UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 9 Strategies for Enhancement in Food Production

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Biology
Chapter Chapter 9
Chapter Name Strategies for Enhancement in Food Production
Number of Questions Solved 43
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 9 Strategies for Enhancement in Food Production (खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मानव कल्याण में पशुपालन की भूमिका की संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर
मानव कल्याण में पशुपालन की भूमिका (Role of Animal Husbandry in Human Welfare)-विश्व की बढ़ती जनसंख्या के साथ खाद्य उत्पादन की वृद्धि एक प्रमुख आवश्यकता है। पशुपालन पर लागू होने वाले जैविक सिद्धान्त खाद्य उत्पादन बढ़ाने के हमारे प्रयासों में मुख्य भूमिका निभाते हैं। पशुपालन, पशु प्रजनन तथा पशुधन वृद्धि की एक कृषि पद्धति है। पशुपालन का सम्बन्ध पशुधन जैसे-भैंस, गाय, सुअर, घोड़ा, भेड़, ऊँट, बकरी आदि के प्रजनन तथा उनकी देखभाल से होता है जो मानव के लिए लाभप्रद हैं। इसमें कुक्कुट पालन तथा मत्स्य पालन भी शामिल हैं। मत्स्यकी (fisheries) में मत्स्यों (मछलियों), मृदुकवची (मोलस्क) तथा क्रस्टेशिआई (प्रॉन, क्रैब आदि) का पालन-पोषण, उनको पकड़ना (शिकार) बेचना आदि शामिल हैं। अति प्राचीनकाल से मानव द्वारा मधुमक्खी, रेशमकीट, झींगा, केकड़ा, मछलियाँ, पक्षी, सुअर, भेड़, ऊँट आदि का प्रयोग उनके उत्पादों जैसे- दूध, अण्डे, मांस, ऊन, रेशम, शहद आदि प्राप्त करने के लिए किया जाता रहा है।

डेरी उद्योग (dairying) एक पशुप्रबन्धन है जिससे मानव खपत के लिए दुग्ध तथा इसके उत्पाद प्राप्त होते हैं। कुक्कुट का प्रयोग भोजन (मांस) प्राप्त करने के लिए अथवा उनके अण्डों को प्राप्त करने के लिए किया जाता है। मधुमक्खी पालन शहद के उत्पादन के लिए मधुमक्खियों के छत्तों का रख-रखाव है। शहद उच्च पोषक महत्त्व का एक आहार है तथा आयुर्वेद औषधियों में भी इसका प्रयोग किया जाता है। मधुमक्खियों से मोम भी प्राप्त होता है, मोम का प्रयोग कान्तिवर्द्धक सौन्दर्य प्रसाधनों में तथा विभिन्न प्रकार के पॉलिश वाले उद्योगों में किया जाता है। एक गणना के अनुसार विश्व का 70 प्रतिशत से भी अधिक पशुधन भारत तथा चीन में है।

प्रश्न 2.
यदि आपके परिवार के पास एक डेरी फार्म है, तब आप दुग्ध उत्पादन में उसकी गुणवत्ता तथा मात्रा में सुधार लाने के लिए कौन-कौन से उपाय करेंगे?
उत्तर
डेरी फार्म प्रबन्धन से दुग्ध की गुणवत्ता में सुधार तथा उसका उत्पादन बढ़ता है। मूल रूप से डेरी फार्म में रहने वाले पशुओं की नस्ल की गुणवत्ता पर ही दुग्ध उत्पादन निर्भर करता है। क्षेत्र की जलवायु एवं परिस्थितियों के अनुरूप उच्च उत्पादन एवं रोग प्रतिरोधक क्षमता वाली नस्लों को अच्छी नस्ल माना जाता है। उच्च उत्पादन क्षमता प्राप्त करने के लिए पशुओं की अच्छी देखभाल, जिसमें उनके रहने के लिए अच्छा आवास तथा पर्याप्त स्वच्छ जल एवं रोगमुक्त वातावरण होना आवश्यक है। पशुओं को भोजन देते समय चारे की गुणवत्ता तथा मात्रा पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त दुग्धीकरण तथा दुग्ध उत्पादों के भण्डारण और परिवहन के दौरान स्वच्छता तथा पशुओं का कार्य करने वाले व्यक्ति के स्वास्थ्य का महत्त्व सर्वोपरि है। पशु चिकित्सक का नियमित जाँच हेतु आना अनिवार्य है। इन सभी कठोर उपायों को सुनिश्चित करने के लिए सही-सही रिकॉर्ड रखने एवं समय-समय पर निरीक्षण की आवश्यकता होती है। इससे समस्याओं की पहचान और उनका समाधान शीघ्रतापूर्वक निकालना सम्भव हो जाता है।

प्रश्न 3.
नस्ल शब्द से आप क्या समझते हैं? पशु प्रजनन के क्या उद्देश्य हैं?
उत्तर
नस्ल (Breed) – पशुओं का वह समूह जो वंश तथा सामान्य लक्षणों जैसे- सामान्य दिखावट, आकृति, आकार, संरूपण आदि में समान हों, एक नस्ल के कहलाते हैं।
पशु प्रजनन का उद्देश्य (Objectives of Animal Breeding) – पशु प्रजनन, पशुपालन का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। पशु प्रजनन का उद्देश्य पशुओं के उत्पादन को बढ़ाना तथा उनके उत्पादों की वांछित गुणवत्ता में सुधार करना है। कृत्रिम प्रजनन द्वारा उच्च दुग्ध उत्पादन वाली नस्ल की मादाओं तथा उच्च गुणवत्ता वाले मांस (कम वसा वाले मांस) प्रदान करने वाली नस्लों को सफलतापूर्वक जनित किया गया है जिससे अल्पकाल में ही बड़ी संख्या में पशुधन में वृद्धि सम्भव है।

प्रश्न 4.
पशु प्रजनन के लिए प्रयोग में लाई जाने वाली विधियों के नाम बताएँ। आपके अनुसार कौन – सी विधि सर्वोत्तम है? क्यों?
उत्तर
पशु प्रजनन के लिए आधुनिक समय में निम्नलिखित विधियाँ प्रयोग में लाई जा रही हैं –
1. अन्तःप्रजनन (Inbreeding) – एक ही नस्ल के पशुओं के मध्य जब प्रजनन होता है तो वह अन्तःप्रजनन कहलाता है। इस विधि में एक नस्ल से उत्तम किस्म का नर तथा उत्तम किस्म की मादा को पहले अभिनिर्धारित किया जाता है तथा जोड़ों में उनका संगम कराया जाता है। ऐसे संगम से जो संतति उत्पन्न होती है, उस संतति का मूल्यांकन किया जाता है तथा भविष्य में कराए जाने वाले संगम के लिए अत्यन्त उत्तम किस्म के नर तथा मादा की पहचान की जाती है। इससे सामान्यत: जनन क्षमता तथा उत्पादन दोनों को बनाए रखने में सहायता मिलती है।

2. बहिःप्रजनन (Out breeding) – इसमें एक ही नस्ल की या भिन्न-भिन्न नस्लों या भिन्न प्रजातियों के सदस्य भाग लेते हैं। यह निम्नलिखित तीन प्रकार का होता है –

  1. बहिःसंकरण (Out-crossing) – इसमें एक ही नस्ल के ऐसे पशुओं का चयन किया जाता है जो 4-6 पीढ़ियों तक किसी भी वंशावली में संयुक्त (उभय) पूर्वज नहीं होते। इससे अन्तः प्रजनन अवसादन या अवर्नमन (depression) समाप्त हो जाता है। इस संगम के फलस्वरूप प्राप्त संतति बहिःसंकर (out-cross) कहलाती है।
  2. संकरण (Hybridization) – संकरण किसी जीव की ऐच्छिक विशिष्टताओं के संरक्षण एवं प्रसार की महत्त्वपूर्ण युक्ति है। जन्तु संकरण द्वारा मानवोपयोगी पशु-पक्षियों की नस्ल सुधारकर अधिकाधिक लाभ प्राप्त किया जाता है। संकरण दो विभिन्न नस्लों के वांछनीय गुणों के संयोजन में सहायक होता है। इससे नई नस्ल जो वर्तमान नस्लों से श्रेष्ठ होती हैं, प्राप्त की जाती हैं जैसे-हिसरडेल (Hisardale) नस्ल की भेड़ का विकास बीकानेरी भेड़ (ewes) तथा मैरीनो रेम्स (मेढ़ा-rams) से किया गया है।
  3. अन्त:विशिष्ट संकरण (Interspecific hybridization) – जब विभिन्न प्रजातियों के नर तथा मादा पशुओं के मध्य संकरण कराया जाता है तो इसे अन्त:विशिष्ट संकरण (interspecific hybridization) कहते हैं। उदाहरण के लिए-गधा तथा घोड़ा अलग-अलग जाति के पशु हैं, किन्तु इन पशुओं के आपस में संकरण द्वारा खच्चर उत्पन्न कराया जाता है। खच्चर गधे एवं घोड़े से अधिक शक्तिशाली होता है।

कृत्रिम निषेचन (Artificial Insemination) – इस विधि में वांछित गुणों वाले नर पशुओं के वीर्य को वीर्य बैंकों में सुरक्षित रखते हैं तथा आवश्यकतानुसार इच्छित मादा पशु के गर्भाशय में एक विशेष पिचकारी द्वारा वीर्य को पहुँचा दिया जाता है।
भारत में संकरण विधि द्वारा जन्तुओं की नस्ल सुधार हेतु अनेक शासकीय एवं अशासकीय अनुसन्धान संस्थान आई०सी०ए०आर० (ICAR-Indian Council of Agriculture Research) के अधीन कार्यरत हैं। इन संस्थानों में कार्यरत वैज्ञानिकों के शोध एवं प्रयासों द्वारा गाय, भैंस, भेड़, बकरी, घोड़ा, ऊँट, कुक्कुट, मछली आदि जन्तुओं की नस्ल एवं उपयोगिता में गुणात्मक सुधार हुआ है। फलतः अनेक जन्तु उत्पादों में विश्व में भारत को अग्रणी स्थान प्राप्त है। कृत्रिम वीर्य-सेचन सबसे अच्छी (सर्वोत्तम) पशु प्रजनन विधि है। इससे अल्प समय में उच्च गुणवत्ता वाले पशुओं को सफलतापूर्वक जनित किया जाता है।

प्रश्न 5.
मौन (मधुमक्खी) पालन से आप क्या समझते हैं? हमारे जीवन में इसका क्या महत्त्व है?
या
मधुमक्खियों द्वारा निर्माण किये जाने वाले दो प्रमुख उत्पादों के नाम लिखिए। (2018)
उत्तर
मौन पालन (मधुमक्खी पालन-Bee Keeping)-शहद के उत्पादन के लिए मधुमक्खियों के छत्तों का रख-रखाव ही मधुमक्खी पालन अथवा मौन पालन (Bee keeping) कहलाता है। मधुमक्खी पालन का व्यवसाय किसी भी क्षेत्र में जहाँ जंगली झाड़ियों, फलों के बगीचों तथा लहलहाती फसलों के पर्याप्त कृषि क्षेत्र या चरागाह हों किया जा सकता है। मधुमक्खी पालन यद्यपि अपेक्षाकृत आसान है, परन्तु इसके लिए विशेष प्रकार के कौशल की आवश्यकता होती है। मधुमक्खी पालन प्राचीनकाल से चला आ रहा एक कुटीर उद्योग है। मधुमक्खियों से शहद तथा मोम प्राप्त होता है। शहद का उपयोग आयुर्वेदिक औषधियों में किया जाता है। मोम का उपयोग कान्तिवर्द्धक वस्तुओं की तैयारी तथा विभिन्न प्रकार के पॉलिश वाले उद्योगों में किया जाता है। पुष्पीकरण के समय यदि मधुमक्खी के छत्तों को खेतों के बीच में रख दिया जाए तो इससे पौधों की परागण क्षमता बढ़ जाती है और इस प्रकार फसल तथा शहद दोनों के उत्पादन में सुधार हो जाता है।

प्रश्न 6.
खाद्य उत्पादन को बढ़ाने में मत्स्यकी की भूमिका की विवेचना कीजिए।
उत्तर
मत्स्यकी की भूमिका (Role of Fishery) – मत्स्यपालन के अन्तर्गत मछली पालने के तरीकों एवं इनके रख-रखाव और उपयोग के बारे में अध्ययन किया जाता है। मछलियों से मांस (प्रोटीन का स्रोत), तेल इत्यादि प्राप्त होता है। मत्स्यकी एक प्रकार का उद्योग है, जिसका सम्बन्ध मछली अथवा अन्य जलीय जीव को पकड़ना, उनका प्रसंस्करण (processing) तथा उन्हें बेचने से होता है। हमारी जनसंख्या का एक बहुत बड़ा भाग आहार के रूप में मछली, मछली उत्पादों तथा अन्य जलीय जन्तुओं पर आश्रित है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में मत्स्यकी का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह समुद्र तटीय राज्यों में अनेक लोगों को आय तथा रोजगार प्रदान करती है। बहुत-से लोगों के लिए यह जीविका का एकमात्र साधन है। मत्स्यकी की बढ़ती हुई माँग को देखते हुए इसके उत्पादन को बढ़ाने के लिए विभिन्न प्रकार की तकनीकें अपनाई जा रही हैं। नीली क्रान्ति (Blue Revolution) मछली उत्पादन से जुड़ी है। इसके अन्तर्गत अलवणीय तथा लवणीय जलीय प्राणियों के उत्पादन में-द्धि की जाती है।

मछली उत्तम प्रोटीन का खाद्य संसाधन है। मछलियों की अलवणीय नस्लों कतला, रोहू, मृगल, सिल्वर कार्प, ग्रास कार्प आदि प्रमुख हैं। कतला मछलियों की वृद्धि सबसे तेज होती है। समुद्री मछलियों के अतिरिक्त झींगा (prawn), केकड़ा (crabs), लॉबस्टर (lobster), ऑयस्टर (oyester) आदि प्रमुख समुद्री खाद्य संसाधन हैं।

प्रश्न 7.
पादप प्रजनन में भाग लेने वाले विभिन्न चरणों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर
पादप प्रजनन (Plant Breeding) – पादप प्रजनन कार्यक्रम अत्यन्त सुव्यवस्थित रूप से पूरे विश्व के सरकारी संस्थानों तथा व्यापारिक संस्थानों द्वारा चलाए जाते हैं। फसल की एक नई
आनुवंशिक नस्ल के प्रजनन में निम्नलिखित मुख्य चरण होते हैं –
(क) परिवर्तनशीलता का संग्रहण (Collection of Variability) – किसी भी प्रजनन कार्यक्रम का मूलाधार आनुवंशिक परिवर्तनशीलता है। बहुत-सी फसलों में यह गुण उन्हें अपनी पूर्ववर्ती आनुवंशिक जंगली प्रजातियों से प्राप्त होता है। किसी फसल में पाए जाने वाले सभी जीन्स के विविध ऐलील (alleles) के समस्त संग्रहण (पादप बीजों के रूप में) को उसका जननद्रव्य (जर्मप्लाज्म) संग्रहण कहते हैं।

(ख) जनकों का मूल्यांकन तथा चयन (Evaluation and Selection of Parents) – पादपों को उनके लक्षणों के वांछनीय संयोजन के साथ अभिनिर्धारित किए जाने के लिए जननद्रव्य (जर्मप्लाज्म) को मूल्यांकित किया जाता है। चयन किए गए पादपों की संख्या वृद्धि कर उनका प्रयोग संकरण की प्रक्रिया में किया जाता है। इस प्रकार वांछनीय एवं शुद्ध वंशक्रम तैयार कर लिया जाता है।

(ग) चयनित जनकों के मध्य संकरण (Cross hybridization among the Selected Parents) – वांछित लक्षणों को बहुधा दो भिन्न जनकों से प्राप्त कर संयोजित किया जाता है। यह संकरण (hybridization) द्वारा सम्भव है कि जनकों के संकरण से वांछित आनुवंशिक लक्षणों का संगम एक पौधे में हो सके। जैसे—उच्च प्रोटीन गुणवत्ता वाले जनक तथा रोग प्रतिरोधक जनक के संयोजन से वांछित (उच्च प्रोटीन-गुणवत्ता एवं रोग प्रतिरोधक) आनुवंशिक लक्षणों वाला पौधा प्राप्त किया जा सकता है।

(घ) श्रेष्ठ पुनर्योगज का चयन तथा परीक्षण (Selection and Testing of Super Recombinant) – प्रजनन उद्देश्य को प्राप्त करने में चयन की यह प्रक्रिया अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसके अन्तर्गत संकरों (hybrids) की संतति से ऐसे पादपों का चयन किया जाता है जिनमें वांछित लक्षण संयोजित हों। स्वपरागण द्वारा शुद्ध लक्षणों को प्राप्त किया जाता है।

(ङ) नए कंषणों का परीक्षण, निर्मुक्त होना तथा व्यापारिकरण (Testing, Release and Commercialization of New Cultivars) – नए चयनित वंशक्रम को उनके उत्पादन तथा अन्य गुणवत्ता; रोगप्रतिरोधकता आदि गुणों के आधार पर मूल्यांकित किया जाता है। मूल्यांकित पौधों को अनुसन्धान वाले खेतों में जहाँ उपयुक्त उर्वरक; सिंचाई तथा अन्य शस्य प्रबन्धन उपलब्ध हों, वहाँ उगाया जाता है तथा उसमें उपर्युक्त गुणों का मूल्यांकन किया जाता है। इसके पश्चात् चयनित पादपों के बीजों को व्यापारिक स्तर पर उगाने के लिए निर्गत कर दिया जाता है।

प्रश्न 8.
जैव प्रबलीकरण का क्या अर्थ है? व्याख्या कीजिए। (2015, 16, 17)
उत्तर
जैव प्रबलीकरण (Biofortification) – उन्नत खाद्य गुणवत्ता रखने वाली फसलों में पादप प्रजनन को जैव प्रबलीकरण कहते हैं। जैव प्रबलीकरण द्वारा प्राप्त उच्च विटामिन, खनिज, प्रोटीन तथा स्वास्थ्यवर्द्धक वसा वाली प्रजनित फसलें जनस्वास्थ्य को सुधारने के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रायोगिक माध्यम होती हैं। उन्नत पोषक गुणवत्ता के लिए निम्नलिखित को सुधारने के उद्देश्य से प्रजनन किया जाता है –

  1. प्रोटीन की मात्रा तथा गुणवत्ता,
  2. तेल की मात्रा तथा गुणवत्ता,
  3. विटामिन की मात्रा,
  4. सूक्ष्मपोषक तथा खनिज की मात्रा।

जैव प्रबलीकरण के द्वारा ही मक्का, गेहूँ तथा धान की उच्च गुणवत्ता वाली किस्में विकसित की गई हैं। सन् 2000 में विकसित की गई मक्का में ऐमीनो एसिड, लाइसीन तथा ट्रिप्टोफैन की दुगुनी मात्रा विकसित की गई। गेहूं की किस्म (एटलस 66 कृष्य) जिसमें उच्च प्रोटीन मात्रा है, विकसित की गई हैं। धान की उच्च लौह तत्त्व वाली किस्म विकसित की गई, इसमें सामान्यत: प्रयोग में लाई गई किस्मों की तुलना में लौह तत्त्व की मात्रा पाँच गुना अधिक है। भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान नई दिल्ली ने प्रचुर मात्रा में विटामिन तथा खनिज वाली सब्जियों की फसलें विकसित की हैं।

प्रश्न 9.
विषाणु मुक्त पादप तैयार करने के लिए पादप को कौन-सा भाग सबसे अधिक उपयुक्त है। तथा क्यों?
उत्तर
विषाणु मुक्त पादप तैयार करने के लिए पादप का शीर्ष तथा कक्षीय भाग (विभज्योतक) सबसे अधिक उपयुक्त होता है, क्योंकि यह भाग विषाणु से अप्रभावित रहता है।

प्रश्न 10.
सूक्ष्मप्रवर्धन द्वारा पादपों के उत्पादन के मुख्य लाभ क्या हैं?
उत्तर
सूक्ष्मप्रवर्धन (Micropropagation) – ऊतक संवर्धन द्वारा हजारों की संख्या में पादपों को उत्पन्न करने की विधि सूक्ष्मप्रवर्धन कहलाती है। इनमें प्रत्येक पादप आनुवंशिक रूप से मूल पादप के समान होते हैं जिससे वे तैयार किए जाते हैं। ये सोमाक्लोन (somaclones) कहलाते हैं। अधिकांश महत्त्वपूर्ण खाद्य पादपों जैसे-टमाटर, केला, सेब आदि का बड़े पैमाने पर उत्पादन इस विधि द्वारा किया गया है।

इस विधि द्वारा अत्यन्त ही अल्प अवधि में हजारों पादप तैयार किए जा सकते हैं। इस विधि का अन्य महत्त्वपूर्ण उपयोग रोगग्रसित पादपों से स्वस्थ पादपों को प्राप्त करना है। यद्यपि पादप विषाणु से संक्रमित है, परन्तु विभज्योतक (शीर्ष तथा कक्षीय) विषाणु से अप्रभावित रहती है। अत: विभज्योतक (मेरिस्टेम) को अलग करके उन्हें विट्रो संवर्धन में उगाया जाता है, ताकि विषाणु मुक्त पादप तैयार हो सकें। वैज्ञानिकों को केला, गन्ना, आलू आदि संवर्धित विभज्योतक तैयार करने में काफी सफलता मिली है।

वैज्ञानिकों ने पादपों से एकल कोशिकाएँ अलग की हैं तथा उनकी कोशिकाभित्ति का पाचन हो जाने से प्लाज्मा झिल्ली द्वारा घिरा नग्न प्रोटोप्लास्ट पृथक् किया जा सका है। प्रत्येक किस्म में वांछनीय लक्षण विद्यमान होते हैं। पादपों की दो विभिन्न किस्मों से अलग किया गया प्रोटोप्लास्ट युग्मित होकर संकर प्रोटोप्लास्ट उत्पन्न करता है जो आगे चलकर नए पादप को जन्म देता है। यह संकर कायिक संकर (somatic hybrid) कहलाता है तथा यह प्रक्रम कायिक संकरण (somatic hybridization) कहलाता है।

प्रश्न 11.
पत्ती में कर्तातक पादप के प्रवर्धन में जिस माध्यम का प्रयोग किया जाता है, उसके विभिन्न घटकों का पता लगाओ।
उत्तर
इस माध्यम के निम्नलिखित घटक होते हैं –

  1. एक्सप्लाण्ट (शीर्षस्थ या कक्षस्थ कलिकाओं का भाग)
  2. संवर्धन माध्यम (सूक्रोज, अकार्बनिक लवण, विटामिन, अमीनो अम्ल )
  3. वृद्धि नियन्त्रक (ऑक्सिन, साइटोकाइनिन)

प्रश्न 12.
शस्य पादपों के किन्हीं पाँच संकर किस्मों के नाम बताएँ, जिनका विकास भारतवर्ष में हुआ है।
उत्तर

  1. शर्बती सोनोरा (गेहूं की किस्म)
  2. गंगा 5 (मक्का की किस्म)
  3. साबरमती BC-S/55 (धान की किस्म)
  4. पूसा-240 (चने की किस्म)
  5. पूसा बोतड (सरसों की किस्म)

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
सामाजिक एवं बहुरूपी कीट है (2017)
(क) घरेलू मक्खी
(ख) मधुमक्खी
(ग) मच्छर
(घ) कॉकरोच
उत्तर
(ख) मधुमक्खी

प्रश्न 2.
निम्न में से कौन-सा उत्पाद मधुमक्खी से प्राप्त किया जाता है? (2017)
(क) शहद
(ख) मोम
(ग) रेशम
(घ) शहद और मोम
उत्तर
(घ) शहद और मोम

प्रश्न 3.
कच्चा रेशम का निर्माण किसके द्वारा होता है? (2018)
(क) नर रेशम कीट
(ख) मादा रेशम कीट
(ग) नर व मादा दोनों रेशम कीट
(घ) कैटरपिलर लारवा
उत्तर
(घ) कैटरपिलर लारवी

प्रश्न 4.
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान कहाँ स्थित है?
(क) हैदराबाद
(ख) शिमला
(ग) भोपाल
(घ) नई दिल्ली
उत्तर
(घ) नई दिल्ली

प्रश्न 5.
पादप प्रजनन की मुख्य विधि है (2017)
(क) वरण
(ख) प्रसंकरण
(ग) प्रवेशन
(घ) इनमें से सभी
उत्तर
(घ) इनमें से सभी

प्रश्न 6.
पादप प्रजनन द्वारा उन्नत खाद्य गुणवत्ता वाले पौधों का निर्माण कहलाता है- (2017)
(क) बायोफोर्टीफिकेशन
(ख) बायोमेगनिफिकेशन
(ग) बायोडिग्रेडेशन
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(क) बायोफोर्टीफिकेशन

प्रश्न 7.
यदि किसी पौधे में दूसरी एक या अधिक जीन्स का प्रवेश करा दिया जाए, तो पौधा कहलाएगा (2017)
(क) ट्रान्सग्रेसिव
(ख) ट्रान्सजेनिक
(ग) त्रिगुणित
(घ) त्रिसोमिक
उत्तर
(ख) ट्रान्सजेनिक

प्रश्न 8.
बी०टी० फसलों के उत्पादन में निम्नलिखित में से कौन भाग लेता है? (2017)
(क) शैवाल
(ख) फफूदी
(ग) जीवाणु
(घ) ये सभी
उत्तर
(ग) जीवाणु

प्रश्न 9.
बी०टी० कपास में कीटनाशक के रूप में एक प्रकार का होता है- (2017)
(क) प्रोटीन
(ख) “लिपिड
(ग) कार्बोहाइड्रेट
(घ) विटामिन
उत्तर
(क) प्रोटीन

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पशुपालन के दो लाभ बताइए। (2015)
उत्तर

  1. दुधारू पशुओं को पालने से हमें उनसे दूध प्राप्त होता है।
  2. पाले गये पशुओं के गोबर का प्रयोग खाद के रूप में किया जाता है जिससे मृदा की उर्वरता बनी रहती है।

प्रश्न 2.
शहतूत के रेशमकीट का वैज्ञानिक नाम लिखिए। (2017)
उत्तर
बॉम्बिक्स मोराइ (Bombyx mori)

प्रश्न 3.
मधुमक्खी की दो प्रजातियों के जन्तु वैज्ञानिक नाम लिखिए। (2014, 16)
उत्तर
एपिस मेलीफेरो (Apis melifero) तथा एपिस इण्डिका (Apis indica)।

प्रश्न 4.
भारत में हरित क्रान्ति का जनक किसे कहते हैं? (2015)
उत्तर
भारत में हरित क्रान्ति का जनक डॉ० एम०एस० स्वामीनाथन को कहते हैं।

प्रश्न 5.
किन्हीं दो बी०टी० फसलों के नाम लिखिए। इनके निर्माण में भाग लेने वाले मुख्य जीवाणु का भी नाम लिखिए। (2017)
उत्तर

  1. BT कपास
  2. BT बैंगन।

BT फसलों के निर्माण के लिए बैसीलस थूरीनजिएंसिस नामक जीवाणु का उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 6.
दलहनी पौधों के लिए नाइट्रोजन युक्त खाद की ज्यादा आवश्यकता नहीं पड़ती हैं क्यों? (2014)
उत्तर
दलहनी पौधों की जड़ों में प्रकृति में उपस्थित मुक्त नाइट्रोजन गैस का स्थिरीकरण करने वाले जीवाणु (राइजोबियम, नाइट्रोबैक्टर आदि) पाये जाते हैं जिनके कारण उन्हें नाइट्रोजन युक्त खाद की ज्यादा आवश्यकता नहीं पड़ती हैं।

प्रश्न 7.
एकल कोशिका प्रोटीन देने वाले दो जीवों के नाम लिखिए। (2017)
उत्तर
स्पाइरुलीना एवं यीस्ट।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पशुपालन क्या है? इसमें सुधार लाने की विभिन्न विधियों का वर्णन कीजिए। (2015)
उत्तर
पशुपालन
पशुपालन, व्यावहारिक जीव विज्ञान की वह शाखा है जो पालतू पशुओं को मितव्ययितापूर्ण एवं स्वस्थ रखने की कला का ज्ञान कराती है। पशुपालन में सुधार लाने की विभिन्न विधियाँ निम्नवत् हैं

  1. आस-पास का तापमान (Near by Temperature) – पशुओं के आस-पास लगभग 20°C ताप उपयुक्त रहता है। ताप में अधिक भिन्नता होने पर चारा ग्रहण क्षमता तथा पाचन क्रिया प्रभावित होने से उत्पादन घटता है।
  2. धूप या विकिरण (Sunshine or Radiation) – मौसम के अनुसार पशुओं को धूप या विकिरण से बचाने का प्रबन्ध करना चाहिए ताकि शरीर में ताप/ऊर्जा सन्तुलन में सहायता मिले।
  3. भोजन व पानी का प्रबन्ध (Arrangement of Food and Water) – पशुओं के लिए पर्याप्त व सन्तुलित भोजन व पानी का प्रबन्ध होना चाहिए। गर्मी में अपेक्षाकृत पानी की अधिक आवश्यकता होती है।
  4. उचित व्यवहार (Good Behaviour) – पशुओं के साथ दया व मित्रतापूर्ण व्यवहार करने से उनका दुग्ध उत्पादन बढ़ता है।
  5. स्वास्थ्य परीक्षण (Health Checkup) – पशुओं का नियमित अन्तराल पर स्वास्थ्य परीक्षण कराना चाहिए तथा बीमारी के लक्षण दिखाई देते ही उसको पृथक् कर देना चाहिए और योग्य पशु चिकित्सक से उपचार कराना चाहिए।
  6. खुरों की छटाई (Hoof Triming) – खुरों को समय-समय पर काटते रहना चाहिए क्योंकि एक ही स्थान पर रहने से उनके खुर बढ़ जाते हैं, चलने में कठिनाई होती है।
  7. व्यायाम (Exercise) – पशुओं को चारागाह में भेजकर या अन्य किसी माध्यम से घुमाने वव्यायाम की व्यवस्था होनी चाहिए।
  8. सींग रोधन – पशुओं की पारस्परिक सुरक्षा तथा अपनी सुरक्षा हेतु सींग रोधन अपनाना चाहिए।
  9. बिछावन व्यवस्था – पशुशाला या पशु बाँधने के स्थान पर मौसम के अनुसार सूखा भूसा, लकड़ी का बुरादा या रेत आदि का प्रयोग बिछावन के रूप में अवश्य करें।
  10. बाह्य-परजीवियों से रक्षा (Protection from External Parasites) – पशु के रहने के स्थान पर मक्खियाँ, जू, खटमले, पिस्सू, चीचड़ी आदि पैदा न होने दें। ये सभी पशु की दैहिक क्रियाओं पर बुरा प्रभाव डालती हैं। अतः सफाई के साथ-साथ कीटनाशकों का प्रयोग करें।
  11. अपशिष्टों से बचाव – घर की सड़ी-गली खाद्य वस्तुओं अथवा अन्य अपशिष्टों को पशुओं को नहीं देना चाहिए, ऐसा करना उनके लिए प्राण घातक भी हो सकता है।

प्रश्न 2.
मधुमक्खी के बीच संचार का वर्णन कीजिए। (2013)
उत्तर
बहुत पहले से लोग जानते हैं कि जब कोई मधुमक्खी (स्काउट मक्खी – scout bee) भोजन के किसी नये स्रोत का पता लगाकर छत्ते में लौटती है तो इसके शीघ्र बाद ही छत्ते से कई भोजन-संग्रहकर्ता मक्खियाँ, स्काउट मक्खी को साथ लिये बिना ही, स्वतन्त्र रूप से नये स्रोत की ओर उड़ जाती हैं। अतः स्पष्ट है कि स्काउट मक्खियाँ भोजन के नये स्रोतों की सूचना भोजन-संग्रहकर्ता मक्खियों को देती हैं। सदियों से वैज्ञानिक मधुमक्खियों में इस सूचना-प्रसारण की विधि का पता लगाने का प्रयास करते रहे हैं। अर्नेस्ट स्पाइट्ज़नर (Ernest Spytzner, 1788) ने पहले-पहल बताया कि स्काउट मक्खियाँ कुछ विशिष्ट प्रकार की गतियों (movements) द्वारा सूचना-प्रसारण करती हैं। इन गतियों को अब “मधुमक्खी के नाच (bee dances)’ कहते हैं। सन् 1946 से 1969 तक अनवरत अनुसंधान के फलस्वरूप, प्रो० कार्ल वॉन फ्रिश (Karl Von Frisch) ने “मधुमक्खी के नाच’ की व्याख्या करने में सफलता पाई और इसके लिये नोबेल पुरस्कार जीता। उन्होंने पता लगाया कि सूचना-प्रसारण के लिये भोजन-खोजकर्ता या स्काउट मक्खियाँ दो प्रकार का “नाच’ करती हैं। (चित्र 7.1)-(1) गोल नाच तथा (2) दुम-दोलनी नाच।
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1. गोल नाच (Round Dance) – इस नाच में स्काउट मक्खी क्रमशः दाईं-बाईं ओर गोल-गोल चक्कर काटती है। ऐसे नाच द्वारा सूचना-प्रसारण तब किया जाता है जब नया भोजन-स्रोत निकट (छत्ते से 75 मीटर तक) ही होता है। इसमें स्रोत की दिशा की सूचना प्रसारित नहीं होती; स्काउट मक्खी द्वारा लाई गई फूलों की सुगन्ध से ही भोजन-संग्रहकर्ता मक्खियों का मार्गनिर्देशन हो जाता है और ये निर्दिष्ट फूलों तक पहुँच जाती हैं।

