UP Board Solutions for Class 8 History Chapter 6 ब्रिटिश राज के अधीन भारत

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ब्रिटिश राज के अधीन भारत

अभ्यास

प्रश्न 1
बहुविकल्पीय प्रश्न
(1) इण्डियन काउंसिल एक्ट पास किया गया
(क) 1892 ई० में
(ख) 1861 ई० में
(ग) 1883 ई० में
(घ) 1885 ई० में

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(2) पहली रेल बोरीवली से थाणे के बीच चली
(क) 1851 ई० में
(ख) 1852 ई० में
(ग) 1853 ई० में
(घ) 1854 ई० में

प्रश्न 2.
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
(1) सी०वी० रमन ने अपने कार्य और योगदान के आधार पर भौतिकी के क्षेत्र में कौन-सा पुरस्कार प्राप्त किया?
उत्तर
सी०वी० रमन ने अपने कार्य और योगदान के आधार पर भौतिकी के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया।

(2) 1835 ई० में कौन-सी भाषा भारतीय प्रशासन की सरकारी भाषा बनी?
उत्तर
1835 ई० में अंग्रेजी भाषा भारतीय प्रशासन की सरकारी भाषा बनी।

(3) किस अधिनियम के द्वारा वाइसराय की परिषद् के सदस्यों की संख्या 12-16 कर दी गईं?”
उत्तर
इण्डिया काउंसिल एक्ट 1892 के द्वारा वाइसराय की परिषद् के सदस्यों की संख्या 12-16 कर दी गई।

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प्रश्न 3.
लघु उत्तरीय प्रश्न
(1) मैकाले भारतीयों को अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा क्यों देना चाहता था?
उत्तर
अंग्रेज शासकों, प्रशासकों ने भारत में आधुनिक शिक्षा का प्रसार इस उद्देश्य से किया कि अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीय उनके समर्थक बन जाएँगे। अंग्रेजी भाषा के रूप में उन्हें सम्पर्क भाषा प्राप्त हुई, जिसके परिणामस्वरूप वे अंग्रेजी साहित्य के सम्पर्क में आए।

लार्ड मैकाले ने जब अंग्रेजी साहित्य की शिक्षा और अंग्रेजी माध्यम (UPBoardSolutions.com) से शिक्षा देने की नीति बनाई थी तो उसका उद्देश्य था कि इस शिक्षा से ऐसे व्यक्ति तैयार होंगे जो आत्मा और आस्था से ब्रिटिशवादी होंगे। मैकाले का अनुमान बहुत हद तक सही था।

(2) महारानी विक्टोरिया ने घोषणा पत्र में भारतीयों के लिए कौन-से आश्वासन दिए गए?
उत्तर
महारानी के घोषणा पत्र में भारतीयों के लिए निम्न आश्वासन दिए गए|

  1. क्षेत्रे के सीमा विस्तार की नीति समाप्त कर दी गई।
  2. अँग्रेजों की हत्या के दोषियों को छोड़ शेष सभी को क्षमा कर दिया गया।
  3. विद्रोह में भाग लेने वाले तालुकेदारों को राजभक्ति प्रदर्शित करने पर उन्हें उनकी जागीर वापस कर दी गई।
  4. बिना भेद-भाव तथा योग्यता के आधार पर सरकारी सेवा में भर्ती करने का वचन दिया गया।

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प्रश्न 4.
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न|
(1) ब्रिटिश संसद द्वारा भारत में किए गए चार प्रशासनिक सुधारों के बारे में लिखिए। ”
उत्तर

  1. ब्रिटिश संसद द्वारा 1861 ई० का इण्डिया कौंसिल एक्ट पास किया गया, जिसके तहत इंग्लैण्ड में भारत के लिए मन्त्री और भारत में वायसराय की नियुक्ति हुई।
  2. इसके बाद इण्डिया कौंसिल एक्ट 1892 अधिनियम पास हुआ, जिसमें वायसराय परिषद् के सदस्य 16 कर दिए गए। घोषणा पत्र के तहत 1861 का इण्डियन सिविल सर्विस एक्ट भी पास हुआ, जिसके अन्तर्गत महत्त्वपूर्ण पदों पर आई०सी०एस० अधिकारी नियुक्त होते थे। इनका चयन लन्दन में खुली प्रतियोगिता के द्वारा होता था।
  3. 1883-85 ई० में स्थानीय स्वशासन अधिनियम (UPBoardSolutions.com) पारित किया गया।
  4. 1893 ई० में सेना और पुलिस को भी पुनर्गठित किया गया। भारतीय सेना में सूबेदार और पुलिस संगठन में दारोगा के पद भारतीयों के लिए रखे गए।

प्रोजेक्ट वर्क-
विद्यार्थी स्वयं करें।

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UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 14 कर्मवीर (मंजरी)

UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 14 कर्मवीर (मंजरी)

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समस्त पद्याथों की व्याख्या

देख कर बाधा ………………………………………………. मिले फूले फले।।

संदर्भ – प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य पुस्तक ‘मंजरी-8’ के ‘कर्मवीर’ नामक कविता से ली गई हैं। इस कविता के लेखक अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ हैं।

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने कर्मवीर अर्थात कर्मठ लोगों की प्रशंसा करते हुए उनके गुणों को बताया है।

व्याख्यो – कवि कहता है कि जो कर्मठ लोग होते हैं वे किसी भी बाधा से घबराते नहीं हैं। वे भाग्य के भरोसे बैठकर दुख नहीं भोगते और पछताते भी नहीं हैं। उनके लिए कोई भी काम कठिन नहीं होता और (UPBoardSolutions.com) वे अपनी योग्यता का दिखावा भी नहीं करते। वे अपनी लगन और मेहनत से अपनी किसी भी परेशानी को दूर कर सकते हैं। साथ ही ऐसे लोग सदैव ही सुखी रहते हैं।

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आज करना है ………………………………………………. जिसे सकते नहीं।

संदर्भ एवं प्रसंग – पूर्ववत्।।

व्याख्या – कवि कहता है कि ऐसे लोग किसी भी काम को कल के लिए नहीं छोड़ते और जो एक बार सोच लेते हैं उसे करके ही दम लेते हैं। ऐसे लोग कभी अहंकार नहीं करते और सबकी सलाह को सुनते हैं। ऐसे लोग किसी भी काम के लिए कभी दूसरे का मुँह नहीं ताकते और ऐसा कोई काम नहीं है जिसे कर्मठ व्यक्ति कर नहीं सकता।

