UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 5 Family

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 5 Family (परिवार) are part of UP Board Solutions for Class 12 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 5 Family (परिवार).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 5
Chapter Name Family (परिवार)
Number of Questions Solved 39
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 5 Family (परिवार)

विस्तृत उत्तीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
परिवार की परिभाषा दीजिए तथा परिवार के कार्यों की विवेचना कीजिए। [2013, 15, 16]
या
परिवार से क्या तात्पर्य है? इसके विभिन्न कार्यों को समझाइए। [2015, 16]
उत्तर:

परिवार का अर्थ एवं परिभाषा

‘Family’ शब्द का उद्गम लैटिन शब्द ‘Famulus’ से हुआ है, जो एक ऐसे समूह के लिए। प्रयुक्त हुआ है जिसमें माता-पिता, बच्चे, नौकर और दास हों। साधारण अर्थों में विवाहित जोड़े को परिवार की संज्ञा दी जाती है, किन्तु समाजशास्त्रीय दृष्टि से यह परिवार शब्द का सही उपयोग नहीं है। परिवार में पति-पत्नी एवं बच्चों का होना आवश्यक है। विभिन्न विद्वानों ने परिवार को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है

मैकाइवर एवं पेज के अनुसार, “परिवार पर्याप्त निश्चित यौन सम्बन्ध द्वारा परिभाषित एक ऐसा समूह है जो बच्चों के जनन एवं लालन-पालन की व्यवस्था करता है।”

डॉ० दुबे के अनुसार, “परिवार में स्त्री और पुरुष दोनों को सदस्यता प्राप्त रहती है, उनमें कम-से-कम दो विपरीत लिंग के व्यक्तियों को यौनसम्बन्धों की सामाजिक स्वीकृति रहती है और उनके संसर्ग से उत्पन्न सन्तान मिलकर परिवार का निर्माण करते हैं।”

मरडॉक के अनुसार, “परिवार एक ऐसा सामाजिक समूह है जिसके लक्षण सामान्य निवास, आर्थिक सहयोग और जनन हैं। इसमें दो विषम लिंगों के वयस्क शामिल होते हैं, जिनमें कम-से-कम दो व्यक्तियों में स्वीकृत यौन सम्बन्ध होता है और जिन वयस्क व्यक्तियों में यौन-सम्बन्ध होता है, उनके अपने या गोद लिये हुए एक या अधिक बच्चे होते हैं।”

लूसी मेयर ने लिखा है, “परिवार एक गार्हस्थ्य समूह है, जिसमें माता-पिता और सन्तान साथसाथ रहते हैं। इनके मूल रूप में दम्पती और उनकी सन्तान रहती हैं।” । संक्षेप में, हम परिवार को जैविकीय सम्बन्धों पर आधारित एक सामाजिक समूह के रूप में परिभाषित कर सकते हैं, जिसमें माता-पिता और बच्चे होते हैं तथा जिसका उद्देश्य अपने सदस्यों के लिए सामान्य निवास, आर्थिक सहयोग, यौन-सन्तुष्टि, प्रजनन, समाजीकरण, शिक्षण आदि की सुविधाएँ जुटाना है।

परिवार के कार्य

परिवार समाज की सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई है। परिवार में बच्चा जन्म लेता है और विकसित होकर एक आदर्श नागरिक बनता है। परिवार वह कार्यशाला है जिसमें आदर्श नागरिक गढ़े जाते हैं। रूसेक के शब्दों में, “परिवार व्यक्तित्व को पालना है।” परिवार एक ऐसी सामाजिक संस्था है, जो मानव-जीवन के विकास में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह बालक को सीख देने वाली प्राथमिक पाठशाला है। परिवार एक ऐसा छोटा सामाजिक समूह है जो बालक में सामाजिक मूल्यों एवं रीति-रिवाजों के प्रति लगाव उत्पन्न करता है। समाज उच्छृखल बालक को नियन्त्रित और सामाजिक बनाकर अपनी भूमिका निभाता है। परिवार के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं
1. प्राणिशास्त्रीय कार्य-एक परिवार के द्वारा निम्नलिखित प्राणिशास्त्रीय कार्य सम्पादित किये जाते हैं

  • यौन-इच्छाओं की पूर्ति-परिवार विवाह संस्था के माध्यम से युवक और युवतियों को दाम्पत्य सूत्र में बाँधकर यौन-इच्छाओं की सन्तुष्टि करने का अवसर जुटाता है। बिना वैवाहिक सूत्र में बंधे समाज यौन-सम्बन्धों को मान्यता नहीं देता। इस प्रकार यौन आवश्यकताओं की पूर्ति कराने के रूप में परिवार का कार्य बहुत महत्त्वपूर्ण होता है।
  • सन्तानोत्पत्ति-सन्तान को जन्म देना परिवार का दूसरा महत्त्वपूर्ण प्राणिशास्त्रीय कार्य है। वैवाहिक जीवन में बँधकर दम्पती यौन-क्रियाओं के माध्यम से सन्तान को जन्म देते हैं। इस प्रकार उत्पन्न सन्तानों को समाज वैध मानता है।
  • प्रजाति की निरन्तरता बनाये रखना-परिवार और समाज प्रजाति की निरन्तरता को बनाये रखता है। वैवाहिक दम्पती सन्तानों को जन्म देकर अपनी प्रजाति के प्रभाव को प्रवाहित रखते हैं। इस कृत्य से प्रजाति की निरन्तरता बनी रहती है।

2. शारीरिक कार्य-परिवार के द्वारा निम्नलिखित शारीरिक कार्य सम्पन्न किये जाते हैं

  • शारीरिक सुरक्षा परिवार का एक महत्त्वपूर्ण कार्य सदस्यों को शारीरिक सुरक्षा प्रदान करना है। परिवार सदस्यों के चोटग्रस्त होने, दुर्घटना में अंग-भंग होने व गम्भीर रूप से बीमार होने पर उनकी सेवा-सुश्रुषा करता है।
  • बच्चों का पालन-पोषण शारीरिक कार्य के निमित्त बच्चों के पालन-पोषण के रूप में परिवार का कार्य बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। परिवार उसका लालन पालन कर उसे समाज का आवश्यक और उपयोगी अंग बनाता है।
  • आवास, भोजन एवं वस्त्रों की व्यवस्था–आवास, भोजन और वस्त्र मानवे की प्राथमिक आवश्यकताएँ हैं। परिवार अपने सदस्यों के लिए आवास, पुष्टिकारक भोजन तथा आरामदायक स्वच्छ वस्त्रों की व्यवस्था करता है। ये तीनों वस्तुएँ मानव के जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

3. आर्थिक कार्य-परिवार के द्वारा निम्नलिखित आर्थिक कार्य सम्पन्न किये जाते हैं

  • उत्तरधिकारी का निर्धारण-परिवार की पुरानी पीढ़ी नयी पीढ़ी को सम्पत्ति और पदों का हस्तान्तरण करती है। प्रत्येक परिवार में वंशगत सम्पत्ति को आदान-प्रदान होता है। पितृसत्तात्मक परिवार में पिता की सम्पत्ति पर पुत्र का तथा मातृसत्तात्मक परिवार में सम्पत्ति पर अधिकार माता के सम्बन्ध से निर्धारित होता है।
  • उत्पादक इकाई-उत्पादक इकाई के रूप में परिवार का कार्य महत्त्वपूर्ण माना जाता है। परिवार में कुटीर उद्योग चलाये जाते हैं। परिवार के सदस्य एक साथ मिलकर वंशानुगत व्यवसाय कर परिवार के लिए आजीविका जुटाते हैं। इस प्रकार उत्पादक इकाई के रूप में परिवार का कार्य महत्त्वपूर्ण है।
  • श्रम-विभाजन-परिवार श्रम-विभाजन का सरल रूप है। परिवार में स्त्री, पुरुष, बच्चों और वृद्धों के मध्य कार्यों का स्पष्ट विभाजन कर दिया जाता है। परिवार में बालकों के पालन-पोषण से लेकर बाह्य कार्य पुरुषों को सौंपे गये हैं। बच्चे पठन पाठन का कार्य करते हैं तथा घर के कार्यों में हाथ बंटाते हैं।

4. धार्मिक कार्य-परिवार अपने सदस्यों के लिए धार्मिक कार्य भी करता है। परिवार बच्चों को धर्म, आचरण, नैतिकता और परम्पराओं की शिक्षा देकर इस कार्य का निर्वाहन करता है। परिवार में रहकर ही बच्चा पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक, सदाचार और दुराचार में भेद करना सीखती है।

5. शिक्षण कार्य-परिवार को नागरिकता की प्रथम पाठशाला कहा जाता है। वह नवजात शिशु को विभिन्न सीखों द्वारा आदर्श नागरिक बनाता है। परिवार द्वारा प्रदत्त शिक्षाएँ व्यक्ति का जीवनभर मार्गदर्शन करती रहती हैं। परिवार बालक को प्रेम, त्याग, सहानुभूति, बलिदान और कर्तव्यपरायणता का पाठ पढ़ाकर उसे भावी जीवन के लिए प्रशिक्षित करता है। बच्चे के चरित्र-निर्माण में पारिवारिक शिक्षण की प्रमुख भूमिका रहती है।

6. मनोरंजनात्मक कार्य-परिवार अपने सदस्यों को स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करने का भी कार्य करता है। परिवार के सदस्य गप्पें लड़ाकर, बच्चों से खेलकर, चुटकुले सुनाकर व खेलकूद द्वारा मनोरंजन कर लेते हैं। समय-समय पर सम्पन्न होने वाले त्योहार और उत्सव भी परिवार में मनोरंजन प्रदान करते हैं। गीत, संगीत व लोकगीत आदि के द्वारा भी परिवार में भरपूर मनोरंजन किया जाता है।

7. मनोवैज्ञानिक कार्य-परिवार का एक महत्त्वपूर्ण कार्य अपने सदस्यों को मनोवैज्ञानिक सन्तुष्टि और सुरक्षा प्रदान करना है। परिवार में बच्चों को माँ की ममता, पिता का स्नेह और भाई-बहनों का प्यार मनोवैज्ञानिक सन्तोष प्रदान करता है। परिवार के मनोवैज्ञानिक कार्य बच्चे के मानसिक विकास और मस्तिष्क को विशाल बनाने में अभूतपूर्व सहयोग प्रदान करते हैं।

8. समाजीकरण का कार्य-परिवार समाजीकरण के अभिकरण के रूप में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। परिवार बच्चे का समाजीकरण करके उसे समाज के अनुकूल बनाता है। बच्चा सांस्कृतिक परम्पराओं, रूढ़ियों, रीति-रिवाजों और समाज के अनुरूप व्यवहार करने का ज्ञान परिवार से ही ग्रहण करता है।

9. मानव अनुभवों का हस्तान्तरण-परिवार में नयी पीढ़ी के सदस्य अपने पूर्वजों द्वारा मापदण्ड और अनुभवों का लाभ उठाते हैं। परिवार की प्रत्येक पीढ़ी इन अनुभवों को अगली पीढ़ी को हस्तान्तरित करती है। नयी पीढ़ी परिस्थितियों के अनुकूल पुरानी मान्यताओं और मूल्यों में परिवर्तन लाती है व नये-नये आविष्कार द्वारा उन्हें सुधारकर नयी पीढ़ी तक पहुँचाती है। परिवार सामाजिक सभ्यता और संस्कृति के विकास में अभूतपूर्व योगदान देता है।

10. सामाजिक नियन्त्रण के कार्य-सामाजिक नियन्त्रण के क्षेत्र में परिवार के कार्य अद्वितीय हैं। परिवार व्यक्ति का समाजीकरण करके सामाजिक नियन्त्रण के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह सदस्यों का चरित्र-निर्माण कर उन्हें- आदर्श नागरिक के रूप में ढाल देता है। परिवार सदस्यों को शैक्षिक, मनोरंजनात्मक व विवाह सम्बन्धी सहयोग देकर सामाजिक नियन्त्रण के क्षेत्र में बहुत सहयोग देता है। यह एकता, ,,, भाईचारा, त्याग, सहानुभूति आदि गुणों का विकास कर व्यक्ति की दानवी शक्तियों का दमन कर नियन्त्रण को बढ़ावा देता है। इस प्रकार, परिवार के अभाव में सामाजिक नियन्त्रण करना दूभर कार्य होगा।

प्रश्न 2
भारतीय समाज में संयुक्त परिवार का भविष्य क्या है? इसकी व्याख्या कीजिए। [2013]
उत्तर:

भारतीय समाज में संयुक्त परिवार का भविष्य

संयुक्त परिवार में हो रहे परिवर्तनों के सन्दर्भ में यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि संयुक्त परिवार का क्या भविष्य है? क्या वास्तव में संयुक्त परिवार टूट रहा है? और, क्या संयुक्त परिवारों का स्थान पश्चिमी देशों में पाए जाने वाले एकाकी परिवार लेते जा रहे हैं? अधिकांश विद्वानों ने संयुक्त परिवार पर किए गए अध्ययनों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है कि यद्यपि समकालीन भारत में संयुक्त परिवार छिन्न-भिन्न होकर एकाकी परिवारों का रूप ले रहे हैं और हमारी सामाजिक संरचना में उनका कोई विशेष स्थान नहीं है, तथापि वास्तविकता यह है कि आज भी संयुक्त परिवार हमारे देश में विद्यमान हैं और इनके छिन्न-भिन्न होने के निकट भविष्य में कोई आसार नहीं हैं। कृषि व्यवसाय, हिन्दू आदर्श तथा मनोवृत्तियाँ और विचार अभी भी संयुक्त परिवारों के पक्ष में हैं।

वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए संयुक्त परिवार के भविष्य के विषय में दो विचारधाराएँ सामने आती हैं—प्रथम, संयुक्त परिवार का भविष्य उज्ज्वल है तथा द्वितीय, संयुक्त परिवार का भविष्य अन्धकारमय है। प्रथम विचारधारा के समर्थक के०एम० कपाडिया हैं। उनके मतानुसार, संयुक्त परिवार ने अभी तक जिस कष्टमय समय को पार किया है, उसका भविष्य बुरा नहीं है।” उन्होंने आगे कहा है, “हिन्दू मनोवृत्तियाँ आज भी संयुक्त परिवार के पक्ष में हैं। इसी कारण विधियों द्वारा संयुक्त परिवार का विनाश अहिन्दू समझा जाता है, क्योंकि वह हिन्दू पारिवारिक मनोवृत्तियों की अवहेलना करता है। इनके द्वारा मुम्बई में किए गए सर्वेक्षण से भी हमें यह पता चलता है।

कि बहुमत (57%) लोग आज भी संयुक्त परिवार के पक्ष में हैं। इस मत को अधिकांश विद्वान् स्वीकार करते हैं। वास्तव में, संयुक्त परिवार परिवर्तित परिस्थितियों के अनुकूल अपने स्वरूप को बदल रहा है और इसका विघटन नहीं हो रहा है। आई०पी० देसाई भी इस विचारधारा के समर्थक हैं। उनका कहना है, “आज भी अधिकतर लोग संयुक्त पारिवारिक व्यवस्था को अच्छा समझते हैं और उसकी उपयोगिता से प्रभावित हैं।

” एम०एन० श्रीनिवास का विचार है। कि आधुनिक युग में भी संयुक्त परिवार की महत्ता बढ़ती जा रही है और संयुक्त परिवार की भावना केवल अलग रहने से समाप्त नहीं हो जाती। दूसरी विचारधारा के समर्थकों का कहना है कि संयुक्त परिवारों का विघटन हो रहा है और उसका भविष्य अन्धकारमय है। उदाहरणार्थ कोलण्डा के अनुसार, अधिकांश भारत में संयुक्त परिवारों की संख्या कम होती जा रही है तथा उसमें विघटन हो रहा है। टी०बी० बॉटोमोर ने 1951 ई० की जनगणना रिपोर्ट के आधार पर इस बात को उल्लेख किया है कि संयुक्त परिवार में काफी परिवर्तन आए हैं। संयुक्त परिवार से पृथक् घर बसाने की प्रवृत्ति निरन्तर बढ़ती जा रही है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि यद्यपि संयुक्त परिवार का तीव्रता के साथ विघटन हो रहा है तथापि भारत में इसका समूल विनाश हो जाना स्वाभाविक दिखाई नहीं देता। एकाकी परिवारों की बढ़ती संख्या के आधार पर हम यह नहीं कह सकते कि आने वाले समय में भारतीय समाज में संयुक्त परिवार पूर्णतः विघटित हो जाएँगे।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
परिवार की स्थायी व अस्थायी प्रकृति से आप क्या समझते हैं ? परिवार के महत्त्व को रूसेक ने क्या कहकर समझाया है ?
उत्तर:
परिवार एक समिति भी है और एक संस्था भी। पति-पत्नी और बच्चे मिलकर परिवाररूपी समिति का निर्माण करते हैं। समिति के रूप में परिवार अस्थायी है, क्योंकि तलाक, मृत्युं, पृथक्करण आदि के कारण परिवार की सदस्यता त्यागी जा सकती है, लेकिन एक संस्था के रूप में परिवार अमर है। परिवार के नियम और कार्य-प्रणाली मिलकर परिवाररूपी संस्था का निर्माण करते हैं। परिवार के सदस्यों के मरने या पृथक् हो जाने पर भी परिवार के नियम (अर्थात् संस्था) तो बने ही रहते हैं। इस रूप में परिवार अमर है, स्थायी है। ‘ परिवार के महत्त्व को प्राचीन काल से ही स्वीकार किया गया है। रूसेक कहते हैं, “परिवार व्यक्तित्व का पालना है।”

प्रश्न 2
परिवार के प्राणिशास्त्रीय कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
परिवार के प्राणिशास्त्रीय कार्य (Biological Functions) निम्नलिखित हैं–
1. यौन-इच्छाओं की पूर्ति-मानव की आधारभूत आवश्यकताओं में यौन-सन्तुष्टि भी महत्त्वपूर्ण है। परिवार ही वह समूह है जहाँ समाज द्वारा स्वीकृत विधि से व्यक्ति अपनी यौन-इच्छाओं की पूर्ति करता है। समाज में ऐसे स्त्री-पुरुषों को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता जो परिवार के बाहर अपनी यौन-इच्छाओं की पूर्ति करते हैं।
2. सन्तानोत्पत्ति-मानव-समाज की निरन्तरता बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि मृत्यु को प्राप्त होने वाले सदस्यों का स्थान नवीन सदस्यों द्वारा भरा जाए। परिवार ही समाज के इस महत्त्वपूर्ण कार्य को करता है। परिवार के बाहर भी सन्तानोत्पत्ति हो सकती है, किन्तु कोई भी समाज अवैध सन्तानों को स्वीकार नहीं करता।
3. प्रजाति की निरन्तरता-परिवार ने ही मानव-जाति को अमर बनाया है। यही मृत्यु और अमरत्व का संगम-स्थल है। नयी पीढ़ी को जन्म देकर परिवार ने मानव की स्थिरता एवं निरन्तरता को बनाये रखा है। गुडे लिखते हैं, “यदि परिवार मानव की प्राणिशास्त्रीय आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त व्यवस्था न करे तो समाज समाप्त हो जाएगा।

प्रश्न 3
परिवार नियोजन के प्रसार के लिए दो उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
परिवार नियोजन का अर्थ है। परिवार को उपलब्ध साधनों के अनुसार नियोजित करना। परिवार नियोजन का अर्थ मात्र जनसंख्या नियन्त्रण ही नहीं है, अपितु भारत में लोगों की आर्थिक दशा तथा देश के संसाधनों के परिप्रेक्ष्य में परिवार नियोजन का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या नियन्त्रण से ही लगाया जाना उचित होगा।

देश में फैली निर्धनता, बेकारी, भुखमरी, मूल्यवृद्धि जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए परिवार नियोजन को सर्वोपरि महत्ता देना नितान्त आवश्यक है। इसके दो उपाय निम्नवत् हैं
1. अज्ञानता व अन्धविश्वासों को दूर करना-भारत की अधिकांश जनसंख्या अशिक्षित (निरक्षर) है, जिसके कारण लोग अनेक अन्धविश्वासों एवं कुसंस्कारों से घिरे हुए हैं। वे समझते हैं कि बच्चे ईश्वरीय देन हैं। इस अज्ञानता के कारण परिवार नियोजन कार्यक्रम वांछित सफलता प्राप्त नहीं कर पा रहा है। हमें लोगों को शिक्षित करना होगा जिससे कि वे इस कार्यक्रम की महत्ता एवं लाभों को समझ सकें।

2. परिवार नियोजन अपनाने के लिए प्रोत्साहन देना-भारत के अधिकांश लोग निर्धन हैं तथा परिवार नियोजन की उनको अधिक आवश्यकता है। हमें उन्हें यह कार्यक्रम अपनाने के लिए उनके बीच जाकर इस कार्यक्रम की महत्ता बतानी होगी तथा उन्हें इसके लिए प्रोत्साहित करना होगा। उनको प्रोत्साहित करने के लिए उनके कुछ लाभों की घोषणा भी करनी चाहिए। जैसे–नौकरी में प्राथमिकता, नकद पुरस्कार या उनका सार्वजनिक
अभिनन्दन आदि।

प्रश्न 4
संयुक्त परिवार की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2016]
या
संयुक्त परिवार की दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2013, 14, 16]
उत्तर:

‘संयुक्त परिवार की मुख्य विशेषताएँ

संयुक्त परिवार की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
1. अधिक पीढ़ियों के लोग-संयुक्त परिवार में एकाकी परिवार की अपेक्षा सामान्यतः तीन-चार पीढ़ियों के लोग निवास करते हैं; जैसे-दादा-दादी, माता-पिता, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, भाई-बहनें भाइयों की पत्नियाँ तथा उनके बच्चे।

2. संयुक्त निवास-
संयुक्त परिवार की दूसरी विशेषता यह है कि इसके सभी सदस्य एक ही मकान में निवास करते हैं। इरावती कर्वे ने “एक ही छत के नीचे रहना” संयुक्त परिवार का मुख्य लक्षण बताया है। आई०पी० देसाई इस विशेषता को महत्व नहीं देते। वे इस पर बल देते हैं कि अगर सदस्य किसी कारणवश एक ही छत के नीचे नहीं रहते, परन्तु पारस्परिक अधिकारों एवं कर्तव्यों का पालन करते हैं तो उसे संयुक्त परिवार ही कहा जाता है। अधिकांश विद्वान संयुक्त परिवार की मुख्य विशेषता ही संयुक्त निवासस्थान बताते हैं। जब संयुक्त परिवार के सदस्यों की संख्या अधिक हो जाती है तो कभी-कभी व्यक्तिगत परिवारों के लिए अलग अलग घर ले लिये जाते हैं, परन्तु भोजन इत्यादि की व्यवस्था ‘बड़े घर में ही होती है।

3. संयुक्त भोजन-
संयुक्त परिवार का तीसरा लक्षण सदस्यों का सम्मिलित रूप से भोजन करना है, अर्थात् सभी सदस्य एक ही रसोई या चूल्हे का बना खाना खाते हैं। कर्ता की पत्नी की देखरेख में परिवार की सभी महिलाएँ (लड़कियाँ तथा बहुएँ) रसोई का कार्य करती हैं। परम्परागत रूप से संयुक्त परिवारों में पहले पुरुष भोजन करते हैं तथा बाद में महिलाएँ।

4. सामान्य सम्पत्ति-
परम्परागत रूप से संयुक्त परिवार का लक्षण सामान्य सम्पत्ति रहा है। संयुक्त परिवार उत्पादन एवं उपभोग दोनों का ही केन्द्र है; अतः न केवल सम्पत्ति पर सबका समान अधिकार होता है, अपितु एक सामान्य कोष में सभी सदस्य अपनी आय जमा करते हैं और इसी कोष से परिवार का खर्च चलता है। सभी सदस्यों पर समान रूप से बिना किसी भेद-भाव के खर्च होता है।

प्रश्न 5
पारिवारिक विघटन के कोई चार कारण बताइए। [2007, 11]
या
संयुक्त परिवार में आधुनिक परिवर्तनों का विश्लेषण कीजिए। [2010]
या
भारत में पारिवारिक विघटन के प्रमुख कारणों का वर्णन कीजिए। [2011, 15, 16]
या
परिवार की संरचना एवं प्रकार्य में होने वाले परिवर्तन के किन्हीं दो कारणों का उल्लेख कीजिए। [2011]
उत्तर:
पारिवारिक विघटन के चार मुख्य कारण निम्नलिखित हैं—
1. औद्योगीकरण एवं नगरीकरण-औद्योगीकरण के कारण लोग रोजगार की तलाश में औद्योगिक नगरों की ओर पलायन कर रहे हैं। साथ-साथ नगरीय जीवन की चमक-दमक तथा आरामदायक जिन्दगी भी मनुष्यों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। ये दोनों ही पारिवारिक विघटन के मुख्य कारक हैं।

2. आर्थिक आत्मनिर्भरता के प्रति झुकाव-आज का नवयुवक वर्ग संयुक्त परिवार की आर्थिक व्यवस्था सहन नहीं कर पाता है। उसके विचारों की आर्थिक आत्मनिर्भरता तथा आर्थिक स्वतन्त्रता ने प्रमुख स्थान धारण कर लिया है। इस कारण भी पारिवारिक विघटन को बल मिल रही है।

3. द्वेष एवं कलह से मुक्ति-आज संयुक्त परिवारों का वातावरण बड़ा बोझिल हो गया है। सदस्यों के सम्बन्ध औपचारिक होते जा रहे हैं तथा आत्मीयता कम होती जा रही है। इस कारण भी पारिवारिक विघटन बढ़ रहा है।

4. व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के प्रति आकर्षण-अधिक सदस्य होने के कारण संयुक्त परिवार में नवविवाहित दम्पती को भी कई बार स्वतन्त्र रूप से मिलना कठिन होता है। फिर यहाँ कर्ता का स्थान इतना अधिक प्रमुख होता है कि प्रत्येक सदस्य अपने को पराधीन अनुभव करता है। तथा स्वतन्त्रता के लिए लालायित रहता है। इस कारण भी पारिवारिक विघटन हो रहा है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
‘परिवार के बदलते स्वरूप में स्त्रियों की स्वतन्त्रता में वृद्धि’ से आप क्या समझते हैं? [2010]
उत्तर:
वर्तमान में परिवार की सम्पत्ति में स्त्रियों के साम्पत्तिक अधिकार बढ़े हैं। अब उन्हें नौकरी या व्यापार करने की भी स्वतन्त्रता है। इससे स्त्रियों की आर्थिक स्वतन्त्रता बढ़ी है। अब वे परिवार पर भार या पुरुषों की कृपा पर आश्रित नहीं हैं। इससे परिवार में स्त्रियों का महत्त्व बढ़ा है। स्त्री-शिक्षा के प्रसार ने सामाजिक चेतना लाने और स्त्रियों को अपने अधिकारों के प्रति सजग बनाने में योगदान दिया है। अब वे सामाजिक जीवन से सम्बन्धित विभिन्न गतिविधियों में भाग लेती हैं। इससे पारिवारिक क्षेत्र में कहीं-कहीं भूमिका-संघर्ष की स्थिति भी पायी जाती है।

प्रश्न 2
परिवार के बदलते स्वरूप में पिता के अधिकारों में क्या कमी आयी है तथा अन्य । सदस्यों का महत्त्व कैसे बढा है ? [2010]
उत्तर:
पिता के अधिकारों में कमी तथा अन्य सदस्यों के महत्त्व का बढ़ना–अब परिवार अधिनायकवादी आदर्शों से प्रजातान्त्रिक आदर्शों की ओर बढ़ रहे हैं। अब पिता परिवार में निरंकुश शासक के रूप में नहीं रहा है। परिवार से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण निर्णय अब केवल पिता के द्वारा नहीं लिये जाते। अब ऐसे निर्णयों में पत्नी और बच्चों का महत्त्व भी बढ़ता जा रहा है। अब परिवार में स्त्री को भार-स्वरूप नहीं समझा जाता। अब बच्चों के प्रति भी माता-पिता के मनोभावों में परिवर्तन आया है। वे समझने लगे हैं कि बच्चों को मार-पीटकर या उनकी इच्छाओं का दमन करके उन्हें सही रास्ते पर नहीं लाया जा सकता। स्पष्ट है कि परिवार में स्त्री-सदस्यों एवं बच्चों का महत्त्व बढ़ा है।

प्रश्न 3
परिवार के शिक्षात्मक कार्य क्या हैं ?
उत्तर:
परिवार ही बच्चे की प्रथम पाठशाला है, जहाँ उसके व्यक्तित्व का निर्माण होता है। परिवार के द्वारा दी गयी शिक्षाएँ जीवन-पर्यन्त उसका मार्गदर्शन करती रहती हैं। महापुरुषों की जीवनियाँ इस बात की साक्षी हैं कि उनके व्यक्तित्व-निर्माण में परिवार की भूमिका प्रमुख रही है। आदिम समय में जब आज की तरहे शिक्षण संस्थाएँ नहीं थीं तो परिवार ही शिक्षा की मुख्य संस्था थी। परिवार में ही बालक दया, स्नेह, प्रेम, सहानुभूति, त्याग, बलिदान, आज्ञापालन एवं कर्तव्यपरायणता का पाठ सीखता है। प्रश्न 4 परिवार के मनोवैज्ञानिक कार्य क्या हैं ? उत्तर: मनोवैज्ञानिक कार्य-परिवार अपने सदस्यों को मानसिक सुरक्षा और सन्तोष प्रदान करता है। परिवार के सदस्यों में परस्पर प्रेम, सहानुभूति और सद्भाव पाया जाता है। माता-पिता में से किसी की मृत्यु, तलाक, पृथक्करण, घर से अनुपस्थिति आदि के कारण बच्चों को स्नेह एवं मानसिक सुरक्षा नहीं मिल पाने पर उनके व्यक्तित्व का समुचित विकास नहीं हो पाता है।

प्रश्न 5
परिवार के ‘समाजीकरण का कार्य से क्या तात्पर्य है ?
या
व्यक्ति के समाजीकरण में परिवार की क्या भूमिका होती है ?
उत्तर:
समाजीकरण का कार्य-परिवार में ही बच्चे का समाजीकरण प्रारम्भ होता है। समाजीकरण की प्रक्रिया से ही मानव जैविक प्राणी से सामाजिक प्राणी बनता है। कॉम्टे (Comte) नामक विख्यात विद्वान् का यह कथन है कि “परिवार सामाजिक जीवन की अमर पाठशाला है।” वास्तव में यह कथन सत्य है, क्योंकि वहीं रहकर उसे परिवार और समाज के रीति-रिवाजों, प्रथाओं, रूढ़ियों और संस्कृति का ज्ञान प्राप्त होता है। धीरे-धीरे बच्चा समाज की प्रकार्यात्मक इकाई बन जाता है। परिवार ही समाज की संस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित करता है। वास्तव में, परिवार एक ऐसी संस्था है जिसका समाज में अद्वितीय स्थान है। परिवार में ही ज्ञान का संचय, संरक्षण एवं वृद्धि होती है। परिवार ही शिशु की प्रथम पाठशाला है।

प्रश्न 6
परिवार की दो विशेषताएँ लिखिए। [2015]
उत्तर:
परिवार अपनी जिन विशेषताओं के कारण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व प्रभावशाली माना जाता है, वे निम्न हैं
1. छोटा व सीमित आकार-परिवार में जन्म लेने वाले व्यक्ति या विवाह सम्बन्धों में बँधे व्यक्ति या नातेदारी सम्बन्धों में आने वाले व्यक्ति ही परिवार के सदस्य माने जाते हैं। यही “कारण है कि परिवार की एक विशेषता उसका छोटा एवं सीमित आकार है।
2. स्थायी व अस्थायी प्रकृति-चूँकि परिवार का निर्माण आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया जाता है; अत: इसकी प्रकृति समिति की तरह अस्थायी होती है लेकिन परिवार का निर्माण करते हुए कुछ निश्चित नियमों व व्यवहार प्रणालियों का ध्यान रखा जाता है, ‘जिनकी प्रकृति स्थायी होती है; अत: यह एक संस्था भी है।

प्रश्न 7
परिवार के चार कार्य लिखिए। [2016]
उत्तर:
परिवार के चार कार्य निम्नलिखित हैं

  1. यौन इच्छाओं की पूर्ति-परिवार का पहला प्रमुख कार्य विवाह संख्या के माध्यम से युवक-युवतियों को दाम्पत्य सूत्र में बाँधकर यौन-इच्छाओं की सन्तुष्टि करने का अवसर जुटाना है।
  2. सन्तानोपत्ति-सन्तान को जन्म देना परिवार का दूसरा प्रमुख कार्य है।
  3. बच्चों का पालन-पोषण-परिवार बच्चों का पालनपोषण कर उन्हें समाज का आवश्यक और उपयोगी अंग बनाता है।
  4. शिक्षण कार्य-परिवार को नागरिकता की प्रथम पाठशाला कहा जाता है। वह नवजात शिशु को विभिन्न सीखों द्वारा आदर्श नागरिक बनाता है।

प्रश्न 8
पारिवारिक विघटन से आप क्या समझते हैं? या पारिवारिक विघटन पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए। [2014]
उत्तर:
जब पति-पत्नी और परिवार के अन्य लोगों के सम्बन्धों में तनावे चरम सीमा पर पहुँच जाता है तो पारिवारिक विघटन आरम्भ हो जाता है। पारिवारिक विघटन में तलाक, अनुशासनहीनता, गृहकलह, पृथक्करण आदि समस्याओं का समावेश होता है। ये समस्याएँ परिवार के स्वरूप एवं गठन को ही बदल देती हैं। इसी स्थिति को पारिवारिक विघटन कहते हैं।

प्रश्न 9
परिवारों में वंशनाम की क्या व्यवस्था होती है ?
उत्तर:
सभी परिवारों में बच्चों का नामकरण करने का कोई-न-कोई आधार होता है। इसे उपनाम या वंशनाम कहते हैं। पितृवंशीय परिवारों में यह नामकरण पिता के वंश के आधार पर तथा मातृवंशीय परिवारों में माता के वंश के आधार पर होता है।

निश्चित उत्तररीय प्रश्न

प्रश्न 1
मैकाइवर एवं पेज ने परिवार की क्या परिभाषा दी है?
उत्तर:
मैकाइवर एवं पेज के अनुसार, “परिवार पर्याप्त निश्चित यौन-सम्बन्धों द्वारा परिभाषित एक ऐसा समूह है जो बच्चों के जनन एवं लालन-पालन की व्यवस्था करता है।”

प्रश्न 2
परिवार को मानव स्वभाव की पोषिका किसने कहा है ?
उत्तर:
चार्ल्स कूले ने परिवार को ‘मानव स्वभाव की पोषिका’ कहा है।

प्रश्न 3
परिवार व्यक्तित्व का पालना है।’ यह कथन किसका है ? [2013, 15, 16]
उत्तर:
यह कथन रूसेक नामक विद्वान् का है।

प्रश्न 4
संयुक्त परिवार से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
जिस परिवार में कई पीढ़ियों के सदस्य सामान्य भोजन, आवास और सामान्य कोष से सम्बन्धित रहते हैं, उसे संयुक्त परिवार कहते हैं।

प्रश्न 5
“परिवार सामाजिक नियन्त्रण का साधन है।” क्या यह सत्य है ?
उत्तर:
नहीं, क्योंकि परिवार सामाजिक नियन्त्रण का अभिकरण अथवा माध्यम है।

प्रश्न 6
पितृसत्तात्मक परिवार किसे कहते हैं ?
उत्तर:
ऐसा परिवार जिसमें सत्ता किसी पुरुष सदस्य में निहित होती है, जिसे परिवार का मुखिया या कर्ता कहा जाता है, उसे पितृसत्तात्मक परिवार कहते हैं।

प्रश्न 7
मातृसत्तात्मक परिवार का कर्ता कौन होता है ? [2009]
उत्तर:
मातृसत्तात्मक परिवार का कर्ता माता या बुजुर्ग महिला होती है।

प्रश्न 8
बहुपति-विवाही परिवार किसे कहते हैं ?
उत्तर:
जिस परिवार में एक स्त्री अनेक पुरुषों की पत्नी होती है, उसे बहुपति-विवाही परिवार कहते हैं।

प्रश्न 9
ऐसा परिवार जिसके सदस्य केवल पति, पत्नी तथा उसके अविवाहित बच्चे होते हैं, उसे ……….. परिवार कहते हैं। [2007]
उत्तर:
एकाकी।

प्रश्न 10
परिवार के सहयोगी आधार में कमी आने का मुख्य कारण क्या है ?
उत्तर:
परिवार में बढ़ती हुई व्यक्तिवादिता, परिवार के सहयोगी आधार में कमी आने का मुख्य कारण है।

प्रश्न 11
जब विवाह के पश्चात पति, पत्नी के साथ उसके माता-पिता के निवासस्थान पर रहने लगता है, तो ऐसे परिवार को क्या कहते हैं ?
उत्तर:
ऐसे परिवार को मातृस्थानीय परिवार कहते हैं।

प्रश्न 12
परिवार को शिशु की प्रथम पाठशाला क्यों कहते हैं ?
उत्तर:
क्योंकि सर्वप्रथम बच्चे का शिक्षण परिवार में होता है, इसीलिए परिवार को शिशु की प्रथम पाठशाला कहते हैं।

प्रश्न 13
नयी पीढी के आ जाने पर भी परिवार के सदस्यों की संख्या निश्चित सीमा तक ही क्यों बनी रहती है ?
उत्तर:
पुरानी पीढ़ी वृद्ध होकर मृत्यु को प्राप्त हो जाती है; अतः नयी पीढ़ी के आने पर भी सदस्यों की संख्या एक निश्चित सीमा तक बनी रहती है।

प्रश्न 14
आधुनिक परिवार तथा संयुक्त परिवार कैसे भिन्न हैं?
उत्तर:
आधुनिक परिवार का आकार छोटा होता जा रहा है, जबकि संयुक्त परिवार का आकार, अर्थात् सदस्य-संख्या, बड़ा होता है।

प्रश्न 15
परिवार एक समिति है या समुदाय? [2016]
उत्तर:
परिवार एक समिति है।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
परिवार की विशेषता है [2016]
(क) सार्वभौमिकता
(ख) अकेलापन
(ग) भावात्मक सम्बन्ध
(घ) संघर्ष

प्रश्न 2.
मातृसत्तात्मक परिवार होता है, जिसमें
(क) विवाह के बाद पत्नी पति के घर जाकर रहती है।
(ख) एक स्त्री कई पतियों की पत्नी हो सकती है।
(ग) पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की स्थिति ऊँची होती है।
(घ) माता की पूजा की जाती है।

प्रश्न 3.
जिस परिवार में पति-पत्नी और उनके अविवाहित बच्चों के अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति नहीं रहता, उसे कहते हैं [2007]
(क) संयुक्त परिवार
(ख) केन्द्रीय परिवार या नाभिक परिवार
(ग) मातृसत्तात्मक परिवार
(घ) बहुपति-विवाही परिवार

