UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 13 Photosynthesis in Higher Plants

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 13 Photosynthesis in Higher Plants (उच्च पादपों में प्रकाश-संश्लेषण)

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अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
एक पौधे को बाहर से देखकर क्या आप बता सकते हैं कि वह C4ई है अथवा C3? कैसे और क्यों?
उत्तर :
पौधे जो शुष्क ट्रॉपिकल क्षेत्रों के लिए अनुकूलित होते हैं उनमें C4पथ पाया जाता है अन्यथा C3तथा C4पौधों में बाह्य आकारिकी लगभग समान होती है।

प्रश्न 2.
एक पौधे की आन्तरिक संरचना को देखकर क्या आप बता सकते हैं कि वह C3है अथवा C4? वर्णन कीजिए।
उत्तर :
पत्तियों की आन्तरिक संरचना (vertical section) को देखकर C3तथा C4पौधों को पहचाना जा सकता है। C4पौधों की पत्तियों की शारीरिकी (anatomy) क्रान्ज प्रकार (Kranz type) की होती है। जर्मन भाषा में क्रान्ज शब्द का तात्पर्य माला (wreath) या छल्ला (ring) है। पत्तियों के पर्णमध्योतक (mesophyll) में खम्भ ऊतक (palisade tissue) नहीं होता। संवहन बण्डल के चारों ओर गोल मृदूतक कोशिकाएँ पर्यों के रूप में व्यवस्थित (UPBoardSolutions.com) होती हैं। पत्तियों के संवहन बण्डल के चारों ओर पूलाच्छद (bundle sheath) होता है। ये कोशिकाएँ बड़ी होती हैं। पुलाच्छद की कोशिकाओं में हरितलवक बड़े होते हैं तथा उनमें ग्रैना कम विकसित होते हैं अथवा अनुपस्थित होते हैं, जबकि पर्ण मध्योतक कोशिकाओं में हरितलवक छोटे होते हैं। इनमें ग्रेना विकसित होते हैं। अत: C4 पौधों की पत्तियों में द्विरूपी हरितलवक (dirmorphic chloroplast) पाए जाते हैं। प्रकाश संश्लेषण प्रक्रम में वर्णक तन्त्र II का अभाव होता है।

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C3 पौधों की पत्तियों की शारीरिकी (anatomy) क्रान्ज प्रकार की नहीं होती। इसकी पत्तियों में पर्णमध्योतक में खम्भ ऊतक पाया जाता है। सभी कोशिकाओं में एक ही प्रकार के हरितलवक पाए। जाते हैं। प्रकाश संश्लेषण तन्त्र में दोनों वर्णक तन्त्र पाए जाते हैं।

प्रश्न 3.
हालांकि C4 पौधों में बहुत कम कोशिकाएँ जैव संश्लेषण-केल्विन पथ को वहन करती हैं फिर भी वे उच्च उत्पादकता वाले होते हैं। क्या इस पर चर्चा कर सकते हो कि ऐसा क्यों है?
उत्तर :
C4 पौधों में दो प्रकार के क्लोरोप्लास्ट मिलते हैं। मीसोफिल का क्लोरोप्लास्ट COवातावरण से लेता है। यह बहुत क CO2  सान्द्रता को भी आसानी से अवशोषित कर सकता है। यहाँ तक कि जब रन्ध्र लगभग बन्द होते हैं तब भी CO2 का अवशोषण कर सकता है। अतः CO2 की आवश्यकता निरन्तर बनी रहती है, अतः इसलिए इनकी उत्पादकता उच्च होती है।

प्रश्न 4.
रुबिस्को (RUBISCO) एक एन्जाइम है जो कार्बोक्सिलेस और ऑक्सीजनेस के रूप में काम करता है। आप ऐसा क्यों मानते हैं कि C4 पौधों में रुबिस्को अधिक मात्रा में कार्बोक्सिलेशन करता है?
उत्तर :
कैल्विन चक्र (Calvin Cycle) में CO2 ग्राही RuBP से क्रिया करके 3-फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल (PGA) के 2 अणु बनाता है। यह क्रिया रुबिस्को (RUBISCO) के द्वारा उत्प्रेरित होती है

RuBP + CO2 + H2O → 2 (3 PGA)

रुबिस्को संसार में सबसे अधिक मात्रा में पाया जाने वाला प्रोटीन (एन्जाइम) है। यह O2 तथा CO2 दोनों से बन्धित हो सकता है। रुबिस्को में O2 की अपेक्षा CO2 के लिए अधिक बन्धुता होती है, लेकिन आबन्धता O2 तथा CO2 की सापेक्ष सान्द्रता पर निर्भर करती है। C3पौधों में कुछ O2 रुबिस्को से बन्धित हो जाने के कारण CO2 का यौगिकीकरण कम हो जाता है; क्योंकि रुबिस्को O2 से बन्धित होकर फॉस्फो ग्लाइकोलेट अणु बनाता है। इस प्रक्रम को प्रकाश श्वसन (UPBoardSolutions.com) (photorespiration) कहते हैं। प्रकाश श्वसन के कारण शर्करा नहीं बनती और न ही ऊर्जा ATP के रूप में संचित होती है।  C4 पौधों में प्रकाश श्वसन नहीं होता। C4 पौधों में पर्णमध्योतक का मैलिक अम्ल पूलाच्छद में टूटकर पाइरुविक अम्ल तथा CO2 बनाता है। इसके फलस्वरूपे  CO2 की सान्द्रता बढ़ जाती है और रुबिस्को एक कार्बोक्सिलेस (carboxylase) के रूप में ही कार्य करता है। इसके फलस्वरूप उत्पादकता बढ़ जाती है। यहाँ रुबिस्को ऑक्सीजिनेस (oxygenase) का कार्य नहीं करता।

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प्रश्न 5.
मान लीजिए यहाँ पर क्लोरोफिल ‘बी’ की उच्च सान्द्रता युक्त, मगर क्लोरोफिल ‘ए’ की कमी वाले पेड़ थे। क्या ये प्रकाश संश्लेषण करते होंगे? तब पौधों में क्लोरोफिल ‘बी’ क्यों होता है और फिर दूसरे गौण वर्णकों की क्या जरूरत है?
उत्तर :
क्लोरोफिल ‘बी’, जैन्थोफिल तथा कैरोटिन सहायक वर्णक (accessory pigments) होते हैं। ये प्रकाश को अवशोषित करके, ऊर्जा को क्लोरोफिल ‘ए’ को स्थानान्तरित कर देते हैं। वास्तव में ये वर्णक प्रकाश संश्लेषण को प्रेरित करने वाली उपयोगी तरंगदैर्घ्य के क्षेत्र को बढ़ाने का कार्य करते हैं और क्लोरोफिल ‘ए’ को फोटो ऑक्सीडेशन (photo oxidation) से बचाते हैं। क्लोरोफिल ‘ए’ प्रकाश संश्लेषण में प्रयुक्त होने वाला मुख्य वर्णक है। अतः क्लोरोफिल ‘ए’ की कमी वाले पौधों में प्रकाश संश्लेषण प्रभावित होगा।

प्रश्न 6.
यदि पत्ती को अँधेरे में रख दिया गया हो तो उसका रंग क्रमशः पीला एवं हरा-पीला हो जाता है? कौन-से वर्णक आपकी सोच में अधिक स्थायी हैं?
उत्तर :
पौधे के हरे भागों में हरितलवक पाया जाता है। हरितलवक की उपस्थिति में पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन का संश्लेषण करते हैं। पौधे के अप्रकाशिक भागों में अवर्णीलवक पाया जाता है। प्रकाश की उपस्थिति में अवर्णीलवक हरितलवक में बदल जाता है। हरितलवक की ग्रैना पटलिकाओं में पर्णहरित, कैरोटिनॉयड्स (carotenoids) पाए जाते हैं। कैरोटिनॉयड्स दो प्रकार के होते हैं जैन्थोफिल (xanthophyll) तथा कैरोटिन (carotene)। ये क्रमश: पीले एवं नारंगी वर्णक होते हैं। पर्णहरित निर्माण के लिए प्रकाश की उपस्थिति आवश्यक होती है। प्रकाश का अवशोषण या प्रकाश ऊर्जा को ग्रहण करने का कार्य मुख्य रूप से पर्णहरित करता है। पौधे को अन्धकार में रख देने पर प्रकाश संश्लेषण क्रिया अवरुद्ध हो जाती है। पौधे में संचित भोज्य पदार्थ समाप्त हो जाते हैं तो इसके फलस्वरूप पत्तियों में पाए जाने वाले पर्णहरित का विघटन प्रारम्भ हो जाता है। इसके फलस्वरूप पत्तियाँ कैसेटिनॉयड्स के कारण पीली या हरी-पीली दिखाई देने लगती हैं। कैरोटिनॉयड्स पर्णहरित की तुलना में अधिक स्थायी होते हैं।

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प्रश्न 7.
एक ही पौधे की पत्ती का छाया वाला (उल्टा) भाग देखें और उसके चमक वाले (सीधे) भाग से तुलना करें अथवा गमले में लगे धूप में रखे हुए तथा छाया में रखे हुए पौधों के बीच तुलना करें। कौन-सा गहरे रंग का होता है और क्यों?
उत्तर :
जब हम पत्ती की पृष्ठ सतह को देखते हैं तो यह अधर तल की अपेक्षा अधिक गहरे रंग की और चमकीली दिखाई देती है। इसी प्रकार धूप में रखे हुए गमले की पत्तियाँ छाया में रखे हुए गमले की पत्तियों की अपेक्षा अधिक गहरे रंग की और चमकीली प्रतीत होती हैं। इसका कारण यह है कि पृष्ठ तल पर अधिचर्म (epidermis) के नीचे खम्भ ऊतक (palisade tissue) पाया जाता है। खम्भ ऊतक में हरितलवक अधिक मात्रा में पाया जाता है। खम्भ ऊतक (UPBoardSolutions.com) प्रकाश संश्लेषण के लिए विशिष्टीकृत कोशिकाएँ होती हैं। धूप में रखे गमले की पत्तियाँ छाया में रखे गमले की अपेक्षा अधिक गहरे रंग की प्रतीत होती हैं। पत्तियों के अधिक गहरे रंग का होने का मुख्य कारण कोशिकाओं में पर्णहरित की मात्रा अधिक होती है क्योंकि पर्णहरित निर्माण के लिए प्रकाश एक महत्त्वपूर्ण कारक होता है। इसके अतिरिक्त प्रकाश संश्लेषण के कारण पृष्ठ सतह की कोशिकाओं में अधिक स्टार्च का निर्माण होता है।

प्रश्न 8.
प्रकाश संश्लेषण की दर पर प्रकाश का प्रभाव पड़ता है। ग्राफ के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए
(अ) वक्र के किस बिन्दु अथवा बिन्दुओं पर (क, ख अथवा ग) प्रकाश एक नियामक कारक है?
(ब) ‘क’ बिन्दु पर नियामक कारक कौन-से हैं?
(स) वक्र में ‘ग’ और ‘घ’ क्या निरूपित करता है?
उत्तर :
(अ)
प्रकाश की गुणवत्ता, प्रकाश की तीव्रता प्रकाश संश्लेषण को प्रभावित करती है। उच्च प्रकाश तीव्रता प्रकाश नियामक कारक नहीं होता; क्योंकि अन्य कारक सीमित हो जाते हैं। कम प्रकाश तीव्रता पर प्रकाश एक नियामक कारक “क” बिन्दु पर होता है।

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(ब)
प्रकाश।

(स)
वक्र में ‘ग’ बिन्दु प्रकाश संतृप्तता को प्रदर्शित करता है। इस बिन्दु पर प्रकाश तीव्रता बढ़ने पर भी प्रकाश संश्लेषण की दर नहीं बढ़ती। ‘घ’ बिन्दु यह निरूपित करता है कि प्रकाश तीव्रता
इस बिन्दु पर सीमाकारक हो सकता है।
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 13 Photosynthesis in Higher Plantsप्रश्न 9.
निम्नलिखित में तुलना कीजिए

(अ) C3 एवं Cपथ
(ब) चक्रीय एवं अचक्रीय फोटोफॉस्फोरिलेशन
(स) C3 एवं C4 पादपों की पत्ती की शारीरिकी।
उत्तर :

(अ)
C3 तथा C4 पथ में अन्तर

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(ब)
चक्रीय तथा अचक्रीय फोटोफॉस्फोरिलेशन में अन्तर

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 13 Photosynthesis in Higher Plants(स)
C3 तथा  C4पादपों की पत्ती की शारीरिकी में अन्तर
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रकाश-संश्लेषण के लिए आवश्यक शर्त हैं
(क) प्रकाश एवं उचित तापक्रम
(ख) पर्णहरित एवं जल
(ग) कार्बन डाइऑक्साइड
(घ) ये सभी
उत्तर :
(घ) ये सभी

प्रश्न 2.
चक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण में उपयोग होता है
(क) PSI
(ख) PSII
(ग) PSI और PSII
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(क) PSI

प्रश्न 3.
अचक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण में किसका उपयोग होता है?
(क) PSI
(ख) PSII
(ग) PSI और PSII
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) PSI और PSII

प्रश्न 4.
निम्न में किसकी CO2 सन्तुलन-प्रकाश तीव्रता उच्चतम होती है?
(क) C2 पौधों की
(ख) C3 पौधों की
(ग) C4 पौधों की
(घ) एल्पाइन पौधों की
उत्तर :
(ख) C3 पौधों की

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प्रश्न 5.
कैल्विन-बेन्सन चक्र का प्रारम्भिक विकर है
(क) फॉस्फोट्रायोज आइसोमेरेज
(ख) राइबुलोज-1, 5-डाइफॉस्फेट कार्बोक्सीलेज
(ग) ट्रायोज फॉस्फेट डीहाइड्रोजीनेज
(घ) इनमें से सभी
उत्तर :
(ख) राइबुलोज-1, 5-डाइफॉस्फेट कार्बोक्सीलेज

प्रश्न 6.
C4 चक्र में प्रथम CO2 ग्रहणकर्ता है
(क) RUBP
(ख) PGA
(ग) OAA
(घ) PEP
उत्तर :
(घ) PEP

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रकाश-संश्लेषण की परिभाषा लिखिए। प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले एक बाह्य कारक तथा एक आन्तरिक कारक का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
वह अभिक्रिया जिसमें हरे पेड़-पौधे सूर्य के प्रकाश, CO2, जल तथा पर्णहरिम की (UPBoardSolutions.com) उपस्थिति में कार्बोहाइड्रेट्स का निर्माण करते हैं, प्रकाश-संश्लेषण कहलाती है। प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख बाह्य कारक प्रकाश तथा आन्तरिक कारक पर्णहरिम है।

प्रश्न 2.
पर्णहरित के पाइरोल चक्र से सम्बन्धित तत्त्व का नाम बताइए।
उत्तर :
पाइरोल वलय (चक्र) (pyrole ring) के मध्य में एक मैग्नीशियम (Mg) परमाणु होता है।

प्रश्न 3.
पर्णहरिम (chlorophyll) के अणु कहाँ पाये जाते हैं?
उत्तर :
हरित लवक के ग्रेना में पाये जाते हैं।

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प्रश्न 4.
प्रकाश संश्लेषण में निकलने वाली ऑक्सीजन किस पदार्थ के अणुओं से प्राप्त होती है?
उत्तर :
जल (H2O) से।

प्रश्न 5.
जल के दो अणु के प्रकाश-अपघटन में कितने फोटॉन की आवश्यकता होती है?
उत्तर :
जल के दो अणु के प्रकाश-अपघटन में चार फोटॉन की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 6.
C4 पौधे क्या हैं? इसके दो उदाहरण लिखिए।
उत्तर :
जिन हैच और स्लैम चक्र वाले पौधों में कार्बन डाइऑक्साइड स्थिरीकरण का प्रथम उत्पाद 4 कार्बन वाला पदार्थ ऑक्सेलोऐसीटिक अम्ल होता है, C4 पौधे कहलाते हैं। उदाहरणार्थ-गन्ना, मक्का इत्यादि।

प्रश्न 7.
क्रान्ज शारीरिकी किन पौधों में पायी जाती है?
उत्तर :
C4 पौधों में।

प्रश्न 8.
एक पौधे का नाम बताइए जिसमें प्रकाश-संश्लेषण में दो कार्बन डाइऑक्साइड ग्राही होते
उत्तर :
गन्ना (C4 पौधा)।

प्रश्न 9.
प्रकाश-संश्लेषण प्रदर्शित करने वाले उपकरण के जल में कोल्ड ड्रिंक मिलाने पर अधिक बुलबुले निकलते हैं। कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
प्रकाश-संश्लेषण प्रदर्शित करने वाले उपकरण के जल में कोल्ड ड्रिंक मिलाने (UPBoardSolutions.com) पर अधिक बुलबुले निकलते हैं; क्योंकि कोल्ड ड्रिंक में CO2 गैस होती है जिसके कारण उपकरण के जल में CO2 की सान्द्रता बढ़ जाती है और प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया तीव्र हो जाती है जिससे अधिक मात्रा में O2 गैस निकलती है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रकाश-संश्लेषण की प्रकाशिक तथा अप्रकाशिक प्रक्रियाओं में अन्तर बताइए।
उत्तर :
प्रकाश-संश्लेषण की प्रकाशिक तथा अप्रकाशिक प्रक्रियाओं में अन्तर
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प्रश्न 2.
हिल अभिक्रिया से आप क्या समझते हैं?

उत्तर :
वैज्ञानिक हिल (Hill) ने प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) की क्रिया के अध्ययन के समय यह बताया कि जल के अणुओं के टूटने पर H2 का निर्माण होता है तथा इससे उप उत्पाद के रूप में ऑक्सीजन गैस उत्पन्न होती है। बाद में H2 को वातावरण से प्राप्त की गई CO2 के साथ (UPBoardSolutions.com) स्थिर करके विभिन्न प्रकार के कार्बोहाइड्रेट्स का निर्माण किया जाता है। हिल अभिक्रिया प्रकाश की उपस्थिति में ही सम्पन्न होती है, इसलिये इस क्रिया को प्रकाश अभिक्रिया (light reaction) भी कहते हैं।
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प्रश्न 3.
प्रकाशीय श्वसन से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर :
प्रकाशीय श्वसन (photorespiration) को समझने के लिए, हमें कैल्विन पथ के प्रथम चरण अर्थात्  CO2 स्थिरीकरण के विषय में कुछ अधिक जानकारी प्राप्त करनी होगी। यह वह अभिक्रिया है जहाँ RuBP कार्बन डाइऑक्साइड से संयोजित होकर 3PGA के 2 अणुओं का गठन करता है और एक एन्जाइम रिबुलोज बिसफॉस्फेट कार्बोक्सिलेज ऑक्सीजिनेज
(RuBisCO) के द्वारा उत्प्रेरित होता है।
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 13 Photosynthesis in Higher Plants image 8RuBisCO
एन्जाइम विश्व में सबसे प्रचुर मात्रा में पाया जाता है क्योंकि यह CO2 एवं O2 दोनों से बन्धित हो सकता है, इसलिए इसे रुबिस्को कहते हैं। रुबिस्को में O2 की अपेक्षा CO2 के लिए अधिक बन्धुता है। कल्पना कीजिए कि यदि ऐसा नहीं होता तो क्या होता? यह बन्धुता प्रतियोगितात्मक है। O2 अथवा  CO2 इनमें से कौन आबन्ध होगा, यह उनकी सापेक्ष सान्द्रता पर निर्भर करता है।

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C2 पौधों में कुछ O2 RuBisCO से बन्धित होती है अत: CO2 का यौगिकीकरण कम हो जाता है। यहाँ पर RUBP, 3-PGA के अणुओं में परिवर्तित होने की बजाय ऑक्सीजन से संयोजित होकर चक्र में एक फॉस्फोग्लिसरेट अणु बनाता है जिसे प्रकाशीय श्वसन कहते हैं। प्रकाश श्वसन पथ में शर्करा और ATP को संश्लेषण नहीं होता; बल्कि इसमें ATP के उपयोग के साथ CO2 भी निकलती है। प्रकाशीय श्वसन पथ में ATP अथवा NADPH का संश्लेषण नहीं होता; अत: प्रकाश श्वसन एक निरर्थक प्रक्रिया है।

C4 पौधों में प्रकाशीय श्वसन नहीं होता है। इसका कारण यह है कि इनमें एक ऐसी प्रणाली होती है जो एन्जाइम स्थल पर CO2 की सान्द्रता बढ़ा देती है। ऐसा तब होता है जब पर्णमध्योतक का C4 अम्ल पूलाच्छद में टूटकर CO2 को मुक्त करता है, जिसके परिणामस्वरूप CO2 की अन्तराकोशिकीय सान्द्रता बढ़ जाती है। इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि रुबिस्को कार्बोक्सिलेज के रूप में कार्य करता है, जिससे इसकी ऑक्सीजनेज के रूप में कार्य करने की क्षमता कम हो जाती है।

प्रश्न 4.
C3 तथा CAM पौधों में अन्तर बताइए।
उत्तर :
कुछ पौधों; विशेषकर अत्यधिक ताप में उगने वाले सरस मरुद्भिदों; जैसे–नागफनी (Opuntia), केतकी (Agave) आदि में दिन के समय रन्ध्र बन्द रहने से ऊतकों को कार्बन डाइऑक्साइड नहीं मिल पाती है। यह रात्रि को रन्ध्रों के खुलने पर उपलब्ध होती है। अत: इन पौधों की पत्तियों की मध्योतक कोशिकाओं (mesophyll cells) में कार्बन डाइऑक्साइड का स्थिरीकरण C4 पौधों के समान ही होता है। रात्रि के समय ये पत्तियाँ PEP (phosphoenol pyruvic acid) के साथ मिलकर CO2 ऑक्सेलोऐसीटिक अम्ल (oxaloacetic acid) तथा बाद में मैलिक अम्ल (malic acid) बना लेती है। दिन के समय मैलिक अम्ल विघटित होकर (UPBoardSolutions.com) CO2 निष्कासित करता है जो कैल्विन चक्र में प्रवेश करती है। ध्यान रहे, यहाँ पर्णमध्योतक कोशिकाओं में ही दोनों बार स्थिरीकरण होता है, C4 पौधों की तरह दो भिन्न कोशिकाओं में नहीं। ऐसे पौधों को कैम पादप (CAM plant) कहा गया है।

प्रश्न 5.
C4 व C3 पौधों में अन्तर कीजिए।
उत्तर :
C4 व C3 पौधों में अन्तर
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प्रश्न 6.
प्रकाश-संश्लेषण को प्रभावित करने वाले बाह्य कारकों का वर्णन कीजिए।

उत्तर :
प्रकाश-संश्लेषण को प्रभावित करने वाले बाह्य कारकों का वर्णन निम्नवत् है
1. प्रकाश
जब हम प्रकाश को प्रकाश – संश्लेषण को प्रभावित करने वाले कारक के रूप में लेते हैं तो हमें प्रकाश की गुणवत्ता, प्रकाश की तीव्रता तथा दीप्तिकाल के बीच अन्तर करने की आवश्यकता होती है। यहाँ कम प्रकाश तीव्रता पर आपतित प्रकाश तथा CO2  के यौगिकीकरण की दर के बीच एक रेखीय सम्बन्ध है। उच्च प्रकाश तीव्रता होने पर, इस दर में कोई वृद्धि नहीं होती है, अन्य कारक सीमित हो जाते हैं। इसमें ध्यान देने वाली रोचक बात यह है कि प्रकाश संतृप्ति पूर्ण प्रकाश के 10 प्रतिशत पर होती है। छाया अथवा सघन जंगलों में उगने वाले पौधों को छोड़कर प्रकाश शायद ही प्रकृति में सीमाकारी कारक हो। एक सीमा के बाद आपतित प्रकाश क्लोरोफिल के विघटन का कारण होता है, जिससे प्रकाश-संश्लेषण की दर कम हो जाती है।

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2. कार्बन डाइऑक्साइड की सान्द्रता
प्रकाश संश्लेषण में कार्बन डाइऑक्साइड एक प्रमुख सीमाकारी कारक है। वायुमण्डल में CO2 की सान्द्रती बहुत ही कम है (0.03 और 0.04 प्रतिशत के बीच)। CO2 की सान्द्रता में 0.05 प्रतिशत तक वृद्धि के कारण CO2 की यौगिकीकरण दर में वृद्धि हो सकती है, लेकिन इससे अधिक की मात्रा लम्बे समय तक के लिए क्षतिकारक बन सकती है। C3 एवं C4 पौधे CO2की भिन्न-भिन्न सान्द्रताओं में भिन्न अनुक्रिया करते हैं। निम्न प्रकाश स्थितियों में दोनों (UPBoardSolutions.com) में से कोई भी समूह उच्च CO2 सान्द्रता के प्रति अनुक्रिया नहीं करते हैं। उच्च प्रकाश तीव्रता में C3 तथा C4 दोनों ही तरह के पादपों में प्रकाश-संश्लेषण की बढ़ी दर अधिक हो जाती है। यहाँ पर यह ध्यान देना महत्त्वपूर्ण है कि C4 पौधे लगभग 360 μ1L-1 पर संतृप्त हो जाते हैं जबकि Cबढ़ी हुई CO2 सान्द्रता पर अनुक्रिया करते हैं तथा संतृप्तता केवल 450 μ1L-1 के बाद ही दिखाते हैं। अत: उपलब्ध CO2 का स्तर C3पादपों के लिए सीमाकारी है।

सच तो यह है कि C3 पौधे उच्चतरे CO2 सान्द्रता में अनुक्रिया करते हैं और इससे प्रकाश-संश्लेषण की दर में वृद्धि होती है, जिसके फलस्वरूप उत्पादन अधिक होता है और इस सिद्धान्त का उपयोग ग्रीन हाउस फसलों; जैसे-टमाटर एवं बेल मिर्च में किया गया है। इन्हें कार्बन-डाइऑक्साइड से भरपूर वातावरण में बढ़ने का अवसर दिया जाता है ताकि उच्च पैदावार प्राप्त हो।

3. ताप
प्रकाश संश्लेषण की अप्रकाशीय अभिक्रिया एन्जाइमों पर निर्भर करती है इसलिए यह ताप द्वारा नियन्त्रित होती है। यद्यपि प्रकाश अभिक्रिया भी ताप संवेदी होती है, लेकिन उस पर ताप का काफी कम प्रभाव होता है। C4 पौधे उच्च ताप पर अनुक्रिया करते हैं तथा उनमें प्रकाश-संश्लेषण की दर भी ऊँची होती है, जबकि C3 पौधों के लिए इष्टतम ताप कम होता है। विभिन्न पौधों के प्रकाश-संश्लेषण के लिए इष्टतम ताप उनके अनुकूलित आवास पर निर्भर करता है। उष्णकटिबन्धी पौधों के लिए इष्टतम ताप उच्च होता है। समशीतोष्ण जलवायु में उगने वाले पौधों के लिए अपेक्षाकृत कम ताप की आवश्यकता होती है।

4. जल
यद्यपि प्रकाश अभिक्रिया में जल एक महत्त्वपूर्ण प्रतिक्रिया अभिकारक है, तथापि, कारक के रूप में जल का प्रभाव पूरे पादप पर पड़ता है, न कि सीधे प्रकाश-संश्लेषण पर। जल तनाव रन्ध्र को बन्द कर देता है; अतः CO2 की उपलब्धता घट जाती है। इसके साथ ही, जल अभाव से पत्तियाँ मुरझा जाती हैं, जिससे पत्तियों का क्षेत्रफल कम हो जाता है और इसके साथ-ही-साथ उपापचयी क्रियाएँ भी कम हो जाती हैं।

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प्रश्न 7.
पौधों के जीवन में प्रकाश का क्या महत्त्व है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
पौधों के जीवन में प्रकाश का बहुत महत्त्व है क्योंकि प्रकाश के बिना पौधों का जीवन संभव नहीं है। पौधों को प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा अपना भोजन निर्माण करने के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है और यदि प्रकाश ही नहीं होगा तो वे प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया नहीं कर पाएँगे। और भोजन के अभाव में मर जायेंगे। इसके अतिरिक्त पौधों को अनेक कार्यों; जैसे-फलने-फूलने, वृद्धि, प्रजनन, बीजों के अंकुरण आदि के लिए भी प्रकाश की आवश्यकता होती है। अतः हम कह सकते हैं कि पौधों के जीवन में प्रकाश का बहुत महत्त्व है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कैल्विन चक्र का विस्तार से वर्णन कीजिए। या प्रकाश-संश्लेषण क्रिया-विधि का संक्षेप में वर्णन कीजिए। या प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया-विधि के सम्बन्ध में आधुनिक विचार बताइए एवं विस्तार से समझाइए। या प्रकाश-संश्लेषण के कैल्विन चक्र का वर्णन कीजिए। था प्रकाश-संश्लेषण के C3 चक्र का विवरण दीजिए। या प्रकाश-संश्लेषण किसे कहते हैं? इसके चक्रीय एवं अचक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण का वर्णन कीजिए। या प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया में पर्णहरित का क्या कार्य है? इसकी प्रकाशिक क्रिया समझाइए। या प्रकाश-संश्लेषण के अन्तर्गत प्रकाश एवं अन्धकार प्रक्रिया में भेद कीजिए। या प्रकाशहीन प्रक्रिया क्या है? कैल्विन चक्र का सचित्र वर्णन कीजिए। या कैल्विन-बेन्सन चक्र का वर्णन कीजिए। यह क्रिया हरितलवक के किस भाग में होती है? या प्रकाश कर्म I तथा प्रकाश कर्म II में अन्तर बताइए। या प्रकाश संश्लेषण से आप क्या समझते हैं? प्रकाश-संश्लेषण में होने वाली प्रकाशहीन अभिक्रिया का सविस्तार वर्णन कीजिए।
उत्तर :

प्रकाश-संश्लेषण

वह अभिक्रिया जिसमें हरे पेड़-पौधे सूर्य के प्रकाश, CO2, जल तथा पर्णहरित (Chlorophyll) की उपस्थिति में कार्बोहाइड्रेट्स का निर्माण करते हैं, प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) कहलाती है। इसे निम्न समीकरण द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है
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प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया-विधि

