UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 2 आन का मान

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name आन का मान (हरिकृष्ण ‘प्रेमी’)
Number of Questions 8
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 2 आन का मान (हरिकृष्ण ‘प्रेमी’)

प्रश्न 1:
‘आन का मान’ नाटक की कथावस्तु संक्षेप (सारांश) में लिखिए।
या
‘आन का मान’ नाटक की कथावस्तु पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के मार्मिक स्थलों का वर्णन कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के प्रथम अंक की कथा संक्षेप में लिखिए।
या
‘आन का मान नाटक के द्वितीय अंक की कथा का सार अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के तीसरे अंक की घटनाओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के किसी एक अंक की कथावस्तु लिखिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के सर्वाधिक प्रिय अंक का कथासार प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

‘आन का मान’ नाटक का सारांश

प्रथम अंक – श्री हरिकृष्ण प्रेमी कृत ‘आने का मान’ नाटक का आरम्भ रेगिस्तान के एक मैदान से हुआ है। यह काल भारत में औरंगजेब की सत्ता का है। इस समय जोधपुर में महाराज जसवन्त सिंह का राज्य था। वीर दुर्गादास उन्हीं के कर्तव्यनिष्ठ सेवक हैं जो कि महाराज की मृत्यु के उपरान्त उनके अवयस्क पुत्र अजीत के संरक्षक बनते हैं। नाटक का कथानक दुर्गादास के चारों ओर घूमता है। अकबर द्वितीय के पुत्र बुलन्द अख्तर और पुत्री सफीयतुन्निसा हैं। दोनों भाई-बहन औरंगजेब की राष्ट्र-विरोधी नीतियों का विरोध करते हैं। उनकी बातों से यह भी आभास होता है कि अकबर द्वितीय ने औरंगजेब के अत्याचारों के विरोध में वीर दुर्गादास से मित्रता कर ली थी। दुर्गादास ने अकबर द्वितीय को बादशाह घोषित कर दिया था, परन्तु औरंगजेब की एक चालवश उसे ईरान भाग जाना पड़ा।

सफीयत और बुलन्द दुर्गादास के पास ही रह जाते हैं। अजीतसिंह युवक होकर जोधपुर का शासन सँभाल लेता है। अजीतसिंह सफीयत से प्रेम करता है। सफीयत जानती है कि हिन्दू युवक और मुसलमान युवती का विवाह कठिन होगा। दुर्गादास भी अजीत को राजपूत धर्म की मर्यादा का ध्यान दिलाता है-“मान रखना राजपूत की आन होती है और इस आन को मान रखना उसके जीवन का व्रत होता है।”

द्वितीय अंक – इस नाटक के सर्वाधिक मार्मिक स्थलों से सम्बन्धित कथा दूसरे अंक की है। कथा का प्रारम्भ भीमनदी के तट पर स्थित ब्रह्मपुरी से प्रारम्भ होता है। औरंगजेब ने इस नगरी का नाम ‘इस्लामपुरी’ रख दिया है। औरंगजेब की भी दो पुत्रियाँ हैं-मेहरुन्निसा तथा जीनतुन्निसा। मेहरुन्निसा औरंगजेब द्वारा हिन्दुओं पर किये जा रहे अत्याचारों का विरोध करती है। जीनत पिता की समर्थक है। औरंगजेब अपनी पुत्रियों की बात सुनता है। तथा मेहरुन्निसा द्वारा बताये गये अत्याचारों के लिए पश्चात्ताप करता है। औरंगजेब अपने पुत्रों को जनता के साथ उदार व्यवहार करने के लिए कहता है। औरंगजेब अपने अन्तिम समय में अपनी वसीयत करता है कि उसका अन्तिम संस्कार सादगी से किया जाए। इस समय ईश्वरदास; दुर्गादास को बन्दी बनाकर औरंगजेब के. पास लाता है। औरंगजेब अपने पौत्र-पौत्री बुलन्द तथा सफीयत को पाने के लिए दुर्गादास से सौदेबाजी करता है, परन्तु दुर्गादास इसके लिए तैयार, नहीं होते।

तृतीय अंक – नाटक के तीसरे और अन्तिम अंक में अजीतसिंह पुनः सफीयत से जीवन-साथी बनने का निवेदन करता है, परन्तु सफीयत अजीत को लोकहित के लिए स्वहित के त्याग करने का परामर्श देती है। वह कहती है-”महाराज ! प्रेम केवल भोग की ही माँग नहीं करता, वह त्याग और बलिदान भी चाहता है।” बुलन्द तथा दुर्गादास के विरोध की अजीत परवाह नहीं करता तथा सफीयत को अपने साथ चलने के लिए कहता है। दुर्गादास पालकी में सफीयत को ले जाना चाहते हैं। अजीत नाराज होकर पालकी को रोककर कहते हैं-“दुर्गादास जी ! मारवाड़ में आप रहेंगे या मैं रहूँगा ………..“।” दुर्गादास मातृभूमि को अन्तिम प्रणाम करके चले जाते हैं। नाटक की कथा यहीं समाप्त हो जाती है।

उपर्युक्त कथा, कथा-संघटन की दृष्टि से सुगठित और व्यवस्थित है। ऐतिहासिक घटना को कल्पना के सतरंगी रंगों में रँगकर रोचक और प्रभावपूर्ण बना दिया गया है। प्रथम अंक में कथा की प्रस्तावना या आरम्भ है। द्वितीय अंक में अजीत व दुर्गादास के टकराव के समय विकास की अवस्था के उपरान्त कथा अपनी चरमसीमा पर आ जाती है। राज्य-निष्कासन के आदेश और सफीयत के पालकी में बैठने के साथ ही कथा का उतार आ जाता है। सफीयत की विदा के साथ ही कथानक समाप्त हो जाता है। राज्य-निष्कासन को हँसकर स्वीकार कर ‘आन का मान’ रखने वाले दुर्गादास से सम्बन्धित यह कथा अत्यन्त संक्षिप्त है।

प्रश्न 2:
नाटकीय तत्त्वों (नाट्यकला) के आधार पर ‘आन का मान’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के देश-काल चित्रण की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘आन का मान नाटक की भाषा-शैली पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
‘नाटक की अभिनेयता’ (रंगमंचीयता) पर प्रकाश डालिए।
या
संवाद-योजना और भाषा-शैली की दृष्टि से ‘आन का मान’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
या
‘संवाद-योजना की दृष्टि से ‘आन का मान’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘आन का मान की पात्र-योजना तथा चरित्र-निर्माण की दृष्टि से समीक्षा कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक में वातावरण पर प्रकाश डालिए।
या
‘आन का मान’ नाटक की भाषा पर प्रकाश डालिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के संवाद-सौष्ठव पर प्रकाश डालिए।
या
‘आन को मान’ नाटक के कथानक का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:

‘आन का मान’ नाटक की तात्विक समीक्षा

नाटकीय तत्त्वों के आधार पर श्री हरिकृष्ण प्रेमी कृत ‘आन को मान’ नाटक की समीक्षा निम्नलिखित प्रकार से
की जा सकती है

(1) कथानक – इस नाटक का कथानक ऐतिहासिक है। एक छोटी-सी ऐतिहासिक कथा में यथार्थ और कल्पना का सुन्दर समन्वय किया गया है। कथा में एकसूत्रता, सजीवता, घटना-प्रवाह आदि का निर्वाह भली-भाँति हुआ है। नाटक का शीर्षक आकर्षक है। कथानक की दृष्टि से प्रस्तुत नाटक एक सफल रचना है। नाटक के कथानक में औरंगजेब के समय का वर्णन है तथा औरंगजेब के अत्याचारों को प्रस्तुत किया गया है। उसके पुत्र अकबर द्वितीय की दुर्गादास सहायता करते हैं तथा उसे बादशाह घोषित कर देते हैं। औरंगजेब द्वारा उत्पन्न की गयी परिस्थितियोंवश अकबर द्वितीय ईरान भाग जाता है तथा उसके पुत्र और पुत्री दुर्गादास के पास ही रह जाते हैं। अकबर द्वितीय की पुत्री सफीयत से अजीतसिंह प्रेम करता है, परन्तु दुर्गादास इसका विरोध करते हैं और सफीयत के साथ मारवाड़ को ही छोड़ देते हैं। कथानक का मुख्य स्वर राजपूती आन और दुर्गादास का शौर्य है।

(2) पात्र तथा चरित्र-चित्रण – पात्रों की कुल संख्या ग्यारह है, जिनमें तीन स्त्री पात्र हैं। नाटक का नायक दुर्गादास है। पात्र कथानक के विकास में पूर्ण रूप से सहायक हुए हैं। दुर्गादास के चरित्र को आदर्श रूप में प्रस्तुत करना नाटककार का प्रमुख लक्ष्य रहा है। दुर्गादास के सामने अन्य पात्र धूमिल-से प्रतीत होते हैं। दुर्गादास के बाद सफीयतुन्निसा के चरित्र को विशेष रूप से उभारा गया है। सफीयत समझदार मुस्लिम युवती है। औरंगजेब को धर्मान्ध और अत्याचारी शासक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अजीत मारवाड़ का शासक है। तथा उसे सामान्य युवक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। चरित्र-चित्रण की दृष्टि से प्रस्तुत नाटक एक सफल नाटक है।

(3) संवाद-योजना – नाटक के संवादं छोटे, वीरत्व और ओज से पूर्ण, तीखे तथा कहीं-कहीं माधुर्य में डूबे हैं। अधिकांश संवाद मर्मस्पर्शी एवं गतिमात्र हैं। संवाद-योजना ने नाटक की कथा को प्रवहमान किया है; यथा
जीनतुन्निसा – तू चौंकी क्यों?
मेहरुन्निसा – मैं समझी जिन्दा पीर आ गये।
जीनतुन्निसा – हँसी उड़ाती है अब्बाजान की।
उनके सामने तो भीगी बिल्ली बन जाती है। मेहरुन्निसा-बनना ही पड़ता है। उनकी आँखें सिंह की भाँति चमकती हैं – खाने को दौड़ती हैं।
इस प्रकार संवाद की दृष्टि से यह एक सफल नाटक है।

(4) भाषा-शैली – ‘आन का मान’ नाटक की भाषा सरल, सुबोध, प्रवाहपूर्ण तथा प्रसाद-गुणयुक्त है। ओज और माधुर्य गुण भाषा के सौन्दर्यवर्द्धन में सफल रहे हैं। वाक्य आवश्यकतानुसार छोटे और बड़े होते गये हैं। नाटक के मुस्लिम पात्र भी शुद्ध हिन्दी का प्रयोग करते हुए दिखाये गये हैं। कहीं-कहीं उर्दू के शब्दों का भी प्रयोग मिलता है। नाटक में लोकोक्तियों, मुहावरों, सूक्तियों तथा गीतों का बड़ा सटीक प्रयोग किया गया है; जैसे-‘दूध का जला छाछ को फूक मारकर पीता है’, ‘सिर पर कफन बाँधे फिरना’, ‘बद अच्छा बदनाम बुरा इत्यादि। नाटक में तीन गीत हैं। नाटक में वर्णनात्मक तथा संवाद शैली का प्रयोग किया गया है। नाटक में प्रयुक्त स्वाभाविक भाषा का एक उदाहरण द्रष्टव्य है – ”इसलिए कि औरंगजेब हत्यारा होते हुए भी हिसाबी है। वह व्यापारी की भाँति गणित लगाता है। दुर्गादास जानता है कि जहाँपनाह मुझे मारकर भी अपना मनोरथ पूरा नहीं कर सकते। जीवित दुर्गादास की अपेक्षा मृत दुर्गादास मुगल साम्राज्य के लिए अधिक खतरनाक है।”

(5) देश-काल तथा वातावरण – नाटककार ने नाटक की रचना में देश-काल तथा वातावरण का पूर्ण ध्यान रखा है। नाटक में मध्यकालीन मुस्लिम तथा हिन्दू संस्कृतियों का समन्वय हुआ है। नाटक के पात्र ऐसे राजघरानों से सम्बन्धित हैं, जिनमें परस्पर संघर्ष चलता रहता था। पात्रों की वेशभूषा, रहन-सहन आदि समय के अनुरूप ही हैं। औरंगजेब सादगी-पसन्द बादशाह था, अतः उसके राजभवन का प्रदर्शन सामान्य रूप में ही किया गया है। देश-काल एवं वातावरण के चित्रण में नाटककार ऐतिहासिकता की रक्षा करने में पूर्णतया सफल रहा है।

(6) उद्देश्य – प्रेमी जी ने प्रस्तुत नाटक के द्वारा आदर्श मानव-मूल्यों की स्थापना का सुन्दर प्रयास किया है। नाटक को उद्देश्य सत्यता, विश्वबन्धुत्व, राष्ट्रीय एकता, धार्मिक सहिष्णुता, कर्तव्यपरायणता जैसे उदात्त गुणों का चित्रण करना है। नाटक के उद्देश्यों की पूर्ति दुर्गादास के चरित्र-चित्रण से होती है। दुर्गादास कर्त्तव्यपरायण और देशप्रेमी है तथा विश्व-बन्धुत्व में विश्वास रखता है। दुर्गादास को आदर्श मूल्यों को स्थापित करने वाला उदात्त नायक कहा जा सकता है। वह कर्म की सफलता में ही फल के आनन्द का अनुभव करने वाला कर्मयोगी है। अन्य पात्र भी नाटककार के सन्देश को प्रसारित व प्रचारित करने में सहयोग देते हैं।

(7) अभिनेयता – प्रस्तुत नाटक रंगमंच की दृष्टि से एक सफल रचना है। कुशल रंगकर्मी द्वारा रेतीले मैदान, फैली हुई चाँदनी, बहती हुई नदी आदि को प्रवाह चित्रों, प्रकाश व ध्वनि के माध्यम से प्रस्तुत किया जा सकता है। औरंगजेब के कक्ष की साधारण सजावट ऐतिहासिक सत्य के अनुरूप है। पहले अंक तथा तीसरे अंक का सेट एक ही है। नाटक के प्रस्तुतीकरण में केवल तीन बार परदा गिराने की आवश्यकता होती है। नाटककार ने वेशभूषा तथा अन्य नाटकीय आवश्यकताओं के लिए उचित संकेत दिये हैं। गतिशील कथानक, कम पात्र, सरल भाषा, अंकों तथा सामान्य मंच-विधान की दृष्टि से यह एक सफल नाटक है।

प्रश्न 3:
‘आन का मान के आधार पर वीर दुर्गादास का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के आधार पर दुर्गादास की चारित्रिक विशेषताएँ निरूपित करते हुए उसमें निहित भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता प्रतिपादित कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के प्रमुख पात्र (नायक) का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘आन का मान’ का कौन पुरुष पात्र आपको सबसे प्रभावशाली प्रतीत होता है। सकारण उत्तर दीजिए।
या
“मानवतावादी दृष्टि मनुष्य को श्रेष्ठ मनुष्य बनाती है।” दुर्गादास के चरित्र के आधार पर इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के नायक की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:

दुर्गादास का चरित्र-चित्रण

श्री हरिकृष्ण प्रेमी कृत“आन का माननाटक के नायक बीर दुर्गादास राठौर हैं। दुर्गादास उच्च मानवीय गुणों से युक्त वीर पुरुष हैं। नाटक का सम्पूर्ण घटनाक्रम इनके चारों ओर ही घूमता है। इनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) मानवतावादी दृष्टिकोण – दुर्गादास एक सच्चा व उच्च श्रेणी का मानव है। वह ऐसे किसी भी सिद्धान्त को आदर्श नहीं मानता, जो मानवता के विरुद्ध हो। औरंगजेब के बेटे को मुसलमान होते हुए भी वह अपना मित्र मानता है तथा प्राणों की बाजी लगाकर वह अकबर की बेटी सफीयत की रक्षा करता है। दुर्गादास कहता है-”मानवता का मानव के साथ जो नाता है, वह स्वार्थ का नाता नहीं, शाहजादा हुजूर!”

