UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 15 भारतीय रिजर्व बैंक

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Board UP Board
Class Class 10
Subject Commerce
Chapter Chapter 15
Chapter Name भारतीय रिजर्व बैंक
Number of Questions Solved 25
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 15 भारतीय रिजर्व बैंक

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
रिज़र्व बैंक की स्थापना हुई
(a) सन् 1901 में
(b) सन् 1919 में
(c) सन् 1935 में
(d) सन् 1949 में
उत्तर:
(c) सन् 1935 में

प्रश्न 2.
भारतीय रिज़र्व बैंक के निदेशक मण्डल में सदस्य होते हैं।
(a) 15
(b) 20
(c) 25
(d) 30
उत्तर:
(b) 20

प्रश्न 3.
भारतीय रिज़र्व बैंक का मुख्य कार्यालय ……….. में है।
(a) मुम्बई
(b) दिल्ली
(c) कोलकाता
(d) चेन्नई
उत्तर:
(a) मुम्बई

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प्रश्न 4.
भारत में नोट निर्गमन का अधिकार किस बैंक को है?
(a) सेन्ट्रल बैंक ऑफ इण्डिया
(b) भारतीय रिज़र्व बैंक
(c) सेन्ट्रल को-ऑपरेटिव बैंक
(d) स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया
उत्तर:
(b) भारतीय रिज़र्व बैंक

प्रश्न 5.
साख नियन्त्रण का कार्य निम्न में से किसका है?
(a) भारतीय स्टेट बैंक
(b) भारतीय रिज़र्व बैंक
(c) जिला सहकारी बैंक
(d) सेन्ट्रल बैंक ऑफ इण्डिया
उत्तर:
(b) भारतीय रिज़र्व बैंक

प्रश्न 6.
“पाँच सौ रुपये के नोट का विमुद्रीकरण ………. हुआ था। (2018)
(a) 15 अगस्त, 2016 को
(b) 2 अक्टूबर, 2016 को
(c) 8 नवम्बर, 2016 को
(d) 30 दिसम्बर, 2016 को
उत्तर:
(c) 8 नवम्बर, 2016 को

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निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
भारतीय रिज़र्व बैंक ने सन् 1934/1935 में केन्द्रीय बैंक के रूप में कार्य करना आरम्भ कर दिया था। (2009)
उत्तर:
सन् 1935 में

प्रश्न 2.
भारतीय रिज़र्व बैंक के प्रतिनिधि बैंक का नाम लिखिए। (2014, 12)
उत्तर:
भारतीय स्टेट बैंक

प्रश्न 3.
सेन्ट्रल बैंक ऑफ इण्डिया भारत का केन्द्रीय बैंक है/नहीं है। (2010)
उत्तर:
नहीं है

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प्रश्न 4.
भारत में नोट निर्गमन का कार्य भारतीय रिज़र्व बैंक/स्टेट बैंक करता है। (2008, 07)
उत्तर:
भारतीय रिज़र्व बैंक

प्रश्न 5.
बैंकों के बैंकर का नाम लिखिए। (2013)
उत्तर:
भारतीय रिज़र्व बैंक

प्रश्न 6.
एक रुपये का नोट भारतीय रिज़र्व बैंक/केन्द्रीय सरकार निर्गमित . करता/करती है। (2011, 09, 08)
उत्तर:
केन्द्रीय सरकार (UPBoardSolutions.com) निर्गमित करती है।

प्रश्न 7.
क्या सभी नोटों का निर्गमन भारतीय रिज़र्व बैंक करता है? (2017)
उत्तर:
नहीं

प्रश्न 8.
रिज़र्व बैंक में कोई भी व्यक्ति अपना खाता खोल सकता है/नहीं खोल – सकता है। (2008, 07)
उत्तर:
नहीं खोल सकता है।

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प्रश्न 9.
भारतीय रिज़र्व बैंक के वर्तमान गवर्नर का नाम लिखिए। (2016)
उत्तर:
उर्जित पटेल

प्रश्न 10.
भारत के वर्तमान वित्तमंत्री का नाम लिखिए। (2018)
उत्तर:
अरुण जेटली

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1.
भारत के केन्द्रीय बैंक और केन्द्रीय बैंक के प्रतिनिधि बैंक के नामों को लिखिए। (2013)
उत्तर:
भारत के केन्द्रीय बैंक का नाम ‘भारतीय (UPBoardSolutions.com) रिज़र्व बैंक’ है। केन्द्रीय बैंक के प्रतिनिधि बैंक का नाम भारतीय स्टेट बैंक’ है।

प्रश्न 2.
भारतीय रिज़र्व बैंक के किन्हीं चार कार्यों को लिखिए। (2016,12)
उत्तर:
भारतीय रिज़र्व बैंक के चार कार्य निम्नलिखित हैं

  1. यह न्यूनतम कोष पद्धति के अन्तर्गत नोटों का निर्गमन करता है।
  2. यह शीर्ष बैंक होने के कारण बैंकों का बैंक के रूप में कार्य करता है।
  3. साख का नियमन व नियन्त्रण करता है।
  4. समाशोधन-गृहों का संचालन करता है।

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प्रश्न 3.
बैंक दर नीति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
बैंक दर, वह दर होती है, जिस पर देश का केन्द्रीय बैंक प्रथम श्रेणी प्रतिभूतियों तथा अनुमोदित ऋणपत्रों की जमानत के आधार पर व्यापारिक बैंकों को ऋण प्रदान करता है। यह बैंक अपनी बैंक दर नीति के द्वारा साख-मुद्रा की मात्रा व उसकी लागत पर प्रभाव डालकर देश में साख-मुद्रा का नियमन करता है।

प्रश्न 4.
वैधानिक तरलता अनुपात में परिवर्तन द्वारा भारतीय रिज़र्व बैंक किस प्रकार साख नियन्त्रण करता है?
उत्तर:
भारत के प्रत्येक अनुसूचित बैंक को अपनी कुल सम्पत्ति (UPBoardSolutions.com) का 20% भाग तरल कोष में रखना पड़ता है। भारतीय रिज़र्व बैंक इस तरलता कोषानुपात में वृद्धि करके साख नियन्त्रण करता है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1.
भारतीय रिज़र्व बैंक के पाँच प्रमुख कार्यों का वर्णन कीजिए। (2009)
अथवा
देश के केन्द्रीय बैंक के रूप में भारतीय रिज़र्व बैंक के कार्यों का वर्णन कीजिए। (2011,07,06)
उत्तर:
भारतीय रिज़र्व बैंक (केन्द्रीय बैंक) से आशय भारतीय रिज़र्व बैंक देश का सर्वोच्च बैंक है। यह देश की बैंकिंग व्यवस्था पर नियन्त्रण करता है। यह अन्य बैंकों का सहयोगी तथा पथ-प्रदर्शक होता है। यह देश की साख और मुद्रानीति का संचालक भी होता है। कैण्ट के अनुसार, “केन्द्रीय बैंक वह संस्था है, जिसे सामान्य जनहित में मुद्रा की मात्रा में विस्तार तथा संकुचन की व्यवस्था करने का दायित्व सौंपा गया है।”

बैंक ऑफ इण्टरनेशनल सैटलमेण्ट के अनुसार, “केन्द्रीय बैंक वह बैंक है, जो देश में चलन तथा साख-मुद्रा की मात्रा का नियमन करे।” लिप्सी के अनुसार, “केन्द्रीय बैंक वह बैंक है, जिसका मुख्य कार्य अर्थव्यवस्था में मुद्रा तथा साख के प्रवाह को नियमित करना है।” शों के अनुसार, “केन्द्रीय बैंक देश की मुद्रा का नियन्त्रण करने वाला बैंक है।” भारतीय रिज़र्व बैंक के कार्य भारतीय रिजर्व बैंक के कार्यों को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा गया है

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I. केन्द्रीय बैंकिंग सम्बन्धी कार्य

भारतीय रिज़र्व बैंक के केन्द्रीय बैंकिंग सम्बन्धी कार्य निम्नलिखित हैं-

  1. नोटों का निर्गमन भारतीय रिज़र्व बैंक को नोट निर्गमन का एकाधिकार प्राप्त है। एक रुपये के नोट को छोड़कर बाकी सभी प्रकार की पत्र-मुद्रा भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा ही निर्गमित की जाती है।
  2. बैंकों का बैंक शीर्ष बैंक होने के नाते भारतीय रिज़र्व बैंक बैंकों का बैंक के रूप में कार्य करता है। यह सभी अनुसूचित एवं गैर-अनुसूचित बैंकों पर नियन्त्रण भी रखता है।
  3. साख नियन्त्रण देश के आर्थिक विकास को बढ़ाने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक व्यापारिक बैंकों की साख नीति पर नियन्त्रण करता है।
  4. समाशोधन कार्य बैंकों के आपसी लेन-देन का (UPBoardSolutions.com) निपटारा करने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा समाशोधन-गृहों का संचालन किया जाता है। देश के प्रमुख 14 केन्द्रों पर भारतीय रिज़र्व बैंक स्वयं समाशोधन-गृहों का प्रबन्ध देखता है।
  5. सरकार का बैंकर, अभिकर्ता एवं सलाहकार भारतीय रिज़र्व बैंक केन्द्रीय तथा राज्य सरकारों के बैंकर, अभिकर्ता तथा वित्तीय सलाहकार के रूप में कार्य करता है। यह बैंक केन्द्रीय तथा राज्य सरकार की ओर से भुगतान स्वीकार करता है।
  6. विदेशी विनिमय नियन्त्रण भारतीय रिज़र्व बैंक देश के बहुमूल्य धातु कोषोंतथा विदेशी विनिमय कोषों को अपने पास सुरक्षित रखता है।
  7. बैंकिंग प्रणाली का नियमन भारतीय रिज़र्व बैंक का यह कर्त्तव्य होता है कि वह देश की बैंकिंग प्रणाली का नियमन इस तरह करे, जिससे कि लोगों का बैंकिंग में विश्वास बना रहे।
  8. आँकड़ों का संकलन व प्रकाशन यह बैंक मुद्रा, साख, अधिकोषण, विदेशी विनिमय और कृषि सम्बन्धी आँकड़ों को एकत्रित करके उनका प्रकाशन भी करता है।

II. सामान्य बैंकिंग सम्बन्धी कार्य

भारतीय रिज़र्व बैंक के सामान्य बैंकिंग सम्बन्धी कार्य निम्नलिखित हैं-

  1. जमाएँ प्राप्त करना भारतीय रिज़र्व बैंक केन्द्रीय व राज्य सरकार, गैर-सरकारी संस्थाओं, आदि से जमाएँ स्वीकार करता है।
  2. ऋण देना भारतीय रिज़र्व बैंक व्यापारिक बैंकों, सहकारी बैंकों तथा राज्य व केन्द्रीय सरकार को अल्पावधि के लिए ऋण प्रदान करता है।
  3. कृषि बिलों का क्रय-विक्रय भारतीय रिज़र्व बैंक 15 माह तक की अवधि के कृषि बिलों का क्रय-विक्रय व उनकी पुनर्कटौती आदि का कार्य करता है।
  4. विदेशी प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय भारतीय रिज़र्व बैंक विदेशी प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय भी करता है।
  5. विनिमय बिलों का क्रय-विक्रय भारतीय रिज़र्व बैंक व्यापारिक बिलों का क्रय-विक्रय व उनकी कटौती का कार्य करता है, लेकिन उनकी परिपक्वता अवधि 90 दिन से कम होनी चाहिए।
  6. अल्पावधि ऋण प्राप्त करना भारतीय रिज़र्व बैंक किसी देश (UPBoardSolutions.com) के बैंक या विदेशी बैंक से 30 दिन के लिए ऋण ले सकता है।
  7. विपत्रों को भुनाना भारतीय रिज़र्व बैंक भारत में लिखे गए व्यापारिक विपत्रों को भुनाने का कार्य भी करता है।

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प्रश्न 2.
भारतीय रिज़र्व बैंक के वर्जित कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारतीय रिज़र्व बैंक के वर्जित कार्य भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम की धारा 18 के अनुसार, भारतीय रिज़र्व बैंक निम्नलिखित कार्य नहीं कर सकता है

  1. व्यापार या व्यवसाय पर रोक भारतीय रिज़र्व बैंक किसी प्रकार का व्यापार या व्यवसाय नहीं कर सकता है।
  2. जमाओं पर ब्याज न देना यह अपने कोष में जमा राशि पर ब्याज नहीं देता है।
  3. सावधि बिलों पर प्रतिबन्ध भारतीय रिज़र्व बैंक सावधि बिल नहीं लिख सकता है और न ही उन्हें भुना सकता है।
  4. अंशों के क्रय व उनकी जमानत पर ऋण देने पर रोक यह न तो किसी कम्पनी के अंशों को क्रय कर सकता है और न ही अंशों की जमानत पर ऋण दे सकता है।
  5. प्रतिभूति रहित ऋणों पर प्रतिबन्ध भारतीय रिज़र्व बैंक प्रतिभूति रहित ऋण नहीं दे सकती है।

प्रश्न 3.
भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा साख नियन्त्रण किस प्रकार किया जाता है? समझाइए।
उत्तर:
रिज़र्व बैंक साख नियन्त्रण के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाता है-