उपर्युक्त समीकरण से, यह स्पष्ट है कि 6O2  निकलने के लिए 12H2O, की आवश्यकता पड़ेगी। वास्तव में, जल (H2O)को प्रकाश में क्लोरोफिल की उपस्थिति में हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के लिए अपघटित (decompose) किया जाता है। वैज्ञानिक हिल (Hill) ने प्रकाशीय क्रियाओं को अलग से पहचाना तथा यह भी निश्चित किया कि प्रकाश की ऊर्जा का उपयोग जल के अणुओं को तोड़कर उससे कच्चे माल की तरह H2 को निष्कासित किया जाता है इसी से उप-उत्पाद के रूप में O2 भी प्राप्त होती है। बाद में, हाइड्रोजन को वातावरण से प्राप्त की गयी कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) के साथ स्थिर (fix) करके कार्बोहाइड्रेट्स (UPBoardSolutions.com) का निर्माण किया जाता है। यह क्रिया अत्यन्त जटिल होती है तथा अनेक पद और तन्त्रों में होकर सम्पन्न होती है। इस प्रकार प्रारम्भिक क्रियाओं के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है अतः ये क्रियाएँ प्रकाशीय क्रियाएँ या हिलअभिक्रियाएँ (light reactions or Hill reactions) कहलाती हैं। बाद की क्रियाओं के लिए प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती है और ये अप्रकाशीय क्रियाएँ (dark reactions) कहलाती हैं। प्रकाश-संश्लेषण के सम्बन्ध में अब यह पूर्णतः निश्चित हो चुका है कि क्लोरोप्लास्ट के अन्दर प्रकाशीय क्रियाएँ गैना (grana) पर तथा अन्य क्रियाएँ पीठिका (stroma) में होती हैं। सभी प्रकार के एन्जाइम्स (enzymes) इत्यादि का निर्माण तथा उपयोग जो प्रकाश संश्लेषण में आवश्यक होते हैं, क्लोरोप्लास्ट के अन्दर ही होता है। इसलिए इस सम्पूर्ण क्रिया को दो भागों में बाँटते हैं

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1. प्रकाशीय प्रक्रियाएँ : हिल अभिक्रियाएँ
समस्त प्रकाशीय अभिक्रियाएँ हरितलवक के ग्रैना (grana) पर होती हैं। प्रकाश के अवशोषण से लेकर प्रकाशीय ऊर्जा को प्रयोग करने वाले तक, सभी सम्बन्धित वर्णक, दो प्रकार के वर्णक तन्त्रों में बँटे रहते हैं। इनको वर्णक तन्त्र-I और वर्णक तन्त्र-II कहते हैं। इन्हीं वर्णक तन्त्रों में क्रमशः प्रकाश कर्म-1 तथा प्रकाश कर्म-II होते हैं। दोनों प्रकाश कर्मों में होने वाली विभिन्न अभिक्रियाओं के मुख्य परिणाम इस प्रकार हैं

    1.  सूर्य के प्रकाश की विकिरण ऊर्जा के कारण क्लोरोफिल के अणु सक्रिय हो जाते हैं और उत्तेजित इलेक्ट्रॉन्स (active electrons) का निष्कासन करते हैं।
    2. इलेक्ट्रॉन्स निष्कासित करने के बाद बने सक्रिय क्लोरोफिल की उपस्थिति में आवश्यक ऊर्जा प्राप्त कर जल के अणुओं का विच्छेदन होता है, जिससे हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन प्राप्त होती है
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    3. उत्तेजित इलेक्ट्रॉन्स इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण तन्त्र के द्वारा अपने स्तर को शनैः-शनैः कम करते हैं। मुक्त हुई इस ऊर्जा को ADP के अणुओं में एक फॉस्फेट गुट्ट जोड़कर, ATP अणु बनाकर संचित कर लिया जाता है।
    4. जल विच्छेदन से प्राप्त हाइड्रोजन NADP नामक हाइड्रोजन ग्राही के द्वारा एकत्र कर ली जाती है।
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  1. प्राप्त ऑक्सीजन पौधे से बाहर निकल जाती है। उपर्युक्त सम्पूर्ण प्रकाशीय अभिक्रियाओं में से प्रकाश कर्म-I में सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा को इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण तन्त्र के माध्यम से चक्रीय प्रकाशीय फॉस्फोरिलेशन के द्वारा ATP में अनुबन्धित कर लिया जाता है। प्रकाश कर्म-II में जल के प्रकाशीय विच्छेदन की क्रिया होती है, यहाँ ATP निर्माण की क्रिया अचक्रिक प्रकाशीय फॉस्फोरिलेशन होती है।

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चक्रीय फोटोफॉस्फोरिलेशन : प्रकाश कर्म-।
इस क्रिया में हरितलवक में स्थित वर्णक तन्त्र-I (pigment system-I) में क्लोरोफिल के अणु प्रकाशीय ऊर्जा अवशोषित कर ऊर्जित हो जाते हैं। इसके फलस्वरूप इनके प्रत्येक अणु से उच्च ऊर्जा स्तर वाला इलेक्ट्रॉन निकलता है। यह इलेक्ट्रॉन ग्राही पदार्थ अथवा फेरेडॉक्सिन द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है। फेरेडॉक्सिन से इलेक्ट्रॉन विभिन्न साइटोक्रोम (cyt b6, cyt f) और प्लास्टोसायनिन से बनी हुई इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण श्रृंखला (electron transport chain) के द्वारा वापस क्लोरोफिल तक पहुँच जाता है। इस क्रमिक क्रिया में इलेक्ट्रॉन्स की कुछ ऊर्जा ए०डी०पी० (ADP) को ए०टी०पी० (ATP) में परिवर्तित करने के काम में आती है; क्योंकि इस क्रिया में ए०डी०पी० में फॉस्फेट का एक मूलक जुड़ता है और यह क्रिया प्रकाश में होती है। अतः इस क्रिया को फोटोफॉस्फोरिलेशन (photophosphorylation) कहते हैं। साथ ही इस क्रिया में क्लोरोफिल से निकला हुआ इलेक्ट्रॉन वापस क्लोरोफिल में ही आ जाता है। अतः इस प्रकार के फोटोफॉस्फोरिलेशन को चक्रीय फोटोफॉस्फोरिलेशन (cyclic photophosphorylation) कहते हैं।
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जल का प्रकाशिक अपघटन : प्रकाश कर्म-II
वर्णक तन्त्र-II (pigment system-II) में होने वाला प्रकाश कर्म-II (photo act-II) अचक्रीय फोटोफॉस्फोरिलेशन (non-cyclic photo- phosphorylation) है अर्थात् इस क्रिया में सक्रिय क्लोरोफिल से उत्सर्जित उत्तेजित इलेक्ट्रॉन वापस क्लोरोफिल में नहीं आता है, परन्तु NADP के माध्यम से इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण तन्त्र में जाकर कार्बन डाइऑक्साइड को शर्करा में अपचयित करता है। ऐसी परिस्थिति में क्लोरोफिल में किसी बाह्य इलेक्ट्रॉन दाता से इलेक्ट्रॉन प्राप्त होने चाहिए। हरित पादपों में यह इलेक्ट्रॉन OH आयनों से प्राप्त होते हैं जो साधारणतया जलीय वातावरण में उपस्थित रहते हैं। सामान्य अचक्रीय फॉस्फोरिलेशन में (UPBoardSolutions.com) NADP इलेक्ट्रॉन ग्राही (electron acceptor) है। NADP का प्रत्येक अणु दो इलेक्ट्रॉन को ग्रहण करके NADP.H2  बनाता है जो बाद में कार्बन डाइऑक्साइड से शर्करा को उत्पन्न करने के काम आता है। NADP.H2  के निर्माण में दो प्रोटॉन्स की भी आवश्यकता होती है जो जल के टूटने से प्राप्त होते हैं। जल के अपघटन में हाइड्रॉक्सिल आयन व इलेक्ट्रॉन भी प्राप्त होते हैं। ये हाइड्रॉक्सिल आयन आपस में क्रिया करके ऑक्सीजन व जल बनाते हैं। और क्लोरोफिल में इलेक्ट्रॉन्स का प्रतिस्थापन साइटोक्रोम श्रृंखला से होकर जल से निकले हुए इलेक्ट्रॉन्स के द्वारा होता है, इस क्रिया में ए०डी०पी० से ए०टी०पी० का संश्लेषण होता है।
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NADP व ADP से क्रमशः NADP.H, व ATP का निर्माण व ऑक्सीजन का निकलना जल के प्रकाशिक अपघटन के अन्तिम उत्पाद हैं। ऑक्सीजन उप-उत्पाद के रूप में ही बनती है। चक्रीय फोटोफॉस्फोरिलेशन में केवल ATP का उत्पादन होता है। इस प्रकार उत्पन्न ATP को स्वांगीकारी शक्ति (assimilatory power) तथा (NADP.H) को अपचयन शक्ति (reducing power) कहते हैं। प्रकाश संश्लेषणात्मक भाग (अप्रकाशीय अभिक्रिया) में यही शक्तियाँ अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं अर्थात् ये वास्तविक संश्लेषण का महत्त्वपूर्ण आधार हैं।

2. अप्रकाशीय (अन्धकार) क्रियाएँ : कैल्विन का योगदान
प्रकाश संश्लेषण के लिए ये संश्लेषणात्मक अभिक्रियाएँ हैं जिनके लिए प्रकाश की कोई आवश्यकता नहीं होती तथा ये क्लोरोप्लास्ट के मैट्रिक्स या पीठिका (matrix or stroma) में होती हैं। इन क्रियाओं में कार्बोहाइड्रेट्स (carbohydrates) का निर्माण होता है। ये अत्यन्त जटिल क्रियाएँ हैं। इस सम्बन्ध में वर्तमान जानकारी प्रमुख रूप से मैल्विन कैल्विन (Malvin Calvin) व बेन्सन (Benson), बैशम (Bassham), गैफरॉन (Gaffron), फैगर (Fager) आदि के द्वारा दी गयी है। कार्बन डाइऑक्साइड (CO2 ) किस तरह, किस-किस प्रकार के यौगिक, किस कोशिका और उसके किस भाग में बनाती है तथा किस प्रकार से कार्बोहाइड्रेट्स का निर्माण होता है? इसका क्रम कार्बन का प्रकाश-संश्लेषण में मार्ग (path of carbon in photosynthesis) कहलाता है। कार्बन का यह पथ प्रमुख रूप से कैल्विन (Calvin) ने अपने साथियों के साथ रेडियो-सक्रिय कार्बन (radioactive carbon =C14) का प्रयोग करके खोजा। कार्बन डाइऑक्साइड, C14O2  प्रकार की प्रयोग में लायी गयी तथा बनने वाले यौगिकों का उनकी रेडियोसक्रियता (radioactivity) के आधार पर पता किया गया कि कार्बन का संयोग किस-किस रूप में होता है। इस आधार पर एक निश्चित चक्र तैयार किया गया। इसको कैल्विन  चक्र (Calvin cycle) कहते हैं।

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कार्बोहाइड्रेट्स के संश्लेषण का कार्य, वास्तव में बिना प्रकाश के ही हो जाता है, किन्तु CO2; के अपचयन के लिए H+ जो NADP .H2 के रूप में प्राप्त होते हैं, प्रकाशीय अभिक्रियाओं से ही मिलते हैं। चूँकि अप्रकाशीय अभिक्रियाएँ अथवा कार्बन पथ की क्रियाएँ एक चक्र के रूप में होती हैं, जिसकी खोज कैल्विन वैज्ञानिक ने की। इस कारण इनके नाम पर ही इस चक्र को कैल्विन चक्र (Calvin cycle) कहते हैं। इन अभिक्रियाओं में CO2 के स्थिरीकरण का प्रथम स्थायी उत्पाद 3 कार्बन (C3) यौगिक, फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल (3-phosphoglyceric acid = 3 PGA) होता है। इस आधार पर इसे C3-चक्र (C3-cycle) भी कहते हैं

कैल्विन चक्र या कार्बन पथ

1. प्रथम फॉस्फोरिलीकरण (First phosphorylation) :
कार्बन डाइऑक्साइड के अपचयन का आरम्भ 5-कार्बन वाली शर्करा रिबुलोज 5-फॉस्फेट (ribulose 5-phosphate) के ए०टी०पी० (ATP) से एक फॉस्फेट समूह प्राप्त करने के बाद होता है। इस प्रकार, इस शर्करा के 6 अणु ATP के 6 अणुओं (प्रकाशीय अभिक्रियाओं से प्राप्त) से संयुक्त होकर रिबुलोज 1, 5-बाइफॉस्फेट के 6 अणुओं का निर्माण करते हैं
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2. कार्बोक्सिलीकरण (Carboxylation) :
उपर्युक्त के अनुसार कार्बन डाइऑक्साइड का अपचयन सबसे पहले 5 कार्बन वाले यौगिक, रिबुलोज 1, 5-बाइफॉस्फेट के साथ होता है। ऐसा समझा जाता है कि इस क्रिया में एक 6 कार्बन वाले अस्थायी कीटो अम्ल का निर्माण होता है और यह शीघ्र ही टूटकर दो, 3-फॉस्फोग्लिसरिक (UPBoardSolutions.com) अम्ल (3-PGA) के अणु बनाता है। इस क्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड के 6 अणुओं का उपयोग होता है
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3. द्वितीय फॉस्फोरिलीकरण (Second phosphorylation) :
3-PGA के 12 अणु जो समीकरण (ii) से प्राप्त हो रहे हैं, एन्जाइम ट्राइओज फॉस्फेट डीहाइड्रोजिनेज तथा फॉस्फोग्लिसरिक ऐसिड काइनेज की उपस्थिति में दो प्रकार की क्रियाएँ करते हैं। पहले 1, 3-डाइफॉस्फोग्लिसरिक अम्ल (1, 3-diphosphoglyceric acid = 1, 3-PGA) बना है। इसमें 12 ATP अणुओं का उपयोग होता है
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4. अपचयन (Reduction) :
1, 3-डाइफॉस्फोग्लिसरिक अम्ल बाद में 3-फॉस्फोग्लिसरेल्डिहाइड (3-phospho-glyceraldehyde = PGAL) में बदल जाता है। इस क्रिया में प्रकाश कर्म-II से प्राप्त NADP. H2 से हाइड्रोजन प्राप्त की जाती है तथा फॉस्फोरिक अम्ल (H3PO4) बनता है
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5. फॉस्फोग्लिसरेल्डिहाइड  :
(PGAL) एक खाद्य पदार्थ है और कई प्रकार से क्रिया करता है। इनमें अभिक्रियाओं को अग्रलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है
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QSW`1. खण्ड A (section A) :
12 PGAL अणुओं में से दो अणु विभिन्न पदों में होकर पहले हेक्सोज शर्करा का एक अणु तथा बाद में अन्य अणुओं के साथ मिलकर मण्ड (starch) आदि का निर्माण करते हैं।

2. खण्ड B (section B) :
12 PGAIL में से शेष 10 अणुओं से चक्रीय क्रियाओं द्वारा 6 अणु रिबुलोज मॉनोफॉस्फेट (ribulose monophosphate) के बनाते हैं।

खण्ड A

(i) PGAL का एक अणु फॉस्फोटाइओज आइसोमिरेज (एन्जाइम) की उपस्थिति में अपने
समावयवी (isomer), डाइहाइड्रॉक्सीऐसीटोन फॉस्फेट (dihydroxyacetone phosphate) में परिवर्तित हो जाता है
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(ii) एक अणु उपर्युक्त क्रिया में बने 3-डाइहाइड्रॉक्सी ऐसीटोन फॉस्फेट के साथ मिलकर फ्रक्टोज 1, 6-डाइफॉस्फेट (fructose 1, 6-diphosphate) का निर्माण करते हैं। यह दो ट्राइओसेज (CG) से मिलकर हेक्सोज (CG) बनने की क्रिया है। इस क्रिया में एल्डोंलेज (एन्जाइम) आवश्यक है।
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(iii) बाद में, फ्रक्टोज 1, 6-डाइफॉस्फेट [समीकरण (vi)] एक फॉस्फेट समूह का निष्कासन, फॉस्फेटेज (phosphatase) एन्जाइम की उपस्थिति में करते हैं
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फ्रक्टोज 6-फॉस्फेट (fructose 6-phosphate) एन्जाइम की उपस्थिति में अन्य हेक्सोज फॉस्फेट का, आन्तरिक परिवर्तन के द्वारा निर्माण कर सकते हैं। इसी प्रकार ग्लूकोज फॉस्फेट का भी निर्माण कर सकते हैं। ग्लूकोज या फ्रक्टोज फॉस्फेट अपना एकमात्र फॉस्फेट समूह फॉस्फेटेज (phosphatase) एन्जाइम की उपस्थिति में निष्कासित कर लेते हैं। इस प्रकार ग्लूकोज (glucose) का एक अणु उत्पादित होता है।

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खण्ड B

इन विभिन्न क्रियाओं में रिलूलोज 5-फॉस्फेट (ribulose 5-phosphate) फिर से उत्पन्न होता है, (UPBoardSolutions.com) पुनरुत्पादन (regeneration)। फॉस्फोग्लिसरेल्डिहाइड (PGAL) डाइहाइड्रॉक्सीऐसीटोन फॉस्फेट, ट्राइओज, 4-कार्बन (tetrose), 5-कार्बन (pentose), 7-कार्बन (heptose) आदि शर्करा फॉस्फेट बनाने के लिये भी प्रारम्भिक पदार्थ हैं। इस कार्य में हेक्सोज शर्कराओं को भी काम में लाया जाता है। निम्नलिखित क्रियाएँ इसको स्पष्ट करती हैं
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समीकरण (xii) तथा (xiii) के परिवर्तनों से रिबुलोज 5-फॉस्फेट (ribulose 5-phosphate) के 2+4 = 6 अणु प्राप्त हो जाते हैं,
जो समीकरण (i) के अनुसार 6 ATP से फॉस्फेट समूह प्राप्त करके रिबुलोज बाइफॉस्फेट (ribulose biphosphate = RuBP) में परिवर्तित होते हैं, जो नये कार्बन डाइऑक्साइड अणुओं के अपचयन के लिये तैयार होते हैं। इस प्रकार ये क्रियाएँ चक्रीय (cyclic) होती हैं। उपर्युक्त सम्पूर्ण क्रियाओं में 18 ATP तथा 12 NADP.H2 काम में आ जाते हैं और केवल एक अणु ग्लूकोज प्राप्त होता हैUP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 13 Photosynthesis in Higher Plants image 25
प्रकाशीय तथा अप्रकाशीय सम्पूर्ण क्रियाओं को जोड़कर निम्न अभिक्रिया प्राप्त होती है
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प्रश्न 2.
C4पथ का वर्णन कीजिए। C3 एवं C4 पौधों की पत्तियों की शारीरिकी की तुलना कीजिए। या हैच-स्लैक चक्र का वर्णन कीजिए। यह किन पौधों में पाया जाता है? इन पौधों की पत्तियों के शरीर की क्या विशेषता हैं?

उत्तर :
वे पौधे जो उच्च ताप वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं उनमें C4 पथ पाया जाता है। इन पौधों में CO2 के यौगिकीकरण का पहला उत्पाद यद्यपि एक 4C पदार्थ ऑक्सैलोऐसीटिक अम्ल (Oxaloacetic acid) होता है फिर भी इनके मुख्य जैव संश्लेषण पथ में C3 पथ अथवा कैल्विन चक्र ही होता है। C4 पौधे विशिष्ट होते हैं। इनकी पत्तियों में एक विशेष प्रकार की शारीरिकी पायी जाती है। ये पौधे उच्च ताप को भी सह सकते हैं। ये उच्च प्रकाश तीव्रता के प्रति अनुक्रिया करते हैं। इनमें प्रकाश श्वसन प्रक्रिया नहीं होती और जैव भार अधिक उत्पन्न होता है।

C4 पथ पौधों के संवहन बण्डल (vascular bundle) के चारों ओर स्थित बृहद् कोशिकाएँ पूलाच्छद (bundle sheath) कोशिकाएँ कहलाती हैं और पत्तियाँ जिनमें ऐसा शरीर होता है, उन्हें क्रैन्ज शरीर (Kranz anatomy) वाली पत्तियाँ कहते हैं। यहाँ कैंज का अर्थ है छल्ला अथवा घेरा, चूँकि कोशिकाओं की व्यवस्था एक छल्ले के रूप में होती है। संवहन बण्डल के आस-पास पूलाच्छद कोशिकाओं की अनेक परतें (several layers) होती हैं। इनमें बहुत अधिक संख्या में क्लोरोप्लास्ट होते हैं। इसकी मोटी भित्तियाँ

गैस से अप्रवेश्य होती हैं और इनमें अन्तरकोशीय स्थान नहीं होता। सर्वप्रथम सन् 1957 में कोर्शचॉक (Kortschak) एवं सहयोगियों ने बताया कि गन्ने के पौधों (sugarcane plants) में अप्रकाशीय अभिक्रिया के दौरान प्रथम स्थाई यौगिक (first stable product) के रूप में 4C वाला यौगिक बनता है। इसी प्रकार की व्याख्या कार्पिलो (Karpilov, 1960) ने मक्का की पत्तियों (maize leaves) में की। बाद में सन् 1966 में एम०डी० हैच और सी०आर० स्लैक (M.D. Hatch and C.R. Slack) ने इसकी विस्तृत व्याख्या की

जिसे हैच एवं स्लैक पथ (Hatch and Slack path) कहते हैं। यह एक चक्रीय प्रक्रिया है। यह मुख्य रूप से एकबीजपत्री पौधों; जैसे-sugarcane, maize, cyperus (घास);  Sorghum, Atriplex आदि में पाया जाता है। यह कुछ द्विबीजपत्री पौधों (जैसे Amaranthus) में भी पाया जाता है। हैच एवं स्लैक पथ के निम्नलिखित चरण होते हैं

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CO2 का प्राथमिक ग्राही एक 3 कार्बन अणु फॉस्फोइनोल पाइरुवेट (PEP) है और वह पर्णमध्योतक कोशिका में स्थित होता है। इस यौगिकीकरण को PEP कार्बोक्सीलेज (PEP carboxylase) नामक एन्जाइम सम्पन्न करता है। पर्णमध्योतक कोशिकाओं में रुबिस्को एन्जाइम (UPBoardSolutions.com) नहीं होता है। C4 अम्ल, ऑक्सैलोऐसीटिक अम्ल (OAA) पर्णमध्योतक कोशिका में निर्मित होता है। इसके बाद पर्णमध्योतक कोशिका में अन्य 4-कार्बन वाले अम्ल; जैसे–मैलिक अम्ल (malic acid) और एस्पार्टिक अम्ल (aspartic acid) बनते हैं, जोकि पूलाच्छद कोशिका (bundle sheath cells) में चले जाते हैं। पूलाच्छद कोशिका में यह C4 अम्ल विघटित हो जाता है जिससे COतथा एक 3-कार्बन अणु पाइरुविक अम्ल मुक्त होते हैं।
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3-कार्बन अणु पुनः पर्णमध्योतक में वापस आ जाता है, जहाँ यह पुनः PEP में बदल जाता है और इस तरह से यह चक्र पूरा होता है। पूलाच्छद कोशिका से निकली COकैल्विन पथ अथवा C3 चक्र में प्रवेश करती है। कैल्विन एक ऐसा पथ है जो सभी पौधों में समान रूप से होता है। पूलाच्छद (UPBoardSolutions.com) कोशिका रुबिस्को से भरपूर होती है, परन्तु इनमें PEP कार्बोक्सीलेज का अभाव होता है। अतः मैलिक पथ एवं कैल्विन पथ जिसके परिणामस्वरूप शर्करा बनती है, वह Cएवं C4 पौधों में सामान्य रूप से होता है। ध्यान रहे कि कैल्विन पथ सभी C3 पौधों की पर्णमध्योतक कोशिकाओं में पाया जाता है। C4 पौधों में पर्णमध्योतक कोशिकाओं में यह सम्पन्न नहीं होता है, किन्तु केवल पूलाच्छद कोशिकाओं में कारगर होता है।

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UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 15 Plant Growth and Development 

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 15 Plant Growth and Development (पादप वृद्धि एवं परिवर्धन)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Biology . Here we  given UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 15 Plant Growth and Development (पादप वृद्धि एवं परिवर्धन)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
वृद्धि, विभेदन, परिवर्धन, निर्विभेदन, पुनर्विभेदन, सीमित वृद्धि, मेरिस्टेम तथा वृद्धि दर की परिभाषा दें।
उत्तर :

1. वृद्धि (Growth) :
ऊर्जा खर्च करके होने वाली उपापचयी क्रियाएँ वृद्धि हैं। किसी भी जीवित प्राणी के लिए (UPBoardSolutions.com) वृद्धि एक उत्कृष्ट घटना है। यह एक अनपलट, बढ़तयुक्त तथा मापदण्ड में प्रकट होने वाली क्रिया है; जैसे-आकार, क्षेत्रफल, लम्बाई, ऊँचाई, आयतन, कोशिका संख्या आदि।

2. विभेदन (Differentiation) :
शीर्ष विभज्योतक, कैम्बियम आदि में बनने वाली कोशिकाएँ सर्वप्रथम समान होती हैं परन्तु बाद में विभेदिकरण के कारण विभिन्न रूपों में परिवर्तित होती है; जैसे-जाइलम व फ्लोएम के तत्त्व आदि।

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3. परिवर्धन (Development) :
परिवर्धन वह प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत एक जीव के जीवन चक्र में आने वाले वे सारे बदलाव शामिल हैं, जो बीजांकुरण तथा जरावस्था के मध्य आते हैं।

4. निर्विभेदन (Dedifferentiation) :
जीवित विभेदित स्थायी कोशिकाएँ जिनमें कोशिका विभाजन की क्षमता नहीं होती, उनमें से कुछ कोशिकाओं में पुन:विभाजन की क्षमता स्थापित हो जाती है। इस प्रक्रिया को निर्विभेदन (dedifferentiation) कहते हैं; जैसे–कॉर्क एधा, अन्तरापूलीय एधा।

5. पुनर्विभेदन (Redifferentiation) :
निर्विभेदित कोशिकाओं या ऊतकों से बनी कोशिकाएँ अपनी विभाजन क्षमता पुनः खो देती हैं और विशिष्ट कार्य करने के लिए रूपान्तरित हो जाती हैं। इस प्रक्रिया को पुनर्विभेदन (redifferentiation) कहते हैं।

6. सीमित वृद्धि (Determinate Growth) :
पौधों में वृद्धि सीमित भी होती है और असीमित भी। पौधे जीवनपर्यन्त वृद्धि करते रहते हैं; अतः इनमें असीमित वृद्धि की क्षमता होती है। इस वृद्धि का कारण विभज्योतक ऊतक के शीर्ष पर उपस्थित है (मूल शीर्ष, स्तम्भ शीर्ष)। पार्श्व विभज्योतक के कारण पौधे चौड़ाई में बढ़ते हैं।

7. मेरिस्टेम (Meristem) :
ये विभज्योतक ऊतक हैं। इनकी कोशिकाएँ सदैव विभाजित होती रहती हैं। ये ऊतक के शीर्ष व पाश्र्व में मिलता है; जैसे—मूल शीर्ष, स्तम्भ शीर्ष, कैम्बियम आदि।

8. वृद्धि दर (Growth Rate) :
समय की प्रति इकाई में बढ़ी हुई वृद्धि को वृद्धि दर कहते हैं। इसे गणित रूप में दर्शाया जा (UPBoardSolutions.com) सकता है। एक जीव अथवा उसका अंग विभिन्न तरीकों से अधिक कोशिका निर्माण कर सकता है। वृद्धि दर इसे ज्यामितीय अथवा अंकगणितीय रुप से दर्शाती है।

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प्रश्न 2.
पुष्पित पौधों के जीवन में किसी एक प्राचालिक (parameter) से वृद्धि को वर्णित नहीं किया जा सकता है, क्यों?
उत्तर :

वृद्धि के प्राचालिक

वृद्धि सभी जीवधारियों की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। पौधों में वृद्धि कोशिका विभाजन, कोशिका विवर्धन या दीर्धीकरण तथा कोशिका विभेदन के फलस्वरूप होती है। पौधे की मेरिस्टेम कोशिकाओं (meristematic cells) में कोशा विभाजन की क्षमता पाई जाती है। सामान्यतया कोशिका विभाजन जड़ तथा तने के शीर्ष (apex) पर होता है। इसके फलस्वरूप जड़ तथा तने की लम्बाई में वृद्धि होती है। एधा (cambium) तथा कॉर्क एधा (8rk cambium) के कारण तने और जड़ की मोटाई में वृद्धि होती है। इसे द्वितीयक वृद्धि (secondary growth) कहते हैं। कोशिकीय स्तर पर वृद्धि मुख्यतः जीवद्रव्य मात्रा में वर्धन का परिणाम है। जीवद्रव्य की बढ़ोतरी या वर्धन का मापन कठिन है। वृद्धि दर मापन के कुछ मापदण्ड हैं–ताजे भोर में वृद्धि, शुष्क भार में वृद्धि, लम्बाई, क्षेत्रफल, आयतन तथा कोशिका संख्या में वृद्धि आदि। (UPBoardSolutions.com) मक्का की जड़ को अग्रस्थ मेरिस्टेम प्रति घण्टे लगभग 17,500 कोशिकाओं का निर्माण करता है। तरबूज की कोशिका के आकार में लगभग 3,50,000 गुना वृद्धि हो सकती है। पराग नलिका की लम्बाई में वृद्धि होने से यह वर्तिकाग्र, वर्तिका से होती हुई अण्डाशय में स्थित बीजाण्ड में प्रवेश करती है।

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प्रश्न 3.
संक्षिप्त वर्णित कीजिए
(अ) अंकगणितीय वृद्धि
(स) सिग्मॉइड वृद्धि वक्र
(ब) ज्यामितीय वृद्धि
(द) सम्पूर्ण एवं सापेक्ष वृद्धि दर
उत्तर :

(अ)
अंकगणितीय वृद्धि

समसूत्री विभाजन के पश्चात् बनने वाली दो संतति कोशिकाओं में से एक कोशिका निरन्तर विभाजित होती रहती है और दूसरी कोशिका विभेदित एवं परिपक्व होती रहती है। अंकगणितीय वृद्धि को हम हैं निश्चित दर पर वृद्धि करती जड़ में देख सकते हैं। यह है एक सरलतम (UPBoardSolutions.com) अभिव्यक्ति होती है। संलग्न चित्र में वृद्धि (लम्बाई) समय के विरुद्ध आलेखित की गई है।इसके फलस्वरूप रेखीय वक्र (linear curve) प्राप्त होता है। इस वृद्धि को हम गणितीय रूप से व्यक्त कर सकते हैं
L1 =L0 +rt
(L1 = समय  ‘r’  पर लम्बाई,
L0= समय  ‘0’  पर लम्बाई
r = वृद्धि दर दीर्घाकरण प्रति इकाई समय में)
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 15 Plant Growth and Development image 1

