UP Board Solutions for Class 9 English Grammar Chapter 5 Modal Auxiliaries

UP Board Solutions for Class 9 English Grammar Chapter 5 Modal Auxiliaries

SOLVED EXERCISES BASED ON TEXT BOOK

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EXERCISE ::
Fill in the blanks with modal auxiliaries will/shall in the following sentences :

Questions.

1. Radha is a good girl she ……………………………………help you.
2. Hari is a good boy. He……………………………… obey his elders.
3.I …………………………………………. go to the play ground today.
4.He …………………………………………….. get a new shirt today.
5.They ……………………………… go to Delhi to see the Red Fort.
6.I ………………….. not go with you as my examinations are near.
7. These boys …………………………………….. play a match today.
8. He …………………………………….. be rewarded for his bravery.
9. …………………………………………………….. you do me a favour?
10. ……………………………………………………. he call you in need?
Answers:
1. will
2. will
3. shall
4. shall
5. will
6. shall
7. shall
8. will
9. Will
10. Will.

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EXERCISE :: 2
Fill in the blanks with modal auxiliaries may/can/must or must not in the following sentences :

Questions.

1. I am sorry. I ……………………………………………………… not help you.
2. It is very dark. You …………………………………………….. not go now.
3. Everyone ……………………………………………….. love his motherland.
4.A student ……………. write his name anywhere in the answer book.
5.You should go there. Your brother…………………………… be in danger.
6. Time is very short. I ……………………… work hard to finish the work.
7. The chair is for Kumar. You …………………………………………. sit here.
8.It ………………………………………………………………………rain today.
9. He is my friend. He …………………………………………. take any book.
10. …………………………………………………………. you succeed in life !
Answers:
1. can
2. can
3. must
4. must not
5. may
6. must
7. may
8. may
9. can
10. May.

EXERCISE :: 3
Fill in the blanks with modal auxiliaries should/would/might/ought/need or need not in the following sentences :

Questions.

1. A good boy……………………………………. get up early in the morning.
2. We…………………………………………………… obey our teachers.
3. An honest boy ………………………………………. not steal anything.
4.We …………………………………………………… help the poor.
5.He ………………………………………………. do his home-work daily.
6. Hari told me that he ……………………………………………. not go there.
7. ……………………………………………………….. you please do it?
8.Sometimes my father ………………………. get angry and…………beat us.
9. The sky is clear. But it …………………………………. rain in the evening.
10. He ……………………………………………… to do his duty sincerely.
Answers:
1. would
2. should
3. would
4. should
5. ought to
6. would
7. Might
8. might
9. might
10. ought.

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EXERCISE :: 4
Fill in the blanks with suitable Modals given in the brackets in the following sentences :

Questions.

1. He …………… rent a house for hundred rupees ten years ago. (must, could, can, should)
2. We are getting late so we ……. go to the station by taxi.(must, can, might, ought)
3.All students ….. answer the first question and any other four questions.(could, might, can, must)
4. He …………………. drive any car.(must, can, should, might)
5.The Headmaster said that the students .. …… go for a picnic.(may, might, should, must)
6. For every tree that is cut down, we……………………. plant two.(may, might, must, can)
7. The teacher said that we ……………. go and see the match.(may, can, shall, might)
8. Walk carefully lest you …………….. fall.(should, will, may, can)
9. Your hair have grown too long, you ……………… have a hair-cut. (can, may, will, should)
10. ………………………… I take your pen just for a minute? (will, may, must, could)
Answers:
1. could
2. must
3. must
4. can
5. might
6. must
7. should
8. should
9. should
10. May.

EXERCISE :: 5
Fill in the blanks with suitable Modals given in the brackets in the following sentences :

Questions.

1.This is not heavy. You ………………. lift it easily. (can, should, must)
2.Our examination is drawing near. We ………………………………………..
work hard………………………………………………………(should, ought, can)
3.He ……………….. have received my letter by now. (must, ought, will)
4.You ……………………….. worry about Mukesh. (need, would, should)
5.We………………………………. defend our country. (must, ought, could)
6.I …………………………….. try to do better next time. (will, shall, need)
7.You …………………………………… keep your promise. (must, may, can)
8.The sky is clear now. But it ………………………………. ………………. rain
within two hours. ……………………………………………(may, could, might)
Answers:
1. can
2. should
3. must
4. need
5. must
6.shall
7. must
8. might.

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UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 1 सूरदास (काव्य-खण्ड)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 1 सूरदास (काव्य-खण्ड)

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कवि-पस्यिय

प्रश्न 1.
सूरदास के जीवन-परिचय और रचनाओं पर प्रकाश डालिए। [2009, 10]
या
कवि सूरदास का जीवन-परिचय एवं उनकी रचनाओं के नाम लिखिए। [2011, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
उत्तर
सूरदास हिन्दी-साहित्य-गगन के ज्योतिर्मान नक्षत्र और भक्तिकाल की सगुणधारा के कृष्णोपासक कवि हैं। इन्होंने अपनी संगीतमय वाणी से कृष्ण की भक्ति तथा बाल-लीलाओं के रस का ऐसा सागर प्रवाहित कर दिया है, जिसको मथकर भक्तजन भक्ति-सुधा और आनन्द-मौक्तिक प्राप्त करते हैं।

जीवन-परिचय-सूरदास जी का जन्म सन् 1478 ई० (वैशाख शुक्ल पंचमी, सं० 1535 वि०) में आगरा-मथुरा मार्ग पर स्थित रुनकता नामक ग्राम में हुआ था। कुछ विद्वान् दिल्ली के निकट ‘सीही ग्राम को भी इनका जन्म-स्थान मानते हैं। सूरदास जी जन्मान्ध थे, (UPBoardSolutions.com) इस विषय में भी विद्वानों में मतभेद हैं। इन्होंने कृष्ण की बाल-लीलाओं का, मानव-स्वभाव का एवं प्रकृति का ऐसा सजीव वर्णन किया है, जो आँखों से प्रत्यक्ष देखे बिना सम्भव नहीं है। इन्होंने स्वयं अपने आपको जन्मान्ध कहा है। ऐसा इन्होंने आत्मग्लानिवश, लाक्षणिक रूप में अथवा ज्ञान-चक्षुओं के अभाव के लिए भी कहा हो सकता है।

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सूरदास की रुचि बचयन से ही भगवद्भक्ति के गायन में थी। इनसे भक्ति का एक पद सुनकर पुष्टिमार्ग के संस्थापक महाप्रभु वल्लभाचार्य ने इन्हें अपना शिष्य बना लिया और श्रीनाथजी के मन्दिर में कीर्तन का भार सौंप दिया। श्री वल्लभाचार्य के पुत्र बिट्ठलनाथ ने ‘अष्टछाप’ नाम से आठ कृष्णभक्त कवियों का जो संगठन किया था, सूरदास जी इसके सर्वश्रेष्ठ कवि थे। वे गऊघाट पर रहकर जीवनपर्यन्त कृष्ण की लीलाओं का गायन करते रहे।

सूरदास जी का गोलोकवास (मृत्यु) सन् 1583 ई० (सं० 1640 वि०) में गोसाईं बिट्ठलनाथ के सामने गोवर्द्धन की तलहटी के पारसोली नामक ग्राम में हुआ। ‘खंजन नैन रूप रस माते’ पद का गान करते हुए इन्होंने अपने भौतिक शरीर का त्याग किया।
कृतियाँ (रचनाएँ)–महाकवि सूरदास की अग्रलिखित तीन रचनाएँ ही उपलब्ध हैं-

(1) सूरसागर-श्रीमद्भागवत् के आधार पर रचित ‘सूरसागर’ के सवा लाख पदों में से अब लगभग दस हजार पद ही उपलब्ध बताये जाते हैं, जिनमें कृष्ण की बाल-लीलाओं, गोपी-प्रेम, गोपी-विरह, उद्धव-गोपी संवाद का बड़ा मनोवैज्ञानिक और सरस (UPBoardSolutions.com) वर्णन है। सम्पूर्ण ‘सूरसागर’ एक गीतिकाव्य है। इसके पद तन्मयता के साथ गाये जाते हैं तथा यही ग्रन्थ सूरदास की कीर्ति का स्तम्भ है।
(2) सूर-सारावली-इसमें 1,107 पद हैं। यह ‘सूरसागर’ का सारभाग है।
(3) साहित्य-लहरी-इसमें 118 दृष्टकूट पदों का संग्रह है। इस ग्रन्थ में किसी एक विषय की विवेचना नहीं हुई है, वरन् मुख्य रूप से नायिकाओं एवं अलंकारों की विवेचना की गयी है। इसमें कहीं-कहीं पर श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं का वर्णन हुआ है तो एकाध स्थलों पर महाभारत की कथा के अंशों की झलक भी मिलती है।

साहित्य में स्थान-भक्त कवि सूरदास का स्थान हिन्दी-साहित्याकाश में सूर्य के समान ही है। इसीलिए कहा गया है–

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सूर सूर तुलसी ससी, उडुगन केशवदास ।
अब के कवि खद्योत सम, जहँ तहँ करत प्रकास ।।

पद्यांशों की सुन्दर्भ व्याख्या

प्रश्न 1.
चरन-कमल बंद हरि राई ।।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंधै, अंधे कौ सब कुछ दरसाई॥
बहिरौ सुनै, गैंग पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराई ।
सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंद तिहिं पाई ॥ [2012, 15, 17]
उत्तर
[ हरि राई = श्रीकृष्ण पंगु = लँगड़ा। लंधै = लाँघ लेता है। गैंग = पूँगा। रंक = दरिद्र। पाई = चरण।।
सन्दर्भ-यह पद्य श्री सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ नामक ग्रन्थ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी के ‘काव्य-खण्ड’ में संकलित ‘पद’ शीर्षक से उद्धृत है।
[ विशेष—इस पाठ के शेष सभी पद्यांशों की व्याख्या में यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग-इस पद्य में भक्त कवि सूरदास जी ने श्रीकृष्ण की महिमा का वर्णन करते हुए उनके चरणों की वन्दना की है। |

व्याख्या-भक्त-शिरोमणि सूरदास श्रीकृष्ण के कमलरूपी चरणों की वन्दना करते हुए कहते हैं। कि इन चरणों का प्रभाव बहुत व्यापक है। इनकी कृपा हो जाने पर लँगड़ा व्यक्ति भी पर्वतों को लाँघ लेता है। और अन्धे को सब कुछ दिखाई देने लगता (UPBoardSolutions.com) है। इन चरणों के अनोखे प्रभाव के कारण बहरा व्यक्ति सुनने लगता है और गूंगा पुनः बोलने लगता है। किसी दरिद्र व्यक्ति पर श्रीकृष्ण के चरणों की कृपा हो जाने पर वह राजा बनकर अपने सिर पर राज-छत्र धारण कर लेता है। सूरदास जी कहते हैं कि ऐसे दयालु प्रभु श्रीकृष्ण के चरणों की मैं बार-बार वन्दना करता हूँ।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. श्रीकृष्ण के चरणों का असीम प्रभाव व्यंजित है। कवि का भक्ति-भाव अनुकरणीय है।
  2. भाषा-साहित्यिक ब्रज।
  3. शैली-मुक्तक
  4. छन्द-गेय पद।
  5. रस-भक्ति।
  6. शब्दशक्ति –लक्षणा।
  7. गुण–प्रसाद।
  8. अलंकार-चरन-कमल’ में रूपक, पुनरुक्तिप्रकाश तथा अन्यत्र अनुप्रास।

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प्रश्न 2.
अबिगत-गति कछु कहत न आवै ।
ज्यौं गूंगे मीठे फल को रस, अंतरगत ही भावै ॥
परम स्वाद सबही सु निरंतर, अमित तोष उपजावै ।
मन-बानी कौं अगम-अगोचर, सो जानैं जो पावै ॥
रूप-रेख-गुन जाति-जुगति-बिनु, निरालंब कित धावै।
सब बिधि अगम बिचारहिं तातें, सूर सगुन-पद गावै ॥ [2012, 14]
उत्तर
[ अबिगत =निराकार ब्रह्म। गति = दशा। अंतरगत = हृदय में। भावै = अच्छा लगता है। परम = बहुत अधिक। अमित = अधिक। तोष = सन्तोष। उपजावै = उत्पन्न करता है। अगम = अगम्य, पहुँच से बाहर। अगोचर = जो इन्द्रियों (नेत्रों) से न जाना (UPBoardSolutions.com) जा सके। रेख = आकृति। जुगति = युक्ति। निरालंब = बिना किसी सहारे के। धावै = दौड़े। तातै = इसलिए। सगुन = सगुण ब्रह्म।]

प्रसंग–इस पद्य में सूरदास जी ने निर्गुण ब्रह्म की उपासना में कठिनाई बताते हुए सगुण ईश्वर (कृष्ण) की लीला के गाने को ही श्रेष्ठ बताया है।

व्याख्या-सूरदास जी कहते हैं कि निर्गुण ब्रह्म का वर्णन करना अत्यन्त कठिन है। उसकी स्थिति के विषय में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। निर्गुण ब्रह्म की उपासना का आनन्द किसी भक्त के लिए उसी प्रकार अवर्णनीय है, जिस प्रकार गूंगे के लिए मीठे फल का स्वाद। जिस प्रकार पूँगा व्यक्ति मीठे फल के स्वाद को कहकर नहीं प्रकट कर सकता, वह मन-ही-मन उसके आनन्द का अनुभव किया करता है, उसी प्रकार निर्गुण ब्रह्म की भक्ति के आनन्द का केवल अनुभव किया जा सकता है, उसे वाणी द्वारा प्रकट नहीं किया जा सकता। यद्यपि निर्गुण ब्रह्म की प्राप्ति से निरन्तर अत्यधिक आनन्द प्राप्त होता है और उपासक को उससे असीम सन्तोष भी प्राप्त होता है, परन्तु वह प्रत्येक की सामर्थ्य से बाहर की बात है। उसे इन्द्रियों से नहीं जाना जा सकता। निर्गुण ब्रह्म का न कोई रूप है, (UPBoardSolutions.com) न कोई आकृति, न उसकी कोई निश्चित विशेषता है, न जाति और न वह किसी युक्ति से प्राप्त किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में भक्त का मन बिना किसी आधार के कहाँ भटकता रहेगा? क्योंकि निर्गुण ब्रह्म सभी प्रकार से पहुँच के बाहर है। इसी कारण सभी प्रकार से विचार करके ही सूरदास जी ने सगुण श्रीकृष्ण की लीला के पद गाना अधिक उचित समझा है।

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काव्यगत सौन्दर्य

  1. निराकार ईश्वर की उपासना को कठिन तथा साकार की उपासना को तर्कसहित सरल बताया गया है।
  2. भाषा-साहित्यिक ब्रज।
  3. शैली-मुक्तक
  4. छन्द-गेय पद।
  5. रस-भक्ति और शान्त।
  6. लंकार-‘अगम-अगोचर’ तथा ‘जाति-जुगति’ में अनुप्रास, ‘ज्यौ गूंग …………. उपजावै’ में दृष्टान्त तथा ‘सब विधि ……………… पद गावै’ में हेतु अलंकार है।
  7. शब्दशक्ति-लक्षणा।
  8. गुण–प्रसाद।
  9. वसाम्य-कबीर ने लिखा है-गूंगे केरी सर्करा, खाक और मुसकाई। तुलसीदास जी ने भी निर्गुण ब्रह्म का वर्णन करते हुए कहा है

बिनु पग चले सुनै बिनु काना, कर बिनु कर्म करै बिधि नाना ।
आनन रहित सकल रस भोगी, बिनु पानी वक्ता बड़ जोगी ॥

प्रश्न 3.
किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत ।।
मनिमय कनक नंद कैं आँगन, बिम्ब पकरिबैं धावत ॥
कबहुँ निरखि हरि आपु छाँह कौं, कर सौं पकरने चाहत ।
किलकि हँसत राजत द्वै दतियाँ, पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत ॥
कनक-भूमि पर कर-पग छाया, यह उपमा इक राजति ।
करि-करि प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा, कमल बैठकी साजति ।।
बाल-दसा-सुख निरखि जसोदा, पुनि-पुनि नंद बुलावति ।
अँचरा तर लै ढाँकि, सूर के प्रभु को दूध पियावति ॥
उत्तर
[मनिमय = मणियों से युक्त। कनक = सोना। पकरिबैं = पकड़ने को। धावत = दौड़ते हैं। निरखि = देखकर। राजत = सुशोभित होती हैं। दतियाँ = छोटे-छोटे दाँत। तिहिं = उनको। अवगाहत = पकड़ते हैं। कर-पग = हाथ और पैर। राजति (UPBoardSolutions.com) = शोभित होती है। बसुधा = पृथ्वी। बैठकी = आसन। साजति = सजाती हैं। अँचरा तर = आँचल के नीचे।]

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प्रसंग—इस पद में कवि ने मणियों से युक्त आँगन में घुटनों के बल चलते हुए बालक श्रीकृष्ण की शोभा का वर्णन किया है।

व्याख्या-श्रीकृष्ण के सौन्दर्य एवं बाल-लीलाओं का वर्णन करते हुए सूरदास जी कहते हैं कि . बालक कृष्ण अब घुटनों के बल चलने लगे हैं। राजा नन्द का आँगन सोने का बना है और मणियों से जटित है। उस आँगन में श्रीकृष्ण घुटनों के बल चलते हैं तो किलकारी भी मारते हैं और अपना प्रतिबिम्ब पकड़ने के लिए दौड़ते हैं। जब वे किलकारी मारकर हँसते हैं तो उनके मुख में दो दाँत शोभा देते हैं। उन दाँतों के प्रतिबिम्ब को भी वे पकड़ने का प्रयास करते हैं। उनके हाथ-पैरों की छाया उस सोने के फर्श पर ऐसी प्रतीत होती है, मानो प्रत्येक मणि में उनके बैठने के लिए पृथ्वी ने कमल का आसन सजा दिया है (UPBoardSolutions.com) अथवा प्रत्येक मणि पर उनके कमल जैसे हाथ-पैरों का प्रतिबिम्ब पड़ने से ऐसा लगता है कि पृथ्वी पर कमल के फूलों का आसन बिछा हुआ हो। श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं को देखकर माता यशोदा जी बहुत आनन्दित होती हैं और बाबा नन्द को भी बार-बार वहाँ बुलाती हैं। इसके बाद माता यशोदा सूरदास के प्रभु बालक कृष्ण को अपने आँचल से ढककर दूध पिलाने लगती हैं।

काव्यगत सौन्दर्य

  1. प्रस्तुत पद में श्रीकृष्ण की सहज स्वाभाविक हाव-भावपूर्ण बाल-लीलाओं का सुन्दर और मनोहारी चित्रण हुआ है।
  2. भाषा-सरस मधुर ब्रज।
  3. शैली-मुक्तक।
  4. छन्द– गेय पद।
  5. रस-वात्सल्य।
  6. शब्दशक्ति-‘करि करि प्रति-पद प्रति-मनि बसुधा, कमल बैठकी साजति’ में लक्षणा।
  7. गुण–प्रसाद और माधुर्य
  8. अलंकार-‘किलकत कान्ह’, ‘दै दतियाँ’, ‘प्रतिपद प्रतिमनि’ में अनुप्रास, ‘कमल-बैठकी’ में रूपक, ‘करि-करि’, ‘पुनि-पुनि’ में पुनरुक्तिप्रकाश।
  9. भावसाम्य-तुलसीदास ने भी भगवान् श्रीराम के बाल रूप की कुछ ऐसी ही झाँकी प्रस्तुत की है

आँगन फिरत घुटुरुवनि धाये।।
नील जलज-तनु-स्याम राम सिसु जननि निरख मुख निकट बोलाये ॥

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प्रश्न 4.
मैं अपनी सब गाई चरैहौं।
प्रात होत बल कैं संग जैहौं, तेरे कहैं न रैहौं ॥
ग्वाल बाल गाइनि के भीतर, नैकहुँ डर नहिं लागत ।
आजु न सोव नंद-दुहाई, रैनि रहौंगौ जागत ॥ और ग्वाल सब गाई चरैहैं, मैं घर बैठो रैहौं ।
सूर स्याम तुम सोइ रहौ अब, प्रात जान मैं दैहौं ।
उत्तर
[ जैहौं = जाऊँगा। गाइनि = गायों के। नैकहुँ = थोड़ा-भी। सोइ रहौ = सो जाओ। जान मैं दैहौं = मैं जाने देंगी।]

प्रसंग–इस पद में बालक श्रीकृष्ण की माता यशोदा से किये जा रहे स्वाभाविक बाल-हठ का वर्णन किया गया है।

व्याख्या-श्रीकृष्ण अपनी माता यशोदा से हठ करते हुए कहते हैं कि हे माता! मैं अपनी सब गायों को चराने के लिए वन में जाऊँगा। प्रात: होते ही मैं अपने बड़े भाई बलराम के साथ गायें चराने चला जाऊँगा और तुम्हारे रोकने पर भी न रुकेंगा। मुझे ग्वाल-बालों और गायों के बीच में रहते हुए जरा भी भय नहीं लगता। मैं नन्द बाबा की कसम खाकर कहता हूँ कि आज रात्रि में सोऊँगा भी नहीं, मैं रातभर जागता ही रहूंगा। (UPBoardSolutions.com) कहीं ऐसा न हो कि सवेरा होने पर मेरी आँखें ही न खुलें और मैं गायें चराने न जा सकें। हे माता! ऐसा नहीं हो सकता कि सब ग्वाले तो गायें चराने चले जायें और मैं अकेला घर पर बैठा रहूँ। सूरदास जी कहते हैं कि बालक श्रीकृष्ण की बात सुनकर माता यशोदा उनसे कहती हैं कि मेरे लाल! अब तुम निश्चिन्त होकर सो जाओ। प्रात:काल मैं तुम्हें गायें चराने के लिए अवश्य जाने देंगी।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. प्रस्तुत पद्य में गायें चराने जाने के लिए किये गये श्रीकृष्ण के बाल-हठ का सुन्दर और मनोहारी वर्णन हुआ है।
  2. भाषा-सरस और सुबोध ब्रज।
  3. शैली-मुक्तक।
  4. छन्द-गेय पद।
  5. रसवात्सल्य।
  6. अलंकार-अनुप्रास।
  7. गुण-माधुर्य।

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प्रश्न 5.
मैया हौं न चरैहौं गाइ।
सिगरे ग्वाल घिरावत मोसों, मेरे पाईं पिराइ ॥
जौं न पत्याहि पूछि बलदाउहिं, अपनी सौंहँ दिवाइ ।
यह सुनि माइ जसोदा ग्वालनि, गारी देति रिसाइ ॥
मैं पठेवति अपने लरिका कौं, आवै मन बहराइ ।
सूर स्याम मेरौ अति बालक, मारत ताहि रिंगाइ ॥ [2009]
उत्तर
[ हौं = मैं। सिगरे = सम्पूर्ण। पिराई = पीड़ा। पत्याहि = विश्वास। सौंहें = कसम। रिसाइ = गुस्सा।। ।। पठवति = भेजती हूँ। रिंगाइ = दौड़ाकर।]

प्रसंग-इस पद में श्रीकृष्ण माता यशोदा से ग्वाल-बालों की शिकायत करते हुए कह रहे हैं कि वे अब गाय चराने के लिए नहीं जाएँगे। |

व्याख्या-बाल-स्वभाव के अनुरूप श्रीकृष्ण माता यशोदा से कहते हैं कि हे माता! मैं अब गाय चराने नहीं जाऊँगा। सभी ग्वाले मुझसे ही अपनी गायों को घेरने के लिए कहते हैं। इधर से उधर दौड़तेदौड़ते मेरे पाँवों में पीड़ा होने लगी है। यदि तुम्हें मेरी (UPBoardSolutions.com) बात का विश्वास न हो तो बलराम को अपनी सौगन्ध दिलाकर पूछ लो। यह सुनकर माता यशोदा ग्वाल-बालों पर क्रोध करती हैं और उन्हें गाली देती हैं। सूरदास जी कहते हैं कि माता यशोदा कह रही हैं कि मैं तो अपने पुत्र को केवल मन बहलाने के लिए वन में भेजती हूँ और ये ग्वाल-बाल उसे इधर-उधर दौड़ाकर परेशान करते रहते हैं।

काव्यगत सौन्दर्य

  1. प्रस्तुत पद में बालक कृष्ण की दु:ख भरी शिकायत और माता यशोदा का ममता प्रेरित क्रोध-दोनों का बहुत ही स्वाभाविक चित्रण किया गया है। निश्चित ही सूरदास जी बाल मनोविज्ञान को जानने वाले कवि हैं।
  2. भाषा-सरल और स्वाभाविक ब्रज।
  3. शैली-मुक्तक।
  4. छन्द-गेय पद।
  5. रसवात्सल्य
  6. शब्दशक्ति–अभिधा।
  7. अलंकार-‘पाइँ पिराइ तथा ‘सूर स्याम’ में अनुप्रास।
  8. गुण-माधुर्य।।

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प्रश्न 6.
सखी री, मुरली लीजै चोरि ।
जिनि गुपाल कीन्हें अपनें बस, प्रीति सबनि की तोरि ॥
छिन इक घर-भीतर, निसि-बासर, धरतन कबहूँ छोरि।
कबहूँ कर, कबहूँ अधरनि, कटि कबहूँ खोंसत जोरि ॥
ना जानौं कछु मेलि मोहिनी, राखे अँग-अँग भोरि ।
सूरदास प्रभु को मन सजनी, बँध्यौ राग की डोरि ॥
उत्तर
[ छिन इक = एक क्षण । निसि-बासर = रात-दिन। कर = हाथ। कटि = कमर। खोंसत = लगी लेते हैं। मोहिनी = जादू डालकर। भोरि = भुलावा। राग = प्रेम।]

प्रसंग-इस पद में सूरदास जी ने वंशी के प्रति गोपियों के ईष्य-भाव को व्यक्त किया है।

व्याख्या-गोपियाँ श्रीकृष्ण की वंशी को अपनी वैरी सौतन समझती हैं। एक गोपी दूसरी गोपी से कहती है कि हे सखी! अब हमें श्रीकृष्ण की यह मुरली चुरा लेनी चाहिए; क्योंकि इस मुरली ने गोपाल को अपनी ओर आकर्षित कर अपने वश में कर लिया है और श्रीकृष्ण ने भी मुरली के वशीभूत होकर हम सभी को भुला दिया है। कृष्ण घर के भीतर हों या बाहर, कभी क्षणभर को भी मुरली नहीं छोड़ते। कभी हाथ में । रखते हैं तो कभी होंठों (UPBoardSolutions.com) पर और कभी कमर में खोंस लेते हैं। इस तरह से श्रीकृष्ण उसे कभी भी अपने से दूर नहीं होने देते। यह हमारी समझ में नहीं आ रहा है कि वंशी ने कौन-सा मोहिनी मन्त्र श्रीकृष्ण पर चला दिया है, जिससे श्रीकृष्ण पूर्ण रूप से उसके वश में हो गये हैं। सूरदास जी कहते हैं कि गोपी कह रही है कि हे सजनी ! इस वंशी ने श्रीकृष्ण का मन प्रेम की डोरी से बाँध कर कैद कर लिया है।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. प्रेम में प्रिय पात्र के दूसरे प्रिय के प्रति ईष्र्या का भाव होना एक स्वाभाविक और मनोवैज्ञानिक तथ्य है। इसी तथ्य का बड़ा ही सुन्दर चित्रण किया गया है।
  2. भाषा–सहज-सरल ब्रजी
  3. शैली-मुक्तक और गीतात्मक।
  4.  छन्द-गेय पद।
  5. रस-श्रृंगार।
  6. शब्दशक्ति– ‘बँध्यौ राग की डोरि’ में लक्षणा।
  7. गुण-माधुर्य।
  8. अलंकार—राग की डोरि’ में रूपक तथा सम्पूर्ण पद में अनुप्रास।

प्रश्न 7.
ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं।।
बृन्दावन गोकुल बने उपबन, सघन कुंज की छाँहीं ॥
प्रात समय माता जसुमति अरु नंद देखि सुख पावत ।
माखन रोटी दह्यौ सजायौ, अति हित साथ खवावत ॥
गोपी ग्वाले बाल सँग खेलत, सब दिन हँसत सिरात ।
सूरदास धनि-धनि ब्रजवासी, जिनस हित जदु-तात ॥ [2010, 11, 13, 17]
उत्तर
[ बिसरत = भूलना। सघन = गहन। कुंज = छोटे वृक्षों का समूह। छाँहीं = छाया। दह्यौ = दही। सजायौ = सजा हुआ, सहित। हित = स्नेह, प्रेम। सिरात = बीत जाना। जदु-तात = कृष्ण।]

प्रसंग-प्रस्तुत पद में उद्धव ने मथुरा पहुँचकर श्रीकृष्ण को वहाँ की सारी स्थिति बतायी, जिसे सुनकर श्रीकृष्ण भाव-विभोर हो गये। इस पर वे उद्धव से अपनी मनोदशा व्यक्त करते हैं।

व्याख्या-श्रीकृष्ण ने उद्धव से ब्रजवासियों की दीन दशा सुनी और उन्हीं के ध्यान में खो गये। वे उद्धव से कहते हैं कि मैं ब्रज को भूल नहीं पाता हूँ। वृन्दावन और गोकुल के वन-उपवन संभी मुझे याद आते रहते हैं। वहाँ के घने कुंजों की छाया को (UPBoardSolutions.com) भी मैं भूल नहीं पाता। नन्द बाबा और यशोदा मैया को देखकर मुझे जो सुख मिलता था, वह मुझे रह-रहकर स्मरण हो आता है। वे मुझे मक्खन, रोटी और भली प्रकार जमाया हुआ दही कितने प्रेम से खिलाते थे ? ब्रज की गोपियों और ग्वाल-बालों के साथ खेलते हुए मेरे सभी दिन हँसते हुए बीता करते थे। ये सभी बातें मुझे बहुत याद आती हैं। सूरदास जी ब्रजवासियों को धन्य मानते हैं। और उनके भाग्य की सराहना करते हैं; क्योंकि श्रीकृष्ण को उनके हित की चिन्ता है और श्रीकृष्ण इन ब्रजवासियों को प्रति क्षण ध्यान करते हैं।