जो कभी अपने ………………………………………………. औरों के लिए।

संदर्भ एवं प्रसंग – पूर्ववत्।।

व्याख्या – कवि कहता है कि ऐसे लोग अपना समय व्यर्थ बातों में नहीं गंवाते और किसी काम को कल पर नहीं छोड़ते तथा परिश्रम करने से कभी जी भी नहीं चुराते। अर्थात उनके लिए कोई भी काम कठिन नहीं होता। ऐसे लोग अपनी कार्य-कुशलता के दम पर दूसरों के लिए उदाहरण बन जाते हैं।

व्योम को छूते ………………………………………………. रहती है कहीं।

संदर्भ एवं प्रसंग – पूर्ववत्।

व्याख्या – कवि कहता है कि चाहे आकाश को छूता हुआ पर्वत शिखर हो, या घना अंधेरी जंगल हो यो उफनती लहर हो या भयानक अग्नि की ज्वाला हो, कुछ भी इनको भयभीत नहीं कर सकती। अर्थात ऐसे लोगों की राह में कैसी भी रूकावट आए तो ये कभी घबराते नहीं और ये अपनी मंजिल पर पहुँच कर ही दम लेते हैं। इस कविता के (UPBoardSolutions.com) माध्यम से कवि कहना चाहता है कि भारत के समस्त नागरिक कर्मवीर बनें और अपने देश की शान बढ़ाएँ।

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प्रश्न-अभ्यास

कुछ करने को- नोट – विद्यार्थी स्वयं करें।
विचार और कल्पना

प्रश्न 1.
जीवन में किसी कार्य की सफलता के लिए क्या-क्या आवश्यक है इस बिन्दु पर अपने विचार लिखिए।
उत्तर :
वन में किसी भी कार्य की सफलता के लिए सच्ची लगन, कार्य के प्रति पूरी निष्ठा । और समर्पण अति आवश्यक है।

प्रश्न 2.
नोट-विद्यार्थी स्वयं करें।

कविता से

प्रश्न 1.
कविता में कवि ने किसकी प्रशंसा की है ?
उत्तर :
इस कविता में कवि ने मेहनती जुझारू और लगनशील व्यक्ति की प्रशंसा की है।

प्रश्न 2.
कर्मवीर देख मिलने पर भी क्यों नहीं पछताते ?
उत्तर :
क्योंकि कर्मवीर इसके बारे में सोचता ही नहीं, न ही इन बातों के बारे में सोचने के लिए उसके पास समय होता है। उसका पूरा ध्यान अपने काम पर और उसकी नजर अपनी मंजिल पर होती है।

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प्रश्न 3.
“सब जगह सब काल में फूलने-फलने से” कवि का क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
कवि का तात्पर्य यह है कि कर्मवीर या कर्मठ व्यक्ति हर संमय और हर स्थान पर सफलता प्राप्त करता है।

प्रश्न 4.
कर्मवीर दूसरों के लिए किस प्रकार नमूना बन जाते हैं ?
उत्तर:
कर्मवीर व्यक्ति अपनी मेहनत, लगन और सफलता से औरों के लिए उदाहरण बन जाती है। और सभी उसकी मिशाल देते हैं।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए
(क) रह भरोसे भाग्य के दुख भोग पछताते नहीं।।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति में कवि का आशय यह है कि कर्मवीर व्यक्ति भाग्य के भरोसे कभी नहीं बैठते और न ही कभी उन्हें दुख होता है और न ही वे कभी असफल होते हैं और न ही भी पछताते हैं।

(ख)
काम करने की जगह बातें बनाते हैं नहीं।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति का आशय यह है कि कर्मवीर या कर्मठ व्यक्ति काम के समय कभी गप्पे नहीं करता अर्थात वे अपने कीमती समय को कभी व्यर्थ में नहीं आँवाता उसके लिए हर क्षण (UPBoardSolutions.com) कीमती होता है और वह समय के हर क्षण का सदुपयोग करता है।

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भाषा की बात

प्रश्न 1.
दिए गए शब्द स्त्रीलिंग हैं या पुल्लिंग? लिखिए
उत्तर :
UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 14 कर्मवीर (मंजरी) 1
प्रश्न 2.
कुछ शब्द उपसर्ग और प्रत्यय दोनों के योग से बनते हैं।
जैसे क् + अधीन + ता = पराधीनता
आप भी इस प्रकार के शब्द बनाइए
उत्तर :
UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 14 कर्मवीर (मंजरी) 2

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UP Board Solutions for Class 9 Hindi Chapter 7 ठेले पर हिमालय (गद्य खंड)

UP Board Solutions for Class 9 Hindi Chapter 7 ठेले पर हिमालय (गद्य खंड)

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. निम्नांकित गद्यांशों में रेखांकित अंशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या और तथ्यपरक प्रश्नों के उत्तर दीजिये-
(1)
ठेले पर बर्फ की सिलें लादे हुए बर्फ वाला आया। ठण्डे, चिकने, चमकते बर्फ से भाप उड़ रही थी। मेरे मित्र का जन्म स्थान अल्मोड़ा है, वे क्षण भर उस बर्फ को देखते रहे, उठती हुई भाप में खोये रहे और खोये-खोये से ही बोले, “यही बर्फ तो हिमालय की शोभा है।” और तत्काल शीर्षक मेरे मन में कौंध गया, ‘ठेले पर हिमालय’ । पर आपको इसलिए बता रहा हूँ कि अगर आप नये कवि हों तो भाई, इसे ले जायँ (UPBoardSolutions.com) और इस शीर्षक पर दो-तीन सौ पंक्तियाँ बेडौल-बेतुकी लिख डालें-शीर्षक मौजूं है और अगर नयी कविता से नाराज हों, सुललित गीतकार हों तो भी गुंजाइश है, इस बर्फ को डाँटें, “उतर आओ। ऊँचे शिखर पर बन्दरों की तरह क्यों चढ़े बैठे हो? ओ नये कवियो! ठेले पर लादो । पान की दुकानों पर बिको।”
प्रश्न
(1)
उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(3) हिमालय की शोभा क्या है?

