UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 2 मलिक मुहम्मद जायसी

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name मलिक मुहम्मद जायसी
Number of Questions 5
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 2 मलिक मुहम्मद जायसी

कवि-परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ

प्रश्न:
मलिक मुहम्मद जायसी का जीवन परिचय लिखिए।
या
मलिक मुहम्मद जायसी की काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
या
मलिक मुहम्मद जायसी का जीवन-परिचय देते हुए उसकी रचनाएँ लिखिए।
उत्तर:
मलिक मुहम्मद जायसी प्रेम की पीर’ के गायक के रूप में विख्यात हैं और हिन्दी के गौरव ग्रन्थ ‘पद्मावत’ नामक प्रबन्ध काव्य के रचयिता हैं। ये हिन्दी-काव्य की निर्गुण प्रेमाश्रयी शाखा के सर्वाधिक प्रमुख एवं प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं।

जीवन-परिचय – जायसी के अपने कथन के अनुसार उनका जन्म 900 हिजरी (1492 ई० ) में हुआ था – ‘भा औतार मौर नौ सदी।’ जायसी को जन्म-स्थान रायबरेली जिले का जायस नामक स्थान था, जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा है – जायसनगर मोर अस्थानू। इसी कारण ये ‘जायसी’ कहलाए। इनके पिता का नाम शेख ममरेज था। इनके माता-पिता की मृत्यु इनके बचपन में ही हो गयी थी। फलत: ये फकीरों और साधुओं के साथ रहने लगे। जायसी का व्यक्तित्व आकर्षक न था। इनके बायें कान की श्रवण-शक्ति एवं बायीं आँख सम्भवतः चेचक से जाती रही थी, जिसका उल्लेख इन्होंने स्वयं ‘पद्मावत’ में किया है-मुहम्मद बाईं दिसि तजा, एक सरवन एक आँखि। जायसी के सम्बन्ध में प्रसिद्ध है कि वे एक बार शेरशाह के दरबार में गये। शेरशाह उनके कुरूप चेहरे पर हँस पड़ा। इस पर कवि ने बड़े शान्त भाव से पूछा-‘मोहिका हँसेसि कि कोहरहि?’ अर्थात् तुम मुझ पर हँसे थे या उस कुम्हार (सृष्टिकर्ता ईश्वर) पर? इस पर शेरशाह ने लज्जित होकर इनसे क्षमा माँगी थी। कवि जायसी का कण्ठस्वर बड़ा ही मीठा था और काव्य था ‘प्रेम की पीर’ से लबालब भरा हुआ। मुख की कुरूपता को देखकर जो हँसे थे, वे ही इस प्रेमकाव्य को सुनकर आँसू भर लाये-जेइमुख देखा तेइ हँसा, सुना तो आये आँसु। कवि का आध्यात्मिक अनुभव बहुत बढ़ा-चढ़ा था। सूफी मुसलमान फकीरों के अतिरिक्त कई सम्प्रदायों (जैसे—गोरखपन्थी, रसायनी, वेदान्ती आदि) के हिन्दू साधुओं के सत्संग से इन्हें हठयोग, वेदान्त, रसायन आदि से सम्बद्ध बहुत-सा ज्ञान प्राप्त हो गया था, जो इनकी रचना में सन्निविष्ट है। इन्हें इस्लाम और पैगम्बर पर पूरी आस्था थी। ये निजामुद्दीन औलिया की शिष्य-परम्परा में थे। ये बड़े भावुक भगवद्भक्त थे और अपने समय के बड़े ही सिद्ध और पहुँचे हुए फकीर माने जाते थे। सच्चे भक्त का प्रधान गुण प्रेम इनमें भरपूर था। अमेठी के राजा रामसिंह इन पर बड़ी श्रद्धा रखते थे।

जीवन के अन्तिम दिनों में ये अमेठी से कुछ दूर एक घने जंगल में रहा करते थे। यहीं पर एक शिकारी की गोली से इनकी मृत्यु हो गयी। इनका निधन 949 हिजरी अर्थात् सन् 1542 ई० में हुआ बताया जाता है।
रचनाएँ जायसी की तीन रचनाएँ प्रामाणिक रूप से इन्हीं की मानी जाती हैं। ये हैं – पद्मावत, अखरावट और आखिरी कलाम।