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काव्यगत सौन्दर्य-

  1. यद्यपि कृष्ण का व्यक्तित्व अलौकिक है किन्तु प्रेमवश वह भी प्रियजनों की याद में साधारण मनुष्य की भाँति द्रवित हो रहे हैं। ब्रज की स्मृति उन्हें अत्यधिक भाव-विह्वल कर रही है।
  2. भाषा-सरल-सरस ब्रज।
  3. शैली-मुक्तक।
  4. छन्द-गेय पदः
  5. रस-शृंगार।
  6. शब्दशक्ति-अभिधा और व्यंजना।
  7. गुण-माधुर्य।
  8. अलंकार-‘ब्रज बिसरत’, बृन्दाबन गोकुल बन उपबन’ में अनुप्रास, उद्धव के द्वारा योग का सन्देश भेजने तथा यह कहने में कि ‘मुझसे ब्रज नहीं भूलता’ में विरोधाभास है।
  9. भावसाम्य–यही भाव रत्नाकर जी ने इस प्रकार व्यक्त किया है

सुधि ब्रजवासिनी की, दिवैया सुखरासिनी की,
उधौ नित हमकौं बुलावन कौं आवती।

प्रश्न 8.
ऊधौ मन न भये दस बीस।।
एक हुतौ सो गयौ स्याम सँग, कौ अवराधै ईस ॥
इंद्री सिंथिल भई केसव बिनु, ज्यौं देही बिनु सीस।
आसा लागि रहति तन स्वासा, जीवहिं कोटि बरीस ॥
तुम तौ सखा स्याम सुन्दर के, सकल जोग के इंस। सूर हमारें नंद-नंदन बिनु, और नहीं जगदीस ॥ [2011, 13, 17]
उत्तर
[ हुतौ = हुआ करता था। अवराधै = आराधना करे। ईस = निर्गुण ब्रह्म। देही = शरीरधारी। बरीस = वर्ष। सखा = मित्र। जोग के ईस = योग के ज्ञाता, मिलन कराने में निपुण।]

प्रसंग–प्रस्तुत पद भ्रमर-गीत प्रसंग का एक सरस अंश है। श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने पर गोपियाँ अत्यधिक व्याकुल हैं। उद्धव जी गोपियों को योग का सन्देश देने मथुरा से गोकुल आये हैं। गोपियाँ योग की शिक्षा ग्रहण करने में अपने को असमर्थ बताती हैं और अपनी मनोव्यथा को उद्धव के समक्ष व्यक्त करती हैं।

व्याख्या-गोपियाँ उद्धव जी से कहती हैं कि हे उद्धव! हमारे मन दस-बीस नहीं हैं। सभी की तरह हमारे पास भी एक मन था और वह श्रीकृष्ण के साथ चला गया है; अत: हम मन के बिना तुम्हारे बताये गये निर्गुण ब्रह्म की आराधना कैसे करें? अर्थात् बिना मन के ब्रह्म की आराधना सम्भव नहीं है। श्रीकृष्ण के बिना हमारी सारी इन्द्रियाँ निष्क्रिय हो गयी हैं और हमारी दशा बिना सिर के प्राणी जैसी हो गयी है। हम कृष्ण के बिना मृतवत् हो (UPBoardSolutions.com) गयी हैं, जीवन के लक्षण के रूप में हमारी श्वास केवल इस आशा में चल रही है कि श्रीकृष्ण मथुरा से अवश्य लौटेंगे और हमें उनके दर्शन प्राप्त हो जाएँगे। श्रीकृष्ण के लौटने की आशा के सहारे तो हम करोड़ों वर्षों तक जीवित रह लेंगी। गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव! तुम तो कृष्ण के अभिन्न मित्र हो और सम्पूर्ण योग-विद्या तथा मिलन के उपायों के ज्ञाता हो। यदि तुम चाहो तो हमारा योग (मिलन) अवश्य करा सकते हो। सूरदास जी कहते हैं कि गोपियाँ उद्धव से कह रही हैं कि हम तुम्हें यह स्पष्ट बता देना चाहती हैं कि नन्द जी के पुत्र श्रीकृष्ण को छोड़कर हमारा कोई आराध्य नहीं है। हम तो उन्हीं की परम उपासिका हैं।।

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काव्यगत सौन्दर्य-

(1) प्रस्तुत पद में गोपियों की विरह दशा और श्रीकृष्ण के प्रति उनके एकनिष्ठ प्रेम का मार्मिक वर्णन है।
(2) भाषा-सरल, सरस और मधुर ब्रज।
(3) शैली–उक्ति वैचित्र्यपूर्ण मुक्तक।
(4) छन्द-गेय पद।
(5) रस-श्रृंगार रस (वियोग)।
(6) अलंकार-‘सखा स्याम सुन्दर के’ में अनुप्रास ‘जोग’ में श्लेष तथा ‘ज्यौं देही बिनु सीस’ में उपमा
(7) गुण-माधुर्य।
(8) शब्दशक्ति–व्यंजना।
(9) इन्द्रियाँ दस होती हैं—

  1. पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ–
    • नासिका,
    • रसना,
    • नेत्र,
    • त्वचा,
    • श्रवण;
  2. पाँच कर्मेन्द्रियाँ–
    • हाथ,
    • पैर,
    • वाणी,
    • गुदा,
    • लिंग।

(10) एकनिष्ठ प्रेम का ऐसा ही भाव तुलसीदास ने भी व्यक्त किया है

एक भरोसो एक बल, एक आस बिस्वास।
एक राम घनस्याम हित, चातक तुलसीदास ॥

प्रश्न 9.
ऊधौ जाहु तुमहिं हम जाने।
स्याम तुमहिं स्याँ कौं नहिं पठयौ, तुम हौ बीच भुलाने ॥
ब्रज नारिनि सौं जोग कहत हौ, बात कहत न लजाने ।
बड़े लोग न बिबेक तुम्हारे, ऐसे भए अयाने ॥
हमसौं कही लई हम सहि कै, जिय गुनि लेह सयाने ।
कहँ अबला कहँ दसा दिगंबर, मष्ट करौ पहिचाने ॥
साँच कहाँ तुमक अपनी सौं, बूझति बात निदाने ।
सूर स्याम जब तुमहिं पठायौ, तब नैकहुँ मुसकाने ।
उत्तर
[ पठयौ = भेजा है। अयाने = अज्ञानी। दिगंबर = दिशाएँ ही जिसके वस्त्र हैं; अर्थात् नग्न। मष्ट करौ = चुप हो जाओ। सौं = सौगन्ध। निदाने = आखिर में नैकहूँ = कुछ।]

प्रसंग-इस पद में गोपियाँ उद्धव के साथ परिहास करती हैं (UPBoardSolutions.com) और कहती हैं कि श्रीकृष्ण ने तुम्हें यहाँ नहीं भेजा है, वरन् तुम अपना मार्ग भूलकर यहाँ आ गये हो या श्रीकृष्ण ने तुम्हें यहाँ भेजकर तुम्हारे साथ मजाक किया है।

व्याख्या-गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि तुम यहाँ से वापस चले जाओ। हम तुम्हें समझ गयी हैं। श्याम ने तुम्हें यहाँ नहीं भेजा है। तुम स्वयं बीच से रास्ता भूलकर यहाँ आ गये हो। ब्रज की नारियों से योग की बात करते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आ रही है। तुम बुद्धिमान् और ज्ञानी होगे, परन्तु हमें ऐसा लगता है कि तुममें विवेक नहीं है, नहीं तो तुम ऐसी अज्ञानतापूर्ण बातें हमसे क्यों करते? तुम अच्छी प्रकार मन में विचार लो कि हमसे ऐसा कह दिया तो कह दिया, अब ब्रज में किसी अन्य से ऐसी बात न कहना। हमने तो सहन भी कर लिया, कोई दूसरी गोपी इसे सहन नहीं करेगी। कहाँ तो हम अबला नारियाँ और कहाँ योग की नग्न अवस्था, अब तुम चुप हो जाओ और सोच-समझकर बात कहो। हम तुमसे एक अन्तिम सवाल पूछती हैं, सच-सच बताना, तुम्हें अपनी कसम है, जो तुम सच न बोले। सूरदास जी कहते हैं कि गोपियाँ उद्धव से पूछ रही हैं कि जब श्रीकृष्ण ने उनको यहाँ भेजा था, उस समय वे थोड़ा-सा मुस्कराये थे या नहीं ? वे अवश्य मुस्कराये होंगे, तभी तो उन्होंने तुम्हारे साथ उपहास करने के लिए तुम्हें यहाँ भेजा है।

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काव्यगत सौन्दर्य-

  1. यहाँ गोपियों की तर्कशीलता और आक्रोश का स्वाभाविक चित्रण हुआ है। गोपियाँ अपनी तर्कशक्ति से उद्धव को परास्त कर देती हैं और गोकुल आने के उनके उद्देश्य को ही समाप्त कर देती हैं।
  2. यहाँ नारी-जाति के सौगन्ध खाने और खिलाने के स्वभाव का यथार्थ अंकन हुआ है।
  3. भाषा-सरल-सरस ब्रज।
  4. शैली-मुक्तक।
  5. छन्द-गेय पद।
  6. रस-श्रृंगार।
  7. अलंकार-‘दसा दिगंबर’ में अनुप्रास।
  8. गुण-माधुर्य।
  9. शब्दशक्ति–व्यंजना की प्रधानता।
  10. भावसाम्य–प्रेम के समक्ष ज्ञान-ध्यान व्यर्थ है। कवि कोलरिज ने भी लिखा है-“समस्त भाव, विचार व सुख प्रेम के सेवक हैं।”

प्रश्न 10.
निरगुन कौन देस कौ बासी ?
मधुकर कहि समुझाइ सौंह दै, बुझति साँच न हाँसी ॥
को है जनक, कौन है जननी, कौन नारि, को दासी ?
कैसे बरन, भेष है कैसौ, किहिं रस मैं अभिलाषी ?
पावैगौ पुनि कियौ आपनौ, जौ रे करैगौ गाँसी ।
सुनत मौन है रह्यौ बावरी, सूर सबै मति नासी ॥ [2009, 12, 14, 17]
उत्तर
[ मधुकर = भ्रमर, किन्तु यहाँ उद्धव के लिए प्रयोग हुआ है। सौंह = शपथ। साँच = सत्य। हाँसी = हँसी। जनक = पिता। बरन = रंग, वर्ण। गाँसी = छल-कपट। बावरी = बावला, पागल। नासी = नष्ट हो गयी।]

प्रसंग-इस पद में सूरदास ने गोपियों के माध्यम से (UPBoardSolutions.com) निर्गुण ब्रह्म की उपासना का खण्डन तथा सगुण कृष्ण की भक्ति का मण्डन किया है।

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व्याख्या-गोपियाँ ‘भ्रमर’ की अन्योक्ति से उद्धव को सम्बोधित करती हुई पूछती हैं कि हे उद्धव! तुम यह बताओ तुम्हारा वह निर्गुण ब्रह्म किस देश का रहने वाला है? हम तुमको शपथ दिलाकर सच-सच पूछ रही हैं, कोई हँसी (मजाक) नहीं कर रही हैं। तुम यह बताओ कि उस निर्गुण का पिता कौन है? उसकी माता का क्या नाम है? उसकी पत्नी और दासियाँ कौन-कौन हैं? उस निर्गुण ब्रह्म का रंग कैसा है, उसकी वेश-भूषा कैसी है और उसकी किस रस में रुचि है? गोपियाँ उद्धव को चेतावनी देती हुई कहती हैं कि हमें सभी बातों का ठीक-ठीक उत्तर देना। यदि सही बात बताने में जरा भी छल-कपट करोगे तो अपने किये का फल अवश्य पाओगे। सूरदास जी कहते हैं कि गोपियों के ऐसे प्रश्नों को सुनकर ज्ञानी उद्धव ठगे-से रह गये और उनका सारा ज्ञान-गर्व अनपढ़ गोपियों के सामने नष्ट हो गया।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. सगुणोपासक सूर ने गोपियों के माध्यम से निर्गुण ब्रह्म का उपहासपूर्वक खण्डन कराया है।
  2. गोपियों के प्रश्न सीधे-सादे होकर भी व्यंग्यपूर्ण हैं। यहाँ कवि की कल्पना-शक्ति और स्त्रियों की अन्योक्ति में व्यंग्य करने की स्वभावगत प्रवृत्ति का बड़ा ही मनोवैज्ञानिक चित्रण हुआ है।
  3. भाषा-सरल ब्रज।
  4. शैली-मुक्तक।
  5. रस-वियोग शृंगार एवं हास्य।
  6. छन्द–गेय पद।
  7. गुण-माधुर्य।
  8. अलंकार–‘समुझाइ सौंह दै’, ‘पावैगौ पुनि’ में अनुप्रास, मानवीकरण तथा ‘मधुकर’ के माध्यम से उद्धव को सम्बोधन करने में अन्योक्ति।

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प्रश्न 11.
सँदेसौ देवकी सौं कहियौ ।
हौं तो धाइ तिहारे सुत की, दया करत ही रहियौ ॥
जदपि टेव तुम जानति उनकी, तऊ मोहिं कहि आवै ।।
प्रात होत मेरे लाल लडैडौँ, माखन रोटी भावै ॥
तेल उबटनौ अरु तातो जल, ताहि देखि भजि जाते ।
जोइ-जोइ माँगत सोइ-सोइ देती, क्रम-क्रम करि कै न्हाते ॥
सूर पथिक सुन मोहिं रैनि दिन, बढ्यौ रहत उर सोच ।
मेरौ अलक लडैतो मोहन, हैहै करत सँकोच ॥ [2009]
उत्तर
[ धाइ = आया, सेविका। टेव = आवत। लडैतें = लाड़ले। तातो = गर्म। क्रम-क्रम = धीरे-धीरे। रैनि = रात। उर = हृदय। अलक लड़तो = दुलारे।]

प्रसंग-श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने पर माता यशोदा बहुत दु:खी हो जाती हैं। उनके मन में विभिन्न आशंकाएँ और चिन्ताएँ होने लगती हैं। प्रस्तुत पद में देवकी को सन्देश भेजते समय वह अपने मन की पीड़ा को व्यक्त कर रही हैं।

व्याख्या-यशोदा जी श्रीकृष्ण की माता देवकी को एक पथिक द्वारा सन्देश भेजती हैं कि कृष्ण तुम्हारा ही पुत्र है, मेरा पुत्र नहीं है। मैं तो उसका पालन-पोषण करने वाली मात्र एक सेविका हूँ। पर वह मुझे मैया कहता रहा है, इसलिए मेरा उसके (UPBoardSolutions.com) प्रति वात्सल्य भाव स्वाभाविक है। यद्यपि तुम उसकी आदतें तो जानती ही होगी, फिर भी मेरा मन तुमसे कुछ कहने के लिए उत्कण्ठित हो रहा है। सवेरा होते ही मेरे लाड़ले श्रीकृष्ण को माखन-रोटी अच्छी लगती है। वह तेल, उबटन और गर्म पानी को पसन्द नहीं करता था, अत: इन वस्तुओं को देखकर ही भाग जाता था। उस समय वह जो कुछ माँगता था, वही उसे देती थी, तब वह धीरे-धीरे नहाता था। सूरदास जी कहते हैं कि यशोदा पथिक से अपने मन की दशा व्यक्त करती हुई कहती हैं कि मुझे तो रात-दिन यही चिन्ता सताती रहती है कि मेरा लाड़ला श्रीकृष्ण अभी तुमसे कुछ माँगने में बहुत संकोच करता होगा।

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काव्यगत सौन्दर्य-

  1. माता के वात्सल्य भाव का सरसे वर्णन हुआ है।
  2. यहाँ कवि ने बाल मनोविज्ञान की सुन्दर अभिव्यक्ति की है कि बच्चे अपरिचित स्थान पर किसी चीज की इच्छा होते हुए भी संकोच के कारण चुप रह जाते हैं, जबकि अपने घर पर जिद कर लेते हैं।
  3. भाषा-सरल-सरस ब्रज।
  4. शैली-मुक्तक।
  5. छन्द-गेय पद।
  6. रसवात्सल्य।
  7. शब्दशक्ति–व्यंजना।
  8. गुणमाधुर्य।
  9. अलंकार-‘लाल लड़तें’ में अनुप्रास तथा ‘जोइ-जोइ’, ‘सोइ-सोइ’, ‘क्रम-क्रम में पुनरुक्तिप्रकाश।

काव्य-सौन्दर्य एवं व्याकरण-बोध

प्रश्न 1
निम्नलिखित पंक्तियों में अलंकार को पहचानकर लक्षणसहित उसका नाम लिखिए
(क) चरन-कमल बंद हरि राई ।
(ख) करि-करि प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा, कमल बैठकी साजति ।
(ग) जोइ-जोइ माँगत, सोइ-सोड़ देती, क्रम-क्रम करि के हाते ।
उत्तर
(क) रूपक अलंकारे।
(ख) अनुप्रास एवं पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार।
(ग) अनुप्रास एवं पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार।

लक्षण-उपर्युक्त अलंकारों में से रूपक एवं अनुप्रास के लक्षण ‘काव्य-सौन्दर्य के तत्त्वों के अन्तर्गत देखें।
पुनरुक्तिप्रकाश-जब एक ही शब्द की लगातार (UPBoardSolutions.com) पुनरावृत्ति होती है, तब वहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार होता है; जैसे उपर्युक्त पद ‘ख’ में करि-करि।

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प्रश्न 2
जहाँ सन्तान के प्रति माता-पिता का वात्सल्य उमड़ पड़ता है, उन स्थानों पर वात्सल्य रस होता है । पाठ के जिन-जिन पदों में वात्सल्य रस है, उनका उल्लेख कीजिए |
उत्तर
पद संख्या 3, 4, 5, 11 पदों में वात्सल्य रस है।

प्रश्न 3
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा रस है ?
(क) अबिगत गति कछु कहत न आवै.
(ख) निरगुन कौन देस को बासी।।
उत्तर
(क) भक्ति रस,
(ख) वियोग शृंगार।

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प्रश्न 4
निम्नलिखित शब्दों में से तत्सम, तदभव और देशज शब्द छाँटकर अलग-अलग लिखिए-
चरन, पंगु, कान्ह, अँचरा, छोटा, गृह, करि, नैन, पानि, सखा, जोग, साँच, जननी, गाँसी, धाई, टेव, अलक-लईतो, ठाढ़े, ग्वाल, बिम्ब, यति, विधु, इंद्री।
उत्तर
तत्सम-पंगु, गृह, करि, जननी, ग्वाल, बिम्ब, यति, विधु।
तद्भव-चरन, अँचरा, नैन, पानि, सखा, (UPBoardSolutions.com) जोग, इंद्री।।
देशज-कान्ह, साँच, छोटा, गाँसी, धाइ, टेव, अलक-लड़तो, ठाढ़े।

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UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 5 अपराजिता (मंजरी)

UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 5 अपराजिता (मंजरी)

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महत्वपूर्ण गद्यांशों की व्याख्या 

कभी-कभी अचानक ………………………………………………………. नहीं ठहराता।
संदर्भ-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘मंजरी’ के संकलित पाठ अपराजिता’ नामक कहानी से उद्धत है। इस कहानी की लेखिका शिवानी हैं।
प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश में लेखिका ने दिव्यांगों की स्थिति को मार्मिक वर्णन किया है।
व्याख्या-कभी-कभी हमें ऐसे विकलांग व्यक्ति भी मिलते हैं जिन्हें देखकर हमें अपने जीवन का खालीपन बहुत छोटा लगने लगती है। तब हमें यह एहसास होता है कि भले ही ईश्वर ने हमें कुछ विपत्ति दी है (UPBoardSolutions.com) परन्तु हमारे शरीर के किसी अंग को तो नहीं छीना। फिर भी हम सब विपत्ति में भगवान को ही दोषी ठहराते हैं। लेखिका ने एक विकलांग लड़की को देखा, जिसने खुशी से यातना झेलकर जीवन में संघर्ष किया, सफलता पाई और ईश्वर को दोष नहीं दिया।

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बहुत बड़ी-बड़ी ………………………………………………………………… भी देता है।
संदर्भ-प्रस्तुत गद्यांश में लेखिका ने एक दिव्यांग बेटी की माँ की संघर्ष का वर्णन किया है।
प्रसंग-डॉ० चन्द्रा की माता शारदा सुब्रहमण्यम् को जे०सी० बेंगलुरू द्वारा वीर जननी पुरस्कार मिला। इस अवसर पर वे किस मुद्रा में दिखाई दे रही थीं, उसका वर्णन किया गया है।
व्याख्या-उनकी बड़ी-बड़ी आँखों में उदासी थी। उनमें माँ की व्यथा और पुत्री की करुण व्यथा छिपी थी। वह पुत्री जिसके लिए वह अपना सुख भूलकर उसकी पहिया लगी कुर्सी को जहाँ-तहाँ घुमाती रही, नाकं के दोनों ओर हीरे की चमकदार लौंग पहने, होठों पर जीत की खुशी और जूड़े में फूलों की चोटी लगाए हुए। उस हिम्मत वाली असाधारण मा शारदा सुब्रह्मण्यम् के ये शब्द लेखिका के कानों में आवाज़ कर रहे हैं। “ईश्वर एक रास्ता बन्द करता है तो दूसरा खोलता है” भाव यह है कि ईश्वर क लड़की को विकलांग किया, तो असाधारण बुद्धि, धैर्य और साहस देकर उसे सफल जीवन का मार्ग भी दिखाया।

पाठ का सर (सारांश)

कभी-कभी विधाता हमें ऐसे विलक्षण व्यक्ति से मिला देता है, जिसे देख हमें अपने जीवन की रिक्तता बहुत छोटी लगने लगती है। हमें तब लगता है कि भले ही उस अनर्यामी ने हमें जीवन में कभी अकस्मात् दन्डित कर दिया हो किन्तु हमारे किसी अंग को हमसे वंचित नहीं किया। फिर भी हममें से कौन ऐसा है जो अपनी विपत्ति के कठिन क्षणों में विधाता को दोषी ठहराता। मैंने अभी पिछले ही महीने, एक ऐसी अभिशप्त काया देखी है, जिसे विधाता ने कठोरतम दंड दिया है। किन्तु उसे वह नतमस्तक तथा आनन्दित मुद्रा में झेल रही है, विधाता को कोसकर नहीं।कठिनतम स्थिति में भी मनुष्य अपने साहस, धैर्य और निरन्तर कोशिश से प्रगति कर सकता है। चन्द्रा एक विकलांग लड़की थी। उसे बचपन में पोलियो हो गया था।

इस उसका गले से निचला भाग बेजान हो गया था। चन्द्रा की माता श्रीमती टी० सुब्रह्मण्यम् ने हिम्मत हारी। उसने एक सर्जन से एक वर्ष तक चन्द्रा का इलाज करवाया, जिससे उसकी ऊपरी धड़ में हरआ गई। निचला धड़ बेजान ही रहा। माँ ने उसे सहारा देकर उठना-बैठना सिखाया चन्द्रा बहुत ही कुशाग्र बुद्धि की थी। पाँच साल की आयु में उसक, पढाई शुरू हुई। माता ने पूरी . लगन से उसे पढ़ाना-लिखाना शुरू किया। बड़ी ही मिन्नतें करने के ब चन्द्रा को बेंगलुरु के माउंट (UPBoardSolutions.com) कारमेल में प्रवेश मिला क्योंकि स्कूल की मदर ने चन्द्रा की माता से का था “कौन आपकी पुत्री को ह्वील चेयर (पहिए वाली कुर्सी) में क्लास रूम में घुमाता रहेगा।” लंकन श्रीमती टी० सुब्रह्मण्यम् कई वर्ष तक अपनी बेटी को स्वयं क्लास रूम में घुमाती रहीं। चन्द्रा ने प्रत्येक परीक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। उसे स्व. पदक मिले। प्राणी शास्त्र में एम०एस०सी० किया, जिसमें चन्द्रा ने पहला स्थान प्राप्त किया। प्रोफेसर ठना के निर्देशन में पाँच साल तक शोध कार्य किया। अन्त में उसे विज्ञान में डॉक्टरेट मिल गई।

इतना सब कुछ होने पर भी डॉ० चन्द्रा ने कविताएँ लिखीं। जिनमें सकी उदासी का चित्रण हुआ था। उसने लेखिका को अपनी कढ़ाई-बुनाई के नमूने भी दिखाए। गर्ल ग ड में राष्ट्रपति का स्वर्ण कार्ड पाने वाली चन्द्रा पहली अपंग बालिका थी।  चन्द्रा के अलबम के अन्तिम पृष्ठ में है, उसकी जननी का बड़ा-सा चित्र, जिसमें वे जे०सी० बेंगलुरु द्वारा प्रदत्त एक विशिष्ट पुरस्कार ग्रहण कर रही हैं- ‘वीर जननी’ का पुरस्कार। बहुत बड़ी-बड़ी उदास आँखें, जिनमें स्वयं माँ की व्यथा भी है और पुत्री की भी, (UPBoardSolutions.com) अपने सारे सुख त्यागकर नित्य छाया बनी पुत्री की पहिया लगी कुर्सी के पीछे चक्र सी घूती जननी की व्यथा, नाक के दोनों ओर हीरे की दो जगमगाती लौंगें, होंठों पर विजय का उल्लास, जूड़े में पुष्पवेणी। मेरे कानों में उस अद्भुत साहसी जननी शारदा सुब्रमण्यम् के शब्द अभी भी जैसे गूंज रहे हैं, “ईश्वर सब द्वार एक साथ बन्द नहीं करता। यदि एक द्वार बन्द करता भी है, तो दूसरा द्वार खोल भी देता है।”

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 प्रश्न-अभ्यास

विचार और कल्पना-   नोट-विद्यार्थी स्वयं करें।
कुछ करने को-            नोट-
विद्यार्थी स्वयं करें।
कहानी से-

प्रश्न 1.
कौन-कौन से कथन सही हैं? हमें अपने जीवन की रिक्तता बहुत छोटी लगने लगती है, जब|
(क) दूसरों के दुख अपने दुखों से बड़े लगने लगते हैं।
(ख) हमारे कष्टों से बड़े कष्ट को कोई हँसकर झेलता दिखाई देता है।
(ग) अपने कष्टों के लिए विधाता को दोषी मान लेते हैं।
(घ) कष्टों को ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार कर लेते हैं।
उत्तर-
हमारे कष्टों से बड़े कष्ट को कोई हंसकर झेलता दिखाई देता है  कष्टों को ईस्वर की इच्छा मानकर स्वीकार कर लेते है।

प्रश्न 2.
लेखिका क्यों चाहती थीं कि लखनऊ का युवक उनकी पंक्तियॉ पढ़े?
उत्तर-
लखनऊ के युवक का केवल एक हाथ कटा था, वह भी तब जब वह उच्च शिक्षा प्राप्त युवक . था। डॉ० चन्द्रा बचपन से अपंग थी, फिर भी उसने कभी हार नहीं मानी। युवक को नियति का आघात (UPBoardSolutions.com) सहर्ष स्वीकार करने की प्रेरणा लेनी चाहिए। डॉ० चन्द्रा अपनी लगन से उत्साहपूर्वक आगे बढ़ी। उससे उत्साह, लगन, महत्त्वाकाक्षा और जिजीविषा की प्रेरणा लखनऊ के युवक को ग्रहण करनी चाहिए। इसलिए लेखिका चाहती थी कि लखनऊ का युवक उनकी पंक्तियाँ पढ़े।

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प्रश्न 3.
डॉ० चन्द्रा की कविताएँ देखकर लेखिका की आँखें क्यों भर आयीं?
उत्तर-
डॉ० चन्द्रा की कविताएँ देखकर लेखिका की आँखें भर आईं क्योंकि वह उदासी जो चन्द्रा के चेहरे पर कभी नहीं देखी गई थी, वह उसकी कविता में परिलक्षित थी।

प्रश्न 4.
डॉ० चन्द्रा ने विज्ञान के अतिरिक्त किन अन्य क्षेत्रों में उपलब्धियाँ प्राप्त कीं? | उत्तर-डॉ० चन्द्रा ने विज्ञान के अतिरिक्त कई अन्य क्षेत्रों में भी उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। उनकी कविता, कढाई-बुनाई और संगीत में रुचि थी। उसने जर्मन भाषा में विशेष योग्यता प्राप्त की। उन्होंने गर्ल गाइड में राष्ट्रपति का स्वर्णकार्ड प्राप्त किया।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित कथनों का भाव स्पष्ट कीजिए-
(क) वह बित्ते भर की लड़की मुझे किसी देवांगना से कम नहीं लगी।
भाव-लेखिका ने अपंग डा० चन्द्रा, जिसका छोटा-सा शरीर था, को देवलोक की स्त्री समान समझा क्योंकि उसके गुण, बुद्धि, पुरुषार्थ और उपलब्धियाँ किसी भी सांसारिक महिला से ज्यादा थीं।

(ख) पूरा निचला धड़ सुन्न है, फिर भी बोटी-बोटी फड़क रही है।
भाव-शरीर निष्क्रिय होते हुए भी जिन्दगी में कुछ करने की ललक (उत्सुकता)।

(ग) मैं चाहती हूँ कि कोई मुझे सामान्य-सा सहारा भी न दे।
भाव-आशय यह है कि वह किसी पर भी आश्रित न होकर स्वावलम्बी हो।

(घ) चिकित्सा ने जो खोया है, वह विज्ञान ने पाया है।
भाव-चन्द्रा पहले चिकित्सक बनना चाहती थी, पर प्रवेश परीक्षा में प्रथम आने पर भी उसे इसलिए प्रवेश नहीं मिल पाया क्योंकि उसका धड़ काम नहीं करता था। यदि वह चिकित्सा के क्षेत्र में जाती, तो महान शल्य चिकित्सक बनती। प्रवेश न मिलने पर उसने विज्ञान के क्षेत्र में शोध किया और प्राणी-विज्ञान में पी०एच०डी० की (UPBoardSolutions.com) उपाधि पाने वाली पहली भारतीय बनी। वह एक अच्छी डॉक्टर बन सकती थी लेकिन बन गई वैज्ञानिक। इस प्रकार चिकित्सा ने चन्द्रा की प्रतिभा को खोया और विज्ञान ने उसे प्राप्त कर लिया।

(ङ) ईश्वर सब द्वार एक साथ बन्द नहीं करता। यदि एक द्वार बन्द करता है तो दूसरी द्वार खोल भी देता है।
भाव-ईश्वर कर्तव्य करने के लिए कोई रास्ता (क्षमता) जरूर प्रदान करता है.

