UP Board Solutions for Class 9 Hindi Chapter 3 मीराबाई (काव्य-खण्ड)

UP Board Solutions for Class 9 Hindi Chapter 3 मीराबाई (काव्य-खण्ड)

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. निम्नलिखित पद्यांशों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए तथा काव्यगत सौन्दर्य भी स्पष्ट कीजिए :

1. बसो मेरे नैनन में ….…………………………………….. भक्त बछल गोपाल।
शब्दार्थ- मकराकृत = मछली के आकार के। छुद्र = छोटी। रसाल = मधुर । भक्त-बछल = भक्त-वत्सल।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी काव्य’ में संकलित श्रीकृष्ण की अनन्य उपासिका मीराबाई के काव्य-ग्रन्थ ‘मीरा-सुधा-सिन्धु’ के अन्तर्गत ‘पदावली’ शीर्षक से अवतरित है।
प्रसंग- प्रेम-दीवानी मीरा भगवान् कृष्ण की मोहिनी मूर्ति को अपने नेत्रों में बसाना चाहती हैं। इस पद में कृष्ण की मोहिनी मूर्ति का सजीव चित्रण है।
व्याख्या- कृष्ण के प्रेम में दीवानी मीरा कहती हैं कि नन्दजी को आनन्दित करनेवाले हे श्रीकृष्ण! आप मेरे नेत्रों में निवास कीजिए। आपका सौन्दर्य अत्यन्त आकर्षक है। आपके सिर पर मोर के पंखों में निर्मित मुकुट एवं कानों में ऊली की आकृति के कुण्डल सुशोभित हो रहे हैं। मस्तक पर लगे हुए लाल तिलक और सुन्दर विशाल नेत्रों से आपका श्यामवर्ण का शरीर अतीव सुशोभित हो रहा है। अमृतरस से भरे आपके सुन्दर होंठों पर बाँसुरी शोभायमान हो रही है । आप हृदय पर वन के पत्र-पुष्पों से निर्मित माला धारण किये हुए हैं। आपकी (UPBoardSolutions.com) कमर में बँधी करधनी में छोटी-छोटी घण्टियाँ सुशोभित हो रही हैं। आपके चरणों में बँधे हुँघरुओं की मधुर ध्वनि बहुत रसीली प्रतीत होती है । हे प्रभु! आप सज्जनों को सुख देनेवाले, भक्तों से प्यार करनेवाले और अनुपम सुन्दर हैं। आप मेरे नेत्रों में बस जाओ।
काव्यगत सौन्दर्य

  1. यहाँ भगवान् कृष्ण की मनमोहक छवि का परम्परागत वर्णन किया गया है।
  2. मीराबाई की कृष्ण के प्रति अनन्य भक्तिभावना प्रकट हुई है।
  3. भाषा-सुमधुर ब्रज।
  4. शैली-मुक्तक काव्य की पद शैली है।
  5. छन्द-संगीतात्मक गेय पद।
  6. रस- भक्ति एवं शान्त।
  7. अलंकार-मोर मुकुट मकराकृति कुण्डल’ तथा ‘मोहनि मूरति साँवरि सूरति’ में अनुप्रास है।
  8. भाव-साम्य-कविवर बिहारी भी मीरा की तरह कृष्ण के इस रूप को अपने मन में बसाना चाहते हैं –

“सीस मुकुट, कटि काछनी, कर मुरली उर माल।
इहिं बानक मो मन सदा, बसौ बिहारीलाल॥”

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2. पायो जी म्हैं तो राम रतन ………………………………………… जस गायो।
शब्दार्थ- अमोलक = अनमोल । खेवटिया = खेनेवाला। भव सागर = संसाररूपी सागर । म्है = मैंने।
सन्दर्भ – यह पद मीराबाई की ‘पदावली’ से लिया गया है, जो हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी काव्य’ में संकलित है।
प्रसंग- प्रस्तुत पद में मीराबाई भगवान् राम के नाम के महत्त्व की चर्चा करती हुई कहती हैं –
व्याख्या- मैंने भगवान् के नामरूपी रत्न सम्पदा को प्राप्त कर लिया। मेरे सच्चे गुरु ने यह अमूल्य वस्तु मुझ पर दया करके मुझे प्रदान की थी, मैंने उसे अंगीकार किया था। इस प्रकार मैंने गुरुदीक्षा के कारण कई जन्मों की संचित पूँजी (पुण्य फल) प्राप्त कर ली और संसार की सारी मोह-मायाओं का त्याग (UPBoardSolutions.com) कर दिया। यह राम नाम की पूँजी ऐसी विचित्र है कि यह खर्च करने पर भी कम नहीं होती और न इसे चोर हो चुरा सकते हैं। यह प्रतिदिन अधिक होती जाती है। मैंने इसी सत्यनाम (ईश्वर का नाम) रूपी नौका पर सवार होकर, जिसके केवट मेरे सच्चे गुरु हैं, संसाररूपी सागर को पार कर लिया है। अंत में मीराबाई कहती हैं कि गिर धरनागर श्रीकृष्ण भगवान् ही एकमात्र मेरे स्वामी हैं। मैं प्रसन्न होकर उनका गुणगान कर रही हूँ।
काव्यगत सौन्दर्य

  1. इस पद में भक्तिकालीन कवियों की परम्परा के अनुसार भगवान् के नाम के महत्त्व को बतलाया गया है।
  2. मीरा कृष्ण की उपासिका हैं, किन्तु यहाँ ‘राम’ रतन धन की चर्चा करती हैं। यहाँ राम का तात्पर्य घट-घट व्यापी राम से है।
  3. अलंकारअनुप्रास और रूपक।
  4. भाषा-राजस्थानी मिश्रित ब्रज।
  5. शैली-मुक्तक।
  6. छंद-गेयपद।
  7. रस-शान्त और भक्ति।

3. माई री मैं ……………………………………………….. जनम कौ कौल।
शब्दार्थ- छाने = छिपकर । बजन्ता ढोल = ढोल बजाकर, सबको जताकर, खुले आम । मुँहघो = महंगा । सुंहघो = सस्ता । कौल = वचन ।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद ‘हिन्दी काव्य’ में संकलित एवं मीरा द्वारा रचित ‘पदावली’ से संकलित है।
प्रसंग- प्रस्तुत पद में मीरा श्रीकृष्ण से अपने सच्चे प्रेम को निस्संकोच भाव से स्वीकार कर रही हैं।
व्याख्या- मीरा कहती हैं- मैंने तो अपने गोविन्द को मोल ले लिया है। लोग मेरे इस प्रेम-व्यापार पर नाना प्रकार के आक्षेप करते हैं। कोई कहता है कि मैंने श्रीकृष्ण को छिपकर अपनाया है और कोई कहता है कि मैंने उससे चुपचाप प्रेम-सम्बन्ध जोड़ा है, पर मैंने तो ढोल बजाकर-सभी को बताकर-उसे अपनाया है। कोई कहता है कि मेरा यह सौदा बड़ा महँगा (कष्टदायक) है और कोई कहता है कि मैंने श्रीकृष्ण को बड़े सस्ते में (सहज प्रयत्न से) पा लिया है, पर मैंने उसे सब प्रकार से परखकर, हृदयरूपी तराजू पर तौलकर मोल (UPBoardSolutions.com) लिया है। चाहे उसे कोई काला कहे चाहे गोरा, मेरे लिए तो वह जैसा भी है, अमूल्य है, क्योंकि उसे हृदय जैसी मूल्यवान वस्तु के बदले खरीदा गया है। सभी जानते हैं कि मीरा ने कृष्ण को आँख बन्द करके-अंधविश्वास में लिप्त होकर स्वीकार नहीं किया है। उसने तो आँखें खोलकर, सब कुछ सोच समझकर उससे प्रीति सम्बन्ध जोड़ा है। मीरा कहती हैं-मेरे प्रभु पूर्वजन्म से मेरे साथ वचनबद्ध हैं, अत: उन्होंने मुझे दर्शन देकर कृतार्थ किया है।
काव्यगत सौन्दर्य

  1. मीरा और कृष्ण के पवित्र प्रेम-बन्धन की झाँकी इस पद में साकार हुई है।
  2. भाषा सरस, सरल और मिश्रित शब्दावली युक्त ब्रजी है।
  3. शैली-आत्मनिवेदनात्मक, भावात्मक तथा व्यंग्य का संस्पर्श लिये है।
  4. अनेक मुहावरों का सुन्दर प्रयोग हुआ है। रस-भक्ति। गुण-प्रसाद। छन्द-गेय पद।

4. मैं तो साँवरे ………………………………………………………. भगति रसीली जाँची॥
शब्दार्थ- साँची = सत्य । ब्याल = सर्प । खारो = नीरस, व्यर्थ । काँची = कच्ची, (क्षणभंगुर)। जाँची = प्रतीत हुई।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी काव्य’ में संकलित एवं मीराबाई द्वारा रचित ‘पदावली’ से उद्धृत है।
प्रसंग- इस पद में मीरा भगवान् कृष्ण के प्रेम में निमग्न होकर पूर्णरूप से उन्हीं के रंग में रंग गयी हैं, इसलिए संसार की अन्य किसी वस्तु में उनका मन नहीं लगता।
व्याख्या- मीरा कहती हैं कि मैं तो साँवले कृष्ण के श्याम रंग में रँग गयी हूँ अर्थात् उनके प्रेम में आत्मविभोर हो गयी हूँ। मैंने तो लोक-लाज को छोड़कर अपना पूरा श्रृंगार किया है और पैरों में सुँघरू बाँधकर नाच भी रही हैं। साधुओं की संगति से मेरे हृदय की सारी कालिमा मिट गयी है और मेरी दुर्बुद्धि भी सद्बुद्धि में बदल गयी है और मैं श्रीकृष्ण की सच्ची भक्त बन गयी हूँ। मैं प्रभु श्रीकृष्ण का नित्य गुणगान करके (UPBoardSolutions.com) कालरूपी सर्प के चंगुल से बच गयी हूँ अर्थात् अब मैं जन्म-मरण के चक्र से छूट गयी हूँ। अब कृष्ण के बिना मुझे यह संसार निस्सार और सूना लगता है, अतः उनकी बातों के अलावा अन्य बातें व्यर्थ लगती हैं। मीराबाई को केवल श्रीकृष्ण की भक्ति में ही आनन्द मिलता है, संसार की किसी अन्य वस्तु में नहीं।
काव्यगत सौन्दर्य

  1. श्रीकृष्ण के प्रति मीरा की एकनिष्ठ भक्ति का सुन्दर चित्रण हुआ है।
  2. कृष्ण की दीवानी मीरा को उनके बिना यह संसार निस्सार और सूना लगता है।
  3. भाषा-राजस्थानी मिश्रित ब्रज
  4. शैली-मुक्तक।
  5. छन्द-गेय पद।
  6. रस- भक्ति और शान्त।
  7. गुण-माधुर्य ।
  8. अलंकार-अनुप्रास, रूपक।।

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5. मेरे तो गिरधर …………………………………… तारो अब मोई।
शब्दार्थ-कानि = मर्यादा, प्रतिष्ठा। ढिंग = समीप । आणंद = आनन्द । राजी = प्रसन्न।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद ‘हिन्दी काव्य’ में संकलित एवं श्रीकृष्ण की अनन्य उपासिका मीरा द्वारा रचित ‘पदावली’ से उद्धृत है।
प्रसंग- मीरा एकमात्र श्रीकृष्ण को ही अपना सर्वस्व घोषित कर रही हैं। संसार के सारे नाते तोड़कर, लोकलाज छोड़कर, केवल श्रीकृष्ण के प्रेम के आनन्द-पल का आस्वाद ले रही हैं।
व्याख्या- मीरा कहती हैं-अब तो मैं अपना नाता केवल एक श्रीकृष्ण से मानती हूँ और कोई भी मेरा इस संसार में अपना नहीं है। सिर पर मोरमुकुट धारण करनेवाले नटवर-नागर ही मेरे पति हैं। पिता, माता, भाई, बन्धु आदि से अब मेरा कोई नाता नहीं रहा। मैंने तो कृष्ण-प्रेम के लिए अपने कुल की प्रतिष्ठा को भी त्याग दिया है। अब मेरा कोई क्या कर लेगा? सभी कहते हैं कि मैंने सन्तों का सत्संग करके स्त्रियोचित लोक-लज्जा को भी तिलांजलि दे दी है। पर मुझे इसकी चिन्ता नहीं। मैंने अपनी कृष्ण-प्रेम की लता को अपने आँसुओं (UPBoardSolutions.com) से सींचकर (महान् कष्ट सहन करके) बढ़ाया है। अब तो यह प्रेम-लता बहुत फैल चुकी है, अब तो इस पर आनन्दरूपी फल लगनेवाले हैं। मुझे तो अब केवल प्रियतम कृष्ण की भक्ति में ही सुख मिलता है। सांसारिक विषयों को देखकर मेरा मन दु:खी होता है। मीराबाई कह रही हैं कि हे गिरिधर गोपाल ! अब आप अपनी दासी मीरा का उद्धार कीजिए और उसे अपनाकर धन्य बना दीजिए।
काव्यगत सौन्दर्य

  1. श्रीकृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम-भाव और भक्ति को मीरा ने हृदयस्पर्शी शब्दावली में साकार किया है।
  2. अलंकार-अनुप्रास, रूपक (‘प्रेम-बेलि’ और ‘आनन्द-फल’) तथा पुनरुक्ति अलंकार हैं।
  3. भाषी सरस, सरल, किन्तु भाव-वहन में पूर्ण समर्थ है।
  4. शैली-आत्मनिवेदनात्मक एवं भावात्मक है। गुण-प्रसाद, छन्द-गेय पद।

प्रश्न 2. मीराबाई का जीवन-परिचय बताते हुए उनकी रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
अथवा मीराबाई का जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक सेवाओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा मीरा की रचनाओं एवं भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।

मीराबाई
(स्मरणीय तथ्य)

जन्म-सन् 1498 ई० । मृत्यु- 1546 ई० के आसपास।
पति- महाराणा भोजराज । 
पिता- रतन सिंह।
रचना- गेय पद।
काव्यगत विशेषताएँ
वर्य-विषय -विनय, भक्ति, रूप-वर्णन, रहस्यवाद, संयोग वर्णन।
रस- श्रृंगार (संयोग-वियोग), शान्त।।
भाषा- ब्रजभाषा, जिसमें राजस्थानी, गुजराती, पूर्वी पंजाबी और फारसी के शब्द मिले हैं।
शैली- गीतकाव्य की भावपूर्ण शैली।
छन्द- राग-रागनियों से पूर्ण गेय पद।
अलंकार- उपमा, रूपक, दृष्टान्त आदि ।

