UP Board Class 10 Social Science Model Papers Paper 1

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Textbook NCERT
Class Class 10
Subject Social Science
Model Paper Paper 1
Category UP Board Model Papers

UP Board Class 10 Social Science Model Papers Paper 1

समय : 3 घण्टे 15 मिनट

सामान्य निर्देश:

  1. प्रारम्भ के 15 मिनट परीक्षार्थियों को प्रश्न-पत्र पढ़ने के लिए निर्धारित हैं।
  2. यह प्रश्न-पत्र दो खण्डों – क एवं ख में विभाजित है। प्रत्येक खण्ड के सभी | प्रश्नों को एक-साथ हल करना आवश्यक है। प्रत्येक खण्ड का उत्तर नए । पृष्ठ से प्रारम्भ किया जाए।
  3. प्रत्येक प्रश्न के निर्धारित अंक उनके सम्मुख अंकित हैं।
  4. प्रश्न-पत्र में चार प्रकार के प्रश्न हैं-बहुविकल्पीय, अतिलघु उत्तरीय, लघु | उत्तरीय व दीर्घ उत्तरीय, जिनके सम्बन्ध में निर्देश उनके प्रारम्भ में दिए गए हैं।
  5. तथा ख खण्डों हेतु दिए गए मानचित्रों को उत्तर-पुस्तिका में मज़बूती के साथ संलग्न करना आवश्यक है।
  6. दृष्टिबाधित परीक्षार्थियों के लिए मानचिकार्य के स्थान पर अलग से खण्ड क में प्रश्न संख्या 14 तथा खण्ड ख में प्रश्न संख्या 28 के उत्तर लिखने के लिए दिए गए हैं।

खण्ड क

बहुविकल्पीय प्रश्न
निर्देश निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के लिए दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर चुनकर अपनी उत्तर-पुस्तिका में लिखिए।
प्रश्न 1.
फ्रांस की क्रान्ति कब प्रारम्भ हुई? (1)
(अ) 1890 ई. में
(ब) 1789 ई. में
(स) 1790 ई. में
(द) 1792 ई. में

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन-सा ‘लीग ऑफ नेशन्स’ का अंग नहीं था? (1)
(अ) सचिवालय
(ब) साधारण सभा
(स) सुरक्षा परिषद्
(द) अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय

प्रश्न 3.
मन्त्रिपरिषद् का अध्यक्ष कौन होता है? (1)
(अ) प्रधानमन्त्री
(ब) राष्ट्रपति
(स) उपराष्ट्रपति
(द) लोकसभा अध्यक्ष

प्रश्न 4.
महात्मा गाँधी अफ्रीका से भारत कब लौटे? (1)
(अ) वर्ष 1918 में
(ब) वर्ष 1917 में
(स) वर्ष 1915 में
(द) वर्ष 1913 में

प्रश्न 5.
‘सत्यार्थ प्रकाश’ का सम्बन्ध किससे है? (1)
(अ) आर्य समाज
(ब) रामकृष्ण मिशन
(स) ब्रह्म समाज
(द) सत्यशोधक समाज

प्रश्न 6.
दक्षेस का मुख्यालय कहाँ स्थित है? (1)
(अ) भारत
(ब) पाकिस्तान
(स) नेपाल
(द) बांग्लादेश

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 7.
राज्य हड़प नीति किसने लागू की, इसकी मुख्य विशेषता क्या थी? (2)

प्रश्न 8.
1857 ई. की क्रान्ति के चार प्रमुख नेताओं के नाम लिखिए। (2)

प्रश्न 9.
साधारण विधेयक और धन विधेयक में दो अन्तर लिखिए। (2)

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 10.
प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी की पराजय के कारणों का उल्लेख कीजिए। (3)
अथवा
रूसी क्रान्ति में लेनिन के योगदान का वर्णन कीजिए। (3)

प्रश्न 11.
राज्यसभा के सभापति की शक्तियाँ एवं कार्य क्या हैं? (3)
अथवा
पंचशील से आपको क्या अभिप्राय है? इसके किन्हीं दो सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए। (3)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 12.
संयुक्त राष्ट्र संघ के अंगों तथा उनके कार्यों का वर्णन कीजिए। (6)
अथवा
भारत के उच्चतम न्यायालय के कार्य एवं शक्तियों का वर्णन कीजिए। (6)

प्रश्न 13.
यूरोप के सामाजिक एवं आर्थिक जीवन पर औद्योगिक क्रान्ति का क्या प्रभाव पड़ा? अपने उत्तर की पुष्टि के लिए उदाहरण दीजिए। (6)
अथवा
इंग्लैण्ड की क्रान्ति को गौरवपूर्ण क्रान्ति की संज्ञा क्यों दी गई है? मानचित्र-कार्य (6)

प्रश्न 14.
निम्नलिखित स्थानों को आपको दिए गए भारत के रेखा-मानचित्र में 9 चिह्न द्वारा दर्शाइए और उनके नाम भी लिखिए। सही नाम और सही स्थिति (चिह्न) के लिए %, 4 अंक निर्धारित है। (6)

  1. वह स्थान जहाँ मंगल पाण्डे को फाँसी दी गई।
  2. वह स्थान जहाँ उत्तर प्रदेश की विधानसभा स्थित है।
  3. वह स्थान जहाँ महात्मा गाँधी ने नमक कानून भंग किया।
  4. वह स्थान जहाँ दो राज्यों की राजधानी है।
  5. वह स्थान जहाँ प्रथमं स्वाधीनता संग्राम का आरम्भ हुआ।

खण्ड ख

बहुविकल्पीय प्रश्न

निर्देश निम्नलिखित विकल्पों में से सही उत्तर चुनकर अपनी उत्तर-पुस्तिका में लिखिए।
प्रश्न 15.
नीलगिरि पर्वत स्थित है। (1)
(अ) दक्षिणी भारत
(ब) पूर्वी भारत
(स) उत्तरी भारत
(द) पश्चिमी भारत

प्रश्न 16.
कपास उत्पादन के लिए सबसे अधिक उपयुक्त कौन-सी मिट्टी है? (1)
(अ) लैटेराइट मिट्टी
(ब) काली मिट्टी
(स) जलोढ़ मिट्टी
(द) लाल मिट्टी

प्रश्न 17.
ऑपरेशन फ्लड (श्वेत क्रान्ति) सम्बन्धित है। (1)
(अ) हरित क्रान्ति
(ब) दुग्ध क्रान्ति
(स) बाढ़ नियन्त्रण
(द) सिंचाई सुविधा

प्रश्न 18.
कौन-सा देश विकासशील देशों की श्रेणी में नहीं आता है? (1)
(अ) पाकिस्तान
(ब) भारत
(स) ब्राजील
(द) जर्मनी

प्रश्न 19.
वस्तु विनिमय सम्बन्धित है। (1)
(अ) वस्तुओं के आपसी लेन-देन से
(ब) मजदूरी निर्धारण से
(स) मुद्रा से
(द) वस्तुओं के उत्पादन से

प्रश्न 20.
बारहवीं पंचवर्षीय योजना की समयावधि क्या है? (1)
(अ) वर्ष 2010-15
(ब) वर्ष 2012-17
(स) वर्ष 2013-10
(द) वर्ष 2014-19

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 21.
मौसम किसे कहते हैं? मौसम और जलवायु में क्या अन्तर है? (1+1)

प्रश्न 22.
विनिमय के दो लाभ बताइए। (2)

प्रश्न 23.
प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष कर के दो-दो उदाहरण दीजिए। (2)

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 24.
भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों की उपलब्धियों पर प्रकाश डालिए। (3)
अथवा
आर्थिक नियोजन की किन्हीं तीन विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (3)

प्रश्न 25.
जल संसाधन से क्या अभिप्राय है? भारत के लिए इनका क्या महत्त्व है? (3)
अथवा
पारितन्त्र किसे कहते हैं? (3)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 26.
भारत में किन्हीं तीन राज्यों के चीनी उद्योग का वर्णन कीजिए। (3+3)
अथवा
विकसित देशों की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (6)

प्रश्न 27.
उत्पादन का क्या अर्थ है? इसके प्रमुख तत्त्व तथा उपादानों (साधनों) का | वर्णन कीजिए। (6)
अथवा
किसी अर्थव्यवस्था के लिए विदेशी व्यापार का महत्त्व समझाइए। मानचित्र-कार्य निर्देश भारत के दिए गए मानचित्र पर निम्नलिखित को दर्शाइए। (6)

प्रश्न 28.

  1. नाथूला तथा बोमडीला दर्रे ( चिह्न द्वारा)
  2. कहवा उत्पादक क्षेत्र ( चिह्न द्वारा)
  3. विन्ध्य पहाड़ियाँ चिह्न द्वारा, नाम सहित
  4. कोई एक खनिज तेल क्षेत्र ID चिह्न द्वारा
  5. मुम्बई-इलाहाबाद रेलमार्ग भा चिह्न द्वारा, नाम सहित

Answers

खण्ड क
बहुविकल्पीय प्रश्न

उत्तर 1.
(ब) 1789 ई. में

उत्तर 2.
(स) सुरक्षा परिषद्

उत्तर 3.
(अ) प्रधानमन्त्री

उत्तर 4.
(स) वर्ष 1915 में

उत्तर 5.
(अ) आर्य समाज

उत्तर 6.
(स) नेपाल

खण्ड ख
बहुविकल्पीय प्रश्न

उत्तर 15.
(अ)
दक्षिणी भारत

उत्तर 16.
(ब)
काली मिट्टी

उत्तर 17.
(ब) दुग्ध क्रान्ति

उत्तर 18.
(द) जर्मनी

उत्तर 19.
(अ) वस्तुओं के आपसी लेन-देन से

उत्तर 20.
(ब) 2012-17

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UP Board Class 12 Physics Model Papers Paper 4

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Subject Physics
Model Paper Paper 4
Category UP Board Model Papers

UP Board Class 12 Physics Model Papers Paper 4

समय 3 घण्टे 15 मिनट
पूर्णांक 70

निर्देश प्रारम्भ के 15 मिनट परीक्षार्थियों को प्रश्न-पत्र पढ़ने के लिए निर्धारित हैं।
नोट

  • सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।
  • इस प्रश्न पत्र में 5 खण्ड हैं : खण्ड ‘अ’, खण्ड ‘ब’ खण्ड ‘स’, खण्ड ‘द’, खण्ड ‘य’।
  • खण्ड़ ‘अ’ बहुविकल्पीय है तथा प्रत्येक प्रश्न 1 अंक का है।
  • खण्ड ‘ब’ अतिलघु उत्तरीय है, तथा प्रत्येक प्रश्न 1 अंक का है।
  • खण्ड ‘स’ लघु उत्तरीय है, प्रत्येक प्रश्न 2 अंक के हैं।
  • खण्ड ‘द’ लघु उत्तरीय है, प्रत्येक प्रश्न 3 अंक के हैं।
  • खण्ड ‘य’ विस्तृत उत्तरीय है, प्रत्येक प्रश्न 5 अंक के हैं। इस खण्ड के चारों प्रश्नों में आन्तरिक विकल्प का चयन प्रदान किया गया है। ऐसे प्रश्नों में आपको दिए गए चयन में से केवल 1 प्रश्न ही करना है।
    [latex]c=3\times { 10 }^{ 8 }m/s\quad [/latex], [latex]h=6.6.3\times { 10 }^{ 34 }Js\quad [/latex],  [latex]e=1.6\times { 10 }^{ -18 }c\quad [/latex], [latex]\cfrac { 1 }{ 4\pi \epsilon \o } =9\times { 10 }^{ 9 }N{ m }^{ 2 }/{ c }^{ 2 } [/latex].

खण्ड (अ)

प्रश्न 1. सभी खण्डों के उत्तर दीजिये।
प्रश्न 1
एक समान आवेशित गोलीय कोशों के पृष्ठ पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता 
104 न्यूटन प्रति कूलॉम है। कोश के केन्द्र से उसके व्यास के बराबर दूरी पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता होगी
(a) 5 न्यूटन/कूलॉम
(b) 250 न्यूटन/कूलॉम
(c) 2500 न्यूटन/कूलॉम
(d) 300 न्यूटन/कूलॉम

प्रश्न 2
एक ताँबे के तार को खींचकर 1% लम्बाई में वृद्धि कर दी जाये, तो प्रतिरोध में परिवर्तन होगा।
(a) 4% की वृद्धि
(b) 2% की वृद्धि
(c) 1% की वृद्धि
(d) 3% की वृद्धि

प्रश्न 3
कोई एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र, इलेक्ट्रॉनों की गति की दिशा के लम्बवत् है। इसके फलस्वरूप इलेक्ट्रॉन 2 सेमी त्रिज्या के वृत्ताकार पथ पर चलता है।
(a) 0.5 सेमी
(b) 1 सेमी
(c) 2 सेमी
(d) 4 सेमी

प्रश्न 4
सम्पर्क में रखे दो पतले लेन्सों की फोकस दूरियाँ क्रमशः 25 सेमी तथा 
-40 सेमी हैं। इसकी संयोजन क्षमता होगी।
(a) -6.67 D
(b) -2.5 D
(c) 1.5 D
(d) +4 D

प्रश्न 5
समान गतिज ऊर्जा वाले विभिन्न कणों के दे-ब्रोग्ली तरंगदैर्घ्य (λ) कण के। द्रव्यमान (m) पर निर्भर करती है।
(a) λ α m
(b)  λ α m1/2
(c) λ α m-1
(d) λ α m-1/2

प्रश्न 6
Li11 में प्रथम बोहर कक्षा से तृतीय बोहर कक्षा में इलेक्ट्रॉन उत्तेजन के लिये ऊर्जा है।
(a) 11.1 eV
(b) 36.3 eV
(c) 108.8eV
(d) 122.4 ev

खण्ड (ब)

प्रश्न 2.
सभी खण्डों के उत्तर दीजिये।               (1 x 6=6)
(i) विशिष्ट प्रतिरोध किन-किन कारकों पर निर्भर करता है?
(ii) बायो-सावर्ट का नियम बताइये तथा इसके पद में प्रयुक्त भौतिक राशियों को 
स्पष्ट कीजिये।
(iii) रेडियो तरंगों के दो उपयोग बताइये।
(iv) किसी पतले प्रिज्म द्वारा उत्पन्न विचलन किन-किन बातों पर निर्भर करता है?
(v) द्रव्य तरंग से सम्बन्धित दे-ब्रोग्ली तरंगदैर्ध्य का सूत्र लिखिये एवं प्रयुक्त 
संकेतों का अर्थ स्पष्ट कीजिये।
(vi) सिग्नलों के मॉडुलन में अति उच्च आवृत्ति की वाहक तरंगों की 
आवश्यकता क्यों होती है?

खण्ड (स)

प्रश्न 3.
सभी खण्डों के उत्तर दीजिये।                  
(2 x4 = 8) 
(i) विभव प्रवणता तथा वैद्युत क्षेत्र में सम्बन्ध स्थापित कीजिये।
(ii) प्रत्यावर्ती धारा परिपथ की प्रतिबाधा से आप क्या समझते हैं? समझाइये।
(iii) ध्रुवण के गुण से प्रकाश तरंगों की अनुप्रस्थ प्रकृति कैसे प्रमाणित होती है?
(iv) p-n सन्धि डायोड के लिये अग्रदिशिक तथा पश्चदिशिक अवस्था में 
परिपथ चित्र खींचिये।

खण्ड (द)

प्रश्न 4.
सभी खण्डों के उत्तर दीजिये। (3 x 10 = 30)
(i) धातु के एक तार में धारा प्रवाहित करने पर प्रारम्भ में धारा का मान अधिक 
रहता है। फिर धीरे-धीरे घटकर पहले से कम मान पर स्थिर हो जाता है, जबकि बैटरी का वैद्युत वाहक बल वही रहता है, कारण बताइये।
(ii) एक बैटरी जिसका वैद्युत वाहक बल E है तथा आन्तरिक प्रतिरोध है, 
एक बाह्य प्रतिरोध R में धारा जा रही है। सिद्ध कीजिये कि बैटरी द्वारा प्रतिरोध R को अधिकतम शक्ति तब दी जायेगी जब R = P। यह अधिकतम शक्ति कितनी होगी?
(iii) दो बहुत बड़े और सीधे तारों के बीच की दूरी 10 सेमी है। इनमें से एक 
तार में 5 ऐम्पियर तथा दूसरे तार में 15 ऐम्पियर की धारा है। चित्रानुसार बिन्दु P पर चुम्बकीय क्षेत्र का परिमाण तथा दिशा ज्ञात कीजिये और बताइये यह एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करेंगे या आकर्षित।
UP Board Class 12 Physics Model Papers Paper 4 image 1
(iv) पृथ्वी के चुम्बकत्व से आप क्या समझते हैं? किसी स्थान पर 
पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के क्षैतिज घटक का मान 0.40 गॉस है एवं नमन कोण 30° है। पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के ऊर्ध्व घटक का मान तथा क्षेत्र की सम्पूर्ण तीव्रता का मान ज्ञात कीजिये।
(v)
(a) वैद्युत चुम्बकीय तरंगें क्या हैं? इसमें विस्थापन धारा से आपका क्या
 अभिप्राय है?
(b) वैद्युत चुम्बकीय तरंगों के विशेष चार गुण लिखिये।

प्रश्न 5.
(i)
(a) लेन्स की क्षमता से क्या अभिप्राय है? डायोप्टर की परिभाषा दीजिये।
(b) एक पोलेरॉएड पर समतल ध्रुवित प्रकाश पोलेरॉएड की ध्रुवण दिशा से 45° के कोण पर गिरता है। पोलेरॉएड से निर्गत् प्रकाश की तीव्रता,आपतित प्रकाश की तीव्रता के कितने प्रतिशत होगी?

(ii) वायु में 300 K ताप पर एक नाइट्रोजन अणु की दे-ब्रोग्ली तरंगदैर्ध्य कितनी होगी? यह मानें कि अणु इस ताप पर अणुओं की चाल वर्ग माध्य से गतिमान है। (नाइट्रोजन का परमाणु द्रव्यमान = 14.0076 u)

(iii) हाइड्रोजन परमाणु की nवीं कक्षा में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा का सूत्र लिखिये। इसमें हाइड्रोजन परमाणु के प्रथम उत्तेजन विभव तथा आयनन विभव का मान ज्ञात कीजिये।
अथवा
(iv) रेडियोऐक्टिवता से आप क्या समझते हैं? रेडियोऐक्टिवता में एल्फा तथा बीटा क्षय 
की व्याख्या कीजिये। |
(v) मॉडुलन तथा विमॉडुलन से क्या अभिप्राय है? आयाम मॉडुलन का अर्थ समझाइये।

खण्ड (य)

प्रश्न 6.
सभी खण्डों के उत्तर दीजिये। (5 x 1 = 20)
वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण से आप क्या समझते हैं? सिद्ध कीजिये कि निरक्षीय स्थिति में किसी बिन्दु पर वैद्युत द्विध्रुव द्वारा वैद्युत विभव शून्य होता है।
अथवा
गॉस प्रमेय का उल्लेख कीजिए। इस प्रमेय का उपयोग करके 
एकसमान आवेशित गोलीय कोश के बाहर केन्द्र से  दूरी पर स्थित किसी बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता का सूत्र प्रतिपादित कीजिए।

प्रश्न 7.
वैद्युत चुम्बकीय प्रेरण से आप क्या समझते हैं? एक कुण्डली काक्षेत्रफल 0.5 मी तथा उसमें 50 फेरे हैं। कुण्डली के तल के लम्बवत् 0.04 टेस्ला का चुम्बकीय क्षेत्र लगा है। यदि 0.1 सेकण्ड में चुम्बकीय क्षेत्र घटकर शून्य हो जाये, तब कुण्डली में कितना प्रेरित वैद्युत वाहक बल तथा प्रेरित धारा होगी? यदि कुण्डली का प्रतिरोध 10Ω हो।

अथवा

लेन्ज का नियम लिखिए। क्या यह ऊर्जा संरक्षण के सिद्धान्त को 
पालन करता है?

प्रश्न 8.
यंग के द्विक-स्लिट प्रयोग में रेखाछिद्रों के बीच की दूरी 0.6 मिमी है तथा रेखाछिद्रों से 1.5 मी की दूरी पर रखे हुये पर्दे पर व्यतिकरण देखा जाता है। यदि व्यतिकरण प्रतिरूप के केन्द्रीय फ्रिन्ज से किसी ओर सातवीं दीप्त फ्रिज और तीसरी अदीप्त फ्रिन्ज के बीच दूरी 4.5 मिमी हो, तो प्रयोग में प्रयुक्त प्रकाश की तरंगदैर्ध्य की गणना कीजिये।
उत्तर
40 Å

अथवा

दो व्यतिकारी प्रकाश-पूँजों में से एक के पथ में । मोटाई की।
पतली । अपवर्तनांक की काँच की प्लेट रख देने पर फ्रिन्जों में । उत्पन्न विस्थापन का व्यंजक प्राप्त कीजिए।

प्रश्न 9.
(a) p-n सन्धि डायोड के लिये अग्रदिशिक तथा पश्चदिशिक अवस्था में परिपथ चित्र खींचिये।
(b) NOT और NOR गेट का लॉजिक चिन्ह, बूलियन व्यंजक 
एवं सत्यता सारणी दीजिये।
अथवा
p-n सन्धि डायोड को अर्द्धतरंग दिष्टकारी के रूप में कैसे । 
प्रयुक्त किया जाता है। सरल परिपथ बनाकर इसकी कार्यविधि समझाइये। किसी ट्रांजिस्टर का उभयनिष्ठ आधार धारा प्रवर्धन गुणांक g. = 9.8 है। इसमें ट्रांजिस्टर का उभयनिष्ठ उत्सर्जक धारा प्रवर्धन गुणांक 8 कितना होगा।
उत्तर
49

Answers

खण्ड (अ)

उत्तर 1.
(c)
2500 न्यूटन/कूलॉम

उत्तर 2.
(b)
2% की वृद्धि

उत्तर 3.
(b) 1 सेमी

उत्तर 4.
(a) -6.67 D

उत्तर 5.
(d) λ α m-1/2

उत्तर 6.
(c) 108.8eV

खण्ड (द)

उत्तर 4.
2.5 x 10-5न्यूटन/ऐम्पियर-मीटर

उत्तर 5(i).
50%

उत्तर 5(ii)
0.028 nm

खण्ड (य)

उत्तर 7.
10 वोल्ट, 1 ऐम्पियर

उत्तर 8.
40 Å

उत्तर 9.
49

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi सामाजिक व सांस्कृतिक निबन्ध

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Subject Samanya Hindi
Chapter Name सामाजिक व सांस्कृतिक निबन्य
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi सामाजिक व सांस्कृतिक निबन्य

सामाजिक व सांस्कृतिक निबन्ध

भारतीय समाज में नारी का स्थान [2009]

सम्बद्ध शीर्षक

  • भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति [2012]
  • आधुनिक भारत में नारी का स्थान
  • आधुनिक नारी का स्थान
  • स्वातन्त्र्योत्तर भारत में महिलाओं की स्थिति
  • भारतीय नारी : आज और कल [2013]
  • नारी सम्मान : भारतीय संस्कृति की पहचान [2014]
  • नारी-चिन्तन का बदलता स्वरूप (2015)

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2. भारतीय नारी का अतीत,
  3. मध्यकाल में भारतीय नारी,
  4. आधुनिक युग में नारी,
  5. पाश्चात्य प्रभाव एवं जीवन-शैली में परिवर्तन,
  6. उपसंहार

प्रस्तावना-गृहस्थीरूपी रथ के दो पहिये हैं—नर और नारी। इन दोनों के सहयोग से ही गृहस्थ जीवन सफल होता है। इसमें भी नारी का घर के अन्दर और पुरुष का घर के बाहर विशेष महत्त्व है। फलतः प्राचीन काल में ऋषियों ने नारी को अतीव आदर की दृष्टि से देखा। नारी पुरुष की सहधर्मिणी तो है ही, वह मित्र के सदृश परामर्शदात्री, सचिव के सदृश सहायिका, माता के सदृश उसके ऊपर अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाली और सेविका के सदृश उसकी अनवरत सेवा करने वाली है। इसी कारण मनु ने कहा है, ”यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता” अर्थात् जहाँ नारियों का आदर होता है वहाँ देवता निवास करते हैं। फिर भी भारत में नारी की स्थिति एक समान न रहकर बड़े उतार-चढ़ावों से गुजरी है, जिसका विश्लेषण वर्तमान भारतीय समाज को समुचित दिशा देने के लिए आवश्यक है।

भारतीय नारी का अतीत-वेदों और उपनिषदों के काल में नारी को पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त थी। वह पुरुष के समान विद्यार्जन कर विद्वत्सभाओं में शास्त्रार्थ करती थी। महाराजा जनक की सभा में हुआ याज्ञवल्क्य-गार्गी शास्त्रार्थ प्रसिद्ध है। मण्डन मिश्र की धर्मपत्नी भारती अपने काल की अत्यधिक विख्यात विदुषी थीं, जिन्होंने अपने दिग्गज विद्वान् पति की पराजय के बाद स्वयं आदि शंकराचार्य से शास्त्रार्थ किया। यही नहीं, स्त्रियाँ युद्ध-भूमि में भी जाती थीं। इसके लिए कैकेयी का उदाहरण प्रसिद्ध है। उस काल में नारी को अविवाहित रहने या स्वेच्छा से विवाह करने का पूरा अधिकार था। कन्याओं का विवाह उनके पूर्ण यौवनसम्पन्न होने पर उनकी इच्छा व पसन्द के अनुसार ही होता था, जिससे वे अपने भले-बुरे का निर्णय स्वयं कर सकें।

मध्यकाल में भारतीय नारी-मध्यकाल में नारी की स्थिति अत्यधिक शोचनीय हो गयी; क्योंकि मुसलमानों के आक्रमण से हिन्दू-समाज का मूल ढाँचा चरमरा गया और वे परतन्त्र होकर मुसलमान शासकों का अनुकरण करने लगे। मुसलमानों के लिए स्त्री मात्र भोग-विलास और वासना-तृप्ति की वस्तु थी। फलत: लड़कियों को विद्यालय में भेजकर पढ़ाना सम्भव न रहा। हिन्दुओं में बाल-विवाह का प्रचलन हुआ, जिससे लड़की छोटी आयु में ही ब्याही जाकर अपने घर चली जाए। परदा-प्रथा का प्रचलन हुआ और नारी घर में ही बन्द कर दी गयी। युद्ध में पतियों के पराजित होने पर यवनों के हाथ न पड़ने के लिए नारियों ने अग्नि का आलिंगन करना शुरू किया, जिससे सती–प्रथा का प्रचलन हुआ। इस प्रकार नारियों की स्वतन्त्रता नष्ट हो गयी और वे मात्र दासी या भोग्या बनकर रह गयीं। नारी की इसी असहायावस्था का चित्रण गुप्त जी ने निम्नलिखित पंक्तियों में किया है-

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी।
आँचल में है दूध और आँखों में पानी ।।

आधुनिक युग में नारी-आधुनिक युग में अंग्रेजों के सम्पर्क से भारतीयों में नारी-स्वातन्त्र्य की चेतना जागी। उन्नीसवीं शताब्दी में भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन के साथ सामाजिक आन्दोलन का भी सूत्रपात हुआ। राजा राममोहन राय और महर्षि दयानन्द जी ने समाज-सुधार की दिशा में बड़ा काम किया। सती–प्रथा कानून द्वारा बन्द करायी गयी और बाल-विवाह पर रोक लगी। आगे चलकर महात्मा गाँधी ने भी स्त्री-सुधार की दिशा में बहुत काम किया। नारी की दीन-हीन दशा के विरुद्ध पन्त का कवि हृदय आक्रोश प्रकट कर उठता है-

मुक्त करो नारी को मानव
चिरबन्दिनी नारी को।

आज नारियों को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त हैं। उन्हें उनकी योग्यतानुसार आर्थिक स्वतन्त्रता भी मिली हुई है। स्वतन्त्र भारत में आज नारी किसी भी पद अथवा स्थान को प्राप्त करने से वंचित नहीं। धनोपार्जन के लिए वह आजीविका का कोई भी साधन अपनाने के लिए स्वतन्त्र है। फलतः स्त्रियाँ अध्यापिका, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, वकील, जज, प्रशासनिक अधिकारी ही नहीं, अपितु पुलिस में नीचे से ऊपर तक विभिन्न पदों पर कार्य कर रही हैं। स्त्रियों ने आज उस रूढ़ धारणा को तोड़ दिया है कि कुछ सेवाएँ पूर्णत: पुरुषोचित होने से स्त्रियों के बूते की नहीं। आज नारियाँ विदेशों में राजदूत, प्रदेशों की गवर्नर, विधायिकाएँ या संसद सदस्याएँ, प्रदेश अथवा केन्द्र में मन्त्री आदि सभी कुछ हैं। भारत जैसे विशाल देश का प्रधानमन्त्रित्व तक एक नारी कर गयी, यह देख चकित रह जाना पड़ता है। श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित ने तो संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्षता कर सबको दाँतों तले अँगुली दबवा दी। इतना ही नहीं, नारी को आर्थिक स्वतन्त्रता दिलाने के लिए उसे कानून द्वारा पिता एवं पति की सम्पत्ति में भी भाग प्रदान किया गया है।

आज स्त्रियों को हर प्रकार की उच्चतम शिक्षा की सुविधा प्राप्त है। बाल-मनोविज्ञान, पाकशास्त्र, गृह-शिल्प, घरेलू चिकित्सा, शरीर-विज्ञान, गृह-परिचर्या आदि के अतिरिक्त विभिन्न ललित कलाओं; जैसे—संगीत, नृत्य, चित्रकला, छायांकन आदि में विशेष दक्षता प्राप्त करने के साथ-साथ वाणिज्य और विज्ञान के क्षेत्रों में भी वे उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं।

स्वयं स्त्रियों में भी अब सामाजिक चेतना जाग उठी है। प्रबुद्ध नारियाँ अपनी दुर्दशा के प्रति सचेत हैं। और उसके सुधार में दत्तचित्त भी। अनेक नारियाँ समाज-सेविकाओं के रूप में कार्यरत हैं। आशा है कि वे भारत की वर्तमान समस्याओं; जैसे-भुखमरी, बेकारी, महँगाई, दहेज-प्रथा आदि के सुलझाने में भी अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएँगी।

पाश्चात्य प्रभाव एवं जीवन-शैली में परिवर्तन–किन्तु वर्तमान में एक चिन्ताजनक प्रवृत्ति भी नारियों में बढ़ती दीख पड़ती है, जो पश्चिम की भौतिकवादी सभ्यता का प्रभाव है। अंग्रेजी शिक्षा के परिणामस्वरूप अधिक शिक्षित नारियाँ तेजी से भोगवाद की ओर अग्रसर हो रही हैं। वे फैशन और आडम्बर को ही जीवन का सार समझकर सादगी से विमुख होती जा रही हैं और पैसा कमाने की होड़ में अनैतिकता की ओर उन्मुख हो रही हैं। यही बहुत ही कुत्सित प्रवृत्ति है, जो उन्हें पुन: मध्यकालीन-हीनावस्था में धकेल देगी। इसी बात को लक्ष्य कर कवि पन्त नारी को चेतावनी देते हुए कहते हैं-

तुम सब कुछ हो फूल, लहर, विहगी, तितली, मार्जारी,
आधुनिके ! कुछ नहीं अगर हो, तो केवल तुम नारी ।

प्रसिद्ध लेखिका श्रीमती प्रेमकुमारी’ दिवाकर’ को कथन है कि, “आधुनिक नारी ने नि:सन्देह बहुत कुछ प्राप्त किया है, पर सब-कुछ पाकर भी उसके भीतर का परम्परा से चला आया हुआ कुसंस्कार नहीं बदल रहा है। वह चाहती है कि रंगीनियों से सज जाए और पुरुष उसे रंगीन खिलौना समझकर उससे खेले। वह अभी भी अपने-आपको रंग-बिरंगी तितली बनाये रखना चाहती है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि जब तक उसकी यह आन्तरिक दुर्बलता दूर नहीं होगी, तब तक उसके मानस का नव-संस्कार न होगा। जब तक उसका भीतरी व्यक्तित्व न बदलेगा तब तक नारीत्व की पराधीनता एवं दासता के विष-वृक्ष की जड़ पर कुठाराघात न हो सकेगा।”