प्रश्न 4.
शास्त्रीय सिद्धान्त के अनुसार, परिवार का प्रारम्भिक स्वरूप था
(क) मातृसत्तात्मक
(ख) संयुक्त
(ग) पितृसत्तात्मक
(घ) मातृवंशीय

प्रश्न 5.
ऐसे परिवार जिनमें सत्ता किसी पुरुष सदस्य में निहित होती है, जिसे परिवार का मुखिया या कर्ता कहा जाता है, को कहते हैं
(क) पितृवंशीय परिवार
(ख) पितृसत्तात्मक परिवार
(ग) पितृस्थानीय परिवार
(घ) संयुक्त परिवार

प्रश्न 6.
किस नियमानुसार परिवार की सम्पत्ति में परिवार के प्रत्येक सदस्य का अधिकार जन्मजात होता है?
(क) दायभाग
(ख) सपिण्ड
(ग) मिताक्षरा
(घ) प्रवर

प्रश्न 7.
दायभाग की प्रथा भारत के किस राज्य में प्रचलित है ?
(क) हरियाणा में
(ख) पंजाब में
(ग) पश्चिम बंगाल में
(घ) बिहार में

प्रश्न 8.
परिवार में परिवर्तन हैं [2011]
(क) संरचनात्मक
(ख) प्रकार्यात्मक
(ग) संरचनात्मक एवं प्रकार्यात्मक
(घ) इनमें से कोई नहीं

उत्तर:
1. (ग) भावात्मक सम्बन्ध, 2. (ग) पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की स्थिति ऊँची होती है, 3. (ख) केन्द्रीय परिवार या नाभिक परिवार,
4. (ग) पितृसत्तात्मक, 5. (ख) पितृसत्तात्मक परिवार, 6. (ग) मिताक्षरा, 7. (ग) पश्चिम बंगाल में, 8. (घ) इनमें से कोई नहीं।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 5 Family (परिवार) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Sociology UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 5 Family (परिवार), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 1 Meaning, Definition and Scope of Psychology

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 1 Meaning, Definition and Scope of Psychology (मनोविज्ञान का अर्थ, परिभाषा एवं क्षेत्र) are part of UP Board Solutions for Class 11 Psychology. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 1 Meaning, Definition and Scope of Psychology (मनोविज्ञान का अर्थ, परिभाषा एवं क्षेत्र).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Psychology
Chapter Chapter 1
Chapter Name Meaning, Definition and Scope of Psychology
(मनोविज्ञान का अर्थ, परिभाषा एवं क्षेत्र)
Number of Questions Solved 25
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 1 Meaning, Definition and Scope of Psychology मनोविज्ञान का अर्थ, परिभाषा एवं क्षेत्र

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मनोविज्ञान से आप क्या समझते हैं। इसके आधुनिक स्वरूप को स्पष्ट कीजिए।
या
मनोविज्ञान के विकास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए इसकी उपयुक्त परिभाषा निर्धारित कीजिए।
या
“मनोविज्ञान व्यवहार का विज्ञान है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
या
मनोविज्ञान का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इसकी आधुनिक परिभाषा का विवेचन कीजिए।
उत्तर :
प्राणी कोई व्यवहार कब, क्यों और कैसे करता है? इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए ही मनोविज्ञान का जन्म हुआ। मनोविज्ञान के अध्ययन की परम्परा के साथ ही इसकी परिभाषा का प्रश्न उत्पन्न हुआ, क्योंकि परिभाषा के अभाव में किसी विषय का समुचित ज्ञान हो पाना सम्भव नहीं है। लेकिन मनोविज्ञान के अर्थ की परिभाषा को लेकर एक लम्बे समय तक विवाद चलता रहा है। मनोविज्ञान के विकास-क्रम में भिन्न-भिन्न स्तरों पर इसके अर्थ में परिवर्तन किया जाता रहा है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए मनोविज्ञान (Psychology) के शाब्दिक अर्थ तथा ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का सामान्य विवरण निम्नलिखित है–

मनोविज्ञान का अर्थ
(Meaning of Psychology)

‘मनोविज्ञान’ शब्द को अंग्रेजी में साइकॉलाजी (Psychology) कहते हैं, जो यूनानी भाषा के दो शब्दों साइके (Psyche) तथा लोगेस (Logas) से मिलकर बना है। साइके का अर्थ है-‘आत्मा’ (Soul) तथा लोगेस का अर्थ है-‘विज्ञान’ (Science)। इस प्रकार साइकॉलाजी का अर्थ हुआ आत्मा का विज्ञान (Science of soul), परन्तु मनोविज्ञान के इस अर्थ को अब स्वीकार नहीं किया जाता है।

मनोविज्ञान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
(Historical Background of Psychology)

आधुनिक मनोविज्ञान के विकास से पूर्व इस विषय का अध्ययन दर्शनशास्त्र के ही अन्तर्गत किया जाता था। 16वीं शताब्दी के दार्शनिकों ने इसे मन का विज्ञान स्वीकार किया और इसके बाद शनैः-शनैः यह विषय दर्शनशास्त्र से अलग हो गया।

लिपजिंग विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान की पहली प्रयोगशाला की स्थापना के साथ-साथ यह विषय प्रयोगात्मक विज्ञान की श्रेणी में आ गया और चेतना का विज्ञान स्वीकार किया गया। इस अर्थ में मनोविज्ञान की विषय-वस्तु चेतना की क्रियाओं का अध्ययन करना था। 1913 ई० में वाटसन द्वारा व्यवहारवाद की स्थापना के साथ ही मनोविज्ञान को व्यवहार का विज्ञान कहा जाने लगा। इस प्रकार समय में परिवर्तन के साथ-साथ मनोविज्ञान का अर्थ भी परिवर्तित होता गया।

मनोविज्ञान का अर्थ, परिभाषा एवं क्षेत्र 9 मनोविज्ञान के प्रारम्भिक अर्थ से इसके आधुनिक एवं प्रचलित अर्थ तक पहुँचने में निम्नलिखित सोपान प्रकाश-स्तम्भ का कार्य करते हैं। इनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है

प्रथम चरण: आत्म-दर्शन-ईसा से लगभग 500 वर्ष पूर्व, प्रारम्भिक काल में मनोविज्ञान का अध्ययने दर्शनशास्त्र के अन्तर्गत किया जाता था। यूनानी दार्शनिकों ने इस शास्त्र को ‘आत्म-दर्शन’ या ‘मानसिक दर्शन’ कहकर पुकारा था। प्लेटो ने मन और विचार को एक समझा तथा अरस्तू ने इसे ‘मानव की आत्मा का अध्ययन स्वीकार किया। इस प्रकार अपने प्रारम्भिक चरण में मनोविज्ञान का अर्थ ‘मानव की आत्मा के चारों ओर परिक्रमा कर रहा था।

द्वितीय चरण : मानसिक व्यापार–सत्रहवीं से अठारहवीं शताब्दी के मध्य चिन्तन की क्रियाओं का क्षेत्र विकसित हुआ जिसने साहचर्यवाद की विचारधारा को पुष्ट किया। अब मानसिक रोगियों तथा अपराधियों का अध्ययन मनोवैज्ञानिक दृष्टि से होने लगा था। इस चरण के प्रमुख विचारकों में रेन डेकार्ते, लाइबनीज, स्पीनोजा, बर्कले तथा डेविड ह्यूम का नाम प्रमुख है। अब मनोविज्ञान का अर्थ प्राणियों के मानसिक व्यापार तथा अनुभवों की ओर केन्द्रित होता जा रहा था।

तृतीय चरण : वैज्ञानिक प्रकृति-उन्नीसवीं शताब्दी के आस-पास मनोविज्ञान में जीव विज्ञान तथा भौतिक विज्ञान के नियमों के प्रवेश से मनोविज्ञान की प्रकृति वैज्ञानिक समझी जाने लगी। वुण्ट के प्रयासों से लिपजिग (जर्मनी) में मनोविज्ञान की प्रयोगशाला सबसे पहले स्थापित हुई और मेन अथवा चेतना के अनुभवों का मापन प्रयोगों की मदद से सम्भव हो सका। फलत: मनोविज्ञान का अर्थ मानव चेतना से मानव व्यवहार की ओर खिसकने लगा। इस चरण के विचारकों में वुण्ट के अलावा वेबर, गाल्टन, फेकनर, कैटल, जेम्स तथा ऐबिंगहास के नाम मुख्य हैं।

चतुर्थ चरण : व्यवहारवादी दृष्टिकोण–पावलोव के प्रतिबद्ध अनुक्रिया सिद्धान्त से प्रभावित वाटसन ने मनोविज्ञान को व्यवहार का नया अर्थ प्रदान किया। मैक्डूगल ने मनोविज्ञान को जीवित वस्तुओं के व्यवहार का विधायक विज्ञान बताया। मनोविश्लेषक फ्रायड ने अतृप्त इच्छाओं, कर्टलीविन ने ‘मनोवैज्ञानिक क्षेत्र की परिकल्पना’ तथा वर्दाईमर, कोहलर व कोफ्का ने ‘गेस्टाल्टवाद’ की क्विारधारा के माध्यम से मानव-व्यवहार को समझाया। स्पष्टत: बीसवीं शताब्दी के इस चरण में मनोविज्ञान को व्यवहारवादी दृष्टि से युक्त एक नया अर्थ मिला।।

मनोविज्ञान के ऐतिहासिक अध्ययन पर आधारित उपर्युक्त चारों सोपान स्पष्ट करते हैं कि आत्मा, मन और चेतना-सम्बन्धी अर्थ बदलता हुआ मनोविज्ञान धीरे-धीरे व्यवहार के विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित हो गया। इस सन्दर्भ में मनोविज्ञान की बदलती हुई परिभाषाओं का विवरण निम्नवर्णित है

मनोविज्ञान की परिभाषा
(Definition of Psychology)

मनोविज्ञान की विषय-वस्तु को स्पष्ट करने के लिए इनमें मनोवैज्ञानिकों ने समय-समय पर मनोविज्ञान की अनेक परिभाषाएँ प्रस्तुत की हैं। कुछ प्रमुख परिभाषाओं का विवरण निम्नलिखित है –

(1) मनोविज्ञान आत्मा का विज्ञान है (Psychology is the Science of Soul) – सर्वप्रथम प्लेटो ने मनोविज्ञान को आत्मा का विज्ञान बताया। बाद में अरस्तू ने भी इसकी पुष्टि की।
आलोचना–लेकिन आत्मा का स्वरूप निर्धारित न होने के कारण यह परिभाषा मान्य न हो सकी। लोगों को आत्मा के अस्तित्व के विषय में नाना प्रकार की शंकाएँ होने लगीं। मनोवैज्ञानिकों ने आत्मा को मनोविज्ञान की खोज स्वीकार नहीं किया। इसके प्रमुख कारण निम्नवर्णित हैं –
(i) आत्मा एवं शरीर के पारस्परिक सम्बन्ध को स्पष्ट नहीं किया गया था;
(ii) आत्मा के स्वरूप को वैज्ञानिक दृष्टि से अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता था; और
(iii) इस विचारधारा के समर्थकों ने आत्मा के विविध अर्थ बताये; अत: विज्ञान की कसौटी पर मनोविज्ञान का आत्मा-विषयक अर्थ खरा नहीं उतर सका। फलतः अपने अस्थिर स्वरूप के कारण आत्मा की विज्ञान सम्बन्धी परिभाषा को मनोविज्ञान की विषय-वस्तु से निकाल दिया गया। विलियम जेम्स का कथन है, “मनोविज्ञान का शाब्दिक अर्थ है—आत्मा का विज्ञान, किन्तु यह परिभाषौ अस्पष्ट है; क्योंकि आत्मा क्या है ? इस प्रश्न का हम सन्तोषजनक उत्तर नहीं दे सकते।”

(2) मनोविज्ञान सन का विज्ञान है (Psychology is the Science of Mind) –‘आत्मा का विज्ञान की परिभाषा अस्पष्ट होने के कारण विद्वानों ने मनोविज्ञान को ‘मन का विज्ञान’ कहकर परिभाषित किया। उनके अनुसार मनोविज्ञान ‘मन’ या ‘मस्तिष्क से सम्बन्धित क्रियाओं का अध्ययन है। यद्यपि इस परिभाषा के आधार पर मनोविज्ञान की विषय-सामग्री को बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक समझाया जाता रहा, किन्तु आत्मा के सदृश मन की यह परिभाषा भी लोकप्रिय न हो सकी।

आलोचना – आलोचकों ने मनोविज्ञान को मन का विज्ञान मानने वालों के विरुद्ध ये तर्क प्रस्तुत किये –

  1. यह स्पष्ट नहीं है कि मन और उसका स्वरूप क्या है ?
  2. मनोविज्ञान में केवल मानसिक प्रक्रियाओं (Mental Processes) अथवा वृत्तियों (Modes) का ही अध्ययन किया जाता है।
  3. इस परिभाषा से मनोविज्ञान की प्रकृति स्पष्ट नहीं होती, क्योंकि परिभाषा यह अभिव्यक्त नहीं कर पाती कि मनोविज्ञान एक विधायक विज्ञान है या नियामक विज्ञान।
  4. इस परिभाषा में मनुष्यों और पशुओं के बाह्य व्यवहार को सम्मिलित नहीं किया गया जिसका इस शास्त्र में सबसे अधिक अध्ययन किया जाता है।
  5. मनोविज्ञान को मन का विज्ञान बताने वाले विद्वान् स्वयं ही उसके एक सर्वमान्य अर्थ का निर्धारण नहीं कर सके।

(3) मनोविज्ञान चेतना का विज्ञान है (Psychology is the Science of Consciousness) – मनोविज्ञान के विकास की प्रक्रिया ने विद्वानों को मानव-व्यवहार को गहराई से अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया। फलस्वरूप चेतना के अनुभवों को व्यवहारों का आधार माना जाने लगा। विलहेम वुर्पट, विलियम जेम्स तथा जेम्स सली ने कहा कि मनोविज्ञान चेतना से सम्बन्धित विज्ञान है। विलियम जेम्स ने लिखा, ‘मनोविज्ञान की सर्वोत्तम परिभाषा ‘चेतना की दशाओं का वर्णन और व्याख्या के रूप में दी जा सकती है।’

आलोचना – ईस परिभाषा की निम्नलिखित आधारों पर आलोचना की गई है –

  1. मनोविज्ञान का प्रचलित अर्थ चेतना’ जैसे किसी तत्त्व को स्वीकार नहीं करता, न ही चेतना कोई बाह्य पदार्थ है। आधुनिक मनोविज्ञान तो चेतन प्रक्रियाओं को मानता है।
  2. विद्वानों ने चेतना के अलग-अलग अर्थ बताये। कुछ विद्वान् इसे विशिष्ट द्रव्य मानते हैं, तो कुछ इसे धारा के रूप में स्वीकार करते हैं, तो कुछ चेतना की प्रक्रिया मानते हैं। वस्तुतः स्वयं इस मत के अनुयायी भी चेतना’ को एक निश्चित अर्थ प्रदान नहीं कर सके।
  3. मनोविज्ञान की परिभाषा भी यह स्पष्ट नहीं कर पायी कि मनोविज्ञान को विधायक विज्ञान कहा जाए या कि नियामक विज्ञान।
  4. चेतना के माध्यम से मानव-स्वभाव के सभी पक्षों को नहीं समझाया जा सकता। इसके लिए तो हमें मनुष्य के अचेतन, अर्द्धचेतन तथा अवचेतन सभी पक्षों को समझना होगा।
  5. चेतना सम्बन्धी यह परिभाषा मनुष्य के व्यवहार की व्याख्या करने में भी असमर्थ रही। मैक्डूगल ने तो यहाँ तक कहा, “चेतना मूल रूप से एक बुरा शब्द है। यह मनोविज्ञान के लिए दुर्भाग्यपूर्ण रहा है कि यह शब्द सामान्य प्रयोग में आ गया।”

(4) मनोविज्ञान व्यवहार का विज्ञान है (Psychology is the Science of Behaviour) – बीसवीं शताब्दी के व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिक जे० बी० वाटसन ने मनोविज्ञान को व्यवहार के विज्ञान के रूप में परिभाषित करते हुए लिखा, “एक ऐसा मनोविज्ञान लिखना सम्भव है …………… जिसकी ‘व्यवहार के विज्ञान के रूप में परिभाषा की जा सके।” विलियम मैक्डूगल के अनुसार, “मनोविज्ञान एक ऐसा विधायक विज्ञान है जिसमें जीवों के व्यवहारों का अध्ययन होता है।” वुडवर्थ ने भी इस विचारधारा को सहमति प्रदान करते हुए कहा है, “सर्वप्रथम मनोविज्ञान ने अपनी आत्मा का त्याग किया, फिर उसने अपने मस्तिष्क का त्याग किया, तत्पश्चात् उसने अपनी चेतना का परित्याग किया, अब वह व्यवहार की विधि को अपनाता है।”

आलोचना – मनोविज्ञान की उपर्युक्त परिभाषाएँ भी आलोचनाओं से नहीं बच सकीं। इनकी परिसीमाएँ निम्नलिखित हैं –

  1. मनोविज्ञान को व्यवहार का विज्ञान बताने वाली इस परिभाषा में ‘व्यवहार’ शब्द का व्यापक अर्थ में प्रयोग नहीं किया। इसे अत्यन्त संकुचित अर्थों में प्रयोग किया गया है।
  2. इस विचारधारा के अनुसार व्यवहार का अर्थ वातावरण में उपस्थित उत्तेजना के प्रति प्राणी की अनुक्रिया है। इस भाँति मनोविज्ञान उत्तेजना-अनुक्रिया (Stimulus-Response) का अध्ययन कहा जा सकता है, जबकि इसमें आन्तरिक प्रक्रियाएँ भी सम्मिलित की जानी आवश्यक हैं।
  3. यह परिभाषा मनोविज्ञान की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करती; अर्थात् मनोविज्ञान को कैसा विज्ञान समझा जाए–नियामक विज्ञान अथवा विधायक विज्ञान।

मनोविज्ञान की आधुनिक परिभाषाएँ
(Modern Definitions of Psychology)

मनोविज्ञान की कुछ अन्य प्रमुख आधुनिक परिभाषाएँ निम्न प्रकार हैं –

  1. मैक्डूगल के अनुसार, “मनोविज्ञान एक ऐसा विधेयक विज्ञान है जिसमें जीवों के व्यवहार का अध्ययन होता है।”
  2. मर्फी के अनुसार, “मनोविज्ञान वह विज्ञान है जो उन अनुक्रियाओं का अध्ययन करता है जिन्हें जीवित व्यक्ति अपने वातावरण के प्रति करते हैं।’
  3. चार्ल्स ई स्किनर के अनुसार, “मनोविज्ञान जीवन की विभिन्न परिस्थितियों के प्रति प्राणी की प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करता है। प्रतिक्रियाओं अथवा व्यवहार से तात्पर्य प्राणी की सभी प्रकार की प्रतिक्रियाओं, समायोजन, कार्य-व्यापारों तथा अनुभवों से है।”
  4. जलोटा का मत है, “मनोविज्ञान मानसिक क्रियाओं का अध्ययन है, जिनका प्रदर्शन शारीरिक व्यवहारों में होता है और प्रत्यक्ष अनुभवों द्वारा उनका निरीक्षण होता है।”
  5. थाउलैस के अनुसार, “मनोविज्ञान मानव के अनुभव एवं व्यवहार का यथार्थ विज्ञान है।”

निष्कर्ष – उपर्युक्त परिभाषाओं का अध्ययन करने पर मनोविज्ञान की निम्नलिखित विशेषताओं पर प्रकाश पड़ता है.

  1. मनोविज्ञान मानव और पशु दोनों के व्यवहार का अध्ययन करने वाला एक विधायक विज्ञान है।
  2. मनोविज्ञान मानव को मनः शारीरिक प्राणी अर्थात् मन और शरीर से युक्त प्राणी मानता है।
  3. प्रत्येक मानव एक वातावरण में रहता है और उसमें उपस्थित विभिन्न तत्त्वों से क्रिया-प्रतिक्रिया करता है, जिसे ‘मानव-व्यवहार’ कहते हैं। मनोविज्ञान इसी मानव-व्यवहार के भिन्न-भिन्न पक्षों का क्रमबद्ध अध्ययन करता है।
  4. मनोविज्ञान प्राणी के व्यवहार पर वातावरण के भौतिक तथा अभौतिक प्रभावों का अध्ययन करता है तथा अन्तिम रूप से प्राणियों की ज्ञानात्मक, क्रियात्मक तथा संवेगात्मक प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करता है।

मनोविज्ञान की उपयुक्त परिभाषा – मनोविज्ञान की उपयुक्त परिभाषाओं की समीक्षा करने से यह ज्ञात होता है कि इनमें से कोई भी परिभाषा सर्वमान्य कहलाने की अधिकारी नहीं है। प्रत्येक परिभाषा में कुछ-न-कुछ दोष अवश्य है। अत: यह निश्चित नहीं किया जा सकता कि एक आदर्श परिभाषा की कसौटी पर किस परिभाषा को खरा समझा जाए। यद्यपि मैक्डूगल और वुडवर्थ की परिभाषाएँ एक ही सीमा तक तर्क संगत समझी जाती हैं, तथापि उसके आधार पर यह जोड़ना उचित होगा कि “मनोविज्ञान प्राणियों के व्यवहार का विधायक विज्ञान है और वातावरण के प्रति उन समस्त अनुक्रियाओं का क्रमबद्ध अध्ययन करता है जो उसके परिवेश के साथ समायोजन में सहायक होते हैं।”

प्रश्न 2.
आधुनिक मनोविज्ञान को विज्ञान की श्रेणी में क्यों रखा जाता है ?
या
आप किस प्रकार सिद्ध करेंगे कि मनोविज्ञान एक विज्ञान है ?
या
मनोविज्ञान की प्रकृति का उल्लेख करते हुए इसकी प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।”
उत्तर :
मनोविज्ञान की प्रकृति
(Nature of Psychology)

प्रायः मनोविज्ञान की प्रकृति के विषय में यह प्रश्न किया जाता है कि इसे ‘विज्ञान’ कहा जाये या ‘कला’ और यदि यह एक विज्ञान है तो किस प्रकार का विज्ञान है ? विज्ञान का शाब्दिक अर्थ है-‘विशिष्ट ज्ञान अथवा किसी वस्तु या क्षेत्र के बारे में क्रमबद्ध ज्ञान। मनोविज्ञान में प्राकृतिक विज्ञानों के अनुरूप ही सभी विशेषताएँ पायी जाती हैं और यह अपनी विषय-वस्तु का क्रमबद्ध अध्ययन विशेष वैज्ञानिक तथा प्रयोगात्मक विधि के माध्यम से करता है।

आधुनिक मनोविज्ञान एक विज्ञान है।
(Modern Psychology is a Science)

आधुनिक मनोविज्ञान में प्राकृतिक विज्ञानों की तरह उच्च वैज्ञानिक, सांख्यिकीय तथा गणितीय विधियों का प्रयोग किया जाता है। रॉबिन्सन, मॉर्गन तथा किंग आदि विद्वानों ने चार ऐसी विशेषताओं का वर्णन किया है जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि मनोविज्ञान एक विज्ञान है। ये विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(1) आनुभविक अध्ययन – मनोविज्ञान में प्राणी के व्यवहारों एवं मानसिक क्रियाओं का अध्ययन प्रयोग, तथा निरीक्षण विधि के द्वारा किया जाता है। अध्ययन के परिणाम वस्तुनिष्ठ और पूर्णतया विश्वसनीय होते हैं। मनोवैज्ञानिक प्रयोग के परिणामों की वैधता की जाँच प्रयोग की पुनरावृत्ति द्वारा कर सकते हैं। इसी भाँति आँकड़ों की जॉच भी की जा सकती है। विषय-वस्तु का ऐसा आनुभविक अध्ययुन विज्ञान के अन्तर्गत ही सम्भव है। इस तरह मनोविज्ञान एक विज्ञान की श्रेणी में आ जाता है।

(2) क्रमबद्ध दृष्टिकोण का सिद्धान्त – मनोविज्ञान के अन्तर्गत मनुष्य तथा पशु के व्यवहारों के विषय में प्रयोग एवं निरीक्षण विधि द्वारा जो आँकड़े प्राप्त किये जाते हैं, उन्हें अलग-अलग बिखरे हुए नहीं छोड़ा जाता, अपितु उन्हें क्रमबद्ध रूप से सारणियों में व्यवस्थित किया जाता है। अन्य प्राकृतिक विज्ञानों के समान, मनोवैज्ञानिक सांख्यिकीय एवं गणितीय विधियों के आधार पर सिद्धान्तों को प्रतिपादन करते हैं जिससे मनुष्य एवं पशु के व्यवहारों के बारे में भविष्यवाणी करने में मदद मिलती है। उदाहरण के लिए, थॉर्नडाइक ने बिल्ली पर प्रयोग करके उसके व्यवहार सम्बन्धी आँकड़ों को क्रमबद्ध किया और मनोविज्ञान का एक प्रमुख सिद्धान्त ‘प्रयत्न एवं भूल का सिद्धान्त’ (Trial and Error Theory) प्रतिपादित किया।

(3) मापन की सुविधा – यथार्थ मापन की सुविधाएँ होने पर ही किसी विषय को विज्ञान कहा जा सकता है। मनोविज्ञान में प्राकृतिक विज्ञानों की तरह मापन की सुविधा उपलब्ध है। मनोवैज्ञानिकों ने प्राणियों के व्यवहार तथा मानसिक प्रक्रियाओं को मापने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक प्रविधियाँ विकसित की हैं, जिन्हें मनोवैज्ञानिक परीक्षण (Psychological Test) कहा जाता है। इस प्रकार से विषय-वस्तु का मापन एक विज्ञान के अन्तर्गत ही सम्भव है।

(4) पदों की परिभाषा – किसी विज्ञान का मनुष्य गुण यह भी है कि उसके पद (Terms) तथा सम्प्रत्यय (Concepts) सही ढंग से परिभाषित होते हैं। मनोविज्ञान के प्रमुख पद; जैसे-प्रेरणा, संवेदना, चिन्तन, अधिगम तथा बुद्धि आदि संक्रियात्मक एवं वैज्ञानिक ढंग से परिभाषित किये गये हैं। इसका यह लाभ है कि मनोविज्ञान की विषय-वस्तु को यथार्थ मापन सम्भव हो जाता है, उसका अध्ययन वस्तुनिष्ठ हो जाता है तथा पूर्वकथन भी सही होता है।

उपर्युक्त विशेषताओं के आधार पर निर्विरोध कहा जा सकता है कि मनोविज्ञान का अध्ययन आनुभविक है। इसकी विषय-वस्तु से सम्बन्धित सभी तथ्य क्रमबद्ध एवं सुव्यवस्थित हैं जिनके आधार पर किसी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया ज़ सकता है। इसमें वैज्ञानिक प्रविधियों द्वारा व्यवहार एवं मानसिक क्रियाओं का मापन किया जा सकता है तथा इसके समस्त पद भली प्रकार परिभाषित हैं और इसी कारण मनोविज्ञान भी एक विज्ञान है।

मनोविज्ञान की वैज्ञानिकता की विशेषताएँ
(Characteristics of Psychology as a Science)

मनोविज्ञान को विज्ञान सिद्ध करने वाली कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(1) वैज्ञानिक पद्धति – मनोविज्ञान के अन्तर्गत किये जाने वाले सभी अध्ययन वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित होते हैं। विज्ञान की प्रयोग विधि में प्रयोगशाला, यन्त्र तथा उपकरणों का अधिकाधिक उपयोग किया जाता है एवं वांछित परिस्थितियों को नियन्त्रित किया जा सकता है। आजकल मनोवैज्ञानिक अध्ययन में प्रयोग विधि की इन सभी शर्तों का पालन किया जाता है। अत: मनोविज्ञान की वैज्ञानिक पद्धति स्पष्ट एवं निश्चित कही जा सकती है।

(2) व्यापकता – मनोविज्ञान एक व्यापक अध्ययन है, जिसमें मनुष्य से लेकर पशु तक के व्यवहारों को सम्मिलित किया गया है। मनोविज्ञान मानव तथा पशु-समाज के अन्तर्गत आने वाली समस्त इकाइयों का पृथक् तथा समूहगत दोनों प्रकार से अध्ययन करता है। इतना ही नहीं, यह तो गर्भ में पल रहे शिशु से लेकर प्रौढ़ मनुष्य तक की समस्त अवस्थाओं में उसके विकास तथा क्रियाओं का भी अध्ययन करता है।

(3) विधायक विज्ञान या तथ्यात्मकता – मनोविज्ञान की एक विशेषता तथ्यात्मकता है। यह एक विधायक विज्ञान है जो प्रत्येक वस्तु का अध्ययन तथ्य के रूप में करता है। इसका अर्थ यह है कि यह ‘क्या है ?’ का अध्ययन करता है। इसका इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि क्या होना चाहिए ? विधायक विज्ञान के रूप में मनोविज्ञान का एक गुण तटस्थता भी है, क्योंकि तथ्यात्मक अध्ययन के परिणाम न तो किसी के पक्ष में होते हैं और न किसी के विपक्ष में। वे तो केवल तथ्य को प्रकट करते हैं।

(4) सार्वभौमिकता – मनोविज्ञान के सिद्धान्त सार्वभौमिक (universal) होते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि मनोविज्ञान के सामान्य सिद्धान्तों पर देश, काल एवं पात्र की भिन्नता का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यदि परिस्थितियाँ एकसमान हैं तो प्रत्येक समय में, प्रत्येक स्थान पर मनोविज्ञान के सिद्धान्तों को सदा ही प्रमाणित किया जा सकता है।

(5) कार्य-कारण सम्बन्धों का अध्ययन – प्रत्येक क्रिया अथवा प्रघटना का कुछ-न-कुछ कारण अवश्य होता है। इसी प्रकार प्रत्येक मानव-व्यवहार के पीछे भी कोई-न-कोई कारण अवश्य होता है। मनोविज्ञान इस बात का विश्लेषण करती है कि विशिष्ट व्यवहार का क्या कारण है एवं किस विशिष्ट व्यवहार से प्रभावित होकर मनुष्य क्या व्यवहार करेगा ? कार्य-कारण सम्बन्धों के अध्ययन से मनोविज्ञान व्यवहार के सामान्य नियम निर्धारित करता है। ये नियम और सिद्धान्त सही तथा निश्चित होते हैं।

(6) पूर्वानुमान या भविष्यवाणी – मनोवैज्ञानिक पूर्वानुमान या भविष्यवाणियाँ कार्य-कारण सम्बन्ध पर आधारित होती हैं। यदि हम एक घटना (अर्थात् कारण) को जानते हैं तो हम दूसरी घटना (अर्थात् परिणाम) की भविष्यवाणी कर सकते हैं। आधुनिक समय में मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के माध्यम से मानव व्यवहार के सम्बन्ध में पूर्वानुमान किये जा सकते हैं। पूर्वानुमान उचित व्यवसाय के लिए उचित व्यक्ति का चुनाव करने में मदद करते हैं।

निष्कर्षतः मनोविज्ञान की ये विशेषताएँ; यथा—वैज्ञानिक पद्धति, व्यापकता, तथ्यात्मकता, सार्वभौमिकता, कार्य-कारण सम्बन्ध तथा पूर्वानुमान; इसे पूरी तरह विज्ञान बना देते हैं। हाँ, मनोविज्ञान तथा प्राकृतिक विज्ञानों के बीच एक आधारभूत अन्तर अवश्य है। मनोविज्ञान प्राणियों के व्यवहार एवं मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है, जबकि प्राकृतिक विज्ञान स्थूल तत्त्वों से सम्बन्ध रखते हैं।

प्रश्न 3.
मनोविज्ञान के अध्ययन क्षेत्र को स्पष्ट कीजिए।
या
मनोविज्ञान का क्षेत्र बताइए तथा स्पष्ट कीजिए कि इसका क्षेत्र दिनो-दिन बढ़ता जा रहा या मनोविज्ञान के बढ़ते हुए क्षेत्र पर विस्तार से प्रकाश डालिए।
या
‘बाल मनोविज्ञान से आप क्या समझते हैं? ।
उत्तर :
मनोविज्ञानं का क्षेत्र
(Scope of Psychology)

मनोविज्ञान का क्षेत्र जीवन की विविध परिस्थितियों में मानव के व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन है। मनोविज्ञान के अध्ययन के क्षेत्र में उन समस्त विषय-सामग्रियों को शामिल किया जाता है जो मानव-जीवन के विभिन्न पक्षों से सम्बन्धित हैं तथा मानव-कल्याण के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। इस भाँति, मनोविज्ञान का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है जिसका सम्पूर्ण एवं विशद वर्णन करना यहाँ प्रायः असम्भव है। अत: हम मनोविज्ञान से सम्बन्धित उन प्रमुख शाखाओं का विवरण प्रस्तुत करेंगे जिनमें इसकी अध्ययन-सामग्री को विभाजित किया गया है –

(1) सामान्य मनोविज्ञान – सामान्य मनोविज्ञान मानव-व्यवहार के सामान्य पक्षों तथा उसके सैद्धान्तिक स्वरूपों का अध्ययन करता है। यह मनोविज्ञान का एक व्यापक क्षेत्र है जिसके अन्तर्गत मनोविज्ञान का अर्थ, परिभाषा, अध्ययन की विधियाँ, संवेग, प्रेरणा, प्रत्यक्षीकरण, सीखना, स्मृति, अवधान, चिन्तन एवं कल्पना, बुद्धि एवं व्यक्तित्व और संवेदना आदि का अध्ययन किया जाता है। मनोविज्ञान के गहन अध्ययन से पूर्व यह आवश्यक समझा जाता है कि मनोविज्ञान के समस्त क्षेत्रों के सामान्य सिद्धान्तों का अध्ययन किया जाए।

(2) वैयक्तिक मनोविज्ञान – वैयक्तिक मनोविज्ञान के अन्तर्गत व्यक्तिगत लक्षणों के आधार पर व्यक्ति-विशेष के मनोविज्ञान का ज्ञान प्राप्त किया जाता है। हम जानते हैं कि विश्व के कोई भी दो व्यक्ति सभी लक्षणों में एकसमान नहीं हो सकते। इसी आधार पर व्यक्तित्व के भी विभिन्न प्रकार हैं। पी० टी० यंग (Young) ने मानव व्यक्तित्व को तीन भागों में बाँटा है–अन्तर्मुखी, बहिर्मुखी तथा उभयमुखी। वैयक्तिक मनोविज्ञान इन तीनों ही प्रकार के व्यक्तित्वों का व्यापक अध्ययन करता है।

(3) वैयक्तिक भिन्नता का मनोविज्ञान – अध्ययन बताते हैं कि व्यक्तियों में वैयक्तिक भिन्नता शारीरिक के साथ-ही-साथ मानसिक स्तर पर भी होती है। मनोविज्ञान की यह शाखा इन भिन्नताओं को समझने में हमारी सहायता करती है। मनोवैज्ञानिक, भिन्नताओं का कारण जानने के अतिरिक्त उनका मापन भी करते हैं। मापन के लिए मानसिक परीक्षणों का सहारा लिया जाता है। वैयक्तिक भिन्नताओं को मापने के लिए अनेक परीक्षणों का निर्माण किया गया है; जैसे-व्यक्तित्व प्रश्नावली, उपलब्धि परीक्षण, विशेष योग्यता परीक्षण तथा बुद्धि परीक्षण आदि। परीक्षणों का निर्माण करते समय वस्तुनिष्ठ मापन को महत्त्व प्रदान किया जाता है।

(4) समाज मनोविज्ञान – व्यक्तियों से मिलकर समाज बनता है। समाज का वास्तविक विकास तभी सम्भव है जब व्यक्ति’ और ‘समूह’ के मनोविज्ञान में सुन्दर सामंजस्य हो; अतः समाज मनोविज्ञान व्यक्ति के व्यवहार का अध्ययन सामाजिक परिस्थितियों के सन्दर्भ में करता है। मनोविज्ञान की यह शाखा सामाजिक परिवर्तनों के साथ-ही-साथ भीड़, श्रोता समूह, प्रचार, विज्ञापन आदि का मनोवैज्ञानिक अध्ययनं करती है। समाज मनोवैज्ञानिक सामाजिक क्षेत्रों में व्याप्त तनावों, संघर्षों, अपराधों तथा पूर्वाग्रहों का अध्ययन कर उनके निदान तथा उपचार-सम्बन्धी सुझाव देता है।

(5) बाल मनोविज्ञान – बाल मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की एक महत्त्वपूर्ण शाखा है। इसमें गर्भस्थ शिशु से लेकर बारह वर्ष तक की आयु के बालक-बालिकाओं के विकास का क्रमिक रूप से अध्ययन किया जाता है। बाल्यावस्था में शरीर और मन का तेजी से विकास होता है। इस अवस्था में बालक नवीन प्रत्ययों को तेजी से सीखता है तथा इस काल के प्रभाव एवं आदतें स्थायी होती हैं। यही कारण है। कि बालक के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा, शिक्षा की व्यवस्था, व्यवहार संशोधन तथा सामंजस्य से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान में बाल मनोविज्ञान ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

(6) किशोर मनोविज्ञान – किशोरवस्था मानव-जीवन का एक नाजुक तथा महत्त्वपूर्ण मोड़ है। इस अवस्था में मानव-व्यवहार का विशिष्ट अध्ययन करने के लिए मनोविज्ञान की एक पृथक् शाखा का विकास हुआ जिसे किशोर-मनोविज्ञान कहा जाता है। यह शाखा तेरह वर्ष से लेकर उन्नीस वर्ष तक की आयु के बालक-बालिकाओं के विकास का क्रमबद्ध अध्ययन करती है। किशोरावस्था में आने वाले परिवर्तनों के कारणों का विश्लेषण कर मनोवैज्ञानिक उनके नियन्त्रण के उपाय बताते हैं जिससे व्यक्तित्व के सन्तुलित विकास तथा भावी समायोजन में सहायता मिलती है। इस भाँति किशोर मनोविज्ञान, मनोविज्ञान के अध्ययन का अत्यन्त उपयोगी क्षेत्र है।

(7) उत्पत्तिमूलक मनोविज्ञान – व्यक्ति, जाति, प्रजाति तथा जातीय नस्लों की उत्पत्ति तथा उनके क्रमिक विकास का अध्ययन मनोविज्ञान की जिस शाखा में किया जाता है. उसे उत्पत्तिमूलक मनोविज्ञान कहते हैं। इस शाखा का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है, क्योंकि इसके अन्तर्गत शिशु, बालक, किशोर और प्रौढ़ आदि समस्त वर्गों का सामूहिक अध्ययन किया जाता है।

(8) विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान – मनोविज्ञान की इस शाखा के अन्तर्गत मानव-व्यवहार से सम्बन्धित स्वाभाविक क्रियाओं का विश्लेषण किया जाता है। इससे व्यवहार का अध्ययन व्यवस्थित और सुविधाजनक बन जाता है। इस प्रकार के अध्ययन में मस्तिष्क की जटिल क्रियाओं को उनके भिन्न-भिन्न भागों में बाँट दिया जाता है। इस क्षेत्र के अन्तर्गत प्रयोग की जाने वाली विधियों में अन्तर्दर्शन, निरीक्षण तथा प्रयोग विधि मुख्य हैं।