(2) हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति को समन्वयवादी – दुर्गादास धार्मिक भेदभाव को नहीं मानता। वह हिन्दू और मुस्लिम एकता का प्रबल पोषक है। वह इन संस्कृतियों की पारस्परिक भेदभाव की दीवार को तोड़ना चाहता है। उसकी दृष्टि में मानवता ही श्रेष्ठ धर्म है। वह कहती है “न केवल मुसलमान ही भारत है, और न केवल हिन्दू ही। दोनों को यहीं जीना है, यहीं मरना है।”

(3) आन को पक्का राजपूत – दुर्गादास अपने वचनों के प्रति निष्ठावान् है। उसका मत है-”मान रखना राजपूत की आन होती है और इस आन का मान रखना उसके जीवन का व्रत होता है।”

(4) सत्य, न्याय व देश का प्रेमी – दुर्गादास सत्य का प्रतीक है, न्याय में विश्वास रखता है तथा सच्चा देशभक्त है। वह कहता है-“राजपूतों की तलवार सदा सत्य, न्याय, स्वाभिमान और स्वदेश की रक्षक होकर रही है।”

(5) स्वामिभक्त और निश्छल – वह स्वामिभक्त और निश्छल है। अपने गुणों को दाँव पर लगाकर वह कुँवर अजीतसिंह की रक्षा करता है तथा उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुँचा देता है। कासिम उसके विषय में कहता है-”संसार भर में हाथ में दीपक लेकर घूम आएँगे, तब भी दुर्गादास जैसा शुभचिन्तक, वीर, स्वामिभक्त और निश्छल व्यक्ति न पाएँगे।”

(6) कर्त्तव्यपरायण – दुर्गादास कर्तव्यपरायण व्यक्ति है। वह सदैव अपने कर्तव्य को प्राथमिकता देता है। औरंगजेब भी वीर दुर्गादास के कर्तव्यपरायण होने की बात ईश्वरदास से कहता है।

(7) सच्चा मित्र – वीरवर दुर्गादास एक सच्चा मित्र है। औरंगजेब का पुत्र अकबर द्वितीय उसका मित्र है। वह मित्रता का ईमानदारी व सच्चाई के साथ पालन करता है। अकबर द्वितीय के सभी साथी उसका साथ छोड़ देते हैं, परन्तु दुर्गादास सच्चे मित्र की तरह उसका साथ देता है। वह अकबर द्वितीय को औरंगजेब के हाथों से बचाने के लिए उसे ईरान भेज देता है।

(8) राष्ट्रीयता – दुर्गादास के हृदय में राष्ट्रीयता कूट-कूटकर भरी है। वह भारत को न मुसलमानों का देश मानता है, न हिन्दुओं का। वह हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की खाई को पाटकर नये समाज का निर्माण करना चाहता है।

(9) सुशासन का समर्थक – दुर्गादास सदैव अच्छे शासन एवं सुव्यवस्था का समर्थक रहा है। वह कहता है-
”सुशासन को प्रजा; राजा का प्यार और भगवान का वरदान मानती है।”

इस प्रकार वीर दुर्गादास उच्च आदर्शों वाला मानव है। वह स्वामिभक्त, कर्तव्यपरायण, मानवता में विश्वास रखने वाला, सच्चा मित्र तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता का समर्थक है। उसके ये सभी मानवीय गुण उसके उदात्त चरित्र के प्रमाण हैं। वही इस नाटक का नायक अर्थात् प्रमुख पात्र है।

प्रश्न 4:
‘आन का मान’ नाटक के आधार पर औरंगजेब का चरित्र-चित्रण संक्षेप में कीजिए।
उत्तर:

औरंगजेब का चरित्र-चित्रण

श्री हरिकृष्ण प्रेमी कृत ‘आन का मान’ नाटक में औरंगजेब; वीर दुर्गादास का प्रतिद्वन्द्वी है तथा उसे खलनायक के रूप में चित्रित किया गया है। वह पूरे भारत पर एकछत्र राज्य की कामना करने वाला मुगल सम्राट् है। वह जीवन भर हिन्दुओं और उनके मन्दिरों के अस्तित्व को खत्म करने के लिए कुचक्र रचता रहता है। उसकी प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) कट्टर धार्मिक और संकीर्ण हृदय व्यक्ति – औरंगजेब संकीर्ण हृदय वाला कट्टर सुन्नी-मुसलमान है। इस्लाम के आगे सभी धर्म उसकी दृष्टि में हेय हैं। मानव-मात्र के लिए वह इस्लाम को ही श्रेयस्कर मानता है। वह जोधपुर के कुमार अजीतसिंह को भी मुसलमान बनाना चाहता है।

(2) नृशंस और निर्दयी-औरंगजेब सत्ता – प्राप्ति के लिए सब-कुछ करने को तैयार हो जाता है। वह अपने भाई दारा और शुजा की हत्या तक कर देता है तथा अपने पिता शाहजहाँ, पुत्र कामबख्श और पुत्री जेबुन्निसा को बन्दी बना लेता है। उसे किसी पर भी दया नहीं आती।

(3) सादा जीवन – औरंगजेब विलासिता से दूर रहकर सादा जीवन व्यतीत करने का पक्षपाती है। वह अपना निजी व्यय सरकारी खजाने से नहीं, वरन् टोपी सिलकर और कुरान की आयतें लिखकर उनकी बिक्री से प्राप्त आय से चलाता है।

(4) आत्मग्लानि से युक्त – औरंगजेब को अपने द्वारा किये गये नृशंस कार्यों के प्रति वृद्धावस्था में ग्लानि होती है। उन्हें सोचकर वह दु:खी होता है। अपनी वसीयत में वह अपने पुत्रों से स्वयं को क्षमा करने की बात लिखता है तथा पुत्र-स्नेह से विह्वल होकर वह अपने पुत्र अकबर को छाती से लगाने के लिए आतुर हो जाता है। मेहरुन्निसा से वह कहता है कि “औरंगजेब बातों के जहर से मरने वाला नहीं है।” मेहर के दण्ड देने की बात सुनकर वह कहता है-“हाथ थक गये हैं बेटी! सिर काटते-काटते।”

(5) स्नेहसिक्त पिता – औरंगजेब जवानी में अपने पिता और सन्तान दोनों के प्रति क्रूरता का व्यवहार करता है, किन्तु बुढ़ापे में आकर उसके हृदय में वात्सल्य का संचार होता है। वह अपने पुत्र अकबर द्वितीय, जो ईरान चला गया है, को हृदय से लगाने के लिए बेचैन है तथा अन्य स्वजनों से मिलने के लिए भी व्याकुल है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि औरंगजेब एक कठोर शासक के रूप में चित्रित किया गया है। अन्तिम समय में उसके चरित्र में परिवर्तन आता है और वह दयालु एवं स्नेही व्यक्ति के रूप में बदल जाता है।

प्रश्न 5:
सफीयतुन्निसा का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक की नायिका या किसी प्रमुख स्त्री पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:

सफीयतुन्निसा का चरित्र-चित्रण

सफीयतुन्निसा; श्री हरिकृष्ण प्रेमी द्वारा रचित ‘आन का मान’ नाटक की प्रमुख नारी-पात्र है। वह औरंगजेब के पुत्र अकबर द्वितीय की पुत्री है। अकबर द्वितीय अपने पिता की राष्ट्रविरोधी नीतियों का विरोधी है। दुर्गादास राठौर द्वारा उसे ही सम्राट घोषित कर दिया जाता है, परन्तु औरंगजेब की एक चाल से उसे ईरान भागना पड़ता है। इस स्थिति में दुर्गादास ही उसके पुत्र बुलन्द अख्तर और सफीयतुन्निसा का पालन-पोषण करता है। सफीयतुन्निसा का चरित्र-चित्रण निम्नलिखित विशेषताओं के आधार पर किया जा सकता है

(1) अत्यन्त रूपवती – सफीयतुन्निसा की आयु 17 वर्ष है और वह अत्यन्त आकर्षक रूप वाली है। नाटक के सभी पात्र उसके रूप-सौंन्दर्य पर मुग्ध हैं।
(2) वाक्-पटु – सफीयतुन्निसा विभिन्न परिस्थितियों में अपनी वाक्-पटुता का प्रभावपूर्ण प्रदर्शन करती है। उसके व्यंग्यपूर्ण कथन तर्क पर आधारित और मर्मभेदी हैं।
(3) संगीत में रचि – वह एक उच्चकोटि की संगीत-साधिका है। उसका मधुर स्वर सहज ही दूसरों का हृदय जीत लेता है।
(4) त्याग एवं देशप्रेम की भावना – उसमें त्याग एवं बलिदान की भावना कूट-कूटकर भरी हुई है। राष्ट्रहित में वह अपना सब कुछ बलिदान करने के लिए तत्पर दिखाई देती है।
(5) कर्तव्यनिष्ठ – सफीयतुन्निसा देश के प्रति अपनी अनुकरणीय कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देती है। राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह करने के उद्देश्य से ही वह अपने भाई के हाथ में राखी बाँधकर उसे युद्धभूमि में प्राणोत्सर्ग के लिए भेज देती है।
(6) शान्तिप्रिय एवं हिंसा – विरोधी – सफीयत की कामना है कि उसके देश में सर्वत्र शान्ति का वातावरण रहे। तथा सभी देशवासी सुखी और समृद्ध हों। किसी भी प्रकार के हिंसापूर्ण कार्यों को वह प्रबल विरोध करती है।
(7) आदर्श प्रेमिका – सफीयत जोधपुर के युवा शासक अजीतसिंह से सच्चा प्रेम करती है, किन्तु प्रेम की। उद्वेगपूर्ण स्थिति में भी वह अपना सन्तुलन बनाये रखती है। वह अजीतसिंह को भी धीरज बँधाती है और उसे लोकहित के लिए आत्महित का त्याग करने की सलाह देती हुई कहती है-”महाराज ! प्रेम केवल भोग की ही माँग नहीं करता, वह त्याग और बलिदान भी चाहता है।”

इस प्रकार सफीयतुन्निसा ‘आन का मान’ नाटक की एक आदर्श नारी-पात्र है। नाटक में उसके चरित्र को विशेष रूप से इस दृष्टि से उभारा गया है कि वह अजीतसिंह से प्रेम करते हुए भी राज्य व अजीतसिंह के कल्याणार्थ विवाह के लिए तैयार नहीं होती।।

प्रश्न 6:
” ‘आन को मान’ नाटक में ऐतिहासिकता के साथ-साथ नाटकीयता का सफल एवं सुन्दर समन्वय हुआ है।” अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक की ऐतिहासिकता पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर:

‘आन का मान’ की ऐतिहासिकता

श्री हरिकृष्ण प्रेमी द्वारा रचित ‘आन का मान’ एक ऐतिहासिक नाटक है, जिसमें इतिहास और कल्पना का मणिकांचने संयोग हुआ है। नाटक के पात्र और उसकी घटनाएँ भारत के मध्यकालीन इतिहास से सम्बद्ध हैं। नाटक के पात्र औरंगजेब, उसका पुत्र अकबर द्वितीय, पुत्रियाँ जीनतुन्निसा व मेहरुन्निसा, पौत्र बुलन्द अख्तर, पौत्री सफीयतुन्निसा, शुजाअत खाँ तथा राजपूतों में दुर्गादास, अजीतसिंह, मुकुन्दीदास आदि प्रसिद्ध ऐतिहासिक व्यक्ति हैं। जोधपुर के महाराजा जसवन्तसिंह की अफगानिस्तान से लौटते समय मृत्यु होना, मार्ग में उनकी दोनों रानियों द्वारा दो पुत्रों को जन्म देना, औरंगजेब के द्वारा महाराजा के परिवार को इस्लाम धर्म अपनाने पर दबाव डालना, दुर्गादास राठौर के नेतृत्व में राजकुमार अजीतसिंह का निकल भागना, प्रतिशोध में औरंगजेब का जोधपुर पर आक्रमण करना, अकबर द्वितीय की ईरान भाग जाना और उसके पुत्र-पुत्रियों की देख-रेख दुर्गादास द्वारा किया जाना आदि प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएँ हैं। साथ ही औरंगजेब की धर्मान्धता, राज्य–विस्तार नीति, साम्प्रदायिक वैमनस्य, व्यापार व कला का ह्रास आदि ऐतिहासिक तत्त्वों को भी प्रस्तुत नाटक में सफलतापूर्वक दर्शाया गया है।

उपर्युक्त ऐतिहासिक तथ्यों के अतिरिक्त प्रस्तुत नाटक में अनेक काल्पनिक घटनाओं का भी समावेश किया गया है। शिलाखण्ड पर बैठी सफीयत और अजीत का प्रणय-प्रसंग, दुर्गादास का पालकी में कन्धा देना तथा प्रमुख पात्रों के चरित्रांकन में भी कल्पना की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है, जिससे नाटक रोचक और सफल बन पड़ा है। इसमें एक सफल नाटक के सभी गुण—-सुगठित कथानक, सीमित और सशक्त पात्र, जीवम कथोपकथन, सटीक देश-काल और वातावरण, उच्च उद्देश्य एवं श्रेष्ठ अभिनेयता विद्यमान हैं। इस प्रकार ‘आन का मान’ एक सफल ऐतिहासिक नाटक है।

प्रश्न 7:
‘आन का मान के आधार पर नाटक के उद्देश्य अथवा सन्देश पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
या
” ‘आन का मान नाटक में राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय नव-निर्माण के लक्ष्य की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
या
“आन का मान’ में देशभक्ति एवं राष्ट्रीय एकता का विलक्षण आदर्श प्रस्तुत किया गया है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक की रचना में नाटककार को अपने उद्देश्य को पूर्ण करने में कहाँ तक सफलता मिली है ? संक्षेप में लिखिए।
या
“विश्व-बन्धुत्व और मानवतावाद ‘आन का मान’ नाटक का मूल स्वर है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए। विश्वव्यापी मानव-प्रेम की भावना का वर्णन कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक में मान, मर्यादा और देशभक्ति का अदभुत समन्वय देखने को मिलता है। सप्रमाण उत्तर दीजिए।
या
उदाहरण देते हुए स्पष्ट कीजिए कि ‘आन का मान’ नाटक गांधीवाद से ओत-प्रोत है।
या
‘आन का मान’ नाटक की मूल भावना का प्रकाश डालिए।
या
” ‘आन का मान’ नाटक में भारतीय चिन्तन परम्परा के अनुरूप मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा है।” उदाहरण द्वारा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