प्रश्न 6.
शारदा सुब्रह्मण्यम को ‘वीर जननी’ का पुरस्कार क्यों मिला?
उत्तर-
शारदा सुब्रह्मण्यम कों ‘वीर जननी’ का पुरस्कार इसलिए मिला क्योंकि चन्द्रा जैसी अपंग । बालिका को उसकी माँ ने स्वयं यातनाएँ सहकर भी पढ़ा-लिखा कर उच्चकोटि का वैज्ञानिक बनाया।

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भाषा की बात
प्रश्न 1.
नोट-विद्यार्थी स्वयं शुद्ध बोलकर पढ़ें।

प्रश्न 2.
‘यातना’ शब्द संज्ञा है। उसमें ‘प्रद’ प्रत्यय जोड़ देने से ‘यातनाप्रद’ शब्द विशेषण बन जाता है, जिसका अर्थ है- कष्ट देने वाला। नीचे लिखे शब्दों में ‘प्रद’ जोड़कर नए शब्द बनाइए और उनके अर्थ लिखिए।
उत्तर-
शब्द। ‘                 प्रद’ जोड़कर नए शब्द              अर्थ
कट                        कष्टप्रद                                        
कष्ट देने वाला
आनन्द                  आनन्दप्रद                                 
आनन्द देने वाला
लाभ                       लाभप्रद                                      
लाभ देने वाला
हानि                       हानिप्रद                                      
हानि देने वाला
ज्ञान                       ज्ञानप्रद                                        
ज्ञान देने वाला 

प्रश्न 3.
निम्नलिखित वाक्य पढ़िए-
(क) इसके इस जीवन से तो मौत भली है।
(ख) मैंने जब वे कविताएँ देखीं तो आँखें भर आईं।
वाक्य (क) में ‘तो’ निपात के रूप में प्रयुक्त है। ‘निपात’ उस शब्द को कहते हैं, जो वाक्य में कहीं भी रखा जा सकता है, जैसे- पर, भर, ही, तो। किन्तु वाक्य (ख) में ‘तो’, ‘जब’ के साथ ‘तब’ के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। क और ख की भाँति दो-दो वाक्य बनाकर लिखिए।
उत्तर-
(क) गुलामी करने से तो मर जाना अच्छा है।
(ख) जब मैंने आसमान में काले बादल देखे तो भीगने से बचने को घर की तरफ दौड़ लगाई।
(क) गरीबी के जीवन से तो पुरुषार्थ करना भला है।
(ख) जब विद्यार्थी बस से टकराकर घायल हो गया तो लोगों ने उसे अस्पताल पहुँचाया।

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प्रश्न 4.
‘वह बैसाखियों से ही हुवील चेयर तक पहुँच उसमें बैठ गई और बड़ी तटस्थता से उसे स्वयं चलाती कोठी के भीतर चली गई।’ इस वाक्य में दो वाक्य हैं, दोनों वाक्य स्वतन्त्र अर्थ दे रहे हैं। किन्तु ये वाक्य ‘और’ से (UPBoardSolutions.com) जुड़े हुए हैं, ऐसे वाक्य को संयुक्त वाक्य कहते हैं। संयुक्त वाक्य में दो या दो से अधिक सरल वाक्य होते हैं, जो ‘और’,’किन्तु’ या ‘इसलिए’ से जुड़े रहते हैं। संयुक्त वाक्य के कोई दो उदाहरण पाठ से चुनकर लिखिए।
उत्तर-
(क) “पहले दुख भुलाने के लिए नशे की गोलियाँ खाने लगा और अब नूरमंजिल की शरण गही है।”
(ख) “एक वर्ष तक कष्टसाध्य उपचार चला और एक दिन स्वयं ही ऊपरी धड़ में गति आ गई।”

प्रश्न 5.
पाठ में आए हुए अंग्रेजी भाषा के शब्दों को छाँटिए और लिखिए।
उत्तर-
‘कार’, ‘सीट’, ‘ह्वीलचेयर’, ‘मशीन’, ‘बटन’, ‘आई०ए०एस०’, ‘स्टेशन’, ‘ट्रेन’, ‘मैडम’, ‘ड्रग रिसर्च इंस्टिट्यूट’, ‘माइक्रोबायोलॉजी’, ‘ईस्ट’, ‘वेस्ट’, ‘सेंटर’,’बायोडाटा’, ‘फेलोशिप’, ‘आई०आई०टी०’, ‘थीसिस’, ‘डाक्टरेट’, ‘पी०एच-डी०’, ‘आर्थोपेडिक’, ‘सर्जन’, ‘डॉक्टर’, ‘पीरियड’, ‘एम०एस-सी०’, ‘स्पेशल’, ‘प्रोफेसर’, ‘लैदर’, ‘जैकेट’, ‘गर्ल’, ‘गाइड’, ‘कॉन्वेंट’, ‘बी०एस०सी०’, ‘इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस’, ‘अलबम’।

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UP Board Solutions for Class 10 Hindi विविध विषयाधारित निबन्ध

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विविध विषयाधारित निबन्ध

51. व्यायाम और स्वास्थ्य [2015]

सम्बद्ध शीर्षक

  • व्यायाम से लाभ [2009]
  • विद्यार्थी जीवन में खेलकूद का महत्त्व [2011]
  • स्वास्थ्य रक्षा
  • स्वस्थ शरीर में स्वस्थ बुद्धि का निवास
  • खेल और व्यायाम
  • स्वास्थ्य शिक्षा का महत्त्व [2012, 13, 16]
  • विद्यालयों में स्वास्थ्य-शिक्षा [2014]
  • व्यायाम का महत्त्व [2016]

रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना,
  2. व्यायाम का अर्थ,
  3. व्यायाम के रूप,
  4. व्यायाम की मात्रा,
  5. व्यायाम के लिए आवश्यक बातें,
  6. व्यायाम से लाभ,
  7. उपसंहार।

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प्रस्तावना-मनव-जीवन में स्वास्थ्य का अत्यधिक महत्त्व है। यदि मनुष्य का शरीर स्वस्थ है तो वह जीवन में अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर सकता है। यह मानव-जीवन की सर्वश्रेष्ठ पूँजी है। एक तन्दुरुस्ती हजार नियामत’ के अनुसार, स्वास्थ्य वह (UPBoardSolutions.com) सम्पदा है जिसके द्वारा मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्राप्त कर सकता है-‘धर्मार्थ-काम-मोक्षाणाम्, आरोग्यं मूलकारणम्।’ अंग्रेजी में भी कहावत है-‘Health is wealth.’; अर्थात् स्वास्थ्य ही धन है। प्राचीन काल से ही स्वास्थ्य की महत्ता पर बल दिया जाता रहा है। शारीरिक स्वास्थ्य के लिए पौष्टिक भोजन, चिन्तामुक्त जीवन, उचित विश्राम और पर्याप्त व्यायाम की आवश्यकता होती है। उत्तम स्वास्थ्य के लिए व्यायाम सर्वोत्तम साधन है।

व्यायाम का अर्थ मन को प्रफुल्लित रखने एवं तन को सशक्त एवं स्फूर्तिमय बनाने के लिए हम कुछ नियमों के अनुसार जो शारीरिक गति करते हैं, उसे ही व्यायाम कहते हैं। केवल दण्ड-बैठक, कुश्ती, आसन आदि ही व्यायाम नहीं हैं, वरन् शरीर के अंग-प्रत्यंग का संचालन भी, जिससे स्वास्थ्य की वृद्धि होती है, व्यायाम कहा जाता है।

व्यायाम के रूप-मन की शक्ति के विकास के लिए चिन्तन-मनन करना आदि मानसिक व्यायाम कहे जाते हैं। शारीरिक बल व स्फूर्ति बढ़ाने को शारीरिक व्यायाम कहा जाता है। प्रधान रूप से व्यायाम शरीर को पुष्ट करने के लिए किया जाता है।

शारीरिक व्यायाम को दो वर्गों में रखा गया है–

  1. खेल-कूद तथा
  2. नियमित व्यायाम।

खेल-कूद में रस्साकशी, कूदना, दौड़ना, कबड्डी, तैरना आदि व्यायाम आते हैं। इनके करने से रक्त का तेजी से संचार होता है और प्राण-वायु की वृद्धि होती है। आधुनिक खेलों में हॉकी, फुटबाल, वॉलीबाल, क्रिकेट आदि खेल व्यायाम के रूप हैं। खेल-कूद सभी स्थानों पर सभी लोग सुविधापूर्वक नहीं कर पाते, इसलिए वे शरीर को पुष्ट रखने के लिए कुश्ती, मुग्दर घुमाना, योगासन आदि अन्य नियमित व्यायाम करते हैं। व्यायाम केवल पुरुषों के लिए ही आवश्यक नहीं है, अपितु स्त्रियों को भी व्यायाम करना चाहिए। रस्सी कूदना, नृत्य करना आदि स्त्रियों के लिए परम उपयोगी व्यायाम हैं।

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व्यायाम की मात्रा–व्यायाम कितना किया जाये, यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है। बालक, युवा, स्त्री, वृद्ध आदि के लिए व्यायाम की अलग-अलग मात्रा है। कुछ के लिए हल्के व्यायाम, कुछ के लिए प्रातः भ्रमण तथा कुछ के लिए अन्य प्रकार के खेल व्यायाम का कार्य करते हैं। आयु, शक्ति, लिंग एवं स्थान के भेद से व्यायाम की मात्रा में अन्तर हो जाता है।

व्यायाम के लिए आवश्यक बातें–व्यायाम का उचित समय प्रात:काल है। प्रातः शौच आदि से निवृत्त होकर बिना कुछ खाये, शरीर पर तेल लगाकरे व्यायाम करना चाहिए। व्यायाम शुद्ध वायु में लाभकारी होता है। व्यायाम प्रत्येक अंग का होना चाहिए। व्यायाम का अभ्यास धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए। व्यायाम के विभिन्न रूप प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रत्येक अवस्था में लाभदायक नहीं हो सकते; अतः उपयुक्त समय में उचित मात्रा में अपने लिए उपयुक्त व्यायाम (UPBoardSolutions.com) का चुनाव करना चाहिए। व्यायाम करते समय नाक से साँस लेना चाहिए और व्यायाम के बाद कुछ देर रुककर स्नान करना चाहिए। व्यायाम करने के बाद दूध आदि पौष्टिक पदार्थों का सेवन आवश्यकता व सामर्थ्य के अनुसार अवश्य करना चाहिए।

व्यायाम से लाभ-व्यायाम से शरीर पुष्ट होता है, बुद्धि और तेज बढ़ता है, अंग-प्रत्यंग में उष्ण रक्त प्रवाहित होने से स्फूर्ति आती है, मांसपेशियाँ सुदृढ़ होती हैं, पाचन-शक्ति ठीक रहती है तथा शरीर स्वस्थ और हल्का प्रतीत होता है। व्यायाम के साथ मनोरंजन का समावेश होने से लाभ द्विगुणित होता है। इससे मन प्रफुल्लित रहता है और व्यायाम की थकावट भी अनुभव नहीं होती। शरीर स्वस्थ होने से सभी , इन्द्रियाँ सुचारु रूप से काम करती हैं। व्यायाम से शरीर नीरोग, मन प्रसन्न और जीवन सरस हो जाता है।

शरीर और मन के स्वस्थ रहने से बुद्धि भी ठीक कार्य करती है। अंग्रेजी में कहावत है—’Sound mind exists in a sound body’; अर्थात् स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है। मन प्रसन्न और बुद्धि सक्रिय रहने से मनुष्य की कार्यक्षमता बढ़ जाती है। वह परिश्रमी और स्वावलम्बी हो जाता है।

व्यायाम करने से अनेक लाभ होते हैं, परन्तु इसमें असावधानी करने के कारण हानियाँ भी हो सकती हैं। व्यायाम का चुनाव करते समय, आयु एवं शारीरिक शक्ति का ध्यान अवश्य रखना चाहिए। उचित समय पर, उचित मात्रा में और उपयुक्त व्यायाम न करने से लाभ के बजाय हानि होती है। व्यायाम करने वालों के लिए ब्रह्मचर्य का पालन करना अधिक लाभकारी होता है।

उपसंहार-आज के इस मशीनी युग में व्यायाम की उपयोगिता अत्यधिक बढ़ गयी है; क्योंकि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मशीनों का आधिपत्य हो गया है। दिन-भर कार्यालय में कुर्सी पर बैठकर कलम घिसना अब गौरव की बात समझी जाती है तथा शारीरिक श्रम को तिरस्कार और उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है।
जर्जर कर दिया है। अत: आज देश के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है (UPBoardSolutions.com) कि वह सुन्दर शरीर, निर्मल मन तथा विवेकपूर्ण बुद्धि के लिए उपयुक्त व्यायाम नियमित रूप से प्रतिदिन करता रहे।

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52. योग शिक्षा : आवश्यकता और उपयोगिता [2016, 17]

सम्बद्ध शीर्षक

  • मानव-जीवन में योग शिक्षा का महत्त्व [2011]

रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना,
  2. योग का अर्थ,
  3. योग की आवश्यकता,
  4. योग की उपयोगिता,
  5. योग के सामान्य नियम
  6. योग से लाभ,
  7. उपसंहार।

प्रस्तावना-योगासन शरीर और मन को स्वस्थ रखने की प्राचीन भारतीय प्रणाली है। शरीर को किसी ऐसे आसन या स्थिति में रखना जिससे स्थिरता और सुख का अनुभव हो, योगासन कहलाता है।
अंग में शुद्ध वायु का संचार होता है जिससे उनमें स्फूर्ति आती है। परिणामत: व्यक्ति में उत्साह और कार्य-क्षमता का विकास होता है तथा एकाग्रता आती है।

योग का अर्थ-योग, संस्कृत के यज् धातु से बना है, जिसका अर्थ है, संचालित करना, सम्बद्ध करना, सम्मिलित करना अथवा जोड़ना। अर्थ के अनुसार विवेचन किया जाए तो शरीर एवं आत्मा का मिलन ही योग कहलाता है। यह भारत के छ: दर्शनों, जिन्हें षड्दर्शन कहा जाता है, में से एक है। अन्य दर्शन हैं-न्याय, वैशेषिक, सांख्य, वेदान्त एवं मीमांसा। इसकी उत्पत्ति भारत में लगभग 5000 ई०पू० में हुई थी। पहले यह विद्या गुरु-शिष्य परम्परा के तहत पुरानी पीढ़ी से नई पीढ़ी को हस्तांतरित होती थी। लगभग 200 ई०पू० में महर्षि पतञ्जलि ने योग-दर्शन को योग-सूत्र नामक ग्रन्थ के रूप में लिखित रूप में प्रस्तुत किया। इसलिए महर्षि पतञ्जलि को ‘योग का प्रणेता’ कहा जाता है। आज बाबा रामदेव ‘योग’ नामक इस अचूक विद्या का देश-विदेश में प्रचार कर रहे हैं।

योग की आवश्यकता–शरीर के स्वस्थ रहने पर ही मस्तिष्क स्वस्थ रहता है। मस्तिष्क से ही शरीर की समस्त क्रियाओं का संचालन होता है। इसके स्वस्थ और तनावमुक्त होने पर ही शरीर की सारी क्रियाएँ भली प्रकार से सम्पन्न होती हैं। इस प्रकार हमारे शारीरिक, (UPBoardSolutions.com) मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक विकास के लिए योगासन अति आवश्यक है।

हमारा हृदय निरन्तर कार्य करता है। हमारे थककर आराम करने या रात को सोने के समय भी हृदय गतिशील रहता है। हृदय प्रतिदिन लगभग 8000 लीटर रक्त को पम्प करता है। उसकी यह क्रिया जीवन भर चलती रहती है। यदि हमारी रक्त-नलिकाएँ साफ होंगी तो हृदय को अतिरिक्त मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। इससे हृदय स्वस्थ रहेगा और शरीर के अन्य भागों को शुद्ध रक्त मिल पाएगा, जिससे नीरोग व सबल हो जाएँगे। फलत: व्यक्ति की कार्य-क्षमता भी बढ़ जाएगी।

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योग की उपयोगिता-मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए हमारे जीवन में योग अत्यन्त उपयोगी है। शरीर, मन एवं आत्मा के बीच सन्तुलन अर्थात् योग स्थापित करना होता है। योग की प्रक्रियाओं में जब तन, मन और आत्मा के बीच सन्तुलन एवं योग (जुड़ाव) स्थापित होता है, तब आत्मिक सन्तुष्टि, शान्ति एवं चेतना का अनुभव होता है। योग शरीर को शक्तिशाली एवं लचीला बनाए रखता है, साथ ही तनाव से भी छुटकारा दिलाता है। यह शरीर के जोड़ों एवं मांसपेशियों में लचीलापन लाता है, मांसपेशियों को मजबूत बनाता है, शारीरिक विकृतियों को काफी हद तक ठीक करता है, शरीर में रक्त प्रवाह को सुचारु करता है तथा पाचन-तन्त्र को मजबूत बनाता है। इन सबके अतिरिक्त यह शरीर की रोग-प्रतिरोधक शक्तियाँ बढ़ाता है, कई प्रकार की बीमारियों जैसे अनिद्रा, तनाव, थकान, उच्च रक्तचाप, चिन्ता इत्यादि को दूर करता है तथा शरीर को ऊर्जावान बनाता है। आज की भाग-दौड़ भरी जिन्दगी में स्वस्थ रह पाना किसी चुनौती से कम नहीं है। अत: हर आयु-वर्ग के स्त्री-पुरुष के लिए योग उपयोगी है।

योग के सामान्य नियम-योगासन उचित विधि से ही करना चाहिए अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि की सम्भावना रहती है। योगासन के अभ्यास से पूर्व उसके औचित्य पर भी विचार कर लेना चाहिए। बुखार से ग्रस्त तथा गम्भीर रोगियों को योगासन नहीं करना चाहिए। योगासन करने (UPBoardSolutions.com) से पहले नीचे दिए सामान्य नियमों की जानकारी होनी आवश्यक है

  1.  प्रातः काल शौचादि से निवृत्त होकर ही योगासन का अभ्यास करना चाहिए। स्नान के बाद योगासन करना और भी उत्तम रहता है।
  2. सायंकाल खाली पेट पर ही योगासन करना चाहिए।
  3. योगासन के लिए शान्त, स्वच्छ तथा खुले स्थान का चयन करना चाहिए। बगीचे अथवा पार्क में योगासन करना अधिक अच्छा रहता है।
  4. आसन करते समय कम, हलके तथा ढीले–ढाले वस्त्र पहनने चाहिए।
  5. योगासन करते समय मन को प्रसन्न, (UPBoardSolutions.com) एकाग्र और स्थिर रखना चाहिए। कोई बातचीत नहीं करनी चाहिए।
  6. योगासन के अभ्यास को धीरे-धीरे ही बढ़ाएँ।
  7. योगासन का अभ्यास करने वाले व्यक्ति को हलका, शीघ्र पाचक, सात्विक और पौष्टिक भोजन करना चाहिए।
  8. अभ्यास के आरम्भ में सरल योगासन करने चाहिए।
  9. योगासन के अन्त में शिथिलासन अथवा शवासन करना चाहिए। इससे शरीर को विश्राम मिल जाता है तथा मन शान्त हो जाता है।
  10. योगासन करने के बाद आधे घण्टे तक न तो स्नान करना चाहिए और न ही कुछ खाना चाहिए।

योग से लाभ–छात्रों, शिक्षकों एवं शोधार्थियों के लिए योग (UPBoardSolutions.com) विशेष रूप से लाभदायक सिद्ध होता है, क्योंकि यह उनके मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ाने के साथ-साथ उनकी एकाग्रता भी बढ़ाता है जिससे उनके लिए अध्ययन-अध्यापन की प्रक्रिया सरल हो जाती है।

पतञ्जलि के योग–सूत्र के अनुसार आसनों की संख्या 84 है। जिनमें भुजंगासन, कोणासन, पद्मासन, मयूरासन, शलभासन, धनुरासन, गोमुखासन, सिंहासन, वज्रासन, स्वस्तिकासन, पवर्तासन, शवासन, हलासन, शीर्षासन, धनुरासन, ताड़ासन, सर्वांगासन, पश्चिमोत्तानासन, चतुष्कोणासन, त्रिकोणासन, मत्स्यासन, गरुड़ासन इत्यादि कुछ प्रसिद्ध आसन हैं। योग के द्वारा शरीर पुष्ट होता है, बुद्धि और तेज बढ़ता है, अंग-प्रत्यंग में उष्ण रक्त प्रवाहित होने से स्फूर्ति आती है, मांसपेशियाँ सुदृढ़ होती हैं, पाचन-शक्ति ठीक रहती है तथा शरीर स्वस्थ और हल्का प्रतीत होता है। योग के साथ मनोरंजन का समावेश होने से लाभ द्विगुणित होता है। इससे मन प्रफुल्लित रहता है और योग की थकावट भी अनुभव नहीं होती। शरीर स्वस्थ होने से सभी इन्द्रियाँ सुचारु रूप से काम करती हैं। योग से शरीर नीरोग, मन प्रसन्न और जीवन सरस हो जाता है।

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उपसंहार–आज की आवश्यकता को देखते हुए योग शिक्षा की बेहद आवश्यकता है, क्योंकि सबसे बड़ा सुख शरीर का स्वस्थ होना है। यदि आपका शरीर स्वस्थ है तो आपके पास दुनिया की सबसे बड़ी दौलत है। स्वस्थ व्यक्ति ही देश और समाज का हित कर सकता है। अत: आज की भाग-दौड़ की जिन्दगी में खुद को स्वस्थ एवं ऊर्जावान बनाए रखने के लिए योग बेहद आवश्यक है। वर्तमान परिवेश में योग न सिर्फ हमारे लिए लाभकारी है, बल्कि विश्व के बढ़ते प्रदूषण एवं मानवीय व्यस्तताओं से उपजी समस्याओं के निवारण के सदर्भ में इसकी सार्थकता और बढ़ गई है।

53. देशाटन

सम्बद्ध शीर्षक

  • देशाटन से लाभ [2010, 11, 12, 13, 16]
  • पर्यटन (देशाटन) का महत्त्व [2013]
  • पर्यटन से होने वाले लाभ एवं हानि [2011]

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. देशाटन का अर्थ,
  3. देशाटन के साधनों का विकास,
  4. देशाटन : एक स्वाभाविक प्रवृत्ति,
  5. देशाटन को महत्त्व,
  6. देशाटन से लाभ,
  7. देशाटन से हानियाँ,
  8. उपसंहार।

प्रस्तावना–परिवर्तन प्रकृति का नियम है। मानव का मन भी परिवर्तन चाहता है। जब मनुष्य एक स्थान पर रहता-रहता ऊब जाता है, तब उसकी इच्छा भ्रमण करने की होती है। भ्रमण का जीवन में बहुत महत्त्व है। भ्रमण से पारस्परिक सम्पर्क बढ़ता है, जिससे सद्भाव और मैत्री उत्पन्न होती है। यह ज्ञान-वृद्धि, मनोरंजन, स्वास्थ्य, व्यापार और विश्व-बन्धुत्व की दृष्टि से बहुत उपयोगी है।

देशाटन का अर्थ-‘देशाटन’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है-‘देश’ + ‘अटन’। इसमें देश का अर्थ है–स्थान और ‘अटन’ का अर्थ है-भ्रमण। इस प्रकार देश-विदेश के विभिन्न स्थानों का भ्रमण करना ‘देशाटन’ कहलाता है। जीवन का वास्तविक आनन्द भ्रमण करने में ही निहित है। भ्रमण करने से मनुष्य का ज्ञान और अनुभव भी बढ़ता है। वैसे विज्ञान के आविष्कारों और पुस्तकों के माध्यम से देश-विदेश की बातें ज्ञात हो जाती हैं, लेकिन सच्चा आनन्द और वास्तविक सुख तो प्रत्यक्ष देखने से ही मिलता है।

देशाटन के साधनों का विकास–मानव प्राचीन काल से ही पर्यटन-प्रेमी रहा है। सभ्यता के विकास के मूल में उसकी पर्यटन-प्रियता छिपी है। मनुष्य कभी तीर्थयात्रा के बहाने, कभी व्यापार के लिए तो कभी ज्ञानार्जन के लिए विदेशों की यात्रा पर निकल पड़ता था। ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि भारतीय विदेशों में गये और विदेशी यात्री भारत आये। विदेशी यात्रियों में ह्वेनसांग, फाह्यान, वास्कोडिगामा आदि के नाम उल्लेखनीय रहे हैं। पहले पर्यटन के सुगम साधन (UPBoardSolutions.com) उपलब्ध नहीं थे, परन्तु आजकल विज्ञान की उन्नति से देशाटन के विभिन्न साधनों का विकास हो गया है, जिससे मानव थोड़े ही समय में सुदूर देशों की सुविधापूर्वक यात्रा कर सकता है। आज पर्यटन के शौकीन लोगों के लिए दूरस्थ तीर्थस्थलों, ऐतिहासिक इमारतों, गर्जन करते हुए समुद्रों और कल-कल करती हुई नदियों तक पहुँच बनाना यातायात के साधनों के माध्यम से अत्यधिक सरल हो गया है।

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देशाटन : एक स्वाभाविक प्रवृत्ति-वैसे तो प्रत्येक व्यक्ति थोड़ा-बहुत घूमना व देश-विदेश का भ्रमण करना चाहता है, परन्तु कुछ लोगों को देशाटन का विशेष शौक होता है। वे साधनों की परवाह न करके उत्साहपूर्वक भ्रमण करते हैं। घुमक्कड़ों का विचार है कि पैदल देशाटन करने में जो आनन्द प्राप्त होता है, वह किसी वाहन से पर्यटन करने में प्राप्त नहीं होता। परिणामस्वरूप आजकल भी लोग पैदल या साइकिल से देश-भ्रमण के लिए निकलते हैं। देशाटन के कारण मनुष्य की जिज्ञासा, खोज-प्रवृत्ति, मनोरंजन एवं अनुभववृत्ति की पूर्ति होती है।

देशाटन का महत्त्व-मनुष्य के जीवन में विभिन्न देशों के भ्रमण का बड़ा महत्त्व है। घूमना-फिरना। मानव की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। देश-विदेश में घूमकर मनुष्य अपनी जानकारी बढ़ाता है और मनोविनोद करता है। नये-नये स्थान और वस्तुएँ देखने से उसकी कौतूहल-वृत्ति शान्त होती है तथा उसका पर्याप्त मनोरंजन भी होता है। भ्रमण करने से भौगोलिक, ऐतिहासिक, पुरातत्त्व सम्बन्धी, सामाजिक और राजनीतिक ज्ञान तथा अनुभव में वृद्धि होती है।

देशाटन से लाभ-देशाटन के अनेक लाभ हैं, जो निम्नवत् हैं।
(अ) प्रकृति का सान्निध्य-सर्वप्रथम मनुष्य को प्रकृति से निकटता प्राप्त होती है। प्राकृतिक दृश्यों को देखने से हृदय आनन्दित और शरीर स्वस्थ हो जाता है। उन्मुक्त पशु-पक्षियों की भाँति जीवन आनन्दमय प्रतीत होने लगता है। प्रकृति के सान्निध्य से सादगी एवं सद्गुणों का विकास भी होता है।
(ब) ज्ञान-वृद्धि-पर्यटन से ज्ञान-वृद्धि में सहायता मिलती है। किसी वस्तु का विस्तृत एवं यथार्थ ज्ञान भ्रमण से ही प्राप्त होता है। अजन्ता की गुफाओं, ताजमहल, कुतुबमीनार और ऐतिहासिक चित्तौड़ दुर्ग को देखकर व उन स्थानों से सम्बन्धित तथ्यों और गौरव-गाथाओं को सुनकर जितनी जानकारी होती है, उतनी पुस्तकों को पढ़ने या सुनने से नहीं हो सकती।
(स) मनोरंजन–मनोरंजन का सर्वाधिक उत्तम साधन पर्यटन है। भ्रमण करने से विविध प्रकार की वस्तुएँ देखने को मिलती हैं। हिमाच्छादित पर्वतमालाओं, कल-कल नाद करती हुई नदियों की धाराओं, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थानों को देखने से मन का अवसाद दूर हो जाता है।
(द) विश्व-बन्धुत्व की भावना-देशाटन करने से मैत्रीभाव की वृद्धि होती है। देश-विदेश में भ्रमण करने (UPBoardSolutions.com) से लोगों का सम्पर्क बढ़ता है, भाईचारे की भावना बढ़ती है तथा राष्ट्रीय एकता में वृद्धि होती है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, अर्थात् सारी वसुधा हमारा कुटुम्ब है, इस विराट भावे की अनुभूति होती है।
(य) व्यापार में वृद्धि–एक स्थान से दूसरे स्थान का भ्रमण करने से वहाँ की कृषि-उपज, खनिज सम्पदा, कलाकृतियों आदि की विशेष जानकारी मिलती है, जिससे व्यापारी लोग व्यापार की सम्भावनाओं का पता लगाकर अपना व्यापार बढ़ाते हैं।

उपर्युक्त लाभों के अतिरिक्त देशाटन से अन्य कई लाभ भी हैं। देशाटन से दृष्टिकोण विस्तृत होता है, अनुभवों का विकास होता है, उदारता और सद्विचारों का उदय होता है, महान् लोगों से सम्पर्क होता है। देशाटन से सहनशीलता, सहानुभूति, सहयोग, मधुर भाषण आदि गुणों का विकास होता है, जो मनुष्य के जीवन में अत्यन्त लाभकारी सिद्ध होते हैं।

देशाटन से हानियाँ-देशाटन की आदत पड़ने से, धन के व्यय की आदत पड़ जाती है। घुमक्कड़ लोग घूमने में ही जीवन बिता देते हैं और भौतिक जीवन की प्रगति करने के प्रति उदासीन हो जाते हैं। जलवायु की भिन्नता, मार्ग की कठिनाइयों और सांस्कृतिक मूल्यों की भिन्नता के कारण कभी-कभी जान-माल से भी हाथ धोना पड़ता है।

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उपसंहार-देशाटने हमारे जीवन के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। फलतः प्रत्येक देश में पर्यटन को प्रोत्साहित किया जा रहा है। पर्यटकों के लिए सुख-सुविधाओं के साधन बढ़ गये हैं। लाखों पर्यटक एक देश से दूसरे देश में पहुँचते रहते हैं। सर्वश्रेष्ठ मानव-जीवन को प्राप्त करके (UPBoardSolutions.com) हमें विश्व की अनेक प्रकार की वस्तुओं को देखकर जीवन सफल करना चाहिए। यदि हमें ईश्वर की इस अनुपम सृष्टि का निरीक्षण किये बिना संसार से विदा हो गये तो मन पछताता ही रह जाएगा—

सैर कर दुनिया की गाफिल, जिन्दगानी फिर कहाँ ?
जिन्दगानी गर रही तो, नौजवानी फिर कहाँ ?

