UP Board Solutions for Class 8 Science Chapter 6 कोशिका से अंग तंत्र तक

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कोशिका से अंग तंत्र तक

अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित के सही विकल्प चुनकर अपनी अभ्यास पुस्तिका में लिखिए
उत्तर
(क) एककोशिक जीव. का उदाहरण है
(अ) मनुष्य
(ब) हाथी
(स) अमीबा
(द) बरगद

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(ख) पादप कोशिका की प्रमुख विशेषता है
(अ) कोशिकाभिति
(ब) हरितलवक
(स) बड़ी रिक्तिका
(द) उपरोक्त सभी

(ग) कोशिका का ऊर्जा ग्रह कहा जाता है
(अ) हरितलवक को
(ब) माइटोकाण्ड्रिया को
(स) रिक्तिका को
(द) राइबोसोम को

(घ) ऑक्सिन है-
(अ) जन्तु हार्मोन्स
(ब) औषधि
(स) उत्सर्जी पदार्थ
(द) पादप हार्मोन्स

(ङ) फलों को पकाने के लिए कौन सा हार्मोन्स उपयोग किया जाता है?
(अ) ऑक्सिन
(ब) एबसिसिक अम्ल
(स) एथिलीन
(द) साइटोकाइनिन

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प्रश्न 2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति करो
उत्तर
(क) जन्तुओं में हार्मोन्स अन्तःस्रावी ग्रंथियाँ द्वारा स्रावित होते हैं।
(ख) कोशिका सजीवों की रचनात्मक एवं कार्यात्मक इकाई है।
(ग) जिबरेलिन ऊत्तक पौधों (UPBoardSolutions.com) की लम्बाई में वृद्धि करने में सहायक होता है।
(घ) शरीर के बाह्य सुरक्षात्मक आवरण बनाने में एपीथिलियम् ऊत्तक सहायता करते हैं।
(ङ) समान रचना एवं कार्य वाली कोशिका के समूह को ऊतक कहते हैं।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित के सही जोड़े बनाइए
उत्तर
UP Board Solutions for Class 8 Science Chapter 6 कोशिका से अंग तंत्र तक img-1

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से सही कथन के आगे सही (✓) का निशान लगाएँ (UPBoardSolutions.com) तथा गलत कथन के आगे गलत (✗) का निशान लगाएँ।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 8 Science Chapter 6 कोशिका से अंग तंत्र तक img-2

प्रश्न 5.
कोशिका के किस भाग में कोशिकांग पाये जाते हैं?
उत्तर
जीवद्रव्य कला में कोशिकांग पाये जाते हैं।

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प्रश्न 6.
प्रतिभाजी ऊतक की दो विशेषताएँ बताइये। ये कहाँ पाये जाते हैं?
उत्तर
अविभाजी ऊतक की कोशिकाएँ-

  1. विभज्योत्तक उतक की कोशिकाएँ समान व्यास वाली होती हैं, जिनका आकार आयताकार या बहुभुजी होती है।
  2.  इन कोशिकाओं का केन्द्रक बड़ा, जीवद्रव्य सघन तथा (UPBoardSolutions.com) इनमें रिक्तिका अनुपस्थित रहती है। उदाहरण- प्याज,

ये पौधे के रूपट टिप, शूट टिप ओर कैबियम में पाये जाते हैं।

प्रश्न 7.
किन्हीं दो अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के नाम तथा उनके कार्य लिखिए।
उत्तर
दो अन्तस्रावी ग्रन्थियाँ निम्नलिखित हैं-

  1. पीयूष ग्रन्थि (कार्य)- शरीर में वृद्धि करता है। इसकी कमी से वृद्धि रुक जाती है।
  2. थायरॉइड ग्रन्थि (कार्य)- शरीर की उपापचयी क्रियाओं को (UPBoardSolutions.com) नियन्त्रित करता है। इसकी कमी से पेंघा रोग होता है।

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प्रश्न 8.
पादप तथा जन्तु कोशिका में अन्तर लिखिए।
उत्तर
पादप और जन्तु कोशिका में अन्तर-
UP Board Solutions for Class 8 Science Chapter 6 कोशिका से अंग तंत्र तक img-3
प्रश्न 9.
केवल चित्रों के माध्यम से रेखित तथा अरेखित (UPBoardSolutions.com) पेशी ऊतक स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 8 Science Chapter 6 कोशिका से अंग तंत्र तक img-4

प्रश्न 10.
पादप कोशिका का नामांकित चित्र बनाइये।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 8 Science Chapter 6 कोशिका से अंग तंत्र तक img-5

● नोट- प्रोजेक्ट कार्य छात्र स्वयं करें।

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UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 9 पर्यावरण और जनजीवन पर उसका प्रभाव

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 9 पर्यावरण और जनजीवन पर उसका प्रभाव

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
पर्यावरण का अर्थ और परिभाषा निर्धारित कीजिए तथा पर्यावरण के विभिन्न वर्गों का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर:
पर्यावरण का अर्थ एवं परिभाषाएँ

मनष्य ही क्या प्रत्येक प्राणी एवं वनस्पति जगत भी पर्यावरण से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है तथा ये सभी अपने पर्यावरण से प्रभावित भी होते हैं। पर्यावरण की अवधारणा को स्पष्ट करने से पूर्व ‘पर्यावरण के शाब्दिक अर्थ को स्पष्ट करना आवश्यक है।
पर्यावरण शब्द दो शब्दों अर्थात् ‘परि’ तथा ‘आवरण’ के संयोग या मेल से बना है। ‘परि’ का अर्थ है चारों ओर’ तथा आवरण का अर्थ है ‘घेरा। इस प्रकार पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ हुआ चारों ओर का घेरा’। इस प्रकार व्यक्ति के सन्दर्भ में कहा जा सकता है कि (UPBoardSolutions.com) व्यक्ति के चारों ओर जो प्राकृतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक शक्तियाँ और परिस्थितियाँ विद्यमान हैं, इनके प्रभावी रूप को ही पर्यावरण कहा जाता है। पर्यावरण का क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत है। पर्यावरण उन समस्त शक्तियों, वस्तुओं और दशाओं का योग है, जो मानव को चारों ओर से आवृत किए हुए हैं। मानवे से लेकर वनस्पति तथा सूक्ष्म जीव तक सभी पर्यावरण के अभिन्न अंग हैं। पर्यावरण उन सभी बाह्य दशाओं एवं प्रभावों का योग है, जो जीव के कार्य-कलापों एवं जीवन को प्रभावित करता है। मानव जीवन पर्यावरण से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है।

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पर्यावरण के शाब्दिक अर्थ एवं सामान्य परिचय को जान लेने के उपरान्त इस अवधारणा की व्यवस्थित परिभाषा प्रस्तुत करना भी आवश्यक है। कुछ मुख्य समाज वैज्ञानिकों द्वारा प्रतिपादित परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

  1.  जिस्बर्ट के अनुसार पर्यावरण से आशय उन समस्त कारकों से है जो किसी व्यक्ति या जीव को चारों ओर से घेरे रहते हैं तथा उसे प्रभावित करते हैं एवं जीव अपने पर्यावरण के प्रभाव से बच नहीं सकता। उनके शब्दों में, “पर्यावरण वह है जो किसी वस्तु को चारों ओर से घेरे हुए है तथा उस पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालता है।”
  2.  रॉस ने पर्यावरण के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए एक संक्षिप्त परिभाषा इन शब्दों में प्रस्तुत की है, “पर्यावरण हमें प्रभावित करने वाली कोई बाहरी शक्ति है।”

उपर्युक्त विवरण द्वारा पर्यावरण का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। निष्कर्ष स्वरूप कहा जा सकता है। कि व्यक्ति के सन्दर्भ में स्वयं व्यक्ति को छोड़कर इस जगत् में जो कुछ भी है वह सब कुछ सम्मिलित रूप से व्यक्ति का पर्यावरण है।

पर्यावरण का वर्गीकरण
पर्यावरण के अर्थ एवं परिभाषा सम्बन्धी विवरण के आधार पर कहा जा सकता है कि पर्यावरण की धारणा अपने आप में एक विस्तृत अवधारणा है। इस स्थिति में पर्यावरण के व्यवस्थित अध्ययन के लिए पर्यावरण को समुचित वर्गीकरण प्रस्तुत करना आवश्यक है। सम्पूर्ण पर्यावरण को मुख्य रूप से निम्नलिखित तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है

(1) प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण:
प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण के अन्तर्गत समस्त प्राकृतिक शक्तियों एवं कारकों को सम्मिलित किया जाता है। पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, पर्यावरण और जनजीवन पर उसका प्रभाव 113 वनस्पति जगत् तथा जीव-जन्तु तो प्राकृतिक पर्यावरण के घटक ही हैं। इनके अतिरिक्त प्राकृतिक शक्तियों एवं घटनाओं को भी प्राकृतिक पर्यावरण ही माना जाएगा। सामान्य रूप से कहा जा सकता है। कि प्राकृतिक पर्यावरण न तो मनुष्य द्वारा निर्मित है और (UPBoardSolutions.com) न यह मनुष्य द्वारा नियन्त्रित ही है। प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण का प्रभाव मनुष्य के जीवन के सभी पक्षों पर पड़ता है। जब हम पर्यावरण-प्रदूषण की बात करते हैं तब पर्यावरण से आशय सामान्य रूप से प्राकृतिक पर्यावरण से ही होता है।

(2) सामाजिक पर्यावरण:
सामाजिक पर्यावरण भी पर्यावरण का एक रूप या पक्ष है। सम्पूर्ण सामाजिक ढाँचा ही सामाजिक पर्यावरण कहलाता है। इसे सामाजिक सम्बन्धों का पर्यावरण भी कहा जा सकता है। परिवार, पड़ोस, खेल के साथी, समाज, समुदाय, विद्यालय आदि सभी सामाजिक पर्यावरण के ही घटक हैं। सामाजिक पर्यावरण भी व्यक्ति को गम्भीर रूप से प्रभावित करता है, परन्तु यह सत्य है कि व्यक्ति सामाजिक पर्यावरण के निर्माण एवं विकास में अपना योगदान प्रदान करता है।

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(3) सांस्कृतिक पर्यावरण:
पर्यावरण का एक रूप या पक्ष सांस्कृतिक पर्यावरण भी है। सांस्कृतिक पर्यावरण प्रकृति-प्रदत्त नहीं है, बल्कि इसका निर्माण स्वयं मनुष्य ने ही किया है। मनुष्य के अतिरिक्त अन्य सभी प्राणियों के सन्दर्भ में सांस्कृतिक पर्यावरण का कोई महत्त्व नहीं है। वास्तव में मनुष्य द्वारा निर्मित वस्तुओं का समग्र रूप तथा परिवेश सांस्कृतिक पर्यावरण कहलाता है। सांस्कृतिक पर्यावरण भौतिक तथा अभौतिक दो प्रकार का होता है। सभी प्रकार के मानव-निर्मित उपकरण एवं साधन सांस्कृतिक पर्यावरण के भौतिक पक्ष में सम्मिलित हैं। इससे भिन्न मनुष्य द्वारा विकसित किए गए मूल्य, संस्कृति, धर्म, भाषा, रूढ़ियाँ, परम्पराएँ आदि सम्मिलित रूप से सांस्कृतिक पर्यावरण के अभौतिक पक्ष का निर्माण करते हैं।

प्रश्न 2:
पर्यावरण के जनजीवन पर पड़ने वाले प्रत्यक्ष प्रभावों का वर्णन कीजिए। [2010]
या
प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण जनजीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।” इस कथन को स्पष्ट करते हुए पर्यावरण के प्रभावों का वर्णन कीजिए।
या
पर्यावरण मानव के लिए किस प्रकार उपयोगी है?
उत्तर:
जब पर्यावरण के प्रभावों का अध्ययन किया जाता है, तब सर्वप्रथम प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण के प्रभावों को ही अध्ययन किया जाता है। वास्तव में पर्यावरण का यही रूप प्रकृति प्रदत्त है तथा मनुष्य के नियन्त्रण से बाहर है। भौगोलिक पर्यावरण के अर्थ को डॉ० डेविस ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “मनुष्य के सन्दर्भ में भौगोलिक पर्यावरण से अभिप्राय भूमि या मानव के चारों ओर फैले उन सभी भौतिक स्वरूपों से है जिनमें वह रहता है, जिनका उसकी आदतों एवं क्रियाओं पर प्रभाव पड़ता है। इस कथन से स्पष्ट है कि प्राकृतिक पर्यावरण के समस्त कारक मनुष्य
के नियन्त्रण से मुक्त हैं।

पर्यावरण के जनजीवन पर प्रत्यक्ष प्रभाव
पर्यावरण जनजीवन के सभी पक्षों को गम्भीर रूप से प्रभावित करता है। पर्यावरण के जनजीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को सामान्य रूप से दो वर्गों में बाँटा जाता है। प्रथम वर्ग में जनजीवन पर पर्यावरण के प्रत्यक्ष रूप से पड़ने वाले प्रभावों को सम्मिलित किया जाता (UPBoardSolutions.com) है तथा द्वितीय वर्ग में जनजीवन पर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ने वाले प्रभावों को सम्मिलित किया जाता है। पर्यावरण के जनजीवन पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ने वाले प्रभावों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है|

(1) पर्यावरण का जनसंख्या पर प्रभाव:
किसी भी क्षेत्र की जनसंख्या के स्वरूप के निर्धारण में वहाँ के प्राकृतिक पर्यावरण की सर्वाधिक भूमिका होती है। अनुकूल प्राकृतिक पर्यावरण होने पर सम्बन्धित क्षेत्र की जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है तथा प्रतिकूल प्राकृतिक पर्यावरण होने की स्थिति में सम्बन्धित क्षेत्र की जनसंख्या का घनत्व कम होता है। यही कारण है कि उपजाऊ भूमि वाले मैदानी क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है, जबकि रेगिस्तानी क्षेत्रों, बंजर भूमि वाले क्षेत्रों तथा दुर्गम पहाड़ी-क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व कम होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरण जनसंख्या के घनत्व को प्रभावित करता है।

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(2) पर्यावरण का खान-पान पर प्रभाव:
मनुष्य को अपनी खाद्य-सामग्री अपने पर्यावरण से ही प्राप्त होती है। इस स्थिति में जिस क्षेत्र में जो खाद्य-सामग्री बहुतायत में उपलब्ध होती है, वही उस क्षेत्र के निवासियों का मुख्य आहार होती है। उदाहरण के लिए–उपजाऊ मैदानी क्षेत्रों में लोगों का , मुख्य आहार वहाँ उगने वाले अनाज तथा सब्जियाँ एवं दालें आदि ही होते हैं। इससे भिन्न समुद्रतटीय क्षेत्रों में लोग अपने आहार में मछली एवं जलीय जीवों के मांस को अधिक स्थान देते हैं। इसी प्रकार ठण्डे एवं अति ठण्डे क्षेत्रों में रहने वाले अधिकांश व्यक्ति मांसाहारी होते हैं, जबकि गर्म क्षेत्रों के अधिकांश निवासी शाकाहारी होते हैं।

(3) पर्यावरण का वेशभूषा पर प्रभाव:
प्राकृतिक पर्यावरण को वहाँ के निवासियों की वेशभूषा पर भी पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में रहने वाले व्यक्ति बारीक, ढीले तथा सूती वस्त्र धारण करते हैं। इससे भिन्न ठण्डे क्षेत्रों में रहने वाले व्यक्ति गर्म एवं चुस्त वस्त्र धारण किया करते हैं। अनेक ठण्डे प्रदेशों में जानवरों की खाले से भी कोट इत्यादि बनाकर पहने जाते हैं।

(4) पर्यावरण का आवासीय स्वरूप पर प्रभाव:
प्राकृतिक पर्यावरण मनुष्य के निवास हेतु प्रयुक्त मकानों तथा इनकी सामग्री को भी प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए—पर्वतीय पर्यावरण में पत्थर तथा लकड़ी सरलता से उपलब्ध होती है। अत: इन क्षेत्रों में मकान बनाने के लिए पत्थर तथा लकड़ी को ही अधिक इस्तेमाल किया जाता है। जिन क्षेत्रों में वर्षा अधिक होती है वहाँ मकानों की छतें ढलावदार बनाई जाती हैं। मैदानी क्षेत्रों में प्रायः ईंट, सीमेण्ट, लोहे आदि से मकान बनाए जाते हैं। कुछ क्षेत्रों में, प्रायः भूकम्प आते रहते हैं। इन क्षेत्रों को अधिक क्षति से बचाने के दृष्टिकोण से लकड़ी के मकान ही बनाए जाते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरण जन-सामान्य के आवासीय स्वरूप को भी प्रभावित करता है।

(5) पर्यावरण का आवागमन के साधनों पर प्रभाव:
प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण का आवागमन के साधनों के विकास पर भी पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। समुद्र तथा नदियों के निकटवर्ती क्षेत्रों में स्टीमर एवं नौकाएँ आवागमन का साधन होती हैं। मैदानी क्षेत्रों में सड़कें बनाना तथा रेल की पटरियाँ बिछाना सरल होता है। अतः इन क्षेत्रों में रेलगाड़ियाँ, मोटर कारें, बसें आदि वाहन अधिक होते हैं। ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में खच्चर ही आवागमन एवं माल ढोने के साधन माने जाते हैं।

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(6) पर्यावरण का शारीरिक लक्षणों पर प्रभाव:
जन-सामान्य के शारीरिक लक्षणों पर भौगोलिक पर्यावरण का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति की त्वचा के रंग पर जलवायु एवं स्थानीय तापमान का अनिवार्य रूप से प्रभाव पड़ता है। गर्म क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का रंग बहुधा काला तथा ठण्डे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का रंग (UPBoardSolutions.com) गोरा होता है। भूमध्यरेखीय जलवायु में रहने वाले व्यक्ति वहाँ की अतिरिक्त उष्णता के कारण नाटे कद के और काले रंग के होते हैं, जबकि भूमध्यसागरीय जलवायु के निवासी प्रायः गोरे तथा लम्बे कद के होते हैं।

(7) पर्यावरण का व्यावसायिक जीवन पर प्रभाव:
प्राकृतिक पर्यावरण सम्बन्धित क्षेत्र के निवासियों के मूल व्यवसायों को भी प्रभावित करता है। यह सर्वविदित तथ्य है कि समुद्र एवं जुल-स्रोतों के निकट रहने वाले लोगों का मुख्य व्यवसाय मछली पकड़ना होता है। नदियों से सिंचित मैदानी क्षेत्रों में कृषि-कार्य ही मुख्य व्यवसाय होता है। पहाड़ी क्षेत्रों में भेड़-बकरियाँ पालना एक मूले व्यवसाय माना जाता है, जब कि अधिक वन वाले क्षेत्रों में लकड़ी काटना मूल व्यवसाय माना जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरण अनिवार्य रूप से व्यावसायिक जीवन को भी प्रभावित करता है।

प्रश्न 3:
पर्यावरण-प्रदूषण से आप क्या समझती हैं? पर्यावरण-प्रदूषण के सामान्य कारणों काभी वर्णन कीजिए। [2007, 08, 16, 18]
या
पर्यावरण प्रदूषण की परिभाषा लिखिए। प्रदूषण के कारण बताइए। पर्यावरण-प्रदुषण नियन्त्रण के लिए सरकार द्वारा क्या उपाय किए गए हैं? [2008, 09, 11, 12]
या
पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य कारण क्या हैं? [2017]
या
जनजीवन पर पर्यावरण के हानिकारक प्रभाव को रोकने के बारे में लिखिए। [2013]
उत्तर:
पर्यावरण-प्रदूषण का अर्थ

पर्यावरण-प्रदूषण का सामान्य अर्थ है-हमारे पर्यावरण का दूषित हो जाना। पर्यावरण को निर्माण प्रकृति ने किया है। प्रकृति-प्रदत्त पर्यावरण में जब किन्ही तत्त्वों का अनुपात इस रूप में बदलने जगती है जिसका जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना होती है, तब कहा जाता है कि यावरण प्रदूषित हो रहा है। उदाहरण के लिए-यदि पर्यावरण के मुख्य भाग वायु में ऑक्सीजन के स्थान पर अन्य विषैली गैसों का अनुपात बढ़ जाये तो कहा जाएगा कि वायु-प्रदूषण हो गया है। ण के किसी भी भाग के दूषित हो जाने को पर्यावरण-प्रदूषण कहा जाएगा। यह प्रदूषण जल-प्रदूषण, मृदा-प्रदूषण, वायु-प्रदूषण तथा ध्वनि-प्रदूषण के रूप में हो सकता है।

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पर्यावरण-प्रदूषण के सामान्य कारण
पर्यावरण प्रदूषण अपने आप में एक गम्भीर तथा व्यापक समस्या है। इस समस्या को उत्पन्न करने तथा बढ़ावा देने वाले वैसे तो असंख्य कारण हैं, परन्तु कुछ सामान्य कारण ऐसे हैं जो अधिक प्रबल तथा
अति स्पष्ट हैं। इस वर्ग के कारणों को ही पर्यावरण-प्रदूषण के सामान्य लक्षण कहा जाता है। इस वर्ग के मुख्य कारणों का सामान्य परिचय निम्नवर्णित है

(1) जल-मल का अनियमित निष्कासन:
आवासीय क्षेत्रों से जल-मल का अनियमित निष्कासन पर्यावरण-प्रदूषण का एक मुख्य (UPBoardSolutions.com) कारण है। खुले शौचालयों से उत्पन्न होने वाली दुर्गन्ध वायु प्रदूषण में सर्वाधिक योगदान देती है। इसके अतिरिक्त वाहित मल जल के स्रोतों को प्रदूषित करता है। घरों में इस्तेमाल होने वाला जल भी विभिन्न कारणों से अत्यधिक प्रदूषित हो जाता है तथा नाले-नालियों के माध्यम से यह दूषित जल नदियों के जल को भी प्रदूषित कर देता है।

(2) घरेलू अवशिष्ट पदार्थ:
घरों में इस्तेमाल होने वाले असंख्य पदार्थों के अवशिष्ट भाग भी पर्यावरण-प्रदूषण में उल्लेखनीय योगदान प्रदान करते हैं। फिनाइल, मच्छर मारने वाले घोल, डिब्बाबन्दी में इस्तेमाल डिब्बे, डिटर्जेण्ट, शैम्पू, साबुन आदि सभी के अवशेष जल, वायु तथा मिट्टी को गम्भीर रूप से प्रदूषित करते हैं।

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(3) औद्योगिकीकरण:
तीव्र गति से होने वाला औद्योगिकीकरण भी पर्यावरण-प्रदूषण के लिए जिम्मेदार एक मुख्य कारण है। औद्योगिक संस्थानों में जहाँ ईंधन जलने से वायु-प्रदूषण होता है। वहीं उनमें इस्तेमाल होने वाली रासायनिक सामग्री के अवशेष आदि वायु, जल तथा मिट्टी को निरन्तर प्रदूषित करते हैं। औद्योगिक संस्थानों में चलने वाली मशीनों, सायरनों तथा अन्य कारणों से ध्वनि-प्रदूषण में भी वृद्धि होती है।

(4) दहन तथा धुआँ:
आधुनिक-उन्नत समाज में मानव ने दहन का क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत कर लिया है। घरेलू रसोईघर से लेकर असंख्य वाहनों तथा औद्योगिक संस्थानों में सर्वत्र दहन का ही बोलबाला है, लकड़ी, कोयला, गैस, पेट्रोल तथा डीजल आदि के दहन से जहाँ अनेक विषैली गैसें तथा धुआँ उत्पन्न होता है, वहीं अप्राकृतिक स्रोतों से भी हानिकारक गैसें उत्पन्न होती हैं। ये सब सामूहिक रूप से वायु के प्राकृतिक स्वरूप को परिवर्तित करते हैं। परिणामस्वरूप वायु प्रदूषण में निरन्तर वृद्धि हो रही है।