उपसंहार-नारी, नारी ही बनी रहकर सबकी श्रद्धा और सहयोग अर्जित कर सकती है, तितली बनकर वह स्वयं तो डूबेगी ही और समाज को भी डुबाएगी। भारतीय नारी पाश्चात्य शिक्षा के माध्यम से आने वाली यूरोपीय संस्कृति के व्यामोह में न फंसकर यदि अपनी भारतीयता बनाये रखे तो इससे उसका और समाज दोनों का हितसाधन होगा और वह उत्तरोत्तर प्रगति करती जाएगी। वर्तमान में कुरूप सामाजिक समस्याओं; जैसे-दहेज प्रथा, शारीरिक व मानसिक हिंसा की शिकार स्त्री को अत्यन्त सजग होने की आवश्यकता है। उसे भरपूर आत्मविश्वास एवं योग्यता अर्जित करनी होगी, तभी वह सशक्त व समर्थ व्यक्तित्व की स्वामिनी हो सकेगी अन्यथा उसकी प्राकृतिक कोमल स्वरूप-संरचना तथा अज्ञानता उसे समाज के शोषण का शिकार बनने पर विवश कर देगी। नारी के इसी कल्याणमय रूप को लक्ष्य कर कविवर प्रसाद ने उसके प्रति इन शब्दों में श्रद्धा-सुमन अर्पित किये-

नारी! तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत-नभ-पग-तल में,
पीयूष-स्रोत-सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में ।

भारतीय नारी की समस्याएँ

सम्बद्ध शीर्षक

  • कामकाजी महिलाओं की समस्याएँ
  • आधुनिक समाज में नारी की समस्याएँ

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना : वैदिक काल में नारी,
  2. मध्यकाल में नारी,
  3. आधुनिक काल में नारी,
  4. संविधान द्वारा दिये गये अधिकार,
  5. कामकाजी महिलाओं की समस्याएँ,
  6. कामकाज से इतर महिलाओं की समस्याएँ,
  7. उपसंहार

प्रस्तावना : वैदिक काल में नारी—भारत में महिलाओं का स्थान कुछ वर्षों पहले तक घर-परिवार की सीमाओं तक ही सीमित माना जाता रहा है। प्राचीन भारत में नारी के पूर्ण स्वतन्त्र तथा सभी प्रकार के दबावों से पूर्ण मुक्त रहने के विवरण मिलते हैं। उस समय वे अपनी पारिवारिक स्थिति के अनुसार इस प्रकार की शिक्षा प्राप्त किया करती थीं; क्योंकि तब शिक्षा प्रणाली आश्रम-व्यवस्था पर आधारित थी। इस कारण नारियाँ भी उन आश्रमों में पुरुषों के समान रहकर ही शिक्षा प्राप्त किया करती थीं। गार्गी, मैत्रेयी, अरुन्धती जैसी महिलाओं के विवरण भी मिलते हैं कि वे मन्त्र-द्रष्टा थीं। अपने पतियों के साथ आश्रमों में रहकर वहाँ की सम्पूर्ण व्यवस्था की, वहाँ रहने वाले अन्य स्त्री-पुरुष व विद्यार्थियों, यहाँ तक कि आश्रमवासी पशु-पक्षियों तक की वे देखभाल किया करती थीं। महर्षि वाल्मीकि और कण्व के आश्रमों में भी नारियों के निवास के विवरण मिलते हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि वैदिक काल में नारी सुरक्षित तो होती ही थी, प्रत्येक प्रकार से स्वतन्त्र भी हुआ करती थी। फिर भी ऐसे विवरण कहीं नहीं मिलते कि घर-गृहस्थी चलाने के लिए उसे कहीं काम करके धनोपार्जन भी करना पड़ता था। गृहस्वामिनी एवं माँ के रूप में उसे पिता एवं आचार्य से भी उच्च स्थान प्राप्त था। महाभारत में उल्लेख भी है कि “गुरुणां चैव सर्वेषां माता परमं को गुरुः।”

मध्यकाल में नारी–इतिहास के अध्ययन से स्पष्ट है कि मध्यकाल में आकर नारी पूर्णरूपेण घरपरिवार की चारदीवारी में बन्द होकर रह गयी थी। यह काल नारियों के लिए अवनति का काल था। भोग-विलास की प्रवृत्ति बढ़ जाने के कारण नारी के शारीरिक पक्ष को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा। मध्यकालीन कुरीतियों में सती–प्रथा, बाल-विवाह और विधवाओं को हेय दृष्टि से देखना प्रमुख थीं । इस काल के सन्तों एवं सिद्ध कवियों ने भी नारी के प्रति अत्यन्त कटु दृष्टिकोण अपनाया-

नारी तो हम भी करी, जाना नहीं बिचार।
जब जाना तब परिहरी, नारी बड़ा बिकार ॥
नारी की झाँई परत, अंधा होत भुजंग।।
कबिरा तिन की कौन गति, जेनित नारी के संग ।। (कबीरदास)

आधुनिक काल में नारी–अंग्रेजों के आगमन के बाद, कुछ उनके और कुछ उनकी चलाई शिक्षादीक्षा के, कुछ यहाँ चलने वाले अनेक प्रकार के शैक्षणिक, सामाजिक और राजनीतिक आन्दोलनों के प्रभाव से भारतीय नारी को घर-परिवार से बाहर कदम रखने का अवसर मिला। इस काल में महान् समाज-सुधारक राजा राममोहन राय ने सती–प्रथा की समाप्ति, विधवाओं के पुनर्विवाह, स्त्री-शिक्षा आदि पर जोर दिया। महात्मा गाँधी ने अछूतोद्धार की भाँति नारी मुक्ति के लिए भी प्रयास किया। समाज-सुधारकों के सामूहिक प्रयास, देश में सामाजिक और राजनीतिक चेतना के प्रादुर्भाव, पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव तथा प्रगतिशील विचारधारा ने नारी दासता की बेड़ियों को काटा और वह मुक्ति की ओर अग्रसर हुई। आज नारी जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त है। वह राजनीतिज्ञ, राजनयिक, विधिवेत्ता, न्यायाधीश, प्रशासक, कवि, चिकित्सकै आदि के रूप में समाज को अपना योगदान दे रही है।

संविधान द्वारा दिये गये अधिकार-स्वतन्त्रता मिलने के पश्चात् लागू भारतीय संविधान में (अनुच्छेद 14 और 15) पुरुषों और स्त्रियों की पूर्ण समानता की गारण्टी दी गयी तथा लैंगिक आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव न करने की बात कही गयी। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 में लड़की को लड़के के समान सह-उत्तराधिकारी बना दिया गया। हिन्दू विवाह अधिनियम, 1956 ने विशेष आधारों पर विवाह के सम्बन्ध को समाप्त करने की अनुमति दी। दहेज को अवैध घोषित किया गया तथा इसके लिए सजा की व्यवस्था की गयी। दहेज की विकरालता को देखते हुए सन् 1961 में एक दहेज विरोधी कानून बनाया गया।

बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में नारी ने लगभग प्रत्येक आन्दोलन में पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर योगदान दिया है तथा समाज की प्रत्येक समस्या के विरुद्ध अपनी आवाज उठायी है। शोषण की घटनाओं के विरुद्ध तो उसने शक्तिशाली प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की हैं। यह इस बात का संकेत है कि महिलाओं में पर्याप्त जागरूकता आयी है। नारियों को विभिन्न स्तरों पर आरक्षण देने की बातें हो रही हैं, परन्तु संविधान में यह व्यवस्था अभी तक नहीं की जा सकी है।

कामकाजी महिलाओं की समस्याएँ-अभाव और महँगाई से दो-चार होने के लिए महिलाओं को कुछ मात्रा में स्वतन्त्रता-प्राप्ति से पहले और अधिकतर स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद कई तरह के काम-काज का भी सहारा लेना पड़ा। पुरुषों एवं महिलाओं का एक वर्ग यह समझता है कि कामकाजी नारी की समस्त समस्याएँ समाप्त हो जाती हैं। नौकरी मिलते ही नारी नारीत्व के अभिशापों से मुक्त हो जाती है, परन्तु वस्तुस्थिति सर्वथा भिन्न है, यथा–

(1) नारी कामकाजी महिला बनने का निर्णय लेने में स्वतन्त्र नहीं होती है। विवाह के पहले माता-पिता और बाद में ससुरालीजनों की इच्छा पर निर्भर रहता है कि वह कामकाजी बनी रहे अथवा नहीं।

(2) कामकाजी होने पर भी महिला आर्थिक दृष्टि से स्वतन्त्र नहीं बन पाती है। उसको अपनी कमाई का हिसाब घरवालों को देना पड़ता है। प्रायः यह भी देखने में आता है कि ससुराल वाले विवाह के पूर्व की जाने वाली उसकी कमाई का भी हिसाब माँगते हैं।

(3) दोहरी जिम्मेदारी-कामकाजी महिलाओं को नौकरी से लौटकर घरेलू कार्य करने पड़ते हैं। अत: एक अतिरिक्त जिम्मेदारी सँभालकर भी कामकाजी महिलाएँ अपनी पूर्व जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो पायी हैं।।

(4) बच्चों की परवरिश-कामकाजी महिलाओं के पास बच्चों को देने के लिए समय का अभाव होता है। फलतः उनके बच्चे संस्कारित नहीं हो पाते और उनका भविष्य बिगड़ जाने की सम्भावना रहती है।

(5) समाज में बदनामी-आधुनिक युग में भी स्त्रियों का नौकरी करना उचित नहीं माना जाता। बहू को नौकरी नहीं करने देने के लिए सास-ससुर, देवर-ज्येष्ठ और पति तक भी तनकर खड़े हो जाते हैं।

(6) परिजनों का शक-नौकरी-पेशा करने वाली महिलाएँ चरित्र के प्रति सन्देह की समस्या से कभी नहीं उबर पाती हैं। कार्यालय में किसी भी कारण से थोड़ी भी देर हो जाए तो परिजनों, विशेषकर पति की शक की निगाहें उसे अन्दर तक बेध डालती हैं। यह समस्या उस वक्त और भी बढ़ जाती है, जब महिला कोई स्टेनो या सेक्रेटरी हो।

(7) यौन शुचिता–आज भी स्त्री की सबसे बड़ी समस्या उसकी यौन शुचिता है। ऑफिस में किसी भी मुस्कराहट या स्पर्श से भी वह दूषित हो जाती है। यौन शुचिता का यह परिवेश नारी को खुलकर कार्य करने से रोकता है तथा उसकी प्रतिभा को कुण्ठित करता है।

(8) यौन-शोषण-सरकारी कार्यालयों में कार्य करने वाली महिलाएँ पूर्ण तो नहीं, किन्तु अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं। सरकारी कार्यालयों में कार्यरत महिलाओं के भी यौन-शोषण होते हैं, किन्तु निजी संस्थानों में अथवा मजदूरी करने वाली महिलाओं की दशा तो अत्यधिक दारुण है।

(9) वरीयता का मापदण्ड योग्यता नहीं–प्राइवेट संस्थानों के रोजगार विज्ञापनों में स्मार्ट, सुन्दर व आधुनिक महिलाओं की वरीयता यह प्रश्न खड़ा करती है कि कार्यक्षमता के आधार पर आगे बढ़ने वाले निजी संस्थानों का काम क्या स्मार्ट, सुन्दर व आधुनिक महिलाएँ ही सँभाल सकती हैं ? योग्यता कोई मापदण्ड नहीं? यह भी एक बीमार मानसिकता की परिचायक है।

(10) परिधान-कामकाजी महिलाओं के लिए परिधान (ड्रेस) बहुत बड़ी समस्या रहती है। वह जरा-सी भी सज-सँवर करके चले तो उस पर फब्तियाँ कसी जाती हैं, उसको तितली अथवा फैशन परेड की नारी कहा जाता है।

(11) पुरुषों की अपेक्षा सौतेला व्यवहार-महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा कम वेतन दिया जाता है। तथा पुरुषों की तुलना में इनके साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है। पहले विमान परिचारिकाओं के गर्भवती होते ही उन्हें सेवा-मुक्त कर दिया जाता था। लम्बे संघर्ष के उपरान्त अब विमान परिचारिकाओं ने माँ बनने का अधिकार पाया है।

(12) बाहरी दौरे-कार्य के लिए अपने गृह जिले के बाहर जाना भी कामकाजी महिलाओं की एक प्रमुख समस्या है। घर की जिम्मेदारी, शील व गरिमा की चिन्ता, पति व बच्चों से आत्मीयता आदि उसे दौरे पर जाने से रोक देते हैं।

(13) रात्रि ड्यूटी-कामकाजी महिलाओं के लिए रात्रि ड्यूटी करना बहुत कठिन होता है। लोगों की शक की निगाहें मुसीबत कर देती हैं। अस्पतालों में रात्रि की पारी में काम करने वाली नर्से, बड़े होटलों में काम करने वाली महिलाएँ अपनी ड्यूटी सुरक्षित निकालकर सुकून का अनुभव करती हैं।

(14) नारी की नौकरी यदि पति की अपेक्षा श्रेष्ठ होती है तो उसको पति की हीन भावना का भी शिकार होना पड़ता है।

(15) नौकरी करते हुए पति-पत्नी एक ही स्थान पर कार्यरत रहें, तब तो कुछ ठीक है, अन्यथा उनका दाम्पत्य तथा गृहस्थ जीवन समाप्त हो जाते हैं, वैसे भी कामकाजी महिलाओं की गृहस्थी अव्यवस्थित तो हो ही जाती है।

(16) कुछ कामकाजी महिलाओं के लिए तो नौकरी अभिशाप बन जाती है। ऐसा प्रायः उन महिलाओं के साथ होता है, जिनके पतियों की आमदनी कम होती है, अथवा पति शराबी व कुमार्गी होते हैं। ऐसे पति अपनी पत्नी की आमदनी को भी उड़ाने के लिए पत्नी को भाँति-भाँति से उत्पीड़ित एवं प्रताड़ित करते हैं।

कामकाज से इतर महिलाओं की समस्याएँ-सुधारों की गर्जना तथा संवैधानिक प्रयास नारी की मौलिक समस्याओं को सुलझा नहीं सके हैं। संविधान ने नारी को मताधिकार एवं सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार प्राप्त करने का अधिकार दे दिया है, परन्तु समाज की दृष्टि में नारी को आज भी पुरुष की अंकशायिनी और दासी ही माना जाता है। हम आज भी अनेकानेक नारियों के उत्पीड़न, आत्मदाह तथा उनकी हत्या के समाचार सुनते रहते हैं। इनमें नौकरी करने वाली यानी कामकाजी महिलाएँ भी सम्मिलित हैं। आज भी दहेज का दानव नारी के जीवन को त्रस्त किये हुए है। विधवा-विवाह के नाम पर आज भी लोग नाक-भौंह सिकोड़ते हैं। नारी की उन्नति के नाम पर हम कितनी भी बातें करें, परन्तु नारी आज भी उपेक्षित है। वह घर-परिवार में एक सामान्य नारी से अधिक कुछ नहीं है। आज भी गर्भ में बच्ची (लड़की) को मार दिया जाता है तथा प्रसूति के समय दूषित प्रकृति का शिकार होना पड़ता है। अपनी रक्षा के लिए मुस्तैद नारी पर लोग तरह-तरह की फब्तियाँ कसते हैं।

उपसंहार-महिला हो या पुरुष, काम करना किसी के लिए भी अनुचित या बुरा नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि समाज की मानसिकता, घर-परिवार और समूचे जीवन की परिस्थितियाँ ऐसी बनायी जाएँ, ऐसे उचित वातावरण का निर्माण किया जाए कि कामकाजी महिला भी पुरुष के समान व्यवहार और व्यवस्था पा सके। नारियों की समस्याओं के निराकरण के लिए फैमिली कोर्ट बनाये जाने चाहिए और उनके प्रति किये जाने वाले आपराधिक मामलों में तकनीकी नहीं, व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। दहेज, बलात्कार, अपहरण आज की नारी के सामने बहुत बड़ी चुनौतियाँ हैं। नारियों के समर्थन में किये जाने वाले हमारे आन्दोलन पश्चिम के अन्धानुकरण को लेकर नहीं होने चाहिए। उनको भारतीय गृहिणी के आदर्शों के अनुरूप ढालने का प्रयास करना चाहिए। पाश्चात्य चिन्तन के अन्धानुकरण से इस देश की नारियों को भी जल्दी-जल्दी तलाक, अवैध शिशु-जन्म आदि समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि जब तक नारी के प्रति समाज के दृष्टिकोण में बदलाव नहीं आएगा, तब तक नारी का जीवन त्रस्त ही बना रहेगा। भारतीय नारी की मुक्ति के लिए सांस्कृतिक आन्दोलन की आवश्यकता है, संविधान और कानून तो उसमें सिर्फ मुददगार हो सकते हैं।

महिला सशक्तीकरण (2017)

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2. सशक्तीकरण का अर्थ,
  3. महिला सशक्तीकरण अभियान,
  4. महिला सशक्तीकरण अभियान के उद्देश्य- (क) महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा को समाप्त करना, (ख) लिंगानुपात को सन्तुलित करना, (ग) लिंग-आधारित आर्थिक असमानता को समाप्त करना, (घ) बाल-विवाह पर रोक लगाना, (ङ) लड़कियों को शिक्षित करना, (च) सीमान्त तथा शोषित महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में लाना, (छ) महिलाओं की खरीद-फरोख्त पर रोक लगाना,
  5. महिलाओं की संवैधानिक स्थिति,
  6. महिला सशक्तीकरण अधिनियम,
  7. महिला सशक्तीकरण और समाज,
  8. उपसंहार।

प्रस्तावना-भारतीय समाज में नारियों को शक्तिस्वरूपा मानते हुए उनकी पूजा होती रही है। प्राचीन भारत के इतिहास के पृष्ठ भारतीय नारियों की गौरवगाथा से भरे हुए हैं।‘मनुस्मृति’ में कहा गया है

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते तत्र देवताः

अर्थात् जहाँ नारी की पूजा की जाती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। भारतीय समाज में नारियों की दशा और दिशा में काल परिवर्तन के साथ परिवर्तन होता रहा है। किसी युग में नारी को पूजा गया तो किसी युग में उसके अपमान, उत्पीड़न और अत्याचार की सीमाएँ पार कर दी गईं। महिलाएँ समाज में अनेक कुरीतियों एवं कुप्रथाओं का भी शिकार होती रहती हैं। भारतीय समाज का ताना-बाना ऐसा है, जिसमें अधिकांश महिलाएँ पिता, पति या पुत्र पर ही आर्थिक रूप से निर्भर होती हैं। निर्णय लेने का अधिकार भी पुरुषों का ही होता है। उनके इन अधिकारों की रक्षा के लिए ही महिला सशक्तीकरण की अवधारणा का जन्म हुआ, जिससे महिलाएं अपने जीवन से जुड़ी प्रत्येक निर्णय स्वयं ले सकें और परिवार तथा समाज में अच्छी प्रकार रह सकें। महिलाओं के वास्तविक अधिकारों के विषय में जानकारी देकर उन्हें सक्षम बनाना ही महिला सशक्तीकरण है। पं० जवाहरलाल नेहरू ने भी महिलाओं की स्थिति को सशक्त बनाने के उद्देश्य से कहा था- “लोगों को जगाने के लिए महिलाओं का जाग्रत होना जरूरी है। एक बार जब वो अपना कदम उठा लेती है, परिवार आगे बढ़ता है, गाँव आगे बढ़ता है और राष्ट्र विकास की ओर उन्मुख होता है।”

सशक्तीकरण का अर्थ–सशक्तीकरण अर्थ है-शक्तिशाली बनाना। वर्तमान में महिला सशक्तीकरण को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक असमानताओं से पैदा हुई समस्याओं के सन्दर्भ में देखा जा रहा है। इसमें जागरूकता, अधिकारों को जानने, सहभागिता और निर्णय लेने के अधिकार जैसे घटक को सम्मिलित किया गया है। लीला मीहेनडल के अनुसार-“निडरता, सम्मान और जागरूकता तीनों शब्द महिला सशक्तीकरण में सहायक हैं।

महिला सशक्तीकरण अभियान–सरकार द्वारा महिलाओं को विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए सन् 2001 ई० में महिला सशक्तीकरण की राष्ट्रीय नीति लागू की गई। इसके अन्तर्गत सरकारी नीति तथा कल्याणकारी योजनाओं में महिलाओं के विधिक अधिकारों को सशक्त करने तथा स्वास्थ्य सुविधाओं को दृढ़ बनाने के उद्देश्य को ध्यान में रखा गया है। महिलाओं के उत्थान हेतु किए जा रहे शासकीय प्रयासों में कुछ सामाजिक और संस्थानात्मक अवरोध सामने आए हैं। इन अवरोधों का उन्मूलनकर महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक सशक्तीकरण के उद्देश्य से 8 मार्च, 2010 ई० को राष्ट्रीय महिला सशक्तीकरण अभियान नामक कार्यक्रम आरम्भ किया गया। भारत में सभी राज्यों एवं सभी केन्द्रशासित प्रदेशों में महिला सशक्तीकरण कार्यक्रम को लागू कर दिया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य महिला विकास से सम्बन्धित कार्यक्रमों को निचले स्तर तक पहुँचाना है।

महिला सशक्तीकरण अभियान के उद्देश्य-महिला सशक्तीकरण अभियान के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
(क) महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा को समाप्त करना-महिलाओं को सुरक्षा और स्वायत्तता प्रदान करने की दिशा में अनेक महत्त्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। महिलाओं के प्रति हिंसा के अन्तर्गत अनेक प्रकार की प्रताड़नाएँ आती हैं; जैसे-मानसिक, शारीरिक और यौन उत्पीड़न एवं दहेज-सम्बन्धी प्रताड़ना आदि। महिला सशक्तीकरण का दृष्टिकोण यह है कि महिलाएँ इन उत्पीड़नरूपी हिंसा व भेदभाव से मुक्त होकर सम्मान के साथ जीवन व्यतीत कर सकें।

(ख) लिंगानुपात को सन्तुलित करना—लैंगिक असमानता भारत का प्रमुख सामाजिक मुद्दा है, जिसमें महिलाएँ निरन्तर पिछड़ती जा रही हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 1000 पुरुषों पर 943 महिलाएँ हैं। इस असमानता को समाप्त करने के लिए महिला सशक्तीकरण में तेजी लाने की आवश्यकता है।

(ग) लिंग-आधारित आर्थिक असमानता को समाप्त करना-महिलाएँ किसी प्रकार भी पुरुषों से कम नहीं हैं। यदि वे वही कार्य करती हैं जो पुरुष करते हैं तो उन्हें पुरुषों के समान ही पारिश्रमिक मिलना चाहिए, जबकि समाज में ऐसा नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 में समान काम, समान वेतन’ की व्यवस्था की गयी है। महिला सशक्तीकरण में इस आर्थिक असमानता को समाप्त करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

(घ) बाल-विवाह पर रोक लगाना-राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, स्वामी दयानन्द सरस्वती आदि के अथक प्रयासों द्वारा बाल-विवाह निरोधक अधिनियम (1955) बना, परन्तु आज भी कई पिछड़े क्षेत्रों में माता-पिता की अशिक्षा, असुरक्षा और गरीबी के कारण बाल-विवाह का प्रचलन है। इस विवाह से अवयस्क माता और शिशु के व्यक्तित्व और स्वास्थ्य में गिरावट आती है। महिला सशक्तीकरण द्वारा इस पर रोक लगाई जा रही है।

(ङ) लडकियों को शिक्षित करना--शिक्षा अज्ञानतारूपी अंधकार को दूर करके विकास और उन्नति के मार्ग खोलती है। भारतीय समाज में लड़की को पराया धन मानकर उसी शिक्षा एवं अन्य सुख-सुविधाओं की उपेक्षा की जाती है, परन्तु आज महिला सशक्तीकरण आन्दोलन के कारण इस दिशा में भी परिवर्तन हो रहा है। आज लड़कियों के स्कूल में पंजीकरण एवं उनकी उपस्थिति में तेजी से वृद्धि हुई है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के अनुसार-“महिलाओं की शिक्षा व्यवस्था, स्वतन्त्र आय तथा सामाजिक परिस्थिति में सुधार ने परिवार में उनकी निर्णय क्षमता को बढ़ाया है और महिलाओं के समावेशन (सशक्तीकरण) के मार्ग को प्रशस्त किया है।”

(च) सीमान्त तथा शोषित महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में लाना–महिला सशक्तीकरण अभियान के अन्तर्गत सीमान्त महिलाओं (वेश्याओं) को वेश्यालयों से रिहा कराना, यौन शोषित एवं एड्स से पीड़ित, विधवाओं, बेसहाराओं, आतंकवाद की शिकार तथा विक्षिप्त महिलाओं के लिए स्वास्थ्य, देखभाल, परामर्श, रोजगारपरक प्रशिक्षण, जागरूकता, पुनर्वास आदि की सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं और उन्हें देश की मुख्य धारा में जोड़ने को साहसपूर्ण एवं सराहनीय कदम उठाया जाता है। इस प्रयास से अनेक महिलाओं का जीवन सुधारा जा सका है।

(छ) महिलाओं की खरीद-फरोख्त पर रोक लगाना–स्वार्थी तत्त्वों द्वारा महिलाओं की खरीद-फरोख्त के अवैध व्यपार को रोकने के लिए अनेक योजनाएँ बनाई जा रही हैं। उज्ज्वला योजना के अन्तर्गत महिलाओं के अवैध व्यापार को रोकने से लेकर उनकी रिहाई, पुनर्वास, पुन:एकीकरण और पुनस्र्थापन का प्रयास किया जा रहा है। इस दिशा में अनेक एन०जी०ओ० तथा हेल्पलाइनें महिला उन्नयन का कार्य कर रही हैं।

महिलाओं की संवैधानिक स्थिति-भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 19, 21, 23, 24, 37, 39 (बी), 44 तथा अनुच्छेद 325 के अनुसार स्त्रियों को भी पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त हैं। संविधान की दृष्टि में स्त्री-पुरुष में कोई भेद नहीं किया गया है। समाज में जो भेद दृष्टिगोचर होते हैं, वह सब अशिक्षा, संकीर्णता और स्वार्थलिप्सा आदि के कारण ही समाज में विद्यमान हैं।

महिला सशक्तीकरण अधिनियम–संवैधानिक अधिकारों के साथ-साथ महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए संसद द्वारा कुछ अधिनियम पास किए गए हैं; जैसे–एक बराबर पारिश्रमिक ऐक्ट, दहेज रोक अधिनियम, अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, मेडिकल टर्मनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी ऐक्ट, बाल-विवाह रोकथाम ऐक्ट, लिंग परीक्षण तकनीक (लड़का-लड़की जाँच पर रोक) ऐक्ट, कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन-शौषण रोकने तथा उन्हें सुरक्षा देने सम्बन्धी ऐक्ट आदि। इन अधिनियमों का सही उपयोग कर महिलाएँ अपना शोषण रोकने में समर्थ हो रही हैं।

महिला सुरक्षा के अन्तर्गत उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 1090 शक्ति-योजना का शुभारम्भ किया गया है। यह महिलाओं की सुरक्षा हेतु एक बहुआयामी योजना है। इसके अन्तर्गत मोबाइल द्वारा मात्र एक बटन दबाते ही पुलिस नियन्त्रण कक्ष को सूचना मिल जाती है और संकटग्रस्त महिला की स्थिीत (स्थान की पहचान) की सही जानकारी पुलिस को हो जाती है, जिससे पुलिस उस महिला की तुरन्त सहायता करती है।

महिला सशक्तीकरण और समाज-भूमण्डलीकरण के इस दौर में स्त्री-पुरुष समानता की दुहाई के साथ-साथ अनेक संगठन, स्वयंसेवी संस्थाएँ, हेल्पलाइनें महिलाओं के सशक्तीकरण और उत्थान में जुटे हुए हैं; फिर भी समाज में महिलाओं की स्थिति में पर्याप्त सुधार नहीं आया है। इसका मुख्य कारण यह है कि स्वयं महिलाओं में आज भी अन्धविश्वास एवं रूढ़िवादिता की प्रवृत्ति कूट-कूटकर भरी है। निरक्षर अथवा अल्पशिक्षित महिलाओं की तो बात ही छोड़िए, सैकड़ों पढ़ी-लिखी महिलाएँ भी पुत्र-रत्न की प्राप्ति के लिए तन्त्र-मन, झाड़-फेंक और ढोंगी बाबाओं के जाल में फंसी हैं। रोजगार के क्षेत्र में भी पर्याप्त सुधार नहीं हो पाया है। उच्च पदों पर महिलाओं की नियुक्ति अभी 2 या 3 प्रतिशत ही है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रत्येक वर्ष एक करोड़ पच्चीस लाख लड़कियाँ जन्म लेती हैं, लेकिन तीस प्रतिशत लड़कियाँ 15 वर्ष से पूर्व ही मृत्यु का शिकार हो जाती हैं। राजनीति में भी महिलाओं का प्रवेश हो गया है, संसद में उनकी संख्या भी बढ़ी है। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, राष्ट्रपति, न्यायाधीश जैसे उच्च पदों को महिलाओं ने सुशोभित किया है। खेलों, फिल्मों, लेखन, पत्रकारिता तथा सौन्दर्य प्रतियोगिताओं में भी महिलाओं ने नये कीर्तिमान स्थापित किए हैं, परन्तु अभी भी समाज में नारी को वह स्थान नहीं मिल पाया है, जिसकी वह अधिकारी है।

उपसंहार-अन्त में कहा जा सकता है कि महिलाओं को सशक्त करने के लिए कोई ईश्वर या मसीहा अवतरित नहीं होगा और न ही समाज द्वारा नारीवाद की परिभाषा गढ़ने से कोई बात बनेगी। यह तभी सम्भव होग जब महिलाएं अपने अधिकारों के लिए स्वयं आगे आएँ, अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करें। सरकारें भी केवल महिला अधिकारों और कानूनों की संख्या में वृद्धि न करें, बल्कि व्यावहारिकता को ध्यान में रखते हुए ऐसे अधिकार और कानून बनाएँ, जिससे वास्तविक सशक्तीकरण की अवधारणा को साकार किया जा सके।

नारी स्वातंत्र्य : उच्छंखलता या प्रगतिशीलता

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2. राष्ट्र की प्रगति में नारी की भूमिका,
  3. नारी स्वातंत्र्य के विरुद्ध घृणित षड्यंत्र,
  4. स्वतन्त्रता का दुरुपयोग,
  5. नारी के बढ़ते कदम,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना-आज की नारी स्वतंत्र है। सत्ता की कुर्सी हो अथवा खेल का मैदान, वैज्ञानिक अनुसंधानों की प्रयोगशाला हो या कला-साहित्य का संसार, आज नारी के लिए प्रत्येक क्षेत्र का द्वार पूर्ण रूप से खुला है। भारत में उपनिवेशवादरूपी राक्षस से लड़ने के लिए उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से ही नारी की दशा में सुधार के प्रयास आरम्भ हो गए थे। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् तो संवैधानिक रूप से भी उन्हें स्वावलम्बी तथा सर्वाधिकारसम्पन्न बना दिया गया। समय-समय पर विभिन्न प्रकार के कानून बनाकर भी उनके स्वातंत्र्य तथा हितों की रक्षा की गई है। विश्व के कई अन्य राष्ट्रों में भी आज नारी को समुचित स्थान प्राप्त है। वस्तुतः ‘स्वतन्त्र और सबल प्रस्थितिवाली नारी’ ही 21वीं सदी को 20वीं सदी की सबसे बड़ी देन है।

किन्तु पिछले कुछ समय से यह विवाद का विषय बन गया है कि नारी स्वातंत्र्य प्रगतिशीलता का पोषक है अथवा उच्छंखलता का। हमारे समक्ष कई उदाहरण हैं कि महिलाओं ने अपनी स्वतन्त्रता का सदुपयोग कर विश्व के सामने विकास को ऊँचा कीर्तिमान प्रस्तुत किया। इसके विपरीत कई ऐसे प्रमाण भी हैं। कि स्त्रियों ने अपने स्वातंत्र्य अधिकारों का दुरुपयोग कर समाज में उच्छृखलता और संस्कारहीनता को बढ़ावा दिया। जहाँ एक ओर संतोष यादव, अरुणिमा सिन्हा और कल्पना चावला जैसी नारियों ने प्रगति की ऊँचाइयों को छुआ है, वहीं दूसरी ओर कुछ युवतियों ने मॉडलिंग के बहाने अपनी देह प्रदर्शन जैसे घृणित कार्य कर समाज के संस्कार को गर्त में गिराया है। वास्तव में नारी स्वातंत्र्य पर चल रहा यह विवाद गम्भीर रूप से विचारात्मक तथा विश्लेषणात्मक है।

