UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 7 School: As a Formal Agency of Education

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 7
Chapter Name School: As a Formal Agency of Education
(विद्यालय: शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में)
Number of Questions Solved 34
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 7 School: As a Formal Agency of Education (विद्यालय: शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विद्यालय का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। विद्यालय की आवश्यकता एवं उपयोगिता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

विद्यालय का अर्थ एवं परिभाषा
(Meaning and Definition of School)

शिक्षा के औपचारिक अभिकरणों में विद्यालय (School) मुख्यतम अभिकरण है। साधारण शब्दों में कहा जा सकता है कि बच्चों को शिक्षा प्रदान करने वाली व्यवस्थित संस्था को विद्यालय या स्कूल कहते हैं। विद्यालय शब्द विद्या + आलय दो शब्दों का संयोग है। आलय का शाब्दिक अर्थ स्थान है। इस प्रकार विद्यालय से अभिप्राय उस स्थान से हैं जहाँ विद्यार्थियों को विद्या प्रदान की जाती है। अंग्रेजी के स्कूल शब्द की व्युत्पत्ति यूनानी शब्द ‘Schola’ से हुई है, जिसका अर्थ है-अवकाश (Leisure)। प्रत्यक्ष रूप से तो विद्यालय और अवकाश के बीच कोई समानता या सम्बन्ध नहीं जान पड़ता, किन्तु इतना अवश्य है कि प्राचीन यूनान में अवकाश का उपयोग आत्म-विकास के लिए किया जाता था। आत्म-विकास का अभ्यास एक विशिष्ट एवं सुनिश्चित स्थान पर होता था, जिसे ‘अवकाश’ कहकर पुकारा गया। इस भाँति, अवकाश-आत्म-विकास (अर्थात् शिक्षा) में जुड़ गया। कालान्तर में अवकाश शिक्षा का समानार्थी बन गया। इस विचार के समर्थन में ए० एफ० लीच ने लिखा है, “वाद-विवाद या वार्ता के स्थान, जहाँ एथेन्स के युवक अपने अवकाश के समय को खेलकूद, व्यवसाय और युद्ध के प्रशिक्षण में बिताते थे, धीरे-धीरे दर्शन और उच्च कलाओं के स्कूलों में बदल गए। एकेडेमी के सुन्दर उद्यानों में व्यतीत किए जाने वाले अवकाश के माध्यम से विद्यालयों का विकास हुआ।”

अनेक शिक्षाशास्त्रियों ने विद्यालय की निम्नलिखित परिभाषाएँ प्रतिपादित की हैं

  1. जॉन डीवी के अनुसार, “विद्यालय एक ऐसा विशिष्ट वातावरण है जहाँ जीवन के कुछ गुणों और कुछ विशेष प्रकार की क्रियाओं तथा व्यवसायों की शिक्षा इस उद्देश्य से दी जाती है कि बालक का विकास वांछित दिशा में हो।”
  2. ओटावे के अनुसार, “विद्यालय को एक ऐसा सामाजिक आविष्कार मानना चाहिए जो समाज के बालकों के लिए विशेष प्रकार की शिक्षा प्रदान करने में समर्थ हो।’
  3. रॉस के अनुसार, “विद्यालय वे संस्थाएँ हैं, जिनको सभ्य मनुष्य के द्वारा इस उद्देश्य से स्थापित किया जाता है कि समाज में सुव्यवस्थित और योग्य सदस्यता के लिए बालकों की तैयारी में सहायता मिले।”
  4. टी० पी० नन के अनुसार, “विद्यालय को मुख्य रूप से इस प्रकार का स्थान नहीं समझा जाना चाहिए जहाँ किसी निश्चित ज्ञान को सीखा जाता है, वरन् ऐसा स्थान जहाँ बालकों को क्रियाओं के उन निश्चित रूपों में प्रशिक्षित किया जाता है जो इस विशाल संसार में सबसे महान् और सबसे अधिक महत्त्व वाली है।”

विद्यालय की आवश्यकता और उपयोगिता
(Need and Utility of School)

आज विद्यालय शिक्षा का एक आवश्यक, औपचारिक, शक्तिशाली एवं महत्त्वपूर्ण स्थान बन गया है। आधुनिक समाज में विद्यालये की आवश्यकता तथा उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए एस० बालकृष्ण जोशी लिखते हैं, “किसी भी राष्ट्र की प्रगति का निर्माण विधानसभाओं, न्यायालयों और फैक्ट्रियों में नहीं, बल्कि विद्यालयों में होता है।”

उपर्युक्त विवेचन से निष्कर्ष निकलता है कि शिक्षा का सविधिक तथा औपचारिक साधन विद्यालय, व्यक्ति और समाज, दोनों की ही प्रगति के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण, आवश्यक एवं उपयोगी है। किसी भी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व्यवस्था के अन्तर्गत इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। टी० पी० नन का कहना है, एक राष्ट्र के विद्यालय उसके जीवन के वे अंग हैं, जिनका विशेष कार्य है उसकी आध्यात्मिक शक्ति को दृढ़ बनाना, उसकी ऐतिहासिक निरन्तरता को बनाए रखना, उसकी भूतकाल की सफलताओं को सुरक्षित रखना और उसके भविष्य की गारण्टी करना।”

प्रश्न 2.
शिक्षा के एक मुख्य औपचारिक अभिकरण के रूप में विद्यालय के कार्यों का उल्लेख 
कीजिए।
विद्यालय के कार्यों की व्याख्या कीजिए। विद्यालय के चार प्रमुख कार्यों की व्याख्या कीजिए।
वैयक्तिक विकास के विचार से विद्यालय के कार्यों को लिखिए।
उत्तर:

विद्यालय के कार्य
(Functions of School)

विद्यालय के कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य निम्नलिखित हैं|

1.शारीरिक विकास- आधुनिक विद्यालयों का प्रमुख एवं प्रथम कर्तव्य बालक का शारीरिक विकास करना है। बालकों का मानसिक विकास, शारीरिक विकास पर ही निर्भर करता है। अत: बालकों को स्वच्छता व स्वास्थ्यवर्द्धन का विद्यालय के कार्य प्रशिक्षण प्रदान करने हेतु प्रत्येक विद्यालय अपने प्रांगण में खेलकूद और व्यायाम का समुचित प्रबन्ध रखता है। इसके अलावा आजकल विद्यालयों में बच्चों के लिए सन्तुलित आहार एवं चिकित्सा सेवा की व्यवस्था भी रहती है।

2. मानसिक विकास- विद्यालय का दूसरा औपचारिक कार्य प्रशिक्षण बालक का मानसिक एवं बौद्धिक विकास करना है। विद्यालय का । सामाजिक प्रशिक्षण वातावरण एवं क्रियाएँ इस प्रकार की हैं कि बालक में ज्ञान की भूख ” भावात्मक एवं सौन्दर्यात्मक जाग्रत हो और उसमें अधिक-से-अधिक जानने के लिए जिज्ञासा व प्रशिक्षण उत्सुकता पैदा हो। शिक्षा का एक विशिष्ट कार्य बालक की रुचि के नेतृत्व एवं नागरिकता के गुणों का अभिरुचि, योग्यता तथा आवश्यकताओं के अनुसार उसकी मानसिक विकास शक्तियों का विकास करना है। मानसिक रूप से विकसित बालक ही बौद्धिक उन्नति को प्राप्त कर भावी जीवन के मूल्यों का निर्माण कर सकता है।

3. नैतिक एवं चारित्रिक विकास- बालक में नैतिक-चरित्र विकसित करना विद्यालय का तीसरा औपचारिक कर्तव्य है। चारित्रिक विकास की दृष्टि से विद्यालय में इस प्रकार का वातावरण तैयार किया जाना चाहिए जिससे कि बालक में नैतिक मूल्यों का प्रादुर्भाव एवं विकास हो सके। शिक्षार्थियों का नैतिक विकास समाज के वातावरण पर निर्भर करता है। अत: विद्यालय को उपयुक्त सामाजिक वातावरण की रचना तथा उत्तम सामाजिक क्रियाओं की व्यवस्था में भी योगदान करना चाहिए। वस्तुत: सामाजिक वातावरण में सामाजिक क्रियाओं के माध्यम से ही बालकों में नैतिक गुण एवं आदर्श आचरण का विकास सम्भव है।

4. व्यावसायिक एवं औद्योगिक प्रशिक्षण- विद्यालय का एक महत्त्वपूर्ण कार्य यह है कि वह बालक को भावी जीवन में आत्मनिर्भर बनने के लिए व्यावसायिक एवं औद्योगिक प्रशिक्षण प्रदान करे। माध्यमिक शिक्षा की समाप्ति पर आधुनिक विद्यालय बालकों की रुचि एवं रुझान के व्यवसायों में उचित प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। विद्यालय ऐसे विभिन्न व्यवसायों की शिक्षा का प्रबन्ध करते हैं जो शिक्षार्थियों को आगे चलकर अपने निर्दिष्ट व्यवसाय को चुनने में सहायता दे सके और इस भाँति उन्हें जीविकोपार्जन के लिए तैयार कर सके। यही कारण है कि वर्तमान समय में व्यावसायिक और औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थाओं का महत्त्व उत्तरोत्तर बढ़ रहा है।

5. सामाजिक प्रशिक्षण- आधुनिक समय में यह विचारधारा परिपक्व एवं सर्वमान्य होती जा रही है । कि विद्यालय को सामुदायिक केन्द्र के रूप में कार्य करना चाहिए। सामाजिक पुनर्रचना के दायित्व का निर्वाह करने की दृष्टि से विद्यालय सामाजिक समारोहों, सामाजिक कार्यों तथा समाज-सेवा के माध्यम से बालकों को उचित सामाजिक प्रशिक्षण प्रदान करते हैं।

6. भावात्मक एवं सौन्दर्यात्मक प्रशिक्षण- बच्चों को भावात्मक एवं सौन्दर्यात्मक प्रशिक्षण प्रदान करना भी विद्यालय का एक प्रमुख औपचारिक कार्य हैं। आधुनिक विद्यालयों में संगीत सम्मेलनों, नाटकों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, वाद-विवाद प्रतियोगिताओं तथा चित्रकला प्रदर्शनियों का आयोजन कर शिक्षार्थियों को भावात्मक तथा सौन्दर्यात्मक परीक्षण दिया जाता है।

7. नेतृत्व एवं नागरिकता के गुणों का विकास- लोकतन्त्र की सफलता उत्तम नेतृत्व एवं नागरिकता पर निर्भर करती है। विद्यालय के वातावरण तथा गतिविधियों के अन्तर्गत ही बालक-बालिकाओं में श्रेष्ठ नेतृत्व के गुणों का विकास होता है। इसके अतिरिक्त विद्यालय ही बालकों को अपने कर्तव्य एवं अधिकार समझने की तथा उनका उचित उपयोग करने की शिक्षा प्रदान करते हैं। बालक को समाज में अपना योग्य एवं विशिष्ट स्थान बनाने का प्रशिक्षण भी विद्यालय द्वारा ही प्राप्त होता है। स्पष्टत: विद्यालय के प्रधान कर्तव्यों में आदर्श नागरिकता एवं नेतृत्व के गुणों का विकास भी सम्मिलित है।

8. मानव-मात्र का कल्याण- शिक्षा का एकमात्र अभीष्ट लक्ष्य मानव-मात्र का कल्याण करना है। शिक्षा की औपचारिक संस्थाएँ विद्यालय हैं। वस्तुत: विद्यालय ज्ञान के वे महान् प्रकाश-स्तम्भ हैं जो विचलित एवं भूले-भटके मनुष्यों को सत्य का मार्ग दिखाते हैं। ज्ञानयुक्त मानव ही सुखी, समृद्ध, शान्त एवं सम्यक् जीवन जी सकता है। सद्ज्ञान, त्याग, परोपकार एवं नि:स्वार्थ सेवा का भाव जगाता है। इस भॉति सद्ज्ञान एवं वास्तविक शिक्षा प्रदान कर विद्यालय मानव-मात्र का कल्याण करते हैं।

 

प्रश्न 3 घर तथा विद्यालय में सम्बन्ध स्थापित करने के मुख्य उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
घर एवं परिवार बालक की प्रथम पाठशाला है। घर में बालक की प्रारम्भिक शिक्षा की व्यवस्था होती है तथा शिक्षा को विस्तृत रूप प्रदान करने का कार्य विद्यालय द्वारा किया जाता है। इस स्थिति में बच्चों की शिक्षा की सुचारु व्यवस्था के लिए घर तथा विद्यालय में परस्पर अच्छे सम्बन्ध एवं सहयोग का होना अति आवश्यक है। इस सहयोगात्मक सम्बन्ध को स्थापित करने के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित उपायों या विधियों को अपनाना आवश्यक है|

1. अभिभावकों का सम्मेलन- समय-समय पर विद्यालय के घर तथा विद्यालय में सम्बन्ध प्रांगण में अभिभावकों के सम्मेलन आयोजित होते रहने चाहिए और स्थापित करने के उपाय उनमें सभी वर्गों के प्रतिनिधियों को आमन्त्रित किया जाना चाहिए,  ताकि उस बालक के माता-पिता, गुरुजनों तथा समाज के ‘प्रतिनिधियों को परस्पर मिलने का अवसर प्राप्त हो सके। सभी लोग प्रधानाचार्य का सहयोग एकत्र होकर बालकों की पढ़ाई-लिखाई तथा अनुशासन सम्बन्धी विद्यालय द्वारा आर्थिक दण्ड नहीं समस्याओं पर विचार-विमर्श कर सकते हैं और उनका उचित हल खोज सकते हैं। यदि गृह एवं समुदाय के लोग विद्यालय के लगन क्रिया-कलापों में रुचि प्रदर्शित कर सहयोग देंगे तो इससे शिक्षा की व्यवस्था सुन्दर बन सकेगी।

2. बालक की प्रगति-रिपोर्ट- विद्यालय को चाहिए कि वह घर सामायिक जीवन के केन्द्र से सम्बन्ध स्थापित करने हेतु समय-समय पर बालकों की प्रगति-रिपोर्ट अभिभावकों को भेजता रहे। उधर अभिभावकों को भी कर्तव्य है कि वे अपने बालक की पढ़ाई-लिखाई तथा चाल-चलन पर पूरा ध्यान दें और वस्तुस्थिति से शिक्षकों को लगातार अवगत कराते रहें। यदि बालक अध्ययन-कार्य में कम रुचि ले रहा है या अनुशासनहीन । हो रहा है तो अभिभावकों को तत्काल ही विद्यालय से सम्पर्क स्थापित कर समस्या का निराकरण करना चाहिए।

3. प्रधानाचार्य का सहयोग- समस्याग्रस्त बालक के अभिभावक की रिपोर्ट पर प्रधानाचार्य को तुरन्त ध्यान देना चाहिए। सम्भव है बालक स्कूल से घर जल्दी या बहुत देर में पहुँचता हो, गृहकार्य न करता हो, बुरी संगति का शिकार हो गया हो या कक्षा छोड़कर भाग जाता हो आदि। सभी दशाओं में शिकायत मिलने पर प्रधानाचार्य का कर्तव्य है कि वह बालक को सम्बन्धित शिक्षक के सामने बुलाकर उसके बारे में बातचीत करे, समझाए या दण्ड दे और भविष्य में उस पर पूरी निगाह रखें। इस प्रकार प्रधानाचार्य का सहयोग घर तथा विद्यालय को परस्पर जोड़ने में मदद देता है।

4. विद्यालय द्वारा आर्थिक दण्ड नहीं- आर्थिक दण्ड का प्रत्यक्ष भार बालक के माता-पिता पर पड़ता है, जिससे उन्हें परेशानी हो सकती है। अत: अधिकतम सहयोग लेने की दृष्टि से विद्यालय को चाहिए कि बच्चों को कभी भी आर्थिक दण्ड न दिया जाए। । 5. शिक्षक बालक के घर जाए-शिक्षा के विभिन्न साधनों के बीच तालमेल स्थापित करने की दृष्टि से समय-समय पर शिक्षक का बालक के घर जाना आवश्यक है। शिक्षकों को चाहिए कि वे समय निकालकर बालक के अभिभावकों से उनके घर सम्पर्क स्थापित करें, उनसे बालक की समस्या जाने और उनका यथोचित समाधान तलाश करें। सभी शिक्षा-मनोवैज्ञानिकों का मत है कि शिक्षक को समस्यात्मक बालक के घर अनिवार्य रूप से जाना चाहिए।

