UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi सफाई हेतु सम्बन्धित अधिकारी को प्रार्थना-पत्र

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Samanya Hindi
Chapter Name सफाई हेतु सम्बन्धित अधिकारी को प्रार्थना-पत्र
Number of Questions 7
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi सफाई हेतु सम्बन्धित अधिकारी को प्रार्थना-पत्र

प्रश्न 1.
अपने क्षेत्र में मच्छरों के प्रकोप का वर्णन करते हुए उचित कार्यवाही के लिए स्वास्थ्य अधिकारी को पत्र लिखिए।
या
अपने क्षेत्र में मलेरिया फैलने की सम्भावना को देखते हुए स्वास्थ्य अधिकारी को एक पत्र लिखिए।
या
अपने मुहल्ले में वर्षा के कारण उत्पन्न हुई जल-भराव की समस्या की ओर ध्यान आकृष्ट कराने के लिए नगरपालिका अधिकारी/जिलाधिकारी को पत्र लिखिए।
या
नगर निगम के स्वास्थ्य अधिकारी को अपने मुहल्ले में विद्यमान गन्दगी के विषय में एक पत्र लिखिए।
या
नगर की स्वच्छता हेतु नगरपालिका अध्यक्ष को आवेदन देते हुए उनका ध्यान गन्दगी से होने वाली बीमारियों की ओर आकृष्ट कीजिए।
या
ग्राम प्रधान की ओर से अपने जनपद के जिलाधिकारी को एक पत्र लिखिए, जिसमें गाँव की सफाई व्यवस्था हेतु अनुरोध किया गया हो।
या
अपने ग्राम प्रधान को एक पत्र लिखकर गाँव की सफाई हेतु अनुरोध कीजिए।
या
अपने नगर में बाढ़ एवं घनघोर वर्षा के बाद गम्दगी के कारण फैलने वाले संक्रामक रोगों की आशंका को दृष्टिगत करते हुए रोकथाम के उपायों हेतु जिलाधिकारी को एक पत्र लिखिए।
उत्तर:
सेवा में,
स्वास्थ्य अधिकारी,
…………………… नगर निगम।
……………… नगर।

विषय-मच्छरों का बढ़ता हुआ प्रकोप।

महोदय,
मैं आपका ध्यान बढ़ते हुए मच्छरों के प्रकोप की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। मैं सुभाष नगर क्षेत्र का निवासी हूँ। पूरे सुभाष नगर क्षेत्र में आजकल मच्छरों का भयंकर आतंक छाया हुआ है। दिन हो या रात, मच्छरों के झुंड सदा घूमते नज़र आ जाते हैं। रात को तो वे सोना दूभर कर देते हैं। जब सुबह उठते हैं। तो बच्चों के मुँह लाल-लाल दानों से भरे होते हैं। मच्छरों के कारण घर-घर में मलेरिया फैला हुआ है। प्रायः सभी घरों में कोई-न-कोई मलेरिया का रोगी मिल जाएगा। इन मच्छरों के कारण स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ा है।

हमारे क्षेत्र में मच्छरों की अधिकता का बड़ा कारण है-पानी के जमे हुए तालाब और गली-मुहल्लों में फैली चौड़ी-चौड़ी खुली नालियाँ। उन कच्ची नालियों को व्यवस्थित करने की कोई व्यवस्था नहीं हुई है। मुहल्ले के जमादार सफाई की ओर ध्यान नहीं देते, इसलिए नालियों में सदा मल जमा पड़ा रहता है। लोग अपने घरों के गन्दे जेल को बाहर यूँ ही बिखरा देते हैं, जिससे मार्गों के गड्ढे भर जाते हैं। हमने कई बार निवेदन किया है कि मारे क्षेत्र के तालाब को भरवा दिया जाए, जिससे मच्छरों का मुख्य अड्डा समाप्त हो जाए, किन्तु इस ओर कभी ध्यान नहीं दिया गया।

इस बार अत्यधिक वर्षा के कारण जगह-जगह जल का जमाव हो गया है। सभी जगह कीचड़, मल और बदबूदार जले का प्रकोप है। अतः मैं पुन: सुभाष नगर के निवासियों की ओर से आपसे अनुरोध करता हूँ कि मच्छरों को समाप्त करने के लिए सार्वजनिक रूप से क्षेत्र में मच्छरनाशक दवाई छिड़कवाने की व्यवस्था की जाए। मलेरिया से बचने के लिए कुनीन बाँटने तथा पूरे क्षेत्र की सफाई के व्यापक प्रबन्ध किये जाएँ। आशा है आप शीघ्र कार्यवाही करेंगे।

धन्यवाद सहित।

भवदीय
क ख ग
मंत्री, मुहल्ला सुधार समिति
सुभाष नगर।

दिनांक : 19 जुलाई, 2016

प्रश्न 2.
दिल्ली नगर निगम के स्वास्थ्य अधिकारी को एक पत्र लिखकर उनसे अपने मुहल्ले की सफाई कराने का अनुरोध कीजिए।
या
अपने क्षेत्र की गन्दगी की ओर ध्यान आकर्षित कस्ते हुए स्वास्थ्य अधिकारी/ उपजिलाधिकारी को एक पत्र लिखिए।
या
अपने गली-मुहल्ले की नालियों की समुचित सफाई के लिए नगरपालिका के अध्यक्ष को एक पत्र लिखिए।
या
नगर की सफाई हेतु नगरपालिका को एक पत्र लिखिए।
उत्तर:
सेवा में,
स्वास्थ्य अधिकारी,
दिल्ली नगर निगम,
दिल्ली।

विषय-मुहल्ले की सफाई कराने हेतु प्रार्थना-पत्र।

श्रीमान,
हम आपका ध्यान मुहल्ले की सफाई सम्बन्धी दुरवस्था की ओर खींचना चाहते हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हमारे मुहल्ले की सफाई हेतु नगर निगम का कोई सफाई कर्मचारी गत दस दिनों से काम पर नहीं आ रहा है। घरों की सफाई करने वाले कर्मचारियों ने भी मुहल्ले में स्थान-स्थान पर गन्दगी और कूड़े-कर्कट के ढेर लगा दिये हैं। इसका कारण सम्भवतः यह भी है कि आसपास कूड़ा-करकट तथा गन्दगी डालने के लिए कोई निश्चित स्थान नहीं है।

आज स्थिति यह है कि मुहल्ले का वातावरणं अत्यन्त दूषित तथा दुर्गन्धमय हो गया है। मुहल्ले से गुजरते हुए नाक बन्द कर लेनी पड़ती है। चारों ओर मक्खियों की भिनभिनाहट है। रोगों के कीटाणु प्रतिदिन बढ़ रहे हैं। नालियों की सफाई न होने के कारण मच्छरों का प्रकोप इस सीमा तक बढ़ गया है कि दिन का चैन और रात की नींद हराम हो गयी है।

वर्षा पाँच-सात दिनों में प्रारम्भ होनी सम्भावित है। यथासमय मुहल्ले की सफाई न होने पर मुहल्ले की दुरवस्था का अनुमान लगाना कठिन है। अतः आपसे हम मुहल्ले वालों का निवेदन है कि आप यथाशीघ्र मुहल्ले का निरीक्षण करें तथा सफाई का नियमित प्रबन्ध करवाएँ, अन्यथा मुहल्ला निवासियों के स्वास्थ्य पर उसका कुप्रभाव पड़ने की आशंका है।

आपकी ओर से उचित कार्यवाही के लिए हम प्रतीक्षारत हैं।

दिनांक : 5 जून, 2017

प्रार्थी
…………………………….. नगर
ब्लॉक-डी के निवासी।

प्रश्न 3.
आपके नगर में प्रदूषित पानी पीने से दस्त व हैजे के रोगी बढ़ रहे हैं। नगरपालिका के स्वास्थ्य अधिकारी को पत्र लिखकर स्थिति से अवगत कराएँ।
उत्तर:
सेवा में,
स्वास्थ्य अधिक्रारी,
कटनी नगरपालिका, कटनी।

विषय-प्रदूषित पानी से महामारी की आशंका।

महोदय,
पिछले कुछ समय से हमारे क्षेत्र में पीने का शुद्ध पानी नहीं आ रहा है। पानी का स्वाद भी कुछ बदला हुआ-सा है। इस पानी को पीने से लोगों को कई तरह के रोगों का सामना करना पड़ रहा है तथा दस्त व हैजे की आम शिकायत बनी हुई है। पानी को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि इसका रंग कुछ मटमैला-सा है। हमारे क्षेत्र से एक सीवरेज पाइप भी गुज़रती है। इस बात की सम्भावना है कि पानी की पाइप में सीवरेज का गन्दा पानी मिल रहा हो। लोगों को पीने के पानी के लिए इसी पाइप लाइन का सहारा लेना पड़ता है। अगर इसी तरह प्रदूषित जल की आपूर्ति होती रही तो किसी महामारी की समस्या खड़ी हो सकती है। बीमारों की निरन्तर बढ़ती संख्या चिन्ता का कारण है। आपसे अनुरोध है कि हमारे क्षेत्र की पानी के पाइप लाइन की जाँच करवाएँ तथा उसे अति शीघ्र ठीक करवाएँ।
आशा है, आप हमारी समस्या को गम्भीरता से लेंगे।
धन्यवाद !
दिनांक : 10 जून, 2017

भवदीय
असलम, रहीम, रहमान,
कादिर, मनीष, कल्पना

प्रश्न 4.
अपने क्षेत्र में व्याप्त गन्दगी के कारण उत्पन्न डेंगू व मलेरिया जैसी भयंकर बीमारियों की जानकारी किसी दैनिक पत्र के सम्पादक को देते हुए पत्र लिखिए।
या
स्वास्थ्य विभाग द्वारा आपके क्षेत्र की गन्दगी की ओर कोई ध्यान न दिये जाने पर किसी दैनिक पत्र के सम्पादक को पत्र लिखिए।
उत्तर:

राकेश शुक्ला
प्रधान
‘मेरा मेरठ : स्वच्छ मेरठ
जागृति विहार, मेरठ
दिनांक : 19 सितम्बर, 2017

श्रीमान सम्पादक महोदय,
दैनिक जागरण,
मोहकमपुर, दिल्ली रोड
मेरठ-250 002

विषय-क्षेत्र की गन्दगी से उत्पन्न समस्याओं तथा स्वास्थ्य विभाग की उपेक्षा के सम्बन्ध में।

महोदय,
आपके लोकप्रिय समाचार-पत्र के माध्यम से मैं मेरठ प्रशासन तथा उसके वरिष्ठ अधिकारियों का ध्यान मेरठ के नगरीय क्षेत्र मलियाना, कासमपुर, तारापुरी, ब्रह्मपुरी में व्याप्त गन्दगी तथा इसके दुष्प्रभाव की ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ। आपसे अनुरोध है कि मेरे इस पत्र को ‘जनवाणी’ शीर्षक स्तम्भ में प्रकाशित करने का कष्ट करें। ये सभी ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ मध्यम तथा निम्न आय वर्ग एवं गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोग रहते हैं। ये चारों ही क्षेत्र प्रत्येक स्तर पर उपेक्षित रहे हैं। इस बार वर्षा की अधिकता के कारण इन क्षेत्रों में स्थान-स्थान पर पानी भर गया है तथा इनके पास बहने वाला नाला भी पानी से भर गया है। पानी के इस भराव के कारण चारों ओर गन्दगी तथा दुर्गन्ध व्याप्त हो गयी है तथा मच्छरों के पनपने के कारण मलेरिया और डेंगू फैल रही है। आये दिन इन रोगों से ग्रस्त रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है। खेद का विषय है कि अधिकारियों का ध्यान इस ओर आकृष्ट कराये जाने पर भी उनकी ओर से इस समस्या के समाधान के लिए गम्भीरतापूर्वक कोई प्रयास नहीं किये गये। प्रशासन की इस उपेक्षा के कारण इन क्षेत्रों में रहने वाले निवासियों को अपने स्वास्थ्य को लेकर चिन्तित होना स्वाभाविक है।।

अपनी संस्था की ओर से मेरा नगर के उच्च पदाधिकारियों तथा नगर निगम के वरिष्ठ अधिकारियों से आग्रह है कि इससे पूर्व कि स्थिति अत्यन्त भयावह होकर अनियन्त्रित हो जाए, इस समस्या को अत्यन्त गम्भीरता से लेते हुए तत्काल इसके समाधान के लिए आवश्यक कदम उठाये जाएँ।

सधन्यवाद!
दिनांक : ……………

भवदीय
राकेश शुक्ला

प्रश्न 5.
शुल्क मुक्ति हेतु अपने विद्यालय के प्रधानाचार्य को एक आवेदन-पत्र लिखिए।
उत्तर:
सेवा में,
श्रीयुत् प्रधानाचार्य,
जवाहर पब्लिक स्कूल,
जनकपुरी, दिल्ली-18
मान्यवर महोदय,
सविनय निवेदन यह है कि मैं आपके विद्यालय का कक्षा 12 (B) का विद्यार्थी हूँ। मेरे पिताजी अपने छोटे से व्यवसाय द्वारा बड़ी कठिनाई से परिवार का पालन-पोषण करते हैं। कमरतोड़ महँगाई के कारण काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। घर में प्रायः आवश्यक वस्तुओं का अभाव रहता है। मेरे 4 भाई-बहन विभिन्न स्कूलों में पढ़ रहे हैं, उनकी पढ़ाई-लिखाई आदि के खर्चे का मानसिक बोझ पिताजी के सिर पर सदा रहता है।

मैं अपनी कक्षा का परिश्रमी छात्र हूँ और कक्षा में सदा प्रथम स्थान प्राप्त करता रहा हूँ। खेलकूद में भी मेरी अच्छी रुचि है। मैं सीनयर ग्रुप फुटबॉल का कप्तान भी हूँ।

अतः आपसे निवेदन है कि मुझे विद्यालय शुल्क से पूर्ण मुक्ति प्रदान करें, जिससे मैं अध्ययनरत रहकर अपने भविष्य को सँवार सकें। मेरे अभिभावक आपके अत्यन्त आभारी रहेंगे।

आपका आज्ञाकारी शिष्य
सतीश शर्मा
कक्षा-12 (B)

दिनांक : ……………

प्रश्न 6.
बिजली-समस्या के निराकरण हेतु अपने जिले के बिजली विभाग को एक शिकायती पत्र लिखिए।
उत्तर:
सेवा में,
बिजली विभाग,
मेरठ

विषय–बिजली की अनियमित आपूर्ति

मान्यवर,
हम जैन नगर कालोनी के निवासी आपका ध्यान बिजली समस्या की ओर आकर्षित कराना चाहते हैं। पानी तथा अन्य कार्यों के लिए बिजली की सर्वाधिक आवश्यकता ग्रीष्म काल में ही होती है और हम सब अप्रैल के प्रारम्भ से ही अनुभव कर रहे हैं कि भरपूर गर्मी प्रारम्भ होने से पूर्व ही बिजली की आपूर्ति कम हो गई है। बिजली जीवन की मूलभूत आवश्यकता है। कोई भी लोकप्रिय सरकार इसकी उपेक्षा नहीं करती।।

हमारी कालोनी में बिजली आपूर्ति प्रारम्भ और बन्द होने का कोई समय भी निर्धारित नहीं है। हमारी कालोनी से एक प्रतिनिधि मण्डल इस सम्बन्ध में बिजली आपूर्ति अधिकारी से भी मिला था और उन्होंने एक सप्ताह में बिजली-आपूर्ति बढ़ाने का वचन दिया था। खेद है कि आज तीन सप्ताह व्यतीत हो जाने पर भी कोई कार्यवाही इस सम्बन्ध में नहीं हुई है।

इस स्थिति में आपसे हमारा निवेदन है कि कृपया हमारी समस्या की ओर ध्यान दें और इसका शीघ्र समाधान करायें। यदि बिजली-आपूर्ति तुरन्त बढ़ाना सम्भव नहीं हो तो कम से कम उसका समय तो निर्धारित किया जा सकता है।
शीघ्र कार्यवाही की आशा में।

हम हैं आपके जैन नगर निवासी
(1) ………………………….
(2) …………………………
(3) …………………………
(4) …………………………

दिनांक : ………………………

प्रश्न 7.
किसी संसाचार-पत्र के सम्पादक को अपने मुहल्ले में लाउडस्पीकर के कारण पढ़ाई में आने वाले व्यवेधान की ओर अधिकारियों का ध्यान आकर्षित करते हुए पत्र लिखिए।
उत्तर:
सेवा में,
सम्पादक महोदय,
दैनिक जागरण, मेरठ।।

विषय–परीक्षा के समय लाउडस्पीकर आदि पर रोक।

मान्यवर,
निवेदन यह है कि प्रायः सभी विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों की परीक्षाओं का आयोजन मार्च और अप्रैल माह में होता है। विद्यार्थी अपने भविष्य को दाँव पर लगाने के लिए बड़ी लगन व उत्साह से अध्ययनरत रहते हैं। थोड़ी-सी अशान्ति और शोरगुल से वे अधीर और आतुर हो उठते हैं। परीक्षा : की तैयारी के समय वे एकान्त, शान्त व एकाग्रचित रहना चाहते हैं।

देखा गया है कि उक्त दोनों महीनों में वातावरण बड़ा अस्थिर व अशान्त रहता है। विवाह-लग्नों की धूम के कारण लाउडस्पीकर और वाद्य-यन्त्रों का शोर मच जाता है। बैण्ड-बाजों की कर्कश ध्वनि मानो पागलै-सा बना देती है। विद्यार्थी अपना सिर थाम लेते हैं। फलस्वरूप झगड़े और फिसाद खड़े हो जाते हैं।

इस वर्ष भी मार्च और अप्रैल महीनों में बहुत शादियाँ हैं। अत: प्रशासन को शीर्ष सतर्क और सावधान होकर लाउडस्पीकर और वाद्य-यन्त्रों पर प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए, अन्यथा गत वर्ष की तरह हिंसा की वारदातें पुनर्जीवित हो सकती हैं।

जिला प्रशासन से हमारा अनुरोध है कि परीक्षा की इन अमूल्य घड़ियों में शोरगुल व बैण्ड-बाजों की कर्कश कटु ध्वनि पर प्रतिबन्ध लगा दें और विवाह-लग्न के अवसर पर धीमा संगीत रखने के आदेश जारी किये जाएँ।

मोहन लाल गुप्त
अध्यक्ष,
भारतीय विद्यार्थी परिषद्
मेरठ।।

दिनांक : …………………

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UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 10 प्राकृतिक आपदाएँ

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 10 प्राकृतिक आपदाएँ are part of UP Board Solutions for Class 12 Home Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 10 प्राकृतिक आपदाएँ.

