UP Board Solutions for Class 11 Sociology Understanding Society Chapter 5 Indian Sociologists

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sociology
Chapter Chapter 5
Chapter Name Indian Sociologists
Number of Questions Solved 57
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Understanding Society Chapter 5 Indian Sociologists (भारतीय समाजशास्त्री)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अनन्तकृष्ण अय्यर तथा शरतचंद्र रॉय ने सामाजिक मानवविज्ञान के अध्ययन का अभ्यास कैसे किया?
उत्तर
एल० के० अनन्तकृष्ण अय्यर (1861-1937 ई०) तथा शरदचंद्र रॉय (1871-1942 ई०) को भारत के अग्रणी विद्वानों में माना जाता है जिन्होंने समाजशास्त्रीय प्रश्नों को आकार प्रदान किया। उन्होंने एक ऐसे विषय पर कार्य करना प्रारंभ किया जो भारत में न तो अभी तक विद्यमान था और न ही कोई ऐसी संस्था थी जो इसे किसी विशेष प्रकार का संरक्षण देती। अय्यर ने अपने व्यवसाय की शुरुआत एक क्लर्क के रूप में की; फिर स्कूली शिक्षक और उसके बाद कोचीन रजवाड़े के महाविद्यालय में शिक्षक के रूप में नियुक्त हुए।

यह रजवाड़ा आज केरल राज्य का एक भाग है। 1902 ई० में कोचीन के दीवान द्वारा उन्हें राज्य के नृजातीय सर्वेक्षण में सहायता के लिए कहा गया। ब्रिटिश सरकार इसी प्रकार के सर्वेक्षण सभी रजवाड़ों तथा अन्य इलाकों में कराना चाहती थी जो प्रत्यक्ष रूप से उनके नियंत्रण में आते थे। अय्यर ने यह कार्य पूर्णरूपेण एक स्वयंसेवी के रूप में अवैतनिक सुपरिंटेंडेंट के रूप में संपन्न किया। उनके इस कार्य की काफी सराहना की गई तथा तत्पश्चात् उन्हें मैसूर रजवाड़े के इसी प्रकार के सर्वेक्षण हेतु नियुक्त किया गया। इन सर्वेक्षणों से वे राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान् बन गए।

कानूनविद् शरत्चंद्र रॉय भी अग्रणी समाज-वैज्ञानिक माने जाते हैं। उन्होंने कुछ अवधि तक कानून की प्रैक्टिस करने के पश्चात् 1898 ई० में राँची के एक ईसाई मिशनरी विद्यालय में अंग्रेजी के शिक्षक के रूप में कार्यभार सँभाला। कुछ वर्षों पश्चात् उन्होंने पुनः राँची की अदालत में कानून की प्रैक्टिस प्रारंभ कर दी। 44 वर्ष राँची में निवास के दौरान उन्होंने छोटा-नागपुर प्रदेश (आज को झारखंड) में रहने वाली जनजातियों की संस्कृति तथा समाज का अध्ययन किया तथा वे इसके विशेषज्ञ बन गए। रॉय की रुचि जनजातीय समाज में, अदालत में दुभाषिए के रूप में उनकी नियुक्ति के कारण भी हुई। अदालत में वे जनजातियों की परंपरा तथा कानूनों को दुभाषित करते थे। उन्होंने जनजातीय क्षेत्रों का व्यापक भ्रमण किया तथा जनजातियों को गहराई से समझने का प्रयास किया। उन्होंने ओराँव, मुंडा तथा खरिया जनजातियों पर भी काफी कुछ लिखा तथा रॉय भारत तथा ब्रिटेन के छोटा-नागपुर के मानवविज्ञानी विशेषज्ञ माने जाने लगे।

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प्रश्न 2.
जनजातीय समुदायों को कैसे जोड़ा जाए’-इस विवाद के दोनों पक्षों के क्या तर्क थे?
उत्तर
1930 एवं 1940 के दशकों में भारत में इस विषय पर वाद-विवाद प्रारंभ हुआ कि भारत में जनजातीय समाज का क्या स्थान हो और राज्य उनसे किस प्रकार का व्यवहार करे। एक तरफ अंग्रेज प्रशासक एवं मानव-वैज्ञानिक थे जिनका मत था कि जनजातियों को संरक्षण देने में राज्य को आगे आना चाहिए ताकि वे अपनी जीवन-पद्धति तथा संस्कृति को बनाए रख सकें। ऐसे विचारकों को यह तर्क था कि यदि सीधे-सादे जनजातीय लोग हिंदू समाज तथा संस्कृति की मुख्य धारा में सम्मिलित हो जाएँगे तो उनका न केवल सांस्कृतिक रूप से पतन होगा, अपितु वे शोषण से भी नहीं बच पाएँगे। इसलिए ऐसे विचारक जनजातियों को अलग-थलग रखने के पक्ष में थे ताकि उन्हें अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने का अवसर मिलता रहे।

जनजातियों को अलग-थलग रखने के विरुद्ध दूसरी तरफ ऐसे राष्ट्रवादी भारतीय भी थे जिनका यह मत था कि जनजातियों के पिछड़ेपन को आदिम संस्कृति के संग्रहालय’ के रूप में ही बनाए नहीं रखा जाना चाहिए। घूर्ये राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक थे तथा उन्होंने जनजातियों को ‘पिछड़े हिंदू समूह’ के रूप में पहचाने जाने पर बल दिया। उन्होंने अनेक ऐसे साक्ष्य भी दिए जिनसे यह प्रमाणित होता था कि वे लंबे समय तक हिंदुत्व से आपसी अंत:क्रिया द्वारा जुड़े हुए थे। घूयें जैसे राष्ट्रवादी विचारकों का मत था कि जनजातियों को राष्ट्रीय विचारधारा में सम्मिलित किया जाना चाहिए। ऐसा करने में होने वाले दुष्परिणाम मात्र जनजातीय संस्कृति तक ही सीमित न होकर भारतीय समाज के सभी पिछड़े तथा दलित वर्गों में समान रूप से देखे जा सकते हैं। विकास के मार्ग में आने वाली ये वे आवश्यक कठिनाइयाँ हैं जिनसे बचा नहीं जा सकता।

प्रश्न 3.
भारत में प्रजाति तथा जाति के संबंधों पर हरबर्ट रिजले तथा जी०एस० घूर्ये की स्थिति की रूपरेखा दें।
उत्तर
ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारी हरबर्ट रिजले मानवविज्ञान के मामलों में अत्यधिक रुचि रखते थे। उन्होंने प्रजातियों का विभाजन उनकी विशिष्ट शारीरिक विशेषताओं के आधार पर किया। उनके अनुसार भारत विभिन्न प्रजातियों के उविकास के अध्ययन की एक विशिष्ट प्रयोगशाला’ था तथा काफी लम्बे समय तक इन प्रजातियों में परस्पर विवाह सम्भव नहीं था क्योकि प्रत्येक प्रजाति अंतर्विवाह पर बल देती थी। जैसे-जैसे विवाह संबंधी यह नियम शिथिल हुआ, वैसे-वैसे विभिन्न प्रजातियों में विवाह होने लगे तथा जाति प्रथा की उत्पत्ति इसी का परिणाम है। अन्य शब्दों में यह कहा जा सकता है कि रिजले के अनुसार जाति व्यवस्था की उत्पत्ति प्रजातीय कारकों में निहित है। उन्होंने अपने मत की पुष्टि में यह तर्क दिया कि उच्च जातियाँ आर्य प्रजाति की विशिष्टताओं से मिलती हैं, जबकि निम्न जातियों में मंगोल तथा अन्य प्रजातियों के गुण देखे जा सकते हैं।

भारत में जी०एस० घुर्ये को जाति तथा प्रजाति का अध्ययन करने वाला प्रमुख विद्वान् माना जाता है। 1932 ई० में प्रकाशित उनकी पुस्तक कास्ट एण्ड रेस इन इंडिया’ इस विषय पर लिखी गई एक आधिकारिक पुस्तक मानी जाती है। इस पुस्तक में उन्होंने जाति तथा प्रजाति के संबंधो पर प्रचलित सिद्धांतों की विस्तारपूर्वक आलोचना की। घूर्ये; रिजले के इन विचारों को अंशत: सत्य मानते थे तथा इसलिए उनसे पूरी तरह से सहमत नहीं थे। उनका मत था कि रिजले द्वारा उच्च जातियों को आर्य तथा निम्न जातियों को अनार्य बताया जाना केवल उत्तरी भारत के लिए ही सही है। भारत के अन्य भागों में विभिन्न प्रजातीय समूहों को आपस में काफी लंबे समय से मेल-मिलाप था। अतः प्रजातीय शुद्धता केवल उत्तर भारत में ही बसी हुई थी क्योंकि वहाँ अंतर्विवाह निषिद्ध था। शेष भारत में अपनी ही जाति या समूह में विवाह करने का प्रचलन उन वर्गों में हुआ जो प्रजातीय स्तर पर वैसे ही भिन्न थे।

प्रश्न 4.
जाति की सामाजिक मानवशास्त्रीय परिभाषा को सारांश में बताएँ।
उत्तर
जाति की कुछ परिभाषाएँ ऐसी हैं जो जाति के साथ-साथ जनजाति पर भी लागू होती हैं। इन परिभाषाओं को ही जाति की सामाजिक मानवशास्त्रीय परिभाषा कहते हैं। उदाहरणार्थ-रिजले ने अपनी पुस्तक ‘दि पीपुल ऑफ इंडिया’ में जाति को इन शब्दों में परिभाषित किया है, “यह परिवार या कई परिवारों का संकलन है जिसको एक सामान्य नाम दिया गया है, जो किसी काल्पनिक पुरुष या देवता से अपनी उत्पत्ति मानता है तथा पैतृक व्यवसाय को स्वीकार करता है और जो लोग विचार कर सकते हैं उन लोगों के लिए एक सजातीय समूह के रूप में स्पष्ट होता है। यह एक ऐसी परिभाषा है। जो दी तो गई है जाति के संदर्भ में, परंतु जनजाति पर भी लागू होती है। जनजाति भी अनेक परिवारों का एक समूह है जिसका एक विशिष्ट नाम होता है। जनजाति के लोग भी अपनी उत्पत्ति किसी देवी-देवता से मानते हैं, निश्चित व्यवसाय करते हैं तथा सजातीय समूह का निर्माण करते हैं।

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प्रश्न 5.
‘जीवंत परंपरा से डी०पी० मुकर्जी का क्या तात्पर्य है? भारतीय समाजशास्त्रियों ने अपनी परंपरा से जुड़े रहने पर बल क्यों दिया?
उत्तर
डी०पी० मुकर्जी समाजशास्त्र के लखनऊ संपद्राय के जाने-पहचाने विद्वान रहे हैं जो शिक्षण के अतिरिक्त बौद्धिक तथा जनजीवन में भी अपने समय के सर्वाधिक प्रभावशाली विद्वान थे। मुकर्जी का मानना था कि भारत की सामाजिक व्यवस्था ही उसका निर्णायक एवं विशिष्ट लक्षण है तथा इसीलिए प्रत्येक सामाजिक विज्ञान के लिए यह आवश्यक है कि वह इस संदर्भ में इससे जुड़ा हो। भारतीय संदर्भ में सामाजिक व्यवस्था का निर्णायक पक्ष इसका सामाजिक पक्ष है क्योंकि इतिहास, राजनीति तथा अर्थशास्त्र पश्चिम की तुलना में भारत में कम विकसित थे।

‘जीवंत परंपरा से अभिप्राय उस परंपरा से है जो भूतकाल तक ही सीमित नहीं है, अपितु परिवर्तन की संवेदनशीलता से भी जुड़ हुई है। अर्थात् यह वह परंपरा है जो भूतकाल से कुछ ग्रहण कर उससे संबंध बनाए रखने के साथ-साथ नई चीजों को भी ग्रहण करती है। अतः जीवंत परंपरा पुराने तथा नए तत्त्वों का मिश्रण है। भारतीय सामाजिक परंपराएँ जीवंत परंपराएँ हैं जिन्होंने अपने आप को भूतकाल से जोड़ने के साथ-ही-साथ वर्तमान के अनुरूप ढाला है और इस प्रकार समय के साथ अपने आप को विकसित कर रही हैं।

भारतीय परंपराओं में श्रुति, स्मृति तथा अनुभव नामक परिवर्तन के तीन सिद्धांत निहित हैं। इसलिए मुकर्जी ने सभी भारतीय समाजशास्त्रियों के लिए जीवंत परंपराओं का अध्ययन आवश्यक माना है। उनका मत था कि भारतीय समाजशास्त्री के लिए केवल समाजशास्त्री होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसकी प्रथम आवश्यकता भारतीय होना है। इस नाते उसके लिए लोकरीतियों, रूढ़ियों, प्रथाओं तथा परंपराओं से जुड़कर ही सामाजिक व्यवस्था के अंदर तथा उसके आगे की वास्तविकता को समझना जरूरी है। मुकर्जी का मानना था कि समाजशास्त्रियों में भाषा को सीखने तथा भाषा की उच्चता-निम्नता और संस्कृति की पहचान करने की क्षमता होनी चाहिए।

प्रश्न 6.
भारतीय संस्कृति तथा समाज की क्या विशिष्टताएँ हैं तथा ये बदलाव के ढाँचे को कैसे प्रभावित करते हैं?
उत्तर
भारतीय संस्कृति तथा समाज का एक लंबा इतिहास है। इसे बनाए रखने में इसकी संरचनात्मक विशिष्टताओं एवं प्रमुख परपंराओं का विशेष योगदान रहा है। प्राचीनता, स्थायित्व, सहिष्णुता, अनुकूलनशीलता, सर्वांगीणता, ग्रहणशीलता एवं आशावादी प्रकृति भारतीय संस्कृति तथा समाज की प्रमुख विशिष्टताएँ हैं। हजारों वर्षों में हुए परिवर्तन के बावजूद ये विशिष्टताएँ यथावत् बनी। हुई हैं। विभिन्न विद्वानों ने भारतीय संस्कृति तथा समाज की अलग-अलग विशिष्टताओं का उल्लेख किया हैं एम०एन० श्रीनिवास ने सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता पर बल दिया है तो ड्युमो ने श्रेणीबद्धता को प्रमुख माना है। योगेन्द्र सिंह ने श्रेणीबद्धता, समग्रवाद, निरंतरता तथा लोकातीतत्व को प्रमुख माना है।

मैंडलबानी ने भारतीय संस्कृति तथा समाज को समझने के लिए दो संकल्पनाओं को। इसकी कुंजी के समान माना है- जाति तथा धर्म। जाति तथा धर्म ने परिवर्तनों के बावजूद न केवल । अपने स्वरूप को बनाए रखा है, अपितु नवीन गुण भी ग्रहण किए हैं। इसी को डी०पी० मुकर्जी ने ‘जीवंत परंपरा’कहा है। भारतीय संस्कृति तथा समाज की विशिष्टताएँ समय के साथ-साथ परिवर्तन की संवेदनशीलता से जुड़ी रही हैं। इसीलिए भारतीय समाज की सभी संरचनात्मक विशिष्टताएँ आज भी किसी-न-किसी रूप में विद्यमान हैं।

प्रश्न 7.
कल्याणकारी राज्य क्या है? ए० आर० देसाई कुछ देशों द्वारा किए गए दावों की आलोचना क्यों करते हैं?
उत्तर
ए० आर० देसाई ने ‘दि मिथ ऑफ दि वेलफेयर स्टेट’ नामक लेख में कल्याणकारी राज्य की विसतृत विवेचना की है। कल्याणकारी राज्य जनता के कल्याण के लिए नीतियों को बनाता तथा लागू करता है। ऐसा राज्य गरीबी, सामाजिक भेदभाव से मुक्ति तथा अपने सभी नागरिकों की सुरक्षा का ध्यान रखता है तथा असमानताओं को दूर करने के लिए तथा सबके लिए रोजगार उपलब्ध कराने हेतु हर संभव कदम उठाता है। देसाई ने कल्याणकारी राज्य की निम्नलिखित तीन प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख किया है –

  1. कल्याणकारी राज्य सकारात्मक राज्य होता है अर्थात् वह कानून एवं व्यवस्था को बनाए रखने के न्यूनतम कार्य ही नहीं करता, अपितु हस्तक्षेपीय राज्य होने के नाते समाज की बेहतरी के लिए सामाजिक नीतियों को तैयार करने तथा लागू करने हेतु भी अपनी शक्तियों का प्रयोग करता है।
  2. कल्याणकारी राज्य लोकतांत्रिक राज्य होता है। बहुदलीय चुनाव इस प्रकार के राज्य की पारिभाषिक विशेषता है। इसी दृष्टि से समाजवादी तथा साम्यवादी राज्यों से भिन्न है।
  3. कल्याणकारी राज्य ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ वाला राज्य होता है अर्थात् ऐसे राज्य की अर्थव्यवस्था में निजी पूँजीवादी कंपनियाँ तथा सार्वजनिक कंपनियों दोनों एक साथ कार्य करती हैं। एक कल्याणकारी राज्य न तो पूँजीवादी बाजार को ही खत्म करना चाहता है और न ही यह उद्योगों तथा दूसरे क्षेत्रों में जनता को निवेश करने से रोकता है। यह जरूरत की वस्तुओं और सामाजिक अधिसंरचना पर ध्यान केंद्रित करता है, जबकि उपभोक्ता वस्तुओं पर निजी उद्योगों का वर्चस्व होता है।

ए०आर० देसाई कल्याणकारी राज्य के द्वारा दिए गए दावों की आलोचना करते हैं। उनका मत है कि ब्रिटेन, अमेरिका तथा यूरोप के अधिकांश राज्य अपने आप को कल्याणकारी राज्य कहते हैं परंतु वे अपने नागरिकों को निम्नतम आर्थिक तथा सामाजिक सुरक्षा देने में असफल रहे हैं। वे आर्थिक असमानताओं को कम करने में भी विफल रहे हैं। तथाकथित कल्याणकारी राज्य बाजार के उतार-चढ़ाव से मुक्त स्थायी विकास करने में भी असफल रहे हैं। अतिरिक्त धन की उपस्थिति तथा अत्यधिक बेरोजगारी इसकी कुछ अन्य असफलताएँ हैं। अपने इन तक के आधार पर देसाई ने यह निष्कर्ष निकाला कि कल्याणकारी राज्य द्वारा मानव कल्याण हेतु किए जाने वाले दावे खोखले हैं तथा कल्याणकारी राज्य की सोच एक भ्रम है।

प्रश्न 8.
समाजशास्त्रीय शोध के लिए गाँव को एक विषय के रूप में लेने पर एम०एन० श्रीनिवास तथा लुईस ड्यूमो ने इसके पक्ष तथा विपक्ष में क्या तर्क दिए हैं?
उत्तर
एम०एन० श्रीनिवास ने अपने पूरे जीवन भर गाँव तथा ग्रामीण समाज के विश्लेषण में अत्यंत रुचि ली। उन्होंने गाँव में किए गए क्षेत्रीय कार्यों का नृजातीय विवरण तथा इस पर परिचर्चा देने के साथ-साथ भारतीय गाँव को सामाजिक विश्लेषण की एक इकाई के रूप में भी स्वीकार किया। उनका मत था कि गाँव एक आवश्यक सामाजिक पहचान है तथा ऐतिहासिक साक्ष्य इस एकीकृत पहचान की पुष्टि करते हैं। श्रीनिवास ने यह दर्शाया कि गाँव में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं तथा गाँव कभी भी आत्म-निर्भर नहीं थे। वे विभिन्न प्रकार के आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक संबंधों से क्षेत्रीय स्तर पर जुड़े हुए थे। इसीलिए उन्होंने उन सभी ब्रिटिश प्रशासकों तथा सामाजिक मानववैज्ञानिकों की आलोचना की है जिन्होंने भारतीय गाँव का स्थिर, आत्म-निर्भर तथा लघु गणतंत्र के रूप में चित्रण किया।

लुईस ड्यूमो गाँव के अध्ययन के पक्ष में नहीं थे। उनका मत था कि जाति जैसी सामाजिक संस्थाएँ गाँव की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण थीं क्योंकि गाँव केवल कुछ लोगों का विशेष स्थान पर निवास करने वाला समूह मात्र था। गाँव बने रह सकते हैं या समाप्त हो सकते हैं और लोग एक गाँव को छोड़ दूसरे गाँव को जा सकते हैं, लेकिन उनकी जाति अथवा धर्म जैसी सामाजिक संस्थाएँ सदैव उनके साथ रहती हैं जहाँ वे जाते हैं वहीं सक्रिय हो जाती हैं। इसीलिए ड्यूमो का मत था कि गाँव को एक श्रेणी के रूप में महत्त्व देना गुमराह करने वाला हो सकता है।

प्रश्न 9.
भारतीय समाजशास्त्र के इतिहास में ग्रामीण अध्ययन का क्या महत्त्व है। ग्रामीण अध्ययन को आगे बढ़ाने में एम०एन० श्रीनिवास की क्या भूमिका रही है?
उत्तर
भारतीय समाजशास्त्र के इतिहास में ग्रामीण अध्ययनों का विशेष महत्त्व है। वस्तुत: भारत में समाजशास्त्र का विकास ही ग्रामीण अध्ययनों से हुआ है। ग्रामीण अध्ययनों के महत्त्व के संबंध में एआर० देसाई का कहना है-“स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात् ग्रामीण सामाजिक संगठन, संरचना, प्रकार्य तथा उविकास का क्रमबद्ध अध्ययन जरूरी ही नहीं अत्यंत जरूरी हो गया है। ग्रामीण पुनर्निर्माण भारतीय सरकार की प्रमुख उद्देश्य रहा है ताकि ग्रामीण समाज से संबंधित समस्याओं का समाधान करके एक शोषण रहित धर्मनिरपेक्ष समाजवादी राज्य बनाया जाए। भारत में ग्रामीण समाजशास्त्र इसलिए आवश्यक तथा महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारत की दो-तिहाई से अधिक जनसंख्या गाँव में ही रहती है।

ए०आर० देसाई ने भारत में ग्रामीण समाज की आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक संरचना आदि के अध्ययन को अति आवश्यक बताते हुए इसके निम्नलिखित तीन कारणों का उल्लेख किया है –

  1. भारत एक कृषि प्रधान देश है। इसके लंबे इतिहास, जटिल सामाजिक संगठन, धार्मिक जीवन, सांस्कृतिक प्रतिमान इत्यादि को अगर सही रूप में समझना है तो ग्रामीण भारत का अध्ययन करना जरूरी है।
  2. भारतीय ग्रामीण समाज भी आधुनिक युग के नवीन विचारों से पूरी तरह प्रभावित है इसलिए अगर विभिन्न सांस्कृतिक स्तरों, जादू-टोने से लेकर तार्किक दृष्टिकोण तक, से अध्ययन करना है तो ग्रामीण समाज को समझना जरूरी है।
  3. अंग्रेजी राज में भारत की ग्रामीण सामाजिक-आर्थिक संरचना में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए जिनके परिणामस्वरूप गाँवों की आत्म-निर्भरता समाप्त हो गई। जजमानी व्यवस्था, संयुक्त परिवार, जाति व्यवस्था इत्यादि में परिवर्तन के कारण एक तरह से असंतुलन-सा पैदा हो गया है। ग्रामीण पुनर्निर्माण करने के लिए भारतीय गाँवों का पर्याप्त ज्ञान होना जरूरी है तथा ग्रामीण समाजशास्त्र इसमें सहायक हो सकता है।

भारत में ग्रामीण अध्ययनों को आगे बढ़ाने में एम०एन श्रीनिवास की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने ग्रामीण अध्ययनों में न केवल नृजातीय शोधकार्य की पद्धति के महत्त्व एवं सार्थकता से अवगत कराया, अपितु भारतीय गाँवों में होने वाले तीव्र सामाजिक परिवर्तन का भी विश्लेषण किया। इस प्रकार के अध्ययन भारतीय नीति-निर्माताओं के लिए काफी उपयोगी सिद्ध हुए। इस प्रकार, ग्रामीण अध्ययनों ने समाजशास्त्र जैसे विषय को स्वतंत्र राज्य के परिप्रेक्ष्य में एक नई भूमिका प्रदान की।

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क्रियाकलाप आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जनजातीय आंदोलन जैसे कितने और संघर्षों के बारे में आप जानते हैं? पता लगाइए कि इन संघर्षों के पीछे कौन-से मुद्दे थे? आप और आपके सहपाठी इन समस्याओं के बारे में ” क्या सोचते हैं? (क्रियाकलाप 1)
उत्तर
भारत में जनजातीय आंदोलनों के अतिरिक्त अनेक समाज-सुधार आंदोलन भी हुए हैं जिनका उद्देश्य समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर कर उनसे प्रभावित वर्गों का उत्थान करना रहा है। ऐसे आंदोलन मुख्य रूप से निम्न जातियों (पूर्व में अस्पृश्य जातियाँ) तथा महिलाओं पर अधिक केंद्रित रहे. हैं। अधिकतर जनजातीय आंदोलन अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक तथा राजनीतिक पहचान पर बल देते हैं। वास्तव में, झारखंड तथा छत्तीसगढ़ राज्यों का निर्माण इसी प्रकार के आंदोलनों का फल है। विकास के नाम पर बड़े-बड़े बाँधों, खदानों एवं फैक्टरियों के निर्माण के कारण जनजातीय वर्गों पर एक असमान दबाव पड़ता है जिससे विस्थापन जैसी गंभीर समस्या विकसित होने लगती है। भारत में पिछले पचास से अधिक वर्षों में 3,300 बड़े बाँध बनाए गए हैं जिनके परिणामस्वरूप लगभग 21 से 33 मिलियन लोग विस्थापित हुए हैं।

जनजातीय एवं दलित वर्गों की स्थिति विस्थापितों में और भी दयनीय है तथा 40-50 प्रतिशत विस्थापित लोग जनजातीय समुदायों के ही हैं। घूर्ये ने जनजातियों को ‘पिछड़े हिंदू समूह’ कहा तथा उन्हें भारत की. मुख्य धारा की संस्कृति में सम्मिलित करने पर बल दिया। ऐसा करने पर जनजातियों में होने वाले आंदोलनों एवं संघर्षों के वैसे ही परिणामों की बात कही जैसे कि अन्य पिछड़े वर्गों में रहे हैं। अस्पृश्यता समाप्त करने हेतु किए गए समाज-सुधार आंदोलनों के पीछे भी इस अमानवीय कुप्रथा को समाप्त कर अस्पृश्यों के स्तों को ऊँचा करना रहा है। इसी भाँति बाल विवाह, सती प्रथा, नरबलि जैसी कुप्रथाओं को लेकर हुए आंदोलनों का लक्ष्य महिलाओं की स्थिति में सुधार करना था। महिला स्वतंत्रता जैसे आंदोलनों के पीछे महिलाओं को समान अधिकार देने जैसा मुद्दा प्रमुख रहा है।

प्रश्न 2.
जीवंत परंपरा से क्या तात्पर्य है? (क्रियाकलाप 2)
उत्तर
डी०पी० मुकर्जी के अनुसार जीवंत परंपरा से तात्पर्य उस परंपरा से है जो भूतकाल से कुछ ग्रहण कर एक ओर उससे अपने संबंध बनाए रखती है तो दूसरी ओर नई चीजों को भी ग्रहण करती है। अत: एक जीवंत परंपरा पुराने तथा नए तत्त्वों का मिश्रण है। जीवंत परंपरा के उदाहरण हमउम्र के बच्चों द्वारा खेले जाने वाले खेलों, पुरुषों एवं स्त्रियों द्वारा पहने जाने वाले पहनावों, जाति एवं धर्म जैसी संस्थाओं में स्पष्ट रूप में देखे जा सकते हैं। आज से 50-60 वर्ष (लगभग दो पीढ़ी) पहले हमउम्र के बच्चे अपने परिवार में ही खेलते थे क्योंकि परिवार में बच्चों की संख्या अधिक होती थी तथा परिवार ही मनोरंजन का एक साधन होता था। आज से 25-30 वर्ष पहले हमउम्र के बच्चे पड़ोसी बच्चों के साथ खेलते थे परंतु इस बात का ध्यान रखा जाता था कि लड़कों के साथ लड़के ही खेलें तथा लड़कियों के साथ लड़कियाँ ही खेलें। आज खेलों में इस प्रकार के प्रतिबंध शिथिल हो गए हैं। न केवल खेल के रूप बदल गए हैं, अपितु लिंग जैसे निषेध समाप्त हो गए हैं। बहुत-से-बच्चों ने अपने मनोरंजन का साधन टेलीविजन के प्रोग्राम अथवा कंप्यूटर गेम्स को बना लिया है जिसमें उन्हें हमउम्र साथियों की आवश्यकता ही नहीं रहती।

जाति जैसी संस्था जीवंत परंपरा का प्रमुख उदाहरण है। आज की जाति व्यवस्था तथा आज से 50 वर्ष पूर्व की जाति व्यवस्था में काफी अंतर है। खान-पान एवं सामाजिक सहवास पर आधारित जातीय निषेध समाप्त हो चुके हैं। अंतर्जातीय विवाह होने लगे हैं तथा जाति का अपने परंपरागत व्यवसाय से संबंध काफी सीमा तक टूट गया है। यद्यपि जाति की अधिकांश विशेषताएँ बदल गई हैं, तथापि जाति आज भी एक नए रूप में हमारे सामने है। जाति ने अपने इस रूप को बनाए रखने के लिए राजनीति जैसे आधुनिक पहलुओं को अपना लिया है। राजनीति में आगे आने तथा सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने अथवा इसे बढ़ाने हेतु जातीय एकता तथा समान स्तर की जातियों में एकीकरण की भावना का विकास हुआ है।

प्रश्न 3.
कल्याणकारी राज्यों ने अपने नागरिकों के लिए जो किया उससे अधिक करना चाहिए अथवा राज्य को अपनी भूमिकाओं को निरंतर कम करके इन्हें स्वतंत्र बाजार के हवाले कर देना चाहिए। इस दृष्टिकोण पर चर्चा कीजिए और दोनों पक्षों को ध्यानपूर्वक सुनिए। (क्रियाकलाप 3)
उत्तर
कल्याणकारी राज्यों ने अपने नागरिकों के लिए जो किया है उससे अधिक करना चाहिए अथवा राज्य को अपनी भूमिकाओं को निरंतर कम करके इन्हें स्वतंत्र बाजार के हवाले कर देना चाहिए। यह एक विवादास्पद मुद्दा है। ए०आर० देसाई जैसे मार्क्सवादी विद्वानों एवं राष्ट्रवादियों द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि कल्याणकारी राज्य लोगों के कल्याण के जो दावे करता है वे खोखले हैं। अमेरिका तथा यूरोप के राज्य, जो अपने आप को तथाकथित कल्याणकारी राज्य कहते हैं, अपने । नागरिकों को न केवल निम्नतम आर्थिक तथा सामाजिक सुरक्षा देने में असफल रहे हैं, अपितु वे आर्थिक असमानताओं को कम करने में भी विफल रहे हैं। वे धन के असमान वितरण तथा अत्यधिक बेरोजगारी रोकने में भी असफल रहे हैं। अत: कल्याणकारी राज्यों को इन सभी कार्यों को भी करना चाहिए तथा वास्तव में कल्याणकारी होने का प्रयास करना चाहिए।

दूसरी ओर, अनेक विद्वान ऐसे हैं जो राज्य के कार्यों को सीमित करने के पक्ष में हैं। उनका तर्क है कि राज्य को केवल कानून बनाने तथा इसे लागू करने पर ही अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि समाज में शांति बनी रहे एवं कानून का शासन स्थापित हो सके। बाकी सभी कार्य राज्य को या तो स्वतंत्र बाजार के हवाले कर देने चाहिए अथवा अन्य संस्थाओं को स्थानांतरित कर देने चाहिए। राज्य से उन सब कल्याणकारी कार्यों की आशा नहीं की जा सकती जो वह कर ही नहीं सकता। इसलिए कल्याणकारी राज्य निर्धनता, बेरोजगारी, सामाजिक भेदभाव, नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करने, पूँजीवादियों की अधिक लाभ कमाने की प्रवृत्ति, श्रमिकों के शोषण आदि समस्याओं का समाधान नहीं कर पाए हैं।

प्रश्न 4.
क्या राज्य पहले की अपेक्षा आज अधिक कार्य कर रहा है या कम? आपको क्या लगता है-यदि राज्य इन कार्यों को करना बंद कर दे तो क्या होगा? (क्रियाकलाप 3)
उत्तर
आज राज्य पहले की अपेक्षा कहीं अधिक कार्य कर रहा है। कानून व्यवस्था बनाए रखने के अतिरिक्त राज्य बाजारी शक्तियों को नियंत्रित एवं नियमित करने तथा सामाजिक समस्याओं के समाधान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। राज्य के कार्यों में निरंतर वृद्धि हुई है। इसका प्रमुख कारण राज्य पर कमजोर वर्गों के हितों को संरक्षण देकर उनका सामाजिक-आर्थिक उत्थान रहा है। साथ ही, परिवर्तन के परिणामस्वरूप जिन संस्थाओं में विकृतियाँ आ गई हैं उन्हें दूर करने हेतु सामाजिक अधिनियम बनाना भी राज्य का कार्य समझा जाने लगा है। यदि राज्य इन सभी कार्यों को करना बंद कर देगा तो अमीर और गरीब में अंतराल अत्यधिक बढ़ने लगेगा तथा समाज के कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा नहीं हो पाएगी। उनका शोषण बढ़ जाएगा तथा जीवनयापन अत्यंत कठिन हो जाएगा। यदि हम अपने पड़ोस में राज्य द्वारा दी गई सुविधाओं एवं सेवाओं की एक सूची बनाएँ तो यह पहले राज्य द्वारा किए जाने वाले कार्यों से अधिक लंबी होगी।

उदाहरणार्थ- इस सूची को विद्यालय से ही प्रारंभ किया जा सकता है। पहले जो विद्यालय थे उनमें निम्न जातियों के बच्चों को प्रवेश नहीं दिया जाता था। अधिक फीस होने के कारण केवल अमीर परिवारों के बच्चे ही शिक्षा ग्रहण कर सकते थे। अब यदि कोई विद्यालय ऐसा करता है तो उसकी न केवल सरकारी सहायता बंद कर दी जाती है, अपितु इस कार्य हेतु उसे बंद भी किया जा सकता है। स्कूलों में भवन का निर्माण सरकारी धन से होता है, प्राध्यापकों एवं अन्य कर्मचारियों का वेतन सरकार देती है, बच्चों से बहुत कम फीस ली जाती है, अनुसूचित जाति/जनजाति के बच्चों को छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है, यदि बुक बैंक योजना है तो छात्र-छात्राओं को पुस्तकें भी उपलब्ध कराई जाती हैं तथा कमजोर वर्गों के छात्रों के लिए मुफ्त में अतिरिक्त कक्षाओं का प्रबंध किया जाता है।

यदि किसी विद्यालय में अनुसूचित जाति/जनजाति हेतु ‘आरक्षित स्थानों का पालन नहीं किया जाता तो उस विद्यालय के विरुद्ध कठोर शासकीय कार्यवाही की जा सकती है। इसी भाँति, यदि हम अपने पड़ोस में सरकार द्वारा किए जाने वाले कार्यों की सूची बनाएँ तो यह पहले की तुलना में काफी लंबी होगी। गलियों में प्रकाश की व्यवस्था, घरों में बिजली-पानी उपलब्ध कराने की व्यवस्था, गंदगी की निकासी हेतु सीवर की व्यवस्था, बच्चों के खेल एवं मनोरंजन के लिए-पार्को की व्यवस्था, समय-समय पर टूटी सड़कों एवं गलियों की मरम्मत करने या उन्हें फिर से नया बनाने की व्यवस्था राज्य द्वारा ही की जाती है। इतना अवश्य है कि सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली सुविधाओं से सभी लोग कभी भी संतुष्ट नहीं होते हैं। कुछ लोग इन्हें अपर्याप्त मानकर सरकार एवं संबंधित सरकारी विभाग की आलोचना भी करते रहते हैं। हो सकता है कि कार्य समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण उनकी आशा के अनुकूल न हो रहा हो।

प्रश्न 5.
मान लीजिए कि आपका कोई मित्र दूसरे ग्रह अथवा सभ्यता का है और पहली बार पृथ्वी पर आया है और उसने कभी गाँव के बारे में नहीं सुना है। आप उन्हें ऐसे कौन-से पाँच सुराग देंगे ताकि वे कभी गाँव को देखें तो उसे पहचान सकें। (क्रियाकलाप 4)
उत्तर
यदि हम अपनी कक्षा में चार-पाँच छात्रों के छोटे समूह बनाकर उन सुरागों की पहचान करने का प्रयास करें जो गाँव के लिए जरूरी होते हैं तो निश्चित रूप से कुछ ऐसे सुराग सामने आ सकते हैं। इन सुरागों में लोगों का मुख्य रूप से कृषि व्यवसाय करना, संयुक्त अथवा विस्तृत परिवारों में रहना, भू-क्षेत्र की दृष्टि से जनसंख्या का सीमित आकार होना, प्रकृति से प्रत्यक्ष संबंध होना तथा सदस्यों की जीवन-पद्धति, विचारधारा एवं रहन-सहन में सजातीयता होना प्रमुख रूप से उभरकर सामने आएँगे। लोगों का रूढ़िवादी होना या धार्मिक मान्यताओं को अधिक महत्त्व देनी अथवा आवास का अनियमित रूप से होने जैसे सुराग भी सामने आ सकते हैं। यदि कोई मित्र दूसरे ग्रह अथवा सभ्यता का है और पहली बार पृथ्वी पर आया है तो वह गाँव में जाकर सरलता से इन सुरागों के माध्यम से इस तथ्य से । संतुष्ट हो सकता है कि वह वास्तव में गाँव में ही है। गाँव भी चूंकि अनेक प्रकार के होते हैं इसलिए उनको पहचानने के सुरागों में थोड़ा-बहुत अंतर हो सकता है।

प्रश्न 6.
टी०वी, फिल्म अथवा अखबारों में गाँव पर कितनी बार चर्चा की जाती है? (क्रियाकलाप 5)
उत्तर
टीवी, फिल्म अथवा अखबारों में पहले गाँव की बहुत चर्चा हुआ करती थी। अनेक टीवी कार्यक्रम अथवा फिल्में ग्रामीण परिवारों के इर्द-गिर्द ही निर्मित होते थे। अब अधिकांश टी०वी० कार्यक्रम एवं फिल्में नगरों में बने स्टूडियों में बनाए जाने लगे हैं जिनमें गाँव की चर्चा कम होने लगी है। इनमें नगरीय परिवारों; विशेष रूप से मध्य एवं उच्च वर्ग के परिवारों का चित्रण अधिक होने लगा है। समाचार-पत्रों में भी अधिकांश घटनाएँ नगरों में संबंधित ही प्रकाशित होती हैं। टी०वी० एवं फिल्मों की भाँति समाचार-पत्रों में भी गाँव की चर्चा कम होने लगी है।

प्रश्न 7.
क्या आपको लगता है कि नगर के लोग आज भी गाँव में रुचि रखते हैं? अगर आप नगर में रहते हैं तो क्या आपका परिवार आज भी अपने गाँव के रिश्तेदार के संपर्क में है? क्या इस प्रकार के संपर्क आपके पिता अथवा दादा की पीढ़ी में थे? (क्रियाकलाप 5)
उत्तर
अनेक नगरीय लोग आज भी गाँव में रुचि रखते हैं। इसका प्रमुख कारण अपने नजदीकी रिश्तेदारों का गाँव में होना है। यदि ऐसा परिवार रोजगार हेतु गाँव छोड़कर नगर में बसा है तो माता-पिता या भाई-बहन हो सकता है अभी गाँव में ही हों। इसलिए नगर में रहते हुए भी ऐसे परिवार गाँव के साथ निरंतर संपर्क बनाए रखते हैं। गाँव से उन्हें गेहूं एवं अन्य वस्तुएँ अपने नातेदारों से मिल जाती हैं तथा ऐसी वस्तुओं को उन्हें नगरों में लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

