UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 2 मैथिलीशरण गुप्त

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name मैथिलीशरण गुप्त
Number of Questions 7
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 2 मैथिलीशरण गुप्त

कवि का साहित्यिक परिचय और कृतिया

प्रश्न 1.
मैथिलीशरण गुप्त का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए। [2009, 10, 11, 16]
था
मैथिलीशरण गुप्त का साहित्यिक परिचय दीजिए और उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए। [2012, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
उत्तर
जीवन-परिचय-राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म संवत् 1943 वि० (सन् 1886 ई०) में, चिरगाँव (जिला झाँसी) में हुआ था। इनके पिता का नाम सेठ रामचरण गुप्त था। सेठ रामचरण गुप्त स्वयं एक अच्छे कवि थे। गुप्त जी पर अपने पिता का पूर्ण प्रभाव पड़ा। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी से भी इन्हें बहुत प्रेरणा मिली। ये द्विवेदी जी को अपना गुरु मानते थे। गुप्त जी को प्रारम्भ में अंग्रेजी पढ़ने के लिए झाँसी भेजा गया, किन्तु वहाँ इनका मन न लगा; अत: घर पर ही इनकी शिक्षा का प्रबन्ध किया गया, जहाँ इन्होंने अंग्रेजी, संस्कृत और हिन्दी का अध्ययन किया। गुप्त जी बड़े ही विनम्र, हँसमुख और सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। इनके काव्य में भारतीय संस्कृति को प्रेरणाप्रद चित्रण हुआ है। इन्होंने अपनी कविताओं द्वारा राष्ट्र में जागृति तो उत्पन्न की ही, साथ ही सक्रिय रूप से असहयोग आन्दोलनों में भी भाग लेते रहे, जिसके फलस्वरूप इन्हें जेल भी जाना पड़ा। ‘साकेत’ महाकाव्य पर इन्हें हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन, प्रयाग से मंगलाप्रसाद पारितोषिक भी मिला। भारत सरकार ने गुप्त जी को इनकी साहित्य-सेवा के लिए पद्मभूषण से सम्मानित किया और राज्यसभा का सदस्य भी मनोनीत किया। जीवन के अन्तिम क्षणों तक ये निरन्तर साहित्य-सृजन करते रहे। 12 दिसम्बर, 1964ई०(संवत् 2021 वि०) को माँ-भारती का यह महान् साधक पञ्चतत्त्व में विलीन हो गया।

साहित्यिक सेवाएँ—गुप्त जी का झुकाव गीतिकाव्य की ओर था और राष्ट्रप्रेम इनकी कविता का प्रमुख स्वर रहा। इनके काव्य में भारतीय संस्कृति का प्रेरणाप्रद चित्रण हुआ है। इन्होंने अपनी कविताओं द्वारा राष्ट्र में जागृति तो उत्पन्न की ही, साथ ही सक्रिय रूप से असहयोग आन्दोलनों में भी भाग लेते रहे, जिसके फलस्वरूप इन्हें जेल भी जाना पड़ा। ‘साकेत’ महाकाव्य पर इन्हें हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन, प्रयाग से मंगलाप्रसाद पारितोषिक भी मिला। भारत सरकार ने गुप्त जी को इनकी साहित्य-सेवा के लिए पद्मभूषण से सम्मानित किया और राज्यसभा का सदस्य भी मनोनीत किया।

रचनाएँ—गुप्त जी की समस्त रचनाएँ दो प्रकार की हैं—(1) अनूदित तथा (2) मौलिक।
इनकी अनूदित रचनाओं में दो प्रकार का साहित्य है-कुछ काव्य और कुछ नाटक। इन अनूदित ग्रन्थों में संस्कृत के यशस्वी नाटककार भास के ‘स्वप्नवासवदत्ता’ का अनुवाद उल्लेखनीय है। ‘वीरांगना’, मेघनाद-वध’, ‘वृत्र-संहार’ आदि इनकी अन्य अनूदित रचनाएँ हैं। इनकी प्रमुख मौलिक काव्य-रचनाएँ निम्नवत् हैं-
साकेत—यह उत्कृष्ट महाकाव्य है, जो ‘श्रीरामचरितमानस’ के बाद राम-काव्य का प्रमुख स्तम्भ है।
भारत-भारती-इसमें भारत की दिव्य संस्कृति और गौरव का गान किया गया है।
यशोधरा–इसमें बुद्ध की पत्नी यशोधरा के चरित्र को उजागर किया गया है।
द्वापर, जयभारत, विष्णुप्रिया-इनमें हिन्दू संस्कृति के प्रमुख पात्रों के चरित्र का पुनरावलोकन कर कवि ने अपनी पुनर्निर्माण कला उत्कृष्ट रूप में प्रदर्शित की है।
गुप्त जी की अन्य प्रमुख काव्य-रचनाएँ इस प्रकार हैं-रंग में भंग, जयद्रथ-वध, किसान, पंचवटी, हिन्दू, सैरिन्ध्री, सिद्धराज, नहुष, हिडिम्बा, त्रिपथगा, काबा और कर्बला, गुरुकुल, वैतालिक, मंगल घट, अजित आदि। ‘अनघ’, ‘तिलोत्तमा’, ‘चन्द्रहास’ नामक तीन छोटे-छोटे पद्यबद्ध रूपक भी इन्होंने लिखे हैं। साहित्य में स्थान-राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त आधुनिक हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि रहे हैं। खड़ी बोली को काव्य के साँचे में ढालकर परिष्कृत करने का जो असाधारण कौशल इन्होंने दिखाया, वह अविस्मरणीय रहेगा। इन्होंने राष्ट्र को जगाया और उसकी चेतना को वाणी दी है। ये भारतीय संस्कृति के यशस्वी उद्गाता एवं परम वैष्णव होते हुए भी विश्व-बन्धुत्व की भावना से ओत-प्रोत थे। ये सच्चे अर्थों में इस राष्ट्र के महनीय मूल्यों के प्रतीक और आधुनिक भारत के सच्चे राष्ट्रकवि थे।

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोचर

कैकेयी का अनुताप

प्रश्न–दिए गए पद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
तदनन्तर बैठी सभा उटज के आगे,
नीले वितान के तले दीप बहु जागे ।
टकटकी लगाये नयन सुरों के थे वे,
परिणामोत्सुक उन भयातुरों के थे वे ।
उत्फुल्ल करौंदी-कुंज वायु रह-रहकर, ।
करती थी सबको पुलक-पूर्ण मह-महकर ।
वह चन्द्रलोक था, कहाँ चाँदनी वैसी,
प्रभु बोले गिरा गंभीर नीरनिधि जैसी ।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) भरत किसे लेने चित्रकूट गए हुए हैं?
(iv) अयोध्या का राज्य किसे मिला था?
(v) “प्रभु बोले गिरा गंभीर नीरनिधि जैसी।” पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्री मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘साकेत’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘कैकेयी का अनुताप’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक कानाम- कैकेयी का अनुताप।
कवि का नाम-मैथिलीशरण गुप्त।।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-पंचवटी में तारों से परिपूर्ण चाँदनी रात्रि में सभा हो रही थी। उस सभा में अयोध्या से भरत के साथ आये हुए सभी लोग शान्ति से बैठे हुए थे। उपस्थित सभी लोग उस सभा में होने वाले निर्णय के परिणाम को जानने के लिए उत्सुक थे। उस सभा के मौन को तोड़ते हुए राम ने भरत को सम्बोधित करते हुए कहा कि ‘हे भरत! अब तुम अपनी इच्छा को बताओ।’ राम के द्वारा अत्यधिक गम्भीर वाणी में बोलने से सभा को ऐसा प्रतीत हुआ कि समुद्र का जल गम्भीर गर्जन कर रहा हो।
(iii) भरत राम को लेने चित्रकूट गए हुए थे।
(iv) अयोध्या का राज्य भरत को मिला था।
(v) अलंकार-उपमा, अनुप्रास।

प्रश्न 2.
कहते आते थे यही अभी नरदेही,
‘माता न कुमाता, पुत्र कुपुत्र भले ही।’
अब कहें सभी यह हाय ! विरुद्ध विधाता-
‘है पुत्र पुत्र ही, रहे कुमाता माता।’
बस मैंने इसका बाह्य-मात्र ही देखा,
दृढ़ हृदय न देखा, मृदुल गात्र ही देखा ।।
परमार्थ न देखा, पूर्ण स्वार्थ ही साधा,
इस कारण ही तो हाय आज यह बाधा !
युग-युग तक चलती रहे कठोर कहानी-
‘रघुकुल में भी थी एक अभागिन रानी।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) पद्यांश के अनुसार, आज तक लोग क्या कहते आए हैं?
(iv) किसने प्रायश्चित्त किया है कि मैंने पुत्र का कोमल शरीर ही देखा, उसका दृढ़ हृदय नहीं देखा?
(v) इन पंक्तियों में कैकेयी को किस बात पर पश्चात्ताप हुआ है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्री मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘साकेत’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘कैकेयी का अनुताप’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक नाम- कैकेयी का अनुताप।
कवि का नाम-मैथिलीशरण गुप्त।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-कैकेयी श्रीराम से कहती है कि आज तक मनुष्य यही कहते आये थे कि पुत्र कितना ही दुष्ट क्यों न हो, परन्तु माता उसके प्रति कभी भी दुर्भाव नहीं रखती है। अब तो मेरे चरित्र के कारण लोगों का इस उक्ति पर से विश्वास हट जाएगा और संसार के लोग यही कहा करेंगे कि माता दुष्टतापूर्ण व्यवहार कर सकती है, परन्तु पुत्र कभी कुपुत्र नहीं हो सकता।
(iii) पद्यांश के अनुसार, आज तक लोग यही कहते आए हैं कि पुत्र कुपुत्र हो सकता है पर माता कुमाता नहीं हो सकती।
(iv) कैकेयी ने प्रायश्चित्त किया है कि मैंने पुत्र का कोमल शरीर हो देखा उसका दृढ़-हृदय नहीं देखा।
(v) इन पंक्तियों में कैकेयी को अपने ऊपर लगने वाले कलंक और पुत्र की प्रवृत्ति को न पहचान पाने का पश्चात्ताप हुआ है।

प्रश्न 3.
निजजन्म जन्म में सुने जीव यह मेरा-
धिक्कार ! उसे था महास्दार्थ ने घेरा।”
सौ बार धन्य वह एक लाल की माई,
जिस जननी ने है जना भरत-सा भाई ।”
पागल-सी प्रभु के साथ सभा चिल्लाई
सौ बार धन्य वह एक लाल की माई ।’
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कैकेयी स्वयं को धिक्कारती हुई क्या कहती हैं?
(iv) कैकेयी के प्रायश्चित्त के उपरान्त श्रीराम उनसे क्या कहते हैं?
(v) प्रभु राम के साथ कैकेयी के अपराध का अपमार्जन करती हुई सभा क्या चिल्ला उठी?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्री मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘साकेत’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘कैकेयी का अनुताप’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक नाम- कैकेयी का अनुताप।
कवि का नाम-मैथिलीशरण गुप्त।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-कैकेयी स्वयं को धिक्कारती हुई कहती है कि मैं सद्गति न पाऊँ और जन्म-जन्मान्तरों में मेरे प्राण यही सुनते रहें कि रघुकुल की उस रानी को धिक्कार है, जिसे घोर स्वार्थ ने घेरकर ऐसा अनुचित कर्म कराया कि उसने धर्म का विचार बिल्कुल छोड़ दिया और अधर्म का आचरण किया।
(iii) कैकेयी स्वयं को धिक्कारती हुई कहती हैं कि मैं सद्गति न पाऊँ और जन्म-जन्मान्तर तक मेरे प्राण यही सुनते रहे कि रघुकुल की रानी ने स्वार्थवश ऐसे अनुचित कर्म कराए।
(iv) कैकेयी के प्रायश्चित्त के उपरान्त श्रीराम उनसे कहते हैं कि तुम अभागिन नहीं हो, वरन् वह माता तो सौ-सौ बार धन्य है, जिसने भरत जैसे भाई को जन्म दिया।
(v) प्रभु राम के साथ कैकेयी के अपराध का अपमार्जन करती हुई सभा चिल्ला उठी की भरत जैसे महान् धर्मशील पुत्र को जन्म देने वाली माता धन्य है, सैकड़ों बार धन्य है।