Board UP Board
Class Class 12
Subject Home Science
Chapter Chapter 10
Chapter Name प्राकृतिक आपदाएँ
Number of Questions Solved 25
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 10 प्राकृतिक आपदाएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
बाढ़, भूकम्प, चक्रवात, सूखा आदि आपदाओं के पीछे निहित कारक होते हैं।
(a) दैवी प्रकोप सम्बन्धी कारक
(b) पाप में वृद्धि सम्बन्धी कारक
(C) प्राकृतिक कारक
(d) मानव द्वारा पर्यावरण-प्रदूषण में वृद्धि सम्बन्धी कारक
उत्तर:
(c) प्राकृतिक कारक

प्रश्न 2.
निम्न में से कौन-सी भूकम्प की स्थिति है?
(a) मकान गिरने से भूमि का हिलना
(b) रेलगाड़ी की धमक से भूमि में कम्पन
(C) पृथ्वी की आन्तरिक शक्तियों की उथल-पुथल से भूमि में कम्पन
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(c) पृथ्वी की आन्तरिक शक्तियों की उथल-पुथल से भूमि में कम्पन

प्रश्न 3.
भूकम्प किन कारणों से आ सकता है?
(a) विवर्तनिक हलचल
(b) ज्वालामुखी विस्फोट
(c) अत्यधिक खनन (d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 4.
16 व 17 जून, 2013 में भारत के किस राज्य को भयंकर प्राकृतिक आपदा का सामना करना पड़ा था? (2014)
(a) बिहार
(b) उत्तर प्रदेश
(c) उत्तराखण्ड
(d) केरल
उत्तर:
(c) उत्तराखण्ड

प्रश्न 5.
बाढ़ से नष्ट होता है। (2017)
(a) फसल
(b) मकान
(c) सड़के और रेलमार्ग
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 6.
बाढ़ से क्षति होती है। (2018)
(a) मनुष्य एवं पालतू जानवर की
(b) मकान की
(C) फसलों की
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

प्रश्न 7.
सूखा आपदा का कारण है। (2014)
(a) वन-विनाश
(b) भूमिगत जल का अधिक दोहन
(c) नदी मार्गों में परिवर्तन
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 8.
सुनामी का सबसे अधिक प्रभाव कहाँ होता है? (2013)
(a) पहाड़ी क्षेत्रों में
(b) तटवर्ती क्षेत्रों में
(C) समुद्र के मध्यवर्ती क्षेत्रों में
(d) मैदानी भागों में
उत्तर:
(b) तटवर्ती क्षेत्रों में

प्रश्न 9.
अकस्मात् उत्पन्न होने वाली आपदा है।
(a) पर्यावरण प्रदूषण
(b) भूमि का मरुस्थलीकरण
(C) सूखा
(d) भूस्खलन
उत्तर:
(d) भूस्खलन

प्रश्न 10.
आग लगने का कारण है। (2016)
(a) पानी
(b) सूरज की किरण
(c) कीचड़
(d) लघु परिपथ
उत्तर:
(d) लघु परिपथ

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक, 25 शब्द)

प्रश्न 1.
प्राकृतिक आपदा से क्या तात्पर्य है? (2009, 18)
उत्तर:
जिन आपदाओं के पीछे उत्तरदायी कारक मानवे नहीं, वरन् प्रकृति होती है, उन्हें प्राकृतिक आपदा’ कहते हैं।

प्रश्न 2.
प्राकृतिक आपदाएँ कौन-कौन सी हैं? (2009, 13)
उत्तर:
बाढ़, सूखा, भूकम्प, भूस्खलन, ज्वालामुखी विस्फोट, चक्रवात, बादल फटना, सुनामी, ओलावृष्टिं आदि प्राकृतिक आपदाएँ हैं।

प्रश्न 3.
बाढ़ की उत्पत्ति में मानवीय क्रियाकलापों की भूमिका स्पष्ट करें।
उत्तर:
अन्धाधुन्ध वन कटाव, अवैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ, अनियोजित निर्माण कार्य आदि मानवीय क्रियाकलापों से प्राकृतिक अपवाह तन्त्र अवरुद्ध हो जाता है। तथा बाढ़ की विध्वंसता बढ़ जाती है।

प्रश्न 4.
सुनामी की उत्पत्ति किस अन्य आपदा से सम्बन्धित है?
उत्तर:
सुनामी की उत्पत्ति भूकम्पीय तरंगों से होती है। अत: यह भूकम्प का एक प्रभाव है।

प्रश्न 5.
सुनामी लहरें तटवर्ती क्षेत्रों पर क्यों अधिक प्रभावी होती हैं?
उत्तर:
जल तरंगों की गति उथले समुद्र में अधिक एवं गहरे समुद्र में कम होती है। इसके अतिरिक्त तरंगों की ऊँचाई तट के निकट अत्यधिक बढ़ जाती है, इन्हीं कारणों से सुनामी लहरें तटवर्ती क्षेत्रों पर अधिक प्रभावी होती हैं।

प्रश्न 6.
सुनामी लहरों से बचाव के कोई दो उपाय बताइए।
उत्तर:
सुनामी लहरों से बचाव के सुरक्षात्मक उपाय के रूप में समुद्रतटवर्ती भागों में पूर्वसूचना केन्द्रों का विकास एवं विस्तार किया जाना चाहिए, इसके अतिरिक्त समुद्री लहरों के प्राकृतिक अवरोधक के रूप में मैंग्रोव वनों को संरक्षित किया जाना आवश्यक है।

प्रश्न 7.
राष्ट्रीय आपदा से आप क्या समझते हैं? राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन की क्या आवश्यकता है? (2014)
उत्तर:
जिस आपदा से पूरा राष्ट्र प्रभावित वे चिन्तित हो, उसे ‘राष्ट्रीय आपदा कहते हैं। किसी भी राष्ट्रीय आपदा को रोकने, उसके प्रभाव को सीमित करने व उससे बचाव के लिए व्यापक उपाय करने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन की आवश्यकता होती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक, 50 शब्द)

प्रश्न 1.
प्राकृतिक आपदा पर चार बिन्दु लिखिए। (2008, 10, 13)
उत्तर:
ऐसी आपदाएँ जिनका सम्बन्ध प्रकृति से होता है, ‘प्राकृतिक आपदाएँ कहलाती हैं। प्राकृतिक आपदा से सम्बन्धित चार बिन्दु निम्नलिखित हैं।

  • प्राकृतिक आपदा से जान-माल को बहुत नुकसान होता है।
  • इससे समाज में गरीबी एवं बेरोजगारी की समस्याएँ बढ़ती हैं।
  • प्राकृतिक आपदाओं को रोकना सम्भव नहीं है, लेकिन इनके प्रभाव को कम किया जा सकता है।
  • प्राकृतिक आपदा के समय जनता को धैर्य से काम लेना चाहिए व मिलकर कार्य करना चाहिए।

प्रश्न 2.
सूखा आपदा के प्रमुख कारण लिखिए। (2012)
उत्तर:
‘सूखा आपदा’ का सीधा सम्बन्ध वर्षा से है, जब किसी क्षेत्र में लम्बे समय तक वर्षा का अभाव होता है और पृथ्वी में नमी की कमी हो जाती है, तो उस स्थिति को ‘सूखा’ कहते हैं। सूखे की स्थिति में कृषि की पैदावार नहीं हो पाती है, प्राकृतिक घास आदि पेड़-पौधे भी नहीं उग पाते हैं, जिससे मानव, पशु व अन्य जीव-जन्तुओं के लिए ‘अकाल’ की स्थिति पैदा हो जाती है।

सूखा आपदा के कारण
सूखा आपदा के निम्नलिखित कारण हैं।

  • किसी क्षेत्र में वर्षा का बिल्कुल न होना या बहुत कम होना।
  • भूमिगत जल को अनियोजित व अनावश्यक रूप में खर्च करना, जिससे पेयजल की कमी हो जाती है।
  • वनों की अन्धाधुन्ध कटाई करना। वन वर्षा को नियमित रूप देने में प्रमुख | भूमिका निभाते हैं। वनों की कमी से वर्षा में भी कमी आ जाती है, जिससे सूखे की समस्या उत्पन्न हो जाती है।
  • अवैज्ञानिक ढंग से खनन कार्य करने से भी सम्बन्धित क्षेत्र में सूखे की समस्या हो जाती है।
  • नदी के मार्ग परिवर्तन से पुरातन नदी तटीय क्षेत्र में सूखे की समस्या उत्पन्न हो जाती है।
  • मिट्टी की संरचना में परिवर्तन होने से भी सम्बन्धित क्षेत्र में जल की कमी हो जाती है तथा पेड़-पौधे सूखने लगते हैं।

प्रश्न 3.
सूखे के परिणामस्वरूप क्या हानियाँ होती हैं? (2016, 18)
उत्तर:
सूखे के परिणामस्वरूप होने वाली हानियों/प्रभावों को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत वर्णित किया जा सकता है।

  • सूखा पड़ने पर फसलें बर्बाद हो जाती हैं, जिससे अन्न की कमी हो जाती है। इस स्थिति को अकाल कहा जाता है।
  • सूखा प्रभावित क्षेत्रों में चारे की कमी होने से मवेशियों की मृत्यु होने लगती है। कृषि कर्म में उपयोगी पशुओं की मौत से सर्वाधिक छोटे एवं सीमान्त किसान प्रभावित होते हैं, इसके अतिरिक्त दूध, मांस आदि की आपूर्ति भी प्रभावित होती है।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि कर्म पर आधारित होती है। अतः सूखे की स्थिति में बेरोजगारी वृद्धि दर में तेजी आती है। लोग रोजगार के अवसरों की तलाश में पलायन करने लगते हैं। अत: जनसंख्या असन्तुलन की समस्या उत्पन्न होने लगती है।
  • सूखे की स्थिति में लोगों की क्रयक्षमता कम हो जाती है, जबकि महँगाई में तेजी से वृद्धि होती है, इसका प्रभाव सम्पूर्ण वाणिज्य व्यवस्था पर पड़ता है।
  • कृषि आधारित कच्चे माल के उत्पादन में गिरावट आने से देश के औद्योगिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • सरकार को सूखे की स्थिति से निपटने के लिए विभिन्न उपायों पर धन व्यय करना पड़ता है। उदाहरणत: सरकार की सब्सिडी एवं आयात आदि पर व्यय बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय बचत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है एवं विकास कार्यों में ठहराव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  • पानी की कमी के कारण लोग दूषित जल पीने को बाध्य होते हैं। इसके परिणामस्वरूप पेयजल सम्बन्धी बीमारियाँ; जैसे-आन्त्रशोथ, हैजा और हेपेटाइटिस हो जाती हैं।

प्रश्न 4.
सूखे के प्रभावों का उल्लेख करते हुए उसके निवारण के उपाय लिखिए।
उत्तर:
सूखा आपदा निवारण के उपाय
सूखे से बचाव के लिए निम्नलिखित उपाय सम्भव हैं।

  • वर्षाजल का संरक्षण-संवर्द्धन, नदियों एवं नहरों के जल का समुचित उपयोग आदि माध्यमों से जल-प्रबन्धन आवश्यक है।
  • वृक्षारोपण के माध्यम से हरित पट्टी को विस्तार किया जाए।
  • कुओं, पोखरों एवं तालाबों को स्थानीय जन-सहयोग से पुनर्जीवित किया जाए।
  • नदी-जोड़ो परियोजना के माध्यम से बाढ़ एवं सूखा दोनों आपदाओं पर नियन्त्रण किया जा सकता है।
  • भूमि उपयोग नियोजन प्रणाली का निर्धारण क्षेत्र विशेष की आवश्यकताओं के अनुरूप किया जाना चाहिए।

प्रश्न 5.
भूस्खलन आपदा पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
भूस्खलन के कारण
भूस्खलन की घटना को प्रभावित करने वाले कारकों में भूआकृतिक कारक, ढाल, भूमि उपयोग, वनस्पति आवरण और मनव क्रियाकलाप प्रमुख भूमिका निभाते हैं। भूस्खलने की घटना प्रायः असंघटित चट्टानों एवं तीव्र ढालों पर अधिक होती है। भूमि का कटाव भी इसमें योगदान देता है।

भूस्खलन के प्रभाव

  • इसका प्रभाव स्थानीय होता है, किन्तु सड़क मार्ग में अवरोध, रेलपटरियों का टूटना और जल वाहिकाओं में चट्टानें गिरने से पैदा हुई रुकावटों के गम्भीर परिणाम हो सकते हैं।
  • भूस्खलन के कारण नदी मार्गों में बदलाव, बाढ़ का कारण बनता है।
  • विकास कार्यों की गति धीमी पड़ जाती है।

भूस्खलन आपदा के निवारण के उपाय
भूसखलन आपदा के निवारण के लिए निम्न उपाय लिए जा सकते हैं

  • भूस्खलन सम्भावी क्षेत्रों में बड़े बाँध बनाने जैसे निर्माण कार्यों पर प्रतिबन्ध होना चाहिए।
  • कृषि कार्य, नदी घाटी तथा कम ढाल वले क्षेत्रों तक सीमित होना चाहिए। पर्वतीय क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेत बनाकर कृषि करनी चाहिए।
  • वनीकरण को बढ़ावा देना चाहिए।
  • जल बहाव को कम करने के लिए छोटे अवरोधक बाँधों का निर्माण करना
    चाहिए।

प्रश्न 6.
आग लगने के सम्भावित कारणों का वर्णन करते हुए आग की घटनाओं से बचाव हेतु व्यवहार्य उपायों का सुझाव कीजिए।
उत्तर:
आग लगने के कारण
आग लगने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं।

  • ज्वलनशील पदार्थ एवं उपकरणों से आग लगने की सम्भावना अधिक रहती है। विद्युत हीटर, विद्युत प्रेस आदि इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
  • रसोईघर में चूल्हे के बर्नर का खुला रह जाना, स्टोव अथवा सिलेण्डर का फटना आदि घटनाएँ भी आग लगने का प्रमुख कारण होते हैं।
  • विद्युत धारा के प्रवाह में अनियमितता, बिजली की कमजोर वायरिंग अथवा बहुकेन्द्रीय एडाप्टर शॉर्ट सर्किट (लघु परिपथ) का कारण बनकर आग लगा सकते हैं।
  • शीघ्र आग पकड़ने वाले पैकिंग पेपर, पटाखे आदि में भी आग लगने की सम्भावना विद्यमान रहती है। असावधानीपूर्वक धूम्रपान का व्यवहार भी आग लगने का प्रमुख कारण माना जाता है।

आग से बचाव
आग की घटनाओं से बचाव हेतु निम्नलिखित उपायों को अपनाया जा सकता है।

  • घर के अन्दर ज्वलनशील पदार्थ रखने से बचना चाहिए यदि रखना आवश्यक ‘: हो तो पूरी सावधानी अपनानी चाहिए।
  • घर में आग बुझाने वाले सिलिण्डर को आवश्यक रूप से रखना चाहिए एवं सभी सदस्यों को इसका प्रयोग करना आना चाहिए।
  • घर से बाहर निकलते समय विद्युत तथा गैस उपकरणों को ध्यान से बन्द कर देना चाहिए एवं घर में प्रवेश करने पर सर्वप्रथम गैस आदि के रिसाव की जाँच कर लेनी चाहिए।
  • बिजली के एक सॉकिट से अनेक विद्युत उपकरणों को नहीं जोड़ना चाहिए अन्यथा शॉर्ट सर्किट होने की सम्भावना हो सकती है।
  • आग लगने के कारण को जानकर, तद्नुसार तत्काल आवश्यक कदम उठाना चाहिए। यदि बिजली के शॉर्ट सर्किट से आग लगी हैं, तो आग बुझाने में पानी का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  • आग लगने की घटना की सूचना तत्काल ही फायर बिग्रेड को दी जानी चाहिए।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (5 अंक, 100 शब्द)

प्रश्न 1.
भूकम्प आपदा द्वारा कौन-कौन सी हानियाँ होती हैं? (2017)
अथवा
प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव व उनसे बचने का उपाय लिखिए। (2017)
अथवा
हमारे समाज में भूकम्प का क्या प्रभाव पड़ता है? इससे बचने के उपायों को समझाइए। (2010)
अथवा
टिप्पणी कीजिए भूकम्प के प्रभाव तथा उससे बचने के उपाय। (2010)
उत्तर:
भूकम्प
पृथ्वी की आन्तरिक शक्तियों के प्रभाव के कारण से पृथ्वी के किसी भी भाग में होने वाले धीमे या भयंकर कम्पन को भूकम्प कहते हैं। जब पृथ्वी की आन्तरिक परतों में हलचल होती है, तो इसका प्रभाव पृथ्वी की सतह पर खड़ी इमारतों, सड़कों, पुलों, बाँधों आदि पर होता है, जिससे प्रभावित मानवों का जीवन भी अस्त-व्यस्त हो जाता है।

