UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 10 Wave Optics

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Physics
Chapter Chapter 10
Chapter Name Wave Optics (तरंग-प्रकाशिकी)
Number of Questions Solved 99
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 10 Wave Optics (तरंग-प्रकाशिकी)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
589 nm तरंगदैर्ध्य का एकवर्णीय प्रकाश वायु से जल की सतह पर आपतित होता है।
(a) परावर्तित, तथा (b) अपवर्तित प्रकाश की तरंगदैर्घ्य, आवृत्ति तथा चाल क्या होगी?
जल का अपवर्तनांक 1.33 है।
हल-
दिया है, आपतित प्रकाश की तरंगदैर्घ्य
λ1 = 589 nm = 589 x 109 मीटर
वायु में प्रकाश की चाल c = 3 x 108 मी/से
तथा [latex s=2]{ _{ a }{ \mu }_{ \omega } }[/latex] = 1.33
(a) परावर्तित प्रकाश के लिए
(i) चूंकि परावर्तित प्रकाश की तरंगदैर्घ्य अपरिवर्तित रहती है, अतः परावर्तित प्रकाश की तरंगदैर्घ्य
λa = λ1 = 589 nm
(ii) चूंकि परावर्तन में माध्यम नहीं बदलता अतः परावर्तित प्रकाश की चाल c = 3 x 108 मी/से
(iii) सूत्र c = υλ से
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प्रश्न 2.
निम्नलिखित दशाओं में प्रत्येक तरंगाग्र की आकृति क्या है?
(a) किसी बिन्दु स्रोत से अपसरित प्रकाश।
(b) उत्तल लेन्स से निर्गमित प्रकाश, जिसके फोकस बिन्दु पर कोई बिन्दु स्रोत रखा है।
(c) किसी दूरस्थ तारे से आने वाले प्रकाश तरंगाग्र का पृथ्वी द्वारा अवरोधित (intercepted) भाग।
उत्तर-
(a) जब एक बिन्दु स्रोत से प्रकाश अपसरित होता है, तब तरंगाग्र गोलीय अभिसारी प्रकार का होता है।
(b) जब बिन्दु स्रोत को उत्तल लेन्स के फोकस पर रखा जाता है, तब लेन्स से निर्गत प्रकाश किरणें एक-दूसरे के समान्तर होती हैं तथा तरंगाग्र समतल होता है।
(c) इस स्थिति में तरंगाग्र की आकृति लगभग समतल होती है क्योंकि प्रकाश स्रोत पृथ्वी से दूरस्थ तारा है, अत: बड़े गोले के पृष्ठ पर छोटा क्षेत्रफल लगभग समतल है।

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प्रश्न 3.
(a) काँच का अपवर्तनांक 1.5 है। काँच में प्रकाश की चाल क्या होगी? (निर्वात में प्रकाश की चाल 3.0 x 10 m-1 है।)
(b) क्या काँच में प्रकाश की चाल, प्रकाश के रंग पर निर्भर करती है? यदि हाँ, तो लाल तथा बैंगनी में से कौन-सा रंग काँच के प्रिज्म में धीमा चलता है?
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प्रश्न 4.
यंग के द्विझिरी प्रयोग में झिर्रियों के बीच की दूरी 0.28 mm है तथा परदा 1.4 m की दूरी पर रखा गया है। केन्द्रीय दीप्त फ्रिन्ज एवं चतुर्थ दीप्त फ्रिन्ज के बीच की दूरी 1.2 cm मापी गई है। प्रयोग में उपयोग किए गए प्रकाश की तरंगदैर्घ्य ज्ञात कीजिए।
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प्रश्न 5.
यंग के द्विझिरी प्रयोग में, λ तरंगदैर्घ्य का एकवर्णीय प्रकाश उपयोग करने पर, परदे के एक बिन्दु पर जहाँ पथान्तर λ है, प्रकाश की तीव्रता K इकाई है। उस बिन्दु पर प्रकाश की तीव्रता कितनी होगी जहाँ पथान्तर λ/3 है?
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प्रश्न 6.
यंग के द्विझिर्स प्रयोग में व्यतिकरण फ्रिन्जों को प्राप्त करने के लिए 650 nm तथा 520 nm तरंगदैघ्र्यों के प्रकाश-पुंज का उपयोग किया गया।
(a) 650 nm तरंगदैर्घ्य के लिए परदे पर तीसरे दीप्त फ्रिन्ज की केन्द्रीय उच्चिष्ठ से दूरी ज्ञात कीजिए।
(b) केन्द्रीय उच्चिष्ठ से उस न्यूनतम दूरी को ज्ञात कीजिए जहाँ दोनों तरंगदैर्यों के कारण दीप्त फ्रिन्ज संपाती (coincide) होते हैं। (दिया है, D = 120 cm तथा d = 2 mm)
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प्रश्न 7.
एक द्विझिरी प्रयोग में एक मीटर दूर रखे परदे पर एक फ्रिन्ज की कोणीय चौड़ाई 0.2° पाई गई है। उपयोग किए गए प्रकाश की तरंगदैर्ध्य 600 nm है। यदि पूरा प्रायोगिक उपकरण जल में डुबो दिया जाए तो फ्रिन्ज की कोणीय चौड़ाई क्या होगी? जल का अपवर्तनांक [latex]\frac { 4 }{ 3 }[/latex] लीजिए।
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प्रश्न 8.
वायु से काँच में संक्रमण (transition) के लिए बूस्टर कोण क्या है? (काँच का अपवर्तनांक = 1.5)।
हल-
बूस्टर के नियम से, n = tan ip
बूस्टर कोण अर्थात् ध्रुवण कोण ip = tan-1 (n)
यहाँ n = 1.5 अतः ip = tan-1 (1.5) = 56.3°

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प्रश्न 9.
5000 Å तरंगदैर्घ्य का प्रकाश एक समतल परावर्तक सतह पर आपतित होता है। परावर्तित प्रकाश की तरंगदैर्ध्य एवं आवृत्ति क्या है? आपतन कोण के किस मान के लिए परावर्तित किरण आपतित किरण के लम्बवत होगी?
हल-
यहाँ λ = 5000 Å = 5000 x 10-10 मीटर = 5 x 10-7
वायु में प्रकाश की चाले c = 3 x 108 मी/से
वायु में प्रकाश की आवृत्ति
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आपतित तथा परावर्तित किरण दोनों एक ही माध्यम (वायु) में होंगे।
अतः परावर्तित प्रकाश की तरंगदैर्घ्य = आपतित प्रकाश की तरंगदैर्घ्य = 5000 Å
परावर्तित प्रकाश की आवृत्ति = आपतित प्रकाश की आवृत्ति = 6 x 1014 हज
परावर्तन कोण r = आपतन कोण i
तथा परावर्तित किरण आपतित किरण के लम्बवत् है; अतः
i + r = 90°, i + i = 90°
वांछित आपतन कोण i = 45°

प्रश्न 10.
उस दूरी का आकलन कीजिए जिसके लिए किसी 4 mm के आकार के द्वारक तथा 400 nm तरंगदैर्घ्य के प्रकाश के लिए किरण प्रकाशिकी सन्निकट रूप से लागू होती है।
हल-
दिया है, λ = 400 nm = 400 x 10-9 m, d = 4 x 10-3 m
माना एकल झिरीं विवर्तन प्रतिरूप में प्रथम निम्निष्ठ केन्द्रीय उच्चिष्ठ से θ1 कोण पर प्राप्त होता है, तब
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अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 11.
एक तारे में हाइड्रोजन से उत्सर्जित 6563 Å की Hα लाइन में 15 Å का अभिरक्त-विस्थापन (red-shift) होता है। पृथ्वी से दूर जा रहे तारे की चाल का आकलन कीजिए।
हल-
दिया है, λ = 6563 Å, अभिरक्त विस्थापन Δλ = 15 Å
तारे की चाल = ?
प्रकाश की चाल c = 3 x 108 ms-1
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प्रश्न 12.
किसी माध्यम (जैसे जल) में प्रकाश की चाल निर्वात में प्रकाश की चाल से अधिक है। न्यूटन के कणिका सिद्धान्त द्वारा इस आशय की भविष्यवाणी कैसे की गई। क्या जल में प्रकाश की चाल प्रयोग द्वारा ज्ञात करके इस भविष्यवाणी की पुष्टि हुई? यदि नहीं, तो प्रकाश के चित्रण का कौन-सा विकल्प प्रयोगानुकूल है?
उत्तर-
न्यूटन के कणिका सिद्धान्त के अनुसार जब प्रकाश किसी विरल माध्यम से सघन माध्यम में प्रवेश करता है तो प्रकाश कणिकाओं पर, माध्यमों की सीमा पृष्ठ के अभिलम्बवत् दिशा में एक आकर्षण बल (विरल से सघने माध्यम की ओर) कार्य करने लगता है। इस बल के कारण कणिकाओं को, सीमा पृष्ठ के अभिलम्बवत् घटक बढ़ने लगता है, जबकि सीमा पृष्ठ के समान्तर घटक अपरिवर्तित रहता है। इससे प्रकाश किरण अभिलम्ब की ओर झुकती हुई सघन माध्यम में अपवर्तित हो जाती है।
सीमा पृष्ठ का समान्तर घटक अपरिवर्तित रहता है; अतः
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परन्तु प्रयोग द्वारा न्यूटन की इस भविष्यवाणी की पुष्टि नहीं हो पाई अपितु इसके विपरीत प्रयोग द्वारा यह ज्ञात हुआ कि सघन माध्यम में प्रकाश की चाल विरल माध्यम की तुलना में कम हाती है। इससे न्यूटन के कणिका सिद्धान्त को अमान्य करार दिया गया और हाइगेन्स के तरंगिका सिद्धान्त को मान्यता मिल गई। इससे ज्ञात होता है कि हाइगेन्स का तरंगिका सिद्धान्त प्रयोग संगत है।

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प्रश्न 13.
आप मूल पाठ में जान चुके हैं कि हाइगेन्स का सिद्धान्त परावर्तन और अपवर्तन के नियमों के लिए किस प्रकार मार्गदर्शक है। इसी सिद्धान्त का उपयोग करके प्रत्यक्ष रीति से निगमन (deduce) कीजिए कि समतल दर्पण के सामने रखी किसी वस्तु का प्रतिबिम्ब आभासी बनता है, जिसकी दर्पण से दूरी, बिम्ब से दर्पण की दूरी के बराबर होती है।
उत्तर-
एक बिन्दु बिम्ब तथा एक समतल दर्पण लीजिए। बिन्दु बिम्ब को केन्द्र मानते हुए तथा दर्पण को स्पर्श करते हुए एक वृत्त खींचिए। यह बिम्ब से चलकर दर्पण तक पहुँचने वाले गोलीय तरंगाग्र का समतलीय भाग है। अब t समय पश्चात् दर्पण की उपस्थिति में तथा अनुपस्थिति में इस तरंगाग्र की स्थितियाँ आरेखित कीजिए। इस प्रकार दर्पण के दोनों ओर सर्वत्रसम चाप प्राप्त होंगे। इनमें से एक परावर्तित तरंगाग्र है। (पहचानिए)। सरल ज्यामिति के उपयोग से देखा जा सकता है कि परावर्तित तरंगाग्र का केन्द्र (बिम्ब को प्रतिबिम्ब) दर्पण से बिम्ब के बराबर दूरी पर है।

प्रश्न 14.
तरंग संचरण की चाल को प्रभावित कर सकने वाले कुछ सम्भावित कारकों की सूची है
(i) स्रोत की प्रकृति,
(ii) संचरण की दिशा,
(iii) स्रोत और / या प्रेक्षक की गति,
(iv) तरंगदैर्घ्य, तथा
(v) तरंग की तीव्रता।
बताइए कि …………
(a) निर्वात में प्रकाश की चाल,
(b) किसी माध्यम (माना काँच या जल) में प्रकाश की चाल इनमें से किन कारकों पर निर्भर करली है?
उत्तर-
(a) निर्वात् में प्रकाश की चाल एक सार्वत्रिक नियतांक है जो उपर्युक्त में से किसी भी कारक पर निर्भर नहीं करती। यहाँ तक कि स्रोत व प्रेक्षक के बीच आपेक्षिक गति पर भी नहीं। (b) किसी माध्यम में प्रकाश की चाल
(i) स्रोत की प्रकृति,
(ii) संचरण की दिशा,
(iii) स्रोत तथा माध्यम के बीच आपेक्षिक गति, तथा
(v) तरंग की तीव्रता पर निर्भर नहीं करती।
परन्तु यह
(iii) माध्यम तथा प्रेक्षक के बीच आपेक्षिक गति, तथा
(iv) प्रकाश की तरंगदैर्ध्य पर निर्भर करती है।

प्रश्न 15.
ध्वनि तरंगों में आवृत्ति विस्थापन के लिए डॉप्लर का सूत्र निम्नलिखित दो स्थितियों में थोड़ा-सा भिन्न है-
(i) स्रोत विरामावस्था में तथा प्रेक्षक गति में हो, तथा
(ii) स्रोत गति में परन्तु प्रेक्षक विरामावस्था में हो।
जबकि प्रकाश के लिए डॉप्लर के सूत्र निश्चित रूप से निर्वात में, इन दोनों स्थितियों में एकसमान हैं। ऐसा क्यों है? स्पष्ट कीजिए। क्या आप समझते हैं कि ये सूत्र किसी माध्यम में प्रकाश गमन के लिए भी दोनों स्थितियों में पूर्णतः एकसमान होंगे?
उत्तर-
निर्वात् में गतिमान प्रकाश के लिए डॉप्लर प्रभाव में प्रेक्षक द्वारा ग्रहण किए गए प्रकाश की आभासी आवृत्ति दोनों ही दशाओं में समान होती है। भले ही दर्शक, स्थिर स्रोत की ओर गति कर रहा हो अथवा स्रोत समान चाल से दर्शक की ओर गतिमान हो। इस प्रकार प्रकाश में डॉप्लर प्रभाव सममित है। दूसरी ओर ध्वनि तरंगों को चलने के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है, इसलिए भले ही चाहे उक्त दोनों स्थितियों में प्रेक्षक तथा स्रोत के बीच समान आपेक्षिक गति होने के कारण ये स्थितियाँ समान प्रतीत होती हैं परन्तु वे समान नहीं हैं। ऐसा इस कारण से है कि दोनों दशाओं में प्रेक्षक का माध्यम के सापेक्ष वेग भिन्न-भिन्न है; अतः उक्त दोनों दशाओं में सुनी गई ध्वनि की आभासी आवृत्तियाँ समान नहीं हो सकतीं।

यदि किसी माध्यम में प्रकाश की गति की बात की जाए तो पुनः दोनों स्थितियाँ अलग-अलग हो जाएँगी चूंकि दोनों स्थितियों में प्रेक्षक का माध्यम के सापेक्ष वेग भिन्न-भिन्न होगा। अतः इस दशा में प्रेक्षक द्वारा ग्रहण किए गए प्रकाश की आवृत्ति के भिन्न डॉप्लर सूत्रों की अपेक्षा की जानी चाहिए।

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प्रश्न 16.
द्विझिरी प्रयोग में, 600 nm तरंगदैर्घ्य का प्रकाश करने पर, एक दूरस्थ परदे पर बने फ्रिज की कोणीय चौड़ाई 0.1° है। दोनों झिर्रियों के बीच कितनी दूरी है?
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प्रश्न 17.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
(a) एकल झिरी विवर्तन प्रयोग में, झिरीं की चौड़ाई मूल चौड़ाई से दोगुनी कर दी गई है। यह केन्द्रीय विवर्तन बैंड के साइज तथा तीव्रता को कैसे प्रभावित करेगी?
(b) द्विझिरी प्रयोग में, प्रत्येक झिरी का विवर्तन, व्यतिकरण पैटर्न से किस प्रकार सम्बन्धित है?
(c) सुदूर स्रोत से आने वाले प्रकाश के मार्ग में जब एक लघु वृत्ताकार वस्तु रखी जाती है तो वस्तु की छाया के मध्य एक प्रदीप्त बिन्दु दिखाई देता है। स्पष्ट कीजिए क्यों?
(d) दो विद्यार्थी एक 10 m ऊँची कक्ष विभाजक दीवार द्वारा 7m के अन्तर पर हैं। यदि ध्वनि और प्रकाश दोनों प्रकार की तरंगें वस्तु के किनारों पर मुड़ सकती हैं तो फिर भी वे विद्यार्थी एक-दूसरे को देख नहीं पाते यद्यपि वे आपस में आसानी से वार्तालाप किस प्रकार कर पाते हैं?
(e) किरण प्रकाशिकी, प्रकाश के सीधी रेखा में गति करने की संकल्पना पर आधारित है। यद्यपि विवर्तन प्रभाव (जब प्रकाश का संचरण एक द्वारक/झिरी या वस्तु के चारों ओर प्रेक्षित किया जाए) इस संकल्पना को नकारता है तथापि किरण प्रकाशिकी की संकल्पना प्रकाशकीय यन्त्रों में प्रतिबिम्बों की स्थिति तथा उनके दूसरे अनेक गुणों को समझने के लिए सामान्यतः उपयोग में लाई जाती है। इसका क्या औचित्य है?
उत्तर-
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अत: झिरीं की चौड़ाई दोगुनी करने पर, केन्द्रीय विवर्तन बैंड की चौड़ाई आधी रह जाएगी, जबकि तीव्रता चार गुनी (तीव्रता ∝ झिरीं का क्षेत्रफल) हो जाएगी।

(b) द्विझिरीं प्रयोग में व्यतिकरण पैटर्न की फ्रिन्ज एकल झिरीं विवर्तन पैटर्न की फ्रिन्जों के साथ अध्यारोपित होती हैं।

(c) वृत्तीय अवरोध के किनारों से विवर्तित तरंगें जब वस्तु की छाया के मध्य बिन्दु पर मिलती हैं तो वहाँ पथान्तर शून्य होने के कारण परस्पर संपोषी व्यतिकरण करती हैं; अत: वहाँ चमकदार बिन्दु दिखाई पड़ता है।

(d) दीवार की ऊँचाई 10 m, ध्वनि तरंगों की तरंगदैर्घ्य की कोटि की है; अत: यह ध्वनि तरंगों में पर्याप्त विवर्तन उत्पन्न करती है और एक विद्यार्थी की ध्वनि दीवार से विवर्तित होकर दूसरे विद्यार्थी तक पहुँच जाती है। वहीं प्रकाश की तरंगदैर्घ्य, दीवार की ऊँचाई की तुलना में अत्यन्त सूक्ष्म है; अत: दीवार प्रकाश तरंगों में पर्याप्त विवर्तन उत्पन्न नहीं कर पाती। इसी कारण विद्यार्थी एक-दूसरे को नहीं देख पाते।

(e) सामान्यतः प्रकाशिक यन्त्रों में प्रयुक्त लेन्सों के द्वारकों का साइज प्रकाश की तरंगदैर्ध्य की तुलना में काफी बड़ा होता है; अत: इन यन्त्रों द्वारा बने प्रतिबिम्बों में विवर्तन का प्रभाव नगण्य ही रहता है। यही कारण है कि प्रतिबिम्बों की स्थिति तथा अन्य गुणों को समझने के लिए प्रायः किरण प्रकाशिकी का ही प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 18.
दो पहाड़ियों की चोटी पर दो मीनारें एक-दूसरे से 40 km की दूरी पर हैं। इनको जोड़ने वाली रेखा मध्य में आने वाली किसी पहाड़ी के 50 m ऊपर से होकर गुजरती है। उन रेडियो तरंगों की अधिकतम तरंगदैर्घ्य ज्ञात कीजिए, जो मीनारों के मध्य बिना पर्याप्त विवर्तन प्रभाव के भेजी जा सकें?
हल-
फ्रेजनल दूरी तय करने पर ही तरंग प्रभाव ज्यामितीय प्रभाव पर हावी हो जाता है। अत: फ्रेजनल दूरी
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प्रश्न 19.
500 pm तरंगदैर्ध्य का एक समान्तर प्रकाश-पुंज एक पतली झिरीं पर गिरता है तथा 1 m दूर परदे पर परिणामी विवर्तन पैटर्न देखा जाता है। यह देखा गया कि पहला निम्निष्ठ परदे पर केन्द्र से 2.5 mm दूरी पर है। झिरीं की चौड़ाई ज्ञात कीजिए।
हल-
विवर्तन प्रारूप में निम्निष्ठों के लिए e sin θ = mλ …(1)
प्रथम कोटि के निम्निष्ठों के लिए m = 1 तथा विवर्तन कोण 8 के छोटे मानों के लिए
sin θ = tan θ ~ θ = [latex]\frac { x }{ D }[/latex]
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प्रश्न 20.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
(a) जब कम ऊँचाई पर उड़ने वाला वायुयान ऊपर से गुजरता है तो हम कभी-कभी टेलीविजन के परदे पर चित्र को हिलते हुए पाते हैं। एक सम्भावित स्पष्टीकरण सुझाइए।
(b) जैसा कि आप मूल पाठ में जान चुके हैं कि विवर्तन तथा व्यतिकरण पैटर्न में तीव्रता का वितरण समझने का आधारभूत सिद्धान्त तरंगों का रेखीय प्रत्यारोपण है। इस सिद्धान्त की तर्कसंगति क्या है?
उत्तर-
(a) ऐसा टेलीविजन के एन्टीना तक सीधे पहुंचने वाले तथा हवाई जहाज से टकराकर एन्टीना तक पहुँचने वाले संकेतों के बीच होने वाले व्यतिकरण के कारण होता है।

(b) तरंग गति को नियन्त्रित करने वाले अवकल समीकरण का चरित्र रेखीय होता है। यदि y1 तथा y2 ऐसे किसी समीकरण के दो अलग-अलग हल हैं तो y1 + y2 भी इस समीकरण का एक हल होगा (रेखीय अवकल समीकरण का गुण)। यही गुण तरंगों के रेखीय प्रत्यारोपण को तर्कसंगत ठहराता है।

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प्रश्न 21.
एकल झिरी विवर्तन पैटर्न की व्युत्पत्ति में कथित है कि [latex s=2]\frac { n\lambda }{ a }[/latex] कोणों पर तीव्रता शून्य है। इस निरसन (cancillation) को, झिरीं को उपयुक्त भागों में बाँटकर सत्यापित कीजिए।
हल-
माना e चौड़ाई की एकल झिरीं n छोटी झिर्रियों में बाँटी गयी है। अत: प्रत्येक झिर्रा की चौड़ाई
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अतः n झिर्रियों में से प्रत्येक θ कोण की दिशा में शून्य तीव्रता प्रेरित करती है जिनमें प्रत्येक की चौड़ाई e’ है। अतः परिणामस्वरूप n झिर्रियों की तीव्रताओं का परिणामी भी शून्य ही होगा।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
हाइगेन्स के अनुसार, प्रकाश की तरंगें होती हैं|
(i) यान्त्रिक, अनुदैर्घ्य
(ii) यान्त्रिक, अनुप्रस्थ
(iii) विद्युत, चुम्बकीय
(iv) यान्त्रिक, गोलीय
उत्तर-
(i) यान्त्रिक, अनुदैर्घ्य

प्रश्न 2.
वायु में प्रकाश की चाल 3.0 x 108 मीटर/सेकण्ड है। 1.5 अपवर्तनांक वाले काँच में प्रकाश की चाल होगी- (2012)
(i) 1.5 x 108 मीटर/सेकण्ड
(ii) 2.0 x 108 मीटर/सेकण्ड
(iii) 1.0 x 108 मीटर/सेकण्ड
(iv) 2.5 x 108 मीटर/सेकण्ड
उत्तर-
(ii) 2.0 x 108 मीटर/सेकण्ड

प्रश्न 3.
वायु में 4000 Å तरंगदैर्घ्य के एकवर्णी प्रकाश की किरणें जल (जिसका अपवर्तनांक = 4/3 है) में प्रवेश करती हैं। जल में इनकी तरंगदैर्ध्य होगी- (2011)
(i) 2500 Å
(ii) 3000 Å
(iii) 4000 Å
(iv) 5333 Å
उत्तर-
(ii) 3000 Å

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प्रश्न 4.
जल की सतह पर तेल की पतली परत बिछी हुई है। सूर्य के प्रकाश में इस सतह पर सुन्दर रंग दिखाई देने का कारण है- (2013)
(i) प्रकाश का वर्णं विक्षेपण
(ii) प्रकाश का ध्रुवण,
(iii) प्रकाश का व्यतिकरण
(iv) प्रकाश का विवर्तन
उत्तर-
(iii) प्रकाश का व्यतिकरण

प्रश्न 5.
व्यतिकरण की घटना का कारण है|
(i) कलान्तर
(ii) आयाम परिवर्तन
(iii) वेग परिवर्तन
(iv) तीव्रता
उत्तर-
(i) कलान्तर

प्रश्न 6.
यदि व्यतिकरण करने वाली दो तरंगों की तीव्रताओं का अनुपात 16 : 9 है, तो व्यतिकरण प्रारूप में महत्तम एवं न्यूनतम तीव्रताओं को अनुपात है- (2010, 13)
(i) 4 : 3
(ii) 49 : 1
(iii) 25 : 7
(iv) 256 : 81
उत्तर-
(ii) 49 : 1

प्रश्न 7.
समान आयाम व समान तरंगदैर्ध्य की दो प्रकाश तरंगें अध्यारोपित की जाती हैं। परिणामी तरंग का आयाम अधिकतम होगा जब उनके बीच कलान्तर है- (2015)
(i) शून्य
(ii) [latex s=2]\frac { \pi }{ 4 }[/latex]
(iii) [latex s=2]\frac { \pi }{ 2 }[/latex]
(iv) π
उत्तर-
(i) शून्य

प्रश्न 8.
प्रकाश-तरंगों का किसी अवरोध की ज्यामितीय छाया में मुड़ना कहलाता है-
(i) प्रकाश का व्यतिकरण
(ii) विवर्तन
(iii) ध्रुवंण
(iv) वर्ण-विक्षेपण
उत्तर-
(ii) विवर्तन

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प्रश्न 9.
प्रकाश सरल रेखा में चलता प्रतीत होता है, क्योंकि-
(i) सह वायुमण्डल द्वारा अवशोषित नहीं होता है।
(ii) इसकी चाल बहुत अधिक है।
(iii) इसकी तरंगदैर्ध्य बहुत छोटी है।
(iv) यह वायुमण्डल के ऊपरी भाग से परावर्तित हो जाता है।
उत्तर-
(iii) इसकी तरंगदैर्घ्य बहुत छोटी है।

प्रश्न 10.
एक एकल स्लिट, जिसकी चौड़ाई e है, तरंगदैर्घ्य λ के प्रकाश द्वारा प्रकाशित की जाती है। प्रथम निम्निष्ठ 60° के विवर्तन कोण पर प्राप्त होगा। यदि
(i) e = [latex s=2]\frac { \lambda }{ \surd 3 }[/latex]
(ii) e = [latex s=2]\frac { 2\lambda }{ \surd 3 }[/latex]
(iii) e = [latex s=2]\frac { 4\lambda }{ \surd 3 }[/latex]
(iv) e = [latex s=2]\frac { \sqrt { 3 } \lambda }{ 2 }[/latex]
उत्तर-
(ii) e = [latex s=2]\frac { 2\lambda }{ \surd 3 }[/latex]

प्रश्न 11.
वह घटना जो प्रकाश की अनुप्रस्थ तरंग प्रकृति दर्शाती है, है- (2010, 12)
(i) व्यतिकरण
(ii) विवर्तन
(iii) ध्रुवण
(iv) अपवर्तन
उत्तर-
(iii) ध्रुवण

प्रश्न 12.
सम्बन्ध n = tan ip, कहलाता है-
(i) परावर्तन
(ii) व्यतिकरण
(iii) बूस्टर का नियम
(iv) न्यूटन का नियम
उत्तर-
(iii) बूस्टर का नियम

प्रश्न 13.
अपवर्तनांक n वाले पृष्ठ पर आपतित प्रकाश के लिए ध्रुवण कोण (बूस्टर कोण) होगा- (2013)
(i) sin-1 (n)
(ii) tan-1 (n)
(ii) cos-1 (n)
(iv) tan ([latex]\frac { 1 }{ n }[/latex])
उत्तर-
(ii) tan-1 (n)

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प्रश्न 14.
ध्रुवण कोण (p) तथा क्रान्तिक कोण (C) में सम्बन्ध व्यक्त होता है- (2017)
(i) tan p = cosec C
(ii) tan p = sin C
(iii) tan p = sec C
(iv) tan p = cos C
उत्तर-
(i) tan p = cosec C

प्रश्न 15.
एक पोलेराइड की पारदर्शी प्लेट उसी प्रकार की एक अन्य प्लेट पर इस प्रकार रखी है कि इनकी ध्रुवण दिशाओं के बीच 30° का कोण बनता है। प्लेटों के इस युग्म में से एक पर । अधूवित प्रकाश आपतित होता है। निर्गत प्रकाश तथा आपतित अधूवित प्रकाश की तीव्रताओं का अनुपात होगा- (2017)
(i) 1 : 4
(ii) 1 : 3
(iii) 3 : 4
(iv) 3 : 8
उत्तर-
(ii) 1 : 3

प्रश्न 16.
प्रकाश तरंगों की अनुप्रस्थ प्रकृति की पुष्टि होती है- (2017)
(i) ध्रुवण के द्वारा
(ii) विवर्तन के द्वारा
iii) व्यतिकरण के द्वारा
(iv) आवर्तन के द्वारा
उत्तर-
(i) ध्रुवण के द्वारा

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
तरंगाग्र के लम्बवत् रेखा किसकी दिशा को प्रदर्शित करती है?
उत्तर-
तरंग-संचरण की दिशा को।

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प्रश्न 2.
ऐसी दो भौतिक घटनाओं का उल्लेख कीजिए जो प्रकाश की तरंग प्रकृति की पुष्टि करती हैं।
उत्तर-
व्यतिकरण तथा विवर्तन।

प्रश्न 3.
निर्वात में किसी प्रकाश की तरंगदैर्घ्य 4800 Å है, जल में तरंगदैर्घ्य की गणना कीजिए। जल का अपवर्तनांक [latex]\frac { 4 }{ 3 }[/latex] है। (2010)
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प्रश्न 4.
काँच-जल के मध्यपृष्ठ पर क्रान्तिक कोण ज्ञात कीजिए, यदि वायु के सापेक्ष काँच एवं जल के अपवर्तनांक क्रमशः [latex]\frac { 3 }{ 2 }[/latex] एवं [latex]\frac { 4 }{ 3 }[/latex] हैं। (2010)
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प्रश्न 5.
समान आवृत्ति वाली दो तरंगों के आयामों का अनुपात 5 : 3 है। इनके अध्यारोपण से उत्पन्न परिणामी तरंग की अधिकतम तथा न्यूनतम तीव्रताओं को अनुपात ज्ञात कीजिए। (2009, 11, 16)
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प्रश्न 6.
कला-सम्बद्ध स्रोतों से आप क्या समझते हैं? (2010)
उत्तर-
ऐसे दो स्रोतों को जिनके बीच कलान्तर सदैव नियत रहता है, कला-सम्बद्ध स्रोत (coherent sources) कहते हैं। दो कला-सम्बद्ध स्रोतों से हम स्थायी (sustained) व्यतिकरण प्रतिरूप प्राप्त कर सकते हैं। ऐसे स्रोत किसी युक्ति द्वारा एक ही स्रोत से प्राप्त किये जाते हैं।

प्रश्न 7.
यंग के व्यतिकरण प्रयोग में यदि दो प्रकाश-स्रोतों में से एक के मार्ग में काँच की पतली प्लेट रख दी जाए, तो फ्रिन्ज की चौड़ाई पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर-
कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, बल्कि व्यतिकरण प्रारूप उसी स्लिट की दिशा में विस्थापित हो जाएगा।

प्रश्न 8.
ध्वनि के व्यतिकरण पर आधारित दो यन्त्रों के नाम लिखिए। (2009)
उत्तर-
क्विण्के की नली, स्वरित्र द्विभुज।

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प्रश्न 9.
प्रकाश के व्यतिकरण का एक प्राकृतिक तथा एक प्रायोगिक उदाहरण बताइए। (2009)
उत्तर-
तेल की परत का रंगीन दिखायी देना, यंग का प्रयोग।

प्रश्न 10.
अध्यारोपण का सिद्धान्त लिखिए। (2009)
उत्तर-
किसी माध्यम में दो अथवा दो से अधिक प्रगामी तरंगें एक साथ परन्तु एक-दूसरे की गति को बिना प्रभावित किये चल सकती हैं। अत: माध्यम के प्रत्येक कण का किसी क्षण परिणामी विस्थापन दोनों तरंगों द्वारा अलग-अलग उत्पन्न विस्थापनों के सदिश (vector) योग के बराबर होता है। इस सिद्धान्त को ‘अध्यारोपण का सिद्धान्त’ कहते हैं।

प्रश्न 11.
तरंगों के अध्यारोपण से कितने प्रकार के प्रभाव प्राप्त होते हैं? कौन-कौन से? (2009)
उत्तर-
तरंगों के अध्यारोपण से तीन प्रकार के प्रभाव प्राप्त होते हैं-

  • व्यतिकरण,
  • विस्पन्द,
  • अप्रगामी तरंगें।

प्रश्न 12.
यदि समान आयाम a की दो प्रकाश तरंगों के व्यतिकरण से परिणामी तरंग का आयाम a ही प्राप्त हो तब दोनों तरंगों के मध्य कलान्तर क्या होगा? (2016)
हल-
दोनों तरंगों के मध्य कलान्तर 120° होगा।

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प्रश्न 13.
समान आवृत्ति की दो प्रकाश तरंगों के आयाम 4 : 3 के अनुपात में हैं। यदि दोनों तरंगें व्यतिकरण करें तो महत्तम व न्यूनतम तीव्रताओं का अनुपात क्या होगा? (2017)
हल-
दिया है, आयामों का अनुपाते, a1 : a2 = 4 : 3
अधिकतम तीव्रता के स्थान पर आयाम = (a1 + a2)
न्यूनतम तीव्रता के स्थान पर आयाम = (a1 ~ a2)
सूत्र I ∝ a2 से,
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 10 Wave Optics VSAQ 13

प्रश्न 14.
दो प्रकाश तरंगों की तीव्रताओं का अनुपात 81 : 49 है। उनके आयामों का क्या अनुपात होगा? (2017)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 10 Wave Optics

प्रश्न 15.
यदि स्लिट की चौड़ाई कम कर दी जाए तो केन्द्रीय उच्चिष्ठ की चौड़ाई पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?
उत्तर-
कोणीय चौड़ाई = 2λ/d अर्थात् यह रेखा-छिद्र की चौड़ाई d के व्युत्क्रमानुपाती है। इसलिए स्लिट की चौड़ाई कम करने से केन्द्रीय उच्चिष्ठ की चौड़ाई बढ़ जाएगी।

प्रश्न 16.
एकल रेखा-छिद्र से प्राप्त विवर्तन प्रारूप में निम्निष्ठों की स्थिति के लिए सूत्र लिखिए तथा प्रयुक्त संकेतों के अर्थ स्पष्ट कीजिए। (2009)
उत्तर-
θ = ± mλ/e.
जहाँ, θ = कोणीय स्थिति, m कोई पूर्णांक,
λ = तरंगदैर्घ्य,
e = स्लिटों के बीच की दूरी।

प्रश्न 17.
किसी 1 x 10-5 मी की चौड़ाई वाली झिरीं पर 6000 Å तरंगदैर्घ्य का प्रकाश लम्बवत् पड़ रहा है। विवर्तन प्रारूप के केन्द्रीय उच्चिष्ठ की.कोणीय चौड़ाई की गणना कीजिए।
हल-
केन्द्रीय उच्चिष्ठ की कोणीय चौड़ाई
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 10 Wave Optics VSAQ 17

प्रश्न 18.
0.2 मिमी चौड़ाई वाले रेखाछिद्र से 2 मीटर दूर रखे पर्दे पर विवर्तन प्राप्त होता है। पर्दे पर केन्द्रीय उच्चिष्ठ के दोनों ओर 5 मिमी पर प्रथम निम्निष्ठ पाया जाता है। प्रकाश की तरंगदैर्ध्य की गणना कीजिए। (2011, 17)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 10 Wave Optics

प्रश्न 19.
एकल स्लिट द्वारा विवर्तन में द्वितीय निम्निष्ठ 6.0 के विवर्तन में कोण पर प्राप्त होता है। यदि प्रकाश की तरंगदैर्घ्य λ हो तब स्लिट की चौड़ाई क्या होगी? (2015)
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प्रश्न 20.
ध्रुवण-कोण से क्या तात्पर्य है? (2012)
या
ध्रुवर्ण-कोण से आप क्या समझते हैं? (2014)
या
ध्रुवण-कोण क्या है? (2017)
उत्तर-
पारदर्शी माध्यम पर आपतित प्रकाश का वह आपतन कोण जिसके लिए परावर्तित प्रकाश पूर्णतया समतल ध्रुवित होता है, धुवण-कोण कहलाता है। इसको ip से प्रदर्शित करते हैं।

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प्रश्न 21.
एक पोलेराइड पर समतल-धुवित प्रकाश, पोलेराइड की ध्रुवण दिशा में (i) 45° के कोण पर, (ii) 60° के कोण पर गिरता है। पोलेराइड से निर्गत प्रकाश की तीव्रता, आपतित प्रकाश की तीव्रता की कितने प्रतिशत होगी? (2009)
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प्रश्न 22.
प्रकाश के ध्रुवण से प्रकाश की प्रकृति के किस तथ्य की पुष्टि होती है ? (2011)
उत्तर-
प्रकाश के ध्रुवण से प्रकाश के तरंग रूप की अनुप्रस्थ प्रकृति की पुष्टि होती है।

प्रश्न 23.
द्विवर्णता क्या है?
उत्तर-
टूरमैलीन क्रिस्टल द्वारा द्वि-अपवर्तन की घटना में इस क्रिस्टल द्वारा दो ध्रुवित अपवर्तित किरणों में से एक किरण को क्रिस्टल द्वारा अवशोषित करने का गुण द्विवर्णता कहलाता है।

प्रश्न 24.
ध्रुवित प्रकाश में कम्पन:-तल तथा ध्रुवण-तल के मध्य का कोण कितना होता है? (2009)
उत्तर-
90°

प्रश्न 25.
द्वि-अपवर्तन से आप क्या समझते हैं? (2011, 16)
उत्तर-
द्वि-अपवर्तन (Double Refraction)- टूरमैलीन, कैलसाइट, क्वार्ट्ज जैसे कुछ क्रिस्टल ऐसे होते हैं कि जब उन पर साधारण प्रकाश (अधुवित प्रकाश) की कोई किरण डाली जाती है, तो वह क्रिस्टल में प्रवेश करने पर दो अपवर्तित किरणों में बँट जाती है। इस घटना को द्वि-अपवर्तन कहते हैं। इन दो। अपवर्तित किरणों में से जो एक किरण अपवर्तन के नियमों का पालन करती है, साधारण किरण (ordinary ray) कहलाती है तथा दूसरी किरण जो अपवर्तन के नियमों का पालन नहीं करती, असाधारण किरण (extra-ordinary ray) कहलाती है। ये दोनों किरणें परस्पर लम्बवत् तलों में समतल ध्रुवित होती हैं।

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प्रश्न 26.
√3 अपवर्तनांक वाले माध्यम के लिए ध्रुवण-कोण कितना होता है? (2012, 14)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 10 Wave Optics VSAQ 26
प्रश्न 27.
एक पारदर्शी माध्यम पर आपतित प्रकाश परावर्तन के बाद पूर्णतः समतल ध्रुवित पाया जाता है। माध्यम के लिए ध्रुवण कोण 45° है। माध्यम का अपवर्तनांक तथा अपवर्तन कोण का मान ज्ञात कीजिए। (2011)
हल-
ध्रुवण कोण हो, ip = 45°
माध्यम का अपवर्तनांक n = tan ip = tan 45° = 1
ip + r = 90
अपवर्तन कोण r = 90° – ip = 90° – 45° = 45°

प्रश्न 28.
उने दो भौतिक घटनाओं का उल्लेख कीजिए जिनसे प्रकाश के तरंग प्रकृति की पुष्टि होती- (2011, 17)
उत्तर-
व्यतिकरण तथा ध्रुवण।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रिज्म द्वारा किसी समतल तरंगाग्र के परावर्तन तथा अपवर्तन को समझाइए।
उत्तर-
माना एक समतल तरंगाग्र PQ अल्प अपवर्तन कोण के प्रिज्म ABC पर आपतित होता है। हाइगेन्स के सिद्धान्तानुसार, तरंगाग्र PQ का प्रत्येक बिन्दु एक नये विक्षोभ केन्द्र की तरह कार्य करता है। ये विक्षोभ केन्द्र द्वितीयक तरंगिकाएँ उत्पन्न करते हैं। भिन्न-भिन्न द्वितीयक तरंगिकाएँ भिन्न-भिन्न मोटाइयों से होकर गुजरती हैं। Q से द्वितीयक तरंगिका C तक पहुँचने में प्रिज्म की सम्पूर्ण लम्बाई तय करेगी। दूसरी ओर प्रिज्म के बिन्दु A पर आपतन कोण के बाद P से द्वितीयक तरंगिका वायु में लगभग सम्पूर्ण दूरी तय करेगी। यह तरंगिका प्रिज्म में बहुत ही अल्प दूरी तय करने के पश्चात् बाहर निर्गत् होती है और पुन: वायु में गति करती है।

जिस समय तरंगिका प्रिज्म में B से C तक गति करती है। ठीक उसी समय P से तरंगिका वायु में लगभग सम्पूर्ण दूरी तय करने के पश्चात् C’ बिन्दु तक पहुँचती है और C’ भी उसी कला में होता है। परिणामस्वरूप एक समतल तरंगाग्र CC’ प्राप्त होता है जिसे निर्गत् समतल तरंगाग्र कहा जाता है। इस प्रकार हम निष्कर्ष निकालते हैं कि प्रिज्म से कोई समतल तरंगाग्रं एक समतल तंरंगाग्र के रूप में ही बाहर निकलता है।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 10 Wave Optics

प्रश्न 2.
प्रकाश के व्यतिकरण से क्या तात्पर्य है? इसके लिए आवश्यक प्रतिबन्ध क्या हैं? (2009, 11, 12, 13, 14, 15, 16)
या
दो प्रकाश पुंजों द्वारा बनी व्यर्तिकरण फ्रिन्जों को प्राप्त करने के लिये आवश्यक प्रतिबन्धों का उल्लेख कीजिए। (2010, 12)
या
प्रकाश के व्यतिकरण के लिए आवश्यक शर्ते बताइए। (2016)
उत्तर-
समान आवृत्ति की दो प्रकाश-तरंगें जिनके आयाम समान हों, जब किसी माध्यम में एक साथ चलती हैं तो माध्यम के विभिन्न बिन्दुओं पर प्रकाश की तीव्रता उने तरंगों की अलग-अलग तीव्रताओं के योग से भिन्न होती है। कुछ स्थानों पर प्रकाश की तीव्रता न्यूनतम (लगभग शून्य) होती है, जबकि कुछ स्थानों पर प्रकाश की तीव्रता अधिकतम होती है। प्रकाश-तरंगों की इस घटना को प्रकाश का व्यतिकरण कहते हैं। जिन स्थानों पर तीव्रता न्यूनतम होती है, उन स्थानों पर हुए व्यतिकरण को ‘विनाशी-व्यतिकरण’ तथा जिन स्थानों पर तीव्रता अधिकतम होती है, उन स्थानों पर हुए व्यतिकरण को संपोषी व्यतिकरण’, कहते हैं।
प्रकाश के व्यतिकरण के लिए आवश्यक शर्ते प्रकाश के व्यतिकरण के लिए आवश्यक शर्ते निम्नलिखित हैं|

  • दोनों प्रकाश-स्रोत ‘कला सम्बद्ध’ होने चाहिए, अर्थात् दोनों स्रोतों से प्राप्त तरंगों के बीच कलान्तर समय के साथ स्थिर रहना चाहिए।
  • दोनों तरंगों की आवृत्तियाँ (अथवा तरंगदैर्घ्य) बराबर होनी चाहिए।
  • दोनों तरंगों के आयाम बराबर होने चाहिए।
  • प्रकाश के दोनों स्रोतों के बीच दूरी बहुत कम होनी चाहिए जिससे दोनों तरंगाग्र एक ही दिशा में चलें और फ्रिजें अधिक चौड़ी बने।
  • दोनों प्रकाश-स्रोत बहुत संकीर्ण होने चाहिए।

प्रश्न 3.
तरंगों के संपोषी तथा विनाशी व्यतिकरण के लिए आवश्यक शर्ते बताइए। (2010, 13)
उत्तर-
संपोषी व्यतिकरण के लिए आवश्यक शर्ते
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अतः संपोषी व्यतिकरण के लिए आवश्यक है, कि
(i) दोनों तरंगों के बीच कलान्तर शून्य अथवा π का सम गुणक होना चाहिए, अर्थात् तरंगें एक ही कला में मिलनी चाहिए।
(ii) दोनों तरंगों के बीच पथान्तर शून्य अथवा तरंगदैर्घ्य λ का पूर्ण गुणक होना चाहिए।

विनाशी व्यतिकरण के लिए आवश्यक शर्ते
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 10 Wave Optics
अत: विनाशी व्यतिकरण के लिए आवश्यक है, कि
(i) दोनों तरंगों के बीच कलान्तर π का विषम गुणक होना चाहिए, अर्थात् तरंगें विपरीत कला में मिलनी चाहिए।
(ii) दोनों तरंगों के बीच पथान्तर अर्द्ध-तरंगदैर्घ्य (λ/2) का विषम गुणक होना चाहिए।

प्रश्न 4.
यंग के द्विक रेखा छिद्र प्रयोग में स्लिटें 0.28 mm दूरी पर हैं और पर्दा 1.4 मीटर दूर रखा है। केन्द्रीय दीप्त-फ्रिज और चौथी दीप्त फ्रिज के बीच की दूरी 1.2 सेमी है। प्रयोग में प्रयुक्त प्रकाश की तरंगदैर्ध्य एवं दीप्त फ्रिन्ज की चौड़ाई ज्ञात कीजिए। (2015)
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 10 Wave Optics SAQ 4

प्रश्न 5.
समान आवृत्ति की दो तरंगें जिनकी तीव्रताएँ I0 तथा 9I0 हैं, अध्यारोपित की जाती हैं। यदि किसी बिन्दु पर परिणामी तीव्रता 7I0 हो तो उस बिन्दु पर तरंगों के बीच न्यूनतम कलान्तंर ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 10 Wave Optics

प्रश्न 6.
यंग के प्रयोग में प्रीला प्रकाश तरंगदैर्घ्य 6000 Å, प्रयुक्त होने पर दृष्टि क्षेत्र में 60 फ्रिजें दिखाई देती हैं। यदि नीला प्रकाश जिसका तरंगदैर्घ्य 4500 Å है, प्रयोग में लाया जाये, तो कितनी फ्रिजें दिखाई देंगी ? (2012)
हल-
पीला प्रकाश (λ = 6000 Å) प्रयुक्त करने पर 60 फ्रिजें दिखाई पड़ती हैं; अतः
दृष्टि-क्षेत्र का विस्तार = फ्रिन्जों की संख्या x फ्रिन्ज की चौड़ाई
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प्रश्न 7.
यंग के प्रयोग में दो स्लिटों के बीच की दूरी 2 x 10-4 मीटर है। 6 x 10-7 मीटर तरंगदैर्घ्य के प्रकाश द्वारा व्यतिकरण फ्रिजें 80.0 सेमी दूर पर्दे पर बनती हैं। केन्द्रीय फ्रिन्जे से द्वितीय दीप्त फ्रिन्ज की दूरी ज्ञात कीजिए। (2013)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 10 Wave Optics SAQ 7