(9) मनो-भौतिक मनोविज्ञान – मनोविज्ञान की इस आधुनिक एवं महत्त्वपूर्ण शाखा को विकसित करने का श्रेय वेबर तथा फिचनर को दिया जाता है। इसमें मानसिक क्रियाओं, संवेदनाओं तथा भौतिक उद्दीपनों के मध्य परिमाणात्मक सम्बन्धों का अध्ययन करते हैं। उदाहरणार्थ, मनो-भौतिक मनोविज्ञान के नियम बताते हैं कि प्रकाश के उद्दीपनों की प्रबलता का प्रकाश की संवेदना पर क्या प्रभाव पड़ता है तथा दो उद्दीपनों को अलग-अलग पहचानने के लिए कितना न्यूनतम अन्तर होना चाहिए।

(10) मनोविश्लेषणात्मक मनोविज्ञान – आधुनिक मनोविज्ञान की अत्यधिक महत्त्वपूर्ण शाखा सिगमण्ड फ्रॉयड द्वारा प्रतिपादित मनोविश्लेषणात्मक मनोविज्ञान है। फ्रॉयड ने अचेतन मन में निहित इच्छाओं को ज्ञात करके उनके कारणों का पता विश्लेषण के द्वारा लगाया। फ्रॉयड ने स्वप्न, दिवास्वप्न, हास्य-विनोद, भूलना, लिखने-बोलने तथा कार्य करने सम्बन्धी त्रुटियों के अलावा कला एवं धर्म आदि का भी विश्लेषण करके उनके अचेतन कारणों का पता लगाया। इससे न केवल मनोविज्ञान के क्षेत्र में एक विशाल एवं रोचक साहित्य का सृजन हुआ, अपितु मानसिक रोगियों के लिए मनोचिकित्सा पद्धति का भी विकास हुआ।

(11) प्रेरणात्मक मनोविज्ञान – मनोविश्लेषणात्मक तथा असामान्य मनोविज्ञान से विकसित ज्ञान की इस शाखा का एक नाम ‘सामान्य प्रेरणा का मनोविज्ञान’ भी है। इसके अन्तर्गत प्राणी की उन आन्तरिक क्रियाओं की व्याख्या की जाती है जिन्हें वह बाह्य जगत में सन्तुष्ट करना चाहता है। प्रायः देखने में आता है कि मनुष्य की इच्छाओं के सन्तुष्ट न हो पाने के कारण उसके व्यक्तित्व का सन्तुलन और सामाजिक समायोजन बिगड़ने लगता है—मनुष्य की ऐसी उलझनों, आदतों तथा इच्छाओं का अध्ययन और व्यवहार के विविध ढंगों की खोज प्रेरणात्मक मनोविज्ञान के अन्तर्गत की जाती है।

(12) लोक मनोविज्ञान – लोक मनोविज्ञान, आधुनिक मनोविज्ञान की एक महत्त्वपूर्ण शाखा है। जिसमें आदिवासी जातियों के क्रमिक विकास का अध्ययन किया जाता है। मनोविज्ञान की यह शाखा इन जातियों में पाए जाने वाले अन्धविश्वासों, पौराणिक कथाओं, धर्म, संगीत तथा कला आदि में निहित मनोवैज्ञानिक तथ्यों की विवेचना करती है और उनकी तुलना आधुनिक समाजों से करती है।

(13) पशु-मनोविज्ञान – पशु मनोविज्ञान का विकास पशुओं और मनुष्यों की समानता के आधार पर हुआ। मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से सम्बन्धित ऐसे अनेक प्रयोग हैं जिन्हें सीधे मनुष्यों पर आरोपित नहीं किया जा सकता; जैसे–मस्तिष्क के किसी भाग को निकालकर उसका प्रभाव देखना तथा आनुवंशिकता सम्बन्धी प्रयोग। ऐसे परीक्षण पशुओं पर सरलता से किये जा सकते हैं तथा उनके निष्कर्षों की तुलना मानव से सम्बन्धित तथ्यों से की जा सकती है। इस प्रकार के अध्ययनों में पशुओं की मूल प्रवृत्तियाँ तथा उनके सीखने के ढंग शामिल हैं।

(14) शारीरिक मनोविज्ञान – यद्यपि मनोविज्ञान मानसिक क्रियाओं का अध्ययन है, किन्तु मन का शरीर से अटूट सम्बन्ध है। मानव-व्यवहार तथा स्वभाव को समझने के लिए विविध शारीरिक अंगों की संरचना तथा उनकी क्रियाओं का अध्ययन अपरिहार्य है। यही कारण है कि मनोविज्ञान की यह शाखा मस्तिष्क, स्नायु मण्डल, संग्राहकों, प्रभावकों तथा मांसपेशियों का विधिवत् अध्ययन करती है। और प्राप्त ज्ञान का उपयोग मानव-व्यवहार की व्याख्या के लिए करती है।

(15) परा-मनोविज्ञान – मनुष्य के विलक्षण व्यवहारों को ‘अलौकिक घटना या परा-सामान्य घटना कहा जाता है; जैसे–स्वप्न में किसी व्यक्ति को देखकर अगले दिन उससे आश्चर्यजनक भेट हो जाना, किसी सफर में चलने से पूर्व न जाने की अप्रकट चेतावनी मिलना और सफर में दुर्घटना का होना, किसी दूर के प्रियजन का विचार मन में आना और अप्रत्याशित रूप से उसका आ जाना। इन अलौकिक या परा-सामान्य घटनाओं का अध्ययन मनोविज्ञान की जो शाखा करती है उसे परामनोविज्ञान कहा जाता है।

(16) प्रयोगात्मक मनोविज्ञान – प्रयोगात्मक मनोविज्ञान आधुनिक मनोविज्ञान का सबसे प्रमुख क्षेत्र है जो प्रयोगों की सहायता से मानसिक क्रियाओं यथा-स्मृति, बुद्धि, सीखना, संवेग, संवेदना आदि प्रत्ययों का अध्ययन करता है और इस भाँति मनोविज्ञान को विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित करता है। मनोविज्ञान की इस शाखा के विकास का श्रेय विलहेम वुण्ट, कैटेल तथा फ्रांसिस गाल्टन जैसे मनोवैज्ञानिकों को जाता है।

(17) असामान्य मनोविज्ञान – मनोविज्ञान में प्राणी के सामान्य व्यवहार के अतिरिक्त उसके असामान्य व्यवहार का भी अध्ययन किया जाता है। मनोविज्ञान की यह शाखा मन की असामान्य अवस्थाओं तथा स्थायी एवं अस्थायी मनोविकृतियों का अध्ययन करती है। इसके अन्तर्गत सनकीपन, भ्रान्तियाँ, अन्धापन, वातरोग, वातोन्माद (हिस्टीरिया), आतंक (फोबिया), हकलाना, चरित्र-विकार, असामाजिक व्यक्तित्व, स्नायु रोग, मानसिक दुर्बलता तथा विविध प्रकार के उन्माद शामिल किये जाते हैं। उपचार की व्यवस्था के कारण असामान्य मनोविज्ञान ने एक नयी शाखा ‘चिकित्सा मनोविज्ञान को भी जन्म दिया है।

(18) व्यावहारिक मनोविज्ञान – यदि सामान्य मनोविज्ञान मानव के स्वभाव तथा व्यवहार के सैद्धान्तिक पक्षों का अध्ययन करता है तो व्यावहारिक मनोविज्ञान इन सिद्धान्तों अथवा नियमों की मानव-जीवन में उपयोगिता खोजता है। व्यावहारिक मनोविज्ञान का अध्ययन मानव एवं उसके समाज की समस्याओं के समाधान से सीधा सम्बन्ध रखता है और इस प्रकार एक अत्यन्त उपयोगी क्षेत्र समझा जाता है। इसके अन्तर्गत विभिन्न मनोवैज्ञानिक परीक्षण, शिक्षा एवं व्यवसाय के लिए निर्देशन, मानसिक स्वास्थ्य, अपराध, सामूहिक तनाव, प्रचार एवं विज्ञापन, औद्योगिक तथा कानूनी मनोविज्ञान विशेष रूप से सम्मिलित हैं।

(19) शिक्षा-मनोविज्ञान – शिक्षा के क्षेत्र की अनेक समस्याओं का समाधान सामान्य मनोविज्ञान के सिद्धान्तों के आधार पर किया जाता है। इनमें मुख्य समस्याएँ बच्चों के शिक्षण, अधिगम, योग्यताओं, अभिप्रेरणा, आकांक्षा-स्तर, पाठ्यक्रम, परीक्षा, उपलब्धि तथा भविष्य योजनाओं से सम्बन्धित होती हैं। शिक्षा-मनोविज्ञान इन सभी समस्याओं का अध्ययन कर उचित समाधान प्रस्तुत करता है।

(20) पर्यावरणीय-मनोविज्ञान – पर्यावरणीय-मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की आधुनिकतम (Recent) शाखाओं में से एक है। इस विज्ञान की विषय-वस्तु मौसम, जलवायु, मृदा तथा भौगोलिक दृश्य-इन चारों क्षेत्रों से सम्बन्धित है। मनोविज्ञान की इस शाखा के अन्तर्गत प्राकृतिक पर्यावरण को मानव-व्यवहार एवं उसकी मानसिक अवस्थाओं से सम्बद्ध करके अध्ययन किया जाता है।

मनोविज्ञान का क्षेत्र एवं विषय-विस्तार दिन-प्रतिदिन वृद्धि कर रहा है। आधुनिक युग में जीवन का कोई भी क्षेत्र एवं पक्ष ऐसा नहीं है जो मनोविज्ञान के अध्ययन-क्षेत्र से बाहर हो। सच तो यह है कि मनोविज्ञान की विस्तृत होती जा रही परिधि को संक्षिप्त विवरण में सीमित नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न 4
मानव-जीवन में मनोविज्ञान की उपयोगिता एवं महत्व को स्पष्ट कीजिए।
या
विभिन्न उदाहरणों द्वारा स्पष्ट कीजिए कि मानव-जीवन के प्रायः सभी क्षेत्रों में मनोविज्ञान उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण है।
उत्तर :
मनोविज्ञान का मूल्य अथवा उपयोगिता एवं महत्त्व
(Value or Utility and Importance of Psychology)

मानव-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मनोविज्ञान ने मूल्यवान योगदान प्रदान किया है। मनोविज्ञान के अध्ययन ने मानव-जीवन के सभी पक्षों को प्रभावित किया है जिसके परिणामस्वरूप मानव के दृष्टिकोण में सकारात्मक परिवर्तनों का जन्म हुआ। इस शास्त्र के सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक ज्ञान ने मानव की व्यक्तिगत तथा सामूहिक समस्याओं का समाधान खोजने में पर्याप्त सहायता दी है। इस भाँति मनोविज्ञान को मनुष्य के दैनिक जीवन में विशेष महत्त्व है। मानव-जीवन को सुखमय बनाने में | मनोविज्ञान की उपयोगिता निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत वर्णित है

(1) व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान में मनोविज्ञान की उपयोगिता – आधुनिक मानव स्वयं को गम्भीर समस्याओं से घिरा पाता है। ये समस्याएँ जीवन के विभिन्न पक्षों से सम्बन्धित हैं और मनुष्य के शारीरिक, मानसिक, सांवेगिक एवं आध्यात्मिक विकास में अवरोध उत्पन्न करती हैं। मनोविज्ञान का ज्ञान इन अवरोधों को हटाने में हमारी पर्याप्त सहायता करता है। बहुत-सी शारीरिक समस्याओं का समाधान मनोवैज्ञानिक विश्लेषण द्वारा सम्भव है। अनुकूलन की समस्या भी मनोविज्ञान के ज्ञान द्वारा हल होती है। मनोविज्ञान के ज्ञान से विभिन्न मानसिक रोगों तथा समस्याओं को दूर करने में सहायता मिलती है। मानव व्यक्तित्व के सन्तुलन तथा विकास में मनोवैज्ञानिक निर्देशन की विशिष्ट भूमिका है। अच्छी आदतों तथा उत्तम चरित्र के निर्माण में मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होते हैं। इस भाँति मनुष्य की व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान में मनोविज्ञान के ज्ञान की अनिवार्यता निर्विवाद है।

(2) शिक्षा के क्षेच्च में मनोविज्ञान की उपयोगिता – मनोविज्ञान ने शिक्षा के क्षेत्र में आधारभूत परिवर्तनों को जन्म दिया है। मनोविज्ञान से सम्बन्धित खोजों ने सम्पूर्ण शैक्षिक प्रक्रिया का दृष्टिकोण ही बदल दिया है। आधुनिक शिक्षा का केन्द्र-बिन्दु शिक्षक से हटकर ‘बालक’ हो गया है अर्थात् शिक्षा ‘बाल केन्द्रित हो गयी है। बालक को दण्ड का भय दिखाकर सीखने के लिए बाध्य नहीं किया जाता; अपितु उसकी भावनाओं को समझकर उसमें अपेक्षित व्यवहार परिवर्तन लाये जाते हैं। बालक को मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों के आधार पर सीखने एवं शिक्षा के लिए प्रेरित किया जाता है। मनोविज्ञान ने शिक्षा से सम्बन्धित विभिन्न पक्षों में क्रान्तिकारी परिवर्तन उपस्थित किये हैं–पाठ्यक्रम, शिक्षण-विधियाँ, शिक्षण-सहायक सामग्री, अभिप्रेरणा के तरीकों तथा सीखने के सिद्धान्तों में मनोविज्ञान का अपूर्व योगदान स्पष्ट है। मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र से सम्बन्धित विभिन्न समस्याओं का समाधान सरल हो गया है।

(3) अपराधियों के सुधार तथा अपराधों के नियन्त्रण में मनोविज्ञान की उपयोगिता – मनोविज्ञान के ज्ञान ने अपराध जगत् को एक अभूतपूर्व सकारात्मक दिशा प्रदान की है। पहले अपराधियों को शारीरिक यन्त्रणाओं के माध्यम से सुधारने के प्रयास किये जाते थे, किन्तु आज मनोविज्ञान ने इस धारणा को मूलतः बदल दिया है। मनोविज्ञान की मान्यता है कि मनुष्य जन्म से अपराधी नहीं होता, अपितु समाज की परिस्थितियाँ उसे अपराधी बना देती हैं। अपराध को जन्म देने वाली परिस्थितियों तथा कारणों का विश्लेषण कर अपराधी में सुधार हेतु प्रयास किये जाने चाहिए। अतः दण्ड के स्थान पर सुधारात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए तथा परिस्थितियों में सुधार का प्रयास किया जाना चाहिए। इसी कारण से आजकल सुधार-गृहों, खुले जेलखानों, बोस्टेल स्कूलों एवं प्रोबेशन की व्यवस्था की गयी है। मनोविज्ञान ने बाल-अपराधियों के लिए भी उदारवादी एवं सुधारात्मक समाधान प्रस्तुत किये हैं। मनोविज्ञान का ज्ञान समाज में अपराधों को नियन्त्रित करने में भी सहायक सिद्ध होता है। यदि पारिवारिक एवं सामाजिक परिस्थितियों में सुधार कर लिया जाये तो निश्चित रूप से क्रमश: बाल-अपराधों एवं अपराधों में कमी आ सकती है।

(4) चिकित्सा के क्षेत्र में मनोविज्ञान का महत्त्व –  शिक्षा एवं अपराध के अतिरिक्त-मभोविज्ञान का चिकित्सा के क्षेत्र में भी विशेष महत्त्व है। दुर्भाग्य से, पहले मन्द बुद्धि वाले व्यक्तियों तथा मानसिक रोगियों के साथ समाज का व्यवहार अच्छा नहीं था। विक्षिप्त अथवा पागल व्यक्तियों के रोग को भूत-प्रेत आदि की आपदाओं का शिकार माना जाता था। उन्हें जंजीरों से बाँधकर रखा जाता था और उन पर अमानवीय अत्याचार किये जाते थे। इस प्रकार के अन्धविश्वासों का खण्डन करके मनोविज्ञान ने इस प्रकार के रोगों के कारणों का पता लगाकर समुचित चिकित्सा की पद्धति विकसित की है। इस भाँति, मनोविज्ञान मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की सहायता से मनोरोगियों के उपचार की व्यवस्था करता है। आधुनिक मनोवैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार कुछ शारीरिक रोगों का कारण भी मनोवैज्ञानिक ही होता है तथा उनका उपचार भी मनोवैज्ञानिक उपायों द्वारा किया जा सकता है।

(5) उद्योग तथा व्यापार के क्षेत्र में उपयोगिता – मनोविज्ञान ने उद्योग तथा व्यापार के क्षेत्र को नये आयाम दिये हैं। औद्योगिक मनोविज्ञान’ नामक मनोविज्ञान की एक शाखा तो विशेषत: औद्योगिक क्षेत्र की समस्याओं का अध्ययन करती है तथा उनका समाधान प्रस्तुत करती है। उद्योगों में हड़ताल तथा तालाबन्दी की समस्याएँ, मजदूर तथा मिल-मालिकों के आपसी सम्बन्ध, कर्मचारियों के कार्य की दशाओं में सुधार और कर्मचारियों की भर्ती सम्बन्धी समस्याएँ आदि ऐसे विषय हैं जिन्हें मनोवैज्ञानिक आधार की आवश्यकता है। मनोविज्ञान ने मानवीय क्षमताओं तथा कौशल के आधार पर श्रम विभाजन का विचार किया, जिससे कम श्रम तथा समय में बेहतर उत्पादन की युक्तियाँ विकसित की गईं। मनोवैज्ञानिक खोजों ने प्रचार तथा विज्ञापन के क्षेत्र को अत्याधुनिक और सर्वाधिक उपयोगी बना दिया है।

(6) मनोविज्ञान स्वयं तथा दूसरों को समझने में सहायक – मनोविज्ञान का अध्ययन मनुष्य के निजी व्यक्तित्व को समझने में सहायता देता है। मनोविज्ञान के ज्ञान से व्यक्ति अपनी शक्तियों, योग्यताओं, क्षमताओं, रुचियों तथा स्वभाव से परिचित होता है और उनके समुचित विकास हेतु प्रयास करता है। मनोविज्ञान के अध्ययन से व्यक्ति अपने व्यवहार-सम्बन्धी कमियों का ज्ञान प्राप्त कर उनमें संशोधन करने की चेष्टा करता है। इस भाँति वह स्वयं को सहज ही वातावरण से समायोजित कर लेता है। इसके अतिरिक्त मनोविज्ञान के जोन से दूसरे लोगों से भिन्न व्यवहार के कारणों तथा स्वभाव का पता चलता है जिससे उनके साथ समायोजन में सहायता मिलती है। इस प्रकार से मनोविज्ञान का अध्ययन मात्र स्वयं को समझने में ही सहायक नहीं है बल्कि इससे दूसरों को समझने में भी सहायता मिलती है।

(7) राजनीतिक क्षेत्र में मनोविज्ञान का महत्त्व – आधुनिक राजनीति में मनोविज्ञान का सक्रिय योगदान है। जनता की इच्छा के विरुद्ध चलने वाली सरकारें स्थायी नहीं होतीं तथा थोड़े समय में ही गिर जाती हैं। चुनाव के दौरान प्रत्याशियों को अपने प्रचार में मनोवैज्ञानिक तरीके अपनाने होते हैं। चुनाव-प्रचार जितना अधिक मनोवैज्ञानिक होगा, चुनाव में उतनी ही अधिक सफलता प्राप्त होगी। प्रजातान्त्रिक व्यवस्था के अन्तर्गत शासन प्रबन्ध चलाने, कानून बनाने तथा सुधारवादी प्रस्तावों के लिए भी मनोवैज्ञानिक समझ होनी चाहिए। देश के नेतागण अपने पद तथा राजनीतिक अस्तित्व की रक्षा हेतु मनोविज्ञान का सहारा लेते हैं। वे जनता के प्रति मनोवैज्ञानिक ढंग से अपना प्रेम, सहानुभूति, सम्मान या अपनी उपलब्धियाँ प्रस्तुत करते हैं। जनक्रान्ति को रोकने तथा जनसमूह पर नियन्त्रण रखने के लिए भी मनोविज्ञान का ज्ञान आवश्यक है। इस प्रकार, राजनीतिक क्षेत्र में मनोविज्ञान का अध्ययन मूल्यवान समझा जाता है। आज वही नेता लोकप्रिय हो सकता है जो जन-साधारण के मनोविज्ञान का ज्ञाता है।

(8) सामाजिक समस्याओं के समाधान हेतु मनोविज्ञान की उपयोगिता – प्रत्येक सामाजिक समस्या का अपना मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण होता है। आज भारतीय समाज विभिन्न कुरीतियों, विषमताओं तथा समस्याओं का शिकार है; उदाहरण के लिए-दहेज-प्रथा, जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, आतंकवाद, बेरोजगारी तथा हिंसा की प्रवृत्तियाँ। इन समस्याओं के समाधान हेतु प्रयास करते समय उनके मनोवैज्ञानिक पक्ष की अनदेखी नहीं की जा सकती। ये समस्याएँ समाज के व्यक्तियों से सम्बन्ध रखती हैं। और समाज के व्यक्तियों की भावनाओं, रुचियों, अभिरुचियों, प्रथाओं एवं परम्पराओं का अध्ययन करके ही उनकी मनोवृत्तियों में परिवर्तन सम्भव है। समाज मनोविज्ञान, सामाजिक समस्याओं के मनोवैज्ञानिक पक्ष को समझकर उनके समाधान का प्रयास करता है। इस प्रकार सामाजिक समस्याओं को हल करने में मनोविज्ञान के अध्ययन की अत्यधिक आवश्यकता प्रतीत होती है।

(9) युद्धकाल में मनोविज्ञान की उपयोगिता – भले ही युद्ध एक बुराई तथा सभ्य मानव समाज के लिए कलंक है, परन्तु प्रत्येक देश-काल में युद्ध होते रहे हैं तथा भविष्य में भी होते रहेंगे। इस स्थिति में प्रत्येक देश सम्भावित युद्धों में विजय प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहता है। युद्धों में सफलता के दृष्टिकोण से भी मनोविज्ञान का ज्ञान उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण है। मनोविज्ञान के ज्ञान ने युद्ध-कार्यों में भारी सहायता प्रदान की है। शीत-युद्ध मनोवैज्ञानिक प्रचार पर आधारित होते हैं। जल, स्थल और वायु सेना में सैनिकों की भर्ती के लिए आवश्यक है कि उनका चुनाव वांछित योग्यतानुसार किया जाये। भर्ती से पूर्व उन्हें मनोवैज्ञानिक परीक्षाएँ देनी होती हैं। जो अभ्यर्थी इन परीक्षणों में सफलता प्राप्त कर लेते हैं उन्हें सेवाओं में प्रवेश मिल जाता है। युद्धकाल में आक्रमण से पूर्व तथा युद्ध घोषित होने के पश्चात् जनता की प्रतिक्रियाओं का मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। सैनिकों को प्रेरित करने की दृष्टि से देश के नेतागण सीमा पर जाते हैं। इससे सैनिकों का हौसला बढ़ता है और वे बड़े-से-बड़े बलिदान करने के लिए तत्पर हो जाते हैं। इसके विपरीत, विभिन्न मनोवैज्ञानिक उपायों द्वारा शत्रुपक्ष की सेना के मनोबल को गिराने का भी प्रयास किया जाता है। यदि शत्रुपक्ष की सेना का मनोबल टूट जाए तो युद्ध में अनिवार्य रूप से विजय प्राप्त की जा सकती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि युद्धकाल में मनोविज्ञान का महत्त्व सर्वाधिक रूप से सिद्ध होता है।

(10) विश्व-शान्ति की स्थापना में मनोविज्ञान का योगदान – विश्व-शान्ति की स्थापना हेतु मानव सम्बन्धों में उचित सामंजस्य की आवश्यकता है। मनोविज्ञान के अध्ययन से ही सामंजस्य या अनुकूलन की समस्या का समाधान सम्भव है। वैयक्तिक भिन्नता की जानकारी प्राप्त करके ही विभिन्न राष्ट्रों के मध्य पारस्परिक तनाव कम किया जा सकता है। विश्व-स्तर पर तनाव एवं अशान्ति के कारणों को खोजकर उनको मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाता है तथा पहले से ही इस प्रकार के संघर्ष का निवारण सम्भव हो जाता है। अन्तर्राष्ट्रीय तनाव तथा राष्ट्रों की आक्रमणकारी प्रवृत्तियों को अन्तर्राष्ट्रीय खेलकूद, व्यापार एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से कम किया जा सकता है। इस प्रकार मनोविज्ञान का ज्ञान वसुधैव कुटुम्बकम् एवं विश्व-बन्धुत्व की भावना को जाग्रत करता है, जिससे विश्व-शान्ति की स्थापना सम्भव है।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मानव-जीवन के प्रत्येक पक्ष में मनोविज्ञान की उपयोगिता एवं महत्त्व स्वयंसिद्ध है। मनोविज्ञान का ज्ञान मनुष्य की दैनिक आवश्यकताओं में बहुमूल्य योगदान प्रदान कर रहा है। आधुनिक युग में मनोविज्ञान के अध्ययन की महती आवश्यकता है और इसकी उपेक्षा करके जन-कल्याण का लक्ष्य पूरा नहीं किया जा सकता।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मनोविज्ञान की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मनोविज्ञान एक नव-विकसित विज्ञान है। विकास-क्रम में मनोविज्ञान को भिन्न-भिन्न रूप में प्रतिपादित किया जाता रहा है, परन्तु अब इसका अर्थ एवं क्षेत्र आदि निर्धारित हो गया है। वर्तमान मान्यताओं के अनुसार मनोविज्ञान की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. मनोविज्ञान मनाव और पशु दोनों के व्यवहार का अध्ययन करने वाला एक विधायक विज्ञान है।
  2. मनोविज्ञान मनुष्य को एक मन:शारीरिक प्राणी मानकर उसका अध्ययन करता है।
  3. मनोविज्ञान मानव-व्यवहार के भिन्न-भिन्न पक्षों का क्रमबद्ध अध्ययन करता है। वास्तव में मनुष्य जिस वातावरण में रहता है, उसमें उपस्थित विभिन्न तत्त्वों से वह क्रिया करता है। इसी को मानव व्यवहार कहते हैं।
  4. मनोविज्ञान प्राणियों के व्यवहार पर वातावरण के भौतिक तथा अभौतिक प्रभाव का अध्ययन करता है तथा अन्तिम रूप से प्राणियों की ज्ञानात्मक तथा संवेगात्मक प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करता है।

प्रश्न 2.
“मनोविज्ञान एक विधायक विज्ञान है।” इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
मनोविज्ञान की वैज्ञानिक प्रकृति को निर्धारित करते हुए यह कहा जाता है कि मनोविज्ञान एक विधायक विज्ञान (Positive Science) है। विज्ञानों की प्रकृति को ध्यान में रखकर किये गये वर्गीकरण के अन्तर्गत विज्ञान के दो मुख्य प्रकार निर्धारित किये गये हैं, जिन्हें क्रमश: ‘विधायक विज्ञान तथा नियामक विज्ञान’ कहा गया है। इस वर्गीकरण के अन्तर्गत विधायक विज्ञान उन विज्ञानों को कहा जाता है जो केवल तथ्यों का अध्ययन करते हैं तथा अपने अध्ययन के आधार पर तथ्यात्मक निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार विधायक विज्ञान क्या है की बात करते हैं। जहाँ तक नियामक विज्ञानों का प्रश्न है, वे मूल्यों एवं आदर्शों का अध्ययन एवं विवेचन करते हैं। ये विज्ञान अपने अध्ययन के आधार पर मूल्यात्मक निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं। नियामक विज्ञान सदैव ‘क्या होना चाहिए’ की बात करते हैं। अब प्रश्न उठता है कि मनोविज्ञान के अध्ययन किस प्रकार के होते हैं? मनोविज्ञान के समस्त अध्ययन तथ्यों से सम्बन्धित होते हैं। मनोविज्ञान द्वारा प्रतिपादित निष्कर्ष भी तथ्यात्मक होते हैं। मनोविज्ञान को मूल्यों एवं आदर्शों से कोई सरोकार नहीं होता। मनोविज्ञान के इस दृष्टिकोण को ही ध्यान में रखते हुए इसे एक विधायक विज्ञान स्वीकार किया गया है।

प्रश्न 3.
मनोविज्ञान की मुख्य शाखाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मनोविज्ञान व्यवहार का विधायक विज्ञान है। व्यवहार के अनेक पक्ष एवं रूप हैं; अतः मनोविज्ञान का अध्ययन क्षेत्र भी अत्यधिक व्यापक है। अध्ययन की सुविधा के लिए मनोविज्ञान की विभिन्न शाखाएँ निर्धारित की गयी हैं। मनोविज्ञान की मुख्य शाखाएँ हैं –

  1. सामान्य मनोविज्ञान
  2. वैयक्तिक मनोविज्ञान
  3. वैयक्तिक विभिन्नता का मनोविज्ञान
  4. समाज मनोविज्ञान
  5. बाल मनोविज्ञान
  6. किशोर मनोविज्ञान
  7. उत्पत्तिमूलक मनोविज्ञान
  8. विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान
  9. मनो-भौतिक मनोविज्ञान
  10. मनोविश्लेषणात्मक मनोविज्ञान
  11. प्रेरणात्मक मनोविज्ञान
  12. लोकमनोविज्ञान
  13. पशु मनोविज्ञान
  14. शारीरिक मनोविज्ञान
  15. परा-मनोविज्ञान
  16. प्रयोगात्मक मनोविज्ञान
  17. असामान्य मनोविज्ञान
  18. व्यावहारिक मनोविज्ञान
  19. शिक्षा मनोविज्ञान
  20. पर्यावरणीय मनोविज्ञान।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मनोविज्ञान की कोई आधुनिक परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
मनोविज्ञान की एक आधुनिक परिभाषा मैक्डूगल ने इन शब्दों में प्रतिपादित की है, मनोविज्ञान एक ऐसा विधायक विज्ञान है जिसमें जीवों के व्यवहार का अध्ययन होता है।”

प्रश्न 2.
मनोविज्ञान द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त किस प्रकार के होते हैं?
उत्तर :
प्रत्येक विज्ञान अपने व्यवस्थित अध्ययन के आधार पर कुछ सिद्धान्त प्रस्तुत करता है। मनोविज्ञान द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त सामान्य रूप से सार्वभौमिक (Universal) होते हैं। सार्वभौमिक सिद्धान्त उन सिद्धान्त को माना जाता है जिन पर देश-काल या पात्र का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। मनोविज्ञान के सिद्धान्त भी देश-काल के प्रभाव से मुक्त हैं। समान परिस्थितियों में भिन्न-भिन्न देश-काल में मनोविज्ञान के सिद्धान्त पूर्ण रूप से प्रामाणिक सिद्ध होते हैं।

प्रश्न 3
क्या मनोविज्ञान द्वारा पूर्वानुमान या भविष्यवाणी करना सम्भव है?
उत्तर :
विज्ञान की एक अनिवार्य विशेषता है-अपने क्षेत्र में पूर्वानुमान या भविष्यवाणी करना। मनोविज्ञान भी एक विज्ञान होने के नाते अपने अध्ययन क्षेत्र से सम्बन्धित पूर्वानुमान या भविष्यवाणी प्रस्तुत करता है। मनोविज्ञान द्वारा विभिन्न परीक्षणों के आधार पर मानव-व्यवहार एवं व्यक्तित्व के विषय में पूर्वानुमान प्रस्तुत किये जाते हैं। इस प्रकार के पूर्वानुमान व्यावसायिक वरण एवं निर्देशन आदि के क्षेत्र में उपयोगी सिद्ध होते हैं।

प्रश्न 4.
मनोविज्ञान की उपयोगिता एवं महत्त्व के मुख्य क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मानव-जीवन के प्रायः सभी क्षेत्रों में मनोविज्ञान की उपयोगिता एवं महत्त्व को स्वीकार किया जा चुका है। मनोविज्ञान के महत्त्व एवं उपयोगिता के मुख्य क्षेत्र हैं –

  1. व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान का क्षेत्र
  2. शिक्षा का क्षेत्र
  3. अपराध नियन्त्रण एवं अपराधियों के सुधार का क्षेत्र
  4. चिकित्सा का क्षेत्र
  5. उद्योग तथा व्यापार का क्षेत्र
  6. राजनीति का क्षेत्र
  7. व्यक्तित्व के अध्ययन का क्षेत्र
  8. सामाजिक समस्याओं के समाधान का क्षेत्र तथा
  9. युद्ध एवं विश्व-शान्ति का क्षेत्र।

प्रश्न 5.
उद्योग मनोविज्ञान से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
औद्योगिक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसका सम्बन्ध मनोविज्ञान के व्यावहारिक पक्ष से है। औद्योगिक मनोविज्ञान के अन्तर्गत मुख्य रूप से औद्योगिक एवं व्यावसायिक पर्यावरण में होने वाले मानवीय व्यवहार का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। औद्योगिक मनोविज्ञान सम्बन्धित क्षेत्र की समस्याओं के लक्षणों, कारणों एवं समाधान के उपायों का भी अध्ययन करता है।

क्रिश्चित उतरीय प्रश्न

प्रश्न I.
निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए –

  1. साइकोलॉजी (Psychology) का शाब्दिक अर्थ है ………………………. |
  2. मनोविज्ञान को प्रारम्भिक अर्थ ………………………. था।
  3. प्रारम्भिक काल में मनोविज्ञान का अध्ययन ………………………. के अन्तर्गत किया जाता था।
  4. अरस्तू ने मनोविज्ञान को ………………………. के रूप में प्रतिपादित किया था।
  5. सत्रहवीं तथा अठारहवीं शताब्दी में मनोविज्ञान को ………………………. माना जाता था।
  6. विलियम जेम्स के अनुसार मनोविज्ञान ………………………. का विज्ञान है।
  7. प्राणी के व्यवहार का अध्ययन ………………………. विषय के अन्तर्गत किया जाता है।
  8. मनोविज्ञान को व्यवहार का विज्ञान मानने वाले विद्वानों को ………………………. कहते हैं।
  9. मनोविज्ञान ………………………. का वैज्ञानिक अध्ययन है।
  10. मनोविज्ञान व्यवहार का ………………………. विज्ञान है।
  11. मनोविज्ञान वह विज्ञान है जो विभिन्न परिस्थितियों में प्राणी के ………………………. का अध्ययन करता है।
  12. जब मनुष्य का व्यवहार सामान्य नहीं होता है तो उसे ………………………. व्यवहार कहा जाता है।
  13. एडविन जी० बोरिंग के अनुसार मनोविज्ञान ………………………. का अध्ययन है।
  14. मनोविज्ञान की एक विशेषता तथ्यात्मकता है और यह ………………………. कहलाता है।
  15. मनोविज्ञान द्वारा प्रतिपादित समस्त सिद्धान्त ………………………. आधारित होते हैं।
  16. मनोविज्ञान का अध्ययन-क्षेत्र ………………………. है।
  17. मनोविज्ञान न केवल सैद्धान्तिक दृष्टिकोण से बल्कि ………………………. दृष्टिकोण से भी उपयोगी है।
  18. मनोविज्ञान द्वारा व्यक्ति के सामान्य तथा ………………………. दोनों प्रकार के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।
  19. मनोविज्ञान की प्रथम प्रयोगशाला की स्थापना ………………………. ने की थी।
  20. विलियम वुण्ट के प्रयासों से विश्व में मनोविज्ञान की प्रथम प्रयोगशाला ………………………. में स्थापित की गयी थी।
  21. बच्चों की समस्याओं तथा व्यवहार के अध्ययन से सम्बन्धित मनोविज्ञान का क्षेत्र है ………………………. |

उत्तर :

  1. आत्मा का विज्ञान
  2. आत्मा का ज्ञान
  3. दर्शनशास्त्र
  4. आत्मा के ज्ञान
  5. मन का विज्ञान
  6. चेतना
  7. मनोविज्ञान
  8. व्यवहारवादी
  9. व्यवहार
  10. विधायक
  11. व्यवहार
  12. असामान्य
  13. मानव स्वभाव
  14. विधायक विज्ञान
  15. तथ्यों पर
  16. व्यापक
  17. व्यावहारिक
  18. असामान्य
  19. विलियम वष्ट
  20. लिपजिग
  21. बाल मनोविज्ञाना

प्रश्न II.
निम्नलिखित प्रश्नों का निश्चित उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए –

प्रश्न 1.
प्राचीन यूनानी विद्वान मनोविज्ञान को किस रूप में प्रतिपादित करते थे?
उत्तर :
प्राचीन यूनानी विद्वान मनोविज्ञान को ‘आत्म-दर्शन’ अथवा ‘मानसिक दर्शन के रूप में प्रतिपादित करते थे।

प्रश्न 2.
मनोविज्ञान को मन का विज्ञान मानना क्यों छोड़ दिया गया?
उत्तर :
मन के स्वरूप के स्पष्ट न हो पाने के कारण ही मनोविज्ञान को मन का विज्ञान मानना छोड़ दिया गया।

प्रश्न 3.
मनोविज्ञान को चेतना का विज्ञान मानने वाले मुख्य विद्वानों के नाम लिखिए।
उत्तर :
विलियम वुण्ट, विलियम जेम्स तथा जेम्स सली।

प्रश्न 4.
व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिक वाटसन द्वारा प्रतिपादित मनोविज्ञान की परिभाषा दीजिए।
उत्तर :
“एक ऐसी मनोविज्ञान लिखना सम्भव है …… जिसकी ‘व्यवहार के विज्ञान के रूप में परिभाषा की जा सके।

प्रश्न 5.
मनोविज्ञान किस प्रकार का विज्ञान है?
उत्तर :
मनोविज्ञान एक विधायक विज्ञान है।

प्रश्न 6.
मनोविज्ञान की उस शाखा को क्या कहते हैं जिसके अन्तर्गत व्यवहार के सामान्य पक्षों तथा उसके सैद्धान्तिक स्वरूपों का अध्ययन किया जाता है?
उत्तर :
उक्त सामान्य मनोविज्ञान।

प्रश्न 7.
मनोविज्ञान की किस शाखा के अन्तर्गत व्यक्ति के असामान्य व्यवहार का अध्ययन किया जाता है?
उत्तर :
असामान्य मनोविज्ञान।

प्रश्न 8.