(ब)
ज्यामितीय वृद्धि

एक कोशिका की वृद्धि अथवा पौधे के एक अंग की वृद्धि अथवा पूर्ण पौधे की वृद्धि सदैव एकसमान नहीं हैं होती।
प्रारम्भिक धीमा वृद्धि काल (initial lag phase)
में वृद्धि की दर पर्याप्त धीमी होती है। तत्पश्चात् यह दर तीव्र हो जाती है और उच्चतम बिन्दु (maximum point) तक पहुँच जाती है। इसे मध्य तीव्र वृद्धि काल छ (middle logarithmic phase) कहते हैं। इसके पश्चात् यह दर धीरे-धीरे कम होती जाती है और अन्त में में स्थिर (UPBoardSolutions.com) हो जाती है। इसे अन्तिम धीमा वृद्धि काल (last stationary phase) कहते हैं। इसे ज्यामितीय वृद्धि कहते हैं। इसमें सूत्री विभाजन से बनी दोनों संतति कोशिकाएँ एक समसूत्री कोशिका विभाजन को
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 15 Plant Growth and Development image 2

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अनुकरण करती हैं और इसी प्रकार विभाजित होने की क्षमता बनाए रखती हैं। यद्यपि सीमित पोषण, आपूर्ति के साथ वृद्धि दर धीमी होकर स्थिर हो जाती है। समय के प्रति वृद्धि दर को ग्राफ पर अंकित करने पर एक सिग्मॉइड वक्र (sigmoid curve) प्राप्त होता है। यह ‘S’ की आकृति का होता है। ज्यामितीय वृद्धि (geometrical growth) को गणितीय रूप से निम्नलिखित प्रकार व्यक्त कर सकते हैं

W1 = [latex]{ W }_{ 0}^{ ert }[/latex]
जहाँ W= अन्तिम आकार–भार, ऊँचाई, संख्या आदि
W= प्रारम्भिक आकार, वृद्धि के प्रारम्भ में
r = वृद्धि दर (सापेक्ष वृद्धि दर)
t = समय में वृद्धि
e = स्वाभाविक लघुगणक का आधार (base of natural logarithms)
r = एक सापेक्ष वृद्धि दर है। यह पौधे द्वारा नई पादप सामग्री का निर्माण क्षमता को मापने के लिए है, (UPBoardSolutions.com) जिसे एक दक्षता सूचकांक (efficiency index) के रूप में संदर्भित किया जाता है;अतः W1 का अन्तिम आकार W0 के प्रारम्भिक आकार पर निर्भर करता है।
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 15 Plant Growth and Development image 3

(स)
सिग्मॉइड वृद्धि वक्र

ज्यामितिक वृद्धि को तीन प्रावस्थाओं में विभक्त कर सकते हैं

  1. प्रारम्भिक धीमा वृद्धि काल (Initial lag phase)
  2. मध्य तीव्र वृद्धि काल (Middle lag phase)
  3. अन्तिम धीमा वृद्धि काल (Last stationary phase)

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यदि वृद्धि दर का समय के प्रति ग्राफ बनाएँ तो ‘S’ की आकृति का वक्र प्राप्त होता है। इसे सिग्मॉइड वृद्धि वक्र कहते हैं।

(द)
सम्पूर्ण एवं सापेक्ष वृद्धि दर

  1. मापन और प्रति यूनिट समय में कुल वृद्धि को सम्पूर्ण या परम वृद्धि दर (UPBoardSolutions.com) (absolute growth rate) कहते हैं।
  2. किसी दी गई प्रणाली की प्रति यूनिट समय में वृद्धि को सामान्य आधार पर प्रदर्शित करना सापेक्ष वृद्धि दर (relative growth rate) कहलाता है।

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 15 Plant Growth and Development image 4

दोनों पत्तियों ने एक निश्चित समय में अपने सम्पूर्ण क्षेत्रफल में समान वृद्धि की है, फिर भी A की सापेक्ष वृद्धि दर अधिक है।

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प्रश्न 4.
प्राकृतिक पादप वृद्धि नियामकों के पाँच मुख्य समूहों के बारे में लिखिए। इनके आविष्कार, कार्यिकी प्रभाव तथा कृषि/बागवानी में इनके प्रयोग के बारे में लिखिए।
उत्तर :

प्राकृतिक पादप वृद्धि नियामक

पौधों की विभज्योतकी कोशिकाओं (meristematic cells) और विकास करती पत्तियों एवं फलों में प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होने वाले विशेष कार्बनिक यौगिकों को पादप हॉर्मोन्स (phytohormones) कहते हैं। ये अति सूक्ष्म मात्रा में परिवहन के पश्चात् पौधों के अन्य अंगों (भागों) में पहुँचकर वृद्धि एवं अनेक उपापचयी क्रियाओं को प्रभावित एवं नियन्त्रित करते हैं। वेण्ट (Went, 1928) के अनुसार वृद्धि नियामक पदार्थों के अभाव में वृद्धि नहीं होती। पादप हॉर्मोन्स को हम निम्नलिखित पाँच प्रमुख समूहों में बाँट लेते हैं
(1) ऑक्सिन (Auxins)
(2) जिबरेलिन (Gibberellins)
(3) सायटोकाइनिन (Cytokinins)
(4) ऐब्सीसिक अम्ल (Abscisic acid)
(5) एथिलीन (Ethylene)

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1. ऑक्सिन
सर्वप्रथम डार्विन (Darwin, 1880) ने देखा कि कैनरी घास (Phalaris conariensis) के नवोभिद् के प्रांकुर चोल (coleoptile) एकतरफा प्रकाश की ओर मुड़ जाते हैं, परन्तु प्रांकुर चोल के शीर्ष को काट देने पर यह एकतरफा प्रकाश की ओर नहीं मुड़ता।

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बायसेन :
जेन्सन (Boysen-Jensen 1910-1913) ने कटे हुए प्रांकुर चोल को अगार (agar) के घनाकार टुकड़े पर रखा, कुछ समय पश्चात् अगार के घनाकार टुकड़े को कटे हुए प्रांकुर चोल के स्थान पर रखने के पश्चात् एकतरफा प्रकाश से प्रकाशित करने पर प्रांकुर चोल प्रकाश की (UPBoardSolutions.com) ओर मुड़ जाता है। वेण्ट (Went, 1928) ने इसी प्रकार के प्रयोग जई (Avena sativa) के नवोभिद् पर किए। उन्होंने प्रयोग से यह निष्कर्ष निकाला कि प्रांकुर चोल के शीर्ष पर बना रासायनिक पदार्थ अगार के टुकड़ों (block) में आ गया था। वेण्ट ने प्रांकुर चोल के कटे हुए शीर्ष को दो अगार के टुकड़ों पर रखा जिनके मध्य अभ्रक (माइका) की पतली प्लेट लगी थी, एकतरफा प्रकाश डालने पर रासायनिक पदार्थ का 65% भाग अप्रकाशित दिशा के टुकड़े में एकत्र हो जाता है और केवल 35% रासायनिक पदार्थ प्रकाशित दिशा के टुकड़े में एकत्र होता है।
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वेण्ट ने इस रासायनिक पदार्थ को ऑक्सिन (auxin) नाम दिया। ऑक्सिन की सान्द्रती तने में वृद्धि को प्रेरित करती है और जड़ में वृद्धि का संदमन करती है। ऑक्सिन के असमान वितरण के फलस्वरूप ही प्रकाशानुवर्तन (phototropism) और गुरुत्वानुवर्तन (geotropism) गति होती है। केनेथ थीमान (Kenneth Thimann) ने ऑक्सिन को शुद्ध रूप में प्राप्त करके इसकी आण्विक संरचना ज्ञात की। ऑक्सिन के कार्यिकी प्रभाव एवं उपयोग

(i) प्रकाशानुवर्तन एवं गुरुत्वानुवर्तन (Phototropism and Geotropism) :
ऑक्सिन की अधिक मात्रा तने के लिए वृद्धिवर्धक (promotional) तथा जड़ के लिए वृद्धिरोधक (inhibition) प्रभाव रखती है।

(ii) शीर्ष प्रभाविता (Apical dominance) :
सामान्यतया पौधों के तने या शाखाओं के शीर्ष पर स्थित कलिका से स्रावित ऑक्सिन पाश्र्वीय कक्षस्थ कलिकाओं की वृद्धि का संदमन (inhibition) करते हैं। शीर्ष कलिका को काट देने से पाश्र्वीय कलिकाएँ शीघ्रता से वृद्धि करती हैं। चाय बागान में तथा चहारदीवारी के लिए प्रयोग की जाने वाली हैज को निरन्तर काटते रहने से झाड़ियाँ घनी होती हैं।

(iii) विलगन (Abscission) :
परिपक्व पत्तियाँ, पुष्प और फल विलगन पर्त के बनने के कारण पौधे से पृथक् हो जाते हैं। (UPBoardSolutions.com) ऑक्सिन; जैसे-IAA, IBA की विशेष सान्द्रता का छिड़काव करके अपरिपक्व फलों के विलगन को रोका जा सकता है। इससे फलों का उचित मूल्य प्राप्त होता है।

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(iv) अनिषेकफलन (Parthenocarpy) :
अनेक फलों में बिना परागण और निषेचन के भी फल को विकास हो जाता है; जैसे–अंगूर, केला, सन्तरा आदि में। ये फल बीजरहित होते हैं। ऑक्सिन का वर्तिकाग्र पर लेपन करने से बिना निषेचन के फल विकसित हो जाते हैं, इस प्रक्रिया को अनिषेकफलन कहते हैं। बीजरहित फलों में खाने योग्य पदार्थ की मात्रा अधिक होती है।

(v) खरपतवार निवारण (Weed destruction) :
खेतों में प्रायः अनेक जंगली पौधे उग आते हैं, इन्हें खरपतवार कहते हैं। ये फसल के साथ प्रतिस्पर्धा करके पैदावार को प्रभावित करते हैं। परम्परागत तरीके से निराई-गुड़ाई, फसल चक्र अपनाकर खरपतवार नियन्त्रण किया जाता है। 2, 4-D नामक संश्लेषी ऑक्सिन का उपयोग करके एकबीजपत्री फसलों में उगने वाले द्विबीजपत्री खरपतवार को नष्ट किया जा सकता है।

(vi) कटे तनों पर जड़ विभेदन (Root differentiation on Stem cutting) :
अनेक पौधों में कलम लगाकर नए पौधे तैयार किए जाते हैं। ऑक्सिन: जैसे–IBA का उपयोग कलम के निचले सिरे पर करने से जड़े शीघ्र निकल आती हैं। अतः ऑक्सिन का उपयोग मुख्यतया सजावटी पौधों को तैयार करने में किया जाता है।

(vii) प्रसुप्तती नियन्त्रण (Control of Dormancy) :
आलू के कन्द तथा अन्य भूमिगत भोजन संचय करने वाले भागों की प्रसुप्त कलिकाओं के प्रस्फुटन (UPBoardSolutions.com) को रोकने के लिए इन्हें कम ताप पर संगृहीत किया जाता है। ऑक्सिने का छिड़काव करके इन्हें सामान्य ताप पर संगृहीत किया जा सकता है। ऑक्सिन कलिकाओं के लिए वृद्धिरोधक का कार्य करते हैं।

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2. जिबरेलिन
धान की फसल में बैकेन (फूलिश सीडलिंग-foolish seedling) नामक रोग एक कवक जिबरेली फ्यूजीकुरोई (Gibberella fujitkuroi) से होता है। इसमें पौधे अधिक लम्बे, पत्तियाँ पीली लम्बी और दाने छोटे होते हैं। कुरोसावा (Kurosawa, 1926) ने प्रमाणित किया कि यदि कवक द्वारा स्रावित रस को स्वस्थ पौधे पर छिड़का जाए तो स्वस्थ चौधा भी रोगी हो जाता है। याबुता और हयाशी (Yabuta and Hayashi, 1939) ने कवक के रस से वृद्धि नियामक पदार्थ को पृथक् किया, इसे जिबरेलिन–A (GA) नाम दिया गया। सबसे पहले खोजा गया जिबरेलिन-As है। अब तक लगभग 110 प्रकार के GA खोजे जा चुके हैं।

जिबरेलिन का पादप कार्यिकी पर प्रभाव एवं कृषि या बागवानी में महत्त्व

(i) लम्बाई बढ़ाने की क्षमता (Efficiency of increase the length) :
जिबरेलिन के प्रयोग से आनुवंशिक रूप से बौने पौधे लम्बे हो जाते हैं, लेकिन यह लक्षण उन्हीं पौधों तक सीमित रहता है। जिन पर GA का छिड़काव किया जाता है। GA के उपयोग से सेब जैसे फल लम्बे हो जाते हैं। अंगुर के डंठल की लम्बाई बढ़ जाती है। गन्ने की खेती पर GA छिड़कने से तनों की लम्बाई बढ़ जाती है। इससे फसल का उत्पादन 20 टन प्रति एकड़ बढ़ जाता है।

(ii) पुष्पन पर प्रभाव (Effect of Flowering) :
कुछ पौधों को पुष्पन हेतु कम ताप तथा दीर्घ प्रकाश अवधि (long photoperiod) की आवश्यकता होती है। यदि इन पौधों पर GA का छिड़काव किया जाए तो पुष्पन सुगमता से हो जाता है। द्विवर्षी पौधे एकवर्षी पौधों की तरह व्यवहार करने लगते हैं। GA के इस प्रभाव को बोल्टिग प्रभाव (Bolting effect) कहते हैं। इसका उपयोग चुकन्दर, गाजर, मूली, पत्तागोभी आदि के पुष्पन के लिए किया जाता है।

(iii) अनिषेकफलन (Parthenocarphy) :
GA के छिड़काव से पुष्प से बिना निषेचन के फल बन जाता है। फल बीजरहित होते हैं।

(iv) जीर्णता या जरावस्था (Senescence) :
GA फलों को जल्दी गिरने से रोकने में सहायक होते हैं।

(v) बीजों का अंकुरण (Seed Germination) :
GA बीजों के अंकुरण को प्रेरित करते हैं।

(vi) पौधों की परिपक्वता (Maturity of Plants) :
GA का छिड़काव करने से अनावृतबीजी पौधे शीघ्र परिपक्व होते हैं और बीज जल्दी तैयार हो जाता है।

3. सायटोकाइनिन
सायटोकाइनिन ऑक्सिने की सहायता से कोशिका विभाजन को उद्दीपित करते हैं। एफ० स्कूग (E Skoog) तथा उसके सहयोगियों ने देखा कि तम्बाकू के तने के अन्तस्पर्व खण्ड से अविभेदित कोशिकाओं को समूह तभी बनता है, जब माध्यम में ऑक्सिन के अतिरिक्त सायटोकाइनिन (UPBoardSolutions.com) नामक बढ़ावा देने वाला तत्त्व मिलाया गया। इसका नाम काइनेटिने रखा। लेथम तथा सहयोगियों ने मक्का के बीज से ऐसा ही पदार्थ प्राप्त करके इसका नाम जिएटिन (zeatin) रखा। काइनेटिन और जिएटिन सायटोकाइनिन ही हैं। सायटोकाइनिन का कार्यिकी प्रभाव एवं महत्त्व

  1. ये पदार्थ कोशिका विभाजन को प्रेरित करते हैं।
  2.  ये जीर्णता (senescence) को रोकते हैं।
  3.  कोशिका विभाजन के अतिरिक्त सायटोकाइनिन पौधों के अंगों के

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निर्माण को नियन्त्रित करते हैं। यदि तम्बाकू की कोशिकाओं का संवर्धन शर्करा तथा खनिज लवणयुक्त माध्यम में किया जाए तो केवल कैलस (callus) ही विकसित होता है। यदि माध्यम में सायटोकाइनिन और ऑक्सिन का अनुपात बदलता रहे तो जड़ अथवा प्ररोह का विकास होता है। संवर्धन के प्रयोग आनुवंशिक इन्जीनियरी के लिए लाभदायक हैं; क्योंकि नई किस्म के पौधे उत्पन्न करने में कोशिका संवर्धन लाभदायक है।

4. ऐब्सीसिक अम्ल
कार्ल्स एवं एडिकोट ने कपास के पौधे की पुष्पकलिकाओं से एक पदार्थ ऐब्सीसिन (abscisin) प्राप्त किया। इस पदार्थ को किसी पौधे पर छिड़कने से पत्तियों का विलगन हो जाता है। वेयरिंग (Wareing, 1963) ने एसर की पत्तियों से डॉरमिन (dormin) प्राप्त किया, यह बीजों के अंकुरण और कलिकाओं की वृद्धि का अवरोधन करता है। इन दोनों पदार्थों को ऐब्सीसिक अम्ल कहा गया। ऐब्सीसिक अम्ल का कार्यिकी प्रभाव एवं महत्त्व

(i) विलगने (Abscission) :
यह पत्तियों के विलगन को प्रेरित करता है।

(ii) कलिकाओं की वृद्धि एवं बीजों का अंकुरण (Growth of buds and germination of seeds) :
यह कलिकाओं की वृद्धि और बीजों के अंकुरण को रोकता है।

(iii) जीर्णता (Senescence) :
यह जीर्णता को प्रेरित करता है।

(iv) वाष्पोत्सर्जन नियन्त्रण (Control of Transpiration) :
यह रन्ध्रों को बन्द करके वाष्पोत्सर्जन की दर को कम करता है। इसका उपयोग कम जल वाली  (UPBoardSolutions.com) भूमि में खेती करने के लिए उपयुक्त है।

(v) कन्द निर्माण (TuberFormation) :
आलू में कन्द निर्माण में सहायता करता है।

(vi) कोशिकाविभाजन एवं कोशिका दीर्धीकरण (Cell division and Cell Elongation) :
ऐब्सीसिक अम्ल कोशिका विभाजन तथा कोशिका दीर्धीकरण को अवरुद्ध करता है। ऐब्सीसिक अम्ल बीजों को प्रसुप्ति के लिए प्रेरित करने और शुष्क परिस्थितियों में पौधे का बचाव करता है।

5. एथिलीन
बर्ग (Burge, 1962) ने एथिलीन को पादप हॉर्मोन सिद्ध किया। यह मुख्यत: पकने वाले फलों से निकलने वाला गैसीय हॉर्मोन होता है। एथिलीन का कार्यिकी प्रभाव एवं महत्त्व

(i) पुष्पन (Flowering) :
यह सामान्यतया पुष्पन को कम करता है, लेकिन अनन्नास में पुष्पन को प्रेरित करता है।

(ii) विलगने (Abscission) :
यह पत्ती, पुष्प तथा फलों के विलगन को तीव्र करता है।

(iii) पुष्प परिवर्तन (Flower Modification) :
कुकरबिटेसी कुल के पौधों में एथिलीन नर पुष्पों की संख्या को कम करके मादा पुष्पों की संख्या को बढ़ाता है।

(iv) फलों को पकना (Fruit Ripening) :
यह फलों को पकाने में सहायक होता है। (आम,केला, अंगूर आदि फलों को पकाने के लिए इथेफोन (ethephon) का प्रयोग औद्योगिक स्तर पर किया जा रहा है। इससे पके फल
प्राकृतिक रूप से पके फलों के समान होते हैं। इथेफोन से एथिलीन गैस निकलती है।)

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प्रश्न 5.
दीप्तिकालिता तथा वसन्तीकरण क्या है? इनके महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
दीप्तिकालिता पौधों के फलने-फूलने, वृद्धि, पुष्पन आदि पर प्रकाश की अवधि (photoperiod) का प्रभाव (UPBoardSolutions.com) पड़ता है। पौधों द्वारा प्रकाश की अवधि तथा समय के प्रति अनुक्रिया को दीप्तिकालिता (photoperiodism) कहते हैं। (अथवा) दिन व रात के परिवर्तनों के प्रति कार्यात्मक अनुक्रियाएँ दीप्तिकालिता कहलाती है। दीप्तिकालिता. ‘ शब्द का प्रयोग गार्नर तथा एलार्ड (Garmer and Allard, 1920) ने किया।

(क)
दीप्तिकालिता के आधार पर पौधों को मुख्य रूप से तीन समूहों में बाँट लेते हैं

  1.  अल्प प्रदीप्तकाली पौधा (Short day plant)
  2. दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधा (Long day plant)
  3. तटस्थ प्रदीप्तकाली पौधा (Photo neutral plant)

अल्प प्रदीप्तकाली पौधों को मिलने वाली प्रकाश अवधि को कम करके और दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों को अतिरिक्त प्रकाश अवधि प्रदान करके पुष्पन शीघ्र कराया जा सकता है।

(ख)
कायिक शीर्षस्थ या कक्षस्थ कलिका उपयुक्त प्रकाश अवधि प्राप्त होने पर ही पुष्प कलिका में रूपान्तरित होती है। यह परिवर्तन फ्लोरिजन (florigen) हॉर्मोन के कारण होता है जो दिन और रात्रि के अन्तराल के कारण संश्लेषित होता है। वसन्तीकरण कम ताप काल में पुष्पन को प्रोत्साहन वसन्तीकरणं कहलाता है। कुछ पौधों में पुष्पन गुणात्मक या मात्रात्मक तौर पर कम तापक्रम में अनावृत होने पर निर्भर करता है। इस गुण को वसन्तीकरण कहते हैं। वसन्तीकरण (UPBoardSolutions.com) शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम टी०डी० लाइसेन्को (T.D. Lysenko, 1928) ने किया था। गेहूँ की शीत प्रजाति को वसन्त ऋतु में बोने योग्य बनाने के लिए इसके भीगे बीजों को 10-12 दिन तक 3°C ताप पर रखते हैं और फिर वसन्ती गेहूँ के साथ बोने से यह वसन्ती गेहूं के साथ ही पककर तैयार हो जाता है। पौधों में कायिक वृद्धि कम होती है। कम ताप उपचार से पौधे की कायिक अवधि कम हो जाती है। अनेक द्विवर्षी पौधों को कम तापक्रम में अनावृत कर दिए जाने से पौधों में दीप्तिकालिता के कारण पुष्पन की अनुक्रिया बढ़ जाती है। वसन्तीकरण के फलस्वरूप द्विवर्षी पौधों में प्रथम वृद्धिकाल में ही पुष्पन किया जा सकता है। पौधों में शीत के प्रति प्रतिरोध क्षमता बढ़ जाती है। वसन्तीकरण द्वारा पौधों को प्राकृतिक कुप्रभावों; जैसे-पाला, कुहरा आदि से बचाया जा सकता है।

प्रश्न 6.
एब्सिसिक अम्ल को तनाव हार्मोन क्यों कहते हैं?
उत्तर :
एब्सिसिक अम्ल का मुख्य कार्य प्रसुप्ति तथा विलगन का नियमन है। यह पादप वृद्धि निरोधक है। यह बीज के अंकुरण को रोकता है, रन्ध्र के बन्द होने को उत्तेजित करता है तथा विभिन्न प्रकार के तनावों को झेलने की क्षमता पौधों को देता है। अतः इसे तनाव हार्मोन कहते हैं।

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प्रश्न 7.
उच्च पादपों में वृद्धि एवं विभेदन खुला होता है, टिप्पणी करें?
उत्तर :
पौधों में वृद्धि विशिष्ट प्रकार से होती है क्योंकि जीवनपर्यन्त उनमें वृद्धि की क्षमता होती है। ऐसा उनके विभज्योतक ऊतकों की स्थिति के कारण होता है। अतः इसे खुला’ वृद्धि व विभेदन कहते हैं।

प्रश्न 8.
अल्प प्रदीप्तकाली पौधे और दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधे किसी एक स्थान पर साथ-साथ फूलते हैं। विस्तृत व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
अल्प प्रदीप्तकाली पौधों (short day plants) में निर्णायक दीप्तिकाल प्रकाश की वह अवधि है जिस पर या इससे कम प्रकाश अवधि पर पौधे पुष्प उत्पन्न करते हैं, परन्तु उससे अधिक प्रकाश अवधि में पौधा पुष्प उत्पन्न नहीं कर सकता। दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों (long day plants) में निर्णायक (UPBoardSolutions.com) दीप्तिकाल प्रकाश की वह अवधि है। जिससे अधिक प्रकाश अवधि पर पौधे पुष्प उत्पन्न करते हैं, परन्तु उससे कम प्रकाश अवधि में पुष्प उत्पन्न नहीं होते। अत: अल्प प्रदीप्तकाली पौधों और दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों में विभेदन उनमें निर्णायक दीप्तिकाल से कम अवधि पर पुष्पन होना अथवा अधिक अवधि पर पुष्प उत्पन्न होने के आधार पर किया

जाता है। दो जातियों के पौधे समान अवधि के प्रकाश में पुष्प उत्पन्न करते हैं, परन्तु उनमें से एक अल्प प्रदीप्तकाली पौधा तथा दूसरा दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधा हो सकता है; जैसे-जैन्थियम (Xanthiur) का निर्णायक दीप्तिकाल 15 1/2 घण्टे है और हाईओसायमस नाइजर (Hyoscyamus niger) को निर्णायक दीप्तिकाल 11 घण्टे है। दोनों पौधे 14 घण्टे की प्रकाशीय अवधि में पुष्प उत्पन्न कर सकते हैं। इस आधार पर जैन्थियम अल्प प्रदीप्तकाली पौधा है क्योंकि यह निर्णायक दीप्तिकाल से कम प्रकाशीय अवधि में पुष्पन करता है तथा हाइओसायमस नाइजर दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधा है; क्योंकि यह निर्णायक दीप्तिकाल से अधिक प्रकाश अवधि में पुष्पन करता है।

प्रश्न 9.
अगर आपको ऐसा करने को कहा जाए तो एक पादप वृद्धि नियामक का नाम दें
(क) किसी टहनी में जड़ पैदा करने हेतु
(ख) फल को जल्दी पकाने हेतु
(ग) पत्तियों की जरावस्था को रोकने हेतु
(घ) कक्षस्थ कलिकाओं में वृद्धि कराने हेतु
(ङ) एक रोजेट पौधे में ‘बोल्ट’ हेतु
(च) पत्तियों के रन्ध्र को तुरन्त बन्द करने हेतु

उत्तर :
(क) ऑक्सिन
(ख) एथिलीन
(ग) साइटोकाइनिन
(घ) ऑक्सिन, साइटोकाइनिन
(ड) जिबरेलिन
(च) एब्सिसिक अम्ल

प्रश्न 10.
क्या एक पर्णरहित पादप दीप्तिकालिता के चक्र से अनुक्रिया कर सकता है? हाँ या नहीं। क्यों?
उत्तर :
प्रकाश अन्धकार काल का अनुभव पत्तियाँ करती हैं। इनमें बनने वाला फ्लोरिजन तना कलिका (UPBoardSolutions.com) में पुष्पन प्रेरित करने के लिए तभी जाती हैं जब पौधे आवश्यक प्रेरित दीप्तिकाल में अनावृत होते हैं। ऐसा माना जाता है कि फ्लोरिजन (हार्मोन) पुष्पन के लिए उत्तरदायी है।

प्रश्न 11.
क्या हो सकता है अगर?
(क) जी एGAs) को धान के नवोभिदों पर डाला जाए।
(ख) विभाजित कोशिका विभेदन करना बन्द कर दें।
(ग) एक सड़ा फल कच्चे फलों के साथ मिला दिया जाए।
(घ) अगर आप संवर्धन माध्यम में साइटोकाइनिन डालना भूल जाएँ।

उत्तर :
(क) धान के पौधों की लम्बाई में वृद्धि होती है।
(ख) कोशिका विभेदन के रुक जाने से संरचनात्मक परिवर्तन आते हैं।
(ग) कच्चे फल तेजी से पक जाएँगे।
(घ) यदि संवर्धन माध्यम में साइटोकाइनिन डालना भूल जाएँ तो कोशिका विभाजन, वृद्धि व विभेदन पर असर पड़ेगा। कोशिकाओं को जो केलस बनता है उनमें विभेदन न होने से कलिकाएँ नहीं बन सकती हैं।

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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सी पादप-हॉर्मोन पत्तियों एवं फलों के विलगन (झड़ने) को रोकता है?
(क) जिबरेलिन
(ख) ऑक्सिन
(ग) साइटोकाइनिन
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) ऑक्सिन

प्रश्न 2.
लम्बे दिन वाले पौधों में कौन-सा रसायन पुष्पन को प्रेरित करता है ?
(क) IBA
(ख) IAA
(ग) GA3
(घ) NAA
उत्तर:
(ग) GA3

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रसायनानुवर्तन गति पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
पौधों द्वारा किसी रसायन के प्रति की जाने वाली गति रसायनानुवर्तन गति कहलाती है। उदाहरणार्थ-पौधों में ऑक्सिन, जिबरेलिन तथा साइटोकाइनिन रसायनों द्वारा वृद्धि होती है जबकि एथिलीन एवं एब्सिसिक अम्ल द्वारा वृद्धि रुक जाती है।

प्रश्न 2.
जीर्णावस्था किसे कहते हैं? जीर्णता को कौन-सा हॉर्मोन रोकता है?
उत्तर :
काल के प्रभाव से पत्तियों के प्रोटीन्स विघटन एवं पर्णहरिम के नष्ट हो जाने से पत्तियाँ पीली हो जाती हैं और अंततः मर जाती हैं, जिसे जीर्णावस्था कहते हैं। साइटोकाइनिन हॉर्मोन पत्तियों की इस जीर्णता को रोकता है।

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प्रश्न 3.
पादप हॉर्मोन की सहायता से बीज रहित फल उत्पन्न करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली क्रिया का नाम लिखिए।
उत्तर :
ऑक्सिन्स का उपयोग करके बीज रहित फलों के निर्माण को अनिषेकफलन (parthenocarpy) कहते हैं।

प्रश्न 4.
2, 4-D का पूरा नाम लिखिए तथा कृषि में इसके एक महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
2, 4-D का पूरा नाम 2, 4-डाइहाइड्रोफोनॉक्सी ऐसीटिक अम्ल है। इसका उपयोग खरपतवार नाशक के रूप में किया जाता है।

प्रश्न 5.
फलों को कृत्रिम रूप से पकाने के लिए किस हॉर्मोन का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर :
एथिलीन गैस या इथेफोन का।

प्रश्न 6.
कोशिका विभाजन तथा कोशिकाद्रव्य विभाजन क्रियाओं का उद्दीपन करने वाले हॉर्मोन्स के नाम लिखिए।
उत्तर :
साइटोकाइनिन तथा ऑक्सिन्स।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रकाशानुवर्तन (phototropism) प्रक्रिया को उदाहरण देकर समझाइए। या प्रकाशानुवर्तन पर टिप्पणी लिखिए। या प्रकाशानुवर्तन क्या है? इस क्रिया का नियमन करने वाले हॉर्मोन्स का नाम लिखिए।
उत्तर :