5. शिक्षकों की सत्यनिष्ठा एवं लगन- शिक्षक को विद्यालय के अन्तर्गत अपने कर्तव्य की पूर्ति अत्यन्त सत्यनिष्ठा, लगन एवं तत्परता के साथ करनी चाहिए। इससे बालकों तथा अभिभावकों पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है, जिसके परिणामत: वे शिक्षकों को अधिकाधिक सम्मान की दृष्टि से देखते हैं और उनसे सम्पर्क बनाकर प्रसन्न तथा प्रेरित होते हैं।

7. सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार- शैक्षिक अधिकारियों का बालकों के अभिभावकों तथा समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ प्रेम एवं सहानुभूतिपूर्ण तथा मानवीय व्यवहार होना चाहिए। शिक्षा के विभिन्न अभिकरणों का एक-दूसरे से उत्तम व्यवहार, विश्वास और सहयोग की दिशा में एक सार्थक कदम है।

8. सामाजिक कार्य- समाज सेवा, राष्ट्रीय सेवा योजना, श्रमदान, सफाई सप्ताह, बालचर संघ तथा प्रौढ़ शिक्षा आदि सामाजिक कार्य क्योंकि समाज के कल्याण की भावना से परिपूर्ण होते हैं; अत: अभिभावकों, शिक्षकों तथा शिक्षार्थियों को मिलकर इसमें भागीदारी करनी चाहिए। इस प्रकार के सामाजिक क्रियाकलापों से घर, विद्यालय तथा समुदाय के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध बनेंगे।

9. सामुदायिक जीवन के केन्द्र- विद्यालयों की स्थापना समुदाय द्वारा जनकल्याण की भावना से की जाती है; अतः विद्यालयों को सामुदायिक जीवन का सबल एवं सजीव केन्द्र होना चाहिए। इसके लिए विद्यालय के प्रांगण में प्रौढ़ शिक्षा, स्त्री शिक्षा, रात्रि पुस्तकालय एवं वाचनालय तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों की व्यवस्था की जा सकती है। परिवार एवं समुदाय द्वारा विद्यालय के साधनों का उपयोग एक स्वस्थ परम्परा को जन्म देता है, जिसके फलस्वरूप गृह, विद्यालय एवं समुदाय के सदस्यों के बीच गहन सूझ-बूझ तथा अन्तर्सम्बन्ध स्थापित होते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विद्यालय से आप क्या समझते हैं ? विद्यालय को एक प्रभावशाली अभिकरण बनाने के लिए आप क्या सुझाव देंगे ?
शिक्षा के अभिकरण के रूप में विद्यालय का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में बच्चों को औपचारिक रूप से शिक्षा प्रदान करने वाला मुख्यतम अभिकरण ‘विद्यालय’ (School) कहलाता है। विद्यालय शिक्षा का औपचारिक अभिकरण है। सभ्य मानव समाज ने अपनी सोच के बल पर विद्यालयों का विकास किया है। ओटावे के अनुसार, ‘‘विद्यालय को एक सामाजिक आविष्कार मानना चाहिए जो समाज के बालकों के लिए विशेष प्रकार की शिक्षा प्रदान करने में समर्थ है। इसी प्रकार रॉस ने स्पष्ट किया है, “विद्यालय वे संस्थाएँ हैं, जिनको सभ्य मनुष्य के द्वारा इस उद्देश्य से स्थापित किया जाता है कि समाज में सुव्यवस्थित और योग्य सदस्यता के लिए बालकों को तैयारी में सहायता मिले।”

स्पष्ट है कि बच्चों की व्यवस्थित शिक्षा में विद्यालय का विशेष महत्त्व है। अब प्रश्न उठता है कि विद्यालयों को शिक्षा का अधिक प्रभावशाली एवं उपयोगी अभिकरण कैसे बनाया जाए? इसके लिए प्रथम सुझाव यह है कि विद्यालय की अनुशासन व्यवस्था अति उत्तम होनी चाहिए। विद्यालयों का शैक्षिक वातावरण अधिक-से-अधिक सौहार्दपूर्ण, आदर्शपरक तथा मूल्यपरक होना चाहिए। विद्यालय में अध्यापकों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। अध्यापकों को पूर्ण निष्ठा एवं लगन से तथा दायित्वपूर्ण ढंग से अध्यापन कार्य । करना चाहिए। विद्यालय प्रबन्धन द्वारा शिक्षा के स्तर को हर प्रकार से उन्नत करने के सभी सम्भव उपाय किए जाने चाहिए।

प्रश्न 2 शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में विद्यालय का विकास कैसे हुआ है ?
उत्तर:

विद्यालय के विकास के कारक
(Points of Development of Schools)

शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में व्यवस्थित विद्यालयों का विकास सभ्यता के पर्याप्त विकास के बहुत बाद में हुआ है। शिक्षा के औपचारिक अभिकरण के रूप में विद्यालय के विकास को प्रोत्साहन देने वाले मुख्य कारक निम्नलिखित हैं

1. पारम्परिक परिवार के स्वरूप में परिवर्तन- पारम्परिक रूप से परिवार का स्वरूप एवं आकार आज के एकाकी परिवार से नितान्त भिन्न था। परिवार बड़े एवं विस्तृत थे। इस प्रकार के परिवारों में बच्चों की सामान्य शिक्षा की समुचित व्यवस्था परिवार में ही हो जाती थी। परन्तु जब पारम्परिक परिवार ने क्रमशः एकाकी परिवार का रूप ग्रहण किया तो परिवार में बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था हो पाना असम्भव हो गया। अत: बच्चों की शिक्षा की सुचारु व्यवस्था के लिए व्यवस्थित विद्यालयों की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी। इसके अतिरिक्त सभ्यता के विकास के साथ-साथ शिक्षा भी अधिक विस्तृत, विशिष्ट एवं जटिल हो गई। इस प्रकार की शिक्षा की व्यवस्था घर पर सम्भव नहीं थी।

2. परिवार द्वारा दायित्वमुक्त होना- पारम्परिक रूप से बच्चों की शिक्षा का दायित्व परिवार का होता था, परन्तु वर्तमान सभ्यता के विकास के परिणामस्वरूप बच्चों की शिक्षा को सार्वजनिक एवं सामाजिक क्षेत्र का कार्य मान लिया गया। इसके साथ ही शिक्षा की व्यवस्था करने के लिए विद्यालय का विकास भी हुआ।

3. विद्यालय के विकास के आर्थिक कारण- विद्यालय के विकास के लिए कुछ आर्थिक कारक भी जिम्मेदार हैं। सभ्यता के विकास के साथ-साथ परिवार की आर्थिक समस्याएँ बढ़ने लगीं। इन दशाओं में बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था करना परिवार के लिए प्रायः असम्भव हो गया। अत: बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था के लिए विद्यालय का प्रादुर्भाव हुआ।

प्रश्न 3.
विद्यालय की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

विद्यालय की प्रमुख विशेषताएँ
(Main Characteristics of School)

शिक्षा के प्रमुख औपचारिक अभिकरण के रूप में विद्यालय की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं|

  1. विद्यालय एक औपचारिक अभिकरण है। इसका उद्देश्य छात्रों में आदर्श नागरिकों के गुणों को विकसित करना होता है। विद्यालय अपने आप में समाज की एक लघु संस्था है।
  2. विद्यालय एक सामाजिक ढाँचा है। इस व्यवस्था में छात्रों द्वारा विभिन्न विषयों को सीखने का तथा अध्यापकों द्वारा सिखाने का कार्य किया जाता है।
  3. औपचारिक अभिकरण होने के कारण विद्यालय की एक स्पष्ट तथा निश्चित नीति निर्धारित की जाती है जिसका पालन सभी पक्षों द्वारा किया जाता है।
  4. विद्यालय के कार्य सुचारु तथा नियमित रूप से सम्पन्न होते हैं।
  5. विद्यालय की एक अपनी संस्कृति होती है। यह सबके हित के लिए होती है तथा सभी पक्ष इसका पालन करते हैं।
  6. विद्यालय के माध्यम से सामूहिक ढंग से जीवन व्यतीत किया जाता है। इससे जुड़े सभी व्यक्तियों के लिए ‘मैं’ या ‘मेरे’ के स्थान पर ‘हम’ या ‘हमारे’ का भाव प्रबल होता है।
  7. विद्यालय की एक विशेषता यह है कि इस वातावरण में अनेक प्रकार की सामाजिक अन्तर्कियाएँ । सम्पन्न होती हैं। ये अन्तर्कियाएँ विभिन्न बालकों के मध्य, बालकों तथा अध्यापकों के मध्य, अध्यापक तथा अध्यापक के मध्य, अध्यापकों एवं प्रधानाचार्य के मध्य सम्पन्न हुआ करती हैं।

प्रश्न 4.
विद्यालय के सामान्य महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

विद्यालय का सामान्य महत्त्व
(General Importance of School)

विद्यालय के सामान्य महत्त्व का विवरण निम्नलिखित है|

  1. आधुनिक जीवन अत्यधिक जटिल होता जा रहा है। जनसंख्या, आवश्यकताओं तथा मूल्य-वृद्धि ने मनुष्यों को जीवन-व्यापार में असामान्य रूप से व्यस्त कर दिया है। लोगों के पास इतना समय नहीं रह गया है। कि वे अपने बच्चों की शिक्षा की देखभाल कर सकें। अत: शिक्षा सम्बन्धी अधिकतम दायित्व विद्यालय के पास आ गए हैं।
  2. अपने सुनिश्चित उद्देश्य तथा पूर्व-नियोजित शैक्षिक कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यालय बालक के व्यक्तित्व को व्यापक रूप से प्रभावित करता है। यहाँ बालक के व्यक्तित्व का सामंजस्यपूर्ण विकास होता
  3. विद्यालय में राज्य के लिए उपयोगी नागरिक के गुणों; जैसे-धैर्य, सहयोग, उत्तरदायित्व आदि का विकास होता है। वस्तुतः विद्यालय ही एकमात्र वह साधन है जिसके द्वारा शिक्षित नागरिकों का निर्माण सम्भव है।
  4. शिक्षा की प्रक्रिया सामाजिक है और विद्यालय एक प्रमुख सामाजिक संस्था है। विद्यालय में समाज की निरन्तरता और विकास के लिए सभी प्रभावपूर्ण साधन केन्द्रित होते हैं।
  5. विद्यालय राष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तान्तरित करने के अभिकरण हैं। इसके अतिरिक्त ये बालकों में बहुमुखी संस्कृति का विकास करने का महत्त्वपूर्ण साधन भी हैं।
  6. विद्यालय गृह एवं व्यापक विश्व को जोड़ने वाली कड़ी हैं। जैसा कि रेमॉण्ट का कथन है, “विद्यालय बाह्य जीवन के बीच की अर्द्ध-पारिवारिक कड़ी है जो बालक की उस समय प्रतीक्षा करता है, जब वह अपने माता-पिता की छत्रछाया को छोड़ती है।”

प्रश्न 5.
घर तथा विद्यालय में पाए जाने वाले सम्बन्ध का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

घर तथा विद्यालय का आपसी सम्बन्ध
(Relation between Home and School)

घर अथवा परिवार तथा विद्यालय के आपसी सम्बन्ध की आवश्यकता एवं महत्त्व को रॉस ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “यदि गृह एवं विद्यालय के बीच सहयोग या सामंजस्य स्थापित न किया जाए तो बालक का अत्यधिक अहित होगा। घर बालक का प्रथम विद्यालय है और विद्यालय एक प्रकार से घर का विस्तार है। शिक्षण संस्था के रूप में विद्यालय घर का स्थान नहीं ले सकता, परन्तु इन दोनों के बीच विशेष सहयोग होता है।” घर अथवा परिवार तथा विद्यालय के आपसी सम्बन्ध का संक्षिप्त विवरण निम्नवर्णित है

  1. घर तथा विद्यालय दोनों ही समाज की अभिन्न इकाइयाँ हैं तथा बालक के सर्वांगीण विकास के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं।
  2. बच्चों का जीवन घर एवं विद्यालय में ही व्यतीत होता है। बच्चा घर से विद्यालय जाता है तथा विद्यालय से घर के वातावरण में पुनः आ जाता है। इस प्रकार से घर तथा विद्यालय दोनों ही बच्चों के व्यक्तित्व के विकास में निरन्तर योगदान प्रदान करते हैं।
  3. बच्चे की शिक्षा की प्रक्रिया में विद्यालय तथा परिवार दोनों का योगदान होता है। विद्यालय द्वारा दिया गया गृह-कार्य आदि परिवार के सदस्यों की सहायता से पूरा होता है। विद्यालय की विभिन्न शैक्षिक गतिविधियों को सुचारु रूप से पूरा करने के लिए परिवार की सहायता अति आवश्यक होती है।

उपर्युक्त विवरण द्वारा स्पष्ट है कि घर अथवा परिवार तथा विद्यालय परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है। बच्चों की शिक्षा के दृष्टिकोणों से ये दोनों परस्पर पूरक हैं। घर शिक्षा का मुख्यतम अनौपचारिक अभिकरण है, जब कि विद्यालय शिक्षा का मुख्यतम औपचारिक अभिकरण है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्पष्ट कीजिए कि पारिवारिक परिस्थितियों में होने वाले परिवर्तन ने विद्यालय के विकास को प्रोत्साहन दिया है ?
उत्तर:
पारम्परिक रूप से घर या परिवार ही बच्चों को शिक्षा प्रदान करने का कार्य करता था, परन्तु सभ्यता के विकास के साथ-साथ परिवार की परिस्थितियाँ, कार्य-क्षेत्र एवं स्वरूप में उल्लेखनीय परिवर्तन होने लगा। इस स्थिति में घर-परिवार द्वारा बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था कर पाना कठिन हो गया। परिणामस्वरूप, बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था करने के लिए विद्यालय का विकास हुआ। एक अन्य पारिवारिक कारक ने भी विद्यालय के विकास में उल्लेखनीय योगदान प्रदान किया। यह कारक था शिक्षा का अधिक जटिल तथा विस्तृत हो जाना। इस प्रकार की शिक्षा की व्यवस्था कर पाना परिवार के लिए सम्भव नहीं था। अत: विद्यालय का प्रादुर्भाव एवं विकास हुआ।

प्रश्न 2.
बच्चों की शिक्षा की सुव्यवस्था के लिए घर तथा विद्यालय में समुचित सहयोग की 
आवश्यकता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बच्चों की शिक्षा की सुव्यवस्था के लिए घर तथा विद्यालय के बीच समुचित सहयोग अति आवश्यक है। वास्तव में घर बच्चों की शिक्षा की प्रथम पाठशाला है तथा उनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर-परिवार द्वारा शुरू की जाती है। शिक्षा की इस प्रक्रिया को विस्तृत, व्यवस्थित तथा विशिष्ट रूप प्रदान करने का कार्य विद्यालय द्वारा किया जाता है। विद्यालय द्वारा बच्चों को शिक्षित करने के कार्य में परिवार द्वारा महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान किया जाता है। बच्चे की पारिवारिक समस्याओं के निवारण में शिक्षक द्वारा समुचित योगदान दिया जा सकता है। इसी प्रकार से बच्चे को विद्यालय सम्बन्धी समस्याओं के समाधान में भी परिवार को सहयोग आवश्यक होता है। वर्तमान समय में विद्यालय की शिक्षा पर्याप्त व्यय-साध्य हो गई है। यह खर्च परिवार द्वारा ही वहन किया जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि बच्चों की शिक्षा की सुव्यवस्था के लिए घर तथा विद्यालय में समुचित सहयोग अति आवश्यक है।

प्रश्न 3.
आपके विचारानुसार घर तथा विद्यालय में आवश्यक सहयोग कैसे स्थापित किया जा 
सकता है?
उत्तर:
बच्चों की सुचारु शिक्षा के लिए घर-परिवार तथा विद्यालय के बीच में समुचित सहयोग होना। अति आवश्यक है। इस प्रकार का सहयोग स्थापित करने के लिए विद्यालय के शिक्षकों तथा बच्चों के अभिभावकों के बीच निकटता के सम्बन्ध एवं नियमित सम्पर्क बना रहना अति आवश्यक है। इस सम्पर्क के लिए विद्यालय द्वारा शिक्षक-अभिभावक संघ की स्थापना की जानी चाहिए तथा इस संघ की समय-समय पर बैठक होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त शिक्षकों को भी कभी-कभी बच्चों के घर जाना चाहिए। शिक्षकों का दायित्व है कि वे बच्चों की शैक्षिक, अनुशासनात्मक तथा व्यक्तिगत गतिविधियों से उनके अभिभावकों को अवगत कराते रहें। इन सभी उपायों द्वारा घर तथा विद्यालय के बीच आवश्यक सहयोग स्थापित किया जा सकता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शाब्दिक दृष्टिकोण से विद्यालय के अर्थ को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘विद्यालय’ शब्द ‘विद्या’ तथा ‘आलय’ दो शब्दों के योग से बना है। इस प्रकार से विद्यालय का अर्थ है–विद्या या ज्ञान का घर।

