्ञानिक प्रयोग अक्सर एक विशाल समूह पर लागू किये जाते हैं जिनसे प्रदत्त या समंक आँकड़े प्राप्त होते हैं। इन आँकड़ों को सार्थक बनाने के लिए आवश्यक है कि इन्हें सुव्यवस्थित किया जाए आँकड़ों को सुव्यवस्थित बनाने में सांख्यिकी विधियाँ उपयोगी हैं। उदाहरण के लिए–आँकड़ों का आवृत्ति वितरण बनाकर उन्हें विभिन्न रेखाचित्रों द्वारा प्रदर्शित करने में सांख्यिकी का बहुत महत्त्व है। केन्द्रीय प्रवृत्ति के मापन की विधियों द्वारा आँकड़ों का वर्णन करने में भी सांख्यिकी उपयोगी है। इस भॉति, सांख्यिकी अव्यवस्थित एवं अर्थहीन आँकड़ों को सरल तथा बोधगम्य बनाती है।

(2) ऑकड़ों की सुस्पष्ट एवं संक्षिप्त प्रस्तुतीकरण – सांख्यिकी की मदद से मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से सम्बद्ध आंकड़ों का सरल, सुस्पष्ट एवं संक्षिप्त प्रस्तुतीकरण किया जाता है। वृत्तचित्र, स्तम्भ रेखाचित्र, आवृत्ति बहुभुज, स्तम्भाकृति, संचित प्रतिशत वक्र तथा संचित आवृत्ति वक्र आदि विधियों के द्वारा आँकड़ों की मुख्य विशेषताओं को स्पष्टता मिलती है। एक मनोवैज्ञानिक बालकों के एक बड़े समूह पर बुद्धि परीक्षण का प्रयोग करके मध्यमान तथा प्रामाणिक विचलन की गणना द्वारा सभी इकाइयों में सामूहिक रूप से मिलने वाले लक्षणों को खोज निकालता है। वह बालकों की औसत बुद्धि ज्ञात कर सकता है और यह पता भी लगा सकता है कि समूह सजातीय है अथवा विषमजातीय। पढ़ने वाले बालकों की योग्यताओं में विषमता अधिक होने पर कक्षा को कई हिस्सों में विभाजित कर बालकों की योग्यताओं के अनुसार पढ़ाया जा सकता है। इसी प्रकार आँकड़ों के वर्णन में सामान्य सम्भावना वक्र के प्रारम्भिक सिद्धान्तों का उपयोग भी किया जाता है।

(3) आँकड़ों को मात्रात्मक स्वरूप प्रदान करना – अन्य सामाजिक विज्ञानों की तरह से मनोविज्ञान में शोध कार्य के अन्तर्गत प्राप्त आँकड़े प्रायः गुणात्मक प्रकृति के होते हैं जिन्हें मात्रात्मक स्वरूप प्रदान करना होता है। यह कार्य सांख्यिकीय विधियों की सहायता से ही सम्भव है। बुद्धि, समायोजन, अन्तर्मुखता, बहिर्मुखता आदि से सम्बन्धित गुणात्मक आँकड़ों को मात्रात्मक रूप में परिवर्तित करने के लिए सांख्यिकी अत्यन्त उपयोगी है।

(4) घटना की यथार्थ व्याख्या – सांख्यिकीय विधियाँ किसी घटना की यथार्थ व्याख्या (Exact descriptions) करने में सक्षम हैं। इस व्याख्या को कोई भी प्रशिक्षित व्यक्ति बिना किसी सन्देह के ठीक-ठीक समझ सकता है। यदि कहा जाए कि कक्षा 12 के छात्र श्याम ने मनोविज्ञान में बहुत अच्छे अंक प्राप्त किये हैं तो इससे श्याम की मनोविज्ञान में योग्यता का सुनिश्चित ज्ञान नहीं होता; किन्तु यदि यह कहा जाए कि श्याम के मनोविज्ञान में प्राप्तांकों का प्रतिशत 95 है तो इससे स्पष्टतया ज्ञात होता है। कि 95% छात्रों के मनोविज्ञान में प्राप्तांक, श्याम के प्राप्तांकों से कम हैं। इस भाँति सांख्यिकी की सहायता से घटना की सही-सही व्याख्या की जा सकती है।

(5) आँकड़ों के सहसम्बन्ध का वर्णन – मनोविज्ञान से जुड़े अध्ययन एवं अनुसन्धान कार्यों में सांख्यिकीय विधियों की सहायता से दो या दो से अधिक चरों (variables) में सहसम्बन्ध ज्ञात किया जा सकता है। यदि कोई मनोवैज्ञानिक किसी कक्षा के बालकों की आयु और उनकी स्मरण-शविन के मध्य सम्बन्ध ज्ञात करना चाहे तो वह सहसम्बन्ध गुणांक को प्रयोग करता है। सहसम्बन्ध की विधियाँ आंशिक तथा बहुगुणी सहसम्बन्ध की गणना भी कर सकती हैं।

(6) तुलनात्मक अध्ययन – बॉडिंगटन का कथन है, “सांख्यिकी का निचोड़ गणना करना ही नहीं है अपितु तुलना करना भी है।’ मनोवैज्ञानिक दो या दो से अधिक समूहों की तुलना के लिए सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग कर सकते हैं। उदाहरण के लिए यदि यह ज्ञात करना हो कि कक्षा 11 के छात्रों को मनोविज्ञान पढ़ाने के लिए शिक्षण की पुस्तक-पाठन तथा व्याख्यान विधि में से कौन-सी विधि अच्छी है तो इसके लिए प्रयोग किया जा सकता है। समान योग्यता वाले छात्रों के दो समूह बनाकर एक समूह को पुस्तक-पाठन विधि द्वारा तथा दूसरे समूह को व्याख्यान विधि द्वारा पढ़ाया जाएगा। फिर दोनों समूहों की प्रामाणिक परीक्षा लेकर उनके प्राप्तांकों पर सांख्यिकीय विधियाँ लागू कर तुलनात्मक अध्ययन द्वारा यह बताना सम्भव है कि मनोविज्ञान शिक्षण की प्रभावशाली विधि कौन-सी

(7) कार्यकारण सम्बन्ध – सांख्यिकीय विधियों की सहायता से कोई भी मनोवैज्ञानिक किसी घटना को उत्पन्न करने वाले कारणों को ज्ञात कर सकता है। इसके लिए स्वतन्त्र चर का परतन्त्र चर पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करना होगा। यदि यह ज्ञात करना हो कि अमुक छात्र किसी विषय में क्यों फेल हो जाता है तो तत्सम्बन्धी कारणों को प्रयोगात्मक विधि (Experimental Method) द्वारा ज्ञात किया जा सकता है। उदाहरणार्थ- प्रयोग में सभी कारणों को स्थिर (Constant) करने के उपरान्त यह पाया जाए कि नियमित अध्ययन न करने वाले छात्र फेल हो जाते हैं तो सम्भवतया छात्र के उस विषय में फेल होने का कारण, नियमित अध्ययन का अभाव ही हो।

(8) मापन तथा मनोवैज्ञानिक परीक्षणों में सांख्यिकी का उपयोग – सांख्यिकीय विधियों के अभाव में मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का निर्माण, उनकी व्याख्या तथा विश्वसनीयता व वैधता की जाँच नहीं की जा सकती। बुद्धि-परीक्षण, निष्पत्ति परीक्षण, अभिवृत्ति परीक्षण तथा प्रवणता परीक्षण आदि के निर्माण में सांख्यिकीय विधियाँ अत्यधिक उपयोगी हैं। इसी प्रकार मनोवैज्ञानिक मापन में भी सांख्यिकी बहुत उपयोगी है।

(9) भविष्यकथन में सांख्यिकी का उपयोग – जब कोई मनोवैज्ञानिक मानव-व्यवहार से सम्बन्धित किसी घटना के सम्बन्ध में पूर्वानुमान लगाना चाहता है या भविष्यकथन करना चाहता है तो वह सांख्यिकी की प्रतीपगमन तथा भविष्यकथन से सम्बन्धित विधियों का उपयोग करता है। उदाहरण के लिए यदि कक्षा बारह के किसी छात्र की बुद्धि-लब्धि (I.Q.), हाईस्कूल में उसके प्राप्तांक तथा अध्ययन के घण्टों के आधार पर उसकी बोर्ड की परीक्षा में सफलता का पूर्वानुमान/भविष्यकथन करना हो तो प्रतीपगमन रेखाओं की मदद से ऐसा किया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक सांख्यिकीय विधियों की सहायता से यह भी ज्ञात किया जा सकता है कि उसका भविष्यकथन कितना त्रुटिपूर्ण है।

(10) शैक्षिक समस्याओं का निदान – सांख्यिकीय विधियाँ शैक्षिक समस्याओं के निराकरण में भी विशिष्ट भूमिका निभाती हैं। छात्रों के चयन (Selection), उनकी पदोन्नति (Promotion) तथा शैक्षिक उपलब्धियों (Educational Achievements) के विषय में भविष्यकथन करने में भी सांख्यिकीय विधियाँ उपयोगी हैं। छात्रों के लिए परीक्षण तैयार करने व उनके मूल्यांकन में सांख्यिकी की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इसी प्रकार छात्रों के मार्गदर्शन में सांख्यिकीय विधियाँ अत्यन्त उपयोगी सिद्ध

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर निष्कर्ष निकलता है कि मनोविज्ञान में सांख्यिकी की महती उपयोगिता है। मनोवैज्ञानिक समस्याओं से सम्बन्धित आकंड़ों के संकलन, वर्गीकरण व्याख्या तथा तुलना में ही नहीं बल्कि उनसे सम्बद्ध पूर्वानुमान व भविष्यकथन में भी सांख्यिकी का बहुत उपयोग है।

प्रश्न 4.
सांख्यिकी की सीमाओं की विवेचना कीजिए।
या
“सांख्यिकीय विधियाँ अयोग्य व्यक्तियों के हाथों में खतरनाक औजार हो सकती है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
उत्तर :
सांख्यिकी की सीमाएँ
(Limitations of Statistics)

सांख्यिकी एक लाभप्रद विज्ञान है। यह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को स्पर्श करता है। सामाजिक विज्ञान शिक्षा तथा मनोविज्ञान में सांख्यिकी का महत्त्वपूर्ण योगदान है। कृषि, नियोजन, अर्थशास्त्र, राजस्व, राजनीतिशास्त्र आदि में भी इसका भरपूर प्रयोग होता है, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि सांख्यिकी की कोई सीमाएँ (कमियाँ) ही नहीं हैं। वास्तविकता यह है कि सांख्यिकी जितना लाभदायक विज्ञान है, उतना ही यह ख़तरनाक भी है। इसका प्रयोग बहुत ही सोच-विचारकर, सावधानीपूर्वक तथा विशेषज्ञों द्वारा किया जाना चाहिए। यदि सांख्यिकी का प्रयोग अकुशल व्यक्तियों द्वारा किया जाता है तो यह बहुत हानिप्रद सिद्ध हो सकता है। इसकी सीमाओं पर सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिए। सांख्यिकी की प्रमुख सीमाएँ इस प्रकार हैं –

(1) सांख्यिकी केवल संख्यात्मक तथ्यों का अध्ययन करती है, न कि गुणात्मक तथ्यों का – सांख्यिकी की यह महत्त्वपूर्ण कमजोरी है। यह मानव-जीवन के केवल उसी पहलू का अध्ययन करती है जिसे संख्याओं द्वारा प्रस्तुत किया जा सके; जैसे-ऊँचाई, आयु, भार तथा आय आदि। जीवन के गुणात्मक पक्ष; जैसे—सुन्दरता, भावना, दुष्टता, बुद्धिमत्ता, कुटिलता आदि का अध्ययन सांख्यिकी द्वारा नहीं कर सकते हैं। गुणात्मक पहलू को संख्याओं में व्यक्त करके अप्रत्यक्ष रूप में अध्ययन कर सकते हैं। बुद्धिमत्ता का माप अनुमानित संख्याओं द्वारा व्यक्त कर सकते हैं, प्रत्यक्ष रूप में नहीं।

(2) सांख्यिकीय समंक सजातीय और एकरूप होने चाहिए – सांख्यिकी में विजातीय तथ्यों का अध्ययन नहीं किया जा सकता, सांख्यिकीय विधियों द्वारा समंकों की तुलना तभी सम्भव है जबकि वे सजातीय हों तथा उनमें एकरूपता पायी जाये।

(3) सांख्यिकी समूह का अध्ययन करती है, न कि व्यक्ति को प्रो० नीजवैगर के अनुसार, सांख्यिकी के निष्कर्ष समूह के सामूहिक व्यवहार का अनुमान करने में सहायक होते हैं, उस समूह की व्यक्तिगत इकाइयों फ़ा नहीं।” सांख्यिकी व्यक्तिगत इकाई की विशेषता पर ध्यान न देकर सामूहिक विशेषता या औसत पर ध्यान देती है। सांख्यिकी के परिणाम समूह से जुड़े होते हैं, न कि व्यक्ति से। किसी कक्षा के प्राप्तांकों का औसत यह नहीं बताता कि अमुक विद्यार्थी के प्राप्तांक उतने ही होंगे।

(4) बिना सन्दर्भ के सांख्यिकी के परिणाम असत्य और भ्रामक होते हैं – समस्या के बिना सन्दर्भ और पूर्ण जानकारी के सांख्यिकीय परिणाम भ्रामक और असत्य मालूम होते हैं। कुछ समंकों से प्राप्त निष्कर्ष किसी भी विषय पर तब तक लागू नहीं किये जा सकते जब तक कि परिस्थिति, सन्दर्भ व समस्या की पूर्ण जानकारी न हो।

(5) सांख्यिकी के प्रयोग के लिए सांख्यिकीय विधियों की जानकारी आवश्यक – सांख्यिकी विज्ञान की यह एक गम्भीर सीमा है कि इसके सही उपयोग करने के लिए सांख्यिकीय विधियों की पूर्ण व सही जानकारी अति आवश्यक है। जो व्यक्ति सांख्यिकीय विधियों के प्रयोग की पूर्ण जानकारी नहीं रखते हैं, उनके द्वारा इनके प्रयोग से लाभ के स्थान पर नुकसान ही होता है। यूल और केण्डाल ने तो यहाँ तक कहा है, “अयोग्य व्यक्तियों के हाथों में सांख्यिकीय विधियाँ खतरनाक औजार हैं।”