राष्ट्र की प्रगति में नारी की भूमिका–इतिहास साक्षी है कि जब-जब समाज या राष्ट्र ने नारी को अवसर तथा अधिकार दिया है, तब-तब नारी ने विश्व के समक्ष श्रेष्ठ उदाहरण ही प्रस्तुत किया है। मैत्रेयी, गार्गी, आंडाल, विश्वपारा, केशा आदि विदुषी स्त्रियाँ शिक्षा के क्षेत्र में अपने बहुमूल्य योगदान के लिए आज भी पूजनीय हैं। आधुनिक काल में महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, महाश्वेता देवी, अमृता प्रीतम, अरुन्धती राय आदि स्त्रियों ने साहित्य तथा राष्ट्र की प्रगति में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। चेनम्मा, रानी दुर्गावती, माँ जीजाबाई, देवी अहिल्याबाई, रजिया सुल्तान, लक्ष्मीबाई, शिरिमाओ भण्डारनायके, इन्दिरा गांधी, आंग सान सू की और एंजेला मार्केल आदि स्त्रियाँ प्रगति के मार्ग पर संघर्ष और सुनेतृत्व की स्पष्ट मूर्तियों के रूप में स्थापित हुईं। कला के क्षेत्र में एम०एस० सुब्बुलक्ष्मी, लता मंगेशकर, देविका रानी, वैजन्तीमाला, सुधा चन्द्रन, सोनाल मानसिंह, मीरा नायर, सरोज खान और फराह खान आदि स्त्रियों का योगदान वास्तव में प्रशंसनीय है। इनके अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों; जैसे—चिकित्सा, अभियान्त्रिकी, बैंकिंग, प्रशासन आदि में भी स्त्रियाँ अपनी सक्रिय तथा विकासोन्मुखी भूमिका निभा रही हैं। इनमें से किसी ने भी उच्छृखलता का मार्ग नहीं अपनाया।

नारी स्वातंत्र्य के विरुद्ध घृणित षड्यंत्र–इन प्रगतिशील तथा उत्तरदायित्वपूर्ण भूमिकाओं के बावजूद नारियों पर यह आरोप लगाया जाता है कि वे अपनी स्वतन्त्रता का गलत फायदा उठा रही हैं तथा समाज में अनुशासनहीनता फैला रही हैं, ऐसे आरोप कुछ तो सत्य होते हैं, किन्तु कुछ पूर्वाग्रह और दुराग्रह से ग्रसित। आज के युग में मध्यमवर्गीय परिवारों में कामकाजी महिलाओं का प्रचलन बढ़ गया है। ऐसी कामकाजी महिलाओं को अपने कार्यालय तथा घर में सामंजस्य बनाए रखना पड़ता है। कार्यालयों में स्त्रियों को लिंग-भेद के पक्षपातपूर्ण व्यवहार का सामना करना पड़ता है। उच्चस्थ अधिकारी तथा साथी कर्मचारी उनके कार्य के नहीं, बल्कि सौन्दर्य के प्रशंसक होते हैं। असभ्य और असम्मानजनक टिप्पणियों का सामना करना आज महिलाओं के लिए दिनचर्या का अभिन्न अंग-सा बन गया है।

यदि स्त्रियाँ इस प्रकार की असभ्यता का विरोध करती हैं तो उन्हें विभिन्न प्रकार से प्रताड़ित किया जाता है-यहाँ तक कि उन्हें सेवा से निष्कासन तक की धमकी दी जाती है और यदि वे अपने उच्चस्थ अधिकारियों को प्रसन्न रखने का प्रयास करती हैं तो उन्हें पुंश्चली (वेश्या) और उच्छंखल की संज्ञा मिल जाती है। वस्तुत: नारी की ऐसी उच्छृखंलता के पीछे पुरुष की ही घृणित मंशा छिपी होती है। बाहर की इन परिस्थितियों से जूझते हुए महिलाएँ जब घर लौटती हैं तो घर के सभी काम उन्हें ही करने पड़ते हैं। इस घोर थकावट के बावजूद उनसे आशा की जाती है। कि वे सदा मुस्कराती रहें। ऐसे में यदि कभी उनके चेहरे पर तनाव या चिन्ता की कोई रेखा पड़ जाती है, तो उन्हें असभ्य और उच्छृखल घोषित कर दिया जाता है। वस्तुत: पुरुष का दम्भ यह स्वीकार ही नहीं कर पा रहा कि जो नारी कल तक उसकी दासी-स्वरूपा थी, वह आज उसकी सहचरी बन गई है। इसलिए नारी-स्वतंत्रता के विरुद्ध घृणित षड्यंत्र रचे जा रहे हैं।

स्वतंत्रता का दुरुपयोग-कई ऐसे प्रमाण भी हैं कि स्त्रियों ने अपनी स्वतंत्रता का गलत उपयोग कर उच्छंखलता का ही परिचय दिया है। ‘रानी मेरी’ की उच्छंखलता (क्रूरता) ने ही उन्हें इतिहास में ‘खूनी मेरी के नाम से कुख्यात किया। इन्दिरा गांधी द्वारा अधिरोपित दो वर्षों का आपातकाल आज तक उनके सफल व्यक्तित्व एवं स्वर्णिम शासनकाल पर बदनुमा दाग है। आज फिल्मोद्योग की कई अभिनेत्रियाँ सोचती हैं कि अंग-प्रदर्शन द्वारा वे दर्शकों के बीच अधिक लोकप्रिय हो सकती हैं और इसलिए वे सामाजिक एवं सांस्कृतिक मर्यादा को लाँघकर अंग-प्रदर्शन करती हैं। मॉडलिंग के क्षेत्र में तो स्थिति और भी बदतर है। फिल्म तथा मॉडलिंग से सम्बन्धित अधिकतर कार्यक्रमों एवं पत्रिकाओं में इस तरह की उच्छंखलता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। नारियों में ऐसी उच्छृखलता सामान्य घरों में भी पाई जाती है। मध्यमवर्गीय परिवारों की लड़कियाँ ऊँचे सपने देखती हैं और उन्हें साकार करने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती हैं। कुछ वर्ष पहले मुम्बई की व्यस्त सड़क पर मात्र पन्द्रह सौ रुपये तथा थोड़ी-सी लोकप्रियता के लिए दो लड़कियों ने बिना किसी झिझक के अपने कपड़े उतार दिए। यह घटना वास्तव में नारी-स्वतंत्रता पर उपादेयता का एक बड़ा प्रश्नचिह्न है और उच्छृखलता की पराकाष्ठा भी।

स्त्रियों द्वारा अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग वास्तव में दु:खद है। यह पुरुष-प्रधान समाज सदा से ही नारी-स्वतंत्रता का विरोधी रहा है। ऐसे में महिलाओं द्वारा अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग तथा उच्छृखलता का। प्रदर्शन पुरुषों को उनके विरुद्ध षड्यन्त्र रचने के अवसर प्रदान करते हैं। महिलाओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि स्वतंत्रता का दुरुपयोग उन्हें नष्ट कर देगी। ऊंचे सपने देखना कदापि गलत नहीं है, किन्तु उन्हें साकार करने के लिए निम्नस्तरीय व्यवहार सदा ही गलत है। ‘नारी’ ही सम्पूर्ण विश्व की जननी है। विश्व की संस्कृति, प्रगति आदि सब उसी के गर्भ से उत्पन्न होती हैं। अत: आज नारी को विश्व के समक्ष ऐसा प्रतिमान स्थापित करना है कि उसकी अनिवार्यता और अपरिहार्यता को समग्र रूप से स्वीकार किया जा सके।

नारी के बढ़ते कदम-स्वतंत्रता का सदुपयोग तथा दुरुपयोग व्यक्तिगत मनोवैज्ञानिक प्रयोग है। कुछ लोग अपनी स्वतंत्रता को अपना अधिकार समझते हैं और इसका प्रयोग स्वार्थ-सिद्धि तथा निजी महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति हेतु करते हैं और कुछ लोग अपनी स्वतंत्रता को अपना उत्तरदायित्व मानते हैं और इसका निर्वहन अपने समाज तथा राष्ट्र के विकास के लिए करते हैं। महिलाओं में भी ये दो श्रेणियाँ पाई जाती हैं, किन्तु अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने वाली महिलाओं की संख्या अपेक्षाकृत अत्यन्त कम है। महिलाओं ने अपनी कर्तव्यनिष्ठा से यह सिद्ध किया है कि वे किसी भी स्तर पर पुरुषों से कम नहीं हैं, बल्कि उन्होंने तो प्रगति के मार्ग पर अपनी श्रेष्ठता ही प्रदर्शित की है।

शारीरिक एवं मानसिक कोमलता के कारण पहले महिलाओं को रक्षा-सम्बन्धी सेवाओं के उपयुक्त नहीं माना जाता था, किन्तु भारत की पहली महिला भारतीय आरक्षी सेवा अधिकारी श्रीमती किरण बेदी ने ही अपनी कर्तव्यनिष्ठा से इस मिथक को पूरी तरह तोड़ दिया। आज देश की आन्तरिक एवं बाह्य सुरक्षा में महिलाएँ समान रूप से संलग्न हैं। नारी-समुदाय पर यह आरोप लगाया जाता था कि वे पुरुषों की अपेक्षा कम बुद्धिमान होती हैं। संघ लोक सेवा आयोग की सर्वप्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा में भावना गर्ग और विजयलक्ष्मी बिदारी जैसी नारियों ने इतिहास रचकर पुरुष के इस दंभ को भी तोड़ा है। पुरुष-वर्चस्व वाले फिल्मोद्योग में सर्वप्रतिष्ठित दादा साहेब फाल्के पुरस्कार की पहली विजेता देविका रानी थीं। सितम्बर, 2001 में आयोजित 58वें वेनिस फिल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का गोल्डन लायन पुरस्कार भारत की प्रसिद्ध फिल्म निर्मात्री मीरा नायर की फिल्म ‘मानसून वेडिंग’ को मिला। भारत के लिए सम्मान की बात यह है कि मीरा नायर यह प्रतिष्ठित पुरस्कार पाने वाली पहली महिला हैं। जुलाई, 2016 में भारतीय वायुसेना के इतिहास में पहली बार तीन महिला लड़ाकू पायलटों ( भावना कान्त, अवनी चतुर्वेदी व मोहना सिंह) को शामिल किया गया। इस प्रकार, नारी को जिस क्षेत्र में अवसर तथा स्वातंत्र्य मिला, उसने अपने उच्चश्रेणी के कर्त्तव्य से वहीं विकास का नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया।

वस्तुत: किसी देश की अन्त:संरचना तथा प्रगति नारी-स्वातंत्र्य के समानुपाती होती है, अर्थात् जिस देश में नारी की सहभागिता जितनी अधिक है, वहाँ की अन्त:संरचना उतनी ही मजबूत तथा प्रगति-दर उतनी ही तीव्र है।

उपसंहार–भारतीय जीवन का आधार वेद एवं शास्त्र हैं। शास्त्रों में लिखी बातें ही हमारे लिए प्रामाणिक होती हैं। नारी की स्वतंत्रता को प्रगति का आवश्यक तत्त्व मानकर ही शास्त्रों में लिखा गया है-

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता”

(नारी की पूजा का अर्थ है–नारी की स्वतंत्रता और उसको प्राप्त सम्पूर्ण अधिकार देवता सम्पन्नता के सूचक हैं।) इस प्रकार शास्त्रों में भी स्पष्ट है कि जहाँ नारी स्वतंत्र है वहाँ सम्पन्नता निश्चित है। उच्छंखलता व्यक्तिगत दोष है जो किसी भी अवस्था में पाया जा सकता है, इसे स्वतंत्रता का परिणाम नहीं कहा जा सकता। दूसरी तरफ विकास स्वतंत्रता का ही परिणाममात्र है।

नारी एवं पुरुष राष्ट्र के आधार हैं। दोनों ही विकासरूपी गाड़ी के दो पहिये हैं। यदि किसी एक पहिये में किसी भी प्रकार का कोई अवरोध होगा तो गाड़ी का आगे बढ़ पाना असम्भव होगा; अतः आवश्यक है कि पहिए आगे बढ़ने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हों।

वर्तमान समाज पर दूरदर्शन का प्रभाव [2009]

सम्बद्ध शीर्षक

  • दूरदर्शन : एक वरदान अथवा अभिशाप
  • मेरे जीवन पर दूरदर्शन का प्रभाव
  • दूरदर्शन : गुण एवं दोष
  • दूरदर्शन और भारतीय समाज [2009]
  • दरदर्शन : लाभ-हानि
  • दूरदर्शन और आधुनिक जीवन
  • दूरदर्शन का शैक्षिक उपयोग [2013, 14]

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2. दूरदर्शन का आविष्कार,
  3. विभिन्न क्षेत्रों में योगदान.
  4. दूरदर्शन से हानियाँ,
  5. उपसंहार।

प्रस्तावना-विज्ञान द्वारा मनुष्य को दिया गया एक सर्वाधिक आश्चर्यजनक उपहार दूरदर्शन है। आज व्यक्ति जीवन की आपाधापी से त्रस्त है। वह दिनभर अपने काम में लगा रहता है, चाहे उसका कार्य शारीरिक हो या मानसिक। शाम को थककर चूर हो जाने पर वह अपनी थकावट और नियों से मुक्ति के लिए कुछ मनोरंजन चाहता है। दूरदर्शन मनोरंजन का सर्वोत्तम साधन है। आज यह जनसामान्य के जीवन का केन्द्रीय अंग हो चला है। दूरदर्शन पर हम केवल कलाकारों की मधुर ध्वनि को ही नहीं सुन पाते वरन् उनके हाव-भाव और कार्यकलापों को भी प्रत्यक्ष देख पाते हैं। दूरदर्शन केवल मनोरंजन का ही साधन हो, ऐसा भी नहीं है। यह जनशिक्षा का एक सशक्त माध्यम भी है। इससे जीवन के विविध क्षेत्रों में व्यक्ति का ज्ञानवर्द्धन हुआ है। दूरदर्शन के माध्यम से व्यक्ति का उन सबसे साक्षात्कार हुआ है जिन तक पहुंचना सामान्य व्यक्ति के लिए कठिन ही नहीं, वरन् असम्भव भी था। दूरदर्शन ने व्यक्ति में जनशिक्षा का प्रसार करके उसे समय के साथ चलने की चेतना दी है। यूरोपीय देशों के साथ भारत में भी दूरदर्शन इस ओर महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह रेडियो, सिनेमा और समाचार-पत्रों से अधिक अच्छा और प्रभावी माध्यम सिद्ध हुआ है।

दूरदर्शन का आविष्कार-दूरदर्शन का आविष्कार अधिक पुराना नहीं है। 25 जनवरी, सन् 1926 ई० में इंग्लैण्ड के एक इंजीनियर जॉन बेयर्ड ने इसको रॉयल इंस्टीट्यूट के सदस्यों के सामने पहली बार प्रदर्शित किया। उसने रेडियो-तरंगों की सहायता से कठपुतली के चेहरे का चित्र बगल वाले कमरे में बैठे वैज्ञानिकों के सम्मुख दिखाकर उन्हें आश्चर्य में डाल दिया। विज्ञान के क्षेत्र में यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटना थी। भारत में दूरदर्शन का पहला केन्द्र सन् 1959 ई० में नयी दिल्ली में चालू हुआ था। आज तो सारे देश में दूरदर्शन का प्रसार हो गया है और इसका प्रसारण क्षेत्र धीरे-धीरे बढ़ता ही जा रहा है। कृत्रिम उपग्रहों ने तो दूरदर्शन के कार्यक्रमों को समस्त विश्व के लोगों के लिए और भी सुलभ बना दिया है।

विभिन्न क्षेत्रों में योगदान–दूरदर्शन अनेक दृष्टियों से हमारे लिए लाभकारी सिद्ध हो रहा है। कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में दूरदर्शन के योगदान, महत्त्व एवं उपयोगिताओं का संक्षिप्त विवरण आगे दिया जा रहा है।

(1) शिक्षा के क्षेत्र में दूरदर्शन से अनेक शैक्षिक सम्भावनाएँ हैं। वह कक्षा में प्रभावशाली ढंग से पाठ की पूर्ति कर सकता है। विविध विषयों में यह विद्यार्थी की रुचि विकसित कर सकता है। यह कक्षा में विविध घटनाओं, महान् व्यक्तियों तथा अन्य स्थानों के वातावरण को प्रस्तुत कर सकता है। दृश्य होने के कारण इसका प्रभाव दृढ़ होता है। इतिहास-प्रसिद्ध व्यक्तियों के जीवन की घटनाओं को दूरदर्शन पर प्रत्यक्ष देखकर चारित्रिक विकास होता है। देश-विदेश के अनेक स्थानों को देखकर भौगोलिक ज्ञान बढ़ता है। अनेक पर्वतों, समुद्रों और वनों के दृश्य देखने से प्राकृतिक छटा के साक्षात् दर्शन हो जाते हैं।

(2) वैज्ञानिक अनुसन्धान तथा अन्तरिक्ष के क्षेत्र में वैज्ञानिक अनुसन्धान की दृष्टि से भी दूरदर्शन का विशेष महत्त्व रहा है। चन्द्रमा, मंगल व शुक्र ग्रहों पर भेजे गये अन्तरिक्ष यानों में दूरदर्शन यन्त्रों का प्रयोग किया गया था, जिनसे उन्होंने वहाँ के बहुत सुन्दर और विश्वसनीय चित्र पृथ्वी पर भेजे। बड़े देशों द्वारा अरबों रुपयों की लागत से किये गये विभिन्न वैज्ञानिक अनुसन्धानों को प्रदर्शित करके दूरदर्शन ने विज्ञान का उच्चतर ज्ञान कराया है तथा सैद्धान्तिक वस्तुओं का स्पष्टीकरण किया है।

(3) तकनीक और चिकित्सा के क्षेत्र में-तकनीक और चिकित्सा के क्षेत्र में भी दूरदर्शन बहुत शिक्षाप्रद रहा है। दूरदर्शन ने एक सफल और प्रभावशाली प्रशिक्षक की भूमिका निभायी है। यह अधिक प्रभावशाली और रोचक विधि से मशीनी प्रशिक्षण के विभिन्न पक्ष शिक्षार्थियों को समझा सकता है। साथ ही यह लोगों को औद्योगिक एवं तकनीकी विकास के विभिन्न पहलू प्रत्यक्ष दिखाकर उनसे परिचित कराता है।

(4) कृषि के क्षेत्र में–भारत एक कृषिप्रधान देश है। यहाँ की तीन-चौथाई जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। यहाँ अधिकांश कृषक अशिक्षित हैं। वे कृषि उत्पादन में पुरानी तकनीक को ही अपनाने के कारण अपेक्षित उत्पादन नहीं कर पाते। दूरदर्शन पर कृषि-दर्शन आदि विविध कार्यक्रमों से भारतीय कृषकों में जागरूकता आयी है।।

(5) सामाजिक चेतना की दृष्टि से-सामाजिक चेतना की दृष्टि से तो दूरदर्शन निस्सन्देह उपयोगी सिद्ध हुआ है। इसने विविध कार्यक्रमों के माध्यम से समाज में व्याप्त कुप्रथाओं और अनेक बुराइयों पर कटु प्रहार किया है। लोगों को ‘छोटा परिवार सुखी परिवार की ओर आकर्षित किया है। इसने बाल-विवाह, दहेज-प्रथा, छुआछूत व साम्प्रदायिकता के विरुद्ध जनमत तैयार किया है। इसके अतिरिक्त दूरदर्शन बाल-कल्याण और नारी-जागरण में भी उपयोगी सिद्ध हुआ है। यह दर्शकों को स्वास्थ्य और स्वच्छता के नियमों, यातायात के नियमों, अल्प बचत, जीवन बीमा तथा कानून और व्यवस्था के विषय में भी शिक्षित करता है।

(6) राजनीतिक दृष्टि से दूरदर्शन राजनीतिक दृष्टि से भी जनसामान्य को शिक्षित करता है। वह प्रत्येक व्यक्ति को एक नागरिक होने के नाते उसके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक करता है। तथा मताधिकार के प्रति रुचि जाग्रत करके उसमें राजनीतिक चेतना लाता है। आजकल दूरदर्शन पर आयकर, दीवानी और फौजदारी मामलों से सम्बन्धित जानकारी भी दी जाती है, जिनके परिणामस्वरूप व्यक्ति का इस ओर ज्ञानवर्द्धन हुआ है।

(7) स्वस्थ रुचि के विकास की दृष्टि से--कवि सम्मेलन, मुशायरों, साहित्यिक प्रतियोगिताओं का आयोजन करके, नये प्रकाशनों का परिचय देकर तथा साहित्यकारों से साक्षात्कार प्रस्तुत करके दूरदर्शन ने साहित्य के प्रति स्वस्थ रुचि का विकास किया है। इसी प्रकार बड़े-बड़े कलाकारों की कलाओं की कला को परिचय देकर कला के प्रति लोगों में जागरूकता और समझ बढ़ायी है। यही नहीं, नये उभरते हुए साहित्यकारों, कलाकारों (चित्रकार, संगीतकार, फोटोग्राफर आदि) एवं विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे कारीगरों के कृतित्व का परिचय देकर न केवल उनको प्रोत्साहित किया है, वरन् उनकी वस्तुओं की बिक्री के लिए व्यापक क्षेत्र भी प्रस्तुत किया है। इससे विभिन्न कलाओं को जीवित रखने और विकसित होने में महत्त्वपूर्ण योगदान मिला है।

इतना ही नहीं, दूरदर्शन अन्य अनेक दृष्टिकोणों से जनसाधारण को जागरूक और शिक्षित करता है, वह चाहे खेल का मैदान हो या व्यवसाय का क्षेत्र। दूरदर्शन खेलों के प्रति रुचि जाग्रत करके खेल और खिलाड़ी की सच्ची भावना पैदा करता है। दूरदर्शन के सीधे प्रसारण ने कुश्ती, तैराकी, बैडमिण्टन, फुटबॉल, हॉकी, क्रिकेट, शतरंज आदि को लोकप्रियता की बुलन्दियों पर पहुँचा दिया है। दूरदर्शन के इस सुदृढ़ प्रभाव को देखते हुए उद्योगपति और व्यवसायी अपने उत्पादन के प्रचार और प्रसार के लिए इसे प्रमुख माध्यम के रूप में अपना रहे हैं।

दूरदर्शन से हानियाँ-दूरदर्शन से होने वाले लाभों के साथ-साथ इससे होने वाली कुछ हानियाँ भी हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। कोमल आँखें घण्टों तक टी० वी० स्क्रीन पर केन्द्रित रहने से अपनी स्वाभाविक शोभा क्षीण कर लेती हैं। इससे निकलने वाली विशेष प्रकार की किरणों का प्रतिकूल प्रभाव नेत्रों के साथ-साथ त्वचा पर भी पड़ता है, जो कि कम दूरी से देखने पर और भी बढ़ जाता है। इसके अधिक प्रचलन के परिणामस्वरूप विशेष रूप से बच्चों एवं किशोर-किशोरियों की शारीरिक गतिविधियाँ एवं खेलकूद कम होने लगे हैं। इससे उनके शारीरिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इस पर प्रसारित होते कार्यक्रमों को देखते रहकर हम अपने अधिक आवश्यक कार्यों को या तो भूल जाते हैं या उनका करना टाल देते हैं। समय की बरबादी करने के साथ-साथ हम आलसी और कामचोर भी हो जाते हैं तथा हमें अपने आवश्यक कार्यों के लिए भी समय का प्रायः अभाव ही बना रहता है।

केबल टी०वी० पर प्रसारित होने वाले कुछ कार्यक्रमों ने तो अल्पवयस्क बुद्धि के किशोरों को वासना के तूफान में ढकेलने का कार्य किया है। इनसे न केवल हमारी युवा पीढ़ी पर विदेशी अप-संस्कृति का प्रभाव पड़ता है अपितु हमारे अबोध और नाबालिग बच्चे भी इसके दुष्प्रभाव से बच नहीं पा रहे हैं। । साथ ही विज्ञापनों के सम्मोहन ने धन के महत्त्व को धर्म और चरित्र से कहीं ऊपर कर दिया है। हानिकारक वस्तुओं को भी धड़ल्ले से बेचने का कार्य व्यापारी वर्ग लुभावने विज्ञापनों के माध्यम से खूब कर रहा है।

उपसंहार-इस प्रकार हम देखते हैं कि दूरदर्शन मनोरंजन के साथ-साथ जनशिक्षा का भी एक सशक्त माध्यम है। विभिन्न विषयों में शिक्षा के उद्देश्य के लिए इसका प्रभावशाली रूप में प्रयोग किया जा सकता है। आवश्यकता है कि इसे केवल मनोरंजन का साधन ही न समझा जाए, वरन् यह जनशिक्षा एवं प्रचार का माध्यम भी बने। इस उद्देश्य के लिए इसके विविध कार्यक्रमों में अपेक्षित सुधार होने चाहिए। इसके माध्यम से तकनीकी और व्यावहारिक शिक्षा का प्रसार किया जाना चाहिए। सरकार दूरदर्शन के महत्त्व को दृष्टिगत रखते हुए देश के विभिन्न भागों में इसके प्रसारण-केन्द्रों की स्थापना कर रही है। दूरदर्शन से होने वाली हानियों के लिए एक तन्त्र एवं दर्शन जिम्मेदार है। इसके लिए दूरदर्शन के निर्देशकों, सरकार एवं सामान्यजन को संयुक्त रूप से प्रयास करने होंगे, जिससे दूरदर्शन के कार्यक्रमों को दोषमुक्त बनाकर उन्हें वरदान के रूप में ग्रहण किया जा सके।

मानवता का आधार : परोपकार

सम्बद्ध शीर्षक

  • परहित सरिस धरम नहिं भाई [2009,15]
  • परोपकार
  • वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे (2015)
  • परोपकार का महत्त्व
  • परपीड़ा सम नहिं अधमाई

प्रमुख विचार-बिन्दु–

  1. प्रस्तावना,
  2. परोपकार की महत्ता अर्थात् परोपकार मानवीय धर्म,
  3. प्रकृति और परोपकार,
  4. परोपकार : मानवता का परिचायक,
  5. परोपकार के विविध रूप,
  6. परोपकार : आत्म-उत्थान का मूल,
  7. उपसंहार।

प्रस्तावनापरहित सरिस धरम नहिं भाई। परपीड़ा सम नहिं अधमाई” अर्थात् दूसरे की भलाई करने से बढ़कर कोई धर्म नहीं और दूसरे को कष्ट पहुँचाने से बढ़कर कोई नीच काम नहीं। महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी की ये पंक्तियाँ धर्म की सुन्दर परिभाषा प्रस्तुत करती हैं।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, अत: समाज में एक-दूसरे का सहयोग किये बिना वह पूर्ण मानव नहीं बन सकता। कोई भी मनुष्य स्वयं में पूर्ण नहीं है, किसी-न-किसी कार्य के लिए वह दूसरे पर आश्रित रहता ही है। हम दूध-दही के लिए पशुओं पर, फल-फूल तथा अन्नादि के लिए वृक्षों पर, जल के लिए बादल एवं नदियों पर आश्रित हैं। ये सभी बिना किसी स्वार्थ के हमें यही सन्देश प्रदान करते हैं।

परोपकार की महत्ता अर्थात् परोपकार मानवीय धर्म–महर्षि दधीचि ने वृत्रासुर वध के लिए देवताओं द्वारा माँगने पर अपनी हड्डियों को प्रदान करते हुए मानवीय परोपकार का एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया था। उनकी हड्डियों से निर्मित सर्वाधिक कठोर वज्र के निर्माण से ही देवता वृत्रासुर का वध कर सके। मानव द्वारा देवों की रक्षा करने के लिए त्याग-भावना द्वारा मानव देक्ताओं से भी महान् दिखाई देने लगता है। महाराज शिवि ने भी करुणा-भावना के वशीभूत एक कबूतर की प्राण रक्षा के लिए अपने हाथों से अपने शरीर का मांस काट-काट कर कबूतर को खाने के लिए आये बाज को खिलाकर परोपकार के क्षेत्र में प्रतिमान उपस्थित किया। वास्तव में ये महान् पुरुष धन्य हैं, जिन्होंने परोपकार के लिए अपने शरीर व प्राणों की भी चिन्ता नहीं की। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने इनकी वन्दना करते हुए उचित ही कहा है

क्षुधार्त्त रन्तिदेव ने दिया करस्थ थाल भी,
तथा दधीचि ने दिया परार्थ अस्थिजाल भी।
उशीनर क्षितीश ने स्वमांस दान भी किया,
सहर्ष वीर कर्ण ने शरीर चर्म भी दिया ।
अनित्य देह के लिए अनादि जीव क्या डरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे ।

इसी भावना से प्रेरित होकर हमारे हजारों क्रान्तिकारी देशभक्तों ने भी नयी पीढ़ी की स्वतन्त्रता एवं सुख-समृद्धि के लिए परोपकार भावना से अनुप्राणित होकर अपने माता-पिता, पति-पत्नी, पुत्र-पुत्री एवं परिवार की तनिक भी चिन्ता न करते हुए अपने प्राणों को हँसते-हँसते देश की बलिवेदी पर चढ़ा दिया। संसार में उन्हीं व्यक्तियों के नाम अमर होते हैं, जो दूसरों के लिए मरते और जीवित रहते हैं। सीता की रक्षा में अपने प्राणों की बाजी लगा देने वाले गिद्धराज जटायु से श्रीराम कहते हैं, “तुमने अपने सत्कर्म से ही सद्गति का अधिकार पाया है, इसका श्रेय मुझे नहीं है”

परहित बस जिनके मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नहीं ॥

प्रकृति और परोपकार-प्रकृति में परोपकार का नियम अप्रतिहत गति से कार्य करता हुआ दिखाई देता है। सूर्य बिना किसी जाति, देश, वर्ण के भेदभाव के समानता-असमानता की भावना से, बिना किसी प्रत्युपकार की भावना के, समस्त संसार को अपने प्रकाश और उष्णता से जीवन प्रदान करते हैं। वायु सभी को प्राण प्रदान कर रही है। चन्द्रमा अपनी शीतल किरणों से सभी को रस एवं शीतलता प्रदान करता है। पृथ्वी रहने को स्थान देती है। मेघ वर्षा ऋतु में आकर फसलों को हरा-भरा कर देते हैं। वृक्ष तो फूल, फल, छाल, शाखाएँ, ऑक्सीजन, जल, पत्ते, लकड़ियाँ, छाया आदि सर्वस्व प्रदान कर मानव-जीवन को आनन्दित बना देते हैं। झरने, प्रपात और नदियाँ अपने अमृतमय जल से पिपासा शान्त करती हुई, विद्युत एवं तैरने के अवसर, नौकाविहार, जलचरों को जीवन प्रदान करती हुई परोपकार की देवी ही बनी हुई है। कहा भी गया है-

बृच्छ कबहुँ नहिं फल भखें, नदी न संचै नीर।
परमारथ के कारने, साधुन धरा सरीर ॥

अर्थात् सूर्य, चन्द्रमा, वृक्ष, वायु आदि ऐसा किसी प्रतिफल प्राप्ति की भावना से नहीं करते हैं, वे केवल अपने जन्मजात स्वभाववश ही ऐसा करते हैं। तब क्या प्रकृति की ही एक देन, मनुष्य, का यह कर्तव्य नहीं है कि वह दूसरों के हित में अपने जीवन को कुछ समय ही लगा दे।

परोपकार : मानवता का परिचायक–परोपकार ही मानव को महामानव बनाने की सामर्थ्य रखता है। परोपकार से ही हमारी स्वार्थ-भावना नष्ट होती है और हम देवता के समान कहलाने लगते हैं

सूर्य, चन्द्र, बादल, सरिता, भू, पेड़, वायु कर पर उपकार।।
बन जाते हैं देवतुल्य क्या, देवों के सचमुच अवतार ॥

परोपकारी व्यक्ति समाज में सर्वत्र सम्मान प्राप्त कर देश एवं विश्व के पूज्य बन जाते हैं। परोपकार से ही मनुष्य विश्वबन्धुत्व की भावना की ओर अग्रसर होता है। जनकल्याण, प्राणिसेवा में निरत व्यक्ति परम आदरणीय हो जाता है-

जो पराये काम आता, धन्य है जग में वही।
द्रव्य ही को जोड़कर, कोई सुयश पाता नहीं ॥

परोपकार भाईचारे की भावना का विकास करता है। यही घृणा, द्वेष और स्वार्थ का नाशक है। सभी प्राणियों में अपने ईश्वर का अंश देखकर महापुरुष जगत् के कल्याण में प्रवृत्त हो जाते हैं। राजा रन्तिदेव अपना सर्वस्व दान में देकर अड़तालीस दिन तक भूखे रहे। उनचासवें दिन जब भोजन का प्रबन्ध हुआ तो एक याचक आ गया। उन्होंने वह भोजन याचक को खिलाकर सन्तोष धारण किया–