प्रश्न 2 ‘विद्यालय की एक संक्षिप्त परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
“विद्यालय वे संस्थाएँ हैं, जिनको सभ्य मनुष्य के द्वारा इस उद्देश्य से स्थापित किया जाता है कि समाज में सुव्यवस्थित और योग्य सदस्यता के लिए बालकों की तैयारी में सहायता मिले।” –रॉस

प्रश्न 3.
“विद्यालय को एक ऐसा सामाजिक आविष्कार मॉनना चाहिए जो समाज के बालकों के लिए
विशेष प्रकार की शिक्षा प्रदान करने में समर्थ हो।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री ओटावे का है।

प्रश्न 4.
कोई ऐसा कथन लिखिए जो विद्यालयों के महत्त्व एवं उपयोगिता को स्पष्ट करता हो?
उत्तर:
“किसी भी राष्ट्र का निर्माण तथा प्रगति विधानसभाओं, न्यायालयों तथा फैक्ट्रियों में नहीं, बल्कि विद्यालयों में होता है।” एस० बालकृष्ण जोशी

प्रश्न 5. विद्यालय शिक्षा का किस प्रकार का अभिकरण है ?
उत्तर:
विद्यालय शिक्षा का मुख्यतम औपचारिक अभिकरण है।

प्रश्न 6.
आधुनिक युग के विद्यालयों के व्यवस्थित गठन से पूर्व बच्चों की शिक्षा का दायित्व किस सामाजिक संस्था का था ?
उत्तर:
आधुनिक युग के विद्यालयों के व्यवस्थित गठन से पूर्व बच्चों की शिक्षा का दायित्व परिवार का था।

प्रश्न 7.
परिवार ने अपने आपको बच्चों की शिक्षा के दायित्व से मुक्त क्यों कर लिया?
उत्तर:
परिवार के आकार एवं स्वरूप के परिवर्तित हो जाने तथा शिक्षा के जटिल एवं विस्तृत हो जाने के कारण परिवार ने अपने आपको बच्चों की शिक्षा के दायित्व से मुक्त कर लिया।

प्रश्न 8.
विद्यालय के चार मुख्य कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • छात्रों का शारीरिक एवं मानसिक विकास करना,
  • छात्रों का नैतिक एवं चारित्रिक विकास करना,
  • व्यावसायिक एवं औद्योगिक प्रशिक्षण प्रदान करना तथा
  • नेतृत्व एवं नागरिकता के गुणों का विकास करना।

प्रश्न 9.
बच्चों की शैक्षिक-व्यवस्था के दृष्टिकोण से घर तथा विद्यालय के सम्बन्ध को स्पष्ट 
कीजिए।
उत्तर:
बच्चों की शैक्षिक-व्यवस्था के दृष्टिकोण से घर तथा विद्यालय परस्पर पूरक हैं।

प्रश्न 10.
बच्चों के सर्वांगीण विकास के उद्देश्य की पूर्ति के लिए घर एवं विद्यालय का क्या दायित्व है?
उत्तर:
बच्चों के सर्वांगीण विकास के उद्देश्य की पूर्ति के लिए घर एवं विद्यालय में पूर्ण सहयोग होना चाहिए।

प्रश्न 11.
“विद्यालय को वास्तव में घर का विस्तृत रूप होना चाहिए।”
उत्तर:
ऐसा किसने कहा? उत्तर जॉन डीवी ने।

प्रश्न 12.
घर एवं विद्यालय में समुचित सहयोग बनाए रखने का मुख्यतम उपाय बताइट।
उत्तर:
घर एवं विद्यालय में समुचित सहयोग बनाए रखने के लिए विद्यालय के शिक्षकों तथा बच्चों के अभिभावकों में निरन्तर सम्पर्क स्थापित होना चाहिए।

प्रश्न 13.
“शिक्षालय न तो ज्ञान की दुकान हैं और न अध्यापक उसके विक्रेता।” प्रस्तुत कथन किसका है ?
उत्तर:
प्रस्तुत कथन जॉन एडम्स का है।

प्रश्न 14 शिक्षा के अभिकरण की दृष्टि से विद्यालय और समाज में क्या अन्तर है ?
उत्तर:
विद्यालय शिक्षा का प्रमुख औपचारिक अभिकरण है, इससे भिन्न समाज शिक्षा का एक अनौपचारिक अभिकरण है।

प्रश्न 15 निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. विद्यालय शिक्षा का मुख्यतम अनौपचारिक अभिकरण है।
  2. व्यक्ति की शैक्षिक योग्यता का प्रमाण-पत्र विद्यालय द्वारा ही दिया जाता है।
  3. घर बालक की प्रथम पाठशाला है तथा विद्यालय घर का ही विस्तृत रूप है।
  4. बच्चों की शिक्षा के दृष्टिकोण से धर एवं विद्यालय का परस्पर सहयोग अनावश्यक एवं व्यर्थ है।
  5. बच्चों की सुचारु शिक्षा-व्यवस्था के लिए सभी विद्यालयों में अभिभावक-शिक्षक संघ होना अति आवश्यक है।

उत्तर:

  1. असत्य,
  2. सत्य,
  3. सत्य,
  4. असत्य,
  5. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए
प्रश्न 1.
“विद्यालय बाह्य जीवन के बीच एक अर्द्ध-पारिवारिक कड़ी है, जो बालक की उस समय प्रतीक्षा करता है जब वह अपने माता-पिता की छत्रछाया को छोड़ता है।” यह कथन किसका है?
(क) जॉन डीवी का
(ख) रेमॉण्ट का।
(ग) फ्रॉबेल का।
(घ) टी० पी० नन का

प्रश्न 2.
आधुनिक युग में विद्यालय के विकास का कारक है
(क) परिवार के आकार एवं स्वरूप में परिवर्तन
(ख) शिक्षा का जटिल एवं विस्तृत हो जाना
(ग) शिक्षा-व्यवस्था को सामाजिक दायित्व स्वीकार करना
(घ) उपर्युक्त सभी कारण :

प्रश्न 3.
विद्यालय से आशय है
(क) यह शिक्षा का मुख्य अनौपचारिक अभिकरण है।
(ख) यह शिक्षा का मुख्य औपचारिक अभिकरण है।
(ग) यह शिक्षा का व्यावसायिक अभिकरण है।
(घ) यह शिक्षा का अनावश्यक अभिकरण है।

प्रश्न 4.
विद्यालय की विशेषता नहीं है।
(क) बालक के बहुपक्षीय विकास में योगदान प्रदान करना
(ख) बालक की शैक्षिक योग्यता का प्रमाण-पत्र प्रदान करना
(ग) आजीवन शिक्षा की प्रक्रिया का परिचालन करना
(घ) उपर्युक्त सभी विशेषताएँ।

प्रश्न 5.
घर एवं विद्यालय के आपसी सम्बन्ध को स्पष्ट करने वाला कथन है
(क) घर एवं विद्यालय दो नितान्त भिन्न संस्थाएँ हैं।
(ख) घर पालन-पोषण करता है, जबकि विद्यालय शिक्षा की व्यवस्था करता है।
(ग) घर तथा विद्यालय परस्पर पूरक संस्थाएँ हैं।
(घ) घर एवं विद्यालय परस्पर विरोधी संस्थाएँ हैं।

प्रश्न 6.
घर तथा विद्यालय में सहयोग स्थापित करने का उपाय है
(क) प्रत्येक विद्यालय में शिक्षक-अभिभावक संघ स्थापित करना
(ख) विद्यालय के विभिन्न उत्सवों में अभिभावकों को आमन्त्रित करना
(ग) शिक्षकों का अभिभावकों से निरन्तर सम्पर्क रहना
(घ) उफ्र्युक्त सभी उपाय

प्रश्न 7.
औपचारिक शिक्षा का प्रमुख साधन है
(क) घर
(ख) समाज
(ग) राज्य
(घ) विद्यालय

प्रश्न 8.
विद्यालय शिक्षा के किस अभिकरण के उदाहरण हैं ?
(क) औपचारिक अभिकरण
(ख) अनौपचारिक अभिकरण
(ग) निरौपचारिक अभिकरण
(घ) निष्क्रिय अभिकरण

प्रश्न 9.
विद्यालय के महत्व को दर्शाने वाला कथन है
(क) विद्यालय में ढीला-ढाला अनुशासन होता है।
(ख) विद्यालय एक विस्तृत संस्था है।
(ग) विद्यालय का घर-परिवार से कोई सम्बन्ध नहीं है।
(घ) विद्यालय घर तथा समाज को जोड़ने वाली कड़ी है।
उत्तर:

1. (ख) रेमॉण्ट का,
2. (घ) उपर्युक्त सभी कारण,
3. (ख) यह शिक्षा का मुख्य औपचारिक अभिकरण है,
4. (ग) आजीवन शिक्षा की प्रक्रिया का परिचालन करना,
5. (ग) घर तथा विद्यालय परस्पर पूरक संस्थाएँ हैं,
6. (घ) उपर्युक्त सभी उपाय,
7. (घ) विद्यालय,
8. (क) औपचारिक अभिकरण,
9. (घ) विद्यालय घर तथा समाज को जोड़ने वाली कड़ी है।

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 9 Local Bodies: As an Agency of Education

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 9 Local Bodies: As an Agency of Education (स्थानीय संस्थाए: शिक्षा के अभिकरण के रूप में) are the part of UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy. Here we have given Chapter 9 Local Bodies: As an Agency of Education (स्थानीय संस्थाए: शिक्षा के अभिकरण के रूप में).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 9
Chapter Name Local Bodies: As an
Agency of Education
(स्थानीय संस्थाए: शिक्षा के
अभिकरण के रूप में)
Number of Questions Solved 15
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 9 Local Bodies: As an Agency of Education (स्थानीय संस्थाए: शिक्षा के अभिकरण के रूप में)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्थानीय संस्थाओं से आप क्या समझते हैं? स्थानीय संस्थाओं के महत्त्व को भी स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
आज के युग में किसी भी राष्ट्र की केन्द्रीय या राज्य सरकार के पास स्थानीय (अर्थात् क्षेत्र विशेष की) समस्याओं के समाधान हेतु समय नहीं होता। ग्राम, कस्बे और नगर की स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय संस्थाओं; जैसे—ग्राम पंचायत, टाउन एरिया या नोटीफाइड एरिया कमेटी, जिला परिषद् या नग़रमहापालिका आदि के माध्यम से किया जाता है। स्थानीय संस्थाएँ अन्य मामलों के साथ-साथ अपने क्षेत्र से जुड़े शिक्षा सम्बन्धी मामलों के विषय में स्वविवेकानुसार निर्णय लेने तथा कार्य करने की पूर्ण स्वतन्त्रता रखती हैं।

स्थानीय संस्थाओं का अर्थ
(Meaning of Local Bodies)

स्थानीय संस्थाओं का तात्पर्य ऐसी संस्थाओं से है जिनका सम्बन्ध किसी स्थान (या क्षेत्र) विशेष से हो और जिनका प्रबन्धं उस स्थान विशेष के निवासियों द्वारा ही किया जाए। स्थानीय संस्थाएँ स्थानीय स्वशासन (Local Self-Government) के अन्तर्गत आती हैं। स्थानीय स्वशासन में स्थानीय जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों को क्षेत्र के शासन-प्रबन्ध में भाग लेने का अवसर मिलता है। इस शासन द्वारा नगर, कस्बे या ग्राम में रहने वाले लोगों को अपने स्थानीय मामलों को अपनी आवश्यकता तथा इच्छा के अनुसार प्रबन्ध करने की स्वतन्त्रता होती है।

स्थानीय संस्थाओं का महत्त्व
(Importance of Local Bodies)

स्थानीय संस्थाओं के महत्त्व का वर्णन निम्नलिखित आधारों पर किया जा सकता है

  1. स्थानीय लोगों का शासन से सम्बन्ध-आधुनिक समय में विश्व के अधिकांश देशों में प्रतिनिध्यात्मक लोकतान्त्रिक शासन-पद्धति प्रचलित है। इस पद्धति के अन्तर्गत स्थानीय लोगों का शासन से सीधा सम्बन्ध नहीं होता। वे स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से समस्याओं का कार्यभार हल्का शासन से सम्बन्ध रखते हैं।
  2. समस्याओं का कार्यभार हल्का स्थानीय संस्थाएँ, केन्द्र और राज्य सरकारों से सम्बद्ध छोटी-छोटी समस्याओं की जिम्मेदारी स्वयं अपने ऊपर लेकर उनका कार्यभार हल्का कर देती हैं।
  3. शक्ति का विकेन्द्रीकरण-उत्तम ढंग से शासन-कार्य चलाने के लिए शासन-शक्ति का अधिकाधिक विकेन्द्रीकरण होना चाहिए। यह विकेन्द्रीकरण सिर्फ स्थानीय संस्थाओं द्वारा ही किया जा सकता
  4. स्थानीय विषयों का कुशल प्रबन्ध-केन्द्र या प्रान्त की सरकारों को न तो स्थानीय विषयों/समस्याओं की जानकारी होती है और न ही वे इनमें खास दिलचस्पी रखती हैं। यही कारण है कि वे स्थानीय विषयों का प्रबन्ध कुशलता से नहीं कर पातीं। स्थानीय व्यक्ति एक तो उस क्षेत्र विशेष के वातावरण तथा समस्याओं से भली-प्रकार परिचित होते हैं और साथ ही वहाँ के विकास में रुचि भी रखते हैं। अत: स्थानीय मामलों का प्रबन्ध स्थानीय संस्थाओं के हाथ में ही रहना श्रेयस्कर है।
  5. शिक्षा साधन के रूप में-शिक्षा साधन के रूप में स्थानीय संस्थाएँ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वे अपने-अपने क्षेत्रों में बालक-बालिकाओं की शिक्षा का दायित्व सँभालती हैं। स्थानीय निकायों द्वारा प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक की व्यवस्था की जाती है। इसके लिए उन्हें राज्य सरकार से आर्थिक सहायता प्राप्त होती है।

टॉकविल ने स्थानीय संस्थाओं का महत्त्व बताते हुए लिखा है, “नागरिकों की स्थानीय संस्थाएँ स्वतन्त्र राष्ट्रों की शक्ति का निर्माण करती हैं। जो महत्त्व विज्ञान की शिक्षा के लिए प्रयोगशालाओं का है वही स्वतन्त्रता का पाठ पढ़ाने के लिए नगर सभाओं का है। एक राष्ट्र स्वतन्त्र सरकार की पद्धति भले ही स्थापित कर ले, किन्तु स्थानीय संस्थाओं के बिना उसमें स्वतन्त्रता की भावना नहीं आ सकती।’

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नगरीय क्षेत्रों में स्थानीय संस्थाओं के शैक्षणिक कार्यों का सामान्य विवरण दीजिए।
उत्तर:

नगरीय क्षेत्रों में स्थानीय संस्थाओं के शैक्षणिक कार्य।
(Educational Functions of Local Bodies in Urban Areas)

नगरीय क्षेत्रों की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए बड़े नगरों में नगरपालिका, नगर महापालिका या नगर निगम बनाए गए हैं। उपनगरों या कस्बों के लिए टाउन एरिया कमेटी एवं नोटीफाइड एरिया कमेटी हैं। इन प्रशासनिक इकाइयों की शासन-व्यवस्था हेतु अधीक्षक के अन्तर्गत विशेष विभागों को संगठन बनाया गया है। इन संस्थाओं के शैक्षणिक कार्य निम्न प्रकार हैं