1. बैंक दर नीति बैंक दर, वह देर होती है, जिस पर देश का केन्द्रीय बैंक प्रथम श्रेणी प्रतिभूतियों तथा अनुमोदित ऋणपत्रों की जमानत के आधार पर व्यापारिक बैंकों को ऋण प्रदान करता है। यह बैंक अपनी बैंक दर नीति के द्वारी साख-मुद्रा की मात्रा व उसकी लागत पर प्रभाव डालकर देश में साख-मुद्रा का नियमन करता है।

2. खुले बाजार की क्रियाएँ खुले बाजार की क्रियाओं से तात्पर्य केन्द्रीय बैंक द्वारा साख नियन्त्रण के उद्देश्य से सरकारी प्रतिभूतियों के प्रथम श्रेणी के बिलों व प्रतिज्ञा-पत्रों के क्रय-विक्रय से होता है।

3. प्रत्यक्ष साख नियन्त्रण की नीति भारतीय रिज़र्व बैंक किसी भी बैंक के बैंकिंग व्यवसाय को रोक सकता है। रिज़र्व बैंक को बैंकों की साख सम्बन्धी नीति को निर्धारित करने का भी अधिकार होता है।
4. नकद कोषानुपात में परिवर्तन भारतीय रिज़र्व बैंक (UPBoardSolutions.com) अनुसूचित बैंकों के नकद कोष के प्रतिशत को बढ़ाकर भी साख नियन्त्रण कर सकता है।

5. उपभोक्ता साख नियन्त्रण भारतीय रिज़र्व बैंक उपभोक्ताओं को प्रदान की जाने वाली साख पर नियन्त्रण करने के उद्देश्य से साख की मात्रा व प्रयोग में कमी या वृद्धि करके साख नियन्त्रण कर सकता है।

6. वैधानिक तरलता अनुपात में परिवर्तन भारत के प्रत्येक अनुसूचित बैंक को अपनी कुल सम्पत्ति का 20% भाग तरल कोष में रखना पड़ता है। भारतीय रिज़र्व बैंक इस तरलता कोषानुपात में वृद्धि करके साख नियन्त्रण करता है।

7. साख की राशनिंग साखे नियन्त्रण की इस विधि के अन्तर्गत भारतीय रिज़र्व बैंक वाणिज्य बैंक द्वारा दी जाने वाली कुल साख को विभिन्न उद्योगों, क्षेत्रों एवं व्यवसायों के बीच राशनिंग (वितरण) कर देता है।
8. प्रत्यक्ष कार्यवाही बैंकों द्वारा भारतीय रिज़र्व बैंक की साख नियन्त्रण की सलाह न मानने पर भारतीय रिज़र्व बैंक को प्रत्यक्ष कार्यवाही करने का अधिकार होता है।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (8 अंक)

प्रश्न 1.
भारतीय रिज़र्व बैंक के कार्यों का वर्णन कीजिए। (2018, 16)
अथवा
भारतीय रिज़र्व बैंक के प्रमुख कार्यों का संक्षेप में वर्णन कीजिए। (2014, 12, 09, 08, 07, 06)
अथवा
केन्द्रीय बैंक की परिभाषा दीजिए। भारत के केन्द्रीय बैंक के कार्यों का वर्णन कीजिए। (2010)
उत्तर:
भारतीय रिज़र्व बैंक (केन्द्रीय बैंक) से आशय भारतीय रिज़र्व बैंक देश का सर्वोच्च बैंक है। यह देश की बैंकिंग व्यवस्था पर नियन्त्रण करता है। यह अन्य बैंकों का सहयोगी तथा पथ-प्रदर्शक होता है। यह देश की साख और मुद्रानीति का संचालक भी होता है। कैण्ट के अनुसार, “केन्द्रीय बैंक वह संस्था है, जिसे सामान्य जनहित में मुद्रा की मात्रा में विस्तार तथा संकुचन की व्यवस्था करने का दायित्व सौंपा गया है।”

बैंक ऑफ इण्टरनेशनल सैटलमेण्ट के अनुसार, “केन्द्रीय बैंक वह बैंक है, जो देश में चलन तथा साख-मुद्रा की मात्रा का नियमन करे।” लिप्सी के अनुसार, “केन्द्रीय बैंक वह बैंक है, जिसका मुख्य कार्य अर्थव्यवस्था में मुद्रा तथा साख के प्रवाह को नियमित करना है। (UPBoardSolutions.com)” शों के अनुसार, “केन्द्रीय बैंक देश की मुद्रा का नियन्त्रण करने वाला बैंक है।” भारतीय रिज़र्व बैंक के कार्य भारतीय रिजर्व बैंक के कार्यों को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा गया है

I. केन्द्रीय बैंकिंग सम्बन्धी कार्य

भारतीय रिज़र्व बैंक के केन्द्रीय बैंकिंग सम्बन्धी कार्य निम्नलिखित हैं-

  1. नोटों का निर्गमन भारतीय रिज़र्व बैंक को नोट निर्गमन का एकाधिकार प्राप्त है। एक रुपये के नोट को छोड़कर बाकी सभी प्रकार की पत्र-मुद्रा भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा ही निर्गमित की जाती है।
  2. बैंकों का बैंक शीर्ष बैंक होने के नाते भारतीय रिज़र्व बैंक बैंकों का बैंक के रूप में कार्य करता है। यह सभी अनुसूचित एवं गैर-अनुसूचित बैंकों पर नियन्त्रण भी रखता है।
  3. साख नियन्त्रण देश के आर्थिक विकास को बढ़ाने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक व्यापारिक बैंकों की साख नीति पर नियन्त्रण करता है।
  4. समाशोधन कार्य बैंकों के आपसी लेन-देन का निपटारा करने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा समाशोधन-गृहों का संचालन किया जाता है। देश के प्रमुख 14 केन्द्रों पर भारतीय रिज़र्व बैंक स्वयं समाशोधन-गृहों का प्रबन्ध देखता है।
  5. सरकार का बैंकर, अभिकर्ता एवं सलाहकार भारतीय रिज़र्व बैंक केन्द्रीय तथा राज्य सरकारों के बैंकर, अभिकर्ता तथा वित्तीय सलाहकार के रूप में कार्य करता है। यह बैंक केन्द्रीय तथा राज्य सरकार की ओर से भुगतान स्वीकार करता है।
  6. विदेशी विनिमय नियन्त्रण भारतीय रिज़र्व बैंक देश के बहुमूल्य धातु कोषोंतथा विदेशी विनिमय कोषों को अपने पास सुरक्षित रखता है।
  7. बैंकिंग प्रणाली का नियमन भारतीय रिज़र्व बैंक का यह कर्त्तव्य होता है कि वह देश की बैंकिंग प्रणाली का नियमन इस तरह करे, जिससे कि लोगों का बैंकिंग में विश्वास बना रहे।
  8. आँकड़ों का संकलन व प्रकाशन यह बैंक मुद्रा, साख, अधिकोषण, (UPBoardSolutions.com) विदेशी विनिमय और कृषि सम्बन्धी आँकड़ों को एकत्रित करके उनका प्रकाशन भी करता है।

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II. सामान्य बैंकिंग सम्बन्धी कार्य

भारतीय रिज़र्व बैंक के सामान्य बैंकिंग सम्बन्धी कार्य निम्नलिखित हैं-

  1. जमाएँ प्राप्त करना भारतीय रिज़र्व बैंक केन्द्रीय व राज्य सरकार, गैर-सरकारी संस्थाओं, आदि से जमाएँ स्वीकार करता है।
  2. ऋण देना भारतीय रिज़र्व बैंक व्यापारिक बैंकों, सहकारी बैंकों तथा राज्य व केन्द्रीय सरकार को अल्पावधि के लिए ऋण प्रदान करता है।
  3. कृषि बिलों का क्रय-विक्रय भारतीय रिज़र्व बैंक 15 माह तक की अवधि के कृषि बिलों का क्रय-विक्रय व उनकी पुनर्कटौती आदि का कार्य करता है।
  4. विदेशी प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय भारतीय रिज़र्व बैंक विदेशी प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय भी करता है।
  5. विनिमय बिलों का क्रय-विक्रय भारतीय रिज़र्व बैंक व्यापारिक बिलों का क्रय-विक्रय व उनकी कटौती का कार्य करता है, लेकिन उनकी परिपक्वता अवधि 90 दिन से कम होनी चाहिए।
  6. अल्पावधि ऋण प्राप्त करना भारतीय रिज़र्व बैंक किसी (UPBoardSolutions.com) देश के बैंक या विदेशी बैंक से 30 दिन के लिए ऋण ले सकता है।
  7. विपत्रों को भुनाना भारतीय रिज़र्व बैंक भारत में लिखे गए व्यापारिक विपत्रों को भुनाने का कार्य भी करता है।

प्रश्न 2.
रिज़र्व बैंक की स्थापना के क्या उद्देश्य थे? इसकी सफलताओं व असफलताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रिज़र्व बैंक की स्थापना के उद्देश्य भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना के उद्देश्य निम्नलिखित हैं

  1. कृषि साख की समुचित व्यवस्था करना।
  2. देश में सुव्यवस्थित एवं सन्तुलित रूप से बैंकिंग का विकास करना।
  3. अन्तर्राष्ट्रीय मौद्रिक सहयोग स्थापित करना।
  4. देश में मुद्रा तथा साख का समुचित प्रबन्ध करना।
  5. सार्वजनिक ऋणों की व्यवस्था करना।
  6. सुसंगठित मुद्रा बाजार का विकास करना।
  7. रुपये के आन्तरिक व बाह्य मूल्य में स्थिरता लाना।

भारतीय रिज़र्व बैंक की सफलताएँ या महत्त्व भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना से लेकर अब तक यह देश के केन्द्रीय बैंक के रूप में कार्य कर रहा है। देश की बैंकिंग व्यवस्था को सदढ़ करने, विकास के लिए वित्त उपलब्ध करवाने और देश की मौद्रिक एवं साख नीति का सफल संचालन करने में भारतीय रिज़र्व बैंक ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

भारतीय रिज़र्व बैंक की प्रमुख सफलताएँ निम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा स्पष्ट की जा सकती हैं-

  1. पत्र-मुद्रा निर्गमन पद्धति हमारे देश में भारतीय रिज़र्व बैंक को नोट निर्गमन का अधिकार है। यह न्यूनतम कोष निधि प्रणाली के आधार पर पत्र-मुद्रा का उचित रूप से निर्गमन करता है। रिज़र्व बैंक ने नोट-निर्गमन की उचित नीति का अनुसरण कर सफलता प्राप्त की है। (2010)
  2. सरकारी बैंकर के रूप में भारतीय रिज़र्व बैंक प्रारम्भ से ही सरकारी (UPBoardSolutions.com) बैंक के रूप में कार्य कर रहा है। यह सरकार की सम्पूर्ण जमाएँ अपने पास रखता है। व समय-समय पर ऋण उपलब्ध करवाता है। इस आधार पर यह सरकारी बैंकर के रूप में सफल रहा है।
  3. सरकार के सलाहकार के रूप में भारतीय रिज़र्व बैंक सरकार को समय-समय पर मौद्रिक, वित्तीय एवं साख के मामलों में सलाह प्रदान करता है।
  4. कृषि वित्त व्यवस्था भारत कृषि-प्रधान देश है। अतः कृषि की वित्त व्यवस्था के लिए सरकार ने यह कार्य भारतीय रिज़र्व बैंक को सौंपा है। इसके लिए भारतीय रिज़र्व बैंक ने अलग से सन् 1982 में नाबार्ड बैंक की स्थापना की थी।
  5. धन हस्तान्तरण की सुविधा भारतीय रिज़र्व बैंक केन्द्र, राज्य व अर्द्ध-सरकारी संस्थाओं के धन का नि:शुल्क हस्तान्तरण भी करता है।
  6. समाशोधन-गृहों की स्थापना भारतीय रिज़र्व बैंक ने 900 केन्द्रों में समाशोधन-गृहों की स्थापना कर सफल संचालन किया है।
  7. साख नियन्त्रण नीति भारतीय रिज़र्व बैंक ने मौद्रिक स्थिरता को कायम करने के लिए साख नियन्त्रण की नीति अपनाई है, जिसमें वह सफल रहा है।
  8. आँकड़ों का प्रकाशन भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा रिज़र्व बैंक बुलेटिन में मुद्रा, मूल्य, वित्त, आदि से सम्बन्धित अनेक प्रकार के समंक प्रकाशित किए जाते हैं।
  9. रुपये का बाह्य मूल्य स्थिर रिज़र्व बैंक ने रुपये के बाह्य मूल्य को स्थिर रखने में भी सफलता प्राप्त की है।

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भारतीय रिज़र्व बैंक की असफलताएँ भारतीय रिज़र्व बैंक की असफलताएँ निम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा स्पष्ट की जा सकती हैं