प्रश्न 4.
मुझको यह प्यारा और इसे तुम प्यारे,
मेरे दुगुने प्रिय, रहो न मुझसे न्यारे ।
मैं इसे न जानें, किन्तु जानते हो तुम,
अपने से पहले इसे मानते हो तुम ।।
तुम भ्राताओं का प्रेम परस्पर जैसा,
यदि वह सब पर यों प्रकट हुआ है वैसा ।
तो पाप-दोष भी पुण्य-तोष है मेरा,
मैं रहूँ पंकिला, पद्म-कोष है मेरा ।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) श्रीराम का कौन प्यारा है?
(iv) कैकेयी को कौन दोगुने प्रिय हैं? क्य?
(v) “मैं रहूँ पंकिला, पद्म-कोष है मेरा।” पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्री मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘साकेत’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘कैकेयी का अनुताप’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- कैकेयी का अनुताप।
कवि का नाम–मैथिलीशरण गुप्त।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-कैकेयी श्रीराम से कहती हैं कि हे राम! मुझे यह भरत प्रिय है और भरत को तुम प्रिय हो। इस प्रकार तो तुम मुझे दोगुने प्रिय हो। तुम दोनों भाइयों के बीच जिस प्रकार का प्रेम सब लोगों के सामने प्रकट हुआ है, उससे तो मेरे पाप का दोष भी पुण्य के सन्तोष में बदल गया है। मुझे तो यह सन्तोष है कि मैं स्वयं कीचड़ के समान निन्दनीय हूँ, किन्तु मेरी कोख से कमल के समान निर्मल भरत को जन्म हुआ।
(iii) श्रीराम को भरत प्यारे हैं।
(iv) कैकेयी को भरत प्रिय हैं और भरत को राम प्रिय हैं इसलिए कैकेयी को राम और भरत दोगुने प्रिय हैं।
(v) रूपक अलंकार।

गीत

प्रश्न–दिए गए पद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
निरख सखी, ये खंजन आये,
फेरे उन मेरे रंजन ने नयन इधर मन भाये !
फैला उनके तन का आतप, मन से सर सरसाये,
घूमें वे इस ओर वहाँ, ये हंस यहाँ उड़ छाये !
करके ध्यान आज इसे जन का निश्चय वे मुसकाये,
फूल उठे हैं कमल, अधर-से यह बन्धूक सुहाये !
स्वागत, स्वागत, शरद, भाग्य से मैंने दर्शन पाये,
नभ से मोती वारे, लो, ये अश्रु अर्घ्य भर लाये ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) उर्मिला द्वारा किस ऋतु का स्वागत किया गया है?
(iv) हंसों को देखकर उर्मिला क्या अनुमान लगाती है?
(v) बन्धूक पुष्पों में उर्मिला ने किसका आभास पाया है।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्री मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘साकेत’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘गीत’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम– गीत।।
कवि का नाम-मैथिलीशरण गुप्त।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–हे शरत्! तुम्हारा स्वागत है; क्योंकि तुम्हारे आगमन पर मैंने खंजन पक्षियों में प्रिय के नेत्रों का, धूप में प्रिय के तप का, हंसों में उनकी गति और हास्य का तथा बन्धूक पुष्पों में उनके अधरों का आभास पाया है। आकाश ने ओस की बूंदों के रूप में मोती न्योछावर कर तुम्हारा स्वागत किया है और मैं अपने आँसुओं का अर्घ्य देकर तुम्हारी अभ्यर्थना करती हूँ।
(iii) उर्मिला द्वारा शरत् ऋतु का स्वागत किया गया है।
(iv) हंसों को देखकर उर्मिला यह अनुमान लगाती हैं कि प्रियतम इस ओर घूमे होंगे अथवा निश्चय ही मेरा ध्यान करके मुस्कराए होंगे।
(v) बन्धूक पुष्पों में उर्मिला ने प्रियतम के अधरों का आभास पाया है।

प्रश्न 2.
मुझे फूल मत मारो,
मैं अबला बाला वियोगिनी, कुछ तो दया विचारो ।।
होकर मधु के मीत मदन, पटु, तुम कटु, गरल न गारो,
मुझे विकलता, तुम्हें विफलता, ठहरो, श्रम परिहारो ।
नहीं भोगिनी यह मैं कोई, जो तुम जाल पसारो,
बल हो तो सिन्दूर-बिन्दु यह—यह हरनेत्र निहारो !
रूप-दर्प कन्दर्प, तुम्हें तो मेरे पति पर वारो,
लो, यह मेरी चरण-धूलि उस रति के सिर पर धारो ।।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) वसंत का मित्र कौन है?
(iv) उर्मिला ने शिव का तीसरा नेत्र किसे बताया है?
(v) उर्मिला ने अपने पति को किससे अधिक सुन्दर बताया है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद्यांश श्री मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘साकेत’ महाकाव्य से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘गीत’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक का नाम- गीत।
कवि का नाम-मैथिलीशरण गुप्त।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-राम के वन-गमन के समय सीता राम के साथ ही रहती हैं। भरत और शत्रुघ्न की पत्नियाँ माण्डवी और श्रुतकीर्ति भी उनसे अलग नहीं होती हैं। मात्र उर्मिला ही अपने पति से अलग रहती हैं; क्योंकि लक्ष्मण राम के साथ ही वन को गये हैं। उर्मिला के विरह-वर्णन में परम्परागत रूप में षड्ऋतु-वर्णन का चित्रण करने के साथ-साथ लाक्षणिक वैचित्र्य की झलक भी दिखाई गयी है। वसन्त ऋतु के आगमन पर उर्मिला कामदेव से आग्रह कर रही हैं कि वे उनके ऊपर अपने पुष्प रूपी बाण न चलाएँ; क्योंकि वे एक अबला और विरहिणी स्त्री हैं। पुराणों के अनुसार कामदेव को काम-वासना के अधिष्ठाता ईश्वर के रूप में माना जाता है। कामदेव की साथी-सहयोगी वसन्त ऋतु है, .. वाहन कोयल नामक पक्षी है तथा लड़ाई के अस्त्र-शस्त्र फूलों से बने हुए धनुष और बाण हैं। इसीलिए उर्मिला फूलों से ने मारने के लिए आग्रह कर रही हैं।
(iii) वसंत का मित्र कामदेव है।
(iv) उर्मिला ने अपने सिन्दूर-बिन्दु को शिव का तीसरा नेत्र बताया है।
(v) उर्मिला ने अपने पति को कामदेव से अधिक सुन्दर बताया है।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 1 अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

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Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
Number of Questions 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 1 अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

कवि का साहित्यिक परिचय और कृतिया

प्रश्न 1.
अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ के जीवन एवं उनकी रचनाओं पर प्रकाश डालिए। [2009, 10, 11]
या
अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए। [2013, 16, 18]
उत्तर
जीवन-परिचय-श्री अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ आधुनिक हिन्दी खड़ी बोली के प्रथम महाकवि थे। इन्होंने काव्य के क्षेत्र में भाव और भाषा दोनों दृष्टियों से नये-नये प्रयोग किये और युगानुरूप नवीन आदर्शों की प्रतिष्ठा की। हरिऔध का जन्म संवत् 1922 वि० (सन् 1865 ई०) में ग्राम निजामाबाद (जिला आजमगढ़) के एक सनाढ्य ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम पंडित भोलासिंह और माता का नाम रुक्मिणी देवी था। भोलासिंह के बड़े भाई पं० ब्रह्मसिंह ज्योतिष के अच्छे विद्वान् थे। हरिऔध जी की प्रारम्भिक शिक्षा इन्हीं की देख-रेख में हुई। मिडिल परीक्षा पास करने के पश्चात् ये काशी के क्वींस कॉलेज में पढ़ने के लिए भेजे गये, किन्तु अस्वस्थता के कारण पढ़ न सके। इन्होंने घर पर ही अंग्रेजी और उर्दू का अध्ययन किया। संवत् 1939 वि० (सन् 1882 ई०) में इनका विवाह हुआ। विवाह के पश्चात् इन्हें आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा, इसलिए सर्वप्रथम इन्होंने निजामाबाद के तहसीली स्कूल में लगभग तीन वर्ष तक अध्यापन-कार्य किया। तदुपरान्त ये कानूनगो हो गये और उत्तरोत्तर उन्नति कर सदर कानूनगो के पद पर पहुँच गये। संवत् 1966 वि० (सन् 1909 ई०) में सरकारी नौकरी से अवकाश प्राप्त कर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अवैतनिक अध्यापक हो गये। सन् 1941 ई० तक वे इसी पद पर रहे। इसके पश्चात् अवकाश ग्रहण कर आजमगढ़ को अपना निवासस्थान बनाया और वहीं रहकर साहित्य-सेवा में अपना जीवन लगा दिया। यहीं संवत् 2002 (सन् 1945 ई० ) में इनका स्वर्गवास हो गया।

साहित्यिक सेवाएँ–हरिऔध जी द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवि थे। इन्होंने खड़ी बोली को नया रूप प्रदान किया तथा प्राचीन कथानकों में नवीन उद्भावनाएँ समाहित कीं। भाषा की विविधता के साथ-साथ इन्होंने हिन्दी छन्दों में भी नवीन छन्द-पद्धति की उद्भावना की। इनके काव्य में वात्सल्य रस एवं विप्रलम्भ श्रृंगार
का जगमगाता रूप झलकता है।

रचनाएँ–हरिऔध जी ने गद्य-पद्य दोनों में ही सफलतापूर्वक रचना की है। इनके द्वारा रचे गये काव्यों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है—(1) प्रियप्रवास, (2) वैदेही-वनवास, (3) रस-कलश, (4) चौखे-चौपदे और चुभते-चौपदे, (5) इनके अतिरिक्त हरिऔध जी के अन्य काव्य-ग्रन्थ इस प्रकार हैं-(i) रुक्मिणीपरिणय, (ii) प्रद्युम्न-विजय, (iii) बोलचाल, (iv) पद्य-प्रसून, (v) पारिजात, (vi) ऋतु-मुकुर, (vii) काव्योपवन, (viii) प्रेम-पुष्पोपहार, (ix) प्रेम-प्रपंच, (४) प्रेमाम्बु-प्रस्रवण, (xi) प्रेमाम्बु-वारिधि। (6) इनके प्रमुख उपन्यास निम्नलिखित हैं- (i) ठेठ हिन्दी का ठाठ, (ii) अधखिला फूल, (iii) प्रेमकान्ता।।

साहित्य में स्थान-नि:संकोच हम यह कह सकते हैं कि हरिऔध जी की काव्य-प्रतिभा विविधरूपिणी है। वे अपनी रचनाओं में कहीं रीतिकालीन हैं तो कहीं भारतेन्दुकालीन, कहीं द्विवेदीकालीन हैं तो कहीं नवयुगकालीन। इनके इन समस्त रूपों में इनका द्विवेदीकालीन रूप ही प्रमुख है। भाव और भाषा दोनों ही क्षेत्रों में इन्होंने नये-नये प्रयोग किये और आधुनिक युगानुरूप नवीन उद्भावनाएँ भी दीं। निश्चय ही ये हिन्दी के गौरव हैं।

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोचर

पवन-दूतिका

प्रश्न–दिए गए पद्यांशों को फ्ढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
बैठी खिन्ना यक दिवस वे गेह में थीं अकेली ।
आके आँसू दृग-युगल में थे धरा को भिगोते ।।
आई धीरे इस सदन में पुष्प-सद्गंध को ले ।
प्रात: वाली सुपवन इसी काल वातायनों से ।।
संतापों को विपुल बढ़ता देख के दु:खिता हो ।
धीरे बोली स-दुःख उससे श्रीमति राधिका यों ।।
प्यारी प्रात: पवन इतना क्यों मुझे है सताती ।
क्या तू भी है कलुषित हुई काल की क्रूरता से ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) घर में दुःखी होकर एक दिन अकेले कौन बैठा था?
(iv) फूलों की सुगंध से युक्त होकर राधा के घर में किसने प्रवेश किया?
(v) राधा ने प्रातःकालीन वायु से दुःखित होकर क्या कहा?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद महाकवि अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित ‘प्रियप्रवास’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘पवन-दूतिका’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।।
अथवा
शीर्षक नाम- पवन-दूतिका।
कवि का नाम-अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–प्रात:कालीन सुखद वायु पुष्यों की सुगंध लेकर धीरे से खिड़कियों के रास्ते उस घर में प्रविष्ट हुई। जो राधा घर में बहुत दु:खी होकर अकेली बैठी थीं। वायु संयोग में सुखद लगती थी, वही अब वियोग में दु:ख बढ़ाने वाली सिद्ध हुई. अत: उस वायु के कारण अपनी व्यथा को और बढ़ता देखकर राधा बहुत दु:खित होकर उससे बोली कि हे प्यारी प्रभातकालीन वायु! तू मुझे इतना क्यों सता रही है? क्या तू भी मेरे भाग्य की कठोरता से प्रभावित होकर दूषित हो गयी है अर्थात् समय या भाग्य तो मेरे विपरीत है ही, पर क्या तू भी उससे प्रभावित होकर मेरा दु:ख बढ़ाने पर तुली है, जब कि सामान्यत: तू लोगों को सुख देने वाली मानी जाती है?’
(iii) एक दिन राधा घर में दु:खी होकर अकेली बैठी हुई थीं।
(iv) फूलों की सुगंध से युक्त होकर राधा के घर प्रात:कालीन सुखद वायु ने प्रवेश किया।
(v) राधा ने प्रात:कालीन वायु से दुःखित होकर कहा कि हे प्रभातकालीन वायु! तू मुझे क्यों सताती है? का तू भी मेरे भाग्य की कठोरता से प्रभावित होकर दूषित हो गई है।

