UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : एक

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name काव्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : एक
Number of Questions 208
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : एक

बहुविकल्पीय प्रश्न : एक

[ ध्यान दें: नीचे दिये गये बहुविकल्पीय प्रश्नों के विकल्पों में सामान्य से अधिक काले छपे विकल्प को उचित विकल्प समझे।] ।
उचित विकल्प का चयन करें-

(1) निम्नलिखित में से कौन-सा कथन आदिकाल से सम्बन्धित नहीं है?
(क) युद्धों का सजीव वर्णन मिलता है
(ख) लक्षण ग्रन्थों की रचना हुई
(ग) रासो ग्रन्थ रचे गये।
(घ) श्रृंगार प्रधान काव्यों की रचना हुई

(2) दलपति विजय किस काल के कवि हैं ?
(क) भक्तिकाल
(ख) रीतिकाल
(ग) आधुनिककाल
(घ) आदिकाल

(3) निम्नलिखित में से लौकिक साहित्य के अन्तर्गत हैं-
(क) रेवंतगिरि रास
(ख) खुसरो की पहेलियाँ
(ग) खुमाण रासो
(घ) कामायनी

(4) हिन्दी के प्रथम कवि के रूप में मान्य हैं [2015, 16]
(क) शबरपा
(ख) चन्द
(ग) लुइपा
(घ) सरहपा

(5) इतिवृत्तात्मकता की प्रधानता’ किस युग की मुख्य विशेषता थी ?
(क) छायावाद काल
(ख) द्विवेदी युग
(ग) भारतेन्दु युग
(घ) प्रगति काल

(6) हिन्दी साहित्य का’आदिकाल’ निम्नांकित में से किस साम्राज्य की समाप्ति के समय से प्रारम्भ होता है ?
(क) अंग्रेजी साम्राज्य
(ख) वर्धन साम्राज्य
(ग) गुप्त साम्राज्य
(घ) मौर्य साम्राज्य

(7) जैन साहित्य का सबसे अधिक लोकप्रिय रूप है
(क) रासो ग्रन्थ
(ख) रीति ग्रन्थ
(ग) रास ग्रन्थ
(घ) लौकिक ग्रन्थ

(8) आदिकाल का एक अन्य नाम है-
(क) स्वर्ण युग
(ख) सिद्ध-सामन्त काल
(ग) श्रृंगार काल
(घ) भक्तिकाल

(9) वीरगाथाकाल के ग्रन्थों की भाषा है-
(क) अवधी
(ख) मैथिली
(ग) डिंगल-पिंगल
(घ) अपभ्रंश

(10) इनमें से हिन्दी का प्राचीनतम (प्रथम) महाकाव्य कौन-सा है ? [2010, 11]
था
निम्नलिखित में से कौन-सा ग्रन्थ आदिकाल का है ? [2013]
(क) श्रीरामचरितमानस
(ख) पद्मावत
(ग) पृथ्वीराज रासो
(घ) प्रिय प्रवास

(11) निम्नलिखित में से कौन आदिकाल के कवि नहीं हैं ?
(क) शारंगधर
(ख) जगनिक
(ग) सुमित्रानन्दन पन्त
(घ) चन्दबरदाई

(12) ‘बीसलदेव रासो’ रचना है [2010]
(क) नरपति नाल्ह की
(ख) भट्ट केदार की
(ग) जगनिक की
(घ) दलपति विजय की

(13) निम्नलिखित में से कौन-सा ग्रन्थ आदिकाल का है ? [2010, 13]
(क) सूरसागर
(ख) पद्मावत
(ग) बीसलदेव रासो
(घ) आँसू

(14) हिन्दी साहित्य के आदिकाल की रचना नहीं है [2013, 14]
(क) पृथ्वीराज रासो
(ख) परमाल रासो
(ग) पद्मावत
(घ) विद्यापति पदावली

(15) आदिकाल की रचना नहीं है [2013]
(क) उक्ति-व्यक्ति प्रकरण
(ख) जयचंद प्रकाश
(ग) राउल वेल
(घ) मृगावती

(16) किस आलोचक ने ‘पृथ्वीराज रासो’ को अर्द्ध प्रामाणिक रचना माना है ?
(क) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
(ख) आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ग) डॉ० नगेन्द्र
(घ) डॉ० गणपतिचन्द्र गुप्त

(17) निम्नलिखित में कौन-सी प्रवृत्ति आदिकाल से सम्बन्धित है ?
(क) संसार की असारता का प्रतिपादन
(ख) अलंकरण के सभी साधन अपनाये गये
(ग) श्रृंगार का पूर्ण बहिष्कार
(घ) युद्धों का सुन्दर और सजीव वर्णन

(18) कौन-सा कथन आदिकाल ( वीरगाथा काल) से सम्बन्धित है ?
(क) आश्रयदाताओं के युद्धोत्साह, केलि-क्रीड़ा आदि के बड़े सरस वर्णन हैं।
(ख) काव्य-भाषा के रूप में खड़ी बोली हिन्दी को मान्यता मिली
(ग) भारतीय काव्य-शास्त्र का हिन्दी में अवतरण हुआ
(घ) ईश्वर की लीलाओं का ज्ञान तथा लोकोन्मुखी भावनाओं का प्रतिपादन

(19) भाट यो चारण कवि क्या करते थे ?
(क) युद्ध-काल में वीर रस के गीत गा-गाकर सेना को प्रोत्साहित करते थे
(ख) अपने आश्रयदाताओं की वीरता का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करते थे
(ग) अपने आश्रयदाताओं की वीरता के गुणगान सम्बन्धी गीत बनाते एवं सुनाते थे
(घ) उपर्युक्त तीनों

(20) कौन-सी प्रवृत्ति आदिकाल के काव्य में वर्णित साहित्य से सम्बन्धित है ?
(क) जीवन की नश्वरता का वर्णन
(ख) युद्ध का विशद वर्णन
(ग) श्रृंगारिक बातों का वर्णन
(घ) काव्य में अलंकरण का वर्णन

(21) कौन-से व्यक्ति ‘नाथ’ साहित्य के व्यवस्थापक (प्रवर्तक) माने जाते हैं ?
(क) विश्वनाथ
(ख) रवीन्द्रनाथ
(ग) जगन्नाथ
(घ) गोरखनाथ

(22) कौन-सा ग्रन्थ रासो परम्परा का श्रेष्ठ महाकाव्य हैं ?
(क) खुमाण रासो
(ख) बीसलदेव रासो
(ग) पृथ्वीराज रासो
(घ) परमाल रासो

(23) कौन-सी रचना वीर गाथात्मक है ?
(क) पृथ्वीराज रासो
(ख) विद्यापति
(ग) खुसरो की पहेलियाँ
(घ) साहित्य लहरी

(24) ‘पृथ्वीराज रासो’ में प्रधानता है [2012]
(क) श्रृंगार रस की
(ख) वीर रस की
(ग) शान्त रस की
(घ) हास्य रस की

(25) वीरगाथा काल में लिखित कौन-सी रचना है ?
(क) रस विलास
(ख) ललित ललाम
(ग) कवित्त रत्नाकर
(घ) सन्देश रासक

(26) निर्गुणभक्ति की ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रधान (प्रतिनिधि) कवि हैं [2010, 13]
(क) रैदास
(ख) कबीरदास
(ग) मलूकदास
(घ) नानक

(27) निम्नलिखित में से कौन ज्ञानाश्रयी शाखा के कवि नहीं हैं ?
(क) नानक
(ख) दादू
(ग) केशव
(घ) मलूकदास

(28) किसे खड़ी बोली का प्रथम कवि माना जाता है ?
(क) अब्दुर्रहमान
(ख) नरपति नाल्ह
(ग) अमीर खुसरो
(घ) धनपाल

(29) निम्नलिखित में से कौन-सा कवि ज्ञानाश्रयी शाखा का नहीं है ? [2009]
(क) मलिक मुहम्मद जायसी
(ख) रैदास
(ग) नानक
(घ) कबीर

(30) “भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे।” प्रस्तुत कथन किस लेखक का है ? [2015]
(क) नन्ददुलारे वाजपेयी
(ख) रामचन्द्र शुक्ल
(ग) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(घ) रामविलास शर्मा

(31) निर्गुण काव्य-धारा की प्रवृत्ति है|
(क) वात्सल्य रस की प्रधानता
(ख) प्रकृति पर चेतन सत्ता का आरोप
(ग) रुढ़ियों एवं बाह्य आडम्बर का विरोध
(घ) आश्रयदाता की प्रशंसा

(32) ‘कबीरदास’ भक्तिकाल की किस धारा के कवि हैं ?
(क) सन्त काव्यधारा
(ख) प्रेम काव्यधारा
(ग) राम काव्यधारा
(घ) कृष्ण काव्यधारा

(33) निम्नलिखित में से कौन-सा कवि ज्ञानाश्रयी शाखा से सम्बन्धित नहीं है ?
(क) कबीर
(ख) नानक
(ग) रैदास
(घ) कुतुबन

(34) सन्त काव्यधारा के कवि नहीं हैं [2013]
(क) कबीर
(ख) रैदास
(ग) कुतुबन
(घ) दादू दयाल

(35) निम्नलिखित में से भक्तिकालीन कवि कौन हैं ? [2013]
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) कुम्भनदास
(ग) हरिऔध
(घ) महादेवी

(36) इस शाखा में केवल सौन्दर्य वृत्ति से प्रेरित स्वच्छन्द प्रेम तथा प्रगाढ़ प्रणय-भावना है-
(क) कृष्णभक्ति शाखा
(ख) रामभक्ति शाखा
(ग) प्रेमाश्रयी शाखा
(घ) ज्ञानाश्रयी शाखा

(37) निर्गुण भक्ति की प्रेमाश्रयी शाखा (सूफी काव्यधारा ) के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं
(क) कुतुबन
(ख) मंझन
(ग) उस्मान
(घ) जायसी

(38) काव्य साहित्य में कौन-सा काल स्वर्ण-काल कहलाता है ?
(क) आदिकाल
(ख) भक्तिकाल
(ग) रीतिकाल
(घ) आधुनिककाल

(39) ‘रुनकता’ नामक स्थान सम्बन्धित है [2013]
(क) जयशंकर प्रसाद से
(ख) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’ से
(ग) कबीरदास से
(घ) सूरदास से

(40) प्रेमाश्रयी सूफी काव्यधारा का सम्बन्ध किससे है ? [2013]
(क) कृष्णभक्ति
(ख) सगुणभक्ति
(ग) निर्गुणभक्ति
(घ) रामभक्ति

(41) कृष्णभक्ति शाखा के कवि नहीं हैं [2013, 14]
(क) सूरदास
(ख) नन्ददास
(ग) नाभादास
(घ) जगन्नाथ दास

(42) कृष्णभक्ति शाखा के कौन कवि नहीं हैं ?
(क) मलिक मुहम्मद जायसी
(ख) तुलसीदास
(ग) सूरदास
(घ) सुमित्रानन्दन पन्त

(43) निम्नलिखित कवियों में वल्लभाचार्य का शिष्य कौन था ?
(क) भूषण
(ख) भिखारीदास
(ग) रघुराज सिंह
(घ) कृष्णदास

(44) कृष्णभक्ति शाखा का प्रथम कवि कहते हैं
(क) सूरदास को
(ख) विद्यापति को
(ग) मीराबाई को
(घ) रसखान को

(45) वात्सल्य रस के सम्राट कहे जाते हैं| या ‘श्रृंगार’ और ‘वात्सल्य रस के अमर कवि हैं [2015]
(क) तुलसीदास
(ख) सूरदास
(ग) परमानन्ददास
(घ) कुम्भनदास

(46) कौन सगुण भक्ति शाखा के कवि नहीं हैं ?
(क) सूरदास
(ख) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ग) तुलसीदास
(घ) ये सभी

(47) कृष्णभक्ति काव्यधारा के अन्तर्गत आते हैं-
(क) सभी ब्रजभाषा के कवि
(ख) भक्तिकाल के कवि
(ग) अष्टछाप के कवि
(घ) सभी श्रृंगारिक रचनाकार

(48) मर्यादा पुरुषोत्तम राम की अवधारणा दी
(क) वाल्मीकि
(ख) तुलसीदास
(ग) कुम्भनदास
(घ) नन्ददास

(49) राम भक्ति शाखा से सम्बन्धित हैं [2009]
(क) कुम्भनदास
(ख) परमानन्ददास
(ग) नाभादास
(घ) चतुर्भुजदास

(50) हिन्दुओं के लिए कौन-से कवि आदरणीय हैं ?
(क) कबीर
(ख) रहीम
(ग) सूरदास
(घ) तुलसीदास

(51) तुलसीदास ने ‘श्रीरामचरितमानस’ की रचना की है [2013]
(क) ब्रजभाषा में
(ख) भोजपुरी में
(ग) अवधी में
(घ) खड़ी बोली में

(52) कौन-सा कथन भक्तिकाल से सम्बन्धित नहीं है ?
(क) जीवन की नश्वरता का वर्णन
(ख) ईश्वर के नाम-स्मरण की महत्ता
(ग) सहयोग और समन्वय की भावना
(घ) नारी को भोग्य सम्पत्ति के रूप में प्रस्तुत करना

(53) कुम्भनदास, परमानन्द दास, क्षीत स्वामी, गोविन्द स्वामी, चतुर्भुज दास, नन्ददास तथा सूरदास को किस श्रेणी का कवि माना जाता था ?
(क) सन्त कवि
(ख) गायक कवि
(ग) महान् कवि
(घ) अष्टछाप के कवि

(54) ‘अष्टछाप’ के कवियों का सम्बन्ध भक्तिकाल की किस शाखा से है ? [2015, 18]
(क) ज्ञानाश्रयी शाखा
(ख) प्रेमाश्रयी शाखा
(ग) कृष्णभक्ति शाखा
(ग) रामभक्ति शाखा

(55) मलिक मुहम्मद जायसी, मंझन तथा कुतुबन किस काव्यधारा के कवि थे ?
(क) ज्ञानाश्रयी निर्गुण काव्यधारा
(ख) सगुण भक्ति काव्यधारा
(ग) प्रेमाश्रयी निर्गुण काव्यधारा
(घ) इनमें से कोई नहीं

(56) निम्नलिखित में से कौन-सी कवि प्रेमाश्रयी शाखा से सम्बन्धित नहीं है ?
(क) जायसी
(ख) मंझन
(ग) चन्दबरदाई
(घ) कुतुबन

(57) ‘प्रेमाश्रयी सूफी काव्यधारा’ का सम्बन्ध किससे था ?
(क) कृष्ण-भक्ति
(ख) सगुण भक्ति
(ग) निर्गुण भक्ति
(घ) इनमें से कोई नहीं

(58) लौकिक प्रेम के माध्यम से अलौकिक प्रेम का प्रतिपादन किस काव्यधारा के काव्य के अन्तर्गत किया गया है ?
(क) निर्गुण भक्ति काव्यधारा
(ख) कृष्णभक्ति काव्यधारा
(ग) प्रेमाश्रयी निर्गुण भक्ति काव्यधारा
(घ) सगुण भक्ति काव्यधारा

(59) रसखान किस काव्यधारा के कवि थे ?
(क) प्रेमाश्रयी काव्यधारा
(ख) निर्गुण भक्ति काव्यधारा
(ग) सगुण भक्ति काव्यधारा
(घ) कृष्णभक्ति काव्यधारा

(60) गोस्वामी तुलसीदास केशवदास, हृदयराम तथा प्राणचन्द किस काव्यधारा के कवि थे ?
(क) सगुण भक्ति काव्यधारा
(ख) कृष्णभक्ति काव्यधारा
(ग) ज्ञानाश्रयी भक्ति काव्यधारी।
(घ) रामभक्ति काव्यधारा

(61) सखा-भाव की भक्ति-भावना की प्रधानता तथा श्रृंगार एवं वात्सल्य रस की प्रधानता किस काव्यधारा की मुख्य विशेषताएँ हैं ?
(क) प्रेमाश्रयी काव्यधारा
(ख) कृष्णभक्ति काव्यधारा
(ग) सगुण भक्ति काव्यधारा
(घ) रामभक्ति काव्यधारा

(62) सेवक-सेव्य भाव की भक्ति की प्रधानता है-
(क) सन्त काव्यधारा में ।
(ख) कृष्णभक्ति काव्यधारा में
(ग) रामभक्ति काव्यधारा में
(घ) सगुण भक्ति काव्यधारा में

(63) ‘भक्तिकाल’ का समय आचार्य रामचन्द्रशुक्ल ने माना है [2012]
(क) संवत् 1000 से संवत् 1375 तक
(ख) संवत् 1374 से संवत् 1700 तक
(ग) संवत् 1040 से संवत् 1370 तक
(घ) संवत् 950 से संवत् 1440 तक

(64) निम्नांकित में से कौन प्रेमाश्रयी शाखा के कवि नहीं हैं ?
(क) जायसी
(ख) सूरदास
(ग) मंझन
(घ) कुतुबन

(65) भक्तिकाल की प्रेमाश्रयी शाखा के कवि हैं [2012]
(क) कुम्भनदास
(ख) दादूदयाल
(ग) मंझन
(घ) नन्ददास

(66) निम्नलिखित में से कौन-सी प्रवृत्ति ज्ञानाश्रयी शाखा के काव्य में नहीं पायी जाती ?
(क) गुरु-गोविन्द की महत्ता
(ख) समाज-सुधार का दृष्टिकोण
(ग) नायक-नायिका का वर्णन
(घ) आडम्बर का विरोध

(67) निम्नलिखित में एक रचना तुलसीदास की नहीं है; उसका नाम लिखिए
(क) श्रीकृष्णगीतावली
(ख) साहित्यलहरी
(ग) विनयपत्रिका
(घ) पार्वतीमंगल

(68) निम्नलिखित में से कौन-सी रचना भक्तिकाल में लिखी गयी है ?
(क) कामायनी
(ख) सूरसागर
(ग) भारतभारती
(घ) उद्धवशतक

(69) गोस्वामी तुलसीदास रचित ‘विनयपत्रिका’ की भाषा है [2010, 16]
(क) अवधी
(ख) मैथिली
(ग) ब्रज
(घ) खड़ी बोली

(70) गोस्वामी तुलसीदास के बचपन का नाम था [2012, 13]
(क) तुकाराम
(ख) आत्माराम
(ग) सीताराम,
(घ) रामबोला

(71) रामचन्द्र शुक्ल ने भक्तिकाल को सर्वश्रेष्ठ लोकवादी कवि किसे कहा है ?
(क) कबीरदास
(ख) सूरदास
(ग) मलिक मुहम्मद जायसी
(घ) तुलसीदास

(72) निम्नलिखित में से किस कवि का काव्य श्रीमद्भागवत से अत्यधिक प्रभावित है ?
(क) केशव
(ख) सूर
(ग) तुलसी
(घ) बिहारी

(73) निम्नलिखित में से किस कवि को बाल-वर्णन क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है ?
(क) तुलसीदास
(ख) बिहारी
(ग) सूरदास
(घ) केशवदास

(74) निम्नलिखित कवियों में स्वामी रामानन्द का शिष्य कौन था ?
(क) नानक
(ख) मलूकदास
(ग) रैदास
(घ) कबीरदास

(75) निम्नलिखित में से कौन-सा कथन भक्तिकाल से सम्बन्धित है ?
(क)लोकोन्मुखी प्रवृत्ति के कारण इस काल की भक्ति-भावना लोक-प्रचलित है।
(ख) इस काल का समस्त साहित्य आक्रमण एवं युद्ध के प्रभावों की मन:स्थितियों का प्रतिफलन है।
(ग) हिन्दी साहित्य में आधुनिकता का सूत्रपात अंग्रेजों की साम्राज्यवादी शासन-प्रणाली के नवीन अनुभव से हुआ था
(घ) प्रगतिवाद के साथ-साथ मनुष्य के मन के यथार्थ को अभिव्यक्त करने वाली प्रयोगवादी धारा भी प्रवाहित हुई।

(76) “वह इस असार संसार को न देखने के वास्ते आँखें बन्द किये थे।” यह किसका कथन है? [2012]
(क) अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का।
(ख) मलिक मुहम्मद जायसी का
(ग) भारतेन्दु हश्चिन्द्र का
(घ) जगन्नाथदास रत्नाकर का

(77) कौन-सा कथन भक्तिकाल की प्रेमाश्रयी शाखा से सम्बद्ध है ?
(क) स्वच्छन्दवादी काव्य-रचनाओं का कला–पक्ष भी नवीनता लिये हुए होता है।
(ख) सामाजिक रूढ़ियों से मुक्त एवं सौन्दर्य-वृत्ति से प्रेरित स्वच्छन्द प्रेम तथा प्रगाढ़ प्रणय भावना ही इस काव्य का मूल विषय रहा है।
(ग) श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में वात्सल्य रस की प्रमुखता है।
(घ) कवियों ने अपने-अपने आश्रयदाताओं की इच्छा के अनुरूप श्रृंगार रस में ही अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं

(78) निम्नलिखित में से कौन सगुण भक्तिशाखा के कवि नहीं हैं ?
(क) सूरदास
(ख) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ग) तुलसी
(घ) केशवदास

(79) निम्नांकित में रामभक्ति शाखा में कौन नहीं हैं ?
(क) तुलसीदास
(ख) चतुर्भुज दास
(ग) अग्रदास
(घ) नाभादास

(80) भक्तिकाल की रचनाओं में निम्नलिखित में से कौन सबसे अधिक लोकप्रिय है ?
(क) पद्मावत
(ख) श्रीरामचरितमानस
(ग) रामचन्द्रिका
(घ) सूरदास

(81) निम्नलिखित में से कौन-सा ग्रन्थ सगुण भक्तिधारा का श्रेष्ठ ग्रन्थ है ?
(क) कवितावली
(ख) साहित्य लहरी
(ग) श्रीरामचरितमानस
(घ) रामलला नहछू

(82) भक्तिकाल की काव्य नहीं है [2012]
(क) पद्मावत
(ख) पृथ्वीराज रासो
(ग) श्रीरामचरितमानस
(घ) सूरसागर

(83) भक्तिकाल की कृति है [2010]
(क) साकेत
(ख) पार्वती-मंगल
(ग) कामायनी
(घ) पृथ्वीराज रासो

(84) सामाजिक दृष्टि से घोर अध:पतन का काल था
(क) आदिकाल
(ख) भक्तिकाल
(ग) रीतिकाल
(घ) छायावाद काल

(85) रीतिकाल से सम्बन्धित विशेषता है
(क) सख्य भाव की भक्ति की प्रधानता
(ख) समन्वयकारी भावना
(ग) भक्ति की प्रधानता
(घ) नारी-सौन्दर्य का विलासितापूर्ण चित्रण

(86) रीतिकाल का अन्य नाम है– [2010, 13]
(क) स्वर्णकाल
(ख) उद्भव कोल
(ग) श्रृंगार काल
(घ) संक्रान्तिकाल

(87) रीतिकाल के कवियों की रचनाओं में प्रधानता है-
(क) भावुकता की
(ख) समाज-सुधार की
(ग) अलंकार-प्रदर्शन की
(घ) राष्ट्रीय भावना की

(88) ‘कठिन काव्य का प्रेत’ कहा जाता है [2013, 16]
(क) घनानन्द को
(ख) ‘भूषण’ को
(ग) ‘केशव’ को
(घ) ‘पद्माकर’ को

(89) कौन-सा ग्रन्थ रीतिकालीन काव्य-परम्परा से सम्बन्धित है ?
(क) श्रीरामचरितमानस
(ख) बिहारी सतसई
(ग) दीपशिखा
(घ) रश्मिरथी

(90) निम्नलिखित में कौन-से कवि रीतिकाल के हैं ?
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) रामधारी सिंह दिनकर
(ग) मलूकदास
(घ) बिहारी

(91) रीतिबद्ध काव्यधारा के कवि हैं
(क) केशवदास
(ख) बिहारी
(ग) घनानन्द
(घ) बोधा

(92) ‘बिहारी सतसई’ की भाषा है [2013]
(क) अवधी
(ख) खड़ी बोली
(ग) ब्रजभाषा
(घ) मैथिली

(93) रीतिमुक्त काव्यधारा के कवि हैं [2013, 14, 15]
(क) घनानन्द
(ख) सेनापति
(ग) बिहारी
(घ) वृन्द

(94) रीतिकाल की कृति है [2010, 11]
(क) रसमंजरी
(ख) प्रेमसागर
(ग) आर्या सप्तशती
(घ) बिहारी सतसई

(95) निम्नलिखित में से कौन-सा कथन रीतिकाल से सम्बन्धित है ?
(क) भागवत धर्म के प्रचार तथा प्रसार के परिणामस्वरूप भक्ति आन्दोलन का सूत्रपात हुआ था
(ख) वीरगाथाओं की रचना प्रवृत्ति की प्रधानता थी
(ग) सामान्य रूप से श्रृंगारप्रधान लक्षण-ग्रन्थों की रचना हुई।
(घ) गुरु और गोविन्द की महत्ता का प्रतिपादन हुआ

(96) निम्नलिखित में रीतिमुक्त कवि कौन हैं ?
(क) महाकवि देव
(ख) आलम
(ग) मतिराम
(घ) पद्माकर

(97) रीतिकाल की निम्नलिखित प्रमुख प्रवृत्तियों में से कौन-सी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है ?
(क) राज-प्रशस्ति
(ख) श्रृंगारिकता
(ग) रीति निरूपण
(घ) नीति

(98) निम्नलिखित कवियों में से रीतिकाल का कवि कौन नहीं है ?
(क) घनानन्द
(ख) मतिराम
(ग) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(घ) पद्माकर

(99) ‘कवितावर्धिनी’ साहित्यिक संस्था की स्थापना की थी [2016]
(क) जयशंकर प्रसाद ने
(ख) महावीरप्रसाद द्विवेदी ने।
(ग) महादेवी वर्मा ने
(घ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने।

(100) भारतेन्दु युग की रचना है [2010]
(क) प्रेम-माधुरी
(ख) कामायनी
(ग) निरुपमा
(घ) युगवाणी

(101) ‘हरिश्चन्द्र चन्द्रिका’ पत्रिका के सम्पादक थे–
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) मैथिलीशरण गुप्त
(ग) महादेवी वर्मा
(घ) सुमित्रानन्दन पन्त

(102) साहित्य सुधानिधि’ के सम्पादक हैं [2013]
(क) जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’
(ख) महावीर प्रसाद द्विवेदी
(ग) अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
(घ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

(103) ‘हरिऔध’ का जन्म-स्थान है [2013]
(क) एबटाबाद
(ख) निजामाबाद
(ग) काशी
(घ) फर्रुखाबाद

(104) मैथिलीशरण गुप्त आधुनिक काल के किस युग से सम्बन्धित हैं ?
(क) शुक्ल युग
(ख) द्विवेदी युग
(ग) छायावादी युग
(घ) छायावादोत्तर युग

(105) मैथिलीशरण गुप्त का प्रथम काव्य-संग्रह है [2012]
(क) अनद्य
(ख) भारत भारती
(ग) पंचवटी
(घ) सिद्धराज

(106) अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ किस युग के कवि हैं ?
(क) भारतेन्दु युग
(ख) प्रगतिवाद युग
(ग) द्विवेदी युग
(घ) छायावाद युग

(107) निम्नलिखित में से कौन-सा ग्रन्थ द्विवेदी युग से सम्बन्धित है ?
(क) कामायनी
(ख) पल्लव
(ग) साकेत
(घ) यामा

(108) निम्नलिखित में से द्विवेदी युग की रचना है [2018]
(क) कामायनी
(ख) तार-सप्तक
(ग) प्रिय-प्रवास
(घ) ग्राम्या

(109) द्विवेदी युग में लिखी गयी रचना है
(क) सान्ध्यगीत
(ख) गीतावली
(ग) पंचवटी
(घ) कवि प्रिया

(110) द्विवेदी युग का महाकाव्य नहीं है [2013]
(क) प्रियप्रवास
(ख) साकेत
(ग) कामायनी
(घ) द्वापर

(111) श्रृंगार के पूर्ण बहिष्कार से सौन्दर्य को स्रोत सूख गया था
(क) भारतेन्दु युग में
(ख) द्विवेदी युग में
(ग) छायावाद युग में
(घ) रीतिकाल में

(112) ‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल’—यह प्रसिद्ध पंक्ति किस काल की देन है ?
(क) छायावादोत्तर काल
(ख) भारतेन्दु काल
(ग) छायावादी काल
(घ) रीतिकाल

(113) हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल’ का सूत्रपात किस शासन-काल में हुआ ?
(क) स्व-शासन-काल
(ख) ब्रिटिश शासन-काल
(ग) मुगल शासन-काल
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं

(114) हिन्दी साहित्य में आधुनिकता का प्रवर्तक साहित्यकार किसे माना जाता है ?
(क) भूषण
(ख) भारतेदु हरिश्चन्द्र
(ग) मतिराम
(घ) गंग कवि

(115) हिन्दी जागरण के अग्रदूत थे-
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) सुमित्रानन्दन पन्त
(ग) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(घ) मुंशी प्रेमचन्द

(116) निम्नांकित में से कौन-सी रचना भारतेन्दु युग में लिखी गयी है ?
(क) प्रेममाधुरी
(ख) कामायनी
(ग) निरुपमा
(घ) युगवाणी

(117) निम्नलिखित में से उस ग्रन्थ का नाम लिखिए जो ‘हरिऔध’ जी का नहीं है
(क) चोखे चौपदे
(ख) वैदेही वनवास
(ग) चित्राधार
(घ) प्रियप्रवास

(118) निम्नलिखित में से कौन-सा कवि छायावादी नहीं है ? [2011]
(क) महादेवी वर्मा
(ख) जयशंकर प्रसाद
(ग) मैथिलीशरण गुप्त
(घ) सुमित्रानन्दन पन्त

(119) निम्नलिखित में से छायावादयुगीन कवि हैं [2011, 17]
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) जगन्नाथदास ‘रत्नाकर
(ग) रामधारीसिंह ‘दिनकर’
(घ) कबीरदास

(120) निम्नलिखित में से कौन-सा छायावादी कवि है?
(क) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला
(ख) भूषण
(ग) बिहारी
(घ) रामधारी सिंह ‘दिनकर’