2. दुम-दोलनी नाच (Tail-wagging or “Shuffle” Dance) – स्काउट मक्खियाँ इस नाच द्वारा सूचना-प्रसारण तब करती हैं जब नया भोजन-स्रोत छत्ते से 75 मीटर से अधिक दूर होता है।
इस नाच द्वारा भोजन-स्रोत की दूरी एवं सूर्य के संदर्भ में इसकी दिशा के ज्ञान का भी प्रसारण होता है। इसमें स्काउट मक्खी पहले एक सीधी रेखा पर तेजी से चलती है। फिर इस रेखा के एक ओर अर्धवृत्ताकार पथ पर चल कर वापस इसी सीधी रेखा पर चलती है। फिर इस रेखा के दूसरी ओर अर्धवृत्ताकार पथ पर चलकर वापस सीधी रेखा पर चलती है। यही गति बार-बार दोहराई जाती है। सीधी रेखा पर चलते समय यह उदर के पिछले अर्थात् पुच्छ भाग को तेजी से दायें-बायें हिलाती रहती है और साथ ही पंखों को फड़-फड़ाकर एक मन्द गति ध्वनि उत्पन्न करती रहती है।

सीधी रेखा पर मक्खी की गति की दिशा से, सूर्य की वर्तमान स्थिति के अनुसार, भोजन-स्रोत की दिशा का ज्ञान होता है। पूर्ण नाच की दर तथा सीधी रेखा पर चलते समय दुम-दोलनी की दर एवं ध्वनि की तीव्रता से स्रोत की दूरी का ज्ञान होता है। यदि सीधी रेखा पर मक्खी छत्ते में ऊपर से नीचे की ओर चलती है तो स्रोत छत्ते से सूर्य की ओर न होकर विपरीत दिशा में होता है और यदि यह गति नीचे से ऊपर की ओर होती है तो स्रोत सूर्य की दिशा में होता है। यदि स्रोत सूर्य की दिशा से किसी कोण पर होता है तो सीधी रेखा भी तद्नुसार ऊपर से नीचे या नीचे से ऊपर की ओर न होकर उसी कोण पर होती है। नाच के समय भोजन-संग्रहकर्ता मक्खियाँ स्काउट मक्खी को छु-छूकर स्पर्श-ज्ञान द्वारा तथा स्काउट मक्खी के पंखों की फड़-फड़ाहट की ध्वनि की श्रवण-संवेदना द्वारा सूचना ग्रहण करती हैं।

प्रश्न 3.
पीडक जन्तु (पेस्ट) किसे कहते हैं? किन्हीं दो कृषि पीडक कीटों के नाम, उनसे होने वाली हानि एवं उत्पादन पर प्रभाव तथा उनके नियंत्रण के उपायों का वर्णन कीजिए। (2014)
उत्तर
पीड़क जन्तु-मनुष्य भोजन के लिए कृषि द्वारा भूमि से अनाज, फल, सब्जी आदि उगाता है, लेकिन कोई भी फसल ऐसी नहीं होती जिससे अनेक प्रकार के कीट अपना भोजन प्राप्त न करते हों। पेड़-पौधों की जड़ों, तनों, पत्तियों, कलियों, फूलों, बीजों आदि पर विभिन्न प्रकार के कीट आक्रमण करते हैं। लगभग एक-तिहाई फसल के भागीदार ये कीट बन जाते हैं। इससे हमारे देश को लगभग 500 करोड़ और अकेले उत्तर प्रदेश को 50 करोड़ की हानि प्रतिवर्ष होती है। इन हानिकारक कीटों को ही हम पीड़क जन्तु या पीड़क कीट कहते हैं।

दो कृषि पीइक कीटों के नाम – दो मुख्य कृषि पीड़क कीटों के नाम निम्नवत् हैं।
1. टिड्डी
2. ईख की गिडार
हानि एवं उत्पादन पर प्रभाव

  1. फसल को टिड्डियों से बहुत हानि होती है। एक टिड्डी दल में करोड़ों तक की संख्या में टिड्डियाँ हो सकती हैं जो कुछ ही मिनटों में सम्पूर्ण फसल का सफाया कर देती हैं, जिससे उत्पादन शून्य भी हो सकता है।
  2. ईख की गिडार गन्ने के तने को भीतर से खोखला कर देती है जिससे उत्पादन घट जाता है।

नियंत्रण के उपाय – निम्नलिखित उपायों द्वारा पीड़क कीटों को नियन्त्रित किया जा सकता है।

  1. यान्त्रिक नियन्त्रण,
  2. भौतिक नियन्त्रण
  3. जैविक नियन्त्रण (बन्ध्याकरण, कीट भक्षण, परजीविता),
  4. सांस्कृतिक नियन्त्रण,
  5. वैज्ञानिक नियन्त्रण तथा
  6. रासायनिक नियन्त्रण।

प्रश्न 4.
पादप प्रजनन का महत्त्व बताइए। (2015)
उत्तर
पादप प्रजनन का महत्त्व
पादप प्रजनन से फसलों की वांछित गुणों व उच्च गुणवत्ता वाली प्रजातियों को विकसित किया जा सकता है। पादप प्रजनन के निम्न प्रमुख लाभ हैं –
1. उत्पादन में वृद्धि (Increase in Production) – तेजी से बढ़ती जनसंख्या के कारण खाद्य संसाधनों को बढ़ाने की आवश्यकता है। पादप प्रजनन द्वारा फसली पौधों की पैदावार व गुणवत्ता को बढ़ाना सम्भव हुआ है। हरित क्रान्ति (green revolution) नामक प्रयास से भारत में गेहूं की नयी, उन्नत फसलें विकसित की गयी हैं। भारतीय वैज्ञानिकों ने गेहूँ की 591-किस्मों से NP-4, NP-52, कल्याण सोना-227, सोनोरा-64 जैसी उन्नत किस्में तैयार की हैं। गेहूँ के अतिरिक्त मक्का, धान, जौ, गन्ना की भी उन्नत किस्में विकसित की गयी हैं।

2. गुणवत्ता में सुधार (Improvement in Quality) – पादप प्रजनन से हम स्वेच्छा से पौधों के | श्रेष्ठ गुणों का विकास करके पौधों की गुणवत्ता सुधार सकते हैं। फसली पौधों की गुणवत्ता में
सुधार का अर्थ है-अधिक पैदावार, रोग प्रतिरोधकता आदि। चने की G-24 किस्म का दाना गहरे भूरे रंग का होता है तथा Pb 7, I-58 व G-17 के साथ इसके संकरण से C-158 व C-132 जैसी गुणवान किस्में विकसित की गयी हैं।

3. रोग व पीइक प्रतिरोधकता (Resistivity for Diseases and Insects) – पौधों में विषाणु, जीवाणु, कवक आदि से विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं। उदाहरण-आलू में अंगमारी (blight) रोग, गन्ने में लाल विगलन (red-rot) व काले किट्ट (black rust) का रोग आदि कवकजनित होते हैं। पादप प्रजनन द्वारा पौधों की रोग प्रतिरोधी किस्में विकसित की गयी हैं। उदाहरण-गेहूँ की C-228, C-253 व चने की GP-17, GP-24 आदि।

4. विशेष मृदा व विशेष जलवायु हेतु किस्में (Varieties for Particular Soil and Climate) – भारतवर्ष में प्रत्येक क्षेत्र की जलवायु व मृदा विभिन्न प्रकार की है। मृदा व जलवायु की विभिन्नता को ध्यान में रखते हुए पादप-प्रजनन द्वारा पौधों की ऐसी किस्में उत्पन्न की गयी हैं जो विभिन्न प्रकार की मृदा व जलवायु में विकसित हो सकती हैं। उदाहरण – पंजाब की मृदा मूंगफली की वृद्धि के लिए अनुकूलित नहीं है। अतः पादप प्रजनन द्वारा मूंगफली की ऐसी किस्में उत्पन्न की गयी हैं जो ऊसर व रेतीली मृदा में भी उग सकती हैं। पादप प्रजनन से पतन प्रतिरोधी किस्में (varieties resistant to lodging) भी तैयार की गई हैं।

प्रश्न 5.
खाद्य उत्पादन में दलहनी पौधों की भूमिका का वर्णन कीजिए। (2014)
उत्तर
दलहनी पौधों के अन्तर्गत दाल वाले पौधे; जैसे-अरहर, चना, मूंग, उड़द आदि सम्मिलित होते हैं। दालें प्रोटीन का मुख्य स्रोत होती हैं क्योंकि इनमें प्रोटीन प्रचुर मात्रा में उपस्थित होती है। यदि हम खाद्य उत्पादन में दलहनी पौधों का विस्तार करेंगे तो ये हमें दो प्रकार से लाभ पहुँचाएँगी –

  1. हमें प्रोटीन का एक अच्छा स्रोत प्राप्त होगा तथा
  2. भूमि उपजाऊ होगी क्योकि दलहनी पौधे मृदा की उपजाऊ शक्ति में वृद्धि करते हैं। इनकी जड़ों में कुछ विशिष्ट जीवाणुओं की गाँठे होती हैं जो मृदा में नाइट्रोजन के स्तर को बढ़ाती हैं।

प्रश्न 6.
जैविक आवर्धन पर टिप्पणी लिखिए। (2015)
उत्तर
अनेक प्रकार के कीटनाशक पदार्थ (pesticides), खरपतवारनाशी (weedicides) व अन्य क्लोरीनयुक्त पदार्थ ऐसे पदार्थ हैं जिनका जीवधारियों द्वारा बहुत कम विघटन होता है, अर्थात् ये अक्षयकारी (non-biodegradable) होते हैं। इनका उपयोग कृषि की उपज बढ़ाने के लिए किया जाता है। ये पदार्थ खाद्य श्रृंखला के द्वारा पौधों व जन्तुओं के शरीर में जाते हैं और वहीं पर संचित होते रहते हैं। इनकी सान्द्रता प्रत्येक ट्रॉफिक स्तर पर बढ़ती जाती है और उच्च उपभोक्ता में अधिकतम हो जाती है। इस क्रिया को जैविक आवर्धन (biological magnification or biological amplification) कहते हैं।

DDT तथा BHC आदि कीटनाशक पदार्थ वसा में घुलनशील होते हैं। अतः ये मनुष्यों व जन्तुओं के वसा ऊतक (adipose tissue) में संचित हो जाते हैं। श्वसन क्रिया में वसा के ऑक्सीकरण के समय ये पदार्थ रुधिर वाहिनियों में प्रवेश करके विषैला प्रभाव दिखाते हैं और इससे कैन्सर तक हो जाता है। इसी को देखते हुए कृषि में DDT के प्रयोग पर प्रतिबन्ध है, परन्तु इसका उपयोग मलेरिँया नियन्त्रण में किया जाता है।

प्रश्न 7.
संकर ओज पर टिप्पणी लिखिए। (2014, 15, 16, 17)
उत्तर
संकर ओज-भिन्न-भिन्न आनुवंशिक संगठन युक्त दो या दो से अधिक जातियों में मौजूद लक्षणों को एक ही जाति में विकसित करने की विधि को संकरण कहते हैं तथा इस प्रकार प्राप्त हुई जातियों को संकर ओज कहते हैं।

प्रश्न 8.
आनुवंशिकीय रूपान्तरित फसलों पर टिप्पणी लिखिए। (2014, 15)
उत्तर
कीट पीड़कों से प्रतिरोधकता विकसित करने की यह पादप प्रजनन विधि है। इस विधि से प्राप्त पौधों पर कीट पीड़कों का कोई प्रभाव नहीं होता। ये पौधे जीवाणु, कवक जीन द्वारा परिवर्तित कर दिये जाते हैं इसलिए इन्हें आनुवंशिकीय रूपान्तरित फसल कहा जाता है। उदाहरणार्थ-बी०टी० फसलें।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए –

  1. BT कपास तथा
  2. हरित क्रान्ति। (2014, 16, 17)

उत्तर
BT कपास
बैसीलस थूरीनजिएंसिस (Bacillus thuringiensis) नामक जीवाणु ऐसी प्रोटीन (जीव विष) को निर्माण करता है जिसमें अनेक प्रकार के कीटों (तम्बाकू का कीट, सैनिक कीट, मूंग कीट) को नष्ट करने की क्षमता होती है। बैसीलस जीवाणु से बनी जीव विष कीटनाशक होता है, लेकिन जीवाणु में निष्क्रिय होता है। कीट में पहुँचते ही सक्रिय हो जाता है तथा कीटों की मृत्यु हो जाती है। जीव विष को बनाने वाली जीवाणु से जीन को पृथक् करके फसलों में समाविष्ट कर देते हैं। इसी प्रकार BT-कपास नामक पौधे का निर्माण कर लिया गया है। BT-कपास पर शलभ (Ballworms) कृमि का प्रभाव नहीं होता है और उत्पादन बढ़ जाता है। जीव विष को बनाने वाली जीन को क्राई (cry) कहते हैं। ये कई प्रकार की होती हैं।

हरित क्रान्ति
भारत एक कृषि प्रधान देश है। भारत के सकल घरेलू उत्पादन की लगभग 33 प्रतिशत आय तथा समष्टि की लगभग 62 प्रतिशत जनता को रोजगार कृषि से प्राप्त होता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती हुई जनसंख्या के पोषण की थी क्योंकि यहाँ कृषि योग्य भूमि सीमित थी। इसके लिए वह वृहद् योजना बनाने की आवश्यकता थी जिससे उपलब्ध भूमि में अधिक-से-अधिक पैदावार की जा सके। 1960 ई० के मध्य से पादप प्रजनन की विधियों का उपयोग कर गेहूँ, धान, मक्का आदि की उन्नत संकर किस्में विकसित की गईं। परिणामस्वरूप खाद्य उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि हुई। इसे प्रावस्था को ‘हरित क्रान्ति’ (Green Revolution) के नाम से जाना जाता है। भारत में हरित क्रान्ति के प्रारम्भ हेतु प्रमुख योगदान डॉ० एम०एस० स्वामीनाथन (Dr. M.S. Swaminathan) व डॉ० नॉर्मन बोरलॉग (Dr. Norman Borlog) ने दिया था। अपने इस योगदान के लिए इन्हें अनेक पुरस्कारों द्वारा सम्मानित किया गया।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिए –

  1. BT बैंगन तथा
  2. ऊतक संवर्धन। (2014, 16, 17, 18)

या
पूर्ण शक्तता (टोटीपोटेन्सी) किसे कहते हैं? ऊतक संवर्धन की प्रमुख विधियों का चित्रों की सहायता से वर्णन कीजिए। (2015)
या
ऊतक संवर्धन क्या है? इसके अन्तर्गत आने वाले विभिन्न पदों के नाम लिखिए। (2015, 17)
उत्तर
BT बैंगन
बैसीलस थूरीनजिएंसिस नामक जीवाणु ऐसी प्रोटीन का निर्माण करता है जिसमें अनेक प्रकार के कीटों (तम्बाकू का कीट, सैनिक कीट, मूंग कीट) को नष्ट करने की क्षमता होती है। बेसीलस जीवाणु से बना यह जीव विष कीटनाशक होता है। जीवाणु में निष्क्रिय परन्तु कीट में पहुँचते ही सक्रिय हो जाता है जिससे कीटों की मृत्यु हो जाती है। जीव विष को बनाने वाले जीवाणु से जीव को पृथक् करके बैंगन की फसल में समाविष्ट कर देते हैं। इनसे BT बैंगन का निर्माण होता है जिस पर पीड़कों का कोई प्रभाव नहीं होता है।

ऊतक संवर्धन
इस तकनीक का विकास सर्वप्रथम सन् 1902 में गोटलीब हेबर लेन्डटू द्वारा किया गया। भोजन की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए इस तकनीक का उपयोग करते हैं। इसके अन्तर्गत प्रयोगशाला के भीतर पादप कोशिका, ऊतक, अंगों की वृद्धि पात्रों में उपस्थित कृत्रिम संवर्धन माध्यम में करके पौधों की संख्या में अपार वृद्धि करते हैं। एक कोशिका अथवा मूल कोशिका द्वारा पूरा पौधा विकसित करने की क्षमता को पूर्ण शक्तता (टोटीपोटेन्सी) कहते हैं। इस प्रक्रिया को ऊतक संवर्धन (tissue culture) कहते हैं। इस विधि से अल्प काल में हजारों की संख्या में पादपों का उत्पादन किया जाता है। इसे सूक्ष्म प्रवर्धन (micro propagation) भी कहते हैं।

सन् 1957 में स्टीवर्ड नामक वैज्ञानिक ने एकल कोशिका से पूर्ण पौधे की वृद्धि को सिद्ध किया। ऊतक संवर्धन में अनेक वृद्धि नियन्त्रक जैसे- ऑक्सिन (auxin) व साइटोकाइनिन (cytokinine) की आवश्यकता होती है। ऊतक संवर्धन की प्रमुख दो विधियाँ हैं –

  1. प्रयोगशाला में वृद्धि जैसे-कैलस (callus) व निलम्बन संवर्धन,
  2. एक्स प्लान्ट जैसे- मेरीस्टेम संवर्धन, भ्रूण संवर्धक, परागकोश संवर्धन, जीवद्रव्य संवर्धन आदि।

संवर्धन के ये प्रयोग आनुवंशिक इन्जीनियरिंग (genetic engineering) में बहुत लाभदायक हैं, क्योंकि नई किस्म के पौधे उत्पन्न करने में कोशिका संवर्धन एक प्रमुख विधि है।
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प्रश्न 11.
एकल कोशिका प्रोटीन पर टिप्पणी लिखिए।
या
एकल कोशिका प्रोटीन क्या है? किन्हीं दो एकल कोशिका प्रोटीन के वानस्पतिक नाम लिखिए। (2014)
उत्तर
एकल कोशिका प्रोटीन
सूक्ष्मजीवों को मनुष्य तथा पशुओं के पोषण में प्रोटीन के स्रोत के रूप में उपयोग में लाया जा रहा है, जैसे- यीस्ट, स्पाइरुलीना आदि।
एकल कोशिका प्रोटीन द्वारा आवश्यक सभी अमीनो अम्ल शरीर को प्राप्त होते हैं। उच्चवर्गीय पौधों के स्थान पर जीवाणु तथा यीस्ट बेहतर प्रोटीन स्रोत हैं, क्योंकि खाद्य के रूप में प्रयुक्त किए जाने वाले उच्च वर्गीय पौधों में लाइसीन अमीनो अम्ल नहीं पाया जाता है। एकल कोशिका प्रोटीन के उत्पादन के लिए कम जगह की आवश्यकता पड़ती है। इसका उत्पादन जलवायु से भी प्रभावित नहीं होता है। शैवाल, जैसे-स्पाइरुलीना, क्लोरेला तथा सिनेडेस्मस का उपयोग एकल कोशिका प्रोटीन के रूप में किया जा रहा है। स्पाइरुलीना को आलू-संसाधन संयन्त्र से निर्मुक्त अवशिष्ट जल जिसमें स्टार्च की। मात्रा उपस्थित रहती है, में आसानी से उगाया जा सकता है।

यहाँ तक कि इसे भूसा, शीरा, पशु खाद तथा मेल-जल में भी उगाया जा सकता है। स्पाईरुलीना में प्रोटीन के अतिरिक्त खनिज, वसा, कार्बोहाइड्रेट तथा विटामिन भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। प्रदूषित जल में आसानी से उगाए जाने के कारण स्पाइरुलीना का उपयोग पर्यावरणीय प्रदूषण को भी कम करने के लिए किया जाता है। शैवालों के अतिरिक्त कवक, जैसे-यीस्ट (सेकेरोमाइसीज), टॉरुलाप्सिस तथा कैंडिडा का उपयोग भी एकल कोशिका प्रोटीन के रूप में किया जा रहा है। फ्यूजेरियम एवं मशरूम के कवकतन्तु को एकल कोशिका प्रोटीन के रूप में उपयोग बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।

गणना की गई है कि 0.5 टन सोयाबीन से 40 किलोग्राम प्रोटीन प्रति 24 घंटे में प्राप्त हो सकती है। इसकी तुलना में 0.5 टन यीस्ट से उसी समय-सीमा में 50 टन प्रोटीन प्राप्त हो सकती है। इसी प्रकार प्रतिदिन 25 किलोग्राम दूध देने वाली गाय 200 ग्राम प्रोटीन पैदा करती है। इसी समय में 250 ग्राम सूक्ष्मजीव; जैसे-मिथायलोफिलस मिथायलोटोपस 25 टन तक प्रोटीन उत्पन्न कर सकते हैं।

प्रश्न 12.
केन्द्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान पर टिप्पणी लिखिए। (2015)
उत्तर
केन्द्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान उत्तर प्रदेश की राजधानी, लखनऊ में स्थित है। यहाँ जैव चिकित्सा विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों से सम्बन्धित अनेक वैज्ञानिक कार्यरत हैं। भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात् स्थापित होने वाली प्रयोगशालाओं में से यह एक है। इस संस्थान का उद्घाटन 17 फरवरी, 1951 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पं० जवाहरलाल नेहरू द्वारा किया गया था। प्रशासनिक और वैज्ञानिक प्रयोजनों के लिए संस्थान को जनशक्ति, तकनीकी और वैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराने के लिए इसे 17 अनुसंधान एवं विकास विभाग और कुछ डिवीजनों में बाँटा गया है। इनके अलावा इस संस्थान के बाहर स्थित दो डाटा सेंटर और एक फील्ड स्टेशन कार्य कर रहे हैं।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मनुष्य के लिए लाभदायक तीन कीटों के जन्तु-वैज्ञानिक नाम लिखिए तथा उनके उत्पाद का उल्लेख कीजिए। उनमें से किसी एक कीट के जीवन चक्र का वर्णन कीजिए। (2011, 12)
या
रेशम कीट पालन किसे कहते हैं ? रेशम कीट का सचित्र जीवन चक्र लिखिए। (2009, 17)
या
आर्थिक महत्त्व के किन्हीं दो कीटों के नाम लिखिए तथा उनके द्वारा उत्पादित पदार्थों का मनुष्य के लिए उपयोग बताइए। (2008,09, 15, 16, 17)
या
किन्हीं दो लाभदायक कीटों का वैज्ञानिक नाम लिखिए तथा उनके द्वारा उत्पादित पदार्थ का नाम एवं मानव द्वारा उपयोग बताइए। (2010, 11, 12, 15)
या
मनुष्य के आर्थिक महत्त्व के किन्हीं तीन कीटों के जन्तु वैज्ञानिक नाम लिखिये तथा इनके द्वारा उत्पादित पदार्थों की उपयोगिता बताइए। भारतवर्ष में पाए जाने वाले रेशम कीट की विभिन्न प्रजातियों के जन्तु वैज्ञानिक नाम लिखिए। (2014)
या
मनुष्य के लिए लाभदायक किन्हीं दो कीटों के जन्तु वैज्ञानिक नाम लिखिए तथा इनके द्वारा उत्पन्न किये जाने वाले उत्पादों का आर्थिक महत्त्व बताइए। (2013, 14, 15)
या
मानव के लिए लाभदायक दो कीटों के जन्तु वैज्ञानिक नाम लिखिए। (2014, 16)
या
आर्थिक महत्त्व के कीटों की एक सूची दीजिए। इनमें से किसी एक द्वारा उत्पादित उत्पादों का उपयोग लिखिए। (2015)
या
टिप्पणी लिखिए-

  1. रेशम,
  2. लाख (2015)

या
किन्हीं दो लाभदायक कीटों के प्राणि वैज्ञानिक नाम लिखिए तथा उनके उत्पादित पदार्थों का मानव हित में उपयोग बताइए। (2017)
या
रेशम कीट का आर्थिक महत्त्व लिखिए। (2018)
उत्तर
मनुष्य के लिए लाभदायक तीन कीट
1. रेशम कीट (Silkworm = Bombyx mort)
इसकी बॉम्बिक्स मोराइ (Bombyx mori) नामक जाति का शहतूत के वृक्षों पर पालन किया जाता है। इस कीट से उत्तम किस्म का रेशम प्राप्त किया जाता है। इसकी एन्थेरिया पैपिया (Antheraeg pupia) नामक जाति से उच्च कोटि का रेशम टसर प्राप्त किया जाता है।

2. मधुमक्खी (Honey bee = Apis indica)
यह एक सामाजिक, बहुरूपी (polymorphic) कीट है। यह मोम की एक छत्तेनुमा कालोनी बनाकर रहती है। प्रत्येक छत्ते में हजारों की संख्या में षट्भुजीय कोष्ठक होते हैं। अनेक कोष्ठकों को खाद्य भण्डार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है जिनमें यह बहुत मात्रा में शहद (honey) एकत्र रखती है। अन्य कोष्ठकों में इसके बच्चों, अण्डों आदि की देखभाल की जाती है।

एक बड़े छत्ते में एक ऋतु में लगभग 150 किलोग्राम तक शहद प्राप्त हो जाता है। मधु मनुष्य के लिए एक प्राकृतिक शक्तिवर्द्धक एवं रोगाणु रोधक, अम्लीय पदार्थ होता है। इसमें औषधि महत्त्व के लगभग 80 प्रकार के पदार्थ होते हैं।
मधुमक्खी का पूरा छत्ता मोम का बना होता है। मोम प्रायः सफेद अथवा हल्का पीला-सा होता है और अनेक सौन्दर्य प्रसाधनों को तैयार करने के लिए आधार पदार्थ होता है।

3. लाख का कीट (Lac insect = Tachardia lacca)
ये कीट प्रतिकूल वातावरणीय परिस्थितियों तथा शत्रुओं से सुरक्षित रहने के लिए ढाक, साल, पीपल, बरगद, अंजीर आदि वृक्षों पर अण्डे देते समय लाख का रक्षात्मक खोल बनाते हैं। यह 1-2 सेमी मोटी पपड़ी के रूप में होता है। हमारे देश में एक महत्त्वपूर्ण उद्योग के रूप में लाख एकत्र किया जाता है। लाख का उपयोग वार्निश, चमड़ा, मोहरी लाख, बिजली के सामान, खिलौने, बर्तन, चूड़ियाँ आदि बनाने में किया जाता है।

रेशम कीट पालन
रेशम उद्योग का एक रोमांचकारी इतिहास है। कहा जाता है कि लगभग 2600 ईसा पूर्व चीन की एक महारानी सी लिंगची (Si Ling Chi) ने अपनी वाटिका में पेड़ों पर सफेद से रंग के कोकून फलों की भाँति लटके हुए देखे। इन्हें देखकर वह आकर्षित हुई और उनमें से सूक्ष्म धागे उतरवाकर महीन व चमकदार कपड़ा बुनवाया जो बहुत अधिक लोकप्रिय हुआ। चीनियों ने रेशम के उद्योग को बढ़ाया और गुप्त रखा, किन्तु कुछ समय बाद पुजारियों द्वारा यह रहस्य किसी प्रकार से यूरोप पहुँच गया। अब यह उद्योग यूरोप तथा एशिया के अनेक देशों में प्रचलित है किन्तु अमेरिका में जहाँ पर श्रमिकों की समस्या है वहाँ यह सफल नहीं हो सका।

रेशम प्राप्ति के लिए रेशम कीट का पालन करना रेशम कीट पालन या सेरीकल्चर (sericulture) कहलाता है। यह कार्य चीन, जापान, इटली, स्पेन आदि देशों में बहुत बड़े पैमाने पर किया जाता है। भारत में असम, मैसूर आदि स्थानों पर इनका पालन औद्योगिक महत्त्व के लिए किया जाता है। समूचे विश्व में लगभग 3 हजार करोड़ किग्रा रेशम इन्हीं कीटों से प्राप्त किया जाता है। रेशम इसकी कोकून अवस्था से प्राप्त किया जाता है। 25 हजार कोकूनों से लगभग 1 पौण्ड रेशम प्राप्त होता है। रेशम का उपयोग रेशमी वस्त्र, साड़ियों आदि के निर्माण में किया जाता है।

रेशम कीट का जीवन चक्र
रेशम कीट एकलिंगी (unisexual) होने के कारण नर तथा मादा कीट अलग-अलग होते हैं। रेशम कीट शहतूत की पत्तियों पर पाला जाता है। इनका भोजन शहतूत की पत्तियाँ हैं।
1. अण्डे (Eggs) – मादा रेशमकीट एक बार में 300 से 400 अण्डे शहतूत की पत्तियों पर देती | है। अण्डे देने के बाद मादा कीट भोजन लेना बन्द कर देती है और 4-5 दिन में मर जाती है।
2. डिम्भक (Larva) – अण्डे से 8-10 दिन में चिकना व बेलनाकार लारवा निकलता है, जिसे इल्ली या कैटरपिलर (caterpillar) कहते हैं। इसका रंग सफेद होता है तथा शरीर 13 खण्डों में बँटा होता है। यह अधिक सक्रिय होने के कारण तेजी से शहतूत की पत्तियों को खाता है। शरीर के दोनों ओर 8 जोड़ी श्वासरन्ध्र (spiracles) होते हैं। शहतूत की पत्तियों को खाकर यह तेजी से बड़ा होता है और चार बार त्वक्पतन या निर्मोचन करके 30-35 दिन में 7-8 सेमी लम्बा हो जाती है। परिपक्व इल्ली पत्ती खाना बन्द कर देती है। अब इसमें एक जोड़ी लार ग्रन्थियाँ बन जाती हैं जिनसे निकला लसदार पदार्थ हवा में सूखकर रेशम (silk) के रूप में परिवर्तित हो जाता है।

प्यूपा तथा उसका कोठून (Pupa and its Cocoon) – इल्ली जब विश्रामावस्था में आ जाती है तो उसके सिर की दोनों लार ग्रन्थियों (salivary glands) से विकसित रेशम ग्रन्थियों से स्रावित एक प्रकार की चिपचिपा पदार्थ लैबियम (labium) के सूक्ष्म रन्ध्रों द्वारा निकलता जाता है। यह पदार्थ वायु के सम्पर्क में आकर पाँच अति महीन सूत्रों के रूप में सूखता जाता है। इसी समय एक गोंद के समान पदार्थ सेरिसिन (sericin) जो दो अन्य ग्रन्थियों से आता है, इन सूत्रों को आपस में चिपकाकर एक ठोस तन्तु के रूप में बदल जाता है।
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इस समय जब ठोस सूत्र का उत्पादन हो रहा होता है तो इल्ली (कैटरपिलर) प्रकाश से हटकर अँधेरे की ओर जाकर अपने सिर को इस तरह घुमाती है कि रेशम तन्तु शरीर पर लिपटता जाता है और तीन-चार दिनों बाद रेशम के महीन तन्तुओं से बना कोकून (cocoon) इल्ली को अपने अन्दर पूर्णतः बन्द कर लेता है। एक कोकून पर लगभग 1000-1500 मीटर लम्बा रेशम का तन्तु होता है। कोकून के अन्दर विश्रामावस्था में इल्ली भूरे रंग के प्यूपा (pupa) में बदल जाती है।

प्यूपा के शरीर से उदर की टाँगें लुप्त हो जाती हैं, वक्ष पर दो जोड़ा पंख बनते हैं तथा शरीर अब कीट की भाँति हो जाता है। यह शिशु कीट ही कोकून को तोड़कर बाहर निकलता है जो रेशम कीट या रेशम शलभ (moth) कहलाता है। एक रेशम कीट का जीवन चक्र लगभग 56 दिनों में पूर्ण होता है। नर व मादा शलभ कोकूनों से निकलने के शीघ्र बाद ही मैथुन करते हैं तथा 3-4 दिनों में मर जाते हैं।

रेशम उद्योग
प्यूपावरण (puparium) के अन्दर जब कीट प्रौढ़ हो जाता है तो वह अपनी क्षारीय लार से कोकून का एक सिरा गला देता है और इसे तोड़कर बाहर निकल आता है। अब यह अपना स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करता है। ऐसा होने से, चूंकि कोकून कट-फट जाता है और उसके सूत्र टूट जाते हैं तो वह रेशम के धागे प्राप्त करने अर्थात् रेशम उद्योग के लिए बेकार हो जाता है। इसलिए पूर्ण रूप से कीट के बनने तथा उसके निकलने के पूर्व ही रेशम उद्योग के लिए कोकून एकत्र कर लिये जाते हैं।

एकत्र किये गये कोकून जिनके अन्दर कीट होता है, उबलते हुए पानी में डाल दिये जाते हैं ताकि उनके अन्दर उपस्थित कीट मर जाये और कोकूनों से महीन तन्तु बिना कटे-फटे उतार लिया जाये।
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रेशम का तन्तु जो कोकून के ऊपर पाया जाता है वह अत्यधिक महीन होता है अतः रेशम बनाने के लिए 6-6 या 8-8 तन्तुओं को ऐंठकर धागे बनाये जाते हैं जिनसे रेशम का कपड़ा तैयार किया जाता है। 454 ग्राम रेशम लगभग 25000 (पच्चीस हजार) कोकूनों से प्राप्त होता है।