(5) कीटनाशकों का बढ़ता प्रयोग:
जैसे-जैसे कृषि एवं उद्यान-क्षेत्र में विस्तार हुआ है, वैसे-वैसे कीटनाशकों को प्रयोग भी निरन्तर बढ़ा है। विभिन्न कीटनाशक अत्यधिक विषैले हैं तथा इनका प्रभाव दूरगामी है। फसलों पर तथा घरों में होने वाले कीटनाशकों के छिड़काव से वायु, जल तथा मिट्टी का अत्यधिक प्रदूषण हो रहा है। इस प्रदूषण का प्रतिकूल प्रभाव मनुष्यों तथा पशु-पक्षियों पर
निरन्तर पड़ रहा है।

(6) नदियों में कूड़ा-करकट तथा मृत शरीर बहाना:
जैसे-जैसे जनसंख्या तथा नगरीकरण में वृद्धि हो रही है; वैसे-वैसे कूड़े-करकट की समस्या भी बढ़ रही है। अज्ञानता तथा प्रचलन के अनुसार कूड़े-करकट तथा मनुष्यों एवं पशुओं के मृत-शरीरों को नदियों में बहा दिया जाता है। इस प्रकार का विसर्जन सुविधाजनक तो (UPBoardSolutions.com) प्रतीत होता है, परन्तु इस प्रचलन के परिणामस्वरूप जल-प्रदूषण में अत्यधिक वृद्धि होती है। इस जल-प्रदूषण से कुछ अंशों में वायु तथा मिट्टी के प्रदूषण में भी वृद्धि होती है।

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(7) वृक्षों की अत्यधिक कटाई:
पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि करने वाला एक मुख्य उल्लेखनीय कारण वृक्षों की अत्यधिक कटाई भी है। वृक्ष वे प्रकृति-प्रदत्त कारक हैं जो वायु के प्राकृतिक स्वरूप को सन्तुलित बनाये रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वृक्ष सूर्य के प्रकाश से कार्बन डाइ-ऑक्साइड ग्रहण करके ऑक्सीजन छोड़ते हैं। वृक्षों के अत्यधिक संख्या में कट जाने के परिणामस्वरूप वायु का प्राकृतिक स्वरूप विकृत होने लगती है और वायु-प्रदूषण की स्थिति को बढ़ावा मिलता है।

(8) रेडियोधर्मी पदार्थ:
पर्यावरण प्रदूषण के लिए उत्तरदायी कारकों में रेडियोधर्मी पदार्थों का भी उल्लेखनीय योगदान है। विभिन्न आणविक परीक्षणों के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले रेडियोधर्मी पदार्थों ने भी पर्यावरण को गम्भीर रूप से प्रदूषित किया है। प्रदूषण के इस कारक के गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव सभी प्राणियों तथा पेड़-पौधों पर भी पड़ रहे हैं। विभिन्न प्रकार के कैन्सर तथा
आनुवंशिक रोग इसी प्रकार के प्रदूषण के परिणाम हैं।

पर्यावरण-प्रदूषण पर नियन्त्रण

पर्यावरण-प्रदूषण अपने आप में एक गम्भीर समस्या है तथा सम्पूर्ण मानव-जगत के लिए एक चुनौती है। इस समस्या के समाधान के लिए मानव-मात्रं चिन्तित है। विश्व के प्रायः सभी देशों में पर्यावरण-प्रदूषण पर प्रभावी नियन्त्रण के लिए अनेक उपाय किए जा रहे हैं। हमारे देश में भी इस समस्या से मुकाबला करने के लिए अनेक उपाय किए जा रहे हैं। कुछ उपायों का संक्षिप्त विवरण निम्नवर्णित है

  1. औद्योगिक संस्थानों के लिए कड़े निर्देश जारी किए गए हैं कि वे पर्यावरण-प्रदूषण को नियन्त्रित करने के हर सम्भव उपाय करें। इसके लिए आवश्यक है कि पर्याप्त ऊँची चिमनियाँ लगाई. जाएँ तथा उनमें उच्च कोटि के छन्ने लगाए जाएँ। औद्योगिक संस्थानों से विसर्जित होने वाले जल को पूर्ण रूप से उपचारित करके ही पर्यावरण में छोड़ा जाना चाहिए। यही नहीं, ध्वनि-प्रदूषण को रोकने के लिए जहाँ तक सम्भव हो ध्वनि अवरोधक लगाये जाने चाहिए। औद्योगिक संस्थानों के आस-पास अधिक-से-अधिक वृक्ष लगाए जाने चाहिए।
  2. वाहन पर्यावरण-प्रदूषण के मुख्य कारण हैं; अत: वाहनों द्वारा होने वाले प्रदूषण को भी नियन्त्रित करना आवश्यक है। इसके लिए वाहनों के इंजन की समय-समय पर जाँच करवाई जानी
    चाहिए। ईंधन में होने वाली मिलावट को भी रोका जाना चाहिए।
  3. जन-सामान्य को पर्यावरण-प्रदूषण के प्रति सचेत होना चाहिए तथा जीवन के हर क्षेत्र में प्रदूषण पर प्रभावी रोक लगाने के हर सम्भव उपाय किए जाने चाहिए।
    पर्यावरण-प्रदूषण वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति की समस्या है; अतः इसे नियन्त्रित (UPBoardSolutions.com) करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को जागरूक होना चाहिए। पर्यावरण प्रदूषण के प्रत्येक कारण को जानने का प्रयास किया जाना चाहिए तथा प्रत्येक कारण के निवारण का भी उपाय किया जाना चाहिए।

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प्रश्न 4:
पर्यावरण-प्रदूषण का जनजीवन पर प्रभाव स्पष्ट कीजिए। [2008, 09, 11, 12, 13, 17, 18]
या
पर्यावरण के दूषित होने से मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
या
विस्तारपूर्वक समझाइए। प्रदूषण किसे कहते हैं? प्रदूषण का मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है? [2011]
या
व्यक्ति के स्वास्थ्य पर पर्यावरण-प्रदूषण का क्या प्रभाव पड़ता है? [2011]
या
मानव जीवन पर पर्यावरण-प्रदूषण का क्या दुष्प्रभाव पड़ता है? संक्षेप में लिखिए। [2017]
उत्तर:
पर्यावरण-प्रदूषण का जनजीवन पर प्रभाव
पर्यावरण का जनजीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है और यह जनजीवन, के सभी पक्षों को प्रभावित करता है। सामान्य स्थितियों में जनजीवन पर्यावरण के अनुरूप निर्धारित हो जाता है तथा उस स्थिति में पर्यावरण से कोई हानि नहीं होती, परन्तु जब पर्यावरण प्रदूषित हो जाता है अर्थात् प्रदूषण की दर बढ़ जाती है तो जन-सामान्य के जीवन पर प्रतिकूल तथा हानिकारक प्रभाव पड़ने लगता है। पर्यावरण-प्रदूषण का अर्थ है-पर्यावरण के किसी एक या सभी पक्षों का दूषित हो जाना। पर्यावरण-प्रदूषण के परिणामस्वरूप विभिन्न साधारण, गम्भीर तथा अति गम्भीर रोग पनपने लगते हैं। जिनसे जन-स्वास्थ्य को गम्भीर खतरा उत्पन्न हो जाता है, परन्तु (UPBoardSolutions.com) पर्यावरण-प्रदूषण का अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिकूल प्रभाव जनसाधारण के आर्थिक जीवन पर भी पड़ता है। रोगों की वृद्धि तथा स्वास्थ्य के निम्न स्तर के कारण जनसाधारण की उत्पादक-क्षमता घटती है तथा रोग निवारण के लिए अतिरिक्त धन व्यय करना पड़ता है। इससे जनसाधारण का जीवन आर्थिक संकट का शिकार हो जाता है। जनजीवन पर पर्यावरण-प्रदूषण के पड़ने वाले प्रभावों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –

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(1) जन-स्वास्थ्य पर प्रभाव:
पर्यावरण-प्रदूषण का सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव जन-स्वास्थ्य पर पड़ता है। जैसे-जैसे पर्यावरण का अधिक प्रदूषण होने लगता है, वैसे-वैसे प्रदूषण जनित रोगों की दर एवं गम्भीरता में वृद्धि होने लगती है। पर्यावरण के भिन्न-भिन्न पक्षों में होने वाले प्रदूषण से भिन्न-भिन्न प्रकार के रोग बढ़ते हैं। हम जानते हैं कि वायु प्रदूषण के परिणामस्वरूप श्वसन-तन्त्र से सम्बन्धित रोग अधिक प्रबल होते हैं। जल-प्रदूषण के परिणामस्वरूप पाचन-तन्त्र से सम्बन्धित रोग अधिक फैलते हैं। ध्वनि-प्रदूषण भी तन्त्रिकी-तन्त्र, हृदय एवं रक्तचाप सम्बन्धी विकारों को जन्म देता है। इसके साथ-ही- साथ मानसिक स्वास्थ्य एवं व्यवहारगत सामान्यता को ध्वनि-प्रदूषण विकृत कर देता है। अन्य प्रकार के प्रदूषण भी जन-सामान्य को विभिन्न सामान्य एवं गम्भीर रोगों का शिकार बनाते हैं। संक्षेप में कहा जा सकता है कि पर्यावरण-प्रदूषण अनिवार्य रूप से जन-स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। प्रदूषित पर्यावरण में रहने वाले व्यक्तियों की औसत आयु भी घटती है तथा स्वास्थ्य का सामान्य स्तर भी निम्न रहता है।

(2) व्यक्तिगत कार्यक्षमता पर प्रभाव:
व्यक्ति एवं समाज की प्रगति में सम्बन्धित व्यक्तियों की कार्यक्षमता का विशेष महत्त्व होता है। यदि व्यक्ति की कार्यक्षमता सामान्य या सामान्य से अधिक हो, तो वह व्यक्ति निश्चित रूप से प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होता है तथा समृद्ध बन सकता है। जहाँ तक पर्यावरण-प्रदूषण का प्रश्न है, इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति की कार्यक्षमता अनिवार्य रूप से घटती है। हम जानते हैं कि पर्यावरण-प्रदूषण के परिणामस्वरूप जन-स्वास्थ्य का स्तर निम्न होता है। निम्न स्वास्थ्य स्तर वाला व्यक्ति न तो अपने कार्य को कुशलतापूर्वक कर सकती है और न ही उसकी उत्पादन-क्षमता सामान्य रह पाती है। ये दोनों ही स्थितियाँ व्यक्ति एवं समाज के लिए हानिकारक सिद्ध होती हैं। वास्तव में प्रदूषित वातावरण में भले ही व्यक्ति अस्वस्थ न भी हो, तो भी उसकी चुस्ती
एवं स्फूर्ति तो घट ही जाती है। यही कारक व्यक्ति की कार्यक्षमता को घटाने के लिए पर्याप्त होता है।

(3) आर्थिक जीवन पर प्रभाव:
व्यक्ति, समाज तथा राष्ट्र की आर्थिक स्थिति पर भी पर्यावरण प्रदूषण का उल्लेखनीय प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वास्तव में यदि व्यक्ति के स्वास्थ्य का स्तर निम्न हो तथा उसकी कार्यक्षमता भी कम हो, तो वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समुचित धन कदापि अर्जित नहीं कर सकता। पर्यावरण-प्रदूषण के परिणामस्वरूप व्यक्ति की उत्पादन क्षमता घट जाती है। इसके साथ-ही-साथ यह भी सत्य है कि यदि व्यक्ति अथवा उसके परिवार का कोई सदस्य प्रदूषण का शिकार होकर किन्हीं साधारण या गम्भीर रोगों से ग्रस्त रहता है तो उसके उपचार पर भी पर्याप्त व्यय करना पड़ सकता है। इससे भी व्यक्ति एवं परिवार का बजट बिगड़ (UPBoardSolutions.com) जाता है तथा व्यक्ति एवं परिवार की आर्थिक स्थिति निम्न हो जाती है।
इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरण-प्रदूषण के प्रभाव से व्यक्ति की आर्थिक स्थिति प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों ही रूपों में कुप्रभावित होती है। इस कारक के प्रबल तथा विस्तृत हो जाने पर समाज एवं
राष्ट्र की आर्थिक स्थिति भी प्रभावित होती है।
उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि पर्यावरण प्रदूषण का जनजीवन पर बहुपक्षीय, गम्भीर तथा प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसलिए पर्यावरण-प्रदूषण को आज गम्भीरतम विश्वस्तरीय समस्या माना जाने लगा है।

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प्रश्न 5:
जल-प्रदूषण क्या है? जल-प्रदूषण के कारण और इसकी रोकथाम के उपाय लिखिए।
मानव जीवन पर पड़ने वाले जल-प्रदूषण के प्रभावों का वर्णन कीजिए। [2012]
या
मानव-जीवन पर वायु-प्रदूषण के प्रभाव लिखिए। [2009, 12, 14]
या
वायु-प्रदूषण किसे कहते हैं ? वायु प्रदूषण के क्या कारण हैं ? वायु-प्रदूषण की रोकथाम के उपायों के लिए अपने सुझाव दीजिए। [2007, 09, 10, 11, 14, 15, 16]
या
वायु-प्रदूषण के कारण, मानव जीवन पर प्रभाव एवं बचाव के उपाय संक्षेप में लिखिए। [2013, 12]
या
जल-प्रदूषित होने से कैसे बचाया जा सकता है? [2014]
या
जल-प्रदूषण से होने वाली हानियों का वर्णन कीजिए। [2013]
या
पयार्वरण-प्रदूषण से आप क्या समझती हैं? यह कितने प्रकार का होता है? [2012, 13, 15, 16]
या
कोई चार उपाय लिखिए जिनके द्वारा आप वायु प्रदूषण को नियन्त्रित करने में सहायता कर सकते हैं। [2016]
उत्तर:
पर्यावरण-प्रदूषण की अवधारणा
पर्यावरण प्रदूषण की नवीनतम अवधारणा वर्तमान विज्ञान, औद्योगीकरण और नगरीकरण की देन है। प्रदूषण शब्द अंग्रेजी भाषा के ‘Pollute’ शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। ‘पोल्यूट’ का अर्थ होता है। ‘दूषित’ या ‘खराब हो जाना। प्रदूषण शब्द भ्रष्ट या खराब होने का भी सूचक है। इस प्रकार प्रदूषण का शाब्दिक अर्थ हुआ दूषित हो जाना। प्राकृतिक पर्यावरण हमारे लिए अत्यन्त लाभदायक है। जब यह प्रदूषकों के कारण अपना उपयोगी स्वरूप खोकर विकृत होने लगता है, (UPBoardSolutions.com) तब उसे पर्यावरण-प्रदूषण कहा जाता है। दूषित तत्त्व तथा गन्दगियाँ कल्याणकारी पर्यावरण को धीरे-धीरे हानिकारक बना रही हैं। पर्यावरण जब अपना मूल लाभकारी गुण खोकर दूषित हो जाता है, तब उसे पर्यावरण-प्रदूषण की संज्ञा दी जाती है। प्रदूषण उत्पन्न होने से पर्यावरण के गुणकारी तत्त्वों का सन्तुलन बिगड़ जाता है। वह लाभ के स्थान पर हानि पहुँचाने लगता है। पर्यावरण में असन्तुलन आ जाने तथा पारिस्थितिकी-तन्त्र में विकृति की स्थिति को प्रदूषण कहा जाता है।

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प्रदूषण की परिभाषा
प्रदूषण की विशेष जानकारी ज्ञात करने के लिए हमें उसकी विभिन्न परिभाषाओं पर दृष्टिपाते करना होगा। विभिन्न पर्यावरणविदों ने प्रदूषण को निम्नवत् परिभाषित किया है
विज्ञान सलाहकार समिति के अनुसार, “पर्यावरण प्रदूषण मनुष्यों की गतिविधियों द्वारा, ऊर्जा, स्वरूपों, विकिरण स्तरों, रासायनिक तथा भौतिक संगठन, जीवों की संख्या में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से परिवर्तन के परिणामस्वरूप उत्पन्न उप-उत्पाद हैं जो हमारे परिवेश में पूर्ण अर्थवा अधिकतम प्रतिकूल परिवर्तन उत्पन्न करता है।”
ओडम के अनुसार, “प्रदूषण हमारी हवा, मृदा एवं जल के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक लक्षणों में अवांछनीय परिवर्तन है जो मानव जीवन तथा अन्य जीवों, हमारी औद्योगिक प्रक्रिया, जीवनदशाओं तथा सांस्कृतिक विरासतों को हानिकारक रूप में प्रभावित करता है अथवा जो कच्चे पदार्थों के स्रोतों को नष्ट कर सकता है, करेगा।”

पर्यावरण-प्रदूषण के रूप
पर्यावरण प्रदूषण के मुख्य रूप हैं-जल-प्रदूषण, वायु प्रदूषण, मृदा-प्रदूषण तथा ध्वनि-प्रदूषण।
जल-प्रदूषण
जल में जीव रासायनिक पदार्थों तथा विषैले रसायन, खनिज ताँबा, सीसा, अरगजी, बेरियम, फॉस्फेट, सायनाइड, पारद आदि की मात्रा में वृद्धि होना ही जल-प्रदूषण है। प्रदूषकों के कारण जब जीवनदायी जल अपनी उपयोगिता खो देता है और उसका गुणकारी तत्त्व घातक बन जाता है तब उसे
जल-प्रदूषण की संज्ञा दी जाती है। जल-प्रदूषण दो प्रकार का होता है
(1) दृश्य प्रदूषण तथा
(2) अदृश्य प्रदूषण।

कारण: जल-प्रदूषण निम्नलिखित कारणों से होता है

  1. औद्योगीकरण जल-प्रदूषण के लिए सर्वाधिक उत्तरदायी है। चमड़े के कारखाने, चीनी एवं ऐल्कोहल के कारखाने, कागज की मिलें तथा अन्य अनेकानेक उद्योग नदियों के जल को प्रदूषित करते हैं।
  2. नगरीकरण भी जल-प्रदूषण के लिए उत्तरदायी है। नगरों की गन्दगी, मल व औद्योगिक अवशिष्टों के विषैले तत्त्व भी जल को प्रदूषित करते हैं।
  3.  समुद्रों में जहाजरानी एवं परमाणु अस्त्रों के परीक्षण से भी जल प्रदूषित होता है।
  4. नदियों के प्रति परम्परागत भक्ति-भाव होते हुए भी तमाम गन्दगी; जैसे-अधजले शव और जानवरों के मृत शरीर तथा अस्थि-विसर्जन आदि; भी नदियों में ही किया जाता है, जो नदियों के जल के प्रदूषित होने का एक प्रमुख कारण है। |
  5.  जल में अनेक रोगों के हानिकारक कीटाणु मिल जाते हैं, जिससे प्रदूषण उत्पन्न हो जाता है।
  6.  भूमि-क्षरण के कारण मिट्टी के साथ रासायनिक उर्वरक तथा कीटनाशक पदार्थों के नदियों
    में पहुँच जाने से नदियों का जल प्रदूषित हो जाता है।
  7. घरों से बहकर निकलने वाला फिनाइल, साबुन, सर्फ आदि से युक्त गन्दा पानी तथा शौचालय (UPBoardSolutions.com) का दूषित मल नालियों में प्रवाहित होता हुआ नदियों और झील के जल में मिलकर उसे प्रदूषित कर देता है।
  8. नदियों और झीलों के जल में पशुओं को नहलाना, मनुष्यों द्वारा स्नान करना व साबुन आदि से गन्दे वस्त्र धोना भी जल-प्रदूषण का मुख्य कारण है।

नियन्त्रण के उपाय:
जल की शुद्धता और उसकी उपयोगिता को बनाए रखने के लिए प्रदूषण को नियन्त्रित किया जाना आवश्र प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए निम्नलिखित उपाय काम में लाए जा सकते हैं

  1. नगरों के दूषित जल और मल को नदियों और झीलों के स्वच्छ जल में सीधे मिलने से रोका जाए।
  2. कल-कारखानों के दूषित और विषैले जल को नदियों और झीलों के जल में न गिरने दिया जाए।
  3. मल-मूत्र एवं गन्दगीयुक्त जल का उपयोग बायोगैस निर्माण या सिंचाई के लिए करके प्रदूषण को रोकने का प्रयास किया जाए।
  4. सागरों के जल में आणविक परीक्षण न कराए जाएँ।
  5.  नदियों के तटों पर दिवंगतों का अन्तिम संस्कार विधि-विधान से करके उनकी राख को प्रवाहित करने के स्थान पर दबा दिया जाए।
  6. पशुओं के मृत शरीर तथा मानव शवों को स्वच्छ जल में प्रवाहित न करने दिया जाए।
  7. जल-प्रदूषण नियन्त्रण के ध्येय से नियम बनाये जाएँ तथा उनका कठोरता से पालन कराया जाए।
  8. नदियों, कुओं, तालाबों और झीलों के जल को शुद्ध बनाये रखने के लिए प्रभावी उपाय काम में लाये जाएँ।
  9. जल-प्रदूषण के कुप्रभाव तथा उनके रोकने के उपायों का जनसामान्य में प्रचार-प्रसार कराया जाए।
  10. जल उपयोग तथा जल संसाधन संरक्षण के लिए राष्ट्रीय नीति बनायी जाए।

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मानव जीवन पर प्रभाव
जल-प्रदूषण के प्रतिकूल प्रभावों अथवा हानियों का संक्षिप्त विवरण निम्नवर्णित है

  1. प्रदूषित जल के सेवन से जीवों को अनेक प्रकार के खतरों का सामना करना पड़ता है।
  2. जल-प्रदूषण अनेक बीमारियों; जैसे-हैजा, पीलिया, पेट में कीड़े, यहाँ तक कि टायफाइड; का भी जनक है। राजस्थान के दक्षिणी भाग के आदिवासी गाँवों के तालाबों का दूषित पानी पीने से ‘नारू’ नाम का भयंकर रोग होता है। इन सुविधाविहीन गाँवों के 6 लाख 90 हजार लोगों में से 1 लाख 90 हजार लोगों को यह रोग है।
  3.  प्रदूषित जल का प्रभाव जल में रहने वाले जन्तुओं और जलीय पौधों पर भी पड़ रहा है। (UPBoardSolutions.com) जल-प्रदूषण के कारण ही मछली और जलीय पौधों में 30 से 50 प्रतिशत तक की कमी हो गई है। जो खाद्य पदार्थ के रूप में मछली आदि का उपयोग करते हैं उनके स्वास्थ्य को भी हानि पहुँचती है।
  4. प्रदूषित जल का प्रभाव कृषि उपजों पर भी पड़ता है। कृषि से उत्पन्न खाद्य पदार्थों को मानव व पशुओं द्वारा उपयोग में लाया जाता है, जिससे मानव व पशुओं के स्वास्थ्य को हानि होती है।
  5. जल जन्तुओं के विनाश से पर्यावरण असन्तुलित होकर विभिन्न प्रकार के कुप्रभाव उत्पन्न करता है।

वायु-प्रदूषण :
वायु में विजातीय तत्त्वों की उपस्थिति चाहे गैसीय हो या पार्थक्य या दोनों का मिश्रण, जोकि मानव के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए हानिकारक हो, वायु-प्रदूषण कहलाता है। वायु-प्रदूषण मुख्य रूप से धूल-कण, धुआँ, कार्बन-कण, सल्फर डाइऑक्साइड, कुहासा, सीसा, कैडमियम आदि घातक पदार्थों के वायु में विलय से होता है। ये सब उद्योगों एवं परिवहन के साधनों के माध्यम से वायुमण्डल में मिलते हैं। वायु के कल्याणकारी रूप का विनाशकारी रूप में परिवर्तन ही वायु-प्रदूषण है। वर्तमान समय में मानव को प्राणवायु के रूप में वायु प्रदूषण के कारण शुद्ध ऑक्सीजन भी उपलब्ध नहीं हो पा रही है।
कारण: वायु-प्रदूषण निम्नलिखित कारणों से होता है