  1. नगरों की स्थानीय संस्थाएँ प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना करती हैं। ये शासन की शिक्षा नीति के अन्तर्गत बालक-बालिकाओं के लिए माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा का प्रबन्ध भी करती हैं।
  2. 6 – 14 वर्ष आयु वर्ग के समस्त बालक-बालिकाओं को अनिवार्य तथा निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करने के लिए अभिप्रेरित और विवश करती हैं। ‘
  3. राज्य सरकार द्वारा प्राप्त आर्थिक सहायता को विभिन्न शिक्षा संस्थाओं में वितरित करने की व्यवस्था करती हैं।
  4. निजी शासन-प्रबन्ध के अन्तर्गत संचालित विद्यालयों में योग्य एवं प्रशिक्षित अध्यापकों की नियुक्ति करती हैं।
  5. नगरों की स्थानीय संस्थाएँ समय-समय पर विभिन्न विद्यालयों के क्रियाकलापों का शिक्षा विभाग के अधिकारियों द्वारा निरीक्षण कराती हैं।
  6. ये प्राथमिक तथा जूनियर हाईस्कूल स्तर पर परीक्षाओं का संचालन कर परीक्षा परिणाम घोषित कराती हैं।
  7. शैक्षिक प्रचार-प्रसार की दृष्टि से उपयुक्त स्थानों पर सार्वजनिक पुस्तकालय तथा वाचनालय खोलती हैं, उनकी देखभाल करती हैं तथा उन्हें आर्थिक सहायता भी देती हैं।
  8. प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम के अन्तर्गत रात्रि-पाठशालाएँ तथा प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र स्थापित करने हेतु धन प्रदान करती हैं।
  9. ये संस्थाएँ चलचित्र, प्रदर्शन और प्रतियोगिताओं के माध्यम से जनता में शिक्षा के अधिकाधिक प्रचार-प्रसार की व्यवस्था करती हैं।
  10. राज्य सरकार की शैक्षिक-नीतियों का अनुपालन करते हुए स्थानीय स्तर पर सभी के लिए श्रेष्ठ एवं हितकारी शिक्षा का प्रबन्ध करती हैं।

प्रश्न 2.
ग्रामीण क्षेत्र में जिला-परिषद के मुख्य शैक्षणिक कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

जिला-परिषद के शैक्षणिक कार्य
(Educational Functions of District Councils)

नगरीय क्षेत्रों की भाँति ग्रामीण क्षेत्रों में जिला- परिषदें शिक्षा की व्यवस्था करती हैं। प्रत्येक जिले में शिक्षा के सुप्रबन्ध तथा विकास हेतु एक शिक्षा विभाग स्थापित किया गया है जो जिला विद्यालय निरीक्षक तथा उपविद्यालय निरीक्षक की सहायता से शिक्षा का प्रबन्ध करता है। जिला परिषद् के शैक्षणिक कार्य इस प्रकार हैं|

  1. जिला-परिषद् अपने क्षेत्र के अन्तर्गत ग्रामों में आवश्यकतानुसार प्राथमिक तथा जूनियर हाईस्कूल खोलने की व्यवस्था करती है।
  2. यह इन विद्यालयों के लिए भवन, शिक्षण-सामग्री तथा अन्य साधनों का प्रबन्ध भी करती है।
  3. शिक्षा सम्बन्धी अपने दायित्वों की पूर्ति हेतु जिला-परिषद् को शिक्षा शुल्क लगाने का अधिकार प्राप्त
  4. परिषद् इन विद्यालयों के लिए शिक्षकों की नियुक्ति करती है तथा उनके वेतन आदि का प्रबन्ध करती
  5. विद्यालयों के अन्तर्गत खेलकूद एवं व्यायाम, सांस्कृतिक एवं पाठ्य सहगामी क्रियाओं तथा अन्य लाभकारी गतिविधियों का क्रियान्वयन भी परिषद् ही करती है। यह परीक्षा लेने का दायित्व भी निभाती है।
  6. जिला-परिषद् ग्रामीण अंचलों में प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम संचालित करती है तथा उनके लिए धन की व्यवस्था करती है।
  7. जिला परिषद् प्रदेश के शासन द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार ही शिक्षा की व्यवस्था करती है। शिक्षा व्यवस्था के निरीक्षण एवं मूल्यांकन कार्य में यह राज्य द्वारा नियुक्त अधिकारियों की मदद लेती है।
  8. जिला-परिषदें अपने विद्यालयों को शासन द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार ही वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं।

प्रश्न 3.
ग्रामीण स्थानीय संस्था ग्राम पंचायत के मुख्य शैक्षणिक कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

ग्राम पंचायत के शैक्षणिक कार्य
(Educational Functions of Gram Panchayat)

हमारे देश में पंचायती राज्य संशोधित अधिनियम (1954) के अनुसार, 250 से अधिक आबादी वाले प्रत्येक ग्राम में एक ग्राम सभा की व्यवस्था की गई है। इससे कम आबादी वाले ग्रामों को पास के ग्राम में मिलाने का प्रावधान है। कई गाँवों को मिलाकर जिस कार्यकारिणी का गठन होता है उसे ग्राम पंचायत कहते हैं। वस्तुत: ग्राम पंचायत ग्राम सभा की कार्यकारिणी समिति है जो निजी क्षेत्र की उन्नति हेतु विविध कार्यक्रमों की व्यवस्था करती है। ग्राम पंचायत के शिक्षा सम्बन्धी कार्य संक्षेप में इस प्रकार हैं

  1. मात्र ग्राम के अन्तर्गत शिक्षा प्रबन्ध तक सीमित रहने वाली ग्राम पंचायत, बालक-बालिकाओं के लिए प्राथमिक विद्यालय स्थापित कर उनका संचालन करती है।
  2. यह ग्रामवासियों के शैक्षिक विकास हेतु ग्राम पंचायत वाचनालय और पुस्तकालय खोलती है।
  3. ग्रामीण अंचल के लोगों को देश-विदेश के समाचार उपलब्ध कराने की दृष्टि से ग्राम में रेडियो तथा टी० वी० का प्रबन्ध करती है।
  4. अनपढ़ लोगों के लिए रात्रि पाठशालाएँ चलवाती है।
  5. ग्रामवासियों की शैक्षणिक प्रगति में सहायक विभिन्न कुटीर उद्योगों का प्रबन्ध करती है।
  6. शिक्षा के व्यापक प्रचार-प्रसार हेतु मेले, प्रदर्शनियाँ, चलचित्र, नाटक, सम्मेलन, व्याख्यान तथा समारोह आयोजित करती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्थानीय संस्थाओं का व्यवस्थित वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
किसी क्षेत्र-विशेष की शासन- व्यवस्था के लिए गठित की गई प्रशासनिक संस्था को स्थानीय संस्था (Local Body) कहा जाता है। स्थानीय संस्थाओं के वर्गीकरण का मुख्य आधार नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्र है। प्रथम वर्ग में हम उन स्थानीय संस्थाओं को सम्मिलित करते हैं जिनका गठन नगरीय क्षेत्र की व्यवस्था एवं समस्याओं के समाधान के लिए किया जाता है। इस वर्ग की स्थानीय संस्थाओं को पुनः दो वर्गों में बाँटा गया है। प्रथम वर्ग में उन स्थानीय संस्थाओं को सम्मिलित किया जाता है जो बड़े नगरों में गठित की जाती हैं। इस वर्ग की मुख्य स्थानीय संस्थाएँ हैं–नगरपालिका नगर महापालिका तथा नगर निगम नगरीय
क्षेत्र की दूसरे वर्ग की स्थानीय संस्थाएँ छोटे नगरों एवं कस्बों से सम्बन्धित हैं। इस वर्ग की स्थानीय संस्थाएँ हैं-टाउन एरिया कमेटी तथा नोटीफाइड एरिया कमेटी। ग्रामीण क्षेत्र की मुख्य स्थानीय संस्थाएँ दो हैं—जिला-परिषद् तथा ग्राम पंचायत।

प्रश्न 2.
शिक्षा के प्रसार में स्थानीय संस्थाओं का क्या योगदान है?
उत्तर:
स्थानीय संस्थाओं का एक मुख्य कार्य अपने क्षेत्र में शिक्षा की समुचित व्यवस्था करना है। इसके लिए स्थानीय संस्थाएँ अपने उपलब्ध साधनों एवं सुविधाओं के अनुसार शिक्षण संस्थाओं की स्थापना करती हैं। तथा उनका संचालन करती हैं। इसके अतिरिक्त ये स्थानीय संस्थाएँ अपने क्षेत्र में रहने वाले समस्त परिवारों को अपने बच्चों को विद्यालय भेजने के लिए प्रेरित भी करती हैं। इसके लिए प्रचार-कार्य तथा कुछ प्रलोभन भी दिए जाते हैं, जैसे कि बच्चों को मुफ्त पुस्तकें या वर्दी देना। बच्चों की शिक्षा के अतिरिक्त प्रौढ़ शिक्षा के प्रसार एवं प्रचार में भी स्थानीय संस्थाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्थानीय संस्थाओं से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
किसी क्षेत्र विशेष की प्रशासनिक व्यवस्था तथा समस्याओं के समाधान के लिए गठित की गई प्रशासनिक संस्थाओं को स्थानीय संस्था कहा जाता है।

प्रश्न 2.
“स्थानीय संस्थाएँ सरकार की दूसरे अंगों से बढ़कर जनता को लोकतन्त्र की शिक्षा देती हैं। वे जातियों को शिक्षित बनाती हैं, नागरिक के गुणों के लिए प्रारम्भिक पाठशालाओं का काम लेती हैं तथा जनता को वास्तविक स्वतन्त्रता का अनुभव कराती हैं।”-यह कथन किसका
उत्तर:
प्रस्तुत कथन लॉस्की का है।

प्रश्न 3.
स्थानीय संस्थाओं के गठन का एक मुख्य उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:
स्थानीय संस्थाओं के गठन का एक मुख्य उद्देश्य है–सत्ता का विकेन्द्रीकरण।

प्रश्न 4.
ग्रामीण क्षेत्र की मुख्य स्थानीय संस्था कौन-सी है?
उत्तर:
ग्रामीण क्षेत्र की मुख्य स्थानीय संस्था ग्राम पंचायत है।

प्रश्न 5.
छोटे उपनगरों अथवा कस्बों में स्थापित की जाने वाली स्थानीय संस्थाएँ कौन-कौन सी हैं?
उत्तर:
छोटे उपनगरों अथवा कस्बों में स्थापित की जाने वाली स्थानीय संस्थाएँ हैं-टाउन एरिया कमेटी तथा नोटीफाइड एरिया कमेटी।। प्रश्न 6 बड़े नगरों में स्थापित की जाने वाली स्थानीय संस्थाएँ कौन-कौन सी हैं? उत्तर:बड़े नगरों में स्थापित की जाने वाली स्थानीय संस्थाएँ हैं—नगरपालिका, नगर महापालिका तथा नगर निगम।।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य|

  1. किसी क्षेत्र विशेष की प्रशासन-व्यवस्था के लिए गठित प्रशासनिक संस्था को स्थानीय संस्था कहा जाता है।
  2. स्थानीय संस्थाएँ शैक्षणिक कार्यों में कोई उल्लेखनीय भूमिका नहीं निभातीं।
  3. ग्राम पंचायतों द्वारा प्रौढ़ शिक्षा की व्यवस्था के लिए रात्रि पाठशालाओं की व्यवस्था की जाती है।
  4. स्थानीय संस्थाएँ शिक्षा की व्यवस्था मनमाने ढंग से करती हैं।
  5. स्थानीय संस्थाओं के संचालन में जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती

उत्तर:

  1. सत्य,
  2. असत्य,
  3. सत्य,
  4. असत्य,
  5. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए
प्रश्न 1.
किसी क्षेत्र-विशेष की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए गठित संस्थाओं को कहते हैं
(क) नगरपालिका
(ख) ग्राम पंचायत
(ग) नोटीफाइड एरिया
(घ) स्थानीय संस्थाएँ

प्रश्न 2.
स्थानीय संस्थाएँ अपने क्षेत्र में शिक्षा की व्यवस्था करती हैं
(क) जैसे-तैसे
(ख) राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार
(ग) स्थानीय सम्पन्न परिवारों के मतानुसार
(घ) अधिक शुल्क लेकर

प्रश्न 3.
ग्राम पंचायत का निर्धारित शैक्षिक दायित्व नहीं है
(क) प्रौढ़ शिक्षा की व्यवस्था करना
(ख) प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था करना
(ग) ग्रामीण जनता को आवश्यक सूचनाएँ प्रदान करना
(घ) उच्च शिक्षा की व्यवस्था करना

उत्तर:

1. (घ) स्थानीय संस्थाएँ,
2. (ख) राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार,
3. (घ) उच्च शिक्षा की व्यवस्था करना।

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UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 15 Basic Education System

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 15 Basic Education System (बेसिक शिक्षा-पद्धति) are the part of UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 15 Basic Education System (बेसिक शिक्षा-पद्धति).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 15
Chapter Name Basic Education System
(बेसिक शिक्षा-पद्धति)
Number of Questions Solved 22
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Pedagogy Chapter 15 Basic Education System (बेसिक शिक्षा-पद्धति)

विरतृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गाँधी जी द्वारा प्रतिपादित बेसिक शिक्षा-पद्धति का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इस शिक्षा-प्रणाली के मुख्य सिद्धान्तों का भी वर्णन कीजिए।
या
बेसिक शिक्षा को बुनियादी शिक्षा क्यों कहा गया है ?
या
बेसिक शिक्षा-प्रणाली के मूलभूत सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बेसिक शिक्षा के जन्मदाता महात्मा गाँधी थे। उनका विचार था कि शिक्षा की रूपरेखा ग्रामीण होनी चाहिए, वह जनसाधारण के लिए होनी चाहिए, भारतीय संस्कृति का उसके द्वारा पुनर्जागरण होना चाहिए और उसमें भारतीय जनता की समस्याओं को सुलझाने की क्षमता होनी चाहिए।

ब्रिटिश शासन काल में भारत में अंग्रेजी शिक्षा का लक्ष्य सरकारी नौकरी के लिए उपयुक्त कर्मचारी तैयार करना था; भारतीयों को शारीरिक, मानसिक तथा चारित्रिक विकास करना नहीं। अत: महात्मा गाँधी ने देश की निर्धन, बेकार, निरक्षर और अस्वस्थ जनता को उन्नति के पथ पर अग्रसर करने के लिए बेसिक शिक्षा योजना का निर्माण किया। गाँधी जी ने हरिजन नामक पत्रिका में राष्ट्रीय शिक्षा की नवीन रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए लिखा है, “शिक्षा से मेरा तात्पर्य बालक और मनुष्य में जो श्रेष्ठतम है, उसका सम्पूर्ण विकास करना अर्थात् शरीर, बुद्धि एवं आत्मा तीनों का विकास करना है। साक्षरता स्वयं में कोई शिक्षा नहीं है, इसलिए मैं बालक की शिक्षा का प्रारम्भ बालक को कुछ हस्तकला सिखाकर उसको प्रशिक्षण के समय से ही उत्पादन करने में समर्थ बनाकर करूंगा। इस प्रकार प्रत्येक स्कूल आत्मनिर्भर हो सकता है, शर्त यह है कि राज्य स्कूल में निर्मित वस्तुओं को खरीद लें।”

बेसिक शिक्षा-पद्धति का प्रारम्भ 1937-38 ई० में हुआ। डॉ० जाकिर हुसैन की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी। इस समिति ने एक शिक्षा योजना तैयार की, जिसे वर्धा योजना भी कहा जाता है।

बेसिक शिक्षा का अर्थ
(Meaning of Basic Education)

बेसिक शिक्षा वह शिक्षा है जो बालकों को विभिन्न प्रकार की हस्तकलाओं का प्रशिक्षण देते हुए उनका शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक विकास कर सके, जिससे देश में समाजवादी समाज की स्थापना हो और जनता को सुखी तथा समृद्ध बनाया जा सके। गाँधी जी के अनुसार, “यह जीवन की शिक्षा है जो जन्म से मृत्यु तक की प्रक्रिया में चलती है।” बेसिक शब्द का हिन्दी रूपान्तर ‘आधारभूत’ तथा ‘बुनियादी’ शब्द है।

इसके नामकरण के निम्नांकित कारण

  1. बेसिक शिक्षा को भारत की राष्ट्रीय सम्पत्ति, सभ्यता एवं शैक्षणिक संगठन के आधार के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
  2. यह शिक्षा सामुदायिक जीवन के आधारभूत व्यवसाय से सम्बन्धित है।
  3. इसमें हस्तकला के माध्यम से शिक्षा दी जाती है, जिनका प्रयोग व्यक्ति जीवन-निर्वाह के लिए करते
  4. इसमें बालकों की रुचियों और आवश्यकताओं को सम्बन्धित करके शिक्षा दी जाती है।
  5. यह शिक्षा भारत के प्रत्येक स्त्री-पुरुष की सामान्य सम्पत्ति समझी जाती है।
  6. यह शिक्षा व्यक्ति को अपने वातावरण में सामंजस्य करने के योग्य बनाती है।
  7. प्रत्येक भारतीय बालक के लिए इस शिक्षा की अनिवार्य व्यवस्था की गई है।