समाज में भूकम्प का प्रभाव
भूकम्प उन प्राकृतिक आपदाओं में से एक है, जिन्होंने हमारे समाज को सबसे अधिक दुष्प्रभावित किया है। वास्तव में, भूकम्प अनेक प्रकार की तबाही का कारण बनता है। भूकम्प से पृथ्वी की बाह्य परत पर भी कम्पन होता है, जिससे प्रभावित क्षेत्र के मकान, सड़कें, टावर, पुल, वन-क्षेत्र इत्यादि को क्षति पहुँचती है। बाँध टूटने से नदियों में बाढ़ आ जाती है, जिससे आस-पास के क्षेत्र भी डूबने लगते हैं।

इन सभी स्थितियों से जन-जीवन बुरी तरह प्रभावित होता है। बहुत-से लोग काल का ग्रास बन जाते हैं, तो बहुत-से जीवनभर के लिए अवसादग्रस्त हो जाते हैं। बहुत-से परिवार बिखर जाते हैं, बच्चे अनाथ हो जाते हैं। इसका सम्पूर्ण सामाजिक जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

प्रभावित क्षेत्रों में सुधार के प्रयासों में देरी होने पर महामारियाँ फैलने लगती हैं, जिसका प्रभाव जन-सामान्य पर पड़ता है। इस प्रकार भूकम्प से प्रभावित समाज के पुनर्वास में बहुत समय लग जाता है।

भूकम्प से बचाव के उपाय
यद्यपि भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदा को टाला नहीं जा सकता है, किन्तु इसके प्रभावों को शीघ्रता से कम अवश्य ही किया जा सकता है। इसके लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं।

  1. भूकम्प की आशंका होने पर, इसकी चेतावनी जारी कर देनी चाहिए, ताकि प्रभावित क्षेत्रों से लोगों को हटाया जा सके, इससे जान-माल के नुकसान को कम किया जा सकेगी।
  2. भूकम्प आने पर शीशे की खिड़की आदि नुकीली चीजों से दूर हट जाना चाहिए।
  3. भूकम्प आते ही घरों से बाहर आकर किसी खुले भाग में चले जाना चाहिए।
  4. खुला स्थान न मिलने पर मेज या पलंग के नीचे बैठ जाना चाहिए।
  5. मकान की दीवारों या भारी सामान से दूर हट जाना चाहिए।
  6. दरवाजों के पास खड़े होकर चौखट को पकड़ लेना चाहिए।
  7. भूकम्प आने पर खुले स्थान पर भी बिजली के तारों इत्यादि से दूर हट जाना चाहिए।
  8. भूकम्प से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में मकान लकड़ी के बनाए जाने चाहिए।

प्रश्न 2.
बाढ़ के प्रभाव तथा उससे बचने के उपाय लिखिए। (2011)
उत्तर:
बाढ़
जब नदी का पानी अपने प्रवाह क्षेत्र से बाहर निकलकर आस-पास के क्षेत्रों में फैल जाती है, तो उस स्थिति को ‘बाढ़’ कहते हैं। सामान्यत: वर्षा ऋतु में अधिक वर्षा के कारण नदियों में बाढ़ की स्थिति देखी जाती है। इसके अलावा बाँधों के टूटने से, नदी के मार्ग परिवर्तित करने आदि स्थितियों के कारण भी बाढ़ की स्थिति देखी जाती है।

बाढ़ के प्रभाव
बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है। यह अपने प्रभाव क्षेत्र में आने वाले क्षेत्रों को बुरी तरह प्रभावित कर देती है। बाढ़ के निम्नलिखित प्रभाव होते हैं।

  1. बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र में चारों ओर पानी-ही-पानी भरा होता है। पानी इमारतों, घरों, दफ्तरों, स्कूलों में भर जाता है, जिससे लोगों का जीवन अस्त व्यस्त हो जाता है।
  2. बाढ़ में डूबने से बड़ी संख्या में मानव जीवने व पशुओं की क्षति होती है।
  3. बाढ़ का सर्वाधिक प्रभाव बुजुर्गों व अपाहिज लोगों पर पड़ता है, जो अपना बचाव करने में सक्षम नहीं होते हैं।
  4. बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों में भोजन, पेयजल आदि दिन-प्रतिदिन की आवश्यक वस्तुओं की कमी हो जाती है। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों की शिक्षा भी कुप्रभावित होती है।
  5. अधिक समय तक पानी भरे रहने से सम्बन्धित क्षेत्रों में महामारी फैलने का डर बना रहता है। इसके अलावा मच्छर आदि का भी प्रकोप बढ़ जाता है।

बाढ़ आपदा निवारण के उपाय
बाढ़ आपदा निवारण के उपाय सामान्यत: तीन स्तरों में बाँटे जा सकते हैं, इनका विवरण निम्नलिखित है।

1. बाढ़ आपदा से पूर्व उपाय
बाढ़ सम्भावित क्षेत्रों में निम्नलिखित उपायों पर ध्यान देकर बाढ़ जैसी प्राकृतिक घटना को आपदा बनने से रोका जा सकता है।

  • बाढ़ सम्भावित क्षेत्रों में नदी जलमार्गों को सीधा रखने पर ध्यान देना चाहिए, नदियों के मार्ग बदलने से बाढ़ आने की आशंका अधिक रहती है।
  • स्थानीय स्तर पर कृत्रिम जलाशय बनाए जाने चाहिए, जिससे बाढ़ की स्थिति में जल को कृत्रिम जलाशय की ओर मोड़ा जा सके।
  • नदियों को आपस में जोड़ने की व्यवस्था की जानी चाहिए, इससे वर्षा के अधिक जल को कम जल क्षेत्र की ओर मोड़ा जा सकता है।
  • तटबन्धों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
  • पर्वतीय क्षेत्रों में बाढ़ आपदा को रोकने के लिए भूस्खलन पर नियन्त्रण आवश्यक है। अतः पर्वतीय क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण हेतु विस्फोटों का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे भूस्खलन की आशंकाएँ बढ़ती हैं।
  • नगर नियोजन के दौरान जल निकास व्यवस्था पर पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए। किसी भी प्रकार से जलधाराओं का प्राकृतिक मार्ग अवरुद्ध नहीं होना चाहिए।
  • नदियों, तालाबों व झीलों के निकट अतिक्रमण के द्वारा बसाव कार्यों पर पूर्ण रोक लगाई जानी चाहिए, जिससे बाढ़ द्वारा होने वाली क्षति न्यूनतम हो।
  • नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों पर सघन वृक्षारोपण का अभियान चलाया जाना चाहिए तथा वन विनाश को रोकने के लिए हर सम्भव उपाय किए। जाने चाहिए।

2. बाढ़ आपदा के दौरान उपाय
बाढ़ आपदा के दौरान निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए

  • जल बहाव के मार्ग में, सतह पर रेत के थैले रखे जाने चाहिए, जिससे सतह सुरक्षित रहे।
  • कमजोर इमारतों से निकलकर किसी सुरक्षित स्थान पर चले जाना चाहिए।
  • बाढ़ के दौरान पेड़ों पर चढ़ना खतरनाक साबित हो सकता है। घर की छतों का उपयोग बाढ़ के दौरान उपयुक्त हो सकता है।

3. बाढ़ आपदा के पश्चात् उपाय
बाढ़ आपदा के पश्चात् किए जाने वाले राहत कार्यों के अन्तर्गत निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

  • अपने घर तथा आस-पास के क्षेत्र की सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए एवं कीटनाशक दवाओं का प्रयोग किया जाना चाहिए।
  • युवा पीढ़ी को मिलकर स्थानीय स्तर पर वृक्षारोपण का अभियान चलाया जाना चाहिए, जिससे मिट्टी के कटाव की समस्या का स्थायी समाधान किया जा सके।
  • सरकारी स्तर पर प्राप्त हो रही सुविधाओं का लाभ उठाने हेतु, क्षेत्र के सम्बन्धित प्रशासनिक अधिकारी से अवश्य सम्पर्क स्थापित करना चाहिए।
  • बाढ़ के पश्चात् चारों ओर फैले हुए पानी पर कीटाणुनाशक दवाएँ छिड़कनी चाहिए, जिससे संक्रामक रोगों के प्रसार को रोका जा सके।

उल्लेखनीय है कि वर्तमान समय में बाढ़ के लिए प्राकृतिक कारणों की अपेक्षा मानवीय कारण अधिक प्रभावी होते जा रहे हैं। अतः आवश्यकता है कि हम पर्यावरण व्यवस्था को बनाए रखने पर विशेष ध्यान केन्द्रित करें। इससे बाढ़ प्रकोप की घटनाओं में अवश्य ही कमी आएगी।

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UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 16 दहेज समस्या एवं उसका उन्मूलन

UP Board Solutions for Class 12  Home Science Chapter 16 दहेज समस्या एवं उसका उन्मूलन are part of UP Board Solutions for Class 12  Home Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 12  Home Science Chapter 16 दहेज समस्या एवं उसका उन्मूलन.

Board UP Board
Class Class 12
Subject Home Science
Chapter Chapter 16
Chapter Name दहेज समस्या एवं उसका उन्मूलन
Number of Questions Solved 19
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 16 दहेज समस्या एवं उसका उन्मूलन

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
दहेज़ को ई में क्या कहते हैं।
(a) जहेज़
(b) वरदक्षिणा
(c) सौगात
(d) दान
उत्तर:
(a) जहेज़

प्रश्न 2.
दहेज़ वह धन, वस्तु अथवा सम्पत्ति है, जो एक स्त्री विवाह के समय पति के लिए लाती हैं। विवाह की यह परिभाषा विसवे द्वारा दी गई है?
(a) चार्ल्स विनिफ
(b) मैक्श रैडिन्
(c) वैतटर शब्दकोश
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) बेब्सटर शब्दकोश

प्रश्न 3.
निम्न में से कौन-सा एक कारण दहेज प्रथा का नहीं हैं।
(a) अंतर्विवाह
(b) महँगी शिधा प्रणाली
(c) अनुलोम विवाह
(d) शिक्षा का प्रसार
उत्तर:
(d) शिक्षा का प्रसार

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से दहेज प्रथा के उन्मूलन के उपायों में शामिल हैं।
(a) शिक्षा का प्रसार
(b) कानून के प्रति जागरूकता
(c) पानमत तैयार करना
(d) में सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 5.
दहेज रोधक अधिनियम बना था
(a) 1961 में
(b) 1562 में
(c) 1955 में
(d) 164 में
उत्तर:
(a) 1981 में

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
दहेज़ से क्या आशय है?
उत्तर:
विवाह के अवसर पर कन्या पक्ष द्वारा वर पक्ष को दिया जाने वाला, सम्पत्ति और सामान इत्यादि को ‘दहेज’ कहा जाता है।

प्रश्न 2.
दहेज़ देने का उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
नवविवाहितों के जीवन निर्वाह में मदद करने के उद्देश्य से ही दहेज दिया

प्रश्न 3.
वर मूल्य किसे कहते हैं?
उत्तर:
वह निश्चित धन या भेट, जो विवाह से पूर्व वा पक्ष द्वारा निश्चित की जाती है, जिसे विवाह से पहले या विवाह तक कन्या पक्ष को चुकाना होता है, बरमूल्य 
कहलाता है।

प्रश्न 4.
दहेज प्रथा के दोष के अन्तर्गत बेमेल विवाह को अति संक्षेप में 
समझाइए।
उत्तर:
अधिक दहेज न दे पाने के कारण माता-पिता अपनी कन्या का विष अवगुण व अपाहिज पुरुष के साथ कर देते हैं। सामान्य रूप में ये बेमेल विवाह

प्रश्न 5.
दहेज़ सम्बन्धी अपराध की सुनवाई कहीं की जाती है?
उत्तर:
दहेज सम्वन्धी अपराध की सुनवाई प्रदम श्रेणी का मजिस्ट्रेट ही कर सकता है तथा इस तरह की शिकायत लिवित होनी चाहिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1.
दहेज के अर्थ को स्पष्ट करते हुए इसके उद्देश्यों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:

दहेज का अर्थ

दहेज शब्द अरबी भाषा के बहे शब्द से रुपान्तरित हुआ है, जिसका अर्थ है-सौगात्। विवाह के अवसर पर कन्या पक्ष द्वारा वर पक्ष को दिया जाने वाला इन, सम्पत्ति और सामान ल्यादि को दहेज कहा जाता हैं। दहेज को उर्दू में जहेज़ कहते हैं। इसे हुण्डा या वरदक्षिणा आदि नामों में से भी जाना जाता हैं। वेव्सटर शब्दकोश के अनुसार, “दहेज वह पन, वस्तु अशा सम्पत्ति है, जो एक र विवाह के समय पति के लिए सातो हैं।”

दहेज का उद्देश्य

प्राचीनकाल से ही वधू के माता-पिता द्वारा वस्त्र, गहने एवं गृहस्थी का कुछ सामान भेंट करते थे, जिसका मूल उद्देश्य वर-वधू की नई गृहस्थी को सुचारु रूप से चलाने में सहायता करना था। वर्तमान युग में दहेज नवविवाहितो के वन निर्वाह में मदद करने के उद्देश्य से ही दिया जाता है।

प्रश्न 2.
दहेज प्रथा के कारणों का उलेख कीजिए।
उत्तर:
दहेज प्रथा आज जिस विकृत रूप में व्याप्त है, उसके प्रमुख कारण इस प्रकार हैं।

  1. अनुलोम विवाह अनुलोम विवाह के चलन से उच्च कुलों के घर की माँग बड़ती गई। उच्च कुलो के लड़कों के पिता ऐसी स्थिति में बड़ी धनराशि की मांग करने लगे।
  2. अत्तर्विवाह अन्तविवाह के नियम के कारण किसी भी कन्या का विवाह जुम की जाति अथवा उपति पर। के शाप होना आवश्यक हो गया। इस कारण विवाह का क्षेत्र सीमित हो गया। योग्य वरों की कम संख्या में दहेज को बढ़ावा दिया।
  3. विवाह की अनिवार्यता कन्या विवाह को अनिवार्य मान गया है। इसलिए उनका विवाह करना जरूरी हो गया। धीरे धीरे योग्य वरो की तलाश में धन को खर्च किया जाने लगा।
  4. धन के महत्व में वृद्धि बर्तमान समय में भौतिकदी विचारधारा के कारण पन का महत्व बढ़ गया। इससे दहेज प्रथा और भी सशकत हो गई।
  5. महँगी शिक्षा प्रणाली माता-पिता अपने बच्चों पर काफी पैसा खर्च करते है, फिर माता-पिता विवाह द्वारा इसकी पूरी का प्रयास करते हैं, जिसके फलस्वरूप यह दहेज प्रथा में परिवर्तित हो जाता है।

प्रश्न 3.
दहेज के विकृत रूप को समझाइए।
अथवा
वर्तमान समय में दहेज की प्रथा किस प्रकार विकसित हुई है?
उत्तर:
पुराने समय से प्रारम्भ हुई दहेज की परम्परा आर पूर्णरूप से विकसित हो गई है। अर्थात् आज इस प्रदा ने विकराल रूप धारण कर लिया है, इसलिए अब इसे र मूल्य कहना अधिक उपयुक्त होगा, क्योंकि योग्य, समृद्ध एवं उच्च शिक्षा प्राप्त वर के लिए अधू के माता-पिता को वर मूल्य देना पड़ता है। दूसरे शब्दों में, वर-मूल्य वह निश्चित धन या भेट हैं, जो विवाह के पहले वर पक्ष द्वारा निश्चित किया जाता है, जिसे विवाह से पूर्व या विवाह तक कन्या पश को चुकाना होता है, इसलिए आज विवाह बन्धन पवित्रता का बन्धन नहीं, बल्कि देवानी का सापत्र बन गया है।

प्रश्न 4.
अन्तर्विवाह द्वारा दहेज़ प्रथा को किस प्रकार बढ़ावा मिला हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अन्तर्विवाह के नियम के कारण किसी भी कन्या को मिला उसी की जाति अपवा उपजाति के पुरुष के आप होना आवश्यक हो गया। इस कारण हि का क्षेत्र सीमित हो गा, जिससे विशाह के लिए योग्य वरों की कमी हो गई। अब योग्य वर देने के लिए अधिक धन खर्च करने की आवश्यकता महसूस की गई। इससे दहेज की प्रथा को प्रोत्साहन मिला। योग्य और समय पर भी विवाह के लिए एक निश्चित धनराशि के साथ वस्त्र एवं आभूषणों तथा अन्य उपहारों को माँग करने लगें, ताकि अधिक-से-अधिक धन की प्राप्ति विषाह में मिलने वाले दहेज से हो सके। यदि इस निश्चित धनराशि को कन्या पक्ष देने में असमर्थ होता हैं, तो विवाह सम्म तोड़ दिया जाता है। कई बार तो तलाक जैसी घटनाएं भी देखने को मिल जाती हैं और यदि कन्या पक्ष इस निश्चित धनराशि का भुगतान करता है, तो सड़की के माता पिता या अभिभावक जीवनभर संघर्ष करते रहते हैं, लेकिन प्रत्येक माता-पिता अपनी कन्या के लिए अच्छे-से-अप्डे वर ढूंढना चाहते है, जिसके लिए वधू-मूल्य अधिक देना।

प्रश्न 5.
दहेज प्रथा के प्रमुख दोषों का वर्णन कीजिए। धनी दहेज प्रथा की हानियाँ लिखिए। 
(2018)
उत्तर:
दहेज प्रथा के कारण समाज में अनेक दोष व्याप्त है, जो निम्नलिखित हैं।