प्रश्न 2.
श्रम विभाजन के संदर्भ में मधुमक्खी के विभिन्न प्रारूपों का उल्लेख कीजिए तथा इनके कार्यों का वर्णन कीजिए। (2013)
उत्तर
मधुमक्खी की कॉलोनी बहुत ही सुव्यवस्थित बस्ती होती है। इसके हजारों सदस्य एक ही परिवार के होते हैं। बहुरूपी सदस्य तीन प्रकार के होते हैं –

  1. केवल एक बड़ी-सी रानी मक्खी (queen),
  2. लगभग 100 नर मक्खियाँ या ड्रोन्स (drones) तथा
  3. हजारों (60 हजार तक) छोटी श्रमिक मक्खियों (workers)।

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रानी मक्खी (The Queen) – यह कॉलोनी की सर्वश्रेष्ठ सदस्य होती है, क्योंकि कॉलोनी का मूल अस्तित्व ही इसी के संदर्भ में होता है। यह सामान्यतः लगभग पाँच वर्ष तक जीवित रहती है और अण्डे देने के अतिरिक्त कोई अन्य कार्य नहीं करती। इसीलिये इसमें बहुत बड़े अण्डाशय (ovaries) होते हैं। अण्डाशयों के कारण उदर भाग बहुत बड़ा होता है। अत: इसका शरीर एक श्रमिक मक्खी से लगभग पाँच गुना बेड़ा (15 से 20 मिमी लम्बी) और तीन गुना भारी होता है। इसके अन्य अंग-पंख, मुखांग, मस्तिष्क, डंक आदि–कम विकसित होते हैं। लार एवं मोम ग्रंथियाँ नहीं होतीं। इस प्रकार, यह न तो उड़ सकती है और न मधु या मोम बना सकती है। पोषण के लिये इसे पूर्णरूपेण श्रमिक मक्खियों पर निर्भर रहना पड़ता है। इसका डंक कम विकसित होते हुये भी क्रियाशील होता है और इसे यह सुरक्षा (defense) के काम में ला सकती है, परन्तु इसका प्रमुख उपयोग यह अण्डारोपण (oviposition) में करती है। अपने जीवनकाल में यह लगभग पन्द्रह लाख अण्डे देती है। एक दिन में सामान्यत: यह एक से तीन हजार अण्डे देती है, परन्तु अण्डारोपण केवल जननकाल (हमारे देश में शरद ऋतु एवं बसन्त) में होता है।

नर मक्खियाँ या झोन्स (Drones) – छत्ते की लगभग 100 नर मक्खियाँ रानी से काफी छोटी (7 से 15 मिमी लम्बी) परन्तु हृष्ट-पुष्ट होती हैं। इनमें उदर भाग कुछ चौड़ा, पाद लम्बे तथा मस्तिष्क, पंख और नेत्र बड़े होते हैं। इनमें भी लार एवं मोम ग्रन्थियाँ नहीं होतीं। अत: पोषण के लिये ये भी श्रमिक मक्खियों पर निर्भर करती हैं। इनमें डंक भी नहीं होता। अतः ये अपनी सुरक्षा भी नहीं कर सकतीं। इनका एकमात्र कार्य रानी का निषेचन करना होता है। अतः जननकाल में श्रमिक मक्खियाँ इनका उपयुक्त पोषण करती हैं और ये प्राय: छत्ते के बाहर उन्मुक्त उड़-उड़ कर जननकाल में उत्पन्न हुई युवा रानी मक्खियों से सम्भोग करती रहती हैं। जननकाल के बाद, ग्रीष्म ऋतु में, श्रमिक मक्खियाँ नर मक्खियों का तिरस्कार करने लगती हैं और अन्त में गरमी से इन्हें मर जाने के लिये छत्ते से बाहर खदेड़ देती हैं।

श्रमिक मक्खियाँ (Worker Bees) – ये नर मक्खियों से भी छोटी (5 से 10 मिमी लम्बी), परन्तु अपेक्षाकृत अधिक हृष्ट-पुष्ट एवं कुछ गहरे रंग की होती हैं। पंख और मुखांग बहुत मजबूत होते हैं। पूर्ण शरीर पर घने, रोम-सदृश शूक (bristles) होते हैं। दूसरे से पाँचवें उदर खण्डों के अधर तल पर एक-एक जोड़ी जेबनुमा (pocket-like) मोम ग्रन्थियाँ (wax glands) होती हैं। इन ग्रन्थियों द्वारा स्रावित मोम को श्रमिक मक्खियाँ अपने मैन्डिबल्स द्वारा खूब चबा-चबाकर इससे नये कोष्ठक बनाती हैं। इन मक्खियों के पाद फूल से पराग (pollens) एकत्रित करने के लिये उपयोजित होते हैं। सभी पादों पर कड़े शूकों के पराग ब्रुश (pollen brushes)” तथा तीसरी जोड़ी के (मेटाथोरैक्सी) पादों पर एक-एक “पराग डलियाँ (pollen baskets) होती हैं। जब ये मक्खियों फूलों का रस चूसने जाती हैं। तो इनके मुखांगों एवं शूकों से अनेक पराग कण चिपक जाते हैं। पराग ब्रुशों द्वारा शरीर के विभिन्न भागों से छुड़ा-छुड़ाकर पराग कणों को पराग डलियों में इकट्ठा किया जाता है।
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अत्यधिक सक्रिय जीवन होने के कारण श्रमिक मक्खियाँ केवल दो से चार महीनों तक ही जीवित रहती हैं। प्रत्येक मक्खी वयस्क बनने के साथ-साथ पहले ही दिन से अथक परिश्रम में जुट जाती है। अत: इनकी कोई बाल्यावस्था नहीं होती। आयु के साथ-साथ इसके कार्य बदलते रहते हैं। तदनुसार प्रत्येक छत्ते की श्रमिक मक्खियों को निम्नलिखित तीन प्रमुख कालवर्गों (age groups) में बाँटा जा सकता है।
1. अपमार्जक या सफाई मक्खियाँ (Scavenger or Sanitary Bees) – वयस्क होते ही पहले तीन दिन प्रत्येक श्रमिक मक्खी रिक्त कोष्ठकों की सफाई करती है।

2. उपचारिका या आया मक्खियाँ (Nurse or House Bees) – चौथे से लगभग पन्द्रहवें दिन तक प्रत्येक श्रमिक मक्खी छत्ते के रख-रखाव एवं शिशुओं के पालन-पोषण से सम्बन्धित विभिन्न कार्य निम्नलिखित क्रम में करती है।

  1. चौथे से छठे दिन तक यह, “उपमाता या धाय (foster mother)” की भाँति, बड़े शिशुओं को मधु एवं पराग का मिश्रण खिलाती है। कभी-कभी यह छत्ते के आस-पास के वातावरण का जायजा लेने हेतु इसके चारों ओर उड़ती है।
  2. सातवें दिन इसकी मैक्सिलरी ग्रन्थियाँ (maxillary glands) सक्रिय हो जाती हैं। इन ग्रंथियों से एक “शाही जैली (royal jelly)’ का स्रावण होने लगता है। अतः अब श्रमिक मक्खी रानी, युवा शिशुओं तथा उन बड़े शिशुओं को जिनका विकास भावी रानियों में होना होता है, शाही जैली खिलाने का काम करने लगती हैं।
  3. लगभग बारहवें दिन की श्रमिक मक्खी में मोम ग्रन्थियाँ सक्रिय हो जाती हैं। अतः अब मक्खी छत्ते की मरम्मत और नये कोष्ठकों के निर्माण का कार्य करने लगती है। मोम ग्रन्थियों से मोम की पपड़ियाँ-सी स्रावित होती हैं। इन्हें मक्खी अपने बिचले (दूसरी जोड़ी के) पादों द्वारा खुरचकर मैन्डिबल्स द्वारा चबाती है और लार में सान-सानकर उपयोग में लाती है। पुराने कोष्ठकों की दीवारों की टूट-फूट एवं दरारों को भरने हेतु ये मक्खियाँ प्रोपोलिस (propolis) नामक एक गोंद-सदृश पदार्थ भी बनाती है। यह पदार्थ भोजन-संग्रहकर्ता मक्खियों द्वारा पौधों से एकत्रित राल (resin) से बनाया जाता है। बारहवें से लगभग पंद्रहवें दिन तक तीन-चार दिन के इस जीवनकाल में श्रमिक मक्खियाँ, छत्ते की मरम्मत एवं पुनर्निर्माण के अतिरिक्त, अन्य निम्नलिखित कर्तव्य (duties) भी साथ-साथ निभाती रहती हैं।

(a) प्रहरी मक्खियाँ (Sentinel Bees) – इस कर्त्तव्य में श्रमिक मक्खियाँ छत्ते के प्रवेश द्वार पर पहरा देती हैं।
(b) सैनिक मक्खियाँ (Soldier Bees) – इस कर्तव्य में ये घुसपैठियों से छत्ते की सुरक्षा करती हैं। यदि किसी दूसरे परिवार अर्थात् दूसरे छत्ते की मधुमक्खी भी आ जाती है तो सैनिक मक्खियाँ इसे डंकों द्वारा मारकर छत्ते से बाहर फेंक देती हैं। इसके अतिरिक्त ये मक्खियाँ भोजन-संग्रहकर्ता मक्खियों द्वारा लाये गये पुष्परस (nectar) की जॉच भी करती हैं।
(c) रानी की अंगरक्षक मक्खियाँ (Retinue of Queen) – इस कर्त्तव्य में लगभग पचास मक्खियाँ हर समय रानी मक्खी को घेरे रहती हैं; इसके शरीर की सफाई और सुरक्षा करती हैं, इसके मल को छत्ते से बाहर निकालती हैं, समय-समय पर इसे शाही जैली खिलाती हैं तथा इसके द्वारा दिये गये अण्डों को पृथक् कोष्ठकों में पहुँचाती हैं।
(d) संवाती मक्खियाँ (Fanning Bees) – इस कर्त्तव्य में ये मक्खियाँ अण्डों एवं नन्हें शिशुओं को गरम रखने तथा पंखों को बार-बार फड़फड़ाकर छत्ते की दूषित वायु को बाहर निकालने का काम करती हैं।

3. भोजन-खोजकर्ता (Scout Bees) एवं भोजन-संग्रहकर्ता मक्खियाँ (Foraging or Field Bees) – लगभग पंद्रह दिन की आयु के बाद, प्रत्येक श्रमिक मक्खी अपने जीवन के सबसे कठिन काम में जुट जाती है। भोजन के नये स्रोत की खोज में, या पहले से ज्ञात स्रोतों से जल, पुष्परस एवं पराग एकत्रित करके लाने हेतु यह बार-बार छत्ते से दूर-दूर उड़कर वापस आती है। इस प्रकार यह पुष्परस के लिये छत्ते एवं स्रोत के बीच प्रतिदिन सात से पंद्रह चक्कर लगाती है। स्पष्ट है कि जल भी मधुमक्खी के लिये बहुत आवश्यक होता है। सामान्यतः एक कॉलोनी में प्रतिदिन एक-दो लीटर जल की आवश्यकता होती है। यदि जल की कमी हो जाये तो श्रमिक मक्खियों एक-दो दिन से अधिक जीवित नहीं रह सकतीं।

कुछ वैज्ञानिकों की धारणा है कि उपरोक्त श्रम विभाजन एवं विविध कर्तव्यों के अतिरिक्त, प्रत्येक छत्ते में तीन-चार सबसे पुरानी या वृद्ध श्रमिक मक्खियों को एक नियन्त्रक (controller) दल या नियन्त्रक परिषद (board of directors) होती है जो अन्य सभी मक्खियों की क्रियाओं को नियन्त्रित रखती है।

प्रश्न 3.
मधुमक्खी पालन से आप क्या समझते हैं? मधुमक्खी के जीवन चक्र का सचित्र वर्णन कीजिए। मधुमक्खी पालन द्वारा बनाये हुए पदार्थों के नाम लिखिए। (2014)
या
भारत में पाई जाने वाली किन्हीं दो प्रजाति की शहद की मक्खियों के जन्तु वैज्ञानिक नाम लिखिए। इनमें से किसी एक की पालन विधि का वर्णन कीजिए। (2014)
या
टिप्पणी लिखिए-शहद (मधु) (2015)
या
“मधुवाटिकाएँ क्या हैं? मधुमक्खी के जीवन चक्र का सचित्र वर्णन कीजिए। इनके द्वारा उत्पादित पदार्थों का आर्थिक महत्त्व बताइए। (2017)
उत्तर
मधुमक्खी पालन मधु (शहद) एवं मोम प्राप्त करने हेतु व्यावसायिक स्तर पर मधुमक्खियों को पालना, मधुमक्खी पालन कहलाता है। इसके लिए बड़े-बड़े मधुमक्खी के फॉर्म स्थापित किये जाते हैं, जिन्हें मधुवाटिकाएँ कहते हैं। इनमें मधुमक्खी पालन वैज्ञानिक विधियों से किया जाता है। भारत में पाई जाने वाली दो प्रजाति की शहद की मक्खियों के नाम इस प्रकार हैं-

  1. एपिस इण्डिका;
  2. एपिस मेलीफेरो।

मधुमक्खी का जीवन चक्र
एक नए छत्ते की सारी मधुमक्खियाँ एक ही रानी मक्खी की सन्तानें होती हैं। रानी मक्खी के अण्डे दो प्रकार के होते हैं।

  1. निषेचित द्विगुणित अण्डे (Fertilized Diploid Eggs) – इनमें गुणसूत्रों की संख्या 32 होती है। इनके भ्रूणीय परिवर्धन से सपुंसक रानी मक्खियाँ या नपुंसक श्रमिक मक्खियाँ बनती हैं। सम्भवतः रानी मक्खी के शरीर से स्रावित एक पदार्थ, ऐल्फा कीटोग्लूटेरिक अम्ल के प्रभाव से श्रमिक मक्खियाँ नपुंसक हो जाती हैं।
  2. अनिषेचित एकगुणित अण्डे (Unfertilized Haploid Eggs) – इनमें गुणसूत्रों की संख्या 16 होती है। इनके भ्रूणीय परिवर्धन से नर मक्खियाँ अर्थात् ड्रोन्स (drones) बनते हैं।

छत्ते में तीन प्रकार की मक्खियों के विकास हेतु भिन्न प्रकार के कोष्ठक होते हैं-श्रमिकों के लिए छोटे षट्भुजीय, ड्रोन्स के लिए मध्यम माप के षट्भुजीय तथा रानियों के लिए बड़े त्रिभुजाकार से। भ्रूणीय परिवर्धन का समय भी तीनों प्रकार की मक्खियों के लिए भिन्न होता है-श्रमिक के लिए 21, ड्रोन के लिए 14 तथा रानी के लिए 16 दिन। प्रत्येक अण्डे से लगभग तीन दिन बाद एक छोटा-सा, सुंडी जैसा शिशु या लार्वा निकलता है जिसे ग्रब कहते हैं। दो दिन तक प्रत्येक लार्वा को आया मक्खियाँ शाही जैली खिलाती हैं। इसके बाद, रानियों की लार्वी का पोषण तो शाही जैली से ही किया जाता है, परन्तु ड्रोन्स एवं श्रमिक मक्खियों की लार्वी को केवल मधु एवं पराग दिया जाता है।

सक्रिय पोषण के फलस्वरूप, प्रत्येक लार्वा में तीव्र वृद्धि होती है। इस वृद्धिकाल में लार्वा में पाँच बार त्वपतन (moulting or ecdysis) होता है। पाँचवें त्वक्पतन के बाद, प्रत्येक लार्वा के कोष्ठक को श्रमिक मक्खियाँ मोम की एक टोपी से बन्द कर देती हैं। अपने बन्द कोष्ठक में प्रत्येक लार्वा अपने चारों ओर रेशमी धागे का एक कोकून (cocoon) बना लेता है और कोकून के भीतर, कायान्तरण द्वारा, प्यूपा (pupa) में बदल जाता है। कायान्तरण द्वारा प्रत्येक प्यूपा शीघ्र ही एक युवा मक्खी (imago) में बदल जाता है जो अपने मैन्डीबल्स की सहायता से कोकून तथा मोम की टोपी को काटकर बाहर निकल आती है।
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मधुमक्खी पालन द्वारा बनाए गए पदार्थ
मधुमक्खी पालन द्वारा निम्नलिखित पदार्थ बनाए जाते हैं।
1. मधू (Honey) – मधुमक्खियों के छत्तों से हमें प्रतिवर्ष लाखों किलोग्राम मधु और मोम मिलता है। एक 150 ग्राम भार के छत्ते में मधु के भण्डारण हेतु लगभग 9100 मोम के कोष्ठक होते हैं। जिनमें चार किलोग्राम तक मधु भरा हो सकता है। तद्नुसार एक बड़े छत्ते से एक ऋतु में 150 किलोग्राम तक मधु मिल जाता है। एक किलोग्राम मधु बनाने के लिए एक भोजन-संग्रहकर्ता मक्खी को एक से डेढ़ लाख बार पुष्परस लाना पड़ता है। यदि फूल छत्ते से औसतन 1500 मीटर दूर हों, अर्थात् एक बार पुष्परस लाने हेतु भोजन-संग्रहकर्ता को तीन किलोमीटर उड़ना पड़े तो एक किलोग्राम मधु बनाने के लिए इसे 3,60,000 से 4,50,000 किलोमीटर, अर्थात् पृथ्वी के चारों ओर 8 से 11 बार चक्कर लगाने के बराबर उड़ना पड़ेगा।

मधु मनुष्य के लिए एक प्राकृतिक शक्तिवर्धक (tonic) एवं रोगाणुरोधक (antiseptic), अम्लीय पदार्थ होता है। इसमें औषधीय महत्त्व के लगभग 80 प्रकार के पदार्थ होते हैं। प्रमुख पदार्थ होते हैं ग्लूकोस एवं फ्रक्टोस (glucose and fructose), शर्कराएँ, डायस्टेज, इन्वर्टेज, कैटेलेज, परऑक्सीडेज, लाइपेज (diastase, invertase, catalase, peroxidase, lipase) आदि एन्जाइम, कई लाभदायक लवण, कार्बनिक अम्ल (मैलिक, सिट्रिक, टार्टरिक, ऑक्जेलिक-malic, citric, tartaric, Oxalic acid) तथा विटामिन (vitamins)। मधु को घाव पर लगा देने से घाव में रोगाणुओं का संक्रमण (infection) नहीं होता और घाव के शीघ्र ठीक होने में सहायता मिलती है। अतः फोड़ा-फुन्सी, नासूर आदि के इलाज में इसका उपयोग होता है। आँखों की सफाई के लिए इसका काजल की भाँति उपयोग करते हैं। अनेक आयुर्वेदिक दवाइयाँ मधु के साथ खाई जाती हैं। प्राचीनकाल में मृत मानव शरीर को परिरक्षित रखने हेतु इसे शहद में रखा जाता था।

2. मधुमक्खी का मोम (Beeswax) – मधुमक्खी का पूरा छत्ता मोम का बना होता है। मोम प्रायः सफेद, कभी-कभी हल्का पीला-सा होता है। विविध प्रकार के सौन्दर्य प्रसाधनों (cosmetics) को तैयार करने में आधार पदार्थ (base material) के रूप में इसका व्यापक उपयोग होता है। कई प्रकार के औषधीय मरहम एवं तेल भी इससे बनाए जाते हैं। मूर्तियाँ और मॉडल, पेन्ट (paints), जूतों की पॉलिश, संगमरमर को जोड़ने वाला सरेस (glue), काँच पर लिखने वाली पेन्सिलों आदि को बनाने में भी इसका उपयोग होता है।

3. मधुमक्खी का विष (Bee Venom or Apitoxin) – यह एक तेज अम्ल (acid) होता है जिसमें महत्त्वपूर्ण प्रतिजैविक औषधि (antibiotic drug) के गुण होते हैं। रुधिर में पहुँचने पर यह विष शरीर के सुरक्षा तन्त्र (immunity) को सुदृढ़ बनाता है। अतः अन्य विषैले जन्तुओं के दंश, रुधिरक्षीणता (anaemia), गठिया (rheumatism) आदि कई रोगों, तन्त्रिका तन्त्र की गड़बड़ियों, कई प्रकार के नेत्र एवं चर्म रोगों, उच्च रुधिरचाप आदि के उपचार में इस विष का प्रयोग किया जाता है।

मधुमक्खी के छत्ते के सीमेन्ट पदार्थ (propolis) तथा पराग का भी औषधीय उपयोग किया जाता रहा है। स्वयं मधुमक्खी के शरीर से बनाई गई एक औषधि डिफ्थीरिया (diphtheria) रोग के उपचार के लिए काम में लाई जाती है।

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UP Board Solutions for Class 11 English Vocabulary Chapter 7 Homophones

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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction (वैद्युत चुम्बकीय प्रेरण) are part of UP Board Solutions for Class 12 Physics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction (वैद्युत चुम्बकीय प्रेरण).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Physics
Chapter Chapter 6
Chapter Name Electromagnetic Induction (वैद्युत चुम्बकीय प्रेरण)
Number of Questions Solved 54
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction (वैद्युत चुम्बकीय प्रेरण)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
चित्र 6.1 (a) से (f) में वर्णित स्थितियों के लिए प्रेरित धारा की दिशा की प्रागुक्ति (predict) कीजिए।
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उत्तर-
(a) चुम्बक के S ध्रुव को कुण्डली की ओर ले जाया जा रहा है, अत: लेन्ज के नियम के अनुसार कुण्डली का इस ओर का सिरा भी S ध्रुव होना चाहिए ताकि यह चुम्बक की गति का विरोध करे (परस्पर प्रतिकर्षण द्वारा) इसलिए कुण्डली में प्रेरित धारा दक्षिणावर्त दिशा में अर्थात् qrpq दिशा में बहेगी।

(b) चुम्बक की गति के विरोध के लिए लेन्ज नियम के अनुसार बायीं ओर की कुण्डली का चुम्बक के ध्रुव S की ओर वाला सिरा S बनना चाहिए तथा दायीं ओर की कुण्डली का (UPBoardSolutions.com) चुम्बक में N ध्रुव की ओर वाला सिरा भी S ध्रुव ही बनना चाहिए ताकि ध्रुव S पर प्रतिकर्षण तथा N पर आकर्षण बल लगे। इसलिए बायीं ओर की कुण्डली में धारा दक्षिणावर्त दिशा में (अर्थात् prqp दिशा में), तथा दायीं ओर की कुण्डली में धारा yzxy दिशा में प्रेरित होनी चाहिए।

(c) दाब कुंजी तुरन्त बन्द करने पर बायीं ओर कुण्डली में धारा शून्य से बढ़ेगी, अत: दायीं ओर की कुण्डली में प्रेरित धारा बायीं ओर कुण्डली में धारा की विपरीत दिशा में (अर्थात् वामावर्त दिशा में) yzx में होनी चाहिए।

(d) चित्र से स्पष्ट है कि धारा नियन्त्रक द्वारा प्रतिरोध घटाया जा रहा है अर्थात् दायीं ओर कुण्डली में धारा बढ़ेगी जिसकी दिशा वामावर्त है। अतः लेन्ज के नियम के अनुसार (UPBoardSolutions.com) बायीं ओर कुण्डली में प्रेरित धारा मुख्य धारा के विपरीत होनी चाहिए अर्थात् zyx दिशा में।

(e) दाब कुंजी को खोलने के तुरन्त बाद प्राथमिक कुण्डली में धारा घटेगी। अतः द्वितीयक कुण्डली में धारा की दिशा प्राथमिक के मुख्य धारा की दिशा में होनी चाहिए अर्थात् xry दिशा में।

(f) कोई प्रेरित धारा नहीं चूँकि बल रेखाएँ लूप के तल में स्थित होंगी तथा फ्लक्स में परिवर्तन नहीं होगा। चूँकि बल-रेखाएँ लूप को काटेंगी भी नहीं।

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प्रश्न 2.
चित्र 6.2 में वर्णित स्थितियों के लिए लेंज के नियम का उपयोग करते हुए प्रेरित विद्युत धारा की दिशा ज्ञात कीजिए।
(a) जब अनियमित आकार का तार वृत्ताकार लूप में बदल रहा हो;
(b) जब एक वृत्ताकार लूप एक सीधे तार में विरूपित किया जा रहा हो।
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उत्तर-
(a) क्रॉस (x) द्वारा एक ऐसे चुम्बकीय-क्षेत्र को प्रदर्शित किया गया है जिसकी दिशा कागज के तल के लम्बवत् भीतर की ओर है अनियमित आकार के लूप को वृत्तीय (UPBoardSolutions.com) रूप में खींचने पर इससे गुजरने वाला फ्लक्स बढ़ेगा। अतः लूप में प्रेरित धारा इस प्रकार की होगी कि वह निम्नगामी फ्लक्स को बढ़ने से रोकेगी। प्रेरित धारी कागज के तल के लम्बवत् ऊपर की ओर चुम्बकीय-क्षेत्र उत्पन्न करेगी। अत: धारा की दिशा a d c b a मार्ग का अनुसरण करेगी।

(b) चुम्बकीय-क्षेत्र कागज के तल के लम्बवत् (UPBoardSolutions.com) बाहर की ओर है। लूप के आकार को बदलने पर उससे गुजरने वाला ऊर्ध्वमुखी फ्लक्स घटेगा। अत: लूप में प्रेरित धारा ऊर्ध्वमुखी चुम्बकीय-क्षेत्र उत्पन्न करेगी। इसके लिए धारा a’d’c’b’a’ मार्ग का अनुसरण करेगी।

प्रश्न 3.
एक लम्बी परिनालिका के इकाई सेंटीमीटर लम्बाई में 15 फेरे हैं। उसके अन्दर 2.0 cm का एक छोटा-सा लूप परिनालिका की अक्ष के लम्बवत रखा गया है। यदि परिनालिका में बहने वाली धारा का मान 0.15 में 2.0 A से 40 A कर दिया जाए तो धारा परिवर्तन के समय प्रेरित विद्युत वाहक बल कितना होगा?
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction Q3.1

प्रश्न 4.
एक आयताकार लूप जिसकी भुजाएँ 8 cm एवं 2 cm हैं, एक स्थान पर थोड़ा कटा हुआ है। यह लूप अपने तल के अभिलम्बवत 0.3 T के एकसमान चुम्बकीय-क्षेत्र से बाहर की ओर निकल रहा है। यदि लूप के बाहर निकलने का वेग 1 cm s-1 है तो कटे भाग के सिरों पर उत्पन्न विद्युत वाहक बल कितना होगा, जब लूप की गति अभिलम्बवत हो
(a) लूप की लम्बी भुजा के
(b) लूप की छोटी भुजा के। प्रत्येक स्थिति में उत्पन्न प्रेरित वोल्टता कितने समय तक टिकेगी?
हल-
(a) चुम्बकीय क्षेत्र B में क्षेत्र के लम्बवत् स्थित क्षेत्रफल A से गुजरने वाला चुम्बकीय फ्लक्स Φ = BA
माना लूप की लम्बाई l व चौड़ाई b है तथा (UPBoardSolutions.com) इसके वेग का परिमाण है। जैसे ही लूप लम्बी भुजा के लम्बवत् चुम्बकीय क्षेत्र से बाहर निकालता है क्षेत्र से बद्ध क्षेत्रफल बदलता है, जिससे में परिवर्तन होता है। फैराडे के नियम से, प्रेरित वैद्युत वाहक बल का परिमाण
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction Q4.1

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प्रश्न 5.
1.0 m लम्बी धातु की छड़ उसके एक सिरे से जाने वाले अभिलम्बवत अक्ष के परितः 400 rad-s-1 की कोणीय आवृत्ति से घूर्णन कर रही है। छड़ का दूसरा सिरा एक धात्विक वलय से सम्पर्कित है। अक्ष के अनुदिश सभी जगह 0.5 T का एकसमान चुम्बकीय-क्षेत्र उपस्थित है। वलय तथा अक्ष के बीच स्थापित विद्युत वाहक बल की गणना कीजिए।
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प्रश्न 6.
एक वृत्ताकार कुंडली जिसकी त्रिज्या 8.0 cm तथा फेरों की संख्या 20 है अपने ऊर्ध्वाधर व्यास के परितः 50 rad-s- की कोणीय आवृत्ति से 3.0 x 10-2 T के एकसमान चुम्बकीय-क्षेत्र में घूम रही है। कुंडली में उत्पन्न अधिकतम तथा औसत प्रेरित विद्युत वाहक बल का मान ज्ञात कीजिए। यदि कुंडली 10 Ω प्रतिरोध का एक बन्द लूप बनाए तो कुंडली में धारा के अधिकतम मान की गणना कीजिए। जूल ऊष्मन के कारण क्षयित औसत शक्ति की गणना कीजिए। यह शक्ति कहाँ से प्राप्त होती है?
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction Q6
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction
कुण्डली में प्रेरित धारा एक बल-आघूर्ण उत्पन्न करती है, जो कुण्डली के घूमने का विरोध करता है। इसलिए कुण्डली को एकसमान कोणीय वेग से (UPBoardSolutions.com) घुमाए रखने के लिए एक बाह्य कारक (रोटर) बल-आघूर्ण प्रदान करता है। इसीलिए व्यय ऊष्मा का स्रोत रोटर (rotor) ही है।

प्रश्न 7.
पूर्व से पश्चिम दिशा में विस्तृत एक 10 m लम्बा क्षैतिज सीधा तार 0.30 x 10-4 Wbm-2 तीव्रता वाले पृथ्वी के चुम्बकीय-क्षेत्र के क्षैतिज घटक के लम्बवत 5.0 m s-1 की चाल से गिर रहा है।
(a) तार में प्रेरित विद्युत वाहक बल का तात्क्षणिक मान क्या होगा?
(b) विद्युत वाहक बल की दिशा क्या है?
(c) तार का कौन-सा सिरा उच्च विद्युत विभव पर है?
हल-
(a) तार की लम्बाई l = 10 मीटर, B = H = 0.30 x 10-4 वेबर/मी2, तार का वेग v = 50 मी/सेकण्ड
अतः तार के सिरों के बीच प्रेरित विभवान्तर e = Bvl sin 90° = Bvl = 0.30 x 10-4 x 5.0 x 10 = 0.0015 वोल्ट = 1.5 मिलीवोल्ट

(b) फ्लेमिंग के दायें हाथ के नियम के अनुसार, तार में प्रेरित धारा की दिशा पूर्व से पश्चिम की ओर होगी। अतः प्रेरित वैद्युत वाहक बल की दिशा पश्चिम से पूर्व की ओर होगी।

(c) चूँकि तार में प्रेरित धारा की दिशा पूर्व से पश्चिम की ओर है, अत: तार में इलेक्ट्रॉन इसके विपरीत पश्चिम से पूर्व की ओर गति करेंगे। चूँकि इलेक्ट्रॉन निम्न विभव (UPBoardSolutions.com) से उच्च विभव की ओर गति करते हैं, अत: तार का पूर्वी सिरा उच्च विभव पर होगा। [विशेष-यदि तार उत्तर-दक्षिण दिशा में रहते हुए गिरता, तब इसकी लम्बाई पृथ्वी के क्षेत्र के क्षैतिज घटक के समान्तर होती। अतः कोई वैद्युत वाहक बल प्रेरित नहीं होता।

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प्रश्न 8.
किसी परिपथ में 0.1 s में धारा 5.0 A से 0.0 A तक गिरती है। यदि औसत प्रेरित विद्युत वाहक बल 200 V है तो परिपथ में स्वप्रेरकत्व का आकलन कीजिए।
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction Q8.1

प्रश्न 9.
पास-पास रखे कुंडलियों के एक युग्म का अन्योन्य प्रेरकत्व 1.5 H है। यदि एक कुंडली । में 0.5 s में धारा 0 से 20 A परिवर्तित हो तो दूसरी कुंडली की फ्लक्स बंधता में कितना परिवर्तन होगा?
हल-
यहाँ M = 1.5 हेनरी, ∆t = 0.5 सेकण्ड,
∆I = I2 – I1 = (20 – 0) = 20 A
Φ1 = MI
∆Φ2 = M∆I1
अतः द्वितीयक कुण्डली की फ्लक्स बद्धता में परिवर्तन
∆Φ2 = 1.5 हेनरी x 20 ऐम्पियर = 30 वेबर
यहाँ धारा बढ़ रही है, अत: फ्लक्स बद्धता में परिवर्तन धारा वृद्धि का विरोध करेगा।