  1. मुद्रा प्रसार को रोकने में असफल भारतीय रिज़र्व बैंक पर यह आरोप है। कि वह देश में मुद्रा प्रसार को रोकने में सफल नहीं हुआ है। इससे देश में वस्तुओं के मूल्यों में लगातार वृद्धि हो रही है।
  2. सुदृढ़ बैंकिंग व्यवस्था का अभाव भारतीय रिज़र्व बैंक अपने कार्यकाल में भारत की बैंकिंग प्रणाली को यथेष्ट सुदृढ़ता प्रदान नहीं कर सका है।
  3. विनिमय दर में अस्थिरता भारतीय रिज़र्व बैंक भारतीय रुपये का मूल्य स्थायी रखने में सफल नहीं हुआ है। इस प्रकार यह विनिमय दर को स्थिर रखने में भी असफल रहा है।
  4. ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाओं की कमी भारतीय रिज़र्व बैंक ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग शाखाओं के विस्तार में असफल रही है।
  5. विकसित बिल बाजार का अभाव भारतीय रिज़र्व बैंक देश में एक सुसंगठित, विकसित तथा विस्तृत बिल बाजार की स्थापना करने में पूर्ण रूप से सफल नहीं हुआ है।
  6. देशी बैंकरों पर नियन्त्रण का अभाव भारतीय रिज़र्व बैंक देशी बैंकरों पर अब तक भी नियन्त्रण नहीं कर सका है, जिससे आज भी मुद्रा बाजार की ब्याज दरों में एकरूपता नहीं पाई जाती है।
  7. विदेशी व्यापार में भारतीय बैंकों की उपेक्षा भारतीय बैंकों का भारत के (UPBoardSolutions.com) विदेशी व्यापार के वित्तीय प्रबन्ध में आज भी नगण्य स्थान है। यह बैंक आज भी भारतीय बैंकों को विदेशी व्यापार में उचित स्थान दिलाने में सफल नहीं हो पाया है।

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UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi समस्यापरक निबन्ध

UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi समस्यापरक निबन्ध are part of UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi समस्यापरक निबन्ध.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Samanya Hindi
Chapter Name समस्यापरक निबन्ध
Category UP Board Solutions

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भारत में जनसंख्या-वृद्धि की समस्या

सम्बद्ध शीर्षक

  • जनसंख्या-विस्फोट और निदान
  • जनसंख्या-वृद्धि: कारण और निवारण
  • बढ़ती जनसंख्य: एक गम्भीर समस्या
  • परिवार नियोजन
  • बढ़ती जनसंख्या बनी आर्थिक विकास की समस्या
  • जनसंख्या नियन्त्रण
  • बढ़ती जनसंख्य: रोजगार की समस्या

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आतंकवाद : समस्या एवं समाधान

सम्बद्ध शीर्षक

  • आतंकवाद के निराकरण के उपाय
  • आतंकवाद
  • आतंकवाद की विभीषिका
  • भारत में आतंकवाद की समस्या
  • आतंकवाद : एक समस्या
  • आतंकवाद : कारण और निवारण
  • आतंकवाद का समाधान
  • भारत में आतंकवाद के बढ़ते कदम
  • भारत में आतंकवाद की समस्या और समाधान

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पर्यावरण-प्रदूषण : समस्या और समाधान

सम्बद्ध शीर्षक

  • पर्यावरण और प्रदूषण
  • पर्यावरण का महत्त्व
  • बढ़ता प्रदूषण और उसके कारण
  • बढ़ता प्रदूषण और पर्यावरण
  • प्रदूषण के दुष्परिणाम
  • पर्यावरण संरक्षण का महत्त्व
  • असन्तुलित पर्यावरण : प्राकृतिक आपदाओं का कारण
  • विश्व परिदृश्य में पर्यावरण प्रदूषण
  • धरती की रक्षा : पर्यावरण सुरक्षा
  • पर्यावरण-प्रदूषण : कारण और निवारण
  • पर्यावरण-असन्तुलन

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भारत में बेरोजगारी की समस्या

सम्बद्ध शीर्षक

  • बेरोजगारी : समस्या और समाधान
  • शिक्षित बेरोजगारों की समस्या
  • बेरोजगारी की विकराल समस्या
  • बेरोजगारी की समस्या
  • बेरोजगारी दूर करने के उपाय
  • बेरोजगारी : एक अभिशाप
  • बढ़ती जनसंख्या : रोजगार की समस्या
  • बेरोजगारी : कारण एवं निवारण

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बेलगाम महँगाई

सम्बद्ध शीर्षक

  • महँगाई की समस्या और उसका समाधान
  • महँगाई : समस्या और समाधान
  • बढ़ती महँगाई : कारण और निदान
  • महँगाई की समस्या
  • महँगाई से परेशान : भारत का इंसान
  • महँगाई की समस्या.: कारण और निवारण

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1. प्रस्तावना,
  2. महँगाई के कारण
    (क) जनसंख्या में तीव्र वृद्धि;
    (ख) कृषि उत्पादन-व्यय में वृद्धि;
    (ग) कृत्रिम रूप से वस्तुओं की आपूर्ति में कमी;
    (घ) मुद्रा-प्रसार;
    (ङ) प्रशासन में शिथिलता;
    (च) घाटे का बजट,
    (छ) असंगठित उपभोक्ता;
    (ज) धन का असमान वितरण :
  3. महँगाई के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली कठिनाइयाँ,
  4. महँगाई को दूर करने के लिए सुझाव,
  5. उपसंहार

प्रस्तावना-भारत की आर्थिक समस्याओं के अन्तर्गत महँगाई की समस्या एक प्रमुख समस्या है। वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि का क्रम इतना तीव्र है कि जब आप किसी वस्तु को दोबारा खरीदने जाते हैं तो वस्तु का मूल्य पहले से अधिक बढ़ा हुआ होता है। | दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती इस महँगाई की मार का वास्तविक चित्रण प्रसिद्ध हास्य कवि काका हाथरसी की निम्नलिखित पंक्तियों में हुआ है

पाकिट में पीड़ा भरी कौन सुने फरियाद ?
यह महँगाई देखकर वे दिन आते याद॥
वे दिन आते याद, जेब में पैसे रखकर,
सौदा लाते थे बाजार से थैला भरकर॥
धक्का मारा युग ने मुद्रा की क्रेडिट ने,
थैले में रुपये हैं, सौदा है पाकिट में।

महँगाई के कारण-वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि अर्थात् महँगाई के बहुत से कारण हैं। इन कारणों में अधिकांश कारण आर्थिक हैं तथा कुछ कारण ऐसे भी हैं, जो सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था से सम्बन्धित हैं। इन कारणों का संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है
(क) जनसंख्या में तीव्र वृद्धि–भारत में जनसंख्या-विस्फोट ने वस्तुओं की कीमतों को बढ़ाने की दृष्टि से बहुत अधिक सहयोग दिया है। जितनी तेजी से जनसंख्या में वृद्धि हो रही है, उतनी तेजी से वस्तुओं का उत्पादन नहीं हो रहा है। इसका स्वाभाविक परिणाम यह हुआ है कि अधिकांश वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यों में निरन्तर वृद्धि हुई है।

(ख) कृषि उत्पादन-व्यय में वृद्धि-हमारा देश कृषि प्रधान है। यहाँ की अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। गत वर्षों से कृषि में प्रयुक्त होने वाले उपकरणों, उर्वरकों आदि के मूल्यों में बहुत अधिक वृद्धि हुई है; परिणामस्वरूप उत्पादित वस्तुओं के मूल्य में भी वृद्धि होती जा रही है। अधिकांश वस्तुओं के मूल्य प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से कृषि पदार्थों के मूल्यों से सम्बद्ध होते हैं। इस कारण जब कृषि-मूल्य में वृद्धि हो जाती है तो देश में अधिकांशतः वस्तुओं के मूल्य अवश्यमेव प्रभावित होते हैं।

(ग) कृत्रिम रूप से वस्तुओं की आपूर्ति में कमी-वस्तुओं का मूल्य माँग और पूर्ति पर आधारित होता है। जब बाजार में वस्तुओं की पूर्ति कम हो जाती है तो उनके मूल्य बढ़ जाते हैं। अधिक लाभ कमाने के उद्देश्य से भी व्यापारी वस्तुओं का कृत्रिम अभाव पैदा कर देते हैं, जिसके कारण महँगाई बढ़ जाती है।

(घ) मुद्रा-प्रसार-जैसे-जैसे देश में मुद्रा-प्रसार बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे ही महँगाई बढ़ती जाती है। तृतीय पंचवर्षीय योजना के समय से ही हमारे देश में मुद्रा-प्रसार की स्थिति रही है, परिणामतः वस्तुओं के मूल्य बढ़ते ही जा रहे हैं। कभी जो वस्तु एक रुपए में मिला करती थी उसके लिए अब लगभग सौ रुपए तक खर्च करने पड़ जाते हैं।

(ङ) प्रशासन में शिथिलता–सामान्यत: प्रशासन के स्वरूप पर ही देश की अर्थव्यवस्था निर्भर करती है। यदि प्रशासन शिथिल पड़ जाता हैं तो मूल्य बढ़ते जाते हैं, क्योंकि कमजोर शासन व्यापारी वर्ग पूर नियन्त्रण नहीं रख पाता। ऐसी स्थिति में वस्तुओं के मूल्यों में अनियन्त्रित और निरन्तर वृद्धि होती रहती है।

(च) घाटे का बजट-विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु सरकार को बहुत अधिक मात्रा में पूँजी की व्यवस्था करनी पड़ती है। पूँजी की व्यवस्था करने के लिए सरकार अन्य उपायों के अतिरिक्त घाटे की बजट प्रणाली को भी अपनाती है। घाटे की यह पूर्ति नये नोट छापकर की जाती है, परिणामत: देश में मुद्रा की पूर्ति आवश्यकता से अधिक हो जाती है। जब ये नोट बाजार में पहुंचते हैं तो वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि करते हैं।

(छ) असंगठित उपभोक्ता-वस्तुओं का क्रय करने वाला उपभोक्ता वर्ग प्रायः असंगठित होता है, जबकि विक्रेता या व्यापारिक संस्थाएँ अपना संगठन बना लेती हैं। ये संगठन इस बात का निर्णय करते हैं। कि वस्तुओं का मूल्य क्या रखा जाए और उन्हें कितनी मात्रा में बेचा जाए। जब सभी सदस्य इन नीतियों का पालन करते हैं तो वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि होने लगती है। वस्तुओं के मूल्यों में होने वाली इस वृद्धि से उपभोक्ताओं को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

(ज) धन का असमान वितरण-हमारे देश में धन का असमान वितरण महँगाई का मुख्य कारण है। जिनके पास पर्याप्त धन है, वे लोग अधिक पैसा देकर साधनों और सेवाओं को खरीद लेते हैं। व्यापारी धनवानों की इस प्रत्ति का लाभ उठाते हैं और महँगाई बढ़ती जाती है। वस्तुतः विभिन्न सामाजिक-आर्थिक विषमताओं एवं समाज में व्याप्त अशान्ति पूर्ण वातावरण का अन्त करने के लिए धन का समान वितरण होना आवश्यक है। कविवरै दिनकर के शब्दों में भी–

शान्ति नहीं तब तक, जब तक
सुख भाग न नर का सम हो,
नहीं किसी को बहुत अधिक हो ।
नहीं किसी को कम हो।

(3) महँगाई के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली कठिनाइयाँ-महँगाई नागरिकों के लिए अभिशाप स्वरूप है। हमारा देश एक गरीब देश है। यहाँ की अधिकांश जनसंख्या के आय के साधन सीमित हैं। इस कारण साधारण नागरिक और कमजोर वर्ग के व्यक्ति अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाते। बेरोजगारी इस कठिनाई को और भी अधिक जटिल बना देती है। व्यापारी अपनी वस्तुओं का कृत्रिम अभाव कर देते हैं। इसके कारण वस्तुओं के मूल्य में अनियन्त्रित वृद्धि हो जाती है। परिणामत: कम आय वाले व्यक्ति बहुत-सी वस्तुओं और सेवाओं से वंचित रह जाते हैं। महँगाई के बढ़ने से कालाबाजारी को प्रोत्साहन मिलता है। व्यापारी अधिक लाभ कमाने के लिए वस्तुओं को अपने गोदामों में छिपा देते हैं। महँगाई बढ़ने से देश की अर्थव्यवस्था कमजोर हो जाती है।

(4) महँगाई को दूर करने के लिए सुझाव–यदि महँगाई इसी दर से ही बढ़ती रही तो देश के आर्थिक विकास में बहुत-सी बाधाएँ उपस्थित हो जाएँगी। इससे अनेक प्रकार की सामाजिक बुराइयाँ भी जन्म लेंगी; अतः महँगाई के इस दानव को समाप्त करना परम आवश्यक है।

महँगाई को दूर करने के लिए सरकार को समयबद्ध कार्यक्रम बनाने होंगे। किसानों को सस्ते मूल्य पर खाद, बीज और उपकरण आदि उपलब्ध कराने होंगे, जिसमें कृषि उत्पादनों के मूल्य कम हो सकें। मुद्रा-प्रसार को रोकने के लिए घाटे के बजट की व्यवस्था समाप्त करनी होगी अथवा घाटे को पूरा करने के लिए नये नोट छपवाने की प्रणाली को बन्द करना होगा। जनसंख्या की वृद्धि को रोकने के लिए अनवरत प्रयास करने होंगे। सरकार को इस बात का भी प्रयास करना होगा कि शक्ति और साधन कुछ विशेष लोगों तक सीमित न रह जाएँ और धन का उचित रूप में बँटवारा हो सके। सहकारी वितरण संस्थाएँ इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। इन सभी के लिए प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त और कर्मचारियों को पूरी निष्ठा तथा कर्तव्यपरायणता के साथ कार्य करना होगा।