(6) सांख्यिकी के परिणाम दीर्घकाल में तथा औसत रूप में सही होते हैं – प्राकृतिक विज्ञानों; जैसे-रसायनशास्त्र, भौतिकशास्त्र आदि के नियम और परिणाम सार्वभौमिक तथा सार्वकालिक होते हैं। ये अल्पकाल तथा दीर्घकाल सभी कालों में लागू होते हैं, परन्तु सांख्यिकी के परिणाम केवले दीर्घकाल में ही सही निकलते हैं तथा वे एक औसत प्रवृत्ति के परिचायक होते हैं। उनमें छोटे-छोटे उच्चावचन एवं कमियाँ विद्यमान रहती हैं। सांखियकी के नियम सम्भावना सिद्धान्त पर आधारित होते हैं। जिसके अनुसार यदि किसी सिक्के को 20 बार उछालें तो सम्भावना यह है कि 10 बार चित (Head) तथा 10 बार पट (Tail) आएगा; किन्तु ‘यथार्थ में हो सकता है 14 बार चित व 6 बार पट आये।

(7) सांख्यिकी एक साधन है, साध्य नहीं – सांख्यिकी का प्रमुख कार्य समस्या से सम्बन्धित आँकड़े एकत्रित कर उन्हें वर्गीकृत करके सारणीयन तथा रेखाचित्रों द्वारा प्रस्तुत करना है। बाउले के मत में सांख्यिकी का काम परिणाम या निष्कर्ष निकालना नहीं है। यदि सांख्यिकी परिणाम निकालेगी। भी, तो वे निष्पक्ष नहीं होंगे। परन्तु कुछ दूसरे सांख्यिकीवेत्ता यह मानते हैं कि बिना परिणाम के सांख्यिकी अनुपयोगी होगी; अतः निष्कर्ष रूप में यह कह सकते हैं कि समंकों के एकत्रीकरण में पूर्ण सावधानी रखकर तटस्थ रूप में उनका प्रयोग करना चाहिए। अनुसन्धानकर्ता के तटस्थ न रहने पर। परिणाम गलत और हानिकारक हो सकते हैं; अतः सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग साधन के रूप में बुद्धिमानीपूर्वक करना चाहिए।

(8) सांख्यिकीय विधि अनुसन्धान की एकमात्र विधि नहीं है – समस्याओं के अनुसन्धान की अनेक विधियाँ हैं, सांख्यिकीय विधि उन अनेक विधियों में से एक हैं। अत: सांख्यिकी से प्राप्त परिणामों को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि अनुसन्धान की दूसरी विधियों से परिणामों की पुनः जाँच न कर ली जाए।

अंत में यह कह सकते हैं कि सांख्यिकीय विधियों के प्रयोग में पूर्ण सावधानी रखनी चाहिए। उपर्युक्त सीमाओं को ध्यान में रखकर निष्कर्ष निकालने चाहिए, अन्यथा इसके परिणाम भ्रामक और हानिकारक हो सकते हैं। यही कारण है कि यूल और केण्डाल यह कहने पर मजबूर हुए हैं कि सांख्यिकीय गीतियाँ अयोग्य व्यक्तियों के हाथों में खतरनाक औजार हो सकते हैं।

प्रश्न 5.
सांख्यिकीय श्रेणियों (Statistical series) से आप क्या समझते हैं। इनके विभिन्न प्रकारों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
सांख्यिकीय श्रेणियाँ
(Statistical Series)

संकलिन आँकड़ों को जब एक निश्चित क्रम में लिखा जाता है तो इस भाँति बनी हुई पदमाला या श्रृंखला को सांख्यिकीय श्रेणी (Statistical Series) कहा जाता है। सांख्यिकीय श्रेणी में हम आँकड़ों को एक क्रमबद्ध ढंग से प्रदर्शित करते हैं। कॉनर (Conner) ने सांख्यिकीय श्रेणी की परिभाषा इस प्रकार दी है, “जब दो चल-राशियों के मूल्यों को साथ-साथ इस भाँति व्यवस्थित किया जाए कि एक का मापनीय अन्तरे दूसरे के मापनीय अन्तर का सहगामी हो तो इस प्रकार से प्राप्त पदमाला को सांख्यिकीय श्रेणी कहते हैं।”

सांख्यिकीय श्रेणियों के प्रकार
(Types of Statistical Series)

सांख्यिकीय श्रेणियाँ कई प्रकार की होती हैं। मुख्यतः सांख्यिकीय श्रेणियों की रचना तीन प्रकार से की जा सकती है –

  1. व्यक्तिगत श्रेणी
  2. असतत या खण्डित या विच्छिन्न श्रेणी
  3. सतत् या अखण्डित या अविच्छिन्न श्रेणी।

(1) व्यक्तिगत श्रेणी (Individual Series) – व्यक्तिगत श्रेणी वह है जिसमें समूह की प्रत्येक इकाई का मान अलग-अलग दिया जाता है। इस श्रेणी में प्रत्येक पद स्वतन्त्र होता है। व्यक्तिगत श्रेणी का निर्माण उस समय किया जाता है कि जब संकलित आँकड़ों से समूह अथवा वर्ग बनाने सम्भव न हों अथवा हर एक पद को महत्त्व देना हो। इन श्रेणियों की रचना आरोही (Ascending) तथा अवरोही (Descending) दोनों ही क्रमों में की जा सकती है। उदाहरण के लिए निम्नलिखित तालिका में कक्षा XI के दस छात्रों के मनोविज्ञान में प्राप्तांक आरोही तथा अवरोही क्रम में प्रस्तुत किये गये हैं –

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 12 Statistics in Psychology 1

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 12 Statistics in Psychology 2

(2) असतत या खण्डित या विच्छिन्न श्रेणी (Discrete or Discontinuous Series) – जिस श्रेणी में प्रत्येक मान अलग-अलग नहीं लिखा जाता, अपितु प्रत्येक मान के समक्ष उसकी आवृत्ति लिख दी जाती है, उसे असतत/खण्डित या विच्छिन्न श्रेणी कहा जाता है। यह श्रेणी वास्तविक अन्तर को प्रकट करती है। उदाहरण के लिए—कक्षा XI के 20 छात्रों के मनोविज्ञान में प्राप्तांक निम्नलिखित हैं –
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 12 Statistics in Psychology 3

(3) सतत या अखण्डित या अविच्छिन्न श्रेणी (Continuous Series) – सतत श्रेणी में इकाइयों के मानों को वर्गान्तरों (Class-intervals) के रूप में व्यवस्थित किया जाता है। इस प्रकार की श्रेणी में ऐसे मान आते हैं जिनका सूक्ष्म विभाजन सम्भव है; जैसे—समय को घण्टा-मिनट-सेकण्ड आदि में विभाजित किया जा सकता है। बुद्धि, भार, ऊँचाई व लम्बाई आदि को भी सरलता से मापा और उपविभाजित किया जा सकता है। मनोविज्ञान में जिन चल-राशियों का अध्ययन किया जाता है, वे अधिकतर इसी श्रेणी के अन्तर्गत आती हैं। कक्ष X के 100 छात्रों के मनोविज्ञान के प्राप्तांकों का विवरण निम्नलिखित है –
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 12 Statistics in Psychology 4

श्रेणियों की रचना में निम्नलिखित बिन्दुओं पर ध्यान देना आवश्यक है –

(i) व्यक्तिगत श्रेणी वस्तुतः असतत या खण्डित श्रेणी का एक विशिष्ट रूप है। यदि असतत श्रेणी में प्रत्येक प्राप्तांक की आवृत्ति 1 हो तो वह व्यक्तिगत श्रेणी का रूप धारण कर लेती है।
(ii) यदि सतत श्रेणी में प्रत्येक वर्गान्तर के मध्य बिन्दु पर उनकी सम्पूर्ण आवृत्तियाँ केन्द्रित मान ली जाये तो यह श्रेणी असतत या खण्डित श्रेणी का रूप धारण कर लेती है।

प्रश्न 6.
ऑकड़ों के व्यवस्थापन से क्या आशय है? आँकड़ों के व्यवस्थापन के मुख्य प्रकारों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
आँकड़ों का व्यवस्थापन या आवृत्ति विवरण
(Organization of the Data or Frequency Distribution)

मनोविज्ञान के क्षेत्र में विभिन्न समस्याओं को लेकर अध्ययन, प्रयोग एवं अनुसन्धान कार्य किये जाते हैं। ये प्रयोग या अनुसन्धान कार्य एक विशाल समूह पर किये जाते हैं। जिनके फलस्वरूप हमें आँकड़े प्राप्त होते हैं। ये आँकड़े हमारे लिए तब तक निरर्थक हैं जब तक कि उन्हें व्यवस्थित रूप प्रदान नहीं कर दिया जाता। इस भाँति, आँकड़ों को सार्थक एवं उपयोगी बनाने के लिए व्यवस्थापन या आवृत्ति वितरण का विशेष महत्त्व है।

संगृहीत आँकड़ों से सुगमतापूर्वक निष्कर्ष निकालने हेतु इनका व्यवस्थापन (Organization) किया जाता है। जिसमें आँकड़ों का वर्गीकरण तथा सारणीयन सम्मिलित है। संगृहीत आँकड़ों को सर्गों तथा सारणियों के रूप में निरूपित करना ही आँकड़ों का व्यवस्थापन या आवृत्ति वितरण है। मुख्यत: व्यवस्थापन की तीन पद्धतियाँ हैं –

  1. वर्गीकरण (Classification)
  2. सारणीयन (Tabulation) तथा
  3. रेखाचित्र प्रस्तुतीकरण (Graphical Representation)।

आँकड़ों का वर्गीकरण समानता या सजातीयता के आधार पर किया जाता है; जैसे–सामाजिक स्तर या धर्म के आधार पर वर्गीकरण। आँकड़ों का वर्गीकरण करने के बाद उनके आपसी सम्बन्ध तथा प्रकृति का ज्ञान प्राप्त करने के लिए उनका सारणीयन किया जाता है जिसे अधिक स्पष्ट रूप से समझने के लिए रेखाचित्रों के माध्यम से आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण किया जाता है।

मूल आँकड़ों के व्यवस्थापन के प्रकार
(Types of Basic Datas Distribution)

मनोवैज्ञानिक अध्ययनों या अनुसन्धान कार्यों में मूल आँकड़े अधिक संख्या में तथा विस्तृत (फैले हुए) होते हैं जिन्हें व्यवस्थापन की प्रक्रिया द्वारा सुस्पष्ट एवं सार्थक बनाया जाता है। आँकड़ों के व्यवस्थापन के प्रमुख तीन प्रकार हैं –

  1. साधारण व्यवस्था
  2. आवृत्ति व्यवस्था तथा
  3. आवृत्ति वितरण।

(1) साधारण व्यवस्था (Simple Array) – साधारण व्यवस्था आँकड़ों को व्यवस्थित करने की सबसे सरल विधि है जिसमें आँकड़ों को आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित किया जाता है। आँकड़ों को इस प्रकार विन्यसित करने से उनकी प्रकृति स्पष्ट हो जाती है। आँकड़ों को साधारण व्यवस्था में उस समय व्यवस्थित किया जाना चाहिए जबकि आँकड़ों की संख्या कम हो। इस व्यवस्था की सबसे बड़ी परिसीमा यह है कि इससे अन्य सांख्यिकी गणनाओं में सहायता नहीं मिलती है।

उदाहरण 1 – कक्षा XI के 10 छात्रों के मनोविज्ञान में प्राप्तांक (पूर्णाक 50) निम्न प्रकार हैं –
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अब इन्हें साधारण व्यवस्था के अन्तर्गत आरोही व अवरोही क्रम में इस प्रकार प्रदर्शित किया जाएगा –
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(2) आवृत्ति व्यवस्था (Frequency Array) – आँकड़ों की प्रकृति अधिक स्पष्ट करने के लिए उनका व्यवस्थापन आवृत्तियों के आधार पर किया जाता है। साधारण व्यवस्था से आवृत्ति व्यवस्था अधिक अच्छी समझी जाती है, किन्तु इसे तभी प्रयोग किया जाना चाहिए जबकि आँकड़ों की संख्या कम हो तथा उनकी आवृत्ति बार-बार हुई हो।

उदाहरण 2 – नीचे की तालिका में एक कक्षा के 100 विद्यार्थियों को बुद्धि-लब्धि के आधार पर विभाजित किया गया है –
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(3) आवृत्ति वितरण (Frequency Distribution) – आवृत्ति वितरण एक ऐसी व्यवस्था है। जिसमें पदों (चरों) के मूल्य तथा उनकी आवृत्तियाँ दी हुई होती हैं। आवृत्ति वितरण के दो प्रमुख तत्त्व हैं –
(i) पद (चर) तथा (ii) आवृत्तियाँ।

(i) पद (Variable) – पद या चर वह संख्यात्मक तथ्य है जो मात्रा या आकार में परिवर्तित होता रहता है; जैसे—आयु, लम्बाई, भार, आय या प्राप्तांक आदि। पद या चर दो प्रकार के हैं(अ) सतत चर तथा (ब) असतत या खण्डित चर। पद या चर को ‘x’ से प्रदर्शित करते हैं।

(ii) आवृत्तियाँ (Frequencies) – किसी प्राप्तांक के बार-बार आने की प्रवृत्ति को आवृत्ति (Frequency) कहते हैं। इकाइयों (व्यक्तियों) की वह संख्या जो किसी वर्ग-विशेष में आती है, उस वर्ग की आवृत्ति या बारम्बारता कहलाती है। इस प्रकार आवृत्तियाँ वह संख्या है जो किसी वर्ग-विशेष के पदों (मूल्यों) को ग्रहण करती है। कोई प्राप्तांक/पद या संख्या यदि पाँच बार आती है तो उस प्राप्तांक की आवृत्ति ‘5’ होगी। आवृत्ति को ‘f’ से प्रकट करते हैं। प्रत्येक वर्ग के अन्तर्गत आने वाले पदों की संख्या उस वर्ग की आवृत्ति कहलाती है।

इन आवृत्तियों को सुविधानुसार भिन्न-भिन्न वर्गों में वितरित अथवा प्रदर्शित करने की विधि आवृत्ति वितरण कहलाती है।

सरल आवृत्ति वितरण
(Simple Frequency Distribution)