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प्रश्न 8.
यंग केद्वि-स्लिट प्रयोग में स्लिटों के बीच की दूरी 10-3 मीटर, स्लिटों तथा पर्दे के बीच की दूरी 3.0 मीटर तथा फ्रिज चौड़ाई 2.1 x 10-3 मीटर पायी गयी। प्रयोग में प्रयुक्त प्रकाश का तरंगदैर्घ्य ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 10 Wave Optics

प्रश्न 9.
दो झिर्रियों के बीच की दूरी 3 मिलीमीटर है। इस पर 6000 Å तरंगदैर्ध्य का प्रकाश लम्बवत् आपतित हो रहा है। 1 मीटर दूर पर्दे पर व्यतिकरण प्रारूप प्राप्त हो रहा है। फ्रिन्जों की चौडाई और केन्द्रीय फ्रिज से दूसरी अदीप्त फ्रिज की दूरी की गणना कीजिए।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 10 Wave Optics SAQ 9

प्रश्न 10.
यंग के द्विक रेखा छिद्र प्रयोग में 6600 Å तरंगदैर्ध्य का प्रकाश पर्दे पर व्यतिकरण प्रतिरूप प्राप्त करने के लिए प्रयुक्त है। फ्रिज की चौड़ाई 1.5 मिमी परिवर्तित हो जाती है जब पर्दा 50 सेमी द्विक रेखा छिद्र की ओर लाया जाता है। दोनों द्विक रेखा छिद्रों के बीच की दूरी ज्ञात कीजिए। (2016)
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 10 Wave Optics SAQ 10.1

प्रश्न 11.
यंग के प्रयोग में दो स्लिटों के बीच की दूरी 0.4 मिमी है। प्रयुक्त प्रकाश की तरंगदैर्घ्य 6000 Å है। व्यतिकरण प्रारूप 100 सेमी दूर रखे पर्दे पर देखा जाता है। केन्द्रीय फ्रिज से द्वितीय अदीप्त एवं तृतीय दीप्त फ्रिज की दूरी की गणना कीजिए। (2017)
हल-
यदि स्लिटों के बीच की दूरी d, प्रकाश की तरंगदैर्घ्य λ तथा पर्दे की स्लिटों से दूरी D हो, तो केन्द्रीय फ्रिन्ज से m वीं अदीप्ते फ्रिन्ज की दूरी
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 10 Wave Optics

प्रश्न 12.
यंग के द्वि-रेखाछिद्र प्रयोग में, स्लिटों के बीच की दूरी 0.2 मिमी और पर्दा 1.6 मी दूर है। यह देखा गया कि केन्द्रीय दीप्त फ्रिज और चौथी अदीप्त फ्रिज के बीच की दूरी 1.8 सेमी है। प्रयुक्त प्रकाश की तरंगदैर्ध्य की गणना कीजिए। (2017)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 10 Wave Optics SAQ 12

प्रश्न 13.
यंग के द्वि-झिरी प्रयोग में स्लिटों के बीच दूरी 0.4 मिमी है। प्रयुक्त प्रकाश की तरंगदैर्घ्य 6000 Å है। 2 मीटर दूर रखे पर्दे पर प्राप्त व्यतिकरण प्रतिरूप में केन्द्रीय फ्रिन्ज से पाँचवें अदीप्त फ्रिन्ज की दूरी तथा फ्रिन्ज की चौड़ाई ज्ञात कीजिए। (2017)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 10 Wave Optics
प्रश्न 14.
यंग के व्यतिकरण प्रयोग में 6000 Å तरंगदैर्घ्य के प्रकाश के लिए स्लिटों से एक मीटर की दूरी पर रखे पर्दे पर फ्रिन्ज की चौड़ाई 0.06 सेमी है। इसी स्थिति में यदि 5000 Å तरंगदैर्घ्य का प्रकाश प्रयोग में लाया जाये तो फ्रिन्जों की चौड़ाई कितनी होगी? (2014)
हल-
यदि स्लिटों के बीच अन्तराल d, स्लिटों से पर्दे की दूरी D तथा प्रकाश की तरंगदैर्घ्य λ हो तो फ्रिन्ज की चौड़ाई
W = [latex s=2]\frac { D\lambda }{ d }[/latex]
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 10 Wave Optics SAQ 14

प्रश्न 15.
किसी 1 x 10-5 मीटर चौड़ाई वाली झिरीं पर 6000 Å तरंगदैर्घ्य का प्रकाश लम्बवत् पड़ रहा है। विवर्तन प्रारूप के केन्द्रीय उच्चिष्ठ की कोणीय चौड़ाई की गणना कीजिए। (2012)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 10 Wave Optics

प्रश्न 16.
व्यतिकरण तथा विवर्तन में क्या अन्तर है? (2016, 17)
या
प्रकाश के व्यतिकरण तथा विवर्तन की घटनाओं में अन्तर के लिए किसी एक विशिष्टता का उल्लेख कीजिए। (2014)
उत्तर-
व्यतिकरण तथा विवर्तन में निम्न अन्तर हैं-
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प्रश्न 17.
किसी 2 x 10-5 मी चौड़ी स्लिट पर 5000 Å तरंगदैर्घ्य का प्रकाश अभिलम्बवत पड़ रही है। विवर्तन प्रारूप में प्रथम निम्निष्ठ, केन्द्रीय उच्चिष्ठ से कितनी कोणीय चौड़ाई पर स्थित होगा ? केन्द्रीय उच्चिष्ठ की कोणीय चौड़ाई भी ज्ञात कीजिए। (2010, 17)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 10 Wave Optics SAQ 17

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प्रश्न 18.
किसी 2 x 10-5 मीटर चौड़ी स्लिट (झिरी) पर 5000 Å तरंगदैर्घ्य का प्रकाश अभिलम्बवत गिर रहा है। विवर्तन प्रतिरूप में केन्द्रीय उच्चिष्ठ की कोणीय चौड़ाई ज्ञात कीजिए। (2015)
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प्रश्न 19.
कम्पन-तल तथा ध्रुवण-तल की परिभाषा दीजिए। (2011)
या
ध्रुवण-तल की परिभाषा लिखिए। (2014)
उत्तर-
कम्पन-तल (Plane of Vibration)- समतल-ध्रुवित प्रकाश में उस तल को जिसमें प्रकाश के चलने की दिशा तथा वैद्युत वेक्टर के कम्पन की दिशा दोनों स्थित हों, ‘कम्पन-तल’ कहते हैं।
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ध्रुवण-तल (Plane of Polarisation)- वह तल, जिसमें प्रकाश के चलने की दिशा स्थित हो तथा जो कम्पन-तल के अभिलम्बवत् हो ‘ध्रुवण-तल’ कहलाता है। इस तल में प्रकाश के कम्पन नहीं होते।

प्रश्न 20.
प्रकाश के ध्रुवण से आप क्या समझते हैं? समतल-धूवित प्रकाश उत्पन्न करने के लिए एक विधि का वर्णन कीजिए। (2009)
या
परावर्तन द्वारा आप समतल धुवित प्रकाश कैसे प्राप्त कर सकते हैं? (2012)
या
प्रकाश के ध्रुवण से आप क्या समझते हैं? (2014)
या
बूस्टर का नियम क्या है? किसी पारदर्शी माध्यम के लिए अपवर्तनांक एवं ध्रुवण कोण में सम्बन्ध लिखिए। (2016)
उत्तर-
प्रकाश का धुवण- प्रकाश की तरंगें अनुप्रस्थ तरंगें हैं जिनमें वैद्युत वेक्टर के कम्पन तरंग के संचरण की दिशा के लम्बवत् तल में सभी दिशाओं में होते हैं। टूरमैलीन क्रिस्टल में से गुजारने पर निर्गत् प्रकाश में वैद्युत वेक्टर के ये कम्पन संचरण की दिशा के लम्बवत् तल में केवल एक दिशा में रह जाते हैं, जबकि, शेष सभी कम्पन क्रिस्टल द्वारा अवशोषित कर लिये जाते हैं। क्रिस्टल से निर्गत् प्रकाश को ‘समतल-धुवित प्रकाश’ कहते हैं तथा यह घटना प्रकाश का धुवण’ कहलाती है।

परावर्तन द्वारा धूवित प्रकाश उत्पन्न करना- जब साधारण अथवा अध्रुवित प्रकाश किसी पारदर्शी माध्यम (जैसे–कॉच) के पृष्ठ से परावर्तित होता है तो वह आंशिक रूप से समतल ध्रुवित हो जाता है। परावर्तित प्रकाश में ध्रुवित प्रकाश की मात्रा, आपतन कोण पर निर्भर करती है। एक विशेष आपतन कोण in के लिए परावर्तित प्रकाश पूर्णतया समतल ध्रुवित होता है तथा इसके कम्पन आपतन तल के लम्बवत् होते हैं। इस आपतन कोण को ‘ध्रुवण-कोण’ (angle of polarization) कहते हैं। ध्रुवण-कोण पर परावर्तित एवं अपवर्तित किरणें परस्पर लम्बवत् होती हैं। परावर्तक माध्यम के अपवर्तनांक (n) और ध्रुवण-कोण (ip) में निम्नलिखित सम्बन्ध होता है-
n = tan ip
(यह सम्बन्ध बूस्टर का नियम कहलाता है।)
वायु-काँच के लिए कोण ip का मान 57° होता है।

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प्रश्न 21.
किसी पारदर्शी माध्यम का ध्रुवण-कोण 60° है। ज्ञात कीजिए
(i) माध्यम का अपवर्तनांक,
(ii) अपवर्तन कोण। [दिया गया है, tan 60° = √3] (2009, 17)
या
किसी पारदर्शी माध्यम के लिए ध्रुवण कोण 60° है। माध्यम के अपवर्तनांक की गणना कीजिए। (2015, 18)
हल-
(i) बूस्टर के नियम से अपवर्तनांक n = tan ip
n = tan 60° = √3 =1.782
(ii) ip + r = 90°
अतः अपवर्तन कोण r = 90° – ip
r = 90° – 60° = 30°

प्रश्न 22.
किसी माध्यम के लिए ध्रुवण-कोण 60° है। इसके लिए क्रान्तिक कोण कितना होगा?
या
एक पारदर्शी माध्यम का ध्रुवण कोण 60° है। माध्यम का अपवर्तनांक ज्ञात कीजिए। (tan 60° = √3) (2013)
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प्रश्न 23.
बूस्टर का नियम क्या है? दिखाइए कि जब प्रकाश, माध्यम पर ध्रुवण-कोण पर आपतित होता है, तो परावर्तित तथा अपवर्तित किरणें परस्पर लम्बवत होती हैं। (2009, 10, 11, 17)
या
ध्रुवण में बूस्टर के नियम का उल्लेख कीजिए। (2017)
या
ध्रुवण-कोण पर आपतित प्रकाश किरण की परावर्ती एवं अपवर्ती किरणों के मध्य कोण का मान ज्ञात कीजिए। (2012)
या
सिद्ध कीजिए कि ध्रुवण-कोण पर किसी किरण के आपतित होने पर परावर्तित एवं अपवर्तित किरणें परस्पर लम्बवत होती हैं। (2014, 17)
उत्तर-
बूस्टर का नियम-किसी पारदर्शी माध्यम के अपवर्तनांक (n) तथा ध्रुवण (ip) के बीच सम्बन्ध n = tan ip है। इसे बूस्टर का नियम कहते हैं।
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प्रश्न 24.
क्षितिज के ऊपर सूर्य का प्रकाश किस कोण पर आपतित हो जिससे शान्त जल के तल से परावर्तित प्रकाश पूर्णतः समतल ध्रुवित हो? (जल का अपवर्तनांक 1.327 तथा tan 53° = 1.327) (2014, 17)
हल-
माना सूर्य के क्षैतिज के ऊपर θ कोण पर होने पर जल के तल से परावर्तित प्रकाश पूर्णतः ध्रुवित है। इस स्थिति में, सूर्य से आपतित प्रकाश का जल के तल पर आपतन कोण MON = ध्रुवण कोण ip होगा। परावर्तित प्रकाश पूर्णत: समतल-ध्रुवित होने की दशा में,
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बूस्टर के नियम से, अपवर्तनांक n = tan ip,
अथवा 1.327 = tan ip = tan 53°
अतः आपतन कोण ip = 53°
क्षैतिज से कोण θ = 90° – 53° = 37°

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
तरंगाग्र किसे कहते हैं? हाइगेन्स के द्वितीयक तरंगिकाओं का सिद्धान्त लिखिए। (2009, 11, 12, 13, 18)
या
हाइगेन्स के तरंग संचरण सम्बन्धी सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए। (2009, 17)
या
तरंगाग्र किसे कहते हैं? (2014, 18)
या
हाइगेन्स के द्वितीयक तरंगिकाओं के सिद्धान्त की विवेचना कीजिए। (2016, 17, 18)
उत्तर-
तरंगाग्र (Wavefront)- किसी एक माध्यम में जिसमें कोई तरंग संचरित हो रही हो, यदि हम कोई ऐसा पृष्ठ (surface) खींचें जिसमें स्थित कण कम्पन की समान कला में हों, तो ऐसे पृष्ठ को ‘तरंगाग्र कहते हैं। समांग (isotropic) माध्यम में किसी तरंग का तरंगाग्र सदैव तरंग संचरण की दिशा के लम्बवत् होता है। अत: तरंगाग्र के लम्बवत् खींची गयी रेखा तरंग के चलने की दिशा को व्यक्त करती है। इसको ही किरण (ray) कहते हैं। तरंगाग्र विविध आकृतियों के होते हैं।

हाइगेन्स का द्वितीयक तरंगिकाओं का सिद्धान्त (Huygens Principle of Secondary Wavelets)
1. जब कोई कम्पन-स्रोत तरंगें उत्पन्न करता है, तो उसके चारों ओर माध्यम (ईथर) के कण कम्पन करने लगते हैं। माध्यम को वह पृष्ठ (surface) जिसमें स्थित सभी कण एक ही कला (phase) में कम्पन कर रहे होते हैं, “तरंगाग्र’ (wavefront) कहलाता है। समांग (homogeneous) माध्यम में किसी तरंग का तरंगाग्र, तरंग के संचरण की दिशा में लम्बवत् होता है। अत: तरंगाग्र के अभिलम्बवत् खींची गयी रेखा तरंग के संचरण की दिशा को व्यक्त करती है तथा इसे किरण (ray) कहते हैं।

2. माध्यम में जहाँ भी तरंगाग्र पहुँचता है वहाँ पर स्थित प्रत्येक कण एक नया तरंग स्रोत बन जाता है। जिसमें नयी तरंगें सभी दिशाओं में निकलती हैं। इन तरंगों को द्वितीयक तरंगिकाएँ (secondary wavelets) कहते हैं। द्वितीयक तरंगिकाएँ प्राथमिक तरंग की चाल से ही आगे बढ़ती हैं।

3. किसी क्षण सभी द्वितीयक तरंगिकाओं को स्पर्श करता हुआ खींचा गया पृष्ठ अर्थात् ‘एन्वलोप’ (envelope) उस क्षण तरंगाग्र की नवीन स्थिति को प्रदर्शित करता है। इस प्रकार तरंग आगे बढ़ती चली जाती है।
चित्र 10.5 (a) में S एक बिन्दु स्रोत है जिससे तरंगें निकल रही हैं। माना कि तरंगों की चाल v है। माना कि किसी क्षण तरंगाग्र की स्थिति AB है।
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AB पर स्थित प्रत्येक बिन्दु से द्वितीयक गोलीय तरंग प्राथमिक तरंग की चाल से चारों ओर फैल रही है। माना कि हमें । समय उपरान्त तरंगाग्र की स्थिति ज्ञात करनी है। इतने समय में प्रत्येक द्वितीयक तरंगिका ut दूरी तय करेगी। अत: हम AB पर स्थित बिन्दुओं; जैसे 1, 2, 3, 4, 5,…… पर vt त्रिज्या के गोले खींचते हैं। इन गोलों को स्पर्श करता हुआ खींचा गया पृष्ठ A1B1 ‘एन्वलोप है। यही तरंगाग्र की नवीन स्थिति है। गोलों का एन्वलोप A2B2 पीछे की दिशा में भी है, परन्तु हाइगेन्स का सिद्धान्त पीछे की दिशा में स्थित ‘एन्वलोप’ को स्वीकार नहीं करता। ठीक इसी प्रकार चित्र 10.5 (b) में समतले तरंगाग्र का बढ़ना समझाया गया है।

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प्रश्न 2.
हाइगेन्स के द्वितीयक तरंगिकाओं के सिद्धान्त की सहायता से तरंगों के अपवर्तन की व्याख्या कीजिए तथा स्नैल के नियम का निगमन कीजिए। (2011)
या
हाइगेन्स तरंग सिद्धान्त के आधार पर प्रकाश तरंगों के अपवर्तन की व्याख्या कीजिए। (2013, 18)
या
हाइगेन्स के द्वितीयक तरंगिकाओं के सिद्धान्त के आधार पर प्रकाश तरंगों के अपवर्तन के नियम की व्याख्या कीजिए। (2014, 18)
उत्तर-
जब कोई तरंग एक समांग माध्यम में चलकर किसी दूसरे समांग माध्यम में प्रवेश करती है तो वह अपने मार्ग से विचलित हो जाती है। इस घटना को अपवर्तन कहते हैं। इसमें तरंग की आवृत्ति नहीं बदलती परन्तु तरंग की चाल एवं तरंगदैर्घ्य बदल जाती हैं।

चित्र 10.6 में ZZ’ समतल पृष्ठ है जो दो माध्यमों को अलग करता है। माना इन माध्यमों में किसी तरंग की चालें क्रमशः v1 व v2 हैं। माना पहले माध्यम में एक समतल तरंगाग्र AB तिरछा आपतित होता है। और पहले माध्यम में पृष्ठ ZZ’ के बिन्दु A को t = 0 समय पर स्पर्श करता है तथा तरंगाग्र के बिन्दु B को A’ तक पहुँचने में है समय लगता है, तब BA’ = v1t
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तरंगाग्र AB के आगे बढ़ने पर वह सीमा पृष्ठ के A व A’ के बीच के बिन्दुओं से टकराता है। इन बिन्दुओं से हाइगेन्स की गोलीय तरंगिकाएँ निकलने लगती हैं जो पहले माध्यम में v1 चाल से और दूसरे माध्यम में v2 चाल से चलने लगती हैं। सर्वप्रथम A से चलने वाली द्वितीयक तरंगिका । समय में दूसरे माध्यम में AB’ (= v2t) दूरी तय करती है और इतने ही समय में बिन्दु B, पहले माध्यम में BA’ (= v1t) दूरी चलकर A’ पर पहुँच जाता है जहाँ से अब द्वितीयक तरंगिका चलना प्रारम्भ करती है। इस प्रकार
AB’ = v2t , BA’ = v1t

बिन्दु A को केन्द्र मानकर AB’ त्रिज्या का एक चाप खींचते हैं तथा A’ से इस चाप पर स्पर्श रेखा A B’ खींचते हैं। जैसे-जैसे आपतित तरंगाग्रे AB आगे बढ़ता जाता है, A व A’ के बीच सभी बिन्दुओं से एक के बाद एक चलने वाली द्वितीयक तरंगिकाएँ एक साथ A’B’ को स्पर्श करेंगी; अर्थात् A’B’ सभी द्वितीयक तरंगिकाएँ को स्पर्श करेगा। अत: A’B’ ‘अपवर्तित’ तरंगाग्र होगा। माना कि आपतित तरंगाग्र AB तथा अपवर्तित तरंगाग्र A’B’ अपवर्तक तल ZZ’ के साथ क्रमश: कोण तथा r बनाते हैं। अब समकोण त्रिभुज ABA’ में
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यही अपवर्तन का प्रथम नियम है। इसको ही स्नैल का नियम कहते हैं। चित्र 10.6 से स्पष्ट है कि आपतित किरण, अपवर्तित किरण तथा आपतन बिन्दु पर अभिलम्ब एक ही तल में हैं (यही अपवर्तन का दूसरा नियम है।)

स्नैल के नियम में प्रयुक्त नियतांक को दूसरे माध्यम का (पहले माध्यम के सापेक्ष) अपवर्तनांक कहते हैं तथा इसे ‘[latex s=2]{ _{ 1 }{ n }_{ 2 } }[/latex]’ से प्रदर्शित करते हैं।
अतः
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प्रश्न 3.
हाइगेन्स के द्वितीयक तरंगिकाओं के सिद्धान्त के आधार पर परावर्तन के नियमों की व्याख्या कीजिए। (2012, 14)
या
हाइगेन्स के द्वितीयक तरंगिकाओं के सिद्धान्त के आधार पर प्रकाश के परावर्तन की व्याख्या कीजिए। (2017)
उत्तर-
हाइगेन्स के द्वितीयक तरंगिकाओं के सिद्धान्त के आधार पर प्रकाश के परावर्तन के नियमों की व्याख्या- चित्र 10.7 में ZZ’ एक परावर्तक पृष्ठ है। जिस पर ABएक समतल तरंगाग्र कोण i के झुकाव पर आपतित है। माना कि है = 0समय पर तरंगाग्र, पृष्ठ ZZ’ को बिन्दु A पर स्पर्श करता है। माना कि तरंगाग्र की चाल v है तथा तरंगाग्र, के बिन्दु B को पृष्ठ के बिन्दु A तक पहुँचने में है समय लगता है। जैसे-जैसे तरंगाग्र AB आगे बढ़ता है, वह परावर्तक पृष्ठ के A व A’ के बीच के बिन्दुओं से टकराता जाता है। हाइगेन्स के सिद्धान्त के अनुसार, A व A’ के बीच स्थित ये सभी बिन्दु नये तरंग स्रोतों का कार्य करते हैं। इनमें नई गोलीय तरंगिकाएँ सभी दिशाओं में निकलती हैं जो चाल के माध्यम से फैलती हैं। सबसे पहले बिन्दु A से द्वितीयक तरंगिका चलती है जो t समय में AB’ (= vt) दूरी तय करती है। परन्तु इसी समय में तरंगाग्र का बिन्दु B, दूरी BA’ चलकर A’ को स्पर्श कर लेता है, यहाँ से भी अब द्वितीयक तरंगिका चलनी शुरू हो जाती है। उपर्युक्त से स्पष्ट है कि
AB’ = BA’ = vt ……(1)
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बिन्दु A को केन्द्र मानते हुए AB’ त्रिज्या का एक गोलीय चाप खींचते हैं तथा A’ से इस चाप पर स्पर्श रेखा (tangent) A’B’ खींच लेते हैं। जैसे-जैसे आपतित तरंगाग्र AB आगे बढ़ता है, परावर्तक पृष्ठ के A व A’ के बीच स्थित सभी बिन्दुओं से एक के बाद एक चलने वाली द्वितीयक तरंगिकाएँ भी एक साथ A’B’ को स्पर्श करेंगी, अथवा A’B’ सभी द्वितीयक तरंगिकाओं को स्पर्श करती है। हाइगेन्स के अनुसार यह A’B’ ही परावर्तित तरंगाग्र है। माना कि यह पृष्ठ ZZ’ से r कोण के झुकाव पर है। अब समकोण त्रिभुज ABA’ तथा A’B’A में भुजा AA’ उभयनिष्ठ है तथा BA = AB’; अत: दोनों त्रिभुज सर्वांगसम (congruent) हैं, इसलिए कोण BAA’ = कोण B’A’ A.

स्पष्ट है कि आपतित तरंगाग्र AB तथा परावर्तित तरंगाग्र A’ B’ परावर्तक पृष्ठ ZZ’ से बराबर कोण बनाते हैं। चूँकि तरंगाग्र के अभिलम्बवत् खींची गई रेखा किरण होती है, अतः आपतित तथा परावर्तित किरणे पृष्ठ ZZ’ खींचे गये अभिलम्ब से भी बराबर कोण बनाती हैं। अतः
आपतन कोण i = परावर्तन कोण r (यह परावर्तन का दूसरा नियम है।)
चूँकि AB, A’B’ व ZZ’ कागज के तेल में हैं। इन पर खींचे गये अभिलम्ब भी एक तल में होंगे। इस प्रकार आपतित किरण, परावर्तित किरण तथा आपतन बिन्दु पर अभिलम्ब तीनों एक ही तल में है। यही परावर्तन का प्रथम नियम है।

प्रश्न 4.
यंग के व्यतिकरण प्रयोग में दो समान्तर स्लिटों के बीच की दूरी d तथा उनसे पर्दे की दूरी D है। यदि प्रकाश की तरंगदैर्घ्य λ हो, तो पर्दे पर केन्द्रीय फ्रिज से किसी
(i) दीप्त फ्रिज,
(ii) अदीप्त फ्रिन्ज की दूरी के लिए व्यंजक स्थापित कीजिए।
या
यंग के व्यतिकरण प्रयोग में दो समान्तर स्लिटों के बीच की दूरीd तथा उनसे पर्दे की दूरी D है। यदि प्रकाश की तरंगदैर्घ्य λ हो तो पर्दे पर केन्द्रीय फ्रिन्ज से किसी दीप्त फ्रिज की दूरी के लिए व्यंजक स्थापित कीजिए। इससे फ्रिन्ज की चौड़ाई के लिए सूत्र W = [latex s=2]\frac { D\lambda }{ d }[/latex] ज्ञात कीजिए। (2014)
या
द्वि-झिरी प्रयोग में बनी दीप्त फ्रिन्जों की चौड़ाई के लिए व्यंजक का निगमन कीजिए। (2013)
या
यंग के द्विक स्लिट प्रयोग में दीप्त अथवा अदीप्त फ्रिन्जों की चौड़ाई w के लिए सूत्र W = [latex s=2]\frac { D\lambda }{ d }[/latex] व्युत्पादित कीजिए। प्रयुक्त संकेतों के सामान्य अर्थ हैं। (2013)
या
यंग के दो स्लिटों के प्रयोग में दीप्त फ्रिन्ज की चौड़ाई के लिए व्यंजक W = [latex s=2]\frac { D\lambda }{ d }[/latex] प्राप्त कीजिए, जहाँ प्रयुक्त संकेतों के अर्थ सामान्य हैं। (2009)
या
प्रकाश के व्यतिकरण के लिए यंग के प्रयोग का विवरण दीजिए। फ्रिन्जों की चौड़ाई के लिए सूत्र प्राप्त कीजिए। (2012, 14, 17)
या
दो पतली समान्तर झिरीं, जो एक-दूसरे से d दूरी पर स्थित हैं, λ तरंगदैर्घ्य के प्रकाश से प्रकाशित की जाती हैं तथा झिर्रियों से D दूरी पर स्थित पर्दे पर फ्रिन्ज बनाती हैं। फ्रिन्जों की चौड़ाई के लिए व्यंजक प्राप्त कीजिए। (2015)
या
व्यतिक्रण की शर्तों का उल्लेख कीजिए। यंग के द्वि-झिरीं प्रयोग बनाने वाली फ्रिन्जों की चौड़ाई के लिए W = [latex s=2]\frac { D\lambda }{ d }[/latex] का निगमन कीजिए। जहाँ प्रयुक्त संकेतों का अर्थ सामान्य है। (2016)
या
यंग के द्वि-स्लिट प्रयोग में प्राप्त व्यतिकरण फ्रिन्जों की चौड़ाई हेतु व्यंजक प्राप्त कीजिए। (2017)
उत्तर-
व्यतिकरण के लिए आवश्यक शर्त- लघु उत्तरीय प्रश्न 2 को उत्तर देखें।
फ्रिन्जों की चौड़ाई के लिए सूत्र-चित्र 10.8 में, S एक रेखा-छिद्र है जिसे एकवर्णी प्रकाश से प्रकाशित किया जाता है। इस रेखा-छिद्र से आगे दो रेखा-छिद्र S1 व S2 हैं जो एक-दूसरे के बहुत समीप हैं, S के संमान्तर हैं तथा उससे समान दूरी पर स्थित हैं। S से चलने वाली द्वितीयक तरंगिकाएँ S1 व S2 पर समान कला में पहुँचती हैं। S1 व S2 भी द्वितीयक तरंगिकाओं के स्रोत बन जाते हैं। इससे निकली तरंगें एक-दूसरे के साथ अध्यारोपण के पश्चात् D दूरी पर स्थित पर्दे पर व्यतिकरण फ्रिजें बनाती हैं। इन फ्रिन्जों की चौड़ाई नापकर प्रकाश की तरंगदैर्ध्य की भी गणना की जा सकती है।
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 10 Wave Optics LAQ 4.3

प्रश्न 5.
यंगके द्विक रेखाछिद्र (द्विझिरीं) के प्रयोग में 1.5 अपवर्तनांक वाली काँच की एक पतली प्लेट किसी एक स्लिट (झिरी) से आने वाली प्रकाश किरण के मार्ग में रख दी जाती है। केन्द्रीय दीप्त फ्रिन्ज हटकर चौथी दीप्त फ्रिन्ज की स्थिति में पहुँच जाती है। यदि प्रयुक्त प्रकाश की तरंगदैर्ध्य 6000 Å हो, तो प्लेट की मोटाई ज्ञात कीजिए। (2013)
हल-
माना केन्द्रीय फ्रिन्ज की चौड़ाई = W
स्लिटों के बीच की दूरी = d
तथा स्लिटों से पर्दे की दूरी = D
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प्रश्न 6.
यंग के द्वि-स्लिट प्रयोग में दो तरंगदैर्यों 6500 Å तथा 5200 Å के प्रकाश पुंज का उपयोग करके व्यतिकरण फ्रिजें प्राप्त की जाती हैं।
(i) तरंगदैर्घ्य 5200 A के लिए पर्दे पर केन्द्रीय फ्रिन्ज (उच्चिष्ठ) से द्वितीय अदीप्त फ्रिज की दूरी ज्ञात कीजिए।
(ii) केन्द्रीय उच्चिष्ठ से वह न्यूनतम दूरी क्या है, जहाँ पर दोनों तरंगदैर्घ्य से उत्पन्न दीप्त फ्रिजें सम्पाती हों? स्लिटों के बीच की दूरी 2 मिमी तथा स्लिटों व पर्दे के बीच की दूरी 120 सेमी हैं। (2016)
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प्रश्न 7.
कलमसम्बद्ध स्रोत से क्या तात्पर्य है? व्यतिकरण की शर्तों का उल्लेख कीजिए। प्रकाश के व्यतिकरण सम्बन्धी प्रयोग में दो स्लिटों के बीच अन्तराल 0.2 मिमी है। इनसे निर्गत प्रकाश के व्यतिकरण से 1 मीटर दूर पर्दे पर बनी व्यतिकरण फ्रिन्ज की चौड़ाई 3 मिमी है। स्लिटों पर आपतित प्रकाश के तरंगदैर्घ्य एवं केन्द्रीय दीप्त फ्रिन्ज से तृतीय अदीप्त फ्रिज की दूरी ज्ञात कीजिए। (2016)
हल-
ऐसे दो स्रोतों को जिनके बीच कलान्तर सदैव नियत रहता है, कलासम्बद्ध स्रोत (coherent source) कहते हैं। दो कलासम्बद्ध स्रोतों से हम स्थायी (sustained) व्यतिकरण प्रतिरूप प्राप्त कर सकते हैं। ऐसे स्रोत किसी युक्ति द्वारा एक ही स्रोत से प्राप्त किये जाते हैं।
प्रकाश के व्यतिकरण के लिए आवश्यक शर्ते- लघु उत्तरीय प्रश्न 2 का उत्तर देखें। दिया है, d = 0.2 मिमी = 2 x 10-4 मी, D = 1 मी,
W = 3 मिमी = 3 x 10-3 मी
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प्रश्न 8.
प्रकाश के विवर्तन से आप क्या समझते हैं? एक पतली झिरी से प्रकाश के विवर्तन के कारण प्राप्त विवर्तन प्रारूप की व्याख्या कीजिए। (2010, 11, 16, 17)
या
एक पतली झिरी से होने वाले प्रकाश के विवर्तन की विवेचना विवर्तन प्रतिमान खींचकर कीजिए। (2011)
या
किसी पतली झिरी द्वारा एकवर्णी प्रकाश के विवर्तन की विवेचना कीजिए तथा केन्द्रीय उच्चिष्ठ की कोणीय चौड़ाई ज्ञात कीजिए। (2012, 13, 16, 17)
उत्तर-
प्रकाश का विवर्तन- जब प्रकाश किसी अवरोध (obstacle) या द्वारक (aperture) पर जिसका आकार प्रकाश के तरंगदैर्घ्य के क्रम का हो, आपतित होता है तो अवरोध या द्वारक के किनारों पर प्रकाश ऋजुरेखीय संचरण से विचलित होकर मुड़ जाता है। जिस स्थान पर ज्यामितीय छाया बननी चाहिए। थी वहाँ भी कुछ प्रकाश पहुँच जाता है। अवरोध या द्वारक के किनारों पर प्रकाश का यह मुड़ना प्रकाश का विवर्तन कहलाता है। प्रकाश का विवर्तन

निम्नलिखित दो घटनाओं से प्रदर्शित होता है-
(i) ज्यामितीय छाया में प्रकाश का पहुँचना।
(ii) एकसमान प्रदीप्त क्षेत्र में फ्रिन्जों का बनना।

एक पतली झिर्रा से प्रकाश का विवर्तन-  चित्र 10.10 में S एक बिन्दुवत् एकवर्णी (monochromatic) प्रकाश-स्रोत है। यह लेन्स L के प्रथम फोकस पर रखा है। अत: S, से चली प्रकाश किरणेंलेन्स L से अपवर्तन के पश्चात् एक समान्तर किरण-पुंज के रूप में निकलेंगी। समानान्तर किरणों का यह किरण-पुंज एक समतल तरंगाग्र (wavefront) ww’ का निर्माण करता है। इस लेन्स L के सामने एक लम्बी संकीर्ण स्लिट AB रखी है जिस पर यह समतल तरंगाग्र लम्बवत् आपतित होता है। स्लिट की चौड़ाई से है। जैसे ही यह तरंगाग्र स्लिट पर आपतित होती है तो हाइगेन्स के तरंग संचरण सम्बन्धी द्वितीयक तरंगिकाओं के सिद्धान्तानुसार, तरंगाग्र का प्रत्येक बिन्दु नये तरंग उत्पादक स्रोत का कार्य करता है तथा इनसे द्वितीयक तरंगिकाएँ निकलने लगती हैं। इन विवर्तित किरणों को लेन्स L2 द्वारा पर्दे YY’ पर फोकस कर लिया जाता है। स्लिट से एक नियत कोण पर विवर्तित सभी किरणें पर्दे के एक बिन्दु पर फोकस होती हैं। इस प्रकार पर्दे पर विवर्तन प्रारूप (diffraction pattern) प्राप्त हो जाता है।

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व्याख्या (Explanation)- जो तरंगिकाएँ θ = शून्य कोण पर विवर्तित होकर पर्दे के केन्द्रीय बिन्दु P, पर अध्यारोपित होती हैं वे सभी समान कला में होती हैं; अर्थात् उनके बीच कलान्तर शून्य होता है। इसलिए Py पर एक दीप्त फ्रिन्ज (बैण्ड) प्राप्त होता है। यह एक दीप्त चौड़ी पट्टी होती है। एक केन्द्रीय बैण्ड के दोनों ओर घटती हुई तीव्रता के अदीप्त व दीप्त बैण्ड एकान्तर क्रम में प्राप्त होते हैं। इस प्रकार पर्दे पर प्राप्त दीप्त व अदीप्त बैण्डों का यह प्रारूप विवर्तन प्रारूप कहलाता है। रेखा-छिद्र (slit) जितना कम चौड़ाई का होता है, उसका विवर्तन प्रारूप उतना ही अधिक फैला होता है तथा केन्द्रीय बैण्ड (पट्टी) उतना ही अधिक चौड़ा होता है।
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विवर्तन प्रारूप में PO पर बना दीप्त बैण्ड केन्द्रीय उच्चिष्ठ अथवा मुख्य उच्चिष्ठ (principal maxima) कहलाता है तथा इसके दोनों ओर घटती तीव्रता के दीप्तं बैण्ड गौण

गौण उच्चिष्ठ उच्चिष्ठ (secondary maxima) कहलाते हैं। दो क्रमागत दीप्त बैण्डों के बीच स्थित अदीप्त बैण्ड निम्निष्ठ (minima) कहलाते हैं। जो द्वितीयक तरंगिकाएँ रेखा-छिद्र AB पर है। कोण से विवर्तित होती हैं वे पर्दे YY’ पर केन्द्रीय बिन्दु PO से ऊपर बिन्दु P पर फोकस होती हैं। ये तरंगिकाएँ रेखा-छिद्र AB के विभिन्न भागों से एक ही कला में चलती हैं, परन्तु P पर भिन्न-भिन्न कलाओं में (पथान्तर के अनुसार) पहुँचकर परस्पर अध्यारोपित होती हैं। चित्र 10.10 में BG पर AG लम्ब डाला गया है। तल AG से पर्दे पर बिन्दु P एक प्रकाशीय पथ बराबर है। अतः रेखा-छिद्र के बिन्दु A तथा B से चलने वाली द्वितीयक तरंगिकाओं के बीच पथान्तर BG है। माना पथान्तर BG = λ जंहाँ λ प्रयुक्त प्रकाश की तरंगदैर्घ्य है। माना AB की चौड़ाई को n बराबर भागों में विभाजित कर लिया जाता है। प्रत्येक अर्द्ध-भाग के संगत बिन्दुओं से चलने वाली । तरंगिकाओं के बीच पथान्तर λ/2 होगा; अत: वे P पर अदीप्त बैण्ड उत्पन्न करेंगी। यह प्रथम निम्निष्ठ होगा जिसके लिए BG = λ.

परन्तु चित्र 10.10 से, BG = AB sin θ = e sin θ (जहाँ AB = e)
अत: P पर प्रथम निम्निष्ठ की स्थिति के लिए सूत्र e sin θ = λ.
अतः सभी निम्निष्ठों की स्थिति के लिए सामान्य सूत्र निम्नलिखित होगा-
e sin θ = ± mλ. (जहाँ m = 1, 2, 3…) …(1)
जबकि m = 0 मुख्य उच्चिष्ठ की स्थिति के संगत है।
यहाँ ± चिह्नों का अर्थ है कि निम्निष्ठ P पर बनने वाले मुख्य उच्चिष्ठ के दोनों ओर बनते हैं।
दो क्रमागत निम्निष्ठों के बीच भी कुछ प्रकाश पहुँच जाता है जहाँ कम चमकीले उँच्चिष्ठ प्राप्त होते हैं। इनको गौण उच्चिष्ठ (secondary maxima) कहते हैं। इनकी तीव्रता मुख्य उच्चिष्ठ के दोनों ओर चित्र 10.11 की भाँति तेजी से गिरती जाती है।
θ बहुत छोटा होने पर sin θ = θ …(2)
अतः उपर्युक्त समी० (1) से।
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चित्र 10.11 में प्रदर्शित वक्र एकल पतले रेखा-छिद्र द्वारा प्राप्त विवर्तन प्रारूप का तीव्रता वितरण वक्र है। इसमें आपतित प्रकाश की तीव्रता का अधिकतम भाग केन्द्रीय उच्चिष्ठ में केन्द्रित होता है और शेष तीव्रता द्वितीयक उच्चिष्ठों में तेजी से घटते क्रम में पायी जाती है। उदाहरण के लिए, यदि केन्द्रीय उच्चिष्ठ की तीव्रता I0 है तो द्वितीयक उच्चिष्ठों की तीव्रताएँ क्रमशः I0/22, I0/61,…… इत्यादि होती हैं।
केन्द्रीय उच्चिष्ठ की चौड़ाई के लिए व्यंजक
केन्द्रीय उच्चिष्ठ के दोनों ओर प्रथम निम्निष्ठों के बीच की कोणीय दूरी केन्द्रीय उच्चिष्ठ की चौड़ाई कहलाती है।
अतः केन्द्रीय उच्चिष्ठ की कोणीय चौड़ाई = θ + θ = 2θ = 2(λ/e)
यदि लेन्स L2 की फोकस दूरी f हो जो रेखा-छिद्र AB के काफी समीप रखा हो, तो इससे दूरस्थ पर्दे पर केन्द्रीय उच्चिष्ठ की रैखिक चौड़ाई निम्न प्रकार ज्ञात की जाती है-
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प्रश्न 9.
ध्रुवित तथा अधुवित प्रकाश में अन्तर समझाइए। (2012, 15)
उत्तर-
धुवित तथा अधुवित प्रकाश में अन्तर- साधारण प्रकाश में वैद्युत वेक्टर के कम्पन तरंग संचरण की दिशा के लम्बवत् सभी दिशाओं में होते हैं, अर्थात् ये तरंग संचरण की दिशा के परितः सममित होते हैं, अत: साधारण प्रकाश को अधुवित प्रकाश (unpolarised light) कहा जाता है। यदि किसी युक्ति द्वारा साधारण प्रकाश के वैद्युत वेक्टरों के कम्पन, तरंग संचरण की दिशा के लम्बवत् तल में केवल एक दिशा में सीमित कर दिये जायें, अर्थात् इन कम्पनों को तरंग संचरण की दिशा के परितः असममित कर दिया जाये तो इस प्रकार प्राप्त प्रकाश धुवित प्रकाश (polarised light) कहलाता है। इसी को समतल ध्रुवित प्रकाश भी कहते हैं। प्रकाश सम्बन्धी यह घटेंना प्रकाश का धुवण (polarisation of light) कहलाती है।

अधूवित प्रकाश में प्रकाश के संचरण की दिशा के लम्बवत् तल में कम्पन की सभी दिशाएँ सम्भव हैं, अतः अध्रुवित प्रकाश को एक तारे द्वारा प्रदर्शित किया जाता है [चित्र 10.12 (a)]।
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प्रकाश के समतल-ध्रुवित पूँज में कम्पन एक सीधी रेखा के अनुदिश होते हैं। जब कम्पन कागज के तल के समान्तर होते हैं, तो वे तीर युक्त रेखाओं द्वारा निरूपित किये जाते हैं [चित्र 10.12 (b)]। जब कम्पन कागज के तल के लम्बवत् एक सीधी रेखा के अनुदिश होते हैं, तो वे बिन्दुओं द्वारा निरूपित किये जाते हैं [चित्र 10.12 (c)]

प्रश्न 10.
पोलेराइड किसे कहते हैं? इसकी सहायता से कैसे पता लगायेंगे कि दिया गया प्रकाश अधुवित है, आंशिक रूप से धुवित है या पूर्णतः ध्रुवित है? (2015)
या
पोलेराइड से किसी प्रकाश किरण के धुवित होने की जाँच आप कैसे करेंगे?
या
पोलेराइड द्वारा समतल ध्रुवित प्रकाश के उत्पन्न करने तथा विश्लेषण करने की विधि का वर्णन कीजिए। (2010, 11)
या
समतल ध्रुवित प्रकाश के उत्पादन तथा संसूचन की किसी विधि का सचित्र वर्णन कीजिए। (2011)
या
पोलेराइड क्या है? इसकी कार्यविधि का वर्णन कीजिए। इसकी सहायता से अधुवित तथा समतल ध्रुवित प्रकाश में किस प्रकार अन्तर कर सकते हैं? (2013)
या
समतल ध्रुवित प्रकाश उत्पन्न करने हेतु किसी एक विधि का वर्णन कीजिए। (2015)
उत्तर-
पोलेराइड एक बड़े आकार की फिल्म होती है जिसे दो काँच की प्लेटों के बीच रखा जाता है। इस फिल्म को बनाने के लिए कार्बनिक यौगिक हरपेथाइट या आयोडो सल्फेट ऑफ क्यूनाइन के अतिसूक्ष्म क्रिस्टल, नाइट्रो-सेलुलोस की पतली चादर पर विशेष विधि द्वारा इस प्रकार फैला दिये जाते हैं कि सभी क्रिस्टलों की प्रकाशिक असें समान्तर रहें। ये क्रिस्टल द्विवर्णक होते हैं।

कार्यविधि- अधूवित प्रकाश में वैद्युत वेक्टर सभी दिशाओं में होते हैं। जब कोई प्रकाश किरण पोलेराइड फिल्म पर आपतित होती है, तो यह दो समतल ध्रुवित किरणों में विभक्त हो जाती है। एक किरण में वैद्युत वेक्टर हरपेथाइट क्रिस्टल की अक्ष के समान्तर तथा दूसरे में अक्ष के लम्बवत् होते हैं। इनमें से हरपेथाइट की अक्ष के लम्बवत् वैद्युत वेक्टर वाली किरण पूर्णतया अवशोषित हो जाती है। इस प्रकार निर्गत प्रकाश पूर्णतया ध्रुवित होता है। पोलेराइड से निर्गत प्रकाश समतल ध्रुवित होता है, इसकी जाँच एक-दूसरे पोलेराइड द्वारा संचरित हो जाता है [चित्र 10.13 (a)]। जब द्वितीय पोलेराइड को 90° से घुमाकर उसको क्रॉस स्थिति में लाते हैं, तो उनमें से प्रकाश संचरित नहीं होता [चित्र 10.13 (b)]। इस स्थिति में दोनों पोलेराइड की ध्रुवण दिशाएँ परस्पर लम्बवत् होती हैं। इस दशा में पोलेराइड क्रॉसित पोलेराइड हैं। उपर्युक्त प्रक्रिया में पहला (analyser) कहलाता है।
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धूवित प्रकाश प्राप्त करना- जब ध्रुवित प्रकाश का एक किरण-पुंज पोलेराइड फिल्म में से गुजरता है, तो फिल्म केवल उन घटकों को पार होने देती है जिनके वैद्युत-वेक्टर पोलेराइड की ध्रुवण दिशा के समांन्तर कम्पन करते हैं। इस प्रकार पारगमित प्रकाश समतल-ध्रुवित प्रकाश होता है।
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समतल-धुवित प्रकाश का संसूचन- पोलेराइड की सहायता से अधुवित, आंशिक रूप से ध्रुवित अथवा, पूर्णतया ध्रुवित प्रकाश का पता लगाया जाता है। किसी पोलेराइड को आपतित प्रकाश के परितः पूरा एक चक्कर घुमाने से यदि निर्गत प्रकाश की तीव्रता में कोई अन्तर नहीं पड़ता तो आपतित प्रकाश अधूवित है, निर्गत प्रकाश की तीव्रता में परिवर्तन तो होता है, परन्तु किसी भी स्थिति में तीव्रता शून्य नहीं होती तो आपतित प्रकाश आंशिक रूप से ध्रुवित है, यदि निर्गत प्रकाश की तीव्रता में परिवर्तन होता है। तथा पोलेराइड के एक चक्कर में दो बार तीव्रता अधिकतम तथा दो बार शून्य हो जाती है तो आपतित प्रकाश पूर्णत: समतल-ध्रुवित है।

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CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8

These Sample papers are part of CBSE Sample Papers for Class 10 Maths. Here we have given CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8.

CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8

Board CBSE
Class X
Subject Maths
Sample Paper Set Paper 8
Category CBSE Sample Papers

Students who are going to appear for CBSE Class 10 Examinations are advised to practice the CBSE sample papers given here which is designed as per the latest Syllabus and marking scheme as prescribed by the CBSE is given here. Paper 8 of Solved CBSE Sample Paper for Class 10 Maths is given below with free pdf download solutions.

Time allowed: 3 Hours
Maximum Marks: 80

General Instructions

 

  • All questions are compulsory.
  • The question paper consists of 30 questions divided into four sections A, B, C andD.
  • Section A contains 6 questions of 1 mark each. Section B contains 6 questions of 2 marks each. Section C contains 10 questions of 3 marks each. Section D contains 8 questions of 4 marks each,
  • There is no overall choice. However, an internal choice has been provided in four questions of 3 marks each and three questions of 4 marks each. You have to attempt only one of the alternatives in all such questions.
  • Use of calculators is not permitted.

Section-A

Question 1.
Find the smallest positive rational number by which [latex s=2]\frac { 1 }{ 7 } [/latex] should be multiplied so that its decimal expansion terminates after 2 places of decimal.

