UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नियुक्ति आवेदन-पत्र

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Name नियुक्ति आवेदन-पत्र
Number of Questions 3
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi नियुक्ति आवेदन-पत्र

कुछ महत्त्वपूर्ण बातें

  1. अन्य पत्रों के समान आवेदन तथा प्रार्थना-पत्र में पत्र-लेखक अपना नाम-पतादि प्रारम्भ में नहीं लिखता और न ही प्रारम्भ में दिनांक लिखा जाता है। आवेदक अपना पता पत्र-समाप्ति पर अन्त में हस्ताक्षर के नीचे दायीं ओर लिखता है और बायीं ओर दिनांक लिखा जाता है।
  2. इन पत्रों का प्रारम्भ प्रथम पंक्ति में बायीं ओर कोने में सेवा में’ या ‘प्रति’ लिखने से होता है।
  3. ‘सेवा में लिखकर दूसरी पंक्ति में बायीं ओर से कुछ स्थान छोड़कर उद्दिष्ट अधिकारी का पदनाम और पता लिखा जाता है।
  4. सम्बोधन के रूप में मान्यवर/मान्य महोदय/महोदया लिखना चाहिए।
  5. निवेदन प्रारम्भ करते हुए प्रारम्भिक विनय-वाक्य लिखना चाहिए; जैसे—सादर निवेदन है/सविनय निवेदन है आदि।
  6. आवेदन का सम्पूर्ण कथ्य लिखने के उपरान्त शिष्टाचार के लिए सधन्यवाद लिखना चाहिए।
  7. स्वनिर्देश के रूप में भवदीय/विनीत/प्रार्थी लिखना चाहिए। स्वनिर्देश के नीचे हस्ताक्षर और पूरा पता देना चाहिए।
  8. अन्त में संलग्न प्रपत्रों की सूची देनी चाहिए। आवेदन-पत्र की दो शैलियाँ होती हैं—
    • प्रपत्र शैली तथा
    • पत्र शैली। दोनों ही शैली के उदाहरण यहाँ दिये जा रहे हैं।

प्रश्न 1.
लिपिक पद हेतु हिन्दी में प्रपत्र शैली में एक आवेदन-पत्र लिखिए। [2009, 11]
या
अपनी शैक्षिक योग्यताओं का उल्लेख करते हुए किसी उद्योग प्रबन्धक को लिपिक के पद पर नियुक्ति हेतु एक आवेदन-पत्र लिखिए। [2018]
या
अपने जनपद के जिलाधिकारी को उनके कार्यालय में रिक्त लिपिक पद पर नियुक्ति पाने के लिए एक आवेदन-पत्र लिखिए। [2009, 13]
या
प्रधानाचार्य/प्रबन्धक महोदय को लिपिक पद पर नियुक्ति हेतु एक प्रार्थना-पत्र लिखिए। [2012, 13, 14, 15, 17]
या
स्थानीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में लिपिक के रिक्त पद पर नियुक्ति हेतु विद्यालय के प्रबन्धक महोदय को एक प्रार्थना-पत्र लिखिए। [2016, 18]
उत्तर
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9. शुल्क विवरण-पोस्टल आर्डर संलग्न (संख्या 05921, दिनांक : ………………………………) मैं घोषणा करती हूँ कि आवेदित पद के लिए सभी निर्धारित अर्हताएँ मुझमें हैं। मैंने जो सूचनाएँ इस आवेदन-पत्र में दी हैं, वे सही हैं। यदि इनमें से कोई भी जानकारी गलत पायी जाये तो मेरी उम्मीदवारी निरस्त कर दी जाये।।

10. संलग्नकों की संख्या : तीन भवदीया
दिनांक : 14 मई, 2014 हस्ताक्षर

[ नाम : …………………………….]

प्रश्न 2.
सहायक अध्यापक पद के लिए पत्र शैली में शिक्षा-निदेशक के नाम एक आवेदन-पत्र लिखिए। [2014]
या
किसी विद्यालय के प्रबन्धक के नाम हिन्दी प्रवक्ता पद हेतु अपनी नियुक्ति के लिए आवेदन-पत्र लिखिए। [2013]
या
अपने जनपद के किसी विद्यालय में शिक्षक के रूप में कार्य करने के लिए अपना आवेदन-पत्र विद्यालय-प्रबन्धक को प्रस्तुत कीजिए। [2015]
उत्तर
सेवा में,
शिक्षा निदेशक,
लखनऊ।

विषय-सहायक अध्यापक पद के लिए आवेदन-पत्र महोदय,

दिनांक 11 मार्च, 2010 के ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ में प्रकाशित आपके विज्ञापन के उत्तर में मैं हिन्दी में सहायक अध्यापक पद के लिए आवेदन कर रहा हूँ। मेरी शैक्षणिक योग्यताओं एवं अन्य जानकारियों का विवरण इस प्रकार है-
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अन्य गतिविधियाँ-विद्यालय तथा महाविद्यालय स्तर पर हुई वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में प्रथम पुरस्कार विजेता, कुछ एक सांस्कृतिक कार्यक्रमों के सफल संचालन का अनुभव।
स्थायी पता-15A, सी-ब्लॉक, शास्त्रीनगर, मेरठ।
मेरी अध्यापन में अत्यधिक रुचि है। यदि आपने इस पद का उत्तरदायित्व मुझे सौंपा, तो मैं पूर्ण निष्ठा से उसका निर्वाह करूंगा तथा कभी शिकायत का अवसर नहीं दूंगा।
सेवा का अवसर प्रदान कर कृतार्थ करें।
धन्यवाद! भवदीय
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प्रश्न 3.
बेसिक शिक्षा अधिकारी को प्राइमरी शिक्षक के पद के लिए आवेदन-पत्र लिखिए। [2010]
या
समाचार-पत्र में दिये गये विज्ञापन के आधार पर सहायक अध्यापक पद पर नियुक्ति हेतु अपने जनपद के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी को एक आवेदन-पत्र लिखिए। [2013]
या
समाचार-पत्र में प्रकाशित विज्ञापन के आधार पर ग्राम पंचायत अधिकारी पद पर नियुक्ति हेतु अपने जनपद के जिला पंचायत राज अधिकारी को एक आवेदन-पत्र लिखिए। [2014]
या
समाचार-पत्र में प्रकाशित विज्ञापन के आधार पर लेखपाल पद पर नियुक्ति हेतु अपने जनपद के जिला अधिकारी को एक आवेदन-पत्र लिखिए। [2016]
उत्तर
सेवा में,
बेसिक शिक्षा अधिकारी,
मेरठ (उ० प्र०)

विषय-प्राइमरी शिक्षक के पद हेतु आवेदन-पत्र

महोदय,
आपके कार्यालय द्वारा कल दिनांक …………. को दैनिक जागरण’ में प्रकाशित विज्ञापन के प्रत्युत्तर में मैं अपना आवेदन-पत्र प्रस्तुत कर रही हूँ। मुझसे सम्बन्धित विवरण निम्नवत् है-
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शैक्षणिक योग्यताएँ–
(क) 2002 ई० में उ० प्र० वोर्ड से 62% अंक लेकर हाईस्कूल परीक्षा उत्तीर्ण की।
(ख) 2004 ई० में उ० प्र० बोर्ड से 61% अंक लेकर इण्टरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण की।
(ग) 2006 ई० में दो वर्षीय बी० टी० सी० प्रशिक्षण कोर्स (उ० प्र०) से किया।
अनुभव-सितम्बर, 2006 से अब तक जनता विद्यालय, मेरठ में प्राथमिक शिक्षक के रूप में कार्य कर रहा हूँ।
आशा है कि आप सेवा का अवसर प्रदान कर कृतार्थ करेंगे।
दिनांक :…………………………. भवदीय
रूपेश कुमार
संलग्नक-सभी प्रमाण-पत्रों की सत्यापित प्रतिलिपियाँ व अनुभव प्रमाण की मूल प्रति।।

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UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue (आय)

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue (आय) are part of UP Board Solutions for Class 12 Economics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue (आय).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Economics
Chapter Chapter 5
Chapter Name Revenue (आय)
Number of Questions Solved 16
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue (आय)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
सीमान्त आय एवं औसत आय से क्या अभिप्राय है? चित्र और उदाहरण की सहायता से इनमें सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए। [2009]
या
तालिका और रेखाचित्र के माध्यम से सीमान्त आय, कुल आय और औसत आय के पारस्परिक सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
या
कुल आय, औसत आय और सीमान्त आय को परिभाषित कीजिए। इनमें परस्पर क्या सम्बन्ध पाया जाता है? [2008]
या
सीमान्त एवं औसत आगम में सम्बन्ध बताइए। [2006]
उत्तर:
आय का अर्थ
सामान्य बोलचाल की भाषा में आय (आगम) का अर्थ व्यक्ति विशेष को समस्त साधनों से होने वाली आय से लगाया जाता है। प्रत्येक फर्म या उत्पादक का उद्देश्य वस्तुओं का न्यूनतम लागत पर उत्पादन करके उनकी अधिकतम बिक्री करने का होता है जिसमें वह अधिकतम लाभ अर्जित कर सके। अर्थशास्त्र में आय या आगम शब्द का आशय प्राप्त होने वाले उस धन से होता है जो किसी उत्पादित वस्तु की बिक्री से प्राप्त होता है। अर्थशास्त्र में आय शब्द का प्रयोग तीन प्रकार से किया जाता है

  1. कुल आय (Total Revenue),
  2. औसत आय (Average Revenue) तथा
  3.  सीमान्त आय (Marginal Revenue)।

1. कुल आय – किसी उत्पादक या फर्म के द्वारा अपने उत्पादन की एक निश्चित मात्रा को बेचकर जो धनराशि प्राप्त की जाती है, उसे कुल आय कहते हैं।
कुल आय ज्ञात करने के लिए फर्म द्वारा बेची जाने वाली इकाइयाँ तथा प्रति इकाई की कीमत ज्ञात होनी चाहिए। फर्म द्वारा बेची जाने वाली वस्तु की मात्रा को कीमत से गुणा करके कुल आय ज्ञात की जा सकती है।
कुल आय = वस्तु की बेची गयी मात्रा या इकाइयों की संख्या x कीमत उदाहरण के लिए–यदि कोई फर्म र 50 प्रति इकाई की दर से 10 कुर्सियाँ बेचती है तो उसकी कुल आय = 50 x 10 = 500 होगी।

2. औसत आय – औसत आय उत्पादने की निश्चित मात्रा की बिक्री की प्रति इकाई आय है, जिसे बिक्री से प्राप्त कुल आय को वस्तु की बेची गयी कुल मात्रा (इकाइयों) से भाग देकर ज्ञात किया जाता है।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 1
उदाहरण के लिए-10 कुर्सियों की बिक्री से ₹500 की कुल आय प्राप्त होती है, तब
औसत आय = [latex]\frac { 500 }{ 10 }[/latex] = ₹50 प्रति कुर्सी

3. सीमान्त आय – सीमान्त आय अन्तिम इकाई की बिक्री से प्राप्त होने वाली आय होती है। किसी वस्तु की एक अधिक अथवा एक कम इकाई बेचने से कुल आय में जो वृद्धि अथवा कमी होती है, वह उस वस्तु की सीमान्त आय कहलाती है। उदाहरण के लिए – 10 कुर्सियों को ₹50 प्रति कुर्सी की दर से बेचने पर कुल आय में ₹500 प्राप्त हुई। यदि उत्पादक एक कुर्सी और बेचना चाहे और वह 11 कुर्सियों को ₹545 में बेच देता है, तब सीमान्त आय ₹545 – 45 हुई। अत:
सीमान्त आय = कीमत x बेची गयी इकाइयों की संख्या – पूर्व की कुल आय।

कुल आय, औसत आय और सीमान्त आय का सम्बन्ध
कुल आय, औसत आय व सीमान्त आय का सम्बन्ध निम्नलिखित तालिका द्वारा दर्शाया गया है –

बिक्री की कुल इकाइयाँ प्रति इकाई कीमत
(₹ में)
कुल आय
(₹ में)
औसत आय
(₹ में)
सीमान्त आय
(₹ में)
1. 17 17 17 = 17
2. 16 32 16 (32-17)=15
3. 15 45 15 (45-32)=13
4. 14 56 14 (56-45)=11
5. 13 65 13 (65-56)= 9
6. 12 72 12 (72-65)= 7
7. 11 77 11 (77-72)= 5
8. 10 80 10 (80-77)= 3

उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि जैसे-जैसे वस्तु की अधिकाधिक इकाइयाँ बेची जाती हैं। वैसे-वैसे अतिरिक्त इकाइयों की कीमत कम करनी पड़ती है, क्योंकि तभी ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में वस्तुओं की कीमत घट जाने से सीमान्त आय और औसत आय घटती जाती हैं; परन्तु सीमान्त आय औसत आय की अपेक्षा अधिक तीव्र गति से घटती है। कुल आय में निरन्तर 80वृद्धि होती जाती हैं, परन्तु वृद्धि की दर गति से उत्तरोत्तर कम होती जाती है।

रेखाचित्र द्वारा स्पष्टीकरण
संलग्न चित्र में Ox-अक्ष पर बिक्री की इकाइयाँ तथा OY- अक्ष पर आये दर्शायी गयी है। चित्र में TR कुल आय वक्र, AR औसत आय वक्र तथा MR सीमान्त आय वक्र हैं। चित्र से स्पष्ट है कि जैसे-जैसे वस्तु की अधिकाधिक इकाइयाँ बेची जाती हैं वैसे-वैसे औसत आय तथा सीमान्त आय घटती जाती हैं। परन्तु औसत आय की अपेक्षा सीमान्त
MR आय अधिक तेजी से घटती है। कुल आय निरन्तर बढ़ रही है, किन्तु वृद्धि की दर उत्तरोत्तर कम होती जा रही है।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 2

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
पूर्ण और अपूर्ण प्रतियोगी बाजार में सीमान्त आय और औसत आय की आकृति को चित्रों की सहायता से स्पष्ट कीजिए।
या
सीमान्त आय वक्र, औसत आय वक्र को इसके निम्नतम बिन्दु पर नीचे की ओर से ही क्यों काटता है ? चित्र की सहायता से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगी बाजार एवं अपूर्ण प्रतियोगी बाजार का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-जिस । बाजार में किसी वस्तु-विशेष के अनेक क्रेता-विक्रेता, उस । वस्तु का क्रय-विक्रय स्वतन्त्रतापूर्वक करते हैं तथा कोई एक क्रेता या विक्रेता वस्तु के मूल्य को प्रभावित नहीं कर सकता, तो ऐसे बाजार को पूर्ण प्रतियोगी बाजार कहते हैं। अपूर्ण । प्रतियोगिता पूर्ण प्रतियोगिता और एकाधिकार के बीच की है स्थिति है अर्थात् अपूर्ण प्रतियोगिता वाले बाजार में कुछ तत्त्व । पूर्ण प्रतियोगिता वाले बाजार के तथा कुछ तत्त्व एकाधिकार वाले बाजार के निहित होते हैं। वास्तविक जीवन में ऐसी ही मिश्रित अवस्था पायी जाती है जिसमें किसी वस्तु का मूल्य समान नहीं होता।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 3
किसी फर्म के औसत आय वक्र AR और सीमान्त आय वक्र MR का आकार कैसा होगा, यह इस बात पर निर्भर होता है कि उस फर्म को पूर्ण प्रतियोगिता अथवा अपूर्ण प्रतियागिता में से किस प्रकार के बाजार की दशाओं में अपना माल बेचना पड़ता है। सामान्यतः प्रतियोगिता जितनी तीव्र होगी तथा वस्तु के जितने निकट स्थानापन्न होंगे, उतना ही अधिक लोचदार उस फर्म का औसत आय वक्र होगा।

पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म ‘कीमत ग्रहण करने वाली’ (Price taker) होती है, कीमत-निर्धारण करने वाली (Price maker) नहीं। इस दशा में फर्म को प्रचलित कीमत को स्वीकार करना पड़ता है, क्योंकि वह इस कीमत पर इच्छानुसार माल बेच सकती है। यदि फर्म अपनी कीमत को बढ़ाती है तो वह समस्त ग्राहकों को खो देगी। यदि कीमत कम करती है तो ग्राहकों की भी भरमार हो जाएगी। अत: पूर्ण प्रतियोगिता की दशा में प्रचलित कीमत ही स्वीकार करनी पड़ती है। यहाँ औसत आये सर्वदा कीमत के बराबर होगी। क्योंकि औसत आय निश्चित है, इसीलिए सीमान्त आय भी निश्चित होगी और वह औसत आय के बराबर होगी। इस प्रकार AR = MR रहती है तथा औसत आय वक्र एक सीधी पड़ी रेखा (Horizontal Straight Line) : होती है। इसका प्रमुख कारण फर्म द्वारा प्रचलित कीमत को स्वीकार करना होता है।