(5) उपसंहार-महँगाई की वृद्धि के कारण हमारी अर्थव्यवस्था में अनेक प्रकार की जटिलताएँ उत्पन्न हो गयी हैं। घाटे की अर्थव्यवस्था ने इस कठिनाई को और अधिक बढ़ा दिया है। यद्यपि सरकार की ओर से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में किये जाने वाले प्रयासों द्वारा महँगाई की इस प्रवृत्ति को रोकने का 3 निरन्तर प्रयास किया जा रहा है, तथापि इस दिशा में अभी तक पर्याप्त सफलता नहीं मिल सकी है।

यदि समय रहते महँगाई के इस दानव को वश में नहीं किया गया तो हमारी अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी और हमारी प्रगति के समस्त मैसर्ग बन्द हो जाएँगे, भ्रष्टाचार अपनी जड़े जमा लेगा और नैतिक मूल्य पूर्णतया समाप्त हो जाएँगे।

गंगा प्रदूषण

सम्बद्ध शीर्षक

  • जल-प्रदूषण
  • देश की भलाई : गंगा की सफाई

रूपरेखा

  1. प्रस्तावना,
  2. गंगा-जल के प्रदूषण के प्रमुख कारण-औद्योगिक कचरा व रसायन तथा मृतक एवं उनकी अस्थियों का विसर्जन,
  3. गंगा प्रदूषण दूर करने के उपाय,
  4. उपसंहार

प्रस्तावना-देवनदी गंगा ने जहाँ जीवनदायिनी के रूप में भारत को धन-धान्य से सम्पन्न बनाया है। वहीं माता के रूप में इसकी पावन धारा ने देशवासियों के हृदयों में मधुरता तथा सरसता का संचार किया है। गंगा मात्र एक नदी नहीं, वरन् भारतीय जन-मानस के साथ-साथ समूची भारतीयता की आस्था का जीवंत प्रतीक है। हिमालय की गोद में पहाड़ी घाटियों से नीचे कल्लोल करते हुए मैदानों की राहों पर प्रवाहित होने : वाली गंगा पवित्र तो है ही, वह मोक्षदायिनी के रूप में भी भारतीय भावनाओं में समाई है। भारतीय सभ्यतासंस्कृति का विकास गंगा-यमुना जैसी अनेकानेक पवित्र नदियों के आसपास ही हुआ है। गंगा-जल वर्षों तक बोतलों, डिब्बों आदि में बन्द रहने पर भी खराब नहीं होता था। आज वही भारतीयता की मातृवत पूज्या गंगा प्रदूषित होकर गन्दे नाले जैसी बनती जा रही है, जोकि वैज्ञानिक परीक्षणगत एवं अनुभवसिद्ध तथ्य है। गंगा के बारे में कहा गया है:

नदी हमारी ही है गंगा, प्लावित करती मधुरस-धारा,
बहती है क्या कहीं और भी, ऐसी पावन कल-कल धारा।

गंगा-जल के प्रदूषण के प्रमुख कारण–पतितपावनी गंगा के जल के प्रदूषित होने के बुनियादी कारणों में से एक कारण तो यह है कि प्रायः सभी प्रमुख नगर गंगा अथवा अन्य नदियों के तट पर और उसके आस-पास बसे हुए हैं। उन नगरों में आबादी का दबाव बहुत बढ़ गया है। वहाँ से मूल-मूत्र और गन्दे पानी की निकासी की कोई सुचारु व्यवस्था न होने के कारण इधर-उधर बनाये गये छोटे-बड़े सभी गन्दे नालों के माध्यम से बहकर वह गंगा या अन्य नदियों में आ मिलता है। परिणामस्वरूप कभी खराब न होने वाला गंगाजल भी आज बुरी तरह से प्रदूषित होकर रह गया है।

औद्योगिक कचरा व रसायन-वाराणसी, कोलकाता, कानपुर आदि न जाने कितने औद्योगिक नगर गंगा के तट पर ही बसे हैं। यहाँ लगे छोटे-बड़े कारखानों से बहने वाला रासायनिक दृष्टि से प्रदूषित पानी, कचरा आदि भी गन्दे नालों तथा अन्य मार्गों से आकर गंगा में ही विसर्जित होता है। इस प्रकार के तत्त्वों ने जैसे वातावरण को प्रदूषित कर रखा है, वैसे ही गंगाजल को भी बुरी तरह प्रदूषित कर दिया है।

मृतक एवं उनकी अस्थियों का विसर्जन–वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि सदियों से आध्यात्मिक भावनाओं से अनुप्राणित होकर गंगा की धारा में मृतकों की अस्थियाँ एवं अवशिष्ट राख तो बहाई जही रही है, अनेक लावारिस और बच्चों के शव भी बहा दिये जाते हैं। बाढ़ आदि के समय मरे पशु भी धारा में आ मिलते हैं। इन सबने भी गंगा-जल-प्रदूषण की स्थितियाँ पैदा कर दी हैं। गंगा के प्रवाह स्थल और आसपास से वनों का निरन्तर कटाव, वनस्पतियों, औषधीय तत्त्वों का विनाश भी प्रदूषण का एक बहुत बड़ा कारण है। गंगा-जल को प्रदूषित करने में न्यूनाधिक इन सभी का योगदान है।

गंगा प्रदूषण दूर करने के उपाय–विगत वर्षों में गंगा-जल का प्रदूषण समाप्त करने के लिए एक योजना बनाई गई थी। योजना के अन्तर्गत दो कार्य मुख्य रूप से किए जाने का प्रावधान किया गया था। एक तो यह कि जो गन्दे नाले गंगा में आकर गिरते हैं या तो उनकी दिशा मोड़ दी जाए या फिर उनमें जलशोधन करने वाले संयन्त्र लगाकर जल को शुद्ध साफ कर गंगा में गिरने दिया जाए। शोधन से प्राप्त मलबा बड़ी उपयोगी खाद का काम दे सकता है। दूसरा यह कि कल-कारखानों में ऐसे संयन्त्र लगाए जाएँ जो उस जल का शोधन कर सकें तथा शेष कचरे को भूमि के भीतर दफन कर दिया जाए। शायद ऐसा कुछ करने का एक सीमा तक प्रयास भी किया गया, पर काम बहुत आगे नहीं बढ़ सका, जबकि गंगा के साथ जुड़ी. भारतीयता का ध्यान रख इसे पूर्ण करना बहुत आवश्यक है।

आधुनिक और वैज्ञानिक दृष्टि अर्पनाकर तथा अपने ही हित में गंगा-जल में शव बहाना बन्द किया जा सकता है। धारा के निकासंस्थल के आसपास वृक्षों, वनस्पतियों आदि का केटाव कठोरता से प्रतिबंधित कर कटे स्थान पर उनका पुनर्विकास कर पाना आज कोई कठिन बात नहीं रह गई है। अन्य ऐसे कारक तत्त्वों का भी थोड़ा प्रयास करके निराकॅरण किया जा सकता है, जो गंगा-जल को प्रदूषित कर रहे हैं। भारत सरकार भी जल-प्रदूषण की समस्यों के प्रति जागरूक है और इसने सन् 1974 में ‘जल-प्रदूषण निवारण अधिनियम’ भी लागू किया है।

उपसंहार- आध्यात्मिक एवं भौतिक प्रकृति के अद्भुत संगम भारत के भूलोक को गौरव तथा प्रकृति का पुण्य स्थल कहा गया है। इस भारत-भूमि तथा भारतवासियों में नये जीवन तथा नयी शक्ति का संचार करने का श्रेय गंगा नदी को जाता है।

“गंगा आदि नदियों के किनारे भीड़ छवि पाने लगी।
मिलकर जल-ध्वनि में गल-ध्वनि अमृत बरसाने लगी।
– सस्वर इधर श्रुति-मंत्र लहरी, उधरे जल-लहरी कहाँ ।
तिस पर उमंगों की तरंगें, स्वर्ग में भी क्या रहा?”

गंगा को भारत की जीवन-रेखा तथा गंगा की कहानी को भारत की.कहानी माना जाता है। गंगा की महिमा अपार है। अत: गंगा की शुद्धता के लिए प्राथमिकता से प्रयास किये जाने चाहिए।

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UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi रस

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name रस
Number of Questions 2
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi रस

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  1. श्रृंगार (संयोग व विप्रलम्भ) रस,
  2. हास्य रस,
  3. करुण रस,
  4. वीर रस,
  5. रौद्र रस,
  6. भयानक रस,
  7. वीभत्स रस,
  8. अद्भुत रस तथा
  9. शान्त रस। कुछ विद्वान् ‘वात्सल्य रस’ और ‘भक्ति रस को भी उपरि-निर्दिष्ट नव रसों की श्रृंखला में ही मानते हैं।


[विशेष—माध्यमिक शिक्षा परिषद्, उ० प्र० द्वारा निर्धारित नवीनतम पाठ्यक्रम में आगे दिये जा रहे पाँच रस ही निर्धारित हैं।]

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उदाहरण 2-

कौन हो तुम वसन्त के दूत
विरस पतझड़ में अति सुकुमार ;

घन तिमिर में चपला की रेख
तपन में शीतल मन्द बयार ।( काव्यांजलि : श्रद्धा-मनु)

स्पष्टीकरण-इस प्रकरण में रति स्थायी भाव है। आलम्बन विभाव है–श्रद्धा (विषय) और मनु (आश्रय)। उद्दीपन विभाव है-एकान्त प्रदेश, श्रद्धा की कमनीयता, शीतल-मन्द पवन। हृदय में शान्ति का • मिलना अनुभाव है। आश्रय मनु के हर्ष, उत्सुकता आदि भाव संचारी भाव हैं। इस प्रकार अनुभावविभावादि से पुष्ट रति नामक स्थायी भाव संयोग श्रृंगार रस की दशा को प्राप्त हुआ है।।

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उदाहरण 2-

मेरे प्यारे नव जलद से कंज से नेत्र वाले
जाके आये न मधुबन से औ न भेजा सँदेशा।

मैं रो-रो के प्रिय-विरह से बावली हो रही हूँ।
जा के मेरी सब दुःख-कथा श्याम को तू सुना दे॥  ( काव्यांजलि : पवन-दूतिका)

स्पष्टीकरण-इस छन्द में विरहिण-राधा की विरह-दशा का वर्णन किया गया है। ‘रति’ स्थायी भाव है। आलम्बन विभाव हैं—राधा (आश्रय) और श्रीकृष्ण (विषय)। उद्दीपन विभाव हैं-मेघ जैसी शोभा और कमल जैसे नेत्रों का स्मरणं। श्रीकृष्ण के विरह में रुदन अनुभाव है। स्मृति, आवेग, उन्माद आदि संचारियों से पुष्ट श्रीकृष्ण से मिलने के अभाव में यहाँ वियोग श्रृंगार रस का परिपाक हुआ है।

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उदाहरण:2-

बिंध्य के वासी उदासी तपोब्रतधारी महा बिनु नारि दुखारे।
गौतमतीय तरी तुलसी, सो कथा सुनि भे मुनिबृन्द सुखारे॥

हैहैं सिला सब चंद्रमुखी परसे पदमंजुल-कंज तिहारे।
कीन्हीं भली रघुनायकजू करुना करि कानन को पगु धारे॥ ( हिन्दी : वन पथ पर)

[विशेष—पाठ्यक्रम में संकलित अंश में हास्य रस का उदाहरण दृष्टिगत नहीं होता। अतः 10वीं की पाठ्य-पुस्तक से उदाहरण दिया जा रहा है।

स्पष्टीकरण—इस छन्द में विन्ध्याचल के तपस्वियों की मनोदशा का वर्णन किया गया है। यहाँ ‘हास’ स्थायी भाव है। आलम्बन विभाव हैं–विन्ध्य के उदास तपस्वी (आश्रय) और राम (विषय)। उद्दीपन विभाव हैं—गौतम की स्त्री का उद्धार। मुनियों का कथा आदि सुनना अनुभाव हैं। हर्ष, उत्सुकता आदि संचारी भावों से पुष्ट प्रस्तुत छन्द में हास्य रस का सुन्दर परिपाक हुआ है।

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उदाहरण 2-

क्यों छलक रहा दुःख मेरा
ऊषा की मृदु पलकों में
हाँ! उलझ रहा सुख मेरा
सन्ध्या की घन अलकों में । ( काव्यांजलि : आँसू)

स्पष्टीकरण-प्रस्तुत पद में कवि के अपनी प्रेयसी के विरह में रुदन का वर्णन किया गया है। इसमें कवि के हृदय का ‘शोक’ स्थायी भाव है। आलम्बन विभाव हैं—प्रेमी, यहाँ पर कवि (आश्रय) तथा प्रियतमा (विषय)। उद्दीपन विभाव हैं—अन्धकाररूपी केश-पाश तथा सन्ध्या। कवि के हृदय से नि:सृत उद्गार अनुभाव हैं। अश्रुरूपी प्रात:कालीन ओस की बूंदें संचारी भाव हैं। इन सबसे पुष्ट शोक नामक स्थायी भाव करुण रस की दशा को प्राप्त हुआ है।

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उदाहरण 2-

साजि चतुरंग सैन अंग, में उमंग धारि,
सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत है।
भूषन भनत नाद बिहद नगारन के,
नदी नद मद गैबरन के रलत है ॥( काव्यांजलि : शिवा-शौर्य)