सरल आवृत्ति वितरण में सर्वाधिक तथा सबसे कम प्राप्तांकों तथा उनके मध्य जितने भी प्राप्तांक आ सकते हैं उन सभी को आकार के अनुसार लिखा जाता है। फिर हर एक प्राप्तांक के सामने वह अंक लिखा जाता है जितनी बार वह प्राप्तांक दोहराया गया है। यही उस पद की आवृत्ति है।
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ये सभी प्राप्तांक अव्यवस्थित, अपरिष्कृत तथा अवर्गीकृत हैं जिन्हें न तो मस्तिष्क में अंकित रखा जा सकता है और न ही इन्हें देखकर मनोविज्ञान की कक्षा के बारे में कोई सुनिश्चित धारणा ही बनायी जा सकती है। हम इन्हें पहले सरल आवृत्ति वितरण के रूप में प्रदर्शित करते हैं –
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सरल आवृत्ति वितरण से प्रत्येक प्राप्तांक की आवृत्ति ज्ञात हो जाती है। प्राप्तांकों का वितरण अर्थात् अधिकांश विद्यार्थियों ने कम अंक प्राप्त किये हैं या उच्च अंक तथा सामान्य अंक पाने वाले विद्यार्थी कितने हैं, इन सभी बातों का हमें आसानी से ज्ञात हो जाता हैं। किन्तु सरल आवृत्ति वितरण बहुत अधिक स्थान घेरता है; अतः हम आवृत्ति वितरण बनाने की वह प्रक्रिया अपनाएँगे जो कुछ क्रुमबद्ध सोपानों पर आधारित होती है। आवृत्ति वितरण तालिका की यह प्रक्रिया निम्नलिखित है –

आवृत्ति वितरण तालिका निर्माण की प्रक्रिया
(Procedure of Preparing a Frequency Distribution Table)

आवृत्ति वितरण तालिका निर्माण की प्रक्रिया के पाँच प्रमुख सोपान हैं जिनके आधार पर आवृत्ति वितरण तालिका आसानी से निर्मित हो सकती है। ये सोपान निम्न प्रकार वर्णित हैं—

(1) प्रसार क्षेत्र (Range) – आवृत्ति वितरण तालिका बनाने के लिए सबसे पहले प्रसार क्षेत्र ज्ञात कर लेना चाहिए। आँकड़ों में उच्चतम अंक (Highest Score) तथा न्यूनतम अंक (Lowest Score) के अन्तर को प्रसार क्षेत्र कहते हैं।

प्रसार क्षेत्र = उच्चतम अंक – न्यूनतम अंक
Range = Highest Score – Lowest Score or Range =H.S. – L.S.
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(2) वर्गान्तर (Class-anterval : C.I.) – प्रसार क्षेत्र ज्ञात करने के उपरान्त वर्गान्तर की संख्या ज्ञात की जाती है जो साधारणत: 5 से लेकर 20 तक हो सकती है। कुछ विद्वानों की राय में यह 10 से कम तथा 20 से अधिक नहीं होनी चाहिए। परिणामों की शुद्धता का ध्यान रखते हुए वर्गान्तरों की संख्या 10 से 15 तक रखना उपयुक्त है।

वर्गान्तरों की संख्या ज्ञात करने के लिए आवश्यक है कि वर्गान्तर का आकार (Size of C.I.) पता लगाया जाये। वर्गान्तर का आकार सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित सूत्र प्रयुक्त होता है –
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गणना सम्बन्धी कार्य (जोड़ना व घटाना ओदि) में सुविधा की दृष्टि से वर्गान्तर का आकार ऐसा चुना जाये जो 5 से पूरी तरह विभाजित हो जाये। प्रश्न हल करते समय प्रसार क्षेत्र को सिर्फ 5 से भाग देकर वर्गान्तर का आकार ज्ञात कर लेना चाहिए। यदि प्रश्न में वर्गान्तर का आकार दिया हुआ हो तो फिर आकार ज्ञात करने की कोई आवश्यकता नहीं होती।

(3) वर्गान्तरों का निर्माण (Construction of Class-intervals) – वर्गान्तरों की संख्या तथा उनका आकार ज्ञात करने के बाद वर्गान्तरों का निर्माण किया जाता है। प्रथम वर्गान्तर बनाते समय निम्नतम अंक सर्वप्रथम लिखा जाता है, फिर निम्नतम अंक में वर्गान्तर के आकार को जोड़कर उसके सामने लिख देते हैं। उदाहरण (3) में निम्नतम अंक 30 है तथा वर्गान्तर का आकार 5 है। अत: पहले 30 लिखा जाएगा, फ़िर 30 में 5 जोड़कर (30 + 5) यानि 35 लिखा जायेगा। इस तरह से पहला वर्गान्तर 30-35 बना।

इसके आगे, पहले वर्गान्तर 30-35 की ऊपरी सीमा दूसरे वर्गान्तर की निम्न सीमा बन जायेगी तथा 35 में 5 जोड़कर (35+ 5) यानी 40, यह दूसरे वर्गान्तर की ऊपरी सीमा होगी। इस भाँति, दूसरा वर्गान्तर होगा 30-40। तीसरे वर्गान्तर की निम्न सीमा 40 होगी जिसमें वर्गान्तर का आकार 5 जोड़ने पर 40 + 5 = 45, इसकी ऊपरी सीमा बनेगी और तीसरा वर्गान्तर 40-50 होगा। वर्गान्तर बनाने का यह क्रम तब तक चलता जायेगा जब तक कि उच्चतम अंक वर्गान्तर में शामिल न हो जाये।

नोट – वर्गान्तरों का निर्माण करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

(i) अक्सर प्राप्तांकों के न्यूनतम अंक से ही वर्गान्तर बनाना शुरू करते हैं; जैसे—उपर्युक्त उदाहरण में न्यूनतम अंक 30 से वर्गान्तर बनाना प्रारम्भ किया गया है।

(ii) गणना को सुविधाजनक बनाने की दृष्टि से ‘वर्गान्तरों को न्यूनतम अंक से भी छोटा या कम अंक से शुरू किया जा सकता है। उदाहरणार्थ-यदि न्यूनतम अंक 26 है और वर्गान्तर का आकार 5 है तो 26-31 वर्गान्तर बन जाता है और यह 25-30 वर्गान्तर भी बन सकता है। वैसे वर्गान्तर 25-30 गणना की दृष्टि से सरल व सुविधाजनक कहा जाएगा।

(iii) यदि निम्नतम प्राप्तांक 5 से कम है तथा आकार 5 या 5 से ज्यादा है तो प्रथम वर्गान्तर ‘शून्य’ से प्रारम्भ करना चाहिए। यदि प्रथम वर्गान्तर ‘शून्य से प्रारम्भ है और वर्गान्तर का आकार 5 है। तो प्रथम वर्गान्तर 0-4 होगा। यहाँ यह स्पष्ट करना उचित है कि 0-4 वर्गान्तर में 5 प्राप्तांक हैं। यानि 0, 1, 2, 3 व 4। इसलिए इस समूह में 0 से लेकर 4 तक अंक पाने वाले सभी व्यक्ति शामिल हो जाएँगे। इस क्रम में दूसरा वर्गान्तर 5 से शुरू होगा तथा 9 पर समाप्त हो जाएगा यानि यही वर्गान्तर 5-9 होगा इसमें भी 5 प्राप्तांक शामिल हैं – 5, 6, 7, 8 व 9।

(iv) वर्गान्तरों को आरोही क्रम (Ascending Order) तथा अवरोही क्रम (Descending Order) दोनों में से किसी भी क्रम में लिखा जा सकता है।

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आवृत्ति तालिका का निर्माण करते समय अव्यवस्थित आँकड़ों के पहले प्राप्तांक को पढ़कर अनुमान लगायें कि यह किस वर्गान्तर में आता है। जिस वर्गान्तर में यह अंक आता हो, उसके सामने एक अंकदण्ड लगा देना चाहिए। अब दूसरा प्राप्तांक पढ़कर सम्बन्धित वर्गान्तर में उसके सामने एक अंकदण्ड लगा दें। इसी तरह से एक के बाद एक सभी प्राप्तांकों को पढ़कर अंकदण्ड लगा दिये जाते हैं। जैसे—उदाहरण (3) में पहला प्राप्तांक 42 है जिसके लिए 40-45 वर्गान्तर के सामने एक अंकदण्ड लगा देंगे। अभिप्राय यह है कि यही क्रिया सभी प्राप्तांकों के लिए दोहराई जाएगी।

(5) अंकदण्डों का आवृत्तियों में बदलना (Changing Tallies in Frequencies)- वर्गान्तरों के सम्मुख आवृत्तियों के अंकदण्डों द्वारा प्रदर्शन के बाद अंकदण्डों को आवृत्तियों में बदलकर लिख दिया जाता है। इसके लिए अंकदण्डों को जोड़कर योग को आवृत्ति (Frequencies) वाले खाने में लिख देते हैं। उदाहरण (3) के 55-60 वर्गान्तर में UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 12 Statistics in Psychology 13 छह अंकदण्ड हैं; अत: इस वर्गान्तर के सामने आवृत्ति वाले खाने में 6 लिखा गया है। इसी प्रकार से सभी वर्गान्तरों के सामने के अंकदण्डों को आवृत्तियों में बदल दिया जाता है। यदि आवृत्ति वितरण तालिका में अंकदण्डों को लगाने में कोई त्रुटि नहीं है तो आवृत्तियों (f) का योगफल व्यक्तियों की कुल संख्या (N) के बराबर होता है।

अब हम उदाहरण (3) के अन्तर्गत सरल आवृत्ति वितरण के आधार पर आरोही तथा अवरोही क्रम में आवृत्ति वितरण तालिकाओं को निर्माण करेंगे।

आवृत्ति वितरण तालिका
(Frequency Distribution Table)
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उदाहरण 4 – कक्षा XI के 50 परीक्षार्थियों ने मनोविज्ञान में नीचे दिये गए अंक प्राप्त किये। इन प्राप्तांकों का आवृत्ति वितरण तैयार कीजिए –
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उदाहरण 5 – निम्नलिखित प्राप्तांकों से उचित वर्गान्तरलेकर आवृत्ति-वितरण तालिका बनाइए –
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उदाहरण 6 – कक्षा x के 50 छात्रों के भार (पौण्ड्स में) ज्ञात किये गये। इन भारों से उचित वर्गान्तर द्वारा आवृत्ति वितरण तालिका तैयार कीजिए –
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संचयी आवृत्तियाँ ज्ञात करना।
(To Find out the Cumulative Frequencies)

किसी आवृत्ति वितरण तालिका में संचयी आवृत्तियाँ (Cumulative Frequencies : C.E:) ज्ञात करने के लिए प्रत्येक वर्ग के सम्मुख उस वर्ग की आवृत्तियों तथा उस वर्ग के नीचे वाले कुल वर्गों की आवृत्तियों का योग लिख दिया जाता है।

उदाहरण 7 – एक स्कूल के 32 शिक्षकों की आयु (वर्षों में दर्शाने वाली संचयी आवृत्तियाँ निम्न प्रकार सारणीबद्ध हैं –
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उपर्युक्त उदाहरण में 20-25 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्ति 4 + 0 = 4 है; क्योंकि इस वर्गान्तर से नीचे आवृत्तियों की संख्या ‘शून्य’ (अर्थात् कुछ भी नहीं) है। इसी भाँति

25 – 30 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्तियाँ = 4 + 8 = 12
30 – 35 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्तियाँ = 7 + 12 = 19
35 – 40 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्तियाँ = 4 + 19 = 23
40 – 45 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्तियाँ = 4 + 23 = 27
45 – 50 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्तियाँ = 2 + 27 = 29
50 – 55 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्तियाँ = 2 + 29 = 31
55 – 60 वाले वर्गान्तर की संचयी आवृत्तियाँ = 1 + 31 = 32

प्राप्तांकों को समूहबद्ध करने की विधियाँ
(Methods of Grouping Scores)

प्राप्तांकों को समूहबद्ध करने की तीन विधियाँ हैं –

  1. समावेशी विधि (Inclusive Method)
  2. शुद्ध वर्गीकृत श्रृंखला (Pure Classification Series)
  3. अपवर्जी विधि (Exclusive Method)

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(1) समावेशी विधि (Inclusive Method) – समावेशी विधि में वर्गान्तर का अन्तिम अंक वर्गान्तर में ही शामिल है। उदाहरणार्थ-40-44 का अर्थ है कि 40 से लेकर 44 तक के प्राप्तांक इसी वर्ग में सम्मिलित हैं। इसी प्रकार 45-49 का अर्थ है कि 45 से लेकर 49 तक के सभी प्राप्तांक इस वर्ग में सम्मिलित हैं। समावेशी विधि द्वारा आवृत्ति वितरण सरलता से एवं बिना किसी त्रुटि के बनाये जा सकते हैं; अत: यह विधि प्राप्तांकों को समूहबद्ध करने की सर्वश्रेष्ठ विधि है।

(2) शुद्ध वर्गीकृत श्रृंखला (Pure Classification Method) – यह विधि सांख्यिकीय दृष्टि से विशुद्ध हैं; क्योंकि इसमें वास्तविक सीमाएँ प्रदर्शित की गयी हैं। यहाँ प्रत्येक वर्ग की उच्चतम तथा निम्नतम सीमाएँ जानने के लिए प्राप्तांकों की वास्तविक सीमाओं की गणना करते हैं। निम्नतम सीमा जानने के लिए उसे प्राप्तांक में से 0.5 घटा देते हैं तथा उचचतम सीमा जानने के लिए 0.5 जोड़ देते हैं। उदाहरण के लिए-पहले वर्गान्तर 40-44 की निम्नतम सीमा 40-0.5 = 39.5 हुई और उच्चतम सीमा 44+ 0.5 = 44.5 हुई। इसी तरह से सभी वर्गों का निर्माण करते हैं। इस विधि की परिसीमा यह है कि इसमें समय अधिक व्यय होता है।

(3) अपवर्जी विधि (Exclusive Method) – अपवर्जी विधि में वर्गान्तर 40-45 का अर्थ यह है कि इस वर्ग में 40 से लेकर 44 तक के अंक शामिल हैं किन्तु 45 शामिल नहीं हैं। 45 प्राप्तांक पहले वर्ग में न होकर दूसरे वर्ग में है। इसी प्रकार वर्गान्तर 45-50 का अर्थ है कि इसमें 45 से 49 तक शामिल हैं लेकिन 50 नहीं। 50 तीसरे वर्ग में है। अपवर्जी विधि का एक दोष यह है कि इसमें कभी-कभी भ्रमवश आवृत्ति चिह्न (अंकदण्ड) गलत वर्ग के सामने लग जाता है। क्योंकि 50 का अंक 45-50 में भी लिखा है और 50-55 में भी, जबकि इसे शामिल 50-55 वाले वर्ग में करना है; अतः यह ध्यान रखना चाहिए।

वर्गान्तर का मध्य-बिन्द ज्ञात करना
(Mid-point of a Class Interval)