प्रकाशानुवर्तन

इस क्रिया में पौधों के विभिन्न भाग प्रकाश उद्दीपन द्वारा विभिन्न प्रकार की वक्रण गतियाँ प्रदर्शित करते हैं।UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 15 Plant Growth and Development image 7

प्रकाश के एकदिशीय उद्दीपन (unilateral stimulus) के कारण तने प्रकाश की ओर मुड़ जाते हैं। इसे धनात्मक प्रकाशानुवर्तन (positive phototropism) कहते हैं। जड़े प्रकाश के इस प्रकार के उद्दीपन के विपरीत वक्रण प्रदर्शित करती हैं। इसे ऋणात्मक प्रकाशानुवर्तन (negative phototropism) कहते हैं। पत्तियाँ उभय प्रकाशानुवर्तन (diaphototropism) तथा शाखाएँ प्रकाश के अन्य किसी कोण पर तिर्यक प्रकाशानुवर्तन (plagiophototropism) प्रदर्शित करती हैं। प्रकाशानुवर्तन का कारण कोलोडनी तथा वेण्ट (Cholodny and went) ने ऑक्सिन के असमान वितरण को पाया। अंधेरे के क्षेत्र की (UPBoardSolutions.com) ओर अधिक ऑक्सिन एकत्रित हो जाने से तनों में उस ओर अधिक वृद्धि तथा जड़ों में वृद्धि का संदमन होने से तने प्रकाश की ओर, किन्तु जड़े प्रकाश के विपरीत वक्रण प्रदर्शित करती हैं। कुछ पौधे अथवा उनके अंग परिवर्द्धन के विभिन्न कालों में भिन्न-भिन्न व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। मूंगफली (groundnut = Arachis hypoged) में अण्डाशय (ovary) के नीचे लगा वृन्त पहले धनात्मक किन्तु निषेचन (fertilization) के बाद ऋणात्मक प्रकाशानुवर्तन प्रदर्शित करता है।

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एक सामान्य प्रयोग द्वारा प्रकाशानुवर्तन को निम्नवत् प्रदर्शित किया जा सकता है।
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लकड़ी का बना एक ऐसा बॉक्स लेते हैं जिसमें एक ओर प्रकाश के आने के लिए खिड़की बनी होती है। एक गमले में । लगा पौधा इस बॉक्स के अन्दर रख दिया जाता है। कुछ दिन बाद देखने पर पता चलता है कि पौधे की शाखायें खिड़की की ओर अर्थात् प्रकाश के स्रोत की ओर मुड़ (UPBoardSolutions.com) जाती हैं। इससे सिद्ध होता है कि पौधे के वायवीय भाग विशेषकर तना धनात्मक प्रकाशानुवर्ती होते हैं।

प्रश्न 2.
गुरुत्वानुवर्तन पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर  :
गुरुत्वानुवर्तन गुरुत्वाकर्षण के उद्दीपन (stimulus) के प्रभाव से होने वाली वक्रण (curvature) गति गुरुत्वानुवर्ती गति(geotropic movement) कहलाती है। पौधों के वायवीय भाग विशेषकर तयों के शीर्ष ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्ती (negatively geotropic),  किन्तु जड़े धनात्मक गुरुत्वानुवर्ती (positively geotropic) होती हैं।
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गुरुत्वाकर्षण शक्ति (gravitational force)
के कारण क्षैतिज स्थिति में रखे हुए पौधे के तने व जड़ के शीर्षों (apices) में नीचे की ओर ऑक्सिन हॉर्मोन एकत्रित हो जाते हैं। तने के शीर्ष में नीचे की ओर एकत्रित ऑक्सिन की अधिक मात्रा के कारण तने के अग्रभाग के निचले क्षेत्र में अधिक वृद्धि होती है और यह ऊपर की ओर मुड़ जाता है। (UPBoardSolutions.com) इसके विपरीत मूलाग्र के निचले भाग में एकत्रित ऑक्सिन की अधिक मात्रा वृद्धि को संदमित (supress) करती है, जबकि इस क्षेत्र के ऊपरी तल में ऑक्सिन की कम मात्रा वृद्धि को प्रोत्साहित करती है। अतः मूलाग्र नीचे की ओर वक्रता प्रदर्शित करता है।
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गुरुत्वानुवर्तन का प्रदर्शन उपर्युक्ते प्रकार के वक्रण को एक सामान्य प्रयोग द्वारा समझाया जा सकता है। जब किसी गमले में लगे पौधे को भूमि के समान्तर रख देते हैं तो ऑक्सिन (auxin) हॉर्मोन के प्रभाव से तने में ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्तन (negative geotropism) तथा जड़ के निचले सिरे पर धनात्मक गुरुत्वानुवर्तन (positive geotropism) होने लगता है। इसके कारण तना’ऊपर की ओर तथा जड़ नीचे की ओर वक्रण प्रदर्शित करती है।

प्रश्न 3.
प्रकाशानुवर्तन तथा गुरुत्वानुवर्तन में अन्तर बताए।
उत्तर :
प्रकाशानुवर्तन तथा गुरुत्वानुवर्तन में अन्तर
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प्रश्न 4.
“स्पर्श से छुईमुई की पत्तियाँ सिकुड़ जाती हैं।” कारण स्पष्ट कीजिए। या कम्पानुकुंचनी गति पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
छुईमुई (Mimosa pudica) की पत्तियों के पत्रक स्पर्श या अन्य आघात के कारण बन्द हो जाते हैं। पत्तियों के आधार पर पर्णाधार में पायी जाने वाली मृदूतक कोशिकाओं के स्फीत होने पर पर्णक खुले रहते हैं, जबकि श्लथ दशा के कारण पर्णक बन्द हो जाते हैं। पर्णाधार के नीचे के आधे (UPBoardSolutions.com) भाग की मृदूतक कोशिकाएँ श्लथ हो जाती हैं, क्योंकि उद्दीपन के कारण जल अन्तराकोशिकीय अवकाशों में चला जाता है और पर्णक बन्द हो जाते हैं। कोशिकाओं के स्फीत दशा में आ जाने से पत्ती सामान्य दशा में आ जाती है।

प्रश्न 5.
प्रकाशानुवर्तन तथा प्रकाशानुकुंचन में अन्तर बताइए।
उत्तर :
प्रकाशानुवर्तन तथा प्रकाशानुकुंचन में अन्तर

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 15 Plant Growth and Development image 12

प्रश्न 6.
हॉर्मोन तथा एन्जाइम में अन्तर बताइए।
उत्तर :
हॉर्मोन तथा एन्जाइम में अन्तर

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 15 Plant Growth and Development image 13

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प्रश्न 7.
फाइटोक्रोम पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
फाइटोक्रोम फाइटोक्रोम एक प्रकाशग्राही वर्णक है। जैव रासायनिक दृष्टि से फाइट्रोक्रोम प्रोटीन है। फाइटोक्रोम अधिकतर पादपों में पाया जाता है। यह एक ऐसा वर्णक है, जिसका उपयोग पौधे प्रकाश को पहचानने के लिए करते हैं। यह प्रकाश के दृश्य स्पेक्ट्रम के लाल और अवरक्त प्रकाश के प्रति संवेदनशील है। कई पुष्पीय पौधे इसका उपयोग प्रकाशीय अवधि के आधार पर पुष्पन के समय का नियंत्रण हेतु करते हैं। यह अन्य प्रतिक्रियाओं; जैसे—बीज-अंकुरण, नवोभिद् (UPBoardSolutions.com) की वृद्धि, आकार, आकृति, पत्तियों की संख्या, हरित लवकों का संश्लेषण आदि को भी नियंत्रित करते हैं। यह अधिकतर पौधों में पत्तियों पर पाया जाता है। फाइटोक्रोम में एक क्रोमोफोर, एक एकल बाइलिन अणु जिसमें, चार पाइरॉल रिंग की खुली श्रृंखला जो प्रोटीन से जुड़ी होती है, पाया जाता है। फाइटोक्रोम क्रोमोफोर साधारणत: फाइटोक्रोमोबिलिन होती है और फायकोसायनोबिलिन एवं बिलिरुबिन से सम्बन्धित होती है। फाइटोक्रोम वर्णक की खोज Sterling Hendricks एवं Harry Borthwick द्वारा की गयी थी। फाइटोक्रोम की पहचान Warren Butler एवं Harold Siegelman द्वारा 1959 में स्पेक्ट्रोफोटोमीटर की सहायता से की गयी थी। फाइटोक्रोम नाम Butler द्वारा दिया गया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बीज प्रसुप्तावस्था के कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर  :
प्रसुप्ति के कारणों को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा गया है

A.
प्रसुप्ति के बाह्य कारण (External Causes of Dormancy) :

कुछ पौधों के बीज शरद् ऋतु के अन्तिम भाग में परिपक्व होते हैं, उस समय उनके अंकुरण के लिए तापमान उच्च रहता है। अत: ये ताप कम होने तक प्रसुप्त (dormant) रहते हैं। ऑक्सीजन की अपर्याप्त उपलब्धि के कारण भी बीजों का अंकुरण रुक जाता है। कुछ बीज पकने पर तालाब में गिरते हैं और पेंदी में मृदा से आच्छादित हो जाते हैं जिससे उन्हें ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। यहाँ पर बीज बहुत अधिक अवधि तक प्रसुप्त (dormant) रह सकते हैं और केवल सतह पर लाए जाने पर ही अंकुरित (germinate) होते हैं।

कुछ जातियों के बीज; जैसे—सलाद (Lettuce), तम्बाकू की कुछ किस्में, मिसिल्टो (Viscum), आदि प्रकाश की अनुपस्थिति में अंकुरित नहीं होते और बहुत कम प्रकाश में रखने पर भी अंकुरित हो जाते हैं। ऐसे बीजों में दृश्य स्पेक्ट्रम (visible spectrum) का लाल (R 660 nm) क्षेत्र अंकुरण के लिए बहुत प्रभावी होता है तथा सुदूर लाल (Far red 730 nm) क्षेत्र, लाल प्रकाश के प्रभाव को समाप्त कर देता है। बीजों के अंकुरण पर लाल (red) तथा सुदूर लाल (far red) प्रकाश का प्रभाव, फाइटोक्रोम (phytochrome) नामक प्रोटीन वर्णक (pigment) के कारण होता है।

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B.
प्रसुप्ति के आन्तरिक कारण (Internal Causes of Dormancy) :

ये मुख्यत: निम्न हैं

1. बीजावरण की जल के लिए अपारगम्यता (Impermeability of Seed Coat to Water) :
अनेक पौधों के बीजों में बीजावरण कठोर व जल के लिए अपारगम्य होता है, अतः बीजं जल के सम्पर्क में रहने पर भी जल अवशोषित नहीं कर पाते और उनमें अंकुरण नहीं हो पाता। ऐसे बीज लम्बी अवधि तक भूमि में पड़े रहते हैं। प्राकृतिक अवस्था में मिट्टी के कणों के अपघर्षण (scarification) तथा जीवाणुओं व कवकों की क्रियाओं के फलस्वरूप बीजावरण धीरे-धीरे कमजोर होकर पारगम्य हो जाता है, इसके बाद ही बीज जल का अवशोषण करके अंकुरित होते हैं।

2. बीजावरण की ऑक्सीजन के लिए अपारगम्यता (Impermeability of Seed Coat to Oxygen) :
कभी-कभी बीजों में प्रसुप्ति, बीजावरण के ऑक्सीजन के लिए अपारगम्य होने के कारण होती है जो कारक या पदार्थ बीजावरण को जल के लिए अपारगम्य बनाते हैं, वे ही धीरे-धीरे इसे ऑक्सीजन के लिए भी अपारगम्य बनाते हैं। जैन्थियम (Xanthium), अनेक घासों तथा कम्पोजिटी (Compositae) कुल के कुछ पौधों के बीजों में इसी प्रकार की प्रसुप्ति (dormancy) पाई जाती है।

3. यान्त्रिक रूप से प्रतिरोधी बीजावरण (Mechanically Resistant Seed Coat) :
कुछ पौधों के बीजों में बीजावरण द्वारा जल व ऑक्सीजन तो ग्रहण कर ली जाती है, परन्तु बीजावरण इतना कठोर होता है कि भ्रूण (embryo) की पूरी वृद्धि नहीं हो पाती और उसका विकास केवल बीजावरण तक ही सीमित हो पाता है। बीजावरण न टूट पाने के कारण अंकुर रुक जाता है, जैसे-ऐलिस्मा प्लैंटेगो (Alisma plantqgo) के बीज में भ्रूण पानी के कारण फूल जाता है और अन्त: शोषण दाब (imbibition pressure) से बीजावरण को दबाता है; परन्तु उसे तोड़ नहीं पाता और अंकुरण रुक जाता है। इस प्रकार की प्रसुप्ति (dormancy) के कुछ अन्य उदाहरण-काली सरसों (Brassica nigra), लेपिडियम (Lepidium), ऐमारेन्थस, रेट्रोफ्लेक्सस (Amaranthus retroflexus), आदि है।

4. अपूर्ण परिवर्धित भ्रूण (Imperfectly Developed Embryo) :
इस प्रकार की प्रसुप्ति (dormancy) में बीज के अन्दर भ्रूणीय विकास (embryonic development) क्रिया पूर्ण भी नहीं हो पाती कि वे मातृ पौधे से पृथक् हो जाते हैं। ऐसे बीजों में भ्रूणीय विकास की निषेचित अण्ड से लेकर, पूर्ण परिवर्धित भ्रूण के सभी श्रेणीकरण (gradation) पाए जाते हैं। (UPBoardSolutions.com) कुछ बीजों में भ्रूणीय परिवर्धन शरद् अथवा शीत ऋतु में धीरे-धीरे होता है और बसंत ऋतु में अंकुरण केठीक पूर्व तक पूर्ण हो जाता है, जैसे-ऐरीथ्रोनियम (Erythronium), रेननकुलस (Ranunculus) तथा इलेक्स (Ilex), आदि।

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5. भ्रूण की परिपक्वन के बाद शुष्क भण्डारण आवश्यकता (Embryo Requiring after Ripening in Dry Storage) :
कुछ परिपक्व बीजों में भ्रूण (embryo) पूर्ण विकसित होते हैं परन्तु उन्हें अंकुरण से पूर्व कुछ समय तक शुष्क वातावरण में रखना आवश्यक हो जाता है, ऐसा न करने पर उनमें अंकुरण नहीं होता। इस प्रक्रिया में बीजों में अनेक ऐसे उपापचयी (metabolic) परिवर्तन होते हैं जो अंकुरण के लिए आवश्यक हैं। (UPBoardSolutions.com) क्रेटीगस (Crategus) के बीजों में यह बाद का परिपक्वन प्रक्रम (after ripening process) एक से तीन महीनों में पूरा हो जाता है। इस प्रक्रिया में जैसे-जैसे बाद का पक्वन बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे भ्रूण (embryo) की अम्लीयता में वृद्धि होती जाती है। इससे जल का अवशोषण बढ़ता है और अंकुरण शीघ्र होता है।

6. अंकुरणरोधक पदार्थों की उपस्थिति (Presence of Germinating Inhibitors) :
अनेक पौधों के भ्रूण, भ्रूणपोष, बीज, फल, आदि के ऊतकों में कुछ निरोधक या संदमक (inhibitors) पदार्थ, जैसे-ऐब्सिसिक अम्ल (abscisic acid), कौमेरिन (coumarin), फेरुलिक अम्ल (ferulic acid) तथा छोटी श्रृंखला वाले वसा अम्ल (fatty acid), आदि होते हैं। ये पदार्थ बीजों के अंकुरण को रोकते हैं।

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UP Board Solutions for Class 7 Maths Chapter 2 घातांक

UP Board Solutions for Class 7 Maths Chapter 2 घातांक

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 7 Maths. Here we have given UP Board Solutions for Class 7 Maths Chapter 2 घातांक.

अभ्यास 2(a)

प्रश्न 1.
[latex]\left( -\frac { 2 }{ 3 } \right) ^{ 5 }[/latex] का मान है
UP Board Solutions for Class 7 Maths Chapter 2 घातांक 1

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प्रश्न 2.
3125 का घातीय संकेतन है : (UPBoardSolutions.com)
(i) 55
(ii) 52
(iii) 53
(iv)54
हल :
3125 = 5 × 5 × 5 × 5 × 5 = 55 (i)

प्रश्न 3.
“2 की घात 7” का मान है :

  1. 49
  2. 14
  3. 128
  4. 32

हल :
27 = 2 × 2 × 2 × 2 × 2 × 2 × 2 = 128 (iii)

प्रश्न 4.
एक वर्गाकार क्यारी की भुजा 5 मी० है। इसके क्षेत्रफल को घातीय संकेतन के रूप में लिखिए।
हल :
वर्गाकार क्यारी की भुजा = 5 मी०
वर्गाकार क्यारी का क्षेत्रफल = भुजा × भुजा
= 5 मी० × 5 मी० = 54वर्ग मी०

UP Board Solutions

प्रश्न 5.
सरल कीजिए –
हल :

  1. 24 × 32 = 2 × 2 × 2 × 2 × 3 × 3 = 144
  2. (-2)3 × (-10)3 = (-2) × (-2) × (-2) × (-10) × (-10) × (-10) = 8000

प्रश्न 6.
15625 के अभाज्य गुणनखंड ज्ञात कर (UPBoardSolutions.com) 15625 को आधार 5 पर घातीय संकेतन के रूप में व्यक्त कीजिए।
हल :
15625 = 5 × 5 × 5 × 5 × 5 × 5 = 56

अभ्यास 2(b)

प्रश्न 1.
सरल कीजिए –
हल :
(i) 37 × 38 = 37+8= 315 = 14348907
(ii) 64 × 62 ÷ 65 = 64+2-5= 61 = 6
(iii) 59 × 54 : 58 = 59+4-8 = 55 = 3125
(iv) 2 × 52 + 5 × 25 = 2 × 5 × 5 + 5 × 2 × 2 × 2 × 2 × 2 = 50 + 160 = 210
UP Board Solutions for Class 7 Maths Chapter 2 घातांक 2

प्रश्न 2.
सरल कीजिए –
UP Board Solutions for Class 7 Maths Chapter 2 घातांक 3

UP Board Solutions
प्रश्न 3.
(-1)3 × (-1)2 × (-1)15 का मैन बताइए।
हल :
(-1)3 × (-1)2 × (-1)15
= (-1)+ 2 + 15 = (-1)20 =1

प्रश्न 4.
(-1)49 ÷ (-1)25 का मान बताइए।
हल :
(-1)49 ÷ (-1)25
= (-1)49-25 = (-1)24 =1

प्रश्न 5.
312 × 37 ÷ 325 का मान ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 7 Maths Chapter 2 घातांक 4
प्रश्न 6.
अपनी अभ्यास पुस्तिका में रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए (पूर्ति करके) –
UP Board Solutions for Class 7 Maths Chapter 2 घातांक 5
प्रश्न संख्या 7 से 9 तक के उत्तर का सही (UPBoardSolutions.com) विकल्प छाँटकर लिखिए –

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प्रश्न 7.
55 × 85 का सरल रूप होगा –
(i) 405
(ii) 4010
(iii) 405
(iv)540
उत्तर :
(i) 40

प्रश्न 8.
(-3)4 ÷ (-3)2 का मान होगा –
(i) 81
(ii)-81
(iii)9
(iv)-9
उत्तर :
(iii) 9

प्रश्न 9.
4 × 52+ 5 × 42 का मान होगा –
(i) 100
(ii) 80
(iii) 200
(iv) 180
उत्तर :
(iv) 180

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अभ्यास 2(c)

प्रश्न 1.
12 × 12 × 12 × 12 × 12 × 12 को घात रूप में व्यक्त कीजिए।
उत्तर :
126

प्रश्न 2.
15625 को आधार 5, आधार 25 एवं आधार 125 के घातीय संकेतनों में व्यक्त कीजिए।
हल :
15625 = 5 × 5 × 5 × 5 × 5 × 5 = 56
15625 = 25 × 25 × 25 = 253
15625 = 125 × 125 = 1252

प्रश्न 3.
0.0001 को आधार 0.01 पर घात रूप में व्यक्त कीजिए। (UPBoardSolutions.com)
हल :
0.0001 = _01 ×.01 = (.01)2
UP Board Solutions for Class 7 Maths Chapter 2 घातांक 6
UP Board Solutions for Class 7 Maths Chapter 2 घातांक 7

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प्रश्न 8.
0.000001 का वर्ग रूप होगा।
(i) (0.01)2
(ii) (0.001)2
(i) (0.0001)2
(iv) (0.00001)2
उत्तर :
(ii) (0.001)2

प्रश्न 9.
(0.05)3 का मान होगा।
(i) 0.125
(ii) 0.0125
(ii) 0.00125
(iv) 0.000125
उत्तर :
(iv)0.000125
UP Board Solutions for Class 7 Maths Chapter 2 घातांक 8

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अभ्यास 2(d)

प्रश्न 1.
34 × 35 × 3-9 का मान ज्ञात कीजिए।
हल :
34 × 35 × 3-9 = (3)4+5-9 = (3)9-9 = 30 =1
UP Board Solutions for Class 7 Maths Chapter 2 घातांक 9
प्रश्न 3.
[latex]\left( -\frac { 1 }{ 2 } \right) ^{ -2 }[/latex] × 22 का (UPBoardSolutions.com) मान होगा :
(i) 2
(i) 4
(iii) 8
(iv) 16
हल :
[latex]\left( -\frac { 1 }{ 2 } \right) ^{ -2 }[/latex] × 22 = 22 × 22 = 24 = 16 (iv)

प्रश्न 4.
3-2 × 35 का मान होगाः
(i) 3
(i) 9
(i) (iv) 27
हल :
3-2 × 35 = 3-2+5 = 33 = 27 (iv)

प्रश्न 5.
निम्नांकित को सरल कीजिए :
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प्रश्न 6.
(2 × 3)6 × 6-3 को मान ज्ञात कीजिए।
हल :
(2 × 3)6 × 6-3 = 66 × 6-3 = 66-3 = 63 = 216
UP Board Solutions for Class 7 Maths Chapter 2 घातांक 11
UP Board Solutions for Class 7 Maths Chapter 2 घातांक 12

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अभ्यास 2(e)

प्रश्न 1.
62,00,00,000 को मानक रूप में लिखिए।
हल :
62,00,00,000 = 6.2 × 108

प्रश्न 2.
0.00008 को वैज्ञानिक संकेतन में व्यक्त कीजिए।
हल :
0.00008 = 8 × 105

प्रश्न 3.
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि चन्द्रमा की उत्पत्ति (UPBoardSolutions.com) आज से लगभग 460 करोड़ वर्ष पहले हुई थी। चन्द्रमा की आयु वैज्ञानिक संकेतन द्वारा व्यक्त कीजिए।
हल :
चन्द्रमा की आयु = 460 करोड़ वर्ष = 4.6 × 109 वर्ष

प्रश्न 4.
पृथ्वी को सूर्य से दूरी लगभग 15,00,00,000 किमी है। इस दूरी को मानक रूप में व्यक्त कीजिए।
हल :
पृथ्वी की सूर्य से दूरी = 15,00,00,000 किमी = 1.5 × 108 किमी

प्रश्न 5.
पृथ्वी का द्रव्यमान 5.98 × (10)22 क्विंटल है। ज्ञात कीजिए कि साधारण संख्या के रूप में इसे लिखने पर 598 के आगे कितने शून्य रखने होंगे?
UP Board Solutions for Class 7 Maths Chapter 2 घातांक 13
प्रश्न 6.
निम्नांकित संख्याओं को वैज्ञार्निक संकेतन के रूप में व्यक्त कीजिए।
(i) 4250000
(i) दो करोड़ बीस लाख
(iii) 0.000045 (UPBoardSolutions.com)
(iv) 0.0025
हल :
(i) 4250000 = 4.25 × 106
(ii) 2,20,00,000 = 2.20 × 107
(iii) 0.000045 = 4.5 × 10-5
(iv) 0.0025 = 2.5 × 10-3

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प्रश्न 7.
निम्नांकित को साधारण संख्या के रूप में लिखिए –
UP Board Solutions for Class 7 Maths Chapter 2 घातांक 14
प्रश्न 8.
एक इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान 9. 107 × 10-28 ग्राम है इसे (UPBoardSolutions.com) साधारण दशमलव भिन्न में बदलने पर दशमलव बिन्दु (.) तथा अंक 9 के बीच कितने शून्य होंगे ?
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दक्षता अभ्यास – 2

प्रश्न 1.
(-8)7 का गुणा रूप बताइए।
हल :
(-8) × (-8) × (-8) × (-8) × (-8) × (-8) ×(-8)

प्रश्न 2.
(-1)999 का मान बताइए।
उत्तर :
1

प्रश्न 3.
3. 38 × 312 को आधार 3 पर घातीय संकेतन लिखिए।
उत्तर :
38+12 = 320

प्रश्न 4.
97 ÷ 93 का आधार 9 पर घातीय संकेतन लिखिए।
उत्तर :
97-3 = 94

प्रश्न 5.
8(5-5) का मान बताइए।
उत्तर :
8° = 1.

प्रश्न 6.
(23)8 का आधार 2 पर घातीय संकेतन बताइए।
उत्तर :
23×8 =224

प्रश्न 7.
-128 को (-2) के घातरूप में व्यक्त कीजिए। (UPBoardSolutions.com)
हल :
-128 = (-2) × (-2) × (-2) × (-2) × (-2) × (-2) × (-2) = (-2)7

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प्रश्न 8.
[latex]\left( -\frac { 7 }{ 9 } \right) ^{ 2 }[/latex] ÷ [latex]\left( -\frac { 14 }{ 3 } \right) ^{ 2 }[/latex] को सरल कर मान ज्ञात कीजिए।
UP Board Solutions for Class 7 Maths Chapter 2 घातांक 16
प्रश्न 9.
(-4)-4 किस संख्या का गुणात्मक प्रतिलोम है?
हल :
[latex]\frac { 1 }{ (-4)^{ 4 } }[/latex] का गुणात्मक प्रतिलोम = (-4)4

प्रश्न 10.
पृथ्वी से चन्द्रमा की औसत दूरी 384400000 मीटर है। इसे वैज्ञानिक संकेतन में व्यक्त कीजिए।
हेल :
पृथ्वी से चन्द्रमा की औसत दूरी = 384400000 मी० = 3.844 × 108 मी०

प्रश्न 11.
प्रकाश की एक किरण वर्ष में तय की गई दूरी 9460500000000000 मीटर है। इसे वैज्ञानिक संकेतन में व्यक्त कीजिए।
हल :
प्रकाश की एक किरण वर्ष में तय की गई दूरी = 9460500000000000 मी०
= 9.4605 × 1015 मी०

प्रश्न 12.
238 × 532 का मान ज्ञात कीजिए तथा बताइए इसमें कुल कितने अंक हैं।
हल :
238 × 532 = 26 × 232 × 532 = 26 × (2 × 5)32 = 64 × (10)32
– 6.4 × 1033
अतः कुल अंक = 1 + 33 = 34

प्रश्न 13.
एक ग्राम मानव मल में 10,00,000 वायरस होते हैं। इनका मान वैज्ञानिक संकेतन में ज्ञात कीजिए।
हल :
1 ग्राम मानव मल में वायरस = 10,00,000
= 10 × 10 × 10 × 10 × 10 × 10
= 106

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प्रश्न 14.

गाँव के एक स्कूल में विश्व स्वच्छता दिवस पर (UPBoardSolutions.com) बच्चों से हाथ धोने का अभ्यास कराया गया। प्रत्येक बच्चा हाथ धोने में 2 मिनट का समय लगाता है। यदि कक्षा में 64 बच्चे हों तो पूरी कक्षा के बच्चों को बारी-बारी से हाथ धोने में लगे समय को घातांक में व्यक्त कीजिए।
हल :
1 बच्चे को हाथ धोने में समय लगता है = 2 मिनट
64 बच्चों को हाथ धोने में समय लगता है = 2 × 64 मिनट
= 2 × 2 × 2 × 2 × 2 × 2 × 2
= 27

प्रश्न 15.

एक कस्बे में आबादी के अधिकांश लोग श्वांस की बीमारी से ग्रस्त थे, जाँच करने पर उस कस्बे की प्रदूषित वायु में 2000 विषाक्त जीवाणु प्रति घन मीटर पाए गए, जो कि एक सप्ताह में 100 गुना बढ़ जाते हैं। तीन सप्ताह बाद जीवाणुओं की संख्या को (UPBoardSolutions.com) मानक संकेतांक में लिखिए।
हल :
कस्बे की प्रदूषित वायु में जीवाणुओं की संख्या = 2000
सप्ताह में जीवाणुओं की संख्या बढ़ जाती है = 100 गुना
1 सप्ताह में जीवाणुओं की संख्या = 2000 × 100
3 सप्ताह में जीवाणुओं की संख्या = 2000 × 100 × 100 × 100
= 2 × 1000 × 10 × 10 × 10 × 10 × 10 × 10
= 2 × 10 × 10 × 10 × 10 × 10 × 10 × 10 × 10 × 10
= 2 × 109

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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry : Some Basic Principles and Techniques

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry : Some Basic Principles and Techniques (कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 Chemistry. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry : Some Basic Principles and Techniques (कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें).