अधिकांश ग्रामवासी नगरों में चूँकि रोजगार हेतु ही आए हैं इसलिए उनका गाँव से संपर्क बना रहता है। दादा-दादी की पीढ़ी में भी इस प्रकार के संपर्क थे तो परंतु बहुत कम थे। उस समय नगरों में जाकर बसने की प्रवृत्ति बहुत कम थी। आवागमन के साधन भी उपलब्ध नहीं थे। अब इस प्रकार क संपर्क बढ़े हैं। परंतु नगरों में स्थायी रूप से बसने वाले परिवारों की आने वाली पीढ़ी में गाँव से संपर्क आने वाले समय में निश्चित रूप से कम हो जाएगा। वस्तुतः धीरे-धीरे नगरवासियों की व्यक्तिवाद एवं व्यावसायिक प्रतिबद्धता के कारण अपने रिश्तेदारों से गाँव में जाकर मिलने की आवृत्ति कम होती जाती है।

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प्रश्न 8.
क्या आप ऐसे किसी व्यक्ति को जानते हैं जो नगर छोड़ गाँव में जाकर बस गया हो? क्या आप ऐसे किसी व्यक्ति को जानते हैं जो वापस जाना चाहता हो? अगर हाँ, तो वे कौन-से कारण हैं जिनके लिए ये नगर छोड़ गाँव में जाकर बसना चाहते हैं? (क्रियाकलाप 5)
उत्तर
कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो रोजगार की तलाश में बिना सोचे-समझे गाँव छोड़ देते हैं। नगर में उन्हें पहले तो रोजगार मिलता ही नहीं और यदि रोजगार मिल भी जाता है तो वे इससे अपने पूरे परिवार का खर्चा नहीं उठा सकते। नगरों में मकानों के महँगे किराये हैं तथा जीवनयापन हेतु भी अधिक धन की आवश्यकता होती है। हो सकता है कि कोई व्यक्ति इन सबसे निराश होकर पुनः गाँव जाने का निर्णय ले ले। वह यह सोचकर वापस गाँव चला जाए कि इतने पैसे कमाकर तो वह गाँव में ही अपना गुजारा आसानी से कर सकता है।

उसके साथ कोई ऐसी घटना भी घटित हो सकती है जो उसे नगरीय जीवन से विमुख कर दे। पहले कभी फिल्मों में यह दिखाया जाता है था कि जब कोई हीरो गाँव से नगर पहली बार आता है तो या तो उसका सामान चोरी हो जाता है या उसकी जेब काट ली जाती है या उसे कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाता है जो उसके भोलेपन का फायदा उठाने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति वापस जाने को तैयार हो जाते हैं। अधिकांश व्यक्ति, जिन्हें नगरीय जीवन ग्रामीण जीवन से अधिक सुविधा-संपन्न लगता है, कभी भी गाँव वापस जाने के बारे में सोचते ही नहीं हैं। गाँव छोड़ने के कारणों में नगरों में बच्चों हेतु उच्च, तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा की उपलब्धता, रोजगार के अधिक अवसर, नगरीय जीवन का आकर्षण आदि प्रमुख हो सकते हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
भारत में वर्ण का परिवर्तित रूप है –
(क) आश्रम-व्यवस्था
(ख) वर्ग-व्यवस्था
(ग) जाति-प्रथा
(घ) वंशावली
उत्तर
(ग) जाति-प्रथा

प्रश्न 2.
‘संस्कृतिकरण विचारधारा से संबंधित विचारक का नाम है –
(क) चार्ल्स कुले
(ख) एन० के० दत्ता
(ग) पी० एच० प्रभु
(घ) एम० एन० श्रीनिवासन
उत्तर
(घ) एम० एन० श्रीनिवासन

प्रश्न 3.
इनमें से कौन भारतीय समाज का परिवर्तन-बोधक वक्तव्य है ?
(क) संयुक्त परिवार का आजकल विकास हो रहा है।
(ख) भारतीय समाज में जातिवाद बढ़ रहा है।
(ग) वृद्ध व्यक्तियों के प्रति आदर का भाव बढ़ रहा है।
(घ) आजकल व्यक्तिवाद घट रहा है।
उत्तर
(ख) भारतीय समाज में जातिवाद बढ़ रहा है।

प्रश्न 4.
प्रभु जाति की अवधारणा मानसिक उपज है –
(क) हट्टन की
(ख) घुरिये की
(ग) एम० एन० श्रीनिवासन की
(घ) डी० एन० मजूमदार की
उत्तर
(ग) एम० एन० श्रीनिवासन की

प्रश्न 5.
घुरिये ने जाति-व्यवस्था की कितनी विशेषताएँ बतायी हैं ?
(क) 8
(ख) 6.
(ग) 10
(घ) 4
उत्तर
(ख) 6

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से कौन-सा व्यक्ति प्रसिद्ध समाजशास्त्री है ?
(क) डी० एन० मजूमदार
(ख) आर० एस० मजूमदार
(ग) लाल बहादुर शास्त्री
(घ) कपाड़िया राधा कांत
उत्तर
(क) डी० एन० मजूमदार

प्रश्न 7.
‘भारत में जाति एवं प्रजाति नामक पुस्तक के लेखक कौन है?
(क) जी०एस० घूयें।
(ख) एम०एन० श्रीनिवास
(ग) डी०पी० मुकर्जी
(घ) एस०सी० दुबे
उत्तर
(क) जी०एस० घूयें

निश्चित उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भारत में समाजशास्त्र की औपचारिक शिक्षा किस वर्ष प्रारंभ हुई?
उत्तर
भारत में समाजशास्त्र की औपचारिक शिक्षा 1919 ई० में प्रारंभ हुई।

प्रश्न 2.
भारत में सर्वप्रथम समाजशास्त्र का प्रारंभ किस विश्वविद्यालय में हुआ?
उत्तर
भारत में सर्वप्रथम समाजशास्त्र का प्रारंभ बंबई विश्वविद्यालय में हुआ।

प्रश्न 3.
घूर्ये का जन्म कब हुआ था?
उत्तर
घूयें का जन्म 12 दिसम्बर, 1893 को महाराष्ट्र के मालवान क्षेत्र के एक सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ।

प्रश्न 4.
घूर्ये की किसी एक पुस्तक का नाम लिखिए।
उत्तर
1932 ई० में लिखी ‘कास्ट एण्ड रेस इन इंडिया’ घूयें की प्रमुख पुस्तक है।

प्रश्न 5.
‘इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसायटी की स्थापना का श्रेय किसे दिया जाता है?
उत्तर
‘इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसायटी की स्थापना का श्रेय जी०एस० घूयें को दिया जाता है।

प्रश्न 6.
घूर्ये भारत में समाजशास्त्र के किस संप्रदाय से संबंधित रहे हैं?
उत्तर
घ बंबई (मुम्बई) संप्रदाय से संबंधित प्रमुख विद्वान माने जाते हैं।

प्रश्न 7.
डी०पी० मुकर्जी का जन्म कब हुआ था?
उत्तर
डी०पी० मुकर्जी का जन्म 5 अक्टूबर, 1894 ई० को बंगाल में एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

प्रश्न 8.
ए० आर० देसाई का जन्म कब हुआ थ?
उत्तर
ए० आर० देसाई का जन्म बड़ौदा के एक सुप्रसिद्ध परिवार में 1915 ई० में हुआ था।

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प्रश्न 9.
ए० आर० देसाई की किसी एक पुस्तक का नाम लिखिए।
उत्तर
‘सोशल बैकग्राउंड ऑफ इंडियन नेशनलिज्म’ ए० आर० देसाई की सुप्रसिद्ध पुस्तक है।

प्रश्न 10.
एम० एन० श्रीनिवास का जन्म कब हुआ था?
उत्तर
एम० एन० श्रीनिवास का जन्म 16 नवम्बर, 1916 ई० को मैसूर के आयंगार ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

प्रश्न 11.
एम०एन० श्रीनिवास की किसी एक पुस्तक का नाम लिखिए।
उत्तर
‘सोशल चेंज इन मॉडर्न इंडिया’ श्रीनिवास द्वारा रचित प्रमुख पुस्तक है।

प्रश्न 12.
एम०एन० श्रीनिवास ने किस गाँव का अध्ययन किया है?
उत्तर
एम०एन० श्रीनिवास ने मैसूर के रामपुरा गाँव का अध्ययन किया है।

प्रश्न 13.
एम०एन० श्रीनिवास ने गाँव के अध्ययन में किस परिप्रेक्ष्य को अपनाया है?
उत्तर
एम०एन० श्रीनिवास ने गाँव के अध्ययन में संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक परिप्रेक्ष्य को अपनाया है।

प्रश्न 14.
संस्कृतिकरण किस विद्वान द्वारा प्रतिपादित संकल्पना है?
उत्तर
संस्कृतिकरण की संकल्पना का प्रतिपादन एम०एन० श्रीनिवास ने किया है।

प्रश्न 15.
्रभु जाति किस विद्वान द्वारा प्रतिपादित संकल्पना है?
उत्तर
प्रभु जाति की संकल्पना के प्रतिपादक एम०एन० श्रीनिवास हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भारत में जनजातीय समाज का अध्ययन करने वाले किन्हीं दो प्रारंभिक विद्वानों का नाम लिखिए।
उत्तर
एल०के० अनन्तकृष्ण अय्यर तथा शरत्चंद्र रॉय भारत में जनजातीय समाज का अध्ययन करने वाले दो प्रमुख प्रारंभिक विद्वान् थे।

प्रश्न 2.
संस्कृतिकरण किसे कहते हैं?
उत्तर
संस्कृतिकरण वह सांस्कृतिक प्रक्रिया है जिसमें कोई निम्न जाति अपने रीति-रिवाज एवं जीवन-पद्धति को बदलकर तथा किसी उच्च जाति का अनुकरण कर परंपरा से प्राप्त निम्न स्थान को ऊँचा करने का प्रयास करती है।

प्रश्न 3.
अंतःविवाह क्या है?
उत्तर
अपने ही समूह में विवाह करना अंत:विवाह कहलाता है। जाति के संदर्भ में अपनी ही जाति में विवाह अंत:विवाह कहा जाता है।

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प्रश्न 4.
बर्हिविवाह क्या है?
उत्तर
अपने समूह से बाहर विवाह करना बर्हिविवाह कहलाता है। हिन्दू विवाह के संदर्भ में सगोत्र, सपिंड या सप्रवर विवाह वर्जित हैं इसलिए इनसे बाहर अर्थात् अपने गोत्र, पिंड या प्रवर से बाहर विवाह बहिर्विवाह कहलाता है।

प्रश्न 5.
मुक्त व्यापार किसे कहते हैं?
उत्तर
मुक्त व्यापार से अभिप्राय अर्थव्यवस्था अथवा आर्थिक संबंधों में राज्य के कम-से-कम हस्तक्षेप से है। इसका शाब्दिक अर्थ व्यापार को खुला छोड़ देना है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जी०एस० घूर्ये के जीवन के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर
भारत में समाजशास्त्र के साथ गोविंद सदाशिव घूर्ये का नाम बड़े सम्मान के साथ जुड़ा हुआ है। वे भारत की प्रथम पीढ़ी के समाजशास्त्रियों में से हैं जिन्होंने भारत में न केवल समाजशास्त्र को दृढ़ता से स्थापित किया वरन् कई ऐसे छात्र भी प्रदान किए जिन्होंने देश के विभिन्न भागों में समाजशास्त्र विषय की स्थापना की एवं समाजशास्त्रीय शोध एवं सिद्धांतों के द्वारा समाजशास्त्रीय साहित्य को समृद्धि प्रदान की।

घूयें का जन्म 12 दिसम्बर, 1893 ई० को महाराष्ट्र के मालवान क्षेत्र के एक सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनका शैक्षणिक जीवन प्रारंभ से ही उच्च कोटि का रहा। उन्होंने अपनी सभी परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। उन्होंने 1919 ई० में संस्कृत एवं बाद में अंग्रेजी में बंबई के एल्फिन्स्टन कॉलेज से प्रथम श्रेणी में स्वर्ण पदक प्राप्त कर एम०ए० की परीक्षा पास की।

1919 ई० में बंबई विश्वविद्यालय ने समाजशास्त्र विषय पढ़ाने के लिए पैट्रिक गैडिस को आमंत्रित किया। उस समय घूयें एल्फिन्स्टन कॉलेज, बंबंई में संस्कृत के प्राध्यापक थे और यह कोई भी नहीं जानता था कि वे एक दिन भारत के महान् समाजशास्त्री बन जाएँगे। गैडिस के भाषणों को जो लोग सुनते थे, उनमें से घूयें भी एक थे। गैडिस ने ब्रिटिश विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र में प्रशिक्षण पाने के लिए घूयें का चयन किया।

उनकी सिफारिश पर बंबई विश्वविद्यालय ने घूयें को लंदन भेजा। कुछ समय तक एल०टी० हॉबहाउस के साथ अध्ययन के बाद वे डब्ल्यू०आर०एच० रिवर्स के पास अध्ययन के बाद वे डब्ल्यू०आर०एच रिवर्स के पास कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में चले गए। वहाँ घूर्ये ने अनेक लेख लिखे तथा रिवर्स के निर्देशन में “Ethnic Theory of Caste” (जाति का प्रजातीय सिद्धांत) विषय पर अपना शोध कार्य किया। घूयें के कार्यों पर रिवर्स का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता था और उनका झुकाव मानवशास्त्रीय महत्त्व के विषयों; जैसे नातेदारी और प्रसारवाद की ओर था। घूयें के शोध कार्य की समाप्ति के पूर्व ही रिवर्स का देहावसान हो गया।

1923 ई० में घूयें कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से डॉक्ट्रेट की उपाधि ग्रहण कर भारत लौट आए। 1924 ई० में उन्हें बंबई विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के रीडर एवं विभागाध्यक्ष पद पर नियुक्ति प्रदान की गई। 1934 ई० में घूयें को प्रोफेसर के पद पर नियुक्त किया गया तथा 1959 ई० में वे यहाँ से सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद भी उनकी सेवाएँ लेने के लिए बंबई विश्वविद्यालय ने उनके लिए ‘प्रोफेसर एमरीटस’ (Ermeritus Professor) का एक नया पद सृजित किया। घूयें ने 25 से भी अधिक पुस्तकों की रचना की है। उन्होंने 800 एम०ए० छात्रों को शीघ्र कार्य एवं 87 छात्रों को डॉक्टरेट हेतु शोध कार्य के लिए निर्देशित किया।

घूयें के लेखन में इतिहास, मानवशास्त्र और समाजशास्त्रीय परंपराएँ विद्यमान हैं। उन्होंने स्वयं को ही नहीं वरन् अपने छात्रों को भी अनुभवाश्रित अध्ययन एवं अनुसंधान करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने भारत के अनेक समाजशास्त्र के अध्यापकों को शिक्षा प्रदान की। वे Anthropological Society of Bombay’ के 1945-50 तक अध्यक्ष भी रहे। घूर्ये ने ‘इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसायटी’ (Indian Sociological Society) की स्थापना की और इसके तत्वाधान में 1952 ई० में ‘सोशियोलॉजिकल बुलेटिन’ नामक पत्रिका का प्रकाशन भी प्रारंभ किया, जो आज भारत में ही नहीं वरन् विश्व की प्रमुख समाजशास्त्रीय पत्रिकाओं में से एक है। वे 1966 ई० तक इसके प्रथम अध्यक्ष के रूप में कार्य करते रहे। 1983 ई० में 90 वर्ष की आयु में घूयें का निधन हो गया।

प्रश्न 2.
प्रजाति की प्रमुख विशेषताएँ कौन-सी हैं?
उत्तर
प्रजाति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. प्रजाति का अर्थ जन-समूह से होता है; अत: इसमें पशुओं की नस्लों को सम्मिलित नहीं किया जाता है।
  2. इस मानव समूह से तात्पर्य कुछ व्यक्तियों से नहीं है वरन् प्रजाति में मनुष्यों का वृहत् संख्या में होना अनिवार्य है।
  3. इस मानव समूह में एक समान शारीरिक लक्षणों का होना अनिवार्य है। ये लक्षण वंशानुक्रमण के द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होते रहते हैं। शारीरिक लक्षणों के आधार पर इन्हें दूसरी प्रजातियों से पृथक् किया जाता है।
  4. प्रजातीय विशेषताएँ प्रजातीय शुद्धता की स्थिति में अपेक्षाकृत स्थायी होती हैं अर्थात् भौगोलिक पर्यावरण के बदलने से भी किसी प्रजाति के मूल शारीरिक लक्षण नहीं बदलते हैं।

प्रश्न 3.
प्रजाति के प्रमुख तत्त्व बताइए।
उत्तर
प्रजाति कुछ विशेष तत्त्वों से मिलकर बनती है। यह विशेष तत्त्व उसके अस्तित्व को दूसरी प्रजातियों से भिन्न करते हैं। इन विशेष तत्वों के आधार पर ही प्रजाति का वर्गीकरण होता है। सामान्य रूप से प्रजातियों में भी तीन प्रकार के तत्त्व पाए जाते हैं –
1. अंतर्नस्ल के तत्त्व – एक प्रजाति के लोग दूसरी प्रजाति के लोगों से विवाह नहीं करते हैं। इसका कारण पहले काफी सीमा तक भौगोलिक स्थिति रहा है। भौगोलिक स्थितियों के कारण एक प्रजाति के लोग दूसरों से कम मिल पाते हैं। दूसरे, प्रत्येक प्रजाति स्थायित्व रखने का प्रयत्न करती है। गतिशीलता के अभाव में अंतर्नस्ल का तत्त्व उग्र रूप से पाया जाता है; जैसे-टुंड्रा प्रदेश के लैप, सेमॉयड और एस्कीमो मानव। इनमें अंर्तप्रजातीय विवाह होता है। यही कारण है। कि इनमें अंतर्नस्ल के तत्त्व उग्र रूप से मिलते हैं। इस प्रकार के विवाह से रक्त की शुद्धता, संस्कृति की रक्षा तथा समान प्रजातीय लक्षणों का स्थायित्व होता है। ऊँची प्रजातियाँ भी अपनी रक्त की पवित्रता को बनाए रखने के लिए अंर्तप्रजातीय विवाह करती हैं।

2. विशेष शारीरिक लक्षणों के तत्त्व – प्रजातियों का वर्गीकरण शारीरिक लक्षणों के आधार पर भी किया जाता है। प्रत्येक प्रजाति में कुछ विशेष शारीरिक लक्षण पाए जाते हैं; जैसे-शरीर का रंग, बाल, आँख, खोपड़ी, नासिका, कद, जबड़ों की बनावट आदि। वर्तमान समय में यातायात के साधनों में वृद्धि होने से शारीरिक लक्षण धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं।

3. वंशानुक्रमण के लक्षणों के तत्व – मैंडल के सिद्धांत से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सहवास से रक्त में उन्हीं लक्षणों का अस्तित्व होता है जो पैतृक होते हैं या वंश परंपरा से चले आ रहे होते हैं। शारीरिक लक्षण एक श्रृंखला के समान होते हैं जो वंश परंपरा के कारण अनेक पीढ़ियों तक चलते हैं, जैसे कि नीग्रो का पुत्र नीग्रो ही होता है। वह कभी भी श्वेत प्रजाति के लक्षणों से युवत नहीं होता है। प्रजाति की पवित्रता और संस्कृति की रक्षा पतृक गुणों के द्वारा ही होती है।

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प्रश्न 4.
प्रजाति के निश्चित एवं अनिश्चित लक्षण कौन-से माने जाते हैं?
उतर
प्रजाति के निश्चित लक्षण संख्यात्मक अनुमान प्रदान करते हैं जिन्हें अंकगणित की संख्याओं में बताया जा सकता है, जबकि प्रजाति के अनिश्चित लक्षणों को मापा नहीं जा सकता है और न ही अंकगणित की संख्याओं द्वारा अभिव्यक्त किया जा सकता है। इनको केवल अनुमान द्वारा ही ज्ञात किया जा सकता है। प्रजाति के निश्चित एवं अनिश्चित लक्षण निम्न प्रकार हैं –
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प्रश्न 5.
डी०पी० मुकर्जी के जीवन के बारे में आप क्या समझते हैं?
उत्तर
भारतीय समाजशास्त्र को अमूल्य योगदान प्रदान करने वाले एक प्रमुख समाजशास्त्री ध्रुजटि प्रसाद मुकर्जी हैं, जिन्हें प्यार से लोग ‘डी०पी०’ के नाम से पुकारते थे। भारतीय समाज के विश्लेषण में मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य को अपनाने वाले समाजशास्त्रियों में इनका अग्रणी स्थान रहा है। वह अपने समय की एक महान् बौद्धिक विभूति, भारतीय समाजशास्त्र के संस्थापकों में अग्रणी और भारतीय नवजाकरण के क्रांतिदूत माने जाते हैं। डी०पी० मुकर्जी प्रतिष्ठित भारतीय सम्मनस्के जो थे ही, उनकी रुचि अर्थशास्त्र, साहित्य, संगीत और कला के क्षेत्र में भी थी। प्रो० मुकर्जी एक विद्वान, सुसंस्कृत और भावुक प्रकृति के यक्ति थे। उनके संपर्क में आने वाले युवा लोग उनसे अत्यधिक प्रभावित होते थे। और उनसे दिशा निर्देश पाते थे।

डी०पी० मुकर्जी का जन्म 5 अक्टूबर, 1894 ई० को बंगाल में एक मध्यवर्गीय ब्राह्मण परिवार में हुआ था यह वह समय था जब बंगाली साहित्यको पुनर्जागरण हो रहा था उन पर बंकिम चंद्र, रवींद्रनाथ ठाकुर एवं शरत्चंद्र का अत्यधिक प्रभाव पड़ा। उनमें भविष्य को देखने की भी अद्भुत क्षमता थी। उनकी शिक्षा-दीक्षा कलकत्ता (कोलका) में हुई, किंतु अपने जीवन का अधिकांश समय उन्होंने लखनऊ में व्यतीत किया। 1922 ई० में लखनऊ विश्वविद्यालय में वे समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र विभाग में शिक्षक नियुक्त हुए जहाँ ने लगभग 32 वर्ष तक कार्य किया बंगला भाषा में उन्हें विशेष योग्यता प्राप्त थी। उनका दर्शनशास्त्र, इतिहास, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्रीय सिद्धांतों और कला, साहित्य व संगीत के सिद्धांतों पर पूरा-पूरा अधिकार था। उन्होंने ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों का इस प्रकार से समन्वय किया कि वे मानव एवं संस्कृति के समक्ष आने वाली विभिन्न समस्याओं को आलोचनात्मक दृष्टि से देख सकते थे।

लखनऊ से सेवानिवृत्ति के एक वर्ष पूर्व 1953 ई० में उन्होंने अलीगढ़ विश्वविद्यालय के तत्कालीन उपकुलपति डॉ० जाकिर हुसैन के निमंत्रण पर वहाँ अर्थशास्त्र विभाग के अध्यक्ष का पद ग्रहण किया। यहाँ वे पाँच वर्षों तक रहे। इसी काल में वे हेग के अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक अध्ययन संस्थान में समाजशास्त्र के अतिथि आचार्य के रूप में गए। मुकर्जी ‘भारतीय समाजशास्त्रीय परिषद् के संस्थापेक सदस्य थे। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय समाजशास्त्रीय परिषद् में भारत की ओर से प्रतिनिधित्व किया और उसके उपाध्यक्ष भी रहे।

मुकर्जी चूंकि अत्यधिक धूम्रपान करते थे अतः उन्हें गले का कैंसर हो गया तथा 5 दिसम्बर, 1962 ई० को वे स्वर्ग सिधार गए। मुकर्जी समाजवाद के प्रति प्रतिबद्ध थे और नियोजन (Planning) में विश्वास करते थे। वे वर्ग एवं विशेषाधिकारों के भी विरुद्ध थे। डी०पी० मुकर्जी एक बहुत ही प्रभावशाली और सफल प्राध्यापक, महान् सामाजिक विचारक, उपन्यासकार, साहित्य और कला के विवेचक, संगीत पारखी, मानवतावादी दृष्टिकोण से ओतप्रोत मानव और कुशल प्रशासक थे। वे समस्त ज्ञान की एकता और अनुभव के एकीकरण में विश्वास करते थे। वे हठवादी मनोवृत्ति, ‘अन्य पंरपरा और संकुचित दृष्टिकोण के विरोधी थे।

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प्रश्न 6.
भारतीय संस्कृति के बारे में मुकर्जी के विचार बताइए।
उत्तर
मुकर्जी के अनुसार भारतीय संस्कृति का इतिहास सांस्कृतिक समन्वय का इतिहास है। भारत की मौलिक संस्कृति उपनिषदों में वर्णित सिद्धांतों पर आधारित है तथा इसीलिए इसमें सभी क्रियाएँ मनुष्य को मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रेरित करती हैं। रहस्यवादी परिप्रेक्ष्य को मुकर्जी ने भारतीय संस्कृति का मौलिक परिप्रेक्ष्य माना है। उनके विचारानुसार बौद्ध संस्कृति ने भारतीय संस्कृति को लचीला बना दिया। मुस्लिम शासनकाल में भारत की कोई विशेष प्रगति नहीं हुई। परंतु अंग्रेजी शासनकाल में भारतीय समाज की अर्थव्यवस्था में अनेक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए।

नवीन अर्थव्यवस्था, पश्चिमी शिक्षा तथा नवीन व्यवसायों ने भारतीय समाज में गतिशीलता की वृद्धि की तथा परंपरागत मध्यम वर्ग की समाप्ति कर एक ऐसे नवीन व चालाक मध्यम वर्ग का निर्माण किया जिसने सामाजिक-आर्थिक विकास में कोई विशेष भूमिका अदा नहीं की। इस मध्यम वर्ग (मुख्यत: जमींदार) ने भारत में अंग्रेजी शासनकाल की जड़े मजबूत करने में सहायता प्रदान की तथा इसी ने देश का विभाजन करने में भी सहायता दी। यह वर्ग भारत में अंग्रेजों की तरह शोषण करता रहा है और भारत के पुनर्गठन व पुनर्निर्माण की ओर उसने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि अंग्रेजों ने भारतीय समाज का एकीकरण उस पर जबरदस्ती लादी गई बनावटी एकरूपता से किया, इसलिए इसके दूरगामी दृष्टि से अच्छे परिणाम नहीं हुए। उनका विचार था कि क्षेत्रीय संस्कृतियों की विशेषता की एकता से ही भारत । का नवनिर्माण हो सकता है।

प्रश्न 7.
ए० आर० देसाई के जीवन के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर
देसाई का जन्म बड़ौदा के एक सुप्रसिद्ध परिवार में 1915 ई० में हुआ था। उन्होंने कानून की शिक्षा प्राप्त कर बंबई विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में प्रो० घूयें के निर्देशन में पी-एच०डी० की उपाधि प्राप्त की। वे इसी विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्राध्यापक और बाद में विभागाध्यक्ष बन गए। देसाई कुछ समय तक ‘भारतीय साम्यवादी दल के सदस्य भी रहे, किन्तु पार्टी के कुछ मुद्दों पर मतभेद हो जाने के कारण 1939 ई० में उन्होंने दल की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। 1953 ई० में वे ‘ट्राटस्कीवादी क्रांतिकारी समाजवादी दल के सदस्य बन गए, किंतु उनकी समझौतेवादी प्रकृति न होने और खरी बौद्धिक ईमानदारी ने अंततः 1961 ई० में उन्हें इस संगठन को भी छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया। फिर भी, वे आजीवन अपनी मार्क्सवादी विचारधारा के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध रहे। बंबई विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने “स्वंतत्रता के बाद भारतीय विकास की द्वंद्वात्मकता विषय पर गहन शोध कार्य किया।

देसाई ‘भारतीय समाजशास्त्रीय परिषद् के संस्थापक सदस्यों में से रहे हैं। वे इस संस्था के 1978-80 के सत्र में अध्यक्ष थे तथा 1951 ई० में यूनेस्को की एक कार्य योजना ‘भारत में समूह तनाव’ के सह-निदेशक थे। वे इसी संस्था के ‘बंबई के औद्योगिक श्रमिकों की साक्षरता और उत्पादन संबंधी कार्य-योजना के मानद निदेशक भी रहे हैं। देसाई ‘इण्डियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च के राष्ट्रीय शोधार्थी (1981-83) भी रहे हैं। देसाई की प्रथम प्रमुख कृति ‘भारतीय राष्ट्रवाद की सामाजिक पृष्ठभूमि’ (हिन्दी अनुवाद) न केवल अपने मार्क्सवाद शैक्षिक परिप्रेक्ष्य के करण एक नवीन प्रवृत्ति स्थापित करने वाला गौरव ग्रंथ (क्लासिक) रहा है, अपितु इसे भारत में समाजशास्त्र का इतिहास के साथ समागम करने वाली एक उत्कृष्ट प्रथम कृति कहा जा सकता है।

देसाई ने इस ग्रंथ के बाद कई भिन्न विषयों; जैसे भारतीय राज्य, कृषक समाज व्यवस्था, प्रजातंत्रात्मक अधिकार, नगरीकरण, कृषक आंदोलन आदि पर लिखा है। उनकी भारत में ग्रामीण समाजशास्त्र नामक संपादित पुस्तके अपने विषय की एक प्रामाणिक पाठ्य-पुस्तक मानी जाती रही है जिसके अब तक कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होंने इसमें भारतीय कृषक व्यवस्था के सामंती चरित्र को उजागर किया है। 1994 ई० में ए०आर० देसाई स्वर्ग सिधार गए।

प्रश्न 8.
एम० एन० श्रीनिवास के जीवन के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर
एम० एन० श्रीनिवास भारत के एक सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री रहे हैं जिनका जन्म 16 नवंबरं, 1916 ई० को मैसूर के आयंगार ब्राह्मण परिवार में हुआ। उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय से 1936 ई० में सामाजिक दर्शनशास्त्र में बी०ए० (आनर्स) किया। सामाजिक दर्शनशास्त्र में उस समय समाजशास्त्र तथा सामाजिक मानवशास्त्र भी पढ़ाया जाता था। तत्पश्चात् श्रीनिवास उच्च शिक्षा के लिए बंबई विश्वविद्यालय चले गए तथा वहीं 1938 ई० में “Marriage and Family among the Kannada Castes in Mysore State” विषय पर शोध-निबंध लिखकर एम०ए० समाजशास्त्र की उपाधि प्राप्त की।

बाद में यह शोध-प्रबंध 1944 ई० में पुस्तक के रूप में प्रकाशित भी हो गया। 1944 ई० में उन्हें प्रो० जी०एस० घूर्ये के निर्देशन में दक्षिण भारत के कुर्ग लोगों पर थीसिस लिखने के आधार पर पी-एच० डी० की उपाधि प्रदान की गई। इसके पश्चात् वह ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में सामाजिक मानवशास्त्र में उच्च अध्ययन करने के लिए चले गए तथा वहाँ सुप्रसिद्ध सामाजिक मानवशास्त्री ए०आर० रैडक्लिफ-ब्राउन तथा ई०ई० ईवांस-प्रिचार्ड के विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुए।

जिन आँकड़ों को आधार मानकर उन्होंने बंबई में पी-एच०डी० के लिए थीसिस लिखा था उन्हीं आँकड़ों के आधार पर डी० फिल० (D. Phil.) के लिए “Religion and Society among the Coorgs of South India” नामक विषय पर थीसिस लिखा जो कि 1952 ई० में पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में ही उन्होंने सर्वप्रथम ‘संस्कृतिकरण’ की अवधारणा का प्रयोग किया है। श्रीनिवास 1999 ई० में स्वर्ग सिधार गए।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जाति एवं प्रजाति का अर्थ स्पष्ट कीजिए। जाति एवं प्रजाति के बारे में जी०एस० घूर्ये के विचारों की समीक्षा कीजिए।
उत्तर
जाति का अर्थ
हिंदी का ‘जाति’ शब्द, संस्कृत भाषा की ‘जन’ धातु से बना है जिसका अर्थ ‘उत्पन्न होना’ व ‘उत्पन्न करना है। इस दृष्टिकोण से जाति से अभिप्राय जन्म से समान गुण वाली वस्तुओं से है। परंतु समाजशास्त्र में जाति’ शब्द का प्रयोग विशिष्ट अर्थों में किया जाता है। रिजले (Risley) के अनुसार, यह परिवार या कई परिवारों का संकलन है जिसको एक सामान्य नाम दिया गया है, जो किसी काल्पनिक पुरुष या देवता से अपनी उत्पत्ति मानता है तथा पैतृक व्यवसाये को स्वीकार करता है। और जो लोग विचार कर सकते हैं उन लोगों के लिए एक सजातीय समूह के रूप में स्पष्ट होता है।”

प्रजातिको अर्थ

प्रजाति एक जैविक अवधारणा है। यह मानवों के उस समूह को प्रकट करती है जिनमें शारीरिक व मानसिक लक्षण समान होते हैं तथा ये लक्षण उन्हें पैतृकता के आधार पर प्राप्त होते हैं। शरीर के रंग, खोपड़ी और नासिका की बनावट वे अन्य अंगों की बनावट के आधार पर विभिन्न प्रजाति समूहों को देखते ही पहचाना जा सकता है। शारीरिक दृष्टि से विभिन्न प्रजातियाँ परस्पर एक-दूसरे से अलग-अलग रही हैं, परंतु सभी लोग एक-दूसरे का अस्तित्व मानते रहे हैं।

परंतु अमेरिका आदि की तरह यहाँ कभी भी रंगभेद पर आधारित प्रजातीय संघर्ष देखने को नहीं मिलता है। इस प्रकार, जैविक अवधारणा के रूप में प्रजाति का प्रयोग सामान्यतः उस समूह के लिए किया जाता है जिसके अंदर सामान्य गुण होते हैं अथवा जिसे समान शारीरिक लक्षणों से पहचाना जा सकता है। हॉबेल (Hoebel) के अनुसार, “प्रजाति एक प्राणिशास्त्रीय अवधारणा हैं यह वह समूह है जो कि शारीरिक विशेषताओं का विशिष्ट योग धारण करता है।”

जाति एवं प्रजाति के बारे में जी०एस० घूयें के विचार

घूयें की रुचि मां से Pाति और प्रजाति से संबंधित विषयों में रही है। उनका पी-एचडी। विषय भी जाति का नृजातीय सिद्धांत’ था जिसके आधार पर 1932 ई० में उनकी प्रथम पुस्तक ‘भारत में जाति एवं प्रजाति के नाम से प्रकाशित हुई। घूयें ने जाति को एक जटिल घटना बताते हुए इसकी निश्चित शब्दों में कोई सामान्य परिभाषा तो नहीं दी है परंतु इसकी छः विशेषताओं का उल्लेख किया है। जो इसका प्रतिनिधित्व करती हैं। ये विशेषताएँ हैं-समाज का खंडात्मक विभाजन, संस्तरण, सामाजिक अंतःक्रियाओं विशेषकर साथ बैठकर भोजन करने पर प्रतिबंध, विभिन्न जातियों के भिन्न-भिन्न अधिकार तथा कर्तव्य, निर्बाध व्यवसाय के चुनाव का अभाव तथा अंत:विवाह अर्थात् जाति से बाहर विवाह पर प्रतिबंध। घूर्ये ने जाति और उपजातियों के भेद को स्पष्ट करते हुए कहा है। कि जिन्हें हम जातियाँ कहते हैं, वे उपजातियाँ हैं और इन पर ही ये छ: विशेषताएँ लागू होती हैं। जाति के उद्भव के बारे में उन्होंने प्रजातीय सिद्धांत का समर्थन किया है।

उनका यह विचार रिजले से प्रभावित था परंतु उन्होंने रिजले के विचारों और प्रजातियों के वर्गीकरण को यथावत् स्वीकार नहीं किया। जाति और प्रजाति में आंतरिक संबंध मानते हुए उन्होंने हिंदू जनसंख्या को उसकी शारीरिक विशेषताओं के आधार पर छह वर्गों में विभाजित किया- इंडो-आर्यन, पूर्व-द्रविड़, द्रविड़, पश्चिमी, मुंडा एवं मंगोलियन जाति के उद्भव के बारे में घूयें ने कहा है-‘जाति व्यवस्थी इंडो-आर्यन संस्कृति के ब्राह्मणों को शिशु है जिसका पालन-पोषण गंगा के मैदान में हुआ है और वहाँ से इसे देश के दूसरे भागों में लाया गया।” अंतर्विवाह (सजातीय विवाह) की उत्पत्ति, जिससे ‘प्रजातीय शुद्धता के विचार जुड़े हुए हैं, भी सर्वप्रथम गंगा के मैदान में रहने वाले ब्राह्मणों में हुई थी और वहीं से अंतर्विवाह की धारणा और जाति व्यवस्था के अन्य तत्त्व ब्राह्मणों के अनुयायियों ने देश के दूसरे भागों में फैलाए।

प्रश्न 2.
घूर्ये द्वारा प्रतिपादित जाति की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
घूयें ने जाति की कोई औपचारिक परिभाषा न देकर इसकी छह महत्त्वपूर्ण विशेषताओं वाली विस्तृत परिभाषा पर बल दिया है। घूयें ने जाति के प्रमुख लक्षणों का वर्णन निम्नलिखित छह शीर्षकों के अंतर्गत किया है –
1. भारतीय समाज का खंडात्मक विभाजन – जाति व्यवस्था एक ऐसी संस्था है जिससे भारतीय समाज खंडों में विभाजित हो गया है और यह विभाजन सूक्ष्म रूप में हुआ है। प्रत्येक खंड के सदस्यों की स्थिति तथा भूमिका सुस्पष्ट व सुनिश्चित रूप से परिभाषित हुई है। घूर्ये ने इसे सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता माना है। उनके शब्दों में, इससे तात्पर्य यह है कि जाति व्यवस्था द्वारा बँधे समाज में हमारी भावना भी सीमित होती है, सामुदायिक भावना संपूर्ण मनुष्य समाज के प्रति न होकर केवल जाति के सदस्यों तक सीमित होती है तथा जातिगत आधार पर सदस्यों को प्राथमिकता दी जाती है। इस प्रकार, प्रत्येक जाति समाज को एक बंद खंड है क्योंकि जाति का निर्धारण जन्म से होता है। किसी भी व्यक्ति की जाति का निर्धारण जन्म से, जन्म के समय होता है। इससे न तो बचा जा सकता है और न ही इसे बदला जा सकती है।

2. संस्तरण या सौपानिक विभाजन – जाति व्यवस्था में ऊँच-नीच की परंपरा स्थापित होती है। इसी कारण प्रत्येक जाति दूसरी जाति की तुलना में असमान होती है अर्थात् प्रत्येक जाति दूसरी . से उच्च अथवा निम्न होती है। सैद्धांतिक रूप से कोई भी दो जातियाँ समान नहीं होतीं। हम की । भावना सीमित होने से सदस्य केवल अपनी जाति के लोगों को ही महत्त्व देते हैं और उनमें श्रेष्ठता की भावना भी जन्म लेती है। परंतु कुछ ऐसी भी जातियाँ हैं जिनमें सामाजिक दूरी इतनी कम है कि उनमें ऊँच-नीच के आधार पर जो सामाजिक संरचना स्पष्ट हुई है वही संस्तरण परंपरा है। जातीय संस्तरण रक्त की पवित्रता, पूर्वजों के व्यवसाय के प्रति आस्था व अन्यों के साथ भोजन-पानी के प्रतिबंध आदि विचारों पर आधारित होती है।

3. सामाजिक अंतःक्रियाओं विशेषकर साथ बैठकर भोजन करने पर प्रतिबंध – भारतीय जाति व्यवस्था प्रत्येक जाति के सदस्यों के लिए अपने समूह के बाहर भोज़न और सामाजिक सहवास पर नियंत्रण रखती है। इन नियमों का बड़ी. कठोरता से पालन किया जाता है। प्रत्येक जाति में ऐसे नियम बड़े सूक्ष्म रूप से बनाए गए हैं जो यह निर्धारण करते हैं कि किसी जाति के सदस्य को (मुख्यतः जो ऊँची जातियों के हैं) कहाँ कच्चा भोजन करना है, कहाँ पक्का तथा कहाँ केवल जल ग्रहण करना है और जल पीना भी निषिद्ध है ये नियम पवित्रता तथा अपवित्रता के विचार से संचालित होते हैं।

4. विभिन्न जातियों के भिन्न-भिन्न अधिकार तथा कर्तव्य – जिस प्रकार जाति व्यवस्था में संस्तरण है ठीक उसी प्रकार इसमें विभिन्न जातियों के लिए भिन्न-भिन्न अधिकार तथा कर्तव्य निर्धारित होते हैं। उनके अधिकार तथा कर्तव्य केवल धार्मिक क्रियाओं तक ही सीमित न रहकर लौकिक विश्व तक फैले हुए होते हैं। विभिन्न जातियों के मध्य होने वाली अंत:क्रिया इन्हीं नियमों से संचालित होती है।