प्रश्न 2.
लज्जाशीला पथिक महिला जो कहीं दृष्टि आये ।
होने देना विकृत-वसना तो न तू सुन्दरी को ।।
जो थोड़ी भी श्रमित वह हो गोद ले श्रान्ति खोना ।
होंठों की औ कमल-मुख की म्लानतायें मिटाना ।।
कोई क्लान्ता कृषक-ललना खेत में जो दिखावे ।
धीरे-धीरे परस उसकी क्लान्तियों को मिटाना ।।
जाता कोई जलद यदि हो व्योम में तो उसे ला।
छाया द्वारा सुखित करना, तप्त भूतांगना को ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) राधा पवन-दूतिका से राह में पथिकों के साथ कैसा व्यवहार करने को कहती हैं?
(iv) राधा ने पवन-दूतिका को पथिक कृषक-स्त्री के ऊपर किसके द्वारा छाया करने को कहा
(v) ‘कृषक ललना’ शब्द में कौन-सा समास होगा?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद महाकवि अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित ‘प्रियप्रवास’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘पवन-दूतिका’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
शीर्षक नाम- पवन-दूतिका।
कवि का नाम-अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-हे पवन ! यदि तुझे मार्ग में कोई लाजवन्ती स्त्री दिखाई पड़े तो इतने वेग से न बहना कि उसके वस्त्र उड़कर अस्त-व्यस्त हो जाएँ और उसका शरीर उघड़ जाए। यदि वह थोड़ी-सी भी थकी दिखाई दे तो उसे गोद में लेकर अर्थात् उसे चारों ओर से घेरकर उसकी थकान मिटा देना, जिससे कि (थकान के कारण) उसके सूखे होंठ और मुरझाया हुआ कमल-सदृश मुख प्रफुल्लित हो उठे।।
(iii) राधा पवन-दूतिका से राह में पथिकों के साथ परोपकार का व्यवहार करने को कहती हैं।
(iv) राधा ने पवन-दूतिका को थकित कृषक-स्त्री के ऊपर मेघ द्वारा छाया करने को कहा है।
(v) ‘कृषक-ललना’ शब्द में ‘तत्पुरुष समास’ होगा।

प्रश्न 3.
तू देखेगी जलद-तन को जा वहीं तद्गता हो ।
होंगे लोने नयन उनके ज्योति-उत्कीर्णकारी ।।
मुद्रा होगी वर बदन की मूर्ति-सी सौम्यता की ।
सीधे साधे वचन उनके सिक्त होंगे सुधा से ।।
नीले फूले कमल दल-सी गात की श्यामता है।
पीला प्यारा वसन कटि में पैन्हते हैं फबीला ।।
छूटी काली अलके मुख की कान्ति को है बढ़ाती ।
सद्वस्त्रों में नवल तन की फूटती-सी प्रभा है ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) प्रस्तुत पंक्तियों में राधा पवन-दूतिका को किसकी पहचान बताती हैं?
(iv) श्रीकृष्ण के नेत्रों की शोभा कैसी है?
(v) श्रीकृष्ण कटि में कैसा वस्त्र धारण करते हैं?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद महाकवि अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित ‘प्रियप्रवास’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘पवन-दूतिका’ शीर्षक काव्यांश से उद्धत है।
अथवा
शीर्षक नाम- पवन-दूतिका।।
कवि का नाम-अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-राधा कहती हैं कि हे पवन! वहाँ जाकर तू मेघ के समान शोभा वाले श्रीकृष्ण को देखेगी। उनके शरीर की श्यामलता खिले हुए नीलकमल के समान मोहक है। मेरे प्रियतम कृष्ण कटि में आकर्षक पीला वस्त्र धारण करते हैं। उनके मुख पर लटकी हुई काले बालों की लट उनकी शोभा को चार चाँद लगा रही होगी। उनके सुन्दर वस्त्रों से उनके मनोहर शरीर की शोभा अत्यधिक बढ़ रही होगी।
(iii) प्रस्तुत पंक्तियों में राधा पवन-दूतिका को श्रीकृष्ण की पहचान बताती हैं।
(iv) श्रीकृष्ण के सुन्दर नेत्र प्रकाश बिखेरते हैं।
(v) श्रीकृष्ण कटि में पीला वस्त्र धारण करते हैं।

प्रश्न 4.
कोई प्यारा कुसुमे कुम्हला गेह में जो पड़ा हो ।
तो प्यारे के चरण पर ला डाल देना उसी को ।।
यों देना ऐ पवन बतला फूल-सी एक बाला ।
म्लाना हो हो कमल-पग को चूमना चाहती है ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) राधा पवन-दृतिका से मुरझाए हुए पुष्प को कहाँ डाल देने के लिए कह रही हैं?
(iv) मुरझाए हुए पुष्प की उपमा किससे की गई है?
(v) श्रीकृष्ण के कमल के समान कोमल चरणों को कौन चूमना चाहता है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद महाकवि अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित ‘प्रियप्रवास’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘पवन-दूतिका’ शीर्षक काव्यांश से उद्धत है।
अथवा
शीर्षक नाम- पवन-दूतिका।
कवि का नाम–अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–हे पवन ! कृष्ण के घर पहुँचकर यदि कोई मुरझाया हुआ सुन्दर फूल वहाँ पड़ा मिल जाए तो उसे प्रिय कृष्ण के चरणों में लाकर रख देना। इस प्रकार तू उन्हें यह बता देना कि इसी फूल की तरह विरह में मुरझाई हुई एक तरुणी (राधा) आपके कमल समान कोमल घरणों को चूमना चाहती है। शायद उस मुरझाए फूल को देखकर ही उन्हें मेरी याद आ जाए।
(iii) राधा पवन-दूतिका से मुरझाए हुए पुष्प को श्रीकृष्ण के चरणों में लाकर डाल देने के लिए कह रही हैं।
(iv) मुरझाए हुए पुष्प की उपमा राधा से की गई है।
(v) श्रीकृष्ण के कमल के समान कोमल चरणों को राधाजी चूमना चाहती हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 3 गरुड़ध्वज

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 3 गरुड़ध्वज (लक्ष्मीनारायण मिश्र) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 3 गरुड़ध्वज (लक्ष्मीनारायण मिश्र).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name गरुड़ध्वज (लक्ष्मीनारायण मिश्र)
Number of Questions 10
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi नाटक Chapter 3 गरुड़ध्वज (लक्ष्मीनारायण मिश्र)

प्रश्न 1:
‘गरुड़ध्वज’ नाटक की कथावस्तु को संक्षेप में लिखिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के प्रथम अंक का कथासार अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के द्वितीय अंक की कथा संक्षेप में लिखिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के अन्तिम (तृतीय) अंक की घटनाओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के किसी एक अंक के कथानक पर प्रकाश डालिए।
या
गरुड़ध्वज’ नाटक के कथानक का सार लिखिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक में कौन-सा अंक आपको सबसे अच्छा लगा और क्यों ?
उत्तर:
श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र कृत ‘गरुड़ध्वज’ नाटक की कथा ऐतिहासिक है। कथा में प्रथम शती ईसा पूर्व के भारतवर्ष की सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक तथा सामाजिक झाँकी प्रस्तुत की गयी है। कहानी में शुंग वंश के अन्तिम सेनापति विक्रमादित्य, मालवा के जननायक ‘विषमशील’ के त्याग और शौर्य की गाथा वर्णित है। विषमशील ही ‘विक्रमादित्य’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।

प्रथम अंक – नाटक के प्रथम अंक में पहली घटना विदिशा में घटित होती है। विक्रममित्र स्वयं को सेनापति सम्बोधित कराते हैं, महाराज नहीं। विक्रममित्र के सफल शासन में प्रजा सुखी है। बौद्धों के पाखण्ड को समाप्त करके ब्राह्मण धर्म की स्थापना की गयी है। सेनापति विक्रममित्र ने वासन्ती नामक एक युवती का उद्धार किया है। उसके पिता वासन्ती को किसी यवन को सौंपना चाहते थे। वासन्ती; एकमोर नामक युवक से प्रेम करती है। इसी समय कवि और योद्धा कालिदास प्रवेश करते हैं। कालिदास; विक्रममित्र को आजन्म ब्रह्मचारी रहने के कारण भीष्म पितामह’ कहते हैं। विक्रममित्र इस समय सतासी वर्ष के हैं। इसी समय साकेत के एक यवन-श्रेष्ठी की कन्या कौमुदी का सेनापति देवभूति द्वारा अपहरण करने की सूचना विक्रममित्र को मिलती है। देवभूति कन्या को अपहरण कर उसे काशी ले जाते हैं। विक्रममित्र कालिदास को काशी पर आक्रमण करने की आज्ञा देते हैं।

द्वितीय अंक – नाटक के दूसरे अंक में दो घटनाएँ प्रस्तुत की गयी हैं। प्रथम में तक्षशिला के राजा अन्तिलिक का मन्त्री ‘हलोदर’ विक्रममित्र से अपने राज्य के दूत के रूप में मिलता है। हलोदर भारतीय संस्कृति में आस्था रखता है तथा सीमा विवाद को वार्ता के द्वारा सुलझाना चाहता है। वार्ता सफल रहती है तथा हलोदर विक्रममित्र को अपने राजा की ओर से रत्नजड़ित स्वर्ण गरुड़ध्वज भेटस्वरूप देता है।

विक्रममित्र के आदेशानुसार कालिदास काशी पर आक्रमण करते हैं तथा अपने ज्ञान और विद्वत्ता से काशी के दरबार में बौद्ध आचार्यों को प्रभावित कर देते हैं। वे कौमुदी का अपहरण करने वाले देवभूति तथा काशी नरेश को बन्दी बनाकर विदिशा ले जाते हैं। नाटक के इसी भाग में वासन्ती काशी विजयी ‘कालिदास’ का स्वागत उनके गले में पुष्पमाला डालकर करती है।

तृतीय अंक – नाटक के तृतीय तथा अन्तिम अंक की कथा ‘अवन्ति’ में प्रस्तुत की गयी है। विषमशील के नेतृत्व में अनेक वीरों ने मालवा को शकों से मुक्त कराया। विषमशील के शौर्य के कारण अनेक राजा उसके समर्थक हो जाते हैं। अवन्ति में महाकाल का एक मन्दिर है, इस पर गरुड़ध्वज फहराता रहता है। मन्दिर का पुजारी मलयवती और वासन्ती को बताता है कि युद्ध की सभी योजनाएँ इसी मन्दिर में बनती हैं। इसी समय विषमशील युद्ध जीतकर आते हैं तथा काशिराज अपनी पुत्री वासन्ती का विवाह कालिदास के साथ विक्रममित्र की आज्ञा लेकर कर देते हैं। इसी अंक में विषमशील का राज्याभिषेक होता है तथा कालिदास को मन्त्री-पद पर नियुक्त किया जाता है। राजमाता जैन आचार्यों को क्षमादान देती हैं। कालिदास की मन्त्रणा से विषमशील का नाम उसके पिता महेन्द्रादित्य तथा किंक्रममित्र के आधार पर विक्रमादित्य रखा जाता है। विक्रममित्र संन्यासी बन जाते हैं तथा कालिदास अपने राजा विक्रमादित्य के नाम पर उसी दिन से विक्रम संवत् का प्रवर्तन करते हैं। नाटक की कथा यहीं समाप्त हो जाती है।

प्रश्न 2:
नाटक के तत्वों (नाट्यकला की दृष्टि) के आधार पर ‘गरुडध्वज’ नाटक की समीक्षा (आलोचना) कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक में निहित सन्देश पर प्रकाश डालिए।
या
पात्र तथा चरित्र-चित्रण की दृष्टि से ‘गरुड़ध्वज’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
या
संवाद-योजना (कथोपकथन) की दृष्टि से ‘गरुड़ध्वज’ नाटक की विवेचना कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक की भाषा-शैली की समीक्षा कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के देश-काल तथा वातावरण की समीक्षा कीजिए।
या
अभिनेयता अथवा रंगमंच की दृष्टि से ‘गरुडध्वज’ नाटक की सफलता पर प्रकाश डालिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के उद्देश्य पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

‘गरुडध्वज’ की तात्त्विक समीक्षा

नाटक के तत्त्वों की दृष्टि से श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र कृत ‘गरुड़ध्वज’ एक उच्चकोटि की रचना है। इसका तात्त्विक विवेचन निम्नवत् है

(1) कथावस्तु (कथानक) – नाटक की कथावस्तु ऐतिहासिक है। इसमें ईसा से एक शताब्दी पूर्व के प्राचीन भारत का सांस्कृतिक, सामाजिक एवं राजनीतिक परिवेश चित्रित किया गया है। प्रथा अंक में कार्य का आरम्भ हुआ है, दूसरे अंक में उसका विकास है तथा तीसरे अंक में चरम-सीमा, उतार तथा समाप्ति है। प्रथम अंक में विक्रममित्र के चरित्र, काशिराज का अनैतिक चरित्र तथा वासन्ती की असन्तुलित मानसिक दशा के साथ ही समाज में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा किये जा रहे अनाचार का चित्रण किया है। विदेशियों के आक्रमण और बौद्ध धर्मावलम्बियों द्वारा राष्ट्रहित को त्यागकर उनकी सहायता इसमें चित्रित की गयी है। दूसरा अंक राष्ट्रहित में धर्म-स्थापना के संघर्ष की है। इस अंक में विक्रममित्र की दृढ़ता एवं वीरता का परिचय प्राप्त होता है। साथ ही , उनके कुशल नीतिज्ञ और एक अच्छे मनुष्य होने का बोध भी होता है। तीसरे अंक के अन्तर्गत युद्ध में विदेशियों की पराजय, कालकाचार्य एवं काशिराज का पश्चात्ताप विक्रममित्र की उदारता तथा आक्रमणकारी हूणों की क्रूर जातिगत प्रकृति को चित्रित किया गया है। इस नाटक का कथानक राज्य के संचालन, धर्म, अहिंसा एवं हिंसा के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डालता है।