किसी वर्गान्तर का मध्य-बिन्दु (Mid-point) उस वर्गान्तर के निम्नतम और उच्चतम प्राप्तांकों को जोड़कर तथा योग का आधार करने पर प्राप्त हो सकता है। इसके लिए अग्रलिखित सूत्र प्रयोग करते हैं –
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प्रश्न 7.
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप से क्या आशय है। केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप के मुख्य उद्देश्य का भी उल्लेख कीजिए।
या
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
समंकों की महत्त्वपूर्ण विशेषताओं को स्पष्ट करने के लिए सांख्यिकीय विश्लेषण में केन्द्रीय प्रवृत्ति (Central Tendency) की माप का महत्त्वपूर्ण स्थान है। समंकों के वर्गीकरण तथा सारणीयन से समंक सरल, सुबोध, व्यवस्थित तथा तुलनीय तो बन जाते हैं किन्तु इससे उनकी महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ प्रकट नहीं होतीं; अत: एक ऐसी विधि की आवश्यकता है जिसके द्वारा एक ही संख्या से सभी संगृहीत आँकड़ों को प्रतिनिधित्व कराया जा सके। इसके लिए केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों या सांख्यिकीय माध्यमों का अध्ययन आवश्यक है।

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप : अर्थ
(Definitions of Measures of Central Tendency or Average)

संगृहीत आँकड़ों के मध्य ऐसी संख्या, जो सभी आँकड़ों का प्रतिनिधित्व करती हो, तो न तो समूह की न्यूनतम मान वाली संख्या होगी और न ही अधिकतम मान वाली। अवश्य ही, वह संख्या समूह के मध्य या उसके आस-पास की संख्या होगी। अत; आँकड़ों में से किस एक आँकड़े के पास पाये जाने की उनकी प्रवृत्ति को केन्द्रीय प्रवृत्ति (Central Tendency) कहा जाता है तथा इस माध्य या औसत को केन्द्रीय माप या केन्द्रीय प्रवृत्ति की मान कहते हैं।

इस भाँति केन्द्रीय प्रवृत्ति से तात्पर्य उस मान से है जो प्राप्त आँकड़ों का प्रतिनिधित्व करता है। अर्थात् वह मान जो प्राप्त आँकड़ों में सबसे अधिक बार आया हो। साधारणत: केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों से हमारा अर्थ ‘सांख्यिकीय माध्य’ या ‘औसत (Average) से होता है; क्योंकि सांख्यिकी माध्यम के आस-पास सभी आँकड़े वितरित होते हैं।

वह संख्या, जो किसी समूह-विशेष के सभी आँकड़ों का प्रतिनिधित्व करती है, उस समूह का सांख्यिकीय माध्य से औसत कहलाती है।

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य की परिभाषाएँ
(Definitions of Measures of Central Tendency or Average)

सांख्यिकीय माध्य या केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

(1) सिम्पसन और काक्का के अनुसार, “केन्द्रीय प्रवृत्ति का माप एक ऐसा प्रतिरूपी मूल्य है। जिसकी ओर अन्य संख्याएँ केन्द्रित होती हैं।”

(2) क्लार्क और शकाडे के मत में, “माध्ये सम्पूर्ण समंक समूह का विवरण देने वाली एकमात्र संख्या प्राप्त करने का प्रयत्न है।”

(3) क्रॉक्सटन और काउडेन के मतानुसार, “माध्य समंकों के विस्तार के अन्तर्गत स्थित एक ऐसा पद है। जिसका प्रयोग श्रेणी के सभी पदों का प्रतिनिधित्व करने के लिए किया जाता है। समंक माला के विस्तार के अन्तर्गत स्थित होने के कारण माध्य को कभी-कभी केन्द्रीय मूल्य का माप भी कहा जाता है।

समंक माला के कुछ पद (मूल्य) माध्य से छोटे तथा कुछ मूल्य बड़े होते हैं; अत: माध्य समंक श्रेणी की केन्द्रीय प्रवृत्ति को प्रदर्शित करता है। अन्त में कह सकते हैं कि माध्य समंक श्रेणी का मध्य मूल्य होता है जो श्रेणी की बनावट वे महत्त्वपूर्ण विशेषताओं को बतलाता है।

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य के उद्देश्य
(Objectives of Averages)

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या औसत या सांख्यिकीय माध्य के महत्त्वपूर्ण उद्देश्य निम्नलिखित है।

(1) जटिल तथ्यों को सरल रूप में प्रस्तुत करना – जिससे वे आसानी से समझ में आ सकें।

(2) विस्तृत तथ्यों को संक्षिप्तता प्रदान करना – माध्य तथ्यों के विशाल समूह को एक संख्या के रूप में प्रस्तुत कर देता है। इससे विशाल समूह की जानकारी प्राप्त हो जाती हैं। मोरेनो के अनुसार, माध्य का उद्देश्य व्यक्तिगत मूल्यों के समूह का सरल और संक्षिप्त रूप में प्रतिनिधित्व करना है। जिससे मस्तिष्क समूह की इकाइयों के सामान्य आकार को असानी से समझ सके।”

(3) समग्र की रचना तथा विशेषताओं की जानकारी प्रदान करना – माध्य के द्वारा सारे समूह की सामान्य बनावट (रचना) की जानकारी मिल जाती है। सम्पूर्ण समूह की महत्त्वपूर्ण विशेषताओं तथा गुणों की जानकारी भी मिलती है।

(4) तुलना में सहायता – माध्यों के द्वारा दो या दो से अधिक समूहों, प्रदेशों के कुछ खास लक्षणों का तुलनात्मक अध्ययन कर सकते हैं। दो कक्षा के छात्रों के माध्य से उनके भार या ऊँचाई की जानकारी मिल जाती है।

(5) मार्गदर्शक के रूप में कार्य करना – सांख्यिकीय माध्यम मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है। माध्य की जानकारी से समूह के विकास सम्बन्धी नीतियों के निर्धारण में सहायता मिलती है।

(6) सांख्यिकीय विश्लेषण का आधार – माध्यम विभिन्न वर्गों में गणितीय सम्बन्ध स्थापित करता है। माध्य से विभिन्न समूहों का सांख्यिकीय विश्लेषण किया जाता है।

(7) माध्य बहुत बड़े समूह या वार्ड के प्रतिनिधि के रूप में कार्य किया करता है।

अन्त में कह सकते हैं कि माध्यों का विश्लेषण में महत्त्वपूर्ण स्थान है। डॉ० बाउले के शब्दों में, “माध्य का उद्देश्य जटिल समूहों तथा विशाल क्रियाओं को कुछ महत्त्वपूर्ण शब्दों में या संख्याओं में प्रस्तुत करना है।”

प्रश्न 8.
मध्यमान अथवा समान्तर माध्य (Mean) से आप क्या समझते हैं? मध्यमान ज्ञात करने की विधियों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
मध्यमान की परिभाषित कीजिए।
उत्तर :
मध्यमान अथवा समान्तर माध्य
(Mean or Arithmetic Mean)

अंकगणित में जिस मान को औसत (Average) कहा जाता है, उसे हम सांख्यिकी में मध्यमान अथवा समान्तर माध्य (Mean or Arithmetic Mean) कहते हैं। मध्यमान को ‘M’ अक्षर द्वारा प्रदर्शित करते हैं।

परिभाषा – “मध्यमान वह मान है जो दिये हुए पदों के योगफल में पदों की संख्या से भाग देने पर प्राप्त होता है।”

या किसी अंक-सामग्री के समस्त अंकों के योगफल को उन अंकों की संख्या से भाग देने से जो भागफल प्राप्त होता है, उसे मध्ययान कहते हैं।”

या “मध्यमान वह प्राप्तांक है जिसके दोनों ओर विचलन समान होता है।”

उदाहरण 1 – यदि कक्षा 8 के पाँच विद्यार्थियों के भार क्रमानुसार 54, 2, 56, 53 तथा 50 किलोग्राम हों तो इनके मध्यमान की गणना कीजिए।
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मध्यमान ज्ञात करना
(Calculation of Mean)

मध्यमान अव्यवस्थित (Ungrouped) तथा व्यवस्थित (Grouped) दोनों ही प्रकार के प्राप्तांकों की मदद से निकाला जा सकता है –

(I) अव्यवस्थित प्राप्तांकों से मध्यमान की गणना (The mean of the Ungreuped Scores) – (N) अव्यवस्थित प्राप्तांकों को मध्यमान निकालने के लिए अव्यवस्थित अंकों को जोड़ लेते हैं तथा प्राप्त योगफल को अंकों की संख्या से भाग दे देते हैं। इसके लिए निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है –
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उदाहरण 3 – नीचे तालिका में प्राप्तांक तथा उनके सामने आवृत्तियाँ लिखी गयी हैं, मध्यमान की गणना कीजिए –
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  1. सबसे पहले प्रत्येक वर्गान्तर (Class-interval) का मध्य-बिन्दु ज्ञात किया जाता है।
  2. प्रत्येक मध्य-बिन्दु को तत्सम्बन्धी आवृति से गुणा कर लेते हैं।
  3. गुणनफलों के योगफल को आवृत्तियों की कुल संख्या से विभाजित कर देते हैं।

उदाहरण 4 – मीचे दी गयी सारणी का दीर्घ विधि द्वारा मध्यमान ज्ञात कीजिए –
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उदाहरण 5 – निम्नांकित सारणी का दीर्घ विधि द्वारा मध्यमान ज्ञात कीजिए –
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(2) संक्षिप्त विधि (Short Method) – मध्यमान की गणना की दीर्घ विधि में समय बहुत ज्यादा लगता है; अत: सामान्यतया, संक्षिप्त विधि से मध्यमान की गणना की जाती है। इसके क्रमागत पद निम्नलिखित हैं –

    1. सबसे पहले वर्गान्तरों के बीच से मध्यवर्ती वर्गान्तर ज्ञात किया जाता है। इस मध्यवर्ती वर्गान्तर का मध्य-बिन्दु ही कल्पित मध्यमान (Assumed Mean) है। सर्वाधिक आवृत्तियों वाले, वर्गान्तर को मध्यवर्ती वर्गान्तर मानना उचित होता है।
    2. इस कल्पित मध्यमान को प्रत्येक मध्य-बिन्दु में से घटाकर विचलन (Deviation) (X- A) ज्ञात किया जाता है।
    3. अब विचलन को वर्ग–अन्तराल से भाग देते हैं। भागफल को संक्षिप्त विचलन Step Deviation) (d) कहते हैं।
    4. स्पष्टंत: कल्पित मध्यमान वाले वर्गान्तर के सामने वाले स्तम्भ में ‘0’ लिखा जाएगा। वितरण के जिस ओर मध्य-बिन्दुओं का मान बढ़ता है, उस तरफ विचलन क्रमशः धनात्मक +1,+2, +3, +4,… आदि होता है तथा जिस ओर मध्य-बिन्दुओं का मान घटता है, उस तरफ विचलन क्रमागत ऋणात्मक -1-2-3,-4… आदि होता है।
    5. अब (fd) ज्ञात किया जाता है जिसके लिए वर्गान्तर के सामने की आवृत्तियों को विचलन से गुणा कर देते हैं और (fd) वाले खाने में लिखते हैं।
    6. (∑fd) की गणना के लिए धनात्मक व ऋणात्मक संख्याओं का अलग-अलग योग ज्ञात करके दोनों का अन्तर ज्ञात कर लिया जाता है।
    7. वर्गान्तर का आकार तथा N का मान प्रश्न से देखकर लिख लिया जाता है और सूत्र में ज्ञात मानों को रखकर मध्यमान की गणना कर ली जाती है।
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उदाहरण 7 – नीचे दी गयी सारणी का संक्षिप्त विधि से मध्यमान ज्ञात कीजिए –
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प्रश्न 9.
मध्यांक या माध्यिका (Median) से आप क्या समझते हैं? मुख्य विशेषताओं का उल्लेख करते हुए इसकी गणना की विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
मध्यांक अथवा माध्यिका
(Median)

मध्यांक (या माध्यिका) (Median) दिये हुए आँकड़ों को दो समूहों में विभक्त कर देता है जिसके एक समूह के प्रत्येक पद का मान मध्यांक से कम और दूसरे समूह का मान मध्यांक से अधिक होता है।

परिभाषा – (1) “यदि आँकड़ों को आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित किया जाये तो बिल्कुल मध्य में पड़ने वाला आँकड़ा ‘मध्यांक’ कहलाता है।”

(2) गैरेट के अनुसार, “जब अव्यवस्थित अंक (Ungrouped Scores) या दूसरी माप, क्रम में व्यवस्थित हो तो मध्य का अंक मध्यांक कहलाता है।”

मध्यांक का संकेत चिह्न Md है।

उदाहरण 1 – किसी कक्षा के पाँच बच्चों की ऊँचाई क्रमानुसार 140, 143, 145, 147, 152 सेमी हैं। और इन्हें ऊँचाईं के आरोही क्रम में खड़ा किया गया है। इनका मध्यांक क्या होगा?

