UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 ईष्र्या, तू न गयी मेरे मन से (गद्य खंड)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 ईष्र्या, तू न गयी मेरे मन से (गद्य खंड)

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जीवन-परिचय एवं कृतियाँ

प्रश्न 1.
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के जीवन-परिचय एवं साहित्यिक योगदान पर प्रकाश डालिए। [2009]
या
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जीवन-परिचय दीजिए एवं उनकी एक रचना का नामोल्लेख कीजिए। [2012, 13, 14, 15, 16, 17, 18]
उत्तर
हिन्दी के प्रसिद्ध कवि व क्रान्ति-गीतों के अमर गायक श्री रामधारी सिंह हिन्दी-साहित्याकाश के दीप्तिमान् ‘दिनकर’ हैं। इन्होंने अपनी प्रतिभा की प्रखर किरणों से हिन्दी-साहित्य-गगन को आलोकित किया है। ये हिन्दी के महान् विचारक, निबन्धकार, आलोचक और भावुक कवि हैं। इनके द्वारा कई ऐसे ग्रन्थों की रचना की गयी है, जो हिन्दी-साहित्य की अमूल्य निधि हैं।

जीवन-परिचय–दिनकर जी का जन्म सन् 1908 ई० में बिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया’ नामक ग्राम में एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री रवि सिंह तथा माता का नाम श्रीमती मनरूप देवी था। अल्पायु में ही इनके पिता का देहान्त हो गया था। इन्होंने पटना विश्वविद्यालय से बी० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की और इच्छा होते हुए भी पारिवारिक कारणों से आगे न पढ़ सके और नौकरी में लग गये। कुछ दिनों तक इन्होंने माध्यमिक विद्यालय मोकामाघाट में प्रधानाचार्य के पद पर कार्य किया। फिर सन् 1934 ई० में बिहार के सरकारी विभाग में सब-रजिस्ट्रार की नौकरी की। इसके बाद (UPBoardSolutions.com) प्रचार विभाग में उपनिदेशक के पद पर स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद तक कार्य करते रहे। सन् 1950 ई० में इन्हें मुजफ्फरपुर के स्नातकोत्तर महाविद्यालय के हिन्दी विभाग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। सन् 1952 ई० में ये राज्यसभा के सदस्य मनोनीत हुए। इसके बाद इन्होंने भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति, भारत सरकार के गृहविभाग में हिन्दी सलाहकार और आकाशवाणी के निदेशक के रूप में कार्य किया। सन् 1962 ई० में भागलपुर विश्वविद्यालय ने इन्हें डी० लिट्० की मानद उपाधि प्रदान की। सन् 1972 ई० में इनकी काव्य-रचना ‘उर्वशी’ पर इन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हिन्दी साहित्य-गगन का यह दिनकर 24 अप्रैल, सन् 1974 ई० को हमेशा के लिए अस्त हो गया।

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रचनाएँ–साहित्य के क्षेत्र में ‘दिनकर’ जी का उदय कवि के रूप में हुआ था। बाद में गद्य के क्षेत्र में भी वे आगे आये। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नवत् हैं|

  1. दर्शन एवं संस्कृति-धर्म’, ‘भारतीय संस्कृति की एकता’, ‘संस्कृति के चार अध्याय’-ये दर्शन और संस्कृति पर आधारित ग्रन्थ हैं। संस्कृति के चार अध्याय ‘साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत रचना
  2. निबन्ध-संग्रह–अर्द्धनारीश्वर’, ‘वट-पीपल’, ‘उजली आग’, ‘मिट्टी की ओर’, रेती के फूल आदि इनके निबन्ध-संग्रह हैं। इसके अतिरिक्त विविध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित इनके अन्य निबन्ध भी हैं।
  3. आलोचना-ग्रेन्थ-शुद्ध कविता की खोज’, इसमें कविता के प्रति शुद्ध और व्यापक दृष्टिकोण व्यक्त हुआ है।
  4. यात्रा-साहित्य-‘देश-विदेश’।
  5. बाल-साहित्य-‘मिर्च का मजा’, ‘सूरज का ब्याह’ आदि।
  6. काव्य-रेणुका’, ‘हुंकार’, ‘रसवन्ती’, ‘कुरुक्षेत्र’, “सामधेनी’, ‘प्रणभंग’ (प्रथम काव्यरचना), ‘उर्वशी’ (महाकाव्य); ‘रश्मिरथी’ और ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ (खण्डकाव्य)-ये दिनकर जी के राष्ट्रप्रेम और क्रान्ति की ओजस्वी भावना से पूर्ण काव्य-ग्रन्थ हैं।
  7. शुद्ध कविता की खोज-दिनकर जी का एक आलोचनात्मक ग्रन्थ है, जिसमें इन्होंने काव्य के सम्बन्ध में अपना व्यापक दृष्टिकोण व्यक्त किया है।

साहित्य में स्थान-क्रान्ति का बिगुल बजाने वाले दिनकर जी कवि ही (UPBoardSolutions.com) नहीं अपितु एक सफल गद्यकार भी थे। इनकी कृतियों में इनका चिन्तक एवं मनीषी रूप प्रतिबिम्बित होता है। राष्ट्रीय भावनाओं से संकलित इनकी कृतियाँ हिन्दी-साहित्य की अमूल्य निधि हैं, जो इन्हें हिन्दी साहित्याकाश का दिनकर सिद्ध करती हैं।

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“गद्यांशों पर आधारित प्रश्न

प्रश्न-पत्र में केवल 3 प्रश्न (अ, ब, स) ही पूछे जाएँगे। अतिरिक्त प्रश्न अभ्यास एवं परीक्षोपयोगी दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण दिए गये हैं।
प्रश्न 1.

ईष्र्या का यही अनोखा वरदान है। जिस मनुष्य के हृदय में ईष्र्या घर बना लेती है, वह उन चीजों से आनन्द नहीं उठाता, जो उसके पास मौजूद हैं, बल्कि उन वस्तुओं से दु:ख उठाता है, जो दूसरों के पास हैं। वह अपनी तुलना दूसरों के साथ करता है और इस तुलना में अपने पक्ष के सभी अभाव उसके हृदय पर दंश मारते रहते हैं। दंश के इस दाह को भोगना कोई अच्छी बात नहीं है। मगर, ईष्र्यालु मनुष्य करे भी तो क्या?  आदत से लाचार होकर उसे यह वेदना भोगनी पड़ती है।
[2011, 13, 15, 18]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने क्या कहा है ?
  2. ईर्ष्यालु मनुष्य क्या करता है ?
  3. ईष्र्यालु मनुष्य को कौन-सी वेदना भोगनी पड़ती है ?
  4. लेखक ने ईष्र्या को अनोखा वरदान क्यों कहा है ?
  5. ईष्र्या का अनोखा (UPBoardSolutions.com) वरदान क्या है ?
  6. ईष्र्यालु व्यक्ति को ईष्र्या से क्या कष्ट मिलता है ?

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[ ईष्र्या = दूसरों से जलन, डाह। दंश मारना = डंक मारना। दाह = जलन। वेदना = पीड़ा। ]
उत्तर
(अ) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘गद्य-खण्ड में संकलित एवं श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा लिखित ‘ईष्र्या, तू न गयी मेरे मन से’ नामक मनोवैज्ञानिक निबन्ध से उद्धृत है। अथवा अग्रवत् लिखिए पाठ का नाम-ईष्र्या, तू न गयी मेरे मन से। लेखक का नाम-श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’।
[ विशेष—इस पीठ के शेष सभी गद्यांशों के प्रश्न ‘अ’ के उत्तर के लिए यही उत्तर लिखा जाएगा। ]

(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या–प्रस्तुत अंश में लेखक ने बताया है कि ईष्र्या अपने भक्त को एक विचित्र प्रकार का वरदान देती है और वह सदैव दु:खी रहने का वरदान है। जिस मनुष्य के हृदय में ईर्ष्या उत्पन्न हो जाती है, वह अकारण ही कष्ट भोगता है। वह अपने पास विद्यमान अनन्त सुख-साधनों के उपभोग द्वारा भी आनन्द नहीं उठा पाता; क्योंकि वह दूसरों की वस्तुओं को देख-देखकर मन में जलता रहता है।

द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी का कहना है कि जब ईष्र्यालु मनुष्य यह देखता है कि कोई वस्तु किसी अन्य के पास है लेकिन उसके पास नहीं है तो उसके मन में पनपी यह अभाव की भावना सदैव उसे डंक मारती रहती है। लेखक का कहना है कि डंक से उत्पन्न कष्ट को सहन करना उचित नहीं है। लेकिन ईष्र्यालु मनुष्य कष्ट को सहन करने के अतिरिक्त और कुछ कर भी नहीं सकता।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने ईर्ष्या से उत्पन्न पीड़ा का वर्णन किया है और कहा है कि ईष्र्यालु व्यक्ति सदा दु:खी रहता है।
  2. ईष्र्यालु व्यक्ति अपनी तुलना ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों से करता है जो उससे किन्हीं बातों में श्रेष्ठ हैं। जब वह देखता है कि अमुक वस्तु दूसरे के पास तो है, लेकिन उसके पास नहीं है, तब वह स्वयं को हीन समझने लगता है। अपने अभाव उसे खटकने लगते हैं और वह अपने पास मौजूद वस्तुओं अथवा साधनों का भी आनन्द नहीं ले पाता।
  3. ईर्ष्यालु व्यक्ति रात-दिन इसी वेदना में जला करता (UPBoardSolutions.com) है कि अमुक वस्तु दूसरों के पास तो है लेकिन उसके पास नहीं है। ईष्र्या की इस दाह में जलना बहुत बुरा है, लेकिन ईर्ष्यालु व्यक्ति को यह वेदना भोगनी ही पड़ती है।
  4. लेखक ने ईष्र्या को अनोखा वरदान इसलिए कहा है क्योंकि ईष्र्यालु मनुष्य उन वस्तुओं से आनन्द नहीं प्राप्त करता जो उसके पास हैं, वरन् उन वस्तुओं से दु:ख उठाता है, जो दूसरों के पास हैं।
  5. ईर्ष्या का अनोखा वरदान यह है कि ईष्र्यालु व्यक्ति उन वस्तुओं से आनन्द नहीं उठाता जो उसके पास हैं, वरन् वह उन वस्तुओं से दु:ख उठाता है, जो दूसरों के पास हैं।
  6. ईष्र्यालु व्यक्ति को ईर्ष्या के कारण उन वस्तुओं से आनन्द नहीं मिलता जो उसके पास हैं वरन् वह उन वस्तुओं से दु:ख उठाता है, जो दूसरों के पास हैं।

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प्रश्न 2.
एक उपवन को पाकर भगवान को धन्यवाद देते हुए उसका आनन्द नहीं लेना और बराबर इस चिन्ता में निमग्न रहना कि इससे भी बड़ा उपवन क्यों नहीं मिला, एक ऐसा दोष है, जिससे ईष्र्यालु व्यक्ति का चरित्र भी भयंकर हो उठता है। अपने अभाव पर दिन-रात सोचते-सोचते वह सृष्टि की प्रक्रिया को भूलकर विनाश में लग जाता है और अपनी उन्नति के लिए उद्यम करना छोड़कर वह दूसरों को हानि पहुँचाने को ही अपना श्रेष्ठ कर्त्तव्य समझने लगता है। [2012]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?
  2. ईष्र्यालु व्यक्ति का चरित्र क्यों भयंकर हो जाता है ?
  3. ईर्ष्यालु व्यक्ति किस बात को अपना श्रेष्ठ कर्त्तव्य समझता है ?

[ ईर्ष्यालु = वह व्यक्ति जो दूसरे के सुख को देखकर दुःखी होता है। अभाव = कमी। उद्यम = कार्य, रोजगार।]
उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या–प्रस्तुत अंश में लेखक ने ईष्र्या से विमुक्ति का यही साधन बताया है कि ईश्वर ने जो वस्तुएँ कम अथवा अधिक, छोटी अथवा बड़ी, मोहक अथवा कुरूप प्रदान की हैं उनके लिए हमें ईश्वर का धन्यवाद (UPBoardSolutions.com) करना चाहिए और उन उपलब्ध वस्तुओं से जीवन को आनन्दमय और सुखमय बनाना चाहिए। इसके विपरीत यदि हम दिन-रात इसी चिन्ता में अपना समय व्यर्थ गॅवाते रहेंगे कि मेरे पड़ोसी के पास सुख-सुविधाओं के साधन मुझसे कहीं अधिक हैं, वे सब मेरे पास क्यों
नहीं हैं; तो ऐसा सोचते रहने से ईर्ष्या बढ़ती जाती है और इस कारण ईर्ष्यालु व्यक्ति का चरित्र भयंकर होता जाता है।

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द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक कहता है कि उत्थान-पतन, जीवन-मृत्यु; ये सब ईश्वर अर्थात् उस अदृश्य शक्ति के अधीन हैं। हमें उसके लिए प्रयास करना चाहिए, लेकिन दिन-रात उसके बारे में चिन्तामग्न रहकर अपने जीवन को दु:खमय और कष्टों से युक्त नहीं बनाना चाहिए। सृष्टि की रचना-प्रक्रिया को भूलकर मनुष्य दिन-रात दूसरे की ईष्र्या में समय गॅवाता है और उद्यम करना छोड़ देता है। वह इसी मन्थन में लगा रहता है कि मैं अमुक व्यक्ति को किस प्रकार हानि पहुँचा सकता हूँ। इसी कार्य को वह अपने जीवन का श्रेष्ठ कर्तव्य समझने लगता है, जो कि एक संकीर्ण विचारधारा है। इससे ऊपर उठकर व्यक्ति को सबके हित की सोच रखनी चाहिए।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक कहना चाहता है कि ईश्वर ने हमें उपभोग के योग्य जो वस्तुएँ प्रदान की हैं, उन्हीं का उपभोग कर जीवन का आनन्द उठाना चाहिए।
  2. ईष्र्यालु व्यक्ति का चरित्र इसलिए भयंकर हो जाता है क्योंकि वह लगातार इस चिन्ता में डूबा रहता है कि उसे अमुक वस्तु से अच्छी वस्तु क्यों नहीं मिली। इस कारण वह उन वस्तुओं का भी आनन्द नहीं ले पाता, जो उसे प्राप्त हैं।
  3. ईष्र्यालु व्यक्ति यह कभी भी विचार नहीं करता कि सृष्टि की सम्पूर्ण रचना ईश्वर के अधीन है। वह अपनी कमी को सोचते-सोचते विनाश में लग जाता है। अपनी उन्नति के लिए वह कदापि प्रयत्न नहीं करता, वरन् दूसरों को कैसे हानि पहुँचा (UPBoardSolutions.com) सकता है, इसी को अपना सर्वश्रेष्ठ कर्त्तव्य समझता है।

प्रश्न 3.
ईष्र्या की बड़ी बेटी का नाम निन्दा है। जो व्यक्ति ईष्र्यालु होता है, वही बुरे किस्म का निन्दक भी होता है। दूसरों को निन्दा वह इसलिए करता है कि इस प्रकार, दूसरे लोग जनता अथवा मित्रों की आँखों से गिर जाएँगे और जो स्थान रिक्त होगा, उस पर मैं अनायास ही बैठा दिया जाऊँगा। [2013, 14, 16]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. ईष्र्यालु व्यक्ति दूसरों की निन्दा क्या सोचकर करता है ?
  2. ईष्र्या के साथ और कौन-से अवगुण पनपते हैं ?
  3. ईष्र्यालु और निन्दक का क्या सम्बन्ध है?
  4. [निन्दक = निन्दा (बुराई) करने वाला। अनायास = बिना श्रम के।]

उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या–दिनकर जी का मत है कि जैसे ही हमारे मन में ईर्ष्या की भावना जन्म लेती है, वैसे ही निन्दा की भावना भी उत्पन्न हो जाती है। इसीलिए निन्दा को ईर्ष्या की बड़ी बेटी अथवा पहली सन्तान कहा गया है। जो (UPBoardSolutions.com) व्यक्ति किसी के प्रति ईर्ष्यालु होता है, वह अत्यन्त बढ़ा-चढ़ाकर उसकी बुराई करता है। उसकी बुराई करने में उसे आनन्द का अनुभव होता है। वह चाहता है कि अन्य लोग भी उस व्यक्ति की बुराई करें। उसके निन्दा करने का उद्देश्य यह होता है कि वह व्यक्ति दूसरे लोगों की दृष्टि में गिर जाये। जब वह व्यक्ति, जिसकी वह निन्दा कर रहा है, अपने मित्रों अथवा समाज के लोगों की नजरों में गिर जाएगा तो उसके द्वारा किये गये रिक्त और उच्च स्थान पर वह बिना परिश्रम के अधिकार कर लेगा।

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(स)

  1. ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की निन्दा यह सोचकर करता है कि जब निन्दित व्यक्ति समाज की नजरों से गिर जाएगा तब उसके स्थान पर वह स्वयं विराजमान हो जाएगा।
  2. ईष्र्या ही निन्दा जैसे अवगुणों की जन्मदात्री है। ईर्ष्या का भाव मन में उत्पन्न होने पर निन्दा का .. अवगुण स्वयमेव पनपने लगता है।
  3. ईष्र्यालु और निन्दक में जनक (जन्म देने वाला) और जन्मा (UPBoardSolutions.com) (जन्म लेने वाला) का सम्बन्ध है। दूसरे शब्दों में, ईष्र्या का भाव मन में उत्पन्न होने पर निन्दा का अवगुण स्वयमेव पनप जाता है।

प्रश्न 4.
मगर ऐसा न आज तक हुआ है और न होगा। दूसरों को गिराने की कोशिश तो अपने को बढ़ाने की कोशिश नहीं कही जा सकती। एक बात और है कि संसार में कोई भी मनुष्य निन्दा से नहीं गिरता। उसके पतन का कारण सद्गुणों का ह्रास होता है। इसी प्रकार कोई भी मनुष्य दूसरों की निन्दा करने से अपनी उन्नति नहीं कर सकता। उन्नति तो उसकी तभी होगी, जब वह अपने चरित्र को निर्मल बनाये तथा अपने गुणों का विकास करे। | [2016, 17]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. किसी व्यक्ति की उन्नति कैसे हो सकती है ?
  2. कौन-सी बात है जो आज तक न हुई है और न होगी ?
  3. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?

उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक का कथन है कि जो व्यक्ति ऊँचा उठना चाहता है, वह अपने ही अच्छे कार्यों से ऊँचा उठ सकता है, दूसरों की निन्दा आदि करके कभी कोई ऊपर नहीं उठ सकता। यदि किसी व्यक्ति का पतन होता है तो किसी की निन्दा से नहीं, अपितु उसके अच्छे गुणों के नष्ट हो जाने के कारण होता है। इसलिए उन्नति के लिए आवश्यक है कि मनुष्य निन्दा करना छोड़ दे और अपने चरित्र को स्वच्छ (UPBoardSolutions.com) बनाये तथा अपने अन्दर मानवीय गुणों का विकास करे।

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(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक का कहना है कि व्यक्ति अपने अन्तर्गुणों का विकास करके ही उन्नति कर सकता है, निन्दा से दूसरों को गिराकर नहीं हो सकती। |
  2. दूसरों को नीचा दिखाने के प्रयास द्वारा स्वयं को ऊँचा उठाने की प्रक्रिया न आज तक सफल हुई है। और न होगी।
  3. किसी व्यक्ति की उन्नति तब ही हो सकती है जब वह अपने चरित्र को निर्मल बनाएगा तथा अपने अन्दर सद्गुणों का विकास करेगा। |

प्रश्न 5.
ईर्ष्या का काम जलाना है, मगर सबसे पहले वह उसी को जलाती है, जिसके हृदय में उसका जन्म होता है। आप भी ऐसे बहुत-से लोगों को जानते होंगे, जो ईष्र्या और द्वेष की साकार मूर्ति हैं और जो बराबर । इस फिक्र में लगे रहते हैं कि कहाँ सुनने वाला मिले और अपने दिल का गुबार निकालने का मौका मिले। श्रोता मिलते ही उनका ग्रामोफोन बजने लगता है, और वे बड़ी ही होशियारी के साथ एक-एक काण्ड इस ढंग से सुनाते हैं, मानो विश्व-कल्याण को छोड़कर उनका और कोई ध्येय नहीं हो। अगर जरा उनके अपने इतिहास को देखिए और समझने की कोशिश कीजिए कि जब से उन्होंने इस सुकर्म का आरम्भ किया है, तब से वे अपने क्षेत्र में आगे बढ़े हैं या पीछे हटे हैं। यह भी कि वे निन्दा करने में समय वे शक्ति का अपव्यय नहीं करते तो आज इनका स्थान कहाँ होता ? [2012, 15]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. ईर्ष्या का काम क्या है ? वह सबसे पहले किसे जलाती है ?
  2. ईष्र्यालु व्यक्ति के चरित्र का अध्ययन करने पर क्या निष्कर्ष निकलता है ?
  3. उपर्युक्त गद्यांश में ईर्ष्यालु व्यक्ति की (UPBoardSolutions.com) मनोदशा कैसी बताई गयी है ?

[ श्रोता = सुनने वाला। सुकर्म = अच्छा कर्म, यहाँ पर लक्षणा (शब्द-शक्ति) से दुष्कर्म। अपव्यय = निरर्थक व्यय।]
उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या–लेखक का कथन है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति किसी सुनने वाले के मिलते ही ग्रामोफोन के रिकॉर्ड की भाँति बजने लगते हैं और किसी अन्य के प्रति अपने हृदय की ईष्र्या के गुबार को निकालना शुरू कर देते हैं। बड़ी चतुरता के साथ वे अपनी कथा को विभिन्न अध्यायों में विभक्त कर प्रत्येक अध्याय की कथा को इस प्रकार सुनाते हैं, मानो वे यह कार्य विश्व-कल्याण की भावना से कर रहे हों और इसके अतिरिक्त उनका कोई अन्य उद्देश्य ही न हो।

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द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक ने ऐसे व्यक्तियों को दयनीय समझते हुए कहा है कि यदि ऐसे व्यक्तियों पर ध्यान दें और उनके सन्दर्भ में यह निष्कर्ष निकालने का प्रयत्न करें कि जब से उन्होंने ईष्र्या में जलना प्रारम्भ किया है तब से वे स्वयं कितना आगे बढ़े हैं तो हमें ज्ञात होगा कि उनकी अवनति ही हुई है। यदि वे निन्दा-कार्य में समय नष्ट न करके स्वयं उन्नति के मार्ग पर बढ़ते तो निश्चित ही प्रगति कर गये होते। लेखक का मत है कि ऐसे लोग अपनी शक्ति का अपव्यय कर अपनी ही हानि करते हैं।
(स)

  1. ईर्ष्या का काम है जलाना। ईर्ष्या सबसे पहले उस व्यक्ति को जलाती है, जिसके हृदय में उसका जन्म होता है। ईर्ष्यालु व्यक्ति किसी सुनने वाले के मिलते ही; जिस व्यक्ति से वह ईर्ष्या करता है; उसकी किसी अच्छी बात को भी बुराई के दृष्टिकोण से विस्तारपूर्वक सुनाने लगता है।
  2. ईष्र्यालु व्यक्ति के चरित्र का अध्ययन करने पर (UPBoardSolutions.com) यह निष्कर्ष निकलता है कि जब से उसने ईष्र्या में जलना शुरू किया है तब से उसकी प्रगति पूर्णतया अवरुद्ध हो गयी है।
  3. प्रस्तुत गद्यांश में ईष्र्यालु व्यक्ति की मनोदशा के सम्बन्ध में बताया गया है कि वह सदैव इस बात का अवसर हूँढ़ता रहता है कि श्रोता मिलते ही वह उस व्यक्ति की बुराई करना शुरू कर दे, जिससे वह ईर्ष्या करता है।

प्रश्न 6.
चिन्ता को लोग चिता कहते हैं। जिसे किसी प्रचण्ड चिन्ता ने पकड़ लिया है, उस बेचारे की जिन्दगी ही खराब हो जाती है, किन्तु ईष्र्या शायद चिन्ता से भी बदतर चीज है; क्योंकि वह मनुष्य के मौलिक गुणों को ही कुंठित बना डालती है। [2011, 17]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. ईर्ष्यालु और चिन्तातुरे व्यक्ति में कौन अधिक बुरा है और क्यों ?
  2. चिन्ता को लोग चिता क्यों कहते हैं ?

[ प्रचण्ड = तीव्र। बदतर = अधिक बुरी। कुंठित = मन्द, प्रभावहीन।]
उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या–लेखक कहता है कि लोग चिन्ता को चिता के समान जलाने वाली कहते हैं। चिता तो मृत देह को ही जलाती है, परन्तु चिन्ता जीवित व्यक्ति को ही जला देती है। चिन्तित मनुष्य का जीवन अत्यधिक (UPBoardSolutions.com) कष्टप्रद अवश्य हो जाता है, किन्तु ईष्र्या उससे भी अधिक हानिकारक है; क्योंकि वह दया, प्रेम, उदारता जैसे मानवीय गुणों को ही नष्ट कर देती है। इन गुणों के बिना मनुष्य का जीवन ही व्यर्थ हो जाता है।

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(स)

  1. चिन्ताग्रस्त व्यक्ति का जीवन खराब हो जाता है लेकिन ईर्ष्यालु व्यक्ति उससे भी अधिक बुरा है; क्योंकि ईष्र्या तो व्यक्ति के मौलिक गुणों को ही समाप्त कर देती है।
  2. चिन्ता को लोग चिता इसलिए कहते हैं क्योंकि चिन्ता भी व्यक्ति को चिता के समान ही जला डालती है। |

प्रश्न 7.
मृत्यु शायद फिर भी श्रेष्ठ है, बनिस्बत इसके कि हमें अपने गुणों को कुंठित बनाकर जीना पड़े। चिन्तादग्ध व्यक्ति समाज की दया का पात्र है, किन्तु ईष्र्या से जला-भुना आदमी जहर की चलती-फिरती गठरी के समान है, जो हर जगह वायु को दूषित करती फिरती है। [2011]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए। |
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स) ईष्र्यालु और चिन्ताग्रस्त व्यक्ति में क्या अन्तर है ?
[ बनिस्बत = अपेक्षाकृत। चिन्तादग्ध = चिन्ता में जला हुआ।]
उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या–लेखक का कथन है कि मनुष्य की मानवता उसके नैतिक गुणों से प्रकट होती है। जिस व्यक्ति में प्रेम, दया, सहानुभूति, परोपकार, त्याग जैसे मानवीय गुण न हों, वह मनुष्य नहीं होता। ईर्ष्या ही वह विष है, जो मनुष्य के इन मानवीय गुणों को नष्ट कर उसका जीवन व्यर्थ कर देती है। ऐसे जीवन से तो मृत्यु कहीं अधिक अच्छी है। चिन्तित व्यक्ति किसी दूसरे का कुछ नुकसान नहीं करता। इसलिए समाज के लोग उस पर दया भी दिखा सकते हैं, पर ईर्ष्या करने वाले पर कोई दया नहीं दिखाता; क्योंकि उसका विचार ही परपीड़क होता है। वह स्वयं जहर की पोटली (UPBoardSolutions.com) की तरह सारे .. समाज को दूषित करता है तथा दूसरों की निन्दा करके समाज का वातावरण गन्दा करता रहता है।
(स) चिन्ताग्रस्त व्यक्ति स्वपीड़क होता है। वह किसी दूसरे का कोई नुकसान नहीं करता। लेकिन ईर्ष्यालु व्यक्ति परपीड़क होता है। वह विष की चलती-फिरती ऐसी गठरी के समान होता है, जो जहाँ भी रहती है, वहाँ के वातावरण को दूषित करती रहती है।

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प्रश्न 8.
ईष्र्या मनुष्य का चारित्रिक दोष नहीं है, प्रत्युत इससे मनुष्य के आनन्द में भी बाधा पड़ती है। जब भी मनुष्य के हृदय में ईष्र्या का उदय होता है, सामने का सुख उसे मद्धिम-सा दिखने लगता है। पक्षियों के गीत में जादू नहीं रह जाता और फूल तो ऐसे हो जाते हैं, मानो वे देखने के योग्य ही न हों। [2015]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. ईष्र्यालु व्यक्ति किन सुखों से वंचित हो जाता है ?
  2. ईष्र्यालु व्यक्ति का सबसे बड़ा पुरस्कार क्या है ?

[ प्रत्युत = वरन्, अपितु। मद्धिम = हल्का।]
उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक का कथन है कि ईर्ष्या मनुष्य के चरित्र का गम्भीर दोष नहीं है। यह भाव व्यक्ति के आनन्द में भी व्यवधान उपस्थित करता है। जिस मनुष्य के हृदय में ईष्र्या का भाव उत्पन्न हो जाती है, उसे अपना सुख ही हल्का प्रतीत होने लगता है। वह सुखद स्थिति में होते हुए भी सुख से वंचित हो जाता है। सुख के साधन समक्ष होने पर भी उसे सुख की अनुभूति नहीं हो पाती। पक्षियों के कलरव अथवा (UPBoardSolutions.com) उनके मधुर स्वर में उसे कोई आकर्षण नहीं दीखता। उसे सुन्दर और खिले हुए पुष्पों से भी ईष्र्या होने लगती है और उनमें भी उसे किसी प्रकार के सौन्दर्य के दर्शन नहीं हो पाते।
(स)

  1. ईष्र्यालु व्यक्ति सुख के समस्त साधन सम्मुख होने पर भी सुख का अनुभव नहीं कर पाता। वह आत्मिक सुख से वंचित होने के साथ-साथ प्राकृतिक सौन्दर्य का भी आनन्द नहीं उठा पाता।।
  2. निन्दा के बाण से अपने प्रतिद्वन्द्रियों को बेधकर हँसने में एक आनन्द है और यह आनन्द ईष्र्यालु व्यक्ति का सबसे बड़ा पुरस्कार है।

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प्रश्न 9.
आप कहेंगे कि निन्दा के बाण से अपने प्रतिद्वन्द्रियों को बेधकर हँसने में एक आनन्द है और यह आनन्द ईर्ष्यालु व्यक्ति का सबसे बड़ा पुरस्कार है। मगर, यह हँसी मनुष्य की नहीं, राक्षस की हँसी होती है। और यह आनन्द भी दैत्यों का आनन्द होता है। [2015]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?
  2. ईष्र्यालु व्यक्ति की हँसी और आनन्द कैसा होता है ?