  • जीवन-परिचय- मीराबाई का जन्म राजस्थान में मेड़ता के पसि चौकड़ी ग्राम में सन् 1498 ई० के आसपास हुआ था। इनके पिता का नाम रतनसिंह था। उदयपुर के राणा सांगा के पुत्र भोजराज के साथ इनका विवाह हुआ था, किन्तु विवाह के थोड़े। ही दिनों बाद इनके पति की मृत्यु हो गयी।
                      मीरा बचपन से ही भगवान् कृष्ण के प्रति अनुरक्त थीं । सारी लोक-लज्जा की चिन्ता छोड़कर साधुओं के साथ कीर्तन-भजन करती रहती थीं। उनकी इस प्रकार का व्यवहार उदयपुर के राज-मर्यादा के प्रतिकूल था। अतः उन्हें मारने के लिए जहर का प्याला भी भेजा। गया था, किन्तु ईश्वरीय कृपा से उनका बाल-बाँका तक नहीं हुआ। परिवार से विरक्त होकर वे वृन्दावन और (UPBoardSolutions.com) वहाँ से द्वारिका चली गयीं। औंर सन् 1546 ई० में स्वर्गवासी हुईं।
  • रचनाएँ- मीराबाई ने भगवान् श्रीकृष्ण के प्रेम में अनेक भावपूर्ण गेय पदों की रचना की है जिसके संकलन विभिन्न नामों से प्रकाशित हुए हैं। नरसीजी को मायरा, राम गोविन्द, राग सोरठ के पद, गीत गोविन्द की टीका मीराबाई की रचनाएँ हैं।

काव्यगत विशेषताएँ

  • (क) भाव-पक्ष- मीरा कृष्णभक्ति शाखा की सगुणोपासिका भक्त कवयित्री हैं। इनके काव्य का वर्ण्य-विषय एकमात्र नटवर नागर श्रीकृष्ण का मधुर प्रेम है।
    1. विनय तथा प्रार्थना सम्बन्धी पद- जिनमें प्रेम सम्बन्धी आतुरता और आत्मस्वरूप समर्पण की भावना निहित है।
    2. कृष्ण के सौन्दर्य वर्णन सम्बन्धी पद- जिनमें मनमोहन श्रीकृष्ण के मनमोहक स्वरूप की झाँकी प्रस्तुत की गयी है।
    3. प्रेम सम्बन्धी पद- जिनमें मीरा के श्रीकृष्ण प्रेम सम्बन्धी उत्कट प्रेम का चित्रांकन है। इनमें संयोग और वियोग दोनों पक्षों का मार्मिक वर्णन हुआ है।
    4. रहस्यवादी भावना के पद- जिनमें मीरा के निर्गुण भक्ति का चित्रण हुआ है।
    5. जीवन सम्बन्धी पद- जिनमें उनके जीवन सम्बन्धी घटनाओं का चित्रण हुआ है।
  • (ख) कला-पक्ष-
    1. भाषा-शैली- मीरा के काव्य की भाषा ब्रजी है जिसमें राजस्थानी, गुजराती, भोजपुरी, पंजाबी भाषाओं के शब्द हैं। मीरा की भाषा भावों की अनुगामिनी है। उनमें एकरूपता नहीं है फिर भी स्वाभाविकता, सरसता और मधुरता कूट-कूटकर भरी हुई है।
    2. रस-छन्द-अलंकार- मीरा की रचनाओं में श्रृंगार रस के दोनों पक्ष, संयोग और वियोग का बड़ा ही मार्मिक वर्णन हुआ है। इसके अतिरिक्त शान्त रस का भी बड़ा ही सुन्दर समावेश हुआ है। मीरा का सम्पूर्ण काव्य गेय पदों में है जो विभिन्न रोगरागनियों में (UPBoardSolutions.com) बँधे हुए हैं। अलंकारों का प्रयोग मीरा की रचनाओं में स्वाभाविक ढंग से हुआ है। विशेषकर वे उपमा, रूपक, दृष्टान्त आदि अलंकारों के प्रयोग से बड़े ही स्वाभाविक हुए हैं।
  • साहित्य में स्थान- हिन्दी गीति काव्य की परम्परा में मीरा का अपना अप्रतिम स्थान है । प्रेम की पीड़ा का जैसा मर्मस्पर्शी वर्णन मीरा की रचनाओं में उपलब्ध होता है वैसा हिन्दी साहित्य में अन्यत्र सुलभ नहीं है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. मीरा ने संसार की तुलना किस खेल से की है और क्यों?
उत्तर- मीरा ने संसार की तुलना चौपड़ के खेल से की है क्योंकि चौपड़ का खेल कुछ देर चलता है फिर समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार संसार की वस्तुएँ कुछ समय रहती हैं और फिर नष्ट हो जाती हैं।

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प्रश्न 2. मीरा गिरिधर के घर जाने की बात क्यों कहती हैं?
उत्तर-
मीरा श्रीकृष्ण को अपना आराध्य ही नहीं, पति भी मानती हैं। वे स्वयं को श्रीकृष्ण के साथ दाम्पत्य-सूत्र में बँधा हुआ अनुभव करती हैं और अपने पति (श्रीकृष्ण) का सामीप्य पाने के लिए उनके घर जाना चाहती हैं।

प्रश्न 3. ‘मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो ने कोई’-पद में मीरा के भक्ति-भाव पर प्रकाश डालिए।
अथवा ‘मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई’ -मीरा द्वारा रचित इस पद का सारांश लिखिए।
उत्तर- कृष्ण की भक्ति में डूबी मीरा उन्हें ही अपना पति मानती हैं और कहती हैं कि उनके तो केवल गिरिधर गोपाल ही हैं, दूसरा कोई नहीं है। जिनके सिर पर मोर-मुकुट हैं वे ही उनके पति हैं। माता-पिता, भाई-बन्धु आदि इस संसार में कोई भी कृष्णु के सिवा उनका अपना नहीं है। उन्होंने कृष्ण-भक्ति में सबको त्याग दिया है। यहाँ तक कि अपने कुल को भी त्याग दिया है। लोग इसके लिए उन्हें क्या कहते हैं, इसकी (UPBoardSolutions.com) चिन्ता भी उन्हें नहीं है। उन्होंने संत एवं साधुओं की संगति में बैठकर लोक-लज्जा का त्याग कर दिया है। उन्होंने आँसुओं से सींचकर जिस कृष्ण-भक्ति की बेल (लता) को बोया, वह अब फैलकर फल दे रही है। अब तो वे सांसारिकता को देखकर संसार के प्रति मनुष्य की अज्ञानता पर रोती हैं और जहाँ भक्ति देखती हैं वहाँ उनका मन प्रसन्न हो उठता है । मीरा कहती हैं-‘हे गिरिधर गोपाल ! मैं तुम्हारी दासी हूँ, अब तुम ही मेरा उद्धार करो।’

प्रश्न 4. धर्म के अन्तर्गत केवल बाहरी कर्मकाण्ड करने से क्या होता है?
उत्तर- बाहरी कर्मकाण्डों से व्यक्ति उन्हीं में फँसा रहता है और भगवान् के सच्चे स्वरूप को नहीं जान पाता है। इस प्रकार उसे मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती। वह बाह्याडम्बरों में फँसा ही जन्म-मरण के चक्र से कभी नहीं छूट पाता है, अत; धर्म में केवल बाहरी कर्मकाण्ड उचित नहीं है।

प्रश्न 5. मीरा के काव्य में व्यक्त भक्ति एवं रहस्यवाद का परिचय दीजिए।
उत्तर-

  1. भक्ति- मीरा की भक्ति प्रेम प्रधान है। उनका कृष्ण राममय और राम कृष्णमय हैं, अर्थात् दोनों ही एक हैं। राम भी कृष्ण ही हैं। भावों की तीव्रता में कोमलता और मधुरता इनकी भक्ति की विशेषता है। वे गोपियों के समान कृष्ण के प्रति माधुर्य भक्ति से प्रेरित हैं। वे कृष्ण के रंग में रंग कर कहती हैं
    ‘‘मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोई।
    जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई॥’
  2. रहस्यवाद- मीरा के काव्य में जिस रहस्यवाद के दर्शन होते हैं, उसमें दाम्पत्य प्रेम की प्रधानता है। वे कहती हैं
    “जिनका पिया परदेश बसत है, लिख-लिख भेजत पाती।
    मेरा पिया हृदय बसत है, ना कहुं आती जाती।”

प्रश्न 6. कृष्ण के क्रय के सम्बन्ध में संसार के लोगों की क्या धारणा है?
उत्तर- मीरा के कृष्ण को क्रय के सम्बन्ध में संसार के लोगों की धारणा है कि मीरा ने गोविन्द को छानबीन कर खरीद लिया है। कोई कहता है कि चुपके से खरीद लिया है, कोई कहता है कि वह काला है, कोई कहता है कि वह गोरा है।

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प्रश्न 7. मीरा ने संसार की तुलना किससे की है और क्यों?
उत्तर- मीरा ने संसार की तुलना चौसर खेल से की है। जिस तरह चौसर खेल क्षण भर में समाप्त हो जाता है, उसी प्रकार यह संसार भी क्षणभंगुर है। क्षण भर में नष्ट होनेवाला है।

प्रश्न 8. मीरा को कौन-सा धन प्राप्त हो गया है? उस धन की क्या विशेषता है?
उत्तर- मीरा को रामरतन रूपी धन प्राप्त हो गया है । इस धन की विशेषता है कि इसको खर्च नहीं किया जा सकता है और न चुराया जा सकता है अपितु प्रयोग करने से दिन-प्रतिदिन बढ़ता रहता है ।

प्रश्न 9. मीरा ने संसार सागर को पार करने का क्या उपाय बताया है?
उत्तर- मीरा संसार सागर को पार करने के विषय में बताती हैं कि राम नाम का बेड़ा बाँधकर संसार सागर से पार हुआ जा सकता है। राम नाम का बेड़ा बाँधने से मीरा का अभिप्राय भगवान् की भक्ति करने से है।

प्रश्न 10. मीरा भगवान् के किस प्रकार के रूप को अपने नयनों में बसाना चाहती हैं?
उत्तर- मीरा मोर मुकुट, मकराकृत कुण्डल और माथे पर अरुण तिलक लगे नन्दलाल के नटवर नागर रूप को अपनी आँखों में बसाना चाहती हैं।

प्रश्न 11. मीरा शरीर पर गर्व न करने का उपदेश क्यों देती हैं?
उत्तर- मीरा का मत है कि यह शरीर नाशवान है, मिट्टी से बना है और एक दिन मिट्टी में ही मिल जायेगा, इसलिए इस शरीर पर गर्व नहीं करना चाहिए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. मीरा की किन्हीं दो रचनाओं के नाम बताइए।
उत्तर- नरसी जी का मायरा और राग गोविन्द ।

प्रश्न 2. मीरा ने किस भाषा में रचना की है?
उत्तर- मीरा ने ब्रजभाषा में अपने गीतों की रचना की है।

प्रश्न 3. मीरा ने प्रेम की लता को किस प्रकार पल्लवित किया?
उत्तर- मीरा ने प्रेम की लता को आँसुओं के जल से सींच-सींचकर पल्लवित किया। उसे लता से उसे आनन्दरूपी फल प्राप्त हुआ।

प्रश्न 4. निम्नलिखित में से सही वाक्य के सम्मुख सही (√) का चिह्न लगाइए –
(अ) मीरा भगवान् के सगुण रूप की उपासिका थीं।                                      (√)
(ब) मीरा के अनुसार शरीर पर गर्व करना चाहिए।                                         (×)
(स) मीरा श्रीकृष्ण को पति रूप में मानती हुई उनके घर जाना चाहती हैं।        (√)
(द) मीराबाई रतन सिंह की पुत्री थीं।                                                               (√)

प्रश्न 5. मीरा ने क्या मोल लिया है?
उत्तर- मीराबाई ने गोविन्द श्रीकृष्ण को मोल लिया है।

प्रश्न 6. मीरा भगवान् के किस रूप की उपासिका थीं?
उत्तर- मीरा भगवान् के साकार रूप की उपासिका थीं। कृष्ण को श्याम सुन्दर रूप, कान में कुण्डल, हाथ में मुरली और गले में वनमाला, श्रीकृष्ण के इस रूप पर मीरा मोहित थीं।

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प्रश्न 7. मीरा किस भक्ति-शाखा की कवयित्री हैं?
उत्तर- मीरा सगुण भक्ति शाखा की कवयित्री हैं।

प्रश्न 8. मीरा किसके रंग में रँगी हैं?
उत्तर- मीरा भगवान् श्रीकृष्ण के रंग में रँगी हैं।

प्रश्न 9. मीरा के काव्य को मुख्य स्वर क्या है?
उत्तर- मीरा के काव्य का मुख्य स्वर कृष्ण-भक्ति है।

काव्य-सौन्दर्य एवं व्याकरण-बोध

प्रश्न 1. निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार का नाम बताइए
(अ) बसो मेरे नैनन में नन्दलाल।
(ब) काल ब्याल हूँ बाँची।
(स) मोर मुकुट मकराकृत कुण्डल।
उत्तर-
(अ) इस पंक्ति में अनुप्रास अलंकार है।
(ब) काल ब्याल हूँ बाँची में रूपक अलंकार है।
(स) मोर मुकुट मकराकृत कुण्डल में वृत्त्यनुप्रास अलंकार है।

प्रश्न 2. निम्नलिखित पंक्ति का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए
गसी मीरा लाल गिरधर, तारो अब मोई।
उत्तर- काव्य सौन्दर्य :
(अ) इस पंक्ति में मीरा अपने को श्रीकृष्ण की दासी बताया है।
(ब) भाषा-ब्रज।
(स) रस-भक्ति एवं शांत।
(द) छंद-गेय।
(य) शैली-मुक्तक।

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प्रश्न 3. निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिए-
भगति, सबद, नैनन, बिसाल, किरपा, आणंद, अँसुवन।
उत्तर- भक्ति, शब्द, नयन, विशाल, कृपा, आनंद, आँसुओं।