न त्वहं कामये स्वर्ग, न मोक्षं न पुनर्भवम् ।।
कामये दुःखतप्तानां, प्राणिनामार्तनाशनम् ॥

राजा रन्तिदेव ने स्वर्ग-मोक्ष न माँग कर मानव ही नहीं सभी प्राणियों की पीड़ा को दूर करने का वरदान माँगा। परोपकारियों को ही सज्जन एवं महापुरुष की पदवी प्रदान की जाती है, जो युगों तक प्रणम्य हो जाते हैं। अट्ठारह पुराणों के रचयिता व्यास जी ने भी परोपकार को पुण्य एवं परपीड़ा को पाप घोषित किया है-

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥

परोपकारी व्यक्ति नि:स्वार्थ परोपकार कर अलौकिक आनन्द का अनुभव करता है। किसी भूखे को भोजन देते समय, प्यासे को पानी पिलाते समय, ठण्ड से ठिठुरते को वस्त्र देते समय, रोगी की सेवा करते समय मानव को जो अपार आनन्द का अनुभव होता है, वह वर्णनातीत है। उस समय वह स्व-पर के भेद से ऊपर उठकर ब्रह्मानन्द की प्राप्ति करता है। हमारी सांस्कृतिक परम्परा में यज्ञ परोपकार ही है, जिसके द्वारा ‘इदं न मम’ कहते हुए अग्नि में डाली गयी आहुति लाखों लोगों का कल्याण करती हुई विस्तृत हो जाती है।”

परोपकार के विविध रूप-नि:शुल्क लंगर, सदाव्रत, प्याऊ, विद्यालय, धर्मशाला, बगीचा, वृक्षारोपण, जलाशय, औषधालये, वस्त्र-वितरण, निर्धन विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति, पुस्तकालय, गौशाला आदि की व्यवस्था करना परोपकार के ही विविध रूप हैं। परोपकार का क्षेत्र केवल मनुष्यों तक संकुचित नहीं है, उसमें पशु-पक्षी कीट-पतंग सभी सम्मिलित हैं। इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने सभी को प्रणाम करते हुए कहा है-

सियाराममय सब जग जानी। करहुँ प्रणाम जोरि जुग पानी ॥

रहीम ने परोपकार की महिमा का बखान करते हुए लिखा है कि-

रहिमन यों सुख होत है, उपकारी के संग।
बाँटनवारे को लगे, ज्यों मेंहदी को रंग॥

तात्पर्य यह है कि परोपकारी व्यक्ति को उसी प्रकार स्वतः ही आनन्द की उपलब्धि होती है, जिस प्रकार लगाने वाले के हाथों में मेंहदी का रंग स्वतः ही आ जाता है।
जहाँ पुल, सड़कें नहीं वहाँ पुल, सड़कों का निर्माण करना, कन्याओं के लिए रोजगार सीखने के नि:शुल्क प्रशिक्षण देना, उन्हें स्वावलम्बी बनाना, अकाल, भूकम्प, युद्धादि के अवसर पर अन्न, वस्त्र, निवास की व्यवस्था करना परोपकारी कार्यों की श्रेणी में आते हैं।

सामान्य व्यक्ति तर्क दे सकते हैं कि धन से सम्पन्न व्यक्ति ही परोपकार कर सकता है। विचार करने पर हम अनुभव करेंगे कि परोपकार के लिए धन की कोई आवश्यकता नहीं होती, अपितु एक सेवाभावी मन की आवश्यकता होती है। हम राह भटके हुए को राह दिखा सकते हैं, सड़क के बीच में पड़े हुए केले के छिलके, कंकड़-पत्थर आदि को उठाकर एक किनारे पर फेंक सकते हैं। यह परोपकार ही तो है। हम किसी दुखिया के आँसू पोंछ सकें, किसी आहत व्यक्ति की आहों में साझीदार बन सकें, किसी के सिर पर रखे हुए बोझ को हलका कर सकें, किसी प्यासे को पानी पिला सकें आदि, तो हम परोपकार के आनन्द एवं पुण्य-फल का लाभ प्राप्त करने के सहज अधिकारी बन जाएँगे। निर्धन विद्यार्थियों को नि:शुल्क ट्यूशन उत्तम कोटि को परोपकार कहलाएगा।

परोपकार : आत्म-उत्थान का मूल-मनुष्य क्षुद्र से महान् और विरल से विराट् तभी बन सकता है, जब उसकी परोपकार-वृत्ति विस्तृत होती रहेगी। भारतीय संस्कृति की यह विशेषता है कि उसने प्राणि-मात्र के हित को मानव-जीवन का लक्ष्य बताया है। यही व्यक्ति का समष्टिमय स्वरूप भी है। ज्यों-ज्यों आत्मा में उदारता बढ़ती जाती है, उसे उतनी ही अधिक आनन्द की उपलब्धि होती जाती है तथा अपने समस्त कर्म जीवमात्र के लिए समर्पित कर देने की भावना तीव्रतर होती जाती है-

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत् ॥

तात्पर्य यह है कि सभी लोग सुखी हों, निरोगी हों, कल्याणयुक्त हों। कोई भी दु:ख-कष्ट नहीं भोगे। इसी भावना से संचालित होकर सभी जीवों के कल्याण में रत रहना चाहिए। यही सर्वकल्याणमय भावना सन्तों का मुख्य लक्षण है; क्योंकि वे मन, वचन और काया से सदा परोपकार में लगे रहते हैं-

पर उपकार वचन मन काया। सन्त सहज सुभान खगराया ॥

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी के शब्दों में–

यही पशु प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे ,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे ।

अर्थात् जो अपने लिए जीता है वह पशु है, जो अपने साथ-साथ दूसरों के लिए भी जीता है वह मनुष्य है और जो केवल दूसरों के लिए ही जीता है वह महामानव है, महात्मा है।

उपसंहार–परोपकारी अक्षय कीर्ति को धारण करते हैं। प्रत्येक युग में उनको सम्मान वृद्धि को प्राप्त होता रहता है। महात्मा गाँधी, पं० मदनमोहन मालवीय, सुभाषचन्द्र बोस, चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, अशफाक उल्ला खाँ, रामप्रसाद बिस्मिल आदि सदैव ही प्रातः स्मरणीय रहेंगे। तभी तो मैथिलीशरण गुप्त जी ने कहा है कि इस जीवन को अमर बनाने के लिए इसे दूसरों को समर्पित कर दो-

विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी ,
मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करें सभी ।

मानव का जीवन क्षणभंगुर है, किन्तु परोपकार के द्वारा वही अमरता को प्राप्त हो जाता है। भगवान् राम, कृष्ण, महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, दयानन्द सरस्वती, राजा राममोहन राय “सर्वभूत हिते रतः’ रहकर ही अक्षय यश के भागी हैं।

वर्तमान समय में परोपकार का स्वरूप बदलता जा रहा है। परोपकार के आवरण में लोग अपने स्वार्थों की पूर्ति कर रहे हैं। कोई राजनीतिक नेता ‘गरीबी हटाओ’ का नारा लगाकर गरीबों का वोट अपनी ओर खींचता है तो कोई जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित करवाकर अपना वोट बैंक पक्का करता है। कुछ व्यापारी आयकर में छूट पाने के लिए औषधालय खुलवाते हैं तथा पंजीकृत संस्थाओं में दान देते हैं। यह आज के परोपकार का परिवर्तित स्वरूप है। भारतीय संस्कृति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’, ‘सर्वजन सुखाय सर्वजन हिताय’ के सविवेक का सन्देश देती है। आज ऐसी ही भावना की आवश्यकता है। भारतीय संस्कृति के इन सन्देशों को अपनाकर ही हम परोपकार के सर्वाधिक समीप पहुँच सकते हैं।

परोपकार किसी भी समाज एवं देश के सुख-संवर्धन का एकमात्र उपाय है। जिस समाज में परोपकारी लोगों का आधिक्य होगा वही सुखी और समृद्ध होगा। डॉ० हरिदत्त गौतम ‘अमर’ के शब्दों में –

पर उपकार निरत जो सज्जन कभी नहीं मरते हैं।
चन्द्र सूर्य जब तक हैं उन पर यशः पुष्प झरते हैं।

सांस्कृतिक प्रदूषण

सम्बद्ध शीर्षक

  • समाज में नैतिक मूल्यों का विघटन
  • केबिल टी०वी० के माध्यम से फैलता सांस्कृतिक प्रदूषण और हम
  • भारतीय संस्कृति और दूरदर्शन [2010]

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2. सांस्कृतिक प्रदूषण का अर्थ,
  3. सांस्कृतिक प्रदूषण का स्वरूप विचारों में प्रदूषण, कलाओं में प्रदूषण, दृष्टिकोण का प्रदूषण, खान-पान का प्रदूषण, रहन-सहन का प्रदूषण,
  4. उपसंहार।

प्रस्तावना–आज के वैज्ञानिक युग में हर ओर प्रदूषण की ही चर्चा है। खुली हवा, धूलरहित आवास, शान्त इमारतें और शोररहित सड़कें आज एक सपना बन कर रह गयी हैं। आज भी सावन आता है पर घरों में वह वृक्ष ही नहीं होता, जिस पर झूला डाला जा सके। घरों में वह खुला आँगन नहीं होता जहाँ बच्चों को हर्षध्वनि करते, भागते-दौड़ते देखा जा सके। आज द्रुतगति की आलीशान वातानुकूलित कारें तो हैं, परन्तु उसकी खिड़की खोलते ही बाहर का शोरगुल और गर्दगुबार बिना निमन्त्रण अन्दर घुसे आता है। आज बच्चे टी० वी० स्क्रीन का कार्टून अपने सपनों में देखते हैं और लोरी के स्थान पर सी० डी० अथवा ऑडियो टेप सुनते हुए सो जाते हैं। यही है–भौतिक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक प्रदूषण।

कुछ विद्वान् इसे विश्व की गम्भीरतम समस्या कहते हैं तो कुछ इसे मानवता का सबसे बड़ा शत्रु। आज सभी रोगों का मूल कारण प्रदूषण को ही माना जाता है तथा यह कहा जाता है कि इससे बच पाना असम्भव है। प्रदूषण सम्बन्धी कथन वास्तव में भौतिक पर्यावरण के प्रदूषण से ही सम्बन्धित है। भौतिक पर्यावरण प्रदूषण के अन्तर्गत मुख्य रूप से वायु-प्रदूषण, जल-प्रदूषण, मृदा-प्रदूषण, ध्वनि-प्रदूषण, रेडियोधर्मी प्रदूषण, रासायनिक प्रदूषण ही आते हैं। यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि प्रदूषण केवल भौतिक पर्यावरण तक ही सीमित नहीं है, वरन् इसके कुछ अन्य रूप भी अति महत्त्वपूर्ण एवं चिन्ता के विषय हैं। प्रदूषण का एक अति गम्भीर रूप सांस्कृतिक प्रदूषण भी है। आज विश्व के अधिकांश विकासशील देश जहाँ एक ओर भौतिक प्रदूषण के शिकार हैं तो साथ-साथ ही वे गम्भीर सांस्कृतिक प्रदूषण के भी शिकार हो रहे हैं। भौतिक प्रदूषण के कारक, प्रभाव आदि स्पष्ट होते हैं तथा इनकी जाँच भी सरलता से की जा सकती है, परन्तु सांस्कृतिक प्रदूषण पर्याप्त सीमा तक छिपा हुआ होता है तथा यह अपना प्रभाव अप्रत्यक्ष रूप से डालता है। यद्यपि सांस्कृतिक प्रदूषण छिपा हुआ होता है तथा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है, तथापि इसके परिणाम अति गम्भीर, हानिकारक तथा दूरगामी होते हैं।

सांस्कृतिक प्रदूषण का अर्थ-प्रदूषण का सामान्य अर्थ है-किसी स्थापित व्यवस्था के मूल रूप में कुछ इस प्रकार का परिवर्तन होना जो जनसामान्य के लिए सामान्य रूप से हानिकारक हो। इस मापदण्ड के आधार पर वायु में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने या ऑक्सीजन की मात्रा घटने की स्थिति वायु-प्रदूषण की स्थिति होती है। सांस्कृतिक प्रदूषण के सन्दर्भ में कहा जा सकता है कि किसी संस्कृति की मौलिक विशेषताओं एवं लक्षण में उससे भिन्न तत्त्वों का समावेश हो जाना ही सांस्कृतिक प्रदूषण है। सांस्कृतिक प्रदूषण के पूर्व संस्कृति के अर्थ को स्पष्टरूपेण समझना आवश्यक है। संस्कृति की अवधारणा पर्याप्त जटिल है। वास्तव में किसी समाज द्वारा जो कुछ भी अपने पूर्व-पुरुषों के अनुभवों के माध्यम से प्राप्त किया जाता है, वह सब कुछ संस्कृति ही है। संस्कृति में ज्ञान, विश्वास, कलाएँ, नीति, विधि, रीति-रिवाज तथा समाज के सदस्य के रूप में मनुष्य द्वारा अर्जित अन्य योग्यताओं एवं आदतों को सम्मिलित किया जाता है। वस्तुतः संस्कृति जीवन का एक ढंग है, जो सैकड़ों-हजारों वर्षों में धीरे-धीरे विकसित होता है।

वर्तमान वैज्ञानिक युग में विश्व के सभी देशों एवं भागों में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से बहुपक्षीय सम्पर्क स्थापित होने लगे हैं। दूरसंचार के साधनों, यातायात की सुविधाओं, पत्र-पत्रिकाओं, दूरदर्शन, इण्टरनेट आदि के माध्यम से अब विश्व की समस्त संस्कृतियाँ एक-दूसरे को प्रभावित करने लगी हैं। इस स्थिति में विकसित (पाश्चात्य) देशों ने अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से विकासशील देशों पर थोपना प्रारम्भ कर कर दिया है। इसी सांस्कृतिक होड़ से हमारे देश की संस्कृति गम्भीर रूप से प्रभावित हो रही है। हमारी संस्कृति पर जो पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव पड़ रहा है, वह हमारी मूल संस्कृति के लिए हानिकारक सिद्ध हो रहा है। अतः इस प्रकार से होने वाले सांस्कृतिक परिवर्तन को हम सांस्कृतिक प्रदूषण की संज्ञा देते हैं।

सांस्कृतिक प्रदूषण का स्वरूप-वर्तमान परिस्थितियों में सांस्कृतिक प्रदूषण में सर्वाधिक योगदान दूरदर्शन के विदेशी और कुछ-एक देशी चैनेलों का है। एम टी० वी०, वी टी० वी०, जी टी० वी० तथा कुछ अन्य विदेशी चैनेल सांस्कृतिक प्रदूषण के मुख्य माध्यम बने हुए हैं। सांस्कृतिक प्रदूषण के मुख्य रूपों का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है|

(1) विचारों में प्रदूषण–पारम्परिक भारतीय संस्कृति में शुद्ध विचारों को विशेष महत्त्व दिया जाता है, परन्तु वर्तमान परिस्थितियों में पाश्चात्य सांस्कृतिक संघात के कारण यह भारतीय धारणा क्रमश: परिवर्तित हो रही है। अब सामान्य जनमानस की विचारधारा धीरे-धीरे कुत्सित हो रही है, विचारों में तीव्र उथल-पुथल मची हुई है तथा व्यक्ति की विचारशक्ति भ्रमित हो रही है। विचारों का इस प्रकार से विकृत होना सांस्कृतिक प्रदूषण का ही एक रूप है।

(2) कलाओं में प्रदूषण- भारतीय कलाओं की अपनी कुछ विशेषताएँ थीं। ये कलाएँ आदर्शोन्मुखी थीं। पाश्चात्य सांस्कृतिक प्रभाव के कारण भारतीय कलाओं में कुछ ऐसा तीव्र परिवर्तन हो रहा है, जो कि सांस्कृतिक प्रदूषण को ही दर्शाता है। साहित्य में दुःखान्त रचनाओं को महत्त्व देना, अकहानी तथा अकविता का प्रचलन, प्रयोगवादी काव्य का प्रादुर्भाव आदि साहित्य के क्षेत्र में प्रदूषण कहे जा सकते हैं। कला के क्षेत्र में सूक्ष्म कला या एब्स्ट्रैक्ट आदि अपने आप में एक प्रदूषणकारी प्रचलन ही हैं। संगीत के क्षेत्र में भारतीय शास्त्रीय संगीत की अवहेलना करके पॉप संगीत तथा डिस्को संगीत स्पष्ट रूप से भारतीय संगीत के लिए प्रदूषण का ही काम कर रहे हैं। भारतीय शास्त्रीय संगीत का अत्यल्प विकृत रूप सिने-संगीत के रूप में श्रोताओं में पर्याप्त लोकप्रिय था। लेकिन अब इस संगीत के दृश्य-श्रव्य माध्यम को विदेशी वाद्यों तथा पर्याप्त नग्नता का समावेश कर रीमिक्स की नवीन संज्ञा देकर पुन: प्रस्तुत किया जा रहा है। इसे भी सांस्कृतिक प्रदूषण का ही स्वरूप माना जाना चाहिए। नृत्य के क्षेत्र में भी कत्थक, भरतनाट्यम आदि भारतीय नृत्यों को छोड़कर पाश्चात्य नृत्यों को अपनाना प्रदूषणकारी ही है। वर्तमान समय में तो भारतीय लोक-नृत्यों का भी पश्चिमीकरण होता जा रहा है। पंजाब का लोकप्रिय लोक-नृत्य भाँगड़ा आज विदेशी रंग में रँगता दिखाई दे रहा है। यह परिवर्तन सांस्कृतिक प्रदूषण का प्रत्यक्ष प्रमाण है। वाद्य-यन्त्रों में भी अब भारतीय वाद्य-यन्त्र अनावश्यक-से प्रतीत हो रहे हैं तथा पाश्चात्य इलेक्ट्रॉनिक वाद्य-यन्त्र अधिक लोकप्रिय हो रहे हैं।

(3) दृष्टिकोण का प्रदूषण–पारम्परिक रूप से भारतीय दृष्टिकोण आध्यात्मिक तथा नैतिकता की ओर उन्मुख था, परन्तु अब पाश्चात्य सांस्कृतिक संघात ने भारतीय जनसामान्य के दृष्टिकोण को भी भौतिकवादी बना दिया है। सम्मिलित परिवारों की भारतीय अवधारणा अब धीरे-धीरे विघटित परिवारों का रूप लेने लगी है। सांस्कृतिक प्रदूषण के कारण ही नवयुवकों में अब बड़े-बुजुर्गों के प्रति सम्मान की वह भावना नहीं रह गयी, जो पहले पायी जाती थी। आज प्रत्येक बात में भौतिकवादी दृष्टिकोण से लाभ-हानि को ही प्राथमिकता दी जाती है। पारम्परिक दृष्टिकोण में होने वाला यह परिवर्तन स्पष्ट रूप से सांस्कृतिक प्रदूषण ही है।

(4) खान-पान का प्रदूषण-खान-पान को भी सांस्कृतिक मान्यता के अन्तर्गत ही माना जाता है। वर्तमान समय में इस सांस्कृतिक मान्यता में भी तीव्र तथा गम्भीर परिवर्तन परिलक्षित हो रहे हैं। आज हर कोई विदेशी खाद्य-पदार्थों तथा पकवानों को अधिक पसन्द कर रहा है। उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय, पंजाबी, कश्मीरी आदि व्यंजनों के स्थान अब चाइनीज़, फास्ट फूड्स, बर्गर, पिज़ा आदि ने ले लिये हैं। भारतीय परिवारों में विवाह आदि शुभ अवसरों पर विदेशी व्यंजनों का परोसा जाना अब शान की बात समझी जाती है। खान-पान में होने वाला यह परिवर्तन भी सांस्कृतिक प्रदूषण ही है।

(5) रहन-सहन का प्रदूषण–आज हर भारतीय परिवार पाश्चात्य-प्रतिमान को आदर्श रहन-सहन मानता है। पारम्परिक भारतीय रहन-सहन को अब दकियानूसी माना जाने लगा है। रसोईघर, बैठक, शयन-कक्ष, पहनावा, सौन्दर्य प्रसाधन आदि सभी स्थानों पर पाश्चात्य प्रतिमानों को ही अपनाया जा रहा है, यह सांस्कृतिक जीवन का ही प्रदूषण है।

उपसंहार-निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि हमारा समाज घोर सांस्कृतिक प्रदूषण का शिकार हो रहा है। इस सांस्कृतिक प्रदूषण के गम्भीर परिणाम हो रहे हैं। हमारे परिवार विघटित हो रहे हैं, विवाह-विच्छेद हो रहे हैं, मान्यताएँ बदल रही हैं तथा परम्पराएँ छिन्न-भिन्न हो रही हैं। स्वास्थ्य-हीनता और नैतिक मूल्यों-मर्यादाओं के टूटने के दुष्परिणाम स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहे हैं। यदि सांस्कृतिक प्रदूषण की इस आँधी को समय रहते रोका न गया तो निकट भविष्य में हम अपनी पहचान गंवा बैठेंगे। हम ने घर के रहेंगे और न घाट के। अतः भारत के प्रत्येक नागरिक विशेष रूप से युवाओं तथा शिक्षकों का दायित्व है कि वे विदेशियों द्वारा फैलायी जा रही अपसंस्कृति अथवा सांस्कृतिक प्रदूषण का विरोध करें तथा इससे अपने समाज एवं देश को बचाने का प्रयास करें।

नैतिक मूल्यों का हास : कारण एवं निवारण (2016)

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2. प्रतिभा की उपेक्षा,
  3. वैचारिक प्रदूषण,
  4. पश्चिम की नकल,
  5. रोजगार की समस्या,
  6. भ्रष्ट राजनीतिक विरासत,
  7. समस्याओं/कारणों के निवारण के उपाय,
  8. उपसंहार।

प्रस्तावना-चाहे धर्म का क्षेत्र हो या दर्शन का, चाहे कला का क्षेत्र हो या विज्ञान का, शताब्दियों तक हमारा देश, विश्व के मानचित्र पर जगमगाता रहा, और आज भी यह दुनिया के उन महानतम देशों में से एक है, जिनके पास प्राकृतिक संसाधनों और मानवीय शक्ति की कहीं कोई कमी नहीं है। आज विश्वभर में फैले हुए भारतीय वैज्ञानिक और इंजीनियर सफलता के ऊँचे शिखर को नैतिक मूल्यों के कारण छू रहे हैं। और यह भी कि–आज अमेरिका की 70 प्रतिशत सिलीकॉन वैली पर भारतीयों का कब्जा है। लेकिन दूसरा पहलू यह भी है कि आज हमारी राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था गहरे संकट से गुजर रही है। राजनीति का अपराधीकरण हो चुका है। नैतिक मूल्यों के ह्रास के कारण अब हमारी छवि दुनिया में धूमिल होने लगी है। नैतिक मूल्यों के ह्रास के कारण हमारी नई पीढ़ी जब इस प्रकार की विरोधाभासी व्यवस्था के बीच से होकर गुजर रही हो, तो उसकी दशा और दिशा का सही अनुमान लगा पाना तो बहुत कठिन है, परन्तु सम्भावित अनुमान प्रस्तुत किया जा सकता है।

प्रतिभा की उपेक्षा–जाति-आधारित आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था से प्रतिभा और दक्षता का अनादर हो रहा है। प्रोन्नतियों में आरक्षण की कोई आवश्यकता नहीं थी, परन्तु वहाँ भी ऐसी व्यवस्था की गयी। यह प्रतिभा और योग्यता के साथ किया जाने वाला अन्याय है और यह अन्याय केवल वोट बैंक की राजनीति के कारण किया गया है। ठीक है कि गरीबों और पिछड़ों को भी आगे बढ़ने का मौका मिलना चाहिए परन्तु इसके लिए उन्हें योग्य एवं प्रतिभाशाली बनाने के उपाय किये जाने चाहिए। आरक्षण की बैसाखी से नई पीढ़ी की दशा और दिशा नहीं बदलने वाली है और फिर गरीब और पिछड़े तो हर जाति में होते हैं। यदि आरक्षण ही देना है तो फिर उन सभी को देना चाहिए, परन्तु वोट बैंक के लाभ-हानि देखकर चुन-चुनकर अपने पक्ष की कुछ विशेष जातियों के लोगों को ही आरक्षण देना और बाकी गरीबों और पिछड़ों को उनके अपने हाल पर छोड़ देना तनिक भी उचित नहीं है। देखा यह भी गया है कि इस आरक्षण का लाभ, पिछड़ों में जो सम्पन्न लोग हैं, उन्हीं को मिल सका है। शेष की हालत बदस्तूर है। यदि निजीक्षेत्र में भी आरक्षण किया गया, यदि विधानसभाओं और संसद में भी महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण हो गया, तो स्थिति और अधिक विकट हो जाएगी। ऐसा करने से नई पीढ़ी की दशा बदतर होगी और दिशा भयावह।।

वैचारिक प्रदूषण-नई पीढ़ी को जो विचार उत्तराधिकार में मिल रहे हैं, वे सामाजिक एकता और सद्भाव को बनाये रखने वाले अथवा सर्वधर्म समभाव वाले नहीं हैं। समाज को जोड़ने के बदले सर्वत्र अलगाव और बिखराव ही अधिक दिखाई दे रहा है। राजनीतिक दलों द्वारा राष्ट्र की एकता और अखण्डता को जाति, धर्म, सम्प्रदाय, बोली, भाषा और क्षेत्र के आधार पर कई टुकड़ों में बाँटने के प्रयास जारी हैं, और यह सब वोट बैंक की राजनीति के कारण हुआ है। यही कारण है कि अयोध्या में विवादित ढाँचा गिराये जाने के आठ वर्ष बाद भी तेरहवीं लोकसभा का सत्र हफ्ते भर तक नहीं चलने दिया गया। एक ही देश में कहीं शौर्य दिवस और कहीं कलंक दिवस मनाये जाने के पीछे यह वैचारिक प्रदूषण ही मुख्य कारण है। इसी वैचारिक प्रदूषण के कारण राजनीतिक दल अपने स्वार्थ को राष्ट्रीय आवश्यकता से अधिक महत्त्व देते हैं। ऐसे प्रदूषित विचारों के मध्य जी रही नई पीढ़ी की दशा और दिशा उज्ज्वल होने की सम्भावना कम ही है।

पश्चिम की नकल-देश की नई पीढ़ी पश्चिम की नकल करते-करते अपनी अकल भी गॅवाती हुई दीख रही है। भारतीय जीवन-दर्शन, भारतीय जीवन-मूल्य, भारतीय आदर्श और भारतीय संस्कृति से अपना पल्ला झाड़कर, यही पीढ़ी पाश्चात्य भौतिकवादी और भोगवादी संस्कृति की ओर उन्मुख दिखाई देती है। नई पीढ़ी की लड़कियों के शरीर पर कपड़े घटते जा रहे हैं और सौन्दर्य प्रसाधनों के बाजारों में भीड़ उमड़ती जा रही है। सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के नाम पर नग्नता और अश्लीलता परोसी जा रही है। लड़के भी इस दौड़ में कहीं पीछे नहीं हैं। शास्त्रीय संगीत के बदले पॉप म्यूजिक लोकप्रिय होता जा रहा है। खुलेपन और प्रगतिशील होने के नाम पर टी०वी० चैनल भी घर-घर में नग्नता और अश्लीलता ही परोस रहे हैं। यह सब देखकर मुझे तो नहीं लगता कि नई पीढ़ी की दशा और दिशा अच्छी हो सकेगी।

रोजगार की समस्या-यद्यपि नई पीढ़ी सूचना प्रौद्योगिकी के युग में जी रही है, परन्तु उसके लिए साधन जुटाना नई पीढ़ी के लिए आसान काम नहीं है। सरकारी नौकरियाँ बहुत कम हैं क्योंकि अब अधिकतर काम कम्प्यूटर करने लगे हैं। फिर आरक्षण भी इसमें बाधक है और हमारी शिक्षा नीति भी रोजगारपरक नहीं है। राजनीतिज्ञों की सन्तानें तो विदेशों में अच्छी उपयोगी शिक्षा पा रही हैं पर देश की सामान्य जनता के लिए सरकारी स्कूल भी पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं। जो विद्यालय हैं भी वहाँ गणित, विज्ञान और भाषा आदि विषयों के शिक्षकों एवं प्रधानाचार्यों की भारी कमी है। आज की शिक्षा-व्यवस्था स्नातक बनाने के बाद छात्र में शारीरिक परिश्रम के प्रति निष्ठा नहीं जगाती, बल्कि छात्र न घर का रहता है न घाट की। ऐसी दशा में नई पीढ़ी का भविष्य उज्ज्वल नहीं दिखाई देता है। उद्योग लगाने के लिए पूँजी की जरूरत होती है, परन्तु वह पूँजी आयेगी कहाँ से? इस प्रश्न का उत्तर पाना बहुत कठिन है।

भ्रष्ट राजनीतिक विरासत-आजादी के बाद छः दशकों में जैसी धोखाधड़ी भारतीय जनता के साथ की गई, उसकी मिसाल शायद ही कहीं और मिले। जनता के धन को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। इस लूट में राजनेता और नौकरशाह दोनों ही जिम्मेदार रहे हैं। भारत के गृह सचिव एन०एन० बोहरा ने 1995 में अपनी रिपोर्ट में कहा था-“माफिया संगठनों को एक तन्त्र देश में समानान्तर सरकार चला रहा है। और उसने राज्य के उपकरणों को अप्रासंगिक बना दिया है। अपराधी गिरोहों, तस्कर गिरोहों और आर्थिक लॉबियों का तेजी से विस्तार हुआ है।”

समस्याओं/कारणों के निवारण के उपाय-राष्ट्र की भौतिक दशा सुधारने के लिए नैतिक मूल्यों का उपयोग कर हम उन्नति की सही राह चुन सकते हैं। हम जानते हैं कि भारत में लोगों के बीच फैला भ्रष्टाचार किस तरह से विकास की धार को मोथरा (कुंद) किए हुए है।

नैतिक मूल्यों में ह्रास होने से समाज में हर प्रकार के अपराध बढ़ रहे हैं। हम यह भी देखते हैं कि मूल्यविहीन समाज में असन्तोष फैल रहा है। बेकारी के बढ़ने से युवक असन्तोष जैसी कई प्रकार की चुनौतियाँ खड़ी दिखाई देती हैं। छोटे से बड़े नौकरशाह निकम्मेपन और भ्रष्टाचार के अंधकूप में डुबकियाँ लगा रहे हैं, उन्हें समाज या राष्ट्र की कोई परवाह नहीं है। इन परिस्थितियों से देश को उबारने के लिए आत्ममंथन अनिवार्य हो जाता है। नैतिक मूल्यों के द्वारा ही देश को समस्याओं के गर्त से उबारा जा सकता है, क्योंकि नीति से ही नैतिक शब्द बना है जिसका अर्थ है-सोच-समझकर बनाए गए नियम या सिद्धान्त। अतः अपने हृदय से दूषित भावनाओं का त्याग कर तथा सदाचार की वैसी बातें जो सभी धर्मों व सभी सम्प्रदायों को मान्य हैं, समाहित कर हम प्रगतिशील समाज की रचना कर सकते हैं तथा साथ ही नैतिक मूल्यों का उत्थान भी कर सकते हैं। नैतिक मूल्यों के ह्रास का निवारण तभी सम्भव हो सकता है जब हम अपनी संस्कृति को पहचानें, उसे अपने जीवन में उतारे और पश्चिम की ओछी भोगवादी संस्कृति से प्रभावित न हों।

उपसंहार-निश्चय ही जिस समाज में अपराधी लोग, जातीय गौरव के रूप में शोभित हो रहे हैं, तो राजनीतिक दल उनसे वंचित कैसे रह सकते हैं? सवाल यह भी है कि जिन लोगों पर गम्भीर आरोप हैं वे चुनाव कैसे जीत जाते हैं? वास्तव में राजनीतिक भ्रष्टाचार के कारण ही राजनीति के अपराधीकरण की समस्या पैदा हुई है। यदि ऐसा नहीं होता तो चन्दन तस्कर वीरप्पन दो राज्य सरकारों को अपने इशारे पर नाच नहीं नचाता। यही कारण है कि आज तमाम विकास योजनाओं का लाभ नेता, अधिकारी, इंजीनियर, बैंक मैनेजर और दलाल उठा रहे हैं। तात्पर्य यह है कि हमारे शासक जिस दिन भ्रष्टाचार पर रोक लगाने में सफल होंगे, उसी दिन से नई पीढ़ी की दशा और दिशा प्रकाशित होने लगेगी; तभी हमारी संस्कृति और समाज का उत्थान हो सकेगा।

आधुनिक जीवन में संचारमाध्यमों की उपयोगिता

सम्बद्ध शीर्षक

  • शिक्षा के उन्नयन में संचय माध्यमों की उपयोगिता [2010]