Question 2.
If the vertices ofa triangle are (1,2), (4, -6) and(3, 5) then, findthearea oftriangle (NTSE2014,2015)

Question 3.
If [latex s=2]\left( \tan { \theta } +\frac { 1 }{ \tan { \theta } } \right) [/latex] = 2, then find the value of [latex s=2]\tan ^{ 2 }{ \theta } +\frac { 1 }{ \tan ^{ 2 }{ \theta } } [/latex](NTSE 2015)

Question 4.
Evaluate: [latex]\sqrt { 6+\sqrt { 6 } +\sqrt { 6+ } } [/latex]…..

Question 5.
What is the common difference of an A. P. in which a21 -a7 = 84 ?

Question 6.
The areas of two similar triangles are 121 cm2 and 64 cm2 respectively. If the median of the first triangle is
12.1 cm, find the corresponding median of the other.

Section-B

Question 7.
Two bills of ₹ 6075 and ₹ 8505 respectively are to be paid separately by cheques of same amount. Find
the largest possible amount of each cheque.

Question 8.
Find the value of70 + 68 + 66 +……..+ 40.

Question 9.
Find the chance that a non-leap year contains 53 Saturdays.

Question 10.
Ajar contains 54 marbles each of which is blue, green or white. The probability of selecting a blue
marble and a green marble at random from the jar is [latex s=2]\frac { 1 }{ 3 } [/latex] and [latex s=2]\frac { 4 }{ 9 } [/latex] respectively. How many white marbles does the jar contain?

Question 11.
If the lines given by 3x + 2ky = 2 and 2x+5y= 1 are parallel, then find the value of k

Question 12.
Find ‘k’ so that the points (7, -2), (5,1) and (3, k) are collinear.

Section-C

Question 13.
If a2 – b2 is a prime number, show that a2 – b2 = a + b, where a, b are natural number.

Question 14.
If the polynomial 6x4 + 8x3 + 17x2 + 21x + 7 is divided by another polynomial 3x2 + 4x+ 1, the remainder comes out to be (ax + b ), find the values of a and b.

Question 15.
If tan θ + sin θ = m and tan θ – sin θ = n, then prove that m2 – n2 = 4[latex]\sqrt { mn } [/latex]
OR
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 1

Question 16.
The following table gives the number of pages written by Sarika for completing her own book for 30 days:
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 2
Find the mean number of pages written per day.

Question 17.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 3

Question 18.
A circle touches all the four sides of a quadrilateral ABCD. Prove that AB + CD = BC + DA.

Question 19.
In figure, two concentric circles with centre O, have radii 21 cm and 42 cm. If ZAOB = 60°, find the area of the shaded region [ Use π = [latex s=2]\frac { 22 }{ 7 } [/latex] ].
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 4

Question 20.
If volumes of two spheres are in the ratio of64 : 27, then what is the ratio of their surface areas?
OR
A medicine-capsule is in the shape of a cylinder of diameter 0.5 cm with two hemispheres stuck to each of its ends. The length of entire capsule is 2 cm. What is the capacity of the capsule?

Question 21.
If A is the area of a right angled triangle and ‘b’ is one of the sides containing the right angle, prove that
the length of the altitude on the hypotenuse is [latex s=2]\frac { 2Ab }{ \sqrt { { b }^{ 4 }+4{ A }^{ 2 } } } [/latex]
OR
ABC is a right. A, right angled at B. AD and CE are the two medians drawn from A and C respectively. If
AC = 5 cm and AD = [latex s=2]\frac { 3\sqrt { 5 } }{ 2 } [/latex] cm, find CE

Question 22.
If the points A (k + 1,2k), B (3k, 2k+ 3) and C (5k- 1,5k) are collinear, then find the value of k.
OR
Show that the points A (1, 0), B (5,3), C (2,7) and D (-2,4) are the vertices of a parallelogram.

Section-D

Question 23.
An aeroplane left 30 minutes later than its scheduled time. The pilot decided to increase its speed. In order to reach its destination 1500 km away in time, pilot has to increase its speed by 250 km/hr from its usual speed. Determine the usual speed.

Question 24.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 5

Question 25.
Draw a line segment AB of length 8 cm. Taking A as centre, draw a circle of radius 4 cm and taking B as centre, draw another circle of radius 3 cm. Construct tangents to each circle from the centre of the other circle.

Question 26.
If h, c, v are respectively the height, the curved surface area and the volume of a cone, prove that 3πvh3– c2h2+ 9v2=0

Question 27.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 6

Question 28.
If a line is drawn parallel to one side of a triangle to intersect the other two sides in distinct points, then prove that the other two sides are divided in the same ratio.
OR
If a line divides any two sides of a triangle in the same ratio, then prove that the line is parallel to the third side.

Question 29.
From the top of a tower, the angles of depression of two objects on the same side of the tower are found to be α and β ( α > β). If the distance between the objects is P; show that the height ‘h’ of the tower is given by h = [latex s=2]\frac { P\tan { \alpha } \tan { \beta } }{ \tan { \alpha } -\tan { \beta } } [/latex] .
OR
A vertical tower stands on a horizontal plane and is surmounted by vertical flag staff of height ‘h’ At a point on the plane, the angles of elevation of the bottom and the top of the flag- staff are α and β respectively. Prove that the height of the tower is [latex s=2]\frac { h\tan { \alpha } }{ \tan { \beta -\tan { \alpha } } } [/latex]

Question 30.
The weekly expenditure of5000 families is tabulated below :
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 7
Find the median expenditure.
OR
The following table shows the marks obtained by 100 students of class X in a school during a particular academic session. Find the mode of this distribution.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 8

Solutions
Section-A

Solution 1.
Since: [latex s=2]\frac { 1 }{ 7 } [/latex] × [latex s=2]\frac { 7 }{ 100 } [/latex] = [latex s=2]\frac { 1 }{ 100 } [/latex] = 0.01
The smallest rational number is [latex s=2]\frac { 7 }{ 100 } [/latex] (1)

Solution 2.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 9

Solution 3.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 10

Solution 4.
Let x = [latex]\sqrt { 6+\sqrt { 6 } +\sqrt { 6+ } } [/latex] ….Then, x = [latex]\sqrt { 6+x } [/latex]
On squaring both the sides, we get
x2 = 6+ x ⇒x2-x-6 = 0
⇒ (x-3)(x + 2) = 0 ⇒ x = 3 or x = -2.
∵ x > 0
So, x = 3 (1)

Solution 5.
Since, a21 – a7 = 84 …(i)
Let the first term and common difference of
given A.P. be a and d respectively.
So, a21 = a+ (21 – 1)d = a + 20d
Now, a7= a + (7 – 1)d = a + 6d
From equation (i),
(a + 20d) – (a + 6d) = 84
⇒ (20-6)d= 84 ⇒ 14d= 84 ⇒d = 6
Hence, the common difference of given A.P. is 6. (1)

Solution 6.
Let ABC and DEFbe two triangles such that ∆ABC ~ ∆DEF
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 11
Let AL, DM be their medians respectively
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 12
Hence required corresponding median = 8.8 cm.

Section-B

Solution 7.
Largest possible amount of cheque will betheHCF (6075,8505).
Applying Euclid’s division lemma to 8505 and 6075, we have,
8505 = 6075 × 1 +2430 (1/2)
Since, remainder 2430 ≠ 0 again applying division lemma to 6075 and 2430
6075 = 2430 × 2+1215 (1/2)
Again remainder 1215 ≠ 0
So, again applying the division lemma to 2430 and 1215
2430=1215 × 2 +0 (1/2)
Here the remainder is zero
So,H.C.F= 1215 (1/2)
Therefore, the largest possible amount of each cheque will be 1215.

Solution 8.
Series: 70 + 68 + 66 + +40
Here a = 70, d = 68 – 70 = -2, tn = 1 = 40.
Now, tn = a + (n-1)d =70 + (n-1)(-2) ⇒ 40 = 70 – 2n + 2 ⇒n= 16 (1)
∴ Sn =[latex s=2]\frac { n }{ 2 } [/latex][a + l] ⇒Sn = [latex s=2]\frac { 16 }{ 2 } [/latex][70 + 40] = 880 (1)

Solution 9.
S = {S, M, T, W, Th, F, Sa} (1/2)
n(S)=7
A non-leap year contains 365 days,
i.e., 52 weeks + 1 day.
E={Sa}
n(E)=1 (1/2)
∴ P(E) = [latex s=2]\frac { n(E) }{ n(S) } [/latex] = [latex s=2]\frac { 1 }{ 7 } [/latex] (1)

Solution 10.
Let there be x blue, y green and z white marbles in the jar.
Then, x+y+ z=54 …(i) (1/2)
∴ P(selecting a blue marble) = [latex s=2]\frac { x }{ 54 } [/latex] ⇒[latex s=2]\frac { x }{ 54 } [/latex] = [latex s=2]\frac { 1 }{ 3 } [/latex] ⇒ x = 18 (1/2)
Similarly, /’(selecting a green marble) = [latex s=2]\frac { y }{ 54 } [/latex] ⇒ [latex s=2]\frac { y }{ 54 } [/latex]= [latex s=2]\frac { 4 }{ 9 } [/latex] ⇒y = 24 (1/2)
Substituting thevaluesofxandyin(i),z= 12
Hence, the jar contains 12 white marbles. (1/2)

Solution 11.
Given lines,
3x + 2ky- 2 = 0
and 2x+ 5y-1 =0
Here, a1 =3,b1 =2k, c1 =-2
a2 = 2, b2 = 5, c2 =-1 (1)
Condition for parallel lines is [latex s=2]\frac { 3 }{ 2 } [/latex] = [latex s=2]\frac { 2k }{ 5 } [/latex] ⇒k = [latex s=2]\frac { 15 }{ 4 } [/latex] (1)

Solution 12.
Since points are collinear,
so, x1(y2 – y3) + x2(y3 – y1) + x3(y1 – y2) = 0 (1/2)
Taking (7, -2) as (x1, y1), (5,1) as (x2, y2) and (3, k) as (x3, y3), we have
7(1 – k) + 5(k + 2) + 3 (-2 -1) = 0 (1/2)
or, 7 – 7k + 5k + 10 – 9 = 0 ⇒ 2k = 8 ⇒k = 4. (1)

Section-C

Solution 13.
a2 – b2 = (a-b)(a +b) ….(1)
∵ a2 -b2 is a prime number (1)
∴One of the two factors = 1
So, a — b= 1 [∵a – b< a+b]
∵ The only divisors of a prime number are 1 and it self. (1)
(1) become a2 -b2= 1 (a + b)
or a2 – b2 = a + b
e.g., 32 – 22 = 5 (which is prime)
⇒ 32 – 22 = 3 +2 (1)

Solution 14.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 13

Solution 15.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 14
OR
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 15

Solution 16.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 16

Solution 17.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 17

Solution 18.
Let there be a circle with centre O whereas AB, BC, CD and DA are tangents at P, Q, R and S respectively.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 18
Here,
AP = AS …(i)
BP = BQ …(ii)
CR=CQ …(iii)
DR=DS …(iv)
[Tangents drawn from a point (outside the circle) on a given circle are equal in lengths]
From equations (i), (ii), (iii) and (iv), (1)
(AP +BP) + (CR + DR) = (BQ + CQ) + (DS + AS)
AB + CD = BC + DA (Hence proved.) (1)

Solution 19.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 19

Solution 20.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 20
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 21
OR
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 22

Solution 21.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 23
OR
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 24

Solution 22.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 25
OR
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 26
Since, the coordinates of the mid-points of diagonals AC and BD are same.
∴ They bisect each other.
Hence, ABCD is a parallelogram. (1)

Section-D

Solution 23.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 27

Solution 24.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 28

Solution 25.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 29
Steps of construction:
(i) Drawa line AB of length 8 cm.
(ii) With centre A and radius 4 cm, draw a circle, which intersect AB at point P.
(iii) With centre B and radius 3 cm, draw the second circle.
(iv) With centre P and radius PA or PB draw third circle, which intersects the circle drawn in step (ii) at C & D and the circle drawn in step (iii) at E & F.
(v) Draw rays AE,AF,BC and BD.
(vi) Thus AE,AF,BC and BD are required tangents. (1)

Solution 26.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 30

Solution 27.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 31
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Solution 28.
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OR
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Solution 29.
CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 36
OR
Let AB be the tower and BC be the flag.
LetAB = H
BC = h
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Solution 30.
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CBSE Sample Papers for Class 10 Maths Paper 8 img 39
OR
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UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements

UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements (p-ब्लॉक के तत्त्व) are part of UP Board Solutions for Class 12 Chemistry. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements (p-ब्लॉक के तत्त्व).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Chemistry
Chapter Chapter 7
Chapter Name The p Block Elements
Number of Questions Solved 141
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements (p-ब्लॉक के तत्त्व)

अभ्यास के अन्तर्गत दिएर गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
ट्राइसैलाइडों से पेन्टाहैलाइड अधिक सहसंयोजी क्यों होते हैं?
उत्तर
किसी अणु में केन्द्रीय परमाणु की जितनी उच्च धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था होती है, उसकी ध्रुवण क्षमता उतनी ही अधिक होती है जिसके कारण केन्द्रीय परमाणु और अन्य परमाणु के मध्य बने आबन्ध में सहसंयोजी गुण बढ़ता जाता है।
इस प्रकार चूंकि पेन्टालाइडों में केन्द्रीय परमाणु +5 ऑक्सीकरण अवस्था में होता है, जबकि ट्राइहैलाइडों में यह +3 ऑक्सीकरण अवस्था में होता है, इसलिए ट्राइलाइडों से पेन्टाहैलाइड अधिक सहसंयोजी होते हैं।

प्रश्न 2.
वर्ग 15 के तत्वों के हाइड्राइडों में BiH3 सबसे प्रबल अपचायक क्यों है?
उत्तर
वर्ग 15 के तत्वों के हाइड्राइडों में BiH3 के प्रबल अपचायक होने का कारण यह है कि इस वर्ग के हाइड्राइडों में Bi-H आबन्ध की लम्बाई सबसे अधिक होती है जिसके कारण BiH3 सबसे कम स्थायी होता है।

प्रश्न 3.
N2 कमरे के ताप पर कम क्रियाशील क्यों है?
उत्तर
N2 कमरे के ताप पर कम क्रियाशील होती है; क्योंकि प्रबल pπ – pπ अतिव्यापन के कारण त्रिओबन्ध N ≡ N बनता है।

प्रश्न 4.
अमोनिया की लब्धि को बढ़ाने के लिए आवश्यक स्थितियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
अमोनिया का निर्माण हेबर प्रक्रम से किया जाता है। इसकी लब्धि बढ़ाने के लिए ला-शातेलिए। सिद्धान्त के अनुसार आवश्यक स्थितियाँ निम्नवत् हैं –

  1. तापमान = 700 K
  2. उच्च दाब 200 x 105 Pa (लगभग 200 वायुमण्डल)
  3. उत्प्रेरक; जैसे- K2O तथा Al2O5 मिश्रित आयरन ऑक्साइड।

प्रश्न 5.
Cu2+ आयन के साथ अमोनिया कैसे क्रिया करती है?
उत्तर
Cu2+ आयन अमोनिया से क्रिया करके गहरे नीले रंग का संकुल बनाते हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 1

प्रश्न 6.
N2O5 में नाइट्रोजन की सहसंयोजकता क्या है?
उत्तर
सहसंयोजकता इलेक्ट्रॉनों के सहभाजित युग्मों की संख्या पर निर्भर करती है। चूंकि N2O5 में, प्रत्येक नाइट्रोजन परमाणु पर इलेक्ट्रॉनों के चार सहभाजित युग्म उपस्थित हैं जैसा कि निम्नवत् दिखाया गया है –
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 2
इसलिए N2O5 में N की सहसंयोजकता 4 है।

प्रश्न 7.
PH3 से PH+4 ई का आबन्ध कोण अधिक है। क्यों?
उत्तर
PH3 तथा PH+4 दोनों sp3 संकरित हैं। PH+4 में चारों कक्षक आबन्धित होते हैं, जबकि PH3 में P पर इलेक्ट्रॉनों का एकाकी युग्म उपस्थित होता है जो PH3 में एकाकी युग्म-आबन्ध युग्म प्रतिकर्षण के लिए उत्तरदायी है जिससे आबन्ध कोण 109°28′ से कम हो जाता है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 3

प्रश्न 8.
क्या होता है जब श्वेत फॉस्फोरस को CO2 के अक्रिय वातावरण में सान्द्र कॉस्टिक सोडा विलयन के साथ गर्म करते हैं?
उत्तर
श्वेत फॉस्फोरस NaOH से अभिक्रिया करके फॉस्फीन (PH3) बनाता है।UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 4

प्रश्न 9.
क्या होता है जब PCl5 को गर्म करते हैं?
उत्तर
PCl5 में तीन निरक्षीय (equatorial) [202 pm] तथा दो अक्षीय (axial) [240 pm] बन्ध होते हैं। चूंकि अक्षीय बन्ध निरक्षीय बन्धों से दुर्बल होते हैं, इसलिए जब PCl5 को गर्म किया जाता है तो कम स्थायी अक्षीय बन्ध टूटकर PCl3 बनाते हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 5

प्रश्न 10.
PCl5 की भारी पानी में जल-अपघटन अभिक्रिया का सन्तुलित समीकरण लिखिए।
उत्तर
PCl5 भारी जल (D2O) से अभिक्रिया करके फॉस्फोरस ऑक्सी-क्लोराइड (POCl3) तथा ड्यूटीरियम क्लोराइड (DCl) बनाता है।
PCl5 + D2O → POCl3 + 2 DCl

प्रश्न 11.
H3PO4 की क्षारकता क्या है?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 6
H3PO4 अणु में तीन -OH समूह उपस्थित हैं, इसलिए इसकी क्षारकता 3 है।

प्रश्न 12.
क्या होता है जब H3PO4 को गर्म करते हैं?
उत्तर
ऑफॉस्फोरस अम्ल या फॉस्फोरस अम्ल (H3PO4) गर्म करने पर असमानुपातित होकर ऑर्थोफॉस्फोरिक अम्ल या फॉस्फोरिक अम्ल तथा फॉस्फीन देता है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 7

प्रश्न 13.
सल्फर के महत्त्वपूर्ण स्रोतों को सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर
भूपर्पटी में सल्फर की मात्रा 0.03 – 0.1% होती है। संयुक्त अवस्था में सल्फर सल्फेट के रूप में—जिप्सम (CaSO4 . 2H2O), एप्सम लवण (MgSO4 . 7H2O), बेराइट (BaSO4) तथा सल्फाइड के रूप में– गैलेना (PbS), जिंक ब्लैण्ड (ZnS), पाइराइट (CuFeS2) में पाया जाता है। कार्बनिक पदार्थों जैसे अण्डा, प्रोटीन, लहसुन, प्याज, सरसों, बाल तथा फर में सल्फर पाया जाता है। ज्वालामुखी में सल्फर के अंश H2S के रूप में पाए जाते हैं।

प्रश्न 14.
वर्ग 16 के तत्वों के हाइड्राइडों के तापीय स्थायित्व के क्रम को लिखिए।
उत्तर
चूँकि तत्वों का आकार वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ता है, इसलिए E-H बन्ध वियोजन ऊर्जा घटती है। जिससे E-H बन्ध सरलता से टूट जाते हैं। अत: वर्ग 16 के तत्वों के हाइड्रोइडों का ऊष्मीय स्थायित्व वर्ग में नीचे जाने पर घटता है।
H2O > H2S > H2Se > H2Te > H2Po

प्रश्न 15.
H2O एक द्रव तथा H2S गैस क्यों है?
उत्तर
ऑक्सीजन के छोटे आकार तथा उच्च विद्युत ऋणात्मकता के कारण H2O में अन्तराआण्विक हाइड्रोजन बन्ध पाए जाने के परिणामस्वरूप यह कमरे के ताप पर द्रव होता है। H2S सल्फर के बड़े आकार के कारण हाइड्रोजन बन्ध नहीं बनाती है, अतः इसके अणुओं के मध्य दुर्बल वान्डर वाल्स बल कार्य करते हैं। इस कारण कक्ष ताप पर H2S गैस होती है।

प्रश्न 16.
निम्नलिखित में से कौन-सा तत्व ऑक्सीजन के साथ सीधे अभिक्रिया नहीं करता?
Zn, Ti, Pt, Fe
उत्तर
प्लैटिनम एक उत्कृष्ट धातु है। इसकी पहली चार आयनन एन्थैल्पियों का योग बहुत अधिक होता है, इसलिए यह ऑक्सीजन से सीधे संयोग नहीं करती है। दूसरी ओर Zn, Ti तथा Fe सक्रिय धातुएँ हैं, इसलिए ये ऑक्सीजन से सीधे संयोग करके संगत ऑक्साइड बनाती हैं।

प्रश्न 17.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं को पूर्ण कीजिए –

  1. C2H4 + O2
  2. 4 Al + 3O2

उत्तर

  1. C2H4 + 3O2 [latex]\underrightarrow { \triangle } [/latex] 2CO2 ↑ + 2H2O
  2. 4Al + 3O2 [latex]\underrightarrow { \triangle } [/latex] 2Al2O3

प्रश्न 18.
O3 एक प्रबल ऑक्सीकारक की तरह क्यों क्रिया करती है?
उत्तर
O3 शीघ्रता से अपघटित होकर नवजात ऑक्सीजन उत्पन्न करती है, जो विभिन्न पदार्थों को ऑक्सीकृत कर देती है। इसलिए यह प्रबल ऑक्सीकारक की तरह क्रिया करती है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 8

प्रश्न 19.
O3 का मात्रात्मक आकलन कैसे किया जाता है?
उत्तर
जब ओजोन पोटैशियम आयोडाइड के आधिक्य, जिसे बोरेट बफर (pH 9.2) के साथ बफरीकृत करते हैं, से अभिक्रिया करती है तो आयोडीन उत्पन्न होती है, इसे सोडियम थायोसल्फेट के मानक विलयन के साथ अनुमापित करते हैं। इस प्रकार O3 का मात्रात्मक आकलन किया जाता है।

प्रश्न 20.
तब क्या होता है जब सल्फर डाइऑक्साइड को Fe(III) लवण के जलीय विलयन में से प्रवाहित करते हैं?
उत्तर
SO2 अपचायक की भाँति कार्य करती है, इसलिए यह आयरन (III) लवण को आयरन (II) लवण में अपचयित कर देती है।
SO2 + 2H2O → SO2-4 + 4H+ + 2e
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 9

प्रश्न 21.
दो S-O आबन्धों की प्रकृति पर टिप्पणी कीजिए जो SO2 अणु बनाते हैं। क्या SO2 अणु के ये दोनों S-O आबन्ध समतुल्य हैं?
उत्तर
SO2 में बनने वाले दोनों S-O आबन्ध सहसंयोजक (covalent) हैं तथा अनुनादी संरचनाओं के कारण समान रूप से प्रबल होते हैं।

प्रश्न 22.
SO2 की उपस्थिति का पता कैसे लगाया जाता है?
उत्तर
SO2 एक तीक्ष्ण गन्ध वाली गैस है। इसकी उपस्थिति को निम्नलिखित दो परीक्षणों से ज्ञात किया जा सकता है –
(i) SO2 गुलाबी-बैंगनी रंग के अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट (VII) विलयन को MnO4 के Mn2+ आयन में अपचयन के कारण रंगहीन कर देती है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 10
(ii) SO2 अम्लीकृत K2Cr2O7 को Cr2O2-7 के Cr3+ आयनों में अपचयन के कारण हरा कर देती है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 11

प्रश्न 23.
उन तीन क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए जिनमें H2SO4 महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उत्तर

  1. उर्वरकों; जैसे- अमोनियम सल्फेट, सुपर फॉस्फेट के निर्माण में।
  2. पेट्रोलियम शोधन में।
  3. सीसा संचायक बैटरियों में।

प्रश्न 24.
संस्पर्श प्रक्रम द्वारा H2SO4 की मात्रा में वृद्धि करने के लिए आवश्यक परिस्थितियों को लिखिए।
उत्तर
H2SO4 के निर्माण में प्रमुख पद SO2 का O2 के साथ उत्प्रेरकीय ऑक्सीकरण है। इसमें V2O5 उत्प्रेरक की उपस्थिति में SO3 प्राप्त होती है।
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अभिक्रिया ऊष्माक्षेपी तथा उत्क्रमणीय है। अग्रगामी अभिक्रिया में आयतन का ह्रास होता है। इसलिए कम ताप तथा उच्च दाब उत्पाद की मात्रा में वृद्धि करने के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ हैं, परन्तु ताप अत्यधिक कम नहीं होना चाहिए, अन्यथा अभिक्रिया की दर कम हो जाएगी।

प्रश्न 25.
जल में H2SO4 के लिए Ka2 << Ka1 क्यों है?
उत्तर
H2SO4 एक द्विक्षारकीय अम्ल है, यह दो पदों में आयनित होता है, इसलिए इसके दो वियोजन स्थिरांक होते हैं।

  1. H2SO4 (aq) + H2O (l) → H3O+ (aq) + HSO4 (aq); Ka1 > 10
  2. HSO4 (aq) + H2O (l) → H3O+ (aq) + SO2-4 (aq); Ka2 = 1.2 x 10-2

Ka1 (>10) के अधिक मान से तात्पर्य यह है कि H2SO4, H3O+ तथा HSO4 में अधिक वियोजित है।
मुख्यत: H3O+ और H2SO4 में प्रथम आयनन के कारण H2SO4 जल में प्रबल अम्ल है। HSO4 का H3O+ तथा SO2-4 आयनों में आयनन लगभग नगण्य होता है;
अत: Ka2 << Ka1

प्रश्न 26.
आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी, इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी तथा जलयोजन एन्थैल्पी जैसे प्राचलों को महत्त्व देते हुए F2 तथा Cl2 की ऑक्सीकारक क्षमता की तुलना कीजिए।
उत्तर
ऑक्सीकारक क्षमता F2 से Cl2 तक घटती है। जलीय विलयन में हैलोजेनों की ऑक्सीकारक क्षमता वर्ग में नीचे की ओर घटती है (F से Cl तक)। फ्लुओरीन का इलेक्ट्रोड विभव (+287 V) क्लोरीन (+136 V) की तुलना में उच्च होता है, इसलिए F2 क्लोरीन की तुलना में प्रबल ऑक्सीकारक है। इलेक्ट्रोड विभव निम्नलिखित प्राचलों पर निर्भर करता है –
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अत: Fप्रबल ऑक्सीकारक है।

प्रश्न 27.
दो उदाहरणों द्वारा फ्लुओरीन के असामान्य व्यवहार को दर्शाइए।
उत्तर
फ्लुओरीन का असामान्य व्यवहार इसके-

  1. लघु आकार
  2. उच्च विद्युत ऋणात्मकता
  3. कम F-F आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी तथा
  4. इसके संयोजी कोश में d-कक्षकों की अनुपलब्धता के कारण होता है।

उदाहरणार्थ

  1. फ्लुओरीन केवल एक ऑक्सोअम्ल बनाती है, जबकि अन्य हैलोजेन अधिक संख्या में ऑक्सो- अम्लों का निर्माण करते हैं।
  2. हाइड्रोजन फ्लुओराइड प्रबल हाइड्रोजन बन्धों के कारण द्रव होता है, जबकि अन्य हाइड्रोजन हैलाइड गैसीय होते हैं।

प्रश्न 28.
समुद्र कुछ हैलोजेन का मुख्य स्रोत है। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर
समुद्र जल में मैग्नीशियम, कैल्सियम, सोडियम तथा पोटैशियम के क्लोराइड, ब्रोमाइड तथा आयोडाइड पाए जाते हैं जिनमें सोडियम क्लोराइड (द्रव्यमान अनुसार 2.5%) प्रमुख हैं। समुद्री जमाव में सोडियम क्लोराइड तथा कार्नेलाइट [KCI . MgCl. 6H2O] प्रमुख होते हैं। कुछ समुद्री जीवधारियों के तन्त्र में आयोडीन पायी जाती है। कुछ समुद्री खरपतवारों ( लेमिनेरिया प्रजाति) में 0.5% आयोडीन तथा चिली साल्टपीटर में 0.2% सोडियम आयोडेट होता है।

प्रश्न 29.
Cl2 की विरंजक क्रिया का कारण बताइए। (2012)
उत्तर
Cl2 की विरंजक क्रिया ऑक्सीकरण के कारण होती है। नमी अथवा जलीय विलयन की उपस्थिति में Cl2 नवजात ऑक्सीजन मुक्त करती है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 14
यह नवजात ऑक्सीजन वनस्पतियों तथा कार्बनिक द्रव्यों में उपस्थित रंगीन पदार्थों का ऑक्सीकरण करके उन्हें रंगहीन पदार्थ में परिवर्तित कर देती है।
रंगीन पदार्थ + [O] → रंगहीन पदार्थ
अत: Cl2 की विरंजक क्रिया ऑक्सीकरण के कारण होती है।

प्रश्न 30.
उन दो विषैली गैसों के नाम लिखिए जो क्लोरीन गैस से बनाई जाती हैं?
उत्तर
फॉस्जीन (COCl2) तथा मस्टर्ड गैस (ClCH2CH2SCH2CH2Cl)।

प्रश्न 31.
I2 से ICl अधिक क्रियाशील क्यों है?
उत्तर
I2 से ICl अधिक क्रियाशील होता है क्योंकि I-I आबन्ध से I-Cl आबन्ध दुर्बल होता है। परिणामस्वरूप ICl सरलता से टूटकर हैलोजेन परमाणु देता है जो तीव्रता से अभिक्रिया करते हैं।

प्रश्न 32.
हीलियम को गोताखोरी के उपकरणों में उपयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर
आधुनिक गोताखोरी के उपकरणों में हीलियम ऑक्सीजन के तनुकारी के रूप में उपयोग में आती है; क्योंकि रुधिर में इसकी विलेयता बहुत कम है।

प्रश्न 33.
निम्नलिखित समीकरण को सन्तुलित कीजिए –
XeF6 + H2O →XeO2F2 + HF
उत्तर
XeF6 + 2H2O → XeO2F2 + 4 HF

प्रश्न 34.
रेडॉन के रसायन का अध्ययन करना कठिन क्यों था?
उत्तर
रेडॉन अत्यन्त कम अर्द्धआयुकाल का रेडियोऐक्टिव तत्व है, इस कारण रेडॉन के रसायन का अध्ययन करना कठिन था।

अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 1.
वर्ग 15 के तत्वों के सामान्य गुणधर्मो की उनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, ऑक्सीकरण अवस्था, परमाण्विक आकार, आयनन एन्थैल्पी तथा विद्युत ऋणात्मकता के सन्दर्भ में विवेचना कीजिए।
उत्तर
(i) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic configuration) – इन तत्वों के संयोजी कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns2 , np3 होता है। इनमें s-कक्षक पूर्णतया भरे हुए तथा p- कक्षक अर्द्धपूरित होते हैं, जो इनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को अधिक स्थायी बनाते हैं।

(ii) ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (Oxidation states) – इन तत्वों की सामान्य ऑक्सीकरण अवस्थाएँ -3, +3 तथा +5 हैं। तत्वों द्वारा -3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति वर्ग में नीचे जाने पर परमाणु आकार तथा धात्विक गुण बढ़ने के कारण घटती है। वस्तुतः अन्तिम तत्व बिस्मथ कठिनता से -3 ऑक्सीकरण अवस्था में यौगिक बनाता है। ऑक्सीकरण अवस्था +5 का स्थायित्व वर्ग में नीचे जाने पर घटता है। इस अवस्था में केवल Bi(V) का यौगिक BiF5 ज्ञात है। ऑक्सीकरण अवस्था +5 तथा ऑक्सीकरण अवस्था +3 का स्थायित्व वर्ग में नीचे जाने पर क्रमशः घटता तथा बढ़ता है (अक्रिय युग्म प्रभाव)। नाइट्रोजन +1, +2, +4 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करता है, जबकि यह ऑक्सीजन के साथ अभिकृत होता है। फॉस्फोरस कुछ ऑक्सोअम्लों में +1 तथा +4 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करता है।

(iii) परमाणु आकार (Atomic size) – समूह में नीचे जाने पर सहसंयोजी तथा आयनिक त्रिज्याएँ बढ़ती हैं। N से P तक सहसंयोजी त्रिज्याओं में पर्याप्त वृद्धि होती है, जबकि As से Bi तक सहसंयोजी त्रिज्याओं में सूक्ष्म वृद्धि प्रेक्षित होती है। यह भारी सदस्यों में पूर्णतया भरे हुए d तथा f-कक्षकों की उपस्थिति के कारण होता है।

(iv) आयनन एन्थैल्पी (Ionisation enthalpy) – वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर आयनन एन्थैल्पी में परमाणु आकार में क्रमिक वृद्धि के कारण कमी आती है। इस प्रकार अधिक स्थायी अर्द्धपूरित p-कक्षक के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास तथा छोटे आकार के कारण वर्ग 15 के तत्वों की आयनन एन्थैल्पी के मान वर्ग 14 के तत्वों से सम्बन्धित आवर्गों में अधिक होते हैं। आयनन एन्थैल्पी का उत्तरोत्तर बढ़ता क्रम निम्नवत् है –
ΔiHi < ΔiH2 < ΔiH3

(v) विद्युत ऋणात्मकता (Electronegativity) – किसी समूह में नीचे जाने पर परमाणु आकार बढ़ने के साथ विद्युत ऋणात्मकता सामान्यतः घटती है। यद्यपि भारी तत्वों में इस प्रकार का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है।

प्रश्न 2.
नाइट्रोजन की क्रियाशीलता फॉस्फोरस से भिन्न क्यों है?
उत्तर
N2 अणु में उपस्थित N ≡ N बन्ध की अत्यधिक बन्ध वियोजन एन्थैल्पी (941.4 kJ mol-1) के कारण नाइट्रोजन अणु फॉस्फोरस अणु की तुलना में बहुत कम क्रियाशील हैं। फॉस्फोरस अणु (P4) में उपस्थित P-P बन्धों की बन्ध वियोजन एन्थैल्पी काफी कम (201.6 kJ mol-1) होती है।

प्रश्न 3.
वर्ग 15 के तत्वों की रासायनिक क्रियाशीलता की प्रवृत्ति की विवेचना कीजिए।
उत्तर
1. हाइड्राइड (Hydrides) – वर्ग 15 के सभी तत्व MH3 तथा MH4 प्रकार के हाइड्राइड बनाते हैं। (M = N, P, As, Sb, Bi)।

  1. क्षारीय गुण (Basic character) – हाइड्राइडों के क्षारीय गुण उनके आकार बढ़ने अर्थात् इलेक्ट्रॉन घनत्व घटने के साथ घटते हैं।
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  2. ऊष्मीय स्थायित्व (Thermal stability) – वर्ग में नीचे जाने पर हाइड्राइडों का ऊष्मीय स्थायित्व घटता है क्योंकि परमाणु आकार बढ़ता है जिससे बन्ध लम्बाई (M – H) बढ़ती है।
  3. अपचायक गुण (Reducing character) – यह वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ता है क्योंकि स्थायित्व घटता है। NH3 के अतिरिक्त सभी प्रबल अपचायक होते हैं।
  4. क्वथनांक (Boiling point) – NH3 का क्वथनांक हाइड्रोजन आबन्ध के कारण PH3 से अधिक होता है। क्वथनांक PH3 से आगे जाने पर बढ़ते हैं क्योंकि आण्विक द्रव्यमान बढ़ने के कारण वान्डर वाल्स बलों में वृद्धि होती है।

अभिक्रियाएँ

  • Ca3P2 + 6H2O → 2PH3 ↑ + 3 Ca(OH)2
  • P4 + 3 KOH + 3H2O → PH3 ↑ + 3 KH2PO2
  • 2NH3 + NaOCl → N2H4 + NaCl + H2O

2. हैलाइड (Halides) :
(i) ट्राइहैलाइड (Trihalides) – ये सभी प्रकार के हैलोजेनों से सीधे संयोग करके MX3 प्रकार के ट्राइलाइड बनाते हैं। NBr3 तथा NI3 को छोड़कर सभी ट्राइहैलाइड स्थायी तथा पिरैमिडी संरचना के होते हैं। BiF3 के अतिरिक्त सभी ट्राइहैलाइड सहसंयोजी प्रकृति के होते हैं। ट्राइहैलाइडों की सहसंयोजी प्रकृति तत्व के आकार के बढ़ने पर घटती है।
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ट्राइहैलाइड सरलता से जल-अपघटित हो जाते हैं –

  • NCl3 + 3H2O → NH3 ↑ + 3 HOCl
  • PCl3 + 3H2O → H3PO3 + 3 HCl
  • 4 AsCl3 + 6H2O → As4O6 + 12 HCl
  • SbCl3 + H2O → SbOCl + 2 HCl
  • BiCl3 + H2O → BiOCl + 2 HCl

फॉस्फोरस तथा एण्टीमनी के ट्राइहैलाइड लूइस अम्ल की भाँति व्यवहार करते हैं।

  • PF3 + F2 → PF5
  • SbF3 + 2F → [SbF5]2-

(ii) पेन्टाहैलाइड (Pentahalides) – P, As तथा Sb सूत्र MCl5 के पेन्टालाइड बनाते हैं। N पेन्टाहलाइड नहीं बनाता है; क्योंकि इलेक्ट्रॉन के उत्तेजन के लिए d-कक्षक अनुपस्थित होते हैं। Bi अक्रिय-युग्म प्रभाव के कारण पेन्टाहैलाइड नहीं बनाता। पेन्टाक्लोराइडों में sp3 संकरण होता है तथा इनकी संरचना त्रिकोणीय द्विपिरैमिडी होती है।

3. ऑक्साइड (Oxides) – ये ऑक्सीजन से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़कर अधिक संख्या में ऑक्साइड बनाते हैं।
(i) नाइट्रोजन के ऑक्साइड (Oxides of nitrogen) – नाइट्रोजन ऑक्सीजन के साथ क्रिया करके कई प्रकार के ऑक्साइड बनाता है। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नांकित रूप में तालिकाबद्ध है –
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(ii) फॉस्फोरस के ऑक्साइड (Oxides of phosphorus) – फॉस्फोरस के दो महत्त्वपूर्ण ऑक्साइड P4O6 (P2O3 का द्विलक) तथा P4O10 (P2O5 का द्विलक) हैं। इन्हें अग्रवत् प्राप्त किया जाता है –
P4 + 6O (सीमित) [latex]\underrightarrow { \triangle } [/latex] P4O6
P4 + 5O2 (आधिक्य) → P4O10

(iii) अन्य तत्वों के ऑक्साइड (Oxides of other elements) – As4O6, As2O5, Sb4O6, Sb2O5, Bi2O3 तथा Bi2O5.
N, P तथा As के ट्राइऑक्साइड अम्लीय होते हैं। अम्लीय गुण वर्ग में नीचे जाने पर घटता है। Sb का ऑक्साइड उभयधर्मी होता है, जबकि Bi का ऑक्साइड क्षारीय होता है। सभी पेन्टाऑक्साइड अम्लीय होते हैं। N2O5 प्रबलतम तथा Bi2O5 दुर्बलतम अम्लीय ऑक्साइड होता है।

(4) ऑक्सी-अम्ल (Oxy-acids) – Bi को छोड़कर अन्य सभी तत्व ऑक्सी-अम्लों (जैसे- HNO3, H3PO4, H3AsO4, तथा H2SbO4) का निर्माण करते हैं। ऑक्सी-अम्लों का सामर्थ्य तथा स्थायित्व वर्ग में नीचे जाने पर घटता है।
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प्रश्न 4.
NH3 हाइड्रोजन बन्ध बनाती है, परन्तु PH3 नहीं बनाती, क्यों?
उत्तर
नाइट्रोजन की विद्युत ऋणात्मकता (3: O) हाइड्रोजन (2 : 1) से अधिक होती है। अत: N – H आबन्ध ध्रुवीय होता है। इसलिए NH3 में अन्तराआण्विक हाइड्रोजन आबन्ध होते हैं। इसके विपरीत P तथा H दोनों की विद्युत ऋणात्मकता 2 : 1 होती है, इसलिए PH बन्ध ध्रुवीय नहीं होता, अत: इसमें हाइड्रोजन बन्ध नहीं होता है।

प्रश्न 5.
प्रयोगशाला में नाइट्रोजन कैसे बनाते हैं? सम्पन्न होने वाली अभिक्रिया के रासायनिक समीकरणों को लिखिए।
उत्तर
प्रयोगशाला में अमोनियम क्लोराइड के सममोलर जलीय विलयन की सोडियम नाइट्राइट के साथ अभिक्रिया से नाइट्रोजन बनाते हैं। इस अभिक्रिया में द्विअपघटन के परिणामस्वरूप अमोनियम नाइट्राइट बनता है जो अस्थायी होने के कारण अपघटित होकर डाइनाइट्रोजन गैस बनाता है।
NH4Cl(aq) + NaNO2 (aq) → NH4NO2 (aq) + NaCl (aq)
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प्रश्न 6.
अमोनिया का औद्योगिक उत्पादन कैसे किया जाता है?
उत्तर
अमोनिया का औद्योगिक उत्पादन हेबर प्रक्रम से किया जाता है।
N2 (g) + 3H2 (g) [latex]\rightleftharpoons [/latex] 2NH(g), ΔfH = – 46.1 kJ mol-1
शुष्क नाइट्रोजन तथा हाइड्रोजन को 1 : 3 में लेकर उच्च दाब (200 से 300 वायुमण्डल) तथा ताप । (723 K से 773 K) पर Al2O3 मिश्रित आयरन उत्प्रेरक पर प्रवाहित करने पर NH3 प्राप्त होती है। जिसे द्रवित करके तरल रूप में प्राप्त कर लेते हैं।

प्रश्न 7.
उदाहरण देकर समझाइए कि कॉपर धातु HNO3 के साथ अभिक्रिया करके किस प्रकार भिन्न उत्पाद दे सकती है?
उत्तर
तनु HNO3 कॉपर के साथ अभिक्रिया करके कॉपर नाइट्रेट तथा नाइट्रिक ऑक्साइड बनाता है, जबकि सान्द्र HNO3 कॉपर के साथ अभिक्रिया करके कॉपर नाइट्रेट तथा नाइट्रोजन डाइऑक्साइड बनाता है।
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प्रश्न 8.
NOतथा N2O5 की अनुनादी संरचनाओं को लिखिए।
उत्तर
(i) NO2 की अनुनादी संरचनाएँ
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(ii) N2O5 की अनुनादी संरचनाएँ
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प्रश्न 9.
HNH कोण का मान, HPH, HAsH तथा HSbH कोणों की अपेक्षा अधिक क्यों होता है?
(संकेत- NH3 में sp3 संकरण के आधार तथा हाइड्रोजन और वर्ग के दूसरे तत्वों के बीच केवल s-p आबंधन के द्वारा व्याख्या की जा सकती है।)
उत्तर
MH3 प्रकार के हाइड्राइडों में केन्द्रीय परमाणु M इलेक्ट्रॉनों के तीन बन्ध युग्मों (bond pairs) तथा एक एकल युग्म (lone pair) से निम्न प्रकार से घिरा रहता है –
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नाइट्रोजन परमाणु का आकार में बहुत छोटे तथा अधिक विद्युत ऋणात्मक होने के कारण NH3 में N परमाणु पर इलेक्ट्रॉन घनत्व का मान अधिकतम होता है। इस कारण बन्ध युग्मों के मध्य अधिकतम प्रतिकर्षण होता है और इस कारण HNH बन्ध कोण का मान अधिकतम होता है। परमाणु आकार में वृद्धि होने के कारण N से Bi की ओर जाने पर M की विद्युत ऋणात्मकता घटती है। फलस्वरूप इलेक्ट्रॉन युग्मों के मध्य प्रतिकर्षण कम हो जाता है। यही कारण है कि NH3 से BiH3 की ओर जाने पर H-M-H बन्ध कोण घटता है।

प्रश्न 10.
R3P = O पाया जाता है जबकि R3N = O नहीं, क्यों (R = ऐल्किल समूह)?
उत्तर
d- ऑर्बिटलों की अनुपस्थिति के कारण, N अपनी सहसंयोजकता को 4 से अधिक करने में और dπ – pπ बन्धों का निर्माण करने में असमर्थ है। इस कारण, यह R3N = O प्रकार के यौगिकों का निर्माण नहीं करता है। इसके विपरीत P के पास d- ऑर्बिटल होते हैं और यह dπ – pπ बहुल बन्ध बनाने में सक्षम है। अत: यह अपनी सहसंयोजकता को 5 तक बढ़ाकर R3P = 0 प्रकार के यौगिक बनाता है।

प्रश्न 11.
समझाइए कि क्यों NH3 क्षारकीय है, जबकि BiH3 केवल दुर्बल क्षारक है?
उत्तर
N परमाणु का आकार (70 pm), Bi के परमाणु आकार (148 pm) की तुलना में काफी कम है। इस कारण NH3 में N परमाणु पर इलेक्ट्रॉन घनत्व का मान BiH3 में Bi पर इलेक्ट्रॉन घनत्व के मान से काफी अधिक होता है। इस कारण BiH3 की तुलना में NH3 अधिक प्रभावशाली ढंग से इलेक्ट्रॉनों के एकल युग्म को दे सकता है। यही कारण है कि BiH3 की तुलना में NH3 अधिक क्षारीय है।

प्रश्न 12.
नाइट्रोजन द्विपरमाणुक अणु के रूप में पाया जाता है तथा फॉस्फोरस P4 के रूप में, क्यों?
उत्तर
छोटे परमाणु आकार तथा अधिक विद्युत ऋणात्मकता के कारण नाइट्रोजन में स्वयं से pπ – pπ बहुल बन्धों को बनाने की प्रबल प्रवृत्ति होती है। इस प्रकार, यह N ≡ N बन्ध का निर्माण कर एक द्वि-परमाणविक अणु (N2 ) के रूप में पाया जाता है। इसके विपरीत, बड़े परमाणु आकार तथा कम विद्युत ऋणात्मकता के कारण फॉस्फोरस में स्वयं से pπ – pπ बहुल बन्धों को बनाने की प्रवृत्ति नहीं होती है। अत: यह P – P एकल बन्धों को बनाकर एक समचतुष्फलकीय P4 अणु का निर्माण करता है।

प्रश्न 13.
श्वेत फॉस्फोरस तथा लाल फॉस्फोरस के गुणों की मुख्य भिन्नताओं को लिखिए।
उत्तर
श्वेत फॉस्फोरस तथा लाल फॉस्फोरस के गुणों की मुख्य भिन्नताएँ निम्नलिखित हैं –
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श्वेत तथा लाल फॉस्फोरस की संरचनाएँ निम्नवत् होती हैं –
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प्रश्न 14.
फॉस्फोरस की तुलना में नाइट्रोजन श्रृंखलन गुणों को कम प्रदर्शित करती है, क्यों?
उत्तर
शृंखलन का गुण तत्व की बन्ध प्रबलता पर निर्भर करता है। चूंकि N-N बन्ध की प्रबलता (159 kJ mol-1), P-P बन्ध की प्रबलता (212 kJ mol-1) से कम होती है, इसलिए नाइट्रोजन फॉस्फोरस की तुलना में कम श्रृंखलन गुणों को दर्शाती है।