  1. पारिवारिक संपर्ष दहेज प्रथा अनेक पारिवारिक संघ से तनालों को जन्म देती हैं। दहेज कम मिलने पर नववधू को तरह-तरह के कष्ट दिए जाते हैं। उन्हें हर समय दहेज का उलाहना दिया जाता है, इससे नववधुओं में हीनता की भावना का जन्म होता है।
  2. ऋणग्रस्तता, आत्महत्या, शिशु हत्या मध्यमवर्गीय परिवारों में कन्या विवाह के लिए व की रकम जुटाना कठिन होता है। इसके लिए उन ची मात्रा में ऋण होना पड़ता है और परिवार अनपस्त हो जाता है। कभी व्यक्ति निन्दा के भय से आमहत्या कर लेता है, तो कभी कन्या शिशु को हत्या भी कर दी जाती है।
  3. बेमेल विवाह अधिक दहेज न दे पाने के कारण माता-पिता अपनी कन्या का विवाह अवगुण, अपाहिज पुरुष के साथ कर देते हैं। ये सामान्य रूप से बेमेल विवाह होते हैं।
  4. अविवाहित लड़कियों की संख्या में वृद्धि दहेज न दे पाने के कारण बहुत-सी सङ्गलियाँ अवाहित हू जाती हैं।
  5. अनेक समस्याओं को जन्म दहेज के कारण हिंसा, हत्या, चोरी आदि होने लगी हैं, क्योंकि व्यक्ति कैसे भी हो इहेव उजुटाना चाहता है, साथ ही दहेज हत्या तथा बहू जला देने की घटनाएँ भी होती हैं।

प्रश्न 6.
दहेज़ निषेद्य अधिनियम, 1961 की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
अधमरा दहेज़ प्रथा को समाप्त करने के लिए वर्ष 1961 के अधिनियम की प्रमुख शर्ते 
क्या थी?
उत्तर:
दहेज प्रथा को समाप्त करने के लिए वर्ष 1961 में एक विधेयक पारित किया गया, जिसे दहेज निरोधक अधिनियम’ के नाम से जाना जाता है। इस अधिनियम के अनुसार दहेज लेना और देना दण्डनीय अपराध है। अधिनियम 1961 में कुछ मुख्य शर्ते में शामिल है, जो इस प्रकार है

  1. विवाह के पूर्व या बाद में जिन वस्तुओं की माँग की जाएगी, वे दहेज के दायरे में आती हैं।
  2. दो हजार रुपये तक के उपहार देने की क्रूट हैं, जिनमें वस्त्र जपा आभूषण शमिल हैं।
  3. विवाह के पहले या बाद में मिली वस्तुओं पर पूर्णरूप से लड़की का अधिकार होगा।
  4. दहेज देने और लेने के लिए 8 माह का कारस और ₹ 5,000 के इण का प्रधान है।
  5. दहेज सम्बन्धी अपराध की सुनवाई प्रथम श्रेणी का मजिस्ट्रेट ही कर सकता है तथा इस तरह की शिकायत लिक्षित होनी चाहिए।

प्रश्न 7.
अधिनियम, 1961 के अन्तर्गत 1844 में पर्याप्त संशोधन 
किए गए, जिनमें प्रमुख बातें क्या थीं? समझाए।
उत्तर:
अधिनियम, 1981 को धारा 2 के अन्तर्गत ‘दहेज निषेध अधिनियम, 1984 और 1988 के तौर पर संशोधित किया, इसमें निम्नलिखित माता को दया गया है।

  1. ‘विवाह निश्चित करने हेतु दहेज के रूप में शर्त रखी जाए’ के स्थान पर विवाह के सम्बन्ध में जो भी कुछ दहेज मिले’ वाक्य जोड़ दिया गया।
  2. अभिभावक या सम्बन्धिों से मिलने वाले उपहार उनकी आर्थिक स्थिति के अनुपात में मिलने चाहिए।
  3. कारावास की सजा अधिकतम 10 वर्ष तथा जुर्माने की राशि ₹ 15000 सी गई या माँगी गई, दोनों रकम में से जो भी अधिक हो, मानी जाएगी।
  4. अपराधी को बिना बारष्ट के भी पकड़ा जा सकता है।
  5. यदि ऐसा नहीं किया जाता है, तो 6 महीने में 2 वर्ष की सजा तथा ₹ 10,000 तक का जुर्माना किया जा सकता है।
  6. यदि वधू नाबालिग हैं, तो उसके बालिग होने के तौन महीने के अन्दर सम्पत्ति को हस्तान्तरित करना होगा।
  7. यदि ऐसा नहीं किया जाता है, तो 6 महीने में 2 वर्ष की सजा तथा ₹ 10,000 तक का जुर्माना किया जा सकता है।
  8. पत्नी की मृत्यु के बाद उसके हिस्से को सम्पत्ति का अधिकार उसके उत्तराहारियों को होगा।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)

प्रश्न 1.
दहेज प्रथा क्या है? इसके कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
हिन्दू विवाह से सम्बन्धित समस्याओं में दहेज प्रथा एक प्रमुख समस्या मान जाती है। यह आजकल गम्भीर रूप धारण करती जा रही हैं। आज यह समस्या तन। गम्भीर हो गई है कि यार के कारण नवविवाहित स्त्रियों को जला देने के सामाधार आए दिन आते रहते हैं। दहेज का अर्थ सामान्यतः उस राशि, वस्तुओं या सम्पत्ति से लगाया जाता है, जिसे कन्या पक्ष विवाह के अवसर पर वर पक्ष को प्रदान करता है। बेसटर शब्दकोश के अनुसार, “दहेज वह धन, वस्तु अशा सम्पत्ति है, जो एक स्त्री विवाह के समय पति के लिए लाती है।”

दहेज प्रथा के कारण

दहेज प्रथा जिस विकृत रूप में आज है, उस रूप में वह हिंदू समाज में कभी नहीं रही। दहेज प्रथा के कारण इसके लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या 2 देखें।

 

प्रश्न 2.
दहेज प्रथा के उन्मूलन की विवेचना कीजिए।
अथवा
भारतीय समाज में दहेज प्रथा के दुष्परिणामों पर प्रकाश डालते हुए इसके उन्मूलन हेतु उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दहेज प्रथा के दोष इसके लिए लघु उत्तरीय प्रश्न सं. 5 देखें।

दहेज प्रथा के उन्मूलन के उपाय/सुझाव

दहेज प्रथा के उन्मूलन के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. शिक्षा का प्रसार दहेज प्रथा को समाप्त करने हेतु शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार किया जाए, ताकि लोग इस बुराई को पहचान कर इसे समाप्त करे।
  2. अन्तर्जातीय तथा प्रेम विवाह को प्रोत्साहन अन्तर्जातीय तथा प्रेम विवाह होने से योग्य वर ढूँढने में आसानी होगी। इससे दहेज प्रथा को समाप्त किया जा सकेगा, क्योंकि इससे विवाह क्षेत्र का विस्तार होगा, जिससे अधिक दहेज नहीं देना पड़ेगा।
  3. लड़की का आत्मनिर्भर बनना लड़कियों को आत्मनिर्भर बनना भी दहेज रोकने का एक अच्छा उपाय हैं। लड़कियों के आत्मनिर्भर बनने से भी दहेज की माँग में कमी आएगी।
  4. कानून के प्रति जागरूकता दहेज उन्मूलन में कानून भी सहायक हो सकता है, इसलिए कानून के प्रति जागरूकता लाना भी आवश्यक है, जिससे दहेज के प्रति झुकाव कम रहे।
  5. जीवनसाथी के चुनाव को स्वतन्त्रता लड़के-लड़कियों को औवन साथी के चुनाव करने की स्वतन्त्रता होना चाहिए, जिससे दहेज और प्रथा का अना हो सका।
  6. जनमत तैयार करना दहेज प्रथा के विरुद्ध जनमत तैयार किया आना चाहिए, जिससे लोग स्वयं इसी बुराई को समझ सके

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UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi सामाजिक व सांस्कृतिक निबन्ध

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Samanya Hindi
Chapter Name सामाजिक व सांस्कृतिक निबन्ध
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi सामाजिक व सांस्कृतिक निबन्ध

भारतीय समाज में नारी का स्थान

सम्बद्ध शीर्षक

  • भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति
  • आधुनिक भारत में नारी का स्थान
  • आधुनिक नारी
  • स्वातन्त्र्योत्तर भारत में महिलाओं की स्थिति
  • भारतीय नारी: आज और कल
  • नारी सम्मान: भारतीय संस्कृति की पहचान
  • नारी-चिन्तन को बदलता स्वरूप

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भारतीय नारी की समस्याएँ

सम्बद्ध शीर्षक

  • कामकाजी महिलाओं की समस्याएँ
  • आधुनिक समाज में नारी की समस्याएँ

प्रमुख विचार-बिन्दु

  1. प्रस्तावना : वैदिक काल में नारी,
  2. मध्यकाल में नारी,
  3. आधुनिक काल में नारी,
  4. संविधान द्वारा दिये गये अधिकार,
  5. कामकाजी महिलाओं की समस्याएँ,
  6. कामकाज से इतर महिलाओं की समस्याएँ,
  7. उपसंहार

प्रस्तावना : वैदिक काल में नारी-भारत में महिलाओं का स्थान कुछ वर्षों पहले तक घर-परिवार की सीमाओं तक ही सीमित माना जाता रहा है। प्राचीन भारत में नारी के पूर्ण स्वतन्त्र तथा सभी प्रकार के दबावों से पूर्ण मुक्त रहने के विवरण मिलते हैं। उस समय वे अपनी पारिवारिक स्थिति के अनुसार इस प्रकार की शिक्षा प्राप्त किया करती थीं; क्योंकि तब शिक्षा-प्रणाली आश्रम-व्यवस्था पर आधारित थी। इस कारण नारियाँ भी उन आश्रमों में पुरुषों के समान रहकर ही शिक्षा प्राप्त किया करती थीं। गार्गी, मैत्रेयी, अरुन्धती जैसी महिलाओं के विवरण भी मिलते हैं कि वे मन्त्र-द्रष्टा थीं। अपने पतियों के साथ आश्रमों में रहकरवहाँ की सम्पूर्ण व्यवस्था की, वहाँ रहने वाले अन्य स्त्री-पुरुष व विद्यार्थियों; यहाँ तक कि आश्रमवासी पशु-पक्षियों तक की वे देखभाल किया करती थीं। महर्षि वाल्मीकि और कण्व के आश्रमों में भी नारियों के निवास के विवरणं मिलते हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि वैदिक काल में नारी सुरक्षित तो होती ही थी, प्रत्येक प्रकार से स्वतन्त्र भी हुआ करती थी। फिर भी ऐसे विवरण कहीं नहीं मिलते कि घर-गृहस्थी चलाने के लिए उसे कहीं काम करके धनोपार्जन भी करना पड़ता था। गृहस्वामिनी एवं माँ के रूप में उसे पिता एवं आचार्य से भी उच्च स्थान प्राप्त था। महाभारत में उल्लेख भी है कि “गुरुणां चैव सर्वेषां माता परमं को गुरुः।”

मध्यकाल में नारी–इतिहास के अध्ययन से स्पष्ट है कि मध्यकाल में आकर नारी पूर्णरूपेण घरपरिवार की चारदीवारी में बन्द होकर रह गयी थी। यह काल नारियों के लिए अवनति का काल था। भोग-विलास की प्रवृत्ति बढ़ जाने के कारण नारी के शारीरिक पक्ष को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा। मध्यकालीन कुरीतियों में सती–प्रथा, बाल-विवाह और विधवाओं को हेय दृष्टि से देखना प्रमुख थीं । इस काल के सन्तों एवं सिद्ध कवियों ने भी नारी के प्रति अत्यन्त कटु दृष्टिकोण अपनाया—

नारी तो हम भी करी, जाना नहीं बिचार।।
जब जाना तब परिहरी, नारी बड़ा बिकार॥
नारी की झाँई परत, अंधा होत भुजंग।
कबिरा तिन की कौन गति, जेनित नारी के संग ।।।

(कबीरदोस)

आधुनिक काल में नारी-अंग्रेजों के आगमन के बाद, कुछ उनके और कुछ उनकी चलाई शिक्षादीक्षा के, कुछ यहाँ चलने वाले अनेक प्रकार के शैक्षणिक, सामाजिक और राजनीतिक आन्दोलनों के प्रभाव से भारतीय नारी को घर-परिवार से बाहर कदम रखने का अवसर मिला। इस काल में महान् समाज-सुधारक’राजा राममोहन राय ने सती–प्रथा की समाप्ति, विधवाओं के पुनर्विवाह, स्त्री-शिक्षा आदि पर जोर दिया। महात्मा गाँधी मे अछूतोद्धार की भॉति नारी मुक्ति के लिए भी प्रयास किया। समाज-सुधारकों के सामूहिक प्रयास, देश में सामाजिक और राजनीतिक चेतना के प्रादुर्भाव, पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव तथा प्रगतिशील विचारधा ने नारी दासता की बेड़ियों को काटा और वह मुक्ति की ओर अग्रसर हुई। आज नारी जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त है। वह राजनीतिज्ञ, राजनयिक, विधिवेत्ता, न्यायाधीश, प्रशासक, कवि, चिकित्सकै आदि के रूप में समाज को अपना योगदान दे रही है।

संविधान द्वारा दिये गये अधिकार स्वतन्त्रता मिलने के पश्चात् लागू भारतीय संविधान में (अनुच्छेद 14 और 15) पुरुषों और स्त्रियों की पूर्ण समानता की गारण्टी दी गयी तथा लैंगिक आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव न करने की बात कही गयी। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 में लड़की को लड़के के समान सह-उत्तराधिकारी बना दिया गया। हिन्दू विवाह अधिनियम, 1956 ने विशेष आधारों पर विवाह के सम्बन्ध को समाप्त करने की अनुमति दी। दहेज को अवैध घोषित किया गया तथा इसके लिए सजा की व्यवस्था की गयी। दहेज की विकरालता को देखते हुए सन् 1961 में एक दहेज विरोधी कानून बनाया गया।

बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में नारी ने लगभग प्रत्येक आन्दोलन में पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर योगदान दिया है तथा समाज की प्रत्येक समस्या के विरुद्ध अपनी आवाज उठायी है। शोषण की घटनाओं के विरुद्ध तो उसने शक्तिशाली प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की हैं। यह इस बात का संकेत है कि महिलाओं में पर्याप्त जागरूकता आयी है। नारियों को विभिन्न स्तरों पर आरक्षण देने की बातें हो रही हैं, परन्तु संविधान में यह व्यवस्था अभी तक नहीं की जा सकी है।

कामकाजी महिलाओं की समस्याएँ--अभाव और महँगाई से दो-चार होने के लिए महिलाओं को कुछ मात्रा में स्वतन्त्रता-प्राप्ति से पहले और अधिकतर स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद कई तरह के काम-काज का भी सहारा लेना पड़ा। पुरुषों एवं महिलाओं को एक वर्ग यह समझता है कि कामकाजी नारी की समस्त समस्याएँ समाप्त हो जाती हैं। नौकरी मिलते ही नारी नारीत्व के अभिशापों से मुक्त हो जाती है, परन्तु वस्तुस्थिति सर्वथा भिन्न है, यथा—

(1) नारी कामकाजी महिला बनने का निर्णय लेने में स्वतन्त्र नहीं होती है। विवाह के पहले माता-पिता और बाद में ससुरालीजनों की इच्छा पर निर्भर रहता है कि वह कामकाजी बनी रहे अथवा नहीं।
(2) कामकाजी होने पर भी महिला आर्थिक दृष्टि से स्वतन्त्र नहीं बन पाती है। उसको अपनी कमाई का हिसाब घरवालों को देना पड़ता है। प्राय: यह भी देखने में आता है कि ससुराल वाले विवाह के पूर्व की जाने वाली उसकी कमाई का भी हिसाब माँगते हैं।
(3) दोहरी जिम्मेदारी कामकाजी महिलाओं को नौकरी से लौटकर घरेलू, कार्य करने पड़ते हैं। अत: एक अतिरिक्त जिम्मेदारी सँभालकर भी कामकाजी महिलाएँ अपनी पूर्व जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो पायी हैं।
(4) बच्चों की परवरिश-कामकाजी महिलाओं के पास बच्चों को देने के लिए समय का अभाव होता है। फलतः उनके बच्चे संस्कारित नहीं हो पाते और उनका भविष्य बिगड़ जाने की सम्भावना रहती है।
(5) समाज में बदनामी-आधुनिक युग में भी स्त्रियों को नौकरी करना उचित नहीं माना जाता। बहू को नौकरी नहीं करने देने के लिए सास-ससुर, देवर-ज्येष्ठ और पति तक भी तनकर खड़े हो जाते हैं।
(6) परिजनों का शक-नौकरी-पेशा करने वाली महिलाएँ चरित्र के प्रति सन्देह की समस्या से कभी नहीं उबर पाती हैं। कार्यालय में किसी भी कारण से थोड़ी भी देर हो जाए तो परिजनों, विशेषकर पति की शक की निगाहें उसे अन्दर तक बेध डालती हैं। यह समस्या उस वक्त और भी बढ़ जाती है, जब महिला कोई स्टेनो या सेक्रेटरी हो।
(7) यौनशुचिता-आज भी स्त्री की सबसे बड़ी समस्या उसकी यौन शुचिता है। ऑफिस में किसी भी मुस्कराहट या स्पर्श से भी वह दूषित हो जाती है। यौन शुचिता का यह परिवेश नारी को खुलकर कार्य करने से रोकता है तथा उसकी प्रतिभा को कुण्ठित करता है।
(8) यौन-शोषण-सरकारी कार्यालयों में कार्य करने वाली महिलाएँ पूर्ण तो नहीं, किन्तु अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं। सरकारी कार्यालयों में कार्यरत महिलाओं के भी यौन-शोषण होते हैं, किन्तु निजी संस्थानों में अथवा मजदूरी करने वाली महिलाओं की दशा तो अत्यधिक दारुण है।
(9) वरीयता का मापदण्ड योग्यता नहीं--प्राइवेट संस्थानों के रोजगार विज्ञापनों में स्मार्ट, सुन्दर वे आधुनिक महिलाओं की वरीयता यह प्रश्न खड़ा करती है कि कार्यक्षमता के आधार पर आगे बढ़ने वाले। निजी संस्थानों का काम क्या स्मार्ट, सुन्दर व आधुनिक महिलाएँ ही सँभाल सकती हैं ? योग्यता कोई मापदण्ड नहीं? यह भी एक बीमारे मानसिकता की परिचायक है।
(10) परिधान कामकाजी महिलाओं के लिए परिधान (ड्रेस) बहुत बड़ी समस्या रहती है। वह जरा-सी भी सज-सँवर करके चले तो उस पर फब्तियाँ कसी जाती हैं, उसको तितली अथवा फैशन परेड की नारी कहा जाता है।
(11) पुरुषों की अपेक्षा सौतेला व्यवहार–महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा कम वेतन दिया जाता है। तथा पुरुषों की तुलना में इनके साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है। पहले विमान परिचारिकाओं के गर्भवती होते ही उन्हें सेवा-मुक्त कर दिया जाता था। लम्बे संघर्ष के उपरान्त अब विमान परिचारिकाओं ने माँ बनने का अधिकार पाया है।
(12) बाहरी दौरे कार्य के लिए अपने गृह जिले के बाहर जाना भी कामकाजी महिलाओं की एक प्रमुख समस्या है। घर की जिम्मेदारी, शील व गरिमा की चिन्ता, पति व बच्चों से आत्मीयता आदि उसे दौरे पर जाने से रोक देते हैं।
(13) रात्रि ड्यूटी–कामकाजी महिलाओं के लिए रात्रि ड्यूटी करना बहुत कठिन होता है। लोगों की शक की निगाहें मुसीबत कर देती हैं। अस्पतालों में रात्रि की पारी में काम करने वाली नर्से, बड़े होटलों में काम करने वाली महिलाएँ अपनी ड्यूटी सुरक्षित निकालकर सुकून का अनुभव करती हैं।
(14) नारी की नौकरी यदि पति की अपेक्षा श्रेष्ठ होती है तो उसको पति की हीन भावना का भी शिकार होना पड़ता है।
(15) नौकरी करते हुए पति-पत्नी एक ही स्थान पर कार्यरत रहें, तब तो कुछ ठीक है, अन्यथा उनको दाम्पत्य तथा गृहस्थ जीवन समाप्त हो जाते हैं, वैसे भी कामकाजी महिलाओं की गृहस्थी अव्यवस्थित तो हो ही जाती है।
(16) कुछ कामकाजी महिलाओं के लिए तो नौकरी अभिशाप बन जाती है। ऐसा प्रायः उन महिलाओं के साथ होता है, जिनके पतियों की आमदनी कम होती है, अथवा पति शराबी व कुमार्गी होते हैं। ऐसे पति अपनी पत्नी की आमदनी को भी उड़ाने के लिए पत्नी को भाँति-भाँति से उत्पीड़ित एवं प्रताड़ित करते हैं।