बेसिक शिक्षा के मौलिक सिद्धान्त
(Fundamental Principles of Basic Education)

बेसिक शिक्षा-पद्धति के मौलिक सिद्धान्त निम्नलिखित हैं|
1.निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा- गाँधी जी का विचार था कि प्राइमरी शिक्षा प्रत्येक बालक के लिए सुलभ होनी चाहिए। गुलामी के कारण हमारे देश के बालक इस अधिकार से वंचित थे। लोकतन्त्र उसी देश में सफल होता है जहाँ शिक्षा सार्वजनिक हो। इसी कारण महात्मा गाँधी ने 
यह निश्चय किया कि 7 से 14 वर्ष तक के बालकों की शिक्षा अनिवार्य और नि:शुल्क होनी चाहिए। गाँधी जी ने स्वयं लिखा है, “जिस प्रकार के नि:शुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा वायु और जल पर सबका अधिकार है और सभी उसे समान रूप से स्वावलम्बन तथा आत्मनिर्भरता प्रयोग में ला सकते हैं, उसी प्रकार शिक्षा भी सबके लिए सुलभ हो शिक्षा का माध्यम मातृभाषा और गरीब लोग भी शिक्षा प्राप्त कर सकें, इसलिए इसका अनिवार्य शिक्षा का आधार हस्तकला और नि:शुल्क होना आवश्यक है।”

2. स्वावलम्बन तथा आत्मनिर्भरता- इस सिद्धान्त का तात्पर्य के जीवनोपयोगी शिक्षा है कि शिक्षकों का वेतन और विद्यालय के अन्य व्यय विद्यालय में बनी। बालक का स्वतन्त्र विकास वस्तुओं को बेचने से आंशिक रूप से निकल आएँ। इस प्रकार से समन्वय समन्वय पर बल शिक्षा संस्थाओं की आर्थिक समस्या का बहुत कुछ हद तक समाधान नागरिकता का आदेश हो जाएगा। इसके अतिरिक्त जब बालक जान जाएँगे कि अपनी शिक्षा के वे स्वयं उत्तरदायी हैं और उसके लिए वे अन्य किसी पर निर्भर नहीं हैं तो उनके अन्तर में आत्मनिर्भरता और स्वावलम्बन के भाव उत्पन्न होंगे और उनमें आत्मविश्वास की भावना का विकास होगा।

3. शिक्षा का माध्यम मातृभाषा- कमेनियस ने मातृभाषा के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए लिखा है, मातृभाषा को सीखने से पहले विदेशी भाषा की शिक्षा प्रदान करना उतना ही विवेकरहित है, जितना कि बच्चे को चलने से पूर्व चढ़ना सिखाना।” इसीलिए बेसिक शिक्षा-पद्धति में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा रखा गया है। प्रथम पाँच कक्षाओं में अंग्रेजी बिल्कुल हटा दी गई है और सभी विषय मातृभाषा के माध्यम से पढ़ाए जाते

4. शिक्षा का आधार हस्तकला- इस पद्धति में हस्तकला को शिक्षा का केन्द्र बनाया गया है। इस पद्धति में बेसिक स्कूलों में किसी हस्तकला से शिक्षा देने की व्यवस्था की जाती है। पाठ्यक्रम के सभी विषय किसी हस्तकला के चारों ओर केन्द्रित करके पढ़ाए जाते हैं। इस पद्धति में ‘क्रिया द्वारा शिक्षा तथा अनुभवे द्वारा सीखना’ दोनों सिद्धान्त निहित हैं। हस्तकलाओं के सम्बन्ध में गाँधी जी ने लिखा है, “प्रत्येक हस्तकार्य आजकल की भाँति यन्त्रवत् नहीं, वरन् वैज्ञानिक ढंग से सिखाया जाएगा ताकि बालक प्रत्येक क्रिया के कार्य-कारण सम्बन्ध को अच्छी तरह समझ जाएँ।” श्री ललित ने लिखा है, “बुनियादी हस्तकला सूर्यमण्डल के केन्द्र के रूप में होनी चाहिए एवं अन्य विषयों को ग्रह नक्षत्रों की भाँति चारों ओर घूमने तथा केन्द्रीय सूर्य से अपने उत्ताप या रोशनी को प्राप्त करना चाहिए।” आधुनिक शिक्षाशास्त्रियों का मत है कि हस्तकला द्वारा दी गई शिक्षा बालक के लिए अधिक मनोवैज्ञानिक होती है, क्योंकि इससे उसके मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार के अनुभव सन्तुलित होते हैं।

5. अहिंसा पर आधारित-बेसिक शिक्षा का आधार गाँधी जी का सत्य और अहिंसा का विचार है। गाँधी जी का यह विचार था कि पाश्चात्य शिक्षा हिंसात्मक प्रवृत्तियों को जन्म देती है, जिससे प्रेम, सहानुभूति, दया, धर्म, उदारता आदि गुणों का लोप होने लगता है, इसीलिए उनका कहना है कि विद्यालय में दण्ड का अभाव होना चाहिए। विद्यालय में इस प्रकार का वातावरण रखना चाहिए, जिससे बालकों में पारस्परिक घृणा, साम्प्रदायिक द्वेष तथा कलह की मनोवृत्तियाँ न विकसित हो सकें।

6. जीवनोपयोगी शिक्षा-तत्कालीन शिक्षा बालक के वास्तविक जीवन से सम्बन्धित नहीं थी। इसलिए बालक को अपने वातावरण से समायोजन करने में कठिनाई अनुभव होती थी और इसके अभाव में वह अपना जीवन भली प्रकार व्यतीत नहीं कर पाता था, इसलिए बेसिक शिक्षा-पद्धति में गाँधी जी ने हस्तकला को प्राकृतिक तथा सामाजिक वातावरण से सम्बन्धित करके बालक के वास्तविक जीवन से सम्बन्ध स्थापित कर दिया। इस पद्धति में शिक्षा बालक की जीवन की परिस्थितियों से सम्बन्धित रहती है और शिक्षा का कार्य । जीवन की वास्तविक परिस्थितियों में सम्पन्न होता है।

7. बालक का स्वतन्त्र विकास- अन्य आधुनिक शिक्षा-पद्धतियों की भॉति बेसिक शिक्षा में भी बालकों की रुचि का ध्यान रखा जाता है और उन्हें पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त होती है। बालकों को स्वतन्त्र अभिव्यक्ति प्रदान करने का अवसर मिलता है। गाँधी जी के अनुसार, “जब शिक्षा का उद्देश्य एक स्वच्छन्द तथा रचनात्मक स्वक्रिया के द्वारा बालक की अधिकतम अभिवृद्धि तथा विकास समझा जाता है तो विद्यार्थियों को स्वयं सोचने, अपनी रुचि के अनुसार अपना कार्य नियोजित करने तथा उन आयोजनों को अपनी ही गति के अनुसार आगे बढ़ने की पर्याप्त स्वतन्त्रता मिलनी चाहिए।’

8. समन्वय पर बल- किसी हस्तकला के आधार पर शिक्षा देने का तात्पर्य शिक्षा को समन्वित करना है। अर्थात् पाठ्यक्रम के सभी विषयों में शरीर के विभिन्न अवयवों की भाँति एक स्वाभाविक सम्बन्ध स्थापित करना है। इस पद्धति में सभी विषयों की शिक्षा किसी हस्तकला को केन्द्र मानकर दी जाती है। बेसिक शिक्षा में बालक के विकास के तीन आधार बताए गए हैं—प्राकृतिक वातावरण, सामाजिक वातावरण और हस्तकला। हस्तकला के द्वारा पहले दो आधारों पर समन्वय सहज ही हो जाता है, क्योंकि हस्तकला की उत्पत्ति और विकास इन्हीं पर निर्भर है। प्राकृतिक शक्तियों और साधनों के उपयोग के द्वारा मनुष्य कई वस्तुएँ तैयार करता है, उद्योग-धन्धे चलाता है, जिनकी समाज को आवश्यकता है। इन तीनों को केन्द्र मानकर बालक की शिक्षा को समन्वित किया जाता है।

9. नागरिकता का आदर्श बेसिक शिक्षा में नागरिकतों का आदर्श निहित है। यदि इस पद्धति में से नागरिकता का सिद्धान्त निकाल दिया जाए तो यह पद्धति अपना निजत्व खो बैठती है। इसका उद्देश्य ऐसे नागरिक तैयार करना है, जो अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों को बुद्धिमानी से समझ सकें और समाज के क्रियाशील सदस्य बनकर समाज के ऋण को किसी सेवा के रूप में चुका सकें। डॉ० जाकिर हुसैन ने लिखा है, “नवीन शिक्षा या बेसिक शिक्षा भारत के भावी नागरिकों में आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता, आत्मशक्ति एवं सामाजिक सेवा की भावना उत्पन्न करेगी।’

प्रश्न 2.
गाँधी जी द्वारा प्रतिपादित बेसिक शिक्षा-प्रणाली के मुख्य गुणों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
या
बेसिक शिक्षा-प्रणाली की मुख्य विशेषताओं का विस्तार से वर्णन कीजिए।
या
बेसिक शिक्षा के गुण एवं दोषों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
या
बेसिक शिक्षा के गुण-दोषों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:

बेसिक शिक्षा के गुण
(Merits of Basic Education)

इस पद्धति के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं|

1. दार्शनिकता- बेसिक शिक्षा योजना महात्मा गाँधी के आदर्शवादी दर्शन का प्रतीक है। यह भारतीय आदर्शवाद पर आधारित है। यह पद्धति बालकों के अन्दर त्याग, कर्तव्य, संयम, सत्य तथा सेवा की भावना का विकास करने पर जोर देती है।

2. सामाजिकता- यह पद्धति सामाजिक दृष्टि से भी बहुत उपयोगी है, क्योंकि यह बालकों के अन्दर सामाजिक गुणों का विकास करती है। यह पद्धति ऐसे नागरिकों का निर्माण करती है जो अपने कर्तव्य एवं अधिकार को भली-भाँति समझकर अपने उत्तरदायित्व को निभा सकें और समाज के विकास में अपना योगदान दे सकें।

3. मनोवैज्ञानिकता- यह पद्धति आधुनिक मनोविज्ञान के प्रमुख सिद्धान्त ‘क्रिया द्वारा शिक्षा पर आधारित है। इसके द्वारा बालकों की जन्मजात तथा रचनात्मक प्रवृत्तियाँ सन्तुष्ट होती हैं तथा बालकों के हाथ एवं मस्तिष्क का प्रशिक्षण एकसाथ होता है, जिससे सीखी हुई वस्तु का प्रभाव इनके ऊपर स्थायी तथा अमिट हो जाता है।

4. आर्थिक दृष्टि से उपयोगी हमारे देश में वर्तमान शिक्षा प्रणाली का प्रमुख दोष यह है कि बालक शिक्षा प्राप्त करने के बाद केवल नौकरी का इच्छुक रहता है और नौकरी प्राप्त न होने पर अपनी शिक्षा को बेकार समझता है, लेकिन बेसिक शिक्षा-पद्धति से बालक किसी-न-किसी उद्योग में प्रवीण हो जाता है और आगे चलकर वह स्वावलम्बी बन जाता है।

5.क्रिया द्वारा शिक्षा- इस शिक्षा-पद्धति में बालकों को ऐसे अवसर मिलते हैं, जिससे वह स्वयं कार्य करके उपयोगी ज्ञान प्राप्त करता है। इस प्रकार वह स्वयं कार्य करके सीखता है।

6. श्रम का महत्त्व- इस पद्धति में बालकों को किसी हस्तकार्य के माध्यम से शिक्षा देने पर बल दिया गया है। इसके परिणामस्वरूप बालक के हृदय में श्रम के प्रति आदर की भावना का विकास होता है और वह श्रमिकों के कार्य को हीन दृष्टि से नहीं देखता।

7. समन्वयता- बेसिक शिक्षा-पद्धति की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि किसी उपयुक्त हस्तकला के माध्यम से शिक्षा प्रदान की जाती है। शिक्षा की व्यवस्था इस प्रकार से की जाती है कि सभी पाठ्य-विषय परस्पर सम्बन्धित रहते हैं। इसे ही शिक्षा में समन्वय एवं अनुबन्ध प्रणाली कहते हैं। इससे समस्याओं के प्रति बालकों में एक जिज्ञासा की भावना उठती है और वे उसे पूर्ण करने में अग्रसर हो जाते हैं। इस प्रकार इस पद्धति में बालक विभिन्न विषयों का ज्ञान अलग-अलग प्राप्त नहीं करता, वरन् दस्तकारी की सहायता से समस्त विषयों को सह-सम्बन्धित करके लाभकारी ज्ञान प्राप्त करता है। इससे शिक्षा एकांगी नहीं रहती।

8. बाल-केन्द्रित शिक्षा- इस शिक्षा-पद्धति में शिक्षा का केन्द्र बेसिक शिक्षा के गुण बालक है। इसके अन्तर्गत बालकों की रुचि, आवश्यकता, अभिवृद्धि दार्शनिकता एवं बुद्धि को ध्यान में रखकर कार्य किया जाता है।

9. लोकतान्त्रिक व्यवस्था- बेसिक स्कूलों में बालकों के स्तर मनोवैज्ञानिकता के अनुकूल बाल संगठनों की व्यवस्था की गई है, जिससे उनमें आर्थिक दृष्टि से उपयोगी अनुशासन की भावना व लोकतान्त्रिक गुणों का विकास हो सके। क्रिया द्वारा शिक्षा धर्म- निरपेक्षता, अस्पृश्यता निवारण, असाम्प्रदायिकता, व्यावहारिक लक्ष्य, नवनिर्माण, ग्रामोत्थान, समाजवादी समाज का निर्माण, विश्व-बन्धुत्व आदि लोकतान्त्रिक गुणः बाल संगठन की प्रमुख बाल-केन्द्रित शिक्षा विशेषताएँ हैं।

10. स्वतन्त्रता प्रधान प्रणाली- इस पद्धति में बालकों के स्वतन्त्रता प्रधान प्रणाली स्वतन्त्र विकास को बहुत अधिक महत्त्व दिया गया है। विद्यालय में सौन्दर्यानुभूति का विकास बालकों को ऐसा वातावरण दिया जाता है, जिससे बालकों की पाठान्तर क्रियाओं का महत्त्व प्रवृत्तियों का स्वतन्त्रतापूर्वक विकास हो सके। ऐसा करने में बालक पर बल खेल के समान ही ज्ञानार्जन करने में भी आनन्द का अनुभव करेगा।

11. सौन्दर्यानुभूति का विकास- यह शिक्षा-पद्धति बालकों के अन्दर सौन्दर्यानुभूति के भावों का विकास करती है। बालक। दिन-प्रतिदिन दूसरों से अधिक सुन्दर तथा सुडौल वस्तुएँ बनाने का प्रयत्न करता है, जिससे उसकी बनाई हुई वस्तुओं की प्रशंसा हो। ऐसे प्रयासों से बालकों में सौन्दर्यानुभूति का विकास होता है। इसके अतिरिक्त बालकों की मूल-प्रवृत्तियों का शोधन और मार्गान्तीकरण भी हो जाता है।

12. पाठान्तर क्रियाओं का महत्त्व- इस पद्धति में विभिन्न पाठान्तर क्रियाओं का महत्त्वपूर्ण स्थान है; जैसे-श्रमदान प्रदर्शनी, उत्सवों का आयोजन, राष्ट्रीय पर्व, भ्रमण, पर्यटन, स्काउटिंग इत्यादि। इनके द्वारा बालकों के व्यावहारिक ज्ञान में वृद्धि होती है।

13. शिक्षकों के चरित्र और व्यक्तित्व पर बल- शिक्षक और बालक के मध्य बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है, इसलिए यह आवश्यक है कि शिक्षक चरित्रवान, ज्ञानवान, क्षमाशील, मृदुभाषी, मिलनसार, कर्तव्यपरायण, विनोदप्रिय, स्फूर्तिवान, परिश्रमी तथा संयमी हों।

14. विद्यालय समाज के वास्तविक प्रतिनिधि- तत्कालीन शिक्षा-प्रणाली का एक दोष यह भी था कि बालक के जीवन, समाज और विद्यालय में कोई सम्बन्ध नहीं था। बेसिक शिक्षा-पद्धति में विद्यालय में समाज के अनुकूल वातावरण रखा जाता है, जिससे बालक अपने वातावरण से सामंजस्य स्थापित कर सकें।