(121) निम्नलिखित में से कौन-सा कथन छायावाद से सम्बन्धित है ?
(क) सौन्दर्य का स्रोत सूख गया था
(ख) ब्रजभाषा का एकछत्र साम्राज्य था।
(ग) सामाजिक समस्याओं का चित्रण हुआ
(घ) मानव की अन्तरात्मा के सौन्दर्य का उद्घाटन हुआ

(122) छायावाद युग का समय कब से कब तक माना जाता है?
(क) 1938-1943 ई०
(ख) 1868-1900 ई०
(ग) 1919-1938 ई०
(घ) 1900-1922 ई०

(123) ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि से विभूषित किया गया है [2010]
या
राष्ट्रकवि का सम्मान मिला है। [2018]
(क) रामकुमार वर्मा को
(ख) मैथिलीशरण गुप्त को
(ग) महादेवी वर्मा को
(घ) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’ को

(124) छायावादी कविता के ह्रास का सबसे बड़ा कारण था-
(क) भक्ति-भावना
(ख) विदेशी शासन के दमन-चक्र की पीड़ा
(ग) नारी को भोग्य सम्पत्ति का रूप देना
(घ) लक्षण ग्रन्थों की रचना

(125) छायावादी काव्य की विशेषता नहीं है-
(क) रहस्यवाद की प्रधानता
(ख) स्वदेश प्रेम की अभिव्यक्ति
(ग) मानवतावादी दृष्टिकोण
(घ) व्यक्तिवादी भावना एवं अतिशय भावुकता

(126) छायावाद की मुख्य विशेषता है– [2010, 11]
(क) प्रकृति-चित्रण
(ख) युद्धों का वर्णन
(ग) यथार्थ-चित्रण
(घ) भक्ति की प्रधानता

(127) ‘छायावाद’ की विशेषता है
(क) इतिवृत्तात्मकता
(ख) शृंगारिक भावना
(ग) सौन्दर्य एवं प्रेम
(घ) उपदेशात्मक वृत्ति

(128) छायावादी कवि हैं– [2010]
(क) सुमित्रानन्दन पन्त
(ख) नागार्जुन
(ग) सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
(घ) अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

(129) निम्नलिखित में से कौन-सा कवि छायावादी है ? [2009]
(क) अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
(ख) श्रीधर पाठक
(ग) महादेवी वर्मा
(घ) मैथिलीशरण गुप्त

(130) प्रकृति के सुकुमार कवि कहलाते हैं [2011]
(क) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’
(ख) सुमित्रानन्दन पन्त
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) महादेवी वर्मा

(131) छायावादी काव्य की वृहत्-त्रयी के रचनाकार नहीं हैं [2012]
(क) प्रसाद
(ख) पन्त
(ग) निराला
(घ) महादेवी

(132) ‘प्रसाद’ का काव्य प्रवृत्ति-निवृत्ति मिश्रित है [2013]
(क) ‘लहर’ में
(ख) “आँसू’ में
(ग) ‘झरना’ में
(घ) ‘कामायनी’ में

(133) कौन-सा नया अलंकार छायावाद की देन है ?
(क) अनुप्रास
(ख) उत्प्रेक्षा
(ग) सन्देह
(घ) मानवीकरण

(134) कौन-सा कवि छायावाद के चार प्रमुख स्तम्भों में से एक नहीं है ?
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला
(ग) जगन्नाथदास ‘रत्नाकर
(घ) महादेवी वर्मा

(135) आधुनिक युग की मीरा हैं [2013]
(क) महादेवी वर्मा
(ख) सुभद्राकुमारी चौहान
(ग) सुमित्रा कुमारी सिन्हा
(घ) इनमें से कोई नहीं

(136) इतिवृत्तात्मकता की प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप किस वाद का प्रादुर्भाव हुआ ?
(क) मानवतावाद
(ख) छायावाद
(ग) प्रगतिवाद
(घ) प्रयोगवाद

(137) ‘पन्त’ जी के उस काव्य-ग्रन्थ का नाम लिखिए जिसमें उनकी सांस्कृतिक एवं दार्शनिक विचारधारा व्यक्त हुई है-
(क) चिदम्बरा
(ख) उत्तरा
(ग) पल्लव
(घ) लोकायतन

(138) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कौन-सी पत्रिका प्रकाशित की थी ?
(क) कविवचन सुधा
(ख) सरस्वती
(ग) कल्पना
(घ) ज्ञानोदय

(139) निम्नलिखित में से कौन-सी रचना छायावाद युग में लिखी गयी है ?
(क) प्रेम-माधुरी
(ख) उद्धव शतक
(ग) चित्राधार
(घ) सूरसारावली

(140) ‘कामायनी’ और ‘झरना’ किस युग की रचनाएँ हैं ? [2011, 13]
(क) भारतेन्दु युग
(ख) द्विवेदी युग
(ग) छायावादी युग
(घ) प्रगतिवादी युग

(141) ‘कामायनी’ महाकाव्य में सर्गों की संख्या है [2013, 14]
(क) नौ
(ख) बारह
(ग) पन्द्रह
(घ) सत्रह

(142) निम्नलिखित में कौन-सा कथन छायावाद से सम्बन्धित है ?
(क) इस काव्य में लौकिक वर्णनों के माध्यम से अलौकिकता की व्यंजना की गयी है।
(ख) धार्मिक क्षेत्र में रूढ़िवाद और बाह्याडम्बर का विरोध किया गया है।
(ग) इस काव्य में मूलतः सौन्दर्य और प्रेम-भावना मुखरित हुई है।
(घ) इस काव्य में भाव-पक्ष की अपेक्षा कला-पक्ष की प्रधानता है।

(143) निम्नलिखित में से कौन-सा कथन आधुनिक काल से सम्बन्धित है ?
(क) हिन्दी काव्य कवियों के स्वच्छन्द और समर्थ व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति है।
(ख) विलास के साधनों से हीन वर्ग कर्म एवं आचार के स्थान में अन्धविश्वासी हो चला था
(ग) साहित्य मानव-समाज की भावनात्मक स्थिति और गतिशील चेतना की अभिव्यक्ति है।
(घ) उपर्युक्त सभी

(144) निम्नलिखित उद्धरणों में कौन-सा उद्धरण आधुनिक काल से सम्बन्धित है ?
(क) जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि सरहपा को हिन्दी का प्रथम कवि माना जाता है।
(ख) लौकिक (देशभाषा) साहित्य देशभाषा डिंगल में उपलब्ध होता है।
(ग) हिन्दी साहित्य में मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के दर्शन को प्रगतिवाद और फ्रायड के मनोविश्लेषण को प्रयोगवाद की संज्ञा दी गयी।
(घ) रहस्यवाद के दर्शन से इस धारा के अधिकांश कवियों का भक्त कवियों में अन्तर्भाव हो जाता है।

(145) “विदेशी सत्ता प्रतिष्ठित हो जाने के कारण देश की जनता में गौरव, गर्व और उत्साह का अवसर न रह गया था।” यह कथन निम्नलिखित लेखकों में से किस लेखक का है ?
(क) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
(ख) आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ग) डॉ० रामकुमार वर्मा
(घ) डॉ० नगेन्द्र

(146) ‘वह तोड़ती पत्थर’ नामक कविता किस प्रकार की है ?
(क) प्रयोगवादी
(ख) रीतिकालीन
(ग) द्विवेदीयुगीन
(घ) प्रगतिवादी

(147) प्रगतिवादी कवि नहीं है [2010]
(क) शिवमंगल सिंह सुमन
(ख) रामविलास शर्मा
(ग) नागार्जुन
(घ) भवानीप्रसाद मिश्र

(148) प्रगतिवादी कवि कौन है ?
(क) महादेवी वर्मा
(ख) पाल भसीन
(ग) नागार्जुन
(घ) प्रभाकर माचवे

(149) काव्य में हालावाद के प्रवर्तक हैं
(क) सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
(ख) सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’
(ग) धर्मवीर भारती
(घ) हरिवंश राय बच्चन’

(150) निम्नलिखित में प्रगतिवाद की कौन-सी समयावधि मान्य है ? [2009]
(क) 1900 ई० से 1918 ई०
(ख) 1918 ई० से 1936 ई०
(ग) 1936 ई० से 1943 ई०
(घ) 1943 ई० से 1953 ई०

(151) ‘काव्य जगत् में व्याप्त प्राचीन रूढ़ियों और मान्यताओं का स्पष्ट विरोध’ तथा काव्य के ‘मानवतावाद की प्रधानता’ किस काल की मुख्य विशेषता है ?
(क) द्विवेदी काल
(ख) प्रगतिवादी काल
(ग) छायावादी काल
(घ) प्रयोगवादी काल

(152) निम्नलिखित में छायावादोत्तर कवि कौन है ?
(क) हरिऔध
(ख) मैथिलीशरण गुप्त
(ग) महादेवी वर्मा
(घ) अज्ञेय

(153) ‘नयी कविता’ का शुभारम्भ हुआ [2012, 13]
(क) सन् 1954 में
(ख) सन् 1940 में
(ग) सन् 1950 में
(घ) सन् 1947 में

(154) नयी कविता की आधारभूत विशेषता है-
(क) आध्यात्मिक छाया-दर्शन
(ख) श्रृंगार की प्रधानता
(ग) किसी भी दर्शन से बँधी हुई नहीं है।
(घ) लाक्षणिकता

(155) किसी भी दर्शन के साथ बँधी हुई नहीं है-
(क) छायावादी कविता
(ख) नयी कविता
(ग) प्रगतिवादी कविता
(घ) रीतिकालीन कविता

(156) ‘कनुप्रियां’ किस युग से सम्बन्धित रचना है ?
(क) द्विवेदी युग
(ख) शुक्ल युग
(ग) छायावादी युग
(घ) छायावादोत्तर युग

(157) प्रयोगवादी काव्यधारा के जनक (प्रवर्तक) हैं [2011, 12]
(क) ‘अज्ञेय’
(ख) “दिनकर’
(ग) “मुक्तिबोध’
(घ) “धूमिल’

(158) निम्नलिखित में कौन प्रगतिवादी कवि नहीं है ?
(क) प्रभाकर माचवे
(ख) मुक्तिबोध
(ग) शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
(घ) अज्ञेय

(159) प्रयोगवाद काव्य के क्षेत्र में—
(क) चिरकाल तक रहा
(ख) शीघ्र ही समाप्ति की ओर चला गया
(ग) बहुत प्रसिद्ध हुआ
(घ) अधिक सफल नहीं हुआ।

(160) घोर वैयक्तिकता, अति यथार्थवाद, अति बौद्धिकता तथा सभी पुरानी मान्यताओं के विरुद्ध पूर्ण विद्रोह किस काव्यधारा की विशेषताएँ हैं ?
(क) छायावादी काव्यधारा
(ख) प्रगतिवादी काव्यधारा
(ग) प्रयोगवादी काव्यधारा
(घ) इनमें से कोई नहीं

(161) “प्रयोग सभी कालों के कवियों ने किया है। ::::किसी एक काल में किसी विशेष दिशा में प्रयोग करने की प्रवृत्ति स्वाभाविक ही है।” यह वक्तव्य निम्नलिखित रचनाकारों में किसका है ?
(क) निराला
(ख) अज्ञेय
(ग) प्रसाद
(घ) महादेवी वर्मा

(162) निम्नलिखित में से प्रयोगवादी कवि कौन है ?
(क) भूषण
(ख) सुमित्रानन्दन पन्त
(ग) बिहारी
(घ) अज्ञेय

(163) ‘अज्ञेय’ ने तार सप्तक’ का प्रकाशन किया [2009, 10, 11, 13, 14]
या
‘तारसप्तक’ का प्रकाशन वर्ष है– [2015, 16,17, 18]
(क) सन् 1947 में
(ख) सन् 1943 में
(ग) सन् 1950 में
(घ) सन् 1931 में

(164) तार सप्तक’ के सम्पादक हैं [2010, 13, 15, 17]
(क) विद्यानिवास मिश्र
(ख) मुक्तिबोध
(ग) अज्ञेय
(घ) हजारीप्रसाद द्विवेदी

(165) तार सप्तक से सम्बन्धित हैं [2009]
(क) रामविलास शर्मा
(ख) नरेन्द्र शर्म
(ग) भवानीप्रसाद मिश्र
(घ) धर्मवीर भारती

(166) ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की स्थापना कब हुई ? [2012, 18]
(क) सन् 1943 में
(ख) सन् 1954 में
(ग) सन् 1938 में
(घ) सन् 1936 में

(167) निम्नलिखित में कौन प्रेमाश्रयी शाखा का कवि नहीं है ?
(क) जायसी
(ख) बिहारीलाल
(ग) कुतुबन
(घ) मंझन

(168) निम्नलिखित में से कौन-सा कथन भक्तिकाल से सम्बन्धित है ?
(क) सामाजिक दृष्टि से यह काल घोर अध:पतन का काल था
(ख) सिद्धों की वाममार्गी योग साधना की प्रतिक्रिया से नायपंथियों की हठयोग साधना आरम्भ हुई
(ग) जीवन का समन्वयवादी एवं मर्यादावादी दृष्टिकोण ही तुलसी की सबसे बड़ी देन है।

(169) विनय-पत्रिका किस भाषा की कृति है ? [2010]
(क) अवधी
(ख) ब्रजभाषा
(ग) खड़ी बोली हिन्दी
(घ) भोजपुरी

(170) कृष्णकाव्य-धारा के प्रतिनिधि कवि हैं [2011]
(क) मीरा
(ख) रसखान
(ग) परमानन्ददास
(घ) सूरदास

(171) कृष्णकाव्य-धारा के कवि नहीं हैं
(क) नन्ददास
(ख) चतुर्भुजदास
(ग) सूरदास
(घ) लालदास

(172) निम्नलिखित में से कौन-सा कवि ‘कृष्णभक्ति धारा’ से सम्बन्धित नहीं है ? (2009)
(क) सूरदास
(ख) नाभादास
(ग) कृष्णदास
(घ) नन्ददास

(173) निम्नलिखित में से कौन-सी रचना वीरगाथात्मक नहीं है ? [2009]
(क) परमाल रासो
(ख) विद्यापति
(ग) पृथ्वीराज रासो
(घ) बीसलदेव रासो

(174) निम्नलिखित में से कौन-सा भक्तिकाल का काव्य है ?
(क) श्रीरामचरितमानस
(ख) साकेत
(ग) कामायनी
(घ) बीसलदेव रासो

(175) निम्नलिखित कवियों में बल्लभाचार्य के शिष्य कौन हैं ?
(क) रघुराज सिंह
(ख) बिहारीलाल
(ग) भूषण
(घ) कृष्णदास

(176) ‘भक्ति-आन्दोलन’ का श्रेय जाता है [2016]
(क) वल्लभाचार्य को
(ख) शंकराचार्य को
(ग) रामानुजाचार्य को
(घ) निम्बार्काचार्य को

(177) निम्नलिखित में से रीतिकाल का काव्य है [2009]
(क) पृथ्वीराज रासो
(ख) रामचन्द्रिका
(ग) कामायनी
(घ) विनय पत्रिका

(178) निम्नलिखित में कौन-सा कवि ‘रीतिमुक्त’ काव्यधारा का है ?
(क) चिन्तामणि
(ख) केशव
(ग) ठाकुर
(घ) देव

(179) मैथिलीशरण आधुनिक काल के किस युग से सम्बन्धित हैं ?
(क) शुक्लयुग
(ख) द्विवेदी युग
(ग) छायावाद युग
(घ) छायावादोत्तर युग

(180) निम्नलिखित में कौन-सी महादेवी वर्मा की रचना है ?
(क) धूप के धान
(ख) चाँद का मुँह टेढ़ा
(ग) सान्ध्य गीत
(घ) पल्लव

(181) शोषण का विरोध एवं शोषकों के प्रति घृणा किस काव्यधारा की प्रमुख विशेषताएँ मानी गयी हैं?
(क) छायावाद
(ख) प्रगतिवाद
(ग) प्रयोगवाद
(घ) नयी कविता

(182) नयी कविता के कवि हैं [2011]
(क) नरेन्द्र शर्मा
(ख) अज्ञेय
(ग) रामधारी सिंह ‘दिनकर’
(घ) सुमित्रानन्दन पन्त

(183) ज्ञानाश्रयी काव्यधारा के कवि नहीं हैं [2014]
(क) कबीरदास
(ख) मलूकदास
(ग) नन्ददास
(घ) रैदास

(184) अमीर खुसरो कवि हैं [2014]
(क) आदिकाल के
(ख) भक्तिकाल के
(ग) रीतिकाल के
(घ) आधुनिककाल के

(185) ‘रीतिकाल’ को ‘ श्रृंगारकाल’ नाम दिया है [2014]
या
रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के जिस काल को ‘रीतिकाल’ कहा है, उसे ‘ श्रृंगार काल’ नाम दिया है [2015, 18]
(क) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने
(ख) आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने
(ग) आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने।
(घ) आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने

(186) रीतिकालीन कवि हैं [2014]
(क) मीराबाई
(ख) रसखान
(ग) द्विजदेव
(घ) विद्यापति

(187) ”हिन्दी साहित्य के हजार वर्षों में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई लेखक उत्पन्न नहीं हुआ।” यह कथन है [2014]
(क) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का
(ख) आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी का
(ग) आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का
(घ) आचार्य श्यामसुन्दर दास का

(188) रामचन्द्र शुक्ल ने जिस काल को ‘वीरगाथाकाल’ कहा है, उसे आदिकाल कहा है-[2014]
(क) राहुल सांकृत्यायन ने
(ख) हजारीप्रसाद द्विवेदी ने
(ग) डॉ० रामकुमार वर्मा ने
(घ) डॉ० धीरेन्द्र वर्मा ने

(189) ‘दूसरा सप्तक’ के कवि हैं [2014]
(क) रामविलास शर्मा
(ख) गिरिजा कुमार माथुर
(ग) केदारनाथ सिंह
(घ) भवानीप्रसाद मिश्र

(190) खड़ी बोली’ का प्रथम महाकाव्य है [2014]
(क) वैदेही वनवास
(ख) प्रिय प्रवास
(ग) साकेत
(घ) कामायनी

(191) ‘रामभक्ति शाखा’ के कवि नहीं हैं [2014]
(क) तुलसीदास
(ख) अग्रदास
(ग) चतुर्भुजदास
(घ) नाभादास

(192) ‘भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार नहीं मिला है [2014]
(क) सुमित्रानन्दन पन्त को
(ख) मैथिलीशरण गुप्त को
(ग) रामधारी सिंह ‘दिनकर’ को
(घ) महादेवी वर्मा को

(193) ‘बसुआ गोविन्दपुर’ में जन्म हुआ था [2014]
(क) रत्नाकर का
(ख) सूरदास का
(ग) रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का
(घ) बिहारी का

(194) सूकर खेत’ स्थान सम्बन्धित है [2014]
(क) कबीरदास से
(ख) सूरदास से
(ग) तुलसीदास से।
(घ) केशवदास से

(195) ‘आदिकाल’ का नाम ‘अपभ्रंश काल दिया है [2014]
(क) मिश्रबन्धु ने
(ख) राहुल सांकृत्यायन ने
(ग) महावीरप्रसाद द्विवेदी ने
(घ) चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ ने।

(196) भवानीप्रसाद मिश्र कवि-रूप में संगृहीत हैं [2015]
(क) तारसप्तक में
(ख) दूसरा सप्तक में
(ग) तीसरा सप्तक में
(घ) चौथा सप्तक में

(197) हिन्दी साहित्य के ‘आदिकाल’ के लिए बीज-वपन काल’ नाम दिया है [2015, 16]
(क) रामचन्द्र शुक्ल ने
(ख) डॉ० रामकुमार वर्मा ने
(ग) आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने
(घ) डॉ० मोहन अवस्थी ने।

(198) चिन्तामणि कवि हैं [2016]
(क) रीतिसिद्ध वर्ग के
(ख) रीतियुक्त वर्ग के
(ग) रीतिरहित वर्ग के
(घ) रीतिबद्ध वर्ग के

(199) मैथिलीशरण गुप्त की रचना में राष्ट्रप्रेम की भावना परिलक्षित होती है– [2016]
(क) भारत-भारती में
(ख) जयद्रथ वध में
(ग) साकेत में
(घ) पंचवटी में

(200) ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ काव्य कृति है [2016]
(क) गजानन माधव मुक्तिबोध की
(ख) रामधारीसिंह ‘दिनकर’ की
(ग) गिरिजाकुमार माथुर की
(घ) धर्मवीर भारती की

(201) कला और बूढ़ा चाँद’ पर सुमित्रानन्दन पन्त को पुरस्कार प्राप्त हुआ [2016, 17]
(क) साहित्य अकादमी
(ख) ज्ञानपीठ
(ग) मंगलाप्रसाद
(घ) सोवियत लैण्ड नेहरू

(202) ‘अलंकार-रत्नाकर’ के लेखक हैं [2016]
(क) याकूब खाँ
(ख) जसवन्त सिंह
(ग) दलपति राय वंशीधर
(घ) भिखारीदास

(203) मध्वाचार्य का वाद हैं [2016]
(क) द्वैतवाद
(ख) अद्वैतवाद
(ग) द्वैताद्वैतवाद
(घ) शुद्धाद्वैतवाद

(204) ‘मुकरियाँ’ रचना है (2016)
(क) मधुकर कवि की
(ख) कुशल राय की
(ग) अमीर खुसरो की
(घ) भट्ट केदार की

(205) ‘प्रयोगवाद’ को ‘नई कविता’ की संज्ञा दी [2016]
(क) गिरिजाकुमार माथुर
(ख) केदारनाथ सिंह
(ग) अज्ञेय
(घ) धर्मवीर भारती

(206) आदिकाल को वीरगाथा काल का नामकरण किया [2016]
(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी ने।
(ख) डॉ० रामकुमार वर्मा ने
(ग) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने
(घ) मिश्रबन्धु ने

(207) प्रेम माधुरी के रचयिता हैं [2016]
(क) प्रतापनारायण मिश्र
(ख) बालकृष्ण भट्ट
(ग) लाला श्री निवासदास
(घ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

(208) मैथिलीशरण गुप्त की रचना है– [2016]
(क) प्रिय-प्रवास
(ख) साकेत
(ग) कामायनी
(घ) लोकापतन

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 3 रश्मिरथी

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 3 रश्मिरथी (रामधारी सिंह दिनकर) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 3 रश्मिरथी (रामधारी सिंह दिनकर).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name रश्मिरथी (रामधारी सिंह दिनकर)
Number of Questions 8
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 3 रश्मिरथी (रामधारी सिंह दिनकर)

प्रश्न 1:
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्यको कथावस्तु (कथानक) का संक्षेप में परिचय लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ के तृतीय सर्ग में कृष्ण और कर्ण के संवाद में दोनों के चरित्र की कौन-सी प्रमुख विशेषताएँ प्रकट हुई हैं ? स्पष्ट कीजिए।
या
‘रश्मिरथी के सप्तम सर्ग की कथावस्तु का संक्षेप में सोदाहरण वर्णन कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के तृतीय सर्ग की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ के पंचम सर्ग में वर्णित कुन्ती-कर्ण के संवाद का सारांश लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ के तृतीय सर्ग के आधार पर श्रीकृष्ण और कर्ण के संवाद को अपने शब्दों में व्यक्त कीजिए।
या
” रश्मिरथी’ के प्रत्येक सर्ग में संवादात्मक स्थल ही सबसे प्रमुख है।” इस कथन का सतर्क विश्लेषण कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण और अर्जुन के युद्ध का वर्णन कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के अन्तिम सर्ग की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा विरचित खण्डकाव्य ‘रश्मिरथी’ की कथा महाभारत से ली गयी है। इस काव्य में परमवीर एवं दानी कर्ण की कथा है। ‘रश्मिरथी के प्रत्येक सर्ग के संवादों में नाटकीयता के गुण विद्यमान हैं। यह नाटकीयता का गुण प्रारम्भ से अन्त तक नाटक के प्रत्येक सर्ग में विद्यमान है। इसमें सरलता, सुबोधता, सुग्राह्यता एवं स्वाभाविकता के साथ-साथ प्रभावशीलता का गुण भी विद्यमान है। कवि ने इस नाटक के संवादों में घटनाओं और परिस्थितियों को भावात्मक धरातल पर सँजोया है। इस खण्डकाव्य की कथावस्तु सात सर्गों में विभाजित है, जो संक्षेप में निम्नवत् है

प्रथम सर्ग : कर्ण का शौर्य-प्रदर्शन

प्रथम सर्ग के आरम्भ में कवि ने अग्नि के समान तेजस्वी एवं पवित्र पुरुषों की पृष्ठभूमि बनाकर कर्ण का परिचय दिया है। कर्ण की माता कुन्ती और पिता सूर्य थे। कर्ण कुन्ती के गर्भ से कौमार्यावस्था में उत्पन्न हुए थे, इसलिए कुन्ती ने लोकलाज के भय से उस नवजात शिशु को नदी में बहा दिया, जिसे एक निम्न जाति (सूत) के व्यक्ति ने पकड़ लिया और उसका पालन-पोषण किया। सूत के घर पलकर भी कर्ण शूरवीर, शीलवान्, पुरुषार्थी और शस्त्र व शास्त्र-मर्मज्ञ बने।

एक बार द्रोणाचार्य ने कौरव व पाण्डव राजकुमारों के शस्त्र-कौशल का सार्वजनिक प्रदर्शन किया। सभी लोग अर्जुन की बाण-विद्या पर मुग्ध हो गये, किन्तु तभी धनुष-बाण लिये कर्ण भी सभा में उपस्थित हो गया और उसने अर्जुन को द्वन्द्व युद्ध के लिए चुनौती दी

आँख खोलकर देख, कर्ण के हाथों का व्यापार।
फूले सस्ता सुयश प्राप्त कर, उस नर को धिक्कार ॥

कर्ण की इस चुनौती से सम्पूर्ण सभा आश्चर्यचकित रह गयी, तभी कृपाचार्य ने उसका नाम, जाति और गोत्र पूछे। इस पर कर्ण ने अपने को सूत-पुत्र बतलाया। फिर कृपाचार्य ने कहा कि राजपुत्र अर्जुन से समता प्राप्त करने के लिए तुम्हें पहले कहीं का राज्य प्राप्त करना चाहिए। इस पर दुर्योधन ने कर्ण की वीरता से मुग्ध होकर, उसे अंगदेश का राजा बना दिया और अपना मुकुट उतारकर कर्ण के सिर पर रख दिया। इस उपकार के बदले भावविह्वल कर्ण सदैव के लिए दुर्योधन का मित्र बन गया। इधर कौरव कर्ण को ससम्मान अपने साथ ले जाते हैं। और उधर कुन्ती भाग्य की दुःखद विडम्बना पर मन मसोसती लड़खड़ाती हुई अपने रथ के पास पहुँचती है।

द्वितीय सर्ग : आश्रमवास

द्वितीय सर्ग का आरम्भ परशुराम के आश्रम-वर्णन से होता है। पाण्डवों के विरोध के कारण द्रोणाचार्य ने जब कर्ण को अपना शिष्य नहीं बनाया तो कर्ण परशुराम के आश्रम में धनुर्विद्या सीखने के लिए जाता है। परशुराम क्षत्रियों को शिक्षा नहीं देते थे। कर्ण के कवच और कुण्डल देखकर परशुराम ने उसे ब्राह्मण कुमार समझा और अपना शिष्य बना लिया।

एक दिन परशुराम कर्ण की जंघा पर सिर रखकर सो रहे थे कि तभी एक विषैला कोट कर्ण की जंघा को काटने लगा। गुरु की निद्रा न खुल जाए, इस कारण कर्ण अपने स्थान से हिला तक नहीं। जंघा से बहते रक्त की धारा के स्पर्श से परशुराम की निद्रा टूट गयी। कर्ण की इस अद्भुत सहनशक्ति को देखकर परशुराम ने कहा कि ब्राह्मण में इतनी सहनशक्ति नहीं होती, इसलिए तू अवश्य ही क्षत्रिय या अन्य जाति का है। कर्ण स्वीकार कर लेता है कि मैं सूत-पुत्र हूँ। क्रुद्ध परशुराम ने उसे तुरन्त अपने आश्रम से चले जाने को कहा और शाप दिया कि मैंने तुझे जो ब्रह्मास्त्र विद्या सिखलायी है, तू अन्त समय में उसे भूल जाएगा

सिखलाया ब्रह्मास्त्र तुझे जो, काम नहीं वह आएगा।
है यह मेरा शाप समय पर, उसे भूल तू जाएगा।

कर्ण गुरु की चरणधूलि लेकर आँसू-भरे नेत्रों से आश्रम छोड़कर चल देता है।

तृतीय सर्ग : कृष्ण सन्देश

कौरवों से जुए में हारने के कारण पाण्डवों को बारह वर्ष का वनवास तथा एक साल का अज्ञातवास भोगना पड़ा। तेरह वर्ष की यह अवधि व्यतीत कर पाण्डव अपने नगर इन्द्रप्रस्थ लौट आते हैं। पाण्डवों की ओर से श्रीकृष्ण कौरवों से सन्धि का प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर जाते हैं। श्रीकृष्ण ने कौरवों को बहुत समझाया, परन्तु दुर्योधन ने सन्धि-प्रस्ताव ठुकरा दिया तथा उल्टे श्रीकृष्ण को ही बन्दी बनाने का असफल प्रयास किया।

दुर्योधन के न मानने पर श्रीकृष्ण ने कर्ण को समझाया कि अब तो युद्ध निश्चित है, परन्तु उसे टालने का एकमात्र यही उपाय है कि तुम दुर्योधन का साथ छोड़ दो; क्योंकि तुम कुन्ती-पुत्र हो। अब तुम ही इस भारी विनाश को रोक सकते हो। इस पर कर्ण आहत होकर व्यंग्यपूर्वक पूछता है कि आप आज मुझे कुन्तीपुत्र बताते हो। उस दिन क्यों नहीं कहा था, जब मैं जाति-गोत्रहीन सूत-पुत्र बना भरी सभा में अपमानित हुआ था। मुझे स्नेह और सम्मान तो दुर्योधन ने ही दिया था। मेरा तो रोम-रोम दुर्योधन का ऋणी है।

फिर भी आप मेरे जन्म का रहस्य युधिष्ठिर को न बताना; क्योंकि मेरे जन्म का रहस्य जानने पर वे ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण अपना राज्य मुझे दे देंगे और मैं वह राज्य दुर्योधन को दे डालूंगा

धरती की तो है क्या बिसात ?
आ जाये अगर बैकुण्ठ हाथ।
उसको भी न्यौछावर कर दें,
कुरुपति के चरणों पर धर हूँ॥

इतना कहकर और श्रीकृष्ण को प्रणाम कर कर्ण चला जाता है।

इस सर्ग की कथा से जहाँ हमें श्रीकृष्ण के महान् कूटनीतिज्ञ और अलौकिक शक्तिसम्पन्न होने की विशिष्टता दृष्टिगोचर होती है वहीं कर्ण के अन्दर हमें सच्चे मित्र और मित्र के प्रति कृतज्ञ होने के गुण दिखाई पड़ते हैं।

चतुर्थ सर्ग : कर्ण के महादान की कथा

इस सर्ग में कर्ण की उदारता एवं दानवीरता का वर्णन किया गया है। कर्ण प्रतिदिन एक प्रहर तक याचकों को दान देता था। श्रीकृष्ण यह बात जानते थे कि जब तक कर्ण के पास सूर्य द्वारा प्रदत्त कवच और कुण्डल हैं, तब तक कर्ण को कोई भी पराजित नहीं कर सकता। इन्द्र ब्राह्मण का वेश धारण करके कर्ण के पास उसकी दानशीलता की परीक्षा लेने आये और कर्ण से उसके कवच और कुण्डल दान में माँग लिये। यद्यपि कर्ण ने छद्मवेशी इन्द्र को पहचान लिया, तथापि उसने इन्द्र को कवच और कुण्डल भी दान दे दिये। कर्ण की इस अद्भुत दानशीलता को देख देवराज इन्द्र का मुख ग्लानि से मलिन पड़ गया

अपना कृत्य विचार, कर्ण का करतब देख निराला ।
देवराज का मुखमण्डल पड़ गया ग्लानि से काला॥

इन्द्र ने कर्ण की बहुत प्रशंसा की। उन्होंने कर्ण को महादानी, पवित्र एवं सुधी कहा तथा स्वयं को प्रवंचक, कुटिल वे पापी बताया और कर्ण को एक बार प्रयोग में आने वाला अमोघ एकघ्नी अस्त्र प्रदान किया।

पंचम सर्ग : माता की विनती

इस सर्ग का आरम्भ कुन्ती की चिन्ता से होता है। कुन्ती इस कारण चिन्तित है कि रण में मेरे पुत्र कर्ण और अर्जुन परस्पर युद्ध करेंगे। कुन्ती व्याकुल हो कर्ण से मिलने जाती है। उस समय कर्ण सन्ध्या कर रहा था, आहट पाकर कर्ण का ध्यान टूट जाता है। उसने कुन्ती को प्रणामकर उसका परिचय पूछा। कुन्ती ने बताया कि तू सूत-पुत्र नहीं मेरा पुत्र है। तेरा जन्म मेरी कोख से तब हुआ था, जब मैं अविवाहिता थी। मैंने लोकलज्जा के भय से तुझे मंजूषा (पेटी) में रखकर नदी में बहा दिया था, परन्तु अब मैं यह सहन नहीं कर सकती कि मेरे ही पुत्र एक-दूसरे से युद्ध करें; अतः मैं तुझसे प्रार्थना करने आयी हूँ कि तुम अपने छोटे भ्राताओं के साथ मिलकर राज्य का भोग करो। कर्ण ने कहा कि मुझे अपने जन्म के विषय में सब कुछ ज्ञात है, परन्तु मैं अपने मित्र दुर्योधन का साथ कभी नहीं छोड़ सकता। असहाय कुन्ती ने कहा कि तू सबको दान देता है, क्या अपनी माँ को भीख नहीं दे सकता ?