पाठ के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित यौगिकों में प्रत्येक कार्बन की संकरण अवस्था बताइए-
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित अणुओं में σ तथा π आबन्ध दर्शाइए-
C6H6, C6H12, CH2Cl2, CH2=C=CH, CH3NO2, HCONHCH3
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-2

प्रश्न 3.
निम्नलिखित यौगिकों के आबन्ध-रेखा सूत्र लिखिए-
आइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल, 2, 3-डाइमेथिल ब्यूटेनल, हेप्टेन-4-ओन
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-3

प्रश्न 4.
निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-4
उत्तर
(क) प्रोपिलबेन्जीन,
(ख) 3-मेथिलपेन्टेननाइट्राइल,
(ग) 2, 5-डाइमेथिलहेप्टेन,
(घ) 3-ब्रोमो-3-क्लोरोहेप्टेन,
(ङ) 3-क्लोरोप्रोपेनल,
(च) 2, 2-डाइक्लोरोएथेनॉल

प्रश्न 5.
निम्नलिखित यौगिकों में से कौन-सा नाम IUPAC पद्धति के अनुसार सही है?
(क) 2, 2-डाइएथिलपेन्टेन अथवा 2-डाइमेथिलपेन्टेन
(ख) 2, 4, 7-ट्राइमेथिलऑक्टेन अथवा 2, 5, 7-ट्राइमेथिलऑक्टेन
(ग) 2-क्लोरो-4-मेथिलपेन्टेन अथवा 4-क्लोरो-2-मेथिलपेन्टेन
(घ) ब्यूट-3-आइन-1-ऑल अथवा ब्यूट-4-ऑल-1-आइन
उत्तर
(क) 2, 2-डाइमेथिलषन्टेन,
(ख) 2, 4, 7-ट्राइमेथिलऑक्टेन
(ग) 2-क्लोरो-4-मेथिलपेन्टेन,
(घ) ब्यूट-3-आइन-1-ऑल

प्रश्न 6.
निम्नलिखित दो सजातीय श्रेणियों में से प्रत्येक के प्रथम पाँच सजातों के संरचना-सूत्र लिखिए-
(क) HCOOH
(ख) CH3COCH3
(ग) H—CH=CH2
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-5
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-6

प्रश्न 7.
निम्नलिखित के संघनितं और आबन्ध रेखा-सूत्र लिखिए तथा यदि कोई क्रियात्मक समूह हो तो उसे पहचानिए-:
(क) 2, 2, 4-टाइमेथिल पेन्टेन
(ख) 2-हाइड्रॉक्सी-1, 2, 3-प्रोषेनट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल
(ग) हेक्सेनडाइएल
उत्तर
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प्रश्न 8.
निम्नलिखित यौगिकों में क्रियात्मक समूह पहचानिए-
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उत्तर
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प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से कौन अधिक स्थायी है तथा क्यों?
O2NCH2CH2O CH3CH2O
उत्तर
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से अधिक स्थायी है क्योंकि NO2 का -1 प्रभाव होता है। अत: यह O परमाणु पर ऋणावेश का परिक्षेपण करता है। इसके विपरीत, CH3CH2 का +1 प्रभाव होता है, अत: यह ऋणावेश की तीव्रता बढ़ाकर इसे अस्थायी करता है।

प्रश्न 10.
निकाय से आबन्धित होने पर ऐल्किल समूह इलेक्ट्रॉनदाता की तरह व्यवहार प्रदर्शित क्यों करते हैं? समझाइए।
उत्तर
अतिसंयुग्मन के कारण -निकाय से आबन्धित होने पर ऐल्किल समूह इलेक्ट्रॉन दाता की तरह कार्य करते हैं जैसा कि नीचे प्रदर्शित है-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-11

प्रश्न 11.
निम्नलिखित यौगिकों की अनुनाद संरचना लिखिए तथा इलेक्ट्रॉनों का विस्थापन मुड़े तीरों की सहायता से दर्शाइए-
(क) C6H5OH
(ख) C6H5NO2
(ग) CH3CH=CHCHO
(घ) C6H5–CHO
(ङ) C6H5–CH+2
(च) CH3CH=CHCH2
उत्तर
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प्रश्न 12.
इलेक्ट्रॉनस्नेहीं तथा नाभिकस्नेही क्या हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
नाभिकस्नेही और इलेक्ट्रॉनस्नेही (Nucleophiles and Electrophiles) इलेक्ट्रॉन-युग्म प्रदान करने वाला अभिकर्मक ‘नाभिकस्नेही’ (nucleophile, Nu : ) अर्थात् ‘नाभिक खोजने वाला’ कहलाता है तथा अभिक्रिया ‘नाभिकस्नेही अभिक्रिया’ (nucleophilic reaction) कहलाती है। इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करने वाले अभिकर्मक को इलेक्ट्रॉनस्नेही (electrophile E+), अर्थात् ‘इलेक्ट्रॉन चाहने वाला कहते हैं और अभिक्रिया ‘इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिक्रिया’ । (electrophilic reaction) कहलाती है।
ध्रुवीय कार्बनिक अभिक्रियाओं में क्रियाधारक के इलेक्ट्रॉनस्नेही केन्द्र पर नाभिकस्नेही आक्रमण करता है। यह क्रियाधारक का विशिष्ट परमाणु अथवा इलेक्ट्रॉन न्यून भाग होता है। इसी प्रकार क्रियाधारकों के इलेक्ट्रॉनधनी नाभिकस्नेही केन्द्र पर इलेक्ट्रॉनस्नेही आक्रमण करता है। अतः आबन्धन अन्योन्यक्रिया के फलस्वरूप इलेक्ट्रॉनस्नेही से इलेक्ट्रॉन-युग्म प्राप्त करता है। नाभिकस्नेही से इलेक्ट्रॉनस्नेही की ओर इलेक्ट्रॉनों का संचलन वक्र तीर द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। नाभिकस्नेही के उदाहरणों में हाइड्रॉक्साइड (OH), सायनाइड आयन (CN ) तथा कार्बऋणायन UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-14 कुछ आयन सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त कुछ उदासीन अणु, (जैसे- UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-15 आदि) भी एकाकी इलेक्ट्रॉन-युग्म की उपस्थिति के कारण नाभिकस्नेही की भाँति कार्य करते हैं। इलेक्ट्रॉनस्नेही के उदाहरणों में कार्बधनायन UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-17 और कार्बोनिल समूह UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-16 अथवा ऐल्किल हैलाइड (R3C—X, X= हैलोजेन परमाणु) वाले। उदासीन अणु सम्मिलित हैं। कार्बधनायन का कार्बन केवल षष्टक होने के कारण इलेक्ट्रॉन-न्यून होता है तथा नाभिकस्नेही से इलेक्ट्रॉन-युग्म ग्रहण कर सकता है। ऐल्किल हैलाइड का कार्बन आबन्ध ध्रुवता के कारण इलेक्ट्रॉनस्नेही–केन्द्र बन जाता है जिस पर नाभिकस्नेही आक्रमण कर सकता है।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित समीकरणों में रेखांकित अभिकर्मकों को नाभिकस्नेही तथा इलेक्ट्रॉनस्नेही में वर्गीकृत कीजिए-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-18
उत्तर
(क) नाभिकस्नेही,
(ख) नाभिकस्नेही
(ग) इलेक्ट्रॉनस्नेही।

प्रश्न 14.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं को वर्गीकृत कीजिए-
(क) CH3CH2Br+HS CH3CH2SH+Br
(ख) (CH3)2C=CH2+HCl → (CH3)2CIC-CH3
(ग) CH2CH2Br+HO → CH2=CH2+H2O+Br
(घ) (CH3)3C-CH2OH+HBr → (CH3)2CBrCH2CH3 + H2O
उत्तर
(क) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन (Nucleophilic substitution)
(ख) इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक (Electrophilic addition)
(ग) विलोपन (Elimination)
(घ) पुनर्विन्यास युक्त नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन (Nucleophilic substitution with rearrangement)

प्रश्न 15.
निम्नलिखित युग्मों में सदस्य-संरके मध्य कैसा सम्बन्ध है? क्या ये संरचनाएँ संरचनात्मक या ज्यामितीसमवयव अथवा अनुनाद संरचनाएँ हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-19
उत्तर
(क) स्थिति समावयवी और मध्यावयवी
(ख) ज्यामितीय समावयवी,
(ग) अनुनाद संरचनाएँ।

प्रश्न 16.
निम्नलिखित आबन्ध विदलनों के लिए इलेक्ट्रॉन विस्थापन को मुड़े तीरों द्वारा दर्शाइए तथा प्रत्येक विदलन को समांश अथवा विषमांश में वर्गीकृत कीजिए। साथ ही निर्मित सक्रिय मध्यवर्ती उत्पादों में मुक्त-मूलक, कार्बधनायन तथा कार्बऋणायन पहचानिए-
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उत्तर
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प्रश्न 17.
प्रेरणिक तथा इलेक्ट्रोमेरी प्रभावों की व्याख्या कीजिए। निम्नलिखित कार्बोक्सिलिक अम्लों की अम्लता का सही क्रम कौन-सा इलेक्ट्रॉन-विस्थापन वर्णित करता है?
(क) Cl3CCOOH > Cl2CHCOOH > ClCH2COOH
(ख) CH3CH2COOH > (CH3)2CHCOOH > (CH3)3C.COOH
उत्तर
प्रेरणिक प्रभाव (Inductive Effect, I-effect)-भिन्न विद्युत-ऋणात्मकता के दो परमाणुओं के मध्य निर्मित सहसंयोजक आबन्ध में इलेक्ट्रॉन असमान रूप से सहभाजित होते हैं। इलेक्ट्रॉन घनत्व उच्च विद्युत ऋणात्मकता के परमाणु के ओर अधिक होता है। इस कारण सहसंयोजक आबन्ध ध्रुवीय हो जाता है। आबन्ध ध्रुवता के कारण कार्बनिक अणुओं में विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक प्रभाव उत्पन्न होते हैं।
उदाहरणार्थ-क्लोरोएथेन (CH3CH2Cl) में C—Cl बन्ध ध्रुवीय है। इसकी ध्रुवता के कारण कार्बन क्रमांक-1 पर आंशिक धनावेश (δ+) तथा क्लोरीन पर आंशिक ऋणावेश (δ) उत्पन्न हो जाता है। आंशिक आवेशों को दर्शाने के लिए δ (डेल्टा) चिह्न प्रयुक्त करते है। आबन्ध में इलेक्ट्रॉन-विस्थापन दर्शाने के लिए तीर (→) का उपयोग किया जाता है, जो 8′ से 6 की ओर आमुख होता है।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-22

कार्बन-1 अपने आंशिक धनावेश के कारण पास के C—C आबन्ध के इलेक्ट्रॉनों को अपनी ओर आकर्षित करने लगता है। फलस्वरूप कार्बन-2 पर भी कुछ धनावेश (∆δ+) उत्पन्न हो जाता है। C—1 पर स्थित धनावेश की तुलना में ∆δ+ अपेक्षाकृत कम धनावेश दर्शाता है। दूसरे शब्दों में, C—CI की ध्रुवता के कारण पास के आबन्ध में ध्रुवता उत्पन्न हो जाती है। समीप के ठ-आबन्ध के कारण अगले 6-आबन्ध के ध्रुवीय होने की प्रक्रिया प्रेरणिक प्रभाव (inductive effect) कहलाती है। यह प्रभाव आगे के आबन्धों तक भी जाता है, लेकिन आबन्धों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ यह प्रभाव कम होता जाता है और तीन आबन्धों के बाद लगभग लुप्त हो जाता है। प्रेरणिक प्रभाव का सम्बन्ध प्रतिस्थापी से बन्धित कार्बन परमाणु को इलेक्ट्रॉन प्रदान करने अथवा अपनी ओर आकर्षित कर लेने की योग्यता से है। इस योग्यता के आधार पर प्रतिस्थापियों को हाइड्रोजन के सापेक्ष इलेक्ट्रॉन-आकर्षी (electron-withdrawing) या इलेक्ट्रॉनदाता समूह के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। हैलोजन तथा कुछ अन्य समूह; जैसे-नाइट्रो (—NO2), सायनो (—CN), कार्बोक्सी (—COOH), एस्टर (—COOR), ऐरिलॉक्सी (—OAr) इलेक्ट्रॉन आकर्षी समूह हैं; जबकि ऐल्किल समूह; जैसे—मेथिल (—CH3), एथिल (—CH2—CH3) आदि इलेक्ट्रॉनदाता समूह हैं।
इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव (E प्रभाव) [Electromeric Effect, E-effect]-यह एक अस्थायी प्रभाव है। केवल आक्रमणकारी अभिकारकों की उपस्थिति में यह प्रभाव बहुआबन्ध (द्विआबन्ध अथवा त्रिआबन्ध) वाले कार्बनिक यौगिकों में प्रदर्शित होता है। इस प्रभाव में आक्रमण करने वाले अभिकारके की माँग के कारण बहु-आबन्ध से बन्धित परमाणुओं में एक सहभाजित -इलेक्ट्रॉन युग्म का पूर्ण विस्थापन होता है। अभिक्रिया की परिधि से आक्रमणकारी अभिकारक को हटाते ही यह प्रभाव शून्य हो। जाता है। इसे E द्वारा दर्शाया जाता है, जबकि इलेक्ट्रॉन के संचलन को वक्र तीर UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-23 द्वारा प्रदर्शित । किया जाता है। स्पष्टतः दो प्रकार के इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव होते हैं-
(i) धनात्मक इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव (+E प्रभाव)-इस प्रभाव में बहुआबन्ध के ए-इलेक्ट्रॉनों का स्थानान्तरण उस परमाणु पर होता है जिससे आक्रमणकारी अभिकर्मक बन्धित होता है।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-24

(ii) ऋणात्मक इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव(-E प्रभाव)—इस प्रभाव में बहु-आबन्ध के -इलेक्ट्रॉनों का स्थानान्तरण उस परमाणु पर होता है जिससे आक्रमणकारी अभिकर्मक बन्धित नहीं होता है। इसका
उदाहरण निम्नलिखित है-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-25

जब प्रेरणिक तथा इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव एक-दूसरे की विपरीत दिशाओं में कार्य करते हैं, तब इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव प्रबल होता है।
(क) Cl3CCOOH > Cl2CHCOOH > ClCH2COOH
यह इलेक्ट्रॉन आकर्षी प्रेरणिक प्रभाव (-I) दर्शाता है।
(ख) CH3CH2COOH > (CH3)2CHCOOH > (CH3)3C.COOH
यह इलेक्ट्रॉन दाता प्रेरणिक प्रभाव (+I) दर्शाता है।

प्रश्न 18.
प्रत्येक का एक उदाहरण देते हुए निम्नलिखित प्रक्रमों के सिद्धान्तों का संक्षिप्त विवरण दीजिए
(क) क्रिस्टलन,
(ख) आसवन,
(ग) क्रोमैटोग्रैफी।
उत्तर
(क) क्रिस्टलन (Crystallisation)—यह ठोस कार्बनिक पदार्थों के शोधन की प्रायः प्रयुक्त विधि है। यह विधि कार्बनिक यौगिक तथा अशुद्धि की किसी उपयुक्त विलायक में इनकी विलेयताओं में निहित अन्तर पर आधारित होती है। अशुद्ध यौगिक को किसी ऐसे विलायक में घोलते हैं जिसमें यौगिक सामान्य ताप पर अल्प-विलेय (sparingly soluble) होता है, परन्तु उच्चतर ताप परे यथेष्ट मात्रा में वह घुल जाता है। तत्पश्चात् विलयन को इतना सान्द्रित करते हैं कि वह लगभग संतृप्त (saturate) हो जाए। विलयन को ठण्डा करने पर शुद्ध पदार्थ क्रिस्टलित हो जाता है जिसे निस्यन्दन द्वारा पृथक् कर लेते हैं। निस्यन्द (मातृ द्रव) में मुख्य रूप से अशुद्धियाँ तथा यौगिक की अल्प मात्रा रह जाती है। यदि यौगिक किसी एक विलायक में अत्यधिक विलेय तथा किसी अन्य विलायक में अल्प
विलेय होता है, तब क्रिस्टलन उचित मात्रा में इन विलायकों को मिश्रित करके किया जाता है। सक्रियिंत काष्ठ कोयले'(activated charcoal) की सहायता से रंगीन अशुद्धियाँ निकाली जाती हैं। यौगिक तथा अशुद्धियों की विलेयताओं में कम अन्तर होने की दशा में बार-बार क्रिस्टलन द्वारा शुद्ध यौगिक प्राप्त किया जाता है।

(ख) आसवन (Distillation)—इस महत्त्वपूर्ण विधि की सहायता से (i) वाष्पशील (volatile) द्रवों को अवाष्पशील अशुद्धियों से एवं (ii) ऐसे द्रवों को, जिनके क्वथनांकों में पर्याप्त अन्तर हो, पृथक् कर सकते हैं। भिन्न क्वथनांकों वाले द्रव भिन्न ताप पर वाष्पित होते हैं। वाष्पों को ठण्डा करने से प्राप्त द्रवों को अलग-अलग एकत्र कर लेते हैं। क्लोरोफॉर्म (क्वथनांक 334K) और ऐनिलीन (क्वथनांक 457 K) को आसवन विधि द्वारा आसानी से पृथक् कर सकते हैं। द्रव-मिश्रण को गोल पेंदे वाले फ्लास्क में लेकर हम सावधानीपूर्वक गर्म करते हैं। उबालने पर कम क्वथनांक वाले द्रव की वाष्प पहले बनती है। वाष्प को संघनित्र की सहायता से संघनित करके प्राप्त द्रव को ग्राही में एकत्र कर लेते हैं। उच्च क्वथनांक वाले घटक के वाष्प बाद में बनते हैं। इनमें संघनन से प्राप्त द्रव को दूसरे ग्राही में एकत्र कर लेते हैं।

(ग) वर्णलेखन (Chromatography)-‘वर्णलेखन (क्रोमैटोग्रफी) शोधन की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तकनीक है जिसका उपयोग यौगिकों का शोधन करने में, किसी मिश्रण के अवयवों को पृथक् करने तथा यौगिकों की शुद्धता की जाँच करने के लिए विस्तृत रूप से किया जाता है। क्रोमैटोग्रफी विधि का उपयोग सर्वप्रथम पादपों में पाए जाने वाले रंगीन पदार्थों को पृथक् करने के लिए किया गया था। ‘क्रोमैटोग्रैफी’ शब्द ग्रीक शब्द क्रोमा’ (chroma) से बना है जिसका अर्थ है ‘रंग’। इस तकनीक में सर्वप्रथम यौगिकों के मिश्रण को स्थिर प्रावस्था (stationary phase) पर अधिशोषित कर दिया जाता है। स्थिर प्रावस्था ठोस अथवा द्रव हो सकती है। इसके पश्चात् स्थिर प्रावस्था में से उपयुक्त विलायक, विलायकों के मिश्रणं अथवा गैस को धीरे-धीरे प्रवाहित किया जाता है। इस प्रकार मिश्रण के अवयव क्रमशः एक-दूसरे से पृथक् हो जाते हैं। गति करने वाली प्रावस्था को ‘गतिशील प्रावस्था (mobile phase) कहते हैं। अन्तर्ग्रस्त सिद्धान्तों के आधार पर वर्णलेखन को विभिन्न वर्गों में वर्गीकृत किया गया है। इनमें से दो हैं-

  1. अधिशोषण-(वर्णलेखन) (Adsorption chromatography)—यह इस सिद्धान्त पर आधारित है कि किसी विशिष्ट अधिशोषक’ (adsorbent) पर विभिन्न यौगिक भिन्न अंशों में अधिशोषित होते हैं। साधारणतः ऐलुमिना तथा सिलिका जेल अधिशोषक के रूप में प्रयुक्त किए जाते हैं। स्थिर प्रावस्था (अधिशोषक) पर गतिशील प्रावस्था प्रवाहित करने के उपरान्त मिश्रण के अवयव स्थिर प्रावस्था पर अलग-अलग दूरी तय करते हैं। निम्नलिखित दो प्रकार की वर्णलेखन-तकनीकें हैं, जो विभेदी-अधिशोषण सिद्धान्त पर आधारित हैं-
    • कॉलम-वर्णलेखन अर्थात् स्तम्भ-वर्णलेखन (Column Chromatography)
    • पतली पर्त वर्णलेखन (Thin Layer Chromatography)
  2. वितरण क्रोमैटोग्रैफी (Partition chromatography)–वितरण क्रोमैटोग्रॅफी स्थिर तथा गतिशील प्रावस्थाओं के मध्य मिश्रण के अवयवों के सतत् विभेदी वितरण पर आधारित है। कागज वर्णलेखन (paper chromatography) इसका एक उदाहरण है। इसमें एक विशिष्ट प्रकार के क्रोमैटोग्रॅफी कागज का इस्तेमाल किया जाता है। इस कागज के छिद्रों में जल-अणु पाशित रहते हैं, जो स्थिर प्रावस्था का कार्य करते हैं।

प्रश्न 19.
ऐसे दो यौगिकों, जिनकी विलेयताएँ विलायक s, में भिन्न हैं, को पृथक करने की विधि की व्याख्या कीजिए।
उत्तर
ऐसे दो यौगिकों, जिनकी विलेयताएँ विलायक s, में भिन्न हैं, को पृथक् करने के लिए। क्रिस्टलन विधि प्रयोग की जाती है। इस विधि में अशुद्ध यौगिक को किसी ऐसे विलायक में घोलते हैं। जिसमें यौगिक सामान्य ताप पर अल्प-विलेय तथा उच्च ताप पर विलेय होता है। इसके पश्चात् विलयन को सान्द्रित करते हैं जिससे वह लगभग संतृप्त हो जाए। अब अल्प-विलेय घटक पहले क्रिस्टलीकृत हो जाएगा तथा अधिक विलेय घटक पुनः गर्म करके ठण्डा करने पर क्रिस्टलीकृत होगा। इसके अतिरिक्त सक्रियित काष्ठ कोयले की सहायता से रंगीन अशुद्धियाँ निकाल दी जाती हैं। यौगिक तथा अशुद्धि की विलेयताओं में कम अन्तर होने पर बार-बार क्रिस्टलन करने पर शुद्ध यौगिक प्राप्त किया जाता है।

प्रश्न 20.
आसवन, निम्न दाब पर आसवन तथा भाप आसवन में क्या अन्तर है? विवेचना कीजिए।
उत्तर
आसवन का तात्पर्य द्रव का वाष्प में परिवर्तन तथा वाष्प का संघनित होकर शुद्ध द्रव देना है। इस विधि का प्रयोग उन द्रवों के शोधन में किया जाता है जो बिना अपघटित हुए उबलते हैं तथा जिनमें अवाष्पशील अशुद्धियाँ होती हैं।
निम्न दाब पर आसवन में भी गर्म करने पर द्रव वाष्प में परिवर्तित होता है तथा संघनित होकर शुद्ध द्रव देता है परन्तु यहाँ निकाये पर कार्यरत् दाब वायुमण्डलीय दाब नहीं होता है; उसे निर्वात् पम्प की सहायता से घटा दिया जाता है। दाब घटाने पर द्रव का क्वथनांक घट जाता है। अतः इस विधि का प्रयोग उन द्रवों के शोधन में किया जाता है जिनके क्वथनांक उच्च होते हैं या वे अपने क्वथनांक से नीचे अपघटित हो जाते हैं।
भाप आसवन कम दाब पर आसवन के समान होता है लेकिन इसमें कुल दाब में कोई कमी नहीं आती है। इसमें कार्बनिक द्रव तथा जल उस ताप पर उबलते हैं जब कार्बनिक द्रव का वाष्प दाब (p1) तथा जल का वाष्प दाब (p2) वायुमण्डलीय दाब (p) के बराबर हो जाते हैं।

p= p1 + p-कक्षकों

इस स्थिति में कार्बनिक द्रव अपने सामान्य क्वथनांक से कम ताप पर उबलता है जिससे उसका अपघटन नहीं होता है।

प्रश्न 21.
लैंसे-परीक्षण का रसायन-सिद्धान्त समझाइए।
उत्तर
किसी कार्बनिक यौगिक में शुपस्थित नाइट्रोजन, सल्फर, हैलोजेन तथा फॉस्फोरस की पहचान ‘लैंसे-परीक्षण’ (Lassaigne’s Test) द्वारा की जाती है। यौगिक को सोडियम धातु के साथ संगलित करने पर ये तत्व सहसंयोजी रूप से आयनिक रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। इनमें निम्नलिखित अभिक्रियाएँ होती हैं-

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C, N, S तथा X कार्बनिक यौगिक में उपस्थित तत्व हैं। सोडियम संगलन से प्राप्त अवशेष को आसुत जल के साथ उबालने पर सोडियम सायनाइड, सल्फाइड तथा हैलाइड जल में घुल जाते हैं। इस निष्कर्ष को ‘सोडियम संगलन निष्कर्ष’ (Sodium Fusion Extract) कहते हैं।

प्रश्न 22.
किसी कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन के आकलन की (i) ड्यूमा विधि तथा (ii) कैल्डाल विधि के सिद्धान्त की रूपरेखा प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
नाइट्रोजन के परिमाणात्मक निर्धारण की निम्नलिखित दो विधियाँ प्रयुक्त की जाती हैं-
(i) ड्यूमा विधि (Duma’s Method)–नाइट्रोजनयुक्त कार्बनिक यौगिक क्यूप्रिक ऑक्साइड के साथ गर्म करने पर इसमें उपस्थित कार्बन, हाइड्रोजन, गन्धक तथा नाइट्रोजन क्रमशः CO2, H2O, SO2 और नाइट्रोजन के ऑक्साइडों (NO2, NO, N2O) के रूप में ऑक्सीकृत हो जाते हैं। इस गैसीय मिश्रण को रक्त तप्त कॉपर की जाली के ऊपर प्रवाहित करने पर नाइट्रोजन के ऑक्साइडों का नाइट्रोजन में अपचयन हो जाता है।

4Cu + 2NO2 → 4CuO + N2
2Cu +2NO → 2CuO +N2
Cu +N2O → CuO + N2

इस प्रकार N2, CO2, H2O तथा SO2 युक्त गैसीय मिश्रण को KOH से भरी नाइट्रोमीटर नामक अंशांकित नली में प्रवाहित करने पर CO2, H2O तथा SO2 का KOH द्वारा अवशोषण हो जाता है। और बची हुई N2 गैस को नाइट्रोमीटर में जल के ऊपर एकत्र कर लिया जाता है। इस नाइट्रोजन का आयतन वायुमण्डल के दाब तथा ताप पर नोट कर लेते हैं। फिर इस आयतन को गैस समीकरण की सहायता से सामान्य ताप व दाब (N.T.P) पर परिवर्तित कर लेते हैं।

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(ii) कैल्डाल विधि (Kjeldahl’s Method)-यह विधि इस सिद्धान्त पर आधारित है कि जब किसी नाइट्रोजनयुक्त कार्बन यौगिक को पोटैशियम सल्फेट की उपस्थिति में सान्द्र H2SO4 के साथ गर्म करते हैं तो उसमें उपस्थित नाइट्रोजन पूर्णरूप से अमोनियम सल्फेट में परिवर्तित हो जाती है। इस प्रकार प्राप्त अमोनियम सल्फेट को साद्र कॉस्टिक सोडा विलयन के साथ गर्म करने पर अमोनिया गैस निकलती है जिसको ज्ञात सान्द्रण वाले H2SO4 के निश्चित आयतन में अवशोषित कर लेते हैं। इस अम्ल का मानक NaOH के साथ अनुमापन करके गणना द्वारा अवशोषित हुई अमोनिया की मात्रा ज्ञात की जाती है। फिर नाइट्रोजन के आयतन की गणना कर ली जाती है।

(NH4)2SO4 + 2NaOH → Na2SO4 + 2H2O + 2NH3
2NH3 + H2SO4 → (NH4)2SO4

मान लिया, कार्बनिक यौगिक का भार = m
प्रयुक्त अम्ल का आयतन =y मिली
प्रयुक्त अम्ल की नॉर्मलता = N

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प्रश्न 23.
किसी यौगिक में हैलोजेन, सल्फर तथा फॉस्फोरस के आकलन के सिद्धान्त की विवेचना कीजिए।
उत्तर
(i) हैलोजेन का आकलन (Estimation of Halogens)
कार्बनिक यौगिक के ज्ञात भार को सधूम HNO3 तथा AgNO3 के कुछ क्रिस्टलों के साथ केरियस नली में लेते हैं। नली का ऊपरी सिरा बन्द कर दिया जाता है। केरियस नली को विद्युत भट्टी में रखकर 180°-200°C पर लगभग 3-4 घण्टे गर्म करते हैं। यौगिक में उपस्थित हैलोजेन (Cl, Br, I), सिल्वर हैलाइड के अवक्षेप में बदल जाते हैं। सिल्वर हैलाइड के अवक्षेप को धोकर तथा सुखाकर तौल लेते हैं। इस प्रकार प्राप्त सिल्वर हैलाइड के भार से हैलोजेन की प्रतिशत मात्रा निम्नलिखित गणना की सहायता से ज्ञात कर लेते हैं-

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(ii) सल्फर का आकलन (Estimation of Sulphur)
इस सिद्धान्त के अनुसार, सल्फरयुक्त कार्बनिक यौगिक को सान्द्र नाइट्रिक अम्ल के साथ गर्म करने पर यौगिक में उपस्थित समस्त गन्धक, सल्फ्यूरिक अम्ल में ऑक्सीकृत हो जाती है। इसमें BaCl2 विलयन मिलाकर इससे BaSO4 अवक्षेपित कर लिया जाता है। इस अवक्षेप को छानकर, धोकर और सुखाकर तौल लेते हैं। इस प्रकार BaSO4 के भार की सहायता से गन्धक की प्रतिशत मात्रा की गणना कर लेते हैं।
अभिक्रियाएँ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-33

(iii) फॉस्फोरस का आकंलन (Estimation of Phosphorus)
कार्बनिक यौगिक की एक ज्ञातं मात्रा को सधूम नाइट्रिक अम्ल के साथ गर्म करने पर उसमें उपस्थित फॉस्फोरस, फॉस्फोरिक अम्ल में ऑक्सीकृत हो जाता है। इसे अमोनिया तथा अमोनियम मॉलिब्डेट मिलाकर अमोनियम फॉस्फोटोमॉलिब्डेट, (NH4)3 PO4.12MoO3 के रूप में हम अवक्षेपित कर लेते हैं, अन्यथा फॉस्फोरिक अम्ल में मैग्नीशिया मिश्रण मिलाकर MgN4PO4 के रूप में अवक्षेपित किया जा सकता है जिसके ज्वलन से Mg2P2O7 प्राप्त होता है।
माना कि कार्बनिक यौगिक का द्रव्यमान = m ग्राम और
अमोनियम फॉस्फोमॉलिब्डेट = m1 ग्राम

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-34

जहाँ Mg2P2O7 का मोलर द्रव्यमान 222 u, लिए गए कार्बनिक पदार्थ का द्रव्यमान का बने हुए Mg2P2O7 का द्रव्यमान m1 तथा Mg2P2O7) यौगिक में उपस्थित दो फॉस्फोरस परमाणुओं का द्रव्यमान 62 है।