स्पष्टीकरण-प्रस्तुत पद में शिवाजी की चतुरंगिणी सेना के प्रयाण का चित्रण है। इसमें ‘शिवाजी के हृदय का उत्साह’ स्थायी भाव है। ‘युद्ध को जीतने की इच्छा आलम्बन है। ‘नगाड़ों का बजना’ उद्दीपन है। ‘हाथियों के मद का बहना’ अनुभाव है तथा उग्रता’ संचारी भाव है। इन सबसे पुष्ट ‘उत्साह’ नामक स्थायी भाव वीर रस की दशा को प्राप्त हुआ है।

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उदाहरण 1

मन पछितैहै अवसर बीते ।
दुर्लभ देह पाई हरिपद भजु, करम वचन अरु होते ॥
अब नाथहिं अनुराग, जागु जड़-त्यागु दुरासा जीते ॥
बुझे न काम अगिनी तुलसी कहुँ बिषय भोग बहु धी ते ॥

स्पष्टीकरण–यहाँ तुलसी (या पाठक)–आश्रय हैं; संसार की असारता आलम्बन; अपना मनुष्य जन्म व्यर्थ होने की चिन्ता–उद्दीपन; मति-धृति आदि संचारी एवं वैराग्यपरक वचन–अनुभाव हैं। इनसे मिलकर शान्त रस की निष्पत्ति हुई है।

उदाहरण 2

अब लौं नसानी अब न नसैहौं ।
रामकृपा भवनिसा सिरानी, जागे फिर न डसैहौं ।

पायो नाम चारु चिंतामनि, उर कर तें न खसैहौं ।
स्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहौं ॥
परबस जानि हँस्यों इन इंद्रिन, निज बस छै न हसैहौं ।
मन-मधुकर पन करि तुलसी, रघुपति पद-कमल बसैहौं ॥ ( काव्यांजलिः विनयपत्रिका)

स्पष्टीकरण—प्रस्तुत पद में तुलसीदास जी की जगत् के प्रति विरक्ति और श्रीराम के प्रति अनुराग मुखर हुआ है। इस पद में संसार से पूर्ण विरक्ति अर्थात् ‘निर्वेद’ नामक स्थायी भाव है। आलम्बन विभाव हैं—तुलसीदास (अश्रय) तथा श्रीराम की भक्ति (विषय)। उद्दीपन विभाव हैं-श्रीराम की कृपा, सांसारिक असारता त इन्द्रियों द्वारा उपहास। स्वतन्त्र होना, राम के चरणों में रत होना, सांसारिक विषयों में पुनः निर्लिप्त न होना आदि से सम्बद्ध कथन अनुभाव हैं। निर्वेद, हर्ष, स्मृति आदि संचारी भाव हैं। इन सबसे पुष्ट ‘निर्वेद’ नामक स्थायी भाव शान्त रस की अवस्था को प्राप्त हुआ है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पद्यांशों में कौन-से रस हैं ? प्रत्येक का स्थायी भाव भी बताइए-
(क) साजि चतुरंग सैन अंग में उमंग धारि,
सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत हैं।
(ख) कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात |
भरे भौन मैं करत हैं, नैननु हीं स बात ।।
(ग) कौन हो तुम वसंत के दूत
‘विरस पतझड़ में अति सुकुमार;
घन तिमिर में चपला की रेख
तपन में शीतल मन्द बयार ?
(घ) आये होंगे यदि भरत कुमति-वश वन में,
तो मैंने यह संकल्प किया है मन में-
उनको इस शर का लक्ष चुनँगा क्षण में,
प्रतिषेध आपका भी न सुनँगा रण में ।
(ङ) सुख भोग खोजने आते सब, आये तुम करने सत्य खोज,
जग की मिट्टी के पुतले जन, तुम आत्मा के, मन के मनोज
जड़ता, हिंसा, स्पर्धा में भर, चेतना, अहिंसा, नम्र ओज,
पशुता का पंकज बना दिया, तुमने मानवता का सरोज ।
उत्तर:
(क) इसमें वीर रस है, जिसका स्थायी भाव उत्साह है।
(ख) इसमें संयोग श्रृंगार रस है, जिसका स्थायी भाव रति है।
(ग) इसमें संयोग श्रृंगार रसे है, जिसका स्थायी भाव रति है।
(घ) इसमें वीर रस है, जिसका स्थायी भाव उत्साह है।
(ङ) इसमें शान्त रस है, जिसका स्थायी भाव निर्वेद है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए–
(क) अपनी पाठ्य-पुस्तक से करुण रस की दो पंक्तियाँ लिखिए। यह भी स्पष्ट कीजिए कि आप इसे करुण रस की रचना क्यों मानते हैं ?
(ख) हास्य रस की निष्पत्ति कब होती है ? अपनी पाठ्य-पुस्तक से उदाहरण देकर समझाइए।
(ग) अपनी पाठ्य-पुस्तक से वीर रस को बतलाने के लिए किसी पद की दो पंक्तियाँ लिखिए और स्पष्ट कीजिए कि उसे वीर रस की रचना क्यों मानते हैं?
(घ) अपनी पाठ्य-पुस्तक से करुण रस का लक्षण लिखिए और उसका उदाहरण दीजिए।
(ङ) अपनी पाठ्य-पुस्तक से शान्त रस की दो पंक्तियाँ लिखिए और यह भी स्पष्ट कीजिए कि आप इसे शान्त रस की रचना क्यों मानते हैं ?
(च) वीर रस का लक्षण लिखिए और अपनी पाठ्य-पुस्तक के आधार पर उसका उदाहरण प्रस्तुत कीजिए।
(छ) विप्रलम्भ श्रृंगार अथवा शान्त रस का लक्षण लिखिए और एक उदाहरण दीजिए।
(ज) अपनी पाठ्य-पुस्तंक से वीर रस की दो पंक्तियाँ लिखिए। रस के आलम्बन और आश्रय की ओर भी संकेत कीजिए।
(झ) संयोग श्रृंगार अथवा वीर रस का लक्षण लिखिए और एक उदाहरण दीजिए।
(ञ) श्रृंगार और करुण में से किसी एक रस का लक्षण और उदाहरण लिखिए।
(ट) “कृरुण’ अथवा ‘वीर’ रस के लक्षण और उदाहरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
[संकेत इन सभी प्रश्नों के उत्तर के लिए इन रसों से सम्बन्धित सामग्री का अध्ययन ‘रस’ प्रकरण के अन्तर्गत प्रश्न 2 से करें]

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UP Board Solutions for Class 5 Maths गिनतारा Chapter 19 आँकड़े

UP Board Solutions for Class 5 Maths गिनतारा Chapter 19 आँकड़े

अभ्यास

प्रश्न 1.
एक विद्यालय के कक्षा 1 में 50 बच्चे, कक्षा 2 में 45 बच्चे, कक्षा 3 में 40 बच्चे, कक्षा 4 में 40 बच्चे और कक्षा 5 में 35 बच्चे हैं। इन्हें चित्र आरेख द्वारा दर्शाओ।
हल:
UP Board Solutions for Class 5 Maths गिनतारा Chapter 19 आँकड़े 1

प्रश्न 2.
किरन और अमरावती कक्षा 5 की छात्राएँ हैं। उनकी छमाही परीक्षा के 20 अंकों में विभिन्न विषयों के प्राप्तांक इस प्रकार है-
UP Board Solutions for Class 5 Maths गिनतारा Chapter 19 आँकड़े 2
आँकड़ों को स्तम्भ चित्रों द्वारा प्रदर्शित करो। दोनों के स्तम्भ चित्रों को एक ही आधार पर प्रत्येक विषय के लिए एक दूसरे से सटाकर बनाओ।
UP Board Solutions for Class 5 Maths गिनतारा Chapter 19 आँकड़े 3

प्रश्न 3.
छह प्राथमिक विद्यालयों के विद्यार्थियों की संख्या दण्ड चित्रों द्वारा प्रदर्शित की गई है। दण्ड चित्रों को देखकर प्रश्नों के उत्तर दो-
UP Board Solutions for Class 5 Maths गिनतारा Chapter 19 आँकड़े 4
(क) विद्यालय क्रमांक 2 में विद्यार्थियों की संख्या कितनी है?
हल:
210

(ख) विद्यालय क्रमांक 3 में विद्यार्थियों की संख्या कितनी है?
हल:
240

(ग) विद्यालय क्रमांक 5 के विद्यार्थियों की संख्या क्रमांक 4 के विद्यार्थियों की संख्या से कितनी कम है?
हल:
क्रमांक 4 के विद्यार्थियों की संख्या – क्रमांक 5 के विद्यार्थियों की संख्या = 310 – 230 = 80

(घ) विद्यालय क्रमांक 2 के विद्यार्थियों की संख्या क्रमांक 3 के विद्यार्थियों से कितनी कम है?
हल:
क्रमांक 3 के विद्यार्थियों की संख्या – क्रमांक 2 के विद्यार्थियों की संख्या = 240 – 210 = 30

(ड़) विद्यालय क्रमांक 1 और 6 को मिलाकर विद्यार्थियों की कुल संख्या कितनी है?
हल:
550

(च) किस विद्यालय में सबसे कम विद्यार्थी हैं?
हल:
क्रमांक 1 में सबसे कम विद्यार्थी हैं।

(छ) किस विद्यालय में सबसे अधिक विद्यार्थी हैं और कितने?
हल:
क्रमांक 6 में 380 विद्यार्थी हैं।

कितना सीखा-5

प्रश्न 1.
सरल करो (करके)-
हल:
(क) 8078 × 307 = 2479946
(ख) 2891 × 269 = 777679
(ग) 8490249 ÷ 679 = भागफल = 12504,शेषफल = 33
(घ) 9576081 + 77896 + 891279 = 10545256
(ड़) 9054000 – 7598796 = 1455204

प्रश्न 2.
बदलो (बदलकर)-
(क) 0.379 को भिन्न में = [latex]\frac{0 \cdot 379 \times 1000}{1000}=\frac{379}{1000}[/latex]
(ख) [latex]17 \frac{3}{9}[/latex] को दशमलव में = [latex]\frac{156}{9}[/latex] = 17.333
(ग) [latex]\frac{1}{7}[/latex] तथा 0.47 को % में = [latex]\frac{1}{7} \times \frac{100}{100}=\frac{100}{7} \%[/latex] = 14.28% तथा 0.47 × [latex]\frac{100}{100}=\frac{47}{100}[/latex] = 47%
(घ) 3.6 हेक्टोमीटर को मी में = 3.60 × 100 मीटर = 360 मीटर
(ड.) 157600 मिमी को किलोमीटर में = – [latex]\frac{157600}{1000000}[/latex] किमी = 0.157600 किमी
(च) 3 घंटे को मिनट में = 3 × 60 = 180 मिनट
(छ) 2.5 एयर को वर्ग मी में = 2.5 × 100 = 250 वर्ग मीटर
(ज) 5.4 वर्ग मी को वर्ग सेमी में = 5.4 × 10000 = 54000 वर्ग सेमी

प्रश्न 3.
जूते का एक डिब्बा लेकर इसकी लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई नापो। इसका परिमाप और आयतन ज्ञात करो।
नोट : विद्यार्थी स्वयं एक डिब्बा लेकर उसका परिमाप व आयतन ज्ञात करें।

प्रश्न 4.
एक लाख मतदाताओं में से 75500 मतदाताओं ने मतदान किया। कितने प्रतिशत मतदान हुआ?
हल:
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प्रश्न 5.
निम्नलिखित का आयतन ज्ञात करो –
(क) घन की एक भुजा 2.5 सेमी है।
हल:
घन की एक भुजा = 2.5 सेमी
घन का आयतन = 2.5 × 2.5 × 2.5 = 15.625 घन सेमी

(ख) घनाभ की लम्बाई 1.25 मी, चौड़ाई 0.75 मी तथा ऊँचाई 35 सेमी है।
हल:
घनाभ की लम्बाई = 1.25 मी, चौड़ाई = 0.75 मी, ऊँचाई = 35 सेमी = 0.35 मी
घनाभ का आयतन = 1.25 × 0.75 × 0.35 = 0.328125 घन मी = 3281.25 घन सेमी

प्रश्न 6.
पानी की एक टंकी 3 मीटर लम्बी, 2 मीटर चौड़ी तथा 1.5 मीटर गहरी है। बताओ उसमें कितना लीटर पानी आएगा, जबकि 1 घन मीटर = 1000 लीटर।
हल:
टंकी की लम्बाई = 3 मीटर, चौड़ाई = 2 मीटर तथा गहराई = 1.5 मीटर
टंकी का आयतन = 3 × 2 × 1.5 = 9 घन मीटर
चूँकि 1 घनमीटर में पानी आएगा = 1000 लीटर
इसलिए 9 घनमीटर में पानी आएगा = 1000 × 9 = 9000 ली

प्रश्न 7.
साबुन की 6 टिकिया 81 रुपए में मिलती है। ऐसी ही 27 टिकिया खरीदने के लिए कितने रुपए चाहिए?
हल:
∵ 6 टिकिया आती हैं = 81 रु० में
∴ 1 टिकिया आएगी = [latex]\frac{81}{6}[/latex] रु.
∴ 27 टिकिया आएँगी = [latex]\frac{81}{6}[/latex] × 27 = 364.50 रु.