मानव-जीवन में मनोविज्ञान की उपयोगिता को निर्धारित करने वाली मनोविज्ञान की शाखा को क्या कहते हैं?
उत्तर :
व्यावहारिक मनोविज्ञान।

प्रश्न 9.
‘मनोविश्लेषणात्मक मनोविज्ञान का संस्थापक कौन था?
उत्तर :
फ्रॉयड।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए 

प्रश्न 1.
मनोविज्ञान के विकास-क्रम के प्रथम चरण में इसे माना जाता था
(क) स्वभाव का विज्ञान
(ख)चेतना का विज्ञान
(ग) आत्मा की ज्ञान
(घ) मन का विज्ञान

प्रश्न 2.
मनोविज्ञान को आत्मा का ज्ञान नहीं कहा जा सकता, क्योंकि
(क) आत्मा का स्वरूप स्पष्ट नहीं है।
(ख) आत्मा तथा शरीर का सम्बन्ध स्पष्ट नहीं है।
(ग) आत्मा के विभिन्न अर्थ प्रतिपादित किये जाते थे
(घ) इन सभी कारणों से

प्रश्न 3.
मनोविज्ञान वैज्ञानिक अध्ययन है
(क) व्यवहार को
(ख) मन का
(ग) आत्मा का
(घ) पदार्थ को

प्रश्न 4.
मनोविज्ञान एक विज्ञान है, क्योकि
(क) यह वैज्ञानिक पद्धति को अपनाता है।
(ख) इसका अध्ययन तथ्यात्मक है।
(ग) यह कार्य-कारण सम्बन्धों का अध्ययन करता है ।
(घ) उपर्युक्त सभी कारणों से

प्रश्न 5.
मनोविज्ञान अपने आप में एक
(क) रोचक विज्ञान है।
(ख) आदर्श विज्ञान है ।
(ग) भौतिक विज्ञान है।
(घ) विधायक विज्ञान है।

प्रश्न 6.
“मनोविज्ञान एक ऐसा विधायक विज्ञान है जिसमें जीवों के व्यवहारों का अध्ययन होता है।” इस परिभाषा के प्रतिपादक हैं
(क) विलियम जेम्स।
(ख) विलियम मैक्डूगल
(ग) विलियम वुण्ट
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 7.
शैक्षिक परिस्थितियों में मानव-व्यवहार का अध्ययन करने वाली मनोविज्ञान की शाखा को कहते हैं
(क) बाल मनोविज्ञान
(ख) शिक्षा मनोविज्ञान
(ग) व्यावहारिक मनोविज्ञान
(घ) सामान्य मनोविज्ञान

प्रश्न 8.
मनोविज्ञान द्वारा किस प्रकार के मानव-व्यवहार का अध्ययन किया जाता है?
(क) केवल सामान्य व्यवहार का
(ख) केवल असामान्य व्यवहार का
(ग) सामान्य तथा असामान्य दोनों प्रकार के व्यवहार का
(घ) शिष्ट व्यवहार का

प्रश्न 9.
मनोविज्ञान का ज्ञान उपयोगी नहीं है
(क) शिक्षा के क्षेत्र में
(ख) उद्योग एवं व्यापार के क्षेत्र में
(ग) चिकित्सा के क्षेत्र में
(घ) नैतिकता का पाठ पढ़ाने में

प्रश्न 10.
मनोविज्ञान की किस शाखा को सम्बन्ध मानसिक समस्याओं के निदान से है?
(क) विकासात्मक मनोविज्ञान
(ख) वैयक्तिक मनोविज्ञान
(ग) नैदानिक मनोविज्ञान
(घ) तुलनात्मक मनोविज्ञान

प्रश्न 11.
प्रमुख व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिक का नाम है
(क) पावलोव
(ख) वाटसन
(ग) होल
(घ) एडलर

उत्तर :

  1. (ग) आत्मा का ज्ञान
  2. (घ) इन सभी कारणों से
  3. (क) व्यवहार का
  4. (घ) उपर्युक्त सभी कारणों से
  5. (घ) विधायन विज्ञान है
  6. मिलियने मैक्डूगल
  7. (ख) शिक्षा मनोविज्ञान
  8. (ग) सामान्य तथा असामान्य दोनों प्रकार के व्यवहार का
  9. (घ) नैतिकता का पाठ पढाने मे
  10. (ग) नैदानिक मनोविज्ञान
  11. (ख) वाटसन

We hope the UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 1 Meaning, Definition and Scope of Psychology (मनोविज्ञान का अर्थ, परिभाषा एवं क्षेत्र) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 11 Psychology Chapter 1 Meaning, Definition and Scope of Psychology (मनोविज्ञान का अर्थ, परिभाषा एवं क्षेत्र), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 22 Industries

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 22 Industries (उद्योग धन्धे) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 22 Industries (उद्योग धन्धे).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 22
Chapter Name Industries (उद्योग धन्धे)
Number of Questions Solved 49
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 22 Industries (उद्योग धन्धे)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भारत के औद्योगिक विकास पर एक निबन्ध लिखिए। [2010]
उत्तर

पंचवर्षीय योजनाओं में औद्योगिक विकास
Industrial Development in Five Year Plans

स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत सरकार ने देश के औद्योगीकरण के लिए ठोस कदम उठाये। 6 अप्रैल, 1948 ई० को औद्योगिक नीति प्रस्तावित की गयी जिसको उद्देश्य “देशवासियों को शिक्षा एवं सार्वजनिक सुविधाएँ विकसित करके देश के प्राकृतिक संसाधनों का विकास एवं देशवासियों का जीवन-स्तर ऊँचा उठाना था।
पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान उद्योगों का विकास निम्नलिखित प्रकार से हुआ –
प्रथम एवं द्वितीय पंचवर्षीय योजनाओं में उद्योग – प्रथम योजना कृषि-प्रधान थी। द्वितीय योजना में देश में समाजवादी अर्थव्यवस्था विकसित करने के लिए उद्योगों पर विशेष बल दिया गया। लोहा-इस्पात, भारी रसायन, उर्वरक, इंजीनियरिंग तथा मशीन निर्माण उद्योगों की स्थापना पर विशेष ध्यान दिया गया। परिणामतः वर्ष 1960-61 में औद्योगिक सूचकांक (वर्ष 1950-51 में = 100) बढ़कर 194 हो गया। अनेक औद्योगिक नगर स्थापित हुए।

तृतीय एवं वार्षिक योजनाओं में उद्योग – तृतीय योजना में कृषि तथा उद्योग के मध्य सन्तुलन लाने का प्रयास किया गया; अतः उद्योगों के क्षेत्र में धीमी प्रगति हुई जो वार्षिक योजनाओं के दौरान स्थिरप्रायः हो गयी। धीमी औद्योगिक प्रगति के अनेक कारण थे-भारत-पाकिस्तान युद्ध, वर्ष 1965-67′ के अकाल, विदेशी सहायता बन्द होना आदि। केवल ऐलुमिनियम, मोटर-वाहन, विद्युत ट्रांसफार्मर, सूती वस्त्र, मशीन उपकरण, चीनी, जूट तथा पेट्रोलियम उत्पादों के उत्पादन लक्ष्य ही पूरे किये जा सके। इस्पात, उर्वरक तथा औद्योगिक रसायनों के उत्पादन में बहुत गिरावट आयी।

चौथी योजना में उद्योग – इस अवधि में औद्योगिक उत्पादन तथा पूँजी निवेश दोनों ही कम रहे। लौह धातु, पेट्रोलियम तथा पेट्रो-रसायन उद्योगों में तो पूँजी निवेश सन्तोषजनक रहा, किन्तु इस्पात, अलौह धातुओं, उर्वरक, चीनी तथा कोयले में कमी रही। औद्योगिक इकाइयों में क्षमता के अनुरूप उत्पादन नहीं हो सका, किन्तु मिश्र धातुओं, ऐलुमिनियम, टायर, पेट्रोल शोधन, इलेक्ट्रॉनिक्स; मशीनी उपकरण, ट्रैक्टर, विद्युत उपकरण सम्बन्धी उद्योगों की प्रगति सन्तोषजनक रही।

पाँचवीं योजना में उद्योग – पाँचवीं योजना में आधारभूत उपभोक्ता तथा निर्यात सम्बन्धी उद्योगों को विशेष महत्त्व दिया गया। खाद्यान्नों, उर्वरकों तथा पेट्रोलियम के मूल्यों में तीव्र वृद्धि के कारण उद्योगों पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा। औद्योगिक योजनाओं में तदनुसार संशोधन करना पड़ा। सार्वजनिक क्षेत्र में । 39,303 करोड़ में से हैं 10,201 करोड़ (लगभग 26%) खनिज व उद्योगों के लिए प्रावधान किया गया।

छठी योजना में उद्योग – इस योजना में सार्वजनिक क्षेत्र के कुल १ 97,500 करोड़ में से है 20,407 करोड़ (लगभग 21%) का प्रावधान बड़े उद्योगों कोयला, पेट्रोलियम तथा खनिजों के लिए किया गया। छठी योजना में उत्पादक इकाइयों का पूर्ण क्षमता उपभोग, उपभोक्ता, पूँजीगत व अन्य पदार्थों के उत्पादन की वृद्धि का लक्ष्य रखा गया। ऐलुमिनियम, जिंक, सीसा, थर्मोप्लास्टिक, पेट्रो-रसायन, विद्युत उपकरण, मोटर वाहन, उपभोक्ता पदार्थों के उत्पादन लक्ष्य प्राप्त हुए किन्तु कोयला, इस्पात, अलौह धातुओं, सीमेण्ट, टेक्सटाइल, जूट, व्यापारिक वाहन, रेल वैगन, चीनी आदि का उत्पादन लक्ष्य से कम रहा। छठी योजना की निम्नलिखित प्राविधिक उपलब्धियाँ उल्लेखनीय हैं-500 मेगावाट शक्ति उत्पादन की इकाई का आरम्भ, 500 मेगावाट टब-जेनरेटर तथा बॉयलर का उत्पादन, 800 cc वाली (कम पेट्रोल खपत वाली) मारुति कार, 1,350 टने प्रतिदिन क्षमता का उर्वरक प्लाण्ट आदि। इस्पात, इलेक्ट्रॉनिक आदि के क्षेत्र में भी विशेष उपलब्धियाँ प्राप्त की गयीं।

सातवीं योजना में उद्योग – इस अवधि में सार्वजनिक क्षेत्र के कुल १ 1,80,000 करोड़ में से 30% ऊर्जा पर, 11% बड़े व मध्यम उद्योगों पर तथा 1.5% छोटे व घरेलू उद्योगों पर व्यय करने का प्रावधान किया गया। इस योजना में समेकित विकास द्वारा उपभोक्ता उद्योगों, प्राविधिक सुधार, इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों के विकास द्वारा निर्यात में वृद्धि तथा रोजगार के पर्याप्त अवसर विकसित करने के उद्देश्य निर्धारित किये गये। सातवीं योजना में औद्योगिक क्षेत्र में 8.7% वार्षिक वृद्धि की दर निश्चित की गयी।
आठवीं योजना में उद्योग – इस अवधि में सभी क्षेत्र के उद्योगों में सुधार हुआ। विनिर्माण के 17 क्षेत्रों में उच्च वृद्धि दर्ज की गयी। 5.7% की वार्षिक वृद्धि दर निर्धारित की गयी।

नौवीं योजना में उद्योग – इस योजना में उद्योगों तथा खनिजों के लिए है 69,972 करोड़ का प्रावधान किया गया जो कुल आयोजना व्यय का 8% से अधिक था। उद्योगों में उदारीकरण तथा वैश्वीकरण को बढ़ावा दिया गया तथा विदेशी पूँजी विनिवेश को उदार बनाया गया। कम्प्यूटर, सॉफ्टवेयर, इलेक्ट्रॉनिक, संचार, परिवहन उपस्कर आदि उद्योगों को अधिक प्रोत्साहन दिया गया। मोटर वाहन उद्योग में विशेष रूप से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को भारत में उद्योग स्थापित करने का अवसर दिया गया।

दसवीं योजना में उद्योग – इस योजना में ग्रामीण तथा लघु उद्योगों में नीतिगत सुधार तथा लघु उद्योग को चरणबद्ध रूप में आरक्षण देना, बिजली-कोयला तथा संचार विधेयकों को लागू कराना, सूचना प्रौद्योगिकी का विकास आदि प्राथमिकताएँ निर्धारित की गयी हैं।
ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में उद्योग – इस योजना में निर्माण के सिलसिले में योजना आयोग ने संवृद्धि में सभी राज्यों तथा समाज के सभी वर्गों को उचित भागीदारी देने की बात कही है तथा Inclusive growth की अवधारणा सामने रखी है। इसी सन्दर्भ में सबकी पहुँच बुनियादी सेवाओं तक बनाने पर जोर दिया गया है। सबको शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ पेयजल आदि प्राप्त होना चाहिए। इसके अतिरिक्त अन्य चुनौतियाँ भी निर्धारित की गयी हैं; जो निम्नलिखित हैं –

  • कृषि क्षेत्र के विकास में गत्यात्मकता लाना
  • विनिर्माण के क्षेत्र को प्रतिस्पर्धात्मक बनाना
  • मानव संसाधनों को विकसित करना
  • पर्यावरण की सुरक्षा आदि।

बारहवीं पंचवर्षीय योजना में उद्योग – भारत की 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) के निर्माण की दिशा का मार्ग अक्टूबर, 2011 में उस समय प्रशस्त हो गया जब इस योजना के दृष्टि पत्र (दृष्टिकोण पत्र/दिशा पत्र/Approach Paper ) को राष्ट्रीय विकास परिषद् (NDC) ने स्वीकृति प्रदान कर दी। 1 अप्रैल, 2012 से प्रारम्भ हो चुकी इस पंचवर्षीय योजना के दृष्टि पत्र को योजना आयोग की 20 अगस्त, 2011 की बैठक में स्वीकार कर लिया गया था तथा केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् ने इसका अनुमोदन 15 सितम्बर, 2011 की अपनी बैठक में किया था। तत्कालीन प्रधानमन्त्री डॉ० मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में राष्ट्रीय विकास परिषद् की नई दिल्ली में 22 अक्टूबर, 2011 को सम्पन्न हुई इस 56वीं बैठक में दिशा पत्र को कुछेक शर्तों के साथ स्वीकार किया गया। राज्यों द्वारा सुझाए गए कुछ संशोधनों का समायोजन योजना दस्तावेज तैयार करते समय योजना आयोग द्वारा किया जायेगा। 12वीं पंचवर्षीय योजना में वार्षिक विकास दर का लक्ष्य 9 प्रतिशत है।

इस लक्ष्य को प्राप्त करने में राज्यों के सहयोग की अपेक्षा तत्कालीन प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने की है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कृषि, उद्योग व सेवाओं के क्षेत्र में क्रमश: 4.0 प्रतिशत, 9.6 प्रतिशत व 10.0 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि प्राप्त करने के लक्ष्य तय किये गये हैं। इनके लिए निवेश दर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की 38.7 प्रतिशत प्राप्त करनी होगी। बचत की दर जीडीपी के 36.2 प्रतिशत प्राप्त करने का लक्ष्य दृष्टि पत्र में निर्धारित किया गया है। समाप्त हुई 11वीं पंचवर्षीय योजना में निवेश की दर 36.4 प्रतिशत तथा बचत की दर 34.0 प्रतिशत रहने का अनुमान था। 11वीं पंचवर्षीय योजना में वार्षिक विकास दर 8.2 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था। 11वीं पंचवर्षीय योजना में थोक मूल्य सूचकांक (Wholesale Price Index) में औसत वार्षिक वृद्धि लगभग 6.0 प्रतिशत अनुमानित था, जो 12वीं पंचवर्षीय योजना में 4.5-5.0 प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य है। योजनावधि में केन्द्र सरकार का औसत वार्षिक राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3.25 प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य इस योजना के दृष्टि पत्र में निर्धारित किया गया है।

प्रश्न 2
उद्योग के मुख्य केन्द्रों का उल्लेख करते हुए भारत में लोहा तथा इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण के कारकों की विवेचना कीजिए।
या
भारत के लौह-इस्पात उद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(क) स्थानीयकरण के कारक, (ख) वितरण। [2013]
या
भारत में लोहा-इस्पात उद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(क) उद्योग का महत्त्व, (ख) स्थानीयकरण के कारण, (ग) उद्योग के प्रमुख क्षेत्र। [2008, 14, 15]
या
भारत में लौह तथा इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण के कारकों की विवेचना कीजिए तथा दो प्रमुख उत्पादन केन्द्रों का वर्णन कीजिए। [2008]
या
भारत में लौह-अयस्क के उत्पादन एवं वितरण का वर्णन कीजिए। [2014, 15, 16]
उत्तर

भारत में लोहा-इस्पात उद्योग का विकास
Development of Iron-steel Industry in India

लोहा-इस्पात उद्योग वर्तमान युग में एक आधारभूत उद्योग है जिसके उत्पाद अन्य सभी उद्योगों एवं वस्तुओं के निर्माण में आवश्यक होते हैं। इसी उद्योग से देश के औद्योगिक विकास की नींव पड़ती है।
भारत में लोहा गलाने, ढालने तथा इस्पात तैयार करने का कार्य अति प्राचीन काल से किया जा रहा है, परन्तु पश्चिमी देशों में आधुनिक ढंग के उद्योग स्थापित हो जाने से भारतीय लोहे के कुटीर उद्योग को बड़ा धक्का लगा तथा भारत निर्यातक से आयातक देश बन गया। सर्वप्रथम 1874 ई० में पश्चिम बंगाल में झरिया कोयला क्षेत्र में कुल्टी नामक स्थान पर बाराकर लौह कम्पनी की स्थापना की गयी। 1889 ई० में इस कारखाने पर बंगाल लोहा-इस्पात कम्पनी का अधिकार हो गया था। इसके बाद 1907 ई० में झारखण्ड के सांकची नामक स्थान पर प्रसिद्ध व्यवसायी श्री जमशेद जी टाटा द्वारा टाटा आयरन एवं इस्पात कम्पनी (TISCO) की स्थापना की गयी।

इसके पश्चात् 1918 ई० में एक और कारखाना पश्चिम बंगाल में भारतीय लोहा-इस्पात कम्पनी के नाम से आसनसोल के निकट हीरापुर में स्थापित किया गया। 1937 ई० में बर्नपुर में स्टील कॉरपोरेशन ऑफ बंगाल की स्थापना की गयी। वर्तमान में कुल्टी, हीरापुर एवं बर्नपुर के कारखाने भारतीय लोहा और इस्पात कम्पनी (IISCO) के अधिकार में हैं। 1932 ई० में दक्षिणी भारत के मैसूर नगर में मैसूर लोहा और इस्पात कारखाने की स्थापना की गयी। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद भारत में लोहा-इस्पात उद्योग का विकास तीव्र गति से किया गया। दूसरी पंचवर्षीय योजना में तीन नये कारखाने स्थापित करने के लिए ‘हिन्दुस्तान स्टील कम्पनी’ की स्थापना की गयी।

इस कम्पनी के तत्त्वावधान में 10-10 लाख टन की क्षमता के तीन कारखाने भिलाई, राउरकेला एवं दुर्गापुर में स्थापित किये गये तथा TISCO एवं IISCO की उत्पादन क्षमता क्रमशः 20 लाख टन और 10 लाख टन इस्पात बनाने की निर्धारित की गयी। तीसरी पंचवर्षीय योजना में एक नया कारखाना बोकारो में खोलने का लक्ष्य निर्धारित किया गया। चौथी पंचवर्षीय योजना में सलेम, विजयनगर एवं विशाखापट्टनम् में तीन नये कारखाने स्थापित करने का प्रस्ताव किया गया। 1978 ई० में सार्वजनिक क्षेत्र की इस्पात इकाइयों के लिए ‘स्टील ऑथोरिटी ऑफ इण्डिया’ की स्थापना की गयी जिसके अधिकार में TISCO को छोड़कर अन्य पाँचों इकाइयाँ हैं।

भारत में लोहा-इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण के लिए उत्तरदायी भौगोलिक कारक
Geographical Factors of Localisation of Iron-steel Industry in India

लोह्म-इस्पात उद्योग मूलत: कच्चे माल पर आधारित उद्योग है। बाजार की निकटता का इस पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है। इसके स्थानीयकरण में अग्रलिखित कारक सहायक हैं –
(1) लौह-अयस्क एवं कोयले की एक-दूसरे के निकट प्राप्ति – इस उद्योग में लोहा एवं कोयला कच्चे माल के रूप में सबसे अधिक प्रयुक्त किये जाते हैं, जो दोनों ही भारी पदार्थ हैं। भारत के झारखण्ड राज्य में कोयला तथा निकटवर्ती राज्य में ओडिशा में लौह-अयस्क निकाली जाती है। इस प्रकार दोनों खनिज पदार्थों के लगभग एक ही स्थान पर उपलब्ध होने के कारण यहाँ लोहा-इस्पात उद्योग की स्थापना में बहुत सुविधा रही है।

(2) अन्य खनिज पदार्थों की सुलभता – लोहा-इस्पात उद्योग में लौह-अयस्क तथा कोयले के अतिरिक्त मैंगनीज, डोलोमाइट तथा चूना-पत्थर आदि अधात्विक खनिज प्रयुक्त किये जाते हैं। भारत में ये पदार्थ भी बिहार एवं ओडिशा राज्यों में ही पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं।

(3) सस्ती एवं सुलभ जल-विद्युत शक्ति – लोहा-इस्पात कारखानों में भारी-भारी मशीनों के संचालन के लिए तथा भट्टियों में लौह-अयस्क को पिघलाने के लिए शक्ति संसाधन के रूप में सस्ती जल-विद्युत शक्ति सुलभ होनी चाहिए। भारत ने जल-विद्युत के उत्पादन में पर्याप्त प्रगति की है। अतः लोहा-इस्पात उद्योग को सस्ती जल-विद्युत शक्ति सुगमता से मिल जाती है।

(4) स्वच्छ जल की आपूर्ति – लोहा-इस्पात उद्योग के लिए काफी मात्रा में स्वच्छ जल की भी आवश्यकता होती है। कारखानों के समीप ही सदावाहिनी नदियाँ इस उद्योग को स्वच्छ जल प्रदान करती हैं।

(5) विस्तृत बाजार – भारत एक विकासशील देश है। यहाँ नये-नये कारखाने, बाँध एवं भवननिर्माण के अनेक कार्य निरन्तर क्रियान्वित किये जा रहे हैं, जिनमें लौह-इस्पात की भारी माँग रहती है। भारत लोहा-इस्पात के सामान का निर्यात भी करता है। पर्याप्त माँग होने के कारण यहाँ लोहा-इस्पात उद्योग का विकास तीव्र गति से हुआ है।

(6) सस्ते एवं कुशल श्रमिक – लोहा-इस्पात उद्योग में कार्य करने के लिए पर्याप्त संख्या में सस्ते एवं कुशल श्रमिकों की आवश्यकता होती है। सघन जनसंख्या के समीपवर्ती भागों में लोहा-इस्पात केन्द्र स्थापित किये जाने के कारण इस उद्योग को पर्याप्त संख्या में सस्ते एवं कुशल श्रमिक आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। भारत में श्रमिकों को कुशल तथा प्रशिक्षित करने के लिए भी अनेक संस्थान खोले गये हैं।”

(7) परिवहन के सस्ते एवं सुलभ साधन – लोहा-इस्पात एक भारी पदार्थ है। इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने, मशीनों को लाने, कच्चा माल एकत्र करने तथा तैयार माल को बाहर भेजने में सस्ते परिवहन साधनों की आवश्यकता पड़ती है। भारत में ये साधन सुलभ एवं सस्ते हैं; अत: लौह-इस्पात उद्योग की स्थापना में इनसे बड़ी सहायता मिली है।

(8) पर्याप्त पूँजी – लोहा-इस्पात उद्योग में बड़े-बड़े संयन्त्र लगाने आवश्यक होते हैं। इनके स्थापन के लिए अरबों रुपयों की आवश्यकता होती है। भारत के साहसी उद्योगपतियों ने इस उद्योग के लिए पर्याप्त पूँजी जुटाकर इस उद्योग की स्थापना में बहुत सहयोग दिया है। भारत सरकार भी इस उद्योग को पर्याप्त अनुदान एवं आर्थिक सहायता प्रदान करती है।

(9) सरकारी संरक्षण एवं सहायता – भारत में लोहा-इस्पात के अधिकांश कारखाने सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित किये गये हैं जिन्हें सरकार ने संरक्षण एवं संहायता प्रदान की है, जिससे लोहा-इस्पात उद्योग की स्थापना में बहुत प्रोत्साहन मिला है।

भारत में लोहा-इस्पात का उत्पादन तथा वितरण
Production and Distribution of Iron-steel in India

भारत में लोहा-इस्पात उद्योग का महत्त्वपूर्ण स्थान है। भारत में जमशेदपुर के इस्पात कारखाने को छोड़कर शेष सभी इस्पात केन्द्र सार्वजनिक क्षेत्र में हैं। देश में इस्पात पिण्डों की स्थापित क्षमता 200 लाख टनं वार्षिक है, जबकि इनका वास्तविक उत्पादन 180 लाख टन है। भारत में लोहा और इंस्पात । तैयार करने वाली इकाइयों का विवरण अग्रलिखित है –

(1) टाटा आयरन एण्ड स्टील, कम्पनी (TISCO) – भारत में यह एक बड़ा तथा महत्त्वपूर्ण लोहा-इस्पात का कारखाना है जो कि अकेला ही निजी क्षेत्र में है। यह एशिया महाद्वीप का सबसे बड़ा इस्पात कारखाना है। यह कारखाना झारखण्ड राज्य के सिंहभूम जिले में कोलकाता-नागपुर रेलमार्ग पर कोलकाता से 240 किमी उत्तर-पश्चिम में झारखण्ड राज्य के सांकची (जमशेदपुर) नामक स्थान पर 1907 ई० में प्रसिद्ध उद्योगपति जमशेद जी टाटा द्वारा स्थापित किया गया था। इसके उत्तर में स्वर्ण रेखा और पश्चिम में खोरकाई नदियाँ प्रवाहित होती हैं।

इस कारखाने में लोहे की सलाखें, गर्डर, रेल के डिब्बे, पहिये एवं पटरियाँ, चादरें, स्लीपर तथा फिश प्लेटें बनाई जाती हैं। इसके निकटवर्ती भागों में टिन प्लेट, कास्ट लोहे की पटरियाँ, इंजीनियरिंग
और मशीन कम्पनी, फाउण्ड्री, कृषि के उपकरण, रेलवे इन्जन तथा विद्युत तार के उद्योग-धन्धे स्थापित किये गये हैं। इस कारखाने की उत्पादन क्षमता प्रतिवर्ष 40 लाख टन इस्पात की है।
स्थानीयकरण के कारक – इस इस्पात केन्द्र को अनेक भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं, जो निम्नलिखित हैं –

  1. इस कारखाने के लिए लोहा पार्श्ववर्ती गुरुमहिसानी की पहाड़ियों से प्राप्त होता है जो यहाँ से लगभग 100 किलोमीटर दूर हैं।
  2. कोयला झरिया की खानों से मिलता है, जो केवल 160 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं।
  3. चूना 320 किलोमीटर की दूरी से आता है, विशेषकर विरमित्रापुर, हाथीबारी, बिसरा, कटनी और बाराद्वार से।
  4. पागपोश की डोलोमाइट की खानें यहाँ से 480 किलोमीटर दूर हैं तथा उत्तम श्रेणी का मैंगनीज और अन्य रासायनिक पदार्थ निकट ही प्राप्त हो जाते हैं। क्वार्ट्जाइट एवं क्रोमाइट वाली शैलें भी यहाँ मिलती हैं।
  5. लोहा इस्पात के लिए मीठे और स्वच्छ जल की आवश्यकता पूर्ति के लिए नदियों के जल को बड़े हौजों में एकत्रित कर लिया जाता है। स्वर्णरेखा नदी की बालू मिट्टी लोहा ढालने के लिए उपयुक्त है।
  6. जमशेदपुर का कारखाना दक्षिणी-पूर्वी रेलमार्ग द्वारा कोलकाता तथा मुम्बई से जुड़ा है, जहाँ निर्मित माल सुविधापूर्वक भेजा जा सकता है।
  7. कोलकाता के निकट अनेक इन्जीनियरिंग उद्योग स्थित हैं जहाँ विभिन्न प्रकार के लोहे की खपत होती है। यहाँ श्रमिक न केवल संथाली लोग हैं वरन् बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के लोग भी हैं।

(2) भारतीय लोहा एवं इस्पात कम्पनी (IISCO) – इस कम्पनी के तीन कारखाने हैं—पहला बर्नपुर में, दूसरा कुल्टी में तथा तीसरा हीरापुर में स्थापित किया गया है। यह कम्पनी भारत में सबसे अधिक लोहा ढलाई का कार्य करती है। 1952 ई० से इन तीनों कारखानों को भारतीय लोहा एवं इस्पात कम्पनी के अधीन कर दिया गया है। 1976 ई० से यह कम्पनी भारत सरकार के अधिकार में है। हीरापुर में केवल लोहे की ढलाई का कार्य किया जाता है। इसकी उत्पादन क्षमता 13 लाख टन ढलवाँ लोहा वार्षिक की है। यहाँ से ढलवाँ लोहा कुल्टी की इकाई को इस्पात निर्माण के लिए भेज दिया जाता है। जिसकी उत्पादन क्षमता 10 लाख टन वार्षिक इस्पात की है। बर्नपुर में इस्पात की ढलाई की जाती है। यहाँ नल एवं रेलवे स्लीपर तैयार किये जाते हैं। भविष्य में इस कारखाने की उत्पादन क्षमता 23 लाख टन किये जाने का प्रस्ताव है।

(3) विश्वेश्वरैया आयरन एण्ड स्टील लिमिटेड (VISL) – इस कारखाने की स्थापना 1923 ई० में कर्नाटक राज्य के शिमोगा जिले में भद्रावती नामक स्थान पर भद्रा नदी के किनारे की गयी थी। 1961 ई० से यह कारखाना कर्नाटक राज्य तथा भारत सरकार के संयुक्त स्वामित्व में है। प्रारम्भ में इस कारखाने का उद्देश्य केमानगुण्डी एवं बाबाबूदन की खानों से लौह-अयस्क प्राप्त करना था जो कि इसके अधिकार क्षेत्र में है। इन खानों से प्रति वर्ष 250 लाख टन लौह-अयस्क प्राप्त की जाती है। इस कारखाने की वार्षिक उत्पादन क्षमता एक लाख टन ढलवाँ लोहा तथा 2 लाख टन इस्पात पिण्ड तैयार करने की है। भविष्य में इसकी उत्पादन क्षमता 3 लाख टन इस्पात तैयार किये जाने का प्रस्ताव है।

(4) राउरकेला इस्पात संयन्त्र (Rourkela Steel Plant) – हिन्दुस्तान स्टील लिमिटेड का यह कारखाना कोलकाता-मुम्बई रेलमार्ग पर कोलकाता से 431 किमी दूर स्थित है। जर्मनी की सहायता से प्रथम धमन भट्टी 1959 ई० से प्रारम्भ की गयी थी। यहाँ पर अधिकतर चपटे आकार की वस्तुएँ, अलग-अलग मोटाई की प्लेट, चादरें, पत्तियाँ, टिन की चादरें आदि बनाई जाती हैं। इस कारखाने की उत्पादन क्षमता बढ़ाकर 35 लाख टन कर दी गयी है।

(5) भिलाई इस्पात संयन्त्र (Bhilai Steel Plant) – हिन्दुस्तान स्टील लिमिटेड का यह कारखाना मध्य प्रदेश में भिलाई नामक स्थान पर रायपुर से 21 किमी दूर पश्चिम में दुर्ग-रायपुर रेलमार्ग पर सन् 1955 में स्थापित किया गया था। इस कारखाने की स्थापना रूस के सहयोग से की गयी है। यहाँ पर इस्पात का उत्पादन सन् 1959 से प्रारम्भ किया गया है। इस कारखाने में रेलों में प्रयुक्त अनेक प्रकार का सामान-छड़े, स्लीपर, शहतीर, लोहे की कतरनें आदि तैयार की जाती हैं। वर्तमान समय में इस कारखाने की उत्पादन क्षमता 25 लाख टन से बढ़ाकर 50 लाख टन कर दी गयी है।

(6) दुर्गापुर इस्पात संयन्त्र लिमिटेड (Durgapur Steel Plant Ltd.) – हिन्दुस्तान स्टील लिमिटेड का यह कारखाना पश्चिम बंगाल राज्य में दामोदर नदी-घाटी में कोलकाता-आसनसोल रेलमार्ग पर कोलकाता के उत्तर-पश्चिम में 160 किमी दूर दुर्गापुर में ब्रिटिश सरकार के सहयोग से सन् 1956 में स्थापित किया गया था। यहाँ इस्पात का उत्पादन सन् 1962 से प्रारम्भ किया गया था।
अधिकांशतः इस कारखाने में पहिये, धुरे, पटरियाँ, छड़े, इस्पात की कतरनें, बिलेट आदि का निर्माण किया जाता है। इस कारखाने की वार्षिक उत्पादन क्षमता 16 लाख टन इस्पात तथा 3.6 लाख टनं ढलवाँ लोहे की है।

(7) बोकारो इस्पात संयन्त्र (Bokaro Steel Plant) – चतुर्थ पंचवर्षीय योजना में लोहा-इस्पात का एक नया कारखाना 1964 ई० में रूस के सहयोग से झारखण्ड के बोकारो नामक स्थान पर स्थापित किया गया था। इसकी प्रारम्भिक क्षमता 40 लाख टन इस्पात उत्पादन की थी जिसे भविष्य में 60 लाख टन तक बढ़ाया जा सकेगा। इसमें 1972 ई० से उत्पादन प्रारम्भ हो गया है।

निर्यात व्यापार – भारत ने लोहा-इस्पात के निर्यात में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। इस्पात का भारी सामान अब रूस को भी निर्यात किया जाने लगा है। भारतीय इस्पात के अन्य प्रमुख ग्राहक न्यूजीलैण्ड, मलेशिया, बांग्लादेश, कुवैत, ईरान, श्रीलंका, म्यांमार, तंजानिया, संयुक्त अरब अमीरात, कीनिया आदि देश हैं। भारत लगभग 15 लाख टन इस्पात के विशेषीकृत उत्पादों को विदेशों से आयात भी करता है, परन्तु देश से इस्पात निर्यात की भावी सम्भावनाएँ वृद्धि की ओर व्यक्त की जा सकती हैं।

प्रश्न 3
भारत में सीमेण्ट उद्योग की अवस्थिति एवं विकास के कारकों की विवेचना कीजिए।
या
भारत में सीमेण्ट उद्योग के स्थानीयकरण के कारकों की विवेचना कीजिए तथा इसके उत्पादन के प्रमुख केन्द्रों का उल्लेख कीजिए। [2011]
या
भारत में सीमेण्ट उद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(क) स्थानीयकरण के कारक, (ख) प्रमुख केन्द्र, (ग) व्यापार। [2013, 16]
या
भारत में सीमेण्ट उद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए –
(क) स्थानीयकरण के कारक, (ख) उत्पादन, (ग) उद्योग के प्रमुख केन्द्र। [2013, 16]
उत्तर

सीमेण्ट उद्योग का विकास
Development of Cement Industry

भारत में संगठित रूप से सीमेण्ट तैयार करने का श्रेय चेन्नई को जाता है, जहाँ सन् 1904 में समुद्री सीपियों से सीमेण्ट बनाने का प्रयास किया गया था, परन्तु इसमें पूर्ण सफलता नहीं मिल सकी। इस उद्योग का वास्तविक विकास वर्ष 1912-13 में हुआ, जबकि मध्य प्रदेश में कटनी, राजस्थान में लखेरी-बूंदी तथा गुजरात में पोरबन्दर में तीन कारखाने स्थापित किये गये। इनमें सन् 1914 से उत्पादन प्रारम्भ हुआ। देश में इस उद्योग की प्रगति का श्रेय एसोसिएटिड सीमेण्ट कम्पनी (ए०सी०सी०), कंक्रीट एसोसिएशन ऑफ इण्डिया एवं सीमेण्ट मार्केटिंग कम्पनी को दिया जा सकता है।

सीमेण्ट वर्तमान युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए सीमेण्ट उद्योग का विकास अति आवश्यक है। यह अनेक उद्योगों के विकास की कुंजी है। भारत संसार का सातवाँ बड़ा सीमेण्ट उत्पादक देश है। इस उद्योग में लगभग 90,000 व्यक्ति कार्यरत हैं। सन् 2012 में सीमेण्ट उत्पादन 210 मिलियन टन हुआ।

सीमेण्ट उद्योग के स्थानीयकरण के भौगोलिक कारक
Geographical Factors of Localisation of Cement Industry

(1) कच्चा माल – सीमेण्ट उद्योग में अधिकांशतः भारी वस्तुओं-चूने का पत्थर, जिप्सम तथा कोयले का उपयोग अधिक किया जाता है। अतः इन्हें ढोने में अधिक व्यय करना पड़ता है। इसी कारण सीमेण्ट उद्योग कच्चे पदार्थों की प्राप्ति के निकटवर्ती स्थानों पर स्थापित किया जाता है। भारत में कोई भी सीमेण्ट कारखाना चूना-पत्थर की खानों से 50 किमी से अधिक दूरी पर स्थित नहीं है। अब सीमेण्ट बनाने के लिए धमन भट्टी का कचरा भी प्रयुक्त किया जाने लगा है।

(2) ऊर्जा – इस उद्योग के लिए ऊर्जा की बहुत आवश्यकता होती है। तमिलनाडु के सीमेण्ट कारखानों को छोड़कर देश के अन्य सभी कारखानों द्वारा यही कोयला काम में लाया जाता है। अब जलविद्युत शक्ति का भी प्रयोग किया जाने लगा है।
(3) पर्याप्त जल।
(4) सस्ता तथा कुशल श्रम – मध्य प्रदेश एवं झारखण्ड राज्य सीमेण्ट उद्योग के लिए सर्वाधिक उपयुक्त क्षेत्र हैं, क्योंकि यहाँ पर कोयला एवं चूने का पत्थर लगभग स्थानीय रूप से उपलब्ध हो जाते हैं। इन क्षेत्रों से पश्चिम बंगाल एवं बिहार के औद्योगिक क्षेत्र भी दूर नहीं पड़ते। कोसी, दामोदर एवं महानदी नदियों की घाटियों में विकसित बहुमुखी परियोजनाओं से सस्ती जल-विद्युत शक्ति प्राप्त हो जाती है।
(5) सस्ते एवं कुशल श्रमिक।
(6) परिवहन के साधन।
(7) पूँजी की उपलब्धता।
(8) सरकारी नीति।
गुजरात, राजस्थान तथा कर्नाटक में कच्चा माल उपलब्ध है।
उपर्युक्त भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए सीमेण्ट उद्योग का स्थापन मुख्यत: राजस्थान के पूर्व से लेकर उत्तरी मध्य प्रदेश होता हुआ झारखण्ड तक विस्तृत एक पेटी के रूप में फैला है।