प्रश्न 24.
पेपर क्रोमैटोग्रॅफी के सिद्धान्त को समझाइए।
उत्तर
पेपर क्रोमैटोग्रैफी (Paper Chromatography) पेपर क्रोमैटोग्रॅफी वितरण क्रोमैटोग्रॅफी का एक प्रकार है। कागज अथवा पेपर क्रोमैटोग्रफी में एक विशिष्ट प्रकार का क्रोमैटोग्रफी पेपर प्रयोग किया जाता है। इस पेपर के छिद्रों में जल-अणु पाशित रहते हैं, जो स्थिर प्रावस्था का कार्य करते हैं।
क्रोमैटोग्रॅफी कागज की एक पट्टी (strip) के आधार पर मिश्रण का बिन्दु लगाकर उसे जार में लटका देते हैं (चित्र-4)। जार में कुछ ऊँचाई तक उपयुक्त विलायक अथवा विलायकों का मिश्रण भरा होता है, जो गतिशील प्रावस्था का कार्य करता है। केशिका क्रिया के कारण पेपर की पट्टी पर विलायके ऊपर की ओर बढ़ता है तथा बिन्दु पर प्रवाहित होता है। विभिन्न यौगिकों का दो प्रावस्थाओं में वितरण भिन्न-भिन्न होने के कारण वे अलग-अलग दूरियों तक आगे बढ़ते हैं। इस प्रकार विकसित पट्टी को ‘क्रोमैटोग्राम’ (chromatogram) कहते हैं। पतली पर्त की भाँति पेपर की पट्टी पर विभिन्न बिन्दुओं की स्थितियों को या तो पराबैंगनी प्रकाश के नीचे रखकर या उपयुक्त अभिकर्मक के विलयन को छिड़ककर हम देख लेते हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-35

प्रश्न 25.
‘सोडियम संगलने निष्कर्ष में हैलोजेन के परीक्षण के लिए सिल्वर नाइट्रेट मिलाने से पूर्व नाइट्रिक अम्ल क्यों मिलाया जाता है?
उत्तर
NaCN तथा Na2S को विघटित करने के लिए सोडियम निष्कर्ष को नाइट्रिक अम्ल के साथ उबाला जाता है।

NaCN+ HNO3 → NaNO3 + HCN↑
Na2S + 2HNO3 → 2NaNO3 + H2S ↑

यदि वे विघटित नहीं होते हैं तब वे AgNO3 से अभिक्रिया करके परीक्षण में निम्न प्रकार बाधा पहुँचाते हैं-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-36

प्रश्न 26.
नाइट्रोजन, सल्फर तथा फॉस्फोरस के परीक्षण के लिए सोडियम के साथ कार्बनिक यौगिक का संगलन क्यों किया जाता है?
उत्तर
कार्बनिक यौगिक का सोडियम के साथ संगलन सह-संयोजी रूप में उपस्थित इन तत्त्वों को आयनिक रूप में परिवर्तित करने के लिए किया जाता है।

प्रश्न 27.
कैल्सियम सल्फेट तथा कपूर के मिश्रण के अवयवों को पृथक करने के लिए एक उपयुक्त तकनीक बताइए।
उत्तर
कैल्सियम सल्फेट तथा कपूर के मिश्रण को निम्न विधियों द्वारा पृथक् किया जा सकता है-

  1. कपूर ऊर्ध्वपातनीय है लेकिन कैल्सियम सल्फेट नहीं। अत: मिश्रण को ऊर्ध्वपातित करने पर कपूर फनल के किनारों पर प्राप्त हो जाता है जबकि कैल्सियम सल्फेट चाइना डिश में शेष रह जाता है।
  2. कपूर कार्बनिक विलायकों, जैसे- CCl4, CHCl3 आदि में विलेय होता है लेकिन कैल्सियम सल्फेट नहीं। अतः मिश्रण को कार्बनिक विलायक के साथ हिलाने पर कपूर विलयन में चला जाता है जबकि CaSO4 अपशिष्ट रूप में रहता है। विलयन को छानकर, वाष्पित करके कपूर को प्राप्त कर लेते हैं।

प्रश्न 28.
भाप-आसवन करने पर एक कार्बनिक द्रव अपने क्वथनांक से निम्न ताप पर वाष्पीकृत। क्यों हो जाता है?
उत्तर
भाप आसवन में, कार्बनिक द्रव और जल का मिश्रण उस ताप पर उबलता है जिस पर द्रव तथा जल के दाबों का योग वायुमंडलीय दाब के बराबर हो जाता है। मिश्रण के क्वथनांक पर जल का वाष्प दाब उच्च तथा द्रव का वाष्प दाब अत्यधिक कम (10-15mm) होता है अत: कार्बनिक द्रव वायुमंडलीय दाब से कम दाब पर आसवित हो जाता है अर्थात् कार्बनिक द्रव अपने सामान्य क्वथनांक से कम ताप पर ही आसवित हो जाता है।

प्रश्न 29.
क्या CCl4 सिल्वर नाइट्रेट के साथ गर्म करने पर AgCl का श्वेत अवक्षेप देगा? अपने उत्तर को कारण सहित समझाइए।
उत्तर
AgCl का अवक्षेप नहीं बनेगा क्योंकि CCl4 सहसंयोजी यौगिक है तथा आयनित होकर Cl आयन नहीं देता है।

प्रश्न 30.
किसी कार्बनिक यौगिक में कार्बन का आकलन करते समय उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने के लिए पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड विलयन का उपयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर
CO2 अम्लीय प्रकृति की होती है तथा प्रबल क्षार KOH से क्रिया करके K2CO3 बनाती है।

2KOH+ CO2 →K2CO3 + H2OAr

इससे KOH का द्रव्यमान बढ़ जाता है। निर्मित CO2 के कारण द्रव्यमान में वृद्धि से कार्बनिक यौगिक में उपस्थित कार्बन की मात्रा की गणना निम्न सम्बन्ध का प्रयोग करके की जाती है

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-37

प्रश्न 31.
सल्फर के लेड ऐसीटेटू द्वारा परीक्षण में सोडियम संगलन निष्कर्ष को ऐसीटिक अम्ल द्वारा उदासीन किया जाता है, न कि सल्फ्यूरिक अम्ल द्वारा। क्यों?
उत्तर
सल्फर के परीक्षण में सोडियम निष्कर्ष को CH3COOH से अम्लीकृत करते हैं क्योकि लेड ऐसीटेट विलेय होता है तथा परीक्षण में बाधा उत्पन्न नहीं करता है। यदि H2SO4 का प्रयोग किया जाए तब लेड ऐसीटेट H2SO4 से क्रिया करके लेड सल्फेट का सफेद अवक्षेप बनाता है जो परीक्षण में बाधा उत्पन्न करता है।

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-38

प्रश्न 32.
एक कार्बनिक यौगिक में 69% कार्बन, 4.8% हाइड्रोजन तथा शेष ऑक्सीजन है। इस यौगिक के 0.20 g के पूर्ण दहन के फलस्वरूप उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल
की मात्राओं की गणना कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-39
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-40

प्रश्न 33.
0.50 g कार्बनिक यौगिक को कैल्डाल विधि के अनुसार उपचारित करने पर प्राप्त अमोनिया को 0.5 M H2SO4 के 50 mL में अवशोषित किया गया। अवशिष्ट अम्ल के उदासीनीकरण के लिए 0.5 M NaOH के 50 mL की आवश्यकता हुई। यौगिक में नाइट्रोजन प्रतिशतता की गणना कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-41

प्रश्न 34.
केरियस आकलन में 0.3780 g’कार्बनिक क्लोरो यौगिक से 0.5740 g सिल्वर क्लोराइड प्राप्त हुआ। यौगिक में क्लोरीन की प्रतिशतता की गणना कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-42

प्रश्न 35.
केरियस विधि द्वारा सल्फर के आकलन में 0.468 g सल्फरयुक्त कार्बनिक यौगिक से 0.668 g बेरियम सल्फेट प्राप्त हुआ। दिए गए कार्बन यौगिक में सल्फर की प्रतिशतता की गणना कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-43

प्रश्न 36.
CH2= CH-CH2-CH2-C = CH, कार्बनिक यौगिक में C2—C3 आबन्ध किन संकरित कक्षकों के युग्म से निर्मित होता है?
(क) sp-sp2
(ख) sp-sp3
(ग) sp2 -sp3
(घ) sp2 -sp3
उत्तर
(ग) sp2 -sp3

प्रश्न 37.
किसी कार्बनिक यौगिक में लैंसे-परीक्षण द्वारा नाइट्रोजन की जाँच में प्रशियन ब्लू रंग निम्नलिखित में से किसके कारण प्राप्त होता है?
(क) Na4 [Fe(CN)6l
(ख) Fe4[Fe(CN)6l3
(ग) Fe2[Fe(CN)6)
(घ) Fe3[Fe(CN)6l4
उत्तर
(ख) Fe4 [Fe(CN)6l3

प्रश्न 38.
निम्नलिखित कार्बधनायनों में से कौन-सा सबसे अधिक स्थायी है?
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-44
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-45

प्रश्न 39.
कार्बनिक यौगिकों के पृथक्करण और शोधन की सर्वोत्तम तथा आधुनिकतम तकनीक कौन-सी है?
(क) क्रिस्टलन
(ख) आसवन
(ग) ऊर्ध्वपातन
(घ) क्रोमैटोग्रैफी
उत्तर
(घ) क्रोमैटोग्रॅफी।

प्रश्न 40.
CH3CH2I+ ROH(aq) → CH2CH2OH+ KI अभिक्रिया को नीचे दिए गए प्रकार में वर्गीकृत कीजिए
(क) इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन
(ख) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन
(ग) विलोपन
(घ) संकलन
उत्तर
(ख) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
CH3-CH (CH3)-CO-CH2-CH2OH का IUPAC नाम है।
(i) 1 हाइड्रॉक्सी-4 मेथिल-3 पेन्टेनॉन
(ii) 2 मेथिल-5 हाइड्रॉक्सी -3 पेन्टेनॉन
(iii) 4 मेथिल-3 ऑक्सी-1 पेन्टेनॉल
(iv) 1-हेक्सेनॉल-3 ऑन
उत्तर
(i) 1 हाइड्रॉक्सी-4 मेथिल-3 पेन्टेनॉन

प्रश्न 2.
निम्न में CH3OC2H5 का कौन-सा IUPAC नाम सही है ?
(i) एथिल मेथिल ईथर
(ii) मेथिल एथिल ईथर
(iii) मेथॉक्सी एथेन
(iv) एथॉक्सी मेथेन
उत्तर
(iii) मेथॉक्सी एथेन

प्रश्न 3.
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-46
(i) 2, 3, 3, 4, 5 पेन्टामेथिल पेन्टेन
(ii) 2,3, 3, 4 ट्रेटामेथिल हेक्सेन
(iii) 1,2,3, 3, 4 पेन्टामेथिल पेन्टेन
(iv) 4 एथिल, 2, 3, 4 ट्राइमेथिल ब्यूटेन
उत्तर
(ii) 2, 3,3,4 ट्रेटामेथिल हेक्सेन

प्रश्न 4.
CH2 = CH—CH(CH3)2 यौगिक का आई० पू० पी० ए० सी० पद्धति में नाम है।
(i) 1, 1 डाइमेथिल-2 प्रोपीन
(ii) 3,3 डाइमेथिल-1-प्रोपीन
(iii) 3-मेथिल-1-ब्यूटीन
(iv) 1 आइसोप्रोपिल एथिलीन
उत्तर
(ii) 3 मेथिल-1-ब्यूटीन

प्रश्न 5.
लैक्टिक अम्ल का आई० पू० पी० ए० सी० नाम है।
(i) 2 हाइड्रॉक्सी-3 प्रोपेनॉइक अम्ल
(ii) 1 कार्बोक्सी-2 हाइड्रॉक्सी प्रोपेन
(iii) 2 हाइड्रॉक्सी प्रोपेनॉइक अम्ल
(iv) 1 कार्बोक्सी एथेनॉल
उत्तर
(iii) 2 हाइड्रॉक्सी प्रोपेनॉइक अम्ल

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में सर्वाधिक स्थायी कार्बोधनायन है।
(i) एथिल कार्बोधनायन
(ii) प्राथमिक कार्योधनायन
(iii) द्वितीयक कार्बाधिनायन
(iv) तृतीयक कार्बोधनायन
उत्तर
(iv) तृतीयक कार्बोधनायन

प्रश्न 7.
ऋण आवेशित कार्बन वाले कार्बनिक समूह को कहते हैं।
(i) मुक्त मूलक
(ii) कार्बन आयन
(iii) लूइस अम्ल
(iv) कार्बोनियम आयन
उत्तर
(ii) कार्बन आयन

प्रश्न 8.
निम्न में से कौन-सा कार्ब-एनायन सबसे अधिक स्थायी है ?
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-47
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-48

प्रश्न 9.
मुक्त मूलक का लक्षण नहीं होता है।
(i) विद्युत उदासीनता ।
(ii) अनुचुम्बकीय गुण
(iii) अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की उपस्थिति
(iv) हेटरोलिटिक विदलन से बनता है।
उत्तर
(iv) हेटरोलिटिक विदलन से बनता है।

प्रश्न 10.
मेथेन का सूर्य के प्रकाश में क्लोरीनीकरण है।
(i) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन
(ii) इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन
(iii) मुक्त मूलक प्रतिस्थापन
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(iii) मुक्त मूलक प्रतिस्थापन

प्रश्न 11.
निम्नलिखित में नाभिकस्नेही अभिकर्मक है।
(i) लूइस अम्ल
(ii) लूइस क्षार
(iii) मुक्त मूलक
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ii) लूइस क्षार

प्रश्न 12.
निम्नलिखित में नाभिकस्नेही अभिकर्मक है।
(i) R2N
(ii) SO3
(iii) BF2
(iv) NO+2
उत्तर
(i) R3N

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में नाभिकस्नेही अभिकर्मक नहीं है।
(i) NH3
(ii) AlCl3
(iii) H2O
(iv) Cl
उत्तर
(ii) AlCl3

प्रश्न 14.
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-49 यह अभिक्रिया है।
(i) इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन
(ii) इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक
(iii) नाभिकस्नेहीं योगात्मक
(iv) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन
उत्तर
(iii) नाभिकस्नेही योगात्मक

प्रश्न 15.
निम्नलिखित में इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिकर्मक है।
(i) BF3
(ii) NH3
(iii) H2O
(iv) R — OH
उत्तर
(i) BF3

प्रश्न 16.
ऐल्कीन में हैलोजन अम्ल का योग है।
(i) न्यूक्लियोफिलिक योग
(ii) इलेक्ट्रोफिलिक योग
(iii) मुक्त मूलक
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ii) इलेक्ट्रोफिलिक योग

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
खुली श्रृंखला यौगिक अथवा अचक्रीय यौगिक अथवा ऐलिफैटिक यौगिक क्या हैं? उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर
जिन कार्बनिक यौगिकों में कार्बन परमाणुओं की खुली श्रृंखला होती है, खुली श्रृंखला यौगिक अथवा अचक्रीय यौगिक कहलाते हैं। इन यौगिकों को ऐलिफैटिक यौगिक भी कहते हैं।
उदाहरणार्थ-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-50

प्रश्न 2.
बन्द श्रृंखला यौगिक अथवा चक्रीय यौगिक की परिभाषा उदाहरण सहित दीजिए।
उत्तर
जिन कार्बनिक यौगिकों में परमाणुओं की एक या उससे अधिक बन्द श्रृंखलाएँ अथवा वलय होते हैं, बन्द श्रृंखला यौगिक अथवा चक्रीय यौगिक कहलाते हैं।
उदाहरणार्थ-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-51

प्रश्न 3.
समचक्रीय तथा विषमचक्रीय यौगिक क्या होते हैं? प्रत्येक के दो-दो उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर
समचक्रीय यौगिक-वे यौगिक जिनमें वलय केवल कार्बन परमाणुओं का बना होता है, समुचक्रीय यौगिक कहलाते हैं। उदाहरणार्थ-साइक्लोप्रोपेन, डाइफेनिल, बेंजीन, टॉलूईन आदि।। विषमचक्रीय यौगिक-वे बन्द श्रृंखला यौगिक जिनकी वलय में विषम परमाणु (कार्बन तथा हाइड्रोजन के अतिरिक्त अन्य परमाणु, जैसे–N, O, s आदि) होते हैं, विषमचक्रीय यौगिक कहलाते हैं।
उदाहरणार्थ–फ्यूरेन, थायोफीन, पिरीडीन आदि।

प्रश्न 4.
ऐलिसाइक्लिक यौगिक क्या हैं? उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर
वे समचक्रीय यौगिक जिनके गुण ऐलिफैटिक यौगिकों के गुणों से मिलते-जुलते होते हैं, ऐलिसाइक्लिक यौगिक कहलाते हैं।
उदाहरणार्थ-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-52

प्रश्न 5.
ऐरोमैटिक यौगिक क्या हैं? उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर
ये विशेष प्रकार के चक्रीय असंतृप्त यौगिक हैं। इन यौगिकों के लिए ऐरोमैटिक शब्द का प्रयोग प्रारम्भ में खोजे गये कुछ यौगिकों की मीठी गन्धं होने के कारण किया गया था परन्तु अब दुर्गन्धयुक्त ऐरोमैटिक भी ज्ञात हैं।
उदाहरणार्थ-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-53

प्रश्न 6.
क्रियात्मक समूह से क्या तात्पर्य है?
उत्तर
किसी अणु में उपस्थित परमाणु अथवा परमाणुओं का समूह, जो मुख्य रूप से उसके रासायनिक गुण निर्धारित करता है, क्रियात्मक समूह कहलाता है।

प्रश्न 7.
ऐल्डिहाइड यौगिक में कौन-सा क्रियात्मक समूह होता है?
उत्तर
ऐल्डिहाइड यौगिक में —CHO क्रियात्मक समूह होता है।

प्रश्न 8.
IUPAC नामकरण पद्धति में प्राथमिक अनुलग्न क्या दर्शाता है।
उत्तर
IUPAC नामकरण पद्धति में प्राथमिक अनुलग्न दर्शाता है कि कार्बन श्रृंखला संतृप्त है अथवा असंतृप्त।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-54
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उत्तर
(i) N, N-डाइमेथिल-2-मेथिल प्रोपेनाइन
(ii) आइसोप्रोप्रिल प्रोपोनेट
(iii) 3-मेथिल पेन्टानोइक ऐसिड
(iv) 2, 4-डाइमेथिल हेक्सेन
(v) हेप्ट-5-ईन-3-आइन, 2-ओन
(vi) 3-ब्रोमो, 2-क्लोरो, 4-आयोडो हेक्सेन
(vii) हाइड्रॉक्सी 2-फेनिल प्रोपेनोइक ऐसिड
(viii) 2-ब्रोमो, एथिल प्रोपानोएट
(ix) N मेथिल 2-प्रोपेनामीन
(x) प्रोपेन 1, 2, 3-ट्राइकार्बोनाइट्राइल
(xi) 3-ब्रोमो, 3-क्लोरो, 2-मेथिल ब्यूटेनोइक ऐसिड
(xii) 4-हाइड्रॉक्सी 4-मेथिल, पेन्टेनोन-2

प्रश्न 10.
IUPAC पद्धति में निम्नलिखित संरचना सूत्र वाले यौगिकों का नाम बताइए
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UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-57
उत्तर
(i) ब्यूट-3-ईन-1-आइन
(ii) पेन्ट-3-ईन-1-आइन
(iii) 2, 2, 3-ट्राइक्लोरो ब्यूटेन-1 ऑल
(iv) 2-मेथिल 1, 4-हेक्सेन-डाई-ऑल।
(v) 2-हाइड्रॉक्सी ब्यूटेन-1 ऑल
(vi) 2-एथिल-4-मेथिल हेक्सेन
(vii) 2-ब्यूटेनल
(viii) 2-प्रोपेनल
(ix) 3-मेथिल-पेन्टेन-2 ऑन
(x) हाइड्रॉक्सी ब्यूटेनोइक अम्ल
(xi) प्रोपेनॉइल क्लोराइड
(xii) 3-मेथिल ब्यूटेनॉइल क्लोराइड

प्रश्न 11.
समतल ध्रुवित प्रकाश किसे कहते हैं? यह कैसे प्राप्त किया जाता है?
उत्तर
वह प्रकाश जिसमें कम्पन केवल एक ही तल में होते हैं, समतल ध्रुवित प्रकाश कहलाता है। साधारण प्रकाश की किरण को निकोल प्रिज्म में से प्रवाहित करने पर वह समतल ध्रुवित प्रकाश में परिवर्तित हो जाता है।

प्रश्न 12.
ध्रुवण घूर्णकता क्या है?
उत्तर
कुछ पदार्थों में क्रिस्टलीय अवस्था या विलयन अवस्था में समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को दायीं ओर या बायीं ओर घुमाने का गुण होता है। पदार्थों के इस गुण की ध्रुवण घूर्णकता कहते हैं। उदाहरणार्थ-लैक्टिक अम्ल, टार्टरिक अम्ल, ग्लूकोस आदि।

प्रश्न 13.
किरेल एवं अकिरेल अणु क्या होते हैं?
उत्तर
जो अणु दायें ओर बायें हाथों की भाँति अपने दर्पण प्रतिबिम्ब पर अध्यारोपित नहीं होते हैं वे किरेल अणु कहलाते है। उदाहरणार्थ-2-ब्यूटेनॉल अणु। जबकि जो अणु दायें और बायें हाथों की भॉति अपने दर्पण प्रतिबिम्ब पर अध्यारोपित होते हैं, वे अकिरेल अणु कहलाते हैं। उदाहरणार्थ-1-ब्यूटेनॉल अणु।।

प्रश्न 14.
असममित कार्बन परमाणु क्या है?
उत्तर
किसी अणु में जो चतुष्फलकीय कार्बन परमाणु चार भिन्न परमाणुओं या समूहों से जुड़ा होता है, असममित कार्बन परमाणु कहलाता है।

प्रश्न 15.
कार्बोनियम आयन को उदाहरण सहित समझाइए। इसके दो गुण लिखिए।
उत्तर
वह धनावेशित आयन जिसमें कार्बन परमाणु पर धनावेश होता है तथा धनावेशित कार्बन परमाणु के संयोजी कोश में केवल 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं, कार्बोधनायन या कार्बोनियम आयन कहलाता है।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-58

कार्बोनियन आयन के दो प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं-

  1. इनका अष्टक अपूर्ण होता है।
  2. ये धनावेशित होते हैं। अत: इनकी प्रकृति इलेक्ट्रॉनस्नेही होती है।

प्रश्न 16.
कार्बनायन किसे कहते हैं? कार्बनायन की दो विशेषताएँ लिखिए। किसी एक कार्बनायन का सूत्र भी लिखिए।
उत्तर
वह ऋणावेशित आयन जिसमें कार्बन परमाणु पर ऋणावेश होता है तथा ऋणावेशित कार्बन के पास एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म होता है, कार्बनायन कहलाता है।
उदाहरणार्थ-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-59

कार्बनायनों की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं-

  1. ऋणावेशित कार्बन के पास एक-एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म होता है।
  2. इनका निर्माण विषमांगी (हेटरोलिटिक) विदलन से होता है।

प्रश्न 17.
मुक्त मूलक क्या होते हैं? ये किस प्रकार बनते हैं?
उत्तर
उदासीन परमाणु या परमाणुओं का समूह जिसके पास विषम या अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होता है, मुक्त मूलक (free radical) कहलाता है। मुक्त मूलक के प्रतीक अथवा सूत्र में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन को एक बिन्दु द्वारा प्रदर्शित करते हैं।’ जैसे—UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-60क्लोरीन मुक्त मूलक को प्रदर्शित करता है। मुक्त मूलक बहुत अस्थायी और बहुत क्रियाशील होते हैं। मुक्त मूलक सह-संयोजी बन्ध में होमोलिटिक विदलन से उत्पन्न होता है। जैसे—क्लोरीन अणु को मुक्त मूलकों में विखण्डन सूर्य के प्रकाश या ऊष्मा द्वारा होता है।
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-61

प्रश्न 18.
आयम तथा मुक्त मूलक में क्या अन्तर है?
उत्तर
आयन तथा मुक्त मूलक में प्रमुख अन्तर इस प्रकार हैं-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-62

प्रश्न 19.
प्रेरणिक प्रभाव व इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव में अन्तर लिखिए।
उत्तर
प्रेरणिक प्रभाव व इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव में निम्नलिखित अन्तर हैं-
UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-63

प्रश्न 20.
नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
यदि प्रतिस्थापन अभिक्रिया नाभिकस्नेही अभिकर्मक द्वारा सम्पन्न होती है तो उसे नाभिकस्नेही । प्रतिस्थापन अभिक्रिया कहते हैं। इसे SN द्वारा प्रकट करते हैं। ऐल्किल हैलाइंडों की प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ नाभिकस्नेही अभिक्रियाएँ होती हैं।
उदाहरणार्थ-ऐल्किल हैलाइड का जलीय क्षारक द्वारा जल-अपघटन

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-64

प्रश्न 21.
SN1 अभिक्रिया से क्या अभिप्राय है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
इस अभिक्रिया में आक्रमणकारी अभिकर्मक नाभिकस्नेही जैसे–OH ,CN आदि होते हैं। इन अभिक्रियाओं की दर केवल एक स्पीशीज के सान्द्रण पर निर्भर करती है अतः इन अभिक्रियाओं को SM1 से प्रदर्शित करते हैं।
उदाहरण—-ब्यूटिल क्लोराइड की जल तथा ऐसीटोन के मिश्रण में सोडियम हाइड्रॉक्साइड से अभिक्रिया द्वारा 1-ब्यूटिल ऐल्कोहॉल बनता है।

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प्रश्न 22.
मुक्त मूलक प्रतिस्थापन अभिक्रिया को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
यदि प्रतिस्थापन अभिक्रिया मुक्त मूलक अभिकर्मक द्वारा सम्पन्न होती है तो उसे मुक्त मूलक प्रतिस्थापन अभिक्रिया कहते हैं।
उदाहरणार्थ-विसरित प्रकाश में मेथेन तथा क्लोरीन की अभिक्रिया

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-66

इस अभिक्रिया में आक्रमणकारी अभिकर्मक एक मुक्त मूलक (Cl·) होता है।

प्रश्न 23.
योगात्मक या संकलन अभिक्रियाएँ क्या हैं?
उत्तर
वे अभिक्रियाएँ जिनमें दो अणु संयोग करके एक अणु बनाते हैं योगात्मक या संकलन अभिक्रियाएँ कहलाती हैं। ये अभिक्रियाएँ सामान्यत: बहुआबन्ध युक्त कार्बनिक यौगिकों में होती हैं। इन अभिक्रियाओं में एक π – आबन्धका विदलन हो जाता है तथा दो σ -आबन्ध बनते हैं।
उदाहरणार्थ-

UP Board Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry Some Basic Principles and Techniques img-67

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
समावयवता किसे कहते हैं? उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर
जिन यौगिकों के अणुसूत्र समान होते हैं परन्तु गुण भिन्न-भिन्न होते हैं समावयवी कहलाते हैं। तथा यह परिघटना समावयवता कहलाती है। उदाहरणार्थ-एथिल ऐल्कोहॉल और डाइमेथिल ईथर दोनों समावयवी हैं।

प्रश्न 2.
संरचनात्मक समावयवता को परिभाषित कीजिए इसके प्रकार भी लिखिए।
उत्तर
संरचनात्मक समावयवता अणुओं के संरचना सूत्रों में भिन्नता होने के कारण उत्पन्न होती है। संरचनात्मक समावयवियों के अणुसूत्र तो समान होते हैं परन्तु उनके संरचना सूत्र भिन्न-भिन्न होते हैं। संरचनात्मक समावयवता के प्रमुख प्रकार निम्नवत् हैं-

  1. श्रृंखला समावयवता,
  2. स्थाने समावयवता,
  3. क्रियात्मक समूह समावयवता,
  4. मध्यावयवता तथा
  5. चलावयवता

प्रश्न 3.
श्रृंखला समावयवता का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर
श्रृंखला समावयवता अणुओं के कार्बन श्रृंखला की रचना में भिन्नता होने के कारण उत्पन्न होती है। श्रृंखला समावयवियों के अणुसूत्र तो समान होते हैं, परन्तु उनकी कार्बन श्रृंखलाओं की रचना में भिन्नता होती है। श्रृंखला समावयवी समान सजातीय श्रेणी के सदस्य होते हैं।
उदाहरणार्थ-ब्यूटेन के दो श्रृंखला समावयवी हैं जिनके संरचना सूत्र निम्नवत् हैं-

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प्रश्न 4.
स्थान समावयवता को परिभाषित कीजिए।
उत्तर
स्थान समावयवता कार्बन श्रृंखला में किसी प्रतिस्थापी समूह या युग्म बन्ध के स्थान में भिन्नता होने के कारण उत्पन्न होती है। स्थान समावयवियों के अणुसूत्र एवं कार्बन श्रृंखला की रचना तो समान होती है परन्तु उनकी कार्बन श्रृंखला में प्रतिस्थापी समूह या युग्म बन्ध का स्थान भिन्न होता है। स्थान समावयवी भी सजातीय श्रेणी के सदस्य होते हैं।
उदाहरणार्थ- 1-ब्यूटीन और 2-ब्यूटीन, ब्यूटीन के दो स्थान समावयवी हैं।

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प्रश्न 5.
क्रियात्मक समूह समावयवता को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
क्रियात्मक समूह समावयवता अणुओं में भिन्न क्रियात्मक समूहों की उपस्थिति के कारण होती है। क्रियात्मक समूह समावयवियों के अणुसूत्र तो समान होते हैं परन्तु उनमें क्रियात्मक समूह भिन्न-भिन्न होते हैं। क्रियात्मक समूह समावयवी भिन्न-भिन्न सजातीय श्रेणियों के यौगिक होते हैं।
उदाहरणार्थ-एथिल ऐल्कोहॉल तथा डाइमेथिल ईथर क्रियात्मक समूह समावयवी हैं।

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प्रश्न 6.
मध्यावयवता को परिभाषित कीजिए।
उत्तर
मध्यावयवता किसी द्वि-संयोजी क्रियात्मक समूह से जुड़े ऐल्किल समूहों की प्रकृति में भिन्नता होने के कारण उत्पन्न होती है। मध्यावयवियों के अणुसूत्र तो समान होते हैं परन्तु उनमें द्वि-संयोजी क्रियात्मक समूह में जुड़े ऐल्किल समूहों की प्रकृति भिन्न-भिन्न होती है। मध्यावयवी एक ही सजातीय श्रेणी के सदस्य होते हैं। ईथर, ऐल्किल सल्फाइड, द्वितीयक ऐमीन, एस्टर आदि मध्यावयवता प्रदर्शित करते हैं।
उदाहरणार्थ-डाइएथिले सल्फाइड एवं मेथिल-n-प्रोपिल सल्फाइड मध्यावयवी हैं।