प्रश्न 15.
H3PO3 की असमानुपातन अभिक्रिया दीजिए।
उत्तर
गर्म किये जाने पर H3PO3 निम्न प्रकार से असमानुपातन प्रदर्शित करता है –
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प्रश्न 16.
क्या PCl5 ऑक्सीकारक और अपचायक दोनों का कार्य कर सकता है? तर्क दीजिए।
उत्तर
PCl5 में P की ऑक्सीकरण अवस्था +5 है जो P की उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था है। अतः, यह अपनी ऑक्सीकरण अवस्था को +5 से अधिक प्रदर्शित नहीं कर सकता है, अर्थात् इसे और अधिक ऑक्सीकृत नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार यह अपचायक की भाँति व्यवहार नहीं कर सकता है। इसके विपरीत, यह आसानी से एक ऑक्सीकारक की भाँति व्यवहार कर सकता है क्योंकि यह अपनी ऑक्सीकरण अवस्था को +5 से घटाकर +3 कर सकता है।
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प्रश्न 17.
O, Se, Te तथा Po को इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, ऑक्सीकरण अवस्था तथा हाइड्राइड निर्माण के सन्दर्भ में आवर्त सारणी के एक ही वर्ग में रखने का तर्क दीजिए।
उत्तर
(i) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic configuration)-इन सभी तत्वों का संयोजी कोश इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान, ns2 np2 (n = 2 से 6 तक) होता है। इससे इन तत्वों को आवर्त सारणी के वर्ग 16 में रखा जाना चरितार्थ होता है।
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(ii) ऑक्सीकरण अवस्था (Oxidation state) – इन्हें समीपवर्ती अक्रिय गैस विन्यास प्राप्त करने के लिए अर्थात् द्विऋणात्मक आयन बनाने के लिए दो अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनों की आवश्यकता पड़ती है, इसलिए इन तत्वों की न्यूनतम ऑक्सीकरण अवस्था -2 होनी चाहिए। ऑक्सीजन विशिष्ट रूप से तथा सल्फर कुछ मात्रा में विद्युत ऋणात्मक होने के कारण -2 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं। इस वर्ग के अन्य तत्व, 0 तथा S से अधिक विद्युत ऋणात्मक होने के कारण ऋणात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित नहीं करते हैं। चूंकि इन तत्वों के संयोजी कोश में 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं, इसलिए ये तत्व अधिकतम +6 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित कर सकते हैं। इन तत्वों द्वारा प्रदर्शित अन्य धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ +2 तथा +4 हैं। यद्यपि ऑक्सीजन 4-कक्षकों की अनुपस्थिति के कारण +4 तथा +6 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित नहीं करता, अतः न्यूनतम तथा अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्थाओं के आधार पर इन तत्वों को समान वर्ग अर्थात् वर्ग 16 में रखा जाना पूर्णतया न्यायोचित है।

(iii) हाइड्राइडों का निर्माण (Formation of hydrides) – सभी तत्व अपने संयोजी इलेक्ट्रॉनों में से दो इलेक्ट्रॉनों की हाइड्रोजन के 1s-कक्षक के साथ सहभागिता करके अपने-अपने अष्टक पूर्ण कर लेते हैं। तथा सामान्य सूत्र EH, के हाइड्राइड बनाते हैं; जैसे- H2O, H2S, H2Se. H2Te तथा H2Po, इसलिए सामान्य सूत्र EH2 वाले हाइड्राइड बनाने के आधार पर इन तत्वों को समान वर्ग अर्थात् वर्ग 16 में रखा जाना पूर्णतया न्यायोचित है।

प्रश्न 18.
क्यों डाइऑक्सीजन एक गैस है, जबकि सल्फर एक ठोस है?
उत्तर
ऑक्सीजन pπ – pπ बहुल बन्ध बनाता है। छोटे आकार तथा उच्च विद्युत ऋणात्मकता के कारण ऑक्सीजन द्विपरमाणुक अणु (O2) के रूप में पाया जाता है। ये अणु परस्पर दुर्बल वाण्डर वाल्स आकर्षण बलों द्वारा जुड़े रहते हैं जो कमरे के ताप पर अणुओं के संघट्टों द्वारा सरलता से हट जाते हैं। अत: O2 कमरे के ताप पर एक गैस होती है।
सल्फर अपने विशाल आकार तथा कम विद्युत ऋणात्मकता के कारण pπ – pπ बहुल बन्ध नहीं बनाता है, अपितु यह S – S एकल बन्ध बनाते हैं। पुनः O – O एकल बन्धों से अधिक प्रबल S – S बन्धों के कारण सल्फर में श्रृंखलन का गुण ऑक्सीजन से अधिक होता है। अत: सल्फर श्रृंखलन की उच्च प्रवृत्ति तथा pπ – pπ बहुल बन्ध बनाने की अल्प प्रवृत्ति के कारण अष्टपरमाणुक अणु (S8) बनाता है जिसकी संकुचित वलय संरचना (puckered ring structure) होती है। विशाल आकार के कारण S8 अणुओं को परस्पर बाँधे रखने वाले आकर्षण बल पर्याप्त प्रबल होते हैं जिन्हें कमरे के ताप पर अणुओं के संघट्टों द्वारा नहीं हटाया जा सकता है। अत: सल्फर कमरे के ताप पर एक ठोस होता है।
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प्रश्न 19.
यदि O → O तथा O → O2- के इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी मान पता हों, जो क्रमशः 141 तथा 702 kJ mol-1 हैं तो आप कैसे स्पष्ट कर सकते हैं कि O2- स्पीशीज वाले ऑक्साइड अधिक बनते हैं न कि O वाले?
(संकेत-यौगिकों के बनने में जालक ऊर्जा कारक को ध्यान में रखिए।)
उत्तर
O2- मूलक युक्त ऑक्साइडों (अर्थात् MO प्रकार के ऑक्साइड) की जालक ऊर्जा (lattice energy) का मान O2- मूलक युक्त ऑक्साइडों (अर्थात् M2O प्रकार के ऑक्साइड) की जालक ऊर्जाओं से काफी अधिक होता है क्योंकि O2- तथा M2+ पर आवेश की मात्रा अधिक होती है। इसलिए O → O2- की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का मान O → O के सम्बन्धित मान की तुलना में काफी अधिक होने के बाद भी MO का निर्माण M2O के निर्माण की तुलना में ऊर्जा की दृष्टि से अधिक सम्भाव्य है। यही कारण है कि MO प्रकार के ऑक्साइडों की संख्या M2O प्रकार के ऑक्साइडों की तुलना में काफी अधिक है।

प्रश्न 20.
कौन-से ऐरोसॉल्स ओजोन को कम करते हैं?
उत्तर
क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) ऐरोसॉल जैसे-फ्रियोन (CCl2F2) वायुमण्डल के स्ट्रेटोस्फियर : (stratosphere) में उपस्थित ओजोन पर्त को विच्छेदित करते हैं। निहित अभिक्रियाएँ निम्न हैं –
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प्रश्न 21.
संस्पर्श प्रक्रम द्वारा H2SO4 के उत्पादन का वर्णन कीजिए। (2009, 12, 15, 16)
उत्तर
संस्पर्श विधि द्वारा H2SO4 का उत्पादन
(Production of H2SO4 by Contact Process)
सल्फ्यूरिक अम्ल का उत्पादन संस्पर्श प्रक्रम द्वारा तीन चरणों में सम्पन्न होता है।
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  1. सल्फर अथवा सल्फाइड अयस्कों को वायु में जलाकर सल्फर डाइऑक्साइड का उत्पादन करना।
  2. उत्प्रेरक (V2O5) की उपस्थिति में ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया कराकर SO2 का SO3 में परिवर्तन करना।
  3. SO3 को सल्फ्यूरिक अम्ल में अवशोषित करके ओलियम (H2S2O7) प्राप्त करना।

सल्फ्यूरिक अम्ल के उत्पादन का प्रवाह चित्र, चित्र-7 में दिया गया है।
प्राप्त सल्फर डाइऑक्साइड को धूल के कणों एवं आर्सेनिक यौगिकों जैसी अन्य अशुद्धियों से मुक्त कर शुद्ध कर लिया जाता है।
सल्फ्यूरिक अम्ल के उत्पादन में ऑक्सीजन द्वारा SO2 गैस का V2O5 उत्प्रेरक की उपस्थिति में SO3 प्राप्त करने के लिए उत्प्रेरकी ऑक्सीकरण मूल पद है।
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यह अभिक्रिया ऊष्माक्षेपी तथा उत्क्रमणीय है एवं अग्र अभिक्रिया में आयतन में कमी आती है। अतः कम ताप और उच्च दाब उच्च लब्धि (yield) के लिए उपयुक्त स्थितियाँ हैं, परन्तु तापक्रम बहुत कम नहीं होना चाहिए अन्यथा अभिक्रिया की गति धीमी हो जाएगी। सल्फ्यूरिक अम्ल के उत्पादन में प्रयुक्त संयन्त्र का संचालन 2 bar दाब तथा 720 K ताप पर किया जाता है। उत्प्रेरकी परिवर्तक से प्राप्त SO3 गैस, सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल,में अवशोषित होकर ओलियम (H2S2O7) बना देती है। जल द्वारा ओलियम का तनुकरण करके वांछित सान्द्रता वाला सल्फ्यूरिक अम्ल प्राप्त कर लिया जाता है। प्रक्रम के सतत संचालन तथा लागत में भी कमी लाने के लिए उद्योग में उपर्युक्त दोनों प्रक्रियाएँ साथ-साथ सम्पन्न की जाती हैं।

  • SO3 + H2SO4 → H2S2O7
  • H2S2O7 + H2O → 2 H2SO4

संस्पर्श विधि द्वारा सल्फ्यूरिक अम्ल की शुद्धता सामान्यतः 96 – 98% होती है।

प्रश्न 22.
SO2 किस प्रकार से एक वायु प्रदूषक है?
उत्तर
SO2 एक अत्यन्त हानिकारक गैस है। वायुमण्डल में इसकी उपस्थिति से श्वसन रोग, हृदय रोग, गले तथा आँखों में अनेक परेशानियाँ उत्पन्न होती हैं। यह अम्ल वर्षा (acid rain) का मुख्य कारण है। अम्ल वर्षा जन्तुओं, वनस्पतियों एवं भवनों के लिए अत्यन्त घातक है। अम्ल वर्षा से सम्बन्धित प्रकाश-रासायनिक अभिक्रियाएँ निम्न हैं –

  • SO2 + hv → SO2
  • SO2 + O2 → SO3 + O
  • SO2 + SO2 → SO3 + SO
  • SO + SO2 → SO3 + S
  • SO + H2O → H2SO4

इस प्रकार, SO2 एक घातक वायु प्रदूषक है।

प्रश्न 23.
हैलोजेन प्रबल ऑक्सीकारक क्यों होते हैं?
उत्तर
हैलोजेनों में अल्प आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी, उच्च विद्युत ऋणात्मकता तथा अधिक ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी के कारण इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके अपचयित होने की प्रबल प्रवृत्ति होती है।
X + e → X
अत: हैलोजेन प्रबल ऑक्सीकरण कर्मक या ऑक्सीकारक होते हैं। यद्यपि इनकी ऑक्सीकारक क्षमता F2 से I2 तक घटती है जैसा कि इनके इलेक्ट्रोड विभवों से सत्यापित होता है –
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इसलिए F2 प्रबलतम तथा I2 दुर्बलतम ऑक्सीकारक होता है।

प्रश्न 24.
स्पष्ट कीजिए कि फ्लुओरीन केवल एक ही ऑक्सो-अम्ल, HOF क्यों बनाता है?
उत्तर
फ्लोरीन सर्वाधिक विद्युत ऋणात्मक तत्त्व है और केवल -1 ऑक्सीकरण अवस्था ही प्राप्त कर सकती है। इसका परमाणु आकार भी काफी कम होता है। इस कारण यह उच्च ऑक्सी अम्लों जैसे- HOXO, HOXO2 तथा HOXO3 आदि में केन्द्रीय परमाणु के रूप में स्थित नहीं हो पाती है और केवल एक ही ऑक्सी अम्ल HOF का निर्माण करती है। इस अम्ल में इसकी ऑक्सीकरण अवस्था-1 है।

प्रश्न 25.
व्याख्या कीजिए कि क्यों लगभग एकसमान विद्युत ऋणात्मकता होने के पश्चात् भी नाइट्रोजन हाइड्रोजन आबन्ध निर्मित करता है, जबकि क्लोरीन नहीं।
उत्तर
यद्यपि O तथा Cl दोनों की विद्युत ऋणात्मकताओं के मान लगभग समान हैं, तथापि उनके परमाणु आकार काफी भिन्न होते हैं (O = 66 pm, Cl = 99 pm)। इस कारण Cl परमाणु की तुलना में O परमाणु पर इलेक्ट्रॉन घनत्व का मान काफी अधिक होता है। इस कारण ही ऑक्सीजन तो हाइड्रोजन बन्ध बनाने में सक्षम है, लेकिन Cl नहीं।

प्रश्न 26.
ClO2 के दो उपयोग लिखिए।
उत्तर

  1. ClO2 एक शक्तिशाली ऑक्सीकारक तथा क्लोरीनीकारक है। अत: इसका उपयोग जल के शुद्धीकरण में किया जाता है।
  2. यह एक उत्कृष्ट विरंजक (bleaching agent) है और इसका उपयोग कागज की लुगदी तथा वस्त्रों के विरंजन में किया जाता है।

प्रश्न 27.
हैलोजेन रंगीन क्यों होते हैं? (2014)
उत्तर
सभी हैलोजेन रंगीन होते हैं। इसका कारण यह है कि इनके अणु दृश्य क्षेत्र में प्रकाश अवशोषित कर लेते हैं जिसके फलस्वरूप इनके इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर उच्च ऊर्जा स्तरों में चले जाते हैं, जबकि शेष प्रकाश उत्सर्जित हो जाता है। हैलोजेनों का रंग वास्तव में इस उत्सर्जित प्रकाश का रंग होता है। उत्तेजन के लिए आवश्यक ऊर्जा की मात्रा परमाणु आकार के अनुसार F से I तक लगातार घटती है, अतः उत्सर्जित प्रकाश की ऊर्जा F से I तक बढ़ती है। दूसरे शब्दों में, हैलोजेन का रंग F2 से I2 तक गहरा होता जाता है।
उदाहरणार्थ– F2 बैंगनी प्रकाश अवशोषित करके हल्का पीला दिखाई देता है, जबकि आयोडीन पीला तथा हरा प्रकाश अवशोषित करके गहरा बैंगनी रंग का प्रतीत होता है। इसी प्रकार हम Cl2 के हरे-पीले तथा ब्रोमीन के नारंगी-लाल रंग की व्याख्या कर सकते हैं।

प्रश्न 28.
जल के साथ F2 तथा Cl2 की अभिक्रियाएँ लिखिए।
उत्तर
प्रबल ऑक्सीकारक होने के कारण F, जल को 0, या 0; में ऑक्सीकृत कर देता है।

  • 2F2 (g) + 2H2O (l) → 4HF (aq) + O2 (g)
  • 3F2 (g) + 3H2O (l) → 6HF (aq) + O3 (g)

Cl2 जल से क्रिया कर हाइड्रोक्लोरिक तथा हाइपोक्लोरस अम्लों का निर्माण करता है।
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प्रश्न 29.
आप HCl से Cl2 तथा Cl2 से HCl को कैसे प्राप्त करेंगे? केवल अभिक्रियाएँ लिखिए।
उत्तर

  1. HCl से cl2 :
    • MnO2 (s) + 4HCl (aq) → MnCl2 (aq) + 2H2O (l) + Cl2 (g)
  2. Cl2 से HCl :
    • Cl2 (g) + H2 (g) → 2HCl (g)

प्रश्न 30.
एन-बार्टलेट Xe तथा PtF6 के बीच अभिक्रिया कराने के लिए कैसे प्रेरित हुए?
उत्तर
नील बार्टलेट ने प्रेक्षित किया कि PtF6 की अभिक्रिया O2 से होने पर एक आयनिक ठोस O+2PtF6 प्राप्त होता है।
O2 (g) + PtF(g) → O+2[PtF6]
यहाँ O2, PtF6 द्वारा O+2 में ऑक्सीकृत हो जाता है।

बार्टलेट ने पाया कि Xe की प्रथम आयनन एन्थैल्पी (1170 kJ mol-1) O2 अणुओं की प्रथम आयनन एन्थैल्पी (1175 kJ mol-1) के लगभग समान है, इसलिए PtF6 द्वारा Xe को Xe+ में ऑक्सीकृत करना चाहिए। इस प्रकार वे Xe तथा PtF6 के बीच अभिक्रिया कराने के लिए प्रेरित हुए। जब Xe तथा PtF6 को मिश्रित किया गया, तब एक तीव्र अभिक्रिया हुई तथा सूत्र Xe+PtF6 का एक लाल ठोस पदार्थ प्राप्त हुआ।
Xe + PtF6 [latex]\underrightarrow { 278K } [/latex] xe+ [PtF6]

प्रश्न 31.
निम्नलिखित में फॉस्फोरस की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ क्या हैं?
(i) H2PO2
(ii) PCl3
(iii) Ca3P2
(iv) Na3PO4
(v) POF3
उत्तर
माना कि फॉस्फोरस की ऑक्सीकरण अवस्था : है –
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प्रश्न 32.
निम्नलिखित के लिए सन्तुलित समीकरण दीजिए –
(i) जब NaCl को MnO2 की उपस्थिति में सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गर्म किया जाता है।
(ii) जब क्लोरीन गैस को NaI के जलीय विलयन में से प्रवाहित किया जाता है।
उत्तर
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(ii) Cl(g) + 2NaI (aq) → 2NaCl (aq) + I2 (s)

प्रश्न 33.
जीनॉन फ्लुओराइड XeF2, XeF4 तथा XeF6 कैसे बनाए जाते हैं?
उत्तर
जीनॉन फ्लुओराइडों को Xe तथा F2 के मध्य विभिन्न परिस्थितियों में सीधे अभिक्रिया द्वारा प्राप्त किया जाता है।

  • Xe (g) + F2 (g) [latex]\underrightarrow { 673K,1bar } [/latex] XeF(s)
  • Xe (g) + 2F2 (g) [latex]\underrightarrow { 873K,7bar } [/latex] XeF4 (s)
  • Xe (g) + 3F2 (g) [latex]\underrightarrow { 573K,60-70bar } [/latex] XeF6 (s)

प्रश्न 34.
किस उदासीन अणु के साथ ClO समइलेक्ट्रॉनी है? क्या यह अणु एक लूइस क्षारक है?
उत्तर
ClO में कुल 17 + 8 + 1 = 26 इलेक्ट्रॉन हैं। यह ClF अणु से समइलेक्ट्रॉनिक है क्योंकि ClF में भी 17 + 9 = 26 इलेक्ट्रॉन उपस्थित हैं। ClF एक लूइस बेस की भाँति व्यवहार करता है क्योंकि [latex s=2] _{ . }^{ . }{ { \overset { .. }{ \underset { .. }{ Cl } } } } [/latex] – F में क्लोरीन परमाणु पर इलेक्ट्रॉनों के तीन एकल युग्म (lone pairs) उपस्थित हैं। यह पुनः F से क्रिया कर ClF3 बना सकती है।

प्रश्न 35.
XeO3 तथा XeF4 किस प्रकार बनाए जाते हैं?
उत्तर
XeF4 तथा XeF6 के जल-अपघटन पर XeO3 बनता है।

  • 6XeF4 + 12H2O → 4Xe + 2XeO3 + 24HF + 3O2
  • XeF6 + 3H2O → XeO3 + 6HF

जीनॉन तथा फ्लु ओरीन को 1 : 5 अनुपात में लेकर 873 K तथा 7 bar पर अभिक्रिया कराने पर XeF4 बनता है।
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प्रश्न 36.
निम्नलिखित प्रत्येक समुच्चय को सामने लिखे गुणों के अनुसार सही क्रम में व्यवस्थित कीजिए –

  1. F2, Cl2, Br2, I2 – आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी बढ़ते क्रम में।
  2. HF, HCl, HBr, HI – अम्ल सामर्थ्य बढ़ते क्रम में।
  3. NH3, PH3, AsH3, SbH3, BiH3 – क्षारक सामर्थ्य बढ़ते क्रम में।

उत्तर
1. F2 से I2 तक आबन्ध दूरी बढ़ने पर आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी घटती है क्योंकि F से I की ओर जाने पर परमाणु के आकार में वृद्धि होती है। यद्यपि F-F आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी, Cl – Cl की तुलना में कम होती है तथा Br – Br की आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी से भी कम होती है। इसका कारण यह है कि F परमाणु अत्यधिक छोटा होता है तथा प्रत्येक F परमाणु पर इलेक्ट्रॉनों के तीन एकाकी युग्म F2 अणु में F-परमाणुओं को बाँधे रखने वाले आबन्ध युग्मों को प्रतिकर्षित करते हैं। अत: आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी का बढ़ता क्रम इस प्रकार होता है- I2 < F2 < Br2 < Cl2.

2. HF, HCl, HBr, HI की आपेक्षिक अम्ल सामर्थ्य इनकी आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी पर निर्भर करती है। F से I तक परमाणु का आकार बढ़ने पर H-X आबन्ध की आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी H – F से H – I तक घटती है। इसलिए अम्ल सामर्थ्य विपरीत क्रम में इस प्रकार बढ़ता है –
HF < HCl < HBr < HI.

3. NH3, PH3, AsH3, BiH3 में केन्द्रीय परमाणु पर इलेक्ट्रॉनों के एकाकी युग्म की उपस्थिति के कारण ये सभी लुईस क्षारों की भाँति व्यवहार करते हैं। यद्यपि NH3 से BiH3 तक जाने पर परमाणु का आकार बढ़ता है, परिणामस्वरूप इलेक्ट्रॉनों का एकाकी युग्म अधिक आयतन घेर लेता है। दूसरे शब्दों में, केन्द्रीय परमाणु पर इलेक्ट्रॉन घनत्व घटता है तथा क्षारक सामर्थ्य NH3 से BiH3 तेक घटती है, इसलिए क्षारक सामर्थ्य का बढ़ता क्रम है- BiH3 < SbH3 < AsH3 < PH3 < NH3 .

प्रश्न 37.
निम्नलिखित में से कौन-सा एक अस्तित्व में नहीं है?

  1. XeOF4
  2. NeF2
  3. XeF2
  4. XeF6.

उत्तर
NeF2 अस्तित्व में नहीं है। इसका कारण यह है कि फ्लोरीन Ne को Ne+2 में ऑक्सीकृत नहीं कर सकता क्योंकि Ne की प्रथम तथा द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के योग का मान Xe की तुलना में काफी अधिक है। इसलिए XeF2, XeOF4, तथा XeF6 प्राप्त किये जा सकते हैं, लेकिन NeF2 नहीं।

प्रश्न 38.
उस उत्कृष्ट गैस स्पीशीज का सूत्र देकर संरचना की व्याख्या कीजिए जो कि इनके साथ समसंरचनीय है –

  1. ICl4
  2. IBr2
  3. BrO3

उत्तर
1. ICl4, XeF4 से समइलेक्ट्रॉनिक है। दोनों वर्ग समतलीय हैं।
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2. IBr2, XeF2 से समइलेक्ट्रॉनिक है। दोनों रेखीय हैं।
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3. BrO3, XeO3 से समइलेक्ट्रॉनिक है। दोनों पिरामिडीय आकृति के होते हैं।
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प्रश्न 39.
उत्कृष्ट गैसों के परमाण्विक आकार तुलनात्मक रूप से बड़े क्यों होते हैं?
उत्तर
उत्कृष्ट गैसों की परमाण्विक त्रिज्या अपने सम्बन्धित आवर्गों में सर्वाधिक होती है। इसका कारण यह है कि उत्कृष्ट गैसों की त्रिज्या केवल वाण्डर वाल्स त्रिज्या होती है (क्योंकि ये अणु नहीं बनाती हैं), जबकि अन्यों की सहसंयोजक त्रिज्याएँ होती है। वाण्डर वाल्स त्रिज्या सहसंयोजक त्रिज्या से अधिक होती है, अतः उत्कृष्ट गैसों के परमाण्विक आकार तुलनात्मक रूप से बड़े होते हैं।

प्रश्न 40.
निऑन तथा आर्गन गैसों के उपयोग सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर
निऑन के उपयोग (Uses of Neon) –

  1. निऑन का उपयोग विसर्जन ट्यूब तथा प्रदीप्त बल्बों में विज्ञापन प्रदर्शन हेतु किया जाता है।
  2. निऑन बल्बों का उपयोग वनस्पति उद्यान तथा ग्रीन हाउस में किया जाता है।

आर्गन के उपयोग (Uses of Argon) –

  1. आर्गन का उपयोग उच्चताप धातुकर्मीय प्रक्रमों में अक्रिय वातावरण उत्पन्न करने के लिए किया जाता है ( धातुओं तथा उपधातुओं के आर्क वेल्डिंग में)।
  2. इसका उपयोग विद्युत-बल्ब को भरने के लिए किया जाता है।
  3. प्रयोगशाला में इसका उपयोग वायु सुग्राही पदार्थों के प्रबन्धन में भी किया जाता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
निम्नलिखित में सर्वाधिक स्थायी है – (2017)
(i) AsH3
(ii) SbH3
(iii) pH3
(iv) NH3
उत्तर
(iv) NH3

प्रश्न 2.
सफेद फॉस्फोरस को किस द्रव में रखते हैं? (2012)
(i) जल
(ii) केरोसीन
(iii) एथिल ऐल्कोहॉल
(iv) क्लोरोफॉर्म
उत्तर
(i) जल

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से किसकी अभिक्रिया से फॉस्फोरस से फॉस्फीन बनाया जाता है? (2017)
(i) HCl
(ii) NaOH
(iii) CO2
(iv) CO2
उत्तर
(ii) NaOH

प्रश्न 4.
अमोनिया और फॉस्फीन गैसों के कौन-से निम्नलिखित गुण में भिन्नता है? (2011)
(i) अणु संरचनाओं में
(ii) क्लोरीन के साथ अभिक्रियाओं में
(iii) अपचायक गुण में
(iv) वायु में जलने में
उत्तर
(iv) वायु में जलने में

प्रश्न 5.
SO2 अणु में सल्फर परमाणु का संकरण है – (2017)
(i) sp
(ii) SP2
(iii) sp3
(iv) sp3d
उत्तर
(ii) sp2

प्रश्न 6.
प्रबल विद्युत ऋणात्मक हैलोजन है – (2017)
(i) F2
(ii) Cl2
(iii) Br2
(iv) I2
उत्तर
(i) F2

प्रश्न 7.
सर्वाधिक इलेक्ट्रॉन बन्धुता वाला तत्त्व है –
(i) N
(ii) 0
(iii) Cl
(iv) F
उत्तर
(iii) Cl

प्रश्न 8.
F, Ci, Br तथा I तत्त्वों के इलेक्ट्रॉन बन्धुता का सही क्रम है – (2016)
(i) F > Cl > Br > I
(ii) I > Br > Cl > F
(iii) F > Br > Cl > I
(iv) F > Cl > Br > I
उत्तर
(i) F > Cl > Br > I

प्रश्न 9.
निम्न में से कौन-सा कथन सही है? (2012)
(i) NO2 नाइट्रिक अम्ल का ऐनहाइड्राइड है
(ii) CO फॉर्मिक अम्ल का ऐनहाइड्राइड है
(iii) Cl2O3 हाइपोक्लोरस अम्ल का ऐनहाइड्राइड है
(iv) Cl2O7 परक्लोरिक अम्ल का ऐनहाइड्राइड है
उत्तर
(iv) Cl2O7 परक्लोरिक अम्ल का ऐनहाइड्राइड है

प्रश्न 10.
निम्न में से विस्फोटक है – (2013)
(i) Hg2Cl2
(ii) PCl3
(iii) NCl3
(iv) SbCl3
उत्तर
(iii) NCl3

प्रश्न11.
क्लोरीन का प्रबलतम ऑक्सी अम्ल है – (2016)
(i) HClO2
(ii) HClO4
(iii) HClO
(iv) HClO3
उत्तर
(ii) HClO4

प्रश्न12.
निष्क्रिय गैसों की खोज का श्रेय जाता है – (2012)
(i) रैले को
(ii) विलियम रैमसे को
(iii) जॉनसन को
(iv) डेवार को
उत्तर
(i) रैले को

प्रश्न 13.
वायुमण्डल में सर्वाधिक पायी जाने वाली गैस है – (2017)
(i) हीलियम
(ii) निऑन
(iii) आर्गन
(iv) क्रिप्टन
उत्तर
(iii) आर्गन

प्रश्न14.
निम्न में से कौन-सी गैस वायुयानों के टायरों में भरी जाती है? (2012)
(i) H,
(ii) He
(iii) Np
(iv) Ar
उत्तर
(ii) He

प्रश्न15.
वायुमण्डल में पायी जाने वाली अक्रिय गैस है – (2011)
(i) He तथा Ne
(ii) He, Ne तथा Ar
(iii) He, Ne, Ar तथा Kr
(iv) Rn को छोड़कर सभी
उत्तर
(iv) Rn को छोड़कर सभी

प्रश्न16.
हीलियम का मुख्य स्रोत है – (2012)
(i) वायु
(ii) मोनाजाइट रेत
(iii) रेडियम
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ii) मोनोजाइट रेत

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अमोनिया की क्लोरीन से क्या अभिक्रिया होती है? (2014)
उत्तर
अमोनिया की क्लोरीन से अभिक्रिया निम्नलिखित दो प्रकार से होती है –

  1. जब अमोनिया आधिक्य में होती है तो N2 तथा NH4Cl प्राप्त होते हैं।
    • 8 NH3 + 3 Cl2 → N2 ↑ + 6 NH4Cl
  2. जब क्लोरीन आधिक्य में होती है तो NCl3 तथा HCl प्राप्त होते हैं।
    • NH3 + 3 Cl2 → NCl3 + 3 HCl

प्रश्न 2.
नाइट्रस अम्ल, ऑक्सीकारक एवं अपचायक दोनों के रूप में कार्य करता है। प्रत्येक को एक-एक उदाहरण देकर समझाइए। (2010, 12)
उत्तर
नाइट्रस अम्ल अपघटित होकर नवजात ऑक्सीजन देता है
2HNO2 → 2NO ↑ + [O] + H2O
नवजात ऑक्सीजन विभिन्न पदार्थों को ऑक्सीकृत कर देती है। इसके विपरीत यह प्रबल ऑक्सीकारकों के प्रति अपचायक का कार्य भी करती है, क्योंकि यह उनमें नवजात ऑक्सीजन ग्रहण करके स्वयं नाइट्रिक अम्ल में बदल जाती है।
HNO2 + [O] → HNO3
उदाहरण –

  1. ऑक्सीकारक गुण – नाइट्रस अम्ल सल्फर डाइऑक्साइड को सल्फ्यूरिक अम्ल में ऑक्सीकृत कर देता है।
    • SO2 + 2HNO2 → H2SO4 + 2NO
  2. अपचायक गुण – नाइट्रस अम्ले H2O2 को H2O में अपचयित कर देता है।
    • H2O2 + HNO2 → HNO3 + H2O

प्रश्न 3.
फॉस्फोरस के अपररूप लिखिए। (2017)
उत्तर
फॉस्फोरस के तीन मुख्य अपररूप निम्नवत् हैं –

  1. सफेद या पीला फॉस्फोरस
  2. लाल फॉस्फोरस
  3. काला फॉस्फोरस

प्रश्न 4.
सफेद फॉस्फोरस से लाल फॉस्फोरस कैसे प्राप्त किया जाता है? (2015)
उत्तर
सफेद फॉस्फोरस को निष्क्रिय वातावरण में 240°C ताप पर गर्म करने से वह लाल फॉस्फोरस में बदल जाता है।
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प्रश्न 5.
फॉस्फोरस के निम्नलिखित ऑक्सी अम्लों के संरचना सूत्र लिखिए – (2017)
(i) हाइपो फॉस्फोरिक अम्ल
(ii) फॉस्फोरिक अम्ल
(iii) ऑर्थों फॉस्फोरिक अम्ल
(iv) पाइरो फॉस्फोरिक अम्ल
उत्तर
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प्रश्न 6.
एक अभिक्रिया लिखिए जिसमें ओजोन अपचायक हो परन्तु स्वयं भी अपचयित होती है – (2017)
उत्तर
ओजोन हाइड्रोजन परॉक्साइड को जल में अपचयित करती है और स्वयं भी अपचयित हो जाती है।
H2O2 + O3 → 2O2 ↑ + H2O

प्रश्न 7.
सल्फर के किन्हीं चार ऑक्सी अम्लों के नाम लिखिए। (2017)
उत्तर

  1. H2SO4 (सल्फ्यूरिक अम्ल)
  2. H2S2O7 (डाइसल्फ्यूरिक अम्ल)
  3. H2S2O3 (थायोसल्फ्यूरिक अम्ल)
  4. H2S2O6 (डाइथायोनिक अम्ल)

प्रश्न 8.
रासायनिक समीकरण देते हुए SO2 की विरंजक क्रिया का कारण समझाइए। (2012, 17)
उत्तर
SO2 अपचयन के आधार पर विरंजक गुण व्यक्त करती है।
SO2 + 2H2O → H2SO4 + 2[H]
रंगीन पदार्थ + [H] → रंगहीन पदार्थ

प्रश्न 9.
जल की अपेक्षा आयोडीन, KI विलयन में क्यों अधिक विलेय है? (2009)
उत्तर
जल के द्वारा आयोडीन का बिल्कुल भी अपघटन नहीं होता है जबकि आयोडीन KI विलयन में घुलकर भूरे रंग का पोटैशियम ट्राइआयोडाइड (KI3) संकर यौगिक बनाती है।
KI + I2 → KI3

प्रश्न10.
सामान्य ताप एवं दाब पर ब्रोमीन एक द्रव है जबकि आयोडीन ठोस। कारण स्पष्ट कीजिए। (2014)
उत्तर
आयोडीन का अणुभार तथा आकार दोनों ब्रोमीन से अधिक हैं चूंकि आयोडीन अणु के मध्य लगने वाला आणविक आकर्षण बल ब्रोमीन की तुलना में अधिक है, इसलिए आयोडीन ठोस तथा ब्रोमीन द्रव है।

प्रश्न 11.
हैलोजनों के दो ऑक्सी अम्लों के संरचना सूत्र लिखिए। (2016, 17)
उत्तर
हैलोजनों के दो ऑक्सी अम्लों के संरचना सूत्र निम्नवत् हैं –
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 43

प्रश्न 12.
HCl का क्वथनांक HF से कम क्यों होता है? (2016)
उत्तर
हाइड्रोजन हैलाइडों के क्वथनांक HCl से HI तक बढ़ते हैं। HF का क्वथनांक अन्तराअणुक हाइड्रोजन आबन्धन के कारण अपसामान्य रूप से इन सबसे उच्च है।

प्रश्न 13.
उत्कृष्ट प्रैसे क्या होती हैं? उत्कृष्ट गैसों के नाम लिखिए। (2009)
उत्तर
आवर्त सारणी में शून्य वर्ग के तत्त्वों को उत्कृष्ट गैसें कहते हैं, क्योंकि ये तत्त्व रासायनिक रूप से अक्रिय होते हैं। हीलियम, आर्गन, निऑन, रेडॉन, क्रिप्टॉन तथा जीनॉन उत्कृष्ट गैसें हैं।

प्रश्न 14.
अक्रिय गैसों की चार विशेषताएँ/गुण लिखिए। (2009, 10)
उत्तर
अक्रिय गैसों के गुण

  1. ये रंगहीन, गंधहीन तथा स्वादहीन गैसें हैं।
  2. इनकी अन्तिम कक्षा का विन्यास ns2np6 (हीलियम को छोड़कर) होता है।
  3. इनकी संयोजकता शून्य होती है।
  4. ये एक परमाणुक गैसें हैं, जिनकी विशिष्ट ऊष्माओं का अनुपात (Cp/Cυ) 1.66 होता है।

प्रश्न15.
अक्रिय गैसों की इलेक्ट्रॉन बन्धुता शून्य क्यों होती है? (2017)
उत्तर
क्योंकि इनके अन्दर और बाहर के सभी कोश पूर्ण रूप से भरे होते हैं।

प्रश्न 16.
उत्कृष्ट गैसें अक्रिय क्यों होती हैं? इनके द्वारा बनाये गये दो यौगिकों के सूत्र लिखिए। (2010, 13, 16)
उत्तर
उत्कृष्ट या अक्रिय गैसों के सभी कक्ष पूर्णतया भरे होने के कारण ये संतृप्त होती हैं और इसी कारण रासायनिक रूप से निष्क्रिय होती हैं। इन तत्त्वों के आयनन विभव स्थायी इलेक्ट्रॉन कक्ष होने के कारण उच्च होते हैं, अतः ये रासायनिक क्रिया में भाग नहीं लेते हैं। इनके द्वारा बनाये गये दो यौगिक क्रमश: WHe2 व Ar6H2O हैं।

प्रश्न 17.
उत्कृष्ट गैसों के आयनन विभव के मान ऊँचे होते हैं? समझाइए। (2013, 15)
उत्तर
उत्कृष्ट गैसों के उच्च आयनन विभव इनके छोटे आकार के कारण होते हैं।

प्रश्न 18.
कारण सहित स्पष्ट कीजिए कि He उत्कृष्ट गैसों में सबसे ज्यादा निष्क्रिय है। (2013)
उत्तर
उत्कृष्ट गैसों की आयनन ऊर्जाओं का क्रम निम्नवत् होता है –
He > Ne > Ar > Kr > Xe > Rn.
इससे स्पष्ट है कि He की आयनन ऊर्जा सर्वोच्च है। अत: इसमें से इलेक्ट्रॉन निष्कासित करना आसान नहीं है। इसी के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि He उत्कृष्ट गैसों में सबसे ज्यादा निष्क्रिय है।

प्रश्न 19.
He और Ne फ्लोरीन के साथ यौगिक नहीं बनाते हैं क्यों? (2017)
उत्तर
He और Ne के फ्लोरीन के साथ यौगिक न बनाने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

  1. छोटा आकार
  2. d कक्षक की अनुपस्थिति
  3. उच्च आयनन ऊर्जा

प्रश्न 20.
अक्रिय गैसों में सबसे अधिक यौगिक बनाने वाली अर्थात् सबसे अधिक क्रियाशील गैस का नाम एवं इसके कोई भी दो यौगिकों के सूत्र लिखिए। (2009, 11, 12)
उत्तर
जीनॉन। यौगिक :

  • जीनॉन डाइफ्लुओराइड (XeF2)
  • जीनॉन टेट्राफ्लुओराइड (XeF4)

प्रश्न 21.
हीलियम तथा निऑन के मिश्रण को पृथक् करने की विधि लिखिए। (2011)
उत्तर
हीलियम तथा निऑन के मिश्रण को 180°C पर चारकोल के सम्पर्क में लाने पर He मुक्त हो। जाती है तथा निऑन अधिशोषित हो जाती है। इसको गर्म करने पर निऑन प्राप्त की जा सकती है।

प्रश्न 22.
निष्क्रिय वातावरण के लिए किस अक्रिय गैस का प्रयोग किया जाता है और क्यों? (2012)
उत्तर
आर्गन को, क्योंकि यह किसी पदार्थ से क्रिया नहीं करती है।

प्रश्न 23.
रेडॉन की खोज किसने की? इसका किस रोग के उपचार में उपयोग किया जाता है? (2010, 12, 17)
उत्तर
रेडॉन (Rn) की खोज डॉर्न ने की थी। इसका प्रयोग कैंसर के उपचार में किया जाता है।

प्रश्न 24.
88Ra266 से प्राप्त होने वाली अक्रिय गैस का नाम तथा इसका प्रमुख उपयोग लिखिए। (2012)
उत्तर
88Ra266 के रेडियोऐक्टिव विघटन से रेडॉन (Rn) गैस प्राप्त होती है।
88Ra266 → 86Ra222 + 2He4
इसका उपयोग कैंसर के उपचार में तथा रेडियोऐक्टिवता के शोध कार्य में किया जाता है।

प्रश्न 25.
क्लीवाइट खनिज में कौन-सी अक्रिय गैस पाई जाती है? इस गैस का एक उपयोग लिखिए। (2018)
उत्तर
क्लीवाइट खनिज में हीलियम गैस पाई जाती है। यह गैस वायुयान के टायरों में भरी जाती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
NF5 नहीं बनता है जबकि PF ज्ञात है। समझाइए। (2014)
उत्तर
नाइट्रोजन (N) 1s2,2s2,2p3 में निम्न ऊर्जा का रिक्त d-कक्षक उपलब्ध नहीं होता है इसलिए नाइट्रोजन अपने अष्टक का प्रसार नहीं कर पाता है अर्थात् अपने वाह्य कोश में 8 से अधिक इलेक्ट्रॉन नहीं रख सकता है जिसके कारण NF5 नहीं बन पाता है।
चूँकि फॉस्फोरस में निम्न ऊर्जा का रिक्त 3d -कक्षक उपलब्ध है इसलिए यह अपने अष्टक का प्रसार करता है अर्थात् अपने बाह्य कोश में 8 से अधिक इलेक्ट्रॉन रख सकता है जिसके कारण PF5 बनता है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 44
PF5 में फॉस्फोरस के पाँच सहसंयोजक हैं तथा फॉस्फोरस के बाह्य कोश में कुल 10 इलेक्ट्रॉन हैं।

प्रश्न 2.
अमोनिया तथा फॉस्फीन बनाने की प्रयोगशाला विधि का रासायनिक समीकरण लिखिए तथा सफेद फॉस्फोरस की क्लोरीन से अभिक्रिया का रासायनिक समीकरण भी लिखिए। (2016)
उत्तर
अमोनिया गैस बनाने की प्रयोगशाला विधि का रासायनिक समीकरण – प्रयोगशाला में अमोनिया गैस अमोनियम क्लोराइड को बुझे हुए चूने के साथ गर्म करके बनायी जाती है।
2NH4Cl + Ca(OH)2 → CaCl2 + 2NH3 + 2H2O

फॉस्फीन गैस बनाने की प्रयोगशाला विधि का रासायनिक समीकरण – प्रयोगशाला में फॉस्फीन गैस वायु की अनुपस्थिति में सफेद फॉस्फोरस को सान्द्र कास्टिक सोडा विलयन के साथ गर्म करके बनायी जाती है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 45
सफेद फॉस्फोरस की क्लोरीन से अभिक्रिया का रासायनिक समीकरण – सफेद फॉस्फोरस साधारण ताप पर क्लोरीन गैस में स्वत: जलने लगता है।
P4 + 6Cl2 → 4PCl3
P4 + 10Cl2 → 4PCl5

प्रश्न 3.
फॉस्फीन बनाने की प्रयोगशाला विधि का सचित्र वर्णन कीजिए। इसके दो गुण एवं उपयोग लिखिए। (2009, 10, 12, 13, 16, 17, 18)
उत्तर
प्रयोगशाला में फॉस्फीन को सान्द्र सोडियम हाइड्रॉक्साइड को अक्रिय वातावरण में सफेद फॉस्फोरस के साथ उबालकर प्राप्त करते हैं।
P4 + 3NaOH + 3H2O → 3NaH2PO2 + PH3
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 46
इसके दो प्रमुख गुण निम्नवत् हैं –

  1. यह वायु से भारी तथा जल में अल्प विलेय होती है।
  2. यह विषैली प्रकृति की होती है।

इसके दो प्रमुख उपयोग निम्नवत् हैं –

  1. इसका उपयोग धातुओं के फॉस्फाइड बनाने में किया जाता है।
  2. इसका उपयोग समुद्री यात्राओं में होम्ज सिग्नल के लिए किया जाता है।

प्रश्न 4.
अमोनिया तथा फॉस्फीन के दो रासायनिक विभेदीय परीक्षण लिखिए। (2014)
उत्तर

  1. अमोनिया जलीय कॉपर सल्फेट के साथ गहरा नीला विलयन बनाती है जबकि फॉस्फीन जलीय कॉपर सल्फेट के साथ कॉपर फॉस्फाइड बनाती है।
  2. अमोनिया सान्द्र HCl के साथ सघन श्वेत धूम देती है जबकि फॉस्फीन HCl से क्रिया करके फॉस्फोनियम क्लोराइड बनाती है।

प्रश्न 5.
होम्ज सिग्नल में किस गैस का प्रयोग किया जाता है और कैसे? (2010)
उत्तर
होम्ज सिग्नल में फॉस्फीन गैस का प्रयोग किया जाता है। इस कार्य के लिए कैल्सियम फॉस्फाइड व कैल्सियम कार्बाइड से भरे हुए दो डिब्बे छेद करके समुद्र में डाल दिये जाते हैं। जल के सम्पर्क में आने पर फॉस्फीन तथा ऐसीटिलीन दोनों ही साथ-साथ जलती हैं।

  • Ca3P2 + 6H2O → 3Ca(OH)2 + 2PH3
  • CaC2 + 2H2O → Ca(OH)2 + C2H2 ↑

फॉस्फीन शीघ्र ज्वलनशील होने के कारण ऐसीटिलीन को जला देती है जिससे प्रकाश उत्पन्न होता है तथा दूर से ऐसा लगता है कि समुद्र में आग लग रही है। इस प्रकार से सूचना समुद्री जहाज के चालकों को मिल जाती है।

प्रश्न 6.
डाइऑक्सीजन के विरचन की प्रमुख विधियाँ तथा इसके रासायनिक गुण एवं उपयोग लिखिए। (2016)
उत्तर
विरचन की विधियाँ

  1. ब्रिन विधि – बेरियम ऑक्साइड वायु में 500°C पर गर्म करने पर बेरियम परॉक्साइड में बदल जाता है तथा बेरियम परॉक्साइड 800°C पर गर्म करने से पुन: BaO और O2 में अपघटित हो जाता है।
    • 2 BaO + O2 [latex]\underrightarrow { { 500 }^{ 0 }C } [/latex] 2BaO2
    • 2BaO2 [latex]\underrightarrow { { 800 }^{ 0 }C } [/latex] 2BaO + O2
  2. प्रयोगशाला विधि – प्रयोगशाला में ऑक्सीजन गैस पोटैशियम क्लोरेट और मैंगनीज डाइऑक्साइड के मिश्रण को 340°C तक गर्म करके बनायी जाती है।
    UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 47

रासायनिक गुण
ऑक्सीकारक गुण – लगभग सभी तत्त्व ऑक्सीजन से सीधे संयोग करके ऑक्साइड बनाते हैं।

  1. C + O2 → CO2 + ऊष्मा + प्रकाश
  2. S + O2 → SO2 + ऊष्मा + प्रकाश
  3. 4P + SO2 → 2P2O5 + ऊष्मा + प्रकाश
  4. 3Fe + 2O2 → Fe3O4
  5. CH4 + 2O2 → CO2 + 2H2O

उपयोग

  1. ऑक्सीकारक के रूप में
  2. श्वसन में,
  3. रासायनिक उद्योगों में
  4. ऑक्सी-ऐसीटिलीन ज्वाला प्राप्त करने में

प्रश्न 7.
सीमेन्स और हाल्सके ओजोनाइजर द्वारा ओजोन के निर्माण का सचित्र वर्णन कीजिए तथा पोटैशियम फैरोसायनाइड और स्टेनस क्लोराइड पर इसकी अभिक्रियाओं के रासायनिक समीकरण लिखिए। (2016)
उत्तर
सीमेन्स और हाल्सके ओजोनाइजर द्वारा ओजोन का औद्योगिक निर्माण – ओजोन का औद्योगिक निर्माण सीमेन्स और हाल्सके (Siemens and Halske) ओजोनाइजर द्वारा किया जाता है। इस ओजोनाइजर की रचना संलग्न चित्र में प्रदर्शित है। यह ओजोनाइजर लोहे का एक बॉक्स होता है जिसमें काँच या पॉर्सिलेने की कई बेलनाकार नलियाँ होती हैं। इन नलियों में ऐलुमिनियम की छड़े लगी होती हैं। जिनका निचला सिरा काँच की प्लेट पर टिका रहता है। ये छड़े इलेक्ट्रोडों का कार्य करती हैं।