  1. नगरीकरण, औद्योगीकरण एवं अनियन्त्रित भवन-निर्माण से वायु प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो रही है।।
  2. परिवहन के साधनों (ऑटोमोबाइलों) से निकलता धुआँ वायु-प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है।
  3. नगरीकरण के निमित्त नगरों की बढ़ती गन्दगी भी वायु को प्रदूषित कर रही है।
  4. वनों की अनियमित एवं अनियन्त्रित कटाई से भी वायु-प्रदूषण बढ़ रहा है।
  5. रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशक ओषधियों के कृषि में अधिकाधिक उपयोग से भी वायु-प्रदूषण बढ़ रहा है।
  6. रसोईघरों तथा कारखानों की चिमनियों से निकलते धुएँ के कारण वायु-प्रदूषण बढ़ रहा है।
  7. विभिन्न प्रदूषकों के अनियन्त्रित निस्तारण से वायु-प्रदूषण उत्पन्न हो रहा है।
  8. दूषित जल-मल के एकत्र होकर दुर्गन्ध फैलाने से वायु प्रदूषित हो रही है।
  9.  युद्ध, आणविक विस्फोट तथा दहन की क्रियाएँ भी वायु को प्रदूषित करती हैं।
  10. कीटनाशक दवाओं के छिड़काव के कारण वायुमण्डल प्रदूषित हो जाता है।

नियन्त्रण के उपाय:
वायु मानव जीवन का मुख्य आधार है। वायु-प्रदूषण मानव जीवन के अस्तित्व के लिए खतरा बनता जा रहा है। वायु-प्रदूषण रोकने के लिए प्रभावी उपाय ढूँढ़ना आवश्यक है। वायु-प्रदूषण रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय काम में लाए जा सकते हैं

  1. कल-कारखानों को नगरों से दूर स्थापित करना तथा उनसे निकलने वाले धुएँ, गैस तथा राख पर नियन्त्रण करना। इसके लिए ऊँची चिमनियाँ लगाई जानी चाहिए तथा चिमनियों में उत्तम प्रकार के छन्ने लगाए जाएँ।
  2. परिवहन के साधनों पर धुआँरहित यन्त्र लगाए जाएँ।
  3. नगरों में हरित पट्टी के रूप में युद्ध स्तर पर वृक्षारोपण किया जाए।
  4. नगरों में स्वच्छता, जल-मले निकास तथा अवशिष्ट पदार्थों के विसर्जन की उचित व्यवस्था की जाए।
  5. वन रोपण तथा वृक्ष संरक्षण पर बल दिया जाए।
  6. रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों के प्रयोग को नियन्त्रित किया जाए।
  7. घरों में बायोगैस, पेट्रोलियम गैस या धुआँरहित चूल्हों का प्रयोग किया जाए।
  8. खुले में मैला, कूड़ा-करकट तथा अवशिष्ट पदार्थ सड़ने के लिए न फेंके जाएँ।
  9. गन्दा जल एकत्र न होने दिया जाए।
  10. वायु-प्रदूषण रोकने के लिए कठोर नियम बनाए जाएँ और दृढ़ता से उनका पालन कराया जाए।

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मानव जीवन पर प्रभाव

वायु-प्रदूषण के मानव जीवन पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं

  1. वायु प्रदूषण से जानलेवा बीमारियाँ; जैसे छाती और साँस की बीमारियाँ यथा ब्रॉन्काइटिस, तपेदिक, फेफड़ों का कैन्सर आदि; उत्पन्न होती हैं।
  2. वायु प्रदूषण मानव शरीर, मानव की खुशियों और मानव की सभ्यता के लिए खतरा बना हुआ है। परिवहन के विभिन्न साधनों द्वारा उत्सर्जित धुआँ नागरिकों पर विभिन्न प्रकार के कुप्रभाव डालता है।
  3. वायु-प्रदूषण चारों ओर फैले खेतों, हरे-भरे पेड़ों व रमणीक दृश्यों को भी धुंधला कर देता है व उन पर झीनी चादर डाल देता है, बल्कि खेतों, तालाबों व जलाशयों को भी अपने कृमिकणों से विषाक्त करता रहता है, जिसका सीधा प्रभाव मानव के स्वास्थ्य पर पड़ता है।
  4. चिकित्साशास्त्रियों ने पाया है कि जहाँ वायु-प्रदूषण अधिक है वहाँ बच्चों की हड्डियों (UPBoardSolutions.com) का विकास कम होता है, हड्डियों की उम्र घट जाती है तथा बच्चों में खाँसी और साँस फूलना तो प्रायः देखा जाता है।
  5.  वायु-प्रदूषण का प्रभाव वृक्षों पर भी देखा जा सकता है। चण्डीगढ़ के पेड़ों और लखनऊ के दशहरी आमों पर वायु प्रदूषण के बढ़ते हुए खतरे को सहज ही देखा जा सकता है, जहाँ मानव को फल कम मात्रा में मिल रहे हैं और उनकी विषाक्तता का सीधा प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।
  6. दिल्ली के वायुमण्डल में व्याप्त प्रदूषण का प्रभाव आम नागरिकों के स्वास्थ्य पर तो पड़ा ही, दिल्ली की परिवहन पुलिस पर भी पड़ा है और यही दशा कोलकाता और मुम्बई की भी है, अर्थात् इससे मानव का जीवन (आयु) घट रहा है। दिल्ली नगर में वायु प्रदूषण के दुष्प्रभावों को देखते हुए ही सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषिद्ध कर दिया गया है।
  7. वायु-प्रदूषण के कारण ओजोन की परत में छिद्र होने की सम्भावना व्यक्त होने से सम्पूर्ण विश्व भयाक्रान्त हो उठा है।
  8.  शुद्ध वायु न मिलने से शारीरिक विकास रुकने के साथ-साथ शारीरिक क्षमता घटती जा रही है।
  9. वायु-प्रदूषण मानव अस्तित्व के सम्मुख एक गम्भीर समस्या बनकर खड़ा हो गया है, जिसे रोकने में भारी व्यय करना पड़ रहा है।

प्रश्न 6:
‘ध्वनि प्रदूषण क्या है? इसके उत्तरदायी कारकों को बताते हुए मानव-जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिए। [2008]
या
ध्वनि-प्रदूषण का मानव-जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है? [2011, 17]
या
ध्वनि-प्रदूषण के दो कारण लिखिए। [2013]
उत्तर:
ध्वनि-प्रदूषण का अर्थ
वायुमण्डल में परिवहन के साधनों, कल-कारखानों, रेडियो, लाउडस्पीकर, ग्रामोफोन आदि के तीव्र ध्वनि से उत्पन्न शोर को ध्वनि-प्रदूषण कहते हैं। कानों को ने भाने वाला वह कर्कश स्वर, जो मानसिक तनाव का कारण बनता है, ध्वनि-प्रदूषण कहलाता है। ध्वनि की तीव्रता के मापन की इकाई डेसीबल है। सामान्य रूप से 80-85 डेसीबल तीव्रता वाली ध्वनियों को प्रदूषण की श्रेणी में रखा जाता है तथा इनका प्रतिकूल प्रभाव मानव-स्वास्थ्य पर पड़ता है। वर्तमान युग में ध्वनि-प्रदूषण सुरसा के मुँह की भाँति बढ़ता जा रहा है। ध्वनि-प्रदूषण के लिए निम्नलिखित कारक उत्तरदायी है

  1. सर्वाधिक ध्वनि-प्रदषण परिवहन के साधनों; जैसे बसों, ट्रकों, रेलों, वायुयानों, स्कुटरों आदि; के द्वारा होता है। धड़धड़ाते हुए असंख्य वाहन कर्कश स्वर देकर शोर उत्पन्न करते हैं, जिससे ध्वनि-प्रदूषण उत्पन्न होता है।
  2. कारखानों की विशालकाय मशीनें, कल-पुर्जे, इंजन आदि भयंकर शोर उत्पन्न करके ध्वनिप्रदूषण के स्रोत बने हुए हैं।
  3. विभिन्न प्रकार के विस्फोटक भी ध्वनि-प्रदूषण के जन्मदाता हैं।
  4. घरों पर जोर से बजने वाले रेडियो, दूरदर्शन, कैसेट्स तथा बच्चों की चिल्ल-पौं की ध्वनि (UPBoardSolutions.com) भी प्रदूषण उत्पन्न करने के मुख्य साधन हैं।
  5. वायुयान, सुपरसोनिक विमान व अन्तरिक्ष यान भी ध्वनि-प्रदूषण फैलाते हैं।
  6. मानव एवं पशु-पक्षियों द्वारा उत्पन्न शोर भी ध्वनि-प्रदूषण का मुख्य कारण है।
  7. आँधी, तूफान तथा ज्वालामुखी के उद्गार के फलस्वरूप भी ध्वनि-प्रदूषण उत्पन्न होता है।

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नियन्त्रण के उपाय

  1. ध्वनि-प्रदूषण को नियन्त्रित करने हेतु हमें स्वयं पर ही नियन्त्रण करना सीखना होगा; जैसे कि ध्वनि विस्तारक यन्त्रों की ध्वनि को विभिन्न शुभ अवसरों पर कम-से-कम रखा जाए।
  2. सड़क पर आवागमन के दौरान अपने वाहनों के हॉर्न बहुत तीव्र ध्वनि वाले न रखें और उनका यथासम्भव कम-से-कम प्रयोग करें।
  3. कारखानों में तीव्र शोर वाली मशीनों के लिए साइलेन्सर या ऐसे ही कुछ अन्य उपाय किए जाएँ।
  4.  समय-समय पर मशीनों की मस्म्मत कराते रहना चाहिए जिससे वे अनावश्यक शोर न करें।
  5. सड़क पर खड़े करने वाले अपने वाहनों को चालू अवस्था में कदापि न छोड़े।

मानव जीवन पर प्रभाव
ध्वनि-प्रदूषण का मानव जीवन पर निम्नलिखित कुप्रभाव पड़ता है

  1. ध्वनि-प्रदूषण मानव के कानों के परदों पर, मस्तिष्क और शरीर पर इतना घातक आक्रमण करता है कि संसार के सारे वैज्ञानिक तथा डॉक्टर इससे चिन्तित हो रहे हैं।
  2. ध्वनि-प्रदूषण वायुमण्डल में अनेक समस्याएँ उत्पन्न करता है और मानव के लिए एक गम्भीर खतरा बन गया है। नोबेल पुरस्कार विजेता रॉबर्ट कोच ने कहा है कि वह दिन दूर नहीं जब आदमी को अपने स्वास्थ्य के इस सबसे बड़े नृशंस शत्रु ‘शोर’ से पूरे जी-जान से लड़ना पड़ेगा।
  3. ध्वनि-प्रदूषण के कारण व्यक्ति की नींद में बाधा उत्पन्न होती है। इससे चिड़चिड़ापन बढ़ता है तथा स्वास्थ्य खराब होने लगता है।
  4. शोर के कारण श्रवण शक्ति कम होती है। बढ़ते हुए शोर के कारण मानव समुदाय निरन्तर बहरेपन की ओर बढ़ रहा है।
  5. ध्वनि-प्रदूषण के कारण मानसिक तनाव बढ़ने से स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ता है। इससे व्यक्ति के रक्तचाप में वृद्धि हो सकती है तथा हृदय-रोग होने की आशंका बढ़ जाती है। निरन्तर अत्यधिक ध्वनि प्रदूषण से व्यक्ति के सुनने की क्षमता भी समाप्त हो सकती है।
  6. ध्वनि-प्रदूषण मनुष्य के आराम में बाधक बनता जा रहा है।
    ध्वनि-प्रदूषण की समस्या दिन-पर-दिन बढ़ती जा रही है। इस अदृश्य समस्या का निश्चित समाधान खोजना नितान्त आवश्यक है।
    वास्तव में जल, वायु और ध्वनि-प्रदूषण आज के सामाजिक जीवन की एक गम्भीर चुनौती हैं। यह एक अन्तर्राष्ट्रीय समस्या बनकर उभरा है। बढ़ते प्रदूषण ने मानव सभ्यता, संस्कृति तथा अस्तित्व पर प्रश्न-चिह्न लगा दिया है। भावी पीढ़ी को इस विष वृक्ष से बचाए रखने के लिए प्रदूषण का निश्चित समाधान खोजना आवश्यक है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
पर्यावरण का सामाजिक संगठन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
यह सत्य है कि पर्यावरण (प्राकृतिक पर्यावरण) सामाजिक संगठन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित नहीं करता, परन्तु पर्यावरण सामाजिक संगठन को अप्रत्यक्ष रूप से अवश्य प्रभावित करता है। इस प्रभाव को लीप्ले ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “ऐसे पहाड़ी व पठारी देशों में जहाँ खाद्यान्न की कमी होती है, वहाँ जनसंख्या की वृद्धि अभिशाप मानी जाती है और इस प्रकार की विवाह संस्थाएँ स्थापित की जाती हैं जिनसे जनसंख्या में वृद्धि न हो। जौनसार भाभर क्षेत्र (UPBoardSolutions.com) में खस जनजाति में सभी भाइयों की एक ही पत्नी होती है। इससे जनसंख्या-वृद्धि प्रभावी तरीके से नियन्त्रित होती है। विवाह की आयु, परिवार को आकार तथा प्रकार भी अप्रत्यक्ष रूप से भौगोलिक परिस्थितियों से प्रभावित होते हैं। इसके विपरीत मानसूनी प्रदेश, जो कि विभिन्न सुविधाओं से सम्पन्न हैं, सदैव अधिक जनसंख्या की समस्या से घिरे रहते हैं।

प्रश्न 2:
पर्यावरण का राजनीतिक संगठन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
पर्यावरण के जनजीवन पर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ने वाले प्रभावों के अन्तर्गत राजनीतिक संगठन पर पड़ने वाले प्रभावों का उल्लेख किया जाता है। विभिन्न अध्ययनों द्वारा स्पष्ट है कि पर्यावरण का प्रभाव राज्य तथा राजनीतिक संस्थाओं पर भी पड़ता है। प्रतिकूल पर्यावरण में जनजीवन प्रायः घुमन्तू होता है तथा इस स्थिति में स्थायी राजनीतिक संगठनों का विकास नहीं हो पाता। अनुकूल पर्यावरण आर्थिक विकास में सहायता प्रदान करता है तथा समाज की राजनीति को स्थायी रूप प्रदान करता है। इस प्रकार की परिस्थितियों में प्रजातन्त्र या साम्यवाद जैसी राजनीतिक व्यवस्थाएँ विकसित होती हैं। यही नहीं, प्राकृतिक पर्यावरण का प्रभाव सरकार के स्वरूप तथा राज्य के संगठन पर भी पड़ता है।

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प्रश्न 3:
पर्यावरण का जन-सामान्य के धार्मिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
प्राकृतिक पर्यावरण अनिवार्य रूप से जन-सामान्य के धार्मिक जीवन को प्रभावित करता है। पर्यावरण के प्रभाव को अधिक महत्त्व देने वाले विद्वानों का मत है कि प्राकृतिक शक्तियाँ धर्म के विकास को प्रभावित करती हैं। मैक्समूलर ने धर्म की उत्पत्ति का सिद्धान्त ही प्राकृतिक शक्तियों के भय से इनकी पूजा करने के रूप में प्रतिपादित किया है। विश्व के जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक प्रकोप अधिक है, वहाँ पर धर्म का विकास तथा धर्म के प्रति आस्था रखने वाले व्यक्तियों की संख्या अधिक होती है। एशिया की मानसूनी जलवायु के कारण ही यहाँ के लोग भाग्यवादी बने हैं। कृषिप्रधान देशों में इन्द्र की पूजा होना सामान्य बात है। स्पष्ट है कि धर्म विकास तथा धर्म के स्वरूप के निर्धारण में भी पर्यावरण की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

प्रश्न 4:
पर्यावरण का जनसाधारण की कलाओं पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
जन-सामान्य के जीवन में विभिन्न कलाओं का भी महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। विद्वानों का मत है कि वास्तुकला, चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत, नृत्य तथा नाटकों पर भौगोलिक परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता है। सुन्दर प्राकृतिक पर्यावरण में चित्रकारी तथा नीरस पर्यावरण में होने वाली चित्रकारी में स्पष्ट रूप से अन्तर देखा जा सकता है। वास्तव में सभी कलाकार अपनी कला के लिए विषयों का चुनाव अपने पर्यावरण से ही करते हैं। यही कारण है कि विभिन्न प्राकृतिक पर्यावरण में विकसित होने वाली कलाओं के स्वरूप में स्पष्ट अन्तर देखा जा सकता है।

प्रश्न 5:
पर्यावरण संरक्षण के लिए जनता को कैसे जागरूक किया जा सकता है? [2011, 13, 18]
उत्तर:
पर्यावरण प्रदूषण अपने आप में एक अति गम्भीर एवं विश्वव्यापी समस्या है। इस समस्या को नियन्त्रित करने के लिए पर्यावरण संरक्षण के लिए जनता को जागरूक करना अति आवश्यक है। इसके लिए व्यापक स्तर पर पर्यावरण-प्रदूषण के कारणों तथा उससे होने वाली हानियों की विस्तृत जानकारी जन-साधारण को दी जानी चाहिए। इसके लिए जन-संचार के समस्त माध्यमों (रेडियो, दूरदर्शन तथा पत्र-पत्रिकाओं आदि) को इस्तेमाल किया जाना चाहिए। (UPBoardSolutions.com) शिक्षा के क्षेत्र में प्रत्येक स्तर पर पर्यावरण-शिक्षा को विशेष महत्त्व दिया जाना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को पर्यावरण-संरक्षण में योगदान के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। वर्तमान परिस्थितियों में प्रत्येक व्यक्ति को पेड़-पौधे लगाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए तथा पॉलीथीन के बहिष्कार के लिए तैयार करना चाहिए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
‘पर्यावरण की एक परिभाषा लिखिए। [2013, 14, 15, 16]
या
पर्यावरण से आप क्या समझती हैं? (2010)
उत्तर:
“पर्यावरण वह है जो किसी वस्तु को चारों ओर से घेरे हुए है तथा उस पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालता है।” -जिस्बर्ट

प्रश्न 2:
पर्यावरण के कौन-कौन से वर्ग माने जाते हैं?
उत्तर:
पर्यावरण के मुख्य रूप से तीन वर्ग माने जाते हैं। इन्हें क्रमशः प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण, सामाजिक पर्यावरण तथा सांस्कृतिक पर्यावरण कहते हैं।

प्रश्न 3:
अनुकूल पर्यावरण वाले क्षेत्र में जनसंख्या का घनत्व कैसा होता है?
उत्तर:
अनुकूल पर्यावरण वाले क्षेत्र में जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है।

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प्रश्न 4:
गर्म जलवायु वाले पर्यावरण में लोगों की वेशभूषा कैसी होती है?
उत्तर:
गर्म जलवायु वाले पर्यावरण में लोगों की वेशभूषा बारीक सूती कपड़े की बनी तथा ढीली-ढाली होती है।

प्रश्न 5:
मैदानी क्षेत्रों में लोगों का आहार कैसा होता है?
उत्तर:
मैदानी क्षेत्रों में लोगों के आहार में अनाज तथा दालों एवं सब्जियों का अधिक समावेश होता है।

प्रश्न 6:
पर्यावरण-प्रदूषण किसे कहते हैं? [2007, 14, 15]
उत्तर:
पर्यावरण-प्रदूषण का अर्थ है-पर्यावरण का दूषित हो जाना। प्रकृति-प्रदत्त पर्यावरण (UPBoardSolutions.com) में जब किन्हीं तत्त्वों का अनुपात इस रूप में बदलने लगता है जिसका जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तब कहा जाता है कि पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है।

प्रश्न 7:
पर्यावरण प्रदूषित होने के कोई दो कारण लिखिए। [2011, 13]
उत्तर:
औद्योगीकरण तथा वृक्षों की अत्यधिक कटाई पर्यावरण-प्रदूषण के दो मुख्य कारण हैं।

प्रश्न 8:
वृक्षारोपण से क्या लाभ हैं? [2009, 11, 14, 16, 17, 18]
उत्तर:
वृक्षारोपण से पर्यावरण में ऑक्सीजन की मात्रा सामान्य बनी रहती है तथा वायु-प्रदूषण को नियन्त्रित करने में सहायता मिलती है।

प्रश्न 9:
वृक्ष (पेड़-पौधे) पर्यावरण (वातावरण) को कैसे शुद्ध करते हैं? [2011, 12, 13, 17, 18]
उत्तर:
वृक्ष पर्यावरण से कार्बन डाई-ऑक्साइड को ग्रहण करके तथा ऑक्सीजन विसर्जित करके पर्यावरण को शुद्ध करते हैं।

प्रश्न 10:
जल-प्रदूषण के दो कारण लिखकर उनके निवारण के उपाय लिखिए। [2011, 12, 13, 14]
उत्तर:
जल-प्रदूषण के दो मुख्य कारण माने जाते हैं (अ) औद्योगीकरण तथा (ब) नगरीकरण। इन कारणों के निवारण के लिए औद्योगीकरण अवशेषों एवं व्यर्थ पदार्थों को जल स्रोतों में मिलने से रोका जाना चाहिए तथा नगरीय कूड़े-करकट को भी जल-स्रोतों में मिलने से रोकना चाहिए।

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प्रश्न 11:
वायु-प्रदूषण से क्या तात्पर्य है? इससे क्या हानि होती है? [2015]
उत्तर:
वायु में किसी भी प्रकार की अशुद्धियों का व्याप्त हो जान्। वायु-प्रदूषण कहलाता है। वायु-प्रदूषण से श्वसन-तन्त्र के विभिन्न रोग हो जाते हैं।

प्रश्न 12:
वायु-प्रदूषण के दो कारण लिखिए। [2018]
उत्तर:
(1) नगरीकरण, औद्योगीकरण एवं अनियन्त्रित भवन-निर्माण से वायु बान्त्रत (UPBoardSolutions.com) भवन-निमोण से वायु प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो रही है।
(2) विभिन्न परिवहन साधनों (वाहनों) से निकलता धुआँ तथा कारखानों की चिमनियों से निकलता धुआँ वायु प्रदूषण में बढ़ोतरी कर रहा है।

प्रश्न 13:
मिल व कारखाने वातावरण को कैसे दूषित करते हैं? [2010, 11]
या
कल-कारखानों से वातावरण कैसे प्रदूषित होता है? [2010, 11, 14, 15]
उत्तर:
मिल तथा कारखानों से निकलने वाली दूषित गैसें तथा विभिन्न व्यर्थ पदार्थ वातावरण को दूषित करते हैं। इनसे वायु-प्रदूषण, जल-प्रदूषण तथा मृदा-प्रदूषण में वृद्धि होती है। मिल तथा कारखानों में होने वाली ध्वनियों से ध्वनि-प्रदूषण में भी वृद्धि होती है।

प्रश्न 14:
ध्वनि-प्रदूषण किसे कहते हैं? [2008, 12]
उत्तर:
वायुमण्डल में परिवहन के साधनों; कल-कारखानों, रेडियो, लाउडस्पीकरों; के शोर को ध्वनि-प्रदूषण कहते हैं।

प्रश्न 15:
वायु-प्रदूषण से फैलने वाले चार रोगों के नाम लिखिए। [2008, 12, 17]
उत्तर:
वायु-प्रदूषण से जानलेवा बीमारियाँ; जैसे-छाती और साँस की बीमारियाँ यथा ब्रॉन्काइटिस, (UPBoardSolutions.com) तपेदिक, फेफड़ों का कैन्सर, हड्डियों को विकास रुक जाना आदि; फैलती हैं।

प्रश्न 16:
पौधे कार्बन डाइऑक्साइड किस समय छोड़ते हैं? [2010]
उत्तर:
सभी पेड़-पौधे रात के समय कार्बन डाइऑक्साइड विसर्जित करते हैं।