हल – ऊँचाइयाँ आरोही क्रम में-140, 143, 145, 147, 152 पाँच बच्चों की ऊँचाइयों का मध्यांक तीसरे बच्चे की ऊँचाई =145 सेमी होगा।

मध्यांक की विशेषताएँ
(Characterisitics of Median)

मध्यांक की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. मध्यांक श्रेणी का केन्द्रीय मूल्य होता है; अत: मध्यांक निर्धारण के लिए श्रेणी को किसी क्रम में व्यवस्थित करना आवश्यक है।
  2. यह श्रेणी का मध्य अंक (बिन्दु) है जिसके ऊपर व नीचे की ओर आधे-आधे प्राप्तांक स्थित होते हैं; अत: मध्यांक का मान इस बात पर निर्भर है कि उसके ऊपर-नीचे कितने प्राप्तांक स्थित हैं, न कि इस बात पर कि उससे प्राप्तांक कितनी दूरी पर स्थित हैं।
  3. मध्यांक की गणना क्रमीय स्तर (Ordinal level) के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है।
  4. वितरण के सिरों पर स्थित प्राप्तांक, मध्यांक के मान को कम प्रभावित करते हैं।
  5. मध्यांक की मानक त्रुटि (Standard Error); मध्यमान की मानक त्रुटि से अधिक किन्तु बहुलक की मानक त्रुटि से कम होती है।

मध्यांक को ज्ञात करना।

मध्यांक की गणना भी ‘आँकड़ों की प्रकृति के अनुसार की जाती है। अव्यवस्थित तथा व्यवस्थित आँकड़ों के मध्यांक को ज्ञात करने की प्रक्रिया का विवरण निम्नलिखित है –

(I) अव्यवस्थित ऑकों का मध्यांक (The Medium of Ungrouped Data) – अव्यवस्थित आँकड़ों का मध्यांक निकालने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान देते हैं –

(1) सर्वप्रथम अव्यवस्थित आँकड़ों को आरोही क्रम (Ascending Order) या अवरोही क्रम (Descending Order) में रखते हैं।
(2) N की संख्या ज्ञात करके उसमें 1 जोड़ देते हैं और योग को 2 से भाग देकर भागफल निकाल लेते हैं।
(3) भागफल की संख्या वाला पद/स्थान मध्यांक है जिसकी गिनती किसी भी छोर से की जा सकती है।
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11 का विस्तार 10.5 से लेकर 11.5 तक है तथा वर्ग-विस्तार (10.5-11.5) का मध्य-बिन्दु 11 है; अतः मध्यांक =11

(II) व्यवस्थित आँकड़ों का मध्यांक (The Median of Grouped Data) – व्यवस्थित या वर्गीकृत आँकड़ों का मध्यांक ज्ञात करने के लिए निम्नलिखित पदों का अनुसरण करना चाहिए –

  1. सर्वप्रथम आवृत्ति वितरण तालिका से दी गयी आवृत्तियों को संचयी आवृत्तियों में बदल लेना चाहिए ताकि यह पता लग सके कि मध्यांक किस वर्गान्तर में है।
  2. इस भाँति उस वर्ग को ज्ञात किया जाता है जिसमें आवृत्तियों के योग के आधार ()[latex]\frac { N }{ 2 } [/latex] स्थित हो। इसे मध्यांक वर्ग कहते हैं।
  3. मध्यांक वर्ग ज्ञात करने के बाद ‘F’, ‘fm’ तथा ” संकेतों के मूल्य ज्ञात करके प्राप्त मूल्यों को निम्नलिखित सूत्र में स्थापित कर मध्यांक की गणना कर लेनी चाहिए –

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हल – प्रश्न में मध्यांक वह बिन्दु होगा जिसके ऊपर ([latex]\frac { 24 }{ 2 } [/latex]) = 12 प्राप्तांक हों। अवलोकन से ज्ञात होता है कि मध्यांक मान 30-39 वाले वर्ग में स्थित है जिसके सम्मुख संचयी आवृत्ति 14 लिखी है।
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विशेष परिस्थितियाँ – आवृत्ति वितरण में मध्यांक की गणना करते समय कुछ विशेष परिस्थितियाँ भी उपस्थित हो सकती हैं जो इस प्रकार हैं –

(i) यदि आवृत्ति वितरण में f का मान °0 दिया गया हो यानी आवृत्ति वितरण के ठीक मध्य में एक अन्तराल (Gap) हो तो मध्यांक की गणना का सूत्र होगा –
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उदाहरण 6 – में 22-24 वर्गान्तर की आवृत्ति ‘0’ है यानी वितरण के ठीक मध्य में एक अन्तराल (Gap) है; अतः यहाँ सूत्र Md = [latex]\frac { L+U }{ 2 } [/latex] प्रयुक्त होगा।
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उदाहरण 7 – में तीन क्रमागत वर्गान्तरों (85-89), (80-84), (75-79) की आवृत्ति ‘0’ दिखायी दे रही है। वितरण में कुल वर्गान्तरों की संख्या 9 है। यहाँ मध्य का वर्गान्तर 80-84 है; अतः =795 और U = 84.5।
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प्रश्न 10.
‘बहुलाक या ‘भूयिष्क (Mol) का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। बहुलाक की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए इसकी गणना की प्रक्रिया को भी स्पष्ट कीजिए।
या
बहुलक किसे कहते हैं?
उत्तर :
बहुलांक (Mode) को हिन्दी में भूयिष्ठक’ भी कहते हैं। यह वह मूल्य या बिन्दु है जिसकी अधिकतम आवृत्ति होती है। सबसे अधिक घनत्व वाले बिन्दु को भी बहुलोक कहते हैं। इस प्रकार से वह मूल्य जिसके आसपास सर्वाधिक श्रेणियाँ केन्द्रित हों बहुलांक कहलाएगा।

उदाहरण 1 – मान लीजिए हमने किसी कक्षा के 15 छात्रों का भार ज्ञात किया जो किग्रा में निम्न प्रकार है –
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हल – इस सारणी में 15 छात्रों में से 6 छात्र ऐसे हैं जिनका भार 51 किग्रा है अर्थात् सर्वाधिक आवृत्ति 51 किग्रा है अर्थात् इन आँकड़ों का बहुलांक 51 किग्रा है।

निष्कर्षतः, सांख्यिकीय आँकड़ों में जिस पद की आवृत्ति अधिकतम हो वह पद बहुलांक कहलाता है।

बहुलांक की परिभाषा
(Definition of Mode)

‘बहुलांक’ को अंग्रेजी में ‘Mode’ कहा गया है। ‘Mode’ शब्द की व्युत्पत्ति फ्रेंच भाषा के ‘la mode’ से हुई है जिसका अर्थ फ्रेंच में फैशन या ‘रिवाज से लिया जाता है। जो वस्तु या मूल्य सर्वाधिक फैशन या चलन में होता है, बहुलांक कहलाती है। उदाहरण के लिए—जूते की दुकान पर उस माप के जूते सबसे ज्यादा संख्या में होंगे जो सबसे ज्यादा लोगों की माप है। इसी भाँति, कपड़े की दुकान पर उस माप के कपड़े अधिक संख्या में होंगे जो अधिकांश लोगों की माप है। यह माप ही बहुलांक है। बहुलांक को Mo से प्रदर्शित किया जाता है।

बहुलांक को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया जा सकता है –

  1. गिलफोर्ड के अनुसार, “किसी वितरण में वह बिन्दु, जिसकी आवृत्ति सर्वाधिक हो, बहुलांक कहलाता है।
  2. क्रॉक्सटन ऐवं काउडेन के अनुसार, “एक श्रेणी का बहुलांक वह मूल्य है जिसके निकट श्रेणी की इकाइयाँ अधिक-से-अधिक केन्द्रित होती हैं।”
  3. ए० एम० टुटले के मतानुसार, “बहुलांक वह मूल्य है जिसके तुरन्त आस-पास आवृत्ति घनत्व अधिकतम होता है।”

बहुलांक की विशेषताएँ
(Characteristics of Mode)

बहुलांक की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. बहुलांक केन्द्रीय प्रवृत्ति को स्थिर एवं विश्वसनीय मान नहीं है, किन्तु इसकी गणना अन्य केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों की अपेक्षा अधिक सरल है।
  2. अव्यवस्थित आँकड़ों में बहुलांक की स्थिति सुनिश्चित नहीं होती; अत: ऐसे समूहों में एक से ज्यादा भी बहुलांक हो सकते हैं।
  3. बहुलांक को वर्गीय स्तर (Nominal Level) के प्राप्तांकों की केन्द्रीय प्रवृत्ति का एकमात्र तथा सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। ऐसी दशाओं में यह केन्द्रीय प्रवृत्ति का सबसे अधिक प्रतिनिधित्व करता है।

अव्यवस्थित आँकड़ों का बहुलक ज्ञात करना
(The Mode of Ungrouped Data)

अव्यवस्थित आँकड़ों में बहुलांक वह प्राप्तांक होता है जो सबसे अधिक बार दोहराया गया हो, अर्थात् जिसकी आवृत्ति सबसे अधिक हो।

उदाहरण 2 – एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग में निम्नलिखित त्रुटियाँ प्राप्त हुई, इनका बहुलक ज्ञात कीजिए –
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हल – निरीक्षण से ज्ञात होता है कि 13 अंक 3 बार दोहराया गया है, जो सबसे अधिक है अर्थात् इसकी आवृत्ति 3 है। अतः अभीष्ट बहुलांक 3 होगा।

व्यवस्थित आँकड़ों का बहुलांक
(The Mode of Grouped Data)

व्यवस्थित आँकड़ों का बहुलक ज्ञात करने के प्रमुख दो सूत्र हैं –
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इस सूत्रे से बहुलांक की गणना के लिए पहले मध्यमान ज्ञात किया जाता है फिर मध्यांक। मध्यांक में 3 का गुणा करते हैं तथा मध्यमान में 2 का। पहली संख्या में से दूसरी घटाकर बहुलक ज्ञात कर लेते हैं। इस सूत्र की सहायता से बहुलक का सन्निकट मान प्राप्त होता है।
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यहाँ, Mo = बहुलांक (Mode)

L1 = उस वर्गान्तर की निम्नतम सीमा है जिसमें आवृत्तियों की संख्या सर्वाधिक है,
fa = यह उस वर्ग की आवृत्ति है जो बहुलांक मान वाले वर्ग के पास हो तथा जिसकी निम्नतम सीमा बहुलांक व मान वाले वर्ग की निम्नतम सीमा से अधिक हो (Post-modal Class),
fb = यह उस वर्ग की आवृत्ति है जो वर्ग बहुलांक मान वाले वर्ग के पास है तथा जिसकी निम्नतम सीमा बहुलांक मान वाले वर्ग की निम्नतम सीमा से कम हो (Pre-Modal Class), तथा
C.I.= वर्गान्तर

उदाहरण 3 – नीचे दी गयी व्यवस्थित अंक सामग्री से बहुलांक की गणना कीजिए –
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नोट – सूत्र (1) द्वारा ज्ञात Mo का मान 29.16 है, जबकि सूत्र (2) द्वारा ज्ञात Mo को मान 33.79 आता है। दोनों मान भिन्न हैं क्योंकि सूत्र (1) की सहायता से सन्निकट मान प्राप्त होता है।

उदाहरण 4 – नीचे दी गयी सारणी की बहुलक मान ज्ञात कीजिए –
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मध्यमान, मध्यांक तथा बहुलक पर अभ्यास के लिए कुछ प्रश्न एवं उनके उत्तर,

1. निम्नलिखित आँकड़ों का मध्यमान तथा मध्यांक ज्ञात कीजिए –
5, 6, 6, 4, 7, 9, 10, 15, 13, 22

2. निम्नलिखित प्राप्तांकों का मध्यांक तथा बहुलांक ज्ञात कीजिए –
72, 80, 84, 88, 92, 76, 78,72,74, 72, 80, 62

3. निम्नलिखित व्यवस्थित अंक सामग्री से मध्यमान तथा बहुलांक की गणना कीजिए (N=70) –
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4. नीचे दी गयी सारणी का मध्यमान, मध्यांक तथा बहुलांक ज्ञात कीजिए (N = 72) –
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5. नीचे दिये गये आवृत्ति वितरण की मदद से केन्द्रवर्ती मान ज्ञात कीजिए (N=84) –
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6. निम्न व्यवस्थित आँकड़ों का मध्यमान, मध्यांक व बहुलांक ज्ञात कीजिए –
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7. कक्षा 11 के छात्रों की मनोविज्ञान में परीक्षा के प्राप्तांकों का आवृत्ति वितरणनीचे है। इनके द्वारा मध्यमान, मध्यांक तथा बहुलक ज्ञात कीजिए (N=38) –
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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
समंकों (Data) की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
समंकों की मुख्य विशेषताएँ सांख्यिकी का सम्बन्ध समंकों से होता है। समंकों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(1) समंक तथ्यों के समूह होते हैं  इसका अभिप्राय यह है कि किसी एक तथ्य से सम्बन्धित संख्या समंक नहीं कही जा सकती है, क्योंकि एक संख्या से कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। उदाहरण के लिए-यदि किसी विद्यार्थी के हिन्दी में प्राप्तांक 40 हैं तो ये प्राप्तांक समंक नहीं कहे जाएँगे, परन्तु यदि उस कक्षा के समस्त विद्यार्थियों के प्राप्तांक दिये हुए हैं तो इन प्राप्तांकों को समंक कहा जाएगा।

(2) समंक संख्याओं के रूप में व्यक्त किये जाते हैं – सांख्यिकी में संख्याओं के रूप में व्यक्त किये गये तथ्य ही समंक कहलाते हैं, न कि गुणात्मक रूप में व्यक्त किये गये तथ्य उदाहरणार्थ–तथ्यों का गुणात्मक रूप; जैसे तीव्र बुद्धि, सामान्य, मन्द बुद्धि समंक नहीं कहलाएँगे; परन्तु यदि इन तथ्यों को हम संख्यात्मक रूप में व्यक्त कर दें तो वे संख्याएँ समंक कही जाएँगी; जैसे-बुद्धि को संख्यात्मक रूप में इस प्रकार व्यक्त किया जाता है –

(3) समंकों के संकलन में उचित शुद्धता होनी चाहिए – समंकों के संकलन में उनकी शुद्धता पर काफी ध्यान देना चाहिए। समंकों की शुद्धता की मात्रा अनुसन्धान के क्षेत्र, उद्देश्य, साधन, समय आदि पर निर्भर करती है।

(4) समंकों को एक-दूसरे से सम्बन्धित रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए – इसका तात्पर्य यह है कि समंक सजातीय तथा समरूप होने चाहिए, तभी उनकी आपस में तुलना की जा सकती है। जैसे-यदि हम किसी कक्षा के एक विद्यार्थी के गणित में प्राप्तांक लिख लें और दूसरे विद्यार्थी की आयु लिख लें तो इन संख्याओं को हम समंक नहीं कह सकते; क्योंकि इन्हें एक-दूसरे से सम्बन्धित नहीं किया जा सकता। परन्तु यदि दोनों विद्यार्थियों के गणित में प्राप्तांक या दोनों की आयु ही लिखें तो वे समंक कहलाये जा सकते हैं।

(5) समंकों के संकलन का पूर्व-निश्चित उद्देश्य होता है – वे संख्यात्मक तथ्य ही समंक कहे जाएँगे जिनके संकलन का पूर्व-निश्चित उद्देश्य होता है। बिना उद्देश्य के एकत्रित किये गये आँकड़े समंक नहीं बल्कि केवल संख्याएँ ही कहलाते हैं।

(6) समंक अनेक कारणों से पर्याप्त सीमा तक प्रभावित होते हैं – समंकों पर अनेक कारणों को सामूहिक रूप से प्रभाव पड़ता है। कोई एक घटना किसी एक कारण का परिणाम नहीं होती, अपितु अनेक कारणों से प्रभावित होती है। जैसे-यदि हाईस्कूल की परीक्षा में अधिक विद्यार्थियों की प्रथम श्रेणी है तो प्रथम श्रेणी के अनेक कारण हो सकते हैं। हो सकता है विद्यार्थी अधिक संख्या में प्रतिभावान हों, अधिक परिश्रम से पढ़ते हों, निरीक्षक उदार हों आदि।