5. निर्बाध व्यवसाय के चुनाव का अभाव – मुख्यत: सभी जातियों के कुछ निश्चित पेशे होते हैं। और जाति के सदस्य अपने उन्हीं पैतृक पेशों को स्वीकार करते हैं। उन्हें छोड़ना उचित नहीं समझा जाता। कोई भी पेशा, चाहे वह व्यक्ति की आवश्यकता की पूर्ति करे या न करे, उसे । मानसिक संतोष हो या न हो; व्यक्ति को परंपरागत पेशों को ही अपनाना पड़ता है। इस प्रकार, जाति व्यवसाय के चुनाव को भी सीमित कर देती है जो जाति की भाँति जन्म पर आधारित तथा वंशानुगत होता है। समाज के स्तर पर जातिगत श्रम-विभाजन में कठोरता देखी जाती है तथा विशिष्ट व्यवसाय कुछ विशिष्ट जातियों को ही दिए जाते हैं।

6. अंतःविवाह – सभी जातियाँ अंत:विवाही होती हैं अर्थात् जाति के सदस्यों को अपनी ही जाति में विवाह करना पड़ता है। घूयें का भी यहीं मत है कि जाति व्यवस्था का अंत:विवाही सिद्धांत इतना कठोर है कि समाजशास्त्री इसे जाति व्यवस्था का प्रमुख तत्त्व मानते हैं। व्यावहारिक रूप : में यह अंत:विवाह भी भौगोलिक सीमा के अंतर्गत बंधा हुआ है। एक जाति की कई उपजातियाँ होती हैं और प्रायः एक ही प्रांत में रहने वाली उपजातियों में विवाह होते हैं। अंतः विवाह के नियम जाति व्यवस्था को आगे बढ़ाने में सहायता करते हैं।

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प्रश्न 3.
मुकर्जी के परंपरा एवं परिवर्तन के बारे में विचारों की समीक्षा कीजिए।
उत्तर
डी०पी० मुकर्जी मार्क्सवादी थे, किंतु वे स्वयं को मार्क्सवादी के स्थान पर ‘मार्क्सशास्त्री (Marxologist) कहलाना अधिक पसंद करते थे। उन्होंने भारतीय इतिहास का द्वंद्वात्मक प्रक्रिया द्वारा विश्लेषण किया है। उनके अनुसार परंपरा तथा आधुनिकता, उपनिवेशवाद तथा राष्ट्रवाद, व्यक्तिवाद और समूहवाद में द्वंद्वात्मक संबंध हैं। ये एक-दूसरे को प्रभावित करते तथा होते हैं। मुकर्जी का द्वंद्ववाद का आधार मानवतावादे रहा है जो संकुचित नृजातीय एवं राष्ट्रीय विचारों की सीमाओं से परे था। उन्होंने मार्क्स के सिद्धांतों को भारतीय परंपरा के साथ जोड़ने का प्रयत्न किया। मुकर्जी ने ‘भारतीय समाज के अध्ययन के लिए परंपराओं के अध्ययन को आवश्यक बताया।

यही कारण है कि परंपरा का विवेचन मुकर्जी के अध्ययन का मुख्य केंद्र-बिंदु रहा। उन्होंने इसके प्रकारों, स्तरों इनमें आपसी द्वंद्व एवं परिवर्तन का गूढ़ विवेचन किया। यही नहीं, उन्होंने भारतीय परंपरा और परिवर्तन (आधुनिकता) के मध्य संघर्ष की द्वंद्वात्मक व्याख्या कर भारतीय समाजशास्त्र में अपना एक विशिष्ट स्थान बनाया है। मुकर्जी ने भारतीय परंपरा में अनेक प्रकारों के विरोधों का उल्लेख किया और इस आधार पर परंपराओं के द्वंद्वात्मक अध्ययन का सुझाव दिया। मुकर्जी भारतीय परंपरा एवं पश्चिम की परंपरा के संघर्ष के द्वंद्व की चर्चा करते हैं। मुकर्जी के विचारानुसार सामाजिक मूल्यों एवं वर्ग हितों में पहले पारस्परिक संघर्ष एवं अंतरखेल या क्रिया (Interplay) होता है, फिर उनमें समन्वय पैदा होता है। यह प्रक्रिया चलती रहती है और इससे समाज में परिवर्तन होता रहता है।

मुकर्जी के अनुसार, भारत में यह प्रक्रिया मुसलमानों के आगमन एवं उनके प्रभाव से ही प्रारंभ हुई, जो आज तक चली आ रही है। ब्रिटिश शासन के प्रभाव से भारत में एक नवीन मध्यम वर्ग का उदय हुआ जिसकी जड़े न तो परंपरा में थीं और न आधुनिकता में ही, वरन् यह दोनों का समन्वय था। भारतीय परंपरा एवं पश्चिम की परंपरा के संघर्ष के फलस्वरूप अनेक सांस्कृतिक विरोधाभास भी उत्पन्न हुए। सांस्कृतिक विरोधाभासों एवं नवीन वर्गों के उदय के कारण भारत में संघर्ष एवं समन्वय की प्रक्रिया भी प्रारंभ हुई। मुकर्जी के अनुसार, इस संघर्ष एवं समन्वय को भारत में विद्यमान वर्ग संरचना के आधार पर आगे बढ़ाया जाना चाहिए और इसे आगे बढ़ाने के लिए योजना का सहारा लिया जाना चाहिए। मुकर्जी ने परंपराओं के अनेक प्रकार के विरोधों का उल्लेख किया है। उनका मत है कि कस्बों एवं नगरों में स्वेच्छावाद पनप रहा है, व्यक्तिवादी प्रवृत्ति प्रबल होती जा रही है और समूहवादी परंपरा का विरोध हो रहा है।

उनका कहना है कि परंपराओं में उत्पन्न हो रहे इस प्रकार के विरोधाभासों का अध्ययन किया जाना चाहिए। उन्होंने आंतरिक एवं बाह्य भारतीय पंरपरा का इस्लामिक परंपरा से द्वंद्व सहित भारतीय परंपरा में निहित उच्च परपंरा और स्थानीय परंपरा के द्वंद्व की उदाहरण सहित विवेचना की है। सामाजिक परिवर्तन के संदर्भ में उन्होंने अत्रेय ब्राह्मण ग्रंथ के ‘चरेवेति-चरेवेति’ अर्थात् ‘आगे बढ़ो, आगे बढ़ो’ की धारणा को स्वीकार किया है। मुकर्जी की दृष्टि में धर्म से संबंधित परंपराएँ, जो आज भी अपनी निरंतरता बनाए हुए हैं और नगरीय मध्यम वर्ग की नवीन परंपराओं के बीच द्वंद्व या संघर्ष पाया जाता है। समाजशास्त्री इन पर इस दृष्टि से विचार करता है कि परंपराओं का विकास संघर्ष या द्वंद्व के माध्यम से होता है। स्वेच्छात्मक क्रिया के अभाव के कारण भारतीय समाज को एक लाभ अवश्य मिला है। कुछ मध्यम वर्गों को छोड़कर, भारतीय जीवन की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता लोगों में नैराशय या कुंठा का अभाव है।

यदि हम भारतीय किसान तथा परिवार के मुखिया को देखें तो पाएँगे कि उनमें ‘आकांक्षाओं का स्तर’नीचा पाया जाता है। यह आकांक्षाओं का स्तर परंपराओं द्वारा निर्देशित होता है जो अधिकतर भारतीयों के लिए संस्कृति और मूल्यों का स्तर निर्धारित करते हैं। मुकर्जी ने परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व का भी उल्लेख किया है। इन्होंने इन्हें क्रमश: वाद और प्रतिवाद के रूप में दर्शाया है। दोनों के संघर्ष से ही आधुनिकीकरण पनपता है जो दोनों का समन्वय भी है। उनका मत है कि आधुनिकीकरण को समझने के लिए परंपरा को समझना आवश्यक है क्योंकि वर्तमान का अध्ययन भूतकाल के संदर्भ में ही किया जा सकता है। मुकर्जी के अनुसार हमारी परंपराओं में परिवर्तन के तीन तत्त्वों-श्रुति, स्मृति तथा अनुभव को मान्यता प्रदान की गई है।

अनुभव को विशेषतः अत्यंत महत्त्वपूर्ण तत्त्व माना गया है। कई उपनिषद् तो व्यक्तिगत अनुभवों पर ही आधारित हैं। व्यक्तिगत अनुभव शीघ्र ही सामूहिक अनुभव के रूप में पुष्पित हुआ। सामूहिक अनुभव को ही परिवर्तन का प्रमुख सिद्धांत माना गया है। यदि हम विभिन्न संप्रदायों या पंथों की उत्पत्ति पर विचार करें तो पाएँगे कि उनके संत-संस्थापकों ने उन्हें अपने व्यक्तिगत अनुभव से प्रारंभ किया, उनका अनुष्ठानों, मंदिरों तथा पुजारियों से कोई संबंध नहीं था। उन्होंने जो कुछ कहा, स्थानीय बोली या भाषा में कहा, न कि संस्कृत में। उन्होंने अधिकतर जातियों एवं वर्गों को ही अपने पंथ से संबंधित प्रमुख बातें बताईं। उन्होंने स्त्रियों को समान स्थिति प्रदान की तथा प्रेम, स्नेह एवं सहजता या स्वाभाविकता का उपदेश दिया। इन संतों का लोगों पर व्यापक प्रभाव पड़ा और उन्होंने परंपराओं पर भी काफी प्रभाव छोड़ा।

उच्च परंपराएँ प्रमुखतः बौद्धिक थीं तथा स्मृति और श्रुति में केंद्रित थीं जहाँ परिवर्तन का सिद्धांत द्वंद्वात्मक अर्थनिरूपण या व्याख्या द्वारा उपलब्ध था। यही प्रक्रिया हमें मुसलमानों में भी देखने को मिलती है। उनमें सूफियों के प्रेम और अनुभव पर विशेष जोर दिया गया। परंपराओं के विकास में जहाँ द्वंद्वात्मक योग्यता का काफी प्रभाव रहा है, वहाँ अनुभव का भी प्रभाव रहा है। यहाँ यह मानना या कहना अनुचित होगा कि बुद्धि-विचार ऐतिहासिक दृष्टि से अनुभव, प्रेम, स्नेह आदि की तुलना में परंपराओं में परिवर्तन के अभिकरण के रूप में अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। मुकर्जी ने बताया है कि जब कभी उच्च और निम्न बौद्धिक परंपराओं में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होगी, तब उसका अनुमान लगा लिया जाता है और प्रयत्नपूर्वक उन्हें वैचारिक दृष्टि से एक-दूसरे के निकट ला दिया जाता है।

भारतीय समाज जाति प्रधान समाज रहा है। यह एक ऐसा समाज है जिसने वर्गों के निर्माण को रोका है तथा सब प्रकार की वर्ग-चेतना को दबाया है। यहाँ तो चुनावों में भी वर्ग चेतना; जातीय चेतना यो भावना के अंतर्गत समाहित होती है। भारतीय समाज भी पश्चिमी समाज के समान बदल रही है, परंतु यहाँ पश्चिमी समाज के सम्मुने उतना विघटन नहीं हुआ है। भारतीय सामाजिक व्यवस्था के अध्ययन के लिए भारतीय समाजशास्त्री को समाजशास्त्र में एक भिन्न परिप्रेक्ष्य को अपनाने की आवश्यकता है क्योंकि इसकी विशेष परंपराएँ हैं; इसके विशेष प्रतीक और संस्कृति तथा सामाजिक क्रियाओं के विशेष प्रतिमान हैं। तत्पश्चात् भारतीय परंपराओं, संस्कृति तथा प्रतीकों पर आर्थिक और प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों का प्रभाव पड़ता है। इन सबका अध्ययन भारतीय समाजशास्त्रियों को करना है।

प्रश्न 4.
ए० आर० देसाई के राज्य संबंधी विचारों की विवेचना कीजिए।
उत्तर
समाजशास्त्रीय दृष्टि से राज्य एक ऐसी संस्था है जो कि शक्ति के वितरण तथा इसके प्रयोग के एकाधिकार से संबंधित है। राज्य को समाज की वह संस्था, पहलू या माध्यम कहा जा सकता है जो कि बल प्रयोग की ताकत एवं अधिकार रखती है, अर्थात् जो बलपूर्वक नियंत्रण लागू कर सकती है। यह शक्ति समाज के सदस्यों को नियंत्रित करने के काम भी आ सकती है और अन्य समाजों के विरुद्ध भी। राज्य का काम चलाने के लिए शासनतंत्र या सरकार होती है, जो राज्य का संस्थात्मक पहलू है। राज्य की अपनी प्रभुसत्ता होती है। राज्य के सभी नियमों का पालन करना उस राज्य के सदस्यों के लिए अत्यंत आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति इसका पालन नहीं करता है, तब राज्य अपनी प्रभुसत्ता के आधार पर दंड देने का अधिकार रखता है। सरकार की संस्था बिना राज्य की धारणा के काई वास्तविकता नहीं।

ए०आर० देसाई की रुचि आधुनिक पूँजीवादी राज्य (जो अपने आप को तथाकथित कल्याणकारी राज्य कहने का दावा करता है) के विश्लेषण में थी तथा इसे विश्लेषण में उन्होंने मार्क्सवादी दृष्टिकोण को अपनाया। उन्होंने अपने ‘दि मिथ ऑफ दि वेलफेयर स्टेट’ नामक लेख में कल्याणकारी राज्य की विस्तृत विवेचना की है। कल्याणकारी राज्य जनता के कल्याण के लिए नीतियों को बनाता तथा लागू करंता है। ऐसा राज्य गरीबी, सामाजिक भेदभाव से मुक्ति तथा अपने सभी नागरिकों की सुरक्षा का ध्यान रखता है तथा असमानताओं को दूर करने के लिए तथा सबके लिए रोजगार उपलब्ध कराने हेतु हर संभव कदम उठाता है।
देसाई ने कल्याणकारी राज्य की निम्नलिखित तीन प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख किया है –

1. सकारात्मक राज्य – कल्याणकारी राज्य सकारात्मक राज्य होता है। ऐसा राज्य उदारवादी राजनीति के शास्त्रीय सिद्धांत की ‘लेसेज फेयर’ नीति से भिन्न होता है अर्थात् केवल उदारवादी होने मात्र से किसी राज्य को कल्याणकारी राज्य नहीं कहा जा सकता है। कल्याणकारी राज्य कानून एवं व्यवस्था को बनाए रखने के न्यूनतम कार्य ही नहीं करता, अपितु हस्तक्षेपीय राज्य होने के नाते समाज की बेहतरी के लिए सामाजिक नीतियों को तैयार करने तथा लागू करने हेतु भी अपनी शक्तियों का प्रयोग करता है।

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2. लोकतांत्रिक राज्य – कल्याणकारी राज्य लोकतांत्रिक राज्य होता है। लोकतंत्र कल्याणकारी राज्य के उदय की एक अनिवार्य शर्त है। औपचारिक लोकतांत्रिक संस्थाओं; विशेष रूप से बहुदलीय चुनाव कल्याणकारी राज्य की परिभाषिक विशेषता समझी जाती है। यही कारण है। कि उदारवादी चिंतकों ने समाजवादी तथा साम्यवादी राज्यों को इस परिभाषा से बाहर रखा है।

3. मिश्रित अर्थव्यवस्था वाला राज्य – कल्याणकारी राज्य मिश्रित अर्थव्यवस्था’ वाला राज्य होता है अर्थात् ऐसे राज्य की अर्थव्यवस्था में निजी पूँजीवादी कंपनियाँ तथा सार्वजनिक कंपनियाँ दोनों
एक साथ कार्य करती हैं। एक कल्याणकारी राज्य न तो पूँजीवादी बाजार को ही खत्म करना चाहता है और न ही यह उद्योगों तथा दूसरे क्षेत्रों में जनता को निवेश करने से रोकता है। कमोबेश कल्याणकारी राज्य जरूरत की वस्तुओं और सामाजिक अधिसंरचना पर ध्यान केंद्रित करता है, जबकि उपभोक्ता वस्तुओं पर निजी उद्योगों को वर्चस्व होता है।

ए०आर० देसाई ने कुछ ऐसे तरीके बताए हैं जिनके आधार पर कल्याणकारी राज्य द्वारा किए गए कार्यों का परीक्षण किया जा सकता है। ये कार्य निम्नलिखित हैं –

  1. क्या कल्याणकारी राज्य गरीबी, सामाजिक भेदभाव से मुक्ति तथा अपने सभी नागरिकों की सुरक्षा का ध्यान रखता है?
  2. क्या कल्याणकारी राज्य आय संबंधी असमानताओं को दूर करने के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण कदम उठाता है।
  3. क्या कल्याणकारी राज्य अर्थव्यवस्था को इस प्रकार से परिवर्तित करता है, जहाँ पूँजीपतियों की अधिक-से-अधिक लाभ कमाने की प्रवृत्ति पर, समाज की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए रोक लगाई जा सकती हो?
  4. क्या कल्याणकारी राज्य स्थायी विकास के लिए आर्थिक मंदी तथा तेजी से मुक्त व्यवस्था का ध्यान रखता है?
  5. क्या कल्याणकारी राज्य सबके लिए रोजगार उपलब्ध कराता है?

उपर्युक्त आधारों को ध्यान में रखते हुए देसाई ने उन देशों के प्रदर्शन का परीक्षण किया है जिनको अक्सर कल्याणकारी राज्य कहा जाता है; जैसे-ब्रिटेन, अमेरिका तथा यूरोप के अधिकांश राज्य। अधिकांश आधुनिक पूँजीवादी राज्य अपने आप को कल्याणकारी राज्य कहने हेतु बढ़ा-चढ़ाकर दावे पेश करते हैं, परंतु वे अपने नागरिकों को निम्नतम आर्थिक तथा सामाजिक सुरक्षा देने में असफल रहे हैं। वे आर्थिक असमानताओं को कम करने में भी विफल रहे हैं। तथाकथित कल्याणकारी राज्य बाजार के उतार-चढ़ाव से मुक्त स्थायी विकास करने में भी विफल रहे हैं। अतिरिक्त धन की उपस्थिति तथा अत्यधिक बेरोजगारी इनकी कुछ अन्य असफलताएँ हैं। अपने इन तर्कों के आधार पर देसाई ने यह निष्कर्ष निकाला कि कल्याणकारी राज्य द्वारा मानव कल्याण हेतु किए जाने वाले दावे खोखले हैं तथा कल्याणकारी राज्य की सोच एक भ्रम है। कल्याणकारी राज्यों को इन सभी कार्यों को भी करना चाहिए तथा वास्तव में कल्याणकारी होने का प्रयास करना चाहिए।

प्रश्न 5.
एम०एन० श्रीनिवास के गाँव संबंधी विचारों को संक्षेप में बताइए।
उत्तर
एम०एन० श्रीनिवास ने अपने पूरे जीवन भर गाँव तथा ग्रामीण समाज के विश्लेषण में अत्यंत रुचि ली। उन्होंने गाँव में किए गए क्षेत्रीय कार्यों का नृजातीय विवरण तथा. इस पर परिचर्चा देने के साथ-साथ भारतीय गाँव को सामाजिक विश्लेषण की एक इकाई के रूप में भी स्वीकार किया। 1938 ई० में “Marriage and Family among the Kannada Castes in Mysore State” विषय पर शोध-निबंध लिखकर उन्होंने एम०ए० समाजशास्त्र की उपाधि प्राप्त की। बाद में यह शोध-प्रबंध 1944 ई० में पुस्तक रूप में प्रकाशित भी हो गया। 1944 ई० में उन्हें प्रो०जी०एस० घूर्ये के निर्देशन में दक्षिण भारत के कुर्ग लोगों पर थीसिस लिखने के आधार पर पी-एच० डी० की उपाधि प्रदान की गई।

इसके पश्चात् वह ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में सामाजिक मानवशास्त्र में उच्च अध्ययन करने के लिए चले गए तथा वहाँ सुप्रसिद्ध सामाजिक मानवशास्त्री ए०आर० डिक्लिफ-ब्राउन (A,R.Radcliffe-Brown) तथा ई० ई० ईवांस-प्रिचार्ड (E.E. Evans-Pritchard) के विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुए। जिन आँकड़ों को आधार मानकर उन्होंने बंबई में पी-एच०डी० के लिए थीसिस लिखा था उन्हीं आँकड़ों के आधार पर डी०फिल० (D. Phil.) के लिए “Religion and Society among the Coorgs of South India” नामक विषय पर थीसिस लिखा जो कि 1952 ई० में पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में ही उन्होंने सर्वप्रथम सँस्कृतिकरण’ की अवधारणा का प्रयोग किया है। श्रीनिवास 1999 ई० में स्वर्ग सिधार गए।

एम०एन० श्रीनिवास ने मैसूर के रामपुरा गाँव को अपने अध्ययन को आधार बनाया तथा यह मत प्रकट किया कि गाँव की एक आवश्यक सामाजिक पहचान होती है तथा ऐतिहासिक साक्ष्य इस एकीकृत पहचान की पुष्टि करते हैं। गाँव पर श्रीनिवास द्वारा लिखे गए लेख निम्नलिखित दो प्रकार के हैं –

  1. गाँव में किए गए क्षेत्रीय कार्यों का नृजातीय ब्योरा और इन ब्योरों पर परिचर्चा, तथा
  2. भारतीय गाँव जिस प्रकार सामाजिक विश्लेषण की एक इकाई के रूप में कार्य करते हैं उस पर ऐतिहासिक एवं अवधारणात्मक परिचर्चाएँ।

गाँव की एक संकल्पना के रूप में उसकी उपयोगिता के प्रश्न पर श्रीनिवास का अन्य विद्वानों से विवाद भी हुआ उदाहरणार्थ- लुईसयूमो का मत था कि आति जैसी सामाजिक संस्थाएँ गाँव की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण थीं क्योंकि गाँव केवल कुछ लोगों का विशेष स्थान पर निवास करने वाला समूह मात्र था। गाँव बने रह सकते हैं या समाप्त हो सकते हैं और लोग एक गाँव को छोड़ दूसरे गाँव को जा सकते हैं, लेकिन उनकी जाति अथवा धर्म जैसी सामाजिक संस्थाएँ सदैव उनके साथ रहती हैं और जहाँ वे जाते हैं वहीं सक्रिय हो जाती हैं। इसलिए ड्यूमो का मत था कि गाँव को एक श्रेणी के रूप में महत्त्व देना गुमराह करने वाला हो सकता है।

ड्यूमो जैसे विद्वानों के तर्कों के विपरीत श्रीनिवास ने यह दर्शाया कि गाँव की अपनी एकीकृत पहचान होती है और ग्रामीण एकता ग्रामीण सामाजिक जीवन में काफी महत्त्वपूर्ण है। वह भारतीय गाँव को स्थिर, आत्म-निर्भर एवं छोटे गणतंत्र के रूप में चित्रित करने के विरुद्ध थे। ऐतिहासिक तथा सामाजिक साक्ष्यों द्वारा श्रीनिवास ने यह दर्शाया कि वास्तव में गाँव में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। यहाँ तक कि गाँव कभी भी आत्म-निर्भर नहीं थे और विभिन्न प्रकार के आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक संबंधों से क्षेत्रीय स्तर पर जुड़े हुए थे।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Understanding Society Chapter 5 Indian Sociologists

श्रीनिवास ने एस०सी० दुबे तथा डी०एन० मजूमदार के साथ मिलकर भारतीय समाजशास्त्र में उस समय के ग्रामीण अध्ययन को प्रभावशाली बनाया।.. रामपुरा गाँव के अध्ययन में श्रीनिवास ने संस्कृतिकरण की प्रक्रिया का भी पता लगाया। संस्कृतिकरण वह प्रक्रिया है जिसमें कोई निम्न जाति किसी उच्च जाति; सामान्यतया प्रभु जाति को अपना आदर्श मानकर उसके रीति-रिवाजों को अपनाने लगती है तथा कालांतर में परंपरा से जो स्थान उसे मिला हुआ है उससे ऊँचे स्थान को प्राप्त करने का प्रयास करती है। निम्न जातियाँ संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में मांस भक्षण एवं मदिरापान जैसी खाने की परंपरा को बदलकर शाकाहारी भोजन अपनाने लगती हैं। श्रीनिवास को रामपुरा का अध्ययन संस्कृतिकरण की अवधारणा के कारण ही अत्यधिक प्रसिद्धि प्राप्त कर पाया है।

गाँव के अध्ययन में समाजशास्त्र को नृजातीय शोध कार्य की पद्धति के महत्त्व से परिचय कराने को एक मौका दिया। इस पद्धति पर आधारित अध्ययनों द्वारा भारतीय गाँव में हो रहे परिवर्तनों की जानकारी से विकास की योजनाएँ बनाने में सहायता मिली। ग्रामीण अध्ययनों ने समाजशास्त्र जैसे विषय को स्वतंत्र राज्य के परिप्रेक्ष्य में एक नवीन भूमिका प्रदान की। मात्र आदिम मानव के अध्ययन तक सीमित रहकर, इसे आधुनिकता की ओर आगे बढ़ते समाज के लिए भी उपयोगी बनाया जा सकता है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 1 कबीरदास

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name कबीरदास
Number of Questions 6
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 1 कबीरदास

कवि-परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ

प्रश्न:
कबीरदास का जीवन-परिचय दीजिए।
या
कबीरदास की काव्यगत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
सन्त कबीर का जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों का नामोल्लेख कीजिए तथा साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
सन्त (ज्ञानाश्रयी निर्गुण) काव्यधारा के प्रवर्तक कबीरदास का जन्म संवत् 1456 (सन् 1399) की ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा, सोमवार को हुआ था। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित दोहा प्रसिद्ध है

चौदह सौ पचपन साल गए, चन्द्रवार एक ठाठ ठए।
जेठ सुदी बरसायत को, पूरनमासी प्रगट भए ॥ (कबीर-चरित-बोध)

बाबू श्यामसुन्दर दास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, श्री हजारीप्रसाद द्विवेदी आदि इसी संवत् को स्वीकार करते हैं। एक जनश्रुति के अनुसार इनका जन्म हिन्दू परिवार में हुआ था। कहते हैं कि ये एक विधवा ब्राह्मणी के पुत्र थे, जिसने इन्हें लोक-लाज के भय से काशी के लहरतारा नामक स्थान पर तालाब के किनारे छोड़ दिया था, जहाँ से नीरू नामक एक जुलाहा एवं उसकी पत्नी नीमा नि:सन्तान होने के कारण इन्हें उठा लाये।

कबीर के जन्म-स्थान के सम्बन्ध में भी विद्वानों में मतभेद हैं, परन्तु अधिकतर विद्वान् इनका जन्म काशी में ही मानते हैं, जिसकी पुष्टि स्वयं कबीर की यह कथन भी करता है – काशी में परगट भये, हैं रामानन्द चेताये। इससे इनके गुरु का नाम भी पता चलता है कि प्रसिद्ध वैष्णव सन्त आचार्य रामानन्द से इन्होंने दीक्षा ग्रहण की। गुरुमन्त्र के रूप में इन्हें ‘राम’ नाम मिला, जो इनकी समग्र भावी साधना का आधार बना।

कबीर की पत्नी का नाम लोई था, जिससे इनके कमाल नामक पुत्र और कमाली नामक पुत्री उत्पन्न हुई। कबीर बड़े निर्भीक और मस्तमौला स्वभाव के थे। व्यापक देशाटन एवं अनेक साधु-सन्तों के सम्पर्क में आते रहने के कारण इन्हें विभिन्न धर्मों एवं सम्प्रदायों का ज्ञान प्राप्त हो गया था। ये बड़े सारग्राही एवं प्रतिभाशाली थे। कबीर की दृढ़ मान्यता थी कि मनुष्य को अपने कर्मों के अनुसार ही गति मिलती है, स्थान-विशेष के प्रभाव से नहीं। अपनी इसी मान्यता को सिद्ध करने के लिए अन्त समय में ये मगहर चले गये; क्योंकि लोगों की मान्यता थी कि काशी में मरने वाले को मुक्ति मिलती है, किन्तु मगहर में मरने वाले को नरक। अधिकतर विद्वानों ने माना है कि कबीर की मृत्यु संवत् 1575 (सन् 1519) में हुई। इसके समर्थन में अग्रलिखित उक्ति प्रसिद्ध है

संवत् पंद्रह सौ पछत्तरा, कियो मगहर को गौन।
माघे सुदी एकादशी, रलौ पौन में पौन ॥

कृतियाँ-कबीर लिखना-पढ़ना नहीं जानते थे। यह बात उन्होंने स्वयं कही है
मसि कागद छूयो नहीं, कलम गयो नहिं हाथ।

उनके शिष्यों ने उनकी वाणियों का संग्रह ‘बीजक’ नाम से किया, जिसके तीन मुख्य भाग हैं – साखी, सबद (पद), रमैनी। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार ‘बीजक’ का सर्वाधिक प्रामाणिक अंश ‘साखी’ है। इसके बाद सबद और अन्त में ‘रमैनी’ का स्थान है।

साखी संस्कृत के ‘साक्षी’ शब्द का विकृत रूप है और ‘धर्मोपदेश’ के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। अधिकांश साखियाँ दोहों में लिखी गयी हैं, पर उनमें सोरठे का प्रयोग भी मिलता है। कबीर की शिक्षाओं और सिद्धान्तों का निरूपण अधिकतर ‘साखी’ में हुआ है।
सबद गेय-पद हैं, जिनमें संगीतात्मकता पूरी तरह विद्यमान है। इनमें उपदेशात्मकता के स्थान पर भावावेश की प्रधानता है; क्योंकि इनमें कबीर के प्रेम और अन्तरंग साधना की अभिव्यक्ति हुई है।
रमैनी चौपाई छन्द में रची गयी है। इनमें कबीर के रहस्यवादी और दार्शनिक विचारों को प्रकट किया गया है।

काव्यगत विशेषताएँ

भावपक्ष की विशेषताएँ

कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे, किन्तु ये बहुश्रुत होने के साथ-साथ उच्च कोटि की प्रतिभा से सम्पन्न थे। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी स्पष्ट कहा है कि ‘‘कविता करना कबीर का लक्ष्य नहीं था, कविता तो उन्हें सेंत-मेंत में मिली वस्तु थी, उनका लक्ष्य लोकहित था।” इस दृष्टि से उनके काव्य में उनके दो रूप दिखाई पड़ते हैं (1) सुधारक रूप तथा (2) साधक (या भक्त) रूप। उनके बाद वाले रूप में ही उनके सच्चे कवित्व के दर्शन होते हैं।

(1) कबीर का सुधारक रूप – कबीरदास के समय में हिन्दुओं और मुसलमानों में कटुता चरम सीमा पर थी। कबीर ने इन दोनों को पास लाना चाहा। इसके लिए उन्होंने सामाजिक और धार्मिक दोनों स्तरों पर प्रयास किया।

(क) सामाजिक स्तर पर कबीर ने देखा कि मुस्लिम समाज में समता का भाव विद्यमान है, परन्तु हिन्दू-समाज में ऊँच-नीच और छुआछूत का भाव बहुत प्रबल है। फलत: हिन्दू समाज में व्याप्त विषमता पर कटु प्रहार करते हुए वे कहते हैं

ऊँचे कुल क्या जनमिया, जे करणी ऊँच न होइ।
सोवन कलस सुरै भया, साधू निंदा सोई॥

(ख) धार्मिक क्षेत्र में भी कबीर का सुधारक रूप उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि सामाजिक क्षेत्र में। उन्होंने देखा कि सारे धर्मों का मूल तत्त्व एक ही है, केवल बाहरी आचार-विचार (जैसे—मूर्तिपूजा, उपवास, तीर्थ, रोजा, नमाज आदि) में भिन्नता के कारण धर्म भी भिन्न दिखाई पड़ते हैं; सर्वत्र पाखण्ड का साम्राज्य है, चाहे हिन्दू हों या मुसलमान, सभी आडम्बर में विश्वास करते हैं। अत: उन्होंने हिन्दू-मुसलमानों में व्याप्त इन बाह्याडम्बरों का डटकर विरोध किया

पाहन पूजे, हरि मिलें, तो मैं पूजू पहार।
ताते यह चाकी भली, पीसि खाय संसार ॥ (मूर्तिपूजा का खण्डन)
काँकर-पाथर जोरि कै, मसजिद लई बनाय।
तो चढि मुल्ला बॉग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाय ॥ (अजान की निरर्थकता)

इस प्रकार सुधारक के रूप में कबीरदास की वाणी कटु लगती है, पर उनके तर्क बड़े सटीक और विरोधी को निरुत्तर करने वाले हैं।

(2) कबीर का साधक( या भक्त )रूप:
सुधारक रूप में यदि कबीर में तर्कशक्ति और बुद्धि की प्रखरता देखने को मिलती है तो साधक रूप में उनके भावुक हृदय से मार्मिक साक्षात्कार होता है। कबीर के अनुसार मानव-जीवन की सार्थकता ईश्वर-दर्शन में है। उस ईश्वर को विभिन्न धर्मों के अनुयायी अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। कबीर ने इसे राम नाम से पुकारा है, पर उनके राम दशरथ-पुत्र श्रीराम न होकर निर्गुण-निराकार राम
कबीर का कहना है कि परमात्मा को प्रेम से ही पाया जा सकता है। प्रेम की साधना वस्तुतः विरह की साधना है। आठों प्रहर राम के ध्यान में डूबे रहना ही सच्चे प्रेम का लक्षण है

चिन्ता तो हरि नाँव की, और न चिन्ता दास।
जो कुछ चितवै राम बिन, सोइ काल के पास ॥

कबीर पर यद्यपि वेदान्त के अतिरिक्त हठयोग का भी प्रभाव परिलक्षित होता है, परन्तु सामान्यतः वे सहज साधना पर ही बल देते हैं। कबीर के काव्य का मुख्य प्रतिपादृा-निर्गुण सत्ता के प्रति ज्ञानपूर्ण भक्ति का निवेदन है। कलापक्ष की विशेषताएँ

(1) अनगढ़, किन्तु सहज-सशक्त भाषा – कबीर ने जो कुछ कहा है, वह स्वानुभूति के बल पर ही कहा है, फलतः उनकी वाणी में बड़ी सहजता और मार्मिकता है, जो हृदय पर सीधी चोट करती है। कुछ लोग उनकी भाषी को अनगढ़ कहते हैं, पर दूसरों की दृष्टि में यह अनगढ़ता ही उनकी सहजता है। व्यापक देशाटन के कारण उनकी भाषा में विभिन्न प्रादेशिक बोलियों का सम्मिश्रण होना स्वाभाविक था। उन्होंने स्वयं अपनी भाषा को ‘पूरबी’ कहा है, किन्तु उसमें अवधी, ब्रज, खड़ी बोली, राजस्थानी, पंजाबी, संस्कृत, फारसी आदि का मिश्रण भी दिखाई पड़ता है। इसी कारण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जैसे विद्वान् उनकी भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ या ‘पंचमेल खिचड़ी’ कहते हैं।

(2) प्रवाहमयी शैली – कबीर की शैली उपदेशात्मक, व्यंग्यात्मक एवं भावात्मक है। उसमें अद्भुत प्रवाह, स्वाभाविकता एवं मार्मिकता है। वह किसी पहाड़ी झरने की भाँति अपने तेज बहाव में हमको बहाती चलती है और हमारे मने पर एक अमिट छाप छोड़ जाती है। उनके पदों में संगीतात्मकता है। रहस्यवादी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के स्थलों पर प्रतीकों का प्रयोग हुआ है और उलटबाँसियों में चमत्कारपूर्ण शैली के कारण कुछ दुर्बोधता भी आ गयी है।

(3) अलंकार – अनुप्रास, यमक, उपमा, रूपक, विरोधाभास, अन्योक्ति, दृष्टान्त आदि अनेक अलंकार स्वाभाविक रूप से उनके काव्य को शोभा प्रदान करते हैं। रूपक का एक उदाहरण प्रस्तुत है
संतौ     भाई      आई     ग्यान    की     आँधी    रे।
भ्रम की.टाटी सबै उड़ाणीं, माया रहै न बाँधी रे॥

(4) छन्द – कबीर ने दोहा, चौपाई तथा गेय-पदों में काव्य-रचना की है। कबीर को दोहा बहुत प्रिय है। इनकी साखियों में दोहा, रमैनी में चौपाई तथा सबद में गेय-पदों का प्रयोग हुआ है, जो भावाभिव्यंजना में पूर्ण समर्थ है।

(5) प्रतीकात्मकता – अपने सिद्धान्त के प्रतिपादन के लिए कबीर ने प्रतीकों का प्रचुरता से प्रयोग किया है। यह उन पर साधनात्मक रहस्यवाद के प्रभाव को भी सूचक है। सामान्यतः इससे उनकी शैली की व्यंजकता बढ़ी है। जैसे – शरीर को ईश्वर रूपी जुलाहे के हाथों बुनी बारीक चादर का प्रतीक बनाना अत्यन्त सारगर्भित है – झीनी झीनी-बीनी चदरिया”
साहित्य में स्थान – आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार, “हिन्दी-साहित्य के हजार वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई लेखक उत्पन्न नहीं हुआ। महिमा में यह व्यक्तित्व केवल एक ही प्रतिद्वन्द्वी जानता है – तुलसीदास।”

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न:
निम्नलिखित पद्यांशों के आधार पर उनसे सम्बन्धित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए

साखी

प्रश्न 1:
दीपक  दीया  तेल भरि,  बाती  दई  अघट्ट ।
पूरा किया बिसाहुणाँ, बहुरि न आवौं हट्ट ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कबीर ने दीपक किसे बताया है?
(iv) कबीर ने बाजार किसे बताया है?
(v) कबीर की आत्मा दोबारा इस संसार में क्यों नहीं आना चाहती?
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘साखी’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है। इसके रचयिता भक्त कवि कबीरदास हैं।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – साखी।
कवि का नाम – कबीरदास।
[संकेत – इस शीर्षक के शेष सभी पद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।]

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – कबीर कहते हैं कि गुरु ने अपने शिष्य को प्रेमरूपी तेल से भरा हुआ ज्ञानरूपी दीपक दिया। उसमें कभी न घटने वाली ईश्वरीय लगनरूपी बत्ती भी दे दी। इस अद्भुत ज्ञानरूपी दीपक के प्रकाश में कबीर ने अपने जीवन को फेरा और तब उसे इस संसाररूपी बाजार में | कुछ भी खरीदने-बेचने के लिए दुबारा नहीं आना पड़ेगा, क्योंकि उसकी जीवात्मा ब्रह्ममय हो जाएगी ‘ और परब्रह्म सनातन है, उसका जन्म-मरण नहीं होता।
(iii) कबीर ने गुरु ज्ञान को दीपक बताया है।
(iv) कबीर ने इस संसार को बाजार बताया है।
(v) कबीर की आत्मा जीवन-मरण का कष्ट भोगने के लिए दोबारा इस संसार में नहीं आना चाहती।

प्रश्न 2:
केसौ कहि कहि कूकिये, ना सोइयै असरार ।
राति दिवस कै कूकणें, कबहूँ लगै पुकार ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कबीर ने ईश्वर-प्राप्ति का अचूक साधन किसे बताया है?
(iv) कबीर ने किंस नींद में सोने से मना किया है?
(v) कबीर प्रभु-स्मरण से क्या प्राप्त करना चाहते हैं?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – राम का नाम बहुत प्यारा नाम है, इसलिए बार-बार राम का नाम लीजिए। हठपूर्वक अज्ञान की नींद में सोते मत रहिए, रात-दिन ईश्वर का नाम जपने से कभी-न-कभी आपकी पुकार की भनक दीन-दयालु के कानों में अवश्य पड़ेगी। फलत: वे तुम पर कृपा करेंगे और तुम्हारा उद्धार होगा।
(iii) कबीर ने ईश्वर-प्राप्ति का अचूक साधन प्रभु-स्मरण को बताया है।
(iv) कबीर ने अज्ञान की नींद सोने से मना किया है।
(v) कबीर प्रभु-स्मरण से मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं।