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2. संचारमाध्यमों का मानव-जीवन में महत्त्व,
  3. उद्योग और व्यवसाय के क्षेत्र में संचारमाध्यमों का योगदान,
  4. भारत में संचारमाध्यमों का विकास (i) समाचार-पत्र, (ii) रेडियो, (ii) सेल्यूलर मोबाइल टेलीफोन सेवा, (iv) इण्टरनेट सेवा,
  5. उपसंहार

प्रस्तावना--अपने विचारों, भावनाओं व सूचनाओं को सम्प्रेषित करने के लिए मनुष्य को संचारमाध्यम की आवश्यकता पड़ती है। संचार का माध्यम मौखिक एवं लिखित दोनों रूपों में हो सकता है। पहले मनुष्य आपस में बोलकर या इशारे से अपनी अभिव्यक्ति करता था। वैज्ञानिक प्रगति ने उसे संचार-माध्यम के अन्य साधन भी उपलब्ध करवाए। अब मनुष्य दुनिया के एक छोर पर मौजूद व्यक्ति से दुनिया के दूसरे छोर से वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से बात करने में सक्षम है।

ये वैज्ञानिक उपकरण ही संचार के माध्यम कहलाते हैं। टेलीफोन, रेडियो, समाचार-पत्र, टेलीविजन इत्यादि संचार के ऐसे ही माध्यम हैं। टेलीफोन ऐसा माध्यम है, जिसकी सहायता से एक बार में कुछ ही व्यक्तियों से संचार किया जा सकता है, किन्तु संचार के कुछ माध्यम ऐसे भी हैं जिनकी सहायता से एक साथ कई व्यक्तियों से संचार किया जा सकता है। जिन साधनों का प्रयोग कर एक बड़ी जनसंख्या तक विचारों, भावनाओं व सूचनाओं को सम्प्रेषित किया जाता है उन्हें हम संचार के माध्यम कहते हैं।

संचार-माध्यमों का मानव-जीवन में महत्त्व-मानव-जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने में संचारमाध्यम महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। सूचनाओं के आदान-प्रदान करने में समय की दूरी घट गई है। अब क्षणभर में संदेश व विचारों का आदान-प्रदान किया जा सकता है। शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन तथा उद्योग आदि के क्षेत्र में संचारमाध्यम का महत्त्व बढ़ गया है। अपराधों पर नियंत्रण करने तथा शासन-व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने में संचार माध्यम का विशेष योगदान है। संचारमाध्यम के अभाव में देश में शान्ति और सुव्यवस्था करना कठिन कार्य है। व्यावसायिक क्षेत्र में भी सही सूचनाओं का महत्त्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है; अतः कहा जा सकता है कि किसी भी राष्ट्र के लिए वहाँ के संचारमाध्यम की व्यवस्था का विकसित होना अत्यावश्यक है।

उद्योग और व्यवसाय के क्षेत्र में संचारमाध्यमों का योगदान–किसी भी देश का विकास उसकी सुदृढ़ अर्थव्यवस्था पर निर्भर करता है, उद्योग और व्यवसाय के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाता है; लेकिन सफल व्यवसाय और उद्योगों के विकास के लिए संचार माध्यम की अत्यधिक आवश्यकता होती है। भूमण्डलीकरण के इस काल में तो व्यवसायी एवं उद्योगपति सूचनाओं के माध्यम से व्यवसाय एवं उद्योग में नई ऊँचाइयों को छूने के लिए लालायित हैं। सूचनाएँ व्यवसाय का जीवन-रक्त हैं। व्यवसाय के अन्तर्गत माल के उत्पादन से पूर्व, उत्पादन से वितरण तक और विक्रयोपरान्त सेवाएँ प्रदान करने के लिए संचार माध्यम का महत्त्वपूर्ण स्थान है। संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास परिषद् की रिपोर्ट के अनुसार, संचार-माध्यम एवं सूचना-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विदेशी निवेश प्राप्त करने के मामले में भारत अग्रणी देश बनता जा रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2000 में दक्षिण एशिया में हुए कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में भारत का हिस्सा 76 प्रतिशत था। चीन में भारत से ज्यादा मोबाइल फोन हैं, लेकिन इण्टरनेट के क्षेत्र में व्यावसायिक गतिविधियों को लाभ उठाने के लिए भारत का माहौल चीन से कहीं बेहतर है। संचार माध्यम में क्रान्ति ने आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन की नई सम्भावना को जन्म दिया है, जिसका लाभ विकसित और विकासशील देश दोनों ही उठा रहे हैं।

भारत में संचारमाध्यमों का विकास–भारत ने संचार माध्यम के क्षेत्र में असीमित उन्नति की है। भारत का संचार नेटवर्क एशिया के विशालतम संचार नेटवर्कों में गिना जाता है। जून, 2013 के अन्त तक 903.10 मिलियन टेलीफोन कनेक्शनों के साथ भारतीय दूरसंचार नेटवर्क चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा नेटवर्क है। जून, 2013 के अन्त तक 873.37 मिलियन टेलीफोन कनेक्शनों के साथ भारतीय वायरलैस टेलीफोन नेटवर्क भी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा नेटवर्क है। आज लगभग सभी देशों के लिए इण्टरनेशनल सबस्क्राइबर डायलिंग सेवा उपलब्ध है। इण्टरनेट उपभोक्ताओं की संख्या 7 करोड़ 34 लाख है। अन्तर्राष्ट्रीय संचार-क्षेत्र में उपग्रह संचार और जल के नीचे से स्थापित संचार सम्बन्धों द्वारा अपार प्रगति हुई है। ध्वनि वाली और ध्वनिरहित संचार सेवाएँ, जिनमें आँकड़ा प्रेषण, फैसीपाइल, मोबाइल रेडियो, रेडियो पेनिंग और लीज्ड लाइन सेवाएँ शामिल हैं। 31 मार्च, 2013 ई० की स्थिति के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में 357.74 मिलियन फोन हैं।

जनसंचार माध्यमों को कुल तीन वर्गों-मुद्रण माध्यम, इलेक्ट्रॉनिक्स माध्यम एवं नव-इलेक्ट्रॉनिक माध्यम में विभाजित किया जा सकता है। मुद्रण माध्यम के अन्तर्गत समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, पैम्फलेट, पोस्टर, जर्नल पुस्तकें इत्यादि हैं। इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के अन्तर्गत रेडियो, टेलीविजन एवं फिल्में आती हैं। और इण्टरनेट जनसंचार का नव-इलेक्ट्रॉनिक माध्यम है। इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-

(i) समाचार-पत्र—मुद्रण माध्यम की शुरुआत गुटेनबर्ग द्वारा 1454 ई० में मुद्रण मशीन के आविष्कार के साथ हुई थी। इसके बाद विश्व के अनेक देशों में समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। आज समाचार-पत्र एवं पत्रिकाएँ विश्वभर में जनसंचार का एक प्रमुख एवं लोकप्रिय माध्यम बन चुके हैं। मैथ्यू अर्नाल्ड ने इसे फटाफट साहित्य का नाम दिया था। समाचार-पत्र कई प्रकार के होते हैं-त्रैमासिक, मासिक, साप्ताहिक एवं दैनिक। इस समय विश्व के अन्य देशों के साथ-साथ भारत में भी दैनिक समाचार-पत्रों की संख्या अन्य प्रकार के पत्रों से अधिक है। भारत का पहला समाचार-पत्र अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित ‘बंगाल गजट’ था। इसका प्रकाशन 1780 ई० में जेम्स ऑगस्टस हिकी ने शुरू किया था। कुछ वर्षों बाद अंग्रेजों ने इसके प्रकाशन पर प्रतिबन्ध लगा दिया। हिन्दी का पहला समाचार-पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ था। इस समय भारत में कई भाषाओं के लगभग तीस हजार से भी अधिक समाचार-पत्र प्रकाशित होते हैं। भारत में अंग्रेजी भाषा का प्रमुख दैनिक समाचार-पत्र ‘द टाइम्स ऑफ इण्डिया’, ‘द हिन्दू’, ‘द : हिन्दुस्तान टाइम्स’ इत्यादि हैं। हिन्दी के दैनिक समाचार-पत्रों में दैनिक जागरण’, दैनिक भास्कर’, ‘हिन्दुस्तान’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘नई दुनिया’, ‘जनसत्ता’ इत्यादि प्रमुख हैं। समाचार-पत्र की उपयोगिता महात्मा गाँधी के इस कथन से भी उजागर होती है-“समाचार-पत्र सच्चाई अथवा वास्तविकता को जानने के लिए पढ़ा जाना चाहिए।’

(ii) रेडियो-आधुनिक काल में रेडियो जनसंचार का एक प्रमुख साधन है, विशेष रूप से दूरदराज के उन क्षेत्रों में जहाँ अभी तक बिजली नहीं पहुंच पाई है या जिन क्षेत्रों के लोग आर्थिक रूप से पिछड़े हैं। भारत में वर्ष 1923 में रेडियो के प्रसारण के प्रारम्भिक प्रयास और वर्ष 1927 में प्रायोगिक तौर पर इसकी शुरुआत के बाद अब तक इस क्षेत्र में अत्यधिक प्रगति हासिल की जा चुकी है और इसका सर्वोत्तम उदाहरण-एफएम रेडियो प्रसारण है। ‘एफएम’ फ्रीक्वेंसी मॉड्यूल का संक्षिप्त रूप है। यह एक ऐसा रेडियो प्रसारण है, जिसमें आवृत्ति को प्रसारण ध्वनि के अनुसार मॉड्यूल किया जाता है। भारत में इसकी शुरुआत 1990 के दशक में हुई थी। स्थानीय स्तर पर ‘एफएम’ प्रसारण के लाभ को देखते हुए देश के कई विश्वविद्यालयों ने इसके माध्यम से अपने शैक्षिक प्रसारण के उद्ददेश्य से अपने-अपने एफएम प्रसारण चैनलों की शुरुआत की है। यही कारण है कि इससे न केवल आम जनता को लाभ पहुँचा है, बल्कि दूरस्थ एवं खुले विश्वविद्यालयों से शिक्षा ग्रहण कर रहे लोगों के लिए भी यह अति लाभप्रद सिद्ध हुआ है। आज एफएम प्रसारण दनियाभर में रेडियो प्रसारण का पसन्दीदा माध्यम बन चुका है, इसका एक कारण इससे उच्च गुणवत्तायुक्त स्टीरियोफोनिक आवाज की प्राप्ति भी है। शुरुआत में इस प्रसारण की देशभर में कवरेज केवल 30% थी, किन्तु अब इसकी कवरेज बढ़कर 60% से अधिक तक जा पहुँची है।

(iii) सेल्यूलर मोबाइल टेलीफोन सेवा–सभी महानगरों और 29 राज्यों के लगभग सभी शहरों के लिए सेवाएँ शुरू हो चुकी हैं। 31 मई, 2013 ई० तक देश में 873.37 मिलियन सेल्यूलर उपभोक्ता थे। नई दूरसंचार नीति के अन्तर्गत सेल्यूलर सेवा के मौजूदा लाइसेंसधारकों को 1 अगस्त, 1999 ई० से राजस्व भागीदारी प्रणाली अपनाने की अनुमति मिल गई। देश के विभिन्न भागों में सेल्यूलर मोबाइल टेलीफोन सेवा चलाने के लिए एम०टी०एन०एल० और बी०एस०एन०एल० को लाइसेंस जारी किए गए। नई नीति के अनुसार सेल्यूलर ऑपरेटरों को यह छूट दी गई कि वे अपने कार्यक्षेत्र में सभी प्रकार की मोबाइल सेवा, जिसमें ध्वनि और गैर-ध्वनि संदेश शामिल हैं, डेटा सेवा और पी०सी०ओ० उपलब्ध करा सकते हैं।

(iv) इण्टरनेट सेवा–नवम्बर, 1998 ई० से इण्टरनेट सेवा निजी भागीदारी के लिए खोल दी गई। इसके बाद सरकार ने देश की प्रत्येक पंचायत में वर्ष 2012 में ब्रॉडबैण्ड की शुरुआत करने का निर्णय लिया। समयानुसार इण्टरनेट आम आदमी की निजी और व्यावसायिक जिन्दगी का अहम हिस्सा बन चुका है। लगभग सभी व्यावसायिक साइटों को इण्टरनेट पर लांच किया जा चुका है। ई-मेल द्वारा मास कैम्पेन चलाना अब एक सामान्य प्रचलन हो चुका है। ‘चैट’ एक ऐसी उपलब्ध सेवा है, जिसके द्वारा इण्टरनेटधारक एक-दूसरे के साथ आपस में ऑनलाइन वार्तालाप कर सकते हैं। ई-गर्वनेंस सरकार की पहली प्राथमिकता है।

उपर्युक्त संचार के माध्यमों के प्रमुख कार्य हैं-लोकमत का निर्माण, सूचनाओं का प्रसार, भ्रष्टाचार एवं घोटालों का पर्दाफाश तथा समाज की सच्ची तसवीर प्रस्तुत करना। इन माध्यमों से लोगों को देश की प्रत्येक गतिविधि की जानकारी तो मिलती ही है, साथ ही उनका मनोरंजन भी होता है। किसी भी देश में जनता का मार्गदर्शन करने के लिए निष्पक्ष एवं निर्भीक संचार माध्यमों का होना आवश्यक है। ये देश की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों की सही तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।

चुनाव एवं अन्य परिस्थितियों में सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों से जन-साधारण को अवगत कराने की जिम्मेदारी भी संचारमाध्यमों को ही वहन करनी पड़ती है। ये सरकार एवं जनता के बीच एक सेतु का कार्य करते हैं। इसे हम मीडिया भी कहते हैं। जनता की समस्याओं को इन माध्यमों से जन-जन तक पहुंचाया जाता है। विभिन्न प्रकार के अपराधों एवं घोटालों का पर्दाफाश कर ये देश एवं समाज का भला करते हैं। इस तरह, ये आधुनिक समाज में लोकतन्त्र के प्रहरी का रूप ले चुके हैं, इसलिए इन्हें लोकतन्त्र के चतुर्थ स्तम्भ की संज्ञा दी गई है। आशा है, आने वाले वर्षों में भारतीय मीडिया अपना कर्तव्य पूरी ईमानदारी के साथ निभाते हुए देश के विकास में और सहयोग करेगा।

उपसंहार–वास्तव में संचारमाध्यम (प्रणाली) ने विश्व की दूरियों को समेटते हुए मानव-जीवन को एक नया मोड़ दिया है। आज हमारा देश संचार टेक्नोलॉजी की दौड़ में निरन्तर आगे बढ़ रहा है। विभिन्न निजी कम्पनियों को भी इसमें विशेष योगदान रहा है, जिसके कारण हम इसे देश के कोने-कोने से जोड़ने में सफल हुए हैं। इस प्रकार संचारमाध्यम के प्रसार ने शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन, व्यवसाय तथा उद्योग के विकास के साथ-साथ मानव-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उन्नति को गति प्रदान की है।

स्वच्छता अभियान की सामाजिक सार्थकता

सम्बद्ध शीर्षक

  • स्वच्छता अभियान [2016, 18]

प्रमुख विचार-बिन्दु–

  1. प्रस्तावना,
  2. मोदी जी की स्वच्छता अभियान की संकल्पना,
  3. स्वच्छता अभियान की शुरुआत,
  4. स्वच्छता अभियान हेतु नवरत्नों की घोषणा,
  5. स्वच्छता अभियान का प्रारूप-(i) शहरी क्षेत्रों के लिए, (ii) ग्रामीण क्षेत्रों के लिए, (ii) विद्यालयों के लिए,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना–‘स्वच्छता अभियान’ एक राष्ट्र स्तरीय अभियान है। गाँधी जी की 145वीं जयन्ती के अवसर पर माननीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने इस अभियान के आरम्भ की घोषणा की। यह अभियान प्रधानमन्त्री जी की महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक है। 2 अक्टूबर, 2014 को उन्होंने राजपथ पर जनसमूह को सम्बोधित करते हुए सभी राष्ट्रवासियों से स्वच्छता अभियान में भाग लेने और इसे सफल बनाने की अपील की। साफ-सफाई के सन्दर्भ में देखा जाए तो यह अभियान अब तक का सबसे बड़ा स्वच्छता अभियान है।

साफ-सफाई को लेकर दुनिया भर में भारत की छवि बदलने के लिए प्रधानमन्त्री जी बहुत गम्भीर हैं। उनकी इच्छा स्वच्छता अभियान को एक जन-आन्दोलन बनाकर देशवासियों को गम्भीरतापूर्वक इससे जोड़ने की है। हमारे नवनिर्वाचित प्रधानमन्त्री जी ने 2 अक्टूबर के दिन सर्वप्रथम गाँधी जी को राजघाट पर श्रद्धांजलि अर्पित की और फिर नई दिल्ली स्थित वाल्मीकि बस्ती में जाकर झाड़ लगाई। कहा जाता है। कि वाल्मीकि बस्ती दिल्ली में गाँधी जी का सबसे प्रिय स्थान था। वे अक्सर यहाँ आकर ठहरते थे।

इसके बाद मोदी जी ने जनपथ जाकर स्वच्छता अभियान की शुरुआत की। इस अवसर पर उन्होंने लगभग 40 मिनट का भाषण दिया और स्वच्छता के प्रति लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया। अपने भाषण के दौरान उन्होंने महात्मा गाँधी और लालबहादुर शास्त्री का जिक्र करते हुए बड़ी ही खूबसूरती से इन दोनों महापुरुषों को इस अभियान से जोड़ दिया। उन्होंने कहा-“गाँधी जी ने आजादी से पहले नारा दिया था, ‘क्विट इण्डिया क्लीन इण्डिया। आजादी की लड़ाई में उनका साथ देकर देशवासियों ने ‘क्विट इण्डिया’ के सपने को तो साकार कर दिया, लेकिन अभी उनका ‘क्लीन इण्डिया का सपना अधूरा है।”

मोदी जी की स्वच्छता अभियान की संकल्पना-माननीय मोदी जी की स्वच्छता अभियान की संकल्पना यह है कि देश के प्रत्येक शहरी और ग्रामीण परिवार में एक स्वच्छ शौचालय हो, जिन घर-परिवारों में स्थानाभाव के कारण शौचालय बनाया जाना सम्भव न हो, वहाँ पर सुलभ सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण किया जाए। देश के प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक के प्रत्येक विद्यालय में छात्र-छात्राओं के लिए स्वच्छ और पृथक्-पृथक् शौचालय हों। उनकी इस संकल्पना से जहाँ सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा समाप्त होगी, वहीं देश की उन करोड़ों महिलाओं को सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर प्राप्त होगा, जिनको खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है। उन बालिकाओं के विद्यालय जाने का मार्ग प्रशस्त होगा, जो विद्यालयों में अलग शौचालयों की व्यवस्था न होने के कारण विद्यालय नहीं जा पातीं।

मोदी जी की स्वच्छता अभियान की संकल्पना केवल शौचालयों के निर्माण तक ही सीमित नहीं है। उनका प्रयास है कि देश का प्रत्येक कोना स्वच्छ हो। इसके लिए देश के प्रत्येक नागरिक की भागेदारी आवश्यक है। उन्होंने देश के सवा सौ करोड़ नागरिकों का आह्वान किया कि देश के प्रत्येक नागरिक को यह संकल्प लेना होगा कि वह न स्वयं गन्दगी फैलाएगा और न दूसरों को फैलाने देगा। यदि देश का प्रत्येक नागरिक अपनी इस जिम्मेदारी को समझे तो देश गन्दा ही न होगा और सारा देश स्वत: ही स्वच्छ हो जाएगा। | स्वच्छता अभियान की शुरुआत-स्वच्छता अभियान की शुरुआत माननीय मोदी जी ने महात्मा गाँधी जी की जयन्ती पर 2 अक्टूबर, 2014 ई० को राजपथ से लोगों को स्वच्छता की शपथ दिलाकर की। इस दिन उन्होंने स्वयं मन्दिर मार्ग, नई दिल्ली स्थित वाल्मीकि बस्ती जाकर झाडू लगाकर फुटपाथ की सफाई की और स्वच्छता अभियान के अन्तर्गत बने पहले जैविक शौचालय (बायो टॉयलेट) को जनता को समर्पित किया।

स्वच्छता अभियान हेतु नवरत्नों की घोषणा–स्वच्छता अभियान से देश के प्रत्येक नागरिक को जोड़ने के लिए माननीय प्रधानमन्त्री जी ने 2 अक्टूबर को ही देश के नौ प्रतिष्ठित लोगों को नवरत्नों के रूप में नामांकित किया, जिनसे प्रेरणा ग्रहण करके देश के लोग स्वच्छता अभियान में पूर्ण मनोयोग से लग जाएँ। उनके ये नवरत्न हैं—अनिल अम्बानी, सचिन तेन्दुलकर, सलमान खान, प्रियंका चौपड़ा, बाबा रामदेव, कमल हसन, मृदुला सिन्हा, शशि थरूर और शाजिया इल्मी। इसके अलावा उन्होंने टी०वी० सीरियल ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ की सम्पूर्ण टीम को भी नामित किया है।

इसी प्रकार, 7 नवम्बर, 2014 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी के असी घाट पर मोदी जी ने स्वच्छता अभियान के लिए उत्तर प्रदेश के नवरत्नों के रूप में भी नौ प्रसिद्ध लोगों को नामांकित किया। इन नौ लोगों में प्रदेश के मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव, क्रिकेटर मुहम्मद कैफ तथा सुरेश रैना, हास्य टी०वी० कलाकार राजू श्रीवास्तव, सूफी गायक कैलाश खेर, भोजपुरी फिल्म अभिनेता मनोज तिवारी, लेखक मनु शर्मा, संस्कृत विद्वान् पद्मश्री प्रोफेसर देवीप्रसाद द्विवेदी, आन्ध्र विश्वविद्यालय चित्रकूट के कुलपति जगद्गुरु रामभद्राचार्य सम्मिलित हैं।

मोदी जी ने इन लोगों के नामांकन के साथ इन सभी का आह्वान किया कि ये सभी लोग अपने स्तर पर नौ-नौ और लोगों को इस अभियान हेतु नामांकित करें, फिर वे लोग दूसरे नौ-नौ लोगों को नामांकित करें। इस प्रकार लोगों की एक श्रृंखला बनती चली जाएगी और देश के सभी लोग इस अभियान से जुड़कर भारत को स्वच्छ बनाने में सफल होंगे।

स्वच्छता अभियान का प्रारूप-स्वच्छता अभियान भारत सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर चलाया गया जन-आन्दोलन है, जिसका प्रयास सन् 2019 तक सम्पूर्ण भारत को स्वच्छ बनाना है। सरकारी सहायता हेतु इस अभियान को तीन क्षेत्रों में विभक्त किया गया है-

(i) शहरी क्षेत्रों के लिए अभियान का उद्देश्य 1.04 करोड़ परिवारों को लक्षित करते हुए 2.5 लाख सामुदायिक शौचालय, 2.6 लाख सार्वजनिक शौचालय और प्रत्येक शहर में एक ठोस अपशिष्ट प्रबन्धन की सुविधा प्रदान करना है। इस कार्यक्रम के तहत आवासीय क्षेत्रों में जहाँ व्यक्तिगत घरेलु शौचालयों का निर्माण करना मुश्किल है वहाँ सामुदायिक शौचालयों का निर्माण करना तथा पर्यटन स्थलों, बाजारों, बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों जैसे प्रमुख स्थानों पर भी सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण करना प्रस्तावित है। यह कार्यक्रम पाँच साल की अवधि में 4401 शहरों में लागू किया जाएगा। इस कार्यक्रम में खुले में शौच करने को रोकना, स्वच्छ शौचालयों को फ्लश शौचालयों में परिवर्तित करने, मैला ढोने की प्रथा का उन्मूलन करने, नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट प्रबन्धन और स्वास्थ्य एवं स्वच्छता से जुड़ी प्रथाओं के सम्बन्ध में लोगों के व्यवहार में परिवर्तन लाने के कार्यक्रम शामिल हैं।

(ii) ग्रामीण क्षेत्रों के लिए स्वच्छता अभियान भारत सरकार द्वारा चलाया जा रहा ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के लिए माँग-आधारित एवं जन-केन्द्रित अभियान है, जिसमें लोगों की स्वच्छता सम्बन्धी आदतों को बेहतर बनाना, स्वसुविधाओं की माँग उत्पन्न करना और स्वच्छता सुविधाओं को उपलब्ध कराना शामिल है, जिससे ग्रामीणों के जीवन-स्तर को बेहतर बनाया जा सके। अभियान का उद्देश्य पाँच वर्षों में भारत को खुला शौच से मुक्त देश बनाना है। अभियान के तहत देश में लगभग 11 करोड़ 11 लाख शौचालयों के निर्माण के लिए एक लाख चौंतीस हजार करोड़ रुपये खर्च किए जाएँगे। बड़े पैमाने पर प्रौद्योगिकी का उपयोग कर ग्रामीण भारत में कचरे को इस्तेमाल उसे पूँजी का रूप देते हुए जैव उर्वरक और ऊर्जा के विभिन्न रूपों में परिवर्तित करे – लिए किया जाएगा। अभियान को युद्ध-स्तर पर प्रारम्भ कर ग्रामीण आबादी और कूल शिक्षकों व छात्रों के बड़े वर्गों के अलावा प्रत्येक स्तर पर इस प्रयास में देश भर की ग्रामीण पंचायत, समिति और जिला परिषद् को भी इससे जोड़ा जाना है।

(iii) विद्यालयों के लिए मानव संसाधन विकास मन्त्रालय के अधीन स्वच्छ विद्यालय अभियान 25 सितम्बर, 2014 से 31 अक्टूबर, 2014 ई० के बीच केन्द्रीय विद्यालयों और नवोदय विद्यालयों में आयोजित किया गया। इस दौरान की जाने वाली गतिविधियाँ इस प्रकार रहीं–

  • शिक्षकगण स्कूल कक्षाओं के दौरान प्रतिदिन बच्चों के साथ सफाई और स्वच्छता के विभिन्न पहलुओं पर, विशेष रूप से महात्मा गाँधी जी की स्वच्छता और अच्छे स्वास्थ्य से जुड़ी शिक्षाओं के सम्बन्ध में बात करें।
  • कक्षा, प्रयोगशाला और पुस्तकालयों आदि की सफाई करना।
  • स्कूल में स्थापित किसी भी मूर्ति या स्कूल की स्थापना करने वाले व्यक्ति के योगदान के बारे में बात करना और इनकी मूर्तियों की सफाई करना।
  • शौचालयों और पीने के पानी वाले क्षेत्रों की सफाई करना।
  • रसोई और भण्डार-गृह की सफाई करना।
  • स्कूल एवं बगीचों का रख-रखाव और सफाई करना।
  • खेल के मैदान की सफाई करना।
  • स्कूल-भवन का वार्षिक रख-रखाव, रँगाई एवं पुताई के साथ।
  • निबन्ध, वाद-विवाद, चित्रकला, सफाई और स्वच्छता पर प्रतियोगिताओं का आयोजन करना।
  • बाल मन्त्रिमण्डलों का निगरानी दल बनाना और सफाई अभियान की निगरानी करना।

इसके अलावा फिल्म-शो, स्वच्छता पर निबन्ध/पेन्टिग और अन्य प्रतियोगिताओं, नाटकों आदि के आयोजन द्वारा स्वच्छता एवं अच्छे स्वास्थ्य का सन्देश प्रसारित करना। मन्त्रालय ने इसके अलावा स्कूलों के छात्रों, शिक्षकों, अभिभावकों और समुदाय के सदस्यों को शामिल करते हुए सप्ताह में दो बार आधे घण्टे सफाई अभियान शुरू करने का प्रस्ताव भी रखा।

उपसंहार—आशा की जा सकती है कि स्वच्छता अभियान की संकल्पना निश्चय ही साकार होगी; क्योंकि जिस अभियान के प्रणेता माननीय नरेन्द्र मोदी जैसे कर्मठ, श्रमशील, ईमानदार और राष्ट्रवादी व्यक्ति हों उसकी सफलता में किसी प्रकार का सन्देह नहीं किया जा सकता है। जिस दिन यह अभियान सफलतापूर्वक सम्पन्न हो जाएगा उस दिन न केवल कश्मीर, वरन् सम्पूर्ण भारत देश धरती का स्वर्ग कहलाएगा।

मानव-जीवन में योग शिक्षा का महत्त्व

सम्बद्ध शीर्षक

  • योग शिक्षा : आवश्यकता और उपयोगिता (2016)

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. योग का अर्थ,
  3. योग की आवश्यकता,
  4. योग की उपयोगिता,
  5. योग के सामान्य नियम
  6. योग से लाभ,
  7. उपसंहार।।

प्रस्तावना-योगासन शरीर और मन को स्वस्थ रखने की प्राचीन भारतीय प्रणाली है। शरीर को किसी ऐसे आसन या स्थिति में रखना जिससे स्थिरता और सुख का अनुभव हो, योगासन कहलाता है। योगासन शरीर की आन्तरिक प्रणाली को गतिशील करता है। इससे रक्त-नलिकाएँ साफ होती हैं तथा प्रत्येक अंग में शुद्ध वायु का संचार होता है जिससे उनमें स्फूर्ति आती है। परिणामत: व्यक्ति में उत्साह और कार्य-क्षमता का विकास होता है तथा एकाग्रता आती है।

योग का अर्थ-योग, संस्कृत के यज् धातु से बना है, जिसका अर्थ है, संचालि। ५५ म्वद्ध करना, सम्मिलित करना अथवा जोड़ना। अर्थ के अनुसार विवेचन किया जाए तो शरीर एवं आत्मा का मि : ही योग कहलाता है। यह भारत के छः दर्शनों, जिन्हें षड्दर्शन कहा जाता है, में से एक है। अन्य दर्शन हैं-न्याय, वैशेषिक, सांख्य, वेदान्त एवं मीमांसा। इसकी उत्पत्ति भारत में लगभग 5000 ई०पू० में हुई थी। पहले यह विद्या गुरु-शिष्य परम्परा के तहत पुरानी पीढ़ी से नई पीढ़ी को हस्तांतरित होती थी। लगभग 200 ई०पू० में महर्षि पतञ्जलि ने योग-दर्शन को योग-सूत्र नामक ग्रन्थ के रूप में लिखित रूप में प्रस्तुत किया। इसलिए महर्षि पतञ्जलि को ‘योग का प्रणेता’ कहा जाता है। आज बाबा रामदेव ‘योग’ नामक इस अचूक विद्या का देश-विदेश में प्रचार कर रहे हैं।

योग की आवश्यकता–शरीर के स्वस्थ रहने पर ही मस्तिष्क स्वस्थ रहता है। मस्तिष्क से ही शरीर की समस्त क्रियाओं का संचालन होता है। इसके स्वस्थ और तनावमुक्त होने पर ही शरीर की सारी क्रियाएँ भली प्रकार से सम्पन्न होती हैं। इस प्रकार हमारे शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक विकास के लिए योगासन अति आवश्यक है।

हमारा हृदय निरन्तर कार्य करता है। हमारे थककर आराम करने या रात को सोने के समय भी हृदय गतिशील रहता है। हृदय प्रतिदिन लगभग 8000 लीटर रक्त को पम्प करता है। उसकी यह क्रिया जीवन भर चलती रहती है। यदि हमारी रक्त-नलिकाएँ साफ होंगी तो हृदय को अतिरिक्त मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। इससे हृदय स्वस्थ रहेगा और शरीर के अन्य भागों को शुद्ध रक्त मिल पाएगा, जिससे नीरोग व सबल हो जाएँगे। फलतः व्यक्ति की कार्य-क्षमता भी बढ़ जाएगी।

योग की उपयोगिता-मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए हमारे जीवन में योग अत्यन्त उपयोगी है। शरीर, मन एवं आत्मा के बीच सन्तुलन अर्थात् योग स्थापित करना होता है। योग की प्रक्रियाओं में जब तन, मन और आत्मा के बीच सन्तुलन एवं योग (जुड़ाव) स्थापित होता है, तब आत्मिक सन्तुष्टि, शान्ति एवं चेतना का अनुभव होता है। योग शरीर को शक्तिशाली एवं लचीला बनाए रखता है, साथ ही तनाव से भी छुटकारा दिलाता है। यह शरीर के जोड़ों एवं मांसपेशियों में लचीलापन लाता है, मांसपेशियों को मजबूत बनाता है, शारीरिक विकृतियों को काफी हद तक ठीक करता है, शरीर में रक्त प्रवाह को सुचारु करता है तथा पाचन-तन्त्र को मजबूत बनाती है। इन सबके अतिरिक्त यह शरीर की रोग-प्रतिरोधक शक्तियाँ बढ़ाता है, कई प्रकार की बीमारियों जैसे अनिद्रा, तनाव, थकान, उच्च रक्तचाप, चिन्ता इत्यादि को दूर करता है तथा शरीर को ऊर्जावान बनाता है। आज की भाग-दौड़ भरी जिन्दगी में स्वस्थ रह पाना किसी चुनौती से कम नहीं है। अतः हर आयु-वर्ग के स्त्री-पुरुष के लिए योग उपयोगी है।