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ के ठेले पर हिमालय’ नामक पाठ से उद्धत है। इसके लेखक डॉ० धर्मवीर भारती जी हैं। प्रस्तुत अवतरण में लेखक ने बर्फ का वर्णन किया है।
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- ठेले पर लदे हुए बर्फ को देखकर लेखक कहता है कि एक मेरा मित्र है जिनका जन्मस्थान अल्मोड़ा है। वे पल भर उसे बर्फ को एकटक देखते रहे। बर्फ से उठती हुई भाप को देखकर वे बोले कि ‘यही बर्फ तो हिमालय की शोभा है’। मेरे मन में तुरन्त यह शीर्षक प्रवेश कर गया, ‘ठेले पर हिमालय।’ मैं आपको इसलिए बताना उचित समझता हूँ कि यदि आप एक (UPBoardSolutions.com) नये कवि हों तो आप इसे ले जायें और इस पर दो-तीन सौ पंक्तियों में रचना कर दीजिए। यह शीर्षक बहुत ही रुचिकर है। यदि आपकी नयी कविता में रुचि नहीं है और सुललित कवि हैं तो झड़प लगावें कि नीचे उतर जाइये। ऊँचे शिखर पर बन्दरों की भाँति क्यों बैठे हो। ठेले पर चढ़ो और चाय, पान आदि की दुकानों पर बिको ।
  3. हिमालय की शोभा बर्फ है।

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(2) सच तो यह है कि सिर्फ बर्फ को बहुत निकट से देख पाने के लिए ही हम लोग कौसानी गये थे। नैनीताल से रानीखेत और रानीखेत से मझकाली के भयानक मोड़ों को पार करते हुए कोसी । कोसी से एक सड़क अल्मोड़ा चली जाती है, दूसरी कौसानी। कितना कष्टप्रद, कितना सूखी और कितना कुरूप है वह रास्ता । पानी का कहीं नाम-निशान नहीं, सूखे भूरे पहाड़, हरियाली का नाम नहीं । ढालों को काटकर बनाये हुए टेढ़े-मेढ़े खेतं, जो थोड़े से हों तो शायद अच्छे भी लगें, पर उनको एकरस सिलसिला बिल्कुल शैतान की आँत मालूम पड़ता है।
प्रश्न
(1)
उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(3) बर्फ को पास से देखने के लिये लेखक कहाँ गया?

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ में धर्मवीर भारती द्वारा लिखित ‘ठेले परे हिमालय’ से लिया गया है। लेखक बर्फ को निकट से देखने के लिए कौसानी जाता है। वह रास्ते में पड़े मुख्य दृश्यों का वर्णन करता है।
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- लेखक बताता है कि कौसानी जाने के लिए नैनीताल से रानीखेत जाना पड़ता है। और रानीखेत से मझकाली के दुर्गम मोड़ों को पार करते हुए एक रास्ता कोसी जाता है। कोसी से एक सड़क अल्मोड़ा को जाती है और दूसरी सड़क कौसानी को जाती है। यह मार्ग अत्यन्त कष्टप्रद और दुर्गम है। मार्ग में पानी कहीं नहीं दिखायी पड़ता है। सूखे-सूखे पहाड़ (UPBoardSolutions.com) दिखायी पड़ते हैं। हरे-भरे दृश्य देखने को मन तरस जाता है। ढालों को काटकर टेढ़े-मेढ़े खेत तैयार किये जाते हैं, जो देखने में अच्छे नहीं लगते हैं।
  3. बर्फ को पास से देखने के लिये लेखक कौसानी गया।

(3) कौसानी के अड्डे पर जाकर बस रुकी। छोटा-सा, बिल्कुल उजड़ा-सा गाँव बर्फ का तो कहीं नाम-निशान नहीं। बिल्कुल ठगे गये हम लोग। कितना खिन्न था मैं, अनखाते हुए बस से उतरा कि जहाँ था वहीं पत्थर की मूर्ति-सा स्तब्ध खड़ा रह गया। कितना अपार सौन्दर्य बिखरा था, सामने की घाटी में। इसे कौसानी की पर्वतमाला ने अपने अंचल में यह जो कत्यूर की रंग-बिरंगी घाटी छिपा रखी है; इसमें किन्नर और यक्ष ही तो वास करते होंगे। पचासों मील चौड़ी यह घाटी, हरे मखमली कालीनों जैसे खेत, सुन्दर गेरू की शिलाएँ काटकर बने हुए लाल-लाल रास्ते, जिनके किनारेकिनारे सफेद-सफेद पत्थरों की कतार और इधर-उधर से आकर आपस में उलझ जानेवाली बेलों की लड़ियों-सी नदियाँ। मन में बेसाख्ता यहाँ आया कि इन बला की लड़ियों को उठाकर कलाई में लपेट लें, आँखों से लगा हूँ।
प्रश्न
(1) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(3) कौन-सी घाटी थी, जिसमें अनन्त सौन्दर्य बिखरा पड़ा था?

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यावतरण डॉ० धर्मवीर भारती द्वारा रचित ‘ठेले पर हिमालय’ नामक यात्रा-वृत्तान्त से उद्धृत है। यह यात्रा-वृत्तान्त हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ में संकलित है। यहाँ नैनीताल से कौसानी तक की यात्रा का वर्णन अत्यन्त रोचक ढंग से किया गया है तथा कौसानी की पर्वत-श्रृंखला के आसपास के सौन्दर्य की झाँकी प्रस्तुत की गयी है।
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- धर्मवीर भारती कहते हैं कि कौसानी के सामने की घाटी के सौन्दर्य और उसके आकर्षण से खिंचा हुआ मैं मन्त्रमुग्ध-सा उसे देखता रहा। वह कत्यूर घाटी थी, जिसमें अनन्त सौन्दर्य बिखरा पड़ा था। जिस प्रकार कोई सुन्दरी अपने सौन्दर्य को अपने आँचल में छिपाकर रखती है, उसी प्रकार कौसानी की इस पर्वत-श्रृंखला ने कत्यूर घाटी के सौन्दर्य को छिपा रखा (UPBoardSolutions.com) था। कत्यूर घाटी के सौन्दर्य में जो आकर्षण है, उससे आकर्षित होकर निश्चय ही प्रेम, सौन्दर्य तथा संगीत के उपासक यक्ष और किन्नर यहाँ आते रहते होंगे। तात्पर्य यह है कि इस कत्यूर घाटी के सौन्दर्य से आकर्षित होकर देवता भी यहाँ आने के लिए उत्सुक रहे। होंगे। यह घाटी लगभग पचास मील चौड़ी है। इस घाटी में हरे-भरे खेत भी हैं, जो हरी मखमली चादर के समान प्रतीत होते हैं। यहाँ गेरू की लाल-लाल शिलाएँ काटकर रास्ते बनाये गये हैं, जो लाल रंग के हैं और अत्यन्त आकर्षक लगते हैं। इन लाल-लाल रास्तों के किनारे सफेद पर्वत खड़े हैं, जो ऐसे लगते हैं मानो सफेद रंग की कोई रेखा खींचे दी गयी हो। उलझी हुई बेलों की लड़ियों के समान नदियाँ वहाँ गॅथी हुई प्रतीत होती हैं। इस सौन्दर्य ने मेरा मन मोह लिया और सहसा मेरे मन में यह विचार आया कि इन बेलों की लड़ियों को उठाकर, अपनी कलाई में लपेटकर आँखों से लगा लूंगा।
  3. कत्यूर घाटी में अनन्त सौन्दर्य बिखरा पड़ा था।

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(4) हिमालय की शीतलता माथे को छू रही है और सारे संघर्ष, सारे अन्तर्द्वन्द्व, सारे ताप जैसे नष्ट हो रहे हैं। क्यों पुराने साधकों ने दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों को ताप कहा था और उसे नष्ट करने के लिए वे क्यों हिमालय जाते थे, यह पहली बार मेरी समझ में आ रहा था और अकस्मात् एक दूसरा तथ्य मेरे मन के क्षितिज पर उदित हुआ। कितनी, कितनी पुरानी है यह हिमराशि । जाने किस आदिम काल से यह शाश्वत, अविनाशी हिम इन शिखरों पर जमा हुआ। कुछ विदेशियों ने इसीलिए इस हिमालय की बर्फ को कहा है-चिरन्तन हिम।
प्रश्न
(1) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(3) कुछ विदेशियों ने हिमालय की बर्फ को चिरन्तन हिम क्यों कहा है?