प्रश्न 3:
पाणी  ही  हैं  हिम भया,  हिम  है  गया  बिलाइ ।
जो कुछ था सोई भया, अब कुछ कहा न जाई ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(ii) कबीर ने पानी और बर्फ का उदाहरण देकर क्या बताया है?
(iv) जल (ब्रह्म) की दूसरी अवस्था कौन-सी है?
(v) जीवात्मा मोक्ष प्राप्त करके किसका रूप धारण करती है?
उत्तर:
(i) रेखांकित अंश की व्याख्या – कबीरदास जी ने यहाँ पानी को परमात्मा और बर्फ को जीवात्मा के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा है कि जिस प्रकार पानी जमकर बर्फ और बर्फ पिघलकर पानी बन जाता है, ठीक उसी प्रकार ईश्वर से साकार जीवात्मा का जन्म होता है और शरीर को त्यागकर वह जीवात्मा पुनः परमात्मा में विलीन हो जाती है। इस प्रकार कबीरदास जी ने इस दार्शनिक तथ्य आत्मा परमात्मा का ही एक अंश है’ को अभिव्यक्ति दी है।
(iii) कबीर ने पानी और बर्फ का उदाहरण देकर जीवात्मा को परमात्मा का ही रूप बताया है।
(iv) जल (ब्रह्म) की दूसरी अवस्था बर्फ (जीव) है।
(v) जीवात्मा मोक्ष प्राप्त करके परमात्मा का रूप धारण करती है।

पदावली

प्रश्न 1:
पंडित बाद बदंते झुठा ।
राम कह्याँ दुनियाँ गति पावै, खाँड कह्याँ मुख मीठा ।।
पावक कह्याँ पाँव जे दाझै, जल कहि त्रिषा बुझाई ।
भोजन कह्याँ भूषि जे भाजै, तो सब कोई तिरि जाई ।।
नर के साथ सूवा हरि बोले, हरि परताप न जाणै ।
जो कबहूँ उड़ि जाइ जंगल मैं, बहुरि न सुर तें आजै ।।
साँची प्रीति बिषै माया हूँ, हरि भगतनि सँ हाँसी ।
कहै कबीर प्रेम नहिं उपज्यौ, बाँध्यौ जमपुरि जासी ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) पंडित लोग किस बात को निरर्थक बताते हैं ।
(iv) किसकी संगति में तोता राम-नाम का उच्चारण करने लगता है?
(v) यदि राम-नाम का उच्चारण करने वाले व्यक्ति के हृदय में सच्चा प्रेम उत्पन्न नहीं होता तो उसकी क्या दशा होती है?
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘पदावली’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है। इसके रचयितासन्त कवि कबीरदास हैं।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – पदावली।
कवि का नाम – कबीरदास।
[संकेत-इस शीर्षक के शेष सभी पद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – कबीरदास जी का कहना है कि पण्डित लोग ईश्वर के विषय में झूठी
बातें करते हैं; जैसे –  “राम का नाम लेने मात्र से ही मुक्ति मिल जाती हैं। कबीर इसका विरोध करते हैं। उनका तर्क है कि यदि राम का नाम लेने मात्र से मुक्ति मिलती तो पानी का नाम लेने से प्यास बुझ जाती और भोजन कहने मात्र से भूख मिट जाती, पर वास्तव में ऐसा होता नहीं। मुक्ति के लिए हृदय की पवित्रता, साधना, सदाचार एवं ज्ञानपूर्ण भक्ति आवश्यक है।
(iii) पंडित लोग निजी अनुभव के बिना शास्त्र के आधार पर जो तर्क प्रस्तुत करते हैं वे सब निरर्थक हैं।
(iv) मनुष्य की संगति में तोता राम-नाम का उच्चारण करने लगता है।
(v) यदि राम नाम का उच्चारण करने वाले व्यक्ति के हृदय में सच्चा प्रेम उत्पन्न नहीं होता तो उसकी वही दशा होती है जो साधारण जनों की होती है।

प्रश्न 2:
काहे री नलनीं हूँ कुम्हिलानी,
तेरे       ही                नालि                सरोवर          पानी ।
जल में उतपति जल मैं बास, जल मैं नलनी तोर निवास ।।
ना तलि तपति न ऊपरि आगि, तोर हेतु कहु कासनि लागि ।
कहै कबीर जे उदिक समान, ते नहिं मूए हमारे जान ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(i) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(ii) कबीरदास ने कमलिनी और जल को किसका प्रतीक माना है?
(iv) जीवात्मा क्यों दुःखों का अनुभव करती है?
(v) कैसे साधक कभी नहीं मरते?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – कबीर ने कमलिनी को सम्बोधित करते हुए कहा है कि हे कमलिनी! तेरा जन्म जल में हुआ है और जल में ही तू रहती है। इस रूप में ‘कमलिनी आत्मा का और ‘जल’ परमात्मा का प्रतीक है। कबीर का मत है कि जो स्वयं ब्रह्मस्वरूप हो गये हैं, वे कभी भी मृत्यु को प्राप्त नहीं होते। ब्रह्मस्वरूप हो जाने पर मृत्यु से कैसा भय? ।
(iii) कबीरदास ने कमलिनी को जीवात्मा का और जल को परमात्मा का प्रतीक माना है।
(iv) जीवात्मा सांसारिक विषयों के भ्रम में पड़कर वास्तविक आनन्द न पाकर दु:खों का अनुभव करती है।
(v) जिनकी आत्मा परमात्मा में लीन रहती है ऐसे साधक कभी नहीं मरते।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 1 राष्ट्र को स्वरूप

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Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name राष्ट्र को स्वरूप (डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल)
Number of Questions 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi गद्य गरिमा Chapter 1 राष्ट्र को स्वरूप (डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल)

लेखक का साहित्यिक परिचय और कृतियाँ

प्रश्न 1.
वासुदेवशरण अग्रवाल का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों पर प्रकाश डालिए। [2009, 10, 11]
या
वासुदेवशरण अग्रवाल का साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी कृतियों पर प्रकाश डालिए। [2012, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
उत्तर
जीवन-परिचय-डॉ० अग्रवाल का जन्म सन् 1904 ई० में मेरठ जनपद के खेड़ा ग्राम में हुआ था। इनके माता-पिता लखनऊ में रहते थे; अत: इनका बचपन लखनऊ में व्यतीत हुआ और यहीं इनकी प्रारम्भिक शिक्षा भी हुई। इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम०ए० तथा लखनऊ विश्वविद्यालय से ‘पाणिनिकालीन भारत’ नामक शोध-प्रबन्ध पर डी०लिट्० की उपाधि प्राप्त की।

डॉ० अग्रवाल ने पालि, संस्कृत एवं अंग्रेजी भाषाओं; भारतीय संस्कृति और पुरातत्त्व का गहन अध्ययन करके उच्चकोटि के विद्वान् के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त की और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में ‘पुरातत्त्व एवं प्राचीन इतिहास विभाग के अध्यक्ष और बाद में आचार्य पद को सुशोभित किया। डॉ० अग्रवाल ने लखनऊ तथा मथुरा के पुरातत्त्व संग्रहालयों में निरीक्षक पद पर, केन्द्रीय सरकार के पुरातत्त्व विभाग में संचालक पद पर तथा दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में अध्यक्ष तथा आचार्य पद पर भी कार्य किया। भारतीय संस्कृति और पुरातत्त्व का यह महान् पण्डित एवं साहित्यकार सन् 1967 ई० में परलोक सिधार गया।

साहित्यिक योगदान–डॉ० अग्रवाल भारतीय संस्कृति, पुरातत्त्व और प्राचीन इतिहास के प्रकाण्ड पण्डित एवं अन्वेषक थे। इनके मन में भारतीय संस्कृति को वैज्ञानिक अनुसन्धान की दृष्टि से प्रकाश में लाने की उत्कट इच्छा थी; अतः इन्होंने उत्कृष्ट कोटि के अनुसन्धानात्मक निबन्धों की रचना की। इनके अधिकांश निबन्ध प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति से सम्बद्ध हैं। इन्होंने अपने निबन्धों में प्रागैतिहासिक, वैदिक एवं पौराणिक धर्म का उद्घाटन किया। निबन्ध के अतिरिक्त इन्होंने पालि, प्राकृत और संस्कृत के अनेक ग्रन्थों का सम्पादन और पाठ-शोधन का कार्य किया। जायसी के ‘पद्मावत’ पर इनकी टीका सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इन्होंने बाणभट्ट के ‘हर्षचरित’ का सांस्कृतिक अध्ययन प्रस्तुत किया और प्राचीन महापुरुषों-श्रीकृष्ण, वाल्मीकि, मनु आदि का आधुनिक दृष्टि से बुद्धिसम्मत चरित्र प्रस्तुत किया। हिन्दी-साहित्य के इतिहास में अपनी मौलिकता, विचारशीलता और विद्वत्ता के लिए ये चिरस्मरणीय रहेंगे।

कृतियाँ-डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल ने निबन्ध, शोध एवं सम्पादन के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किया। इनकी प्रमुख रचनाओं का विवरण निम्नवत् है—
निबन्ध-संग्रह-‘पृथिवी-पुत्र’, ‘कल्पलता’, ‘कला और संस्कृति’, ‘कल्पवृक्ष’, ‘भारत की एकता’, ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’, ‘वाग्धारा’ आदि इनके प्रसिद्ध निबन्ध-संग्रह हैं।
शोध प्रबन्ध-‘पाणिनिकालीन भारतवर्ष’।।
आलोचना-ग्रन्थ-‘पद्मावत की संजीवनी व्याख्या’ तथा ‘हर्षचरित का सांस्कृतिक अध्ययन’।
सम्पादन–पालि, प्राकृत और संस्कृत के एकाधिक ग्रन्थों का।।
साहित्य में स्थान-भारतीय संस्कृति और पुरातत्त्व के विद्वान् डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल का निबन्धसाहित्य अत्यधिक समृद्ध है। पुरातत्त्व और अनुसन्धान के क्षेत्र में उनकी समता कोई नहीं कर सकता। विचार- प्रधान निबन्धों के क्षेत्र में तो इनका योगदान सर्वथा अविस्मरणीय है। निश्चय ही हिन्दी-साहित्य में इनको मूर्धन्य स्थान है।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोचर

प्रश्न–दिए गए गद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1.
धरती माता की कोख में जो अमूल्य निधियाँ भरी हैं जिनके कारण वह वसुंधरा कहलाती है उससे कौन परिचित न होना चाहेगा? लाखों-करोड़ों वर्षों से अनेक प्रकार की धातुओं को पृथिवी के गर्भ में पोषण मिला है। दिन-रात बहने वाली नदियों ने पहाड़ों को पीस-पीसकर अगणित प्रकार की मिट्टियों से पृथिवी की देह को सजाया है। हमारे भावी आर्थिक अभ्युदय के लिए इन सबकी जाँच-पड़ताल अत्यन्त आवश्यक है। पृथिवी की गोद में जन्म लेने वाले जड़-पत्थर कुशल शिल्पियों से सँवारे जाने पर अत्यन्त सौन्दर्य के प्रतीक बन जाते हैं। नाना भाँति के अनगढ़ नग विन्ध्य की नदियों के प्रवाह में सूर्य की धूप से चिलकते रहते हैं, उनको जब चतुर कारीगर पहलदार कटाव पर लाते हैं तब उनके प्रत्येक घाट से नयी शोभा और सुन्दरता फूट पड़ती है। वे अनमोल हो जाते हैं। देश के नर-नारियों के रूप-मंडन और सौन्दर्य प्रसाधने में इन छोटे पत्थरों का भी सदा से कितना भाग रहा है; अतएव हमें उनका ज्ञान होना भी
आवश्यक है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) दिन-रात बहने वाली नदियों ने किस प्रकार से पृथिवी की देह को सजाया है?
(iv) पृथिवी की गोद में जन्म लेने वाले जड़-पत्थर कैसे सौन्दर्य के प्रतीक बन जाते हैं?
(v) लेखक ने हमें किनके योगदान के बारे में बताते हुए उनसे परिचित होने की प्रेरणा दी है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित एवं भारतीय संस्कृति के अध्येता डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल द्वारा लिखित ‘राष्ट्र का स्वरूप’ शीर्षक निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम- राष्ट्र का स्वरूप।
लेखक का नाम-वासुदेवशरण अग्रवाल।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–विद्वान् लेखक ने कहा है कि धरती माता की कोख में अमूल्य रत्न भरे पड़े हैं। इन्हीं रत्नों के कारण पृथ्वी का एक नाम वसुन्धरा (वसुओं = रत्नों को धारण करने वाली) भी है। बहुमूल्य रत्न, धातुएँ व खनिज पदार्थ, अन्न, फल, जल और इसी प्रकार की असंख्य अनमोल वस्तुओं, जिन्हें भूमि अपने आँचल में छिपाये रहती है, से हमारा प्रगाढ़ परिचय होना ही चाहिए।
(iii) दिन-रात बहने वाली नदियों ने पहाड़ों को पीस-पीसकर अगणित प्रकार की मिट्टियों से पृथिवी की देह को सजाया है।
(iv) पृथिवी की गोद में जन्म लेने वाले जड़-पत्थर कुशल शिल्पियों के सँवारे जाने पर अत्यन्त सौन्दर्य के प्रतीक बन जाते हैं। लेखक ने हमें छोटे-छोटे पत्थरों के योगदान के बारे में बताते हुए उन अमूल्य निधियों से परिचित होने के बात कही है।

प्रश्न 2.
राष्ट्र का तीसरा अंग जन की संस्कृति है। मनुष्यों ने युगों-युगों में जिस सभ्यता का निर्माण किया है वही उसके जीवन की श्वास-प्रश्वास है। बिना संस्कृति के जन की कल्पना कबंधमात्र है; संस्कृति ही जन का मस्तिष्क है। संस्कृति के विकास और अभ्युदय के द्वारा ही राष्ट्र की वृद्धि सम्भव है। राष्ट्र के समग्र रूप में भूमि और जन के साथ-साथ जन की संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यदि भूमि और जन अपनी संस्कृति से विरहित कर दिए जायँ तो राष्ट्र का लोप समझना चाहिए। जीवन के विटप को पुष्प संस्कृति है। संस्कृति के सौन्दर्य और सौरभ में ही राष्ट्रीय जन के जीवन का सौन्दर्य और यश अन्तर्निहित है। ज्ञान
और कर्म दोनों के पारस्परिक प्रकाश की संज्ञा संस्कृति है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) राष्ट्र के समग्र रूप में भूमि और जन के साथ-साथ किसका महत्त्वपूर्ण स्थान है?
(iv) कब राष्ट्र का लोप समझना चाहिए?
(v) संस्कृति के सौन्दर्य और सौरभ में क्या अन्तर्निहित है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित एवं भारतीय संस्कृति के अध्येता डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल द्वारा लिखित ‘राष्ट्र का स्वरूप’ शीर्षक निबन्ध से अवतरित है।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या वास्तव में संस्कृति मनुष्य का मस्तिष्क है और मनुष्य के जीवन में मस्तिष्क सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अंग है, क्योंकि मानव-शरीर का संचालन और नियन्त्रण उसी से होता है। जिस प्रकार से मस्तिष्क से रहित धड़ को व्यक्ति नहीं कहा जा सकता है अर्थात् मस्तिष्क के बिना मनुष्य की कल्पना नहीं की जा सकती, उसी प्रकार संस्कृति के बिना भी मानव-जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। इसलिए संस्कृति के विकास और उसकी उन्नति में ही किसी राष्ट्र का विकास, उन्नति और समृद्धि निहित है।
(iii) राष्ट्र के समग्र रूप में भूमि और जैन के साथ-साथ जन की संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थान है।
(iv) यदि भूमि और जन अपनी संस्कृति से विरहित कर दिए जाएँ तो राष्ट्र का लोप समझना चाहिए।
(v) संस्कृति के सौन्दर्य और सौरभ में राष्ट्रीय जन के जीवन का सौन्दर्य और यश अन्तर्निहित है।

प्रश्न 3.
साहित्य, कला, नृत्य, गीत, आमोद-प्रमोद, अनेक रूपों में राष्ट्रीय जन अपने-अपने मानसिक भावों को प्रकट करते हैं। आत्मा का जो विश्वव्यापी आनंद-भाव है, वह इन विविध रूपों में साकार होता है। यद्यपि बाह्य रूप की दृष्टि से संस्कृति के ये बाहरी लक्षण अनेक दिखायी पड़ते हैं, किन्तु आन्तरिक आनंद की दृष्टि से उनमें एकसूत्रता है। जो व्यक्ति सहदय है, वह प्रत्येक संस्कृति के आनंद-पक्ष को स्वीकार करता है और उससे आनंदित होता है। इस प्रकार की उदार भावना ही विविध जनों से बने हुए राष्ट्र के लिए स्वास्थ्यकर है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) किन रूपों में राष्ट्रीय जन अपने-अपने मानसिक भावों को प्रकट करते हैं?
(iv) सहृदय व्यक्ति किसको स्वीकार करते हुए आनंदित होता है?
(v) प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक ने राष्ट्र के किस स्वरूप पर प्रकाश डाला है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित एवं भारतीय संस्कृति के अध्येता डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल द्वारा लिखित ‘राष्ट्र का स्वरूप’ शीर्षक निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम– राष्ट्र का स्वरूप।
लेखक का नाम-वासुदेवशरण अग्रवाल।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक कहते हैं कि एक ही राष्ट्र के भीतर अनेकानेक उपसंस्कृतियाँ फलती-फूलती हैं। इन संस्कृतियों के अनुयायी नाना प्रकार के आमोद-प्रमोदों में अपने हृदय के उल्लास को प्रकट किया करते हैं। साहित्य, कला, नृत्य, गीत इत्यादि संस्कृति के विविध अंग हैं। इनका प्रस्तुतीकरण उस आनन्द की भावना को व्यक्त करने के लिए किया जाता है, जो सम्पूर्ण विश्व की आत्माओं में विद्यमान है।
(iii) साहित्य, कला, नृत्य, आमोद-प्रमोद, अनेक रूपों में राष्ट्रीय जन अपने-अपने मासिक भावों को प्रकट करते हैं।
(iv) सहृदय व्यक्ति प्रत्येक संस्कृति के आनन्द-पक्ष को स्वीकार करते हुए उससे आनन्दित होता है।
(v) प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक ने विविध संस्कृति वाले राष्ट्र की एकसूत्रता और उसके एकीकृत स्वरूप पर प्रकाश डाला है।

प्रश्न 4.
पूर्वजों ने चरित्र और धर्म-विज्ञान, साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में जो कुछ भी पराक्रम किया है। उस सारे विस्तार को हम गौरव के साथ धारण करते हैं और उसके तेज को अपने भावी जीवन में साक्षात् देखना चाहते हैं। यही राष्ट्र-संवर्धन का स्वाभाविक प्रकार है। जहाँ अतीत वर्तमान के लिए भाररूप नहीं है, जहाँ भूत वर्तमान को जकड़ नहीं रखना चाहता वरन् अपने वरदान से पुष्ट करके उसे आगे बढ़ाना चाहता है, उस राष्ट्र का हम स्वागत करते हैं।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) पूर्वजों की किन उपलब्धियों को हम गौरव के साथ धारण करते हैं?
(iv) किस राष्ट्र का हम स्वागत करते हैं?
(v) प्रस्तुत गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित एवं भारतीय संस्कृति के अध्येता डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल द्वारा लिखित ‘राष्ट्र का स्वरूप’ शीर्षक निबन्ध से अवतरित है।
अथवा
पाठ का नाम- राष्ट्र का स्वरूप।
लेखक का नाम-वासुदेवशरण अग्रवाल।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या–विद्वान लेखक कहते हैं कि हमारे पूर्वजों ने धर्म, विज्ञान, साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में महान् सफलताएँ प्राप्त की थीं। हम उनकी उपलब्धियों पर गौरव का अनुभव करते हैं। उन्होंने जो महान् कार्य किये, हमें उन्हें अपने जीवन में अपनाना चाहिए। हमें इसमें गौरव की अनुभूति होनी चाहिए कि हम उनके महान् कार्यों का अनुसरण कर रहे हैं। अपने पुरखों के महान् आदर्शों को अपने जीवन में उतारने से हमारा जीवन सफल और महान् बनेगा। राष्ट्र की प्रगति और
समृद्धि का स्वाभाविक तरीका यही है। ऐसा करने से ही राष्ट्र की उन्नति सम्भव है।
(iii) पूर्वजों ने चरित्र और धर्म विज्ञान, साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में जो कुछ भी उपलब्धियाँ की हैं। उनको हम गौरव के साथ साधारण करते हैं।
(iv) जहाँ अतीत वर्तमान के लिए भाररूप नहीं है, जहाँ भूत वर्तमान को जकड़ नहीं रखना चाहता वरन् अपने वरदान से पुष्ट करके उसे आगे बढ़ाना चाहता है, उस राष्ट्र का हम स्वागत करते हैं।
(v) प्रस्तुत गद्यांश का आशय यह है कि राष्ट्र की उन्नति उसकी प्राचीन परम्पराओं से संदेश लेकर भविष्य के लिए समयानुकूल नवीन प्रयास करने पर निर्भर करती हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Sociology Understanding Society Chapter 4 Introducing Western Sociologists

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sociology
Chapter Chapter 4
Chapter Name Introducing Western Sociologists
Number of Questions Solved 61
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Understanding Society Chapter 4 Introducing Western Sociologists (पाश्चात्य समाजशास्त्री-एक परिचय)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बौद्धिक ज्ञानोदय किस प्रकार समाजशास्त्र के विकास के लिए आवश्यक है?
उत्तर
समाजशास्त्र के विकास में बौद्धिक ज्ञानोदय की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। ज्ञानोदय को ‘विवेक का युग’ कहा जाता है। 17 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध एवं 18 वीं शताब्दी में पश्चिमी यूरोप के देशों में विश्व के बारे में सोचने-विचारने का एक नया दृष्टिकोण विकसित हुआ जिसे ज्ञानोदय कहा जाता है। इस नवीन दर्शन ने एक ओर मनुष्य को संपूर्ण ब्रह्मांड के केंद्र-बिंदु के रूप में स्थापित कर दिया तो दूसरी ओर विवेक को मनुष्य की प्रमुख विशेषता के रूप में प्रतिपादित किया।

विवेकपूर्ण एवं आलोचनात्मक ढंग से सोचने की क्षमता ने मनुष्य को अपनी ही नजर में हमेशा के लिए परिवर्तित कर दिया। यद्यपि व्यक्ति को ज्ञान के उत्पादक एवं उपभोक्ता के रूप में प्रतिस्थापित किया गया, तथापि उन्हीं व्यक्तियों को पूर्ण रूप से मनुष्य माना गया जो विवेकपूर्ण ढंग से सोच-विचार सकते थे। इस क्षमता के न होने वाले व्यक्तियों को आदिमानव’ अथवा ‘बर्बर मानव’ कहा गया। मानव समाज चूंकि मनुष्यों द्वारा बनाया जाता है इसलिए इसका युक्तिसंगत विश्लेषण संभव है। इस प्रकार के विश्लेषण की मदद से एक समाज में रहने वाले लोग दूसरे समाज को भी समझ सकते हैं।

विवेकपूर्ण एवं आलोचनात्मक ढंग से सोचने की क्षमता ने धर्म, संप्रदाय व देवी-देवताओं के महत्त्व को कम कर दिया तथा ‘धर्मनिरपेक्षता’ ‘वैज्ञानिक सोच तथा ‘मानवतावादी सोच’ जैसी वैचारिक प्रवृत्तियाँ विकसित हुईं। प्रोटेस्टेंट विद्रोह तथा वैज्ञानिक क्रांति ने 18वीं शताब्दी में जिस ज्ञानोदय के युग का प्रारंभ किया उसमें सामाजि एवं राजनीतिक समस्याओं के प्रति नवीन दृष्टि से विचार किया जाने लगा। इसी नवीन दृष्टि ने समाजशास्त्र के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

ज्ञानोदय द्वारा व्यक्तिवाद को बढ़ावा मिला तथा यह दृढ़ विश्वास विकसित हुआ कि प्राकृतिक विज्ञानों की पद्धति द्वारा मानवीय पहलुओं का अध्ययन किया जा सकता है और करना भी चाहिए। उदाहरणार्थ-ग़रीबी, जो अभी तक प्राकृतिक प्रक्रिया के रूप में जानी जाती थी, उसे सामाजिक समस्या के रूप में देखना प्रारंभ हुआ जो कि मानवीय उपेक्षा अथवा शोषण का परिणाम है। यह दृष्टिकोण विकसित हुआ कि गरीबी को समझा जा सकता है और इसका निराकरण संभव है। यह धारणा भी विकसित हुई कि ज्ञान में वृद्धि से सभी बुराइयों का समाधान संभव है। इन्हीं विचारों से समाजशास्त्र का विकास हुआ। समाजशास्त्र के जनक आगस्त कॉम्टे का विश्वास था कि जिस विषय का विकास कर रहे हैं वह मानव कल्याण में योगदान देगा।

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Understanding Society Chapter 4 Introducing Western Sociologists

प्रश्न 2.
औद्योगिक क्रांति किस प्रकार समाजशास्त्र के जन्म के लिए उत्तरदायी है?
उत्तर
उत्पादन हेतु मशीनों के प्रयोग पर आधारित वह तकनीक, जिसने आधुनिक उद्योगों की नींव रखी, औद्योगिक क्रांति की देन है। इस क्रांति का प्रारंभ ब्रिटेन में 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तथा 19वीं शताब्दी के शुरू में हुआ। भूमि के स्थान पर उद्योग धन का स्रोत बन गए। पुराने कुटीर उद्योग ढह गए तथा फैक्ट्रियों व कारखानों में काम करने के लिए दूर-दराज से मजदूर आकर इकट्ठे होने लगे। हाथ के कारीगर बेरोजगार हो गए; अतः वे कारखानों में काम करने के लिए मजबूर हो गए।

बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे माल की खपत होने लगी। निर्मित माल के विक्रय-के लिए बाजार का भी विस्तार आवश्यक हो गया। पश्चिमी यूरोप के देशों के लिए अंतर्राष्ट्रीय व्यापार खोजना स्वाभाविक बन गया। उद्योगपतियों की आपसी होड़ और अधिक-से-अधिक लाभ कमाने की प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप कारखानों में मजदूरों की दशा दयनीय हो गई। औद्योगिक नगर समृद्धि के चारों ओर दर्दनाक गरीबी के साक्षी बन गए। पुराने सामाजिक मूल्य और परंपराएँ सामान्य जनता की आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक नहीं रह गए थे।

औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप सामाजिक जीवन में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। न केवल ऊँच-नीच में वृद्धि हुई, अपितु लोग गाँव छोड़कर नगरों में रोजगार की तलाश में आने लगे। स्त्रियों और बच्चों तक को खतरनाक परिस्थितियों में काम करना पड़ा। मजदूर वर्ग के गरीब लोग झुग्गी-झोंपडियों वाली गंदी बस्तियों में रहने के लिए विवश हो गए। इन परिस्थितियों ने राज्यतंत्र को सार्वजनिक सामूहिक विषयों की जिम्मेदारी उठाने के लिए बाध्य कर दिया।

इन नई जिम्मेदारियों को निभाने के लिए शासनतंत्र को एक नवीन प्रकार की जानकारी व ज्ञान की आवश्यकता महसूस हुई। नए ज्ञान के लिए उभरती माँग ने समाजशास्त्र जैसे विषय के अभ्युदय एवं विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसीलिए शुरू से ही समाजशास्त्रीय विचार मुख्य रूप से औद्योगिक समाज के विकास के वैज्ञानिक आविष्कार से जुड़े हुए हैं।

प्रश्न 3.
उत्पादन के तरीकों के विभिन्न संघटक कौन-कौन से हैं?
उत्तर
जर्मनी में जन्मे विद्वान कार्ल मार्क्स (1818-1883 ई०) वैज्ञानिक समाजवाद द्वारा मजदूरों पर होने वाले अत्याचार एवं शोषण को समाप्त करना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने पूँजीवादी समाज का आलोचनात्मक विश्लेषण कर उसकी कमियों को उजागर किया ताकि इस व्यवस्था का पतन हो सके। पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के बारे में मार्क्स की धारणा थी कि यह उत्पादन के तरीकों पर आधारित होती है। यह उत्पादन की विस्तृत प्रणाली है जिसका संबंध ऐतिहासिक काल से होता है। आदिम साम्यवाद, दास प्रथा, सामंतवाद, पूँजीवाद- ये सब उत्पादन की व्यवस्थाएँ हैं।

सामान्य स्तर पर उत्पादन की व्यवस्थाएँ एक समय विशेष में जीवन की विशेषताओं को दर्शाती हैं। अर्थव्यवस्था का आधार प्राथमिक तौर पर आर्थिक होता है और इसमें उत्पादन शक्तियाँ और उत्पादन संबंध सम्मिलित होते हैं। उत्पादन शक्तियों से तात्पर्य उत्पादन के सभी साधनों (जैसे-भूमि, मजदूर, तकनीक, ऊर्जा के विभिन्न स्रोत आदि) से है। उत्पादन संबंधों के अंतर्गत वे सभी आर्थिक संबंध-आते हैं जो मजदूर संगठन के रूप में उत्पादन में भाग लेते हैं। उत्पादन संबंध, संपत्ति संबंध भी होते हैं क्योंकि ये स्वामित्व अथवा उत्पादन के साधनों के नियंत्रण से संबंधित होते हैं।

प्रश्न 4.
मार्क्स के अनुसार विभिन्न वर्गों में संघर्ष क्या होते हैं?
उत्तर
मार्क्स के लिए व्यक्ति को सामाजिक समूहों में विभाजित करने वाला सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आधार उत्पादन प्रक्रिया है। उत्पादन प्रक्रिया में जो व्यक्ति एक जैसे पदों पर आसीन होते हैं, वे स्वतः ही एक वर्ग निर्मित करते हैं। उत्पादन प्रक्रिया में अपनी स्थिति के अनुसार तथा संपत्ति के संबंधों में उनकै एक जैसे हित तथा उद्देश्य होते हैं। यही सामान्य हित वर्ग के सदस्यों में वर्ग के प्रति जागरूकता विकसित करते हैं।

मार्क्स ने पूँजीवादी समाज में दो प्रमुख वर्गों का उल्लेख किया है- एक पूँजीपतियों का वर्ग (बुर्जुआ वर्ग) जिसका उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण होता है तथा दूसरा सम्पत्तिविहीन सर्वहारा वर्ग जिसके सदस्यों को अपनी आजीविका के लिए मजबूरी में श्रमिकों के रूप में काम करना पड़ता है। इन वर्गों के उद्देश्य परस्पर विरोधी होते हैं। वर्ग चेतना विकसित होने के उपरांत राजनीतिक गोलबंदी के तहत इन दोनों में वर्ग संघर्ष विकसित होने लगते हैं।

मार्क्स का मत था-“प्रत्येक विद्यमान समाज का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है।” आदिम युग से लेकर आधुनिक युग के समाज तक समाज में दो वर्ग ही प्रमुख रहे हैं-एक शोषक वर्ग तथा दूसरा शोषित वर्ग। इन दोनों वर्गों के नाम विभिन्न युगों में भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। शोषक और शोषित वर्ग, एक-दूसरे का कभी दबे रूप में और कभी खुले रूप में निरंतर विरोध करते रहे हैं। यही विरोध वर्ग संघर्ष के रूप में प्रतिफलित होता रहा है। माक्र्स ने कल्पना की थी कि एक दिन सर्वहारा वर्ग पूँजीपतियों को खदेड़कर उत्पादन के साधनों पर अपना अधिकार जमा लेगा तथा ऐसे समाज का निर्माण होगा जिसे उन्होंने ‘वर्गविहीन समाज’ की संज्ञा दी।

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प्रश्न 5.
‘सामाजिक तथ्य क्या हैं? हम उन्हें कैसे पहचानते हैं?
उत्तर
समाजशास्त्र के जनक कॉम्टे के उत्तराधिकारी माने जाने वाले फ्रांसीसी विद्वान् दुर्खोम (1858 – 1917 ई०) ने समाजशास्त्र को वैज्ञानिक धरातल पर दृढ़ करने में विशेष भूमिका निभाई है। उनका विचार था कि समाजशास्त्र की विषय-वस्तु सामाजिक तथ्य हैं जिनका अध्ययन आनुभविक रूप में किया जा सकता है। प्रत्येक समाज में घटनाओं का एक विशिष्ट समूह होता है जो कि उन तथ्यों से भिन्न होता है जिनका अध्ययन प्राकृतिक विज्ञान करते हैं। सामाजिक तथ्यों की श्रेणी में कार्य करने, सोचने तथा अनुभव करने के वे तरीके आते हैं जिनमें व्यक्तिगत चेतना से बाहर भी अपने अस्तित्व को बनाए रखने की उल्लेखनीय विशेषता होता है।

दुर्खोम के अनुसार, “एक सामाजिक तथ्य काम करने का वह प्रत्येक ढंग है जो निर्धारित अथवा अनिर्धारित है और जो व्यक्ति पर एक बाहरी दबाव डालने के योग्य है अथवा काम करने का वह प्रत्येक तरीका है जो निर्दिष्ट समाज में सर्वत्र सामान्य है, और साथ ही व्यक्तिगत अभिव्यक्तियों से स्वतंत्र वह अपना अस्तित्व बनाए रखता है।” इस परिभाषा से दो बातें स्पष्ट होती हैं- प्रथम, सामाजिक तथ्य कार्य करने (चाहे वे संस्थागत हैं या नहीं), सोचने तथा अनुभव करने के तरीके हैं; तथा दूसरे, इन तरीकों में व्यक्तिगत चेतना से बाह्यता (Exteriority) और दबाव की शक्ति (Constraint) की दो प्रमुख विशेषताएँ पायी जाती हैं।

बाह्यता का अर्थ है कि सामाजिक तथ्यों का स्रोत व्यक्ति नहीं होता, अपितु समाज होता है, चाहे वह पूर्ण राजनीतिक समाज हो या उसका कोई आंशिक समूह; जैसे-धार्मिक समुदाय तथा राजनीतिक, साहित्यिक एवं व्यावसायिक संघ इत्यादि। दबाव की शक्ति का अर्थ है कि सामाजिक तथ्य व्यक्ति के व्यवहार पर नियंत्रण रखते हैं। जब हम कोई ऐसी बात करना चाहते हैं जिसे दूसरे पसंद नहीं करते तथा न ही उसके करने की प्रशंसा करते हैं। तो हम वह कार्य सामान्य रूप से नहीं करते अर्थात् व्यक्ति तब दबाव महसूस करता है जब वह किसी कार्य को करना चाहता है परंतु कर नहीं पाता क्योंकि दूसरे व्यक्ति ऐसा नहीं चाहते।

प्रश्न 6.
‘यांत्रिक’ और ‘सावयवी एकता में क्या अंतर है?
उत्तर
दुर्खोम ने सामाजिक एकता (जिसे सामाजिक संश्लिष्टता अथवा सामाजिक मतैक्य भी कहा जाता है) के सिद्धांत का प्रतिपादन अपनी सर्वप्रथम पुस्तक ‘दि डिविजन ऑफ लेबर इन सोसायटी में किया है। यह पुस्तक 1893 ई० में फ्रेंच भाषा में प्रकाशित हुई तथा बाद में 1933 ई० में उसका अंग्रेजी में अनुवाद किया गया। वास्तव में, दुर्खोम की यह पुस्तक सामान्य जीवन के तथ्यों का वैज्ञानिक विधि द्वारा विश्लेषण का प्रथम प्रयास था। इस पुस्तक को लिखने की प्रेरणा उन्हें अर्थशास्त्री ऐडम स्मिथ के विचारों से मिली।

सामाजिक एकता का अर्थ समाज की विभिन्न इकाइयों में सामंजस्य से है अर्थात् यह ऐसी परिस्थिति है। जिसमें समाज की विभिन्न इकाइयाँ अपनी भूमिका निभाती हुई संपूर्ण समाज में संतुलन बनाए रखती हैं। उनके अनुसार सामाजिक एकता पूर्णतः एक नैतिक घटना है क्योंकि इसी के द्वारा पारस्परिक सहयोग तथा सद्भावना को बढ़ावा मिलता है। दुर्खोम ने सामाजिक एकता को दो श्रेणियों में बाँटा है –

1. यांत्रिक एकता – यांत्रिक एकता आदिम समाजों में अथवा सभ्यता और संस्कृति की दृष्टि से पिछड़े हुए समाजों में पायी जाती है। इन समाजों में विभेदीकरण अर्थात् कार्यों का वितरण न के बराबर होता है तथा केवल लिंग और आयु के आधार पर ही कार्यों में थोड़ा-बहुत विभेदीकरण पाया जाता है। सामूहिक चेतना (Collective conscience) द्वारा,सभी व्यक्ति एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं तथा इस सामूहिक चेतना को बनाए रखना सभी व्यक्ति अपना परम कर्तव्य मानते. हैं। यांत्रिक एकता वह एकता है जो कि व्यक्तियों द्वारा एक जैसे कार्यों के कारण आती है। अर्थात् जो समरूपता (Likeness) का परिणाम है यह एक सरल प्रकार की एकता है जो दमनकारी कानून द्वारा बनाए रखी जाती है।

2. सावयवी एकता – सावयवी एकता असमानताओं से विकसित होती है। इसका प्रमुख आधार श्रम-विभाजन है। यह एकता आधुनिक समाज की प्रमुख विशेषता मानी जाती है। दुर्खोम का कहना है कि जैसे-जैसे समाज की जनसंख्या का घनत्व तथा आयतन बढ़ता जाता है वैसे-वैसे व्यक्तियों की आवश्यकताएँ भी बढ़ती जाती हैं। इन बढ़ती हुई आवश्यकताओं के कारण व्यक्तियों के कार्यों में भिन्नता आती है तथा इसके साथ ही इनमें विशेषीकरण बढ़ता है अर्थात् श्रम-विभाजन की वृद्धि होती है। उस एकता को, जो कि कार्यों की भिन्नता द्वारा विशेषीकरण (अर्थात् श्रम-विभाजन) और इसके परिणामस्वरूप व्यक्तियों की अन्योन्याश्रितता के कारण आती हैं, दुर्वीम सावयवी एकता कहते हैं। सावयवी एकता की पुष्टि क्षतिपूरक कानून द्वारा होती है।
‘यांत्रिक’ और ‘सावयवी’ एकता में निम्नलिखित अंतर पाए जाते हैं-

  1. यांत्रिक एकता समानताओं पर आधारित होती है, जबकि सावयवी असमानताओं अर्थात् श्रम-विभाज़न पर आधारित होती है।
  2. यांत्रिक एकता सरल समाजों में पायी जाती है, जबकि सावयवी एकता आधुनिक समाजों को प्रमुख लक्षण है।
  3. यांत्रिक एकता बनाए रखने में दमनकारी कानून की प्रमुख भूमिका होती है, जबकि सावयवी एकता बनाए रखने में क्षतिपूरक कानून की।
  4. यांत्रिक एकता का प्रारूप खंडात्मक होता है, जबकि सावयवी एकता का संगठित।
  5. यांत्रिक एकता जनसंख्या के सापेक्षिक रूप से कम घनत्व वाले समाजों में पायी जाती है, जबकि सावयवी एकता जनसंख्या में घनत्व की ऊँची मात्रा वाले समाजों में।

प्रश्न 7.
उदाहरण सहित बताएँ कि नैतिक संहिताएँ सामाजिक एकता को कैसे दर्शाती हैं?
उत्तर
नैतिक संहिताओं का सामाजिक एकता को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। वस्तुतः नैतिक संहिताओं के आधार पर ही सामाजिक एकता के स्वरूप को पहचाना जा सकता है। सरल समाजों में अपराध सामूहिक चेतना के विरुद्ध कार्य माने जाते हैं तथा समाज इसका उल्लंघन करने वालों को कठोर दंड देता है। इन समाजों में नैतिक संहिताएँ लागू करने में दनमकारी कानून की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। आधुनिक समाजों में नैतिक संहिताओं का अनुपालन क्षतिपूरक कानून द्वारा होता है जिसका उद्देश्य क्षति-प्राप्त व्यक्ति की क्षति को पूरा करना है अर्थात् उसे वह सब कुछ लौटा देना है जिसे गलत ढंग से उससे छीना गया है। इस प्रकार की नैतिक संहिताएँ एवं क्षतिपूरक कानून सावयवी एकता वाले समाज का लक्षण है।