प्रश्न 17:
ध्वनि-प्रदूषण तथा वायु-प्रदूषण में क्या अन्तर होता है? [2007]
उत्तर:
ध्वनि-प्रदूषण की दशा में पर्यावरण में शोर बढ़ जाता है जबकि वायु-प्रदूषण की दशा में वायु दूषित हो जाती है तथा उसमें हानिकारक तत्त्वों की मात्रा बढ़ जाती है।

प्रश्न 18:
मृदा-प्रदूषण का जन-जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है? [2008]
उत्तर:
मृदा-प्रदूषण में होने वाली वृद्धि का सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव फसलों पर पड़ता है। कृषि-उत्पादन घटते हैं। इसके अतिरिक्त प्रदूषित मिट्टी में उत्पन्न होने वाले भोज्य-पदार्थों को ग्रहण करने से हमारे स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।

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बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न:
निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

1. पर्यावरण में सम्मिलित हैं
(क) जड़ पदार्थ
(ख) चेतन पदार्थ
(ग) प्राकृतिक कारक
(घ) ये सभी

2. सम्पूर्ण पर्यावरण का गठन होता है
(क) प्राकृतिक पर्यावरण से
(ख) सामाजिक पर्यावरण से
(ग) सांस्कृतिक पर्यावरण से
(घ) इन सभी से

3. पर्यावरण का अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है
(क) जन-सामान्य के धार्मिक जीवन पर
(ख) जन-सामान्य की कलाओं पर
(ग) जन-सामान्य के साहित्य पर
(घ) इन सभी पर

4. आधुनिक युग की गम्भीर समस्या है
(क) बेरोजगारी
(ख) निरक्षरता
(ग) पर्यावरण-प्रदूषण
(घ) भिक्षावृत्ति

5. पर्यावरण-प्रदूषण का प्रभाव पड़ता है
(क) जन-स्वास्थ्य पर
(ख) व्यक्तिगत कार्यक्षमता पर
(ग) आर्थिक जीवन पर
(घ) इन सभी पर

6. पर्यावरण-प्रदूषण में वृद्धि करने वाले कारक हैं
(क) औद्योगीकरण
(ख) नगरीकरण
(ग) यातायात के शक्ति-चालित साधने
(घ) ये सभी

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7. पौधे वायुमण्डल का शुद्धिकरण करते हैं [2016]
या
पौधे भोजन बनाते समय वायुमण्डल का शुद्धिकरण करते हैं [2007]
(क) नाइट्रोजन द्वारा
(ख) ऑक्सीजन द्वारा
(ग) कार्बन डाइऑक्साइड द्वारा
(घ) जल द्वारा

8. प्रदूषण से बचने के लिए किस प्रकार का ईंधन उत्तम होता है? [2017]
(क) लकड़ी
(ख) कोयला
(ग) गैस
(घ) कंडी (उपला)

9. चौबीसों घण्टे ऑक्सीजन प्रदान करने वाला पौधा कौन-सा है?
(क) आम का पेड़
(ख) आँवला का पेड़
(ग) पीपल और नीम का पेड़
(घ) गुलाब का पेड़

10. वस्तु के जलने से गैस बनती है [2009, 11, 17]
(क) कार्बन डाइऑक्साइड
(ख) नाइट्रोजन
(ग) ऑक्सीजन
(घ) ओजोन

11. जल-प्रदूषण को रोकने के लिए कौन-से रासायनिक पदार्थ का प्रयोग किया जाता है?
(क) सोडियम क्लोराइड
(ख) कैल्सियम क्लोराइड
(ग) ब्लीचिंग पाउडर
(घ) पोटैशियम मेटाबोइसल्फाइट

12. ध्वनि मापक इकाई को कहते हैं
(क) कैलोरी
(ख) फारेनहाइट
(ग) डेसीबल
(घ) इनमें से कोई नहीं

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13. ध्वनि प्रदूषण का कारण है [2016, 17, 18]
(क) साइकिल
(ख) लाउडस्पीकर
(ग) रिक्शा
(घ) इनमें से सभी

14. ध्वनि प्रदूषण प्रभावित करता है। [2017]
(क) आमाशय को
(ख) वृक्क को
(ग) कान को
(घ) यकृत को

15. लाउडस्पीकर की आवाज से किस प्रकार का प्रदूषण फैलता है? [2015]
(क) वायु-प्रदूषण
(ख) ध्वनि प्रदूषण
(ग) मृदा-प्रदूषण
(घ) जल-प्रदूषण

16. प्रकृति में ऑक्सीजन का सन्तुलन बनाए रखते हैं [2008, 09, 12, 15]
(क) मनुष्य
(ख) कीट-पतंगे
(ग) वन्य-जीव
(घ) पेड़-पौधे

17. पौधों से ऑक्सीजन प्राप्त होती है [2009, 14, 15 ]
(क) रात में
(ख) सवेरे में
(ग) दिन में
(घ) शाम को

18. पौधे कार्बन डाइऑक्साइड गैस किस समय छोड़ते हैं ? [2010]
(क) दिन में
(ख) रात में
(ग) दोपहर के समय
(घ) इनमें से कोई नहीं

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19. हमारे स्वास्थ्य के लिए किस प्रकार का प्रदूषण हानिकारक है? [2011, 13, 14, 15]
(क) जल-प्रदूषण
(ख) ध्वनि प्रदूषण
(ग) वायु-प्रदूषण
(घ) ये सभी

20. पर्यावरण कहते हैं। [2013]
(क) प्रदूषण को
(ख) वातावरण को
(ग) पृथ्वी के चारों ओर के वातावरण को
(घ) इनमें से कोई नहीं

21. वायु-प्रदूषण का कारण है। [2014]
(क) औद्योगीकीकरण
(ख) वनों की अनियमित कटाई
(ग) नगरीकरण
(घ) ये सभी

22. पर्यावरण दिवस किस दिन मनाया जाता है ? [2011, 12, 13, 15, 16]
(क) 1 जून
(ख) 5 जून
(ग) 12 जून
(घ) 18 जून

23. ऑक्सीजन कहाँ से प्राप्त होती है? [2013]
(क) बन्द कमरे से
(ख) पेड़-पौधों से
(ग) नालियों से
(घ) खनिज से

24. कार्बनिक यौगिकों (वस्तुओं के जलने से कौन-सी गैस बनती है ? [2015, 16, 17]
(क) ऑक्सीजन
(ख) कार्बन डाइऑक्साइड
(ग) नाइट्रोजन
(घ) अमोनिया

25. ‘अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस’ किस दिन मनाया जाता है ? [2018]
(क) 21 जून
(ख) 20 जून
(ग) 25 जून
(घ) 28 जून

उत्तर:
1. (घ) ये सभी,
2. (घ) इन सभी से,
3. (घ) इन सभी पर,
4. (ग) पर्यावरण-प्रदूषण,
5. (घ) इन सभी पर,
6. (घ) ये सभी,
7. (ख) ऑक्सीजन द्वारा,
8. (ग) गैस,
9. (ग) पीपल और नीम का पेड़,
10. (क) कार्बन डाइऑक्साइड,
11. (ग) ब्लीचिंग पाउडर,
12. (ग) डेसीबल,
13. (ख) लाउडस्पीकर,
14. (ग) कान,
15. (ख) ध्वनि प्रदूषण,
16. (घ) पेड़-पौधे,
17. (ग) दिन में,
18. (ख) रात में,
19. (घ) ये सभी,
20. (ग) पृथ्वी के चारों ओर के वातावरण को,
21. (घ) ये सभी,
22. (ख) 5 जून,
23. (ख) पेड़-पौधों से,
24. (ख) कार्बन डाइ-ऑक्साइड,
25. (क) 21 जून

We hope the UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 9 पर्यावरण और जनजीवन पर उसका प्रभाव help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 9 पर्यावरण और जनजीवन पर उसका प्रभाव, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 13 वस्त्रों की धुलाई तथा रख-रखाव

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 13 वस्त्रों की धुलाई तथा रख-रखाव

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Home Science . Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 13 वस्त्रों की धुलाई तथा रख-रखाव

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
वस्त्रों की धुलाई से आप क्या समझती हैं? वस्त्रों की धुलाई की आवश्यकता भी स्पष्ट कीजिए।
या
वस्त्रों की धुलाई क्यों आवश्यक होती है? [2011,17,18]
उत्तर:
वस्त्रों की धुलाई का अर्थ

सभ्य मनुष्य के जीवन में वस्त्रों का अत्यन्त महत्त्व है। प्रत्येक व्यक्ति समय-समय पर जो वस्त्र धारण करता है, उन वस्त्रों से जहाँ एक ओर उसके शरीर को विभिन्न प्रकार की सुरक्षा प्राप्त होती है, वहीं दूसरी ओर वे वस्त्र व्यक्ति के व्यक्तित्व को (UPBoardSolutions.com) निखारने में भी महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान करते हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि केवल साफ-सुथरे तथा धुले हुए वस्त्र ही उत्तम माने जाते हैं।
नियमित रूप से धारण किए जाने वाले तथा घर पर अन्य प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल होने वाले वस्त्र शीघ्र ही गन्दे एवं मैले हो जाते हैं। वस्त्रों के गन्दे एवं मैले होने में जहाँ बाहरी धूल-मिट्टी एवं गन्दगी की विशेष भूमिका होती है, वहीं वस्त्रों को धारण करने वाले व्यक्ति के शरीर से निकलने वाले पसीने का भी विशेष प्रभाव होता है। पसीने से गीले हुए वस्त्रों में बाहरी धूल-मिट्टी जम जाती है। यही नहीं पसीना वस्त्रों में ही सूखकर उन्हें दुर्गन्धयुक्त भी बनाता है। इस प्रकार विभिन्न कारणों से गन्दे एवं मैले हुए वस्त्रों को पुनः गन्दगी एवं दुर्गन्धरहित साफ-सुथरा बनाने की प्रक्रिया को ही वस्त्रों की धुलाई कहते हैं। वस्त्रों की धुलाई के अन्तर्गत विभिन्न साधनों एवं उपायों द्वारा वस्त्रों की मैल, गन्दगी, दुर्गन्ध
आदि को समाप्त किया जाता है तथा पुनः वस्त्रों को साफ-सुथरा बनाया जाता है। वस्त्रों की धुलाई के लिए जल तथा शोधक पदार्थ (साबुन, डिटर्जेण्ट आदि) आवश्यक होते हैं तथा इसके लिए वस्त्रों को मलना, रगड़ना, पीटना एवं खंगालना आदि आवश्यक उपाय होते हैं।

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वस्त्रों की धुलाई की आवश्यकता

प्रश्न उठता है कि वस्त्रों को धुलाई की आवश्यकता क्यों होती है? या यह कहा जाए कि वस्त्रों की धुलाई का उद्देश्य क्या होता है? इस विषय में निम्नलिखित तथ्यों को जानना अभीष्ट होगा

(1) वस्त्रों की सफाई के लिए:
शरीर की नियमित सफाई जिस प्रकार अति आवश्यक होती है, ठीक उसी प्रकार शरीर पर धारण करने वाले तथा अन्य प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल होने वाले वस्त्रों की भी नियमित सफाई आवश्यक होती है। शारीरिक सफाई के लिए स्नान आवश्यक होता है तथा की सफाई के लिए वस्त्रों की धुलाई को आवश्यक माना जाता है।

(2) वस्त्रों की दुर्गन्ध समाप्त करने के लिए:
कपड़ों को पहनने, बिछाने तथा ओढ़ने आदि के दौरान शरीर से निकलने वाला पसीना उनमें व्याप्त हो जाता है। इस पसीने से वस्त्रों में दुर्गन्ध आ जाती है। इस दुर्गन्ध को समाप्त करने के लिए भी वस्त्रों की धुलाई आवश्यक हो जाती है।

(3) कपड़ों की सुरक्षा के लिए:
कपड़ों की सुरक्षा के लिए भी इनकी नियमित धुलाई आवश्यक मानी जाती है। गन्दे एवं मैले वस्त्रों को विभिन्न प्रकार के कीड़ों, फफूदी तथा बैक्टीरिया आदि द्वारा नष्ट कर देने की आशंका बनी रहती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए वस्त्रों की सुरक्षा के लिए भी वस्त्रों की धुलाई को आवश्यक माना जाता है।

(4) व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए:
मैले एवं गन्दे वस्त्र व्यक्तिगत स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव डालते हैं। मैले एवं गन्दे वस्त्र निरन्तर धारण किए रहने की स्थिति में विभिन्न चर्म रोग हो जाने की आशंका रहती है। यही नहीं गन्दे वस्त्र धारण करने से व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव (UPBoardSolutions.com) पड़ सकता है। ऐसा व्यक्ति प्रायः हीन-भावना का शिकार हो जाता है। इस स्थिति में व्यक्तिगत, शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को रम्नाए रखने के लिए भी वस्त्रों की नियमित धुलाई आवश्यक मानी जाती है।

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(5) कपड़ों की सुन्दरता के लिए:
गन्दे एवं मैले वस्त्र भद्दे एवं बुरे लगते हैं। वस्त्रों को सुन्दर एवं आकर्षक बनाने के लिए उनकी नियमित धुलाई आवश्यक होती है।

(6) व्यक्तित्व के निखार के लिए:
नि:सन्देह कहा जा सकता है कि साफ-सुथरे एवं धुले हुए तथा अच्छी तरह से प्रेस किए हुए वस्त्र धारण करने से व्यक्ति के व्यक्तित्व में निखार आ जाता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए भी वस्त्रों की धुलाई को आवश्यक माना जाता है।

(7) बचत के लिए:
वस्त्रों की धुलाई का एक उद्देश्य समुचित बचत करना भी होता है। वास्तव में गन्दे वस्त्र शीघ्र फट जाते हैं, जबकि नियमित रूप से धोये जाने वाले वस्त्र अधिक दिन तक ठीक बने रहते हैं। इस प्रकार कपड़ों पर होने वाले व्यय की भी बचत होती है।

प्रश्न 2:
वस्त्रों को घर पर धोने से क्या लाभ है? [2009, 10, 11]
या
वस्त्रों की धुलाई करते समय कौन-कौन सी मुख्य बातों को ध्यान में रखेंगी?
या
कपड़े धोते समय ध्यान रखने योग्य पाँच सावधानियाँ लिखिए। [2009, 11]
या
घर पर वस्त्र धोने के क्या लाभ हैं? वस्त्रों को धोने से पहले क्या-क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए? [2008, 09, 10, 11, 18]
या
वस्त्रों की घर पर धुलाई के लाभ बताइए। [2007, 09, 10, 11, 13, 14]
या
वस्त्रों को धोने से पहले किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? [2015, 16]

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उत्तर:
घर पर वस्त्र धोने से लाभ

व्यावसायिक स्तर पर कपड़ों की धुलाई का कार्य धोबियों द्वारा अथवा नगरों में स्थापित लॉण्ड्रियों द्वारा किया जाता है, परन्तु परिवार के सदस्यों के दैनिक इस्तेमाल के वस्त्रों की धुलाई का कार्य घर पर ही किया जाता है। वास्तव में घर पर वस्त्रों की धुलाई करना (UPBoardSolutions.com) अधिक सुविधाजनक एवं लाभदायक भी होता है। घर पर वस्त्रों की धुलाई के मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं

(1) समय की बचत:
धोबी अथवी लॉण्ड्री से वस्त्र धुलवाने में कई दिन का समय लगता है, जबकि स्वयं वस्त्र धोने पर उन्हें केवल कुछ घण्टों बाद ही प्रयोग में लाया जा सकता है। इस प्रकार घर पर वस्त्र धोने से समय की पर्याप्त बचत होती है।

(2) धन की बचत:
घर पर वस्त्र धोने से बहुत कम धन व्यय होता है। धोबी अथवा लॉण्ड्री की धुलाई में प्रति वस्त्र काफी धन व्यय करना पड़ता है, जबकि एक ही अच्छे साबुन अथवा डिटर्जेण्ट पाउडुर के प्रयोग से अनेक वस्त्रों की धुलाई की जा सकती है तथा धन की पर्याप्त बचत भी की जा सकती है। इसके अतिरिक्त घर पर वस्त्र धोने पर वस्त्रों की कम संख्या में ही कामे चलाया जा सकता है।

(3) वस्त्रों की आयु में वृद्धि:
वस्त्रों को धोते समय धोबी प्राय: अम्ल एवं कास्टिक सोडा अधिक मात्रा में प्रयोग करते हैं, जिससे तन्तु कमजोर हो जाने के फलस्वरूप वस्त्र शीघ्र फट जाते हैं। घर पर वस्त्रों की धुलाई ठीक प्रकार से होती है। अतः ये अधिक समय तक चलते हैं।

(4) रोगों से बचाव:
धोबी प्रायः अनेक घरों वस्त्र एकत्रित कर एक साथ उनकी धुलाई करते हैं। इस प्रकार रोगी एवं स्वस्थ मनुष्यों के वस्त्र साथ-साथ धुलते हैं। अधिकांश धोबी नगर के निकट के किसी तालाब या पोखर के पानी से कपड़े धोया करते हैं। यह पानी काफी गन्दा होता है। (UPBoardSolutions.com) इससे अनेक संक्रामक रोगों के फैलने की सम्भावना रहती है। घर पर रोगी के वस्त्र अलग से विधिपूर्वक धोए जाते हैं, जिससे रोगों से बचाव की पूर्ण सम्भावना रहती है।

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(5) अन्य लाभ:
घर पर वस्त्रों की धुलाई से होने वाले कुछ अन्य लाभ हैं|

  1. वर्षा ऋतु में कपड़े धोकर लाने में धोबी अधिक एवं अनिश्चित समय लगाता है, जबकि घर पर आवश्यक वस्त्र धोने से इस कठिनाई से बचा जा सकता है।
  2. धोबी प्रायः धोए जाने वाले वस्त्रों का स्वयं भी प्रयोग करते हैं। उनकी लापरवाही के कारण कई बार वस्त्र या तो खो जाते हैं अथवा दूसरे व्यक्तियों से बदल जाते हैं। घर पर वस्त्रों को धोने से इस प्रकार की कठिनाइयाँ नहीं होतीं।
  3. धोबी कई बार सफेद व रंगीन वस्त्रों को एक साथ धो देते हैं, जिससे सफेद वस्त्रों में रंगीन धब्बों के लगने की आशंका रहती है। घर पर वस्त्रों को धोने से इस प्रकार की आशंका से बचा जा सकता है। घर पर वस्त्र धोते समय वस्त्रों में इच्छानुसार केलफ लगाया जा सकता है।

वस्त्र धोने से पूर्व ध्यान देने योग्य बातें

वस्त्र धोने की तैयारी अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। वस्त्रों की धुलाई से पूर्व कुछ सावधानियों का पालन करने से तथा विधिपूर्वक वस्त्र धोने से न केवल वस्त्र ठीक प्रकार से धुलते हैं, बल्कि कई अन्य लाभ भी होते हैं। वस्त्रों की धुलाई से पूर्व निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. धोने से पहले वस्त्रों की जेबों को सावधानीपूर्वक देख लेना चाहिए। इससे कई बार जेबों में रखी मुद्रा अथवा महत्त्वपूर्ण कागज नष्ट होने से बच जाते हैं।
  2. वस्त्रों में लगे लोहे के बकसुए, बैचेज़, बकल एवं अन्य इस प्रकार के सामान धुलाई से पूर्व अलग कर देने चाहिए। इससे वस्त्र जंग लगने से सुरक्षित रहते हैं।
  3. फटे वस्त्रों की धुलाई से पूर्व ही मरम्मत कर लेनी चाहिए। यदि वस्त्रों के बटन आदि टूट गये हों तो उनमें भी प्रारम्भ में ही टाँके लगा देने चाहिए।
  4. वस्त्रों में यदि दाग अथवा धब्बे लगे हों, तो उन्हें धुलाई से पूर्व ही साफ करना चाहिए।
  5. रोगी के वस्त्रों को अलग करके व उन्हें उबलते पानी में कुछ समय तक डालकर (UPBoardSolutions.com) उनका नि:संक्रमण करना चाहिए। इससे अन्य व्यक्तियों में रोग फैलने की आशंका समाप्त हो जाती है।
  6. रेशमी, ऊनी व सूती वस्त्रों को अलग-अलग कर लेना चाहिए। (7) रेशमी वस्त्रों को धोते समय कास्टिक सोडे का न्यूनतम प्रयोग करना चाहिए।
  7.  रेशमी व ऊनी कपड़ों को अधिक गर्म पानी में नहीं धोना चाहिए और इन्हें अधिक कसकर नहीं निचोड़ना चाहिए।
  8. सूती वस्त्र धोते समय गर्म पानी व कास्टिक सोडे का प्रयोग किया जा सकता है। सफेद सूती वस्त्रों को धोते समय रानीपाल व नील का भी प्रयोग करते हैं। सूती वस्त्रों में इच्छानुसार कलफ भी लगाया जा सकता है।
  9. सफेद व रंगीन कपड़ों को अलग-अलग धोना चाहिए। पहले सफेद कपड़ों को तथा बाद में रंगीन कपड़ों को धोना चाहिए। इससे सफेद कपड़ों पर रंगों के धब्बे पड़ने की आशंका नहीं रहती है।

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प्रश्न 3:
रेशमी तथा ऊनी वस्त्रों की धुलाई की सम्पूर्ण विधि का वर्णन कीजिए। [2007, 11, 12]
या
ऊनी वस्त्रों को धोते समय क्या-क्या सावधानियाँ रखेंगी? [2011, 12, 14, 15]
या
ऊनी वस्त्र धोने एवं सुखाने की विधि लिखिए। [2010, 12]
या
रेशमी वस्त्रों की धुलाई की विधि लिखिए। [2007, 09, 10, 11, 13, 15]
उत्तर:
रेशमी वस्त्रों की धुलाई

तीव्र क्षार, रगड़ एवं अधिक ताप के उपयोग से रेशम के तन्तु दुर्बल व बेकार हो जाते हैं। अत: मूल्यवान् रेशमी वस्त्रों की या तो ड्राइक्लीनिंग करानी चाहिए अथवा उन्हें विधिपूर्वक धोना चाहिए। रेशमी वस्त्रों को क्षारहीन साबुन से अथवा उत्तम गुणवत्ता वाले डिटर्जेण्टों से गुनगुने पानी में धोनी चाहिए। ईजी अथवा रीठों का सत रेशमी वस्त्रों को धोने के लिए प्रयुक्त करना चाहिए। सफेद एवं रंगीन रेशमी वस्त्रों को अलग-अलग धोना चाहिए।

धोने की विधि:
एक प्लास्टिक के टब अथवा बाल्टी में हल्का गर्म पानी लेकर उसमें डिटर्जेण्ट पाउडर घोलकर झाग बना लेते हैं। रीठे का प्रयोग करते समय बीज निकालकर रीठों को पानी में उबाल लेते हैं। अब इस पानी को ठण्डा कर झाग उत्पन्न कर लेते हैं। रेशमी वस्त्रों को उपर्युक्त (UPBoardSolutions.com) किसी भी प्रकार के झागदार पानी में डुबो देते हैं। अब इन्हें हाथों से हल्के-हल्के मलकर एवं दबाकर इनका मैल निकाल देते हैं। यह प्रक्रिया दो या तीन बार दोहराते हैं। अन्तिम बार हल्के रंग के वस्त्रों के लिए एक चम्मच मेथिलेटिड स्प्रिट व गहरे र के वस्त्रों के लिए एक चम्मच सिरका एक लीटर पानी में मिलाकर खंगालने से इन वस्त्रों में स्वाभाविक चमक आ जाती है।

निचोड़ना एवं सुखाना:
रेशमी वस्त्रों को या तो हल्के-हल्के दबाकर उनका पानी निकालना चाहिए अथवा तौलिये में लपेटकर निचोड़ना चाहिए। अब इन्हें सावधानीपूर्वक फैलाकर छाँव में सुखाना चाहिए। हल्के से नम रहने पर मध्यम गर्म इस्त्री से इनकी सलवटें दूर की जा सकती हैं।