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UP Board Solutions for Class 8 Science Chapter 5 सूक्ष्मजीवों का सामान्य परिचय एवं वर्गीकरण

UP Board Solutions for Class 8 Science Chapter 5 सूक्ष्मजीवों का सामान्य परिचय एवं वर्गीकरण

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सूक्ष्मजीवों का सामान्य परिचय एवं वर्गीकरण

अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित प्रश्नों में सही विकल्प छाँटकर लिखिए
उत्तर
(क) सूक्ष्मजीव पाये जाते हैं

(अ) हवा
(ब) पानी
(स) मिट्टी
(द) सर्वत्र

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(ख) टी.बी. (तपेदिक) रोग होता है।
(अ) प्रोटोजोआ द्वारा
(ब) कवक द्वारा
(स) जीवाणु द्वारा
(द) सर्वत्र

(ग) चना/मटर की जड़ों की गाँठों में पाया जाने वाला जीवाणु है
(अ) राइजोबियम
(ब) क्लॉस्ट्रीडियम
(स) एशेरिया कोलाई
(द) वायरस

(घ) कुकुरमुत्ता है।
(अ) कवक
(ब) शैवाल
(स) जीवाणु
(द) प्रोटोजोआ

(ङ) पेचिस रोग होता है-
(अ) अमीबा द्वारा
(ब) पैरामीशियम द्वारा
(स) एण्ट अमीबा द्वारा
(द) प्लाजमोडियम द्वारा

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प्रश्न 2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति करो
उत्तर
(क) सूक्ष्मजीवों को देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी की आवश्यकता होती है।
(ख) जीवाणु द्वारा नीबू के पौधे में कैंकर नामक रोग होता है।
(ग) प्रथम प्रतिजैविक (UPBoardSolutions.com) दवा पेनीसिलीन थी।
(घ) डेंगू रोग टाइगर (एडिज एजिप्ट) मच्छर के काटने से होता है।
(ङ) हैजा रोग दूषित जल/भोजन से फैलता है।
(च) राइजोबियम जीवाणु नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करते हैं।

प्रश्न 3.
सही कथन के आगे सही (✓) का निशान (UPBoardSolutions.com) लगाएँ तथा गलत कथन के आगे गलत (✗) का निशान लगाएँ।
उत्तर
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प्रश्न 4.
स्तम्भ ‘क’ को स्तम्भ ‘ख’ से सुमेलित कीजिए
उत्तर
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प्रश्न 5.
सूक्ष्मजीवों का आर्थिक महत्व बताइए।
उत्तर
सूक्ष्मजीवों का आर्थिक महत्त्व निम्नलिखित हैं

1. कृषि में-

  1. नाइट्रोजन स्थिरीकरण जीवाणुओं द्वारा,
  2. मृत पौधों या जन्तुओं के सड़ने से

2. डेयरी में-

  1. दही जमाने में

3. औद्योगिक महत्त्व-

  1. सिरके का निर्माण,
  2. चाय के उद्योग में

4. विविध- जीवाणु कार्बनिक मल पदार्थों जैसे गोबर, (UPBoardSolutions.com) मल व पेड़ पौधों की सड़ी-गली पत्तियों को खाद ह्युमस में बदलना।

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प्रश्न 6.
प्रतिजैविक दवाएँ किसे कहते हैं। इनका क्या उपयोग है?
उत्तर
सूक्ष्मजीवों द्वारा अनेक प्रतिजैविक दवाइयाँ बनाई जाती हैं। (UPBoardSolutions.com) प्रतिजैविक दवाएँ वे दवाएँ हैं जो रोग फैलाने वाले जीवाणुओं के प्रतिरोध में उपयुक्त होती हैं और शरीर में पहुँचते ही इन रोगाणुओं को नष्ट कर देती है।

उपयोग- प्रतिजैविक दवाओं का उपयोग सूक्ष्मजीवों द्वारा होने वाले अनेक रोग जैसे टी.बी., हैजा, टायफाइड, निमोनिया आदि के उपचार में किया जाता है।

प्रश्न 7.
टीकाकरण किसे कहते हैं?
उत्तर
किसी बीमारी के विरुद्ध प्रतिरोधात्मक क्षमता विकसित (UPBoardSolutions.com) करने के लिये जो दवा, खिलायी/ पिलायी या किसी अन्य रूप में दी जाती है उसे टीकाकरण कहते हैं।

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प्रश्न 8.
सूक्ष्मजीवों से होने वाली बीमारियों तथा उनसे बचाव के तरीके बताइए।
उत्तर
सूक्ष्मजीवों से होने वाली बीमारियों तथा उनसे बचाव के तरीके जन्तुओं की भाँति पौधों में भी सूक्ष्मजीवों द्वारा अनेक रोग हो जाते हैं।
जैसे-

  1. गेहूँ की गेरुई – कवक द्वारा
  2. गेहूं का कन्डूआ रोग – कवक द्वारा
  3. नींबू का कैकर — जीवाणु द्वारा

उनसे बचाव के तरीके-

  1. मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया, जापानी, मस्तिष्क ज्वर (जे० ई० जापानी इन्सेफलाइटिस) एवं एक्यूर इन्सेफलाईटिस सिन्ड्रोम (ए० ई० एस०) बीमारी से बचने हेतू मच्छर रोधी दवाओं का प्रयोग करें एवं गड्ढों, खेतों में नीम की खली का प्रयोग करें।
  2. शरीर को अधिक ढंक कर रखें ।।
  3. घर के आस-पास गंदा पानी न इकट्ठा होने दें।
  4. शुद्ध जल का प्रयोग करके तथा रोग वाहक (UPBoardSolutions.com) (मक्खी मच्छर) से बचाव और स्वच्छता की आदतों को अपना करके हम हैजा, आमातिसार, पेचिश, पीलिया आदि रोगों से ग्रसित होने से बच सकते हैं।
  5. व्यक्तिगत स्वच्छता जैसे, स्नान, शरीर की सफाई हाथ को साबुन से धोना खांसी, आने पर लोगों का मुँह पर रूमाल रखना आदि।

● नोट- प्रोजेक्ट कार्य छात्र स्वयं करें।

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We hope the UP Board Solutions for Class 8 Science Chapter 5 सूक्ष्मजीवों का सामान्य परिचय एवं वर्गीकरण help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 8 Science Chapter 5 सूक्ष्मजीवों का सामान्य परिचय एवं वर्गीकरण, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 6 जल : स्रोत तथा उपयोग

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 6 जल : स्रोत तथा उपयोग

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Home Science . Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 6 जल : स्रोत तथा उपयोग .

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
जल के कार्य लिखिए। मानव-शरीर के लिए जल क्यों उपयोगी है? [2008, 09, 10]
या
जल के कार्यों एवं उपयोगिता का वर्णन कीजिए। [2008, 17]
या
जल मनुष्य के लिए क्यों उपयोगी है? [2013, 17]
या
मानव शरीर के लिए जल क्यों आवश्यक है? [2018]
या
शरीर के लिए जल क्यों उपयोगी है? [2010, 13, 15]
या
जल ही जीवन है, इसका मूल्य पहचानें, इसे बरबाद न करें।” संक्षेप में लिखिए। [2016]
या
मानव जीवन में जल का क्या महत्त्व है? [2017]

उत्तर:
जल की उपयोगिता एवं महत्त्व
जल अथवा पानी का जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्राणी-जगत तथा वनस्पति-जगत के अस्तित्व का एक आधार जल ही है। जल के अभाव में व्यक्ति केवल कुछ दिन तक ही कठिनता से जीवित रह सकता है। वास्तव में व्यक्ति के स्वस्थ एवं चुस्त रहने के (UPBoardSolutions.com) लिए जल अति आवश्यक है। जल जीवन की। एक मूल आवश्यकता है जो कि प्यास के रूप में अनुभव की जाती है। शारीरिक आवश्यकता के अतिरिक्त मानव जीवन के सभी कार्य-कलापों में जल की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। हमारे भोजन पकाने, नहाने-धोने, सफाई करने तथा फसलों को उँगाने के लिए एवं अन्य प्रकार के उत्पादनों के लिए जल की अत्यधिक आवश्यकता एवं उपयोगिता होती है। सभ्य जीवन के लिए वरदान स्वरूप विद्युत ऊर्जा का निर्माण भी प्रायः जल से ही होता है। जल की उपयोगिता एवं महत्त्व को बहुपक्षीय विवरण निम्नवर्णित है

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(क) मानव-शरीर सम्बन्धी उपयोग

(1) पीने के लिए:
हमारे शरीर का 70-75% भाग जल से बना है; अत: जल का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपयोग पीने के लिए ही है। अत्यधिक गर्मी या अन्य किसी कारण से शरीर में होने वाली जल की कमी की पूर्ति हमें तुरन्त जल पीकर कर लेनी चाहिए अन्यथा जल की कमी अथवा ही-हाइड्रेशन के भयानक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। जल की शारीरिक आवश्यकता प्यास के रूप में महसूस होती है। प्यास एक अनिवार्य आवश्यकता है तथा इसकी पूर्ति तुरन्त होनी आवश्यक होती है।

(2) आन्तरिक शारीरिक प्रक्रियाएँ:

मानव शरीर की लगभग सभी जैविक एवं जैव-रासायनिक क्रियाओं के संचालन के लिए सर्वाधिक आवश्यक तत्त्व जल ही है। उदाहरण के लिए-पाचन क्रिया का मूल आधार भी जल है। इसी प्रकार उत्सर्जन की क्रिया भी (जैसे—स्वेद एवं मूत्र निष्कासन) जल पर ही आधारित रहती है। इसके अतिरिक्त जितने भी पेय पदार्थ; जैसे कि दूध, फलों का रस आदि; हम लेते हैं उनका अधिकांश भाग जल होता है।

(3) शारीरिक तापमान का नियमन:
हमारे शरीर में उपस्थित जल हमारे शरीर के तापमान को सामान्य रखता है। बाह्य रूप में भी हम ग्रीष्म ऋतु में शीतल तथा शीत ऋतु में गर्म जल से स्नान कर शारीरिक तापमान को सामान्य रखने का प्रयत्न करते हैं।

(4) रक्त संचार व्यवस्था:
हमारे रक्त का अधिकांश भाग (लगभग 80%) जल होता है जो कि रक्त की तरलता का मूल आधार है। तरल अवस्था में ही रक्त शरीर की धमनियों एवं शिराओं में संचार करता है। जल ही रक्त को तरलता प्रदान करता है। रक्त में जल की कमी हो जाने पर रक्त गाढ़ा हो जाता है तथा रक्त के गाढ़ा हो जाने पर न तो रक्त का संचार सुचारु रूप से हो पाता है और न ही शरीर स्वस्थ रह पाता है।

(5) शारीरिक स्वच्छता:
जल शारीरिक स्वच्छता का प्रमुख साधन है। नियमित रूप से किया गया स्नान हमारी त्वचा को स्वच्छ एवं यथासम्भव रोगमुक्त बनाये रखता है। |

(6) चुस्ती-फुर्ती के लिए:
शरीर को चुस्त एवं फुर्तीला बनाए रखने में भी जल का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। जल की कमी होने पर व्यक्ति आलस्य एवं उदासीनता का शिकार रहता है।

(ख) घरेलू उपयोग

शरीर के समान घरेलू दैनिक जीवन के संचालन के लिए भी जल अत्यधिक आवश्यक है। जल के प्रमुख घरेलू उपयोग निम्नलिखित हैं

  1. भोजन पकाने के लिए,
  2. वस्त्रादि की धुलाई के लिए,
  3. रसोईघर व बर्तनों की सफाई के लिए,
  4. फर्श, खिड़कियाँ, दीवारों, स्नानागार व शौचालय इत्यादि की सफाई के लिए,
  5. विभिन्न प्रकार के पेय पदार्थों को बनाने में तथा
  6. घरेलू पेड़-पौधों की सिंचाई करने के लिए।

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(ग) सामुदायिक उपयोग

जल किसी भी समाज, प्रदेश अथवा राष्ट्र की मूल आवश्यकता है। सामुदायिक जनजीवन की विभिन्न सुविधाओं एवं उपलब्धियों की प्राप्ति के लिए जल अत्यधिक आवश्यक है। इसकी पुष्टि में जल के सामुदायिक उपयोग निम्नलिखित हैं

  1. नगर एवं देहात की गलियों, सड़कों व नालियों आदि की सफाई के लिए जल एक प्रमुख साधन है।
  2.  सार्वजनिक पार्को, बाग-बगीचों व वृक्षारोपण जैसे महत्त्वपूर्ण (UPBoardSolutions.com) लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए जल अति आवश्यक है।
  3. कृषि आधारित समाज अथवा राष्ट्र के लिए जल की पर्याप्त उपलब्धि सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।
  4. जल से आज अति महत्त्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत विद्युत की प्राप्ति होती है।
  5. हमारे आधुनिक समाज के अनेक उद्योग जल पर आधारित हैं।
  6. अग्नि को नियन्त्रित करने के लिए भी जल की आवश्यकता पड़ती है। अग्निशामक विभाग जल का मुख्य रूप से उपयोग करके ही अवांछित एवं भयानक अग्निकाण्डों पर नियन्त्रण पाने का प्रयास करता है।

प्रश्न 2:
जल का संघटन बताइए। जल-प्राप्ति के स्रोतों का उल्लेख कीजिए। [2009, 11]
या
जल-प्राप्ति के मुख्य स्रोत बताइए व जल प्रदूषण के कारण बताइए। [2007]
या
जल-प्राप्ति के साधन क्या हैं? जल के अशब्द होने के कारण लिखिए। जल को शब्द करने की दो घरेलू विधियों का वर्णन कीजिए। [2009]
या
जल-प्राप्ति के मुख्य स्रोत बताइए। [2007, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
या
जल का संघटन क्या है? [2016]
उत्तर:
जल का संघटन
जल हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का एक यौगिक है। इसमें दो भाग हाइड्रोजन और एक भाग ऑक्सीजन (H2O) है। यही शुद्ध जल होता है। सामान्यत: जल में कई प्रकार के घुलनशील पदार्थ घुले रहते हैं जिसके कारण यह अशुद्ध हो जाता है। जल एक महत्त्वपूर्ण विलायक होने के कारण अनेक पदार्थों; जैसे—अनेक तत्त्वों के लवण इत्यादि; को आत्मसात् कर लेता है। प्राचीनकाल में जल को एक तत्त्व के रूप में जाना जाता था। वैज्ञानिकों ने बाद में (UPBoardSolutions.com) विभिन्न प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया कि जल हाइड्रोजन (दो भाग) व ऑक्सीजन (एक भाग) का यौगिक है तथा इसे H2O का सूत्र प्रदान किया। जल का वैज्ञानिक विश्लेषण सर्वप्रथम इंग्लैण्ड निवासी वैज्ञानिक केवेन्डिस ने किया था।
प्रकृति में जल तीन निम्नलिखित अवस्थाओं में पाया जाता है