कामकाज से इतर महिलाओं की समस्याएँ-सुधारों की गर्जना तथा संवैधानिक प्रयास नारी की मौलिक समस्याओं को सुलझा नहीं सके हैं। संविधान ने नारी को मताधिकार एवं सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार प्राप्त करने का अधिकार दे दिया है, परन्तु समाज की दृष्टि में नारी को आज भी पुरुष की अंकशायिनी और दासी ही माना जाता है। हम आज भी अनेकानेक नारियों के उत्पीड़न, आत्मदाह तथा उनकी हत्या के समाचार सुनते रहते हैं। इनमें नौकरी करने वाली यानी कामकाजी महिलाएँ भी सम्मिलित हैं। आज भी.दहेज का दानव नारी के जीवन को त्रस्त किये हुए है। विधवा-विवाह के नाम पर आज भी लोग नाक-भौंह सिकोड़ते हैं। नारी की उन्नति के नाम पर हम कितनी भी बातें करें, परन्तु नारी आज भी उपेक्षित है। वह घर-परिवार में एक सामान्य नारी से अधिक कुछ नहीं है। आज भी गर्भ में बच्ची (लड़की) को मार दिया जाता है तथा प्रसूति के समय दूषित प्रकृति का शिकार होना पड़ता है। अपनी रक्षा के लिए मुस्तैद नारी पर लोग तरह-तरह की फब्तियाँ कसते हैं।

उपसंहार–महिला हो या पुरुष, काम करना किसी के लिए भी अनुचित या बुरा नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि समाज की मानसिकता, घर-परिवार और समूचे जीवन की परिस्थितियाँ ऐसी बनायी जाएँ, ऐसे उचित वातावरण का निर्माण किया जाए कि कामकाजी महिला भी पुरुष के समान व्यवहार और व्यवस्था पा सके। नारियों की समस्याओं के निराकरण के लिए फैमिली कोर्ट बनाये जाने चाहिए और उनके प्रति किये जाने वाले आपराधिक मामलों में तकनीकी नहीं, व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। दहेज, बलात्कार, अपहरण आज की नारी के सामने बहुत बड़ी चुनौतियाँ हैं। नारियों के समर्थन में किये ज़ाने वाले हमारे आन्दोलन पश्चिम के अन्धानुकरण को लेकर नहीं होने चाहिए। उनको भारतीय गृहिणी के आदर्शों के अनुरूप ढालने का प्रयास करना चाहिए। पाश्चात्य चिन्तन के अन्धानुकरण से इस देश की नारियों को भी जल्दी-जल्दी तलाक, अवैध शिशु-जन्म आदि समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि जब तक नारी के प्रति समाज के दृष्टिकोण में बदलाव नहीं आएगा, तब तक नारी का जीवन त्रस्त ही बना रहेगा। भारतीय नारी की मुक्ति के लिए सांस्कृतिक आन्दोलन की आवश्यकता है, संविधान और कानून तो उसमें सिर्फ मददगार हो सकते हैं।

वर्तमान समाज पर दूरदर्शन

सम्बद्ध शीर्षक

  • दूरदर्शन : एक वरदान अथवा अभिशाप
  • मेरे जीवन पर दूरदर्शन का प्रभाव
  • दूरदर्शन : गुण एवं दोष का प्रभाव
  • दूरदर्शन और भारतीय समाज
  • दूरदर्शन : लाभ-हानि
  • दूरदर्शन और आधुनिक जीवन
  • दूरदर्शन का शैक्षिक उपयोग

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UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 7 अनुक्रमणिका या सूची

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 7 अनुक्रमणिका या सूची are the part of UP Board Solutions for Class 10 Commerce. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 7 अनुक्रमणिका या सूची.

Board UP Board
Class Class 10
Subject Commerce
Chapter Chapter 7
Chapter Name अनुक्रमणिका या सूची
Number of Questions Solved 18
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 7 अनुक्रमणिका या सूची

बहुविकल्पीय प्रश्न ( 1 अंक)

प्रश्न 1.
पत्र-पुस्तक अनुक्रमणिका का प्रयोग होता है।
(a) छोटे व्यवसाय में
(b) बड़े व्यवसाय में
(c) सहकारी समितियों में
(d) इन तीनों में
उत्तर:
(d) छोटे व्यवसाय में

प्रश्न 2.
पुस्तकालय के लिए कौन-सी अनुक्रमणिका का प्रयोग किया जाता है?
(a) खुली अनुक्रमणिका
(b) स्वरात्मक अनुक्रमणिका
(c) कार्ड अनुक्रमणिका
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(c) कार्ड अनुक्रमणिका

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प्रश्न 3.
‘संकेत काई’ का प्रयोग किया जाता है।
(a) कार्ड अनुक्रमणिका में
(b) जिल्ददार पुस्तक सूची में
(c) ‘a’ और ‘b’ दोनों में
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(a) कार्ड अनुक्रमणिकां में

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
अनुक्रमणिका के अभाव की कोई एक कठिनाई लिखिए।
उत्तर:
ग्राहकों से प्राप्त आदेशों की पूर्ति (UPBoardSolutions.com) में कठिनाई बनी रहती है।

प्रश्न 2.
पहले और बाद वाले पत्रों का सन्दर्भ देने वाली अनुक्रमणिका कौन-सी होती हैं?
उत्तर:
शृंखला अनुक्रमणिका

प्रश्न 3.
कार्ड अनुक्रमणिका का आविष्कार किस विद्वान ने किया था?
उत्तर:
ऐबे जीन रोजियर

प्रश्न 4.
बैंक में नमूने के हस्ताक्षर के लिए कौन-सी अनुक्रमणिका उपयुक्त है?
उत्तर:
कार्ड अनुक्रमणिका

प्रश्न 5.
दृश्य कार्ड सूची की मुख्य विशेषता क्या है?
उत्तर:
इसमें अनेक कार्ड एक साथ देखे जा सकते हैं।

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1.
अनुक्रमणिका के चार लाभ या महत्त्व बताइए। (2014, 12)
उत्तर:
अनुक्रमणिका के चार लाभ या महत्त्व निम्नलिखित हैं-

  1. अनुक्रमणिका पत्रों को निश्चित क्रम में रखने की सुविधा प्रदान करती है।
  2. अनुक्रमणिका खड़ी फाइलिंग के लिए अनिवार्य होती है।
  3. अनुक्रमणिका पत्रों को फाइल करने में सुविधा प्रदान करती है।
  4. अनुक्रमणिका द्वारा पत्रों एवं महत्त्वपूर्ण प्रलेखों को सुरक्षित रखा जा सकता

प्रश्न 2.
अनुक्रमणिका की विभिन्न विधियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
अनुक्रमणिका की विभिन्न विधियों के नाम निम्नलिखित हैं-

  1. साधारण/पत्र-पुस्तक या वर्णात्मक अनुक्रमणिका
  2. स्वरात्मक अनुक्रमणिका
  3. श्रृंखला अनुक्रमणिका
  4. कार्ड अनुक्रमणिका
  5. दिखने वाली (खुली/दृश्य) कार्ड अनुक्रमणिका
  6. चक्रीय अनुक्रमणिका

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प्रश्न 3.
शृंखला अनुक्रमणिका क्यों बनाई जाती है?
उत्तर:
शृंखला अनुक्रमणिका या सूची एक ऐसी पद्धति है, जिसकी सहायता से किसी ग्राहक को अलग-अलग तिथियों पर लिखे गए पत्रों की ऐसी जानकारी एक ही पृष्ठ पर प्राप्त हो जाती है कि पत्र विशेष से पहले के पत्रों व आगे के पत्रों की प्रतिलिपि किन (UPBoardSolutions.com) पृष्ठों पर दी गई है, जिससे पुराने पत्रों को सरलता से प्राप्त किया जा सके। इस उद्देश्य से श्रृंखला अनुक्रमणिका बनाई जाती है।

प्रश्न 4.
कार्ड अनुक्रमणिका क्या है? इसके दो गुणों का उल्लेख कीजिए। (2014)
उत्तर:
कार्ड अनुक्रमणिका इस अनुक्रमणिका में संकेत कार्डों का प्रयोग किया जाता है तथा प्रत्येक ग्राहक के लिए एक कार्ड बना दिया जाता है, जिस पर उसका नाम, पता एवं सूचनाएँ स्पष्ट रूप से लिख दी जाती हैं। बैंक में नमूने के हस्ताक्षर के लिए भी इसी अनुक्रमणिका का प्रयोग किया जाता है। इसके लिए विभिन्न वस्तुओं की आवश्यकता होती है; जैसे-दराजदार अलमारी, नाम कार्ड, संकेत कार्ड, अनुपस्थिति कार्ड, आदि। कार्ड अनुक्रमणिका के दो गुण निम्नलिखित हैं।

  1. यह प्रणाली लोचदार होती है।
  2. यह सरल एवं सुविधाजनक प्रणाली है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1.
अनुक्रमणिका से क्या आशय है? इसके दो महत्त्वों का उल्लेख कीजिए। (2012)
अथवा
अनुक्रमणिका क्या है? अनुक्रमणिका के क्या-क्या लाभ हैं? संक्षेप में वर्णन कीजिए। (2011)
अथवा
अनुक्रमणिका से आप क्या समझते हैं? इसके उद्देश्यों का वर्णन कीजिए। (2010)
उत्तर:
अनुक्रमणिका से आशय अनुक्रमणिका एक ऐसी युक्ति या सूची होती है, जिसके द्वारा शीघ्रतापूर्वक यह पता लगाया जा सकता है कि अमुक पत्र या प्रलेख कहाँ रखा हुआ है। इसकी सहायता से भविष्य में सन्दर्भ के लिए उसे निकालने में सुविधा रहती है।

अनुक्रमणिका की आवश्यकता/उद्देश्य/महत्त्व/लाभ प्रत्येक प्रगतिशील व्यापारिक कार्यालय के लिए वर्तमान युग में अनुक्रमणिका का अत्यधिक महत्त्व होता है। पत्र-व्यवहार व्यापार की आत्मा होती है। बिना पत्र-व्यवहार के कोई भी व्यापार वर्तमान समय (UPBoardSolutions.com) में सुचारु रूप से संचालित नहीं किया जा सकता है। इस उद्देश्य से पत्रों को सँभालकर रखना व्यापार के हित में होता है। इन्हें शीघ्रता व सुगमता से प्राप्त करने के लिए अनुक्रमणिका की आवश्यकता होती है। अनुक्रमणिका के महत्त्व या उद्देश्यों को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

  1. पत्रों को फाइल करने में सुविधा ग्राहकों के पत्रों व प्रलेखों को सुगमता व शीघ्रता से उपयुक्त स्थान पर फाइल करने के लिए अनुक्रमणिका सहायक होती है।
  2. पत्रों को ढूंढने में सुविधा व्यापारिक कार्यालय में आने व जाने वाले पत्रों को फाइलों में सुरक्षित रखा जाता है, जिससे किसी भी पत्र को ढूंढने में अनुक्रमणिका सहायता प्रदान करती है।
  3. पत्रों को नस्तीकरण करने में सुविधा अनुक्रमणिका तैयार करने से पत्रों को सुरक्षित रखने में भी काफी सुविधा मिलती है।
  4. समय तथा श्रम दोनों की बचत अनुक्रमणिका की सहायता से आवश्यकता पड़ने पर पत्रों को खोजने में समय व श्रम दोनों की बचत होती है।
  5. पत्रों को निश्चित क्रम में रखने की सुविधा अनुक्रमणिका एक निश्चित आधार के अनुसार बनाई जाती है। इस कारण, पत्रों को भी एक निश्चित क्रम में सुरक्षित रखा जा सकता है।
  6. पुस्तकालय में उपयोगी पुस्तकालय में रखी हजारों पुस्तकों में से कोई एक पुस्तक सरलतापूर्वक निकालने के लिए अनुक्रमणिका का प्रयोग किया जा सकता है।
  7. पत्रों एवं महत्त्वपूर्ण प्रलेखों की सुरक्षा अनुक्रमणिका की सहायता से पत्रों एवं प्रलेखों को रखने एवं निकालने में पत्रों को अधिक उलटना-पलटना नहीं पड़ता है। इससे पत्र फटने से बच जाते हैं।
  8. खाताबही के लिए अनिवार्य खाताबही में अनुक्रमणिका अवश्य बनाई जाती है। इससे ग्राहक के खाते का तुरन्त ज्ञान हो जाता है।
  9. खड़ी फाइलिंग के लिए अनिवार्य खड़ी फाइलिंग के अन्तर्गत अनुक्रमणिका तैयार करना अनिवार्य होता है।
  10. अन्य लाभ अनुक्रमणिका द्वारा ग्राहकों के पते, उनके बैंक खातों की संख्या, उनके बैंक का नाम, उधार किस्तें, उनकी आर्थिक स्थिति, ग्राहकों के व्यवसाय एवं पूर्व सन्दर्भो, आदि की जानकारी सरलतापूर्वक प्राप्त हो जाती है।

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प्रश्न 2.
अनुक्रमणिका क्या है? वर्णात्मक अनुक्रमणिका का वर्णन कीजिए। (2009)
उत्तर:
अनुक्रमणिका का अर्थ
अनुक्रमणिका से आशय अनुक्रमणिका एक ऐसी युक्ति या सूची होती है, जिसके द्वारा शीघ्रतापूर्वक यह पता लगाया जा सकता है कि अमुक पत्र या प्रलेख कहाँ रखा हुआ है। इसकी सहायता से भविष्य में सन्दर्भ के लिए उसे निकालने में सुविधा रहती है।

अनुक्रमणिका की आवश्यकता/उद्देश्य/महत्त्व/लाभ प्रत्येक प्रगतिशील व्यापारिक कार्यालय के लिए वर्तमान युग में अनुक्रमणिका का अत्यधिक महत्त्व होता है। पत्र-व्यवहार व्यापार की आत्मा होती है। बिना पत्र-व्यवहार के कोई भी व्यापार वर्तमान समय में सुचारु रूप से संचालित नहीं किया जा सकता है। इस उद्देश्य से पत्रों को सँभालकर रखना व्यापार के हित में होता है। इन्हें शीघ्रता व सुगमता से प्राप्त करने के लिए अनुक्रमणिका की आवश्यकता होती है। अनुक्रमणिका के महत्त्व या उद्देश्यों को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