उपकरण को ठण्डा रखने के लिए बेलनाकार नलियों के चारों ओर ठण्डा जल लगातार प्रवाहित किया जाता है। लोहे के बॉक्स को भू-सम्पर्कित करके छड़ों को लगभग 10 हजार वोल्ट के विभव पर रखा जाता है। ओजोनाइजर के निचले भाग से शुद्ध और शुष्क ऑक्सीजन गैस की मन्द धारा ओजोनाईजर में प्रवाहित की जाती है। छड़ों और नलियों के बीच के वलयाकार अन्तराल (annular space) में ऑक्सीजन प्रवेश करती है तथा ऊपर की ओर उठती है और ओजोन में परिवर्तित हो जाती है। बाहर निकलने वाली ओजोनित ऑक्सीजन में ओजोन आयतन से 10% तक होती है।
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ओजोन की पोटैशियम फैरोसायनाइड से अभिक्रिया
यह पोटैशियम फैरोसायनाइड को पोटैशियम फैरीसायनाड में ऑक्सीकृत करती है।
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ओजोन की स्टेनस क्लोराइड से अभिक्रिया
यह स्टैनस क्लोराइड को स्टैनिक क्लोराइड में ऑक्सीकृत करती है।
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प्रश्न 8.
ओजोन एक ऑक्सीकारक एवं अपचायक पदार्थ है। उदाहरणों द्वारा समीकरण देते हुए इस कथन की पुष्टि कीजिए। (2012)
उत्तर
ओजोन एक ऑक्सीकारक एवं अपचायक दोनों है। इसे हम निम्नलिखित उदाहरणों द्वारा समझ सकते हैं –

  1. ऑक्सीकारक गुण – ओजोन जल की उपस्थिति में सल्फर को सल्फ्यूरिक अम्ल में ऑक्सीकृत कर देती है।
    • S + H2O + 3O3 → H2SO4 + 3O2
  2. अपचायक गुण – ओजोन बेरियम परॉक्साइड को बेरियम मोनोऑक्साइड में अपचयित कर देती है।
    • BaO2 + O3 → BaO + 2O2

प्रश्न 9.
ओजोन की मर्करी, शुष्क आयोडीन तथा स्टैनस क्लोराइड से अभिक्रिया का रासायनिक समीकरण लिखिए। (2016)
उत्तर

  1. ओजोन की मर्करी से अभिक्रिया का समीकरण
    ओजोन मर्करी को मयूरस ऑक्साइड में ऑक्सीकृत कर देती है।
    UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 51
  2. ओजोन की शुष्क आयोडीन से अभिक्रिया का समीकरण
    ओजोन शुष्क आयोडीन को पीले रंग के ऑक्साइड (I4O9) में ऑक्सीकृत कर देती है।
    UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 52
  3. ओजोन की स्टैनस क्लोराइड से अभिक्रिया का समीकरण
    ओजोन स्टैनस क्लोराइड को स्टैनिक क्लोराइड में ऑक्सीकृत कर देती है।
    UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 53

प्रश्न 10.
‘सल्फर के अपररूप’ पर टिप्पणी लिखिए। (2016)
उत्तर
सल्फर के अनेक क्रिस्टलीय अपररूप ज्ञात हैं; जैसे- रोम्बिक सल्फर (rhombic sulphur or d-sulphur), मोनोक्लाइनिक सल्फर (monoclinic sulphur or B-sulphur), अमॉरफस सल्फर (amorphous sulphur), कोलॉइडी सल्फर (colloidal sulphur), प्लास्टिक सल्फर (plastic sulphur) आदि। रीम्बिक सल्फर और मोनोक्लाइनिक सल्फर, सल्फर के दो मुख्य अपररूप हैं। रोम्बिक और मोनोक्लाइनिक सल्फर दोनों के क्रिस्टल S8 अणुओं से बने होते हैं किन्तु क्रिस्टलों में अणओं की व्यवस्था में अन्तर होता है। साधारण ताप पर सल्फर का स्थायी रूप रोम्बिक सल्फर है। गर्म करने पर 95.6°C पर रोम्बिक सल्फर धीरे-धीरे मोनोक्लाइनिक सल्फर में बदल जाती है। 95.6°C से ऊपर के किसी ताप से ठण्डा करने पर मोनोक्लाइनिक सल्फर 95.6°C पर पुन: रोम्बिक सल्फर में बदल जाती है।
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95.6°C से नीचे सल्फर का स्थायी रूप रोम्बिक रूप और 95.6°C से ऊपर मोनोक्लाइनिक रूप विद्यमान होता है।

प्रश्न 11.
सल्फर डाइऑक्साइड के निर्माण की प्रयोगशाला विधि का वर्णन कीजिए। इसके ऑक्सीकारक और अपचायक गुण देते हुए इसके उपयोग भी दीजिए। (2016, 17)
उत्तर
प्रयोगशाला विधि – प्रयोगशाला में सल्फर डाइऑक्साइड गैस कॉपर धातु की छीलन को सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गर्म करके बनाई जाती है।
Cu + 2H2SO4 → CuSO4 + 2H2O + SO2
ऑक्सीकारक गुण – सल्फर डाइऑक्साइड अनेक क्रियाओं में ऑक्सीकारक का कार्य करती हैं; जैसे-

  1. H2S का S में ऑक्सीकरण
    • 2H2S + SO2 → 3S + 2H2O
  2. आयरन का फेरस ऑक्साइड में ऑक्सीकरण
    • 3Fe + SO2 → 2FeO + FeS

अपचायक गुण – सल्फर डाइऑक्साइड अनेक क्रियाओं में अपचायक का कार्य करती हैं; जैसे-

  1. K2Cr2O7 का Cr2(SO4)3 में अपचयन
    • K2Cr2O7 + H2SO4 + 3SO2 → K2SO4 + Cr2(SO4)3 + H2O
  2. Cl को HCl में अपचयन
    • Cl2 + 2H2O + SO2 → H2SO4 + 2HCl

उपयोग

  1. ऑक्सीकारक के रूप में
  2. अपचायक के रूप में
  3. कीटाणु और रोगाणुनाशक के रूप में
  4. चीनी उद्योग में

प्रश्न 12.
सीसा कक्ष विधि द्वारा सल्फ्यूरिक अम्ल के निर्माण का सचित्र वर्णन कीजिए। संयंत्र के प्रत्येक भाग में होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं के रासायनिक समीकरण भी दीजिए। (2016, 18)
उत्तर
सीसा कक्ष विधि द्वारा सल्फ्यूरिक अम्ल का निर्माण करने में सल्फर डाइऑक्साइड, वायु और नाइट्रिक ऑक्साइड (उत्प्रेरक) मिश्रण के भाग से क्रिया कराने पर सल्फ्यूरिक अम्ल प्राप्त होता है।
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इस विधि द्वारा सल्फ्यूरिक अम्ल का निर्माण करने में प्रयुक्त संयंत्र संलग्न चित्र में प्रदर्शित है। इस संयंत्र के गुणक भाग और उनमें होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं के रासायनिक समीकरण निम्नवत् हैं –
1. पाइराइट बर्नर

  • 4FeS2 + 11O2 → 2Fe2O3 + 8SO2
  • S +O2 → SO2

2. धूल कक्ष – पाइराइट बर्नर में प्राप्त सल्फर डाइऑक्साइड गैस और वायु के मिश्रण को धूल कक्ष में भेजा जाता है। इस कक्ष में गैसीय मिश्रण भाप के सम्पर्क में आता है और उसमें उपस्थित धूल के कण भारी होकर कक्ष की पेंदी में बैठ जाते हैं।
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3. नाइटर पात्र 
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 57
4. ग्लोवर टावर 

  • SO2 + NO2 + H2O → H2SO4 + NO
  • 2(NO . HSO4) + H2O → 2H2SO4 + NO2 + NO

5. सीसा कक्ष 

  • 2SO2 + O2 + 2NO + 2H2O → 2H2SO4 + 2NO

6. गे-लुसैक टावर

  • 2H2SO4 + NO + NO2 → 2(NO . HSO4) + H2O

प्रश्न 13.
सल्फ्यूरिक अम्ल एक ऑक्सीकारक एवं निर्जलीकारक है। इसके एक-एक उदाहरण दीजिए। (2009, 10, 11, 12, 16, 18)
उत्तर
1. ऑक्सीकारक गुण – गर्म करने पर सान्द्र H2SO4 अपघटित होकर ऑक्सीजन परमाणु देता है और ऑक्सीकारक का कार्य करता है।
H2SO4 → SO2 + H2O + O

(i) HBr तथा HI को क्रमश: Br2 और I2 में ऑक्सीकृत कर देता है।

  • 2HBr + H2SO4 → Br2 ↑ + SO2 ↑ + 2H2O
  • 2HI + H2SO4 → I2 ↑ + SO2 ↑ + 2H2O

(ii) कार्बन को CO2 में तथा सल्फर को SO2 में ऑक्सीकृत करता है।

  • C + 2 H2SO4 → CO2 ↑ + 2SO2 ↑ + 2H2O
  • S + 2 H2SO4 → 3SO2 ↑ + 2H2O

2. निर्जलीकारक गुण – यह कार्बनिक यौगिकों; जैसे–चीनी, फॉर्मिक अम्ल तथा ऑक्लैलिक अम्ल से जल का शोषण कर लेता है। अतः चीनी काली पड़ जाती है।
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प्रश्न 14.
क्लोरीन, ब्रोमीन तथा आयोडीन के फ्लोरीन से बने किन्हीं चार अन्तरा हैलोजन यौगिकों के बनाने का रासायनिक समीकरण दीजिए। (2016)
उत्तर
अन्तरा हैलोजन यौगिक दो भिन्न हैलोजनों के सीधे संयोग द्वारा या निम्न अन्तरा हैलोजन यौगिक की हैलोजन से क्रिया द्वारा बनाए जाते हैं।

  • Cl2 + F2 [latex]\underrightarrow { { 250 }^{ 0 }C } [/latex] 2ClF
  • Cl2 + 3F2 (आधिक्य) [latex]\underrightarrow { { 500 }^{ 0 }C } [/latex] 2ClF3
  • Br2 + 5F2 (आधिक्य) [latex]\underrightarrow { { 500 }^{ 0 }C } [/latex] 2BrF5
  • IF5 + F2 → IF7

प्रश्न 15.
अन्तरा हैलोजन यौगिक क्या हैं? उदाहरण द्वारा समझाइए। AB3 प्रकार के क्लोरीन तथा फ्लोरीन के अन्तरा हैलोजन यौगिक बनाने का रासायनिक समीकरण लिखिए। (2014, 16)
या
ClF3 के बनाने की विधि का ताप तथा दाब की परिस्थितियों को दिखाते हुए रासायनिक समीकरण लिखिए। (2017)
उत्तर
दो भिन्न हैलोजन परमाणु X तथा X’ से बने यौगिक अन्तरा हैलोजन यौगिक कहलाते हैं। इनका सामान्य सूत्र XX’ और XX’n है। (जहाँ n = 3 से 7 तक)
IF को छोड़कर सभी XX’ प्रकार के अन्तराहैलोजन यौगिक बनाये गए हैं।
AB3 प्रकार के क्लोरीन तथा फ्लोरीन के अन्तरा हैलोजन यौगिक
Cl2 + 3F2 [latex]\underrightarrow { { 300 }^{ 0 }C } [/latex] 2ClF3

प्रश्न16.
आवर्त सारणी में अक्रिय गैसों के स्थान की विवेचना कीजिए। (2015)
उत्तर
आवर्त सारणी में अक्रिय गैसों को दायीं ओर शून्य समूह (वर्ग-18) में रखा गया है। इन तत्त्वों को इनके गुणों में समानता होने के कारण एक साथ रखा गया है। He को छोड़कर सभी अक्रिय गैसों के बाह्य कोश में 8 इलेक्ट्रॉन होते हैं। रेडॉन को छोड़कर सभी अक्रिय गैसें वायुमण्डल में मौजूद हैं। आन्तरिक और बाह्य सभी कोश पूर्ण होने के कारण ये रासायनिक रूप से निष्क्रिय होती हैं। अत: इन्हें अक्रिय गैस कहा जाता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर नाइट्रोजन वर्ग (पाँचवे वर्ग) के तत्त्वों की आवर्त सारणी में स्थिति की विवेचना कीजिए। (2009, 10, 11, 12, 15)
उत्तर
नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, आर्सेनिक, ऐण्टिमनी तथा बिस्मथ को आवर्त सारणी के V-A उपसमूह में रखा गया है। इन तत्त्वों को नाइट्रोजन परिवार के तत्त्व कहते हैं। इन्हें प्रायः निक्टोजन (Pnictogen) भी कहते हैं। ये तत्त्व p-ब्लॉक के तत्त्व हैं। इनका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न प्रकार है –
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सभी तत्त्वों के बाहरी कोश में 5 इलेक्ट्रॉन हैं और बाह्यतम कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास nsnp3 है। भीतर के सभी उपकोश पूर्ण हैं। इलेक्ट्रॉनिक विन्यास में समानता होने के कारण इनको एक ही उपसमूह में रखा जाना उचित है।
इनके गुणों में समानता तथा उनमें क्रमिक परिवर्तन तत्त्वों को एक ही उपवर्ग में रखे जाने की पुष्टि करते हैं।
गुणों में समानता

  1. इन तत्त्वों की मुख्य संयोजकता 3 तथा 5 है।
  2. ये (N2 को छोड़कर) स्वतन्त्र अवस्था में नहीं पाये जाते हैं।
  3. N2 के अतिरिक्त सभी ठोस हैं।
  4. N2 को छोड़कर सभी अपररूपता प्रदर्शित करते हैं।
  5. ये सभी हाइड्राइड बनाते हैं और सभी सहसंयोजक यौगिक हैं; जैसे- NH3, PH3, AsH3, SbH3 तथा BiH3.
  6. ये सभी बहु-परमाणुकता प्रकट करते हैं।
  7. ये सभी M2O3 तथा M2O5 प्रकार के ऑक्साइड बनाते हैं। नाइट्रोजन N2O, NO, NO2 प्रकार के भी ऑक्साइड बनाती है।
  8. ये सभी MX3 प्रकार के हैलाइड बनाते हैं, जिनका जल-अपघटन हो जाता है।
    • NCl3 +3 H2O → NH3 ↑ + 3HOCl
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गुणों में क्रमिक परिवर्तन – परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ-साथ ऊपर से नीचे की ओर चलने पर

  1. परमाणु त्रिज्या तथा इलेक्ट्रॉन बन्धुता बढ़ती है।
  2. आयनन विभव तथा ऋण-विद्युतता घटती है।
  3. धात्विक लक्षण बढ़ता है।
    • UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 62
  4. इनके क्वथनांक तथा घनत्व क्रमशः बढ़ते हैं।
  5. इनके ऑक्साइडों का अम्लीय लक्षण घटता है।
    • UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 63
  6. जबकि नाइट्रोजन के ऑक्साइडों में अम्लीय प्रकृति का क्रम इस प्रकार है –
    • N2O < NO < N2O3 < N2O4 < N2O5
  7. हाईड्राइडों का स्थायित्व घटता है, विषैलापन बढ़ता है और क्षारीय गुण घटता है, जबकि अम्लीय गुण बढ़ता है।
    • UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 64
  8. इनके गलनांक व क्वथनांक NH3 से SbH3 तक घटते हैं, जबकि अपचायक क्रम इस प्रकार है –
    • BiH3 > SbH3 > AsH3 > PH3
  9. इन सभी में sp3 -संकरण होता है और पिरेमिड ज्यामिति होती है, परन्तु बन्ध कोण NH3 से BiH तक घटता है।
  10. इनके ऑक्सी-अम्लों की प्रबलता घटती है।
    • HNO3 > H3PO4 > H3AsO4 > H3SbO4 > H3BiO4
  11. इनके हैलाइडों का स्थायित्व N से Bi तक बढ़ता है तथा वाष्पशीलता घटती है। अतः ये ट्राइहैलाइड बनाते हैं।
    • UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 65

नाइट्रोजन को छोड़कर अन्य सभी तत्त्व पेण्टाहैलाइड भी बनाते हैं।

प्रश्न 2.
हेबर विधि द्वारा अमोनिया के औद्योगिक निर्माण का नामांकित चित्र सहित वर्णन कीजिए। इसके दो प्रमुख गुण एवं दो उपयोग लिखिए। इस विधि में ला-शातेलिए नियम का क्या महत्त्व है ? (2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 17)
उत्तर
हेबर विधि का सिद्धान्त–यदि शुद्ध नाइट्रोजन और हाइड्रोजन के 1 : 3 अनुपात के मिश्रण को गर्म किया जाए तो अमोनिया बनती है।
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यह एक ऊष्माक्षेपी उत्क्रमणीय अभिक्रिया है और क्रिया के पश्चात् आयतन में कमी होती है, इसलिए ला-शातेलिए के नियमानुसार कम ताप और अधिक दाब पर अमोनिया अधिक उत्पन्न होगी। कम ताप पर अभिक्रिया का वेग बढ़ाने के लिए एक उत्प्रेरक प्रयोग किया जाता है। इस अभिक्रिया का उत्प्रेरक की उपस्थिति में अनुकूलतम ताप 450°-500°C तथा उच्च दाब 200 वायुमण्डल है; क्योंकि अभिक्रिया उत्क्रमणीय है, इसलिए अमोनिया को बराबर क्रिया क्षेत्र से हटाने के बाद, अमोनिया गैस अधिक बनेगी। इस अभिक्रिया में लोहे का बारीक चूर्ण (उत्प्रेरक) तथा मॉलिब्डेनम (उत्प्रेरक वर्धक) की सूक्ष्म मात्रा प्रयुक्त होती है। इसमें गैसीय मिश्रण शुद्ध होना चाहिए जिससे उत्प्रेरक विषाक्त न हो।
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विधि- शुद्ध N2 तथा H2 को 1 : 3 अनुपात में मिलाकर 200 वायुमण्डल दाब पर तप्त लोहे के बारीक चूर्ण (उत्प्रेरक) को, जिसमें मॉलिब्डेनम (उत्प्रेरक वर्धक) मिला होता है, 500°C ताप पर गर्म करते हैं। इस विधि में 10 – 15% अमोनिया बनती है, जिसे संघनित्र में प्रवाहित करके द्रवित कर लेते हैं। शेष गैसों को फिर से उत्प्रेरक कक्ष में प्रवाहित करते हैं जिससे N2 व H2 के संयोजन द्वारा NH3 का लगातार उत्पादन होता रहता है।
रासायनिक गुण
1. क्षारीय गुण – यह क्षारीय गैस है तथा लाल लिटमस को नीला कर देती है। यह अम्लों से क्रिया करके लवण बनाती है।
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2. धातु ऑक्साइडों का अपचयन – यह धातु ऑक्साइडों को अपचयित कर देती है।
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उपयोग

  1. प्रयोगशाला में अभिकर्मक के रूप में।
  2. बर्फ बनाने तथा कोल्ड स्टोरेज में प्रशीतक के रूप में; क्योंकि इसके वाष्पन की गुप्त ऊष्मा 327 कैलोरी/ग्राम (उच्च) होती है।

प्रश्न 3.
प्रयोगशाला में नाइट्रस ऑक्साइड बनाने की विधि का सचित्र वर्णन कीजिए। नाइट्रस ऑक्साइड के दो प्रमुख रासायनिक गुण एवं दो उपयोग लिखिए। (2009, 11)
उत्तर
प्रयोगशाला में नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) को सोडियम नाइट्रेट तथा अमोनियम सल्फेट के मिश्रण को अथवा केवल अमोनियम नाइट्रेट को गर्म करके बनाया जाता है।
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अमोनियम सल्फेट व सोडियम नाइट्रेट के मिश्रण को एक गोल पेंदे के फ्लास्क में लेकर गर्म किया जाता है। इस क्रिया से N2O बनती है, जिसमें Cl2, NO व NH3 की अशुद्धियाँ होती हैं। अत: इस गैस को क्रमशः NaOH विलयन, FeSO4 विलयन व सान्द्र H2SO4 में से प्रवाहित किया जाता है जहाँ क्रमशः Cl2, NO व NH3 एवं जल-वाष्प आदि अशुद्धियाँ अवशोषित हो जाती हैं। N2O ठण्डे जल में अत्यन्त विलेय है; अतः इसे गर्म पानी के ऊपर गैस जार में एकत्रित कर लेते हैं।
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रासायनिक गुण

  1. सोडामाइड से अभिक्रिया होने पर सोडियम ऐजाइड बनता है।
    • NaNH2 + N2O → NaN3 + H2O
  2. KMnO4 इसको नाइट्रिक ऑक्साइड में ऑक्सीकृत कर देता है।
    • N2O + [O] [latex]\xrightarrow [ { KMnO }_{ 4 } ]{ { H }_{ 2 }{ SO }_{ 4 } } [/latex] 2NO ↑

उपयोग

  1. ऑक्सीजन के साथ इसका मिश्रण दाँतों की शल्य चिकित्सा (dental surgery) में निश्चेतक (anaesthetic) के रूप में प्रयोग किया जाता है।
  2. सोडियम ऐजाइड बनाने में।

प्रश्न 4.
ओस्टवाल्ड विधि द्वारा नाइट्रिक अम्ल के औद्योगिक निर्माण का सचित्र वर्णन कीजिए। सम्बन्धित अभिक्रियाओं का समीकरण दीजिए। तनु नाइट्रिक अम्ल (20%) की लेड पर अभिक्रिया लिखिए। (2011, 14, 15, 16, 17)
या
अमोनिया से नाइट्रिक अम्ल के निर्माण की विधि का सचित्र वर्णन कीजिए तथा अभिक्रियाओं के रासायनिक समीकरण भी दीजिए। Cu पर इस अम्ल की क्रिया किस प्रकार होती है? यदि अम्ल (i) गर्म और सान्द्र हो (ii) ठण्डा और तनु हो। सभी अभिक्रियाओं के समीकरण लिखिए। (2009, 11, 13)
उत्तर
ओस्टवाल्ड विधि- इसमें अमोनिया गैस वायु से ऑक्सीकृत होकर नाइट्रिक ऑक्साइड बनाती है जो फिर ऑक्सीकृत होकर नाइट्रोजन डाइऑक्साइड देती है। यह जल से क्रिया करके नाइट्रिक अम्ल में परिवर्तित हो जाती है।

  • 4NH3 + 5O2 [latex]\underrightarrow { Pt } [/latex] 4NO + 6H2O
  • 2NO + O2 → 2NO2
  • 3NO2 + H2O → 2HNO3 + NO ↑

शुद्ध NH3 व वायु का मिश्रण 1 : 9 के अनुपात में परिवर्तक में प्रवाहित किया जाता है। यहाँ प्लेटिनम की जाली 650° – 800°C पर गर्म रखी जाती है जो उत्प्रेरक का कार्य करती है। यहाँ NH3 का 90% भाग ऑक्सीकृत होकर नाइट्रिक ऑक्साइड बनाता है। अब गैसों का मिश्रण ऑक्सीकारक स्तम्भ में पहुँचाया जाता है, जहाँ NO ऑक्सीकृत होकर नाइट्रोजन डाइऑक्साइड देती है। NO2 अवशोषण स्तम्भ में जल में अवशोषित होकर नाइट्रिक अम्ल बनाती है।
इस प्रकार प्राप्त नाइट्रिक अम्ल तनु होता है। इसका आसवन करने पर एक निश्चित क्वथनांक का मिश्रण प्राप्त होता है, जिसे साधारण सान्द्र नाइट्रिक अम्ल कहते हैं।
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तनु नाइट्रिक अम्ल की लेड पर अभिक्रिया– इस अभिक्रिया के फलस्वरूप लेड नाइट्रेट, NO व जल बनता है।
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Cu पर क्रिया

  1. गर्म और सान्द्र HNO3 कॉपर से क्रिया करके Cu (NO3)2, N2 और जल देता है।
    • 5Cu + 12HNO3 → 5Cu (NO3)2 + N2 ↑ + 6H2O
  2. ठण्डा और तनु HNO, कॉपर से क्रिया करके Cu(NO3)2 N2O और जल देता है।
    • 4Cu + 10HNO3 → 4Cu (NO3)2 + N2O ↑ + 5H2O

प्रश्न 5.
हड्डी की राख से फॉस्फोरस प्राप्त करने की आधुनिक विधि का वर्णन कीजिए। फॉस्फोरस से फॉस्फीन गैस कैसे बनाओगे? (2009, 10, 11)
उत्तर
हड्डियों की राख या खनिज कैल्सियम फॉस्फेट [Ca3(PO4)2] को कोक एवं रेत के साथ मिलाकर हॉपर मार्ग से पेचदार चालक की सहायता से विद्युत भट्ठी में गिराते हैं। इस भट्ठी में दो कार्बन इलेक्ट्रोड होते हैं जिनके बीच विद्युत आर्क उत्पन्न किया जाता है। जिसके फलस्वरूप 1500°C ताप उत्पन्न हो जाता है। सर्वप्रथम कैल्सियम फॉस्फेट [Ca3(PO4)2], रेत (SiO2) के साथ क्रिया कर कैल्सियम सिलिकेट (CaSiO3) और फॉस्फोरस पेन्टॉक्साइड (P2O5) बनाता है। फिर P2O5 कार्बन द्वारा अपचयित होकर फॉस्फोरस की वाष्प देता है। यह वाष्प ऊपर के द्वार से निकलकर जल में ठोस रूप में एकत्रित हो जाती है। कैल्सियम सिलिकेट (धातुमल) नीचे के द्वार से निकाल लिया जाता है।
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2P2O5 + 10C → P4 + 10CO ↑

शुद्धिकरण– इस प्रकार प्राप्त फॉस्फोरस में कुछ अशुद्धियाँ होती हैं। इनको पृथक् करने के लिए एक टैंक में अशुद्ध फॉस्फोरस को क्रोमिक अम्ल (K2Cr2O7 + सान्द्र H2SO4) में डालकर पिघलाते हैं। इससे अशुद्धियाँ ऑक्सीकृत होकर मल के रूप में द्रव के ऊपर तैरने लगती हैं और फॉस्फोरस एक निर्मल और रंगहीन द्रव के रूप में टैंक के पेंदे में बैठ जाता है। पिघले हुए फॉस्फोरस को एक लम्बी नली में से प्रवाहित करते हैं जिसमें वह ठण्डा होकर जम जाता है। नली में जल डालकर ठोस फॉस्फोरस को जल में एकत्रित करते हैं।
फॉस्फोरस से फॉस्फीन गैस बनाना – फॉस्फोरस को निष्क्रिय वातावरण में NaOH के सान्द्र विलयन के साथ गर्म करने पर फॉस्फीन गैस बनती है।
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प्रश्न 6.
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर आवर्त सारणी में ऑक्सीजन एवं सल्फर तत्त्वों की स्थिति की विवेचना कीजिए। (2010)
या
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर आवर्त सारणी में ऑक्सीजन परिवार (VI-A वर्ग के तत्त्वों) के तत्त्वों की स्थिति की विवेचना कीजिए। (2012)
उत्तर
मेंडलीव की आवर्त सारणी के VI-A समूह में पाँच तत्त्व हैं। तत्त्वों का यह परिवार ‘ऑक्सीजन परिवार’ कहलाता है। इस समूह के प्रथम चार तत्त्वों को सामूहिक रूप में ‘कैल्कोजन’ (chalcogen) के रूप में पुकारा जाता है। इस समूह में परमाणु भार की वृद्धि के साथ धात्विक या धन विद्युतीय गुण बढ़ता है तथा घनत्व, क्वथनांक और गलनांक में वृद्धि होती है। इस समूह में O, S अधातु हैं, जबकि Se व Te उपधातुएँ हैं और Po धातु है।
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रासायनिक गुणों में ऑक्सीजन, परिवार के अन्य तत्त्वों से भिन्न है, परन्तु अन्य सभी तत्त्वों के गुणों में समानता पाई जाती है।

  1. 1. ऑक्सीजन, सल्फर व सेलीनियम परमाणु के बाह्यतम संयोजी कक्ष में 6 इलेक्ट्रॉन हैं।UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 7 The p Block Elements image 77
    अतः इन तीनों तत्त्वों के परमाणु रासायनिक अभिक्रिया में अन्य परमाणुओं से 2 इलेक्ट्रॉन लेकर अथवा 2 इलेक्ट्रॉन के जोड़े साझा करके अपनी बाह्यतम कक्ष में अधिकतम इलेक्ट्रॉन (8) प्राप्त करने हेतु संयोग करते हैं।
  2. तीनों ही अधातु हैं (Se धात्विक गुण भी रखती है) जो प्रकृति में स्वतन्त्र व संयुक्त अवस्था में पाये जाते है।
  3. तीनों समान यौगिक बनाते हैं।
    • CO2, H2O, P2O5, As2O5,
    • SO2, H2S, P2S5, As2S5,
    • SeO2, H2Se, P2Se3,
    • C2H2OH तथा C2H2SH; C2H2-O-C2H5 तथा C2H5-S-C2H5
  4. तीनों ही हाइड्रोजन के साथ संयोग कर लेते हैं।
    • H2O, H2S, H2S3, H2Se,
    • H2O2, H2S2, H2S4
  5. तीनों ही RO2 प्रकार के ऑक्साइड बनाते हैं; जैसे- O3,SO2, SeO2 आदि। O3 ऑक्सीजन का ऑक्साइड माना जाता है।
  6. तीनों ही कार्बन के साथ संयोग करके क्रमश: CO2, CS2 व CSe2 बनाते हैं।
  7. तीनों ही अपररूपती प्रदर्शित करते हैं।
  8. तीनों तत्त्व ऑक्सीजन, सल्फर व सेलीनियम शृंखलन गुण भी व्यक्त करते हैं।
  9. धातु से क्रिया– ये Na, Cu, Zn, Fe आदि धातुओं के साथ क्रिया करके क्रमश: ऑक्साइड, सल्फाइड व सेलिनाइड बनाते हैं।
  10. ऑक्साइड व ऑक्सी अम्ल– ये तत्त्व ऑक्सीजन से संयोग करके डाई ऑक्साइड बनाते हैं। (सल्फर ट्राइ ऑक्साइड) भी बनाते हैं; जैसे- SO2, SeO2 आदि। ये जल में घुलकर ऑक्सी अम्ल बनाते हैं।
    • SO2 + H2 → H2SO3
    • SeO2 + H2O → H2SeO3
      इनकी प्रबलता का क्रम H2SO3 > H2SeO3 है।

अतः स्पष्ट है कि ऑक्सीजन, सल्फर व सेलीनियम तीनों को ही आवर्त सारणी के षष्ठम् समूह में एक साथ रखना औचित्यपूर्ण है।

प्रश्न 7.
शुद्ध ओजोन किस प्रकार प्राप्त करते हैं? Sncl2, FeSO2 और KI के साथ इसकी अभिक्रियाएँ लिखिए। (2009, 11, 14)
या
ओजोन बनाने की प्रयोगशाला विधि का वर्णन कीजिए। प्रयुक्त उपकरण का नामांकित रेखाचित्र दीजिए तथा इसके दो ऑक्सीकारक गुण दीजिए। समीकरण भी लिखिए। (2011, 13)
या
ब्रॉडी के ओजोनाइजर द्वारा ओजोन बनाने की विधि का सचित्र वर्णन कीजिए। इसके दो मुख्य उपयोग भी लिखिए। (2009)
या
ब्रॉडी ओजोनाइजर का नामांकित चित्र बनाइए। (2018)
उत्तर
प्रयोगशाला में ओजोन, ऑक्सीजन के नीरव विद्युत विसर्जन विधि द्वारा प्राप्त की जाती है।
3O2 → 2O3
नीरव विद्युत विसर्जन के लिए सीमेन्स का ओजोनाइजर या ब्रॉडी का ओजोनाइजर प्रयोग किया जाता है।
ब्रॉडी का ओजोनाइजर – यह एक U आकार की नली का बना होता है जिसका एक सिरा काफी चौड़ा होता है। इस सिरे में एक पतली परखनली को डालकर ऊपर वाले भाग को बन्द कर दिया जाता है। परखनली में तनु H2SO4 भरा होता है और उसमें एक प्लेटिनम का तार लटका देते हैं। सारे उपकरण को तनु H2SO4 में रखते हैं। इस बर्तन में भी एक प्लेटिनम का तार लटका देते हैं। प्लेटिनम के दोनों इलेक्ट्रोडों को चित्रानुसार प्रेरण कुण्डली से जोड़ देते हैं। नली में शुष्क ऑक्सीजन प्रवाहित करते हैं, जिससे 25% ओजोन प्राप्त होती है।
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ऑक्सीकारक गुण

  1. 1. यह स्टेनस क्लोराइड को तनु HCl की उपस्थिति में स्टेनिक क्लोराइड में ऑक्सीकृत कर देती है।
    • 3SnCl2 +6HCl +O3 → 3SnCl4 +3H2O
  2. 2. यह फेरस सल्फेट को तनु H2SO4 की उपस्थिति में फेरिक सल्फेट में ऑक्सीकृत कर देती है।
    • 2FeSO2 + O3 + H2SO4 → Fe2(SO4)3 + H2O + O2
  3. KI विलयन में प्रवाहित करने पर I2 में ऑक्सीकृत कर देती है।
    • 2KI + H2O + O3 → 2KOH + I2 ↑ + O2

उपयोग

  1. प्रबल ऑक्सीकारक के रूप में।
  2. जीवाणुनाशक के रूप में।

प्रश्न 8.
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर क्लोरीन, ब्रोमीन एवं आयोडीन की आवर्त सारणी में स्थिति स्पष्ट कीजिए (2010)
या
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर आवर्त सारणी में हैलोजनों की स्थिति की विवेचना कीजिए। (2010, 12)
उत्तर
क्लोरीन, ब्रोमीन, आयोडीन को फ्लोरीन तथा ऐस्टैटीन के साथ आवर्त सारणी के VIIA उप-समूह में रखा गया है। VIIA के प्रथम चार तत्त्वों (F, CI, Br, I) को हैलोजन कहते हैं। ‘हैलोजन’ शब्द की उत्पत्ति दो ग्रीक शब्दों ‘हैल्स’ (Hals) तथा ‘जेन्स’ (Genes) से हुई है, जिसका अर्थ है-समुद्री लवण पैदा करने वाला। ये सभी तत्त्वे अपने लवण के रूप में समुद्री जल में पाये जाते हैं। इनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास इस प्रकार हैं –
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इन सभी तत्त्वों के बाहरी कोश में 7 इलेक्ट्रॉन होते हैं और बाहरी कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns2 np5 है तथा भीतर के सभी कोश पूर्ण हैं। इलेक्ट्रॉनिक विन्यास में समानता होने के कारण इनके गुणों में समानता है और उनमें क्रमिक परिवर्तन पाया जाता है।
गुणों में समानता

  1. ये वैद्युत संयोजकता (-1) तथा सह-संयोजकता दोनों ही प्रकट करते हैं।
  2. इनकी वाष्प रंगीन तथा तीक्ष्ण गन्ध वाली होती है।
  3. गैसीय अवस्था में ये द्वि-परमाणुक होते हैं।
  4. सभी प्रारूपिक अधातु हैं।
  5. हाइड्रोजन से सीधा संयोग कर हाइड्रो अम्ल बनाते हैं; जैसे- HCl, HBr, HI
  6. इनकी धातुएँ वाष्प में जलकर हैलाइड बनाती हैं।
    • 2Na + Cl2 → 2NaCl
    • Mg + Br2 → MgBr2
  7. Cl2 तथा Br2 जल के साथ क्रिया कर O2 निकालती है।
    • 2Cl2 + 2H2O → 4HCl + O2
  8. Cl2, Br2,I2, ऑक्सीकारक के रूप में प्रयुक्त होते हैं।
  9. ये तत्त्व वैद्युत तथा ऊष्मा के कुचालक होते हैं।
  10. क्षारों के साथ समान रूप से क्रिया करते हैं।
  11. सभी प्रबल ऑक्सीकारक हैं।
    • H2S + Cl2 → 2HCl + S
    • SO2 + Cl2 + 2H2O → 2HCl + H2SO4
  12. सभी अम्लीय ऑक्साइड बनाते हैं।

गुणों में क्रमिक परिवर्तन – परमाणु संरचना तथा गुणों की समानता से स्पष्ट है कि इन तत्त्वों को एक ही समूह में रखना न्यायोचित है। इसके अतिरिक्त तत्त्वों के गुणों में श्रेणीबद्ध परिवर्तन परमाणु क्रमांक के परिवर्तन पर निर्भर करता है तथा किसी समूह में तत्त्वों की विभिन्न स्थानों पर स्थिति का निर्णायक भी है। इन तत्त्वों के गुणों में परमाणु क्रमांक बढ़ने पर श्रेणीबद्ध परिवर्तन इस प्रकार हैं –

  1. तत्त्वों की अवस्था में क्रमिक परिवर्तन होता है; जैसे- क्लोरीन गैस है, ब्रोमीन द्रव तथा आयोडीन ठोस है।
  2. गैसों का रंग गहरा होता जाता है। अत: फ्लोरीन हल्की पीली है, क्लोरीन हरी-पीली, ब्रोमीन लाल-भूरी तथा आयोडीन वाष्प गहरी बैंगनी है।
  3. इनकी क्रियाशीलता घटती है।
  4. इनका ऑक्सीकारक स्वभाव भी घटता है।
  5. क्वथनांक बढ़ते हैं तथा आपेक्षिक ताप घटते हैं।
  6. परमाणु त्रिज्याएँ बढ़ती हैं।
  7. आयनन विभव घटते हैं।

इन तत्त्वों के गुणों में समानता तथा परमाणु क्रमांक में क्रमिक वृद्धि के साथ गुणों में श्रेणीबद्ध परिवर्तन इस बात का निर्णायक है कि ये तत्त्व एक समूह में रखे जाने चाहिए। इनके परमाणुओं के बाहरी कोश की ns2 np5 संरचना सह इंगित करती है कि इनकी सातवें समूह में स्थिति न्यायोचित है।

प्रश्न 9.
डीकन विधि द्वारा क्लोरीन के निर्माण का सचित्र वर्णन कीजिए। यह निम्नलिखित से किस प्रकार की क्रिया करती है? (2015)
(i) सोडियम आर्सेनाइट विलयन, (ii) गर्म चूने का पानी।
या
डीकन विधि द्वारा क्लोरीन के औद्योगिक निर्माण का सचित्र वर्णन कीजिए। इसकी अमोनिया के साथ अभिक्रिया लिखिए। आवश्यक रासायनिक समीकरण भी लिखिए। (2013, 15, 16, 18)
या
क्लोरीन के एक ऑक्सीकारक गुण का रासायनिक समीकरण दीजिए।
उत्तर
क्लोरीन के औद्योगिक निर्माण की निम्नलिखित तीन विधियाँ हैं-

  1. वेल्डन विधि
  2. डीकन विधि तथा
  3. वैद्युत-अपघटनी विधि।

डीकन विधि या HCl से क्लोरीन के निर्माण की विधि – इस विधि में HCl का ऑक्सीकरण क्यूप्रस क्लोराइड (उत्प्रेरक) की उपस्थिति में वायु की ऑक्सीजन द्वारा निम्न प्रकार किया जाता है –
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4HCl + O2 [latex]\underrightarrow { { Cu }_{ 2 }{ Cl }_{ 2 } } [/latex] 2H2O +2Cl2 ↑
उत्प्रेरक कक्ष में झाँबा पत्थर क्यूप्रस क्लोराइड विलयन में भिगोकर रख देते हैं तथा ताप 450°C कर देते हैं। HCl तथा वायु का मिश्रण 4 : 1 के अनुपात में लेकर उत्प्रेरक कक्ष में प्रवाहित किया जाता है। यहाँ क्लोरीन बनती है, पर इसमें HCl, N2,O2 तथा जल-वाष्प मिले होते हैं। इस मिश्रण को स्क्रबर में प्रवाहित करके HCl हटा देते हैं। दूसरे कक्ष में प्रवाहित करने पर सान्द्र H2SO4 द्वारा जल-वाष्प पृथक् कर देते हैं। इस प्रकार N2,O2 मिश्रित क्लोरीन प्राप्त होती है।
उत्प्रेरक की क्रिया निम्न प्रकार होती है –

  • 2Cu2Cl2 + O2 → 2Cu2OCl2
  • 2HCl + Cu2OCl2 → 2CuCl2 + H2O
  • 2CuCl2 → Cu2Cl2 + Cl2

क्रियाएँ

  1. यह सोडियम आर्सेनाईट को सोडियम आर्सिनेट में ऑक्सीकृत कर देती है।
    • Na3AsO3 + H2O + Cl2 → Na3AsO4 +2HCl
  2. क्लोरीन गर्म चूने के पानी के साथ कैल्सियम क्लोराइड तथा कैल्सियम क्लोरेट बनाती है।
    • 6Ca(OH)2 + 6Cl2 → 5CaCl2 + Ca(ClO3)2 + 6H2O

ऑक्सीकारक गुण – यह H2S को सल्फर में ऑक्सीकृत कर देती है।
H2S + Cl2 → 2HCl + S ↓
NH3 से अभिक्रिया
NH3 + 3Cl2 → NCl3 + 3HCl

प्रश्न10.
प्रयोगशाला में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के विरचन की विधि, प्रमुख रासायनिक गुण तथा उपयोग का वर्णन कीजिए। (2017)
उत्तर
हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के विरचन की प्रयोगशाला विधि – प्रयोगशाला में हाइड्रोजन क्लाराइड गैस सोडियम क्लोराइड (नमक) को सान्द्र H2SO4 के सार्थ गर्म करके बनाई जाती है।
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हाइड्रोजन क्लोराइड गैस को जल में अवशोषित करने पर हाइड्रोक्लोरिक अम्ल प्राप्त होता है। हाइड्रोजन क्लोराइड गैस के जलीय विलयन को हाइड्रोक्लोरिक अम्ल कहते हैं।
हाइड्रोजन क्लोराइड गैस एवं हाइड्रोक्लोरिक अम्ल बनाने में प्रयुक्त उपकरण संलग्न चित्र में प्रदर्शित है।

1. हाइड्रोजन क्लोराइड गैस बनाने की विधि – एक गोल पेंदे के फ्लास्क में कुछ सोडियम क्लोराईड (ठोस) लो और थिसेल फनल द्वारा सावधानी से सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल फ्लास्क में डालो जिससे फनल का निचला सिरा अम्ल में डूब जाए। फ्लास्क को गर्म करो। गर्म करने पर हाइड्रोजन क्लोराइड गैस बनती हैं और निकास नली से बाहर निकलने लगती है। गैस को वायु के उपरिमुखी विस्थापन द्वारा एक गैस जार में एकत्रित कर लो।। शुष्क HCl गैस प्राप्त करने के लिए निकास नली को सान्द्र H2SO4 की बोतल से जोड़ दो जिससे कि नम HCl गैस सान्द्र H2SO4 में से प्रवाहित होकर शुष्क हो जाए। सान्द्र H2SO4 युक्त बोतल में लगी दूसरी निकास नली से निकल रही शुष्क HCl गैस को अब जार में एकत्रित कर लो।
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2. हाइड्रोजन क्लोराइड गैस से हाइड्रोक्लोरिक अम्ल बनाने की विधि – चित्र में प्रदर्शित फ्लास्क में लगी हुई निकास नली के बाहर निचले सिरे पर रबर की नली के द्वारा एक साधारण फनल (छोटे स्तम्भ की) जोड़ दो। फनल का कुछ भाग एक पात्र में भरे जल में डुबा दो। निकास नली से फनल के द्वारा HCl गैस जल में पहुँचेगी और जल में विलेय हो जाएगी। इस प्रकार HCl गैस का जलीय विलयन अर्थात् हाइड्रोक्लोरिक अम्ल बन जाएगा।

रासायनिक गुण
1. धातुओं से क्रिया – कॉपर, मरकरी, सिल्वर, गोल्ड और प्लैटिनम धातुओं को छोड़कर लगभग सभी धातुएँ हाइड्रोक्लोरिक अम्ल से क्रिया करती हैं। क्रिया में धातु क्लोराइड बनता है और हाइड्रोजन गैस निकलती है।

  • 2Na + 2HCl → 2NaCl + H2
  • Mg + 2HCl → MgCl2 + H2
  • Zn + 2HCl → ZnCl2 + H2
  • Fe + 2HCl → FeCl2 + H2
  • 2Al + 6HCl → 2AlCl2 + 3H2

सान्द्र हाइड्रोक्लोरिक अम्ल और सान्द्र नाइट्रिक अम्ल के आयतन से 3 : 1 मिश्रण को ‘ऐक्वारेजिया’ (aquaregia) कहते हैं। इस मिश्रण में गोल्ड (Au), प्लेटिनम (Pt) आदि धातुएँ घुल जाती हैं।
3HCl + HNO3 → NOCl + Cl2 + 2H2O
Au + Cl2 + NOCl → AuCl3 + NO
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2. क्षारों से क्रिया – क्षार और अम्ल के परस्पर क्रिया करने से लवण और जल बनता है। इस क्रिया को उदासीनीकरण कहते हैं।

  • NaOH + HCl → NaCl + H2O
  • Ba(OH)2 + 2HCl → BaCl + 2H2O

3. धातु ऑक्साइडों से क्रिया – धातु ऑक्साइड और अम्ल की परस्पर क्रिया कराने पर लवण और जल बनता है।

  1. MgO + 2HCl → MgCl2 + H2O
  2. CuO + 2HCl → CuCl2 + H2O
  3. ZnO + 2HCl → ZnCl2 + H2O

4. अमोनिया से क्रिया – अमोनिया और HCl गैस की परस्पर क्रिया से अमोनियम क्लोराइड के सफेद धूम (fumes) बनते हैं।
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अमोनियम के जलीय विलयन की HCl विलयन से क्रिया कराने पर अमोनियम क्लोराइड और जल बनता है।
NH4OH + HCl → NH4Cl+ H2O

5. धातु कार्बोनेट से क्रिया – धातु कार्बोनेट की हाइड्रोक्लोरिक अम्ल से क्रिया कराने पर लवण, जल और कार्बन डाइऑक्साइड बनते हैं।

  • Na2CO3 + 2HCl → 2NaCl + H2O + CO2
  • CaCO3 + 2HCl → CaCl2 + H2O + CO2

उपयोग

  1. धातुओं के क्लोराइड बनाने में।
  2. अम्ल के रूप में।
  3. ऐक्वारेजिया (आयतन से 1 भाग सान्द्र HNO3 +3 भाग सान्द्र HCl) बनाने में।
  4. क्लोरीन गैस बनाने में।
  5. गाई, चमड़े और अन्य उद्योगों में।

प्रश्न 11.
विरंजक चूर्ण क्या है? विरंजक चूर्ण के निर्माण की विधि का वर्णन नामांकित चित्र के साथ कीजिए तथा इसका एक ऑक्सीकारक गुण भी लिखिए। (2016)
उत्तर
यह एक मिश्रित लवण है जिसको कैल्सियम क्लोरोहाइपोक्लोराइट भी कहते हैं। विरंजक चूर्ण के एक अणु में एक कैल्सियम आयन (Ca2+), एक क्लोराइड आयन (Cl) तथा एक हाइपोक्लोराइट आयन (OCl) होते हैं, जिसको Ca2+ (Cl) (OCl) रूप में भी व्यक्त कर सकते हैं। विरंजक चूर्ण का निर्माण बैचमान विधि द्वारा किया जाता है। इसके अन्तर्गत शुष्क बुझे हुए चूने पर क्लोरीन की अभिक्रिया करायी जाती है।
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विधि- यह विधि विरंजक चूर्ण (CaOCl2) बनाने की आधुनिक विधि है। इसमें लोहे का बना हुआ एक टॉवर होता है जिसमें खाने बने होते हैं। संयंत्र के ऊपरी भाग से हॉपर द्वारा बुझा हुआ चूना [Ca(OH2)] डाला जाता है। टॉवर में नीचे से गर्म वायु और क्लोरीन की धारा प्रवाहित की जाती है। Ca(OH)2 व Cl2 गैस की क्रिया से विरंजक चूर्ण बनता है, जिसे संयंत्र के निचले भाग से बाहर निकाल लेते हैं। व्यर्थ गैसें संयंत्र के ऊपरी भाग से बाहर निकल जाती हैं।

ऑक्सीकारक गुण – यह तनु अम्ल की अभिक्रिया से ऑक्सीजन देता है, अत: यह एक ऑक्सीकारक है।

    1. यह PbO को PbO2 में ऑक्सीकृत कर देता है।
      • 2CaOCl2 + 2PbO → 2CaCl2 + 2PbO2
  1. यह अम्लीय माध्यम में KI को I2 में ऑक्सीकृत कर देता है।
    • CaOCl2 + 2CH3COOH + 2KI → (CH3COO)2Ca + 2KCl + I2 ↑ + H2O

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UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Chemistry
Chapter Chapter 1
Chapter Name The Solid State
Number of Questions Solved 105
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State (ठोस अवस्था)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
ठोस कठोर क्यों होते हैं?
उत्तर
ठोस कठोर होते हैं, क्योंकि इनके अवयवी कण अत्यन्त निविड संकुलित होते हैं। इनमें कोई स्थानान्तरीय गति नहीं होती है तथा ये केवल अपनी माध्य स्थिति के चारों ओर कम्पन कर सकते हैं।

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प्रश्न 2.
ठोसों का आयतन निश्चित क्यों होता है?
उत्तर
ठोस के अवयवी कणों की स्थिति नियत होती है तथा वे गति के लिए स्वतन्त्र नहीं होते हैं। इसलिए इनका आयतन निश्चित होता है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित को अक्रिस्टलीय तथा क्रिस्टलीय ठोसों में वर्गीकृत कीजिए पॉलियूरिथेन, नैफ्थेलीन, बेन्जोइक अम्ल, टेफ्लॉन, पोटैशियम नाइट्रेट, सेलोफेन, पॉलिवाइर्निल क्लोराइड, रेशा काँच, ताँबा।
उत्तर
अक्रिस्टलीय ठोस – पॉलियूरिथेन, फ्लॉन, सेलोफेन, पॉलिवाइनिल, क्लोराइड, रेशा काँच।
क्रिस्टलीय ठोस – नैफ्थेलीन, बेन्जोइक अम्ल, पोटैशियम नाइट्रेट, ताँबा।

प्रश्न 4.
काँच को अतिशीतित द्रव क्यों माना जाता है?
उत्तर
क्योंकि यह ठोस होते हुए भी द्रवों के कुछ गुण प्रदर्शित करता है। द्रवों के समान इसमें प्रवाहित होने का गुण होता है। इसका यह गुण पुरानी इमारतों के काँच में देखा जा (UPBoardSolutions.com) सकता है जो तली पर कुछ मोटा होता है। यह केवल तभी सम्भव है जबकि यह अत्यन्त मन्द गति से द्रवों के समान प्रवाहित हो।

प्रश्न 5.
एक ठोस के अपवर्तनांक का मान सभी दिशाओं में समान प्रेक्षित होता है। इस ठोस की प्रकृति पर टिप्पणी कीजिए। क्या यह विदलन गुण प्रदर्शित करेगा?
उत्तर
चूँकि ठोस के अपवर्तनांक का मान सभी दिशाओं में समान है। अत: यह समदेशिक प्रकृति का है। अतः यह अक्रिस्टलीय ठोस है। यह स्वच्छ विदलने गुण प्रदर्शित नहीं करेगा।

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प्रश्न 6.
उपस्थित अन्तराआण्विक बलों की प्रकृति के आधार पर निम्नलिखित ठोसों को विभिन्न संवर्गों में वर्गीकृत कीजिए-पोटैशियम सल्फेट, टिन, बेंजीन, यूरिया, अमोनिया, जल, जिंक सल्फाइड, ग्रेफाइट, रूबिडियम, आर्गन, सिलिकन कार्बाइड।
उत्तर
पोटैशियम सल्फेट = आयनिक, टिन = धात्विक, बेंजीन = आण्विक (अध्रुवीय), यूरिया = आण्विक (ध्रुवीय), अमोनिया = आण्विक (हाइड्रोजन आबन्धित), जल = आण्विक (हाइड्रोजन आबन्धित), जिंक सल्फाइड = आयनिक, ग्रेफाइट = सहसंयोजी, रूबिडियम = धात्विक, आर्गन = आण्विक (अध्रुवीय), सिलिकन कार्बाइड = सहसंयोजी या नेटवर्क।

प्रश्न 7.
ठोस A, अत्यधिक कठोर तथा ठोस एवं गलित अवस्थाओं में विद्युतरोधी है और अत्यन्त उच्च दाब पर पिघलता है। यह किस प्रकार का ठोस है?
उत्तर
सहसंयोजी अथवा नेटवर्क ठोस, जैसे- SiC

प्रश्न 8.
आयनिक ठोस गलित अवस्था में विद्युत चालक होते हैं, परन्तु ठोस अवस्था में नहीं। व्याख्या कीजिए।
उत्तर
गलित अवस्था में आयनिक यौगिक वियोजित होकर मुक्त आयन देते हैं तथा विद्युत चालन करते हैं। ठोस अवस्था में आयन गति करने के लिए मुक्त नहीं होते हैं। अत: ये ठोस अवस्था में विद्युत चालन नहीं करते हैं।

प्रश्न 9.
किस प्रकार के ठोस विद्युत चालक, आघातवर्थ्य और तन्य होते हैं?
उत्तर
धात्विक ठोस।

प्रश्न 10.
‘जालक बिन्द’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर
प्रत्येक जालक बिन्दु ठोस के एक अवयवी कण को प्रदर्शित करता है। अवयवी कण परमाणु, अणु या आयन हो सकते हैं। किसी विशेष क्रिस्टलीय ठोस की आकृति के लिए जालक बिन्दु उत्तरदायी होते हैं।

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प्रश्न 11.
एकक कोष्ठिका को अभिलक्षणित करने वाले पैरामीटरों के नाम बताइए।
उत्तर

  1. एकक कोष्ठिका की कोर की विमाएँ (a, b,c) – परस्पर लम्बवत् हो सकती हैं अथवा नहीं।
  2. कोरों के मध्य के कोण (a,B तथा γ)

प्रश्न 12.
निम्नलिखित में विभेद कीजिए –

  1. षट्कोणीय और एकनताक्ष एकक कोष्ठिका
  2. फलक केन्द्रित तथा अंत्य-केन्द्रित एकक कोष्ठिका।

उत्तर

  1. षट्कोणीय एकक कोष्ठिका में,
    a = b ≠ c; α = β = 90° तथा γ = 120°
    एकनताक्ष एकक कोष्ठिका में
    a ≠ b ≠ c तथा α = γ = 90° तथा β = 90°
  2. fcc में अवयवी कण सभी 8 कोनों एवं सभी 6 फलकों के केन्द्रों पर व्यवस्थित होते हैं। अंत्य- केन्द्रित एकक कोष्ठिका में अवयवी कण सभी 8 कोनों तथा दो विपरीत फलकों के केन्द्रों पर स्थित होते हैं।

प्रश्न 13.
स्पष्ट कीजिए कि एक घनीय एकक कोष्ठिका के

  1. कोने और
  2. अन्तःकेन्द्र पर उपस्थित परमाणु का कितना भाग सन्निकट कोष्ठिका से सहभाजित होता है?