[ प्रतिद्वन्द्वी = विरोधी।]
उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या-प्रस्तुत गद्य-अंश में लेखक ने यह बताया है कि प्रायः निन्दा करने वाला, अपने कटु वचनरूपी बाणों से अपने प्रतिद्वन्द्वी को घायल कर हँसता है और आनन्दित होता है। वह समझता है कि उसने निन्दा करके अपने प्रतिद्वन्द्वी को दूसरों की दृष्टि से नीचे गिरा दिया है और अपना स्थान दूसरों की दृष्टि में ऊँचा बना लिया है। इसीलिए वह प्रसन्न होता है और इसी प्रसन्नता को प्राप्त करना उसका लक्ष्य (UPBoardSolutions.com) होता है; किन्तु सच्चे अर्थ में ईष्र्यालु व्यक्ति की यह हँसी और यह क्रूर आनन्द उसमें छिपे राक्षस की हँसी और आनन्द है। यह न तो मनुष्यता की हँसी है और न ही मानवता का आनन्द।
(स)

  1. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक कहना चाहता है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति राक्षस के समान होता है।
  2. ईष्र्यालु व्यक्ति की हँसी और आनन्द सामान्य मनुष्य की हँसी और आनन्द के जैसी नहीं होती वरन्। उसकी हँसी राक्षस की हँसी के समान और आनन्द दैत्यों के आनन्द के समान होता है।

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प्रश्न 10.
ईर्ष्या का सम्बन्ध प्रतिद्वन्द्विता से होता है, क्योंकि भिखमंगा करोड़पति से ईर्ष्या नहीं करता। यह एक ऐसी बात है, जो ईर्ष्या के पक्ष में भी पड़ सकती है; क्योंकि प्रतिद्वन्द्विता से मनुष्य का विकास होता है, किन्तु अगर आप संसारव्यापी सुयश चाहते हैं तो आप रसेल के मतानुसार, शायद नेपोलियन से स्पर्धा करेंगे। मगर याद रखिए कि नेपोलियन भी सीज़र से स्पर्धा करता था और सीज़र सिकन्दर से तथा सिकन्दर हरकुलिस से।. [2017]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. यश की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को क्या करना चाहिए ?
  2. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने ईष्र्या के सम्बन्ध में कौन-सी सकारात्मक बात कही है?
  3. विश्वव्यापी प्रसिद्धि के इच्छुक व्यक्ति किससे स्पर्धा करेंगे और उन्हें क्या याद रखना | चाहिए?
  4. प्रतिद्वन्द्विता से क्या लाभ होता है ?

उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या–लेखक का कहना है कि ईष्र्या मनुष्य का चारित्रिक दोष है; क्योंकि यह आनन्द में बाधा पहुँचाती है, किन्तु यह एक दृष्टि से लाभदायक भी हो सकती है; क्योंकि ईष्र्या के अन्दर प्रतिद्वन्द्विता का भाव निहित होता है। ईष्यवश मनुष्य किसी दूसरे से स्पर्धा करता है और इसके कारण वह अपने जीवन-स्तर को विकसित करता है। यहाँ यह बात विचार करने योग्य है कि यह स्पर्धा समान-स्तर से नहीं, अपितु (UPBoardSolutions.com) अपने से कुछ अधिक स्तर रखने वाले व्यक्ति से की जानी चाहिए। यही कारण है कि भिक्षा-वृत्ति पर जीवन-यापन करने वाला व्यक्ति किसी करोड़पति से ईष्र्या नहीं करता। स्पर्धा या प्रतिद्वन्द्विता से सम्बद्ध यही एक बात ईष्र्या को उचित भी ठहरा सकती है, क्योंकि स्पर्धा से ही कोई भी मनुष्य उन्नति के पथ पर अग्रसर होता है।
(स)

  1. यश की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को अपने से कुछ अधिक स्तर रखने वाले व्यक्ति से स्पर्धा अथवा प्रतिद्वन्द्विता करनी चाहिए क्योकि सार्थक प्रतिद्वन्द्विता से व्यक्ति उन्नति के पथ पर अग्रसर होता है।
  2. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने ईष्र्या के सम्बन्ध में एक सकारात्मक बात कही है और वह है उसमें निहित प्रतिद्वन्द्विता की भावना, जो मनुष्य को विकास की ओर ले जाती है।
  3. यदि कोई व्यक्ति विश्वव्यापी प्रसिद्धि प्राप्त करना चाहता है तो उसे नेपोलियन जैसे महत्त्वाकांक्षी शासक से स्पर्धा करनी होगी, ऐसा विद्वान् रसेल का मत है। इसके साथ ही उसे यह बात भी याद रखनी चाहिए कि नेपोलियन जूलियस सीज़र से, सीज़र सिकन्दर से और सिकन्दर हरकुलिस से स्पर्धा करता था। इन सम्राटों को विश्वविख्यात व्यक्ति इस स्पर्धा या प्रतिद्वन्द्विता की भावना ने ही बनाया था।
  4. प्रतिद्वन्द्विता से मनुष्य का विकास होता है।

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प्रश्न 11.
ईष्र्या का एक पक्ष, सचमुच ही लाभदायक हो सकता है, जिसके अधीन हर आदमी, हर जाति और हर दल अपने को अपने प्रतिद्वन्द्वी का समकक्ष बनाना चाहता है, किन्तु यह तभी सम्भव है, जब कि ईर्ष्या से जो प्रेरणा आती हो, वह रचनात्मक हो। अक्सर तो ऐसा ही होता है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति यह महसूस करता है कि कोई चीज है, जो उसके भीतर नहीं है, कोई वस्तु है, जो दूसरों के पास है, किन्तु वह यह नहीं समझ पाता कि इस वस्तु को प्राप्त कैसे करना चाहिए और गुस्से में आकर वह अपने किसी पड़ोसी मित्र या समकालीन व्यक्ति को अपने से श्रेष्ठ मानकर उससे जलने लगता है, जबकि ये लोग भी अपने आपसे शायद वैसे ही असन्तुष्ट हों। [2015]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. ईष्र्यालु व्यक्ति लोगों से क्यों ईष्र्या करने लगता है ?
  2. ईष्र्या का लाभदायक पक्ष क्या है और यह कैसे सम्भव है ?
  3. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक द्वारा बताये गये ईष्र्या की उत्पत्ति के कारण को स्पष्ट कीजिए।

[ पक्ष = पहलू। समकक्ष = समान। समकालीन = अपने समय के।]
उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक का कथन है कि ईष्र्या का भाव अनेक दृष्टियों से हानिकारक तो है, परन्तु इसका एक लाभदायक पहलू भी है। वह लाभदायक पहलू यह है कि प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक जाति अथवा प्रत्येक दल में (UPBoardSolutions.com) अपने प्रतिद्वन्द्वी को देखकर यह विचार उत्पन्न होता है। कि वह भी अपने प्रतिद्वन्द्वी के समान बने और उसे इसके लिए जो भी प्रयास अपेक्षित हों, उन प्रयासों की ओर प्रवृत्त हो। परन्तु यह तब तक सम्भव नहीं हो सकता, जब तक ईर्ष्या से प्राप्त होने वाली प्रेरणा ध्वंसात्मक होने के स्थान पर रचनात्मक हो।

द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक श्री दिनकर जी का कहना है कि प्राय: ऐसा ही देखने में आता है कि किसी प्रतिद्वन्द्वी को देखकर व्यक्ति अपनी योग्यता, गुण, कौशल अथवा साधनों की वृद्धि अथवा विकास करने के स्थान पर दूसरों में ही उनके अभावों की कामना करने लगता है। उसे ईष्र्यावश दूसरे की समर्थता और अपनी असमर्थता की ही अनुभूति होती रहती है। उसे यह बोध ही नहीं हो पाता कि वह दूसरों की समृद्धि से ईष्र्या करने के स्थान पर अपने अभावों की पूर्ति किस प्रकार करे। अपनी अभावावस्था पर दु:खी और क्रोधित होकर तथा किसी भी व्यक्ति को अपने से अधिक उत्तम मानकर, वह उससे ईष्र्या करने लग जाता है, जबकि सम्भव है कि जिस व्यक्ति से वह ईर्ष्या कर रहा है, वह भी अपने किसी अभाव के कारण स्वयं से सन्तुष्ट न हो।

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(स)

  1. ईर्ष्यालु व्यक्ति लोगों से इसलिए ईर्ष्या करने लगता है कि क्योंकि वह यह नहीं समझ पाता कि जो वस्तु दूसरों के पास है और उसके पास नहीं है, वह उसे किस प्रकार प्राप्त कर सकता है।
  2. ईर्ष्या का एक लाभदायक पक्ष यह है कि प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक जाति में अपने प्रतिद्वन्द्वी को देखकर यह विचार उत्पन्न होता है कि वह भी अपने प्रतिद्वन्द्वी के समान बने और इसके लिए अपेक्षित प्रयासों की ओर प्रवृत्त हो।
  3. जब कोई वस्तु किसी के पास नहीं होती और वह यह नहीं समझ पाता कि इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है तो वह उस व्यक्ति को अपने से श्रेष्ठ समझकर उससे ईष्र्या करने लगता है।

प्रश्न 12.
तो ईष्र्यालु लोगों से बचने का क्या उपाय है? नीत्से कहता है कि “बाजार की मक्खियों को छोड़कर एकान्त की ओर भागो। जो कुछ भी अमर तथा महान् है, उसकी रचना और निर्माण बाजार तथा सुयश से दूर रहकर किया जाता है। जो लोग नये मूल्यों का निर्माण करने वाले होते हैं, वे बाजारों में नहीं बसते, वे शोहरत के पास भी नहीं रहते।” जहाँ बाजार की मक्खियाँ नहीं भिनकतीं, वहाँ एकान्त है। यह तो हुआ ईष्र्यालु लोगों से बचने का उपाय, किन्तु ईष्र्या से आदमी कैसे बच सकता है? [2012]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. ईष्र्यालु व्यक्तियों से बचने का क्या उपाय है ?
  2. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?
  3. ‘बाजार की मक्खियों’ से क्या आशय (UPBoardSolutions.com) है ? स्पष्ट कीजिए।
  4. नये मूल्यों का निर्माण करने वाले लोग कहाँ नहीं रहते हैं ?

[ नीत्से = यूरोप का एक प्रसिद्ध दार्शनिक, विद्वान् व लेखक। शोहरत = यश, प्रसिद्धि।]
उत्तर
(ब) प्रथम रेखांकित अंश की व्याख्या–लेखक ईर्ष्यालु व्यक्तियों से दूर रहने की सलाह देता है। प्रसिद्ध दार्शनिक नीत्से ने ईष्र्यालु व्यक्तियों को ‘बाजार की मक्खियाँ’ कहा है। जिस प्रकार मक्खियाँ गन्दगी पर बैठकर बीमारियाँ फैलाती हैं, उसी प्रकार ईर्ष्यालु लोग दूसरों की निन्दा कर समाज के वातावरण में जहर घोलकर उसे प्रदूषित करते हैं। यदि मनुष्य अपने जीवन में कोई श्रेष्ठ कार्य करना चाहता है तो उसे एकान्त स्थान में जाना चाहिए, जहाँ ये लोग न पहुँच सकें।

द्वितीय रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी कहते हैं कि ईर्ष्यालु लोगों के साथ रहकर श्रेष्ठ रचना, नये सामाजिक मूल्यों को निर्माण अथवा कोई भी महान् कार्य नहीं किया जा सकता है। रचनात्मक महान् कार्य भीड़ से दूर रहकर ही किये जाते हैं। महान् कार्य करने के लिए प्रसिद्धि के लोभ को छोड़ना पड़ता है। जो व्यक्ति समाज के नये मूल्यों का निर्माण करते हैं, वे बाजार जैसे प्रतिस्पर्धा के स्थानों से दूर रहते हैं। नीत्से के अनुसार एकान्त स्थान वही है, जहाँ ये बाजार की मक्खियाँ (ईर्ष्यालु लोग) नहीं होती हैं।
(स)

  1. ईष्र्यालु व्यक्तियों से बचने का एकमात्र उपाय उनसे दूर रहना है; अर्थात् व्यक्तियों को ऐसे स्थान में रहना चाहिए जहाँ ईर्ष्यालु लोग न पहुँच सकें।
  2. प्रस्तुत गद्यांश में प्रसिद्ध दार्शनिक नीत्से के मत का उल्लेख करते हुए लेखक ने ईष्र्यालु व्यक्ति से दूर रहने की सलाह दी है और कहा है कि विश्व में जो भी महान् कार्य हुए हैं, वे सभी एकान्तसेवियों ने ही किये हैं।
  3. नीत्से के अनुसार बाजार की मक्खियों से आशय ईष्र्यालु व्यक्तियों से है। जिस प्रकार मक्खियाँ मिठाई के आस-पास भिनभिनाती रहती हैं, उसी प्रकार ईष्र्यालु व्यक्ति यश रूपी मिठाई अर्थात् यशस्वी लोगों के आस-पास भिनभिनाते (UPBoardSolutions.com) रहते हैं और मौका मिलते ही उनकी निन्दा करते हैं और समाज के वातावरण में जहर घोलकर उसे प्रदूषित करते हैं।
  4. नये मूल्यों का निर्माण करने वाले लोग बाजार जैसे प्रतिस्पर्धा के स्थानों से और शोहरत से दूर रहते

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प्रश्न 13.
ईष्र्या से बचने का उपाय मानसिक अनुशासन है। जो व्यक्ति ईर्ष्यालु स्वभाव का है, उसे फालतू बातों के बारे में सोचने की आदत छोड़ देनी चाहिए। उसे यह भी पता लगाना चाहिए कि जिस अभाव के कारण वह ईष्र्यालु बन गया है, उसकी पूर्ति का रचनात्मक तरीका क्या है। जिस दिन उसके भीतर यह जिज्ञासा आएगी, उसी दिन से वह ईष्र्या करना कम कर देगा। . [2009, 11, 16]
(अ) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(स)

  1. ईर्ष्या से बचने के लिए क्या उपाय करना चाहिए ?
  2. ईष्र्यालु व्यक्ति कब से ईर्ष्या करना कम कर सकता है ?
  3. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक क्या कहना चाहता है ?