प्रश्न 10.
एक जेट प्लेन पश्चिम की ओर 1800 km/h वेग से गतिमान है। प्लेन के पंख 25 m लम्बे हैं। इनके सिरों पर कितना विभवान्तर उत्पन्न होगा? पृथ्वी के चुम्बकीय-क्षेत्र का मान उस स्थान पर 5 x 10-4 Tतथा नति कोण (dip angle) 30° है।
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अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 11.
मान लीजिए कि प्रश्न 4 में उल्लिखित लूप स्थिर है किन्तु चुम्बकीय-क्षेत्र उत्पन्न करने वाले विद्युत चुम्बक में धारा का मान कम किया जाता है जिससे चुम्बकीय-क्षेत्र का मान अपने प्रारम्भिक मान 0.3 T से 0.02 Ts-1 की दर से घटता है। अब यदि लूप का कटा भाग जोड़ दें जिससे प्राप्त बन्द लूप का प्रतिरोध 1.6 Ω हो तो इस लूप में ऊष्मन के रूप में शक्ति ह्रास क्या है? इस शक्ति का स्रोत क्या है?
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प्रश्न 12.
12 cm भुजा वाला वर्गाकार लूप जिसकी भुजाएँ X एवं Y अक्षों के समान्तर हैं, x-दिशा में 8 cm s-1 की गति से चलाया जाता है। लूप तथा उसकी गति का परिवेश धनात्मक दिशा के चुम्बकीय-क्षेत्र का है। चुम्बकीय-क्षेत्र न तो एकसमान है और न ही समय के साथ नियत है। इस क्षेत्र की (UPBoardSolutions.com) ऋणात्मक दिशा में प्रवणता 10-3 Tcm-1 है। (अर्थात् ऋणात्मक x-अक्ष की दिशा में इकाई सेंटीमीटर दूरी पर क्षेत्र के मान में 10-3 Tcm-1 की वृद्धि होती है) तथा क्षेत्र के मान में 10-3 Ts-1 की दर से कमी भी हो रही है। यदि कुंडली का प्रतिरोध 4.50 mΩ हो तो प्रेरित धारा का परिमाण एवं दिशा ज्ञात कीजिए।
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प्रश्न 13.
एक शक्तिशाली लाउडस्पीकर के चुम्बक के ध्रुवों के बीच चुम्बकीय-क्षेत्र की तीव्रता के परिमाण का मापन किया जाना है। इस हेतु एक छोटी चपटी 2 cm क्षेत्रफल की अन्वेषी कुंडली (search coil) का प्रयोग किया गया है। इस कुंडली में पास-पास लिपटे 25 फेरे हैं तथा इसे चुम्बकीय-क्षेत्र के लम्बवत व्यवस्थित किया गया है और तब इसे द्रुत गति से क्षेत्र के बाहर निकाला जाता है। तुल्यतः एक अन्य विधि में अन्वेषी कुंडली को 90° से तेजी से घुमा देते हैं जिससे कुंडली का तल चुम्बकीय-क्षेत्र के समान्तर हो जाए। इन दोनों घटनाओं में कुल 7.5 mC आवेश का प्रवाह होता है (जिसे परिपथ में प्रक्षेप धारामापी (ballistic galvanometer) लगाकर ज्ञात किया जा सकता है)। कुंडली तथा धारामापी का संयुक्त प्रतिरोध 0.50 Ω है। चुम्बक की क्षेत्र की तीव्रता का आकंलन कीजिए।
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction Q13

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प्रश्न 14.
चित्र 6.6 में एक धातु की छड़ PQ को दर्शाया गया है जो पटरियों AB पर रखी है तथा एक स्थायी चुम्बक के ध्रुवों के मध्य स्थित है। पटरियाँ, छड़ एवं चुम्बकीय-क्षेत्र परस्पर अभिलम्बवत दिशाओं में हैं। एक गैल्वेनोमीटर (धारामापी) G को पटरियों से एक स्विच K की सहायता से संयोजित किया गया है। छड़ की लम्बाई = 15 cm, B = 0.50 T तथा पटरियों, छड़ तथा धारामापी से बने बन्द लूप का प्रतिरोध = 9.0 m2 है। क्षेत्र को एकसमान मान लें।
(a) माना कुंजी Kखुली (open) है तथा छड़ 12 cm s-1 की चाल से दर्शायी गई दिशा में गतिमान है। प्रेरित विद्युत वाहक बल का मान एवं ध्रुवणता (polarity) बताइए।
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(b) क्या कुंजी Kखुली होने पर छड़ के सिरों पर आवेश का आधिक्य हो जाएगा? क्या होगा यदि कुंजी K बंद (close) कर दी जाए?
(c) जब कुंजी K खुली हो तथा छड़ एकसमान वेग से गति में हो तब भी इलेक्ट्रॉनों पर कोई परिणामी बल कार्य नहीं करता यद्यपि उन पर छड़ की गति के कारण चुम्बकीय बल कार्य करता है। कारण स्पष्ट कीजिए।
(d) कुंजी बन्द होने की स्थिति में छड़ पर (UPBoardSolutions.com) लगने वाले अवमन्दन बल का मान क्या होगा?
(e) कुंजी बन्द होने की स्थिति में छड़ को उसी चाल (= 12 cms-1) से चलाने हेतु कितनी शक्ति (बाह्य कारक के लिए) की आवश्यकता होगी?
(f) बन्द परिपथ में कितनी शक्ति का ऊष्मा के रूप में क्षय होगा? इस शक्ति का स्रोत क्या है?
(g) गतिमान छड़ में उत्पन्न विद्युत वाहक बल का मान क्या होगा यदि चुम्बकीय-क्षेत्र की दिशा पटरियों के लम्बवत होने की बजाय उनके समान्तर हो?
हल-
दिया है, B = 0.50 T, l = 0.15 m, v = 0.12 m s-1, R = 9.0 x 10-3
(a) छड़ में प्रेरित विद्युत वाहक बल
e = Bvl = 0.50 x 0.12 x 0.15 = 9 x 10-3 V = 9.0 mV
छड़ का सिरा P धनात्मक तथा २ ऋणात्मक होगा।

(b) हाँ, छड़ के Q सिरे पर इलेक्ट्रॉन एकत्र हो जाएँगे जबकि P सिरे पर धनावेश की अधिकता हो जाएगी। यदि कुंजी K को बन्द कर दिया जाए तो सिरे पर एकत्र होने वाले इलेक्ट्रॉन बन्द परिपथ से होते हुए (G से होकर) सिरे P की ओर गति करने लगेंगे। इस प्रकार परिपथ में स्थायी धारा स्थापित हो जाएगी।

(c) जब कुंजी K खुली है तो P सिरा धनात्मक व Q सिरा ऋणात्मक हो जाता है। इससे छड़ के भीतर सिरे P से सिरे २ की ओर एक विद्युत क्षेत्र स्थित हो जाता है। (UPBoardSolutions.com) इस क्षेत्र के कारण इलेक्ट्रॉनों पर Q से P की ओर विद्युत बल लगता है जो विपरीत दिष्ट चुम्बकीय बल को सन्तुलित कर लेता है। इस प्रकार इलेक्ट्रॉनों पर कोई नैट बल कार्य नहीं करता है।

(d) कुंजी K बन्द होने की स्थिति छड़ PQ से प्रवाहित धारा
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(e) कुंजी K के बन्द होने पर छड़ को खींचते रहने के लिए व्यय की जाने वाली शक्ति
P = Fv = 0.075 x 0.12 = 9 x 10-3 W

(f) परिपथ में व्यय ऊष्मीय शक्ति
P = R= (1.0) x 9.0 x 10-3 = 9 x 10-3 W
इस शक्ति का स्रोत छड़ को एकसमान वेग से खींचते रहने के लिए बाह्य स्रोत द्वारा व्यय की गई शक्ति है।

(g) शून्य; इस स्थिति में छड़ चुम्बकीय बल रेखाओं को नहीं काटेगी।
अतः कोई विद्युत वाहक बल प्रेरित नहीं होगा।

प्रश्न 15.
वायु के क्रोड वाली एक परिनालिका में, जिसकी लम्बाई 30 cm तथा अनुप्रस्थ काट का कषेत्रफल 25 cm तथा कुल फेरे 500 हैं, 2.5 A धारा प्रवाहित हो रही है। धारा को 10-38 के अल्पकाल में अचानक बन्द कर दिया जाता है। परिपथ में स्विच के खुले सिरों के बीच उत्पन्न औसत विद्युत वाहक बल का मान क्या होगा? परिनालिका के सिरों पर चुम्बकीय क्षेत्र के परिवर्तन की उपेक्षा कर सकते हैं ?
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प्रश्न 16.
(a) चित्र 6.7 में दर्शाए अनुसार एक लम्बे, सीधे तार तथा एक वर्गाकार लूप जिसकी एक भुजा की लम्बाई a है, के लिए अन्योन्य प्रेरकत्व का व्यंजक प्राप्त कीजिए।
(b) अब मान लीजिए कि सीधे तार में 50 A की धारा प्रवाहित हो रही है तथा लूप एक स्थिर वेग v = 10 m/s से दाईं ओर को गति कर रहा है। लूप में प्रेरित विद्युत वाहक बल का परिकलन चित्र 6.7 उंस क्षण पर कीजिए जब x = 0.2 m हो। लूप के लिए a = 0.1 m लीजिए तथा यह मान लीजिए कि उसका प्रतिरोध बहुत अधिक है।
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction Q16
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction
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प्रश्न 17.
किसी M द्रव्यमान तथा R त्रिज्या वाले एक पहिए के किनारे (rim) पर एक रैखिक आवेश स्थापित किया गया है जिसकी प्रति इकाई लम्बाई पर आवेश का मान 2 है। पहिए के स्पोक (spoke) हल्के एवं कुचालक हैं तथा वह अपनी अक्ष के परितः घर्षण रहित घूर्णन हेतु स्वतन्त्र हैं जैसा कि चित्र 6.9 में दर्शाया गया है। पहिए के वृत्तीय भाग पर रिम, के अन्दर एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र विस्तरित है। इसे इस प्रकार परिभाषित किया गया है-
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction Q17.1
चुम्बकीय-क्षेत्र को अचानक ‘ऑफ (Switched off) करने के पश्चात्, पहिए का कोणीय वेग ज्ञात कीजिए।
हल-
माना चुम्बकीय-क्षेत्र को स्विच ऑफ करने पर E विद्युत-क्षेत्र उत्पन्न होता है तथा पहिया ω कोणीय वेग से घूमना प्रारम्भ करता है।
यदि पहिए पर कुल आवेश q है तो एक पूर्ण चक्र के दौरान विद्युत-क्षेत्र द्वारा आवेश को घुमाने में कृत कार्य
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UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction Q17.3

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रेरित वैद्युत धारा की दिशा का पता चलता है- (2012, 15)
(i) लेन्ज के नियम द्वारा
(ii) फ्लेमिंग के बायें हाथ के नियम द्वारा
(iii) बायो-सेवर्ट के नियम द्वारा
(iv) ऐम्पियर के नियम द्वारा
उत्तर-
(i) लेन्ज के नियम द्वारा

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प्रश्न 2.
लेन्ज का नियम किसके संरक्षण नियम के अनुरूप उत्पन्न होता है? (2017, 18)
(i) आवेश
(ii) संवेग
(iii) ऊर्जा
(iv) द्रव्यमान
उत्तर-
(iii) ऊर्जा

प्रश्न 3.
लेन्ज के वैद्युत चुम्बकीय फ्लक्स प्रेरण के नियमानुसार इनमें से क्या सत्य है? (2010, 12, 13)
(i) आवेश का संरक्षण
(ii) चुम्बकीय फ्लक्स का संरक्षण
(iii) ऊर्जा का संरक्षण
(iv) संवेग का संरक्षण
उत्तर-
(iii) ऊर्जा का संरक्षण

प्रश्न 4.
हेनरी/मीटर मात्रक है-
(i) वैद्युतशीलता का
(ii) चुम्बकशीलता का
(iii) परावैद्युतक का
(iv) स्वप्रेरकत्व का
उत्तर-
(ii) चुम्बकशीलता का

प्रश्न 5.
[latex]\frac { L }{ R }[/latex] की विमा होगी, जहाँ प्रेरकत्व है तथा प्रतिरोध है- (2013,17)
(i) [M0L0T-1]
(ii) [M0LT]
(iii) [M0L0T]
(iv) [MLT-2]
उत्तर-
(iii) [M0L0T]

प्रश्न 6.
10 ओम प्रतिरोध तथा 10 हेनरी प्रेरकत्व की एक कुण्डली 50 वोल्ट की बैटरी से जोड़ी गयी है। कुण्डली में संचित ऊर्जा है- (2014)
(i) 125 जूल
(ii) 62.5 जूल
(iii)250 जूल
(iv) 500 जूल
उत्तर-
(iv) 500 जूल

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प्रश्न 7.
एक कुण्डली के लिए स्वप्रेरकत्व 2 mH है। उसमें वैद्युत धारा प्रवाह की दर 103 ऐम्पियर/सेकण्ड है। इसमें प्रेरित विद्युत वाहक बल है। (2014)
(i) 1 वोल्ट
(ii) 2 वोल्ट
(iii) 3 वोल्ट
(iv) 4 वोल्ट
उत्तर-
(ii) 2 वोल्ट

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वैद्युत चुम्बकीय प्रेरण का लेन्ज का नियम क्या है? (2014, 16, 17)
उत्तर-
किसी परिपथ में प्रेरित विद्युत वाहक बल, अथवा प्रेरित धारा की दिशा सदैव ऐसी होती है कि यह उस कारण का विरोध करती है जिससे वह स्वयं उत्पन्न होती है।

प्रश्न 2.
भंवर धाराओं से आप क्या समझते हैं? (2010, 12, 17, 18)
या
भंवर धाराएँ क्या होती हैं? (2013, 18)
उत्तर-
आँवर धाराएँ (Eddy Currents)- सन् 1875 में फोको (Focault) ने देखा कि जब किसी धातु का टुकड़ा किसी परिवर्ती” (variable) चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है, अथवा किसी चुम्बकीय क्षेत्र में इस प्रकार गति करता है कि उससे बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में लगातार परिवर्तन हो, तो धातु के (UPBoardSolutions.com) सम्पूर्ण आयतन में प्रेरित धाराएँ उत्पन्न हो जाती हैं। ये धाराएँ धातु के टुकड़े की गति का (अथवा फ्लक्स परिवर्तन का) विरोध करती हैं। इन धाराओं को ‘भंवर धाराएँ’ कहते हैं। फोको के नाम पर इन्हें ‘फोको धाराएँ’ भी कहा जाता है। कभी-कभी ये धाराएँ इतनी प्रबल हो जाती हैं कि धातु का टुकड़ा गर्म होकर लाल-तप्त हो जाता है।

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प्रश्न 3.
भंवर धाराओं से क्या हानियाँ हैं? किसी ट्रांसफॉर्मर की क्रोड में इनको उत्पन्न होने से किस प्रकार रोका जा सकता है? (2017)
उत्तर-
ट्रांसफॉर्मर, डायनमो तथा मोटर की आमेचर कुण्डलियों की क्रोड नर्म लोहे की बनी होती हैं। जब इन यन्त्रों में प्रत्यावर्ती धारा प्रवाहित होती है तो क्रोड से बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है, जिससे क्रोड में भंवर धाराएँ उत्पन्न हो जाती हैं और वे गर्म हो जाते हैं। इस प्रकार वैद्युत ऊर्जा का ऊष्मीय (UPBoardSolutions.com) ऊर्जा में हास होने लगता है। इस हास ( भंवर धाराओं) को कम करने के लिए क्रोड को नर्म लोहे के एक अकेले टुकड़े के रूप में न लेकर, नर्म लोहे की कई पतली-पतली पत्तियों को वार्निश द्वारा जोड़कर आवश्यक मोटाई बना लेते हैं। इस प्रकार की क्रोड, पटलित क्रोड (laminated core) कहलाती है। ऐसा करने से क्रोड का प्रतिरोध बढ़ जाता है तथा मँवर धाराएँ क्षीण हो जाती हैं, फलस्वरूप ऊर्जा ह्रास कम हो जाता है।

प्रश्न 4.
चित्र 6.10 में एक दण्ड-चुम्बक मुक्त रूप से एक कुण्डली के बीच से होकर गिरता है। कारण सहित बताइए कि घुम्बक की त्वरण (a), गुरुत्वीय त्वरण(g) से कम अथवा समान अथवा अधिक होगा। (2015)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction
उत्तर-
जब एक दण्ड चुम्बक मुक्त रूप से एक कुण्डली के बीच से होकर गिरता है तो कुण्डली में वैद्युत धारा प्रेरित हो जाती है, जो सदैव उस कारण का विरोध करती है, जिससे वह उत्पन्न होती है। अत: चुम्बक का त्वरण (a), गुरुत्वीय त्वरण (g) से कम होगा।

प्रश्न 5.
0.2 वेबर /मी के चुम्बकीय क्षेत्र में 10.0 सेमी पृष्ठ क्षेत्रफल की एक आयताकार कुण्डली 20.0 रेडियन/से के नियत कोणीय वेग से घूम रही है। उत्पन्न अधिकतम प्रेरित विद्युत वाहक बल ज्ञात कीजिए (2013)
हल-
आयताकार कुण्डली से बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स
Φ = BA = (0.2) x (10 x 10-4) वेबर = 2 x 10-4 वेबर
आयताकार कुण्डली 20.0 रेडियन/से के नियत कोणीय वेग से घूम रही है अर्थात् प्रत्येक चक्कर में फ्लक्स परिवर्तन कें होगा। चूंकि कुण्डली 1 सेकण्ड में 20 चक्कर पूरे कर रही है, अत: फ्लक्स परिवर्तन की दर 20Φ होगी जो कि अभीष्ट प्रेरित विवा० बल होगा।
अतः e = 20Φ = 20 x 2 x 10-4 वोल्ट = 4.0 x 10-3 वोल्ट = 4 मिलीवोल्ट

प्रश्न 6.
एक कुण्डली से बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स 0.1 सेकण्ड में 1 वेबर से 0.1 वेबर हो जाता है। कुण्डली में प्रेरित विद्युत वाहक बल ज्ञात कीजिए। (2015)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction VSAQ 6

प्रश्न 7.
1000 फेरों वाली एक कुण्डली में 2.5 ऐम्पियर की दिष्ट धारा प्रवाहित करने पर कुण्डली से बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स 1.4 x 10-4 वेबर है। कुण्डली का प्रेरकत्व क्या है? (2013)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction

प्रश्न 8.
एक कुण्डली से बढ़ चुम्बकीय फ्लक्स 0.1 सेकण्ड में 10 वेबर से 1 वेबर कर दिया जाता है। कुण्डली में प्रेरित विद्युत वाहक बल का मान बताइए। (2015)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction VSAQ 8

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प्रश्न 9.
अन्योन्य प्रेरण गुणांक की विमा लिखिए। (2011)
उत्तर-
[ML2T-2A-2].

प्रश्न 10.
स्वप्रेरण से आप क्या समझते हैं? (2016)
या
स्वप्रेरण का अर्थ समझाइए तथा स्वप्रेरण गुणांक का विमीय सूत्र लिखिए। (2017)
उत्तर-
स्वप्रेरण- किसी कुण्डली से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स के मान में परिवर्तन होने पर उसी कुण्डली में प्रेरित वैद्युत वाहक बल तथा प्रेरित धारा क्त्पन्न होने की घटना को स्वप्रेरण कहते हैं। स्वप्रेरण गुणांक का विमीय सूत्र = [ML2T-2A-2]

प्रश्न 11.
स्वप्रेरण-गुणांक का विमा सूत्र लिखिए।
उत्तर-
[ML2T-2A-2]

प्रश्न 12.
8.0 मिली-हेनरी स्वप्रेरकत्व वाली कुण्डली में 2.0 ऐम्पियर धारा है। कुण्डली के भीतर चुम्बकीय क्षेत्र में कितनी ऊर्जा संचित है? (2010)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction VSAQ 12

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प्रश्न 13.
एक कुण्डली का स्वप्रेरकत्व 3.0 x 10-3 हेनरी है। यदि 0.1 सेकण्ड में कुण्डली की धारा का मान 5 ऐम्पियर से घट कर शून्य हो जाये तो कुण्डली में उत्पन्न स्वप्रेरित विद्युत वाहक बल की गणना कीजिए। (2011, 12)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction

प्रश्न 14.
एक कुण्डली का स्वप्रेरण गुणांक 10 मिली हेनरी है। इसमें वैद्युत धारा 5 मिलीसेकण्ड में 5 ऐम्पियर से 15 ऐम्पियर हो जाती है। कुण्डली में प्रेरित विद्युत वाहक बल ज्ञात कीजिए। (2016, 18)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction

प्रश्न 15.
यदि प्राथमिक कुण्डली में बहने वाली 3.0 ऐम्पियर की धारा को 0.001 सेकण्ड में शून्य कर दिया जाए तो द्वितीयक कुण्डली में उत्पन्न प्रेरित वाहक बल 15000 वोल्ट होता है। इन कुण्डलियों का अन्योन्य प्रेरण गुणांक ज्ञात कीजिए। (2017)
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction VSAQ 15

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फ्लेमिंग का दायें हाथ का नियम लिखिए। (2011)
उत्तर-
फ्लेमिंग के दायें हाथ का नियम (Fleming’s Right Hand Rule)- जब कोई ऋजुरेखीय चालक तार किसी चुम्बकीय क्षेत्र में उसके लम्बवत् गति करता है तो इसमें उत्पन्न प्रेरित धारा की दिशा फ्लेमिंग के दायें हाथ के नियम की सहायता से ज्ञात की जाती है। इस नियम के अनुसार, (UPBoardSolutions.com) यदि हम दायें हाथ का अँगूठा तथा इसके पास वाली दोनों अँगुलियों को एक साथ इस प्रकार फैलाएँ कि वे परस्पर लम्बवत् हों (चित्र 6.11), तब यदि पहली अँगुली चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में तथा अँगूठा चालक की गति की दिशा में संकेत करें तो बीच वाली अँगुली चालक में प्रेरित वैद्युत धारा की दिशा की ओर संकेत करेगी।”
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प्रश्न 2.
फैराडे के वैद्युत-चुम्बकीय प्रेरण सम्बन्धी नियम बताइए। (2009, 11, 15, 17, 18)
उत्तर-
फैराडे के वैद्युत-चुम्बकीय प्रेरण के नियम-फैराडे ने वैद्युत-चुम्बकीय प्रेरण के निम्नलिखित दो नियम दिये हैं
(i) प्रथम नियम- “जब किसी परिपथ से बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है तो उसमें एक विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है।” यदि परिपथ ‘बन्द’ है तो उसमें प्रेरित धारा बहने लगती है। यह धारा केवल तभी तक बहती है जब
तक कि चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता रहता है।

(ii) द्वितीय नियम- “प्रेरित विद्युत वाहक बल चुम्बकीय फ्लक्स के परिवर्तन की ऋणात्मक दर के बराबर होता है।” यदि किसी समय परिपथ से गुजरने वाले चुम्बकीय फ्लक्स का मान के Φ1 है और Δt समयान्तर के बाद यह फ्लक्स हो जाता है, तो
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ऋणात्मक चिह्न यह प्रदर्शित करता है कि वि० वा० बल सदैव चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन का विरोध करता है। यह लेन्ज का नियम कहलाता है। यदि चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन की दर वेबर प्रति सेकण्ड में लें तो प्रेरित विद्युत वाहक बल वोल्ट में होता है। यदि कुण्डली में N फेरे हों तो पूरी कुण्डली में प्रेरित वि० वा० बल
UP Board Solutions for Class 12 Physics Chapter 6 Electromagnetic Induction SAQ 2.1
जहाँ, NΦ कुण्डली में चुम्बकीय फ्लक्स-ग्रन्थिताओं (flux linkages) की संख्या है।

प्रश्न 3.
भंवर धाराओं के अनुप्रयोग लिखिए। (2017, 18)
उत्तर-
आँवर धाराओं के अनुप्रयोग निम्नवत् हैं-
(i) दोलन-रुद्ध धारामापी- चल-कुण्डली धारामापियों को दोलन-रुद्ध (dead beat) बनाने के लिए भंवर धाराओं का उपयोग किया जाता है। इसके लिये धारामापी की कुण्डली ताँबे के विद्युतरोधी तार को ऐलुमिनियम के फ्रेम पर लपेटकर बनायी जाती है। जब कुण्डली विक्षेपित होती है, (UPBoardSolutions.com) तो उससे बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है जिससे फ्रेम में भंवर धाराएँ उत्पन्न हो जाती हैं जो कुण्डली की गति का विरोध करती हैं। अत: कुण्डली शीघ्र ही शून्य पर लौट आती है।

(ii) प्रेरण भट्टी- प्रेरण भट्टी में पिघलाये जाने वाली धातु को एक तेजी से परिवर्तित होने वाले चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है जिसे उच्च-आवृत्ति प्रत्यावर्ती धारा से प्राप्त किया जाता है इससे धातु में प्रबल भंवर धाराएँ उत्पन्न हो जाती हैं जिनकी ऊष्मा से धातु लाल-तप्त होकर पिघल जाती है। यह प्रक्रिया खनिज पदार्थ से धातु निकालने में भी प्रयुक्त की जाती है।

(iii) प्रेरण मोटर- जब एक धात्विक बेलन किसी घूमते हुए चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है, तो बेलन में भंवर धाराएँ उत्पन्न हो जाती हैं। ये धाराएँ, लेन्ज के नियमानुसार, (UPBoardSolutions.com) बेलन तथा चुम्बकीय क्षेत्र के बीच आपेक्षिक गति को घटाने का प्रयत्न करती हैं। अतः बेलन चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में घूमने लगता है। प्रेरण मोटर का यही सिद्धान्त है।

(iv) वैद्युत ब्रेक- विद्युत रेलगाड़ियों में पहिये की धुरी के साथ एक ड्रम लगा रहता है जो पहिये के साथ घूमता है। जब ब्रेक लगाने होते हैं, तो ड्रम पर एक प्रबल चुम्बकीय क्षेत्र लगा दिया जाता है। जिससे ड्रम में भंवर धाराएँ उत्पन्न हो जाती हैं और ड्रम पहिये को रोक देता है।

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प्रश्न 4.
एक कुण्डली का क्षेत्रफल 100 सेमी है तथा इसमें 400 फेरे हैं। 0.20 वेबर/मी2 का चुम्बकीय क्षेत्र कुण्डली के तल के लम्बवत है। यदि चुम्बकीय क्षेत्र 0.1 सेकण्ड में घटकर शुन्य हो जाए तो कुण्डली में प्रेरित वि० वा० बल का मान ज्ञात कीजिए। यदि कुण्डली का प्रतिरोध 4 ओम हो तो प्रेरित धारा का मान ज्ञात कीजिए। (2013, 14)
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प्रश्न 5.
एक L लम्बाई की धातु की छड़ कोणीय आवृत्ति से अपने एक सिरे के परितः घूर्णन कर रही है। चुम्बकीय क्षेत्र B छड़ की घूर्णन अक्ष के समान्तर आरोपित है। छड़ के सिरों के बीच उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल ज्ञात कीजिए। यदि छड़ का प्रतिरोध हो तब उसमें प्रेरित धारा क्या होगी? (2014)
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प्रश्न 6.
जब एक प्राथमिक कुण्डली में धारा शून्य से 2.0 ऐम्पियर, 300 मिली सेकण्ड में परिवर्तित की जाती है तो द्वितीयक कुण्डली में प्रेरित विद्युत वाहक बल 0.80 वोल्ट है। दोनों कुण्डलियों के बीच अन्योन्य प्रेरण गुणांक की गणना कीजिए। (2015)
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प्रश्न 7.
स्वप्रेरण गुणांक की परिभाषा लिखिए तथा मात्रक बताइए। (2009, 11, 13, 16, 17, 18)
या
स्वप्रेरकत्व की परिभाषा लिखिए। (2013, 14, 17)
उत्तर-
NΦ = Li तथा यदि i = 1 तो L = NΦ, अत: किसी कुण्डली का स्वप्रेरण गुणांक कुण्डली में चुम्बकीय फ्लक्स ग्रन्थिताओं के बराबर होता है, जबकि कुण्डली में एकांक धारा प्रवाहित हो रही है। संख्यात्मक रूप से प्रेरित विद्युत वाहक बल का परिमाण
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अत: “किसी कुण्डली का स्वप्रेरण गुणांक संख्यात्मक (UPBoardSolutions.com) रूप से उस प्रेरित वि० वा० बल के बराबर होता है जो कुण्डली में धारा-परिवर्तन की दर एकांक अर्थात् एक ऐम्पियर प्रति सेकण्ड होने पर उत्पन्न होता है।” इसका मात्रक हेनरी होता है।

प्रश्न 8.
एक समतल वृत्ताकार कुण्डली के लिए स्वप्रेरण गुणांक का सूत्र निगमित कीजिए। (2012)
उत्तर-
माना r मीटर त्रिज्या तथा N फेरों की एक समतल वृत्ताकार कुण्डली में ऐम्पियर की वैद्युत धारा प्रवाहित हो रही है। अतः कुण्डली के केन्द्र पर चुम्बकीय क्षेत्र
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मानी कुण्डली के सम्पूर्ण तल में चुम्बकीय क्षेत्र B एकसमान है (यद्यपि कुण्डली की परिधि के समीप चुम्बकीय क्षेत्र B अधिक होता है)। अतः कुण्डली से बद्ध चुम्बकीय-फ्लक्स Φ = BA
जहाँ, A कुण्डली के तल का क्षेत्रफल है; अतः A = πr²
समीकरण (1) से B का मान रखने पर,
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समीकरण (1) से स्पष्ट है कि किसी कुण्डली का स्वप्रेरकत्व बढ़ाने के लिए कुण्डली में फेरों की संख्या अधिक लेनी चाहिए। यदि कुण्डली के अन्दर. लौहचुम्बकीय पदार्थ की छड़ रख दी जाए तो कुण्डली से बद्ध चुम्बकीय-फ्लक्स बढ़ जाता है, जिससे कुण्डली का स्वप्रेरकत्व बढ़ जाएगा।

प्रश्न 9.
धारावाही लम्बी परिनालिका के स्व-प्रेरकत्व का सूत्र स्थापित कीजिए। (2017, 18)
उत्तर-
माना एक लम्बी वायु-क्रोड परिनालिकों की लम्बाई l तथा परिच्छेद क्षेत्रफल A है। परिनालिका में फेरों की कुल संख्या N तथा उसमें प्रेरित धारा i है।
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प्रश्न 10.
स्वप्रेरण गुणांक की परिभाषा दीजिए। (2018)
एक प्रेरक में प्रवाहित धारा i = 2 + 5t द्वारा व्यक्त की जाती है, जहाँ i ऐम्पियर तथा t सेकण्ड में है। इसमें स्वप्रेरित विद्युत वाहक बल 10 मिलीवोल्ट है। ज्ञात कीजिए।
(i) स्वप्रेरण गुणांक तथा
(ii) t = 2 सेकण्ड पर प्रेरक में संचित ऊर्जा
हल-
[स्वप्रेरण गुणांक की परिभाषा के लिए लघु उत्तरीय प्रश्न 7 का उत्तर देखें।]
दिया है,
e = 10 मिलीवोल्ट = 10 x 10-3 वोल्ट
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प्रश्न 11.
एक प्रेरकत्व कुण्डली में वैद्युत धारा 0.3 सेकण्ड में शून्य से बढ़कर 8.0 A हो जाती है। जिसके कारण उसमें 30 V का प्रेरित वि० वा० बल उत्पन्न हो जाता है। कुण्डली का स्वप्रेरकत्व गुणांक ज्ञात कीजिए। (2014)
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प्रश्न 12.
किसी कुण्डली में 0.1 सेकण्ड में धारा शून्य से बढ़कर 5.0 ऐम्पियर हो जाती है, जिससे 20 वोल्ट का प्रेरित वैद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है। कुण्डली का स्वप्रेरण गुणांक ज्ञात कीजिए। (2016)
हल-
दिया है, समयान्तराल ∆t = 0.1 सेकण्ड
प्रेरित विद्युत वाहक बल, e = 20 वोल्ट
धारा परिवर्तन, ∆i = (5 – 0) = 5 ऐम्पियर
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प्रश्न 13.
विद्युत चुम्बकीय प्रेरण से क्या अभिप्राय है। किसी कुण्डली का स्वप्रेरण गुणांक 80 मिली हेनरी है। इस कुण्डली में कितने समय में धारा शून्य से बढ़कर 5 ऐम्पियर होने पर विद्युत वाहक बल 400 वोल्ट हो जायेगा? (2015)
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संक्षेप में बताइए कि लेन्ज का नियम ऊर्जा संरक्षण के सिद्धान्त को कैसे पोषित करता है। (2009)
या
लेन्ज का नियम लिखिए। क्या यह ऊर्जा संरक्षण के सिद्धान्त का उल्लंघन करता है? (2009, 11)
या
विद्युत चुम्बकीय प्रेरण सम्बन्धी लेन्ज के नियम का उल्लेख कीजिए। यह किस संरक्षण के नियम पर आधारित है? (2015)
या
लेन्ज का नियम क्या है? (2018)
उत्तर-
लेन्ज का नियम- किसी परिपथ में प्रेरित वि० वा० बल, अथवा प्रेरित धारा, की दिशा सदैव ऐसी होती है कि यह उस कारण का विरोध करती है जिससे कि यह उत्पन्न होती है। इसे ही ‘लेन्ज का नियम’ कहते हैं। लेन्ज के नियम की पुष्टि फैराडे के प्रयोगों से हो जाती है। इन प्रयोगों में (UPBoardSolutions.com) चुम्बक की गति के कारण ही कुण्डली में प्रेरित धारा बहती है। जब हम चुम्बक के उत्तरी ध्रुव को कुण्डली के पास लाते हैं तो कुण्डली में प्रेरित धारा ऐसी दिशा में प्रवाहित होती है कि कुण्डली का चुम्बक के सामने वाला तल उत्तरी ध्रुव की तरह कार्य करता है (चित्र 6.12 a)। अतः यह पास आते हुए चुम्बक को दूर हटाने का प्रयत्न करता है अर्थात् उसकी गति का विरोध करता है। इसी प्रकार, जब चुम्बक के उत्तरी ध्रुव को।