‘आन का मान’ का सन्देश अथवा उद्देश्य

प्रस्तुत ऐतिहासिक नाटक ‘आन को मान’ हरिकृष्ण प्रेमी जी की एक सफल रचना है। इसमें प्रेमी जी ने आदर्श मानवीय गुणों को चित्रित किया है तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता का सन्देश दिया है। वीर दुर्गादास को भारतीय संस्कृति के आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया गया है। सदाचार, सद्भाव, सत्य, स्वाभिमान, शौर्य, राष्ट्रीय भावना, साम्प्रदायिक एकता, जनतन्त्र का समर्थन, अत्याचार का विरोध आदि गुणों से अनुप्राणित करके दुर्गादास का चरित्रांकन नाटककार ने इस उद्देश्य से किया है कि आधुनिक भारत के युवक इन गुणों से युक्त होकर नायक दुर्गादास के आदर्श का पालन करते हुए आदर्श देश-प्रेमी तथा सच्चे मनुष्य बनें। इस प्रकार नाटक के बहुमुखी उद्देश्य हैं।

(1) एकता का सन्देश – साम्प्रदायिक एकता का सन्देश भी नाटक का प्रमुख उद्देश्य है। राष्ट्र का उद्बोधन एवं जागरण ही इस नाटक का सन्देश है। दुर्गादास राजपूती गौरव का ज्वलन्त प्रतीक है। उसके अनुसार “राजपूतों की तलवार सदैब सत्य, न्याय, स्वाभिमान और स्वदेश की संरक्षक होकर रही है। भारत ने कभी सीमा से बाहर जाकर साम्राज्य विस्तार के लिए तलवार नहीं उठायी। अगर वह बाहर गया तो ज्ञान का दीपक लेकर।”

(2) लोकहित का महत्त्व – प्रस्तुत नाटक के द्वारा प्रेमी जी ने लोकहित के महत्त्व को भी स्थापित किया है। राष्ट्रीय एकता और नव-निर्माण के लक्ष्य की ओर ध्यान दिया गया है। राष्ट्र-निर्माण का कार्य तभी पूरा हो सकेगा, जब जातीयता और साम्प्रदायिकता का समूल नाश हो जाएगा। आज का सामान्य मनुष्य व्यक्तिवादी हो गया है। ऐसे लोगों को ‘सफीयत’ के द्वारा सन्देश दिया गया है कि लोकहित के लिए आत्महित का त्याग कर देना चाहिए। आज के भौतिकवादी और केवल मांसल प्रेम के लिए इच्छुक युवकों को सन्देश देती हुई ‘सफीयत’ कहती है-“प्रेम केवल भोग की ही माँग नहीं करता, वह त्याग और बलिदान भी चाहता है।”

(3) देश प्रेम या देशभक्ति – नाटककार का उद्देश्य है कि भारतीय युवक देश के प्रति गहन अपनत्व की भावना से परिपूर्ण हो जाएँ और सच्चे देशप्रेमी बनें। इस नाटक में दुर्गादास के चरित्र के माध्यम से देशभक्ति एवं स्वामिभक्ति का विलक्षण आदर्श प्रस्तुत किया गया है। वह कहता है-”दुर्गादास जाता है, और मारवाड़ को यदि दुर्गादास के प्राणों की आवश्यकता हुई तो वह लौटकर आएगा। मैं अपनी जन्मभूमि को अन्तिम प्रणाम करता हूँ।”

(4) प्रलोभन का त्याग – दुर्गादास सच्चा राजपूत उसे ही स्वीकार करता है जो बड़े से बड़ा प्रलोभन मिलने पर भी अपने स्वामी और देश से द्रोह न करे तथा यश-अपयश की परवाह न कर अपना धर्म निभाता रहे।

(5) संगठन में शक्ति – नाटक में प्राय: सभी पात्रों को राष्ट्रीय एकता की दिशा में प्रयत्नशील चित्रित किया गया है। प्रेमी जी मानते हैं कि भारत को शक्तिशाली बनाने के लिए जातीय एकता अनिवार्य है। भावात्मक समन्वय का आदर्श नाटक में कहीं भी धूमिल नहीं हो पाया है।

(6) विश्वबन्धुत्व की भावना – नाटक में विश्व-बन्धुत्व और मानवतावाद, विश्व-शान्ति और अन्तर्राष्ट्रीय समन्वय का सन्देश दिया गया है। दुर्गादास बुलन्द अख्तर से कहता है- “ पिता और पुत्र के नाते से भी बड़ा नाता मानवता का है। मानव को मानव के साथ जो नाता है, वह स्वार्थ का नाता नहीं है, वह पवित्र नाता है।” इस नाटक में अन्तर्राष्ट्रीय एकता और विश्वबन्धुत्व का आदर्श प्राप्त करने के लिए युद्ध विरोधी संस्कारों को अनिवार्य बताया गया है। इस प्रकार प्राचीन ऐतिहासिक कथानक के माध्यम से नाटककार ने आधुनिक समाज को कुछ सन्देश दिये हैं। ये सन्देश हैं-आदर्श मानवीय चरित्र का पालन, क्रूर राजनीति से घृणा, राष्ट्रीय प्रेम का सन्देश, साम्प्रदायिक एकता का सन्देश; कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा। इन सन्देशों को नाटक के माध्यम से समाज को सम्प्रेषित करना ही नाटककार का उद्देश्य है, जिसमें वह पूर्ण रूप से सफल रहा है।

प्रश्न 8:
‘आन का मान’ नाटक के शीर्षक अथवा नामकरण की सार्थकता सिद्ध कीजिए।
या
‘आन का मान’ नाटक के शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
या
‘आन का मान’ नाटक का शीर्षक किस पात्र के माध्यम से रखा गया है ? स्पष्ट कीजिए।
या
‘आन का मान में किसके आन के मान की चर्चा की गयी है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

शीर्षक की सार्थकता

श्री हरिकृष्ण प्रेमी कृत ‘आन का मान’ नाटक में सर्वत्र राजपूतों द्वारा अपनी ‘आन’ अर्थात् अपने व्रत या परम्परा का निर्वाह प्रदर्शित हुआ है। दुर्गादास द्वारा राजपूतों को संगठित करके राजपूती आन एवं सम्मान की रक्षा हेतु प्रयासरत रहना इसी तथ्य का परिचायक है। दुर्गादास द्वारा अपने स्वामी जसवन्तसिंह के पुत्र अजीतसिंह को राजपूती आन की रक्षार्थ बड़े-से-बड़े संकट से जूझने के लिए तैयार करना, अजीतसिंह में राजपूती परम्परा पर आधारित गुणों का विकास करना तथा अन्तिम समय तक औरंगजेब के पुत्र अकबर द्वितीय के साथ अपनी मित्रता का निर्वाह करना भी, शीर्षक की सार्थकता की ओर ही संकेत करते हैं। दुर्गादास नारी के सम्मान की रक्षा हेतु सदैव तैयार रहता है। वह अपने मित्र अकबर द्वितीय के ईरान चले जाने पर उसके पुत्र-पुत्री का पालन-पोषण स्वयं करता है और इस्लाम धर्म के अनुरूप ही उनकी शिक्षा की व्यवस्था करता है। अपनी आन के अनुरूप वह उन बच्चों की प्रत्येक स्थिति में रक्षा करता है और अन्त में उन बच्चों को अकबर द्वितीय के पिता औरंगजेब को सौंप देता है। अजीतसिंह का विरोध करके भी दुर्गादास; सफीयतुन्निसा की इज्जत की रक्षा करना अपना राजपूती धर्म समझता है।

इस प्रकार ‘आन का मान’ नाटक में राजपूती ‘आन-मान’ के अनुरूप नारी के सम्मान की रक्षा, मित्र के प्रति अपनी वचनबद्धता का निर्वाह, कर्तव्य-पालन को सर्वोपरि मानना, राजपूत जाति के प्रति गौरव की भावना का प्रदर्शन करना आदि ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि प्रस्तुत नाटक अपने शीर्षक अथवा नामकरण की दृष्टि से पूर्णतः सफल नाक है।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कथा भारती Chapter 1 धुवयात्रा

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name धुवयात्रा (जैनेन्द्र कुमार)
Number of Questions 2
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कथा भारती Chapter 1 धुवयात्रा (जैनेन्द्र कुमार)

प्रश्न 1.
‘ध्रुवयात्रा’ कहानी का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।’ [2012, 13, 14, 16, 17, 18]
उत्तर
ध्रुवयात्रा’ हिन्दी के सुप्रसिद्ध कहानीकार जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित कहानी है। जैनेन्द्र जी मुंशी प्रेमचन्द की परम्परा के अग्रणी कहानीकार हैं। मनोवैज्ञानिक कहानियाँ लिखकर इन्होंने हिन्दी कहानी-कला के क्षेत्र में एक नवीन अध्याय को जोड़ा है। प्रस्तुत कहानी में इन्होंने मानवीय संवेदना को मनोवैज्ञानिक तथा दार्शनिक दृष्टिकोण में समन्वित करके एक नवीन धारी को जन्म दिया और कहानी ‘ध्रुवयात्रा’ की रचना की। इस कहानी का सारांश निम्नवत् है राजा रिपुदमन बहादुर उत्तरी ध्रुवे को जीतकर अर्थात् उत्तरी ध्रुव की यात्रा करके यूरोप के नगरों से बधाइयाँ लेते हुए भारत आ रहे हैं इस खबर को सभी समाचार पत्रों ने मुखपृष्ठ पर मोटे अक्षरों में प्रकाशित किया। उर्मिला, जो राजा रिपुदमन की प्रेमिका है और जिसने उनसे विवाह किये बिना उनके बच्चे को जन्म दिया है, ने भी इस समाचार को पढ़ा। उसने यह भी पढ़ा कि वे अब बम्बई पहुँच चुके हैं, जहाँ उनके स्वागत की तैयारियाँ जोर-शोर से की जा रही हैं। ………. उन्हें अपने सम्बन्ध में इस प्रकार के प्रदर्शनों में तनिक भी उल्लास नहीं है। ……….” इसलिए वे बम्बई में न ठहरकर प्रात: होने के पूर्व ही दिल्ली पहुँच गये। ……….. उनके चाहने वाले उन्हें अवकाश नहीं दे रहे हैं, ऐसा लगता है कि वे आराम के लिए कुछ दिन के लिए अन्यत्र जाएँगे।

राजा रिपुदमन को अपने से ही शिकायत है। उन्हें नींद नहीं आती है। वे अपने किये पर पश्चाताप कर रहे हैं। जब उर्मिला ने उनसे शादी के लिए कहा था तो उन्होंने परिवारीजनों के डर से मना कर दिया था। उनकी वही भूल आज उन्हें पीड़ा प्रदान कर रही है। वह उसके विषय में बहुत चिन्तित हैं।
दिल्ली में आकर वे आचार्य मारुति से मिलते हैं, जिनके बारे में उन्होंने यूरोप में भी बहुत सुन रखा था।

आचार्य मारुति तरह-तरह की चिकित्सकीय जाँच के परिणामों को ठीक बताते हुए उन्हें विवाह करने की सलाह देते हैं। लेकिन रिपुदमन स्वयं को विवाह के अयोग्य बताते हुए इसे बन्धन में बँधना कहते हैं। आचार्य मारुति उन्हें प्रेम-बन्धन में बँधने की सलाह देते हैं और कहते हैं कि प्रेम का इनकार स्वयं से इनकार है।

अगले दिन राजा रिपुदमन उर्मिला से मिलते हैं और अपने बच्चे का नामकरण करते हैं। वे उर्मिला से समाज के विपरीत अपने द्वारा किये गये व्यवहार के लिए क्षमा माँगते हैं और अपने व उर्मिला के सम्बन्धों को एक परिणति देना चाहते हैं। लेकिन उर्मिला मना करती है और उनसे सतत आगे बढ़ते रहने के लिए कहती है। वह पुत्र की ओर दिखाती हुई कहती है कि तुम मेरे ऋण से उऋण हो और मेरी ओर से आगामी गति के लिए मुक्त हो।

रिपुदमन उर्मिला को आचार्य मारुति के विषय में बताता है। वह उसे ढोंगी, महत्त्व को शत्रु और साधारणता का अनुचर बताती है। वह कहती है कि तुम्हारे लिए स्त्रियों की कमी नहीं है, लेकिन मैं तुम्हारी प्रेमिका हूँ। और तुम्हें सिद्धि तक पहुँचाना चाहती हूँ, जो कि मृत्यु के भी पार है।।

रिपुदमन आचार्य मारुति से मिलता है तथा उसे बताता है कि वह उर्मिला के साथ विवाह करके साथ में रहने के लिए तैयार था, लेकिन उसने मुझे ध्रुवयात्रा के लिए प्रेरित किया और कुछ मेरी स्वयं की भी इच्छा थी। अब वह मुझे सिद्धि तक जाने के लिए प्रेरित कर रही है। आचार्य मारुति स्वीकार करते हैं कि उर्मिला उनकी ही पुत्री है। वे उसे विवाह के लिए समझाएँगे।

जब उर्मिला आचार्य के बुलवाने पर उनके पास जाती है तो वे उससे विवाह के लिए कहते हैं। वह कहती है। कि शास्त्र से स्त्री को नहीं जाना जा सकता उसे तो सिर्फ प्रेम से जाना जा सकता है। वे उसे रिपुदमन से विवाह के लिए समझाते हैं, लेकिन वह नहीं मानती। वह स्पष्ट कहती है कि मुक्ति का पथ अकेले का है। अन्त में आचार्य उर्मिला के ऊपर इस रहस्य को प्रकट कर देते हैं कि वे ही उसके पिता हैं। इस अभागिन को भूल जाइएगा’ यह कहती हुई वह उनके पास से चली जाती है।

रिपुदमन के पूछने पर उर्मिला बताती है कि वह आचार्य से मिल चुकी है। रिपुदमन उसके कहने पर दक्षिणी ध्रुव के शटलैण्ड द्वीप के लिए जहाज तय करते हैं। अब उर्मिला उनको रोकना चाहती है, लेकिन वे नहीं रुकते। वे चले जाते हैं। रिपुदमन की ध्रुव पर जाने की खबर पूरी दनिया को ज्ञात हो जाती है। उर्मिला को भी अखबारों के माध्यम से सारी खबर ज्ञात होती रहती है और वह इन्हीं कल्पनाओं में डूबी रहती है।