योग के सामान्य नियम-योगासन उचित विधि से ही करना चाहिए अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि की सम्भावना रहती है। योगासन के अभ्यास से पूर्व उसके औचित्य पर भी विचार कर लेना चाहिए। बुखार से ग्रस्त तथा गम्भीर रोगियों को योगासन नहीं करना चाहिए। योगासन करने से पहले नीचे दिए सामान्य नियमों की जानकारी होनी आवश्यक है-

  1. प्रातः काल शौचादि से निवृत्त होकर ही योगासन का अभ्यास करना चाहिए। स्नान के बाद योगासन करना और भी उत्तम रहता है।
  2. सायंकाल खाली पेट पर ही योगासन करना चाहिए।
  3. योगासन के लिए शान्त, स्वच्छ तथा खुले स्थान का चयन करना चाहिए। बगीचे अथवा पार्क में योगासन करना अधिक अच्छा रहता है।
  4. आसन करते समय कम, हलके तथा ढीले-ढाले वस्त्र पहनने चाहिए।
  5. योगासन करते समय मन को प्रसन्न, एकाग्र और स्थिर रखना चाहिए। कोई बातचीत नहीं करनी चाहिए।
  6. योगासन के अभ्यास को धीरे-धीरे ही बढ़ाएँ।
  7. योगासन का अभ्यास करने वाले व्यक्ति को हलका, शीघ्र पाचक, सात्विक और पौष्टिक भोजन करना चाहिए।
  8. अभ्यास के आरम्भ में सरल योगासन करने चाहिए।
  9. योगासन के अन्त में शिथिलासन अथवा शवासन करना चाहिए। इससे शरीर को विश्राम मिल जाता है तथा मन शान्त हो जाता है।
  10. योगासन करने के बाद आधे घण्टे तक न तो स्नान करना चाहिए और न ही कुछ खाना चाहिए।

योग से लाभ-छात्रों, शिक्षकों एवं शोधार्थियों के लिए योग विशेष रूप से लाभदायक सिद्ध होता है, क्योंकि यह उनके मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ाने के साथ-साथ उनकी एकाग्रता भी बढ़ाता है जिससे उनके लिए अध्ययन-अध्यापन की प्रक्रिया सरल हो जाती है।

पतञ्जलि के योग-सूत्र के अनुसार आसनों की संख्या 84 है। जिनमें भुजंगासन, कोणासन, पद्मासन, मयूरासन, शलभासन, धनुरासन, गोमुखासन, सिंहासन, वज्रासन, स्वस्तिकासन, पवर्तासन, शवासन, हलासन, शीर्षासन, धनुरासन, ताड़ासन, सर्वांगासन, पश्चिमोत्तानासन, चतुष्कोणासन, त्रिकोणासन, मत्स्यासन, गरुड़ासन इत्यादि कुछ प्रसिद्ध आसन हैं। योग के द्वारा शरीर पुष्ट होता है, बुद्धि और तेज बढ़ता है, अंग-प्रत्यंग में उष्ण रक्त प्रवाहित होने से स्फूर्ति आती है, मांसपेशियाँ सुदृढ़ होती हैं, पाचन शक्ति ठीक रहती है तथा शरीर स्वस्थ और हल्का प्रतीत होता है। योग के साथ मनोरंजन का समावेश होने से लाभ द्विगुणित होता है। इससे मन प्रफुल्लित रहता है और योग की थकावट भी अंनुभव नहीं होती। शरीर स्वस्थ होने से सभी इन्द्रियाँ सुचारु रूप से काम करती हैं। योग से शरीर नीरोग, मन प्रसन्न और जीवन सरस हो जाती है।

उपसंहार-आज की आवश्यकता को देखते हुए योग शिक्षा की बेहद आवश्यकता है, क्योंकि सबसे बड़ा सुख शरीर का स्वस्थ होना है। यदि आपको शरीर स्वस्थ है तो आपके पास दुनिया की सबसे बड़ी दौलत है। स्वस्थ व्यक्ति ही देश और समाज का हित कर सकता है। अत: आज की भाग-दौड़ की जिन्दगी में खुद को स्वस्थ एवं ऊर्जावान बनाए रखने के लिए योग बेहद आवश्यक है। वर्तमान परिवेश में योग न सिर्फ हमारे लिए लाभकारी है, बल्कि विश्व के बढ़ते प्रदूषण एवं मानवीय व्यस्तताओं से उपजी समस्याओं के निवारण के संदर्भ में इसकी सार्थकता और बढ़ गई है।

विज्ञापनों का हमारे जीवन पर प्रभाव

सम्बद्ध शीर्षक

  • विज्ञापन की दुनिया (2016)

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2. विज्ञापन का उद्देश्य,
  3. विज्ञापन की विशेषताएँ,
  4. विज्ञापन के लाभ व हानियाँ,
  5. पत्रकारिता के मूल्यों का ह्रास,
  6. विज्ञापन के प्रभाव,
  7. उपसंहार।

प्रस्तावना–“विज्ञापन समाज एवं व्यापार जगत् में होने वाले परिवर्तन को प्रदर्शित करने वाला उद्योग है, जो बदलते समय के साँचे में तेजी से ढल जाता है। ऐसा भारत में ‘ऐडगुरु’ के नाम से विख्यात प्रसून जोशी का मानना है। आज हमारे चारों ओर संचार-तन्त्र का जाल-सा बिछा हैं। एक ओर हमारे जीवन में पुस्तकें, पत्रिकाएँ, समाचार-पत्र जैसे प्रिण्ट मीडिया के साधनों की भरमार है, तो दूसरी ओर हम घर से बाहर तक रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा, कम्प्यूटर, मोबाइल जैसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अत्याधुनिक साधनों से घिरे हुए हैं, किन्तु यदि हम कहें कि मीडिया के इन सारे साधनों पर सर्वाधिक आधिपत्य विज्ञापन का है, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी, क्योंकि विज्ञापन न केवल इनकी आय का मुख्य स्रोत है वरन् पूरे संचार-तन्त्र का अपना गहरा प्रभाव भी छोड़ता है। तभी तो मार्शल मैकलुहन ने इसे बीसवीं सदी का सर्वोत्तम कला-विधान की संज्ञा दी है।

विज्ञापन का उद्देश्य–विज्ञापन का मुख्य उद्देश्य उत्पाद को प्रभावी तरीके से आम जन तक पहुँचाना होता है। सचमुच एक छोटा-सा विज्ञापन भला क्या नहीं कर सकता! हिट हो जाए तो एक सामान्य से उत्पाद को आसमान की बुलन्दियों तक पहुँचा सकता है। विज्ञापन की बानगी देखिए-“दो बूंद जिन्दगी की’ (पोलियो उन्मूलन), ‘जागो रे’ (टाटा चाय), ‘दाग अच्छे हैं’ (सर्फ एक्सेल) अथवा ‘नो उल्लू बनाईंग’ (आइडिया मोबाइल) जैसे विज्ञापन इतने प्रचलित हुए कि सहज ही लोगों की जुबान पर चढ़ गए। यद्यपि रेडियो या टेलीविजन के प्रसारण के छोटे-से समय अथवा समाचार-पत्रों के छोटे से हिस्से के द्वारा विज्ञापनों को अपना उद्देश्य पूरा करना पड़ता है, फिर भी इनमें रचनात्मकता देखते ही बनती है। इसमें दो राय नहीं है कि मैगी, साबुन, शैम्पू, मोबाइल जैसे उत्पादों में वृद्धि का कारण इनके रचनात्मक विज्ञापन ही हैं और वर्तमान समय का सच भी यही है कि आज किसी भी उत्पाद के प्रचार-प्रसार का सबसे प्रभावशाली माध्यम विज्ञापन ही है।

प्रसून जोशी के शब्दों में-“विज्ञापन का क्षेत्र अति सृजनात्मक है। मैं विज्ञापन लिखने के दौरान तुकबन्दी न कर पूरी कविता की रचना करता हूँ; जैसे-उम्मीदों वाली धूप, सनशाइन वाली आशा अथवा हाँ मैं क्रेजी हूँ! एक अच्छा विज्ञापन लोगों के दिल में उतर जाता है और वे ब्राण्ड से जुड़ जाते हैं।”

विज्ञापन, उपभोक्ताओं को शिक्षित एवं प्रभावित करने वाले दृष्टिकोण से निर्माताओं, थोक विक्रेताओं और खुदरा विक्रेताओं की ओर विचारों, उत्पादों एवं सेवाओं से सम्बन्धित सन्देशों का अव्यक्तिगत संचार है। यह मुद्रित, ऑडियो अथवा वीडियो रूप में हो सकता है। इसके प्रसारण के लिए समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं, रेडियो, टेलीविजन एवं फिल्मों को माध्यम बनाया जाता है। इनके अतिरिक्त होर्डिंग्स, बिलबोर्ड्स, पोस्टर्स इत्यादि का प्रयोग भी विज्ञापन के लिए किया जाता है। जूते-चप्पल से लेकर लिपस्टिक, पाउडर एवं दूध-दही यानी दुनिया की ऐसी कौन-सी चीज है, जिसका विज्ञापन किसी-न-किसी रूप में कहीं प्रकाशित न होता हो! यहाँ तक कि विवाह के लिए वर या वधू की तलाश हेतु भी विज्ञापन प्रकाशित एवं प्रसारित होते हैं।

विज्ञापन की विशेषताएँ-विज्ञापन की विशेषताओं पर गौर करें, तो पता चलता है कि ये सन्देश के अव्यक्तिगत संचार होते हैं। इनका उद्देश्य वस्तुओं एवं सेवाओं का संवर्द्धन करना होता है। इनके प्रायोजक द्वारा लोगों को वस्तुओं एवं सेवाओं को खरीदने के लिए प्रेरित करने वाला एक सन्देश प्रेषित किया जाता है। इस तरह, विज्ञापन संचार का भुगतान किया हुआ एक रूप है।

विज्ञापन से कई प्रकार के लाभ होते हैं। यह उत्पादों, मूल्यों, गुणवत्ता, बिक्री सम्बन्धी जानकारियों, विक्रय उपरान्त सेवाओं इत्यादि के बारे में उपयोगी सूचनाएँ प्राप्त करने में उपभोक्ताओं की मदद करता है। यह नए उत्पादों के प्रस्तुतीकरण, वर्तमान उत्पादों के उपभोक्ताओं को बनाए रखने और नए उपभोक्ताओं को आकर्षित कर अपनी बिक्री बढ़ाने में निर्माताओं की मदद करता है। यह लोगों को अधिक सुविधा, आराम, बेहतर जीवन-पद्धति उपलब्ध कराने में सहायक होता है।

इन सबके अतिरिक्त, विज्ञापन समाचार-पत्र, रेडियो एवं टेलीविजन की आय का प्रमुख स्रोत होता है। यदि सही मात्रा में इन माध्यमों को विज्ञापन न मिलें, तो इन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जो समाचार-पत्र हम दो या तीन रुपये में खरीदते हैं, उसकी छपाई का ही व्यय दस रुपये से अधिक होता है। फिर प्रश्न उठता है कि हमें कम कीमत पर यह कैसे उपलब्ध हो जाता है। दरअसल, विज्ञापनों से प्राप्त आय से इसकी भरपाई की जाती है। इस तरह स्पष्ट है कि यदि संचार माध्यमों को पर्याप्त विज्ञापन न मिलें, तो इनके बन्द होने का खतरा हो सकता है। बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ ही आज खेल-कूद आयोजनों एवं कार्यक्रमों को प्रायोजित करती हैं। टेलीविजन पर सीधा प्रसारण हो या रेडियो पर ऑखों देखा हाल, इन सबको बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ ही प्रसारित करती हैं और इसका उद्देश्य होता है—उनकी वस्तुओं एवं सेवाओं का विज्ञापन। इस तरह, विज्ञापन के कारण ही लोगों का मनोरंजन भी होता है। आजकल टेलीविजन पर अत्यधिक मात्रा में प्रसारित विज्ञापनों के कारण लोगों को इससे अरुचि होने लगी है। इस बात से कैसे इनकार किया जा सकता है कि यदि विज्ञापन न हों, तो किसी कार्यक्रम का प्रसारण भी नहीं हो पाएगा। इस तरह देखा जाए, तो विज्ञापन के कारण ही लोगों का मनोरंजन हो पाता है। खिलाड़ियों के लिए विज्ञापन कुबेर का खजाना बन चुके हैं।

आजकल तकनीक एवं प्रौद्योगिकी में प्रगति के साथ ही विज्ञापन संचार के सशक्त माध्यम के रूप में उभरे हैं। समाचार-पत्र एवं रेडियो, टेलीविज़न ही नहीं, इण्टरनेट पर भी आजकल विभिन्न प्रकार के विज्ञापनों को देखा जा सकता है। सरकार की विकासोन्मुखी योजनाएँ-साक्षरता अभियान, परिवार नियोजन, महिला सशक्तीकरण, कृषि एवं विज्ञान सम्बन्धी योजनाएँ, पोलियो एवं कुष्ठ निवारण अभियान इत्यादि विज्ञापन के माध्यम से ही त्वरित ति से क्रियान्वित होकर प्रभावकारी सिद्ध होती हैं। इस तरह से विज्ञापन समाजसेवा में भी सहायक होता है। फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन एवं अभिनेत्री ऐश्वर्या राय द्वारा ‘पोलियो मुक्त अभियान के लिए प्रस्तुत किया गया विज्ञापन ‘दो बूंद जिन्दगी की’ इसका जीता-जागता उदाहरण है। इस विज्ञापन का जनमानस पर गहरा प्रभाव पड़ा है।

केवल व्यावसायिक लाभों के लिए कम्पनियों द्वारा ही विज्ञापनों का प्रसारण या प्रकाशन नहीं किया जाता। अब राजनीतिक दल भी अपने विचारों एवं योजनाओं को जन-जन तक पहुँचाने के लिए विज्ञापन का सहारा लेते हैं। इस तरह, चुनावों के समय लोकमत के निर्माण में भी विज्ञापनों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। बिल बर्नबेक के अनुसार, विज्ञापन का सर्वाधिक शक्तिशाली तत्त्व सच है।

विज्ञापन के लाभ व हानियाँ-विज्ञापन से यदि कई लाभ हैं, तो इससे हानियाँ भी कम नहीं हैं। विज्ञापन पर किए गए व्यय के कारण उत्पाद के मूल्य में वृद्धि होती है। उदाहरण के तौर पर ठण्डे पेय पदार्थों को ही लीजिए। जो ठण्डा पेय पदार्थ बाजार में दस रुपये में उपलब्ध होता है, उसका लागत मूल्य मुश्किल से 5 से 7 रुपये के आस-पास होता है, किन्तु इसके विज्ञापन पर करोड़ों रुपये व्यय किये जाते हैं। इसलिए इनकी कीमत में अनावश्यक वृद्धि होती है।

कभी-कभी विज्ञापन हमारे सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों को भी क्षति पहुँचाता है। भारत में पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव एवं उपभोक्तावादी संस्कृति के विकास में विज्ञापनों का भी हाथ है। ‘वैलेण्टाइन डे’ हो यो ‘न्यू ईयर ईव’ बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ इनका लाभ उठाने के लिए विज्ञापनों का सहारा लेती हैं। इण्टरनेट से लेकर गली-मुहल्ले तक में इनसे सम्बन्धित सामानों को बाजार लग जाता है। इस तरह कम्पनियों को करोड़ों को लाभ होता है तथा ग्राहकों को भी उचित मूल्य पर वस्तुएँ प्राप्त हो जाती हैं।

पत्रकारिता के मूल्यों का ह्रास–विज्ञापन से होने वाली एक और हानि यह है कि विज्ञापनदाताओं के विरुद्ध किसी भी प्रकार का भण्डाफोड़ करने से जनसंचार माध्यम बचते हैं। विज्ञापनों से होने वाले आर्थिक लाभ के कारण धन लेकर समाचार प्रकाशित करने की प्रवृत्ति भी आजकल बढ़ रही है। इससे पत्रकारिता के मूल्यों का ह्रास हुआ है। मीडिया को लोकतन्त्र का चतुर्थ स्तम्भ कहा जाता है। विज्ञापनदाताओं के अनुचित प्रभाव एवं व्यावसायिक लाभ को प्राथमिकता देने के कारण मीडिया के उद्देश्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है। कई बार यह भी देखने में आता है कि सरकारी विज्ञापनों के लोभ में समाचार-पत्र एवं टीवी चैनल सरकार के विरोध में कुछ प्रकाशित या प्रसारित नहीं करते।।

विज्ञापन से एकाधिकार की प्रवृत्ति का भी सृजन होता है। माइक्रोसॉफ्ट प्रारम्भ से ही यह प्रयास करती रही है कि कम्प्यूटर की दुनिया में उसका एकाधिकार रहे। इसके लिए वह समस-समय पर विज्ञापनों का सहारा लेती है। विज्ञापनों के माध्यम से एकाधिकार की लड़ाई का सबसे अच्छा उदाहरण कोकाकोला एवं पेप्सी कम्पनियों के बीच विज्ञापनों की होड़ है। यह हमेशा माँग में वृद्धि करवाने में सहायक होता है।

विज्ञापन के प्रभाव-लुभावने विज्ञापनों द्वारा हमारी सोच को बीमार कर दिया जाता है और हम उनकी ओर स्वयं को बँधे हुए पाते हैं। आज मुँह धोने के लिए हजारों किस्म के साबुन और फेशवास तथा मुख की कांति को बनाए रखने के लिए हजारों प्रकार की क्रीम मिल जाएँगे, जिनमें विज्ञापनों द्वारा हमें यह विश्वास दिला दिया जाता है कि यह क्रीम हमें जवान और सुंदर बना देगा। रंग यदि काला है तो वह गोरा हो जाएगा। इन विज्ञापनों में सत्यता लाने के लिए बड़े-बड़े खिलाड़ियों और फिल्मी कलाकारों को लिया जाता है। हम इन कलाकारों की बातों को सच मानकर अपना पैसा पानी की तरह बहाते हैं परन्तु नतीजा कुछ भी सच नहीं निकलता।

हमें विज्ञापन देखकर जानकारी अवश्य लेनी चाहिए परन्तु विज्ञापनों को देखकर वस्तुएँ नहीं लेनी चाहिए। विज्ञापनों में जो दिखाया जाता है, वह शत-प्रतिशत सही नहीं होता। विज्ञापन हमारी सहायता करते हैं कि बाजार में किस प्रकार की सामग्री आ गई है। हमें विज्ञापनों द्वारा वस्तुओं की जानकारियाँ प्राप्त होती हैं। विज्ञापन ग्राहक और निर्माता के बीच कड़ी का काम करते हैं।

ग्राहकों को अपने उत्पादों की बिक्री करने के लिए विज्ञापनों द्वारा आकर्षित किया जाता है। लेकिन इनके प्रयोग करने पर ही हमें उत्पादों की गुणवत्ता का सही पता चलता है। आज आप कितने ही ऐसे साबुन, क्रीम और पाउडरों के विज्ञापनों को देखते होंगे जिनमें यह दावा किया जाता है कि यह साँवले रंग को गोरा बना देता है, परन्तु ऐसा नहीं होता है। लोग अपने पैसे व्यर्थ में बरबाद कर देते हैं। उनके हाथ मायूसी ही लगती है। हमें चाहिए कि सोच-समझकर उत्पादों का प्रयोग करें। विज्ञापन हमारी सहायता अवश्य कर सकते हैं परन्तु कौन-सा उत्पाद हमारे काम का है या नहीं यह हमें तय करना चाहिए।

उपसंहार-विज्ञापन की दुनिया एक रोचक दुनिया है। जहाँ जैसा है, ग्लैमर है, शोहरत है एवं सफलता की ऊँचाइयाँ हैं। कई मॉडलों के प्रसिद्ध होने में विज्ञापनों का योगदान रहा है। कई फिल्मों के हिट होने के पीछे भी विज्ञापन की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। विज्ञापन की दुनिया की सबसे खास बात इसकी रचनात्मकता होती है। कुछ विज्ञापन तो हास्य-व्यंग्य से भी भरपूर होते हैं, जिसके कारण इनसे भी लोगों का अच्छा मनोरंजन हो जाता है। नि:सन्देह जानकारी बढ़ाने, मेल-मिलाप करने जैसे सकारात्मक साधन के रूप में कार्य करने पर विज्ञापन जनकल्याण के साथ-साथ देशहित में भी सहायक होगा। नॉर्मन डगलस से कहा भी है-“आप अपने विज्ञापनों के माध्यम से राष्ट्र के आदर्शों को प्रकट कर सकते हैं।’

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 26 Disaster Management

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 26 Disaster Management (आपदा प्रबन्धन) are part of UP Board Solutions for Class 12 Geography. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 26 Disaster Management (आपदा प्रबन्धन).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 26
Chapter Name Disaster Management (आपदा प्रबन्धन)
Number of Questions Solved 30
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 26 Disaster Management (आपदा प्रबन्धन)

विस्तृत उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1
आपदा प्रबन्धन से आप क्या समझते हैं ? कौन-कौन सी संस्थाएँ इस कार्य में संलग्न हैं?
या
भारत में आपदा प्रबन्धन की विवेचना कीजिए। [2015]
या
आपदा प्रबन्धन का उद्देश्य बताइए। [2016]
उत्तर

आपदा प्रबन्धन
Disaster Management

प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को कम करने अर्थात् उनके प्रबन्धन के तीन पक्ष हैं –

  1. आपदाग्रस्त लोगों को तत्काल राहत पहुँचाना
  2. प्रकोपों तथा आपदाओं की भविष्यवाणी करना तथा
  3. प्राकृतिक प्रकोपों से सामंजस्य स्थापित करना।

आपदाग्रस्त लोगों को राहत पहुँचाने के लिए निम्नलिखित उपाय आवश्यक हैं –
(1) आपदा की प्रकृति तथा परिमाण का वास्तविक चित्र उपलब्ध होना चाहिए। प्रायः मीडिया की रिपोर्ट घटनाओं का वास्तविक चित्र प्रस्तुत करने की अपेक्षा भ्रमपूर्ण तथ्य प्रस्तुत करती है। (यद्यपि ऐसा जान-बूझकर नहीं किया जाता है, पर्यवेक्षक या विश्लेषणकर्ता के व्यक्तिगत मत के कारण ऐसा होता है) अतएव, अन्तर्राष्ट्रीय समुदायों को सम्बन्धित सरकार से जानकारी हासिल करनी चाहिए।

(2) निवारक तथा राहत कार्यों को अपनाने के पूर्व प्राथमिकताएँ निश्चित कर लेनी चाहिए। उदाहरणार्थ–राहत कार्य घने आबाद क्षेत्रों में सर्वप्रथम करने चाहिए। बचाव के विशिष्ट उपकरण, मशीनें, पम्प, तकनीशियन आदि तुरन्त आपदाग्रस्त क्षेत्रों में भेजने चाहिए। दवाएँ तथा औषधियाँ भी उपलब्ध करानी चाहिए।

(3) विदेशी सहायता सरकार के निवेदन पर ही आवश्यकतानुसार भेजनी चाहिए अन्यथा आपदाग्रस्त क्षेत्र में अनावश्यक सामग्री सम्बन्धी भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है तथा समस्याएँ अधिक जटिल हो जाती हैं।

(4) प्राकृतिक आपदाओं के प्रबंधन में शोध तथा भविष्यवाणी का बहुत महत्त्व है। प्राकृतिक आपदाओं की पूर्वसूचना ( भविष्यवाणी) किसी प्राकृतिक आपदा से ग्रस्त क्षेत्र में आपदा की आवृत्ति, पुनरावृत्ति के अन्तराल, परिमाण, घटनाओं के विस्तार आदि के इतिहास के अध्ययन के आधार पर की जानी चाहिए। उदाहरण के लिए, बड़े भूस्खलन के पूर्व किसी क्षेत्र में पदार्थ का मन्द सर्पण लम्बे समय तर्क होता रहता है; किसी विस्फोटक ज्वालामुखी उद्गार के पूर्व धरातल में साधारण उभार पैदा होता है। तथा स्थानीय रूप से भूकम्पन होने लगता है। नदी बेसिन के संग्राहक क्षेत्र में वर्षा की मात्रा तथा तीव्रता के आधार पर सम्भावित बाढ़ की स्थिति की भविष्यवाणी सम्भव है। स्रोतों के निकट उष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों तथा स्थानीय तूफानों एवं उनके गमन मार्गों का अध्ययन आवश्यक है।

(5) प्राकृतिक प्रकोपों एवं आपदाओं का मानचित्रण करना, मॉनीटर करना तथा पर्यावरणीय दशाओं में वैश्विक परिवर्तनों का अध्ययन करना बहुत आवश्यक है। इसके लिए वैश्विक, प्रादेशिक एवं स्थानीय स्तरों पर आपदा-प्रवण क्षेत्रों का गहरा अध्ययन आवश्यक होता है। इण्टरनेशनल काउन्सिल ऑफ साइण्टिफिक यूनियन (ICSU) तथा अन्य संगठनों ने मानवीय क्रियाओं तथा प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले पर्यावरणीय परिवर्तनों की क्रियाविधि, मॉनीटरिंग तथा उन्हें कम करने सम्बन्धी अनेक शोधकार्य प्रारम्भ किये हैं। आपदा-शोध तथा आपदा कम करने सम्बन्धी कुछ महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम निम्नलिखित हैं –

(i) SCOPE-ICSU ने साइण्टिफिक कमेटी ऑन प्रॉब्लम्स ऑफ एनवायरन्मेण्ट नामक समिति की स्थापना 1969 में की, जिसका उद्देश्य सरकारी तथा गैर-सरकारी संगठनों के लिए पर्यावरण पर मानवीय प्रभावों तथा पर्यावरणीय समस्याओं सम्बन्धी घटनाओं की समझ में वृद्धि करना है। SCOPE यूनाइटेड नेशन्स के एनवायरन्मेण्ट कार्यक्रम (UNEP), यूनेस्को के मानव एवं बायोस्फियर कार्यक्रम (MAB) तथा WMO के वर्ल्ड क्लाइमेट प्रोग्राम (wCP) की भी सहायता करता है।

(ii) IGBP– ICSU ने अक्टूबर, 1988 में स्टॉकहोम (स्वीडन) में इण्टरनेशनल जिओस्फियरबायोस्फियर कार्यक्रम (IGBP) या ग्लोबल चेंज कार्यक्रम (GCP) भूमण्डलीय पर्यावरण सम्बन्धी मुद्दों का अध्ययन करने के लिए प्रारम्भ किया।
यह कार्यक्रम भौतिक पर्यावरण के अन्तक्रियात्मक प्रक्रमों के अध्ययन पर बल देता है। ये अध्ययन उपग्रह दूर संवेदी तकनीकों, पर्यावरणीय मॉनीटरिंग तथा भौगोलिक सूचना तन्त्रों (GIS) पर आधारित हैं।

(iii) HDGC – सामाजिक वैज्ञानिकों ने ‘ह्युमन डाइमेन्शन ऑफ ग्लोबल चेंज’ (HDGC) नामक एक समानान्तर शोध कार्य चालू किया है। यह कार्यक्रम GNU, ISSC तथा IFIAS जैसे संगठनों से सहायता तथा वित्त प्राप्त करता है।

(iv) IDNDR-UNO ने 1990-2000 के लिए IDNDR (International Decade for Natural Disaster Reduction) कार्यक्रम प्रारम्भ किया जिसका उद्देश्य विश्व की प्रमुख प्राकृतिक आपदाओं का अध्ययन करना तथा मानव समाज पर उसके घातक प्रभावों को कम करना था। इसके अन्तर्गत भूकम्प, ज्वालामुखी उद्गार, भू-स्खलन, सूनामी, बाहें, तूफान, वनाग्नि, टिड्डी-प्रकोप तथा सूखा जैसे प्रक्रम सम्मिलित हैं। इस कार्यक्रम के अन्तर्गत निम्नलिखित सम्मिलित हैं –

  • प्रत्येक देश में प्राकृतिक आपदाओं की पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने की क्षमता में सुधार करना।
  • प्राकृतिक आपदाओं को कम करने सम्बन्धी जानकारी बढ़ाने के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विकसित करना।
  • प्राकृतिक आपदाओं के आकलन, भविष्यवाणी, रोकने तथा कम करने की दिशा में वर्तमान तथा नयी सूचनाओं का संग्रह करना।
  • अनेक विधियों तथा प्रदर्शन परियोजनाओं के माध्यम से प्राकृतिक आपदाओं के आकलन, भविष्यवाणी, रोकने तथा कम करने के उपाय करना।

(6) प्राकृतिक प्रकोपों को कम करने हेतु आपदा शोध में निम्नलिखित सम्मिलित हैं –

  1. प्राकृतिक प्रकोप एवं आपदा के कारकों तथा क्रियाविधि का अध्ययन।
  2. प्राकृतिक प्रकोपों तथा आपदा के विभाव (सम्भावना) का वर्गीकरण एवं पहचान करना तथा आँकड़ा-आधार तैयार करना जिसमें पारितन्त्र के भौतिक तथा सांस्कृतिक घटकों, परिवहन एवं संचार साधनों, भोजन, जल एवं स्वास्थ्य सुविधाओं, प्रशासनिक सुविधाओं आदि का मानचित्रण करना सम्मिलित है। प्राकृतिक आपदा शोध को महत्त्वपूर्ण पक्ष दूर संवेदन, इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक तकनीकों से धरातलीय जोखिम के क्षेत्रों की पहचान करना है।

(7) आपदा कम करने के कार्यक्रम में आपदा सम्बन्धी शिक्षा की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इस शिक्षा का आधार व्यापक होना चाहिए तथा यह वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, नीति एवं निश्चयकर्ताओं तथा जनसाधारण तक जनसंचार के माध्यमों (समाचार-पत्र, रेडियो, टेलीविजन, पोस्टरों, डॉक्यूमेण्ट्री फिल्मों आदि) द्वारा पहुँचनी चाहिए। अधिकांश देशों में जनता को आने वाली आपदा की सूचना देने का उत्तरदायित्व सरकार का होता है। अतएव शोधकर्ताओं एवं वैज्ञानिकों को निश्चयकर्ताओं (प्रशासकों एवं राजनीतिज्ञों) को निम्नलिखित उपायों द्वारा शिक्षित करने की आवश्यकता है –

  1. निश्चयकर्ताओं तथा सामान्य जनता को प्राकृतिक प्रकोपों एवं आपदाओं के प्रति सचेत करना। तथा उन्हें स्थिति का सामना करने के लिए प्रशिक्षित करना।
  2. समय से पहले ही संम्भावित आपदा की सूचना देना।
  3. जोखिम तथा संवेदनशीलता के मानचित्र उपलब्ध कराना।
  4. लोगों को आपदाओं से बचने के लिए निर्माण कार्य में सुधार करने के लिए प्रेरित करना।
  5. आपदा कम करने की तकनीकों की व्याख्या करना।

(8) भौगोलिक सूचना तन्त्र (GIS) तथा हवाई सर्वेक्षणों द्वारा प्राकृतिक आपदा में कमी तथा प्रबन्धन कार्यक्रमों में सहायता मिल सकती है।
(9) जनता को प्राकृतिक आपदाओं के साथ सामंजस्य करने की आवश्यकता है, जिसमें निम्नलिखित सम्मिलित हैं –

  1. प्राकृतिक संकटों एवं आपदाओं के प्रति व्यक्तियों, समाज एवं संस्थाओं के बोध (Perception) एवं दृष्टिकोण में परिवर्तन।
  2. प्राकृतिक संकटों एवं आपदाओं के प्रति चेतना में वृद्धि।
  3. प्राकृतिक संकटों एवं आपदाओं की समय से पूर्व चेतावनी का प्रावधान।
  4. भूमि उपयोग नियोजन (उदाहरणार्थ-आपदा प्रवण क्षेत्रों की पहचान तथा सीमांकन एवं लोगों को ऐसे क्षेत्रों में बसने के लिए हतोत्साहित करना)।
  5. सुरक्षा बीमा योजनाओं द्वारा जीवन एवं सम्पत्ति की हानि के मुआवजे का प्रावधान करना, जिससे समय रहते लोग अपने घर, गाँव, नगर आदि छोड़ने के लिए तैयार रहें।
  6. आपदा से निपटने की तैयारी का प्रावधान।