कुण्डली से दूर हटाते हैं तो कुण्डली में प्रेरित धारा की दिशा इस प्रकार होती है कि कुण्डली का सामने वाला तल दक्षिणी ध्रुव की तरह कार्य करता है (चित्र 6.12 b)। अब यह चुम्बक को अपनी ओर आकर्षित करता है अर्थात् उसकी गति को पुन: विरोध करता है। ठीक इसी प्रकार, जब चुम्बक के दक्षिणी ध्रुव को कुण्डली के पास ले जाते हैं अथवा दूर हटाते हैं तो कुण्डली में प्रेरित धारा की दिशा इस प्रकार होती है (UPBoardSolutions.com) कि वह चुम्बक की गति का विरोध करती है (चित्र 6.12 c तथा d)। अतः स्पष्ट है कि प्रत्येक दंशा में चुम्बक को गतिमान करने के लिए इस विरोधी बल के कारण कुछ यान्त्रिक कार्य करना पड़ता है। ऊर्जा-संरक्षण के नियमानुसार, ठीक यही कार्य हमें कुण्डली में वैद्युत-ऊर्जा (ऊष्मा) के रूप में प्राप्त होता है।

हम चुम्बक को जितना तेज चलायेंगे हमें उतनी ही तेजी से कार्य करना होगा अर्थात् प्रेरित धारा उतनी ही प्रबल होगी। यदि कुण्डली किसी स्थान पर कटी हो (परिपथ खुला हो) तब चुम्बक को चलाने पर धारा प्रेरित नहीं होगी (यद्यपि वि० वा० बल प्रेरित होगा) तथा कोई कार्य भी नहीं होगा।
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उपर्युक्त प्रयोगों में यह बात उल्लेखनीय है कि यदि कुण्डली में प्रेरित धारा की दिशा चुम्बक की गति का विरोध न करे तो हमें बिना कोई कार्य किये ही लगातार वैद्युत-ऊर्जा प्राप्त होती रहेगी जो कि असम्भव है। अतः लेन्ज का नियम ऊर्जा-संरक्षण के लिए एक आवश्यकता है।

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प्रश्न 2.
वैद्युत-चुम्बकीय प्रेरण क्या होता है ? वैद्युत-चुम्बकीय प्रेरण के आधार पर अन्योन्य प्रेरण की परिघटना समझाइए। अन्योन्य प्रेरण का एक उदाहरण दीजिए। (2011, 17)
या
अन्योन्य प्रेरण गुणांक की परिभाषा एवं मात्रक लिखिए। दो समतल कुण्डलियों के बीच अन्योन्य प्रेरकत्व के लिए सूत्र स्थापित कीजिए। (2012)
या
अन्योन्य प्रेरण गुणांक की परिभाषा दीजिए तथा इसका मात्रक लिखिए। (2015, 17)
उत्तर-
वैद्युत-चुम्बकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction)- जब किसी कुण्डली तथा चुम्बक के बीच आपेक्षिक गति होती है तो कुण्डली में एक वि० वा० बल उत्पन्न हो जाता है, जिसे प्रेरित विद्युत वाहक बल कहते हैं। यदि कुण्डली एक बन्द परिपथ में है तो इस प्रेरित वि० वा० बल के कारण (UPBoardSolutions.com) कुण्डली में वैद्युत धारा प्रवाहित होती है, जिसे प्रेरित धारा कहते हैं। इस घटना को वैद्युत-चुम्बकीय प्रेरण कहते हैं।
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अन्योन्य प्रेरण (Mutual Induction)- यदि दो कुण्डलियों को पास-पास रखकर, एक में धारा प्रवाहित करें, अथवा उसमें प्रवाहित धारा को बन्द करे, अथवा प्रवाहित धारा के मान में परिवर्तन करें तो दूसरी कुण्डली में एक प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है। वैद्युत-चुम्बकीय प्रेरण की (UPBoardSolutions.com) यह घटना अन्योन्य प्रेरण कहलाती है। वह कुण्डली जिसमें धारा परिवर्तित होती है, प्राथमिक कुण्डली तथा जिसमें प्रेरित वि० वा० बल उत्पन्न होता है, द्वितीयक कुण्डली कहलाती है। अन्योन्य प्रेरण के उदाहरण ट्रांसफॉर्मर तथा प्रेरण कुण्डली हैं।

अन्योन्य प्रेरण-गुणांक अथवा अन्योन्य प्रेरकत्व– (i) यदि प्राथमिक कुण्डली में ip ऐम्पियर की धारा प्रवाहित होने से द्वितीयक कुण्डली में प्रत्येक फेरे से बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स Φs, हो और द्वितीयक कुण्डली में कुल Ns फेरे हों, तो द्वितीयक कुण्डली से बद्ध कुल चुम्बकीय फ्लक्स NsΦs होगा, जो प्राथमिक कुण्डली में प्रवाहित धारा ip के अनुक्रमानुपाती होता है, अर्थात्
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अत: ‘दो कुण्डलियों के बीच अन्योन्य प्रेरण-गुणांक किसी एक कुण्डली के उस प्रेरित वि० वी० बल के संख्यात्मक मान के बराबर होता है जो कि दूसरी कुण्डली में धारा-परिवर्तन की दर एकांक होने पर उत्पन्न होता है।” अन्योन्य प्रेरण-गुणांक का मात्रक हेनरी है तथा विमा [ML2T-2A-2] है।

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UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 8 Human Health and Disease

UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 8 Human Health and Disease (मानव स्वास्थ्य तथा रोग) are part of UP Board Solutions for Class 12 Biology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 8 Human Health and Disease (मानव स्वास्थ्य तथा रोग).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Biology
Chapter Chapter 8
Chapter Name Human Health and Disease
Number of Questions Solved 46
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 8 Human Health and Disease (मानव स्वास्थ्य तथा रोग)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कौन-से विभिन्न जन स्वास्थ्य उपाय हैं जिन्हें आप संक्रामक रोगों के विरुद्ध रक्षा-उपायों के रूप में सुझायेंगे?
उत्तर
संक्रामक रोगों के विरुद्ध हम निम्नलिखित जन-स्वास्थ्य उपायों को सुझायेंगे –

  1. अपशिष्ट व उत्सर्जी पदार्थों का समुचित निपटान होना।
  2. संक्रमित व्यक्ति व उसके सामान से दूर रहना।
  3. नाले-नालियों में कीटनाशकों का छिड़काव करना।
  4. आवासीय स्थलों के निकट जल-ठहराव को रोकना, नालियों के गंदे पानी की समुचित निकासी होना।
  5. संक्रामक रोगों की रोकथाम हेतु वृहद स्तर पर टीकाकरण कार्यक्रम चलाये जाना।

प्रश्न 2.
जीव विज्ञान (जैविकी) के अध्ययन ने संक्रामक रोगों को नियन्त्रित करने में किस प्रकार हमारी सहायता की है?
उत्तर
जीव विज्ञान (जैविकी) के अध्ययन ने संक्रामक रोगों को नियन्त्रित करने में हमारी सहायता निम्नलिखित प्रकार से की है –

  1. जीव विज्ञान रोगजनकों को पहचानने में हमारी सहायता करता है।
  2. रोग फैलाने वाले रोगजनकों के जीवन चक्र का अध्ययन किया जाता है।
  3. रोगजनक के मनुष्य में स्थानान्तरण की क्रिया-विधि की जानकारी होती है।
  4. रोग से किस प्रकार सुरक्षा की जा सकती है, ज्ञात होता है।
  5. बहुत से रोगों के विरुद्ध इन्जेक्शन तैयार करने में सहायता मिलती है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित रोगों का संचरण कैसे होता है?

  1. अमीबता
  2. मलेरिया
  3. ऐस्कैरिसता
  4. न्यूमोनिया।

उत्तर
1. अमीबता (Amoebiasis) – अमीबता या अमीबी अतिसार (amoebic dysentery) नामक रोग मानव की वृहद् आंत्र में पाए जाने वाले एण्टअमीबा हिस्टोलिटिका (Entumoeba histobytica) नामक प्रोटोजोआ परजीवी से होता है। इस रोग के लक्षण कोष्ठबद्धता (कब्ज), उदर पीड़ा और ऐंठन, अत्यधिक श्लेष्म और रुधिर के थक्के वाला मल आदि हैं। इस रोग की वाहक घरेलू मक्खियाँ होती हैं जो परजीवी को संक्रमित व्यक्ति के मल से खाद्य और खाद्य पदार्थों तक ले जाकर उन्हें संदूषित (contaminated) कर देती हैं। संदूषित पेयजल और खाद्य पदार्थ संक्रमण के प्रमुख स्रोत हैं। इससे बचने के लिए स्वच्छता के नियमों का पालन करना चाहिए और खाद्य पदार्थों को ढककर रखना चाहिए।

(ख) मलेरिया (Malaria) – इस रोग के लिए प्लाज्मोडियम (Plasmodium) नामक प्रोटोजोआ उत्तरदायी है। मलेरिया के लिए प्लाज्मोडियम की विभिन्न प्रजातियाँ (जैसे–प्ला० वाइवैक्स, प्ला० मैलेरिआई, प्ला० फैल्सीपेरम) तथा प्ला० ओवेल उत्तरदायी हैं। इनमें से प्ला० फैल्सीपेरम (Plasmodium fulsipurum) द्वारा होने वाला दुर्दम (malignant) मलेरिया सबसे गम्भीर और घातक होता है। इसके संक्रमण के कारण रक्त केशिकाओं में थ्रोम्बोसिस हो जाने के कारण ये अवरुद्ध हो जाती हैं और रोगी की मृत्यु हो जाती है।

मादा ऐनोफेलीज रोगवाहक अर्थात् रोग का संचारण करने वाली है। जब मादा ऐनोफेलीज मच्छर किसी. संक्रमित व्यक्ति को काटती है तो परजीवी उसके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और जब संक्रमित मादा मच्छर किसी अन्य स्वस्थ मानव को काटती है तो स्पोरोज्वाइट्स (sporozoites) मादा मच्छर की लार से मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। मलेरिया में ज्वर की पुनरावृत्ति एक निश्चित अवधि (48 या 72 घण्टे) के पश्चात् होती रहती है। इसमें लाल रक्त कणिकाओं की निरन्तर क्षति होती रहती है।

(ग) ऐस्कैरिसता (Ascariasis) – यह रोग आंत्र परजीवी ऐस्कैरिस (Ascaris) से होता है। इस रोग के लक्षण आन्तरिक रुधिरस्राव, पेशीय पीड़ा, ज्वर, अरक्तता, आंत्र का अवरोध आदि है। इस परजीवी के अण्डे संक्रमित व्यक्ति के मल के साथ बाहर निकल आते हैं और मिट्टी, जल, पौधों आदि को संदूषित कर देते हैं। स्वस्थ व्यक्ति में संक्रमण संदूषित पानी, शाक-सब्जियों, फलों, वायु आदि से होता है। इससे रक्ताल्पता (anaemia), दस्त (diarrhoea), उण्डुकपुच्छ शोध (appendicitis) आदि रोग हो जाते हैं। कभी-कभी ऐस्कैरिस के लार्वा पथ भ्रष्ट होकर विभिन्न अंगों में पहुँचकर क्षति पहुँचाते हैं।

(घ) न्यूमोनिया (Pneumonia) – मानव में न्यूमोनिया रोग के लिए स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी (Streptococcus pneumoniae) और हिमोफिलस इंफ्लुएन्ज़ी (Haemophilus influenzae) जैसे जीवाणु उत्तरदायी हैं। इस रोग में फुफ्फुस अथवा फेफड़ों (lungs) के वायुकोष्ठ संक्रमित हो जाते हैं। इस रोग के संक्रमण से वायुकोष्ठों में तरल भर जाता है जिसके कारण साँस लेने में परेशानी होती है। इस रोग के लक्षण ज्वर, ठिठुरन, खाँसी और सिरदर्द आदि हैं। न्यूमोनिया विषाणुजनित एवं कवक जनित भी होता है।

प्रश्न 4.
जलवाहित रोगों की रोकथाम के लिये आप क्या उपाय अपनायेंगे?
उत्तर

  1. सभी जल स्रोतों; जैसे- जल कुण्ड, पानी के टैंक इत्यादि की नियमित सफाई करनी चाहिये तथा इन्हें असंक्रमित रखना चाहिये।
  2. वाहित मल एवं कूड़ा-करकट आदि को जलीय स्रोतों में बहाने से रोकना चाहिये।
  3. भोजन बनाने के लिये, पीने के लिये व अन्य घरेलू कार्यों हेतु परिष्कृत (संक्रमण, निलम्बित व घुले हुए पदार्थों से स्वतन्त्र) जल का उपयोग करना चाहिये।

प्रश्न 5.
डी०एन०ए० वैक्सीन के सन्दर्भ में ‘उपयुक्त जीन के अर्थ के बारे में अपने अध्यापक से चर्चा कीजिए।
उत्तर
DNA वैक्सीन में उपयुक्त जीन’ का अर्थ है कि इम्युनोजेनिक प्रोटीन का निर्माण इसे नियन्त्रित करने वाले जीन से हुआ है। ऐसे जीन क्लोन किये जाते हैं तथा फिर वाहक के साथ समेकित करके व्यक्ति में प्रतिरक्षा उत्पन्न करने के लिए उसके शरीर में प्रवेश कराये जाते हैं।

प्रश्न 6.
प्राथमिक और द्वितीयक लसिकाओं के अंगों के नाम बताइये।
उत्तर

  1. प्राथमिक लसिका अंग- अस्थिमज्जा व थाइमस हैं।
  2. द्वितीयक लसिकाएँ- प्लीहा, लसिका नोड्स, टॉन्सिल्स, अपेन्डिक्स व छोटी आँत के पियर्स पैचेज आदि हैं।

प्रश्न 7.
इस अध्याय में निम्नलिखित सुप्रसिद्ध संकेताक्षर इस्तेमाल किये गये हैं। इनका पूरा रूप बताइये –

  1. एम०ए०एल०टी०
  2. सी०एम०आई०
  3. एड्स
  4. एन०ए०सी०ओ
  5. एच०आई०वी०

उत्तर

  1. एम०ए०एल०टी० (MALT) – म्यूकोसल एसोसिएटिड लिम्फॉइड टिशू (Mucosal Associated Lymphoid Tissue)
  2. सी०एम०आई० (CMI) – सेल मीडिएटिड इम्यूनिटी (Cell Mediated Immunity)।
  3. एड्स (AIDS) – एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशिएन्सी सिन्ड्रोम (Acquired Immuno | Deficiency Syndrome)।
  4. एन०ए०सी०ओ० (NACO) – नेशनल एड्स कन्ट्रोल ऑर्गेनाइजेशन (National AIDS Control Organisation)
  5. एच०आई०वी० (HIV) – ह्यमन इम्यूनो डेफिशिएन्सी वायरस (Human Immuno Deficiency Virus)।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में भेद कीजिए और प्रत्येक के उदाहरण दीजिए –
(क) सहज (जन्मजात) और उपार्जिल प्रतिरक्षा
(ख) सक्रिय और निष्क्रिय प्रतिरक्षा। (2009)
उत्तर
(क) सहज (जन्मजात) और उपार्जित प्रतिरक्षा में अन्तर
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 8 Human Health and Disease img-1

(ख) सक्रिय और निष्क्रिय प्रतिरक्षा में अन्तर
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 8 Human Health and Disease img-2
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 8 Human Health and Disease img-3

प्रश्न 9.
प्रतिरक्षी (प्रतिपिण्ड) अणु का अच्छी तरह नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर
प्रतिरक्षी (प्रतिपिण्ड) अणु
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 8 Human Health and Disease img-4

प्रश्न 10.
वे कौन-कौन से विभिन्न रास्ते हैं जिनके द्वारा मानव में प्रतिरक्षान्यूनता विषाणु (एच०आई०वी०) का संचारण होता है?
उत्तर
एच०आई०वी० के संचारण के निम्न कारण हैं –

  1. संक्रमित रक्त व रक्त उत्पादों के आधान से।
  2. संक्रमित व्यक्ति के साथ यौन सम्बन्ध।
  3. इन्ट्रावीनस औषधि के आदी व्यक्तियों में संक्रमित सुइयों का साझा करके।

प्रश्न 11.
वह कौन-सी क्रियाविधि है जिससे एड्स विषाणु संत व्यक्ति के प्रतिरक्षा तन्त्र का ह्रास करता है?
उत्तर

  1. संक्रमित व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करने के पश्चात् एड्स विषाणु वृहद् भक्षकाणु (macrophage) में प्रवेश करता है।
  2. यहाँ इसका RNA जीनोम, विलोम ट्रांसक्रिप्टेज विकर (reverse transcriptase enzyme) की मदद से, रेप्लीकेशन (replication) द्वारा विषाणुवीय DNA (viral DNA) बनाता है जो कोशिका में DNA में प्रविष्ट होकर, संक्रमित कोशिकाओं में विषाणु कण निर्माण का निर्देशन करता है।
  3. वृहद् भक्षकाणु विषाणु उत्पादन जारी रखते हैं व HIV की उत्पादन फैक्टरी का कार्य करते हैं।
  4. HIV सहायक T-लसीकाणु में प्रविष्ट होकर अपनी प्रतिकृति बनाता है व संतति विषाणु उत्पन्न करता है।
  5. रक्त में उपस्थित संतति विषाणु अन्य सहायक T-लसीकाणुओं पर आक्रमण करते हैं।
  6. यह प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती है जिसके परिणामस्वरूप संक्रमित व्यक्ति के शरीर में T-लसीकाणुओं की संख्या घटती रहती है।
  7. रोगी ज्वर व दस्त से निरन्तर पीड़ित रहता है, वजन घटता जाता है, रोगी की प्रतिरक्षा इतनी कम हो जाती है कि वह इन प्रकार के संक्रमणों से लड़ने में असमर्थ होता है।

प्रश्न 12.
प्रसामान्य कोशिका से कैंसर कोशिका किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर

  1. एक प्रसामान्य कोशिका में कोशिका वृद्धि व कोशिका विभेदन अत्यन्त नियन्त्रित व नियमित होते हैं।
  2. प्रसामान्य कोशिका में संस्पर्श संदमन (contact inhibition) नामक गुण होता है जिसके कारण अन्य कोशिकाओं में इसका स्पर्श अनियन्त्रित वृद्धि का संदमन करता है।
  3. इसके विपरीत कैंसर कोशिका में यह गुण समाप्त हो जाता है, अत: इन कोशिकाओं में वृद्धि व विभेदन अनियन्त्रित हो जाते हैं।
  4. इसके परिणामस्वरूप कैंसर कोशिकायें निरन्तर वृद्धि करके कोशिकाओं में एक पिण्ड, रसौली (tumour) बना देती हैं।

प्रश्न 13.
मेटास्टेसिस का क्या मतलब है? व्याख्या कीजिये।
उत्तर

  1. मेटास्टेसिस में कैंसर कोशिकाओं के अन्य ऊतकों व अंगों में स्थानान्तरण से कैंसर फैलता है। परिणामस्वरूप द्वितीयक ट्यूमर का निर्माण होता है।
  2. यह प्राथमिक ट्यूमर की अति वृद्धि के परिणामस्वरूप फैलता है।
  3. अति वृद्धि करने वाली ट्यूमर कोशिकायें रक्त वाहिनियों में से गुजरती हैं या सीधे द्वितीयक बनाती हैं।
  4. दूसरे उपयुक्त ऊतक या अंग पर पहुँचने के बाद, एक नया ट्यूमर बनता है।
  5. यह बना ट्यूमर, जो द्वितीयक बना सकते हैं, घातक ट्यूमर कहलाता है।
  6. वे कोशिकाएँ जो ट्यूमर से फैलने के योग्य होती हैं, घातक (malignant) कोशिकायें होती हैं।

प्रश्न 14.
ऐल्कोहॉल/ड्रग के द्वारा होने वाले कुप्रयोग के हानिकारक प्रभावों की सूची बनाइये।
उत्तर
ऐल्कोहॉल/ड्रग के द्वारा होने वाले कुप्रयोग के हानिकारक प्रभाव निम्नलिखित हैं –

  1. अत्यधिक मात्रा में लेने पर इन पदार्थों से श्वसन निष्क्रियता, हृदय- घात, कोमा व मृत्यु भी हो सकती है।
  2. मादक पदार्थों के व्यसनी पैसे न मिलने पर चोरी का सहारा ले सकते हैं। अत: परिवार/समाज के लिये मानसिक व आर्थिक कष्ट हो सकता है।
  3. ऐल्कोहॉल के चिरकारी प्रयोग से तन्त्रिका तन्त्र व यकृत को क्षति पहुँचती है।
  4. रक्त शिरा में इन्जेक्शन द्वारा ड्रग्स लेने पर एड्स व यकृत शोथ-बी जैसे गम्भीर संक्रमण की सम्भावना बढ़ जाती है।
  5. गर्भावस्था के दौरान मादक पदार्थों का प्रतिकूल प्रभाव भ्रूण पर पड़ता है।
  6. अन्धाधुन्ध व्यवहार, बर्बरता व हिंसा का बढ़ना।
  7. महिलाओं में उपापचयी स्टेराइड के सेवन से पुरुष; जैसे- लक्षण, आक्रामकता, भावनात्मकता स्थिति में उतार-चढ़ाव, अवसाद, असामान्य आर्तवचक्र, मुंह व शरीर पर बालों की अतिरिक्त वृद्धि, आवाज का भारी होना आदि दुष्प्रभाव देखे जा सकते हैं।
  8. पुरुषों में मुहाँसे, आक्रामकता का बढ़ना, अवसाद, वृषणों के आकार का घटना, शुक्राणु उत्पादन की कमी, समय से पूर्व गंजापन आदि लक्षण ड्रग्स सेवन के कुप्रभाव हैं।

प्रश्न 15.
क्या आप ऐसा सोचते हैं कि मित्रगण किसी को ऐल्कोहॉल/डग सेवन के लिये प्रभावित कर सकते हैं? यदि हाँ, तो व्यक्ति ऐसे प्रभावों से कैसे अपने आपको बचा सकते हैं?
उत्तर
मित्रगण किसी को ऐल्कोहॉल/ड्रग लेने के लिये प्रभावित कर सकते हैं। युवा प्रायः ऐसे मित्रों के चंगुल में फंस जाते हैं जो मादक द्रव्यों के आदी हो चुके होते हैं। ऐसे मित्र युवाओं को धीरे-धीरे मादक पदार्थों के सेवन की लत लगा देते हैं तथा युवा इन पदार्थों के चंगुल में बुरी तरह फंस जाते हैं।
स्वयं को इस प्रकार के प्रभाव से बचाने के लिये निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं –

  1. प्रथम माता-पिता व अध्यापकों का विशेष उत्तरदायित्व है। ऐसा लालन-पालन जिसमें पालन-पोषण का स्तर ऊँचा हो व सुसंगत अनुशासन हो।
  2. ऐसे मित्रों के चंगुल में आने पर तुरन्त अपने माता-पिता व समकक्षियों से मदद व उचित मार्गदर्शन लें।
  3. समस्याओं व प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने, निराशाओं व असफलताओं को जीवन का एक हिस्सा समझकर स्वीकार करने की शिक्षा व परामर्श लेना इस प्रकार के प्रभाव से बचने में सहायक होता है।
  4. क्षमता से अधिक कार्य करने के दबाव से बचें।

प्रश्न 16.
ऐसा क्यों है कि जब कोई व्यक्ति ऐल्कोहॉल या ड्रग लेना शुरू कर देता है तो उस आदत से छुटकारा पाना कठिन होता है? अपने अध्यापक से चर्चा कीजिये।
उत्तर

  1. ड्रग/ऐल्कोहॉल लाभकारी है। इसी सोच के कारण व्यक्ति इसे बार-बार लेता है। डुग/ऐल्कोहॉल के प्रति लत मनोवैज्ञानिक आशक्ति है।
  2. ड्रग/ऐल्कोहॉल के बार-बार सेवन से शरीर में मौजूद ग्राहियों का सहन स्तर बढ़ जाता है। जिसके कारण अधिकाधिक मात्रा में ड्रग लेने की आदत पड़ जाती है।
  3. इस प्रकार ऐल्कोहॉल/डूग व्यसनी शक्ति प्रयोग करने वाले को दोषपूर्ण चक्र में घसीट लेती है। तथा व्यक्ति इनका नियमित सेवन करने लगता है और इस चक्र में फंस जाता है।

प्रश्न 17.
आपके विचार से किशोरों को ऐल्कोहॉल या ड्रग के सेवन के लिये क्या प्रेरित करता है और इससे कैसे बचा जा सकता है?
उत्तर

  1. जिज्ञासा, जोखिम उठाने व उत्तेजना के प्रति आकर्षण व प्रयोग करने की इच्छा प्रमुख कारण है जो नवयुवकों को ऐल्कोहॉल/ड्रग्स के लिये अभिप्रेरित करते हैं।
  2. इन पदार्थों के प्रयोग को फायदे के रूप में देखना भी एक अन्य कारण है।
  3. शिक्षा के क्षेत्र या परीक्षा में आगे रहने के दबाव से उत्पन्न तनाव भी नवयुवकों को मादक पदार्थों की ओर खींच सकता है।
  4. युवकों में यह भी प्रचलन है कि धूम्रपान, ऐल्कोहॉल, ड्रग्स आदि का प्रयोग व्यक्ति की प्रगति का सूचक है।
  5. सामाजिक एकाकीपन, कामवासना में वृद्धि का अनुभव, जीवन के प्रति नीरसता, मानसिक क्षमता में वृद्धि की मिथ्या धारणा, क्षणिक स्वर्गिक आनंद की अभिलाषा व कुसंगति का प्रभाव नवयुवकों को इन पदार्थों के प्रति आकर्षित करता है।
  6. इसको नजरअंदाज करने के लिये रोकथाम व नियन्त्रण सम्बन्धी उपाय कारगर हो सकते हैं।
  7. पढ़ाई, खेल-कूद, संगीत, योग के साथ-साथ अन्य स्वास्थ्य गतिविधियों में ऊर्जा लगानी चाहिये।
  8. युवाओं के व्यसनी होने पर योग्य मनोवैज्ञानिक की सहायता ली जानी चाहिये।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
निद्रा रोग किस जन्तु के द्वारा होता है? (2015)
(क) यूग्लीना
(ख) प्लाज्मोडियम
(ग) ट्रिपैनोसोमा
(घ) अमीबा
उत्तर
(ग) ट्रिपैनोसोमा

प्रश्न 2.
चिकनगुनिया विषाणु का वाहक है – (2017)
(क) क्यूलेक्स मच्छर
(ख) एडीज मच्छर
(ग) एनोफिलीज मच्छर
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ख) एडीज मच्छर

प्रश्न 3.
एडिस इजिप्टियाई वाहक है – (2017)
(क) डेंगू बुखार का
(ख) मलेरिया बुखार का
(ग) फाइलेरिया का
(घ) कालाजार का
उत्तर
(क) डेंगू बुखार का

प्रश्न 4.
निम्न में से कौन-सा जीवाणु-जनित मानव रोग है? (2014)
(क) पोलियो
(ख) पायरिया
(ग) अतिसार
(घ) हाथीपाँव
उत्तर
(ग) अतिसार

प्रश्न 5.
निम्न में से कौन-सा रोग विषाणुओं द्वारा नहीं उत्पन्न होता है? (2016)
(क) पोलियो
(ख) चेचक
(ग) एड्स
(घ) टी०बी०
उत्तर
(घ) टी०बी०

प्रश्न 6.
विषाणु संक्रमण से रक्षा के लिए शरीर निम्नलिखित में से किस विशेष प्रकार के प्रोटीन को उत्पन्न करता है? (2014)
(क) हॉर्मोन्स
(ख) एन्जाइम
(ग) प्लाज्मिड्म
(घ) इण्टरफेरॉन
उत्तर
(घ) इण्टरफेरॉन

प्रश्न 7.
लिम्फोसाइट्स का निर्माण निम्नलिखित में से किसमें होता है? (2015)
(क) लसीका में
(ख) यकृत में
(ग) आमाशय में
(घ) वृक्क में
उत्तर
(क) लसीका में

प्रश्न 8.
टी०बी० के टीके का नाम है – (2017)
(क) PAS
(ख) OPV
(ग) DPT
(घ) BCG
उत्तर
(घ) BCG

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मनुष्य में विषाणु जनित कुछ प्रमुख रोगों के नाम लिखिए। (2010, 15)
उत्तर
चेचक (small pox), हरपीज (herpes), आर्थराइटिस (arthritis) आदि डी०एन०ए० वाइरस (DNA virus) द्वारा तथा पोलियो (polio), डेंगू ज्वर (dengue fever), कर्णफेर (mumps), खसरा (measles), रेबीज (rabies) आदि आर०एन०ए० वाइरस (RNA virus) द्वारा उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 2.
स्वाइन फ्लू के कारक अभिकर्ता का नाम, रोग के लक्षण तथा बचाव के उपाय बताइए। (2017)
उत्तर
स्वाइन फ्लू एक विषाणु जनित रोग है। इसकी अनेक स्ट्रेन्स पायी जाती हैं जिन्हें H1N1, H1N2, H3N1 आदि नामों से जाना जाता है। इस विषाणु का संक्रमण सुअरों के सम्पर्क में रहने से होता है।

इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं, तीव्र सिरदर्द, बुखार, ठण्ड लगना, शरीर में दर्द, मितली आना, वमन, नाक का बहना, गले में जलन व खराश, साँस लेने में कठिनाई, सुस्ती, थकान एवं भूख का न लगना
आदि।

इस रोग से बचाव के लिए हाथों एवं नाखून की उचित सफाई करनी चाहिए, छींकते एवं खाँसते समय मुंख को ढक लेना चाहिए, रोग ग्रसित व्यक्ति से कम-से-कम एक मीटर की दूरी बनाकर रहना चाहिए।

प्रश्न 3.
एस्केरिस के लार्वा में कितने त्वक पतन होते हैं? (2017)
उत्तर
एस्केरिस के लार्वा में चार त्वक पतन होते हैं।

प्रश्न 4.
विसंक्रमण क्या है? (2014)
उत्तर
वह कोई भी प्रक्रिया जिसके द्वारा संक्रामक एजेण्टों; जैसे- कवक, जीवाणु, विषाणु, बीजाणु आदि को मार दिया जाता है, विसंक्रमण कहलाती है। यह क्रिया गर्म करके, ठण्डा करके, रासायनिक प्रक्रिया, उच्च दाब आदि द्वारा सम्पादित की जाती है।

प्रश्न 5.
स्वास्थ्य के क्षेत्र में अलेक्जेण्डर फ्लेमिंग के योगदान का उल्लेख कीजिए। (2015)
उत्तर
अलेक्जेण्डर फ्लेमिंग ने पेनिसिलिन नामक सर्वप्रथम प्रतिजैविक का निर्माण किया था।

प्रश्न 6.
मानव शरीर की प्राकृतिक विनाशी कोशिकाएँ किन्हें कहते हैं? (2015)
उत्तर
श्वेत रुधिराणु – लिम्फोसाइट्स को मानव शरीर की प्राकृतिक विनाशी कोशिकाएँ कहते हैं।

प्रश्न 7.
यदि मानव शरीर से थाइमस ग्रन्थि निकाल दी जाय तो उसके प्रतिरोधी संस्थान पर क्या प्रभाव पड़ेगा? (2017)
उत्तर
थाइमस मानव शरीर में प्राथमिक लसीकाभ अंग है, जहाँ अपरिपक्व लसीकाणु, प्रतिजन संवेदनशील लसीकाणुओं में विभेदित होते हैं। यदि शरीर से थाइमस ग्रन्थि को निकाल दिया जाये तो इन लसीकाणुओं का प्रतिजन संवेदनशील लसीकाणुओं में विभेदन नहीं हो पायेगा।।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
एण्टअमीबा हिस्टोलिटिका तथा एण्टअमीबा जिन्जीवेलिस मानव शरीर में कहाँ पाये जाते हैं? इनसे उत्पन्न मनुष्य में एक-एक रोग का नाम लिखिए। (2013, 14)
उत्तर
एण्टअमीबा हिस्टोलिटिका – यह मनुष्य की आंत्र में अन्त:परजीवी के रूप में पाया जाता है। यह मनुष्य में अमीबिएसिस या अमीबिक पेचिश (Amoebiasis or Amoebic dycentry) रोग उत्पन्न करता है।

एण्टअमीबा जिन्जीवेलिस – यह मनुष्य के मसूड़ों में परजीवी के रूप में पाया जाता है। यह मनुष्य में पाइरिया रोग उत्पन्न करता है।