प्रश्न 8.
विद्यालय की सभी कक्षाओं की एक माह की औसत उपस्थिति के प्रतिशत का विवरण दिया गया है। आँकड़ों को स्तम्भ चित्रों द्वारा प्रदर्शित करो-
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हल:
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प्रश्न 9.
वर्ग पहेली पूरा करो-
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हल:
वर्ग पहेली को पूरा करके-
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UP Board Solutions for Class 5 Maths Gintara

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 2 सत्य की जीत

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 2 सत्य की जीत part of UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 2 सत्य की जीत.

Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name सत्य की जीत
Number of Questions Solved 8
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi खण्डकाव्य Chapter 2 सत्य की जीत

कथावस्तु पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1.
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की किसी एक घटना का उल्लेख कीजिए जो आपको अच्छी लगी हो। (2018)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं का सारांश लिखिए। (2018)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथावस्तु/कथानक अपने शब्दों में ‘ लिखिए। (2018, 16)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य का कथानक संक्षेप में लिखिए। अथवा ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटना का उल्लेख कीजिए। (2017, 16)
अथवा
सत्य की जीत खण्डकाव्य की किसी प्रमुख घटना का परिचय दीजिए। (2018, 16)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य का कथानक/कथावस्तु संक्षेप में लिखिए। (2018, 14, 13, 12, 11, 10)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथावस्तु के आधार पर सिद्ध कीजिए कि जीत वहाँ होती है, जहाँ सत्य, धर्म और न्याय होता है।
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथा महाभारत के द्रौपदी के चीर-हरण की संक्षिप्त, किन्तु मार्मिक घटना पर आधारित है। सिद्ध कीजिए।
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं पर प्रकाश डालिए। (2014, 13, 12)
उत्तर:
प्रस्तुत खण्डकाव्य की कथा ‘महाभारत’ के द्रौपदी चीर-हरण की अत्यन्त संक्षिप्त, किन्तु मार्मिक घटना पर आधारित है। यह एक अत्यन्त लघु काव्य है, जिसमें कवि ने पुरातन आख्यान को वर्तमान सन्दर्भो में प्रस्तुत किया है। दुर्योधन पाण्डवों को यूतक्रीड़ा (जुआ) के लिए आमन्त्रित करता है और छल-प्रपंच से उनका सब कुछ छीन लेता है। युधिष्ठिर जुए में स्वयं को हार जाते हैं। अन्त में वह द्रौपदी को भी दांव पर लगा देते हैं और हार आते हैं। इस पर कौरव भरी सभा में द्रौपदी को वस्त्रहीन करके अपमानित करना चाहते हैं।

दुःशासन द्रौपदी के केश खींचते हुए उसे सभा में लाता है। द्रौपदी के लिए यह अपमान असह्य हो जाता है। वह सभा में प्रश्न उठाती है कि जो व्यक्ति स्वयं को हार गया है, उसे अपनी पत्नी को दाँव पर लगाने का क्या अधिकार है?

अतः मैं कौरवों द्वारा विजित नहीं हैं। दुःशासन उसका चीर-हरण करना चाहता है। उसके इस कुकर्म पर द्रौपदी अपने सम्पूर्ण आत्मबल के साथ सत्य का सहारा लेकर उसे ललकारती है और वस्त्र खींचने की चुनौती देती है।

अरे-ओ! दु:शासन निर्लज्ज!
देख तू नारी का भी क्रोध।
किसे कहते उसका अपमान
कराऊँगी मैं इसका बोध।।”

तब भयभीत दुःशासन दुर्योधन के आदेश पर भी उसके चीर-हरण का साहस नहीं कर पाता। दुर्योधन का छोटा भाई विकर्ण द्रौपदी का पक्ष लेता है। उसके समर्थन से अन्य सभासद भी दुर्योधन और दुःशासन की निन्दा करते हैं, क्योंकि वे सभी यह अनुभव करते हैं कि यदि आज पाण्डवों के प्रति होते हुए अन्याय को नहीं रोका गया, तो इसका परिणाम बहुत बुरा होगा। अन्ततः धृतराष्ट्र पाण्डवों के राज्य को लौटाकर उन्हें मुक्त करने की घोषणा करते हैं। इस खण्डकाव्य में कवि ने द्रौपदी के चीर हरण की घटना में श्रीकृष्ण द्वारा चीर बढ़ाए जाने की अलौकिकता को प्रस्तुत नहीं किया हैं। द्रौपदी का पक्ष सत्य, न्याय का पक्ष है। तात्पर्य यह है कि जिसके पास सत्य और न्याय का बल हो, असत्यरूपी दुःशासन उसका चीर-हरण नहीं कर सकता।

द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी जी ने इस कथा को अत्यधिक प्रभावी और युग के अनुकूल सृजित किया है और नारी के सम्मान की रक्षा करने के संकल्प को दोहराया है। इस प्रकार प्रस्तुत खण्डकाव्य की कथावस्तु अत्यन्त लघु रखी गई है। कथा का संगठन अत्यन्त कुशलता से किया गया हैं। इस प्रकार ‘सत्य की जीत को एक सफल ‘खण्ड काव्य’ कहना सर्वथा उचित होगा।

प्रश्न 2.
खण्डकाव्य की विशेषताओं के आधार पर सत्य जीत खण्डकाव्य की समीक्षा कीजिए। (2018)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की विशेषताएँ लिखिए। (2017)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की सामान्य विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2018, 17)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2017)
उत्तर:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की भावात्मक एवं कलात्मक विशेषताओं का विवरण इस प्रकार है। भावपक्षीय विशेषताएँ ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की भावपक्षीय विशेषताएँ इस प्रकार हैं।

  1. आधुनिक युग आधुनिक युग ‘नारी-जागरण’ का युग है। द्रौपदी के माध्यम से इस काव्य में पग-पग पर आज की जागृत नारी ही बोल रही है। यद्यपि इस खण्डकाव्य की कथा महाभारत की चीर-हरण घटना पर आधारित है, किन्तु कवि ने उसमें वर्तमान नारी की दशा को आरोपित किया है। साथ ही कुछ मौलिक परिवर्तन भी किए हैं। कवि का विचार है कि शक्ति का उपयोग युद्ध के लिए नहीं, अपितु शान्ति एवं विकास कार्यों के लिए होना चाहिए। जीवन में सत्य, न्याय, प्रेम, करुणा, क्षमा, सहानुभूति, सेवा आदि मूल्यों का विकास आवश्यक है।
  2. उदात्त आदर्शों का स्वर सम्पूर्ण भावात्मक क्षेत्रों से भारतीय नारियों के प्रति श्रद्धा, विनाशकारी आचरण एवं शस्त्रों के अंगीकरण का विरोध, प्रजातान्त्रिक आदशों तथा सत्य के आत्मबल की शक्ति का स्वर मुखरित होता है। इस खण्डकाव्य में द्रौपदी के चीर-हरण को प्रसंग बनाकर उदात्त आदशों की भावधारा प्रवाहित की गई है।
  3. रस योजना प्रस्तुत खण्डकाव्य में वीर एवं रौद्र रस की प्रधानता है। ओज गुण की प्रधानता भी दिखाई देती है। इस खण्डकाव्य का विषय एवं भाव नारी के शक्ति-रूप को चित्रित करना है। अत: उसके अनुरूप वीर एवं रौद्र रस की योजना की गई है।

कलापक्षीय विशेषताएँ ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कलापक्षीय विशेषताएँ निम्न प्रकार है।

1. भाषा-शैली प्रस्तुत खण्डकाव्य न घटना प्रधान है, न भाव प्रधान। यह एक विचारशील रचना है। इस कारण कवि ने इसे अत्यन्त सरल, प्रवाहपूर्ण और प्रसादगुण सम्पन्न खड़ी बोली हिन्दी में लिखा है। इसकी भाषा में न तो अलंकारों की प्रधानता है और न ही कृत्रिमता की।

सह सका भरी सभा के बीच नहीं वह अपना यों अपमान।
देख नर पर नारी का वार एकदम गरज उठी अभिमान।।”

इस काव्य की भाषा बड़ी ओजपूर्ण है। द्रौपदी इसकी प्रमुख स्त्री पात्र है। वह सिंहनी सी निक, दुर्गा सी तेजस्विनी और दीपशिखा सी आलोकमयी है। दूसरी ओर पुरुष पात्रों में दुःशासन प्रमुख है, उसमें पौरुष का अहं है और भौतिक शक्ति का दम्भ भी। अतः दोनों पात्रों के व्यक्तित्व एवं विचारों के अनुरूप ही इस काव्य की भाषा को अत्यन्त वेगपूर्ण एवं ओजस्वी रूप प्रदान किया गया है।

2. संवाद योजना एवं नाटकीयता ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने कथोपकथनों द्वारा कथा को प्रस्तुत किया है। इसके संवाद सशक्त, पात्रानुकूल तथा कथा को आगे बढ़ाने वाले हैं। कवि के इस प्रयास से काव्य में नाटकीयता का समावेश हो गया है, जिस कारण सत्य की जीत’ काव्य अधिक आकर्षक बन गया है| “द्रौपदी बढ़-चढ़ कर मत बोल, कहा उसने तत्क्षण तत्काल। पीट मत री नारी का ढोल, उगल मत व्यर्थ अग्नि की ज्वाल।।”

3. अलंकार योजना प्रस्तुत खण्डकाव्य में उत्प्रेक्षा, उपमा एवं रूपक अलंकारों का प्रयोग किया गया है। अनुभावों की चित्रोपमता की सजीव योजना की गई है—

और वह मुख! प्रज्वलित प्रचण्ड
अग्नि को खण्ड, स्फुलिंग का कोष।”

इस प्रकार प्रस्तुत खण्डकाव्य की कथावस्तु अत्यन्त लघु रखी गई है। कथा का संगठन अत्यन्त कुशलता से किया गया है। द्रौपदी का चरित्र आदर्शमय है। इस प्रकार ‘सत्य की जीत’ को एक सफल खण्डकाव्य कहना सर्वथा उपयुक्त हैं।

4. उद्देश्य प्रस्तुत खण्डकाव्य में कवि का उद्देश्य असत्य पर सत्य की विजय दिखाना है। इस खण्डकाव्य का मूल उद्देश्य मानवीय सद्गुणों एवं उदात्त भावनाओं को चित्रित करके समाज में इनकी स्थापना करना और समाज के उत्थान में नर-नारी का समान रूप से सहयोग देना है।

प्रश्न 3.
“सत्य की जीत आधुनिक युग की नारी-जागरण की झलक है।” इस कथन की सार्थकता पर प्रकाश डालिए। (2016)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के शीर्षक (नामकरण) की सार्थकता (आशय) पर प्रकाश डालिए।
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में निहित सन्देश (उददेश्य) को स्पष्ट कीजिए। (2014, 13, 12, 10)
उत्तर:

‘सत्य की जीत’ शीर्षक की सार्थकता

श्री द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी द्वारा रचित ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में द्रौपदी चीर-हरण के प्रसंग का वर्णन किया गया है, किन्तु यह सर्वथा नवीन है। अत्याचारों को द्रौपदी चुपचाप स्वीकार नहीं करती वरन् पूर्ण आत्मबल से उसके विरुद्ध संघर्ष करती है। चीर-हरण के समय वह दुर्गा का रूप धारण कर लेती है, जिससे दु:शासन सहम जाता है। सभी कौरव द्रौपदी के सत्य बल, तेज और सतीत्व के आगे कान्तिहीन हो जाते हैं। अन्ततः जीत उसी की होती है और पूरी राजसभा उसके पक्ष में हो जाती है। इस खण्डकाव्य के माध्यम से कवि का उद्देश्य सत्य को असत्य पर विजय प्राप्त करते हुए दिखाना है। खण्डकाव्य का मुख्य आध्यात्मिक भाव सत्य की असत्य पर विजय है। अतः खण्डकाव्य का शीर्षक सर्वथा उपयुक्त है।

‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य का उद्देश्य

प्रस्तुत खण्डकाव्य में कवि का उद्देश्य असत्य पर सत्य की विजय दिखाना है। इस खण्डकाव्य का मूल उद्देश्य मानवीय सद्गुणों एवं उदात्त भावनाओं को चित्रित करके समाज में इनकी स्थापना करना है और समाज के उत्थान में नर-नारी का समान रूप से सहयोग देना है। इस खण्डकाव्य में निम्नलिखित विचारों का प्रतिपादन हुआ है।

1. नैतिक मूल्यों की स्थापना ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने दुःशासन और दुर्योधन के छल-कपट, दम्भ, ईष्र्या, अनाचार, शस्त्र बल आदि की पराजय दिखाकर उन पर सत्य, न्याय, प्रेम, मैत्री, करुणा, श्रद्धा आदि मानव मूल्यों की प्रतिष्ठा की है। कवि का विचार है कि मानव को भौतिकवाद के गर्त से नैतिक मूल्यों की स्थापना करके ही निकाला जा सकता है।

जहाँ है सत्य, जहाँ है धर्म, जहाँ है न्याय, वहाँ है जीत”

2. नारी की प्रतिष्ठा प्रस्तुत खण्डकाव्य में कवि ने द्रौपदी को कोमलता व श्रृंगार की मूर्ति के रूप में नहीं वरन् दुर्गा के रूप में प्रतिष्ठित किया है। कवि ने द्रौपदी को उस नारी के रूप में प्रस्तुत किया है, जो अपने सतीत्व और मर्यादा की रक्षा के लिए चण्डी और दुर्गा बन जाती है। यही कारण है। कि भारत में नारी की शक्ति को दुर्गा के रूप में स्वीकार किया गया है। द्रौपदी दु:शासन से स्पष्ट कह देती है कि नारी का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व है, वह पुरुष की सम्पत्ति या भोग्या नहीं हैं। समय पड़ने पर वह कठोरता का वरण भी कर सकती है।