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प्रश्न 7.
चयावयवता का वर्णन कीजिए।
उत्तर
यह एक विशेष प्रकार की संरचनात्मक समावयवता है जिनमें दो संरचनात्मक समावयवी सरलता से एक-दूसरे में परिवर्तित हो जाते हैं तथा समावयवियों के मध्य साम्यावस्था विद्यमान होती है। वह परिघटना जिसमें दो संरचना समावयवी सरलता में एक-दूसरे में परिवर्तित हो जाते हैं और परस्पर साम्यवस्था में रहते हैं चलावयव या चलावयवी रूप कहलाते हैं।
यौगिक विभिन्न प्रकार की चलावयवता प्रदर्शित करते हैं जिनमें कीटो-ईनोल चलावयवता प्रमुख है। ऐल्डिहाइड और कीटोन जिनमें कार्बोनिल समूह के निकटवर्ती कार्बन परमाणु पर एक या अधिक हाइड्रोजन परमाणु उपस्थित होते हैं। कीटो-ईनोल चलावयवता प्रदर्शित करते हैं। कीटो-ईनोल चलावयवता -हाइड्रोजन परमाणु का निकटवर्ती कार्बोनिल समूह के ऑक्सीजन परमाणु पर अभिगमन होने में उत्पन्न होती है।

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प्रश्न 8.
त्रिविम समावयवती को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
जब अणुओं में अनके परमाणुओं की आकाशीय व्यवस्था (विन्यास) में भिन्नता होती है तो यह परिघटना त्रिविम समावयवता कहलाती है। त्रिविम समावयवियों के अणुसूत्र एवं संरचना सूत्र तो समान होते हैं परन्तु उनके परमाणुओं की आकाशीय व्यवस्था भिन्न-भिन्न होती है।
उदाहरणार्थ-2-ब्यूटीन की निम्नलिखित दो त्रिविम संरचनाएँ सम्भव हैं|

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प्रश्न 9.
त्रिविम समावयवियों के प्रकार बताइए।
उत्तर
त्रिविम समावयवी मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं-

  1. प्रतिबिम्ब रूप तथा
  2. अप्रतिबिम्बी त्रिविम समावयव

जो त्रिविम समावयवी बायें एवं दायें हाथों के सदृश एक-दूसरे के अन-अध्यारोपणीय दर्पण प्रतिबिम्ब रूप कहलाते हैं जबकि जो त्रिविम समावयवी एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिम्ब नहीं होते हैं, वे अप्रतिबिम्बी त्रिविम समावयवी कहलाते हैं।

प्रश्न 10.
ज्यामितीय समावयवता को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
प्राय: कार्बन-कार्बन युग्म बन्ध युक्त वे यौगिक जिनमें युग्म-बन्धित कार्बन परमाणु में जुड़े दो परमाणु या समूह भिन्न प्रकार के होते हैं, ज्यामितीय समावयवता प्रदर्शित करते हैं, यह समावयवता युग्म बन्ध के चारों ओर सीमित घूर्णन के कारण उत्पन्न होती है।
उदाहरणार्थ-2-ब्यूटीन की। निम्नलिखित दो त्रिविम संरचनाएँ सम्भव हैं-

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ये दो त्रिविम संरचनाएँ (I एवं II) 2-ब्यूटीन के दो ज्यामितीय समावयवियों को प्रदर्शित करती हैं जो सिस-ट्रान्स समावयवी कहलाते हैं। जिन ज्यामितीय समावयवी में समान समूह एक ही पथ में होते हैं। उसे cis-समावयवी या समकक्ष रूप और जिनमें समान विपरीत पक्षों में होते हैं उसे trans-समावयवी या विपक्ष रूप कहते हैं।

प्रश्न 11.
प्रकाशिक समावयवता को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
प्रकाशिक समावयवता एक प्रकार की त्रिविम समावयवता है तो उन कार्बनिक यौगिकों द्वारा दर्शायी जाती है जिनके अणु विसममित अर्थात् किरेल होते हैं। प्रकाशिक समावयवी समतल ध्रुवित प्रकाश के प्रति भिन्न व्यवहार प्रदर्शित करते हैं जो त्रिविम समावयवी ध्रुवित प्रकाश के तल को दक्षिणावर्त घुमाता है उसे दक्षिण ध्रुवण-घूर्णक ओर जो त्रिविम समावयवी ध्रुवित प्रकाश के तल को वामावर्त घुमाता है उसे वाम ध्रुवण-घूर्णक कहते हैं। ध्रुवण अघूर्णक प्रकाशिक समावयवी मेसो समावयवी कहलाते हैं। मेसो समावयवियों के अणु सममित होते हैं। प्रकाशिक समावयवियों के रासायनिक गुण में तो समानता होती है परन्तु उनके भौतिक गुण समान या भिन्न हो सकते हैं।
उदाहरणार्थ-लैक्टिक अम्ल की प्रकाशिक समावयवता

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प्रश्न 12.
एक यौगिक का सूत्र CH2OH—CHCl—CHOH—CHOH—CHCl—CH2OH है। यौगिक के प्रकाशिक संमावयवियों की गणना कीजिए।
उत्तर
यौगिक CH2OH—CHCl—CHOH—CHOH—CHCl—CH2OH के अणु में असममित कार्बन परमाणुओं की संख्या (n) चार है।

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यौगिक के अणु को एक जैसे दो बराबर भागों में विभाजित किया जा सकता है तथा अणु में असममित परमाणुओं की संख्या सम (even) है। अतः ऐसी स्थिति में यौगिक के,
ध्रुवण-घूर्णक समावयवियों की संख्या, a = 2(n-1) = 2(4-1) = 8
मेसो-समावयवियों की संख्या, m=2(n/2-1) = 2(2-1) =2
और प्रकाशिक समावयवियों की संख्या = a+m= 8+2= 10

प्रश्न 13.
होमोलिटिक तथा हेटरोलिटिक विदलन को एक उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
एक सह-संयोजी बन्ध दो परमाणुओं के मध्य इलेक्ट्रॉन युग्म की साझेदारी द्वारा बनता है। इस प्रकार संयुक्त दो परमाणुओं को एक-दूसरे से अलग होना बन्ध का विदलन या विखण्डन कहलाता है।
(i) होमोलिटिक विदलन या समांग विखण्डन—यह वह प्रक्रम है जिसमें पृथक् होने वाली प्रत्येक परमाणु सह-संयोजी बन्ध के इलेक्ट्रॉन युग्म से एक इलेक्ट्रॉन लेकर पृथक् होता है। इस विदलन द्वारा उत्पन्न खण्डों के पास सह-संयोजक बन्ध का एक-एक इलेक्ट्रॉन होता है। इन खण्डों को मुक्त मूलक कहते हैं।

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उदाहरणार्थ-

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(ii) हेटरोलिटिक विदलन या विषमांग विखण्डन-इस विदलन में बन्ध के साझे का इलेक्ट्रॉन युग्म । किसी भी परमाणु या खण्ड के साथ चला जाता है और दो आयन बनते हैं।

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जब R+ एक ऐसा समूह होता है जिसके कार्बन परमाणु पर धनावेश होता है तो इसे कार्बोनियम आयनं कहते हैं तथा जब R के कार्बन परमाणु पर ऋणावेश होता है तो इसे कार्बनायन कहते हैं।

प्रश्न 14.
अनुनाद पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
ऐसे अनेक कार्बनिक यौगिक ज्ञात हैं जिनके सभी गुणों को केवल एक लूईस संरचना (Lewis structure) द्वारा पूर्णतः प्रदर्शित नहीं किया जा सकता है। ऐसे में यौगिक के अणु को अनेक ऐसी संरचनाओं द्वारा प्रदर्शित किया जाता है जिनमें से प्रत्येक अणु के अधिकांश गुणों की व्याख्या करती है, परन्तु कोई भी अणु के सभी गुणों की व्याख्या नहीं करती है। ऐसे में अणु की वास्तविक संरचना इन सभी योगदान करने वाली संरचनाओं (जिन्हें अनुनाद संरचनाएँ या विहित संरचनाएँ कहते हैं) की मध्यवर्ती होती है तथा इसे सभी लूईस संरचनाओं का अनुनाद संकर (resonance hybrid) कहते हैं। इस परिघटना को अनुनाद या मीसोमेरिकता कहते हैं।
वास्तव में अनुनाद संरचनाओं या विहित संरचनाओं (canonical structures) का कोई अस्तित्व नहीं है। वास्तव में अणु की केवल एक ही संरचना होती है जो कि विभिन्न विहित संरचनाओं का अनुनाद संकर होता है तथा इसे एक लूईस संरचना द्वारा प्रदर्शित नहीं किया जा सकता है। किसी अणु की विभिन्न संरचनाओं को चिह्न (+) द्वारा पृथक् करके लिखा जाता है। बेंजीन भी एक ऐसा ही यौगिक है जिसके व्यवहार को केवल एक लूईस संरचना द्वारा समझाया नहीं जा सकता है। बेंजीन को निम्न दो अनुनादी संरचनाओं का अनुनाद संकर माना जाता है।

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प्रश्न 15.
अनुनाद प्रभाव या मीसोमेरिक प्रभाव को समझाइए।
उत्तर
संयुग्मित निकायों (जिनमें एकान्तर से एकल और द्विआबन्ध होते हैं) में अनुनाद के कारण निकाय के एक भाग से दूसरे भाग में इलेक्ट्रॉनों का विस्थापन होता है जिसके कारण उच्च तथा निम्न इलेक्ट्रॉन घनत्व के केन्द्र बन जाते हैं। यह प्रभाव अनुनाद प्रभाव अथवा मीसोमेरिक प्रभाव कहलाता है। यह दो प्रकार का होता है।
1. धनात्मक अनुनाद प्रभाव—यह प्रभाव उन समूहों द्वारा दर्शाया जाता है जो द्विआबन्ध अथवा एक संयुग्मित निकाय को इलेक्ट्रॉन दान देते हैं। —Cl,—Br,I,-NH2,-NR2,–OH,-OR,-SH-SR आदि ऐसे समूहों के उदाहरण हैं।

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2. ऋणात्मकं अनुनाद प्रभाव—यह प्रभाव उन समूहों द्वारा दर्शाया जाता है जो द्विआबन्ध या संयुग्मित निकाय से इलेक्ट्रॉन अपनी ओर विस्थापित करते हैं।

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प्रश्न 16.
अतिसंयुग्मन प्रभाव पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
संतृप्त निकाय पर ऐल्किल समूहों के प्रेरणिक प्रभाव का क्रम निम्न होता है

(CH3 )3 C—(CH3)2CH—>CH3CH2–>CH3

परन्तु जब ऐल्किल समूह किसी असंतृप्त निकाय से जुड़ा होता है तो प्रेरणिक प्रभाव का क्रम उल्टा हो । जाता है। यह प्रभावं अतिसंयुग्मन प्रभाव कहलाता है। चूंकि इस प्रभाव को सर्वप्रथम बेकर तथा नाथन ने देखा इसलिए इस प्रभाव को बेकर-नाथन प्रभाव भी कहते हैं।
अतिसंयुग्मन में द्विआबन्ध के p-कक्षकों तथा समीपवर्ती एकल आबन्ध के 6–कक्षक के अतिव्यापन के द्वारा 5-इलेक्ट्रॉनों का विस्थानीकरण होता है। अत: इसमें -7 संयुग्मन (G-I conjugation) होता है। वास्तव में अतिसंयुग्मन प्रभाव अनुनाद प्रभाव का ही विस्तार है। चूंकि अतिसंयुग्मन – H परमाणुओं के द्वारा होता है, इसलिए 0- H परमाणुओं की संख्या जितनी अधिक होती है, उतनी ही अधिक अतिसंयुग्मी संरचनाएँ होती हैं और प्रभाव भी उतना ही अधिक होता है। मेथिल समूह, एथिल समूह, आइसोप्रोपिल समूह तथा तृतीयक-ब्यूटिल समूह के साथ हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या क्रमशः 3, 2, 1 तथा 0 होती है अतः इन विभिन्न समूहों के लिए अतिसंयुग्मन प्रभाव का क्रम निम्न होता है-

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प्रश्न 17.
इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
यदि प्रतिस्थापन अभिक्रिया इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिकर्मक द्वारा सम्पन्न होती है तो उसे इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया कहते हैं। इसे SE (S = substitution तथा E= electrophilic) से प्रकट करते हैं तथा SE1 और SE2 में 1 तथा 2 कोटि को प्रकट करते हैं। ऐरोमैटिक प्रतिस्थापन; जैसे-हैलोजनीकरण, नाइट्रीकरण तथा सल्फोनीकरण SE 2 प्रकार के इलेक्ट्रोफिलिक (इलेक्ट्रॉनस्नेही) प्रतिस्थापन हैं।
उदाहरणार्थ-

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प्रश्न 18.
ऐल्काइनों की हाइड्रोजन हैलाइडों से योग क्रिया किस प्रकार की अभिक्रिया है ? इसकी क्रियाविधि समझाइए।
या
इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रिया को उदाहरण देते हुए समझाइए।
उत्तर
यदि योगात्मक अभिक्रिया इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिकर्मक द्वारा सम्पन्न होती है तो उसे इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रिया कहते हैं। प्रश्न में उल्लिखित अभिक्रिया भी एक इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक (संकलन) अभिक्रिया है। ऐल्कीनों में हाइड्रोजन हैलाइड का योग कार्बन-कार्बन युग्म बन्ध पर दो पदों में होता है। पहले पद में ऐल्किल हाइड्रोजन हैलाइड से प्रोटॉन H+ (इलेक्ट्रॉनस्नेही) ग्रहण करती है और कार्बोधनायन (मध्यवर्ती) तथा हैलाइड आयन बनाती है। दूसरे पद में कार्बोधनायन हैलाइड आयन से संयोग करता है और ऐल्किल हैलाइड बनाता है।
उदाहरणार्थ-एथिलीन में HBr का योग

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प्रश्न 19.
नाभिकस्नेही योगात्मक अभिक्रिया का उदाहरण सहित उल्लेख कीजिए।
उत्तर
यदि योगात्मक अभिक्रिया नाभिकस्नेही अभिकर्मक द्वारा सम्पन्न होती है तो उसे नाभिकस्नेही योगात्मक अभिक्रिया कहते हैं।
उदाहरणार्थ- मेथेनल (फॉर्मेल्डिहाइड) पर HCN का योग

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ऐल्डिहाइड और कीटोन मुख्यत: इसी प्रकार की अभिक्रियाएँ करते हैं।

प्रश्न 20.
मुक्त मूलक योगात्मक अभिक्रिया को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
यदि योगात्मक अभिक्रिया मुक्त मूलक अभिकर्मक द्वारा सम्पन्न होती है तो उसे मुक्त मूलक योगात्मक अभिक्रिया कहते हैं।
उदाहरणार्थ-परॉक्साइड की उपस्थिति में ऐल्कीनों पर HBr का योग।

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प्रश्न 21.
किसी ऐल्किल हैलाइड के विहाइड्रोहैलोजनीकरण की अभिक्रिया की क्रिया-विधि समझाइए।
या
α-विलोपन अभिक्रियाएँ क्या हैं? उदाहरण दीजिए।
उत्तर
जिन अभिक्रियाओं में परमाणुओं अथवा समूहों को विलोपन क्रियाधार अणु के एक ही परमाणु में होता है, वे α-विलोपन अभिक्रियाएँ कहलाती हैं। विहाइड्रोहैलोजनीकरण α-विलोपन अभिक्रिया का उदाहरण है। ऐल्किल हैलाइडों को ऐल्कोहॉलीय KOH के साथ उबालने पर ऐल्कीन प्राप्त होते हैं; जैसे- आइसोप्रोपिल ब्रोमाइड प्रोपीन देता है।

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यह अभिक्रिया विहाइड्रोहैलोजनीकरण कहलाती है। इस अभिक्रिया में हाइड्रोजन एक कार्बन परमाणु से तथा हैलोजन निकटवर्ती दूसरे कार्बन परमाणु से HBr के रूप में विलोपित होता है। इस अभिक्रिया की क्रिया-विधि (SN 2) एक ही पद में निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त की जाती है।

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प्रश्न 22.
β-विलोपन अभिक्रियाएँ क्या होती हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
या
निर्जलीकरण अभिक्रिया की क्रिया-विधि को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
जिन अभिक्रियाओं में परमाणुओं या समूहों का विलोपन क्रियाधार अणु के समीपवर्ती परमाणुओं में होता है, वे β-विलोपन अभिक्रियाएँ कहलाती हैं।
उदाहरणार्थ-सान्द्र H2SO4, H3PO4 निर्जल ZnCl2 आदि निर्जलीकारक पदार्थ ऐल्कोहॉल का निर्जलीकरण करके ऐल्कीन बनाते हैं।

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ऐल्कीन ऐल्कोहॉलों के निर्जलीकरण की क्रिया-विधि को निम्नलिखित पदों में प्रकट कर सकते हैं।

  1. ऐल्कोहॉलों के –OH समूह में इलेक्ट्रॉन के दो एकाकी युग्म होते हैं। इनमें से एक युग्म प्रयुक्त अम्ल से एक प्रोटॉन ग्रहण करके प्रोटॉनयुक्त ऐल्कोहॉल या ऑक्सोनियम आयन बना लेता है।
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  2. ऑक्सोनियम आयन जल तथा कार्बोनियम आयन में विघटित हो जाता है।
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  3. कार्बोनियम आयन के कार्बन परमाणु पर केवल 6 इलेक्ट्रॉन होते हैं। इसलिए यह एक इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करने की प्रवृत्ति रखती है। इस स्थिति में पास का कार्बन परमाणु हाइड्रोजन आयन पृथक् करता है और ऐल्कीन अणु उत्पन्न होता है।
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प्रश्न 23.
नाइट्रीकरण पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
जब किसी ऐल्केन के हाइड्रोजन परमाणु को नाइट्रो (-NO2) मूलक द्वारा प्रतिस्थापित करते हैं, तो नाइट्रोऐल्केन उत्पाद प्राप्त होता है। इस प्रकार के प्रतिस्थापन को नाइट्रीकरण कहते हैं।
सामान्यतया ऐल्केन नाइट्रिक अम्ल के साथ साधारण परिस्थितियों में कोई अभिक्रिया नहीं दर्शाते हैं। लेकिन उच्च ताप पर जब ऐल्केन व नाइट्रिक अम्ल के वाष्पों को अधिक ताप (300-450°C) पर गर्म किया जाता है, तो नाइट्रोऐल्केन प्राप्त होते हैं। इस अभिक्रिया को वाष्प नाइट्रीकरण कहते हैं।

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प्रश्न 24.
आप कार्बनिक यौगिक में कार्बन और हाइड्रोजन की पहचान कैसे करेंगे?
उत्तर
किसी यौगिक में कार्बन तथा हाइड्रोजन की उपस्थिति की जाँच एक ही परीक्षण द्वारा हो जाती है। इस परीक्षण में यौगिक को कॉपर (II) ऑक्साइड के साथ गर्म करते हैं। ऐसा करने पर यौगिक में उपस्थित कार्बन तथा हाइड्रोजन क्रमशः डाइऑक्साइड तथा जल में परिवर्तित हो जाते हैं।

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कार्बन डाइऑक्साइड चूने के पानी (lime water) को दूधिया (milky) कर देती है और जल निर्जल कॉपर सल्फेट को नीला कर देता है।

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प्रश्न 25.
आप कार्बनिक यौगिक में सल्फर की पहचान कैसे करेंगे?
उत्तर
किसी कार्बनिक यौगिक में सल्फर की उपस्थिति की जाँच निम्न परीक्षणों के द्वारा की जाती है।
1. ऑक्सीकरण परीक्षण कार्बनिक यौगिक को पोटैशियम नाइट्रेट और सोडियम कार्बोनेट के मिश्रण के साथ संगलित करते हैं। इससे उसमें उपस्थित सल्फर सल्फेट में ऑक्सीकृत हो जाता। है।

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संगलित पदार्थ को जल के साथ निष्कर्षित करके इसे उबालते हैं और फिर इसे छान लेते हैं। निस्वंद में सोडियम सल्फेट होता है। निस्वंद में तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल डालकर उसे अम्लीकृत करते हैं और फिर उसमें बेरियम सल्फेट विलयन डालते हैं। सफेद अवक्षेप की प्राप्ति यौगिक में सल्फर की उपस्थिति दर्शाती है।

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2. लैंसे परीक्षण–सर्वप्रथम लैंसे निष्कर्ष तैयार करते हैं। यदि यौगिक में सल्फर उपस्थित होता है। तो वह सोडियम से अभिक्रिया करके सोडियम सल्फाइड बनाता है।

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अतः लैंसे निष्कर्ष में सोडियम सल्फाइडे उपस्थित होता है। अब इस निष्कर्ष को दो भागों में बाँट देते हैं। पहले भाग को तनु ऐसीटिक अम्ल से अम्लीकृत करके उसमें लेड ऐसीटेट विलयन की कुछ बूंदें मिलाते हैं। यदि काला अवक्षेप प्राप्त होता है तो यह यौगिक में सल्फर की उपस्थिति को दर्शाता है।

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लैंसे निष्कर्ष के दूसरे भाग में सोडियम नाइट्रोभुसाइड की कुछ बूंदें डालते हैं। यदि विलयन बैंगनी हो जाता है तो यह यौगिक में सल्फर की उपस्थिति को दर्शाता है।

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प्रश्न 26.
आप कार्बनिक यौगिकों में हैलोजनों की पहचान कैसे करेंगे?
उत्तर
किसी कार्बनिक यौगिक में हैलोजनों की जाँच निम्न परीक्षणों द्वारा की जाती है-
1. बेलस्टीन परीक्षण–एक साफ कॉपर के तार को बुन्सन बर्नर की ऑक्सीकारी ज्वाला में तब तक गर्म करते हैं जब तक कि वह ज्वाला को हरा या नीला रंग देना बंद नहीं कर देता। अब इस गर्म तार को यौगिक में डुबाकर दोबारा से बुन्सन बर्नर की ज्वाला में गर्म करते हैं। ज्वाला का रंग दोबारा से हरा या नीला हो जाना यौगिक में हैलोजनों की उपस्थिति दर्शाता है। इस परीक्षण की कुछ सीमाएँ भी हैं। इस परीक्षण द्वारा यह पता नहीं चलता है कि यौगिक में कौन-सा हैलोजन है। दूसरे, कुछ ऐसे पदार्थ जिनमें हैलोजन नहीं होते हैं, वे भी यह परीक्षण देते हैं। यूरिया, थायोयूरिया आदि ऐसे पदार्थों के उदाहरण हैं।
2. लैंसे परीक्षण–इस परीक्षण के लिए पहले लैंसे निष्कर्ष तैयार करते हैं। लैंसे निष्कर्ष तैयार करने में जब कार्बनिक यौगिक को सोडियम के साथ संगलित करते हैं तब कार्बनिक यौगिक में उपस्थित हैलोजन सोडियम के साथ संयोग करके सोडियम हैलाइड बनाते हैं। ये सोडियम हैलाइड लैंसे निष्कर्ष में उपस्थित होते हैं।

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लैंसे निष्कर्ष के एक भाग को तनु नाइट्रिक अम्ल के साथ उबालकर तथा फिर उसे ठण्डा करके उसमें सिल्वर नाइट्रेट विलयन की कुछ बूंदें मिलाते हैं। अवक्षेप का बनना हैलोजन की उपस्थिति दर्शाता है।

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अवक्षेप अवक्षेप के रंग और उसकी अमोनियम हाइड्रॉक्साइड में विलेयता के आधार पर कार्बनिक यौगिक में उपस्थित हैलोजन की पहचान की जाती है।

  1. सफेद अवक्षेप बनता है जो अमोनियम हाइड्रॉक्साइड में घुल जाता है—क्लोरीन उपस्थित
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  2. हल्का पीला अवक्षेप जो अमोनियम हाइड्रॉक्साइड में कम घुलता है—ब्रोमीन उपस्थित
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  3. गहरा पीला अवक्षेप जो अमोनियम हाइड्रॉक्साइड विलयन में बिल्कुल भी नहीं घुलता हैआयोडीन उपस्थित
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3. कार्बन डाइसल्फाइड परीक्षण–इस परीक्षण का प्रयोग ब्रोमीन और आयोडीन की जाँच के लिए किया जाता है। इसमें लैंसे निष्कर्ष को नाइट्रिक अम्ल से अम्लीकृत करके उसमें क्लोरीन जल की कुछ बूंदें डाल देते हैं। फिर इस विलयन में कार्बन डाइसल्फाइड या कार्बन टेट्राक्लोराइड मिलाकर इसे हिलाते हैं। कार्बन डाइसल्फाइड या कार्बन टेट्राक्लोराइड पर्त का नारंगी रंग यौगिक में ब्रोमीन की उपस्थिति दर्शाता है जबकि इसका बैंगनी रंग यौगिक में आयोडीन की उपस्थिति दर्शाता है।
अम्लीकृत लैंसे निष्कर्ष (सोडियम हैलाइड) में क्लोरीन जल डालने पर मुक्त Br2 और I2 उत्सर्जित होती हैं जो कार्बन डाइसल्फाइड यो कार्बन टेट्राक्लोराइड में घुलकर उन्हें क्रमशः नारंगी (orange) तथा बैंगनी (violet) रंग प्रदान करती हैं।

2NaBr+Cl2 → 2NaCl+ Br2 (CS2 या CCl4 में नारंगी रंग)
2Nal+Cl2 → 2NaCl + I2 (CS2, या CCl4 में बैंगनी रंग)

प्रश्न 27.
आप कार्बनिक यौगिक में ऑक्सीजन व फॉस्फोरस की पहचान कैसे करेंगे?
उत्तर
ऑक्सीजन की पहचान–किसी कार्बनिक यौगिक में ऑक्सीजन की उपस्थिति की जाँच के लिए कोई प्रत्यक्ष विधि उपलब्ध नहीं है। इसकी जाँच सामान्यत: निम्नांकित अप्रत्यक्ष विधियों द्वारा की जाती है।

  1. कार्बनिक यौगिकों की ऑक्सीजन युक्त क्रियात्मक समूहों –OH, COOH, CHO,—NO, के लिए जाँच करते हैं। यदि किसी यौगिक में इनमें से कोई क्रियात्मक समूह उपस्थित होता है तो यह यौगिक में ऑक्सीजन की उपस्थिति दर्शाता है।
  2. कार्बनिक यौगिक में उपस्थित अन्य तत्त्वों की प्रतिशतताएँ ज्ञात करते हैं। यदि इन प्रतिशतताओं का योग 100 से कम होता है तो यह यौगिक में ऑक्सीजन की उपस्थिति दर्शाता है। इनका अंतर यौगिक में ऑक्सीजन का प्रतिशत बताता है।
    फॉस्फोरस की पहचान–कार्बनिक यौगिक को सोडियम परॉक्साइड (ऑक्सीकारक) के साथ संगलित करते हैं जिससे सोडियम फॉस्फेट बनता है। संगलित पदार्थ का जल के साथ निष्कर्षण करके उसे छान लेते हैं। निस्वंद (filtrate) जिसमें सोडियम फॉस्फेट उपस्थित होता है, को सान्द्र नाइट्रिक अम्ल के साथ उबालकर उसमें अमोनियम मॉलिब्डेट विलयन मिलाते हैं। | पीले अवक्षेप अथवा पीले रंग की प्राप्ति कार्बनिक यौगिक में फॉस्फोरस की उपस्थिति दर्शाती है।

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प्रश्न 28.
कार्बनिक यौगिक में कार्बन और हाइड्रोजन का निर्धारण कैसे किया जाता है? समझाइए।
उत्तर
कार्बनिक यौगिकों में कार्बन और हाइड्रोजन का निर्धारण लीबिग की दहन विधि (Liebig’s combustion method) द्वारा किया जाता है। कार्बन और हाइड्रोजन का निर्धारण एक ही प्रयोग द्वारा हो जाता है। इसमें कार्बनिक यौगिक की ज्ञात मात्रा को शुद्ध शुष्क ऑक्सीजन (आर्द्रता और कार्बन डाइऑक्साइड रहित) के वातावरण में कॉपर (II) ऑक्साइड के साथ गर्म करते हैं। इससे कार्बनिक यौगिक में उपस्थित कार्बन, कार्बन डाइऑक्साइड में तथा हाइड्रोजन, जल में ऑक्सीकृत हो जाते हैं।

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उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड U-नली में लिए गए सान्द्र पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड विलयन द्वारा अवशोषित कर ली जाती है जबकि उत्पन्न जल एक अन्य U-नली में लिए गए निर्जल कैल्सियम क्लोराइड द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है।
इससे सान्द्र पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड विलयन तथा कैल्सियम क्लोराइड के द्रव्यमानों में वृद्धि से क्रमश: कार्बन डाइऑक्साइड और जल की मात्राएँ ज्ञात कर लेते हैं। इनसे कार्बन तथा हाइड्रोजन की, प्रतिशतता की गणना कर लेते हैं।

प्रश्न 29.
कार्बनिक यौगिक में ऑक्सीजन का निर्धारण करने की विधि लिखिए।
उत्तर
कार्बनिक यौगिक में ऑक्सीजन की प्रतिशतता की गणना कुल प्रतिशतता (100) में से अन्य तत्त्वों की प्रतिशतताओं के योग को घटाकर की जाती है। ऑक्सीजन का प्रत्यक्ष निर्धारण निम्नविधि से भी किया जा सकता है।
कार्बनिक यौगिक की एक निश्चित मात्रा नाइट्रोजन गैस की धारा में गर्म करके अपघटित की जाती है। प्राप्त ऑक्सीजनयुक्त गैसीय मिश्रण को रक्त-तप्त कोक पर प्रवाहित करते हैं जिससे सारी ऑक्सीजन कार्बन मोनो-ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाती है। तत्पश्चात् गैसीय मिश्रण को हल्के गर्म आयोडीन पेन्टाऑक्साइड (I2O5) में प्रवाहित करते हैं जिससे कार्बन मोनोऑक्साइड कार्बन डाइऑक्साइड में ऑक्सीकृत हो जाती है और आयोडीन मुक्त होती है।

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ऑक्सीजन की प्रतिशतता का आकलन मुक्त कार्बन डाइऑक्साइड अथवा आयोडीन की मात्रा से किया जा सकता है।