कर्ण ने कहा कि माँ! मैं तुम्हें एक नहीं चार पुत्र दान में देता हूँ। मैं अर्जुन को छोड़कर तुम्हारे किसी पुत्र को नहीं मारूंगा। यदि अर्जुन के हाथों मैं मारा गया तो तुम पाँच पुत्रों की माँ रहोगी ही, परन्तु यदि मैंने युद्ध में अर्जुन को मार दिया तो विजय दुर्योधन की होगी और मैं दुर्योधन का साथ छोड़कर तुम्हारे पास आ जाऊँगा। तब भी तुम पाँच पुत्रों की ही माँ रहोगी। कुन्ती निराश मन लौट आती है

हो रहा मौन राधेय चरण को छूकर, दो बिन्दु अश्रु के गिरे दृगों से चूकर।
बेटे का मस्तक सँघ बड़े ही दुःख से, कुन्ती लौटी कुछ कहे बिना ही मुख से ।

षष्ठ सर्ग : शक्ति-परीक्षण

युद्ध में आहत भीष्म शरशय्या पर पड़े हुए हैं। कर्ण उनसे युद्ध हेतु आशीर्वाद लेने जाता है। भीष्म पितामह उसे नर-संहार रोकने के लिए समझाते हैं, परन्तु कर्ण नहीं मानता और भीषण युद्ध आरम्भ हो जाता है। कर्ण अर्जुन को युद्ध के लिए ललकारता है, किन्तु श्रीकृष्ण अर्जुन का रथ कर्ण के सामने ही नहीं आने देते; क्योंकि उन्हें भय है कि कर्ण एकघ्नी का प्रयोग करके अर्जुन को मार देगा। अर्जुन को बचाने के लिए श्रीकृष्ण ने भीम-पुत्र घटोत्कच को युद्धभूमि में उतार दिया। घटोत्कच ने घमासान युद्ध किया, जिससे कौरव-सेना त्राहि-त्राहि कर । उठी। अन्ततः दुर्योधन ने कर्ण से कहा

हे वीर ! विलपते हुए सैन्य का अचिर किसी विधि त्राण करो,
जब नहीं अन्य गति, आँख मूंद एकघ्नी का सन्धान करो।
अरि का मस्तक है दूर, अभी अपनों के सीस बचाओ तो,
जो मरण-पाश है पड़ा, प्रथम, उसमें से हमें छुड़ाओ तो ॥

कर्ण ने भारी नरसंहार करते हुए घटोत्कच पर एकघ्नी का प्रयोग कर दिया, जिससे घटोत्कच मारा गया। घटोत्कच पर एकघ्नी का प्रयोग हो जाने से अर्जुन अभय हो गया। आज युद्ध में विजयी होने पर भी कर्ण एकघ्नी का प्रयोग हो जाने से स्वयं को मन-ही-मन पराजित-सा मान रहा था।

सप्तम सर्ग : कर्ण के बलिदान की कथा

‘रश्मिरथी’ का यह अन्तिम सर्ग है। कौरव सेनापति कर्ण ने पाण्डवों की सेना पर भीषण आक्रमण किया। कर्ण की गर्जना से पाण्डव सेना में भगदड़ मच जाती है। युधिष्ठिर युद्धभूमि से भागने लगते हैं तो कर्ण उन्हें पकड़ लेता है, किन्तु कुन्ती को दिये वचन का स्मरण कर युधिष्ठिर को छोड़ देता है। इसी प्रकार भीम, नकुल और सहदेव को भी पकड़-पकड़कर छोड़ देता है। कर्ण का सारथी शल्य उसके रथ को अर्जुन के रथ के निकट ले आता है। कर्ण के भीषण बाण-प्रहार से अर्जुन मूर्च्छित हो जाता है। चेतना लौटने पर श्रीकृष्ण अर्जुन को पुनः कर्ण से युद्ध करने के लिए उत्तेजित करते हैं। दोनों ओर से घमासान युद्ध होता है। तभी कर्ण के रथ का पहिया रक्त के कीचड़ में फँस जाता है। कर्ण रथ से उतरकर पहिया निकालने लगता है। इसी समय श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्ण पर बाण-प्रहार करने के लिए कहते हैं

खड़ा है देखता क्या मौन भोले!
शरासन तान, बस अवसर यही है,
घड़ी फिर और मिलने की नहीं है।
विशिख कोई गले के पार कर दे,
अभी ही शत्रु का संहार कर दे।

कर्ण धर्म की दुहाई देता है तो श्रीकृष्ण उसे कौरवों के पूर्व कुकर्मों का स्मरण दिलाते हैं। इसी वार्तालाप में अवसर देखकर अर्जुन कर्ण पर प्रहार कर देता है और कर्ण की मृत्यु हो जाती है। अन्त में युधिष्ठिर आदि सभी कर्ण की मृत्यु पर प्रसन्न हैं, किन्तु श्रीकृष्ण दु:खी हैं। वे युधिष्ठिर से कहते हैं कि क्जिय तो अवश्य मिली, पर मिली मर्यादा खोकर। वास्तव में चरित्र की दृष्टि से तो कर्ण ही विजयी रहा। आप लोग कर्ण को भीष्म और द्रोणाचार्य की भाँति ही सम्मान दीजिए। यहाँ पर इस खण्डकाव्य की कथा समाप्त हो जाती है।

[ विशेष – मुझे इस सर्ग की कथा सर्वाधिक रुचिकर प्रतीत हुई। इस सर्ग में वर्णित कर्ण के शौर्य व साहस की तुलना इतिहास में विरल है। व्यक्ति अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए किस प्रकार पतित हो जाता है, भले ही वह ‘धर्मराज’ कहलाता हो अथवा ‘भगवान्। यह यहाँ इतनी कलात्मकता से दर्शाया गया है कि मन नि:स्पन्द हो जाती है। अन्त में कर्ण की मृत्यु को जीवन’ और ‘विजय’ से कहीं ऊँचा सिद्ध करते हुए कृष्ण कहते हैं

दया कर शत्रु को भी त्राण देकर, खुशी से मित्रता करे प्राण देकर,
गया है कर्ण भू को दीन करके, मनुज-कुल को बहुत बलहीन करके।
    Χ                              Χ                    Χ
समझकर द्रोण मन में भक्ति भरिए, पितामह की तरह सम्मान कारिए
मनुजता का नया नेता उठा है, जगत् से ज्योति का जेता उठा है।

वस्तुतः कर्ण जैसा व्यक्ति और व्यक्तित्व स्रष्टा ने अभी तक कोई अन्य बनाया ही नहीं। वह अपनी तुलना आप है।]

प्रश्न 2:
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की कथावस्तु की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के कथा-संगठन की समीक्षा कीजिए।
या
” ‘रश्मिरथी’ में कवि द्वारा आधुनिक युग की सामाजिक विसंगतियों; जातिवाद और वर्णाश्रम; पर करारा प्रहार किया गया है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के कथा संयोजन पर प्रकाश डालिए।
या
‘रश्मिरथी’ एक उदात्त और आदर्श भावनाओं का काव्य है। इस कथन की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
या
” ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में दिनकर ने महाभारतकालीन संगतियों तथा विसंगतियों का सच्चा लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है।” स्पष्ट कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के कथानक में ऐतिहासिकता और धार्मिकता दोनों हैं। तर्कसहित उत्तर दीजिए।
या
किन विशेषताओं के आधार पर ‘रश्मिरथी’ को उच्चकोटि का काव्य माना जाता है?
उत्तर:
कविवर रामधारी सिंह दिनकर ने ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में परमवीर कर्ण के जीवन से सम्बद्ध कुछ प्रसंगों को लेकर कथा का संगठन किया है। रश्मिरथी’ की कथावस्तु की कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) प्रभावशाली कथावस्तु – रश्मिरथी’ का आरम्भ शस्त्र-विद्या के प्रदर्शन से होता है। इस प्रदर्शन में कर्ण का जाति व गोत्र के नाम पर अपमान किया जाता है। इस प्रकार कथा का आरम्भ बड़ा ही प्रभावशाली है। इसके बाद परशुराम भी जाति के आधार पर कर्ण को शाप देकर अपने आश्रम से निकाल देते हैं। श्रीकृष्ण और कुन्ती कर्ण को अपनी ओर करना चाहते हैं। यहाँ आकर कथा की चरम सीमा आ जाती है। इसके बाद कर्ण युद्ध में युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव को पकड़ कर छोड़ देता है और घटोत्कच पर एकघ्नी का प्रयोग करता है। यहाँ कथा का उतार है। इसके बाद कर्ण के रथ का पहिया धंस जाता है और अर्जुन निहत्थे कर्ण पर बाण-वर्षा करके मार डालता है। अन्त में श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर के वार्तालाप के साथ रश्मिरथी’ का अन्त हो जाता है। इस प्रकार रश्मिरथी’ में कवि ने सभी घटनाओं को बड़े कौशल के साथ प्रभावशाली ढंग से एक सूत्र में पिरोया है। वास्तव में इस काव्य की कथावस्तु पाठक के हृदय और मस्तिष्क पर अमिट प्रभाव छोड़ती है।

(2) ऐतिहासिकता – ‘रश्मिरथी की कथा महाभारत से ली गयी है। महाभारत में भी यह कथा इसी प्रकार है। दिनकर जी ने अपने रचना-कौशल से कथा को अत्यन्त मार्मिक व हृदयस्पर्शी बना दिया है। इस प्रकार ‘रश्मिरथी की सम्पूर्ण कथा ऐतिहासिक है।

(3) प्रेरणाप्रद (उद्देश्य) – ‘रश्मिरथी की एक मुख्य विशेषता यह है कि इसमें कवि ने भारतवर्ष में व्याप्त जाति-पाँतिगत भेदभाव, कौमार्यावस्था में सन्तानोत्पत्ति, राजलिप्सा हेतु परस्पर युद्ध आदि देशगत अन्य समस्याओं का संकेत किया है। कवि आधुनिक भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत ऊँच-नीच के भेदभावों को मिटाकर मानवीय गुणों की प्रतिष्ठा का मार्ग प्रशस्त करता है

धंस जाए वह देश अतल में, गुण की नहीं जहाँ पहचान।
जाति गोत्र के बल से ही, आदर पाते हैं जहाँ सुजान ॥

इसके अतिरिक्त कवि ने युद्ध की समस्या, कुँवारी माताओं के शील की समस्या के माध्यम से आधुनिक भारतीय समाज के ज्वलन्त प्रश्नों, उनके दुष्परिणामों को नयी व्याख्या दी है। इसके साथ ही इस खण्डकाव्य में अदम्य वीरता, असाधारण दानशीलता, सत्यनिष्ठा, अटल मित्रता, कृतज्ञता, सर्वस्व दान, उदारता, सहृदयता आदि महान् गुणों की प्रतिष्ठा हुई है। इससे पाठक महान् बनने की प्रेरणा प्राप्त करता है।

(4) मार्मिकता – कवि ने इस काव्य में अनेक मार्मिक प्रसंगों का चित्रण किया है; जैसे–कर्ण का शौर्य-प्रदर्शन और अपमान, मन मसोसती हुई कुन्ती का रथ की ओर गमन, परशुराम के आश्रम से कर्ण का निष्कासन; कुन्ती का कर्ण से वार्तालाप आदि। ये स्थल इतने अधिक मार्मिक हैं कि पाठक या श्रोता अपने आपको भी भूल जाता है।

इस प्रकार ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की कथावस्तु उत्कृष्ट कोटि की है। ‘दिनकर’ का पूरा प्रकाश कथावस्तु को आलोकित रखता है।

प्रश्न 3:
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कर्ण के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के प्रमुख पुरुष पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ में कवि का मुख्य मन्तव्य कर्ण के चरित्र के शीलपक्ष, मैत्रीभाव तथा शौर्य का चित्रण है। सिद्ध कीजिए।
या
” ‘रश्मिरथी’ काव्य में कर्ण के चरित्र-चित्रण में धर्मनिष्ठा और अडिग निष्ठा दिखाई पड़ती है।” स्पष्ट कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ में वर्णित वीर कर्ण के गुणों (दानवीरता) पर प्रकाश डालिए।
या
‘रश्मिरथी के आधार पर कर्ण के मानसिक अन्तर्द्वन्द्व की समीक्षा कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में आधार पर नायक की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
कर्ण के चरित्र में ऐसे कौन-से गुण हैं, जो उसे महामानव की कोटि तक उठा देते हैं ?
या
रश्मिरथी कर्ण धनुर्धर होने के साथ ही महान धर्मनिष्ठ भी था। इस दृष्टि से कर्ण के चरित्र पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
‘रश्मिरथी कर्ण के चरित्र पर आधारित खण्डकाव्य है। कर्ण का चरित्र शील की प्रतिमूर्ति, शौर्य व पौरुष का अगाध सिन्धु, शक्ति का स्रोत, सत्य-साधना-दाने-त्याग का तपोवन तथा आर्य-संस्कृति का आलोकमय तेज है। कर्ण के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) नायक – कर्ण ‘रश्मिरथी’ का नायक है। काव्य की सम्पूर्ण कथा कर्ण के ही चारों ओर घूमती है। काव्य का नामकरण भी कर्ण को ही नायक सिद्ध करता है। रश्मिरथी’ का अर्थ है-वह मनुष्य, जिसका रथ रश्मि अर्थात् पुण्य का हो। इस काव्य में कर्ण का चरित्र ही पुण्यतम है। कर्ण के आगे अन्य किसी पात्र को चरित्र नहीं ठहर-पाता। कर्ण के सम्बन्ध में कवि के ये शब्द द्रष्टव्य हैं

तन से समरशूर, मन से भावुक, स्वभाव से दानी।
जाति गोत्र का नहीं, शील का पौरुष का अभिमानी ॥

(2) साहसी और वीर योद्धा – इस खण्डकाव्य के आरम्भ में ही कर्ण हमें एक वीर योद्धा के रूप में दिखाई देता है। शस्त्र-विद्या-प्रदर्शन के समय वह प्रदर्शन-स्थल पर उपस्थित होकर अर्जुन को ललकारता है तो सब स्तब्ध रह जाते हैं। जब इस पर कृपाचार्य कर्ण से उसकी जाति-गोत्र आदि पूछते हैं तो कर्ण उन्हें सटीक उत्तर देता है

पूछो मेरी जाति, शक्ति हो तो मेरे भुज बल से।
रवि-समान दीपित ललाट से, और कवच कुण्डल से ।।

(3) सच्चा मित्र – दुर्योधन ने जाति-अपमान से कर्ण की रक्षा उसे राजा बनाकर की, तभी से कर्ण दुर्योधन का अभिन्न मित्र बन गया। कृष्ण और कुन्ती के समझाने पर भी कर्ण दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ता। वह स्पष्ट शब्दों में कह देता है

धरती की तो है क्या बिसात ? आ जाये अगर बैकुण्ठ हाथ,
उसको भी न्यौछावर कर दें, कुरुपति के चरणों पर धर हूँ ॥

और अन्त समय तक कर्ण अपनी मित्रता के प्रति पूर्ण समर्पित रहता है।

(4) सच्चा गुरुभक्त – कर्ण गुरु के प्रति परम विनयी एवं श्रद्धालु है। कीट कर्ण की जाँघ काटकर भीतर घुस जाता है, रक्त की धारा बहने लगती है, पर कर्ण पैर नहीं हिलाता; क्योंकि हिलने से उसकी जाँघ पर सिर रखकर सोये गुरु की नींद खुल जाएगी। आँखें खुलने पर गुरु को वह अपनी जाति-गोत्र बता देता है तो वे क्रोधित होकर उसे आश्रम से निकाल देते हैं, परन्तु कर्ण अपनी विनय नहीं छोड़ता और जाते समय गुरु की चरणधूलि लेता है–

परशुधर के चरण की धूलि लेकर, उन्हें, अपने हृदय की भक्ति देकर,
निराशा से विकल, टूटा हुआ-सा, किसी गिरि-शृंग से छूटा हुआ-सा,

(5) परम दानवीर – कर्ण के चरित्र की एक प्रमुख विशेषता यह है कि वह धन-सम्पत्ति की लिप्सा से मुक्त है। इसलिए प्रतिदिन प्रात:काल सन्ध्या-वन्दन करने के बाद वह याचकों को दान देता है। ब्राह्मण-वेश में आये इन्द्र को वह अपने जीवन-रक्षक कवच और कुण्डल तक दान में दे देता है। अपनी माता कुन्ती को युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव को न मारने का अभयदान देता है। कर्ण की दोनशीलता के सम्बन्ध में कवि कहता है

रवि-पूजन के समय सामने, जो भी याचक आता था।
मुँह माँगा वह दान कर्ण से, अनायास ही पाता था।

(6) महान् सेनानी – कौरवों की ओर से कर्ण महाभारत के युद्ध में सेनापति है। वह शरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह से युद्ध हेतु आशीर्वाद लेने जाता है। भीष्म उसके विषय में कहते हैं

अर्जुन को मिले कृष्ण जैसे । तुम मिले कौरवों को वैसे ॥

युद्ध में कर्ण ने अपने रण-कौशल से पाण्डवों की सेना में हाहाकार मचा दिया। उसकी वीरता की प्रशंसा करते . हुए श्रीकृष्ण कहते हैं

दाहक प्रचण्ड इसका बल है। यह मनुज नहीं कालानल है॥

(7) जाति-प्रथाका विरोधी – कर्ण को जाति और गोत्र के कारण ही भरी सभा में अपमानित होना पड़ा था। इसी कारण उसके मन में जाति और गोत्र के प्रति गहरा विषाद था। इस सम्बन्ध में कर्ण की तिलमिलाहट बड़ी मार्मिक हैं

ऊपर सिर पर कनक छत्र, भीतर काले के काले।
शरमाते हैं नहीं जगत् में, जाति पूछने वाले ॥

(8) कृतज्ञ – कर्ण के चरित्र में कृतज्ञता का बड़ा गुण विद्यमान है। जब उसे यह पता लग जाता है कि उसकी माता राजरानी कुन्ती है तो भी वह निम्न जाति राधा के उपकौर को नहीं भुलाता; जिसने उसका पालन-पोषण किया था। दुर्योधन ने उसे अंगदेश को राज्य देकर राजपुत्रों के साथ युद्ध का अधिकारी बनाया था, उसके उपकार को भी वह जीवनभर नहीं भुला पाता।

(9) मानसिक अन्तर्द्वन्द्व से ग्रस्त – आरम्भ से अन्त तक कर्ण को मानसिक अन्तर्द्वन्द्व से जूझना पड़ता है। जीवन के प्रत्येक पग पर उसके सामने एक ही प्रश्न खड़ा होता है कि वह अब क्या करे ? शस्त्र-कौशल के समय उसका नाम, जाति तथा गोत्र पूछने पर, द्रोण द्वारा अपना शिष्य न बनाये जाने पर, परशुराम की सेवा करते समय अपनी सहनशक्ति के प्रदर्शन पर, गुरु परशुराम द्वारा शाप देने पर वह दुविधाग्रस्त हो जाता है। श्रीकृष्ण द्वारा उसको उसके जन्म का रहस्य समझाने पर और पाण्डवों के पक्ष में कौरवों का साथ छोड़ देने के लिए कहने पर, माता कुन्ती द्वारा जन्म का रहस्य समझाने तथा कौरवों का साथ छोड़ अपने भाइयों से मिल जाने के लिए कहने आदि अनेक अवसरों पर कर्ण भयंकर अन्तर्द्वन्द्व से ग्रस्त हो जाता है; किन्तु वह प्रत्येक अवसर पर विवेक और धैर्य से अपने अन्तर्द्वन्द्व पर विजय प्राप्त कर; अन्ततः सही निर्णय लेकर अपना मार्ग प्रशस्त करता है।

(10) अन्य विशेषताएँ – कर्ण महाभारत के युद्ध में मारा जाता है, किन्तु उसकी मृत्यु के पश्चात् श्रीकृष्ण उसकी चारित्रिक विशेषताओं का गुणगान करते हुए युधिष्ठिर से कहते हैं

हृदय का निष्कपट, पावन क्रिया का, दलित हारक, समुद्धारक क्रिया का।
बड़ा बेजोड़ दानी था, सदय था, युधिष्ठिर कर्ण का अदभुत हृदय था।
X                               X                              X
समझकर द्रोण मन में भक्ति भरिए, पितामह की तरह सम्मान करिए।
मनुजता का नया नेता उठा है, जगत् से ज्योति का जेता उठा है ॥

इस प्रकार हम पाते हैं कि कवि का मुख्य मन्तव्य कर्ण के चरित्र के शीलपक्ष, मैत्रीभाव एवं शौर्य का चित्रण करना रहा है, जिसके लिए उसने कर्ण को राज्य और विजय की गलत महत्त्वाकांक्षाओं से पीड़ित न दिखाकर षड्यन्त्रों, परीक्षाओं और प्रलोभनों की स्थितियों में उसे अडिग चित्रित किया है। यही स्थिति उसको खण्डकाव्य का महान् नायक बना देती है।

प्रश्न 4:
रश्मिरथी’ के आधार पर श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कृष्ण के विराट व्यक्तित्व को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण के चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ दिखाई देती हैं-

(1) युद्ध-विरोधी – पाण्डवों के वनवास से लौटने के बाद श्रीकृष्ण कौरवों को समझाने के लिए स्वयं हस्तिनापुर जाते हैं और युद्ध टालने का भरसक प्रयास करते हैं, किन्तु हठी दुर्योधन नहीं मानता। इसके बाद वे कर्ण को भी समझाते हैं, परन्तु कर्ण भी अपने प्रण से नहीं हटता। अन्त में श्रीकृष्ण कहते हैं

यश मुकुट मान सिंहासन ले ले, बस एक भीख मुझको दे दे।
कौरव को तज रण रोक सखे, भू का हर भावी शोक सखे ॥

(2) निर्भीक एवं स्पष्टवादी – श्रीकृष्ण केवल अनुनय-विनय ही करना नहीं जानते, वरन् वे निर्भीक एवं स्पष्ट वक्ता भी हैं। जब दुर्योधन समझाने से नहीं मानता तो वे उसे चेतावनी देते हुए कहते हैं

तो ले मैं भी अब जाता हूँ, अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं अब रण होगा, जीवन-जय या कि मरण होगा।

(3) शीलवान व व्यावहारिक – श्रीकृष्ण के सभी कार्य उनके शील के परिचायक हैं। वास्तव में वे एक सदाचारपूर्ण समाज की स्थापना करना चाहते हैं। वे शील को ही जीवन का सार मानते हैं

नहीं पुरुषार्थ केवल जाति में है, विभा का सार शील पुनीत में है।

साथ ही वह सांसारिक सिद्धि और सफलता के सभी सूत्रों से भी अवगत हैं।

(4) गुणों के प्रशंसक – श्रीकृष्ण अपने विरोधी के गुणों का भी आदर करते हैं। कर्ण उनके विरुद्ध लड़ता है, परन्तु श्रीकृष्ण कर्ण का गुणगान करते नहीं थकते

……….. वीर शत बार धन्य, तुझ-सा न मित्र कोई अनन्य।

(5) महान् कूटनीतिज्ञ – श्रीकृष्ण महान् कूटनीतिज्ञ हैं। पाण्डवों की विजय श्रीकृष्ण की कूटनीति के कारण ही हुई। वे पाण्डवों की ओर से कूटनीतिज्ञ का कार्य कर दुर्योधन की बड़ी शक्ति कर्ण को उससे अलग करने का प्रयत्न करते हैं। उनकी कूटनीतिज्ञता का प्रमाण कर्ण से कहा गया उनका यह कथन है

कुन्ती का तू ही तनय श्रेष्ठ, बलशील में परम श्रेष्ठ।
मस्तक पर मुकुट धरेंगे हम, तेरा अभिषेक करेंगे हम ॥

(6) अलौकिक शक्तिसम्पन्न – कवि ने श्रीकृष्ण के चरित्र में जहाँ मानव-स्वभाव के अनुरूप अनेक साधारण विशेषताओं का समावेश किया है, वहीं उन्हें अलौकिक शक्ति-सम्पन्न रूप देकर लीलापुरुष भी सिद्ध किया है। जब दुर्योधन उन्हें कैद करना चाहता है, तब वे अपने विराट् स्वरूप में प्रकट हो जाते हैं-

हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप विस्तार किया।
डगमग डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले
‘जंजीर बढ़ाकर साध मुझे, हाँ हाँ दुर्योधन बाँध मुझे।”

इस प्रकार इस खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण को श्रेष्ठ कूटनीतिज्ञ, किन्तु महान् लोकोपकारक के रूप में चित्रित करके कवि ने उनके पौराणिक चरित्र को युगानुरूप बनाकर प्रस्तुत किया है। कवि के इस प्रस्तुतीकरण की विशेषता यह है कि इससे कहीं भी उनके पौराणिक स्वरूप को क्षति नहीं पहुँची है। कृष्ण का यह व्यक्तित्व कवि की कविता में युगानुसार प्रकट हुआ है।

प्रश्न 5:
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कुन्ती का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
“कुन्ती के चरित्र में कवि ने मातृत्व के भीषण अन्तर्द्वन्द्व की सृष्टि की है।” इस कथन के आधार पर कुन्ती का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य के किसी प्रमुख नारी पात्र के चरित्र का चित्रण कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कुन्ती के चरित्र की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘रश्मिरथी’ के आधार पर कुन्ती के मातृत्व रूप पर प्रकाश डालिए।
या
‘रश्मिरथी’ खाण्डकाव्य के प्रधान नारी पात्र का चरित्रांकन कीजिए।
उत्तर:
कुन्ती पाण्डवों की माता है। अविवाहिता कुन्ती के गर्भ से सूर्यपुत्र कर्ण का जन्म हुआ था। इस प्रकार कुन्ती के पाँच नहीं वरन् छ: पुत्र थे। कुन्ती की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) वात्सल्यमयी माता – कुन्ती को जब यह ज्ञात होता है कि कर्ण का उसके अन्य पाँच पुत्रों से युद्ध होने वाला है तो वह कर्ण को मनाने उसके पास पहुँच जाती है। उस समय कर्ण सूर्य की उपासना कर रहा था। अपने पुत्र कर्ण के तेजोमय रूप को देख कुन्ती फूली नहीं समाती। सन्ध्या से आँखें खोलने पर कर्ण स्वयं को राधा का पुत्र बताता है तो कुन्ती यह सुनकर व्याकुल हो जाती है