प्रश्न 2
भूकम्प से आप क्या समझते हैं? भूकम्प के कारण व इसके हानिकारक प्रभावों की विवेचना कीजिए।
या
किसी एक प्राकृतिक आपदा व इससे प्रभावित क्षेत्रों का वर्णन कीजिए। [2011]
या
भूकम्प को प्राकृतिक आपदा क्यों कहा जाता है? [2014]
या
भूकम्प के प्रमुख कारणों का वर्णन कीजिए। [2014]
या
भारत में भूकम्प एवं भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों की समस्याओं का वर्णन कीजिए। [2014]
उत्तर

भूकम्प (Earthquake)

भूकम्प का सामान्य अर्थ ‘भूमि का कॉपना या हिलना है जो पृथ्वी के अन्तराल की तापीय दशाओं के कारण उत्पन्न विवर्तनिक शक्तियों (Tectonic forces) के कारण घटित होता है। भूमि का कम्पन सामान्य से लेकर तीव्रतम हो सकता है जिससे इमारतें ढह जाती हैं तथा धरातल पर दरारें उत्पन्न हो जाती हैं।

भूकम्प की उत्पत्ति धरातल के नीचे किसी बिन्दु से होती है जिसे उत्पत्ति केन्द्र (Focus) कहते हैं। इस बिन्दु से ऊर्जा की तीव्र लहरें उत्पन्न होकर पृथ्वी के धरातल पर पहुँचती हैं। ऊर्जा की तीव्रता को ‘रिक्टर मापक’ (Richter Scale) द्वारा नापा जाता है। यह मापक 0 से 9 के मध्य होता है। सन् 1934 में बिहार (भारत) के भूकम्प का माप रिक्टर मापक पर 8.4 था, जबकि सन् 1964 में अलास्का (संयुक्त राज्य अमेरिका) के भूकम्प का माप 8.4 से 8.6 तक था। ये दोनों भूकम्प विश्व के उग्रतम भूकम्पों में गिने जाते हैं।
भूकम्प की तीव्रता मापने का एक अन्य पैमाना या मापेक ‘मरकेली मापक’ (Mercalli Scale) भी है, किन्तु रिक्टर मापक अधिक प्रचलित है।

भूकम्प के कारण
Causes of Earthquake

भूकम्प पृथ्वी की सतह पर किसी भी मात्रा में अव्यवस्था या असन्तुलन के कारण उत्पन्न होते हैं। यह असन्तुलन अनेक कारणों से सम्भव है; जैसे-ज्वालामुखी उद्गार, भ्रंशन एवं वलन, मानवनिर्मित जलाशयों का जलीय भार तथा प्लेट विवर्तनिकी। इन सभी कारणों में से प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त (Plate tectonic theory) भूकम्पों की उत्पत्ति की सर्वोत्तम व्याख्या करता है। इस सिद्धान्त के अनुसार भूपटल ठोस तथा गतिशील दृढ़ प्लेटों से निर्मित है। इन्हीं प्लेटों के किनारों पर सभी विवर्तनिक घटनाएँ होती हैं। कम गहराई पर उत्पन्न होने वाले भूकम्प प्लेटों के रचनात्मक किनारों के सहारे पैदा होते हैं, जबकि अधिक गहराई पर स्थित उत्पत्ति केन्द्र वाले भूकम्प विनाशात्मक प्लेट किनारों के सहारे उत्पन्न होते हैं। विनाशात्मक प्लेट किनारे वे होते हैं जो दो प्लेटों के परस्पर निकट आने पर टकराते हैं। यही कारण है कि विश्व के सर्वाधिक भूकम्प अग्निवलय (Ring of Fire) या परि-प्रशान्त पेटी के सहारे तथा मध्य महाद्वीपीय पेटी (आलप्स-हिमालय पर्वतश्रृंखला) के सहारे उत्पन्न होते हैं। इसी प्रकार, कैलीफोर्निया (संयुक्त राज्य अमेरिका) में संरक्षी प्लेट किनारों के सहारे उत्पन्न रूपान्तरित भ्रंशों के स्थान पर भी भयंकर भूकम्प आते हैं।

भारत में हिमालय तथा उसकी तलहटी में आने वाले भूकम्पों की व्याख्या प्लेट विवर्तनिकी के सन्दर्भ में की जा सकती है। एशियाई प्लेट दक्षिण की ओर गतिशील है, जबकि भारतीय प्लेट उत्तर की ओर खिसक रही है। अतएव भारतीय प्लेट एशियाई प्लेट के नीचे क्षेपित हो रही है। इन दोनों प्लेटों के परस्पर टकराने से वलन या भ्रंशन क्रियाएँ होती हैं जिनसे हिमालय की ऊँचाई निरन्तर बढ़ रही है। इससे भू-सन्तुलन बिगड़ता रहता है, जो इस क्षेत्र में भूकम्पों की आवृत्ति का कारण है।

भूकम्पों के हानिकारक प्रभाव
Hazardous Effects of Earthquakes

भूकम्पों की तीव्रता का निर्धारण रिक्टर मापक की अपेक्षा मानव-जीवन तथा सम्पत्ति पर भूकम्पों से होने वाले हानिकारक प्रभावों के परिप्रेक्ष्य में किया जाता है। यह आवश्यक नहीं है कि रिक्टर मापक पर उच्च तीव्रता वाला भूकम्प हानिकारक है। भूकम्प तभी विनाशकारी होता है जब वह सघन आबाद क्षेत्र में आता है। कभी-कभी रिक्टर मापक पर साधारण तीव्रता वाले भूकम्प भी भयंकर विनाशकारी होते हैं। भूकम्प के प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रभावों में निम्नलिखित सम्मिलित हैं –

(1) ढालों की अस्थिरता एवं भूस्खलन – पर्वतीय क्षेत्रों में जहाँ कमजोर संरचनाएँ पायी जाती है. वहाँ ढाल अस्थिर होते हैं जिससे भूस्खलन तथा शैल-पतन जैसी घटनाएँ बस्तियों तथा परिवहन मार्गों को हानि पहुँचाती हैं। सन् 1970 में पीरू तथा सन् 1989 में तत्कालीन सोवियत संघ के ताजिक गणतन्त्र में आये भूकम्पों से इसी प्रकार की क्षति हुई थी जिनमें युंगे (पीरू) तथा लेनिनाकन (ताजिक) नगर ध्वस्त हो गये।

(2) मानवकृत संरचनाओं को क्षति – इमारतें, सड़कें, रेलें, कारखाने, पुल, बाँध आदि संरचनाओं को भूकम्पों से भारी क्षति पहुँचती है। इस प्रकार मानव सम्पत्ति की हानि होती है। सन् 1934 में नेपाल-बिहार सीमा पर तथा पुनः सन् 1988 में बिहार के भूकम्प से 10,000 से अधिक मकान क्षतिग्रस्त हो गये। सन् 1985 में मैक्सिको सिटी के भूकम्प से 40,000 इमारतें ढह गयीं तथा 50,000 अन्य मकान क्षतिग्रस्त हुए।

(3) नगरों तथा कस्बों को क्षति – घने आबाद नगर तथा कस्बे भूकम्प के विशेष शिकार होते हैं। उच्च तीव्रता वाले भूकम्पों से बड़ी इमारतें ध्वस्त हो जाती हैं तथा उनके निवासी मलबे में दबकर काल का ग्रास बन जाते हैं। पाइप लाइनें, बिजली एवं टेलीफोन के खम्भे व तार आदि भी नष्ट हो जाते हैं।

(4) जनजीवन की हानि – भूकम्पों की तीव्रता जीवन की क्षति द्वारा भी निर्धारित की जाती है। भारत के इतिहास में सबसे भीषण भूकम्प सन् 1737 में कोलकाता में आया, जिसमें 3 लाख व्यक्ति काल-कवलित हुए। सन् 1905 में कॉगड़ा के भूकम्प में 20 हजार व्यक्ति मारे गये। सन् 2001 में भुज के भूकम्प में 20,000 व्यक्तियों की मृत्यु हो गयी। विश्व के इतिहास में 1556 ई० में शेन शु (चीन) में 8,30,000 व्यक्तियों की जाने गयीं। पुन: सन् 1976 में तांगशान (चीन) में 7,50,000 व्यक्ति मृत हुए। सन् 1920 में कान्सू (चीन) में 1,80,000 व्यक्ति, 1927 ई० में नामशान (चीन) में 1,80,000 व्यक्ति सन् 1908 में मेसीना (इटली) में 1,60,000 व्यक्ति, 1923 ई० में टोकियो (जापान) में 1,63,000 व्यक्ति, सन् 1932 ई० में सगामी खाड़ी (जापान) में 2,50,000 व्यक्ति, सन् 1990 में उत्तरी ईरान में 50,000 व्यक्ति मारे गये। सन् 2004 में सुमात्रा में भूकम्प से उत्पन्न सूनामी लहरों के विध्वंसकारी प्रभाव से 3,50,000 लोग मारे गये। 2005 ई० में कश्मीर के भूकम्प में भारत तथा पाकिस्तान में लगभग 1 लाख लोगों की मृत्यु हो गयी।

(5) अग्निकाण्ड – तीव्र भूकम्पों के कारण होने वाले कम्पन से इमारतों तथा कारखानों में गैस सिलिण्डरों के उलटने तथा बिजली के नंगे तारों के मिलने आदि से आग लग जाती है। सन् 1923 में सगामी खाड़ी (जापान) में ऐसे ही अग्निकाण्ड से 38,000 व्यक्ति मारे गये। सन् 1906 में सैनफ्रान्सिस्को (संयुक्त राज्य अमेरिका) में भी भूकम्प से नगर के अनेक मार्गों में आग लग गयी।

(6) धरातल की विकृति – कभी-कभी भूकम्पों से धरातल पर दरारें पड़ती हैं तो कभी धरातल का अवतलन या उत्क्षेप हो जाता है। सन् 1819 के भूकम्प से सिन्धु नदी के मुहाने (पाकिस्तान) पर 4,500 वर्ग किमी क्षेत्र का अवतलन हो गया जो सदा के लिए समुद्र में डूब गया। इसके साथ ही 80 किमी लम्बा तथा 26 किमी चौड़ा क्षेत्र निकटवर्ती भूमि से 3 मीटर ऊँचा उठ गया, जिसे ‘अल्लाह-बन्द’ कहा जाता है।

(7) बाढे – तीव्र भूकम्पीय लहरों से बाँधों के टूटने पर बाढ़े आती हैं। सन् 1971 में लॉस एंजिल्स (संयुक्त राज्य अमेरिका) नगर के उत्तर पश्चिम में भूकम्प के कारण सान फर्नाण्डो घाटी क्षेत्र में स्थित वॉन नार्मन बाँध में दरार पड़ने से ऐसी ही क्षति हुई थी। सन् 1950 में असम के भूकम्प में दिहांग नदी के मार्ग में भूस्खलन के कारण उत्पन्न अवरोध से भयंकर बाढ़ आयी।

(8) सूनामी – समुद्रों के अन्दर भूकम्प आने पर तीव्र सूनामी लहरें उत्पन्न होती हैं। सन् 1819 ई० में कच्छ क्षेत्र में सूनामी लहरों से भारी क्षति हुई। सन् 1755 में लिस्बन (पुर्तगाल) में सूनामी लहरों के कारण 30 हजार से 60 हजार लोग मृत्यु का ग्रास बने। दिसम्बर, 2004 ई० में सुमात्रा के निकट भूकम्प उत्पन्न होने पर सूनामी लहरों का प्रकोप श्रीलंका तथा तमिलनाडु तट (भारत) तक देखा गया।

प्रश्न 3
बाढ़ नियन्त्रण के उपायों पर प्रकाश डालिए। [2011]
या
भारत में बाढ़ नियन्त्रण एवं बाढ़ प्रबन्धन हेतु उपाय सुझाइए। [2014]
उत्तर
बाहें एक प्राकृतिक परिघटना हैं तथा इससे पूर्णतः मुक्ति सम्भव नहीं है, किन्तु इसके प्रभाव को मनुष्य अपनी तकनीकी क्षमता द्वारा अवश्य कम कर सकता है। बाढ़ नियन्त्रण के निम्नलिखित उपाय सम्भव हैं –

(1) प्रथम तथा सबसे महत्त्वपूर्ण उपाय वर्षा की तीव्रता तथा उससे उत्पन्न धरातलीय भार को नियन्त्रित करना है। मनुष्य वर्षा की तीव्रता को तो कम नहीं कर सकता है, किन्तु धरातलीय वाह (वाही जल) को नदियों तक पहुँचने पर देरी अवश्य कर सकता है। यह उपाय बाढ़ों के लिए कुख्यात नदियों के जल संग्राहक पर्वतीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण द्वारा सम्भव है। वृक्षारोपण द्वारा जल के धरातल के नीचे रिसाव को प्रोत्साहन मिलता है जिससे वाही जल की मात्रा कुछ सीमा तक कम हो जाती है। वृक्षारोपण से मृदा अपरदन में भी कमी आती है तथा नदियों में अवसादों की मात्रा कम होती है। अवसादन में कमी होने पर नदियों में जल बहाने की क्षमता बढ़ जाती है। इस प्रकार बाढ़ों की आवृत्ति तथा परिमाण में कमी की जा सकती है।

(2) घुमावदार मार्ग से होकर बहने पर नदियों में जल बहने की क्षमता में कमी आती है। इसके लिए नदियों के मार्गों को कुछ स्थानों पर सीधा करना उपयुक्त रहता है। यह कार्य मोड़ों को कृत्रिम रूप से काटकर किया जा सकता है, किन्तु यह उपाय बहुत व्ययपूर्ण है। दूसरे, विसर्पण (Meandering) एक प्राकृतिक प्रक्रम है, नदी अन्यत्र विसर्प बना लेगी। वैसे यह उपाय निचली मिसीसिपी में ग्रीनविले (संयुक्त राज्य अमेरिका) के निकट सन् 1933 से 1936 में अपनाया गया, जिसके तहत नदी का मार्ग 530 किमी से घटाकर 185 किमी कर दिया गया।

(3) नदी में बाढ़ आने के समय जल के परिमाण को अनेक इंजीनियरी उपायों द्वारा; जैसे-भण्डारण जलाशय बनाकर, कम किया जा सकता है। ये बाँध बाढ़ के अतिरिक्त जल को संचित कर लेते हैं। इसे जल की सिंचाई में भी प्रयुक्त किया जा सकता है। यदि जलाशयों के साथ बाँध भी बना दिया जाता है तो इससे जलविद्युत उत्पादन में भी सफलता मिलती है। ऐसे उपाय सन् 1913 में ओह्यो राज्य (संयुक्त राज्य अमेरिका) में मियामी नदी पर किये गये थे जो बहुत प्रभावी एवं लोकप्रिय सिद्ध हुए। सन् 1933 के पूर्व टैनेसी नदी बेसिन भी बाढ़ों के लिए कुख्यात था, किन्तु सन् 1933 में टैनेसी घाटी प्राधिकरण द्वारा अनेक बाँध तथा जलाशय बनाकर इस समस्या का निदान सम्भव हुआ। वही टैनेसी बेसिन अब एक स्वर्ग बन गया है। टैनेसी घाटी परियोजना से प्रेरित होकर भारत में भी दामोदर घाटी निगम की स्थापना की गयी तथा दामोदर नदी तथा इसकी सहायकों पर चार बड़े बाँध एवं जलाशय बनाये गये। इसी प्रकार तापी नदी पर उकई बाँध एवं जलाशय के निर्माण से नदी की निचली घाटी तथा सूरत नगर को बाढ़ के प्रकोप से बचा लिया गया है।

(4) तटबन्ध, बाँध तथा दीवारें बनाकर भी बाढ़ के जल को संकीर्ण धारा के रूप में रोका जा सकता है। ये दीवारें मिट्टी, पत्थर या कंकरीट की हो सकती हैं। दिल्ली, इलाहाबाद, लखनऊ आदि अनेक नगरों में इस प्रकार के उपाय किये गये हैं। चीन तथा भारत में कृत्रिम कगारों का निर्माण बहुत प्राचीन काल से प्रचलित रहा है। कोसी (बिहार) तथा महानन्दा नदियों पर भी बाढ़ नियन्त्रण हेतु इसी प्रकार के उपाय किये गये हैं।

(5) सन् 1954 में केन्द्रीय बाढ़ नियन्त्रण बोर्ड के गठन तथा राज्य स्तर पर बाढ़ नियन्त्रण बोर्ड की स्थापना भी बाढ़ नियन्त्रण में लाभकारी रही है। भारत में बाढ़ की भविष्यवाणी तथा पूर्व चेतावनी की प्रणाली सन् 1959 में दिल्ली में बाढ़ की स्थिति मॉनीटर करने हेतु प्रारम्भ की गयी। तत्पश्चात् देश भर में प्रमुख नदी बेसिनों में बाढ़ की दशाओं को मॉनीटर करने हेतु एक नेटवर्क बनाया गया। बाढ़ की भविष्यवाणी के ये केन्द्र वर्षा सम्बन्धी, डिस्चार्ज दर आदि आँकड़े एकत्रित करते हैं तथा अपने अधिकार क्षेत्र के निवासियों को विशिष्ट नदी बेसिन के सन्दर्भ में बाढ़ की पूर्व चेतावनी देते हैं।

प्रश्न 4
सूखे के प्रभाव एवं नियन्त्रण के उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर

सूखे के प्रभाव
Effects of Droughts

सूखा जैवमण्डलीय पारितन्त्र के सभी जीवन-रूपों को प्रभावित करता है। जल की किसी भी प्रकार की कमी पेड़-पौधों एवं प्राणियों को प्रभावित करती है। लम्बी अवधि तक सूखा पड़ने पर अनेक प्रकार के पारिस्थितिकीय, आर्थिक, जनांकिकीय एवं राजनीतिक प्रभाव पड़ते हैं।

(1) निरन्तर कई वर्षों तक सूखा पड़ने पर किसी प्रदेश के प्राकृतिक पारितन्त्र के जैविक घटक में परिवर्तन हो जाता है, क्योंकि कुछ ऐसे पेड़-पौधे एवं प्राणी हैं जो अतिशय सूखा सहन नहीं कर सकते। अनेक प्राणी अन्यत्र स्थानान्तरित हो जाते हैं तब किसी विशेष प्राणी प्रजाति की जनसंख्या में कमी आ जाती है। कुछ प्राणी भूख से मर जाते हैं। भोजन के लिए स्पर्धा बढ़ने पर कमज़ोर प्राणी लुप्त होने लगते हैं।
(2) कृषि उत्पादन में कमी होने पर पशु पदार्थों के उत्पादन में भी कमी हो जाती है।
(3) सूखाग्रस्त क्षेत्रों से लोगों का पलायन होने लगता है। गुजरात, राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में ऐसी स्थिति प्राय: देखने को मिलती हैं।

(4) सूखाग्रस्त निर्धन देशों को खाद्यान्नों के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है। इससे अनेक बार राजनीतिक समस्याएँ भी उत्पन्न हो जाती हैं। उदाहरणार्थ-अफ्रीका की सहेल प्रदेश’ (सहारा मरुस्थल के दक्षिण तथा सवाना प्रदेश के उत्तर में स्थित प्रदेश जो पश्चिमी अफ्रीका से लेकर पूर्व में इथोपिया तक विस्तृत है) एक शुष्क प्रदेश है जहाँ बंजारे पशुचारक तथा कृषक अल्प वर्षाकाल में प्राप्त वर्षा पर निर्भर करते हैं। यहाँ के निवासी पेयजल के लिए भूमिगत जल पर निर्भर हैं। निरन्तर सूखा पड़ने पर भूमिगत जल का स्तर गिर जाता है तथा पेयजल की भारी कमी हो जाती है। इस प्रदेश में 1968-1975 तक निरन्तर सूखा पड़ा जो 1971-1974 के मध्य विकट हो गया, तब यहाँ के निवासियों को अपने घर, मवेशी आदि छोड़कर नगरों के निकट लगाये गये विशिष्ट कैम्पों में रहना पड़ा। विश्व के अनेक देशों में खाद्यान्नों की सहायता भेजी, फिर भी हजारों लोग भुखमरी का शिकार हो गये। अकेले इथोपिया में ही 50,000 लोग भूख, कुपोषण एवं रोगों से मुत्यु का ग्रास बन गये। सम्पूर्ण रुहेल प्रदेश में 5 मिलियन मवेशी भी मर गये। पुनः 1992-93 में इथोपिया में भीषण अकाल पड़ा, जिसमें 30 लाख लोग मारे गये।

ऑस्ट्रेलिया में भी सूखा बहुत सामान्य प्राकृतिक परिघटना है। इनकी पुनरावृत्ति तथा व्यापकता भी अधिक़ है। देश का सबसे बुरा सूखा 1895-1902 के दौरान पड़ा था। इसके बाद भी अनेक बार सूखा पड़ा जिसके दुष्प्रभाव पशु (भेड़ों) तथा कृषि उत्पादन पर पड़े।

भारत भी प्रायः सूखे की चपेट में रहता है। देश के 67 जिले निरन्तर सूखे से ग्रस्त रहते हैं, जहाँ देश की 12% जनसंख्या निवास करती है तथा 25% शस्य भूमि विद्यमान है। प्रमुख सूखाग्रस्त क्षेत्र का विस्तार राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश तथा दक्षिणी उत्तर प्रदेश राज्यों में है। द्वितीय सूखा-प्रवण प्रदेश पश्चिमी घाटों के वृष्टिछाया प्रदेश में चतुर्भुजाकार क्षेत्र के रूप में स्थित है। इसके अन्तर्गत दक्षिण-पश्चिमी आन्ध्र प्रदेश, पूर्वी कर्नाटक, दक्षिण-पश्चिमी महाराष्ट्र सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त तिरुनेलवेली, कोयम्बटूर (तमिलनाडु), पलामू (बिहार), पुरुलिया (बंगाल), कालाहण्डी (ओडिशा) आदि जिले भी सूखा प्रवण हैं। 1899 में भारत का भीषणतम अकाल ‘छप्पन का अकाल पड़ा था, जिसकी पुनरावृत्ति 1917 में हुई। इन दोनों अकालों में लाखों लोग मारे गये।

सूखा नियन्त्रण के उपाय
Drought Control Measures

बाढ़ों की भाँति सूखे की चेतावनी देना सम्भव नहीं है, यद्यपि कम्प्यूटर के आधार पर विभिन्न जलवायवीय एवं मौसमी प्राचलों के अध्ययन से आगामी वर्षों की वर्षा का कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। वायु की नमी तथा वर्षण की मात्रा को वृक्षारोपण द्वारा बढ़ाया जा सकता है। सूखे से निपटने के लिए अधिकांश देशों में प्रचलित व्यवस्था यही है कि सूखाग्रस्त लोगों को राहत दी जाये। इसके अतिरिक्त सूखे को कम करने के कुछ दीर्घकालीन उपाय भी करने चाहिए। इन उपायों में वृक्षारोपण, शुष्क कृषि तकनीकों का प्रयोग, मरुस्थलीकरण रोकना, जल संरक्षण की योजनाएँ बनाना, बागवानी तथा चरागाहों का विकास, सूखा-प्रवण क्षेत्रों के कार्यक्रमों को अपनाना, जलाशयों तथा कुओं का निर्माण आदि सम्मिलित हैं।

प्रश्न 5
जनजीवन को प्रभावित करने वाली भारत की प्रमुख प्राकृतिक आपदाओं का वर्णन कीजिए। [2016]
उत्तर
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 1, 2, 3 व 4 का अध्ययन करें।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
पर्यावरण संकट एवं आपदा क्या है ? आपदा का वर्गीकरण कीजिए।
या
प्राकृतिक आपदाएँ किसे कहते हैं ? [2009, 11]
उत्तर
वे घटनाएँ अथवा दुर्घटनाएँ जो प्राकृतिक प्रक्रमों या मानवीय कारणों से उत्पन्न होती हैं, चरम घटनाएँ (Extreme events) कहलाती हैं। ऐसी घटनाएँ अपवाद-रूप में उत्पन्न होती हैं तथा प्राकृतिक पर्यावरण के प्रक्रमों को उग्र कर देती हैं जो मानव-समाज के लिए आपदा बन जाते हैं; उदाहरणार्थ-पृथ्वी की विवर्तनिक संचलनों के कारण भूकम्प या ज्वालामुखी विस्फोट होना, निरन्तर सूखा पड़ना या आकस्मिक रूप से बाढ़ आना, ऐसी ही प्राकृतिक आपदाएँ हैं।

पर्यावरणीय संकट की परिभाषा ऐसी चरम घटनाओं (प्राकृतिक या मानवकृत) के रूप में दी जा सकती है, जो सहने की सीमा से परे होती हैं तथा सम्पत्ति एवं जनजीवन का विनाश उत्पन्न करती हैं।
आपदा वर्गीकरण – उत्पत्ति के कारणों के आधार पर आपदाओं को दो वर्गों में रखा जाता है –

  • प्राकृतिक आपदाएँ तथा
  • मानवजनित आपदाएँ।

प्रश्न 2
प्राकृतिक तथा मानवीय आपदाओं का वर्णन कीजिए। [2014]
उत्तर
प्राकृतिक तथा मानव-जनित आपदाओं का वर्गीकरण
Classification of Natural and Man-made Disasters
UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 26 Disaster Management 1

प्रश्न 3
ज्वालामुखी उद्गारों के हानिकारक प्रभाव लिखिए।
उत्तर
ज्वालामुखी उद्गारों के हानिकारक प्रभाव-जवालामुखी उद्गार निम्नलिखित विधियों से मानव-जीवन तथा सम्पत्ति को भारी हानि पहुँचाते हैं –
(1) उष्ण लावा के प्रवाह से, (2) ज्वालामुखी पदार्थों के पतन से, (3) इमारत, कारखाने, सड़कें, रेले, विमान पत्तन, बाँध, पुल, जलाशय आदि मानवीय संरचनाओं की क्षति द्वारा, (4) अग्निकाण्ड द्वारा, (5) बाढ़ों तथा (6) जलवायु परिवर्तनों द्वारा।

(1) उष्ण तथा तरल लावा की विशाल राशि तीव्र गति से प्रवाहित होते हुए मानवीय संरचनाओं को ढक लेती है, जीव-जन्तु तथा सभी लोग मारे जाते हैं, फार्म तथा चरागाह नष्ट हो जाते हैं, नदियों के म तथा झीलें अवरुद्ध हो जाती हैं तथा वन जलकर नष्ट हो जाते हैं। हवाई द्वीप पर मोना लोको ज्वालामुखी के उद्गार से 53 किमी दूर तक लावा का प्रवाह हुआ था। आइसलैण्ड में लाकी ज्वालामुखी प्रवाहं से भी बड़ी मात्रा में लावा निकलकर सम्पूर्ण द्वीप पर फैल गया था। माउण्ट पीली तथा सेण्ट हेलेन्स के उद्गार भी ऐसे ही क्षतिकारी थे।

(2) ज्वालामुखी विस्फोट से अपखण्डित पदार्थ, धुआँ, धूल, राख आदि पदार्थ बाहर निकलकर भूमि को ढक लेते हैं जिससे खड़ी फसलें, वनस्पतियाँ, इमारतें आदि नष्ट हो जाती हैं। विषैली गैसें भी मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं तथा अम्ल वर्षा का कारण बनती हैं।

(3) सभी प्रकार के ज्वालामुखी उद्गार मानव-जीवन को भारी हानि पहुँचाते हैं। विस्फोटक उद्गार होने पर लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचने का समय ही नहीं मिल पाता है। मार्टिनीक द्वीप पर माउण्टे पीली के आकस्मिक उद्गार (1902) से समस्त सेण्ट पियरे नगर तथा उसके 28,000 निवासी मारे गये, केवल दो व्यक्ति शेष बचे। सन् 1985 में कोलम्बिया के नेवादो डेल रुइज ज्वालामुखी के उद्गार से लगभग 23,000 व्यक्ति काले-कवलित हो गये। सन् 1980 में वाशिंगटन राज्य (संयुक्त राज्य अमेरिका) के माउण्ट सेण्ट हेलेन्स के भयंकर उद्गार से 2 बिलियन डॉलर की सम्पत्ति नष्ट हो गयी।

(4) ज्वालामुखी उद्गारों से भारी मात्रा में धूल तथा राख बाहर निकलकर आकाश में व्याप्त हो जाती हैं जिससे प्रादेशिक तथा वैश्विक स्तर पर मौसमी एवं जलवायवीय परिवर्तन होते हैं। ज्वालामुखी उद्गारों से नि:सृत धूल समताप मण्डल में एकत्रित होकर पृथ्वी पर आने वाली सौर्थिक ऊर्जा की मात्रा को कम कर देती है, जिससे तापमानों में कमी आ जाती है। क्राकाटोआ ज्वालामुखी उद्गार (1883) के ऐसे ही प्रभाव सामने आये। 1783 में आयरलैण्ड के लाकी उद्गार से भी तापमानों का ह्रास हुआ।

(5) कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार ज्वालामुखी उद्गारों से नि:सृत धूल तथा राख से जीवों की कुछ प्रजातियों का सामूहिक विनाश (विलोप) हो जाता है। दकन लावा प्रवाह के दौरान ब्रिटेशस के अन्त तथा टर्शियरी के आरम्भ में भारत में प्राणियों की अनेक प्रजातियों का विलोप हो गया।

प्रश्न 4
उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात कहाँ आते हैं ? विभिन्न चक्रवातों का वर्णन कीजिए।
या
उष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों को किन-किन स्थानीय नामों से जाना जाता है ?
उत्तर
उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात पृथ्वी ग्रह पर अत्यधिक शक्तिशाली, विनाशकारी एवं घातक वायुमण्डलीय तूफान हैं जिन्हें ग्लोब के विभिन्न भागों में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है। उत्तरी अटलांटिक महासागर (मुख्यत: दक्षिण-पूर्वी संयुक्त राज्य) में ये हरीकेन’ कहलाते हैं, जबकि उत्तरी प्रशान्त महासागर (मुख्यत: चीन, जापान, फिलीपीन्स तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया) में ये ‘टाइफून’ कहलाते हैं। बांग्लादेश तथा भारत में इन्हें चक्रवात’ कहा जाता है तथा ऑस्ट्रेलिया में ‘विली विलीज’।

इन उष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों की गति 180 से 400 किमी प्रति घण्टा तक होती है जिससे समुद्रों में उच्च ज्वारीय तरंगें पैदा होती हैं, भारी वर्षा होती है, समुद्रतल में असाधारण वृद्धि होती है तथा ये कई दिन (प्राय: एक सप्ताह) तक कायम रहते हैं। इन सबके सम्मिलित प्रभाव से प्रभावित क्षेत्र में भारी क्षति होती है, जनजीवन तथा सम्पत्ति की अपार हानि होती है। इन चक्रवातों के इतिहास के अध्ययन से इनकी विभीषिका का अनुमान लगाया जा सकता है।

(1) चक्रवात (Cyclone) – ये भारत के पूर्वी तट एवं बांग्लादेश के दक्षिणी तटवर्ती भागों में आते हैं। इतिहास में सबसे भयंकर चक्रवात बांग्लादेश में 1970 में आया, जिसमें 3 लाख व्यक्ति मृत्यु के ग्रास बने। अधिकांश लोगों की मृत्यु स्थल पर 20 फीट ऊँची समुद्री लहरों में डूबने से हुई। बांग्लादेश की सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार, 2 लाख लोग मारे गये, 50 हजार से 1 लाख व्यक्ति लापता हो गये, 3 लाख मवेशी मारे गये, 40 हजार घर बरबाद हो गये तथा 63 मिलियन डॉलर की फसलें क्षतिग्रस्त हो गयीं।

भारत में पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आन्ध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु के तटवर्ती भाग विशेष रूप से उष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों से क्षतिग्रस्त होते हैं। सन् 1737 में पूर्वी तट पर आये चक्रवात से 3 लाख लोग मृत्यु को प्राप्त हुए। इसी प्रकार सन् 1977 (55,000 मृत्यु), 1864 (50,000 मृत्यु) के चक्रवात भी । विनाशकारी थे। सन् 1977 में आन्ध्र तट पर चक्रवाती लहरों ने 55,000 लोगों के प्राण ले लिये। बीस लाख – लोगों के घर बरबाद हो गये तथा 12,00,000 हेक्टेयर भूमि पर फसलें नष्ट हो गयीं।