उत्तर

  1. कोने पर उपस्थित परमाणु 8 एकक कोष्ठिकाओं से सहभाजित होता है। अतः एक एकक कोष्ठिका के लिए इसका योगदान 1/8 होता है।
  2. अन्त:केन्द्र पर उपस्थित परमाणु किसी भी अन्य एकक कोष्ठिका द्वारा सहभाजित नहीं होता है।

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प्रश्न 14.
एक अणु की वर्ग निविड संकुलित परत में द्विविमीय उप-सहसंयोजन संख्या क्या होगी?
उत्तर
द्विविमीय निविड संकुलित परत में परमाणु 4 सन्निकट परमाणुओं को स्पर्श करता है अत: इसकी उप-सहसंयोजन संख्या 4 होगी।

प्रश्न 15.
एक यौगिक षट्कोणीय निविड़ संकुलित संरचना बनाता है। इसके 0.5 मोल में रिक्तियों की संख्या कितनी होगी? उनमें से कितनी रिक्तियाँ चतुष्फलकीय हैं?
हल
यौगिक के 0.5 मोल में परमाणुओं की संख्या = 0.5 x 6.022 x 1023
= 3.011 x 1023
अष्टफलकीय रिक्तियों की संख्या = संकुलन में परमाणुओं की संख्या
= 3.011 x 1023
चतुष्फलकीय रिक्तियों की संख्या = 2 x संकुलन में परमाणुओं की संख्या
= 2 x 3.011 x 1023 = 6.022 x 1023
∴ रिक्तियों की कुल संख्या = (3.011 + 6.022) x 1023
= 9.033 x 1023

प्रश्न 16.
एक यौगिक दो तत्त्वों M तथा N से बना है। तत्त्व N, ccp संरचना बनाता है और M के परमाणु चतुष्फलकीय रिक्तियों के 1/3 भाग को अध्यासित करते हैं। यौगिक का सूत्र क्या है।
हल
माना ccp में N परमाणु = n
∴ चतुष्फलकीय रिक्तियों की संख्या = 2n
चूँकि M परमाणु चतुष्फलकीय रिक्तियों का 1/3 भाग घेरते हैं।
अतः M परमाणुओं की संख्या = [latex s=2]\frac { 2n }{ 3 }[/latex]
M : N = [latex s=2]\frac { 2n }{ 3 }[/latex] : n = 2 : 3
अत: सूत्र M2N2 होगा।

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प्रश्न 17.
निम्नलिखित में से किस जालक में उच्चतम संकुलन क्षमता है?

  1. सरल घनीय,
  2. अन्तः केन्द्रित घन और
  3. षट्कोणीय निविड संकुलित जालक।

उत्तर
संकुलन क्षमताएँ निम्न हैं –

  1. सरल घनीय = 52.4%,
  2. अन्तः केन्द्रित घनीय = 68%,
  3. षट्कोणीय निविड संकुलित = 74%

अतः षट्कोणीय निविड संकुलित व्यवस्था में अधिकतम संकुलन क्षमता होती है।

प्रश्न 18.
एक तत्त्व का मोलर द्रव्यमान 2.7 x 10-2 kg mol-1 है। यह 405 pm लम्बाई की भुजा वाली घनीय एकक कोष्ठिका बनाता है। यदि उसका घनत्व 2.7 x 103 kg m-3 हो तो घनीय एकक कोष्ठिका की प्रकृति क्या होगी?
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 1
चूँकि प्रति एकक कोष्ठिका में तत्त्व के चार परमाणु हैं, अत: घनीय एकक कोष्ठिका फलक-केन्द्रित (fcc) या घनीय निविड संकुलित होगी।

प्रश्न 19.
जब एक ठोस को गर्म किया जाता है तो किस प्रकार का दोष उत्पन्न हो सकता है? इससे कौन-से भौतिक गुण प्रभावित होते हैं और किस प्रकार?
उत्तर
रिक्तिका दोष; गर्म करने पर ठोस के कुछ परमाणु अथवा आयन जालक स्थल को पूर्णतः छोड़ देते। हैं। परमाणुओं अथवा आयनों के क्रिस्टल को पूर्णतः छोड़ने के कारण पदार्थ का घनत्व कम हो जाता है।

प्रश्न 20.
निम्नलिखित किस प्रकार का स्टॉइकियोमीट्री दोष दर्शाते हैं?

  1. ZnS
  2. AgBr

उत्तर

  1. फ्रेंकेल दोष
  2. फ्रेंकेल तथा शॉटकी दोष दोनों।

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प्रश्न 21.
समझाइए कि एक उच्च संयोजी धनायन को अशुद्धि की तरह मिलाने पर आयनिक ठोस में रिक्तिकाएँ किस प्रकार प्रविष्ट होती हैं?
उत्तर
विद्युत उदासीनता बनाए रखने के लिए उच्च संयोजकता वाले धनायन द्वारा निम्न संयोजकता वाले दो या अधिक धनायन प्रतिस्थापित होते हैं। अत: कुछ धनायन रिक्तियाँ जनित होती हैं, जैसे- यदि आयनिक ठोस Na+ cl में Sr2+ की अशुद्धि मिलाई जाती है तब दो Na+ जालक बिन्दु रिक्त हो जाते हैं तथा इनमें से एक Sr2+ आयन द्वारा घिर जाती है तथा अन्य रिक्त रहती हैं।

प्रश्न 22.
जिन आयनिक ठोसों में धातु आधिक्य दोष के कारण ऋणायनिक रिक्तिका होती हैं, वे रंगीन होते हैं। उपयुक्त उदाहरण की सहायता से समझाइए।
उत्तर
इसको सोडियम क्लोराइड (Na+ cl) का उदाहरण लेकर समझा सकते हैं। जब इसके क्रिस्टलों को सोडियम वाष्प की उपस्थिति में गर्म करते हैं तब कुछ Cl आयन अपने जालक स्थलों को छोड़कर सोडियम से संयुक्त होकर NaCl बना लेते हैं। इस अभिक्रिया के होने के लिए सोडियम (UPBoardSolutions.com) परमाणु इलेक्ट्रॉन खोकर Na+ आयन बनाते हैं। ये इलेक्ट्रॉन क्रिस्टल में विसरित होकर Cl आयनों द्वारा जनित ऋणायनिक रिक्तिकाओं को घेर लेते हैं। क्रिस्टल में अब सोडियम का आधिक्य होता है। अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों द्वारा घेरे गए स्थल F- केन्द्र कहलाते हैं। ये क्रिस्टल को पीला रंग प्रदान करते हैं, क्योंकि वे दृश्य प्रकाश की ऊर्जा का अवशोषण करके उत्तेजित हो जाते हैं।

प्रश्न 23.
वर्ग 14 के तत्त्व को n- प्रकार के अर्द्धचालक में उपयुक्त अशुद्धि द्वारा अपमिश्रित करके रूपान्तरित करना है। यह अशुद्धि किस वर्ग से सम्बन्धित होनी चाहिए?
उत्तर
अशुद्धि वर्ग 15 से सम्बन्धित होनी चाहिए।

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प्रश्न 24.
किस प्रकार के पदार्थों से अच्छे स्थायी चुम्बक बनाए जा सकते हैं-
लौहचुम्बकीय अथवा फेरीचुम्बकीय? अपने उत्तर का औचित्य बताइए।
उत्तर
लौहचुम्बकीय पदार्थ श्रेष्ठ स्थायी चुम्बक बनाते हैं क्योंकि इनमें धातु आयन छोटे क्षेत्रों में व्यवस्थित होते हैं, जिन्हें डोमेन कहते हैं। प्रत्येक डोमेन सूक्ष्म चुम्बक के रूप में (UPBoardSolutions.com) कार्य करता है। ये डोमेन अनियमित रूप में व्यवस्थित होते हैं। जब इन पर चुम्बकीय क्षेत्र आरोपित किया जाता है तब वे चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में व्यवस्थित हो जाते हैं तथा प्रबल चुम्बकीय क्षेत्र बनाते हैं। बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र के हटा लेने पर भी डोमेन व्यवस्थित रहते हैं। इस प्रकार लौहचुम्बकीय पदार्थ स्थायी चुम्बक में परिवर्तित हो जाता है।

अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 1.
‘अक्रिस्टलीय पद को परिभाषित कीजिए। अक्रिस्टलीय ठोसों के कुछ उदाहरण दीजिए।
उत्तर
ऐसे ठोस जिनका निश्चित ज्यामितीय आकार या विन्यास नहीं होता है अर्थात् इनके अवयवी कण निश्चित क्रम में व्यवस्थित नहीं होते हैं, अक्रिस्टलीय ठोस (amorphous solids) कहलाते हैं। इनका कोई निश्चित गलनांक नहीं होता है तथा ये समदैशिक (isotropic) होते हैं; जैसे, प्लास्टिक, काँच आदि।

प्रश्न 2.
काँच, क्वार्टज जैसे ठोस से किस प्रकार भिन्न है? किन परिस्थितियों में क्वार्टज को काँच में रूपान्तरित किया जा सकता है?
उत्तर
काँच अक्रिस्टलीय ठोस है। इसमें अवयवी कणों (SiO4 चतुष्क) की केवल लघु परासी व्यवस्था होती है। दूसरी ओर क्वार्ट्ज में अवयवी कणों (SiO4 चतुष्क) की लघु और दीर्घ (दोनों) परासी व्यवस्थाएँ होती हैं। दूसरे शब्दों में, क्वार्ज क्रिस्टलीय होता है।
क्वार्ट्ज़ को पिघलाकर उसे शीघ्रता से ठंडा करने पर काँच प्राप्त होता है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित ठोसों का वर्गीकरण आयनिक, धात्विक, आण्विक, सहसंयोजक या अक्रिस्टलीय में कीजिए।

  1. टेट्राफॉस्फोरस डेकॉक्साइड (P4O10)
  2. अमोनियम फॉस्फेट (NH4)3 PO4
  3. SiC
  4. I2
  5. P4
  6. प्लास्टिक
  7. ग्रेफाइट
  8. पीतल
  9. Rb
  10. LiBr
  11. Si

उत्तर

  1. आयनिक (Ionic) : अमोनियम फॉस्फेट (NH4)3 PO4, LiBr
  2. धात्विक (Metallic) : पीतल, Rb
  3. आण्विक (Molecular) : टेट्राफॉस्फोरस डेकॉक्साइड (P4O10), I2, P4
  4. सहसंयोजक (Covalent) : ग्रेफाइट, SiC, Si
  5. अक्रिस्टलीय (Amorphous) : प्लास्टिक

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प्रश्न 4.

  1. उपसहसंयोजन संख्या का क्या अर्थ है?
  2. निम्नलिखित में परमाणुओं की उपसहसंयोजन संख्या क्या है?
    1. एक घनीय निविड संकुलित संरचना
    2. एक अन्त:केन्द्रित घनीय संरचना।

उत्तर

  1. उप-सहसंयोजन संख्या – यदि परमाणुओं को गोलों के रूप में प्रदर्शित किया जाए, तब किसी विशेष गोले के सन्निकट उपस्थित अन्य गोलों की संख्या उसकी उप-सहसंयोजन संख्या कहलाती है। आयनिक क्रिस्टलों में किसी आयन के चारों ओर उपस्थित विपरीत आवेशित गोलों की संख्या उसकी उप-सहसंयोजन संख्या कहलाती है।।
    1. 12
    2. 8.

प्रश्न 5.
यदि आपको किसी अज्ञात धातु का घनत्व एवं एकक कोष्ठिका की विमाएँ ज्ञात हैं तो क्या आप उसके परमाण्विक द्रव्यमान की गणना कर सकते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
परमाण्विक द्रव्यमान, M = [latex s=2]\frac { \rho \times { a }^{ 3 }\times { N }_{ A } }{ Z } [/latex]
किसी अज्ञात धातु का घनत्व एवं एकक कोष्ठिका की विमाएँ ज्ञात होने पर उपर्युक्त सूत्र की सहायता से उसके परमाण्विक द्रव्यमान की गणना की जा सकती है।

प्रश्न 6.
‘किसी क्रिस्टल की स्थिरता उसके गलनांक के परिमाण द्वारा प्रकट होती है।’ टिप्पणी कीजिए। किसी आँकड़ा पुस्तक से जल, एथिल ऐल्कोहॉल, डाइएथिल ईथर तथा मेथेन के गलनांक एकत्र करें। इन अणुओं के मध्य अन्तराआण्विक बलों के बारे में आप क्या कह सकते हैं?
उत्तर
किसी पदार्थ का गलनांक जितना उच्च होता है उसके अवयवी कणों के मध्य आकर्षण बल उतना ही अधिक होता है और पदार्थ भी उतना ही अधिक स्थायी होता है। जल, एथिल ऐल्कोहॉल, डाइएथिल ईथर और मेथेन के गलनांक क्रमशः 273 K, 155.7 K, 156.8 K और 90.5 K हैं। जल और एथिल ऐल्कोहॉल में अंतराआण्विक बल हाइड्रोजन आबंधन होते हैं। जल के अणुओं के मध्य हाइड्रोजन आबंधन एथिल ऐल्कोहॉल (UPBoardSolutions.com) के अणुओं की तुलना में प्रबल होता है जोकि उनके गलनांकों से भी स्पष्ट होता है। डाइएथिल ईथर के अणुओं के बीच द्विध्रुव-द्विध्रुव आकर्षण होता है तथा मेथेन अणुओं के मध्य यह दुर्बल वाण्डरवाल्स बल होता है जो कि इनके गलनांकों से स्पष्ट है।

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प्रश्न 7.
निम्नलिखित युगलों के पदों (शब्दों) में कैसे विभेद करोगे?

  1. षट्कोणीय निविड संकुलन एवं घनीय निविड संकुलन
  2. क्रिस्टल जालक एवं एकक कोष्ठिका
  3. चतुष्फलकीय रिक्ति एवं अष्टफलकीय रिक्ति।

उत्तर
1. षट्कोणीय निविड संकुलन एवं घनीय निविड संकुलन
(Hexagonal Close Packing and Cubic Close Packing)
ये दोनों त्रिविमीय निविड संकुलित संरचनाएँ द्विविम-षट्कोणीय निविड संकुलित परतों को एक-दूसरे पर रखकर जनित की जा सकती हैं।

षट्कोणीय निविड संकुलन – जब तृतीय परत को द्वितीय परत पर रखा जाता है, तब उत्पन्न एक सम्भावना के अन्तर्गत द्वितीय परत की चतुष्फलकीय रिक्तियों को तृतीय परत के गोलों द्वारा आच्छादित किया जा सकता है। इस स्थिति में तृतीय परत के गोले प्रथम परत के गोलों के साथ पूर्णत: (UPBoardSolutions.com) संरेखित होते हैं। इस प्रकार गोलों का पैटर्न एकान्तर परतों में पुनरावृत्त होता है। इस पैटर्न को प्रायः ABAB….पैटर्न लिखा जाता है। इस संरचना को षट्कोणीय निविड संकुलित (hcp) संरचना कहते हैं (चित्र-1)। इस प्रकार की परमाणुओं की व्यवस्था कई धातुओं; जैसे- मैग्नीशियम और जिंक में पायी जाती है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 2
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घनीय निविड संकुलन – इसके लिए तीसरी परत दूसरी परत के ऊपर इस प्रकार रखते हैं कि उसके गोले अष्टफलकीय रिक्तियों को आच्छादित करते हों। इस प्रकार से रखने पर तीसरी परत के गोले प्रथम अथवा द्वितीय किसी भी परत के साथ संरेखित नहीं होते। इस व्यवस्था को ‘C’ प्रकार का (UPBoardSolutions.com) कहा जाता है। केवल चौथी परत रखने पर उसके गोले प्रथम परत के गोलों के साथ संरेखित होते हैं। जैसा चित्र-1 व 2 में दिखाया गया है। इस प्रकार के पैटर्न को प्रायः ABCABC… लिखा जाता है। इस संरचना को घनीय निविड संकुलित संरचना (ccp) अथवा फलक-केन्द्रित घनीय (fcc) संरचना कहा जाता है। धातु; जैसे- ताँबा तथा चाँदी इस संरचना में क्रिस्टलीकृत होते हैं।
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उपर्युक्त दोनों प्रकार के निविड़ संकुलन अति उच्च क्षमता वाले होते हैं और क्रिस्टल का 74% स्थान सम्पूरित रहता है। इन दोनों में प्रत्येक गोला बारह गोलों के सम्पर्क में रहता है। इस प्रकार इन दोनों संरचनाओं में उपसहसंयोजन संख्या 12 है।

2. क्रिस्टल जालक एवं एकक कोष्ठिका
(Crystal Lattice and Unit Cell)
क्रिस्टल जालक – क्रिस्टलीय ठोसों का मुख्य अभिलक्षण अवयवी कणों का नियमित और पुनरावृत्त पैटर्न है। यदि क्रिस्टल में अवयवी कणों की त्रिविमीय व्यवस्था को (UPBoardSolutions.com) आरेख के रूप में निरूपित किया जाए, जिसमें प्रत्येक बिन्दु को चित्रित किया गया हो तो व्यवस्था को क्रिस्टल जालक कहते हैं। इस प्रकार, “द्विकस्थान (space) में बिन्दुओं की नियमित त्रिविमीय व्यवस्था को क्रिस्टल जालक कहते हैं।”
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क्रिस्टल जालक के एक भाग को चित्र- 3 में दिखाया गया है। केवल 14 त्रिविमीय जालक सम्भव हैं।
एकक कोष्ठिका – एकक कोष्ठिका क्रिस्टल जालक का लघुतम भाग है (चित्र-3)। जब इसे विभिन्न दिशाओं में पुनरावृत्त किया जाता है तो पूर्ण जालक की उत्पत्ति होती है।

3. चतुष्फलकीय रिक्ति एवं अष्टफलकीय रिक्ति
(Tetrahedral Void and Octahedral Void)
चतुष्फलकीय रिक्ति – ये रिक्तियाँ चार गोलों द्वारा घिरी रहती हैं जो एक नियमित चतुष्फलक के शीर्ष पर स्थित होते हैं। इस प्रकार जब भी द्वितीय परत का एक गोला प्रथम (UPBoardSolutions.com) परत की रिक्ति के ऊपर होता है, तब एक चतुष्फलकीय रिक्ति बनती है। इन रिक्तियों को चतुष्फलकीय रिक्तियाँ इसलिए कहा जाता है। क्योंकि जब इन चार गोलों के केन्द्रों को मिलाया जाता है, तब एक चतुष्फलक बनता है। चित्र-4 में इन्हें “T’ से अंकित किया गया है। ऐसी एक रिक्ति को अलग से चित्र-5 में दिखाया गया है।
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अष्टफलकीय रिक्ति – ये रिक्तियाँ सम्पर्क में स्थित तीन गोलों द्वारा संलग्नित रहती हैं। इस प्रकार द्वितीय परत की त्रिकोणीय रिक्तियाँ प्रथम परते की त्रिकोणीय रिक्तियों (UPBoardSolutions.com) के ऊपर होती हैं और इनकी त्रिकोणीय आकृतियाँ अतिव्यापित नहीं होतीं। उनमें से एक में त्रिकोण का शीर्ष ऊर्ध्वमुखी और दूसरे में अधोमुखी होता है। इन रिक्तियों को चित्र-4 में ‘O’ से अंकित किया गया है। ऐसी रिक्तियाँ छह गोलों से घिरी होती हैं। ऐसी एक रिक्ति को अलग से चित्र- 5 में दिखाया गया है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 7

प्रश्न 8.
निम्नलिखित जालकों में से प्रत्येक की एकक कोष्ठिका में कितने जालक बिन्दु होते हैं?

  1. फलक-केन्द्रित घनीय,
  2. फलक-केन्द्रित चतुष्कोणीय,
  3. अन्तःकेन्द्रित।

उत्तर

  1. फलक-केन्द्रित घनीय संरचना (fcc) में जालक बिन्दु
    = 8 (कोनों पर) + 6 (फलक केन्द्र पर) = 14
  2. फलक-केन्द्रित चतुष्कोणीय संरचना में जालक बिन्दु
    = 8 (कोनों पर) + 6 (फलक केन्द्र पर) = 14
  3. अन्त:केन्द्रित घनीय (bcc) संरचना में जालक बिन्दु
    = 8 (कोनों पर) + 1 (अन्त:केन्द्र पर) = 9

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प्रश्न 9.
समझाइए –

  1. धात्विक एवं आयनिक क्रिस्टलों में समानता एवं विभेद का आधार।
  2. आयनिक ठोस कठोर एवं भंगुर होते हैं।

उत्तर
1. समानताएँ (Similarities) – (1) आयनिक तथा धात्विक दोनों क्रिस्टलों में स्थिर विद्युत आकर्षण बल विद्यमान होता है। आयनिक क्रिस्टलों में यह विपरीत आवेशयुक्त आयनों के मध्य होता है। धातुओं में यह संयोजी इलेक्ट्रॉनों तथा करनैल (kernels) के मध्य होता है। इसी कारण से इन दोनों के गलनांक उच्च होते हैं।
(2) दोनों स्थितियों में बन्ध अदैशिक (non-directional) होता है।

विभेद (Differences) – (1) आयनिक क्रिस्टलों में आयन गति के लिए स्वतन्त्र नहीं होते हैं। अत: ये ठोस अवस्था में विद्युत का चालन नहीं करते। ये ऐसा केवल गलित अवस्था या जलीय विलयन में करते हैं। धातुओं में संयोजी इलेक्ट्रॉन बँधे नहीं होते, अपितु मुक्त रहते हैं। अत: ये ठोस (UPBoardSolutions.com) अवस्था में भी विद्युत का चालन करते हैं।
(2) आयनिक बन्ध स्थिर विद्युत आकर्षण के कारण प्रबल होते हैं। धात्विक बन्ध दुर्बल भी हो सकता है। या प्रबल भी, यह संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या तथा करनैल के आकार पर निर्भर करता है।

2. आयनिक क्रिस्टल कठोर होते हैं क्योंकि इनमें विपरीत आवेशयुक्त आयनों के मध्य प्रबल स्थिर विद्युत आकर्षण बल उपस्थित होता है। ये भंगुर होते हैं क्योंकि आयनिक बन्ध अदिशात्मक होता है।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित के लिए धातु के क्रिस्टल में संकुलन क्षमता की गणना कीजिए।

  1. सरल घनीय,
  2. अन्त:केन्द्रित घनीय,
  3. फलक-केन्द्रित घनीय।

(यह मानते हुए कि परमाणु एक-दूसरे के सम्पर्क में हैं।)

उत्तर
1. सरल घनीय जालक में संकुलन क्षमता
(Packing Efficiency in Simple Cubic Lattice)
सरल घनीय जालक में परमाणु केवल घन के कोनों पर उपस्थित होते हैं। घन के किनारों (कोरों) पर कण एक-दूसरे के सम्पर्क में होते हैं (चित्र-6)। इसलिए घन के कोर अथवा भुजा की लम्बाई ‘a’ और प्रत्येक कण का अर्द्धव्यास r निम्नलिखित प्रकार से सम्बन्धित होता है –
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a = 2r
घनीय एकक कोष्ठिका का आयतन = a3 = (2r)3 = 8r3
चूँकि सरल घनीय एकक कोष्ठिका में केवल 1 परमाणु होता है।
अतः अध्यासित दिक्स्थान का आयतन = 4/3 πr3
∴ संकुलन क्षमता
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 9

2. अन्तः केन्द्रित घनीय जालक में संकुलन क्षमता
(Packing Efficiency in Body-centred Cubic Lattice)
संलग्न चित्र से यह स्पष्ट है कि केन्द्र पर स्थित परमाणु विकर्ण पर व्यवस्थित अन्य दो परमाणुओं के सम्पर्क में है।
Δ EFD में,
b2 = a2 + a2 = 2a2
b = √2a

अब Δ AFD में,
c2 = a2 + b2 = a2 + 2a2 = 3a2
c= √3a
काय विकर्ण 4r की लम्बाई 47 के बराबर है, जहाँ r गोले (परमाणु) का अर्द्धव्यास है क्योंकि विकर्ण पर उपस्थित तीनों गोले एक-दूसरे के सम्पर्क में हैं। अतः
√3a = 4r
a = [latex s=2]\frac { 4 }{ \sqrt { 3 } } [/latex] r
अतः यह भी लिख सकते हैं कि r = [latex s=2]\frac { \sqrt { 3 } }{ 4 } [/latex] a
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 10
इस प्रकार की संरचना में परमाणुओं की कुल संख्या 2 है तथा उनका आयतन 2 x (4/3) πr3 है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image image 11

3. फलक-केन्द्रित घनीय जालक में संकुलन क्षमता
(Packing Efficiency in Face-centred Cubic Lattice)
संलग्न चित्र से, Δ ABC में,
AC2 = b2 = BC2 + AB2
= a2 + a2 = 2a2
या  b = √2a
यदि गोले का अर्द्धव्यास r हो तो
b= 4r = √2a
या  a = [latex s=2]\frac { 4r }{ \sqrt { 2 } } [/latex] = 2√2r
या  r = [latex s=2]\frac { a }{ 2\sqrt { 2 } } [/latex]
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 12
इस प्रकार की संरचना में परमाणुओं की कुल संख्या चार होती है तथा उनका आयतन 4 x [latex]\frac { 4 }{ 3 } [/latex] πr3 है।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 13
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 14

प्रश्न 11.
चाँदी का क्रिस्टलीकरण fcc जालक में होता है। यदि इसकी कोष्ठिका के कोरों की लम्बाई 4.07 x 10-8 cm तथा घनत्व 10.5 g cm-3 हो तो चाँदी का परमाण्विक द्रव्यमान ज्ञात कीजिए।
हल
fcc जालक के लिए Z = 4
कोर की लम्बाई, a = 4.077 x 10-8 cm, घनत्व ρ = 10.5 g cm-3
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 15
=107.14 g mol-1
अतः चाँदी का परमाण्विक द्रव्यमान = 107.14 g mol-1 होगा।

प्रश्न 12.
एक घनीय ठोस दो तत्वों P एवं Q से बना है। घन के कोनों पर Q परमाणु एवं अन्तःकेन्द्र पर P परमाणु स्थित हैं। इस यौगिक का सूत्र क्या है? P एवं Q की उपसहसंयोजन संख्या क्या है?
हल
घन में परमाणु Q, 8 कोनों पर स्थित हैं।
Q परमाणुओं की संख्या = 1/8 x 8= 1
परमाणु P अन्त: केन्द्र पर स्थित है,
अतः P परमाणुओं की संख्या = 1
अतः यौगिक का सूत्र = PQ
P तथा Q की उप-सहसंयोजन संख्या = 8

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प्रश्न 13.
नायोबियम का क्रिस्टलीकरण अन्तःकेन्द्रित घनीय संरचना में होता है। यदि इसका घनत्व 8.55 g cm-3 हो तो इसके परमाण्विक द्रव्यमान 93u का प्रयोग करके परमाणु त्रिज्या की गणना कीजिए।
हल
अन्त: केन्द्रित घनीय संरचना (bcc) में Z = 2, घनत्व ρ = 8.55 g cm-3, परमाण्विक द्रव्यमान,
M = 92.9 g mol-1
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 16
∴ a = (36.1 x 10-24 cm3)1/3 = 3.3 x 10-8 cm
bcc एकक कोष्ठिका के लिए,
विकर्ण = 4 x नायोबियम परमाणु की त्रिज्या
√3a = 4 x नायोबियम परमाणु की त्रिज्या
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 17
= 1.43 x 10-8 cm

प्रश्न 14.
यदि अष्टफलकीय रिक्ति की त्रिज्या हो तथा निविड संकुलन में परमाणुओं की त्रिज्या हो तो r एवं R में सम्बन्ध स्थापित कीजिए।
हल
अष्टफलकीय रिक्ति में स्थित गोला चित्र 9 में छायांकित वृत्त द्वारा प्रदर्शित है। रिक्ति के ऊपर तथा नीचे उपस्थित गोले चित्र-9 में प्रदर्शित नहीं हैं। अब चूंकि ABC एक समकोण त्रिभुज है, अत: पाइथागोरस सिद्धान्त लागू करने पर,
AC2 = AB2 + BC2
(2R)2 = (R + r)2 + (R + r)2
= 2(R + r)2
4R2 = 2(R + r)2
(√2R)2 = (R + r)2
√2R = R + r
r = √2R – R
r = (√2 – 1)R
r = (1.414 – 1)R
r = 0.414 R
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प्रश्न 15.
कॉपर fcc जालक के रूप में क्रिस्टलीकृत होता है जिसके कोर की लम्बाई 3.61 x 10-8 cm है। यह दर्शाइए कि गणना किए गए घनत्व के मान तथा मापे गए घनत्व 8.92 g cm-3 में समानता है।
हल
fcc जालक में Z = 4, कोर की लम्बाई, a = 3.61 x 10-8 cm, घनत्व ρ = ?
कॉपर का परमाण्विक द्रव्यमान, M = 63.5 g mol-1
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 19
= 8.97 g cm-3
अतः घनत्व का गणनात्मक मान 8.97 g cm-3 तथा मापे गये घनत्व का मान 8.92 g cm-3 लगभग समान हैं।

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प्रश्न 16.
विश्लेषण द्वारा ज्ञात हुआ कि निकिल ऑक्साइड का सूत्र Ni0.98 O1.00 है। निकिल आयनों का कितना अंश Ni2+ और Ni3+ के रूप में विद्यमान है?
हल
Ni0.98 O1.00 नॉन- स्टॉइकियोमीटी यौगिक है। Ni आयन तथा ऑक्साइड आयनों का संघटन 98 : 100 है। माना Ni में x Ni2+ आयन तथा (98 – x) Ni3+ आयन हैं।
Ni2+ तथा Ni3+ पर उपस्थित धनावेश ऑक्साइड आयनों पर उपस्थित ऋणावेश के बराबर होगा, अतः
x × 2 + (98 – x )3 = 100 x 2
2 + 294 – 3x = 100 × 2
∴ x = 94
अत: 98 Ni आयनों में 94 Ni2+ आयन तथा 4 Ni3+ आयन होंगे।
∴ Ni2+ आयनों का प्रतिशत = [latex]\frac { 94 }{ 98 } [/latex] x 100= 96%
Ni3+ आयनों का प्रतिशत = 4%

प्रश्न 17.
अर्द्धचालक क्या होते हैं? दो मुख्य अर्द्धचालकों का वर्णन कीजिए एवं उनकी चालकता क्रियाविधि में विभेद कीजिए।
उत्तर
अर्द्धचालक (Semiconductors) – वे ठोस जिनकी चालकता 10-6 से 104 ohm-1 m-1 तक के मध्यवर्ती परास में होती है, अर्द्धचालक कहलाते हैं।
अर्द्धचालकों में संयोजक बैण्ड एवं चालक बैण्ड के मध्य ऊर्जा- अन्तराल कम होता है। अतः कुछ इलेक्ट्रॉन चालक बैण्ड में लाँघ सकते हैं और अल्प- चालकता प्रदर्शित कर सकते हैं। ताप बढ़ने के साथ अर्द्धचालकों में विद्युत- चालकता बढ़ती है, क्योंकि अधिक संख्या में इलेक्ट्रॉन चालक बैण्ड में देखे जा सकते हैं। सिलिकन एवं जर्मेनियम जैसे पदार्थ इस प्रकार का व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। इनमें उचित अशुद्धि को (UPBoardSolutions.com) उपयुक्त मात्रा में मिलाने से इनकी चालकता बढ़ जाती है। इस आधार पर दो प्रकार के अर्द्धचालक तथा उनकी चालकता- क्रियाविधि का वर्णन निम्नवत् है –
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(i) n- प्रकार के अर्द्धचालक (n-type semiconductors) – सिलिकन तथा जर्मेनियम आवर्त सारणी के वर्ग 14 से सम्बन्धित हैं और प्रत्येक में चार संयोजक इलेक्ट्रॉन हैं। क्रिस्टलों में इनका प्रत्येक परमाणु अपने निकटस्थ परमाणुओं के साथ चार सहसंयोजक बन्ध बनाता है [चित्र-11 (a)]। जब वर्ग 15 के तत्व; जैसे- P अथवा As, जिनमें पाँच संयोजक इलेक्ट्रॉन होते हैं, को अपमिश्रित किया जाता है तो ये (UPBoardSolutions.com) सिलिकन अथवा जर्मेनियम के क्रिस्टल में कुछ जालक स्थलों में आ जाते हैं [चित्र-11 (b)]। P अथवा As के पाँच में से चार इलेक्ट्रॉनों का उपयोग चार सन्निकट सिलिकन परमाणुओं के साथ चार सहसंयोजक बन्ध बनाने में होता है। पाँचवाँ अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन विस्थानित (delocalised) हो जाता है। यह विस्थानित इलेक्ट्रॉन अपमिश्रित सिलिकन (अथवा जर्मेनियम) की चालकता में वृद्धि करता है। यहाँ चालकता में वृद्धि ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन के कारण होती है, अत: इलेक्ट्रॉन-धनी अशुद्धि से अपमिश्रित सिलिकन को n-प्रकार का अर्द्धचालक कहा जाता है।
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(ii) p- प्रकार के अर्द्धचालक (p-type semiconductors) – सिलिकन अथवा जर्मेनियम को वर्ग 13 के तत्वों; जैसे- B, Al अथवा Ga के साथ भी अपमिश्रित किया जा सकता है जिनमें केवल तीन संयोजक इलेक्ट्रॉन होते हैं। वह स्थान जहाँ चौथा इलेक्ट्रॉन नहीं होता, इलेक्ट्रॉन रिक्ति या इलेक्ट्रॉन छिद्र कहलाता है [चित्र-11 (c)]। निकटवर्ती परमाणु से इलेक्ट्रॉन आकर इलेक्ट्रॉन छिद्र को भर सकता है, परन्तु ऐसा करने पर वह अपने मूल स्थान पर इलेक्ट्रॉन छिद्र छोड़ जाता है। यदि ऐसा हो तो यह प्रतीत होगा जैसे कि (UPBoardSolutions.com) इलेक्ट्रॉन छिद्र जिस इलेक्ट्रॉन द्वारा यह भरा गया है, उसके विपरीत दिशा में चल रहा है। विद्युत क्षेत्र के प्रभाव में इलेक्ट्रॉन, इलेक्ट्रॉन छिद्रों में से धनावेशित प्लेट की ओर चलेंगे, परन्तु ऐसा प्रतीत होगा; जैसे इलेक्ट्रॉन छिद्र धनावेशित हैं और ऋणावेशित प्लेट की ओर चल रहे हैं। इस प्रकार के अर्द्धचालकों को p- प्रकार के अर्द्धचालक कहते हैं।

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प्रश्न 18.
नॉनस्टॉइकियोमीट्री क्यूप्रस ऑक्साइड, Cu2O प्रयोगशाला में बनाया जा सकता है। इसमें कॉपर तथा ऑक्सीजन का अनुपात 2 : 1 से कुछ कम है। क्या आप इस तथ्य की व्याख्या कर सकते हैं कि यह पदार्थ p- प्रकार का अर्द्धचालक है?
उत्तर
Cu2O में Cu तथा O का 2 : 1 से कम अनुपात यह प्रदर्शित करता है कि इसमें धनायनिक रिक्ति के कारण धातु न्यूनता (metal deficiency) है। धातु न्यून यौगिक धनायन छिद्रों के द्वारा विद्युत चालन करते हैं। अतः p- प्रकार के अर्द्धचालक (p- type semiconductors) होते हैं।

प्रश्न 19.
फेरिक ऑक्साइड में ऑक्साइड आयन के षट्कोणीय निविड़ संकुलन में क्रिस्टलीकृत होता है जिसकी तीन अष्टफलकीय रिक्तियों में से दो पर फेरिक आयन उपस्थित होते हैं। फेरिक ऑक्साइड का सूत्र ज्ञात कीजिए।
हल
माना निविड संकुलित संरचना में ऑक्साइड (O2-) आयनों की संख्या = x
∴ अष्टफलकीय रिक्तियों की संख्या = x
∴ इन रिक्तियों का 2/3 भाग फेरिक आयनों (Fe3+) द्वारा भरा है।
अत: उपस्थित Fe3+ आयनों की संख्या 2/3 × x = 2x/3
Fe3+ : O2- = 2x/3 : x = 2 : 3
अतः फेरिक ऑक्साइड का सूत्र Fe2O3 होगा।

प्रश्न 20.
निम्नलिखित को p-प्रकार या n-प्रकार के अर्द्धचालकों में वर्गीकृत कीजिए –

  1. In से डोपित Ge,
  2. Si से डोपित B

उत्तर

  1. p- प्रकार का अर्द्धचालक,
  2. n- प्रकार का अर्द्ध-चालक।

प्रश्न 21.
सोना (परमाणु त्रिज्या= 0.144 nm) फलक-केन्द्रित एकक कोष्ठिका में क्रिस्टलीकृत होता है। इसकी कोष्ठिका के कोर की लम्बाई ज्ञात कीजिए।
हल
fcc संरचना के लिए यदि r परमाणु की त्रिज्या हो तो
फलक विकर्ण = 4r
यदि कोष्ठिका की कोर की लम्बाई a हो तो फलक विकर्ण = √2a
अतः √2a = 4r
∴ a = [latex]\frac { 4 }{ \sqrt { 2 } } [/latex] × 0.144
0.407 nm

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प्रश्न 22.
बैण्ड सिद्धान्त के आधार पर

  1. चालक एवं रोधी
  2. चालक एवं अर्द्धचालक में क्या अन्तर होता है?

उत्तर

  1. चालक एवं रोधी में अन्तर (Difference between conductor and insulator) – अचालक अथवा रोधी में संयोजक बैण्ड तथा चालक बैण्ड के मध्य ऊर्जा-अन्तर बहुत अधिक होता है, जबकि चालक में ऊर्जा-अन्तर अत्यन्त कम होता है या संयोजक बैण्ड तथा चालक बैण्ड के बीच अतिव्यापन होता है।
  2. चालक एवं अर्द्धचालक में अन्तर (Difference between conductor and semiconductor) – चालक में संयोजक बैण्ड तथा चालक बैण्ड के बीच ऊर्जा-अन्तर अत्यन्त कम होता है। अथवा अतिव्यापन होता है, जबकि अर्द्धचालकों में ऊर्जा अन्तर सदैव कम ही होता है, कभी भी अतिव्यापन नहीं होता।

प्रश्न 23.
उचित उदाहरणों द्वारा निम्नलिखित पदों को परिभाषित कीजिए

  1. शॉट्की दोष
  2. फ्रेंकेल दोष
  3. अन्तराकाशी
  4. F-केन्द्र।

उत्तर
1. शॉट्की दोष (Schottky defect) – यह आधारभूत रूप से आयनिक ठोसों का रिक्तिका दोष है। जब एक परमाणु अथवा आयन अपनी सामान्य (वास्तविक) स्थिति से लुप्त हो जाता है तो एक जालक रिक्तता निर्मित हो जाती है; इसे शॉकी दोष कहते हैं। विद्युत उदासीनता को बनाए रखने के लिए लुप्त होने वाले धनायनों और ऋणायनों की संख्या बराबर होती है। शॉट्की दोष उन आयनिक पदार्थों द्वारा दिखाया जाता है जिनमें धनायन और ऋणायन लगभग समान आकार के होते हैं। उदाहरण के लिए– NaCl, KCl, CsCl और AgBr शॉट्की दोष दिखाते हैं।

2. फ्रेंकेल दोष (Frenkel defect) – यह दोष आयनिक ठोसों द्वारा दिखाया जाता है। लघुतर आयन (साधारणतया धनायन) अपने वास्तविक स्थान से विस्थापित होकर अन्तराकाश में चला जाता है। यह वास्तविक स्थान पर रिक्तिका दोष और नए स्थान पर अन्तराकाशी दोष उत्पन्न करता है। (UPBoardSolutions.com) फ्रेंकेल दोष को विस्थापन दोष भी कहते हैं। यह ठोस के घनत्व को परिवर्तित नहीं करता। फ्रेंकेल दोष उन आयनिक पदार्थ द्वारा दिखाया जाता है जिनमें आयनों के आकार में अधिक अन्तर होता है। उदाहरण के लिए– ZnS, AgCl, AgBr और AgI में यह दोष Zn2+ और Ag+ आयन के लघु आकार के कारण होता है।

3. अन्तराकाशी दोष (Interstitial defect) – जब कुछ अवयवी कण (परमाणु अथवा अणु) अन्तराकोशी स्थल पर पाए जाते हैं तब उत्पन्न दोष अन्तराकाशी दोष कहलाता है। यह दोष पदार्थ के घनत्व को बढ़ाता है। अन्तराकाशी दोष अनआयनिक ठोसों में पाया जाता है। आयनिक ठोसों में सदैव विद्युत उदासीनता बनी रहनी चाहिए। इससे इनमें यह दोष दिखाई नहीं देता है।

4. F-केन्द्र (F-centre) – जब क्षारकीय हैलाइड; जैसे- NaCl को क्षार धातु (जैसे- सोडियम) की वाष्प के वातावरण में गर्म किया जाता है तो सोडियम परमाणु क्रिस्टल की सतह पर जम जाते हैं। Cl आयन क्रिस्टल की सतह में विसरित हो जाते हैं और Na+ आयनों के साथ जुड़कर NaCl देते हैं। Na+ आयन बनाने के लिए Na परमाणु से एक इलेक्ट्रॉन निकल जाता है। निर्मुक्त इलेक्ट्रॉन विसरित होकर क्रिस्टल के (UPBoardSolutions.com) ऋणायनिक स्थान को अध्यासित करते हैं, परिणामस्वरूप अब क्रिस्टल में सोडियम का आधिक्य होता है। अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों द्वारा भरी जाने वाली इन ऋणायनिक रिक्तिकाओं को F-केन्द्र कहते हैं। ये NaCl क्रिस्टलों को पीला रंग प्रदान करते हैं। यह रंग इन इलेक्ट्रॉनों द्वारा क्रिस्टल पर पड़ने वाले प्रकाश से ऊर्जा अवशोषित करके उत्तेजित होने के परिणामस्वरूप दिखता है।

प्रश्न 24.
ऐलुमिनियम घनीय निविड संकुलित संरचना में क्रिस्टलीकृत होता है। इसका धात्विक अर्द्धव्यास 125 pm है।

  1. एकक कोष्ठिका के कोर की लम्बाई ज्ञात कीजिए।
  2. 1.0 cm3 ऐलुमिनियम में कितनी एकक कोष्ठिकाएँ होंगी?