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प्रश्न 8.
‘नौकरशाही की बुनियादी विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर
नौकरशाही के साथ जर्मनी के सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स वेबर (1864-1920 ई०) का नाम जुड़ा हुआ है। उनके अनुसार नौकरशाही एक संस्तरणबद्ध संगठन है जिसकी रचना तार्किक ढंग से बहुत-से ऐसे व्यक्तियों के कार्यों के समीकरण के लिए की गई है जो वृहद् स्तर पर प्रशासनिक दायित्वों के संगठनात्मक लक्ष्यों की प्राप्ति में लगे हैं। नौकरशाही की बुनियादी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. अधिकारियों के प्रकार्य – नौकरशाही के अंतर्गत प्रत्येक अधिकारी के प्रकार्य (काम) सुस्पष्ट होते हैं जिनका संचालन नियमों, कानूनों तथा प्रशासनिक विधानों द्वारा होता है। उच्च अधिकारियों द्वारा अधीनस्थ वर्गों के कार्यों पर नियंत्रण रखा जाता है। नौकरशाही में नौकरी के अनुकूल योग्यता वाले व्यक्तियों की ही भरती की जाती है। नौकरशाही में सरकारी पद पदधारी से स्वतंत्र होते हैं क्योंकि वे उनके कार्यकाल के पश्चात् भी बने रहते हैं।
  2. पदों का सोपानिक क्रम – नौकरशाही में सभी पद श्रेणीगत सोमान पर आधारित होते हैं। इसीलिए जहाँ एक ओर उच्च अधिकारी निम्न अधिकारी को निर्देश देते हैं वहीं दूसरी ओर निम्न अधिकारी अपनी शिकायत उच्च अधिकारी को कर सकते हैं।
  3. लिखित दस्तावेजों की विश्वसनीयता – नौकरशाही का कार्य लिखित दस्तावेजों के आधार पर | होता है तथा फाइलों को रिकॉर्ड के रूप में सँभालकर रखा जाता है।
  4. कार्यालय का प्रबंधन – कार्यालय का प्रबंधन विशिष्ट तथा आधुनिक क्रिया है। इसीलिए इसमें कार्य के लिए प्रशिक्षित और कुशल कर्मचारियों की आवश्यकता होती है।
  5. कार्यालयी आचरण – प्रत्येक कार्यालय में कर्मचारियों का आचरण नियमों तथा कानूनों द्वारा | नियंत्रित होता है। इन्हीं के कारण उनका सार्वजनिक आचरण उनके निजी व्यवहार से अलग होता है। अपने आचरण हेतु प्रत्येक कर्मचारी जिम्मेदार होता है।

प्रश्न 9.
सामाजिक विज्ञान में किस प्रकार विशिष्ट तथा भिन्न प्रकार की वस्तुनिष्ठता की आवश्यकता होती है?
उत्तर
मैक्स वेबर ने समाजशास्त्र को वैज्ञानिक धरातल प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनका तर्क था कि सामाजिक विज्ञानों का पूर्ण उद्देश्य ‘सामाजिक क्रिया की व्याख्यात्मक सोच’ का विकास करना है। इसी अर्थ में सामाजिक विज्ञान, भौतिक विज्ञानों, जिनका उद्देश्य प्रकृति के नियमों की खोज करना है से भिन्न होते हैं। सामाजिक क्रियाओं में सभी अर्थपूर्ण मानवीय व्यवहार सम्मिलित होते हैं। मानवीय क्रियाओं के विषयगत (व्यक्तिनिष्ठ) अर्थों से संबंधित होने के कारण ही सामाजिक विज्ञान प्राकृतिक विज्ञानों से भिन्न है। सामाजिक क्रियाओं का अध्ययन करते समय समाजशास्त्री का कार्य उन अर्थों को ढूंढना होता है जो कर्ता द्वारा समझे जाते हैं। इसके लिए समानुभूति’ की भावना उसकी सहायता करती है।

वेबर ने सामाजिक विज्ञानों में पायी जाने वाली वस्तुनिष्ठता पर भी विचार व्यक्त किए हैं। सामाजिक यथार्थता की खोज मनुष्य के अर्थों, मूल्यों, समझ, पूर्वाग्रहों, आदर्शों इत्यादि पर आधारित होती है। इसलिए सामाजिक विज्ञानों को सदैव ‘समानुभूति समझ’ को अपनाना पड़ता है। अपने अध्ययन को वस्तुनिष्ठ बनाने हेतु समाजशास्त्री को बिना स्वयं की निजी मान्यताओं से प्रभावित हुए पूर्ण रूप से विषयगत अर्थों एवं सामाजिक कर्ताओं की अभिप्रेरणा को समझना पड़ता है। वेबर ने सामाजिक विज्ञानों में पायी जाने वाली इस प्रकार की वस्तुनिष्ठता को मूल्य तटस्थता’ कहा है अर्थात् अपने मूल्यों से तटस्थ होकर ही समाज-वैज्ञानिक वस्तुनिष्ठ अध्ययन कर सकता है। वस्तुनिष्ठ अध्ययन करने हेतु वेबर ने अपने पद्धतिशास्त्र में ‘आदर्श प्रारूप का भी उल्लेख किया है जो सामाजिक घटना का तार्किक मॉडल है जिसमें उस घटना की महत्त्वपूर्ण विशेषताओं को रेखांकित किया जाता है।

प्रश्न 10.
क्या आप ऐसे किसी विचार अथवा सिद्धांत के बारे में जानते हैं जिसने आधुनिक भारत में किसी सामाजिक आंदोलन को जन्म दिया हो?
उत्तर
आधुनिक भारत में अनेक सामाजिक आंदोलन हुए हैं। प्रत्येक आंदोलन के पीछे कोई-न-कोई विचारधारा होती हैं। उदाहरणार्थ-निम्न जातियों में हुए समाज सुधार आंदोलनों के पीछे न केवल इन जातियों का सामाजिक-आर्थिक उत्थान करना था, अपितु एक ऐसे समाज का निर्माण करना भी था जो समता पर आधारित हो। इसी भाँति, पर्यावरणीय चुनौतियों को लेकर हुए आंदोलनों के पीछे यह विचारधारा रही है कि मानव प्रजाति को सतत विकास के प्रयास में पर्यावरण संतुलन को बनाए रखना चाहिए।

ऐसा मानव समाज के अस्तित्व के लिए आवश्यक है क्योंकि पर्यावरणीय असंतुलन विनाश का कारण बन सकता है। चिपको आंदोलन तथा नर्मदा बचाओ आंदोलन इसी विचारधारा पर आधारित आंदोलन रहे हैं। इसी भाँति, महिलाओं में हुए आंदोलनों के पीछे यह सोच रही है कि आधुनिक युग में उन्हें पुरुषों के समान अधिकार मिलने चाहिए तथा आगे बढ़ने के लिए वे सभी अवसर उपलब्ध होने चाहिए जो पुरुषों को उपलब्ध है। कृषक आंदोलन कृषक समस्याओं के समाधान की असफलता के परिणामस्वरूप विकसित असंतोष के कारण हुए हैं। इन आंदोलनों में कृषक अपनी सामूहिक पहचान के आधार पर संगठित हुए हैं। विश्वव्यापी मानवाधिकार आंदोलनों के पीछे यह विचारधारा रही है कि सभी देशों के नागरिकों, चाहे वे किसी भी जाति, प्रजाति, धर्म, रंग के क्यों न हों, को ससम्मान जीने को अधिकार है।

प्रश्न 11.
मार्क्स तथा वेबर ने भारत के विषय में क्या लिखा है-पता करने की कोशिश कीजिए।
उत्तर
मार्क्स तथा वेबर ने भारत के बारे में काफी कुछ लिखा है। उदाहरणार्थ-मार्क्स ने भारतीय समाज की संरचना, उसकी ऐतिहासिक गत्यात्मकता, भारत पर ब्रिटिश राज की स्थापना, ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में कार्यकलाप, अंग्रेजों द्वारा भारत का दोहन व शोषण, भारतीयों को 1857 ई० का स्वतंत्रता संग्राम, उसकी असफलता के कारण, भारत में ब्रिटिश राज के भावी परिणाम आदि के बारे में विस्तार से लिखा है। यह उल्लेखनीय है कि मार्क्स स्वयं कभी न तो भारत आए और न ही उन्होंने विशेष रूप से भारत के इतिहास या उसके शास्त्रीय ग्रंथों का अध्ययन किया।

भारत पर उनकी जानकारी के चार प्रमुख स्रोत थे- ब्रिटिश म्यूजियम में उपलब्ध सामग्री, लंदन के समाचार-पत्रों में भारत संबंधी समाचार, ब्रिटिश संसद में भारतीय मुद्दों पर बहस तथा भारत से आए जातियों के संस्मरण। इनके आधार पर मार्क्स ने जो भी लिखा वह काफी हद तक सही था। इतना ही नहीं, मार्क्स ने भारत के उज्ज्वल भविष्य की भी कल्पना की जो अंग्रेज अधिकारियों की इसी टिप्पणी पर आधारित थी कि भारतीयों में अपने को काम के अनुकूल ढाल लेने और मशीनों को चलाने के लिए आवश्यक जानकारी हासिल कर लेने की विशिष्ट योग्यता पायी जाती है।

इसी भाँति, मैक्स वेबर ने धर्म के तुलनात्मक अध्ययन में हिंदू एवं बौद्ध धर्म का भी अध्ययन किया तथा यह बताने का प्रयास किया कि किस प्रकार इन धर्मों की मान्यताएँ तथा प्रोटेस्टेंट धर्म की मान्यताओं एवं आचार संहिताओं में अंतर है। उन्होंने इसी आधार पर यह प्रतिपादित करने का प्रयास किया कि भारत में पूँजीवाद विकसित न होने का कारण हिंदू धर्म की मान्यताएँ एवं आचार संहिताएँ ही हैं।

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प्रश्न 12.
क्या आप कारण बता सकते हैं कि हमें उन चिंतकों के कार्यों का अध्ययन क्यों करना चाहिए जिनकी मृत्यु हो चुकी है। इनके कार्यों का अध्ययन करने के कारण क्या हो सकते हैं?
उत्तर
किसी भी विषय को समझने के लिए उन चिंतकों का अध्ययन करना अनिवार्य है जिन्होंने उस विषय को विकसित करने में अथवा उसे आगे बढ़ाने में विशेष योगदान दिया है। ऐसे विद्वान् ‘शास्त्रीय चितंक’ कहलाते हैं जिनके विचारों को समझे बना विषय का ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता। स्वाभाविक है कि सभी विषय पुराने हैं और उनके प्रतिपादकों की मृत्यु हो गई है। यदि हम समाजशास्त्र का ही उदाहरण लें तो इसके जनक आगस्त कॉम्टे के अतिरिक्त एमाइल दुर्खोम, मैक्स वेबर, कार्ल मार्क्स, विलफ्रेडो पेरेटो आदि विद्वानों के विचारों को समझना जरूरी है। यही वे विद्वान हैं जिन्होंने न केवल इस विषय के निर्माण हेतु अपितु इसे वैज्ञानिक स्वरूप देने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

उन्होंने ही इस विषय में अध्ययन-अनुसंधान हेतु पद्धतिशास्त्र का भी निर्माण किया है। उनके द्वारा जो कार्य किए गए हैं वे उनकी शास्त्रीय रचनाओं में उपलब्ध हैं तथा उनके कार्यों को या रचनाओं को पढ़े बिना समाजशास्त्र को समझना संभव नहीं है। यदि हम उनके कार्यों का अध्ययन नहीं करेंगे तो विषय पर हमारी पकड़ अच्छी नहीं हो पाएगी। हम रटकर प्रश्न का उत्तर तो दे देंगे परंतु सामाजिक यथार्थता को पूर्णतया समझ नहीं पाएँगे।

क्रियाकलाप आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
समाजशास्त्र परिचय पुस्तक के प्रथम अध्याय की चर्चा ‘यूरोप में आधुनिक युग का आगमनं को देखें। वे कौन-से परिवर्तन थे जिनसे यह तीनों प्रक्रियाएँ (ज्ञानोदय, फ्रांसीसी क्रांति तथा औद्योगिक क्रांति) जुड़ी हुई थीं? (क्रियाकलाप 1)
उत्तर
ज्ञानोदय, फ्रांसीसी क्रांति तथा औद्योगिक क्रांति तीन ऐसी प्रक्रियाएँ मानी जाती हैं जिनके परिणामस्वरूप यूरोपीय समाजों में आमूल-चूल परिवर्तन हुए तथा इन परिवर्तनों को तथा इनके अनुरूप विकसित होने वाली सामाजिक संरचना को समझने के लिए समाजशास्त्र जैसे विषय का विकास हुआ। ज्ञानोदय के परिणामस्वरूप पश्चिमी यूरोप में एक नवीन दर्शन विकसित हुआ जिसने एक ओर मनुष्य को सम्पूर्ण ब्रह्मांड के केंद्र-बिंदु के रूप में स्थापित कर दिया तो दूसरी ओर विवेक को मनुष्य को की प्रमुख विशेषता के रूप में प्रतिपादित किया। विवेकपूर्ण एवं आलोचनात्मक ढंग से सोचने की क्षमता ने मनुष्य को अपनी ही नजर में हमेशा के लिए ही परिवर्तित कर दिया।

इसी के परिणामस्वरूप ‘धर्मनिरपेक्षता’ वैज्ञानिक सोच’ तथा ‘मानवतावादी सोच’ जैसी वैचारिक प्रवृत्तियाँ विकसित हुईं। इसी भाँति फ्रांसीसी क्रांति तथा औद्योगिक क्रांति ने सामाजिक संरचना के सभी पक्षों को बदल दिया। उत्पादन की पूँजीवादी व्यवस्था विकसित हुई जिससे इन समाजों में वर्ग पर आधारित विषमताएँ और गहरी हो गईं। सामाजिक समस्याओं को समझने के लिए सामाजिक सर्वेक्षण किए जाने लगे ताकि इन समस्याओं का समाधान निकाला जा सके। जीवन में अत्यधिक गतिशीलता एवं प्रतियोगिता आ गई तथा भौतिकवादी प्रवृत्ति विकसित होने लगी।

अतिरिक्त उत्पादन ने उपनिवेशवाद को जन्म दिया, नगरीकरण में वृद्धि होने लगी तथा नगरों एवं औद्योगिक केंद्रों में जनसंख्या बढ़ने लगी। गंदी बस्तियाँ और सफाई के नितांत अभाव से अनेक नई समस्याएँ विकसित हो गईं जिनके समाधान की आशा राज्यतंत्र से की जाने लगी। राज्य से समाज कल्याण के कार्यों की अधिक आशा होने लगी। बाजारों का तेजी से विकास हुआ तथा अनौपचारिक संबंधों के स्थान पर औपचारिक संबंध प्रमुख होने लगे। यह सब परिवर्तन इतने दूरगामी थे कि इन्हें समझने के लिए समाजशास्त्र जैसे विषय का विकास हुआ।

प्रश्न 2.
क्या आप तथा आपके सहपाठियों द्वारा बनाए गए समूह माक्र्सवादी अर्थ में वर्ग कहलाएँगे? इस दृष्टिकोण के पक्ष तथा विपक्ष में तर्क दीजिए। (क्रियाकलाप 2)
उत्तर
उन व्यक्तियों के समूह को वर्ग कहा जाता है जिनके जीवन बिताने का ढंग एक जैसा होता है। इसे प्रमुख रूप से आर्थिक आधार पर परिभाषित किया जाता है। यद्यपि वर्ग का आधार आर्थिक है परंतु वह आर्थिक समूह से कुछ अधिक होता है। मार्क्स के अनुसार, सामाजिक वर्ग ऐतिहासिक परिवर्तन की इकाइयाँ तथा आर्थिक व्यवस्था द्वारा समाज में निर्मित श्रेणियाँ दोनों ही हैं। मार्क्स ने एक समान चेतना को वर्ग का प्रमुख आधार माना है। अपनी समान स्थिति की चेतना के बिना वर्ग अधूरा होता है। वर्ग के प्रति सदस्यों की यह चेतना उनकी विभिन्न क्रियाओं में स्पष्ट देखी जा सकती है।

यह एक विवादास्पद विषय है कि विद्यालय में सहपाठियों के समूह को वर्ग कहा जा सकता है या नहीं। यह सही है कि इस समूह की प्रमुख विशेषता सहपाठी होना है; परंतु क्या इसी के आधार पर यह समूह वर्ग कहा जा सकता है? माक्र्स के वर्ग के विचारों के संदर्भ में तो नहीं। न तो सहपाठियों के समूह में उस अर्थ में अपने सामान्य भाग्य के प्रति चेतना पाई जाती है जिसको उल्लेख न ही मार्क्स ने किया है। और न ही उनके हित किसी अन्य समूह के विपरीत हैं जिससे कि वह अपने आपको संगठित कर सकें।

प्रश्न 3.
क्या कारखानों तथा कृषि कार्य करने वाले मजदूर एक ही वर्ग से संबंध रखते हैं? एक ही कारखाने में काम करने वाले मजदूर तथा मैनेजर-क्या ये एक ही वर्ग से संबंधित हैं? (क्रियाकलाप 2)
उत्तर
कारखानों में काम करने वाले मजदूर तथा कृषि कार्य करने वाले मजदूर एक ही वर्ग से संबंध रखते हैं। उनको अपने श्रम के बदले वेतन मिलता है तथा वे अपनी निम्न एवं दयनीय स्थिति के प्रति सचेत होते हैं। माक्र्स ने वर्ग को जिस अर्थ में प्रयुक्त किया है उसमें इन्हें ही वर्ग का माना जा सकता है। कारखानों में काम करने वाले मजदूर शोषक वर्ग में आते हैं जिनका उनके मालिक शोषण करते हैं। इसी भाँति, कृषि कार्य करने वाले भू-पतियों के शोषण का शिकार होते हैं।

दोनों प्रकार के मजदूरों में अपने सामान्य भाग्य के प्रति चेतना पायी जाती है। एक कारखानों में काम करने वाले मजदूर तथा मैनेजर एक वर्ग से संबंध नहीं होते। दोनों हैं तो कर्मचारी परंतु मजदूरों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति तथा कार्य मैनेजरों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति तथा कार्य से भिन्न होते हैं। मजदूर एक वर्ग का निर्माण करते हैं। तो मैनेजर दूसरे वर्ग का। मैनेजरों के वर्ग को कुछ लोग माध्यम वर्ग कहते हैं क्योंकि यह श्रमिक वर्ग एवं पूँजीपति वर्ग के बीच का वर्ग है। आजकल बैंकों में मैनेजरों के अपने अलग संगठन हैं तथा क्लर्को एवं चपरासियों के अलग।

प्रश्न 4.
क्या अमीर उद्योगपति अथवा फैक्ट्री के मालिक, जो नगरों में रहते हैं तथा जिनके पास, कोई कृषि भूमि नहीं है, एक ही वर्ग से संबंध रखते हैं जैसे गरीब कृषक मजदूर जो गाँव में रहता है तथा जिसके पास कोई जमीन नहीं है? (क्रियाकलाप 2)
उत्तर
अमीर उद्योगपति अथवा फैक्ट्री के मालिक, जो नगरों में रहते हैं तथा जिनके पास कोई कृषि भूमि नहीं है, एक ही वर्ग से संबंध नहीं रखते हैं। एक ग्रामीण गरीब भूमिहीन कृषक मजदूर तथा एक अमीर उद्योगपति अथवा फैक्ट्री के मालिक में कोई समानता नहीं है। यद्यपि दोनों के पास जमीन नहीं है, तथापि पहला निर्धन होने के कारण श्रमिक वर्ग का सदस्य है, जबकि उद्योगपति या फैक्ट्री के मालिक पूँजीपति वर्ग या उच्च वर्ग के सदस्य हैं। दोनों के हित भी एक जैसे नहीं है। एक निर्धनता का जीवन व्यतीत कर रहा है तथा हो सकता है कि पूरे वर्ष उसे मजदूरी का काम भी न मिले। मजदूरी के काम में भू-स्वामी उसका शोषण करता है।

अमीर उद्योगपति अथवा फैक्ट्री के मालिक दूसरों (श्रमिकों एवं अपने अधीन कार्य करने वाले अन्य कर्मचारियों) का शोषण करते हैं तथा उनका जीवन-स्तर भूमिहीन कृषि मजदूर के जीवन-स्तर से कहीं अधिक ऊँचा होता है। उनका एकमात्र उद्देश्य लाभ कमाना होता है। चाहे इसके लिए कर्मचारियों का कितना भी शोषण क्यों न करना पड़े। इतना ही नहीं, उत्पादन के साधनों की दृष्टि से भी दोनो अलग वर्ग के हैं। अमीर उद्योगपति अथवा फैक्ट्री का मालिक उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण रखते हैं, जबकि मजदूरों का इन साधनों पर किसी प्रकार का नियंत्रण नहीं होता। उन्हें केवल अपने श्रम के बदले निर्धारित धनराशि दी जाती है।

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प्रश्न 5.
एक जमींदार जो काफी जमीन का मालिक है और एक छोटा किसान जिसके पास कम भूमि है-क्या ये दोनों एक ही वर्ग से संबंधित होंगे यदि वे एक ही गाँव में रहते हों तथा दोनों जमींदार हों? (क्रियाकलाप 2)
उत्तर
यह सही है कि एक ही गाँव में रहने वाले दो व्यक्ति-पहला जो काफी जमीन का मालिक है। तथा दूसरा जो एक छोटा किसान है जिसके पास कम भूमि है-भू-स्वामित्व के आधार पर जमींदार हैं। इस दृष्टि से उन्हें एक ही वर्ग का माना जा सकता है। इसे देखने का एक दूसरा दृष्टिकोण भी है, जिसके अनुसार दोनों जरूरी नहीं है कि एक ही वर्ग के हों। जो जमींदार काफी जमीन का मालिक है। उसका रहन-सहन एवं जीवन पद्धति उस जमींदार से कहीं ऊँची होगी जिसके पास कम भूमि है।

यदि दोनों भू-स्वामित्व के कारण अपनी सम्मान स्थिति के प्रति सचेत हैं तथा भूमिहीन कृषि मजदूरों के असंतोष एवं रोष का सामना कर रहे हैं तो दोनों एक वर्ग के भी सदस्य हो सकते हैं। मार्क्स ने जिस ‘बुर्जुआ’ वर्ग का उल्लेख किया है उसमें पूँजीपति सम्मिलित हैं, चाहे वे किसी एक छोटे कारखाने के मालिक हों या अनेक बड़े कारखानों के मालिक। अपने वर्ग के प्रति चेतना उन्हें एक वर्ग का तथा चेतना को अभाव उन्हें भिन्न वर्ग का सदस्य बना सकता है। वस्तुत: इस प्रकार के उदाहरणों में प्रमुख बात यह है कि वर्ग ‘अपने में वर्ग’ है अथवा ‘अपने लिए वर्ग है। अपने में वर्ग समान लक्षणों वाला हो सकता है जिसमें चेतना न हो। अपने लिए वर्ग समान विशेषताओं के साथ-साथ चेतनायुक्त भी होता है।

प्रश्न 6.
दुर्खोम तथा माक्र्स ने सामाजिक श्रम-विभाजन के विषय में क्या कहा-तुलना करने की कोशिश कीजिए। (क्रियाकलाप 3)
उत्तर
दुर्खोम ने श्रम-विभाजन की प्रकार्यात्मक व्याख्या प्रस्तुत की है। उनके अनुसार प्रत्येक समाज विभिन्न व्यक्तियों में कार्यों का विभाजन इसलिए करता है है ताकि अपने अस्तित्व को बनाए रखे। श्रम-विभाजन के कारण व्यक्ति एक-दूसरे पर आश्रित हो जाते हैं तथा इसी से उनमें सावयवी एकता विकसित होती है जो समाज के एकीकरण में सहायक होती है। इसीलिए दुर्खोम ने कहा है कि श्रम-विभाजन का कार्य सभ्यता का निर्माण करना नहीं है अपितु इसका कार्य मुख्यतः समूहों तथा व्यक्तियों को एक सूत्र में बाँधकर समाज में एकता लाना है। दुर्खोम ने श्रम-विभाजन के कारणों एवं दशाओं को समाज में खोजने का प्रयास किया है तथा इसके असामान्य प्रारूप का भी उल्लेख किया है। मार्क्स ने श्रम-विभाजन का उल्लेख पूँजीवादी व्यवस्था में संदर्भ में किया है। उन्होंने अर्थव्यवस्था को उत्पादन के तरीकों पर आधारित माना है तथा उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व के आधार पर पूँजीपति एवं श्रमिक वर्ग में श्रम-विभाजन एवं संघर्ष का विश्लेषण किया है।

प्रश्न 7.
क्या आप कारण बता सकते हैं कि मार्क्स आधुनिक समाज के विषय में गलत क्यों हो सकते हैं? (क्रियाकलाप 3)
उत्तर
अनेक विद्वान आज यह मानने लगे हैं कि मार्क्स आधुनिक समाज के विषय में गलत हैं। इसके पीछे उनका यह तर्क है कि मार्क्स के सिद्धांत आधुनिक समाजों में निरर्थक हो गए हैं। उदाहरणार्थ-न तो पूँजीपति वर्ग एवं श्रमिक वर्ग में उस प्रकार का संघर्ष पाया जाता है जिसका उल्लेख मार्स ने किया है और न ही वह समय आया है जब सर्वहारा वर्ग ने पूँजीपतियों को खदेड़कर अपना शासन स्थापित किया है जितने भी साम्यवादी देश थे वे साम्यवाद से पूँजीवाद एवं खुली अर्थव्यवस्था की ओर आगे बढ़ रहे हैं। पूर्व सोवियत संघ का विघटन मार्क्स के अनेक सिद्धांतों को झुठलाने में सहायक है।

आज श्रमिकों में न तो उस प्रकार का अलगाव है जैसा वर्णन मार्स ने किया है और न ही उस प्रकार का शोषण। अनेक पूँजीपति श्रमिकों को वेतन के अतिरिक्त अनेक अन्य सुविधाएँ प्रदान करते हैं जो शोषण का कार्य न होकर श्रमिक वर्ग के प्रति उनकी सहानुभूति का प्रतीक है। प्रतिवर्ष उन्हें अच्छे कार्य के लिए बोनस भी दिया जाता है। माक्र्स ने जिस वर्गविहीन समाज की कल्पना की थी वह समाज भी आज तक निर्मित नहीं हो पाया। इन सब तर्कों के आधार पर अनेक विद्वान अब कहने लगे हैं कि मार्क्सवादी दर्शन समाप्ति की ओर है तथा मार्क्स अप्रासंगिक होता जा रहा है।

प्रश्न 8.
माक्र्स अभी भी सही है-इस विषय पर किसी को समझाने के लिए आप कौन-से तर्क देंगे? (क्रियाकलाप 3)
उत्तर
कई विद्वान यह भी तर्क देते हैं कि मार्क्स अभी भी सही है। वे मार्क्सवाद के आधुनिक समाजों में अप्रासंगिक होने का खंडन करते हैं। उनका तर्क है कि माक्र्सवादी विचारधारा को भूमंडलीकरण, निजीकरण एवं उदार अर्थव्यवस्था से जो चुनौतियाँ मिली हैं उनसे थोड़ी अवधि के लिए इसका महत्त्व अवश्य कम हो गया है, किंतु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मार्क्स आज की परिस्थितियों में अप्रासंगिक हैं। अनेक पूर्व-साम्यवादी देशों में साम्यवादी दल फिर से उभरने लगे हैं। चीन जैसे देश में साम्यवाद ने उदारीकृत बाजारी अर्थव्यवस्था से इस प्रकार को समन्वय कर लिया है कि वहाँ साम्यवाद को फिलहाल किसी प्रकार का खतरा नहीं है।

आज भी वर्ग के आधार पर संघर्ष अनेक समाजों में हो रहे हैं तथा अर्थव्यवस्था ही अन्य उप-व्यवस्थाओं को निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। शासक वर्ग सभी देशों में अपने प्रभुत्वशाली विचारधारा को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं। ऐतिहासिक भौतिकवाद तथा द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के मार्क्स के विचार आज भी सार्थक हैं। अनेक देशों में श्रमिकों में अलगाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। अतिरिक्त मूल्य को पूँजीपतियों द्वारा हड़प करने की प्रवृत्ति आज भी यथावत् बनी हुई है। इन तर्कों के आधार पर कुछ विद्वान यह प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं कि मार्क्स अभी भी सही है।

प्रश्न 9.
दुर्खोम आधुनिक समाज में व्यक्ति को अधिक स्वतंत्रता दिए जाने पर गलत क्यों हो सकते (क्रियाकलाप 3)
उत्तर
दुर्खोम के अनुसार समाजशास्त्र को सामाजिक तथ्यों का अध्ययन करने वाला विज्ञान माना गया है। सामाजिक तथ्य व्यक्ति के लिए बाहरी होते हैं तथा वे अपनी दबाव की शक्ति के माध्यम से व्यक्ति को नियंत्रित करते हैं। यह सही है कि सोचने, काम करने तथा अनुभव करने के तरीके व्यक्तियों द्वारा ही विकसित किए जाते हैं परंतु एक बार विकसित हो जाने पर व्यक्तियों का उन पर कोई नियंत्रण नहीं रहता है। इसी दृष्टि से दुर्खोम ने इस बात पर बल दिया है कि सामूहिक प्रतिनिधिानों की समाज में स्थायित्व बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। दुर्खोम व्यक्ति को अधिक स्वतंत्रता दिए जाने के पक्ष में नहीं थे क्योंकि इससे समाज में सामूहिक प्रतिनिधानों का महत्त्व कम हो जाएगा तथा समाज में अव्यवस्था विकसित हो जाएगी।

यह स्थिति समाज के एकीकरण के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। दुर्वीम इस बात को भूल गए कि समाज का निर्माण व्यक्तियों से होता है तथा बिना व्यक्तियों के समाज का अस्तित्व ही सम्भव नहीं हैं बिना स्वतंत्रता के व्यक्तियों का विकास नहीं हो सकता। आधुनिक युग में व्यक्ति अधिक-से-अधिक स्वतंत्रता की माँग कर रहे हैं तथा अपने पर उतना ही अंकुश लगाएं पाश्चात्य समाजशास्त्री-एक परिचय 351 रखने को उचित मानते हैं जितना कि सामाजिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है। दुर्खोम इन तर्को को नकारते हैं तथा इसीलिए उन्हें आधुनिक समाज में व्यक्ति को अधिक स्वतंत्रता देने का विरोधी माना जाता है। वस्तुतः दुर्खोम जैसे प्रकार्यवादी समाजशास्त्री सामाजिक व्यवस्था के विभिन्न अंगों को बात करते हैं जिसमें व्यक्ति का महत्त्व गौण हो जाता है।

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प्रश्न 10.
कहाँ तक निम्नलिखित समूहों अथवा गतिविधियों में वेबर के अर्थों में नौकरशाही सत्ता का प्रयोग हुआ है –

  1. आपकी कक्षा,
  2. आपका विद्यालय,
  3. फुटबॉल टीम,
  4. एक गाँव की पंचायत समिति,
  5. लोकप्रिय अभिनेता के प्रशंसकों का संघ,
  6. ट्रेन अथवा बस में रोजाना सफर करने वाले लोगों का समूह,
  7. सामूहिक परिवार,
  8. ग्रामीण समुदाय,
  9. जहाज का क्रू,
  10. अपराधियों का गिरोह,
  11. धार्मिक नेता के अनुयायी,
  12. सिनेमा घर में सिनेमा देखते हुए लोग।

अपनी चर्चा के आधार पर किस समूह को आप नौकरशाही के रूप में पहचानेंगे? (क्रियाकलाप 4)
उत्तर
उपर्युक्त समूहों अथवा गतिविधियों के विश्लेषण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि इनमें से अधिकांश में वेबर के अर्थों में नौकरशाही सत्ता का प्रयोग होता है। कक्षा में मॉनीटर अन्य छात्रों के आचरण पर नियंत्रण रखता है तथा छात्र भी कोई समस्या होने पर उसके माध्यम से उसे क्लास टीचर या प्रिंसिंपल तक पहुँचाने का प्रयास करते हैं। विद्यालय में प्रबंध समिति प्रिंसिपल के कार्यों की देखरेख करती है, प्रिंसिपल अध्यापकों की तथा अध्यापक छात्रों की। इनमें से प्रत्येक की न केवल सत्ता अलग-अलग है, अपितु दायित्व भी भिन्न-भिन्न हैं।

फुटबॉल टीम में कैप्टन एवं उप-कैप्टन टीम के अन्य सदस्यों को निर्देशित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसी भाँति, किसी गाँव की पंचायत समिति में पंचायत का प्रधान अपनी सत्ता के आधार पर निर्णय लेता है तथा पंचायत के लिए निर्धारित कार्यों को पूरा करने का प्रयास करता है। सामूहिक परिवार में परिवार का कर्ता परिवार के अन्य सदस्यों पर अपनी सत्ता के आधार पर ही नियंत्रण रखता है। ग्रामीण समुदाय में पंचायत के प्रधान के पास सत्ता होती है तथा वह इसका प्रयोग ग्रामीण लड़ाई-झगड़ों को सुलझाने में करता है।

जहाज के क्रू में भी स्पष्ट संस्तरण देखा जा सकता है। क्रू का प्रत्येक सदस्य अपने निर्धारित कार्यों को करता है तथा सबका यह प्रयास रहता है कि जहाज बिना किसी बाधा के अपनी मंजिल तक ठीक-ठाक पहुँच सके। अपराधियों के गिरोह में भी कोई-न-कोई ऐसा नेता होता है जो इन अपराधियों को संगठित बनाए रखता है तथा आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देने की योजना बनाने में अहम भूमिका निभाता है।

किसी धार्मिक सपंद्राय में नेता के पास सत्ती अधिक होती है तथा वह इस सत्ता के माध्यम से अपने अनुयायियों पर नियंत्रण रखता है। लोकप्रिय अभिनेता के प्रशंसकों के संघ, ट्रेन अथवा बस में रोजाना सफ़र करने वाले लोगों तथा सिनेमा घर में सिनेमा देखते हुए लोगों में वेबर के अर्थों में नौकरशाही सत्ता का अभाव पाया जाता है। नौकरशाही सत्ता के लिए पदों में संस्तरण तथा प्रत्येक पद के साथ वैधता जुड़ी होना आवश्यक है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
श्रम विभाजन का सिद्धांत किसने प्रतिपादित किया?
(क) कार्ल जे० फ्रेडरिक
(ख) रैक्जे म्योर
(ग) दुर्वीम
(घ) वेबर
उत्तर
(ग) दुखम

प्रश्न 2.
आदर्श प्रारूप की अवधारणा किसने दी?
(क) बटेंड रसेल
(ख) वेबर ने
(ग) वाटसन
(घ) हैन्सन
उत्तर
(ख) वेबर ने

प्रश्न 3.
“नौकरशाही मंत्रीय उत्तरदायित्व की आड़ में फलती-फूलती है।” यह कथन किसने कहा?
(क) रैक्जे म्योर
(ख) परकिंस
(ग) लार्ड हेवर्ट।
(घ) फिफनर
उत्तर
(क) रैक्जे म्योर

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प्रश्न 4.
“इतिहास केवल वर्ग संघर्ष का ही लेखा मात्र नहीं है।” यह कथन किसका है?
(क) प्रो० कैरयू हंट
(ख) रैक्जे म्योर
(ग) प्रो० लास्की
(घ) डा० राधाकृष्णन
उत्तर
(घ) डा० राधाकृष्णन

प्रश्न 5.
‘दि डिविसन ऑफ लेबर इन सोसाइटी पुस्तक के लेखक कौन हैं?
(क) मैक्स वेबर
(ख) लार्ड हेवर्ट
(ग) एमाइल दुखम
(घ) परकिंस
उत्तर
(ग) एमाइल दुर्वीम

निश्चित उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
दुर्खोम की प्रथम पुस्तक का नाम क्या है?
उत्तर
दुर्खाम की प्रथम पुस्तक का नाम समाज में श्रम-विभाजन’ (The Division of Labour in Society) है।

प्रश्न 2.
दुर्खोम की आत्महत्या पर लिखी सुप्रसिद्ध पुस्तक कौन-सी है?
उत्तर
दुर्खोम की आत्महत्यास पर लिखी उनकी तीसरी सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘दि सुसाईड’ (The Suicide) है।

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प्रश्न 3.
धर्म पर लिखी दुर्खोम की प्रसिद्ध पुस्तक का नाम क्या है?
उत्तर
धर्म पर लिखी दुर्खोम की प्रसिद्ध पुस्तक का नाम ‘दि एलीमेंट्री फार्ल्स ऑफ रिलिजियस लाइफ’ (The Elementary Forms of Religious Life) है।

प्रश्न 4.
दुर्खोम ने समाजशास्त्र को किसके अध्ययन के रूप में परिभाषित किया है?
उत्तर
दुर्खोम ने समाजशास्त्र को सामाजिक तथ्यों के अध्ययन के रूप में परिभाषित किया है।

प्रश्न 5.
दुर्खोम ने समाजशास्त्र को किस प्रकार का विज्ञान कहा है?
उत्तर
दुर्खोम ने समाजशास्त्र को ‘समाजों का विज्ञान’ (The science of societies) कहा है।

प्रश्न 6.
मैक्स वेबर ने समाजशास्त्र को किसके विज्ञान के रूप में प्रतिपादित किया है?
उत्तर
मैक्स वेबर ने समाजशास्त्र को सामाजिक क्रिया का अर्थपूर्ण बोध कराने वाले विज्ञान के रूप में प्रतिपादित किया है।

प्रश्न 7.
वेबर ने अपने पद्धतिशास्त्र में किस पद्धति का अधिक प्रयोग किया है?
उत्तर
वेबर ने अपने अध्ययनों में तुलनात्मक पद्धति का अधिक प्रयोग किया है।

प्रश्न 8.
वेबर के अनुसार सत्ता किसे कहते हैं?
या
वेबर के अनुसार सत्ता क्या है?
उत्तर
वेबर के अनुसार वैध (औचित्यपूर्ण) शक्ति को सत्ता कहते हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मार्क्स की वर्ग की अवधारणा की विवेचना कीजिए।
उत्तर
माक्र्स के अनुसार वर्ग आर्थिक आधार पर निर्मित समुह है तथा ये वैधानिक अथवा धार्मिक रूप में परिभाषित नहीं होते। मार्क्स के शब्दों में, “सामाजिक वर्ग ऐतिहासिक परिवर्तन की इकाइयाँ तथा आर्थिक व्यवस्था द्वारा समाज में निर्मित श्रेणियाँ दोनों ही हैं। वस्तुत: केवल एक समान आर्थिक स्थिति वाले व्यक्तियों का समूह ही वर्ग नहीं है अपितु यह एक ऐसा समूह है जिसके सदस्य अपने वर्ग अथवा इसके चिह्नों के प्रति मानसिक चेतना भी रखते हैं तथा उनकी यह चेतना वर्ग की विभिन्न क्रियाओं में देखी जा सकती है।

प्रश्न 2.
माक्र्स की अधिसंरचना तथा ‘अधोसंरचना की अवधारणा की व्याख्या कीजिए।
उत्तर
किसी समाज की अधिसंरचना से अभिप्राय उस आर्थिक संरचना से है जिस पर समाज का संपूर्ण ढाँचा निर्भर करता है। इसके निर्धारण में उत्पादन के संबंधों एवं उत्पादन की शक्तियों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। मार्स ने इसे वह आधार माना है जो समाज की अधोसंरचना को निर्धारित करता है। अधोसंरचना से अभिप्राय उन वैचारिक संरचनाओं से है जो अधिसंरचना द्वारा निर्धारित होती है। इनमें कानून, राजनीति, धर्म, कलाएँ, दर्शन आदि सम्मिलित होते हैं। माक्र्स का कहना है कि आर्थिक अधिसंरचना के अनुसार ही कानून, राजनीति, धर्म, कलाएँ, दर्शन आदि अधोसरचंनाएँ निर्मित होती हैं।

प्रश्न 3.
दमनकारी एवं प्रतिकारी (क्षतिपूरक) कानून क्या हैं?
उत्तर
दुर्वीम ने समाज में पायी जाने वाली एकता को इसे बनाए रखने वाले कानूनों से जोड़ा है। उनके अनुसार यांत्रिक एकता की अवस्था में दमनकारी कानून तथा सावयविक एकता की अवस्था में प्रतिकारी कानून का प्रचलन होता है। दमनकारी कानून वाले समाजों में विचलन या अपराध सामूहिक चेतना के विरुद्ध कार्य समझे जाते हैं; अतः ऐसे व्यक्तियों को कठोर दंड दिया जाता है। इससे नैतिक संतुलन बना रहता है तथा सामूहिक चेतना भी बनी रहती है। प्रतिकारी कानून वाले समाजों में अपराध को समस्त समाज के विरुद्ध अपराध नहीं समझा जाता अपितु इसे व्यक्ति विशेष के विरुद्ध अपराध माना जाता है। अतः प्रतिकारी कानून का उद्देश्य हानि-प्राप्त व्यक्ति की हानि को पूरा करना होता है।