रे कर्ण ! बेध मत मुझे निदारुण शर से ।
राधा का सुत तू नहीं, तनय मेरा है।।

कर्ण के पास से निराश लौटती हुई कुन्ती कर्ण को अपने अंक में भर लेती है, जो उसके वात्सल्य का प्रमाण है।

(2) अन्तर्द्वन्द्वग्रस्त – जब कुन्ती के ही पुत्र परस्पर शत्रु बने खड़े हैं, तब कुन्ती के हृदय में अन्तर्द्वन्द्व की भीषण आँधी उठ रही थी। वह इस समय बड़ी ही उलझन में पड़ी हुई है। पाँचों पाण्डवों और कर्ण में से किसी की हानि हो, पर वह हानि तो कुन्ती की ही होगी। वह अपने पुत्रों का सुख-दु:ख अपना सुख-दु:ख समझती है

दो में किसका उर फटे, फहूँगी मैं ही।
जिसकी भी गर्दन कटे, कहूँगी मैं ही ॥

(3) समाजभीरु – कुन्ती लोक-लाज से बहुत अधिक भयभीत एक भारतीय नारी की प्रतीक है। कौमार्यावस्था में सूर्य से उत्पन्न नवजात शिशु (कर्ण) को वह लोक-निन्दा के भय से गंगा की लहरों में बहा देती है। इस बात को वह कर्ण के समक्ष भी स्वीकार करती है

मंजूषा में धर वज्र कर मन को,
धारा में आयी छोड़ हृदय के धन को।

कर्ण को युवा और वीरत्व की प्रतिमूर्ति बने देखकर भी अपना पुत्र कहने का साहस नहीं कर पाती। जब युद्ध की विभीषिका सम्मुख आ जाती है, तो वह कर्ण से अपनी दयनीय स्थिति को इन शब्दों में व्यक्त करती है-

बेटा धरती पर बड़ी दीन है नारी,
अबला होती, सचमुच योषिता कुमारी।
है कठिन बन्द करना समाज के मुख को,
सिर उठा न पा सकती पतिता निज सुख को।

(4) निश्छल – कुन्ती का हृदय छलरहित है। वह कर्ण के पास मन में कोई छल रखकर नहीं, वरन् निष्कपट भाव से गयी थी। यद्यपि कर्ण उसकी बातें स्वीकार नहीं करता, किन्तु कुन्ती उसके प्रति अपनी ममत्व कम नहीं करती।

(5) बुद्धिमती और वाक्पटु – कुन्ती एक बुद्धिमती नारी है। वह अवसर को पहचानने तथा दूरगामी परिणाम का अनुमान करने में समर्थ है। कर्ण-अर्जुन युद्ध का निश्चय जानकर वह समुचित कदम उठाती है

सोचा कि आज भी चूक अगर जाऊँगी,
भीषण अनर्थ फिर रोक नहीं पाऊँगी।
फिर भी तू जीता रहे, न अपयश जाने,
अब आ क्षणभर मैं तुझे अंक में भर लें ॥

इस प्रकार कवि ने ‘रश्मिरथी’ में कुन्ती के चरित्र में कई उच्चकोटि के गुणों के साथ-साथ मातृत्व के भीषण अन्तर्द्वन्द्व की सृष्टि करके, इस विवश माँ की ममता को महान् बना दिया है।

प्रश्न 7:
‘रश्मिरथी’ के काव्य-सौष्ठव (काव्य-सौन्दर्य) पर प्रकाश डालिए।
या
‘खण्डकाव्य’ की दृष्टि से ‘रश्मिरथी की समीक्षा कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ उच्चकोटि का खण्डकाव्य है-इस कथन को प्रमाणित कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ काव्य का भाषा-शैली की दृष्टि से मूल्यांकन कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ का काव्यगुणों के आधार पर विवेचन कीजिए।
या
रचना-शैली की दृष्टि से ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य का मूल्यांकन कीजिए।
या
रश्मिरथी के संवाद-कौशल की विशेषताएँ बताइए।
या
सिद्ध कीजिए कि ‘रश्मिरथी’ एक प्रगतिशील और सफल खण्डकाव्य है।
या
खण्डकाव्य के लक्षणों के आधार पर ‘रश्मिरथी’ की आलोचना कीजिए।
या
कलापक्ष और भावपक्ष की दृष्टि से ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की काव्यगत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की लेखनी सदैव देशप्रेम एवं मानवतावादी दृष्टिकोण की समर्थक रही है। प्रस्तुत खण्डकाव्य ‘रश्मिरथी’ भी इस बात का अपवाद नहीं है। इसकी विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(1) कथानक – ‘रश्मिरथी’ को कथानक महाभारत के प्रसिद्ध पात्र कर्ण के जीवन-प्रसंग पर आधारित है, किन्नु लेखक ने इन प्रसंगों को एक मौलिक स्वरूप देकर कर्ण के व्यक्तित्व की एक नयी छवि प्रस्तुत की है। कथानक का संगठन बड़ा सुनियोजित है। प्रसंगों का समय भिन्न-भिन्न है और उनमें पर्याप्त अन्तराल है; किन्तु उन्हें इस प्रकार श्रृंखलाबद्ध किया गया है कि कथा के प्रवाह में कहीं कोई बाधा नहीं पड़ती और उसका क्रमबद्ध विकास होता रहता है। कथा का अन्त इस प्रकार किया गया है कि वह कर्ण की विशेषताओं को विभूषित करते हुए समाप्त हो जाती है।

(2) पात्र एवं चरित्र-चित्रण – इस खण्डकाव्य में कर्ण के सामाजिक स्तर पर उपेक्षित जीवन की पीड़ा का मर्म उजागर करना और उसकी चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालना ही कवि का उद्देश्य रहा है। इसलिए अन्य पात्रों का चुनाव इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर किया गया है। कथानक में एक भी अनावश्यक पात्र को स्थान नहीं दिया गया है। कर्ण के चरित्र में वर्तमान युग के सामाजिक रूप से उपेक्षित व्यक्तियों एवं कुन्ती के रूप में समाज के नियमों से प्रताड़ित नारियों की व्यथा को स्वर दिया गया है। इस प्रकार इसे खण्डकाव्य में पात्रों का चरित्र-चित्रण अत्यन्त स्वाभाविक ढंग से हुआ है।

काव्यगत विशेषताएँ

‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की काव्यगत विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(अ) भावगत विशेषताएँ

(1) ऐतिहासिकता – रश्मिरथी’ की कथा महाभारत से ली गयी है। उसकी सभी घटनाएँ एवं पात्र ऐतिहासिक हैं। अविवाहित कुन्ती अपने नवजात शिशु को त्याग देती है। आगे चलकर वही पुत्र कर्ण के नाम से असाधारण पराक्रमी बनकर कुन्ती-पुत्रों के समक्ष उनके शत्रु एवं महान् दानी के रूप में आता है। पग-पग पर उसके साथ छल किया जाता है और अन्त में निहत्थे कर्ण को अर्जुन युद्ध की मर्यादा के विरुद्ध मार देता है। महाभारत के इस आख्यान को ही रश्मिरथी’ काव्य में कवि ने प्रस्तुत किया है।

(2) रस एवं संवाद-योजना – रश्मिरथी’ में करुण, भयानक, रौद्र एवं वीर रसों का निरूपण हुआ है, किन्तु यह खण्डकाव्य वीर रसप्रधान है। ‘दिनकर जी’ की रस-योजना को सफल बनाने में खण्डकाव्य की संवादात्मक शैली का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है; क्योंकि इन रसों का आलम्बन और उद्दीपन खण्डकाव्य के पात्र ही हैं। पात्रों के भावों का प्रकटीकरण कवि ने उनके संवादों के माध्यम से करके जहाँ उनके चरित्रों को निखारा है, वहीं प्रभाव एवं शैली की दृष्टि से खण्डकाव्य को सशक्त भी बनाया है। खण्डकाव्य में प्रयुक्त संवाद भावों से प्रेरित, स्वाभाविक, पैने और व्यंग्य से परिपूर्ण हैं; उदाहरणार्थ

वीर रसपूर्ण संवाद – धनु की डोरी तन जाने दें,
                             संग्राम तुरत ठन जाने दें।
                            ताण्डवी तेज लहराएगा,
                                संसार ज्योति कुछ पाएगा।

(3) प्रकृति-चित्रण – यद्यपि ‘रश्मिरथी’ काव्य में प्रकृति-चित्रण कवि का विषय नहीं है, तथापि यत्र-तत्र प्रसंगवश प्रकृति-चित्रण हुआ है। रश्मिरथी’ का प्रकृति-चित्रण बहुत ही सजीव है; यथा

हँसती थीं रश्मियाँ रजत से, भरकर वारि विमल को।

परशुराम के आश्रम का एक चित्र द्रष्टव्य है

बैठे हुए सुखद आतप में, मृग रोमन्थन करते हैं।
वन के जीव विवर से बाहर, हो विश्रब्ध विचरते हैं।

(ब) कलागत विशेषताएँ।

(1) भाषा – रश्मिरथी’ खण्डकाव्य की भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली हिन्दी है, किन्तु उसमें साधारण बोलचाल के शब्दों का भी पर्याप्त प्रयोग किया गया है। भाषा में प्रभावात्मकता, प्रवाहमयता तथा विषयानुरूपता है। भाषा ओजगुण प्रधान है। भाषा की स्पष्टता व सुबोधता सर्वत्र देखी जा सकती है। उदाहरणार्थ

तब किसी तरह हिम्मत समेटकर सारी।
आयी मैं तेरे पास भाग्य की मारी ॥

‘रश्मिरथी की संस्कृतनिष्ठ भाषा का भी एक उदाहरण द्रष्टव्य है

तन में रवि का अप्रतिम तेज जगता था।
दीपक ललाट अपराकै सदृश लगता था।

सभी स्थलों के उपयुक्त भाषिक शब्दावली की रचना में कवि सिद्धहस्त है। कवि ने अनेक लोकोक्तियों व मुहावरों का भी उचित स्थल पर प्रयोग किया है; जैसे – हृदय फटना, पुण्य लूटना, मन मसोसना, वज्र गिरना आदि।।

(2) शैली – रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में मुख्य रूप से वर्णनात्मक प्रबन्ध शैली की चित्रोपमता, सूक्ति शैली, संवाद शैली और व्यंग्यात्मक शैली को अपनाया गया है। कवि ने वर्णनात्मक शैली में घटनाओं और परिस्थितियों को भावात्मक धरातल पर सँजोया है। वस्तुत: कवि ने प्रभाववादी शैली का अनुगमन करते हुए वर्णनात्मक शैली की कमियों का पूर्णतः निराकरण कर दिया है

पाकर प्रसन्न आलोक नया, कौरव सेना का शोक गया
आशा की नवल तरंग उठी, जन जन में नयी उमंग उठी।

(3) छन्द-विधान – कवि ने प्रत्येक सर्ग में अलंग-अलग छन्दों का प्रयोग किया है। ये छन्द-परिवर्तन मात्र परिवर्तन के लिए ही नहीं किये गये हैं, वरन् विषय और मानसिक परिस्थितियों तथा घटनाओं की संवेदनात्मक पकड़ को दृष्टि में रखते हुए ही इन छन्दों का आयोजन किया गया है। एक ही सर्ग में अनुभव के संवेदनात्मक तनाव के परिवर्तित होने पर कवि ने छन्द-योजना ही परिवर्तित कर दी है। ‘रश्मिरथी’ में कवि ने ‘सुमेरु’ (एक प्रकार का मात्रिक छन्द जिसके प्रत्येक चरण में 19 मात्राएँ होती हैं, अन्त में यगण होता है, 12 मात्राओं पर यति होती है तथा पहली, आठवीं, पन्द्रहवीं मात्राओं का लघु होना आवश्यक होता है।), ‘हरिगीतिका’, ‘पद्धरी (एक मात्रिक छन्द, जिसके प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं और अन्त में जगण होता है।) आदि मात्रिक छन्दों का सफल प्रयोग किया है।

(4) अलंकार-योजना – ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में कवि ने उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग किया है; उदाहरणार्थ

उपमा ”वन्य कुसुम-सा खिला कर्ण जग की आँखों से दूर।”
उत्प्रेक्षा – “लौह-दण्ड पर जड़ित पड़ा हो, मानो अर्थ अंशुमाली।”
रूपक – ‘फिर सहसा क्रोधाग्नि भयानक, भभक उठी उनके तन में।”

कवि ने व्यर्थ के आलंकारिक प्रयोगों से भाषा को बोझिल नहीं बनाया है। अलंकारों का प्रयोग इतना स्वाभाविक और वास्तविक लगता है कि वह पाठकों को आलंकारिक भूल-भुलैया में नहीं ले जाता। इस प्रकार ‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य काव्य-सौन्दर्य की दृष्टि से एक सफल खण्डकाव्य है, जो आज के समाज की विकृतियों को दूर करने का सशक्त सन्देश देता है तथा वर्तमान युग के लिए अत्यन्त उपयोगी भी है।

प्रश्न 8:
‘रश्मिरथी’ शीर्षक की सार्थकता पर विचार कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
या
‘रश्मिरथी’ खण्डकाव्य में वर्णित उद्देश्य में कवि कितना सफल हुआ है ? अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘रश्मिरथी’ के माध्यम से कवि समाज को क्या सन्देश देना चाहता है ?
या
‘रश्मिरथी की कथा प्राचीन कलेवर में आधुनिक भारतीय समाज का चित्रण है, पर प्रकाश डालिए।
या
‘रश्मिरथी’ शीर्षक का अर्थ स्पष्ट करते हुए सिद्ध कीजिए कि कर्ण का यह नाम सर्वथा उपयुक्त है।
या
” रश्मिरथी’ खण्डकाव्य जातिवाद के विष से पीड़ित वर्तमान भारतीय समाज के लिए परोक्ष रूप से एक निदान प्रस्तुत करता है।” इस कथन की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
शीर्षक की सार्थकता – राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ ने इस खण्डकाव्य का नामकरण सर्वथा उचित और उपयुक्त आधार पर किया है। पौराणिक कथा के आधार पर कर्ण सूर्य का पुत्र है; अतः सूर्य की रश्मियों (किरणों) को उसका पुत्र कहना उचित है। इसके अतिरिक्त कर्ण का व्यक्तित्व सूर्य जैसा ही तेजस्वी है। निश्चय ही वह चारित्रिक प्रखर किरणों वाले रथ का रथी है; अत: उसे रश्मिरथी’ कहा जा सकता है। कर्ण की प्रतिभा सूर्य की किरणों के समान दीप्तिमान थी। वह प्रतिभा के इस रथ का रथी था, इसलिए भी उसे ‘रश्मिरथी’ कहा जा सकता है। यदि हम कर्ण को समाज के उपेक्षित वर्ग के प्रतिभासम्पन्न व्यक्तित्व का प्रतीक मान लें तो ऐसी प्रतिभा को किरणों की संज्ञा दी जा सकती है और उस प्रतिभावान् को ‘रश्मिरथी’ कहा जा सकता है। अतः, ‘रश्मिरथी’ ही एक ऐसा उपयुक्त शीर्षक है, जो कर्ण के सम्पूर्ण व्यक्तित्व की पूर्णता को समेटने में समर्थ है।

उद्देश्य – कथानक के पौराणिक होने के पश्चात् भी इस खण्डकाव्य की रचना में कवि का उद्देश्य असाधारण प्रतिभा से सम्पन्न, किन्तु उपेक्षित जनों की ओर समाज का ध्यान आकर्षित करना रहा है। कहीं जन्म के आधार पर, कहीं जाति, वर्ण और कुल के आधार पर जो व्यक्तित्व का हनन होता रहा है, उन अवधारणाओं पर कवि ने प्रकाश डाला है और स्पष्ट किया है कि उपेक्षित प्रतिभाएँ कुण्ठित होकर कुसंगति में पड़ती हैं और समाज के विनाश का कारण बनती हैं। यदि कर्ण को बचपन से यथोचित सम्मान प्राप्त होता तो वह कदाचित् दुर्योधन का साथ देने को विवश न होता और सम्भवतः ऐसी स्थिति में महाभारत का विनाशकारी युद्ध भी न होता। इसके अतिरिक्त भारतीय समाज में नारियों की मनोदशा एवं समाज में उनकी स्थिति पर भी प्रकाश डाला गया है।
[ संकेत – प्रश्न 2 में इसी शीर्षक के अन्तर्गत दी गयी सामग्री का भी अध्ययन करें]

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : दो

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name गद्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : दो
Number of Questions 127
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य-साहित्यका विकास बहुविकल्पीय प्रश्न : दो

पत्र/पत्रिका विधा पर आधारित

उचित विकल्प का चयन कीजिए-

(1) ‘प्रजाहितैषी’ नाम के पत्र का प्रकाशन/सम्पादन किया– [2013]
(क) राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द ने
(ख) राजा लक्ष्मण सिंह ने
(ग) बाबू नवीनचन्द्र राय ने।
(घ) सुखदयाल शास्त्री ने

(2) भारतेन्दु युग में प्रकाशित ‘आनन्द कादम्बिनी’ नामक पत्रिका के सम्पादक थे [2009, 10, 11, 15]
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’
(ग) राय कृष्णदास
(घ) धर्मवीर भारती

(3) बालकृष्ण भट्ट द्वारा सम्पादित पत्रिका है [2009, 11, 12, 13]
(क) हिन्दी प्रदीप
(ख) इन्दु
(ग) माधुरी
(घ) प्रभा

(4) हिन्दी दीप्ति-प्रकाश’ नामक पत्रिका का सम्पादन किया-
(क) प्रतापनारायण मिश्र ने
(ख) कार्तिकप्रसाद खत्री ने
(ग) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने
(घ) राय कृष्णदास ने

(5) ‘इन्दु’, ‘सुदर्शन’, ‘समालोचक’, ‘प्रभा’, ‘मर्यादा’ और ‘माधुरी’ पत्रिकाएँ किस युग में प्रकाशित हुई ?
(क) भारतेन्दु युग में
(ख) द्विवेदी युग में
(ग) छायावाद युग में
(घ) छायावादोत्तर युग में

(6) ‘ब्राह्मण’ पत्र के सम्पादक हैं [2009, 12, 13, 14]
(क) बालकृष्ण भट्ट
(ख) राधाचरण गोस्वामी
(ग) प्रतापनारायण मिश्र
(घ) पं० लल्लूलाल

(7) ‘कवि-वचन-सुधा’ नामक पत्रिका के सम्पादक थे-
(क) प्रतापनारायण मिश्र
(ख) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(ग) श्यामसुन्दर दास
(घ) भारतेन्दु हरिश्चन्द

(8) ‘विशाल-भारत’ नामक पत्रिका के सम्पादक थे–
(क) प्रेमचन्द
(ख) श्रीराम शर्मा
(ग) धर्मवीर भारती
(घ) प्रतापनारायण मिश्र

(9) ‘हंस’ नामक पत्रिका के सम्पादक थे [2010, 14, 16, 17, 18]
(क) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(ख) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ग) बालकृष्ण भट्ट
(घ) मुंशी प्रेमचन्द

(10) महावीरप्रसाद द्विवेदी द्वारा सम्पादित पत्रिका है [2009, 13]
(क) प्रदीप
(ख) इन्दु
(ग) प्रभा
(घ) सरस्वती

(11) निम्नलिखित में से कौन पत्रिका नहीं है? [2011]
(क) इन्दु
(ख) भारत दुर्दशा
(ग) सरस्वती
(घ) आनन्द कादम्बिनी

(12) ‘दिनकर के पत्र का प्रकाशन-वर्ष है [2012, 16]
(क) 1970
(ख) 1977
(ग) 1981
(घ) 1991

(13) ‘सरस्वती’ पत्रिका के प्रथम सम्पादक हैं [2014, 16]
(क) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) हरदेव बाहरी

(14) हिन्दी प्रदीप’ पत्र का सम्पादन होता था (2015)
(क) इलाहाबाद से
(ख) वाराणसी से
(ग) कानपुर से
(घ) दिल्ली से

(15) ‘ज्ञानोदय’ पत्रिका के सम्पादक थे [2016]
(क) डॉ० सम्पूर्णानन्द
(ख) पं० महावीरप्रसाद द्विवेदी
(ग) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर
(घ) रामवृक्ष बेनीपुरी

उत्तर (1) ख, (2) ख, (3) क, (4) ख, (5) ख, (6) ग, (7) घ, (8) ख, (9) घ, (10) घ, (11) ख, (12) ग,
(13) खे, (14) के, (15) ग।

नादळ विथा पर आधारित

उचित विकल्प का चयन कीजिए-

(1) ‘रणधीर’ और ‘प्रेम मोहिनी’ नाट्य कृतियों के नाटककार हैं-
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) प्रतापनारायण मिश्र
(ग) बालकृष्ण भट्ट
(घ) लाला श्रीनिवास दास

(2) ‘स्वर्णविहीन’, ‘रक्षाबन्धन’, ‘प्रतिशोध’ के रचयिता हैं
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) हरिकृष्ण ‘प्रेमी’
(ग) रामकुमार वर्मा
(घ) लक्ष्मीनारायण मिश्र

(3) संन्यासी’ और ‘मुक्ति का रहस्य’ के रचयिता हैं-
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) हरिकृष्ण ‘प्रेमी
(ग) रामकुमार वर्मा
(घ) लक्ष्मीनारायण मिश्र

(4) निम्नलिखित रचनाओं में से कौन-सी रचना नाटक है ?
(क) नमक का दारोगा
(ख) गोदान
(ग) आखिरी चट्टान तक
(घ) राजमुकुट

(5) सूतपुत्र’ नाटक के रचनाकार हैं-
(क) डॉ० गंगासहाय ‘प्रेमी
(ख) जयशंकर प्रसाद
(ग) विष्णु प्रभाकर
(घ) हरिकृष्ण प्रेमी

(6) निम्नलिखित में से कौन-सी रचना नाटक है? [2009]
(क) सन्नाटा
(ख) निन्दा रस
(ग) गरुड़ध्वज
(घ) राष्ट्र का स्वरूप

(7) निम्नलिखित में से नाटक है [2011]
(क) उसने कहा था
(ख) कलम का सिपाही
(ग) चन्द्रगुप्त
(घ) आँसू

(8) निम्नलिखित में से नाटककार हैं [2013]
(क) रामचन्द्र शुक्ल
(ख) मोहन राकेश
(ग) डॉ० नगेन्द्र
(घ) महादेवी वर्मा

(9) निम्नलिखित में से नाटक है [2014]
(क) त्रिशंकु
(ख) आत्मनेपद
(ग) विपथगा।
(घ) उत्तर प्रियदर्शी

(10) हिन्दी का प्रथम नाटक है [2014]
(क) सती-प्रताप
(ख) अजातशत्रु
(ग) स्कन्दगुप्त
(घ) नहुष

(11) स्कन्दगुप्त नाटक के लेखक हैं [2015]
(क) प्रेमचन्द
(ख) लक्ष्मीनारायण मिश्र
(ग) जयंशकर प्रसाद
(घ) धर्मवीर भारती

(12) श्री चन्द्रावली’ नामक नाटक के लेखक हैं [2016]
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) जयशंकर प्रसाद
(ग) हरिकृष्ण प्रेमी
(घ) श्रीनिवास दास

(13) ‘मुद्रा राक्षस’ नामक नाटक के रचनाकार हैं [2016]
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) मोहन राकेश
(ग) धमवीर भारती
(घ) राहुल सांकृत्यायन

उत्तर (1) घ, (2) ख, (3) घ, (4) घ, (5) क, (6) ग, (7) ग, (8) ख, (9) घ, (10) घ, (11) ग, (12) क,
(13) के।।

एकांकी विधा पर आधारित

उचित विकल्प का चयन कीजिए-

(1) ‘एक बूंट’ को हिन्दी का प्रथम एकांकी मानते हैं। इसके रचयिता हैं
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) जैनेन्द्र कुमार
(ग) रामकुमार वर्मा
(घ) उदयशंकर भट्ट

(2) ‘पृथ्वीराज की आँखें’ एकांकी संग्रह के एकांकीकार हैं
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) जैनेन्द्र कुमार
(ग) रामकुमार वर्मा
(घ) सेठ गोविन्ददास

(3) ‘बहू की विदा’ एकांकी के रचयिता हैं
(क) सेठ गोविन्ददास
(ख) हरिकृष्ण प्रेमी
(ग) मोहन राकेश
(घ) विनोद रस्तोगी

(4) निम्नलिखित में से कौन एकांकीकार नहीं हैं ?
(क) उपेन्द्रनाथ अश्क’
(ख) विष्णु प्रभाकर
(ग) लक्ष्मीनारायण मिश्र
(घ) सीताराम वर्मा

(5) हिन्दी एकांकी का विकास किस युग से माना जाता है ? [2008]
(क) छायावाद युग
(ख) छायावादोत्तर युग
(ग) द्विवेदी युग
(घ) भारतेन्दु युग

(6) हिन्दी एकांकी का जनक माना जाता है– [2017]
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ग) डॉ० रामकुमार वर्मा
(घ) उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’

उतर (1) क, (2) ग, (3) घे, (4) घ, (5) ख, (6) ग।

कहानी विधा पर आधारित

उचित विकल्प का चयन कीजिए-

(1) हिन्दी की प्रथम कहानी के नाम से जानी जाती है-
(क) दुलाईवाली
(ख) इन्दुमती
(ग) प्लेग की चुडैल
(घ) ग्यारह वर्ष का समय

(2) आधुनिक ढंग की कहानियों को प्रारम्भ किस पत्रिका के प्रकाशन काल से माना जाता है ?
(क) सरस्वती
(ख) माधुरी
(ग) इन्दु
(घ) मर्यादा

(3) हिन्दी गद्य की कालजयी कहानी ‘उसने कहा था’ के लेखक हैं-
(क) चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी
(ख) प्रेमचन्द
(ग) सुदर्शन
(घ) जयशंकर प्रसाद

(4) कहानियों के क्षेत्र में सर्वाधिक चर्चित कहानीकार प्रेमचन्द के कहानियों के संकलन प्रकाशित हुए
(क) क्षीरसागर’ शीर्षक से
(ख) मानसरोवर’ शीर्षक से
(ग) “मानसागर’ शीर्षक से
(घ) कथा-संग्रह’ शीर्षक से

(5) ‘ग्राम’, ‘आकाशदीप’, ‘गुण्डा’, ‘चित्रमन्दिर’, ‘आँधी’, ‘सलीम’, ‘मधुआ’ आदि कहानियाँ किस कहानीकार द्वारा रचित हैं ? [2010]
(क) भगवतीचरण वर्मा
(ख) उपेन्द्रनाथ अश्क
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) प्रेमचन्द

(6) ‘धर्मयुद्ध’, ‘फूल की चोरी’, ‘चार आने’, ‘अभिशप्त’, ‘कर्मफल’, ‘परदा’, ‘फूलों का कुर्ता’ किस कहानीकार द्वारा रचित प्रसिद्ध कहानियाँ हैं ? [2010]
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) यशपाल
(ग) प्रेमचन्द
(घ) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

(7) ‘तीसरी कसम’, ‘पान की बेगम’, ‘रसपिरिया’ किस लेखक की प्रसिद्ध रचनाएँ हैं ?
(क) फणीश्वरनाथ रेणु
(ख) शिवप्रसाद सिंह
(ग) प्रेमचन्द
(घ) अमरकान्त

(8) ‘रानी केतकी की कहानी’ नामक कहानी विधा की रचना के रचयिता हैं[ 2010, 11, 13, 17]
(क) पं० लल्लूलाल
(ख) मुंशी इंशा अल्ला खाँ
(ग) सदल मिश्र
(घ) रामप्रसाद निरंजनी

(9) पंचलाइट की रचना-विधा है
(क) निबन्ध
(ख) संस्मरण
(ग) कहानी
(घ) आत्मकथा

(10) ‘नमक का दारोगा’ के कहानीकार हैं
(क) जैनेन्द्र कुमार
(ख) जयशंकर प्रसाद
(ग) महादेवी वर्मा
(घ) प्रेमचन्द

(11) निम्नलिखित में से कौन-सी कहानी भारतेन्दु के पूर्व की है ?
(क) इन्दुमती
(ख) ग्यारह वर्ष का समय
(ग) रानी केतकी की कहानी
(घ) दुलाईवाली

(12) ‘दुलाईवाली’ किस विधा की रचना है ? [2010]
(क) उपन्यास
(ख) नाटक
(ग) कहानी
(घ) रेखाचित्र

(13) मुंशी प्रेमचन्द ने किस विधा को ‘मानव चरित्र का चित्रमात्र’ कहा है ? [2010]
(क) जीवनी
(ख) उपन्यास
(ग) कहानी
(घ) संस्मरण

(14) ‘हरखू’ पात्र किस कहानी से सम्बन्धित है ? [2012]
(क) बलिदान
(ख) आकाशदीप
(ग) प्रायश्चित्त
(घ) समय

(15) ‘मधुआ’ किस विधा की रचना है ? [2013]
(क) रेखाचित्र
(ख) कहानी
(ग) आत्मकथा
(घ) संस्मरण

(16) ‘जिन्दगी और जोंक’ के लेखक हैं [2014]
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) अमरकान्त
(ग) शिवानी
(घ) शिवप्रसाद सिंह

(17) इन्दुमती है [2015]
(क) प्रथम कहानी
(ख) प्रथम उपन्यास
(ग) निबन्ध
(घ) इनमें से कोई नहीं

(18) गद्य-विधा की दृष्टि से ‘वोल्गा से गंगा’ है [2016]
(क) उपन्यास
(ख) कहानी
(ग) आत्मकथा
(घ) संस्मरण

(19) ‘वोल्गा से गंगा’ कहानी संग्रह है [2016]
(क) जैनेन्द्र कुमार का
(ख) यशपाल का
(ग) राहुल सांकृत्यायन का
(घ) प्रेमचन्द का

उत्तर (1) ख, (2) क, (3) क, (4) ख, (5) ग, (6) ख, (7) क, (8) ख, (9) ग, (10) घ, (11) ग, (12) ग,
(13) ग, (14) के, (15) ख, (16) ख, (17) क, (18) ख, (19) (ग)