रेखाचित्र द्वारा स्पष्टीकरण
अपूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में फर्म के औसत व सीमान्त आय वक्रे दोनों ही ऊपर से नीचे की ओर गिरते हैं। स्पष्ट है कि फर्म के उत्पादन के बढ़ने पर औसत आय (AR) और सीमान्त आय (MR) दोनों ही गिरती हैं, किन्तु सीमान्त आय, औसत आय की अपेक्षा तेजी से गिरती है। इसका मुख्य कारण यह है कि अपूर्ण प्रतियोगिता की है – स्थिति में विक्रेताओं की संख्या पूर्ण प्रतियोगिता की तुलना में अपेक्षाकृत कम होती है जिसके कारण विक्रेता कीमत को प्रभावित करने की स्थिति में होता है अर्थात् वे कीमत में कमी करके वस्तु की बिक्री की मात्रा को अधिकतम करके अधिक लाभ अर्जित कर सकते हैं। इस कारण सीमान्त आय वक्र औसत आय वक्र को इसके न्यूनतम बिन्दु पर नीचे की ओर से ही काटता है।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 4

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
औसत आय से क्या अभिप्राय है?
या
औसत आय (आगम) का सूत्र लिखिए। [2011, 15]
उत्तर:
औसत आय उत्पादन की निश्चित मात्रा की बिक्री की प्रति इकाई आय है, जिसे बिक्री से प्राप्त कुल आय को वस्तु की बेची गई कुल मात्रा (इकाइयों) से भाग देकर ज्ञात किया जाता है।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 5

प्रश्न 2
सीमान्त आय किसे कहते हैं ?
उत्तर:
सीमान्त आय अन्तिम इकाई की बिक्री से प्राप्त होने वाली आय होती है। किसी वस्तु की अधिक अथवा एक़ कम इकाई बेचने से कुल आय में जो वृद्धि अथवा कमी होती है, वह उस वस्तु से प्राप्त होने वाली सीमान्त आय कहलाती हैं।
सीमान्त आय = कीमत x बेची गयी इकाइयों की संख्या – पूर्व की कुल आय।

प्रश्न 3
सीमान्त एवं औसत आगम में सम्बन्ध बताइए। [2006]
या
कुल आय, सीमान्त आय और औसत आय में सम्बन्ध बताइए।
उत्तर:
जैसे-जैसे कोई फर्म अतिरिक्त इकाइयों का उत्पादन करती है, कुल आगम में वृद्धि होती जाती है। धीरे-धीरे कुल आगम में वृद्धि की दर में कमी आने लगती है और एक सीमा के बाद इसमें वृद्धि होनी समाप्त हो जाती है। इस बिन्दु पर उत्पादक उत्पादन कार्य समाप्त कर देगा। औसत आय एवं सीमान्त आय में आरम्भ से ही धीरे-धीरे कमी आने लगती है किन्तु सीमान्त आय के घटने की गति औसत आय की तुलना में तीव्र होती है।

प्रश्न 4
निम्नलिखित प्रश्न का उत्तर लिखिए सिदद कीजिए कि जब औसत आगम =

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 6, तो औसत आगम = कीमत।
उत्तर:
कुल आगम = वस्तु की बेची जाने वाली इकाइयाँ x कीमत
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 7
अतः औसत आगम = कीमत
उदाहरण के लिए-10 कुर्सियों की बिक्री से ₹500 की कुल आगम प्राप्त होती है, तब
औसत आगम = [latex]\frac { 500 }{ 10 }[/latex] = ₹50 प्रति
औसत आगम = कीमत
औसत आगम या वस्तु की कीमत एक ही बात है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
कुल आय किसे कहते हैं ?
उत्तर:
किसी उत्पादक या फर्म के द्वारा अपने उत्पादन की एक निश्चित मात्रा को बेचकर जो धनराशि प्राप्त की जाती है उसे कुल आय कहते हैं। कुल आय = वस्तु की बेची गयी मात्रा या इकाइयों की संख्या x कीमत।

प्रश्न 2
यदि किसी वस्तु की 10 इकाइयों से प्राप्त कुल आय ₹ 180 है और 11 इकाइयों से प्राप्त कुल आय ₹ 187 है, तो सीमान्त आय क्या होगी ?
उत्तर:
सीमान्त आय = 187 – 180 = ₹ 7

प्रश्न 3
यदि किसी वस्तु की 1 इकाई का बाजार मूल्य ₹16 है, तो उसकी 25 इकाइयों की कुल आय कितनी होगी ?
उत्तर:
कुल आय = 25 x 16 = ₹ 400.

प्रश्न 4
औसत उत्पादकता क्या है? [2007]
उत्तर:
कुल उत्पादकता को साधन की संख्या से भाग देकर औसत आय प्राप्त कर ली जाती है। Teases

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
कुल आय बराबर है
(क) वस्तु की बेची गयी इकाइयों की संख्या x कीमत
(ख) वस्तु की बेची गयी इकाइयों की संख्या + कीमत
(ग) वस्तु की बेची गयी इकाइयों की संख्या – कीमत
(घ) वस्तु की बेची गयी इकाइयों की संख्या + कीमत
उत्तर:
(क) वस्तु की बेची गयी इकाइयों की संख्या x कीमत।

प्रश्न 2
औसत आय बराबर है
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 8
उत्तर:
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 5 Revenue 9

प्रश्न 3
सीमान्त आय बराबर है
(क) कुल आय x पिछली इकाइयों की आय
(ख) सीमान्त आय + पिछली इकाइयों की आय
(ग) कुल आय – पिछली इकाइयों की आय
(घ) उपर्युक्त (ख) एवं (ग)
उत्तर:
(ग) कुल आय – पिछली इकाइयों की आय।

प्रश्न 4
पूर्ण प्रतियोगिता की अवस्था में फर्म होती है
(क) कीमत ग्रहण करने वाली एवं कीमत-निर्धारित करने वाली
(ख) कीमत ग्रहण करने वाली, कीमत निर्धारित करने वाली नहीं
(ग) कीमत ग्रहण करने वाली नहीं, परन्तु कीमत निर्धारित करने वाली
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) कीमत ग्रहण करने वाली, कीमत निर्धारित करने वाली नहीं।

प्रश्न 5
आगम से तात्पर्य है।
(क) वस्तु की बिक्री से होने वाली आय
(ख) साधनों की बिक्री से होने वाली आय
(ग) सीमान्त आय
(घ) औसत आगम
उत्तर:
(क) वस्तु की बिक्री से होने वाली आय।।

प्रश्न 6
पूर्ण प्रतियोगिता में सीमान्त आय रेखा और औसत आय रेखा का स्वरूप होता है
(क) नीचे गिरती हुई
(ख) ऊपर उठती हुई
(ग) बराबर व क्षैतिज
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) बराबर व क्षैतिज।

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UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 6 Shivaji

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Textbook NCERT
Class Class 12
Subject History
Chapter Chapter 6
Chapter Name Shivaji (शिवाजी)
Number of Questions Solved 17
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 6 Shivaji (शिवाजी)

अभ्यास

प्रश्न 1.
निम्नलिखित तिथियों के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख कीजिए|
1. 1627 ई०
2.1659 ई०
3.1674ई०
4.1680 ई०
उतर:
दी गई तिथियों के ऐतिहासिक महत्व के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ-संख्या- 118 पर तिथि सार का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 2.
सत्य या असत्य बताइए
उतर:
सत्य-असत्य प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 118 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 3.
बहुविकल्पीय प्रश्न
उतर:
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 119 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 4.
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
उतर:
अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 119 का अवलोकन कीजिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मराठों के उदय के चार कारण लिखिए।
उतर:
मराठों के उदय के चार कारण निम्नवत हैं

  • महाराष्ट्र की भौगोलिक स्थिति
  • मराठा धर्म सुधारकों का प्रभाव
  • मराठों की सैनिक व प्रशासनिक कार्यों में दक्षता
  • औरंगजेब की दक्षिण नीति।

प्रश्न 2.
पुरन्दर की सन्धि के बारे में आप क्या जानते हैं?
उतर:
पुरन्दर की सन्धि शिवाजी और मुगलों के मध्य हुई थी। शिवाजी ने इस सन्धि में 35 में से 23 दुर्ग मुगलों को दे दिए। शिवाजी ने मुगलों का आधिपत्य स्वीकार कर लिया परन्तु अपने स्थान पर अपने पुत्र शम्भाजी को 5000 घुड़सवारों के साथ मुगलों की सेवा में भेज दिया। शिवाजी ने बीजापुर के सुल्तान के विरुद्ध मुगलों को सैनिक सहायता देना स्वीकार किया। इस सन्धि से मुगलों को बहुत लाभ पहुँचा।

प्रश्न 3.
शिवाजी के राजनैतिक आदर्श क्या थे?
उतर:
हिन्दू-पद-पादशाही, धर्मशास्त्र की पुस्तकें और कोटिल्य का अर्थशास्त्र’ शिवाजी के राजनैतिक आदर्श थे।

प्रश्न 4.
शिवाजी की किन्हीं दो विजयों का वर्णन कीजिए।
उतर:

  1. जावली विजय- सन् 1656 ई० में शिवाजी ने जावली पर विजय प्राप्त की। जावली एक मराठा सरदार चन्द्रराव के अधिकार में था। वह शिवाजी के विरुद्ध बीजापुर राज्य से मिला हुआ था। शिवाजी ने चन्द्रराव की हत्या कर किले पर अधिकार कर लिया। इससे उनका राज्य–विस्तार दक्षिण-पश्चिम की ओर सम्भव हो सका।।
  2. कोंकण विजय- जावली की विजय के उपरान्त शिवाजी ने कोंकण की ओर दृष्टिपात किया और उत्तरी कोंकण तथा भिवण्डी के दुर्गों पर अधिकार करके उन्होंने कोंकण में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली। उत्तरी कोंकण के पश्चात दक्षिणी कोंकण पर भी उनका अधिकार हो गया जिससे उनका राज्य समुद्री तटों तक विस्तृत हो गया।

प्रश्न 5.
शिवाजी ने अफजल खाँ की हत्या क्यों की?
उतर:
अफजल खाँ शिवाजी को छलपूर्वक परास्त करना चाहता था। शिवाजी अफजल खाँ के मन्तव्य को जान चुका था। जब शिवाजी,

अफजल खाँ के व्यक्तिगत मुलाकात के निमन्त्रण पर उससे मिलने के लिए उनके पास पहुँचा तो उसने आगे बढ़कर शिवाजी का स्वागत किया और शिवाजी को अपनी बाँहों में दबोचकर तलवार से वार किया। शिवाजी ने अफजल खाँ के कुचक्र को समझते
हुए बहुत ही चालाकी और साहसिक ढंग से अफजल खाँ का वध कर दिया।

प्रश्न 6.
शिवाजी ने शाइस्ता खाँ पर आक्रमण क्यों कर दिया?
उतर:
औरंगजेब ने दक्षिण में मराठों के बढ़ते प्रभाव से चिंतित होकर शिवाजी की शक्ति को कुचलने के लिए मुगल सूबेदार शाइस्ता खाँ को आदेश दिए। शाइस्ता खाँ ने बीजापुर के साथ मिलकर शिवाजी से पूना, चाकन और कल्याण को छीनने में सफलता प्राप्त की। इन पराजयों से शिवाजी की शक्ति कमजोर पड़ गई। मराठा सेना का उत्साह बढ़ाने के लिए शिवाजी ने एक दिन रात्रि के समय पूना में शाइस्ता खाँ के शिविर पर आक्रमण कर उसे परास्त कर दिया।

प्रश्न 7.
शिवाजी के अष्टप्रधान के विषय में आप क्या समझते हैं?
उतर:
शिवाजी ने अपनी शासन-व्यवस्था को सुचारू ढंग से चलाने के लिए आठ मन्त्रियों की एक परिषद् का गठन किया जो ‘अष्टप्रधान’ के नाम से सम्बोधित की जाती थी। केवल सेनापति के अलावा अन्य सभी मन्त्रिगण ब्राह्मण होते थे, जिनकी नियुक्ति सम्राट के द्वारा की जाती थी तथा वे सम्राट के प्रति उत्तरदायी होते थे। इन मंत्रियों द्वारा कार्य कराने का भार भी सम्राट पर ही था।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मुगलकाल में मराठों को एक स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने में सफलता क्यों मिली?
उतर:
मुगलकाल में मराठों को एक स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने में सफलता मिलने के निम्नलिखित कारण हैं

1. महाराष्ट्र की भौगोलिक स्थिति- महाराष्ट्र की भौगोलिक परिस्थितियों ने मराठा शक्ति के उत्कर्ष में उल्लेखनीय सहायता की। महाराष्ट्र का अधिकांश भाग पठारी है। जहाँ जीवन की सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को प्रकृति से कठोर संघर्ष करना पड़ता है। इस कारण वहाँ के निवासी परिश्रमी और साहसी होते हैं। वहाँ आक्रमणकारी के लिए बहुत कठिनाइयाँ थीं तथा सेना को लेकर चलना तथा उसके लिए रसद प्राप्त करना कठिन था, जबकि सुरक्षा के लिए वहाँ अनेक सुविधाएँ थीं। स्थान-स्थान पर सरलता से पहाड़ी किले बनाए जा सकते थे, जिनकी सुरक्षा करना सरल था, परन्तु उनको जीतना कठिन था। गुरिल्ला युद्ध-पद्धति अथवा छापामार रणनीति का प्रयोग वहाँ सरलता से सम्भव था। इसके अतिरिक्त भारत के बीच में स्थित होने के कारण वहाँ के निवासियों के लिए उत्तर और दक्षिण दोनों दिशाओं में अपनी प्रगति करने की सुविधा थी।

2. आर्थिक पृष्ठभूमि- आर्थिक दृष्टि से महाराष्ट्र के निवासियों में आर्थिक असमानताएँ न थी। व्यापारी वर्ग के अतिरिक्त वहाँ धनी वर्ग के व्यक्ति अधिक न थे। इसका कारण था- आर्थिक शोषण करने वाले वर्ग का अभाव। इससे महाराष्ट्र निवासियों का चरित्र दृढ़ बना, वे परिश्रमी और साहसी बने, उनमें समानता की भावना जगी, वे छोटे और बड़े की भावना से रहित हुए तथा वे उस भोग-विलास से दूर ही रहते थे, जिसके कारण उत्तर भारत के समाज का नैतिक पतन हो रहा था।

3. भाषा और साहित्य का योगदान- भाषा की दृष्टि से मराठी भाषा बहुत सरल और व्यावहारिक थी। इस जनसाधारण की भाषा के प्रयोग से महाराष्ट्र के निवासियों में एकता और समानता पनपी। सन्त तुकाराम के पद बिना भेदभाव के गाए जाते थे। इस प्रकार धार्मिक साहित्य ने लोगों के मध्य अप्रत्यक्ष रूप से एकता स्थापित कर दी थी। सर जदुनाथ सरकार के अनसार, शिवाजी द्वारा किए गए राजनीतिक संगठन से पर्व ही महाराष्ट्र में एक भाषा, एक रीति-रिवाज और एक ही प्रकार के समाज का निर्माण हो चुका था।

4. मराठा धर्मसुधारकों का प्रभाव- मराठों में स्वदेश-प्रेम और राष्ट्रीयता की भावना जगाने में महाराष्ट्र के धर्मसुधारकों का महत्वपूर्ण योगदान था। महाराष्ट्र धर्म-सुधार आन्दोलन का एक प्रमुख केन्द्र था। यहाँ संत ज्ञानेश्वर, संत एकनाथ, तुकाराम, संत रामदास और बामन पंडित जैसे विचारक और सुधारक हुए, जिन्होंने मराठों में जागृति ला दी। जनसाधारण की भाषा का सहारा लेकर इन लोगों ने घर-घर में अपनी बात पहुँचाई। शिवाजी के गुरु रामदास समर्थ ने अनेक मठों की स्थापना कर, ‘दसबोध’ नामक ग्रन्थ की रचना की और मठों में नवचेतना का संचार किया।

5. सैनिक व प्रशासनिक कार्यों में दक्षता- अहमदनगर, गोलकुण्डा व बीजापुर जैसे मुस्लिम राज्यों में लम्बे समय तक उच्च सैनिक व प्रशासनिक पदों पर कार्य करते रहने से मराठा, सैनिक व प्रशासनिक कार्यों में दक्ष हो गए थे, जिसका उन्हें कालान्तर में काफी लाभ मिला।

6. औरंगजेब की दक्षिण नीति- औरंगजेब ने उत्तर भारत को विजित करने के बाद दक्षिण भारत को विजित करने का निर्णय लिया। इसे देखकर समस्त मराठा शक्ति संगठित हो गई और उन्होंने मुगलों से संघर्ष करने का निर्णय किया। इसका मुख्य कारण उनका दक्षिण में पर्याप्त प्रभावशाली होना था। औरंगजेब का आक्रमण उनके इस प्रभाव को खत्म कर सकता था। यदि वे औरंगजेब की सत्ता को स्वीकार भी करते, तो औरंगजेब की धर्मान्ध नीति के कारण उन्हें वे उच्च पद व सुविधाएँ मिलने की सम्भावना बिलकुल ही नगण्य थी, जो कि उन्हें दक्षिण के दुर्बल व विलासी मुसलमान शासकों से मिल रही थी। यह एक व्यावहारिक कारण था, जिसने शिवाजी के नेतृत्व में मराठों को संगठित होने के लिए प्रेरित किया।