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ऊनी वस्त्रों की धुलाई

धोने की विधि:
ऊनी वस्त्रों को धोने से पूर्व अच्छी प्रकार झाड़कर उनकी धूल-मिट्टी दूर कर देनी चाहिए। ऊनी वस्त्रों को रीठे के झागदार पानी अथवा पानी में डिटर्जेण्ट पाउडर डालकर रेशमी वस्त्रों के समान धोना चाहिए। रंगीन व हल्के रंगों के ऊनी वस्त्रों को अलग-अलग धोना चाहिए। ऊनी वस्त्रों को हल्के हाथों से मलकर उनका मैल दूर करना चाहिए।

खंगालना व निचोड़ना:
ऊनी वस्त्रों को धीरे से हाथ का नीचे की ओर से सहारा देकर जल से बाहर निकालना चाहिए। हल्का-सा दबाव देकर इनका शोषित जल निकाल दें। साफ जल का प्रयोग कर इस प्रक्रिया को 2-3 बार दोहराएँ जिससे कि वस्त्रों से साबुन पूर्ण रूप से दूर हो जाए। अन्तिम बार एक लीटर जल में आधा चम्मच सिरका डालने से इन वस्त्रों में स्वाभाविक चमक आ जाती है। अब हाथों से दबाकर अथवा तौलिये में लपेटकर इन्हें निचोड़ना चाहिए।

सुखाना:
ऊनी वस्त्रों को सुखाना एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। इन्हें सूती वस्त्रों के समान लटका कर नहीं सुखाना चाहिए। इससे जल के भार के कारण इनकी आकृति विकृत हो जाती है। इनको पुराने समाचार-पत्र पर इनकी आकृति के अनुसार फैला देना चाहिए। समाचार-पत्र के नीचे मोटा (UPBoardSolutions.com) तौलिया बिछाकर टॉकों अथवा पिनों की सहायता से इनकी आकृति को स्थायित्व दिया जाना चाहिए। अब इन्हें लटकाकर अथवा फैलाकर सुखाया जा सकता है। ऊनी वस्त्रों पर गीला कपड़ा फैलाकर पर्याप्त गर्म इस्त्री द्वारा प्रेस की जाती है।

प्रश्न 4:
सफेद सूती वस्त्रों की धुलाई की विधि लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 16, 17]
उत्तर:
सूती वस्त्रों की धुलाई

सूती वस्त्रों को धोते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. सफेद व रंगीन वस्त्रों को अलग-अलग कर देना चाहिए।
  2.  टूटे बटन वाले व फटे वस्त्रों की मरम्मत कर लेने चाहिए।
  3. वस्त्रों पर लगे दाग-धब्बे छुड़ा लेने चाहिए।
  4. वस्त्रं धोने की सामग्री; जैस – टब, बाल्टी, मग, साबुन, स्टार्च, नील आदि; (UPBoardSolutions.com) को सुविधाजनक स्थान पर एकत्रित कर लेना चाहिए।
  5. सूती वस्त्रों को ठण्डे गुनगुने पानी में 4-5 घण्टे तक भिगो देने से उनका मैल गल जाता है।

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धोने की विधि:
मजबूत सूती वस्त्रों पर साबुन लगाकर दबाव के साथ रगड़ा जाता है। एक बाल्टी में पानी भरकर साबुन के फ्लेक्स अथवा पाउडर घोलकर झाग उत्पन्न कर लेने चाहिए। अब सूती वस्त्रों को इसमें भिगोकर कसकर रगड़े। अधिक मैले स्थानों पर अतिरिक्त साबुन लगाकर दोबारा रगड़ना चहिए। अब इन्हें निचोड़कर 3-4 बार साफ पानी में खंगालें।

कई बार धोने पर सफेद वस्त्रों में पीलापन आने लगता है। इस प्रकार के वस्त्रों को धोने के लिए खौलते हुए पानी को प्रयोग में लाना चाहिए। एक बड़े भगौने में पानी व साबुन का घोल बनाकर वस्त्र भिगोकर उन्हें 15-20 मिनट तक उबालना चाहिए तथा वस्त्रों को लकड़ी की थपकी से चलाते रहना चाहिए। अब जल को ठण्डा होने दें। वस्त्रों को अच्छी प्रकार से रगड़कर निचोड़ लें तथा साफ पानी में 3-4 बार खंगालकर इनसे साबुन के अंश दूर करें। इस विधि द्वारा वस्त्रों का नि:संक्रमण हो जाता है। तथा चिकनाई एवं प्रोटीन के धब्बे भी दूर हो जाते हैं।

सूती वस्त्रों में धुलाई के पश्चात् नील व कलफ लगाया जाता है। इसके लिए एक टब में एक लीटर पानी लेकर उपयुक्त मात्रा में नील व कलफ (स्टार्च) घोल लिया जाता है। अब इसमें धुले वस्त्रों को भिगोकर तथा हल्के दबाव से निचोड़कर सुखा देना चाहिए। ध्यान रहे कि रंगीन कपड़ों को धूप में नहीं सुखाना चाहिए। सफेद वस्त्रों में अतिरिक्त चमक-दमक लाने के लिए रानीपाल का प्रयोग भी किया जाता है।

प्रश्न 5:
सूती वस्त्रों को कलफ क्यों लगाया जाता है? कलफ बनाने की मुख्य विधियों का वर्णन कीजिए।
या
कलफ किन-किन वस्तुओं से तैयार किया जाता है ? विस्तार से समझाइए। [2007, 08, 09, 10, 11, 16, 17, 18]
या
मैदा या अरारोट का कलफ बनाने की विधि लिखिए। [2008, 09, 10, 11, 12, 13, 15]
या
कलफ कितने प्रकार के होते हैं? रेशमी वस्त्र पर किस चीज का कलफ लगाया जाता है ? इसे बनाने की विधि बताइए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16]
या
वस्त्रों पर कलफ क्यों लगाया जाता है ? विभिन्न प्रकार के वस्त्रों पर कौन-कौन से कलफ लगाने चाहिए ? किसी प्रकार के कलफ बनाने और प्रयोग करने की विधि लिखिए। [2008, 09, 16]
या
अरारोट/चावल का कलफ बनाने की विधि लिखिए। [2011, 16]
उत्तर:
सूती वस्त्रों में कलफ

माँडी (स्टार्च) अथवा कलफ के प्रयोग से सूती वस्त्रों में कड़ापन उत्पन्न हो जाता है। कलफ धागों के मध्य के रिक्त स्थानों को भर देता है, जिससे वस्त्रों में धूल व गन्दगी आसानी से नहीं लग पाती। कलफ लगे वस्त्रों पर इस्त्री करने से उनमें झोल नहीं पड़ता तथा उनमें (UPBoardSolutions.com) चमक व नवीनता की जाती है।
कलफ बनाने की विधियाँ वस्त्रों को कलफ लगाने के लिए स्टार्च युक्त भिन्न-भिन्न पदार्थों से कलफ तैयार किया जाता है। कलफ बनाने की कुछ विधियों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है

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(1) मैदा या अरारोट का कलफ:
इसे बनाने के लिए एक बड़ी चम्मच मैदा या अरारोट, तीनचौथाई चम्मच सुहागा, चौथाई चम्मच मोम लेकर ठण्डे पानी में गाढ़ा घोल तैयार करते हैं। अब धीरेधीरे गर्म पानी डालकर तथा किसी बड़े चमचे से हिलाते हुए घोल को पतला कर लेते हैं। इसके उपरान्त हल्की आँच पर इसे पका लेते हैं। पकाते समय इसे निरन्तर चलाते रहना चाहिए अन्यथा गाँठे पड़ जाने की आशंका रहती है। अच्छी तरह पक जाने पर कलफ तैयार हो जाता है।

(2) चावल का कलफ:
चावल को पीसकर महीन छलनी में छान लें। अब चावल का आटा दो चम्मच, सुहागा आधा चम्मच एवं मोम चौथाई चम्मच लेकर तथा इन्हें पानी में घोलकर धीमी आँच पर पकाकर कलफ बनाया जाता है। एक अन्य विधि में चावल बनाते समय शेष बची माँडी में सुहागा व मोम (UPBoardSolutions.com) मिलाकर भी चावल का कलफ बनाया जाता है, परन्तु यह विधि उत्तम नहीं मानी जाती है, क्योंकि इस स्थिति में खाने के लिए शेष बचे चावलों में पोषक तत्वों की न्यूनता हो जाती है। |

(3) साबूदाने का कलफ:
50 ग्राम साबूदाने को आधा लीटर पानी में भिगो दें। 10-15 मिनट बाद थोड़ा पानी डालकर उबाल लें। दानों के भली प्रकार गलकर घुल जाने पर इसे एक महीन कपड़े में छान लें तथा इसमें आधा चम्मच सुहागा मिलाकर कलफ तैयार कर लें।

(4) चोकर का कलफ:
मक्का के चोकर को चार गुने पानी में डालकर लगभग आधा घण्टे तक उबालते हैं। अब इस घोल को महीन कपड़े में छानकर प्रयोग में लाते हैं।

(5) गोंद का कलफ:
125 ग्राम गोंद को लगभग एक लीटर पानी में घोल लें। अब इसे हिलाते हुए गर्म करें। जब यह पूर्णरूप से घुल जाए, तो इसे महीन कपड़े से छान लें। अब इसमें आवश्यकतानुसार पानी मिलाकर प्रयोग में ला सकते हैं। गोंद का कलफ प्रायः ऐसे वस्त्रों में लगाया जाता है जिनमें कि अधिक शक्ति की आवश्यकता नहीं होती है। गोंद का कलफ साधारणतः रेशमी वस्त्रों, झालर तथा लेस आदि में ल्याया जाता है।

प्रश्न 6:
दाग व धब्बे छुड़ाने की प्रमुख विधियाँ कौन-कौन सी हैं? वस्त्रों पर साधारणतः पड़ने वाले दाग-धब्बों को आप किस प्रकार दूर करेंगी? [2012, 13, 15, 16]
या
धब्बे कितने प्रकार के होते हैं? किन्हीं पाँच धब्बों को छुड़ाने की विधि लिखिए। [2007, 12]
या
चाय/वार्निश और हल्दी का धब्बा कैसे छुड़ाएँगी? [2010, 11, 12, 13, 14, 16]
या
दाग-धब्बे छुड़ाने की विधियाँ लिखिए। चिकनाई व हल्दी के धब्बे आप कैसे छुड़ाएँगी? [2007, 11]
या
नेल पॉलिश और हल्दी के धब्बे छुड़ाने की विधि लिखिए। [2011]
या
किन्हीं पाँच धब्बों को छुड़ाने की विधि लिखिए। चाय और स्याही के दाग छुड़ाने की विधि लिखिए। [2007, 12, 13]
या
चाय, स्याही और हल्दी के धब्बे छुड़ाने की विधियाँ लिखिए। [2007, 08, 09, 10, 12, 16, 17, 18]
उत्तर:
दाग-धब्बे छुड़ाने की मुख्य विधियाँ

दाग-धब्बे वस्त्रों की स्वाभाविक सुन्दरता को नष्ट कर देते हैं। थोड़ी-सी भी लापरवाही से दागधब्बे वस्त्रों पर लग जाते हैं और यदि समय रहते इन्हें न छुड़ाया जाए, तो ये स्थायी बनकर रह जाते हैं। इन्हें छुड़ाने की मुख्य विधियाँ निम्नलिखित हैं|

(1) विलायकों द्वारा:
विलायकों; जैसे – कार्बन टेट्राक्लोराइड, पेट्रोल, तारपीन का तेल इत्यादि का प्रयोग कर घुलनशीन धब्बों को छुड़ाया जाता है। विलायक को ब्लॉटिंग पेपर या रुई पर लगाकर धब्बे के पीछे मल देते हैं। धब्बा विलायक में घुलकर वस्त्र से अलग हो जाता है।

(2) रासायनिक पदार्थों द्वारा:
सुहागा, ऑक्जेलिक एसिड, नींबू का रस आदि ऐसे रासायनिक पदार्थ हैं जिनके तनु घोल में वस्त्र भिगोने पर उसके धब्बे दूर हो जाते हैं। विशेष प्रकार के धब्बे के लिए विशिष्ट रासायनिक पदार्थ का उपयोग किया जाता है।

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(3) अवशोषक विधि द्वारा:
इस विधि में धब्बों के ऊपर टेल्कम पाउडर, खड़िया, मैदा व नमक आदि डाले जाते हैं तथा फिर इन्हें ब्रश द्वारा झाड़ दिया जाता है। इस प्रक्रिया को कई बार दोहराने से धब्बे दूर हो जाते हैं।

वस्त्रों से विभिन्न प्रकार के धब्बे दूर करना

वस्त्रों पर प्रायः चाय, कॉफी, फलों के रस, चिकनाई, हल्दी, पेण्ट व स्याही इत्यादि के धब्बे लग जाते हैं। वस्त्रों पर लगने वाले सामान्य धब्बों को निम्नलिखित विधियों से दूर किया जा सकता है

(1) चाय के धब्बे:
ठण्डे पानी व साबुन से चाय का ताजा धब्बा सहज ही दूर हो जाता है। गर्म पानी में सुहागा घोलकर चाय के पुराने धब्बों को दूर किया जा सकता है।

(2) कॉफी व चॉकलेट के धब्बे:
सुहागा व जल के गुनगुने घोल में भिगोकर धोने से कॉफी व चॉकलेट के धब्बे दूर हो जाते हैं।

(3) दूध के धब्बे:
चिकनाई के विलायक लगाकर गुनगुने पानी से धोने पर ये सहज ही दूर हो जाते हैं।

(4) क्रीम के धब्बे:
ग्लिसरीन लगाकर तथा गुनगुने पानी में साबुन से धोकर इन धब्बों को छुड़ाया जा सकता है।

(5) पसीने के धब्बे:
सिरका अथवा अमोनिया के हल्के घोल का प्रयोग करके धब्बों को दूर करें तथा फिर साफ पानी से वस्त्र को धो दें।

(6) पान के धब्बे:
दही, कच्चा आलू, हरी मिर्च आदि से धब्बे को रगड़कर गर्म पानी व साबुन से धोने पर पान के धब्बों को दूर किया जा सकता है।

(7) रक्त के धब्बे:
सूती वस्त्र को नमक के घोल अथवा कपड़े धोने के सोडे में डुबोकर ब्रश (UPBoardSolutions.com) से रगड़ने पर रक्त के धब्बे दूर हो जाते हैं। रेशमी वस्त्रों पर जल में बने स्टार्च का पेस्ट लगाकर तथा सूखने पर ब्रश द्वारा झाड़ने से रक्त के धब्बों को दूर किया जा सकता है।

(8) अण्डे के धब्बे:
ताजे धब्बों को कास्टिक सोडे के घोल से रगड़कर दूर किया जा सकता है। पुराने धब्बों को पिसा हुआ नमक रगड़कर तथा फिर साबुन से धोकर दूर किया जा सकता है।

(9) फलों के रस के धब्बे :
सूती वस्त्रों पर लगे धब्बों को सुहागे के घोल में कुछ घण्टों तक भिगोकर दूर किया जा सकता है। रेशमी वस्त्रों पर लगे धब्बों को पहले ग्लिसरीन लगाकर र नींबू का रस लगाकर धोकर दूर किया जा सकता है।

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(10) हल्दी के धब्बे:
हल्दी के धब्बों को तुरन्त साबुन से धोएँ तथा अब हल्के पड़े धब्बों पर स्प्रिट अथवा हाइड्रोजन-पर-ऑक्साइड का प्रयोग करके इन्हें दूर किया जा सकता है।

(11) पेण्ट व वार्निश के धब्बे:
इन्हें पेट्रोल, तारपीन का तेल अथवा कार्बन टेट्राक्लोराइड जैसे विलायकों का प्रयोग कर दूर किया जा सकता है।

(12) जंग के धब्बे:
नींबू का रस एवं नमक लगाकर धोने से प्रायः ये धब्बे दूर हो जाते हैं, परन्तु ऐसा न होने पर ऑक्जेलिक एसिड लगाकर धोने से ये निश्चित रूप से दूर हो जाते हैं।

(13) स्याही के धब्बे:
मेथिलेटिड स्प्रिट में भिगोकर धोने से बॉलपेन स्याही के धब्बे दूर हो जाते हैं। गर्म दूध व नींबू का रस लगाने तथा फिर साबुन से धोने पर साधारण स्याही के धब्बों को दूर किया जा सकता है।

(14) नेल पॉलिश के धब्बे:
नेल पॉलिश को घोलने के लिए थिनर उपलब्ध होता है। रूई में थिनर लगाकर धब्बे पर रगड़ने से नेल पॉलिश का धब्बा समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 7:
वस्त्रों की सुरक्षा एवं उनके रख-रखाव के उपायों का उल्लेख कीजिए।
या
ऊनी वस्त्रों की आप सुरक्षा कैसे कर सकती हैं? [2010, 11, 14, 15, 16, 17]
उत्तर:
वस्त्रों की सुरक्षा एवं उनका रख-रखाव

मनुष्य की प्रमुख आवश्यकताओं में वस्त्र भी अपना स्थान रखते हैं। मनुष्य वस्त्रे सदैव मौसम एवं अवसर के अनुसार ही पहनता है। गर्मी में सूती एवं रेशमी वस्त्रों का प्रयोग होता है तथा शीतकाल में ऊनी वस्त्रों का प्रयोग किया जाता है। मानवकृत (कृत्रिम) तन्तुओं से निर्मित वस्त्रों का प्रत्येक ऋतु में पहनने का प्रचलन हो गया है। इसीलिए ऐसे वस्त्रों को जो केवल एक विशेष ऋतु; जैसे-ऊनी व कीमती साड़ियाँ; अथवा विशेष अवसरों पर ही प्रयोग किए जाते हैं, फफूदी एवं कीड़ों से सुरक्षा करनी चाहिए।

वस्त्रों की सुरक्षा के उपाय

  1. वस्त्रों को सीलनरहित स्थान (सन्दूक या अलमारी) में ही रखना चाहिए। डी०डी०टी० पाउडर छिड़ककर व अखबार का कागज बिछाकर ही कपड़ों को रखना चाहिए अथवा ओडोनिल या ओडोर की एक टिकिया खोलकर सन्दूक अथवा अलमारी में रख देनी चाहिए।
  2. (रखने से पहले देख लेना चाहिए कि वस्त्रों में नमी तो नहीं है।
  3. ऊनी वस्त्रों को सदैव धोकर ब्रश से साफ करके ही रखना चाहिए। कीमती वस्त्रों (UPBoardSolutions.com) को ड्राइक्लीन करके ही रखना चाहिए। धूल-मिट्टी, गन्दगी की वजह से ही ऊनी वस्त्रों में कीड़ा लगता है।
  4. ऊनी वस्त्रों को यदि अखबार के कागज में लपेटकर रखा जाए, तो उनमें कीड़ा नहीं लगता। .
  5. ऊनी वस्त्रों के सन्दूक में नीम की सूखी पत्तियाँ या नेफ्थलीन की गोलियाँ अथवा ओडोनिल की टिकिया रखने पर कीड़ा कदापि नहीं लगता है। सन्दूक अथवा अलमारी में बरसाती हवा नहीं जानी । चाहिए।
  6. ऊनी वस्त्रों को वर्षा ऋतु के उपरान्त एक-दो बार अवश्य ही तेज धूप में 3-4 घण्टे के लिए सुखाना चाहिए।
  7. जरीदार, रेशमी एवं गोटे-सल्मे के वस्त्रों को अलग से मलमल के कपड़े में बन्द करके रखना चाहिए। इनमें नैफ्थलीन की गोलियाँ कदापि न रखें।

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रख-रखाव

  1. वस्त्रों को यथासम्भव घर पर ही धोना चाहिए। इससे उनका जीवनकाल बढ़ जाता है।
  2. बनियान, अण्डरवियर अदि को प्रतिदिन धोना चाहिए।
  3. वस्त्रों को कभी भी बहुत ज्यादा गन्दा नहीं होने देना चाहिए; क्योंकि बहुत गन्दा होने पर एक वे बिल्कुल साफ नहीं होते हैं तथा धोने के लिए इन्हें काफी रगड़ना व मसलना पड़ता है, जिससे ये क्षीण हो जाते हैं।
  4. पैण्ट, कमीज, कुर्ता, साड़ी इत्यादि को यदि हैंगर पर टाँगकर सुखाएँ, तो उन पर प्रेस आसानी से हो जाती है।
  5. वस्त्रों की समय-समय पर आवश्यक मरम्मत करते रहना चाहिए। यदि कोई वस्त्र उधड़ गया हो या कट-फट गया हो, तो उसकी तुरन्त मरम्मत करनी चाहिए। वस्त्रों के टू न एवं बिगड़ी हुई जिप आदि को भी यथाशीघ्र ठीक कर लेना चाहिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
वस्त्रों की धुलाई के सामान्य सिद्धान्त लिखिए।
उत्तर:
वस्त्रों की धुलाई को कार्य दैनिक पारिवारिक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। अतः इस कार्य के व्यावहारिक पक्ष के साथ-ही-साथ सैद्धान्तिक पक्ष को जानना भी आवश्यक है। वस्त्रों की धुलाई के सैद्धान्तिक पक्ष के अन्तर्गत दो तथ्यों की जानकारी आवश्यक है। प्रथम यह कि वस्त्र कैसे गन्दे या मैले हो जाते हैं तथा दूसरा यह कि इन्हें साफ करने का क्या उपाय है? | वस्त्रों की गन्दगी के लिए दो कारक जिम्मेदार होते हैं। प्रथम है धूल या उड़ने वाली गन्दगी। इस प्रकार की गन्दगी वस्त्रों पर चिपकती नहीं है। वस्त्रों से इस प्रकार की गन्दगी को अलग करने के लिए वस्त्रों को ब्रश से अच्छी प्रकार से झाड़ा जाता है। इसके अतिरिक्त सरलता से धोये जाने वाले वस्त्रों को भली-भाँति पानी द्वारा खंगाल लेने से भी धूल-मिट्टी अलग हो जाती है। वस्त्रों को गन्दा करने वाला दूसरा कारक है-स्थिर गन्दगी यो मैल। नमी, चिकनाई या पसीने (UPBoardSolutions.com) में बाहरी धूल मिट्टी पड़ जाने पर वह चिपककर स्थिर गन्दगी या मैल का रूप धारण कर लेती है। इस प्रकार की गन्दगी को वस्त्रों से अलग करने के लिए कुछ अतिरिक्त उपाय करने पड़ते हैं। इसके लिए जिस प्रक्रिया को अपनाया जाता है, उसे ही व्यवस्थित धुलाई कहा जाता है। धुलाई के लिए जल एवं शोधक पदार्थ (साबुन आदि) की आवश्यकता होती है। शोधक पदार्थों द्वारा मैल को घोलकर वस्त्रों से अलग किया जाता है तथा बार-बार साफ पानी में खंगाल कर वस्त्रों को पूरी तरह से साफ कर लिया जाता है।

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प्रश्न 2:
सूती और रेशमी वस्त्र की धुलाई में क्या अन्तर है? [2009]
उत्तर:
सूती एवं रेशमी वस्त्रों के तन्तुओं के भौतिक एवं रासायनिक गुणों में अन्तर होने के कारण इन्हें धोने के लिए भिन्न विधियाँ अपनाई जाती हैं। सूती एवं रेशमी वस्त्रों की धुलाई की विधियों में निम्नलिखित अन्तर होते हैं