पद्मावत: जायसी की कीर्ति का मुख्य आधार ‘पद्मावत’ नामक प्रबन्ध काव्य है, जो हिन्दी में अपने ढंग का अनोखा है। यह एक प्रेमाख्यानक काव्य है, जिसका पूर्वार्द्ध कल्पित और उत्तरार्द्ध ऐतिहासिक है। पूर्वार्द्ध में चित्तौड़ के राजा रत्नसेन और सिंहलद्वीप की राजकुमारी पद्मावती की प्रेमगाथा है। सूफी सिद्धान्तानुसार कवि ने रत्नसेन को साधक और पद्मावती को ब्रह्म के रूप में प्रस्तुत किया है। रत्नसेने अनेक बाधाओं को पार करता और कष्टों को सहता हुआ अन्त में पद्मावती को प्राप्त करता है। उत्तरार्द्ध में पद्मिनी और अलाउद्दीन वाली ऐतिहासिक गाथा है। इस भाग में पद्मावती ब्रह्म रूप में नहीं, प्रत्युत एक सामान्य नारी के रूप में प्रस्तुत की गयी है।

आखिरी कलाम – यह रचना दोहे-चौपाइयों में और बहुत छोटी है। इनमें मरणोपरान्तं जीव की दशा और कयामत (प्रलय) के अन्तिम न्याय आदि का वर्णन है।

अखरावट – इसमें वर्णमाला के एक-एक अक्षर को लेकर इस्लामी सिद्धान्त-सम्बन्धी कुछ बातें कही गयी हैं। इसमें ईश्वर, जीव, सृष्टि आदि से सम्बन्धित दार्शनिक वर्णन है।

चित्ररेखा – यह ‘प्रेमकाव्य है, जिसमें कन्नौज के राजा कल्याणसिंह के पुत्र राजकुमार प्रीतम सिंह तथा चन्द्रपुर-नरेश चन्द्रभानु की राजकुमारी चित्ररेखा की प्रेमकथा वर्णित है।

काव्यगत विशेषताएँ

भावपक्ष की विशेषताएँ

रस-योजना -‘पद्मावत’ प्रबन्ध काव्य होते हुए भी एक श्रृंगारप्रधान प्रेमकाव्य है; अतः श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों पक्षों का वर्णन इसमें मिलता है। यद्यपि अन्य रसों की भी योजना की गयी है, परन्तु गौण रूप में ही। ये गौण रस हैं–करुण, वात्सल्य, वीर, शान्त और अद्भुत।

संयोग-पक्ष – जायसी के प्रमुख काव्य ‘पद्मावत’ में संयोग-पक्ष को उतना विशद् और विस्तृत चिंत्रण नहीं है, जितना वियोग-पक्ष का; क्योंकि संयोग-पक्ष से कवि के आध्यात्मिक उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती थी। रहस्यवादी कवि होने के नाते इन्होंने रनसेन और पद्मावती को जीव और ब्रह्म का प्रतीक माना है। सूफी सिद्धान्त की दृष्टि से रत्नसेन और पद्मावती के संयोग-वर्णन को इन्होंने अधिक महत्त्व दिया है। संयोग के अन्तर्गत नवोढ़ा स्त्री की भावनाओं का अत्यधिक सुन्दर चित्र निम्नांकित पंक्तियों में मिलता है

हौं बौरी औ दुलहिन, पीउ तरुन सह तेज।
ना जानौं कस होइहिं, चढ़त कंते के सेज ॥

विरह-वर्णन – जायसी का विरह-वर्णन अद्वितीय है। नागमती और पद्मावती दोनों के विरह-चित्र हमें ‘पद्मावत’ में मिलते हैं। यद्यपि इस वर्णन, में अत्युक्तियों का सहारा भी लिया गया है, पर उसमें जो वेदना की तीव्रता है, वह हिन्दी-साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ है। उसका एक-एक पद विरह का अगाध सागर है। पति के प्रवासी होने पर नागमती बहुत दु:खी है। वह सोचती है कि वे स्त्रियाँ धन्य हैं, जिनके पति उनके पास हैं

जिन्ह घर कंता ते सुखी, तिन्ह गारौ औ गर्ब।
कन्त पियारा बाहिरे, हम सुख भूला सर्ब ।।

करुणरस – श्रृंगार के उपरान्त करुण रस का जायसी ने विशेष वर्णन किया है। करुणा का प्रथम दृश्य वहाँ आता है, जहाँ रत्नसेन योगी बनकर घर से निकलने लगता है और उसकी माता–पत्नी विलाप करती हुई उसे समझाती

रोवत मायन बहुरत बारा। रतन चला घर भा अँधियारा॥
रोवहिं रानी तजहिं पराना। नोचहिं बार करहिं खरिहाना ॥