[ मानसिक अनुशासन = मन पर नियन्त्रण। जिज्ञासा = जानने की इच्छा।]
उत्तर
(ब) रेखांकित अंश की व्याख्या-लेखक कहता है कि ईष्र्या से बचने का एकमात्र उपाय अपने मन पर नियन्त्रण करना है। मन का स्वभाव चंचल होता है। इसको वश में रखकर ही ईर्ष्या से बचा जा सकता है। जो चीजें हमारे पास नहीं हैं, उनके बारे में सोचना व्यर्थ है। जिसके मन में ईष्र्या जन्म ले लेती है, उसे यह जानना चाहिए कि किस अभाव के कारण उसके मन में ईष्र्या उत्पन्न हुई है। उसके बाद उसे उन अभावों (UPBoardSolutions.com) को दूर करने का सकारात्मक प्रयत्न करना चाहिए। उसे ऐसे उपायों का पता लगाना चाहिए, जिससे उन अभावों की पूर्ति हो सके। अपने अभावों को दूर करने के लिए कोई रचनात्मक उपाय करना चाहिए।
(स)

  1. ईष्र्या से बचने के लिए व्यक्ति को अपने आपको मानसिक अनुशासन के अन्तर्गत बाँध लेना चाहिए। ।
  2. जिस दिन ईष्र्यालु व्यक्ति को यह पता चल जाएगा कि किस अभाव के कारण वह ईष्र्यालु बन गया है और उस अभाव की पूर्ति का सकारात्मक उपाय क्या है, उसी दिन से वह ईर्ष्या करना कम कर सकता है।
  3. प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने स्पष्ट किया है कि अभाव के कारण ही ईष्र्या की उत्पत्ति होती है। ईष्र्या से बचने का एकमात्र उपाय मन को वश में करना है।

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व्याकरण एवं रचना-बोध

प्रश्न 1
निम्नलिखित शब्दों से उपसर्गों को पृथक् कीजिए-
अत्यन्त, दरअसल, निमग्न, निर्मल, साकार, अपव्यय, समकक्ष, दुर्भावना, अनुशासन।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 ईष्र्या, तू न गयी मेरे मन से (गद्य खंड) img-1

प्रश्न 2
निम्नलिखित शब्दों से प्रत्ययों को पृथक् करके लिखिए-
ईष्र्यालु, लाभदायक, मौलिक, रचनात्मक, समकालीन, अहंकार।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 5 ईष्र्या, तू न गयी मेरे मन से (गद्य खंड) img-2

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प्रश्न 3
निम्नलिखित शब्दों का वाक्य-प्रयोग द्वारा अर्थ स्पष्ट कीजिए-
प्रतिद्वन्द्वी-प्रतिद्वन्द्विता, मूर्ति-मूर्त, जिज्ञासा-जिज्ञासु, चरित्र-चारित्रिक।
उत्तर
प्रतिद्वन्द्वी-प्रतिद्वन्द्विता–स्वस्थ प्रतिद्वन्द्विता उसे ही कहा जा सकता है, जिसमें प्रतिद्वन्द्वी एक-दूसरे से ईर्ष्या न करते हों। |
मूर्ति-मूर्त-मूर्तिकार अपनी कल्पना को अपनी (UPBoardSolutions.com) मूर्ति में मूर्त रूप प्रदान करता है।
जिज्ञासा-जिज्ञासु-अपनी जिज्ञासा शान्त करने के लिए जिज्ञासु पता नहीं कहाँ-कहाँ मारा-मारा फिरता है।
चरित्र-चारित्रिक–समाज के चारित्रिक विकास के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने चरित्र को पवित्र बनाये रखना चाहिए।

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UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 7 जूलिया (मंजरी)

UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 7 जूलिया (मंजरी)

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पाठ का सर (सारांश)

प्रस्तुत एकांकी में एक भोली-भाली सेविका जूलिया की मार्मिक पीड़ा और विवशता का चित्रण किया गया है। इसके साथ ही साथ शोषण से मुक्ति पाने का संदेश भी नाटक के अन्त में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। गृहस्वामी (मालिक) जूलिया को बच्चों को पढ़ाने और देखभाल करने के कार्य के लिए उसकी मासिक तनख्वाह नियत करता है। (UPBoardSolutions.com) दो मास की तीस रूबल प्रति मासिक की दर से साठ रूबल तय करके मालिक जूलिया की गैरहाजिरी, रविवार और कार्य के प्रति लापरवाही के कारण कटौती करके उसे सिर्फ ग्यारह रूबल ही देता है।

जूलिया काँपते हाथों से धन्यवाद कहकर मालिक से वेतन लेती है। मालिक के पूछने पर कि उसने धन्यवाद क्यों कहा तो वह कहती है कि उसने धन्यवाद इसलिए कहा कि उसे मालिक ने कुछ तो दिया जबकि उसे पहले किसी ने काम के बदले कभी कुछ नहीं दिया। मालिक ने छोटे से क्रूर मजाक के लिए जूलिया से माफी माँगते हुए उसे पूरे अस्सी रूबल दो मास का वेतन दिया। साथ ही उसने जूलिया को समझाया कि इंसान को भला बनने के लिए दब्बू, भीरु और कमजोर बनने की। (UPBoardSolutions.com) आवश्यकता नहीं है बल्कि अपनी सुरक्षा के लिए संसार की ज्यादतियों से पूरी शक्ति के साथ लड़ना चाहिए।

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प्रश्न-अभ्यास 

कुछ करने को
नोट- प्रश्न 1 से प्रश्न 3 तक विद्यार्थी स्वयं करें।

प्रश्न 4.
रूस की मुद्रा रूबल है। बांग्लादेश, चीन, अमेरिका, जापान और पाकिस्तान की मुद्रा के बारे में पता कीजिए।
उत्तर-
देश                              मुद्रा
बांग्लादेश                     टका
चीन                             
युआन
अमेरिका                      डॉलर
जापान                          येन
पाकिस्तान                    
पाकिस्तानी रुपया


नोट-  
प्रश्न 5 तथा 6 विद्यार्थी स्वयं करें।

विचार और कल्पना-

प्रश्न 1.
“इससे पहले मैंने जहाँ-जहाँ काम किया, उन लोगों ने तो मुझे एक पैसा तक नहीं दिया, आप कुछ तो दे रहे हैं। इस वाक्य के भाव के आधार पर बताइए कि जूलिया ने किस-किस तरह के लोगों के बीच गवर्नेश का काम किया होगा?
उत्तर-
जूलिया की बातों से यह पता चलता है कि उसने पहले जिन-जिन लोगों के घर गवर्नेश का काम किया था, वे अच्छे लोग नहीं थे। क्योंकि काम कराकर किसी को भी पारिश्रमिक (वेतन) न देना बहुत बुरी बात है और बहुत बड़ी बेईमानी है। 

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प्रश्न 2.
यदि इन लोगों कि जगह आप होते तो जूलिया को पैसे देते अथवा नहीं? क्यों?
उत्तर-
यदि कुछ लोगों की जगह में होता तो जूलिया को उसका वेतन समय पर दे देता क्योंकि किसी से काम कराकर उसे वेतन न देना बेइमानी और पाप होता है।

प्रश्न, 3.
यदि आप जूलिया के स्थान पर होते तो ऐसे लोगों से कैसा व्यवहार करते?
उत्तर-
यदि मैं जूलिया की जगह होता तो ऐसे लोगों के खिलाफ थाने में रिपोर्ट लिखवाता तथा उनके पड़ोसियों को बताता और अपना वेतन जरूर लेता।। 

एकांकी से-
प्रश्न 1.
गृहस्वामी ने उन्नीस नागे’ किस प्रकार गिनाए और इसके लिए कितने रूक्ल की कटौती की?
उत्तर-
नौ इतवार और तीन छुट्टियों, चार दिन लड़का बीमार और तीन दिन दाँतों में दर्द- इस प्रकार बारह और सात उन्नीस नागे के लिए गृहस्वामी ने उन्नीस रूबल की कटौती की।

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प्रश्न 2.
गृहस्वामी के अनुसार जूलिया के कारण क्या-क्या नुकसान हुआ था?
उत्तर-
गृहस्वामी के अनुसार जूलिया ने चाय की प्लेट और प्याली तोड़ी थी। जूलिया की लापरवाही से लड़के की जैकेट फट गई। नौकरानी नए जूते चुराकर ले गई।

प्रश्न 3.
गृहस्वामी ने अन्त में सत्ताइस रूबल किस आधार पर काट लिए थे?
उत्तर-
दस जनवरी को मालिक ने दस रूबल दिए थे। जूलिया के कथनानुसार मालकिन ने तीन रूबल दिए थे। इस प्रकार तेरह रूबल की कटौती हुई।

प्रश्न 4.
गृहस्वामी को अंत में जूलिया पर गुस्सा क्यों आया और उसने जूलिया को क्या समझाया? ।
उत्तर-
गृहस्वामी को जूलिया पर गुस्सा इसलिए आया कि ग्यारह रूबल की तनख्वाह लेकर जूलिया ने ‘धन्यवाद’ कहा, जो ठीक नहीं था। मालिक ने जूलिया को समझाया कि अन्याय का विरोध करना चाहिए। दुनिया की ज्यादतियों का पूरी शक्ति से विरोध करना चाहिए। संसार में कमजोरों के लिए कोई स्थान नहीं है।

प्रश्न 5.
‘इस संसार में दब्बू और रीढ़रहित लोगों के लिए कोई स्थान नहीं है’ इस वाक्य का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
दुनिया में कमजोर, डरपोक और सीधे-साधे व्यक्तियों को परेशान किया जाता है और उनका । शोषण किया जाता है।

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 प्रश्न 6.
एकांकी के कौन से संवाद आपको सबसे अच्छे लगे, क्यों?
उत्तर-
जिन संवादों में मालिक द्वारा जूलिया को यह समझाया गया कि अन्याय का विरोध करना चाहिए, वह संवाद मुझे सबसे अच्छा लगा।

भाषा की बात-

प्रश्न 1.
पाठ में अनेक जगहों पर अंग्रेजी तथा (UPBoardSolutions.com) अरबी-फारसी के शब्द आए हैं, जैसेगवर्नेस, तनख्वाह। इसी प्रकार के अन्य शब्दों को पाठ से छाँटकर उनका वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर-
अंग्रेजी-गवर्नेस, सोफा, नोट, जनवरी, प्लेट, डायरी।’
अरबी-फारसी-खुद, तनख्वाह, ख्याल, जरूरत, इतवार, मगर, खैर, मुश्किल, बावजूद, साफ, मजाक, जेब, खामोश, कीमती, नुकसान, नजर, लापरवाही, यकीन, ज्यादतियाँ।

प्रश्न 2.
रीढ़रहित का अर्थ है ‘रीढ़ से हीन’ इसका विपरीतार्थक अर्थ होगा- ‘रीढ़युक्त। इसी प्रकार निम्नलिखित शब्दों में ‘रहित’ और ‘युक्त’ लगाकर शब्द बनाइए
उत्तर-
शब्द                      ‘रहित’ लगाकर                   ‘युक्त’ लगाकर
प्राण             –          प्राणरहित                               प्राणयुक्त
धन              –           धनरहित                                धनयुक्त
बल              –           बलरहित                               बलयुक्त
यश              –           यशरहित                               यशयुक्त

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों के विपरीतार्थक शब्द लिखिए
उत्तर-
अन्याय – न्याय, क्रूर – दयालु, मूर्ख – बुद्धिमान, दुर्बल – बलवाने, करुण – कठोर

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UP Board Solutions for Class 9 English Grammar Chapter 4 Primary Auxiliaries [Be, Have, Do]

UP Board Solutions for Class 9 English Grammar Chapter 4 Primary Auxiliaries [Be, Have, Do]

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SOLVED EXERCISES BASED ON TEXT BOOK
EXERCISE ::
Fill in the blanks with the correct form of the ‘Auxiliary Verbs’ given in the brackets in the following sentences :
Questions.

  1. She must ……………………………. received the marksheet by now. (has, have)
  2.  You ……………………………… not go to school today. (are, did, have)
  3.  He …………………………………………….. not work hard nowadays. (is, does, has)
  4.  He ………………. not beat his sister. (is, do, did)
  5. The milkman…………….. not come. (are, has, have)
  6.  Why ……………………. she weeping bitterly? (are, was, were)
  7. When………………… she going to the temple? (is, was, were)
  8.  He ……………….. not do his duty. (does, did, has)
  9. She ………………. not help her friend in difficulty. (does, do, did)
  10. We………………….. not go there yesterday. (do, does, did)

Answer:

  1. have
  2.  did
  3. does
  4. did
  5.  has
  6. was
  7. was
  8. does
  9.  does
  10. did.

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EXERCISE :: 2
Fill in the blanks with the correct form of the ‘Auxiliary Verbs’ given in the brackets in the following sentences :
Questions.

  1. When I ……………………. entered the room,
    the teacher started teaching…………………(have)
  2. It was a winter night. We … ………. sitting round the fire.
  3. (be)……………… he know your address? (do)
  4. He must …… … received my parcel by now.(have)
  5. Man ……………………….. the only animal that can laugh. (be)
  6. The Head-Master ………………….. very disappointed. (be)
  7. I… ………….. my homework at seven o’clock this morning. (do)
  8. As he…………………. not there, I spoke to his brother. (be)
  9.  You ……………………… guilty. (be)
  10.  Since we……………….. late, we were not admitted. (be

Answer:

  1. had
  2.  were
  3.  Does
  4.  have
  5.  is
  6.  is
  7. did
  8.  was
  9.  are
  10. were.

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UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 4 पेड़ों के संग बढ़ना सीखो (मंजरी)

UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 4 पेड़ों के संग बढ़ना सीखो (मंजरी)

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समस्त पथों की व्याख्या

बहुत दिनों से ………………….…………………………………….. अंग भिगो लें।
संदर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक मंजरी-8 में संकलित कविता-‘पेड़ों के संग बढ़ना सीखो’ से उधृत है। इस कविता के कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना हैं। कविता के माध्यम (UPBoardSolutions.com) से कवि ने पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणा दी है।
व्याख्या-कवि कहता है कि बहुत दिनों से मैं सोच रहा हूँ कि थोड़ी-सी जमीन लेकर उस पर बाग-बगीचा लगाऊँ। जिसमें फल-फूल खिलें, चिड़ियाँ बोलें और सर्वत्र सुगंध बिखरे। बगीचे में एक जलाशय भी हो जिसमें ताजी हवा अपना अंग भिगोकर और भी ठंडी हो जाए।

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हो सकता है ……….…………………………………………….. चिड़ियों को रोना।
संदर्भ एवं प्रसंग-पूर्ववत्।
व्याख्या-कवि बच्चों से कहता है कि संभव है तुम्हारे पास तुम्हारी अपनी ज़मीन हो, फल-फूल से लदे बगीचे हों या अपनी खाली जमीन हो; या हो सकता है छोटी-सी क्यारी ही हो जो फूलों के खुश्बू से महक रही हो या फिर कुछ खेत हों जिसमें फसलें लगी हों। यह भी संभव है कि उनमें चौपाए यानी पशु घूमते हों या आँगन में पक्षी चहकते हों तो तुमसे विनती है कि तुम इनको मत मिटने देना, पेड़ों को कभी मत कटने देना। क्योंकि ऐसा करने से चिड़ियों का आश्रय छिन जाएगा और तुम्हें चिड़ियों के लिए तरसना पड़ जाएगा।

एक-एक पत्ती ……………………..………………………………….. संग हिलना।
संदर्भ एवं प्रसंग-पूर्ववत्।
व्याख्या-कवि कहता है कि पेड़ों-वनस्पतियों की एक-एक पत्ती हमारे लिए मूल्यवान हैं, क्योंकि वे हमारे सपनों को आधार देते हैं। जब पेड़ों की शाखाएँ कटती हैं तो वे भी शिशुओं की तरह रोते हैं। इसलिए अपने जीवन में पेड़ों के महत्व को समझते हुए पेड़ों के संग बढ़ना, इतराना और हिलना सीखो। यानी पेड़ों को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बना लो।

बच्चे और पेड़ …………………………………………………………… बाँट रही है।
संदर्भ एवं प्रसंग-पूर्ववत्।
व्याख्या-कवि के अनुसार इस संसार की हरियाली और खुशहाली का आधार पेड़ व बच्चे हैं। जो इस बात को नहीं समझते, उन्हें पछताना पड़ता है। वर्तमान समय में सभ्यता वहशी बनी हुई है। अर्थात शहरीकरण व औद्योगीकरण ने मानवों को पेड़ों का दुश्मन बना दिया है। वे पेड़ों को काटते जा रहे हैं। पेड़ों के कटने से हवा जहरीली हो रही है, जिससे मनुष्य बीमार हो रहा है।

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प्रश्न-अभ्यास

कुछ करने को-

प्रश्न 1.
नोट- विद्यार्थी स्वयं करें।

प्रश्न 2.
नीचे लिखे गये शब्दों की सहायता से आप भी एक तुकान्त कविता बनाइएखोना, रोना, काट, बाँट, हरा, भरा।
उत्तर-
मानव! तू यदि नहीं चाहता
अपना जीवन खोना,
शुद्ध हवा, हरियाली, चिड़ियाँ
और खुशबू को रोना,|
तो सावधान हो जा अब भी
पेड़ों को मत काट,

जहरीली हवा स्वयं के
बच्चों को मत बाँट,
जब तक तेरे उपवन में
पेड़ रहेगा हरा,
तब तक रहेगा संसार तुम्हारा
खुशियों से भरा।

नोट- उपरोक्त कविता उदाहरण स्वरूप दी गई है। बच्चे अपनी रचनात्मकता का उपयोग करते हुए कविता स्वयं लिखने का प्रयास करें।