(1) ठोस अवस्था:
हिमाच्छादित पर्वत शिखरों पर पाई जाने वाली हिम अथवा बर्फ जल की ठोस अवस्था है। सामान्य जल को 0°C तक ठण्डा करके बर्फ में परिवर्तित किया जा सकता है।

(2) द्रव अवस्था:
सामान्य जल इस अवस्था का उदाहरण है। अधिक तापमान पर बर्फ तथा ठण्डा करने पर जल-वाष्प सामान्य जल की द्रव अवस्था में परिवर्तित हो जाते हैं।

(3) गैस अवस्था:
आकाश में दिखाई पड़ने वाले मेघ अथवा बादल जल की गैस अवस्था (जल-वाष्प) के उदाहरण हैं। सामान्य जल गर्म करने पर पहले खौलने लगता है तथा धीरे-धीरे जल वाष्प में परिवर्तित हो जाता है। वायु में सदैव जलवाष्प विद्यमान रहती है।

जल-प्राप्ति के स्रोत
मनुष्य हो अथवा पेड़-पौधे या फिर अन्य प्राणी एवं जीवधारी, जल सभी के जीवन का आधार है। प्रकृति ने अपनी इस अमूल्य देन के पृथ्वी पर अनेक स्रोत उपलब्ध किए हैं। इन साधनों अथवा स्रोतों को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जा सकता है
(1) समुद्र का जल,
(2) वर्षा का जल,
(3) धरातलीय जल तथा
(4) भूमिगत जल।

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(1) समुद्र का जल:
पृथ्वी का लगभग 2/3 भाग समुद्र है। यह जल का विशालतम एवं प्रमुख स्रोत है। सूर्य की गर्मी से समुद्र का जल-वाष्प बनकर ऊपर उठता है। यह जल-वाष्प बादलों में परिवर्तित होकर जल के दूसरे स्रोत वर्षा के जल को जन्म देती है। वर्षा का जल पर्वतों एवं घा झीलों, झरनों एवं नदियों के जल में वृद्धि करता है। पृथ्वी के धरातल पर गिरने वाला वर्षा का जल भूमिगत जल-स्रोतों का निर्माण करता है। अन्त में नदियों द्वारा जल पुन: समुद्र में जा मिलता है। समुद्र के जल में लगभग तीन प्रतिशत सामान्य नमक घुला होता है। इस प्रकार समुद्र का जल हमारे लिए नमक का एक अति महत्त्वपूर्ण स्रोत है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है (UPBoardSolutions.com) कि भले ही समुद्र जल के विशालतम स्रोत हैं, परन्तु समुद्र का जल खारा होने के कारण पीने एवं खाना पकाने आदि के काम में नहीं लाया जा सकता। लवण की अधिक मात्रा होने के कारण इसे सिंचाई के कार्य में भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। |

(2) वर्षा का जल:
पृथ्वी पर पाए जाने वाले अन्य जल-स्रोतों का मूल वर्षा का जल है। यह पूर्णतया शुद्ध होता है, परन्तु पृथ्वी पर पहुँचते-पहुँचते इसमें वायुमण्डल की अनेक गैसों; कार्बन डाइ-ऑक्साइड, नाइट्रोजने आदि; धूल कणों एवं पर्यावरणीय अशुद्धियों व रोगाणुओं के मिल जाने के कारण यह अशुद्ध एवं हानिकारक हो जाता है। औद्योगीकरण के कारण वायु-प्रदूषण की दर बढ़ जाने के कारण वर्षा को जल प्राय: प्रदूषित हो जाता है। इस स्थिति में एक-दो बार वर्षा हो जाने पर वर्षा के जल को पीने के लिए एकत्रित करना कम हानिकारक रहता है। वर्षा का जल मृदु होता है तथा घरेलू उपयोगों के लिए उपयुक्त रहता है।

(3) धरातलीय जल:
धरातलीय जल-स्रोत नदियाँ, झीलें, झरने, तालाब इत्यादि हैं। इन सभी स्रोतों की अपनी अलग-अलग विशेषताएँ एवं उपयोग हैं जो निम्नलिखित हैं

(क) नदियाँ:
तीव्र प्रवाह वाली नदियों का जल प्रायः मृद् एवं शुद्ध होता है। प्रायः उद्गम स्थान पर सभी नदियों का जल पीने योग्य होता है, परन्तु बड़े शहरों अथवा औद्योगिक क्षेत्रों के किनारों पर पहुँचकर अनेक सार्वजनिक एवं औद्योगिक अशुद्धियाँ मिल जाने के कारण नदियों का जल पीने के योग्य नहीं रह पाता है। इस स्थिति में नदियों के जल को किसी उपयुक्त उपाय द्वारा शुद्ध एवं साफ करके ही उसे पीने के काम में लाना चाहिए।

(ख) झीलें:
झीलें वर्षा के जल का संगृहीत रूप हैं। ये प्राय: गहरी भूमि में बनती हैं। इनमें बर्फ पिघलने पर पर्वतीय नदियों का तथा वर्षा का जल एकत्रित होता रहता है। इस प्रकार की झील प्राकृतिक होती है; जैसे-कश्मीर की डल झील, तथा नैनीताल की झील। मानव द्वारा निर्मित झील कृत्रिम झील कहलाती है। यह बाँधों द्वारा बनाई जाती है; जैसे–पंजाब में भाखड़ा बाँध की झील। झील के जल को शुद्ध करके पीने योग्य बनाया जा सकता है तथा इससे विद्युत उत्पादन भी किया जा सकता है।

(ग) सोते एवं झरने:
जल प्राप्ति के प्राकृतिक स्रोत सोते एवं झरने भी हैं। जब कहीं कठोर चट्टान को फोड़कर भूमिगत जल बाहर निकलने लगता है, तब उसे जल को सोता या स्रोत कहते हैं। पानी के सोते अनेक प्रकार के होते हैं। कुछ सोतों से तो केवल शुद्ध जल ही निकलता है तथा कुछ सोतों से लवणयुक्त तथा गर्म पानी भी प्राप्त होता है। सोतों का जल भिन्न-भिन्न गुणों से युक्त होता है। सोतों के जल को अनेक बार पेट तथा त्वचा सम्बन्धी रोगों के उपचार के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। कुछ सोतों में गन्धक की पर्याप्त मात्रा घुलित अवस्था में पाई जाती है। यह जल अनेक प्रकार से। स्वास्थ्य-लाभ के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सोतों के समान झरने भी जल प्राप्ति के प्राकृतिक स्रोत होते हैं। झरने मुख्य रूप से पहाड़ी क्षेत्रों में ही पाए जाते हैं। झरने का जल ऊँचाई से नीचे गिरता है। झरनों का जल भी सोतों के ही समान होता है। सोतों तथा झरनों के पानी का इस्तेमाल करने से पूर्व उनके गुणों की जाँच कर लेनी चाहिए, क्योंकि इनमें कुछ हानिकारक लवण भी विद्यमान हो सकते हैं।

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(घ) तालाब:
झीलों की तरह तालाबों में भी वर्षा का जल एकत्रित होता है। देहात में जल-प्राप्ति का यह एक प्रमुख प्राकृतिक साधन है। ग्रामीण लोग इसमें स्नान करते हैं एवं वस्त्र आदि धोते हैं। पशुओं के नहाने के पीने के पानी का तालाब एक महत्त्वपूर्ण साधन है। तालाब का (UPBoardSolutions.com) जल ठहरा होने के कारण शीघ्र ही दूषित हो जाता है; अतः इसे ज्यों-का-त्यों पीने के काम में नहीं लाना चाहिए। यदि इसे पीना आवश्यक हो, तो किसी घरेलू उपाय द्वारा इसे शुद्ध करना अति आवश्यक होता है।

(4) भूमिगत जल:
वर्षा का जल जब भूमि पर गिरता है, तो इसका एक बड़ा भाग बह जाता है। इसका शेष भाग भूमि द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है। यह अवशोषित जल भूम्याकर्षण शक्ति के कारण नीचे की ओर खिसकता रहता है। मार्ग में अभेद्य चट्टान के आ जाने पर यह एकत्रित हो भूमिगत जल-स्तर का निर्माण करता है। जल के इस स्रोत का उपयोग कर साधारण कुएँ, विद्युत कुएँ भूमिगत जल-स्तर तक भूमि को बेधकर कुओं का निर्माण किया जाता है। कुएँ प्रायः निम्न प्रकार के होते हैं

(क) उथले कुएँ:
भूमि की प्रथम अप्रवेश्य स्तर तक ही खुदाई करके इन कुओं का निर्माण किया जाता है। इनकी गहराई लगभग तीस फीट होती है। भूमि में उपस्थित लवणों के कारण उथले कुओं का जल प्रायः कठोर होता है। गन्दी जगह अथवा नाले के आस-पास स्थित कुओं का जल पीने योग्य नहीं होता है।

(ख) गहरे कुएँ:
इन कुओं की गहराई लगभग सौ फीट तक होती है। इनका जल मृदु तथा अशुद्धियों से मुक्त होता है। इन कुओं से लगभग सभी ऋतुओं में जल प्राप्त होता है।

(ग) आदर्श कुएँ:
देहात क्षेत्र में पीने के पानी का मुख्य स्रोत प्रायः कुएँ ही होते हैं; अत: मृदु एवं शुद्ध जल वाला आदर्श कुआँ प्रत्येक गाँव के लिए आवश्यक है। आदर्श कुएँ का निर्माण करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. आदर्श कुएँ का निर्माण गन्दे स्थानों; नाले, तालाब आदि; से कम-से-कम 100 फीट की दूरी पर किया जाना चाहिए।
  2. कुएँ की भीतरी सतह पक्की ईंटों अथवा पत्थरों की बनी होनी चाहिए तथा कुएँ की दीवार भूमि की सतह से काफी ऊपर तक निर्मित होनी चाहिए। इससे बाहर का गन्दा पानी कुएँ में प्रवेश नहीं कर पाता।
  3. कुआँ अधिकाधिक गहरा होना चाहिए।
  4. कुएँ के ऊपर यदि सम्भव हो, तो चारों ओर खम्भे लगाकर ऊँचाई पर छत डलवा देनी चाहिए। इससे कुएँ में पेड़ों की टहनियाँ व पत्तियाँ आदि नहीं गिरतीं तथा कुआँ पक्षियों की बीट जैसे अवांछनीय तत्त्वों से भी सुरक्षित रहता है।
  5.  कुएँ के चारों ओर न तो स्नान करना चाहिए और न ही वस्त्रादि धोने चाहिए।
  6.  कुएँ से जल खींचते समय गन्दे बर्तन वे गन्दी रस्सी का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  7. कुएँ के जल में माह में कम-से-कम एक बार पोटैशियम परमैंगनेट अथवा लाल दवा अवश्य डालनी चाहिए। इससे जल के कीटाणु मर जाते हैं।

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(घ) आर्टीजन कुएँ:
इने कुओं से जल पृथ्वी के दबाव के कारण स्वत: निकला करता है। फ्रांस के आर्टाइथ स्थान में प्राचीनकाल में इस प्रकार के कुएँ बनाए जाते रहने के कारण इनका नाम
आर्टीजन कुएँ पड़ा। इन्हें ही पाताल-तोड़ कुएँ भी कहते हैं। इनका सिद्धान्त है कि यदि किसी स्थान पर किसी दूसरे स्थान की अपेक्षा भूमिगत जल-स्तर बहुत नीचा हो गया है और पत्थरों की चट्टान के कारण रुका हुआ हो तो यदि चट्टान में छेद कर दिया जाए, तो पानी स्वत: ही ऊपर की ओर दबाव के साथ उतना ही ऊँचा उछलता है जितनी कि ऊँची सतह होती है। आर्टीजन कुओं का जल गहरे कुओं के जल के समान शुद्ध होता है।
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 6 जल : स्रोत तथा उपयोग
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(ङ) नलकूप:
भूमि में जल-स्तर को गहराई तक छेदकर लोहे का पाइप डाल दिया जाता है। इस जल को ऊपर खींचने के लिए हाथ के पम्प अथवा विद्युत मशीन का प्रयोग किया जाता है। नलकूपों का प्रयोग सिंचाई एवं पीने के जल की प्राप्ति के लिए किया जाता है। अधिक गहराई वाले (UPBoardSolutions.com) नलकूप का जल प्रायः शुद्ध होता है। 3

प्रश्न 3:
गाँवों में जल-प्राप्ति के मुख्य साधन क्या हैं? वहाँ जल को दूषित होने से किस प्रकार बचाया जा सकता है? .
या
देहात में पेयजल के स्रोत क्या हैं? कुओं और तालाबों का जल किस प्रकार दूषित हो जाता है? इनको दूषित होने से किस प्रकार बचाया जा सकता है?
या
तालाब के जल की अशुद्धियों को रोकने तथा दूर करने के पाँच उपाय लिखिए।
या
नदियों का जल किस प्रकार से दूषित हो जाता है? नदियों के जल को दूषित होने से बचाने के उपायों का भी वर्णन कीजिए।
उत्तर:
गाँवों में जल-प्राप्ति के साधन

नगरों की अपेक्षा गाँवों में पेयजल की व्यवस्था अधिक जटिल है। इसके प्रमुख कारण हैं सुदूर देहात क्षेत्र में नगरपालिका जैसी व्यवस्थित संस्थाओं का न होना तथा उपयुक्त स्वास्थ्य सम्बन्धी शिक्षा का अभाव। अतः ग्रामीण क्षेत्र में न तो गन्दगी के निकास की समुचित व्यवस्था पर कोई विशेष ध्यान दिया जाता है और न ही पेयजल की शुद्धता बनाए रखने के आवश्यक उपाय किए जाते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल के साधन निम्नलिखित हैं –
(1) नदियाँ,
(2) तालाब,
(3) कुएँ,
(4) नलकूप।