सन् 1990 में आन्ध्र तट पर 1977 की अपेक्षा 25 गुना तीव्र तथा विनाशकारी चक्रवात आया, जिसमें लोगों की मृत्यु तो अधिक नहीं हुई किन्तु 30 लाख लोग बुरी तरह प्रभावित हुए, 3 लाख लोग बेघरबार हो गये, 90,000 मवेशी मर गये तथा १ 1,000 करोड़ की सम्पत्ति नष्ट हो गयी। इस चक्रवात से तमिलनाडु तट भी बुरी तरह प्रभावित हुआ। सन् 1999 में ओडिशा के सुपर साइक्लोन ने राज्य में भारी तबाही मचायी। इसी वर्ष कच्छ क्षेत्र में भी चक्रवातों से काँदला बन्दरगाह एवं तटवर्ती क्षेत्रों में 15,000 व्यक्ति मारे गये। सम्पत्ति की भी अपार हानि हुई।

(2) हरीकेन (Hurricane) – संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिणी तथा दक्षिण-पूर्वी -क्ट्रीय राज्य (लूसियाना, टेक्सास, अलाबामा तथा फ्लोरिडा) हरीकेनों से सर्वाधिक क्षतिग्रस्त होते हैं। सन् 1990 में गाल्वेस्टन (टेक्सास) में हरीकेन से 6,000 लोग मारे गये तथा 3,000 मकान नष्ट हो गये। सितम्बर, 2005 में संयुक्त राज्य में कैटरिना हरीकेन से न्यूऑर्लियन्स नगर के 1,000 लोग मारे गये। हरीकेन रीटा उतना विध्वंसकारी सिद्ध नहीं हुआ। हरीकेन विल्मा मैक्सिको में तथा हरीकेन ओटाने निकारागुआ तट पर प्रहार किया।

(3) ऑस्ट्रेलिया के डार्विन नगर में सन् 1974 में ट्रेसी चक्रवात से यद्यपि मात्र 49 व्यक्ति मृत हुए किन्तु इस नगर की 80% इमारतें नष्ट हो गयीं। जल वितरण, विद्युत व्यवस्था, परिवहन तथा संचार तन्त्र अस्त- व्यस्त हो गये। तेज पवनों तथा मूसलाधार वर्षा से यह विध्वंस हुआ।

(4) स्थानीय तूफान (Local storms) – दक्षिणी तथा पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका के टॉरनेडो तथा थण्डरस्टॉर्म स्थानीय तूफान हैं जो छोटे किन्तु अत्यन्त विनाशकारी होते हैं। इनसे प्रतिवर्ष अनुमानतः 150 मृत्यु तथा 10 मिलियन डॉलर की सम्पत्ति नष्ट होती है। वर्जीनिया, उत्तरी कैरोलिना, दक्षिणी कैरोलिना, जॉर्जिया, अलाबामा, मिसीसिपी, टेनेसी ओह्यो तथा केण्टुकी राज्य इनसे विशेषतः प्रभावित होते हैं।

(5) टाइफून (Typhoon) – ये तूफान पूर्वी एशियाई तट को प्रभावित करते हैं। इनसे 1881 में चीन में 3 लाख व्यक्ति तथा 1923 में जापान में 2,50,000 व्यक्ति मृत्यु का ग्रास बने।

प्रश्न 5
टिप्पणी लिखिए–रासायनिक दुर्घटनाएँ।
उत्तर
रासायनिक दुर्घटनाएँ (Chemical Accidents) – विषैली गैसों के रिसाव से पर्यावरण दूषित हो जाता है तथा उस क्षेत्र के निवासियों के स्वास्थ्य एवं जीवन के लिए गम्भीर संकट पैदा हो जाता है। दिसम्बर, 1984 में भोपाल (मध्य प्रदेश) में यूनियन कार्बाइड के कारखाने से विषैली मिथाइल आइसो-सायनाइड के स्टोरेज टैंक से रिसाव की घटना भारतीय इतिहास की बड़ी मानवीय दुर्घटनाओं में से है। इस गैस के तेजी से रिसाव से 3,598 लोगों की जाने चली गयीं तथा हजारों पशु तथा असंख्य सूक्ष्म जीव मारे गये। गैर-राजनीतिक स्रोतों के अनुसार, मृतकों की संख्या 5,000 से अधिक थी। इस गैस के रिसाव से आसपास का वायुमण्डल तथा जलराशियाँ भी प्रदूषित हो गयीं। गैस रिसाव के प्रभाव से लगभग 50% गर्भवती स्त्रियों को गर्भपात हो गया। दस हजार लोग हमेशा के लिए पंगु हो गए तथा 30,000 लोग आंशिक रूप से पंगु हो गए। डेढ़ लाख लोगों को हल्की-फुल्की असमर्थता पैदा हो गयी। इसी प्रकार सन् 1986 में पूर्ववर्ती सोवियत संघ के चनबिल परमाणु संयन्त्र में से रिसाव की दुर्घटना से सैकड़ों लोग मृत्यु का ग्रास बने।

सन् 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति पर संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा तथा नागासाकी नगरों पर परमाणु बमों के प्रहार से मानवता की जो अपूरणीय क्षति हुई, जिसकी विभीषिका आज भी याद है, मानवकृत आपदाओं में सबसे भयंकर घटना है। यही नहीं, आज भी अनेक देश जैव-रासायनिक शस्त्रों का निर्माण कर रहे हैं, जो मानवता के लिए घातक सिद्ध होंगे।

प्रश्न 6
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए –
(i) भूस्खलन एवं एवलांश।
(ii) अग्निकाण्ड। (2011)
या
भू-स्खलन क्या है? [2013, 14]
उत्तर
(i) भूस्खलन एवं एवलांश – लोगों का ऐसा मानना है कि धरातल जिस पर हम रहते हैं, ठोस आधारशिला है, किन्तु इस मान्यता के विपरीत, पृथ्वी का धरातल अस्थिर है, अर्थात् यह ढाल से नीचे की ओर सरेक सकता है।

भूस्खलन एक प्राकृतिक परिघटना है जो भूगर्भिक कारणों से होती है, जिसमें मिट्टी तथा अपक्षयित शैल पत्थरों की, गुरुत्व की शक्ति से, ढाल से नीचे की ओर आकस्मिक गति होती है। अपक्षयित पदार्थ मुख्य धरातल से पृथक् होकर तेजी से ढाल पर लुढ़कने लगता है। यह 300 किमी प्रति घण्टा की गति से गिर सकता है। जब भूस्खलन विशाल शैलपिण्डों के रूप में होता है तो इसे शैल एवलांश कहा जाता है। स्विट्जरलैण्ड, नॉर्वे, कनाडा आदि देशों में तीव्र ढालों वाली घाटियों की तली में बसे गाँव प्रायः शिलापिण्डों के सरकने से नष्ट हो जाते हैं। भारत में भी जम्मू एवं कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड एवं उत्तर-पूर्वी राज्यों में प्रायः भूस्खलनों के समाचार मिलते रहते हैं। भूस्खलनों से सड़क परिवहन का बाधितं होना सामान्य परिघटना है। कभी-कभी छोटी नदियाँ भी भूस्खलनों से अवरुद्ध हो जाती हैं।

शिलाचूर्ण से मिश्रित हिम की विशाल राशि, जो भयंकर शोर के साथ पर्वतीय ढालों से नीचे की ओर गिरती है, एवलांश कहलाती है। एवलांश भी मानवीय बस्तियों को ध्वस्त कर देते हैं।

(ii) अग्निकाण्ड – अग्निकाण्ड प्राकृतिक एवं मानवीय दोनों कारणों से होते हैं। प्राकृतिक कारणों में तड़ित (Lightening) या बिजली गिरना, वनाग्नि, (Forest-fire) तथा ज्वालामुखी उद्गार सम्मिलित हैं। मानवीय कारणों में असावधानी, बिजली का शॉर्ट सर्किट, गैस सिलिण्डर का फटना आदि सम्मिलित हैं। इन सभी कारणों से उत्पन्न अग्निकाण्डों में वनाग्नि तथा बिजली के शॉर्ट सर्किट द्वारा उत्पन्न अग्निकाण्ड सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।

वनों में आग लगना एक सामान्य घटना है। यह वृक्षों की परस्पर रगड़ (जैसे—बाँस के वृक्ष), असावधानीवश भूमि पर जलती सिगरेट आदि फेंक देने अथवा कैम्प-फायर के दौरान होती है। इस प्रकार की आग से ऊँची लपटें तो नहीं निकलती हैं किन्तु धरातल पर पड़े हुए समस्त पदार्थ जलकर खाक हो जाते हैं। छोटी-मोटी झाड़ियाँ भी जल जाती हैं। सबसे विनाशकारी वितान-अग्नि (Crown-fire) होती है जिससे बड़े पैमाने पर विनाश होता है। ऐसे अग्निकाण्ड घने वनों में होते हैं। वनाग्नि के परिणाम दूरगामी होते हैं। इससे वन्य जीव-जन्तु व वनस्पतियाँ ही नहीं, समस्त पारिस्थितिकी प्रभावित होती है।

नगरों तथा बस्तियों में अग्निकाण्ड से जनजीवन तथा सम्पत्ति की बहुत हानि होती है। निर्धन लोगों की झुग्गी-झोंपड़ियों में आग लगना सहज बात होती है। नगरीय इमारतों में बिजली के शॉर्ट सर्किट से आग लगने की घटनाएँ होती हैं। मेलों तथा जलसों में भी शॉर्ट सर्किट से प्रायः आग लग जाती है। इस सन्दर्भ में सन् 1995 में डबबाली (जिला सिरसा, हरियाणा) में एक विद्यालय के वार्षिक जलसे में शॉर्ट सर्किट से उत्पन्न अग्निकाण्ड में 468 लोगों की जाने चली गयीं। 10 अप्रैल, 2006 को उत्तर प्रदेश के मेरठ नगर के विक्टोरिया पार्क में आयोजित एक उपभोक्ता मेले में 50 से अधिक लोग अग्निकाण्ड में मृत हुए तथा 100 से अधिक गम्भीर रूप से घायल हो गये।

प्रश्न 7
सूनामी कैसे उत्पन्न होती है? [2013]
या
सूनामी किसे कहते हैं? [2014]
उत्तर
समुद्र में लहरें उठना एक सामान्य बात है तथा ये सदैव ही उठती रहती हैं, परन्तु कुछ स्थितियों में ये विकराल रूप ग्रहण कर लेती हैं तथा सम्बन्धित क्षेत्र के लिए भयंकर आपदा सिद्ध होती हैं। सामान्य समुद्री लहरें (Sea waves) कभी-कभी विनाशकारी रूप धारण कर लेती हैं। इनकी ऊँचाई 15 मीटर और कभी-कभी इससे भी अधिक तक होती है। ये तट के आस-पास की बस्तियों को तबाह कर देती हैं। ये लहरें मिनटों में ही तट तक पहुँच जाती हैं। जब ये लहरें उथले पानी में प्रवेश करती हैं, तो भयावह शक्ति के साथ तट से टकराकर कई मीटर ऊपर तक उठती हैं। तटवर्ती मैदानी इलाकों में इनकी रफ्तार 50 किमी प्रति घण्टा तक हो सकती है।

इन विनाशकारी समुद्री लहरों को ‘सूनामी’ कहा जाता है। सूनामी, जापानी भाषा का शब्द है, जो दो शब्दों ‘सू’ अर्थात् ‘बन्दरगाह और नामी’ अर्थात् ‘लहर से बना है। सूनामी लहरें अपनी भयावह शक्ति के द्वारा विशाल चट्टानों, नौकाओं तथा अन्य प्रकार के मलबे को भूमि पर कई मीटर अन्दर तक धकेल देती हैं। ये तटवर्ती इमारतों, वृक्षों आदि को नष्ट कर देती हैं। 26 दिसम्बर, 2004 को दक्षिण-पूर्व एशिया के 11 देशों में सूनामी’ द्वारा फैलाई गयी विनाशलीला से हम सब परिचित हैं।

प्रश्न 8
भारत में भूस्खलन को रोकने के किन्हीं दो उपायों को बताइए। (2015)
उत्तर
भूस्खलन एक प्राकृतिक आपदा है फिर भी मानव-क्रियाएँ इसके लिए उत्तरदायी हैं। इसके न्यूनीकरण की दो युक्तियाँ निम्नलिखित हैं –
(1) भूमि उपयोग – वनस्पतिविहीन ढलानों पर भूस्खलन का खतरा बना रहता है। अतः ऐसे स्थानों पर स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार वनस्पति उगाई जानी चाहिए। भू-वैज्ञानिक विशेषज्ञों के द्वारा सुझाये गये उपायों को अपनाकर, भूमि के उपयोग तथा स्थल की जाँच से ढलान को स्थिर बनाने वाली विधियों को अपनाकर भूस्खलन से होने वाली हानि को 95% से अधिक कम किया जा सकता है। जेल के प्राकृतिक प्रवाह में कभी भी बाधक नहीं बनना चाहिए।

(2) प्रतिधारण दीवारें – भूस्खलन को सीमित करने तथा मार्गों को क्षतिग्रस्त होने से बचाने के लिए सड़कों के किनारों पर प्रतिधारण दीवारें तीव्र ढाल पर बनायी जानी चाहिए जिससे ऊँचे पर्वत से पत्थर सड़क पर गिर न जाएँ। रेल लाइनों के लिए प्रयोग की जाने वाली सुरंगों के पश्चात् काफी दूर तक प्रतिधारण दीवारों का निर्माण किया जाना चाहिए।

प्रश्न 9
भारत में सूखा प्रभावित क्षेत्रों की समस्याओं (दुष्प्रभावों का वर्णन कीजिए। [2010, 11, 13, 14]
उत्तर

भारत में सूखा प्रभावित क्षेत्रों की समस्याएँ

सूखा एक विनाशकारी प्राकृतिक आपदा है, क्योंकि इसका सीधा सम्बन्ध मानव की तीन आधारभूत आवश्यकताओं वायु, जल और भोजन से है। सूखे से मानव के सामने अनेक समस्याएँ उत्पन्न होने लगती हैं, ऐसी ही कुछ समस्याएँ निम्नलिखित हैं –

  1. सूखा पड़ने पर कृषि उपजे नष्ट होने लगती हैं, जिससे भोजन की कमी हो जाती है।
  2. सूखा पड़ने से पशुओं के लिए चारे की कमी हो जाती है, कभी-कभी चारे की कमी के कारण पशुओं की मृत्यु भी हो जाती है।
  3. ग्रामों की अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है, परन्तु सूखे के कारण कृषि नष्ट हो जाती है। इसलिए ग्रामों में किसान को आर्थिक हानि का सामना करना पड़ता है।
  4. ग्रामों में कृषि पर आधारित रोजगारों की प्रधानता होती है परन्तु सूखे के कारण ग्रामों में रोजगार की कमी हो जाती है। इससे गाँव के लोगों की क्रयक्षमता कम हो जाती है जिसका प्रभाव सम्पूर्ण वाणिज्य व्यवस्था पर पड़ता है।
  5. लम्बी अवधि तक सूखा पड़ने पर दुर्भिक्ष (Famine) जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिससे भुखमरी के कारण व्यापक रूप में मानव एवं पशुओं की मृत्यु होने लगती है।
  6. सरकार को सूखे से निपटने के लिए विविध उपायों पर धन व्यय करना पड़ता है जिससे राष्ट्रीय बचत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तथा विकास कार्यों में धन की मात्रा में गिरावट आने लगती है।
  7. सूखा पड़ने पर उद्योगों के लिए कृषि आधारित कच्चे माल की कमी हो जाती है जिससे औद्योगिक उत्पादन में गिरावट के कारण कीमतें ऊँची हो जाती हैं।
  8. सूखे के कारण लोग अपने मूल स्थान से पलायन करने लगते हैं इसलिए अन्य क्षेत्रों में जनसंख्या असन्तुलन की समस्या उत्पन्न होने लगती है।

प्रश्न 10
भारत में सूखा प्रभावित किन्हीं दो क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए। [2011]
उत्तर
भारत में सूखा संकट के आधार पर सूखा प्रभावित तीन प्रमुख क्षेत्र हैं –
(i) उच्च या प्रचण्ड सूखाग्रस्त क्षेत्र
(ii) मध्यम सूखाग्रस्त क्षेत्र
(iii) न्यून सूखाग्रस्त क्षेत्र। इनमें दो क्षेत्रों का उल्लेख इस प्रकार है –

(i) उच्च या प्रचण्ड सूखाग्रस्त क्षेत्र इस क्षेत्र में राजस्थान का मरुस्थलीय एवं अर्द्ध-मरुस्थलीय क्षेत्र, गुजरात, हरियाणा, मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश का दक्षिणी भाग प्रचण्ड सूखाग्रस्त क्षेत्र हैं। इस क्षेत्र का विस्तार लगभग 6 लाख वर्ग किमी में हैं।
(ii) मध्यम सूखाग्रस्त क्षेत्र इसके अन्तर्गत महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु का पश्चिमी भाग सम्मिलित है। यह प्रदेश लगभग 300 किमी की चौड़ाई में पश्चिमी घाट के पूर्व में चतुर्भुजाकार रूप में फैला है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
प्राकृतिक आपदा से क्या तात्पर्य है ? दो उदाहरण लिखिए।
उत्तर
वे घटनाएँ अथवा दुर्घटनाएँ जो प्राकृतिक प्रक्रमों या मानवीय कारणों से उत्पन्न होती हैं और जिनसे अपार जान-माल की हानि होती है, प्राकृतिक आपदा कहलाती है। उदाहरण-स्वरूप, भूकम्प तथा बाढ़ ऐसी ही प्राकृतिक आपदाएँ हैं।

प्रश्न 2
भूकम्प की तीव्रता किस प्रकार मापी जाती है ?
उत्तर
भूकम्प की तीव्रता रिक्टर पैमाने से मापी जाती है।

प्रश्न 3
विश्व के अधिकांश ज्वालामुखी कहाँ स्थित हैं?
उत्तर
विश्व के 80% सक्रिय ज्वालामुखी विनाशकारी या अभिसारी प्लेट किनारों (Convergent margins) के सहारे स्थित हैं। अभिसारी प्लेट किनारे अग्निवलय के सहारे स्थित हैं।

प्रश्न 4
सूखा से क्या आशय है?
उत्तर
हॉब्स (Hobbs) के अनुसार, किसी विशेष समय में औसत वर्षा न होने की स्थिति को सूखा कहा जाता है।

प्रश्न 5
भारत के किन भागों में भयंकर सूखा पड़ता है?
या
उत्तर भारत के दो सूखाग्रस्त क्षेत्रों के नाम लिखिए। [2014]
उत्तर
राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, ओडिशा, दक्षिणी उत्तर प्रदेश राज्य के क्षेत्र भारत के प्रमुख सूखाग्रस्त क्षेत्र हैं।

प्रश्न 6
भारत में बाढ़ के किन्हीं दो कारणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर

  1. तीव्र भूकम्पीय लहरों से बाँधों के टूटने पर।
  2. नदी के मार्ग में भूस्खलन के कारण उत्पन्न अवरोध से।

प्रश्न 7
प्राकृतिक आपदा के दो उदाहरण दीजिए। [2012]
उत्तर

  1. भूकम्प तथा
  2. सूखा पड़ना।

प्रश्न 8
आपदा प्रबन्धन से आप क्या समझते हैं? [2012, 13, 15, 16]
उत्तर
प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को कम करने को आपदा प्रबन्धन कहते हैं।

प्रश्न 9
भारत में भूस्खलन से प्रभावित किन्हीं दो राज्यों के नाम लिखिए। [2012]
उत्तर

  1. जम्मू एवं कश्मीर तथा
  2. हिमाचल प्रदेश।

प्रश्न 10
भूस्खलन क्या है? [2016]
उत्तर
भूस्खलन एक प्राकृतिक घटना है जो भौगोलिक कारणों से होती है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1
भोपाल गैस रिसाव की दुर्घटना थी –
(क) प्राकृतिक
(ख) मानवीय
(ग) वायुमण्डलीय
(घ) आकस्मिक
उत्तर
(ख) मानवीय।

प्रश्न 2
भूस्खलन परिघटना है –
(क) भूगर्भिक
(ख) मानवीय
(ग) वायुमण्डलीय
(घ) आकाशीय
उत्तर
(क) भूगर्भिक।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 26 Disaster Management

प्रश्न 3
सूनामी की उत्पत्ति का सम्बन्ध है – [2011]
(क) भूकम्प से
(ख) ज्वालामुखी से
(ग) भूस्खलन से
(घ) बाढ़ से
उत्तर
(क) भूकम्प से।

प्रश्न 4
सर्वाधिक भूस्खलन होता है – [2015]
(क) पठारी क्षेत्र में
(ख) पर्वतीय क्षेत्र में
(ग) तटीय क्षेत्र में
(घ) तराई क्षेत्र में
उत्तर
(ख) पर्वतीय क्षेत्र में।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 26 Disaster Management

प्रश्न 5
निम्नलिखित में से कौन-सी मानवकृत आपदा है? [2016]
(क) निर्वनीकरण
(ख) बाढ़
(ग) भूस्खलन
(घ) ज्वालामुखी
उत्तर
(क) निर्वनीकरण।

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UP Board Class 10 English Model Papers Paper 1

UP Board Class 10 English Model Papers Paper 1 are part of UP Board Class 10 English Model Papers . Here we have given UP Board Class 10 English Model Papers Paper 1.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 10
Subject English
Model Paper Paper 1
Category UP Board Model Papers

UP Board Class 10 English Model Papers Paper 1

Time : 3 hrs 15 min
Maximum Marks : 70

Instruction First 15 minutes are allotted for the candidates to read the question paper.
Note:

  1. This question paper is divided into two sections A and B.
  2. All questions from the two sections are compulsory.
  3. Marks are indicated against each question.
  4. Read the questions very carefully before you start answering them.

Section A

Question 1.
Read the following passage and answer the questions given below it:
Now we have to see to it that we grow into such citizens that people will want the light of our character and our influence everywhere. We do not wish to have the sort of character that will make people want us to stay in one place and not to mix with others. If we are to be good citizens, who will be able to serve their country, we must be carrying light with us wherever we go and not darkness. Our influence on others must be for good and not for bad. Our lives must be such that wherever we go and wherever we live, other people will be the better for our having been with them. A good citizen is a center of light wherever he lives and whatever he is doing. The greater the number of good citizens in a country, the more enlightened will the country be as a whole.

  1. What type of citizens should we grow into? (2)
  2. What makes a country more enlightened? (2)

Question 2.
Answer one of the following questions in about 60 words: (4)

  1. How did the Yaksha reward Yudhishthira?
  2. What was the significance of the Ganga for Nehru and for India?

Question 3.
Answer two of the following questions in about 25 words each: (2+2=4)

  1. What great qualities of Socrates brought out in the lesson appeal to you most?
  2. Who is the creator of the universe? What has he created?
  3. Why did Yama take the form of the Yaksha?

Question 4.
Match the words of List A with their meanings in List B: (1 x 4=4)

List A List B
Treasured Peak
Predicted Victory
Crest Stored
Triumph Foretold

Question 5.
Read the following lines of poetry and answer the questions given below.
Not enjoyment, and not sorrow,
Is our destined end or way,
But to act, that each tomorrow Finds us farther than today.

  1. What is the purpose or aim of our life? (2)
  2. What is the meaning of “destined” in the second line? (2)

Question 6.
Give the central idea of one of the following poems: (3)

  1. The Village Song
  2. The Fountain

OR
Write four lines from one of the poems given in your textbook. (Do not copy out the lines given in this question paper.)

Question 7.
Answer two of the following questions in about 25 words each: (2+2=4)

  1. Why did Edison decide to take up a job in the railways? How much did he earn on the first day?
  2. Why did the king of Ujjain want to sit on the judgement seat of Vikramaditya?
  3. Who were Jesse Owens and Luz Long? When did they meet for the first time?

Question 8.
Point out true and false statements in the following: (1 x 4=4)

  1. Edison was never satisfied till he got the right answer.
  2. Edison bought toys and sweets with the pocket money his father gave him.
  3. Olympic Games were held in America in 1936.
  4. The king of Ujjain sat and possessed the throne of Vikramaditya at last.

Question 9.
Select the most suitable alternative to complete the following statements: (1 x 4=4)

1. The teacher thought Edison was …………..
(A) stubborn and naughty
(B) a genius
(C) stupid and naughty
(D) very mischievous

2. Vikramaditya is famous for his ……………
(A) wisdom
(B) justice
(C) honesty
(D) love for his subject

3. The laborers dug out a block of marble slab supported on the hands and wings of stone angels numbering …………
(A) a dozen
(B) twenty-five
(C) twenty-one
(D) thirty-one

4. Luz Long was a real sportsman because ……………
(A) he was tall and well built
(B) he was a German
(C) his main objective in games was not conquering but fighting well
(D) he was a selfish player

Section B

Question 10.
Do as indicated against each of the following sentences:

  1. It passion can achieve one anything for if has one. (Frame a correct sentence by re-ordering the words) (2)
  2. The baby ate up all the cake. (Change into passive voice) (2)
  3. The teacher said to the students, “Did you listen to my words?” (Change into indirect speech) (2)
  4. He has to bring his umbrella. (Use correct form of the verb ‘forget’ to fill in the blanks) (2)

Question 11.
1. Choose the correct preposition from the ones given below the sentence to fill in the blank: (2)
When will Sameer leave Hong Kong? (from, to, for, by)

2. Complete the following sentence: (2)
I did not understand what

3. Complete the spellings of the following words:

  1.  e_st_s_
  2. in_l_en_e

4. Punctuate the following sentence using capital letters wherever necessary: (2)
from where can i get a taxi Suraj asked to Vivek

Question 12.
Translate the following into English: (4)

आजकल के बच्चे किताबों से पढ़ना पसन्द नहीं करते हैं। उन्हें संगणक पर पढ़ना अधिक पसन्द है। परन्तु किताबें हमारा अमूल्य खजाना हैं। किताबों से हम अच्छे लेखकों की अच्छी भाषा एवं विचार सीखते हैं। ये विचार हमारे जीवन में भी मददगार होते हैं।

Question 13.
Write an application to the Manager, Everest Hand loom
Company, Faridabad for the post of a salesman. You saw the advertisement in the Times of India of 8th June, 2015. They want a smart young man having fluency in English and Hindi both. (Do not write your name and roll no.) (4)

  1. (A) We should grow into such citizens that people will want the light of our character and influence everywhere.
    (B) The greater number of good citizens makes a country more enlightened.
  2. (A) The Yaksha was very pleased with Yudhisthira’s satisfactory answers. His answers proved that he was a man of patience and kindness, and had the knowledge of life. Being impressed with his answers, the Yaksha offered him the revival of one of his brothers’ lives. Yudhishtira showed his love for justice by choosing Nakula. This impressed the Yaksha a lot and he rewarded him by reviving all his brothers.

Or
Write a letter to your friend requesting him to come and spend the summer vacation with you. (Do not write your Name and Address.)

Question 14.
Write an essay on one of the following topics in about 60 words. Points are given below for each topic to develop the composition. (6)
1. My Grandmother
(A) Introduction
(B) Her Health and Education
(C) Her Dress and Habits
(D) Her Hobbies and Qualities

2. Your Favorite Festival
(A) Introduction
(B) Name of the Festival, Time of Celebration
(C) Legends Behind It
(D) How it is Celebrated
(E) Conclusion

3. My Birthday Celebration
(A) Introduction
(B) Preparations
(C) Blessings, Photographs, Delicious Dinner Served, A Wonderful Experience.
(D) Various Programs held
(E) Conclusion

Question 15.
Read the following passage carefully and answer the questions given below it:
In many parts of the country, Harijans were treated very badly before Independence. Gandhiji gave a call to the nation to abolish Unsociability and improve the lot of the Harijans who form one seventh of our population. India cannot progress unless their condition is improved.

Special facilities like scholarships, free distribution of books and free ships in schools and hostels are now given to them. All these and many more achievements in the fields of health, medicine, social education, transport and industry have been made through our five year plans. All this has been achieved in spite of great natural calamities and unexpected events like the Chinese invasion and wars with Pakistan. A check on our population, more education, better sense of duty and honesty can make our country a land of milk and honey again.

  1. Which facilities are now given to the Harijans who were earlier deprived of them? (3)
  2. In which fields have the achievements been made through our five year plans? (3)
  3. Significance of the Ganga for Nehru Nehruji had no religious sentiments for the Ganga.

He had been attached to the Ganga ever since his childhood. She reminded him of the snow-covered mountains and valleys where his life and work had been cast. Hence, Nehru is so attached to the Ganga. Significance of the Ganga for India The Ganga is beloved of the Indian people. She is the symbol of India’s age-long culture and civilisation. India’s racial memories, triumphs and victories are intimately related to the Ganga. Hence, the Ganga is the ‘River of India’ in his view.

Answers

Answer 1.

  1. We should grow into such citizens that people will want the light of our character and influence everywhere.
  2. The greater number of good citizens makes a country more enlightened.

Answer 2.
(A) The Yaksha was very pleased with Yudhisthira’s
satisfactory answers. His answers proved that he was a man of patience and kindness, and had the knowledge of life. Being impressed with his answers, the Yaksha offered him the revival of one of his brothers’ lives. Yudhishtira showed his love for justice by choosing Nakula. This impressed the Yaksha a lot and he rewarded him by reviving all his brothers.

Answer 3.

  1. Socrates thoughtfulness, his nobility, simple way of living and fearlessness are the most appealing qualities. Also, he was a great leader and philosopher.
  2. Brahma is the creator of the universe. He has created many majestic and wonderful things like mountain ranges, waterfalls, peacock, flowers etc. He has also added beauty and charm to them.
  3. Yama, who was the Lord of Death, took the form of the Yaksha because he wanted to see Yudhishthira and test his knowledge and wisdom.

Answer 4.

List A List B
Treasured Stored
Predicted Foretold
Crest Peak
Triumph Victory

Answer 5.

  1. Our purpose of life should be to act and make progress so that we have a better future.
  2. Destined means ‘pre-decided’ or ‘that is in fate’.

Answer 6.
1. The Village Song In the poem, The Village Song’, the poetess ‘Sarojini Naidu’ has described that joys in life are transitory in nature and one should not run after them. In other words, she intends to say that nothing in life is permanent and what is today may not be tomorrow. The poetess also appreciates the beauty of nature in this poem and says that it is much more appealing than the material things in life.

2. The Fountain The poet finds an inspiration of a perfect life in the fountain. It always looks happy and charming. It remains cheerful in all seasons. It cannot be tamed. It is always in motion without tiredness. Besides, the fountain is ever happy, fresh and glorious in the sunlight as well as in the moonlight. The poet wants to be pure, change full and yet steady like the fountain.
OR
Into the sunshine,
Full of the light Leaping and flashing From mom till night!

Answer 7.

  1. Edison needed more money to buy books (to read) and also to carry out his experiments. So, he decided to take up a job in the railways. He earned two dollars on the first day of his job.
  2. The king of Ujjain wanted to sit on the judgement seat of Vikramaditya hoping that the spirit of Vikramaditya would descend upon him and he would become a just king.
  3. Jesse Owens was an American Negro and a long-jumper. Luz Long was a German long-jumper. They met for the first time during the Olympic Games in Berlin in 1936.

Answer 8.

  1. True
  2. False
  3. False
  4. False

Answer 9.
1. (C)stupid and naughty
2. (B) justice
3. (B) twenty-five
4. (C) his main objective in games was not conquering but fighting well

Answer 10.

  1. One can achieve anything if one has passion for it.
  2. All the cake was eaten up by the baby.
  3. The teacher asked the sidelights if they had listened to his words.
  4. He has forgotten to bring his umbrella.

Answer 11.

  1. When will Sameer leave for Hong Kong?
  2. I did not understand what he was saying.
  3. (i) e c s t a s y , (ii) i n f 1 u e n c e
  4. “From where can I get a taxi?” Suraj asked Vivek.

Answer 12.
Children of today (today’s age) do not like to study from books. They prefer reading through computer. But, books are our valuable treasure. We learn good language and good thoughts of good authors from books. These thoughts are helpful in our life too.

Answer 13.
106, Sharda Apartments Gauri Nagar
Faridabad 9th June, 20XX
The Manager, ‘
Everest Handloom Company Faridabad
Dear Sir,
With reference to your advertisement dated 8th June, 20XX, in The Times of India; I wish to apply for the post of a salesman in your esteemed company.
I have passed H.S.S.C. with second division in the year 20XX from SMJ College. I have also done a certificate course in computer. I can speak English and Hindi and interact with the customers nicely.
I would be grateful to you if you find me eligible for the above said post and give me an opportunity.
Thanking you
Yours faithfully,
XYZ
OR
Refer to text on page 95.

Answer 14.

  1. Refer to text on page 107.
  2. Refer to text on page 102.
  3. Refer to text on page 106.

Answer 15.

  1. Harijans are now given the facilities of scholarships, free distribution of books and free ships in schools and hostels,
  2. Many achievements have been made in the fields of health, medicine, social education, transport and industry.

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