प्रश्न 2.
प्रोटोजोआ द्वारा उत्पन्न होने वाले किन्ही दो रोगों के नाम लिखिये। इनमें से किसी एक रोग के जनक, लक्षण एवं रोकथाम का उल्लेख कीजिए। (2013)
या
अमीबीय पेचिश क्या है? इसके लक्षण, रोकथाम एवं चिकित्सा का उल्लेख कीजिए। (2014, 16)
या
एण्टअमीबा हिस्टोलिटिका के संक्रमण से बचने के लिए चार महत्त्वपूर्ण उपायों का उल्लेख कीजिए। (2013)
या
पेचिश या अमीबता रोग के रोगजनक का नाम लिखिए तथा इस रोग के लक्षण एवं उपचार बताइए। (2015)
या
अमीबिक पेचिश पर टिप्पणी लिखिए। (2015)
या
टिप्पणी लिखिए-पेचिश। (2015)
उत्तर
प्रोटोजोआ द्वारा उत्पन्न होने वाले दो रोगों का नाम निम्नवत् है –
(i) मलेरिया
(ii) अमीबिक पेचिश या अमीबिएसिस

अमीबिएसिस अथवा अमीबिक पेचिश
आमातिसार अथवा अमीबिएसिस नामक बीमारी एक प्रोटोजोआ एण्टअमीबा हिस्टोलिटिका (Entomoeba histolytica) द्वारा होती है। एण्टअमीबा (Entamoeba) की ट्रोफोजाइट (trophozoite) अवस्था बड़ी आँत में हिस्टोलायटिक (histolytic) विकर स्रावित करके घाव (ulcer) पैदा कर देती है। इन घावों से रक्त, म्यूकस आदि मल के साथ पेचिश के रूप में बाहर आता है। ये परजीवी चतुष्केन्द्रीय पुटिकाओं (cysts) के रूप में रोगी के मल के साथ बाहर आते हैं तथा संक्रमित भोजन एवं जल द्वारा दूसरे मानवों में पहुँचकर रोग फैलाते हैं। इस रोग को फैलाने में घरेलू मक्खियों का भी बड़ा हाथ रहता है। कभी-कभी यह परजीवी फेफड़ों, यकृत व मस्तिष्क में पहुंचकर सूजन व घाव का कारक बनता है।
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 8 Human Health and Disease img-5

इस रोग के होने पर पेट में दर्द व ऐंठन रहती है, वमन की इच्छा होती है व पेट भारी रहता है, सिर में दर्द व शरीर कमजोर हो जाता है। श्लेष्मा व रक्तयुक्त दस्त हो जाते हैं। रोगी की आँखों के आस-पास काले घेरे बन जाते हैं व चेहरा मुरझा जाता है। एण्टअमीबा हिस्टोलिटिका परजीवी अण्डाकार व शरीर 20μ – 30μ व्यास का होता है। इसका शरीर एक मोटे, भौथरे (blunt) पाद युक्त होता है। कोशिकाद्रव्य एन्डोप्लाज्म व एक्टोप्लाज्म में विभाजित रहता है। कुंचनशीलधानी अनुपस्थित होती है, माइटोकॉण्डिया आदि अंगक थोड़े ही होते हैं। यह परजीवी विश्व के लगभग 10% व्यक्तियों में पाया जाता है व सिर्फ 3% को ही प्रभावित करता है।

रोकथाम व उपचार (Control and Treatment) – भोजन को अच्छी तरह से पकाकर खाना चाहिए तथा फल आदि ठीक प्रकार से धोने चाहिए। नियमित रूप से नहाना, नाखून काटना, भोजन से पूर्व हाथ धोने चाहिए। स्वच्छ जल का प्रयोग करना चाहिए। रोगी को स्वस्थ मनुष्यों से अलग रखना चाहिए। रोग हो जाने पर फ्यूमेजिलिन (fumagilin), इरथ्रोमायसिन (erythromycin), बायोमीबिक-D (biomebic-D), डिपेन्डॉल-m (dependal-m), डायडोक्विन (diadoquin), ट्राइडेजॉल (tridazole), मेट्रोजिल (metrogyle), एम्जोल (amzole), ह्यमेटिन (humatin) आदि औषधियों का प्रयोग लाभकारी होता है।

प्रश्न 3.
प्रतिरक्षा तन्त्र से आप क्या समझते हैं? इसकी खोज करने वाले वैज्ञानिक का नाम लिखिए। (2015, 17, 18)
उत्तर
प्रतिरक्षा तन्त्र तथा प्रतिरोधी क्षमता
सामान्य भाषा में किसी प्राणि के शरीर द्वारा किसी रोग विशेष के रोगजनक (pathogen) के प्रति रोग उत्पन्न करने में प्रतिरोध करने की शक्ति को प्रतिरोध क्षमता या प्रतिरक्षा या असंक्राम्यता (immunity) कहा जाता है। जिस प्राणि में यह शक्ति होती है, वह रोधक्षम या प्रतिरक्षित या असंक्राम्य (immune) कहलाता है; जैसे- जिन व्यक्तियों में एक बार चेचक का संक्रमण हो जाता है, उनमें चेचक का संक्रमण पुनः जीवन भर नहीं होता।

इसका कारण यह है कि एक बार संक्रमित मनुष्य के शरीर के रुधिर में चेचक के विषाणु के प्रति प्रतिरोध क्षमता या असंक्राम्यता उत्पन्न करने की शक्ति रहती है, जो असंक्रमित मनुष्य के रुधिर में नहीं होती। एक बार संक्रमित मनुष्य के रुधिर में कुछ ऐसे पदार्थ उत्पन्न हो जाते हैं; जो उसी प्रकार के विषाणु के शरीर पर पुनः संक्रमण की क्रिया को रोकते हैं। यही शक्ति शरीर में रोग न होने देने की क्षमता रखती है अथवा रोग-प्रतिरोध करती है। अत: यह रोगरोधक क्षमता ही प्रतिरक्षा, असंक्राम्यता अथवा प्रतिरोध क्षमता (immunity) कहलाती है।

रूस के वैज्ञानिक एली मैचनीकॉफ (Elie Metchnikoff, 1884) ने सर्वप्रथम भक्षाणुओं द्वारा शरीर में आये सूक्ष्मजीवों की प्रतिरोधक क्षमता या प्रतिरक्षी क्रियाओं का वर्णन ‘फैगोसाइटोसिस (phagocytosis) या कोशिका भक्षण के नाम से प्रस्तुत किया। बाद में मैचनीकॉफ को 1908 ई० में नोबेल पुरस्कार (Noble prize) से भी सम्मानित किया गया।

यद्यपि अनेक बार लुई पाश्चर (Louis Pasteur) को उनके सूक्ष्म जीवों के कार्य के लिए प्रतिरक्षा विज्ञान के जनक’ (father of immunology) के रूप में सम्मानित किया जाता है। यद्यपि अन्य लोग एमिल वॉन बैहरिंग (Emil Von Behring) को ‘फादर ऑफ इम्यूनोलॉजी’ कहते हैं। ऐबामोफ (Abamoff, 1970) के अनुसार, प्रतिरोध क्षमता शरीर की वह क्षमता है, जो अपने से बाहर के पदार्थों को नष्ट कर देती है अथवा बाहर निष्कासित करके रोगजनकों से अपनी सुरक्षा करने में सक्षम होती है।

प्रश्न 4.
कोशिका भक्षण को संक्षेप में वर्णन कीजिए तथा इसके उपयोग लिखिए। (2014)
या
टिप्पणी लिखिए – भक्षी कोशिका (2015)
उत्तर
श्वेत रुधिराणुओं में पादाभों द्वारा भ्रमण करने की क्षमता पायी जाती है। ये रुधिर के बहाव की उल्टी दिशा में भी भ्रमण कर सकते हैं। यही नहीं ये महीन केशिकाओं की दीवार के छिद्रों से निकलकर ऊतक द्रव्य में भी जाते रहते हैं। ऊतकों में जाकर अधिकांश श्वेत रुधिराणु जीवाणुओं, विषाणुओं, विष पदार्थों, टूटी-फूटी कोशिकाओं तथा अन्य अनुपयोगी निर्जीव कणों का अपने पादाभों द्वारा अन्तर्ग्रहण करते रहते हैं। इस प्रक्रिया को कोशिका भक्षण तथा श्वेत रुधिराणुओं को भक्षी कोशिका कहते हैं।

इस प्रक्रिया का प्रमुख उपयोग यह है कि इसके द्वारा हमारे शरीर में उपस्थित अनुपयोगी तत्त्वों का निराकरण होता रहता है।

प्रश्न 5.
इण्टरफेरॉन्स (interferons) क्या हैं? प्रतिरक्षी अनुक्रिया में इनका महत्त्व (कार्य) समझाइए। (2017)
या
‘इण्टरफेरॉन्स’ पर टिप्पणी लिखिए। (2015)
या
‘इण्टरफेरॉन के विषय में आप क्या जानते हैं? उस वैज्ञानिक का नाम बताइए जिसने इसका पता लगाया। इसकी रासायनिक प्रकृति एवं शारीरिक प्रतिरक्षा अनुक्रिया में महत्त्व बताइए। (2014)
या
इण्टरफेरॉन क्या हैं? इनका कार्य लिखिए। (2015)
या
इण्टरफेरॉन की परिभाषा एवं कार्य लिखिए। (2016)
उत्तर
इण्टरफेरॉन्स इण्टरफेरॉन्स (interferons) कशेरुकी जन्तुओं में वाइरस से संक्रमित कोशिकाओं द्वारा स्रावित एक ग्लाइकोप्रोटीन पदार्थ है जो इन कोशिकाओं को वाइरसों से संक्रमण के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करते हैं। इण्टरफेरॉन का उपयोग वाइरस संक्रमण के लिए रोग निवारक (therapeutic) तथा निरोधक (preventive) औषधियों के रूप में किया जाता है। आइसक्स तथा लिण्डनमैन (Isaacs and Lindenmann) ने सन् 1957 में इस प्रकार की प्रोटीन का पता लगाया और चूँकि इसके द्वारा अन्त:कोशिकीय विषाणुओं के गुणन को रोका (interfere) जाता है इसलिए इसको इण्टरफेरॉन (interferon) कहा गया।

ऐसा समझा जाता है कि इण्टरफेरॉन्स विषाणु केन्द्रकीय अम्ल (nucleic acid) संश्लेषक तन्त्र को बाधित करता है, किन्तु यह किसी प्रकार भी कोशिका के उपापचय (metabolism) में कोई विघ्न नहीं डालता है। यह भी निश्चित हो चुका है कि इण्टरफेरॉन्स कोशिका के बाहर उपस्थित विरिऑन्स (virions) आदि को किसी प्रकार भी प्रभावित नहीं करते हैं, न ही संक्रमण रोकने में किसी प्रकार सक्षम हैं। ये कोशिका के अन्दर ही क्रिया करते हैं अर्थात् केवल अन्त:कोशिकीय (intracellular) क्रियाएँ ही करते हैं।

प्रश्न 6.
प्रतिरक्षी प्रतिक्रिया (immune response) का विस्तार से वर्णन कीजिए। (2010, 12)
या
प्रौढ मानव में T तथा B-लिम्फोसाइट्स कहाँ बनते हैं? T एवं B-लिम्फोसाइट्स के परिपक्वन से आप क्या समझते हैं? (2014)
या
प्रतिरक्षण तन्त्र से आप क्या समझते हैं? प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया के दो प्रमुख प्रकार बताइए। (2015, 17, 18)
या
सेल्फ एवं नॉन-सेल्फ की पहचान के संदर्भ में, प्रतिरक्षा तंत्र की विशेषताएँ लिखिए। (2015)
या
प्रतिरक्षण तन्त्र क्या है? प्रतिरक्षण प्रतिक्रिया की प्रमुख विशेषताएँ बताइए। (2015)
उत्तर
प्रतिरक्षण तन्त्र
अनेक अंग हमारे शरीर में सभी प्रकार के रोगोत्पादक जीवों अर्थात् रोगाणुओं और प्रतिजनों के कुप्रभाव का प्रतिरोध करके समस्थैतिकता बनाए रखने के लिए एक तंत्र की रचना करते हैं, जिसे प्रतिरक्षण तन्त्र कहते हैं।

प्रतिरक्षी प्रतिक्रिया
प्रतिरक्षी प्रतिक्रियाएँ प्राणियों में एण्टीबॉडीज का निर्माण करने के लिए प्रेरित करती हैं। इसके लिए रुधिर वे लसीका में पाये जाने वाले लिम्फोसाइट्स शरीर में प्रवेश करने वाले रोगाणुओं या उनके एण्टीजन के प्रति सुग्राही हो जाते हैं और बाहरी जीवों (रोगाणुओं) को पहचानकर उनको नष्ट करके उनसे जीवनभर सुरक्षा प्रदान करते हैं। इस प्रकार प्रतिरक्षी प्रतिक्रिया की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित होती हैं –

1. आक्रामक की पहचान करना – प्रतिरक्षी प्रतिक्रिया का पहला और सबसे प्रमुख कार्य है। आक्रामक की पहचान करना। प्रतिरक्षी तन्त्र की लिम्फोसाइट्स शरीर में आये बाहरी पदार्थों व रोगाणुओं को पहचानने और उनको नष्ट करने का कार्य करती हैं। यह कार्य T और B लिम्फोसाइट्स करती हैं।

2. आक्रामक से बचाव या एण्टीजन को नष्ट करना – एण्टीबॉडीज निम्नलिखित चार प्रकार से बाह्य रोगाणुओं व एण्टीजन को नष्ट करते हैं

  1. निष्प्रभावी करके – एण्टीबॉडीज विषाणुओं से चिपककर उनके चारों ओर एक आवरण – सा बना लेती हैं जिससे विषाणु कायिक कोशिकाओं की प्लाज्मा झिल्ली से नहीं चिपकने पाते हैं और उनमें प्रवेश नहीं कर पाते हैं। इसी प्रकार एण्टीबॉडीज जीवाणुओं के विष को भी निष्प्रभावी कर देती हैं।
  2. समूहन – अकेली एण्टीबॉडी कई एण्टीजन्स से जुड़कर उनको समूह में एकत्र कर देती है। बाद में इन समूहों को मैक्रोफेज कोशिकाएँ निगलकर नष्ट कर देती हैं।
  3. अवक्षेपण – एण्टीबॉडीज विलेय एण्टीजन्स से जुड़कर उनको अविलेय बना देती हैं। फिर ये अवक्षेपित हो जाती हैं और मैक्रोफेज द्वारा नष्ट हो जाती हैं।
  4. पूरक तन्त्र का सक्रियण – एण्टीजन-एण्टीबॉडी कॉम्प्लेक्स अविशिष्ट प्रतिरक्षा तन्त्र के पूरक प्रोटीन अणुओं की श्रृंखला को सक्रिय कर देते हैं। ये प्रोटीन जीवाणु कोशिका की प्लाज्मा झिल्ली में रन्ध्र कर देते हैं जिससे ये फूलकर फट जाते हैं और नष्ट हो जाते हैं।

3. आक्रामक को याद रखना – प्रतिरक्षी तन्त्र की कोशिकाएँ शरीर में प्रवेश करने वाले पदार्थों को याद रखने वाली स्मृति कोशिकाओं का निर्माण करती हैं। B तथा T दोनों प्रकार की लिम्फोसाइट्स स्मृति कोशिकाओं को उत्पन्न करती हैं जो रुधिर एवं लसीका में सुप्तावस्था में पड़ी रहती हैं। शरीर में दूसरी बार उन्हीं एण्टीजन के प्रवेश करते ही उसकी विरोधी सभी स्मृति कोशिकाएँ सक्रिय होकर संक्रमण से शरीर की रक्षा के लिए तत्पर हो जाती हैं। इसे द्वितीयक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया कहते हैं।

T-लिम्फोसाइट्स या T-कोशिकाओं की एण्टीजन के प्रति अनुक्रिया – रोगाणुओं द्वारा उत्पन्न एण्टीजन के सम्पर्क में आने पर T-लिम्फोसाइट्स सक्रिय हो जाती हैं और ये वृद्धि करके समसूत्री विभाजन द्वारा विभाजित होती हैं। विभाजन के बाद निम्नलिखित चार प्रकार की T-लिम्फोसाइट्स बनती हैं –

  1. मारक कोशिकाएँ (Killer T-cells) – ये कोशिकाएँ रोगाणु कोशिकाओं पर सीधे आक्रमण करके उन्हें नष्ट कर देती हैं।
  2. दमनकारी या निरोधक कोशिकाएँ (Suppressor Cells) – ये शरीर की अपनी कोशिकाओं को नष्ट होने से बचाने के लिए संक्रमण समाप्त होने के बाद T व B कोशिकाओं की सक्रियता को भी समाप्त करती हैं।
  3. सहायक कोशिकाएँ (Helper Cells) – ये कोशिकाएँ B-कोशिकाओं को सक्रिय करती हैं तथा . इनके द्वारा स्रावित इण्टरल्यूकिन-2 विभिन्न प्रकार की T-कोशिकाओं की सक्रियता को बढ़ाकर प्रतिरक्षी प्रतिक्रिया को बढ़ाती हैं।
  4. स्मृति कोशिकाएँ (Memory Cells) – रोगाणुओं के सम्पर्क में आयी कुछ B-कोशिकाएँ संवेदनशील होने के बाद लसीका ऊतक में स्मृति कोशिकाओं के रूप में संगृहीत हो जाती हैं। और आजीवन जीवित रहती हैं। पुनः वही आक्रमण होने पर ये कोशिकाएँ तुरन्त सक्रिय हो जाती हैं।

B-लिम्फोसाइट्स या B-कोशिकाओं की एण्टीजन के प्रति अनुक्रिया – ऊतक द्रव में एण्टीजन के प्रवेश कर जाने पर B-लिम्फोसाइट्स उद्दीप्त होकर एण्टीबॉडीज बनाती हैं। एक विशिष्ट प्रकार के एण्टीजन के लिए विशिष्ट प्रकार की B-कोशिकाएँ होती हैं। कुछ B-लिम्फोसाइट्स सक्रिय होकर प्लाज्मा कोशिकाओं का एक क्लोन बनाती हैं। प्लाज्मा कोशिकाएँ लसीका ऊतक में रहकर एण्टीबॉडीज का निर्माण करती हैं। ये एण्टीबॉडीज लसीका एवं रुधिर में परिवहन करती रहती हैं। कुछ सक्रिय B-लिम्फोसाइट्स स्मृति कोशिकाओं के रूप में लसीका ऊतक में संचित हो जाती हैं। शरीर में पुनः वही संक्रमण होने पर ये अपने जैसी लाखों कोशिकाएँ बनाकर तेजी से विशिष्ट एण्टीबॉडीज का उत्पादन प्रारम्भ कर देती हैं।

प्रश्न 7.
टीकाकरण पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2013, 17)
या
टीका एवं टॉक्साइड्स का तुलनात्मक वर्णन कीजिए। (2014, 15)
उत्तर
टीकाकरण
वैक्सीन अथवा टीका (vaccine) प्रायः कोशिका निलम्बन (cell suspension) होता है अथवा यह कोशिका द्वारा उत्सर्जित एक उत्पाद होता है, जो प्रतिरक्षण कर्मक (immunizing agent) के रूप में प्रयोग किया जाता है। वास्तव में, वैक्सीन प्रतिजनों (antigens) का तैयार घोल होता है, जो इन्जेक्शन द्वारा शरीर में प्रविष्ट कराने पर विशिष्ट प्रतिरक्षियों (antibodies) के निर्माण को प्रेरित करके शरीर में सक्रिय कृत्रिम प्रतिरोध क्षमता या प्रतिरक्षा उत्पन्न करता है। यह क्रिया ही टीकाकरण (vaccination) कहलाती है। सबसे पहले सन् 1798 में एडवर्ड जेनर (Edward Jenner) ने टीकाकरण की तकनीक में गौशीतला विषाणु (cowpoxvirus) को चेचक (smallpox) के विरुद्ध प्रतिरक्षण कर्मक (immunizing agent) के रूप में प्रयोग किया था। एडवर्ड जेनर को प्रतिरक्षा विज्ञान का जनक (father of immunology) माना जाता है।

टीके या वैक्सीन के प्रकार
सामान्यतः ये निम्नांकित प्रकार के होते हैं –
1. जीवित प्रतिजन से निर्मित वैक्सीन – इसमें जीवित जीवाणुओं या विषाणुओं को क्षीणीकृत (attenuated) करके घोल तैयार किया जाता है, जो प्रतिजनयुक्त होता है। इस प्रकार का वैक्सीन अच्छा माना जाता है, क्योंकि इसकी थोड़ी-सी मात्रा शरीर में प्रविष्ट कराने से जीवाणु या विषाणु गुणन करके बहुत अधिक मात्रा में बढ़ जाते हैं। इसमें सूक्ष्म जीवों के अतिरिक्त उनका विष भी रहता है जिससे कि यह अधिक प्रभावशाली होते हैं तथा इनके प्रभाव से उत्पन्न प्रतिरोध क्षमता अधिक लम्बे समय तक शरीर में बनी रहती है।

2. मृत प्रतिजन से निर्मित वैक्सीन – इसमें सूक्ष्मजीवों को मृत करके उनका घोल इन्जेक्शन द्वारा शरीर में प्रविष्ट कराया जाता है। इसका प्रमुख लाभ यह है कि रोगजनक सूक्ष्मजीव रोग का प्रभाव उत्पन्न नहीं कर पाता है। अतः टीकाकरण के बाद इसके दुष्प्रभाव बहुत कम दिखायी। देते हैं। यह वैक्सीन जीवित प्रतिजन से निर्मित वैक्सीन की अपेक्षा कम प्रभावशाली है।

3. प्रतिजन के आविष से निर्मित वैक्सीन – कुछ रोगजनक जीवाणु जो बहि:आविष (exotoxin) उत्पन्न करते हैं, उन्हें प्रतिजन से अलग करके केवल यह आविष (toxin), आविषाभ (toxoid) के रूप में शरीर में प्रविष्ट कराकर प्रतिरक्षी एवं प्रतिआविष (antitoxin) के निर्माण के लिए उत्प्रेरित किया जा सकता है। इस श्रेणी में टिटेनस (tetanus) एवं टायफॉइड (typhoid) के वैक्सीन आते हैं जो इन रोगों के बचाव हेतु बहुत सरल एवं सुरक्षित साधन होते हैं।

4. मिश्रित वैक्सीन – कभी-कभी दो या अधिक विभिन्न प्रकार के रोगों के रोगजनक सूक्ष्मजीव अथवा प्रतिजनों के मिश्रण से एक वैक्सीन तैयार किया जाता है। इसमें सभी वैक्सीन मिलाकर एक वैक्सीन का निर्माण किया जाता है जिससे कि इसमें सभी वैक्सीन के गुण आ जाते हैं और शीघ्र ही कई रोगों के प्रति प्रतिरोध क्षमता उत्पन्न हो जाती है। उदाहरण – डिफ्थीरिया-कुकुर या काली खाँसी-टिटेनस वैक्सीन (diphtheria- pertussis-tetanus vaccine = DPT)।

प्रश्न 8.
विषाणु द्वारा उत्पन्न एक रोग का नाम, लक्षण, उपचार तथा बचाव के उपाय बताइए। (2011, 12, 15)
उत्तर
विषाणु रोग : एड्स
एड्स (AIDS) एक भयंकर, प्रायः लाइलाज तथा अत्यन्त गम्भीर रोग है।
एड्स तथा उसके लक्षण (AIDS and its Symptoms) – HIV जो एड्स (AIDS) रोग उत्पन्न करने वाला विषाणु है, की मुख्य लक्ष्य कोशिकाएँ (target cells) T, लिम्फोसाइट्स (TA lymphocytes) होती हैं। इस प्रकार विषाणु शरीर में पहुँचकर इन कोशिकाओं को संक्रमित करता है और एक प्रोवाइरस (provirus) निर्मित करता है जो पोषद कोशिका (host cell) के डी० एन० ए० में समाविष्ट हो जाता है। इस प्रकार पोषद कोशिका अन्तर्हित संक्रमित (latent infected) हो जाती है। समय-समय पर प्रोवाइरस सक्रिय होकर पोषद कोशिका में सन्तति विरिओन्स (daughter virions) का निर्माण करते रहते हैं, जो पोषद कोशिका से मुक्त होकर नयी T, लिम्फोसाइट्स को संक्रमित करने में पूर्णतः सक्षम होते हैं।

इस प्रकार लिम्फोसाइट की क्षति से मनुष्य की प्रतिरक्षण क्षमता धीरे-धीरे दुर्बल होती जाती है। सामान्यतः 4-12 वर्षों तक तो व्यक्तियों में HIV के संक्रमण का पता तक नहीं चलता। कुछ व्यक्तियों को संक्रमण के कुछ हफ्तों के बाद ही सिरदर्द, घबराहट, हल्का बुखार आदि हो सकता है। धीरे-धीरे प्रतिरक्षण क्षमता कमजोर होने से जब व्यक्ति पूर्ण रूप से एड्स (AIDS) अर्थात् उपार्जित प्रतिरक्षा-अपूर्णता संलक्षण (Acquired Immuno-Deficiency Syndrome) का शिकार हो जाता है तो उसमें भूख की कमी, कमजोरी, थकावट, पूर्ण शरीर में दर्द, खाँसी, मुख व आँत में घाव, सतत ज्वर (persistant fever) एवं अतिसार (diarrhoea) तथा जननांगों पर मस्से हो जाते हैं। अन्ततः इनका प्रतिरक्षण तन्त्र इतना दुर्बल हो जाता है कि व्यक्ति अनेक अन्य रोगों से ग्रसित हो जाता है तथा उसकी मृत्यु हो जाती है।

एड्स रोग का संचरण (Transmission of AIDS) – रोगी के शरीर से स्वस्थ मनुष्य के शरीर के साथ रुधिर स्थानान्तरण, यौन सम्बन्ध, इन्जेक्शन की सूई का परस्पर उपयोग, रोगी माता से उसकी सन्तानों में संचरण आदि एड्स रोग के विषाणु (virus) के संचरण की विधियाँ हैं।

एड्स का रोगनिदान एवं उपचार (Diagnosis and Treatment of AIDS) – अभी तक एड्स (AIDS) के लिए किसी प्रभावशाली स्थाई उपचार की विधि का विकास नहीं हो पाया है। इसीलिए संसार भर में सैकड़ों लोगों की मृत्यु प्रतिदिन इस रोग से हो जाती है।

रुधिर में प्रतिरक्षी प्रोटीन की उपस्थिति एवं अनुपस्थिति का पता सीरमी जाँच (serological test) द्वारा लगाकर, HIV के संक्रमण के होने या न होने का पता लगाया जाता है। इन प्रतिरक्षियों की सीरमी जाँच के लिए ELISA किट (एन्जाइम सहलग्न प्रतिरोधी शोषक जाँच किट) का निर्माण किया गया है। मुम्बई के कैन्सर अनुसन्धान संस्थान (Cancer Research Institute) ने “HIV-1 तथा HIV-II W. Biot” किट बनाया। लगभग तीस औषधियों में AIDS के इलाज की क्षमता का पता लगाया गया है; जैसे-जाइडोवुडाइन, ऐजोडोथाइमिडीन (Zidovudine, Azodothymidine–AZT), XQ – 9302, ऐम्फोटेरिसीन आदि।

एइस पर नियन्त्रण (Control on AIDS) – एड्स पर नियन्त्रण के लिए अभी तक कोई टीका (vaccine) आदि नहीं बनाया जा सका है। इसे निम्न प्रकार से नियन्त्रित किया जा सकता है –

  1. किसी अनजाने व्यक्ति के साथ यौन सम्बन्ध स्थापित नहीं करना चाहिए।
  2. एक बार उपयोग की गई इन्जेक्शन की सूई का प्रयोग दोबारा नहीं किया जाना चाहिए।
  3. एड्स संक्रमित व्यक्ति को किसी भी तरह से रुधिर दान नहीं करना चाहिए।
  4. रुधिर आधान से पूर्व रुधिर का HIV मुक्त होना आवश्यक है अर्थात् इसकी पूर्ण जाँच अनिवार्य होनी चाहिए।

प्रश्न 9.
स्टेम कोशिका के बारे में आप क्या जानते हैं? चिकित्सकीय उपचार में उनकी भूमिका की समीक्षा कीजिए। (2017)
उत्तर
बहुकोशिकीय जीवों की ऐसी अभिन्नित कोशिकाएँ (undifferentiated cells) जिनमें विभाजन द्वारा उसी प्रकार की असंख्य कोशिकाएँ उत्पन्न करने की क्षमता हो तथा इन कोशिकाओं के विभिन्नन (differentiation) से अन्य विशिष्ट कोशिकाएँ बन सकें, स्टेम कोशिका कहलाती हैं। एक स्टेम कोशिका अनेक प्रकार की कोशिकाओं एवं ऊतक का निर्माण करने में सक्षम होती है। मानव में विभिन्न रोगों के उपचार हेतु स्टेम कोशिकाओं का अत्यधिक महत्त्व है। इससे सम्बन्धित कुछ उपचार निम्नलिखित हैं –

  1. हृदय रोग (Heart Disease) – पेशी हृदय स्तर रोधगलने (myocardial infraction) रोग के उपचार हेतु अस्थिमज्जा स्टेम कोशिकाओं को उपयोग करके हृदय पेशियों तथा हृदय पेशी कोशिकाओं एवं ऊतकों को बनाया जाता है।
  2. त्वचा निरोपण (Skin Grafting) – आग या अम्ल से झुलसी त्वचा का निरोपण त्वचा की स्टेम कोशिकाओं से तैयार त्वचा द्वारा किया जाता है।
  3. रुधिर कैंसर उपचार (Leukemia Treatment) – रुधिर कैंसर रोगी में कीमोथिरेपी (chemotherapy) से अस्थिमज्जा नष्ट हो जाती है जिसे स्टेम कोशिका प्रत्यारोपण द्वारा सही किया जाता है।
  4. कॉर्निया प्रत्यारोपण (Cornea Transplantation) – कॉर्निया के खराब हो जाने पर स्टेम कोशिकाओं द्वारा विकसित कॉर्निया का प्रत्यारोपण करके इसे ठीक किया जाता है। इस विधि को होलोक्लार (holoclar) कहते हैं।
  5. बहरापन का इलाज (Treatment of Deafness) – निकट भविष्य में स्टेम कोशिकाओं द्वारा बहरेपन (deafness) का भी इलाज किया जा सकेगा।
  6. गर्भनाल रक्त संग्रह (Umblical Cord Blood Storage) – गर्भनाल से रक्त स्टेम कोशिकाओं को प्राप्त करके इसे सुरक्षित किया जाता है। इसका उपयोग रुधिर कणिकाओं एवं प्लेटलेट्स के निर्माण में किया जाता है।
  7. नई दवाइयों के परीक्षण हेतु भी स्टेम कोशिकाओं से ऊतक संवर्धन करके इन पर बीमारी की प्रकृति एवं दवाइयों के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संक्रामक तथा असंक्रामक रोग से आप क्या समझते हैं? प्रत्येक के दो-दो उदाहरण देकर इनके लक्षण, कारक एवं रोकथाम के उपाय लिखिए। (2014)
या
टिप्पणी लिखिए-न्यूमोनिया एवं टाइफॉइड (2015)
या
जुकाम किन विषाणुओं से होता है? जुकाम के दो लक्षण लिखिए। (2017)
या
कैंसर रोग के कारण, रोकथाम एवं बचाव पर प्रकाश डालिए। (2017)
उत्तर
संक्रामक रोग
वे रोग जो एक व्यक्ति से दूसरे में आसानी से संचारित हो सकते हैं, संक्रामक रोग कहलाते हैं।
1. न्यूमोनिया
कारक – यह रोग मुख्यत: शिशुओं व वृद्धजनों में होता है परन्तु अन्य उम्र के लोगों में भी हो सकता है। फेफड़ों में होने वाला यह संक्रामक रोग स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनिआई व हीमोफिलस इन्फ्लुएंजी नामक जीवाणुओं से होता है। इनके अतिरिक्त स्टेफाइलोकोकस पाइरोजीन्स, क्लीष्सीला न्यूमोनिआई तथा चेचक व खसरा उत्पन्न करने वाले विषाणु व माइकोप्लाज्मा भी इस रोग के कारक हो सकते हैं। न्यूमोनिया दो प्रकार का होता है –

  1. विशिष्ट न्यूमोनिया – यह स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनिआई नामक जीवाणु से होता है। यह रोग सामान्य श्वसन तंत्र वाले व्यक्तियों में होता है।
  2. द्वितीयक न्यूमोनिया – यह इन्फ्लुएंजा पीड़ित व्यक्ति में स्टेफाइलो कोकाई जीवाणु द्वारा होता है। यह रोग उन व्यक्तियों में होता है जिनके फेफड़े इस रोग से पूर्व प्रभावित होते हैं।

लक्षण 

  1. रोगी को श्वास लेने में बाधा उत्पन्न होती है।
  2. रोगी को तीव्र सर्दी लगती है।
  3. रोगी को तीव्र ज्वर भी होता है।
  4. रोगी की भूख मर जाती है।