(2) पात्र और चरित्र-चित्रण – पात्र और चरित्र-चित्रण की दृष्टि से यह एक सफल नाटक है। प्रस्तुत नाटक में 14 पुरुष-पात्रों और 4 स्त्री-पात्रों को मिलाकर कुल 18 पात्र हैं। इसके मुख्य पात्र हैं – विक्रममित्र, विषमशील, कालिदास, मलयवती, वासन्ती, काशी-नरेश और कुमार कार्तिकेय। पात्रों में विविध प्रकार के चरित्र हैं-सदाचारी, वीर, साहित्यकार, संगीतकार, लम्पट तथा देशद्रोही। विक्रममित्र आजीवन ब्रह्मचारी रहने के कारण परिचित जनों द्वारा ‘भीष्म पितामह’ के नाम से पुकारे जाते हैं। पात्रों का चरित्र-चित्रण नाटक के कथ्य के अनुसार ही किया गया है। मुख्य पात्र विक्रममित्र हैं, सम्पूर्ण नाटक इनके चारों ओर ही घूमता है। चरित्रों के द्वारा नाटक के कथ्य को दर्शकों तक पहुँचाने के लिए इसके सभी पात्रों का चित्रण उपयुक्त है। निरर्थक पात्र-योजना का समावेश नहीं किया गया है।

(3) भाषा-शैली – ‘गरुड़ध्वज’ की भाषा सुगम, संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली हिन्दी है। नाटक में लक्ष्मीनारायण मिश्र जी ने सहज, सरल एवं सुबोध शैली का प्रयोग किया है। भाषा में कहीं-कहीं क्लिष्टता है, किन्तु मुहावरों तथा लोकोक्तियों का प्रयोग सफलता से हुआ है, जिसने नाटक की भाषा को सहज, सरल और आकर्षक बना दिया है। ऐतिहासिक नामों के प्रयोग विभिन्न घटनाओं के साथ इस प्रकार आये हैं कि उन्हें समझना आसान है। मिश्र जी ने विचारात्मक, दार्शनिक, हास्यात्मक आदि शैलियों का पात्रों के अनुकूल प्रयोग किया है। भाषा-शैली की दृष्टि से यह एक सफल रचना है। नाटक में प्रयुक्त स्वाभाविक भाषा का एक उदाहरण देखिए-”मैं लज्जा और संकोच से मरने लगता हूँ राजदूत! जब इस युग का सारा श्रेय मुझे दिया जाता है। आत्म-स्तुति । से प्रसन्न नास्तिक होते हैं। उसके भीतर जो दैवी अंश था उसी ने उसे कालिदास बना दिया। उसकी शिक्षा और संस्कार में मैं प्रयोजन मात्र बना था। उसका पालन मैंने ठीक इसी तरह किया, जैसे यह मेरे अंश का ही नहीं, मेरे इस शरीर का हो।”

(4) संवाद-योजना (कथोपकथन – नाटक का सबसे सबल तत्त्व उसका संवाद होता है। संवादों के द्वारा ही पात्रों का चरित्र-चित्रण किया जाता है। इस दृष्टि से नाटककार ने संवादों का उचित प्रयोग किया है। नाटक के संवाद सुन्दर हैं। तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप संवादों की रचना की गयी है। संवाद संक्षिप्त, परन्तु प्रभावशाली हैं। वे पात्रों की मनोदशा तथा भावनाओं को स्पष्ट करने में समर्थ हैं; जैसे
वासन्ती-नहीं …….नहीं, बस दो शब्द पूगी कवि ! लौट आओ ……।।
कालिदास—(विस्मय से) क्या है राजकुमारी ?
वासन्ती–यहाँ आइए ! आज मैं कुमार कार्तिकेय का स्वागत करूसँगी। उनका वाहन मोर भी यहीं है।
संवादों में कहीं-कहीं हास्य, व्यंग्य, विनोद तथा संगीतात्मकता का पुट भी मिलता है।

(5) देश-काल तथा वातावरण – नाटक में देश-काल तथा वातावरण का निर्वाह उचित रूप में हुआ है। नाटक में ईसा पूर्व की सांस्कृतिक, धार्मिक तथा राजनीतिक हलचलों को सुन्दर तथा उचित प्रस्तुतीकरण है। नाटककार तत्कालीन समाज के वातावरण का चित्रण करने में पूर्णरूपेण सफल रहा है। तत्कालीन समाज में राजमहल, युद्ध-भूमि, पूजागृह, सभामण्डल आदि का वातावरण अत्यन्त कुशलतापूर्वक चित्रित किया गया है। नाम, स्थान तथा वेशभूषा में देश-काल तथा वातावरण का सुन्दर सामंजस्य देखने को मिलता है।

(6) उद्देश्य अथवा सन्देश – नाटक का उद्देश्य, अतीत की घटनाओं के माध्यम से वर्तमान भारतीयों को उच्च चरित्र, आदर्श मानवता तथा ईमानदारी के साथ-साथ देश के नव-निर्माण का सन्देश देना भी है। नाटककार उदार धार्मिक भावनाओं को व्यंजित करके धर्मनिरपेक्षता पर बल देता है। वह देश की रक्षा और अन्यायियों के विनाश के लिए शस्त्रों के उपयोग का समर्थन करता है। नाटक के तीन अंक हैं। तीनों अंकों में एक-एक मुख्य घटना है। ये घटनाएँ क्रमशः न्याय, राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय शौर्य को प्रदर्शित करती हैं। नाटक की भूमिका में नाटककार स्वयं कहते हैं-”सम्पूर्ण नाटक राष्ट्र की एकता और संस्कृति का सन्देश अपनी घटनाओं में अभिव्यक्त करता है।”

(7) अभिनेयता – ‘गरुड़ध्वज’ नाटक मंच पर अभिनीत किया जा सकता है। नाटक में मात्र तीन अंक हैं। वेशभूषा का प्रबन्ध भी कठिन नहीं है। एकमात्र कठिनाई नाटक की दुरूह भाषा तथा पात्रों के कठिन नाम हैं, जो कहीं-कहीं सफल संवाद-प्रेषण में कठिनाई उत्पन्न कर सकते हैं, परन्तु देश-काल के सजीव चित्रण के लिए, यह आवश्यक था।
इस प्रकार यह नाटक रचना-तत्त्वों की दृष्टि से एक सफल रचना है।

प्रश्न 3:
‘गरुडध्वज’ नाटक के नायक की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के प्रमुख पुरुष पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
विक्रममित्र की चारित्रिक विशेषताओं का उद्घाटन कीजिए।
या
‘गरुडध्वज’ नाटक के आधार पर विक्रममित्र के चरित्र पर प्रकाश डालिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के किसी पुरुष पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:

विक्रममित्र का चरित्र-चित्रण

श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र कृत ‘गरुड़ध्वज’ नाटक में विषमशील तथा विक्रममित्र दो प्रमुख पात्र हैं। नाटक के नायक विक्रममित्र हैं, जो नाटक के आरम्भ से अन्त तक की सभी घटनाओं के साथ जुड़े रहते हैं। यह कहा जा सकता है कि सारे कथानक के मेरुदण्ड विक्रममित्र ही हैं, जिन्होंने मूल कथा को सबसे अधिक प्रभावित किया है। विक्रममित्र, पुष्यमित्र शुंग के वंश के अन्तिम शासक हैं। वे ब्रह्मचारी, सदाचारी, वीर, कुशल राजनीतिज्ञ तथा प्रजावत्सल हैं। वह शासन का संचालन कुशलता से करते हैं। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं-

(1) सज्जन महापुरुष  – विक्रममित्र सज्जन महापुरुष हैं। वे स्वयं को ‘महाराज’ कहलवाना पसन्द नहीं करते, अतः लोग उन्हें सेनापति’ कहते हैं। नारियों के प्रति सम्मान का भाव सदा उनके मन में रहता है।

(2) अनुशासनप्रिय – विक्रममित्र अनुशासनप्रिय हैं तथा कठोर अनुशासन का पालन करने और कराने के पक्षधर हैं। सेनापति के स्थान पर ‘महाराज’ कहे जाने पर सेवक को डर लगता है कि कहीं सेनापति उसे दण्ड न दे दें। विक्रममित्र के शासन में अनुशासन भंग करना और मर्यादा का उल्लंघन करना अक्षम्य अपराध है।

(3) प्रजा के सेवक – विक्रममित्र अपनी प्रजा को अपनी सन्तान की भाँति स्नेह करते हैं। वे अत्याचारी नहीं हैं। उनका मत है-‘सेनापति धर्म और जाति का सबसे बड़ा सेवक है।”

(4) भागवत धर्म के रक्षक – विक्रममित्र भारतवर्ष में मिटती हुई वैदिक संस्कृति तथा ब्राह्मण धर्म के रक्षक हैं। वे भागवत धर्म और उसकी प्रतिष्ठा के लिए आजीवन संघर्ष करते हैं। उनको सेवक कालिदास काशी में हुए शास्त्रार्थ में बौद्धों को निरुत्तर कर देता है।

(5) संगठित राष्ट्र-निर्माता – उस समय देश छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था। विक्रममित्र ने उन्हें इकट्ठा करने का सफल प्रयास किया। विक्रममित्र का मत है – “देश का गौरव, इसके सुख और शान्ति की रक्षा मेरा धर्म है।” वे कालिदास का विवाह काशी-नरेश की पुत्री से कराते हैं। विक्रममित्र के संन्यास के समय तक मगध, साकेत तथा अवन्ति को मिलाकर एक सुदृढ़ राज्य की स्थापना हो चुकी होती है।

(6) निष्काम कर्मवीर –  विक्रममित्र राजा होते हुए भी महाराजा कहलाना पसन्द नहीं करते। वे स्वयं को प्रजा का सेवक ही मानते हैं। विषमशील के योग्य हो जाने पर वे उसे शासक बनाकर स्वयं संन्यासी हो जाते हैं। कालिदास का उन्हें भीष्म पितामह कहना सटीक सम्बोधन है।

(7) नीतिप्रिय – आचार्य विक्रममित्र नीति के अनुसार चलने वाले जननायक हैं। कुमार विषमशील की सफलता का एकमात्र कारण सेनापति विक्रममित्र की नीतियाँ ही हैं। वह नागसेन और पुष्कर से कहते हैं- “तुम जानते हो विक्रममित्र के शासन में अनीति चाहे कितनी छोटी क्यों न हो, छिपी नहीं रह सकती है।”

(8) शरणागतवत्सल – विक्रममित्र अपनी शरण में आये हुए की रक्षा करते हैं। चंचु और कालकाचार्य को क्षमा-दान देना उनकी शरणागतवत्सलता के प्रमाण हैं।

(9) निरभिमानी – विक्रममित्र शासक होते हुए भी अभिमान से कोसों दूर रहते हैं। वे हलोदर से कहते हैं-”मैं लज्जा और संकोच से मरने लगता हूँ; राजदूत! जब इस युग का सारा श्रेय मुझे दिया जाता है।”

इस प्रकार विक्रममित्र न्यायप्रिय, प्रजावत्सल, वीर शासक तथा निष्काम महामानव हैं।

प्रश्न 4:
‘गरुड़ध्वज़’ के आधार पर कालिदास का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘गरुडध्वज’ के अन्य पुरुष-पात्रों की तुलना में कालिदास की चारित्रिक विशेषताओं को प्रकाशित कीजिए।
उत्तर:
‘गरुड़ध्वज’ के पुरुष पात्रों में कालिदास भी एक प्रमुख पात्र हैं। विक्रममित्र शुंगवंशीय शासक एवं वीर सेनापति के रूप में प्रमुख पात्र है। इसके पश्चात् द्वितीय एवं तृतीय क्रम पर क्रमशः विषमशील, कालिदास का ही नाम आता है। विषमशील और विक्रममित्र तो प्रबुद्ध, शासक, सेनापति और शूरवीर पुरुष हैं। कालिदास शकारि विक्रमादित्य के दरबारी रत्नों में एक मुख्य रत्न माने जाते थे। ये एक विद्वान् कवि थे और वीर सैनिक भी थे; अतः वे विषमशील तथा विक्रममित्र से भी कुछ अधिक गुणों के स्वामी हैं। उनकी चरित्र की कुछ प्रमुख विशेषताएँ अग्रवत् हैं