7. मराठों का उच्च चरित्र- मराठों के उच्च चरित्र ने भी उनके उत्कर्ष में सहायता की। उनके अन्दर साहस, एकता, परिश्रम, नैतिकता, राष्ट्र-प्रेम आदि गुण मौजूद थे।

8. भक्ति व धर्म-सुधार आन्दोलन- 15वीं व 16वीं शताब्दी के धर्म व भक्ति आन्दोलनों ने सामाजिक व धार्मिक धार्मिक करके मराठों में जातीय एकता की भावना भर दी, जिसने उन्हें शक्तिशाली बना दिया। इतिहासकार रानाडे के अनुसार महाराष्ट्र की राजनीति में उत्पन्न उथल-पुथल का प्रमुख कारण धार्मिक-आन्दोलन था। इसमें किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं है कि महाराष्ट्र के संत ज्ञानेश्वर, एकनाथ, तुकाराम व रामदास जैसे सन्तों ने मराठों में राष्ट्रीय भावना का संचार कर दिया।

9. दक्षिणी मुसलमानों का पतन- दक्षिण के मुसलमान शासकों का कुछ तो नैतिक पतन हो चुका था। वे शासन की जिम्मेदारी मराठों को सौंपकर भोग-विलास में डूबे रहते थे, जिससे मराठों ने शासन के महत्वपूर्ण पदों को कब्जे में करके सैन्य संचालन व प्रशासन को अपने हाथों में ले लिया था। तत्पश्चात् दिल्ली के मुगल शासकों विशेष रूप से औरंगजेब की दक्षिण नीति के कारण कई दक्षिणी मुसलमान राज्य औरंगजेब के हाथों में चले गए थे। उसने अहमदनगर पर विजय पाने के बाद गोलकुण्डा व बीजापुर को जीतने का प्रयास किया। दक्षिण के मुसलमान शासकों की दुर्बल स्थिति को देखकर मराठों ने कई महत्वपूर्ण दुर्ग अपने हाथों में ले लिए और स्वतंत्र मराठा राज्य के स्वप्न को साकार करने का सफल प्रयास किया।

प्रश्न 2.
शिवाजी की उपलब्धियों का विवरण दीजिए।
उतर:
शिवाजी ने सबसे पहले 1646 ई० में बीजापुर के तोरण नामक पहाड़ी किले पर अधिकार कर लिया। इस किले में उन्हें भारी खजाना मिला, जिसकी सहायता से शिवाजी ने अपनी सेना में वृद्धि की तथा तोरण के किले से पाँच मील पूर्व में रायगढ़ नामक नया किला बनवाया। इससे शिवाजी की शक्ति में वृद्धि हुई। इसके बाद धीरे-धीरे उन्होंने चोकन, कोंडाना, पुरन्दर, सिंहगढ़ आदि किलों पर अधिकार कर लिया। शिवाजी की प्रगति को देखते हुए बीजापुर के सुलतान ने उनके पिता शाहजी भोंसले को 1648 ई० में कैद कर लिया और तभी छोड़ा जब शाहजी के पुत्र शिवाजी तथा व्यंकोजी ने बंगलौर (बंगलुरु) और कोंडाना के किले सुल्तान के आदमियों को वापस कर दिए।

इससे शिवाजी की गतिविधियाँ कुछ समय के लिए रुक गईं। 1656 ई० में शिवाजी की एक महत्वपूर्ण विजय जावली की थी। जावली एक मराठा सरदार चन्द्रराव के अधिकार में था और वह शिवाजी के विरुद्ध बीजापुर राज्य से मिला हुआ था। शिवाजी ने चन्द्रराव की हत्या कर दी और किले पर अधिकार कर लिया। इससे उनका राज्य–विस्तार दक्षिण-पश्चिम की ओर सम्भव हो सका। शिवाजी की उपलब्धियों का वर्णन निम्न प्रकार किया जा सकता है

1. मुगलों के साथ प्रथम मुठभेड़- 1657 ई० में शिवाजी का मुकाबला पहली बार मुगलों से हुआ। दक्षिण के सूबेदार शहजादा औरंगजेब ने बीजापुर पर आक्रमण किया और बीजापुर ने शिवाजी से सहायता माँगी। यह अनुभव करके कि दक्षिण में मुगलों की बढ़ती हुई शक्ति को रोकना आवश्यक है, शिवाजी ने बीजापुर की सहायता करने के उद्देश्य से मुगलों के दक्षिण-पश्चिम भाग पर आक्रमण करना प्रारम्भ कर दिया। इसी समय शिवाजी ने जुन्नार को लूटा और स्थान-स्थान पर आक्रमण करके मुगलों को तंग किया। परन्तु जब बीजापुर ने मुगलों से संधि कर ली तब शिवाजी ने मुगलों पर आक्रमण करने आरम्भ कर दिए। उत्तराधिकार के युद्ध के कारण मुगलों को प्राय: दो वर्ष तक दक्षिण भारत की ओर ध्यान देने का अवकाश न मिल सका।।

2. बीजापुर से संघर्ष- औरंगजेब के उत्तर भारत चले जाने के बाद शिवाजी ने फिर से देश विजय का सिलसिला शुरू कर दिया और इस बार उनका लक्ष्य बीजापुर के प्रदेश थे। उन्होंने पश्चिमी घाट और समुद्र के बीच पड़ने वाले कोंकण क्षेत्र पर जोरदार हमला किया और उसके उत्तरी हिस्से को जीत लिया। उन्होंने कई और पहाड़ी किलों पर भी कब्जा कर लिया, जिससे बीजापुर ने उनके खिलाफ कड़ा कदम उठाने का फैसला किया। 1659 ई० में बीजापुर ने दस हजार सैनिकों के साथ अफजल खाँ नामक एक प्रमुख बीजापुरी सरदार को शिवाजी के खिलाफ भेजा और उसे निर्देश दिया कि चाहे जिस तरह भी करो पर उसे बंदी बना लो। उन दिनों ऐसे मौकों पर धोखेबाजी खूब चलती थी। अफजल खाँ और शिवाजी पहले भी कई बार धोखेबाजी का सहारा ले चुके थे।

शिवाजी के सैनिक खुली लड़ाई के अभ्यस्त नहीं थे और अफजल खाँ की विशाल सेना देखकर वह ठिठक गए। अफजल खाँ ने शिवाजी को व्यक्तिगत मुलाकात के लिए निमन्त्रण भेजा और यह वादा किया कि वह उसे बीजापुर के सुल्तान से माफी दिलवा देगा। लेकिन शिवाजी को पूरा शक था कि वह अफजल खाँ की चाल थी, इसलिए वे भी पूरी तैयारी के साथ उसके शिविर में आ गए और चालाकी से, लेकिन साथ ही बहुत साहसिक ढंग से, उसे मार डाला। अब उन्होंने अफजल खाँ की नेतृत्वविहीन सेना पर आक्रमण करके उसके पैर उखाड़ दिए और उसके सारे साज-सामान पर, जिसमें तोपखाना भी शामिल था, अधिकार कर लिया। इस विजय से प्रोत्साहित होकर शिवाजी ने दक्षिण कोंकण, पन्हाला और कोल्हापुर जिले में अपनी सेनाएँ भेजकर उन्हें विजित कर लिया।

3. शिवाजी और शाइस्ता खाँ- औरंगजेब ने दक्षिण में मराठों के बढ़ते प्रभाव से चिंतित होकर शिवाजी की शक्ति को कुचलने के लिए 1660 ई० में मुगल सूबेदार शाइस्ता खाँ को शिवाजी को समाप्त करने के आदेश दिए। उसने बीजापुर राज्य से मिलकर शिवाजी को समाप्त करने की योजना बनाई और शिवाजी से पूना, चाकन और कल्याण को छीनने में सफलता प्राप्त की। इन पराजयों से शिवाजी की शक्ति कमजोर पड़ी। मराठा सेना का उत्साह बढ़ाने के उद्देश्य से शिवाजी ने एक दु:साहसिक कदम उठाया। 1663 ई० में एक रात्रि में उन्होंने पूना में शाइस्ता खाँ के शिविर पर आक्रमण कर उसे जख्मी कर दिया एवं उसके एक पुत्र तथा सेनानायक को मार दिया। शाइस्ता खाँ को भागकर अपने प्राणों की सुरक्षा करनी पड़ी। इस पराजय से मुगल प्रतिष्ठा को जहाँ ठेस पहुँची वहीं शिवाजी की प्रतिष्ठा पुन: बढ़ गई तथा मुगलों पर पुनः आक्रमण आरम्भ हो गए।

4. सूरत की प्रथम लूट (1664 ई०)- शाइस्ता खाँ पर विजय से प्रोत्साहित होकर 1664 ई० में शिवाजी ने मुगलों के बन्दरगाह नगर सूरत पर धावा बोल दिया। मुगल बादशाह और उनके सामन्त सूरत से जाने वाले मालवाहक जहाजों में आमतौर से पूँजी निवेश करते थे। शिवाजी के इस आक्रमण से मुगल किलेदार भाग खड़ा हुआ। शिवाजी ने चार दिन तक सूरत को अच्छी तरह लूटा, जिसमें एक करोड़ रुपए से अधिक राशि का माल तथा बहुमूल्य वस्तुएँ प्राप्त हुईं।

5. मिर्जा राजा जयसिंह और शिवाजी- शाइस्ता खाँ की विफलता के बाद औरंगजेब ने शिवाजी का दमन करने के लिए आम्बेर के राजा जयसिंह को भेजा। जयसिंह औरंगजेब के सबसे विश्वस्त सलाहकारों में से था। उसे पूरी प्रशासनिक और सैनिक स्वायत्तता प्रदान की गई, जिससे उसे दक्कन में मुगल प्रतिनिधि पर किसी प्रकार निर्भर न रहना पड़े। उसका सीधा सम्बन्ध सम्राट से था। पहले के सेनापतियों की तरह जयसिंह ने मराठों की शक्ति को कम आँकने की भूल नहीं की। जयसिंह ने शिवाजी को अकेला करने के लिए पहले उनके प्रमुख सेनापतियों को प्रलोभन दिया। उसने शिवाजी को कमजोर करने के लिए उनकी पूना की जागीर के आसपास के गाँवों को तहस-नहस कर दिया। यूरोप की व्यापारी कम्पनियों को भी मराठा नौ-सेना की किसी भी कार्यवाही को रोकने के निर्देश दे दिए गए। अन्ततः जयसिंह ने पुरन्दर के दुर्ग की घेराबन्दी (1665 ई०) कर दी और मराठों को झुकना पड़ा। उसके बाद दोनों पक्षों के बीच पुरन्दर की सन्धि हुई।

6. शिवाजी का मुगल दरबार में जाना- पुरन्दर की सन्धि शिवाजी के लिए कष्टदायक थी, तथापि परिस्थिति के अनुसार उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया। जयसिंह के अनुरोध पर शिवाजी औरंगजेब से मिलने आगरा गए। आगरा में शिवाजी का यथोचित सम्मान नहीं किया गया और उनसे पंचहजारी मनसबदारों में खड़े होने को कहा गया। शिवाजी के विरोध करने पर औरंगजेब ने उन्हें नजरबन्द कर लिया। औरंगजेब के इरादों को भाँपकर शिवाजी पहरेदारों को धोखा देकर अपने पुत्र के साथ आगरा से निकल गए और सकुशल महाराष्ट्र वापस लौट गए। मराठा इतिहासकारों ने इस घटना को बहुत महत्वपूर्ण माना है। डॉ० सरदेसाई ने तो लिखा है कि “इस घटना से ही मुगल साम्राज्य का पतन प्रारम्भ हो जाता है।” महाराष्ट्र लौटने के पश्चात् शिवाजी कुछ वर्षों तक शान्त रहे। इस बीच उन्होंने औरंगजेब से समझौता भी कर लिया।

 

औरंगजेब ने उन्हें बाबर की जागीर एवं ‘राजा’ की उपाधि दी तथा उनके पुत्र को पाँच हजारी मनसब का पद दिया। शिवाजी का औरंगजेब के साथ यह समझौता एक कूटनीतिक चाल थी। औरंगजेब बीजापुर और गोलकुण्डा को समाप्त करने के लिए समय चाहता था तो शिवाजी अपनी आन्तरिक स्थिति सुदृढ़ करने के लिए। इस बीच दक्षिण में मुगलों की दुर्बल स्थिति को देखते हुए शिवाजी ने अपने खोए हुए दुर्गों को पुनः वापस प्राप्त करने के लिए प्रयास आरम्भ कर दिया। 1670 ई० से मराठा मुगल सम्बन्ध पुनः कटु हो गए। शहजादा मुअज्जम और दिलेर खाँ के आपसी मनमुटाव का लाभ उठाकर शिवाजी ने मुगलों से अनेक किले वापस छीन लिए। उन्होंने सूरत पर दुबारा आक्रमण कर उसे लूटा और 1670 ई० में वहाँ से चौथ वसूल की। 1670-74 ई० के बीच उन्होंने पुरन्दर, पन्हाला, सतारा एवं अनेक दुर्गों को वापस ले लिया और मुगलों तथा बीजापुर के सुल्तान को परेशान किया।

7. शिवाजी का राज्याभिषेक- 1674 ई० तक शिवाजी की शक्ति और उनका प्रभाव-क्षेत्र अत्यधिक विकसित हो चला था। अतः 15 जून, 1674 में उन्होंने बनारस के विद्वान पण्डित गंगाभट्ट के हाथों अपना राज्याभिषेक करवाया और छत्रपति की उपाधि धारण की तथा भगवा-ध्वज उनका झण्डा बना एवं रायगढ़ को अपनी राजधानी बनाया। शिवाजी के राज्याभिषेक को सत्रहवीं शताब्दी की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना माना गया है, इससे न केवल मराठा नेताओं के ऊपर शिवाजी का वर्चस्व कायम हुआ बल्कि उनका शासक के रूप में पद ऊँचा हुआ और उन्होंने मुगलों के विरोध में हिन्दू राजतन्त्र की खुलकर घोषणा की। समारोह से पहले शिवाजी ने कई महीनों तक मन्दिरों में पूजा की, जिसमें चिपलुण में परसराम मन्दिर और प्रतापगढ़ में भवानी मन्दिर शामिल हैं। अब शिवाजी एक जागीरदार अथवा लुटेरा मात्र नहीं थे, बल्कि मराठा राज्य के संस्थापक बन गए।

शासक के रूप में शिवाजी का सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य था- कर्नाटक में अपनी शक्ति का विस्तार करना। उन्होंने बीजापुर के विरुद्ध गोलकुण्डा से सन्धि (1677 ई०) कर ली। बीजापुरी कर्नाटक क्षेत्र को अबुल हसन कुतुबशाह और शिवाजी ने आपस में बाँट लेने का फैसला किया। अबुल हसन ने शिवाजी को एक लाख हून प्रतिवर्ष कर देने एवं एक मराठा प्रतिनिधि को अपने दरबार में रखने एवं सैनिक सहायता देने का भी आश्वासन दिया। इस सन्धि से शिवाजी की शक्ति और प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई। प्रायः एक वर्ष के समय में ही शिवाजी ने बीजापुर के जिंजी और वैल्लोर पर कब्जा कर लिया। इसके अतिरिक्त तुंगभद्रा से कावेरी नदी के बीच का इलाका भी उन्होंने जीत लिया। इतना ही नहीं उन्होंने इसमें से सन्धि के अनुसार गोलकुण्डा को कोई हिस्सा नहीं दिया तथा पुनः बीजापुर को अपने पक्ष में मिलाने का प्रयास किया।

प्रश्न 3.
शिवाजी की शासन-व्यवस्था निम्नलिखित शीर्षकों के अनुसार समझाइए
(क) केन्द्रीय प्रशासन,
(ख) सैन्य प्रशासन
(ग) भूमि प्रशासन
उतर:
(क) केन्द्रीय प्रशासन
1. राजा- मध्ययुग के अन्य शासकों की भाँति शिवाजी एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न निरकुंश शासक थे। राज्य की सम्पूर्ण शक्तियाँ उनमें केन्द्रित थीं। उनके अधिकार असीमित थे। वहीं राज्य के प्रशासकीय प्रधान, मुख्य न्यायधीश, कानून निर्माता और सेनापति थे। परन्तु शिवाजी ने अपनी शक्तियों का प्रयोग निरंकुश तानाशाही के लिए नहीं किया बल्कि जनहितार्थ किया। इतिहासकार रानाडे के शब्दों में, “शिवाजी नेपोलियन की भाँति एक महान संगठनकर्ता और असैनिक प्रशासन के निर्माणकर्ता थे।’