54. मेरा प्रिय खेल : क्रिकेट

सम्बद्ध शीर्षक

  • किसी क्रिकेट मैच का वर्णन [2016]
  • क्रिकेट का आँखों देखा हाल [2014]

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. हमारे विद्यालय का क्रिकेट मैच,
  3. खेल के मैदान की व्यवस्था,
  4. मैच का आरम्भ,
  5. भोजनावकाश के बाद का खेल,
  6. पुरस्कार वितरण,
  7. उपसंहार।

प्रस्तावना व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए शिक्षा और भोजन ही पर्याप्त नहीं हैं, वरन् इनके लिए खेलकूद भी परमावश्यक है। खेल जहाँ एक ओर मनोरंजन करते हैं, वहीं दूसरी ओर इनसे खिलाड़ियों में अनुशासन और परस्पर सद्भाव भी जाग्रत होता है। मानव के विकास में खेलों के महत्त्व को समझते हुए उनको प्रोत्साहित करने की दृष्टि से अनेक क्रीड़ा प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। आज का व्यक्ति गम्भीर और जटिल होता चला जा रहा है। उसे पुन: बालकों की भाँति उत्साही, साहसी व खुशमिजाज बनने के लिए खेलों की ओर मुड़ना चाहिए। आज सभी वैज्ञानिक और स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि जो स्फूर्ति खेलों से प्राप्त हो सकती है, वह किसी ओषधि से नहीं।

हमारे विद्यालय का क्रिकेट मैच–प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी नवम्बर मास में हमारे विद्यालय में अन्य खेलों के साथ-साथ क्रिकेट का आयोजन हुआ। इसमें हमारे विद्यालय की क्रिकेट टीम का मुकाबला स्थानीय एस० एस० डी० कॉलेज की क्रिकेट टीम से हुआ। हमारे विद्यालय (UPBoardSolutions.com) एस०डी० इण्टर कॉलेज की क्रिकेट टीम नगर की अन्य टीमों की तुलना में बहुत सुदृढ़ है। हमारे बल्लेबाज और गेंदबाज दोनों ही कुशल हैं तथा उनका क्षेत्ररक्षण बहुत चुस्त है। दूसरी टीम भी बहुत सुदृढ़ थी। खेल का आयोजन हमारे ही विद्यालय के मैदान में हुआ, जो नगर के मध्य में स्थित है। दोनों टीमों का मुकाबला बहुत रोमांचक रहा, जिसकी याद मन-मस्तिष्क में सदा ताजा रहेगी।

खेल के मैदान की व्यवस्था—यह मैच 50-50 ओवरों का था। खेल 9 बजे शुरू होना था। दोनों विद्यालय के छात्र और बहुत बड़ी संख्या में स्थानीय दर्शक वहाँ पर एकत्रित हो चुके थे। मैं तो समय से पहले ही वहाँ पहुँच गया था। खेल के आयोजन की सुन्दर व्यवस्था थी। जिला विद्यालय निरीक्षक इस मैच के मुख्य अतिथि थे। मैदान में सफेद चूने से रेखाएँ खींची हुई थीं। मैदान के चारों ओर दर्शकों के बैठने की व्यवस्था थी। कुछ ही देर में दोनों टीमों के कप्तान भी आये। सिक्का उछालकर टॉस हुआ। हमारे विद्यालय के कप्तान ने टॉस जीता और पहले दूसरी टीम को बल्लेबाजी करने के लिए आमन्त्रित किया।

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मैच का आरम्भ-खेल शुरू हुआ। हमारी टीम के तेज गेंदबाज ने खेल की पहली गेंद फेंकी। बल्लेबाज जल्दबाजी कर बैठा और गेंद उसके बल्ले का बाहरी कोना लेते हुए विकेट-कीपर के हाथों में जा । पहुँची। इस तरह हमारी टीम को पहली सफलता मिली। अगला खिलाड़ी बल्लेबाजी के लिए आया। दोनों ने बहुत तालमेल के साथ दूसरे विकेट की साझेदारी में 120 रन बनाये, जिनमें दस चौके और चार शानदार छक्के सम्मिलित थे। हमारे कप्तान के पसीने छुट रहे थे। कप्तान ने अब गेंद फिरकी गेंदबाजों को सौंपी। उन्होंने इतनी सटीक गेंदबाजी की कि बल्लेबाजों के साथ ‘तू चल मैं आता हूँ की कहावत चरितार्थ हो गयी। एक के बाद एक बल्लेबाज आउट होते चले गए। अभी बयालिस ओवर ही फेंके गये थे कि सारी टीम मात्र 204 रनों पर सिमट गयी।।

भोजनावकाश के बाद का खेल–भोजन से निवृत्त होते ही एस० एस० डी० कॉलेज के खिलाड़ी मैदान में पहुँच गये। हमारी टीम के प्रारम्भिक बल्लेबाज मैदान पर पहुँचे और खेल आरम्भ हो गया। हमारे दोनों प्रारम्भिक बल्लेबाजों ने बहुत सूझ-बूझ और गति के साथ स्कोर को 80 तक पहुँचा दिया। पन्द्रह ओवर का खेल हो चुका था। दूसरी टीम के कप्तान ने अब स्वयं गेंद सँभाली और अपने क्षेत्ररक्षक चारों ओर फैला दिये। उसने बल्लेबाजों को खुलकर खेलने के लिए ललचाया। पहली ही गेंद पर चौका लगा। अगली गेंद बल्लेबाज को चकमा दे गयी। आरम्भिक जोड़ी टूट गयी। गेंदबाजों के हौसले बढ़े और उन्होंने जल्दी-जल्दी चार विकेट ले (UPBoardSolutions.com) लिये। शेष 25 ओवरों में 90 रन बनाने थे और छह विकेट हाथ में.थे। कोई मुश्किल लक्ष्य नहीं था, लेकिन कहते हैं कि क्रिकेट की हर गेंद निर्णायक हो सकती है। अब दो ओवर का खेल शेष था और जीत के लिए दस रन बनाये जाने थे। दोनों बल्लेबाजों ने आपसी तालमेल से विकेट के बीच दौड़ते हुए .1-1 रन लेना शुरू किया और पाँच रन बना लिये। क्षेत्ररक्षकों को करीब बुलाकर विपक्षी टीम के कप्तान ने उन्हें इस तरह रन बनाने से रोकना चाहा, लेकिन तभी बल्लेबाज ने स्थिति को समझते हुए गेंद को ऊपर हवा में उछाल दिया। गेंद सीमा-रेखा से बाहर हो गयी और हमारी टीम ने मैच में रोमांचक विजय प्राप्त की।

पुरस्कार-वितरण-खेल की समाप्ति पर मुख्य अतिथि ने पुरस्कार-वितरण किये। हमारी टीम के प्रारम्भिक बल्लेबाज को ‘मैन ऑफ द मैच’ घोषित किया गया और टीम के कप्तान को विजेता शील्ड प्रदान की गयी। इस प्रकार यह क्रिकेट प्रतियोगिता सम्पन्न हुई, जिसके रोमांचक क्षण आज भी मेरी स्मृति में ताजा बने हुए हैं।

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उपसंहार–हम देख रहे हैं कि एशियन एवं ओलम्पिक खेलों की पदक तालिका में भारतवर्ष पिछड़ता जा रहा है। यह दयनीय स्थिति है। जनसंख्या में चीन के पश्चात् दूसरा स्थान रखने वाला, कभी हॉकी में स्वर्ण पदक विजेता रहा भारत आज कहीं नहीं जम पा रहा है और आजादी के छः दशक बाद भी खेलों के क्षेत्र में उसे निराशा ही हाथ लग रही है।

दुःख की बात है कि हम हर क्षेत्र में पिछड़े होने के प्रभाव से अभी तक मुक्त नहीं हो पाये हैं। (UPBoardSolutions.com) इस स्थिति से उबरने के लिए हमें खिलाड़ियों के उचित प्रशिक्षण, निष्पक्ष चयन व ईमानदार चयनकर्ताओं की अति आवश्यकता है।

55. रोचक यात्रा का वर्णन [2009, 10, 15]

सम्बद्ध शीर्षक

  • किसी रेल यात्रा का वर्णन
  • किसी यात्रा का वर्णन [2011]

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. यात्रा की तैयारी और प्रस्थान,
  3. मार्ग के दृश्य,
  4. वांछित स्थान पर पहुँचना और वहाँ के दर्शनीय स्थलों का वर्णन,
  5. वापसी,
  6. उपसंहार।।

प्रस्तावना–प्राय: हर व्यक्ति के जीवन में एक निश्चित दिनचर्या बन जाया करती है। वह एक बँधीबँधाई दिनचर्या के अनुसार कार्य करते रहने पर कभी-कभी ऊब जाता है और अपने जीवन-चक्र में बदलाव चाहता है। हर प्रकार के परिवर्तन के लिए यात्रा का अत्यधिक महत्त्व है। यात्रा अथवा नये स्थानों पर भ्रमण से व्यक्ति के जीवन में आयी नीरसता समाप्त हो जाती है और वह अपने अन्दर एक नया उत्साह पाता है। इतना ही नहीं, इन यात्राओं से व्यक्ति के अन्दर आत्मविश्वास और साहस उत्पन्न होता है। इससे विभिन्न व्यक्तियों के बीच आत्मीयता भी बढ़ती है और हमारे व्यावहारिक ज्ञान की वृद्धि होती है।

यात्रा की तैयारी और प्रस्थान-मई का महीना था। हमारी परीक्षाएँ अप्रैल में ही समाप्त हो चुकी थीं। मेरे कुछ साथियों ने आगरा घूमने का कार्यक्रम बनाया। मैंने अपने पिताजी और माताजी से इसके लिए स्वीकृति ले ली और विद्यालय के माध्यम से रियायत प्राप्त करके रेलवे के (UPBoardSolutions.com) आरक्षित टिकट बनवा लिये थे। सभी साथी अपना-अपना सामान लेकर मेरे यहाँ एकत्रित हो गये। घर से सभी छात्र एक थ्री-व्हीलर द्वारा स्टेशन पहुँचे। प्लेटफॉर्म पर बहुत भीड़ थी। कुछ समय के पश्चात् गाड़ी आयी। हमने अपना सामान गाड़ी में चढ़ाया। प्लेटफॉर्म पर सामान बेचने वालों की आवाजों से बहुत शोर हो रहा था, तभी गाड़ी ने सीटी दे दी। गाड़ी के चलने पर ठण्डी हवा लगी तो सभी को राहत मिली।

मार्ग के दृश्य-हम सभी अपनी-अपनी सीटों पर बैठ चुके थे। डिब्बे में इधर-उधर निगाह घुमायी तो देखा कि कुछ लोग बैठे हुए ताश खेल रहे हैं, तो कोई उपन्यास पढ़कर मन बहला रहा है। कुछ लोग बैठे हुए ऊँघ रहे थे। मैं भी अपने साथियों के साथ गपशप कर रहा था। खिड़की से बाहर झाँकने पर मुझे पेड़-पौधे तथा खेत-खलिहान पीछे की ओर दौड़ते नजर आ रहे थे। सभी दृश्य बड़ी तेजी से पीछे छूटते जा रहे थे। गाड़ी छोटे-बड़े स्टेशनों पर रुकती हुई अपने गन्तव्य की ओर निरन्तर बढ़ती ही जा रही थी। हमने कुछ समय ताश खेलकर बिताया। साथ लाये भोजन और फल मिल-बाँटकर खाते-पीते हम सब यात्रा का पूरा आनन्द ले रहे थे।

एक स्टेशन पर गाड़ी रुकते ही अचानक कानों में आवाज पड़ी कि ‘पेठा, आगरे का मशहूर पेठा’। हम सब अपना-अपना सामान सँभालते हुए नीचे उतरे।।

वांछित स्थान पर पहुँचना और वहाँ के दर्शनीय स्थलों का वर्णन–हम सभी साथी एक धर्मशाला में जाकर ठहर गये। धर्मशाला में पहुँचकर हमने मुँह-हाथ धोकर अपने को तरोताजा किया। शाम के सात बज चुके थे। इसलिए हम लोग शीघ्र ही भोजन करके धर्मशाला के आस-पास ही घूमने के लिए निकल गये। अगले दिन 11.00 बजे दिन में हम लोग सिटी बस द्वारा ताज देखने के लिए चल दिये। भारत के गौरव और संसार के गिने-चुने आश्चर्यों में से एक ताजमहल के अनूठे सौन्दर्य को देखकर हम सभी स्तम्भित रह गये। श्वेत संगमरमर पत्थरों से निर्मित ताज दिन में भी शीतल किरणों की वर्षा करता प्रतीत हो रहा था।

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ताजमहल का निर्माण मुगल सम्राट् शाहजहाँ ने अपनी बेगम मुमताज महल की स्मृति में कराया था। यह एक सफेद संगमरमर के ऊँचे चबूतरे पर बना हुआ है। इस चबूतरे के चारों कोनों पर चार मीनारें बनी हुई। हैं। मुख्य इमारत इस चबूतरे के बीचों-बीच बनी हुई है। (UPBoardSolutions.com) इमारत के ऊपरी भाग में चारों ओर कुरान की आयतें खुदी हुई हैं। इस इमारत के चारों ओर सुन्दर बगीचे बने हुए हैं, जो इसके सौन्दर्य में चार चाँद लगा रहे हैं। वास्तव में यह भारतीय और यूनानी शैली में बनी अद्वितीय और अनुपम इमारत है, जिसे देखने के लिए दुनिया के विभिन्न भागों से प्रति वर्ष लाखों व्यक्ति आते हैं।

दूसरे दिन हमने आगरे को लाल किला तथा दयाल बाग देखने का कार्यक्रम बनाया। इन भवनों के अपूर्व सौन्दर्य ने हम सबका मन मोह लिया। आगरे का लाल किला सम्राट् अकबर द्वारा बनवाया गया है। इस विशाल किले को देखने के लिए वैसे तो कई दिन भी कम हैं, किन्तु हम लोगों ने जल्दी-जल्दी इसके तमाम महत्त्वपूर्ण स्थलों को देखा। यहीं से हम लोग बस द्वारा दयाल बाग पहुँच गये। यहाँ पर राधास्वामी मत वाले एक इमारत का निर्माण पिछले कई वर्षों से करवा रहे हैं, पर अभी भी यह अधूरी ही है। इस इमारत की भव्यता और सौन्दर्य को देखकर यह कहा जा सकता है कि जिस समय यह पूर्ण होगी, निश्चित ही स्थापत्य कला का एक अनुपम उदाहरण होगी।

वापसी-आगरा की आकर्षक और सजीव स्मृतियों को मन में सँजोये, पेठे और नमकीन की खरीदारी कर तथा काँच के चौकोर बक्से में बन्द ताज की अनुकृति लिये हुए हम लोग वापस लौटे। इस प्रकार हमारी यह रोचक यात्रा सम्पन्न हुई।

उपसंहार—घर लौट आने पर मैं प्रायः सोचता कि कूप-मण्डूकता के विनाश के लिए समय-समय पर प्रत्येक व्यक्ति को विविध स्थलों की यात्रा अवश्य करनी चाहिए; क्योंकि इससे कल्पना और यथार्थ का भेद समाप्त होता है और जीवन की वास्तविकता से साक्षात्कार भी होता है। आगरा की यात्रा ने मुझे ढेर सारे नवीन अनुभवों तथा प्रत्यक्ष ज्ञान से साक्षात्कार कराया है।

56. विद्यालय का वार्षिकोत्सव [2011, 12, 13, 14, 15]

सम्बद्ध शीर्षक

  • किसी समारोह का आँखों देखा हाल
  • मेरे विद्यालय का वार्षिक समारोह
  • विद्यालय का पर्वायोजन

रूपरेखा—

  1. प्रस्तावना,
  2. उत्सव की तैयारी,
  3. मुख्य अतिथि का आगमन और उत्सव का आरम्भ,
  4. रोचक कार्यक्रम,
  5. उत्सव का समापन और मुख्य अतिथि का सन्देश,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना-मानव-जीवन संघर्षों का जीवन है। समय-समय पर आयोजित उत्सव उसके जीवन में नवस्फूर्ति भर देते हैं। उसका हृदय उल्लास से भर जाता है और वह कठिनाइयों से जूझता हुआ जीवन-पथ पर आगे बढ़ता चलता है। इसी को दृष्टि में रखकर विभिन्न विद्यालयों में अनेक उत्सवों का आयोजन किया जाता है। हमारे विद्यालय में भी प्रतिवर्ष खेलकूद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, यही वार्षिकोत्सव कहलाता है जो (UPBoardSolutions.com) बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। विद्यालय का वार्षिकोत्सव मेरा सर्वप्रिय उत्सव रही है। मैं बहुत दिनों पहले से ही इस उत्सव पर अपने कार्यक्रम को प्रस्तुत करने की तैयारी में जुट जाता हूँ। यह उत्सव प्राय: जनवरी माह में मनाया जाता है। इसके साथ ही वार्षिकोत्सव में विद्यालय की भावी प्रगति की रूपरेखा प्रस्तुत की जाती है।

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उत्सव की तैयारी-इस वर्ष 4-5-6 जनवरी को विद्यालय का वार्षिकोत्सव होना निश्चित हुआ। प्रधानाचार्य द्वारा इसकी घोषणा से सभी विद्यार्थियों में आनन्द की लहर दौड़ गयी। उत्सव प्रारम्भ होने में 20 दिन का समय शेष था। अब जोर-शोर से खेलकूद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारी शुरू हो गयी। कुछ छात्र लम्बी कूद, ऊँची कूद, भाला फेंक, गोला फेंक में जुटे हुए थे तो कुछ वाद-विवाद, अन्त्याक्षरी, गीतों, नाटक आदि के पूर्वाभ्यास में। इन तैयारियों के लिए प्रधानाचार्य महोदय ने कुछ समय निर्धारित कर दिया और शेष समय में पढ़ाई नियमित रूप से जारी रखने का निर्देश दिया। सभी छात्रों में नया उत्साह और नया जोश था। विद्यालय की विधिवत् सफाई शुरू हो गयी थी।

मुख्य अतिथि का आगमन और उत्सव का आरम्भ-न जाने कब प्रतीक्षा के दिन समाप्त हुए और 4 जनवरी आ गयी, पता ही नहीं चला। इस दिन खेल-कूद की प्रतियोगिताओं का आयोजन था। मैदान हरा-भरा था। चूने की सफेदी से बनी रेखाएँ और रंग-बिरंगी झण्डियाँ मैदान की शोभा को द्विगुणित कर रही थीं। जिला विद्यालय निरीक्षक हमारे खेल-कूद कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे। हमारे प्रधानाचार्य और गणमान्य अतिथि खेल के मैदान पर पहुँचे। सभी ने खड़े होकर तालियों की गड़गड़ाहट के साथ उनका अभिवादन किया। इसके बाद खेलकूद प्रतियोगिता आरम्भ हुई।

रोचक कार्यक्रम-खेलों की शुरुआत ने मैदान में हलचल मचा दी। भिन्न-भिन्न प्रकार के खेलों के : लिए अलग-अलग स्थान निर्धारित थे। दिनभर खेल प्रतियोगिताएँ चलती रहीं। मैंने भी ऊँची कूद में भाग लिया और नया कीर्तिमान स्थापित कर खुशी से फूला न समाया। सभी कार्यक्रम बहुत सुव्यवस्थित एवं आकर्षक ढंग से सम्पादित होते रहे।

अगले दिन शाम चार बजे से विद्यालय प्रांगण में बने भव्य पण्डाल में अन्त्याक्षरी कार्यक्रम का आरम्भ हुआ। कार्यक्रम बहुत रोचक रहा। इसके बाद वाद-विवाद प्रतियोगिता शुरू हुई, जिसका विषय था-‘आज की शिक्षा-नीति का देश की प्रगति में योगदान’। इसके (UPBoardSolutions.com) पक्ष-विपक्ष में वक्ताओं ने अपने-अपने विचार रखे और जोरदार तर्क प्रस्तुत किये। विद्यालय के 12वीं कक्षा के छात्र पंकज गुप्ता ने प्रथम और निर्मल जैन ने द्वितीय स्थान प्राप्त किया। रात्रि के आठ बजे से सांस्कृतिक कार्यक्रम रखा गया था।. सांस्कृतिक कार्यक्रमों में गीत, नाटक, एकांकी, पैरोडी, समूह गान आदि का आयोजन किया गया था। रात्रि के लगभग 12 बजे कार्यक्रम की समाप्ति हुई।

तीसरे दिन का उत्सव प्रदर्शनी और पुरस्कार वितरण के लिए निश्चित था। विद्यालय के बड़े हॉल में छात्रों द्वारा बनाये गये चित्र, मूर्तियों और हस्तनिर्मित अनेक कलात्मक कृतियों की प्रदर्शनी सजी हुई थी। सभी दर्शकों ने छात्रों के सुन्दर व कलात्मक प्रयासों की बहुत सराहना की। इसके बाद तीनों दिनों के कार्यक्रमों के विजेताओं और श्रेष्ठ कलाकारों को पुरस्कार वितरित किये गये। पुरस्कार समारोह के मुख्य अतिथि हमारे क्षेत्र के माननीय उपशिक्षा निदेशक महोदय थे।

उत्सव का समापन और मुख्य अतिथि का सन्देश-पुरस्कार वितरण के बाद हमारे प्रधानाचार्य ने विद्यालय की वर्षभर की प्रगति का विवरण प्रस्तुत किया और वार्षिकोत्सव की सफलता के लिए सम्बन्धित सभी अध्यापकों और विद्यार्थियों का आभार प्रकट किया।

मुख्य अतिथि ने अपने सन्देश में सर्वप्रथम अपने हार्दिक स्वागत पर आभार प्रकट किया और विद्यालय की प्रगति तथा वार्षिकोत्सव के सफल आयोजन पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने विजेताओं को बधाई दी और अन्य छात्रों को भी आगामी वार्षिकोत्सव में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया।

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उपसंहार–हमारे विद्यालय का वार्षिकोत्सव बहुत सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। इस उत्सव पर सभी छात्रों का हृदय आनन्द-विभोर हो गया। प्रत्येक कार्यक्रम बहुत रोचक और आकर्षक था। सचमुच ऐसे उत्सवों से छात्रों की बहुमुखी प्रतिभा प्रकट होती है और उनके व्यक्तित्व के विकास में सहायता मिलती है। इसलिए इस प्रकार के उत्सवों का आयोजन प्रत्येक विद्यालय में किया जाना चाहिए।

57. मनोरंजन के साधन

सम्बद्ध शीर्षक

  • मनोरंजन के आधुनिक साधन [2014]

रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना : जीवन में मनोरंजन का महत्त्व,
  2. मनोरंजन के साधनों का विकास,
  3. आधुनिक काल में मनोरंजन के विविध साधन,
  4. उपसंहार।।

प्रस्तावना : जीवन में मनोरंजन का महत्त्व-जीवन में मनोरंजन, सब्जी में नमक की भाँति आवश्यक है। यह मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता है। यह उसे प्रसन्नचित्त बनाने की गारण्टी तथा जीवन के कटु अनुभवों को भुलाने की ओषधि दोनों ही हैं। एक नन्हा शिशु भी इसका आकांक्षी है और एक वयोवृद्ध व्यक्ति के लिए भी यह उतना ही महत्त्वपूर्ण है। बच्चे को बेवजह रोना इस बात का संकेत है कि वह उकता रहा है। यदि वृद्ध सनकी और चिड़चिड़े हो उठते हैं तो उसका कारण भी मनोरंजन का अभाव ही है।

मनोरंजन वस्तुतः हमारे जीवन की सफलता का मूल है। मनोरंजनरहित जीवन हमारे लिए भारस्वरूप बन जाएगा। यह केवल हमारे मस्तिष्क के लिए ही नहीं, शारीरिक स्वास्थ्य-वृद्धि के लिए भी परमावश्यक है। मनोरंजन के विविध रूपों-खेलकूद, अध्ययन व सुन्दर दृश्यों के अवलोकन से हमारा हृदय असीम आनन्द से भर उठता है। इससे शरीर के रक्त-संचार को नवीन गति और स्फूर्ति मिलती है तथा हमारे स्वास्थ्य की अभिवृद्धि भी होती है।

मनोरंजन के साधनों का विकास-मनोरंजन की इसी गौरव-गरिमा के कारण बहुत प्राचीन काल से ही मानव-समाज मनोरंजन के साधनों का उपयोग करता आया है। शिकार खेलना, रथ दौड़ाना आदि विविध कार्य प्राचीन काल में मनोरंजन के प्रमुख साधन थे, परन्तु आजकल युग के परिवर्तन के साथ-साथ मनोरंजन के साधन भी बदल गये हैं। विज्ञान ने मनोरंजन के क्षेत्र में क्रान्ति कर दी है। आज कठपुतलियों का नाच जनसमाज की आँखों के लिए उतना प्रिय नहीं रहा, जितना कि सिनेमा के परदे पर हँसते-बोलते नयनाभिराम दृश्य।

आधुनिक काल में मनोरंजन के विविध साधन :
(क) वैज्ञानिक साधन–सिनेमा, रेडियो, टेलीविजन आदि विज्ञान प्रदत्त मनोरंजन के साधनों ने आधुनिक जनसमाज में अत्यन्त लोकप्रियता प्राप्त कर ली है। रेडियो तो मनोरंजन का पिटारा है ही इसे अपने घर में रखे सुन्दर गाने, भाषण, समाचार आदि सुन सकते हैं। टेलीविजन तो इससे भी आगे बढ़ गया है। विविध कार्यक्रमों, खेलों आदि के सजीव प्रसारण को देखकर पर्याप्त मनोरंजन किया जा सकता है।
(ख) अध्ययन-साहित्य का अध्ययन भी मनोरंजन की श्रेणी में आता है। यह हमें मानसिक आनन्द देता है और चित्त को प्रफुल्लित करता है। साहित्य द्वारा होने वाले मनोरंजन से मन की थकान ही नहीं मिटती, वरन् ज्ञान की अभिवृद्धि भी होती है।
(ग) ललित कलाएँ–संगीत, नृत्य, अभिनय, चित्रकला आदि ललित कलाएँ भी मनोरंजन के उत्कृष्ट साधन हैं। संगीत के मधुर स्वरों में आत्म-विस्मृत करने की अपूर्व शक्ति होती है।
(घ) खेल-ललित कलाओं के साथ-साथ खेल भी मनोरंजन के प्रिय विषय हैं। हॉकी, फुटबॉल, क्रिकेट, टेनिस, बैडमिण्टन आदि खेलों से खिलाड़ी एवं दर्शकों का बहुत मनोरंजन होता है। विद्यार्थी वर्ग के लिए खेल बहुत ही हितकर हैं। इनके द्वारा उनका मनोरंजन ही नहीं होता, अपितु स्वास्थ्य भी ठीक रहता है। गर्मी की साँय-साँय करती लूओं से भरे वातावरण में घर बैठकर साँप-सीढ़ी, लूडो, ताश, कैरम, शतरंज खूब खेले जाते हैं।
(ङ) अन्य साधन–कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं, जिन्हें अभीष्ट कार्य को पूर्ण करने में ही आनन्द की प्राप्ति हो जाती है। कुछ लोग अपने कार्य-स्थलों से लौटने के बाद अपने उद्यान को ठीक प्रकार से सँवारने में ही घण्टों व्यतीत कर देते हैं। कुछ लोगों का मनोरंजन फोटोग्राफी होता है। कहीं मन-लुभावना आकर्षक-सा दृश्य दिखाई दिया और उन्होंने उसे कैमरे में कैद कर लिया। इसी से मन प्रफुल्लित हो उठा।