सीमेण्ट का उत्पादन एवं वितरण
Production and Distribution of Cement

सीमेण्ट उद्योग का वितरण विकेन्द्रित है। अधिकांश कारखाने देश के पश्चिमी तथा दक्षिणी भागों में विकसित हुए हैं, जबकि सीमेण्ट की अधिकांश माँग उत्तरी एवं पूर्वी क्षेत्रों में अधिक है। तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, गुजरात, बिहार, राजस्थान, कर्नाटक एवं आन्ध्र प्रदेश राज्य देश का 74% सीमेण्ट उत्पन्न करते हैं, जबकि कुल उत्पादित क्षमता का 86% भाग इन्हीं राज्यों में केन्द्रित है। निम्नलिखित राज्यों का सीमेण्ट उत्पादन में महत्त्वपूर्ण स्थान है –
(1) मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ – मध्य प्रदेश राज्य देश का 15% सीमेण्ट उत्पन्न करता है। यहाँ सीमेण्ट के 8 विशाल कारखाने हैं। कटनी, कैमूर, सतना, जबलपुर, दुर्ग, बनमोर एवं दमोह में प्रमुख कारखाने हैं। इस राज्य में सीमेण्ट के 5 नये कारखाने प्रस्तावित हैं। यहाँ कोयला झारखण्ड से तथा शेष कच्चा माल स्थानीय रूप से उपलब्ध है।’. ”

(2) तमिलनाडु – इंसे राज्य को सीमेण्ट के उत्पादन में दूसरा स्थान है। यहाँ पर सीमेण्ट के 7 कारखाने हैं जो बड़े आकार के हैं तथा देश का 12% सीमेण्ट उत्पन्न करते हैं। चूना-पत्थर की पूर्ति स्थानीय क्षेत्रों के साथ-साथ कर्नाटक एवं आन्ध्र प्रदेश सज्यों से भी की जाती है। तुलुकापट्टी, तिलाईयुथू, : तिरुनलवेली, डालमियापुरम, राजमलायम, संकरी दुर्ग एवं मधुकराई प्रमुख सीमेण्ट उत्पादक केन्द्र हैं।

(3) आन्ध्र प्रदेश – आन्ध्र प्रदेश में सीमेण्ट के 18 कारखाने हैं, जो गुण्टूर, कर्नूल, नालगोण्डा, मछलीपट्टनम्, हैदराबाद एवं विजयवाड़ा में केन्द्रित हैं। इस राज्य की सीमेण्ट उत्पादन क्षमता 45 लाख टन तक पहुँच गयी है।
(4) राजस्थान – सीमेण्ट के उत्पादन में राजस्थान राज्य का चौथा स्थान है। यहाँ अरावली पहाड़ियों में चूने-पत्थर के पर्याप्त भण्डार हैं। यहाँ सीमेण्ट उत्पादन के 10 कारखाने हैं, जो लखेरी (बूंदी), सवाईमाधोपुर, चित्तौड़गढ़, चुरू, नीम्बाहेड़ा एवं उदयपुर में हैं।
(5) बिहार – इस राज्य में सीमेण्ट के 10 बड़े कारखाने हैं। सभी कारखाने कोयला एवं चूना-पत्थर क्षेत्रों के समीप पड़ते हैं। डालमियानगर, सिन्द्री, बनजारी, चायबासी, खलारी, जापला एवं कल्याणपुर प्रमुख केन्द्र हैं। बिहार राज्य में सीमेण्ट के दो कारखाने और लगाये जाने प्रस्तावित हैं।

(6) कर्नाटक – इस राज्य में बीजापुर, भद्रावती, गुलबर्गा, उत्तरी कनारा, तुमुकुर एवं बंगलुरु . प्रमुख सीमेण्ट उत्पादक केन्द्र हैं। यहाँ सीमेण्ट उत्पादन के 8 बड़े संयन्त्र स्थापित किये गये हैं।

(7) गुजरात – गुजरात राज्य में सीमेण्ट के 10 कारखाने हैं। सीमेण्ट उद्योग का प्रारम्भ इसी राज्य से किया गया था। चूना-पत्थर और समुद्री सीपों का उपयोग यहाँ पर सीमेण्ट बनाने में किया जाता है। सिक्का (जामनगर), अहमदाबाद, राणाबाव, बड़ोदरा, पोरबन्दर, सेवालिया, ओखामण्डल एवं द्वारका प्रमुख सीमेण्ट उत्पादक केन्द्र हैं। यहाँ 20 लाख टन सीमेण्ट का वार्षिक उत्पादन किया जाता है।

(8) अन्य राज्य – हरियाणा में सूरजपुर एवं डालमिया-दादरी; केरल में कोट्टायम; उत्तर प्रदेश में चुर्क एवं चोपन; ओडिशा में राजगंगपुर एवं हीराकुड; जम्मू-कश्मीर में वुयाने तथा असम में गुवाहाटी अन्य प्रमुख सीमेण्ट उत्पादक केन्द्र हैं। सन् 1985 के बाद से उत्तर प्रदेश राज्य में लघु संयन्त्रों की स्थापना की ओर विशेष ध्यान आकर्षित हुआ है तथा यहाँ94 लघु संयन्त्र स्थापन की अनुमति प्रदान की जा चुकी है।

भारत में सीमेण्ट उद्योग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ कुल उत्पादन क्षमता का 84% सीमेण्ट का ही उत्पादन किया जाता है। सन् 1965 में इस उद्योग के विकास एवं विस्तार हेतु सीमेण्ट निगम की स्थापना की गयी थी। इस निगम का प्रमुख कार्य कच्चे माल के नये क्षेत्रों का पता लगाना तथा इस उद्योग से सम्बन्धित समस्याओं को हल करना था। निगम द्वारा मन्धार (मध्य प्रदेश) तथा करकुन्ता (कर्नाटक) में सीमेण्ट के कारखाने स्थापित किये गये हैं। बोकाजन (असम), पॉवटा साहिब (हिमाचल प्रदेश), अलकतरा एवं नीमच (मध्य प्रदेश), तन्दूर, अदिलाबाद एवं येरागुन्तला (आन्ध्र प्रदेश) तथा बरूवाला (उत्तर प्रदेश) केन्द्रों में नवीन सीमेण्ट कारखाने स्थापित किये गये हैं।

व्यापार Trade

स्वतन्त्रता-प्राप्ति के समय देश में सीमेण्टे का उत्पादन बहुत कम था परन्तु तब से अब तक उसके उत्पादन में निरन्तर प्रगति हुई है। भारत समय-समय पर विदेशों को सीमेण्ट का निर्यात भी करता रहा है। यह निर्यात मुख्यतः पश्चिमी एशियाई देशों को हुआ है। कुछ वर्षों पूर्व तक हम अपनी आवश्यकता का भी सीमेण्ट उत्पादित नहीं कर पाते थे परन्तु अब हम सीमेण्ट उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गए हैं। सन् 1997-98 में भारत ने 42.5 लाख टन, सन् 2001-02 में 51.4 लाख टन तथा सन् 2012 में 210 मिलियन टन सीमेण्ट विदेशों को निर्यात किया था। उत्तम क्वालिटी के कारण भारतीय सीमेण्ट ने बंगलादेश, इण्डोनेशिया, मलेशिया, नेपाल, म्यांमार, अफ्रीका तथा पश्चिमी व दक्षिणी एशिया के देशों के बाजार में महत्त्वपूर्ण स्थान बनाया है।

प्रश्न 4.
भारत में चीनी उद्योग के स्थानीयकरण के कारकों एवं विकास का विवरण दीजिए।
या
भारत में चीनी उद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए –
(क) उत्पादन की प्रवृत्ति, (ख) उत्पादक क्षेत्र। [2011]
या
भारत में चीनी उद्योग का भौगोलिक विवरण निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत दीजिए –
(अ) स्थानीयकरण के कारक, (ब) वितरण प्रतिरूप। [2007, 10]
या
भारत में चीनी उद्योंग के स्थानीयकरण के कारकों की विवेचना कीजिए तथा उद्योग के दो प्रमुख केन्द्रों का विवरण दीजिए। [2008]
या
भारत में चीनी उद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(क) स्थानीयकरण के कारक, (ख) उद्योग के प्रमुख केन्द्र। [2014, 16]
उत्तर
चीनी उद्योग कृषि पर आधारित भारत का दूसरा सबसे बड़ा संगठित उद्योग है। सन् 1982 से भारत का इस उद्योग में विश्व में प्रथम स्थान है। इस उद्योग में ₹ 1,250 करोड़ की पूँजी लगी है तथा इससे 2.86 लाख लोगों को रोजगार प्राप्त होता है। इसके साथ ही देश के लाखों किसानों एवं श्रमिकों को गन्ना उत्पादन से आजीविका प्राप्त होती है।

भारत में चीनी उद्योग का विकास – भारत में चीनी उद्योग का वास्तविक विकास 20वीं शताब्दी से आरम्भ होता है। सन् 1931 तक इसका विकास काफी मन्द रहा, परन्तु इसके बाद सरकार ने चीनी के आयात पर नियन्त्रण लगाकर इस उद्योग के विकास को प्रोत्साहन दिया। सन् 1951 में भारत में चीनी की 138 मिलें थीं जिनकी उत्पादन क्षमता 15 लाख टन थी, परन्तु उत्पादन केवल 11 लाख टन ही हो पाया। वर्तमान में भारत में 453 चीनी मिलें हैं जिनमें 134 निजी क्षेत्र में, 67 सार्वजनिक क्षेत्र में तथा 252 सहकारी क्षेत्र में हैं। इसके बाद इस उद्योग को तीव्र गति से विकास हुआ, जिसकी
प्रगति निम्नलिखित तालिका से स्पष्ट हो जाती है –
तालिका : चीनी उत्पादन की प्रगति
UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 22 Industries 1

चीनी उद्योग के स्थानीयकरण के भौगोलिक कारक
Geographical Factors of Localisation of Sugar Industry

भारत में चीनी उद्योग के लगभग 65% कारखाने उत्तर प्रदेश एवं बिहार राज्यों में केन्द्रित हैं, जहाँ से कुल चीनी उत्पादन का लगभग दो-तिहाई भागे प्राप्त होता है। इस उद्योग के स्थानीयकरण के निम्नलिखित कारण हैं –

  1. गंगा नदी-घाटी की उर्वरा-शक्ति अधिक है जहाँ पर कांप मिट्टी में बहुत ही कम व्यय में गन्ने का उत्पादन भारी मात्रा में किया जाता है।
  2. गन्ना तोल में घट जाने वाला पदार्थ है; अत: इसके अधिकांश कारखाने गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में स्थापित किये गये हैं।
  3. चीनी उद्योग में शक्ति की प्राप्ति गन्ने को पेरने से प्राप्त खोई से की जाती है। उत्तरी भारत में तराई क्षेत्र से लकड़ी भी प्राप्त हो जाती है।
  4. शुद्ध जल की प्राप्ति नहरों अथवा नलकूपों द्वारा प्राप्त कर ली जाती है।
  5. गंगा घाटी के सघन बसे होने के कारण पर्याप्त संख्या में कम मजदूरी पर श्रमिक उपलब्ध हो जाते हैं।
  6. संघने जनसंख्या के कारण पर्याप्त मात्रा में चीनी की आवश्यकता पड़ती है; अत: स्थानीय रूप से बाजार की सुविधा उपलब्ध हो जाती है।
  7. उत्तरी भारत में गन्ना उत्पादन के लिए पर्याप्त सिंचाई की सुविधाएँ हैं।
  8. उत्तरी भारत में गन्ना ही एक प्रमुख व्यापारिक एवं नकदी फसल है। यहाँ गन्ना उत्पादक क्षेत्र रेल एवं सड़क मार्गों द्वारा जुड़े हैं। इस प्रदेश में कोई भी चीनी मिल गन्ना उत्पादक क्षेत्रों से 20 किमी से अधिक दूरी पर स्थित नहीं है।

दक्षिणी भारत में चीनी उद्योग की स्थापना के भौगोलिक कारक
Geographical Factors for Establishment of Sugar Industry in South India

देश में चीनी उद्योग अब धीरे-धीरे दक्षिणी भारत की ओर पलायन कर रहा है। दक्षिण भारत में इस उद्योग के विकसित होने के अग्रलिखित कारक उत्तरदायी रहे हैं –

  1. दक्षिणी भारत में उत्तरी भारत की अपेक्षा गन्ने का प्रति हेक्टेयर उत्पादन अधिक होता है तथा इसमें रस की मात्रा भी अधिक होती है।
  2. समुद्री जलवायु के कारण दक्षिणी भारत में गन्ना उत्पादन के लिए भौगोलिक परिस्थितियाँ उत्तरी भारत की अपेक्षा अधिक अनुकूल हैं।
  3. दक्षिणी भारत के अधिकांश कारखाने अपने ही कृषि फार्मों पर गन्ने का उत्पादन करते हैं; अतः कच्चे माल के रूप में गन्ने की प्राप्ति सुगम रहती है।
  4. दक्षिणी भारत की चीनी मिलें गन्ना पेराई के मौसम के बाद मूंगफली से तेल निकालने का कार्य करती हैं; अत: इन्हें दोहरा लाभ प्राप्त होता है।

भारत में चीनी उत्पादक राज्य
Sugar Producing States in India

भारत में निम्नलिखित राज्य चीनी के उत्पादन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं –
(1) महाराष्ट्र – महाराष्ट्र राज्य ने चीनी के उत्पादन में पिछले कुछ वर्षों से भारी प्रगति की है। चीनी के उत्पादन में इसका प्रथम स्थान है। यहाँ 100 चीनी मिलें हैं जिनमें देश की लगभग 35% चीनी उत्पादित की जाती है। गोदावरी, प्रवरा, मूला-मूठा, नीरा एवं कृष्णा नदियों की घाटियों में चीनी मिलें केन्द्रित हैं। मनमाड़, नासिक, पुणे, अहमदनगर, शोलापुर, कोल्हापुर, औरंगाबाद, सतारा एवं सांगली प्रमुख चीनी उत्पादक जिले हैं।

(2) उत्तर प्रदेश – इस राज्य का चीनी के उत्पादन में द्वितीय स्थान है। इस प्रदेश में 105 चीनी मिलें हो गयी हैं। उत्तर प्रदेश में उपयुक्त भौगोलिक परिस्थितियों के कारण ही चीनी मिलों का केन्द्रीकरण हुआ है। यह राज्य देश की 24% चीनी का उत्पादन करता है यद्यपि अभी भी यहाँ देश का सर्वाधिक गन्ना उगाया जाता है। यहाँ चीनी उत्पादन के निम्नलिखित तीन क्षेत्र प्रमुख हैं –

  • ऊपरी गंगा-यमुना दोआब – पश्चिमी उत्तर प्रदेश का यह क्षेत्र राज्य की एक-तिहाई चीनी तैयार करता है। यहाँ पर अधिकांश चीनी की मिलें रेलमार्गों के सहारे-सहारे स्थित केन्द्रों में स्थापित हुई हैं। सृहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, गाजियाबाद एवं बुलन्दशहर जिले प्रमुख चीनी उत्पादक हैं।
  • तराई क्षेत्र – तराई क्षेत्र पश्चिम में बिजनौर जिले से लेकर पूर्व में देवरिया जिले तक विस्तृत है। देवरिया, गोरखपुर, बस्ती, गोंडा, रामपुर, पीलीभीत, बहराइच एवं बिजनौर जिले प्रमुख चीनी उत्पादक हैं।
  • मध्यवर्ती एवं अन्य क्षेत्र – रुहेलखण्ड, फैजाबाद, कानपुर एवं लखनऊ मण्डलों में इस क्षेत्र का विस्तार है। सीतापुर, हरदोई, मुरादाबाद, फैजाबाद, एटा, कानपुर, शाहजहाँपुर, बरेली एवं इलाहाबाद प्रमुख चीनी उत्पादक जिले हैं।

(3) कर्नाटक – चीनी के उत्पादन में कर्नाटक राज्य का तीसरा स्थान है। यहाँ पर चीनी उद्योग के 27 केन्द्र हैं जिनमें देश की 9% चीनी उत्पन्न की जाती है। बेलगाम, मांडया, बीजापुर, बेलारी, शिमोगा एवं चित्रदुर्ग महत्त्वपूर्ण चीनी उत्पादक जिले हैं।
(4) तमिलनाड – इस राज्य का चीनी के उत्पादन में चौथा स्थान है जहाँ 22 चीनी मिलें हैं। यहाँ देश की लगभग 8% चीनी उत्पादित की जाती है। मदुराई, उत्तरी एवं दक्षिणी अर्काट, कोयम्बटूर एवं तिरुचिरापल्ली प्रमुख चीनी उत्पादक जिले हैं।

(5) आन्ध्र प्रदेश – यहाँ पर चीनी की 32 मिलें हैं जो प्रमुखत: प्रदेश के उत्तरी भागों में स्थित हैं। पूर्वी एवं पश्चिमी गोदावरी, कृष्णा, विशाखापट्टनम्, निजामाबाद, मेंडक, हास्पेट, बोबीलो, अनाकापाले, सामलकोट, पीठापुरम्, हैदराबाद, विजयवाड़ा और चित्तूर जिलों में चीनी के कारखाने स्थापित हुए हैं।

(6) बिहार – बिहार भारत का एक महत्त्वपूर्ण चीनी उत्पादक राज्य है जहाँ देश की 5% चीनी का उत्पादन किया जाता है। यहाँ चीनी की 29 मिलें हैं जो विशेष रूप से सारन, चम्पारन, दरभंगा, मुजफ्फरपुर आदि उत्तरी जिलों के गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में केन्द्रित हैं। पटना, गया, शाहाबाद जिलों में भी चीनी का उत्पादन किया जाता है।

(7) अन्य उत्पादक राज्य – चीनी उत्पादक अन्य राज्यों में गुजरात, हरियाणा, पंजाब, केरल, . मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं पश्चिम बंगाल मुख्य हैं।
व्यापार – भारत चीनी का निर्यातक देश है और विश्व के चीनी निर्यात व्यापार में भारत 0.6% का हिस्सा रखता है। देश की आवश्यकता को पूरी करने के उपरान्त केवल 2 लाख टन चीनी निर्यात के लिए शेष बचती है, परन्तु निर्यात की मात्रा घटती-बढ़ती रहती है।

प्रश्न 5
भारत के सूती वस्त्र उद्योग की विवेचना निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(i) स्थानीयकरण के कारक, (ii) उद्योग के क्षेत्र, (iii) कोई दो समस्याएँ। [2009]
या
भारत में सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण का विवरण दीजिए। [2008]
या
भारत में सूती वस्त्रोद्योग के स्थानीयकरण के कारक बताइए तथा इस उद्योग के दो प्रमुख केन्द्रों का उल्लेख कीजिए। [2009, 11]
या
भारत में सूती वस्त्र उद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए –
(अ) स्थानीयकरण के कारक, (ब) प्रमुख केन्द्र। [2014, 16]
उत्तर

भारत में सूती वस्त्र उद्योग का विकास
Development of Cotton Textile Industry in India

सूती वस्त्र उद्योग भारत का एक प्राचीन उद्योग है। यह एक ऐसा उद्योग है जिसने लगभग सौ वर्ष पूर्व भारत में औद्योगीकरण का आधार प्रस्तुत किया था। देश का यह सबसे बड़ा उद्योग है। सन् 1854 में प्रथम भारतीय सूती वस्त्र कारखाना मुम्बई में स्थापित किया गया तथा भारतीय वस्त्र उद्योग प्रारम्भ हुआ। सन् 1900 तक भारत में 193 मिलें खुल चुकी थीं। सन् 1945 में 417 मिलें हो गयी थीं जिनमें 10.2 करोड़ तकुएँ तथा2 लाख करघे कार्य कर रहे थे। सन् 1947 में विभाजन के फलस्वरूप देश के 15 कारखाने तथा 73% कपास उत्पादक क्षेत्र पाकिस्तान में चले जाने के कारण 402 मिलें ही भारत में रह गयी थीं।

सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण के कारक
Factors of Localization of Cotton Textile Industry

सूती वस्त्र उद्योग के लिए कपास एक शुद्ध कच्चा माल है जो निर्माण प्रक्रिया में अपना अस्तित्व नहीं खोता। इसी कारण सूती वस्त्र उद्योग का स्थापन केवल कच्चे माल के क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहा। इसका स्थापन उन क्षेत्रों में भी हो गया है जहाँ पर इस उद्योग के लिए अन्य सुविधाएँ; जैसे—बाजार, श्रमिक, शक्ति-संसाधन, रासायनिक पदार्थ आदि पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते हैं। इसी कारण यह उद्योग बाजार की समीपता से प्रभावित होता है न कि कच्चे माल की निकटता से। भारत में सूती वस्त्र उद्योग की स्थापना में निम्नलिखित कारक उत्तरदायी रहे हैं –

(1) कपास के रूप में शुद्ध कच्चे माल की स्थानीय प्राप्ति – सूती वस्त्र उद्योग के लिए कच्चे माल के रूप में पर्याप्त मात्रा में कपास की आवश्यकता होती है। यह कच्चा माल इस उद्योग को आसानी से उपलब्ध हो जाता है। प्रायद्वीपीय पठार की लावा निर्मित काली मिट्टी के क्षेत्र में देश का सर्वाधिक कपास उत्पादन किया जाता है। महाराष्ट्र, गुजरात तथा पंजाब राज्य मिलकर देश के कुल उत्पादन का 55% से भी अधिक कपास का उत्पादन करते हैं। कपास के अन्य महत्त्वपूर्ण उत्पादक राज्य हैं-आन्ध्र प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान, कर्नाटक आदि। तमिलनाडु राज्य में कपास के आर्थिक उत्पादन तथा पायकारा परियोजना से सस्ती जल-विद्युत की उपलब्धता के कारण देश की संर्वाधिक (439) मिलों की स्थापना की गयी है, जिनमें से अधिकांश केवल सूत का ही निर्माण करती हैं। इसके अतिरिक्त उत्तम रेशे की कपास मिस्र, सूडान एवं संयुक्त राज्य अमेरिका से भी आसानी से उपलब्ध हो जाती है।
(2) आर्द्र जलवायु का होना।
(3) पर्याप्त संख्या में सस्ते एवं कुशल श्रमिकों की प्राप्ति।
(4) कपास उत्पादक क्षेत्रों का देश के अन्य भागों से तीव्रगामी परिवहन साधनों द्वारा जुड़ा होना।
(5) शक्ति-संसाधनों के रूप में जल-विद्युत शक्ति का पर्याप्त विकास तथा कोयले की उपलब्धि।
(6) सघन जनसंख्या के कारण पर्याप्त खपत तथा विदेशों में भी भारी माँग।
(7) उद्योग के लिए रासायनिक पदार्थों की सुलभता।
(8) सरकारी संरक्षण एवं अनुदानों की उपलब्धि।
(9) विदेशी सूती वस्त्रों पर भारी आयात कर का लगाया जाना।
(10) विदेशों से मिलों के लिए मशीनों एवं उपकरणों का आयात।
(11) निर्यात व्यापार से विदेशी मुद्रा की प्राप्ति।

इस प्रकार यह उद्योग कच्चे माल के उत्पादन क्षेत्रों में ही सीमित न रह सका, बल्कि बाजार एवं शक्ति जैसी सुविधाओं ने वस्त्र उद्योग के कारखानों को अपनी ओर आकर्षित किया है। दिल्ली, कानपुर व कोलकाता जैसे महानगरों में यह उद्योग इन्हीं कारणों से पनपा है। देश में सूती वस्त्रों की अधिक माँग होने के कारण सघन जनसंख्या ने यह उद्योग गंगा के मैदान में भी आकर्षित किया है, जबकि यहाँ पर कच्चे माल का उत्पादन नगण्य ही है। कपास के व्यापार ने ही मुम्बई के सूती वस्त्र उद्योग को विकसित करने में सुविधा प्रदान की है।

भारत में सूती वस्त्रों का उत्पादन एवं वितरण
Production and Distribution of Cotton Textile in India

सूती वस्त्र उद्योग भारत का एक विकेन्द्रीकृत उद्योग है। महाराष्ट्र एवं गुजरात राज्य सूती वस्त्र उद्योग में अग्रणी हैं। देश में सूती वस्त्र उत्पादक राज्यों का विवरण निम्नलिखित है –
(1) गुजरात – गुजरात भारत में प्रथम बड़ा सूती वस्त्र उत्पादक राज्य है, जहाँ सूती वस्त्रों की 120 मिलें हैं। इस राज्य द्वारा देश के एक-तिहाई सूती वस्त्रों का उत्पादन किया जा रहा है। अहमदाबाद सूती वस्त्र उद्योग की राजधानी है, जहाँ पर 72 मिलें केन्द्रित हैं। इसे ‘भारत का मानचेस्टर’ कहा जाता है। राजकोट, मोरवी, बीरमगाँव, कलोल, नवसारी, भावनगर, अंजार सिद्धपुर, नाडियाड, सूरत, भड़ौंच, पोरबन्दर एवं बड़ोदरा अन्य प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं।

(2) महाराष्ट्र – इस राज्य का सूती वस्त्र उत्पादन में दूसरा स्थान है, जहाँ 112 मिलों में वस्त्रों का उत्पादन किया जाता है। देश के एक-चौथाई सूती वस्त्र इसी राज्य में तैयार किये जाते हैं। अकेले मुम्बई महानगर में ही सूती वस्त्र की 62 मिले हैं। इसी कारण इसे ‘सूती वस्त्रों की राजधानी’ कहा जाता है। महाराष्ट्र राज्य के इस उद्योग में 3 लाख से अधिक श्रमिक कार्य करते हैं। बरसी, अकोला, अमरावती, वर्धा, शोलापुर, पुणे, ठाणे, हुबली, सतारा, कोल्हापुर, जलगाँव, सांगली, बिलमोरिया, नागपुर, आलमेनेर इस उद्योग के अन्य प्रधान केन्द्र हैं। यहाँ पर लट्ठा, मलमल, वॉयले, छींट, चद्दर, सूटिंग एवं शर्लिंग, धोतियाँ आदि अनेक प्रकार के रंगीन कपड़ों का निर्माण किया जाता है।

(3) पश्चिम बंगाल – पश्चिम बंगाल राज्य का देश के सूती वस्त्र उत्पादन में तीसरा स्थान है। इस राज्य में बाजार की सुविधा (जनाधिक्य) ने इस उद्योग को आकर्षित किया है। यहाँ सूती वस्त्र की 45 मिले हैं। यहाँ पर कुछ प्रमुख अनुकूल भौगोलिक सुविधाएँ पायी जाती हैं; जैसे-शक्ति संसाधनों के रूप में रानीगंज एवं झरिया की खानों से कोयला; कोलकाता पत्तन की निकटता से मशीनें मँगाने की सुविधा, पूँजी एवं अन्य व्यापारिक सुविधाएँ, सघन जनसंख्या के कारण उपभोक्ता बाजार की सुविधा, वस्त्र उद्योग के अनुकूल जलवायु आदि, परन्तु कपास देश के अन्य भागों से आयात की जाती है। श्यामनगर, पानीहाटी, कोलकाता, सिरामपुर, मौरीग्राम, शिवपुर, पाल्टा, फूलेश्वर, लिलुआ, रिशरा, बेलघरिया, घुसरी प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं।

(4) उत्तर प्रदेश – सूती वस्त्र के उत्पादन की दृष्टि से इस राज्य का चौथा स्थान है। सम्पूर्ण प्रदेश में मिलों की संख्या 41 है। कानपुर इस उद्योग का प्रमुख केन्द्र है जहाँ सूती वस्त्र की 14 मिलें हैं तथा यह उत्तरी भारत को मानचेस्टर’ कहलाता है। यहाँ गंगा घाटी में छोटे रेशे वाली कपास उगायी जाती है; अत: मोटा कपड़ा ही अधिक बनाया जाता है। मुरादाबाद, वाराणसी, आगरा, बरेली, अलीगढ़, मोदीनगर, हाथरस, सहारनपुर, रामपुर, इटावा, लखनऊ आदि अन्य प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं। उत्तर प्रदेश में बाजार एवं यातायात की सुविधाओं के कारण इस उद्योग का विकास हुआ है।

(5) तमिलनाडु – भारत में सूती वस्त्र की मिलें तमिलनाडु राज्य में सबसे अधिक मिलती हैं। जिनकी संख्या 215 है, परन्तु उत्पादन की दृष्टि से इस राज्य का देश में पाँचवाँ स्थान है। यहाँ सूती वस्त्र उद्योग का विकास पायकारा जल-विद्युत परियोजना से सस्ती जलशक्ति की प्राप्ति, कपास का स्थानीय उत्पादन, पर्याप्त श्रमिक तथा उपभोक्ता सुविधाओं के कारण हुआ है। कोयम्बटूर इस राज्य की वस्त्र राजधानी है, जहाँ 105 सूती वस्त्र की मिले हैं। अन्य प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र मदुराई, सलेम, चेन्नई, पेराम्बूर, तिरुचिरापल्ली, रामनाथपुरम्, तूतीकोरिन, तंजौर, काकीनाडा एवं तिरुनेलवेली हैं।

(6) मध्य प्रदेश – मध्य प्रदेश राज्य में वर्धा एवं पूर्णा नदियों की घाटियों में पर्याप्त मात्रा में कपास का उत्पादन किया जाता है। आदिवासी जनसंख्या की अधिकता के कारण श्रमिक पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हो जाते हैं। रामकोला एवं तातापानी की खानों से कोयले की प्राप्ति तथा चम्बल परियोजना से सस्ती जलविद्युत शक्ति की प्राप्ति होती है। रतलाम, इन्दौर, ग्वालियर, देवास, निमाड़, सतना, भोपाल, उज्जैन, बुरहानपुर, अचलपुर एवं जबलपुर प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं। यहाँ पर सूती वस्त्रों की 24 मिलें हैं।

(7) अन्य राज्य – आन्ध्र प्रदेश में 21, कर्नाटक में 32, केरल में 26, राजस्थान में 19, पंजाब में 9, ओडिशा में 5, बिहार में 6, दिल्ली में 4, असोम में 2 तथा गोआ में 1 सूती वस्त्र की मिलें हैं।

निर्यात व्यापार – भारत से सूती कपड़े का निर्यात मुख्यतः अदन, म्यांमार, सूडान, कीनिया, तंजानिया, ऑस्ट्रेलिया, इण्डोनेशिया, पाकिस्तान, श्रीलंका, सिंगापुर, इराक, ईरान, सीरिया, थाईलैण्ड, अरब देश, रूस, ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, नेपाल, नाइजीरिया, बांग्लादेश आदि देशों को किया जाता है। देश के कुल निर्यात का 90 से 92 प्रतिशत कपड़ा मोटा एवं मध्यम श्रेणी का होता है जिसे आयातक देश पुनर्निर्यात के लिए मॅगाते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका व रूस भारतीय सूती वस्त्र के प्रमुख ग्राहक हैं।
सूती वस्त्रोद्योग की समस्याएँ – सूती वस्त्रोद्योग की प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं –

  1. भारत में उत्तम किस्म की लम्बे और मुलायम रेशे वाली कपास का अभाव है। अधिकतर राज्यों में घटिया किस्म की कपास ही उगायी जाती है, जिससे उत्पादन भी घटिया ही होता है।
  2. उत्पादन प्रक्रिया में आज भी अधिकांश कारखानों में उत्पादन प्रक्रिया में परम्परागत तकनीकी का ही प्रयोग हो रहा है जिससे उत्पादित माल को अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है।
  3. भारतीय सूती मिलों की मशीनें पुरानी व निम्न स्तर की हैं जो आये दिन खराब होती रहती हैं, जिससे उत्पादन कम होता है।
  4. भारतीय सूती वस्त्र महँगा और घटिया होने के कारण विदेशी वस्त्रों की टक्कर में नहीं टिक पाता है।
  5. भारतीय मिलों में काम करने वाले मजदूरों को उचित पारिश्रमिक नहीं दिया जाता, जिससे वे अपनी माँगों को लेकर हड़ताल कर देते हैं और उत्पादन कई दिनों तक बन्द रहता है।

प्रश्न 6
भारत में कागज उद्योग के दो प्रमुख केन्द्रों के नाम बताइए तथा उनमें इस उद्योग के स्थानीयकरण के भौगोलिक कारकों की विवेचना कीजिए।
या
भारत में कागज उद्योग के स्थानीयकरण को प्रभावित करने वाले कारकों तथा वितरण का वर्णन कीजिए।
उत्तर

भारत में कागज उद्योग का विकास
Development of Paper Industry in India

कागज आधुनिक सभ्यता का मूलाधार है। ऐसा माना जाता है कि ईसा से 300 वर्ष पूर्व कागज निर्माण की कला का विकास सर्वप्रथम चीन में हुआ था। भारत में कागज का निर्माण अति प्राचीन काल से
कुटीर उद्योग के रूप में किया जा रहा है जिसके प्रमुख केन्द्र कालपी, मथुरा एवं सांगानेर तथा आरवल में थे। आधुनिक ढंग का प्रथम प्रयास 1716 ई० में ट्रंकुबार (चेन्नई के समीप) नामक स्थान पर किया गया, परन्तु इसमें असफलता हाथ लगी। 1840 ई० में हुगली नदी के किनारे सिरामपुर में भी असफलता ही मिली, परन्तु इस उद्योग का वास्तविक विकास तब हुआ जब 1879 ई० में लखनऊ में अपर इण्डिया पेपर मिल्स तथा 1881 ई० में पश्चिम बंगाल में टीटागढ़ पेपर मिल्स की स्थापना की गयी। इसके बाद कारखानों की संख्या में वृद्धि होती गयी। शिक्षा में प्रगति के साथ-साथ कागज की माँग में भी वृद्धि होती रही है; फलतः उत्पादन में भी वृद्धि हुई। वर्तमान में देश में कागज के 380 कारखाने कार्यरत हैं।

कागज उद्योग के स्थानीयकरण को प्रभावित करने वाले भौगोलिक कारक
Geographical Factors Affecting to Localisation of Paper Industry

भारत में कागज उद्योग परम्परागत कच्चे माल (वन-आधारित लकड़ी) से मुक्त है, क्योंकि बाजार का 62% कागज गैर-परम्परागत कच्चे माल से तैयार किया जाता है। इनमें कृषि-कचरा एवं पुनः उपयोग में आने वाला कागज सम्मिलित है। देश में कागज उद्योग को निम्नलिखित भौगोलिक सुविधाएँ
उपलब्ध हैं –
(1) कच्चा माल – कागज उद्योग की स्थापना में कच्चे माल का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। कागज बनाने में सवाईघास, गन्ने की खोई,फटे-पुराने चीथड़े, रद्दी कागज, बाँस तथा कोमल लकड़ी प्रयुक्त की जाती है। भारत के तराई क्षेत्र में कागज उद्योग में प्रयुक्त की जाने वाली घास अधिक उगती हैं। इनसे लगभग 9% लुग्दी तैयार की जाती है। उत्तर प्रदेश तथा महाराष्ट्र में गन्ने की खोई पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है जिससे लगभग 4% लुग्दी तैयार की जाती है। पश्चिम बंगाल तथा दक्षिणी भारत में बाँस की लुगदी से कागज बनाया जाता है। यह कागज मोटा और घटिया किस्म का होता है। भारत में कोमल लकड़ी के वृक्ष कम उगते हैं; अत: केवल घास से ही कागज बनाया जाता है। अल्प मात्रा में लुगदी पश्चिमी यूरोपीय देशों से आयात की जाती है।

(2) स्वच्छ जल – कागज उद्योग के लिए स्वच्छ जल की आवश्यकता बहुत अधिक होती है। कागज उद्योग में प्रयुक्त पदार्थों को गलाने व साफ करने में स्वच्छ जल उपयोग में लाया जाता है। यही कारण है कि यहाँ पर अधिकांश कारखानों की स्थापना नदियों के किनारे पर की गयी है।
(3) रासायनिक पदार्थ – कच्चे माल के साथ-साथ कागज उद्योग में अनेक प्रकार के रासायनिक पदार्थों की आवश्यकता होती है। विभिन्न पदार्थों का रंग उड़ाने के लिए ब्लीचिंग पाउडर, गन्धक, सोडाएश, कॉस्टिक सोडा, क्लोरीन गैस, अमोनियम सल्फेट, चूना तथा नमक आदि की आवश्यकता होती है। ये सभी पदार्थ भारत में पर्याप्त मात्रा में स्थानीय रूप से उपलब्ध हैं।

(4) शक्ति संसाधन – कागज उद्योग में चालक शक्ति के रूप में जल-विद्युत अथवा ताप विद्युत- शक्ति (कोयला) की आवश्यकता होती है। कोयला एक भारी पदार्थ है; अत: उसे दूरवर्ती स्थानों तक ले जाने में कठिनाई तथा अधिक व्यय करना पड़ता है। भारत में जल-विद्युत के उत्पादन में कमी होने के कारण, कागज के कारखानों में उत्पादन बहुत घट गया है। पश्चिम बंगाल में अनेक कारखाने जल-विद्युत के अभाव में बन्द हो गये हैं या आंशिक रूप से चल रहे हैं। वर्तमान समय में 125 कागज मिलें इसी कारण बन्द पड़ी हैं अथवा आंशिक रूप से चल रही हैं। अत: इस उद्योग के विकास में पर्याप्त सस्ती जल-विद्युत शक्ति की अत्यन्त आवश्यकता है।

(5) सस्ते एवं कुशल श्रमिक – कागज की मिलों में कार्य करने के लिए अधिक संख्या में सस्ते एवं कुशल श्रमिकों की आवश्यकता होती है। भारत में प्राचीन काल से ही कागज उद्योग कुटीर उद्योग के रूप में चलाया जाता रहा है; अतः कुशल तथा अनुभवी श्रमिक यहाँ पर्याप्त संख्या में सुगमता से उपलब्ध हो जाते हैं। भारत की सघन जनसंख्या इस उद्योग को सस्ते श्रमिक उपलब्ध करा देती है।

(6) परिवहन के साधन – कागज की मिलों तक कच्चा माल लाने तथा तैयार कागज को बाहर भेजने के लिए परिवहन के सस्ते एवं सुगम साधनों की आवश्यकता पड़ती है। यही कारण है कि भारत में कागज के कारखाने प्रायः रेलवे लाइनों, नदियों अथवा सड़कों के सहारे-सहारे स्थापित किये गये हैं।

(7) पर्याप्त माँग – भारत में कागज की खपत बहुत अधिक है। इस विशाल देश में विद्यालयों तथा कार्यालयों के लिए कागज की पर्याप्त माँग रहती है। भारत का कागज उद्योग देश की माँग की पूर्ति (केवल 90%) भी नहीं कर पाता है।
(8) सरकारी सहायता एवं संरक्षण – भारत सरकार ने कागज उद्योग को सन् 1982 से संरक्षण प्रदान किया है जिसके फलस्वरूप इस उद्योग में आशातीत प्रगति हुई है। इसके अतिरिक्त सरकार कागज उद्योग को वित्तीय सहायता भी प्रदान करती है।