2. अष्टप्रधान- शिवाजी की सहायता के लिए आठ मन्त्रियों की एक परिषद् होती थी जो ‘अष्टप्रधान’ के नाम से सम्बोधित की जाती थी। केवल सेनापति के अतिरिक्त अन्य सभी मन्त्रिगण ब्राह्मण होते थे, जिनकी नियुक्ति सम्राट द्वारा की जाती थी तथा वे सम्राट के प्रति ही उत्तरदायी थे। इन मन्त्रियों से कार्य कराने का भार भी स्वयं सम्राट पर ही था।

शिवाजी ने इन मन्त्रियों को अपने विभागों में पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान नहीं की थी वरन् सरलतापूर्वक कार्य विभाजन के लिए इन मन्त्रियों की नियुक्ति की जाती थी, जिनके निरीक्षण एवं निर्देशन का भार शिवाजी पर ही था। आठ में से छह मन्त्रियों को समय पड़ने पर युद्धभूमि में जाना पड़ता था। शिवाजी यद्यपि इन मन्त्रियों से इनके विभागीय कार्यों के लिए परामर्श लेते थे, किन्तु उनको मानने के लिए वे बाध्य नहीं थे वरन् जिस बात को वे उचित समझते थे, वही करते थे। इस प्रकार का निरंकुश शासन तभी तक सफल रह सकता था, जब तक कि राजा योग्य हो। शिवाजी की मन्त्रिपरिषद् में निम्नलिखित पद थे

  • प्रधानमन्त्री एवं पेशवा- मुगल सम्राटों के वजीर के समान शिवाजी के राज्य में पेशवा का स्थान था। वह अन्य सभी विभागों तथा मन्त्रियों पर निगरानी रखता था तथा राजा की अनपुस्थिति में राज्य के कार्यों की देखभाल करता था। राजकीय पत्रों पर राजा की मुहर के नीचे उसकी मुहर होती थी तथा प्रजा की सुख सुविधाओं का ध्यान रखना उसका कर्तव्य था।
  • मजमुआदार अथवा अमात्य- आय तथा व्यय का निरीक्षण करना तथा सम्पूर्ण राज्य की आय का ब्यौरा रखना अमात्य का कार्य होता था।
  • वाकयानवीस अथवा मन्त्री- राजदरबार में घटित होने वाली घटनाओं तथा राजा के कार्यों का ब्यौरा रखना मन्त्री का कार्य था। वह राजा के विरुद्ध रचित षड्यन्त्रों एवं कुचक्रों का पता लगाता था, उसके खाने-पीने की वस्तओं का निरीक्षण करता था तथा राजमहल का प्रबन्ध करता था।
  • सचिव- सम्राट के पत्र-व्यवहार का निरीक्षण करना सचिव का कार्य था। सचिव महल तथा परगनों के लेखों का निरीक्षण करता था तथा राज्य के पत्रों पर मुहर लगाता था।
  • सुमन्त- बाह्य नीति में राजा को परामर्श देने वाला मन्त्री सुमन्त कहलाता था। अन्य राजाओं के राजदूतों से भेंट करना तथा पड़ोसी राज्यों में घटित होने वाली घटनाओं की सूचना भी उसे रखनी पड़ती थी।
  • सेनापति- सेना का अध्यक्ष सेनापति होता था, जिसका कार्य सैनिकों की भर्ती करना, सैन्य-व्यवस्था करना, सैनिकों को प्रशिक्षण देना तथा सेना में अनुशासन बनाए रखना होता था। युद्धभूमि में भेजने के लिए वह
    सैनिकों का चयन भी करता था।
  • पण्डितराव अथवा दानाध्यक्ष- धार्मिक कार्यों के लिए दान, धार्मिक उत्सवों का प्रबन्ध, ब्राह्मणों को दान देना तथा धर्म विरोधियों को दण्ड देना पण्डितराव अथवा दानाध्यक्ष का कर्तव्य था। वह जन-आचरण निरीक्षण विभाग का प्रधान होता था। धर्म-संस्थाओं तथा साधु-सन्तों को दान देने के विषय में भी वही निर्णय लेता था।
  • न्यायाधीश- दीवानी, फौजदारी तथा सैन्य सम्बन्धी झगड़ों का निर्णय करने के लिए न्यायाधीश सबसे बड़ा अधिकारी होता था। यह न्यायाधीश प्रायः हिन्दू रीति-रिवाजों एवं प्राचीन धर्मशास्त्रों के आधार पर निर्णय करता था।

अष्टप्रधान की स्थापना का निर्णय शिवाजी ने एक समय पर अथवा अपने राज्याभिषेक के समय नहीं किया वरन् इसका विकास क्रमशः हुआ तथा शिवाजी आवश्यकता के अनुसार इन मन्त्रिगणों की संख्या में वृद्धि करते रहे। अन्त में उनकी अष्टप्रधान सभा का पूर्ण विकसित रूप उनके ‘छत्रपति बनने के पश्चात ही दृष्टिगोचर हुआ।

(ख) सैन्य प्रशासन- शिवाजी ने सेना के बल पर ही एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया था तथा साम्राज्य की सुरक्षा के लिए उन्होंने एक सुव्यवस्थित एवं सुदृढ़ सेना का संगठन किया। शिवाजी के पास एक स्थायी सेना थी, जिसमें 10000 पैदल, 30000 से लेकर 45000 तक घुड़सवार, 1160 हाथी, लगभग 3000 ऊँट और 500 तोपें थीं। उनकी मृत्यु के समय उनकी अनुशासित एवं व्यवस्थित सेना की संख्या 1 लाख थी, जिसमें, 20000 मावले पैदल सैनिक, 45000 राज्य के घुड़सवार तथा 60000 सिलहदार थे। उनके पास लगभग 3000 हाथी तथा 32000 घोड़े इसके अतिरिक्त थे।

शिवाजी से पूर्व सैनिक 6 महीने कृषि करते थे तथा 6 महीने सेना में रहते थे परन्तु शिवाजी ने स्थायी सेना की व्यवस्था की तथा विश्रृंखलित मराठों को एकत्रित करके एक राष्ट्रीय सेना का रूप प्रदान किया। जागीरदारी प्रथा को हटाकर उन्होंने सैनिकों को नकद वेतन देने की व्यवस्था की, जिससे सम्राट तथा सेना में प्रत्यक्ष सम्पर्क स्थापित हो सका तथा शिवाजी के मराठा सैनिक अपने नेता के इशारे पर प्राण न्योछावर करने को प्रस्तुत रहने लगे। घोड़े दगवाने तथा घुड़सवारों का हुलिया लिखवाने की प्रथा को प्रचलित किया गया। उनकी सेना में हिन्दू तथा मुसलमान दोनों वर्गों के व्यक्तियों को समान रूप से स्थान प्राप्त था तथा अनेक मुसलमान सैनिकों ने बड़ी स्वामीभक्ति के साथ उत्कृष्ट कार्य किए थे।

1. सेना में अनुशासन की व्यवस्था- शिवाजी ने अपनी सेना में कठोर अनुशासन की व्यवस्था की थी। सेना को उसका पालन करना अनिवार्य था अन्यथा उन्हें कठोर दण्ड के लिए तैयार रहना पड़ता था। इसका प्रभाव सेना पर यह हुआ कि सेना हमेशा अनुशासित रहती थी। वर्षा ऋतु के पश्चात् सैनिक मुगल प्रदेशों पर आक्रमण करके उनसे चौथ व सरदेशमुखी कर वसूलते थे। शिवाजी के आदेशानुसार शत्रु-पक्ष के बच्चों व स्त्रियों पर अत्याचार करने की बिल्कुल मनाही थी। उन्हें सम्मानपूर्वक वापस भेजने की व्यवस्था थी। सैनिक राज्य के कृषक व ब्राह्मणों पर बिलकुल भी अत्याचार नहीं कर सकते थे। लूटे गए माल को सम्पूर्ण रूप से पदाधिकारियों को देने का आदेश था, जिसे शिवाजी के राजकोष में संगृहीत कर दिया जाता था। नियमित वेतन के अलावा सैनिक किसी से भी रिश्वत नहीं ले सकता था अन्यथा कठोर दण्ड मिलता था। शिवाजी अपने नियमों को कठोरतापूर्वक पालन करवाते थे।

2. घुड़सवार सेना- किसी भी राजा की प्रमुख सेना घुड़सवार सेना होती है। यह सेना का प्रमुख अंग होती है। शिवाजी की भी सेना का मुख्य अंग घुड़सवार सेना थी। इसके दो भाग थे- बारगीर व सिलहदार। बारगीर वर्ग के सैनिकों को राज्य की ओर से घोड़े व अस्त्र-शस्त्रों की व्यवस्था थी परन्तु सिलहदारों को अस्त-शस्त्र व घोड़े खरीदने पड़ते थे। इसके लिए उन्हें एक निश्चित धनराशि दी जाती थी। बारगीर मासिक वेतन प्राप्त करते थे। 25 घुड़सवारों पर 1 हवलदार, 5 हवलदारों पर एक जुमलादार तथा 10 जुमलादारों पर एक हजारी होता था, जिसे 1 हजार हून वार्षिक मिलते थे। सर-ए-नौबत या सेनापति घुड़सवारों का प्रधान था।

3. पैदल सेना- सेना की दूसरी प्रमुख शाखा पैदल सेना थी। पैदल सेना का भी विभाजन घुड़सवार सेना के समान था। साधारण सैनिक नायक के अधीन होते थे। 5 नायकों पर 1 हवलदार, 5 हवलदारों पर 1 जुमलादार, 10 जुमलादारों पर 1 हजारी तथा 7 हजारियों पर सर-ए-नौबत अथवा सेनापति होता था। शिवाजी के पास 20,000 मावलों की अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित, अनुशासित एवं सुव्यवस्थित सेना थी।

4. जलसेना- शिवाजी ने एक जलसेना का भी संगठन किया, जिससे जंजीरा के अबीसीनियन सिद्दियों को भी पराजित किया जा सके। सन् 1680 ई० में उन्होंने एक युद्ध में शत्रु पक्ष को बुरी तरह पराजित भी किया था। कोलाबा उनकी जलसेना का प्रमुख अड्डा था, जिसमें शिवाजी की 200 जहाजों की सेना रहती थी। जहाजी बेड़े का संचालन अधिकांशतः मुसलमान पदाधिकारियों के हाथ में था। लेकिन शिवाजी की जलसेना अधिक शक्तिशाली अथवा कुशल नहीं थी। फिर भी शिवाजी के पश्चात भी आंग्रे के अधीन मराठों की जल-सेना 18 वीं शताब्दी तक अंग्रेजों एवं पुर्तगालियों के लिए भय का कारण बनी रही।

5. युद्ध-पद्धति- शिवाजी ने मुगलों से सर्वथा भिन्न युद्ध-पद्धति को अपनाया। मुगल सेनापति तथा अन्य पदाधिकारी अत्यन्त विलासी होते थे। वे युद्धभूमि में भी भारी सामान के साथ चलते थे तथा युद्ध में विजय प्राप्त करने की अपेक्षा उन्हें निजी स्वार्थ का अधिक ध्यान रहता था। इसके विपरीत, मराठा सैनिकों को कष्ट सहन करने की आदत डाली जाती थी। वे टट्टओं पर सवार होकर मुट्ठी भर चने के साथ सरदार की आज्ञा प्राप्त होते ही चल पड़ते थे तथा उनको एकत्रित होने में विलम्ब नहीं लगता था। छोटी-छोटी टुकड़ियाँ होने के कारण उनके सैन्य-संचालन में विशेष असुविधा नहीं होती थी। उनके अस्त्र-शस्त्र भी हल्के होते थे तथा सामान न के बराबर होता था। महाराष्ट्र की प्राकृतिक स्थिति छापामार रण-पद्धति के सर्वथा अनुकूल थी तथा इसी पद्धति के कारण शिवाजी मुगल साम्राज्य के विरुद्ध अपना एक स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने में सफल हो सके।

6. दुर्गों की व्यवस्था- शिवाजी ने दुर्गों के महत्व पर अत्यधिक बल दिया था। दुर्ग शत्रु आक्रमणकारियों से सुरक्षित रहने के महत्वपूर्ण साधन थे। मराठा सैनिक दुर्गों की रक्षा करना अपना परम कर्तव्य समझते थे तथा माता के समान उनकी पूजा करते थे। दुर्गों के निकटवर्ती प्रदेशों के निवासियों को संकटकाल में दुर्गों में ही शरण प्राप्त होती थी। शिवाजी के राज्य में 240 दुर्ग थे। उन्होंने कुछ नए दुर्गों का भी निर्माण करवाया तथा प्राचीन दुर्गों का जीर्णोद्वार करवाकर उन्हें सुदृढ़ बनवाया। प्रत्येक महत्वपूर्ण घाटी अथवा पहाड़ी पर उन्होंने सुदृढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया, जो मराठा सैनिकों की रक्षा करने के लिए उत्तम शरणस्थल थे।

शिवाजी के राज्य की जीवन-शक्ति यही दुर्ग थे। उन्होंने प्रत्येक दुर्ग की सुरक्षा के लिए तीन पदाधिकारियोंहवलदार, सबनीस तथा सर-ए-नौबत की नियुक्ति की। ये तीनों पदाधिकारी भिन्न-भिन्न जातियों के होते थे, जिससे कि विश्वासघात न कर सकें। दुर्ग की चाबियाँ हवलदार के पास रहती थीं, जो दुर्ग की सेना का प्रधान अधिकारी होता था। शासन तथा मालगुजारी का प्रबन्ध ब्राह्मण सबनीस करता था तथा किलेदार अर्थात् दुर्ग का सर-ए-नौबत खाने-पीने का सामान तथा घोड़ों के लिए दाने आदि की व्यवस्था करता था। ये तीनों पदाधिकारी समान पद के होते थे तथा एक-दूसरे पर नियन्त्रण रखते थे। दुर्ग में स्थित सेना में जातियों का सम्मिश्रण कर दिया गया था। शिवाजी की दुर्ग व्यवस्था सर्वथा सराहनीय थी तथा पहाड़ियों में छापामार रण-पद्धति की सफलता इसी व्यवस्था पर निर्भर थी।

(ग) भूमि प्रशासन- सेना की ही तरह शिवाजी ने भूमिकर व्यवस्था के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण कार्य किए। प्रत्येक गाँव का क्षेत्रफल ब्यौरेवार रखा जाता था और प्रत्येक बीघे की उपज का अनुमान लगाया जाता था। उपज का 2/5 भाग राज्य को दिया जाता था। किसानों को बीज और पशुओं की सहायता दी जाती थी जिसका मूल्य सरकार कुछ किश्तों में वसूल कर लेती थी। भूमि कर नकद अथवा जिन्स के रूप में वसूला जाता था।

शिवाजी की लगान व्यवस्था रैयतवाड़ी थी जिसमें राज्य के किसानों से सीधा सम्पर्क स्थापित कर रखा था। शिवाजी नहीं चाहते थे कि जमींदार, देशमुख और देसाई किसानों में हस्तक्षेप करें। हरसम्भव वे लगान अधिकारियों को जागीर के बदले नकद वेतन ही दिया करते थे। वे जब कभी जागीर देते भी थे तो इस बात का विशेष ध्यान रखते थे कि जागीरदार अपनी जागीर में कोई राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित न कर सके।

शिवाजी की आय का मुख्य साधन चौथ था। यह पड़ोसी राज्यों की आय का चौथा भाग होता था जिसे वसूल करने के लिए शिवाजी उन पर आक्रमण करते थे। चौथ हर साल वसूल करते थे। शिवाजी की आय का दूसरा मुख्य साधन सरदेशमुखी थी। यह राज्यों की आय का 1/10 भाग होता था।

प्रश्न 4.
‘शिवाजी में एक सफल सेनानायक एवं प्रशासक के गुण मौजदू थे।” विवेचना कीजिए।
उतर:
शिवाजी एक सफल सेनानायक- शिवाजी को दादा कोणदेव के द्वारा पूर्ण सैनिक शिक्षा प्राप्त हुई थी। वे वीर सैनिक थे तथा भयंकर-से-भयंकर संकट में भी नहीं घबराते थे। आगरा में औरंगजेब के द्वारा बन्दी बनाए जाने पर उनका पलायन उनके साहस एवं धैर्य का अप्रतिम उदाहरण है। वे केवल एक वीर सैनिक ही नहीं वरन् महान सेनापति भी थे। उनका आकर्षक व्यक्तित्व उनके सैनिकों तथा सम्पर्क में आने वाले अन्य सभी व्यक्तियों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता था। उनके सैनिक और कर्मचारी उनकी पूजा करते थे तथा उनके लिए अपने प्राणों का बलिदान देने को सदैव उत्सुक रहते थे। उन्होंने एक कुशल सेनापति की भाँति महाराष्ट्र में छापामार युद्ध को अपनाया जिसके कारण उनके शत्रु उन पर विजय प्राप्त करने में सदैव असमर्थ रहे। शिवाजी प्रथम भारतीय सम्राट थे जिन्होंने जल सेना के महत्त्व को समझा तथा एक शक्तिशाली जल-बेड़े का निर्माण करवाया।