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जल-प्राप्ति के इन स्रोतों का जल अशुद्ध होने तथा उसे अशुद्धि से बचाने के उपायों का संक्षिप्त विवरण अग्रलिखित है
(1) नदी का जल:
तीव्र प्रवाह वाली नदियों को जल प्राय: शुद्ध होता है, परन्तु मानवीय क्रियाएँ इसे अशुद्ध कर देती हैं।
जल की अशुद्धि के कारण:

  1. नदी के किनारे बसे नगरों एवं गाँवों की गन्दगी नदी में बहा दिए जाने के कारण इसका जल पीने योग्य नहीं रहता।
  2. नदी के किनारे की जाने वाली खेती से रासायनिक पदार्थ; खाद तथा कीटनाशक ओषधियाँ; नदी के पानी में मिलकर उसे दूषित करते रहते हैं।
  3.  नदी के किनारों पर स्नान करने तथा वस्त्रादि धोने से भी इसका जल अशुद्ध होता रहता है।
  4. पशुओं को नदी में घुसाकर स्नान कराने से जल में गन्दगी की वृद्धि होती है।
  5. नदियों के किनारे पर शवदाह करने तथा अस्थियाँ एवं राख सीधे जल में विसर्जित करने से भी यह जल पीने योग्य नहीं रह जाता।
  6. विभिन्न औद्योगिक संस्थानों द्वारा औद्योगिक अवशेषों तथा व्यर्थ पदार्थों को भी निकटवर्ती नदियों के जल में सीधे प्रवाहित कर दिया जाता है। इससे भी नदियों का जल अशुद्ध एवं दूषित हो जाता है।

बचाव के उपाय:
नदियों के जल को कुछ सामान्य उपाय अपनाकर दूषित होने से बचाया जा सकता है, जो निम्नलिखित हैं

  1. नदियों के जल में मल-मूत्र व अन्य प्रकार की गन्दगी प्रवाहित नहीं करनी चाहिए।
  2. औद्योगिक अवशेषों एवं व्यर्थ पदार्थों से नदियों के जल का बचाव किया जाना चाहिए।
  3.  नदी के किनारे पर स्नान नहीं करना चाहिए तथा नदी के जल में वस्त्रादि धोकर उसकी गन्दगी में वृद्धि नहीं करनी चाहिए।
  4.  पशुओं को नदी में नहीं घुसने देना चाहिए।
  5. नदियों में अस्थियों की राख विसर्जित नहीं करनी चाहिए।
  6.  नदी के किसी साफ तट को छाँटकर वहीं से पेयजल प्राप्त करना चाहिए। नदी के जल को उबालकर पीना स्वास्थ्य के लिए हितकर रहता है।

(2) तालाब का जल:
अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में तालाब उपलब्ध होते हैं। तालाबों में मूल रूप से वर्षा का ही जल एकत्र होता है, परन्तु विभिन्न आन्तरिक एवं बाहरी कारणों से तालाबों का जल दूषित हो जाता है; अत: सामान्य रूप से पीने योग्य नहीं रह जाता।
जल की अशुद्धि के कारण:

  1. ग्रामीण इनमें स्नान करते हैं तथा वस्त्रादि धोते हैं।
  2. पशुओं को नहाने व पानी पीने के लिए सीधे ही तालाब में उतार दिया जाता है।
  3. गाँव की नालियों के गन्दे पानी का निकास भी प्राय: तालाब में ही होता है।
  4. पेड़ों की टहनियाँ और पशु-पक्षियों के मल-मूत्र भी (UPBoardSolutions.com) तालाब में सड़ते रहते हैं।
  5. स्थिर अवस्था में रहने के कारण तालाब के जल में मच्छर एवं कुछ कीड़े भी पनपते रहते हैं।

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बचाव के उपाय:
तालाब के जल को कुछ सामान्य उपाय अपनाकर दूषित होने से बचाया जा सकता है। ये महत्त्वपूर्ण उपाय निम्नलिखित हैं

  1. तालाब का निर्माण ऐसे स्थान पर होना चाहिए कि जहाँ पर सार्वजनिक गन्दगियों का निष्कासन क्षेत्र न हो।
  2. तालाब की चहारदीवारी ऊँची होनी चाहिए। इससे आस-पास का गन्दा पानी तालाब में नहीं जा पाता है।
  3. तालाब के चारों ओर काँटेदार बाड़ लगा देनी चाहिए जिससे कि इसमें जानवर न घुस सकें।
  4. नहाने व कपड़े धोने की व्यवस्था तालाब के बाहर इस प्रकार होनी चाहिए कि गन्दा पानी : तालाब में न गिरे।
  5. तालाब से जल प्राप्त करते समय स्वच्छ बर्तनों का प्रयोग करना चाहिए।
  6. तालाब के जल को शुद्ध बनाये रखने के लिए इसमें छोटी-छोटी मछलियाँ छोड़ देनी चाहिए। ये कई प्रकार के हानिकारक कीट-पतंगों को खाकर नष्ट कर देती हैं।
  7. समय-समय पर तालाब की गन्दगी; जैसे–पेड़-पौधों की पत्तियों व टहनियों आदि: को साफ करते रहना चाहिए। इन सभी उपायों को अपनाकर तालाब के पानी को और अधिक अशुद्ध होने से बचाया जा सकता है। वैसे स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह आवश्यक माना जाता है कि तालाब के पानी को किसी घरेलू विधि द्वारा शुद्ध करके ही पीने एवं खाना पकाने के काम में लाना चाहिए।

(3) कुओं का जल:
गहरे कुएँ पेयजल के श्रेष्ठ साधन हैं।
जल की अशुद्धि के कारण:

  1. कुओं के कम गहरे व कच्चे बने होने पर इसके जल के अशुद्ध होने की अधिक सम्भावनाएँ रहती हैं।
  2. ऊपर से ढका न होने के कारण आस-पास के पेड़-पौधों की पत्तियाँ एवं पक्षियों के मल-मूत्र इसके अन्दर सीधे गिरकर सड़ते रहते हैं।
  3.  कुएँ की मेंढ़ पर बैठकर स्नान करने व वस्त्रादि धोने से इनमें गन्दा पानी गिरता रहता है और जल को दूषित करता है।
  4. गन्दे नाले आदि के पास स्थित होने पर कुएँ के पानी में कीड़े व कीटाणु आसानी से पनप जाते हैं।
  5. गन्दे बर्तन व गन्दी रस्सी द्वारा कुएँ से पानी प्राप्त करने से कुएँ के जल की अशुद्धियों में वृद्धि होती है।

बचाव के उपाय:
आदर्श कुएँ का निर्माण कुएँ के जल को पीने योग्य बनाये रखने का एकमात्र उपाय है। आदर्श कुएँ की विशेषताओं का उल्लेख विगत प्रश्न के अन्तर्गत किया जा चुका है।

(4) नलकूप का जल:
नलकूप कुओं का आधुनिकतम एवं सुरक्षित रूप है। नलकूप के जल के अशुद्ध होने के मूल कारण कुएँ से मिलते-जुलते हैं। अतः नलकूप के जल को पीने योग्य बनाए रखने के उपाय भी लगभग उसी प्रकार के हैं; जैसे कि

  1.  नलकूप एक स्वच्छ स्थान (गन्दे नाले व तालाब आदि से दूर) पर निर्मित किए जाने चाहिए।
  2. अधिकाधिक गहराई तक खुदाई करके नलकूप लगाने चाहिए।
  3. नलकूप ऊपर से ढके रहने चाहिए।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
हमें प्रतिदिन कितने जल की आवश्यकता होती है?
उत्तर:
हमें विभिन्न दैनिक कार्यों को सम्पन्न करने के लिए जले की अनिवार्य रूप से आवश्यकता (UPBoardSolutions.com) होती है। यद्यपि 1-2 लीटर जल जीवित रहने के लिए पर्याप्त है फिर भी प्रति सामान्य व्यक्ति 120-130 लीटर जल प्रतिदिन की निम्नलिखित दैनिक कार्यों के अनुसार आवश्यकता पड़ती है
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 6 जल : स्रोत तथा उपयोग

प्रश्न 2:
वर्षा के जल की क्या विशेषताएँ हैं? [2008, 15, 16]
उत्तर:
वर्षा को जल नदियों, झीलों तथा कुओं के लिए जल उपलब्धि का महत्त्वपूर्ण स्रोत होता है। कृषि के लिए वर्षा का जल अति महत्त्वपूर्ण स्रोत है। वर्षा का जल आसुत जल के समान होता है। इसकी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. वर्षा के जनक बादल हैं जो कि समुद्र, नदियों, तालाबों आदि के जल के वाष्प में परिवर्तित होने से बनते हैं। इस प्रकार वर्षा का जल आसुत जल के समान होता है।
  2. वर्षा का जल रंगहीन, स्वादहीन व शुद्ध होता है।
  3. वर्षा का जल जब वायुमण्डल से गुजर कर पृथ्वी तक पहुँचता है, तो मार्ग में इसमें कार्बन डाइ-ऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड्स, अमोनिया इत्यादि गैसों, बीजाणुओं तथा अनेक रोगाणुओं के मिल जाने के कारण यह दुषित व हानिकारक हो जाता है। इसका विकल्प यह है कि एक या होने के पश्चात् इसे पेय जल के रूप में प्रयोग में लाया जा सकता है।
  4. वर्षा का जल कोमल होता है; अतः खाना पकाने, स्नान करने तथा वस्त्रादि धोने के लिए उपयुक्त रहता है।

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प्रश्न 3:
आदर्श कुएँ से क्या तात्पर्य है? [2017, 18]
उत्तर:
गहरे कुएँ से लिया गया जल सभी कार्यों के लिए उपयुक्त होता है और यदि ऐसा उपयुक्त कुआँ हो तो उसे आदर्श कुएँ में बदलने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना अत्यन्त आवश्यक है

  1. कुआँ अच्छी भूमि में खुदवाना चाहिए।
  2. कुआँ पक्का होना चाहिए ताकि पानी निकालते समय उसमें मिट्टी न गिरे।
  3. प्रत्येक माह कुएँ के पानी में लाल दवा डालकर सफाई करवानी चाहिए, ताकि कुएँ का जल . दूषित होने से बच सके।
  4. ऐसे कुएँ के ऊपर छतरीनुमा एक छत होनी आवश्यक है, जिससे धूल, मिट्टी, पक्षियों की बीट इत्यादि कुएँ में न गिर सके।
  5. कुएँ के आस-पास का भाग पक्का होना चाहिए जिससे आस-पास का जल कुएँ में गिरकर जल को अशुद्ध न कर सके।

प्रश्न 4:
जल-संभरण से क्या तात्पर्य है? स्वास्थ्य की दृष्टि से इसकी क्या व्यवस्था होनी चाहिए?
उत्तर:
नगरों तथा महानगरों में जल-आपूर्ति की व्यवस्था को जल-संभरण कहते हैं। यहाँ यह व्यवस्था जल निगम द्वारा की जाती है। ये जल निगम स्वायत्त विभाग के रूप में अथवा नगरपालिकाओं के विभाग के अन्तर्गत कार्य करते हैं। छोटे गाँवों और कस्बों में, जहाँ सार्वजनिक जल-वितरण की सुविधा उपलब्ध नहीं है, जल आपूर्ति का मुख्य स्रोत कुएँ, तालाब, झील, पोखर और नदियाँ हैं।
जल निगम सार्वजनिक उपक्रम होते हैं। ये नागरिकों को उनके घरों तक शुद्ध जल (UPBoardSolutions.com) की आपूर्ति की सुचारु व्यवस्था करते हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से ये निम्नलिखित व्यवस्थाएँ बनाए रखते हैं

  1. जल का आवश्यक संग्रह,
  2.  जेल की अघुलित अशुद्धियों को दूर करना,
  3. कीटाणुनाशकों; जैसे – क्लोरीन व ओजोन गैस, पोटैशियम परमैंगनेट तथा पराबैंगनी किरणों आदि; का प्रयोग कर जल को रोगाणुओं से मुक्त रखना।
    दूसरी ओर प्राकृतिक साधनों से प्राप्त जल में अनेक प्रकार की अशुद्धियाँ होती हैं तथा उसमें रोगजनक कीटाणुओं के होने की भी पूरी सम्भावना रहती है। ऐसे जल को उपयुक्त विधि द्वारा शुद्ध करके उसका प्रयोग करना चाहिए तथा पेय जल को ढककर रखना चाहिए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
मनुष्य के लिए जल मुख्य रूप से किस रूप में आवश्यक है।
उत्तर:
मनुष्य की प्यास शान्त करने के साधन के रूप में जल मुख्य रूप से आवश्यक है।

प्रश्न 2:
जल के दो महत्त्वपूर्ण शारीरिक उपयोग बताइए। [2011, 13]
उत्तर:
विभिन्न आन्तरिक शारीरिक क्रियाओं (पाचन, उत्सर्जन, रक्त-संचालन आदि) तथा शरीर की बाहरी स्वच्छता के साधन के रूप में जल उपयोगी है।

प्रश्न 3:
जल का संगठन क्या है? [2011]
उत्तर:
जल एक यौगिक है। इसमें दो भाग हाइड्रोजन तथा एक भाग ऑक्सीजन विद्यमान है।

प्रश्न 4:
H2O किसका रासायनिक सूत्र है? [2013, 14]
उत्तर:
H2O जल का रासायनिक सूत्र है।

प्रश्न 5:
जल की विभिन्न अवस्थाएँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर:
जल की तीन अवस्थाएँ होती हैं – ठोस, द्रव तथा गैस।

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प्रश्न 6:
जल-प्राप्ति के मुख्य स्रोत कौन-कौन से हैं? [2007, 10, 11, 12, 13, 14]
या
प्राकृतिक जल के विभिन्न स्रोत लिखिए। [2008]
उत्तर:
समुद्र, वर्षा, नदियाँ, तालाब, झीलें, कुएँ तथा झरने जल-प्राप्ति के मुख्य स्रोत हैं।

प्रश्न 7:
जल का विशालतम स्रोत क्या है?
उत्तर:
समुद्र भूमण्डले पर जल का विशालतम स्रोत है।