(1) वीरता – कालिदास एक वीर पुरुष हैं। जब देवभूति कौमुदी का अपहरण कर लेता है तो कालिदास उसे काशी में घेर कर पकड़ लाते हैं। उसकी इसी वीरता पर मुग्ध होकर काशी की राजकुमारी वासन्ती उससे प्रेम करने लगती है और काशिराज भी प्रसन्न होकर उन दोनों के विवाह की स्वीकृति देते हैं।

(2) सच्चा-मित्र – कालीदास विषमशील का मित्र है, इसीलिए विषमशील के साथ उसका हास-परिहास चलता रहता है। वह मलयवती के बारे में राजकुमार विषमशील से चुटकी लेता हुआ कहता है
“किस तरह भूल गये विदिशा के प्रासाद का वह उपवन ……….”। घूम-घाम कर मलयवती को आँखों से पी जाना चाहते थे।”

(3) सच्चा-प्रेमी और कवि – वह वासन्ती का सच्चा प्रेमी है। वासन्ती को भी उस पर पूरा विश्वास है। वह वासन्ती के बारे में कहता है-“मैं सब कुछ जानता हूँ। उन्होंने तो उस यवन को देखा भी नहीं, फिर उसकी पवित्रता में शंका उत्पन्न करना तो पार्वती की पवित्रता में शंका उत्पन्न करना होगा। इसके अतिरिक्त वे एक महाकवि भी हैं। जैसा कि मलयवती ने कहा भी है-”क्यों महाकवि को यह क्या सूझी है ?” निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि कालिदास ‘गरुड़ध्वज’ के अन्य पुरुष-पात्रों की अपेक्षा विलक्षण हैं। वे वीर, सच्चे मित्र, सच्चे प्रेमी और महाकवि भी हैं। वे शासक भी हैं और शासित भी; वे वीर हैं, न्यायप्रिय हैं, कठोर हैं और कोमल भी हैं।

प्रश्न 5:
‘गरुड़ध्वज’ के आधार पर विषमशील का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
कुमार विषमशील ‘गरुड़ध्वज’ नाटक के दूसरे प्रमुख पात्र हैं। ये धीरोदात्त स्वभाव के उच्च कुलीन श्रेष्ठ पुरुष हैं। आदि से अन्त तक इनके चरित्र का क्रमिक विकास होता है। इनके चरित्र में निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं:

(1) उदार और गुणग्राही – कुमार विषमशील मालवा के गर्दभिल्लवंशी महाराज महेन्द्रादित्य के वीर सुपुत्र हैं। अपने महान् कुल के अनुरूप ही उनमें उदारता और गुणग्राहकता विद्यमान है। कवि कालिदास की विद्वत्ता, वीरता आदि गुणों को देखकर वे उनके गुणों पर ऐसे मुग्ध हो जाते हैं कि उनसे अलग होना नहीं चाहते।

(2) महान् वीर – वीरता कुमार विषमशील के चरित्र की महती विशेषता है। अपनी वीरता के कारण वह शकारि क्षत्रियों को पराजित कर भारी विजय प्राप्त करते हैं। कुमार की वीरता और योग्यता को देखकर ही आचार्य विक्रममित्र उसे सम्राट बनाकर निश्चिन्त हो जाते हैं।

(3) सच्चा-प्रेमी – कुमार विषमशील एक भावुक व्यक्ति है। उसके हृदय में दया, प्रेम, उत्साह आदि मानवीय भावनाएँ पर्याप्त मात्रा में पायी जाती हैं। स्वभाव से धीर होते हुए भी कुमारी मलयवती को देखकर उनके हृदय में प्रेम अंकुरित हो जाता है।

(4) विवेकशील – कुमार विषमशील एक विवेकशील व्यक्ति के रूप में चित्रित हुए हैं। वे भली-भाँति समझते हैं कि किस प्रकार, किस अवसर पर अथवा किस स्थान पर किस प्रकार की बात करनी चाहिए। कालिदास के साथ उसका व्यवहार मित्रों जैसा होता है, हास और उपहास भी होता है किन्तु सेनापति विक्रममित्र के सामने वे सर्वत्र संयत और शिष्ट-आचरण करते हैं। वासन्ती और मलयवती के साथ बातें करते समय वह भावुक हो। उठते हैं। किसी काम को करने से पूर्व वह विवेक से काम लेते हैं तथा उसके दूरगामी परिणाम को सोचते हैं। जब सेनापति विक्रममित्र साकेत और पाटलिपुत्र का राज्य भी उसे सौंपते हैं तो वह बहुत विवेक से काम लेता । है। अवन्ति में रहकर सुदूर पूर्व के इन राज्यों की व्यवस्था करना कोई सरल काम नहीं था। इसलिए वह विक्रममित्र से निवेदन करता है ।
“आचार्य! अभी कुछ दिन आप महात्मा काशिराज के साथ उधर की व्यवस्था करें। मैं चाहता हूँ, मेरे सिर पर किसी मनस्वी ब्राह्मण की छाया रहे और फिर मैं यह देख भी नहीं सकता कि जिस क्षेत्र में प्रायः डेढ़ सौ वर्षों से आपके पूर्व-पुरुषों का अनुशासन रहा, वह अकस्मात् इस प्रकार मिट जाये।”

(5) कृतज्ञता – कुमार विषमशील दूसरे के किये हुए उपकार से अपने को उपकृत मानता है। कालिदास के उपकार के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए वह कहता है “और वह राज्य मुझे देकर मुझ पर, मेरे मन, मेरे प्राण पर राज्य करने की युक्ति निकाल ली।………. मैं सुखी हूँ ……… तुम्हारा अधिकार मेरे मन पर सदैव बना रहे ……… महाकाल से मेरी यही कामना है।”

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि कुमार विषमशील का चरित्र एक सुयोग्य राजकुमार का चरित्र है। वह स्वभाव से उदार, गुंणग्राही तथा भावुक व्यक्ति है। उसमें वीरता, विवेकशीलता आदि कुछ ऐसे गुण हैं जिनके आधार पर उसमें एक श्रेष्ठ शासक बनने की क्षमता सिद्ध हो जाती है। उसका चरित्र स्वाभाविक तथा मानवीय है।

प्रश्न 6:
‘गरुड़ध्वज’ के आधार पर वासन्ती का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के किसी नारी-पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ के प्रमुख नारी-पात्र के विषय में अपने विचार प्रकट कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक की नायिका (प्रमुख नारी-पात्र) का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
क्या वासन्ती का चरित्र आधुनिक नारियों के लिए अनुकरणीय है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

वासन्ती का चरित्र-चित्रण

श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र कृत ‘गरुड़ध्वज’ नाटक की नायिका वासन्ती है। वासन्ती काशिराज की इकलौती पुत्री है। बौद्ध धर्म के अनुयायी होने के कारण वे वासन्ती का विवाह किसी राजकुल में नहीं कर पाते, अतः अपनी युवा पुत्री का विवाह शाकल के 50 वर्षीय यवन राजकुमार से निश्चित करते हैं, किन्तु इसी बीच विक्रममित्र के प्रयास से यह विवाह बीच में रोक दिया जाता है और वासन्ती को राजमहल में सुरक्षित पहुँचा दिया जाता है। बाद में वह कालिदास की प्रेयसी के रूप में हमारे सम्मुख आती है। वासन्ती के चरित्र में निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ पायी जाती हैं

(1) अनुपम सुन्दरी – वासन्ती रूप और गुण दोनों में अद्वितीय है। उसका सौन्दर्य कालिदास जैसे संयमी पुरुष को भी आकर्षित कर लेता है। उसके सौन्दर्य की प्रशंसा करते हुए कुमार विषमशील कालिदास से कहते हैं  “और तुम्हारी वासन्ती-रूप और गुण का इतना अद्भुत मिश्रण ………… पता नहीं, कितने कुण्ड इस पर्वतीय स्रोत के सामने फीके पड़ेंगे।”

(2) उदारता और प्रेमभावना से परिपूर्ण – वासन्ती विश्व के समस्त प्राणियों के लिए अपने हृदय में उदार भावना रखती है। उसमें बड़े-छोटे, अपने-पराये सभी के लिए एक समान प्रेमभाव ही भरा हुआ है।

(3) धार्मिक संकीर्णता से त्रस्त – पिता के बौद्ध धर्मानुयायी होने के कारण कोई भी राज-परिवार वासन्ती से विवाह-सम्बन्ध के लिए तैयार नहीं होता। अन्त में उसके पिता काशिराज उसे 50 वर्षीय यवन राजकुमार को सौंप देने का निश्चय कर लेते हैं, जब कि वासन्ती उससे विवाह नहीं करना चाहती। इस प्रकार वासन्ती तत्कालीन समाज में व्याप्त धार्मिक संकीर्णता से त्रस्त है। धार्मिक संकीर्णता से ऊपर उठना चाहिए तथा योग्य व्यक्ति का वरण करना चाहिए।

(4) आत्मग्लानि से विक्षुब्ध – वासन्ती आत्मग्लानि से विक्षुब्ध होकर अपने जीवन से छुटकारा पाना चाहती है। और अपनी जीवन-लीला समाप्त करने का प्रयास करती है, परन्तु विक्रममित्र उसको ऐसा करने से रोक लेते हैं। वह असहाय होकर कहती है-”वह महापुरुष कौन होगा, जो स्वेच्छा से आग के साथ विनोद करेगा।” नारियों को इस तरह की भावना को त्यागकर साहसपूर्वक जीवनयापन करना चाहिए और समाज के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।

(5) स्वाभिमानिनी – वासन्ती धार्मिक संकीर्णता से त्रस्त होने पर भी अपनी स्वाभिमान नहीं खोती। वह किसी ऐसे राजकुमार से विवाह-बन्धन में नहीं बँधना चाहती, जो विक्रममित्र के दबाव के कारण ऐसा करने के लिए विवश हो। अतः आधुनिक नारियों को भी इस तरह संकल्प लेना चाहिए।

(6) सहृदय और विनोदप्रिय – वासन्ती विक्षुब्ध और निराश होने पर भी सहृदय और विनोदप्रिय दृष्टिगोचर . होती है। वह कालिदास के काव्य-रस का पूरा आनन्द लेती है।

(7) आदर्श प्रेमिका – वासन्ती एक सहृदया, सुन्दर, आदर्श प्रेमिका है। वह निष्कलंक और पवित्र है।

सार रूप में यह कहा जा सकता है कि वासन्ती एक आदर्श नारी-पात्र है और इस नाटक की नायिका है|

वासन्ती का चरित्र आधुनिक नारियों के लिए अनुकरणीय है।

प्रश्न 7:
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के आधार पर मलयवती का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:

मलयवती का चरित्र-चित्रण

मलयवती; श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र कृत ‘गरुड़ध्वज’ नाटक के नारी-पात्रों में एक प्रमुख पात्र है। सम्पूर्ण नाटक में अनेक स्थलों पर उसका चरित्र पाठकों को आकर्षित करता है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) अपूर्व सुन्दरी – मलयवती का व्यक्तित्व अत्यन्त प्रभावपूर्ण है। वह मलय देश की राजकुमारी और अपूर्व सुन्दरी है। विदिशा के राजप्रासाद के उपवन में उसके रूप-सौन्दर्य को देखकर कुमार विषमशील भी उस पर मुग्ध हो जाते हैं।

(2) ललित कलाओं में रुचि रखने वाली – मलयवती की ललित-कलाओं में विशेष रुचि है। ललित कलाओं में दक्ष होने के उद्देश्य से ही वह विदिशा जाती है और वहाँ मलय देश की चित्रकला, संगीतकला आदि भी
सीखती है।

(3) विनोदप्रिय – राजकुमारी मलयवती प्रसन्नचित्त और विनोदी स्वभाव की है। वासन्ती उसकी प्रिय सखी है। और वह उसके साथ खुलकर हास-परिहास करती है। जब राजभृत्य उसे बताता है कि महाकवि कह रहे थे कि मलयवती और वासन्ती दोनों को ही राजकुमारी के स्थान पर राजकुमार होना चाहिए था तो मलयवती कहती है-“क्यों महाकवि को यह सूझी है? इस पृथ्वी की सभी कुमारियाँ कुमार हो जाएँ, तब तो अच्छी रही। कह देना महाकवि से इस तरह की उलट-फेर में कुमारों को कुमारियाँ होना होगा और महाकवि भी कहीं उस चक्र में न आ जाएँ।’

(4) आदर्श प्रेमिका – मलयवती के हृदय में कुमार विषमशील के प्रति प्रेम का भाव जाग्रत हो जाता है। वह विषमशील का मन से वरण कर लेने के उपरान्त, एकनिष्ठ भाव से केवल उन्हीं का चिन्तन करती है। वह स्वप्न में भी किसी अन्य की कल्पना करना नहीं चाहती। उसका प्रेम सच्चा है और उसे अपने प्रेम पर पूर्ण विश्वास है। अन्ततः प्रेम की विजय होती है और कुमार विषमशील के साथ उसका विवाह हो जाता है। इस प्रकार मलयवती का चरित्र एवं व्यक्तित्व अनुपम है। वह एक आदर्श राजकुमारी की छवि प्रस्तुत करती है।