एक साधारण जागीरदार के पुत्र होते हुए शिवाजी ने विशाल सेना का नेतृत्व करते हुए एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया। इस साम्राज्य निर्माण का मुख्य ध्येय हिन्दुओं की रक्षा करना था जो किसी राजनीतिक शक्ति के द्वारा असम्भव थी। इसी उद्देश्य को लेकर उन्होंने स्वराज्य का निर्माण किया। शिवाजी ने तोरण वियज के द्वारा 1649 ई० में विजय कार्य आरम्भ किया तथा केवल थोड़े ही वर्षों में बीजापुर, गोलकुण्डा तथा मुगल साम्राज्य के प्रदेशों को विजय करके एक विशाल साम्राज्य निर्मित किया। उनकी मृत्यु के समय उनके पास एक स्वतन्त्र राज्य, एक शक्तिशाली जल-बेड़ा तथा 45,000 घुड़सवारों, 60,000 सिलहदारों तथा 20,000 पैदल सैनिकों की सुव्यवस्थित एवं अनुशासित विशाल सेना थी। उनके राज्य में चोरी-डाके का नामोनिशान नहीं था। भिन्न-भिन्न जातियों में विभाजित मराठा सेना का संगठन करके उन्होंने छत्रपति’ की उपाधि धारण की तथा हिन्दुओं का परित्राण किया।

शिवाजी एक सफल प्रशासक- शिवाजी में अन्य महान विजेताओं के समान कुशल शासन-प्रबन्ध के गुण विद्यमान थे जिनकी उनके आलोचकों तक ने प्रशंसा की है। यद्यपि उन्होंने निरंकुश राज्यतन्त्र-पद्धति को अपनाया किन्तु उनका राज्य प्रजाहित के लिए था। वे प्रजावत्सल सम्राट थे जो निरन्तर कठोर परिश्रम के द्वारा अपनी प्रजा की सुख एवं समृद्धि की वृद्धि के लिए तत्पर रहते थे। उन्होंने अपने राज्य में शांति सुव्यवस्था एवं समृद्धि को जन्म दिया। उनकी केन्द्रीय शासन-व्यवस्था, सैनिक संगठन, नौ-सेना व्यवस्था समय एवं परिस्थिति के सर्वथा अनुकूल थी।

ग्राण्ड डफ ने भी उनके शासन सम्बन्धी गुणों की प्रशंसा करते हुए लिखा है- “उनका राज्य तथा शासन गरीब प्रजा एवं उसकी उन्नति के लिए था। उन्होंने जागीरदारी प्रथा, वंशानुगत पद आदि दोषपूर्ण व्यवस्थाओं को हटाकर नकद वेतन तथा योग्यता के आधार पर पदों का वितरण की व्यवस्था की। उनकी अष्टप्रधान सभा, सैनिक संगठन, भूमि सुधार उनको एक कुशल शासक सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं।” एक अन्य स्थान पर उन्होंने लिखा है- “जो प्रदेश शिवाजी ने जीता अथवा जो धन एकत्रित किया वह मुगलों के लिए इतना भयावह नहीं था, जितना की शिवाजी का स्वयं का आदर्श, नई विचारधारा और प्रणाली जो उन्होंने चलाई तथा एक नई प्रेरणा उन्होंने मराठा जाति में फेंक दी थी।

प्रश्न 5.
शिवाजी के चरित्र एवं शासन-प्रबन्ध का मूल्यांकन कीजिए।
उतर:
शिवाजी के चरित्र एवं शासन-प्रबन्ध का मूल्यांकन निम्नलिखित है
1. योग्य सेनापति- शिवाजी एक योग्य सेनापति थे। अपने देश की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल उन्होंने गुरिल्ला युद्ध-पद्धति का प्रयोग किया और सुरक्षा के लिए अनेक दुर्गों का निर्माण कराया।

2. महान् शासक-प्रबन्धक- शिवाजी ने असैनिक और सैनिक दोनों ही प्रकार की शासन-व्यवस्था में महान् शासक प्रबन्धक होने का परिचय दिया। अष्टप्रधान व्यवस्था, उनकी लगान व्यवस्था, देशपाण्डे और देशमुख जैसे पैतृक पदाधिकारियों को बिना हटाए हुए उनकी शक्ति और प्रभाव को समाप्त करके किसानों से सीधा सम्पर्क स्थापित करना तथा ऐसे शासन की स्थापना करना जो उनकी अनुपस्थिति में भी सुचारु रूप से चल सके, ऐसी बातें थीं, जो उनके असैनिक शासन की श्रेष्ठता सिद्ध करती हैं। शिवाजी की घुड़सवार सेना और पैदल सैनिकों में पदों का विभाजन, ठीक समय पर वेतन देना, उनको योग्यतानुसार पद देना, गुरिल्ला युद्ध-पद्धति तथा किलों की सुरक्षा का प्रबन्ध आदि उनकी सैनिक व्यवस्था की श्रेष्ठता सिद्ध करते हैं। शिवाजी ने एक अच्छी नौसेना के निर्माण का भी प्रयत्न किया था। शिवाजी ने मराठी भाषा को राजभाषा बनाया था और एक राज्य व्यावहारिक संस्कृत कोष का भी निर्माण कराया था। इससे मराठी साहित्य के निर्माण में सहायता मिली थी।

3. हिन्दू राज्य के संस्थापक- शिवाजी ने एक स्वतन्त्र हिन्दू राज्य की स्थापना करने में सफलता पाई। उन्होंने ऐसी परिस्थितियों में हिन्दू राज्य का निर्माण किया, जबकि मुगल सम्राट औरंगजेब अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ मराठा राज्य को तो क्या दक्षिण के शिया राज्यों गोलकुण्डा और बीजापुर को भी समाप्त करने पर तुला हुआ था। इसके अतिरिक्त बीजापुर राज्य, पुर्तगालियों और जंजीरा के सिद्दियों का प्रबल विरोध होते हुए भी शिवाजी ने मराठा स्वराज्य की न केवल स्थापना की बल्कि जनता को सुरक्षा और शांति प्रदान की।

4. कुशल और साहसी सैनिक- शिवाजी एक कुशल और साहसी सैनिक थे। अनेक युद्धों में उन्होंने अपने जीवन को संकट में डाला था। अफजल खाँ से भेंट करना, शाइस्ता खाँ पर अचानक उसके शहर और निवास स्थान में प्रवेश करके आक्रमण करना, औरंगजेब से आगरा मिलने जाना उनके जीवन की ऐसी घटनाएँ हैं, जो यह सिद्ध करती हैं कि शिवाजी अपने जीवन को खतरे में डालने से कभी नहीं झिझके।। राष्ट्र निर्माता- शिवाजी का नवीनतम कार्य हिन्दू-मराठाराष्ट्र का निर्माण करना और उनकी महानतम् देन, उसको स्वतन्त्रता की भावना प्रदान करना था। गुलाम रहकर वे बड़ी-से-बड़ी प्रतिष्ठा को स्वीकार करने के लिए तत्पर न थे। अपने कार्य को उन्होंने बिना किसी विशेष सहायता के आरम्भ किया और यह अनुभव करके कि बढ़ती हुई मुस्लिम शक्ति का विरोध मराठों की एकता के बिना सम्भव नहीं है, उन्होंने मराठों को एकसूत्र में बाँधने का प्रयत्न किया। उन्हें रघुनाथ बल्लाल, समरजी पन्त, तानाजी मालसुरे, सन्ताजी घोरपड़े, खाण्डेराव दाभादे जैसे योग्य मराठा सरदारों का सहयोग मिला।

5. धार्मिक सहिष्णुता की प्रवृत्ति- शिवाजी की धार्मिक प्रवृत्ति एक पहाड़ी झरने की भाँति स्वच्छ जल को अविरल गति से बहाने वाली थी, जिसमें धर्मान्धता की गन्दगी न थी। उन्होंने सभी धर्मों का सम्मान किया और उनके साथ समान व्यवहार किया। धर्म, धार्मिक ग्रन्थ और कहानियाँ उनके प्रेरणा स्त्रोत थे।

महाराष्ट्र के तत्कालीन धार्मिक आन्दोलनों और सन्तों से वह प्रभावित हुए थे। शिवाजी पहले हिन्दू थे, जिन्होंने मध्य युग की बदलती हुई युद्ध की नैतिकता को समझा। उनके विरोधी इतिहासकार चाहे उन्हें डाकू कहें, चाहे विद्रोही सामन्त और चाहे औरंगजेब ने उनको ‘पहाड़ी चूहा’ कहकर अपनी सन्तुष्टि कर ली हो, परन्तु शिवाजी ने हिन्दू युद्ध-नीति की नैतिकता में एक नवीन अध्याय जोड़ा कि युद्ध जीतने के लिए लड़ा जाता है न कि शौर्य के प्रदर्शन के लिए। उनकी धार्मिक सहनशीलता आधुनिक समय के लिए भी उदाहरण स्वरूप है।

शिवाजी नि: सन्देह महान् थे। इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार ने लिखा है, “मैं उन्हें हिन्दू जाति द्वारा उत्पन्न किया हुआ अन्तिम महान् क्रियात्मक व्यक्ति और राष्ट्र निर्माता मानता हूँ।” वे पुनः लिखते हैं, “शिवाजी ने यह सिद्ध कर दिखाया कि हिन्दुत्व का वृक्ष वास्तव में गिरा नहीं है बल्कि वह सदियों की राजनीतिक दासता, शासन से पृथकत्व और कानूनी अत्याचार के बावजूद भी पुनः उठ सकता है, उसमें नए पत्ते और शाखाएँ आ सकती हैं और एक बार फिर आकाश में सिर उठा सकता है। इस प्रकार शिवाजी ने मराठों को एक राष्ट्र के रूप में संगठित कर उनमें राष्ट्र-प्रेम की भावना को जगाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

प्रश्न 6.
शिवाजी की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उतर:

शिवाजी के चरित्र एवं शासन-प्रबन्ध का मूल्यांकन निम्नलिखित है
1. योग्य सेनापति- शिवाजी एक योग्य सेनापति थे। अपने देश की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल उन्होंने गुरिल्ला युद्ध-पद्धति का प्रयोग किया और सुरक्षा के लिए अनेक दुर्गों का निर्माण कराया।

2. महान् शासक-प्रबन्धक- शिवाजी ने असैनिक और सैनिक दोनों ही प्रकार की शासन-व्यवस्था में महान् शासक प्रबन्धक होने का परिचय दिया। अष्टप्रधान व्यवस्था, उनकी लगान व्यवस्था, देशपाण्डे और देशमुख जैसे पैतृक पदाधिकारियों को बिना हटाए हुए उनकी शक्ति और प्रभाव को समाप्त करके किसानों से सीधा सम्पर्क स्थापित करना तथा ऐसे शासन की स्थापना करना जो उनकी अनुपस्थिति में भी सुचारु रूप से चल सके, ऐसी बातें थीं, जो उनके असैनिक शासन की श्रेष्ठता सिद्ध करती हैं। शिवाजी की घुड़सवार सेना और पैदल सैनिकों में पदों का विभाजन, ठीक समय पर वेतन देना, उनको योग्यतानुसार पद देना, गुरिल्ला युद्ध-पद्धति तथा किलों की सुरक्षा का प्रबन्ध आदि उनकी सैनिक व्यवस्था की श्रेष्ठता सिद्ध करते हैं। शिवाजी ने एक अच्छी नौसेना के निर्माण का भी प्रयत्न किया था। शिवाजी ने मराठी भाषा को राजभाषा बनाया था और एक राज्य व्यावहारिक संस्कृत कोष का भी निर्माण कराया था। इससे मराठी साहित्य के निर्माण में सहायता मिली थी।

3. हिन्दू राज्य के संस्थापक- शिवाजी ने एक स्वतन्त्र हिन्दू राज्य की स्थापना करने में सफलता पाई। उन्होंने ऐसी परिस्थितियों में हिन्दू राज्य का निर्माण किया, जबकि मुगल सम्राट औरंगजेब अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ मराठा राज्य को तो क्या दक्षिण के शिया राज्यों गोलकुण्डा और बीजापुर को भी समाप्त करने पर तुला हुआ था। इसके अतिरिक्त बीजापुर राज्य, पुर्तगालियों और जंजीरा के सिद्दियों का प्रबल विरोध होते हुए भी शिवाजी ने मराठा स्वराज्य की न केवल स्थापना की बल्कि जनता को सुरक्षा और शांति प्रदान की।

4. कुशल और साहसी सैनिक- शिवाजी एक कुशल और साहसी सैनिक थे। अनेक युद्धों में उन्होंने अपने जीवन को संकट में डाला था। अफजल खाँ से भेंट करना, शाइस्ता खाँ पर अचानक उसके शहर और निवास स्थान में प्रवेश करके आक्रमण करना, औरंगजेब से आगरा मिलने जाना उनके जीवन की ऐसी घटनाएँ हैं, जो यह सिद्ध करती हैं कि शिवाजी अपने जीवन को खतरे में डालने से कभी नहीं झिझके।। राष्ट्र निर्माता- शिवाजी का नवीनतम कार्य हिन्दू-मराठाराष्ट्र का निर्माण करना और उनकी महानतम् देन, उसको स्वतन्त्रता की भावना प्रदान करना था। गुलाम रहकर वे बड़ी-से-बड़ी प्रतिष्ठा को स्वीकार करने के लिए तत्पर न थे। अपने कार्य को उन्होंने बिना किसी विशेष सहायता के आरम्भ किया और यह अनुभव करके कि बढ़ती हुई मुस्लिम शक्ति का विरोध मराठों की एकता के बिना सम्भव नहीं है, उन्होंने मराठों को एकसूत्र में बाँधने का प्रयत्न किया। उन्हें रघुनाथ बल्लाल, समरजी पन्त, तानाजी मालसुरे, सन्ताजी घोरपड़े, खाण्डेराव दाभादे जैसे योग्य मराठा सरदारों का सहयोग मिला।

5. धार्मिक सहिष्णुता की प्रवृत्ति- शिवाजी की धार्मिक प्रवृत्ति एक पहाड़ी झरने की भाँति स्वच्छ जल को अविरल गति से बहाने वाली थी, जिसमें धर्मान्धता की गन्दगी न थी। उन्होंने सभी धर्मों का सम्मान किया और उनके साथ समान व्यवहार किया। धर्म, धार्मिक ग्रन्थ और कहानियाँ उनके प्रेरणा स्त्रोत थे।

महाराष्ट्र के तत्कालीन धार्मिक आन्दोलनों और सन्तों से वह प्रभावित हुए थे। शिवाजी पहले हिन्दू थे, जिन्होंने मध्य युग की बदलती हुई युद्ध की नैतिकता को समझा। उनके विरोधी इतिहासकार चाहे उन्हें डाकू कहें, चाहे विद्रोही सामन्त और चाहे औरंगजेब ने उनको ‘पहाड़ी चूहा’ कहकर अपनी सन्तुष्टि कर ली हो, परन्तु शिवाजी ने हिन्दू युद्ध-नीति की नैतिकता में एक नवीन अध्याय जोड़ा कि युद्ध जीतने के लिए लड़ा जाता है न कि शौर्य के प्रदर्शन के लिए। उनकी धार्मिक सहनशीलता आधुनिक समय के लिए भी उदाहरण स्वरूप है।

शिवाजी नि: सन्देह महान् थे। इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार ने लिखा है, “मैं उन्हें हिन्दू जाति द्वारा उत्पन्न किया हुआ अन्तिम महान् क्रियात्मक व्यक्ति और राष्ट्र निर्माता मानता हूँ।” वे पुनः लिखते हैं, “शिवाजी ने यह सिद्ध कर दिखाया कि हिन्दुत्व का वृक्ष वास्तव में गिरा नहीं है बल्कि वह सदियों की राजनीतिक दासता, शासन से पृथकत्व और कानूनी अत्याचार के बावजूद भी पुनः उठ सकता है, उसमें नए पत्ते और शाखाएँ आ सकती हैं और एक बार फिर आकाश में सिर उठा सकता है। इस प्रकार शिवाजी ने मराठों को एक राष्ट्र के रूप में संगठित कर उनमें राष्ट्र-प्रेम की भावना को जगाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

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UP Board Class 12 Maths Model Papers Paper 1

UP Board Class 12 Maths Model Papers Paper 1 are part of UP Board Class 12 Maths Model Papers. Here we have given UP Board Class 12 Maths Model Papers Paper 1.