प्रश्न 4.
दुर्खोम की किन्हीं दो पुस्तकों के नाम लिखिए।
उत्तर
दुखैम का समाजशास्त्र के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने समाजशास्त्र को एक सुदृढ़ आधारशिला प्रदान की तथा समाजशास्त्र को विज्ञान के रूप में प्रतिस्थापित किया। उनके द्वारा लिखित दो पुस्तकें निम्नलिखित हैं –

  1. 1893 ई० में प्रकाशित ‘De la Division du Travail Social (The Division of Labour in Society); तथा
  2. 1897 ई० में प्रकाशित Le Suicide (The Suicide)।

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प्रश्न 5.
मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांत की मानवीय इतिहास के बारे में क्या धारणा है।
उत्तर
मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांत की समस्त मानवीय इतिहास के बारे में दो धारणाएँ हैं-

  1. जीवित रहने के साधनों का उत्पादन तथा
  2. बच्चों का उत्पादन ताकि समाज की निरंतरता बनी रह सके।

प्रश्न 6.
द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की दो विशेषताएँ इस प्रकार हैं –

  1. विपरीतों की एकता तथा संघर्ष का नियम,
  2. निषेध के निषेध का नियम।

प्रश्न 7.
मार्क्स के द्वारा वर्णित किन्हीं दो युगों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
मार्क्स द्वारा वर्णित दो युग इस प्रकार हैं-

  1. आदिम साम्यवादी युग तथा
  2. दास युग।

प्रश्न 8.
अधोसंरचना से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
अधोसंरचना से अभिप्राय उन वैचारिक संरचनाओं से है जो अधिसंरचना (आर्थिक संरचना) द्वारा निर्धारित होती हैं। इसमें कानून, राजनीति, धर्म, कलाएँ, दर्शन आदि सम्मिलित होते हैं।

प्रश्न 9.
मैक्स वेबर के अनुसार किसी क्रिया को सामाजिक क्रिया कब कहा जाता है?
उत्तर
मैक्स वेबर के अनुसार कोई भी क्रिया तभी सामाजिक क्रिया कही जाती है जब उसको करने वाले व्यक्ति द्वारा लगाए गए चेतना संबंधी अर्थ के कारण वह क्रिया दूसरे व्यक्तियों के व्यवहार द्वारा प्रभावित होती है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मार्क्स को एक समाजशास्त्री क्यों कहा जाता है?
उत्तर
आगस्त कॉम्टे की तरह मार्क्स एक दार्शनिक तथा समाजशास्त्री दोनों ही था। इससे अभिप्राय यह नहीं कि मार्क्स ने केवल उन्हीं समस्याओं की ओर ध्यान दिया जो कि आज दर्शनशास्त्र अथवा समाजशास्त्र की विषय-वस्तु के अंतर्गत आती हैं। मार्क्स अपने समय के अन्य विद्वानों की तरह यह विश्वास रखते थे कि दर्शनशास्त्र तथा समाजशास्त्र एक सामान्य समग्र के ही अंग हैं तथा तार्किक दृष्टि से अन्वेषण का ही एक विषय हैं। दर्शनशास्त्र समाज के अन्वेषण में अवधारणात्मक रूपरेखा प्रस्तुत करता है, जबकि समाजशास्त्र दार्शनिक समस्याओं को सुलझाने में सहायक होता है।

सामान्य विश्वास के विपरीत, मार्क्स एक भौतिकवादी (इस शब्द के आध्यात्मिक अथवा आत्म-विषयक अर्थ में) नहीं थे, क्योंकि उन्होंने कभी भी पदार्थ की संचार की गति को आवश्यक या अतिंम तत्त्व नहीं माना तथा यह नहीं कहा कि इसके अतिरिक्त संसार में कुछ भी नहीं है। वे मानते थे कि न तो मस्तिष्क अथवा समाज इतिहास को अमानवीय वस्तुओं के यात्रिक नियमों के रूप में परिसीमित कर सकता है और न ही इनकी व्याख्या दी जा सकती है। मार्क्स के लिए प्रकृति पदार्थ से अधिक व्यापक अवधारणा थी।

जैड० ए० जोर्डन के अनुसार मार्क्स ‘एक प्रकृतिवादी दार्शनिक थे, न कि भौतिकवादी। प्रकृतिवादी से अभिप्राय है कि मस्तिष्क प्रकृति का अंग है, इसका अन्वेषण तथा अध्ययन उसी विधि के द्वारा किया, जा सकता है जिसके द्वारा अन्य प्राकृतिक वस्तुओं का; अर्थात् अनुभवाश्रित विधि द्वारा, न कि काल्पनिक वैज्ञानिक विधि अथवी आध्यात्मिक निगमन विधि द्वारा। वे यह मानते थे कि समय, स्थान तथा कारणवाद की श्रेणियाँ सामाजिक जगत से संबंधित ज्ञान प्राप्त करने के लिए मौलिक हैं। मार्क्स के समय प्रकृतिवाद तथा भौतिकवाद में अंतर नहीं किया जा सकता था, परंतु उन्होंने कभी भी इन्हें पर्यायवाची शब्दों के रूप में प्रयोग नहीं किया। यद्यपि मार्क्स की व्यक्ति की अवधारणा का स्रोत दार्शनिक है तथापि इनका व्यक्ति का विज्ञान समाजशास्त्रीय तथा अनुभवाश्रित है, न कि दार्शनिक या काल्पनिक। व्यक्ति सदैव एक सामाजिक प्राणी रहा है, क्योंकि उसे सामाजिक क्रिया द्वारा जीवनयापन तथा जीवित रहने के लिए सामूहिक रूप से उत्पादन करना पड़ता था।

समाज का निर्माण अंत:क्रियारत व्यक्तियों द्वारा होता है तथा मार्क्स स्वयं मानते थे कि समाज व्यक्तियों का योग नहीं अपितु व्यक्तियों की पारस्परिक क्रियाओं का परिणाम है तथा व्यक्ति का विज्ञान, समाज के व्यक्तियों की अंत:क्रियाओं का ही अध्ययन है। ये मनोवैज्ञानिक व्यक्तिवाद (जिसे जे० एस० मिल तथा हरबर्ट स्पेंसर समर्थन देते थे) के विरोधी थे, क्योंकि इनकी मान्यता थी कि सामाजिक नियम अंत में मनोवैज्ञानिक नियम ही हैं। मार्क्स को एक समाज-वैज्ञानिक इसलिए माना जाता है कि उन्होंने केवल समाजशास्त्र को ही सैद्धांतिक एवं अनुभवाश्रित योगदान नहीं दिया अपितु ऐसे सिद्धांतों का निर्माण किया जो राजनीति विज्ञान एवं अर्थशास्त्र में भी महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

मार्क्स को समाजशास्त्री इसलिए कहा जाता है क्योकि इन्होंने ऐसे सिद्धांतों का निर्माण किया जो केवल समाज के विभिन्न पक्षों से ही संबंधित नहीं है, अपितु समाज के विभिन्न पक्षों में संबंधों का निर्धारण करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनका वर्ग-संघर्ष का सिद्धांत, अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत, अलगाव का सिद्धांत, सामाजिक परिवर्तन का सिद्धांत इत्यादि ऐसे महत्त्वपूर्ण सिद्धांत हैं जिन्हें आज समाजशास्त्र का कोई भी छात्र अनदेखा नहीं कर सकता है।

प्रश्न 2.
मार्क्स के सामाजिक अध्ययनों के दार्शनिक आधार को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
मार्क्स ने सामाजिक विज्ञानों में प्रचलित प्रकृतिवादी विचारधारा की दार्शनिक मान्यताओं का निर्माण किया। कोई समाज-वैज्ञानिक प्रकृतिवाद अथवा गैर-प्रकृतिवाद को मानता है या नहीं, यह उसके प्रकृति तथा विषय-वस्तु से संबंधित विचारों पर आधारित है। मार्स एक भौतिकवादी नहीं थे, क्योंकि उन्होंने कभी भी यह दावा नहीं किया कि सामाजिक घटना को प्राकृतिक घटना में परिसीमित किया जा सकता है अथवा दोनों घटनाएँ एक प्रकार की हैं, वरन् उन्होंने यह तर्क दिया कि सभी विज्ञानों के संबंधों को वैज्ञानिक विधि द्वारा संकलित किया जा सकता है। अन्य विज्ञानों की तरह समाजशास्त्र का संबंध भी अनुभवाश्रित प्रस्तावनाओं का निर्माण करना तथा उन्हें प्रमाणित करना है।

मार्क्स के अनुसार सामाजिक विज्ञानों का संबंध मानवीय अंत:क्रियाओं की घटनाओं से संबंधित है। इसे उन्होंने अंत:क्रियावाद कहा है तथा इसे अनेक समाज-वैज्ञानिक आज भी मानते हैं, चाहे वे प्रकृतिवाद के समर्थक हैं या अप्रकृतिवाद के। मार्क्स के लिए उविकासीय परिवर्तन एक स्वचालित प्रक्रिया है। जिसके नियमों की खोज करना समाजशास्त्र का प्रमुख कार्य होना चाहिए।

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प्रश्न 3.
मार्क्स का सैद्धांतिक दृष्टिकोण क्या है? टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
प्रकृतिवाद दार्शनिक आधार से संबंधित तीन सैद्धांतिक दृष्टिकोणों पर आश्रित है, जिनकी व्याख्या पद्धतिशास्त्र तथा सार रूप दोनों से हो सकती है। इनसे विचारों अथवा संबंधों के प्रकारों का पता चलता है, जो कि सामाजिक घटना के अन्वेषण में लाभदायक तथा अनिवार्य माने जाते हैं। ये समाज के अध्ययन का सामान्य दृष्टिकोण व्यक्ति करते हैं। मार्क्स का प्रथम दृष्टिकोण यह विश्वास है। कि संघर्ष एक प्रभावशाली प्रक्रिया अथवा संबंध (जिससे संघर्षमय संबंध सदैव निहित है) है तथा इसके परिणाम विभाजित करने वाले एवं संश्लिष्टता बढ़ाने वाले दोनों ही प्रकार के हो सकते हैं। संघर्ष को सामाजिक जीवन से पृथक् नहीं किया जा सकता। विकास संघर्ष का ही परिणाम है तथा संघर्ष रहित समाज एक स्थिर समाज है।

दूसरा दृष्टिकोण समाज के विभिन्न अंगों में सार्वभौमिक आत्मनिर्भरता तथा विशेष प्रकार की एकता से संबंधित है। प्रत्येक अंग का निर्धारण दो तरह से किया जाता है- उस व्यवस्था के रूप में जिसका कि वह भाग है तथा वह व्यवस्था के अन्य अंगों को कैसे प्रभावित करता है। इसे प्रकार्यवाद की प्रस्तावना कहा जा सकता है। संघर्ष तथा प्रकार्यात्मक आश्रितता एक ही प्रक्रिया के दो पूरक पहलू हैं।
तीसरे सैद्धांतिक दृष्टिकोण के अनुसार, वृहत् समाजशास्त्रीय संरचनाओं तथा नियमों की प्रामाणिकता किसी विशेष समय के संदर्भ में ही दी सकती है। इसलिए उन्हें ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। समाजशास्त्रीय वर्णन सामाजिक घटनाओं के ऐतिहासिक पहलुओं की ओर ध्यान दिए बिना अपूर्ण है।

सैद्धांतिक दृष्टिकोण को कुछ अवधारणाओं के रूप में व्यक्ति किया जाता है। इस प्रकारे सैद्धांतिक दृष्टिकोण और अवधारणात्मक ढाँचे में सह-संबंध पाया जाता है। जहाँ तक माक्र्स का संबंध है, यह सह-संबंध उनके अध्ययन में स्पष्ट देखा जा सकता है।

प्रश्न 4.
दुर्खोम के अनुसार समाजशास्त्र की विषय-वस्तु क्या है?
उत्तर
एमाइल दुर्खोम ने सामाजिक तथ्यों को समाजशास्त्र की अध्ययन-वस्तु माना तथा संस्थाओं और सामाजिक प्रक्रियाओं के अध्ययन पर बल दिया है। इन्होंने एक अनुसंधान पत्रिका निकालनी शुरू की जिसमें समाजशास्त्र को सात भागों में विभाजित किया-

  1. सामान्य समाजशास्त्र
  2. धर्म का समाजशास्त्र
  3. कानून और नियमों का समाजशास्त्र
  4. अपराध का समाजशास्त्र
  5. आर्थिक समाजशास्त्र
  6. जनसंख्या विज्ञान तथा
  7. कलात्मक समाजशास्त्र।

दुर्वीम ने समाजशास्त्र की विषय-सामग्री को तीन भागों में विभक्त किया है-
1. सामाजिक रूपशास्त्र – दुर्खोम का कहना है कि समाज के संगठनों पर भौगोलिक तत्त्वों का गहरा प्रभाव पड़ता है। भौगोलिक तत्त्व समाज में जनसंख्या के घनत्व को प्रभावित करते हैं। दुर्खोम सामाजिक रचना को भौगोलिक तत्त्वों का ही परिणाम मानते हैं। इसलिए उनका कहना है कि समाजशास्त्र के अंतर्गत उन भौगोलिक तत्त्वों का अध्ययन किया जाता है जो समाज की रचना को प्रभावित करते हैं। इसे ही दुर्खोम ने सामाजिक रूपशास्त्र’ कहा है।

2. सामाजिक दैहिकी – कानून, धर्म तथा पारिवारिक जीवन एवं भाषा आदि समाज के आधारभूत नियंत्रक तत्त्व हैं। इन सभी तत्त्वों के कारण समाज में नियंत्रण की व्यवस्था बनी रहती है। इसी को सामाजिक दैहिकी कहते हैं। समाजशास्त्र में सामाजिक दैहिकी से संबंधित सभी तत्त्वों का अध्ययन किया जाता है। धर्म का समाजशास्त्र, भाषा का समाजशास्त्र आदि का अध्ययन इसमें प्रमुख रूप से किया जाता है।

3. सामान्य समाजशास्त्र – सामान्य समाजशास्त्र में साधारण सामाजिक नियमों का अध्ययन किया जाता है। इसके साथ-साथ सामान्य अंगों को सुरक्षित रखने के लिए जो भी संभव प्रयत्न किए जाते हैं उन सबका अध्ययन भी समाजशास्त्र की विषय-वस्तु है।

प्रश्न 5.
समन्वयात्मक संप्रदाय के बारे में दुखम के विचारों की विवेचना कीजिए।
उत्तर
समन्वयात्मक संप्रदाय के अनुसार समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान है तथा यह अन्य विशिष्ट सामाजिक विज्ञानों का समन्वय मात्र है। इस संप्रदाय के प्रमुख समर्थक फ्रांसीसी और अंग्रेज समाजशास्त्री हैं। इनके अनुसार समाजशास्त्र को अपना क्षेत्र सीमित तथा संकुचित न बनाकर विस्तृत और व्यापक बनाना होगा। समाजशास्त्र के क्षेत्र को कुछ विषयों तक सीमित न करके उसे अन्य सभी विज्ञानों में भी समन्वित करना चाहिए। अन्य विज्ञानों से पृथक् रखने पर समाजशास्त्र एक जड़ विषय हो जाएगा।

दुर्खोम, हॉबहाउस, सोरोकिन, जिन्सबर्ग तथा मोटवानी आदि इसी मत के समर्थक हैं। इन विद्वानों के मत में समाजशास्त्र एक विज्ञानों का विज्ञान’ (Science of sciences) है। सभी विज्ञान उसके क्षेत्र में आ जाते हैं और वह सभी को अपने में समन्वित करता है। सामाजिक जीवन के समस्त भाग परस्पर संबंधित हैं। इस कारण किसी एक पक्ष का अध्ययन करने से हम संपूर्ण समाजिक जीवन को नहीं समझ सकते। ऐसी दशा में आवश्यक है कि हम समाजशास्त्र में संपूर्ण सामाजिक जीवन का व्यवस्थित अध्ययन करें, केवल सूक्ष्म सिद्धांतों का अध्ययन करने से काम नहीं चलेगा।

दुर्खोम के अनुसार प्रत्येक समाज में कुछ विचारे, धारणाएँ एवं भावनाएँ होती हैं जिनका पालन संबंधित समाज के अधिकांश सदस्य करते हैं। ये विचार एवं धारणाएँ संबंधित समाज के सामाजिक जीवन का ‘सामूहिक प्रतिनिधित्व करते हैं। दुर्खोम के अनुसार, समाजशास्त्र का कार्य इसी सामूहिक प्रतिनिधित्व का अध्ययन करना है। इसी स्थिति में स्पष्ट है कि समाजशास्त्र को एक सामान्य विज्ञान होना चाहिए।

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प्रश्न 6.
दुर्खोम की सामाजिक तथ्य की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
या
सामाजिक तथ्य पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
दुर्खोम ने सामाजिक तथ्यों को समाजशास्त्र की विषय-वस्तु माना है। इनके अनुसार समाजशास्त्र समस्त मानवीय क्रियाओं का अध्ययन नहीं करता, बल्कि ‘सामाजिक तथ्य’ ही समाजशास्त्र की वास्तविक अध्ययन-वस्तु हैं। सामाजिक तथ्यों से दुर्वीम का अभिप्राय व्यवहार के उन तरीकों से है जो व्यक्ति पर बाह्य दबाव डालने की क्षमता रखते हैं तथा व्यक्तिगत स्वरूपों से अलग अपना अस्तित्व रखते हैं।

दुर्खोम के अनुसार सामाजिक तथ्यों को वस्तुओं के समान समझना चाहिए; अर्थात् इनमें कुछ ऐसे विशिष्ट गुण होते हैं जिन्हें बाहरी रूप से देखा जा सकता है। इन्हें अनुभवं द्वारा जाना जा सकता है तथा वे अपने अस्तित्व के लिए मनुष्य पर ही निर्भर नहीं होते। सामाजिक तथ्यों की व्याख्या मनोविज्ञान, प्राणिशास्त्र या भौतिकशास्त्र के सिद्धांतों द्वारा संभव नहीं है। इनके कारण तथा परिणाम समाज में ही विद्यमान होते हैं। दुर्खोम के शब्दों में, “सामाजिक तथ्य व्यवहार (विचार, अनुभव या क्रिया) का वह पक्ष है जिसका निरीक्षण वस्तुनिष्ठ रूप में संभव है जो व्यक्ति को एक विशेष ढंग से व्यवहार करने को बाध्य करता है।”
उपर्युक्त परिभाषा से यह स्पष्ट हो जाता है कि किसी भी विचार, अनुभव या क्रिया को तभी सामजिक तथ्य माना जाएगा जबकि उसमें दो विशेषताएँ हों-

  1. विचार, अनुभव या क्रिया का वास्तविक रूप में निरीक्षण संभव हो; तथा
  2. ये व्यक्ति पर बाहरी दबाव रखने की क्षमता रखते हों।

दुर्खोम के अनुसार सामाजिक तथ्य में कार्य करने, सोचने, अनुभव करने के वे तरीके सम्मिलित हैं जो व्यक्ति के लिए बाहरी होते हैं तथा वे अपनी दबाव शक्ति के माध्यम से व्यक्ति को नियंत्रित करते हैं।”

प्रश्न 7.
दुर्खोम के अनुसार सामाजिक तथ्यों की प्रमुख विशेषताएँ कौन-सी हैं?
उत्तर
दुर्खोम ने सामाजिक तथ्यों की निम्नलिखित दो विशेषताएँ बताई हैं-
1. बाह्यता – बाह्यता का अर्थ यह है कि सामाजिक घटनाओं या तथ्यों का निर्माण तो समाज के सदस्यों द्वारा ही होता है किंतु सामाजिक तथ्य एक बार विकसित हो जाने के पश्चात् फिर किसी एक व्यक्ति को नहीं रहता और वह भी इस अर्थ में कि इसे एक स्वतंत्र वास्तविकता के रूप में अनुभव किया जाता है। सामाजिक तथ्यों में सामूहिक चेतना पायी जाती है। दुर्खोम के अनुसार, जिस प्रकार वैयक्तिक विचारों का मूलभूत स्रोत स्नायुमंडल के विभिन्न कोशाणु हैं, उसी प्रकार सामाजिक विचारों का आधार समाज में सम्मिलित व्यक्ति होते हैं।

सामूहिक चेतना का विकास वैयक्तिक चेतना के सम्मिलिन तथा संगठन से होता है अथवा यह भी कहा जा सकता है कि वैयक्तिक विचारों का जब संगठन होता है तो एक नए प्रकार के विचार ‘सामूहिक विचार’ का विकास होता है जिसकी अपनी विशेषताएँ होती हैं। दुर्खोम के अनुसार, सामूहिक विचार व्यक्ति की परिधि से स्वतंत्र अपनी सत्ता रखते हैं।

2. बाध्यता – सामाजिक तथ्यों की दूसरी विशेषता बाध्यता है अर्थात् सामाजिक तथ्यों को व्यक्ति पर बाध्यकारी प्रभाव पड़ता है। वास्तव में, व्यक्ति जो भी कार्य करता है उस पर सामाजिक तथ्य का प्रभाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है क्योंकि तथ्यों के निर्माण में समाज के अनेक सदस्यों का योगदान होता है। दुर्खोम ने उदाहरण देते हुए यह स्पष्ट किया है कि नैतिक नियम, धार्मिक विश्वास व वित्तीय व्यवस्थाएँ मनुष्य के व्यवहार तथा कार्यों को करने के तरीकों को अत्यधिक प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 8.
दूर्णीम की सामाजिक तथ्य की अवधारणा की आलोचना किन आधारों पर की गई है? समझाइए।
उत्तर
दुर्खोम की सामाजिक तथ्य की अवधारणा की अनेक आधारों पर आलोचना की गई है। आलोचना के प्रमुख आधार निम्नलिखित हैं –

  1. सामाजिक तथ्यों को सदैव वस्तुएँ नहीं माना जा सकता, वे भी ऐसी वस्तुएँ जो मानवीय अंत:क्रियाओं से परे हैं। उदाहरणार्थ-यदि किसी विश्वविद्यालय से प्रोफेसर और विद्यार्थी निकाल दिए जाएँ तो वहाँ नाम के अतिरिक्त और कुछ नहीं रह जाएगा।
  2. सामाजिक तथ्यों को बाहरी निरीक्षण तक सीमित करना भी उचित नहीं है क्योंकि अनेक ऐसे विषय हैं जो तर्क व परिष्कृत सामान्य बुद्धि से बहुत सुंदर रीति से समझे जा सकते हैं।
  3. सोरोकिन के अनुसार बाह्यती व बाध्यता की विशेषताएँ विशिष्ट समस्याओं के अध्ययन के लिए तो उपयुक्त हैं पर सभी प्रकार के सामाजिक तथ्यों के लिए नहीं।
  4. बार्ल्स के अनुसार दुर्खोम ने सामाजिक तथ्यों की अपनी अवधारणा में बाध्यता पर आवश्यकता से अधिक बल दिया है।

उपर्युक्त आलोचनाओं के बावजूद दुखम की सामाजिक तथ्य की अवधारणा एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण अवधारणा मानी जाती है।

प्रश्न 9.
दुर्खोम के अनुसार यांत्रिक एकता किसे कहते हैं?
उत्तर
प्राचीन समाजों में श्रम-विभाजन का अभाव पाया जाता था तथा केवल लैंगिक आधार पर थोड़ा-बहुत श्रम-विभाजन पाया जाता था, परंतु फिर भी विशेषीकरण नहीं था। इसलिए दुर्खोम के अनुसार प्राचीन समाजों में एकता का आधार समानता थी। दुर्खोम ने इस प्रकार की एकता को यांत्रिक एकता कहा है। यांत्रिक एकता उन समाजों में पायी जाती है जिनमें दमनकारी कानून की प्रधानता होती है। दुर्खोम का कहना है कि जिस प्रकार की आचार-संहिता समाज में पायी जाती है, उसी के अनुरूप एकता उस समाज में मुख्य रूप से पायी जाती है।

यांत्रिक एकता आदिम समाजों में अथवा सभ्यता और संस्कृति की दृष्टि से पिछड़े हुए समाजों में पायी जाती है। इन समाजों में विभेदीकरण अर्थात् कार्यों का वितरण न के बराबर है तथा केवल लिंग और आयु के आधार पर ही थोड़ा-बहुत कार्यों में विभेदीकरण पाया जाता है। सामूहिक चेतना द्वारा सभी व्यक्ति एक-दूसरे के साथ जुड़े रहते हैं तथा इस सामूहिक चेतना को बनाए रखना सभी व्यक्ति अपना परम कर्तव्य मानते हैं। कोई भी ऐसा कार्य करना, जिससे कि सामूहिक चेतना को आघात पहुँचता हो, बहुत बुरा अपराध माना जाता है। अतः यांत्रिक एकता वह एकता है जो कि व्यक्तियों द्वारा एक जैसे कार्यों के करने के कारण आती है अर्थात् जो समरूपता का परिणाम है। यह एक सरल प्रकार की एकता है जो दमनकारी कानून द्वारा बनाए रखी जाती है।

प्रश्न 10.
सावयवी एकता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
जैसे-जैसे समाज में जटिलता आती जाती है तथा वह परंपरा से आधुनिकता की ओर आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे समाज में श्रम-विभाजन एवं विशेषीकरण में वृद्धि होने लगती है। इससे व्यक्ति एक-दूसरे पर अधिक-से-अधिक आश्रित होने लगते हैं। दुर्खोम के अनुसार, आधुनिक समाजों में एकता का आधार श्रम-विभाजन के कारण आने वाली अन्योन्याश्रितता है। इसी एकता को दुर्खोम ने सावयवी एकता कहा है। दुर्खोम का कहना है कि जैसे-जैसे समाज की जनसंख्या का घनत्व तथा आयतन बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे व्यक्तियों की आवश्यकताएँ भी बढ़ती जाती हैं।

इन बढती हुई आवश्यकताओं के कारण व्यक्तियों के कार्यों में भिन्नता आती है तथा इसके साथ ही इनमें विशेषीकरण बढ़ता है अर्थात् श्रम-विभाजन की वृद्धि होती है। दुर्खोम उस एकता को, जो कि कार्यों की भिन्नता द्वारा विशेषीकरण (अर्थात् श्रम-विभाजन) और इसके परिणामस्वरूप व्यक्तियों की अन्योन्याश्रितता के कारण आती है, सावयवी एकता कहते हैं। यांत्रिक एकता के विपरीत, इसमें समरूपता की बजाय भिन्नता व्यक्तियों को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास करती है। सावयविक एकता व्यक्तियों के व्यक्तित्व में परिवर्तन के साथ-साथ परिवर्तित होती रहती है। सावयवी एकता की पुष्टि प्रतिकारी कानून द्वारा होती है। सहयोगी कानून का दमनकारी कानून पर प्रभुत्व इस बात का प्रतीक है कि श्रम-विभाजन द्वारा जो संबंध स्थापित होते हैं वह असंख्य होते हैं अर्थात् समरूपता द्वारा स्थापित संबंधों से कहीं अधिक होते हैं।

प्रश्न 11.
वेबर की समाजशास्त्र की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
जर्मन सामाजिक विचारधारा में वेबर का नाम उल्लेखनीय है। इन्हें राजनीतिक-अर्थशास्त्री तथा समाजशास्त्री दोनों रूपों में स्वीकार किया गया है। इन्हें भी समाजशास्त्र के प्रतिपादकों में से एक माना जाता है। इन्होंने भी समाजशास्त्र को वैज्ञानिक रूप देने का प्रयास किया। मैक्स वेबर के शब्दों में, समाजशास्त्र वह विज्ञान है जो सामाजिक क्रिया का अर्थपूर्ण बोध कराने का प्रयत्न करता है ताकि इसके घटनाक्रम (गतिविधि) एवं परिणामों की कार्य-कारण व्याख्या तक पहुँचा जा सके।” उपर्युक्त परिभाषा से यह स्पष्ट हो जाता है कि वेबर समाजशास्त्र की विषय-वस्तु सामाजिक क्रिया मानते हैं, इसलिए समाजशास्त्र का विस्तृत अर्थ तथा प्रकृति को समझने के लिए इसकी सामाजिक क्रिया की अवधारणा को समझना आवश्यक है।

मनुष्यों की सभी क्रियाएँ सामाजिक नहीं हैं, अपितु केवल सामाजिक संदर्भ में की जाने वाली क्रियाएँ ही . सामाजिक क्रियाएँ कहलाती हैं। उदाहरणार्थ- अकेले बैठे-बैठे हाथ उठाना कोई सामाजिक क्रिया नहीं है परंतु किसी के सामने हाथ जोड़ना एक सामाजिक क्रिया है। ‘क्रिया’ शब्द का अर्थ ‘कर्म’ या कार्य है, जबकि सामाजिक’ शब्द सामाजिक संदर्भ या सामाजिक परिस्थिति का द्योतक है। वेबर के अनुसार ‘क्रिया में वह सारा मानव व्यवहार आ जाता है जिसको कर्ता चेतना संबंधी अर्थ से संबंधित करता है। इस अर्थ में क्रिया बाहरी भी हो सकती है और आंतरिक या चेतना संबंधी भी। यह किसी परिस्थिति में सकारात्मक रूप से दखल देने अथवा जानबूझकर उस परिस्थिति से दूर रहने के रूप में हो सकती है। एक सामाजिक प्राणी होने के नाते व्यक्ति की क्रियाएँ एवं व्यवहार सामाजिक संदर्भ में ही अर्थपूर्ण होते हैं; अतः सामाजिक संदर्भ में की जाने वाली क्रिया को ही सामाजिक क्रिया कहा जाता है।

वेबर के अनुसार ‘क्रिया’ में वह सारी व्यवहार आ जाता है जिसको क्रियारत व्यक्ति (कर्ता) चेतना संबंधी अर्थ से संबंधित करता है। इस अर्थ में क्रिया बाहरी भी हो सकती है तथा आतंरिक या चेतना संबंधी भी; यह किसी परिस्थिति में सकारात्मक रूप से दखल देने अथवा जानबूझकर उस परिस्थिति से दूर रहने के रूप में हो सकती है। वेबर के अनुसार, “किसी क्रिया को सामाजिक क्रिया तभी कहा जा सकता है जबकि उस क्रिया को करने वाले व्यक्ति या व्यक्तियों के द्वारा लगाए गए चेतना संबंधी अर्थ के कारण यह क्रिया दूसरे व्यक्तियों के व्यवहार द्वारा प्रभावित हो और उसी के अनुसार उसकी गतिविधि निर्धारित हो।’

वेबर का अर्थपूर्ण समाजशास्त्र व्यक्ति तथा उसकी क्रिया को एक मूल इकाई मानता है। व्यक्ति ही उच्च सीमा है तथा अर्थपूर्ण व्यवहार को करने वाला है। अन्य अवधारणाएँ; जैसे-‘राज्य’, ‘समिति’, ‘सामंतवाद’ इत्यादि मानवीय अंतःक्रियाओं को ही कुछ श्रेणियाँ हैं। इसलिए समाजशास्त्र का उद्देश्य इन अवधारणाओं को अर्थपूर्ण क्रियाओं में परिवर्तित करना है।

प्रश्न 12.
वेबर की सत्ता की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
जब राजनीतिक शक्ति के साथ वैधता को जोड़ दिया जाता है तो उसे सत्ता कहते हैं। वेबर के अनुसार सत्ता का संबंध शक्ति से है। वैध शक्ति (Legitimate power) को ही सत्ता कहा जाता है। सत्ता द्वारा ही सामाजिक क्रिया का परिसंचालन होता है तथा इसी के द्वारा समाज में स्थायित्व बना रहता है अथवा सामाजिक व्यवस्था का निर्धारण होता है। वेबर की सत्ता संबंधों की चर्चा, अर्थात् कुछ व्यक्तियों के पास शक्ति कहाँ से आती है तथा वे यह अनुमान क्यों लगाते हैं कि अन्य व्यक्तियों को उनका अनुपालन करना चाहिए। वास्तव में, उनके आदर्श-प्रारूप का ही एक उदाहरण है जिसमें वह सत्ता का तीन श्रेणियों में वर्गीकरण प्रस्तुत करते हैं।

इस प्रकार, शक्ति को जब वैधानिक रूप दे दिया जाता है तो उसे सत्ता कहा जाता है। सत्ता को मानना अथवा इसका पालन करना एक ऐच्छिक कार्य है। सत्ता ही समाज में स्थायित्व का वास्तविक आधार है। सत्ता केवल राजनीतिक क्रियाओं अथवा परिस्थितियों तक ही सीमित नहीं है अपितु सामजिक जीवन के प्रत्येक पहलू में सत्ता क्रियाशील है तथा देखी जा सकती है। राजनीतिक तथा सामाजिक पहलुओं में अंतर केवल इतना है कि पहले में सत्ता इसके साथ जुड़ी हुई है, जबकि दूसरे में शक्ति तथा सत्ताका वितरण समान रूप से नहीं है।

यदि सरकार को जनता वैध स्वीकार नहीं करती है तो सरकार के प्रति अविश्वास प्रकट किया जाता है। कई बार युद्ध और क्रांतियों द्वारा सरकार का तख्ता तक पलट दिया जाता है। वास्तव में, कोई भी सरकार हिंसा, दंड या दमन के आधार पर ही अपना अस्तित्व नहीं बनाए रख सकती। वैधता जनता के मन में उसके प्रति विश्वास पैदा करती है और जनसाधारण उसे नैतिक दृष्टि से सही और उचित मानने लगता है। इस प्रकार का विश्वास राज्य व्यवस्था की सभी संरचनाओं, कार्यविधियों, नीतियों, अधिकारियों तथा नेताओं के प्रति होना ही वैधता कहलाता है।

प्रजातंत्रीय राज्यों में वैधता का महत्त्वपूर्ण स्थान है तथा इसके रहने पर द्वंद्व एवं विवाद भी राज्य-व्यवस्था को कभी विभंग नहीं कर सकते। वैधता के कारण ही अधीनस्थ अधिकारी अपने से उच्च अधिकारियों का आदेश मानते हैं। वैधता सारी व्यवस्था को सुचारु बना देती है। वास्तव में, वैधता के अभाव में शक्ति केवल बल (Force) है तथा इसके न होने पर शासकों का भी विरोध किया जाता है।

प्रश्न 13.
वेबर के अनुसार सत्ता कितने प्रकार की होती है?
उत्तर
वेबर ने वैध शक्ति या औचित्यपूर्ण शक्ति को सत्ता कहा है। उनके अनुसार समाज में स्थायित्व इसलिए नहीं आता कि राजनीतिक शक्ति में बल प्रयोग किया जाता है अथवा करने की धमकी दी जाती है, वरन् इसलिए आता है कि शक्ति को वैधता सुदृढ़ करती है। जब शक्ति के साथ वैधता को जोड़ दिया जाता है तो उसे सत्ता कहते हैं। सत्ता केवल राजनीतिक क्रियाओं अथवा परिस्थितियों तक ही सीमित नहीं है अपितु सामाजिक जीवन के प्रत्येक पहलू में सत्ता क्रियाशील है तथा देखी जा सकती है। राजनीतिक तथा सामाजिक पहलुओं में अंतर केवल इतना है कि पहले में सत्ता शक्ति के साथ जुड़ी हुई है, जबकि दूसरे में शक्ति तथा सत्ता का वितरण समान रूप से नहीं पाया जाता।
वेबर ने सत्ता को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है। ये हैं –

  1. तार्किक वैधानिक सत्ता – इस प्रकार की सत्ता की वैधता का आधार व्यक्ति का पद होता है। जिसके साथ वैधानिक व्यवस्था की मान्यता जुड़ी होती है। आधुनिक समाजों में इस प्रकार की सत्ता अधिक पायी जाती है।
  2. परंपरागत सत्ता – इस प्रकार की सत्ता का आधार प्राचीनकाल से चले आ रहे मूल्य, आदर्श प्रतिमान या परंपराएँ होती हैं।
  3. चमत्कारिक सत्ता – इस प्रकार की सत्ता की वैधता का आधार व्यक्ति के कुछ व्यक्तिगत गुण होते हैं। इन्हीं गुणों के कारण अन्य लोग उस चमत्कारिक व्यक्ति के आदेशों का पालन करते हैं।

उपर्युक्त तीनों प्रकारआदर्श-प्रारूप होते हैं तथा वस्तुत: एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

प्रश्न 14.
वेबर की आदर्श-प्रारूप की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
या
‘आदर्श-प्रारूप’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
आदर्श-प्रारूप की अवधारणा मैक्स वेबर के पद्धतिशास्त्र का एक प्रमुख पहलू है। वेबर के समय जर्मनी में यह विचारधारा अत्यंत प्रचलित थी कि सामाजिक घटनाओं पर प्राकृतिक विज्ञानों की पद्धति के अनुसार विचार नहीं किया जा सकता, क्योंकि सामाजिक क्षेत्र में व्याख्या और स्पष्टीकरण मूलतः ऐतिहासिक हैं। आदर्श-प्रारूप की अवधारणा इस विचारधारा का खंडन कर एक ऐसी पद्धति प्रदान करती है जो कि वस्तुनिष्ठ अध्ययन करने में सहायक है।

वेबर के अनुसार तर्कसंगत ढंग से सामाजिक घटनाओं के कार्य-कारण संबंधों को तब तक स्पष्ट नहीं किया जा सकता जब तक कि उन घटनाओं को पहले समानताओं के आधार पर कुछ सैद्धांतिक श्रेणियों में न बाँट लिया जाए। ऐसा करने पर समाजशास्त्री को आदर्श-प्रारूप घटनाएँ मिल जाएँगी। इस दृष्टिकोण से सामाजिक घटनाओं की तार्किक संरचना में बुनियादी पुनर्निर्माण की आवश्यकता होती है जिसे वेबर ने आदर्श-प्रारूप की अवधारणा को विकसित करके किया है। समाजशास्त्रियों को अपनी उपकल्पना का निर्माण करने के लिए ‘आदर्श’ अवधारणाओं को चुनना चाहिए।

वैबर के अनुसार-‘आदर्श-प्रारूप न तो औसत-प्रारूप है और न ही आदर्शात्मक है, बल्कि वास्तविकता के कुछ तत्त्वों के विचारपूर्वक चुनाव तथा सम्मिलन द्वारा निर्मित आदर्शात्मक मापदंड है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है-“आदर्श-प्रारूप से तात्पर्य कुछ वास्तविक तथ्यों के तर्कसंगत आधार पर यथार्थ अवधारणाओं का निर्माण करने से है।” “आदर्श’ शब्द किसी प्रकार के मूल्यांकन से संबंधित नहीं है।
वेबर के द्वारा प्रतिपादित आदर्श-प्रारूप की अवधारणा की निम्नलिखित तीन प्रमुख विशेषताएँ है-

  1. आदर्श-प्रारूप का निर्माण, कर्ता की क्रिया के इच्छित अर्थ के अनुसार किया जाता है।
  2. आदर्श-प्रारूप संपूर्णता अथवा सब-कुछ का विश्लेषण नहीं है अपितु सामाजिक क्रिया या घटना के अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्षों का निरूपण है; विशेषतया उन पक्षों का जिन्हें आदर्श-प्रारूप का निर्माण करने वाला विद्वान महत्त्वपूर्ण मानता है।
  3. वेबर के अनुसार आदर्श-प्रारूप सामाजिक विज्ञानों का अंतिम सत्य नहीं है अपितु आदर्श-प्रारूप को मात्र ठोस ऐतिहासिक समस्याओं के विश्लेषण हेतु साधन या उपकरण के रूप में प्रयोग किया जाना चाहिए।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
दुर्खोम के समाज में श्रम-विभाजन के सिद्धांत की विस्तृत विवेचना कीजिए।
या
दुर्खोम के द्वारा प्रतिपादित श्रम-विभाजन के सिद्धांत की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
या
श्रम विभाजन किसे कहते हैं? श्रम-विभाजन के बारे में दुर्खोम के विचारों को संक्षेप में बताइए।
या
दुर्खोम द्वारा प्रतिपादित श्रम-विभाजन के कारणों की व्याख्या कीजिए। यह व्याख्या कहाँ तक सामाजिक एकता से संबंधित है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
श्रम-विभाजन की उत्पत्ति आधुनिक नहीं है अपितु 18 वीं शताब्दी में इसे समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से देखने का नवीन प्रयास अवश्य किया गया। दुर्खोम ने इस मूल रूप से आर्थिक संस्था का समाजशास्त्रीय विश्लेषण प्रस्तुत किया है। सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडम स्मिथ के अनुसार श्रम-विभाजन से उत्पादन में वृद्धि होती है तथा वस्तुओं की श्रेणी में भी श्रेष्ठता आती है। दुर्खोम के अनुसार इससे सामाजिक एकता बनी रहती है।