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ में धर्मवीर भारती द्वारा रचित ‘ठेले पर हिमालय’ नामक पाठ से लिया गया है। इन पंक्तियों में लेखक ने यह बताने का प्रयास किया है कि प्राचीनकाल से साधकों के हिमालय पर जाने का क्या प्रयोजन था?
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- लेखक स्पष्ट करता है कि पुराने साधकों ने दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों को ताप की संज्ञा दी थी और वे इस कष्ट से मुक्त होने के लिए हिमालय जाते थे। यह बात मेरी समझ में आयी । हिमालय तापे का नाशक और शीतलता का सूचक है। एकाएक मेरे मन में यह विचार आया कि यह हिमराशि कितनी पुरानी है, न जाने किस काल से यह उत्तुंग (UPBoardSolutions.com) शिखरों पर जमा हुआ है। इसीलिए विदेशियों ने हिमालय की बर्फ को चिरंतन हिम की संज्ञा प्रदान की है।
  3. न जाने किस आदिम काल से यह शाश्वत, अविनाशी हिम इन शिखरों पर जमा हुआ। कुछ विदेशियों ने इसीलिए इस हिमालय की बर्फ को चिरन्तन हिम भी कहा है।

(5) सूरज डूबने लगा और धीरे-धीरे ग्लेशियरों में पिघली केसर बहने लगी। बर्फ कमल के लाल फूलो में बदलने लगी, घाटियाँ गहरी नीली हो गयीं। अँधेरा होने लगा तो हम उठे और मुँह-हाथ धोने और चाय पीने में लगे। पर सब चुपचाप थे, गुमसुम जैसे सबका कुछ छिन गया हो या शायद सबको कुछ ऐसा मिल गया हो, जिसे अन्दर-ही-अन्दर सहजेने में सब आत्मलीन हो अपने में डूब गये हों।
प्रश्न
(1) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(3) किस समय बर्फ कमल के लाल फूलों में बदलने सी प्रतीत होने लगी?

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ में धर्मवीर भारती द्वारा रचित ‘ठेले पर हिमालय’ नामक पाठ से लिया गया है। प्रस्तुत अवतरण में लेखक ने कौसानी की सायंकालीन बेला का चित्रण किया है।
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- लेखक कहता है कि जब सूर्य अस्त होने का समय आया तो ग्लेशियरों में पिघली केसर प्रवाहित होने लगी। बर्फ कमल के लाल फूलों में बदलने-सी प्रतीत होने लगी और घाटियाँ नीली दिखायी पड़ने लगीं। अँधेरा हो गया। मैं उठा और हाथ-मुँह धोकर चाय पीने लगा। उस समय का वातावरण बिल्कुल शान्त था। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे सबका सर्वस्व (UPBoardSolutions.com) छिन गया हो या सभी को सब कुछ मिल गया हो और ऐसा लग रहा था जैसे सभी अन्दर-अन्दर संजोने में तल्लीन होकर आत्मविभोर हो गये हों। यह दृश्य अत्यन्त मनमोहक था।
  3. सूर्य अस्त के समय बर्फ कमल के लाल फूलों में बदलने सी प्रतीत होने लगी।

(6) आज भी उसकी याद आती है तो मन पिरा उठता है। कल ठेले के बर्फ को देखकर मेरे मित्र उपन्यासकार जिस तरह स्मृतियों में डूब गये, उसे दर्द को समझता हूँ और जब ठेले पर हिमालय की बात कहकर हँसता हूँ तो वह उस दर्द को भुलाने का ही बहाना है। ये बर्फ की ऊँचाइयाँ बार-बार बुलाती हैं और हम हैं कि चौराहों पर खड़े ठेले पर लदकर निकलने वाली बर्फ को ही देखकर मन बहला लेते हैं। किसी ऐसे क्षण में ऐसे ही ठेलों पर लदे हिमालयों से घिरकर ही तो तुलसी ने कहा था-‘कबहुँक हैं यदि रहिन रहगो’-मैं क्या कभी ऐसे भी रह सकेंगा, वास्तविक हिमशिखरों की ऊँचाइयों पर?
प्रश्न
(1) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(3) किसने हिमालय के शिखरों पर रहने की इच्छा व्यक्त की है?

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश धर्मवीर भारती द्वारा लिखित ‘ठेले पर हिमालय’ नामक पाठ से अवतरित है। इस अवतरण में लेखक कहता है कि मुझे बार-बार हिमालय का स्मरण आता है। हिमालय की ऊँचाइयों को देखने की इच्छा उसके मन में बार-बार उत्पन्न होती है।
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- लेखक कहता है कि आज भी जब हिमालय की याद आती है तो मन दर्द के मारे कराह उठता है। मेरे उपन्यासकार मित्र ठेले की बर्फ को देखकर स्मृतियों में डूब जाते थे। जब हिमालय का वास्तविक दर्शन होता तो क्या स्थिति होती। मैं उनके इस दर्द को भली-भाँति समझता हूँ। बर्फ की ऊँचाइयों को देखकर ऐसा मालूम होता है जैसे वे मुझे बुला v(UPBoardSolutions.com) रही हैं। हम ठेले पर लदे बर्फ को ही देखकर मन बहला लेते हैं। तुलसी ने भी हिमालय के शिखरों पर रहने की अपनी इच्छा व्यक्त की थी। उन्हें भी हिमालय की ऊँची-ऊँची शिखरों से बेहद लगाव था।
  3. तुलसी ने भी हिमालय के शिखरों पर रहने की इच्छा व्यक्त की है।

प्रश्न 2. डॉ० धर्मवीर भारती की जीवनी एवं कृतियों का उल्लेख कीजिए।

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प्रश्न 3. डॉ० धर्मवीर भारती के साहित्यिक अवदान एवं भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।