प्रश्न 8:
गन्धकयुक्त जल किसके लिए लाभकारी होता है?
उत्तर:
गन्धकयुक्त जल त्वचा के लिए लाभकारी होता है।

प्रश्न 9:
कुएँ कितने प्रकार के होते हैं? [2018]
उत्तर:
कुएँ के मुख्य प्रकार हैं-उथले कुएँ, गहरे कुएँ, आदर्श कुएँ तथा आर्टीजन कुएँ।

प्रश्न 10:
एक आदर्श कुआँ खोदने के लिए किस स्थान का चुनाव उपयुक्त होगा?
उत्तर:
सामान्य रूप से साफ, ऊँचे एवं गन्दे तथा खत्ते आदि (UPBoardSolutions.com) से दूर स्थित स्थान पर ही आदर्श कुआँ खोदा जा सकता है।

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प्रश्न 11:
नदियों के जल की क्या विशेषताएँ होती हैं? [2011]
उत्तर:
अपने उद्गम स्थल पर नदियों का जल शुद्ध होता है परन्तु बस्तियों एवं औद्योगिक क्षेत्रों से गुजरने पर यह जल प्रदूषित हो जाता है। अतः नदियों के जल को शुद्ध करके ही पीने के काम में लाना चाहिए।

प्रश्न 12:
पाताल-तोड़ कुआँ किसे कहते हैं? [2007]
उत्तर:
पाताल-तोड़ कुएँ आर्टीजन कुएँ ही कहलाते हैं। इन कुओं का जल बहुत गहरे में जाकर होता है। इन कुओं का जल पृथ्वी के नीचे से दबाव के कारण स्वतः ही निकला करता है।

प्रश्न 13:
घरेलू स्तर पर अधिक जल नष्ट होने से बचाने के दो उपाय लिखिए। [2009, 13, 18]
उत्तर:
(1) नल की टोंटियों को अनावश्यक रूप से नहीं खोलना चाहिए।
(2) कपड़े धोने के बाद बचे हुए जल को टॉयलेट में डालना चाहिए जिससे टॉयलेट की सफाई भी हो जाती है और जल की बचत भी हो जाती है।

प्रश्न 14:
विश्व जल दिवस कब मनाया जाता है? [2014]
उत्तर:
विश्व जल दिवस प्रतिवर्ष 22 मार्च को मनाया जाता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न:
निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

1. हमारे लिए जल उपयोगी है
(क) प्यास बुझाने के लिए।
(ख) भोजन पकाने के लिए
(ग) शारीरिक सफाई के लिए
(घ) इन सभी कार्यों के लिए

2. जल अपने आप में क्या है?
(क) तत्त्व
(ख) मिश्रण
(ग) यौगिक
(घ) न मिश्रण न यौगिक

3. जल का रासायनिक सूत्र है [2010, 11, 12, 13, 14, 15]
(क) HO
(ख) HO2
(ग) H2O
(घ) H2O2

4. समुद्र का जल होता है
(क) स्वादिष्ट
(ख) खारा
(ग) मीठा
(घ) खट्टा

5. सर्वोत्तम कुआँ माना जाता है
(क) कच्चा एवं उथला कुआँ
(ख) पक्का एवं गहरा कुआँ
(ग) नाले के निकट स्थित कुआँ
(घ) ये सभी

6. कुएँ के जल को शुद्ध करने के लिए क्या डालते हैं? [2012]
(क) पोटैशियम परमैंगनेट
(ख) ब्लीचिंग पाउडर
(ग) गन्धक
(घ) डी० डी० टी०

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7. तालाब का जल नहीं माना जाता
(क) स्नान करने योग्य
(ख) पीने योग्य
(ग) कपड़े धोने योग्य
(घ) किसी अन्य कार्य को करने योग्य

8. झील का जल पीना चाहिए
(क) ठण्डा करके
(ख) छानकर
(ग) उबालकर
(घ) यूँ ही

9. जल रक्त को बनाए रखता है
(क) ठण्डा
(ख) गर्म
(ग) गाढ़ा
(घ) तरल

10. मानव शरीर में जल का प्रतिशत है [2015, 16]
(क) 50 – 60%
(ख) 70 – 75%
(ग) 80 – 90%
(घ) 100%

उत्तर:
1. (घ) इन सभी कार्यों के लिए,
2. (ग) यौगिक,
3. (ग) H2O
4. (ख) खारा,
5. (ख) पक्का एवं गहरा कुओं,
6. (क). पोटेशियम परमैंगनेट,
7. (ख) पीने योग्य,
8. (ग) उबालकर,
9. (घ) तरल,
10. (ख) 70 – 75%

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UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 9 हिन्दी विश्वशांति की भाषा है! (मंजरी)

UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 9 हिन्दी विश्वशांति की भाषा है! (मंजरी)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 8 Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 9 हिन्दी विश्वशांति की भाषा है! (मंजरी).

प्रश्न-अभ्यास 

कुछ करने को-       नोट-विद्यार्थी स्वयं करें।
विचार और कल्पना-

प्रश्न 1.
यदि पेड़-पौधे और जीव-जन्तु भी भाषा बोलने में सक्षम होते तो
– वे हमसे क्या-क्या चिन्ताएँ बताते?
– इसका वातावरण पर क्या प्रभाव पडतो?
उत्तर-
पेड़-पौधे और जीव-जन्तु का भाषा बोलने में सक्षम होना कल्पनातीत है।

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प्रश्न 2.
हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा है किन्तु वेश के अनेक प्रदेशों में इसके अतिरिक्त प्रादेशिक भाषाएँ भी बोली जाती हैं। नीचे लिखी गई भाषाओं को उनके प्रदेशों से मिलान कीजिए-
उत्तर-
भाषा                         प्रदेश
मराठी                         महाराष्ट्र
मलयालम                   केरल
कन्नड़                         कर्नाटक
तेलुगू                         
आंध्र प्रदेश
तमिल                         
तमिलनाडु

बातचीत से-
प्रश्न1
साइजी माकिनो भारत कब और किस कार्य के लिए आए?
उत्तर-
साइजी माकिनो 36 वर्ष की उम्र में सन् 1959 ई० में गांधी जी के सेवाग्राम में पशुचिकित्सक के रूप में आए।

प्रश्न 2.
साइजी माकिनो ने शांतिनिकेतन की क्या विशेषताएँ बताई हैं?
उत्तर-
शांतिनिकेतन के प्राकृतिक सौन्दर्य ने साइजी (UPBoardSolutions.com) माकिनो को बहुत प्रभावित किया। शांतिनिकेतन का परिवेश इतना शान्त था कि पुस्तकालय में बैठे घड़ी की आवाज सुनी जा सकती थी। शांतिनिकेतन में विश्व की तमाम संस्कृतियों को समाए रखने की क्षमता है।

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प्रश्न 3.
साइजी माकिनो को ग्वालियर की बिड़ला फैक्ट्री में क्यों जाना पड़ा?
उत्तर-
ग्वालियर में जापानी तकनीक से बिड़ला फैक्टरी लगाई गई। जापानी इंजीनियर हिन्दी नहीं जानते थे और फैक्टरी मजदूर जापानी भाषा से अनभिज्ञ थे। अतः साइजी माकिनो वहाँ दुभाषिए के रूप में गए।

प्रश्न 4.
साइजी की क्या कामना है?
उत्तर-
साइजी की कामना है कि हिन्दी विश्व-शांति की भाषा बने और वह जीवनपर्यन्त इससे जुड़े रहें।

प्रश्न 5.
जापान में हिन्दी की क्या स्थिति है?
उत्तर-
जापान में हिन्दी का बहुत सम्मान है। ओसाका ओर टोकियो में बी०ए० और एम०ए० स्तर तक हिन्दी पढ़ाई जाती है। जापानी में संस्कृत शब्द भरे पड़े हैं। 

प्रश्न 6.
साइजी ने पाठकों को कौन-सा संदेश देना चाहा है?
उत्तर-
साइजी का पाठकों के लिए संदेश है कि अपने देश को आगे बढ़ाने के लिए अपनी भाषा और संस्कृति ही काम आती है।

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प्रश्न 7.
हिन्दी भाषा के क्षेत्र में कुछ जापानी लेखकों ने कार्य किए हैं। स्तम्भ ‘क’ में कार्य एवं स्तम्भ ‘ख’ में उनके नाम लिखे गए हैं उनका सही-सही मिलाने कीजिए-
उत्तर-
UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 9 हिन्दी विश्वशांति की भाषा है! (मंजरी) 1

भाषा की बात-
प्रश्न 1.
भाषा के सौन्दर्य से सम्बन्धित निम्नलिखित वाक्यों को ध्यान से पढ़िए
(क) समझ नहीं आता कि गुरुदेव के व्यक्तित्व ने वातावरण को इतना सुन्दर बना दिया है या इतने शान्त वातावरण ने ही गुरुदेव जैसे महापुरुष की रचना की है।
(ख) समझ नहीं आता कि आपकी महानता ने आपको इतना सुन्दर बना दिया है या आपकी सुन्दरता ने आपको महान बना दिया है। इसी प्रकार से किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान की दो विशेषताओं को लेकर दो वाक्यों की रचना कीजिए।
उत्तर-
(क) समझ नहीं आता कि सत्य और अहिंसा की पूजा से गांधी जी महान बने या गांधी जी की महानता से सत्य और अहिंसा का प्रचार हुआ।
(ख) समझ में नहीं आता कि कुतुबमीनार दिल्ली में होने के कारण प्रसिद्ध है या दिल्ली कुतुबमीनार के होने से प्रसिद्ध है।

प्रश्न 2.
‘शान्ति’ में ‘निकेतन’ जोड़कर ‘शान्तिनिकेतन’ बना है। इसी प्रकार ‘शान्ति’ में अन्य शब्द को जोड़कर तीन नए शब्द बनाइए।
उत्तर-
शान्तिदूत, शान्तिसदन, शान्तिभवन।

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प्रश्न 3.
जिस शब्द से क्रिया की विशेषता प्रकट हो, उसे क्रियाविशेषण कहते हैं, जैसे
(क) वह धीरे-धीरे टहलता है।
(ख) पी०टी० ऊषा तेज दौड़ती है
यहाँ सभी रेखांकित शब्द क्रियाविशेषण हैं क्योंकि पहले वाक्य में ‘धीरे-धीरे’ क्रिया ‘टहलना’ की विशेषता और दूसरे वाक्य में ‘तेज’ शब्द ‘दौड़ने’ क्रिया की विशेषता बता रहा है। इस प्रकार पाठ में आए किन्हीं चार क्रियाविशेषण (शब्दों) को छाँटकर सम्बन्धित क्रियाओं के साथ लिखिए।
उत्तर-

  1. कार तेज दौड़ती है।
  2. वह जोर-जोर से पढ़ता है।
  3. तुम अधिक बोलते हो।
  4. वह सुन्दर लिखती है।

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UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 7 घरेलू विधियों से जल को शुद्ध करना

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 7 घरेलू विधियों से जल को शुद्ध करना

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
शुद्ध तथा अशुद्ध जल के लक्षणों या गुणों को स्पष्ट कीजिए। जल किस प्रकार से दूषित हो जाता है?
या
जल किस प्रकार दूषित होता है ? आप अशुद्ध जल को कैसे शुद्ध करेंगी? [2008, 10]
या
जल में पाई जाने वाली मुख्य अशुद्धियों का वर्णन कीजिए। [2008]
या
जल अशुद्ध होने के क्या कारण हैं? [2010]
उत्तर:
शुद्ध जल के गुण या लक्षण
यह एक सर्वविदित तथ्य है कि हमारी पृथ्वी पर थल की तुलना में जल का भाग बहुत अधिक है। जल के मुख्य स्रोत समुद्र, नदियाँ, झीलें, तालाब, झरने तथा भूमिगत जल हैं। जल की अत्यधिक मात्रा उपलब्ध होने पर भी विश्व को पेयजल की कमी का सामना करना पड़ रहा है। इस समस्या का मूल कारण यह है कि हमारे लिए केवल शुद्ध जल ही उपयोगी होता है। अशुद्ध जल या दूषित जल न तो पिया जा सकता है और न ही भोजन पकाने तथा अन्य महत्त्वपूर्ण कार्यों में ही इस्तेमाल किया जा सकता है। इस स्थिति में शुद्ध जल के आवश्यक गुणों एवं लक्षणों की पहचान की समुचित जानकारी होना आवश्यक है।
शुद्ध जल वह सरल यौगिक है जो हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन से बनता है। शुद्ध जल (UPBoardSolutions.com) स्वादरहित, रंगरहित, गन्धरहित द्रव्य होता है। शुद्ध अवस्था में जल साफ, स्वच्छ एवं पूर्ण रूप से पारदर्शी होता है। शुद्ध जल में एक प्रकार की प्राकृतिक चमक भी होती है।

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अशुद्ध जल के गुण या लक्षण

जल एक अत्यधिक उत्तम विलायक है। अनेक वस्तुएँ एवं लवण जल में शीघ्र ही घुल जाते हैं। इसीलिए पूर्ण शुद्ध अवस्था में जल मुश्किल से ही प्राप्त होता है। कोई-न-कोई लवण जल में घुल जाता है अथवा कुछ अशुद्धियों या गन्दगी का जल-स्रोतों में समावेश हो जाता है जिसके . परिणामस्वरूप जल अशुद्ध हो जाता है। अशुद्ध जल के गुणों या लक्षणों का उल्लेख करने से पूर्व कहा जा सकता है कि वह जल अशुद्ध है जिसमें शुद्ध जल के आवश्यक किसी एक गुण या सभी गुणों को अभाव होता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि अशुद्ध जल में
किसी-न-किसी प्रकार का स्वाद पाया जाता है। यह खारा भी हो सकता है तथा मीठा भी। अशुद्ध जल में गन्ध या दुर्गन्ध का पाया जाना भी एक लक्षण है। प्रायः अशुद्ध जल मटमैला भी हो सकती है। अशुद्ध जल में कुछ अशुद्धियाँ तैरती हुई भी दिखाई दे सकती हैं। अशुद्ध जल अर्द्ध-पारदर्शी होता है तथा उसमें शुद्ध जल की प्राकृतिक चमक का भी प्रायः अभाव ही होता है।