  1. पत्रों को फाइल करने में सुविधा ग्राहकों के पत्रों व प्रलेखों को सुगमता व शीघ्रता से उपयुक्त स्थान पर फाइल करने के लिए अनुक्रमणिका सहायक होती है।
  2. पत्रों को ढूंढने में सुविधा व्यापारिक कार्यालय में आने व जाने वाले पत्रों को फाइलों में सुरक्षित रखा जाता है, जिससे किसी भी पत्र को ढूंढने में अनुक्रमणिका सहायता प्रदान करती है।
  3. पत्रों को नस्तीकरण करने में सुविधा अनुक्रमणिका तैयार करने से पत्रों को सुरक्षित रखने में भी काफी सुविधा मिलती है।
  4. समय तथा श्रम दोनों की बचत अनुक्रमणिका की सहायता से (UPBoardSolutions.com) आवश्यकता पड़ने पर पत्रों को खोजने में समय व श्रम दोनों की बचत होती है।
  5. पत्रों को निश्चित क्रम में रखने की सुविधा अनुक्रमणिका एक निश्चित आधार के अनुसार बनाई जाती है। इस कारण, पत्रों को भी एक निश्चित क्रम में सुरक्षित रखा जा सकता है।
  6. पुस्तकालय में उपयोगी पुस्तकालय में रखी हजारों पुस्तकों में से कोई एक पुस्तक सरलतापूर्वक निकालने के लिए अनुक्रमणिका का प्रयोग किया जा सकता है।
  7. पत्रों एवं महत्त्वपूर्ण प्रलेखों की सुरक्षा अनुक्रमणिका की सहायता से पत्रों एवं प्रलेखों को रखने एवं निकालने में पत्रों को अधिक उलटना-पलटना नहीं पड़ता है। इससे पत्र फटने से बच जाते हैं।
  8. खाताबही के लिए अनिवार्य खाताबही में अनुक्रमणिका अवश्य बनाई जाती है। इससे ग्राहक के खाते का तुरन्त ज्ञान हो जाता है।
  9. खड़ी फाइलिंग के लिए अनिवार्य खड़ी फाइलिंग के अन्तर्गत अनुक्रमणिका तैयार करना अनिवार्य होता है।
  10. अन्य लाभ अनुक्रमणिका द्वारा ग्राहकों के पते, उनके बैंक खातों की संख्या, उनके बैंक का नाम, उधार किस्तें, उनकी आर्थिक स्थिति, ग्राहकों के व्यवसाय एवं पूर्व सन्दर्भो, आदि की जानकारी सरलतापूर्वक प्राप्त हो जाती है।

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वर्णात्मक अनुक्रमणिका
अनुक्रमणिका से आशय अनुक्रमणिका एक ऐसी युक्ति या सूची होती है, जिसके द्वारा शीघ्रतापूर्वक यह पता लगाया जा सकता है कि अमुक पत्र या प्रलेख कहाँ रखा हुआ है। इसकी सहायता से भविष्य में सन्दर्भ के लिए उसे निकालने में सुविधा रहती है।

अनुक्रमणिका की आवश्यकता/उद्देश्य/महत्त्व/लाभ प्रत्येक प्रगतिशील व्यापारिक कार्यालय के लिए वर्तमान युग में अनुक्रमणिका का अत्यधिक महत्त्व होता है। पत्र-व्यवहार व्यापार की आत्मा होती है। बिना पत्र-व्यवहार के कोई भी व्यापार वर्तमान समय में सुचारु रूप से संचालित नहीं किया जा सकता है। इस उद्देश्य से पत्रों को सँभालकर रखना व्यापार के हित में होता है। इन्हें शीघ्रता व सुगमता से प्राप्त करने के लिए अनुक्रमणिका की आवश्यकता होती है। अनुक्रमणिका के महत्त्व या उद्देश्यों को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

  1. पत्रों को फाइल करने में सुविधा ग्राहकों के पत्रों व प्रलेखों को सुगमता व शीघ्रता से उपयुक्त स्थान पर फाइल करने के लिए अनुक्रमणिका सहायक होती है।
  2. पत्रों को ढूंढने में सुविधा व्यापारिक कार्यालय में आने व जाने वाले पत्रों को फाइलों में सुरक्षित रखा जाता है, जिससे किसी भी पत्र को ढूंढने में अनुक्रमणिका सहायता प्रदान करती है।
  3. पत्रों को नस्तीकरण करने में सुविधा अनुक्रमणिका तैयार करने से पत्रों को सुरक्षित रखने में भी काफी सुविधा मिलती है।
  4. समय तथा श्रम दोनों की बचत अनुक्रमणिका की सहायता से आवश्यकता पड़ने पर पत्रों को खोजने में समय व श्रम दोनों की बचत होती है।
  5. पत्रों को निश्चित क्रम में रखने की सुविधा अनुक्रमणिका एक निश्चित आधार के अनुसार बनाई जाती है। इस कारण, पत्रों को भी एक निश्चित क्रम में सुरक्षित रखा जा सकता है।
  6. पुस्तकालय में उपयोगी पुस्तकालय में रखी हजारों पुस्तकों में से कोई एक पुस्तक सरलतापूर्वक निकालने के लिए अनुक्रमणिका का प्रयोग किया जा सकता है।
  7. पत्रों एवं महत्त्वपूर्ण प्रलेखों की सुरक्षा अनुक्रमणिका की सहायता से पत्रों एवं प्रलेखों को रखने एवं निकालने में पत्रों को अधिक उलटना-पलटना नहीं पड़ता है। इससे पत्र फटने से बच जाते हैं।
  8. खाताबही के लिए अनिवार्य खाताबही में अनुक्रमणिका अवश्य बनाई (UPBoardSolutions.com) जाती है। इससे ग्राहक के खाते का तुरन्त ज्ञान हो जाता है।
  9. खड़ी फाइलिंग के लिए अनिवार्य खड़ी फाइलिंग के अन्तर्गत अनुक्रमणिका तैयार करना अनिवार्य होता है।
  10. अन्य लाभ अनुक्रमणिका द्वारा ग्राहकों के पते, उनके बैंक खातों की संख्या, उनके बैंक का नाम, उधार किस्तें, उनकी आर्थिक स्थिति, ग्राहकों के व्यवसाय एवं पूर्व सन्दर्भो, आदि की जानकारी सरलतापूर्वक प्राप्त हो जाती है।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (8 अंक)

प्रश्न 1.
अनुक्रमणिका क्या है? अनुक्रमणिका की विभिन्न रीतियों एवं उनके महत्त्व का वर्णन कीजिए। (2008)
उत्तर:
अनुक्रमणिका से आशय
अनुक्रमणिका से आशय अनुक्रमणिका एक ऐसी युक्ति या सूची होती है, जिसके द्वारा शीघ्रतापूर्वक यह पता लगाया जा सकता है कि अमुक पत्र या प्रलेख कहाँ रखा हुआ है। इसकी सहायता से भविष्य में सन्दर्भ के लिए उसे निकालने में सुविधा रहती है।

अनुक्रमणिका की आवश्यकता/उद्देश्य/महत्त्व/लाभ प्रत्येक प्रगतिशील व्यापारिक कार्यालय के लिए वर्तमान युग में अनुक्रमणिका का अत्यधिक महत्त्व होता है। पत्र-व्यवहार व्यापार की आत्मा होती है। बिना पत्र-व्यवहार के कोई भी व्यापार वर्तमान समय में सुचारु रूप से संचालित नहीं किया जा सकता है। इस उद्देश्य से पत्रों को सँभालकर रखना व्यापार के हित में होता है। इन्हें शीघ्रता व सुगमता से प्राप्त करने के लिए अनुक्रमणिका की आवश्यकता होती है। अनुक्रमणिका के महत्त्व या उद्देश्यों को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

  1. पत्रों को फाइल करने में सुविधा ग्राहकों के पत्रों व प्रलेखों को सुगमता व शीघ्रता से उपयुक्त स्थान पर फाइल करने के लिए अनुक्रमणिका सहायक होती है।
  2. पत्रों को ढूंढने में सुविधा व्यापारिक कार्यालय में आने व जाने वाले पत्रों को फाइलों में सुरक्षित रखा जाता है, जिससे किसी भी पत्र को ढूंढने में अनुक्रमणिका सहायता प्रदान करती है।
  3. पत्रों को नस्तीकरण करने में सुविधा अनुक्रमणिका तैयार करने से पत्रों को सुरक्षित रखने में भी काफी सुविधा मिलती है।
  4. समय तथा श्रम दोनों की बचत अनुक्रमणिका की सहायता से आवश्यकता (UPBoardSolutions.com) पड़ने पर पत्रों को खोजने में समय व श्रम दोनों की बचत होती है।
  5. पत्रों को निश्चित क्रम में रखने की सुविधा अनुक्रमणिका एक निश्चित आधार के अनुसार बनाई जाती है। इस कारण, पत्रों को भी एक निश्चित क्रम में सुरक्षित रखा जा सकता है।
  6. पुस्तकालय में उपयोगी पुस्तकालय में रखी हजारों पुस्तकों में से कोई एक पुस्तक सरलतापूर्वक निकालने के लिए अनुक्रमणिका का प्रयोग किया जा सकता है।
  7. पत्रों एवं महत्त्वपूर्ण प्रलेखों की सुरक्षा अनुक्रमणिका की सहायता से पत्रों एवं प्रलेखों को रखने एवं निकालने में पत्रों को अधिक उलटना-पलटना नहीं पड़ता है। इससे पत्र फटने से बच जाते हैं।
  8. खाताबही के लिए अनिवार्य खाताबही में अनुक्रमणिका अवश्य बनाई जाती है। इससे ग्राहक के खाते का तुरन्त ज्ञान हो जाता है।
  9. खड़ी फाइलिंग के लिए अनिवार्य खड़ी फाइलिंग के अन्तर्गत अनुक्रमणिका तैयार करना अनिवार्य होता है।
  10. अन्य लाभ अनुक्रमणिका द्वारा ग्राहकों के पते, उनके बैंक खातों की संख्या, उनके बैंक का नाम, उधार किस्तें, उनकी आर्थिक स्थिति, ग्राहकों के व्यवसाय एवं पूर्व सन्दर्भो, आदि की जानकारी सरलतापूर्वक प्राप्त हो जाती है।

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1. साधारण या पत्र-पुस्तक अनुक्रमणिका या वर्णात्मक अनुक्रमणिका यह अनुक्रमणिका उन कार्यालयों के लिए होती है, जहाँ थोड़ी मात्रा में ही पत्र आते-जाते हैं। इस अनुक्रमणिका में प्रत्येक अक्षर के लिए एक पृष्ठ नियत कर दिया जाता है। इस प्रकार, अंग्रेजी की अनुक्रमणिका बनाने के लिए 24 पृष्ठ आवश्यक होते हैं, जबकि A से W तक प्रत्येक अक्षर के लिए एक-एक कुल 23 पृष्ठ और Y Y 7 इन तीनों अक्षरों के लिए केवल एक पृष्ठ होता है। क्योंकि इन (UPBoardSolutions.com) अक्षरों से आरम्भ होने वाले नाम बहुत कम होते हैं। हिन्दी की अनुक्रमणिका के लिए 36 पृष्ठों की आवश्यकता होती है; जैसे-अ, इ, उ, ए, ओ, अं, क, ख, ग, घ, च, छ (क्ष), ज, झ, ट, ठ, ड, ढ़, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, श (षे, स), हे, त्र, ज्ञा ये पृष्ठ दाईं ओर इस प्रकार से कटे होते हैं कि वर्णमाला के सभी अक्षरे एक सीधी रेखा में दिखाई देते हैं तथा पृष्ठों को पलटे बिना यह मालूम किया जा सकता है कि अमुक नाम का हवाला किस पृष्ठ पर मिलेगा।

हिन्दी वर्णमाला का आधार
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  • सरलता यह प्रणाली अत्यन्त सरल होती है। इसका प्रयोग सामान्य स्तर वाला व्यापारी भी सरलता से कर सकता है।
  • लोचदार अनुक्रमणिका की इस प्रणाली में लोचता का गुण अधिक पाया जाता है।
  • मितव्ययी इस प्रणाली में समय व श्रम दोनों की बचत होती है।

2. स्वरात्मक अनुक्रमणिका यह अनुक्रमणिका वस्तुतः साधारण अनुक्रमणिका का ही विकसित रूप होता है। बड़े-बड़े व्यापारिक कार्यालयों में जहाँ ग्राहकों की संख्या अधिक होती है, वहाँ इस पद्धति का प्रयोग किया जाता है। इसके अन्तर्गत स्वर के आधार पर अनुक्रमणिका तैयार की जाती है अर्थात् जब एक अक्षर से प्रारम्भ होने वाले नामों की संख्या अधिक हो जाती है, तब उसे स्वर के आधार पर विभाजित कर दिया जाता है। इसे अंग्रेजी एवं हिन्दी में निम्न प्रकार से तैयार किया जा सकता है

(i) अंग्रेजी स्वरों के आधार पर अंग्रेजी भाषा में पाँच स्वर होते हैं- (A, E, I, 0, U) जिनके आधार पर वर्णमाला के अक्षरों को 5 भागों में विभक्त किया जाता है; जैसे-R के 5 उपनाम RA, RE, RI, RO, RU के द्वारा निम्न प्रकार से स्वरात्मक अनुक्रमणिका बनाई जा सकती है-

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(ii) हिन्दी स्वरों के आधार पर हिन्दी में मात्राओं के आधार पर 13 स्वर (अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ:) होते हैं।

इसे निम्न उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है-
हिन्दी में ‘क’ अक्षर से शुरू होने वाले ग्राहकों के नाम
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स्वरात्मक अनुक्रमणिका के गुण या महत्त्व स्वरात्मक अनुक्रमणिका के गुण या महत्त्व निम्नलिखित हैं

  1. सरलता अनुक्रमणिका की इस प्रणाली के अन्तर्गत पत्रों को सरलता से ढूंढा जा सकता है।
  2. उपयुक्तता अनुक्रमणिका की यह प्रणाली छोटे, मध्यम एवं बड़े सभी प्रकार के व्यापारियों के लिए उपयुक्त होती है, परन्तु मध्यम स्तर के व्यापारियों के लिए यह अत्यधिक उपयुक्त होती है।
  3. बचत इस प्रणाली में पत्रों को आसानी से ढूंढा जा सकता है, जिससे समय वे श्रम दोनों की बचत होती है।
  4. लोचदार व्यापार की आवश्यकतानुसार इसमें परिवर्तन किया जा सकता है। अतः यह लोचदार पद्धति होती है।

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3. श्रृंखला अनुक्रमणिका अथवा श्रृंखला संकेत क्रम शृंखला अनुक्रमणिका, अनुक्रमणिका की एक ऐसी विधि है, जिसकी सहायता से किसी ग्राहक विशेष को अलग-अलग तिथियों पर लिखे गए पत्रों के सम्बन्ध में यह जानकारी एक ही स्थान पर मिल जाती है (UPBoardSolutions.com) कि इन पत्रों की प्रतिलिपि किन-किन पृष्ठों पर दी गई है, ताकि उन्हें सरलता एवं शीघ्रता से प्राप्त किया जा सके।

श्रृंखला अनुक्रमणिका बनाने की विधि

मान लीजिए कि श्याम को भेजे गए पत्रों की नकलें पृष्ठ संख्या 8, 12, 15, 20 पर हैं, तो पृष्ठ संख्या 8 पर हर 0/12 पृष्ठ के ऊपर हाशिए में बीचों-बीच लाल स्याही या पेन्सिल से लिख दिया जाएगा। अंश व हर पृष्ठ 12 पर 8/15, पृष्ठ 15 पर 12/20 तथा पृष्ठ 20 पर 15 लिखा जाएगा। बीसवें पृष्ठ पर केवल अंश ही लिखा हुआ हैं, हर नहीं। इसका तात्पर्य यह है। कि पिछले पत्र की नकल 15वें पृष्ठ पर है और अभी इससे आगे कोई पत्र नहीं लिखा गया है।
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श्रृंखला अनुक्रमणिका के गुण या महत्त्व श्रृंखला अनुक्रमणिका के गुण या महत्त्व निम्नलिखित हैं

  1. सरल इस प्रणाली के अन्तर्गत ग्राहकों को अलग-अलग तारीखों पर भेजे गए पत्रों की प्रतिलिपि को आसानी से एक निश्चित स्थान पर प्राप्त किया जा सकता है।
  2. मितव्ययिता इस प्रणाली के अन्तर्गत अधिक धन व्यय करने की आवश्यकता नहीं होती है।
  3. बचत इस प्रणाली के अन्तर्गत पत्रों को आसानी से ढूंढा जा सकता है, जिससे समय व श्रम दोनों की बचत होती है।

4. कार्ड अनुक्रमणिका इसका आविष्कार 18वीं शताब्दी में फ्रांसीसी विद्वान ऐबे जीन रोजियर ने किया था। इस अनुक्रमणिका का प्रयोग पुस्तकालय में किया जाता है। इस अनुक्रमणिका में कार्डों का प्रयोग किया जाता है। प्रत्येक ग्राहक के लिए एक कार्ड बना दिया जाता है, जिस पर उसका नाम, पता एवं सूचनाएँ स्पष्ट रूप से लिख दी जाती हैं। बैंक में नमूने के हस्ताक्षर के लिए भी इसी अनुक्रमणिका का प्रयोग किया जाता है। इसमें निम्नलिखित वस्तुओं की आवश्यकता होती है

  1. दराजदार अलमारी दराजों की संख्या व्यापार की आवश्यकता पर निर्भर करती है। प्रत्येक दराज के सामने अंग्रेजी वर्णमाला में क्रमवार संकेत चिन्ह लगे होते हैं।
  2. नाम कार्ड इन्हें दराजों में वर्णात्मक क्रम में रखा जाता है। नाम कार्ड पर ग्राहक का नाम, पता, टेलीफोन नं., खाता पृष्ठ संख्या, आदि लिखी होती है।
  3. संकेत कार्ड इन कार्डों के माध्यम से दराज को संख्यात्मक, वर्णात्मक या स्वरात्मक क्रमानुसार कई भागों में बाँट सकते हैं। इसमें प्रत्येक कार्ड का एक सिरा ऊपर उठा होता है, जिस पर अक्षर व संख्या लिखी होती है।
  4. अनुपस्थिति कार्ड जब किसी वस्तु को उसके स्थान से हटाया जाता है, तो उसके स्थान पर जो विवरण युक्त कार्ड रखा जाता है, उसे अनुपस्थिति कार्ड कहते हैं।

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कार्ड अनुक्रमणिका के गुण या महत्त्व कार्ड अनुक्रमणिका के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं

  1. लोचता यह प्रणाली लोचदार होती है, क्योंकि इसमें व्यापार की आवश्यकतानुसार दराजों की संख्या कम व अधिक की जा सकती है।
  2. स्वच्छता यह अनुक्रमणिका हमेशा स्वच्छ रहती है, क्योंकि इसको (UPBoardSolutions.com) पुस्तक-सूची की तरह काटना नहीं पड़ता है। यदि किसी व्यापारी से पत्र-व्यवहार बन्द हो जाता है, तो उसके कार्ड को निकालकर नए व्यापारी का कार्ड लगा दिया जाता है।
  3. सुविधाजनक इस सूची में संकेत-पत्रों के कारण कार्ड आसानी से प्राप्त किया जाता है वे संकेत कार्डों का पता सरलता से लग जाता है।
  4. नवीनतम इसमें नए ग्राहकों के कार्ड समायोजित किए जा सकते हैं, जिससे सूची सदैव नवीनतम बनी रहती है।
  5. केवल चालू कार्डों को रखना इस प्रणाली में ऐसे ग्राहकों के कार्ड, जिनसे व्यापार बन्द हो गया है, आसानी से हटाए जा सकते हैं। इस प्रकार इसमें केवल चालू कार्ड ही रहते हैं।
  6. मितव्ययिता इस प्रणाली में बार-बार पुस्तकें या जिल्दें नहीं खरीदनी पड़ती हैं, इसलिए यह प्रणाली अन्य प्रणालियों से मितव्ययी
  7. उपयुक्तता यह प्रणाली बड़े व्यापारिक कार्यालयों के लिए अधिक उपयुक्त रहती है।

5. दिखने वाली (खुली) कार्ड अनुक्रमणिका दिखने वाली अनुक्रमणिका, कार्ड अनुक्रमणिका का ही एक विकसित रूप होता है। इसे खुली अनुक्रमणिका के नाम से भी जाना जाता है। यह एक ऐसी प्रणाली है, जिसमें अनेक कार्डों को एक साथ देखा जा सकता है, जबकि कार्ड अनुक्रमणिका में एक समय में केवल एक ही कार्ड को देखा जा सकता है।

प्रयोग विधि इस अनुक्रमणिका की पद्धति के अन्तर्गत अनुक्रमणिका को तैयार करने के लिए नाम कार्डों को पारदर्शी लिफाफे में रखकर धातु के चौखटों में लगा दिया जाता है। इन चौखटों में नीचे कब्जे लगे होते हैं, जिनमें कार्डों को इस प्रकार से लगाया जाता है कि कार्ड ऊपर से नीचे की ओर एक विशेष क्रम में आ जाएँ, ताकि उन्हें बाहर से देखा जा सके। कार्ड को शीघ्रता से ढूंढने के लिए बीच-बीच में संकेत कार्ड भी लगे होते हैं।

दिखने वाली अनुक्रमणिका के गुण या महत्त्व दिखने वाली अनुक्रमणिका के गुण निम्नलिखित हैं-

  1. सरलता इस प्रणाली के अन्तर्गत एक से अधिक कार्ड एक साथ सरलतापूर्वक देखे जा सकते हैं।
  2. उपयुक्तता बड़े व्यापारिक कार्यालयों के लिए यह प्रणाली उपयुक्त होती है।
  3. लोचता यह प्रणाली लोचपूर्ण होती है। इसमें पुराने कार्डों के क्रमानुसार नए कार्डों को लगाया जा सकता है।
  4. कम स्थान इस प्रणाली के अन्तर्गत अधिक स्थान की आवश्यकता (UPBoardSolutions.com) नहीं होती है।
  5. सुरक्षा यह प्रणाली अनुक्रमणिका की अन्य प्रणालियों की अपेक्षा अधिक सुरक्षित होती है, क्योकि ग्राहकों के नाम कार्ड होल्डरों में लगे हुए होते हैं।

6. चक्रीय अनुक्रमणिका यह अनुक्रमणिका दिखने वाली कार्ड अनुक्रमणिका का ही विकसित रूप होता है। इसमें लोहे के स्टैण्ड में एक घुमावदार पहिया लगा होता है, जो चारों ओर घूमता है। इस पहिए में ऊपर की ओर कार्डो को फँसाने के लिए स्थान होता है। इस पहिए में लगभग 1,000 से 5,000 तक कार्ड लगाए जा सकते हैं। इसमें कार्ड को देखने के लिए पहिए को घुमाया जाता है। चक्रीय अनुक्रमणिका के गुण या महत्त्व चक्रीय अनुक्रमणिका के गुण या लाभ निम्नलिखित हैं

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  1. सरलता इस प्रणाली के अन्तर्गत ग्राहकों से सम्बन्धित सूचनाओं को सरलतापूर्वक देखा जा सकता है।
  2. अल्पव्ययी वृहद् आकार के व्यापार के लिए यह प्रणाली कम खर्चीली या अल्पव्ययी होती है।
  3. लोचता इस प्रणाली में व्यापार की आवश्यकता व सुविधा के अनुसार परिवर्तन किया जा सकता है।
  4. सुविधाजनक चक्रीये अनुक्रमणिका प्रणाली के अन्तर्गत कम स्थान की आवश्यकता होती है तथा इसे आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाया व ले जाया जा सकता है। अतः यह पद्धति अधिक सुविधाजनक होती है।

प्रश्न 2.
कार्ड अनुक्रमणिका का वर्णन कीजिए तथा इसकी उपयोगिता समझाइट। (2017)
उत्तर:
कार्ड अनुक्रमणिका 
अनुक्रमणिका से आशय अनुक्रमणिका एक ऐसी युक्ति या सूची होती है, जिसके द्वारा शीघ्रतापूर्वक यह पता लगाया जा सकता है कि अमुक पत्र या प्रलेख कहाँ रखा हुआ है। इसकी सहायता से भविष्य में सन्दर्भ के लिए उसे निकालने में सुविधा रहती है।

अनुक्रमणिका की आवश्यकता/उद्देश्य/महत्त्व/लाभ प्रत्येक प्रगतिशील व्यापारिक कार्यालय के लिए वर्तमान युग में अनुक्रमणिका का अत्यधिक महत्त्व होता है। पत्र-व्यवहार व्यापार की आत्मा होती है। बिना पत्र-व्यवहार के कोई भी व्यापार वर्तमान समय में सुचारु रूप (UPBoardSolutions.com) से संचालित नहीं किया जा सकता है। इस उद्देश्य से पत्रों को सँभालकर रखना व्यापार के हित में होता है। इन्हें शीघ्रता व सुगमता से प्राप्त करने के लिए अनुक्रमणिका की आवश्यकता होती है। अनुक्रमणिका के महत्त्व या उद्देश्यों को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

  1. पत्रों को फाइल करने में सुविधा ग्राहकों के पत्रों व प्रलेखों को सुगमता व शीघ्रता से उपयुक्त स्थान पर फाइल करने के लिए अनुक्रमणिका सहायक होती है।
  2. पत्रों को ढूंढने में सुविधा व्यापारिक कार्यालय में आने व जाने वाले पत्रों को फाइलों में सुरक्षित रखा जाता है, जिससे किसी भी पत्र को ढूंढने में अनुक्रमणिका सहायता प्रदान करती है।
  3. पत्रों को नस्तीकरण करने में सुविधा अनुक्रमणिका तैयार करने से पत्रों को सुरक्षित रखने में भी काफी सुविधा मिलती है।
  4. समय तथा श्रम दोनों की बचत अनुक्रमणिका की सहायता से आवश्यकता पड़ने पर पत्रों को खोजने में समय व श्रम दोनों की बचत होती है।
  5. पत्रों को निश्चित क्रम में रखने की सुविधा अनुक्रमणिका एक निश्चित आधार के अनुसार बनाई जाती है। इस कारण, पत्रों को भी एक निश्चित क्रम में सुरक्षित रखा जा सकता है।
  6. पुस्तकालय में उपयोगी पुस्तकालय में रखी हजारों पुस्तकों में से कोई एक पुस्तक सरलतापूर्वक निकालने के लिए अनुक्रमणिका का प्रयोग किया जा सकता है।
  7. पत्रों एवं महत्त्वपूर्ण प्रलेखों की सुरक्षा अनुक्रमणिका की सहायता से पत्रों एवं प्रलेखों को रखने एवं निकालने में पत्रों को अधिक उलटना-पलटना नहीं पड़ता है। इससे पत्र फटने से बच जाते हैं।
  8. खाताबही के लिए अनिवार्य खाताबही में अनुक्रमणिका अवश्य बनाई जाती है। इससे ग्राहक के खाते का तुरन्त ज्ञान हो जाता है।
  9. खड़ी फाइलिंग के लिए अनिवार्य खड़ी फाइलिंग के अन्तर्गत अनुक्रमणिका तैयार करना अनिवार्य होता है।
  10. अन्य लाभ अनुक्रमणिका द्वारा ग्राहकों के पते, उनके बैंक खातों की संख्या, उनके बैंक का नाम, उधार किस्तें, उनकी आर्थिक स्थिति, ग्राहकों के व्यवसाय एवं पूर्व सन्दर्भो, आदि की जानकारी सरलतापूर्वक प्राप्त हो जाती है।

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कार्ड अनुक्रमणिका की उपयोगिता कार्ड अनुक्रमणिका की उपयोगिता निम्नलिखित है-

  1. कार्ड अनुक्रमणिका का प्रयोग बीमा कम्पनी द्वारा पॉलिसी धारकों के विवरण जैसे-नाम, पता, पॉलिसी संख्या, अवधि, आदि लिखने हेतु किया। जाता है।
  2. कार्ड अनुक्रमणिका के द्वारा किसी ग्राहक को दिए गए ऋण का विवरण जैसे-कार्ड पर लिखित अनुबन्ध की तिथि, ऋण का समय व मात्रा, आदिका पता लगाया जा सकती है।
  3. किसी ग्राहक को आगे के पत्र लिखने हेतु भी कार्ड अनुक्रमणिका का उपयोग किया जाता है।
  4. कार्ड अनुक्रमणिका द्वारा पता सूची तैयार कर उसे उपयोग (UPBoardSolutions.com) में ले सकते हैं, जिसमें ग्राहक का नाम, पता, टेलीफोन नं., आदि विवरण होता है।
  5. कार्ड अनुक्रमणिका का प्रयोग खड़ी फाइल रखने हेतु भी किया जाता है।
  6. कार्ड अनुक्रमणिका का उपयोग पुस्तकालय में किसी विशेष पुस्तक को खोजने हेतु भी किया जाता है।
  7. बैंक द्वारा अपने ग्राहकों के खातों की जानकारी एवं ग्राहकों के हस्ताक्षरों के नमूने रखने हेतु भी कार्ड अनुक्रमणिका का प्रयोग किया जाता है।
  8. कार्ड अनुक्रमणिका का प्रयोग व्यापार सूची के रूप में भी किया जाता है, जिसमें व्यापार का विवरण, शर्ते, माल सम्बन्धी सूचनाओं का विवरण, आदि दिया जाता है।
  9. किस्तों द्वारा माल खरीदने एवं बेचने का विवरण भी कार्ड अनुक्रमणिका द्वारा ज्ञात किया जा सकता है।
  10. ग्राहकों के पूछताछ का लेखा भी कार्ड अनुक्रमणिका द्वारा किया जा सकता
    है, जिससे आदेश प्राप्त नहीं होने पर उससे पत्र-व्यवहार किया जा सके।

प्रश्न 3.
कार्ड अनुक्रमणिका के गुण एवं दोषों का वर्णन कीजिए। (2010, 09)
अथवा
कार्ड अनुक्रमणिका क्या है? इसके गुणों एवं दोषों का वर्णन कीजिए। (2014, 13)
उत्तर:
कार्ड अनुक्रमणिका का अर्थ 
अनुक्रमणिका के चार लाभ या महत्त्व निम्नलिखित हैं-

  1. अनुक्रमणिका पत्रों को निश्चित क्रम में रखने की सुविधा प्रदान करती है।
  2. अनुक्रमणिका खड़ी फाइलिंग के लिए अनिवार्य होती है।
  3. अनुक्रमणिका पत्रों को फाइल करने में सुविधा प्रदान करती है।
  4. अनुक्रमणिका द्वारा पत्रों एवं महत्त्वपूर्ण प्रलेखों को सुरक्षित रखा जा सकता

कार्ड अनुक्रमणिका के गुण
अनुक्रमणिका से आशय अनुक्रमणिका एक ऐसी युक्ति या सूची होती है, जिसके द्वारा शीघ्रतापूर्वक यह पता लगाया जा सकता है कि अमुक पत्र या प्रलेख कहाँ रखा हुआ है। इसकी सहायता से भविष्य में सन्दर्भ के लिए उसे निकालने में सुविधा रहती है।

अनुक्रमणिका की आवश्यकता/उद्देश्य/महत्त्व/लाभ प्रत्येक प्रगतिशील व्यापारिक कार्यालय के लिए वर्तमान युग में अनुक्रमणिका का अत्यधिक महत्त्व होता है। पत्र-व्यवहार व्यापार की आत्मा होती है। बिना पत्र-व्यवहार के कोई भी व्यापार वर्तमान समय में सुचारु रूप से संचालित नहीं किया जा सकता है। इस उद्देश्य से पत्रों को सँभालकर रखना व्यापार के हित में होता है। इन्हें शीघ्रता व सुगमता से प्राप्त करने के लिए अनुक्रमणिका की आवश्यकता होती है। अनुक्रमणिका के महत्त्व या उद्देश्यों को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

  1. पत्रों को फाइल करने में सुविधा ग्राहकों के पत्रों व प्रलेखों को सुगमता व शीघ्रता से उपयुक्त स्थान पर फाइल करने के लिए अनुक्रमणिका सहायक होती है।
  2. पत्रों को ढूंढने में सुविधा व्यापारिक कार्यालय में आने व जाने वाले पत्रों को फाइलों में सुरक्षित रखा जाता है, जिससे किसी भी पत्र को ढूंढने में अनुक्रमणिका सहायता प्रदान करती है।
  3. पत्रों को नस्तीकरण करने में सुविधा अनुक्रमणिका तैयार करने से पत्रों को सुरक्षित रखने में भी काफी सुविधा मिलती है।
  4. समय तथा श्रम दोनों की बचत अनुक्रमणिका की सहायता से आवश्यकता पड़ने पर पत्रों को खोजने में समय व श्रम दोनों की बचत होती है।
  5. पत्रों को निश्चित क्रम में रखने की सुविधा अनुक्रमणिका एक निश्चित आधार के अनुसार बनाई जाती है। इस कारण, पत्रों को भी एक निश्चित क्रम में सुरक्षित रखा जा सकता है।
  6. पुस्तकालय में उपयोगी पुस्तकालय में रखी हजारों पुस्तकों में से कोई एक पुस्तक सरलतापूर्वक निकालने के लिए अनुक्रमणिका का प्रयोग किया जा सकता है।
  7. पत्रों एवं महत्त्वपूर्ण प्रलेखों की सुरक्षा अनुक्रमणिका की सहायता से पत्रों एवं प्रलेखों को रखने एवं निकालने में पत्रों को अधिक उलटना-पलटना नहीं पड़ता है। इससे पत्र फटने से बच जाते हैं।
  8. खाताबही के लिए अनिवार्य खाताबही में अनुक्रमणिका अवश्य बनाई जाती है। इससे ग्राहक के खाते का तुरन्त ज्ञान हो जाता है।
  9. खड़ी फाइलिंग के लिए अनिवार्य खड़ी फाइलिंग के अन्तर्गत अनुक्रमणिका तैयार करना अनिवार्य होता है।
  10. अन्य लाभ अनुक्रमणिका द्वारा ग्राहकों के पते, उनके बैंक खातों की संख्या, (UPBoardSolutions.com) उनके बैंक का नाम, उधार किस्तें, उनकी आर्थिक स्थिति, ग्राहकों के व्यवसाय एवं पूर्व सन्दर्भो, आदि की जानकारी सरलतापूर्वक प्राप्त हो जाती है।

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कार्ड अनुक्रमणिका के दोष कार्ड अनुक्रमणिका के दोष निम्नलिखित हैं:

  1. अधिक स्थान घेरना इस पद्धति में प्रयोग की जाने वाली अलमारी अधिक स्थान घेरती है, इसलिए बहुत बड़े व्यापारी ही इसका प्रयोग कर सकते हैं।
  2. खोजने में कठिनाई इस प्रणाली में यदि भूल से कोई कार्ड इधर-उधर होजाए या गलत स्थान पर रख दिया जाए, तो उसे खोजने में अधिक समयलगता है।
  3. सूचना प्राप्ति में कठिनाई यदि कोई कार्ड खो जाता है, तो उससे सम्बन्धित सूचना प्राप्त करने में बहुत कठिनाई होती है।
  4. नियन्त्रण में कठिनाई यदि कार्डों के निकालने एवं रखने की उचित व्यवस्था न हो, तो अनुक्रमणिका की इस पद्धति पर नियन्त्रण करना कठिन हो जाता है।
  5. मँहगी प्रणाली कार्ड अनुक्रमणिका प्रणाली छोटे एवं मध्यम व्यापारिक कार्यालयों हेतु महँगी होती है, क्योंकि इसमें अलमारी, संकेत कार्ड, नाम  कार्ड, अनुपस्थिति कार्ड, आदि की आवश्यकता होती है, जिस पर अधिक व्यय करना पड़ता है।
  6. अधिक समय लगना इसमें एक बार में केवल एक ही कार्ड को देख सकते हैं, इससे इस प्रणाली में अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है।

प्रश्न 4.
दिखने वाली अनुक्रमणिका से क्या आशय है? इसके गुण और दोष लिखिए। (2007)
अथवा
दिखने वाली अनुक्रमणिका के गुण एवं दोषों को बताइए।
उत्तर:
अनुक्रमणिका से आशय 
अनुक्रमणिका से आशय अनुक्रमणिका एक ऐसी युक्ति या सूची होती है, जिसके द्वारा शीघ्रतापूर्वक यह पता लगाया जा सकता है कि अमुक पत्र या प्रलेख कहाँ रखा हुआ है। इसकी सहायता से भविष्य में सन्दर्भ के लिए उसे निकालने में सुविधा रहती है।