प्रश्न 8.
” ‘गरुडध्वज’ नाटक राष्ट्र की एकता और संस्कृति का सन्देश अपनी घटनाओं में अभिव्यक्त करता है।” नाटक की कथावस्तु से इस कथन की पुष्टि कीजिए।
या
” ‘गरुड़ध्वज’ नाटक में राष्ट्र की एकता और संस्कृति का सन्देश है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक की राष्ट्रीयता को स्पष्ट कीजिए।
या
“राष्ट्र को गतिशील बनाने वाले जो उच्च विचार हैं, वे ‘गरुड़ध्वज’ नाटक में समाविष्ट हैं।” विवेचना कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक में युगीन समाज का यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया गया है? स्पष्ट कीजिए।
या
‘मरुड़ध्वज’ नाटक के शीर्षक की सार्थकता को स्पष्ट कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ में राष्ट्रीय भावना का संयोजन है। स्पष्ट कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक में ‘नीति और संस्कृति के मानदण्ड स्थापित हैं। इस कथन पर प्रकाश डालिए।
या
राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता की दृष्टि से ‘गरुड़ध्वज’ नाटक कितना समर्थ है ? साधार स्पष्ट कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के कथानक में न्याय और राष्ट्रीय एकता पर विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर:

‘गरुड़ध्वज’ का महत्त्व

श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र द्वारा रचित ‘गरुड़ध्वज’ नाटक में ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी के भारतीय इतिहास के एक महत्त्वपूर्ण युग के धुंधले स्वरूप को चित्रित किया गया है, जो भारत की राष्ट्रीय एकता और प्राचीन संस्कृति को प्रस्तुत करता है। इसमें तत्कालीन न्यायव्यवस्था का स्वरूप भी परिलक्षित होता है।
राष्ट्रीय एकता और भारतीय संस्कृति का चित्रण – प्रस्तुत नाटक में मगध, साकेत, अवन्ति और मलय देश के एकीकरण की घटना, सुदृढ़ भारत राष्ट्र के निर्माण, राष्ट्रीय अखण्डता तथा एकता की प्रतीक है। विक्रममित्र तथा विषमशील के चरित्र सशक्त राष्ट्र के निर्माता और राष्ट्रीय एकता के संरक्षक-सन्देशवाहक हैं। इस नाटक में नाटककार धार्मिक संकीर्णताओं और स्वार्थों के परिणामस्वरूप देश की विशृंखलता और अध:पतन की ओर पाठकवर्ग का ध्यान आकर्षित करके राष्ट्र को एकता के सूत्र में बाँधने का सन्देश देता है। नाटक का नायक विक्रममित्र वैदिक संस्कृति और भागवत् धर्म का उन्नायक है। वह भगवान् विष्णु का उपासक है, इसीलिए उसका राजचिह्न गरुड़ध्वज है, जो उसके लिए सर्वाधिक पवित्र और पूज्य है। वह सनातन भागवत धर्म की ध्वजा सर्वत्र फहरा देता है। इस दृष्टि से नाटक का शीर्षक ‘गरुड़ध्वज’ भी सार्थक हो उठी है।

निष्पक्ष एवं सुदृढ़ न्याय-व्यवस्था – प्राचीन भारत में न्याय निष्पक्ष होता था। शासक द्वारा प्रत्येक नागरिक की भाँति अपने रिवारजनो को भी अपराध के लिए समान कठोर दण्ड दिये जाने की व्यवस्था थी। नाटक के प्रथम अंक’ की घरना इसका उदाहरण है। शुंग वंश के कुमार सेनानी देवभूति ने श्रेष्ठी अमोघ की कन्या कौमुदी को अपहरण विह-मण्डप से कर लिया। इस समाचार से विक्रममित्र बहुत दु:खी हुए। देवभूति शुंग साम्राज्य के शासक हैं, किन्तु विक्रममित्र अपने सैनिकों को तत्काल काशी का घेरा डालने और देवभूति को पकड़ने का आदेश देते हैं। यह तत्कालीन निष्पक्ष एवं सुदृढ़ न्याय-व्यवस्था का स्पष्ट प्रमाण है।

प्रश्न 9:
‘गरुड़ध्वज’ नाटक की ऐतिहासिकता प्रमाणित कीजिए।
या
‘गरुडध्वज’ नाटक की कथावस्तु के ऐतिहासिक पक्ष को स्पष्ट कीजिए।
या
” ‘गरुडध्वज’ की कथा में ऐतिहासिकता एवं काल्पनिकता का मेल है।” इस कथन का विवेचन कीजिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक में अभिव्यक्त सांस्कृतिक चेतना पर प्रकाश डालिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ नाटक में नाटककार ने इतिहास के किस काल को अपनी रचना के विषय रूप में चुना है, प्रकाश डालिए।
उत्तर:

‘गरुड़ध्वज’ की ऐतिहासिकता तथा संस्कृति

श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र द्वारा रचित ‘गरुड़ध्वज’ नाटक में ईसा से एक शती पूर्व के समय का वर्णन है। उस समय भारत में विक्रमादित्य नाम का एक शासक था। नाटक में कुमार विषमशील का नामकरण ‘विक्रमादित्य’ हुआ है। शुंग वंश में सेनापति पुष्यमित्र के वंश में विक्रममित्र अन्तिम ऐतिहासिक व्यक्ति हुए। वंश-परम्परा का लोप, नाटककार के अनुसार विक्रममित्र के आजीवन ब्रह्मचारी रहने के कारण हुआ।

नाटक के प्रसिद्ध पात्र इतिहाससम्मत हैं; जैसे-तक्षशिला की यवन शासक अन्तिलिक, उसका मन्त्री हलोदर, शुंग साम्राज्य में काशी का शासक देवभूति, कालिदास, जैन आचार्य कोलके आदि। नाटक के कुछ स्थानों के नाम भी ऐतिहासिक हैं; जैसे—विदिशा, पाटलिपुत्र, अवन्ति, साकेत, काशी इत्यादि। घटना की दृष्टि से भी नाटक को इतिहास से अनुप्राणित किया गया है। विक्रमादित्य द्वारा शकों को पराजित करने की घटना, कालिदास का विक्रमादित्य का सभासद होना तथा ईसा से 57 वर्ष पूर्व विक्रम संवत् का प्रवर्तन होना इतिहास-सम्मत है। इस काल में भारत के सामाजिक परिवेश पर जैनों, बौद्धों तथा वैदिक धर्माचार्यों का प्रभाव था। नाटककार ने नाटक में सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक परिस्थितियों का चित्रण करते समय इस तथ्य का ध्यान रखा है। भारत में उस समय अनेक गणराज्य थे। बौद्धों, सनातनियों तथा जैनियों के संघर्ष धार्मिक वातावरण को प्रभावित कर रहे थे। नाटक में नारी अपहरण के साथ-साथ विक्रममित्र द्वारा अपहरणकर्ता को दण्ड, प्रेम-विवाह, बहु-विवाह, संगीत तथा ललित-कलाओं में अभिरुचि का चित्रण करके तत्कालीन धार्मिक और सांस्कृतिक वातावरण को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है। विक्रममित्र मूलभूत वैदिक संस्कृति के आधार पर राज्य और समाज को चलाना चाहते थे। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि ‘गरुड़ध्वज’ नाटक में ऐतिहासिकता तथा तत्कालीन भारतीय संस्कृति को समन्वित रूप प्रस्तुत करके नाटककार ने स्तुत्य कार्य किया है।

प्रश्न 10:
‘गरुड़ध्वज’ नाटक की रचना नाटककार ने किन उद्देश्यों से प्रेरित होकर की है ?
या
‘गरुड़ध्वज’ के रचनात्मक उद्देश्य (प्रतिपाद्य) पर प्रकाश डालिए।
या
‘गरुड़ध्वज’ में किस समस्या को उठाया गया है ?
उत्तर:

‘गरुड़ध्वज’ का उद्देश्य

‘गरुड़ध्वज’ ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी के भारतीय इतिहास के कथानक पर आधारित नाटक है। नाटककार श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र ने आदियुग के एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण किन्तु धुंधले स्वरूप को उजागर करने का प्रयास किया है। पाठकों के सम्मुख एक ज्वलन्त ऐतिहासिक तथ्य को प्रस्तुत किया गया है, जिसमें धार्मिक संकीर्णताओं तथा स्वार्थों के कारण देश की एकता के बिखराव और उसके नैतिक पतन की ओर ध्यान आकृष्ट करके नाटककार पूरे राष्ट्र को एकता के सूत्र में बाँधने का संकेत देता है। परोक्ष रूप में नाटक के निम्नलिखित उद्देश्य भी हैं

  1.  नाटककार को धार्मिक कट्टरता बिल्कुल भी मान्य नहीं है। वह धर्म और सम्प्रदाय की दीवारों से बाहर होकर लोक-कल्याण की ओर उन्मुख होना चाहता है।
  2. हलोदर के कथन में नाटककार स्वयं बोल रहा है। वह देश की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य मानता है।
  3.  उदार धार्मिक भावना का सन्देश ही नाटक का मूल स्वर है।
  4.  नाटक में राष्ट्रीय एकता एवं जनवादी विचारधारा का समर्थन किया गया है।
  5. वासन्ती, कौमुदी आदि नारियों के उद्धार के पीछे नारी के शील और सम्मान की रक्षा के लिए प्रेरणा देने का उद्देश्य निहित है।
  6. प्रस्तुत नाटक में धर्मनिरपेक्षता का उद्देश्य भी स्पष्ट रूप में चित्रित किया गया है।
  7.  नाटक में स्वस्थ गणराज्य की स्थापना पर बल दिया गया है।
  8. देश की रक्षा तथा अन्यायियों के विनाश के लिए शस्त्रों का उपयोग उचित माना गया है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 4 समय

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 4 समय (यशपाल) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 4 समय (यशपाल).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name समय (यशपाल)
Number of Questions 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 4 समय (यशपाल)

प्रश्न 1:
श्री यशपाल द्वारा लिखित ‘समय’ कहानी का सारांश (कथानक) अपने शब्दों में लिखिए।
या
‘समय’ कहानी की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
प्रसिद्ध कहानीकार यशपाल की ‘समय’ कहानी बड़ी रोचक है। एक अधिकारी को रिटायर होने से डेढ़-दो वर्ष पहले से ही चिन्ता होने लगी कि उसका समय कैसे कटेगा ? जब वे नौकरी करते थे तब अवकाश के दिन कितने अच्छे लगते थे। गिन-गिन कर अवकाश के दिनों की प्रतीक्षा करते थे। लेकिन पूर्ण अवकाश होने पर व्यक्ति निरुत्साहित क्यों हो जाता है ? उसको इसे तो अपने श्रम का अर्जित फल मानकर, उससे पूरी लाभ उठाना चाहिए और सन्तोष करना चाहिए। आराम और अपनी इच्छा से श्रम करने में तो कोई बाधा नहीं डालेगा। अध्ययन का मन चाहा अवसर होगा और पर-आदेश पालन से मुक्ति मिलेगी। इससे बड़ा सन्तोष दूसरा क्या चाहिए?

सर्विस के समय गर्मियों में महीने दो महीने हिल स्टेशनों पर रह लेने का पापा को बहुत शौक था। मितव्ययिता के कारण रिटायर होने पर उन्होंने पहाड़ जाना छोड़ दिया है। रिटायर होने पर उन्होंने लखनऊ आवास बनाया तथा सन्ध्या के समय टहलने जाने का नियम भी। पहले टहलने या शॉपिंग के लिए वे स्वयं व पत्नी को लेकर जाते थे, बच्चों को साथ नहीं ले जाते थे। बच्चों को मम्मी-पापा के साथ बाजार जाने की उत्सुकता रहती थी। जब कभी बच्चों को बाजार साथ ले जाते तो बच्चे जो भी चीज माँगते, वह खरीद देते। बाजार में पापा बच्चों को डराते-धमकाते नहीं थे। मम्मी-पापा जब बाजार जाने को तैयार होते तो बच्चों को नौकर के साथ इधर-उधर टहला देते थे। वे अपने साथ बच्चों को बाजार में ले जाकर स्वयं को बुजुर्ग सिद्ध करना नहीं चाहते थे।

समय बीतने पर पापा के स्वभाव और, व्यवहार में कुछ परिवर्तन और आया। पहले उन्हें अपनी पोशाक चुस्त-दुरुस्त रखने और व्यक्तिगत उपयोग में बढ़िया चीजों का शौक था। अब पापा अपने शौक और रुचियों को बच्चों द्वारा पूरा होते देखकर सन्तोष पाते हैं; मानो उन्होंने अपने व्यक्तित्व को न्यास बच्चों में कर लिया है। धीरे-धीरे समय के गुजरने के साथ-साथ पापा के स्वभाव में पर्याप्त परिवर्तन हो गया। पत्नी अस्वस्थ एवं वृद्ध होने के कारण टहलने में असमर्थ हो गयी। इसलिए पापा हजरतगंज बाजार टहलने जाने के लिए बच्चों को साथ ले जाने लगे। कभी मण्टू को, कभी पुष्पा को और कभी किसी एक बच्चे को साथ ले जाते। हजरतगंज टहलने के बाद पापा स्वयं ही प्रस्ताव कर देते – कहो, क्या पसन्द है? कॉफी या आइसक्रीम।