रहस्यवाद – कविवर जायसी ने अपने ‘पद्मावत’ नामक महाकाव्य में लौकिक प्रेम के माध्यम से अलौकिक प्रेम का चित्रण किया है। ‘पद्मावत’ में ऐसे अनेक स्थल हैं, जहाँ लौकिक पक्ष से अलौकिक की ओर संकेत किया गया है। नागमती का हृदयद्रावक सन्देश निम्नलिखित पंक्तियों में द्रष्टव्य है ।

पिउ सौ कहेउ सँदेसड़ा, हे भौंरा ! हे काग।
सो धनि बिरहै जरि मुई, तेहि क धुवाँ हम्ह लाग॥

प्रकृति-चित्रण – मानव-प्रकृति के चित्रण के अतिरिक्त जायसी ने बाह्य दृश्यों का भी बहुत ही उत्कृष्ट चित्रण किया है। यद्यपि इनके काव्य में प्रकृति का आलम्बन-रूप में चित्रण नहीं मिलता, तथापि उद्दीपन और मानवीकरण अलंकारों के रूप में प्रकृति के अनेक रम्य चित्र उपलब्ध होते हैं।
भावपक्ष के उपर्युक्त विवेचन से सिद्ध होता है कि जायसी वास्तव में रससिद्ध कवि हैं।

कलापक्ष की विशेषताएँ।

भावपक्ष के साथ ही जायसी का कलापक्ष भी पुष्ट, परिमार्जित और प्रांजल है, जिसका विवेचन निम्नवत् है

छन्दोविधान:
जायसी ने अपने काव्य के लिए दोहा-चौपाई की पद्धति चुनी है। इस पद्धति में कवि ने चौपाई की सात पंक्तियों के बाद एक दोहे का क्रम रखा है, जब कि तुलसी ने आठ पंक्तियों के बाद। इस छन्द-विधान के लिए जायसी तुलसी के पथ-प्रदर्शक भी माने जा सकते हैं।

भाषा:
जायसी की भाषा ठेठ अवधी है। इसमें बोलचाल की अवधी का माधुर्य पाया जाता है। इसमें शहद की। सहज मिठास है, मिश्री को परिमार्जित स्वाद नहीं। लोकोक्तियों के प्रयोग से इसमें प्राण-प्रतिष्ठा भी हुई है। कहीं-कहीं शब्दों को तोड़-मरोड़ दिया गया है और कहीं एक ही भाव या वाक्य के कई स्थानों पर प्रयुक्त होने के कारण पुनरुक्ति दोष भी आ गया है। भाषा की स्वाभाविकता, सरसता और मनोगत भावों की प्रकाशन-पद्धति ने जायसी को अवधी साहित्य के क्षेत्र में मान्य बना दिया है।

शैली:
काव्य-रूप की दृष्टि से जायसी ने प्रबन्ध शैली को अपनाया है। उस समय फारसी में मसनवी शैली और हिन्दी में चरितकाव्यों की एक विशेष शैली प्रचलित थी। जायसी ने दोनों का समन्वय कर एक नवीन शैली को जन्म दिया। ‘पद्मावत’ में शैली का यही मिश्रित-नवीन रूप मिलता है। ‘पद्मावत’ के आरम्भ में मसनवी शैली और भाषा, छन्द आदि में चरित-काव्य की शैली मिलती है। इन्होंने चौपाई और दोहा छन्दों में भाषा-शैली को सुन्दर निर्वाह किया है। समग्र रूप में जायसी की भाषा-शैली सरल, सशक्त एवं प्रवाहपूर्ण है।

अलंकार – अलंकारों का प्रयोग जायसी ने काव्य-प्रभाव एवं सौन्दर्य के उत्कर्ष के लिए ही किया है, चमत्कार-प्रदर्शन के लिए नहीं। इनके काव्य में सादृश्यमूलक अलंकारों की प्रचुरता है। आषाढ़ के महीने के घन-गर्जन को विरहरूपी राजा के युद्ध-घोष के रूप में प्रस्तुत करते हुए बिजली में तलवार का और वर्षा की बूंदों में बाणों की कल्पना कर कितना सुन्दर रूपक बाँधा गया है

खड़गे बीजु चमकै चहुँ ओरा। बूंद बान बरसहिं घन घोरा॥

यहाँ रूपक के साथ-साथ अनुप्रास का भी सुन्दर एवं कलात्मक प्रयोग हुआ है।
साहित्य में स्थानडॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल ने जायसी की सराहना करते हुए लिखा है कि, “जायसी अत्यन्त संवेदनशील कवि थे। संस्कृत के महाकवि बाण की भाँति वे शब्दों के चित्र लिखने के धनी हैं। वे अमर कवि हैं।