बेसिक शिक्षा के दोष
(Demerits of Basic Education)

बेसिक शिक्षा-पद्धति में कुछ दोष भी हैं, जिनका विवरण निम्नलिखित है|

1. हस्तकला पर आवश्यकता से अधिक बल- बालकों को हस्तकला के माध्यम से शिक्षा देने का। विचार दोषपूर्ण है। बालकों पर प्रारम्भ से हस्तकला लाद देने से उनकी रुचि और स्वतन्त्रता का हनन होता है। आरम्भ से ही बालकों के सम्मुख जीविकोपार्जन का उद्देश्य रख देने से उनका विकास एकांगी रह जाता है।

2. आत्मनिर्भरता का सिद्धान्त दोषपूर्ण है- बेसिक शिक्षा के स्वावलम्बी होने की योजना बहुत-से लोगों को अव्यावहारिक जान पड़ती है। इससे शिक्षकों तथा विद्यार्थियों में धन कमाने की प्रतिस्पर्धा चल पड़ेगी और सारे स्कूल कारखानों का रूप ले लेंगे। इससे बालकों की रुचियों का विकास नहीं हो सकेगा। स्कूल तथा शिक्षकों की सफलता का मूल्यांकन शिक्षा की प्रगति से नहीं, बल्कि बनी हुई वस्तुओं की बिक्री से प्राप्त मूल्य से होगा।

3. कच्चे माल की बरबादी- बेसिक शिक्षा-पद्धति में समस्या छोटे-छोटे बालकों को हस्तकार्य सिखाने की व्यवस्था की गई, कार्य समय का दोषपूर्ण विभाजन जिससे बहुत अधिक मात्रा में कच्चा माल नष्ट होता है।

4. निर्मित वस्तुओं की बिक्री की समस्या- बालक कितना ही घार्मिक शिक्षा की अवहेलना प्रयत्न करें, किन्तु उनके द्वारा निर्मित वस्तुएँ उतनी उत्कृष्ट नहीं होने वैयक्तिक विभिन्नता की उपेक्षा सकतीं जितनी कि कुशल कारीगरों द्वारा निर्मित। अत: इस प्रकार की उत्पादक कार्यों पर आवश्यकता वस्तुओं की बिक्री की समस्या है। दूसरे बेसिक स्कूलों में निर्मित से अधिक बल वस्तुओं की लागत भी अधिक होगी।

5. कार्य समय का दोषपूर्ण विभाजन- बेसिक स्कूलों का उपेक्षा समय विभाग चक्र दोषपूर्ण है। इसके अनुसार बालकों को लगातार साढ़े तीन घण्टे तक हस्तकार्य में लगे रहना पड़ता है। इतनी देर तक अभाव एक ही कार्य करने से बालकों में अरुचि पैदा हो जाती है, जिससे वे। भारतीय संस्कृति के प्रतिकूल अन्य विषयों की उपेक्षा करने लगते हैं।

6. शिक्षकों के हितों की उपेक्षा- बेसिक शिक्षा-पद्धति में शिक्षकों को बहुत कम वेतन देकर उनसे अधिक परिश्रम लिया जाता। अपूर्ण शिक्षा-पद्धति है। इससे वे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकते और इस व पेशे की ओर से लोगों का ध्यान हटने लगता है।

7. धार्मिक शिक्षा की अवहेलना- भारत एक धर्मप्रधान देश है, लेकिन बेसिक शिक्षा योजना में धर्म की अवहेलना की गई। प्रत्येक युग की शिक्षा में धर्म को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता रहा है, लेकिन महात्मा गाँधी जैसे धार्मिक व्यक्ति द्वारा इसका परित्याग आश्चर्यजनक प्रतीत होता है।

8. वैयक्तिक विभिन्नता की उपेक्षा- इस पद्धति में बालकों को अपनी रुचि तथा मानसिक स्थिति के अनुसार विषय का चयन करने की स्वतन्त्रता नहीं है। जिस बालक की हस्तकौशल में रुचि नहीं होती, उसे हस्तकौशल सीखने के लिए विवश करना अमनोवैज्ञानिक है।

9. उत्पादक कार्यों पर आवश्यकता से अधिक बल- इस पद्धति में उत्पादक कार्यों पर आवश्यकता से अधिक बल दिया गया है। साढ़े पाँच घण्टे के विद्यालय के समय में साढ़े तीन घण्टे से कुछ कम उत्पादक कार्यों की शिक्षा पर व्यय किए जाते हैं। उत्पादक कार्यों पर इतना अधिक समय देना अनुचित है। इससे बालकों को अन्य विषयों के अध्ययन का अवसर नहीं मिलता।

10. पाठ्य-पुस्तकों की उपेक्षा- बेसिक शिक्षा में पाठ्य-पुस्तकों का महत्त्व बहुत कम है, फलस्वरूप इस पद्धति का क्षेत्र बहुत ही सीमित हो जाता है। बालक पुस्तकों से प्राप्त होने वाले लाभ से वंचित रह जाते हैं। और उनके ज्ञान का क्षेत्र शिक्षकों के उपदेशों तक ही सीमित रह जाता है।

11. विज्ञान तथा तकनीकी ज्ञान की उपेक्षा- बेसिक शिक्षा ग्रामीण क्षेत्रों के लिए तो उपयुक्त हो सकती है, लेकिन नगरों के लिए यह उपयुक्त नहीं है; क्योंकि आजकल विज्ञान और तकनीकी ज्ञान का अत्यधिक प्रचार हो रहा है, परन्तु यह पद्धति हस्तकार्य पर इतना अधिक बल देती है कि विज्ञान और तकनीकी ज्ञान की उपेक्षा स्वतः हो जाती है।

12. कुशल एवं प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव- बेसिक शिक्षा योजना के लिए कुशल, योग्य एवं प्रशिक्षित शिक्षकों का मिलना कठिन है। ऐसे शिक्षक बहुत कम होते हैं, जो किसी भी हस्तकार्य के माध्यम से विभिन्न विषयों का विस्तृत ज्ञान दे सकें। अत: बेसिक शिक्षा में कुशल योग्य तथा प्रशिक्षित शिक्षकों के अभाव की समस्या रहती है।

13. भारतीय संस्कृति के प्रतिकूल- बेसिक शिक्षा-पद्धति व्यक्ति को बहुत अधिक भौतिकवादी बनाती है और इसमें आध्यात्मिक आदर्शवाद का अभाव है जो कि भारतीय संस्कृति का मूलमन्त्र है।

14. समन्वय की व्यवस्था अव्यावहारिक--इस शिक्षा-पद्धति में समन्वय की व्यवस्था अव्यावहारिक, अस्वाभाविक तथा अमनोवैज्ञानिक मालूम पड़ती है। विषयों को खींचतान कर हस्तकला से सम्बन्धित किया जाता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि समन्वय पूर्ण रूप से सफल नहीं होता और पाठ्यक्रम की बहुत-सी बातें छूट जाती हैं। कुछ विषयों में तो यह अभाव हो सकता है, परन्तु किसी ऐसी सर्वमान्य कला का अभी तक अनुसन्धान नहीं हुआ है जिसके चारों ओर संभी विषय केन्द्रित किए जा सकें।

15. अपूर्ण शिक्षा-पद्धति- बेसिक शिक्षा-पद्धति को अपूर्ण शिक्षा-पद्धति माना जाता है, क्योंकि इसमें सात वर्ष की आयु से पहले और 14 वर्ष की आयु के बाद की शिक्षा की कोई रूपरेखा प्रस्तुत नहीं की गई है। निष्कर्ष-उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि बेसिक शिक्षा-पद्धति में अनेक दोष पाए जाते हैं, लेकिन यह दोष ऐसे नहीं हैं जिन्हें दूर न किया जा सकता हो। बेसिक शिक्षा-पद्धति में आवश्यक परिवर्तन तथा सुधार करके इसे उपयोगी, व्यावहारिक और लोकप्रिय बनाया जा सकता है। वस्तुत: बेसिक शिक्षा-पद्धति नितान्त मौलिक है। तथा हमारे जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं को पूर्ण करने में सर्वथा समर्थ है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बेसिक शिक्षा-प्रणाली द्वारा निर्धारित किए गए पाठ्यक्रम का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:

बेसिक शिक्षा का पाठ्यक्रम
(Curriculum of Primary Education)

बेसिक शिक्षा के पाठ्यक्रम के अन्तर्गत निम्नलिखित विषयों को प्रमुख स्थान दिया गया है|

  1. हस्तकलाएँ- कताई, बुनाई, कृषि, काष्ठकला, चर्म कार्य, फलों तथा साग-सब्जी के उद्योग, मिट्टी के खिलौने बनाना, प्राकृतिक तथा सामाजिक वातावरण के अनुकूल अन्य कोई हस्तकला, जिसका शैक्षिक मूल्य हो।
  2. मातृभाषा।
  3. अंकगणित।
  4. सामाजिक विषय (इतिहास, भूगोल तथा नागरिकशास्त्र)।
  5. सामान्य विज्ञान (बागवानी, वनस्पतिशास्त्र, पशु विद्या, शरीर विज्ञान, रसायनशास्त्र आदि)।
  6. स्वास्थ्य विज्ञान।
  7. संगीत।
  8. चित्रकला तथा ड्राइंग।
  9. हिन्दुस्तानी।

बेसिक शिक्षा में पाँचवीं कक्षा तक सह-शिक्षा का आयोजन है तथा लड़के एवं लड़कियों के लिए एक ही . प्रकार के पाठ्यक्रम की व्यवस्था की गई है। छठी से आठवीं कक्षाओं में लड़कों को सामान्य विज्ञान और लड़कियों को गृह विज्ञान पढ़ना होता है। बेसिक शिक्षा के पाठ्यक्रम के अन्तर्गत अंग्रेजी और धार्मिक शिक्षा को कोई स्थान नहीं दिया गया है।

बेसिक स्कूल में विभिन्न विषयों के समय चक्र निम्नवत् हैं

प्रश्न 2.
बेसिक शिक्षा-प्रणाली की मुख्य समस्या का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

बेसिक शिक्षा की प्रमुख समस्याएँ
(Main Problems of Primary Education)

महात्मा गाँधी के निर्देशानुसार भारत में बेसिक शिक्षा बड़े उत्साह के साथ लागू की गई, परन्तु 1937 ई० से 1947 ई० तक इसकी प्रगति नगण्य रही। बाद में कोठारी आयोग ने इसे स्वीकार तो किया, लेकिन इसका स्वरूप ही बदल दिया। वास्तव में बेसिक शिक्षा की निम्नांकित समस्याओं ने इसकी प्रगति में अवरोध उपस्थित किया है

  1. क्राफ्ट और अन्य विषयों में सह-सम्बन्ध कैसे स्थापित किया जा सकता है ?
  2. क्राफ्ट और उद्योग के उत्पादन का उपयोग कैसे किया जाना चाहिए ?
  3. पाठ्य-विषयों के सन्दर्भ में सामग्री कैसे उपलब्ध हो सकती है ?
  4. पाठ्यक्रम के विषयों का भौतिक और सामाजिक पर्यावरण के साथ किस प्रकार सम्बन्ध स्थापित हो सकता है ?
  5. बेसिक विद्यालयों और अन्य विद्यालयों के छात्रों का स्थान क्या है ?
  6. योग्य अध्यापकों की पूर्ति किस प्रकार की जा सकती है ?
  7. बेसिक विद्यालय समाज के जीवन से क्या सम्बन्ध रखते हैं ?
  8. बेसिक शिक्षा बालिकाओं के लिए किस प्रकार उपयोगी बनाई जा सकती है ?
  9. बेसिक शिक्षा को राजनीति से किस प्रकार दूर रखा जा सकता है ?
  10. बेसिक शिक्षा का मानदण्ड क्यों गिर रहा है ?

प्रश्न 3.
गाँधी जी द्वारा प्रतिपादित बेसिक शिक्षा-प्रणाली को सफल बनाने के लिए कुछ उपयोगी सुझाव दीजिए।
उत्तर:

बेसिक शिक्षा की सफलता हेतु सुझाव
(Suggestions to Success of Primary Education)

  1. क्राफ्ट और अन्य विषयों में सह-सम्बन्ध लाने के लिए योग्य एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों की खोज की जाए। अध्यापकों में विशेष योग्यता रखने वाले को खोज निकालना शोधकर्ताओं का कार्य है। अत: बेसिक शिक्षा-पद्धति पर विशद् अनुसन्धान किया जाना चाहिए।
  2. बेसिक विद्यालय द्वारा उत्पादित सामग्री स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से बेची जाए तथा सहकारी .. सहयोग से भी काम लिया जाए।
  3. विषय-सामग्री उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न स्रोतों की खोज करना आवश्यक है, लेकिन इस कार्य में देश की आर्थिक कठिनाई को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
  4. पाठ्यक्रम के विषयों का भौतिक और सामाजिक वातावरण के साथ सम्बन्ध रखने के लिए विषय-सामग्री को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप निर्धारित किया जाए। यहाँ भी शोध एवं सर्वेक्षण की आवश्यकता होगी।
  5. बेसिक विद्यालय के छात्रों और अन्य विद्यालयों के छात्रों की उपलब्धियों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए और प्रशिक्षण कॉलेज एवं स्नातकोत्तर छात्रों के लिए ऐसे कार्य दिए जाएँ।
  6. योग्य अध्यापकों की पूर्ति के लिए अधिक संख्या में प्रशिक्षण महाविद्यालयों को खोलकर तथा प्रशिक्षण की सभी सुविधाएँ उपलब्ध करके अधिक संख्या में अध्यापकों को प्रशिक्षित किया जाए। इसके साथ अंशकालीन एवं अभिनवे कोर्स की व्यवस्था भी उचित ढंग से की जाए।
  7. समाज के लोगों को विद्यालय में आमन्त्रित करके उन्हें सहयोग देने के लिए आकर्षित किया जाए और जीवन की क्रियाओं को विद्यालय में ही पूरा कराया जाए।
  8. बालिकाओं के लिए पृथक् कोर्स की व्यवस्था की जाए, जो बालिका जिस प्रकार की शिक्षा लेना चाहे, उसे उसी प्रकार की शिक्षा दी जाए। सभी को एक ढंग की शिक्षा न दी जाए।
  9. शिक्षा राज्य सरकार के नियन्त्रण में न होकर शिक्षाशास्त्रियों के अधीन हो। शिक्षकों में दलगत दूषित राजनीति से अपने को दूर रखने का साहस होना चाहिए। दलगत शिक्षकों को अध्यापन सेवा से अलग कर दिया जाए।
  10. बेसिक विद्यालयों में दी जाने वाली शिक्षा के मानदण्ड को ऊँचा उठाने के लिए सुप्रशिक्षित अध्यापक, कुशल कारीगर एवं योग्य प्रबन्धक रखे जाएँ। इसके साथ ही छात्रों को उत्पादन के लाभ में हिस्सा भी दिया जाए।

तिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बेसिक शिक्षा प्रणाली द्वारा अपनाई जाने वाली शिक्षण-विधि का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या बेसिक शिक्षा की शिक्षण पद्धतियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बेसिक शिक्षा की शिक्षण-विधि निम्नलिखित है