श्रम-विभाजन का अर्थ एवं परिभाषाएँ

श्रम-विभाजन का अर्थ कार्यों का वितरण है अर्थातु किसी उत्पादन प्रक्रिया में कार्यों को इस प्रकार से विभाजित करना कि वे अलग-अलग व्यक्तियों या अलग-अलग समूहों द्वारा संपादित किए जाएँ श्रम-विभाजन कहलाता है। विभिन्न विद्वानों ने इसे निम्नांकित रूप से परिभाषित किया है –

  1. दुर्खोम (Durkheim) के अनुसार – “श्रम-विभाजन से अभिप्राय केवल भूमिकाओं में विभिन्नीकरण एवं विशेषीकरण से नहीं है अपितु इन भूमिकाओं में समन्वय से भी है।’
  2. वाटसन (Wattson) के अनुसार – “किसी उत्पादन क्रिया को सूक्ष्म भागों में बाँटना, श्रमिकों को विशिष्ट साधन उपलब्ध कराना और फिर सब साधनों के प्रयासों को मिलाकर आवश्यक उपयोग की वस्तुओं का उत्पादन करना श्रम-विभाजन कहलाता है।”
  3. हैन्सन (Henson) के अनुसार – “श्रम-विभाजन का अर्थ क्रिया का विशिष्टीकरण है।”

श्रम-विभाजन एवं सामाजिक एकता

दुम्का नाम समाजशास्त्र में श्रम-विभाजन के सिद्धांत के साथ जुड़ा हुआ है। इसी सिद्धांत में इन्होंने यांत्रिक एवं सावयविक एकता की अवधारणाओं का उल्लेख किया है। श्रम-विभाजन का अभिप्राय कार्यों या भूमिकाओं का वितरण है। जैसे-जैसे श्रम-विभाजन बढ़ता जाता है। वैसे-वैसे कार्यों में विशेषीकरण आता-जाता है। दुर्खोम का कहना है, “श्रम-विभाजन से अभिप्राय केवल भूमिकाओं में विभिन्नीकरण एवं विशेषीकरण से ही नहीं है अपितु इन भूमिकाओं में समन्वय से भी है। प्राचीन समाजों में श्रम-विभाजन का अभाव पाया जाता था तथा केवल लैंगिक आधार पर थोड़ा-बहुत श्रम-विभाजन पाया जाता था, परंतु फिर भी विशेषीकरण नहीं था।

इसलिए दुर्खोम के अनुसार प्राचीन समाजों में एकता का आधार समान था। परंतु जैसे-जैसे समाज में जटिलता आती गई तथा वह परंपरा से आधुनिकता की ओर आगे बढ़ता गया, समाज में श्रम-विभाजन एवं विशेषीकरण में वृद्धि होने लगी तथा इससे व्यक्ति एक-दूसरे पर अधिक-से-अधिक आश्रित होने लगे। दुखीम के अनुसार आधुनिक समाजों में एकता का आधार श्रम-विभाजन के कारण आने वाली अन्योन्याश्रितता है। दुर्खोम ने इन दोनों प्रकार की एकताओं को क्रमशः यांत्रिकसावयविक एकता कहा है।

दुर्खोम के अनुसार सामाजिक एकता के इन दोनों स्वरूपों की एक अन्य विशेषता यह है कि ये विशिष्ट वैधानिक व्यवस्थाओं से संबंधित हैं। यांत्रिक एकता की अवस्था में दमनकारी कानून (Repressive law) तथा सावयविक एकता की अवस्था में क्षतिपूरक कानून (Restitutive law) का प्रचलन होता है। दमनकारी कानून वाले समाजों में विचलन या अपराध सामूहिक चेतना के विरुद्ध कार्य समझे जाते हैं; अतः ऐसे व्यक्तियों को कठोर दंड दिया जाता है। इससे नैतिक संतुलन बना रहता है तथा सामूहिक चेतना भी बनी रहती है। प्रतिकारी कानून वाले समाजों में अपराध को समस्त समाज के विरुद्ध अपराध नहीं समझा जाता, अपितु इसे व्यक्ति विशेष के विरुद्ध अपराध माना जाता है। अतः क्षतिपूरक कानून को उद्देश्य हानि-प्राप्त व्यक्ति की हानि को पूरा करना होता है।

यांत्रिक एकता उन समाजों में पायी जाती है जिनमें दमनकारी कानून की प्रधानता होती है। दुर्खोम का कहना है कि जिस प्रकार की आचार-संहिता समाज में पायी जाती है, उसी के अनुरूप एकता उस समाज में मुख्य रूप से पायी जाती है। यांत्रिक एकता आदिम समाजों में अथवा सभ्यता और संस्कृति की दृष्टि से पिछड़े हुए समाजों में पायी जाती है। इन समाजों में विभेदीकरण अर्थात् कार्यों का वितरण न के बराबर है तथा केवल लिंग और आयु के आधार पर ही थोड़ा-बहुत कार्यों में विभेदीकरण पाया जाता है। सामूहिक चेतना (Collective conscience) द्वारा सभी व्यक्ति एक-दूसरे के साथ बंधे रहते हैं तथा इस सामूहिक चेतना को बनाए रखना सभी व्यक्ति अपना परम कर्तव्ये मानते हैं। कोई भी ऐसा कार्य करना, जिससे कि सामूहिक चेतना को आघात पहुँचता हो, बहुत बुरा अपराध माना जाता है। अतः यांत्रिक एकता वह एकता है जो कि व्यक्तियों द्वारा एक जैसे कार्यों के करने के कारण आती है। अर्थात् जो समरूपता -(Likeness) का परिणाम है। यह एक सरल प्रकार की एकता है जो दमनकारी कानून द्वारा बनाए रखी जाती है।

आधुनिक समाजों में सावयविक एकता पायी जाती है। जैसे-जैसे समाज की जनसंख्या का घनत्व तथा आयतन बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे व्यक्तियों की आवश्यकताएँ भी बढ़ती जाती हैं। इन बढ़ती हुई आवश्यकताओं के कारण व्यक्तियों के कार्यों में भिन्नता आती है तथा इसके साथ ही इनमें विशेषीकरण बढ़ता है अर्थात् श्रम-विभाजन की वृद्धि होती है। दुर्खोम उस एकता को, जो कि कार्यों की भिन्नता द्वारा विशेषीकरण (अर्थात् श्रम-विभाजन) और इसके परिणामस्वरूप व्यक्तियों की अन्योन्याश्रितता के कारण आती है, सावयविक एकता कहते हैं। यांत्रिक एकता के विपरीत, इसमें समरूपता की बजाय भिन्नता व्यक्तियों को एक सूत्र मे बाँधने का प्रयास करती है। सावयविक एकता व्यक्तियों के व्यक्तित्व में परिवर्तन के साथ-साथ परिवर्तित होती रहती है। सावयविक एकता की पुष्टि प्रतिकारी कानून द्वारा होती है। सहयोगी कानून का दमनकारी कानून पर प्रभुत्व इस बात का प्रतीक है कि श्रम-विभाजन द्वारा जो संबंध स्थापित होते हैं वह असंख्य होते हैं अर्थात् समरूपता द्वारा स्थापित संबंधों से कहीं अधिक होते हैं।

इस प्रकार, दुर्खोम के विचारानुसार श्रम-विभाजन के परिणामस्वरूप एक व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अन्य व्यक्तियों पर आश्रित हो जाता है तथा इस अन्योन्याश्रितता के कारण समाज में सावयविक एकता आती है। सावयविक एकता की तुलना जैविक शरीर से की जा सकती है जिसके सभी अंग एक-दूसरे पर आश्रित होते हैं। सावयविक एकता वाले समाजों में सामूहिक चेतना की बजाय व्यक्तिवादिता अधिक पायी जाती है।

श्रम-विभाजन के कारण तथा दशाएँ

अर्थशास्त्रियों के अनुसार श्रम-विभाजन का कारण हमारी बढ़ती हुई प्रसन्नता है। इसमें यह मान लिया गया है कि हम वास्तव में खुशी तथा प्रसन्नता की ओर बढ़ रहे हैं। परंतु दुर्खोम इस प्रकार के तर्क से सहमत नहीं है। उनका कहना है कि इतिहास के प्रत्येक युग में जो प्रसन्नता व्यक्तियों को मिलती है वह सीमित है। यदि श्रेम-विभाजन का और कोई कारण नहीं है तो प्रसन्नता प्राप्त होने के पश्चात् श्रम-विभाजन में वृद्धि रुक जानी चाहिए, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं होता है। इसके विपरीत, यह देखा गया है कि दुःखदायी अनुभव होने पर भी श्रम-विभाजन में निरंतर वृद्धि होती रहती है। दूसरे, प्रसन्नता स्वास्थ्य की एक दशा मात्र है।

दुर्खोम का कहना है कि श्रम-विभाजन का कारण समाज के नैतिक घनत्व (Moral density) में वृद्धि है जिसका सूचक भौतिक घनत्व (Material density) है। समयानुसार खंडात्मक प्रकार की संरचना का लोप होना शुरू हो जाता है और सामाजिक आयतन में वृद्धि होनी शुरू हो जाती है। इस प्रकार, समाजों के आयतन तथा घनत्व में वृद्धि द्वारा भौतिक घनत्व बढ़ता है जिसके द्वारा यांत्रिक रूप से श्रम-विभाजन की प्रगति निर्धारित होती है तथा अस्तित्व के लिए संघर्ष शुरू हो जाता है। इसके कारण अधिक उत्पादन तथा अच्छी वस्तुओं की माँग बढ़ने के साथ-साथ विशेषीकरण भी बढ़ने लगता है। दुर्खोम का कहना है कि श्रम-विभाजन तथा विशेषीकरण तभी विकसित हो सकता है जबकि व्यक्तिगत भिन्नताएँ बढ़ जाती हैं।

दुर्खोम; स्पेंसर (Spencer) के इस सिद्धांत से सहमत नहीं हैं कि आयतन में वृद्धि व्यक्तिगत भिन्नताओं को बढ़ावा देती है। इनका कहना है कि भिन्नताओं का बढ़ना श्रम-विभाजन का विरोधी है। इस प्रकार, दुर्खोम श्रम-विभाजन के कारण सामाजिक पर्यावरण तथा सामाजिक घटनाओं के संदर्भ में ही देखते हैं। दुर्खोम श्रम-विभाजन की दशाएँ भौगोलिक पर्यावरण में नहीं अपितु सामाजिक संबंधों में देखते हैं। इनका कहना है कि पैतृकता, श्रम-विभाजन के विकास में एक बाधा है।

दुर्खोम के अनुसार समाजों के आयतन तथा घनत्व में वृद्धि के कारण व्यक्तियों में भी परिवर्तन:आते हैं। और वे अधिक स्वतंत्र हो जाते हैं तथा सामूहिक व्यक्तित्व से अपना संबंध तोड़ लेते हैं। इससे विशेषीकरण बढ़ने लगता है तथा श्रम-विभाजन में भी वृद्धि होती है।

श्रम-विभाजन के असामान्य प्रारूप

दुर्खोम का कहना है कि श्रम-विभाजन के सामान्य प्रारूपों को समझने के लिए इसके असामान्य प्रारूपों का ज्ञान होना जरूरी है। असामान्य प्रारूप वे हैं जिसमें श्रम-विभाजन अपनी सामान्य भूमिका नहीं निभाता अर्थात् एकता या सामाजिक संश्लिष्टता नहीं ला पाता, अपितु इसके विपरीत इसमें बाधाएँ उत्पन्न करता है। दुर्खोम ने तीन असामान्य प्रारूपों का उल्लेख किया है –

1. विश्रृंखला श्रम-विभाजन – इसमें समाज की विभिन्न इकाइयों में सामंजस्य समाप्त हो जाता है। दुर्खोम का कहना है कि मानव शरीर की तरह समाज की भी अनेक इकाइयाँ हैं जो अपना कार्य करती हैं तथा पारस्परिक सामंजस्य बनाए रखती हैं जिससे सामान्य सामाजिक चेतना तथा सावयविक एकता का उदय होता है। परन्तु कई बार ऐसा होता है कि व्यक्ति पारस्परिक संतुलन खो देते हैं तथा उनकी स्थिति अनिश्चित हो जाती है। यदि व्यक्ति अपने कार्य नहीं करते तथा कार्यों में समन्वय नहीं रहता तो इसे अवस्था को विशृंखल श्रम-विभाजन की अवस्था कहा जाता है। अनेक क्षेत्रों में विश्रृंखला श्रम-विभाजन स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। प्रमुख रूप से औद्योगिक क्षेत्रों, आर्थिक क्षेत्रों, ज्ञान-विज्ञान तथा मानसिक क्षेत्रों में व्याधिकीय विश्रृंखला की अवस्था देखी जा सकती है।

2. आरोपित श्रम-विभाजन – आरोपित श्रम-विभाजन का उदाहरण वर्ग संघर्ष है तथा इसकी उत्पत्ति व्यक्ति की उसके प्रकार्य से समन्वय न होने की दशा द्वारा होती है क्योंकि प्रकार्य व्यक्ति पर जबरदस्ती थोपा गया होता है। वास्तव में, आरोपित श्रम-विभाजन में व्यक्ति की योग्यता, क्षमता तथा रुचि और समाज द्वारा सौंपे गए कार्य में सामंजस्य नहीं रहता। दुर्खोम का कहना है कि श्रम-विभाजन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसको हम व्यक्तियों पर न तो बलपूर्वक थोप ही सकते हैं और न ही उसमें व्यक्ति को पूर्ण स्वतंत्रता ही दे सकते हैं।

3. एक अन्य असामान्य प्रारूप – दुर्खोम ने एक तीसरे असामान्य प्रारूप का उल्लेख किया है। जिसे वह कोई विशेष नाम नहीं देते। जब प्रत्येक कर्ता की प्रकार्यात्मक भूमिका अपर्याप्त होती है।
तो श्रम-विभाजन सामाजिक एकता नहीं ला पाता। सामाजिक संबंधों में एकता तथा निरंतरता लाए रखने के लिए यह जरूरी है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी भूमिका पर्याप्त मात्रा में निभाता रहे। परंतु जब व्यक्ति अपनी प्रकार्यात्मक भूमिकाएँ पर्याप्त मात्रा में नहीं निभाते तो सामाजिक संबंधों में शिथिलता आ जाती है तथा श्रम-विभाजन अपनी प्रमुख भूमिका अर्थात् सामाजिक एकता लाना छोड़ देता है।

श्रम-विभाजन के सिद्धांत की आलोचना

यद्यपि दुर्वीम ने अपने श्रम-विभाजन का सिद्धांत इतने विधिवत् रूप से प्रस्तुत किया है फिर भी इसमें कुछ कमियाँ दिखाई देती हैं। दुर्खोम श्रम-विभाजन के केवल सामाजिक पक्ष की ओर अधिक ध्यान देता है तथा इसका कारण जनसंख्या में घनत्व तथा आयतन में वृद्धि मानता है। इसका कार्य भी दुर्वीम के अनुसार समाज में सामाजिक संश्लिष्टता लाना है तथा यह संश्लिष्टता श्रम-विभाजन के कारण व्यक्तियों की एक-दूसरे पर आश्रितता द्वारा आती है। परंतु श्रम-विभाजन के इतने अधिक विकास के कारण भी आधुनिक समाजों के व्यक्तियों में संतोष नहीं है। आदिम समाजों में लोग अधिक सुखी थे जबकि उनमें श्रम-विभाजन नहीं था।

साथ ही, दुर्खोम एकदम समरूपता (Likeness) से श्रम-विभाजन पर आ जाता है तथा बीच की उन अवस्थाओं का कोई उल्लेख नहीं करता, जिनमें श्रम-विभाजन अभी अपनी प्रारंभिक अवस्था में है। इन समाजों और आधुनिक समाजों में, जिनमें श्रम-विभाजन चरम सीमा पर पहुंच चुका है, क्या अन्तर है तथा श्रम-विभाजन के विभिन्न स्तर किस प्रकार सामाजिक संश्लिष्टता को प्रभावित करते हैं- इस बारे में दुर्खोम का सिद्धांत कोई प्रकाश नहीं डालता। इन आलोचनाओं के बावजूद दुर्खोम का सिद्धांत समाजशास्त्रीय सिद्धांतों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।

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प्रश्न 2.
मार्क्स के वर्ग संघर्ष के सिद्धांत की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।
या
“अभी तक के सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है।” व्याख्या कीजिए।
उत्तर
कार्ल मार्क्स का मत है कि समाज में वर्ग संघर्ष सदैव से ही होते चले आए हैं। ‘साम्यवादी घोषणा-पत्र में कहा गया है-“अब तक के समस्त विद्यमाने समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का ही इतिहास है।” वर्ग संघर्ष से आशय है कि समाज में दो वर्गों का अस्तित्व है तथा इन वर्गों के हित एक-दूसरे के विपरीत हैं। इस कारण इनमें संघर्ष चलता रहा है। उसका कथन है कि वर्ग संघर्ष आधुनिक युग में पूंजीपतियों और श्रमिकों के बीच मुख्य रूप से पाया जाता है और इस संघर्ष के परिणामस्वरूप ही समाज मानवीय आशाओं के अनुरूप उन्नति नहीं कर पाता है। इसलिए वर्ग संघर्ष ही राज्य तथा समाज की एक महत्त्वपूर्ण समस्या है। यह वर्ग संघर्ष अनेक प्रकार की राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं को जन्म देता है।

मार्क्स का वर्ग संघर्ष का सिद्धांत

मार्क्स अपने वर्ग संघर्ष के सिद्धांत को ऐतिहासिक आधार पर सत्य मानता है। उसका मत है कि इतिहास में आदिम साम्यवादी व्यवस्था के अतिरिक्त कोई भी ऐसा युग नहीं रहा जबकि दो वर्गों के बीच संघर्ष की स्थिति न रही हो। इस संबंध में मार्क्स का मत है कि वर्तमान समाज धनवानों और निर्धनों में विभाजित है। ये धनवान वर्ग और निर्धन वर्ग; पूँजीपति वर्ग तथा श्रमिक वर्ग कहलाते हैं। इन दोनों वर्गों में कभी कोई संयोग नहीं हो सकता। इसलिए सभी समाजवादियों को एक साथ मिलकर ऐसी प्रयास करना चाहिए कि वर्ग संघर्ष की समाप्ति हो जाए और वर्गहीन समाज की स्थापना हो जाए। माक्र्स अपने वर्ग संघर्ष के इस सिद्धांत को निम्नलिखित आधारों पर सत्य मानता है –

  1. मार्क्स इस बात में विश्वास करता है कि आदिम साम्यवादी व्यवस्था के अतिरिक्त प्राचीनकाल से ही इतिहास में विरोधी वर्गों का अस्तित्व देखने को मिलता है।
  2. व्यक्तियों के विभिन्न स्वार्थ होते हैं, इसलिए उनमें मतभेद होना स्वाभाविक ही है।
  3. सभी लोग अपनी क्षमता और कार्यकुशलता में समान नहीं होते हैं, इसलिए भी समाज में वर्ग-संघर्ष पाया जाता है।
  4. मार्क्स का विचार है कि विश्व में महायुद्धों की उत्पत्ति का एकमात्र कारण पूँजीवाद है और युद्धों में एक प्रबल वर्ग निम्न वर्ग के अधिकारों का हनन करता है जिसके परिणामस्वरूप समाज में इस अंतर्विरोध के कारण क्रांति का जन्म होता है।
  5. मार्क्स और एंगेल्स का मत है कि राज्य की उत्पत्ति वर्गभेद के कारण ही हुई है।

मार्क्स का मत है कि जब समाज में पूँजीपतियों का उत्पादन के साधनों पर एकाधिकार स्थापित हो जाएगा, तब समाज धनिक वर्ग और निर्धन वर्ग में विभाजित हो जाएगा। इस पूँजीवादी युग में श्रमिकों के दु:खों में वृद्धि निरंतर होती रहती है। श्रम के अधिक शोषण करने तथा निरंतर घटती मजदूरी के कारण श्रमिक निरंतर दु:खों तथा कठिनाइयों के दबावों में रहते हैं जिसके कारण उनका स्वास्थ्य भी निरंतर गिरता चला जाता है और वे इस स्थिति में भी नहीं रहते हैं कि अब और अधिक परिश्रम कर सकें। पूँजीवादी युग मानवीय संवेदनाओं को समाप्त कर देता है।

पूँजीपति श्रमिकों को पशुओं के रूप में देखता है। वह कम मजदूरी देकर अधिक कार्य लेना चाहता है। उसके लिए मार्क्स उसे ‘आपदाओं का बढ़ता हुआ सिद्धांत’ (Theory of increasing miseries) का नाम देता है। उसका कहना है कि एक दिन यह स्थिति ही क्रांति को जन्म देगी, जब दुनिया के मजदूर संगठित होकर पूँजीवाद के विरुद्ध क्रांति करके उसको समाप्त कर देंगे और एक वर्गहीन समाज की स्थापना होगी। माक्र्स इसी प्रकार की क्रांति को ‘वर्ग संघर्ष’ की संज्ञा प्रदान करता है, और वर्म संघर्ष को ही पूँजीवाद के विनाश का कारण मानता है।

मार्क्स का मत है कि जब श्रमिक वर्ग पूँजीवाद का उन्मूलन कर लेगा तब समाज में सर्वहारा वर्ग का अधिनायकतंत्र स्थापित होगा। उत्पादन के सभी साधनों पर श्रमिकों का सामूहिक अधिकार होगा और ऐसा समाज वर्गहीन समाज होगा, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को उसकी क्षमतानुसार कार्य और योग्यतानुसार वेतन मिलेगा। उस समाज में सभी व्यक्तियों को अनिवार्य रूप से कार्य करना होगा और उसमें साहित्य, संस्कृति व कला का पूर्ण रूप से विकास होगा।

वर्ग संघर्ष के सिद्धांत की आलोचना

मार्क्स का वर्ग संघर्ष का सिद्धांत आलोचना की विषय-वस्तु रहा है। इस संबंध में आलोचकों ने निम्नलिखित मत व्यक्त किए हैं –

  1. मार्क्स का वर्ग संघर्ष का सिद्धांत कल्पनावादी सिद्धांत कहा जाता है।
  2. मार्क्स अपने वर्ग संघर्ष के सिद्धांत में केवल श्रमिक वर्ग पूँजीपति वर्ग का ही वर्णन करता है। और वह समाज में पाए जाने वाले माध्यम वर्ग की उपेक्षा करता है।
  3. संघर्ष ही सामाजिक जीवन का मूल तत्त्व नहीं है, वरन् समाज में संघर्ष की अपेक्षा सहयोग अधिक पाया जाता है।
  4. मार्क्स वर्ग संघर्ष को ही सभी सामाजिक संकटों का एकमात्र कारण मानता है, किंतु आलोचकों का मत है कि उसकी यह विचारधारा भ्रमपूर्ण है, क्योंकि सामाजिक संकट वर्ग संघर्ष के अतिरिक्त युद्ध आदि कारणों से भी उत्पन्न हो सकते हैं।
  5. मार्क्स का यह विश्वास भी आलोचकों को मान्य नहीं है कि वर्ग संघर्ष के कारण ही समाज में पूँजीवाद का अंत हो जाएगा। उनका तर्क है कि सदियों से पूँजीपति वर्ग तथा निर्धन वर्ग में संघर्ष की स्थिति बनी हुई है, किंतु आज तक भी श्रमिक वर्ग पूँजीपति वर्ग का विनाश करने में सफल नहीं हुआ है।
  6. मार्क्स की यह विचारधारा भी मान्य नहीं है कि वर्ग संघर्ष से श्रमिकों का हित होगा, क्योंकि संघर्ष से कभी किसी का हित नहीं होता है। संघर्ष तो विघटन को जन्म देते हैं।
  7. मार्क्स का यह मत भी अमान्य है कि विश्व के सभी श्रमिकों के हित समान होते हैं। आलोचकों का विचार है कि सामाजिक हित भौतिक परिस्थितियों पर आधारित होते हैं और प्रत्येक देश में नागरिकों की भौतिक परिस्थितियाँ भिन्न हैं, इसलिए हितों की समानता का प्रश्न ही नहीं उठता है।
  8. मार्स अपने इस सिद्धांत में कोई वैज्ञानिक तर्क भी प्रस्तुत नहीं करता है। इसलिए माक्र्स का यह सिद्धांत कोरी कल्पना है। इस संबंध में प्रो० लास्कीका कथन है-“पूँजीवाद का अंत होने के पश्चात् तो साम्यवाद की उत्पत्ति के स्थान पर ऐसे अराजकतावाद की स्थापना संभावित है जो किसी प्रकार से भी साम्यवादी सिद्धांतों से समता नहीं रखेगा।”
  9. क्रांति श्रमिक वर्ग के स्थान पर बुद्धिजीवी वर्ग से भी संभव हो सकती है।
  10. समस्त सामाजिक जीवन का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास नहीं है। डॉ० राधाकृष्णन के अनुसार, “इतिहास केवल वर्ग संघर्ष का ही लेखा मात्र नहीं है।’
  11. सामाजिक और आर्थिक वर्ग एक ही नहीं है।
  12. मार्क्स द्वारा चित्रित वर्ग संघर्ष के परिणाम सत्य सिद्ध नहीं हुए हैं।

मार्क्स की वर्ग संघर्ष की धारणा का मूल्यांकन प्रो० कैरयू हण्ट ने इन शब्दों में किया है-“मार्क्स का यह विचार कि मनुष्यों के समस्त झगड़े वर्ग संघर्ष से उत्पन्न होते हैं- किंतु एक वैज्ञानिक धारणा के रूप में मिथ्या है।”

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प्रश्न 3.
नौकरशाही किसे कहते हैं? वेबर के सत्ता के एक प्रकार के रूप में नौकरशाही के सिद्धांत की विवेचना कीजिए।
या
नौकरशाही पर एक लेख लिखिए।
या
नौकरशाही को परिभाषित कीजिए तथा इसके कार्यों एवं अकार्यों की विवेचना कीजिए।
या
नौकरशाही की परिभाषा देते हुए मैक्स वेबर के नौकरशाही सिद्धांत का परीक्षण कीजिए।
उत्तर
वेबर द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों में नौकरशाही का सिद्धांत प्रमुख स्थान रखता है। उन्होंने नौकरशाही की विवेचना तार्किक-वैधानिक सत्ता के रूप में की है। उनकी नौकरशाही की विवेचना उनके द्वारा प्रतिपादित ‘आदर्श प्रारूप की संकल्पना पर आधारित है। वस्तुतः उनकी सत्ता की संकल्पना का स्पष्टीकरण उनके नौकरशाही के सिद्धांत द्वारा ही किया जा सकता है। अतः नौकरशाही के सिद्धांत का ज्ञान, सत्ता के इस प्रमुख प्रकार को समझने के लिए अनिवार्य है।

नौकरशाही का अर्थ

‘नौकरशाही’ (Bureaucracy) शब्द फ्रांसीसी भाषा के burequ’ शब्द से बनी है, जिसका अर्थ है- लिखने की मेज या डेस्क। इस प्रकार नौकरशाही’ का अर्थ उस सरकार से है जिसके कर्मचारी केवल कार्यालय में बैठकर कार्य करते हैं। आधुनिक युग में यह शब्द अपयश का प्रतीक बन गया है। नौकरशाही के इस आधुनिक अर्थ के संदर्भ में जॉन ए० वेग (John A. Vieg) ने कहा है-“नौकरशाही का अर्थ बदनामी और विकृति के कारण घोटाला, स्वेच्छाचारिता, अपयश, कार्यालय की कार्यवाही तथा तानाशाही होकर रह गया है।”

कभी-कभी इस शब्द का प्रयोग अच्छे भाव से भी किया जाता है जिसमें नौकरशाही का अभिप्राय ऐसे व्यक्ति से होता है जो अपने अनुभव, ज्ञान तथा उत्तरदायित्व के लिए प्रसिद्ध हो। मार्क्स ने नौकरशाही का प्रयोग निम्नलिखित भावनाओं से किया है –
नौकरशाही ऐसा संगठन है, जो संगठित रूप में बहुत-से कार्य करता है और जिसके प्रभाव से सभी थर्राते हैं।”

नौकरशाही की परिभाषाएँ

मैक्स वेबर (Max Weber) ने नौकरशाही को दो रूपों में परिभाषित किया है –

  1. कानूनी सत्ता के रूप में – इस रूप में नौकरशाही ‘कानून द्वारा स्थापित अवैयक्तिक व्यवस्था (Legally established impersonal order) है जिसमें व्यक्ति पद की सत्ता का प्रयोग इस आधार पर करते हैं कि उन्हें अपने पद की सत्ता के दायरे में आदेश देने की औपचारिक वैधता प्राप्त है।
  2. एक संगठन के रूप में – संगठन के रूप में नौकरशाही “एक संस्तरणबद्ध संगठन है जिसकी रचना तार्किक ढंग से बहुत से ऐसे व्यक्तियों के कार्यों के समीकरण के लिए की गई है जो वृहद् स्तर पर प्रशासनिक दायित्वों व संगठनात्मक लक्ष्यों की प्राप्ति में लगे हैं।”

माशर किंग्स्ले एवं स्टैहल (Masher Kingsley and Stahl) के अनुसार – नौकरशाही को प्रशासकीय संरचना के रूप में माना है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति प्रशासन के जटिल संयंत्र में एक पुर्जे की तरह कार्य करता है। कोई असंदिग्ध बात इस संरचना में नहीं जोड़ी जाती है। इसमें सभी प्रशासकीय संबंधों की पूर्ण व्याख्या की जाती है। अधिकार का स्तंभ दायित्व के स्तरों में समान रूप से विभाजित होता है।”

कुछ विद्वानों ने नौकरशाही या लोकशाही को महान प्रशासन (big administration) या सरकार (Government) से जोड़ा है। आज के युग में हम विस्तृत प्रशासकीय संस्थाओं के अंतर्गत; जिसमें अनेक सरकारी संस्थाएँ, निगम (Corporation), मजदूर संघ (Trade union) तथा राजनीतिक दल (Political parties) सम्मिलित हैं; रहते हैं। इन सभी प्रशासकीय अंगों का विस्तृत रूप होता है और इनका विस्तार भी नौकरशाही का कारण है। महान् शासन से तात्पर्य है-प्रशासन की बड़ी मशीनरी, अर्थात् प्रशासकीय विभाग को अधिकार प्रदान करते हुए अधिक महत्त्व प्रदान करना। इस दृष्टि से आज का लोक-कल्याण राज्य’ (Welfarestate) एक प्रशासकीय राज्य कहलाता है।

नौकरशाही का एक अर्थ दूषित मनोवृत्ति के रूप में भी किया जाता हैं, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता को आघात पहुँचाता है। इस शासन में प्रशासन तंत्र अर्थात् सरकारी अधिकारी अपने लाभ के लिए शासन करते हैं तथा वे स्वयं को जनता का सेवक न समझकर शासक समझते हैं।

नौकरशाही के सामान्य लक्षण

नौकरशाही व्यवस्था के सामान्य लक्षण निम्नलिखित हैं –
1. कार्य-क्षेत्र की निश्चितता – नौकरशाही व्यवस्था का आधार एक निश्चित कार्य-क्षेत्र से संबंधित होता है। जब विधायिका आदेश देती है तो उसी के अनुसार कार्यपालिका तथा प्रशासकीय व्यवस्था का निर्माण किया जाता हैं। नौकरशाही विभाग के कार्य के साथ-साथ अपने उत्तरदायित्व को निभाने का भी कार्य पूर्ण रूप से करती है। उत्तरदायित्व के प्रति यह जागरूकता ही नौकरशाही की कर्तव्यपरायणता मानी जाती है।

2. सरकारी कार्यों की गोपनीयता – इस व्यवस्था में लोकसेवकों अथवा नौकरशाही से शपथ ली जाती है और उनसे आशा की जाती है कि वे सरकारी विषयों को गुप्त रखेंगे। इसका प्रमुख कारण यह है कि गोपनीयता भंग होने से राष्ट्र तथा समाज दोनों को हानि हो सकती है और शत्रु द्वारा इसका लाभ उठाया जा सकता है।

3. नियुक्ति का आधार पदक्रम – नौकरशाही व्यवस्था में पद के क्रमानुसार नियुक्तियों की जाती , हैं और उनमें वरीयता का भी ध्यान रखा जाता है। प्रत्येक लोकसेवक को यह मालूम रहता है। कि उसकी नियुक्ति के अनुसार ही पदोन्नति का क्रम होगा। इस व्यवस्था में सरकारी आदेशों का पालन किया जाता है और ऊपर से नीचे तक के क्रम श्रेष्ठता-सूची के अनुसार निश्चित रहते हैं। नीचे का अधिकारी अपने उच्च अधिकारी के प्रति उत्तरदायी होता है। आदेश के क्रम ऊपर से नीचे की ओर प्रवाहित होते जाते हैं। यह क्रम निरंतर क्लता रहता है। व्यवस्था का यह क्रम उचित मार्ग (Proper channel) कहलाता है।

4. कार्य में नियमबद्धता – प्रत्येक लोकसेवक को जितना कार्य सौंपा जाता है वह उसी के अनुसार कार्य करता है। साथ ही वह इस बात का ध्यान रखता है कि अधिक कार्य को भी वह उन्हीं के नियमों का पालन करते हुए संपन्न करेगा। नौकरशाही द्वारा नियमानुसार कार्य करने का ही फल है कि राष्ट्र का प्रत्येक कार्य संपन्न होता रहता है। लोकसेवक पक्षपात रहित होकर कानूनी बातों और नियमपूर्वक कार्य की ओर अधिक ध्यान देता है।

5. विशेष संगठन के रूप में कार्य – नौकरशाही एक विशिष्ट संगठन के रूप में कार्य करती है। इसी कारण ऐसा कहा जाता है कि नौकरशाही में अहं की भावना (Egoism) होती है। यह ठीक भी है; क्योंकि अधिकांश लोकसेवक समाज-कल्याण की भावना से काम न करके स्वामी भावना से प्रेरित होकर कार्य करते हैं उनकी विशिष्टता एक संगठन के रूप में दिखाई देती है। इस संगठन से प्रायः वे सरकार पर प्रभाव डालते रहते हैं।

6. कार्यों में अंतर – प्रशासनिक सेवाओं की संगठित व्यवस्था को ही लोक-प्रशासन कहा जाता है। सरकार से संबंधित सभी पक्षों को इसमें सम्मिलित किया जाता है। सरकार के दायित्व : प्रशासकीय आधार पर भी भिन्न-भिन्न होते हैं। यदि एक लोकसेवक लेखांकन का कार्य कर रहा होता है तो दूसरा लेखा-परीक्षण का दोनों का कार्य-क्षेत्र सार्वजनिक सेवाएँ हैं पंरतु दोनों के कार्यों की प्रकृति भिन्न-भिन्न होती है। इसी आधार पर लोकसेवकों का सार्वजनिक सेवाओं से संबद्ध विविध क्षेत्रों पर एकाधिकार होता है।

7. सिद्धांत और व्यवहार में अंतर – प्रत्येक लोकसेवक पर उसकी नियुक्ति के साथ ही जनसेवक की भूमिका निभाने का दायित्व होता है। वह जनता के समक्ष निष्ठा और नियमपूर्वक कार्य करने के लिए कृत-संकल्प होता है। पंरतु इस व्यवस्था में उसका आचरण उसके घोषित स्वरूप से भिन्न प्रतीत होता है। वह मात्र जनसेवक नहीं रह जाता, उसकी जनभक्ति स्व-भक्ति और स्वार्थ-भक्ति के रूप में बदल जाती है।

8. अधिकारिक रिकॉर्ड – नौकरशाही के अंतर्गत अधिकारिक रिकॉर्डों को उचित ढंग से रखा जाता है। संगठन के निर्णयों और गतिविधियों को औपचारिक रूप से रिकॉर्ड कर लिया जाता है। और भावी संदर्भ के लिए सुरक्षित रखा जाता है।

9. अवैयक्तिक संबंध – नौकरशाही के अंतर्गत कर्मचारियों के मध्य संबंध अवैयक्तिक होते हैं। कार्यालय की स्थिति व्यक्तिगत संबंधों, भावनाओं और अनुभूतियों से मुक्त होती है। निर्णय औचित्य के आधार पर लिए जाते हैं न कि व्यक्तिगत आधार पर। वेबर को मत है-“नौकरशाही तंत्र औचित्यपूर्ण निर्णयों के लिए मार्ग प्रशस्त करता है।”

10. विशेषज्ञता – नौकरशाही में कर्मचारियों का चयन उनकी योग्यताओं के आधार पर किया जाता है। ये नियुक्तियाँ प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से या पूर्व उत्तीर्ण परीक्षाओं के आधार पर की जाती है। ये अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं, इन्हें चुना नहीं जाता, क्योंकि चुनाव-पद्धति में चयन तकनीकी योग्यता के आधार पर नहीं हो सकता।

नौकरशाही के प्रमुख कार्य

नौकरशाही के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं –
1. परामर्श देना – नौकरशाही या लोकसेवक देश तथा समाज से संबंधित वास्तविक कार्य करने के लिए मुख्य कार्यपालिका को, उसकी नीति के अनुरूप प्रशासकीय दायित्वों को पूरा करने के साथ-साथ मंहत्त्वपूर्ण कार्यों में परामर्श भी देते हैं। वे यह कार्य अपने को निष्पक्ष रखकर करते हैं। देखा जाए तो संपूर्ण प्रशासकीय कार्य उनके परामर्श से ही प्रारंभ होते हैं। परंतु इस कार्य को वही नौकरशाह या लोकसेवक उचित रूप से पूर्ण कर सकता है जिसे अपने विषय का पूर्ण ज्ञान हो और विषय को सूक्ष्मता से समझने की क्षमता हो।

2. नियोजन की रूपरेखा बनाना – नौकरशाही का एक महत्त्वपूर्ण कार्य परामर्श के आधार पर किसी योजना की रूपेरखा तैयार करना है। यह कार्य लोकसेवक नियोजन के सिद्धांत के अनुरूप ही करते हैं। इस दृष्टि से उनको विविध प्रकार के कार्य संपन्न करने पड़ते हैं। इस दृष्टि से वे न केवल नियोजक होते हैं, वरन् भविष्यदृष्टा भी होते हैं। नियोजन करते समय वह प्राप्त साधनों तथा लक्ष्यों के अनुसार अपनी योजनाएँ बनाते हैं। उनके उसी महत्त्वपूर्ण कार्य के अनुसार संपूर्ण देश का शासन संचालित होता है और सफलता प्राप्त करता है।

3. उत्पादन करना – सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु नौकरशाह या लोकसेवक महत्त्वपूर्ण दायित्व पूरे करते हैं उनका प्रत्येक कार्य एक उत्पादन सेवा और एक उपलब्धि के रूप में दृष्टिगोचर होता है। यह उपलब्धि और उत्पादन सेवा करने का एक सापेक्ष रूप है। लोकसेवक का प्रत्येक कार्य, चाहे वह कितना भी छोटा हो अथवा बड़ा, एक प्रकार से उत्पादन के क्षेत्र में आता है। उसका प्रत्येक कार्य एक भौतिक अस्तित्व, एक भावनात्मक आधार तथा प्रशासकीय सफलता है और यह उसी का उत्पादने है।

4. आदर्शों को व्यावहारिक रूप देना – लोकसेवक या नौकरशाह निष्ठा की भावना से कार्य करते हैं जिससे देश तथा समाज में सजीव आधार बनता है। इनका समूचा प्रस्तुतीकरण समाज, राष्ट्र व प्रशासन के आदर्शों को सजीव आधार प्रदान करता है।

5. सार्वजनिक सेवाओं को ईमानदारी से संपन्न करना – नौकरशाह जनता की सेवा मनोयोग तथा आत्मनिष्ठा के साथ पूर्ण करते हैं। निष्ठापूर्वक किए गए उनके इन कार्यों के परिणाम भी अच्छे निकलते हैं। इससे सामाजिक जीवन में संतुलन और समृद्धि की अभिव्यक्ति एक साथ होने लगती है। सरकार प्रशासनिक सेवाओं के बलबूते पर ही अपने दायित्वों को संपन्न करती है। और नागरिक अपने लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होते हैं।