उपन्यास विधा पर आधारित

उचित विकल्प का चयन कीजिए—

(1) हिन्दी का प्रथम मौलिक उपन्यास माना जाता है [2008, 13, 14, 17]
(क) परीक्षा-गुरु
(ख) भूतनाथ
(ग) चन्द्रकान्ता
(घ) सेवासदन

(2) ‘भाग्यवती’ को हिन्दी का प्रथम सामाजिक उपन्यास माना जाता है। इसके लेखक थे [2016]
(क) नवीनचन्द्र राय
(ख) गोपालराम गहमरी
(ग) श्रद्धाराम फुल्लौरी
(घ) देवकीनन्दन खत्री

(3) हिन्दी उपन्यासों की विकास-परम्परा का अध्ययन किस लेखक के नाम से किया जाता है ?
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) प्रेमचन्द
(ग) जैनेन्द्र कुमार
(घ) यशपाल

(4) ‘गोदान’, ‘निर्मला’, ‘रंगभूमि’, ‘कर्मभूमि’ किस लेखक की रचनाएँ हैं ? [2009, 13]
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) यशपाल
(ग) प्रेमचन्द
(घ) जैनेन्द्र कुमार

(5) ‘कंकाल’ और ‘तितली’ जैसे उपन्यास हिन्दी-साहित्य को किस लेखक ने दिये ? [2010]
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) स० ही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
(ग) मागार्जुन
(घ) प्रेमचन्द

(6) निम्नलिखित में से कौन उपन्यासकार प्रेमचन्द युग का नहीं है ?
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’
(ग) बालकृष्ण भट्ट
(घ) भगवतीप्रसाद वाजपेयी

(7) निम्नलिखित उपन्यासकारों में से कौन आंचलिक उपन्यासकारों की श्रेणी में आते हैं ?
(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ख) फणीश्वरनाथ ‘रेणु’
(ग) रांगेय राघव
(घ) अमृतलाल नागर

(8) निम्नलिखित में से कौन उपन्यास नहीं है ?
(क) बाणभट्ट की आत्मकथा
(ख) मैला आँचल
(ग) शेखर : एक जीवनी
(घ) संस्कृति के चार अध्याय

(9) निम्नलिखित में से कौन-सी रचना उपन्यास नहीं है ? [2011]
(क) परीक्षा गुरु
(ख) तितली
(ग) अशोक के फूल
(घ) गबन

(10) ‘परीक्षागुरु’ की रचना-विधा है [2013]
(क) कहानी
(ख) उपन्यास
(ग) नाटक
(घ) जीवनी

(11) ‘गिरती दीवारें’ (उपन्यास) के रचनाकार हैं [2013]
(क) उपेन्द्रनाथ अश्क’
(ख) शिवप्रसाद सिंह
(ग) सही०वा०‘अज्ञेय’
(घ) रामविलास शर्मा

(12) ‘सुनीता’ विधा की दृष्टि से रचना है [2014]
(क) कहानी
(ख) आलोचना
(ग) निबन्ध
(घ) उपन्यास

(13) ‘बलचनमा’ उपन्यास है [2014]
(क) फणीश्वरनाथ रेणु’ का
(ख) नागार्जुन का
(ग) अमृतराय का
(घ) अमरकान्त का

(14) उपन्यास विधा पर आधारित रचना है– [2016]
(क) स्कन्दगुप्त
(ख) गोदान
(ग) अशोक के फूल
(घ) चिन्तामणि

(15) ‘चारुचन्द्र लेख’ विधा है—- [2016]
(क) कहानी
(ख) उपन्यास
(ग) निबन्ध
(घ) नाटक

उत्तर (1) क, (2) ग, (3) ख, (4) ग, (5) क, (6) ग, (7) ख, (8) घे, (9) ग, (10) ख, (11) क, (12) घ,
(13) ख, (14) ख, (15) ख।

निबन्ध विधा पर आधारित

उचित विकल्प का चयन कीजिए-

(1) निम्नलिखित में से कौन भारतेन्दुयुगीन निबन्धकार नहीं हैं ?
(क) प्रतापनारायण मिश्र
(ख) बालकृष्ण भट्ट
(ग) बालमुकुन्द गुप्त
(घ) महावीरप्रसाद द्विवेदी

(2) ‘चिन्तामणि’ निबन्ध-संग्रह में शुक्ल युग के किस निबन्धकार के निबन्ध संकलित हैं? [2013]
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) रामवृक्ष बेनीपुरी
(ग) रामचन्द्र शुक्ल
(घ) सम्पूर्णानन्द

(3) इनमें से कौन शुक्ल युग के निबन्धकार नहीं हैं ?
(क) वियोगी हरि
(ख) राय कृष्णदास
(ग) डॉ० नगेन्द्र
(घ) वासुदेवशरण अग्रवाल

(4) श्रीराम शर्मा और राहुल सांकृत्यायन किस युग के निबन्धकार हैं ?
(क) भारतेन्दु युग
(ख) द्विवेदी युग
(ग) शुक्ल युग
(घ) शुक्लोत्तर युग

(5) ‘अशोक के फूल’ के रचनाकार हैं [2009]
(क) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’
(ख) मोहन राकेश
(ग) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(घ) कुबेरनाथ राय

(6) ‘रस-मीमांसा’ के रचयिता हैं-
(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ख) रघुवीर सिंह
(ग) डॉ० नगेन्द्र
(घ) रामचन्द्र शुक्ल

(7) इनमें से कौन शुक्लोत्तर युग के निबन्धकार नहीं हैं ?
(क) डॉ० नगेन्द्र
(ख) रामचन्द्र शुक्ल
(ग) हजारीप्रसाद द्विवेदी .
(घ) नन्ददुलारे वाजपेयी

(8) महादेवी वर्मा, विजयेन्द्र स्नातक और विद्यानिवास मिश्र किस युग के निबन्धकार हैं ?
(क) भारतेन्दु युग
(ख) द्विवेदी युग
(ग) शुक्ल युग
(घ) शुक्लोत्तर युग

(9) निम्नलिखित में से कौन हास्य-व्यंग्य प्रधान निबन्धों के रचनाकार नहीं हैं ?
(क) वासुदेवशरण अग्रवाल
(ख) श्रीनारायण चतुर्वेदी
(ग) हरिशंकर परसाई
(घ) शरद जोशी

(10) ‘गेहूँ और गुलाब’ की रचना-विधा है–
(क) निबन्ध
(ख) संस्मरण
(ग) डायरी
(घ) आत्मकथा

(11) निबन्ध विधा की रचना है
(क) मेला-झमेला
(ख) भारत-दुर्दशा
(ग) रसज्ञ-रंजन
(घ) आचरण की सभ्यता

(12) ‘राष्ट्र का स्वरूप’ निबन्ध के लेखक हैं [2009, 13]
(क) वासुदेवशरण अग्रवाल
(ख) सरदार पूर्णसिंह
(ग) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर
(घ) “अज्ञेय

(13) विद्यानिवास मिश्र ने किस प्रकार के निबन्ध अधिक लिखे हैं ? [2009]
(क) ललित
(ख) ऐतिहासिक
(ग) मनोविश्लेषणात्मक निबन्ध
(घ) विश्लेषणात्मक निबन्ध

(14) निबन्ध’ शब्द के अंग्रेजी पर्याय शब्द ‘एसे’ का अर्थ है
(क) प्रयोग
(ख) प्रयास
(ग) प्रबन्ध
(घ) प्रकीर्ण

(15) निम्नलिखित में कौन-सा वर्णनात्मक निबन्ध है ? [2008]
(क) आचरण की सभ्यता
(ख) महाकवि माघ का प्रभात वर्णन
(ग) कुटज
(घ) निन्दा रस

(16) छायावादोत्तर काल के लेखक हैं [2010]
(क) विद्यानिवास मिश्र
(ख) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
(ग) बाबू गुलाबराय
(घ) श्यामसुन्दर दास

(17) वासुदेवशरण अग्रवाल द्वारा लिखित निबन्ध राष्ट्र का स्वरूप’ किस निबन्ध-संग्रह से लिया गया [2011]
(क) धरती पुत्र
(ख) पृथ्वी-पुत्र
(ग) राष्ट्र-चेतना
(घ) सांस्कृतिक गौरव

(18) निम्नलिखित में से कौन निबन्धकार नहीं है ? [2011]
(क) विद्यानिवास मिश्र
(ख) प्रेमचन्द
(ग) कुबेरनाथ राय
(घ) हजारीप्रसाद द्विवेदी

(19) ‘भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है’ हिन्दी गद्य की विद्या है– [2011]
(क) निबन्ध
(ख) उपन्यास
(ग) आलोचना
(घ) नाटक

(20) अशोक के फूल’ निबन्ध है [2012]
(क) मनोवैज्ञानिक निबन्ध
(ख) ललित निबन्ध
(ग) बुद्धिप्रधान निबन्ध
(घ) ऐतिहासिक निबन्ध

(21) ‘चिन्तामणि’ की गद्य-विधा है [2013, 15]
(क) नाटक
(ख) उपन्यास
(ग) निबन्ध
(घ) कहानी

(22) निबन्ध विधा का सर्वाधिक विकास हुआ [2013]
(क) द्विवेदी युग के
(ख) छायावादी युग के
(ग) भारतेन्दु युग में
(घ) छायावादोत्तर यग में

उत्तर (1) घ, (2) ग, (3) ग, (4) ग, (5) ग, (6) घ, (7) ख, (8) घ, (9) क, (10) क, (11) घ, (12) क,
(13) क, (14) खे, (15) ख, (16) क, (17) ख, (18) ख, (19) क, (20) ख, (21) ग, (22) क

आलोचना विधा पर आधारित

उचित विकल्प का चयन कीजिए–

(1) ‘हिन्दी नवरत्न’ नामक आलोचनात्मक निबन्ध-संग्रह के रचयिता हैं-
(क) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
(ख) श्यामसुन्दर दास
(ग) मिश्रबन्धु
(घ) मोहन राकेश

(2) ‘कबीर’ नामक आलोचनात्मक ग्रन्थ के रचयिता हैं [2011]
(क) डॉ० सम्पूर्णानन्द
(ख) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
(ग) राहुल सांकृत्यायन
(घ) हजारीप्रसाद द्विवेदी

(3) निम्नलिखित में से कौन प्रसिद्ध आलोचक हैं ?
(क) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
(ख) महादेवी वर्मा
(ग) मुंशी प्रेमचन्द
(घ) जयशंकर प्रसाद

(4) निम्नलिखित में से छायावादोत्तर काल के समालोचक नहीं हैं [2010]
(क) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(ख) डॉ० नगेन्द्र
(ग) बाबू गुलाबराय
(घ) रामविलास शर्मा

(5) त्रिवेणी’ किस विधा की रचना है ? [2011]
(क) निबन्ध
(ख) संस्मरण
(ग) आलोचना
(घ) कहानी

(6) साहित्यलोचन’ गद्य-विधा की रचना है? [2012]
(क) नाटक
(ख) उपन्यास
(ग) आलोचना
(घ) निबन्ध

उत्तर (1) ग, (2) घ, (3) क, (4) ग, (5) ग, (6) ग।

आत्मकथा विधा पर आधारित

उचित विकल्प का चयन कीजिए-

(1) ‘क्या भूलें क्या याद करूँ’ ( हरिवंशराय बच्चन) किस विधा की रचना है ? [2017, 18]
(क) आत्मकथा
(ख) जीवनी
(ग) संस्मरण
(घ) कहानी

(2) नीड़ का निर्माण फिर’ किस विधा और लेखक की रचना है ?
(क) संस्मरण-सुमित्रानन्दन पन्त
(ख) आत्मकथा-डॉ० हरिवंशराय बच्चन
(ग) जीवनी–सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’
(घ) रेखाचित्र–महादेवी वर्मा

(3) ‘अपनी खबर’ (पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’) किस विधा की रचना है ? [2010, 15]
(क) निबन्ध
(ख) आत्मकथा
(ग) उपन्यास
(घ) कहानी

(4) ‘मेरी असफलताएँ’ ( बाबू गुलाबराय) किस विधा की रचना है ? [2011, 13, 15]
(क) जीवनी-साहित्य
(ख) कहानी
(ग) डायरी
(घ) आत्मकथा

(5) वियोगी हरि कृत ‘मेरा जीवन प्रवाह’ किस विधा की रचना है ? [2009]
(क) जीवनी
(ख) आत्मकथा,
(ग) संस्मरण
(घ) कहानी

(6) गद्य की किस विधा में काल्पनिक प्रसंगों का स्थान नहीं है? [2012]
(क) कहानी
(ख) उपन्यास
(ग) नाटक
(घ) आत्मकथा

(7) गद्य-विद्या की दृष्टि से आत्मकथा है [2014]
(क) आवारा मसीहा
(ख) कलम का सिपाही
(ग) नीड़ का निर्माण फिर
(घ) शिखर से सागर तक

(8) गुड़िया भीतर गुड़िया’ की विधा है [2016]
(क) कहानी
(ख) आत्मकथा
(ग) रेखाचित्र
(घ) संस्मरण

उत्तर (1) क, (2) ख, (3) ख, (4) घ, (5) ख, (6) घ, (7) ग, (8) ख।।

जीवनी विधा पर आधारित

उचित विकल्प का चयन कीजिए-

(1) ‘आवारा मसीहा’ (शरत्चन्द्र की जीवनी) के रचयिता कौन हैं ? (2010, 12, 13, 16, 17]
(क) रामवृक्ष बेनीपुरी
(ख) रांगेय राघव
(ग) विष्णु प्रभाकर
(घ) राहुल सांकृत्यायन

(2) ‘कलम का सिपाही’ (प्रेमचन्द की जीवनी) के रचयिता कौन हैं ? [2011, 18]
(क) रामवृक्ष बेनीपुरी
(ख) रांगेय राघव
(ग) अमृतराय
(घ) राहुल सांकृत्यायन

(3) निराला की साहित्य-साधना’ (सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’ की जीवनी) के लेखक हैं—
(क) रामविलास शर्मा
(ख) महादेवी वर्मा
(ग) शान्ति जोशी
(घ) अमृतराय

(4) ‘मनीषी की लोकयात्रा’ ( गोपीनाथ कविराज की जीवनी) के लेखक हैं
(क) रामविलास शर्मा
(ख) भगवतीप्रसाद सिंह
(ग) रामवृक्ष बेनीपुरी
(घ) रामनरेश त्रिपाठी

(5) ‘आवारा मसीहा’ है (2015)
(क) आत्मकथा
(ख) जीवनी
(ग) उपन्यास
(घ) कहानी

उत्तर (1) ग, (2) ग, (3) क, (4) खे, (5) ख।

संस्मरण/रेखाचित्र विधा पर आधारित

उचित विकल्प का चयन कीजिए-

(1) निम्नलिखित रचनाओं में से कौन-सी रचना ‘रेखाचित्र’ है ?
(क) नीरजा
(ख) जयसन्धि
(ग) स्मृति की रेखाएँ
(घ) बिखरे फूल

(2) निम्नलिखित में से कौन-सी रचना देवेन्द्र सत्यार्थी की, रेखाचित्र विधा की रचना नहीं है?
(क) रेखाएँ बोल उठीं
(ख) सौन्दर्य बोध
(ग) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
(घ) लाल तारा

(3) ‘पथ के साथी’ की रचना-विधा है [2009]
(क) कहानी
(ख) जीवनी
(ग) आत्मकथा
(घ) संस्मरण

(4) ‘राबर्ट नर्सिंग होम में रचना-विधा की दृष्टि से है
(क) कहानी
(ख) नाटक
(ग) रेखाचित्र
(घ) रिपोर्ताज

(5) ‘माटी हो गई सोना’ किस विधा की रचना है ? [2009]
(क) उपन्यास
(ख) नाटक
(ग) रेखाचित्र
(घ) संस्मरण

(6) ‘मेरे पिताजी’ संस्मरण के लेखक हैं [2012]
(क) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’
(ख) हरिशंकर परसाई
(ग) मोहन राकेश
(घ) हजारीप्रसाद द्विवेदी

(7) हिन्दी के रेखाचित्रकार हैं [2016]
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) महादेवी वर्मा
(ग) रामकुमार वर्मा
(घ) विष्णु प्रभाकर

उत्तर (1) ग, (2) घ, (3) घ, (4) घ, (5) ग, (6) क, (7) ख।

डायरी विधा पर आधारित

उचित विकल्प का चयन कीजिए-

(1) ‘डायरी’ विधा का प्रारम्भ युग है
(क) भारतेन्दु युग
(ख) द्विवेदी युग
(ग) छायावाद युग
(घ) छायावादोत्तर युग

(2) ‘मेरी कॉलेज डायरी’ नामक डायरी के लेखक हैं
(क) डॉ० धीरेन्द्र वर्मा
(ख) श्रीराम शर्मा
(ग) जयप्रकाश भारती
(घ) धर्मवीर भारती

(3) ‘डायरी के पन्ने’ नामक डायरी के लेखक हैं-
(क) धर्मवीर भारती
(ख) घनश्याम दास बिड़ला
(ग) सुन्दरलाल त्रिपाठी
(घ) नरदेव शास्त्री ‘वेदतीर्थ

(4) हिन्दी साहित्य में डायरी-लेखन का उद्देश्य है
(क) जीवन-वृत्त
(ख) समाज-सुधार
(ग) आत्मालोचन
(घ) संस्मरण

(5) हिन्दी के प्रथम डायरी लेखक कौन हैं ? (2009)
(क) धीरेन्द्र वर्मा
(ख) इलाचन्द्र जोशी
(ग) शमशेर बहादुर सिंह
(घ) नरदेव शास्त्री ‘वेदतीर्थ

उत्तर (1) ग, (2) क, (3) ख, (4) ग, (5) घ।

रिपोर्ताज एवं यात्रावृत्त विधा पर आधारित

उचित विकल्प का चयन कीजिए-

(1) रिपोर्ताज विधा का प्रारम्भिक युग है
या
‘रिपोर्ताज’ साहित्य विधा किस युग की देन है ?
(क) द्विवेदी युग
(ख) छायावाद युग
(ग) छायावादोत्तर युग
(घ) भारतेन्दु युग

(2) ‘तूफानों के बीच’ किस विधा और लेखक की रचना है ?
(क) संस्मरण-रामवृक्ष बेनीपुरी
(ख) गद्यगीत–राय कृष्णदास
(ग) रेखाचित्र—महादेवी वर्मा
(घ) रिपोर्ताज-डॉ० रांगेय राघव

(3) रिपोर्ताज विधा की रचना नहीं है-
(क) लक्ष्मीपुरा
(ख) पहाड़ों में प्रेममयी संगीति
(ग) युद्ध यात्रा
(घ) दैनन्दिनी

(4) हिन्दी में रिपोर्ताज विधा का प्रवर्तक किसे माना जाता है ?
(क) महादेवी वर्मा
(ख) राहुल सांकृत्यायन
(ग) कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर
(घ) बाबू गुलाबराय

(5) ‘आखिरी चट्टान तक’ की रचना-विधा है [2012, 16]
(क) आत्मकथा
(ख) रिपोर्ताज
(ग) यात्रावृत्त
(घ) कहानी

(6) ‘मेरी तिब्बत-यात्रा’ यात्रावृत्त किस काल की अमूल्य थाती है ? [2009]
(क) भारतेन्दु युग
(ख) द्विवेदी युग
(ग) छायावादोत्तर युग
(घ) छायावाद युग

(7) ‘रिपोर्ताज’ विधा की सफल प्रस्तुति है [2008, 11]
(क) गेहूं बनाम गुलाब
(ख) आचरण की सभ्यता
(ग) कुटज
(घ) राबर्ट नर्सिंग होम में

(8) रिपोर्ताज के लेखक हैं [2010]
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) विष्णुकान्त शास्त्री
(ग) महावीरप्रसाद द्विवेदी
(घ) डॉ० सम्पूर्णानन्द

(9) ‘बंगाल का अकाल’ विधा है [2016]
(क) डायरी
(ख) रेखाचित्र
(ग) रिपोर्ताज
(घ) भेटवार्ता

उत्तर (1) ग, (2) घे, (3) घ, (4) ग, (5) ग, (6) ग, (7) घे, (8) ख, (9) ग

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UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 7 Employment: Growth, Informalisation and Other Issues

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 7 Employment: Growth, Informalisation and Other Issues (रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे) are part of UP Board Solutions for Class 11 Economics. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 7 Employment: Growth, Informalisation and Other Issues (रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Economics
Chapter Chapter 7
Chapter Name Employment: Growth, Informalisation and Other Issues (रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे)
Number of Questions Solved 57
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 7 Employment: Growth, Informalisation and Other Issues (रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
श्रमिक किसे कहते हैं?
उत्तर
सकल राष्ट्रीय उत्पाद में योगदान देने वाले सभी क्रियाकलापों को हम आर्थिक क्रियाएँ कहते हैं। वे सभी व्यक्ति जो आर्थिक क्रियाओं में संलग्न होते हैं, श्रमिक कहलाते हैं।

प्रश्न 2.
श्रमिक-जनसंख्या अनुपात की परिभाषा दें।
उत्तर
श्रमिक जनसंख्या अनुपात एक सूचक है जिसका प्रयोग देश में रोजगार की स्थिति के विश्लेषण करने के लिए किया जाता है। यह अनुपात यह जानने में सहायक है कि जनसंख्या का कितना अनुपात वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में सक्रिय योगदान दे रहा है।

प्रश्न 3.
क्या ये भी श्रमिक हैं: एक भिखारी, एक चोर, एक तस्कर, एक जुआरी? क्यों?
उत्तर
एक भिखारी, एक चोर, एक तस्कर और एक जुआरी श्रमिक नहीं हैं क्योंकि ये आर्थिक क्रियाओं में कोई योगदान नहीं देते हैं।

प्रश्न 4.
इस समूह में कौन असंगत प्रतीत होता है—
(क) नाई की दुकान का मालिक,
(ख) एक मोची,
(ग) मदर डेयरी का कोषपाल,
(घ) ट्यूशन पढ़ाने वाला शिक्षक,
(ङ) परिवहन कम्पनी का संचालक,
(च) निर्माण मजदूर।
उत्तर
(घ) ट्यूशन पढ़ाने वाला शिक्षक इन सब में असंगत है क्योंकि यह स्व: नियोजित की श्रेणी में आता है जबकि शेष किराये के श्रमिक की श्रेणी में आते हैं।

प्रश्न 5.
नए उभरते रोजगार मुख्यतः …………….क्षेत्रक में ही मिल रहे हैं। (सेवा/विनिर्माण)
उत्तर
सेवा।

प्रश्न 6.
चार व्यक्तियों को मजदूरी पर काम देने वाले प्रतिष्ठान को…………..क्षेत्रक कहा जाता है। (औपचारिक/अनौपचारिक)
उत्तर
अनौपचारिक।

प्रश्न 7.
राज स्कूल जाता है। पर जब वह स्कूल में नहीं होता, तो प्रायः अपने खेत में काम करता| दिखाई देता है। क्या आप उसे श्रमिक मानेंगे? क्यों?
उत्तर
वे सभी व्यक्ति जो आर्थिक क्रियाकलाप में भाग लेते हैं, श्रमिक कहलाते हैं। खेत में काम करना भी एक आर्थिक क्रियाकलाप है क्योंकि इससे वस्तुओं के प्रवाह में बढ़ोतरी होती है। अत: राज को एक श्रमिक माना जा सकता है।

प्रश्न 8.
शहरी महिलाओं की अपेक्षा ग्रामीण महिलाएँ अधिक काम करती दिखाई देती हैं। क्यों?
उत्तर
भारत में शहरी क्षेत्रों में केवल 14 प्रतिशत महिलाएँ ही किसी आर्थिक कार्य में व्यस्त हैं तथा ग्रामीण क्षेत्रों में 30 प्रतिशत महिलाएँ आर्थिक कार्यों में लगी हुई हैं। शहरी क्षेत्रों में महिलाओं का प्रतिशत इसलिए कम है क्योंक वहाँ पर पुरुष पर्याप्त रूप से उच्च आय अर्जित करने में सफल रहते हैं और वे परिवार की महिलाओं को घर से बाहर रोजगार प्राप्त करने को प्राय: निरुत्साहित करते हैं। शहरी महिलाएँ घरेलू कामकाज में ही व्यस्त रहती हैं और महिलाओं द्वारा परिवार के लिए किए गए अनेक कार्यों को आर्थिक या उत्पादन कार्य ही नहीं माना जाता।

प्रश्न 9.
मीना एक गृहिणी है। घर के कामों के साथ-साथ वह अपने पति की कपड़े की दुकान के काम में भी हाथ बँटाती है। क्या उसे एक श्रमिक माना जा सकता है? क्यों?
उत्तर
हाँ, मीना को एक श्रमिक माना जा सकता है क्योंकि वह घरेलू कामकाज के साथ-साथ पति की पकड़े की दुकान में भी हाथ बंटाती है जोकि एक आर्थिक क्रियाकलाप है।

प्रश्न 10.
यहाँ किसे असंगत माना जाएगा
(क) किसी अन्य के अधीन रिक्शा चलाने वाला,
(ख) राजमिस्त्री,
(ग) किसी मेकेनिक की दुकान पर काम करने वाला श्रमिक,
(घ) जूते पॉलिश करने वाला लड़का।
उत्तर
यद्यपि उपर्युक्त सभी श्रमिक हैं, क्योंकि ये सभी आर्थिक क्रियाकलाप में संलग्न हैं, फिर भी चारों लोगों में (घ) जूते पॉलिश करने वाला लड़का असंगत है क्योंकि प्रथम तीनों किराए के श्रमिक हैं जबकि जूते पॉलिश करने वाला स्वनियोजित है।

प्रश्न 11.
निम्न सारणी में 1972-73 ई० में भारत में श्रमबल का वितरण दिखा गया है। इसे ध्यान से पढ़कर श्रमबल के वितरण के स्वरूप के कारण बताइए। ध्यान रहे कि ये आँकड़े 30 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 1
उत्तर
उपर्युक्त तालिका में दिए गए तथ्यों के आधार पर निम्न निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं

  1. भारत में कुल श्रमबल (19.4 + 3.9 = 23.3 करोड़) या 233 मिलियन था, जिसमें 194 मिलियन ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत थे, शेष शहरी क्षेत्रों में कार्यरत थे।
  2. कुल श्रमबल में 157 मिलियन पुरुष (68%) तथा 76 मिलियन (32%) महिलाएँ थीं।
  3. 125 मिलियन पुरुष (64%) ग्रामीण क्षेत्रों में काम करते थे।
  4. कुल रोजगार में पुरुष श्रमिकों का प्रतिशत 82 तथा महिलाओं का प्रतिशत 9.18 था।
  5. कुल महिला श्रमिकों में ग्रामीण महिला श्रमिकों का प्रतिशत 91 तथा शहरी क्षेत्रों में महिला श्रमिकों का प्रतिशत 9 था।

प्रश्न 12.
इस सारणी में 1999-2000 में भारत की जनसंख्या और श्रमिक जनानुपात दिखाया गया है। क्या आप भारत के (शहरी और सकल) श्रमबल का अनुमान लगा सकते हैं?
UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 5 Human Capital Formation in India 2
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 5 Human Capital Formation in India 3

ग्रामीण क्षेत्र में कुल कार्यबल = 30.12
करोड़ शहरी क्षेत्र में कुल कार्यबल = 961 करोड़
|
कुल कार्यबल =39.66 करोड़

प्रश्न 13.
शहरी क्षेत्रों में नियमित वेतनभोगी कर्मचारी ग्रामीण क्षेत्र से अधिक क्यों होते हैं?
उत्तर
भारत में अधिकांश जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च आय के अवसर सीमित होते हैं। श्रम बाजार में भागीदारी हेतु भी संसाधनों की उनके पास कमी होती है। उनमें से अधिकांश व्यक्ति स्कूल, महाविद्यालय या किसी प्रशिक्षण संस्थान में नहीं जा पाते। यदि कुछ जाते भी हैं तो वे बीच में ही छोड़कर श्रम शक्ति में सम्मिलित हो जाते हैं। इसके विपरीत शहरी लोगों के पास शिक्षा और प्रशिक्षण पाने हेतु अधिक अवसृर होते हैं। शहरी जनसमुदाय को रोजगार के भी विविधतापूर्ण अवसर उपलब्ध हो जाते हैं। वे अपनी शिक्षा और योग्यता के अनुरूप रोजगार की तलाश में रहते हैं किन्तु ग्रामीण क्षेत्र के लोग घर पर नहीं बैठ सकते, क्योंकि उनकी आर्थिक दशा उन्हें ऐसा नहीं करते देती। इस कारण गाँवों की तुलना में शहरों में नियमित वेतनभोगी श्रमिक अधिक पाए जाते हैं।

प्रश्न 14.
नियमित वेतनभोगी कर्मचारियों में महिलाएँ कम क्यों हैं?
उत्तर
जब किसी श्रमिक को कोई व्यक्ति या उद्यम नियमित रूप से काम पर रख उसे मजदूरी देता है, तो वह श्रमिक नियमित वेतनभोगी कर्मचारी कहलाता है। भारत में नियमित वेतनभोगी रोजगारधारियों में पुरुष अधिक अनुपात में लगे हुए हैं। देश के 18 प्रतिशत पुरुष नियमित वेतनभोगी हैं और इस वर्ग में केवल 6 प्रतिशत ही महिलाएँ हैं। महिलाओं की इस कम सहभागिता का एक कारण कौशल स्तर में अन्तर हो सकता है। नियमित वेतनभागी वाले कार्यों में अपेक्षाकृत उच्च कौशल और शिक्षा के उच्च स्तर की आवश्यकता होती है। सम्भवत: इस अभाव के कारण ही अधिक अनुपात में महिलाओं को रोजगार नहीं मिल पा रहे हैं।