Board UP Board
Textbook NCERT Based
Class Class 12
Subject Maths
Model Paper Paper 1
Category UP Board Model Papers

UP Board Class 12 Maths Model Papers Paper 1

समय : 3 घण्टे 15 मिनट
पूर्णांक : 100

निर्देश प्रारम्भ के 15 मिनट परीक्षार्थियों को प्रश्न-पत्र पढ़ने के लिए निर्धारित हैं। इस प्रश्न पत्र में कुल 31 प्रश्न हैं। सभी प्रश्न अनिवार्य हैं। दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों में अथवा का विकल्प दिया गया है। प्रश्नों के अंक उनके सम्मुख अंकित हैं।

प्रश्न 1
यदि P(E)= 0.35 व P (E∪F)= 0.6 है तथा E व F स्वतन्त्र घटनाएँ हैं, तब.P(F) का मान है [1]
(a) [latex]\frac { 5 }{ 13 } [/latex]
(b) [latex]\frac { 7 }{ 13 } [/latex]
(c) [latex]\frac { 9 }{ 13 } [/latex]
(d) [latex]\frac { 11 }{ 13 } [/latex]

प्रश्न 2
यदि सुसंगत क्षेत्र परिबद्ध है, तो उद्देश्य फलन के मान प्राप्त होंगे। [1]
(a) अधिकतम
(b) न्यूनतम
(C) अधिकतम एवं न्यूनतम
(d) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 3
UP Board Class 12 Maths Model Papers Paper 1 image 1

प्रश्न 4
UP Board Class 12 Maths Model Papers Paper 1 image 2

प्रश्न 5
UP Board Class 12 Maths Model Papers Paper 1 image 3

प्रश्न 6
फलन f(x) = sin 3x + 4 के लिए उच्चतम मान (यदि कोई विद्यमान हो) ज्ञात कीजिए। [1]

प्रश्न 7
यदि P(A) = [latex]\frac { 3 }{ 5 } [/latex], P(B) = [latex]\frac { 1 }{ 5 } [/latex] तथा A व B स्वतन्त्र घटनाएँ हैं, तब P(A∩B) ज्ञात कीजिए। [1]

प्रश्न 8
दो 2×2 कोटि के आव्यूह P तथा Q इस प्रकार लिखिए कि P ≠ 0, Q ≠ 0 परन्तु PQ = 0 तथा QP ≠ 0 है। [1]

प्रश्न 9
A तथा B ऐसी घटनाएँ हैं कि P(A) = x, P(B) = y, तब P(A∪B) + P (A∩B) का मान ज्ञात कीजिए। [1]

प्रश्न 10
UP Board Class 12 Maths Model Papers Paper 1 image 4

प्रश्न 11
फलन f(x) जो निम्न प्रकार परिभाषित है f(x) =
UP Board Class 12 Maths Model Papers Paper 1 image 5
x = [latex]\frac { \pi }{ 2 } [/latex] पर f(x) की सतत्ता का परीक्षण कीजिए। [2]

प्रश्न 12
यदि सदिश [latex]\hat { i } +\hat { j } +\hat { k } [/latex] को सदिशों [latex]\hat { 2i } +\hat { 4j } -\hat { 5k } [/latex] और [latex]\hat { \lambda i } +\hat { 2j } +\hat { 3k }[/latex] के योगफल की दिशा में मात्रक सदिश के साथ अदिश गुणनफल 1 के बराबर है, तब λ. का मान ज्ञात कीजिए। [2]

प्रश्न 13
प्रारम्भिक पंक्ति संक्रिया के आव्यूह
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का व्यत्क्रम ज्ञात कीजिए। [2]

प्रश्न 14
यदि 2P(A) = P(B) = [latex]\frac { 5 }{ 12 } [/latex] व P([latex]\frac { A }{ B } [/latex]) = [latex]\frac { 1 }{ 5 } [/latex] है, तब P (AUB) ज्ञात कीजिए। [2]

प्रश्न 15
निम्न आव्यूह समीकरण में से 4 तथा y के मान ज्ञात कीजिए। [2]
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प्रश्न 16
यदि सदिश [latex]\hat { 2i } +\hat { j } +\hat { k } [/latex] तथा [latex]\hat { i } -\hat { 4j } +\hat { \lambda k }[/latex] परस्पर लम्ब हैं, तब λ का मान ज्ञात कीजिए। [2]

प्रश्न 17
ज्ञात कीजिए कि x के किन मानों के लिए फलन [latex]\frac { ax }{ { a }^{ 2 }+{ x }^{ 2 } } [/latex] उच्चिष्ठ अथवा निम्निष्ठ है। [2]

प्रश्न 18
समीकरण निकाय 3x – y + 72 = 3, 2x + y + 32 = 5, x + 49 – 2z = 1 की संगतता की जाँच कीजिए। [2]

प्रश्न 19
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प्रश्न 20
यदि sin-1x+ tan-1x = [latex]\frac { \pi }{ 2 } [/latex], तो सिद्ध कीजिए कि 2x2 +1 = √5   [5]

प्रश्न 21
पासों के एक जोड़े को 4 बार उछाला जाता है। यदि ‘पासों पर प्राप्त अंकों का द्विक होना एक सफलता मानी जाती है, तब 2 सफलताओं की प्रायिकता ज्ञात कीजिए। [5]

प्रश्न 22
एक विशेष प्रकार के केक को 200 ग्राम आटा व 25 ग्राम वसा की आवश्यकता होती है तथा दूसरे प्रकार के केक के लिए 100 ग्राम आटा तथा 50 ग्राम वसा की आवश्यकता होती है। केकों की अधिकतम संख्या ज्ञात कीजिए, जोकि 5 किग्रा आटे तथा 1 किग्रा वसा से बना सकते हैं, यह मान लिया गया है कि केकों को बनाने के लिए अन्य पदार्थों की कमी नहीं रहेगी। [5]

प्रश्न 23
किन्हीं तीन सदिशों a, b व c के लिए सिद्ध कीजिए कि a-b, b-c तथा c-a समतलीय हैं। [5]

प्रश्न 24
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प्रश्न 25
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प्रश्न 26
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प्रश्न 27
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प्रश्न 28
फलन {{x – 1) (x – 2) (x – 3)}, का उच्चिष्ठ मान ज्ञात कीजिए। [5]

प्रश्न 29
रेखा [latex]\frac { x+2 }{ 3 }[/latex] = [latex]\frac { y+1 }{ 2 }[/latex] = [latex]\frac { z-3 }{ 2 }[/latex] पर स्थित उस बिन्दु के निर्देशांक ज्ञात कीजिए, जोकि बिन्दु (1,2, 3) से 3√2 की दूरी पर स्थित हैं। [8]
अथवा
उस समतल का समीकरण ज्ञात कीजिए, जोकि समतलों 2x+y-z = 3, 5x -3y+4z+9= 0 के प्रतिच्छेदन से होकर जाता है और रेखा [latex]\frac { x-1 }{ 2 }[/latex] = [latex]\frac { y-3 }{ 4 }[/latex] = [latex]\frac { z-5 }{ 5 }[/latex] के समान्तर है। [8]

प्रश्न 30
क्षेत्र {(x,y): y2<4x, 4x2 + 4y2 < 9} का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए। [8]
अथवा
परवलय x2=y, रेखा y = x + 2 एवं x.अक्ष से घिरे क्षेत्र का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए। [8]

प्रश्न 31
सिद्ध कीजिए कि [8]
UP Board Class 12 Maths Model Papers Paper 1 image 13
अथवा
अन्तराल [1, 3] में फलन f(x) = x3 – 5x2 – 3x के लिए माध्यमान प्रमेय सत्यापित कीजिए। [8]

Solutions

उत्तर 1
(a)

उत्तर 2
(c)

उत्तर 3
(c)

उत्तर 4
(d)

उत्तर 5
(c)

उत्तर 6
5

उत्तर 7
[latex]\frac { 3 }{ 25 } [/latex]

उत्तर 8
UP Board Class 12 Maths Model Papers Paper 1 image 14

उत्तर 9
x + y

उत्तर 10
UP Board Class 12 Maths Model Papers Paper 1 image 15

उत्तर 11
सतत्

उत्तर 12
λ =1

उत्तर 13
UP Board Class 12 Maths Model Papers Paper 1 image 16

उत्तर 14
[latex]\frac { 13 }{ 24 } [/latex]

उत्तर 15
x = 2, y = -2

उत्तर 16
λ = 2

उत्तर 17
x = a पर उच्चिष्ठ तथा x = -a पर निम्निष्ठ।

उत्तर 18
असंगत

उत्तर 19
प्रान्त =R-{-1,1} तथा परिसर = (-∞,0)∪(1,∞)

उत्तर 21
[latex]\frac { 25 }{ 216 } [/latex]

उत्तर 22
कुल केकों की संख्या = 30, जहाँ 20 विशेष प्रकार के तथा 10 दूसरे प्रकार के केक हैं।

उत्तर 24
UP Board Class 12 Maths Model Papers Paper 1 image 17

उत्तर 25
0

उत्तर 27
UP Board Class 12 Maths Model Papers Paper 1 image 18

उत्तर 28
[latex]\frac { 2 }{ 3\sqrt { 3 } } [/latex]

उत्तर 29
UP Board Class 12 Maths Model Papers Paper 1 image 19

उत्तर 30
UP Board Class 12 Maths Model Papers Paper 1 image 20

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UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 20 Interest, Attention and Education

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 20 Interest, Attention and Education (रुचि, अवधान तथा शिक्षा) are part of UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 20 Interest, Attention and Education (रुचि, अवधान तथा शिक्षा).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 20
Chapter Name Interest, Attention and Education
(रुचि, अवधान तथा शिक्षा)
Number of Questions Solved 34
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 20 Interest, Attention and Education (रुचि, अवधान तथा शिक्षा)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
रुचि का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। बालकों में रुचि उत्पन्न करने के उपायों को भी स्पष्ट कीजिए।
या
रुचि क्या है? विषय-वस्तु में रुचि पैदा करने के लिए अध्यापक को कौन-से उपाय करने चाहिए? स्पष्ट कीजिए।
या
रुचि से आप क्या समझते हैं? सीखने में रुचि के महत्त्व की विवेचना कीजिए। [2015]
या
रुचि के स्वरूप पर प्रकाश डालिए। किसी पाठ को पढ़ाते समय अध्यापक अपने छात्रों पर किस प्रकार रुचि उत्पन्न कर सकता है? [2009, 11]
या
वे कौन-से कारक हैं जो रुचियों के निर्माण को आगे बढ़ाते हैं? [2015]
या
रुचिसे आप क्या समझते हैं?”रुचि सीखने की वह दशा है जो अध्यापक और विद्यार्थी दोनों के लिए आवश्यक है।” इस कथन की विवेचना कीजिए। [2008, 11, 13]
या
रुचि क्या है? क्या यह जन्मजात अथवा अर्जित होती है? अधिगम में इसके महत्त्व की विवेचना कीजिए। [2016]
या
रुचि का अर्थ स्पष्ट कीजिए। छात्रों में रुचि उत्पन्न करने की विधियों का वर्णन कीजिए। [2016]
उत्तर :
रुचि का अर्थ एवं परिभाषा
रुचि अवधान का अन्तरंग प्रेरक है। रॉस (Ross) के अनुसार, रुचि का अर्थ है-लगाव अर्थात् जिस वस्तु के प्रति हमारा लगाव होता है, उसमें हमारी रुचि होती है। एक किशोर का लगाव पाठ्य-पुस्तकों की अपेक्षा उपन्यास में अधिक होता है। इस प्रकार यह लगाव ही रुचि है। रुचि में अन्तर करने की भावना होती है। हम किसी वस्तु में इस कारण रुचि रखते हैं, क्योंकि उसे अन्य वस्तुओं से अधिक महत्त्वपूर्ण समझते हैं।

रुचि की कुछ परिभाषाओं का विवरण निम्नलिखित है

  1. क्रो व क्रो के अनुसार, “रुचि उस प्रेरक शक्ति को कहा जाता है, जो हमें किसी व्यक्ति, वस्तु या क्रिया के प्रति ध्यान देने के लिए प्रेरित करती है।”
  2. डॉ० एस० एम० माथुर के अनुसार, “रुचि को प्रेरक शक्ति कहा जाता है, जो हमारे ध्यान को एक व्यक्ति, वस्तु या क्रिया की तरफ उन्मुख करती है या इसे प्रभावपूर्ण कहा जा सकता है, जो स्वयं ही अपनी सक्रियता से उत्तेजित होती है।”
  3. भाटिया के अनुसार, “रुचि का अर्थ है-अन्तर करना। हम वस्तुओं में इस कारण रुचि रखते हैं, क्योंकि हमारे लिए उनमें और दूसरी वस्तुओं में अन्तर होता है, क्योंकि उनका हमसे सम्बन्ध होता है।

उपर्युक्त विवरण द्वारा रुचि का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। रुचियों के दो प्रकार या वर्ग निर्धारित किये गये हैं, जिन्हें क्रमश :

  • जन्मजात रुचियाँ तथा
  • अर्जित रुचियाँ कहते हैं।

[संकेत : रुचियों के प्रकार के विस्तृत विवरण हेतु लघु उत्तरीय प्रश्न 1 का उत्तर देखें।]

बालकों में रुचि उत्पन्न करने के उपाय
निम्नांकित उपायों या विधियों द्वारा बालकों में पाठ के प्रति रुचि उत्पन्न की जा सकती है

  1. छोटे बालक सबसे अधिक रुचि अपने आप में लेते हैं। अत: किसी नीरस विषय को बालकों के अपने मन से सम्बन्धित करके पढ़ाया जाए।
  2. छोटे बालकों की रुचि मूल-प्रवृत्तियों पर आधारित होती है। अतः अध्यापक को चाहिए कि पढ़ाते समय मूल-प्रवृत्यात्मक रुचियों को सुविधानुसार पाठ से सम्बन्धित करें।
  3. आयु के विकास के साथ-साथ बालकों की रुचियों में भी परिवर्तन होता है। अतः इस बात को ध्यान में रखकर ही पाठ्य विकास का आयोजन किया जाए।
  4. रुचि का आधार जिज्ञासा प्रवृत्ति है। अतः विषय के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न करना आवश्यक है।
  5. रुचि के अनुसार विषय में परिवर्तन भी किया जाना चाहिए।
  6. पाठ पढ़ाते समय बालकों को उसका उद्देश्य भी बता दिया जाए, क्योंकि बालक किसी कार्य में । तभी रुचि लेते हैं, जब उन्हें उद्देश्य को पता चल जाता है।
  7. पाठ्य वस्तु का सम्बन्ध यथासम्भव जीवन की आवश्यकताओं से किया जाए।
  8. किसी पाठ का अध्ययन करते समय प्रभावशाली स्थूल दृश्य-श्रव्य साधनों या सहायक सामग्री का प्रयोग करना चाहिए।
  9. बालक रचनात्मक कार्यों में विशेष रुचि लेते हैं। अत: पाठ का यथासम्भव सम्बन्ध रचनात्मक कार्यों में किया जाए।
  10. लगातार मौखिक शिक्षण बालकों में नीरसती उत्पन्न कर देता है। अतः बीच में उन्हें प्रयोग व निरीक्षण आदि के अवसर दिये जाएँ।
  11. प्राथमिक स्तर पर खेल विधि का प्रयोग उचित है।
  12. नवीन ज्ञान का सम्बन्ध पूर्व ज्ञान से करना परम आवश्यक है, क्योंकि छात्र उसे वस्तु में ही विशेष रुचि लेते हैं, जिनका उन्हें पहले से ही ज्ञान होता है।
  13. पढ़ाते समय किसी तथ्य की आवश्यकता से अधिक पुनरावृत्ति न की जाए, क्योंकि अधिक पुनरावृत्ति से नीरसता उत्पन्न होती है।
  14. पाठ्य विषयं को रोचक व प्रभावशाली बनाने में पर्यटन का सहारा लेना अधिक उपयोगी है। अतः अध्यापक को समय-समय पर शैक्षिक भ्रमण यात्राओं का आयोजन करना चाहिए।

शिक्षा या सीखने (अधिगम) में रुचि का महत्त्व
वास्तव में अध्यापक के लिए आवश्यक है कि वे विद्यार्थी में शिक्षा के प्रति रुचि जाग्रत करें और स्वयं भी शिक्षण-कार्य में रुचि लें, क्योंकि “रुचि सीखने की वह दशा है जो अध्यापक और विद्यार्थी दोनों के लिए आवश्यक है।” शिक्षा के क्षेत्र में रुचि का अत्यधिक महत्त्व एवं आवश्यकता है। रुचि के नितान्त अभाव में शिक्षा की प्रक्रिया सुचारु रूप से चल ही नहीं सकती।