रोकथाम के उपाय 

  1. संक्रमित व्यक्ति से दूर रहना चाहिए।
  2. रोगी के द्वारा प्रयोग किये गये गर्म वस्त्र, बर्तन, बिस्तर आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  3. घर तथा पड़ोस में स्वच्छता बनाये रखनी चाहिए।

2. जुकाम या सामान्य ठण्ड
कारक – यह अति संक्रामक रोग पिकोवायरस समूह के रहिनो विषाणु द्वारा होता है। यह विषाणु जल की कणिकाओं तथा नाक के स्राव से एक-दूसरे में फैलता है।
लक्षण – आँखों तथा नाक से पानी आना, खांसी तथा बुखार आना, हाथ-पैर व कमर में दर्द रहना, बेचैनी रहना वे शरीर का कमजोर हो जाना।
रोकथाम के उपाय – इस रोग से बचाव हेतु, संक्रमित व्यक्ति से दूर रहना चाहिए। रोगी को खाँसते या छींकते समय रूमाल से मुंह ढक लेना चाहिए। इस रोग से संक्रमित व्यक्ति की वस्तुओं के उपयोग से बचना चाहिए।

3. टाइफॉइड ज्वर
यह संक्रामक रोग ग्राम नेगेटिव, रॉड की आकृति वाले गतिशील जीवाणु (gram negative, rode shaped motile bacteria) द्वारा होता है। इसे सालमोनेला टायफी (Salmonella typhi) भी कहते हैं। यह जीवाणु छोटी आँत में रहता है व रक्त परिसंचरण द्वारा शरीर के अन्य भागों में फैल जाता है। यह रोग अधिकतर गर्मी में होता है तथा इसका जीवाणु संक्रमित भोजन, जल, मल-मूत्र आदि द्वारा लोगों में पहुँचता है। मक्खियाँ इस रोग को फैलाने में मुख्य भूमिका निभाती हैं। प्राकृतिक आपदाओं; जैसे- बाढ़ आदि के समय भी यह रोग अधिक फैलता है। यह रोग पूरे विश्व में पाया जाता है, प्रायः यह 1-15 वर्ष के बालकों में अधिक होता है।

लक्षण (Symptoms)

  1. रोगी को लम्बे समय तक तेज बुखार रहता है।
  2. पूरे शरीर में दर्द रहता है।
  3. भूख नहीं लगती है तथा आँतों में परेशानियाँ होने लगती हैं।
  4. इसके साथ-साथ रोगी की नाड़ी धीमी हो जाती है तथा शरीर पर चमकीले छोटे-छोटे दाने निकल आते हैं।
  5. कभी – कभी रोगी की आँतों से रक्त स्रावित होने लगता है। सही समय पर उपचार न होने पर रोगग्रस्त व्यक्तियों में से 10% की मृत्यु हो जाती है।

बचाव के उपाय (Measures of Prevention)

  1. खाद्य पदार्थों को हमेशा ढककर रखना चाहिए, जिससे मक्खियाँ जीवाणुओं को खाने तक न ला सकें।
  2. रोगी को हवादार तथा रोशनीयुक्त कमरे में रखना चाहिए।
  3. रोगी के मलमूत्र, थूक आदि को जलाकर नष्ट कर देना चाहिए।
  4. जल व अन्य पदार्थों को उबालकर प्रयोग में लेना चाहिए।
  5. बाजार के खुले खाद्य पदार्थों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  6. वातावरण को स्वच्छ रखना चाहिए तथा कीटनाशकों का नियमित छिड़काव करना चाहिए।
  7. TAB के टीके (TAB vaccine) लगवाने चाहिए।

रोग का उपचार (Treatment of Disease)

  1. इस रोग की जाँच विडाल टेस्ट (widal test) द्वारा की जाती है।
  2. इस रोग में क्लोरोमाइसिटीन, एपिसीलीन (ampicilline) व क्लोरेम्फेनिकोल (chloramphenicol) नामक दवाइयाँ लाभदायक होती हैं।
  3. अब रोगी के शरीर से पित्ताशय को निकालकर भी रोग का उपचार किया जाता है।

असंक्रामक रोग
वे रोग जो एक व्यक्ति से दूसरे में संचारित नहीं होते हैं, असंक्रामक रोग कहलाते हैं।
1. एलर्जी
कारक – हममें से कुछ लोग पर्यावरण में मौजूद कुछ कणों; जैसे-पराग, चिंचड़ी, कीट आदि के प्रति संवेदनशील होते हैं। इनके सम्पर्क में आने से ही हमारे शरीर में प्रतिक्रियास्वरूप खुजली आदि प्रारम्भ हो जाती है। यही एलर्जी है।
लक्षण 

  1. हमारे शरीर पर लाल दाने या चकते पड़ जाते हैं।
  2. शरीर में खुजली होती है।
  3. छींक आती है।
  4. नाक में से पानी बहता है।

रोकथाम के उपाय – हमें नये स्थान पर जाते समय वहाँ की भौगोलिक दशा के अनुरूप तैयारी करनी चाहिए अर्थात् यदि वहाँ धूल, पराग आदि अधिक होने की संभावना हो तो मुंह पर मास्क लगाकर निकलना चाहिए। शरीर को पूरा ढककर बाहर निकलना चाहिए तथा एलर्जी हो जाने पर प्रति हिस्टैमीन, एड्रीनेलिन और स्टीराइडों जैसी औषधियों का प्रयोग करना चाहिए।

2. कैंसर
कारक – सामान्य कोशिकाओं को कैंसरी कोशिकाओं में रूपान्तरण को प्रेरित करने वाले कारक भौतिक, रासायनिक अथवा जैविक हो सकते हैं। ये कारक कैंसरजन कहलाते हैं। एक्स किरणें, गामा किरणें, पराबैंगनी किरणें, तम्बाकू के धुएँ में मौजूद कैंसरजन आदि कैंसर उत्पन्न करने के प्रमुख कारण हैं।

लक्षण – कैंसर ग्रस्त रोगी के शरीर में गाँठे पड़ जाती हैं जो बढ़ती रहती हैं।
रोकथाम के उपाय – कैंसरों के उपचार के लिए शल्यक्रिया, विकिरण चिकित्सा और प्रतिरक्षा चिकित्सा का प्रयोग किया जाता है। आजकल कीमोथैरेपी का प्रचलन बढ़ गया है क्योंकि इससे रोग के समाप्त होने की संभावना अधिक होती है।

प्रश्न 2.
एस्केरिएसिस से आप क्या समझते हैं? इसके बचाव, उपचार और नियंत्रण का उल्लेख कीजिए। (2013, 14)
उत्तर
एस्केरिएसिस
यह रोग मनुष्य की आँत में रहने वाले परजीवी एस्केरिस लुम्ब्रिकॉयड्स (Ascaris lumbricoides) नामक, गोल कृमि से होता है। संक्रमित भोजन के साथ इस परजीवी के अण्डे मनुष्य की आँत में पहुँच जाते हैं। आँत में इसका लार्वा छेद करके हृदय, फेफड़े, यकृत को संक्रमित करता है। यह परजीवी हमारी आँत में पचे हुए भोजन पर निर्भर करता है। आँत में इसकी संख्या 500-5000 तक हो सकती है।

लक्षण व रोग जनकता (Symptoms and Pathogenecity) – इस रोग के मुख्य लक्षण हैं-पेट में दर्द, उल्टियाँ, अपेन्डिसाइटिस (appendicitis), अतिसार (diarrhoea), गैस्ट्रिक अल्सर (gastric ulcer), सन्नित (delirium), घबराहट, ऐंठन (convulsions) आदि। परपोषी की आँत में इस परजीवी के होने का कोई विशेष नुकसान नहीं होता है किन्तु संक्रमित बालक कुपोषण का शिकार होकर दुर्बल हो जाते हैं, इनकी वृद्धि मन्द हो जाती है। रोगी को हमेशा वमन की इच्छा बनी रहती है जिससे मन व मस्तिष्क बेचैन रहते हैं। आँत में एस्केरिस की संख्या अधिक होने पर पेट दर्द, भूख न लगना, अनिद्रा, दस्त, उल्टी आदि लक्षण विकसित हो जाते हैं।

एस्केरिस के द्वारा रोगी का उण्डुक (appendix) अवरुद्ध हो जाता है जिससे उदरशूल (colic pain) व उण्डुक पुच्छशोथ (appendicitis) विकार हो जाते हैं। रोगी के पित्तनली, अग्न्याशयी नाल आदि में एस्केरिस के फँस जाने पर स्थिति गम्भीर हो जाती है। एस्केरिस रोगी के शरीर में घूमता रहता है जिससे फेफड़े, आँत की दीवारें व रक्त केशिकाएँ घायल हो जाती हैं जिससे रक्तस्राव प्रारम्भ हो जाता है, फलस्वरूप रोगी दुर्बलता, सूजन, ऐंठन आदि का शिकार हो जाता है। शिशु एस्केरिस विपथगामी भ्रमण द्वारा रोगी के मस्तिष्क, वृक्क, नेत्र, मेरुदण्ड आदि में प्रवेश कर जाता है जिससे इन अंगों को हानि पहुँचती है।
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 8 Human Health and Disease img-6

रोकथाम (Control) – अपने आस-पास के वातावरण को स्वच्छ रखना, मल-मूत्र का खुला विसर्जन न करना, प्रदूषित भोजन व सड़े-गले फल-सब्जी आदि से बचना, भोजन करने से पूर्व हाथों को भली-भाँति धोना, शौचालय की साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देना व स्वच्छ जल का प्रयोग करना आदि इस रोग की रोकथाम के प्रमुख उपाय हैं। रोग होने पर इस परजीवी को मारने के लिए पाइपराजिन सिट्रेट (piperazin citrate) तथा पाइपराजिन फॉस्फेट (piperazin phosphate) औषधियों का प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त मीबेन्डाजोल (mebendazole), पाइरान्टेल पामोएट (pyrantel pamoate) व ऐल्बेन्डाजोल (albendazole) औषधियाँ भी इस रोग के इलाज में प्रयुक्त की जाती हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Biology Chapter 8 Human Health and Disease img-7

निदान एवं चिकित्सा (Diagnosis and Therapy) – एस्केरिस रोग के संक्रमण की पहचान रोगी के मल में इसके अण्डों की उपस्थिति से होती है। एस्केरिस द्वारा होने वाले रोग को एस्केरिएसिस (ascariasis) कहा जाता है। रोगी की आँत से कृमि को निकालने हेतु बथुआ का तेल (oil of chenopodium), डीमेटोड (dematode), मीबेन्डाजोल (mebendazole), जीटोमिसोल-पी (zetomisol-p), हेट्राजान (hetrazan), वर्मिसोल (vermisol), केट्राक्स (ketrax), जेन्टेल (zentel), एन्टीपार (antipar), एल्कोपार (alcopar), डिकैरिस (decaris) आदि औषधियाँ प्रयुक्त की जाती हैं। वर्तमान में 12 घंटे के उपवास के साथ हैक्सिल रिसॉर्सिनाल (hexylresorcinol) का तथा पाइपराजीन (piperazine), हैल्मेसिड सिना के साथ (halmacid with senna) आदि का उपयोग अत्यन्त प्रभावशाली सिद्ध हो रहा है।

प्रश्न 3.
मलेरिया रोग के रोगजनक, लक्षण तथा उपचार लिखिए। (2014)
या
मलेरिया तथा इसके नियंत्रण पर टिप्पणी लिखिए। (2014)
या
मलेरिया रोग के रोगजनक तथा रोगवाहक का नाम लिखिए और उसके लक्षण एवं निदान बताइए।
(2015, 17)
उत्तर
रोगजनक – मलेरिया रोग का जनक एक प्रोटोजोआ जीव प्लाज्मोडियम है। प्लाज्मोडियम वाइवैक्स, प्लाज्मोडियम ओवल, प्लाज्मोडियम मलेरी तथा प्लाज्मोडियम फैल्सीपेरम इस जीव की प्रमुख जातियाँ हैं जो मलेरिया रोग के लिए उत्तरदायी हैं।
लक्षण 

  1. इस रोग में रोगी की भूख मर जाती है।
  2. रोगी को तीव्र ज्वर चढ़ जाता है।
  3. रोगी को कब्ज हो जाता है तथा जी मिचलाता है।
  4. रोगी का मुँह सूखने लगता है।
  5. रोगी के सिर, पेशियों और जोड़ो में तीव्र दर्द होता है।

उपचार – मलेरिया के उपचार के लिए 300 वर्षों से कुनैन एक परम्परागत औषधि बनी हुई है। यह डच ईस्ट इण्डीज, भारत, पेरू, लंका आदि देशों में सिन्कोना वृक्ष की छाल के सत से बनाई जाती है। यह रोगी के रुधिर में उपस्थित प्लाज्मोडियम की सभी प्रावस्थाओं को नष्ट कर देती है। कुनैन से मिलती-जुलती कृत्रिम औषधियाँ-ऐटीब्रिन, बेसोक्विन, एमक्विन, मैलोसाइड, मेलुब्रिन, निवाक्विन, रेसोचिन, कामोक्विन, क्लोरोक्विन आदि आजकल प्रचलित हैं। पेल्यूड्रिन, मेपाक्रीन, पैन्टाक्विन, डेराप्रिम, प्राइमाक्विन एवं प्लाज्मोक्विन रोगी के यकृत में उपस्थित प्लाज्मोडियम की प्रावस्थाओं को भी नष्ट करती हैं।

बचाव व नियन्त्रण – मलेरिया से बचाव व इसके नियन्त्रण के निम्नलिखित उपाय हैं –

  1. तालाब व गड्ढों में पानी जमा नहीं रहने देना चाहिए।
  2. घरेलू कुलर आदि में भी पानी की सफाई दो-तीन दिन के उपरान्त करनी चाहिए। नाली व अन्य पानी जमा होने वाले स्थानों पर मच्छरों का जनन रोकने हेतु मिट्टी का तेल डालना चाहिए। मच्छर के लारवा को खाने वाली मछलियों को तथा बतखों को पानी में छोड़ देते हैं। तथा यूट्रीकुलेरिया (Utricularia) जैसे पादपों को पानी में उगाते हैं।
  3. मच्छर के जनन स्थानों को नष्ट कर देना चाहिए तथा नालियों को खुला नहीं छोड़ना चाहिए।
  4. D.D.T, B.H.C. आदि का प्रयोग मच्छर नष्ट करने हेतु करना चाहिए परन्तु इन दोनों का प्रयोग भारत में प्रतिबन्धित है।
  5. क्लोरोक्विन, प्राइमोक्विन, डाराप्रिम दवाओं का प्रयोग रोगी को स्वस्थ करने में सहायक होता है।
  6. मच्छरों को दूर भगाने हेतु allout तेल व क्रीम तथा मच्छरदानी का प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 4.
निम्न पर टिप्पणी लिखिए –
(क) डेंगू बुखार (2018)
(ख) फाइलेरिंएसिस (2015, 16, 17)
उत्तर
(क) डेंगू बुखार
यह एक विषाणुजनित बुखार है, जिसे हड्डीतोड़ बुखार भी कहते हैं। डेंगू विषाणु की वाहक मादा ऐडीज मच्छर (Aedes aegypti) है। इस रोग का विषाणु फ्लेविवाइरिडी (flaviviridae) कुल का सदस्य है जिसे फ्लेविवाइरस (Flavivirus) कहा जाता है। इसे आर्बोवाइरस (Arbovirus) भी कहते हैं क्योंकि यह विषाणु मच्छरों (arthropod vector) द्वारा संचारित होता है।

डेंगू विषाणु की चार से पाँच स्ट्रेन्स (strains) या सेरोटाइप (serotypes) पायी जाती है जिन्हें क्रमशः DENV-1, DENV-2, DENV-3, DENV-4 आदि कहते हैं। यदि किसी व्यक्ति में इसमें से किसी भी एक स्ट्रेन द्वारा संक्रमण हो जाता है, तो उसे डेंगू बुखार हो जाता है तथा व्यक्ति इस स्ट्रेन के लिए जीवन पर्यन्त प्रतिरक्षा (immunity) विकसित कर लेता है किन्तु दूसरे अन्य स्ट्रेन्स के प्रति प्रतिरक्षण न होने के कारण उनके द्वारा संक्रमण का खतरा बना रहता है।

मादा ऐडीज दिन में (मुख्यत: प्रात: काल एवं सायंकाल) मनुष्य को काटती है। मनुष्य डेंगू विषाणु का प्राथमिक पोषद (primary host) और मादा मच्छर इसका द्वितीयक पोषद (secondary host) है। मनुष्य के शरीर में डेंगू विषाणु प्रवेश से लेकर बुखार का लक्षण प्रकट होने तक के समय को उद्भवन काल (incubation period) कहते हैं। यह 3 से 7 दिन कभी-कभी 10 से 12 दिन का होता है।

डेंगू बुखार के लक्षण (Symptoms of Dengue Fever) – डेंगू बुखार की दो श्रेणियाँ हैं –

  1. साधारण डेंगू बुखार—इसमें तेज ज्वर के साथ तेज सिरदर्द, जोड़ों में दर्द, चक्कर आना, भूख न लगना, मांसपेशियों में ऐंठन आदि हैं।
  2. प्रचण्ड डेंगू बुखार (Severe Dengue Fever) – इसकी दो अवस्थाएँ हैं –
    • डेंगू रक्तस्राव ज्वर (Dengue Haemorrhagic Fever) – इसमें सिरदर्द, बुखार, भूख न लगना, नाक-कान से रक्तस्राव होना, खून की उल्टी होना तथा रक्त में प्लेटलेट्स की संख्या घट जाना आदि इसके लक्षण हैं।
    • डेंगू घातक लक्षण (Dengue Shock Syndrome) – इसमें बेचैनी, रुधिर दाब का अत्यधिक कम हो जाना तथा शरीर के प्रमुख अंगों में तरल की कमी होना आदि लक्षण हैं।

डेंगू का उपचार (Treatment of Dengue) – डेंगू एक विषाणु जनित रोग है इसके लिए कोई प्रतिजैविक (antibiotic) नहीं है। इसके लिए सहायक उपचार ही मुख्य चिकित्सकीय सहायता है। डेंगू बुखार में पेरासिटामोल तथा दर्द निवारक ऐसिटामिनोफेन एवं कोडीन दिया जाना चाहिए। मैक्सिको की सनोफी (sanofi) फार्मा कम्पनी ने एक वैक्सीन डेंग्वाक्सिया तैयार किया। इसका प्रयोग बहुत जल्द शुरू हो जायेगा।

डेंगू की रोकथाम (Control of Dengue) – डेंगू के रोकथाम एवं उन्मूलन के लिए निम्न प्रमुख उपाय हैं –

  1. सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग।
  2. दिन में मच्छरों से बचाव के लिए मच्छर भगाने वाली क्रीम का प्रयोग।
  3. टंकी, कूलर, गमला आदि में जल संग्रह नहीं होने देना चाहिए, क्योंकि इसके वाहक मच्छर अपने लार्वा स्वच्छ जल में ही देते हैं।
  4. मच्छरों को मारने हेतु कीटनाशक का छिड़काव, लार्वा खाने वाले कीटों का प्रयोग आदि उपाय किए जाने चाहिए।

(ख) फाइलेरिएसिस
यह रोग क्यूलेक्स (Culex) मच्छर द्वारा फैलता है। यह ऐसे क्षेत्रों में अधिक होता है जहाँ मच्छर अधिक होते हैं व दूषित जल का प्रयोग किया जाता है। यह रोग एक निमेटोड वाउचेरेरिया बैंक्राफ्टी (Wuchereria buncrqfti) नामक परजीवी से होता है जो लसीका बाहिनियों (lymph ducts) में रहता है। इस परजीवी की जीवित व मृत दोनों अवस्थाओं से रोग होता है। जीवित अवस्था में यह ऐलीफेन्टियासिस (elephantiasis) या फाइलेरिएसिस (filariasis) नामक रोग उत्पन्न करता है, इसे हाथी पाँव भी कहते हैं।

इस रोग में लिम्फ वाहिनियों की एन्डोथीलियम कोशिकाएँ विभाजित होकर दीवारों को मोटा कर देती हैं। शुरुआत में रोगी को हल्का बुखार व शरीर में दर्द बना रहता है। लसीका नोड के ऊतक व अन्य अंगों; जैसे- यकृत, प्लीहा, अण्डकोष, टॉगों आदि में सूजन आने से इनको आकार बढ़ जाता है। इन अंगों में सूजन आने व लसीका बहने से ट्यूमर बन जाते हैं। इस रोग की गम्भीर अवस्था में टाँग का आकार सूजकर बढ़ जाता है तथा इस अवस्था को हाथी पाँव (elephantiasis) कहते हैं। इस रोग का संचरण क्यूलेक्स मच्छर द्वारा तीसरे चरण के लार्वा माइक्रोफाइलेरिया (Microfilaria) की अवस्था में होता है। क्यूलेक्स मच्छर द्वारा किसी मनुष्य को काटने पर लार के द्वारा माइक्रोफाइलेरिया लार्वा शरीर में प्रवेश कर जाता है। तत्पश्चात् यह रक्त व लसीका वाहिनियों में पहुंचकर वयस्क में रोग का संक्रमण कर देता है।

मादा क्यूलेक्स संक्रमित व्यक्ति के रुधिर से माइक्रोफाइलेरिया लार्वा को मुख्यतः रात के समय प्राप्त करती है; क्योंकि रात में यह लार्वा संक्रमित व्यक्ति की त्वचा के रुधिर वाहिनियों में आ जाते हैं।

रोकथाम (Control) – इस रोग से बचाव के लिए मच्छर व उनके लार्वा को नष्ट कर देना चाहिए तथा मच्छर के काटने से बचना चाहिए। वयस्क कृमियों को मारने के लिए आर्सेनिक से निर्मित दवा व M.S.Z. का प्रयोग किया जाना चाहिए। माइक्रोफाइलेरिया लार्वा को मारने के लिए डाइमिथाइल कार्बोमोनोजॉइन (dimethyl carbomonozoine) नामक दवी प्रभावी होती है। संक्रामक लार्वा के लिए पैरामेलेमिनाइल-फिनाइलस्टीबोनेट (paramelamynil-phenylstibonate) का प्रयोग किया जाता है। फाइलेरिया को पूर्ण रूप से समाप्त करने व फाइलेरिएसिस रोग की सूचना प्राप्त करने हेतु सरकार ने राष्ट्रीय फाइलेरिया नियन्त्रण कार्यक्रम (National Filaria Control Programme) चलाया है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित के सेवन से होने वाले हानिकारक प्रभावों का वर्णन कीजिए तथा इनसे बचने के उपायों को लिखिए – (2014)
(i) ऐल्कोहॉल (2017)
(ii) ड्रग (नशीली दवाएँ) (2017)
(iii) तम्बाकू
उत्तर-
(i) ऐल्कोहॉल
ऐल्कोहॉल (शराब) का सेवन करने से शरीर पर निम्नलिखित प्रमुख दुष्प्रभाव होते हैं –
1. शराब के प्रभाव से तन्त्रिका तन्त्र; विशेषकर केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र दुर्बल हो जाता है जिससे आत्म-नियन्त्रण समाप्त होना, मस्तिष्क कमजोर होना, स्मरण शक्ति क्षीण होना, विचार शक्ति लुप्त होना, अच्छे-बुरे का ज्ञान समाप्त होना, एकाग्रता की कमी होना आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। बाद में ऐसा व्यक्ति अपना आत्मसंयम तथा आत्मसम्मान खो देता है।

2. शराब में ऐल्कोहॉल होता है जो कोशिकाओं से जल और शरीर की आन्तरिक ग्रन्थियों से होने वाले स्रावों को तेजी से अवशोषित करता है। परिणामस्वरूप पहले तो यकृत (लिवर) सिकुड़कर छोटा हो जाता है और इसके बाद उसका आकार सामान्य से अधिक हो जाता है। जिससे उसकी प्राकृतिक क्रियाशीलता नष्ट हो जाती है। पाचन तन्त्र तथा श्वसन तन्त्र में अनेक विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। शरीर का पोषणे उचित न होने के कारण दुर्बलताएँ और अधिक बढ़ती हैं।

3. ऐल्कोहॉल आमाशय तथा आँतों की श्लेष्मिका झिल्ली को हानि पहुँचाता है। इसके फलस्वरूप पेप्टिक अल्सर हो जाता है। कभी-कभी पेप्टिक अल्सर के फोड़े कैन्सर भी बन जाते हैं।

4. कोशिकाओं से जल अवशोषित होने के कारण वे नष्ट हो जाती हैं और धीरे-धीरे शरीर; विशेषकर मांसपेशियाँ; दुर्बल होकर, शिथिल (ढीला-ढाला) पड़ जाता है।

5. शरीर में विटामिनों की कमी हो जाती है; विशेषकर विटामिन B श्रेणी के विटामिन (थायमीन आदि); और उनका वितरण अनियमित हो जाता है जो शरीर में अनेक प्रकार की विकृतियाँ और रोग उत्पन्न करता है।

6. रुधिर परिसंचरण प्रमुखतः त्वचा की ओर अधिक होने से त्वचा का रंग लाल हो जाता है। वास्तव में, इन स्थानों की रुधिर केशिकाएँ चौड़ी हो जाती हैं, अत: इस स्थान पर ताप अधिक हो जाता है।

7. भावनात्मकता यद्यपि बढ़ी हुई दिखाई देती है किन्तु शीघ्र ही उसमें आक्रामकता झलकने लगती है जो बाद में घृणास्पद हो जाती है।
ऐल्कोहॉल का आदी व्यक्ति अपने समस्त पारिवारिक सम्बन्धों की ओर से उदासीन अथवा कटु हो जाता है, उसमें सामाजिकता का अभाव होता जाता है तथा धीरे-धीरे वह आत्मकेन्द्रित हो जाता है। अनेक प्रकार की जटिलताएँ आयु के साथ (35-40 वर्ष से आगे) बढ़ती ही जाती हैं। कम-से-कम 5 प्रतिशत व्यक्ति हृदय अथवा वृक्कीय (cardiac or renal) जटिलताओं के कारण मर जाते हैं।

(ii) ड्रग (नशीली दवाएँ)
नशीली औषधियों को शरीर पर प्रभाव के आधार पर निम्नलिखित प्रकार से वर्गीकृत किया जाता है –
1. शामक व निद्राकारक – ये औषधियाँ केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र के उच्च केन्द्रों पर प्रभाव डालती हैं और कुछ क्षण के लिए चिन्ताओं को दूर करती हैं, तनाव व बेचैनी को कम करती हैं, निद्रा लाती हैं; जैसे-लुमिनल, इक्वेनिल, बार्बिट्यूरिक अम्ल आदि।

2. उत्तेजक या एण्टीडिप्रेसेन्ट्स – ये औषधियाँ केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र को उत्तेजित करती हैं। इनसे कष्ट से राहत तथा ठीक होने की संवेदना प्राप्त होती है। इनके कारण रक्त चाप बढ़ जाता है। इनकी अत्यधिक मात्रा उग्रता उत्पन्न करती है। इसके प्रयोग से चुस्त होने का अहसास एवं आत्मविश्वास उत्पन्न होता है; जैसे-कैसीन, कोकेन, टॉफरेनिल, मेथिलफेनिडेट आदि।

3. विभ्रमक या साइकेडेलिक औषधियाँ – ये पदार्थ श्रवण तथा दृष्टि भ्रम उत्पन्न करते हैं। इनके प्रयोग से रंग न होते हुए भी रंग का आभास होता है। व्यसनी (drug addict) को रंगीन स्वप्निल दुनिया का आभास होता है। इनके कारण प्रसन्नता को झूठा आभास होता है तथा समय, स्थान व दूरी का उचित सामंजस्य नहीं रहता। एल०एस०डी० (लाइसेर्जिक ऐसिड डाइएथिलैमाइंड = LSD), सीलोसाइविन, चरस, गाँजा, हशीश आदि विभ्रमकारी पदार्थ हैं।

4. ओपिएट – ओपिएट नारकोटिक तथा दर्दनाशक दवाइयों का एक वर्ग है जिसमें अफीम तथा इसके स्राव से बने मॉर्फीन, हेरोइन, कोडीन, मीथाडोन तथा पैथिडीन आते हैं। ये दर्द, चिन्ता तथा तनाव को कम करते हैं। इनसे निद्रा व सुस्ती आती है। व्यसनी स्वयं को अच्छा महसूस करते हैं। इनमें से हेरोइन सबसे खतरनाक है।

(iii) तम्बाकू
तम्बाकू का सेवन पान, बीड़ी, सिगरेट, सिगार, पाइप, पान मसाला आदि किसी भी रूप में किया जाए, इसके सेवन के अनेक दुष्प्रभाव होते हैं, जो निम्नलिखित हैं –

  1. तम्बाकू में निकोटिन नामक विष होता है जो फेफड़ों में एकत्रित होकर कैन्सर, दमा, तपेदिक आदि भयंकर रोगों को उत्पन्न होने में सहायता करता है।
  2. तम्बाकू के सेवन से रुधिर परिसंचरण की गति बढ़ जाती है जिससे उच्च रक्त चाप और हृदय सम्बन्धी अन्य रोग होने की सम्भावना बढ़ जाती है।
  3. धूम्रपान द्वारा तम्बाकू का सेवन अपने मार्ग मुंह, गला, फेफड़े इत्यादि की श्लेष्म कला (mucous membrane) पर हानिकारक प्रभाव डालता है। इससे कैन्सर जैसा भयंकर रोग होने की सम्भावना हो जाती है।
  4. श्लेष्म कला प्रभावित होकर अत्यधिक मात्रा में श्लेष्मक (mucous) स्रावित करती है, जिससे खाँसी, कफ (cough) और बाद में रोगाणुओं की रोकथाम की शक्ति (रोग अवरोधक क्षमता) कम होने से दमा, तपेदिक जैसे संक्रामक रोग भी शरीर में आसानी से घर कर लेते हैं।
  5. तम्बाकू के सेवन से पाचन शक्ति क्षीण होना, आमाशय और आँतों में सूजन आना, गैस अधिक बनना, कब्ज होना, भूख कम लगना, जी मिचलाना (मितली आना), मुँह में छाले होना आदि रोग उत्पन्न होते हैं।
  6. तम्बाकू सेवन से मस्तिष्क में खुश्की आने से मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ता है और अनिद्रा की स्थिति पैदा होती है। मानसिक शक्ति, विशेषकर विचार करने की क्षमता तथा तार्किकता क्षीण हो जाती है।
  7. धूम्रपान आदि से मांसपेशियों की कार्यक्षमता पर विशेष प्रभाव पड़ता है, उनकी संकुचन शक्ति कम होने से व्यक्ति की कार्यक्षमता भी प्रभावित होती है।
  8. धूम्रपान के द्वारा तम्बाकू सेवन का प्रभाव आँखों पर भी पड़ता है।
  9. गर्भवती स्त्रियों के लिए धूम्रपान करना विशेष हानिकारक होता है। इससे गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।
  10. प्रौढ़ावस्था में धूम्रपान का प्रभाव धीमा होता है किन्तु यौवनावस्था में यह अति तीव्र गति से प्रभावित करता है।
  11. धूम्रपान विशेष रूप से प्रदूषणकारी है। कहते हैं, धूम्रपान करने वाले व्यक्ति से अधिक उसका पड़ोसी प्रभावित होता है।
  12. धूम्रपान तथा अन्य प्रकार से तम्बाकू सेवन तन्त्रिका तन्त्र पर बुरा प्रभाव डालता है।

धुम्रपान एवं तम्बाकू के सेवन से अनेक हानियाँ होती हैं, इसीलिए विश्व के सभी उन्नत देशों में इसका सेवन न करने की निरन्तर चेतावनी दी जाती है। सिगरेट एवं तम्बाकू के प्रत्येक पैकेट पर इस प्रकार की वैधानिक चेतावनी अनिवार्य रूप से लिखी जाती है।
भारत में वर्तमान समय में तम्बाकू तथा तम्बाकू से बनी सभी वस्तुओं के सार्वजनिक विज्ञापन पर पूर्णतया रोक लगी हुई है।

रोकथाम एवं नियन्त्रण
यौवनावस्था में मानव को नशीले पदार्थ व ऐल्कोहॉल के सेवन से रोका जा सकता है जिसमें ऐसे मानव जो नशीला पदार्थ ले रहे हैं, उन्हें उचित शिक्षा व परामर्श देकर तथा योग्य मनोवैज्ञानिक की सहायता लेकर नशीले पदार्थ एवं ऐल्कोहॉल के अतिप्रयोग की रोकथाम व नियन्त्रण किया जा सकता है।

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UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 19 Excretory Products and their Elimination 

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 19 Excretory Products and their Elimination (उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन)

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अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
गुच्छीय निस्पंद दर (GFR) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर :
वृक्कों द्वारा प्रति मिनट निस्यंदित की गई मूत्र की मात्रा गुच्छीय नियंद दर (GFR) कहलाती है। एक स्वस्थ व्यक्ति में यह 125 ml/मिनट अथवा 180 ली प्रतिदिन होती है।