जल का दूषित होना

प्रकृति ने हमें शुद्ध जल ही प्रदान किया था, परन्तु विभिन्न कारणों से जल क्रमश: दूषित होता जा रहा है। जल को अधिक दूषित करने में सर्वाधिक योगदान सभ्य व औद्योगिक एवं नगरीय मानव समाज का ही है। विभिन्न अति विकसित एवं आधुनिक मानवीय गतिविधियों के कारण ही जल क्रमशः दूषित होता जा रहा है। जल को दूषित करने वाले कुछ मुख्य कारकों का संक्षिप्त विवरण अग्रवर्णित है

(1) घरेलू वाहित मल (सीवेज):
इसमें मल-मूत्र, घरेलू गन्दगी तथा कपड़ों को धोने के बाद का जल आदि सम्मिलित होते हैं। सामान्य रूप से इस प्रकार का दूषित जल, घर की नालियों तथा बड़े नालों के माध्यम से बहता हुआ मुख्य जल-स्रोतों में मिल जाता है तथा इन स्रोतों के जल को भी प्रदूषित (UPBoardSolutions.com) कर देता है। इसके परिणामस्वरूप नदियों के किनारे, झील आदि के जल में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। वाहित मल से अनेक प्रकार के कीटाणु जल में आ जाते हैं, जिसके कारण जल का अत्यधिक क्लोरीनीकरण करना आवश्यक हो जाता है।

(2) वर्षा का जल:
वर्षा का जल खेतों की मिट्टी की ऊपरी परत को बहाकर नदियों, झीलों तथा समुद्र तक पहुँचा देता है। इसके साथ अनेक प्रकार के खाद (नाइट्रोजन एवं फॉस्फेट के यौगिक) एवं कीटनाशक पदार्थ भी जल में पहुँच जाते हैं तथा जल क्रमशः दूषित हो जाता है।

(3) औद्योगिक संस्थानों द्वारा विसर्जित पदार्थ:
इनमें अनेक विषैले पदार्थ (अम्ल, क्षार, सायनाइड आदि), रंग-रोगन व कागज उद्योग द्वारा विसर्जित पारे (मरकरी) के यौगिक, रसायन एवं पेस्टीसाइड उद्योग द्वारा विसर्जित सीसे (लैड) के यौगिक तथा कॉपर वे जिंक के यौगिक प्रमुख हैं। इन सभी पदार्थों के जल में मिल जाने से जल दूषित एवं हानिकारक हो जाता है।

(4) तैलीय (ऑयल) प्रदुषण:
इस प्रकार का प्रदूषण समुद्र के जल में होता है। समुद्र में यह प्रदूषण या तो जहाजों द्वारा तेल विसर्जित करने से होता है अथवा समुद्र के किनारे स्थित तेल-शोधक संस्थानों के कारण होता है।

(5) रेडियोधर्मी पदार्थ:
नाभिकीय विखण्डन के फलस्वरूप अनेक रेडियोधर्मी पदार्थ जल को दूषित कर देते हैं। इस प्रकार का प्रदूषण प्रायः समुद्र के जल में होता है।

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जल में पाई जाने वाली मुख्य अशुद्धियाँ

दूषित जल में मुख्य रूप से दो प्रकार की अशुद्धियाँ पायी जाती हैं जिन्हें क्रमशः घुलित अशुद्धियाँ तथा अघुलित अथवा तैरने वाली अशुद्धियाँ कहा जाता है। इन दोनों प्रकार की अशुद्धियों को। संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है

(1) घुलित अशुद्धियाँ:
जल एक उत्तम विलायक है; अत: इसके सम्पर्क में आने वाले विभिन्न पदार्थ शीघ्र घुलकर इसमें समा जाते हैं। इस प्रकार जल में समा जाने वाले विजातीय तत्त्वों को जल की घुलित अशुद्धियाँ कहा जाता है। इस प्रकार की अशुद्धियाँ प्रायः दो प्रकार की होती हैं। प्रथम वर्ग की घुलित अशुद्धियाँ कुछ लवण होते हैं। मुख्य रूप से जल के कुछ सल्फेट, कार्बोनेट तथा बाइकार्बोनेट घुल जाया करते हैं। ये लवण घुलकर पानी को कठोर बना देते हैं। कठोर जल हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। लवणों के अतिरिक्त कुछ गैसें भी जल में घुल जाती हैं। ये गैसें मुख्य रूप से सल्फ्यूरेटेड हाइड्रोजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड होती हैं। (UPBoardSolutions.com) इन गैसों से युक्त जल भी हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक ही होता है।

(2) अघुलित अथवा तैरने वाली अशुद्धियाँ:
अशुद्ध जल में कुछ ऐसी अशुद्धियाँ भी पाई जाती हैं जो जल में नहीं घुलतीं, परन्तु इनका जल में अस्तित्व ही जल को दूषित एवं हानिकारक बना देता है। इस प्रकार की अशुद्धियों को तैरने वाली अशुद्धियाँ भी कहा जाता है। जल में पाई जाने वाली इस प्रकार की मुख्य अशुद्धियाँ निम्नलिखित हो सकती हैं| ”

  1. धूल-मिट्टी के कण एवं विभिन्न प्रकार का कूड़ा-करकट। पत्ते, घास, तिनके तथा बाल आदि इसी प्रकार की अशुद्धियाँ मानी जाती हैं।
  2.  विभिन्न रोगों के रोगाणु भी जल को अशुद्ध बनाते हैं। अशुद्ध जल में हैजा, पेचिश, मोतीझरा आदि रोगों के कीटाणु पाए जाते हैं।
  3. अशुद्ध जल में अनेक प्रकार के कीड़े, कीड़ों के बच्चे तथा अण्डे भी पाए जाते हैं।
  4. जल को अशुद्ध बनाने वाली कुछ अशुद्धियाँ पशुजनित भी होती हैं। पशुओं द्वारा जल में मल-मूत्र विसर्जित कर दिया जाता है। इसके अतिरिक्त उनके शरीर के बाल एवं अन्य अशुद्धियाँ भी जल को अशुद्ध बना देती हैं।

(संकेत–अशुद्ध जल को शुद्ध करने की घरेलू विधियों के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न सं० 2 के अन्तर्गत ‘अशुद्ध जल को शुद्ध करने की घरेलू विधियाँ देखें।

प्रश्न 2:
अशुद्ध जल को शुद्ध करने की घरेलू विधियों का सविस्तार वर्णन कीजिए। [2007, 11, 12, 13, 15, 17]
या
अशुद्ध जल को शुद्ध करने की कौन-कौन सी विधियाँ हैं? किन्हीं दो विधियों का वर्णन कीजिए। [2011, 17, 18]
या
अशुद्ध जल का स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है? जत की अशुद्धियों को किस प्रकार दूर कर सकते हैं? [2008]
या
घर पर जल शुद्ध करने की कोई एक रासायनिक विधि लिखिए। [2011, 14, 15]
या
अशुद्ध जल को (चित्र सहित) चार घड़ों द्वारा शुद्ध करने की विधि लिखिए।
या
जल कितने प्रकार से दूषित होता है? जल में पाई जाने वाली अशुद्धियों को दूर करने के उपाय बताइए। [2008]
या
घर पर जल शुद्ध करने की विधियाँ लिखिए। [2009, 10, 11, 12, 13, 14]

उत्तर:
(संकेत:जल कितने प्रकार से दूषित होता है, इसके अध्ययन के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न सं० 1 के अन्तर्गत ‘जल कां दूषित होना’ शीर्षक देखें।

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अशुद्ध जल को शुद्ध करने की घरेलू विधियाँ

अनेक प्रकार के घुलित एवं अघुलित कार्बनिक व अकार्बनिक पदार्थों तथा अनेक प्रकार के कीटाणुओं की उपस्थिति के कारण जल अशुद्ध अथवा दूषित हो जाता है। इस प्रकार के जल का सेवन स्वास्थ्य को कुप्रभावित करता है तथा अनेक रोगों की उत्पत्ति का कारण बन सकता है। (UPBoardSolutions.com) अतः इन अशुद्धियों को दूर कर शुद्ध जल प्राप्त करना अत्यन्त आवश्यक है। इस प्रकार जनसाधारण के स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से जल के शुद्धिकरण की घरेलू विधियों का ज्ञान और भी महत्त्वपूर्ण है। घरेलू विधियों द्वारा जल को शुद्ध करने के विभिन्न उपायों को निम्नलिखित तीन वर्गों में रखा जा सकता है
(क) भौतिक विधियाँ,
(ख) यान्त्रिक विधियाँ एवं
(ग) रासायनिक विधियाँ।

(क) भौतिक विधियाँ:
जल-शोधन की कुछ प्रमुख भौतिक विधियाँ निम्नलिखित हैं

(1) जल को उबालकर शुद्ध करना:
उबालने से जल के अधिकांश कीटाणु नष्ट हो जाते हैं, जल में घुली गैसें निकल जाती हैं तथा अनेक घुलित लवण अवक्षेपित होकर नीचे बैठ जाते हैं। इस प्रकार उबालने से जल की अनेक अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं और यह पीने योग्य हो जाता है। । उबालने के उपरान्त जल को निथार कर अथवा छानकर उसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए। उबालना अशुद्ध जल को शुद्ध करने की एक उत्तम विधि है, परन्तु इस विधि द्वारा केवल सीमित मात्रा में ही जल को शुद्ध किया जा सकता है।
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अतः अधिक-से-अधिक पीने वाले तथा खाना पकाने के लिए पानी, को ही इस विधि द्वारा शुद्ध किया जा सकता है।

(2) आसवन विधि द्वारा जल का शुद्धीकरण:
इस विधि में अशुद्ध जल को उबाला जाता है। तथा परिणामस्वरूप बनी जल-वाष्पे को एक स्वच्छ बर्तन में एकत्रित कर ठण्डा करके शुद्ध जल प्राप्त किया जाता है। इस विधि में जल की अशुद्धियाँ उबालने वाले बर्तन में ही रह जाती हैं। आसवन विधि द्वारा शुद्ध किए गए जल को (UPBoardSolutions.com) आसुत जल कहते हैं। आसुत जल उत्तम कोटि का शुद्ध जल होता है जिसे पीने में तथा औषधियों के विलायक के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। इस विधि द्वारा भी केवल सीमित मात्रा में ही जल को शुद्ध किया जा सकता है।

(3) परा-बैंगनी अथवा अल्ट्रा-वॉयलेट किरणों से जल का शुद्धिकरण:
प्राचीनकाल से ही जल को शुद्ध करने के लिए सूर्य के प्रकाश का उपयोग किया जाता रहा है। सूर्य के प्रकाश में पाई जाने वाली पराबैंगनी किरणें जल के कीटाणुओं को नष्ट कर देती हैं। आजकल यन्त्रों द्वारा दूषित जल में परा-बैंगनी किरणें डालकर जल को शुद्ध किया जाता है।

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(ख) यान्त्रिक विधियाँ:
आजकल दूषित जल को शुद्ध करने के लिए अनेक यान्त्रिक साधन अपनाये जाते हैं। ये जल को पीने के योग्य बनाने गन्दा पानी के लिए सरल उपकरण हैं। इनमें से कुछ प्रमुख यान्त्रिक साधन निम्नलिखित हैं

(1) चार घड़ों की विधि:
यह विधि ग्रामीण क्षेत्रों में पानी । अधिक प्रचलित है। इसमें चार घड़ों को लकड़ी के स्टैण्ड पर कोयले का चूरा एक के ऊपर एक रख दिया जाता है। ऊपर के तीन घड़ों की तली में एक छिद्र होता है। सबसे ऊपर के घड़े में अशुद्ध जल पानी भर दिया जाता है। दूसरें घड़े में कोयला पीसकर रख देते हैं तथा कंकड़ तथा बालू तीसरे घड़े में ऊपर की ओर बालू तथा नीचे की ओर कंकड़ अथवा बजरी रख देते हैं। प्रत्येक छिद्र में थोड़ी रूई लगा देना लाभकर रहता है। अब सबसे ऊपर के घड़े का जल धीरे-धीरे । शेष घड़ों से छनकर गुजरता हुआ नीचे के घड़े में एकत्रित होता रहता है। इस विधि में जल में तैरती हुई अघुलित अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं तथा जल पीने योग्य हो जाता है।
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(2) आधुनिक निस्यन्दक अथवा फिल्टर द्वारा जल का शुद्धीकरण:
पाश्चर चैम्बरलेन फिल्टर तथा वर्कफील्ड फिल्टर द्वारा जल को प्रभावी ढंग से छानकर शुद्ध किया जाता है। इसका निर्माण क्ले तथा पोर्सलीन मिट्टी से किया जाता है। इसमें नीचे की ओर एक बाहरी बर्तन । टोंटी लगी होती है तथा अन्दर की ओर एक दूसरा बर्तन ऊपर लटका होता है जिसकी तली में क्ले मिट्टी का बना सिलेण्डर होता है। सिलेण्डर का पतला भाग दूसरे बर्तन में निकला होता है। यह सिलेण्डर सिलेण्डर – ही जल को शुद्ध करने (UPBoardSolutions.com) का कार्य करता है। इस सिलेण्डर को पोर्सलीन का – समय-समय पर स्वच्छ कराते रहना चाहिए। इस फिल्टर द्वारा जल भीतरी बर्तन तेजी से छनता है तथा पूर्णरूप से शुद्ध होता है। घरेलू उपयोग के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण उपकरण है। आजकल बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ; जैसे बजाज, क्रॉम्पटन, बलसारा इत्यादि; विभिन्न क्षमता के फिल्टर बना रही हैं, जिनको बाजार से क्रय किया जा सकता है।
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(ग) रासायनिक विधियाँ:
जल-शोधन की प्रमुख रासायनिक विधियाँ निम्नलिखित हैं

(1) अवक्षेपक द्वारा:
अशुद्ध जल में फिटकरी डालने से जल में निलम्बित पदार्थ अवक्षेपित होकर नीचे बैठ जाते हैं। इस जल में थोड़ी मात्रा में चूना मिला देने से जल और शुद्ध हो जाता है। इसके अतिरिक्त निर्मली नामक एक फल भी जल की अशुद्धियों को अवक्षेपित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। अवक्षेपण के उपरान्त जल को निथार अथवा छान कर अशुद्धियों से रहित किया जा सकता है।

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(2) कीटाणुनाशक पदार्थों द्वारा:
विभिन्न प्रकार के जीवाणु व कीटाणु जल की अशुद्धि का एक महत्त्वपूर्ण कारण होते हैं। अशुद्ध जल को पीने योग्य बनाने के लिए इनको नष्ट किया जाना अति. आवश्यक है। जल को शुद्ध करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले मुख्य कीटाणुनाशकों का सामान्य परिचय निम्नवर्णित है