(7) सर्मक व्यवस्थित रूप से संकलित होते हैं – समंक एकत्रित करने के लिए एक निश्चित योजना तैयार की जाती है तथा उन आँकड़ों का विश्लेषण करके समुचित तथा तर्कसंगत निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। संगणकों को आँकड़े एकत्रित करने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। समंक प्रश्नावली तथा अनुसूची के अनुसार एकत्र किये जाते हैं।

(8) समंकों को गणना या अनुमान द्वारा संकलित किया जाता है – संमकों को गणना अथवा अनुमान द्वारा एकत्रित किया जाता है। यदि अनुसन्धान का क्षेत्र सीमित है तो गणना द्वारा समंकों का संकलन,किया जा सकता है और यदि क्षेत्र विस्तृत है तो अनुमान द्वारा ही समंकों का संकलन सम्भव है।

प्रश्न 2.
मनोविज्ञान में सांख्यिकी के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
या
मनोविज्ञान में सांख्यिकीय अध्ययन की कोई चारे उपयोगिताएँ बताइए।
उत्तर :
मनोविज्ञान में सांख्यिकी का महत्त्व

आधुनिक युग में मनोविज्ञान के अध्ययनों में सांख्यिकी का अपना एक विशिष्ट स्थान है। विभिन्न मनोवैज्ञानिक समस्याओं के अध्ययन में सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। सच तो यह है कि मनोवैज्ञानिक सांख्यिकी का प्रयोग अपनी पसन्द या नापसन्द के आधार पर नहीं करता बल्कि आँकड़ों की प्रकृति के कारण सांख्यिकी का प्रयोग उसे अनिवार्य रूप से करना पड़ता है। सांख्यिकीय विधियाँ उपकल्पना की जाँच, व्यक्तिगत विभिन्नताओं के मापन तथा जटिल मानव-व्यवहार को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। सांख्यिकी के प्रयोग से मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के परिणाम निष्पक्ष, विश्वसनीय तथा वैध बन जाते हैं और उनके आधार पर भविष्यवाणियाँ करना सम्भव होता है। मनोविज्ञान में सांख्यिकी का महत्त्व इस प्रकार है

(1) मनोविज्ञान की समस्याओं के अध्ययन में एकत्र किये गये आँकड़े जटिल, अतुलनीय एवं अस्पष्ट होते हैं। सांख्यिकीय विधियों से अव्यवस्थित समंकों को व्यवस्थित रूप में वर्गीकृत करके सारणी, चित्रों व रेखाचित्रों के माध्यम से सरल व बोधगम्य रूप से प्रदर्शित किया जाता है।

(2) मनोवैज्ञानिक प्रयोगों के सम्बन्ध में सांख्यिकी की मदद से वस्तुगत (Objective) तथा शुद्ध (Accurate) परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं।

(3) सांख्यिकीय अध्ययनों से कुछ निष्कर्ष प्राप्त होते हैं जो तथ्यों की वैधानिक व्याख्या कर सकते हैं। सामान्य निष्कर्षों के निर्धारण में भी सांख्यिकी का महत्त्व है; क्योंकि ये निष्कर्ष सांख्यिकीय सूत्रों व नियमों के आधार पर निकाले जाते हैं।

(4) मनोविज्ञान से सम्बन्धित तुलनात्मक अध्ययनों में शुद्ध विश्वसनीय परिणाम निकाले जा सकते हैं। साथ ही तुलना ज्यादा सरल हो जाती है। उदाहरणार्थ-बालकों की बुद्धि की तुलना बुद्धि-लब्धि (1.2.) द्वारा सम्भव है।

(5) सांख्यिकीय अध्ययनों के आधार पर व्यवहार से सम्बन्धित निष्कर्षों के आधार मनोवैज्ञानिक पूर्वकथन या भविष्यवाणी कर सकते हैं।

(6) मनोविज्ञान के क्षेत्र में प्राय: अध्ययन प्रतिदर्श (Sample) पर आधारित होते हैं। प्रतिदर्श समष्टि (Universe) का प्रतिनिधि होता है। सांख्यिकी विधियाँ प्रतिनिधित्वपूर्ण प्रतिदर्श का चयन करने में सहायक हैं।

(7) मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के निर्माण में सांख्यिकी का अत्यधिक महत्त्व है। मानसिक व शारीरिक योग्यताओं के मापन हेतु बहुत-से मनोवैज्ञानिक परीक्षण निर्मित होते हैं; उदाहरणार्थ-बुद्धि परीक्षण, व्यक्तित्व परीक्षण तथा रुचि परीक्षण आदि।

स्पष्टत: मेनोविज्ञान के क्षेत्र में सांख्यिकी का विशेष महत्त्व है।

प्रश्न 3.
आँकड़ों के व्यवस्थापन या आवृत्ति वितरण के महत्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
आँकड़ों के व्यवस्थापन यो आवृत्ति वितरण का महत्त्व

आँकड़ों के व्यवस्थापन या आवृत्ति वितरण का महत्त्व निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत प्रतिपादित किया जा सकता है –

(1) संगृहीत किन्तु अव्यवस्थित आँकड़ों से तत्सम्बन्धी समस्या या अध्ययन विषय के परिणाम के सम्बन्ध में उचित निर्णय लेने में कठिनाई होती है। आँकड़ों को व्यवस्थित करने अर्थात् आवृत्ति वितरण बनाने पर ये ही आँकड़े संक्षिप्त, स्पष्ट तथा बोधगम्य महसूस होते हैं और इनके द्वारा परिणामों के बारे में सरलतापूर्वक उचित निर्णय दिया जा सकता है।

(2) व्यवस्थापन या आवृत्ति वितरण द्वारा सांख्यिकीय आँकड़ों का संक्षिप्त प्रदर्शन सम्भव है। अर्थात् आवृत्ति वितरण आँकड़ों को अर्थपूर्ण बनाने का एक सरल उपाय है। वस्तुतः अव्यवस्थित आँकड़े अर्थहीन होते हैं जिनके गुण-दोषों को सामान्यतः व्यक्ति ग्रहण नहीं कर पाता है। आवृत्ति वितरण तालिका में प्रदर्शित होकर ये ही आँकड़े अर्थपूर्ण बन जाते हैं जिन्हें व्यक्ति सरलता से ग्रहण कर लेता है।

(3) सारणीयन में आवृत्ति वितरण तालिका बनाने के उपरान्त तालिका (Table) का सिर्फ अवलोकन करके ही आँकड़ों का अर्थ ज्ञात किया जा सकता है।

(4) आवृत्ति वितरण तालिका के माध्यम से समान या सजातीय गुण (Homogeneous Characters) पूरी तरह स्पष्ट हो जाते हैं।

(5) आवृत्ति वितरण से आँकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन एकदम सरल हो जाता है।

आँकड़ों के व्यवस्थापन या आवृत्ति वितरण के महत्त्व को हम एक उदाहरण के माध्यम से अच्छी प्रकार समझ सकते हैं। मान लीजिए, हमें कक्षा XI के छात्रों की अंक-सूची (Marks-list) प्राप्त है। क्योंकि ये अंक अव्यवस्थित हैं; अतः इनसे परीक्षण के परिणाम के बारे में उचित निर्णय देना दुष्कर होगा। इन प्राप्तांकों को सुव्यवस्थित करैने पर अर्थात् इनका आवृत्ति वितरण तैयार करने पर यही अंक-सूची एक संक्षिप्त, स्पष्ट तथा बोधगम्य स्वरूप में हमारे सामने आ जाएगी। अब हम इसके माध्यम से आसानी से बता पाएँगे कि कितने छात्रों ने प्रथम श्रेणी, कितनों ने द्वितीय और तृतीय श्रेणी प्राप्त की है तथा कितने छात्र परीक्षा में अनुत्तीर्ण हुए हैं।

प्रश्न 4.
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य के महत्त्व एवं उपयोगिता का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य : महत्त्व और उपयोगिता

माध्य के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए प्रो० फिशर ने कहा है कि विशाल संख्यात्मक तथ्यों को समझाने के लिए माध्य बहुत उपयोगी अंक है। सांख्यिकीय में माध्य के अत्यधिक महत्त्व के कारण ही डॉ० बाउले ने तो सांख्यिकी को माध्यों का विज्ञान (Science of Averages) तक कह दिया है। सांख्यिकी विश्लेषण की दूसरी अनेक विधियाँ माध्य पर ही अवलम्बित हैं।

व्यक्तिगत इकाइयों का सांख्यिकी में कोई महत्त्व या उपयोगिता नहीं है किन्तु माध्यों के द्वारा सभी इकाइयों की सामूहिक विशेषताओं व लक्षणों को आसानी से प्रकट किया जा सकता है। इसी प्रकार एक व्यक्ति की आये या आयु का कोई महत्त्व नहीं है, किन्तु सम्पूर्ण समाज की औसत आय या आयु का अत्यधिक महत्त्व है। इस तरह माध्य का समाज में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण स्थान है। माध्य के महत्त्व पर प्रो० टिप्पेट ने इस प्रकार प्रकाश डाला है—“माध्य की अपनी सीमाएँ (कमियाँ)होती हैं, किन्तु यदि उनको स्वीकार किया जाए तो कोई भी एक सांख्यिकीय संख्या माध्य से अधिक उपयोगी नहीं होती है।”

गैरेट (H.E. Garrett) ने केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों का महत्त्व इस प्रकार प्रतिपादित किया है –

  1. केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप समूह के प्राप्तांकों का प्रतिनिधित्व करती है।
  2. यह समूचे समूह के गुणों को संक्षेप में प्रदर्शित कर देती है।
  3. इसकी सहायता से दो या दो से अधिक समूह के कार्यों एवं गुणों का बोध व उनकी तुलना आसानी से की जा सकती है।
  4. इनके द्वारा ढेर सारे प्राप्तांकों के अर्थ को सिर्फ कुछ अंकों या शब्दों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।
  5. प्रामाणिक विचलन (Standard Deviation) तथा सह-सम्बन्ध (Correlation) जैसे उच्च सांख्यिकीय विश्लेषण में केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप आवश्यक होती है।
  6. उच्च सांख्यिकीय अध्ययनों में केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप का प्रयोग प्राथमिक सांख्यिकीय विधियों के रूप में किया जाता है।

प्रश्न 5.
केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों या सांख्यिकी माध्य की प्रमुख विशेषताओं एवं गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों या सांख्यिकीय माध्य की
प्रमुख विशेषताएँ एवं गुण

‘केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों का आदर्श माध्य में निम्नलिखित विशेषताएँ तथा गुण अनिवार्य रूप से होने चाहिए –

(1) सरल – एक अच्छी माध्य वही हो सकता है जो समझने तथा गणना करने में सरल हो। इससे उसका उपयोग व्यापक रूप में किया जा सकती है।

(2) स्पष्टता और निश्चितता – माध्य की परिभाषा स्पष्ट होनी चाहिए। उसकी कितनी ही बार गणना की जाये, उसका मान हमेशा ही समान आना चाहिए। अनुसन्धानकर्ता के अनुमान की गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए। परिभाषा में भिन्न-भिन्न अर्थ न निकले।।

(3) प्रतिनिधित्व – माध्य ऐसा होना चाहिए कि समंक माला अर्थात् समूह के प्रमुख-प्रमुख लक्षण उसमें दिखाई दें। समग्र के प्रत्येक पद में उसके निकट रहने की प्रवृत्ति दिखलाई दे।

(4) बीजगणितीय क्रियाओं के योग्य – माध्य ऐसा हो कि उससे बीजगणितीय क्रियाएँ अर्थात् । जोड़, बाकी, गुणा एवं भाग आसानी से की जा सकें।

(5) माध्ये एक निरपेक्ष संख्या होनी चाहिए – माध्यम समंक माला की संख्याओं में हो,.न कि प्रतिशत या दूसरे सापेक्ष रूप में।

(6) न्यादर्श में परिवर्तन से माध्य बहुत कम प्रभावित हो। न्यादर्श के बदल जाने से माध्य में परिवर्तन न हो या क-से-कम हो। समग्र में से एक तरीके से अनेक न्यादर्श चुने जाये जिनके माध्य लगभग समान हों।

(7) समंक माला के सभी पदों पर आधारित होना चाहिए – माध्य किसी एक पद पर आधारित न हो, तभी माध्य समग्र का प्रतिनिधित्व कर सकता है।

(8) माध्ये सीमान्त पदों से अधिक प्रभावित नहीं होना चाहिए, वह सभी पदों पर आधारित हो।

प्रश्न 6.
केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों या सांख्यिकीय माध्य की सीमाओं या दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों या सांख्यिकीय माध्य की सीमाएँ या दोष

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य की प्रमुख सीमाएँ या दोष निम्नलिखित हैं –

  1. सांख्यिकीय माध्य से सिर्फ समूह के गुणों, कार्यों तथा विशेषताओं को ही समझा जा सकता है, ये व्यक्तिगत विशेषताओं का वर्णन नहीं करते।
  2. यदि समूह के गुणों, कार्यों तथा विशेषताओं में विषमता पायी जाये तो उस दशा में सांख्यिकी माध्य समूह की प्रतिनिधित्व नहीं करते, जिसका परिणाम यह होता है कि उच्च सांख्यिकीय विश्लेषण के दौरन दूषित और भ्रामक निष्कर्ष निकलते हैं।
  3. अलग-अलग तरह के सांख्यिकी विश्लेषण में सांख्यिकीय माध्य के अलग-अलग मापक भिन्न परिणाम प्रस्तुत करते हैं।

प्रश्न 7.
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य के विभिन्न प्रकारों का उल्लेख कीजिए तथा इनका तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य के प्रकार

सांख्यिकी में माध्य कई प्रकार के होते हैं जिनमें से प्रमुख माध्ये निम्नलिखित हैं –

  1. मध्यमान (Mean)
  2. मध्यांक माने (Median) तथा
  3. बहुलांक मान (Mode)।

केन्द्रीय प्रवृत्ति की विभिन्न मापों की तुलना

मध्यमान, मध्यांक और बहुलांक – केन्द्रीय प्रवृत्ति की इन तीन मापों में समानता या विषमता, आवृत्ति वितरण की प्रकृति पर निर्भर है। इस विषय में निम्नलिखित दशाएँ अनुभव में आती हैं –