  1. विषयों को हस्तकला पर केन्द्रित करके पढ़ाना-बेसिक स्कूलों में हस्तकला के माध्यम से शिक्षा दी जाती है। विद्यार्थी स्कूल में अधिक समय उसी हस्तकौशल से सम्बन्धित कार्य करते हैं। शेष समय में जो विषय पढ़ाए जाते हैं, वे उसी दिन के कार्य से सम्बन्धित होते हैं। इस प्रकार इस पद्धति में केन्द्रीकरण विधि द्वारा शिक्षा देने का प्रमुख स्थान है।
  2. क्रिया द्वारा शिक्षा-इस पद्धति में विद्यार्थी केवल मात्र निष्क्रिय श्रोता नहीं होता, बल्कि वह अपने हाथ से कार्य करता है। वह बहुत शीघ्र ही हस्तकार्य को सीख जाता है और रुचिपूर्वक उसे करता है। इस प्रकार इस पद्धति में क्रिया की प्रधानता रहती है।
  3. स्वाभाविक रूप से शिक्षा- इस पद्धति में पाठ्यक्रम को सात भागों में विभक्त कर दिया जाता है और प्रत्येक विषय का ज्ञान् क्रम से व्यवस्थित कर लिया जाता है। फिर उसी क्रम के अनुसार विषय का ज्ञान बालकों को दिया जाता है; जैसे-पहली कक्षा में मौखिक वार्तालाप या कहानी के द्वारा बालक को मातृभाषा का ज्ञान कराया जाता है। फिर उसे पढ़ना-लिखना या रचनात्मक कार्य सिखाए जाते हैं।
  4. छोटे-छोटे समूहों में शिक्षा- बालकों के छोटे-छोटे समूह बनाकर उन्हें कुछ निश्चित कार्य दे दिया जाता है, जिसे वे एक-दूसरे के सहयोग से पूरा करते हैं।
  5. भाषण विधि- कुछ विषय ऐसे हैं, जो कि भाषण विधि द्वारा पढ़ाए जाते हैं। सामान्य रूप से बेसिक शिक्षा-पद्धति में आधुनिक मनोवैज्ञानिक शिक्षण विधियों के सभी सूत्रों को प्रयोग में लाया जाता है और शिक्षण को अधिक-से-अधिक मनोवैज्ञानिक बनाने का प्रयास किया जाता है।

प्रश्न 2.
बेसिक शिक्षा-प्रणाली तथा प्रोजेक्ट पद्धति में विद्यमान समानताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
बेसिक शिक्षा-प्रणाली तथा प्रोजेक्ट पद्धति में विद्यमान समानताओं को निम्नलिखित तालिका में दर्शाया गया है

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
महात्मा गाँधी ने कौन-सी शिक्षण पद्धति बनाई थी ? बेसिक शिक्षा प्रणाली के जन्मदाता कौन थे?
उत्तर:
महात्मा गाँधी ने बेसिक शिक्षा पद्धति का प्रतिपादन किया था।

प्रश्न 2.
बेसिक शिक्षा-प्रणाली को किस अन्य नाम से भी जाना जाता है ?
उक्ट
बेसिक शिक्षा-प्रणाली को ‘बुनियादी तालीम’ या ‘बुनियादी शिक्षा के नाम से भी जाना जाता या।

प्रश्न 3.
बेसिक शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत किस आयु वर्ग के बालक-बालिकाओं की शिक्षा की व्यवस्था है ?
सन् 1937 में वर्धा योजना (बेसिक शिक्षा) में प्रस्तावित प्राथमिक शिक्षा के लिए बालकों की क्या आयु वर्ग निश्चित की गई थी?
उत्तर
बेसिक शिक्षा प्रणाली के अन्तर्गत 7 से 14 वर्ष के बालक-बालिकाओं के लिए शिक्षा की व्यवस्था है।

प्रश्न 4.
गाँधी जी ने बेसिक शिक्षा-प्रणाली का मुख्य उद्देश्य क्या निर्धारित किया था ?
उत्तर:
गाँधी जी ने बेसिक शिक्षा-प्रणाली का मुख्य उद्देश्य बालक-बालिकाओं को स्वावलम्बी तथा आत्मनिर्भर बनाना निर्धारित किया था।

प्रश्न 5.
बेसिक शिक्षा-प्रणाली के चार मुख्य सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(i) नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का सिद्धान्त,
(ii) स्वावलम्बन तथा आत्मनिर्भरता का सिद्धान्त,
(iii) शिक्षा का माध्यम मातृभाषा तथा
(iv) शिक्षा का आधार हस्तकला।

प्रश्न 6.
शिक्षा की कौन-सी विधि शिल्प के माध्यम से शिक्षा पर बल देती है ?
उक्ट
गाँधी जी द्वारा प्रतिपादित बेसिक-शिक्षा प्रणाली शिल्प के माध्यम से शिक्षा पर बल देती है।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. बेसिक शिक्षा-प्रणाली के प्रवर्तक डॉ० जाकिर हुसैन थे।
  2. बेसिक शिक्षा-प्रणाली कुछ जटिल सिद्धान्तों पर आधारित है।
  3. बेसिक शिक्षा-प्रणाली में कठोर अनुशासन का प्रावधान है।
  4. बेसिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा को बनाया गया है।
  5. वर्तमान भारतीय परिस्थितियों में बेसिक शिक्षा-प्रणाली का कोई व्यावहारिक महत्त्व नहीं है।

उन्ट

  1. असत्य,
  2. असत्य,
  3. असत्य,
  4. सत्य,
  5. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
बेसिक शिक्षा प्रणाली का निर्धारण किया गया है
(क) अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर
(ख) तत्कालीन भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर
(ग) औद्योगिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर
(घ) कृषि सम्बन्धी दशाओं को ध्यान में रखकर

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन एक गाँधी जी की शिक्षा योजना नहीं है?
(क) बेसिक शिक्षा
(ख) वर्धा योजना
(ग) नयी तालीम
(घ) हस्तशिल्प

प्रश्न 3.
बेसिक शिक्षा-प्रणाली के पाठ्यक्रम में सम्मिलित नहीं किया गया है
(क) हस्तकलाओं की शिक्षा को
(ख) गणित की शिक्षा को
(ग) धार्मिक शिक्षा को
(घ) सामाजिक विषयों की शिक्षा को

प्रश्न 4.
बेसिक शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्मत सामान्य शिक्षा सम्बद्ध है
(क) धार्मिक जीवन से ।
(ख) भौतिक जीवन से
(ग) व्यावहारिक जीवन से
(घ) काल्पनिक जीवन से

प्रश्न 5.
वर्धा शिक्षा योजना कब प्रस्तुत की गई?
(क) अगस्त 1929 में।
(ख) अक्टूबर 1930 में
(ग) अक्टूबर 1937 में
(घ) जनवरी 1939 में।

प्रश्न 6.
“जिस प्रकार वायु और जल पर सबका अधिकार है और सभी इन्हें समान रूप से प्रयोग में ला सकते हैं, उसी प्रकार शिक्षा भी सबके लिए सुलभ हो और निर्धन भी शिक्षा प्राप्त कर सके। इसको अनिवार्य एवं निःशुल्क होना जरूरी है।” यह मान्यता किसकी है?
(क) मैडम मॉण्टेसरी।
(ख) महात्मा गाँधी
(ग) मदन मोहन मालवीय
(घ) डॉ० राधाकृष्णन

प्रश्न 7.
बेसिक शिक्षा का विचार दिया गया था
(क) पेस्टालॉजी द्वारा।
(ख) महामना मालवीय द्वारा
(ग) महात्मा गाँधी द्वारा
(घ) डा० एनीबेसेंट द्वारा

प्रश्न 8.
कौन-सी शिक्षा प्रणाली शिल्प-केन्द्रित है?
(क) बेसिक शिक्षा
(ख) डाल्टन प्लान
(ग) मॉण्टेसरी विधि
(घ) प्रोजेक्ट विधि
उत्तर:

1. (ख) तत्कालीन भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर,
2. (ग) नयी तालीम,
3. (ग) धार्मिक शिक्षा को,
4. (ग) व्यावहारिक जीवन से,
5. (ग) अक्टूबर 1937 में,
6. (ख) महात्मा गाँधी,
7. (ग) महात्मा गाँधी द्वारा,
8. (क) बेसिक शिक्षा।

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UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 7 जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 7
Chapter Name जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’
Number of Questions 6
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 7 जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’

कवि का साहित्यिक परियाय और कृतियाँ

प्रश्न 1.
जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ के जीवन एवं कृतियों (साहित्यिक योगदान) पर प्रकाश डालिए।
या
जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ का साहित्यिक परिचय लिखते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
जीवन-परिचय–सुकवि जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ आधुनिक ब्रजभाषा के अन्तिम प्रतिनिधि कवि थे। सुन्दर, सरस और प्रवाहयुक्त रचनाएँ प्रस्तुत करके रत्नाकर जी ने ब्रजभाषा की धूमिल ज्योति को देदीप्यमान कर दिया। रत्नाकर जी का जन्म भाद्रपद सुदी 5, संवत् 1923 वि० (सन् 1866 ई०) को काशी के एक प्रसिद्ध अग्रवाल कुल में हुआ। इनके पिता का नाम श्री पुरुषोत्तमदास था, जो अरबी-फारसी के अच्छे विद्वान् और हिन्दी-काव्य के प्रेमी थे। अपने पिता के माध्यम से रत्नाकर जी, भारतेन्दु जी के सम्पर्क में आये। रत्नाकर जी को बाल्यावस्था से ही कविता से प्रेम था। इनकी एक रचना से प्रसन्न होकर भारतेन्दु जी ने यह भविष्यवाणी की थी कि यह लड़का एक दिन अच्छा कवि बनेगा’, जो अक्षरश: सत्य सिद्ध हुई। रत्नाकर जी की शिक्षा काशी में हुई। प्रारम्भ में उन्हें फारसी पढ़ायी गयी, बाद में उन्होंने हिन्दी का अध्ययन किया। सन् 1891 ई० में उन्होंने क्वीन्स कॉलेज से बी० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा एम० ए० (फारसी) का अध्ययन आरम्भ किया, किन्तु किसी कारणवश परीक्षा न दे सके। तत्पश्चात् इन्होंने दो वर्ष तक अवागढ़ में ‘कोषाध्यक्ष के पद पर कार्य किया, किन्तु वहाँ की जलवायु अनुकूल न पाकर ये काशी लौट आये। फिर ये अयोध्या-नरेश के प्राइवेट सेक्रेटरी हो गये। सन् 1903 ई० में अयोध्या-नरेश की मृत्यु के पश्चात् वहाँ की महारानी ने इन्हें अपना प्राइवेट सेक्रेटरी बना लिया और अन्त तक ये योग्यतापूर्वक इसी पद पर कार्य करते रहे। 21 जून, 1932 ई० (संवत् 1989 वि०) को हरिद्वार में इनका देहान्त हो गया। साहित्यिक सेवाएँ-राजसेवा से मुक्ति पाकर रत्नाकंर जी ने अपना सारा समय साहित्य-सेवा में लगा दिया और ब्रजभाषा में रचना करना आरम्भ किया। रत्नाकर जी की सर्वप्रथम काव्यकृति ‘हिंडोला’ 1894 ई० में तथा ‘गंगावतरण’ सन् 1923 ई० में समाप्त हुई।

इसके अतिरिक्त रत्नाकर जी ने ‘साहित्य-सुधा-निधि’ नामक मासिक पत्र का सम्पादन प्रारम्भ किया था तथा अनेक ग्रन्थों का सम्पादन भी किया। नागरी प्रचारिणी सभा के कार्यों में रत्नाकर जी का पूरा सहयोग रहता। ये सन् 1926 ई० में ओरियण्टल कॉन्फ्रेन्स के हिन्दी विभाग के सभापति हुए और सन् 1930 ई० में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के बीसवें अधिवेशन (कलकत्ता अधिवेशन) के सभापति चुने गये।

रचनाएँ—

  1. मौलिक रचनाएँ–गंगावतरण, हरिश्चन्द्र, उद्धव-शतक, समालोचनादर्श, श्रृंगार लहरी, विष्णु लहरी, रत्नाष्टक, वीराष्टक।
  2. सम्पादित रचनाएँ—हम्मीर हठ, तरंगिणी, कण्ठाभरण, बिहारी सतसई आदि।
  3. टीका ग्रन्थ-‘बिहारी सतसई’ पर आपने ‘बिहारी रत्नाकर’ नाम से विस्तृत टीका लिखी, जो काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हो चुकी है।

साहित्य में स्थान–रत्नाकर जी के काव्य में सरसा, स्वाभाविकता और कलात्मकता का पूर्ण परिपाक हुआ है। यही कारण है कि समग्र आलोचकों ने इन्हें आधुनिक ब्रजभाषा का प्रतिनिधि कवि कहा है। वस्तुतः ये इस काल के ब्रजभाषा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोवर

उद्धव-प्रसंग

प्रश्न-दिए गए पद्यांशों को पढ़करे उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए।

प्रश्न 1.
भेजे मनभावन के उद्धव के आवन की
सुधि ब्रज-गावॅनि में पावन जबै लगीं ।
कहैं ‘रतनाकर’ गुवालिनि की झौरि-झौरि
दौरि-दौरि नंद-पौरि आवन तबै लगीं ।।
उझकि-उझकि पद-कंजनि के पंजनि पै
पेखि-पेखि पाती छाती छोहनि छबै लगीं ।
हमकौं लिख्यौ है कहा, हमकौं लिख्यौ है कहा
हमकौं लिख्यौ है कहा कहने सबै लगीं ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) किसके आने का समाचार पाकर गोपियों के झुण्ड-के-झुण्ड दौड़-दौड़कर नन्द जी के द्वार पर आने लगे?
(iv) गोपियों के पास श्रीकृष्ण का सन्देश लेकर कौन आए थे?
(v) ‘दौरि-दौरि कन्द-पौरि आवन तबै लगीं।’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद श्री जगन्नाथदास’रत्नाकर’ द्वारा रचित और हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘उद्धव-प्रसंग’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
पाठ का नाम- उद्धव-प्रसग।
लेखक का नाम-जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या—सभी गोपियाँ उत्सुकता और बेचैनीपूर्वक उद्धव से पूछने लगीं कि हमारे लिए प्राणप्रिय कृष्ण ने क्या लिखा है, हमारे लिए क्या लिखा है, हमारे लिए क्या लिखा है। प्रत्येक.कौ यही उत्कण्ठा थी कि उसके लिए कृष्ण ने क्या सन्देश भेजा है।
(iii) श्रीकृष्ण द्वारा भेजे हुए उद्धव के आने का समाचार पाकर गोपियों के झुण्ड-के-झुण्ड दौड़-दौड़कर नन्द जी के द्वार पर आने लगे।
(iv) गोपियों के पास श्रीकृष्ण का सन्देश लेकर उद्धव आए थे।
(v) पुनरुक्तिप्रकाश और अनुप्रास अलंकार।

प्रश्न 2.
कान्ह-दूत कैधौं ब्रह्म-दूत है पधारे आप
धारे प्रन फेरन कौ मति ब्रजबारी की ।।
कहैं ‘रतनाकर’ पै प्रीति-रीति जानत ना ।
ठानत अनीति आनि नीति लै अनारी की ।।।
मान्यौ हम, कान्ह ब्रह्म एक ही, कह्यौ जो तुम
तौहूँ हमें भावति ना भावना अन्यारी की ।।
जैहैं बनि बिगरि न बारिधिता बारिधि कौं |
बूंदता बिलैहैं बूंद बिबस बिचारी की ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) गोपियाँ सन्देह प्रकट करते हुए उद्धव से क्या कहती हैं?
(iv) गोपियों ने उद्धव को अनाड़ी क्यों बताया है? ।
(v) किसमें मिल जाने से बूंद का अस्तित्व मिट जाएगा?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद श्री जगन्नाथदास’रत्नाकर’ द्वारा रचित और हमारी पाठ्य-पुस्तक’काव्यांजलि में संकलित ‘उद्धव-प्रसंग’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
पाठ का नार्म- उद्धव-प्रसग।
लेखक का नाम–जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव! आप प्रेम की रीति को जाने बिना हमें ब्रह्म का उपदेश दिये चले जा रहे हैं। हम तो एकमात्र श्रीकृष्ण के प्रेम में ही अनुरक्त हैं, वही हमारे सब-कुछ हैं। वे उद्धव जी से व्यंग्यपूर्ण भाव में पूछती हैं कि आप ब्रजबालाओं की बुद्धि को बदलने का प्रण लेकर और श्रीकृष्ण के दूत बनकर यहाँ आये हैं अथवा ब्रह्म के दूत के रूप में आये हैं ? कहने को तो आप श्रीकृष्ण के दूत बनकर आये हैं, फिर भी आप निरन्तर केवल ब्रह्म की ही चर्चा किये . जा रहे हैं।
(iii) गोपियाँ सन्देह प्रकट करते हुए उद्धव से कहती हैं कि आप श्रीकृष्ण के दूत बनकर आए हैं या ब्रह्म ने तुम्हें दूत बनाकर भेजा है।
(iv) योग-मार्ग का सन्देश, जो पुरुषों को दिया जाने वाला है उसे स्त्रियों को देने के कारण, गोपियों ने उद्धव को अनाड़ी बताया है।
(v) समुद्र में मिल जाने से बूंद के अस्तित्व मिट जाएगा।