बच्चों को साथ ले जाने के दो ही प्रयोजन होते थे। एक तो बूढ़ों या बुजुर्गों की अपेक्षा नवयुवकों का साथ और दूसरे बुढ़ापे के कारण, कमजोर नजर का प्रभाव। अकेले चलने में वे ठोकर खा जाते हैं और प्रकाश की चकाचौंध से परेशानी का भी अनुभव करते हैं। इसलिए जब वे सन्ध्या समय बाहर जाते, तो किसी न किसी को साथ ले जाते थे।

पापा की बाहर जाने की तैयारी अनेक घोषणाओं और पुरस्कारों के साथ होती, जिससे सब जान जाएँ कि वे बाहर जा रहे हैं और कोई उनके साथ हो ले। एक बार उन्होंने हमेशा की तरह आवाज लगायी, पुष्पा दीदी आवाज सुनकर मण्ट्र से साथ जाने को कहती हैं। लेकिन मण्टू ने उत्तर दिया कि मुझे बुङ्कों के साथ जाने में बोरियत होती है। पापा ने इस बात को सुन लिया और चिन्ता में डूब गये। मुझे भी बचपन की स्मृति आ गयी। सोचने लगा समय के साथ सब बदल जाते हैं। पापा ने माँ से अपनी छड़ी माँगी और टहलने चल दिये।। सम्भवतः उन्होंने भी स्वीकार कर लिया कि समय के साथ सब बदल जाता है।

प्रश्न 2:
कहानी-कला की दृष्टि से यशपाल द्वारा लिखित ‘समय’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
पात्र-योजना की दृष्टि से ‘समय’ कहानी का विवेचन कीजिए।
या
‘वातावरण’ एवं ‘भाषा-शैली के आधार पर ‘समय’ कहानी का मूल्यांकन कीजिए।
या
‘समय’ कहानी की समीक्षा देश-काल के आधार पर कीजिए।
या
कथावस्तु की दृष्टि से ‘समय’ कहानी की विशेषताएँ बताइए।
या
‘समय’ का कथानक लिखिए तथा उसके उद्देश्य को स्पष्ट कीजिए।
या
कहानी के तत्त्वों के आधार पर ‘समय’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
कहानी-कला के तत्त्वों के आधार पर ‘समय’ कहानी की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘समय’ कहानी के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
या
‘समय’ कहानी के पात्रों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
यथार्थवादी प्रगतिशील कहानीकारों में यशपाल जी का विशिष्ट स्थान है। यशपाल जी समाजवादी विचारधारा के प्रबुद्ध कहानीकार हैं। उनकी प्रस्तुत कहानी का कथानक मध्यमवर्गीय जीवन से लिया गया है। उनकी यह कहानी सत्य और यथार्थ पर आधारित समाजवादी विचारधारा की सुन्दर रचना है। कहानी-शिल्प की दृष्टि से इस कहानी की विशेषताएँ निम्नवत् हैं-

(1) शीर्षक – प्रस्तुत कहानी का शीर्षक ‘समय’ एक प्रतीक के रूप में प्रयुक्त हुआ है। सम्पूर्ण कहानी में समय की ही प्रमुखता को दर्शाया गया है। अपने जीवन के शीर्ष समय में शीर्ष पर स्थित व्यक्ति समय बदल जाने; अर्थात् नौकरी से अवकाश प्राप्त कर लेने अथवा बुजुर्ग हो जाने पर कितना बदल जाता है, उसके आस-पास की स्थितियों में कितना परिवर्तन हो जाता है, उसे इस कहानी में अच्छी तरह से दर्शाया गया है। शीर्षक में प्रतीकात्मकती, कौतूहल, सरलता और सजीवता है। ‘समय’ सम्पूर्ण कहानी के कथानक का प्राण है।

(2) कथावस्तु – इस कहानी के माध्यम से एक ऐसे मध्यमवर्गीय परिवार का चित्र खींचा गया है, जिसका मुखिया उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी है। अपनी नौकरी के समय में कार्यालय से घर वापस आने पर इनको अधिकांश समय; चाहे वह बाजार जाने का हो या टहलने का; पत्नी के साथ ही व्यतीत होता था। इसमें बच्चों की सहभागिता न्यूनतम होती थी। अवकाश-प्राप्ति के बाद लखनऊ में स्थापित होने पर इन्हें बच्चों के साहचर्य की आवश्यकता महसूस होने लगी। पहले तो ये पत्नी के साथ ही घूमने चले जाया करते थे, लेकिन पत्नी के असमर्थ होने और कुछ अपनी भी कमजोरियों के कारण अब वे अपने युवा हो चुके बच्चों पर निर्भर होने लगे। लेकिन युवा मानसिकता की अपनी रुचि, अपनी व्यस्तता। एक दिन मण्टू ने तो स्पष्ट रूप से कह दिया कि बुड्डों के साथ जाने में बोरियत होती है। पापा ने यह सब कुछ सुना, समझा और छड़ी उठाकर अकेले ही टहलने के लिए चल दिये। सम्भवतः उन्होंने भी अन्तर्मन से इस सत्य को स्वीकार कर लिया।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि कहानी का कथानक संगठित है। लेखक ने यथार्थवादी दृष्टि से एक मध्यमवर्गीय तथाकथित शिक्षित परिवार की वास्तविक तसवीर प्रस्तुत की है। कथानक में संक्षिप्तता, सजीवता, रोचकता, कुतूहल आदि गुण विद्यमान हैं। कहानी मर्मस्पर्शी तो नहीं है, लेकिन विचारों को आन्दोलित अवश्य करती है।

(3) पात्र और चरित्र-चित्रण – इस कहानी के सभी पात्र यथार्थवादी हैं। कहानी में पात्रों की संख्या कम है। सभी पात्र एक परिवार के सदस्य और भाई-बहन हैं। परिवार के मुखिया अर्थात् पापा ही कहानी के मुख्य पात्र हैं और शेष सभी पात्र; जिसमें गृह-स्वामिनी भी सम्मिलित है; गौण हैं। ये सभी मुख्य पात्र पापा की चारित्रिक विशेषताओं को उजागर करने के लिए ही कहानी में प्रयुक्त हुए हैं। कहानी में यशपाल ने पात्रों को चरित्र-चित्रण अत्यधिक स्वाभाविकता और मनोवैज्ञानिकता के साथ किया है।

(4) कथोपकथन या संवाद – ‘समय’ कहानी के संवाद जीवन की यथार्थ अभिव्यक्ति में सक्षम हैं। सम्पूर्ण कहानी लेखक द्वारा अपनी पूर्व स्मृति और बचपन की घटनाओं को समायोजित करते हुए लिखी गयी है। कहानी में लेखक के स्वयं के कथन और उठाये गये प्रश्न हैं। इन प्रश्नों के उत्तर भी लेखक ने स्वयं ही दिये हैं। कहानी में संवाद-योजना अति अल्प है, लेकिन जहाँ कहीं भी है, पूर्णता के साथ मुखर हुई है। एक उदाहरण द्रष्टव्य हैमण्टू ने मुझे रोककर कहा-”सुनो, अम्मी पापा के साथ बाजार जा रही हैं। हम भी उनके साथ बाजार जाएँगे।”

मण्टू ने हुबिया को सम्बोधित किया, “हुबिया, हमारी सैण्डल में कील लग रही है। हम दूसरी सैण्डल पहनकर आते हैं।” हम दोनों घर की ओर भाग आये। मण्टू का अनुमान ठीक था। हम लौटे तो ड्योढ़ी में पहुँचते ही अम्मी की पुकार सुनायी दी – ”जी, आइए, मैं चल रही हैं।” अम्मी बाहर जाने के लिए साड़ी बदले और जूड़े में पिनें खोंसती हुई आ रही थीं। मण्टू अम्मी की कमर से लिपट गयी और डबडबाई आँखें अम्मी के मुँह की ओर उठाकर आँसू-भरे स्वर में हिचक-हिचककर गिड़गिड़ाने लगी – ‘कभी कभी कभी बच्चों को भी ” तो “साथ ले जाना
चाहिए।”
तब तक पापा भी आ गये थे। उन्होंने पूछा–“क्या है, क्या है?” वे समझ गये थे, बोले- “अच्छा बच्चो, एकदम तैयार हो जाओ।”

इस प्रकार ‘समय’ कहानी के संवाद पात्रों के मनोभावों को भली-भाँति अभिव्यक्त करते हैं। वे संक्षिप्त तथा प्रभावशाली हैं।

(5) देश-काल तथा वातावरण – यशपाल जी एक यथार्थवादी कहानीकार हैं और उनकी कहानी ‘समय’ एक, यथार्थपरक कहानी है। इसमें देश-काल तथा वातावरण का वर्णन कहानी को पूर्णता प्रदान करने के उद्देश्य से ही किया गया है। एक उदाहरण देखिएहम लोग उनकी संगति के लिए बचपन के दिनों की तरह लालायित नहीं रह सकते। कारण यह है कि अठारह-बीस पार कर लेने पर हम लोग भी अपना व्यक्तित्व अनुभव करने लगे हैं।

हम लोगों की अपनी वैयक्तिक रुझानें, अपने काम और अपने क्षेत्र भी हो गये हैं और उनके आकर्षण और आवश्यकताएँ भी रहती हैं। कभी-कभी पापा की आवश्यकता और हमारी संगति के लिए उनकी इच्छा और हमारी अपनी आवश्यकताओं और आकर्षणों में द्वन्द्व की स्थिति आ जाना अस्वाभाविक नहीं है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि देश-काल तथा वातावरण का वर्णन सीमित रूप से होते हुए भी कहानी की सफलता में अपना योगदान करता है।

(6) भाषा-शैली – प्रस्तुत कहानी के पात्र समाज के शिक्षित और मध्यम वर्ग से सम्बन्धित हैं। इसलिए कहानी की भाषा सरल, सुबोध और व्यावहारिक खड़ी बोली है। कहानी में तत्सम शब्दों का प्रयोग प्रचुरता से हुआ है। सम्पूर्ण कहानी की भाषा कहीं पर भी स्तर से नीचे नहीं होने पायी है। आजकल का युवा वर्ग बात-चीत में अंग्रेजी शब्दों का खुलकर प्रयोग करता है। इसी उद्देश्य से लेखक ने अपनी भाषा में भी अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग बिना किसी संकोच के खुलकर किया है। इसके प्रयोग से कहीं भी भाषा की गतिमयता बाधित होती नहीं दीखती। कहीं-कहीं पर स्थानीय बोली में प्रयुक्त शब्द भी आये हैं। कहानी में विचारात्मक-विश्लेषणात्मक शैली का प्रयोग हुआ है। एक उदाहरण देखिए

पापा की अवचेतना में रिटायर हो जाने के डेढ़-दो वर्ष पूर्व से ही चिन्ता सिर उठाने लगी थी-रिटायर हो जाने पर अवकाश का बोझ कैसे सँभलेगा? अपनी इस चिन्ता का निराकरण करने के लिए प्राय: ही कहने लगते लोग बाग रिटायर होकर निरुत्साह क्यों हो जाते हैं? सोचिए नौकरी करते समय अवकाश के दिनों की प्रतीक्षा की जाती है। जब दीर्घ श्रम के पुरस्कार में पूर्ण अवकाश का अवसर आ जाये तो निरुत्साह होने का क्या कारण? इसे तो अपने श्रम का अर्जित फल मानकर, उससे पूरा लाभ उठाना और सन्तोष पाना चाहिए।

(7) उद्देश्य –  यशपाल प्रगतिशील साहित्यकार हैं। प्रस्तुत कहानी में यशपाल जी ने यह दर्शाया है कि प्रत्येक व्यक्ति को समय का महत्त्व समझना चाहिए और समय के परिवर्तन के साथ-साथ अपने में भी परिवर्तन ले आना चाहिए। यह सत्य है कि अधिक उम्र का व्यक्ति युवा के साथ रहकर स्वयं को भी युवावत अनुभव करता है। लेकिन उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि युवा स्न्नयं को उम्रदराज के साथ कैसा अनुभव करता होगा। अत: सभी को समय के साथ स्वयं में परिवर्तन ले आना चाहिए। लेखक ने इस बात को कहानी के अन्त में स्पष्ट भी कर दिया है-“हाँ, यह तो बहुत अच्छी बात है।” पापा ने छड़ी की मूठ पर हाथ फेरकर कहा और छड़ी. टेकते हुए किसी की ओर देखे बिना घूमने के लिए चले गये; मानो हाथ की छड़ी को टेककर उन्होंने समय को स्वीकार कर लिया।

प्रश्न 3:
‘समय’ कहानी के माध्यम से लेखक क्या सन्देश देना चाहता है?
उत्तर:
‘समय’ कहानी के माध्यम से लेखक यशपाल यह सन्देश देना चाहते हैं कि जब बच्चे युवा हो जाएँ, अपना हित-अहित सोचने में सक्षम हो जाएँ, औचित्य-अनौचित्य का निर्णय करने में समर्थ हो जाएँ तो बुजुर्गों को उनके व्यक्तिगत कार्यों या व्यस्तताओं में न तो हस्तक्षेप करना चाहिए, न ही उसे अपने अनुसार परिवर्तित करना चाहिए और न ही उनमें स्वयं को समायोजित करने का प्रयास करना चाहिए। ऐसी स्थिति अनावश्यक रूप से कटुता को जन्म देती है। अत: प्रत्येक व्यक्ति को समय के अनुसार अपने आचार-विचारव्यवहार में परिवर्तन लाना चाहिए। यही विचार सुखी जीवन की आधारशिला है।

प्रश्न 4:
‘समय’ कहानी का प्रमुख पात्र कौन है? उसका चरित्र-चित्रण कीजिए अथवा उसकी चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
‘समय’ कहानी के प्रमुख पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
‘समय’ कहानी का प्रमुख पात्र एक अवकाश प्राप्त अधिकारी है। कहानी में इन्हें ‘पापा’ की संज्ञा दी गयी है। इनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) सम्भावित भविष्य के प्रति चिन्तित – ‘पापा’ अपनी नौकरी से अवकाश प्राप्त करने के पूर्व से ही चिन्तित थे कि अवकाश का बोझ कैसे सँभलेगा और जीवन का अधिकांश समय कैसे व्यतीत होगा?