प्रश्न 15.
भारत में श्रमबल के क्षेत्रकवार वितरण की हाल की प्रवृत्तियों का विश्लेषण करें।
उत्तर
देश के आर्थिक विकास के क्रम में श्रमबल का प्रवाह कृषि एवं सम्बन्धित क्रयाकलापों से उद्योग एवं सेवा क्षेत्रक की ओर बढ़ा है। आर्थिक संवृद्धि की प्रक्रिया में मजदूर ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों को प्रवसन करते हैं। विकास के अन्तर्गत सेवा क्षेत्रक का अधिक विकास होने पर उद्योग क्षेत्र का रोजगार के मामले में हिस्सा घटने लगता है। भारत में अधिकांश श्रमिकों के रोजगार का प्रमुख स्रोत प्राथमिक क्षेत्रक है। द्वितीयक क्षेत्रक केवल 16 प्रतिशत श्रमबल को ही नियोजित कर रहा है। लगभग 24 प्रतिशत श्रमिक सेवा क्षेत्रक में लगे हुए हैं। ग्रामीण भारत में कृषि, खनन एवं उत्खनन की क्रियाओं में तीन-चौथाई प्रतिशत ग्रामीण रोजगार पाते हैं जबकि विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्रक में रोजगार पाने वाले ग्रामीणों का अनुपात क्रमशः 10 एवं 13 प्रतिशत है। 60 प्रतिशत शहरी श्रमिक सेवा क्षेत्रक में हैं। लगभग 30 प्रतिशत शहरी श्रमिक द्वितीयक क्षेत्रक में नियोजित हैं।

प्रश्न 16.
1970 से अब तक विभिन्न उद्योगों में श्रमबल के वितरण में शायद ही कोई परिवर्तन आया 
है। टिप्पणी करें।
उत्तर
भारत एक कृषिप्रधान देश है। यहाँ की जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग ग्रामीण क्षेत्रों में बसा है एवं कृषि और उससे सम्बन्धित क्रियाओं पर निर्भर है। भारत में विकास योजनाओं का ध्येय कृषि पर निर्भर जनसंख्या के अनुपात को कम करना रहा है। लेकिन कृषि श्रम का गैर-कृषि श्रम के रूप में खिसकाव अपर्याप्त रहा है। वर्ष 1972-73 में प्राथमिक क्षेत्रक में 74 प्रतिशत श्रमबल लगा था, वहीं 1999-2000 ई० में यह अनुपात घटकर 60 प्रतिशत रह गया। द्वितीयक तथा सेवा क्षेत्रक में यह प्रतिशत क्रमशः 11 से बढ़कर 16 तथा 15 से बढ़कर 24 प्रतिशत हो गया है। परन्तु राष्ट्र की विशालता एवं भौतिक प्राकृतिक संसाधनों की तुलना में उक्त बदलाव नगण्य दिखाई पड़ता है।

प्रश्न 17.
क्या आपको लगता है पिछले 50 वर्षों में भारत में रोजगार के सृजन में भी सकल घरेलू उत्पाद के अनुरूप वृद्धि हुई है? कैसे? उत्तर
सकल घरेलू उत्पाद (G.D.P.) एक वर्ष की अवधि में देश में हुए सभी वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन का बाजार मूल्य होता है। 1960-2000 ई० की अवधि में सकल घरेलू उत्पाद में सकारात्मक वृद्धि हुई है और यह संवृद्धि दर रोजगार वृद्धि दर से अधिक रही है। सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर में कुछ उतार-चढ़ाव भी आते रहे हैं परन्तु इस अवधि में रोजगार की वृद्धि लगभग 2 प्रतिशत बनी रही। परन्तु 1990 ई० के अन्तिम वर्षों में रोजगार वृद्धि दर कम होकर उसी स्तर पर पहुँच गई जहाँ योजनाकाल के प्रथम चरणों में थी। इस अवधि में सकल घरेलू उत्पाद एवं रोजगार बढ़ोतरी की दरों में अन्तर रहा है। इस प्रकार हम भारतीय अर्थव्यवस्था में रोजगार सृजन के बिना ही अधिक वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करने में सक्षम रहे हैं।

प्रश्न 18.
क्या औपचारिक क्षेत्रक में ही रोजगार का सृजन आवश्यक है? अनौपचारिक में नहीं? कारण बसाइए।
उत्तर
सार्वजनिक क्षेत्रक की सभी इकाइयाँ एवं 10 या अधिक कर्मचारियों को रोजगार देने वाले निजी क्षेत्रक की इकाइयाँ औपचारिक क्षेत्रक माने जाते हैं। इन इकाइयों में काम करने वाले को औपचारिक क्षेत्र के कर्मचारी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी इकाइयाँ और उनमें कार्य कर रहे श्रमिक, अनौपचारिक श्रमिक कहलाते हैं।

औपचारिक क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के लाभ मिलते हैं। इनकी आमदनी भी अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों से अधिक होती है। इसके विपरीत अनौपचारिक क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों की आय नियमित नहीं होती है तथा उनके काम में भी निश्चितता एवं नियमितता नहीं होती। किन्तु दोनों ही क्षेत्रक रोजगार देते हैं, अत: दोनों को ही विकास आवश्यक है। साथ ही अनौपचारिक क्षेत्र को नियमित एवं नियन्त्रित करना भी आवश्यक है।

प्रश्न 19.
विक्टर को दिन में केवल दो घण्टे काम मिल पाता है। बाकी सारे समय वह काम की तलाश में रहता है। क्या वह बेरोजगार है? क्यों? विक्टर जैसे लोग क्या काम करते होंगे?
उत्तर
विक्टर दिन में दो घण्टे काम करता है अर्थात् वह आर्थिक क्रियाकलाप में बहुत कम समय के लिए भाग लेता है। आर्थिक क्रियाकलाप में भाग लेने के कारण उसे श्रमिक कहा जा सकता है। लेकिन विक्टर को पूर्ण रोजगार प्राप्त नहीं है। उसका रोजगार अनियमित है। दूसरे शब्दों में वह अर्द्ध-बेरोजगार है। ऐसे लोग सकल घरेलू उत्पाद में तनिक-सा ही योगदान कर पाते हैं। अत: उनको नियमित रोजगार दिया जाना चाहिए।

प्रश्न 20.
क्या आप गाँव में रह रहे हैं? यदि आपको ग्राम-पंचायत को सलाह देने को कहा जाए तो आप | गाँव की उन्नति के लिए किस प्रकार के क्रियाकलाप का सुझाव देंगे, जिससे रोजगार सृजन भी हो।
उत्तर
ग्रामवासी होन के नाते मैं ग्राम पंचायत को गाँव की उन्नति के लिए निम्नलिखित सुझाव दूंगा

  1. ग्राम पंचायत आधारित संरचना के विकास पर समुचित ध्यान दे। नालियाँ, पुलियाएँ व सड़क : बनवाएँ। इससे रोजगार के नए-नए अवसर सृजित होंगे।
  2. वह गाँव में कुटीर उद्योगों के विकास पर बल दे। इससे खाली समय में लोगों को रोजगार मिलेगा।
  3. गाँवों में सार्वजनिक निर्माण कार्यों को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार वित्तीय सहायता उपलब्ध | कराए।
  4. ग्रामीणों के लिए रोजगार सुनिश्चित किया जाए।
  5. बेसहारा बुजुर्गों, विधवा महिलाओं और अनाथ बच्चों के लिए सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराए।
  6. ग्राम पंचायत देखे कि गाँव का प्रत्येक बच्चा पढ़ने के लिए पाठशाला जाता है।
  7. ग्राम पंचायत गाँव में बच्चों के लिए स्वस्थ मनोरंजन के साधन उपलब्ध कराए।

प्रश्न 21.
अनियत दिहाड़ी मजदूर कौन होते हैं?
उत्तर
जब एक श्रमिक को जितने समय काम करना चाहिए उससे कम समय काम मिलता है अथवा वर्ष में कुछ महीनों के लिए बेकार रहना पड़ता है तो उसे अनियत दिहाड़ी मजदूर कहा जाता है। अनियत मजदूर को अपने काम के बदले उचित दाम व सामाजिक सुरक्षा के लाभ नहीं मिलते हैं। निर्माण मजदूर अनियत मजदूरी वाले श्रमिक कहलाते हैं।

प्रश्न 22.
आपको यह कैसे पता चलेगा कि कोई व्यक्ति अनौपचारिक क्षेत्रक में काम कर रहा है?
उत्तर
भारत में श्रमबल को औपचारिक तथा अनौपचारिक दो वर्गों में विभाजित किया गया है। सभी सार्वजनिक प्रतिष्ठानों तथा 10 या अधिक कर्मचारियों को रोजगार देने वाले निजी क्षेत्रक में काम करने वाले श्रमिकों को औपचारिक श्रमिक हो जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी उद्यम और उनमें काम कर रहे श्रमिकों को अनौपचारिक श्रमिक हो जाएगा। किसान, मोची, छोटे दुकानदार अनौपचारिक क्षेत्रक में काम करने वाले श्रमिक हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
गाँवों की तुलना में शहरों में नियमित वेतनभोगी श्रमिक पाए जाते हैं
(क) कम
(ख) अधिक
(ग) नगण्य ।
(घ) लगभग बराबर
उत्तर
(ख) अधिक

प्रश्न 2.
जब श्रमिक की उत्पादकता शून्य अथवा ऋणात्मक होती है, उसे कहते हैं
(क) मौसमी बेरोजगारी ।
(ख) स्थायी बेरोजगारी ।
(ग) छिपी हुई बेरोजगारी
(घ) शिक्षित बेरोजगारी
उत्तर
(ग) छिपी हुई बेरोजगारी

प्रश्न 3.
बेरोजगारी का सामाजिक दुष्परिणाम है१
(क) मानव संसाधन का निष्क्रिय पड़ा रहना
(ख) उत्पादन की हानि होना ।
(ग) उत्पादता का स्तर निम्न रहना
(घ) सामाजिक अशान्ति बढ़ना
उत्तर
(घ) सामाजिक अशान्ति बढ़ना

प्रश्न 4.
भारत का मुख्य व्यवसाय क्या है?
(क) कृषि
(ख) वाणिज्य
(ग) खनन
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(क) कृषि

प्रश्न 5.
भारत में कौन-सी बेरोजगारी की स्थिति बड़ी करुण व दयनीय है?
(क) शिक्षित
(ख) मौसमी
(ग) औद्योगिक
(घ) अदृश्य
उत्तर
(क) शिक्षित

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सकल घरेलू उत्पाद क्या है?
उत्तर
किसी देश में एक वर्ष में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का कुल मौद्रिक मूल्य इसका सकल घरेलू उत्पाद’ कहलाता है।

प्रश्न 2.
आर्थिक क्रियाएँ क्या हैं?
उत्तर
सकल राष्ट्रीय उत्पाद में योगदान देने वाले सभी क्रियाकलापों को आर्थिक क्रियाएँ कहते हैं।

प्रश्न 3.
श्रमिक कौन हैं?
उत्तर
वे सभी व्यक्ति जो आर्थिक क्रियाओं में संलग्न होते हैं, श्रमिक कहलाते हैं।

प्रश्न 4.
भारत में रोजगार की प्रकृति कैसी है?
उत्तर
भारत में रोजगार की प्रकृति बहुमुखी है। कुछ लोगों को वर्ष भर रोजगार प्राप्त होता है तो कुछ लोग वर्ष में कुछ महीने ही रोजगार पाते हैं।

प्रश्न 5.
देश में रोजगार की स्थिति के विश्लेषण के लिए किस सूचक का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर
देश में रोजगार की स्थिति के विश्लेषण के लिए ‘श्रमिक जनसंख्या अनुपात’ का प्रयोग किया जाता है। यह सूचक यह जानने में सहायक है कि जनसंख्या का कितना अनुपात वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में सक्रिय रूप से योगदान दे रहा है।

प्रश्न 6.
‘जनसंख्या से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
‘जनसंख्या’ शब्द का अभिप्राय किसी क्षेत्र-विशेष में किसी समय-विशेष पर रह रहे व्यक्तियों की कुल संख्या से है।

प्रश्न 7.
श्रमिक-जनसंख्या अनुपात का आकलन कैसे किया जाता है?
उत्तर
श्रमिक-जनसँख्या अनुपात का आकलन करने के लिए देश में कार्य कर रहे सभी श्रमिकों की संख्या को देश की जनसंख्या से भाग देकर उसे 100 से गुणा कर दिया जाता है। सूत्र रूप में,
UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 5 Human Capital Formation in India 4
प्रश्न 8.
‘श्रमबल से क्या आशय है?
उत्तर
‘श्रमबल’ से आशय व्यक्तियों की उस संख्या से है जो वास्तव में काम कर रहे हैं या काम करने के इच्छुक हैं।

प्रश्न 9.
‘कार्यबल से क्या आशय है?
उत्तर
‘कार्यबल’ से आशय व्यक्तियों की उस संख्या से है जो वास्तव में काम कर रहे हैं।

प्रश्न 10.
सहभागिता दर से क्या आशय है?
उत्तर
सहभागिता दर से आय जनसंख्या के उस प्रतिशत से है जो वास्तव में उत्पादन क्रिया में सहभागी होते हैं। इसे देश की कुल जनसंख्या तथा कार्यबल के बीच अनुपात के रूप में मापा जाता है। सूत्र रूप में,
UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 5 Human Capital Formation in India 5

प्रश्न 11.
‘मजदूरी रोजगार’ में कौन आते हैं?
उत्तर
‘मजदूरी रोजगार’ में वे व्यक्ति आते हैं जिनको अन्य व्यक्तियों ने रोजगार प्रदान किया हुआ है और इन्हें अपनी सेवाओं के बदले मजदूरी प्राप्त होती है।

प्रश्न 12.
स्वनियोजित किन व्यक्तियों को कहा जाता है?
उत्तर
स्वनियोजित उन व्यक्तियों को कहा जाता है जो अपने उद्यम के स्वामी और संचालक होते हैं। कपड़े की दुकान का स्वामी स्वनियोजित है।

प्रश्न 13.
नियमित वेतनभोगी कर्मचारी कौन हैं?
उत्तर
जब किसी श्रमिक को कोई व्यक्ति या उद्यम नियमित रूप से काम पर रख उसे मजदूरी देता है तो वह श्रमिक नियमित वेतनभोगी कर्मचारी’ कहलाता है।

प्रश्न 14.
देश की आजीविका का सर्वप्रमुख स्रोत क्या है? ”
उत्तर
देश की आजीविका का सर्वप्रमुख स्रात ‘स्वरोजगार है। 50 प्रतिशत से अधिक लोग इसी वर्ग में कार्यरत हैं।

प्रश्न 15.
भारत में अधिकांश श्रमिकों के रोजगार का प्रमुख स्रोत कौन-सा है?
उत्तर
भारत में अधिकांश श्रमिकों के रोजगार का स्रोत प्राथमिक क्षेत्रक (लगभग 60%) है।

प्रश्न 16.
गत 50 वर्षों से योजनाबद्ध विकास का प्रमुख उददेश्य क्या रहा है?
उत्तर
गते 50 वर्षों से योजनाबद्ध विकास का प्रमुख उद्देश्य राष्ट्रीय उत्पाद और रोजगार में वृद्धि के माध्यम से अर्थव्यवस्था का प्रसार रहा है।

प्रश्न 17.
श्रमबल में किन श्रमिकों का अनुपात निरन्तर बढ़ रहा है? ”
उत्तर
श्रमबल में अनियत श्रमिकों का अनुपात निरन्तर बढ़ रहा है।

प्रश्न 18.
श्रमबल को किन दो वर्गों में विभाजित किया जाता है?
उत्तर
श्रमबल को निम्नलिखित दो वर्गों में विभाजित किया जाता है-
1. औपचारिक अथवा संगठित वर्ग,
2. अनौपचारिक अथवा असंगठित वर्ग।।

प्रश्न 19.
संगठित अथवा औपचारिक वर्ग में कौन-कौन से प्रतिष्ठान आते हैं?
उत्तर
सभी सार्वजनिक क्षेत्रक प्रतिष्ठान तथा 10 या अधिक कर्मचारियों को रोजगार देने वाले निजी क्षेत्रक प्रतिष्ठान, संगठित क्षेत्र में सम्मिलित किए जाते हैं।

प्रश्न 20.
अनौपचारिक (असंगठित क्षेत्रक में कौन-कौन से कर्मचारी सम्मिलित होते हैं?
उत्तर
अनौपचारिक (असंगठित) क्षेत्रक में करोड़ों किसान, कृषि श्रमिक, छोटे-छोटे काम धन्धे चलाने वाले और उनके कर्मचारी तथा सभी सुनियोजित व्यक्ति जिनके पास भाड़े के श्रमिक नहीं हैं, सम्मिलित हैं।

प्रश्न 21.
बेरोजगारी से क्या आशय है?
उत्तर
बेरोजगारी वह दशा है जिसमें शारीरिक तथा मानसिक दृष्टि से कार्य करने के योग्य और प्रचलित मजदूरी पर कार्य करने को तत्पर व्यक्ति को कार्य न मिले।।

प्रश्न 22.
ऐच्छिक बेरोजगारी से क्या आशय है?
उत्तर
प्रत्येक समाज में प्रत्येक समय कुछ-न-कुछ व्यक्ति ऐसे अवश्य होते हैं जो काम करने के योग्य होते हुए भी काम करना नहीं चाहते। यह ऐच्छिक बेरोजगारी की अवस्था कहलाती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बेरोजगारी के आर्थिक व सामाजिक दुष्परिणाम बताइए।
उत्तर
बेरोजगारी के आर्थिक दुष्परिणाम निम्नलिखित हैं

  1. मानव संसाधन निष्क्रिय रहते हैं। यह एक प्रकार का अपव्यय है।
  2. उत्पादन की हानि होती है।
  3. निवेशाधिक्य सृजित न होने के कारण पूँजी-निर्माण की दर धीमी रहती है।
  4. उत्पादकता का स्तर निम्न रहता है।

बेरोजगारी के सामाजिक दुष्परिणाम निम्नलिखित हैं

  1. जीवन की गुणवत्ता कम होती है।
  2. आय तथा सम्पत्ति के वितरण में असमानता बढ़ती जाती है।
  3. इससे सामाजिक अशान्ति बढ़ती है।
  4. इस अवस्था में वर्ग-संघर्ष पनपता है।

प्रश्न. 2.
रोजगार/बेरोजगारी की सामान्य, साप्ताहिक तथा दैनिक स्थिति को समझाइए।
उत्तर-
1. सामान्य स्तर- यह वह स्थिति है जिसमें एक व्यक्ति अपना अधिकांश समय काम में व्यतीत करता है। भारत में सामान्य तथा 183 दिवस काम को मानक सीमा बिन्दु माना जाता है। जो व्यक्ति वर्ष में 183 या अधिक दिन काम करते हैं, वे सामान्य रोजगार प्राप्त हैं, अन्य सामान्य रूप से बेरोजगार हैं।

2. साप्ताहिक स्तर- यदि अनुबन्धित सप्ताह के दौरान आप कार्यबल का भाग बन जाते हैं तो आपको साप्ताहिक स्तर के आधार पर रोजगार प्राप्त माना जाएगा अन्यथा साप्ताहिक स्तर पर बेरोजगार।

3. दैनिक स्तर- इसका अनुमान व्यक्ति दिवसों के रूप में लगाया जाता है। ‘साप्ताहिक स्तर दीर्घकालीन बेरोजगारी की ओर संकेत करता है जबकि ‘दैनिक स्तर’ दीर्घकालीन तथा छिपी दोनों बेरोजगारियों का संकेत देता है।

प्रश्न 3.
अदृश्य अथवा छिपी बेरोजगारी से क्या आशय है? ।
उत्तर
अदृश्य अथवा छिपी बेरोजगारी आंशिक बेरोजगारी की वह अवस्था है जिसमें रोजगार में संलग्न श्रम शक्ति का उत्पादन में यागदान शून्य या लगभग शून्य होता है। किसी व्यवसाय/उद्योग में आवश्यकता से अधिक श्रम का लगा होना अदृश्य बेरोजगारी को जन्म देता है। अदृश्य बेरोजगारी निम्न दो रूपों में पाई जाती है
1. जब लोग अपनी योग्यता से कम उत्पादन कार्यों में लगे होते हैं। यह सामान्यतः औद्योगिक देशों में पाई जाती है।
2. जब किसी कार्य में आवश्यकता से अधिक लोग लगे होते हैं। यह बेरोजगारी प्रायःअल्पविकसित कृषिप्रधान देशों में पाई जाती है।

अदृश्य बेरोजगारी की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. इसका सम्बन्ध अपना निजी काम करने वालों से होता है, मजदूरी पर काम करने वाले लोगों से | नहीं।
  2. यह दीर्घकालीन जनाधिक्य का परिणाम होती है।
  3. इसका कारण पूरक साधनों की कमी का होना है।

प्रश्न 4.
सामान्यतः आर्थिक क्रियाओं को किन वर्गों में विभाजित किया जाता है?
उत्तर
आर्थिक क्रियाओं को निम्न वर्गों में विभाजित किया जाता है–
1. प्राथमिक क्षेत्रक, जिसमें
(क) कृषि तथा
(ख) खनन व उत्खनन सम्मिलित होते हैं।

2. द्वितीयक क्षेत्रक, जिसमें
(क) विनिर्माण,
(ख) विद्युत, गैस एवं जलापूर्ति तथा
(ग) निर्माण 
कार्य सम्मिलित होते हैं।

3. तृतीयक अथवा सेवा क्षेत्रक, जिसमें
(क) वाणिज्य,
(ख) परिवहन और भण्डारण तथा
(ग) सेवाएँ सम्मिलित होती हैं।

प्रश्न 5.
सरकार रोजगार सृजन के लिए क्या प्रयास करती है?
उत्तर
केन्द्र एवं राज्य सरकारें रोजगार सृजन हेतु अवसरों की रचना करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती आ रही हैं। इनके प्रयासों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है—प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष रूप से सरकार अपने विभिन्न विभागों में प्रशासकीय कार्यों के लिए नियुक्तियाँ करती है। सरकार अनेक उद्योग, होटल और परिवहन कम्पनियाँ भी चला रही है। इन सब में वह प्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्रदान करती है। सरकारी उद्यमों में उत्पादकता के स्तर में वृद्धि अन्य उद्यमों के विस्तार को प्रोत्साहित करती है जिससे रोजगार के नए-नए अवसर सृजित होते हैं।देश में निर्धनता निवारण के लिए चलाए ज रहे विभिन्न कार्यक्रम रोजगार सृजन कार्यक्रम ही हैं। से कार्यक्रम केवल रोजगार ही उपलब्ध नहीं कराते अपितु इनके सहारे प्राथमिक, जनस्वास्थ्य, प्राथमिक शिक्षा, ग्रामीण आवास, ग्रामीण जलापूर्ति, पोषण, लोगों की आय तथा रोजगार सृजन करने वाली परिसम्पत्तियाँ खरीदने में सहायता, दिहाड़ी रोजगार के सृजन के माध्यम से सामुदायिक परिसम्पत्तियों का विकास, गृह और स्वच्छता सुविधाओं का निर्माण, गृहनिर्माण के लिए सहायता, ग्रामीण सड़कों का निर्माण और बंजर भूमि आदि के विकास के कार्य पूरे किए जाते हैं।

प्रश्न 6.
क्या आप जानते हैं कि भारत जैसे देश में रोजगार वृद्धि की दर को 2 प्रतिशत स्तर पर बनाए रखना इतना आसान काम नहीं है? क्यों?
उत्तर
भारत एक विकासशील देश है। कृषि यहाँ का मुख्य व्यवसाय है। भारत के लगभग 60 प्रतिशत लोग कृषि कार्यों में संलग्न हैं। जनसंख्या की तीव्र वृद्धि के कारण कृषि क्षेत्र में श्रमाधिक्य है। पूँजी व अन्य सहायक साधनों के अभाव में रोजगार के आवश्यक अवसरों का सृजन नहीं हो पाता है। सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में देरी तथा सार्वजनिक रूप से बढ़ते भ्रष्टाचार के कारण ये परियोजनाएँ पूर्णत: सफल नहीं हो पाती हैं। बढ़ती मुद्रा स्फीति के कारण इन परियोजनाओं की लागत भी बढ़ती जाती है। इसके अतिरिक्त, इनके लाभ भी लाभार्थियों तक नहीं पहुँच पाते हैं।

प्रश्न 7.
इनमें से असंगठित क्षेत्रकों की क्रियाओं में लगे व्यक्तियों के सामने चिह्न अंकित करें

  1. एक ऐसे होटल का कर्मचारी, जिसमें सात भाड़े के श्रमिक एवं तीन पारिवारिक सदस्य हैं।
  2. एक ऐसे निजी विद्यालय का शिक्षक, जहाँ 25 शिक्षक कार्यरत हैं।
  3. एक पुलिस सिपाही।
  4. सरकारी अस्पताल की एक नर्स।
  5. एक रिक्शाचालक।
  6. कपड़े की दुकान का मालिक, जिसके यहाँ नौ श्रमिक कार्यरत हैं।
  7. एक ऐसी बेस कम्पनी का चालक, जिसमें 10 से अधिक बसें और 20 चालक, संवाहक तथा अन्य कर्मचारी हैं।
  8. दस कर्मचारियों वाली निर्माण कम्पनी का सिविल अभियन्ता।
  9. राज्य सरकारी कार्यालय में अस्थायी आधार पर नियुक्त कम्प्यूटर ऑपरेटर।
  10. बिजली दफ्तर का एक क्लर्क।

उत्तर
असंगठित क्षेत्रकों की क्रियाओं में संलग्न व्यक्ति हैं-
(1) एक ऐसे होटल का कर्मचारी, जिसमें सात भाड़े के श्रमिक एवं तीन पारिवारिक सदस्य हैं।
(5) एक रिक्शाचालक।
(6) कपड़े की दुकान का मालिक, जिसके यहाँ नौ श्रमिक कार्यरत हैं।
(9) राज्य सरकारी कार्यालय में अस्थायी आधार पर नियुक्त कम्प्यूटर ऑपरेटर। 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बेरोजगारी किसे कहते हैं? भारत में बेरोजगारी के विभिन्न स्वरूप बताइए।
उत्तर
पूर्ण रोजगार के अभाव की स्थिति को बेरोजगारी कहते हैं। यह एक अत्यन्त पतित एवं दूषित स्थिति है जिसे ‘आर्थिक बरबादी’ के नाम से भी पुकारा जाता है। वस्तुतः बेरोजगारी की स्थिति आर्थिक विकास के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है जो सामाजिक और राजनीतिक अशान्ति को जन्म देती है। इसका समस्त समाज पर व्यापक दुष्प्रभाव पड़ता है। अर्थशास्त्रीय दृष्टि से वही व्यक्ति बेरोजगार कहलाता है, जो शारीरिक तथा मानसिक दृष्टि से कार्य करने के योग्य हो। साथ ही, प्रचलित मजदूरी की दर पर कार्य करने को तत्पर भी हो, परंतु उसे कार्य न मिले। इसके विपरीत, यदि कोई व्यक्ति शारीरिक या मानसिक दृष्टि से कार्य करने के योग्य नहीं है अथवा प्रचलित मजदूरी की दर पर कार्य करने के लिए तत्पर नहीं है (जबकि उसे कार्य उपलब्ध हो) तो उसे 
बेरोजगार नहीं कहा जाएगा। अभिप्राय यह है कि अर्थशास्त्र में ऐच्छिक बेरोजगारी (Voluntary Unemployment) को बेरोजगारी नहीं कहा जाता।

ऐच्छिक बेरोजगारी
प्रत्येक समाज में प्रत्येक समय कुछ-न-कुछ व्यक्ति ऐसे अवश्य पाए जाते हैं जो काम करने के स्रोग्य होते हुए भी काम नहीं करना चाहते। इस प्रकार की बेरोजगारी प्राय: तीन कारणों से उत्पन्न होती है

  1. कुछ व्यक्ति आलसी व कमजोर होने के कारण काम पसन्द नहीं करते जैसी भिखारी, साधु आदि।
  2. कुछ व्यक्ति धनी होने के कारण काम करने की आवश्यकता ही नहीं समझते।
  3. कुछ व्यक्ति उदासीन प्रकृति के होते हैं।

अनैच्छिक बेरोजगारी
जब स्वस्थ, योग्य एवं काम के इच्छुक व्यक्तियों को मजदूरी की प्रचलित दर पर काम नहीं मिल पाता तो इसे अनैच्छिक बेरोजगारी कहते हैं। कीन्स के अनुसार-“इस प्रकार की बेरोजगारी प्रभावपूर्ण माँग में कमी होने के कारण उत्पन्न होती है।”

भारत में बेरोजगारी का स्वरूप

भारत एक विकासशील देश है। अतः यहाँ ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी का स्वरूप एक-सा नहीं पाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी के तीन मुख्य रूप दिखाई देते हैं-खुली बेरोजगारी, मौसमी बेरोजगारी और छिपी हुई बेरोजगारी। शहरों में पाई जाने वाली बेरोजगारी मुख्यतः दो प्रकार की है—औद्योगिक बेरोजगारी और शिक्षित बेरोजगारी।

ग्रामीण बेरोजगारी
भारत में ग्रामीण बेरोज़गारी का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है

1. खुली बेरोजगोरी– इससे हमारा अभिप्राय उन व्यक्तियों से है जिन्हें जीवन-यापन हेतु कोई कार्य नहीं मिलता। इसे स्थायी बेरोजगारी भी कहा जाता है। इस स्थायी बेरोजगारी के अन्तर्गत भारतीय गाँवों में बहुत सारे व्यक्ति बेरोजगार रहते हैं। स्थायी बेरोजगारी का मुख्य कारण कृषि पर जनसंख्या की अत्यधिक निर्भरता है।

2. मौसमी बेरोजगारी– इस प्रकार की बेरोजगारी वर्ष के कुछ महीनों में अधिक दिखाई देती है। श्रम की माँग में होने वाले परिवर्तनों में मौसमी बेरोजगारी की मात्रा भी परिवर्तित होती रहती है। सामान्यतः फसलों के बोने तथा काटने के समय श्रम की अधिक माँग रहती है, परन्तु अन्य मौसमों में रोजगार उपलब्ध नहीं होता। ग्रामीणों को सामान्यतया साल में 128 से 196 दिन तक बेरोजगार रहना पड़ता है।

3. छिपी हुई बेरोजगारी– जब श्रमिक की उत्पादकता शून्य अथवा ऋणात्मक होती है, तब उसे छिपी हुई या अदृश्य बेरोजगारी कहते हैं। इस प्रकार की बेरोजगारी का अनुमान लगाना कठिन है। , देश की लगभग 67% जनसंख्या कृषि में संलग्न है जबकि इतनी जन-शक्ति की वहाँ आवश्यकता नहीं है।