(1) सममित (Symmetrical) आवृत्ति वितरण की स्थिति में मध्यमान, मध्यांक तथा बहुलक तीनों को मान समान आता है।
(2) विषमता (Skewness) आवृत्ति वितरण होने पर इन तीनों अर्थात् मध्यमान, मध्यांक तथा बहुलक के मान भिन्न-भिन्न आते हैं। यहाँ दो स्थितियाँ सम्भव हैं –
(a) धनात्मक विषमता (Positively Skewed Distribution) में मध्यमान का मूल्य कम, मध्यांक को मध्यमान से अधिक तथा बहुलांक का मध्यांक से भी अधिक होता है।
(b) ऋणात्मक विषमता (Negatively Skewed Distribution) में मध्यमान का मान सबसे अधिक, मध्यांक का मान उससे कम तथा बहुलांक का मान सबसे कम होता है।
(3) मध्यमान सबसे अधिक शुद्ध, मध्यांक अपेक्षाकृत कम शुद्ध तथा बहुलांक सबसे कम शुद्ध मान स्वीकार किये गये हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सांख्यिकी की परिभाषा दीजिए।
उत्तर :
प्रो० सेलिगमैन ने सांख्यिकी की एक स्पष्ट परिभाषा इन शब्दों में प्रतिपादित की है, सांख्यिकी वह विज्ञान है जो किसी भी अनुसन्धान (जाँच) के क्षेत्र पर प्रकाश डालने के लिए संख्यात्मक आंकड़ों का संग्रहण, प्रस्तुतीकरण, वर्गीकरण, तुलना तथा निर्वचन की रीतियों का प्रयोग करता है।”

प्रश्न 2.
सांख्यिकी की किन्हीं दो विशेषताओं के बारे में लिखिए।
उत्तर :

  1. सांख्यिकी विज्ञान तथा कला दोनों है।
  2. सांख्यिकी में किसी अनुसंधान क्षेत्र से सम्बन्धित सामूहिक संख्यात्मक तथ्यों के संकलन, प्रदर्शन, विश्लेषण तथा निर्वचन की रीतियों का विधिवत् अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 3.
सांख्यिकी की मुख्य सीमाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
यह सत्य है कि सांख्यिकी की अत्यधिक उपयोगिता एवं महत्त्व है, परन्तु इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं। सर्वप्रथम हम कह सकते हैं कि सांख्यिकी के माध्यम से केवल संख्यात्मक तथ्यों का अध्ययन किया जा सकता है, इसके माध्यम से गुणात्मक तथ्यों का अध्ययन नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार सांख्यिकी के माध्यम से विजातीय तथ्यों का अध्ययन नहीं किया जा सकता है। यही नहीं, इसके माध्यम से केवल समूह का अध्ययन किया जा सकता है, व्यक्ति का नहीं। बिना सन्दर्भ से सांख्यिकी के माध्यम से प्राप्त होने वाले परिणाम असत्य तथा भ्रामक होते हैं। सांख्यिकी के माध्यम से प्राप्त होने वाले परिणाम केवल औसत रूप में ही सही हैं। वास्तव में, सांख्यिकी एक साधन है, साध्य नहीं। इन्हीं सीमाओं को ध्यान में रखते हुए यूल तथा केण्डाल ने कहा है, “सांख्यिकीय राीतियाँ अयोग्य व्यक्तियों के हाथों में खतरनाक औजार हो सकती हैं।”

प्रश्न 4.
प्रदत्त (Data) से क्या आशय है?
उत्तर :
प्रदत्त (Datum) वह तथ्य या सूचना है जिसके आधार पर हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं। किसी परीक्षा में प्राप्तांकों को प्रदत्त कहा जा सकता है। यह परीक्षा उनके व्यवहार के किसी भी पहलू से सम्बन्धित हो सकती है। उदाहरण के लिए-यदि कक्षा बारह के छात्रों की मनोविज्ञान विषय में परीक्षा ली जाये तो परीक्षा में छात्रों को जो प्राप्तांक प्राप्त होंगे उन्हें प्रदत्त कहा जाएगा। प्रयोगों, शोध कार्य या सर्वेक्षणों में जो आँकड़े सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं, उन्हें भी प्रदत्त कहा जाता है। अंग्रेजी में Data शब्द बहुवचन है जबकि Datum शब्द एकवचन।

प्रश्न 5.
प्राप्तांक (Score) के अर्थ एवं सीमाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
“किसी मनोवैज्ञानिक परीक्षा में प्राप्तांक का अभिप्राय उस इकाई से है जो दो सीमान्तों के बीच होती है। उदाहरणार्थ-किसी छात्र के बुद्धि-परीक्षण में 130 प्राप्तांक का अर्थ दो सीमान्तों 129.5-130.5 में लगाया जाता है। यहाँ 130 प्राप्तांक 129.5-130.5 का मध्य-बिन्दु है।

सांख्यिकी में किसी भी प्राप्तांक का विस्तार (Interval) दी गई संख्या से आधा इकाई कम से लेकर आधार इकाई अधिक तक माना जाता है। इस भाँति प्रत्येक प्राप्तांक का प्रसार क्षेत्र (Range) एक के बराबर होता है। किसी प्राप्तांक की दो सीमाएँ हैं—उसकी उच्चतम सीमा (Upper limit) तथा उसकी निम्नतम सीमा (Lower limit)। प्राप्तांक की उच्चतम सीमा ज्ञात करने के लिए उसमें 0.5 जोड़ देना चाहिए तथा निम्नतम सीमा ज्ञात करने के लिए उसमें से 0.5 घटा देना चाहिए। प्राप्तांक 130 से हमारा अभिप्राय- 129.5 से लेकर 130.5 तक है तथा प्राप्तांक 130 का मान इन दोनों सीमाओं के मध्य कोई भी हो सकता है। 130.5 इस प्राप्तांक की उच्चतम सीमा तथा 129.5, इसकी निम्नतम सीमा है। प्राप्तांक 150 की उच्चतम सीमा 150 + 0.5 अर्थात् 15.5 तथा निम्नतम सीमा 150-0.5 = 149.5 होगी।। इसी भाँति 151 प्राप्तांक की निम्नतम सीमा 150.05 तथा उच्चतम सीमा 151.5 होगी। इसे निम्नलिखित रूप में प्रदर्शित कर सकते हैं –
UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 12 Statistics in Psychology 60

प्रश्न 6.
सांख्यिकी में प्रसार क्या है?-एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
सांख्यिकी में प्राप्तांकों में परिवर्तनशीलता की मापों को ज्ञात किया जाता है। परिवर्तनशीलता की एक माप को प्रसार (Range) कहा जाता है। यह परिवर्तनशीलता की एक स्थल माप है। जब किसी अध्ययन के दौरान अध्ययनकर्ता के पास कम समय होता है तथा वह प्राप्तांकों के विवरण की परिवर्तनशीलता को जानना चाहता है तो उस स्थिति में विवरण के प्रसार को ज्ञात करने का प्रयास किया जाता है। नियमानुसार प्रसार को निम्नलिखित सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता है –
प्रसार (Range)= (उच्चतम प्राप्तांक-न्यूनतम प्राप्तांक) +1
उदाहरण-उच्चतम प्राप्तांक 80, न्यूनतम प्राप्तांक 5
प्रसार = (80 – 5) + 1 = 76

प्रश्न 7.
मध्यमान (Mean) की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2016]
उत्तर :
मध्यमान में निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं –

  1. मध्यमान दिये गये वितरण का केन्द्र या सन्तुलन बिन्दु होता है।
  2. मध्यमान की स्थिति वितरण के प्रत्येक प्राप्तांक से प्रभावित होती है। उदाहरणार्थ—प्राप्तांकों में से किसी प्राप्तांक को घटाने या बढ़ाने पर वितरण का मध्यमान भी घट या बढ़ जाएगा।
  3. वितरण के सभी प्राप्तांकों को एक निश्चित संख्या से गुणा करने पर मध्यमान का मान उस संख्या के गुणनफल के बराबर हो जाएगा।
  4. केन्द्रीय प्रवृत्ति के मापों में मध्यमान एक निष्पक्ष (Unbiased) सांख्यिकी है जिसमें मानक त्रुटि (Standard Error) कम होती है।

प्रश्न 8.
मध्यसान के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मध्यमान के मुख्य गुण निम्नलिखित हैं –

  1. केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों में सर्वाधिक शुद्ध माप मध्यमान है।
  2. यह सबसे अधिक विश्वसनीय सांख्यिकी है।
  3. इसकी गणना शीघ्र तथा सरलता से हो जाती है।
  4. मध्यमान वितरण के प्राप्तांकों का विशुद्ध प्रतिनिधित्व करता है।
  5. केन्द्रीय प्रवृत्ति की अन्य मापों की अपेक्षा मध्यमान की मदद से तुलना करना अधिक सरल
  6. प्रामाणिक विचलन तथा सहसम्बन्ध गुणांक जैसी सांख्यिकी गणनाओं में मध्यमान की गणना जरूरी है।

प्रश्न 9.
मध्यमान के मुख्य दोषों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट कीजिए कि इसका प्रयोग कब उचित होता है?
उत्तर :
मध्यमान के कुछ दोष ये हैं –

  1. मुक्त सिरों वाले या अपूर्ण प्राप्तांक वितरण के अन्तर्गत मध्यमान प्रयोग नहीं किया जा सकता।
  2. इसी प्रकार असामान्य अंक-वितरण के अन्तर्गत भी मध्यमान की जगह मध्यांक का प्रयोग उचित समझा जाता है।

मध्यमान का प्रयोग कब और कहाँ करना उचित है, इसके लिए कुछ निर्देश नीचे दिये जा रहे

  1. सबसे अधिक शुद्ध एवं विश्वसनीय केन्द्रीय प्रवृत्ति ज्ञात करने हेतु मध्यमान का प्रयोग किया जाता है।
  2. जब बहुलांक, प्रामाणिक विचलन तथा सहसम्बन्ध आदि की गणना करनी हो, तब भी मध्यमान की गणना आवश्यक होती है।
  3. सामान्य वितरण (अर्थात् जब दिये गये प्राप्तांकों के सभी अंक समान रूप से वितरित हों) के अन्तर्गत भी मध्यमान प्रयुक्त होती है।
  4. मध्यमान की गणना तुलनात्मक अध्ययन के समय भी आवश्यक होती है।

प्रश्न 10.
मध्यांक (Median) के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मध्यांक के मुख्य गुण निम्नलिखित हैं –

  1. सरलता – मध्यांक को ज्ञात करना तथा इसे समझना दोनों ही बहुत आसान हैं।
  2. चरम मूल्यों से अप्रभावित – मध्यांक के मूल्य पर श्रेणी के सबसे बड़े या छोटे मूल्य का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
  3. गुणात्मक विशेषताओं के अध्ययन में उपयोगी – गुणात्मक तथ्य; जैसे-बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य, ईमानदारी, गरीबी आदि के निर्धारण में यह अति उपयोगी होता है।
  4. निश्चितता – मध्यांक का मूल्य बहुलांक की भाँति अस्पष्ट और अनिश्चित नहीं होता है।
  5. अधूरे समंक से मध्यांक निर्धारण सम्भव है। केवल मध्यांक वर्ग तथा कुछ दूसरी सूचनाएँ मिल जाने पर ही इसको ज्ञात कर सकते हैं। सम्पूर्ण पदमाला की जानकारी जरूरी नहीं।
  6. इसको बिन्दुरेख विधि से भी ज्ञात कर सकते हैं। निरीक्षण से भी मध्यांक का निर्धारण किया जा सकता है।

प्रश्न 11.
मध्यांक (Median) के मुख्य दोषों या सीमाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मध्यांक के मुख्य दोष या सीमाएँ निम्नलिखित हैं –

  1. सीमान्त मूल्यों की उपेक्षा – सामान्यत: मध्यांक निर्धारण में श्रेणी के सीमान्त पदों पर ध्यान नहीं दिया जाता है। इस तरह मध्यांक में सभी पदों को समान महत्त्व नहीं देते हैं।
  2. आवश्यक क्रियाएँ – श्रेणी को आरोही या अवरोही आधार पर व्यवस्थित करने का कार्य अनिवार्य रूप से करमा पड़ता है।
  3. निर्धारण में कठिनाई – यदि मध्य पद दो मूल्यों के बीच आता है, तब मध्यांक मूल्य बिल्कुल ठीक नहीं होता है। केन्द्रीय मूल्यों के औसत को मध्यांक लिया जाता है। इसी तरह सतत श्रेणी में भी यह इस मान्यता पर आधारित है कि प्रत्येक वर्ग में आवृत्तियाँ समान हैं।
  4. कभी-कभी मध्यांक एक प्रतिनिधि माप नहीं होता है विशेषकर पदों की संख्या कम होने पर।
  5. मध्यांक बीजगणितीय विवेचन में अनुपयोगी रहता है। मध्यांक मूल्य को पदों की संख्या से गुणा करने पर पदों के मूल्यों का योग मालूम नहीं कर सकते हैं।

प्रश्न 12.
मध्यांक के उचित प्रयोग सम्बन्धी कुछ निर्देश दीजिए।
उत्तर :
मध्यांक के उचित प्रयोग हेतु निम्नलिखित निर्देश दिये जा सकते हैं –

  1. मध्यांक की गणना असामान्य वितरण की स्थिति में करनी चाहिए जबकि अंक सामग्री का वास्तविक मध्य-बिन्दु पता लगाना हो।
  2. श्रेणी के शुरू तथा अन्तर के अंक जब मध्यमान को प्रभावित करते हों तब भी मध्यांक की गणना की जाती है। उदाहरणार्थ – 2, 3, 4, 5, 6 का मध्यमान (M) तथा मध्यांक (Md) 4 है। यदि 6 के स्थान पर 11 हो तो मध्यांक 4 ही रहेगा लेकिन मध्यमान 5 हो जाएगा।
  3. इसकी गणना उस समय की जानी उचित है जबकि अपेक्षाकृत कम शुद्ध केन्द्रीय प्रवृत्ति के मान की आवश्यकता हो।
  4. बहुलांक (Mode) की गणना के समय भी मध्यांक ज्ञात किया जाता है।

प्रश्न 13.
बहुलांक (Mode) के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
बहुलांक के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं –

  1. निर्धारण में सरलता—इसको निरीक्षण अर्थात् देखकर भी तय किया जा सकता है।
  2. बिन्दुरेखीय विधि से भी इसका निर्धारण कर सकते हैं।
  3. प्रतिनिधित्व-बहुलांक मूल्य श्रेणी का सबसे श्रेष्ठ प्रतिनिधि माना जाता है।
  4. सीमान्त पदों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
  5. उद्योग, व्यापार एवं वाणिज्य में इसका बहुत उपयोग होता है। विशेषकर जूते निर्माताओं, सिले-सिलाये वस्त्र तैयार करने वालों आदि के लिए यह बहुत उपयोगी है।

प्रश्न 14.
बहुलांक (Mode) के मुख्य दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
बहुलांक के मुख्य दोष निम्नलिखित हैं –