तीसरे दिन के अखबार में उर्मिला राजा रिपुदमन की आत्महत्या की खबर का एक-एक अंश पूरे ध्यान से पढ़ती है। अखबार वालों ने एक पत्र भी छापा था, जिसमें रिपुदमन ने स्वीकार किया था कि उनकी यह यात्रा नितान्त व्यक्तिगत थी, जिसे सार्वजनिक किया गया। मैं किसी से मिले आदेश और उसे दिये गये अपने वचन को पूरा नहीं कर पा रहा हूँ, इसलिए होशो हवाश में अपना काम-तमाम कर रहा हूँ। भगवान मेरे प्रिय के अर्थ मेरी आत्मा की रक्षा करे।’ यहीं पर कहानी समाप्त हो जाती है।

प्रश्न 2
‘धुवयात्रा’ कहानी की कथावस्तु का विवेचन कीजिए। या ध्रुवयात्रा कहानी के कथानक की विवेचना कीजिए। [2018]
या
कथा-संगठन की दृष्टि से ‘धुवयात्रा’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
‘ध्रुवयात्रा’ कहानी के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए। [2013, 14, 15, 16, 18]
या
‘ध्रुवयात्रा’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
जैनेन्द्र कुमार महान् कथाकार हैं। ये व्यक्तिवादी दृष्टि से पात्रों का मनोविश्लेषण करने में कुशल हैं। प्रेमचन्द की परम्परा के अग्रगामी लेखक होते हुए भी इन्होंने हिन्दी कथा-साहित्य को नवीन शिल्प प्रदान किया। ‘ध्रुवयात्रा’ जैनेन्द्र कुमार की सामाजिक, मनोविश्लेषणात्मक, यथार्थवादी रचना है। कहानीकला के कतिपय प्रमुख तत्त्वों के आधार पर इस कहानी की समीक्षा निम्नवत् है-

(1) शीर्षक–कहानी का शीर्षक आकर्षक और जिज्ञासापूर्ण है। सार्थकता तथा सरलता इस शीर्षक की विशेषता है। कहानी का शीर्षक अपने में कहानी के सम्पूर्ण भाव को समेटे हुए है तथा प्रारम्भ से अन्त तक कहानी इसी ध्रुवयात्रा पर ही टिकी है। कहानी का प्रारम्भ नायक के ध्रुवयात्रा से आगमन पर होता है और कहानी का समापन भी ध्रुवयात्रा के प्रारम्भ के पूर्व ही नायक के समापन के साथ होता है। अत: कहानी का शीर्षक स्वयं में पूर्ण और समीचीन है।।

(2) कथानक-श्रेष्ठ कथाकार के रूप में स्थापित जैनेन्द्र कुमार जी ने अपनी कहानियों को कहानी- कला की दृष्टि से आधुनिक रूप प्रदान किया है। ये अपनी कहानियों में मानवीय गुणों; यथा-प्रेम, सत्य तथा करुणा; को आदर्श रूप में स्थापित करते हैं।

इस कहानी की कथावस्तु का आरम्भ राजा रिपुदमन की ध्रुवयात्रा से वापस लौटने से प्रारम्भ होता है। कथानक का विकास रिपुदमन और आचार्य मारुति के वार्तालाप, तत्पश्चात् रिपुदमन और उसकी अविवाहिता प्रेमिका उर्मिला के वार्तालाप और उर्मिला तथा आचार्य मारुति के मध्य हुए वार्तालाप से होता है। कहानी के मध्य में ही यह स्पष्ट होता है कि उर्मिला ही मारुति की पुत्री है। कहानी का अन्त और चरमोत्कर्ष राजा रिपुदमन द्वारा आत्मघात किये जाने से होता है।

प्रस्तुत कहानी में कहानीकार ने एक सुसंस्कारित युवती के उत्कृष्ट प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शाया है तथा प्रेम को नारी से बिलकुल अलग और सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित किया है। कहानी का प्रत्येक पात्र कर्तव्य के प्रति निष्ठा एवं नैतिकता के प्रति पूर्णरूपेण सतर्क दिखाई पड़ता है और जिसकी पूर्ण परिणति के लिए वह अपना जीवन अर्पण करने से भी नहीं डरता। कहानी मनौवैज्ञानिकता के साथ-साथ दार्शनिकता से भी ओत-प्रोत है और संवेदनाप्रधान होने के कारण पाठक के अन्तस्तल पर अपनी अमिट छाप छोड़ती हैं। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि ध्रुवयात्रा एक अत्युत्कृष्ट कहानी है।

(3) उद्देश्य-प्रस्तुत कहानी में कहानीकार जैनेन्द्र जी ने बताया है कि प्रेम एक पवित्र बन्धन है और विवाह एक सामाजिक बन्धन। प्रेम में पवित्रता होती है और विवाह में स्वार्थता। प्रेम की भावना व्यक्ति को उसके लक्ष्य तक पहुँचने में मदद करती है। उर्मिला कहती है, “हाँ, स्त्री रो रही है, प्रेमिका प्रसन्न है। स्त्री की मत सुनना, मैं भी पुरुष की नहीं सुनँगी। दोनों जने प्रेम की सुनेंगे। प्रेम जो अपने सिवा किसी दया को, किसी कुछ को नहीं जानता।”
निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि प्रेम को ही सर्वोच्च दर्शाना इस कहानी का मुख्य उद्देश्य है, जिसमें कहानीकार को पूर्ण सफलता मिली है।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 7 सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन’ अज्ञेय’

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 7
Chapter Name सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन’ अज्ञेय’
Number of Questions 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 7 सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन’ अज्ञेय’

कवि का साहित्यिक परिचय और कृतिया

प्रश्न 1.
अज्ञेय के जीवन-परिचय और कृतियों पर प्रकाश डालिए। [2009, 10, 11]
या
सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए। (2012, 13, 14, 15, 16, 18]
उत्तर
जीवन-परिचय-अज्ञेय जी का जन्म सन् 1911 ई० में करतारपुर (जालन्धर) में हुआ था। इनके पिता पं० हीरानन्द शास्त्री भारत के प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता थे। ये वत्स गोत्र के और सारस्वत ब्राह्मण परिवार के थे। संकीर्ण जातिवाद से ऊपर उठकर वत्स गोत्र के नाम से ये वात्स्यायन कहलाये। अज्ञेय जी का शैशव अपने पिता के साथ वन और पर्वतों में बिखरे पुरातत्त्व अवशेषों के मध्य व्यतीत हुआ। माता और भाइयों से अलग एकान्त में रहने के कारण इनका जीवन और व्यक्तित्व कुछ विशेष प्रकार का बन गया। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा पुराने ढंग से अष्टाध्यायी रटकर संस्कृत में हुई। इसके बाद इन्होंने फारसी और अंग्रेजी सीखी। इनकी आगे की शिक्षा मद्रास (चेन्नई) और लाहौर में हुई। सन् 1929 ई० में बी० एस-सी० उत्तीर्ण करने के उपरान्त ये अंग्रेजी में एम० ए० के अन्तिम वर्ष में ही थे कि क्रान्तिकारी आन्दोलनों में भाग लेने के कारण गिरफ्तार कर लिये गये। चार वर्ष जेल में और एक वर्ष घर में ही नजरबन्द रहकर व्यतीत करना पड़ा। इन्होंने मेरठ के किसान आन्दोलन में भाग लिया था और तीन वर्ष तक सेना में भरती होकर असम-बर्मा सीमा पर और यहाँ युद्ध समाप्त हो जाने पर पंजाब के पश्चिमोत्तर सीमान्त पर सैनिक रूप में सेवा भी की। सन् 1955 ई० में यूनेस्को की वृत्ति पर आप यूरोप गये तथा सन् 1957 ई० में जापान और पूर्वेशिया का भ्रमण किया। कुछ समय तक ये अमेरिका में भारतीय साहित्य और संस्कृति के प्राध्यापक रहे तथा जोधपुर विश्वविद्यालय में तुलनात्मक साहित्य और भाषा अनुशीलन विभाग में निदेशक पद पर भी कार्य किया। ये ‘दिनमान’ और ‘नया प्रतीक’ पत्रों के सम्पादक भी रहे।

साहित्य के अतिरिक्त चित्रकला, मृत्तिका-शिल्प, फोटोग्राफी, बागवानी, पर्वतारोहण आदि में ये विशेष रुचि लेते थे। 4 अप्रैल, 1987 ई० को इनका स्वर्गवास हो गया। इन्हें मरणोपरान्त ‘भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

साहित्यिक सेवाएँ-अज्ञेय जी की रचनाओं में उनका व्यक्तित्व बहुत मुखर रहा है। वे प्रयोगवादी कवि के रूप में विख्यात हैं और उनकी प्रतिभा निरन्तर परिमार्जित होती रही है। प्रगतिवादी काव्य का ही एक रूप प्रयोगवादी काव्य के आन्दोलन में प्रतिफलित हुआ। इसका प्रवर्तन ‘तार सप्तक’ के द्वारा अज्ञेय जी ने ही किया था। इन्होंने अपने कलात्मक बोध, समृद्ध कल्पना-शक्ति और संकेतमयी अभिव्यंजना द्वारा भावना के अनेक नये अनछुए रूपों को उजागर किया।

प्रमुख रचनाएँ—(1) आँगन के पार द्वार, (2) सुनहले शैवाल, (3) पूर्वा, (4) हरी घास पर क्षण भर, (5) बावरा अहेरी, (6) अरी ओ करुणामय प्रभामय, (7) इन्द्रधनु रौंदे हुए ये, (8) कितनी नावों में कितनी बार, (9) पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ, (10) इत्यलम्, (11) चिन्ता, (12) सागरमुद्रा, (13) महावृक्ष के नीचे, (14) भग्नदूत, (15) रूपांवरा, (16) नदी के बॉक पर छाया आदि इनके प्रमुख काव्य ग्रन्थ हैं। ‘प्रिज़न डेज़ ऐण्ड अदर पोयम्स’ नाम से इनकी अंग्रेजी भाषा में रचित एक अन्य काव्य-कृति भी प्रकाशित हुई है।

साहित्य में स्थान–अज्ञेय की सतत प्रयोगशील प्रतिभा किसी एक बँधी-बँधायी लीक पर चलने वाली न थी, फलतः इन्होंने काव्य के भावपक्ष तथा कलापक्ष दोनों में नये-नये प्रयोग करके हिन्दी-कविता के भावक्षेत्र का विस्तार किया तथा अभिव्यक्ति को नूतन व्यंजकता प्रदान की। अत: इनके विषय में यह नि:संकोच कहा जा सकता है कि इन्होंने हिन्दी कविता का नव संस्कार किया। ये प्रयोगवादी काव्यधारा के प्रवर्तक तथा आधुनिक हिन्दी कवियों में उच्च स्थान के अधिकारी हैं।

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोर

मैंने आहुति बनकर देखा

प्रश्न–दिए गए पद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है-
वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहन-कारी हाला है।
मैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया-
मैंने आहुति बनकर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है !
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कवि ने रोगी किसे बताया है?
(iv) किनको संवेदनाहीन मृतक की संज्ञा दी गयी है?
(v) कवि ने यह कैसे सिद्ध किया है कि प्रेम यज्ञ की ज्वाला के समान पवित्र और कल्याणकारी
उत्तर
(i) प्रस्तुत पंक्तियाँ प्रयोगवाद के प्रवर्तक श्री सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन’अज्ञेय’ द्वारा रचित ‘पूर्वा’ कविता-संग्रह से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘मैंने आहति बनकर देखा’ शीर्षक कविता से उद्धृत हैं।
अथवा
शीर्षक का नाम- मैंने आहुति बनकर देखा।
कवि का नाम–सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-कवि अज्ञेय का कहना है कि प्रेम जीवन में माधुर्य और सरसता का संचार करता है तथा व्यक्ति को एक नवीन चेतना और उत्साहित करने वाली नव-प्रेरणा प्रदान करता है। यह निष्प्राण व्यक्ति में भी प्राण डाल देता है। कवि कहता है कि मैंने स्वयं अनुभूत करके प्रेम के सच्चे स्वरूप और उसकी महत्ता को जान लिया है। मुझे प्रेम का यह तत्त्व अथवा रहस्य ज्ञात हो गया है कि प्रेम यज्ञ की उस ज्वाला के समान पवित्र और कल्याणकारी है, जो भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टियों से व्यक्ति के लिए आवश्यक और मंगलकारी है। साथ ही प्रेम के इस मंगलकारी स्वरूप की अनुभूति तथा प्रेमरूपी यज्ञ की ज्वाला के दर्शन उसी समय सम्भव हो पाते हैं, जब व्यक्ति स्वयं प्रेमरूपी यज्ञ में अपनी आहुति देता है। आशय यह है कि कठिनाइयों और बाधाओं को पार करके तथा संघर्ष में तपकर ही हम प्रेम के तत्त्व को पहचान सकते हैं।
(iii) कवि ने उन लोगों को रोगी बताया है जो प्रेम को कटु अनुभवों का प्याला बताते हैं।
(iv) जो लोग प्रेम को अचेतन करने वाली मदिरा कहते हैं उनको संवेदनाहीन मृतक की संज्ञा दी है।
(v) कवि ने स्वयं व्यक्तिगत गहन अनुभूमि के आधार पर यह सिद्ध किया है कि प्रेम यज्ञ की ज्वाला के समान पवित्र और कल्याणकारी है।

हिरोशिमा

प्रश्न 1.
छायाएँ मानव-जन की
नहीं मिटीं लम्बी हो-होकर :
मानव ही सब भाप हो गये।
छायाएँ तो अभी लिखी हैं,
झुलसे हुए पत्थरों पर
उजड़ी सड़कों की गच पर ।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) प्रस्तुत अंश में किसका वर्णन हुआ है?
(iv) परमाणु हमले से कहाँ पर तुरन्त ही सब कुछ समाप्त हो गया?
(v) हिरोशिमा की उजड़ी सड़कों पर आज भी कितनी काली छायाएँ देखी जा सकती हैं?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पंक्तियाँ प्रयोगवाद के प्रवर्तक श्री सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन’अज्ञेय’ द्वारा रचित ‘पूर्वा’ कविता-संग्रह से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘हिरोशिमा’ शीर्षक कविता से उद्धृत हैं।
अथवा
शीर्षक का नाम- हिरोशिमा।
कवि का नाम–सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-‘अज्ञेय’ जी ने कहा है कि परमाणु शक्ति के दुरुपयोग से मानवता त्रस्त होती है। मानव के साथ-साथ प्रकृति और दूसरे जीव-जन्तु भी समूल नष्ट हो जाते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के अन्त में अमेरिका ने जापान देश के हिरोशिमा और नागासाकी नगरों पर परमाणु बमों से हमला किया तो मनुष्य द्वारा रचे गये उस सूर्य की रोशनी में वहाँ की जनता भाप बन कर उड़ गयी थी। लोगों की छायाएँ डूबते सूर्य के प्रकाश में जैसे लम्बी होकर मिटती हैं, वैसी हिरोशिमा में नहीं मिटी थीं, वहाँ तुरन्त ही सब कुछ समाप्त हो गया था। आज तक भी वहाँ की उजड़ी सड़कों और परमाणु बमों की आग से झुलसे पत्थरों पर उस त्रासदी की काली छायाएँ स्पष्ट देखी जा सकती हैं।
(iii) प्रस्तुत अंश में अमेरिका के परमाणु बमों द्वारा जापान के हिरोशिमा और नागासाकी नगरों में हुए भीषण नर-संहार का वर्णन हुआ है।
(iv) हिरोशिमा और नागासाकी नगरों में परमाणु हमले से तुरन्त ही सब-कुछ समाप्त हो गया।
(v) हिरोशिमा की उजड़ी सड़कों पर परमाणु बस की आग से झुलसे पत्थरों पर उस त्रासदी की काली छायाएँ स्पष्ट देखी जा सकती हैं।