प्रश्न 2.
गुच्छीय निस्पंद दर (GFR) की स्वनियमन क्रियाविधि को समझाइए।
उत्तर :
गुच्छीय निस्पंद की दर के नियमन के लिए गुच्छीय आसन्न उपकरण द्वारा एक अति सूक्ष्म क्रियाविधि सम्पन्न की जाती है। यह विशेष संवेदी उपकरण अभिवाही तथा अपवाही धमनिकाओं के सम्पर्क स्थल पर दूरस्थ संकलित नलिका की कोशिकाओं में रूपान्तरण (UPBoardSolutions.com) से बनता है। गुच्छ निस्यंदन दर में गिरावट इन आसन्न गुच्छ कोशिकाओं को रेनिन के स्रावण के लिए सक्रिय करती है जो वृक्कीय रक्त का प्रवाह बढ़ाकर गुच्छनियंद दर को पुनः सामान्य कर देती है।

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित कथनों को सही अथवा गलत में इंगित कीजिए
(अ) मूत्रण प्रतिवर्ती क्रिया द्वारा होता है।
(ब) ए०डी०एच० मूत्र को अल्पपरासरणी बनाते हुए जल के निष्कासन में सहायक होता है।
(स) बोमेन संपुट में रक्त प्लाज्मा से प्रोटीन रहित तरल निस्पंदित होता है।
(द) हेनले लूप मूत्र के सांद्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
(य) समीपस्थ संवलित नलिका (PCT) में ग्लूकोस सक्रिय रूप से पुनः अवशोषित होता है।
उत्तर :
(अ) सही
(ब) गलत
(स) सही
(द) सही
(य) सही

प्रश्न 4.
प्रतिधारा क्रियाविधि का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :

प्रतिधारा क्रियाविधि

शरीर में जैल की कमी हो जाने पर वृक्क सान्द्र मूत्र उत्सर्जित करने लगते हैं। इसमें जल की मात्रा बहुत कम और उत्सर्जी पदार्थों की मात्रा बहुत अधिक हो जाती है। ऐसा मूत्र रक्त की तुलना में 4-5 गुना अधिक गाढ़ा हो सकता है। इसकी परासरणीयता 1200 से 1400 मिली ऑस्मोल/लीटर हो सकती है। मूत्र के सान्द्रण की प्रक्रिया में जक्स्टा मेड्यूलरी (juxta medullary) वृक्क नलिकाओं की विशेष भूमिका हो जाती है; क्योंकि हेनले के लूप तथा परिजालिका केशिकाओं (वासा रेक्टा-vasa recta) के लूप पेल्विस तक फैले होते हैं। यह प्रक्रिया ADH के नियन्त्रण में तथा पिरैमिड्स के ऊतक द्रव्य में वल्कुट भाग से पेल्विस तक क्रमिक उच्च परासरणीयता बनाए रखने पर निर्भर करती है। वृक्कों के वल्कुट भाग में ऊतक तरल की परासरणीयता 300 मिली ऑस्मोल/लीटर जल होती है। मध्यांश (medulla) भाग के पिरेमिड्स (UPBoardSolutions.com) में यह परासरणीयता क्रमशः बढ़कर पेल्विस तक 1200 से 1400 मिली ऑस्मोल/लीटर जल हो जाती है। ऊतक तरल की परासरणीयता मुख्यतः Na+ व Cl आयन तथा यूरिया पर निर्भर करती है।

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Na+ , Cl– आयन्स का परिवहन हेनले लूप की आरोही भुजा द्वारा होता है जिसका हेनले लुप की अवरोही भुजा के साथ विनिमय किया जाता है। सोडियम क्लोराइड ऊतक द्रव्य को वासा रेक्टा की आरोही भुजा द्वारा लौटा दिया जाता है। इसी प्रकार यूरिया की कुछ मात्रा हेनले लूप के सँकरे आरोही भाग में विसरण द्वारा पहुँचती है जो संग्रह नलिका द्वारा ऊतक द्रव्य को पुनः लौटा दी जाती है। हेनले लूप तथा वासो रेक्टा द्वारा इन पदार्थों के परिवहन को प्रतिधारा क्रियाविधि (UPBoardSolutions.com) द्वारा सुगम बनाया जाता है। इसके फलस्वरूप मध्यांश के ऊतक द्रव्य की प्रवणता बनी रहती है। यह प्रवणता संग्रहनलिका द्वारा जल के अवशोषण में सहायता करती है और नियंद का सान्द्रण करती है। प्रतिधारा क्रियाविधि जल के ह्रास को रोकने की प्रमुख विधि है।

प्रश्न 5.
उत्सर्जन में यकृत, फुफ्फुस तथा त्वचा का महत्त्व बताइए।
उत्तर :
मनुष्य तथा अन्य कशेरुकियों में वृक्क के अतिरिक्त यकृत, फुफ्फुस तथा त्वचा का उत्सर्जन में महत्त्व है। ये सहायक उत्सर्जी अंगों की तरह कार्य करते हैं।

(i) यकृत (Liver) :
यकृत अमोनिया को यूरिया में बदलता है। यूरिया अमोनिया की तुलना में कम हानिकारक होता है। यकृत कोशिकाएँ हीमोग्लोबिन के विखण्डन से पित्त वर्णक बिलिरुबिन (bilirubin), बिलिवर्डिन (biliverdin) बनाती हैं। इसके अतिरिक्त पित्त में उत्सर्जी पदार्थ कोलेस्टेरॉल (cholesterol), कुछ निम्नीकृत स्टीरॉयड हॉर्मोन्स, औषधियाँ आदि होती हैं। ये उत्सर्जी पदार्थ यकृत के पित्त द्वारा ग्रहणी में पहुँच जाते हैं और मल के साथ शरीर से त्याग दिए जाते हैं।

(ii) फुफ्फुस (Lungs) :
श्वसन क्रिया के फलस्वरूप मुक्त CO2 (18 L/day) एवं जलवाष्प फेफड़ों (फुफ्फुस) द्वारा शरीर से निष्कासित होती है।

(iii) त्वचा (Skin) :
जलीय प्राणियों में अमोर्निया का उत्सर्जन त्वचा द्वारा होता है। स्थलीय जन्तुओं, में त्वचा की स्वेद ग्रन्थियों (sweat glands) द्वारा जल, खनिज तथा सूक्ष्म मात्रा में यूरिया, लैक्टिक अम्ल आदि पसीने के रूप में उत्सर्जित होता है। त्वचा की तेल ग्रन्थियाँ (oil glands) सीबम (sebum) के साथ कुछ हाइड्रोकार्बन्स, मोम (wax), स्टेरॉल (sterol), वसीय अम्ल (fatty acids) आदि उत्सर्जित होते हैं।

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प्रश्न 6.
मूत्रण की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
मृत्रण मूत्र वृक्क में बनकर मूत्राशय में एकत्र होता रहता है। सामान्यतः अन्त:मूत्रीय तथा बाह्यमूत्रीय संकोचक पेशियों के संकुचन के कारण मूत्रमार्ग बन्द रहता है। मूत्राशय से मूत्र त्याग तभी होता है जब मूत्रमार्ग की दोनों प्रकार की संकोचक पेशियाँ शिथिल हो जाएँ। अन्त:मूत्रीय संकोचक में अरेखित पेशी तथा बाह्य मूत्रीय संकोचक में रेखित पेशी तन्तु होते हैं, इसलिए अन्त:मूत्रीय संकोचक का शिथिलन स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र के नियन्त्रण में होने वाली अनैच्छिक और (UPBoardSolutions.com) बाह्य मूत्रीय पेशियों का शिथिलन एक ऐच्छिक प्रतिक्रिया होती है। मूत्रण वास्तव में अनैच्छिक तथा ऐच्छिक प्रतिक्रियाओं के सहप्रभाव से होता है। ऐच्छिक नियन्त्रण के कारण हम इच्छानुसार मूत्र त्याग करते हैं।

प्रश्न 7.
स्तम्भ I के बिन्दुओं का खण्ड स्तम्भ II से मिलान कीजिए
स्तम्भ I                               – स्तम्भ II
(i) अमोनियोत्सर्जन             (अ) पक्षी
(ii) बोमेन सम्पुट                (ब) जल का पुनःअवशोषण
(iii) मूत्रण                           (स) अस्थिल मछलियाँ
(iv) यूरिक अम्ल उत्सर्जन  (द) मूत्राशय
(v) ए०डी०एच०                 (य) वृक्क नलिका
उत्तर :
स्तम्भI                             –    स्तम्भ II
(i) अमोनियोत्सर्जन         –  (स) अस्थिल मछलियाँ
(ii) बोमेन सम्पुट              – (य) वृक्क नलिका
(iii) मूत्रण                        –   (द) मूत्राशय
(iv) यूरिक अम्ल उत्सर्जन  (अ) पक्षी
(v) ए०डी०एच०                –  (ब) जल का पुनः अवशोषण

प्रश्न 8.
परासरण नियमन का अर्थ बताइए।
उत्तर :
परासरण नियमन वृक्क शरीर से हानिकारक पदार्थों को मूत्र के रूप में शरीर से निरन्तर बाहर निकालते रहते हैं। इसके अतिरिक्त ऊतक तरल में लवणों और जल की मात्रा का नियन्त्रण भी करते हैं। शरीर में जल की मात्रा के बढ़ जाने अर्थात् शरीर के तरल की परासरणीयता (osmotality) के कम हो जाने पर मूत्र पतला (तनु) हो जाता है और उसकी मात्रा बढ़ जाती है। शरीर में जल की कमी होने पर अर्थात् शरीर के ऊतक तरल की परासरणीयता के बढ़ जाने पर मूत्र गाढ़ा हो जाता है और इसकी मात्रा कम हो जाती है। मूत्र की मात्रा का नियन्त्रण मुख्यतः ऐल्डोस्टेरॉन (aldosterone) तथा एण्टीडाइयूरेटिक (antidiuretic hormone, ADH) द्वारा होता है। ऐल्डोस्टेरॉन Na+ के पुनरावशोषण को बढ़ाता है, जिससे अन्त:वातावरण में Na+ की उपयुक्त मात्रा बनी रहे। एण्टीडाइयूरेटिक (ADH) या वैसोप्रेसिन (vasopressin) मूत्र के तनुकरण या सान्द्रण का प्रमुख नियन्त्रक होता है। परासरण नियमन प्रक्रिया द्वारा जीवधारी के शरीर में परासरणीयता (osmotality) को नियन्त्रित रखा जाता है।

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प्रश्न 9.
स्थलीय प्राणी सामान्यतया यूरिया उत्सर्जी या यूरिक अम्ल उत्सर्जी होते हैं तथा अमोनिया उत्सर्जी नहीं होते हैं, क्यों?
उत्तर :
प्रोटीन्स के पाचन के फलस्वरूप ऐमीनो अम्ल प्राप्त होते हैं। जीवधारी आवश्यकता से अधिक ऐमीनो अम्लों का विअमोनीकरण या अमीनोहरण (deamination) करते हैं। इससे कीटो समूह (Keto group) एवं ऐमीनो समूह से अमोनिया (ammonia) प्राप्त होती है। कीटो समूह का उपयोग अपचय (catabolism) के अन्तर्गत ऊर्जा उत्पादन में हो जाता है।अमोनिया को जलीय जन्तुओं में उत्सर्जित कर दिया जाता है। यह जल में घुलनशील और विषैली होती है। इसको उत्सर्जित करने के लिए अधिक जल की आवश्यकता होती है। इसी कारण अमोनिया जलीय प्राणियों का मुख्य उत्सर्जी पदार्थ है। अमोनिया उत्सर्जी स्थलीय जन्तुओं में अमोनिया को यकृत द्वारा यूरिया में बदल दिया जाता है। यूरिया जल में घुलनशील और अमोनिया की तुलना में बहुत कम विषैला या हानिकारक होता है। अतः अधिकांश स्थलीय जन्तु यूरिया (UPBoardSolutions.com) उत्सर्जी (ureotelic) होते हैं। जैसे—अनेक उभयचर तथा स्तनी प्राणी।। शुष्क परिस्थितियों में रहने वाले जन्तु; जैसे—सरीसृप एवं पक्षी वर्ग के सदस्यों में जल की कमी बनी रहती है। जल संचय के लिए ये प्राणी यूरिया को यूरिक अम्ल (uric acid) के रूप में उत्सर्जित करते हैं। यूरिक अम्ल जल में अघुलनशील होता है। यह विषैला नहीं होता। इसे मल के साथ त्याग दिया जाता है। सरीसृप, पक्षी, कीट आदि यूरिक अम्ल उत्सर्जी (uricotelic) होते हैं।

प्रश्न 10.
वृक्क के कार्य में जक्सटा गुच्छ उपकरण (JGA) का क्या महत्त्व है?
उत्तर :
जक्सटा गुच्छ उपकरण (Juxta glomerular apparatus, JGA) की उत्सर्जन में जटिल नियमनकारी भूमिका है।JGA की विशिष्ट कोशिकाएँ केशिकागुच्छ नियंदन का स्वनियमन स्वयं वृक्क द्वारा उत्पन्न दाबक क्रियाविधि(renal pressure mechanism) की उपस्थिति के कारण होता है। इसकी खोज टाइगरस्टीट और बर्गमन (Tigersteat and Bergman, 1898) ने की।JGA की विशिष्ट कोशिकाओं से रेनिन हॉर्मोन स्रावित होता है। Na+ की कम सान्द्रता या निम्न केशिकागुच्छ निस्पंदन दर या निम्न केशिकागुच्छ दाब (glomerular pressure) के कारण रेनिन रक्त में उपस्थित एन्जियोटेंसिनोजन (angiotensinogen) को एन्जियोटेन्सिन-I (angiotensin-I) और बाद में एन्जियोटेन्सिन-II (angiotensin-II) में बदलता है। एन्जियोटेन्सिन-II एक प्रभावकारी वाहिका संकीर्णक (vasoconstrictor) का कार्य करता है, जो गुच्छीय रुधिर दाब तथा जी०एफ०आर० (glomeruler filtration rate, GFR) को बढ़ा देता है। एन्जियोटेन्सिन-II अधिवृक्क वल्कुट को ऐल्डोस्टेरॉन (aldosterone) हॉर्मोन के स्रावण को प्रेरित करता है। ऐल्डोस्टेरॉन स्रावी नलिका के दूरस्थ भाग में Na’ तथा जल के पुनरावशोषण को बढ़ाता है। इससे रक्त दाब तथा जी०एफ०आर० में वृद्धि होती है। यह जटिल क्रियाविधि रेनिन एन्जियोटेन्सिन (renin angiotensin mechanism) कहलाती है।

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प्रश्न 11.
नाम का उल्लेख कीजिए
(अ) एक कशेरुकी जिसमें ज्वाला कोशिकाओं द्वारा उत्सर्जन होता है।
(ब) मनुष्य के वृक्क के वल्कुट के भाग जो मध्यांश के पिरामिड के बीच धंसे रहते हैं।
(स) हेनले लूप के समानान्तर उपस्थित केशिका का लूप।
उत्तर :
(अ) सेफेलोकॉडेंट (एम्फीऑक्सस)
(ब) बर्टिनी के स्तम्भ
(स) वासा रेक्टा।

प्रश्न 12.
रिक्त स्थान भरिए
(अ) हेनले लूप की आरोही भुजा जल के लिए………….जबकि अवरोही भुजा इसके लिए है।
(ब) वृक्क नलिका के दूरस्थ भाग द्वारा जल का पुनरावशोषण…………हार्मोन द्वारा होता है।
(स) अपोहन द्रव में………..पदार्थ के अलावा रक्त प्लाज्मा के अन्य सभी पदार्थ उपस्थित होते हैं।
(द) एक स्वस्थ वयस्क मनुष्य द्वारा औसतन ग्राम यूरिया का प्रतिदिन उत्सर्जन होता
उत्तर :
(अ) अपारगम्य, पारगम्य
(ब) ADH
(स) नाइट्रोजनी व्यर्थ
(द) 25-30

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अमोनिया से यूरिया का संश्लेषण कहाँ होता है?
(क) वृक्क में
(ख) रुधिर में
(ग) वृक्क नलिकाओं में
(घ) यकृत में
उत्तर :
(घ) यकृत में

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
केशिकागुच्छ कहाँ पाये जाते हैं? इनका प्रमुख कार्य क्या है?
उत्तर :
केशिकागुच्छ बोमैन सम्पुट के मध्य स्थित होते हैं। यह रक्त केशिकाओं से बना जाल होता है। इसमें परानिस्यन्दन की क्रिया होती है। इसके फलस्वरूप ग्लोमेरुलर निस्यन्दन बनता है।

प्रश्न 2.
ग्लोमेरुलस का एक प्रमुख कार्य लिखिए।
उत्तर :
ग्लोमेरुलस (glomerulus) में मूत्र निर्माण की परानिस्यन्दन (ultrafiltration) क्रिया सम्पन्न होती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बहिःक्षेपण तथा उत्सर्जन में अन्तर लिखिए।
उत्तर :
बहिःक्षेपण व उत्सर्जन के बीच अन्तर
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प्रश्न 2.
एमनिओटेलिज्म से आप क्या समझते हैं? यह किन जीवों में होता है? इसमें भाग लेने वाले अंगों की कार्यविधि लिखिए।
उत्तर :
कुछ जीव विलेयशील अमोनिया का उत्सर्जन करते हैं ऐसे जीव अमोनोटेलिक तथा यह प्रक्रिया एमनिओटेलिज्म कहलाती है। इस प्रक्रिया में यकृत की कोशिकाएँ डीएमीनेशन की क्रिया में अमीनो अम्लों को अपघटित करके अमोनिया बनाती हैं, जिसका सीधे ही उत्सर्जन हो जाता है। (UPBoardSolutions.com) अमोनोटेलिक जन्तुओं के अन्तर्गत प्रोटोजोअन, क्रस्टेशियन, प्लेटीहेल्मिन्थीस, नीडेरियन, पोरीफेरन्स, इकाइनोडर्स तथा अन्य जलीय अकशेरुकीय जीव सम्मिलित होते हैं। इन जन्तुओं में अमोनिया का उत्सर्जन त्वचा, जल-क्लोम अथवा वृक्कों द्वारा होता है।

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प्रश्न 3.
मनुष्य के एक प्रारूपी वृक्क (नेफ्रॉन) का सम्पूर्ण पृष्ठीय, स्पष्ट, भली-भाँति नामांकित आरेखी चित्र खींचिए (वर्णन अनापेक्षित)। या मनुष्य की वृक्क नलिका का स्वच्छ नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर :

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 19 Excretory Products and their Elimination image 3

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्सर्जन किसे कहते हैं? जन्तुओं के मुख्य उत्सर्जी उत्पाद क्या है? उत्सर्जन क्यों आवश्यक है? मानव में मूत्र निर्माण की क्रियाविधि को समझाइए। “या अमोनोटेलिक उत्सर्जन किसे कहते हैं? एक उदाहरण दीजिए। या अमोनिया उत्सर्गी, यूरिक अम्ल उत्सर्गी तथा यूरिया उत्सर्गी प्राणियों से आप क्या समझते हैं? मानव वृक्क में मूत्र निर्माण का सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर :
[संकेत-उत्सर्जन की परिभाषा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न संख्या 2 के उत्तर में देखें। ]

जन्तुओं के मुख्य उत्सर्जी उत्पाद

1. अमीनो अम्ल (Amino Acids) :
ये प्रोटीन के निम्नीकरण से बनते हैं। कुछ जन्तुओं में इनका सीधे ही उत्सर्जन हो जाता है।

2. अमोनिया (Ammonia) :
यकृत की कोशिकाएँ डीएमीनेशन (deamination) की क्रिया में अमीनो अम्लों को अपघटित करके अमोनिया बनाती हैं। यह काफी विषैला पदार्थ है। ऐसे जन्तुओं को अमोनिया उत्सर्गी (ammonotelic) कहते हैं। इन जन्तुओं में अमोनिया का सीधे ही उत्सर्जन हो जाता है।

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उदाहरणार्थ :
अलवेणजलीय मछलियाँ।

3. यूरिया (Urea) :
यकृत कोशिकाएँ अमीनो अम्लों के अपघटन से प्राप्त अमोनिया को अपेक्षाकृत कम विषैले यूरिया में बदलती हैं। यूरियो जल में विलेय होता है। अत: मूत्र के रूप में इसका उत्सर्जन स्तनियों में प्रमुख रूप से होता है। ऐसे जन्तु यूरिया उत्सर्गी (ureotelic) कहलाते हैं।

4. यूरिक अम्ल (Uric Acids) :
अनेक जन्तुओं में यह प्रमुख उत्सर्जी पदार्थ होता है; जैसे-छिपकलियों तथा पक्षियों में। यह भी कम विषैला पदार्थ है। अमोनिया से इसका निर्माण होता है। यह जल में अविलेय होता है। अत: ठोस रूप में इसका उत्सर्जन होता है। ऐसे जन्तुओं को यूरिक अम्ल उत्सर्गी (uricotelic) कहते हैं। (UPBoardSolutions.com) मनुष्य में प्यूरीन्स के विखण्डन से भी यूरिक अम्ल का निर्माण होता है।

5. ट्राइमेथिल एमीन ऑक्साइड (Trimethyl Amine Oxide) :
यह प्रमुखतः समुद्री जन्तुओं का उत्सर्जी पदार्थ होता है।

6. ग्वानीन (Guanine) :
यह अघुलनशील है। कुछ जन्तुओं; जैसे—मकड़ियों, केचुओं आदि, में यह उत्सर्जी पदार्थ होता है।

7. अन्य उत्सर्जी पदार्थ :
प्यूरीन (purine), हिप्यूरिक अम्ल (hippuric acid), ऑर्निथिक अम्ल (ornithic acid), क्रिएटिन (creatine), क्रिएटिनी (creatinine) आदि भी नाइट्रोजनयुक्त पदार्थ हैं जिनकी कुछ मात्रा रुधिर में रहती है किन्तु अधिक मात्रा मूत्र या पसीने के रूप में शरीर से बाहरउत्सर्जित की जाती है।

8. एलेनीन (Alanine) :
यह मनुष्य में पिरीमिडीन्स के अपघटन से बनता है।

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उत्सर्जन की आवश्यकता

शरीर की कोशिकाओं में, उपापचय (metabolism) के फलस्वरूप, कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), जल, अमोनिया, यूरिया, यूरिक अम्ल, रंगाएँ, लवण आदि कई ऐसे अपजात या अपशिष्ट (waste) पदार्थ बनते रहते हैं जो शरीर के लिए अनावश्यक ही नहीं, वरन् हानिकारक भी होते हैं। अत: कोशिकाएँ इन्हें निरन्तर अपने बाह्यकोशिकीय द्रव्य में विसर्जित करती रहती हैं। फिर इन अपशिष्ट पदार्थों को शरीर के बाहरी वातावरण में विसर्जित कर दिया जाता है। इनमें से CO2 का विसर्जन मुख्यत: श्वसन-क्रिया के अन्तर्गत, गैसीय-विनिमय (gaseous exchange) में हो जाता है। शेष अपशिष्ट पदार्थों में मुख्यत: प्रोटीन-विघटन से व्युत्पन्न पदार्थ होते हैं। इन सब पदार्थों को उत्सर्जी पदार्थ (excretory substances) कहते हैं। वातावरण में इनके विसर्जन को उत्सर्जन (excretion) कहते हैं। क्योकि उत्सर्जी पदार्थों का विसर्जन जल में घुली अवस्था में होता है, जल सन्तुलन अर्थात् परासरण नियन्त्रण(osmoregulation) भी उत्सर्जन का महत्त्वपूर्ण पहलू होता है।

मानव में मूत्र निर्माण की क्रियाविधि

[संकेत-उत्तर के लिए दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 2 का उत्तर देखें।]

प्रश्न 2.
उत्सर्जन, परानिस्यन्दन, वरणात्मक पुनः अवशोषण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। मानव मूत्र में सामान्यतया कौन-से घटक, कितनी प्रतिशत मात्रा में मौजूद रहते हैं? या मूत्र बनने की प्रक्रिया अथवा वृक्क नलिका में पुनरावशोषण की क्रिया को चित्र की सहायता से समझाइए। या उत्सर्जन किसे कहते हैं? किसी स्तनधारी की एक मूत्रजन नलिका का स्वच्छ नामांकित चित्र बनाइए एवं इसकी कार्य-विधि भी समझाइए। या वरणात्मक पुनरावशोषण(selective reabsorption) किसे कहते हैं? मनुष्य में यह कहाँ व कैसे होता है? या वृक्क नलिका में पुनरावशोषण की क्रिया को चित्र की सहायता से समझाइए। या मूत्र का रासायनिक संघटन लिखिए। (UPBoardSolutions.com) मानव वृक्क नलिका के वरणात्मक पुनरावशोषण को नामांकित चित्र की सहायता से समझाइए। या परानिस्यन्दन एवं चयनात्मक पुनरावशोषण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। या एक वृक्क नलिका की संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए तथा परानिस्यन्दन एवं चयनात्मक पुनरावशोषण समझाइए। या मनुष्य की एक वृक्क नलिका का स्वच्छ एवं नामांकित चित्र बनाइए तथा मूत्र निर्माण की क्रियाविधि का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
उत्तर :

उत्सर्जन

प्रत्येक जीव में कोशिकीय उपापचयी क्रियाओं (metabolic activities) के फलस्वरूप कई प्रकार के अपशिष्ट उत्पाद (waste products) बनते हैं, जो उसके शरीर के लिये निरर्थक एवं हानिकारक होते हैं। इन अपशिष्ट उत्पादों को शरीर से निष्कासित करने की जैव-क्रिया को उत्सर्जन (excretion) कहते हैं। निम्न श्रेणी के अनेकानेक जन्तु अपशिष्ट पदार्थों को शरीर की सतह से विसरण द्वारा उत्सर्जित करते हैं। अनेक उच्च श्रेणी के अकशेरुकी तथा कशेरुकी प्राणियों में इन अपशिष्ट पदार्थों के निष्कासन के लिए विशिष्ट अंग पाये जाते हैं, जो सम्मिलित रूप से सम्बन्धित प्राणि में उत्सर्जन तन्त्र (excretory system) का निर्माण करते हैं।

मूत्र निर्माण : क्रिया-विधि

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मूत्र निर्माण वृक्क नलिकाओं में होता है। मूत्र निर्माण की सम्पूर्ण क्रिया निम्नलिखित तीन चरणों में पूर्ण होती है

  1. परानिस्यन्दन
  2. वरणात्मक या चयनात्मक पुनरावशोषण
  3. स्रावण

1. परानिस्यन्दन
वृक्कों में रुधिर परिसंचरण शरीर के अन्य अंगों की अपेक्षा काफी अधिक होता है। प्रत्येक वृक्क नलिका का सम्बन्ध दो प्रकार के रुधिर केशिकीय जालों (blood capillary networks) से होता है

  1.  बोमैन सम्पुट में स्थित ग्लोमेरुलस एक चौड़ी अभिवाही धमनिका (afferent arteriole) द्वारा बनता है।
  2.  परिनलिका केशिका जाल (peritubular capillary network) ग्लोमेरुलस से आने वाली एक अपवाही धमनिका (efferent arteriole) द्वारा बनता है।

अपवाही धमनिका अपेक्षाकृत सँकरी होती है; अत: ग्लोमेरुलस से रुधिर का निष्कासन अपेक्षाकृत धीमी गति से होता है।ग्लोमेरुलस में रुधिर को उच्च दाब (लगभग 60 mm. Hg) बना रहता है। इसका पुरिणाम यह होता है कि ग्लोमेरुलस की कोशिकाओं की पतली भित्ति से तरल प्लाज्मा छनकर बाहर आता रहता है। ग्लोमेरुलस के साथ बोमैन सम्पुट की महीन व छिद्रिले (perforated) भित्ति, जो पोडोसाइट्स कोशिकाओं (podocytes cells) की बनी होती है, एक अधिक पारगम्य ग्लोमेरुलर कला (glomerular membrane) का निर्माण करती है। ग्लोमेरुलस की रुधिर केशिकाओं से प्लाज्मा इस कला के द्वारा छनकर ही बोमैन सम्पुट में पहुँच पाता है। इस तरल को ग्लोमेरुलर निस्यन्द (glomerular filtrate) तथा छनने की इस प्रकिया को परानिस्यन्दन  (ultrafiltration) कहते हैं। ग्लोमेरुलर निस्यन्द में रुधिराणु व प्लाज्मा प्रोटीन्स के अतिरिक्त रुधिर के लगभग सभी घटक पाये जाते हैं। इनमें जल, लवण, अमीनो अम्ल, यूरिक अम्ल, यूरिया, ग्लूकोज, क्रिटिनीन आदि उल्लेखनीय हैं।

2. वरणात्मक या चयनात्मक पुनरावशोषण
बोमैन सम्पुट के निस्यन्द में प्लाज्मा प्रोटीन्स को छोड़कर अन्य पदार्थ; जैसे-ग्लूकोज, यूरिया, लवण, अमीनो अम्ल आदि रुधिर के समान मात्रा में ही पाये जाते हैं। इस प्रकार यह प्रोटीन रहित प्लाज्मा के समपरासरणी (isotonic) होता है। समीपस्थ कुण्डलित नलिकाओं की भित्ति का भीतरी तल माइक्रोविलाई (microvilli) की उपस्थिति के कारण अत्यधिक विस्तृत होता है। इस क्षेत्र की कोशिकाएँ निस्यन्द के लगभग 80% भाग तक का पुनरावशोषण (reabsorption) कर उसे परिनलिका केशिका जाल के रुधिर में वापस पहुँचा देती हैं। इस क्रिया में ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, विटामिन्स आदि तथा Na+, Cl, K+, Ca++,[latex]{ HCO }_{ 3}^{ – }[/latex], [latex]{ PO }_{ 4}^{ 3- }[/latex]आदि को सक्रिय स्थानान्तरण (active transport) होता है। इस क्रिया के बाद निस्यन्द का जल सामान्य परासरण द्वारा रुधिर में चला जाता है।

हेनले लूप में पहुँचने पर इसकी अवरोही भुजा (descending limb) से निस्यन्द का जल काफी मात्रा में बाहरी ऊतक द्रव्य में जाता रहता है। परिणाम यह होता है कि निस्यन्द धीरे-धीरे रुधिर के प्लाज्मा के उच्चपरासरणी (hypertonic) हो जाता है। अब निस्यन्द हेनले लूप की आरोही भुजा (UPBoardSolutions.com) (ascending limb) में पहुँचता है। इसकी भित्ति जल के लिए लगभग अपारगम्य, परन्तु NaCl व यूरिया के लिए कुछ सीमा तक पारगम्य होती है। वृक्क के वल्कलीय भाग के ऊतक द्रव्य में इन आयन्स की संख्या कम होती है। आरोही भुजा में उपस्थित निस्यन्द से Na+ व Cl आयन्स सामान्य प्रसरण द्वारा बाहरी ऊतक द्रव्य में निकलने लगते हैं। इससे निस्यन्द की मात्रा पर तो कोई प्रभाव नहीं पड़ता, परन्तु यह रुधिर प्लाज्मा के समपरासरणी (isotonic) हो जाता है।

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हेनले लूप की आरोही भुजा का मोटा भोग तथा दूरस्थ कुण्डलित नलिका मिलकर वृक्क नलिका का तनुकरण खण्ड (diluting segment) बनाते हैं। उपर्युक्त दोनों भागों की भित्तियाँ मोटी तथा जल व यूरिया के लिए अपारगम्य होती हैं। इस भाग में निस्यन्द के पहुंचने पर इसमें से Na+ व Cl आयन्स बाहर ऊतक द्रव्य में चले जाते हैं, जिससे कि निस्यन्द प्लाज्मा से निम्नपरासरणी (hypotonic) हो जाता है। अब निस्यन्द दूरस्थ कुण्डलित नलिका से संग्रह नलिका में पहुँचता है। संग्रह नलिका का ऊपरी भाग केवल जल के लिए तथा निचला भाग जल व यूरिया दोनों के लिए पारगम्य होता है। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि ऊतक द्रव्य की परासरणीयता में निरन्तर (UPBoardSolutions.com) वृद्धि होती रहती है। इसके सन्तुलन के लिए संग्रह नलिका के निस्यन्द से जल की आवश्यक मात्रा तथा कुछ यूरिया का पुनरावशोषण होता है।

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3. स्रावण 
वृक्क नलिका की भित्ति की कोशिकाएँ परिनलिका जाल की रुधिर केशिकाओं के रुधिर से कुछ पदार्थों; जैसे-यूरिक अम्ल, K+ H+, आदि का अवशोषण कर उन्हें निस्यन्द में स्रावित करती रहती हैं।

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मूत्र (Urine) :
संग्रह नलिकाओं में निस्यन्द पूर्ण रूप से मूत्र में परिवर्तित हो जाता है। मूत्र के घटेक (components of urine) प्रायः इस प्रकार होते हैं95% जल, 2% अनावश्यक लवणों के आयन, 2.6% यूरिया, 0.3% यूरिक अम्ल तथा 0.1% अन्य अनावश्यक एवं अवशिष्ट पदार्थ। मूत्र थोड़ा अम्लीय (pH-6.00) (UPBoardSolutions.com) होता है। [संकेत-वृक्क नलिका के चित्र के लिए लघु उत्तरीय प्रश्न 3 का उत्तर देखें]

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