भारत में कागज का उत्पादन एवं वितरण
Production and Distribution of Paper in India

कागज के उत्पादन की दृष्टि से भारत का विश्व में बीसवाँ स्थान है। कागज एक विस्तृत उद्योग है। देश का 70% से भी अधिक कागज का उत्पादन पश्चिम बंगाल, आन्ध्र प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं मध्य प्रदेश राज्यों से प्राप्त होता है। कागज के उत्पादन का कुछ भाग हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, केरल एवं गुजरात राज्यों से प्राप्त होता है। प्रमुख कागज उत्पादक राज्यों का विवरण निम्नवत् है –
(1) पश्चिम बंगाल – पश्चिम बंगाल राज्य देश का लगभग 20% कागज उत्पन्न कर प्रथम स्थान बनाये हुए है। इस राज्य में कागज की 19 मिले हैं। टीटागढ़, रानीगंज, नैहाटी, त्रिवेणी, कोलकाता, काकिनाड़ा, चन्द्रहाटी (हुगली), आलम बाजार (कोलकाता), बड़ा नगर, बांसबेरिया तथा शिवफूली कागज उद्योग के प्रमुख केन्द्र हैं। टीटागढ़ में देश की सबसे बड़ी कागज मिल है जिसमें बाँस का कागज निर्मित किया जाता है।

(2) महाराष्ट्र – यह दूसरा बड़ा कागज उत्पादक राज्य है। यहाँ पर 14 कागज एवं 3कागज-गत्ते के सम्मिलित कारखाने हैं जो देश का लगभग 13% कागज का उत्पादन करते हैं। यहाँ पर कोमल लकड़ी की लुगदी विदेशों से आयात की जाती है। इसके अतिरिक्त बाँस, खोई एवं फटे-पुराने चिथड़ों का उपयोग कागंज बनाने में किया जाता है। गन्ने की खोई एवं धान की भूसी से गत्ता बनाया जाता है। पुणे, खोपोली, मुम्बई, बल्लारपुर, चन्द्रपुर, ओगेलवाडी, चिचवाडा, रोहा, कराड़, कोलाबा, कल्याण, वाड़ावाली, काम्पटी, नन्दुरबार, पिम्परी, भिवंडी एवं वारसनगाँव कागज उद्योग के प्रधान केन्द्र हैं। बल्लारपुर एवं सांगली में अखबारी कागज की मिलें भी स्थापित की गयी हैं।।

(3) आन्ध्र प्रदेश – कागज के उत्पादन में आन्ध्र प्रदेश राज्य का देश में तीसरा स्थान है, जहाँ देश का 12% कागज तैयार किया जाता है। कागज उद्योग के लिए बॉस इस राज्य का प्रमुख कच्चा माल है; अतः यहाँ पर यह उद्योग इसी कच्चे माल पर आधारित है। सिरपुर, कागजनगर, तिरुपति तथा राजमहेन्द्री प्रमुख कागज उत्पादक केन्द्र हैं।

(4) मध्य प्रदेश – इस राज्य में वनों का विस्तार अधिक है। यहाँ बाँस एवं सवाई घास पर्याप्त मात्रा में उगती है। इस राज्य में इन्दौर, भोपाल, सिहोर, शहडोल, रतलाम, मण्डीद्वीप, अमलाई एवं विदिशा प्रमुख कागज उत्पादक केन्द्र हैं। नेपानगर में अखबारी कागज तथा होशंगाबाद में नोट छापने के कागज बनाने का सरकारी कारखाना स्थापित है।

(5) उत्तर प्रदेश – उत्तर प्रदेश राज्य का यह उद्योग शिवालिक एवं तराई क्षेत्रों में सवाई, भाबर एवं मूंज घास तथा बॉस की प्राप्ति के ऊपर निर्भर करता है। यहाँ देश का 4.3% कागज उत्पन्न किया जाता है। लखनऊ, गोरखपुर एवं सहारनपुर कागज उत्पादन के प्रमुख केन्द्र हैं। इनके अतिरिक्त मेरठ, मुजफ्फरनगर, उझानी, पिपराइच, मोदीनगर, नैनी, लखनऊ तथा सहारनपुर प्रमुख गत्ता उत्पादक केन्द्र हैं।

(6) कर्नाटक – इस राज्य में भद्रावती, बेलागुला तथा डांडेली केन्द्रों पर कागज की मिलें हैं।
(7) अन्य राज्य – भारत के अन्य कागज उत्पादक राज्यों में बिहार, गुजरात, ओडिशा, केरल, हरियाणा एवं तमिलनाडु प्रमुख हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार – भारत में कागज का उपभोग निरन्तर बढ़ता जा रहा है। अतः उत्पादन की कमी की पूर्ति विदेशों से कागज का आयात कर की जाती है। यह आयात नॉर्वे, स्वीडन, जापान, हॉलैण्ड, पोलैण्ड, जर्मनी, कनाडा आदि देशों से किया जाता है। भारत थोड़ी मात्रा में कागज का निर्यात भी करता है। यह निर्यात अफ्रीकी एवं दक्षिणी-पूर्वी एशियाई देशों को किया जाता है। वर्ष 2001-2002 में भारत ने ₹ 2,131 करोड़ मूल्य के कागज का आयात किया। इस आयात को देखते हुए यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भविष्य में कागज उत्पादन में आत्मनिर्भर होने के लिए देश के भीतर ही सम्भावित स्थानों पर कागज की मिलों का विस्तार किया जाना चाहिए।

प्रश्न 7
उत्तर प्रदेश के चमड़ा उद्योग का विवरण लिखिए।
उत्तर
चमड़ा उद्योग पूर्ण रूप से पशुओं पर आधारित उद्योग है। विश्व के लगभग एक-तिहाई पशु भारत में पाले जाते हैं। उत्तर प्रदेश राज्य में सर्वाधिक पशु पाले जाते हैं जिनसे खाल एवं चमड़ा पर्याप्त मात्रा में प्राप्त होता है। पशुपालन व्यवसाय में इस राज्य का भारत में प्रथम स्थान है। इसी कारण यहाँ चमड़ा उद्योग काफी प्रगति कर गया है। राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में चमड़ा एवं उससे निर्मित पदार्थों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उत्तर प्रदेश राज्य में यह उद्योग कुटीर उद्योग के रूप में विकसित हुआ है।
चमड़ा उद्योग का वर्गीकरण निम्नलिखित चार मुख्य विभागों में किया जा सकता है –

  • चाम एवं खालों का कमाना।
  • जूते बनाना।
  • यात्रा में काम आने वाले सामान।
  • मशीनों के पट्टे तथा उद्योगों में काम आने वाले यन्त्रों एवं उपकरणों का निर्माण।

उत्तर प्रदेश राज्य में चमड़े के लगभग 80 कारखाने हैं जिनमें चमड़ा पकाकर एवं कमाकर तैयार किया जाता है। कानपुर चमड़ा उद्योग का प्रधान केन्द्र है जहाँ इसके 25 कारखाने हैं। यहाँ जूते, चप्पल, सूटकेस, अटैचियाँ एवं सैनिक सामान बनाया जाता है। कानपुर में चमड़े की वस्तुओं को प्रोत्साहन देने हेतु (Finished Leather and Leather Manufacturers Council) की स्थापना की गयी है।

आगरा इस उद्योग का दूसरा बड़ा केन्द्र है, जहाँ इसके 25 कारखाने कार्यरत हैं। इनमें जूते, चप्पल अधिक बनाये जाते हैं। ये देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों को भी निर्यात किये जाते हैं। मेरठ खेल को सामान बनाने में देशव्यापी प्रसिद्ध केन्द्र है। यहाँ पर चमड़े से निर्मित खेल के सामान की पूर्ति देश भर में की जाती है। अन्य केन्द्रों में बरेली, अलीगढ़, इलाहाबाद एवं सहारनपुर प्रमुख हैं। यहाँ जूते विशेष रूप से बनाये जाते हैं।

उत्तर प्रदेश में जूते बनाने की 5 बड़ी इकाइयाँ हैं जिनमें कपूर एलन एण्ड कम्पनी, कानपुर; मॉडल इण्डस्ट्रीज, दयालबाग; आगरा तथा कर्जन शू फैक्ट्री, आगरा बहुत ही प्रसिद्ध हैं। प्रदेश में जितना चमड़ा बनता है उसका दो-तिहाई भाग जूता उद्योग में खप जाता है। वैसे तो यह उद्योग घरेलू स्तर पर छोटे-बड़े सभी नगरीय केन्द्रों में किया जाता है, परन्तु वृहत् स्तर पर पश्चिमी ढंग के जूते बनाने के केवल 5 कारखाने प्रदेश में स्थापित हैं, जबकि देश में कुल 15 कारखाने हैं। इस प्रदेश में निर्मित जूते, चप्पल, ब्रीफकेस, अटैचियाँ, खेल का सामान, सैनिक साज-सामान की माँग देश भर में रहती है।

जूता उद्योग के लिए आवश्यक कच्चा माल – जूता उद्योग के लिए आवश्यक कच्चा माल चाम एवं खाले हैं। प्रयोग करने से पहले इसे कमाया जाता है। देश में चमड़ा कमाने के 40 कारखाने हैं। इस व्यवसाय में १ 15 करोड़ की पूँजी लगी है। इनमें से लगभग 10% कारखाने उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित हैं। इन कच्ची खालों की उपलब्धि गाय एवं भैंसों से होती है, परन्तु देश के विभाजन के कारण कच्ची खालों की उपलब्धता में कुछ कमी आयी तथा खालों के कुछ केन्द्र पाकिस्तान में रह गये तथा खाल कमाने के कुछ कारखाने भारत में आये। चमड़ा कमाने के इस देशी उद्योग पर इस स्थिति का काफी प्रभाव पड़ा। भेड़-बकरियों की खाले अन्य कच्चा माल है जिसकी उपलब्धि आवश्यकता से भी अधिक है। अतः इनका विदेशों को निर्यात कर दिया जाता है।

चमड़ा कमाने में काम आने वाली वनस्पति में देश आत्मनिर्भर नहीं है। इस वनस्पति में बबूल की छाल एवं उसका सत महत्त्वपूर्ण है तथा इसका आयात पूर्वी अफ्रीका से किया जाता है। उत्तर प्रदेश राज्य में बबूल का उत्पादन उत्तरी-पश्चिमी भाग में किया जाता है। चमड़ा कमाने में काम आने वाली अन्य प्रमुख वनस्पति, आँवला एवं उसका सत, हर्र, बहेड़ा की छाल हैं। ये वनस्पति पदार्थ प्रदेश के शिवालिक की पहाड़ियों एवं दक्षिणी पठारी भागों में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। अन्य पदार्थों में चूना, सोडियम सल्फाइड, बोरिक एसिड, बाइक्रोमेट ऑफ सोडा, गन्धक का तेजाब मुख्य हैं। इनमें से अधिकांश वस्तुओं में देश आत्मनिर्भर है। इनके अतिरिक्त कॉड, हैरिंग एवं सील मछलियों का तेल भी काम में लाया जाता है। छाल एवं रासायनिक पदार्थों के अतिरिक्त ऐलुमिनियम, अण्डे की जर्दी एवं जैतून का तेल भी चमड़ा शोधन के काम में आता है। इस प्रकार अधिकांश चमड़ा कमाने के कच्चे पदार्थ देश में ही उपलब्ध हैं। कुछ रासायनिक पदार्थों का विदेशों से आयात किया जाता है। प्रदेश का यह उद्योग सफलता की ओर अग्रसर है।

भारतीय चमड़े की माँग प्रमुखतया ब्रिटेन 45%, जर्मनी 10%, फ्रांस 7% एवं संयुक्त राज्य अमेरिका 9% देशों में रहती है। इटली, जापान, बेल्जियम एवं पूर्ववर्ती यूगोस्लाविया अन्य प्रमुख आयातक देश हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भारतीय अर्थव्यवस्था में कुटीर उद्योगों की महत्ता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
भारतीय अर्थतन्त्र कृषि पर आधारित है। देश की 72% जनसंख्या गाँवों में बसती है तथा कृषि द्वारा आजीविका निर्वाह करती है। कृषि एक मौसमी व्यवसाय है, जिससे कृषकों को पर्याप्त रोजगार प्राप्त नहीं होता। अतएव कृषि पर आधारित कुटीर उद्योगों; जैसे-हथकरघा द्वारा सूती धागा तथा वस्त्र बनाना, खाद्य तेल प्रसंस्करण, गुड़, शक्कर बनाना, चटाई, बान, रस्सी आदि बनाना बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। इन उद्योगों से जहाँ ग्रामीण जनसंख्या को आजीविका के साधन प्राप्त होते हैं, वहीं अर्थतन्त्र में भी सुधार होता है। इसी प्रकार, नगरों में भी अनेक कुटीर उद्योग लोगों की पारिवारिक आय का साधन होते हैं। इनसे श्रमिकों को रोजगार की प्राप्ति होती है।

प्रश्न 2
भिलाई में लौह-इस्पात उद्योग के स्थापित होने के दो कारणों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
भिलाई में लौह-इस्पात उद्योग के स्थापित होने के दो कारण निम्नलिखित हैं –
(1) कच्चे लोहे की निकट उपलब्धता – इस कारखाने के लिए कच्चा लोहा बस्तर, करघाली व राजहरा की पहाड़ियों से उपलब्ध हो जाता है। इसके अतिरिक्त झरिया और बोकारो का मिश्रित कोयला धातुशोधन के उपयुक्त बनाया जाता है। कोरबा ताप शक्ति-गृह से 90,000 किलोवाट बिजली भी उपलब्ध होती है।

(2) चूना व डोलोमाइट की निकट उपलब्धता – इस कारखाने के लिए चुना निकट ही दुर्ग, रायपुर और बिलासपुर जिलों से प्राप्त हो जाता है। डोलोमाइट भी निकट ही भानेवर, कासोंदी, पारसोदा, खरिया, रामतोला और हरदी (बिलासपुर) और भाटापारा (रायपुर) से प्राप्त हो जाता है।

प्रश्न 3
भारत में लौह तथा इस्पात उद्योग के चार केन्द्रों का उल्लेख कीजिए।
या
बोकारो भारत के किस राज्य में स्थित है तथा यह किस उद्योग के लिए प्रसिद्ध है? [2010,14]
उत्तर
भारत में लौह तथा इस्पात उद्योग के चार केन्द्र निम्नलिखित हैं –

  1. राउरकेला इस्पात लिमिटेड – हिन्दुस्तान स्टील लिमिटेड के तत्वावधान में 1955 ई० में ओडिशा राज्य के सुन्दरगढ़ जिले में राउरकेला नामक स्थान पर जर्मनी की क्रुप्स डिमॉग कम्पनी के सहयोग से इस कारखाने की स्थापना की गयी थी। वर्तमान में इसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता 30.10 लाख टन इस्पात तैयार करने की है।
  2. भिलाई इस्पात लिमिटेड – इस कारखाने की स्थापना 1953 ई० में पूर्व सोवियत संघ की सहायता से छत्तीसगढ़ राज्य के भिलाई नामक स्थान पर की गयी थी। इस कारखाने पर भी हिन्दुस्तान स्टील लिमिटेड का अधिकार है। वर्तमान में इस कारखाने की वार्षिक उत्पादन क्षमता 40 लाख टन इस्पात तैयार करने की है।
  3. दुर्गापुर इस्पात लिमिटेड – हिन्दुस्तान स्टील लिमिटेड के तत्त्वावधान में इस कारखाने की स्थापना सन् 1956 में पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर नामक स्थान पर ब्रिटिश सरकार की सहायता से की गयी है। इस कारखाने की वार्षिक उत्पादन क्षमता 28 लाख टन है।
  4. बोकारो इस्पात लिमिटेड – चतुर्थ पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत सन् 1964 में पश्चिमी झारखण्ड के धनबाद जिले के बोकारो नामक स्थान पर इस कारखाने की स्थापना की गयी थी। इसके निर्माण में पूर्व सोवियत संघ की सरकार से सहायता ली गयी थी। इस कारखाने की उत्पादन क्षमता 40 लाख टन थी, जिसे बाद में 60 लाख टन तक बढ़ाया गया है।

प्रश्न 4
भारत में चीनी उद्योग के विकास की समस्याओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
भारत में चीनी उद्योग के विकास की प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं –

  1. भारत में गन्ने का लागत मूल्य अधिक है; अत: चीनी उत्पादन महँगा पड़ता है।
  2. चीनी की मिलों में पुराने उपकरण तथा मशीनें होने से उत्पादन कम होता है।
  3. चीनी उद्योग पर सरकार ने भारी कर लगा रखे हैं।
  4. श्रमिकों की हड़तालें भी चीनी उत्पादन में बाधक हैं।

प्रश्न 5
भारत के सूती वस्त्र उद्योग के किसी एक राज्य में स्थानीयकरण के कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
महाराष्ट्र – यहाँ 119 कारखानों में से 40 कताई मिल तथा 79 सम्मिश्रित कारखाने हैं। अकेले मुम्बई में 54 कारखाने स्थापित हैं। नागपुर, पुणे, वर्धा, अमरावती, अकोला, कोल्हापुर, शोलापुर एवं सांगली प्रमुख केन्द्र हैं। राज्य में सूती वस्त्रोद्योग के विकास में निम्नलिखित कारक उत्तरदायी रहे हैं –

  1. दक्कन लावा के मिट्टी क्षेत्र में कपास की खेती उत्तम होती है।
  2. मुम्बई पत्तन से मिस्र, अमेरिका आदि से कपास तथा यूरोप से मशीनरी आयात की सुविधा है।
  3. राज्य में सघन आबादी के कारण पर्याप्त श्रमिक उपलब्ध हैं।
  4. राज्य में उद्योग के पूर्वारम्भ के कारण श्रमिक कुशल हो गये हैं।
  5. मुम्बई नगर प्रमुख व्यापार केन्द्र होने के कारण पूँजी की सुविधा प्राप्त है।
  6. मुम्बई भीतरी भागों से रेलों एवं सड़कों द्वारा जुड़ा है।
  7. मुम्बई की आर्द्र जलवायु सूती वस्त्र बनाने के लिए उपयुक्त है। कारखानों के भीतर कृत्रिम नमी उत्पन्न करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
  8. जल-विद्युत एवं परमाणु विद्युत का विकास होने के कारण विदेशों से कोयलों के आयात की आवश्यकता नहीं पड़ती।
  9. अनेक प्रकार के विशिष्ट वस्त्र (लट्ठा, मलमल, वायल, छींट, सूटिंग, शर्लिंग, धोती, साड़ी, चादरें आदि) तैयार किये जाते हैं।
  10. उद्योग के पूर्वारम्भ के कारण मुम्बई को ‘सूती वस्त्रों की राजधानी’ (Cottonopolis) कहा जाता है।

प्रश्न 6
उद्योगों के स्थानीयकरण के लिए किन्हीं चार भौगोलिक कारकों का उल्लेख कीजिए
उत्तर
उद्योगों के स्थानीकरण के चार भौगोलिक कारकों का विवरण निम्नवत् है –

  1. कच्चे माल की उपलब्धता – किसी स्थान पर कच्चे माल की उपलब्धता वहाँ सम्बन्धित उद्योग के स्थानीयकरण का प्रमुख कारक है। ऐसा न होने पर कच्चा माल अन्यत्र दूरस्थ स्थान पर ले जाने में समय व धन का अपव्यय होता है। यही कारण है कि चीनी के उद्योग का उत्तर प्रदेश में, लौह-इस्पात उद्योग का झारखण्ड में, सूती वस्त्र उद्योग को महाराष्ट्र में स्थानीयकरण हुआ है।
  2. जलवायु – किसी भी उद्योग के लिए किसी स्थान पर उपयुक्त जलवायु होना भी स्थानीयकरण का कारक है। सूती वस्त्र उद्योग के लिए आर्द्र जलवायु आवश्यक है तो चीनी उद्योग के लिए उष्ण-आर्द्र। यही कारण है कि सूती वस्त्र उद्योग का महाराष्ट्र व गुजरात में स्थानीयकरण हुआ है।
  3. जल की उपलब्धता – अधिकांश विनिर्माण उद्योगों में जल की आवश्यकता बड़ी मात्रा में पड़ती है। सीमेण्ट उद्योग, कागज उद्योग, चीनी उद्योग ऐसे उद्योगों के उदाहरण हैं। ये उद्योग उन्हीं स्रोतों पर केन्द्रित हैं जहाँ जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है।
  4. श्रम-शक्ति की उपलब्धता – लगभग सभी उद्योगों में पर्याप्त तथा कुशल श्रम-शक्ति की आवश्यकता पड़ती है। किसी जल-विहीन या निम्नतम जनसंख्या घनत्व वाले स्थान पर उद्योगों के लिए श्रम-शक्ति का अभाव होता है। अन्य स्थानों से श्रम-शक्ति को लाकर बसाना महँगा व असुविधाजनक होती है। अत: उद्योगों के स्थानीयकरण में श्रम-शक्ति की उपलब्धता एक महत्त्वपूर्ण कारक है।

प्रश्न 7
भारत में सूती वस्त्रोद्योग के स्थानीयकरण के कोई चार कारक बताइए। [2007]
उत्तर
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 5 के अन्तर्गत ‘सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण के कारक शीर्षक देखें।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
भारत की इस्पात नगरी किसे कहते हैं? उत्तर भारत के झारखण्ड राज्य के सिंहभूम जिले में सांकची (जमशेदपुर) नामक स्थान पर प्रसिद्ध उद्योगपति जमशेदं जी टाटा द्वारा स्थापित “टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी, जमशेदपुर को भारत की इस्पात नगरी कहा जाता है।

प्रश्न 2
सलेम का इस्पात संयन्त्र किस राज्य में है?
उत्तर
सलेम का इस्पात संयन्त्र भारत के तमिलनाडु के सलेम जिले में है।

प्रश्न 3
सीमेण्ट का सर्वाधिक उत्पादन करने वाला राज्य कौन-सा है?
उत्तर
भारत में सीमेण्ट का सर्वाधिक उत्पादन आन्ध्र प्रदेश राज्य (देश का 15%) में होता है।

प्रश्न 4
एशिया का सबसे बड़ा सीमेण्ट कारखाना कहाँ स्थित है?
उत्तर
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में चुर्क तथा चुनार कजराहट में स्थित है।

प्रश्न 5
भारत का सबसे बड़ा सूती वस्त्र उत्पादक राज्य कौन-सा है? उत्तर गुजरात भारत का सबसे बड़ा सूती वस्त्र उत्पादक राज्य है।

प्रश्न 6
‘उत्तरी भारत का मानचेस्टर’ किसे कहा जाता है?
उत्तर
उत्तर प्रदेश का कानपुर नगर सूती वस्त्र उद्योग का प्रमुख केन्द्र होने के कारण ‘उत्तरी भारत का मानचेस्टर’ कहा जाता है।

प्रश्न 7
भारत की सर्वाधिक सूती वस्त्र मिलें किस राज्य में स्थित हैं?
उत्तर
भारत में सर्वाधिक सूती वस्त्र मिलें तमिलनाडु राज्य में स्थित हैं।

प्रश्न 8
भारत का सर्वाधिक चीनी उत्पादक राज्य कौन-सा है?
उत्तर
उत्तर प्रदेश भारत का सर्वाधिक चीनी उत्पादक राज्य है।

प्रश्न 9
वर्तमान में भारत में कितनी चीनी मिलें हैं?
उत्तर
वर्तमान में भारत में 435 चीनी मिलें हैं।

प्रश्न 10
छत्तीसगढ़ के सीमेण्ट उद्योग के केन्द्रों के नाम लिखिए।
उत्तर
छत्तीसगढ़ में सीमेण्ट उद्योग केन्द्र हैं—जामुला, मंधार, तिलदा, मोदीग्राम, अलकतरा एवं रायगढ़।

प्रश्न 11
हिन्दुस्तान मशीन टूल्स के कारखाने कहाँ-कहाँ स्थित हैं?
उत्तर
‘हिन्दुस्तान मशीन टूल्स के कारखाने जलाहाजी, बंगलुरु, पिंजौर, कालामसेरी और हैदराबाद आदि स्थानों पर स्थित हैं।

प्रश्न 12
भारत में उत्पन्न होने वाले विभिन्न रेशमों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर
शहतूत का रेशम, टशर रेशम, मूंगा रेशम तथा ईरी रेशम।

प्रश्न 13
टशर रेशम क्या है? इसके प्रमुख उत्पादक राज्यों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर
यह शहतूत पर पाले गये कीड़ों से प्राप्त किया जाता है। यह रेशम कुछ घटिया किस्म का माना जाता है। इसके प्रमुख उत्पादक राज्य झारखण्ड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ हैं।

प्रश्न 14
पश्चिम बंगाल की कृषि पर आधारित प्रमुख उद्योग का नाम बताइए तथा उसके प्रमुख केन्द्रों के नाम लिखिए। [2008]
उत्तर
पश्चिम बंगाल में कृषि पर आधारित प्रमुख फसल जूट है। जूट उद्योग के प्रमुख केन्द्र टीटागढ़, शिवपुर, हावड़ा, श्यामनगर, बाटानगर, सियालदाह, बिरलापुर, बैरकपुर आदि हैं।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 22 Industries

प्रश्न 15
भिलाई भारत के किस राज्य में स्थित है तथा यह किस उद्योग के लिए प्रसिद्ध है? [2008, 14]
उत्तर
भिलाई भारत के छत्तीसगढ़ राज्य में स्थित है तथा यह इस्पात उद्योग के लिए प्रसिद्ध है, जो यहाँ सन् 1953 में पूर्व सोवियत संघ की सहायता से स्थापित किया गया था।

प्रश्न 16
गुजरात के सूती वस्त्र उद्योग के किन्हीं दो केन्द्रों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
गुजरात के सूती वस्त्र उद्योग के दो केन्द्र हैं-अहमदाबाद तथा सूरत।

प्रश्न 17
उद्योगों के स्थानीयकरण के लिए किन्हीं दो कारकों के नाम लिखिए। [2007]
उत्तर

  1. कच्चे माल की उपलब्धता तथा
  2. यातायात के साधनों की उपलब्धता।

प्रश्न 18
पश्चिम बंगाल के दो प्रमुख कागज उद्योग-केन्द्रों के नाम लिखिए। [2007]
उत्तर

  1. टीटागढ़ तथा
  2. रानीगंज।

प्रश्न 19
भारत के दो प्रमुख लौह तथा इस्पात संयन्त्रों के नाम बताइए। [2008, 09, 16]
उत्तर

  1. भिलाई इस्पात लिमिटेड तथा
  2. बोकारो इस्पात लिमिटेड।

प्रश्न 20
भारत में लौह-अयस्क भण्डार के दो प्रमुख राज्यों का उल्लेख कीजिए। [2014]
उत्तरं

  1. झारखण्ड तथा
  2. छत्तीसगढ़।

प्रश्न 21
भारत के सूती वस्त्र उद्योग के अधिक विकास वाले दो राज्यों के नाम लिखिए। [2008]
या
भारत के सूती वस्त्र उद्योग के दो केन्द्रों के नाम लिखिए। [2013]
उत्तर

  1. गुजरात तथा
  2. महाराष्ट्र।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1
भारत के जूट उद्योग का सबसे मुख्य क्षेत्र है –
(क) पश्चिम बंगाल में हुगली नदी का किनारा
(ख) उत्तर प्रदेश में शहजनता
(ग) बिहार में दरभंगा
(घ) मध्य प्रदेश में रायगढ़
उत्तर
(क) पश्चिम बंगाल में हुगली नदी का किनारा।

प्रश्न 2
भारत का सबसे बड़ा सूती वस्त्र उत्पादक राज्य है –
(क) महाराष्ट्र
(ख) गुजरात
(ग) बंगाल
(घ) मध्य प्रदेश
उत्तर
(ख) गुजरात।

प्रश्न 3
सूती वस्त्र उत्पादन में पूर्व का बोस्टन कहलाता है –
(क) गुजरात का अहमदाबाद
(ख) उत्तर प्रदेश का कानपुर
(ग) महाराष्ट्र का कोल्हापुर
(घ) पश्चिम बंगाल का कोलकाता
उत्तर
(क) गुजरात का अहमदाबाद।

प्रश्न 4
स्टील ऑथोरिटी ऑफ इण्डिया लि० की स्थापना किस वर्ष हुई?
(क) 1963 ई० में
(ख) 1971 ई० में
(ग) 1973 ई० में
(घ) 1976 ई० में
उत्तर
(ग) 1973 ई० में।

प्रश्न 5
भारत का लोहा-इस्पात कारखाना जो निजी क्षेत्र में स्थापित है –
(क) विशाखापट्टनम् स्टील प्लाण्ट
(ख) सलेम स्टील प्लाण्ट
(ग) टाटा आयरन एण्ड स्टील प्लाण्ट
(घ) दुर्गापुर स्टील प्लाण्ट
उत्तर
(ग) टाटा आयरन एण्ड स्टील प्लाण्ट

प्रश्न 6
निम्नलिखित केन्द्रों में से कौन लोहा-इस्पात उद्योग का केन्द्र नहीं है?
(क) बोकारो
(ख) रेनुकूट
(ग) भिलाई
(घ) राउरकेला
उत्तर
(ख) रेनुकूट।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 22 Industries

प्रश्न 7
निम्नलिखित में से भारत की कौन-सी लौह-इस्पात इकाई सबसे पुरानी है?
(क) भद्रावती
(ख) बोकारो
(ग) जमशेदपुर
(घ) दुर्गापुर
उत्तर
(ग) जमशेदपुर।

प्रश्न 8
निम्नलिखित इस्पात केन्द्रों में से कौन छत्तीसगढ़ राज्य में स्थित है?
(क) भिलाई
(ख) राउरकेला
(ग) दुर्गापुर
(घ) बोकारो
उत्तर
(क) भिलाई।

प्रश्न 9
पंजाब का कौन-सा नगर हौजरी उद्योग के लिए प्रसिद्ध है?
(क) गुरदासपुर
(ख) लुधियाना
(ग) अमृतसर
(घ) जालन्धर
उत्तर
(ख) लुधियाना।

प्रश्न 10
देश में रेशम उद्योग का सर्वाधिक स्थानीयकरण किस राज्य में हुआ?
(क) कर्नाटक
(ख) आन्ध्र प्रदेश
(ग) पंजाब
(घ) झारखण्ड तर
उत्तर
(क) कर्नाटक।

प्रश्न 11
टाटा का लोहा तथा इस्पात संयन्त्र स्थित है – [2010,14] 
(क) बिहार में
(ख) मध्य प्रदेश में
(ग) झारखण्ड में
(घ) छत्तीसगढ़ में
उत्तर
(ग) झारखण्ड में।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 22 Industries

प्रश्न 12
निम्नलिखित में से कौन-सा औद्योगिक नगर है? [2012]
(क) जमशेदपुर
(ख) वाराणसी
(ग) लखनऊ
(घ) मथुरा
उत्तर
(क) जमशेदपुर।

प्रश्न 13
भिलाई लौह-इस्पात संयन्त्र अवस्थित है – [2015, 16]
(क) मध्य प्रदेश में
(ख) झारखण्ड में
(ग) छत्तीसगढ़ में
(घ) ओडिशा में
उत्तर
(ग) छत्तीसगढ़ में।

प्रश्न 14
‘जमशेदपुर’ सम्बन्धित है – [2016]
(क) सूती वस्त्र उद्योग से।
(ख) चीनी उद्योग से
(ग) सीमेण्ट उद्योग से
(घ) लोहा एवं इस्पात उद्योग से
उत्तर
(घ) लोहा एवं इस्पात उद्योग से।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 22 Industries (उद्योग धन्धे) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 22 Industries (उद्योग धन्धे), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 17 Population Education

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 17 Population Education (जनसंख्या शिक्षा) are part of UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 17 Population Education (जनसंख्या शिक्षा).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 17
Chapter Name Population Education (जनसंख्या शिक्षा)
Number of Questions Solved 42
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 17 Population Education (जनसंख्या शिक्षा)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
जनसंख्या शिक्षा से आप क्या समझते हैं? भारत में जनसंख्या शिक्षा की आवश्यकता एवं महत्त्व का भी उल्लेख कीजिए।
उतर
जनसंख्या शिक्षा की अवधारणा
जनसंख्या शिक्षा शिक्षाशास्त्र की एक नवीन अवधारणा है। इस अवधारणा की उत्पत्ति और प्रसार का प्रमुख कारण जनसंख्या की तीव्र गति से वृद्धि है। जनसंख्या की असाधारण वृद्धि ने विश्व के सम्मुख एक अत्यन्त भीषण समस्या उत्पन्न कर दी है। जनसंख्या की वृद्धि वैयक्तिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक पक्ष पर अपना दूषित प्रभाव डालती है। भारत में तो जनसंख्या इतनी तीव्र गति से बढ़ी है। कि हमारे प्रगति के सभी मार्ग अवरुद्ध हो गये हैं। कुछ समय पूर्व तक जनसंख्या शिक्षा की अवधारणा को व्यक्त करने के हेतु यौन शिक्षा, पारिवारिक जीवन शिक्षा आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता था। 1962 ई० के बाद कोलम्बिया विश्वविद्यालय के प्रो० वेलैण्ड ने जनसंख्या शिक्षा शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया। उसी समय से जनसंख्या शिक्षा’ शब्द का प्रयोग निरन्तर होता आ रहा है। अब जनसंख्या शिक्षा को अति आवश्यक एवं उपयोगी माना जाने लगा है। इसका कारण यह है कि शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर जनसंख्या शिक्षा के समावेश को आवश्यक माना जाने लगा है।

जनसंख्या शिक्षा की परिभाषा
अभी तक ‘जनसंख्या शिक्षा का कोई भी सर्वमान्य स्वीकृत अर्थ नहीं प्रस्तुत किया गया है और न ही उसकी कोई परिभाषा है। सबसे पहले इसकी व्याख्या सितम्बर, 1970 ई० में यूनेस्को की ओर से बैंकांक में आयोजित की जाने वाली ‘जनसंख्या शिक्षा संगोष्ठी में की गयी। उसमें कहा गया-“जनसंख्या शिक्षा एक शैक्षिक कार्यक्रम है, जिसमें परिवार, समाज, राष्ट्र एवं विश्व की जनसंख्या की स्थिति का अध्ययन किया जाता है। इस अध्ययन का उद्देश्य छात्रों में इस स्थिति के प्रति विवेकपूर्ण, उत्तरदायित्वपूर्ण दृष्टिकोण तथा व्यवहार का विकास करना है।”

डॉ० वी०के०आर०वी० राव ने जनसंख्या शिक्षा की परिभाषा इस प्रकार दी है-“जनसंख्या शिक्षा प्रमुख रूप से ऐसी प्रेरणा-शक्ति है जो हमारे परिवार की सीमा एवं परिवार नियोजन की आवश्यकताओं के प्रति उचित दृष्टिकोण उत्पन्न करती है और राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक विकास में सहायता प्रदान करती है। इसे यौन शिक्षा और परिवार नियोजन की जानकारी से निश्चित नहीं किया जाना चाहिए।” डॉ० राव का विचार है कि शिक्षा का सम्बन्ध मानवीय स्थितियों के विकास से भी है, क्योंकि सीमित परिवार अथवा परिवार की संख्या उसकी प्रगति अथवा सुधार के मार्ग को निश्चित करती है। | वीडरमैन के अनुसार, “जनसंख्या शिक्षा एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा छात्रों को जनसंख्या तत्त्व की प्रवृत्ति और उसकी व्याख्या, जनसंख्या की विशेषताओं, जनसंख्या में परिवर्तनों के कारणों, उसके परिणामों और इन परिवर्तनों से परिवार, समाज, देश एवं विश्व पर पड़ने वाले प्रभावों से अवगत कराया जाता है।

डॉ० चन्द्रशेखर का मत है, “जनसंख्या शिक्षा न तो यौन-शिक्षा है और न परिवार नियोजन की शिक्षा। जनसंख्या शिक्षा जनसंख्या वृद्धि, इसके वितरण एवं जीवन-स्तर से , उसके सम्बन्ध और उसके आर्थिक एवं सामाजिक परिणामों का अर्थशास्त्र एवं समाजशास्त्र है।” इस तरह जनसंख्या शिक्षा के माध्यम से छात्रों को विश्व, राष्ट्र, राज्य, स्थानीय और परिवार स्तर पर जनसंख्या के विविध पहलुओं से अवगत कराया जाता है। साथ ही उन्हें रहन-सहन के स्तर एवं आर्थिक और सामाजिक स्तर पर जनसंख्या वृद्धि के प्रभाव के सम्बन्ध में जानकारी प्रदान की जाती है। इस तरह जनसंख्या शिक्षा का अन्तिम लक्ष्य व्यक्ति को इस योग्य बनाना है कि वे जनसंख्या वृद्धि और उससे उत्पन्न समस्याओं को समझ सकें। उनमें यह संचेतना उत्पन्न हो जिससे वे विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हो सकें।

भारत में जनसंख्या शिक्षा की आवश्यकता और महत्त्व
2011 की जनसंख्या के अनुसार, भारत की जनसंख्या 121.02 करोड़ हो चुकी है। भारत में जनसंख्या विस्फोट के इस विकराल रूप ने जनसंख्या शिक्षा की आवश्यकता को अनिवार्य बना दिया है। जनसंख्या शिक्षा के उद्देश्य, जो “राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसन्धान प्रशिक्षण परिषद्” ने अपनी पुस्तिका में व्यक्त किये हैं, उनसे उसका महत्त्व स्पष्ट हो जाता है, इस प्रकार है-

  1. छात्रों को आधुनिक विश्व की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना के रूप में जनसंख्या वृद्धि की गति तथा
    कारणों के सम्बन्ध में ज्ञानं प्रदान करना।
  2. छात्रों को व्यक्ति, परिवार, समाज तथा विश्व के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा
    राजनीतिक जीवन पर जनसंख्या वृद्धि के पड़ने वाले प्रभावों से अवगत कराना।
  3. छात्रों को परिवार के आकार तथा रहन-सहन के स्तर के सम्बन्ध में बताना तथा कम आय वाले।
    परिवारों की कव॑िनाई बताकर उन्हें छोटा परिवार रखने हेतु प्रेरित करना।
  4. छात्रों को जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न होने वाली निम्नलिखित समस्याओं की जानकारी प्रदान करके उनमें जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण रखने के दृष्टिकोण का विकास करना-
    1. रोगों तथा दुर्भिक्षों की फैलना
    2. अपराधों एवं सामाजिक संघर्षों का बढ़ना,
    3. जन्म-दर एवं मृत्यु-दर में असन्तुलन
    4. देश की आवश्यकता तथा सुरक्षा में बाधा उत्पन्न होना
    5. भोजन, वस्त्र, मकान, रोजगार, शिक्षण संस्थाओं आदि का अभाव होना।

जनसंख्या शिक्षा के उपर्युक्त उद्देश्यों को एक राष्ट्रीय सेमिनार में इस प्रकार स्पष्ट किया गया-“जनसंख्या शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को यह समझने की योग्यता प्रदान करना होना चाहिए कि परिवार के आकार को नियन्त्रित किया जा सकता है, जनसंख्या का सीमा निर्धारण राष्ट्र में उत्तम जीवन को सुविधाजनक बना सकता है और परिवार का छोटा आकार प्रत्येक परिवार के सदस्य के जीवन-स्तर के उन्नयन में अतिशय योगदान दे सकता है।’ यहाँ हम भारत में जनसंख्या शिक्षा की आवश्यकता और महत्त्व की विवेचना करेंगे। भारत एक प्रगतिशील देश है जिसने लोकतान्त्रिक व्यवस्था को अपनाया है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद हमने विभिन्न क्षेत्रों में काफी प्रगति की है परन्तु जनसंख्या वृद्धि के फलस्वरूप हमारी प्रगति का सम्पूर्ण लाभ राष्ट्र को नहीं प्राप्त हो सका है। यद्यपि खाद्यान्न के क्षेत्र में हम आत्मनिर्भर हो चुके हैं परन्तु अन्य क्षेत्रों में हम काफी पिछड़े हुए हैं। ऐसी स्थिति में जनसंख्या पर नियन्त्रण रखना अत्यन्त आवश्यक है।