प्रश्न 4. डॉ० धर्मवीर भारती का जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्यिक योगदान पर प्रकाश डालिए।
अथवी डॉ० धर्मवीर भारती का साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
अथवा डॉ० धर्मवीर भारती के लेखन की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

डॉ० धर्मवीर भारती
( स्मरणीय तथ्य )

जन्म- 25 दिसम्बर, सन् 1926 ई० । मृत्यु- 4 सितम्बर, सन् 1997 ई० । जन्म-स्थान– इलाहाबाद (उ० प्र०) ।
शिक्षा- प्रयाग में । प्रयाग विश्वविद्यालय से पी-एच०डी० की उपाधि ।
रचनाएँ-काव्य- ‘ठण्डा लोहा’, ‘कनुप्रिया’, ‘सात गीत वर्ष’ और ‘अन्धायुग’।
कहानी संग्रह- चाँद और टूटे हुए लोग।
नाटक- नदी प्यासी थी, नीली झील (एकांकी संग्रह)।
उपन्यास- ‘गुनाहों का देवता’ और ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’।
समीक्षा-साहित्य- मानव मूल्य और साहित्य। सम्पादन- ‘संगम’ और ‘धर्मयुग’।
साहित्य-सेवा- कवि के रूप में, गद्य लेखक के रूप में एवं सम्पादक के रूप में।
भाषा- शुद्ध परिमार्जित खड़ीबोली । संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू के प्रचलित शब्दों का प्रयोग।
शैली- विषयानुकूल, शैली में पर्याप्त विविधता ।
अलंकार योजना- उपमा, मानवीकरण, रूपक तथा रूपकातिशयोक्ति।

  • जीवन-परिचय- आधुनिक हिन्दी के सशक्त कथाकार एवं ललित निबन्धकार डॉ० धर्मवीर भारती का जन्म इलाहाबाद में 25 दिसम्बर, सन् 1926 ई० को हुआ था। इन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम० ए० करने के पश्चात् पी-एच० डी० की उपाधि प्राप्त की। कुछ समय तक प्रयाग से निकलने वाले साप्ताहिक हिन्दी पत्र ‘संगम’ का सम्पादन किया तथा कुछ वर्षों तक प्रयाग विश्वविद्यालय में हिन्दी के अध्यापक भी रहे। सन् 1958 ई० में वे मुम्बई से प्रकाशित होनेवाले प्रसिद्ध साप्ताहिक पत्र ‘धर्मयुग’ (UPBoardSolutions.com) के सम्पादक हो गये। पत्रकारिता के प्रयोजन से आपने देश-विदेश का भ्रमण भी किया है। भारत सरकार ने सन् 1972 ई० में उनकी हिन्दी-सेवाओं एवं हिन्दी पत्रकारिता के लिए ‘पद्मश्री’ से अलंकृत कर सम्मानित किया। उन्होंने ‘धर्मयुग’ पत्रिका का सफलतापूर्वक सम्पादन किया। हिन्दी के यशस्वी साहित्यकार एवं ‘अंधायुग’ एवं ‘गुनाहों का देवता’ जैसी लोकप्रिय पुस्तकों के प्रणेता डॉ० धर्मवीर भारती का निधन 4 सितम्बर, सन् 1997 ई० को हो गया।
  • रचनाएँ-भारती जी की प्रतिभा बहुमुखी थी। इन्होंने कविता, नाटक, उपन्यास, कहानी आदि सभी कुछ लिखा है। इनकी रचनाएँ निम्न हैं –
  • काव्य- ‘ठण्डा लोहा’, ‘कनुप्रिया’, ‘सात गीत वर्ष’ और ‘अंधायुग’।
    1. निबन्ध-संग्रह-‘कहानी-अनकहनी’, ‘ठेले पर हिमालय’ और ‘पश्यन्ती’ आदि।
    2. उपन्यास- ‘गुनाहों का देवता’ और ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’।
    3. नाटक और एकांकी संग्रह- ‘नदी प्यासी थी’, ‘नीली झील’।
    4. कहानी- संग्रह-‘चाँद और टूटे हुए लोग।
    5. आलोचना- ‘मानव मूल्य और साहित्य’ ।
    6. सम्पादन- ‘संगम’ और ‘धर्मयुग’।
    7. अनुवाद- ‘देशान्तर’।
  • भाषा- भारती जी की भाषा शुद्ध तथा परिमार्जित खड़ीबोली है। नवीन शिल्प के प्रतिनिधि लेखक होने के नाते ये भावों को प्रकट करने के लिए किसी विशेष भाषा-शैली का मुँह नहीं ताकते। अत: इनकी भाषा में संस्कृत (मूर्ति, स्तब्ध, सहयोगी आदि), अंग्रेजी (कैमरा, अकादमी, थर्मस, शेड आदि), उर्दू (खासा, दिलचस्प, यकीन, गुंजाइश आदि) के प्रचलित शब्दों तथा देशज शब्दों और मुहावरों (शैतान की आँख, चाँद-तारों से बात करना) आदि का खुलकर प्रयोग हुआ है।
  • साहित्यिक विशेषताएँ- डॉ० धर्मवीर भारती एक प्रतिभाशाली कवि, कथाकार, नाटककार एवं ललित निबन्धकार थे। इनकी कविताओं में रागतत्त्व, कहानियों और उपन्यासों में सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक समस्याओं को लेकर बड़े जीवन्त चरित्र प्रस्तुत किये गये हैं। डॉ० भारती में किसी भी दृश्य को शब्दों की सीमा में बाँधकर उसमें चित्रमयता प्रदान करने की अद्भुत क्षमता थी। (UPBoardSolutions.com) समय-समय पर आपने जो संस्मरण, रेखाचित्र तथा ललित निबन्ध लिखे थे उनके माध्यम से हिन्दी में एक प्रयोग के संकेत मिलते हैं। इन्होंने अन्य भाषाओं की कुछ प्रसिद्ध रचनाओं के भी अनुवाद प्रस्तुत किये हैं।
  • भाषा और शैली- डॉ० भारती की भाषा अत्यन्त ही सरल, स्वाभाविक एवं प्रवाहपूर्ण है। उसमें विचारों की अभिव्यक्ति की अद्भुत क्षमता होने के साथ-साथ मधुर काव्यमयता है। भाषा ओज और प्रसाद गुणों से सम्पन्न है। लाक्षणिकता एवं व्यंग्य पुटों से भाषा और भी जीवन्त हो गयी है। डॉ० भारती की भाषा में देशज और अंग्रेजी-उर्दू आदि भाषाओं के शब्दों को हिन्दी में प्रयोग कर उन्हें पचा लेने की अद्भुत क्षमता थी। डॉ० भारती के गद्य की शैली वर्णनात्मक और विवरणात्मक (UPBoardSolutions.com) दोनों प्रकार की हैं। संस्मरण, रेखाचित्र तथा यात्रा-विवरणों में विवरणात्मक शैली का प्रयोग हुआ है। रिपोर्ताज में वर्णनात्मक शैली प्रयुक्त हुई है। उक्त सभी विधाओं में आत्मव्यंजक शैली भी प्रयोग में लायी गयी है।