प्रश्न 2.
मानव का रचा हुआ सूरज
मानव को भाप बनाकर सोख गया।
पत्थर पर लिखी हुई यह
जली हुई छाया
मानव की साखी है।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) मानव का रचा हुआ सूरज क्या है?
(iv) अणुबमरूपी सूरज किसे और किस प्रकार भाप बनाकर सोख गया?
(v) कौन आज भी महाविनाश के गवाह हैं?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पंक्तियाँ प्रयोगवाद के प्रवर्तक श्री सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘हिरोशिमा’ द्वारा रचित ‘पूर्वा’ कविता-संग्रह से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित हिरोशिमा’ शीर्षक कविता से उद्धत हैं।
अथवा
शीर्षक का नाम-हिरोशिमा।
कवि का नाम-सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’।।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–परमाणु बम के रूप में मनुष्य ने मानो कृत्रिम सूरज की रचना कर ली है। इसके विस्फोट में सूरज के समान ही अत्यधिक ताप उत्पन्न होता है। अमेरिका ने जब हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराया तो विस्फोट के समय उससे इतना ताप और प्रकाश उत्पन्न हुआ कि लगा आसमान से टूटकर सूरज ही धरती पर आ गिरा हो। उस समय मनुष्य भाप बनकर उड़ गया और उसकी राख तक शेष न रही। सूर्य में भी इतना ही ताप है कि उसके पास पहुँचकर कोई भी वस्तु ठोस अथवा द्रव अवस्था में नहीं रहती, वरन् वह गैस में परिवर्तित हो जाती है, ऐसा ही हिरोशिमा के परमाणु बम विस्फोट के समय हुआ था। जहाँ पर बम गिरा था, वहाँ की अधिकांश वस्तुएँ विशेषकरे पेड़-पौधे और जीव-जन्तु अत्यधिक ताप के कारण भाप (गैस) बनकर उड़ गये थे। यह वैज्ञानिक प्रगति के महाविनाश का प्रथम प्रमाण था।
(iii) मानव का रचा हुआ सूरज अणुबम है।
(iv) अणुबमरूपी सूरज ने मनुष्यों को उसी प्रकार जलाकार भस्म कर डाला जिस प्रकार सूर्य पानी को भाप बना डालता है।
(v) अणुबम की आग ने मानव तो मानव, पत्थर तक को जलाकर काला कर डाला, जो आज भी उस महाविनाश की गाथा के गवाह हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 6 रामधारी सिंह दिनकर

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name रामधारी सिंह दिनकर
Number of Questions 6
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 6 रामधारी सिंह दिनकर

कवि का साहित्यिक परिचय और कृतिया

प्रश्न 1.
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जीवन-परिचय और साहित्यिक प्रदेय पर प्रकाश डालिए। [2009]
था
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए। [2010, 11]
था
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का साहित्यिक परिचय दीजिए एवं उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए। [2012, 14, 15, 16, 17, 18]
उतर
जीवन-परिचय-श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म 30 सितम्बर, 1908 ई० ( संवत् 1965 वि० ) को जिला मुंगेर (बिहार) के सिमरिया नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री रवि सिंह और माता का नाम श्रीमती मनरूपदेवी था। इनकी दो वर्ष की अवस्था में ही पिता का देहावसान हो गया; अत: बड़े भाई वसन्त सिंह और माता की छत्रछाया में ही ये बड़े हुए। इनकी आरम्भिक शिक्षा गाँव की पाठशाला में ही हुई। अपने विद्यार्थी जीवन से ही इन्हें आर्थिक कष्ट झेलने पड़े। विद्यालय के लिए घर से पैदल दस मील रोज आना-जाना इनकी विवशता थी। इन्होंने मैट्रिक (हाईस्कूल) की परीक्षा मोकामा घाट स्थित रेलवे हाईस्कूल से उत्तीर्ण की और हिन्दी में सर्वाधिक अंक प्राप्त करके ‘भूदेव’ स्वर्णपदक जीता। 1932 ई० में पटना से इन्होंने बी० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की। ग्रामीण परम्पराओं के कारण दिनकर जी का विवाह किशोरावस्था में ही हो गया। अपने पारिवारिक दायित्वों के प्रति दिनकर जी जीवन भर सचेत रहे और इसी कारण इन्हें कई प्रकार की नौकरी करनी पड़ी। सन् 1932 ई० में बी० ए० करने के बाद ये एक नये स्कूल में अध्यापक बने। सन् 1934 ई० में इस पद को छोड़कर सीतामढ़ी में सब-रजिस्ट्रार बने। सन् 1950 ई० में बिहार सरकार ने इन्हें मुजफ्फरपुर के स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिन्दी-विभागाध्यक्ष के पद पर नियुक्त किया। सन् 1952 ई० से सन् 1963 ई० तक ये राज्यसभा के सदस्य मनोनीत किये गये। इन्हें केन्द्रीय सरकार की हिन्दी-समिति को परामर्शदाता भी बनाया गया। सन् 1964 ई० में ये भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति बने।।

दिनकर जी को कवि-रूप में पर्याप्त सम्मान मिला। ‘पद्मभूषण’ की उपाधि, ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार, द्विवेदी पदक, डी० लिट् की मानद उपाधि, राज्यसभा की सदस्यता आदि इनके कृतित्व की राष्ट्र द्वारा स्वीकृति के प्रमाण । सन् 1972 ई० में इन्हें उर्वशी’ के लिए ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया गया। इनका स्वर्गवास 24 अप्रैल, 1974 ई०( संवत् 2031 वि०) को मद्रास (चेन्नई) में हुआ।

साहित्यिक सेवाएँ–दिनकर जी की सबसे प्रमुख विशेषता उनकी परिवर्तनकारी सोच रही है। उनकी कविता का उद्भव छायावाद युग में हुआ और वह प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नयी कविता आदि के युगों से होकर गुजरी। इस दीर्घकाल में जो आरम्भ से अन्त तक उनके काव्य में रही, वह है उनका राष्ट्रीय स्वर। ‘दिनकर’ जी राष्ट्रीय भावनाओं के ओजस्वी गायक रहे हैं। इन्होंने देशानुराग की भावना से ओत-प्रोत, पीड़ितों के प्रति सहानुभूति की भावना से परिपूर्ण तथा क्रान्ति की भावना जगाने वाली रचनाएँ लिखी हैं। ये लोक के प्रति निष्ठावान, सामाजिक दायित्व के प्रति सजग तथा जनसाधारण के प्रति समर्पित कवि रहे हैं।

कृतियाँ-दिनकर जी की साहित्य विपुल है, जिसमें काव्य के अतिरिक्त विविध-विषयक गद्य-रचनाएँ भी हैं। इनकी प्रमुख
काव्य-रचनाएँ—(1) रेणुका, (2) हुंकार, (3) कुरुक्षेत्र तथा (4) उर्वशी हैं। इनके अतिरिक्त दिनकर जी के अन्य काव्यग्रन्थ निम्नलिखित हैं(5) खण्डकाव्य-रश्मिरथी, (6) कविता-संग्रह–(i) रसवन्ती, (ii) द्वन्द्वगीत, (iii) सामधेनी, (iv) बापू, (v) इतिहास के आँसू, (vi) धूप और धुआँ, (vii) नीम के पत्ते, (viii) नीलकुसुम, (ix) चक्रवाल, (x) कविश्री, (xi) सीपी और शंख, (xii) परशुराम की प्रतीक्षा, (xiii) स्मृति-तिलक, (xiv) हारे को हरिनाम आदि, (7) बालसाहित्य-धूप-छाँह, मिर्च का मजा, सूरज को ब्याह।
साहित्य में स्थान–दिनकर जी की सबसे बड़ी विशेषता है, उनका समय के साथ निरन्तर गतिशील रहना। यह उनके क्रान्तिकारी व्यक्तित्व और ज्वलन्त प्रतिभा का परिचायक है। फलत: गुप्त जी के बाद ये ही राष्ट्रकवि पद के सच्चे अधिकारी बने और इन्हें ‘युग-चरण’, ‘राष्ट्रीय-चेतना का वैतालिक’ और ‘जनजागरण का अग्रदूत’ जैसे विशेषणों से विभूषित किया गया। ये हिन्दी के गौरव हैं, जिन्हें पाकर सचमुच हिन्दी कविता धन्य हुई।

‘पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोचर

पुरवा प्रश्न–दिए गए पद्यांश को पढ़कर उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
कौन है अंकुश, इसे मैं भी नहीं पहचानता हूँ ।
पर, सरोवर के किनारे कंठ में जो जल रहा है।
उस तृषा, उस वेदना को जानता हूँ।
सिन्धु-सा उद्द्दाम, अपरम्पार मेरा बल कहाँ है ?
गूंजता जिस शक्ति का सर्वत्र जयजयकारे,
उस अटल संकल्प का सम्बल कहाँ है ?
यह शिला-सा वक्ष, ये चट्टान-सी मेरी भुजाएँ,
सूर्य के आलोक से दीपित, समुन्नत भाल,
मेरे प्राण का सागर अगम, उत्ताल, उच्छल है।
सामने टिकते नहीं वनराज, पर्वत डोलते हैं,
काँपता है कुंडली मारे समय का व्याल,
मेरी बाँह में मारुत, गरुड़, गजराज का बल है।
मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूँ मैं,
उर्वशी ! अपने समय का सूर्य हूँ मैं ।
अंध तम के भाल पर पावक जलाता हूँ,
बादलों के सीस पर स्यन्दन’चलाता हूँ।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) राजा पुरूरवा किससे अपने मन की दुविधाग्रस्त स्थिति का वर्णन कर रहे हैं?
(iv) ऐसा क्या है जो राजा पुरूरवा को उर्वशी जैसी रूपसी के पास होने पर भी कामना पूरी करने पर रोक रहा है?
(v) हे उर्वशी! मैं अपने समय का सूर्य हूँ।” इस बात का क्या आशय है?
उत्तर
(i) ये पंक्तियाँ महाकवि रामधारीसिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित नाटकीय महाकाव्य ‘उर्वशी’ के तृतीय अंक से हमारी पाठ्य-पुस्तक काव्यांजलि’ में संकलित ‘पुरूरवा’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत हैं।
अथवा
शीर्षक का नाम-— उर्वशी।
कवि का नाम-रामधारी सिंह ‘दिनकर’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-पुरूरवा कहते हैं कि मैं उस अंकुश या प्रतिबन्ध के विषय में नहीं जानता कि वह कौन-सी शक्ति है, जो मुझे अपनी प्यास बुझाने से रोक रही है। मेरी स्थिति उस व्यक्ति की-सी है, जो प्रेम सरोवर के किनारे बैठा है, किन्तु प्यास की पीड़ा से व्याकुल होने पर भी वह अपनी प्यास नहीं बुझा पाता। ऐसा क्यों होता है, यह मैं स्वयं नहीं समझ पाता। पुरूरवा का आशय है कि उर्वशी जैसी अनुपम रूपसी पास होने पर भी और स्वयं कामाग्नि से विह्वल होने पर भी वह अपनी कामना पूरी क्यों नहीं कर पा रहा है। सम्भवतया उसके सत्संस्कार उसे इस समाज विरुद्ध सम्बन्ध बनाने से रोक रहे हैं।
(iii) राजा पुरूरवा अप्सरा उर्वशी से अपने मन की दुविधाग्रस्त स्थिति का वर्णन कर रहे हैं।
(iv) राजा पुरूरवा के सत्संस्कार हैं जो उसे समाज के विरुद्ध सम्बन्ध बनाने से रोक रहे हैं।
(v) ‘हे उर्वशी! मैं अपने समय का सूर्य हूँ इस बात का आशय है कि जैसे सूर्य के तेज के सामने तारे फीके पड़ जाते हैं वैसे ही मेरे दुर्धर्ष तेज के सामने संसार के सारे राजा-गण निस्तेज हो चुके हैं।

उर्वशी

प्रश्न–दिए गए पद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
मैं नहीं गगन की लता
तारकों में पुलकिता फूलती हुई,
मैं नहीं व्योमपुर की बाला,
विधु की तनया, चन्द्रिका-संग,
पूर्णिमा सिन्धु की परमोज्ज्वल आभा-तरंग,
मैं नहीं किरण के तारों पर झूलती हुई भू पर उतरी ।
मैं नाम-गोत्र से रहित पुष्प,
अम्बर में उड़ती हुई मुक्त आनन्द-शिखा
इतिवृत्त हीन,
सौन्दर्य-चेतना की तरंग;
सुर-नर-किन्नर गन्धर्व नहीं,
प्रिय! मैं केवल अप्सरा
विश्वनर के अतृप्त इच्छा-सागर से समुद्भूत ।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) इस पद्यांश में उर्वशी ने किसे अपना परिचय दिया है?
(iv) आकाश में उड़ती हुई स्वच्छन्द आनन्द की शिखा कौन है?
(v) ‘मैं नाम-ग्रोत्र से रहित पुष्प’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर
(i) यह पद्यांश राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित ‘उर्वशी’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘उर्वशी’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- उर्वशी
कवि का नाम-रामधारी सिंह ‘दिनकर’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-मैं नक्षत्रों के बीच में रहकर प्रसन्नतापूर्वक फलने-फूलने वाली आकाश की लता नहीं हूँ, न मैं आकाश में स्थित किसी नगर से उतरी युवती हुँ, न ही मैं चन्द्रमा की पुत्री हूँ, जो चाँदनी के साथ चन्द्रकिरणरूपी तारों पर लटककर पृथ्वी पर उतरी हो और न ही मैं पूर्णिमा के चन्द्रमा के उज्ज्वल प्रकाशरूपी सागर की हिलोरें लेती लहर हूँ। मैं तो मानव के हृदय में सुखोपभोग की अतृप्त इच्छाओं का जो सागर लहरा रहा है, उसी से उत्पन्न हुई केवल एक अप्सरा हूँ।
(iii) इस पद्यांश में उर्वशी ने राजा पुरूरवा को अपना परिचय दिया है।
(iv) उर्वशी आकाश में उड़ती हुई स्वच्छन्द आनन्द की शिखा है।
(v) रूपक अलंकार।।