हल
घनीय निविड संकुलित संरचना में fcc संरचना होती है।
अतः फलक विकर्ण a√2 = 4r

1. ऐलुमिनियम की एकक कोष्ठिका की कोर की लम्बाई
a = [latex]\frac { 4 }{ \sqrt { 2 } } [/latex] × 125 pm = 353.5 pm
2. Al के 1 cm3 में एकक कोष्ठिकाओं की संख्या
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 22

प्रश्न 25.
यदि NaCl को SrCl2 के 10-3 मोल % से डोपित किया जाए तो धनायनों की रिक्तियों का सान्द्रण क्या होगा?
हल
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 23

प्रश्न 26.
निम्नलिखित को उचित उदाहरणों से समझाइए –

  1. लौहचुम्बकत्व
  2. अनुचुम्बकत्व
  3. फेरीचुम्बकत्व
  4. प्रतिलौहचुम्बकत्व
  5. 12 – 16 और 13 – 15 वर्गों के यौगिक।

उत्तर
1. लौहचुम्बकत्व (Ferromagnetism) – कुछ पदार्थ; जैसे-लोहा, कोबाल्ट, निकिल, गैडोलिनियम और CrO2 बहुत प्रबलता से चुम्बकीय क्षेत्र की ओर आकर्षित होते हैं। ऐसे पदार्थों को लौहचुम्बकीय पदार्थ कहा जाता है। प्रबल आकर्षणों के अतिरिक्त ये स्थायी रूप से चुम्बकित किए जा सकते हैं। ठोस अवस्था में लौहचुम्बकीय पदार्थों के धातु आयन छोटे खण्डों में एकसाथ समूहित हो जाते हैं, इन्हें डोमेन कहा जाता है। इस प्रकार प्रत्येक डोमेन एक छोटे चुम्बक की भाँति व्यवहार करता है। लौहचुम्बकीय पदार्थ के अचुम्बकीय (UPBoardSolutions.com) टुकड़े में डोमेन अनियमित रूप से अभिविन्यसित होते हैं और उनकी चुम्बकीय आघूर्ण निरस्त हो जाता है। पदार्थ को चुम्बकीय क्षेत्र में रखने पर सभी डोमेन चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में अभिविन्यसित हो जाते हैं (चित्र-12 (a)] और प्रबल चुम्बकीय प्रभाव उत्पन्न होती है। चुम्बकीय क्षेत्र को हटा लेने पर भी डोमेनों का क्रम बना रहता है और लौहचुम्बकीय पदार्थ स्थायी चुम्बक बन जाते हैं। चुम्बकीय पदार्थों की यह प्रवृत्ति लौहचुम्बकत्व कहलाती है।
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2. अनुचुम्बकत्व (Paramagnetism) – वे पदार्थ जो चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा आकर्षित होते हैं, अनुचुम्बकीय पदार्थ कहलाते हैं। इन पदार्थों की यह प्रवृत्ति अनुचुम्बकत्व कहलाती है। अनुचुम्बकीय पदार्थ चुम्बकीय क्षेत्र की ओर दुर्बल रूप से आकर्षित होते हैं। ये चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में ही चुम्बकित हो जाते हैं तथा चुम्बकीय क्षेत्र की अनुपस्थिति में अपना चुम्बकत्व खो देते हैं। अनुचुम्बकत्व का कारण एक अथवा (UPBoardSolutions.com) अधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति है, जो कि चुम्बकीय क्षेत्र की ओर आकर्षित होते हैं। O2, Cu2+, Fe3+, Cr3+ ऐसे पदार्थों के कुछ उदाहरण हैं।

3. फेरीचुम्बकत्व (Ferrimagnetism) – जब पदार्थ में डोमेनों के चुम्बकीय आघूर्णो का संरेखण समान्तर एवं प्रतिसमान्तर दिशाओं में असमान होता है, तब पदार्थ में फेरीचुम्बकत्व देखा जाता है। [चित्र-12 (c)]। ये लोहचुम्बकत्व की तुलना में चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा दुर्बल रूप से आकर्षित होते हैं। Fe3O4 (मैग्नेटाइट) और फेराइट जैसे MgFe2O4, ZnFe2O4, ऐसे पदार्थों के उदाहरण हैं। ये पदार्थ गर्म करने पर फेरीचुम्बकत्व खो देते हैं और अनुचुम्बकीय बन जाते हैं।

4. प्रतिलौहचुम्बकत्व (Antiferromagnetism) – प्रतिलौहचुम्बकत्व प्रदर्शित करने वाले पदार्थ जैसे MnO में डोमेन संरचना लोहचुम्बकीय पदार्थ के समान होती है, परन्तु उनके डोमेन एक-दूसरे के विपरीत अभिविन्यसित होते हैं तथा एक-दूसरे के चुम्बकीय आघूर्ण को निरस्त कर (UPBoardSolutions.com) देते हैं [चित्र-12 (b)]। जब चुम्बकीय आघूर्ण इस प्रकार अभिविन्यासित होते हैं कि नेट चुम्बकीय आघूर्ण शून्य हो जाता है, तब चुम्बकत्व प्रतिलौहचुम्बकत्व कहलाता है।

5. 12 – 16 और 13 -15 वर्गों के यौगिक (Compounds of group 12-16 and 13-15) – वर्ग 12 के तत्वों और वर्ग 16 के तत्वों से बने यौगिक 12 – 16 वर्गों के यौगिक कहलाते हैं; जैसे- ZnS, HgTe आदि।
वर्ग 13 के तत्वों और वर्ग 15 के तत्वों से बने यौगिक 13 – 15 वर्गों के यौगिक कहलाते हैं; जैसे- GaAs, AlP आदि।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

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बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
एक विशेष ठोस अति कठोर है तथा इसका गलनांक अति उच्च है। ठोस अवस्था में यह अचालक है तथा प्रगलन पर यह विद्युत चालक हो जाता है। ठोस है।
(i) धात्विक
(ii) आण्विक
(iii) नेटवर्क
(iv) आयनिक
उत्तर
(iv) आयनिक

प्रश्न 2.
किस प्रकार के ठोस विद्युत चालक, आघातवर्धनीय और तन्य होते हैं?
(i) आणिवक
(ii) आयनिक
(iii) धात्विक
(iv) सहसंयोजक
उत्तर
(iii) धात्विक

प्रश्न 3.
ठोस Aएक अति कठोर ठोस तथा गलित अवस्था में विद्युतरोधी है और बहुत उच्च ताप पर पिघलता है। यह किस प्रकार का ठोस है?
(i) आण्विक
(ii) आयनिक
(iii) धात्विक
(iv) सहसंयोजक
उत्तर
(iv) सहसंयोजक

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प्रश्न 4.
ग्रेफाइट है –
(i) आयनिक ठोस
(ii) धात्विक ठोस
(iii) सहसंयोजी ठोस
(iv) आण्विक ठोस
उत्तर
(iii) सहसंयोजी ठोस

प्रश्न 5.
निम्न में से कौन-सा सहसंयोजक क्रिस्टल है?
(i) रॉक साल्ट
(ii) बर्फ
(iii) क्वार्ट्ज
(iv) शुष्क बर्फ
उत्तर
(iii) क्वार्ट्ज

प्रश्न 6.
प्लास्टिक है –
(i) आयनिक ठोस
(ii) धात्विक ठोस
(iii) सहसंयोजी ठोस
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(iv) इनमें से कोई नही

प्रश्न 7.
सोडियम क्लोराइड क्रिस्टल की संरचना है –
(i) फलक केन्द्रित घनीय
(ii) मोनोक्लीनिक
(iii) ऑर्थोरोम्बिक
(iv) चतुष्कोणीय
उत्तर
(i) फलक केन्द्रित घनीय

प्रश्न 8.
फलक केन्द्रित घनीय जालक में एक एकक कोष्ठिका में परमाणुओं की संख्या होगी –
(i) 2
(ii) 3
(iii) 4
(iv) 5
उत्तर
(iii) 4

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प्रश्न 9.
58.5 g NaCl में एकक कोष्ठिकाओं की लगभग संख्या होगी –
(i) 1.5 x 1023
(ii) 6 x 1023
(iii) 3 x 1022
(iv) 0.5 x 1024
उत्तर
(i) 1.5 x 1023

प्रश्न 10.
Zn अपनी गलित अवस्था से ठोस अवस्था में परिवर्तित होता है जिसकी संरचना hcp प्रकार की है। समीपस्थ परमाणुओं की संख्या होगी –
(i) 6
(ii) 8
(iii) 12
(iv) 4
उत्तर
(iii) 12

प्रश्न11.
एक ठोस AB, जिसकी संरचना NaCl प्रकार की है, में A परमाणु घनीय एकक कोष्ठिका के सभी कोनों को घेरते हैं। यदि एक अक्ष के सभी फलक केन्द्रित परमाणु निष्कासित हो जायें तो ठोस की स्टॉइकियोमीट्री होगी –
(i) AB2
(ii) A2B
(iii) A4B3
(iv) A3B4
उत्तर
(iv) A3B4

प्रश्न12.
एक एकक कोष्ठिका जिसमें परमाणुओं की संख्या 2 है तथा जो ABC ABC….. संकुलन क्रम प्रदर्शित करती है, में चतुष्फलकीय रिक्तियों की संख्या होगी –
(i) Z
(ii) 2Z
(iii) Z/2
(iv) Z/4
उत्तर
(ii) 2Z

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प्रश्न 13.
सोडियम क्लोराइड क्रिस्टल में Na’ आयन की समन्वय संख्या है –
(i) 6
(ii) 8
(iii) 4
(iv) 1
उत्तर
(i) 6

प्रश्न 14.
एक धातु फलक केन्द्रित घनीय जालक में क्रिस्टलित होता है। एकक कोष्ठिका की कोर की लम्बाई 408 pm है। धातु परमाणु का व्यास है
(i) 288 pm
(ii) 408 pm
(iii) 144 pm
(iv) 204 pm
उत्तर
(i) 288 pm

प्रश्न 15.
सरल घन में उपस्थित परमाणुओं द्वारा घेरे गये कुल आयतन का प्रभाव है –
(i) [latex s=2]\frac { \pi }{ 4 } [/latex]
(ii) [latex s=2]\frac { \pi }{ 6 } [/latex]
(iii) [latex s=2]\frac { \pi }{ 3\sqrt { 2 } } [/latex]
(iv) [latex s=2]\frac { \pi }{ 4\sqrt { 2 } } [/latex]
उत्तर
(ii) [latex s=2]\frac { \pi }{ 6 } [/latex]

प्रश्न 16.
एक ठोस यौगिक XY की NaCl संरचना है। यदि धनायन की त्रिज्या 100 pm है तो ऋणायन (Y) की त्रिज्या होगी –
(i) 275.1 pm
(ii) 322.5 pm
(iii) 241.5 pm
(iv) 165.7 pm
उत्तर
(iii) 241.5 pm

प्रश्न17.
फ्रेंकेल दोष के कारण आयनिक क्रिस्टल का घनत्व –
(i) घटता है।
(ii) बढ़ता है।
(iii) परिवर्तित होता है।
(iv) अपरिवर्तित रहता है।
उत्तर
(iv) अपरिवर्तित रहता है।

प्रश्न 18.
फ्रेंकेल तथा शॉटकी दोष होते हैं –
(i) नाभिकीय दोष
(ii) क्रिस्टल दोष
(iii) परमाणु दोष
(iv) अणु दोष
उत्तर
(ii) क्रिस्टल दोष

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प्रश्न 19.
शॉटकी दोष किसके जालक की अपूर्णताएँ परिभाषित करता है?
(i) गैस की
(ii) प्लाज्मा की
(iii) द्रव की
(iv) ठोस की
उत्तर
(iv) ठोस की

प्रश्न 20.
Fe3O4 का क्रिस्टल है –
(i) प्रतिचुम्बकीय
(ii) लौहचुम्बकीय
(iii) अनुचुम्बकीय
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ii) लौहचुम्बकीय

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
क्रिस्टलीय ठोस क्या हैं?
उत्तर
वे ठोस जिनमें घटक कणों की दीर्घ परास व्यवस्था होती है, क्रिस्टलीय ठोस कहलाते हैं।  उदाहरणार्थ– चाँदी, ताँबा, सोडियम क्लोराइड आदि।

प्रश्न 2.
अक्रिस्टलीय ठोस को परिभाषित कीजिए।
उत्तर
एक ठोस अक्रिस्टलीय कहलाता है, जब इसके अवयवी कणों की लघु परास व्यवस्था होती है।

प्रश्न 3.
आण्विक ठोस से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
जिन ठोसों के क्रिस्टल जालक सरल विविक्त अणुओं से बने होते हैं, वे आण्विक ठोस कहलाते हैं। उदाहरणार्थ– आयोडीन, सल्फर, सफेद फास्फोरस आदि।

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प्रश्न 4.
आयनिक ठोस की परिभाषा दीजिए।
उत्तर
जिन ठोसों के क्रिस्टल जालक धनायनों और ऋणायनों से बने होते हैं, वे आयनिक ठोस कहलाते हैं। उदाहरणार्थ– सोडियम क्लोराइड, धातु ऑक्साइड, धातु सल्फाइड आदि।

प्रश्न 5.
धात्विक ठोस को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
जो ठोस धातुओं के गुण प्रकट करते हैं, धात्विक ठोस कहलाते हैं। उदाहरणार्थ– सोना, चाँदी, ताँबा आदि।

प्रश्न 6.
सह-संयोजक ठोस से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
जिन ठोसों के क्रिस्टल जालक परमाणुओं से बने होते हैं, वे सह-संयोजक ठोस कहलाते हैं। उदाहरणार्थ -हीरा, ग्रेफाइट, सिलिका आदि।

प्रश्न 7.
सोडियम क्लोराइड का टुकड़ा सोडियम धातु से कठोर होता है। क्यों?
उत्तर
NaCl (सोडियम क्लोराइड) में Na+ तथा Cl के मध्य आयनिक बन्ध होता है जिसके कारण ये अपेक्षाकृत कठोर होते हैं। सोडियम धातु में धात्विक बन्ध होता है जो आयनिक बन्ध की तुलना में कमजोर होता है, इसलिए सोडियम धातु NaCl की तुलना में नर्म होता है।

प्रश्न 8.
रॉक साल्ट प्रकार की संरचना में प्रत्येक आयन की उपसहसंयोजन संख्या क्या होती है?
उत्तर
रॉक साल्ट प्रकार की संरचना में प्रत्येक आयन की उपसहसंयोजन संख्या 6 होती है।

प्रश्न 9.
आयनिक क्रिस्टलों में 12 उप-सहसंयोजन संख्या क्यों नहीं पायी जाती है?
उत्तर
घनीय रिक्तिको के निर्माण के लिए त्रिज्या अनुपात परास 0.732 से 1.0 होता है। अतः उप-सहसंयोजन संख्या 8 से अधिक नहीं हो सकती है।

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प्रश्न 10.
क्या किसी दिये गये तत्त्व के षट्कोणीय निविड संकुलन तथा घनीय निविड संकुलन संरचना के घनत्व समान हो सकते हैं? समझाइए।
उत्तर
दोनों प्रकार की संरचना में घेरा गया कुल आयतन समान (74%) होता है एवं दोनों संरचनाओं में उप-सहसंयोजन संख्या 12 होती है। अतः दोनों संरचनाओं में घनत्व समान होंगे।

प्रश्न 11.
एक क्रिस्टलीय ठोस में ऑक्साइड आयन घनीय निविड संकुलन संरचना में व्यवस्थित है। धनायन A समान रूप से अष्टफलकीय तथा चतुष्फलकीय रिक्तियों में वितरित है। यदि सभी अष्टफलकीय रिक्तियाँ भरी हों तब ठोस का सूत्र क्या है?
उत्तर
ऑक्साइड आयनों की घनीय निविड संकुलन संरचना में प्रति एकक कोष्ठिका 4 ऑक्साइड आयन होने चाहिए। प्रत्येक ऑक्साइड आयन 2 चतुष्फलकीय रिक्तियों तथा एक अष्टफलकीय रिक्तियों से सम्बन्धित होता है। अत: 4 अष्टफलकीय तथा 8 चतुष्फलकीय रिक्तियाँ होनी चाहिए। (UPBoardSolutions.com) चूंकि सभी अष्टफलकीय रिक्तियाँ A द्वारा घेरी जाती हैं। अत: अष्टफलेकीय रिक्तियों में 4 धनायन A होंगे तथा समान संख्या में धनायन A चतुष्फलकीय रिक्तियों में होंगे। अत: 4 ऑक्साइड आयन तथा 8 धनायन A होंगे। अतः ठोस का सूत्र A 80,या A20 होगा।

प्रश्न 12.
घनीय निविड संकुलन संरचना युक्त 1 मोल यौगिक में अष्टफलकीय रिक्तियाँ कितनी होंगी?
उत्तर
अष्टफलकीय रिक्तियों की संख्या = संकुलन में परमाणुओं की संख्या
= 1 मोल = 6.023 × 1023

प्रश्न 13.
संकुलन दक्षता (क्षमता) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर
क्रिस्टल में उपलब्ध कुल स्थान का परमाणुओं द्वारा घेरा हुआ अंश संकुलन दक्षता कहलाता है। यह प्रायः प्रतिशत में व्यक्त की जाती है।
यदि किसी क्रिस्टल संरचना की एकक कोष्ठिका में उपस्थित परमाणुओं द्वारा कोष्ठिका का घेरा हुआ, आयतन Voccu और एकक कोष्ठिका का कुल आयतन Vcell है, तो
संकुलन क्षमता = [latex s=2]\frac { { V }_{ occu } }{ { V }_{ cell } } [/latex] x 100

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प्रश्न 14.
किसी तत्त्व x की परमाणु त्रिज्या 3.6Å है। इसकी एकक कोष्ठिका में सन्निकट पड़ोसी कण की दूरी क्या होगी?
हल
d = 2r = 2 x 3.6 Å = 7.2 Å.

प्रश्न 15.
फ्रेंकेल दोष AgCl क्रिस्टलों के घनत्व को परिवर्तित क्यों नहीं करता है?
उत्तर
चूँकि फ्रेंकेल दोषयुक्त क्रिस्टल में आयनों की संख्या समान रहती है इसलिए यह दोष क्रिस्टलों के घनत्व में कोई परिवर्तन नहीं करता है।

प्रश्न 16.
क्रिस्टलों में कौन-सा बिन्दु दोष सम्बन्धित ठोस के घनत्व को परिवर्तित नहीं करता है?
उत्तर
फ्रेंकेल दोष।

प्रश्न 17.
फ्रेंकेल दोष उपस्थित होने पर भी क्रिस्टल के घनत्व में कोई परिवर्तन नहीं होता है, क्यों?
उत्तर
फ्रेंकेल दोष में धनायन अपने जालक बिन्दुओं से हटकर अन्तराकाशी स्थानों में आ जाते हैं, इसलिए क्रिस्टल के घनत्व में कोई परिवर्तन नहीं होता है।

प्रश्न 18.
शॉटकी तथा फ्रेंकेल दोषों का क्रिस्टल की उदासीनता पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
शॉटकी तथा फ्रेंकेल दोष उपस्थित होने पर क्रिस्टल उदासीन (neutral) बने रहते हैं।

प्रश्न 19.
CaCl2, AgCI क्रिस्टल में मिलाने पर शॉटकी दोष उत्पन्न करता है। व्याख्या कीजिए।
उत्तर
विद्युत उदासीनता बनाए रखने के लिए 2Ag2+ आयन 1 Ca2+ द्वारा प्रतिस्थापित होंगे। अत: प्रत्येक Ca2+ आयन के प्रवेश पर जालक स्थल में एक छिद्र उत्पन्न होता है।

प्रश्न20.
F- केन्द्र क्या है?
उत्तर
वह स्थान जहाँ ऋणायन रिक्तिका में इलेक्ट्रॉन उपस्थित होता है, F- केन्द्र कहलाता है।

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प्रश्न 21.
रिक्तिका को परिभाषित कीजिए।
उत्तर
धातु परमाणुओं अथवा आयनों को जब क्रिस्टल में संकुलित किया जाता है, तब इनके मध्य उपस्थित स्थान रिक्तिका कहलाता है।

प्रश्न 22.
एक लवण का नाम लिखिए जिसे AgCl में मिलाकर धनायन रिक्तियाँ उत्पन्न की जा सकती हैं।
उत्तर
CdCl2 अथवा SrCl2

प्रश्न 23.
क्षारीय धातु हैलाइडों के रंग के लिए उत्तरदायी नॉन-स्टॉइकियोमिट्री बिन्दु दोष का नाम लिखिए।
उत्तर
धातु आधिक्य अथवा ऋणायनिक रिक्तिकाएँ अथवा F- केन्द्र।

प्रश्न 24.
आप किस प्रकार NaCl संरचना को CsCl प्रकार की संरचना में एवं CsCl को NaCl प्रकार की संरचना में परिवर्तित करेंगे?
उत्तर
CsCl प्रकार की संरचना को NaCl प्रकार की संरचना में गर्म करके तथा NaCI पर उच्च दाब आरोपित करके CSCl प्रकार की संरचना प्राप्त की जा सकती है।

प्रश्न 25.
साधारण नमक शुद्ध सफेद के स्थान पर कभी-कभी पीला दिखाई देता है? क्यों?
उत्तर
ऐसा जालक स्थलों में ऋणायनों के स्थान पर इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति के कारण होता है। ये स्थल F- केन्द्रों की तरह कार्य करते हैं।

प्रश्न 26.
जिंक ऑक्साइड सफेद होता है लेकिन गर्म करने पर यह पीला पड़ जाता है। समझाइए।
उत्तर
जब जिंक ऑक्साइड को गर्म किया जाता है तब यह निम्न समीकरण के अनुसार ऑक्सीजन खोता है।
ZnO → Zn2+ + 1/2 O2 + 2e
Zn2+ अन्तराकाशी रिक्तिकाओं में व्यवस्थित हो जाते हैं तथा इलेक्ट्रॉन विद्युत उदासीनता बनाए रखने के लिए पड़ोसी अन्तराकाशी रिक्तियों में व्यवस्थित हो जाते हैं। इससे धातु आधिक्य दोष उत्पन्न होता है। अन्तराकाशी रिक्तियों में इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति के कारण यह पीला होता है क्योंकि इलेक्ट्रॉनों द्वारा श्वेत प्रकाश के अन्य रंगों को अवशोषित कर लिया जाता है।

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प्रश्न 27.
अर्द्धचालकों की विद्युत चालकता पर ताप का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
ताप वृद्धि से अर्द्धचालकों की विद्युत चालकता बढ़ जाती है।

प्रश्न 28.
गर्म करने पर चुम्बकीय पदार्थ अनुचुम्बकीय हो जाते हैं, क्यों?
उत्तर
गर्म करने पर इलेक्ट्रॉन चक्रण अनियमित रूप से अभिविन्यसित (aligned) हो जाने के कारण लौहचुम्बकीय पदार्थ अनुचुम्बकीय हो जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
58.5 ग्राम NaCl में इकाई सेलों की संख्या ज्ञात कीजिए।
हल
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प्रश्न 2.
एक आयनिक ठोस के फलक केन्द्रित घनीय सेल के कोर की लम्बाई 508 pm है। यदि धनायन की त्रिज्या 110 pm हो, तो ऋणायन की त्रिज्या की गणना कीजिए।
हल
दिया गया है, कोर की लम्बाई = 508 pm,
धनायन की त्रिज्या (r+)= 110 pm, ऋणायन की त्रिज्या (r)= ?
सूत्र कोर की लम्बाई = 2(r+ + r) से,
508 /2 = r+ + r
r+ + r = 254
110 + r = 254
r = 254 – 110
r = 144 pm

प्रश्न 3.
चाँदी घनीय संवृत संकुलन (ccp) जालक बनाती है। इसके क्रिस्टल की x – किरण जाँच से ज्ञात हुआ कि इसके एकक सेल के कोर की लम्बाई 408.6 pm है। चाँदी के घनत्व की गणना कीजिए। (चाँदी का परमाणु द्रव्यमान = 107.9)
हल
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प्रश्न 4.
बैण्ड सिद्धान्त के आधार पर चालक और अर्द्धचालक पदार्थों के विद्युत गुणों को समझाइए।
उत्तर
बैन्ड सिद्धान्त के अनुसार, प्रत्येक तत्व में दो प्रकार के बैन्ड उपस्थित होते हैं, संयोजक बैन्ड तथा आगामी उच्च रिक्त बैन्ड (चालकता बैन्ड)। इन दोनों बैन्डों के मध्य की दूरी को ऊर्जा अन्तराल कहते हैं। चालकों (धातुओं) में संयोजकता बैन्ड आंशिक रूप से भरा होता है, या रिक्त (UPBoardSolutions.com) चालकता बैन्ड के साथ अतिव्यापन करता है जिससे विद्युत क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन आसानी से प्रवाहित हो सकते हैं और धातुएँ चालकता दर्शाती हैं।

अर्द्धचालकों में ऊर्जा अन्तराल कम होता है। इस कारण कुछ इलेक्ट्रॉन संयोजक बैन्ड से चालकता बैन्ड में चले जाते हैं। इस प्रकार अर्द्धचालक अल्पचालकता दर्शाते हैं। ताप बढ़ने पर अर्द्धचालकों की विद्युत चालकता बढ़ जाती है।
विद्युतरोधियों में ऊर्जा अन्तराल इतना अधिक होता है, कि इलेक्ट्रॉन इसे नहीं लाँघ सकते। अतः चालकता नहीं दर्शाते हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 27

दीर्थ शरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ठोसों को किस प्रकार वर्गीकृत किया जाता है? प्रत्येक प्रकार के अवयवी कण के बारे में समझाइए तथा उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर
ठोसों का वर्गीकरण (Classification of Solids) – ठोसों को दो वृहत् प्रकारों- क्रिस्टलीय तथा अक्रिस्टलीय में वर्गीकृत किया जा सकता है। क्रिस्टलीय ठोसों में अवयवी कणों (परमाणु, आयन अथवा अणु) का क्रम सुव्यवस्थित होता है। क्रिस्टलीय ठोस साधारणत: लघु क्रिस्टलों की (UPBoardSolutions.com) अत्यधिक संख्या से बना होता है, उनमें प्रत्येक का निश्चित अभिलक्षणिक जयामितीय आकार होता है। इसमें दीर्घ परासी व्यवस्था होती है अर्थात् कणों की व्यवस्था का पैटर्न नियमित होता है जिसकी सम्पूर्ण क्रिस्टल में एक से अन्तराल पर पुनरावृत्ति होती है। सोडियम क्लोराइड और क्वार्ट्ज क्रिस्टलीय ठोसों के विशिष्ट उदाहरण हैं।

अक्रिस्टलीय ठोस (ग्रीक अमोरफोस= आकृति नहीं होना) असमाकृति के कणों से बने होते हैं। इन ठोसों में अवयवी कणों (परमाणुओं, अणुओं अथवा आयनों) की व्यवस्था केवल लघु परासी व्यवस्था होती है। ऐसी व्यवस्था में नियमित और आवर्ती पुनरावृत्त पैटर्न केवल अल्प दूरियों तक देखा जाता है। ऐसे भाग बिखरे होते । हैं और इनके बीच व्यवस्था-क्रम अनियमित होते हैं। क्वार्ट्ज (क्रिस्टलीय) और क्वार्ट्ज काँच (अक्रिस्टलीय) की संरचनाएँ क्रमश: चित्र-14 (a) और (b) में दर्शाई गई हैं।

यद्यपि दोनों संरचनाएँ लगभग समरूप हैं, फिर भी अक्रिस्टलीय क्वार्ट्ज काँचे में दीर्घ परासी व्यवस्था नहीं है। अक्रिस्टलीय ठोसों की संरचना द्रवों के सदृश होती है। अवयवी कणों की व्यवस्था में अन्तर के कारण दोनों प्रकार के ठोसों के गुण भिन्न होते हैं।

अधिकतर ठोस पदार्थ (तत्त्व तथा यौगिक) क्रिस्टलीय प्रकृति के होते हैं। उदाहरण के लिए – सभी धात्विक तत्व; जैसे- लोहा, ताँबा और चाँदी; अधात्विक तत्व; जैसे-सल्फर, फॉस्फोरस और आयोडीन एवं यौगिक; जैसे सोडियम क्लोराइड, जिंक सल्फाइड और नैफ्थेलोन क्रिस्टलीय ठोस हैं। (UPBoardSolutions.com) काँच, रबर और प्लास्टिक अक्रिस्टलीय ठोसों के विशिष्ट उदाहरण हैं। कुछ पदार्थ विभिन्न स्थितियों में भिन्न- भिन्न संरचनात्मक व्यवस्थाएँ प्राप्त करते हैं। ये व्यवस्थाएँ बहुरूप (polymorph) कहलाती हैं।
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उदाहरणार्थ– डायमण्ड तथा ग्रेफाइट कार्बन के दो भिन्न बहुरूप हैं। इन भिन्न संरचनाओं के गुण; जैसे-गलनांक, घनत्व आदि भिन्न-भिन्न होते हैं। उदाहरणार्थ- ग्रेफाइट कोमल तथा विद्युत का अच्छा चालक होता है, जबकि डायमण्ड कठोर तथा विद्युत का दुर्बल चालक होता है। क्रिस्टलीय ठोसों को उनमें परिचालित अन्तराआण्विक बलों की प्रकृति के आधार पर चार वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है। इनका वर्णन निम्नलिखित है –

(1) आण्विक ठोस (Molecular Solids)
आण्विक ठोसों के अवयवी कण अणु होते हैं। इन्हें निम्नलिखित उपवर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है –
(i) अधुवी आण्विक ठोस (Non-polar molecular solids) – इनके अन्तर्गत वे ठोस आते हैं जो या तो परमाणुओं उदाहरणार्थ– निम्न ताप पर ऑर्गन और हीलियम अथवा अध्रुवी सहसंयोजक बन्धों से बने अणुओं; उदाहरणार्थ– निम्न ताप पर H2, Cl2, और I2 द्वारा बने होते हैं। इन (UPBoardSolutions.com) ठोसों में परमाणु अथवा अणु दुर्बल परिक्षेपण बलों अथवा लण्डन बलों द्वारा बँधे रहते हैं। ये ठोस मुलायम और विद्युत के अचालक होते हैं। इनके गलनांक निम्न कोटि के होते हैं और ये सामान्यत: कमरे के ताप और दाब पर द्रव अथवा गैसीय अवस्था में होते हैं।

(ii) ध्रुवीय-आण्विक ठोस (Polar molecular solids) – HCl, SO2 आदि पदार्थों के अणु ध्रुवीय सहसंयोजक बन्धों से बने होते हैं। ऐसे ठोसों में अणु अपेक्षाकृत प्रबल द्विध्रुव-द्विध्रुव अन्योन्यक्रियाओं (dipole-diple interactions) से एक-दूसरे के साथ बँधे रहते हैं। ये ठोस मुलायम और विद्युत के अचालक होते हैं। इनके गलनांक अध्रुवी आण्विक ठोसों से अधिक होते हैं, फिर भी इनमें से अधिकतर कमरे के ताप और दाब पर गैस अथवा द्रव हैं। ठोस SO2 और ठोस NH3 ऐसे ठोसों के उदाहरण हैं।

(iii) हाइड्रोजन आबन्धित आण्विक ठोस (Hydrogen bonded molecular solids) – ऐसे ठोसों के अणुओं में H और F, O अथवा N परमाणुओं के मध्य ध्रुवीय-सहसंयोजक बन्ध होते हैं। प्रबल हाइड्रोजन आबन्धन ऐसे ठोसों के अणुओं; जैसे-H2O (बर्फ) बंधित करते हैं। ये विद्युत के अचालक हैं। सामान्यतः ये कमरे के ताप और दाब पर वाष्पशील द्रव अथवा मुलायम ठोस होते हैं।

(2) आयनिक ठोस (Ionic Solids)
आयनिक ठोसों के अवयवी कण आयन होते हैं। ऐसे ठोसों का निर्माण धनायनों और ऋणायनों के त्रिविमीय विन्यासों में प्रबल कूलॉमी (स्थिर विद्युत) बलों से बँधने पर होता है। ये ठोस कठोर और भंगुर प्रकृति के होते हैं। इनके गलनांक और क्वथनांक उच्च होते हैं। चूंकि इनमें आयन गमन (UPBoardSolutions.com) के लिए स्वतन्त्र नहीं होते; अतः ये ठोस अवस्था में विद्युतरोधी होते हैं। यद्यपि गलित अवस्था में अथवा जल में घोलने पर आयन गमन के लिए मुक्त हो जाते हैं और वे विद्युत का संचालन करते हैं।

(3) धात्विक ठोस (Metallic Solids)
धातुएँ मुक्त इलेक्ट्रॉनों के समुद्र से घिरे और उनसे जुड़े धनायनों के सुव्यवस्थित संग्रह हैं। ये इलेक्ट्रॉन गतिशील होते हैं और क्रिस्टल में सर्वत्र समरूप से विस्तारित होते हैं। प्रत्येक धात्विक परमाणु इन गतिशील इलेक्ट्रॉनों के समुद्र में एक अथवा अधिक इलेक्ट्रॉनों का योगदान देता है। ये मुक्त और गतिशील इलेक्ट्रॉन, धातुओं की उच्च विद्युत और ऊष्मीय चालकता के लिए उत्तरदायी होते हैं। (UPBoardSolutions.com) विद्युत क्षेत्र प्रयुक्त करने पर ये इलेक्ट्रॉन धनायनों के नेटवर्क में सतत प्रवाह करते हैं। इसी प्रकार जब धातु के एक भाग में ऊष्मा संचरित की जाती है तो ऊष्मीय ऊर्जा मुक्त इलेक्ट्रॉनों द्वारा सर्वत्र एकसमान रूप से विस्तारित हो जाती है। धातुओं की दूसरी महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ कुछ स्थितियों में उनकी चमक और रंग हैं। ये भी उनमें उपस्थित मुक्त इलेक्ट्रॉनों के कारण होती हैं। धातुएँ अत्यधिक आघातवर्धनीय और तन्य होती हैं।

(4) सहसंयोजक अथवा नेटवर्क ठोस (Covalent or Network Solids)
अधात्विक क्रिस्टलीय ठोसों की विस्तृत बहुरूपता (polymorphism) सम्पूर्ण क्रिस्टल में निकटवर्ती परमाणुओं के मध्य सहसंयोजक बन्धों के बनने के कारण होती है। इन्हें विशाल अणु (giant molecule) भी कहा जाता है। सहसंयोजक बन्ध प्रबल और दिशात्मक प्रकृति के होते हैं; इसीलिए परमाणु अपनी स्थितियों पर अति प्रबलता से बँधे रहते हैं। ऐसे ठोस अत्यधिक कठोर और भंगुर होते हैं। इनका गलनांक अत्यन्त उच्च होता है और गलन से पूर्व ये विघटित भी हो सकते हैं। ये विद्युत का संचालन नहीं करते; अतः ये विद्युतरोधी होते हैं। हीरा और सिलिकन कार्बाइड ऐसे ठोसों के विशिष्ट उदाहरण हैं।

ग्रेफाइट मुलायम और विद्युत चालक है। इसके अपवादात्मक गुण इसकी विशिष्ट संरचना के कारण होते हैं। इसमें कार्बन परमाणु विभिन्न परतों में व्यवस्थित होते हैं और प्रत्येक परमाणु उसी परत के तीन निकटवर्ती परमाणुओं से सहसंयोजक बन्धन में होता है। प्रत्येक परमाणु का चौथा (UPBoardSolutions.com) संयोजकता इलेक्ट्रॉन अलग परतों के मध्य उपस्थित होता है और यह गमन के लिए मुक्त होता है। यही मुक्त इलेक्ट्रॉन ग्रेफाइट को विद्युत का उत्तम चालक बनाते हैं। विभिन्न परतें एक-दूसरे पर फिसल सकती हैं। ये ग्रेफाइट को मुलायम ठोस और उत्तम ठोस-चिकनाई (Solid lubricant) बनाते हैं।

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प्रश्न 2.
क्रिस्टल तन्त्र के प्रकारों की विस्तृत विवेचना कीजिए। उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर
क्रिस्टल तन्त्र के प्रकार (Types of Crystal System) – सामान्यतया दो प्रकार की एकक कोष्ठिकाएँ मिलकर विभिन्न क्रिस्टल तन्त्र बनाती हैं। ये एकक कोष्ठिकाएँ निम्नलिखित हैं –
(1) आद्य एकक कोष्ठिकाएँ (Primitive unit cells) – जब अवयवी कण एकक कोष्ठिका के केवल कोनों पर उपस्थित हों तो उसे आद्य एकक कोष्ठिका कहा जाता है।

(2) केन्द्रित एकक कोष्ठिकाएँ (Centred unit cells) – जब एकक कोष्ठिका में एक अथवा अधिक अवयवी कण कोनों के अतिरिक्त अन्य स्थितियों पर भी उपस्थित होते हैं तो उसे केन्द्रित एकक कोष्ठिका कहते हैं। केन्द्रित एकक कोष्ठिकाएँ निम्नलिखित तीन प्रकार की होती हैं –

  1. अन्त:केन्द्रित एकक कोष्ठिका (Body-centred unit cells) – ऐसी एकक कोष्ठिका में एक अवयवी कण (परमाणु, अणु अथवा आयन) कोनों में उपस्थित कणों के अतिरिक्त उसके अन्त:केन्द्र में होता है।
  2. फलक-केन्द्रित एकक कोष्ठिका (Face-centred unit cells) – ऐसी एकक कोष्ठिका में कोनों पर उपस्थित अवयवी कणों के अतिरिक्त एक अवयवी कण प्रत्येक फलके के केन्द्र पर भी होता है।
  3. अंत्य-केन्द्रित एकक कोष्ठिका (End-centred unit cells) – ऐसी एकक कोष्ठिका में कोनों पर उपस्थित अवयवी कणों के अतिरिक्त एक अवयवी कण किन्हीं दो विपरीत फलकों के केन्द्र में पाया जाता है।

सात क्रिस्टल तन्त्र (Seven Crystal System) – जब क्रिस्टल जालक में एकक कोष्ठिका के जालक स्थल केवल कोनों पर स्थित होते हैं, तब यह सरल अथवा आद्य एकक कोष्ठिका कहलाती है। क्रिस्टलों के सभी प्रकारों में सात प्रकार की सरल अथवा आद्य एकक कोष्ठिकाएँ होती हैं। (UPBoardSolutions.com) ये एकक कोष्ठिकाएँ लम्बाई a, b तथा c और कोण α, β तथा γ द्वारा अभिलक्षणित होती हैं। यह सात क्रिस्टल तन्त्र कहलाता है (चित्र-15)। सभी क्रिस्टलों को इनमें से किसी एक के द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। ये सात प्रकार अग्रलिखित हैं –

(1) घनीय (Cubic) – इसमें तीनों अक्ष समान लम्बाई की एवं परस्पर समकोण पर होती हैं (a = b = c, सभी कोण = 90°)। इस प्रकार की एकक कोष्ठिका से बने क्रिस्टल घनीय क्रिस्टल कहलाते हैं। उदाहरणार्थ- NaCl, KCl, CaF2, ZnS, हीरा, CsSl आदि।

(2) चतुष्कोणीय या द्विसमलम्बाक्ष (Tetragonal or Dirhombic) – तीनों अक्ष परस्पर समकोण पर होती हैं, परन्तु केवल दो अक्ष समान लम्बाई की होती हैं (a = b ≠ c, सभी कोण = 90°)। इन क्रिस्टलों के उदाहरण SnO2, TiO2, Sn, यूरिया आदि हैं।

(3) विषमलम्बाक्ष (Orthorhombic) – इसमें तीन असमान अक्ष होती हैं जो परस्पर समकोण पर होती हैं (a ≠ b ≠ c, सभी कोण = 90°)। BaSO4, KNO3 आदि इस प्रकार के क्रिस्टलों के उदाहरण हैं।

(4) एकनताक्ष (Monoclinic) – इसमें असमान लम्बाई की तीन अक्ष होती हैं तथा दो कोण 90° के होते हैं (a ≠ b ≠ c, दो कोण = 90° तथा एक कोण ≠ 90°)। कैल्सियम सल्फेट (CaSO4.2H2O), पोटैशियम मैग्नीशियम सल्फेट [K2Mg(SO4)2.6H2O] आदि एकनताक्ष क्रिस्टलों के कुछ उदाहरण हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 1 The Solid State image 30

(5) त्रिसमनताक्ष अथवा त्रिकोणी (Rhombohedral or Trigonal) – इस प्रकार के क्रिस्टलों में तीनों अक्षों की भुजाएँ समान होती हैं। तीनों अन्तराअक्षीय (interfacial) कोण भी समान होते हैं; परन्तु कोणों का मान 90° नहीं होता है। उदाहरणार्थ- कैल्सियम कार्बोनेट (CaCO3), सोडियम नाइट्रेट (NaNO3), क्वार्ट्ज (SiO2), कैल्साइट आदि।

(6) त्रिनताक्ष (Triclinic) – इस प्रकार के क्रिस्टलों की संरचना में तीनों अक्षों की तीनों भुजाएँ। असमान होती हैं। तीनों कोण भी असमान होते हैं। कोई भी कोण 90° (UPBoardSolutions.com) का नहीं होता है (a ≠ b ≠ c, α ≠ β ≠ γ ≠ 90°)। उदाहरण- कॉपर सल्फेट (CuSO4), पोटैशियम डाइक्रोमेट (K2Cr2O7), बोरिक अम्ल (H3BO3) आदि।

(7) षट्कोणीय (Hexagonal) – दो अक्षों की भुजाएँ (a तथा b) समान और तीसरे अक्ष की भुजा (c) इन दोनों से भिन्न होती है। दो अक्षीय कोण समान एवं 90° के तथा तीसरा कोण 120° का होता है। (d = b # c, दो कोण = 90° तथा एक कोण = 120°)। उदाहरण– कैल्सियम (Ca), जिंक (Zn), मैग्नीशियम (Mg), मर्करी सल्फाइड (HgS), बर्फ, ग्रेफाइट आदि।

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प्रश्न 3.
निविड संकुलित संरचनाओं से आप क्या समझते हैं? एकविमा, द्विविमा तथा त्रिविमा में निविड संकुलन को समझाइए।
उत्तर
निविड संकुलित संरचनाएँ
(Close-packed Structures)
ठोसों में अवयवी कण निविड संकुलित होते हैं तथा उनके मध्य न्यूनतम रिक्त स्थान होता है। ये संरचनाएँ निविड संकुलित संरचनाएँ कहलाती हैं (यदि हम अवयवी कणों को समरूप कठोर गोले मानें जो एक-दूसरे के सम्पर्क में हैं)।
एकविमा में निविड संकुलन (Close Packing in One Dimension) जब कणों को प्रदर्शित करने वाले गोले एक पंक्ति में एक-दूसरे को स्पर्श करते हुए व्यवस्थित किए जाते हैं, तब यह एकविमा में निविड का संकुलन कहलाता है।
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द्विविमा में निविड संकुलन (Close Packing in Two Dimension)
द्विविमीय निविड संकुलित संरचना निविड संकुलित गोलों की पंक्तियों को एकसाथ व्यवस्थित करके प्राप्त की जा सकती है। इसे निम्नलिखित दो भिन्न प्रकार से किया जा सकता है –
(1) प्रथम विधि के अन्तर्गत द्वितीय पंक्ति को प्रथम के सम्पर्क में इस प्रकार रखा जा सकता है कि द्वितीय पंक्ति के गोले प्रथम पंक्ति के गोलों के ठीक ऊपर हों तथा दोनों (UPBoardSolutions.com) पंक्तियों के गोले क्षैतिजीय तथा साथ ही ऊध्र्वाधर रूप से संरेखित हों। यदि प्रथम पंक्ति को ‘A’ प्रकार की पंक्ति माना जाए तो द्वितीय पंक्ति प्रथम पंक्ति के ठीक समान होने के कारण, वह भी ‘A’ प्रकार की होगी। इसी प्रकार से अधिक पंक्तियों को रखकर AAA…. प्रकार की व्यवस्था प्राप्त की जा सकती है।

इसे चित्र-17 (a) में दिखाया गया है। स्पष्ट है कि इस व्यवस्था में प्रत्येक गोला चार निकटवर्ती गोलों के सम्पर्क में रहता है। इस प्रकार द्विविमीय उपसहसंयोजन संख्या चार है। साथ ही यदि इन सन्निकट चार गोलों के केन्द्रों को जोड़ा जाए तो एक वर्ग प्राप्त होता है। अतः इस संकुलन को द्विविमा में वर्ग निविड संकुलन (square close packing in two dimension) कहा जाता है।
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(2) द्वितीय विधि के अन्तर्गत द्वितीय पंक्ति को प्रथम के ऊपर एकसमान रूप से इस प्रकार रखा जा सकता है कि उसके गोले प्रथम पंक्ति के अवनमनों में भली-भाँति व्यवस्थित हो जाएँ। यदि प्रथम पंक्ति के गोलों की व्यवस्था को ‘A’ प्रकार कहा जाए तो द्वितीय पंक्ति जो कि भिन्न है, उसे ‘B’ (UPBoardSolutions.com) प्रकार कहा जा सकता है। जब तृतीय पंक्ति को द्वितीय के निकट एकसमान रूप से रखा जाता है तो उसके गोले प्रथम तल के गोलो से संरेखित होते हैं, अत: यह तल भी ‘A’ प्रकार का है। इसी प्रकार से रखे गए चौथी पंक्ति के गोले द्वितीय पंक्ति (‘B’ प्रकार) से संरेखित होते हैं, अत: यह व्यवस्था ABAB…. प्रकार की है।

इस व्यवस्था में मुक्त स्थान कम होता है और इसमें संकुलन, वर्ग निविड संकुलन से अधिक दक्ष है। प्रत्येक गोला छह निकटवर्ती गोलों के सम्पर्क में रहता है और द्विविमीय उपसहसंयोजन संख्या छह है। इन छह गोलों के केन्द्र सम-षट्कोण के कोनों पर हैं [चित्र-17 (b)]। इस प्रकार इस संकुलन को द्विविमा में षट्कोणीय निविड संकुलन कहा जाता है। चित्र-17 (b) में स्पष्ट परिलक्षित होता है कि इस तल में कुछ रिक्तियाँ हैं। जो त्रिकोणीय आकृति की हैं। इन्हें त्रिकोणीय रिक्तियाँ कहते हैं। ये दो प्रकार की होती हैं। एक पंक्ति में त्रिकोण का शीर्ष ऊर्ध्वमुखी और अगली पंक्ति में अधोमुखी होता है।

त्रिविमा में निविड संकुलन (Close Packing in Three Dimension)
सभी वास्तविक संरचनाएँ त्रिविम संरचनाएँ होती हैं। इन्हें द्विविमीय परतों को एक-दूसरे के ऊपर रखकर प्राप्त किया जा सकता है। वर्ग निविड संकुलित तथा षट्कोणीय निविड संकुलित संरचनाओं से त्रिविमीय संरचना निम्नवत् प्राप्त की जा सकती है –