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मेले-तमाशे, सैर-सपाटे, यात्रा-देशाटन आदि मनोरंजन के विविध साधन हैं। इनसे हमारा मनोरंजन तो होता ही है, साथ-ही-साथ हमारा व्यावहारिक ज्ञान भी बढ़ता है। राहुल सांकृत्यायनं तो देशाटन द्वारा अर्जित ज्ञान के कारण ही महापण्डित कहलाये। सन्तों ने तो हर काम को हँसते-खेलते अर्थात् मनोरंजन करते हुए करने को कहा है, यहाँ तक कि ध्यान (meditation) भी मन को प्रसन्न करते हुए किया जा सकता। है-हसिबो खेलिबो धरिबो ध्यानम्।

उपसंहार-निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि जीवन में अन्य कार्यों की भाँति मनोरंजन भी उचित मात्रा में होना आवश्यक है। सीमा से अधिक मनोरंजन समय जैसी अमूल्य सम्पत्ति को नष्ट करता है। जिस प्रकार आवश्यकता से अधिक भोजन अपच का कारण बन शरीर के रुधिर-संचरण में विकार उत्पन्न करता है, उसी प्रकार अधिक मनोरंजन भी हानिकारक होता है। हमें चाहिए कि उचित मात्रा में मनोरंजन करते हुए अपने जीवन को उल्लासमय और सरल बनाएँ।

58. यातायात के नियम

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. नियम-पालन की आवश्यकता,
  3. यातायात के नियम,
  4. उपसंहार।

प्रस्तावना-हम अपने अधिकारों और स्वतन्त्रता का उपभोग तभी तक कर सकते हैं, जब तक कि वे दूसरे लोगों के अधिकारों व स्वतन्त्रता में बाधक न हों। कुछ ऐसे नियम होते हैं जिनका हमें पालन करना ही चाहिए। जब हम नियमों का पालन नहीं करते अथवा बिना सोचे-समझे काम करते हैं तब हम दूसरों के लिए असुविधा पैदा करते हैं।

इसी प्रकार यातायात के नियम हैं जो सड़क के प्रत्येक प्रयोगकर्ता को मानने चाहिए। गाड़ियों के चालकों, साइकिल सवारों तथा पैदल यात्रियों सभी को इन नियमों का पालन करना चाहिए। यदि वे उन्हें नहीं मानेंगे तब वे स्वयं और अन्य व्यक्तियों को भी खतरे में डालेंगे। यातायात के संकेत जानने भी आवश्यक हैं क्योंकि उनके न जानने पर दुर्घटनाओं का अत्यधिक खतरा रहता है।

नियम-पालन की आवश्यकता–एक दिन एक सज्जन अपनी टहलने की छड़ी को अपने हाथों में . (UPBoardSolutions.com) गोल-गोल घुमाते हुए और अपने को महत्त्वपूर्ण व्यक्ति दर्शाते हुए किसी भीड़-भाड़ वाली सड़क पर टहले रहे थे। उनके पीछे आते हुए एक व्यक्ति ने आपत्ति की, “आपको अपनी टहलने की छड़ी इस तरह गोल-गोल नहीं घुमानी चाहिए।’

“मैं अपनी टहलने की छड़ी से जो चाहूँ करने के लिए स्वतन्त्र हूँ।” उन सज्जन ने तर्क दिया।

आप वास्तव में स्वतन्त्र हैं,” दूसरे व्यक्ति ने कहा, “परन्तु आपको यह मालूम होना चाहिए कि आपकी स्वतन्त्रता वहीं समाप्त हो जाती है, जहाँ तक वह मेरी स्वतन्त्रता में बाधक नहीं होती।

निश्चित रूप से हम दूसरों की स्वतन्त्रता में जानबूझकर हस्तक्षेप नहीं करते। परन्तु कभी-कभी अनजाने में हम दूसरों के कार्यों में बाधक बन जाते हैं। यह उस समय होता है जब हम कोई कार्य बिना सोचे-समझे करते हैं या उन नियमों का पालन नहीं करते जिनका हमें पालन करना चाहिए।

यातायात के नियम-यातायात के ऐसे कोई नियम नहीं हैं जो हमें बताएँ कि सभी मामलों में हमें किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए और किस प्रकार का नहीं। परन्तु कुछ मामलों में ऐसे नियम हैं। जिनका हम सबको पालन करना चाहिए। इन नियमों का उद्देश्य प्रत्येक के लिए सड़क के यातायात को सुरक्षित बनाना है। आजकल हमारे नगरों और कस्बों की सड़कें यातायात के कारण अत्यधिक व्यस्त होती चली जा रही हैं। दिन में अधिकांश समय तक सड़कें कुछ धीमे तथा कुछ तेज गति के वाहनों से भरी रहती हैं। यदि लोग यातायात के नियमों का उल्लंघन करते हैं, तो देर-सबेर दुर्घटनाएँ हो सकती हैं। पैदल चलने वालों, गाड़ियों और सड़क के प्रत्येक प्रयोगकर्ता के लिए इन नियमों को जानना आवश्यक है।

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पैदल चलने वालों के लिए एक महत्त्वपूर्ण नियम है। यदि फुटपाथ है तो उन्हें फुटपाथ पर चलना चाहिए। जहाँ कोई फुटपाथ नहीं है, वहाँ पर पैदल चलने वालों को सड़क के बायीं ओर किनारे-किनारे चलना चाहिए। यदि वे इस नियम का पालन नहीं करते हैं, तो वे अपने और दूसरों के लिए भी खतरा पैदा करेंगे। एक वाहन चालक पैदल चलने वाले को बचाने के लिए अचानक ही अपने वाहन को मोड़ सकता है। और ऐसा करने में वह किसी दूसरे को टक्कर मार सकता है, अपने वाहन पर सन्तुलन खो सकता है और फुटपाथ पर अनेक लोगों को टक्कर मारकर गिरा सकता है।

सभी वाहनों को यथासम्भव अपनी बायीं ओर चलना चाहिए और सड़क का दाहिना आधा भाग विपरीत दिशा से आने वाले वाहन के लिए छोड़ देना चाहिए। भारत के समस्त भागों में यातायात का यही नियम प्रचलित है। साइकिल सवारों को सदैव सड़क के किनारे चलना चाहिए और पैदल यात्रियों अथवा वाहनों के मार्ग में कदापि बाधक नहीं बनना चाहिए। हम अक्सर दो या अधिक साइकिल-सवारों को सड़क के बीच में एक-दूसरे के बगल में जाता हुआ देखते हैं, यातायात के नियम इस बात की आज्ञा नहीं देते। जहाँ सड़क बहुत व्यस्त है, वहाँ इससे यातायात में बाधा उपस्थित होगी और दुर्घटनाएँ होंगी।

आगे जा रहे वाहन को पार करने का नियम भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। किसी भी वाहन को दूसरे वाहन से आगे निकलने के लिए दायीं ओर से जाना चाहिए अन्यथा वह उस वाहन से टकरा सकता है, जो बायीं ओर रहने का प्रयत्न कर रहा है।

जहाँ सड़कें एक-दूसरे को काटती हैं वहाँ वाहन के पहले निकलने के अधिकार के बारे में भी नियम है। ऐसे स्थानों पर, साधारणतया, एक गोल चक्कर बना रहता है। जो वाहन दायीं ओर से आ रहा है, उसे बायीं ओर से आने वाले वाहन से पहले मार्ग पाने का अधिकार है। यदि प्रत्येक चालक इस नियम का पालन करे तो गोल-चक्करों पर यातायात सुचारु रूप से चलेगा और दुर्घटनाओं से बचा जा सकेगा।

वाहनों के चालकों को सही संकेत देने में कभी भूल नहीं करनी चाहिए, अन्यथा दुर्घटना होने का खतरा बना रहेगा। दाएँ-बाएँ मुड़ने, चाल मन्दी करने और रुकने तथा दूसरी गाड़ियों को आगे निकल जाने देने के संकेत हैं। साइकिल-सवार, यह सोचकर कि ये संकेत केवल मोटर-चालकों के लिए ही महत्त्वपूर्ण हैं, प्रायः संकेत देने में लापरवाही करते हैं। परन्तु सड़क का प्रयोग करने वाले सभी व्यक्तियों को, चाहे वे साइकिल-सवार हों या मोटरचालक, सही संकेत देने चाहिए, जिससे सड़क पर चलने वाले दूसरे लोग सचेत हो जाएँ। पैदल चलने वालों को भी इन संकेतों का ज्ञान होना चाहिए, जिससे वे यह पता लगा सकें कि सड़क पर चलने वाला वाहन किधर होकर जा रहा है। जब दो मोटर-चालक रात्रि के समय विपरीत दिशाओं से आते हुए अपनी गाड़ियों के प्रकाश को मन्द कर देते हैं तो वे एक-दूसरे के कार्य में सहायक होते हैं।

इस प्रकार के सभी कार्यो में हम अपनी थोड़ी-सी स्वतन्त्रता और सुविधा का त्याग करते हैं जिससे अन्य व्यक्ति अपनी स्वतन्त्रता और सुविधा का आनन्द ले सकें और जीवन सबके लिए सुगमतापूर्वक चल सके।

उपसंहार–इन सभी बातों से अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सार्वजनिक सड़क का प्रयोग करने वाले व्यक्ति को यातायात-नियन्त्रण कार्य पर तैनात पुलिसकर्मी की आज्ञा का पालन करना चाहिए। यह सभी नियमों में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। जरा कल्पना कीजिए कि पैदल चलने वालों और तेज गति से चलने वाले वाहनों से भरी व्यस्त सड़क पर यदि पुलिसकर्मी तैनात न हो तो क्या दशा होगी? आप समझ सकते हैं। कि पुलिसकर्मी कितना महत्त्वपूर्ण हैं और आप उसके आदेश को सदैव पालन करने लगेंगे और यदि आप यह समझते हैं कि वह गलत है और आप ठीक हैं, तो भी आप उससे कभी नाराज नहीं होंगे।

59. यदि मैं अपने विद्यालय का प्रधानाचार्य होता [2014]

रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना,
  2. मेरी कल्पना प्रधानाचार्य बनना,
  3. अध्यापकों पर ध्यान देना,
  4. पुस्तकालय, खेल आदि का स्तर सुधारने पर बल,
  5. विद्यालय की दशा सुधारना,
  6. शिक्षा-परीक्षा पद्धति में परिवर्तन,
  7. उपसंहार।।

प्रस्तावना-कल्पना भी क्या चीज होती है। कल्पना के घोड़े पर सवार होकर मनुष्य न जाने कहाँ-कहाँ की सैर कर आता है। यद्यपि कल्पना की कथाओं में वास्तविकता नहीं होती तथपि कल्पना में जहाँ मनुष्य क्षण भर के लिए आनन्दित होता है, वहीं वह अपने लिए कतिपय आदर्श भी निर्धारित कर लेता है। इसी कल्पना से लोगों ने नये कीर्तिमान भी स्थापित किये हैं। एडीसन, न्यूटन, राइट बंधु आदि सभी वैज्ञानिकों ने कल्पना का सहारा लेकर ही ये नये आविष्कार किये। कल्पना में मनुष्य स्वयं को सर्वगुणसम्पन्न भी समझने लगता है।

मेरी कल्पना प्रधानाचार्य बनना-मेरी कल्पना अपने आप में अत्यन्त सुखद है कि काश मैं अपने विद्यालय का प्रधानाचार्य होता। प्रधानाचार्य का पद गौरव एवं उत्तरदायित्वपूर्ण होता है। मैं प्रधानाचार्य होने पर अपने सभी कर्तव्यों का भली-भाँति पालन करता। हमारे विद्यालय में तो प्रधानाचार्य यदा-कदा ही दर्शन देते हैं जिससे विद्यार्थी और अध्यापकगण कृतार्थ हो जाते हैं। मैं नित्य-प्रति विद्यालय आता। अपने विद्यार्थियों व अध्यापकगणों की समस्याएँ सुनता और तदनुरूप उनका समाधान करता। अध्यापकों पर ध्यान देना-सामान्यत: विद्यालयों में कुछ अध्यापक अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने ही आते हैं। वे स्वतन्त्र व्यवसाय करते हैं तथा (UPBoardSolutions.com) विद्यार्थियों को पढ़ाना अपना कर्तव्य नहीं समझते। हमारे गणित के अध्यापक शेयरों का धन्धा करते हैं। मन्दी आने पर वे सारा क्रोध विद्यार्थियों पर निकालते हैं। यदि कोई विद्यार्थी उनसे प्रश्न हल करवाने चला जाता है तो वे उसकी पिटाई कर देते हैं। अंग्रेजी के अध्यापक बीमा कम्पनी के एजेन्ट हैं। वे अभिभावकों को बीमा करवाने की नि:शुल्क सलाह देते रहते हैं। अधिकांश अध्यापक ट्यूशन पढ़ाने के शौकीन हैं। वे कक्षा में बिल्कुल नहीं पढ़ाते। जो छात्र उनसे ट्यूशन नहीं पढ़ते, उन्हें वे अनावश्यक रूप से परेशान करते हैं। यहाँ तक कि उनको परीक्षाओं में भी असफल कर देते हैं। यदि मैं अपने विद्यालय का प्रधानाचार्य होता तो सर्वप्रथम अध्यापकों की बुद्धि की इस मलिनता को दूर करता। ट्यूशन पढ़ाने को निषेध घोषित करता तथा ट्यूशन पढ़ाने वालों को दण्डित करता। जो अध्यापक अपने कर्तव्यों को पूरा नहीं करते उनको विद्यालय से निकालने अथवा उनके स्थानान्तरण की संस्तुति कर देता। सभी अध्यापकों को आदर्श अध्यापक बनने के लिए येन-केन प्रकारेण विवश कर देता।

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पुस्तकालय, खेल आदि का स्तर सुधारने पर बल-हमारे विद्यालय के पुस्तकालय की दशा अत्यन्त शोचनीय हैं। छात्रों को पुस्तकालय से अपनी रुचि एवं आवश्यकता की पुस्तकें नहीं मिलती। मैं विद्यालय के पुस्तकालय की दशा सुधारता। शिक्षाप्रद पुस्तकों तथा महान साहित्यकारों की पुस्तकों की पर्याप्त मात्रा में प्रतियाँ खरीदवाता। किसी भी विषय की पुस्तकों का पुस्तकालय में अभाव नहीं रहने देता और निर्धन विद्यार्थियों को नि:शुल्क पुस्तकें भी उपलब्ध कराता।।

हमारे विद्यालय में खेलों का आवश्यक सामान नहीं है। प्रधानाचार्य होने पर मैं विद्यार्थियों की आवश्यकतानुसार खेल का सामान उपलब्ध करवाता। विद्यालय की टीम के जीतने पर खिलाड़ियों को पुरस्कृत कर उनका मनोबल बढ़ाता। अपने विद्यालय की टीमों को खेलने के लिए बाहर भेजता, साथ ही अपने विद्यालय में भी नये-नये खेलों का आयोजन करता राज्यीय और अन्तर्राज्यीय प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करता।

विद्यालय की दशा सुधारना-मैं विद्यार्थियों से श्रमदान करवाता। श्रमदान के द्वारा विद्यालय के बगीचे में नाना-प्रकार के पेड़-पौधे लगवाता। विद्यार्थियों को पर्यावरण के विषय में सचेत करती। विद्यालय के चारों ओर खुशबूदार फूलों के पौधे लगवाता, जिससे विद्यालय का वातावरण फूलों की सुगन्ध से खुशनुमा हो जाता।

सांस्कृतिक कार्यक्रमों के विषय में मेरा विद्यालय अपने क्षेत्र का सर्वोत्तम विद्यालय होता। संगीत, कला, आदि की शिक्षा की विद्यालय में समुचित व्यवस्था करवाता। प्रत्येक महीने चित्रकला व वाद-विवाद प्रतियोगिता करवाता। विद्यार्थियों के मस्तिष्क में कला के प्रति आकर्षण पैदा करता। इस प्रकार मैं अपने विद्यालय को नवीन रूप प्रदान करता।।

शिक्षा-परीक्षा पद्धति में परिवर्तन-इतना करने के उपरान्त मैं सर्वप्रथम शिक्षा पद्धति में परिवर्तन लाने पर ध्यान केन्द्रित करता। शिक्षा विद्यार्थियों के लिए सामाजिक, नैतिक, बौद्धिक विकास में सहायक होती है। मैं विद्यालय में प्राथमिक शिक्षा पर तो ध्यान देता ही साथ ही व्यावसायिक प्रशिक्षण की भी सुविधा प्रदान करवाता। इस प्रकार विद्यार्थियों को शिक्षा-प्राप्ति के बाद पराश्रित नहीं रहना पड़ता। मैं अपने विद्यालय में हिन्दी को अनिवार्य विषय घोषित करता। इसमें विद्यार्थियों में राष्ट्रभाषा के प्रति सम्मान की भावना जाग्रत होती, साथ ही उनमें देश-प्रेम की भावना भी आती।

हमारे विद्यालय की परीक्षा-प्रणाली बहुत दोषपूर्ण है। परीक्षा से पहले ही विद्यार्थी अत्यधिक तनावग्रस्त हो जाते हैं। मेरे प्रधानाचार्य बनने पर विद्यार्थियों को परीक्षाओं को भूत इस तरह नहीं सताता कि उन्हें अनैतिक विधियाँ अपनाकर परीक्षा उत्तीर्ण करनी पड़े। वार्षिक परीक्षा के साथ-साथ आन्तरिक (UPBoardSolutions.com) मूल्यांकन भी उनकी योग्यता का मापदण्ड होता। लिखित और मौखिक दोनों रूप में परीक्षा होती। शारीरिक स्वास्थ्य भी परीक्षा का एक भाग होता तथा परीक्षा छात्रों के चहुंमुखी विकास का मूल्यांकन करती।

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उपसंहार–यदि मैं प्रधानाचार्य होता तो विद्यालय का रूप ही दूसरा होता। यह सब मेरी कल्पना में रचा-बसा है। यदि मैं प्रधानाचार्य बनूंगा तो अपनी सभी कल्पनाओं को साकार करूंगा, यह मेरा दृढ़ संकल्प है। मैं ऐसी सूझबूझ से विद्यालय का संचालन करूंगा कि राज्य में ही नहीं पूरे देश में मेरे विद्यालय का नाम रोशन हो जायेगा। मुझे आशा है कि भगवान मेरी इसे कल्पना को अवश्य पूरा करेगा।

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 1 (Section 3)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 1 भारत : भौतिक स्वरूप (अनुभाग – तीन)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Social Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 1 भारत : भौतिक स्वरूप (अनुभाग – तीन).

विरत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत का भौगोलिक वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए [2016]
(क) स्थिति एवं विस्तार,
(ख) भू-आकृति (उच्चावच),
(ग) जल-निकास (प्रवाह)।
उत्तर :

(क) भारत की स्थिति एवं विस्तार

हिन्द महासागर के शीर्ष पर स्थित भारत एक विशाल देश है। इसका क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग किमी (2.43%) है। भारत 8°4′ से 37°6′ उत्तरी अक्षांशों और 687′ से 97°25′ पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थित है। निकोबार द्वीप समूह में स्थित ‘इन्दिरा प्वॉइण्ट’ भारत का दक्षिणतम बिन्दु है। मुख्य स्थल पर कन्याकुमारी भारत का सबसे दक्षिण में स्थित बिन्दु है जब कि जम्मू-कश्मीर राज्य में स्थित इन्दिरा कोल’ सबसे उत्तरी बिन्दु। 26 दिसम्बर, 2009 में सूनामी के कारण भारत के सबसे दक्षिणी बिन्दु ‘इन्दिरा प्वॉइण्ट’ ने जल समाधि ले ली। 82°30′ पूर्वी देशान्तर रेखा भारत की प्रामाणिक देशान्तर रेखा है, (UPBoardSolutions.com) जो इलाहाबाद तथा चेन्नई से होकर गुजरती है। कर्क वृत्त (23°30′ उत्तरी अक्षांश) देश के लगभग मध्य से होकर गुजरती है; अत: देश का उत्तरी भाग उपोष्ण (सम-शीतोष्ण) कटिबन्ध में तथा दक्षिणी भाग उष्ण कटिबन्ध में पड़ता है। भारतीय मानक समय रेखा भारत के पाँच राज्यों-उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं आन्ध्र प्रदेश से गुजरती है। भारत का दक्षिणी भाग, जिसमें प्रायद्वीपी-भारत सम्मिलित है, उष्ण कटिबन्ध में आता है। उत्तरी भाग जिसमें मुख्यत: उत्तर का पर्वतीय मैदानी भाग है, उपोष्ण कटिबन्ध में आता है। तीन ओर से सागरों से घिरा होने के कारण यहाँ विशिष्ट मानसूनी जलवायु पायी जाती है, जो देश के समूचे अर्थतन्त्र को प्रभावित करती है। भारत यूरोप से ऑस्ट्रेलिया तथा दक्षिणी और पूर्वी एशियाई देशों के व्यापारिक मार्गों पर स्थित है। . इसलिए प्राचीन काल से ही यहाँ विदेशी व्यापार उन्नत रहा है।

भारतीय उपमहाद्वीप एक सुस्पष्ट भौगोलिक इकाई है, जिसमें एक विशिष्ट संस्कृति का विकास हुआ है। इस महाद्वीप के उत्तर-पश्चिम में पाकिस्तान, केन्द्र में भारत, उत्तर में नेपाल, उत्तर-पूर्व में भूटान तथा पूर्व में बाँग्लादेश सम्मिलित हैं। हिन्द महासागर में स्थित द्वीपीय देश श्रीलंका और मालदीव हमारे दक्षिणी पड़ोसी देश हैं। इन प्रदेशों की भौगोलिक स्थिति, जलवायु, प्राकृतिक मिट्टी तथा जनसंख्या की विशेषताओं में विभिन्नताएँ तथा विविधताएँ होते हुए भी उनमें एकात्मकता दिखायी पड़ती है। इसीलिए इसे उपमहाद्वीप कहा जाता है।

भारत विषुवत् रेखा के उत्तर में स्थित है। इस कारण यह उत्तरी गोलार्द्ध में आता है। प्रधान मध्याह्न रेखा (ग्रीनविच रेखा) के पूर्व में स्थित होने के कारण भारत पूर्वी गोलार्द्ध में आता है। हम जानते हैं कि मध्याह्न रेखा की मध्य स्थिति 90° पूर्वी देशान्तर है, जो भारत से ही होकर गुजरती है। 82°30′ पूर्वी मध्याह्न रेखा भारत की मानक मध्याह्न रेखा है। इससे पूर्वी गोलार्द्ध में भारत की केन्द्रीय स्थिति स्पष्ट हो जाती है। भारत एशिया महाद्वीप के दक्षिण (UPBoardSolutions.com) मध्य प्रायद्वीप में स्थित है। एशियो संसार में सबसे बड़ा तथा सबसे अधिक जनसंख्या वाला महाद्वीप है। अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण ही भारत को प्राचीन काल से ही आर्थिक लाभ प्राप्त हुए हैं।

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(ख) भारत का उच्चावच अथवा प्राकृतिक स्वरूप (बनावट)

उच्चावच से तात्पर्य किसी भू-भाग के ऊँचे व नीचे धरातल से है। सभी प्रकार के पहाड़ी, पठारी व मैदानी तथा मरुस्थलीय क्षेत्र मिलकर किसी क्षेत्र के उच्चावच का निर्माण करते हैं। उच्चावच की दृष्टि से भारत में अनेक विभिन्नताएँ मिलती हैं। इनका मूल कारण अनेक शक्तियों और संचालनों का परिणाम है, जो लाखों वर्ष पूर्व घटित हुई थीं। इसकी उत्पत्ति भूवैज्ञानिक अतीत के अध्ययन से स्पष्ट की जा सकती है। आज से 25 करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप विषुवत् रेखा के दक्षिण में स्थित प्राचीन गोण्डवानालैण्ड का एक भाग था। अंगारालैण्ड नामक एक अन्य प्राचीन भूखण्ड विषुवत् रेखा के उत्तर में स्थित था। दोनों प्राचीन भूखण्डों के मध्य टेथिस नामक एक सँकरा, लम्बा, उथला सागर था। इन भूखण्डों की नदियाँ टेथिस में अवसाद जमा करती रहीं, जिससे कालान्तर में टेथिस सागर पट गया। पृथ्वी की आन्तरिक हलचलों के कारण दोनों भूखण्ड टूटे। गोण्डवानालैण्ड से भारत का प्रायद्वीप अलग हो गया तथा भूखण्डों के टूटे हुए भाग विस्थापित होने लगें। आन्तरिक हलचलों से टेथिस सागर के अवसादों की परतों में भिंचाव हुआ और उसमें विशाल मोड़ पड़े गये। इस प्रकार हिमालय पर्वत-श्रृंखला की रचना हुई। इसी कारण हिमालय को वलित पर्वत कहा जाता है।

हिमालय की उत्पत्ति के बाद भारतीय प्रायद्वीप और हिमालय के मध्य एक खाई या गर्त शेष रह गया। हिमालय से निकलने वाली नदियों ने स्थल का अपरदन करके अवसादों के उस गर्त को क्रमशः भरना शुरू किया जिससे विशाल उत्तरी मैदान की रचना (UPBoardSolutions.com) हुई। इस प्रकार भारतीय उपमहाद्वीप की भू-आकृतिक इकाइयाँ अस्तित्व में आयीं।

भारत एक विशाल देश है। भू-आकृतिक संरचना की दृष्टि से भारत में अनेक विषमताएँ एवं विभिन्नताएँ दृष्टिगोचर होती हैं। भारत का 29.3% भाग पर्वतीय, पहाड़ी एवं ऊबड़-खाबड़, 27.7% भाग पठारी तथा 43% भाग मैदांनी है। भारत में अन्य देशों की अपेक्षा मैदानी क्षेत्रों का विस्तार अधिक है (विश्व की औसत 41%)। देश में एक ओर नवीन मोड़दार पर्वत-श्रृंखलाएँ हैं तो दूसरी ओर विस्तृत तटीय मैदान, कहीं नदियों द्वारा समतल उपजाऊ मैदान हैं तो कहीं प्राचीनतम कठोर चट्टानों द्वारा निर्मित कटा-फटा पठारी भाग है।

(ग) जल-निकास : प्रवाह विस्तृत स्तरीय प्रश्न संख्या 6 देखें।

प्रश्न 2.
भारत को प्रमुख भू-आकृतिक विभागों में बाँटिए और भारतीय प्रायद्वीपीय पठार का वर्णन कीजिए।
या
भारत को भौतिक विभागों में विभाजित कीजिए तथा उनमें से किन्हीं एक का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए [2014]
(क) स्थिति का विस्तार, (ख) प्राकृतिक स्वरूप।
या
भारत को उच्चावच के आधार पर भौतिक विभागों में विभाजित कीजिए तथा उनमें से किसी। एक की स्थिति, विस्तार एवं भौतिक स्वरूप का वर्णन कीजिए। [2012]
या

भारत को विभिन्न भौतिक विभागों में बाँटिए और पूर्वी  तथा पश्चिमी (UPBoardSolutions.com) मैदानों की विशेषताओं का वर्णन कीजिए। भारत को प्राकृतिक भागों में विभक्त कीजिए तथा उनमें से किसी एक की स्थिति, धरातल तथा मानव-जीवन का वर्णन कीजिए। [2016]
या

पूर्वी समुद्र तटीय मैदान की स्थिति एवं विस्तार का वर्णन कीजिए। [2017]
उत्तर :

भारत का प्राकृतिक स्वरूप (बनावट)

भारत एक विशाल देश है। भू-आकृतिक संरचना की दृष्टि से भारत में अनेक विषमताएँ एवं विभिन्नताएँ दृष्टिगोचर होती हैं। भारत का 29.3% भाग पर्वतीय, पहाड़ी एवं ऊबड़-खाबड़; 27.7% भाग पठारी तथा 43% भाग मैदानी है। भारत में अन्य देशों की अपेक्षा मैदानी क्षेत्रों का विस्तार अधिक है (विश्व का औसत 41%)। देश में एक ओर नवीन मोड़दार पर्वत-श्रृंखलाएँ हैं, तो दूसरी ओर विस्तृत तटीय मैदान, कहीं नदियों द्वारा समतल उपजाऊ मैदान हैं तो कहीं प्राचीनतम कठोर चट्टानों द्वारा निर्मित कटा-फटा पठारी भाग है। इस प्रकार जम्मू से कन्याकुमारी तक भारत को उच्चावच अथवा भू-आकृतिक संरचना के अनुसार अग्रलिखित पाँच भागों में विभाजित किया जा सकता है

  • उत्तरीय पर्वतीय प्रदेश,
  • उत्तरी भारत का विशाल मैदान,
  • दक्षिण का पठार,
  • समुद्रतटीय मैदान एवं द्वीप समूह,
  • थार का मरुस्थल।

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इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-
(1) उत्तरी पर्वतीय प्रदेश– भारत के उत्तर में लगभग 2,500 किमी की लम्बाई तथा पूर्व में 150 किमी तथा पश्चिम में 400 किमी की चौड़ाई में उत्तरी अथवा हिमालय पर्वतीय प्रदेश का विस्तार है। यह पर्वत-श्रृंखला पूर्व से पश्चिम तक चाप के आकार में फैली हुई है। इस पर्वतीय प्रदेश का विस्तार लगभग 5 लाख वर्ग किमी है। यह मोड़दार पर्वतमाला तीन समानान्तर श्रेणियों-