3. स्वार्थ एवं ईष्र्या का विनाश आज को मनुष्य स्वार्थी होता जा रहा है। स्वार्थ भावना ही संघर्ष को जन्म देती है। इनके वश में होकर व्यक्ति कुछ भी कर सकता है। इसे कवि ने द्रौपदी चीर-हरण की घटना के माध्यम से दर्शाया है। दुर्योधन पाण्ड्वों से ईष्र्या रखता है तथा उन्हें छूतक्रीड़ा (जुआ) में छल से पराजित कर देता है और उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाता है। वह द्रौपदी को निर्वस्त्र करके उसे अपमानित करना चाहता है। कवि स्वार्थ और ईष्र्या को पतन का कारण मानता है। कवि इस खण्डकाव्य के माध्यम से यह सन्देश देता है कि स्वार्थपरता, बैर-भाय, ईष्र्या-द्वेष आदि को हमें समाप्त कर देना चाहिए और उसके स्थान पर मैत्री, सत्य, प्रेम, त्याग, परोपकार, सेवा-भावना आदि का प्रसार करना चाहिए।

4, प्रजातान्त्रिक भावना का प्रतिपादन प्रस्तुत खण्डकाव्य का सन्देश यह भी है कि हम प्रजातान्त्रिक भावनाओं का आदर करें। कवि ने निरंकुशता का खण्डन करके प्रजातन्त्र की उपयोगिता का प्रतिपादन किया है। निरंकुशता पर प्रजातन्त्र एक अंकुश है। राजसभा में द्रौपदी के प्रश्न पर जहाँ दुर्योधन, दुःशासन और कर्ण अपना तर्क प्रस्तुत करते हैं, वहीं धृतराष्ट्र अपना निर्णय देते समय जनभावनाओं को पूर्ण ध्यान में रखते हैं।

5. विश्वबन्धुत्व का सन्देश ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में कवि ने यह सन्देश दिया है कि सहयोग और सह-अस्तित्व से ही विश्व का कल्याण होगा।

जिएँ हम और जिएँ सब लोग।”

इससे सत्य, अहिंसा, न्याय, मैत्री, करुणा आदि को बल मिलेगा और समस्त संसार एक कुटुम्ब की भाँति प्रतीत होने लगेगा।

6. निरंकुशवाद के दोषों का प्रकाशन रचनाकार ने स्वीकार किया है कि जब सत्ता निरंकुश हो जाती है, तो वह अनैतिक कार्य करने में कोई संकोच नहीं करती। ऐसे राज्य में विवेक कुण्ठित हो जाता है। भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र आदि भी दुर्योधन की सत्ता की निरंकुशता के आगे हतप्रभ है।

इस प्रकार ‘सत्य की जीत’ एक विचार प्रधान खण्डकाव्य है। इसमें शाश्वत भारतीय जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा की गई है और स्वार्थ एवं ईष्र्या के समापन की कामना भी। कवि पाठकों को सदाचारपूर्ण जीवन की प्रेरणा देना चाहता है। वह उन्नत मानवीय जीवन का सन्देश देता है।

प्रश्न 4.
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी और दुःशासन के वार्तालाप को अपने शब्दों में लिखिए। (2015)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी और दुःशासन के संवाद को अपने शब्दों में लिखिए। (2011)
उत्तर:
कवि द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी कृत ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य का कथानक ‘महाभारत’ के ‘सभा पर्व’ से लिया गया हैं। इस खण्डकाव्य की कथावस्तु संक्षेप में इस प्रकार है-दुर्योधन पाण्डवों को छूतक्रीड़ा का निमन्त्रण देता है। पाण्डवे उसके निमन्त्रण को स्वीकार कर लेते हैं और जुआ खेलते हैं। युधिष्ठिर जुए में निरन्तर हारते रहते हैं। अन्त में युधिष्ठिर द्रौपदी को भी दाँव पर लगा देते हैं और हार जाते हैं। प्रतिशोध की अग्नि में जलता हुआ दुर्योधन द्रौपदी को भरी सभा में अपमानित करना चाहता है। अतः वह दुःशासन को भरी सभा में द्रौपदी को वस्त्रहीन करने का आदेश देता है। इस घटना को भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, धृतराष्ट्र एवं विदुर जैसे ज्ञानीजन भी मूकदर्शक बने देखते रहते हैं। केश पकड़कर द्रौपदी को सभा में लाया जाता है। इस अपमान से क्षुब्ध होकर वह एक सिंहनी के समान गर्जना करती हुई दु:शासन को ललकारती है। सभी सभासद उसकी ललकार सुनकर स्तब्ध रह जाते हैं। द्रौपदी कहती है-

अरे-ओ! दुःशासन निर्लज! देख तू नारी का भी क्रोध।
किसे कहते उसका अपमान, कराऊँगी मैं इसका बोध।”

द्रौपदी द्वारा नारी जाति पर पुरुषों के अत्याचार का विरोध किया जाता है। दुःशासन नारी को अबला, तुच्छ, महत्त्वहन एवं पुरुष की आश्रिता बताता है, परन्तु द्रौपदी उसे नारी-क्रोध से दूर रहने को कहती है। द्रौपदी कहती है कि संसार के कल्याण के लिए नारी को महत्त्व दिया जाना आवश्यक है।

द्रौपदी और दु:शासन दोनों धर्म-अधर्म, न्याय-अन्याय, सत्य-असत्य पर तर्क-वितर्क करते हैं। द्रौपदी उपस्थित सभासदों से तथा नीतिज्ञ, विद्वान् और प्रतापी व्यक्तियों से पूछती है कि जुए में हारे हुए युधिष्ठिर को मुझे दांव पर लगा देने का अधिकार कैसे हो सकता है? यदि युधिष्ठिर को उसे दांव पर लगाने का अधिकार नहीं है, तो उसे विजित कैसे माना गया और उसे भरी सभा में अपमानित करने का किसी को क्या अधिकार है? द्रौपदी के इस कथन के प्रति सभी संभाजन अपनी सहमति व्यक्त करते हैं। भीष्म पितामह इसका निर्णय युधिष्ठिर पर छोड़ते हैं। द्रौपदी भीष्म पितामह के वचन सुनकर कहती है कि दुर्योधन ने छल-प्रपंच करके सरल हदय वाले युधिष्ठिर को अपने जाल में फंसा लिया हैं। अत: धर्म एवं नीति के ज्ञाता स्वयं निर्णय लें कि उन्हें छल-कपट एवं असत्य की विजय स्वीकार है। अथवा धर्म, सत्य एवं सरलता की। द्रौपदी की बात सुनकर दुःशासन कहता है कि कौरवों को अपने शस्त्र बल पर भरोसा है न कि शास्त्र बल पर। कर्ण, शनि और दुर्योधन, दुःशासन के इस कथन का पूर्ण समर्थन करते हैं।

सभा में उपस्थित एक सभासद विकर्ण को यह बात बुरी लगती है। वह कहता है। कि यदि शास्त्र बल से शस्त्र बल ऊँचा और महत्त्वपूर्ण है, तो मानवता का विकास सम्भव नहीं है, क्योंकि शस्त्र बल मानवता को पशुता में बदल देता है। वह कहता है कि सभी विद्वान् एवं धर्मशास्त्रों के ज्ञाताओं को द्रौपदी के कथन का उत्तर अवश्य देना चाहिए, नहीं तो बड़ा अनर्थ होगा। विकर्ण द्रौपदी को विजित . नहीं मानता। विकर्ण की घोषणा सुनकर सभी सभासद दुर्योधन, दु:शासन आदि की निन्दा करने लगते हैं, परन्तु कर्ण उत्तेजित होकर कौरवों का पूर्ण समर्थन करता है। और द्रौपदी को निर्वस्त्र करने के लिए दु:शासन को आज्ञा देता है।

सभी स्तब्ध रह जाती है। पांचों पाण्डव अपने वस्त्र-अलंकार उतार देते हैं। दुःशासन अट्टहास करता है और द्रौपदी के वस्त्र खींचने के लिए हाथ बढ़ाता है। द्रौपदी गरज उठती है और अपने पूर्ण बल के साथ उसे रोककर कहती है कि वह किसी भी तरह विजित नहीं है तथा दुःशासन उसके प्राण रहते उसका चीर-हरण नहीं कर सकता। यह सुनकर मदान्ध दुःशासन द्रौपदी के वस्त्रों की ओर पुनः हाथ बढ़ाता है। द्रौपदी दुर्गा का रूप धारण कर लेती हैं, जिसे देखकर दुःशासन सहम जाता है तथा अपने आपको चीर-हरण में असमर्थ अनुभव करता है।

द्रौपदी दुःशासन को चीर-हरण के लिए ललकारती है, परन्तु वह दुर्योधन की चेतावनी पर भी द्रौपदी के रौद्र रूप से आतंकित बना रहता है। सभी कौरव द्रौपदी के सत्य बल, तेज और सतीत्व के आगे कान्तिहीन हो जाते हैं। कौरवों को अनीति की राह पर चलता देखकर सभी सभासद उनकी निन्दा करने लगते हैं। राजमदान्ध दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण आदि को द्रौपदी फिर ललकारती हुई घोषणा करती है-

“और तुमने देखा यह स्वयं, कि होते जिधर सत्य और न्याय।
जीत होती उनकी ही सदा, समय चाहे जितना लग जाय।।”

सभी सभासद कौरवों की निन्दा करते हैं, क्योंकि वे यह अनुभव करते हैं कि यदि पाण्डवों के प्रति होते हुए इस अन्याय को नहीं रोका गया तो प्रलय हो जाएगा। अन्त में धृतराष्ट्र उठते हैं और सभा को शान्त करते हैं। वे अपने पुत्र दुर्योधन की भूल को स्वीकार करते हैं। धृतराष्ट्र पाण्डवों की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि उन्होंने सत्य, धर्म एवं न्याय का मार्ग नहीं छोड़ा। वे दुर्योधन को आदेश देते हैं कि पाण्डवों का राज्य लौटा दिया जाए तथा उन्हें मुक्त कर दिया जाए। वे भरी सभा में ‘जियो और जीने दो’ की नीति की घोषणा करते हैं-

नीति समझो मेरी यह स्पष्ट, जिएँ हम और जिएँ सब लोग।” धृतराष्ट्र द्रौपदी के विचारों को उचित ठहराते हैं। वे उसके प्रति किए गए। दुर्व्यवहार के लिए उससे क्षमा माँगते हैं। पाण्डवों के गौरवपूर्ण व सुखद भविष्य की कामना करते हुए कहते हैं-

“जहाँ है सत्य, जहाँ है धर्म, जहाँ है न्याय, वहाँ है जीत।
तुम्हारे यश-गौरव के दिग्-दिगन्त में गूंजेंगे स्वर गीत।।”

इस प्रकार ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की कथा द्रौपदी चीर-हरण की अत्यन्त संक्षिप्त, किन्तु मार्मिक घटना पर आधारित है। कवि ने इस कथा को अत्यधिक प्रभावी और युगानुकूल बनाकर नारी के सम्मान की रक्षा करने का अपना संकल्प दोहराया है।

चरित्र-चित्रण पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 5.
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी के चरित्र की विशेषताएँ बताइए। (2018, 17)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी का चरित्रांकन कीजिए। (2017)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर उसकी नायिका के चरित्र की विशेषताएँ बताइए। (2017)
अथवा
‘सत्य की जीत’ के आधार पर सिद्ध कीजिए कि “नारी अबला नहीं शक्ति स्वरूप है।” (2016)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर द्रौपदी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2016)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर किसी स्त्री पात्र का चरित्रांकन कीजिए। (2016)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर नायिका द्रौपदी का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2013, 12, 11, 10)
अथवा
“सत्य की जीत में द्रौपदी के चरित्र में वर्तमान युग के नारी जागरण का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।” इस कथन को सिद्ध कीजिए। (2013)
उत्तर:
द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी कृत खण्डकाव्य ‘सत्य की जीत’ की नायिका द्रौपदी है। कवि ने उसे महाभारत की द्रौपदी के समान सुकुमार, निरीह रूप में प्रस्तुत न करके आत्मसम्मान से युक्त, ओजस्वी, सशक्त एवं वाक्पटु वीरांगना के रूप में चित्रित किया है। द्रौपदी की चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं।