  1. तीव्र क्षार, रगड़ एवं अधिक ताप के उपयोग से रेशम के तन्तु दुर्बल एवं बेकार हो जाते हैं। अत: मूल्यवान रेशमी वस्त्रों की या तो ड्राइक्लीनिंग करानी चाहिए अथवा उन्हें विधिपूर्वक सावधानी से धोना चाहिए। इसके विपरीत सूती वस्त्रों को खौलते पानी, तीव्र क्षार एवं रगड़कर धोया जा सकता है।
  2.  रेशमी वस्त्रों को उत्तम गुणवत्ता के डिटर्जेण्टों अथवा रीठों के सत का प्रयोग कर (UPBoardSolutions.com) गुनगुने पानी में हल्के-हल्के मलकर धोना चाहिए। सूती वस्त्रों को कास्टिक सोडायुक्त साबुन लगाकर रगड़-रगड़कर ठण्डे से खौलते पानी तक में धोया जा सकता है।
  3. सूती वस्त्रों में अधिक सफेदी व चमक लाने के लिए नील व रानीपाल लगाया जाता है, जबकि रेशमी वस्त्रों पर इनका प्रयोग नहीं किया जाता।
  4. रेशमी वस्त्रों में कड़ापन उत्पन्न करने के लिए केवल गोंद का कलफ लगाया जाता है, जबकि सूती वस्त्रों में लगभग सभी प्रकार का कलफ लगाया जा सक

प्रश्न 3:
नायलॉन व टेरीलीन वस्त्रों की धुलाई किस प्रकार की जाती है?
उत्तर:
मानवकृत तन्तुओं से निर्मित इन वस्त्रों को धोने के लिए मध्यम तापक्रम के जल का उपयोग किया जाता है। कम क्षार वाले साबुन, सर्फ, जेण्टील तथा रीठों का सत आदि कृत्रिम वस्त्रों को धोने के लिए उपयुक्त रहते हैं। कृत्रिम वस्त्रों को धोते समय उन्हें बलपूर्वक रगड़ना नहीं चाहिए। इन्हें साबुन लगाकर अथवा झागयुक्त साबुन के घोल में डालकर हल्के-हल्के मलकर धोना चाहिए। अधिक मैले भाग पर अतिरिक्त साबुन लगाकर धोना चाहिए। अब वस्त्रों को 2-3 बार साफ पानी में खंगालना चाहिए।
कृत्रिम वस्त्रों को निचोड़ना नहीं चाहिए। इन्हें तौलिए में लपेटकर दबा-दबाकर इनका पानी निकालना चाहिए। अब इन्हें हैंगर पर लटकाकर सुखाना चाहिए। इस प्रकार सुखाने से इनमें सलवटें नहीं पड़ती हैं, जिससे इन पर इस्त्री करने की आवश्यकता नहीं रहती है। रंगीन वस्त्रों को धूप में नहीं सुखाना चाहिए।

प्रश्न 4:
सफेद वस्त्रों पर नील लगाने की विधि का वर्णन कीजिए। या सफेद सूती वस्त्रों में नील का प्रयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर:
सफेद वस्त्रों के पीलेपन को समाप्त करने के लिए तथा अधिक सफेदी एवं चमक लाने के लिए नील का प्रयोग किया जाता है। धुलाई के पश्चात् स्वच्छ पानी में अन्तिम खंगाल के बाद वस्त्रों को नील के घोल में डुबोकर निकाला जाता है। एक साफ कपड़े के टुकड़े में नील की पोटली बनाकर स्वच्छ पानी डालकर हिलाते हैं। इससे नील का साफ घोल बन जाता है। आजकल घुलित नील का उपयोग किया जाता है, जोकि अधिक प्रभावी रहता है। इसकी 8-10 बूंदें एक बाल्टी जल के लिए पर्याप्त रहती हैं। अब धुले हुए सफेद वस्त्रों को नील के घोल में 5-10 मिनट तक डुबोकर निकाल
ग सामान्य धूप में सुखा लिया जाता है। यदि वस्त्रों में अधिक नील लग जाए, तो तनु ऐसीटिक अम्ल का प्रयोग कर नील के रंग को कम किया जा सकता है।

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प्रश्न 5:
सूती वस्त्रों में कलफ लगाने से क्या लाभ हैं? या सफेद सूती कपड़ों में कलफ और नील का प्रयोग क्यों करते हैं? [2009, 12]
उत्तर:
सूती वस्त्रों को धोने के बाद उनमें कलफ व नील लगाकर उन्हें सुखाया जाता है। सूखने पर इन वस्त्रों पर इस्त्री की जाती है। कलफ व नील लगाने से निम्नलिखित लाभ होते है।

  1. वस्त्रों के तन्तुओं के मध्य रिक्त स्थानों की कलफ द्वारा पूर्ति हो जाने से इनमें धूल व गन्दगी प्रवेश नहीं कर पाती है।
  2. कड़ापन आ जाने से वस्त्रों में झोल नहीं पड़ता तथा क्रीज अच्छी बनती है।
  3. सुहागे, मोम वे नील से वस्त्रों में स्वाभाविक चमक आती है।
  4. वस्त्र अधिक समय तक सुन्दर व स्वच्छ रहते हैं।

प्रश्न 6:
सफेद वस्त्रों को धूप में सुखाने से क्या लाभ होता है? [2018]
उत्तर:
सफेद सूती वस्त्रों को जहाँ तक हो सके धूप में ही सुखाना चाहिए। वस्त्रों को धूप में सुखाने से निम्नलिखित लाभ होते हैं

  1. वस्त्र शीघ्र ही सूख जाते हैं।
  2. वस्त्र को धूप में सुखाने से नील एवं कलफ की गन्ध समाप्त हो जाती है।
  3. कपड़ों में व्याप्त सीलन की दुर्गन्ध समाप्त हो जाती है।
  4. धूप में वस्त्रों को सुखाने से उनका समुचित नि:संक्रमण हो जाता है अर्थात् उनमें विद्यमान रोगाणु नष्ट हो जाते हैं।
  5. सफेद सूती वस्त्र धूप में सुखाने पर अधिक सफेद तथा चमकदार हो जाते हैं।
  6. धूप में वस्त्रों को सुखाने से नील एवं कलफ के अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 7:
वस्त्रों पर इस्त्री करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखा जाता है? [2007, 15]
या
वस्त्रों पर इस्त्री करना क्यों आवश्यक है? इस्त्री करते समय क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए? [2007, 08, 09, 10, 14, 15, 16, 18]
उत्तर:
इस्त्री करके कपड़ों की सलवटें दूर कर क्रीज बनाई जाती है, जिससे कपड़े सुन्दर व आकर्षक दिखाई पड़ते हैं, परन्तु अनुपयुक्त विधि अथवा लापरवाही से इस्त्री करने पर कपड़ों की अपार क्षति की सम्भावना रहती है; अतः इस्त्री करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1.  कोयले वाली इस्त्री का खुले वातावरण अथवा पंखे के नीचे कदापि प्रयोग न करें, क्योंकि वायु द्वारा चिंगारी उड़ने से कपड़ों के जलने की सम्भावना रहती है।
  2.  विद्युत-इस्त्री को उसके निर्दिष्ट तापक्रम तक ही गर्म होने दें। विद्युत-इस्त्री प्रयोग (UPBoardSolutions.com) में लाते समय लकड़ी की कुर्सी पर बैठकर लकड़ी की मेज पर वस्त्र फैलाकर इस्त्री करें। इससे विद्युत झटकों से सुरक्षित रहा जा सकता है।
  3. इस्त्री को दाएँ से बाएँ चलाना चाहिए।
  4.  इस्त्री करने से पूर्व वस्त्रों को उनके आकार व क्रीज के अनुरूप व्यवस्थित करें।
  5. पहले कॉलर फिर कफ व झालर, तत्पश्चात् अन्य भागों पर इस्त्री करनी चाहिए।
  6. इस्त्री को वस्त्रों के अनुरूप ही गर्म करना चाहिए।

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प्रश्न 8:
सूती, रेशमी व ऊनी वस्त्रों पर इस्त्री किस प्रकार की जाती है?
या
रेशमी कपड़ों पर इस्त्री करने की विधि लिखिए। [2007, 08, 11]
या
वस्त्रों पर इस्त्री क्यों करते हैं? वस्त्रों पर इस्त्री करने की विधि लिखिए। [2008]
उत्तर:
वस्त्रों पर इस्त्री करने का एक कारण तो कपड़ों की सलवटें दूर करना व उन्हें आकर्षक बनाना है किन्तु इस्त्री करना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि धुलाई के दौरान यदि वस्त्रों में कुछ रोगाणु रह गए हों, तो वे इस्त्री की गरम सेंक से नष्ट हो जाएँ। इसके अलावा इस्त्री करने के बाद कपड़ों को सहेजकर रखने में सरलता होती है, क्योंकि तह किए हुए कपड़े फैले हुए कपड़ों की अपेक्षा कम स्थान घेरते हैं। सूती वस्त्रों को अधिक ताप, दबाव एवं नमी की आवश्यकता होती है; अतः इन वस्त्रों को पहले पानी छिड़ककर नम किया जाता है तथा इसके बाद अत्यधिक गर्म इस्त्री द्वारा अधिक दबाव डालकर इन पर प्रेस की जाती है। रेशमी वस्त्रों को (UPBoardSolutions.com) अपेक्षाकृत कम ताप, दबाव व नमी की आवश्यकता होती है। थोड़े नम रेशमी वस्त्रों को चादर बिछी मेज पर फैलाकर इनकी उल्टी सतह पर मध्यम गर्म इस्त्री की जाती है। ऊनी वस्त्रों पर मोटा व नम सूती कपड़ा बिछाकर इनकी उल्टी सतह पर मध्यम गर्म इस्त्री की जाती है। इसके अतिरिक्त ऊनी कपड़ों पर भाप की प्रेस द्वारा भी इस्त्री की जाती है।

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प्रश्न 9:
शुष्क धुलाई से क्या तात्पर्य है? शुष्क धुलाई के काम आने वाले प्रतिकर्मकों के नाम लिखिए। [2014, 16]
उत्तर:
शाब्दिक रूप से शुष्क धुलाई का अर्थ है–सुखी धुलाई, परन्तु वास्तव में यह सूखी नहीं होती वास्तव में यह धुलाई की वह विधि है जिसमें कपड़े को साफ करने के लिए जल का उपयोग बिल्कुल भी नहीं किया जाता है। जल का इस्तेमाल न होने के कारण ही इसे सूखी धुलाई कहा जाता है। वैसे इस धुलाई में अन्य गीले द्रव विलायक के रूप में अवश्य ही अपनाए जाते हैं। शुष्क धुलाई के मुख्य प्रतिकर्मक हैं–पेट्रोल, डीजल, बेन्जीन तथा कार्बन टेट्राक्लोराइड।

प्रश्न 10:
किन वस्त्रों पर शुष्क धुलाई की जाती है? शुष्क धुलाई के लाभ लिखिए। [2011, 14, 15, 16]
उत्तर:
मूल्यवान वस्त्रों तथा रेशम, ऊन व रेयॉन आदि से निर्मित वस्त्रों की शुष्क धुलाई (ड्राइ-क्लीनिंग) की जाती है। यह भी कहा जा सकता है कि पानी से धोने पर जिन वस्त्रों के खराब होने की
आशंका हो, उन्हें शुष्क धुलाई द्वारा साफ किया जाता है। इससे होने वाले लाभ निम्नलिखित हैं

  1. वस्त्रों की कोमलता, चमक व बुनाई को क्षति पहुँचने की सम्भावना अत्यधिक कम रहती है।
  2.  शुष्क धुलाई द्वारा वस्त्रों को धोने पर वे बिल्कुल भी सिकुड़ते नहीं हैं।
  3. वस्त्रों में सिकुड़न नहीं होती व उनकी स्वाभाविक आकृति भी बनी रहती है।
  4. चिकनाई के कारण वस्त्रों पर जमी धूल आदि दूर हो जाती है।

प्रश्न 11:
शुष्क धुलाई से होने वाली हानियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
यह सत्य है कि शुष्क धुलाई को धुलाई की एक उत्तम विधि माना जाता है, परन्तु धुलाई की इस विधि से कुछ हानियाँ भी हैं; जैसे

  1. यह धुलाई साधारण धुलाई की तुलना में बहुत महँगी होती है, क्योंकि पेट्रोल आदि विलायक बहुत महँगे होते हैं तथा शीघ्र ही उड़ने वाले होते हैं।
  2. शुष्क धुलाई में इस्तेमाल होने वाले विलायकों में एक विशेष प्रकार की तीखी गन्ध होती है। कुछ लोगों को यह गन्ध अच्छी नहीं लगती तथा कभी-कभी इससे एलर्जी के कारण जुकाम आदि की शिकायत भी हो जाती है।
  3. शुष्क धुलाई द्वारा कपड़ों की हर प्रकार की गन्दगी को अलग नहीं किया जा सकता। इस विधि द्वारा कपड़ों से केवल उन्हीं धब्बों को हटाया जा सकता है, जो पेट्रोल आदि विलायकों में सरलता से घुल जाते हैं, परन्तु कुछ दाग-धब्बे ऐसे भी हो सकते हैं जो इन विलायकों में नहीं घुलते। इस प्रकार के दाग-धब्बों को शुष्क धुलाई द्वारा साफ नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 12:
रासायनिक पदार्थों के प्रयोग से वस्त्र का धब्बा छुड़ाते समय कौन-सी सावधानियाँ रखनी चाहिए? [2016, 18]
उत्तर:
रासायनिक पदार्थों से वस्त्रों के दाग-धब्बे छुड़ाने के लिए विशेष सावधानी से काम लेना चाहिए तथा निम्नलिखित सावधानियाँ रखनी चाहिए|

  1. रासायनिक विधि द्वारा दाग: धब्बों को छुड़ाना हो तो विशेष सावधानी से काम लेना चाहिए। सामान्य रूप से रासायनिक प्रतिकर्मकों के हल्के घोल को ही प्रयुक्त करना चाहिए। यदि हल्के घोल से धब्बे न छूटें तो क्रमशः अधिक सान्द्र घोल का प्रयोग करना चाहिए। बहुत अधिक सान्द्रित रसायनों से कपड़े खराब भी हो सकते हैं।
  2. रासायनिक प्रतिकर्मकों को अधिक समय तक कपड़ों पर नहीं लगे रहने देना चाहिए। जैसे ही धब्बा हट गया प्रतीत हो, वैसे ही रासायनिक प्रतिकर्मक से युक्त कपड़े को साफ जल से धो लेना चाहिए। इससे कपड़ों का रंग खराब नहीं होता तथा वे क्षतिग्रस्त भी नहीं होते।
  3. रासायनिक विधि से दाग: धब्बे छुड़ाते समय सदैव खुले स्थान पर बैठकर ही इन पदार्थों का प्रयोग करना चाहिए, अन्यथा इन रासायनिक पदार्थों से निकलने वाली या बनने वाली गैसों से व्यक्ति के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
  4. अम्लीय रासायनिक पदार्थों को प्रयुक्त करने से कपड़े का रंग भी फीका पड़ जाता है। ऐसे कपड़ों को दाग-धब्बे छुड़ाकर तुरन्त अमोनिया के हल्के घोल में डाल देना चाहिए। इससे कपड़े का रंग नहीं बिगड़ता।
  5. दाग-धब्बों को हटाने वाले कुछ रासायनिक पदार्थ ज्वलनशील होते हैं; उदाहरण के लिए: पेट्रोल, ऐल्कोहल, स्पिरिट आदि। इस प्रकार के रसायनों का प्रयोग करते समय पास में कोई
    जलती हुई मोमबत्ती या अँगीठी नहीं होनी चाहिए।

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
वस्त्रों की धुलाई के मुख्य उद्देश्य बताइए। [2011]
उत्तर:
वस्त्रों की सफाई, उनकी दुर्गन्ध समाप्त करना, सुरक्षा, सुन्दर बनाना, व्यक्तिगत स्वास्थ्य तथा बचत करना वस्त्रों की धुलाई के मुख्य उद्देश्य हैं।

प्रश्न 2:
वस्त्रों की धुलाई के मुख्य चरण कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
वस्त्रों की धुलाई के मुख्य चरण हैं
(1) कपड़ों को पानी में भिगोना,
(2) साबुन या कोई शोधक पदार्थ लगाना,
(3) मैल निकालना,
(4) साफ पानी में खंगालना तथा
(5) सुखाना।

प्रश्न 3:
धुलाई के काम आने वाली मुख्य वस्तुएँ बताइए। [2012]
उत्तर:
धुलाई के काम आने वाली मुख्य वस्तुएँ हैं-जल, टब, बाल्टी, मग, ब्रश, साबुन या डिटर्जेण्ट पाउडर, नील, कलफ तथा चाहें तो कपड़े धोने की मशीन।

प्रश्न 4:
सफेद कपड़ों को रंगीन कपड़ों के साथ क्यों नहीं धोना चाहिए? [2018]
उत्तर:
सफेद कपड़ों को यदि रंगीन कपड़ों के साथ धोया जाता है तो सफेद कपड़ों पर रंगीन कपड़ों का रंग लग जाने की आशंका रहती है।

प्रश्न 5:
सफेद सूती वस्त्रों का पीलापन आप कैसे दूर करेंगी? [2008, 09, 12, 13, 14]
उत्तर:
सूती वस्त्रों को साबुन के पानी में उबालने से उनकी चिकनाई व प्रोटीन के धब्बे दूर हो जाते हैं (UPBoardSolutions.com) तथा उनका पीलापन दूर हो जाता है। धोने के उपरान्त किसी अच्छे श्वेतक का प्रयोग भी किया जा सकता है। नील लगाने से भी सूती वस्त्रों की सफेदी खिल उठती है।

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प्रश्न 6:
सूती वस्त्रों को धोने के बाद उन पर की जाने वाली दो प्रक्रियाओं के बारे में लिखिए।
उत्तर:
सूती वस्त्रों को धोने के बाद मुख्य रूप से अपनाई जाने वाली प्रक्रियाएँ हैं
(1) कलफ लगाना तथा
(2) प्रेस करना। कलफ से इन कपड़ों में कड़ापन व स्वाभाविक चमक आ जाती है तथा प्रेस से सलवटें दूर हो जाती हैं और अच्छी क्रीज़ बन जाती है।

प्रश्न 7:
रंगीन वस्त्रों को धोकर धूप में क्यों नहीं सुखाना चाहिए? [2018]
उत्तर:
रंगीन वस्त्रों को धोकर धूप में सुखाने से इन वस्त्रों का रंग बिगड़ जाने की आशंका रहती है।

प्रश्न 8:
गोंद का कलफ बनाने की विधि लिखिए। [2013]
उत्तर:
गोंद को पीसकर गर्म पानी में उबाल लेते हैं। अब इसे छानकर कलफ के रूप में प्रयुक्त करते हैं।

प्रश्न 9:
गोंद का कलफ किस प्रकार के वस्त्रों को दिया जाता है? [2007, 09, 11, 12, 13, 15]
उत्तर:
गोंद का कलफ मुख्य रूप से रेशमी वस्त्रों को दिया जाता है।

प्रश्न 10:
ऊनी वस्त्रों को धोकर रस्सी पर क्यों नहीं सुखाना चाहिए? [2009, 12]
उत्तर:
ऊनी वस्त्रों को धोकर यदि रस्सी पर टाँगकर सुखाया जाए, तो उनका आकार बिगड़ जाता है तथा वे किसी एक दिशा में लटक जाते हैं।

प्रश्न 11:
ऊनी वस्त्र रखते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? [2014]
या
आप अपने ऊनी वस्त्रों को कैसे सुरक्षित रखेंगी? [2011, 14]
या
ऊनी वस्त्रों को बॉक्स में रखते समय क्या सावधानी रखनी चाहिए? [2007, 10, 18]
उत्तर:
ऊनी वस्त्रों को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें
(1) सफेद कागज अथवा स्वच्छ समाचार-पत्र में लपेट देना चाहिए।
(2) नमीरहित सन्दूक या अलमारी में रखना चाहिए।
(3)नीम की सूखी पत्तियाँ एवं नेफ्थलीन की गोलियाँ (UPBoardSolutions.com) डालकर रखना चाहिए।

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प्रश्न 12:
रीठे के घोल में कौन-कौन से वस्त्र धोये जाते हैं और क्यों? [2008]
उत्तर:
रीठे के घोल में मुख्य रूप से ऊनी तथा रेशमी वस्त्र धोये जाते हैं। वास्तव में रीठे के घोल में किसी प्रकार का क्षार नहीं होता। इस स्थिति में क्षार से खराब होने वाले ऊनी एवं रेशमी वस्त्र रीठे के घोल में धोने पर खराब नहीं होते।

प्रश्न 13:
रेशमी वस्त्र में चमक लाने के लिए किस पदार्थ का प्रयोग किया जाता है? [2010]
उत्तर:
रेशमी वस्त्र में चमक लाने के लिए मेथिलेटिड स्प्रिट को इस्तेमाल किया जाता है।

प्रश्न 14:
रेशमी वस्त्र को प्रेस करते समय आप क्या सावधानी रखेंगी?
उत्तर:
रेशमी वस्त्र जब कुछ नम हों तभी प्रेस करनी चाहिए। प्रेस अधिक गर्म नहीं होनी चाहिए तथा कपड़े को उल्टा करके प्रेस करनी चाहिए।

प्रश्न 15:
किन वस्त्रों पर इस्त्री करने की विशेष आवश्यकता नहीं होती?
उत्तर:
नाइलॉन, टेरीलीन तथा ‘वाश एण्ड वीयर’ प्रकार के वस्त्रों पर इस्त्री करने की आवश्यकता नहीं होती।

प्रश्न 16:
कपड़ों को इस्त्री करना क्यों आवश्यक है? [2007, 08, 09, 10, 14, 15, 18]
उत्तर:
कपड़ों में आकर्षण, सुन्दरता तथा चमक लाने के लिए इस्त्री करना आवश्यक होता है। इस्त्री करने से कपड़े की सलवटें समाप्त हो जाती हैं।

प्रश्न 17:
कपड़ों से धब्बे छुड़ाने की मुख्य विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
कपड़ों से धब्बे छुड़ाने की मुख्य विधियाँ हैं-विलायक विधि, रासायनिक विधि तथा अवशोषक विधि।

प्रश्न 18:
नींबू का प्रयोग किन धब्बों को छुड़ाने के लिए किया जाता है?
उत्तर:
नींबू के रस से स्याही, जंग तथा चाय-कॉफी के धब्बों को छुड़ाया जा सकता है।

प्रश्न 19:
धुलाई से पूर्व वस्त्रों की छंटाई करना क्यों आवश्यक है? [2014]
उत्तर:
सफेद एवं रंगीन कपड़ों को अलग-अलग धोना आवश्यक होता है ताकि सफेद वस्त्रों पर रंग न लगे। इसी प्रकार रेशमी, ऊनी तथा सूती वस्त्रों को भिन्न-भिन्न विधियों द्वारा धोना आवश्यक होता है। अतः धुलाई से पूर्व वस्त्रों की छंटाई करनी आवश्यक होता है।

प्रश्न 20:
ऊनी कपड़ों को समतल स्थान पर क्यों सुखाते हैं? [2013]
उत्तर:
ऊनी कपड़ों के आकार को बिगड़ने से बचाने के लिए समतल स्थान पर सुखाते हैं।

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प्रश्न 21:
कीड़ों तथा फफूदी से वस्त्रों की रक्षा आप किस प्रकार करेंगी? [2015, 16]
उत्तर:
वस्त्रों को कीड़ों से बचाने के लिए उन्हें सुरक्षित स्थान पर सँभालकर रखना चाहिए। ऊनी वस्त्रों को बन्द करते समय उनमें नेफ्थलीन की गोलियाँ या नीम की सूखी पत्तियाँ रखनी चाहिए। फफूदी से बचाव के लिए कपड़ों को कभी भी नम या गीली दशा में बन्द (UPBoardSolutions.com) करके नहीं रखना चाहिए। यदि अधिक समय तक बन्द रखना हो तो वस्त्रों में कलफ भी नहीं लगा होना चाहिए।

प्रश्न 22:
चिकनाई का धब्बा किस प्रकार छुड़ाया जा सकता है? [2016]
उत्तर:
चिकनाई का धब्बा छुड़ाने के लिए कपड़े को साबुन तथा गर्म पानी से धोया जाता है।