प्रश्न 3.
नोट- विद्यार्थी स्वयं करें।
विचार और कल्पना-
प्रश्न 1.
अगर पेड़ न होंगे तो मनुष्य का जीवन कैसा हो जायेगा? इस संबंध में अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर-
पेड़-पौधे प्रकृति का अनुपम उपहार हैं। आज जंगलों को अंधाधुंध काटा जा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप मौसम में परिवर्तन, तापमान में वृद्धि, ओजोन परत में छेद आदि समस्याओं में वृद्धि हुई है। बढ़ती आबादी, शहरीकरण और औद्योगिकरण के कारण मानव जंगलों को लगातार काटती जा रहा है, जिससे न केवल पर्यावरण असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो गई है वरन् वन्य जीवों का अस्तित्व भी खतरे में है। कई वन्य-प्राणी तो लुप्त हो चुके हैं। वृक्ष पहाड़ियों की सतह को (UPBoardSolutions.com) बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं तथा तेजी से बढ़ते बारिश के पानी में प्राकृतिक बाधाएँ उत्पन्न करते हैं। परंतु वृक्षों के अभाव में नदी का जलस्तर बढ़ जाता है, जिससे बातें आती हैं। हम जानते हैं कि बाढ़ के अपने दुष्प्रभाव हैं।  वनों की कटाई के परिणाम बहुत गंभीर हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान वायु प्रदूषण के रूप में देखने को मिलता है। जहाँ पेड़ों की कमी होती है वहाँ हवा प्रदूषित हो जाती है और साँस से संबंधित अनेक प्रकार की बीमारियाँ हो जाती हैं।

वनों के विनाश के कारण वन्य-जीवों का अस्तित्व भी संकट में है। ग्लोबल वार्मिंग का खतरा अलग बढ़ रहा है। जंगलों के कटने से भूमि क्षरण के कारण रेगिस्तान बड़े पैमाने पर फैल रहा है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से वर्षा कम होने लगी है। अपर्याप्त वर्षा से जल स्रोत दूषित हो रहा है। हवा में जहरीली गैसों के बढ़ने से पर्यावरण में प्रदूषण की मात्रा अत्यधिक बढ़ गई है। यदि समय रहते मनुष्य नहीं सँभला और उसने पेड़ों के संरक्षण व संवर्धन की तरफ उचित ध्यान नहीं दिया तो यह (UPBoardSolutions.com) धरती पेड़-पौधों एवं वनस्पतियों से विहीन हो जाएगी। मनुष्य साँस-साँस को तरसेगा। सूखा, अकाल या बाढ़ की भयावह स्थिति उत्पन्न हो जाएगी, वन्य-जीव मनुष्यों के निवास पर धावा बोलेंगे और या तो मारे जाएँगे या मनुष्यों को मारेंगे। कुल मिलाकर पेड़ों के बिना मनुष्य जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। मनुष्य बिना वृक्षों के नहीं जी सकता। वृक्ष नहीं रहे तो सबसे पहले मानव का अस्तित्व पृथ्वी से समाप्त होगा।

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प्रश्न 2.
यदि पेड़ पौधे बोलने लगें तो वे अपनी कौन-कौन सी समस्या बतायेंगे? ।
उत्तर-
यदि पेड़ बोलने लगें तो वे अपनी बहुत-सी समस्या हम मनुष्यों से बाँटेंगे। जैसे कि  हम मनुष्य उनका ख्याल नहीं रखते। उनकी शाखाओं को काटने पर उन्हें भी दर्द होता है। वे हमें फल-फूल, लकड़ी जैसी अनेक वस्तुएँ उपहार में देते हैं परंतु हम इन सबके बदले उन्हें तकलीफ पहुँचाते हैं।

कविता से
प्रश्न 1.
“बहुत दिनों से सोच रहा था, थोड़ी-सी धरती पाऊँ” से कवि का क्या आशय है ?
उत्तर-
“बहुत दिनों से सोच रहा था, थोड़ी-सी धरती पाऊँ” से कवि का आशय यह है कि वे काफी समय से इस प्रयास में लगे हुए हैं कि बाग-बगीचा लगाने के लिए थोड़ी-सी ज़मीन कहीं खरीदें।

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प्रश्न 2.
कविता में कवि की क्या चिन्ता है?
उत्तर-
कविता में कवि की चिन्ता यह है कि मनुष्य यदि इसी तरह पेड़-पौधे काटते जाएँगे तो पशु-पक्षियों को आश्रय छिन जाएगा और मनुष्य उन्हें देखने के लिए तरस जाएगा, साथ ही हवा जहरीली 
हो जाएगी और धरती पर जीवन का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।

प्रश्न 3.
कवि क्या विनती कर रहा है?
उत्तर-
कवि सभी लोगों से विनती कर रहा है कि वे पेड़ों को न काटें। साथ ही कवि यह भी विनती कर रहा है कि लोग अधिक से अधिक पेड़ लगाएँ और धरती को हरा-भरा रखें।

प्रश्न 4.
बच्चे और पेड़ संसार को हरा-भरा किस प्रकार रखते हैं।
उत्तर-
बच्चों से ही दुनिया में खुशहाली है। जिन घरों में बच्चे नहीं होते, वहाँ सन्नाटा और मातम-सा माहौल होता है। उसी प्रकार पेड़ संसार को हरियाली प्रदान करते हैं। पेड़ों के बिना यह धरती (UPBoardSolutions.com) प्राणहीन और बंजर हो जाएगी। बच्चों की हँसी, शरारतें और पेड़ों की हरियाली तथा शुद्ध हवा ही इसे संसार को हरा-भरा रखते हैं। 

भाषा की बात-
प्रश्न 1.
क्रिया के जिस रूप से ज्ञात होता है कि कर्ता स्वयं कार्य न करके किसी दूसरे को कार्य करने के लिए प्रेरित कर रही है, उसे ‘प्रेरणार्थक क्रिया कहते हैं, जैसे-पढ़ना-पढ़वाना।

निम्नलिखित क्रियो शब्दों से प्रेरणार्थक क्रिया बनाइए
खेलना, रखना, घूमना, काटना, बनाना, लिखना, देखना, पिलाना।
उत्तर-
खेलना – खिलवाना                               
रखना – रखवाना
घूमना – घुमवाना                                  काटना – कटवाना
बनाना – बनवाना                                  लिखना – लिखवाना
देखना – दिखवाना                                पिलाना – पिलवाना 

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प्रश्न 2.
जहाँ पर वर्गों की आवृत्ति से काव्य की शोभा बढ़ती हो वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है। उदाहरण के लिए-संग-संग, एक-एक, बाग-बगीचा, फूल-फल आदि। आप अपनी पुस्तक से खोजकर अनुप्रास अलंकार के दो अन्य उदाहरण लिखिए
उत्तर-
(i) वरदे वीणावादिनी वरदे – ‘व’ अक्षर की आवृत्ति।
(ii) पोथी पढ़ि-पढि जग मुवा, पंडित भया न कोय। (‘प’ वर्ण की आवृत्ति)

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UP Board Solutions for Class 10 Hindi सामाजिक निबन्ध

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सामाजिक निबन्ध

30. दूरदर्शन का सामाजिक जीवन पर प्रभाव

सम्बद्ध शीर्षक

  • दूरदर्शन का महत्त्व
  • दूरदर्शन का जीवन पर प्रभाव
  • दूरदर्शन से लाभ एवं हानि [2012]
  • दूरदर्शन : गुण और दोष [2010]

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. दूरदर्शन का आविष्कार,
  3. विभिन्न क्षेत्रों में दूरदर्शन का योगदान,
  4. दूरदर्शन से हानियाँ,
  5. उपसंहार।

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प्रस्तावना-विज्ञान द्वारा मनुष्य को दिया गया एक सर्वाधिक आश्चर्यजनक उपहार है—दूरदर्शन। आज व्यक्ति जीवन की आपाधापी से त्रस्त है। वह दिन-भर अपने काम में लगा रहता है, चाहे उसका कार्य शारीरिक हो या मानसिक। शाम को (UPBoardSolutions.com) थक कर चूर हो जाने पर अपनी थकावट और चिन्ताओं से मुक्ति के लिए व्यक्ति कुछ मनोरंजन चाहता है। दूरदर्शन मनोरंजन का सर्वोत्तम साधन है। आज यह जनसामान्य के जीवन का केन्द्रीय अंग हो चला है। इससे जीवन के विविध क्षेत्रों में व्यक्ति का ज्ञानवर्द्धन हुआ है। दूरदर्शन ने व्यक्ति में जनशिक्षा का संचार करके उसे समय के साथ चलने की चेतना दी है। यह रेडियो, सिनेमा और समाचार-पत्रों से अधिक अच्छा और प्रभावी माध्यम सिद्ध हुआ है।

दूरदर्शन का आविष्कार-दूरदर्शन का आविष्कार अधिक पुराना नहीं है। 25 जनवरी, 1926 ई० को इंग्लैण्ड के एक इंजीनियर जॉन बेयर्ड ने इसको रॉयल इंस्टीट्यूट के सदस्यों के सामने पहली बार प्रदर्शित किया। भारत में दूरदर्शन का पहला केन्द्र 1959 ई० में नयी दिल्ली में चालू हुआ था। आज तो लगभग सारे देश में दूरदर्शन का प्रसार हो गया है और इसका प्रसारण-क्षेत्र धीरे-धीरे बढ़ता ही जा रहा है। कृत्रिम उपग्रहों ने तो दूरदर्शन के कार्यक्रमों को समस्त विश्व के लोगों के लिए और भी सुलभ बना दिया है। ।

विभिन्न क्षेत्रों में दूरदर्शन का योगदान–दूरदर्शन अनेक दृष्टियों से हमारे लिए लाभकारी सिद्ध हो रहा है। कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में दूरदर्शन के योगदान, महत्त्व एवं उपयोगिताओं का संक्षिप्त विवरण नीचे दिया जा रहा है
(क) शिक्षा के क्षेत्र में-दूरदर्शन से अनेक शैक्षिक सम्भावनाएँ जीवन्त हुई हैं। वह कक्षा में प्रभावशाली ढंग से पाठ की पूर्ति कर सकता है तथा विविध विषयों में यह विद्यार्थी की रुचि विकसित कर सकता है। दृश्य होने के कारण इसका प्रभाव दृढ़ होता है। देश-विदेश के अनेक स्थानों को देखकर भौगोलिक ज्ञान बढ़ता है।
(ख) वैज्ञानिक अनुसन्धान तथा अन्तरिक्ष के क्षेत्र में वैज्ञानिक अनुसन्धान की दृष्टि से भी दूरदर्शन (UPBoardSolutions.com) का विशेष महत्त्व रहा है। चन्द्रमा, मंगल व शुक्र ग्रहों पर भेजे गये अन्तरिक्ष यानों में दूरदर्शन यन्त्रों का प्रयोग किया गया था, जिन्होंने वहाँ के बहुत सुन्दर और विश्वसनीय चित्र पृथ्वी पर भेजे। विभिन्न वैज्ञानिक अनुसन्धानों को प्रदर्शित करके दूरदर्शन ने विज्ञान का उच्चतर ज्ञान कराया है।

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(ग) तकनीक और चिकित्सा के क्षेत्र में तकनीक और चिकित्सा के क्षेत्र में भी दूरदर्शन बहुत शिक्षाप्रद रहा है। दूरदर्शन ने एक सफल और प्रभावशाली प्रशिक्षक की भूमिका निभायी है। यह अधिक। प्रभावशाली और रोचक विधि से मशीनी प्रशिक्षण के विभिन्न पक्ष शिक्षार्थियों को समझा सकता है।
(घ) कृषि के क्षेत्र में–भारत एक कृषिप्रधान देश है। यहाँ अधिकांश कृषक अशिक्षित हैं। दूरदर्शन ने अपने कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों को फसल बोने की आधुनिक तकनीक, उत्तम बीज तथा रासायनिक खाद के प्रयोग और उसके परिणामों को प्रत्यक्ष दिखाकर इस क्षेत्र में सराहनीय कार्य किया है।
(ङ) सामाजिक चेतना की दृष्टि से विविध कार्यक्रमों के माध्यम से दूरदर्शन ने लोगों को ‘छोटा परिवार-सुखी परिवार की ओर आकर्षित किया है। इसने बाल-विवाह, दहेज-प्रथा, छुआछूत व साम्प्रदायिकता के विरुद्ध जनमत तैयार किया है। यह बाल-कल्याण और नारी-जागरण में भी उपयोगी सिद्ध हुआ है। यह दर्शकों को कानून और व्यवस्था के विषय में भी शिक्षित करता है।
(च) राजनीतिक दृष्टि से दूरदर्शन राजनीतिक दृष्टि से भी जनसामान्य को शिक्षित करता है। वह प्रत्येक व्यक्ति को, उसके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक करता है तथा मताधिकार के प्रति रुचि जात करके उसमें राजनतिक चेतना लाता है।

दूरदर्शन के सीधे प्रसारण ने कुश्ती, तैराकी, बैडमिण्टन, फुटबॉल, हॉकी, क्रिकेट आदि खेलों को लोकप्रियता की बुलन्दियों पर पहुँचा दिया है। दूरदर्शन के इस सुदृढ़ प्रभाव को देखते हुए उद्योगपति और व्यवसायी अपने उत्पादनों के प्रचार के लिए इसे प्रमुख माध्यम के रूप में अपना रहे हैं।

दूरदर्शन से हानियाँ-दूरदर्शन से होने वाले लाभों के साथ-साथ इससे होने वाली कुछ हानियाँ भी हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। कोमल आँखें घण्टों तक टी० वी० स्क्रीन पर केन्द्रित रहने से अपनी स्वाभाविक शोभा क्षीण कर लेती हैं। इससे निकलने वाली विशेष प्रकार की किरणों का प्रतिकूल प्रभाव नेत्रों के साथ-साथ त्वचा पर भी पड़ता है। इसके कारण हमें अपने आवश्यक कार्यों के लिए भी समय का प्रायः अभाव ही बना रहता है।

केबल टी० वी० पर प्रसारित होने वाले कुछ कार्यक्रमों ने तो अल्पवयस्क बुद्धि के किशोरों को वासना के पंक में धकेलने का कार्य किया है। इनसे न केवल हमारी युवा पीढ़ी पर विदेशी अपसंस्कृति का प्रभाव पड़ रहा है अपितु हमारे अबोध और नाबालिग बच्चे भी इसके दुष्प्रभाव से बच नहीं पा रहे हैं।

उपसंहार-इस प्रकार हम देखते हैं कि दूरदर्शन मनोरंजन के साथ-साथ जन-शिक्षा का भी एक . सशक्त माध्यम है। आवश्यकता है कि इसे केवल मनोरंजन का साधन ही न समझा जाए, वरन् यह जन-शिक्षा एवं प्रचार का माध्यम भी बने। इस उद्देश्य के लिए इसके विविध कार्यक्रमों में अपेक्षित सुधार होने चाहिए। इसके माध्यम से तकनीकी और व्यावहारिक शिक्षा का प्रसार किया जाना चाहिए। दूरदर्शन से होने वाली हानियों के लिए एक विशेष तन्त्र एवं दर्शक (UPBoardSolutions.com) जिम्मेदार हैं। इसके लिए दूरदर्शन के निदेशकों, सरकार एवं सामान्यजन को संयुक्त रूप से प्रयास करने होंगे, जिससे दूरदर्शन के कार्यक्रमों को दोषमुक्त बनाकर उन्हें वरदान के रूप में ग्रहण किया जा सके।

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31. वनों (वृक्षों) का महत्त्व [2009, 13, 17]