प्रश्न 30.
1.05 ग्राम एक कार्बनिक यौगिक की केल्डाल विधि से क्रिया की गयी तथा उत्पन्न NH3 को 100 मिली N/10 H2SO4 में अवशोषित किया गया। बचे हुए अम्ल को उदासीन करने हेतु 10 मिली N/5 NaOH घोल की आवश्यकता हुई। यौगिक में नाइट्रोजन की प्रतिशत मात्रा ज्ञात कीजिए।
उत्तर
मान लीजिए, V मिली शेष अम्ल N/10 H2SO4 को उदासीन करने में 10 मिली N/5 NaOH लगे,
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प्रश्न 31.
एक कार्बनिक यौगिक के 1.195 ग्राम का दहन करने पर 0.44 ग्राम CO2 तथा 0.9 ग्राम जल प्राप्त हुआ। 0.2046 ग्राम यौगिक के दहन पर 15°C ताप तथा 732.7 मिमी दाब पर 30.4 मिली नम नाइट्रोजन प्राप्त हुई। यौगिक में कार्बन, हाइड्रोजन तथा नाइट्रोजन की प्रतिशत मात्रा ज्ञात कीजिए। (15°C ताप पर जलवाष्प दाब 12.7 मिमी) (C= 12, H =1, 0= 16, N=14)
उत्तर
सूत्रानुसार,
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प्रश्न 32.
C, H, N तथा O युक्त एक कार्बनिक यौगिक ने विश्लेषण करने पर निम्नलिखित परिणाम दिये।
(i) यौगिक के 0.25 ग्राम को दहन करने पर 0.368 ग्राम CO2 तथा 0.205 ग्राम जल प्राप्त हुए।
(ii) 0.6 ग्राम यौगिकसे केल्डाल क्रिया द्वारा निकली अमोनिया गैस को 60 मिली [latex]\frac { N }{ 6 } [/latex]H2SO4 में अवशोषित किया गया। अम्ल के आधिक्य को उदासीन करने के लिए 20.0 मिली A कास्टिक पोटाश विलयन की आवश्यकता पड़ी। यौगिक में उपस्थित सभी तत्त्वों की प्रतिशतता ज्ञात कीजिए। (C=12, H = 1, N = 14,0= 16)
उत्तर
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प्रश्न 33.
केरियस विधि द्वारा हैलोजन के आकलन में 0.40 ग्राम कार्बनिक यौगिक से 0.47 ग्राम AgBr प्राप्त हुआ। यौगिक में ब्रोमीन की प्रतिशतता ज्ञात कीजिए। [Ag= 108, Br = 80]
उत्तर
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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आप कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन की पहचान कैसे करेंगे?
या
लैंसे परीक्षण के रसायन का वर्णन कीजिए।
उत्तर
नाइट्रोजन की पहचान—किसी कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन की पहचान निम्न परीक्षणों द्वारा की जाती है ।
1. सोडा-लाइम परीक्षण–यौगिक की थोड़ी मात्रा को सोडा-लाइम (NaOH+CaO) के साथ तेज गर्म करते हैं। मिश्रण में से अमोनिया की गंध यौगिक में नाइट्रोजन की उपस्थिति दर्शाती है।

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इस परीक्षण की सीमा यह है कि अनेक कार्बनिक यौगिक (जैसे नाइट्रो और डाइएजो यौगिक) इन परिस्थितियों में अमोनिया उत्पन्न नहीं करते हैं।
2. लैंसे परीक्षण–इस परीक्षण का उपयोग न केवल नाइट्रोजन बल्कि अन्य तत्त्वों; जैसे सल्फर और हैलोजनों की उपस्थिति की जाँच के लिए भी किया जाता है। नाइट्रोजन की उपस्थिति की जाँच के लिए यह परीक्षण निम्न दो पदों में किया जाता है।

  1. लैंसे निष्कर्ष तैयार करना–सोडियम धातु के एक छोटे से टुकड़े को फिल्टर पेपर द्वारा सुखाकर एक साफ और शुष्क ज्वलन नली (ignition tube) में लेते हैं। इस ज्वलन नली को बुन्सन बर्नर की ज्वाला में धीरे-धीरे गर्म करते हैं। जब सोडियम धातु पिघलकर पारे की तरह चमकने लगता है तब ज्वलन नली में कार्बनिक यौगिक की थोड़ी मात्रा डाल देते हैं। अब ज्वलन नली को पहले धीरे-धीरे और फिर तेजी से गर्म करते हैं। जब ज्वलन नली का नीचे का भाग लाल हो जाता है तब इस रक्त-तप्त नली को चाइना डिश में लिए गए 10-15 mL आसुत जल में डाल देते हैं। चाइना डिश में उपस्थित विलयन को थोड़ी देर उबालकर ठंडा , कर लेते हैं और फिर इसे छान लेते हैं। छानने से प्राप्त हुए निस्वंद (filtrate) को लैंसे निष्कर्ष (Lassaigne’s extract) या सोडियम निष्कर्ष कहते हैं। सोडियम धातु के यौगिक के साथ संगलित होने पर यौगिक में उपस्थित तत्त्व सहसंयोजी रूप से आयनिक रूप में परिवर्तित हो जाते हैं।
  2. नाइट्रोजन के लिए परीक्षण-एक परखनली में 1 mL लैंसे निष्कर्ष लेकर उसमें तनु सोडियम हाइड्रॉक्साइड विलयन की कुछ बूंदें डालते हैं। इससे लैंसे निष्कर्ष क्षारकीय हो जाता है। सामान्यतः लैंसे निष्कर्ष की प्रकृति क्षारकीय ही होती है। परखनली में 2 mL ताजा बना हुआ फेरस सल्फेट का सान्द्र विलयन डालकर परखमली को गर्म करते हैं। विलयन को ठंडा करके उसमें कुछ बूंद फेरिक क्लोराइड विलयन डालते हैं और फिर उसमें तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल डालकर उसे अम्लीय करते हैं।
    यदि विलयन का रंग प्रशियन नीला (prusssian blue) हो जाता है तो यह यौगिक में । नाइट्रोजन की उपस्थिति दर्शाता है। परीक्षण में निम्न अभिक्रियाएँ होती हैं।

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जब यौगिक में नाइट्रोजन और सल्फर दोनों उपस्थित होते हैं तो संगलन के परिणामस्वरूप’. सोडियम सल्फोसायनाइड बनता है। यह फेरिक आयनों से अभिक्रिया करके रक्त लाल (blood red) रंग का फेरिक सल्फोसायनाइड बनाता है।

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उपरोक्त अभिक्रिया में सोडियम सल्फोसायनाइड अपर्याप्त सोडियम के कारण बनता है। जब सोडियम आधिक्य में उपस्थित होता है तो सोडियम सल्फोसायनाइड अपघटित होकर सोडियम सायनाइड और सोडियम सल्फाइड बनाता है।

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इस स्थिति में यौगिक में सल्फर के उपस्थित होने पर भी रक्त लाल रंग प्राप्त नहीं होता है। अत: रक्त लाल रंग की अनुपस्थिति से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है कि यौगिक में सल्फर अनुपस्थित है।

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UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 1 माहेश्वर-सूत्र एवं वर्गों का उच्चारण (व्याकरण) 

UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 1 माहेश्वर-सूत्र एवं वर्गों का उच्चारण (व्याकरण)  are the part of UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 1 माहेश्वर-सूत्र एवं वर्गों का उच्चारण (व्याकरण).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 9
Subject Sanskrit
Chapter Chapter 1
Chapter Name माहेश्वर-सूत्र एवं वर्गों का उच्चारण (व्याकरण)
Number of Questions Solved 28
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 1 माहेश्वर-सूत्र एवं वर्गों का उच्चारण (व्याकरण)

भाषा- भाषा द्वारा हम अपने विचारों को दूसरों तक पहुँचाते हैं तथा दूसरों के भावों को ग्रहण करते हैं। भाषा में अनेक ध्वनियाँ होती हैं। ध्वनियों को प्रकट करने वाले प्रतीकों को वर्ण कहा जाता है। दो या दो से अधिक वर्ण मिलकर शब्द-रचना करते हैं तथा अनेक शब्दों से मिलकर वाक्य बनते हैं। और अनेक वाक्यों द्वारा भाषा का निर्माण होता है। भाषा का प्रवाह सदैव नदी के समान स्वच्छन्द होता है। व्याकरण (UPBoardSolutions.com) इसमें किनारों का काम करता है। भाषा को देखकर ही व्याकरण के नियम बनाये जाते हैं; अर्थात् भाषा पहले होती है और व्याकरण उसके बाद। संस्कृत भाषा का व्याकरण बहुत वैज्ञानिक है। इसके नियमों को बड़ी सरलता से समझा जा सकता है। संस्कृत भाषा के समस्त व्याकरण एवं वर्णमाला का आधार महर्षि पाणिनि द्वारा प्रतिपादित चौदह सूत्र हैं, जिन्हें ‘शिव सूत्र’ अथवा ‘माहेश्वर सूत्र’ भी कहते हैं।

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संस्कृत  की वर्णमाला

कोई भी वर्णमाला विभिन्न प्रकार के वर्षों से बनती है और वर्ण विभिन्न प्रकार की ध्वनियों को प्रकट करने वाले प्रतीक होते हैं। संस्कृत वर्णमाला के वर्ण मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं-(अ) स्वर या अच् तथा (ब) व्यंजन या हल्।।

(अ) स्वर या अच्- जिसका उच्चारण किसी अन्य ध्वनि की सहायता के बिना होता है और मुँह से श्वास-वायु बिना किसी रुकावट के बाहर निकल जाती है, उसे स्वर या अच् कहते हैं; जैसे-अ, इ, उ आदि।

स्वर वर्णो को तीन भागों में विभक्त किया गया है

  1. ह्रस्व स्वर- इनके उच्चारण में कम समय लगता है। इनके उच्चारण-समय को एक मात्रा माना गया है; जैसे-अ, इ, उ, ऋ, लु।
  2. दीर्घ स्वर- इनके उच्चारण में ह्रस्व स्वरों से दुगुना समय लगता है। इसीलिए इनके उच्चारण-समय को दो मात्रा माना गया है; जैसे—आ, ई, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ। (UPBoardSolutions.com)
  3. प्लुत् स्वर- इनके उच्चारण में सबसे अधिक समय लगता है। इसीलिए इनके उच्चारण समय को तीन मात्रा का माना गया है; ऐसे वर्गों के सम्मुख ३ लिख देते हैं; जैसे-ओ३म्। इन स्वरों का प्रयोग सामान्य संस्कृत में नहीं मिलता है।

(ब) व्यंजन या हल्- जिन वर्गों का उच्चारण स्वर की सहायता के बिना नहीं हो सकता और श्वास-वायु किसी-न-किसी अवरोध के बाद ही मुँह से बाहर निकलती है, उन्हें व्यंजन कहते हैं; जैसे—क, ख आदि। व्यंजनों के उच्चारण की सरलता के लिए उनमें ‘अ’ मिला रहता है; जैसे—क् + अ = क। व्यंजन वर्गों को भी तीन भागों में विभक्त किया गया है

1.स्पर्श व्यंजन- जिन वर्गों के उच्चारण के समय मुख के दो अवयव एक-दूसरे का स्पर्श करते हैं और श्वास-वायु के निकलने में बाधा डालते हैं, उन्हें स्पर्श व्यंजन कहा जाता है। ये संख्या में 25 होते हैं, जिनका वर्गानुसार विभाजन इस प्रकार है
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2.अन्तःस्थ-
जो वर्ण न तो पूरी तरह स्वर होते हैं और न व्यंजन; अर्थात् दोनों के बीच (अन्तः) में स्थित होते हैं, उन्हें अन्त:स्थ वर्ण कहा जाता है। ये चार हैं

अन्तःस्थ- य र ल व

3. ऊष्म- जिन वर्गों का उच्चारण करते समय मुख से निकलने वाली वायु ऊष्म (घर्षण के कारण) होकर बाहर निकलती है, उन्हें ऊष्म वर्ण कहा जाता है। ये भी संख्या में चार हैं

ऊष्मा – श ष स है।

विशेष-

  1. उपर्युक्त के अतिरिक्त विसर्ग (:) व (अनुस्वार) (‘) भी अन्य ध्वनियाँ हैं।
  2. अ, ए तथा ओ स्वर वर्गों को गुण कहते हैं; जब कि ओ, ऐ, औ को वृद्धि कहते हैं।

उच्चारण-स्थान

वर्गों का उच्चारण करते समय मुख का कोई-न-कोई भाग विशेष भूमिका निभाता है। वर्ण के उच्चारण में जिस भाग की विशेष भूमिका होती है, वही उसका उच्चारण-स्थान कहलाता है। इन उच्चारण-स्थानों के आधार पर वर्गों का नामकरण भी किया गया है। वर्गों के उच्चारण-स्थान क्रमशः इस प्रकार हैं
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प्रयत्न

वर्गों का उच्चारण करते समय मुख के विभिन्न भाग कुछ चेष्टाएँ करते हैं। इन भागों के उच्चारण करने की चेष्टा को ही प्रयत्न कहते हैं। उच्चारण में कुछ चेष्टाएँ मुख के अन्दर के भागों में होती हैं तथा कुछ बाहर के भागों में होती हैं। मुख के अन्दर होने वाली चेष्टाओं को आभ्यन्तर प्रयत्न तथा बाहर होने (UPBoardSolutions.com) वाली चेष्टाओं को बाह्य प्रयत्न कहते हैं। आभ्यन्तर प्रयत्न निम्नलिखित पाँच प्रकार के होते हैं

(1) स्पृष्ट- इस प्रयत्न में जिह्वा मुख के विभिन्न भागों को स्पर्श करती है। इसलिए ही इन्वर्गों को स्पर्श वर्ण भी कहते हैं। इसके अन्तर्गत ‘क’ से ‘म’ तक के वर्ण आते हैं। 

(2) ईषत् स्पृष्ट– इस प्रयत्न में जिह्वा मुख के विभिन्न भागों का स्पृष्ट वर्गों की अपेक्षा कम स्पर्श करती है। इसके अन्तर्गत ‘य’, ‘र’, ‘ल’, ‘व वर्ण आते हैं।

(3) विवृत- इस प्रयत्न द्वारा स्वर वर्गों का उच्चारण होता है। इस प्रयत्न में मुख को खोलना पड़ता है।

(4) ईषत् विवृत- इस प्रयत्न में जिह्वा को अपेक्षाकृत कम उठाना पड़ता है। इसके अन्तर्गत ‘श’, ‘ष’, ‘स’, ‘ह’ वर्ण आते हैं।

(5) संवृत- इसमें वायु का मार्ग बन्द हो जाता है। यह प्रयत्न केवल ह्रस्व ‘अ’ के लिए होता है। बाह्य प्रयत्नों में ओष्ठों की चेष्टाएँ तथा उच्चारण के समय बनने वाली मुखाकृतियाँ आती हैं।

माहेश्वर-सूत्र

महर्षि पाणिनि ने संस्कृत के सभी वर्गों को लेकर लघु सूत्रों द्वारा विस्तृत अर्थ वाले नियमों का निर्माण किया है। ये लघु सूत्र चौदह हैं, जिन्हें शिव-सूत्र अथवा माहेश्वर-सूत्र भी कहते हैं।

  1. अइंउण्,
  2. ऋलुक्,
  3.  एओङ,
  4. ऐऔच्,
  5. हयवरट्,
  6. लणे,
  7. अमरूणनम्,
  8. झभञ्,
  9. घढधष्,
  10. जबगडदश्,
  11. खफछठथचटतव्,
  12. कपय्,
  13. शषसर्,
  14. हल्।

इन सूत्रों के प्रत्याहार बनाते समय प्रत्येक सूत्र का अन्तिम (हलन्त) अक्षर लुप्त हो जाता है। इनमें आरम्भ के चार सूत्रों में स्वर वर्ण हैं तथा शेष दस सूत्रों में व्यंजन वर्ण। 

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चौहद शिव- सूत्रों से प्रत्याहारों का निर्माण किया जाता है। महर्षि पाणिनि के अनुसार “वह संक्षिप्त रूप जो ‘किसी सूत्र के प्रथम और अन्तिम वर्गों को जोड़कर बनाया जाता है, प्रत्याहार कहलाता है। जैसे-अइउण सूत्र का प्रत्याहार अण। जो प्रत्याहार बनाना हो, उसका प्रथम वर्ण लेकर और (UPBoardSolutions.com) शिव-सूत्रों का अन्तिम हलन्त वर्ण निकालकर प्रत्याहार बनता है, अर्थात् प्रथम वर्णसहित अन्तिम वर्ण से पूर्व के सभी वर्ण उस प्रत्याहार के अन्तर्गत आ जाते हैं। इसमें हलन्त वर्गों को छोड़ दिया जाता है। कुछ प्रमुख प्रत्याहारों का विवरण निम्नलिखित है

  1.  इक्–इ, उ, ऋ, लू ( ‘अइउण्’ के ‘इ’ से ऋलुक्’ के ‘क’ के पूर्व के वर्ण)
  2. यण–य, व, र, ल ( ‘हयवर’ के ‘य’ से ‘लण’ के ‘ण के पूर्व के वर्ण)
  3. अक्-अ, इ, उ, ऋ, लू ( ‘अइउण्’ के ‘अ’ से ऋलुक्’ के ‘क’ के पूर्व के वर्ण)
  4. अच्-अ, इ, उ, ऋ, लु, ए, ओ, ऐ, औ ( ‘अइउण्’ के ‘अ’ से ‘ऐऔच्’ के ‘च्’ के पूर्व के वर्ण)
  5. एङ–ए, ओ ( ‘एओङ ‘ए’ से ‘ङ’ के पूर्व के वर्ण)
  6. एच् ए, ओ, ऐ, औ ( ‘एओङ’ के ‘ए’ से ‘ऐऔच्’ के ‘च्’ के पूर्व के वर्ण) |
  7. झल्-झ, भ, घ, ढ, ध (वर्ग का चतुर्थ वर्ण), ज ब ग ड द (वर्ग का तृतीय वर्ण), ख, फ, छ, ठ, थे (वर्ग को द्वितीय वर्ण), च, ट, त, क, प (वर्ग का प्रथम वर्ण), श, ष, स, ह (ऊष्म वर्ण) = 24 वर्ण ( ‘झेभञ्’ में ‘झ’ से ‘हल्’ के ‘ल्’ तक के वर्ण)
  8. जश्-ज, ब, ग, ड, द (वर्ग का तृतीय वर्ग-जबगडदश्’ में ‘ज’ से ‘श्’ के पूर्व के वर्ण)
  9. हश्–ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द (वर्गों के तृतीय, चतुर्थ, पञ्चम वर्ण और य, र, ल, व)। ‘हश्’ को कोमल व्यंजन भी कहते हैं। |
  10. खर्-ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स (वर्गों के प्रथम, द्वितीय वर्ण तथा श, ष, स)। ‘खर्’ प्रत्याहार को कठोर व्यंजन भी कहते हैं। | पाणिनि के चौदह सूत्रों से अनेक प्रत्याहार बन सकते हैं, परन्तु पाणिनि ने मात्र 42 प्रत्याहारों का प्रयोग अपने व्याकरण में किया है। ये 42 प्रत्याहार पाणिनीय व्याकरण के सार माने जाते हैं। अकारादि क्रम से ये निम्नलिखित हैं
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विशेष— प्रत्याहारों के निर्माण के लिए चौदह माहेश्वर सूत्रों को क्रम से शुद्ध रूप में स्मरण रखना आवश्यक है, अन्यथा प्रत्याहार शुद्ध रूप से नहीं लिखे जा सकेंगे। जिस प्रत्याहार के वर्षों को लिखना हो उसका प्रथम वर्ण चौदह सूत्रों में से छाँटिए और अन्तिम (हलन्त) वर्ण तक चले जाइए (UPBoardSolutions.com) जब वह मिल जाए तो उसके मध्य के सभी वर्गों को लिख लीजिए। ये वर्ण ही उस प्रत्याहार के वर्ण होंगे।

लघु-उत्तरीय प्रश्‍नोत्तर संस्कृत व्याकरण से।

प्रश्‍न 1- निम्नलिखित प्रश्न के उत्तर दीजिए
(अ)
च का उच्चारण-स्थान बताइए।
उत्तर
च का उच्चारण-स्थान तालु है।

(आ)
कण्ठ से किन वर्गों का उच्चारण होता है?
उत्तर
कण्ठ से अ, क, ख, ग, घ, ङ, ह तथा विसर्ग का उच्चारण होता है।

(इ)
य, र, ल, व को किस नाम से पुकारते हैं?
उत्तर
य, र, ल, व को अन्त:स्थ नामों से पुकारते हैं।

(ई)
तालु से किन-किन वर्गों का उच्चारण होता है?
उत्तर
तालु से इ, च, छ, ज, झ, ञ, य और श वर्गों का उच्चारण होता है।

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(उ)
त और थ का उच्चारण किस स्थान से होता है?
उत्तर
त और थे का उच्चारण दन्त से होता है।

(ऊ)
श का उच्चारण किस वर्ग के उच्चारण से मिलता है?
उत्तर
श का उच्चारण चवर्ग के उच्चारण से मिलता है।

(ऋ)
ष का उच्चारण स्थान बताइए।
उत्तर
ष का उच्चारण-स्थान मूद्ध है।

(ए)
स का उच्चारण स्थान बताइए।
उत्तर
स का उच्चारण-स्थान दन्त है।।

प्रश्‍न 2- निम्नलिखित कथनों में सही कथन पर ‘✓’ तथा गलत कथन पर ‘✗’ का निशान लगाइए

(क) अ और क का उच्चारण-स्थान एक नहीं है। (✗)
(ख) ल और स को उच्चारण दाँतों के सहारे होता है। (✓)
(ग) इ और य का उच्चारण-स्थान एक है। (✓)
(घ) उ और व का उच्चारण-स्थान एक नहीं है। (✓)
(ङ) मूद्ध से उच्चरित होने वाले वर्षों में ठ, ड और र हैं। (✓)

प्रश्‍न– 3–अधोलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए
(क)
जश् प्रत्याहार के अन्तर्गत आने वाले वर्ण बताइए।
उत्तर
जश् प्रत्याहार के अन्तर्गत आने वाले वर्ण ज, ब, ग, ड, द हैं।

(ख)
इक् से क्या समझते हैं?
उत्तर
इक् प्रत्याहार का तात्पर्य इ, उ, ऋ, लु वर्गों के समूह से है।

(ग)
ए और एच् में अन्तर बताइए।
उत्तर
एङ प्रत्याहार के अन्तर्गत ए, ओ वर्ण हैं, जब कि एच् प्रत्याहार के अन्तर्गत ए, ऐ, ओ, औ वर्ण आते हैं।

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(घ)
स्पर्श किन वर्गों को कहते हैं और क्यों?
उत्तर
क से म तक के समस्त वर्गों को स्पर्श वर्ण कहते हैं; क्योंकि इनके उच्चारण में जिह्वा विभिन्न उच्चारण-स्थानों का स्पर्श करती है।

(ङ)
वर्गों के तीसरे वर्ण किस प्रत्याहार में आते हैं?
उत्तर
वर्गों के तीसरे वर्ण जश् प्रत्याहार में आते हैं।

(च)
नासिका के सहारे किन वर्गों का उच्चारण होता है?
उत्तर
नासिका के सहारे ङ, ञ, ण, न, म वर्गों का उच्चारण होता है।

(छ)
पवर्ग से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
पवर्ग से आशय प, फ, ब, भ, म वर्गों के समूह से है।

(ज)
किस प्रत्याहार में सभी स्वर आते हैं?
उत्तर
अच् प्रत्याहार में सभी स्वर आते हैं।

(झ)
गुण किसे कहते हैं?
उत्तर
अ, ए, ओ वर्गों को गुण कहते हैं।

(ञ)
वृद्धि में कौन-कौन-से वर्ण आते हैं?
उत्तर
वृद्धि में आ, ऐ, औ वर्ण आते हैं।

प्रश्‍न  4- निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

(क)
प्रयत्न किसे कहते हैं?
उत्तर
वर्गों का उच्चारण करने के लिए मुख के अंगों द्वारा की गयी चेष्टाएँ ही प्रयत्न कहलाती

(ख)
आभ्यन्तर प्रयत्न कितने प्रकार का होता है?
उत्तर
आभ्यन्तर प्रयत्न पाँच प्रकार का होता है स्पृष्ट, ईषत् स्पृष्ट, विवृत, ईषत् विवृत और 
संवृत।

(ग)
स्वरों के उच्चारण में कौन-सा प्रयत्न होता है?
उत्तर
स्वरों के उच्चारण में विवृत प्रयत्न होता है।

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(घ)
स्पृष्ट प्रयत्न में कौन-कौन से वर्ण आते हैं?
उत्तर
स्पृष्ट प्रयत्न में क से में तक के समस्त वर्ण आते हैं।

(ङ)
उ और य के उच्चारण में क्या असमानता है?
उत्तर
उ का उच्चारण-स्थान ओष्ठ तथा प्रयत्न विवृत है, जब कि य का उच्चारण-स्थान तालु और प्रयत्न ईषत् स्पष्ट है।

वरित प्रश्‍नत्तर

अधोलिखित प्रश्नों में प्रत्येक प्रश्‍न के उत्तर रूप में चार विकल्प दिये गये हैं। इनमें से एक विकल्प शुद्ध है। शुद्ध विकल्प का चयन कर अपनी उत्तर-पुस्तिका में लिखिए

1. कौन-से वर्ण स्वर वर्ण कहलाते हैं?
(क) जो श्वास वायु के मार्ग में बिना बाधा डाले उच्चरित होते हैं।
(ख) जो श्वास वायु के मार्ग में बाधा डालकर उच्चरित होते हैं।
(ग) जो हलन्त से युक्त होते हैं।
(घ) जो दूसरे वर्गों की सहायता से उच्चरित होते हैं।

2. किन स्वरों के उच्चारण में एक मात्रा का समय लगता है?
(क) ह्रस्व
(ख) दीर्घ
(ग) प्लुत ।
(घ) अन्त:स्थ

3. किन स्वरों के उच्चारण में दो मात्रा का समय लगता है?
(क) अन्त:स्थ
(ख) दीर्घ
(ग) प्लुत
(घ) ह्रस्व

4. प्लुत स्वरों के सामने क्या लिखा जाता है? |
(क) २
(ख) दो
(ग) ३
(घ) तीन

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5. ‘य’ वर्ण का उच्चारण-स्थान कौन-सा है?
(क) मूद्ध
(ख) कण्ठ ।
(ग) दन्त
(घ) तालु

6. ‘फ’ वर्ण का उच्चारण-स्थान कौन-सा है?
(क) दन्तौष्ठ
(ख) ओष्ठ ।
(ग) जिह्वामूल
(घ) कण्ठौष्ठ

7. ‘ऐ’ वर्ण का उच्चारण-स्थान कौन-सा है?
(क) मूद्ध
(ख) दन्त ।
(ग) कण्ठ-तालु
(घ) तालु।

8. ‘लू’ वर्ण का उच्चारण-स्थान कौन-सा है?
(क) कण्ठौष्ठ
(ख) कण्ठ-तालु
(ग) दन्त
(घ) दन्तौष्ठ

9. विसर्ग’:’ का उच्चारण-स्थान क्या माना जाता है? ”
(क) कण्ठ
(ख) नासिका
(ग) दन्तौष्ठ
(घ) ओष्ठ 

10. ‘कण्ठ-तालु’ से उच्चरित होने वाले कौन-से वर्ण हैं?
(क) ए, ऐ
(ख) उ, ऊ
(ग) इ, ई
(घ) ओ, औ,

11. अनुस्वार( ) का उच्चारण-स्थान क्या माना जाता है?
(क) नासिका
(ख) जिह्वामूल
(ग) दन्तौष्ठ
(घ) तालु

12. ‘ऋ’ वर्ण का उच्चारण-स्थान कौन-सा है?
(क) दन्त
(ख) कण्ठ
(ग) मूद्ध
(घ) तालु

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13. ‘व’ वर्ण का उच्चारण-स्थान कौन-सा है?
(क) कण्ठौष्ठ
(ख) जिह्वामूल
(ग) कण्ठ-तालु।
(घ) दन्तौष्ठ

14. स्पर्श व्यंजन वर्गों के अन्तर्गत कुल कितने वर्ण आते हैं?
(क) पन्द्रह
(ख) पचीस
(ग) पाँच
(घ) पैंतीस

15. ‘ह’ वर्ण के लिए कौन-सा आभ्यन्तर प्रयत्न है?
(क) विवृत
(ख) ईषत् विवृत ।
(ग) स्पृष्ट
(घ) ईषत् स्पृष्ट

16. ‘य’ वर्ण के लिए कौन-सा अभ्यन्तर प्रयत्न है?
(क) ईषत् स्पृष्ट
(ख) विवृत
(ग) स्पृष्ट
(घ) ईषत् विवृत

17. यण् प्रत्याहार में कौन-कौन से वर्ण आते हैं?
(क) ज, ब, ग, ड, द
(ख) ह, य, व, र, ल
(ग) य, व, र, ल ।
(घ) श, ष, स, ह

18. अम् प्रत्याहार में कौन-कौन से वर्ण आते हैं?
(क) ञ, म, ग, ण ।
(ख) ङ, म, ण, न, ग
(ग) ङ, में, ण, न .,
(घ) ञ, म, ङ, ण, ने।

19. अक् प्रत्याहार में कौन-कौन-से वेर्ण आते हैं?
(क) अ, इ, उ
(ख) अ, इ, उ, ऋ
(ग) अ, इ, उ, ऋ, लु, ए, ओ ।
(घ) अ, इ, उ, ऋ, लु।

20. झष प्रत्याहार में कौन-कौन-से वर्ण आते हैं?
(क) झ, भ, घ, ढ,ध ।
(ख) झ, भ, धे, ढ
(ग) झ, भ, घ, ढे,
(घ) झ, भ, ज ।

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21. ‘ज, ब, ग, ड, द’ वर्गों का प्रत्याहार कौन-सा है? |
(क) जब्
(ख) जश्
(ग) जर्
(घ) जय्

22. ‘च, ट, त, क, प, श, ष, स’ वर्गों का प्रत्याहार कौन-सा है? ।
(क) चय्
(ख) चल्
(ग) चट्
(घ) चर्

23. ‘श, ष, स’ वर्गों को प्रत्याहार कौन-सा है?
(क) जश्
(ख) शर्
(ग) शल्
(घ) हल्

24. ‘इ, उ, ऋ, लु’ वर्गों का प्रत्याहार कौन-सा है?
(क) अच्
(ख) अण्
(ग) अक्
(घ) इक्

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