(i) पोटैशियम परमैंगनेट:
यह लाल दवा के नाम से भी प्रसिद्ध है। गाँवों में तालाबों व कुओं के जल को शुद्ध करने में इसका प्रयोग किया जाता है। 1000 लीटर जल में पाँच ग्राम लाल दवा डाली जाने पर जल में उपस्थित अधिकांश कीटाणु नष्ट हो जाते हैं।
(ii) तूतिया अथवा कॉपर सल्फेट:
इसका उपयोग सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए, क्योंकि अधिक मात्रा में यह मनुष्यों के लिए भी विषैला प्रभाव रखता है। दो लाख भाग जल में एक भाग तूतिया डालने से जल पीने योग्य हो जाता है।
(iii) आयोडीन:
200 भाग जल में एक भाग पोटैशियम आयोडाइड डालने से जल के अनेक प्रकार के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं।
(iv) ब्लीचिंग पाउडर:
एक लाख गैलन जल में 250 ग्राम ब्लीचिंग पाउडर डालने से अनेक प्रकार के जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।
(v) क्लोरीन:
यह एक उपयोगी कीटाणुनाशक गैस है। प्राय: सार्वजनिक जल आपूर्ति संस्थाओं द्वारा जल के कीटाणुओं को नष्ट करने के लिए जल का क्लोरीनीकरण किया जाता है। चार हजार भाग जल में एक भाग क्लोरीन विलेय करने से जल के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं तथा जल पीने योग्य हो जाता है। अब क्लोरीन की गोलियाँ भी उपलब्ध है, जिन्हे घरेलू स्तर पर जल के शुद्धिकरण के लिए इस्तेमाल किया जा सकती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
अशुद्ध जल से होने वाली हानियों का वर्णन कीजिए। [2009, 10, 13, 15, 16]
उत्तर:
व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए केवल शुद्ध जल ही उपयोगी है। अशुद्ध जल अनेक प्रकार से हानिकारक होता है। अशुद्ध जल से अनेक रोग होने की आशंका रहती है। मुख्य रूप से अशुद्ध जल के निरन्तर सेवन से पाचन क्रिया बिगड़ जाती है, भूख घट जाती है तथा जी मिचलाने (UPBoardSolutions.com) लगता है। कै होना, कब्ज हो जाना आदि रोग भी अशुद्ध जल पीने से ही हुआ करते हैं। इसके अतिरिक्त हैजा, मियादी बुखार, पेचिश, अतिसार आदि रोग भी अशुद्ध जल के सेवन से हो सकते हैं। कुछ रासायनिक तत्त्वों से अशुद्ध हुए जल के सेवन से कैन्सर जैसे घातक रोग भी हो सकते हैं।

प्रश्न 2:
कठोर जल किसे कहते हैं? कठोरता कितने प्रकार की होती है?
या
कठोर जल की क्या पहचान है?
या
जल में कितने प्रकार की कठोरता पाई जाती है? जल की कठोरता कैसे दूर की जा सकती है? [2007, 11, 13, 15]
या
जल की कठोरता को दूर करने के उपाय लिखिए। [2017]

उत्तर:
कठोर जल: साबुन के साथ सरलता से झाग उत्पन्न न करने वाला जल कठोर कहलाता है। जल में कठोरता इसमें उपस्थित लवणों के कारण होती है। जल की कठोरता दो प्रकार की होती है

(क) अस्थायी कठोरता:
यह वह कठोरता है जिसे आसानी से उबालकर जल से दूर किया जा सकता है।
(ख) स्थायी कठोरता:
यह वह कठोरता है जिसे उबालकर दूर नहीं किया जा सकता हैं। यह जल कपड़े धोने एवं दैनिक कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं होता है।

जल की अस्थायी कठोरता कैल्सियम व मैग्नीशियम के बाइकार्बोनेटों के कारण होती है तथा स्थायी कठोरता कैल्सियम व मैग्नीशियम के क्लोराइड अथवा सल्फेट के कारण। अस्थायी कठोरता को सरलता से दूर किया जा सकता है, किन्तु स्थायी कठोरता का निवारण कठिन है। जल की अस्थायी कठोरता को जल उबालकर समाप्त किया जा सकता है; किन्तु स्थायी कठोरता का निवारण कठिन है। स्थायी कठोरता के निवारण के लिए कठोर जल में कपड़े धोने का सोडा अल्प मात्रा में मिलाया जाता है। अथवा सोडे एवं चूने का मिश्रण मिलाया जाता है। इसके अतिरिक्त परम्यूटिट विधि द्वारा भी स्थायी करता को संमाप्त किया जा सकता है।

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प्रश्न 3:
कठोर जल से क्या हानियाँ होती हैं। [2008]
उत्तर:
जिस जल में विभिन्न प्रकार के अनावश्यक तत्त्व घुलित अवस्था में होते हैं, उसे कठोर जल कहते हैं। कठोर जल में साबुन कम झाग उत्पन्न करता है। यह पीने में तो स्वादिष्ट होता है किन्तु भोजन पकाने व वस्त्र धोने के लिए उपयुक्त नहीं होता। इसके उपयोग से तल-जम (UPBoardSolutions.com) जाने के कारण बॉयलर शीघ्र ही खराब हो जाते हैं। इसमें घुले कई रासायनिक पदार्थ कई बार हानिकारक मात्रा में घुले होते हैं। तो वे ऐसा जल पीने वाले व्यक्ति के स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं जिससे एक स्वस्थ मनुष्य के बीमार पड़ने का खतरा भी होता है।

प्रश्न 4:
मृद एवं कठोर जल में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2007, 09, 10, 13, 15, 16, 17]
या
मृदु जल किसे कहते हैं? [2016]
उत्तर:
स्थायी एवं अस्थायी कठोरता से रहित जल को मृदु जल कहा जाता है और यह जल ही सेवन योग्य होता है। कठोर जल तथा मृदु जले में विद्यमान अन्तरों को निम्नांकित तालिका द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है
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प्रश्न 5:
शुद्ध तथा अशुद्ध जल में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2007, 08, 10, 11, 14, 16, 18]
उत्तर:
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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
शुद्ध जल की क्या पहचान है? [2011, 15]
या
शुद्ध जल के क्या गुण हैं? [2012, 15]
या
सुरक्षित पीने के पानी की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
शुद्ध जल स्वादहीन, गन्धहीन, रंगहीन, पारदर्शी तथा एक प्रकार की प्राकृतिक चमक से युक्त होता है। इसमें किसी रोग के कीटाणु नहीं होते। यह पीने के लिए सुरक्षित होता है।

प्रश्न 2:
जल में कितने प्रकार की अशुद्धियाँ पाई जाती हैं? [2007, 08, 09]
उत्तर:
जल में दो प्रकार की अशुद्धियाँ पाई जाती हैं, जिन्हें क्रमश: जल की घुलित अशुद्धियाँ तथा जल की अघुलित अथवा तैरने वाली अशुद्धियाँ कहा जाता है।

प्रश्न 3:
अशुद्ध जल को शुद्ध करने की भौतिक विधियाँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर:
अशुद्ध जल को शुद्ध करने की तीन भौतिक विधियाँ हैं-उबालना, आसवन तथा अल्ट्रा-वॉयलेट किरणों का प्रभाव।।

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प्रश्न 4:
कठोर जल किसे कहते हैं? इसकी पहचान क्या है?
उत्तर:
जिस जल में विभिन्न अनावश्यक पदार्थ घुलित अवस्था में विद्यमान होते हैं, उस जल को कठोर जल कहते हैं। कठोर जल साबुन के साथ कम झाग उत्पन्न करता है।

प्रश्न 5:
जल की कठोरता को दूर करने के दो उपाय लिखिए। [2017]
उत्तर:
जल की अस्थायी कठोरता जल को उबालकर दूर की जा सकती है। जल की (UPBoardSolutions.com) स्थायी कठोरता को दूर करने के लिए जल में सोड़े तथा चूने का मिश्रण मिलाया जाता है।

प्रश्न 6:
आसुत जल किस जल को कहते हैं? [2007, 08]
या
आसुत जल की उपयोगिता लिखिए। [2007, 11]
या
आसुत जल क्या है? इसका प्रयोग कब किया जाता है? [ 2011, 13, 15]
उत्तर:
आसवन विधि द्वारा शुद्ध किए गए जल को आसुत जल कहते हैं। यह जल पूर्ण रूप से शुद्ध होता है। इसका पेयजल के रूप में तथा दवाओं में प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 7:
जल को छानकर किस प्रकार की अशुद्धियों से मुक्त किया जा सकता है?
उत्तर:
जल को छानकर अघुलित अथवा तैरने वाली अशुद्धियों से मुक्त किया जा सकता है।

प्रश्न 8:
ग्रामीण क्षेत्रों में जल को कीटाणु मुक्त करने के लिए इस्तेमाल होने वाली दवा का नाम बताइए।
उत्तर:
ग्रामीण क्षेत्रों में जल को कीटाणु मुक्त करने के लिए लाल दवा या पोटैशियम परमैंगनेट नामक दवा इस्तेमाल की जाती है।

प्रश्न 9:
जल के कीटाणओं को मारने के लिए कौन-सी गैस इस्तेमाल की जाती है?
उत्तर:
जल के कीटाणुओं को मारने के लिए क्लोरीन नामक गैस इस्तेमाल की जाती है।

प्रश्न 10:
जल के शुद्धिकरण के लिए प्रयोग किये जाने वाले जीवाणुनाशक पदार्थों के नाम लिखिए।
उत्तर:
जल के शुद्धिकरण के लिए सामान्य रूप से अपनाये जाने वाले मुख्य जीवाणुनाशक पदार्थ हैं ब्लीचिंग पाउडर, नीला थोथा, पोटैशियम परमैंगनेट तथा क्लोरीन।

प्रश्न 11:
जल को उबालने से किस प्रकार की कठोरता दूर होती है?
उत्तर:
जल को उबालने से केवल उसकी अस्थायी कठोरता ही दूर हो सकती है।

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प्रश्न 12:
अशुद्ध जल की पहचान लिखिए। [2008]
उत्तर:
अशुद्ध जल का रंग मटमैला या गंदला होता है। इसका स्वाद खारा तथा यह अर्द्ध-पारदर्शी होता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न:
निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

1. शुद्ध जल में अभाव होता है
(क) गन्ध को
(ख) स्वाद का
(ग) रंग का
(घ) इन सभी को

2. शुद्ध जल कौन-सा होता है?
(क) वायु रहित
(ख) रंग रहित
(ग) स्वाद रहित
(घ) नाइट्रोजन रहित

3. जल दूषित कैसे होता है?
(क) हाथ की गन्दगी से
(ख) पात्र की गन्दगी से
(ग) कुएँ की गन्दगी से
(घ) सभी स्रोतों से

4. घर पर शुद्ध पेय जल प्राप्त करने के लिए सर्वोत्तम उपाय है
(क) जल का आसवन करना
(ख) जल को उबालना
(ग) जल का अवक्षेपण करना
(घ) जल का क्लोरीनीकरण करना

5. आसवन विधि द्वारा शुद्ध किए गए जल का नाम है
(क) कठोर जल
(ख) आसुत जल
(ग) प्राकृतिक जल
(घ) मृदु जल

6. आसुत जल का प्रयोग होता है
(क) दवाओं में
(ख) खाना बनाने में
(ग) पीने में
(घ) सफाई करने में

7. कपड़ों की धुलाई के लिए कौन-सा जल उत्तम होता है? [2008, 17]
(क) मृदु
(ख) कठोर
(ग) ठण्डा
(घ) गर्म

8. कठोर जल में कौन-से लवण घुले रहते हैं?
(क) लौह लवण
(ख) कैल्सियम
(ग) फॉस्फोरस
(घ) पोटैशियम

9. जल की अघुलित अशुद्धियों को जल से अलग किया जा सकता है
(क) अवक्षेपण क्रिया द्वारा
(ख) आसवन क्रिया द्वारा
(ग) उबालने की क्रिया द्वारा
(घ) छानने की क्रिया द्वारा

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10. व्यापक स्तर पर जल को कीटाणुरहित करने का उत्तम उपाय है
(क) उबालना
(ख) आसवन
(ग) ब्लीचिंग पाउडर अथवा क्लोरीन का इस्तेमाल
(घ) कुछ भी करना व्यर्थ है।

11. जल की घुलित अशुद्धियों को अलग करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है
(क) क्लोरीन का
(ख) तूतिया का
(ग) फिटकरी का
(घ) लाल दवा का

12. आसुत जल किस विधि द्वारा तैयार होता है?
(क) उबालकर
(ख) आसवन द्वारा
(ग) एक्वागार्ड द्वारा
(घ) छानकर

13. कुएँ के जल को शुद्ध करने के लिए उसमें डालते हैं   [2007, 08, 09, 10]
(क) पोटैशियम परमैंगनेट
(ख) ब्लीचिंग पाउडर
(ग) गन्धक
(घ) डी० डी० टी० पाउडर

14. जल शुद्धिकरण के लिए किसका प्रयोग किया जाता है? [2008]
(क) सोडियम परमैंगनेट
(ख) ब्लीचिंग पाउडर
(ग) पोटैशियम परमैंगनेट
(घ) जिंक ऑक्साइड

15. पोटैशियम परमैंगनेट का प्रयोग जल के शुद्धिकरण के लिए कहाँ किया जाता है? [2013]
(क) समुद्र में
(ख) नदी में
(ग) बरसात में
(घ) कुएँ में

उत्तर:
1. (घ) इन सभी का,
2. (घ) नाइट्रोजन रहित,
3. (घ) सभी स्रोतों से,
4. (ख) जल को उबालना,
5. (ख) आसुत जल,
6. (क) दवाओं में,
7. (क) मृदु.
8. (ख) कैल्सियम,
9. (घ) छानने की क्रिया द्वारा,
10. (ग) ब्लीचिंग पाउडर अथवा क्लोरीन का इस्तेमाल,
11. (ग) फिटकरी,
12. (ख) आसवन द्वारा,
13. (क) पोटैशियम परमैंगनेट,
14. (ख) ब्लीचिंग पाउडर,
15. (घ) कुएं में।

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