( लघु उत्तरीय प्रश्न )

प्रश्न 1. कौसानी की यात्रा में नैनीताल से कोसी तक लेखक का सफर कैसा रहा?
उत्तर- कौसानी की यात्रा में नैनीताल से कोसी तक लेखक का सफर कष्टप्रद था। भयानक-भयानक मोड़ थे और ऊबड़खाबड़ मार्ग था ।

प्रश्न 2. कोसी के आगे जो बदलाव आया उसका मुख्य कारण क्या था?
उत्तर- कोसी के आगे जो बदलाव आया उसका मुख्य कारण था कि प्रसन्नवदन शुक्ल जी मिल गये और उनकी सारी थकान दूर हो गयी।

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प्रश्न 3. कौसानी पहुँचने पर पहले लेखक को अवाक् मूर्ति-सा स्तब्ध कर देने वाला कौन-सा दृश्य दिखायी दिया?
उत्तर- कौसानी के अड्डे पर बस रुकने पर जब लेखक को वहाँ एक उजड़ा-सा गाँव दिखा तो वह खिन्न हो उठा। वहाँ बर्फ का कहीं नामोनिशान तक नहीं था। लगता था जैसे लेखक ठगा गया हो लेकिन जब वह बस से नीचे उतरा तो वह जहाँ था वहाँ पत्थर की मूर्ति-सा स्तब्ध खड़ा रह गया यह देखकर कि सामने की घाटी में तो अपार सौन्दर्य बिखरा पड़ा है।

प्रश्न 4. कत्यूर घाटी के पार बादलों की ओट के बीच से दिखता हिमालय का एक श्रृंग उसे कैसा लगा? |
उत्तर- कत्यूर घाटी के पास बादलों की ओट के बीच से दिखता हिमालय का एक श्रृंग लेखक को ऐसा दिखा जैसे वह खिड़की से झाँक रहा है। लेखक प्रसन्नता से चीख उठा ‘बरफ’। सभी ने देखा लेकिन अकस्मात् वह फिर लुप्त हो गया।

( अतिलघु उत्तरीय प्रश्न )

प्रश्न 1. धर्मवीर भारती की दो रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर- धर्मवीर भारती की दो रचनाएँ- (1) गुनाहों का देवती, (2) सूरज का सातवाँ घोड़ा।

प्रश्न 2. धर्मवीर भारती किस युग के लेखक हैं?
उत्तर- धर्मवीर भारती आधुनिक युग के लेखक हैं।

प्रश्न 3. धर्मवीर भारती का जन्म कब हुआ था?
उत्तर- धर्मवीर भारती का जन्म 25 दिसम्बर सन् 1926 ई० को इलाहाबाद में हुआ था।

प्रश्न 4. हिमालय की शोभा क्या है? |
उत्तर- हिमालय की शोभा बर्फ है।

प्रश्न 5. हिम श्रृंग के क्षणिक दर्शन का उस पर क्या प्रभाव हुआ?
उत्तर- हिम श्रृंग के क्षणिक दर्शन से लेखक की सारी खिन्नता, निराशा, थकावट छुमन्तर हो गयी।

प्रश्न 6. पूरी हिम-श्रृंखला देखने पर लेखक के मन में कैसे भाव उदित हुए?
उत्तर- हिमालय की शीतलता लेखक के माथे को छू रही थी। लेखक के मन में भाव उत्पन्न हुआ कि पुराने साधक लोग दैहिक, दैविक एवं भौतिक तापों को नष्ट करने के लिए हिमालय की शरण में आते थे।

प्रश्न 7. रात होने पर चाँद दिखायी दिया तब लेखक को क्यों लगने लगा कि जैसे उसका मन कल्पनाहीन हो गया हो?
उत्तर- जब चाँद निकला तो सब शान्त था, जैसे हिम सो रहा हो। लेखक को लगा जैसे उसका मन अत्यन्त कल्पनाहीन हो गया। इसी हिमालय को देखकर लेखक एवं कवियों ने अनेक रचनाएँ कर डालीं । लेखक कहता है-यह मेरा मन है कि मैंने एक पंक्ति भी नहीं लिखी।

प्रश्न 8. बैजनाथ पहुँचकर गोमती में स्नान करते हुए लेखक के मन में हिमालय के प्रति कैसे भाव जगते हैं?
उत्तर- बैजनाथ पहुँचकर गोमती में स्नान करते हुए लेखक के मन में अनेक भाव उत्पन्न हुए। उसे लगा जैसे गोमती की उज्ज्वल जलराशि में हिमालय की बर्फीली चोटियों की छाया तैर रही हो। लेखक कहता है कि पता नहीं उन शिखरों पर कैसे और कब पहुँचूँगा ।

व्याकरण-बोध

प्रश्न 1. निम्न में समास-विग्रह कीजिए और समास का नाम भी बताइए-
हिमालय, शीर्षासन, जलराशि, पर्वतमाला, तन्द्रालस, प्रसन्नवदन।
उत्तर-
हिमालय – हिम का आलय – षष्ठी तत्पुरुष समास
शीर्षासन – शीर्ष के द्वारा आसन – तृतीया तत्पुरुष समास
जलराशि – जल की राशि – षष्ठी तत्पुरुष समास
पर्वतमाला – पर्वत की माला – षष्ठी तत्पुरुष समास
तन्द्रालस – तन्द्रा से पूर्ण आलस –  तृतीया तत्पुरुष समास
प्रसन्नवदन – प्रसन्न वदन वाला – कर्मधारय समास

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प्रश्न 2. इस पाठ के आधार पर भारती जी की भाषा-शैली पर एक लेख लिखिए।
उत्तर- भारती जी की भाषा परिष्कृत एवं परिमार्जित खड़ीबोली है। इनकी भाषा में सरलता, सजीवता और आत्मीयता को पुट है तथा देशज, तत्सम एवं तद्भव शब्दों का (UPBoardSolutions.com) प्रयोग हुआ है। मुहावरों और कहावतों के प्रयोग से भाषा में गति और बोधगम्यता आ गयी है। विषय और विचार के अनुकूल भारती जी की इस रचना में भावात्मक, समीक्षात्मक, वर्णनात्मक, चित्रात्मक शैलियों के प्रयोग हुए हैं।