  • महान् हिमालय (हिमाद्रि हिमालय),
  • लघु हिमालय,
  • बाह्य हिमालय (शिवालिक हिमालय) में विस्तृत है। महान् हिमालय की औसत ऊँचाई 6,000 मीटर से अधिक होने के कारण ये श्रेणियाँ सदैव बर्फ से ढकी रहती हैं। विश्व की सर्वोच्च पर्वत-श्रेणी माउण्ट एवरेस्ट इसी हिमालय पर्वतमाला में स्थित है। समुद्र तल से इसकी ऊँचाई 8,848 मीटर है। हिमालय पर्वत उत्तरी भारत की अधिकांश नदियों का उद्गम स्थल तथा हरे-भरे वनों का भण्डार है। यहाँ बहने वाली नदियाँ (UPBoardSolutions.com) तीव्रगामी तथा अपनी युवावस्था में हैं। ये उत्तरी मैदानों में बहती हुई अरब सागर या बंगाल की खाड़ी में गिर जाती हैं। इनसे भारतीय उपमहाद्वीप की तीन प्रमुख नदियाँ सिन्धु, सतलुज तथा ब्रह्मपुत्र हिमालय के उस पार से निकलती हैं। हिमालय अपनी सुन्दर और रमणीक घाटियों के लिए विश्वविख्यात हैं, जिनमें कश्मीर घाटी, दून घाटी, कुल्लू और काँगड़ा घाटी पर्यटकों को अपनी ओर खींचती हैं।
    UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 1 भारत भौतिक स्वरूप 1

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(2) उत्तरी भारत का विशाल मैदान- उत्तरी भारत अथवा गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान हिमालय पर्वत के दक्षिण में और दक्षिणी पठार के उत्तर में भारत का ही नहीं वरन् विश्व का सबसे अधिक उपजाऊ और घनी जनसंख्या वाला मैदान है। इसका क्षेत्रफल लगभग 7 लाख वर्ग किमी से अधिक है। इस मैदान की पश्चिम से पूरब की लम्बाई 2,414 किलोमीटर तथा उत्तर-दक्षिण की चौड़ाई 150 से 500 किलोमीटर है। इस मैदान का ढाल लगभग 25 सेण्टीमीटर प्रति किलोमीटर है। अरावली पर्वत-श्रेणी को छोड़कर इसका कोई भी भाग समुद्र तल से 150 मीटर से ऊँचा नहीं है।

यह मैदान सिन्धु, सतलुज, गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और उनकी अनेक सहायक नदियों द्वारा लाई गयी मिट्टी से बना है; अत: यह बहुत ही उपजाऊ है। इस मैदान के बीच में अरावली पर्वत आ जाने के कारण सिन्धु और उसकी नदियाँ पश्चिम में तथा गंगा और उसकी सहायक नदियाँ तथा ब्रह्मपुत्र पूर्व में बहती हैं। पश्चिमी मैदान का ढाल उत्तर से दक्षिण की ओर है और पूर्वी मैदान का ढाल उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर है। इस मैदान में गहराई (UPBoardSolutions.com) नहीं पायी जाती। सम्पूर्ण गंगा का मैदान बाँगर तथा खादर से निर्मित है। यहाँ देश की 45% जनसंख्या निवास करती है। प्रति वर्ष नदियाँ इस मैदान में उपजाऊ काँप मिट्टी अपने साथ लाकर बिछाती रहती हैं।

(3) दक्षिण का पठार(प्रायद्वीपीय पठार)– भारत के दक्षिण में प्राचीन ग्रेनाइट तथा बेसाल्ट की कठोर शैलों से बना दकन का पठार है, जिसे दक्षिण का पठार भी कहते हैं। यह राजस्थान से लेकर कुमारी अन्तरीप तक और पश्चिम में गुजरात से लेकर पूर्व की ओर पश्चिम बंगाल तक विस्तृत है। इसका आकार त्रिभुजाकार है एवं आधार उत्तर की ओर तथा शीर्ष दक्षिण की ओर है। पठार के उत्तर में। अरावली, विन्ध्याचल और सतपुड़ा की पहाड़ियाँ हैं, पश्चिम में ऊँचे पश्चिमी घाट और पूरब में निम्न पूर्वी घाट और दक्षिण में नीलगिरि पर्वत हैं।

इसके पश्चिमी भाग पर ज्वालामुखी द्वारा निर्मित लावा के निक्षेप हैं, जो काली मिट्टी के उपजाऊ क्षेत्र हैं। इस पठारी क्षेत्र पर अधिकांश नदियों ने गहरी घाटियाँ बना ली हैं। इस पठार की औसत ऊँचाई 500. से 750 मीटर है। इसको धरातल बहुत ही विषम है। इस पठारी भाग का क्षेत्रफल लगभग 16 लाख वर्ग किमी है। दकन का पठारी क्षेत्र खनिज पदार्थों का विशाल भण्डार है। इस पठार पर बहुमूल्य मानसूनी वन सम्पदा पायी जाती है। सागौन एवं चन्दन की बहुमूल्य लकड़ी इसी पठारी भाग में मिलती है। यह कृषि-उपजों का भण्डार तथा उद्योग-धन्धों का महत्त्वपूर्ण केन्द्र भी है।

इस पठार पर बहने वाली अधिकांश नदियाँ दक्षिण-पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी ऐसी ही नदियाँ हैं। नर्मदा और ताप्ती नदियाँ भ्रंश घाटी में होकर बहती हैं तथा अरब सागर में गिरती हैं। अरब (UPBoardSolutions.com) सागर में गिरने वाली अन्य नदियाँ बहुत छोटी तथा तीव्रगामी हैं।

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(4) समुद्रतटीय मैदान एवं द्वीप समूह– दकन के पठार के दोनों ओर पूर्वी तथा पश्चिमी तटीय क्षेत्रों पर पतली पट्टी के रूप में जो मैदान फैले हैं, उन्हें समुद्रतटीय मैदान कहते हैं। इन मैदानों का निर्माण सागर की लहरों तथा नदियों ने अपनी निक्षेप क्रियाओं द्वारा लाये गये अवसाद से किया है। इस मैदानी क्षेत्र को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है

  • पश्चिमी तटीय मैदान- यह मैदान पश्चिम में खम्भात की खाड़ी से लेकर कुमारी अन्तरीप तक फैला हुआ है। इसकी औसत चौड़ाई 64 किलोमीटर है। इसमें बहने वाली नदियाँ अत्यन्त तीव्रगामी हैं। इसके दक्षिणी मार्ग में नावों के लिए अनेक अनूप (Lagoons) पाये जाते हैं। नया । मंगलोर, कोचीन इन्हीं अनूपों पर स्थित हैं। यहाँ चावल, केला, गन्ना व रबड़ खूब पैदा होता है। ” कॉदला, मुम्बई व कोचीन इस तट पर स्थित अन्य प्रमुख बन्दरगाह हैं।
  • पूर्वी तटीय मैदान– पश्चिमी तटीय मैदान की अपेक्षा यह मैदान अधिक (UPBoardSolutions.com) चौड़ा है। इसकी औसत | चौड़ाई 161 से 483 किलोमीटर है। यह उत्तर में गंगा के मुहाने से दक्षिण में कुमारी अंन्तरीप तक फैला हुआ है। कोलकाता, मद्रास (चेन्नई) व विशाखापत्तनम् इस तट के प्रमुख बन्दरगाह हैं।

द्वीप समूह–भारत के मुख्य स्थल भाग के पश्चात् सागरों के बीच में जो आकृतियाँ स्थित हैं वे द्वीपसमूह के रूप में जानी जाती हैं। ये भारत का अभिन्न अंग हैं। छोटे-बड़े मिलाकर कुल 247 द्वीप हैं, जो स्थिति-अनुसार निम्नलिखित दो भागों में बँटे हुए हैं—

  1. अरब सागरीय द्वीप-ये द्वीप अरब सागर के मुख्य स्थल (केरल तट) के पश्चिम में स्थित हैं। | इन द्वीपों की आकृति घोड़े की नाल या अँगूठी के समान है। इनका निर्माण अल्पजीवी सूक्ष्म प्रवाल जीवों के अवशेषों के जमाव से हुआ है। इसलिए इन्हें प्रवालद्वीप वलय (एटॉल) कहते हैं। इनमें लक्षद्वीप, मिनीकोय एवं अमीनीदीवी प्रमुख हैं। इन द्वीपों पर नारियल के वृक्ष बहुत अधिक उगाये जाते हैं। इन द्वीपों की संख्या 43 है तथा लक्षद्वीप का क्षेत्रफल मात्र 32 वर्ग किलोमीटर है। कवरत्ति यहाँ की राजधानी है।
  2. बंगाल की खाड़ी के द्वीप- बंगाल की खाड़ी में भी भारत के अनेक द्वीप हैं। इन्हें अण्डमान तथा निकोबार द्वीप समूह के नाम से पुकारते हैं। ये द्वीप बड़े भी हैं और संख्या में भी अधिक हैं। ये जल में डूबी हुई पहाड़ियों की श्रृंखला पर स्थित हैं। (UPBoardSolutions.com) इन द्वीपों में से कुछ की उत्पत्ति ज्वालामुखी के उद्गार से हुई है। भारत को एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी इन्हीं द्वीपों में एक बैरन द्वीप पर स्थित है। इनका विस्तार 590 किमी की लम्बाई तथा अधिकतम 50 किमी की चौड़ाई में अर्द्ध-चन्द्राकार रूप में बना हुआ है। ये द्वीप यहाँ एक समूह के रूप में पाये जाते हैं, जो एक-दूसरे से संकीर्ण खाड़ी द्वारा पृथक् होते हैं। इनकी कुल संख्या 204 है तथा पोर्ट ब्लेयर यहाँ की राजधानी है।

(5) थार का मरुस्थल- राजस्थान का उत्तर-पश्चिमी भाग रेगिस्तानी है जिसे ‘थार का मरुस्थल’ कहा जाता है। इस मरुस्थल का कुछ भाग पाकिस्तान में भी है। इस भाग में प्रतिदिन धूल व रेतभरी तेज हवाएँ चलती हैं, जो जगह-जगह रेत के टीले बना देती हैं। यहाँ 10 सेमी से भी कम वर्षा होती है, इसलिए यह भाग वर्ष भर शुष्क बना रहता है और पूरे भाग में पानी की कमी रहती है। अतः यहाँ ज्वार-बाजरा जैसी कम पानी वाली फसलें अधिक उगाई जाती हैं। यह मरुस्थलीय भाग 644 किमी लम्बा व लगभग 161 किमी चौड़ा है। इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 1,04,000 वर्ग किमी है तथा इसका विस्तार हरियाणा, पंजाब, राजस्थान तथा उत्तरी गुजरात राज्यों में है। इस प्रदेश में अत्यन्त विरल । जनसंख्या निवास करती है। लूनी इस मरुस्थलीय प्रदेश की मुख्य मौसमी नदी है। यहाँ पर साँभर, डिंडवाना, लूनकरनसर, कुचामन तथा डेगाना खारे पानी की प्रमुख झीलें हैं, जिनसे नमक बनाया जाता है। कुछ भागों में ग्रेनाइट, नीस तथा शिस्ट चट्टानों की नंगी सतह दिखलायी पड़ती हैं। खनिज पदार्थों में ताँबा, जिप्सम पत्थर तथा मुल्तानी मिट्टी यहाँ मुख्यतः मिलती हैं। राजस्थान में झुंझुनू जिले के खेतड़ी नगर के पास ताँबे की अनेक खाने हैं। यहाँ ऊँट यातायात का प्रमुख साधन है, (UPBoardSolutions.com) जिसे रेगिस्तान का जहाज कहा जाता है। मरुस्थलीय संरचना एवं जलवायु की विषमताओं के कारण यह क्षेत्र आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ है। पूर्व की ओर इन्दिरा गांधी नहर के बन जाने से धीरे-धीरे सम्बद्ध क्षेत्रों में विकास हो रहा है।

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प्रश्न 3.
भारत के उत्तर में स्थित हिमालय पर्वत की बनावट कैसी है? इस प्रदेश का भौगोलिक वर्णन कीजिए।
या
हिमालय के कोई दो महत्त्व लिखिए। हिमालय पर्वत से होने वाले कोई पाँच लाभ लिखिए। [2011]
या

हिमालय पर्वतों की तीन समान्तर शृंखलाओं के नाम लिखिए और प्रत्येक की एक-एक विशेषता लिखिए। भारत के हिमालय पर्वतीय प्रदेश का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए- [2015]
(क) स्थिति एवं विस्तार, (ख) धरातलीय संरचना, (ग) जल-प्रवाह।
उत्तर :

हिमालय पर्वत की संरचना

भारत के उत्तर में हिमालय पर्वत चाप के आकार में तथा पश्चिम में सिन्धु नदी के मोड़.से पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी • के मोड़ तक 2,500 किमी की लम्बाई में चन्द्राकार रूप में फैले हैं। इसकी औसत चौड़ाई 150 से 400 किमी के बीच है। हिमालय; भारत और तिब्बत (चीन) के मध्य एक अवरोध के रूप में स्थित है। मुख्य हिमालय में विश्व की सर्वोच्च पर्वत-चोटियाँ पायी जाती हैं, जिनकी औसत ऊँचाई 6,000 मीटर से भी अधिक है। एशिया महाद्वीप में 97 (UPBoardSolutions.com) ऐसी ज्ञात चोटियाँ हैं, जिनकी ऊँचाई 7,500 मीटर से अधिक है। इनमें से 95 चोटियाँ भारत के इसी पर्वतीय प्रदेश में स्थित हैं। हिमालय की ये पर्वत-श्रेणियाँ सदैव बर्फ से ढकी रहती हैं, इसलिए इस पर्वतमाला का नाम हिमालय रखा गया है। इसका क्षेत्रफल लगभग 5 लाख वर्ग किमी है। भौगोलिक दृष्टि से हिमालय पर्वतीय प्रदेश को निम्नलिखित उपविभागों में बाँटा जा सकता है–

1. महान् या वृहद् हिमालय– हिमालय की यह पर्वत-श्रेणी सबसे ऊँची है, जिन्हें हिमाद्रि या वृहत्तर हिमालय भी कहा जाता है। इस पर्वत-श्रेणी की औसत ऊँचाई 6,000 मीटर से अधिक होने के कारण यह वर्षभर बर्फ से आच्छादित रहती है। इस पर्वत-श्रेणी की लम्बाई सिन्धु नदी के मोड़ से अरुणाचल प्रदेश में ब्रह्मपुत्र नदी के मोड़ तक 2,500 किमी तथा औसत चौड़ाई 25 किमी है। इस क्षेत्र में गंगोत्री, जेमू तथा मिलाम जैसे विशाल हिमनद (Glaciers) पाये जाते हैं, जिनकी लम्बाई 20 किमी से भी अधिक है। माउण्ट एवरेस्ट, कंचनजंगा, मकालू, धौलागिरि, नंगा पर्वत, गॉडविन-ऑस्टिन, त्रिशूल, बदरीनाथ, नीलकण्ठ, केदारनाथ आदि इस क्षेत्र के प्रमुख पर्वत-शिखर हैं। इन। पर्वत-श्रेणियों का निर्माण ग्रेनाइट, नीस, शिस्ट आदि कठोर और प्राचीन शैलों से हुआ है। माउण्ट एवरेस्ट (नेपाल देश में स्थित) विश्व की सर्वोच्च पर्वत-श्रेणी है, जिसकी ऊँचाई 8,848 मीटर है। महान् हिमालय में अनेक दरें पाये जाते हैं जिनमें शिपकीला, थांगला, नीति, लिपुलेख, बुर्जिल, माना, नाथुला तथा (UPBoardSolutions.com) जैलेपला आदि मुख्य हैं। इन्हीं दरों के मार्ग द्वारा भारत की सीमा के पार जाया जा सकता है। महान् हिमालय की पूर्वी सीमा पर ब्रह्मपुत्र तथा पश्चिमी सीमा पर सिन्धु नदियाँ गहरी एवं सँकरी घाटियों से होकर प्रवाहित होती हैं। वृहद् हिमालय और श्रेणियों के मध्य दो प्रमुख घाटियाँ हैंकाठमाण्डू की घाटी (नेपाल) और कश्मीर की घाटी (भारत)।

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2. लघु या मध्य हिमालय- यह पर्वत-श्रेणी महान् हिमालय के दक्षिण में उसके समानान्तर फैली हुई है, जो 80 से 100 किमी तक चौड़ी है। इस श्रेणी की औसत ऊँचाई 2,000 से 3,500 मीटर तक है। तथा अधिकतम ऊँचाई 4,500 मीटर तक पायी जाती है। इस भाग में नदियाँ ‘वी’ (V) अकार की घाटियाँ तथा गहरी कन्दराएँ बनाकर बहती हैं, जिनकी गहराई 1,000 मीटर तक है। महान् और लघु हिमालय के मध्य कश्मीर, काठमाण्डू, काँगड़ा एवं कुल्लू की घाटियाँ महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं। शीत-ऋतु में तीन-चार महीने यहाँ हिमपात होता है। ग्रीष्म ऋतु में ये पर्वतीय क्षेत्र उत्तम एवं स्वास्थ्यवर्द्धक जलवायु तथा मनमोहक प्राकृतिक सुषमा के कारण पर्यटन के केन्द्र बन जाते हैं। कश्मीर की जास्कर और पीर पंजाल इसकी महत्त्वपूर्ण श्रेणियाँ हैं, जो अनेक भुजाओं वाली हैं। इस श्रेणी की ऊँचाई 4,000 मीटर है। चकरौता, शिमला, मसूरी, नैनीताल, रानीखेत, दार्जिलिंग आदि स्वास्थ्यवर्द्धक पर्वतीय नगर लघु हिमालय में ही स्थित हैं, जहाँ प्रति वर्ष लाखों पर्यटक सैर के लिए जाते हैं। इस श्रेणी के उत्तरी ढाल मन्द, हैं, जब कि दक्षिणी ढाल तीव्र। इस पर्वतीय क्षेत्र में उपयोगी कोणधारी वृक्ष तथा ढालों पर घास उगती है। घास के इन मैदानों को कश्मीर में मर्ग (गुलमर्ग, खिलनमर्ग, सोनमर्ग) तथा उत्तराखण्ड में बुग्याल और पयार (गढ़वाल एवं कुमाऊँ हिमालय) के नाम से पुकारते हैं। इस भाग की संरचना में अवसादी शैलों की प्रधानता है, जिनमें अधिकांश चूने की चट्टानें विस्तृत क्षेत्र में फैली हैं।

3. उप-हिमालय या शिवालिक श्रेणियाँ अथवा बाह्य हिमालय- हिमालय की सबसे निचली तथा दक्षिणी पर्वत-श्रेणियाँ इसके अन्तर्गत आती हैं, जिन्हें बाह्य हिमालय या शिवालिक श्रेणियों के नाम से भी पुकारते हैं। यह हिमालय का नवनिर्मित भाग है, जो पंजाब में पोतवार बेसिन के दक्षिण से आरम्भ होकर पूर्व में कोसी नदी अर्थात् 87° देशान्तर तक विस्तृत है। इन पर्वत-श्रेणियों का निर्माण-काल बीस लाख वर्ष से दो करोड़ वर्ष के मध्य माना जाता है। शिवालिक श्रेणियों का निर्माण नदियों द्वारा लायी गयी अवसाद में मोड़ पड़ने से हुआ है, इसलिए इन पर अपरदन की क्रियाओं का विशेष प्रभाव पड़ा है। तिस्ता और (UPBoardSolutions.com) रायडॉक के निकट 50 किमी की चौड़ाई में इन पहाड़ियों का लोप हो जाता है। इनकी औसत चौड़ाई पश्चिम में 50 किमी और पूरब में 15 किमी है। ये पर्वत औसत रूप से 600 से 1,500 मीटर तक ऊँचे हैं। इस क्षेत्र में अनेक उपजाऊ तथा समतल विस्तृत घाटियाँ हैं, जिन्हें दून और द्वार कहते हैं; जैसे-देहरादून, पूर्वादून, कोठड़ीदून, पाटलीदून, हरिद्वार, कोटद्वार आदि।

भौगोलिक महत्त्व/लाभ

हिमालय पर्वत ने हमारे देश के भौतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक स्वरूप का निर्माण किया है। इनके भौगोलिक महत्त्व/लाभ का वर्णन निम्नलिखित है

  1. ये पर्वत साइबेरिया और मध्यवर्ती एशिया की ओर से आने वाली बर्फीली, तूफानी और शुष्क हवाओं से भारत की रक्षा करते हैं।
  2. हिमालय की ऊँची-ऊँची हिमाच्छादित चोटियाँ उत्तरी भारत के तापमान एवं आर्द्रता (वर्षा) को | प्रभावित करती हैं। इसी के फलस्वरूप हिमालय में हिम नदियाँ, सदावाहिनी नदियाँ प्रारम्भ होती हैं, जो उत्तरी मैदान को उपजाऊ बनाती हैं।
  3. हिमालय के हिमाच्छादित शिखरों और नैसर्गिक दृश्यों के कारण इन पर्वतों का पर्यटकों के लिए महत्त्व बढ़ गया है।
  4. हिमालय की घाटी में जैसे ही वृक्षों की सीमा समाप्त होती है, वहाँ छोटे-छोटे चरागाह पाये जाते हैं, जिन्हें मर्ग कहते हैं; जैसे—गुलमर्ग, सोनमर्ग आदि। यहाँ कश्मीरी गड़रिये भेड़-बकरियाँ चराते हैं।
  5. हिमालय पर्वत से निकलने वाली सदावाहिनी नदियाँ अपने प्रवाह-मार्ग में प्राकृतिक जल-प्रपातों की . रचना करती हैं। ये जल-प्रपात जल-विद्युत शक्ति के उत्पादन में सहायक सिद्ध हुए हैं।
  6. शीत ऋतु में उत्तरी ध्रुवीय प्रदेश से ठण्डी एवं बर्फीली पवनें दक्षिण की ओर चला करती हैं। हिमालय | पर्वतमाला इन पर्वतों के मार्ग में बाधा बनकर भारत को ठण्ड से बचाती है। 7. हिमालय पर्वत पर पर्याप्त मात्रा में कोयला, पेट्रोल तथा अन्य खनिज पदार्थ प्राप्त होने की सम्भावना | व्यक्त की गयी है, जिससे इसका आर्थिक महत्त्व और अधिक बढ़ गया है।
  7. हिमालय पर्वतमाला भारत के उत्तर में पहरेदार की भाँति एक अभेद्य दीवार के रूप में खड़ी है, जो । आक्रमणकारियों से भारत की रक्षा करती है।
  8. हिमालय की कश्मीर घाटी को फलों का स्वर्ग कहा जाता है। यहाँ सेब, अखरोट, आड़, खुबानी, अंगूर व नाशपाती आदि फल उगाये जाते हैं। पर्वतीय ढालों पर चाय, सीढ़ीदार खेतों में चावेल व आलू की खेती भी की जाती है।
  9. हिमालय पर्वत के दोनों ढालों पर उपयोगी वनों का बाहुल्य है। इन वनों से विभिन्न उद्योगों के लिए कच्चे माल, उपयोगी इमारती लकड़ियाँ आदि प्राप्त होती हैं।
  10. हिमालय पर्वतमाला से अनेक जड़ी-बूटियाँ प्राप्त होती हैं, जो अनेक (UPBoardSolutions.com) रोगों की चिकित्सा में काम आती हैं। इसके अतिरिक्त हिमालय के वनों से शहद, आँवला, बेंत, गोंद, लाख, कत्था, बिरोजा आदि प्राप्त होते हैं, जो मानव की विविध आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। हिमालय के अनेक पर्वतीय नगर ग्रीष्म-ऋतु में पर्यटकों के भ्रमण के लिए आकर्षण के केन्द्र बन जाते हैं।

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प्रश्न 4.
भारत के उत्तरी विशाल मैदान का भौगोलिक वर्णन कीजिए तथा इसके आर्थिक महत्त्व का उल्लेख कीजिए। [2014]
या

भारत के उत्तरी मैदान की स्थिति व विस्तार को स्पष्ट कीजिए। इसकी कृषि के लिए क्या उपयोगिता है? [2010]
या

गंगा के मैदानी भाग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए- [2011, 18]
(क) स्थिति, (ख) विस्तार, (ग) महत्त्व।
या
भारत के उत्तरी मैदानी भाग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए- [2012]
(क) स्थिति, (ख) विस्तार, (ग) वनस्पति, (घ) व्यवसाय
या
भारत के उत्तरी विशाल मैदान का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए- [2016, 18]
(क) स्थिति एवं विस्तार, (ख) मिट्टियाँ, (ग) कृषि।
या
भारत का उत्तरी मैदानी क्षेत्र घना क्यों बसा है? कोई तीन कारण बताइए। [2018]
उत्तर :
उत्तर का विशाल मैदान नवीनतम भूखण्ड है। इस विशाल मैदान का निर्माण हिमालय पर्वतमाला की उत्पत्ति के बाद उत्तर में हिमालयं तथा दक्षिण में प्रायद्वीपीय पठार से निकलने वाली नदियों द्वारा बहाकर लायी गयी अवसाद से हुआ है। सिन्धु की सहायक सतलुज, रावी, झेलम, चिनाब, व्यास, गंगा तथा उसकी सहायक और ब्रह्मपुत्र व उसकी सहायक नदियों द्वारा बहाकर लायी गयी अवसाद के जमने से इस मैदान के निर्माण में विशेष (UPBoardSolutions.com) योगदान मिला है। इसे जलोढ़ मैदान के नाम से भी पुकारते हैं। यह जलोढ़ दो प्रकार की होती है—प्राचीन एवं नवीन। नवीन जलोढ़ अत्यधिक उपजाऊ होती है। अत: यह मैदान अत्यधिक उर्वर तथा घना आबाद है।

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हिमालय पर्वत के दक्षिण तथा प्रायद्वीपीय पठार के उत्तर में यह मैदान भारत का ही नहीं, अपितु विश्व का सर्वाधिक उपजाऊ एवं सघन जनसंख्या वाला मैदान है। यहाँ देश की 45% जनसंख्या निवास करती है। इस मैदान का क्षेत्रफल 7 लाख वर्ग किमी है। पूर्व से पश्चिम इस मैदान की लम्बाई 2.414 किमी तथा चौडाई पश्चिम में 480 किमी है, जब कि पूर्व में यह केवल 145 किमी रह जाती है। यह एक समतल मैदान है, जिसका अधिकांश भाग समुद्र तल से 150 मीटर से अधिक ऊँचा नहीं है। इस मैदान का निर्माण काँप मिट्टी से हुआ है, जिसकी गहराई 400 मीटर तक मिलती है। इस मैदान का विस्तार उत्तरी राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तरी बिहार, पश्चिम बंगाल तथा असोम राज्यों में है।

विभिन्न प्राकृतिक कारकों तथा बहने वाली नदियों की प्राथमिकता के आधार पर इस वृहद् मैदान को तीन उप-विभागों में बाँटा गया है—
(1) पश्चिमी मैदान, (2) मध्यवर्ती मैदान एवं (3) पूर्वी मैदान।

1. पश्चिमी मैदान- 
इस भाग में पंजाब, राजस्थान और हरियाणा का पश्चिमी भाग सम्मिलित किया जाता है। सम्पूर्ण पश्चिमी मैदान की औसत ऊँचाई 150 से 300 मीटर तक है। इसको सामान्य ढाल उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर है। पश्चिमी मैदान के अन्तर्गत थार के मरुस्थल को भी सम्मिलित किया जाता है। इसे पश्चिमी शुष्क मैदान भी कहते हैं, जो 640 किलोमीटर लम्बा तथा 160 किलोमीटर चौड़ा है। यह नीची भूमि का (UPBoardSolutions.com) प्रदेश है।

यमुना नदी के पश्चिम में पंजाब और हरियाणा राज्यों में विस्तृत भाग पंजाब का मैदान कहलाता है। यह मैदान चौरस है तथा समुद्र तल से इसका धरातल 200 से 250 मीटर ऊँचा है। सिन्धु के मैदान का अधिकांश भाग अब पाकिस्तान में चला गया है।

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2. मध्यवर्ती मैदान अथवा गंगा का मैदान– 
पश्चिम में यमुना नदी से लेकर पूर्व में बांग्लादेश की पश्चिमी सीमा तक लगभग 1,400 किलोमीटर लम्बा तथा उत्तर में शिवालिक पर्वत श्रेणी से दक्षिण में पठारी प्रदेश तक औसतन 300 किलोमीटर चौड़ा क्षेत्र मध्यवर्ती मैदान कहलाता है। इसे गंगा का मैदान भी कहते हैं। देश के सबसे महत्त्वपूर्ण तथा समतल इस मैदान का क्षेत्रफल 3,57,000 वर्ग किलोमीटर है। इस मैदान का ढाल सामान्यतः उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर 15 सेण्टीमीटर प्रति किलोमीटर है। .