जनसंख्या शिक्षा द्वारा छात्र-छात्राओं में इस विचार का समावेश करके कि “छोटा परिवार सुखी परिवार” हम भावी नागरिकों को परिवार नियोजन के हेतु प्रेरित कर सकेंगे। यदि पाठ्यक्रम में जीवन और विज्ञान के अध्ययन को आवश्यक माना जाता है तो मानव जनसंख्या के अध्ययन को भी आवश्यक मानकर उसे पाठ्यक्रम में स्थान दिया जाना चाहिए। भारत में अनेक सामाजिक कुरीतियाँ व्याप्त हैं। संसार के उन्नत देशों की अपेक्षा भारत में विवाह की आयु बहुत कम है। इस कारण युवक और युवतियों को विवाह से पूर्व ही जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न होने वाली समस्याओं आदि की जानकारी प्रदान करना अत्यन्त आवश्यक है। जब युवक और युवतियाँ जनसंख्या शिक्षा के द्वारा पर्याप्त जानकारी उपलब्ध कर लेंगे तो जनसँख्या पर नियन्त्रण रखना आसान हो जाएगा। यह कहा जाता है कि किसी देश के स्वस्थ नागरिक ही देश के भविष्य को उज्ज्वल बना सकते हैं।

आज संसार के सभी देश अपने नागरिकों के कल्याण, स्वास्थ्य और पूर्ण विकास के हेतु प्रयत्नशील हैं। भारत भी इस क्षेत्र में प्रयास तो कर रहा है परन्तु हमें सफलता तब तक नहीं प्राप्त हो सकती जब तक य के लोग जनसंख्या शिक्षा द्वारा जनसंख्या वृद्धि के कुप्रभावों से परिचित न हो जाएँ और जनसंख्या वृद्धि को रोकने के हेतु युद्ध-स्तर पर कार्यवाही की जाए। जनसंख्या की वृद्धि देश के आर्थिक और सामाजिक विकास में बाधक है। जनसंख्या वृद्धि के कारण ही भारतीय नागरिकों के रहन-सहन का स्तर ऊँचा नहीं उठ पा रहा है। जनसंख्या शिक्षा द्वारा छात्र-छात्राओं को इससे अवगत कराना आवश्यक हो गया है। जनसंख्या शिक्षा के अन्तर्गत केवल परिवार नियोजन आदि के विषय में ही नहीं बतलाया जाता है बल्कि इसके अन्तर्गत छात्रों को उन सभी बातों से अवगत कराया जाता है जो जनसंख्या से सम्बन्धित हैं। इनकी जानकारी प्राप्त करके छात्र-छात्राएँ कालान्तर में अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह भली-भाँति कर सकते हैं।

डॉ० लल्ला और डॉ० मूर्ति ने ठीक ही लिखा है-“कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति आधुनिक समय के सन्दर्भ में जनसंख्या शिक्षा के महत्त्व और आवश्यकता की उपेक्षा नहीं कर सकता।” भारत में जनसंख्या शिक्षा की विशेष आवश्यकता है। विकासशील भारत के पास सीमित संसाधन हैं। और सीमित संसाधनों से विशाल जनसंख्या का भरण-पोषण करना अत्यन्त कठिन है, फलस्वरूप जनसंख्या नियन्त्रण की विशेष आवश्यकता है। भारत में जनसंख्या शिक्षा परिवार को सीमित रखने के लिए अत्यन्त आवश्यक है, साथ ही जीवन की गुणवत्ता को बनाये रखने, जन्मदर और मृत्युदर को सन्तुलित रखने, परिवार को स्वस्थ-सुखी बनाने, माताओं को उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करने, बच्चों को कुपोषण से बचाने, निरक्षरता का उन्मूलन करने, बेरोजगारी की समस्या के समाधान, पर्यावरण प्रदूषण से बचने और देश के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए जनसंख्या शिक्षा अत्यन्त आवश्यक है। उत्पादन एवं उपभोक्ता के मध्य सन्तुलन स्थापित करने के लिए भी जनसंख्या शिक्षा की विशेष आवश्यकता है। इस शिक्षा के प्रति लोगों में संचेतना जाग्रत करना अत्यन्त आवश्यक है।

प्रश्न 2
भारत में जनसंख्या शिक्षा के कार्यक्रमों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
भारत में राष्ट्रीय जनसंख्या शिक्षा कार्यक्रम को 1 अप्रैल, 1980 से प्रारम्भ किया गया। शिक्षा की औपचारिक और अनौपचारिक पद्धतियों के साथ जनसंख्या शिक्षा को जोड़ा गया जिससे कि विद्यार्थियों और युवा पीढ़ी में जनसंख्या के प्रति एक स्वस्थ दृष्टिकोण का विकास हो सके। इस कार्यक्रम को सभी राज्यों और संघीय क्षेत्रों में चलाया जा रहा है। कार्यक्रम के संचालन हेतु केन्द्र सरकार ने एक उच्च अधिकार प्राप्त संचालन समिति का गठन किया है। देश की विभिन्न शिक्षण-संस्थाओं में जनसंख्या शिक्षा के प्रसार का दायित्व राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान प्रशिक्षण परिषद् के सुपुर्द किया गया। । विद्यालय स्तर पर यह एक अलग विषय के रूप में नहीं बल्कि विभिन्न विषयों के साथ सम्मिलित करके पढ़ाया जाता है। इस समय तक लगभग 16 लाख शिक्षकों को जनसंख्या शिक्षा में प्रशिक्षित किया गया है और श्रव्य-दृश्य साधनों के रूप में हिन्दी और अंग्रेजी भाषा में स्लाइडों को तैयार किया गया है, जिन्हें सभी राज्यों में वितरित किया गया है।

शिक्षकों के हेतु जनसंख्या शिक्षा नामक पुस्तक भी प्रकाशित की गयी है जिसमें बी०एड० के सेवा पूर्व शिक्षक प्रशिक्षण के हेतु पाठ्यचर्या सम्मिलित की गयी है। ‘यूनेपा’ (UNEPA) के सहयोग से भारत ने “मेरे बच्चे, मेरा भविष्य” नामक श्रव्य-दृश्य कार्यक्रम तैयार किया है। वर्तमान समय में 800 लाख छात्रों को जनसंख्या शिक्षा की जानकारी प्रदान की जा रही है। जनसंख्या शिक्षा पर राष्ट्रीय स्तर और राज्य स्तर पर लगभग 400 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। ‘राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसन्धान प्रशिक्षण परिषद् ने स्कूली पाठ्यचर्या में जनसंख्या शिक्षा के हेतु ‘प्लग प्वाइंट्स नामक दस्तावेज का प्रकाशन किया है जिसके आधार पर राज्यों और संघीय क्षेत्रों में पाठ्यचर्या निर्मित की गयी है।

साथ ही जनसंख्या शिक्षा से सम्बन्धित प्रदर्शनी, पोस्टर, निबन्ध लेखन प्रतियोगिता, कार्यशाला और सेमिनारों आदि का आयोजन भी किया जाता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग देश के कई विश्वविद्यालयों में जनसंख्या शिक्षा केन्द्रों और कॉलेजों की स्थापना कर रहा है। विभिन्न एजेंसियों से प्राप्त जनसंख्या शिक्षा सामग्री की एक निर्देशिका भी तैयार की गयी है जिसे जनसंख्या शिक्षा संस्थानों में वितरित किया गया है। जनसंख्या शिक्षा संस्थान कॉलेजों के नवयुवकों एवं समुदाय के लोगों हेतु प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहा है। स्कूली शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, उच्च शिक्षा, दस्तकारों एवं नागरिकों के हेतु व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम में जनसंख्या शिक्षा कार्यक्रम को भी जोड़ दिया गया है। अनौपचारिक शिक्षा केन्द्रों में भी जनसंख्या शिक्षा को जोड़ा गया है। जनसंख्या शिक्षा पर राष्ट्रीय स्रोत’ नामक पुस्तिका का प्रकाशन किया गया है जिसमें प्रारम्भिक शिक्षा के शिक्षकों के प्रशिक्षण हेतु जनसंख्या शिक्षा पाठ्यचर्या सम्मिलित की गयी है।

अन्तर्राष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान मुम्बई से जनसंख्या शिक्षा की मूल्यांकन रिपोर्ट प्राप्त करके आठवीं तथा नवीं पंचवर्षीय योजना में जनसंख्या शिक्षा कार्यक्रम और अधिक तेज करने का संकल्प रखा गया और 1986 ई० की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप जनसंख्या शिक्षा के प्रशिक्षण को ग्रहण करने के हेतु जिला शिक्षा और प्रशिक्षण संस्थान, अध्यापक शिक्षा कॉलेज और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् के साथ सक्रिय सहयोग स्थापित किया गया। प्रशिक्षण के लिए इलेक्ट्रॉनिक प्रचार माध्यमों के उपयोग को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। कुछ राज्यों में प्रौढ़ शिक्षा के साथ जनसंख्या शिक्षा कार्यक्रम को जोड़ा गया है। जनसंख्या शिक्षा में लगे राज्य संसाधन केन्द्रों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है और प्रशिक्षार्थियों को स्वास्थ्य, परिवार, कल्याण, रोग प्रतिरक्षण और जनसंख्या समस्याओं के प्रति जागरूक किया जा रहा है।

प्रश्न 3
जनसंख्या शिक्षा की समस्याओं का उल्लेख कीजिए तथा उनके समाधान के उपायों का भी वर्णन कीजिए।
था
जनसंख्या शिक्षा की क्या समस्याएँ हैं ? जनसंख्या शिक्षा के शिक्षण के लिए सुझाव दीजिए। [2007]
उत्तर
जनसंख्या शिक्षा की समस्याएँ
जनसंख्या शिक्षा की समस्याएँ अत्यन्त जटिल हैं। इसका कारण यह है कि जनसंख्या शिक्षा का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक और विस्तृत है। इसके अन्तर्गत जनसंख्या की वृद्धि की गति, वातावरण एवं स्वास्थ्य और व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र तथा विश्व पर पड़ने वाले । जनसंख्या शिक्षा की समस्याएँ उसके बहुमुखी प्रभावों का अध्ययन सम्मिलित होता है। इन तथ्यों । को टालने जनाधि पायों के छात्रों हेतु जनसंख्या शिक्षा एवं उनके समाधान के उपायों का उल्लेख यहाँ किया जा रहा है-

1. छात्रों हेतु जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी साहित्य की सम्बन्धी ज्ञान की कमी
हमारे देश में विभिन्न स्तरों के विद्यालयों में अध्ययनरत विद्यालयों में जनसंख्या शिक्षा छात्रों के हेतु जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी साहित्य का अभाव है। इस सम्बन्धी उपकरणों की कमी अभाव के फलस्वरूप उन्हें जनसंख्या वृद्धि के वास्तविक आँकड़े, जनसंख्या समन्थी शोधक तथा व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के जीवन के ऊपर इस वृद्धि के की कमी कुप्रभावों की पूर्ण जानकारी प्रदान नहीं की जा सकती है। इसी के फलस्वरूप विद्यालय स्तर पर जनसंख्या शिक्षा का प्रसार नहीं हो पा रहा है।

2. शिक्षकों में जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी ज्ञान की कमी
सभी स्तरों के विद्यालयों के शिक्षकों . में जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी ज्ञान का अनुभव है। प्रमुख रूप से इसके तीन कारण हैं-

  1. अभी तक जनसंख्या शिक्षा के सम्बन्ध में बहुत कम पुस्तकें लिखी गयी हैं। फलस्वरूप शिक्षकों को जनसंख्या शिक्षा की पर्याप्त सामग्री उपलब्ध नहीं हो पाती।
  2. सेवारत शिक्षकों को जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी ज्ञान प्रदान करने हेतु केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकारों, शिक्षा विभागों तथा विश्वविद्यालयों द्वारा कोई सुसंगठित योजना अभी पूरी तरह से संचालित नहीं की गयी है।
  3. महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों और शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं के पाठ्यक्रमों के अन्तर्गत जनसंख्या शिक्षा नामक विषय को स्थान नहीं दिया गया है। इन कारणों से सेवारत तथा नव-प्रशिक्षित शिक्षकों में जनसंख्या शिक्षा के समुचित ज्ञान के होने की आशा नहीं की जा सकती है। समुचित ज्ञान न होने के फलस्वरूप वे छात्रों को जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी बातों का ज्ञान प्रदान करने में असमर्थ रहते हैं।

3. विद्यालयों में जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी उपकरणों की कमी
भारतीय विद्यालयों में जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी उपकरणों का नितान्त अभाव है। ऐसा कदाचित कोई भी विद्यालय नहीं है जो जनसंख्या शिक्षा से सम्बन्धित सभी उपकरणों से पूरी तरह सुसज्जित हो। सामान्य शिक्षा के उपकरणों को संग्रह करने हेतु जितना प्रयास किया जाता है उसका शतांश प्रयास भी जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी उपकरणों को प्राप्त करने हेतु नहीं किया जाता। सम्भवतः इसका कारण यह है कि जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी उपकरणे अत्यन्त महँगे हैं। किन्तु यदि प्रतिवर्ष थोड़ा-थोड़ा धन व्यय करके इन उपकरणों की व्यवस्था की जाए तो इनके अभाव को दूर किया जा सकता है। परन्तु वास्तविक स्थिति यह है कि इस कार्य हेतु लेशमात्र भी ध्यान नहीं दिया जाता। परिणामस्वरूप भारतीय विद्यालयों में इनका नितान्त अभाव है और इनके अभाव में जनसंख्या शिक्षा का कार्यक्रम लागू करने में कठिनाई है।

4. जनसंख्या सम्बन्धी शोधकार्यों की कमी
भारत में जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी शोधकार्य अभी प्रारम्भकालीन है। इस कारण जनसंख्या के दुष्परिणामों को सही प्रकार से प्रसार नहीं है।

5. अशिक्षित एवं अर्द्धशिक्षित अभिभावकों द्वारा जनसंख्या शिक्षा का विरोध
भारत में बड़ी संख्या में अभिभावक अशिक्षित एवं अर्द्धशिक्षित हैं। एक अध्ययन के द्वारा यह स्पष्ट हुआ है कि ये अशिक्षित एवं अर्द्धशिक्षित अभिभावक विद्यालयों में जनसंख्या शिक्षा दिये जाने के प्रबल विरोधी हैं। उनका विरोध निम्नलिखित कारणों से है-

  1. वे यह मानते हैं कि जनसंख्या शिक्षा का सम्बन्ध यौन-शिक्षा से है। यदि विद्यालयों में इस शिक्षा की व्यवस्था की जाती है तो बालक-बालिकाओं के नैतिक चरित्र पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।
  2. उनकी यह मान्यता है कि जनसंख्या शिक्षा परिवार नियोजन को ही दूसरा रूप है, अतएव उनका विद्यालयी शिक्षा से कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए।
  3. उनकी यह भी धारणा है कि जनसंख्या शिक्षा का सम्बन्ध जनसंख्या विषयक तथ्यों एवं आँकड़ों से है। यह तथ्य और आँकड़े इतने कठिन हैं कि अल्प आयु में छात्र इन्हें आत्मसात नहीं कर सकेंगे।
  4. उनका यह भी विचार है कि जनसंख्या शिक्षा का विचार अन्य देशों से ग्रहण किया गया है और उनसे प्रभावित होकर ही इस शिक्षा को विद्यालयों में स्थान दिया जा रहा है, और इस कारण ऐसा किया जाना पूरी तरह से अनुचित है।

समस्याओं का समाधान

हम इस तथ्य से सहमत हैं कि भारत की जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि हो रही है जो भविष्य में विभिन्न प्रकार की समस्याओं की उत्पत्ति का कारण बनेगी। अतः जनसंख्या विस्फोट को रोकने के सम्बन्ध में जनसंख्या शिक्षा को एकमात्र-आशा की किरण माना जा रहा है। जनसंख्या शिक्षा के निम्नलिखित तथ्य जनसंख्या-विस्फोट का समाधान करने में सहायक सिद्ध हुए हैं
1. पर्याप्त एवं उपयुक्त साहित्य की व्यवस्था
भारतीय विश्वविद्यालयों में जनसंख्या शिक्षा के प्रसार को गति प्रदान करने के लिए पर्याप्त मात्रा में उपयुक्त साहित्य का निर्माण किया जाना चाहिए। इस साहित्य का निर्माण सरल एवं सुबोध भाषा वाली पुस्तकों के रूप में किया जाए जिससे कि प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों के छात्रों को जनसंख्या शिक्षा का अध्ययन करके ज्ञान प्रदान करने में किसी प्रकार की कठिनाई न हो। इसके साथ ही सामाजिक विज्ञान की पुस्तकों में जनसंख्या शिक्षा से सम्बन्धित पाठों को स्थान दिया जाना चाहिए।

2. शिक्षकों को जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी ज्ञान प्रदान करने की व्यवस्था
यदि शिक्षकों से यह आशा की जाती है कि वे छात्रों को जनसंख्या शिक्षा की शिक्षा दें तो स्वयं शिक्षकों को इस ज्ञान से सम्पन्न करने की पर्याप्त व्यवस्था की जाए। इस व्यवस्था में ५ शिक्षकों को जनसंख्या शिक्षा निम्नलिखित सुझाव दिये जा सकते हैं ।

  1. राज्यों अथवा शिक्षा विभागों द्वारा जनसंख्या शिक्षा के केन्द्र स्थापित किये जाने चाहिए और विद्यालयों द्वारा सेवारत अध्यापकों को इन केन्द्रों पर निश्चित अवधि तक रहने हेतु पूर्ण वेतन पर अवकाश दिया जाना चाहिए। इन केन्द्रों में अध्यापकों हेतु व्याख्यानों, विचार-गोष्ठियों एवं समाप्त करना अध्ययन की समस्त सुविधाओं का प्रबन्ध किया जाना चाहिए।
  2.  महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों और शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थाओं के पाठ्यक्रमों में जनसंख्या शिक्षा के विषय को सम्मिलित किया जाना चाहिए। यदि इन सुझावों को व्यावहारिक रूप प्रदान कर दिया जाए तो सेवारत और नव-प्रशिक्षित दोनों तरह के शिक्षकों को जनसंख्या शिक्षा का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त हो जाएगा और उसके द्वारा वे अपने छात्रों को लाभान्वित कर सकेंगे।

3. उपकरणों की व्यवस्था
विद्यालय प्रबन्धकों को यह समझना चाहिए कि जितने आवश्यक सामान्य शिक्षा के उपकरण हैं उतने ही आवश्यक जनसंख्या शिक्षा के उपकरण भी हैं। उन्हें जनसंख्या शिक्षा से सम्बन्धित उपकरणों की व्यवस्था हेतु निरन्तर प्रयत्नशील रहना चाहिए। इन उपकरणों में निम्नलिखित पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए

  1. जनसंख्या शिक्षा हेतु उपयोगी फिल्म और श्रव्य-दृश्य सामग्री।।
  2. छात्रों को अपने देश और विश्व की जनसंख्या सम्बन्धी जानकारी प्रदान करने वाले ग्राफ, चार्ट और प्रतिमान।

4. जनसंख्या सम्बन्धी शोधकार्यों की व्यवस्था
इसके लिए विद्वानों और सुशिक्षित व्यक्तियों को भी जनसंख्या वृद्धि के कुप्रभावों एवं दुष्परिणामों से भली-भाँति अवगत कराने हेतु जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी शोधकार्य की उत्तम व्यवस्था की जानी चाहिए। यह कार्य मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रश्नों से सम्बन्धित होने चाहिए-

  1. विद्यालयों में जनसंख्या शिक्षा के हेतु अनुकूल वातावरण का निर्माण किस तरह किया जा सकता है।
  2. शिक्षकों को जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी ज्ञान से पूरी तरह से सम्पन्न बनाने हेतु किस तरह के कार्यक्रम उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।
  3. विद्यालयों के प्रबन्ध समितियों तथा शिक्षा विभागों द्वारा जनसंख्या शिक्षा के प्रसार में कितना और किस तरह का योगदान दिया जा सकता है।
  4. साधारण जनता में जनसंख्या शिक्षा की आवश्यकता तथा उपयोगिता के सम्बन्ध में किन उपायों द्वारा अधिकाधिक विश्वास उत्पन्नकिया जा सकता है।

5. अभिभावकों के विरोध को समाप्त करना
विद्यालयों में जनसंख्या शिक्षा के कार्यक्रम को सफल बनाने हेतु, उसके प्रति अशिक्षित और अर्द्धशिक्षित अभिभावकों का विरोध समाप्त किया जाना चाहिए। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु दो उपाय किये जा सकते हैं

  1. पत्रिकाओं, समाचार-पत्रों, फिल्म प्रदर्शनी और विद्वानों के व्याख्यानों द्वारा जनसंख्या शिक्षा की धारणा का स्पष्टीकरण।
  2. विद्यालयों द्वारा जनसंख्या शिक्षा के दिवसों, समारोहों आदि का आयोजन किया जाये और उनमें अभिभावकों को आमन्त्रित करके उन्हें जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी बातों से अवगत कराया जाए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
जनसंख्या विस्फोट (Population Explosion) क्या है? भारत में जनसंख्या विस्फोट के कारणों का उल्लेख कीजिए।
या
देश में जनसंख्या विस्फोट हो रहा है। इसको रोकने में जनसंख्या शिक्षा किस प्रकार सहायक है? [2016]
या
भारत में जनसंख्या वृद्धि के क्या कारण हैं? [2012, 14]
या
भारत में जनसंख्या विस्फोट के क्या कारण हैं? [2012]
उत्तर
जनसंख्या विस्फोट से आशय है-जनसंख्या की वृद्धि की दर का अत्यधिक होना। हमारे देश में होने वाली जनसंख्या की वृद्धि को जनसंख्या विस्फोट की श्रेणी में ही रखा जाएगा। इसका प्रमाण यह है कि सन् 1951 ई० की जनगणना में भारत की जनसंख्या 36.1 करोड़ थी जो 2011 ई० में बढ़कर 121.02 करोड़ हो चुकी है। इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि हमारे देश में जनसंख्या वृद्धि की दर बहुत अधिक है। भारत में जनसंख्या विस्फोट के लिए विभिन्न कारक जिम्मेदार हैं। सर्वप्रथम हमारे देश में जन्म-दर बहुत अधिक है। इसका एक मुख्य कारण अशिक्षा तथा यौन-शिक्षा की जानकारी का अभाव है। हमारे देश में छोटी आयु में विवाह का प्रचलन है। इससे स्त्रियों का प्रजनन काल काफी लम्बा होता है। अतः अधिक सन्ताने उत्पन्न होने की गुंजाइश रहती है। इसके साथ ही गर्म जलवायु भी प्रजनन शक्ति की वृद्धि में सहायक होती है। हमारे समाज में बेटे को जन्म देना प्रायः अनिवार्य माना जाता है।

अतः बेटे की चाह में प्राय: तीन-चार अथवा इससे भी अधिक बेटियों को जन्म दे दिया जाता है। यही नहीं कुछ धार्मिक अन्धविश्वासों के अनुसार परिवार-नियोजन अर्थात् सन्तानोत्पत्ति को रोकना अनुचित तथा पाप माना जाता है। इस कारण भी जन्म-दर में वृद्धि होती है। इन विभिन्न कारणों से हमारे देश में आज भी जन्म-दर काफी अधिक है तथा यह कारक जनसंख्या विस्फोट का प्रबल कारक है। इसके अतिरिक्त आधुनिक चिकित्सा शास्त्र में हुई चमत्कारिक खोजों एवं उपचार के उपायों के कारण बाल-मृत्यु दर बहुत घट गयी है तथा व्यक्ति की औसत आयु में भी वृद्धि हुई है। इस कारक ने भी जनसंख्या विस्फोट में योगदान प्रदान किया है। देश में जनसंख्या की वृद्धि की अधिक दर को नियन्त्रित करने का एक प्रभावी उपाय है-जनसंख्या शिक्षा। जनसंख्या शिक्षा की समुचित व्यवस्था से निश्चित रूप से जनसंख्या वृद्धि की दर को घटाया ज़ा सकता है।

प्रश्न 2
‘नयी राष्ट्रीय जनसंख्या नीति, 2000’ का सामान्य परिचय दीजिए। या । भारतवर्ष की राष्ट्रीय जनसंख्या नीति, 2000 की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2011, 13]
उत्तर
भारत की जनसंख्या में निरन्तर होने वाली वृद्धि को ध्यान में रखते हुए इसे नियन्त्रित करना अनिवार्य माना जा रहा है। इस मुख्य उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए ‘नयी राष्ट्रीय जनसंख्या नीति-2000′ निर्धारित की गयी। ‘नयी राष्ट्रीय जनसंख्या नीति-2000′ की घोषणा फरवरी 2000 में भारत के प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा की गयी। इस जनसंख्या नीति में सर्वप्रथम कहा गया था कि सन् 2010 ई० तक जनसंख्या वृद्धि की दर को 2.1 प्रतिशत पर लाया जाएगा तथा सन् 2045 ई० में जनसंख्या वृद्धि रुक जाएगी अर्थात् जनसंख्या स्थिर हो जाएगी। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हर सम्भव उपाय किये जाएँगे। इस नीति को कार्यान्वित करने के लिए सरकार द्वारा विभिन्न निर्णय लिये गये हैं, जैसे कि-

  1. इस जनसंख्या नीति के अन्तर्गत पंचायतों/जिला परिषदों को जनसंख्या नियन्त्रण के लिए प्रेरित करने के लिए पुरस्कार प्रदान किये जाएँगे।
  2. इस नीति के अन्तर्गत ‘बाल-विवाह निरोधक अधिनियम’ तथा ‘प्रसव पूर्व लिंग परीक्षण तकनीकी निरोधक अधिनियम’ को कठोरता से लागू करने की घोषणा की गयी है।
  3. समाज के गरीबी की रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवारों के लिए स्वास्थ्य बीमा-योजना को लागू किया गया है। इसके अतिरिक्त बालिका शिशुओं के पालन-पोषण के लिए उसके माता-पिता को १ 500 की प्रोत्साहन राशि देने का भी प्रावधान है। |

नयी राष्ट्रीय जनसंख्या नीति’ सराहनीय है परन्तु कुछ विद्वानों ने इसकी व्यावहारिकता पर प्रश्न-चिह्न लगाया है। उनका कहना है कि 2010 तक जनसंख्या वृद्धि की दर को 2.1 प्रतिशत तक लाना सम्भव नहीं है। इसके अतिरिक्त इस नीति में न तो यौन-शिक्षा की बात कही गयी है और न ही अनिवार्य नसबन्दी का कोई प्रावधान है। अतः यह जनसंख्या नीति केवल सैद्धान्तिक है, व्यावहारिक नहीं।

प्रश्न 3
राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद् के अनुसार जनसंख्या शिक्षा के उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए।
या
जनसंख्या शिक्षा के चार उद्देश्य बताइए। [2010]
उत्तर
‘राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद् ने Population in Classroom नामक एक पुस्तिका प्रकाशित की थी। इसमें जनसंख्या शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्यों का उल्लेख किया गया है-

  1. छात्रों को आधुनिक विश्व की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना के रूप में जनसंख्या वृद्धि की गति तथा कारणों के सम्बन्ध में ज्ञान प्रदान करना।
  2. छात्रों को व्यक्ति, परिवार, समाज तथा विश्व के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक जीवन पर जनसंख्या वृद्धि के पड़ने वाले प्रभावों से अवगत कराना।
  3. छात्रों को परिवार के आकार तथा रहन-सहन के स्तर के सम्बन्ध में बताना तथा कम आय वाले परिवारों की कठिनाई बताकर उन्हें छोटा परिवार रखने हेतु प्रेरित करना।
  4. छात्रों को जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न होने वाली अग्रलिखित समस्याओं की जानकारी प्रदान करके उनमें जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण रखने के दृष्टिकोण का विकास करना-

(क) रोगों तथा दुर्भिक्षों का फैलना
(ख) अपराधों एवं सामाजिक संघर्षों का बढ़ना
(ग) जन्म-दर एवं मृत्यु-दर में असन्तुलन
(घ) देश की आवश्यकता और सुरक्षा में बाधा उत्पन्न होना तथा
(ङ) भोजन, वस्त्र, मकान, रोजगार तथा शिक्षण संस्थाओं आदि का अभाव होना।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
जनसंख्या शिक्षा में अध्यापक की भूमिका का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
नि:सन्देह जनसंख्या शिक्षा अत्यधिक आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण है। शिक्षा के इस प्रकार में शिक्षक द्वारा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी जाती है। शिक्षक को जनसंख्या शिक्षा की समुचित जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। उसका दायित्व है कि वह अपने छात्र-छात्राओं तथा समाज के व्यक्तियों को जनसंख्या सम्बन्धी विस्तृत जानकारी प्रदान करे। शिक्षक का दायित्व है कि वह छात्रों को जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न समस्याओं की विस्तृत जानकारी प्रदान करे तथा जनसंख्या वृद्धि को नियन्त्रित करने की आवश्यकता तथा उपायों की भी जानकारी प्रदान करे। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि शिक्षा के पाठ्यक्रम में जनसंख्या शिक्षा को अवश्य सम्मिलित किया जाना चाहिए। इस स्थिति में शिक्षक अपने दायित्व को भली-भाँति निभा सकेंगे।

प्रश्न 2
जनसंख्या की तीव्र वृद्धि के दो कुप्रभावों का उल्लेख कीजिए। [2009]
उत्तर
जनसंख्या की तीव्र वृद्धि को जनसंख्या विस्फोट के रूप में जाना जाता है। यह एक गम्भीर समस्या है तथा इसका बुरा प्रभाव जनजीवन के प्रायः सभी पक्षों पर पड़ता है। सर्वप्रथम यह स्पष्ट है कि इस स्थिति में देश के नागरिकों को मूलभूत सुविधाओं की अत्यधिक कमी महसूस होने लगती है। इसके अतिरिक्त दूसरा प्रतिकूल प्रभाव यह होता है कि देश में बेरोजगारी तथा निर्धनता की समस्याएँ प्रबल हो जाती हैं।

परश्न 3
जनसंख्या शिक्षा के क्षेत्र का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
जनसंख्या शिक्षा में निम्नलिखित तथ्यों को सम्मिलित किया जाता है-

  1. जनसंख्या की स्थिति के प्रति छात्रों में जागृति तथा उचित दृष्टिकोण विकसित करना।
  2. जनाधिक्य का जीवन की गुणवत्ता पर क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है? इसके सम्बन्ध में बताना।
  3. जनसंख्या वृद्धि से उत्पन्न सामाजिक, आर्थिक एवं पारिवारिक समस्याओं के सम्बन्ध में संचेतना का विकास करना।
  4. जनसंख्या-वृद्धि के कारणों एवं नियन्त्रण के उपायों की जानकारी प्रदान करना।
  5. जनसंख्या-वृद्धि का पर्यावरण, रोजगार, आवास, खाद्यान्न और शिक्षा पर क्या कुप्रभाव पड़ता है? इस सम्बन्ध में छात्रों को जानकारी प्रदान करना।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
जनसंख्या शिक्षा क्या है? [2009]
उत्तर
“जनसंख्या शिक्षा एक शैक्षिक कार्यक्रम है, जिसमें परिवार, समाज, राष्ट्र एवं विश्व की जनसंख्या की स्थिति का अध्ययन किया जाता है। इस अध्ययन का उद्देश्य छात्रों में इस स्थिति के
प्रति विवेकपूर्ण एवं उत्तरदायित्वपूर्ण दृष्टिकोण तथा व्यवहार का विकास करना है।”
                                                                                      -यूनेस्को द्वारा आयोजित जनसंख्या शिक्षा संगोष्ठी

प्रश्न 2
भारत जैसे विकासशील देशों की प्रमुख समस्या क्या है?
उत्तर
भारत जैसे विकासशील देशों की प्रमुख समस्या है जनसंख्या की वृद्धि की दर का अधिक होना।

प्रश्न 3
जनसंख्या-वृद्धि सम्बन्धी समस्या के समाधान के लिए किया जाने वाला शैक्षिक उपाय क्या है?
उत्तर
जनसंख्या-वृद्धि सम्बन्धी समस्या के समाधान के लिए किया जाने वाला शैक्षिक उपाय है। जनसंख्या शिक्षा की व्यवस्था करना।

प्रश्न 4
भारत में जनसंख्या सम्बन्धी स्थिति क्या है?
उतर
भारत में जनसंख्या-विस्फोट की स्थिति है।

प्रश्न 5
जनसंख्या विस्फोट से क्या आशय है?
या
जनसंख्या विस्फोट क्या है ? [2007, 11]
उत्तर
जनसंख्या विस्फोट का आशय जनसंख्या की वृद्धि की दर का अत्यधिक होना है।

प्रश्न 6
किस बच्चे को देश का एक अरबवाँ बच्चा घोषित किया गया ?
उत्तर
11 मई, 2000 को नई दिल्ली स्थित सफदरजंग अस्पताल में जन्म लेने वाली आस्था नामक बच्ची को देश को एक अरबवाँ बच्चा घोषित किया गया।

प्रश्न 7
भारत की नयी जनसंख्या नीति कब घोषित की गयी ?
उत्तर
भारत की नयी जनसंख्या नीति 15 फरवरी, 2000 को प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा घोषित की गयी।

प्रश्न 8
जनसंख्या वृद्धि को नियन्त्रित करने का शैक्षिक उपाय क्या है ?
उत्तर
जनसंख्या शिक्षा को लागू करना।

प्रश्न 9
जनसंख्या शिक्षा की अवधारणा को सर्वप्रथम किसने प्रस्तुत किया था ? उक्ट जनसंख्या शिक्षा की अवधारणा को सर्वप्रथम प्रो० स्लोन आर० वेलैण्ड ने प्रस्तुत किया था।

प्रश्न 10
2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या कितनी थी? [2014]
उत्तर
121 करोड़ से अधिक।

प्रश्न 11
ग्रामीण क्षेत्रों में जनता को जनसंख्या शिक्षा प्रदान करने का प्रमुख साधन क्या है?
उत्तर
दूरदर्शन तथा जनसंचार के अन्य माध्यम।

प्रश्न 12
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद् (NCERT) द्वारा प्रकाशित जनसंख्या शिक्षा सम्बन्धी पुस्तक का क्या नाम है?
उत्तर
Population in Classroom.