प्रश्न 3. निम्न शब्दों से प्रत्यय अलग कीजिए –
सुहावनापन, कष्टप्रद, शीतलता।
उत्तर- पन, प्रद, ता।

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UP Board Solutions for Class 8 History Chapter 11 स्वतन्त्र भारत की चुनौतियाँ एवं विकास

UP Board Solutions for Class 8 History Chapter 11 स्वतन्त्र भारत की चुनौतियाँ एवं विकास

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स्वतन्त्र भारत की चुनौतियाँ एवं विकास

अभ्यास

प्रश्न 1.
बहुविकल्पीय प्रश्न
(1) भारत स्वतंत्र हुआ
(क) 14 अगस्त, 1947 ई० को
(ख) 15 अगस्त, 1947 ई० को
(ग) 26 जनवरी, 1947 ई० को
(घ) 26 जनवरी, 1950 ई० को

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(2) प्रथम पंचवर्षीय योजना लागू की गई|
(क) 1 अप्रैल, 1951 ई० में
(ख) 11 अप्रैल, 1952 ई० में
(ग) 11 अप्रैल, 1951 ई० में
(घ) 15 दिसम्बर 1952 ई० में

प्रश्न 2.
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
(1) जब हम आजाद हुए तो देश में कुल रियासतें कितनी थीं?
उत्तर
जब हम आजाद हुए तो देश में कुल 562 रियासतें थीं?

(2) लौह पुरुष किसे कहा जाता है?
उत्तर
लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल को कहा जाता है?

प्रश्न 3.
लघु उत्तरीय प्रश्न
(1) स्वतंत्र भारत का प्रधानमंत्री किसे बनाया गया तथा उनको शपथ किसने दिलाई?
उत्तर
स्वतंत्र भारंत का प्रधानमंत्री पं० जवाहर लाल नेहरू को बनाया गया तथा उनको शपथ गवर्नर । जनरल लार्ड माउन्ट बेटेन ने दिलाई।

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(2) शरणार्थियों को समस्या क्या थी? ।
उत्तर
देश के विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान में हुए साम्प्रदायिक (UPBoardSolutions.com) दंगों के कारण पाकिस्तान से भारत आए लगभग 75 हजार हिन्दू, सिख और मुसलमान शरणार्थी भाइयों को बसाना एवं उनको रोजगार देना एक गंभीर समस्या थी।

प्रश्न 4.
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
(1) स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में कौन-कौन सी तत्कालीन समस्याएं थीं? इनका समाधान किस प्रकार से किया गया?
उत्तर
स्वतन्त्रता मिलने के बाद भारत को निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ा-
(क) शरणार्थियों की समस्या- शरणार्थी लाखों की संख्या में पाकिस्तान के भिन्न-भिन्न इलाकों से आए। उनकी सहायता तथा रोजगार देने की कठिन समस्या भारत के सामने थी।

(ख) औद्योगिक समस्या- देश के विभाजन से पहले भारत का जूट तथा वस्त्र उद्योग बहुत उन्नत था परन्तु विभाजन के बाद जूट और कपास पैदा करने वाले क्षेत्र पाकिस्तान चले गए और अर्थव्यवस्था असन्तुलित हो गई थी। उद्योगों के लिए कच्चे माल का अभाव हो गया। कपास और पटसन के कारखाने तो भारत में थे परन्तु कच्चे माल का उत्पादन करने वाले अधिकांश (UPBoardSolutions.com) क्षेत्र पाकिस्तान में थे। अत: बहुत से कारखाने बन्द हो गए।

(ग) देशी राज्यों की समस्या- भारत की स्वतन्त्रता के साथ 500 से अधिक देशी रियासतें भी स्वतन्त्र हो गईं। इन रियासतों को भारतीय संघ में शामिल किए बिना भारत की स्वतन्त्रता अधूरी थी।

(घ) खाद्यान्न की समस्या- देश के विभाजन से गेहूँ और चावल पैदा करने वाला काफी सारा उपजाऊ क्षेत्र पाकिस्तान में चला गया। इसी प्रकार भारत में नहरी सिंचाई वाले क्षेत्र भी कम रह गए। अतः भारत में खाद्यान्न की समस्या पैदा हो गई।

(ङ) परिवहन व्यवस्था का तहस-नहस होना- परिवहन व्यवस्था तहस-नहस हो गई, जरूरी चीजों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने में कठिनाई आई।

समाधान- सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च करके शरणार्थियों को बसाया। पंचवर्षीय योजनाओं के द्वारा खाद्यान्न, औद्योगिक तथा रोजगार समस्याओं को हल किया गया। सरदार पटेल के प्रयत्नों (UPBoardSolutions.com) से देश को एकीकरण हुआ। सितम्बर 1961 ई० में सैनिक कार्यवाही करने पर पुर्तगालियों ने गोआ, दमन और दीव, दादरा और नगर हवेली भारत को सौंप दिए।

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प्रोजेक्ट वर्क-
विद्यार्थी स्वयं करें।

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UP Board Solutions for Class 8 History Chapter 5 प्रथम स्वतंत्रता संग्राम-कारण एवं परिणाम

UP Board Solutions for Class 8 History Chapter 5 प्रथम स्वतंत्रता संग्राम-कारण एवं परिणाम

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प्रथम स्वतंत्रता संग्राम-कारण एवं परिणाम

अभ्यास

प्रश्न 1.
बहुविकल्पीय प्रश्न
(1) 1857 ई० की क्रांति के लिए तिथि निश्चित की गई
(क) 8 अप्रैल 1857 ई०
(ख) 31 मई 1857 ई०
(ग) 10 मई 1857 ई०
(घ) 1 जून 1857 ई०

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(2) बहादुरशाह द्वितीय की मृत्यु हुई
(क) रंगून में
(ख) कानपुर में
(ग) झाँसी में
(घ) लखनऊ में :

प्रश्न 2.
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
(1) 1835 ई० में कम्पनी के सिक्कों से किसका नाम हटा दिया गया?
उत्तर
1835 ई० में कम्पनी के सिक्कों से मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर का नाम हटा दिया गया।

(2) सन् 1857 ई० की क्रांति की शुरूआत कहाँ से हुई?
उत्तर
सन् 1857 ई० की क्रांति की शुरूआत बैरकपुर से हुई।

(3) बंगाले छावनी के किस सिपाही ने कारतूस का प्रयोग करने से मना कर दिया था?
उत्तर
बंगाल छावनी के सिपाही मंगल पाण्डे ने कारतूस का प्रयोग करने से मना कर दिया था।