प्रश्न 23:
वस्त्रों और कालीन को धूप में सुखाना क्यों आवश्यक है? [2014, 16, 17, 18]
उत्तर:
वस्त्रों और कालीन को धूप में सुखाने से उनकी नमी एवं दुर्गन्ध समाप्त हो जाती है तथा विभिन्न जीवाणु भी मर जाते हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न
निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

1. धूल तथा चिकनाई मिलकर क्या बन जाती है?
(क) गन्दगी
(ख) मिट्टी
(ग) मैल
(घ) हानिकारक पदार्थ

2. नियमित धुलाई से वस्त्र
(क) साफ रहते हैं।
(ख) दुर्गन्ध रहित रहते हैं।
(ग) रोगाणुरहित रहते हैं।
(घ) ये सभी

3. वस्त्र धोने से पूर्व
(क) फटा वस्त्र सिल लेना चाहिए
(ख) शो बटन निकाल लेना चाहिए
(ग) दाग-धब्बे छुड़ा लेना चाहिए
(घ) इनमें से सभी

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4. धुलाई के लिए किस प्रकार को जल उत्तम होता है? [2008, 15, 17, 18]
(क) मृदु जल
(ख) कठोर जल
(ग) ठण्डा जल
(घ) ये सभी

5. घर पर कपड़े धोने से किसकी बचत होती है?[2010, 11, 15]
(क) समय की
(ख) धन की
(ग) साबुन की
(घ) ये सभी

6. तारकोल के दाग को छुड़ाने के लिए प्रयोग किया जाता है
(क) ब्लीचिंग पाउडर
(ख) पेट्रोल
(ग) तारपीन का तेल
(घ) साबुन

7. शुष्क धुलाई में इस्तेमाल किया जाता है
(क) सूखा पाउडर
(ख) गर्म पानी
(ग) रासायनिक विलायक
(घ) कुछ भी नहीं

8. ऊनी वस्त्रों को धोने के लिए किसका प्रयोग किया जाता है? [2011, 12, 13, 15, 16]
(क) मुल्तानी मिट्टी
(ख) रीठे का घोल
(ग) साधारण साबुन
(घ) इनमें से कोई नहीं

9. ऊनी वस्त्रों की सुरक्षा हेतु किसका प्रयोग करते हैं? [2010]
(क) आम की पत्तियाँ
(ख) गुलाब की पत्तियाँ
(ग) नीम की पत्तियाँ
(घ) पीपल की पत्तियाँ

10. ऊनी वस्त्रों को कलफ लगाया जाता है
(क) गोंद का
(ख) अरारोट का
(ग) चावल का
(घ) इनमें से कोई नहीं

11. अरारोट का कलफ किन वस्त्रों में दिया जाता है?
(क) रेशमी
(ख) ऊनी
(ग) सूती
(घ) कृत्रिम

12. चावल का कलफ किन वस्त्रों में दिया जाता है? [2009, 12, 13, 15]
(क) रेशमी
(ख) ऊनी
(ग) सूती
(घ) कृत्रिम

13. कलफ का मुख्य रूप से प्रयोग किया जाता है ।
(क) ऊनी वस्त्रों पर
(ख) रेशमी वस्त्रों पर
(ग) सूती वस्त्रों पर
(घ) कृत्रिम वस्त्रों पर

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14. रेशमी वस्त्रों में चमक के लिए प्रयोग करते हैं
(क) नींबू का रस
(ख) नमक का पानी
(ग) मेथिलेटिड स्प्रिट
(घ) कुछ नहीं

15. रेशमी वस्त्रों पर कलफ लगाया जाता है [2007, 11]
(क) गोंद का
(ख) मैदा का
(ग) अरारोट का
(घ) सभी का

16. किस प्रकार के वस्त्रों में गोंद का कलफ लगाया जाता है? [2007, 09,11,12,13]
(क) रेशमी
(ख) ऊनी
(ग) सूती
(घ) कृत्रिम

17. स्टार्च का कलफ किन वस्त्रों को दिया जाता है?
(क) रेशमी
(ख) ऊनी
(ग) सूती
(घ) बनारसी

18. नील का प्रयोग किस वस्त्र पर करते हैं? [2010, 15, 16, 17]
(क) रेशमी
(ख) ऊनी
(ग) सफेद सूती
(घ) संगीत

19. कच्चे रंग के कपड़े धोते समय पानी में मिलाया जाता है
(क) सिरको
(ख) नींबू का रस
(ग) अमोनिया
(घ) रानीपाल

20. रेशमी वस्त्रों को कैसे धोना चाहिए ? [2013]
(क) वस्त्रों को पीटकर
(ख) वस्त्रों को रगड़कर
(ग) वस्त्रों को पटककर
(घ) इनमें से कोई नहीं

21. रेशमी वस्त्रों को धोने के लिए किसका प्रयोग किया जाता है? [2014]
(क) सोडा
(ख) मिट्टी
(ग) अपमार्जक
(घ) रीठे का सत

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उत्तर:
1. (ग) मैल,
2. (घ) ये सभी
3. (घ) इनमें से सभी,
4. (क) मृदु जल,
5. (ख) धन की,
6. (ग) तारपीन का तेल,
7. (ग) रासायनिक विलायक,
8. (ख) रीठे का घोल,
9. (ग) नीम की पत्तियों,
10. (घ) इनमें से कोई नहीं,
11. (ग) सूती,
12. (ग) सूती,
13. (ग) सूती वस्त्रों पर,
14. (ग) मेथिलेटिड सिट,
15. (क) गोद का,
16. (क) रेशमी,
17. (ग) सूती,
18. (ग) सफेद सूती
19. (क) सिरका,
20. (घ) इनमें से कोई नहीं,
21. (घ) रीठे का सता

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UP Board Solutions for Class 9 Hindi Chapter 5 भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (काव्य-खण्ड)

UP Board Solutions for Class 9 Hindi Chapter 5 भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (काव्य-खण्ड)

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(विस्तृत उत्तरीय प्रश्न)

प्रश्न 1. निम्नलिखित पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए तथा काव्यगत सौन्दर्य भी स्पष्ट कीजिए :

( प्रेम-माधुरी )

1. कूकै लगीं ……….…………………………………………………….. बरसै लगे।
शब्दार्थ- कुकै लगीं = कूकने लगीं। पात = पत्ते । सरसै लगे = सुशोभित होने लगे। दादुर = मेंढक। मयूर = मोर। सँजोगी जन = अपने प्रिय के साथ रहनेवाले लोग। हरसै = हर्षित। सीरी = शीतल । हरिचंद = कवि हरिश्चन्द्र, श्रीकृष्ण। निगोरे = निगोड़े, ब्रज की एक गाली जिसका अर्थ विकलांग होता है।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्यांश पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी काव्य’ में कवित्त-छन्द भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की रचना है जो कि उनके ‘प्रेममाधुरी’ शीर्षक के अन्तर्गत संगृहीत छन्दों से उधृत है।
प्रसंग- कवि ने इस छन्द में वर्षा-ऋतु के आगमन पर दृष्टिगोचर होने वाले विविध प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन किया है।
व्याख्या- वर्षा-ऋतु आने पर कोयलें फिर कदम्ब के वृक्षों पर बैठकर कूकने लगी हैं। वर्षा के जल से धुले हुए वृक्षों के पत्ते वायु में हिलते हुए शोभा पाने लगे हैं। मेंढक बोलने (UPBoardSolutions.com) लगे हैं, मोर नाचने लगे हैं और अपने प्रियजनों के समीप स्थित लोग इस वर्षा-ऋतु के दृश्यों को देख-देखकर प्रसन्न होने लगे हैं। सारी भूमि हरियाली से भर गयी है, शीतल वायु चलने लगी है और हरिश्चन्द्र (श्रीकृष्ण) को देखकर हमारे प्राण मिलने को फिर तरसने लगे हैं। झूमते हुए बादलों के साथ यह वर्षा-ऋतु फिर आ गयी और ये निगोड़े बादल फिर धरती पर झुक झुककर बरसने लगे हैं।
काव्यगत सौन्दर्य- 

  1. कवि ने वर्षा के मनोहारी दृश्यों को शब्द-चित्रों में उतारा है।
  2. भाषा में सरसता एवं प्रवाह है।
  3. शैली वर्णनात्मक तथा शब्द चित्रात्मक है।
  4. अलंकार- अनुप्रास तथा पुनरुक्ति अलंकार हैं। रस-शृंगार।

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2. जिय पै जु…………………………………………………………………………….. कै बिसारिए।
शब्दार्थ- निरधारिये = निर्धारित कीजिए, निश्चित कीजिए। जिय = हृदय। श्रोत = कान। उतै = उधर, कृष्ण की ओर। पराई = परवश। निषारिये = रोकिये। ताहि = उसे । बिसारिए = भुलाइये।
सन्दर्भ- प्रस्तुत छन्द ‘हिन्दी काव्य’ में संकलित एवं कवि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के ‘प्रेम-माधुरी’ काव्य संग्रह से उद्धृत है।
प्रसंग- गोपियाँ उद्धव के सम्मुख अपनी कृष्ण-प्रेमजनित विवशता का वर्णन कर रही हैं।
व्याख्या- गोपियाँ कहती हैं-हे उद्धव। यदि हमारा अपने मन पर अधिकार हो तभी तो हम लोक-लज्जा तथा अच्छे-बुरे आदि का निर्धारण कर सकती हैं। पर हमारे नेत्र, कान, (UPBoardSolutions.com) हाथ, पैर सभी तो परवश हो चुके हैं। ये तो बार-बार कृष्ण की ओर ही आकर्षित होते चले जाते हैं। हम तो सब प्रकार से परवश हो चुकी हैं। अब हमें ज्ञान का उपदेश देकर आप कृष्ण से विमुख कैसे कर पायेंगे। अरे। जो मन में बसा हो उसे तो भुलाया भी जा सकता है, किन्तु स्वयं मन जिसमें बसा हुआ हो उसे कैसे भुलाया जा सकता है।
काव्यगत सौन्दर्य-

  1. भारतेन्दु जी ने गोपियों की प्रेम-विवशता को बड़े मार्मिक शब्दों में प्रस्तुत किया है।
  2. भाषी भावानुरूप है।
  3. शैली भावुकता से सिंचित है।
  4. अलंकार-अनुप्रास अलंकार की योजना है। छन्द-कवित्त।

3. यह संग में………………………………………………………………..………….. नहिं मानती हैं।
शब्दार्थ-  लागिये = लगी हुई। आनती हैं = लाती हैं, धारण करती हैं। छिनहू = क्षण-भर को भी। चाल प्रलै की = आँसू बहाना । बरुनी = बरौनी । थिरें = स्थिर रहतीं । झपैं = बन्द होती हैं। उझपैं = खुलती हैं। पल = पलक। समाइबौ = बन्द होना । निहारे = देखे।
सन्दर्भ – प्रस्तुत सवैया-छन्द ‘हिन्दी काव्य’ में संकलित है जो कवि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की ‘प्रेम-माधुरी’ को प्रसाद है।
प्रसंग- कवि ने वियोगिनी गोपियों के नेत्रों की विवशता को मार्मिक वर्णन किया है।
व्याख्या- गोपियाँ कहती हैं-हे प्रिय । हमारी ये आँखें सदा आपके संग-संग ही लगी रही हैं। आपको देखे बिना इनको चैन ही नहीं पड़ता। यदि कभी क्षणभर को भी आपसे वियोग (UPBoardSolutions.com) हो जाता है तो ये आँखें प्रलय की ठान लेती हैं अर्थात् आँसू बरसाना प्रारम्भ कर देती हैं। ये कभी बरौनियों में स्थिर नहीं रह पातीं। कभी बन्द होती हैं तो कभी खुलती हैं। पलकों में बन्द होना तो जैसे इनको आता ही नहीं है। हमारे प्यारे, हे प्रिय । आपको देखे बिना हमारी आँखें मानती ही नहीं।
काव्यगत सौन्दर्य-

  1. आँखों का मिलन-आकुलता का कवि ने बड़ा हृदयस्पर्शी वर्णन प्रस्तुत किया है। ‘प्रिय प्यारे…..नहीं मानती है’ पंक्ति के चारों ओर ही पूरे छन्द को बुना गया है।
  2. भाषा ब्रज है।
  3. शैली चमत्कारिक और आलंकारिक है।
  4. मुहावरों का मुक्त भाव से प्रयोग हुआ है जैसे-संग लगे डोलना, धीरज न लाना, प्रलय की चाल ठानना आदि । रस-वियोग श्रृंगार । गुण-माधुर्य, छन्द-सवैया।

4. पहिले बहु भाँति……..…………………………………………………………. अब आपुहिं धावती हैं।
शब्दार्थ- भरोसो = आश्वासन। जुदा = अलग।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी काव्य’ में संकलित एवं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित ‘प्रेम माधुरी’ पाठ से उधृत है।
प्रसंग- इस सवैये में श्रीकृष्ण के वियोग में व्याकुल एक गोपी अपनी सखियों के समझाने पर उपालम्भ दे रही है
व्याख्या- हे सखि । पहले तो तुम हमें तरह-तरह से भरोसा दिलाती थीं कि हम अभी श्रीकृष्ण को लाकर तुमसे मिला देती हैं। जो मेरी अपनी सखियाँ कहलाती हैं, मैं उनके ही (UPBoardSolutions.com) विश्वास पर बैठी रही, लेकिन अब वही मुझसे अलग हो गयी हैं। श्रीकृष्ण को मिलाने की अपेक्षा वे उल्टा मुझे ही समझाती हैं। अरी सखी । इन्होंने पहले तो मेरे हृदय में प्रेम की आग भड़का दी और अब उसे बुझाने के लिए स्वयं ही जल लेने को दौड़ी जाती हैं। यह कहाँ का न्याय है?
काव्यगत सौन्दर्य- 

  1. यहाँ कवि ने सखियों के प्रति गोपी की खीझ का सुन्दर चित्रण किया है।
  2. भाषा- ब्रजे ।
  3. शैली- मुक्तक।
  4. रस- विप्रलम्भ श्रृंगार।
  5. छन्द- सवैया।
  6. अलंकार- अनुप्रास। गुण- प्रसाद।

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5. ऊधौ जू सूधो गहो……………………………………………………………….. यहाँ भाँग परी है।
शब्दार्थ- गहो = पकड़ो। सिख = शिक्षा। खरी = पक्की।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी काव्य’ में संकलित एवं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित ‘प्रेम माधुरी’ से उधृत है।
प्रसंग- इस सवैये में गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि वे किसी प्रकार भी उनके निराकार ब्रह्म के उपदेश को ग्रहण नहीं कर सकतीं।
व्याख्या- हे उद्धव। तुम उस मार्ग पर सीधे चले जाओ, जहाँ तुम्हारे ज्ञान की गुदड़ी रखी हुई है। यहाँ पर तुम्हारे उपदेश को कोई गोपी ग्रहण नहीं करेगी; क्योंकि सभी श्रीकृष्ण के प्रेम में विश्वास रखती हैं। हे उद्धव । ये सभी ब्रजबालाएँ एक-सी हैं, कोई भिन्न प्रकृति की नहीं हैं। इनकी तो पूरी मण्डली (UPBoardSolutions.com) ही बिगड़ी हुई है। यदि किसी एक गोपी की बात होती तो तुम उसे ज्ञान का उपदेश देते किन्तु यहाँ तो कुएँ में ही भाँग पड़ी हुई है अर्थात् सभी श्रीकृष्ण के प्रेम-रस में सराबोर होकर पागल-सी हो गयी हैं। इसलिए तुम्हारा उपदेश देना व्यर्थ होगा।
काव्यगत सौन्दर्य-

  1. यहाँ कवि ने श्रीकृष्ण के प्रति गोपियों का अनन्य प्रेम प्रकट किया है।
  2. भाषा- मुहावरेदार, सरस ब्रज।
  3. शैली- मुक्तक।
  4. छन्द- सवैया।
  5. अलंकार- अनुप्रास, रूपक। रस- शृंगार।

6. सखि आयो बसन्त ………………………………………………….. पाँय पिया परसों।
शब्दार्थ-   रितून को कन्त = ऋतुओं को स्वामी बसन्त । वर = श्रेष्ठ। समीर = वायु । गर सों = गले तक, पूरी तरह। परसों = (1) स्पर्श करूँ, (2) आने वाख्ने कल के बाद का दिन।
सन्दर्भ- प्रस्तुतः पद्य हमारी पाठ्यपुस्तक हिद्धी काव्य में भ्रारतेन्दु हुश्चिन्द्र द्वाह चूित ग्रेस धुमाढले अधूख है।
प्रसंग- इस सवैये में बसन्त ऋतु के आगमन पर गोपियों की विरह-व्यथा का चित्रण किया गया है।
व्याख्या- एक गोपी कृष्ण-विरह से पीड़ित होकर दूसरी सखी से अपनी मनोव्यथा को व्यक्त करती हुई कहती है कि हे सखि । ऋतुओं का स्वामी बसन्त आ गया है। चारों दिशाओं में पीली-पीली सरसों फूल रही है। अत्यन्त सुन्दर, शीतल, मन्द और सुगन्धित वायु बह रही है किन्तु बसन्त ऋतु का (UPBoardSolutions.com) मादक वातावरण श्रीकृष्ण के बिना मुझे पूर्णरूप से कष्टदायक प्रतीत हो रहा है। नन्दनन्दन श्रीकृष्ण हमसे यह बताकर गये थे कि मैं परसों तक मथुरा से लौट आऊँगा, परन्तु उन्होंने परसों के स्थान पर न जाने कितने वर्ष व्यतीत कर दिये और अभी तक लौटकर नहीं आये। मैं तो अपने प्रियतम कृष्ण के चरणों का स्पर्श करने के लिए तरस रही हूँ, पता नहीं कब उनके दर्शन हो सकेंगे?
काव्यगत सौन्दर्य- 

  1. बसन्त ऋतु का सुहावना वातावरण गोपियों की विरह-व्यथा को और भी अधिक बढ़ाता है।
  2. भाषा- ब्रज।
  3. शैली- वर्णनात्मक, मुक्तक।
  4. रस- वियोग शृंगार।
  5. छन्द- सवैया।
  6. अलंकार- यमक, अनुप्रास । गुण- माधुर्य ।

7. इन दुखियान को…………………………………………………………………….रहि जायँगी।
शब्दार्थ-   चैन = शान्ति, सुख । बिकल = बेचैन। औधि = अवधि। जौन-जौन = जिस-जिस।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी काव्य’ में संकलित एवं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित ‘प्रेम माधुरी’ पाठ से अवतरित है।
प्रसंग- इस सवैये में श्रीकृष्ण के विरह में व्याकुल गोपियों के नेत्रों की व्यथा का मार्मिक चित्रण किया गया है।
व्याख्या- विरहिणी गोपियाँ कहती हैं कि प्रियतम श्रीकृष्ण के विरह में आकुल इन नेत्रों को स्वप्न में भी शान्ति नहीं मिल पाती है; क्योंकि इन्होंने कभी स्वप्न में भी श्रीकृष्ण के दर्शन नहीं किये। इसलिए ये सदा प्रिय-दर्शन के लिए व्याकुल होते रहेंगे। प्रियतम के लौट आने की अवधि को बीतती (UPBoardSolutions.com) हुई जानकर मेरे प्राण इस शरीर से निकलकर जाना चाहते हैं, परन्तु मेरे मरने पर भी ये नेत्र प्राणों के साथ नहीं जाना चाहते हैं; क्योंकि इन्होंने अपने प्रियतम कृष्ण को जी भरकर नहीं देखा है। इसलिए जिस किसी भी लोक में ये नेत्र जायेंगे, वहाँ पश्चाताप ही करते रहेंगे। हे उद्धव। तुम श्रीकृष्ण से कहना कि हमारे नेत्र मृत्यु के पश्चात् भी तुम्हारे दर्शन की प्रतीक्षा में खुले रहेंगे।
काव्यगत सौन्दर्य-

  1. गोपियों के एकनिष्ठ प्रेम का चित्रण है।
  2. भाषा- ब्रज।‘सपनेहुँ चैन न मिलना’, ‘देखो एक बारहू न नैन भरि’-मुहावरों का सुन्दर प्रयोग है।
  3. शैली- मुक्तक।
  4. रस- वियोग श्रृंगार।
  5. छन्द- सवैया।
  6. अलंकार- अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश।
  7. भाव-साम्य- सूर की अँखियाँ भी हरि-दर्शन की भूखी हैं –

अँखियाँ हरि दरसन की भूखी।
कैसे रहति रूप-रस राँची,ये बतियाँ सुनि रूखी॥

प्रश्न 2. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के जीवन-परिचय एवं रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
अथवा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की साहित्यिक सेवाओं का उल्लेख करते हुए उनके जीवन-परिचय पर प्रकाश 
डालिए।
अथवा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की कृतियों का उल्लेख करते हुए उनकी भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।

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भारतेन्दु हरिश्चन्द्र 
( स्मरणीय तथ्य )

जन्म- सन् 1850 ई०, काशी। मृत्यु- सन् 1885 ई० । पिता- बाबू गोपालचन्द्र।
रचनाएँ- प्रेम-माधुरी, प्रेम-तरंग, प्रेम-फुलवारी, श्रृंगार सतसई आदि।
काव्यगत विशेषताएँ
वण्र्य-विषय- श्रृंगार, प्रेम, ईश्वर-भक्ति, राष्ट्रीय प्रेम, समाज-सुधार आदि।
भाषा- गद्य-खड़ीबोली, पद्य-ब्रजभाषा में उर्दू, अंग्रेजी आदि के शब्द मिश्रित हैं और व्याकरण की अशुद्धियाँ हैं।
शैली- उद्बोधन, भावात्मक, व्यंग्यात्मक।
छन्द- गीत, कवित्त, कुण्डलिया, लावनी, गजल, छप्पय, दोहा आदि।
रस तथा अलंकार- नव रसों का प्रयोग।

  • जीवन-परिचय- बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म काशी के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में सन् 1850 ई० में हुआ था। इनके पिता बाबू गोपालचन्द्र जी (गिरधरदास) ब्रजभाषा के अच्छे कवि थे। इन्हें काव्य की प्रेरणा पिता से ही मिली थी। पाँच वर्ष की अवस्था में ही एक दोहा लिखकर बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने पिता से कवि होने का आशीर्वाद प्राप्त कर लिया था। दुर्भाग्य से भारतेन्दु जी की स्कूली शिक्षा सम्यक् प्रकार से नहीं हो सकी थी। इन्होंने घर पर ही हिन्दी, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी और संस्कृत भाषाओं का ज्ञान स्वाध्याय से प्राप्त किया था। भारतेन्दु जी साहित्य स्रष्टा होने के साथ-साथ साहित्यकारों और कलाकारों को खूब (UPBoardSolutions.com) सम्मान करते थे। ये अत्यन्त ही मस्तमौला स्वभाव के व्यक्ति थे और इसी फक्कड़पन में आकर इन्होंने अपनी सारी पैतृक सम्पत्ति को बर्बाद कर दिया था जो बाद में इनके पारिवारिक कलह का कारण बना। सन् 1885 ई० में इनका देहान्त राजयक्ष्मी की बीमारी से हो गया। 35 वर्ष के अल्पकाल में ही भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने हिन्दी के सर्वतोन्मुखी विकास के लिए जो प्रयास किया वह अद्वितीय । था। इन्होंने पत्रिका प्रकाशन के साथ-साथ लेखकों का एक दल तैयार किया और निबन्ध, कहानी, उपन्यास, नाटक, कविता आदि हिन्दी की विभिन्न विधाओं में साहित्य प्रणयन को प्रेरणा प्रदान की। भारतेन्दु की साहित्यिक सेवाओं का ही परिणाम है कि उनके युग को ‘भारतेन्दु युग’ कहा गया है।
  • रचनाएँ- बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की प्रसिद्ध काव्य-रचनाएँ हैं-प्रेम-माधुरी, प्रबोधिनी, प्रेम-सरोवर, प्रेम-फुलवारी, सतसई श्रृंगार, भक्तमाल, विनय, प्रेम पचीसी आदि । काशी नागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशित तीन खण्डों में भारतेन्दु ग्रन्थावली’ नाम से इनकी सस्त रचनाओं का (UPBoardSolutions.com) संकलन हुआ है। भारतेन्दु जी की रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्होंने रीतिकालीन काव्यधारा को राजदरबारी विलासिता के वातावरण से मुक्त कराकर स्वतन्त्र जन-जीवन के साथ विचरण करने की नयी दिशा प्रदान की। इनकी रचनाओं में प्रेम और भक्ति के साथ-साथ राष्ट्रीयता, समाज-सुधार, राष्ट्रभक्ति और देश-प्रेम के व्यापक स्वरूप के दर्शन होते हैं। इन्होंने रीतिकालीन कवियों की भाँति प्रेम और श्रृंगार की भी सरल एवं भावपूर्ण मार्मिक रचनाएँ की हैं।