इनके विपरीत यह भी सत्य है कि यदि किसी विषय के प्रति रुचि जाग्रत हो जाए तो उस दशा में शिक्षा की प्रक्रिया सरल, उत्तम तथा शीघ्र सम्पन्न होने लगती है। रुचि से जिज्ञासा उत्पन्न होती है तथा जिज्ञासा से ज्ञान प्राप्ति के हर सम्भव प्रयास किये जाते हैं तथा परिणामस्वरूप ज्ञान प्राप्त भी कर लिया जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि शिक्षा के लिए रुचि आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 2
अवधान का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। अवधान की विशेषताओं का भी विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
अवधान का अर्थ एवं परिभाषा
‘अवधान’ वह मानसिक क्रिया है, जिसमें हमारी चेतना किसी वस्तु या पदार्थ पर केन्द्रित होती है। उदाहरण के लिए, हम किसी पार्क में बैठे एक गुलाब के फूले को देख रहे हैं। यद्यपि पार्क में स्त्री, पुरुष, बच्चे, फव्वारे भी हमारी कुछ-न-कुछ चेतना में हैं, परन्तु हमने अपने चेतना को केन्द्रित केवल गुलाब के फूल पर ही कर रखा है। इस प्रकार सेञ्चेतना का किसी वस्तु-विशेष पर केन्द्रित करना ही अवधान क्रहलाता है।

अवधान की कुछ प्रमुख परिभाषाएँ इस प्रकार हैं

  1. डूमवाइल के अनुसार, “अन्य वस्तुओं की अपेक्षा एक ही वस्तु पर चेतना का केन्द्रीकरण ही अवधान है।”
  2. रॉस के अनुसार, “अवधान विचार की वस्तु को मन के समक्ष स्पष्ट रूप से प्रकट करने की प्रक्रिया है।”
  3. वेलेण्टाइन के अनुसार, “अवधान मस्तिष्क की शक्ति नहीं है, वरन् सम्पूर्ण रूप से मस्तिष्क की क्रिया या अभिव्यक्ति है।’
  4. बी० एन० झा के अनुसार, “किसी विचार या संस्कार को चेतना में स्थिर करने की प्रक्रिया को अवधान कहते हैं।”
  5. मन के अनुसार, “हम चाहे जिस दृष्टिकोण से विचार करें, अन्तिम निष्कर्ष में अवधान एक प्रेरणात्मक प्रक्रिया है।”
  6. मैक्डूगल के अनुसार, “ज्ञानात्मक प्रक्रिया पर पड़े प्रभाव की दृष्टि से विचार करने पर अवधान एक चेष्टा या प्रयास भर है।”

इस प्रकार स्पष्ट है कि जब चेतना के समक्ष आने वाले पदार्थों में एकता स्थापित करने की चेष्टा की जाती है तो उस मानसिक प्रक्रिया को अवधान कहा जाता है।

अवधान की विशेषताएँ
अवधान की ‘निम्नांकित विशेषताएँ पायी जाती हैं

1. एकाग्रता :
अवधान किसी वस्तु पर चेतना को एकाग्र करना है। अतः अवधान के लिए चित्त की एकाग्रता परम आवश्यक है।

2. मानसिक क्रियाशीलता :
अवधान की एक प्रमुख विशेषता क्रियाशीलता है। बिना मानसिक क्रियाशीलता के हम किसी वस्तु पर अवधान नहीं लगा सकते। उदाहरण के लिए, यदि हमें गुलाब के फूल पर अवैधान केन्द्रित करना है, तो इसके लिए मन को क्रियाशील बनाना होगा।

3. चयनात्मकता :
जिस वस्तु पर हम अवधान केन्द्रित करते हैं, उसका चयन अनेक वस्तुओं में से होता है। किसी बगीचे के अनेक फूलों में से किसी एक विशेष फूल पर हमारा अवधान केन्द्रित होता है।

4. प्रयोजनशीलता :
हम उन वस्तुओं पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं, जिनमें हमारा किसी-न-किसी प्रकार का प्रयोजन होता है। बालक का ध्यान रसगुल्ले पर क्यों एकदम चला जाता है, क्योंकि वह उसे खाने में अच्छा लगता है।

5. परिवर्तनशीलता :
अवधान अस्थिर तथा चंचल प्रकृति का होता है। कठिनता से ही एक वस्तु पर हम अपना ध्यान केन्द्रित कर पाते हैं, परन्तु प्रयास द्वारा अवधान केन्द्रित करने की शक्ति को बढ़ाया जा सकता है।

6. संकीर्ण या संकुचित प्रसार :
अवधान का विस्तार संकीर्ण या सन्तुलित होता है। हमारा अवधान विभिन्न पहलुओं में से किसी एक वस्तु पर ही केन्द्रित होता है। कुछ देर बाद हमारा अवधान दूसरी वस्तु पर केन्द्रित हो जाता है।

7. सजीवता :
अवधान चेतना के कारण प्रतिपादित होता है। अत: वह सजीव है। हम जिस वस्तु पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं, उसका अस्तित्व हमारी चेतना में होता है।

8. तत्परता :
वुडवर्थ (wood worth) के अनुसार, “अवधान की आवश्यक क्रिया तत्परता है।” अवधान की दशा में हमारा शरीर एक प्रकार की तत्परता की दशा में होता है।

9. गति-समायोजन :
अवधान में गतियों का समायोजन होता है, अर्थात् जब हम किसी वस्तु पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं, उस समय हमारी ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों के संचालन का समायोजन उस प्रक्रिया की प्रकृति के अनुसार हो जाता है। भाषण सुनते समय श्रोता के आँख, कान, गर्दन तथा बैठने की स्थिति नेता या भाषणकर्ता की ओर समायोजन कर लेती हैं।

प्रश्न 3
अवधान में सहायक दशाओं का वर्णन कीजिए।
या
अवधान केन्द्रित करने में सहायक बाह्य तथा आन्तरिक दशाओं का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
अवधान की दशाएँ।
अवधान का केन्द्रीकरण किस प्रकार होता है ? अथवा वे कौन-कौन-सी दशाएँ हैं, जो अवधान केन्द्रित करने में सहायक होती हैं ? इन प्रश्नों के लिए हमें उन दशाओं का अध्ययन करना होगा, जो कि अवधान केन्द्रित करने में सहायक होती हैं। ये दशाएँ दो वर्गों में विभक्त की जा सकती हैं-बाह्य दशाएँ तथा आन्तरिक दशाएँ।

अवधान केन्द्रित करने की बाह्य दशाएँ
अवधान केन्द्रित करने की बाह्य दशाएँ निम्नलिखित हैं अवधान केन्द्रित करने में सहायक बाह्य दशाओं के अन्तर्गत जिन कारकों को सम्मिलित किया जाता है, उनका सम्बन्ध मुख्य रूप से बाह्य विषय-वस्तु से होता है। इस वर्ग की दशाओं यो कारकों का सामान्य विवरण निम्नलिखित है।

1. स्वरूप :
अधान का केन्द्रीकरण उद्दीपन की प्रकृति या स्वरूप पर निर्भर करता है। छोटे बालक चटकीले रंग की वस्तुओं की ओर आकर्षित हो जाते हैं। जिन पुस्तकों में रंगीन चित्र होते हैं, उनमें बालक का ध्यान अधिक लगती है।

2. आकार :
अधिक या बड़े आकार की वस्तु की ओर हमारा ध्यान शीघ्र आकर्षित होता है। अखबारों के प्रथम पृष्ठ पर किसी मुख्य समाचार को मोटे-मोटे अक्षरों में इस कारण ही छापा जाता है। बड़े-बड़े विज्ञापन के पोस्टर भी इसके उदाहरण हैं।

3. गति :
स्थिर वस्तु की अपेक्षा गतिशीलं या चलती वस्तु की ओर, अवधान केन्द्रित करने हमारा ध्यान शीघ्र आकर्षित होता है। बैठे हुए मनुष्य की ओर हमारा ध्यान की बाह्य दशाएँ। नहीं जाती, परन्तु सड़क पर दौड़ता मनुष्य हमारा ध्यान आकर्षित कर लेता है।

4. विषमता :
विषमता के कारण भी हमारा ध्यान आकर्षित होता है। एक गोरे परिवार के व्यक्तियों में यदि कोई काला व्यक्ति है तो उसकी ओर विषमता के कारण हमारा ध्यान अवश्य जाता है।

5. नवीनता :
किसी नवीन या विचित्र वस्तु की ओर हमारा ध्यान तत्काल जाता है। यदि कोई अध्यापक प्रतिदिन कोट-पैंट में विद्यालय आते हैं। और किसी दिन वे धोती-कुर्ता पहनकर आ जाते हैं तो समस्त छात्रों का ध्यान । उनकी ओर आकर्षित हो जाता है।

6. अवधि :
जिस वस्तु पर जितना देखने का अवसर मिलती है, उतना ही उस पर हमारा ध्यान केन्द्रित होता है। इसी कारण भूगोल के शिक्षण में । मानचित्र बार-बार दिखाये जाते हैं।

7. परिवर्तन :
कक्षा में यदि शान्त वातावरण है, परन्तु सहसा किसी कोने से शोर होने लगता है, तो तुरन्त ही हमारा ध्यान उस ओर चला जाता है। इस प्रकार उद्दीपन में जब भी परिवर्तन होता हैं, तो उस परिवर्तन की ओर हमारा ध्यान तुरन्त चला जाता है।

8. प्रकार या रूप :
हमारा ध्यान आकर्षक, सुन्दर तथा सुडौल वस्तुओं की ओर शीघ्र जाता है और उन्हें बार-बार देखने की इच्छा होती है।

9. स्थिति :
उद्दीपन या वस्तु की स्थिति के समान हमारे अवधान की अवस्था होती है। प्रतिदिन हम सड़क पर वृक्षों के नीचे से गुजरते हैं, किन्तु हमारा ध्यान उनकी ओर आकर्षित नहीं होता है। परन्तु यदि किसी दिन उनमें से किसी वृक्ष को गिरा हुआ देखते हैं, तो हमारा ध्यान उसकी ओर तुरन्त चला जाता है।

10. तीव्रता :
शक्तिशाली और तीव्र उद्दीपन हमारा ध्यान अधिक आकर्षित करते हैं। मन्द ध्वनि की अपेक्षा तीव्र ध्वनि की ओर हमारा ध्यानं शीघ्र जाता है।

11. पुनरावृत्ति :
जिस बात को बार-बार दोहराया जाता है, उस ओर हमारा ध्यान स्वाभाविक रूप से चला जाता है। इसी कारण किसी पाठ के तत्त्वों को बार-बार दोहराया जाता है।

12. रहस्यमयता :
रहस्यपूर्ण बातों की ओर हमारा ध्यान शीघ्र आकर्षित होता है। दो व्यक्तियों में यदि कोई सामान्य बात हो रही हो तो उस ओर हमारा ध्यान नहीं जाता, परन्तु जब वे कानाफूसी करने लगते हैं तो तुरन्त ही हम उनकी ओर देखने लगते हैं।

अवधान केन्द्रित करने की आन्तरिक दशाएँ

अवधान की वे दशाएँ जो व्यक्ति में विद्यमान होती हैं, आन्तरिक दशाएँ कहलाती हैं। इन दशाओं का विवरण इस प्रकार है
1. अभिवृत्ति :
जिन वस्तुओं में हमारी अभिवृत्ति होती है, प्राय: उन वस्तुओं में हमारा ध्यान अधिक केन्द्रित होता है।

2. रुचि :
रुचि का ध्यान से घनिष्ठ सम्बन्ध है। हम उन्हीं वस्तुओं की ओर ध्यान देते हैं, जिनमें हमारी रुचि होती है। अरुचिकर वस्तुओं की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता है।

3. मूल-प्रवृत्तियाँ :
ध्यान को केन्द्रित करने में मूल-प्रवृत्तियों का भी योग रहता है। रोमांटिक उपन्यास तथा कहानियों में किशोर-किशोरियों मूल-प्रवृत्तियों का ध्यान सामान्य पुस्तकों की अपेक्षा अधिक लगता है। साबुन, पाउडर, तेल आदि के विज्ञापनों पर स्त्रियों के चित्र इसी उद्देश्य से लगाये जाते हैं।

4. पूर्व अनुभव :
ध्यान के केन्द्रीकरण का एक अन्य कारण हमारे पूर्व अनुभव भी होते हैं। पूर्व अनुभव के आधार पर ही हम अपना ध्यान केन्द्रित कर पाते हैं।

5. मस्तिष्क :
जो विचार हमारे मस्तिष्क पर जिस समय छाया रहता है, उस समय उससे सम्बन्धित बात पर ही हम ध्यान देते हैं। उदाहरण के लिए, हमारे मस्तिष्क में किसी रोजगार का विचार है तो अखबार में हमारा सर्वप्रथम ध्यान रोजगार के विज्ञापनों पर ही जाएगा।

6. जानकारी या ज्ञान :
जिस विषय की हमें विशद जानकारी होती है, उस विषय पर हमारा ध्यान सरलता से केन्द्रित हो जाता है। जब बालक गणित के प्रश्न ठीक प्रकार से समझ जाता है तो वह उन पर अपना ध्यान सरलता से केन्द्रित कर लेता है।

7. आवश्यकता :
जो वस्तु हमारी आवश्यकताओं को पूरा करती है, उसकी ओर हमारा ध्यान स्वतः हीं चला जाता है। भूख के समय हमारा ध्यान भोजन की ओर तुरन्त चला जाता है।

8. जिज्ञासा :
जिज्ञासा अवधान को केन्द्रित करने में विशेष योग देती है। जिस वस्तु में हमारी जिज्ञासा होती है, उस पर हमारा ध्यान स्वाभाविक रूप से केन्द्रित हो जाता है।

9. लक्ष्य :
जब व्यक्ति को अपना लक्ष्य ज्ञात हो जाता है तो उस पर उसका ध्यान केन्द्रित हो जाता है। परीक्षा के दिनों में छात्रों का अध्ययन पर इस कारण ही केन्द्रित हो जाता है।

10. आदत :
आदत के कारण भी ध्यान केन्द्रित होता है, जो व्यक्ति किसी कारखाने के पास रहता है, उसे कारखाने के शोरगुल में भी ध्यान केन्द्रित करने की आदत पड़ जाती है। जो बालक शाम के पाँच बजे खेलने के अभ्यस्त हैं, तो प्रतिदिन पाँच बजे उनका ध्यान खेल की ओर चला जाता है।

प्रश्न 4
कक्षा में बालकों के अवधान को केन्द्रित करने के मुख्य उपायों का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
बालकों का अवधान केन्द्रित करने के उपाय
शिक्षण को उत्तम एवं प्रभावकारी बनाने के लिए बालकों के अवधान को पाठ्य विषय पर केन्द्रित होना आवश्यक माना जाता है। कक्षा में बालकों को अवधान केन्द्रित करने के लिए निम्नांकित उपाय काम में लाये जा सकते हैं

1. शान्त वातावरण :
ध्यान की एकाग्रता के लिए शान्त वातावरण का होना अत्यन्त आवश्यक है। शोरगुल बालकों के ध्यान को विचलित कर देता है। अतः अध्यापक का कर्तव्य है कि वह कक्षा में सदा शान्ति बनाये रखने का प्रयत्न करें।

2. विषय के प्रति रुचि जाग्रत करना :
यह बात सर्वमान्य है। कि जिस विषय में बालक की रुचि होती है, उसे वह कम समय में और कुशलता से सीख लेता है। अतः रुचि उत्पन्न करना अध्यापक का एक आवश्यक कार्य हो जाता है। वास्तव में विषय में रुचि उत्पन्न हो जाने पर छात्रों के ध्यान के भटकने को प्रश्न ही नहीं उठता।

3. बालकों की रुचियों का ध्यान :
विषय के प्रति रुचि जाग्रत करने के साथ-साथ अध्यापक को बालकों की रुचियों का भी ध्यान अतः शिक्षण के समय बालकों की रुचियों का ध्यान रखा जाए।

4. जिज्ञासा प्रवृत्ति का उपयोग :
बालकों का ध्यान पाठ पर केन्द्रित करने के लिए उनमें जिज्ञासा जाग्रत करना भी अत्यन्त आवश्यक है।

5. विषय में परिवर्तन :
ध्यान स्वभाव से चंचल होता है। अतः बालक अधिक काल तक किसी विषय पर अपना ध्यान केन्द्रित नहीं कर सकते। अत: एक विषय को अधिक समय तक न पढ़ाकर किसी दूसरे विषय का शिक्षण प्रारम्भ करना चाहिए।

6. सहायक सामग्री का प्रयोग :
सहायक सामग्री बालक के ध्यान को विषय पर केन्द्रित करने में विशेष योग देती है। ऐसी दशा में यथासम्भव सहायक सामग्री का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।

7. उचित शिक्षण विधियों का प्रयोग :
व्याख्यान विधि जैसी परम्परागत शिक्षण विधियाँ छात्रों का ध्यान अधिक देर तक विषय पर केन्द्रित नहीं रख पातीं। अतः बालक को ध्यान आकर्षित करने के लिए। अध्यापक को चाहिए कि वह खेल विधि, निरीक्षण विधि तथा प्रयोगात्मक विधि आदि का उपयोग भी करें।