ओ०एच०के० स्पेट ने इस विस्तृत मैदान को निम्नलिखित तीन उपविभागों में बाँटा है–

  • ऊपरी गंगा का मैदान अथवा गंगा-यमुना दोआब-यह भाग पश्चिम में दिल्ली से पूर्व में इलाहाबाद तक विस्तृत है। इसका प्रमुख भाग गंगा-यमुना का दोआब है। यह मैदान यमुना, गंगा, शारदा, चम्बल नदियों द्वारा जमा किये गये अवसादों से बना है।
  • मध्य गंगा का मैदान—यह इलाहाबाद से भागलपुर (बिहार) तक लगभग 1,62,200 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। इसमें गंगा की सहायक नदियाँ–गोमती, घाघरा, गण्डक, कोसी, टोंस तथा सोन–बहती हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार के मैदान इस भाग में स्थित हैं। यह मैदान दोमट तथा जलोढ़ मिट्टियों से बना है।
  • निचला गंगा का मैदान अथवा गंगा का डेल्टा-इसके अन्तर्गत गंगा का डेल्टा प्रदेश आता है, जो पश्चिम बंगाल राज्य में फैला है। इसका क्षेत्रफल 79,100 वर्ग किलोमीटर है। इसका अधिकांश भाग बांग्लादेश में है। इस मैदान की औसत ऊँचाई समुद्र की सतह से 50 मीटर से भी कम है। कोलकाता के पास इसकी ऊँचाई केवल 6 मीटर है। यह संसार का सबसे बड़ा डेल्टा क्षेत्र है।

3. पूर्वी मैदान अथवा ब्रह्मपुत्र का मैदान– असोम राज्य में सदिया के उत्तर-पूर्व से लेकर धुवरी स्थान तक लगभग 650 किलोमीटर लम्बा एवं 100 किलोमीटर चौड़ा पूर्वी मैदान है। इसे ब्रह्मपुत्र का मैदान भी कहते हैं। इस मैदान के पश्चिमी भागों को (UPBoardSolutions.com) छोड़कर सभी ओर ऊँचे पहाड़ी भाग हैं। इस समतल भाग का ढाल क्रमशः उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पूर्व की ओर कम होता जा रहा है।

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उपर्युक्त मैदानों के अतिरिक्त हिमालय पर्वत के बाहरी ढाल पर कंकरीली बलुई मिट्टी के निक्षेप से बने भाग को भाबर का मैदान कहते हैं। भावर के आगे बारीक कंकड़, पत्थर, रेत और चिकनी मिट्टी से तराई का , मैदान बना है।।

भौगोलिक महत्त्व अथवा संसाधनों का आकलन

यह मैदान भारत के लगभग एक-तिहाई क्षेत्रफल को घेरे हुए है। अनुकूल जलवायु, उपजाऊ मिट्टी, सिंचाई की सुविधा तथा यातायात के मार्गों का विस्तृत जाल और जीवन की अन्य सुविधाएँ सुलभ हो जाने से सम्पूर्ण देश की लगभग 45% जनसंख्या इसी क्षेत्र में निवास करती है। यद्यपि भौगोलिक तथा आर्थिक दृष्टि से यह मैदान भारत का सर्वोत्तम भाग है, किन्तु भू-वैज्ञानिक दृष्टि से इसका महत्त्व अधिक नहीं है, क्योंकि यह भारत का नवीनतम भाग है और इसकी संरचना सरल है। इस मैदान का महत्त्व अग्रलिखित तथ्यों से स्पष्ट होता है

  1. इस मैदान की रचना उर्वर-काँप मिट्टी से होने के कारण यह कृषि सम्पन्न प्रदेश है तथा भारत का ‘अन्न भण्डार’ कहलाता है। तापमान व आर्द्रता की भिन्नता के आधार पर यहाँ फसलों की विविधता पायी जाती है।
  2. इस मैदान में असंख्य नदियाँ प्रवाहित होती हैं, जिनमें से अधिकांश हिमालय से निकलने वाली सदावाहिनी नदियाँ हैं। उत्तर प्रदेश व पंजाब के शुष्क भागों में सिंचाई के लिए ये विशेष उपयोगी हैं।
  3. उत्तरी मैदान की नदियों के मार्ग में ढाल प्रवणता बहुत कम है; अतएव ये नौकारोहण योग्य हैं।
  4. जहाँ कहीं भी नदियों के मार्ग में प्रपात स्थित हैं, वहाँ (UPBoardSolutions.com) जल-विद्युत शक्ति विकसित की गयी है।
  5. समतल एवं कोमल शैलों से निर्मित होने के कारण यहाँ सड़क व रेलमार्गों का उत्तम विकास सम्भव हुआ है।
  6. नवीन शैलों से निर्मित होने के कारण इस मैदान में खनिजों की कमी है। मैदान के पूर्वी एवं पश्चिमी छोरों पर कहीं-कहीं कोयला एवं पेट्रोलियम प्राप्त होने की सम्भावनाएँ अवश्य हैं।
  7. शताब्दियों से यह मैदान सघन जनसंख्या के पोषण में समर्थ रहा है। भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति यहीं फली-फूली है।
  8. यह मैदान भारतीय इतिहास, राजनीति एवं धर्म का केन्द्र तथा भारत की समृद्धि एवं गौरव का प्रतीक रहा है।

यह क्षेत्र आर्थिक दृष्टि से भारत का सर्वोत्तम भाग है। भूमि समतल होने के कारण यहाँ रेलमार्गों व सड़कों का जाल बिछा हुआ है। इसके परिणामस्वरूप देश के बड़े-बड़े व्यापारिक और औद्योगिक केन्द्र यहाँ स्थित हैं। दिल्ली, कानपुर, पटना तथा कोलकाता जैसे प्रमुख नगर इसी क्षेत्र में बसे हैं।

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मिट्टियाँ

उत्तरी विशाल मैदान में सर्वत्र काँप (जलोढ़) मिट्टी का विस्तार है। यह मिट्टी कृषि-उत्पादन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है जिसका विस्तार 7.68 लाख वर्ग किमी क्षेत्र पर है। इसी कारण इस क्षेत्र में सघन जनसंख्या निवास करती है। काँप मिट्टियाँ हिमालय पर्वत से निकलने वाली सिन्धु, गंगा, ब्रह्मपुत्र एवं उनकी सहायक नदियों द्वारा लाई गयी अवसाद से निर्मित हुई हैं। यह मिट्टी हल्के भूरे रंग की होती है। इस मिट्टी में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और वनसपति के अंशों की कमी होती है तथा सिलिका एवं चूने के अंशों की प्रधानता होती है। यह मिट्टी पीली दोमट है। कुछ स्थानों पर यह चिकनी एवं बलुई होती है। उत्तरी विशाल मैदान की मिट्टियों को वर्षा की भिन्नता, क्षारीय गुणों, बालू एवं चीका की भिन्नता के आधार पर निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता है

  1. पुरातन काँप- इसे बाँगर मिट्टी के नाम से भी पुकारा जाता है। इस मिट्टी का विस्तार उन क्षेत्रों में है। जहाँ नदियों की बाढ़ का पानी नहीं पहुँच पाता है। इसमें कहीं-कहीं कंकड़ भी पाये जाते हैं। खुरदरे एवं बड़े कणों वाली मिट्टी को भूड़ कहते हैं। इस मिट्टी में गन्ना एवं गेहूं अधिक उगाया जाता है।
  2. नवीन काँप- इसे खादर मिट्टी भी कहा जाता है। यह मिट्टी रेतीली एवं कम कंकरीली होती है। इस मिट्टी के क्षेत्रों में प्रतिवर्ष बाढ़े आती हैं तथा उनके द्वारा नवीन काँप मिट्टी बिछती रहती है। इस मिट्टी में नमी धारण करने की शक्ति अधिक होती है। कहीं-कहीं पर दलदल भी होती है। इसमें पोटाश, फॉस्फोरस, चूना एवं जीवांशों की मात्रा अधिक होती है।
  3. डेल्टाई काँप- यह मिट्टी नदियों के डेल्टा में पायी जाती है। यहाँ नदियाँ नवीन क़ाँप मिट्टी का जमाव करती रहती हैं, अत: यह मिट्टी अत्यधिक उपजाऊ होती है। इस मिट्टी के कण बहुत ही बारीक होते हैं। जिन फसलों को अधिक जल की (UPBoardSolutions.com) आवश्यकता होती है, उनमें सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। चावल, जूट, तम्बाकू, गेहूँ, तिलहन आदि इस मिट्टी की प्रमुख फसलें हैं। उत्तरी विशाल मैदान के दक्षिण-पश्चिम में मरुस्थलीय अथवा रेतीली मिट्टी पायी जाती है। वर्षा की कमी के कारण इसमें नमी की मात्रा कम होती है। जल की कमी के कारण यह मिट्टी अनुपजाऊ होती है।

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कृषि

उत्तरी विशाल मैदान में कृषि के तौर पर मुख्यतः गन्ना, गेहूँ, कपास, ज्वार व बाजरा आदि फसलो पर जोर. दिया जाता है। ‘नकदी फसल के रूप में गन्ना प्रमुख है। इस क्षेत्र की कृषि की प्रमुख विशेषताएँ अग्र प्रकार हैं

1. खाद्य आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक-देश के साथ- साथ इस क्षेत्र की कृषि को मुख्य उद्देश्य क्षेत्र की विशाल जनसंख्या की खाद्य आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। किन्तु अभी हाल के वर्षों में इसमें व्यापारिक और बाजारोन्मुख होने के प्रवृत्ति देखी जा रही है।

2. विशाल जनसंख्या का भारी दबाव- 
देश की कृषि की तरह इस क्षेत्र की कृषि पर जनसंख्या का भारी दबाव है। देश की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा यहाँ निवास करता है जिसमें अधिकांश पूरी तरह कृषि पर निर्भर है। जनसंख्या के तेजी से बढ़ने के कारण प्रति व्यक्ति कृषि भूमि का औसत निरन्तर कम होता जा रहा है।

3. खाद्यान्नों की कृषि को प्रमुखता- 
इस क्षेत्र की कृषि में खाद्यान्नों की कृषि में प्रमुखता है। यह कृषिगत क्षेत्र का 76 प्रतिशत भाग और सम्पूर्ण कृषि उत्पादन का 80 प्रतिशत भाग प्रदान करते हैं। इसमें गन्ना, गेहूं, ज्वार, बाजरा, चना, मक्का एवं कुछ मात्रा में चावल आदि शामिल हैं।

4. कृषि फसलों में विविधता- 
यहाँ की कृषि में फसलों की विविधता देखने (UPBoardSolutions.com) को मिलती है। ऐसा इस क्षेत्र की जलवायु एवं भौतिक विशेषताओं में भिन्नता के कारण है। कभी-कभी तो एक ही खेत में एक साथ अनेक फसलें बोई जाती हैं।

5. खेत छोटे-छोटे टुकड़ों में- 
भौतिक, आर्थिक एवं सामाजिक कारणों से देश की तरह इस क्षेत्र में भी कृषि भूमि का आकार बहुत छोटे-छोटे खेतों के रूप में है। यह छोटे-छोटे खेत आधुनिक कृषि के दृष्टिकोण से उचित नहीं हैं।

6. वर्षा पर आधारित कृषि-
इस क्षेत्र में कृषि अधिकांशत: वर्षा पर निर्भर है।

नदियों द्वारा लायी गयी बारीक मिट्टी से निर्मित तथा सिंचित होने के कारण यह मैदान बहुत उपजाऊ है। यहाँ गेहूँ, गन्ना, दाल-दलहन, कपास आदि की फसलें बड़े पैमाने पर पैदा की जाती हैं। इस क्षेत्र में अनेक तीर्थस्थल; जैसे-हरिद्वार, मथुरा, प्रयाग, काशी आदि स्थित हैं। यहाँ सारे देश से यात्रीगण आते हैं, जिस कारण इन स्थानों पर आर्थिक गतिविधियाँ प्रायः पूरे वर्ष चरम पर रहती हैं।

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प्रश्न 5.
दक्षिण के प्रायद्वीपीय पठार की भौगोलिक रचना तथा आर्थिक महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
या
भारत के दक्षिणी पठारी भाग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए
(क) स्थिति, (ख) विस्तार, (ग) खनिज सम्पदा। [2014]
या

भारत के दक्षिणी पठारी भाग के किन्हीं तीन खनिज संसाधनों का वर्णन कीजिए। [2014]
या

भारत के दक्षिणी पठारी भाग की छः विशेषताएँ बताइए। [2014]
या

भारत के दक्षिणी पठारी भाग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए- [2010]
(अ) धरातल, (ब) जल-प्रवाह प्रणाली, (स) भौगोलिक महत्त्व।
भारत के दक्षिणी प्रायद्वीपीय भाग में जल-प्रवाह (UPBoardSolutions.com) प्रणाली का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। [2010]
या

दक्षिण के पठारी भाग की स्थिति, विस्तार तथा खनिज सम्पदा का वर्णन कीजिए। [2012]
या

दकन के पठार का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। भारत के दक्षिणी पठारी भाग का वर्णन निम्नलिखित शीषकों में कीजिए- [2015]
(क) स्थिति एवं विस्तार, (ख) जल-प्रवाह प्रणाली, (ग) खनिज़।
या
भारत में दक्षिणी पठार का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए- [2016, 17]
(क) स्थिति एवं विस्तार, (ख) प्राकृतिक बनावट (भौतिक लक्षण) (ग) खनिज।
या
भारत के दक्षिणी पठार के किन्हीं तीन आर्थिक महत्त्व पर प्रकाश डालिए। [2018]
उत्तर :

दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठार की भौगोलिक रचना (धरातल)

भारत के दक्षिण में प्राचीन ग्रेनाइट तथा बेसाल्ट की कठोर शैलों से निर्मित दकन (दक्षिण) को पठार है। यह विशाल प्रायद्वीपीय पठार प्राचीन गोण्डवानालैण्ड का ही एक अंग है, जो भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे प्राचीन भूभाग है। यह पठारी प्रदेश 16 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल में विस्तृत है। इसकी आकृति त्रिभुजाकार है। इसके उत्तर में गंगा-सतलुज-ब्रह्मपुत्र का मैदान, पूर्व में पूर्वी तटीय मैदान एवं बंगाल की खाड़ी, दक्षिण में हिन्द महासागर तथा पश्चिम में पश्चिमी तटीय मैदान एवं अरब सागर स्थित है। इस पठार पर अनेक पर्वत विस्तृत हैं, जो मौसमी क्रियाओं; अर्थात् अपक्षय; द्वारा प्रभावित हैं। इस (UPBoardSolutions.com) भौतिक प्रदेश में सबसे अधिक धरातलीय विषमताएँ मिलती हैं। समुद्र-तल से इस पठार की औसत ऊँचाई 500 से 700 मीटर है। इस पठारी प्रदेश का विस्तार उत्तर में राजस्थान से लेकर दक्षिण में कुमारी अन्तरीप तक 1,700 किमी की लम्बाई तथा पश्चिम में गुजरात से लेकर पूर्व में पश्चिम बंगाल तक 1,400 किमी की चौड़ाई में है। प्राकृतिक दृष्टिकोण से इसकी उत्तरी सीमा अरावली, कैमूर तथा राजमहल की पहाड़ियों द्वारा निर्धारित होती है। यहाँ मौसमी क्रियाओं द्वारा चट्टानों का अपक्षरण होता रहता है। नर्मदा नदी की घाटी सम्पूर्ण प्रायद्वीपीय पठारी क्षेत्र को दो असमान भागों में विभाजित कर देती हैं। उत्तर की ओर के भाग को मालवा का पठार तथा दक्षिणी भाग को दकन ट्रैप या प्रायद्वीपीय पठार के नाम से पुकारते हैं। इस प्रदेश में निम्नलिखित स्थलाकृतिक विशिष्टताएँ पायी जाती हैं’

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1. मालवा का पठार- 
मालवा का पठार ज्वालामुखी से प्राप्त लावे द्वारा निर्मित हुआ है, जिससे यह समतल हो गया है। इस पठार पर बेतवा, माही, पार्वती, काली-सिन्धु एवं चम्बल नदियाँ प्रवाहित होती हैं। चम्बल एवं उसकी सहायक नदियों ने इस पठार के उत्तरी भाग को बीहड़ तथा ऊबड़-खाबड़ गहरे खड्डों में परिवर्तित कर दिया है, जिससे अधिकांश भूमि खेती के अयोग्य हो गयी है। शेष भूमि समतल और उपजाऊ है। इस पठार का ढाल पूर्व तथा उत्तर-पूर्व की ओर है। विन्ध्याचल की पर्वत-श्रृंखलाएँ यहीं पर स्थित हैं।

2. विन्ध्याचल श्रेणी– 
प्रायद्वीपीय पठार के उत्तर-पश्चिमी भाग पर विन्ध्याचल श्रेणी का विस्तार है। इस श्रेणी के उत्तर-पश्चिम (राजस्थान) में अरावली श्रेणी स्थित है। यह श्रेणी अत्यधिक अपरदन के कारण निचली पहाड़ियों के रूप में दृष्टिगोचर होती है। विन्ध्याचल. श्रेणी के दक्षिण में नर्मदा की घाटी स्थित है। नर्मदा घाटी के दक्षिण में सतपुड़ा श्रेणी का विस्तार है, जो महानदी और गोदावरी के बीच स्थित है।

3. बुन्देलखण्ड एवं बघेलखण्ड का पठार- 
यह पठार मालवा पठार के उत्तर-पूर्व में स्थित है। यमुना एवं चम्बल नदियों ने इस पठार को काट-छाँटकर बीहड़ खड्डों का निर्माण किया है, जिससे यह असमतल तथा अनुपजाऊ हो गया है। इस पठार पर नीस, ग्रेनाइट, बालुका-पत्थर की चट्टानें तथा पहाड़ियाँ मिलती हैं।

4. छोटा नागपुर का पठार- 
यह पठार एक सुस्पष्ट पठारी इकाई है। इसके उत्तर व पूर्व में गंगा का मैदान है। इसका पश्चिमी मध्यवर्ती भाग 100 मीटर ऊँचा है, जिसे ‘पाट क्षेत्र’ कहते हैं। झारखण्ड राज्य के गया, हजारीबाग तथा राँची जिलों में यह पठार विस्तृत है। (UPBoardSolutions.com) महानदी, सोन, स्वर्ण-रेखा एवं दामोदर इस पठार की प्रमुख नदियाँ हैं। यहाँ ग्रेनाइट एवं नीस की शैलें पायी जाती हैं। यह पठार खनिज पदार्थों में बहुत धनी है। इसकी औसत ऊँचाई 400 मीटर है।

5. मेघालय का पठार- 
उत्तर-पूर्व में इस पठार को मिकिर की पहाड़ियों के नाम से पुकारते हैं। इसका | उत्तरी ढाल खड़ा है, जिसमें ब्रह्मपुत्र तथा उसकी सहायक नदियाँ प्रवाहित होती हैं। इसी पठार में गारो, खासी तथा जयन्तिया की पहाड़ियाँ विस्तृत हैं।

6. दकन का पठार- 
यह महाराष्ट्र पठार के नाम से भी जाना जाता है। इसका क्षेत्रफल 5 लाख वर्ग किमी है। इसका विस्तार मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, पश्चिमी तमिलनाडु एवं आन्ध्र प्रदेश राज्यों पर है। यह पठार बेसाल्ट शैलों से निर्मित है तथा खनिज पदार्थों में धनी है। यह पठार दो भागों में विभाजित है-तेलंगाना एवं दकन का पठार।

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7. प्रायद्वीपीय पठार 
की प्रमुख पर्वत-श्रेणियाँ–यह पठारी प्रदेश अनाच्छादन की क्रियाओं से प्रभावित है। यहाँ विन्ध्याचल, सतपुड़ा एवं अरावली की पहाड़ियाँ प्रमुख हैं। इनकी औसत ऊँचाई 300 से 900 मीटर तक है।

8. पश्चिमी घाट– 
इन्हें सह्याद्रि की पहाड़ियों के नाम से भी पुकारा जाता है। ये पश्चिमी तट के समीप उसके समानान्तर विस्तृत हैं। इनकी औसत चौड़ाई 50 किमी है। इनका विस्तार मुम्बई के उत्तर से दक्षिण में कुमारी अन्तरीप तक लगभग 1,600 किमी है। थाकेघाट, भोरघाट व पालघाट यहाँ के प्रमुख दरें हैं। इस श्रेणी के उत्तर-पूर्व में पालनी तथा दक्षिण में इलायची की पहाड़ियाँ हैं। अनाईमुडी इसका सर्वोच्च शिखर (2,695 मीटर) है।

9. पूर्वीघाट– 
इस श्रेणी का विस्तार महानदी के दक्षिण में उत्तर-पूर्व दिशा से दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर नीलगिरि की पहाड़ियों तक 1,300 किमी की लम्बाई में है। इनकी औसत ऊँचाई 615 मीटर तथा औसत चौड़ाई उत्तर में 190 किमी तथा दक्षिण में 75 किमी है। इन घाटों को काटकर महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि नदियाँ पश्चिमी भागों से पूर्व की ओर बहती हुई उपजाऊ मैदान में डेल्टा बनाती हैं।

जल-प्रवाह प्रणाली

दक्षिण पठारी भाग की जल-प्रवाह प्रणाली में नर्मदा, ताप्ती, महानदी, कृष्णा, कावेरी, पेन्नार आदि नदियों का योगदान है। इनमें नर्मदा व ताप्ती पश्चिम की ओर बहकर अरब सागर में गिरती हैं। नर्मदा अमरकण्टक की पहाड़ियों से निकलती है तथा ताप्ती (UPBoardSolutions.com) मध्य प्रदेश के बैतूल जिले से निकलती है। यह दोनों नदियाँ सतपुड़ा के दक्षिण में सँकरी तथा गहरी भ्रंश घाटियों से होकर बहती हैं। महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी तथा पेन्नार नदियाँ बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। साबरमती व माही नदियाँ कच्छ की खाड़ी में गिरती हैं।

भौगोलिक महत्त्व

प्रायद्वीपीय पठार के भौगोलिक-आर्थिक महत्त्व का वर्णन निम्नलिखित है

  • प्राचीन आग्नेय कायान्तरित शैलों से निर्मित होने के कारण यह भू-भाग खनिज सम्पन्न है। मध्य प्रदेश में मैंगनीज, संगमरमर, चूना-पत्थर, बिहार व उड़ीसा (ओडिशा) में लोहा व कोयला, कर्नाटक में सोना, आन्ध्र प्रदेश में कोयला, हीरा आदि आर्थिक महत्त्व के खनिज उपलब्ध होते हैं।
  • लावा की मिट्टी कपास व गन्ने की खेती के लिए अत्युत्तम है। पहाड़ी क्षेत्रों में लैटेराइट मिट्टियाँ चाय, कहवा तथा रबड़ के लिए उपयुक्त हैं। गर्म मसाले, काजू, केला अन्य महत्त्वपूर्ण उपजें हैं।
  • वनों में चन्दन, साल, सागौन, शीशम आदि बहुमूल्य लकड़ी तथा लाख, बीड़ी बनाने के लिए तेन्दू व टिमरु वृक्ष के पत्ते, हरड़, बहेड़ा, आँवला, चिरौंजी, अग्नि व रोशा घास आदि आर्थिक महत्त्व की गौण वन-उपजें प्राप्त होती हैं।
  • पठारी धरातल पर प्रवाहित होने वाली नदियों के प्रपाती मार्ग में अनेक स्थानों पर जल-विद्युत शक्ति के विकास की सम्भावनाएँ उपलब्ध हैं। कठोर चट्टानी धरातल होने के कारण वर्षा के जल को एकत्रित करने के लिए जलाशय में बाँध की सुविधाएँ प्राप्त हैं।
  • सामान्यतः प्रायद्वीपीय पठार की जलवायु उष्ण है, किन्तु उटकमण्ड, पंचमढ़ी, महाबलेश्वर आदि सुरम्य एवं स्वास्थ्यवर्द्धक स्थल पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र हैं।
  • विषम धरातल होने के कारण यहाँ आवागमन के साधनों का (UPBoardSolutions.com) समुचित विकास नहीं हो सका है। उत्तरी मैदान की तुलना में यहाँ कृषि भी अधिक विकसित नहीं है। चम्बल व अन्य नदियों के बीहड़ लम्बी अवधि तक डाकुओं व असामाजिक तत्वों के शरणस्थल रहे हैं। विन्ध्याचल एवं सतपुड़ा पर्वत प्राचीन काल से ही उत्तर एवं दक्षिण भारत के मध्य प्राकृतिक व सांस्कृतिक अवरोध रहे हैं; अतएव दक्षिणी भारत में उत्तर भारत से सर्वथा भिन्न संस्कृति विकसित हुई है।

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प्रश्न 6.
भारत में जल-प्रवाह प्रणाली का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए
(क) पूर्वी तट का जल-प्रवाह, (ख) उत्तरी मैदानी भाग का जल-प्रवाह।
उत्तर भूतल की बनावट तथा नदियों के उद्गम के दृष्टिकोण से भारत के जल-प्रवाह तन्त्र को दो भागों में बाँटा जा सकता है- (क) उत्तरी मैदानी-भाग को जल-प्रवाह तथा (ख) प्रायद्वीपीय या दक्षिण भारत का जल-प्रवाह। दक्षिण भारत के जल-प्रवाह में कुछ जल अरब सागर में प्रवाहित होता है तथा कुछ। बंगाल की खाड़ी में। उत्तरी मैदानी भाग तथा पूर्वी तट जल-प्रवाह दोनों का वर्णन निम्नलिखित है–

(क) पूर्वी तट का जल-प्रवाह– 
इसे जल-प्रवाह में महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, पेन्नार आदि नदियाँ बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। इनका संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है

  • महानदी- इस नदी का उद्गम-स्रोत छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले में फरसिया ग्राम के निकट स्थित एक तालाब से है। यह मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, बिहार से होकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
  • गोदावरी- यह प्रायद्वीपीय भारत की सबसे बड़ी नदी है। यह महाराष्ट्र राज्य में नासिक से दक्षिण-पश्चिम में त्र्यम्बक गाँव से निकलती है। यह 1,465 किमी लम्बी है। यह मध्य प्रदेश, कर्नाटक, ओडिशा तथा आन्ध्र प्रदेश से होती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
  • कृष्णा- यह नदी महाबलेश्वर की पहाड़ियों से निकलती है। इसकी लम्बाई 1,400 किमी है। यह महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा आन्ध्र प्रदेश से होकर बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।
  • कावेरी- यह नदी कर्नाटक राज्य की नीलगिरि पर्वत-श्रेणियों से निकलती है। यह कर्नाटक तथा तमिलनाडु राज्यों से होकर बहती है। यह लगभग 815 किमी लम्बी है।

(ख) उत्तरी मैदानी भाग का जल-प्रवाह- उत्तरी मैदानी भाग के जल-प्रवाह तन्त्र (UPBoardSolutions.com) को तीन नदी तन्त्रों–सिन्धु नदी, गंगा नदी तथा ब्रह्मपुत्र नदी में विभाजित किया जा सकता है। इनका संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है

  • सिन्धु नदी तन्त्र– सिन्धु नदी तन्त्र- में पश्चिम हिमालय से निकलने वाली नदियाँ–सिन्धु, झेलम, चिनाब, रावी, व्यास और सतलुज आती हैं। ये सभी अरब सागर में गिरती हैं। इनका प्रवाह उत्तर से दक्षिण- पश्चिम की ओर है।
  • गंगा नदी तन्त्र- गंगा नदी तन्त्र बंगाल की खाड़ी में मिलता है। इस तन्त्र की मुख्य नदी गंगा है। गंगा नदी, भागीरथी व अलकनन्दा नदियों का सम्मिलित रूप है। इसका उद्गम उत्तरकाशी जिले के ग्लेशियर से है। उद्गम स्थल से मुहाने तक गंगा नदी की लम्बाई 2,525 किमी है। इसकी मुख्य सहायक नदियाँ हैं-राम गंगा, गोमती, घाघरा, गण्डक, कोसी, यमुना तथा चम्बल। गंगा नदी तन्त्र का प्रवाह उत्तर से दक्षिण-पूर्व की ओर है।
  • ब्रह्मपुत्र नदी तन्त्र– उत्तरी भारत के अपवाह का पूर्वी भाग ब्रह्मपुत्र व उसकी सहायक नदियों द्वारा बनाया गया है। ब्रह्मपुत्र भारत की सबसे बड़ी नदी है। यह तिब्बत में कैलाश पर्वत पर मानसरोवर झील से 80 किमी की दूरी पर 5,150 मीटर की ऊँचाई से निकलती है। लगभग 1,100 किमी तक महान् हिमालय के समानान्तर बहने के बाद यह नामचा-बरुआ के निकट दक्षिण की ओर मुड़कर असोम में दिहांग के नाम से प्रकट होती है। यहाँ से यह दक्षिण-पश्चिम की ओर बहती है।।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ब्रह्मपुत्र की घाटी का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर :
ब्रह्मपुत्र का उद्गम स्थान तिब्बत में सिन्धु और सतलुज के उद्गम के निकट ही है। ब्रह्मपुत्र की लम्बाई सिन्धु नदी के बराबर है, परन्तु इसका अधिकांश विस्तार तिब्बत में है। तिब्बत में इसका नाम सांग है। नामचा-बरुआ नामक पर्वत के पास यह तीखा मोड़ लेकर भारत में प्रवेश करती है। अरुणाचल प्रदेश में इसे दिहांग के नाम से पुकारते हैं। लोहित, दिहांग तथा दीबांग के संगम के पश्चात् इसका नाम ब्रह्मपुत्र पड़ता है। बांग्लादेश के उत्तरी (UPBoardSolutions.com) भाग में इसका नाम जमुना है तथा मध्य भाग में इसे पद्मा कहते हैं। दक्षिण में पहुंचकर ब्रह्मपुत्र और गंगा आपस में मिल जाती हैं, तब इस संयुक्त धारा को मेघना कहते हैं।

प्रश्न 2.
भारत के उत्तरी विशाल मैदान का निर्माण किस प्रकार हुआ ?
उत्तर :
भारत का उत्तरी मैदान हिमालय तथा दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठार के मध्य स्थित है। यह मैदान हिमालय तथा प्रायद्वीपीय पठार से निकलकर उत्तर की ओर बहने वाली नदियों द्वारा लायी गयी मिट्टियों से बना है। इन महीन मिट्टियों को जलोढ़क’ कहते हैं। उत्तरी मैदान जलोढ़कों द्वारा निर्मित एक समतल उपजाऊ भू-भाग है।

प्राचीनकाल में इसे मैदान के स्थान पर एक विशाल गर्त था। हिमालय पर्वतों के निर्माण के बाद हिमालय से निकलकर बहने वाली नदियों ने उस गर्त में गाद भरने शुरू किये। अनाच्छादन के कारकों ने हिमालय का अपरदन किया तथा भारी मात्रा में अवसाद (UPBoardSolutions.com) उस गर्त में एकत्रित होते गये। क्रमश: वह गर्त अवसादों से पट गया तथा उत्तरी मैदान की रचना हुई।

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प्रश्न 3.
पश्चिमी तटीय मैदान की भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार तथा उसकी तीन विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2010]
या
भारत के पश्चिमी तटीय भाग के दोनों नामों को स्थिति सहित लिखिए।
उत्तर :
पश्चिमी तटीय मैदान एक सँकरी पट्टी के रूप में विस्तृत हैं। प्रायद्वीप के पश्चिम में खम्भात की खाड़ी से लेकर कुमारी अन्तरीप तक इस मैदान का विस्तार है। इसकी औसत चौड़ाई 64 किमी है, जब कि नर्मदा एवं ताप्ती नदियों के मुहाने के निकट ये 80 किमी तक चौड़े हैं। इस मैदान के उत्तरी भाग को कोंकण तथा दक्षिणी भाग को मालाबार कहते हैं। यहाँ सघन जनसंख्या पायी जाती है। इनकी स्थिति का विवरण अग्रलिखित है 10.