सम्बद्ध शीर्षक

  • हमारी वन सम्पदा
  • वन और पर्यावरण
  • वन-महोत्सव की उपयोगिता
  • वृक्ष हमारे जीवन-साथी
  • वृक्षारोपण का महत्त्व [2009, 11]
  • वृक्षों की रक्षा : पर्यावरण सुरक्षा [2012, 13]
  • वृक्षारोपण [2013, 18]
  • वृक्ष : मानव के सच्चे हितैषी [2016]

रूपरेखा—

  1. प्रस्तावना,
  2. वनों को प्रत्यक्ष योगदान,
  3. वनों का अप्रत्यक्ष योगदान,
  4. भारतीय बन-सम्पदा के लिए उत्पन्न समस्याएँ,
  5. वनों के विकास के लिए सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयास,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना-वन मानव-जीवन के लिए बहुत उपयोगी हैं, किन्तु सामान्य व्यक्ति इसके महत्त्व को नहीं समझ पा रहे हैं। जो व्यक्ति वनों में रहते हैं या जिनकी आजीविका वनों पर आश्रित है, वे तो वनों के महत्त्व को समझते हैं, लेकिन जो लोग वनों में नहीं रह रहे हैं, वे इन्हें प्राकृतिक शोभा का साधन मानते हैं। वनों का मनुष्यों के जीवन से कितना गहरा सम्बन्ध है, इसके लिए विभिन्न क्षेत्रों में उनका योगदान क्रमिक रूप से द्रष्टव्य है।

वनों का प्रत्यक्ष योगदान :
(क) मनोरंजन का साधन-वन, मानव को सैर-सपाटे के लिए रमणीक क्षेत्र प्रस्तुत करते हैं। वृक्षों के अभाव में पर्यावरण शुष्क हो जाता है और सौन्दर्य नष्ट। ग्रीष्मकाल में लोग पर्वतीय क्षेत्रों की यात्रा करके इस प्राकृतिक सौन्दर्य का आनन्द लेते हैं।
(ख) लकड़ी की प्राप्ति-वनों से हम अनेक प्रकार की बहुमूल्य लकड़ियाँ प्राप्त करते हैं। इन्हें ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। कुछ लकड़ियाँ व्यापारिक दृष्टिकोण से भी बहुत उपयोगी होती हैं,
जिनमें साल, सागौन, देवदार, चीड़, शीशम, चन्दन, (UPBoardSolutions.com) आबनूस आदि की लकड़ियाँ मुख्य हैं। इनका प्रयोग फर्नीचर, इमारती सामान, माचिस, रेल के डिब्बे, जहाज आदि बनाने में किया जाता है।

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(ग) विभिन्न उद्योगों के लिए कच्चे माल की पूर्ति–वनों से लकड़ी के अतिरिक्त अनेक उपयोगी सहायक वस्तुओं की प्राप्ति होती है, जिनका अनेक उद्योगों में कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जाता है। इनमें गोंद, शहद, जड़ी-बूटियाँ, कत्था, लाख, बाँस, बेंत आदि मुख्य हैं। इनका कागज, फर्नीचर, दियासलाई, टिम्बर, ओषधि आदि उद्योगों में कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जाता है।
(घ) प्रचुर फलों की प्राप्ति-वन प्रचुर मात्रा में फल उत्पन्न करके मानव का पोषण करते हैं। ये फल अनेक बहुमूल्य खनिज लवणों व विटामिनों के स्रोत हैं।
(ङ) जीवनोपयोगी जड़ी-बूटियाँ-वन अनेक जीवनोपयोगी जड़ी-बूटियों के भण्डार हैं। वनों में ऐसी अनेक वनस्पतियाँ पायी जाती हैं, जिनसे अनेक असाध्य रोगों का निदान सम्भव हो सका है। विजयसार की लकड़ी मधुमेह की अचूक औषध है।
(च) वन्य पशु-पक्षियों को संरक्षण–वन्य पशु-पक्षियों की सौन्दर्य की दृष्टि से अपनी एक विशिष्ट उपयोगिता है। वन अनेक वन्य पशु-पक्षियों को संरक्षण प्रदान करते हैं। ये हिरन, नीलगाय, गीदड़, रीछ, शेर, चीता, हाथी आदि वन्य पशुओं की क्रीड़ास्थली हैं। ये पशु वनों में स्वतन्त्र विचरण करते हैं, भोजन प्राप्त करते हैं और संरक्षण पाते हैं। पालतू पशुओं के लिए भी वन विशाल चरागाह उपलब्ध कराते हैं।
(छ) आध्यात्मिक लाभ–मानव-जीवन के भौतिक पक्ष के अतिरिक्त उसके मानसिक एवं (UPBoardSolutions.com) आध्यात्मिक पक्षों के लिए भी वनों का महत्त्व कुछ कम नहीं है। सांसारिक जीवन से क्लान्त मनुष्य यदि वनों में कुछ समय निवास करते हैं तो उन्हें सन्तोष तथा मानसिक शान्ति प्राप्त होती है।

उपर्युक्त के अतिरिक्त सरकार को राजस्व और वनों के ठेकों के रूप में करोड़ों रुपये की आय होती है। साथ ही सरकार चन्दन के तेल, उसकी लकड़ी से बनी कलात्मक वस्तुओं, फर्नीचर, लाख, तारपीन के तेल आदि के निर्यात से प्रति वर्ष करोड़ों रुपये की बहुमूल्य विदेशी मुद्रा अर्जित करती है।

वनों का अप्रत्यक्ष योगदान :

(क) वर्षा–भारत एक कृषिप्रधान देश है। कृषि की मानसून पर निर्भरता की दृष्टि से वनों का बहुत महत्त्व है। वन वर्षा में सहायता करते हैं। इन्हें वर्षा का संचालक कहा
जाता है।
(ख) पर्यावरण सन्तुलन (शुद्धीकरण)-वन-वृक्ष वातावरण से दूषित वायु (कार्बन डाइऑक्साइड) ग्रहण करके अपना भोजन बनाते हैं और ऑक्सीजन छोड़कर पर्यावरण को शुद्ध बनाते हैं। इस प्रकार वन पर्यावरण में सन्तुलन बनाये रखने में सहायक होते हैं।
(ग) जलवायु पर नियन्त्रण-वनों से वातावरण का तापक्रम, नमी और वायु प्रवाह नियन्त्रित होता है, जिससे जलवायु में सन्तुलन बना रहता है। वन जलवायु की भीषण उष्णता को सामान्य बनाये रखते हैं। ये आँधी-तूफानों से हमारी रक्षा करते हैं तथा जलवायु को भी प्रभावित करते हैं।
(घ) जल के स्तर में वृद्धि–वन वृक्षों की जड़ों के द्वारा वर्षा के जल को सोखकर भूमि के नीचे के जल-स्तर को बढ़ाते रहते हैं। इससे दूर-दूर तक के क्षेत्र हरे-भरे रहते हैं, साथ ही भूमिगत जल का स्तर घटने नहीं पाता। पहाड़ों पर बहते चश्मे, वनों की पर्याप्तता के ही परिणाम हैं।
(ङ) भूमि-कटाव पर रोक–वनों के कारण वर्षा का जल मन्द गति से प्रवाहित होता है; अतः भूमि का कटाव कम होता है। वर्षा के अतिरिक्त जल को वन सोख लेते हैं और नदियों के प्रवाह को नियन्त्रित करके भूमि के कटाव को रोकते हैं, जिसके फलस्वरूप भूमि की उर्वरा-शक्ति भी बनी रहती है।
(च) रेगिस्तान के प्रसार पर रोक-वन तेज आँधियों को रोकते हैं तथा वर्षा को आकर्षित करते हैं, जिससे मिट्टी के कण उनकी जड़ों में बँध जाते हैं। इससे रेगिस्तान का प्रसार नहीं होने पाती।।

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भारतीय वन-सम्पदा के लिए उत्पन्न समस्याएँ-वनों के योगदान से स्पष्ट है कि वन हमारे जीवन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूप से बहुत उपयोगी हैं। वनों में अपार सम्पदा पायी जाती थी, किन्तु जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती गयी, वनों को मनुष्य के प्रयोग के लिए काटा जाने लगा। अनेक अद्भुत और घने वन आज समाप्त हो गये हैं। वन-सम्पदा के इस संकट ने व्यक्ति और सरकार को वन-संरक्षण की ओर सोचने पर विवश कर दिया है। (UPBoardSolutions.com) आज हमारे देश में वनों का क्षेत्रफल केवल 20 प्रतिशत से भी कम रह गया है, जो कम-से-कम एक-तिहाई होना चाहिए था। वनों के पर्याप्त दोहन, नगरीकरण, वनों की अन्धाधुन्ध कटाई ने भारतीय वन-सम्पदा के लिए अनेक समस्याएँ उत्पन्न कर दी हैं।

वनों के विकास के लिए सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयास सरकार ने वनों के महत्त्व को दृष्टिगत रखते हुए समय-समय पर वनों के संरक्षण और विकास के लिए अनेक कदम उठाये हैं, जिनका संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है

  1. सन् 1956 ई० में वन महोत्सव का आयोजन किया गया, जिसका मुख्य नारा था-‘अधिक वृक्ष लगाओ’, तभी से यह उत्सव प्रति वर्ष 1 से 7 जुलाई तक मनाया जाता है।
  2. सन् 1965 ई० में सरकार ने केन्द्रीय वन आयोग की स्थापना की जो वनों से सम्बन्धित आँकड़े और सूचनाएँ एकत्रित करके वनों के विकास में लगी हुई संस्थाओं के कार्य में ताल-मेल बैठाता है।
  3. विभिन्न राज्यों में वन निगमों की रचना की गयी है, जिससे वनों की अनियन्त्रित कटाई को रोका जा सके।

व्यक्तिगत स्तर पर भी अनेक आन्दोलनों का संचालन करके समाज-सेवियों द्वारा समय-समय पर सरकार को वनों के संरक्षण और विकास के लिए सचेत किया जाता रहा है।

उपसंहार-निस्सन्देह वन हमारे लिए बहुत उपयोगी हैं। इसलिए वनों का संरक्षण और संवर्द्धन बहुत आवश्यक है। इसलिए आवश्यकता है कि सरकार वन-संरक्षण नियमों को कड़ाई से पालन कराकर आने वाली पीढ़ी की भावी प्राकृतिक विपदाओं से रक्षा करे। इसके लिए सरकार के (UPBoardSolutions.com) साथ-साथ सामान्य जनता का सहयोग भी अपेक्षित है। यदि प्रत्येक व्यक्ति वर्ष में एक बार एक वृक्ष लगाने और उसको भली प्रकार संरक्षण करने का संकल्प लेकर उसे क्रियान्वित भी करे तो यह राष्ट्र के लिए आगे आने वाले कुछ एक वर्षों में अमूल्य योगदान हो सकता है।

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32. ग्राम्य-जीवन [2010]

सम्बद्ध शीर्षक

  • भारत गाँवों में बसता है।
  • भारतीय किसान का जीवन
  • भारतीय किसान की समस्याएँ

रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना,
  2. ग्रामीणों का सरल और सात्त्विक जीवन,
  3. ग्राम्य-जीवन का आनन्द,
  4. भारतीय ग्रामों की दुर्दशा,
  5. सरकार के सुधार और प्रयत्न,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना–भारत ग्रामप्रधान देश है। यहाँ की 70% जनसंख्या ग्रामों में निवास करती है। गाँधीजी का कथन था कि, “भारत ग्रामों में बसता है।’ कवीन्द्र रवीन्द्र का कथन है कि ‘‘यदि तुम्हें ईश्वर के दर्शन करने हैं तो वहाँ जाओ, जहाँ किसान जेठ की दुपहरी में हल जोतकर एड़ी-चोटी का पसीना एक करता है। इन कथनों से स्पष्ट होता है कि भारत का सच्चा सौन्दर्य ग्रामों में है। भारत में ग्रामों की संख्या अधिक है। ग्रामों में लोग झोपड़ियों में निवास करते हैं, जबकि नगरों के लोग उच्च अट्टालिकाओं और दिव्य प्रासादों में। फिर भी वास्तविक आनन्द ग्रामों में ही प्राप्त होता है, नगरों में नहीं।

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ग्रामीणों का सरल और सात्त्विक जीवन–ग्रामों के लोग बाहर से अधनंगे, अनाकर्षक और अशिक्षित होते हुए भी हृदय से सीधे, सच्चे और पवित्र होते हैं। भारत की सच्ची सभ्यता के दर्शन ग्रामों में ही होते हैं। ग्रामवासी ईमानदार और अतिथि-सत्कार करने वाले होते हैं। ग्रामीणों का जीवन कृत्रिमता, बाह्यआडम्बर, छल, धोखा आदि से दूर रहता है। ‘सादा जीवन और उच्च विचार’ की झलक सरल ग्राम्य-जीवन में ही मिलती है। ग्रामीणों में अधिक व्यय की भावना नहीं होती। वे कृत्रिम साधनों से दूर तथा सिनेमा, नाटक , और नाच-रंग से अछूते रहते हैं।

ग्रामीण लोग रूखा-सूखा, जो कुछ मिल जाता है, खा लेते हैं। मोटा और सस्ता कपड़ा पहनते हैं। अतिथि का दिल खोलकर स्वागत करते हैं। खुली हवा और खुली धूप में प्रकृति के ये नौजवान साधु खेतों में काम करते हैं। प्रात:काल की ऊषा की लालिमा से लेकर (UPBoardSolutions.com) सन्ध्या तक ये खेतों में कठिन परिश्रम करते हैं। सन्ध्या-पूजा से अनभिज्ञ इन लोगों के हृदय में ईश्वर निवास करता है। इनमें परमात्मा के प्रति अटूट विश्वास, मानवता से प्रेम तथा भाईचारा, दया, करुणा, सहयोग आदि की उच्च भावनाएँ पायी जाती हैं। गाय-भैंस के ताजे दूध और मक्खन, अपने खेत में उत्पन्न अन्न और सब्जियों, ग्राम-वधुओं के हाथ से पीसे गये आटे और उनके द्वारा बिलोये गये मट्टे में जो आनन्द और सन्तोष मिलता है, वह नगरों के चटनी, अचार, मुरब्बों और पकवानों में कहाँ ?