1. स्वाभिमानिनी द्रौपदी स्वाभिमानिनी है। वह अपमान सहन नहीं कर सकती। वह अपना अपमान नारी जाति का अपमान समझती हैं। वह नारी के स्वाभिमान को ठेस पहुँचाने वाली किसी भी बात को स्वीकार नहीं कर सकती। ‘सत्य की जीत’ की द्रौपदी ‘महाभारत’ की द्रौपदी से बिल्कुल अलग है। वह असहाय और अबला नहीं है। वह अन्याय और अधर्मी पुरुषों से संघर्ष करने वाली हैं।
2. निर्भीक एवं साहसी द्रौपदी निर्भीक एवं साहसी है। दुःशासन द्रौपदी के बाल खींचकर भरी सभा में ले आता है और उसे अपमानित करना चाहता है। तब द्रौपदी बड़े साहस एवं निर्भीकता के साथ दुःशासन को निर्लज्ज और पापी कहकर पुकारती है।
3. विवेकशील द्रौपदी पुरुष के पीछे-पीछे आँखें बन्द करके चलने वाली नारी नहीं है वरन् विवेक से काम लेने वाली हैं। वह भरी सभा में यह सिद्ध कर देती है कि जो व्यक्ति स्वयं को हार गया हो, उसे अपनी पत्नी को दाँव पर लगाने का अधिकार ही नहीं है। अत: वह कौरवों द्वारा विजित नहीं हैं।
4. सत्यनिष्ठ एवं न्यायप्रिय द्रौपदी सत्यनिष्ठ है, साथ ही न्यायप्रिय भी है। वह अपने प्राण देकर भी सत्य और न्याय का पालन करना चाहती है। जब दुःशासन द्रौपदी के सत्य एवं शील का हरण करना चाहता है, तब वह उसे ललकारती हुई कहती है-

न्याय में रहा मुझे विश्वास,
सत्य में शक्ति अनन्त महान्।
मानती आई हूँ मैं सतत्,
सत्य ही है ईश्वर, भगवान।”

5. वीरांगना द्रौपदी विवश होकर पुरुष को क्षमा कर देने वाली असहाय और अबला नारी नहीं है। वह चुनौती देकर दण्ड देने को कटिबद्ध वीरांगना है-

“अरे ओ! दु:शासन निर्लज्ज!
देख तू नारी का भी क्रोध।
किसे कहते उसका अपमान,
कराऊँगी मैं उसका बोध।”

6. नारी जाति का आदर्श द्रौपदी सम्पूर्ण नारी जाति के लिए एक आदर्श है। दुःशासन नारी को वासना एवं भोग की वस्तु कहता है, तो वह बताती है कि नारी वह शक्ति है, जो विशाल चट्टान को भी हिला देती है। पापियों के नाश के लिए वह भैरवी भी बन सकती है। वह कहती है-

पुरुष के पौरुष से ही सिर्फ,
बनेगी धरा नहीं यह स्वर्ग।
चाहिए नारी का नारीत्व,
तभी होगा यह पूरा सर्ग।”

सार रूप में कहा जा सकता है कि द्रौपदी पाण्डव-कुलवधू, वीरांगना, स्वाभिमानिनी, आत्मगौरव सम्पन्न, सत्य और न्याय की पक्षधर, सती-साध्वी, नारीत्व के स्वाभिमान से मण्डित एवं नारी जाति का आदर्श है।

प्रश्न 6.
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के नायक का चरित्रांकन कीजिए। (2018)
अथवा
‘सत्य की जीत के आधार पर युधिष्ठिर का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2018)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2018)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के नायक की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए। (2017)
अथवा
‘सत्य की जीत’ के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2017)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य/नाटक के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2018, 16)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर युधिष्ठिर की चारित्रिक विशेषताओं को लिखिए। (2016)
उत्तर:
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के नायक रूप में युधिष्ठिर के चरित्र को स्थापित किया गया है। द्रौपदी एवं धृतराष्ट्र के कथनों के माध्यम से युधिष्ठिर का चरित्र प्रकट हुआ है। ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में युधिष्ठिर का चरित्र महान् गुणों से परिपूर्ण है।
उनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

1. सरल-हृदयी व्यक्तित्व युधिष्ठिर का व्यक्तित्व सरल हृदयी है तथा अपने समान ही सभी अन्य व्यक्तियों को भी सरल हृदयी समझते हैं। इसी गुण के कारण वे दुर्योधन और शकुनि के कपट रूपी माया जाल में फंस जाते हैं और इसका दुष्परिणाम भोगने के लिए विवश हो जाते हैं।

2. धीर-गम्भीर युधिष्ठिर ने अपने जीवन काल में अत्यधिक कष्ट भोगे थे, परन्तु उनके स्वभाव में परिवर्तन नहीं हुआ। दुःशासन द्वारा द्रौपदी का चीर-हरण व उसका अपमान किए जाने के पश्चात् भी युधिष्ठिर का मौन व शान्त रहने का कारण उनकी कायरता या दुर्बलता नहीं थी, अपितु उनकी धीरता व गम्भीरता का गुण था।।

3. अदूरदर्शी युधिष्ठिर सैद्धान्तिक रूप से अत्यधिक कुशल थे, परन्तु व्यावहारिक रूप से कुशलता का अभाव अवश्य है। वे गुणवान तो हैं, परन्तु द्रौपदी को दांव पर लगाने जैसा मूर्खतापूर्ण कार्य कर बैठते हैं। परिणामस्वरूप इस फर्म का दूरगामी परिणाम उनकी दृष्टि से ओझल हो जाता है और चीर-हरण जैसे कुकृत्य को जन्म देता है। इस प्रकार युधिष्ठिर अदूरदर्शी कहे जाते हैं।

4. विश्व-कल्याण के अग्रदूत युधिष्ठिर का व्यक्तित्व विश्व-कल्याण के प्रवर्तक के रूप में देखा गया है। इस गुण के सन्दर्भ में धृतराष्ट्र भी कहते हैं कि

“तुम्हारे साथ विश्व है, क्योंकि तुम्हारा ध्येय विश्व-कल्याण।”

अर्थात् धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर के साथ सम्पूर्ण विश्व को माना है, क्योंकि उनका उद्देश्य विश्व-कल्याण मात्र है।
5. सत्य और धर्म के अवतार युधिष्ठिर को सत्य और धर्म का अवतार माना गया है। इनकी सत्य और धर्म के प्रति अडिग निष्ठा है। युधिष्ठिर के इसी गुण पर मुग्ध होकर धृतराष्ट्र ने कहा कि हे युधिष्ठिर! तुम श्रेष्ठ व धर्मपरायण हो और इन्हीं गुणों को आधार बनाकर बिना किसी भय के अपना राज्य संभालो और राज करो।

निष्कर्ष स्वरूप कहा जा सकता है कि युधिष्ठिर इस खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र व नायक हैं, जिनमें विश्व कल्याण, सत्य, धर्म, धीर, शान्त व सरल हृदयी व्यक्तित्व का समावेश है।

प्रश्न 7.
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर दुःशासन के चरित्र की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2018)
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर दुःशासन का चरित्रांकन कीजिए।
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के आधार पर दुःशासन के चरित्र पर सोदाहरण प्रकाश डालिए।
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के प्रमुख पुरुष पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।
अथवा
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में दुःशासन का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत खण्डकाव्य में दुःशासन एक प्रमुख पात्र है। यह दुर्योधन का छोटा भाई तथा धृतराष्ट्र का पुत्र है। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

1. अहंकारी एवं बुद्धिहीन दुःशासन अत्यन्त अहंकारी एवं बुद्धिहीन है। उसे अपने बल पर अत्यन्त घमण्ड हैं। वह बुद्धिहीन भी है, विवेक से उसे कुछ लेना-देना नहीं है। वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ एवं महत्त्वपूर्ण मानता है। वह पशुबल में विश्वास करता है। वह भरी सभा में पाण्डवों का अपमान करता है। सत्य, प्रेम, अहिंसा की अपेक्षा वह पाश्विक शक्तियों को ही सब कुछ मानता है।
2. नारी के प्रति उपेक्षा भाव द्रौपदी के साथ हुए तर्क वितर्क से दुःशासन का नारी के प्रति रूढ़िवादी दृष्टिकोण प्रकट हुआ है। वह नारी को भोग्या और पुरुष की दासी मानता है। वह नारी की दुर्बलता का उपहास उड़ाता है। उसके अनुसार पुरुष ने ही विश्व का विकास किया है। नारी की दुर्बलता का उपहास उसने इन शब्दों में किया है

“कहाँ नारी ने ले तलवार, किया है पुरुषों से संग्राम।
जानती है वह केवल पुरुष-भुजाओं में करना विश्राम।”

3. शस्त्र-बल विश्वासी दुःशासन शस्त्र-बल को सब कुछ समझता है। उसे धर्मशास्त्र और धर्मज्ञों में विश्वास नहीं है। वह शस्त्र के समक्ष शास्त्र की अवहेलना करता है। शास्त्रज्ञाताओं को वह दुर्बल मानता हैं।
4. दुराचारी दुःशासन हमारे सम्मुख एक दुराचारी व्यथित के रूप में आता हैं। वह अपने बड़ों व गुरुजनों के सामने अभद्र व्यवहार करने में भी संकोच नहीं करता। द्रौपदी को सम्बोधित करते हुए दुःशासन कहता है

“विश्व की बात द्रौपदी छोड़,
शक्ति इन हाथों की ही तोल।
खींचता हूँ मैं तेरा वस्त्र,
पीट मत न्याय धर्म का ढोल।”

5. सत्य एवं सतीत्व से पराजित दुःशासन के चीर-हरण से असमर्थता इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि हमेशा सत्य की ही जीत होती है। वह जैसे ही द्रौपदी का चीर खींचने के लिए हाथ आगे बढ़ाता है, वैसे ही द्रौपदी के सतीत्व की ज्वाला से पराजित हो जाता हैं।

दु:शासन के चरित्र की दुर्बलताओं का उद्घाटन करते हुए डॉ. ओंकारप्रसाद माहेश्वरी लिखते हैं, “लोकतन्त्रीय चेतना के इस युग में अब भी कुछ ऐसे साम्राज्यवादी प्रकृति के दु:शासन हैं, जो दूसरों के बढ़ते मान-सम्मान को नहीं देख सकते तथा दूसरों की भूमि और सम्पत्ति को हड़पने के लिए प्रतिक्षण घात लगाए हुए बैठे रहते हैं। इस काव्य में
दुःशासन उन्हीं का प्रतीक है।

प्रश्न 8.
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य के प्रमुख पात्रों का संक्षेप में परिचय दीजिए। (2016)
उत्तर:
इस खण्डकाव्य के प्रमुख पात्र द्रौपदी और दुःशासन हैं। अन्य पात्रों में युधिष्ठिर, दुर्योधन, विकर्ण, विदुर और धृतराष्ट्र उल्लेखनीय हैं। जिनका संक्षेप में परिचय निम्नलिखित है।

  1.  दुःशासन दुःशासन, दुर्योधन का छोटा भाई व धृतराष्ट्र का पुत्र है। यह अहंकारी एवं बुद्धिहीन हैं। सत्य, प्रेम, अहिंसा के स्थान पर वह पाश्विक शक्तियों को महत्त्व देता है। दु:शासन का नारी के प्रति उपेक्षित भाव है। वह दुराचारी व शस्त्र-बल विश्वासी है। वह शस्त्र के समक्ष शास्त्र की अवहेलना करता है तथा शास्त्रज्ञाताओं को दुर्बल मानता है।
  2. द्रौपदी ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य की नायिका द्रौपदी स्वाभिमानी, ओजस्वी, सशक्त एवं वाक्पटु वीरांगना के रूप में मुखरित हुई है। द्रौपदी पाण्डव-कुलवधू, सत्यनिष्ठ प्रिय, विवेकशील, निर्भक एव साहसी तथा न्याय की पक्षधर, सती साध्वी, नारीत्व के स्वाभिमान से मण्डित एवं नारी जाति का आदर्श है।
  3. दुर्योधन दुर्योधन, धृतराष्ट्र का सबसे बड़ा पुत्र है। इस खण्डकाव्य में दुर्योधन को भी दुःशासन के समान ही असत्य, अन्याय और अनैतिकता को समर्थक माना गया है। वह भी शस्त्रबल का पुजारी है। ईष्र्यालु प्रवृत्ति के कारण ही वह पाण्डवों की समृद्धि और मान-सम्मान से जलता रहा और इसी कारण उसने छल-कपट करके पाण्डवों के राज्य हड़प लिए। सत्ता लोलुपता दुर्योधन के चरित्र की महत्त्वपूर्ण विशेषता है।।
  4. युधिष्ठिर पाण्डवों में सबसे बड़े युधिष्ठिर हैं। वह सरल हदयी व्यक्तित्व के हैं। धीर, गम्भीर, अदूरदर्शी, विश्व-कल्याण के अग्रदूत व सत्य और धर्म के अवतार आदि गुणों का समन्वय युधिष्ठिर के चरित्र में है। कवि ने युधिष्ठिर को आदर्श राष्ट्रनायक के रूप में प्रस्तुत किया है।
  5. पृतराष्ट्र इस खण्डकाव्य के आधार पर धृतराष्ट्र उदारता और विवेकपूर्णता के गुण से अभिभूत हैं। खण्डकाव्य के अन्तिम अंश में धृतराष्ट्र का उल्लेख हुआ है। वे दोनों पक्षों (पाण्डवों और कौरवों) के समल तक को सुनते हैं और सत्य को सत्य तथा असत्य को असत्य घोषित कर उचित न्याय की प्रक्रिया को पूर्ण करते हैं।
  6. विकर्ण एवं विदुर विकर्ण और विदुर दोनों अस्त्र शस्त्र शक्ति के घोर विरोधी हैं। वे शान्तिप्रिय हैं तथा शस्त्र-बल पर स्थापित शान्ति को प्रान्ति मानते हैं। दोनों पात्र कौरव-कुल के होने के पश्चात् भी द्रौपदी के समर्थन में हैं। ये दोनों पात्र न्यायप्रिय, स्पष्टवादी और निर्भीक हैं।

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