  • कोंकण का मैदान– इस मैदान का विस्तार दमन से लेकर गोआ तक 500 किमी की लम्बाई में है। इस मैदान की चौड़ाई 50 से 60 किमी के बीच है तथा मुम्बई के निकट सबसे अधिक है।
  • मालाबार का तटीय मैदान– इस मैदान का विस्तार मंगलोर से लेकर कन्याकुमारी तक 500 किमी की लम्बाई में है। इस पर लैगून नामक छोटी-छोटी तटीय झीलें पायी जाती हैं।

पश्चिमी तटीय मैदानों की प्रमुख तीन विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • ये मैदान एक सँकरी पट्टी के रूप में विस्तृत हैं। गुजरात में ये अधिकतम चौड़े हैं तथा दक्षिण की ओर सँकरे हैं।
  • इस तट पर अनेक ज्वारनदमुख स्थित हैं जिनमें नर्मदा और ताप्ती के ज्वारनदमुख (एस्चुरी) मुख्य हैं।
  • दक्षिण में केरल में अनेक लैगून या पश्चजल स्थित हैं। उनके मुख पर बालूमिति या रोधिकाएँ स्थित हैं।

प्रश्न 4.
पूर्वी तटीय मैदान की स्थिति, विस्तार तथा उसकी तीन विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
प्रायद्वीपीय पठार के पूर्वी किनारे पर बंगाल की खाड़ी के तट तक तथा पूर्वी घाट के मध्य प० बंगाल से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक पूर्वी तटीय मैदानों का विस्तार है। तमिलनाडु में यह मैदान 100 से 120 किमी चौड़ा है। गोदावरी के डेल्टा के उत्तर में यह सँकरा है। कहीं-कहीं इसकी चौड़ाई 32 किमी तक है। इसकी तीन विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

  • यह मैदान पश्चिमी तटीय मैदान से अधिक चौड़ा है। नदियों के डेल्टाओं के निकट विशेष रूप से यह अधिक चौड़ा है।
  • नदी डेल्टाओं के मैदान अत्यधिक उर्वर तथा सघन आबाद हैं। महानदी, (UPBoardSolutions.com) गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी यहाँ बहने वाली नदियाँ हैं।
  • डेल्टाओं में नदियों से अनेक नहरें निकाली गयी हैं, जो सिंचाई के महत्त्वपूर्ण साधन हैं। यहाँ अनेक लैंगून झीलें भी मिलती हैं, जिनमें ओडिशा की चिल्का, आन्ध्र प्रदेश की कोलेरू तथा तमिलनाडु की पुलीकट झीलें उल्लेखनीय हैं।

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प्रश्न 5.
उत्तरी पर्वत प्राचीर तथा प्रायद्वीपीय पठार में क्या अन्तर है ?
उत्तर :
उत्तरी पर्वत प्राचीर तथा प्रायद्वीपीय पठार में निम्नलिखित अन्तर हैं
UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 1 भारत भौतिक स्वरूप 2

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प्रश्न 6.
हिमालय की उत्पत्ति की विवेचना कीजिए। या हिमालय का निर्माण किस प्रकार हुआ ?
उत्तर :
हिमालय की उत्पत्ति या निर्माण-उच्चावच से तात्पर्य किसी भू-भाग के ऊँचे व नीचे धरातल से है। सभी प्रकार के पहाड़ी, पठारी व मैदानी तथा मरुस्थलीय क्षेत्र मिलकर किसी क्षेत्र के उच्चावच का निर्माण करते हैं। उच्चावच की दृष्टि से भारत में अनेक विभिन्नताएँ मिलती हैं। इनका मूल कारण अनेक शक्तियों और संचलनों का परिणाम है, जो लाखों वर्ष पूर्व घटित हुई थीं। इसकी उत्पत्ति भूवैज्ञानिक अतीत के अध्ययन से स्पष्ट की जा सकती है। आज से 25 करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप विषुवत रेखा के दक्षिण में स्थित प्राचीन गोण्डवानालैण्ड का एक भाग था। अंगारालैण्ड नामक एक अन्य प्राचीन भूखण्ड विषुवत् रेखा के उत्तर (UPBoardSolutions.com) में स्थित था। दोनों प्राचीन भूखण्डों के मध्य टेथिस नामक एक सँकरा, लम्बा, उथला सागर था। इन भूखण्डों की नदियाँ टेथिस में अवसाद जमा करती रहीं, जिससे कालान्तर में टेथिस सागर पट गया। पृथ्वी की आन्तरिक हलचलों के कारण दोनों भूखण्ड टूटे। गोण्डवानालैण्ड से भारत का प्रायद्वीप अलग हो गया तथा भूखण्डों के टूटे हुए भाग विस्थापित होने लगे। आन्तरिक हलचलों से टेथिस सागर के अवसादों की परतों में भिंचाव हुआ और उसमें विशाल मोड़ पड़ गये। इस प्रकार हिमालय पर्वत-श्रृंखला की रचना हुई। इसी कारण हिमालय को वलित पर्वत कहा जाता है।

हिमालय की उत्पत्ति के बाद भारतीय प्रायद्वीप और हिमालय के मध्य एक खाई या गर्त शेष रह गया। हिमालय से उतरने वाली नदियों ने स्थल का अपरदन करके अवसादों के उस गर्त को क्रमशः भरना शुरू किया जिससे विशाल उत्तरी मैदान की रचना हुई। इस प्रकार भारतीय उपमहाद्वीप की भू-आकृतिक इकाइयाँ अस्तित्व में आयीं।

प्रश्न 7.
हिमालय से निकलने वाली नदियों तथा प्रायद्वीपीय भारत की नदियों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
हिमालय से निकलने वाली नदियों तथा प्रायद्वीपीय नदियों में निम्नलिखित अन्तर हैं
UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 1 भारत भौतिक स्वरूप 3

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प्रश्न 8.
दक्षिण के पठार में नहर बनाना क्यों कठिन है ? इसके दो कारण लिखिए।
उत्तर:
दक्षिण के पठार में भौगोलिक स्थितियाँ नहर बनाने के अनुकूल नहीं हैं। इसके दो कारण निम्नलिखित हैं

  1. चम्बल व उसकी सहायक नदियों ने इस पठार के उत्तरी भाग को बीहड़ तथा ऊबड़-खाबड़ गहरे खड्डों में परिवर्तित कर दिया है। यही स्थिति बुन्देलखण्ड एवं बघेलखण्ड के पठार की भी है, जहाँ पर चम्बल व यमुना नदी ने बीहड़ निर्मित किये हैं। यह क्षेत्र नहर बनाने के लिए उपयुक्त नहीं है।
  2. यह पठारी क्षेत्र अत्यन्त कठोर चट्टानों द्वारा निर्मित है। इन चट्टानों को तोड़कर (UPBoardSolutions.com) नहरें निकालना अत्यन्त महँगा व श्रम-साध्य कार्य है। इन्हीं कारणों से दक्षिण के पठार में नहरें बनाना कठिन है।

प्रश्न 9.
भारत के समुद्रतटीय मैदानों के आर्थिक महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
प्रायद्वीपीय पठार के दोनों ओर पूर्वी तथा पश्चिमी तटीय क्षेत्रों पर पतली सँकरी पट्टी के रूप में जो मैदान फैले हैं, उन्हें समुद्रतटीय मैदान कहते हैं। ये क्रमश: पश्चिमी तथा पूर्वी समुद्रतटीय मैदान कहलाते हैं। इनका आर्थिक महत्त्व निम्नवत् है

1. पश्चिमी तटीय मैदान– 
प्रायद्वीप के पश्चिम में खम्भात की खाड़ी से लेकर कुमारी अन्तरीप तक इस मैदान का विस्तार है। नर्मदा तथा ताप्ती यहाँ की प्रमुख नदियाँ हैं। नदियों के मुहानों पर बालू जम जाने से यहाँ लैगून निर्मित होते हैं। इनमें मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। उपयुक्त जलवायु तथा उत्तम मिट्टी के कारण यहाँ चावल, आम, केला, सुपारी, काजू, इलायची, गरम मसाले, नारियल आदि की फसलें उगायी जाती हैं। सागर तट पर नमक बनाने तथा मछलियाँ पकड़ने का व्यवसाय भी पर्याप्त रूप में विकसित हुआ है। भारत के प्रमुख पत्तन इन्हीं मैदानों में स्थित हैं। काँदला, मुम्बई ( न्हावाशेवा) व कोचीन इस तट के प्रमुख बन्दरगाह हैं।

2. पूर्वी तटीय मैदान– 
प्रायद्वीपीय पठारों के पूर्वी किनारों पर बंगाल की खाड़ी के तट तक तथा पूर्वी घाट के मध्य प० बंगाल से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक पूर्वी तटीय मैदानों का विस्तार है। इस मैदान में महानदी, गोदावरी, कृष्णा एवं कावेरी नदियों के डेल्टा विकसित हुए हैं। डेल्टाओं में नदियों से अनेक नहरें निकाली गयी हैं, जो सिंचाई का महत्त्वपूर्ण साधन हैं। यह तटीय मैदान उपजाऊ है तथा कहीं- कहीं पर कॉप मिट्टी से ढका है। यह मैदान कृषि की दृष्टि से बड़ा अनुकूल है। चावल, गन्ना, तम्बाकू व जूट इस मैदान की मुख्य उपज हैं।

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प्रश्न 10.
भारत के पश्चिमी तथा पूर्वी तटीय मैदानों में दो मुख्य अन्तर लिखिए।
या
भारत के पूर्वी व पश्चिमी तटीय मैदानों की तुलना कीजिए। [2014]
उत्तर :
प्रायद्वीपीय पठार के दोनों ओर पूर्वी तथा पश्चिमी तटीय क्षेत्रों पर पतली पट्टी के रूप में जो मैदान फैले हैं, उन्हें समुद्रतटीय मैदान कहते हैं। इन मैदानों को दो क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है-पूर्वी तटीय मैदान एवं पश्चिमी तटीय मैदान। इन दोनों मैदानों में दो मुख्य अन्तर निम्नलिखित हैं

  • आकार–पश्चिमी तटीय मैदान एक सँकरी पट्टी के रूप में विस्तृत हैं। इनकी औसत चौड़ाई 64 किमी है तथा नर्मदा एवं ताप्ती के मुहाने के निकट ये 80 किमी चौड़े हैं, जबकि पूर्वी तटीय मैदान अपेक्षाकृत अधिक चौड़े हैं। इनकी औसत चौड़ाई (UPBoardSolutions.com) 161 से 483 किमी है।
  • विस्तार–पश्चिमी तटीय मैदान प्रायद्वीप के पश्चिम में खम्भात की खाड़ी से लेकर कुमारी अन्तरीप तक फैले हैं, जबकि पूर्वी तटीय मैदान प्रायद्वीपीय पठारों के पूर्वी किनारों पर बंगाल की खाड़ी के तट तक तथा पूर्वी घाट के मध्य पश्चिमी बंगाल से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक विस्तृत हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रज,

प्रश्न 1.
भारत के अक्षांशीय एवं देशान्तरीय विस्तार को लिखिए। [2012]
उत्तर :
भारत हिन्द महासागर के शीर्ष पर स्थित एक विशाल देश है। इसका क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग किमी है। भारत 8°4′ उत्तर से 37°6′ उत्तरी अक्षांश और 68°7′ से 97°25′ पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थित है।

प्रश्न 2.

क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का विश्व में कौन-सा स्थान है ?
उत्तर:
क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत विश्व का सातवाँ विशाल देश है। इससे अधिक बड़े आकार वाले देश क्रमशः रूस, कनाडा, चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्राजील तथा ऑस्ट्रेलिया हैं।

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प्रश्न 3.
भारत की सीमाओं पर स्थित पड़ोसी देशों के नाम लिखिए।
उत्तर:
भारत की पूर्वी सीमा बांग्लादेश तथा म्यांमार से, पश्चिमी सीमा पाकिस्तान (UPBoardSolutions.com) व अफगानिस्तान से, उत्तरी सीमा चीन, नेपाल और भूटान से तथा दक्षिण में श्रीलंका से मिलती है।

प्रश्न 4.
भारतीय उपमहाद्वीप में कौन-कौन-से देश हैं ?
उत्तर:
भारतीय उपमहाद्वीप में पाकिस्तान,भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका तथा मालदीव देश सम्मिलित हैं।

प्रश्न 5.
हिमालय को नवीन वलित पर्वत क्यों कहते हैं ?
उत्तर:
हिमालय की उत्पत्ति टेथिस सागर में लगातार तलछटों के निक्षेप से बनी परतों में मोड़ पड़ जाने से हुई। भिंचाव की शक्तियों के कारण ये मोड़ ऊँचे उठते चले गये जो बाद में पर्वत बन गये। इसीलिए हिमालय को नवीन वलित पर्वत कहते हैं।

प्रश्न 6.
भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे प्राचीन भू-भाग कौन-सा है ?
उत्तर:
भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे प्राचीन भू-भाग विशाल प्रायद्वीपीय पठार है, जो उत्तरी मैदान के दक्षिण में स्थित है।

प्रश्न 7.
लक्षद्वीप किस सागर में स्थित है ?
उत्तर:
लक्षद्वीप अरब सागर में स्थित है।

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प्रश्न 8.
उत्तर भारत के विशाल मैदानों की दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2011]
उत्तर:

  • उत्तर का विशाल मैदान सतलज, गंगा तथा ब्रह्मपुत्र नदियों के अपरदन से बना है।
  • यह क्षेत्र अत्यधिक उपजाऊ है।

प्रश्न 9.
शिवालिक श्रेणी किन दो राज्यों में स्थित है ?
उत्तर:
शिवालिक श्रेणी

  • पंजाब तथा
  • उत्तराखण्ड राज्यों में स्थित है।

प्रश्न 10.
भारत के पश्चिमी तट के दक्षिणी भाग को किस नाम से जाना जाता है ?
उत्तर:
भारत के पश्चिमी तट के दक्षिणी भाग को ‘मालाबार’ (UPBoardSolutions.com) नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 11.
हिमालय के दो सर्वोच्च शिखरों के नाम लिखिए।
उत्तर:
हिमालय के दो सर्वोच्च शिखर माउण्ट एवरेस्ट (नेपाल) तथा के-2 (भारत) हैं।

प्रश्न 12.
हिमालय की प्रमुख घाटियों के नाम बताइए। इनका क्या महत्त्व है ?
उत्तर:
हिमालय की प्रमुख घाटियों, जिन्हें ‘दून’ कहते हैं; के नाम हैं-देहरादून, पूर्वादून, कोठड़ीदून, पाटलीदून आदि। ये घाटियाँ अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के लिए विश्वविख्यात हैं।

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प्रश्न 13.
पूर्वांचल में पर्वत-श्रृंखलाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
पटकाई कूम, गारो-खासी जयन्तिया तथा चुसाई पहाड़ियाँ।

प्रश्न 14.
गंगा-ब्रह्मपुत्र नदियों के डेल्टा को हम किस नाम से जानते हैं?
उत्तर:
सुन्दरवन डेल्टा।

प्रश्न 15.
विशाल प्रायद्वीपीय पठार की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
विशाल प्रायद्वीपीय पठार की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • यह विशाल प्रायद्वीपीय पठार भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे प्राचीन भू-भाग है, जो गोण्डवाना–लैण्ड का ही एक अंग है।
  • इस पठार का निर्माण त्रिभुजाकार आकृति में प्राचीन (UPBoardSolutions.com) ग्रेनाइट तथा बेसाल्ट की कठोर शैलों से हुआ है।

प्रश्न 16.
ब्रह्मपुत्र नदी भारत के किस राज्य में बहती है ?
उत्तर:
ब्रह्मपुत्र नदी भारत के असोम राज्य में बहती है।

प्रश्न 17.
सतपुड़ा पर्वत किन दो नदियों के बीच स्थित है ?
उत्तर:
सतपुड़ा पर्वत नर्मदा और ताप्ती नदियों के बीच स्थित है।

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प्रश्न 18.
अरावली पहाड़ियाँ किस राज्य में स्थित हैं ?
उत्तर:
अरावली पहाड़ियाँ राजस्थान राज्य में स्थित हैं।

प्रश्न 19.
बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली दो नदियों के नाम लिखिए। [2018]
उत्तर:

  • महानदी तथा
  • स्वर्ण रेखा नदी।

प्रश्न 20.
थार मरुस्थल कहाँ है ?
उत्तर:
थार मरुस्थल उत्तर-पश्चिमी भारत (राजस्थान) में है।

प्रश्न 21.
भारत और विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा कौन-सा है ?
उत्तर:
भारत और विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा या सुन्दरवन है।

प्रश्न 22.
डेल्टा को परिभाषित कीजिए और किसी एक डेल्टा का नाम लिखिए। [2011, 12]
या
डेल्टा किसे कहते हैं? यह कैसे बनता है?
उत्तर:
जब नदियों में अवसाद की मात्रा ज्यादा हो जाती है तो (UPBoardSolutions.com) नदियों का पानी कई शाखाओं में होकर बहने लगता है, जिससे निक्षेपण क्षेत्र A के आकार का हो जाता है, जिसे ‘डेल्टा’ कहते हैं। सुन्दरवन डेल्टा विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा है।

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प्रश्न 23.
मालय के दो प्रमुख दरों के नाम लिखिए। [2011, 13, 16]
उत्तर:
हिमालय के दो प्रमुख दरों के नाम हैं–

  • कराकोरम तथा
  • शिपकी-ला।

प्रश्न 24.
अरब सागर में गिरने वाली दो नदियों के नाम लिखिए। [2011, 13]
उत्तर:
अरब सागर में गिरने वाली दो नदियाँ हैं–सिन्धु नदी तथा नर्मदा नदी।

प्रश्न 25.
भारत और चीन के बीच सीमा-रेखा का क्या नाम है ?
उत्तर:
भारत और चीन के बीच सीमा-रेखा का नाम मैकमोहन रेखा है।

प्रश्न 26.
कौन-सा दर्रा भारत के सिक्किम राज्य को तिब्बत से जोइता है ?
उत्तर:
नाथुला दर्रा भारत के सिक्किम राज्य को तिब्बत से जोड़ता है।

प्रश्न 27.
भारत के पश्चिम और दक्षिण में कौन-से सागर हैं? [2014]
उत्तर:

पश्चिम-(1) अरब सागर।
दक्षिण-(2) हिन्द महासागर।

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प्रश्न 28.
डेल्टा तथा ज्वारनदमुख में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
जब नदियों में अवसाद की मात्रा ज्यादा हो जाती है तो नदियों का पानी कई शाखाओं में होकर बहने लगता है, जिससे निक्षेपण क्षेत्र A के आकार का हो जाता है, जिसे डेल्टा’ (Delta) कहते हैं तथा जब नदियाँ बिना डेल्टा का निर्माण किए सीधे समुद्र (UPBoardSolutions.com) में गिरती हैं तो उसे ‘ज्वारनदमुख’ कहते हैं।

बहुविकल्पीय

प्रश्न 1. भारत किस महाद्वीप में स्थित है?

(क) यूरोप में
(ख) अफ्रीका में
(ग) एशिया में
(घ) ऑस्ट्रेलिया में

2. भारत किस कटिबन्ध में स्थित है?

(क) उपोष्ण
(ख) उष्ण
(ग) शीतोष्ण
(घ) शीत

3. भारत की वह नदी जो ज्वारनदमुख बनाती है

(क) ताप्ती
(ख) महानदी
(ग) गोदावरी
(घ) लूनी

4. भारत के कुल क्षेत्रफल में मैदानी भाग हैं [2011]

(क) लगभग 43%
(ख) लगभग 40%
(ग) लगभग 33%
(घ) लगभग 30%

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5. ‘शिपकी-ला’ दर्रा भारत को जोड़ता है [2011]

(क) पाकिस्तान से
(ख) चीन से
(ग) भूटान से
(घ) नेपाल से

6. भारत के दक्षिण में स्थित देश का नाम है [2012]

(क) श्रीलंका
(ख) नेपाल
(ग) चीन
(घ) म्यांमार

7. हिमालय पर्वत की सर्वोच्च चोटी है

(क) एवरेस्ट
(ख) कंचनजंगा
(ग) K-2
(घ) नन्दा

8. अरुणाचल प्रदेश में मुख्य दर्रा है[2011]

(क) नाथुला दर्रा
(ख) बोमडिला दर्रा
(ग) कराकोरम दर्रा
(घ) बोलन दर्रा

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9. गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी है

(क) चम्बल
(ख) यमुना
(ग) बेतवा
(घ) नर्मदा

10. नन्दा देवी शिखर किस पर्वत से सम्बन्धित है?

(क) नीलगिरि पर्वत से
(ख) सतपुड़ा पर्वत से
(ग) हिमालय पर्वत से
(घ) मैकाले पर्वत से

11. भारत का सर्वोच्च शिखर कौन-सा है? [2011, 13, 14]

(क) गॉडविन ऑस्टिन
(ख) कंचनजंगा
(ग) नन्दा देवी ,
(घ) इनमें से कोई नहीं

12. भारत की स्थल सीमा की कुल लम्बाई कितनी है?

(क) 15,200 किमी.
(ख) 15,300 किमी
(ग) 15,400 किमी
(घ) 15,500 किमी

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13. नीलगिरि पर्वत स्थित है [2011, 12, 13, 16]

(क) उत्तरी भारत में
(ख) दक्षिणी भारत में
(ग) पूर्वी भारत में
(घ) पश्चिमी भारत में

14. नाथूला दर्रा किस राज्य में स्थित है?

(क) अरुणाचल प्रदेश में
(ख) असोम में
(ग) सिक्किम में ।
(घ) मणिपुर में

15. बोमडिला दर्रा किस राज्य में स्थित है? [2010]

(क) सिक्किम में
(ख) हिमाचल प्रदेश में
(ग) जम्मू-कश्मीर में
(घ) अरुणाचल प्रदेश में

16. निम्नलिखित में से कौन-सी नदी अरब सागर में गिरती है? [2012, 13, 18]

(क) सतलुज
(ख) महानदी
(ग) ताप्ती
(घ) कावेरी

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17. ऊटकमण्ड किस राज्य में स्थित है? [2012]

(क) केरल
(ख) कर्नाटक
(ग) तमिलनाडु
(घ) उत्तराखण्ड

18. शिवालिक पर्वत स्थित है [2012]

(क) उत्तरी भारत में
(ख) दक्षिणी भारत में
(ग) पूर्वी भारत में
(घ) पश्चिमी भारत में

19. जोजिला दर्रा जोड़ता है [2012]

(क) जम्मू और कठुआ को
(ख) जम्मू और ऊधमपुर को
(ग) श्रीनगर और लेह को
(घ) श्रीनगर और कुपवाड़ा को

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20. निम्नलिखित में से कौन-सी सबसे बड़ी नदी है? [2011]

(क) गोदावरी
(ख) गंगा
(ग) कृष्णा
(घ) साबरमती

21. निम्नलिखित में से कौन-सी नदी बंगाल की खाड़ी में गिरती है? [2011]

(क) नर्मदा
(ख) गोदावरी
(ग) ताप्ती
(घ) साबरमती

22. शिपकी-ला दर्रा किस राज्य में है?

(क) उत्तराखण्ड
(ख) हिमाचल प्रदेश
(ग) सिक्किम

23. भारतीय गणराज्य में कितने राज्य हैं?

(क) 29
(ख) 28
(ग) 30
(घ) 35

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24. कौन-सा समुद्र तट कोरोमण्डल तट कहा जाता है? [2013, 15]

(क) गुजरात का समुद्र तट
(ख) केरल का समुद्र तट
(ग) तमिलनाडु की समुद्र तट
(घ) ओडिशा का समुद्र तट

25. किस राज्य की तट रेखा सबसे लम्बी है? [2014]

(क) गुजरात
(ख) आन्ध्र प्रदेश
(ग) पश्चिम बंगाल
(घ) गोवा

26. भारतवर्ष का क्षेत्रफल है [2014]

(के) 32,87,263 वर्ग किमी
(ख) 33,87,364 वर्ग किमी
(ग) 30,80,362 वर्ग किमी
(घ) 31,80,664 वर्ग किमी

27. क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य है [2014]

(क) मध्य प्रदेश
(ख) उत्तर प्रदेश
(ग) बिहार
(घ) राजस्थान

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28. कंचनजंगा की ऊँचाई है [2015]

(क) 8598 मीटर
(ख) 7598 मीटर
(ग) 6598 मीटर
(घ) 5598 मीटर

29. संसार का सबसे बड़ा डेल्टा है [2015]

(क) अमेजन का डेल्टा ।
(ख) गंगा का डेल्टा
(ग) मिसीसिपी का डेल्टा
(घ) नील नदी का डेल्टा

30. माउण्ट एवरेस्ट की ऊँचाई है [2015, 16]

(क) 8848 मीटर
(ख) 7747 मीटर
(ग) 6646 मीटर
(घ) 5545 मीटर

31. भारत की सर्वोच्च श्रेणी की ऊँचाई है [2015]

(क) 8211 मीटर
(ख) 8611 मीटर
(ग) 8000 मीटर
(घ) 8302 मीटर

32. कंचनजंगा चोटी अवस्थित है [2015]

(क) जम्मू और कश्मीर में
(ख) उत्तराखण्ड में
(ग) सिक्किम में
(घ) हिमाचल प्रदेश में

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33. मालाबार तट कहा जाता है [2015]

(क) पश्चिमी समुद्र तटीय मैदान का उत्तरी भाग
(ख) पश्चिमी समुद्र तटीय मैदान का दक्षिणी भाग
(ग) पूर्वी समुद्र तटीय मैदान का उत्तरी भाग
(घ) पूर्वी समुद्र तटीय मैदान का दक्षिणी भाग

34. मैकमोहन रेखा स्थित है [2015, 16]

(क) भारत तथा बांग्लादेश के मध्य
(ख) भारत तथा नेपाल के मध्य ।
(ग) भारत तथा पाकिस्तान के मध्य
(घ) भारत तथा चीन के मध्य

35. निम्नलिखित में से कौन पर्वतीय चोटी भारत में स्थित है? [2016]

(क) माउण्ट एवरेस्ट
(ख) धौला गिरि
(ग) अन्नपूर्णा
(घ) नन्दा देवी

36. निम्नलिखित में से किस राज्य में समुद्र तट नहीं है? [2017]

(क) महाराष्ट्र
(ख) गुजरात
(ग) केरल
(घ) मध्य

प्रदेश 37. गंगा नदी का उद्गम स्थल है [2017]

(क) तिब्बत का पठार
(ख) मानसरोवर झील
(ग) गोमुख हिमनद
(घ) नंगा पर्वत

38. नीलगिरि पर्वत स्थित है [2017]

(क) तमिलनाडु
(ख) कर्नाटक
(ग) केरल
(घ) आन्ध्र

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प्रदेश 39. कन्याकुमारी स्थित है [2017]

(क) कर्नाटक
(ख) आन्ध्र प्रदेश
(ग) केरल
(घ) तमिलनाडु

40. नवीनतम पर्वतश्रेणी है

(क) नीलगिरि
(ख) सतपुड़ा
(ग) शिवालिक
(घ) विन्ध्य की पहाड़ियाँ

उत्तरमाला

1. (ग), 2. (क), 3. (क), 4. (क), 5. (ख), 6. (क), 7. (क), 8. (ख), 9. (ख), 10. (ग), 11. (ख), 12. (क), 13. (ख), 14. (ग), 15. (घ), 16. (ग), 17. (ग), 18. (क), 19. (ग), 20. (ख), 21. (ख), 22. (ख), 23. (क), 24. (ग), 25. (क), 26. (क), 27. (घ), 28. (क), 29. (ख), 30. (क), 31. (ख), 32. (ग), 33. (ख), 34. (घ) 35. (घ), 36. (घ), 37. (ग), 38. (क), 39. (घ), 40. (ग) |

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