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प्रश्न 3.
लघु उत्तरीय प्रश्न
(1) 1857 ई० की क्रांति के चार कारण लिखिए।
उत्तर
(क) राजनैतिक कारण- अँग्रेजों की युद्ध नीति, लॉर्ड वेलेजली द्वारा चलाई गई सहायक सन्धि नीति तथा लॉर्ड डलहौजी की लैप्स नीति के परिणामस्वरूप बंगाल, बिहार, उड़ीसा, अवध, हैदराबाद, म्यांमार (बर्मा), पंजाब, सतारा, नागपुर, झाँसी आदि भारतीय रियासतों को हड़प लिया गया। अँग्रेजों ने ‘ग्राम स्वराज्य’ (पंचायतों) को समाप्त करके (UPBoardSolutions.com) लोगों को गुलामी की जंजीरों में जकड़ लिया, जिससे राजनैतिक असंतोष फैल गया।

(ख) आर्थिक शोषण- अंग्रेजों ने भारतीय व्यापार तथा दस्तकारियों को नष्ट कर दिया। वे भारत से कच्चा माल कौड़ियों के भाव खरीद लेते थे और अपने कारखानों में उसे संशोधित कर तैयार माल को भारत के बाजारों में ऊँचे दामों पर बेचते थे। अँग्रेजों की भूमि-कर नीति के बाद भारत में अकाल पड़े और बेरोजगारी फैल गई। उच्च सरकारी नौकरियों के दरवाजे भारतीयों के लिए बन्द कर दिए गए।

(ग) धार्मिक हस्तक्षेप- अँग्रेजों ने बड़ी संख्या में भारतीयों को ईसाई बना लिया। एक कानून द्वारा धर्म-परिवर्तन करने वालों को पैतृक सम्पत्ति में हिस्सा देने का निर्णय लिया गया। इससे अँग्रेजों ने ईसाई बनने वालों के हितों की रक्षा की। भारतीय हिन्दुओं तथा मुसलमानों में असन्तोष का यह एक प्रमुख कारण था।

(घ) सामाजिक कारण- अँग्रेज साम्राज्यवादी नीति पर चलकर अपने स्वार्थ को पाल रहे थे। घूस और भ्रष्टाचार का बाजार गर्म था। अँग्रेजों ने पंचायत व्यवस्था को भी समाप्त कर दिया। इससे न्याय महँगा हो गया और देर से मिलने लगा। नई भूमि-कर व्यवस्था से भी किसानों का शोषण हुआ, जिससे अँग्रेजों के विरुद्ध जन-असंतोष का बढ़ना स्वाभाविक था।

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(2) 1857 ई० की क्रांति की असफलता के कारण लिखिए।
उत्तर
1857 ई० की क्रान्ति की असफलता के कारण

  1. क्रान्ति की असफलता का सबसे बड़ा कारण किसी निश्चित योजना तथा केन्द्रीय संगठन का न होना था, जिससे स्थानीय विद्रोह एक-दूसरे से जुड़कर राष्ट्रव्यापी स्वरूप धारण न कर सका।
  2. सारे देश में एक निश्चित तिथि को क्रान्ति का प्रारम्भ न होना (UPBoardSolutions.com) भी विद्रोहियों की हार का एक कारण था।
  3. यातायात के प्रमुख साधनों (विशेषकर रेलों) तथा डाक-तार व्यवस्था पर अँग्रेजों को अधिकार था। इससे वे अपने सैनिकों को युद्ध के स्थानों पर शीघ्र पहुँचा देते थे। उन्हें संचार साधनों से विद्रोहियों की गतिविधियों का तुरन्त पता चल जाता था और वे समय रहते ही उनसे निपटने की योजना बना लेते थे।
  4. अँग्रेजों को अपने मातृदेश इंग्लैण्ड से निरन्तर जन, धन तथा सामरिक सामग्री की पूरी सहायता मिलती रही, जिससे उनकी स्थिति मजबूत बनी रही और उनका मनोबल ऊँचा रहा।
  5. अँग्रेजों की अपेक्षा क्रान्तिकारियों के नेता अनुभवहीन तथा अयोग्य थे।
  6. बहुत-से भारतीय नरेशों ने भी अँग्रेजों का साथ दिया।

प्रश्न 4.
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
(1) 1857 ई० की क्रांति की प्रमुख घटनाओं के बारे में लिखिए।
उत्तर
1857 ई० की क्रांति की प्रमुख घटनाएँ निम्नलिखित हैं-
बैरकपुर में लार्ड कैनिंग ने चर्बीयुक्त कारतूस के प्रयोग के लिए भारतीय सैनिकों के साथ धोखाधड़ी की। 29 मार्च, 1857 को बंगाल छावनी के सिपाही मंगल पाण्डे ने कारतूस के प्रयोग से मना कर दिया तथा अपने साथियों को विद्रोह के लिए संगठित किया। इसके परिणाम स्वरूप मंगल पाण्डे को फाँसी दे दी गयी।

मेरठ में 9 मई की घटना के अनुसार 90 में से 85 सिपाहियों ने कारतूस में दाँत लगाने से मना कर दिया। इस कारण इन सिपाहियों को दस वर्ष की जेल की सख्त सजा दी गयी। 19 मई, 1857 को मेरठ में तैनात पूरी (UPBoardSolutions.com) भारतीय सेना ने विद्रोह कर दिया तथा जेल पर धावा बोलकर अपने साथियों को छुड़ा लिया और कई अंग्रेज अधिकारियों को मार डाला।

बहराइच में हजारों सैनिकों ने दिल्ली की ओर कूच किया। वहाँ के लोग उनके साथ मिलकर लालकिले पहुँचे। वहाँ पहुँचकर बहादुरशाह-द्वितीय को भारत का शासक घोषित कर दिया।

बरेली में खान बहादुर खान ने क्रांति का नेतृत्व किया उन्होंने स्वयं को नवाब घोषित कर दिया। कैम्पबेल के नेतृत्व में यहाँ की क्रांति को दबाया गया तथा खान बहादुर खान को फाँसी दे दी गई।

कानपुर में नाना साहब पेशवा घोषित कर दिए गए। अजीम उल्ला खाँ नाना साहब का सहयोगी था। नाना साहेब ने अंग्रेजों की सारी फौज को कानपुर से खदेड़ दिया।

आजमगढ़ में स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व बाबू कुँवर सिंह ने किया। अतरौलिया नामक स्थान पर उन्होंने मिलमैन एवं डेन्स की संयुक्त अंग्रेजी सेना को पराजित किया। युद्ध में लड़ते-लड़ते 26 अप्रैल, 1858 ई० को इनकी मृत्यु हो गई।

झाँसी में रानी लक्ष्मी बाई सर हयूरोज की सेना के साथ बहादुरी से लड़ीं किन्तु झाँसी पर अंग्रेजों ने अधिकार कर लिया। रानी बहादुरी से लड़ते हुए मारी गयीं।

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