ग्राम्य-जीवन का आनन्द–ग्रामवासियों का जीवन सरल, शान्त और आनन्दमय होता है। नगरों की विशाल अट्टालिकाओं, चौड़ी-चिकनी सड़कों, बिजली की चकाचौंध, सिनेमा, नाट्यधरों और अन्य विलासिता की सामग्री में वह आनन्द नहीं, जो शान्त, एकान्त, कोलाहल से दूर प्रकृति की सुरम्य गोद अर्थात् ग्रामों के वातावरण में है। कल-कल नाद करके बहती हुई नदी की धारा, घनी अमराइयों, पुष्पित लताओं, दूर तक फैली हरीतिमा और लहलहाते खेतों से जो मानसिक शान्ति और आत्म-सन्तोष मिलता है, वह धुआँ उगलती चिमनियों, क्लोरीन मिले पानी, सड़कों पर घर-घर्र और पों-पों के कोलाहल, हवा की पहुँच से दूर घने बसे घरों के वातावरण से पूर्ण नगरों में कहाँ ? गाँवों में प्रकृति का शुद्ध रूप देखने को मिलता है।

भारतीय ग्रामों की दुर्दशा-सरलता, सादगी और प्रकृति की सुरम्य गोद अर्थात् भारतीय ग्रामों की एक अपनी करुण कहानी है। शताब्दियों से इन दीन-हीन किसानों का शोषण होता आ रहा है। आज ग्रामों में जो विकट समस्याएँ मुँह बाये खड़ी हुई हैं, वे भारत जैसे देश के लिए कलंक की बात हैं। अधिकांश ग्रामीण अशिक्षा के भयंकर रोग, दरिद्रता के दुर्दान्त दानव एवं अन्धविश्वास के भूत से ग्रसित हैं। भारत की स्वतन्त्रता से पूर्व कृषक का जन्म दरिद्रता और अज्ञान के मध्य होता था, वे अन्धविश्वास और ऋण की गोद में पलते थे, दु:ख और दरिद्रता में बड़े होते थे। भारत की लोकप्रिय सरकार ने ग्रामों की दशा में उल्लेखनीय सुधार किये हैं।

वर्तमान समय में गाँव दुर्गुणों, बुराइयों, रूढ़ियों एवं हानिकारक रीति-रिवाजों के अड्डे बन गये हैं। भोले किसानों को सूदखोर महाजनों एवं मुनाफाखोर व्यापारियों के शोषण का शिकार होना पड़ता है। ग्रामों में स्नेह, स्वावलम्बन, सहयोग, सरलता, पवित्रता आदि गुणों को लोप होता जा (UPBoardSolutions.com) रहा है। बढ़ती हुई बेकारी ने ग्रामीणों के जीवन को कुण्ठित और निराशामय बना दिया है। जातिवाद, लड़ाई-झगड़े एवं मुकदमेबाजी के कारण उनका जीवन नरकतुल्य बन गया है; अतः ग्रामों के देश भारत की सर्वांगीण उन्नति करने के लिए ग्रामों के सुधार की नितान्त आवश्यकता है।

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सरकार के सुधार और प्रयत्न-हमारी लोकप्रिय सरकार ग्रामों के सुधार की ओर विशेष ध्यान दे रही है। ग्रामों में रोगों से मुक्ति दिलाने के लिए अस्पताल तथा अशिक्षा को दूर करने के लिए स्कूल खोले जा रहे हैं। ग्रामों के आर्थिक विकास के लिए उन्हें सड़कों और रेलमार्गों से जोड़ा जा रहा है। नलकूपों, बिजली, उत्तम बीज, रासायनिक खाद तथा कृषि-यन्त्रों को सुलभ कराके ग्रामों की दशा सुधारी जा रही है। ग्राम पंचायतों के माध्यम से रेडियो, टेलीविजन आदि के द्वारा मनोरंजन के साधन सुलभ कराये जा रहे हैं।

उपसंहार–स्वतन्त्रता से पूर्व ग्रामों की दशा अत्यन्त शोचनीय थी। सरकार के प्रयत्नों से ग्रामों की दशा में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। ग्राम-सुधार और विकास कार्यक्रमों में तेजी लाने के लिए ग्राम के उत्साही युवकों का सहयोग अपेक्षित है। वह दिन दूर नहीं है, जब भारत के ग्राम पुन: ‘पृथ्वी का स्वर्ग’ कहलाएँगे।

33. चलचित्र : लाभ और हानियाँ

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. चलचित्रों की व्यापकता,
  3. मनोरंजन का साधन,
  4. समाज पर कुप्रभाव,
  5. उपसंहार।

प्रस्तावना मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, जो समाज में रह कर ही अपने मनोरंजन के माध्यम हूँढ़ने का यत्न करता है। समय और परिस्थिति के अनुसार उसके मनोरंजन के साधन बदलते रहते हैं। जब तक विज्ञान का पूर्ण विकास नहीं हुआ था, तब तक वह मेले-तमाशे आदि के माध्यम से अपना मनोरंजन करता था, परन्तु वैज्ञानिक विकास के साथ उसने अपनी सुख-सुविधाओं के नवीन साधनों का भी आविष्कार किया है। उसने दृश्य और (UPBoardSolutions.com) श्रव्य की सहायता से अनेक आविष्कार किये हैं और इन्हीं के संयोग से चलचित्र का निर्माण किया है। सन् 1929 तक बने चलचित्रों में फोटोग्राफी तो सचल थी पर उनमें ध्वनि की कमी थी। सवाक् चलचित्रों का निर्माण सन् 1930 से आरम्भ हो गया था। पिछले वर्षों में इसने जो भी उन्नति की है, उसी के कारण मानव-मनोरंजन के क्षेत्र में इनको प्रमुख स्थान हो गया है।

चलचित्रों की व्यापकता–चलचित्रों ने समाज को अत्यधिक प्रभावित किया है। प्रारम्भ में जनता ने कौतूहल के साथ इस मनोरंजन का आस्वादन किया। धीरे-धीरे उसको इसमें कथा, नाटक, प्रहसन आदि का आनन्द भी मिलने लगा। इससे सिनेमा के दर्शकों की संख्या में वृद्धि होने लगी। जनता के प्रत्येक वर्ग में इसके प्रति मोह बढ़ने लगा। आज भारत में अमेरिका के बाद दूसरे नम्बर पर चलचित्रों का निर्माण होता है। प्रतिवर्ष भारत में बनने वाले चलचित्रों की संख्या लगभग एक हजार है। इनके निर्माण पर अरबों रुपये खर्च होते हैं। यह एक सफल व्यवसाय बन चुका है, जिसमें न जाने कितने लागों को रोजगार के अवसर प्राप्त होते हैं।

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मनोरंजन का साधन–सिनेमा आज मनोरंजन का प्रमुख, सर्वसुलभ एवं सस्ता माध्यम माना जाता है। दिन भर विभिन्न कार्यों में लगे रहने के कारण लोगों का मन श्रान्त-क्लान्त रहता है। अपनी शारीरिक एवं मानसिक थकान को दूर करने के लिए वे थोड़ी-सी राशि व्यय करके सिनेमा देखते हैं तथा इसे देखते हुए आनन्द की धारा में बहकर अपनी समस्त पीड़ाओं को भूल जाते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें जो मानसिक सन्तुष्टि प्राप्त होती है, उससे वे अपने अगले दिन के कार्यों के लिए उत्साह प्राप्त करते हैं।

सिनेमा शिक्षा के प्रचार का साधन भी स्वीकार किया जाता है। इसके द्वारा हमें अनेक प्रकार की शिक्षाएँ प्राप्त होती हैं। जिनके आधार पर दर्शक अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए अपने जीवन से विभिन्न बुराइयों को दूर कर अपना जीवन ‘आदर्श जीवन’ बना सकते हैं। अनेक समस्याओं के सहज, स्वाभाविक समाधान भी चलचित्रों के माध्यम से सुझाये जा सकते हैं, जो समाज में नवचेतना उत्पन्न कर सकते हैं। वीरों एवं देशभक्तों के चरित्रों पर बनी फिल्में राष्ट्रीय भावना को जाग्रत करती हैं।

सिनेमा से विभिन्न प्रकार के दृश्यों का आनन्द प्राप्त होता है। सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक चलचित्रों के माध्यम से हमें अपनी प्राचीन समृद्धि और परम्परा का ज्ञान होता है, जिससे प्रेरणा प्राप्त कर हम अपने वर्तमान को भी महान् बना सकते हैं।

समाज पर कुप्रभाव-सिनेमा ने आधुनिक समाज को जहाँ अत्यधिक प्रभावित करते हुए उसमें नव-चेतना जाग्रत की है, वहीं उसे पर्याप्त हानि भी पहुँचाई है। धन के लोभी फिल्म-निर्देशकों ने भद्दी-अश्लील और फूहड़ फिल्में बनानी आरम्भ कर दी हैं। इस प्रकार के चलचित्रों से दर्शकों के आचरण पर बुरा प्रभाव पड़ता है। श्रृंगार एवं फैशन के प्रति आकर्षण भी चलचित्रों के प्रभाव से बढ़ रहा है। जिन लोगों को इसका व्यसन लग जाता है, (UPBoardSolutions.com) वे अपनी आर्थिक स्थिति की चिन्ता किये बिना अपना सर्वस्व इसी में स्वाहा कर देते हैं। फिल्मों से मानवीय मूल्य नष्ट हो रहे हैं। लोगों को दृष्टिकोण हीन और कामुक होने लगा है तथा जीवन की वास्तविकता के प्रति उनकी आस्था समाप्त होने लगी है। कम आयु के बालक जब चलचित्र में अश्लील, अमानवीय और अतिमानवीय व्यवहार देखते हैं तो वे भविष्य में वैसा ही करने की प्रेरणा लेकर घर आते हैं।

आज स्थिति ऐसी हो गयी है कि सिनेमाघर बच्चों के बिगड़ने के अड्डे बन गये हैं। बच्चों के आयु से पहले परिपक्व हो जाने के पीछे भी सिनेमा का प्रमुख हाथ है। फिल्मों ने भारतीय समाज को ‘प्रेम-संस्कृति प्रदान की है जिसमें ‘गर्ल फ्रेण्ड’ और ‘ब्वॉय फ्रेण्ड’ का प्रचलन बढ़ा है, पति-पत्नी में मानसिक प्रतिरोध बढ़ा है तथा सामाजिक और पारिवारिक सम्बन्धों में विकार उत्पन्न हुए हैं।

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उपसंहार–सिनेमा सैद्धान्तिक रूप से ज्ञानवर्द्धक है। इसका व्यावसायिक रूप अत्यन्त हानिकारक है। आज हमें इस प्रकार के चलचित्रों की आवश्यकता है जो सामाजिक, राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक चेतना जगाने वाली हों। फिल्म निर्माण में संलग्न निर्माता, निर्देशकों, अभिनेताओं आदि को भी अपना उत्तरदायित्व समझते हुए समाज-सुधार एवं राष्ट्र-निर्माण में योगदान देना चाहिए। दर्शकों को सिनेमा मनोरंजन के लिए देखना चाहिए, व्यसन के रूप में नहीं तभी सिनेमा की सार्थकता सिद्ध होगी।

34. नारी-शिक्षा (2010, 13]

सम्बद्ध शीर्षक

  • नारी-शिक्षा का महत्त्व [2011, 12, 14]

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. स्त्री-शिक्षा का अतीत और वर्तमान,
  3. नारी शिक्षा की ओवश्यकता,
  4. नारी-शिक्षा को रूप,
  5. आधुनिक शिक्षा,
  6. उपसंहार : भारत में नारी-शिक्षा की वर्तमान स्थिति।

प्रस्तावना-एक समय था, जब कि भारतवर्ष जगद्गुरु कहलाता था। विश्व के कोने-कोने से शिक्षार्थी यहाँ के विश्वविद्यालयों में विद्या ग्रहण करने आते थे। परन्तु परिस्थितियों के चक्रवात में भारत ऐसा फैसा कि आज यहाँ अशिक्षा और अज्ञान का साम्राज्य (UPBoardSolutions.com) व्याप्त हो गया है। आज विश्व के निरक्षरों का एक बड़ा प्रतिशत भारत में विद्यमान है। यहाँ की नारियों की स्थिति और भी दयनीय है। अक्षर-ज्ञान, स्कूली शिक्षा, तकनीकी शिक्षा आदि के क्षेत्र में वे बहुत पिछड़ी हुई हैं।

स्त्री-शिक्षा का अतीत और वर्तमान-ऐसा नहीं है कि भारतीय नारियाँ सदा-से ही अशिक्षित रही हों। प्राचीन काल में स्त्रियों को भी पुरुषों के समान शिक्षा दी जाती थी। अनुसूया, गार्गी, लीलावती आदि विदुषियों ने अपने ज्ञान से समाज को प्रभावित किया था। आचार्य मण्डन मिश्र की पत्नी ने जगद्गुरु शंकराचार्य से शास्त्रार्थ करके स्त्रियों के गौरव को बढ़ाया था। परन्तु दुर्भाग्य से भारतवर्ष को शताब्दियों तक आक्रमणकारियों के युद्ध झेलने पड़े। अस्तित्व के लिए जूझने हमारे देश का शैक्षिक विकास रुक गया। भारतीय नारी को अपनी लाज बचाने के लिए घर की दहलीज में सीमित रहना पड़ा। परिणामस्वरूप अशिक्षा उसकी विवशता बन गयी।

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उल्लेखनीय बात यह है कि युगों तक विद्यालयी शिक्षा से वंचित रहने पर भी भारतीय नारी ने पुरुषसमाज को सुसंस्कारित करने का बीड़ा उठाया। शिवाजी को महान बनाने वाली जीजाबाई थीं। ‘तुलसीदास को ‘रामबोला’ बनाने वाली उनकी अर्धांगिनी रत्नावली’ थीं। सैकड़ों वर्षों के युद्धों में अपने धर्म और संस्कृति को बचाये रखने वाली भारत की नारियाँ ही थीं। इस कारण हम यहाँ की नारियों को अशिक्षित होते हुए भी असंस्कारित नहीं कह सकते।

नारी-शिक्षा की आवश्यकता–नारी और पुरुष दोनों समाज रूपी रथ के दो पहिये हैं। दोनों का समान रूप से शिक्षित होना आवश्यक है। समाज के कुछ पुरातनपन्थी लोग स्त्री-शिक्षा के विरोधी हैं। वे स्त्री को ‘पराया-धन’ या ‘पाँव की जूती’ या ‘अनुत्पादक’ मानकर पुरुषों के समकक्ष नहीं आने देना चाहते। वे भूल जाते हैं कि मनुष्य-जीवन की सबसे मूल्यवान शक्ति नारी के हाथों में ही है। नारियाँ ही माँ बनकर बच्चों को पालती हैं, उन्हें गुणवान बनाती हैं। वे ही उस कच्ची मिट्टी को अपने कल्पित साँचे में ढालती हैं। वह उसे देवता भी बना सकती हैं और राक्षस भी। यदि नारी में ही विवेक न होगा तो उसकी सन्तानें कैसे विवेकवान होंगी। अतः सर्वप्रथम नारी को शिक्षित, संस्कारित एवं ज्ञान-समृद्ध बनाना आवश्यक है।

अरस्तू के कथनानुसार, “नारी की उन्नति तथा अवनति पर ही राष्ट्र की उन्नति या (UPBoardSolutions.com) अवनति निर्भर करती है।’ प्रसिद्ध दार्शनिक बर्नार्ड शॉ का कहना है कि “किसी व्यक्ति का चरित्र कैसा है, यह उसकी माता को देखकर बताया जा सकता है।”

नारी-शिक्षा का रूप–प्रश्न यह है कि नारी-शिक्षा का स्वरूप क्या होना चाहिए ? क्या नारी और पुरुष की शिक्षा में कोई अन्तर होना चाहिए ? उत्तर है–हाँ, होना चाहिए। जब प्रकृति ने उन्हें स्वभावतया पुरुष से भिन्न बनाया है तो उनकी शिक्षा भी भिन्न होनी चाहिए। नारी स्वभाव से कोमल होती है। उसमें समस्त रचनात्मक क्षमताएँ होती हैं। जयशंकर प्रसाद ने नारी-हृदय के गुणों की महिमा का वर्णन करते हुए लिखा है

दया माया ममता लो आज, मधुरिमा लो अगाध विश्वास।
हमारा हृदय-रत्न निधि स्वच्छ, तुम्हारे लिए खुला है पास ॥

नारी में दया, ममता, मधुरिमा, विश्वास, स्वच्छता, समर्पण, त्याग आदि उदात्त वृत्तियाँ होती हैं। अतः उसकी शिक्षा भी ऐसी होनी चाहिए जिससे उसकी इन शक्तियों का उत्तरोत्तर विकास हो। एक नारी चिकित्सा, शिक्षा, सेवा, पालन-पोषण, सौन्दर्य-बोध, कला आदि क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। वह चिकित्सक, शिक्षिका, प्रशिक्षक, परिधान-विशेषज्ञ आदि के रूप में कुशल सिद्ध हो सकती है। ये कार्य उसकी शक्तियों और रुचियों के अनुरूप हैं।