  1. समान आवृत्तियाँ होने पर इसका निर्धारण कठिन हो जाता है।
  2. सीमान्त मूल्यों की अवहेलना होती है।
  3. बीजगणितीय विश्लेषण सम्भव नहीं है।
  4. श्रेणी के सभी पदों पर आधारित नहीं होता है।
  5. श्रेणी में कभी-कभी बहुलांक भ्रमात्मक होता है।

प्रश्न 15.
बहुलांक (Mode) का प्रयोग किन परिस्थितियों में किया जाना चाहिए?
उत्तर :

बहुलांक का प्रयोग निम्नलिखित परिस्थितियों में करना वांछित है –

  1. सबसे कम शुद्ध केन्द्रीय प्रवृत्ति के मान की गणना के समय बहुलांक का प्रयोग उचित है।
  2. यदि निरीक्षण-मात्र से ही केन्द्रीय प्रवृत्ति की गणना करनी हो तो बहुलक उपयोगी है।
  3. वितरण के कुछ वर्ग या अंक छूटे होने पर भी बहुलांक का प्रयोग उचित है।
  4. व्यापार में अधिक प्रचलित वस्तु या लोकप्रिय फैशन से जुड़ी समस्या के अध्ययन में बहुलांक का सर्वाधिक प्रयोग होता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न I.
निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –

  1. बहुवचन में सांख्यिकी शब्द का अर्थ ………………….. से है, जो किसी विशिष्ट क्षेत्र से सम्बन्धित संख्यात्मक तथ्य होते हैं।
  2. ………………….. प्रदत्तों के संग्रह, उनके विश्लेषण तथा निष्कर्ष निकालने का विज्ञान है।
  3. सांख्यिकी में संख्याओं के रूप में व्यक्त किये गये तथ्य ही ………………….. कहलाते हैं।
  4. मनोविज्ञान के क्षेत्र में तुलनात्मक अध्ययन करने में सांख्यिकी ………………….. होती है।
  5. सांख्यिकी केवल संख्यात्मक तथ्यों का अध्ययन करती है, ………………….. का नहीं।
  6. सांख्यिकी द्वारा केवल ………………….. तथ्यों का ही अध्ययन किया जा सकता है।
  7. सांख्यिकी अपने आप में एक साधन है, ………………….. नहीं।
  8. संकलित आँकड़ों को जब एक निश्चित क्रम में लिखा जाता है तो इस भाँति बनी हुई पदमाला या श्रृंखला को ………………….. कहा जाता है।
  9. दिये गये प्रदत्तों के उच्चतम एवं न्यूनतम अंकों के अन्तर को ………………….. कहते हैं।
  10. आँकड़ों को समानता या सजातीयता के आधार पर वर्गों में व्यवस्थित करने को ………………….. कहते हैं।
  11. किसी प्राप्तांक के बार-बार आने की प्रवृत्ति को ………………….. कहते हैं।
  12. केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप समूह के प्राप्तांकों का ………………….. करती है।
  13. अव्यवस्थित सांख्यिकीय आँकड़ों को व्यवस्थित करके मध्यमान की गणना हेतु ………………….. निर्धारित किया जाता है।
  14. किसी कक्षा के बच्चों के प्राप्तांकों को जोड़कर बच्चों की कुल संख्या से भाग देने पर जो मान प्राप्त होता है, उसे ………………….. कहते हैं।
  15. केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों में सर्वाधिक शुद्ध माप ………………….. है।
  16. सांख्यिकी में दिये गये प्राप्तांकों को ठीक दो बराबर भागों में बांटने वाले बिन्दु को ………………….. कहते हैं।
  17. आरोही अथवा अवरोही क्रम में लिखे पदों के मध्य पद के रूप को ………………….. कहते हैं।
  18. किसी दी गयी पदमाला में सर्वाधिक बार आने वाले मूल्य को ………………….. कहते हैं।
  19. बहुलांक में श्रेणी के सीमान्त मूल्यों की ………………….. होती है।

उत्तर :

  1. सर्मकों या आंकड़ों
  2. सांख्यिकी
  3. समंक
  4. सहायक
  5. गुणात्मक तथ्यों
  6. सजातीय
  7. साध्य
  8. सांख्यिकी श्रेणी
  9. वर्ग विस्तार
  10. वर्गीकरण
  11. केन्द्रीय प्रवृत्ति
  12. प्रतिनिधित्व
  13. कल्पित मध्यमान
  14. मध्यमान
  15. मध्यमान
  16. मध्यांक
  17. मण्यांक
  18. पुलकि
  19. अपहेलना।

प्रश्न II
निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए।

प्रश्न 1.
शाब्दिक रूप से सांख्यिकी (Statlalc) का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
सांख्यिकी’ शब्द दो अर्थों में प्रयोग होता है। एकवचन के अर्थ में ‘सांख्यिकी का प्रयोग एक विज्ञान के रूप में किया जाता है। बहुवचन के अर्थ में सांख्यिकी का प्रयोग आँकड़ों, संख्याओं या समंकों के रूप में लिया जाता है।

प्रश्न 2.
सांख्यिकी के सन्दर्भ में समंकों की दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. समंक तथ्यों के समूह होते हैं तथा
  2. समंक संख्याओं के रूप में व्यक्त किये जाते हैं।

प्रश्न 3.
एक विज्ञान के रूप में सांख्यिकी की उचित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
लाविट के अनुसार, “सांख्यिकी वह विज्ञान है जो संख्यात्मक तथ्यों के संग्रह, वर्गीकरण तथा सारणीयन से सम्बन्ध रखता है, जिससे उन्हें घटनाओं की व्याख्या, विवरण और तुलना के लिए प्रयुक्त किया जा सके।

प्रश्न 4.
सांख्यिकी की प्रकृति क्या है?
उत्तर :
सांख्यिकी विज्ञान तथा कला दोनों है। इसमें किसी अनुसन्धान क्षेत्र से सम्बन्धित सामूहिक संख्यात्मक तथ्यों के संकलन, प्रदर्शन, विश्लेषण तथा निर्वचन की रीतियों का विधिवत् अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 5.
सांख्यिकी के विषय में वॉलिस और “रॉबर्टस का दृष्टिकोण क्या है?
उत्तर :
बॉलिस और रॉबर्ट्स के अनुसार, “सांख्यिकी स्वतन्त्र और मूलभूत ज्ञान का समूह नहीं है अपितु ज्ञान-प्राप्ति की रीतियों का समूह है।”

प्रश्न 6.
‘सांख्यिकीय श्रेणी की एक व्यवस्थित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
कॉनर के अनुसार, “जब दो चल-राशियों के मूल्यों को साथ-साथ इस भाँति व्यवस्थित किया जाये कि एक मापनीय अन्तर दूसरे के मापनीय अन्तर का सहगामी हो तो इस प्रकार से प्राप्त पदमाला को सांख्यिकीय श्रेणी कहते हैं।”

प्रश्न 7.
सांख्यिकीय श्रेणियों के मुख्य प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

(क) व्यक्तिगत श्रेणी
(ख) असतत या खण्डित या, विच्छिन्न श्रेणी तंथा
(ग) सतत या अखण्डित या अविच्छिन श्रेणी।

प्रश्न 8.
वर्गीकरण की एक व्यवस्थित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
कॉनर के अनुसार, “वर्गीकरण तथ्यों को उनकी विशेषताओं अथवा गुणों के आधार पर समूह एवं वर्गों में क्रमबद्ध करने की एक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य विभिन्नताओं के बीच समान तथ्यों को खोजकर एक साथ रखना है।”

प्रश्न 9.
सारणीयन की परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
कॉनर के अनुसार, “सारणीयन किसी विचाराधीन समस्या को स्पष्ट करने के उद्देश्य से किया जाने वाला सांख्यिकी तथ्यों का क्रमबद्ध एवं सुव्यवस्थित प्रस्तुतीकरण है।’

प्रश्न 10.
प्राप्तांकों को समूहबद्ध करने की विधियाँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर :

(क) समावेशी विधि
(ख) शुद्ध वर्गीकृत श्रृंखला विधि तथा
(ग) अपवर्जी विधि।

प्रश्न 11.
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप लिखिए।
उत्तर :

  1. मध्यमान, (Mean)
  2. मध्यांक (Median) तथा
  3. बहुलांक (Mode)

प्रश्न 12.
सांख्यिकीय माध्य या औसत से क्या आशय है?
उत्तर :
वह संख्या, जो किसी समूह-विशेष के सभी आँकड़ों का प्रतिनिधित्व करती है, उस समूह का सांख्यिकी माध्य या औसत कहलाती है।

प्रश्न 13.
मध्यमान (Mean) से क्या आशय है?
उत्तर :
मध्यमान वह मान है जो दिये हुए पदों के योगफल में पदों की संख्या से भाग देने पर प्राप्त होता है।

प्रश्न 14.
अव्यवस्थित प्राप्तांकों से मध्यमान ज्ञात करने का सूत्र लिखिए।
उत्तर :
[latex]{ M= }\frac { \Sigma X }{ N } [/latex]
यहाँ M = मध्यमान, ∑ = प्राप्तांकों का योग, N = प्राप्तांकों की संख्या।

प्रश्न 15.
मध्यांक (Median) से क्या आशय है?
उत्तर :
यदि आँकड़ों को आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित किया जाये तो बिल्कुल मध्य में पड़ने वाला आँकड़ा मध्यांक कहलाता है।

प्रश्न 16.
बहुलांक (Mode) से क्या आशय है?
उत्तर :
क्राक्सटन एवं काउडेन के अनुसार, “एक श्रेणी का बहुलांक वह मूल्य है। जिसके निकट श्रेणी की इकाइयाँ अधिक-से-अधिक केन्द्रित होती हैं।”

प्रश्न 17.
शुद्धता के दृष्टिकोण से मध्यमान, मध्यांक और बहुतांक या तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
परिणामों की शुद्धता के दृष्टिकोण से मध्यमान को सबसे अधिक शुद्ध, मध्यांक को अपेक्षाकृत कम शुद्ध तथा बहुलांक को सबसे कम शुद्ध माना जाता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सांख्यिकी का प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्ध है –

(क) विज्ञान से
(ख) संख्यात्मक तथ्यों से
(ग) सुझावों एवं संकेतों से
(घ) गुणात्मक तथ्यों से,

प्रश्न 2.
“सांख्यिकी को संख्यात्मक समंकों के एकत्रीकरण, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण तथा निर्वचन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।” प्रस्तुत परिभाषा के प्रतिपादक हैं –

(क) डॉ० बाउले
(ख) पर्सन और हार्लोज
(ग) क्रॉक्सटन और काउडेन
(घ) इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 3.
सांख्यिकी को माना जाता है –

(क) शुद्ध विज्ञान
(ख) शुद्ध कला
(ग) विज्ञान तथा कला दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 4.
मनोविज्ञान में सांख्यिकी की उपयोगिता है –

(क) आँकड़ों को सरल एवं बोधगम्य बनाना
(ख) आँकड़ों को सुस्पष्ट एवं संक्षिप्त प्रस्तुतीकरण
(ग) आँकड़ों के सहसम्बन्ध का वर्णन
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 5.
आँकड़ों के व्यवस्थापन की पद्धति है –

(क) वर्गीकरण
(ख) सारणीयन
(ग) रेखाचित्र प्रस्तुतीकरण
(घ) ये सभी

प्रश्न 6.
प्राप्तांक 76 की न्यूनतम सीमा है – [2014]

(क) 76
(ख) 76.5
(ग) 755
(घ) 75.

प्रश्न 7.
सांख्यिकी में प्राप्तांक 1 का विस्तार होता है – [2011]

(क) 0.0 से 1
(ख) 0.5 से 1
(ग) 0.5 से 1.5
(घ) 1 से 1.5 8.

प्रश्न 8.
आंकड़े 8, 23, 16, 15, 5, 26, 6, 38, 33, 11 एवं 15 का विस्तार है – (2015)

(क) 5
(ख) 6
(ग) 33
(घ) 38

प्रश्न 9.
केन्द्रीय प्रवृत्ति के माप हैं – (2008)

(क) मध्यमान तथा सहसम्बन्ध
(ख) मध्यांक तथा
(ग) बहुलक
(घ) मध्यमान, मध्यांक तथा बहुलक।

प्रश्न 10.
अंक वितरण के सभी अंकों को जोड़कर उनकी संख्या से भाग देने पर जो भागफल प्राप्त होता है, उसे कहते हैं – (2010)

(क) प्रतिशतांक
(ख) मध्येमान
(ग) मध्यांक
(घ) प्रसार

प्रश्न 11.
मध्यमान का गुण है –

(क) सर्वाधिक शुद्ध माप
(ख) शीघ्र एवं सरल गणना
(ग) दिये गये प्राप्तांकों का विशुद्ध प्रतिनिधित्व
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 12.
किसी सांख्यिकीय वितरण में ऊपर-नीचे दो बराबर भागों में बाँटने वाले बीच के अंक को कहते हैं –

(क) मध्यमान
(ख) मध्यांक
(ग) बहुलक
(घ) प्रतिशतांक

प्रश्न 13.
यदि दिये गये आँकड़ों को आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित किया जाए तो बिल्कुल मध्य में पड़ने वाला ऑकड़ा कहलाता है – (2007)

(क) मध्यमान
(ख) मध्यांक
(ग) बहुलांक
(घ) इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 14.
मध्यांक का दोष है –

(क) सीमान्त मूल्यों की अपेक्षा
(ख) निर्धारण में कठिनाई
(ग) कम पदों की दशा में सही प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता
(घ) उपर्युक्त सभी दोष

प्रश्न 15.
वितरण में जिस अंक की आवृत्ति सर्वाधिक होती है, उसे कहते हैं –

(क) मध्यांक
(ख) बहुलक
(ग) मध्यमान
(घ) चतुर्थांक

प्रश्न 16.
आँकड़े 8, 6, 8, 2, 11, 6, 8 एवं 5 में से है –

(क) मध्यमान
(ख) मानक विचलन
(ग) मध्यांक
(घ) बहुलांक

उत्तर :

  1. (ख) संख्यात्मक तथ्यों से
  2. (ग) क्रॉक्सटन और काउडन
  3. (ग) विज्ञान तथा कला दोनों
  4. (घ) उपर्युक्त सभी
  5. (घ) ये सभी
  6. (ग) 75.57
  7. (ख) 0.5 से 1 8.
  8. (ग) 33
  9. (घ) मध्यमान मध्यांक तथा बहुलेक
  10. (ख) मध्यमान
  11. (घ) उपर्युक्त सभी
  12. (ख) मध्याक
  13. (ख) मध्यांक
  14. (घ) उपर्युक्त सभी दोष
  15. (ख)बहुलक
  16. (घ) बहुलाका

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