काव्यगत विशेषताएँ

  • (क) भाव-पक्ष-
    1. भारतेन्दु जी को हिन्दी के आधुनिक काल का प्रथम राष्ट्रकवि नि:संकोच कहा जा सकता है। क्योंकि सर्वप्रथम इन्होंने ही साहित्य में राष्ट्रीयता, समाज-सुधार, राष्ट्रभक्ति तथा देश-भक्ति के स्वर मुखर किये।
    2. गद्यकार के रूप में तो आप आधुनिक हिन्दी गद्य के जनक ही माने जाते हैं।
    3. कविवचन सुधा और हरिश्चन्द्र सुधा आदि पत्रिकाओं के माध्यम से भारतेन्दु जी ने हिन्दी के लेखकों और कवियों को प्रेरणा प्रदान की तथा पद्य की विविध विधाओं का मार्ग निर्देशन किया।
  • (ख) कला-पक्ष-
    1. भाषा-शैली- भारतेन्दु जी की काव्य की भाषा ब्रज़ी और गद्य की भाषा खड़ीबोली है। इन्होंने भाषा का पर्याप्त संस्कार किया है। बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की काव्यगत शैलियों को निम्नलिखित चार श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है- (1) भावात्मक शैली, (2) अलंकृत शैली, (३) उद्बोधन शैली तथा (4) व्यंजनात्मक शैली ।। इसके अतिरिक्त गद्य के क्षेत्र में परिचयात्मक, विवेचनात्मक तथा भावात्मक, तीन प्रकार की रचनाएँ प्रयुक्त हुई हैं।
    2. रस-छन्द-अलंकार- बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की रचनाओं में भक्ति, श्रृंगार, हास्य, वीभत्स और करुण आदि रसों को विशेष रूप से प्रयोग हुआ है। इन्होंने गीति काव्य के अतिरिक्त कवित्त, सवैया, छप्पय, कुण्डलिया, लावनी, गजल, दोहे आदि सभी प्रचलित (UPBoardSolutions.com) छन्दों का प्रयोग अपनी रचनाओं में किया है। उपमा, रूपक, सन्देह, अनुप्रास, श्लेष, यमक इनके प्रिय अलंकार हैं।
  • साहित्य में स्थान- आपको हिन्दी का युग-निर्माता कहा जाता है। आपने अपनी प्रतिभा से हिन्दी साहित्य को एक नया मोड़ दिया। इस दृष्टि से आधुनिक काल के साहित्यकारों में आपका एक विशिष्ट स्थान है।

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प्रश्न 3. ‘प्रेम माधुरी’ के सम्बन्ध में भारतेन्दु के विचारों को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर- ‘प्रेम माधुरी’ कविता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित है। इस कविता में कवि ने गोपिकाओं की विरह दशा का वर्णन किया है।
सारांश- वर्षा ऋतु आने पर कोयलें फिर कदम्ब के वृक्षों पर बैठकर कूकने लगी हैं। मेंढक बोलने लगे हैं, मोर नाचने लगे। हैं और अपने प्रियजनों के समीप स्थित लोग इस वर्षा-ऋतु के दृश्यों को देख-देखकर प्रसन्न होने लगे हैं।
                   भगवान् श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने पर उनके वियोग में गोपिकाएँ अत्यन्त दु:खी हैं। मथुरा जाते समय श्रीकृष्ण ने गोपिकाओं से वादा किया था कि परसों आ (UPBoardSolutions.com) जायँगे। परसों की जगह बरसों बीत गये लेकिन श्रीकृष्ण भगवान् वापस नहीं आये। उद्धव गोपिकाओं को निर्गुण ब्रह्म की उपासना का सन्देश देते हैं। इसके उत्तर में गोपिकाएँ कहती हैं कि हम लोगों का मन पूरी तरह से श्रीकृष्ण में लीन है, अत: भगवान् श्रीकृष्ण से अलग नहीं हो सकता।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. ‘प्रलय’ की चाल से कवि का क्या तात्पर्य है?
उत्तर- प्रलयकाल में भयंकर वर्षा होती है, पृथ्वी पानी में डूब जाती है। प्रलय की चाल से कवि का तात्पर्य है कि आँखों से बहुत आँसू बहते हैं।

प्रश्न 2. श्रीकृष्ण को भूलने में गोपियाँ अपने को असमर्थ क्यों पाती हैं?
उत्तर- गोपियाँ श्रीकृष्ण को भूलने में अपने को इसलिए असमर्थ पाती हैं, क्योंकि उनका स्वयं मन ही जाकर श्रीकृष्ण में बस गया था।

प्रश्न 3. ‘कूप ही में यहाँ भाँग परी है’ से कवि का क्या तात्पर्य है?
उत्तर- इस पंक्ति में गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि यहाँ तो कुएँ में ही भाँग पड़ी हुई है; अर्थात् सारे ब्रजवासियों पर श्रीकृष्ण के प्रेम का नशा चढ़ा हुआ है।

प्रश्न 4. निगोड़े का अर्थ स्पष्ट करते हुए बताइए कि बादलों को निगोड़े क्यों कहा गया है?
उत्तर- बादलों को देखकर गोपियों की विरह-वेदना और तेज हो गयी। विरहिणी ने बादल को निगोड़ा इसलिए कहा है। क्योंकि बादलों ने उमड़-घुमड़ कर ऐसा वातावरण निर्मित कर दिया है कि उनकी विरह वेदना और बढ़ गयी है। बादलों ने उनके साथ ऐसा करके दुष्टता का काम किया है।

प्रश्न 5. ‘आग लगा कर पानी के लिए दौड़ने’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- आग लगाकर पानी के लिए दौड़ने का आशय अपनी की हुई गलत्री को छिपाना है। आग लगाकर पानी के लिए दौड़नेवाला यह दिखाना चाहता है कि आग उसने नहीं (UPBoardSolutions.com) लगायी, बल्कि वह तो आग से बचाना चाहता है। विरहिणी गोपी को उसकी सखी ने पहले प्रिय से मिलाने का वायदा किया और उसके मन में उत्कण्ठा पैदा की और फिर उसे समझाने लगी।

प्रश्न 6. वियोगिनी गोपियों की आँखों को सदैव पश्चात्ताप क्यों रहेगा?
उत्तर- गोपियों की आँखें कृष्ण को नयन भरकर नहीं देख पायीं; अत: उनके वियोग में मरने के उपरान्त जिस-जिस लोक में वे जायेंगी, उन्हें पश्चात्ताप रहेगा।

प्रश्न 7. कृष्ण के रूप-सौन्दर्य को देखे बिना गोपियों के नेत्रों की क्या दशा हो रही है?
उत्तर- गोपियों के नेत्रों को स्वप्न में भी चैन प्राप्त नहीं है। श्रीकृष्ण के वियोग में गोपियों के प्राण निकलना चाहते हैं; किन्तु नेत्र उनके साथ नहीं जाना चाहते । अपने नेत्रों की व्याकुलता का वर्णन करती हुई गोपियाँ कहती हैं कि श्रीकृष्ण के दर्शन के अभाव में मरने पर भी हमारी आँखें खुली-की-खुली रह जायेंगी।

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प्रश्न 8. भारतेन्दु जी के लेखन की भाषा बताइए। 
उत्तर- भारतेन्दु जी के लेखन की भाषा ब्रजभाषा एवं खड़ीबोली हिन्दी है।

प्रश्न 9. ‘उतै चलि जात’ में किधर जाने की ओर संकेत है?
उत्तर- जिधर श्रीकृष्ण गये (मथुरा की ओर) उधर जाने का संकेत है।

प्रश्न 10. रितून को कंत’ किसे और क्यों कहा गया है?
उत्तर- ‘रितून को कंत’ बसंत को कहा गया है क्योंकि चारों तरफ सरसों के फूल खिले हुए हैं।

प्रश्न 11. गोपियाँ उद्धव से ज्ञान का उपदेश वापस ले जाने के लिए क्यों कह रही हैं?
उत्तर- गोपियाँ उद्धव से ज्ञान का उपदेश वापस लेने को इसलिए कह रही हैं क्योंकि ब्रज में उसको कोई ग्रहण नहीं करेगा। उनका मन श्रीकृष्ण के साथ चला गया है फिर वे कौन-से मन से उनके उपदेश को ग्रहण करें।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र किस युग के साहित्यकार हैं?
उत्तर- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र भारतेन्दु युग के साहित्यकार हैं।

प्रश्न 2. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को ‘भारतेन्दु’ की उपाधि से किसने सम्मानित किया?
उत्तर- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को ‘भारतेन्दु’ की उपाधि से तत्कालीन पत्रकारों ने सम्मानित किया।

प्रश्न 3. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की किन्हीं दो रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर- ‘प्रेम-माधुरी’ और ‘प्रेम-तरंग’ ।

प्रश्न 4. ‘प्रेम-माधुरी’ भारतेन्दु जी की किस भाषा की रचना है?
उत्तर- ‘प्रेम माधुरी’ की रचना ब्रजभाषा में की गयी है।

प्रश्न 5. भारतेन्दु युग के उस कवि का नाम बताइए, जिसे खड़ीबोली को जनक कहा जाता है।
उत्तर- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ।

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प्रश्न 6. निम्नलिखित में से सही उत्तर के सम्मुख सही (√) का चिह्न लगाइए-
(अ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र शुक्ल युग के कवि हैं।                                  (×)
(ब) अपनी भाषा में व्यक्त बातों को सभी समझ लेते हैं।                   (√)
(स) अपनी मातृभाषा ही सभी उन्नति का मूल है।                             (√)
(द) ‘कविवचन सुधा’ पत्रिका के सम्पादक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र थे।       (√)

काव्य-सौन्दर्य एवं व्याकरण-बोध

प्रश्न 1. निम्नलिखित पंक्तियों का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए-
(अ) परसों को बिताय दियो बरसों तरसों कब पांय पिया परसों।
(ब) पिय प्यारे तिहारे निहारे बिना, अँखियाँ दुखियाँ नहीं मानती हैं।
(स) बोलै लगे दादुर मयूर लगे नाचै फेरि ।
       देखि के संजोगी जन हिय हरसै लगे।
उत्तर-

  • (अ) काव्य-सौन्दर्य- 
    1. यहाँ पर कवि ने बसंत ऋतु के आगमन का सुन्दर वर्णन करते हुए गोपियों की विरह अवस्था का मर्मस्पर्शी चित्रण किया है। प्रकृति के उद्दीपन रूप का सजीव चित्रण है।
    2. अलंकार- अन्त्यानुप्रास, वृत्त्यनुप्रास।
    3. रस- विप्रलम्भ श्रृंगार।
    4. भाषा- साहित्यिक ब्रजभाषा।
    5. शैली- भावात्मक।
    6. छन्द- सवैया।
    7. गुण- माधुर्य ।
  • (ब) काव्य-सौन्दर्य- 
    1. यहाँ गोपियों की श्रीकृष्ण दर्शन की तीव्र लालसा का सुन्दर चित्रण है।
    2. अलंकार- अनुप्रास
    3. रस- वियोग श्रृंगार ।
    4. भाषा- साहित्यिक ब्रजभाषा।
    5. गुण- माधुर्य ।
    6. शैली- भावात्मक।
    7. छन्द- सवैया।
  • (स) काव्य-सौन्दर्य- 
    1. वर्षा ऋतु विरही जन के लिए दु:खद होती है। यह उद्दीपन का कार्य करती है। तुलसी ने भी कहा है

“घन घमण्ड नभ, गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा।”

प्रश्न 2. ‘कुकै लग कोइलैं कदंबन पै बैठि फेरि’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर- ‘कूकै लगीं’ कोइलैं कदंबन पै बैठि फेरि’ में वृत्त्यनुप्रास अलंकार है।

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प्रश्न 3. निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ स्पष्ट करते हुए वाक्यों में प्रयोग कीजिए –
प्रलय ढाना, पलकों में न समाना, कुएँ में भाँग पड़ी होना।

  • प्रलय ढाना- (कहर ढाना)
    मेरे परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने पर घर में जैसे प्रलये ढा गया हो।
  • पलकों में न समाना- (आनन्दित होना)
    विवाह के समय इतना उल्लास था कि वह आनन्द जैसे पलकों में न समा रहा हो।
  • कुएँ में भाँग पड़ी होना- (सभी की एक जैसी स्थिति)।
    कृष्ण के विरह में ब्रज की सभी गोपियाँ व्याकुल थीं, जिसे देखकर लगता था जैसे पूरे कुएँ में भाँग पड़ी हो।

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UP Board Solutions for Class 8 Science Chapter 12 प्रकाश एवं प्रकाश यंत्र

UP Board Solutions for Class 8 Science Chapter 12 प्रकाश एवं प्रकाश यंत्र

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 8 Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 8 Science Chapter 12 प्रकाश एवं प्रकाश यंत्र.

प्रकाश एवं प्रकाश यंत्र

अभ्यास प्रश्ने

प्रश्न 1.
दिये गये विकल्पों में सही विकल्प चुनिए-
उत्तर
(क) मानव नेत्र किसी वस्तु का प्रतिबिम्ब बनाता है-
(क) कॉनिर्या पर
(ब) बाइरिस पर
(स) पुतली पर
(द) रेटिना पर

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(ख) सामान्य नेत्र के लिए निकट बिन्दु की दूरी है-
(क) 25 मी
(ब) 2.5 मी
(स) 25 सेमी
(द) 2.5 सेमी

(ग) श्वेत प्रकाश जब त्रिज्या से होकर गुजरता है तो प्रिज्म के आधार की ओर प्राप्त रंग होता है-
(क) लाल
(ब) पीला
(स) बैंगनी
(द) हरा (UPBoardSolutions.com)

(घ) उत्तल लेंस के फोकस बिन्दु तथा प्रकाश केन्द्र के बीच रखे वस्तु का का प्रतिबिम्ब होगा।
(क) आभासी, बड़ा व सीध्य
(ब) अभासी, उल्टा वे बड़ा
(स) आभासी सीधा व छोटा
(द) आभासी, उल्टा व बड़ा

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित कथनों में सही कथन के सम्मुख (UPBoardSolutions.com) सही (✓) और गलत के कथन के सामने गलत (✗) लिखिए।-
उत्तर
UP Board Solutions for Class 8 Science Chapter 12 प्रकाश एवं प्रकाश यंत्र img-1

प्रश्न 3.
रिक्त स्थानों की पूर्ति अपनी अभ्यास-पुस्तिका में कीजिए (पूर्ति करके) –
उत्तर
(क) सरल सूक्ष्मदर्शी में उत्तल लेंस प्रयोग होता है।
(ख) दूर की वस्तुओं को देखने के लिए दूरदर्शी का प्रयोग किया जाता है।
(ग) खून की जाँच के लिए सूक्ष्मदर्शी का प्रयोग किया जाता है।
(घ) निकट दृष्टि दोष के निवारण हेतु चश्मे में अवतल लेंस प्रयोग होता है।

प्रश्न 4.
प्रकाश का अपवर्तन किसे कहते? (UPBoardSolutions.com) प्रकाश के अपवर्तन सम्बंधी नियमों को लिखिएं
उत्तर
जब प्रकाश की किरण एक पारदर्शी माध्यम से दूसरे पारदर्शी माध्यम में प्रवेश करती है प्रकाश की किरण का अपवर्तन होता है तथा अपवर्तन की घटना में निम्नलिखित दो नियमों का पालन होता है।

  1. आपतित किरण, अपवर्तित किरण तथा अपवर्तक पुष्ट के आपतन बिन्दु पर डाला गया अभिलम्व तीनों एक ही तल में स्थित होते हैं।
  2. किसी पारदर्शी माध्यम युग्म (UPBoardSolutions.com) के लिए आपतन कोण की ज्या (Sine) तथा अपवर्तन कोण के (Sine) का अनुपात नियत होता है। इस नियम को स्नेल (snell) का नियम भी कहते हैं।
    स्नेल के नियमानुसार = [latex]\frac { sin\quad i }{ sin\quad r }[/latex] नियतांक

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प्रश्न 5.
अपवर्तनांक की परिभाषा माध्यम में प्रकाश के चाल के पदों में लिखिए।
उत्तर
वायुमण्डल कभी शान्त नहीं रहता, इसमें सदैव टण्डी एवं गर्म हवा की धाराएँ चलती रहती हैं, इसके फलस्वरूप वायुमण्डल के किसी स्थान की वायु का अपवर्तनांक बदलता रहता है। वायुमण्डल के (UPBoardSolutions.com) अपवर्तनांक में आकस्मिक परिवर्तन के कारण तारे से आने वाली प्रकाश किरणें अपवर्तन के पश्चात् अपने पूर्ववर्ती मार्ग से हट जाती हैं। इसके फलस्वरूप कुछ क्षणों के लिए प्रेक्षक की आँखों में तारे से आने वाला प्रकाश बिल्कुल नहीं पहुँचता या बहुत कम पहुँचता है।

प्रश्न 6.
उचित किरण आरेख खींचते हुए उत्तल लेंस तथा अवतल लेंस के फोकस दूरी की परिभाषा लिखिए।
उत्तर
उत्तल लेंस से प्रतिबिम्ब का बनना-उत्तल लेंस (UPBoardSolutions.com) से बने प्रतिबिम्ब की आकृति, स्थिति एवं आकार वस्तु की स्थिति पर निर्भर करता है। निम्नलिखित चित्रों में इन प्रतिबिम्बों के निर्माण का किरण आरेख प्रस्तुत किया गया है।

(i) वस्तु लेंस के प्रकाशिक केन्द्र 0 तथा फोकस F के बीच स्थित है। वस्तु का प्रतिबिम्ब वस्तु के पीछे आभासी सीधा तथा वस्तु से बड़ा है। चित्र 12.16 (i)
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(ii) लेंस के फोकस पर स्थित वस्तु का प्रतिबिम्ब अनन्त परे, वास्तविक, उल्टा तथा वस्तु से बड़ा बनता है। चित्र 12.16 (ii)
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(iii) लेंस के फोकस दूरी तथा फोकस दूरी के दोगुनी दूरी (UPBoardSolutions.com) के बीच स्थित वस्तु का प्रतिबिम्ब लेंस के दूसरी ओर लेंस के फोकस दूरी के दोगुनी दूरी से अधिक दूर, वास्तविक, उल्टा तथा वस्तु से बड़ा बनता है। चित्र 12.16 (iii)
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(iv) लेंस के फोकस दूरी के दो गुनी दूरी पर रखी वस्तु का प्रतिबिम्ब लेंस के दूसरी ओर लेंस के फोकस दूरी के दोगुनी दूरी पर, वास्तविक उल्टा तथा वस्तु के बराबर बनता है। चित्र 12.16 (iv)
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(v) लेंस के फोकस दूरी के दोगुने दूरी से अधिक दूरी पर रखी (UPBoardSolutions.com) वस्तु का प्रतिबिम्ब लेंस के दूसरी ओर लेंस के फोकस तथा फोकस दूरी की दो गुनी दूरी के बीच, वास्तविक, उल्टा तथा वस्तु । से छोटा बनता है। चित्र 12-16 (V)
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(vi) अनन्त दूरी पर रखी वस्तु का प्रतिबिम्ब लेंस के दूसरी ओर लेंस के फोकस पर, वास्तविक, उल्टा तथा वस्तु से अत्यधिक छोटा बनता है। चित्रा 12-16 (vi)
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अवतल लेंस से प्रतिबिम्ब का बनना-
(i) अनन्त पर स्थित वस्तु से आने वाली किरणें लेंस के मुख्य अक्ष के समान्तर होती हैं, अतः लेंस से अपवर्तन के पश्चात् लेंस के फोकस बिन्दु F से फैलती हुयी प्रतीत होती है। अतः अनन्त पर स्थित वस्तु का अवतल लेंस से बना प्रतिबिम्ब लेंस के फोकस पर बनेगा। वस्तु का प्रतिबिम्ब आभासी, सीधा एवं अत्यन्त सूक्ष्म होगा। चित्र 12.17 (i)
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(ii) यदि वस्तु को अनन्त से लेंस के ओर खिसकाया जाए तो (UPBoardSolutions.com) वस्तु का प्रतिबिम्ब भी लेंस के फोकस बिन्दु से लेंस की ओर खिसकने लगता है किन्तु प्रतिबिम्ब सदैव आभासी, सीधा तथा वस्तु से छोटा बनता है। चित्र (12.17 (ii)
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प्रश्न 7.
दूरदर्शी किसे कहते हैं? स्वच्छ किरण आरेख खींचकर दूरदर्शी से बने प्रतिबिम्ब की स्थिति दशाईए। प्रतिबिम्ब की प्रकृति आकार तथा स्थिति का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर
सूक्ष्मदर्शी एक ऐसा प्रकाशिक यंत्र है जिसकी सहायता से सूक्ष्म वस्तुएँ देखी जा सकती हैं। सूक्ष्म दर्शी दो प्रकार के होते हैं।

  1. सरल सूक्ष्मदर्शी (Simple Microscope)
  2. सयुंक्त सूक्ष्मदर्शी (Compound Microscope)

(i) सरल सूक्ष्मदर्शी (Simple Microscope) – सरल सूक्ष्मदर्शी कम फोकस दूरी का एक उत्त्तल लेंस होता है। लेंस के प्रकाश केन्द्र तथा फोकस बिन्दु के बीच एक सूक्ष्म वस्तु AB चित्र 12.18 के अंनुसार रखी गयी है। (UPBoardSolutions.com) लेंस द्वारा वस्तु का बड़ा आभासी तथा सीधा प्रतिबिम्ब A’B’ बनता है। इसे स्पष्ट देखने के लिए लेंस से वस्तु AB की दूरी को इस प्रकार समायोजित करते हैं कि वस्तु का प्रतिबिम्ब A’B आँख से स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी पर बने।

(ii)संयुक्त सूक्ष्मदर्शी (Compound Microscope)- संयुक्त सूक्ष्मदर्शी द्वारा सूक्ष्म वस्तु का प्रतिबिम्ब सरल सूक्ष्मदर्शी की अपेक्षा बहुत बड़ा बनता है।
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प्रश्न 8.
नेत्र दोष किसे कहते हैं? कितने प्रकार का होता है? निकट दृष्टि दोष कैसे दूर कर सकते हैं?
उत्तर
जब मानव नेत्र के सामने स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी (25 सेमी) पर रखी वस्तु साफ-साफ दिखाई नहीं देती तो इसे दृष्टि दोष कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है-

  1. निकट दृष्टि दोष
  2. दूर दृष्टि दोष

निकट दृष्टि दोष को दूर करने के लिए चश्में में उचित फोकस दूरी (UPBoardSolutions.com) का अवतल लेंस प्रयोग किया जाता है। यह लेंस प्रकाश किरणों को अपसारित करके प्रतिबिम्ब को रेटिना पर बनाता है जिससे निकट दृष्टि दोष दूर हो जाता है।

● नोट- प्रोजेक्ट कार्य छात्र स्वयं करें।

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