प्रश्न 2.
देवालय में देवता नहीं, केवल मैं हूँ।
मेरी प्रतिमा को घेर उठ रही अगुरु-गन्ध,
बज रहा अर्चना में मेरी मेरा नूपुर ।
भू-नभ को सब संगीत नाद मेरे निस्सीम प्रणय को है,
सारी कविता जयगान एक मेरी त्रयलोक-विजय का है।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि को नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) इन पंक्तियों में नारी की विश्वव्यापी शक्ति का वर्णन कौन कर रहा है?
(iv) उर्वशी ने मन्दिरों में देवताओं के स्थान पर किसका वास बताया है?
(v) संसार का समस्त काव्य किसका गान करता है?
उत्तर
(i) यह पद्यांश राष्ट्रकवि रामधारीसिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित ‘उर्वशी’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘उर्वशी’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- उर्वशी।
कवि का नाम-रामधारी सिंह ‘दिनकर’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-उर्वशी कह रही है कि मन्दिरों में देवताओं का नहीं, अपितु मेरा ही वास है। आशय यह है कि देव-प्रतिमाएँ मनुष्य की सौन्दर्य चेतना का परिणाम हैं और इस सौन्दर्य चेतना का मूल आधार नारी है। इस प्रकार मन्दिरों में देव-प्रतिमाओं के विभिन्न रूपों में मनुष्य वस्तुतः सौन्दर्य की साकार प्रतिमा नारी को ही अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित करता है। अतः स्पष्ट है कि देवालयों में देव-प्रतिमाओं के स्थान पर मुख्यतः नारी ही अधिष्ठित है।
(iii) इन पंक्तियों में नारी की विश्वव्यापी शक्ति का वर्णन उर्वशी कर रही है।
(iv) उर्वशी ने मन्दिरों में देवताओं के स्थान पर स्वयं का वास बताया है।
(v) संसार का समस्त काव्य नारी के ही त्रैलोक्य-विजय का गान करता है।

अभिनव मनुष्य

प्रश्न–दिए गए पद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
यह मनुज, ब्रह्माण्ड का सबसे सुरम्य प्रकाश,
कुछ छिपा सकते न जिससे भूमि या आकाश ।
यह मनुज जिसकी शिखा उद्द्दाम,
कर रहे जिसको चराचर भक्तियुक्त प्रणाम ।
यह मनुज, जो सृष्टि का श्रृंगार,
ज्ञान का, विज्ञान का, आलोक का आगार ।
‘व्योम से पाताल तक सब कुछ इसे है ज्ञेय’
पर, न यह परिचय मनुज का, यह न उसका श्रेय ।
श्रेय उसका, बुद्धि पर चैतन्य उर की जीत;
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) आकाश और पृथ्वी का कोई भी तत्त्व किससे अज्ञात नहीं रह सकता?
(iv) संसार के सभी जड़-चेतन पदार्थ किस कारण मनुष्य को प्रणाम करते हैं?
(v) ‘आकाश’ शब्द के दो पर्यायवाची शब्द लिखिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश कविवर रामधारी सिंह दिनकर’ द्वारा रचित ‘कुरुक्षेत्र’ काव्य के छठे सर्ग से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘अभिनव मनुष्य’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- अभिनव मनुष्य।
कवि का नाम-रामधारी सिंह ‘दिनकर’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–कवि कहता है कि आज मनुष्य ने वैज्ञानिक प्रगति के बल पर इस संसार के विषय में सब कुछ जान लिया है। पृथ्वी के गर्भ से लेकर सुदूर अन्तरिक्ष तक के सभी रहस्यों का उद्घाटन कर दिया है। चाँद-तारे, सूरज आदि की स्थिति को स्पष्ट कर दिया है कि आसमान में कहाँ और कैसे टिके हैं? पृथ्वी के गर्भ में जहाँ शीतल जल का अथाह भण्डार है, वहीं दहकता लावा भी विद्यमान है; उसके द्वारा यह भी ज्ञात किया जा चुका है। किन्तु यह ज्ञान-विज्ञान तो मनुष्यता की पहचान नहीं है और न ही इससे मानवता का कल्याण हो सकता है। संसार का कल्याण तो केवल इस बात में निहित है कि प्रत्येक मनुष्य प्राणिमात्र से स्नेह करे, उसे अपने समान ही समझे, यही मनुष्यता की अथवा मनुष्य होने की पहचान भी है, अन्यथा ज्ञान-विज्ञान की जानकारी तो एक कम्प्यूटर भी रखता है, मगर उसमें मानवीय संवेदनाएँ नहीं होती; अत: उसे मनुष्य नहीं कहा जा सकता।
(iii) आकाश और पृथ्वी का कोई भी तत्त्व अभिनव मनुष्य से अज्ञात नहीं रह सकता।
(iv) आज का यह अभिनव मनुष्य इतना बुद्धिमान हो गया है कि इसके यश की अदम्य-शिखा सर्वत्र शोभित है जिसे संसार के सभी जड़-चेतन पदार्थ शक्तिपूर्वक प्रणाम करते हैं।
(v) आकाश’ शब्द के दो पर्यायवाची शब्द हैं–नभ, शून्य।

प्रश्न 2.
सावधान, मनुष्य ! यदि विज्ञान है तलवार,
तो इसे दे फेंक, तजकर मोह, स्मृति के पार ।
हो चुका है सिद्ध, है तू शिशु अभी अज्ञान;
फूल काँटों की तुझे कुछ भी नहीं पहचान ।
खेल सकता तू नहीं ले हाथ में तलवार,
काट लेगा अंग, तीखी है बड़ी यह धार ।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कवि ने भौतिकवादी और वैज्ञानिक युग के मानव को क्या चेतावनी दी है?
(iv) कवि ने तलवार किसे बताया है और इसका इस्तेमाल करने से मनुष्य को क्यों मना किया
(v) ‘तलवार’ शब्द के दो पर्यायवाची लिखिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश कविवर रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित ‘कुरुक्षेत्र’ काव्य के छठे सर्ग से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘अभिनव मनुष्य’ शीर्षक काव्यांश से उद्धत है।।
अथवा
शीर्षक का नाम- अभिनव मनुष्य।।
कवि का नाम-रामधारी सिंह ‘दिनकर’।।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-कवि श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ मनुष्य को सचेत करते हुए कहते हैं। कि हे मनुष्य! यह सिद्ध हो चुका है कि तुम अभी एक शिशु के समान अज्ञानी हो। तुम अपने ही हाथों अपना सर्वनाश करने पर तुले हुए हो। तुम्हें फूल और काँटों की कुछ भी पहचान नहीं है; अर्थात् तुम्हें यह पहचान नहीं है कि तुम्हारे लिए क्या लाभदायक है और क्या हानिकारक। अणुबम का प्रयोग करके विज्ञान पर गर्व करने वाले मनुष्य ने अपनी अबोधता और विवेकहीनता को सिद्ध कर दिया है।
(iii) कवि ने भौतिकवादी और वैज्ञानिक युग के मानव को यह चेतावनी दी है कि यदि तू अभी सावधान नहीं हुआ तो तुझे विज्ञान के दुष्परिणाम भोगने पड़ेंगे।
(iv) कवि ने विज्ञान को तलवार बताया है और इसे मनमानी क्रीड़ा का माध्यम बना लेना स्वयं का नुकसान करना है। इसलिए इसके प्रचण्ड प्रभाव वे बचने के लिए मनुष्य को मना किया है।
(v) तलवार’ शब्द के दो पर्यायवाची हैं-खड्ग तथा कृपाण।।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 1 कुहासा और किरण

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 1 कुहासा और किरण (विष्णु प्रभाकर) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 1 कुहासा और किरण (विष्णु प्रभाकर).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name कुहासा और किरण (विष्णु प्रभाकर)
Number of Questions 8
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 1 कुहासा और किरण (विष्णु प्रभाकर)

प्रश्न 1:
‘कुहासा और किरण’ नाटक की कथावस्तु पर प्रकाश डालिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के सर्वाधिक मार्मिक प्रसंग पर प्रकाश डालिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के द्वितीय अंक की कथा का सारांश लिखिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के तृतीय (अन्तिम) अंक की कथा पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के प्रथम सर्ग की कथा का सार लिखिए।
या
‘कुहासा और किरण’ की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए।
या
कथानक के ऐतिहासिक आधार पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:

‘कुहासा और किरण’ का सारांश

विष्णु प्रभाकर जी का ‘कुहासा और किरण’; राजनीतिक वातावरण पर आधारित नाटक है। नाटक की पृष्ठभूमि में स्वतन्त्रता-प्राप्ति से 15 वर्ष पूर्व की कथा छिपी है।।

मुलतान में चन्द्रशेखर, राजेन्द्र, चन्दर, हाशमी तथा कृष्णदेव नाम के देशभक्तों ने अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध क्रान्ति की योजना बंनायी। अंग्रेज सरकार इन लोगों के षड्यन्त्र से बौखला गयी। इसी समय कृष्णदेव सरकार को मुखबिर बन गया। इस कारण शेष चार साथियों को कठोर कारावास मिला। सन् 1946 ई० में ये लोग जेल से मुक्त हुए। हाशमी और चन्दर निर्धनता के कारण समाप्त हो गये। राजेन्द्र ने नौकरी की, परन्तु उसका शरीर कार्य करने में सक्षम न था। चन्द्रशेखर तपेदिक रोग से पीड़ित हो गया और उसकी पत्नी मालती बेसहारा हो गयी। सन् 1947 ई० में देश स्वतन्त्र हुआ। सन् 1942 ई० का धोखेबाज मुखबिर कृष्णदेव अब देशभक्त नेता बन गया। उसने अपना नाम कृष्ण चैतन्य रख लिया। नाटक के सारांश को तीन अंकों में प्रस्तुत किया जा रहा है।

प्रथम अंक – नाटक का प्रारम्भ नेताजी कृष्ण चैतन्य के निवास पर उनकी षष्ठिपूर्ति के अवसर पर उनकी सेक्रेटरी सुनन्दा और अमूल्य के वार्तालाप से होता है। उन्होंने इस अवसर पर नेताजी को बधाई दी। अन्य लोग भी उन्हें बधाई देने के लिए पहुँचे। अब कृष्ण चैतन्य सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में है 250 प्रति माह राजनीतिक पेंशन पाते हैं। वे प्रत्येक प्रकार के गैर-कानूनी कार्य करते हैं। उन्होंने सुनन्दा नामक लड़की को अपनी व्यक्तिगत सचिव नियुक्त किया और उसके माध्यम से ब्लैकमेल जैसे घृणित कार्य भी किये। कृष्ण चैतन्य के ये कार्य उसकी पत्नी गायत्री को नहीं सुहाते थे। देशभक्त राजेन्द्र के पुत्र अमूल्य के नौकरी की तलाश में कृष्ण चैतन्य के पास आने पर वे उसे विपिन बिहारी के यहाँ सम्पादक की नौकरी दिला देते हैं। अमूल्य की रिश्ते की एक बहन प्रभा; चैतन्य के यहाँ आती-जाती है।

चन्द्रशेखर की विक्षिप्त पत्नी मालती; कृष्ण चैतन्य से राजनीतिक पेंशन दिलाने का आग्रह करने हेतु उसके पास आती है और उसको पहचान लेती है। वहाँ उपस्थित अमूल्य को भी उसकी असली स्थिति का आभास हो जाता है।

द्वितीय अंक – द्वितीय अंक का प्रारम्भ विपिन बिहारी के निजी कक्ष से होता है। पाँच-पाँच पत्रिकाओं के मुख्य अधिकारी विपिन बिहारी अपने कक्ष में बैठे हैं। अमूल्य के आवेदन-पत्र को पढ़कर विपिन बिहारी उसके पिता के विषय में पूछते हैं। अमूल्य ने मुलतान षड्यन्त्र केस के विषय में विपिन बिहारी को बताया। सुनन्दा ने विपिन बिहारी से कहा कि कृष्ण चैतन्य कांग्रेस का मुखौटा लगाये एक देशद्रोही है, किन्तु विपिन बिहारी किसी भी कीमत पर कृष्ण चैतन्य का विरोध करने का साहस नहीं कर पाता। सभी को यह पता चल जाता है कि आज का महान् कांग्रेसी नेता कृष्ण चैतन्य देशद्रोही व मित्रघाती-मुखबिर कृष्णदेव है।

अपनी वास्तविकता को प्रकट हुआ देख कृष्ण चैतन्य, अमूल्य को फंसाने का प्रयास करता है। यातनाओं के कारण अमूल्य आत्महत्या करने का भी प्रयास करता है, परन्तु पुलिस उसको बचाकर अस्पताल ले जाती है। कृष्ण चैतन्य की पत्नी गायत्री को यह सब जानकर बहुत ग्लानि होती है और वह अपने पति को सभी बुरे कार्य : छोड़ने का परामर्श देती है। गायत्री की कार एक ट्रक के साथ टकरा जाती है और गायत्री का देहान्त हो जाता है। पत्नी की मृत्यु के बाद चैतन्य को आत्मग्लानि होती है। यहीं पर दूसरा अंक समाप्त हो जाता है।

तृतीय अंक – यह अंक कृष्ण चैतन्य के निवास से आरम्भ होता है। कृष्ण चैतन्य अपनी पत्नी गायत्री के चित्र के सम्मुख बैठकर अपनी भूलों के लिए प्रायश्चित्त करते हैं तथा गायत्री के बलिदान की महत्ता को स्वीकार करते हैं। सभी लोग शंकित हैं कि यह मामला गायत्री की मृत्यु का नहीं वरन् आत्महत्या का है।

सुनन्दा द्वारा दी गयी सूचना पर वहाँ गुप्तचर विभाग के अधिकारी आ जाते हैं। सुनन्दा अमूल्य का परिचय देते हुए उसे निर्दोष बताती है। कृष्ण चैतन्य भी कागज-चोरी की कहानी को मनगढ़न्त बताते हैं। वे विपिन बिहारी और उमेशचन्द्र के कुकृत्यों का भी पर्दाफाश कर देते हैं। तभी मालती अपनी पेंशन के लिए उनके पास पहुँच जाती है। कृष्ण चैतन्य उससे क्षमा याचना करते हुए उसे अपना सर्वस्व सौंप देते हैं। विपिन बिहारी और उमेशचन्द्र को बन्दी बना लिया जाता है। गुप्तचर अधिकारी कृष्ण चैतन्य को भी साथ चलने के लिए कहते हैं। वे अपनी पत्नी के चित्र को प्रणाम करके उनके साथ चल देते हैं। अमूल्य को निर्दोष सिद्ध होने पर छोड़ दिया जाता है। उसके “बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता”.-इस कथन के साथ ही नाटक समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 2:
नाटक के तत्त्वों (नाट्यकला) की दृष्टि से ‘कुहासा और किरण’ नाटक की समीक्षा (आलोचना) कीजिए।
या
भाषा-शैली की दृष्टि से ‘कुहासा और किरण’ की समीक्षा कीजिए।
या
पात्र तथा चरित्र-चित्रण की दृष्टि से ‘कुहासा और किरण’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
या
संवाद (कथोपकथन) की दृष्टि से ‘कुहासा और किरण’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण’ की कथावस्तु (कथानक) की समीक्षा कीजिए।
या
अभिनय की दृष्टि से ‘कुहासा और किरण’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण के उद्देश्य पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
रंगमंचीयता की दृष्टि से ‘कुहासा और किरण’ की समीक्षा कीजिए।
या
कुहासा और किरण नाटक के प्रतिपाद्य पर प्रकाश डालिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटकं की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
या
देश-काल और वातावरण की दृष्टि की दृष्टि से ‘कुहासा और किरण’ की समीक्षा कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक में स्वातन्त्र्योत्तर भारतीय समाज का यथार्थ चित्र अंकित किया गया है।” इस कथन की सार्थकता सिद्ध कीजिए।
या
“कुहासा और किरण’ नाटक के सन्देश पर प्रकाश डालिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के संवाद प्रभावशाली हैं। इस कथन की समीक्षा कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:

‘कुहासा और किरण’ की तात्त्विक समीक्षा

प्रस्तुत नाटक भारत की वर्तमान राजनीतिक तथा सामाजिक परिस्थितियों का सच्चा दर्पण है। नाटककार श्री विष्णु प्रभाकर ने नाटक के रचना-विधान में नाटकीय तत्त्वों के निर्वाह का ध्यान रखा है। नाटकीय तत्त्वों के आधार पर नाटक का विश्लेषण निम्नलिखित है

(1) कथावस्तु – इस नाटक का कथानक भारत की वर्तमान परिस्थितियों पर आधारित है। यह एक । समस्यामूलक कथानक है, जो स्वाधीन भारत के सामाजिक और राजनीतिक जीवन से सम्बन्धित है। अवसरवादी भ्रष्ट नेताओं के कारनामों का कच्चा चिट्ठा नाटक के माध्यम से खोला गया है। देश की स्वतन्त्रता के लिए प्राणों की बाजी लगा देने वाले लोगों की दुर्दशा भी वर्तमान का एक कटु सत्य है, जिसे लेखक ने बड़ी कुशलता से उभारा है। कथावस्तु को तीन अंकों में बाँटा गया है। पहले अंक में कथानक का आरम्भ तथा विकास है, दूसरे में चरम-सीमा तथा तीसरे अंक में उपसंहार और अन्त हुआ है। स्वाभाविकता, रोचकती, यथार्थता, सुसम्बद्धता आदि गुणों की दृष्टि से प्रस्तुत नाटक का कथानक परिपूर्ण है और उसमें आज के जीवन की सजीव झाँकी दिखाई देती है। लेखक ने अपने प्रतिपादित विषय को पूर्ण सफलता के साथ प्रस्तुत किया है। इस प्रकार कथावस्तु की दृष्टि से नाटक एक सशक्त और सफल रचना है।

(2) पात्र तथा चरित्र-चित्रण – कृष्ण चैतन्य (कृष्णदेव), अमूल्य, उमेशचन्द्र तथा विपिन बिहारी नाटक के प्रमुख पुरुष-पात्र हैं, जब कि प्रभा, सुनन्दा, मालती तथा गायत्री नारी-पात्र हैं। अन्य पात्रों में क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर, राजेन्द्र, हाशमी तथा चन्दर हैं। इनकी भूमिका गौण है। कृष्ण चैतन्य अवसरवादी मनोवृत्ति का पात्रं है। वह सभी प्रकार के नीच एवं घृणास्पद धन्धों में लिप्त रहता है। अमूल्य प्रसिद्ध देशभक्त राजेन्द्र का बेटा है। वह ईमानदार, परिश्रमी, देशभक्त, पढ़ा-लिखा और उदात्त स्वभाव वाला युवक है। नारी पात्रों में सुनन्दा तथा प्रभा अधिक प्रखर बुद्धिवाली हैं। ये दोनों भ्रष्टाचार का विरोध करती हैं। गायत्री सामान्य भारतीय नारी है। पात्र तथा चरित्र-चित्रण की दृष्टि से यह एक सफल रचना है। नाटक के सभी पात्र जीवन्त प्रतीत होते हैं। उनके व्यवहार में भी वास्तविकता का ध्यान रखा गया है। आज के वातावरण में रचे-बसे पात्रों का चित्रण नाटककार की सफलता का प्रतीक है।

(3) संवाद-योजना – नाटक में संवादों का विशेष महत्त्व होता है। निर्विवाद रूप से संवाद इस नाटक के प्राण हैं। ‘कुहासा और किरण’ की संवाद-रचना उत्तम है। संवाद पात्रों के चरित्र के अनुरूप तथा परिवेश को सजीव बनाने में समर्थ हैं। नाटककार ने छोटे और संक्षिप्त संवादों के द्वारा पात्रों की मानसिक स्थिति, चरित्र और भावों को अत्यन्त कुशलता से चित्रित किया है। नाटक के सरल, गतिशील और स्वाभाविक संवादों को एक नमूना प्रस्तुत हैं

अमूल्य  –  तुम आ गयीं सुनन्दा ?
सुनन्दा  –   इसमें भी सन्देह है ?
अमूल्य  –  (हँसकर) मेरा मतलब यह नहीं था। मैं तो कहना चाहता था कि आज तुम देर से आयी हो, जड़ कि आना जल्दी चाहिए था।
सुनन्दा  –  (पास आकर) क्यों आना चाहिए था ?
अमूल्य  –  क्योंकि आज से ही तो सर का षष्ठिपूर्ति महोत्सव’ आरम्भ होता है।
सुनन्दा  –  ओ’………….”समझी ! (व्यंग्य से) सर के प्रति बड़ी श्रद्धा है तुममें।
संवादों द्वारा पात्रों की मानसिक स्थिति और मनोभावों को कुशलता से चित्रित किया गया है

कृष्ण चैतन्य – (आवेश में आकर) विल यू ऑल शट अप ? (चीखकर) गेट आउट, गेट आउट।
संवादों में सामाजिक व्यंग्य और कृटूक्तियाँ भी प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं; जैसे

(i) हमाम में सभी नंगे हैं और नंगा नंगे को क्या नंगा करेगा ?
(ii) अन्धे को सत्य दिखाते-दिखाते स्वयं अन्धा होने की मेरी जरा भी इच्छा नहीं है।
संवादों में सहजता तथा पैनापन है। ये पात्रों के चरित्र को सफलता से प्रकट करते हैं तथा परिस्थितियों को सही प्रकार से प्रस्तुत करने में सक्षम हैं।।

(4) भाषा-शैली – नाटक की भाषा सामान्य खड़ी बोली है। प्रचलित अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत शब्दों का प्रयोग प्रचुर मात्रा में हुआ है। अंग्रेजी शब्द; जैसे—सर, केस, ब्लैक-मार्केट, इंस्पेक्टर, सोशल, बाइकॉट इत्यादि हैं। उर्दू शब्दों में बेनक़ाब, बेईमान, बेगुनाह, पोशाक, ज़मानत इत्यादि अनेक शब्द हैं। मुहावरों तथा लोकोक्तियों का प्रयोग सुन्दरता से हुआ है; जैसे-‘भाँडा फोड़ना’, ‘लंका में सभी वन गज के’, ‘दूध का धुला’ आदि।। नाटक की शैली रोचक है। इस नाटक की रचना में भारतीय और पचात्य दोनों नाट्य शैलियों का समन्वय प्रस्तुत हुआ है। वस्तुतः नाटक में प्रतीकात्मक शैली का प्रयोग हुआ है। व्यंग्य तथा चुटीलापन इसकी शैली की मुख्य विशेषता है। भाषा की सक्षमता एवं भावानुरूपता का एक उदाहरण कृष्ण चैतन्य के कथन में द्रष्टव्य है

”दार्शनिकों ने जीवन को दो भागों में बाँटा है। पहले भाग की उद्देश्य है-प्रकृति की सेवा अर्थात् परिवार का पालन-पोषण करना। दूसरे भाग का अर्थ है–संस्कृति की सेवा अर्थात् जीवन के उच्च आदर्शों का अनुशीलन। प्रकृति की मूल प्रेरणा है-अपने प्रवाह को बनाये रखना अर्थात् सन्तान-वृद्धि, और संस्कृति की प्रेरणा जीवन के तत्त्व-रूप आदर्शो की चरितार्थता।”

(5) देश-काल तथा वातावरण – प्रस्तुत नाटक में देश-काल और वातावरण को यथार्थ और उचित निर्वाह हुआ है। आधुनिक युग के सामान्य भारतीय की मूल प्रवृत्ति “कैसे भी पैसा कमाने की नीयत’ को सुन्दर ढंग से चित्रित किया गया है। कृष्ण चैतन्य जैसे कपटी राष्ट्रभक्तों एवं धूर्त समाज-सेवकों के जीवन-स्तर, उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा, काले-धन्धे में लिप्त पूँजीपतियों और पत्रकारों से उनके सम्बन्ध तथा ईमानदार लोगों की सामाजिक-आर्थिक दशा का चित्रण एक सजीव और वास्तविक लगने वाले वातावरण में हुआ है। भारतीयता के माथे पर लगे इस कलंक को अमूल्य, सुनन्दा तथा प्रभा जैसे युवा ही धो सकते हैं। भाषा, वेश-भूषा तथा स्थान इत्यादि के चयन में नाटककार सजग रहे हैं। इस प्रकार ‘कुहासा और किरण’ देश-काल तथा वातावरण की
दृष्टि से एक सफल रचना है।

(6) अभिनेयता – ‘कुहासा और किरण मंचन की दृष्टि से अच्छी रचना है। प्रस्तुत नाटक के पात्र सामान्य वेश-भूषा से युक्त और सीमित संख्या में हैं। अंक भी सीमित हैं। सम्पूर्ण नाटक तीन अंकों में विभाजित है। नाटककार ने आवश्यकतानुसार रंग-संकेत, मंच-सज्जा तथा वातावरण को स्पष्ट किया है। मंचन की दृष्टि से अधिक सामान जुटाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। आधुनिक परिवेश का नाटक होने के कारण सभी प्रकार के वस्त्रादि प्रयोग किये जा सकते हैं। नारी पात्र कम हैं तथा वेशभूषा की कोई समस्या नहीं आती। कहने का तात्पर्य यह है कि नाटक पूर्ण रूप से अभिनेयता की कसौटी पर कसा जा सकता है।

(7) उद्देश्य अथवा सन्देश – नाटककार का उद्देश्य आधुनिक समस्याओं का प्रस्तुतीकरण रहा है। समस्याओं के साथ-साथ लेखक ने उनका समाधान प्रस्तुत करने का भी प्रयास किया है; जैसे – नकली देशभक्तों का स्वार्थ-सिद्धि के लिए राष्ट्र-प्रेम दिखाना। लोकतन्त्र में प्रेस की स्वतन्त्रता है, लेकिन इस नाटक द्वारा नाटककार ने ऐसे सम्पादकों का भण्डाफोड़ किया है, जो सरकार के साथ-साथ जनता को भी भ्रमित करते और लूटते हैं। कृष्ण चैतन्य, विपिन बिहारी और उमेशचन्द्र जैसे मगरमच्छों से जनसाधारण को परिचित कराना भी नाटक का उद्देश्य है। भ्रष्ट आचरण वाले ऐसे व्यक्तियों के मुखौटे उतारकर रख देना, मुखबिरों के रहस्य को खोल देना तथा समाज में व्याप्त चोर दरवाजों को तोड़ देना आदि इस नाटक के मुख्य उद्देश्य हैं। नाटककार का वास्तविक उद्देश्य भारत के नव-निर्माण का है। समाधान के रूप में प्रभाकर जी ने बताया है कि एकता में शक्ति है। सब मिलकर ही समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त कर सकते हैं।

प्रश्न 3:
‘कुहासा और किरण’ नाटक के उस पुरुष-पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए, जिसने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया हो।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के प्रमुख पात्र (नायक) का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
अमूल्य के चरित्र-वैशिष्ट्य पर प्रकाश डालिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक का नायक (प्रमुख पात्र) कौन है? उसकी चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख संक्षेप में कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण नाटक के किसी एक पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:

अमूल्य का चरित्र-चित्रण

अमूल्य; श्री विष्णु प्रभाकर कृत ‘कुहासा और किरण’ नाटक का नायक तथा देशभक्त राजेन्द्र का पुत्र है। अमूल्यं ऐसे नवयुवकों का प्रतिनिधित्व करता है, जो देश के भ्रष्ट वातावरण में भी ईमानदारी का जीवन जीना चाहते हैं तथा जिन्हें देश से प्रेम है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) देशभक्त युवक – अमूल्य का पिंता सच्चा देशभक्त था। पिता के गुण अमूल्य में भी विद्यमान हैं। वह देश को व्यक्ति से अधिक मूल्यवान् मानता है। उसका कथन है – “हमारे लिए देश सबसे ऊपर है। देश की स्वतन्त्रता हमने प्राणों की बलि देकर पायी थी, उसे अब कलंकित न होने देंगे।”

(2) कर्तव्यपरायण – अमूल्य अपने सभी कर्तव्यों के प्रति जागरूक है। पिता की असमय मृत्यु के पश्चात् भी परिश्रम के बल पर वह अपना अध्ययन पूरा करता है। वह जिस कार्य पर भी लगता है, उसे पूर्ण लगन के साथ पूरा करता है।

(3) सत्यवादी – अमूल्य सत्यवादी है। कृष्ण चैतन्य जैसे व्यक्ति के सम्पर्क में आकर भी वह अपनी ईमानदारी और सच्चाई का रास्ता नहीं छोड़ती। षड्यन्त्र में फंसने पर भी वह दृढ़ रहता है और कहता है-“चलिए, कहीं भी चलिए। मुझे जो कहना है, वह कहूँगा।”

(4) निर्भीक तथा साहसी – अमूल्य साहसी युवक है। वह पुलिस इन्स्पेक्टर से नहीं डरता और विपिन बिहारी को सबके सामने बेईमान कहता है। पुलिस इन्स्पेक्टर के सामने वह साहसपूर्वक कहता है-”यह षड्यन्त्र है. ………”आप सदा ब्लैक से कागज बेचते हैं और मुझे फंसाना चाहते हैं: …………“आप सब नीच ………..“आप देशभक्त की पोशाक पहने देशद्रोही हैं, भेड़िये हैं।”

(5) आदर्श मार्गदर्शक – अमूल्य आधुनिक युवकों के लिए एक आदर्श मार्गदर्शक है। वह भ्रष्ट आचरण वाले व्यक्तियों के मुखौटे उतारने का संकल्प लेता है। देशसेवा के प्रति अमूल्य के शब्दों को देखिए “अब आवश्यकता है कि हम देशसेवा का अर्थ समझे। जो शैतान मुखौटे लगाये शिव बनकर घूम रहे हैं, उनके वे मुखौटे उतारकर उनकी वास्तविकता प्रकट करें।”