प्रश्न 3.
छावते कुटीर कहुँ रम्य जमुना कै तीर
गौन रौन-रेती सों कदापि करते नहीं ।
कहैं ‘रतनाकर’ बिहाइ प्रेम-गाथा गूढ़
स्रौंन रसना मै रस और भरते नहीं ।।
गोपी ग्वाल बालनि के उमड़ते आँसू देखि
लेखि प्रलयागम हूँ नैंकु डरते नहीं ।
होतौ चित चाब जौ न रावरे चितावन को
तजि ब्रज-गाँव इतै पाँव धरते नहीं ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) उद्धव यमुना-तट पर बसकर अपने कानों और जीहा से किसे रस का पान और बखान करना चाहते हैं?
(iv) उद्धव ने गोपी-ग्वालबालों के अश्रुप्रवाह को किससे भयंकर बताया है?
(v) निम्नलिखित के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए
(अ) यमुना,
(ब) आँसू।
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद श्री जगन्नाथदास’रत्नाकर’ द्वारा रचित और हमारी पाठ्य-पुस्तक’काव्यांजलि’ में संकलित ‘उद्धव-प्रसंग’ शीर्षक काव्यांश से उद्धत है।
अथवा
पाठ का नाम- उद्धव-प्रसग
लेखक का नाम-जगन्नाथदास ‘रत्नाकर
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-हे कृष्ण! यदि गोपियों की प्रेममयी दशा से अवगत कराकर आपको उनकी उपेक्षा न करके शीघ्र दर्शन देने की चेतावनी देने का विचार मेरे हृदय में न होता तो मैं ब्रजभूमि को छोड़कर इधर पैर नहीं रखता। वहीं कहीं यमुना के सुन्दर तट पर कुटिया डालकर निवास करने लगता और उस रमणीक रेती को छोड़कर अन्यत्र कहीं न जाता।
(iii) उद्धव यमुना-तट पर बसकर अपने कानों से प्रेम रस का पान और जीह्वा से उसी रस का बखान करना चाहते हैं।
(iv) उद्धव ने गोपी-ग्वालबालों के अश्रुप्रवाह को प्रलय से भी भयंकर बताया है।
(v) (अ) यमुना – कालिंदी, रवितनया।
(ब) आँसू — अश्रु, नेत्रवारि।

गंगावतरण

प्रश्न 1.
निकसि कमंडल तें उमंडि नभ-मंडल-खंडति ।
धाई धार अपार बेग सौं बायु बिहंडति ।।
भयी घोर अति शब्द धमक सों त्रिभुवन तरजे ।
महामेघ मिलि मनहु एक संगहि सब गरजे ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) पद्यांश के अनुसार, गंगा जी कहाँ से निकली हैं?
(iv) किसकी धमक से तीनों लोक भयभीत हो गए?
(v) “महामेघ मिलि मनहु एक संगहि सब गरजे।” पंक्ति में कौन-सा अलंकार होगा?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद श्री जगन्नाथदास’ रत्नाकर’ द्वारा रचित और हमारी पाठ्य-पुस्तक’काव्यांजलि’ । में संकलित ‘गंगावतरण’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
पाठ का नाम- गंगावतरण
लेखक का नाम-जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-ब्रह्मा के कमण्डल से निकलकर गंगा की धारा उमड़कर आकाशमण्डल को भेदती तथा वायु को चीरती हुई प्रचण्ड वेग से नीचे को दौड़ पड़ी।
(iii) पद्यांश के अनुसार, गंगाजी ब्रह्म के कमण्डल से निकली हैं।
(iv) गंगाजी की प्रचण्ड धार की धमक से तीनों लोक भयभीत हो गए।
(v) अनुप्रास अलंकार।

प्रश्न 2.
कृपानिधान सुजान संभु हिय की गति जानी ।
दियौ सीस पर ठाम बाम करि कै मनमानी ।।
सकुचति ऐचति अंग गंग सुख संग लजानी।।
जटाजूट हिम कुट सघन बन सिमटि समानी ।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) किसकी कोमल भावना को शिवजी जान गए?
(iv) शिवजी ने गंगाजी को कहाँ पर स्थान दिया?
(v) गंगाजी कहाँ पर सिमट कर छिप जाती हैं?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद श्री जगन्नाथदास’रत्नाकर’ द्वारा रचित और हमारी पाठ्य-पुस्तक’काव्यांजलि’ में संकलित ‘गंगावतरण’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
पाठ का नाम- गंगावतरण।।
लेखक का नाम-जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’।
(ii) गंगा को पत्नी के रूप में स्वीकार करने पर गंगा को नारी-सुलभ संकोच की अनुभूति होती है और वह अपने शरीर को सिकोड़कर, सुख का अनुभव करती हुई लजाती है और शिव के जटाजूटरूपी हिमालय पर्वत के घने वन में सिमटकर छिप जाती है।
(iii) गंगाजी की कोमल भावना को शिवजी जान गए।
(iv) शिवजी ने गंगाजी को अपने सिर पर स्थान दिया।
(v) गंगाजी शिवजी के जटाजूट रूपी हिमालय पर्वत के घने वन में सिमटकर छिप जाती हैं।

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UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 6 भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
Number of Questions 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 6 भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

कवि का साहित्यिक परिचय और कृतियाँ

प्रश्न 1.
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी रचनाओं पर प्रकाश डालिए।
या
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के जीवन-परिचय और साहित्यिक प्रदेय पर प्रकाश डालिए।
या
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का साहित्यिक परिचय लिखते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
जीवन-परिचय-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र खड़ी बोली हिन्दी गद्य के जनक माने जाते हैं। इन्होंने हिन्दी गद्य साहित्य को नवचेतना और नयी दिशा प्रदान की। भारतेन्दु का जन्म काशी के एक सम्पन्न और प्रसिद्ध वैश्य परिवार में सन् 1850 ई० में हुआ था। इनके पिता गोपालचन्द्र, काशी के सुप्रसिद्ध सेठ थे जो ‘गिरिधरदास’ उपनाम से ब्रज भाषा में कविता किया करते थे। भारतेन्दु जी में काव्य-प्रतिभा बचपन से ही विद्यमान थी। इन्होंने पाँच वर्ष की आयु में निम्नलिखित दोहा रचकर अपने पिता को सुनाया और उनसे सुकवि होने का आशीर्वाद प्राप्त किया-

लै ब्योढ़ी ठाढ़े भये, श्री अनिरुद्ध सुजान।
बाणासुर की सैन को, हनन लगे भगवान् ॥

पाँच वर्ष की आयु में माता के वात्सल्य से तथा दस वर्ष की आयु में पिता के प्यार से वंचित होने टोले भारतेन्दु की आरम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। इन्होंने घर पर ही हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी तथा बँगला आदि भाषाओं का अध्ययन किया। 13 वर्ष की अल्पायु में मन्नो देवी नामक युवती के साथ इनका विवाह हो गया। भारतेन्दु जी यात्रा के बड़े शौकीन थे। इन्हें जब भी समय मिलता, ये यात्रा के लिए निकल जाते थे। ये बड़े उदार और दानी पुरुष थे। अपनी उदारता और दानशीलता के कारण इनकी आर्थिक दशा शोचनीय हो गयी और ये ऋणग्रस्त हो गये। परिणामस्वरूप श्रेष्ठि-परिवार में उत्पन्न हुआ यह महान् साहित्यकार ऋणग्रस्त होने के कारण, क्षयरोग से पीड़ित हो 35 वर्ष की अल्पायु में ही सन् 1885 ई० में दिवंगत हो गया।

साहित्यिक सेवाएँ-हिन्दी-साहित्य में भारतेन्दु का आविर्भाव एक ऐतिहासिक घटना है। उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध राजनीतिक और सामाजिक चेतनाओं के रूप में जागरण की अँगड़ाई लेने लगा था, यद्यपि मध्ययुगीन, नीति-मूल्यों और जीवन-मर्यादाओं के मोह से उसे अभी छुटकारा नहीं मिल पाया था। साहित्य के क्षेत्र में रीतिकाल की परम्परा का अनुकरण हो रहा था, किन्तु नवोत्थान की प्रेरणा से उसकी धमनियों में भी नवीन रक्त का संचार होने लगा था। इस संक्रान्ति-काल में भारतेन्दु का उदय हुआ। इनके साहित्य में जहाँ एक ओर हिन्दी के विगत युगों की अभिव्यक्ति संचित है, वहीं दूसरी ओर युग की आशाओं और आकांक्षाओं का प्रबल स्पन्दन भी मिलता है। युग के नवोन्मेष में इन्होंने भारत की वीणा में नये स्वरों की प्रतिष्ठा की।

रचनाएँ-भारतेन्दु जी द्वारा रचित प्रमुख काव्य-कृतियों के नाम निम्नलिखित हैं-
‘प्रेम माधुरी’, ‘प्रेम तरंग”प्रेमाश्रु वर्णन’, ‘प्रेम सरोवर’, ‘प्रेम मालिका’, ‘प्रेम फुलवारी’, ‘प्रेम प्रलाप’ आदि भक्ति तथा दिव्य प्रेम पर आधारित रचनाएँ हैं। केवल प्रेम को ही लेकर इनकी रचनाओं के उपर्युक्त सात संग्रह प्रकाशित हुए, जिसमें विशुद्ध श्रृंगार-भावना की अभिव्यक्ति हुई है। अपने आराध्यदेव श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं को चिंत्रण इन्होंने प्रेमपूर्वक–‘देवी छद्मलीला’, ‘तन्मय लीला’, ‘कृष्ण-चरित’, ‘दान-लीला’ आदि रचनाओं में किया है। इनकी ‘भारत वीरत्व’, ‘विजय वल्लरी’, ‘विजयिनी’ एवं ‘विजय पताका’ नामक रचनाओं में देश-प्रेम की प्रवृत्तियाँ परिलक्षित होती हैं। ‘उर्दू का स्यापा’, ‘बन्दर सभा’, ‘नये जमाने की मुकरी’ आदि रचनाओं में इनकी हास्य-व्यंग्य प्रकृति के दर्शन होते हैं।

साहित्य में स्थान निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि भारतेन्दु सच्चे अर्थों में स्रष्टा थे। एक असाधारण प्रतिभासम्पन्न कलाकार की उनके पास सृजन-शक्ति थी। उनमें प्राचीन और नवीन का सामंजस्य मिलता है। वे हिन्दी के युगद्रष्टा और युगस्रष्टा तो थे ही, हिन्दी साहित्य संसार के युगपुरुष भी थे।

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-दिए गए पद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रेम माधुरी

प्रश्न 1.
ब्यापक ब्रह्म सबै थल पूरन है हमहूँ पहिचानती हैं।
पै बिना नंदलाल बिहाल सदा ‘हरिचंद’ न ज्ञानहिं ठानती हैं ।।
तुम ऊधौ यहै कहियो उनसों हम और कछु नहिं जानती हैं।
पिय प्यारे तिहारे निहारे बिना अँखियाँ दुखियाँ नहिं मानती हैं ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) गोपियाँ ब्रह्म के बारे में उद्धव से क्या कहती हैं?
(iv) ‘प्यारे तिहारे निहारे’ इन शब्दों में कौन-सा अलंकार है?
(v) गोपियाँ उद्धव से श्रीकृष्ण को क्या सन्देश देने को कहती हैं?
उत्तर
(i) यह पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित एवं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित ‘प्रेम-माधुरी’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
पाठ का नाम- प्रेम-माधुरी।
लेखक का नाम-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-ब्रज-गोकुल की गोपियाँ श्रीकृष्ण के अलावा किसी अन्य की उपासना करना ही नहीं चाहतीं। उन्हें ज्ञान-मार्ग नहीं, अपितु प्रेम-मार्ग भाता है। इसलिए वे ज्ञानी उद्धव से स्पष्ट कह देती हैं कि तुम श्रीकृष्ण को हमारा यह सन्देश दे देना कि तुम्हारे दर्शन किये बिना हमारी आँखों को
सन्तोष होता ही नहीं है; अत: शीघ्र ही हमें दर्शन दो।।
(iii) गोपियाँ ब्रह्म के बारे में उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव’ हमें भी पता है कि ब्रह्म कण-कण में व्याप्त है।
(iv) “प्यारे तिहारे निहारे’ इन शब्दों में २’ अक्षर की पुनरावृत्ति होने के कारण अनुप्रास अलंकार है।
(v) गोपियाँ उद्धव से श्रीकृष्ण को यह सन्देश देना चाहती हैं कि तुम्हारे दर्शन किए बिना हमारी आँखों को सन्तोष होने वाला नहीं है, इसलिए अतिशीघ्र हमें दर्शन दो।

यमुना-छवि

प्रश्न-दिए गए पद्यशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

प्रश्न 1.
तरनि-तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये ।
झुके कुल सों जल परसन हित मनहुँ सुहाये ।।
किधौं मुकुर मैं लखत उझकि सब निज-निज सोभा ।
कै प्रनवत जल जानि परम पावन फल लोभा ।।
मनु आप वारन तीर कौ सिमिटि सबै छाये रहत ।।
कै हरि सेवा हित नै रहे निरखि नैन मन सुख लहत ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) जलरूपी दर्पण में अपनी शोभा देखने के लिए उचक-उचककर कौन आगे झुक गए हैं?
(iv) कवि के अनुसार किन्हें देखकर नेत्रों को और मन को सुख प्राप्त होता है?
(v) उपर्युक्त पंक्तियाँ किन अलंकारों से सुशोभित हैं?
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद भारतेन्दु जी द्वारा रचित और हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘यमुना-छवि’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
पाठ का नाम– यमुना-छवि।
लेखक का नाम--भारतेन्दु हरिश्चन्द्र।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-यमुना के किनारे तमाल के अनेक सुन्दर वृक्ष सुशोभित हैं। वे तट पर आगे को झुके हुए ऐसे लगते हैं, मानो यमुना के पवित्र जल का स्पर्श करना चाहते हों।
(iii) जलरूपी दर्पण में अपनी शोभा देखने के लिए तमाल के वृक्ष उचक-उचककर आगे झुक गए हैं।
(iv) तमाल के सुन्दर वृक्षों को यमुना-तट पर जले की ओर झुके देखकर नेत्रों और मन को सुख प्राप्त होता है।
(v) उपर्युक्त पंक्तियाँ अनुप्रास, सन्देह और उत्प्रेक्षा अलंकारों से सुशोभित हैं।

प्रश्न 2.
मनु जुग पच्छ प्रतच्छ होत मिटि जात जमुन जल ।
कै तारागने ठगन लुकत प्रगटत ससि अबिकल ॥
कै कालिन्दी नीर तरंग जितो उपजावत ।
तितनो ही धरि रूप मिलन हित तासों धावत ॥
कै बहुत रजत चकई चलत कै फुहार जल उच्छरत ।
कै निसिपति मल्ल अनेक बिधि उठि बैठत कसरत करत ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) क्या देखकर प्रतीत होता है, मानों यमुना के जल में दोनों पक्ष (कृष्ण और शुक्ल) मिल गए हों? ।
(iv) कौन तरंगे उत्पन्न करता है?
(v) कौन उठ-बैठकर अनेक प्रकार की कसरतें करता हुआ दिखाई पइता है? ”
उत्तर
(i) प्रस्तुत पद भारतेन्दु जी द्वारा रचित और हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘यमुना-छवि’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है।
अथवा
पाठ का नाम– यमुना-छवि।
लेखक का नाम–भारतेन्दु हरिश्चन्द्र।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या-यमुना के चंचल जल में चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब कभी तो दिखाई देता है। और कभी नहीं। इससे ऐसा प्रतीत होता है, मानो यमुना के जल में दोनों पक्ष (कृष्ण और शुक्ल) मिल गये हैं; अर्थात् चन्द्रमा के छिप जाने पर लगता है कि कृष्ण पक्ष आ गया है और तुरन्त निकल आने पर लगता है कि कृष्ण पक्ष समाप्त हो गया और शुक्ल पक्ष आ गया है। फिर थोड़ी ही देर में वह भी समाप्त हो जाता है। जल के अन्दर चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब अनेक प्रकार से शोभित हो रहा है अथवा इस चन्द्रमा को देखकर ऐसा लगता है कि वह तारा-समूह को ठगने के लिए कभी छिप जाता है तो कभी प्रकट हो
जाता है।
(iii) चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब देखकर लगता है, मानो यमुना के जल में दोनों पक्ष (कृष्ण और शुक्ल) मिल गए हों।
(iv) यमुना का जल तैरंगे उत्पन्न करता है।
(v) चन्द्रमारूपी पहलवान उठ-बैठकरे अनेक प्रकार की कसरतें करता हुआ दिखाई पड़ता है।

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