नौकरशाही के प्रमुख अकार्य

नौकरशाही शासन-व्यवस्था की अनेक विद्वानों द्वारा कटु आलोचनाएँ की जाती हैं। इसके सबसे बड़े आलोचक रैम्जे म्योर (Ramsay Muir) हैं। उसने आलोचना करते हुए कहा है-“संक्षेप में नौकरशाही की शक्ति के रूप में शासन का ढंग पूर्ण रूप से कठोर है-चाहे वह प्रशासन के क्षेत्र में हो, कानून के क्षेत्र में हो या वित्त के क्षेत्र में हो। प्रजातात्रिक शासन में तो यह भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है और कई बार तो यह तानाशाह के समान व्यवहार करती है।” रैम्जे म्योर ने नौकरशाही पर यह लांछन लगाया है-“नौकरशाही मंत्रीय उत्तरदायित्व की आड़ में फलती-फूलती है। एक अन्य स्थान पर उन्होंने इसकी तुलना अग्नि से की है जो कि एक सेवक के रूप में तो बहुत उपयोगी सिद्ध होती है, परंतु जब यह स्वामी (मालिक) बन जाती है तो घातक सिद्ध होती है। इसी प्रकार लॉर्ड हेवर्ट (Lord Hawart) ने नौकरशाही की शक्ति को ‘नई तानाशाही’ (New Despotism) कहकर पुकारा है।

नौकरशाही के प्रमुख अकार्य निम्नलिखित हैं –
1. जनता की इच्छाओं तथा माँगों की अवहेलना करना – नौकरशाही व्यवस्था में सरकारी अधिकारी स्वयं को जनता का संरक्षक तथा हितैषी समझते हैं। वे जनमत को महत्त्वपूर्ण नहीं समझते। वास्तविकता यह है कि वे व्यवहार में वही करते हैं, जो उनको अच्छा लगता है। फिफनर (Pfiffner) के शब्दों में, “नौकरशाही बहुत मनमानी करती है। वह जनता की नीतियों का सरकारी नीतियों से सामंजस्य न करके उन्हें नए रूप प्रदान करती है। इससे जनसाधारण की माँगों तथा इच्छाओं की उपेक्षा होती है।”

2. लालफीताशाही या औपचारिकता की अधिकता – लालफीताशाही औपचारिक बातों को अधिक महत्त्व देती है। इसमें संदेह नहीं है कि नौकरशाही में ‘क्रिया-प्रक्रिया के नियमों (Rules of procedure) को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इससे शासन-व्यवस्था में सरकार का व्यय प्रतिवर्ष बढ़ता रहता है। प्रायः प्रशासनिक अधिकारी यह भूल जाते हैं कि उनका उद्देश्य केवल फॉर्म भरना अथवा नियमों का परिपालन करना ही नहीं है, वरन् समाज-सेवा करना भी है। नौकरशाही प्रक्रिया-औपचारिकताओं को अपना उद्देश्य बना लेती है, जबकि वे जन-सेवा के लिए एक माध्यम मात्र हैं।

3. अधिकारियों की संख्या की वृद्धि – इसके विषय में परकिंस के अनुसंधान के अनुसार अधिकारियों की संख्या में प्रतिवर्ष 15.75% की वृद्धि हो जाती है, जिसका बोझ जनता को करों के रूप में वहन करना पड़ता है।

4. अधिकारियों की शक्ति-वृद्धि की भावना – नौकरशाह सदैव शक्ति के भूखे रहते हैं। जनतंत्रीय कार्यों के प्रति उनमें आदर तथा सद्भावना नहीं होती। वे जनता की ओर से अपनी शक्ति को निरंतर बढ़ाते चले जाते हैं। संसदात्मक शासन-प्रणाली में मंत्रियों के उत्तरदायित्वों की आड़ में विभागों की शक्ति निरंतर बढ़ती जाती है।

5. विभागीकरण या साम्राज्य-रचना – नौकरशाही की एक त्रुटि यह है कि इसमें सरकौर के कार्यों को पृथक्-पृथक् विभागों (Isolated departments) में विभक्त कर दिया जाता है। प्रत्येक विभाग स्वयं को आत्मनिर्भर बनाना चाहता है तथा दूसरे विभागों को सहयोग देने के पक्ष में नहीं होता। प्रत्येक विभाग के अधिकारी अपने विभाग को अपना छोटा राज्य (Little kingdom) समझने लगते हैं वे यह भूल जाते हैं कि वे एक बड़े प्रशासन के अंश मात्र हैं।

6. पुरानी प्रथाओं से प्रेम तथा रूढ़िवादिता-बट्टेण्ड रसेल (Burtrend Russell) के अनुसार, प्रत्येक राष्ट्र में नौकरशाही व्यवस्था में अधिकारियों की मनोवृत्ति नकारात्मक हो जाती है। नवीन प्रयोग करने में उनकी बिलकुल रुचि नहीं होती। वे रूढ़िवाद में मग्न रहते हैं। उनमें पद की गर्वीली भावनाएँ उदित हो जाती हैं, जिसके कारण वे सत्य बात को भी सुनना नहीं चाहते।”

7. प्रजातंत्र की विरोधी – नौकरशाही किसी भी रूप में अपने वर्गीय अस्तित्व की अनुभूति के साथ-साथ प्रजातंत्र से न्यायपूर्ण संबंध नहीं बना पाती। रैम्जे म्योर ने स्पष्ट रूप से यह उल्लेख किया है-“संसद लोक-सेवकों के हाथ की कठपुतली है।”

8. श्रेष्ठता की भावना – इस व्यवस्था के अंतर्गत अधिकारियों में श्रेष्ठता की भावना आ जाती है। इन्हें कुछ विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं। इसलिए ये अपने आप को जनता और राजनीतिक नेतृत्व से पृथक् और श्रेष्ठ समझने लगते हैं। फलस्वरूप शासकों और शासितों के बीच गहरी खाई पैदा हो जाती है, कहीं असंतोष तो कहीं भ्रष्टाचार की भावना को जन्म देने में सहायक होती है।

9. निरंकुशता का प्रदर्शन – उदारता के लिए नौकरशाही में कोई स्थान नहीं होता। वे निरंकुशता के लिए नियमों का आश्रय लेते हैं। उनकी यह निरंकुशता उनके श्रेष्ठ अनुभव, पृथक् अनुभव तथा विशेषज्ञ-अनुभव करने की भावना से आबद्ध है। यद्यपि वे अपने को परिस्थिति के अनुसार परिवर्तित करने की क्षमता रखते हैं, तथापि उनकी यह प्रवृत्ति उनमें निरंकुशं मनोभावना को विकास करती है।

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वेबर के नौकरशाही के सिद्धांत की आलोचना

नौकरशाही के अध्ययन तथा विवेचन में मैक्स वेबर को पथ-प्रदर्शक के रूप में माना जाता है। विद्वानों द्वारा उनके विचारों की पर्याप्त आलोचानाएँ प्रस्तुत की गई हैं जो निम्नलिखित हैं –

  1. मैक्स वेबर नौकरशाही को व्यवस्था का एक आदर्श रूप मानता है, जबकि नौकरशाही में कुछ भी आदर्श नहीं है।
  2. आलोचकों के अनुसार, वेबर के विचार उपकल्पना के रूप में हैं। उनका कोई गवेषणात्मक आधार नहीं है।
  3. वेबर; मानव मनोविज्ञान, व्यक्ति के अनौपचारिक संबंध तथा औपचारिक प्रभावों पर कोई ध्यान नहीं देता।
  4. वेबर ने नौकरशाही के पूर्णतः औपचारिक स्वरूप का अध्ययन किया है तथा सामाजिक घटनाओं या अनौपचारिक संबंधों को प्रसंगवश मानकर छोड़ दिया है, जबकि ये किसी भी संगठन के सुचारू कार्य-संचालन के लिए अति आवश्यक हैं।

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि नौकरशाही के अध्ययन में वेबर का अद्वितीय स्थान है। इनकी प्रतिभा को स्वीकार करते हुए कार्ल जे० फ्रेडरिक (Carl J. Friedrich) ने इन्हें अध्ययन की महत्त्वपूर्ण दिशाएँ खोलने वाला बताया है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 2 आकाशदीप

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 2 आकाशदीप (जयशंकर प्रसाद) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 2 आकाशदीप (जयशंकर प्रसाद).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name आकाशदीप (जयशंकर प्रसाद)
Number of Questions 6
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi कथा भारती Chapter 2 आकाशदीप (जयशंकर प्रसाद)

प्रश्न 1:
प्रसाद जी द्वारा रचित ‘आकाशदीप’ कहानी का सारांश या कथानक या कथावस्तु अपनी भाषा में लिखिए।
या
‘आकाशदीप’ कहानी की कथावस्तु लिखकर यह स्पष्ट कीजिए कि यह कहानी आपको क्यों अच्छी लगती है ?
या
‘आकाशदीप’ कहानी क़ी विषय-वस्तु संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
समुद्र में अपने गन्तव्य पर जा रहे पोत पर दो बन्दी, दस नाविक और कुछ प्रहरी हैं। आँधी-तूफान आने की सम्भावना है। एक बन्दी, दूसरे से पूछता है कि मुक्त होना चाहते हो। दूसरा पूछता है कि शस्त्र मिल जाएगा। एक बन्दी अपने को स्वतन्त्र कर दूसरे के बन्धन खोलता है और हर्ष से दूसरे को गले लगा लेता है। पता चलता है कि वह स्त्री है। वह आश्चर्य करता है। पूछने पर वह अपना नाम चम्पा बताती है और एक नाविक के शरीर से टकराकर वह उसका कृपाण निकाल लेती है। उसी समय भयंकर आँधी आती है। एक बन्दी पोत से जुड़ी नाव को अलग करता है। दोनों बन्दी, पोतं के कुछ नाविक और उनका नायक नाव पर आ जाते हैं और पोत अपने । अध्यक्ष मणिभद्र के साथ ही समुद्र में डूब जाता है।

प्रात: होने पर नायक देखता है कि बन्दी मुक्त हो चुके हैं। बन्दी का नाम बुद्धगुप्त है, जो कि एक जलदस्यु है। नायक बुद्धगुप्त को बन्दी बनाना चाहती है। दोनों में वर्चस्व के लिए युद्ध होता है, जिसमें बुद्धगुप्त विजयी होता है। नायक स्वयं को बुद्धगुप्त का अनुचर स्वीकार करता है। चम्पो बुद्धगुप्त को स्नेहिल दृष्टि से देखती है।

चलती हुई नौका बाली द्वीप से दूर एक नवीन द्वीप पर पहुँचती है। बुद्धगुप्त उस द्वीप का नाम चम्पा द्वीप रखता है। द्वीप के मार्ग में ही दोनों; चम्पा और बुद्धगुप्त; एक-दूसरे को अपना परिचय देते हैं। बुद्धगुप्त के मन में चम्पा के प्रति कोमलता उत्पन्न होती है। वह स्वयं में भी परिवर्तन अनुभव करता है।

धीरे-धीरे दोनों के पाँच वर्ष उसी द्वीप पर व्यतीत हो जाते हैं। बुद्धगुप्त का समीप के बाली, सुमात्रा, जावा द्वीपों पर वाणिज्य का अधिकार हो जाता है। चम्पा उसे महानाविक कहती है। एक शाम चम्पा द्वीप के किसी उच्च स्थान पर बैठकर आकाशदीप जला रही होती है कि बुद्धगुप्त आता है और आकाशदीप के लिए उसकी किंचित् हँसी उड़ा देता है। इस पर चम्पा नाराज होती है और उसे अपनी माता द्वारा पिता के लिए जलाये जाने वाले आकाशदीप का इतिहास बताती है तथा दस्युवृत्ति छोड़ देने के बाद भी ईश्वर की हँसी उड़ाने के लिए व्यंग्य-बाणों से प्रताड़ित करती है।

एक दिन चम्पा और जया (चम्पा की एक सेविका) एक छोटी नौका में समुद्र में चल देती हैं। सूर्यास्त हो जाता है। पास ही एक बड़ी नौका पर स्थित बुद्धगुप्त चम्पा को उस पर चढ़ा लेता है और उसके पास बैठ छलछला आयी। आँखों से प्रेमपूर्ण निवेदन करता है। चम्पा रो पड़ती है और स्वीकार करती है कि वह भी उससे प्यार करती है। बुद्धगुप्त इस प्रेमपूर्ण क्षण की स्मृतिस्वरूप समुद्र में एक प्रकाश-गृह का निर्माण कराने के लिए कहता है।

चम्पा द्वीप के दूसरे भाग में एक पर्वत-श्रृंखला थी। सम्पूर्ण द्वीप को किसी देवी की भाँति सजाया गया था। पर्वत के ऊँचे शिखर पर एक दीप-स्तम्भ बनवाया गया था। उसी के समारोह में चम्पा वहीं समारोह-स्थल पर पालकी से जा रही थी। बुद्धगुप्त से अत्यधिक प्रेम करते हुए भी वह मानती थी कि वह ही उसके पिता का हत्यारा है। बुद्धगुप्त उसके सम्मुख स्वीकार करता है कि वह उसके पिता का हत्यारा नहीं, और उससे विवाह के लिए निवेदन करता है। वह कहता है कि इस द्वीप पर इन्द्र और शची की तरह पूजित वे दोनों आज भी अविवाहित हैं। वह उसे उस द्वीप को छोड़कर स्वदेश भारत चलने के लिए कहता है।

चम्पा उसे मना कर देती है और कहती है कि वह वहीं रहेगी। बुद्धगुप्त कहता है कि वह यहाँ रहकर अपने हृदय पर अधिकार नहीं रख सकता। उसकी साँसों में विकलती थी। चम्पा उससे इसी द्वीप में रहकर आकाशदीप की तरह स्वयं जलने के लिए कहती है।

एक दिन प्रात: बुद्धगुप्त अपनी नौकाओं को लेकर द्वीप छोड़कर चला जाता है। चम्पा की आँखों से आँसू बहने लगते हैं। चम्पा उसी द्वीप-स्तम्भ में जीवनपर्यन्त दीपक जलाती रही। द्वीप के निवासी उसकी देवी सदृश पूजा करते थे।

प्रश्न 2:
कहानी-कला के तत्त्वों की दृष्टि से प्रसाद की ‘आकाशदीप’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
चरित्र-चित्रण की दृष्टि से ‘आकाशदीप कहानी का मूल्यांकन कीजिए।
या
‘आकाशदीप’ कहानी का मुख्य उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
या
भाषा और कथोपकथन की दृष्टि से ‘आकाशदीप’ कहानी का मूल्यांकन कीजिए।
या
श्रेष्ठ कहानी की विशेषताएँ बताते हुए ‘आकाशदीप’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
जयशंकर प्रसाद की संकलित कहानी की कथावस्तु की समीक्षा कीजिए।
या
कहानी के प्रमुख तत्त्वों के आधार पर ‘आकाशदीप’ कहानी की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
भाषा और शैली की दृष्टि से ‘आकाशदीप’ कहानी की समीक्षा कीजिए।
या
‘आकाशदीप’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
या
‘आकाशदीप’ कहानी की संवाद-योजना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ‘आकाशदीप’ कहानी ऐतिहासिक धरातल पर आधारित है। प्रसाद जी का कहानी-साहित्य भाव और शिल्प दोनों दृष्टियों से अद्वितीय है। इस कहानी की तात्त्विक समीक्षा निम्नवत् है

(1) शीर्षक – ‘आकाशदीप’ कहानी का शीर्षक संक्षिप्त, सरल और कौतूहलवर्द्धक है। ‘आकाशदीप’ शब्द में ही कहानी का कथानक समाया हुआ है। यह वस्तु-व्यंजक होने के साथ-साथ सांकेतिक भी है। इसका सीधा सम्बन्ध कहानी की मूल चेतना से है और इसमें कहानी का केन्द्रबिन्दु स्वयं सिमट आया है। कहानी की सभी मूल घटनाओं का केन्द्र चम्पा द्वारा प्रज्वलित ‘आकाशदीप’ ही हैं। कथा के अनेक वैशिष्ट्यों को अपने में समाविष्ट करने के कारण शीर्षक उपयुक्त एवं समीचीन है।

(2) कथानक – जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ‘आकाशदीप’ शीर्षक कहानी का कथानक चम्पा और बुद्धगुप्त के जीवन और कार्य के इतिवृत्त पर आधारित है। चम्पा मणिभद्र के दिवंगत प्रहरी की क्षत्रिय कन्या है और बुद्धगुप्त ताम्रलिप्ति का क्षत्रिय कुमार। दोनों ही जलपोत पर बन्दी के रूप में रहते हैं। कहानीकार ने इस कहानी के कथानक को क्रमबद्धता देने के लिए एक, दो, तीन, चार जैसे उपविभागों में विभाजित किया है।

कहानी को आरम्भ चम्पा और बुद्धगुप्त; दोनों बन्दियों; के मुक्ति-सम्बन्धी संवादों से होता है। दूसरे उपविभाग में युद्ध में विजयी होकर बुद्धगुप्त चम्पा पर अपनी वीरता का प्रभाव छोड़ता है। तीसरे उपविभाग में चम्पा बुद्धगुप्त को अपनी व्यथा-कथा सुनाती है, जिससे यह पता चलता है कि वह वासना-लिप्त वणिक मणिभद्र के यहाँ बन्दी जीवन व्यतीत कर रही थी। इसी कथा-व्यापार में बुद्धगुप्त नये द्वीप पर पहुँचता है और उसका नाम चम्पा द्वीप रखता है। चम्पा के सान्निध्य में आने से जलदस्यु बुद्धगुप्त के हृदय में प्रेम और संवेदना का आविर्भाव होता है। धीरे-धीरे पाँच वर्ष बीत जाते हैं। चम्पा आकाशदीप जलाकर द्वीपवासी जनता का मार्ग आलोकित करती है। वह अपनी माँ द्वारा जलाये गये आकाश-दीपक की परम्परा का निर्वाह करती है। चम्पा और बुद्धगुप्त के परस्पर सान्निध्य से प्रेम के आविर्भाव के साथ-साथ बुद्धगुप्त की दस्युगंत नास्तिकता समाप्त होकर मानवता और मृदुलती के रूप में परिवर्तित होती है। उसका हृदय और मस्तिष्क दोनों ही परिवर्तित होकर संवेदनशील बन जाते हैं। बुद्धगुप्त के यह कहने पर कि वह उसके पिता का हत्यारा नहीं, चम्पा प्रेम और प्रतिशोध के अन्तर्द्वन्द्व से जन्मे संशय में बँध जाती है। अनास्तिक और अनास्थावादी बुद्धगुप्त द्रवित होकर चम्पा के साथ जीवनयापन के लिए प्रतिज्ञाबद्ध होता है परन्तु प्रेम, आशा और उत्साह का संचार होते हुए भी चम्पा उसे द्वीप के मूल निवासियों को छोड़कर महानाविक के साथ भारत नहीं लौटती है। चम्पा आजीवन उस दीपस्तम्भ में आलोक जलाती रही और एक दिन काल कवलित हो गयी। इस कहानी का कथानक प्रतीकात्मक होते हुए भी सेवा, त्याग और प्रेम की भावना से कथानक को गतिशील बनाता है।

(3) पात्र और चरित्र-चित्रण – प्रसाद जी की पात्र-योजना बड़ी उदात्त होती है। उनके अधिकांश पात्रों को चयन भारत के उस प्राचीन गौरवमय अतीत से है, जिस पर वे आधुनिक समाज की नींव रखना चाहते हैं। प्रस्तुत कहानी में चम्पा और बुद्धगुप्त दो ही मुख्य पात्र हैं। अन्य सभी पात्र मात्र कथा-प्रसंग की समुचित पूर्ति के लिए ही सम्मिलित किये गये हैं। चम्पा के माध्यम से कहानीकार ने अन्तर्द्वन्द्व, कर्तव्यनिष्ठा एवं उत्सर्ग की उदात्त भावनाओं को चित्रित किया है। चम्पा के चरित्र का ताना-बाना मानवीयता के चतुर्दिक उच्च आदर्श के धागों से बुना हुआ है। उसके आन्तरिक द्वन्द्व का सजीव चित्रण कर कहानीकार ने कर्तव्यनिष्ठा एवं उत्सर्ग की उदात्त भावनाओं को उजागर किया है। बुद्धगुप्त भी वीर, साहसी, सौन्दर्य का उपासक, कर्मठ, संयमी एवं आदर्श प्रेमी है। प्रसाद जी की इस कहानी के पात्र भी स्वाभाविक, सजीव तथा मनोवैज्ञानिक आधार पर पूर्ण रूप से खरे उतरते हैं। चरित्र-चित्रण की दृष्टि से यह कहानी एक सफल कहानी है।

(4) कथोपकथन या संवाद – इस कहानी का कथोपकथन संक्षिप्त, नाटकीय एवं अर्थ-गाम्भीर्य से परिपूर्ण होने के कारण सजीव, मार्मिक एवं प्रभावशाली है। कहानी के पात्र स्वयं के संवादों द्वारा अपना परिचय प्रस्तुत करते हैं। प्रसाद जी श्रेष्ठ नाटककार हैं, इसी कारण प्रस्तुत कहानी की संवाद-योजना नाटकीय है। इस कहानी के संवाद संक्षिप्त, सारगर्भित, कथानक को गति देने वाले, वातावरण की सृष्टि में सहायक तथा पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं को प्रकट करने वाले हैं। इस कहानी के संवाद सार्थक, मार्मिक और प्रभावशाली हैं। एक उदाहरण द्रष्टव्य है
‘बन्दी ।’
‘क्या है? सोने दो।’
‘मुक्त होना चाहते हो।’
अभी नहीं, निद्रा खुलने पर, चुप रहो।
‘फिर अवसर न मिलेगा।’
‘बड़ी शीत है, कहीं से एक कम्बल डालकर कोई शीत से मुक्त करता।’
‘आँधी की सम्भावना है। यही अवसर है, आज मेरे बन्धन शिथिल हैं।’
‘तो क्या तुम भी बन्दी हो?’

(5) भाषा-शैली – प्रसाद जी की भाषा कलात्मक, संस्कृतनिष्ठ और परिष्कृत है। प्रस्तुत कहानी की भाषा संस्कृत प्रधान है और उसमें तत्सम शब्दों की बहुलता है। प्रसाद जी की शब्दावली समृद्ध और व्यापक तथा शैली अलंकृत है। कहानी की भाषा-शैली कथाक्स्तु की गरिमा और पात्रों की भाव-व्यंजना के अनुकूल है।

भाषा सरस और मार्मिक है। मोहक अलंकार-विधान और तत्समप्रधान ओजमयी भाषा के कारण ‘आकाशदीप को प्रसाद जी की प्रतिनिधि कहानी कहा जा सकता है। इस कहानी में नाटकीय शैली तो प्रधान है ही, चित्रात्मक, वर्णनात्मक और भावात्मक शैलियों का भी यथास्थान प्रयोग हुआ है। उदाहरण द्रष्टव्य है

चम्पा और बुद्धगुप्त के परस्पर सान्निध्य से सौन्दर्यजन्य प्रेम के आविर्भाव के साथ-साथ बुद्धगुप्त की दस्युगत नास्तिकता समाप्त होकर मानवता और मृदुलता के रूप में परिवर्तित होती है।
शरद के धवल नक्षत्र नील गगन में झिलमिला रहे थे। चन्द्रकी उज्ज्वल विजय पर अन्तरिक्ष में शरदलक्ष्मी ने आशीर्वाद के फूलों और खीलों को बिखेर दिया।

(6) देश-काल व वातावरण – प्रसाद जी ने अपनी कहानियों में देश-काल और वातावरण का यथोचित निर्वाह किया है। ‘आकाशदीप’ कहानी में वातावरण ऐतिहासिक तथा पात्र काल्पनिक हैं। द्वीप के आंचलिक वातावरण का सुन्दर चित्रण है। भाषा तथा घटनाएँ देश-काल के सर्वथा अनुरूप हैं। वातावरण को सजीव करने के लिए चित्रात्मक शैली का प्रयोग किया गया है। दृश्य-वर्णन के साकार रूप का यह उदाहरण द्रष्टव्य है

समुद्र में हिलोरें उठने लगीं। दोनों बन्दी आपस में टकराने लगे। पहले बन्दी ने अपने को स्वतन्त्र कर लिया। दूसरे का बन्धन खोलने का प्रयत्न करने लगा। लहरों के धक्के एक-दूसरे को स्पर्श से पुलकित कर रहे थे। मुक्ति की आशा-स्नेह का असम्भावित आलिंगन। दोनों ही अन्धकार में मुक्त हो गये।

वातावरण के निर्माण में प्रसाद जी कवित्वमयी, अलंकृत और साहित्यिक शैली से काम लेते हैं तथा प्रकृति के दृश्यों का वर्णन बड़ी कुशलता से करते हैं। अपनी बहुमुखी कल्पना के द्वारा प्रसाद जी सूक्ष्म-से- सूक्ष्म रेखाओं को पाठकों के सामने उपस्थित कर देते हैं। इस प्रकार यह कहानी देश-काल और वातावरण की दृष्टि से एक सफल कहानी है।

(7) उद्देश्य – प्रसाद जी का साहित्य आदर्शवादी है। प्रस्तुत कहानी में भावना की अपेक्षा कर्तव्यनिष्ठा का आदर्श प्रस्तुत किया गया है। चम्पा एक आदर्श प्रेमिका है और इन सबसे ऊपर है उसका उत्सर्ग भाव। वह अपने कर्तव्य का पालन करती हुई अपने व्यक्तिगत प्रेम और जीवन को समर्पित कर देती है। उसका चरित्र एक आदर्श उदात्त नारी का चरित्र है। कहानीकार का उद्देश्य उसके चरित्र के माध्यम से समाज में प्रेम का आदर्श स्वरूप उपस्थित करना है, जिसमें कहानीकार को पूर्ण सफलता मिली है।

इस प्रकार ‘आकाशदीप’ कहानी की कथावस्तु जीवन्त तथा मार्मिक है। चम्पा प्रेम, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति के प्रति सजग है। वह अपने प्रेम का बलिदान करती है तथा प्रेम के गौरव की रक्षा के लिए स्वयं का आत्मोत्सर्ग भी करती है। निष्कर्ष रूप से यह कहा जा सकता है कि प्रस्तुत कहानी; कहानी-कला की कसौटी पर खरी उतरती है।

प्रश्न 3:
जयशंकर प्रसाद की ‘आकाशदीप’ कहानी के आधार पर चम्पा का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
“प्रसाद जी की ‘आकाशदीप’ कहानी में कर्तव्य एवं प्रेम के द्वन्द्वपूर्ण केन्द्रबिन्दु को विकसित कर चम्पा का चरित्र-चित्रण किया गया है।” इस कथन को प्रमाणित कीजिए।
या
‘आकाशदीप’ कहानी की प्रमुख नारी पात्रा का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘आकाशदीप’ कहानी के प्रमुख पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
हिन्दी कथा-साहित्य की कुछ अमर कृतियों में से जयशंकर प्रसाद की आकाशदीप कहानी भी एक है। इस कहानी की नायिका चम्पा ही कहानी की मुख्य नारी पात्रा है। वह अपने वीर और बलिदानी पिता की एकमात्र सन्तान है। उसकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) सुन्दर बालिका – चम्पा अति सुन्दर बालिका है। वह सौन्दर्य की साक्षात् प्रतिमूर्ति है। यह उसके अतीव सौन्दर्य का ही प्रभाव था कि बुद्धगुप्त जिसके नाम से बाली, जावा और चम्पा का आकाश पूँजता था, पवन थर्राता था, घुटनों के बल चम्पा के सामने; प्रणय-निवेदन करता, छलछलाई आँखों से बैठा था।

(2) निडर, स्वाभिमानी और साहसी – चम्पा निडर, स्वाभिमानी और साहसी है। उसकी निडरता का पता तब चलता है जब मणिभद्र उसके समक्ष घृणित प्रस्ताव रखता है और वह उसके आश्रय में रहते हुए भी उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर देती है। उसके स्वाभिमानी होने को प्रमाण उसके बन्दी बनाये जाने पर मिलता है। उसे बन्दी होना स्वीकार है, लेकिन घृणित प्रस्ताव स्वीकार नहीं। उसके साहस का परिचय अनजाने द्वीप पर सबसे पहले उतरने पर मिलता है।

(3) आदर्श प्रेमिका – चम्पा के हृदय में प्रेम का अथाह सागर हिलोरें लेता है, परन्तु वह इसे प्रेम-सागर की लहरों को नियन्त्रण में रखना जानती है। बुद्धगुप्त जब भी उसके पास आता है, वह उस पर न्योछावर हो जाती है। उसके प्रेम का वर्णन स्वयं कहानीकार ने इन शब्दों में किया है-”उस सौरभ से पागल चम्पा ने बुद्धगुप्त के दोनों हाथ पकड़ लिये। वहाँ एक आलिंगन हुआ, जैसे क्षितिज में आकाश और सिन्धु का।”

(4) आदर्श सन्तान – चम्पा अपने माता-पिता की आदर्श सन्तान है। उसे अपनी माता के द्वारा पिता के पथ-प्रदर्शन के प्रतीक रूप में आकाशदीप जलाना सदैव याद रहता है। उसके पिता की मृत्यु का कारण एक जलदस्यु था, यह वह कभी नहीं भूल पाती। वह बुद्धगुप्त से कहती है कि ये आकाशदीप मेरी माँ की पुण्य स्मृति हैं। वह बुद्धगुप्त को जलदस्यु से सम्बोधित कर अपने सामने से हट जाने के लिए भी कहती है।।

(5) अन्तर्द्वन्द्व – चम्पा का पूरा चरित्र अन्तर्द्वन्द्व की भावना से भरा हुआ है। द्वीपवासियों के प्रति उसका प्रेम और व्यक्तिगत प्रेम का सहज अन्तर्द्वन्द्व उसको घेरे रहता है। एक ओर वह कर्त्तव्य-निर्वाह के लिए अपने प्रेम को न्योछावर कर देती है तो दूसरी ओर व्यक्तिगत प्रेम के गौरव की रक्षा के लिए आत्मोत्सर्ग भी कर देती है। उसको अन्तर्द्वन्द्व इन शब्दों में व्यक्त हुआ है-

”बुद्धगुप्त! मेरे लिए सब भूमि मिट्टी है; सब जल तरल है; सब पवन शीतल है। कोई विशेष आकांक्षा हृदय में अग्नि के समान प्रज्वलित नहीं। सब मिलाकर मेरे लिए एक शून्य है। ……. और मुझे, छोड़ दो इन निरीह भोले-भाले प्राणियों के दुःख की सहानुभूति और सेवा के लिए।

इस प्रकार चम्पा के चरित्र का गौरवपूर्ण और सजीव चित्रण करते हुए प्रसाद जी ने उसको द्वीपवासियों के प्रेम और व्यक्तिगत प्रेम के अन्तर्द्वन्द्व में घिरा दिखाया है तथा व्यक्तिगत प्रेम के उत्सर्ग को चित्रित कर चम्पा के चरित्र को गरिमामय अभिव्यक्ति प्रदान की है।

(6) धैर्यशालिनी – चम्पा के जीवन में अनेक बाह्य तथा आन्तरिक संघर्ष आते हैं, परन्तु वह विचलित नहीं होती और धैर्यपूर्वक उनका सामना करती है। वह अनाथ है। माता की मृत्यु के बाद पिता के साथ जल- पोत पर रहती है। पिता की मृत्यु के बाद बन्दिनी हो जाती है। इसके बाद भी वह मुक्ति के लिए संघर्ष करती है। वह अपना धैर्य कभी नहीं छोड़ती।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि चम्पा का चरित्र ‘आकाशदीप’ कहानी का प्राण है। वह एक आदर्श नायिका है, एक आदर्श प्रेमिका है और साथ ही प्रसाद जी के अन्य नारी पात्रों के समान वन्दनीय है। स्वयं प्रसाद जी लिखते हैं, “चम्पा आजीवन उस दीप-स्तम्भ में आलोक जलाती रही। किन्तु उसके बाद भी बहुत दिन तक, द्वीप निवासी, उस माया-ममता और स्नेह-सेवा की देवी की समाधि सदृश पूजा करते थो।

प्रश्न 4:
‘आकाशदीप’ कहानी के आधार पर बुद्धगुप्त का चरित्र-चित्रण कीजिए।
या
‘आकाशदीप’ कहानी के प्रमुख पात्र का चरित्रांकन कीजिए।
या
‘आकाशदीप’ कहानी के आधार पर उसके नायक की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
‘आकाशदीप’ के नायक की चारित्रिक विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
श्री जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित कहानी ‘आकाशदीप’ की मुख्य पात्री चम्पा ही है। कहानी के अन्य पात्रों का चित्रण चम्पा के चरित्र की विशेषताओं को ही स्पष्ट करने के लिए हुआ है। ऐसे ही एक पात्र के रूप में बुद्धगुप्त भी है। इस कहानी में बुद्धगुप्त के चरित्र की विशेषताएँ निम्नवत् दर्शायी गयी हैं.

(1) साहसी – बुद्धगुप्त ताम्रलिप्ति का एक क्षत्रिय कुमार है। साहस उसमें कूट-कूटकर भरा हुआ है। नौका के स्वामित्व को लेकर नायक और बुद्धगुप्त में द्वन्द्वयुद्ध होता है। उस समय बुद्धगुप्त अपने साहस का परिचय देता है और द्वन्द्वयुद्ध में उसे हरा देता है।

(2) मानवतावादी – बुद्धगुप्त मानवतावादी है। उसमें मानवीयता के गुण विद्यमान हैं। इसी कारण चम्पा के प्रति उसके मन में दया की भावना उत्पन्न हो जाती है, जो बाद में प्रेम में परिवर्तित हो जाती है। चम्पा के सान्निध्य से उसकी दस्युगत मानसिकता और कठोरता समाप्त होकर मानवता और मृदुलता में परिवर्तित हो जाती है।

(3) संवेदनशील और प्रेमी व्यक्ति – बुद्धगुप्त एक संवेदनशील व्यक्ति है। जब चम्पा कहती है कि उसके पिता की मृत्यु एक जलदस्यु के हाथों हुई थी तब वह स्पष्ट रूप से कहता है कि, “मैं तुम्हारे पिता का घातक नहीं हूँ, चम्पा! वह एक दूसरे दस्यु के शस्त्र से मरे।” चम्पा के प्रति उसका प्रेम संवेदनशीलता की चरम सीमा पर पहुंचा हुआ है। वह चम्पा से कहता है, “इतना महत्त्व प्राप्त करने पर भी मैं कंगाल हूँ। मेरा पत्थर-सा हृदय एक दिन सहसा तुम्हारे स्पर्श से चन्द्रकान्तमणि की तरह द्रवित हुआ।”

(4) वीर – बुद्धगुप्त एक वीर युवक है। बन्धन मुक्त होने पर जब उससे पूछा जाता है कि तुम्हें किसने बन्धनमुक्त किया तो वह कृपाण दिखाकर नायक को बताता है इसने। नायक और बुद्धगुप्त के द्वन्द्वयुद्ध में विजयश्री बुद्धगुप्त को मिलती है। चम्पा भी उसकी वीरता से प्रभावित हुए बिना नहीं रहती। स्वयं प्रसाद जी कहते हैं, “चम्पा ने युवक जलदस्यु के समीप आकर उसके क्षतों को अपनी स्निग्ध दृष्टि और कोमल करों से वेदना-विहीन कर दिया।”

(5) भारत के प्रति प्रेम – बुद्धगुप्त भारतभूमि के ही एक स्थल ताम्रलिप्ति का एक क्षत्रिय कुमार है। भारतभूमि । के प्रति उसके मन में अगाध स्नेह है। वह चम्पा से कहता है, “स्मरण होता है वह दार्शनिकों का देश! वह महिमा की प्रतिमा! मुझे वह स्मृति नित्य आकर्षित करती है।” चम्पा के अस्वीकार कर देने पर वह स्वयं भारत लौट आता है।

निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि इस कहानी का नायक होते हुए भी बुद्धगुप्त चम्पा के चरित्र की विशेषता को उजागर करने वाला मात्र एक सहायक पात्र है, तथापि उसके चरित्र की उपर्युक्त विशेषताएँ उसकी एक अलग छवि प्रस्तुत करती हैं।

प्रश्न 5:
‘आकाशदीप’ कहानी में सजीव ऐतिहासिक वातावरण की सृष्टि किस प्रकार की गयी है? भाषा और शैली के आधार पर उत्तर दीजिए।
उत्तर:
प्रसाद जी ने ‘आकाशदीप’ कहानी के वातावरण निर्माण में इतिहास और कल्पना का सहारा लेकर रचना को सजीव बना दिया है। इसको जीवन्त स्वरूप देने में उनकी कवित्वपूर्ण भाषा और नाटकीय शैली का अपूर्व सहयोग रहा है। इससे ऐतिहासिक वातावरण साकार हो उठा है। उन्होंने तत्कालीन वातावरण के अनुकूल ही संस्कृतबहुल शब्दावली का प्रयोग किया है। काव्यात्मक भाषा का एक उदाहरण द्रष्टव्य है-
“जाह्नवी के तट पर।चम्पानगरी की एक क्षत्रिय बालिका हूँ।पिता इसी मणिभद्र के यहाँ प्रहरी का काम करते थे।” ……….
“मैं भी ताम्रलिप्ति का एक क्षत्रिय हूँ, चम्पा! परन्तु दुर्भाग्य से जलदस्यु बनकर जीवन बिताता हूँ।”
प्रस्तुत कहानी में प्रसाद जी की नाटकीय शैली ने वातावरण को स्वाभाविक और सरस बना दिया है; जैसे
‘बावली हो क्या? यहाँ बैठी हुई अभी तक दीप जला रही हो, तुम्हें यह काम करना है?’
‘क्षीरनिधिशायी अनंत की प्रसन्नता के लिए क्या दासियों से आकाशदीप जलवाऊँ?’
‘हँसी आती है। तुम किसको दीप जलाकर पथ दिखलाना चाहती हो? उसको, जिसको तुमने भगवान् मान लिया है?’
‘हाँ, वह कभी भटकते हैं, भूलते हैं; नहीं तो, बुद्धगुप्त को इतनी ऐश्वर्य क्यों देते?’
‘तो बुरा क्या हुआ, इस द्वीप की अधीश्वरी चम्पारानी!’
‘मुझे इस बन्दीगृह से मुक्त करो। अब तो बाली, जावा और सुमात्रा का वाणिज्य केवल तुम्हारे ही अधिकार में है महानाविक! परन्तु मुझे उन दिनों की स्मृति सुहावनी लगती है, जब तुम्हारे पास एक ही नाव थी और चम्पा के उपकूल में पण्य लादकर हम लोग सुखी जीवन बिताते थे।’

इस प्रकार प्रसाद जी ने कहानी में देश-काल के अनुकूल भाषा-शैली का प्रयोग करके ऐतिहासिक वातावरण को सहज ही साकार कर दिया है।

प्रश्न 6:
‘आकाशदीप’ कहानी के माध्यम से प्रसाद जी ने कौन-सा आदर्श रखना चाहा है?
उत्तर:
प्रसाद जी ने ‘आकाशदीप’ कहानी के माध्यम से प्रेम और कर्तव्यनिष्ठा के समन्वय के आदर्श की स्थापना की है। उनके अनुसार देशप्रेम व्यक्तिगत प्रेम से अधिक महान् है। स्वदेश के लिए हमें अपने व्यक्तिगत प्रेम को न्योछावर कर देने में संकोच नहीं करनी चाहिए। चम्पा; चम्पा द्वीप जिसने उसको नया जीवन प्रदान किया था; के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करती हुई अपने व्यक्तिगत प्रेम की बलि चढ़ा देती है। साथ ही वह आत्म-बलिदान के लिए प्रस्तुत होकर प्रेम के गौरव को भी बनाये रखती है। दूसरी ओर बुद्धगुप्त भी भारतभूमि के प्रति प्रेम के लिए अपने व्यक्तिगत प्रेम चम्पा को छोड़कर वापस आ जाता है। इस प्रकार चम्पा और बुद्धगुप्त दोनों ही देश और प्रियतम दोनों के प्रति अप्रतिम रीति से अपने कर्तव्य का पालन करते हैं।

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