(1) द्विविम वर्ग निविड़ संकुलित परतों से त्रिविम निविड़ संकुलन (Three dimensional close packing from two dimensional square close packed layers) – इसके अन्तर्गत द्वितीय परत को प्रथम परत के ऊपर इस प्रकार रखा जाता है कि ऊपरी परत के गोले प्रथम परत के गोलों के ठीक ऊपर रहें। इस व्यवस्था में दोनों परतों के गोले पूर्णतया क्षैतिज तथा साथ ही ऊर्ध्वाधर रूप से सीध में होते हैं (चित्र-18), इसी प्रकार से हम और परतों को एक-दूसरे के ऊपर रख सकते हैं। यदि प्रथम परत के गोलों की (UPBoardSolutions.com) व्यवस्था को ‘A’ प्रकार कहा जाए तो सभी परतों में समान व्यवस्था होती है। इस प्रकार इस जालक में AAA…. प्रकार का पैटर्न है। इस प्रकार उत्पन्न होने वाला जालक सरल घनीय जालक (simple cubic lattice) और उसकी एकक कोष्ठिका आद्य- घनीय एकक कोष्ठिका (primitive- cubic unit cell) है।
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(2) द्विविम-षट्कोणीय निविड संकुलित परतों से त्रिविम निविड संकुलन (Three dimensional close packing from two dimensional-hexagonal close packed layers) – इसमें परतों को एक-दूसरे पर रखकर त्रिविमीय निविड संकुलित संरचना निम्नलिखित प्रकार से प्राप्त की जा सकती है –
(i) द्वितीय परंत को प्रथम परत के ऊपर रखना (Placing the second layer on the first layer) – एक द्विविम-षट्कोणीय निविड संकुलित परत ‘A’ पर समान परत इस प्रकार रखते हैं कि द्वितीय परत के गोले प्रथम परत के अवनमनों में आ जाएँ। चूंकि दो परतों के गोले भिन्न प्रकार से संरेखित हैं, अतः द्वितीय परत को हम B परत कहते हैं। यह चित्र-19 में देखा जा सकता है कि प्रथम परत की (UPBoardSolutions.com) सभी त्रिकोणीय रिक्तियाँ द्वितीय परत के गोलों से आवृत नहीं हैं। इससे अलग-अलग व्यवस्थाओं की उत्पत्ति होती है। जब भी द्वितीय परत का एक गोला प्रथम परत की रिक्ति के ऊपर होता है, तब एक चतुष्फलकीय रिक्ति बनती है। चित्र-19 में इन्हें ‘T’ से दर्शाया गया है।

अन्य स्थानों पर द्वितीय परत की त्रिकोणीय रिक्तियाँ प्रथम परत की त्रिकोणीय रिक्तियों के ऊपर हैं और इनकी त्रिकोणीय आकृतियाँ अतिव्यापित नहीं होती हैं। उनमें से एक में त्रिकोण का शीर्ष ऊर्ध्वमुखी और दूसरे में अधोमुखी होता है। इन रिक्तियों को चित्र-19 में ‘O’ से दर्शाया गया है। ये रिक्तियाँ छह गोलों से घिरी होती हैं तथा इन्हें अष्टफलकीय रिक्तियाँ कहा जाता है।

(ii) तृतीय परत को द्वितीय परत पर रखना (Placing the third layer on the second layer) – इस स्थिति में दो सम्भावनाएँ होती हैं –
(क) द्वितीय परत की चतुष्फलकीय रिक्तियों को तृतीय परत के गोलों द्वारा आच्छादित किया जा सकता है। इस स्थिति में तृतीय परत के गोले प्रथम परत के गोलों के साथ पूर्णत: संरेखित होते हैं। इस प्रकार गोलों का पैटर्न एकान्तर परतों में पुनरावृत्त होता है। इस पैटर्न को प्राय: ABAB… पैटर्न लिखा जाता है तथा इस संरचना को षट्कोणीय निविड संकुलित (hcp) संरचना कहते हैं। अनेक धातुओं; जैसे- मैग्नीशियम और जिंक में परमाणुओं की व्यवस्था hcp प्रकार की होती है।
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(ख) तृतीय परत को द्वितीय परत पर इस प्रकार रखा जा सकता है कि गोले अष्टफलकीय रिक्तियों को आच्छादित करते हों। इस प्रकार से रखने पर तृतीय परत के गोले प्रथम अथवा द्वितीय किसी भी परत के साथ संरेखित नहीं होते। इस व्यवस्था को ‘C’ प्रकार कहा जाता है। केवल चौथी (UPBoardSolutions.com) परत रखने पर उसके गोले प्रथम परत के गोलों के साथ संरेखित होते हैं। इस प्रकार के पैटर्न को प्राय: ABCABC…. लिखा जाता है। इस संरचना को घनीय निविड संकुलित संरचना (ccp) अथवा फलक-केन्द्रित घनीय (fcc) संरचना कहा जाता है। कुछ धातुएँ जैसे ताँबा तथा चाँदी इस संरचना में क्रिस्टलीकृत होते हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 15 Communication Systems

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 15 Communication Systems (संचार व्यवस्था) are part of UP Board Solutions for Class 12 Physics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 15 Communication Systems (संचार व्यवस्था).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Physics
Chapter Chapter 15
Chapter Name Communication Systems (संचार व्यवस्था)
Number of Questions Solved 45
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 15 Communication Systems (संचार व्यवस्था)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1:
व्योम तरंगों के उपयोग द्वारा क्षितिज के पार संचार के लिए निम्नलिखित आवृत्तियों में से कौन-सी आवृत्ति उपयुक्त रहेगी?
(a) 10 kHz
(b) 10 MHz
(c) 1 GHz
(d) 1000 GHz
उत्तर:
(b) 10 MHz
3 MHz से 30 MHz आवृत्ति तक की तरंगें व्योम तरंगों की श्रेणी में आती हैं। इससे उच्च आवृत्ति की तरंगें (जैसे-1GHz, 1000 GHz) आयन मण्डल को भेदकर पार निकल जाती हैं जबकि 10 kHz आवृत्ति की तरंगें ऐन्टीना की ऊँचाई अधिक होने के कारण उपयोगी नहीं हैं।

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प्रश्न 2:
UHF परिसर की आवृत्तियों का प्रसारण प्रायः किसके द्वारा होता है?
(a) भू-तरंगें
(b) व्योम तरंगें
(c) पृष्ठीय तरंगें
(d) आकाश तरंगें
उत्तर:
(d) आकाश तरंगें। UHF परिसर में प्रसारण आकाश तरंगों द्वारा ही होता है।

प्रश्न 3:
अंकीय सिगनल :
(i) मानों का संतत समुच्चय प्रदान नहीं करते।
(ii) मानों को विविक्त चरणों के रूप में निरूपित करते हैं।
(iii) द्विआधारी पद्धति का उपयोग करते हैं।
(iv) दशमलव के साथ द्विआधारी पद्धति का भी उपयोग करते हैं। उपरोक्त प्रकथनों में कौन-से सत्य ?
(a) केवल (i) तथा (ii)
(b) केवल (ii) तथा (iii)
(c) (i), (ii) तथा (iii) परन्तु (iv) नहीं
(d) (i), (ii), (iii) तथा (iv) सभी
उत्तर:
(c) (i), (ii) तथा (iii) सत्य हैं परन्तु (iv) सत्य नहीं है।
अंकीय सिगनल द्विआधारी पद्धति (अंकों 0 तथा 1) का उपयोग करते हैं। अत: मानों का सतत समुच्चय प्रदान करने के स्थान पर उन्हें विविक्त चरणों में निरूपित करते हैं।

प्रश्न 4:
दृष्टिरेखीय संचार के लिए क्या यह आवश्यक है कि प्रेषक ऐन्टीना की ऊँचाई अभिग्राही ऐन्टीना की ऊँचाई के बराबर हो? कोई TV प्रेषक ऐन्टीना 81m ऊँचा है। यदि अभिग्राही ऐन्टीना भूस्तर पर है तो यह कितने क्षेत्र में सेवाएँ प्रदान करेगा?
हल:
नहीं, प्रायः ग्राही ऐन्टीना की ऊँचाई प्रेषी ऐन्टीना से अधिक होती है।
प्रेषी को रेडियो-क्षितिज, dT = [latex]\sqrt { 2{ R }_{ e }{ \quad h }_{ T } }[/latex]
जिसमें Re पृथ्वी की त्रिज्या है।
सेवा-क्षेत्रफल (service area),
A = π[latex]{ d }_{ T }^{ 2 }[/latex]
= π. 2RhT
दिया है, hT = 81 m,
Re = 6.4 x 106 m ।
= 3.14 x 2 x 6.4 x 106 x 81 m2
= 3258 x 106 m2 = 3258 km2

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प्रश्न 5:
12v शिखर वोल्टता की वाहक तरंग का उपयोग किसी संदेश सिगनल के प्रेषण के लिए किया गया है। माडुलन सूचकांक 75% के लिए माडुलक सिगनल की शिखर वोल्टता कितनी होनी चाहिए?
हल:
माडुलन सूचकांक, ma= [latex]\frac { { E }_{ m } }{ { E }_{ c } } [/latex]
a E. माडुलक सिगनल का शिखर मान, Em = ma Ea
दिया है, ma = 75% = 0.75,
Ec = 12V
∴ Em = 0.75 x 12V = 9V

प्रश्न 6:
चित्र 15.1 में दर्शाए अनुसार कोई माडुलक सिगनल वर्ग तरंग है।
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दिया गया है कि वाहक तरंग c(t) = 2 sin (8πt)V
(i) आयाम माडुलित तरंग रूप आलेखित कीजिए।
(ii) माडुलन सूचकांक क्या है?
हल:
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प्रश्न 7:
किसी माडुलित तरंग का अधिकतम आयाम 10V तथा न्यूनतम आयाम 2V पाया जाता है। माडुलन सूचकांक μ का मान निश्चित कीजिए।
यदि न्यूनतम आयाम शून्य वोल्ट हो तो माडुलन सूचकांक क्या होगा?
हल:
दिया है, Emax = 10 V, Emin = 2V
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प्रश्न 8:
आर्थिक कारणों से किसी AM तरंग का केवल ऊपरी पाश्र्व बैंड ही प्रेषित किया जाता है, परन्तु ग्राही स्टेशन पर वाहक तरंग उत्पन्न करने की सुविधा होती है। यह दर्शाइए कि यदि कोई ऐसी युक्ति उपलब्ध हो जो दो सिगनलों की गुणा कर सके तो ग्राही स्टेशन पर माडुलक सिगनल की पुनःप्राप्ति सम्भव है।
हल:
माना वाही तरंग , ec = Ec cos ωc t …(1)
यदि सूचना माडुलक सिगनल की कोणीय आवृत्ति ωmt हो, तो ग्रहण किया गया सिगनल होगा है
er = Er cos (ωm) t …(2)
समीकरण (1) व (2) को गुणा करने पर,
e= Ec Ercos ωct t cos (ωc + ωm)t
सूत्र 2 cos A cos B = cos (A + B) + cos (A – B) का प्रयोग करने पर,
e = [latex]\frac { { E }_{ c }{ E }_{ r } }{ 2 }[/latex] [cos (2ωm) t + cos ωmt ]
यदि इस सिगनल को लो-पास फिल्टर (low pass filter) में से गुजारा जाए, तो उच्च आवृत्ति (2ωcm ) का सिगनले रुक जाएगा तथा केवल ωm आवृत्ति को सिगनल ही गुजरेगा।
अत: हमें माडुलक सिगनल, em = [latex]\frac { { E }_{ c }{ E }_{ r } }{ 2 }[/latex]cos ωmt प्राप्त हो जायेगा।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

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प्रश्न 1:
वाहक तरंग की आवृत्ति fc के साथ श्रव्य तरंग आवृत्ति fm के मॉड्यूलेशन से प्राप्त बैण्ड चौड़ाई का मान होगा (2015, 17)
(i) 2fc
(ii) 2fm
(iii) fm +fc
(iv) fm – fc
उत्तर:
(ii) 2fm

प्रश्न 2:
200 KHz की वाहक आवृत्ति और 10 kHz के मॉडुलन संकेत के लिए आयाम मॉडुलित (AM) सिगनल की बैण्ड चौड़ाई होगी (2016)
(i) 20 kHz
(ii) 210 kHz
(iii) 400 kHz
(iv) 190 kHz
उत्तर:
(iii) 400 kHz

प्रश्न 3:
आयर्न मण्डल से निम्न में से कौन-सी आवृत्ति परावर्तित हो सकती है? (2018)
(i) 5 KHz
(ii) 5 MHz
(iii) 5 GHz
(iv) 500 MHz
उत्तर:
(ii) 5 MHz

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प्रश्न 4:
UHF परास की आवृत्तियाँ सामान्यतः संचरित होती हैं
(i) भू-तरंगों द्वारा
(i) व्योम तरंगों द्वारा
(iii) पृष्ठ तरंगों द्वारा
(iv) आकाश तरंगों द्वारा
उत्तर:
(iv) आकाश तरंगों द्वारा

प्रश्न 5:
निम्न में से कौन विद्युत चुम्बकीय तरंग नहीं है? (2017)
(i) प्रकाश तरंगें
(ii) रेडियो तरंगें
(iii) X-किरणें
(iv) ध्वनि तरंगें
उत्तर:
(iv) ध्वनि तरंगें

प्रश्न 6:
उच्च आवृत्ति तरंगों पर संदेश संकेत के अध्यारोपण की प्रक्रिया कहलाती है (2016)
(i) संचरण
(ii) मॉड्यूलन
(iii) संसूचन
(iv) अभिग्रहण
उत्तर:
(ii) मॉड्यूलन

प्रश्न 7:
यदि संप्रेषी ऐण्टीना की ऊँचाई h1 तथा अभिग्राही ऐण्टीना की ऊँचाई h2 हो तब दृष्टिरेखीय (LOS) संचरण विधि में संतोषजनक संचरण के लिए दोनों ऐण्टीनों के बीच की अधिकतम दूरी होती है। (पृथ्वी की त्रिज्या = R) (2016)
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उत्तर:
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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
संचार व्यवस्था की तीन मूल इकाइयाँ (तत्त्व) क्या हैं?
उत्तर:

  1.  प्रेषित्र,
  2.  संचार चैनल,
  3.  अभिग्राही।

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प्रश्न 2:
ट्रांसड्यूसर क्या है?
उत्तर:
यह वह युक्ति है जिसका उपयोग ऊर्जा को एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित करने के लिए किया जाता है।

प्रश्न 3:
दिए गए ब्लॉक आरेख में संचार व्यवस्था के X तथाY भागों को पहचानिए  (2017)
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उत्तर:
X-सूचना स्रोत, Y-चैनल

प्रश्न 4:
सूचना सिगनल किसे कहते हैं?
उत्तर:
सूचना, भाषण, संगीत आदि को किसी उचित ट्रांसड्यूसर द्वारा विद्युत सिगनल में परिवर्तित किया जाता है। यह सिगनल ही सूचना (संदेश) सिगनल कहलाता है।

प्रश्न 5:
सिगनल की बैण्ड-चौड़ाई से आप क्या समझते हैं? (2014, 17)
या
बैण्ड चौड़ाई को परिभाषित कीजिए। (2017)
उत्तर:
किसी सिगनल में अधिकतम तथा न्यूनतम आवृत्तियों के अन्तर को आवृत्ति परास कहते हैं। यही बैण्ड-चौड़ाई भी कहलाती है।

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प्रश्न 6:
व्योम तरंग संचरण (sky wave propagation) क्या है? इनकी आवृत्ति बताइए। (2014, 17, 18)
उत्तर:
वह संचरण प्रक्रिया जिसमें वाहक तरंगों का संचरण आयन मण्डल से तरंगों के परावर्तन से होता है, व्योम तरंग संचरण कहलाती है। व्योम तरंगों की आवृत्ति 1.5 मेगाहर्ट्ज से 30 मेगाहर्ट्ज तक होती है।

प्रश्न 7:
आकाश तरंगें क्या हैं? इनकी आवृत्ति बताइए। (2017)
उत्तर:
अति उच्च आवृत्ति (30 मेगाहर्ट्ज़ से 300 मेगाहर्ट्ज), परा उच्च आवृत्ति (300 मेगाहर्ट्ज से 3000 मेगाहर्ट्ज) तथा 3000 मेगाहर्ट्ज से उच्च आवृत्ति की रेडियो तरंगें आकाश तरंगें कहलाती हैं।

प्रश्न 8:
आकाश तरंग संचरण से आप क्या समझते हैं? इन तरंगों का संचरण किन विधियों के द्वारा किया जाता है? (2014, 17)
उत्तर:
वह तरंग संचरण जिसमें आकाश तरंगें प्रेषण ऐण्टीना से अभिग्राही ऐण्टीना तक दृष्टि रेखा पथ पर गमन करती हैं।
इन तरंगों का संचरण निम्न दो प्रकार से किया जा सकता है

  1.  भू-स्थिर संचार उपग्रहों के द्वारा।
  2. सीधे प्रेषित ऐण्टीना के द्वारा।

प्रश्न 9:
मॉड्यूलेशन (modulation) से क्या तात्पर्य है?
या
मॉड्यूलेशन से आप क्या समझते हैं? (2015, 16, 18)
उत्तर:
यह वह क्रिया है जिसमें उच्च आवृत्ति की वाहक तरंगों के आयाम, आवृत्ति अथवा कला को निम्न आवृत्ति के सूचना सिगनल के तात्क्षणिक मानों के अनुकूल परस्पर इनके अध्यारोपण के माध्यम से बदला जाता है ।

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प्रश्न 10:
मॉड्यूलित तरंग क्या है? (2014)
उत्तर:
मॉड्यूलेशन की क्रिया में सूचना सिगनल अर्थात् निम्न आवृत्ति की वैद्युत-चुम्बकीय तरंगों को उच्च आवृत्ति की वैद्युत-चुम्बकीय तरंगों पर अध्यारोपित किया जाता है। इनमें सूचना सिगनल को मॉड्यूलक या मॉड्यूलेटिंग तरंगें, उच्च आवृत्ति की वैद्युत-चुम्बकीय तरंगों को वाहक तरंगें तथा इन दोनों के अध्यारोपण के फलस्वरूप प्राप्त परिणामी तरंगों को मॉड्यूलित तरंगें कहते हैं।

प्रश्न 11:
ऐण्टीना का क्या कार्य है? इसकी न्यूनतम लम्बाई कितनी होती है? (2017)
उत्तर:
ऐण्टीना एक प्रकार का ट्रान्सड्यूसर है जो वैद्युत चुम्बकीय तरंगों को प्रसारित करने या ग्रहण करने के काम आता है। ऐण्टीना की न्यूनतम लम्बाई 75 मीटर होती है जो कि व्यावहारिक है।

प्रश्न 12:
3 x 108 Hz आवृत्ति की वाहक तरंगों के लिए द्विध्रुव ऐण्टीना की लम्बाई क्या होनी चाहिए? (2014)
हल:
वांछित लम्बाई
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प्रश्न 13:
एक दूरदर्शन टॉवर की ऊँचाई 75 मीटर है। अधिकतम दूरी क्या है जो यह दूरदर्शन प्रसारण ग्रहण कर सकती है? (Re = 6.4 x 106 मीटर) (2015, 18) हल:
दिया है, h= 75 मीटर, d = ? , Re = 6.4 x 106 मीटर
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प्रश्न 14:
एक टी.वी. टॉवर की ऊँचाई एक दिए गए स्थान पर 500 मी है। यदि पृथ्वी की त्रिज्या 6400 किमी हो तो इसके प्रसारण परास की गणना कीजिए। (2017, 18)
हल:
दिया है, h = 500 मी, Re = 6400 किमी = 6.4 x 106 मी
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प्रश्न 15:
एक वाहक तरंग जिसकी शिखर वोल्टता 12 वोल्ट है किसी संदेश सिगनल को प्रेषित करने के लिए उपयोग की जाती है। मॉडयूलित सिगनल की शिखर वोल्टता क्या होनी चाहिए? (2014)
हल:
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प्रश्न 16:
आयाम मॉड्यूलन क्या है? (2014)
उत्तर:
मॉड्यूलन की वह प्रक्रिया जिसमें वाहक तरंग के आयाम को मॉड्यूलक या मॉड्यूलेटिंग तरंग (सूचना संकेत) के तात्क्षणिक मान द्वारा परिवर्तित किया जाता है, जबकि वाहक तरंग के अन्य दो प्राचल आवृत्ति तथा कला अपरिवर्तित रहते हैं, आयाम मॉड्यूलन कहलाती है।

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प्रश्न 17:
आयाम मॉड्यूलेशन संचार व्यवस्था की बैण्ड-चौड़ाई का सूत्र लिखिए। (2017)
उत्तर:
बैण्ड-चौड़ाई = 2 x मॉड्यूलक सिगनल की आवृत्ति।

प्रश्न 18:
मॉड्यूलन सूचकांक क्या है? इसकी क्या महत्ता है? (2017)
उत्तर:
मॉड्यूलक तरंग के आयाम तथा वाहक तरंग के आयाम के अनुपात को मॉड्यूलन सूचकांक कहते हैं। यह उस सीमा को प्रदर्शित करता है जहाँ तक वाहक तरंग का आयाम सूचना सिगनल द्वारा परावर्तित होता है।

प्रश्न 19:
आवृत्ति मॉड्यूलन (FM) से आप क्या समझते हैं? (2016)
उत्तर:
जब उच्च आवृत्ति की वाहक तरंगों की आवृत्ति को श्रव्य संकेतों के संगत आयामों के अनुरूप परिवर्तित किया जाता है, तो उनके परस्पर अध्यारोपण की प्रक्रिया आवृत्ति मॉड्यूलन कहलाती है।

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प्रश्न 20:
एक वाहक तरंग प्रदर्शित की जाती है।
c(t) = 4 sin (8πt) volt यदि मॉडुलक सिगनल तरंग का आयाम 1.0 volt हो तब मॉडुलन सूचकांक का मान क्या है? (2017)
हल:
दिया है, Em = 1.0V
Ec = 4V
मॉडुलन सूचकांक, ma = [latex]\frac { { E }_{ m } }{ { E }_{ c } }[/latex] = [latex]\frac { 1 }{ 4 }[/latex] = 0.25

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
संचार व्यवस्था के मुख्य अवयव कौन-कौन से हैं? ब्लॉक आरेख खींचकर समझाइए। (2017)
या
रेडियो संचार व्यवस्था का नामांकित ब्लॉक आरेख बनाइए। (2014, 16, 17)
उत्तर:
संचार व्यवस्था के अवयव
ऐसी व्यवस्था जिसके द्वारा सन्देशों अथवा सूचनाओं को एक स्थान से किसी विधि द्वारा (जैसे केबल्स द्वारी अथवा विद्युत-चुम्बकीय तरंगों द्वारा) सम्प्रेषित किया जाता है तथा दूसरे स्थान पर इनको ग्रहण किया जाता है, संचार व्यवस्था कहते हैं। संचार व्यवस्था के निम्नलिखित तीन अवयव होते हैं

1. प्रेषित्र (Transmitter):
यह मूल सन्देश (सूचना, भाषण) सिगनल को एक उचित सिगनल में बदलता है, जिसे उचित माध्यम से गुजारा जा सके; इसे  सम्प्रेषण चैनल कहते हैं। जब वक्ता तथा श्रोता के बीच बहुत अधिक दूरी होती है। ३) मॉड्यूलेटर प्रवर्धक तो केबल्स (cables) सम्प्रेषण चैनल  का कार्य नहीं कर सकतीं (UPBoardSolutions.com) ऐसी स्थिति में ध्वनि को माइक्रोफोन द्वारा विद्युत सिगनलों में बदला जाता है, उनकी शक्ति, प्रवर्धक द्वारा बढ़ायी जाती है। अभिग्राही तत्पश्चात् इसको रेडियो आवृत्ति की  वाहक तरंगों (carrier waves) के साथ मॉड्यूलित किया जाता है और अन्त में ऐण्टीना द्वारा विद्युत-चुम्बकीय तरंगों  के रूप में अन्तरिक्ष (space) में प्रेषित  किया जाता है।
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 2. संचार चैनल (Transmission Channel):
वह माध्यम जिसके द्वारा प्रेषित्र से भेजी गई विद्युत-चुम्बकीय तरंगों के रूप में सूचना अथवा भाषण अभिग्राही के ऐण्टीना तक पहुँचती हैं, संचार चैनल कहलाता है। यह तारों का एक युग्म अथवा केबल, बेतार अर्थात् मुक्त आकाश हो सकता है।

3. अभिग्राही (Receiver):
यह प्रेषित्र द्वारा भेजे गये परावर्द्धित सिगनल को वास्तविक सन्देश अथवा सूचना में परिवर्तित करता है। यह प्रक्रिया डिमॉड्यूलेशन (demodulation) कहलाती है। जब अभिग्राही के ऐण्टीना पर मॉड्यूलित तरंग पहुँचती है तो वहाँ श्रव्य तरंगें उनसे अलग कर . ली जाती हैं। इनको प्रवर्धित करके लाउडस्पीकर में भेजा जाता है। जहाँ इन्हें पुन: ध्वनि तरंगों में परिवर्तित कर लेते हैं। संचार व्यवस्था का योजनाबद्ध ब्लॉक आरेख चित्र 15.4 में प्रदर्शित है।

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प्रश्न 2:
वायुमण्डल में आकाश तरंगों के संचरण को स्पष्ट कीजिए।
या
सिद्ध कीजिए कि आकाश तरंगों के संचरण हेतु एक टी.वी.प्रेषी ऐण्टीना जो पृथ्वी तल से h ऊँचाई पर है, का प्रसारण परास d = [latex]\sqrt { 2Rh }[/latex] है, जहाँ पृथ्वी की त्रिज्या है? (2015, 17)
या
आकाश तरंगों के संचरण को समझाइए। इन तरंगों के संचरण के लिए प्रयुक्त आवृत्ति परास क्या है? (2015)
या
तरंग संचरण में दृष्टि रेखा पक्ष (LOS)’ से क्या तात्पर्य है? किन तरंगों में इसका प्रयोग होता है? (2018)
उत्तर:
आकाश तरंगों का संचरण (Propagation of space waves or tropospherical waves):
रेडियो तरंग संचरण की अन्य विधा आकाश तरंग है। आकाश तरंग, प्रेषण ऐण्टीना से अभिग्राही ऐण्टीना तक दृष्टि रेखा पथों (line of sight : LOS) पर गमन करती है। (UPBoardSolutions.com) 40 MHz से ऊँची आवृत्तियों के लिये संचार मुख्यत: दृष्टि रेखा पथों तक ही सीमित रहता है। इन आवृत्तियों पर ऐण्टीना का साइज अपेक्षाकृत छोटा होता है तथा इसे पृथ्वी के पृष्ठ से कई तरंगदैर्यो की ऊँचाई पर स्थापित किया जा सकता है।
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टी०वी० सिगनलों (80-200 MHz) को न तो भू-तरंगों द्वारा (पृथ्वी के समीप वायुमण्डल द्वारा उनके उच्च अवशोषण के कारण) संचरित किया जा सकता है और न व्योम तरंगों द्वारा (आयनमण्डल से उनके परावर्तन न होने के कारण)। इन सिगनलों को केवल तभी प्राप्त किया जा सकता है जब ग्राही ऐण्टीना प्रेषक ऐण्टीना से चलने वाले सिगनल के मार्ग में पड़े। टी०वी० का अधिक क्षेत्र विस्तार प्राप्त करने के (UPBoardSolutions.com) लिये प्रसारण ऊँचे ऐण्टीना से करना चाहिए।
टी०वी० ऐण्टीना की ऊँचाई है तथा वह दूरी d जहाँ तक सिगनल प्रेषित किये जा सकते हैं, सम्बन्ध ज्ञात करने के लिये, माना ST टी०वी० का है ऊँचाई को प्रेषित्र ऐण्टीना है तथा पृथ्वी का  केन्द्र O एवं त्रिज्या R है (चित्र 15.5)। पृथ्वी की वक्रता के कारण पृथ्वी की सतह के बिन्दुओं P तथा २ के परे सिगनल प्राप्त नहीं किये जा सकते। यहाँ PT तथ QT क्रमशः P तथा Q पर स्पर्श रेखाएँ हैं। माना d (= SP अथवा SQ) ऐण्टीना के आधार से पृथ्वी की दूरी है, जहाँ तक सिगनल प्राप्त होते हैं। समकोण त्रिभुज OPT में,
(OT)2 = (OP)2 + (TP)2 जहाँ
OT = R+h,OP= R तथा
TP = SP= d (क्योंकि h<<R )
इस प्रकार (R+h)2 = R2+a2
h2+2Rh = d2
चूंकि h<<R अत: हम h2 को 2Rh के सापेक्ष उपेक्षणीय मान सकते हैं। इस प्रकार
2Rh = d2
अथवा  d = [latex]\sqrt { 2Rh }[/latex]
टी०वी० प्रसारण में क्षेत्र विस्तार A= πd2 =2πRh
संचार परास (Range of communication) अथवा दृष्टि रेखा दूरी (Line of sight – distance)-प्रेषी ऐण्टीना तथा ग्राही ऐण्टीना के बीच सरल रेखीय दूरी को संचार परास अथवा दृष्टि रेखा दूरी कहते हैं। इसको । अथवा d से प्रदर्शित करते हैं। यह प्रेषक ऐण्टीना की परास तथा ग्राही ऐण्टीना की परास के योग के बराबर होती है।

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यदि प्रेषक ऐटीना की ऊँचाई hT तथा ग्राही ऐण्टीना की ऊँचाई hR हो एवं इनसे क्षैतिज दूरियाँ अर्थात् इनकी परास क्रमश: dT व dR हो, तो
d= [latex]\sqrt { { 2R }_{ e }{ h }_{ T } }[/latex] तथा dr = [latex]\sqrt { { 2R }_{ e }{ h }_{ R } }[/latex];
जहाँ, Re= पृथ्वी की वक्रता त्रिज्या।
दोनों ऐण्टीनाऔं के बीच की रेखीय दू्री r = dm = dT + dR =  [latex]\sqrt { { 2R }_{ e }{ h }_{ T } }[/latex] +  [latex]\sqrt { { 2R }_{ e }{ h }_{ R } }[/latex]
इस तरंग संचरण का प्रयोग टेलीविजन प्रसारण, माइक्रोवेव-लिंक तथा सैटेलाइट संचार आदि संचार प्रणालियों में किया जाता है।

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प्रश्न 3:
निम्नलिखित आवृत्तियों की वाहक तरंगों के लिए ऐण्टीना की आवश्यक ऊँचाई ज्ञात कीजिए
(i) 30 MHz
(ii) 300 MHz
(iii) 6 x 108 Hz
प्राप्त परिणामों से किस फल को प्राप्त करोगे?
हल:
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प्रश्न 4:
आयाम मॉडुलन से आप क्या समझते हैं? एक आयाम मॉडलित तरंग प्राप्त करने का नामांकित परिपथ बनाइए। (2017)
उत्तर:
जब उच्च आवृत्ति की वाहक तरंगों के आयाम को निम्न आवृत्ति के श्रव्य सिगनलों के संगत आयामों के अनुरूप परिवर्तित किया जाता है तो उनके परस्पर अध्यारोपण की (UPBoardSolutions.com) प्रक्रिया आयाम मॉडुलन कहलाती है। चित्र 15.7 में परिणामी आयाम मॉडुलित तरंग प्रदर्शित है
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प्रश्न 5:
एक मॉड्यूलित तरंग का अधिकतम आयाम 11 वोल्ट तथा न्यूनतम आयाम 3 वोल्ट है। मॉड्यूलन सूचकांक का मान ज्ञात कीजिए। (2014)
हल:
दिया है, Emax = 11 V, Emin = 3V
∴ Ec + Em = 11V      …(1)
तथा Ec – Em = 3V …(2)
समी० (1) व समी० (2) को हल करने पर,
Ec = 7 v तथा
Em = 4V
मॉड्यूलन सूचकांक ma=[latex]\frac { 4 }{ 7 }[/latex] = 0.57

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प्रश्न 6:
मॉड्यूलित वाहक तरंग के अधिकतम एवं न्यूनतम आयाम क्रमशः 900 mV तथा 300 mV हैं। मॉड्यूलन सूचकांक की गणना कीजिए। (2015)
हल:
दिया है, Emax = 900 mV, Emin = 300 mV
∴ Ec + Em = 900 mV  ……….(1)
तथा Ec – Em = 300 mV ………..(2)
समी० (1) वे समी० (2) को हल करने पर,
Ec = 600 mV, Em = 300 mV
∴ मॉड्यूलन सूचकांक m= [latex]\frac { { E }_{ m } }{ { E }_{ c } }[/latex] = [latex]\frac { 300mV }{ 600mV }[/latex]  = 0.5

प्रश्न 7:
2 x 105 हर्ट्ज आवृत्ति तथा अधिकतम वोल्टेज 60 वोल्ट की वाहक तरंग को श्रव्य तरंग  em = 30 sin 2π x 2500t वोल्ट द्वारा मॉडुलित किया जाता है। ज्ञात कीजिए
(i) मॉडुलन प्रतिशतता
(ii) मॉडुलित तरंग के घटक की आवृत्ति (2017)
उत्तर:
दिया है, Ec = 60 वोल्ट तथा f= 2 x 105 हज
श्रव्ये तरंग em = 30 sin 2π x 2500t वोल्ट
अतः Em = 30 वोल्ट तथा fm = 2500 वोल्ट
(i) मॉडुलन गुणक (ma) = [latex]\frac { { E }_{ m } }{ { E }_{ c } }[/latex] = [latex]\frac { 30 }{ 60 }[/latex]   = 0.5
अतः मॉडुलन प्रतिशतता = 0.5 x 100 = 50%
(ii) मॉडुलित तरंग के घटक की आवृत्ति = fc +fm
= 2 x 105 + 2500 = 202500 हर्ट्ज
= 202.5 किलोहर्ट्ज

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
उपग्रह संचार पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उतर:
उपग्रह संचार (Satellite communication):
अन्तरिक्ष तरंग संचरण विधि द्वारा पृथ्वी के सम्पूर्ण क्षेत्र को आवरित नहीं किया जा सकता, क्योंकि विषम भौगोलिक परिस्थितियों (जैसे, मध्य में कई महासागर आदि) के कारण निरन्तर पुनरावर्तक (repeater) लगाना सम्भव नहीं है। अतः इसके लिए आवश्यक है कि संचार उच्च आवृत्ति पर हो। 30 MHz से अधिक आवृत्ति की तरंगें परम्परागत विधियों द्वारा संचारित नहीं की जा सकतीं। इसके लिए संचार उपग्रहों का प्रयोग किया जाता है।

संचार उपग्रह एक ऐसा उपग्रह है जो पृथ्वी के चारों ओर पश्चिम से पूर्व की ओर वृत्ताकार कक्षा में इस प्रकार परिक्रमण करता है कि इसका आवर्त काल पृथ्वी के अपनी (UPBoardSolutions.com) अक्ष के परितः घूर्णन काल के बराबर अर्थात् 24 घण्टे हो। इसलिए यह उपग्रह पृथ्वी के सापेक्ष सदैव स्थिर प्रतीत होता है। इस प्रकार लम्बी दूरी के संचरण के लिए इन संचार उपग्रहों का प्रयोग किया जाता है। इनको भूस्थिर उपग्रह अथवा तुल्यकालिक उपग्रह भी कहते हैं।

इस प्रकार के संचार उपग्रहों में माइक्रो तरंग सिगनल के अभिग्रहण तथा प्रेषण के लिए आवश्यक उपकरण (रेडियो ट्रॉन्सपोंडर) लगे रहते हैं। पृथ्वी के प्रेषित्र स्टेशन से एक आवृत्ति (अपलिंक) के माइक्रो तरंग सिगनल उपग्रह की ओर प्रेषित किये जाते हैं। ये सिगनल उपग्रह पर लगे उपकरणों द्वारा ग्रहण कर संशोधित एवं प्रवर्धित किये जाते हैं तथा तत्पश्चात् एक अन्य आवृत्ति (डाउनलिंक) पर पृथ्वी पर ग्राही स्टेशन की ओर प्रेषित कर दिये जाते हैं। अपलिंक तथा डाउनलिंक की दोनों भिन्न आवृत्तियाँ सूक्ष्म तरंग अथवा UHF क्षेत्र में पड़ती हैं। इतनी उच्च आवृत्ति की तरंगें आयन मण्डल को पार कर जाती हैं। अत: पृथ्वी पर प्रेषित (UPBoardSolutions.com) तथा ग्राही ऐण्टीनों को निश्चित झुकाव कोणों पर रखा जाता है। उपग्रह संचार प्रणाली की आवृत्ति परास 1GHz से 10 GHz होती है। इस संचार प्रणाली की विशेषता यह है कि उपग्रह संचार बिना किसी विक्षोभ के काफी बड़ी दूरियों को आवंटित करता है। यह लम्बी दरियों, दरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों के लिए संचार का आसान तथा अपव्ययी संचार माध्यम है। यह टेलीविजन, टेलीफोन तथा मोबाइल फोन सेवाओं के लिए उपयुक्त संचार माध्यम है। गोपनीयता की दृष्टि से यह संचार माध्यम उपयुक्त नहीं है।
चित्र 16.8 में वैद्युत-चुम्बकीय तरंगों, के संचरण की विभिन्न विधियों को दर्शाया गया है।
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प्रश्न 2:
मॉड्यूलेशन से क्या तात्पर्य है? इसकी आवश्यकता संचार निकाय में क्यों पड़ती है? (2014, 18)
या
दो कारणों को लिखिए जिससे किसी सिगनल के मॉड्यूलन की आवश्यकता स्पष्ट होती है।
या
सिगनल संचरण के लिए मॉड्यूलेशन की आवश्यकता क्यों है? (2015, 16, 18)
उत्तर:
सामान्यतः भेजे जाने वाले डिजिटल एवं एनालॉग सिगनलों को इनके मूलरूप में नहीं भेजा जा सकता है, चूंकि इन सिगनलों की आवृत्ति बहुत कम होती है। इस तरह के (UPBoardSolutions.com) सिगनलों को भेजने के लिए वाहक की आवश्यकता होती है। ये वाहक उच्च आवृत्ति की तरंगें (संकेत या सिगनल) होती हैं। मॉड्यूलेशन को निम्न प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है ।
“अल्प आवृत्ति के संकेत (सिगनल) को उच्च आवृत्ति के संकेते पर लंदना ‘भाँड्यूलेशन’ कहलाता है।”

मॉड्यूलेशन की आवश्यकता
(Need of Modulation):
संचार निकाय में संदेश सिगनलों को (जिन्हें आधार बैण्ड सिगनल भी कहते हैं) दूरस्थ स्थानों को प्रेषित करना होता है। संदेश सिगनल श्रव्य आवृत्ति (UPBoardSolutions.com) परास (20 Hz से 20000 Hz) में होते हैं। इनको पहले माइक्रोफोन द्वारा वैद्युत सिगनल में बदला जाता है जिनकी आवृत्ति परास भी (20 Hz से 20000 Hz) ही होती है। इन सिगनलों को अधिक दूरी तक संप्रेषित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि इसमें निम्नलिखित कठिनाइयाँ आती हैं

1. ऐण्टीना का आकार (Size of antenna):
किसी सिगनल के सम्प्रेषण के लिए आवश्यक है। कि ऐण्टीना का आकार प्रेषित किये जाने वाले सिगनल की तरंगदैर्ध्य की कोटि का होना चाहिए।
अतः
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अत: इन तरंगों को प्रेषित करने के लिए 100 मीटर लम्बाई के ऐण्टीना की आवश्यकता होगी जिसको आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। अतः प्रेषण से पूर्व न्यून आवृत्ति आधार बैण्ड सिगनल में निहित सूचना को उच्च रेडियो आवृत्तियों में रूपान्तरित करने की आवश्यकता होती है।

2. कम शक्ति का प्रभावी विकिरण (Effect low power radiation):
विकिरण के सैद्धान्तिक अध्ययन के आधार पर l लम्बाई के रेखीय ऐण्टीना द्वारा विकरित शक्ति P तरंगदैर्घ्य λ के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होती है। चूंकि P α (1/λ)2अत: । के नियत मान के लिए P α 1/λ2
अतः स्पष्ट है कि लम्बी तरंगदैर्घ्य (निम्न आवृत्ति) के आधार बैण्ड सिगनल द्वारा प्रभावी शक्ति विकिरण कम होगा। परन्तु अच्छे प्रेषण के लिए उच्च शक्ति चाहिए जो कम तरंगदैर्घ्य (उच्च आवृत्ति) के आधार बैण्ड सिगनल से सम्भव है। इस प्रकार यह तथ्य प्रेषण के लिए उच्च आवृत्ति के उपयोग की आवश्यकता दर्शाता है।

3. विभिन्न प्रेषित्रों से प्राप्त सिगनलों का मिश्रण: आधार बैण्ड सिगनलों के सीधे प्रेषण के विरूद्ध निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण तर्क अधिक व्यावहारिक हैं जब एक ही क्षण कई आधार बैण्ड सिगनल प्रेषित किये जा रहे होते हैं तो ये परस्पर मिल जाते हैं। तथा उनमें विभेद करने का कोई सरल उपाय नहीं है। इस कठिनाई को दूर करने के लिए सिगनलों को उच्च आवृत्ति पर प्रेषित करते हैं तथा प्रत्येक प्रसारण स्टेशन को एक बैण्ड आवंटित करते हैं। उपरोक्त सभी बिन्दुओं से यह स्पष्ट होता है कि न्यून आवृत्ति के मूल आधार बैण्ड (UPBoardSolutions.com) अर्थात् सूचना सिगनल को प्रेषण से पूर्व किसी उच्च आवृत्ति तरंग में रूपान्तरित करना आवश्यक है। यह रूपान्तरण क्रिया इस प्रकार की होनी चाहिए कि रूपान्तरित सिगनल में उन सभी सूचनाओं का समावेश रहे जो मूल सिगनल में समाहित थे। ऐसा करने के लिए हम किसी उच्च आवृत्ति सिगनल की सहायता लेते हैं। इस सिगनल को वाहक तरंग (carrier wave) कहते हैं। इस प्रकार उपर्युक्त सभी बिन्दु मॉड्यूलेशन की आवश्यकता को स्पष्ट करते हैं।

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प्रश्न 3:
मॉड्यूलन तथा विमॉड्यूलन से क्या अभिप्राय है? एक आयाम मॉड्यूलित तरंग को प्राप्त करने व संसूचित करने को परिपथ आरेख द्वारा समझाइए। (2015, 17)
या
आयाम मॉड्यूलन की व्याख्या कीजिए तथा किसी आयाम मॉड्यूलन को परिपथ आरेख बनाइए। (2015)
या
मॉड्यूलन से आप क्या समझते हैं? आयाम मॉड्यूलित तरंग के उत्पादन हेतु आवश्यक नामांकित परिपथ आरेख बनाइए। (2015, 16, 18)
उत्तर:
मॉडयलन: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 2 के उत्तर के अन्तर्गत देखिए।
विमॉड्थूलिन : मॉड्यूलित तरंग से श्रव्य सिगनल (audio signal) अर्थात् सूचना सिगनल को पुनः प्राप्त करने की क्रिया संसूचन अथवा विमॉड्यूलन (Demodulation) कहलाती है।
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आयाम मॉड्यूलित (मॉड्यूलेटिड) तरंग प्राप्त करना

आयाम मॉड्यूलित तरंग के उत्पादन के लिए आवश्यक परिपथ आरेख  चित्र 15.9 में दर्शाया गया है। यह परिपथ वाहक तरंग सिगनल के लिए
सामान्यतः एक उभयनिष्ठ उत्सर्जक वाहक प्रवर्धक है। मॉड्यूलक सिगनल  [em = Em sinωm .t] आधार पर आरोपित किया जाता है। इस प्रकार निर्गम आधार (UPBoardSolutions.com) बायसिंग वोल्टता नियत d.c वोल्टता नहीं है, बल्कि यह नियत d.c. वोल्टता VBB तथा मॉड्यूलक वोल्टता a.c [em = Em sinωm.t] का योग है।
चित्र 15.9 अत: आधार वोल्टता नियत न रहकरे । मॉड्यूलक सिगनल के तात्कालिक मान के अनुसार परिवर्तित होती रहती है। इस प्रकार प्रवर्धन भी परिवर्तित होता है। अतः निर्गम वोल्टता भी उसी के अनुसार परिवर्तित होती रहती है। इस प्रकार निर्गम में आयाम मॉड्यूलित तरंग प्राप्त हो जाती है। उत्पादन प्रक्रिया को ब्लॉक चित्र 15.10 में प्रदर्शित है।
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आयाम मॉड्यूलित तरंग का संसूचन
आयाम मॉड्यूलेटिड तरंग को संसूचित करने में निम्नलिखित दो क्रियाएँ होती हैं
(i) मॉड्यूलित तरंग (UPBoardSolutions.com) का दिष्टीकरण (Rectification),
(ii) मॉझ्यालित तरंग से वाहक तरंग (रेडियो आवृत्ति) घटक को अलग करना। आयाम मॉड्यूलित तरंग के संसूचन अर्थात् विमॉड्यूलेशन के लिए आवश्यक परिपथ आरेख चित्र 15.11 में दर्शाया गया है।
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निवेशी परिपथ स्वप्रेरकत्व L1 तथा परिवर्ती संधारित्र C1 का समान्तर संयोजन है। इसको ट्यून्ड परिपथ (tuned circuit) कहते हैं। ग्राही के ऐण्टीना पर प्राप्त विभिन्न (UPBoardSolutions.com) सिगनलों से वांछित मॉड्यूलित रेडियो सिगनल C1 की आवृत्ति को व्यवस्थित करके अनुनाद के आधार पर चयनित कर लिया जाता है।
डायोड D इस सिगनल को दिष्टीकृत कर देता है। अतः डायोड का निर्गम, रेडियो आवृत्ति की धारा स्पन्दों के धनात्मक आधे वक्रों की चेन है। इन सिगनलों के शिखर श्रव्य सिगनलों के अनुसार परिवर्तित होते हैं। श्रव्य सिगनलों को पुनः प्राप्त करने के लिए डायोड दिष्टीकृत निर्गम को कम मान के (UPBoardSolutions.com) संधारित्र C2 तथा एक लोड प्रतिरोध RL के समान्तर संयोजन पर आरोपित किया जाता है। संधारित्र C2 उच्च आवृत्ति की वाहक तरंगों के लिए निम्न प्रतिघात ( Xc= [latex]\frac { 1 }{ 2\pi f{ C }_{ 2 } }[/latex]) तथा निम्न आवृत्ति की श्रव्य तरंगों के लिए उच्च प्रतिघात उत्पन्न करता है। अत: उच्च आवृत्ति की वाहक तरंगें इस संधारित्र से निकल जाती हैं। तथा निम्न आवृत्ति की श्रव्य तरंगें लोड प्रतिरोध RLपर प्राप्त हो जाती हैं। अत: यह हैडफोन में धारा भेजता है जिससे कि मूल श्रव्य सिगनल पुन: प्राप्त हो जाता है।।

संसूचन प्रक्रिया (विमॉड्यूलेशन) का ब्लॉक आरेख
संसूचन के लिए संतोषजनक प्रतिबन्ध: फिल्टर परिपथ से जुड़े संधारित्र की धारिता इतनी होनी चाहिए कि रेडियो आवृत्ति fके लिए इसका प्रतिघात ( X=[latex]\frac { 1 }{ { \omega }_{ c }C }[/latex] )प्रतिरोध R की तुलना में बहुत कम हो अर्थात्
X <<R अथवा    [latex]\frac { 1 }{ 2\pi { f }_{ c }C }[/latex] << R
जबकि श्रव्य-आवृत्ति f के लिए इसका प्रतिघात, प्रतिरोध है की तुलना में बहुत अधिक हो अर्थात्
[latex]\frac { 1 }{ { \omega }_{ m }C }[/latex]  >> R या  [latex]\frac { 1 }{ 2\pi { f }_{ m }C }[/latex]  >> R

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