(6) सरल स्वभाव वाला – अमूल्य सरल स्वभाव वाला स्वामिभक्त युवक है। सुनन्दा उसके सरल स्वभाव को देखकर ही कहती है-”पिताजी की बात अभी रहने दो। देखा नहीं था तुमने ? उनका नाम सुनकर सब चौंक पड़े थे। उनसे पिताजी की बात मत कहना अभी।”

इस प्रकार ‘कुहासा और किरण’ नाटक का सबसे अनमोल चरित्र अमूल्य का है। वह नाटक का नायक भी है। वह भ्रष्टाचार तथा निराशापूर्ण कुहासे को भेदकर कर्तव्यनिष्ठा, दृढ़ता, सत्यता, देशभक्ति तथा निर्भीकता की स्वर्णिम प्रकाश-किरणों से समाज को आलोकित करना चाहता है। अमूल्य ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ के आदर्श का प्रतीक है।।

प्रश्न 4:
‘कुहासा और किरण’ के आधार पर कृष्ण चैतन्य का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
कृष्ण चैतन्य की चारित्रिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
या
“कुहासा और किरण’ नाटक का खलनायक कौन है ? उसकी चरित्रगत विशेषताएँ बताए।
उत्तर:

कृष्ण चैतन्य का चरित्र-चित्रण

‘कुहासा और किरण’ नाटक में कृष्ण चैतन्य’ का चरित्र अवसरवादी, स्वार्थी तथा सभी प्रकार से भ्रष्ट व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वह नाटक का खलनायक है। आज कृष्ण चैतन्य जैसे अनेक नेता अपनी स्वार्थ सिद्धि हेतु; समाज और देश को खोखला करने में लगे हैं। कृष्ण चैतन्य के चरित्र से सम्बद्ध धनात्मक और
ऋणात्मक विशिष्टताओं की विवेचना निम्नलिखित है

(1) अवसरवादी – कृष्ण चैतन्य पक्का अवसरवादी है। वह पहले अंग्रेजों का दलाल बना रहता है, फिर कांग्रेसी नेता बन जाता है।
(2) मित्रघाती – कृष्ण चैतन्य अपने साथियों की मुखबिरी करके उन्हें पकड़वा देता है। इस प्रकार मित्रघाती होने का भी वह दोषी है, जब कि वह इस कलंक को छिपाने की भरसक चेष्टा करता है।
(3) चतुर – चालाक – कृष्ण चैतन्य चतुर तथा चालाक है। उसका मत है कि-”कुछ करने से पहले सौ बार सोच लेना बुद्धिमानी का लक्षण है।”
(4) भ्रष्टाचार का प्रतीक – कृष्ण चैतन्य सभी प्रकार के गलत हथकण्डों में माहिर है। वह ब्लैकमेल करता है, रिश्वत लेता है। इसी प्रकार की दूसरी अनेक बुराइयाँ; जैसे – क्रूरता, कठोरता और धनलिप्सा का आधिक्य भी उसमें विद्यमान है।
(5) देशद्रोही – ‘मुलतान षड्यन्त्र’ की मुखबिरी करके वह देशद्रोही बनता है। इसके उपरान्त भी वह समाज तथा देश के साथ गद्दारी करता ही रहता है।
(6) कृत्रिमता तथा आडम्बर से परिपूर्ण – कृष्ण चैतन्य का जीवन कृत्रिमता तथा आडम्बर से पूर्ण है। वह मुलतान केस में अंग्रेजों का मुखबिर बनकर देश के साथ गद्दारी करता है, किन्तु देश और समाज की सेवा का ढोंग रचता है, जिससे वह शासन और जनता दोनों की आँखों में धूल झोंकता रहता है।
(7) प्रभावशाली व्यक्तित्व – कृष्ण चैतन्य का व्यक्तित्व प्रभावशाली है। उसके प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण ही सरकार व प्रशासन पर उसका पर्याप्त प्रभाव है।
(8) दूरदर्शी – कृष्ण चैतन्य दूरदर्शी व्यक्ति है। अपनी दूरदर्शिता के कारण ही वह अपने वास्तविक नाम ‘कृष्णदेव’ को बदलकर ‘कृष्ण चैतन्य’ रख लेता है। विपिन बिहारी के यहाँ अमूल्य की नियुक्ति उसकी दूरदर्शिता का ही परिचायक है।
(9) आत्मपरिष्कार की भावना – गायत्री का बलिदान कृष्ण चैतन्य में प्रायश्चित्त का भाव उत्पन्न करता है। वह गायत्री के चित्र के सम्मुख पश्चात्ताप करते हुए कहता है-”मेरी आँखें खोलने के लिए तुमने प्राण दे। दिये।”
(10) कूटनीतिज्ञ – कृष्ण चैतन्य एक प्रतिभाशाली और कूटनीतिज्ञ पात्र है। यह ठीक है कि वह अपनी प्रतिभा का दुरुपयोग करता है, जिसके कारण उसका चरित्र घृणित हो जाता है, परन्तु यदि उसकी प्रतिभा का सदुपयोग होता तो वह एक श्रेष्ठ पुरुष बन सकता था।

इस प्रकार कृष्ण चैतन्य के चरित्र में अनेकानेक दोष हैं। अन्त में वह अपनी भूलों के लिए प्रायश्चित्त करते हुए कहता है-“चलिए टमटा साहब, मैंने देश के साथ जो गद्दारी की है, उसकी सजा मुझे मिलनी चाहिए।” इस प्रकार अन्त में अपने दोषों के परिष्कार के प्रयास से वह पाठकों की सहानुभूति का पात्र बन जाता है।

प्रश्न 5:
सुनन्दा के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के प्रमुख नारी-पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:

सुनन्दा का चरित्र-चित्रण

श्री विष्णु प्रभाकर द्वारा रचित ‘कुहासा और किरण’ नाटक की सुनन्दा प्रमुख नारी-पात्र है। उसके चरित्र की . प्रमुख विशेषताएँ अग्रवत् हैं

(1) भ्रष्टाचार की विरोधी नवयुवतियों की प्रतिनिधि – वह उन नवयुवतियों का प्रतिनिधित्व करती है, जो जागरूक एवं सजग हैं। सुनन्दा दूरदर्शी, साहसी, चतुर, विनोदी, कर्तव्यपरायणी एवं देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए संकल्पबद्ध एक सहयोगी तथा कर्मशीला नवयुवती है। उसे अमूल्य से सहानुभूति है तथा वह समाज के पाखण्डियों के रहस्य खोलने में अन्त तक अमूल्य का साथ देती है। मुखौटाधारी भ्रष्टाचारियों से वह कहती है – ”मैं पुकार-पुकार कर कहूँगी कि आप सब भ्रष्ट हैं, नीच हैं, देशद्रोही हैं। आज नहीं तो कल आपको समाज के सामने जवाब देना होगा।”

(2) जागरूक नवयुवती – सुनन्दा, कृष्ण चैतन्य की सेक्रेटरी है। उसकी आयु 25 वर्ष है। वह जागरूक नवयुवती है और समाचार-पत्रों के महत्त्व तथा उसमें निहित शक्ति को पहचानती है। उसी के शब्दों में- “शक्ति-संचालन का सूत्र जितना समाचार-पत्रों के हाथ में है, उतना और किसी के नहीं।”

(3) वाक्पटु – सुनन्दा की वाक्पटुता देखते ही बनती है। वह उमेशचन्द्र और कृष्ण चैतन्य की मिलीभगत से परिचित है। उसकी व्यंग्यपूर्ण वाक्पटुता देखिए-“आकाश जैसे पृथ्वी को आवृत्त किये है, वैसे ही आप उनको ( कृष्ण चैतन्य को) आवृत्त किये हैं। आकाश के कारण ही पृथ्वी अन्नपूर्णा होती है।”

(4) देशद्रोहियों की प्रबल विरोधी – स्वच्छ मुखौटाधारी देशद्रोहियों का सुनन्दा प्रबल विरोध करती है। वह विपिन बिहारी को भी खरी-खोटी सुनाती है। वह उससे कृष्ण चैतन्य के विषय में स्पष्ट कहती है-”क्या आपको अब भी पता नहीं कि कृष्ण चैतन्य वह नहीं हैं जो दिखाई देते हैं। वह मुखौटा लगाये एक देशद्रोही है।

(5) मुखौटाधारियों की विरोधिनी – अवसर आने पर सुनन्दा मुखौटाधारियों का प्रबल विरोध करती हैं। यहाँ तक कि वह चाहती है कि गायत्री द्वारा लिखा गया पत्र पुलिस के हवाले कर दिया जाए, क्योंकि पत्र पुलिस के हाथ में पहुँचने पर कृष्ण चैतन्य की परेशानी बढ़ सकती थी। वह उमेशचन्द्र अग्रवाल को लक्ष्य कर कहती है-”मुझे घिनौने चेहरों से सख्त नफरत है। गायत्री माँ के बलिदान के पीछे जो उदात्त भावना है, वह जनता तक पहुँचनी ही चाहिए।”

(6) सहृदया – सुनन्दा के हृदय में अमूल्य के प्रति सहानुभूति है। वह उसकी विवशता को समझती है। जब अमूल्य चोरी के झूठे जुर्म में गिरफ्तार कर लिया जाता है, तब वह अन्याय से जूझने के लिए तत्पर हो जाती है।

इस प्रकार सुनन्दा एक प्रगतिशील, व्यवहारकुशल व स्वदेश-प्रेमी नवयुवती के रूप में पाठकों पर अपनी विशिष्ट छाप छोड़ती है।

प्रश्न 6:
‘कुहासा और किरण’ नाटक के शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
या
विष्णु प्रभाकर ने नाटक का नाम ‘कुहासा और किरण’ क्यों रखा है?
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक के शीर्षक का औचित्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

‘कुहासा और किरण’ शीर्षक की सार्थकता

‘कुहासा और किरण’ में नाटककार श्री विष्णु प्रभाकर भ्रष्टाचार, निराशा और छद्म के कुहासा से धुंधलाते वातावरण को देशप्रेम, कर्तव्यनिष्ठा, व्यवहारकुशलता और नवचेतना की किरण से नष्ट करना चाहते हैं। कुहासे के रूप में कृष्ण चैतन्य, विपिन बिहारी, उमेशचन्द्र जैसे पात्र हैं तो किरण के रूप में अमूल्य, सुनन्दा आदि पात्र। ये भ्रष्टाचार और पाखण्ड के कुहासे को अपने आचरण की किरण से दूर करते हैं। इसीलिए लेखक ने इस नाटक का नाम ‘कुहासा और किरण’ रखा है, जो पूर्णरूपेण सार्थक भी है।

प्रश्न 7:
‘कुहासा और किरण’ आधुनिक भारत की सामाजिक और राजनीतिक समस्या को राष्ट्रीय परिवेश में व्यंजित करता है।” इस कथन पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक की समस्या पर प्रकाश डालिए।
या
“कुहासा और किरण’ के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक में सामाजिक समस्याओं और ऐतिहासिक घटनाओं का सुन्दर सामंजस्य है।” स्पष्ट कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण’ का उद्देश्य शैतान के भीतर के शिव को जगाना है। स्पष्ट कीजिए।
या
‘कुहासा और किरण’ नाटक में उठायी गयी समस्याओं का उल्लेख करते हुए उसकी विवेचना कीजिए।
उत्तर:
श्री विष्णु प्रभाकर ने प्रस्तुत नाटक ‘कुहासा और किरण’ के माध्यम से आधुनिक भारतीय समाज में फैले भ्रष्टाचाररूपी: कुहासे का यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया है। उनका उद्देश्य समाज में व्याप्त बुराइयों को आवरणरहित करना तथा उनका समाधान सुझाना है। कृष्ण चैतन्य जैसे अनेक अवसरवादी नेता आज शासक दल में घुसे हैं। उनका दीन-ईमान मात्र धन है। धन कमाने के लिए इस प्रकार के नेतागण सभी प्रकार के बुरे कार्य कर सकते हैं। नाटक में अनेक समस्याएँ प्रस्तुत की गयी हैं। दिखावटी देशभक्त, भ्रष्ट समाचार-पत्र, लुटेरे समाज-सेवक, चोरबाजारी तथा भयादोहन करने वाले सफेदपोश अपराधी आदि इस नाटक में बुराइयों तथा ज्वलन्त समस्याओं के रूप में प्रस्तुत किये गये हैं।

उपर्युक्त समस्याओं का समाधान खोजने का प्रयत्न भी विष्णु प्रभाकर जी ने किया है। उनका मत है कि यदि अमूल्य, सुनन्दा, प्रभा तथा मालती जैसे लोग भ्रष्टाचारियों पर प्रहार करें तो भ्रष्ट लोगों के झूठे मुखौटे उतारे जा सकते हैं। प्रभा के शब्दों में- ”मैं मुखौटा लगाये मुखबिरों को, भ्रष्टाचारियों को, देश में फैले छद्मवेशधारियों को बेनकाब करूंगी। मैं पुकारे-पुकारकर कहूँगी कि आप सब भ्रष्ट हैं, नीच हैं, देशद्रोही हैं। आज नहीं तो कल आपको समाज के सामने जवाब देना होगा। गायत्री माँ के बलिदान के पीछे जो उदात्त भावना है, वह जनता तक पहुँचनी ही चाहिए।”

इस प्रकार ‘कुहासा और किरण’ नाटक में आधुनिक भारतीय जीवन के यथार्थ चित्र प्रस्तुत किये गये हैं। समाज के बदनुमा धब्बों को उभारा गया है तथा साथ ही इन दागों को मिटाने का मार्ग भी सुझाया गया है।

प्रश्न 8:
‘कुहासा और किरण’ नाटक में निहित व्यंग्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
श्री विष्णु प्रभाकर ने कुहासा और किरण’ नाटक में आधुनिक भारतीय समाज में व्याप्त भ्रष्टाचाररूपी कुहासे का व्यंग्यपूर्ण चित्रण किया है। इस नाटक के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को आवरणहीन करना तथा उनका समाधान सुझाना है। कृष्ण चैतन्य जैसे अनेक अवसरवादी नेताओं के मुंह पर करारा तमाचा है, जिनका दीन-ईमान मात्र धन है। धन कमाने के लिए इस प्रकार के नेतागण सभी प्रकार के बुरे कार्य कर सकते हैं। दिखावटीं देशभक्त, भ्रष्ट समाचार-पत्र, लुटेरे समाज-सेवक, चोरबाजारी तथा भयादोहन करने वाले सफेदपोश अपराधी आदि इस नाटक में बुराइयों तथा ज्वलन्त समस्याओं के रूप में प्रस्तुत किये गये हैं। भ्रष्ट आचरण वाले व्यक्तियों के मुखौटे उतारकर रख देना, मुखबिरों के रहस्य को खोल देना तथा चोर दरवाजों को तोड़ देना आदि व्यंग्य प्रधास बातें हैं जो आज के युग में व्याप्त हैं। अत: हम कह सकते हैं कि यह नाटक व्यंग्य प्रधान है।

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