शहरी बेरोजगारी 
भारत की शहरी बेरोजगारी का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है
1. औद्योगिक बेरोजगारी- औद्योगिक क्षेत्र में पाई जाने वाली बेरोजगारी को औद्योगिक बेरोजगारी
कहा जाता है। इस प्रकार की बेरोजगारी चक्रीय बेरोजगारी तथा तकनीकी बेरोजगारी से प्रभावित होती है। शिक्षित बेरोजगारी 

2. शिक्षा के प्रसार के साथ- साथ इस प्रकार की बेरोजगारी का प्रसार हो रहा है। देश में शिक्षित बेरोजगारी की स्थिति बड़ी करुण एवं दयनीय हो गई है। ‘भारत में प्रशिक्षितों की बेरोजगारी‘ नामक पुस्तक में स्थिति का मूल्यांकन इन शब्दों में किया गया है-“हमारे ।
शिक्षित युवकों में बढ़ती हुई बेरोजगारी हमारे राष्ट्रीय स्थायित्व के लिए जबरदस्त खतरा है। उसे नियन्त्रित करने के लिए यदि समायोचित कदम नहीं उठाया गया तो भारी उथल-पुथल का अन्देशा

बेरोजगारी एक अभिशाप है। इससे एक ओर राष्ट्र के बहुमूल्य साधनों की बरबादी होती है तो दूसरी ओर निर्धनता, ऋणग्रस्तता, औद्योगिक अशान्ति को जन्म मिलता है। सामाजिक दृष्टि से अपराधों में वृद्धि होती है तथा राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न होती है, जिसका समस्त समाज पर व्यापक दुष्प्रभाव पड़ता है। अतः राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों में कहा गया है कि आजीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करना नागरिकों का अधिकार है।

प्रश्न 2.
भारत में बेरोजगारी के प्रमुख कारण बताइए। बेरोजगारी को दूर करने के लिए उपयुक्त| सुझाव दीजिए।
उत्तर
भारत में बेरोजगारी के कारण भारत में बेरोजगारी के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

1. जनसंख्या में तीव्र वृद्धि–देश में जनसंख्या की वृद्धि-दर लगभग 1.93% वार्षिक रही है। इस प्रकार, जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है, लेकिन रोजगार की सुविधाओं में उस अनुपात में वृद्धि नहीं हुई है।

2. कुटीर उद्योगों का अभाव- भारत में कुटीर उद्योगों का ह्रास हो जाने के कारण भी बेरोजगारी में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है क्योंकि उनमें संलग्न लोगों को अन्य क्षेत्रों में रोजगार नहीं मिला है।

3. दोषपूर्ण शिक्षा-प्रणाली- हमारे देश में दोषपूर्ण शिक्षा-प्रणाली के कारण भी बेरोजगारी में वृद्धि हुई है। भारत में शिक्षा पद्धति व्यवसाय-प्रधान न होकर सिद्धान्त-प्रधान है, जो बेरोजगारी को जन्म दे रही है।

4. यन्त्रीकरण में वृद्धि – विकास की गति को तेज करने के लिए कृषि व उद्योगों में यन्त्रीकरण व आधुनिकीकरण की नीति को अपनाया जा रहा है, जिसके कारण अस्थायी बेरोजगारी को बढ़ावा मिला है।

5. श्रमिकों की गतिशीलता में कमी– शिक्षा का अभाव, पारिवारिक मोह, रूढ़िवादिता,अन्धविश्वास आदि भारतीय श्रमिक की गतिशीलता में बाधक हैं, जिसके कारण व्यक्ति घर पर बेकार रहना पसन्द करता है।

6. अविकसित प्राकृति साधन- यद्यपि हमारे देश में प्राकृतिक साधने पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं।तथापि उनका पूर्ण विदोहन नहीं हुआ है, जिसके कारण देश के औद्योगिक विकास की गति धीमी रही है।

7. तकनीकी ज्ञान का अभाव- देश के शिक्षित समुदाय में तकनीकी ज्ञान का अभाव है। वह केवल लिपिक बन सकता है, किसी भी व्यवसाय को आरम्भ करने की क्षमता उसमें नहीं है। इस कारण देश में शिक्षित बेरोजगारी की प्रचुरता है।

8. बचत तथा विनियोग की न्यून दर– प्रति व्यक्ति आय कम होने के कारण हमारे देश में बचत करने की शक्ति कम है, जिसके फलस्वरूप विनियोग भी कम होता है। विनियोग के अभाव में नवीन उद्योग स्थापित नहीं हो पाते।

9. शरणार्थियों का आगमन- म्यांमार, ब्रिटेन, श्रीलंका, कीनिया, युगाण्डा आदि देशों से भारतीयों के लौटने तथा पाकिस्तान के शरणार्थियों के आगमन के कारण बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि रही

10. दोषपूर्ण विचार पद्धति–अधिकांश व्यक्ति पढ़ाई के पश्चात् नौकरी चाहते हैं। वे स्वयं अपना कोई कार्य करना पसन्द नहीं करते, जिससे रोजगार चाहने वालों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही

11. पूँजी-गहन परियोजनाओं पर अधिक बल–द्रिय योजना के प्रारम्भ से ही हमने आधारभूत उद्योगों के विकास पर अधिक बल दिया है, जिससे भारी इन्जीनियरी व रसायन उद्योगों में अधिक पूँजी तो लगाई गई, लेकिन उसमें रोजगार के अवसर ज्यादा नहीं खुल पाए।

12. रोजगार-नीति व अंम-शक्ति नियोजन का अभाव योजनाओं में रोजगार प्रदान करने केसम्बन्ध में कोई व्यापक व प्रगतिशील नीति नहीं अपनाई गई। श्रम-शक्ति नियोजन की दिशा में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई। इसके फलस्वरूप देश में बेरोजगारी बढ़ी है।

बेरोजगारी को दूर करने हेतु सुझाव

बेरोजगारी के लिए उत्तरदायी कारणों से स्पष्ट है कि हमारे देश में बेरोजगारी का मूल कारण देश का मन्द आर्थिक विकास है। आज बेरोजगारी समय की सबसे बड़ी चुनौती है; अतः रोजगार की मात्रा में वृद्धि के लिए आर्थिक विकास के कार्यक्रमों की गति देनी ही होगी। इस समस्या को सुलझाने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं-

  1. देश में श्रम-शक्ति की वृद्धि को रोकने के लिए जनसंख्या की वृद्धि पर प्रभावपूर्ण नियन्त्रण लगाया | जाए।
  2. जन-शक्ति के उचित उपयोग के लिए जन-शक्ति का नियोजन (Man-power planning) किया जाए।
  3. योजना में वित्तीय लक्ष्यों की उपलब्धि के साथ रोजगार लक्ष्यों की पूर्ति पर ध्यान केन्द्रित होना | चाहिए। अन्य शब्दों में, पंचवर्षीय योजनाओं को पूर्णरूपेण ‘रोजगार-प्रधान’ बनाया जाए।
  4. कुटीर तथा लघु उद्योगों का विकास किया जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में तो ये उद्योग ही सम्भावित रोजगार । के केन्द्रबिन्दु हैं।
  5. कृषि के विकास तथा हरित क्रान्ति को स्थायी बनाने के प्रयास किए जाएँ।
  6. ग्रामीण औद्योगीकरण का विस्तार किया जाए।
  7. बचत तथा विनियोग दर में वृद्धि का हर सम्भव प्रयास किया जाए, क्योंकि अधिक पूँजी का विनियोग रोजगार के अधिक अवसर प्रदान करेगा।
  8. आर्थिक विकास के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार करने की दृष्टि से शिक्षा-प्रणाली तथा सामाजिक व्यवस्था में वांछित परिवर्तन किया जाए।
  9. रोजगार कार्यालयों (Employment Exchanges) द्वारा रोजगार सेवाओं का विस्तार किया जाए।
  10. बेरोजगारी विशेषज्ञ समिति का सुझाव है कि रोजगार और जन-शक्ति के आयोजन के लिए एक राष्ट्रीय आयोग स्थापित किया जाए।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 2 सत्य की जीत

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 2 सत्य की जीत (द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 2 सत्य की जीत (द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name सत्य की जीत (द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी)
Number of Questions 9
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 2 सत्य की जीत (द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी)

प्रश्न 1:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य का कथानक (कथावस्तु) संक्षेप में लिखिए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में वर्णित अत्यधिक मार्मिक प्रसंग का निरूपण कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी और दुःशासन के वार्तालाप को अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘सत्य की जीत’ में धृतराष्ट्र ने लोकमंगल की जिस नीति की उदघोषणा की है, उसका सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘सत्य की जीत’ के आधार पर दुःशासन एवं विकर्ण के शस्त्र एवं शास्त्र सम्बन्धी विचारों की सम्यक विवेचना कीजिए।
या
“शस्त्र को सर्वस्व मानना विनाश का मूल है।” यह बात ‘सत्य की जीत’ में किस प्रकार अभिव्यक्त की गयी है ?
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
प्रस्तुत खण्डकाव्य की कथा द्रौपदी के चीर-हरण से सम्बद्ध है। यह कथानक महाभारत के सभापर्व में द्यूतक्रीड़ा की घटना पर आधारित है। यह एक अत्यन्त लघुकाव्य है, जिसमें कवि ने पुरातन आख्यान को वर्तमान सन्दर्भो में प्रस्तुत किया है। इसकी कथा संक्षेप में अग्रवत् है–

दुर्योधन पाण्डवों को द्यूतक्रीड़ा के लिए आमन्त्रित करता है। पाण्डव उसके निमन्त्रण को स्वीकार कर लेते हैं। युधिष्ठिर जुए में निरन्तर हारते रहते हैं और अन्त में अपना सर्वस्व हारने के पश्चात् द्रौपदी को भी हार जाते हैं। इस पर कौरव भरी सभा में द्रौपदी को वस्त्रहीन करके अपमानित करना चाहते हैं। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए। दुर्योधन दु:शासन को आदेश देता है कि वह बलपूर्वक द्रौपदी को भरी सभा में लाये। दु:शासन राजमहल से द्रौपदी के केश खींचते हुए सभा में लाता है। द्रौपदी को यह अपमान असह्य हो जाता है। वह सिंहनी के संमान गरजती हुई दुःशासन को ललकारती है। द्रौपदी की गर्जना से पूरा राजमहल हिल जाता है और समस्त सभासद स्तब्ध रह जाते हैं-

ध्वंस विध्वंस प्रलय का दृश्य, भयंकर भीषण हा-हाकार।
मचाने आयी हूँ रे आज, खोल दे राजमहल का द्वार ॥

इसके पश्चात् द्रौपदी और दु:शासन में नारी पर पुरुष द्वारा किये गये अत्याचार, नारी और पुरुष की सामाजिक समानता और उनके अधिकार, उनकी शक्ति, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, शस्त्र और शास्त्र, न्याय-अन्याय आदि विषयों पर वाद-विवाद होता है। अहंकारी दु:शासन भी क्रोध में आ जाता है। ‘भरी सभा में युधिष्ठिर अपना सर्वस्व हार चुके हैं तो मुझे दाँव पर लगाने का उन्हें क्या अधिकार रह गया है ? द्रौपदी के इस तर्क से सभी सभासद प्रभावित होते हैं। वह युधिष्ठिर की सरलता और दुर्योधन आदि कौरवों की कुटिलता का भी रहस्य प्रकट करती है। वह कहती है कि सरल हृदय युधिष्ठिर कौरवों की कुटिल चालों में आकर छले गये हैं; अतः सभा में उपस्थित धर्मज्ञ यह निर्णय दें कि क्या वे अधर्म और कपट की विजय को स्वीकार करते हैं अथवा सत्य और धर्म की हार को अस्वीकार करते हैं ?

कहता है कि यदि शास्त्र-बल से शस्त्र-बल ऊँचा और महत्त्वपूर्ण हो जाएगा तो मानवता का विकास अवरुद्ध . हो जाएगा; क्योंकि शस्त्र-बल मानवता को पशुता में बदल देता है। वह इस बात पर बल देता है कि द्रौपदी द्वारा प्रस्तुते तर्क पर धर्मपूर्वक और न्यायसंगत निर्णय होना चाहिए। वह कहता है कि द्रौपदी किसी प्रकार भी कौरवों द्वारा जीती हुई नहीं है।

किन्तु कौरव ‘विकर्ण की बात को स्वीकार नहीं करते। हारे हुए युधिष्ठिर अपने उत्तरीय वस्त्र उतार देते हैं। दुःशासन द्रौपदी के वस्त्र खींचने के लिए हाथ बढ़ाता है। उसके इस कुकर्म पर द्रौपदी अपने सम्पूर्ण आत्मबल के साथ सत्य का सहारा लेकर उसे ललकारती है और वस्त्र खींचने की चुनौती देती है। वह कहती है कि मैं किसी प्रकार भी विजित नहीं हैं और उसके प्राण रहते उसे कोई भी निर्वस्त्र नहीं कर सकता। यह सुनकर मदान्ध दु:शासन द्रौपदी का चीर खींचने के लिए पुन: हाथ बढ़ाता है। द्रौपदी रौद्र रूप धारण कर लेती है। उसके दुर्गा-जैसे तेजोद्दीप्त भयंकर रौद्र-रूप को देख दुःशासन घबरा जाता है और उसके वस्त्र खींचने में स्वयं को असमर्थ पाता है।

द्रौपदी कौरवों को पुनः चीर-हरण करने के लिए ललकारती है। सभी सभासद द्रौपदी के सत्य, तेज और सतीत्व के आगे निस्तेज हो जाते हैं। वे सभी कौरवों की निन्दा तथा द्रौपदी के सत्य और न्यायपूर्ण पक्ष का समर्थन करते हैं। मेदान्ध दुर्योधन, दु:शासन, कर्ण आदि को द्रौपदी पुन: ललकारती हुई कहती है-

और तुमने देखा यह स्वयं, कि होते जिधर सत्य और न्याय ।
जीत होती उनकी ही सदा, समय चाहे कितना लग जाय ॥

वहाँ उपस्थित सभी सभासद कौरवों की निन्दा करते हैं; क्योंकि वे सभी यह अनुभव करते हैं कि यदि पाण्डवों के प्रति होते हुए इस अन्याय को आज रोका नहीं गया तो इसका परिणाम बहुत बुरा होगा।

अन्त में धृतराष्ट्र उठते हैं और पाण्डवों को मुक्त करने तथा उनका राज्य लौटाने के लिए दुर्योधन को आदेश देते। हैं। इसके साथ ही चे द्रौपदी का पक्ष लेते हुए उसका समर्थन करते हैं तथा सत्य, न्याय, धर्म की प्रतिष्ठा तथा संसार का कल्याण करना ही मानवं-जीवन का उद्देश्य बताते हैं। वे पाण्डवों की कल्याण-कामना करते हुए कहते हैं-

तुम्हारे साथ तुम्हारी सत्य, शक्ति श्रद्धा, सेवा औ’ कर्म ।
यही जीवन के शाश्वत मूल्य, इन्हीं पर टिका मनुज का धर्म ॥
इन्हीं को लेकर दृढ़ अवलम्ब, चल रहे हो तुम पथ पर अभय ।
तुम्हारा गौरवपूर्ण भविष्य, प्राप्त होगी पग-पग पर विजय ॥

धृतराष्ट्र द्रौपदी के विचारों को उचित ठहराते हैं। वे उसके प्रति किये गये दुर्व्यवहार के लिए उससे क्षमा माँगते हैं। तथा कहते हैं-

जहाँ है सत्य, जहाँ है धर्म, जहाँ है न्याय, वहाँ है जीत।
तुम्हारे यश-गौरव के दिग्-दिगन्त में गूंजेंगे स्वर, गीत ॥

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि इस खण्डकाव्य की कथा द्रौपदी के चीरहरण की अत्यन्त संक्षिप्त किन्तु मार्मिक घटना पर आधारित है। द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी ने इस कथा को अत्यधिक प्रभावी बनाया है और युग के अनुकूल बनाकर नारी के सम्मान की रक्षा करने के संकल्प को दुहराया है।

प्रश्न 2:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ की कथावस्तु की समीक्षा कीजिए।
या
“वस्तु-सौष्ठव एवं संगठन की दृष्टि से ‘सत्य की जीत’ एक सफल खण्डकाव्य है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
खण्डकाव्य की दृष्टि से ‘सत्य की जीत’ काव्य की समीक्षा (आलोचना) कीजिए।
या
“सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के रचना-कौशल पर प्रकाश डालिए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की पात्र-योजना अथवा पात्रों की प्रतीकात्मकता पर अपनी दृष्टि डालिए।
उत्तर:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य कथा-संगठन एवं उसके रचना-शिल्प के अनुसार निम्नलिखित विशेषताओं से युक्त है

(1) प्रसिद्ध पौराणिक घटना पर आधारित – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथावस्तु द्रौपदी के चीर-हरण’ की पौराणिक घटना पर आधारित है। महाभारत में वर्णित यह मार्मिक प्रसंग सभी युगों में विद्वानों द्वारा विवाद एवं निन्दात्मक समस्या का विषय बना रहा है। तत्कालीन युग में विदुर ने नारी के इस अपमान को भीषण विनाश का पूर्व संकेत माना था और अधिकांश समालोचकों के अनुसार महाभारत के युद्ध का कारण भी प्रमुख रूप से यही था। पाण्डवों को तत्कालीन समाज का भावनात्मक समर्थन भी इसी कारण मिला था। कवि ने इसी मार्मिक घटना को अपने खण्डकाव्य की कथावस्तु बनाया है।

(2) कथावस्तु का संगठन – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने संवादों के माध्यम से कथा का संगठन किया है। प्रसंग लघु होने के कारण संवाद-सूत्र में व्यक्त की गयी इस कथा का संगठन अत्यन्त उत्तम कोटि का है। कवि ने वातावरण, मनोवेग, आक्रोश आदि की अभिव्यक्ति जिन संवादों द्वारा की है, वह अपनी व्यंजना में पूर्णतया सफल रहे हैं। कथावस्तु में केवल राजसभा का एक दृश्य सामने आता है, किन्तु नाटकीय आरम्भ एवं कौतूहलपूर्ण मोड़ों से गुजरती हुई कथावस्तु स्वाभाविक रूप में तथा त्वरित गति से अपनी सीमा की ओर बढ़ी

(3) कथावस्तु की लघुता में विशालता – ‘सत्य की जीत’ का कथा-प्रसंग अत्यन्त लघु है। कवि ने द्रौपदी के चीर-हरण के प्रसंग पर अपने खण्डकाव्य की कथावस्तु-योजना तैयार की है। इस एक घटना को लेकर कवि ने प्रस्तुत खण्डकाव्य में विशद वस्तु-योजना की है, जिसमें महाभारत काल के साथ-साथ वर्तमान युग के समाज की विसंगतियों के प्रति आक्रोश की उद्घोषणा हुई है ।

पुरुष के पौरुष से ही सिर्फ, बनेगी धरा नहीं यह स्वर्ग।
चाहिए नारी का नारीत्व, तभी होगा पूरा.यह सर्ग।

(4) मौलिकता – यद्यपि ‘सत्य की जीत की कथा महाभारत की चीर-हरण घटना पर आधारित है, किन्तु कवि ने उसके प्रस्तुतीकरण में वर्तमान नारी की दशा को प्रस्तुत किया है और कुछ मौलिक परिवर्तन भी किये हैं। वे द्रौपदी के वस्त्र को श्रीकृष्ण द्वारा बढ़ाया जाता हुआ नहीं दिखाते, वरन् स्वयं द्रौपदी को ही अपने आत्मबल के प्रयोग के द्वारा दुःशासन को रोकते हुए दिखाते हैं। माहेश्वरी जी ने इस प्रसंग को स्वाभाविक एवं बुद्धिगम्य बना दिया है।

(5) देशकाल एवं वातावरण – इस खण्डकाव्य में महाभारतकालीन देशकाल एवं वातावरण का अनुभव अत्यन्त कुशलता से कराया गया है। दृश्य तो एक ही है, किन्तु पात्रों के संवाद एवं उनकी छवि के अंकन से इस देशकाल एवं वातावरण का पूर्ण स्वरूप सामने आ जाता है।

(6) नाटकीयती अथवा संवाद-योजना – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने कथोपकथनों के द्वारा कथा को प्रस्तुत किया है। इसके संवाद सशक्त, पात्रानुकूल तथा कथा-सूत्र को आगे बढ़ाने वाले हैं। कवि के इस प्रयास से काव्य में नाटकीयता का समावेश हो गया है, जिस कारण ‘सत्य की जीत काव्य अधिक आकर्षक बन गया है। द्रौपदी का यह संवाद उसकी निडर मनोवृत्ति का परिचायक हैं

अरे ओ दुर्योधन निर्लज्ज, करता यों बढ़-बढ़कर बात।
बाल बाँकी कर पाया नहीं, तुम्हारा वीर विश्वविख्यात ।।

(7) सुसम्बद्धता – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथावस्तु पात्रों के कथोपकथनों की कड़ियों से सुसम्बद्ध हैं। कवि की कल्पना-शक्ति, अद्भुत प्रस्तुतीकरण और प्रबन्धात्मकता सभी सराहनीय हैं। कथा में आदि से अन्त तक कहीं भी अव्यवस्था नहीं आयी है। इस प्रकार समस्त कथावस्तु सुसम्बद्ध एवं सुव्यवस्थित है।

(8) खण्डकाव्य का सन्देश और उद्देश्य – प्रस्तुत खण्डकाव्य में कवि ने पात्रों के कथोपकथनों तथा तर्कवितर्क द्वारा यह सिद्ध कर दिया है कि असत्य, क्रूरता, अहंकार, अन्याय और अत्याचार की पराजय अवश्य होती है। कवि का उद्देश्य प्रस्तुत खण्डकाव्य की कथा के द्वारा नारी-जागरण एवं शस्त्रों के भण्डारण के विरुद्ध मानवतावादी भावना को स्वर देना है। राष्ट्र या समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना भी इस खण्डकाव्य की कथावस्तु का उद्देश्य है।

(9) पात्रों की प्रतीकात्मकता – इस खण्डकाव्य में प्रस्तुत किये गये सभी पात्रों का प्रतीकात्मक महत्त्व है। द्रौपदी सत्य, न्याय, धर्म आदि के गुणों की पुंज एवं अपने अधिकारों के लिए सजग और प्रगतिशील नारी को प्रतीक है। दु:शासन और दुर्योधन अनैतिकता एवं हिंसावृत्ति के प्रतीक हैं। पाण्डवों की प्रतीकात्मकता निम्नलिखित पंक्तियों से स्पष्ट है

युधिष्ठिर सत्य, भीम हैं शक्ति, कर्म के अर्जुन हैं अवतार।
नकुल श्रद्धा, सेवा सहदेव, विश्व के हैं ये मूलाधार ॥

(10) पात्रों का चयन एवं समायोजन – कवि ने इस खण्डकाव्य की कथा-योजना में महाभारतकालीन उन्हीं प्रमुख पात्रों को लिया है, जिनका द्रौपदी के चीर-हरण प्रसंग में उपयोग किया जा सकता था। नवीनता यह है कि इन पात्रों में श्रीकृष्ण को किसी भी रूप में सम्मिलित नहीं किया गया है। प्रमुख पात्र द्रौपदी एवं दु:शासन हैं। अन्य पात्रों का उल्लेख केवल वातावरण एवं प्रसंग को उद्दीपन प्रदान करने के लिए हुआ है। पात्रों को चरित्र-चित्रण स्वाभाविक है और उनके मनोभावों की अभिव्यक्ति की बड़ी सुन्दर अभिव्यंजना हुई है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि वस्तु-संगठन की दृष्टि से खण्डकाव्य की कथा लघु होनी चाहिए, नायक या नायिका में उदात्त-गुणों का समावेश होना चाहिए और कथा का विस्तार क्रमिक एवं उद्देश्य आदर्शों की स्थापना होना चाहिए। इन सभी विशेषताओं का समावेश इस खण्डकाव्य में सफलतापूर्वक किया गया है; अतः यह एक सफल खण्डकाव्य है।।

प्रश्न 3:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में निहित सन्देश (उद्देश्य) को स्पष्ट कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ में प्रतिपादित आदर्शों का सोदाहरण विवेचन कीजिए।
या
” ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने मानवीय आदर्श एवं शाश्वत जीवन-मूल्यों की प्रतिष्ठा की है, इस कथन की पुष्टि कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ की प्रमुख विचारधारा पर प्रकाश डालिए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि की सफलता पर प्रकाश डालिए।
या
‘सत्य की जीत’ के प्रमुख विचार-बिन्दुओं पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
या
” ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथावस्तु पौराणिक होते हुए भी आधुनिक विचारधारा की पोषक है,” उद्धरण देकर सिद्ध कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ में जिन उदात्त जीवन-मूल्यों का चित्रण किया गया है, उन्हें सोदाहरण समझाइए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य से समाज को क्या सन्देश मिलता है ? ‘सत्य की जीत’ शीर्षक की सार्थकता को प्रमाणित कीजिए। ‘सत्य की जीत के आधार पर ‘जीओ और जीने दो’ की समीक्षा कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में नारी विषयक अवधारणा का चित्रण कीजिए।
उत्तर:
सत्य की जीत’ शीर्षक से स्वतः स्पष्ट है कि कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी प्रस्तुत खण्डकाव्य में असत्य पर सत्य की विजय प्रतिष्ठित करना चाहते हैं। इसे खण्डकाव्य में द्रौपदी के चीर-हरण का प्रसंग वर्णित किया गया है, किन्तु इसमें कथा का रूप सर्वथा मौलिक है। अत्याचारियों के दमन को द्रौपदी झुककर स्वीकार नहीं करती, वरन् वह पूर्ण आत्म-बलं से अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करती है। उसकी पक्ष सत्य एवं न्याय का पक्ष है। अन्ततः उसकी ही जीत होती है और पूरी राजसभा उसके पक्ष में हो जाती है।
प्रस्तुत खण्डकाव्य में कवि का उद्देश्य असत्य पर सत्य की विजय को दर्शाना है तथा खण्डकाव्य का मुख्य आध्यात्मिक भाव भी यही है। इस दृष्टिकोण से इसे खण्डकाव्य का यह शीर्षक पूर्णरूप से उपयुक्त और सार्थक है। इस खण्डकाव्य में निम्नलिखित विचारों का प्रतिपादन हुआ है

(1) नैतिक मानव-मूल्यों की स्थापना – ‘सत्य की जीत’ में कवि ने दुःशासन और दुर्योधन के छल-कपट, दम्भ, ईष्र्या, अनाचार, शस्त्र-बल, परपीड़न आदि की पराजय दिखाकर उन पर सत्य, धर्म, न्याय, प्रेम, मैत्री, करुणा, श्रद्धा आदि शाश्वत मानव-मूल्यों की प्रतिष्ठा की है और कहा है

जहाँ है सत्य, जहाँ है धर्म, जहाँ है न्याय, वहाँ है जीत।

कवि का विचार है कि मानव को भौतिकवाद के गर्त से नैतिक मूल्यों की स्थापना के आधार पर ही निकाला जा सकता है।

(2) नारी की प्रतिष्ठा – कवि ने प्रस्तुत खण्डकाव्य में द्रौपदी को श्रृंगार व कोमलता की परम्परागत मूर्ति के रूप में नहीं, वरन् दुर्गा के नव रूप में प्रतिष्ठित किया है, जो अपने सतीत्व और मर्यादा की रक्षा के लिए चण्डी और दुर्गा भी बन जाती है। यही कारण है कि भारत में नारी की शक्ति को दुर्गा के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। द्रौपदी दुःशासन से स्पष्ट कह देती है कि नारी पुरुष की सम्पत्ति या भोग्या नहीं है। उसका अपना स्वतन्त्र व्यक्तित्व है। पुरुष और नारी के सहयोग से ही विश्व का मंगल सम्भव है

पुरुष के पौरुष से ही सिर्फ, बनेगी धरा नहीं यह स्वर्ग।
चाहिए नारी का नारीत्व, तभी होगा पूरा यह सर्ग ॥

(3) प्रजातान्त्रिक भावना का प्रतिपादन – प्रस्तुत खण्डकाव्य का सन्देश है कि हम प्रजातान्त्रिक भावनाओं का आदर करें। किसी एक व्यक्ति की निरंकुश नीति को अनाचार की छूट न दें। राजसभा में द्रौपदी के प्रश्न पर जहाँ दुर्योधन, दु:शासन, कर्ण अपना तर्क प्रस्तुत करते हैं वहीं धृतराष्ट्र अपना निर्णय देते समय जन-भावनाओं की अवहेलना भी नहीं करते।

(4) स्वार्थ और ईष्र्या का उन्मूलन – आज का मनुष्य ईर्ष्या व स्वार्थ के चंगुल में फंसा हुआ है। ईर्ष्या और स्वार्थ संघर्ष को जन्म देते हैं। इनके वशीभूत होकर व्यक्ति सब कुछ कर बैठता है-इसे कवि ने कौरवों द्वारा द्रौपदी के चीर-हरण की घटना से व्यक्त किया है। दुर्योधन पाण्डवों से ईर्ष्या रखता है, जिसके कारण वह उन्हें द्यूतक्रीड़ा में हराकर उन्हें नीचा दिखाने तथा द्रौपदी को निर्वस्त्र करके उन्हें अपमानित करना चाहता है। कवि स्वार्थ और ईर्ष्या को पतन का कारण सिद्ध करता है और उनके स्थान पर मैत्री, त्याग और सेवा जैसे लोकमंगलकारी भावों को प्रतिष्ठित करना चाहता है।

(5) सहयोग, सह-अस्तित्व और विश्व-बन्धुत्व का सन्देश – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने आज के युग के अनुरूप यह सन्देश दिया है कि सहयोग और सह-अस्तित्व के विकास से ही विश्व-कल्याण होगा–जियें हम और जियें सब लोग। इससे सत्य, न्याय, मैत्री, करुणा और सदाचार को बल मिलेगा, जिससे व्यक्ति को समस्त संसार एक कुटुम्ब की भाँति प्रतीत होने लगेगा।