8. पूर्व ज्ञान का नवीन ज्ञान से सम्बन्ध :
बालकों के पूर्व ज्ञान से नवीन ज्ञान को सम्बन्धित करना आवश्यक है। जब नवीन ज्ञान पूर्व ज्ञान से सम्बन्धित हो जाता है तो बालक का ध्यान सरलता से केन्द्रित हो। जाता है।

9. उचित वातावरण :
अनुचित वातावरण बालकों के ध्यान की एकाग्रता में सहायक नहीं होता है। यदि प्रकाश का अभाव है, बैठने के लिए पर्याप्त स्थान नहीं है तथा आसपास बदबू आती है तो छात्रों को। अपना ध्यान केन्द्रित करने में कठिनाई होगी। अत: कक्षा के वातावरण को अनुकूल बनाना चाहिए।

10. बालक का स्वास्थ्य :
कमजोर बालक, जिसके सिर में दर्द रहता है, जिनकी आँखें कमजोर हैं। तथा जो कम सुनते हैं, वे पाठ पर अपना ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाते हैं। अतः बालक के स्वास्थ्य के विषय में अध्यापक को अभिभावकों से सम्पर्क स्थापित करना चाहिए।

11. सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार :
अध्यापक को बालकों के ध्यान को विषय के प्रति आकर्षित करने के लिए उनके साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। कठोर व्यवहार से बालक ध्यान को एकाग्र नहीं कर पाते हैं।

12. पर्याप्त विश्राम :
थकान ध्यान को विचलित करने में सहायक होती है। अत: प्रधानाचार्य को कर्तव्य है कि वह विद्यालय की समय-सारणी का निर्माण इस ढंग से करे कि बालकों को पर्याप्त विश्राम मिल सके तथा उन्हें कम-से-कम थकान का अनुभव हो।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
रुचि के प्रकारों का उल्लेख कीजिए। [2007]
या
मानवीय रुचियों का स्पष्ट वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
रुचि मुख्यतः दो प्रकार की होती है

  1. जन्मजात एवं
  2. अर्जित।

1. जन्मजात रुचि :
जन्मजात रुचि, मूल-प्रवृत्तियों (Instincts) पर आधारित होती है और मनुष्य के स्वभाव तथा प्रकृति में निहित होती है। इनका स्रोत व्यक्ति के अन्दर जन्म से ही विद्यमान होता है। भोजन में हमारी रुचि भूख की जन्मजात प्रवृत्ति के कारण है। काम-वासना में रुचि होने के कारण हमारा ध्यान विपरीत लिंग की ओर आकृष्ट होता है। चिड़िया दाना खाने, गाय तथा भैंस हरा चारा खाने तथा हिंसक पशु मांस खाने में रुचि रखते हैं। यह जन्मजात क्रियाओं के कारण।

2. अर्जित रुचि :
अर्जित करने का अर्थ है उपार्जित करना (अर्थात् कमाना)। अर्जित रुचियों को व्यक्ति अपने वातावरण से अर्जित करता है। इनका निर्माण मनुष्य के अनुभव के आधार पर होता है। मनुष्य के मन की भावनाएँ तथा आदतें इनकी आधारशिला हैं। अतः भावनाओं तथा आदतों में परिवर्तन के साथ ही इनमें परिवर्तन आता रहता है। अपने हित या लाभ की परिस्थितियों के प्रति व्यक्ति की रुचियाँ बढ़ जाती हैं। किसी वस्तु या प्राणी के प्रति आकर्षण के कारण उसके प्रति हमारी रुचि पैदा हो जाती है। एक फोटोग्राफर को अच्छे कैमरे में रुचि होती है तथा बच्चों की रुचि नये-नये खिलौनों में।

प्रश्न 2
अवधान के मुख्य प्रकार कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर :
अवधान के मुख्य प्रकारों का सामान्य परिचय निम्नलिखित है

1. ऐच्छिक अवधान :
जब कोई व्यक्ति किसी वस्तु या उद्दीपन पर अपनी समस्त चेतना को केन्द्रित कर देता है तो इस अवस्था को ऐच्छिक अवधान कहते हैं। इस प्रकार के अवधान में हमें किसी वस्तु या विचार पर ध्यान लगाने के लिए अपनी संकल्प-शक्ति का प्रयोग करना पड़ता है। सामान्य शब्दों में हम कहते हैं कि पूर्ण प्रयास करने पर ही ऐच्छिक अवधाने को लगाया जा सकता है। इस प्रकार के अवधान को सक्रिय अवधान भी कहते हैं।

2. अनैच्छिक अवधान :
जब किसी वस्तु या विचार पर हम बिना किसी प्रयत्न के अवधान लगाते हैं तो इस प्रकार के अवधान को अनैच्छिक अवधान कहते हैं। अनैच्छिक अवधान के लिए हमें अपनी संकल्प शक्ति का प्रयोग नहीं करना पड़ता। इस प्रकार के अवधान को निष्क्रिय अवधान भी कहा जाता है। उदाहरण के लिए, किसी जोर की आवाज पर, तीव्र प्रकाश पर तथा मधुर संगीत पर हमारा ध्यान अपने आप चला जाता है।

प्रश्न 3
अवधान और रुचि के सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
मनोवैज्ञानिकों में अवधान और रुचि के विषय में परस्पर मतभेद है। रुचि और अवधान के परस्पर सम्बन्ध में तीन मत प्रचलित हैं

1. अवधान रुचि पर आधारित है :
इस मत के प्रतिपादकों का कहना है कि व्यक्ति उन्हीं बातों पर ध्यान देता है, जिनमें उसकी रुचि होती है। दूसरे शब्दों में, अवधान रुचि पर आधारित है। जिसे वस्तु में हमारी रुचि नहीं होगी, उस पर हमारी चेतना केन्द्रित नहीं होगी।

2.रुचि अवधान पर आधारित है-कुछ मनोवैज्ञानिकों का मत है कि रुचि का आधार ध्यान है। जब हम किसी वस्तु पर ध्यान देंगे ही नहीं तो हमारी उस वस्तु के प्रति रुचि उत्पन्न होगी ही नहीं। रुचि की। जागृति तभी होती है, जब हम किसी वस्तु पर ध्यान देते हैं।

3. समन्वयवादी मत :
यह मत उक्त दोनों मतों का समन्वय करता है। इस मत के समर्थकों के अनुसार अवधान और रुचि दोनों ही एक-दूसरे पर आधारित हैं। रॉस (Ross) के अनुसार, “अवधान तथा रुचि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यदि रुचि के कारण कोई व्यक्ति किसी वस्तु पर ध्यान देता है तो अवधान के कारण उस वस्तु में उसकी रुचि उत्पन्न हो जाएगी।” मैक्डूगल ने भी लिखा है, “रुचि गुप्त अवधान है और अवधान सक्रिय रुचि है।”

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
व्यक्ति की रुचियों के विकास की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
यह सत्य है कि व्यक्ति की कुछ रुचियाँ जन्मजात होती हैं, परन्तु रुचियों का समुचित विकास जीवन में धीरे-धीरे तथा क्रमिक रूप से होता है। शिशु की रुचियों का आधार उसकी ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं, अर्थात् शैशवावस्था में रुचियों का विकास ज्ञानेन्द्रियों से सम्बन्धित होता है। बाल्यावस्था में बालक की सक्रियता बढ़ जाती है; अतः इस अवस्था में उसकी रुचियों का विकास क्रियात्मक खेलों के माध्यम से होता है।

बाल्यावस्था के उपरान्त किशोरावस्था में व्यक्ति की रुचियों का विकास कल्पनाओं, संवेगों तथा जिज्ञासा के माध्यम से होता है। इसके उपरान्त प्रौढ़ावस्था में व्यक्ति की नयी रुचियाँ प्रायः उत्पन्न नहीं होती। इस अवस्था में व्यक्ति की रुचियाँ स्थायी रूप ग्रहण करती हैं।

प्रश्न 2
रुचि और योग्यता का घनिष्ठ सम्बन्ध है।” इस कथन पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
हम जानते हैं कि रुचि एक शक्ति है जो व्यक्ति को किसी विषय, वस्तु या कार्य के प्रति ध्यान केन्द्रित करने के लिए प्रेरित करती है। रुचि से लगन उत्पन्न होती है तथा व्यक्ति की शक्तियाँ अभीष्ट दिशा या कार्य में केन्द्रित हो जाती हैं। रुचि की इन विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए ही कहा जाता है कि रुचि और योग्यता को घनिष्ठ सम्बन्ध है।

वास्तव में रुचि की दशा में व्यक्ति अधिक ध्यानपूर्वक, लगन से तथा अपनी समस्त शक्तियों को जुटा कर कार्य करता है। इस स्थिति में योग्यता को विकास होना स्वाभाविक ही हो जाती है। यही कारण है कि हम कह सकते हैं कि रुचि और योग्यता का घनिष्ठ सम्बन्ध है।

प्रश्न 3
अनभिप्रेत अवधान से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
अनभिप्रेत अवधान एक विशेष प्रकार का अवधान है जिसमें व्यक्ति को विशिष्ट प्रयास की जरूरत होती है। यह अवधान ऐच्छिक होकर भी ऐच्छिक अवधान से भिन्न होता है। अनभिप्रेत अवधान के अन्तर्गत व्यक्ति किसी उत्तेजना या वस्तु पर अपनी इच्छा तथा रुचि के विरुद्ध जाकर ध्यान केन्द्रित करता है, लेकिन ऐच्छिक अवधान में व्यक्ति उस उत्तेजना या वस्तु की ओर अपनी इच्छा और रुचि के अनुकूल ध्यान केन्द्रित करने को प्रयास करता है।

उदाहरणार्थ :
माना एक कवि अपनी इच्छा एवं रुचि के अनुकूल काव्य-रचना में लगा है। उसी समय उसे किसी बीमार आदमी के लिए जरूरी तौर पर दवा लेने जाना पड़े। कविता से हटकर उसका जो ध्यान दवाइयों की दुकान पर केन्द्रित होगा; उसे अनभिप्रेत अवधान कहेंगे।

प्रश्न 4
व्यक्ति के अवधान का आदत से क्या सम्बन्ध है ?
उत्तर :
व्यक्ति के अवधान में आदत का विशेष योगदान होता है। आदत को अवधान की सबसे अधिक अनुकूल या सहायक दशा माना गया है। व्यक्ति की जब जिस वस्तु की आदत होती है, उससे सम्बन्धित पदार्थ की ओर एक निर्धारित समय पर उसका अवधान अवश्य केन्द्रित हो जाता है। उदाहरण के लिए–यदि किसी व्यक्ति की दोपहर बाद तीन बजे चाय पीने की आदत हो तो निश्चित समय पर उसका ध्यान चाय की ओर केन्द्रित हो जाएगा।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
“रुचि को वह प्रेरक शक्ति कहा जाता है, जो हमें किसी व्यक्ति, वस्तु या क्रिया के प्रति ध्यान देने के लिए प्रेरित करता है।”-रुचि की यह परिभाषाकिसके द्वारा प्रतिपादित है?
उत्तर :
रुचि की प्रस्तुत परिभाषा क्रो तथा क्रो द्वारा प्रतिपादित है।

प्रश्न 2
ध्यान या अवधान का क्या अर्थ है ?
उत्तर :
ध्यान या अवधान वह मानसिक क्रिया है, जिसमें हमारी चेतना किसी व्यक्ति, विषय या वस्तु पर केन्द्रित होती है।

प्रश्न 3
अवधान की प्रक्रिया की चार मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
अवधान की प्रक्रिया की मुख्य विशेषताएँ हैं

  1. एकाग्रता
  2. मानसिक क्रियाशीलता
  3. चयनात्मकता तथा
  4. प्रयोजनशीलता

प्रश्न 4
कोई ऐसा कथन लिखिए जिससे अवधान एवं रुचि के सम्बन्ध को जाना जा सके।
उत्तर :
“अवधान तथा रुचि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यदि रुचि के कारण कोई व्यक्ति किसी वस्तु पर ध्यान देता है तो अवधान के कारण उस वस्तु में उसकी रुचि उत्पन्न हो जाएगी।” [रॉस]

प्रश्न 5
“रुचि अपने क्रियात्मक रूप में एक मानसिक प्रवृत्ति है।” यह किसका कथन है ? [2007, 10]
उत्तर :
प्रस्तुत कथन जेम्स ड्रेवर का है।

प्रश्न 6
रुचियों के मुख्य वर्ग या प्रकार कौन-कौन से हैं? [2007, 2016]
या
रुचि के कितने प्रकार हैं?
उत्तर :
रुचियों के मुख्य वर्ग या प्रकार दो हैं

  1. जन्मजात रुचियाँ तथा
  2. अर्जित रुचियाँ

प्रश्न 7
रुचि क्या है? [2013]
उत्तर :
रुचि किसी उत्तेजना, वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति की ओर आकर्षित होने की प्राकृतिक, जन्मजात या अर्जित प्रवृत्ति है।

प्रश्न 8
अवधान के मुख्य दो प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर :
अवधान के मुख्य दो प्रकार हैं

(1) ऐच्छिक अवधान तथा
(2) अनैच्छिक अवधान।

प्रश्न 9
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. अवधान अपने आप में एक चयनात्मक प्रक्रिया है।
  2. प्रबल उत्तेजनाओं के प्रति व्यक्ति का अवधान केन्द्रित नहीं हो पाता।
  3. अवधान तथा रुचि का परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं होता।
  4. रुचि गुप्त. अवधान है और अवधान सक्रिय रुचि है।
  5. अध्ययन के प्रति रुचि उत्पन्न करने के लिए शान्त तथा अनुकूल वातावरण आवश्यक होता है।
  6. रुचिकर विषय-वस्तुओं के प्रति अवधान शीघ्र केन्द्रित हो जाता है।

उत्तर :

  1. सत्य
  2. असत्य
  3. असत्य
  4. सत्य
  5. सत्य
  6. सत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1
“किसी दूसरी वस्तु की अपेक्षा एक वस्तु पर चेतना का केन्द्रीकरण अवधान है।” यह परिभाषा किसने दी है?
(क) जे० एस० रॉस ने
(ख) मैक्डूगल ने
(ग) डम्बिल ने
(घ) वुडवर्थ ने
उत्तर :
(ग) डम्बिल ने

प्रश्न 2
“किसी भी दृष्टिकोण से देखा जाए, अन्तिम विश्लेषण में अवधान एक प्रेरणात्मक प्रक्रिया है।” यह किसका कथन है ?
(क) मन का
(ख) जंग का
(ग) डम्बिल का
(घ) मैक्डूगल का
उत्तर :
(क) मन का

प्रश्न 3
“अवधान गतिशील होता है, क्योंकि वह अन्वेषणात्मक है।” यह कथन है
(क) वुडवर्थ का
(ख) मैक्डूगल का
(ग) हिलेगार्ड का
(घ) डम्बिल को
उत्तर :
(क) वुडवर्थ का

प्रश्न 4
रुचि एक
(क) अर्जित शक्ति है
(ख) प्रेरक शक्ति है
(ग) नैसर्गिक शक्ति है
(घ) बौद्धिक शक्ति है
उत्तर :
(ख) प्रेरक शक्ति है

प्रश्न 5
रुचि अपने क्रियात्मक रूप में एक मानसिक संस्कार है।” यह कथन है
(क) मैक्डूगल का
(ख) वुडवर्थ को
(ग) डेवर का
(घ) गेट्स का
उत्तर :
(ग) ड्रेवर का

प्रश्न 6
“रुचिं गुप्त अवधान है और अवधान सक्रिय रुचि है।” यह मत किसका है ?
(क) को तथा क्रो का
(ख) स्किनर का
(ग) वुडवर्थ को
(घ) मैक्डूगल का
उत्तर :
(घ) मैक्डूगल का

प्रश्न 7
विचार की किसी वस्तु को मस्तिष्क के सामने स्पष्ट रूप से लाने की प्रक्रिया है
(क) रुचि
(ख) कल्पना
(ग) अवधान
(घ) संवेदन
उत्तर :
(ग) अवधान

प्रश्न 8
पाठ को रुचिकर बनाने के लिए क्या आवश्यक है। [2012]
(क) शांतिपूर्ण वातावरण हो
(ख) पाठ के क्रियात्मक पद पर ध्यान दिया जाए
(ग) उपयुक्त शिक्षण विधियों का प्रयोग किया जाए
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर :
(घ) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 9
अवधान तथा रुचि के आपसी सम्बन्ध के विषय में सत्य है
(क) रुचि ध्यान पर आधारित होती है
(ख) ध्यान रुचि पर आधारित होता है
(ग) रुचि तथा ध्यान परस्पर फूक होते हैं
(घ) ये सभी कथन सत्य हैं
उत्तर :
(ग) रुचि तथा ध्यान परस्पर पूरक होते हैं।

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