आधुनिक शिक्षा-आज की नारी पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने की होड़ में इंजीनियरिंग, वाणिज्य, सेना, पायलट, पुलिस आदि सेवाओं में जा रही है। आज के इस समानता-समर्थक युग में इस दौड़ को उचित कहा जा रहा है, परन्तु ये क्षेत्र स्त्रियोचित नहीं हैं। सेना-पुलिस जैसे क्षेत्र पुरुषोचित हैं। इनके लिए चित्त की कठोरता और अनथक भागदौड़ की आवश्यकता होती है। स्त्री के लिए वैसी शिक्षा और नौकरी चाहिए जिससे उसका स्त्रैण स्वभाव अक्षुण्ण बना रहे। फिर भी यदि नारी-समाज का अल्पांश कानून, पुलिस, सेना, वाणिज्य जैसे क्षेत्रों में जाना चाहे तो उसे पुरुषवत् अधिकार दिये जाने चाहिए; क्योंकि रानी लक्ष्मीबाई, इन्दिरा गाँधी, सरोजिनी नायडू, किरण बेदी आदि प्रतिभाओं ने कठोर क्षेत्रों में आकर जनसमाज को क्रान्तिकारी दिशा प्रदान करने में सफलता प्राप्त की है।

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उपसंहार : भारत में नारी-शिक्षा की वर्तमान स्थिति-यद्यपि भारत में नारी-शिक्षा की स्थिति सन्तोषजनक नहीं है, किन्तु आशाजनक अवश्य है। सरकार और समाज के प्रयत्नों से नारी-शिक्षा को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। हरियाणा में स्नातक स्तर तक ग्रामीण नारियों की शिक्षा मुफ्त कर दी गयी है। लड़कियों ने कला, चिकित्सा, विज्ञान, वाणिज्य, प्रशासनिक सेवा सभी क्षेत्रों में लड़कों को जबरदस्त चुनौती दी है। लड़कियों की उत्तीर्णता प्रतिशत और गुणवत्ता (UPBoardSolutions.com) प्रतिशत लड़कों से अधिक है। इससे स्पष्ट है कि भारत नारी-शिक्षा और प्रतियोगिता के क्षेत्र में उत्तरोत्तर प्रगति कर रहा है। यह एक शुभ संकेत है।

35. परिवार नियोजन

सम्बद्ध शीर्षक

  • बढ़ती जनसंख्या : संसाधनों पर बोझ
  • बढ़ती हुई जनसंख्या और हमारी प्रगति

रूपरेखा–

  1. प्रस्तावना,
  2. भारत की स्थिति,
  3. जनसंख्या : समस्या क्यों?,
  4. जनसंख्यावृद्धि के कारण,
  5. जनसंख्या-वृद्धि रोकने के उपाय,
  6. उपसंहार : शिक्षा तथा प्रोत्साहन।

प्रस्तावना–परिवार-नियोजन का तात्पर्य है-परिवार को सीमित रखना, दूसरे शब्दों में कम सन्तान को जन्म देना या जनसंख्या पर रोक लगाना। भारतवर्ष बीसवीं-इक्कीसवीं सदी में जिस सबसे बड़े और • भयानक संकट के दौर से गुजर रहा है, वह है-जनसंख्या-विस्फोट।

भारत की स्थिति-भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या के आँकड़े चौंका देने वाले हैं। यहाँ की आबादी एक अरंब बीस करोड़ का आँकड़ा पार कर चुकी है। हर मिनट में कई बच्चे जन्म ले लेते हैं। इस प्रकार प्रतिवर्ष सवा करोड़ की वृद्धि होती चली जाती है। दूसरे शब्दों में, भारत में हर वर्ष एक नया ऑस्ट्रेलिया समा जाता है।

जनसंख्या : समस्या क्यों ?–बढ़ती हुई जनसंख्या भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा इसलिए है, क्योंकि भारत के पास बढ़ती हुई आबादी को खिलाने-पिलाने, काम देने और बसाने की सुविधाएँ नहीं हैं। बढ़ती आबादी और साधनों का सन्तुलन बुरी तरह टूट चुका है। भारत की आबादी विश्व की कुल आबादी का लगभग 17% है, जब कि भूमि केवल 2% ही है। इस भूमि को बढ़ाने का कोई तरीका हमारे पास नहीं है।

दूसरी समस्या यह है कि देश में खाद्यान्न 4 +4 = 8 की दर से बढ़ते हैं तो जनसंख्या 4 x 4 = 16 की दर से। इस भाँति भूमि पर नित्य अभाव, गरीबी और भूख का दबाव बढ़ता चला जाता है। आजीविका के साधनों का भी यही हाल है। आजादी के बाद देश में कुछ लाख ही बेरोजगार थे, जिनकी संख्या बढ़कर आज कई करोड़ तक पहुँच चुकी है।

जनसंख्या-विस्फोट से सारा देश भयाक्रान्त है। जहाँ भी जाइए लोगों की अनन्त भीड़ दिखायी देती है। महानगरों में तो लोग मधुमक्खी के छत्तों की भाँति मँडराते नजर आते हैं। इससे प्रत्येक प्राणी पर मानसिक तनाव बढ़ता है। लोगों के लिए पैदल चलना तक कठिन हो (UPBoardSolutions.com) गया है। इसके अतिरिक्त बेकार लोगों की भीड़ चोरी, उपद्रव, अपराध आदि में रुचि लेती है। अधिक जनसंख्या से देश का जीवन-स्तर कदापि नहीं उठ सकता; क्योंकि जीवन-स्तर का सीधा सम्बन्ध समृद्धि से है। जनसंख्या-वृद्धि से परिवार की सम्पन्नता में वृद्धि की जगह बिखराव आता है। इसलिए खाते-पीते परिवार भी गरीब होते चले जाते हैं। भारत में जनसंख्या वृद्धि के कारण स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास की समस्या दिनोंदिन बढ़ती चली जा रही है जिससे देश का आर्थिक ढाँचा बुरी तरह चरमरा रहा है।

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जनसंख्या-वृद्धि के कारण-जनसंख्या-विस्फोट का सबसे बड़ा कारण है जन्म-दर और मृत्यु-दर का सन्तुलन बिगड़ना। भारत की मृत्यु-दर निरन्तर कम होती जा रही है, जब कि जन्म-दर वहीं-की–वहीं है। मृत्यु-दर इसलिए कम हुई है, क्योंकि स्वास्थ्य-सेवाओं में पर्याप्त सुधार हुआ है। हैजा, टी० बी०, मलेरिया, चेचक आदि जानलेवा बीमारियों का शत-प्रतिशत उपचार हुँढ़ लिया गया है। वैज्ञानिक उन्नति के कारण बाढ़, सूखा, अकाल, प्राकृतिक प्रकोपों पर भी पर्याप्त नियन्त्रण कर लिया गया है, परन्तु । जन्म-दर को रोकने में उतनी अधिक सफलता नहीं मिली है।

जनसंख्या-वृद्धि रोकने के उपाय-जनसंख्या-वृद्धि को रोकने का सबसे कारगर उपाय यह है कि नर-नारी को सीमित परिवार की शिक्षा दी जाए। शहरों में यह कार्य लगभग पूरा हो चुका है। शहरी आबादी सीमित परिवार के प्रति सचेत है, परन्तु ग्रामीण आबादी अभी भी इस विषय में लापरवाह है। जब तक सामाजिक संस्थाएँ सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर सीमित परिवार की चेतना नहीं जगाएँगी, तब तक जनसंख्या की बाढ़ आती रहेगी। शहरों में भी अभी लोग पुत्र-मोह के कारण दो लड़कियों के पश्चात् तीसरी-चौथी सन्तान पैदा कर देते हैं। अभी कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अन्धविश्वास के कारण सन्तान को रोकने में बुराई मानते हैं। इसका उपचार लगातार शिक्षा देने से ही हो सकता है।

जहाँ तक सन्तान को रोकने के वैज्ञानिक साधनों का प्रश्न है, भारत में साधनों की कमी नहीं है। इन साधनों का निस्संकोच प्रयोग करने से जनसंख्या पर निश्चित रूप से नियन्त्रण किया जा सकता है।

उपसंहार : शिक्षा तथा प्रोत्साहन-जनसंख्या को सीमित करने के लिए औपचारिक शिक्षा के साथ-साथ परिवार-नियोजन की शिक्षा भी दी जानी चाहिए। उन माता-पिताओं को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जिन्होंने परिवार को सीमित किया है। सरकार ने अपनी ओर से ऐसे अनेक उपाय किये हैं, परन्तु आवश्यकता इस बात की है कि परिवार को सीमित बनाने सम्बन्धी कठोर कानून बनाये जाएँ तभी हर मिनट बढ़ता हुआ खतरा रुक सकता है। इस विषय में (UPBoardSolutions.com) यदि कोई जाति, धर्म या सम्प्रदाय आड़े भी आता है तो उसकी परवाह नहीं करनी चाहिए। अब तो जनसंख्या-वृद्धि जीवन और मरण का प्रश्न बन चुका है। डॉ० चन्द्रशेखर ने सच ही कहा है-“हम एक रात की भी प्रतीक्षा नहीं कर सकते। परिवार-नियोजन के बिना हर रात एक भयावह स्वप्ने की तरह है।’

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36. सत्संगति का महत्त्व [2016, 18]

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  • कबिरा संगत साधु की, हरे और व्याधि
  • कुसंग का ज्वर भयानक होता है।

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. संगति का प्रभाव,
  3. सत्संगति का अर्थ,
  4. सत्संगति से लाभ,
  5. कुसंगति से हानि,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना–“संसर्ग से ही मनुष्य में गुण-दोष आते हैं।” मनुष्य का जीवन अपने आस-पास के वातावरण से प्रभावित होता है। मूलरूप से मानव के विचारों और कार्यों को उसके संस्कार व वंश-परम्पराएँ ही दिशा दे सकती हैं। यदि उसे स्वच्छ वातावरण मिलता है तो वह कल्याण के मार्ग पर चलता है और यदि वह दूषित वातावरण में रहता है तो उसके कार्य भी उससे प्रभावित हो जाते हैं।

संगति का प्रभाव-मनुष्य जिस वातावरण एवं संगति में अपना अधिक समय व्यतीत करता है, उसका प्रभाव उस पर अनिवार्य रूप से पड़ता है। मनुष्य ही नहीं, वरन् पशुओं एवं वनस्पतियों पर भी इसका असर होता है। मांसाहारी पशु को यदि शाकाहारी (UPBoardSolutions.com) प्राणी के साथ रखा जाए तो उसकी आदतों में स्वयं ही परिवर्तन हो जाएगा। यही नहीं, मनुष्य को भी यदि अधिक समय तक मानव से दूर पशु-संगति में रखा जाए। तो वह भी शनैः-शनै: मनुष्य-स्वभाव छोड़कर पशु-प्रवृत्ति को ही अपना लेगा।।

सत्संगति का अर्थ-सत्संगति का अर्थ है-‘अच्छी संगति’। वास्तव में ‘सत्संगति’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है-‘सत्’ और ‘संगति’ अर्थात् ‘अच्छी संगति’। अच्छी संगति का अर्थ है-ऐसे सत्पुरुषों के साथ निवास, जिनके विचार अच्छी दिशा की ओर ले जाएँ।

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सत्संगति से लाभ–सत्संगति के अनेक लाभ हैं। सत्संगति मनुष्य को सन्मार्ग की ओर अग्रसर करती है। सत्संगति व्यक्ति को उच्च सामाजिक स्तर प्रदान करती है, विकास के लिए सुमार्ग की ओर प्रेरित करती है, बड़ी-से-बड़ी कठिनाइयों का सफलतापूर्वक सामना करने की शक्ति प्रदान करती है और सबसे बढ़कर व्यक्ति को स्वाभिमान प्रदान करती है। सत्संगति के प्रभाव से पापी पुण्यात्मा और दुराचारी सदाचारी हो जाते हैं। ऋषियों की संगति के प्रभाव से ही, वाल्मीकि जैसे भयानक डाकू महान कवि बन गए तथा अंगुलिमाल ने महात्मा बुद्ध की संगति में आने से हत्या, लूटपाट के कार्य छोड़कर सदाचार के मार्ग को अपनाया। सन्तों के प्रभाव से आत्मा के मलिन भाव दूर हो जाते हैं तथा वह निर्मल बन जाती है।

सत्संगति एक प्राण वायु है, जिसके संसर्ग मात्र से मनुष्य सदाचरण का पालक बन जाता है; दयावान, विनम्र, परोपकारी एवं ज्ञानवान बन जाता है। इसलिए तुलसीदास ने लिखा है कि

सठ सुधरहिं सत्संगति पाई,
पारस परस कुधातु सुहाई।”

एक साधारण मनुष्य भी महापुरुषों, ज्ञानियों, विचारवानों एवं महात्माओं की संगत से बहुत ऊँचे स्तर को प्राप्त करता है। वानरों-भालुओं को कौन याद रखता है, लेकिन हनुमान, सुग्रीव, अंगदं, जाम्बवन्त आदि श्रीराम की संगति पाने के कारण अविस्मरणीय बन गए।

सत्संगति ज्ञान प्राप्त की भी सबसे बड़ी साधिका है। इसके बिना तो ज्ञान की कल्पना तक नहीं की जा सकती

‘बिनु सत्संग विवेक न होई।।

जो विद्यार्थी अच्छे संस्कार वाले छात्रों की संगति में रहते हैं, उनका चरित्र श्रेष्ठ होता है एवं उनके सभी कार्य उत्तम होते हैं। उनसे समाज एवं राष्ट्र की प्रतिष्ठा बढ़ती है।

कुसंगति से हानि–कुसंगति से लाभ की आशा करना व्यर्थ है। कुसंगति से पुरुष का विनाश निश्चित है। कुसंगति के प्रभाव के मनस्वी पुरुष भी अच्छे कार्य करने में असमर्थ हो जाते हैं। कुसंगति में बँधे रहने के कारण वे चाहकर भी अच्छा कार्य नहीं कर पाते। कुसंगति के कारण ही दानवीर कर्ण अपना उचित सम्मान खो बैठा। जो छात्र कुसंगति में पड़ जाते हैं वे अनेक व्यसन सीख जाते हैं, जिनका प्रभाव उनके जीवन पर बहुत बुरा पड़ता है। उनके लिए प्रगति के मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं। उनका मस्तिष्क अच्छे-बुरे का भेद करने में असमर्थ हो जाता है। उनमें अनुशासनहीनता आ जाती है। गलत दृष्टिकोण रखने के कारण ऐसे छात्र पतन के गर्त में गिर जाते हैं। वे देश के प्रति अपने उत्तरदायित्व भी भूल जाते हैं।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ठीक ही लिखा है-“कुसंग का ज्वर सबसे भयानक होता है। किसी युवा पुरुष की संगति बुरी होगी तो वह उसके पैरों में बँधी चक्की के समान होगी, जो उसे दिन-पर-दिन अवनति के गड्डे में गिराती जाएगी और यदि अच्छी होगी तो सहारा देने (UPBoardSolutions.com) वाली बाहु के समान होगी, जो उसे निरन्तर उन्नति की ओर उठाती जाएगी।”

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उपसंहार–सत्संगति का अद्वितीय महत्त्व हैं जो सचमुच हमारे जीवन को दिशी प्रदान करती है। सत्संगति का पारस है, जो जीवनरूपी लोहे को कंचन बना देती है। मानव-जीवन की सर्वांगीण उन्नति के लिए सत्संगति आवश्यक है। इसके माध्यम से हम अपने लाभ के साथ-साथ अपने देश के लिए भी एक उत्तरदायी तथा निष्ठावान नागरिक बन सकेंगे।

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