अनुक्रमणिका की आवश्यकता/उद्देश्य/महत्त्व/लाभ प्रत्येक प्रगतिशील व्यापारिक कार्यालय के लिए वर्तमान युग में अनुक्रमणिका का अत्यधिक महत्त्व होता है। पत्र-व्यवहार व्यापार की आत्मा होती है। बिना पत्र-व्यवहार के कोई भी व्यापार वर्तमान समय (UPBoardSolutions.com) में सुचारु रूप से संचालित नहीं किया जा सकता है। इस उद्देश्य से पत्रों को सँभालकर रखना व्यापार के हित में होता है। इन्हें शीघ्रता व सुगमता से प्राप्त करने के लिए अनुक्रमणिका की आवश्यकता होती है। अनुक्रमणिका के महत्त्व या उद्देश्यों को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

  1. पत्रों को फाइल करने में सुविधा ग्राहकों के पत्रों व प्रलेखों को सुगमता व शीघ्रता से उपयुक्त स्थान पर फाइल करने के लिए अनुक्रमणिका सहायक होती है।
  2. पत्रों को ढूंढने में सुविधा व्यापारिक कार्यालय में आने व जाने वाले पत्रों को फाइलों में सुरक्षित रखा जाता है, जिससे किसी भी पत्र को ढूंढने में अनुक्रमणिका सहायता प्रदान करती है।
  3. पत्रों को नस्तीकरण करने में सुविधा अनुक्रमणिका तैयार करने से पत्रों को सुरक्षित रखने में भी काफी सुविधा मिलती है।
  4. समय तथा श्रम दोनों की बचत अनुक्रमणिका की सहायता से आवश्यकता पड़ने पर पत्रों को खोजने में समय व श्रम दोनों की बचत होती है।
  5. पत्रों को निश्चित क्रम में रखने की सुविधा अनुक्रमणिका एक निश्चित आधार के अनुसार बनाई जाती है। इस कारण, पत्रों को भी एक निश्चित क्रम में सुरक्षित रखा जा सकता है।
  6. पुस्तकालय में उपयोगी पुस्तकालय में रखी हजारों पुस्तकों में से कोई एक पुस्तक सरलतापूर्वक निकालने के लिए अनुक्रमणिका का प्रयोग किया जा सकता है।
  7. पत्रों एवं महत्त्वपूर्ण प्रलेखों की सुरक्षा अनुक्रमणिका की सहायता से पत्रों एवं प्रलेखों को रखने एवं निकालने में पत्रों को अधिक उलटना-पलटना नहीं पड़ता है। इससे पत्र फटने से बच जाते हैं।
  8. खाताबही के लिए अनिवार्य खाताबही में अनुक्रमणिका अवश्य बनाई जाती है। इससे ग्राहक के खाते का तुरन्त ज्ञान हो जाता है।
  9. खड़ी फाइलिंग के लिए अनिवार्य खड़ी फाइलिंग के अन्तर्गत अनुक्रमणिका तैयार करना अनिवार्य होता है।
  10. अन्य लाभ अनुक्रमणिका द्वारा ग्राहकों के पते, उनके बैंक खातों की संख्या, उनके बैंक का नाम, उधार किस्तें, उनकी आर्थिक स्थिति, ग्राहकों के व्यवसाय एवं पूर्व सन्दर्भो, आदि की जानकारी सरलतापूर्वक प्राप्त हो जाती है।

1. साधारण या पत्र-पुस्तक अनुक्रमणिका या वर्णात्मक अनुक्रमणिका यह अनुक्रमणिका उन कार्यालयों के लिए होती है, जहाँ थोड़ी मात्रा में ही पत्र आते-जाते हैं। इस अनुक्रमणिका में प्रत्येक अक्षर के लिए एक पृष्ठ नियत कर दिया जाता है। इस प्रकार, अंग्रेजी की अनुक्रमणिका बनाने के लिए 24 पृष्ठ आवश्यक होते हैं, जबकि A से W तक प्रत्येक अक्षर के लिए एक-एक कुल 23 पृष्ठ और Y Y 7 इन तीनों अक्षरों के लिए केवल एक पृष्ठ होता है। (UPBoardSolutions.com) क्योंकि इन अक्षरों से आरम्भ होने वाले नाम बहुत कम होते हैं। हिन्दी की अनुक्रमणिका के लिए 36 पृष्ठों की आवश्यकता होती है; जैसे-अ, इ, उ, ए, ओ, अं, क, ख, ग, घ, च, छ (क्ष), ज, झ, ट, ठ, ड, ढ़, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, श (षे, स), हे, त्र, ज्ञा ये पृष्ठ दाईं ओर इस प्रकार से कटे होते हैं कि वर्णमाला के सभी अक्षरे एक सीधी रेखा में दिखाई देते हैं तथा पृष्ठों को पलटे बिना यह मालूम किया जा सकता है कि अमुक नाम का हवाला किस पृष्ठ पर मिलेगा।

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हिन्दी वर्णमाला का आधार
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  • सरलता यह प्रणाली अत्यन्त सरल होती है। इसका प्रयोग सामान्य स्तर वाला व्यापारी भी सरलता से कर सकता है।
  • लोचदार अनुक्रमणिका की इस प्रणाली में लोचता का गुण अधिक पाया जाता है।
  • मितव्ययी इस प्रणाली में समय व श्रम दोनों की बचत होती है।

2. स्वरात्मक अनुक्रमणिका यह अनुक्रमणिका वस्तुतः साधारण अनुक्रमणिका का ही विकसित रूप होता है। बड़े-बड़े व्यापारिक कार्यालयों में जहाँ ग्राहकों की संख्या अधिक होती है, वहाँ इस पद्धति का प्रयोग किया जाता है। इसके अन्तर्गत स्वर के आधार पर अनुक्रमणिका तैयार की जाती है अर्थात् जब एक अक्षर से प्रारम्भ होने वाले नामों की संख्या अधिक हो जाती है, तब उसे स्वर के आधार पर विभाजित कर दिया जाता है। इसे अंग्रेजी एवं हिन्दी में निम्न प्रकार से तैयार किया जा सकता है

(i) अंग्रेजी स्वरों के आधार पर अंग्रेजी भाषा में पाँच स्वर होते हैं- (A, E, I, 0, U) जिनके आधार पर वर्णमाला के अक्षरों को 5 भागों में विभक्त किया जाता है; जैसे-R के 5 उपनाम RA, RE, RI, RO, RU के द्वारा निम्न प्रकार से स्वरात्मक अनुक्रमणिका बनाई जा सकती है-

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(ii) हिन्दी स्वरों के आधार पर हिन्दी में मात्राओं के आधार पर 13 स्वर (अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ:) होते हैं।

इसे निम्न उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है-
हिन्दी में ‘क’ अक्षर से शुरू होने वाले ग्राहकों के नाम
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स्वरात्मक अनुक्रमणिका के गुण या महत्त्व स्वरात्मक अनुक्रमणिका के गुण या महत्त्व निम्नलिखित हैं

  1. सरलता अनुक्रमणिका की इस प्रणाली के अन्तर्गत पत्रों को सरलता | से ढूंढा जा सकता है।
  2. उपयुक्तता अनुक्रमणिका की यह प्रणाली छोटे, मध्यम एवं बड़े सभी प्रकार के व्यापारियों के लिए उपयुक्त होती है, परन्तु मध्यम स्तर के व्यापारियों के लिए यह अत्यधिक उपयुक्त होती है।
  3. बचत इस प्रणाली में पत्रों को आसानी से ढूंढा जा सकता है, जिससे समय वे श्रम दोनों की बचत होती है।
  4. लोचदार व्यापार की आवश्यकतानुसार इसमें परिवर्तन किया जा सकता है। अतः यह लोचदार पद्धति होती है।

3. श्रृंखला अनुक्रमणिका अथवा श्रृंखला संकेत क्रम शृंखला अनुक्रमणिका, अनुक्रमणिका की एक ऐसी विधि है, जिसकी सहायता से किसी ग्राहक विशेष को अलग-अलग तिथियों पर लिखे गए पत्रों के सम्बन्ध में यह जानकारी एक ही स्थान पर मिल जाती है कि इन (UPBoardSolutions.com) पत्रों की प्रतिलिपि किन-किन पृष्ठों पर दी गई है, ताकि उन्हें सरलता एवं शीघ्रता से प्राप्त किया जा सके।

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श्रृंखला अनुक्रमणिका बनाने की विधि

मान लीजिए कि श्याम को भेजे गए पत्रों की नकलें पृष्ठ संख्या 8, 12, 15, 20 पर हैं, तो पृष्ठ संख्या 8 पर हर 0/12 पृष्ठ के ऊपर हाशिए में बीचों-बीच लाल स्याही या पेन्सिल से लिख दिया जाएगा। अंश व हर पृष्ठ 12 पर 8/15, पृष्ठ 15 पर 12/20 तथा पृष्ठ 20 पर 15 लिखा जाएगा। बीसवें पृष्ठ पर केवल अंश ही लिखा हुआ हैं, हर नहीं। इसका तात्पर्य यह है। कि पिछले पत्र की नकल 15वें पृष्ठ पर है और अभी इससे आगे कोई पत्र नहीं लिखा गया है।
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श्रृंखला अनुक्रमणिका के गुण या महत्त्व श्रृंखला अनुक्रमणिका के गुण या महत्त्व निम्नलिखित हैं

  1. सरल इस प्रणाली के अन्तर्गत ग्राहकों को अलग-अलग तारीखों पर भेजे गए पत्रों की प्रतिलिपि को आसानी से एक निश्चित स्थान पर प्राप्त किया जा सकता है।
  2. मितव्ययिता इस प्रणाली के अन्तर्गत अधिक धन व्यय करने की आवश्यकता (UPBoardSolutions.com) नहीं होती है।
  3. बचत इस प्रणाली के अन्तर्गत पत्रों को आसानी से ढूंढा जा सकता है, जिससे समय व श्रम दोनों की बचत होती है।

4. कार्ड अनुक्रमणिका इसका आविष्कार 18वीं शताब्दी में फ्रांसीसी विद्वान ऐबे जीन रोजियर ने किया था। इस अनुक्रमणिका का प्रयोग पुस्तकालय में किया जाता है। इस अनुक्रमणिका में कार्डों का प्रयोग किया जाता है। प्रत्येक ग्राहक के लिए एक कार्ड बना दिया जाता है, जिस पर उसका नाम, पता एवं सूचनाएँ स्पष्ट रूप से लिख दी जाती हैं। बैंक में नमूने के हस्ताक्षर के लिए भी इसी अनुक्रमणिका का प्रयोग किया जाता है। इसमें निम्नलिखित वस्तुओं की आवश्यकता होती है

  1. दराजदार अलमारी दराजों की संख्या व्यापार की आवश्यकता पर निर्भर करती है। प्रत्येक दराज के सामने अंग्रेजी वर्णमाला में क्रमवार संकेत चिन्ह लगे होते हैं।
  2. नाम कार्ड इन्हें दराजों में वर्णात्मक क्रम में रखा जाता है। नाम कार्ड पर ग्राहक का नाम, पता, टेलीफोन नं., खाता पृष्ठ संख्या, आदि लिखी होती है।
  3. संकेत कार्ड इन कार्डों के माध्यम से दराज को संख्यात्मक, वर्णात्मक या स्वरात्मक क्रमानुसार कई भागों में बाँट सकते हैं। इसमें प्रत्येक कार्ड का एक सिरा ऊपर उठा होता है, जिस पर अक्षर व संख्या लिखी होती है।
  4. अनुपस्थिति कार्ड जब किसी वस्तु को उसके स्थान से हटाया जाता है, तो उसके स्थान पर जो विवरण युक्त कार्ड रखा जाता है, उसे अनुपस्थिति कार्ड कहते हैं।

कार्ड अनुक्रमणिका के गुण या महत्त्व कार्ड अनुक्रमणिका के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं

  1. लोचता यह प्रणाली लोचदार होती है, क्योंकि इसमें व्यापार की आवश्यकतानुसार दराजों की संख्या कम व अधिक की जा सकती है।
  2. स्वच्छता यह अनुक्रमणिका हमेशा स्वच्छ रहती है, क्योंकि इसको पुस्तक-सूची की तरह काटना नहीं पड़ता है। यदि किसी व्यापारी से पत्र-व्यवहार बन्द हो जाता है, तो उसके कार्ड को निकालकर नए व्यापारी का कार्ड लगा दिया जाता है।
  3. सुविधाजनक इस सूची में संकेत-पत्रों के कारण कार्ड आसानी से प्राप्त किया जाता है वे संकेत कार्डों का पता सरलता से लग जाता है।
  4. नवीनतम इसमें नए ग्राहकों के कार्ड समायोजित किए जा सकते हैं, (UPBoardSolutions.com) जिससे सूची सदैव नवीनतम बनी रहती है।
  5. केवल चालू कार्डों को रखना इस प्रणाली में ऐसे ग्राहकों के कार्ड, जिनसे व्यापार बन्द हो गया है, आसानी से हटाए जा सकते हैं। इस प्रकार इसमें केवल चालू कार्ड ही रहते हैं।
  6. मितव्ययिता इस प्रणाली में बार-बार पुस्तकें या जिल्दें नहीं खरीदनी पड़ती हैं, इसलिए यह प्रणाली अन्य प्रणालियों से मितव्ययी
  7. उपयुक्तता यह प्रणाली बड़े व्यापारिक कार्यालयों के लिए अधिक उपयुक्त रहती है।

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5. दिखने वाली (खुली) कार्ड अनुक्रमणिका दिखने वाली अनुक्रमणिका, कार्ड अनुक्रमणिका का ही एक विकसित रूप होता है। इसे खुली अनुक्रमणिका के नाम से भी जाना जाता है। यह एक ऐसी प्रणाली है, जिसमें अनेक कार्डों को एक साथ देखा जा सकता है, जबकि कार्ड अनुक्रमणिका में एक समय में केवल एक ही कार्ड को देखा जा सकता है।

प्रयोग विधि इस अनुक्रमणिका की पद्धति के अन्तर्गत अनुक्रमणिका को तैयार करने के लिए नाम कार्डों को पारदर्शी लिफाफे में रखकर धातु के चौखटों में लगा दिया जाता है। इन चौखटों में नीचे कब्जे लगे होते हैं, जिनमें कार्डों को इस प्रकार से लगाया जाता है कि कार्ड ऊपर से नीचे की ओर एक विशेष क्रम में आ जाएँ, ताकि उन्हें बाहर से देखा जा सके। कार्ड को शीघ्रता से ढूंढने के लिए बीच-बीच में संकेत कार्ड भी लगे होते हैं।

दिखने वाली अनुक्रमणिका के गुण या महत्त्व दिखने वाली अनुक्रमणिका के गुण निम्नलिखित हैं-

  1. सरलता इस प्रणाली के अन्तर्गत एक से अधिक कार्ड एक साथ सरलतापूर्वक देखे जा सकते हैं।
  2. उपयुक्तता बड़े व्यापारिक कार्यालयों के लिए यह प्रणाली उपयुक्त होती है।
  3. लोचता यह प्रणाली लोचपूर्ण होती है। इसमें पुराने कार्डों के क्रमानुसार नए कार्डों को लगाया जा सकता है।
  4. कम स्थान इस प्रणाली के अन्तर्गत अधिक स्थान की आवश्यकता नहीं होती है।
  5. सुरक्षा यह प्रणाली अनुक्रमणिका की अन्य प्रणालियों की अपेक्षा अधिक सुरक्षित होती है, क्योकि ग्राहकों के नाम कार्ड होल्डरों में लगे हुए होते हैं।

6. चक्रीय अनुक्रमणिका यह अनुक्रमणिका दिखने वाली कार्ड अनुक्रमणिका का ही विकसित रूप होता है। इसमें लोहे के स्टैण्ड में एक घुमावदार पहिया लगा होता है, जो चारों ओर घूमता है। इस पहिए में ऊपर की ओर कार्डो को फँसाने के लिए स्थान होता है। (UPBoardSolutions.com) इस पहिए में लगभग 1,000 से 5,000 तक कार्ड लगाए जा सकते हैं। इसमें कार्ड को देखने के लिए पहिए को घुमाया जाता है। चक्रीय अनुक्रमणिका के गुण या महत्त्व चक्रीय अनुक्रमणिका के गुण या लाभ निम्नलिखित हैं

  1. सरलता इस प्रणाली के अन्तर्गत ग्राहकों से सम्बन्धित सूचनाओं को सरलतापूर्वक देखा जा सकता है।
  2. अल्पव्ययी वृहद् आकार के व्यापार के लिए यह प्रणाली कम खर्चीली या अल्पव्ययी होती है।
  3. लोचता इस प्रणाली में व्यापार की आवश्यकता व सुविधा के अनुसार परिवर्तन किया जा सकता है।
  4. सुविधाजनक चक्रीये अनुक्रमणिका प्रणाली के अन्तर्गत कम स्थान की आवश्यकता होती है तथा इसे आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाया व ले जाया जा सकता है। अतः यह पद्धति अधिक सुविधाजनक होती है।

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  1. महँगी प्रणाली यह प्रणाली अन्य प्रणालियों की अपेक्षा अधिक महँगी होती है।
  2. सीमित क्षेत्र अधिक खर्चीली होने के कारण छोटे एवं मध्यम वर्ग के व्यापारी इस प्रणाली का प्रयोग करने में सक्षम नहीं होते हैं। अत: इसका प्रयोग केवल  बड़े व्यापारियों द्वारा ही किया जाता है।
  3. अन्य दोष
  • इसमें कार्डों के बदले जाने एवं खोने का भय रहता है।
  • इसका स्थानान्तरण करना कठिन होता है।
  • यदि कार्ड सही क्रम में नहीं रखे गए हैं, तो उन्हें खोजना कठिन कार्य

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