प्रश्न 13
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य-

  1. विश्व के अधिकांश विकासशील देशों में जनसंख्या की अधिकता की गम्भीर समस्या है।
  2. जनसंख्या शिक्षा के अन्तर्गत जनसंख्या सम्बन्धी समस्याओं का अध्ययन किया जाता है।
  3. स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाले युवक-युवतियों के लिए जनसंख्या शिक्षा अनावश्यक एवं व्यर्थ
  4. ‘राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग के अध्यक्ष के०सी० पंत हैं।
  5. नयी राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के अनुसार सन् 2045 तक जनसंख्या में स्थिरीकरण आ जाएगा।

उत्तर

  1. सत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. असत्य
  5. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए-

प्रश्न 1
“जनसंख्या शिक्षा परिवार के आकार के सम्बन्ध में वैज्ञानिक मनोवृत्ति विकसित करने के लिए प्रेरणाशक्ति प्रदान करती है।” यह कथन किसका है?
(क) डॉ० चन्द्रशेखर
(ख) डॉ० माल्थस
(ग) डॉ० वी०के०आर०वी०राव
(घ) डॉ० अमर्त्यसेन
उत्तर
(ग) डॉ० वी०के०आर०वी० राव

प्रश्न 2
जनसंख्या शिक्षा की आवश्यकता किस कारण से है?
(क) जनसंख्या की वृद्धि
(ख) जनसंख्या-नियन्त्रण
(ग) परिवार नियोजन
(घ) परिवार कल्याण
उत्तर
(ख) जनसंख्या-नियन्त्रण

प्रश्न 3
जनसंख्या शिक्षा का प्रमुख लक्ष्य है
(क) शिशु कल्याण
(ख) मातृ कल्याण
(ग) सीमित परिवार
(घ) सुखी जीवन
उत्तर
(ग) सीमित परिवार

प्रश्न 4
जनसंख्या शिक्षा का आरम्भ होना चाहिए
(क) माध्यमिक शिक्षा स्तर पर
(ख) प्राथमिक शिक्षा स्तर पर
(ग) व्यावसायिक शिक्षा स्तर पर
(घ) उच्च शिक्षा स्तर पर
उत्तर
(ख) प्राथमिक शिक्षा स्तर पर

प्रश्न 5
भारतीय जनसंख्या की प्रमुख विशेषता है
(क) जन्म-दर में वृद्धि
(ख) मृत्यु-दर में वृद्धि
(ग) महिलाओं की अधिक संख्या
(घ) साक्षरता का अधिक प्रतिशत
उतर
(क) जन्म-दर में वृद्धि

प्रश्न 6
भारत की जनसंख्या एक अरब कब हुई?
(क) 11 मई, 2000 में
(ख) 15 मई, 2000 में
(ग) 31 मई, 2000 में
(घ) 1 जुलाई, 2000 में
उत्तर
(क) 11 मई, 2000 में

प्रश्न 7
जनसंख्या की दृष्टि से भारत का विश्व में स्थान है
(क) प्रथम
(ख) द्वितीय
(ग) तृतीय
(घ) चतुर्थ
उतर
(ख) द्वितीय

प्रश्न 8
राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग का गठन कब हुआ?
(क) 15 जून, 1995 को
(ख) 20 मई, 1997 को
(ग) 11 मई, 2000 को
(घ) 1 जुलाई, 2000,को
उत्तर
(ग) 11 मई, 2000 को

प्रश्न 9
राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग के उपाध्यक्ष कौन हैं?
(क) यशवन्त सिन्हा
(ख) डॉ० हर्षवर्धन
(ग) नटवर सिंह
(घ) जी० टी० नानावती
उत्तर
(ख) डॉ० हर्षवर्धन

प्रश्न 10
विश्व जनसंख्या दिवस प्रतिवर्ष किस तिथि को मनाया जाता है? [2014]
(क) 4 जुलाई
(ख) 11 जुलाई
(ग) 10 दिसम्बर
(घ) 25 दिसम्बर
उत्तर
(ख) 11 जुलाई

प्रश्न 11
कौन-सा प्रान्त, भारत की जनगणना 2011 के अनुसार, सबसे अधिक जनसंख्या वाला
(क) उत्तर प्रदेश
(ख) बिहार
(ग) मध्य प्रदेश
(घ) राजस्थान
उत्तर
(क) उत्तर प्रदेश

प्रश्न 12
जनसंख्य शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है-  [2007]
(क) छात्रों और अध्यापकों को जनसंख्या वृद्धि के दुष्परिणामों से अवगत कराना
(ख) सांस्कृतिक विकास लाना
(ग) राजनैतिक उथल-पुथल पैदा करना
(घ) वैज्ञानिकं और तकनीकी विकास लाना
उत्तर
(क) छात्रों और अध्यापकों को जनसंख्या वृद्धि के दुष्परिणामों से अवगत कराना

प्रश्न 13
भारत में जनसंख्या शिक्षा पर प्रथम राष्ट्रीय कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ- [2008]
(क) 1984 ई० में
(ख) 1985 ई० में
(ग) 1980 ई० में
(घ) 1986 ई० में
उत्तर
(घ) 1986 ई० में

प्रश्न 14
भारत में जनगणना कितने वर्षों बाद की जाती है ? [2009, 15]
(क) 15 वर्ष बाद
(ख) 20 वर्ष बाद
(ग) 10 वर्ष बाद
(घ) 25 वर्ष बाद
उत्तर
(ग) 10 वर्ष बाद

प्रश्न 15
जनसंख्या-वृद्धि का मुख्य कारण है [2013]
(क) शिक्षा का विस्तार
(ख) स्वास्थ्य सेवाओं में वृद्धि
(ग) जनसंख्या विस्फोट
(घ) वृक्षारोपण
उत्तर
(ख) स्वास्थ्य सेवाओं में वृद्धि

प्रश्न 16
जनसंख्या शिक्षा का प्रमुख रूप से किससे सम्बन्ध है?
(क) परिवार नियोजन से
(ख) छोटे परिवार से
(ग) जनसंख्या की स्थिति से
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ग) जनसंख्या की स्थिति से

प्रश्न 17
जनसंख्या शिक्षा की अवधारणा को सर्वप्रथम किसने प्रस्तुत किया?
(क) बलेंसन ने
(ख) स्लोन आर० वेलैण्ड ने
(ग) मसियालस ने
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ख) स्लोन आर० वेलैण्ड ने

प्रश्न 18
जनसंख्या शिक्षा की प्रमुख समस्या है।
(क) अभिभावकों के विरोध की समस्या
(ख) अन्धविश्वास
(ग) अशिक्षा
(घ) ये सभी
उतर
(घ) ये सभी

प्रश्न 19
जनसंख्या शिक्षा का आरम्भ होना चाहिए
(क) माध्यमिक शिक्षा स्तर से
(ख) प्राथमिक शिक्षा स्तर से
(ग) व्यावसायिक शिक्षा स्तर से
(घ) उच्च शिक्षा स्तर से
उत्तर
(ख) प्राथमिक शिक्षा स्तर से

प्रश्न 20
जनसंख्या शिक्षा, भारत की दिन-प्रतिदिन बढ़ती आबादी के सन्दर्भ में
(क) अनावश्यक है
(ख) आवश्यक है
(ग) मंहत्त्वहीन है
(घ) अनुपयोगी है
उत्तर
(ख) आवश्यक है।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 17 Population Education (जनसंख्या शिक्षा) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 17 Population Education (जनसंख्या शिक्षा), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 21 Effect of Environment on Indian Social Life

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 21 Effect of Environment on Indian Social Life (पर्यावरण का भारतीय सामाजिक जीवन पर प्रभाव) are part of UP Board Solutions for Class 12 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 21 Effect of Environment on Indian Social Life (पर्यावरण का भारतीय सामाजिक जीवन पर प्रभाव).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 21
Chapter Name Effect of Environment on Indian Social Life (पर्यावरण का भारतीय सामाजिक जीवन पर प्रभाव)
Number of Questions Solved 30
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 21 Effect of Environment on Indian Social Life (पर्यावरण का भारतीय सामाजिक जीवन पर प्रभाव)

विस्तृत उत्तीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
‘पर्यावरण की परिभाषा दीजिए। भारतीय जीवन पर भौगोलिक पर्यावरण के प्रत्यक्ष प्रभावों का विवेचन कीजिए। [2007]
या
भौगोलिक पर्यावरण किस प्रकार से सामाजिक जीवन को प्रभावित करता है? [2013]
या
पर्यावरण की परिभाषा दीजिए। भौगोलिक पर्यावरण के प्रत्यक्ष प्रभावों की विवेचना कीजिए। [2007, 12]
या
पर्यावरण को परिभाषित कीजिए। [2015]
या
पर्यावरण क्या है? सामाजिक जीवन पर पर्यावरण का प्रभाव बताइए। [2016]
उत्तर:
‘पर्यावरण’एक विस्तृत अवधारणा है, इसे अंग्रेजी में ‘एनवायरनमेण्ट’ (Environment) कहते हैं। पर्यावरण का हमारे जीवन से इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है कि पर्यावरण को स्वयं से पृथक् करना एक असम्भव-सी बात लगती है। सामाजिक मानव के विषय में पूर्ण अध्ययन करने के लिए यह आवश्यक है कि उसके पर्यावरण का अध्ययन किया जाये। यही कारण है कि समाजशास्त्र विषय के अन्तर्गत मनुष्य का अध्ययन पर्यावरण के सन्दर्भ में ही किया जाता है।

पर्यावरण का अर्थ एवं परिभाषाएँ
‘पर्यावरण’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है। ये शब्द हैं-‘परि’ और आवरण। ‘परि’ का अर्थ है चारों ओर’ तथा ‘आवरण’ का अर्थ है ‘घिरे हुए’ अथवा ढके हुए। इस प्रकार पर्यावरण का अर्थ हुआ – चारों ओर से घिरे हुए अथवा ढके हुए। दूसरे शब्दों में, ‘पर्यावरण’ शब्द का अर्थ उन वस्तुओं से है जो मनुष्य से अलग होने पर भी उसे चारों ओर से ढके या घेरे रहती है। संक्षेप में, वे सभी परिस्थितियाँ जो एक प्राणी के अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं तथा उसको चारों ओर से घेरे हुए अथवा ढके हुए हैं, उसका पर्यावरण कहलाती हैं। पर्यावरण को विभिन्न विद्वानों ने विभिन्न प्रकार से परिभाषित किया है। कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नवत् हैं

इलियट के मतानुसार, “चेतन पदार्थ की इकाई से प्रभावकारी उद्दीपन और अन्तक्रिया के क्षेत्र को पर्यावरण कहते हैं।”
रॉस के अनुसार, “कोई भी बाहरी शक्ति, जो हमें प्रभावित करती है, पर्यावरण होती है।” प्रो० गिलबर्ट के शब्दों में, “वह वस्तु जो किसी वस्तु को चारों ओर से घेरती एवं उस पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालती है, पर्यावरण है।

उपर्युक्त परिभाषाओं द्वारा यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि पर्यावरण से तात्पर्य उस ‘सब कुछ से होता है जिसका अनुभव सामाजिक मनुष्य करता है तथा जिससे वह प्रभावित भी होता है।

भारतीय सामाजिक जीवन पर भौगोलिक पर्यावरण के प्रभाव

भौगोलिक पर्यावरण को प्राकृतिक पर्यावरण’ (Natural Environment) अथवा ‘अनियन्त्रित पर्यावरण’ (Uncontrolled Environment) भी कहते हैं। इस प्रकार के पर्यावरण से तात्पर्य हमारे चारों ओर के प्राकृतिक वातावरण से है। मैकाइवर तथा पेज के अनुसार, “भौगोलिक पर्यावरण उन दशाओं से मिलकर बनता है जिन्हें प्रकृति ने मनुष्य के लिए प्रदान किया।” लैण्डिस ने कहा है कि, “इसमें वे समस्त प्रभाव सम्मिलित होते हैं जो यदि मनुष्य द्वारा पृथ्वी से पूर्ण रूप से हटा दिये जाएँ, तब भी उनका अस्तित्व बनी रहे।” भौगोलिक पर्यावरण का मानव-जीवन पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार से प्रभाव पड़ता है। भारतीय सामाजिक जीवन भी इस नियम का अपवाद नहीं है। भौगोलिक विभिन्नताओं के कारण ही हमारे देशवासियों की जीवन-शैली, प्रथाओं, परम्पराओं, खान-पान, वेशभूषा आदि में भी भिन्नता है। भौगोलिक पर्यावरण के भारतीय सामाजिक जीवन पर पड़ने वाले प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभावों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(क) प्रत्यक्ष प्रभाव

1. जनसंख्या पर प्रभाव – मनुष्य उन्हीं स्थानों पर रहना अधिक पसन्द करता है, जहाँ की जलवायु ऋतुएँ, भूमि की बनावट व जल इत्यादि की सुविधाएँ उत्तम हैं। बहुत अधिक गर्म और बहुत अधिक ठण्डे तथा अत्यधिक वर्षा वाले भागों में लोग रहना पसन्द नहीं करते। कहने का तात्पर्य यह है कि जहाँ भौगोलिक पर्यावरण अनुकूल होता है वहाँ जनसंख्या का घनत्व भी अधिक होता है तथा प्रतिकूल पर्यावरण वाले स्थानों पर जनसंख्या का घनत्व बहुत कम पाया जाता है। यही कारण है कि हमारे देश में गंगा-यमुना वाले क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है और उसकी अपेक्षाकृत रेगिस्तान और हिमालय आदि
क्षेत्रों में जनसंख्या कम पायी जाती है।

2. “आवास की प्रकृति अथवा मानव निवास पर प्रभाव – भौगोलिक पर्यावरण का ‘आवास’ की प्रकृति अथवा मनुष्य के निवास पर भी प्रभाव पड़ता है। बहुत अधिक गर्म प्रदेशों के लोग हवादार मकान बनवाते हैं; जैसे – भारत में बिहार, राजस्थान आदि प्रदेशों में। इसके विपरीत ठण्डे प्रदेशों में मकान ऐसे बनवाये जाते हैं जिनमें ठण्ड से बचाव किया जा सके। भारत के मैदानी प्रदेशों में गारा-मिट्टी और ईंटों के मकान बनाये जाते हैं, जब कि पहाड़ी क्षेत्रों में पत्थरों और लकड़ी के मकान बनाये जाते हैं।

3. वेशभूषा एवं खानपान पर प्रभाव – ठण्डी जलवायु वाले स्थानों के लोग अधिकांशतः मांसाहारी होते हैं तथा ऊनी वस्त्र धारण करते हैं, जब कि गर्म स्थानों के लोग अधिकांशतः शाकाहारी होते हैं और वर्ष में अधिक समय वे सूती वस्त्र धारण करते हैं। उदाहरण के लिए, कश्मीर में रहने वाले लोग मांस, मछली, अण्डा और इसी प्रकार के अन्य गर्म खाद्य-पदार्थों का सेवन अधिक करते हैं तथा चमड़े, खाल और ऊन से बने वस्त्रों का अधिक प्रयोग करते हैं। इसके विपरीत गर्म प्रदेशों; जैसे-राजस्थान, बिहार आदि के लोग सूती, हल्के व ढीले वस्त्रों का अधिक प्रयोग करते हैं तथा ठण्डे व शीघ्र पचने वाले खाद्य-पदार्थों का सेवन करते हैं।

4. व्यवसाय पर प्रभाव – मनुष्य के मूल व्यवसाय भी भौगोलिक पर्यावरण पर आधारित होते हैं। उदाहरणार्थ-भारत के हर प्रदेश में हर प्रकार की फसल उगाना जलवायु की विभिन्नता के कारण सम्भव नहीं है। अत: जिस प्रदेश में जो फसल पैदा नहीं होती, उस प्रदेश से वह कृषि-उपज जहाँ वह खूब पैदा करती हैं मँगाकर अपनी जरूरत पूरी करता है और इस प्रकार विनिमय व्यापार (Exchange Trade) का जन्म होता है।

5. आवागमन के साधनों पर प्रभाव – भौगोलिक पर्यावरण का प्रभाव आवागमन के साधनों पर भी पड़ता है। जिन स्थानों पर अति शीत के कारण भूमि तथा समुद्र बर्फ से ढके रहते हैं। वहाँ पर किसी भी प्रकार के आने-जाने के रास्ते बनाना सम्भव नहीं है। अधिक वर्षा वाले भागों में भी रेलवे ट्रैक या सड़कें नहीं बनायी जा सकतीं। मरुस्थलों में भी रेतीली भूमि होने के कारण सड़कें बनाना बहुत कठिन होता है। कुहरायुक्त वातावरण में वायुयान की उड़ान असम्भव है। इसीलिए समतल भूमि पर जहाँ वर्षा सामान्य होती है, मार्ग (सड़कें, रेलवे ट्रैक) बनाना बहुत आसान होता है। यही कारण है कि भारत के अनेक भागों में (जो कि अधिकांशतः मैदानी क्षेत्र हैं) आवागमन के साधन अधिक हैं। परन्तु पर्वतीय प्रदेशों में ऐसा नहीं है।

(ख) अप्रत्यक्ष प्रभाव

1. उद्योग-धन्धों पर प्रभाव  – अर्थशास्त्रीय उद्योगों के स्थानीयकरण का सिद्धान्त यही स्पष्ट करता है कि किसी भी विशेष उद्योग की स्थापना के लिए विशेष भौगोलिक पर्यावरण की आवश्यकता पड़ती है। लोहे के कारखानों का बिहार में अधिक मात्रा में होने का मुख्य कारण वहाँ कोयले की खानों का अधिक होना है। अहमदाबाद और मुम्बई में कपास की खेती अधिक होने के कारण वहाँ कपड़ा मिलों की अधिकता है। इसी प्रकार फिल्म उद्योग के लिए साफ आसमान, प्रकाश और स्वच्छ मौसम की आवश्यकता होती है। इसीलिए यह उद्योग मुम्बई में सबसे अधिक विकसित है।।

2. धर्म, साहित्य व कला पर प्रभाव – जिन वस्तुओं से मनुष्य अपने जीवन का निर्वाह करता है उसके प्रति उसके मन में श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है वह उनकी पूजा करने लगता है। उदाहरण के लिए, भारत के लोगों द्वारा गंगा, यमुना, सूर्य आदि की पूजा की जाती है। साहित्य पर भी पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है। उदाहरणार्थ-रेगिस्तानी क्षेत्र में रहने वाला साहित्यकार अपने साहित्य में ऊँट’ या खजूर के पेड़ों का वर्णन करते हुए मिलता है। इसी प्रकार समुद्री तट के निकटतम प्रदेश में रहने वाला चित्रकार जितनी अच्छी तरह समुद्र का चित्र चित्रित कर सकता है, उतना पहाड़ी इलाके में रहने वाला नहीं। रामायण, महाभारत आदि रचनाओं पर भी पर्यावरण का ही प्रभाव देखने को मिलता है।

3. समाज-जीवन पर प्रभाव – विभिन्न प्राकृतिक या भौगोलिक परिस्थितियों के कारण ही भिन्न-भिन्न रीति-रिवाजों का जन्म होता है। हमारे देश के विभिन्न प्रदेशों के रीति-रिवाजों, प्रथाओं, भोजन, साहित्य, कला आदि में जो विभिन्नताएँ विद्यमान हैं, उनके पीछे मूल कारण भौगोलिक अथवा प्राकृतिक पर्यावरण की विभिन्नता ही है।

4. सामाजिक संगठन पर प्रभाव – भौगोलिक पर्यावरण का सर्वाधिक प्रभाव सामाजिक संगठन पर पड़ता है। लीप्ले ने लिखा है कि ‘‘ऐसे पर्वतीय प्रदेशों में जहाँ खाद्यान्न की कमी होती है। वहाँ जनसंख्या की वृद्धि अभिशाप मानी जाती है और ऐसी विवाह संस्थाएँ स्थापित की जाती हैं जिनसे जनसंख्या न बढ़ पाये।” यही कारण है कि भारत में जौनसार बाबर में बहुत-से “भाइयों की केवल एक ही पत्नी होती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि भौगोलिक पर्यावरण का भारतीय सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्षों पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 2
भौगोलिक कारकों का मानव के सामाजिक जीवन पर कैसे प्रभाव पड़ता है.?
उत्तर:
कई भूगोलविदों ने भौगोलिक कारकों एवं सामाजिक संस्थाओं का सम्बन्ध प्रकट किया है। उदाहरण के लिए, जिन स्थानों पर खाने-पीने एवं रहने की सुविधाएँ होती हैं, वहाँ संयुक्त परिवार पाये जाते हैं और जाँ-इनका अभाव होता है, वहाँ एकाकी परिबार। जहाँ प्रकृति से संघर्ष करना होता है, वहाँ पुरुषप्रधान समाज होते हैं। इसी प्रकार से जहाँ जीविकोपार्जन की सुविधाएँ सरलता से मिल जाती हैं और कृषि की प्रधानता होती है, वहाँ बहुपत्नी प्रथा तथा जहाँ जीवन-यापन कठिन होता है, वहाँ बत्तिाप्रथा अथवा एक विवाह की प्रथा पायी जाती है। इसका कारण यह है कि संघर्षपूर्ण पर्यावरण में स्त्रियों का भरण-पोषण सम्भव न होने से कन्या-वध आदि की प्रथा पायी जाती है, जिससे उनकी संख्या घट जाती है। जिन स्थानों पर जीवन-यापन के लिए कठोर श्रम एवं सामूहिक प्रयास करना होता है, वहाँ सामाजिक संगठन सुदृढ़ होता है।

भारत के भौगोलिक पर्यावरण ने यहाँ के सामाजिक जीवन को प्रभावित किया है। खस एवं टोडा जनजातियाँ पहाड़ी भागों में निवास करती हैं, जहाँ परिवार को आर्थिक भरण-पोषण कठिनाई से होता है। उन्हें जीवन-यापन के लिए प्रकृति से घोर संघर्ष करना पड़ता है। इस संघर्ष में स्त्रियाँ और भी कमजोर होती हैं। अत: वहाँ जन्म के समय ही लड़कियों को मार देने की प्रथा पायी जाती है, जिसके कारण इन समाजों में पुरुषों की अधिकता एवं स्त्रियों की कमी पायी जाती है। इस विषम लिंग अनुपात के कारण यहाँ बहुपति विवाह की प्रथा विकसित हुई। दूसरी ओर उत्तरी भारत के मैदानी भागों में जीवन-यापन सरल है; इससे वहाँ लिंग-अनुपात लगभग समान है, अतः वहाँ एक विवाह प्रथा विकसित हुई और सम्पन्न लोग एकाधिक पत्नियाँ भी रखने लगे, जिनसे बहुपत्नी प्रथा का जन्म हुआ।

दक्षिणी भारत के पठारी क्षेत्र होने के कारण लोगों को दूर क्षेत्र तक गमन कठिन था। अत: उनका विवाह एवं नातेदारी का क्षेत्र अपने गाँवों या निकटवर्ती गाँवों तक ही सीमित रहा, जब कि उत्तरी भारत के मैदानी क्षेत्रों में विवाह एवं नातेदारी का विस्तार दूर-दराज के क्षेत्रों तक पाया जाता है। मैदानी क्षेत्रों में पुरुष का दबदबा अधिक होने से पितृसत्तात्मक परिवार व्यवस्था ने जन्म लिया। गारो, खासी और जयन्तिया जनजातियाँ जो कि मातृसत्तात्मक हैं, पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करती हैं। इनमें पुरुष जीवन-यापन की सुविधाएँ जुटाने, शिकार करने एवं जंगलों से कन्द-मूल-फल एकत्रित करने एवं कृषि के लिए अधिकांश समय तक घर से बाहर ही रहता है। ऐसी स्थिति में परिवार एवं बच्चों के पालन-पोषण का दायित्व महिलाओं पर आ जाता है, इससे परिवार में महिलाओं को प्रभुत्व स्थापित हुआ एवं मातृसत्तात्मक परिवार पनपे।

प्रश्न 3
सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण का भारतीय सामाजिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
सामाजिक जीवन केवल भौगोलिक पर्यावरण से ही प्रभावित नहीं होता, वरन् सामाजिकसांस्कृतिक पर्यावरण भी उसे प्रभावित करता है। सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण स्वयं मानव द्वारा निर्मित होता है। उसमें मानव द्वारा निर्मित भौतिक वस्तुएँ; जैसे—पेन, घड़ी, रेडियो, मकान, सड़क, मशीनें, कलाकृतियाँ, धार्मिक स्थल और हजारों-लाखों वस्तुएँ सम्मिलित हैं। अभौतिक वस्तुओं में सामाजिक संस्थाएँ, कला, विज्ञान, धर्म, विश्वास, परम्पराएँ, कानून और मानव का ज्ञान आदि आते हैं। भारत इन भौतिक एवं अभौतिक तथ्यों से निर्मित सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण की भूमि रहा है। यहाँ समय-समय पर आक्रमणकारियों के रूप में विभिन्न प्रजातियों, धर्मों एवं संस्कृतियों से सम्बन्धित लोग भी आते रहे हैं, जिन्होंने यहाँ के निवासियों की जीवन-विधि को प्रभावित किया है।

भारतीयों का खान-पान, रहन-सहन, परिवार, विवाह, नातेदारी की प्रथाएँ, आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन सदैव एक-से नहीं रहे हैं, वरन् समय के साथ-साथ बदलते रहे हैं। वैदिक काल, धर्मशास्त्र काल, मुगलकाल, अंग्रेजों के शासन के समय एवं स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद के सामाजिक जीवन में भिन्नताएँ पायी जाती हैं। वैदिक युग में वर्ण एवं आश्रम-व्यवस्था ने भारतीयों के जीवन को प्रभावित किया। उस समय धर्मशास्त्र काल में विभिन्न धर्म-ग्रन्थों की रचना की गयी। जिनमें परिवार, विवाह, शिक्षा, आर्थिक जीवन से सम्बन्धित विभिन्न नियमों का भी उल्लेख किया गया। इसी समय वर्णव्यवस्था ने कठोर जाति-व्यवस्था का रूप ले लिया और जाति ने भारतीय जीवन के प्रत्येक पक्ष को निर्धारित किया। स्त्रियों को भी अनेक अधिकारों से वंचित कर दिया गया।

मुगलकाल में विवाह व सती–प्रथा का प्रचलन बढ़ा तथा विधवा विवाहों पर रोक लगा दी गयी। अन्तर्जातीय एवं अन्तर्वर्गीय विवाहों पर भी रोक लगी। इस्लाम ने भारतीयों के सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक जीवन, खान-पान एवं पहनावे में कई परिवर्तन किये। अंग्रेजी काल में भारतीयों का जीवन पश्चिमी सभ्यता एवं संस्कृति से प्रभावित हुआ। उनके समय में सम्पूर्ण भारत एक राजनीतिक सत्ता के अधीन शासित हुआ, औद्योगीकरण की नींव रखी गयी, अनेक नवीन आविष्कार जो पश्चिम में हुए, उनसे भारतीय भी परिचित हुए। कृषि एवं उत्पादन के नये तरीके अपनाये गये। मशीनों का प्रचलन बढ़ा। अंग्रेजी शिक्षा-प्रणाली प्रचलित हुई, खान-पान एवं पहनावे में परिवर्तन आया। चुकन्दर, शलगम, मांस-मदिरा का प्रयोग बढ़ा। टेबल-कुर्सी पर बैठकर, काँटे-छुरी एवं क्रॉकरी के माध्यम से भोजन किया जाने लगा। पैण्ट, शर्ट, टाई एवं कोट का प्रचलन हुआ।

आजादी के बाद भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण में एक बार फिर परिवर्तन हुआ। एकाकी परिवार, अन्तर्जातीय विवाह, विलम्ब विवाह का प्रचलन बढ़ा, विधवा पुनर्विवाह होने लगे, नातेदारी का महत्त्व घटने लगा, धर्मनिरपेक्ष मूल्य पनपे। सार्वभौमिक शिक्षा प्रदान की जाने लगी। प्रजातान्त्रिक मूल्य स्थापित हुए। विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं एवं सामुदायिक विकास योजनाओं के माध्यम से ग्रामीण भारत एवं सम्पूर्ण भारत के सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक जीवन को उन्नत करने का प्रयास किया गया, जिसके फलस्वरूप वर्तमान में भारतीयों का जो सामाजिक जीवन है वह वैदिक काल एवं मध्यकाल से एकदम भिन्न दिशा की ओर अग्रसर हुआ। फिर भी धर्म एवं अध्यात्मवाद की प्रधानता, कर्म एवं पुनर्जन्म का सिद्धान्त, संयुक्त परिवार प्रणाली और जाति-प्रथा आज भी भारतीयों के सामाजिक जीवन का मूलाधार बने हुए हैं। स्पष्ट है कि भारतीयों के सामाजिक जीवन को प्रभावित करने में भौगोलिक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण ने पर्याप्त योगदान दिया।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
भौगालिक पर्यावरण मानव के अपराधी व्यवहारों को कैसे प्रभावित करता है ?
उत्तर:
अनेक अपराधशास्त्रियों का मत है कि भौगोलिक पर्यावरण का अपराधी प्रवृत्ति के व्यक्ति पर भी प्रभाव पड़ता है। गर्मियों में व्यक्ति के विरुद्ध एवं सर्दियों में सम्पत्ति के विरुद्ध अपराध अधिक होते हैं। उपजाऊ भूमि, अनुकूल वर्षा एवं प्राकृतिक साधनों की अधिकता होने पर अपराध कम होंगे और इसके विपरीत स्थितियों में अधिक। उत्तरी भारत के आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न होने के कारण यहाँ जनाधिक्य है। जनसंख्या के दबाव के कारण यहाँ चोरी, डकैती, बलात्कार, हत्या आदि अपराधों की घटनाएँ अधिक पायी जाती हैं। इनकी तुलना में दक्षिणी भारत शान्त क्षेत्र है।
इसी प्रकार जब भारत में अकाल पड़ता है तब भी अपराधों की दर में वृद्धि होती है तथा जब वर्षा पर्याप्त होती है, फसलों की पैदावार अच्छी होती है तो आर्थिक प्रवृत्ति के अपराध घट जाते हैं।

प्रश्न 2
भौगोलिक पर्यावरण किस प्रकार से सामाजिक जीवन को प्रभावित करता है ? [2009]
उत्तर:
भौगोलिक पर्यावरण सामाजिक जीवन को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों रूपों में प्रभावित करता है। कुछ भौगोलिकविदों का कहना है कि भौगोलिक दशाएँ ही मनुष्य के सम्पूर्ण सामाजिकसांस्कृतिक जीवन, विभिन्न संस्थाओं, मानवीय व्यवहारों एवं सभ्यता के स्वरूप का निर्धारण करती हैं। भौगोलिकविदों के मतानुसार

  1. जनसंख्या की रचना एवं घनत्व,
  2. व्यवसाय,
  3.  सामाजिक व्यवहार,
  4. मकान-निर्माण,
  5. भोजन,
  6. वेशभूषा,
  7. सामाजिक संस्थाओं (अर्थात् विवाह, अधिकार, विश्वास आदि),
  8. उद्योग-धन्धों,
  9. आवागमन के साधन,
  10.  कला व साहित्य इत्यादि पर भौगोलिक पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है।

इतना ही नहीं; कुछ विद्वानों (हंटिंग्टन, बकल, मॉण्टेस्क्यू, डेक्सटर आदि) ने तो यहाँ तक कहा है कि सभी मानवीय व्यवहारों; जैसे – मनुष्य की कार्यकुशलता, आत्महत्या, सम्पत्ति एवं व्यक्ति के विरुद्ध अपराध, मानसिक सन्तुलन, जन्म एवं मृत्यु-दर इत्यादि पर जलवायु तथा ऋतुओं का प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 3
पर्यावरण के प्रकार अथवा भेद बताइए। [2015]
उत्तर:
पर्यावरण के प्रकारों अथवा भेदों के विषय में विद्वानों ने विभिन्न प्रकार के मत व्यक्त किये हैं; जैसे(क) लैण्डिस (Landis) के अनुसार, पर्यावरण के तीन प्रकार हैं
(i) प्राकृतिक,
(ii) सामाजिक तथा
(iii) सांस्कृतिक।

(ख) ऑगबर्न एवं निमकॉफ के अनुसार पर्यावरण के दो प्रकार हैं
(i) प्राकृतिक तथा
(ii) मनुष्यकृत।।

(ग) गिलिन तथा गिलिन के अनुसार भी पर्यावरण के दो भेद हैं
(i) प्राकृतिक पर्यावरण तथा
(ii) सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण।

सामान्य आधार पर पर्यावरण को निम्नलिखित तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है

  1. भौगोलिक या प्राकृतिक पर्यावरण – इसमें प्रकृति प्रदत्त वस्तुएँ आती हैं; जैसे-स्थलमण्डल, जलमण्डल, वायुमण्डल इत्यादि। ये सभी अपनी-अपनी शक्तियों से अनेक क्रियाएँ करते हैं। जिससे पृथ्वी पर अनेक भौगोलिक दशाओं की उत्पत्ति होती है तथा ये सभी दशाएँ मानव के जीवन पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डालती हैं।
  2. सामाजिक पर्यावरण – सभी सामाजिक रीति-रिवाज, प्रथाएँ, परम्पराएँ, लोकाचार आदि सामाजिक पर्यावरण के अन्तर्गत आती हैं।
  3.  सांस्कृतिक पर्यावरण – किसी समाज का सांस्कृतिक पक्ष सांस्कृतिक पर्यावरण कहलाता है। इसके अन्तर्गत उन समस्त वस्तुओं का समावेश होता है जिनको निर्माण स्वयं मनुष्य ने किया है; जैसे-धर्म, नैतिकता, भाषा, साहित्य, प्रथाएँ, लोकाचार, कानून, व्यवहार-प्रतिमान इत्यादि। इस प्रकार के पर्यावरण को सामाजिक विरासत’ या ‘संस्कृति’ (Culture) भी कहते हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
भौगोलिक पर्यावरण का सामाजिक संगठन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
भौगोलिक पर्यावरण विविध प्रकार से सामाजिक संगठन को प्रभावित करता है। इसके प्रभाव प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में पड़ते हैं। सामाजिक संगठन पर पड़ने वाले इसके प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं

  1. भौगोलिक पर्यावरण जनसंख्या के घनत्व का निर्धारण करता है। अधिक जनसंख्या अथवा कम जनसंख्या सामाजिक जीवन को प्रभावित करती है।
  2. भौगोलिक पर्यावरण का खान-पान पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि भौगोलिक पर्यावरण अनुकूल होता है तो आर्थिक समृद्धि के कारण व्यक्तियों का खान-पान उच्च स्तर को होता है।
  3. भौगोलिक पर्यावरण धार्मिक विश्वासों को प्रभावित करता है। उदाहरणार्थ कृषि प्रधान देश होने के कारण यहाँ इन्द्र अर्थात् वर्षा के देवता की पूजा का विशेष महत्त्व होता है।
  4. भौगोलिक पर्यावरण मानव व्यवहार को प्रभावित करता है। भारत के विभिन्न राज्यों के रीति| रिवाज, खान-पान तथा साहित्य आदि में अन्तर पाए जाने का मूल कारण भौगोलिक पर्यावरण की विभिन्नता ही है।

प्रश्न 2
सांस्कृतिक पर्यावरण का मानव जीवन के आर्थिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
सांस्कृतिक पर्यावरण व्यक्तियों के आर्थिक जीवन को भी प्रभावित करता है। यदि सांस्कृतिक मूल्य आर्थिक विकास में सहायता देने वाले हैं तो वहाँ व्यक्तियों को आर्थिक जीवन अधिक उन्नत होगा। मैक्स वेबर के अनुसार, प्रोटेस्टेण्ट ईसाइयों की धार्मिक मान्यताएँ पूँजीवादी प्रवृत्ति के विकास में सहायक हुई हैं। इसीलिए प्रोटेस्टेण्ट ईसाइयों के बहुमत वाले देशों में पूँजीवाद अधिक है। यदि सांस्कृतिक मूल्य आर्थिक विकास में बाधक हैं तो व्यक्तियों के आर्थिक जीवन पर इनका कुप्रभाव पड़ता है तथा वे आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए रहते हैं।

प्रश्न 3
भौगोलिक पर्यावरण का मानसिक क्षमता पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
भौगोलिक पर्यावरण का मानसिक क्षमता पर प्रभाव के सन्दर्भ में हंटिंग्टन का मत है कि जब तापमान बहुत गिर जाता है तो मानसिक योग्यता की अधिक हानि होती है और जलवायु में शीघ्र पुनः परिवर्तन न हो तो इसमें निरन्तर कमी आती जाती है। यदि हवा में कुछ गर्मी आ जाए तो इसमें कुछ सुधार होता है, लेकिन हवी अधिक गर्म हो जाने पर मानसिक क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अत्यधिक गर्मी में शीत ऋतु की तुलना में भारतीयों की मानसिक क्षमता कम हो जाती है।

प्रश्न 4
प्रदूषण के प्रमुख दो सामाजिक प्रभावों को लिखिए।
उत्तर:
प्रदूषण मानव तथा अन्य जीवों के जीवन-चक्र पर हानिकारक प्रभाव डालता है। अत: यह मानव तथा समाज दोनों के लिए हानिकारक है। प्रदूषण के दो प्रमुख हानिकारक प्रभाव निम्नलिखित हैं

  1. मानव के जीवन-स्तर पर प्रभाव – मानव-जीवन पर प्राकृतिक सम्पदाओं का प्रभाव पड़ता है। यह प्राकृतिक सम्पदाएँ भूमि, पेड़-पौधे, खनिज-पदार्थ, जल, वायु आदि के रूप में मनुष्य को उपलब्ध हैं। प्रदूषण के कारण इन सभी पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। प्रदूषण के कारण फसलों, फलों, सब्जियों आदि पर बुरा प्रभाव पड़ता है, जलीय जीव (मछलियाँ आदि) नष्ट हो जाते हैं। इससे वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि हो जाती है तथा लोगों को आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ता है।
  2. प्राणियों के खाद्य-पदार्थों में कमी – वनों की अन्धाधुन्ध कटाई के परिणामस्वरूप जीव जन्तुओं को चारा तक उपलब्ध नहीं हो पा रहा है, जिस कारण हमें पशुओं से जो पदार्थ प्राप्त होते हैं, वे नष्ट होते जा रहे हैं।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
नगरीकरण से पर्यावरण प्रभावित होता है। (हाँ/नहीं)
या
जनसंख्या से पर्यावरण प्रभावित है। (हाँ/नहीं) [2015]
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 2
भौगोलिक पर्यावरण का प्रभाव प्रत्यक्ष भी होता है और …….. भी।
उत्तर:
अप्रत्यक्ष

प्रश्न 3
सभ्यता की वृद्धि के साथ भौगोलिक पर्यावरण का प्रभाव भी …….. जाता है।
उत्तर:
घटता।

प्रश्न 4
उस बाह्य शक्ति को क्या कहते हैं जो हमें प्रभावित करती है?
उत्तर:
पर्यावरण।

प्रश्न 5
किस विद्वान ने प्राकृतिक परिस्थितियों को धार्मिक व्यवहार से जोड़ने का प्रयास किया है।
उत्तर:
मैक्स मूलर।।

प्रश्न 6
‘भौगोलिक निर्णायकवाद’ की संकल्पना को किसने विकसित किया? [2008]
उत्तर:
बकल ने।

प्रश्न 7
“संस्कृति पर्यावरण का मानव निर्मित भाग है।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
हर्सकोविट्स का।।

प्रश्न 8
चिपको आन्दोलन किसने चलाया? [2009]
उत्तर:
सुन्दरलाल बहुगुणा ने।

प्रश्न 9
प्रदूषण की एक परिभाषा दीजिए। [2009]
उत्तर:
प्रदूषण हमारी वायु, मृदा एवं जल के भौतिक, रासायनिक तथा जैविके लक्षणों में अवांछनीय परिवर्तन है जो मानव जीवन तथा अन्य जीवों पर हानिकारक प्रभाव डालता है।

प्रश्न10
संस्कृति मानव……….वातावरण है। [2009]
उत्तर:
निर्मित।

प्रश्न 11
संस्कृति के दो प्रकार लिखिए। [2009]
उत्तर:
भौतिक एवं अभौतिक संस्कृति।

प्रश्न 12
सांस्कृतिक पर्यावरण की एक परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
हर्सकोविट्स के अनुसार, “सांस्कृतिक पर्यावरण के अन्तर्गत वे सभी भौतिक और अभौतिक वस्तुएँ सम्मिलित हैं जिनका निर्माण मानव ने किया है।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
“पर्यावरण किसी भी उस बाह्य शक्ति को कहते हैं जो हमें प्रभावित करती है।” यह परिभाषा किस विद्वान ने प्रस्तुत की है?
(क) जिसबर्ट
(ख) रॉस
(ग) मैकाइवर
(घ) डेविस

प्रश्न 2
प्रकृति द्वारा मनुष्य को प्रदत्त दशाओं से निर्मित पर्यावरण को क्या कहा जाता है?
(क) भौगोलिक
(ख) सामाजिक
(ग) सांस्कृतिक
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 3
निम्नलिखित में से किस विद्वान ने भौगोलिक निश्चयवाद का समर्थन किया है?
(क) बकल
(ख) लीप्ले
(ग) हटिंग्टन
(घ) ये सभी

प्रश्न 4
भौगोलिक पर्यावरण किन तत्त्वों से बनता है?
(क) मनुष्य
(ख) प्राकृतिक दशाएँ
(ग) धार्मिक विश्वास
(घ) प्रथाएँ

प्रश्न 5
वह कौन-सा सिद्धान्त है जो सम्पूर्ण मानवीय क्रियाओं को भौगोलिक पर्यावरण के आधार पर स्पष्ट करने का प्रयास करता है?
(क) भौगोलिक निर्णायकवाद
(ख) तकनीकी निर्णायकवाद
(ग) सांस्कृतिक निर्णायकवाद
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 6
हंटिंग्टन किस सम्प्रदाय का समर्थक है?
(क) भौगोलिक निर्णायकवाद
(ख) तकनीकी निर्णायकवाद
(ग) सांस्कृतिक निर्णायकवाद
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 7
भारतीय सरकार ने गंगा विकास प्राधिकरण’ की स्थापना किस सन में की थी?
(क) सन् 1984 में
(ख) सन् 1985 में
(ग) सन् 1986 में
(घ) सन् 1987 में

प्रश्न 8
पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। [2009]
(क) 5 जून को
(ख) 24 जून को
(ग) 6 जून को
(घ) 20 जून को

उत्तर
1, (ख) रॉस,
2. (ख) सामाजिक,
3. (घ) ये सभी,
4. (ख) प्राकृतिक दशाएँ,
5. (क) भौगोलिक निर्णायकवाद,
6. (क) भौगोलिक निर्णायकवाद,
7. (ख) सन् 1985 में,
8. (क) 5 जून को।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 21 Effect of Environment on Indian Social Life (पर्यावरण का भारतीय सामाजिक जीवन पर प्रभाव) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 21 Effect of Environment on Indian Social Life (पर्यावरण का भारतीय सामाजिक जीवन पर प्रभाव), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.