(2) व्यवस्थित दिनचर्या के व्यक्ति – ‘पापा’ व्यवस्थित दिनचर्या वाले व्यक्ति हैं। अवकाश प्राप्त होने पर उन्हें कार्यालयीय भार से मुक्ति मिल जाएगी। अतः उस समय का सदुपयोग करने के लिए उन्होंने पहले से ही योजना बना ली थी कि वे अपने शासन-कार्य के अनुभव पर एक पुस्तक लिखेंगे। अब वे इस पर अध्ययन करते हैं और नोट्स भी बनाते हैं। शाम को वे विभिन्न वस्तुओं की खरीदारी भी करते हैं।

(3) शौकीन मिजाज – पापा बहुत ही शौकीन मिजाज के व्यक्ति थे। उनकी पोशाक हमेशा चुस्त-दुरुस्त रहती थी। अपने उपयोग में आने वाली अच्छी और स्तरीय वस्तुओं का उन्हें शौक था। नौकरी के दौरान वे खर्चीले स्वभाव के थे। गरमियों के दिनों में पर्वतीय स्थानों पर घूमने व रहने का उन्हें बड़ा शौक था। घर में हमेशा दो-तीन नौकर रहा करते थे।

(4) जीवन से सन्तुष्ट – पापा अपनी नौकरी के समय में अपने जीवन से सन्तुष्ट थे और अब अवकाश के समय में भी सन्तुष्ट हैं। अपने जिन शौक और रुचियों से उन्हें अब सन्तुष्टि नहीं होती, उन शौक और रुचियों को अपने बच्चों द्वारा पूरा होते देखकर वे सन्तुष्ट हो जाते हैं।

(5) युवा दिखने की चाहत – पापा को शुरू से ही युवा दीखने की चाहत थी। इसीलिए मम्मी के साथ घूमने जाते समय वे बच्चों को अपने साथ नहीं ले जाते थे; क्योंकि इससे उन्हें अपने बुजुर्ग होने का अनुभव होता था।

(6) समय के साथ परिवर्तित – अवकाश प्राप्त होने के बाद पापा मितव्ययी हो गये। दूसरे वे बच्चों को भी अपने साथ ले चलना चाहते हैं; क्योंकि बच्चे भी अब कद में उनसे ऊँचे, जवान, स्वस्थ और सुडौल हो गये हैं। इससे उन्हें अब गर्व का अनुभव होता है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि एक पढ़े-लिखे, सभ्य और सुशिक्षित युवक और कालान्तर में परिवर्तित प्रौढ़ व्यक्ति के चरित्र में जो गुण होने चाहिए, वे सभी गुण पापा में निहित हैं। लेखक यशपाल जी ने कहानी में इनका चरित्र-चित्रण अत्यधिक गरिमापूर्ण और स्वाभाविक ढंग से ऐसे ही किया है, जैसे वे स्वयं अपने पिता का चरित्र-चित्रित कर रहे हों।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कथा भारती Chapter 4 बहादुर

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कथा भारती Chapter 4 बहादुर (अमरकान्त) are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कथा भारती Chapter 4 बहादुर (अमरकान्त).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name बहादुर
Number of Questions 3
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कथा भारती Chapter 4 बहादुर (अमरकान्त)

प्रश्न 1
‘बहादुर’ कहानी का सारांश संक्षेप में अपने शब्दों में लिखिए। [2010, 11, 14, 15, 16, 17, 18]
या
‘बहादुर’ कहानी की कथावस्तु का उल्लेख कर सिद्ध कीजिए कि यह एक यथार्थवादी कहानी है।
उत्तर
अमरकान्त जी द्वारा लिखी कहानी ‘बहादुर’, एक मध्यमवर्गीय परिवार में नौकर के साथ परिवारजनों द्वारा किये गये अत्यधिक कटु व्यवहार की कहानी है। लेखक ने स्वयं को कहानी का पात्र बनाते हुए कहानी की आत्म-कथात्मक रूप में रचना की है। अपने से सम्पन्न रिश्तेदारों के घर नौकर द्वारा जुटाई सुविधा एवं शान को देखकर लेखक की पत्नी निर्मला स्वयं भी एक नौकर रखना चाहती है। बहादुर नेपाल को 12-13 साल का लड़का है, जो अपनी माँ के दुर्व्यवहार से तंग आकर घर छोड़कर शहर चला आता है और निर्मला के परिवार में नौकर रख लिया जाता है। निर्मला और उसका परिवार बहादुर के प्रति पहले तो अच्छा व्यवहार करते हैं, परन्तु धीरे-धीरे कठोरता बरतने लगते हैं। वह घर का सारा कार्य करता है, इसके बावजूद उसके साथ गाली-गलौज से मारपीट तक की नौबत आ जाती है। झूठी चोरी का इल्जाम लगाकर उसे अपमानित किया जाता है और पीटा जाता है। अन्तत: बहादुर घर छोड़कर चला जाता है। अब परिवार के सभी सदस्य उसे ढूंढ़ते हैं, क्योंकि उसके कारण सब आराम के आदी हो चुके हैं।

बहादुर की उपयोगिता देखकर सभी अब अपना घरेलु कार्य करने से घबराते हैं, वहादुर के घर छोड़ जाने पर वे सभी पश्चात्ताप करते हैं तथा अच्छा व्यवहार करने की सोचते हैं। परन्तु अब पछताये होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत।।
बहादुर में सहनशीलता और स्वाभिमान की भावना कूट-कूटकर भरी हुई है। उसके इसी चरित्र के कारण यह कहानी हमें प्रिय है।

प्रश्न 2
‘बहादुर’ कहानी के उद्देश्य का विवेचनात्मक परिचय दीजिए। बहादुर कहानी की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए। [2016]
या
‘बहादुर’ कहानी की कथावस्तु का विवेचन कीजिए और कहानी का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए। [2009, 11]
या
‘बहादुर’ कहानी के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए। [2012, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
उत्तर
आधुनिक कथा-जगत् में प्रेमचन्द की कहानी-कला को अक्षुण्ण रखने वाले कलाकारों में अमरकान्त अग्रणी हैं। इनकी कहानियों में मध्यम वर्ग तथा निम्न वर्ग की पारिवारिक परिस्थितियों का सजीव, आदर्श तथा यथार्थवादी चित्रण मिलता है। इनकी ‘बहादुर’ कहानी; मध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी करने वाले बहादुर नाम के पहाड़ी लड़के पर आधारित एक समस्यामूलक कहानी है। कहानी-कला के तत्त्वों के आधार पर कहानी की संक्षिप्त समीक्षा आगे प्रस्तुत है–

(1) शीर्षक-प्रस्तुत कहानी का शीर्षक लघु, आकर्षक, सरल तथा सार्थक है। कहानी की कथा इसके प्रमुख पात्र बहादुर के चारों ओर घूमती है; अत: शीर्षक की दृष्टि से ‘बहादुर’ कहानी एक सफल रचना है।
(2) कथानक-प्रस्तुत कहानी में लेखक ने समाज के वर्ग-भेद को उजागर किया है। बहादुर 12-13 वर्ष की उम्र का एक गरीब बालक है। वह एक साधारण परिवार में नौकर है, जिसका मुखिया स्वयं लेखक है। प्रारम्भ में तो उसका परिवार में पालतू पशु-पक्षियों की तरह बड़ा आदर-सत्कार होता है और वह भी बड़ी मेहनत व लगन से काम करता है, किन्तु कुछ दिनों बाद वह लेखक के बड़े लड़के किशोर और उसकी पत्नी निर्मला द्वारा डॉट, मार खाने लगता है। उससे अपनी रोटी स्वयं सेंक लेने को भी कहा जाता है। एक दिन घर में आये कुछ रिश्तेदारों द्वारा बहादुर के ऊपर चोरी करने का आरोप लगाया जाता है और लेखक द्वारा बहादुर को मारा-पीटा भी जाता है। पत्थर की एक सिल के टूट जाने और समस्त परिवारजनों के दुर्व्यवहार से पीड़ित होने के कारण वह उस घर से भाग जाता है। वह अपने साथ घर का और अपना कोई भी सामान नहीं ले जाता। बहादुर के चले जाने के बाद परिवार के लोगों को बहादुर के गुणों की अनुभूति होती है और वे अपने द्वारा उसके प्रति किये गये अमानवीय व्यवहारों पर पश्चात्ताप करते हैं।

कहानी का कथानक रोचक, सुगठित, संक्षिप्त तथा समस्याप्रधान है। इसमें बताया गया है कि मात्र पूँजीपति ही श्रम का शोषण नहीं करते, वरन् सामान्य मध्यम वर्ग भी इस कुकृत्य में पीछे नहीं है। इस प्रकार कथानक-तत्त्व की दृष्टि से यह एक सफल कहानी है।

(3) उद्देश्य ( सन्देश)—इस कहानी का उद्देश्य समाज में उत्पन्न वर्ग-संघर्ष को मानवीय सहानुभूति द्वारा समाप्त करने का सन्देश देना है। शोषितों के प्रति मानवता एवं प्रेम का व्यवहार, ऊँच-नीच के भेद के कारण दिलों में पड़ी दरार को भर देता है। बहादुर भी मानवीय स्नेह एवं संवेदनाओं का भूखा है। मालिक द्वारा पीटे जाने और प्रतिक्रिया स्वरूप उसके द्वारा घर छोड़ दिये जाने पर परिवार के सभी लोगों को पश्चात्ताप का अनुभव होता है। वे स्वयं को दोषी महसूस करते हैं। धनी और निर्धन का वर्ग-भेद मानवीय भावनाएँ ही कम कर सकती हैं। लेखक का मुख्य उद्देश्य दोनों के हृदयों का परिवर्तन है और सबके प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार बनाये रखने का सन्देश देना है।

‘बहादुर’ कहानी अत्यन्त मार्मिक कहानी है। यह आत्म-कथात्मक शैली में प्रस्तुत की गयी है। अमरकान्त जी ने बड़े सटीक और सुन्दर ढंग से कहानी को प्रस्तुत करके पाठकों के मन पर अमिट छाप छोड़ी है। कहानी-कला के तत्त्वों की दृष्टि से यह एक सफल कहानी है।

प्रश्न 3
‘बहादुर’ कहानी में उद्घाटित समाज के शोषक चरित्र पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
अमरकान्त द्वारा रचित ‘बहादुर’ कहानी का नायक ‘दिल बहादुर’ नामक नेपाली लड़का, एक निम्नवर्गीय परिवार का सदस्य है और निर्मला का परिवार मध्यमवर्गीय स्थिति को परिवार है। यह आर्थिक दृष्टि से अधिक सम्पन्न परिवार नहीं है, लेकिन झुठे दिखावे और शान-शौकत के लिए नौकर की आवश्यकता को बनाये हुए है। निर्मला पड़ोसियों को अपनी शान-शौकत से प्रभावित करना चाहती है। निर्मला का पति भी दिखावे और प्रदर्शन को ही अपने जीवन का वास्तविक आधार मानता है। अपनी आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के बावजूद अपने रिश्तेदारों की नकल करते हुए वह अपने यहाँ नौकर रख लेता है। निर्मला का लड़का किशोर, नौकर को हीन दृष्टि से देखता है और बात-बात पर उसे गाली देता है। नौकर रखने का प्रदर्शन, नौकर के प्रति दिखावे का व्यवहार, नौकर पर रोब डालना, नौकर से जी-तोड़ काम लेना, उसको बात-बात पर पीटना-गाली देना आदि क्रिया-कलाप मध्यमवर्गीय परिवारों; जो कि समाज का सबसे बड़ा तबका है; की शोषक मानसिकता को उजागर करते हैं और समाज के शोषक चरित्र पर प्रकाश डालते हैं।

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