(6) शान्ति की कामना – प्रस्तुत खण्डकाव्य में कवि गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित है। वह शस्त्र बल पर सत्य, न्याय और शास्त्र की विजय दिखलाता है। धृतराष्ट्र भी शस्त्रों का प्रयोग स्थायी शान्ति की स्थापना के लिए किये जाने पर बल देते हैं

किये हैं जितने भी एकत्र, शस्त्र तुमने, उनका उपयोग।
युद्ध के हित नहीं, शान्ति हित करो, यही है उनका स्वत्व प्रयोग।

(7) निरंकुशवाद के दोषों का प्रकाशन – प्रस्तुत खण्डकाव्य के द्वारा कवि यह बताना चाहता है कि जब सत्ता निरंकुश हो जाती है तो वह अनैतिक कार्य करने में भी कोई संकोच नहीं करती। ऐसे राज्य में विवेक पूर्णतया कुण्ठित हो जाता है। भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र आदि भी दुर्योधन की सत्ता की निरंकुशता के आगे हतप्रभ हैं। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में भारतीय शाश्वत जीवन-मूल्यों की प्रतिष्ठा की गयी है। इस खण्डकाव्य के द्वारा कंवि अपने पाठकों को सदाचारपूर्ण जीवन की प्रेरणा देना चाहता है। वह उन्नत मानवीय जीवन का सन्देश देता हैं। धृतराष्ट्र की उदारतापूर्ण इस घोषणा में काव्य का उद्देश्य स्पष्ट हो जाता है

नीति समझो मेरी यह स्पष्ट, जियें हम और जियें सब लोग।
बाँटकर आपस में मिले सभी, धरा का करें बराबर भोगे॥

प्रश्न 4:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर नायिका द्रौपदी का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
” ‘सत्य की जीत’ में द्रौपदी के चरित्र में वर्तमान युग के नारी-जागरण का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।” स्पष्ट कीजिए।
या
“सत्य की जीत’ के किसी मुख्य पात्र की चरित्रगत विशेषताएँ लिखिए।
या
‘सत्य की जीत’ के आधार पर द्रौपदी के चरित्र-चित्रण की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
“नारी अबला नहीं, शक्तिरूपा है।” द्रौपदी के चरित्र के माध्यम से इस कथन की सार्थकता प्रमाणित कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ में कवि ने द्रौपदी के चरित्र में जो नवीनताएँ प्रस्तुत की हैं, उनका उदघाटन करते हुए उसके चरित्र-वैशिष्ट्य पर प्रकाश डालिए।
या
‘सत्य की जीत के आधार पर द्रौपदी के संघर्षमय जीवन का चित्रण कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ की नायिका द्रौपदी के चरित्र में समाविष्ट मानवीय आदर्शों का विश्लेषण कीजिए।
या
द्रौपदी का पक्ष सत्य और न्याय का पक्ष है। इस बात को सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं-

(1) नायिका:  द्रौपदी ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की नायिका है। सम्पूर्ण कथा उसके चारों ओर घूमती है। वह राजा द्रुपद की पुत्री, धृष्टद्युम्न की बहन तथा युधिष्ठिर सहित पाँचों पाण्डवों की पत्नी है। ‘सत्य की जीत खण्डकाव्य में अत्यधिक विकट समय होते हुए भी वह बड़े आत्मविश्वास से दु:शासन को अपना परिचय देती हुई कहती है

जानता नहीं कि मैं हूँ कौन ? द्रौपदी धृष्टद्युम्न की बहन।
पाण्डुकुल वधू भीष्म, धृतराष्ट्र, विदुर को कब रे यह सहन॥

(2) स्वाभिमानिनी सबला – द्रौपदी स्वाभिमानिनी है। वह अपना अपमान नारी-जाति का अपमान समझती है। और वह इसे सहन नहीं करती। ‘सत्य की जीत की द्रौपदी महाभारत की द्रौपदी की भाँति असहाय, अबला और संकोची नारी नहीं है। यह द्रौपदी तो अन्यायी, अधर्मी पुरुषों से जमकर संघर्ष व विरोध करने वाली है। इस प्रकार उसका निम्नलिखित कथन द्रष्टव्य है

समझकर एकाकी, निशंक, दिया मेरे केशों को खींच।
रक्त का पैंट पिये मैं मौन, आ गयी भरी सभा के बीच ॥
इसलिए नहीं कि थी असहाय, एक अबला रमणी का रूप।
किन्तु था नहीं राज-दरबार, देखने मेरा भैरव-रूप ।।

(3) विवेकशीला – द्रौपदी पुरुष के पीछे-पीछे आँख बन्द कर चलने वाली नारी नहीं, वरन् विवेक से कार्य करने वाली नारी है। आज की नारी की भाँति वह अपना अधिकार प्राप्त करने के लिए सजग है। द्रौपदी की स्पष्ट मान्यता है कि नारी में अपार शक्ति और आत्मबल विद्यमान है। पुरुष स्वयं को संसार में सर्वाधिक शक्तिसम्पन्न समझता है, किन्तु द्रौपदी इस अहंकारपूर्ण मान्यता का खण्डन करती हुई कहती है

नहीं कलिंका कोमल सुकुमार, नहीं रे छुई-मुई-सा गात !
पुरुष की है यह कोरी भूल, उसी के अहंकार की बात ॥

वह केवल दुःशासन ही नहीं वरन् अपने पति को भी प्रश्नों के कटघरे में खड़ा कर स्पष्टीकरण माँगती है। वह भरी सभा में यह सिद्ध कर देती है कि जुए में स्वयं को हारने वाले युधिष्ठिर को मुझे दाँव पर लगाने का कोई अधिकार नहीं है।-

द्रौपदी के वचन सुनकर सम्पूर्ण सभा, स्तब्ध और किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाती है और द्रौपदी के तर्को पर न्यायपूर्वक विचार करने के लिए विवशं हो जाती है। द्रौपदी के ये कथन उसकी वाक्पटुता एवं योग्यता के परिचायक हैं।

(4) साध्वी – द्रौपदी में शक्ति, ओज, तेज, स्वाभिमान और बुद्धि के साथ-साथ सत्य, शील और धर्म का पालन करने की शक्ति भी है। द्रौपदी के चरित्र की श्रेष्ठता से प्रभावित धृतराष्ट्र उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं।

द्रौपदी धर्मनिष्ठ है सती, साध्वी न्याय सत्य साकार।
इसी से आज सभी से प्राप्त, उसे बल सहानुभूति अपार ॥

(5) ओजस्विनी – ‘सत्य की जीत’ की नायिका द्रौपदी ओजस्विनी है। वह अपना अपमान होने पर सिंहनी की भाँति दहाड़ती है

सिंहनी ने कर निडर दहाड़, कर दिया मौन सभा को भंग।

दुःशासन द्वारा केश खींचने के बाद वह रौद्र-रूप धारण कर लेती है। कवि कहती है

खुली वेणी के लम्बे केश, पीठ पर लहराये बन काल।।
उगलते ज्यों विष कालिया नाग, खोलकर मृत्यु-कणों का जाल ।

(6) सत्य, न्याय और धर्म की एकनिष्ठ साधिका – द्रौपदी सत्य और न्याय की अजेय शक्ति और असत्य तथा अधर्म की मिथ्या शक्ति का विवेचन बहुत संयत शब्दों में करती हुई कहती है

सत्य का पक्ष, धर्म का पक्ष, न्याय का पक्ष लिये मैं साथ।
अरे, वह कौन विश्व में शक्ति, उठा सकती जो मुझ पर हाथ॥

(7) नारी-जाति की पक्षधर – ‘सत्य की जीत की द्रौपदी आदर्श भारतीय नारी है। भारतीय संस्कृति के आधार वेद हैं और वेदों के अनुसार आदर्श नारी में अपार शक्ति, सामर्थ्य, बुद्धि, आत्म-सम्मान, सत्य, धर्म, व्यवहारकुशलता, वाक्पटुता, सदाचार आदि गुण विद्यमान होते हैं। द्रौपदी में भी ये सभी गुण विद्यमान हैं। अपने सम्मान को ठेस लगने पर वह सभा में गरज उठती है

मौन हो जा मैं सह सकतीन, कभी भी नारी का अपमान।
दिखा देंगी तुझको अभी, गरजती आँखों का तूफान ।।

द्रौपदी को पता है कि नारी में अपार शक्ति-सामर्थ्य, बुद्धि और शील विद्यमान हैं। नारी ही मानव-जाति के सृजन की अक्षय स्रोत है। वह नारी-जाति को पुरुष के आगे हीन सिद्ध नहीं होने देती है। नारी की गरिमा का वर्णन करती हुई वह कहती है

पुरुष उस नारी की ही देन, उसी के हाथों का निर्माण।

(8) वीरांगनां – वह पुरुष को विवश होकर क्षमा कर देने वाली असहाय अबला नहीं वरन् चुनौती देकर दण्ड देने को कटिबद्ध है

अरे ओ दुःशासन निर्लज्ज, देख तू नारी को भी क्रोध ।
किसे कहते उसका अपमान, कराऊँगी मैं उसका बोध ॥

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि द्रौपदी पाण्डव-कुलवधू, वीरांगना, स्वाभिमानी, आत्मगौरव- सम्पन्न, सत्य और न्याय की पक्षधर, सती-साध्वी, नारीत्व के स्वाभिमान से मण्डित एवं नारी जाति का आदर्श है।

प्रश्न 5:
‘सत्य की जीत के आधार पर दुःशासन का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ के एक प्रमुख पुरुष पात्र (दुःशासन) के चरित्र की विशेषताएँ बताइट।
या
‘सत्य की जीत’ में व्यक्त दुःशासन के चरित्र की समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत खण्डकाव्य में दुःशासन एक प्रमुख पात्र है जो दुर्योधन का छोटा भाई तथा धृतराष्ट्र का पुत्र है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं-

(1) अहंकारी एवं बुद्धिहीन – दुःशासन को अपने बल पर बहुत अधिक घमण्ड है। विवेक से उसे कुछ लेना-देना नहीं है। वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण मानता है तथा पाण्डवों का भरी सभा में अपमान करता है। सत्य, प्रेम और अहिंसा की अपेक्षा वह पाशविक शक्तियों को ही सब कुछ मानता है

शस्त्र जो कहे वही है सत्य, शस्त्र जो करे वही है कर्म ।
शस्त्र जो लिखे वही है शास्त्र, शस्त्र-बल पर आधारित धर्म ॥

इसीलिए परिवारजन और सभासदों के बीच द्रौपदी को निर्वस्त्र करने में वह तनिक भी लज्जा नहीं मानता है।

(2) नारी का अपमान करने वाला – द्रौपदी के साथ हुए तर्क-वितर्क में दु:शासन का नारी के प्रति पुरातन और रूढ़िवादी दृष्टिकोण प्रकट हुआ है। दु:शासन नारी को पुरुष की दासी और भोग्या तथा पुरुष से दुर्बल मानता है। नारी की दुर्बलता का उपहास उड़ाते हुए वह कहता है

कहाँ नारी ने, ले तलवार, किया है पुरुषों से संग्राम ।
जानती है वह केवल पुरुष, भुजदण्डों में करना विश्राम ॥

(3) शस्त्र-बल विश्वासी – दु:शासन शस्त्र-बल को सब कुछ समझता है। उसे धर्म-शास्त्र और धर्मज्ञों में कोई विश्वास नहीं है। इन्हें तो वहें शस्त्र के आगे हारने वाले मानता है ।

धर्म क्या है और क्या है सत्य, मुझे क्षणभर चिन्ता इसकी न।
शास्त्र की चर्चा होती वहाँ, जहाँ नर होता शस्त्र-विहीन ।।

(4) दुराचारी – दु:शासन हमारे समक्ष एक दुराचारी व्यक्ति के रूप में आती है। वह मानवोचित व्यवहार भी नहीं जानता। वह अपने बड़ों व गुरुजनों के सामने भी अभद्र व्यवहार करने में संकोच नहीं करता। वह शास्त्रज्ञों, धर्मज्ञों व नीतिज्ञों पर कटाक्ष करता है और उन्हें दुर्बल बताता है

लिया दुर्बल मानव ने ढूँढ, आत्मरक्षा का सरल उपाय।
किन्तु जब होता सम्मुख शस्त्र, शास्त्र हो जाता निरुपाय ॥

(5) धर्म और सत्य का विरोधी – धर्म और सत्य का शत्रु दु:शासन आध्यात्मिक शक्ति का विरोधी एवं भौतिक शक्ति का पुजारी है। वह सत्य, धर्म, न्याय, अहिंसा जैसे उदार आदर्शों की उपेक्षा करता है।

(6) सत्य व सतीत्व से पराजित – दुःशासन की चीर-हरण में असमर्थता इस तथ्य की पुष्टि करती है कि सत्य की ही जीत होती है। वह शक्ति से मदान्ध होकर तथा सत्य, धर्म एवं न्याय की दुहाई देने को दुर्बलता का चिह्न बताता हुआ जैसे ही द्रौपदी का चीर खींचने के लिए हाथ आगे बढ़ाता है, वैसे ही द्रौपदी के शरीर से प्रकट होने वाले सतीत्व की ज्वाला से पराजित हो जाता है।

दुःशासन के चरित्र की दुर्बलताओं या विशेषताओं का उद्घाटन करते हुए डॉ० ओंकार प्रसाद माहेश्वरी लिखते हैं कि “लोकतन्त्रीय चेतना के जागरण के इस युग में अब भी कुछ ऐसे साम्राज्यवादी प्रकृति के दुःशासन हैं, जो दूसरों के बढ़ते मान-सम्मान को नहीं देख सकते तथा दूसरों की भूमि और सम्पत्ति को हड़पने के लिए प्रतिक्षण घात लगाये हुए बैठे रहते हैं। इस काव्य में दुःशासन उन्हीं का प्रतीक है।”

प्रश्न 6:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर दुर्योधन का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
श्री द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी कृत ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में दुर्योधन एक प्रमुख पुरुष पात्र है जो दु:शासन का बड़ा भाई तथा धृतराष्ट्र का पुत्र है। उसकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) अभिमानी और विवेकहीन – दुर्योधन को अपने बाहुबल पर अत्यधिक घमण्ड है। विवेक से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। वह बाहुबल में विश्वास रखता है। नैतिकता में उसे बिल्कुल विश्वास नहीं है। वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण मानता है, इसी कारण पाण्डवों का भरी सभा में अपमान करता है। दुर्योधन का नारी के प्रति पुरातन रूढ़िवादी दृष्टिकोण है। वह पाशविक शक्तियों को ही सब कुछ मानता है।

(2) नारी के प्रति उपेक्षा-भाव – द्रौपदी के द्वारा उपहास किये जाने पर वह उससे प्रतिशोध लेने की भावना में दग्ध रहता है। वह नारी को भोग्या और चरणों की धूल समझता है। इसी कारण भरी सभा में द्रौपदी का चीर-हरण करवाता है।

(3) दुराचारी – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में दुर्योधन हमारे सामने एक दुराचारी पुरुष पात्र के रूप में आता है। वह मानवोचित व्यवहार भी नहीं जानता है। वह अपने बड़ों व गुरुजनों के सामने भी अभद्र व्यवहार करने में संकोच नहीं करता।

(4) ईष्र्यालु – दुर्योधन ईष्र्यालु प्रवृत्ति का पुरुष पात्र है, जो हमेशा ही पाण्डवों से ईर्ष्या रखता है। वह पाण्डवों की समृद्धि और मान सम्मान को सहन नहीं कर सकता है।

(5) छल-कपट में विश्वास – दुर्योधन यद्यपि वीर है लेकिन वह छल-कपट में विश्वास रखता है। छल-कपट से ही वह पाण्डवों को जुए के खेल में हरा देता है और उनके राज्य को हड़प लेता है। इस प्रकार उपर्युक्त गुणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि उसके चरित्र में वर्तमान साम्राज्यवादी शासकों की लोलुपता की झलक प्रस्तुत की गयी है।

प्रश्न 7:
‘सत्य की जीत के आधार पर युधिष्ठिर का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्रांकन कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के प्रधान पात्र का चरित्रांकन कीजिए।
उत्तर:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में युधिष्ठिर का चरित्र धृतराष्ट्र और द्रौपदी के कथनों के माध्यम से उजागर हुआ है। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) सत्य और धर्म के अवतार – युधिष्ठिर की सत्य और धर्म में अडिग निष्ठा है। उनके इसी गुण पर मुग्ध धृतराष्ट्र कहते हैं

युधिष्ठिर ! धर्मपरायण श्रेष्ठ, करो अब निर्भय होकर राज्य।

(2) सरल-हृदय व्यक्ति – युधिष्ठिर बहतं सरल-हृदय के व्यक्ति हैं। वे दसरों को भी सरल-हृदय समझते हैं। इसी सरलता के कारण वे शकुनि और दुर्योधन के कपटे जाल में फंस जाते हैं और उसका दुष्परिणाम भोगते हैं। द्रौपदी ठीक ही कहती है

युधिष्ठिर ! धर्मराज थे, सरल हृदय, समझे न कपट की चाल।

(3) सिन्धु-से धीर-गम्भीर – द्रौपदी का अपमान किये जाने पर भी युधिष्ठिर का मौन व शान्त रहने का कारण उनकी दुर्बलता नहीं, वरन् उनकी धीरता, गम्भीरता और सहिष्णुता है

खिंची है मर्यादा की रेखा, वंश के हैं वे उच्च कुलीन।।

(4) अदूरदर्शी – युधिष्ठिर यद्यपि गुणवान हैं, किन्तु द्रौपदी को दाँव पर लगाने जैसा अविवेकी कार्य कर बैठते हैं, जिससे जान पड़ता है कि वह सैद्धान्तिक अधिक किन्तु व्यवहारकुशल कम हैं। वह इस कृत्य का दूरगामी परिणाम दृष्टि से ओझल कर बैठते हैं

युधिष्ठिर धर्मराज का हृदय, सरल-निर्मल-निश्छल-निर्दोष।
भेरा अन्तर-सागर में अमित, भाव-रत्नों का सुन्दर कोष ॥

(5) विश्व-कल्याण के साधक – युधिष्ठिर का लक्ष्य विश्व-मंगल है, यह बात धृतराष्ट्र भी स्वीकार करते हैं

तुम्हारे साथ विश्व है, क्योंकि, तुम्हारा ध्येय विश्व-कल्याण।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि युधिष्ठिर इस खण्डकाव्य के ऐसे पात्र हैं, जो आरम्भ से लेकर अन्त तक मौन रहे हैं। कवि ने उनके मौन से ही उनके चरित्र की उपर्युक्त विशेषताएँ स्पष्ट की हैं।

प्रश्न 8:
‘सत्य की जीत’ की काव्यगत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘सत्य की जीत’ की भाषा-शैली की विशेषताएँ बताइए।
या
काव्य-सौन्दर्य की दृष्टि से ‘सत्य की जीत का मूल्यांकन कीजिए।
या
एक खण्डकाव्य के रूप में सत्य की जीत का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
‘सत्य की जीत’ की काव्यगत विशेषताएँ निम्नवत् हैं

(अ) भावगत विशेषताएँ

(1) सुगठित कथावस्तु – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथावस्तु अत्यन्त स्पष्ट, सरल और सुगठित है। काव्य की सभी घटनाएँ परस्पर सुसम्बद्ध हैं। कथा में आदि से अन्त तक रोचकता एवं कौतूहल विद्यमान है। कथा में कहीं भी अस्वाभाविकता एवं अरोचकता नहीं है।

(2) विश्व-बन्धुत्व का सन्देश – कवि ने विश्व को ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में प्रेम, सत्य, न्याय, मैत्री, करुणा और सदाचार की शिक्षा देकर सम्पूर्ण संसार को मार्ग दिखाया है

न्याय समता मैत्री भ्रातृत्व, भावना, स्नेहित सह अस्तित्व।
इन्हीं शाश्वत मूल्यों से बने, विश्व का मंगलमय व्यक्तित्व ॥

(3) शान्ति की कामना – ‘सत्य की जीत’ गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित है। केवल शस्त्र-बल पर विश्वास रखने वाले दुर्योधन और दु:शासन दोनों सत्य, न्याय और शास्त्र से पराजित होते हैं। स्थायी शान्ति की स्थापना के लिए धृतराष्ट्र कहते हैं

किये हैं जितने भी एकत्र, शस्त्र तुमने, उनका उपयोग।
युद्ध के हित नहीं, शान्ति हित करो, यही है उनका स्वत्व प्रयोग।

(4) उदात्त आदर्शों का स्वर – प्रस्तुत खण्डकाव्य से नारियों के प्रति श्रद्धा, विनाशकारी आचरण, शस्त्रीकरण का विरोध, प्रजातान्त्रिक आदर्शो, असत्य की निर्बलता एवं सत्य के आत्मबल की शक्ति का स्वर मुखरित होता है। इस खण्डकाव्य में कवि ने द्रौपदी के चीर-हरण को प्रसंग बनाकर उदात्त आदर्शों की. भाव-धारा प्रवाहित की है। यह भाव-धारा ही इस खण्डकाव्य की आत्मा है।

(5) रस-निरूपण – प्रस्तुत खण्डकाव्य में वीर रस की प्रधानता है, किन्तु इसमें रौद्र, शान्त आदि रसों का भी सुन्दर परिपाक हुआ है। ओजस्विनी, वीरांगना, द्रौपदी की ओजमयी वाणी इस काव्य का केन्द्रीय आकर्षण है। रौद्र रस का एक उदाहरण द्रष्टव्य है:

मौन हो जा मैं सह सकती न, कभी भी नारी का अपमान।
दिखा देंगी तुझको अभी, गरजती आँखों का तूफान ।

(6) प्रतीकात्मकता – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में सभी पुरुष तथा स्त्री पात्रों का चरित्र प्रतीकात्मक है। द्रौपदी सत्य, न्याय, धर्म आदि गुणों की प्रतीक और अपने अधिकारों के लिए सजग नारी है। पाण्डवों की प्रतीकात्मकता द्रष्टव्य है

युधिष्ठिर सत्य, भीम है शक्ति, कर्म के अर्जुन हैं अवतार।
नकुल श्रद्धा, सेवा सहदेव, विश्व के हैं ये मूलाधार ॥

इसके बाद भी पाण्डवों के सभी गुण द्रौपदी की तेजस्विता के सम्मुख हीन जान पड़ते हैं।

(ब) कलागत विशेषताएँ

(1) भाषा – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की भाषा सरल, सुबोध और परिष्कृत खड़ी बोली है। इसकी भाषा में प्रवाहमयता, प्रभावात्मकता, स्वाभाविकता, प्रसंगानुकूलता आदि गुण भी विद्यमान हैं। काव्य में संवादों की सजीवता एवं प्रभावपूर्णता निस्सन्देह सराहनीय है। भाषा में कहीं भी अस्वाभाविकता एवं दुरूहता के दर्शन नहीं होते; यथा

किया यदि शस्त्रों से ही मोह, न अपनाया विवेक का पन्थ।
मुझे लगता है, जो कुछ हुई, प्रगति अब तक, उसका रे अन्त ।।

(2) शैली – सारा खण्डकाव्य संवादात्मक शैली में रचित है। इसकी सम्पूर्ण कथावस्तु धृतराष्ट्र की राजसभा में पात्रों के कथोपकथनों के रूप में प्रस्तुत की गयी है। संवादों पर आधारित कथा की प्रगति शैली की प्रमुख विशेषता है

द्रौपदी बढ़-बढ़कर मत बोल, कहा उसने तत्क्षण तत्काल।
पीट मत री नारी का ढोल, उगल मत व्यर्थ अग्नि की ज्वाल॥

संवादों के कारण इस काव्य में नाटकीय-सौन्दर्य आ गया है। काव्य के समस्त घटना-व्यापार को सजीव, प्रवाहपूर्ण, सरल और विचारोत्तेजक संवादों के माध्यम से दृश्यांकित किया गया है। इन संवादों में कवि की अपूर्व मनोवैज्ञानिकता एवं सूझ-बूझ का परिचय मिलता है।

(3) अलंकार-योजना – ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास आदि अलंकारों का प्रयोग किया है; यथा

रूपक – खोल जीवन-पुस्तक के पृष्ठ, मुस्कराते समरांगण बीच।
                  शस्त्र से लिखते सच्चे शास्त्र, रक्त के स्वर्णिम अक्षर खींच।
उपमा – माँग में सिन्दूर की यह रेख, मौन विद्युत-सी घन के बीच।
                कि जैसे अवसर पाकर शीघ्र, गिराएगी दुश्मन पर खींच ॥

(4) छन्द-विधान – ‘सत्य की जीत में कवि ने 16-16 मात्राओं के चार पंक्तियों वाले; मुक्त छन्द का प्रयोग किया है।

(5) भाव-चित्रण – मानव-हृदय में किसी भाव के उठने पर कुछ शारीरिक प्रतिक्रियाएँ होती हैं। इन्हें अनुभाव या संचारी भाव कहते हैं। ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने विभिन्न-पात्रों के अनुभावों का चित्रण किया है। यहाँ क्रोधाभिभूत भीम की मुद्राओं का चित्रण देखिए

फड़कने लगे भीम के अंग, शस्त्र-बल की सुनकर ललकार।
नेत्र मुड़े धर्मराज की ओर, झुके पी, मौन रक्त की धार ।

निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि उदात्त आदर्शों के लिए सद्गुणी नायिका को आधार बनाकर लिखी गयी यह काव्य-रचना कथा की लघुती, क्रम-विस्तार आदि गुणों से युक्त है, अत: काव्य-सौन्दर्य की दृष्टि से ‘सत्य की जीत’ एक सफल खण्डकाव्य है।

प्रश्न 9:
” ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में आज की आधुनिक जाग्रत नारी का स्वर मुखर हुआ है।” इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं?
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में द्रौपदी द्वारा प्रतिपादित नारी की शक्ति एवं महत्ता पर प्रकाश डालिटी:
या
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी और दुःशासन के वार्तालाप (संवाद) को अपने शब्दों में लिखिए।
या
” ‘सत्य की जीत’ में महाभारत युग के साथ वर्तमान युग भी बोल उठा है। इस कथन को समझाइट।
या
‘सत्य की जीत’ कथनक की वर्तमान सामाजिक प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिए।
या
नारी जागरण की दृष्टि से सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी ने द्रौपदी के परम्परागत चरित्र में नवीन उद्भावनाएँ करके आज की नारी का मार्गदर्शन किया है। दूसरे शब्दों में, हम यह भी कह सकते हैं कि माहेश्वरी जी ने द्रौपदी के माध्यम से आधुनिक नारी के उभरते स्वर को सशक्त अभिव्यक्ति दी है, जिसका विवेचन निम्नवत् है
दुःशासन द्वारा भरी-सभा में अपमानित हुई द्रौपदी अबला-सी बनकर केवल आँसू नहीं बहाती, वरन् वह साहसी आधुनिक स्त्री की भाँति सिंहनी के समान गरजती हुई क्रोधित होकर उसे चेतावनी देती है

अरे-ओ ! दुःशासन निर्लज्ज ! देख तू नारी का भी क्रोध।
किसे कहते उसका अपमान, कराऊँगी मैं इसका बोध ॥

द्रौपदी दु:शासन को अपमानित करती हुई बड़े आत्मविश्वास से कहती है कि तू मुझे बाल खींचकर भरी-सभा में ले तो अवश्य आया है, किन्तु मैं रक्त के बूंट पीकर केवल इसलिए चुप हूँ; क्योंकि नारी से मार खाकर तू संसार में मुंह दिखाने के योग्य नहीं रह जाएगा।

द्रौपदी के व्यंग्य बाणों से दु:शासन तिलमिला उठता है और कहता है कि “तू नारी की श्रेष्ठता के ढोल मत पीट। क्या कभी किसी नारी ने तलवार अपने हाथ में लेकर कहीं संग्राम किया है ? नारी तो पुरुष पर निर्भर रहती है। वह तो पुरुष के पैरों की धूल के समान है।”

इस पर द्रौपदी नारी-विषयक पुरातन मान्यताओं को तोड़ती हुई दु:शासन को फटकारती हुई कहती है कि “तू अभी नारी की शक्ति को पहचान ही नहीं पाया है। यद्यपि नारी दिखने में कोमल-कलिका के समान अवश्य होती है, परन्तु आवश्यकता पड़ने पर वह पापियों का संहार करने के लिए भैरवी का रूप भी धारण कर सकती है। पुरुष की यह भूल ही है कि वह सारे विश्व पर अपना अधिकार मानता है, नारी पर अकारण ही चोट करता है, जबकि नारी और पुरुष दोनों एक समान हैं।”

द्रौपदी के व्यंग्य-कटाक्षों को काटते हुए दु:शासन पुनः कहता है कि “नारीरूपी सरिताएँ क्या कभी पुरुषरूपी पहाड़ को हिला पायी हैं ? लहरों को तो भूधर के केवल चरण छूकर लौट जाना पड़ता है। स्त्रीरूपी लहर तो पुरुषरूपी किनारा पाकर शान्त हो जाती है।’ दुःशासन पुनः कहता है कि “तू हमारी दासी है, क्योंकि पाण्डव तुझे जुए में हार गये हैं। तू नारीत्व की बात मत कर।”

इस प्रकार द्रौपदी और दु:शासन के वार्तालाप द्वारा कवि ने यह सिद्ध किया है कि मानवता के विकास में नारी और पुरुष दोनों का ही समान महत्त्व है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। ‘पुरुष का स्थान उच्च और नारी का स्थान निम्न है’ ऐसा सोचना नारी के प्रति अन्याय व असत्य का द्योतक है। इस रूप में, ‘सत्य की जीत’ में स्थल-स्थल पर आज की जाग्रत नारी का स्वर ही मुखरित हुआ प्रतीत होता है। ऐसी जाग्रत नारी, जो अपनी सृजनात्मक महत्ता से भली-भाँति परिचित है और जो समय आने पर सीता ही नहीं चण्डी तथा काली भी बन सकती है

पुरुष उस नारी की ही देन, उसी के हाथों का निर्माण।

अन्तत: द्रौपदी और दु:शासन के वार्तालाप का अन्त ‘सत्य की जीत’ से होता है।

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