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न-निम्नलिखित पद्यांशों के आधार पर उनसे सम्बन्धित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए

नागमती-वियोग-वर्णन

प्रश्न 1:
नागमती चितउर पथ हेरा । पिउ जो गए पुनि कीन्ह न फेरा ।।
नागर काहु नारि बस परा।   तेइ मोर पिउ मोसौं हरा ।।
सुआ काल होइ लेइगा पीऊ । पिउ नहिं जात, जात बरु जीऊ ।।
भयउ नरायन बावन करा। राज करत रोजा बलि छरा ।।
करन पास लीन्हेछ कै छंदू । बिप्र रूप धरि झिलमिल इंदू ॥
मानत भोग गोपिचंद भोगी । लेइ अपसवा जलंधर जोगी ।।
लै कान्हहिं भी अकरूर अलोपी । कठिन बिछोह जियहिं किमि गोपी ।।

सारस जोरी कौन हरि, मारि बियाधा लीन्ह ।
झुरि-झुरि पज़र हौं भई, बिरह काल मोहि दीन्ह ॥

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) नागमती चित्तौड़ में किसकी राह देख रही है?
(iv) विष्णु ने वामन रूप धारण करके किसे छला था?
(v) किर कारण नागमती सूखकर हड्डियों का ढाँचामात्र रह गयी है?
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में ‘नागमती-वियोग-वर्णन’ शीर्षक के अन्तर्गत संकलित एवं मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित ‘पद्मावत’ महाकाव्य से उद्धृत है।। अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – नागमती-वियोग-वर्णन।
कवि का नाम – मलिक मुहम्मद जायसी।
[संकेत – इस शीर्षक के शेष सभी पद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – नागमती चित्तौड़ में अपने पति राजा रत्नसेन की बाट जोह रही थी और
कहती थी कि सारस की जोड़ी में से एक (नर) को मारकर किस व्याध (बहेलिये) ने मादा को उससे अलग कर दिया है और यह विरहरूपी काल मुझे दे दिया है, जिसके कारण मैं सूखकर हड्डियों का ढाँचामात्र रह गयी हूँ।
(iii) नागमती चित्तौड़ में अपने राजा रत्नसेन की राह देख रही है।
(iv) विष्णु ने वामन रूप धारण करके राजा बलि को छला था।
(v) नागमती अपने प्रीतम से अलग होकर विरह काल के कारण सूखकर हड्डियों का ढाँचामात्र रह गयी है।

प्रश्न 2:
पाट महादेइ ! हिये न हारू । समुझि जीउ चित चेतु सँभारू ।।
भौंर कँवल सँग होइ मेरावा । सँवरि नेह मालति पहँ आवा ।।
पपिहै स्वाती सौं जस प्रीती । टेकु पियास बाँधु मन थीती ।।
धरतिहिं जैस गगन सौं नेहा । पलटि आव बरषा ऋतु मेहा ।।
पुनि बसंत ऋतु आव नवेली । सो रसे सो मधुकर सो बेली ।।
जिनि असे जीव करसि तू बारी । यह तरिबर पुनि उठिहिं सँवारी ।।
दिन दस बिनु जल सूखि बिधंसा । पुनि सोई सरबर सोई हंसा ।।

मिलहिं जो बिछुरे साजन, अंकम भेटि गहंत ।
तपनि मृगसिरा जे सहैं, ते अद्रा पलुहंत ॥

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(i) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) पति-वियोग से पीड़ित नागमती को उनकी सखियाँ क्या धीरज बँधाती हैं?
(iv) आकाश पृथ्वी से किस रूप में वापस आ मिलता है?
(v) पपीहा अपनी प्यास कैसे बुझाता है
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – रानी नागमती पति-वियोग से पीड़ित है। उसकी सखियाँ उसे धीरज बँधाती हुई कहती हैं कि पटरानी जी! आप अपने हृदय में इतनी निराश न हों। धैर्य धारण कर स्वयं को सँभालिए। जब बिछुड़े हुए पति तुम्हें पुनः मिलेंगे तो वे (द्विगुणित अनुराग से) तुम्हें प्रगाढ़ आलिंगन में बाँध लेंगे; क्योकि जो मृगशिरा नक्षत्र में (ज्येष्ठ मास) की तपन सहते हैं, वे आर्द्रा नक्षत्र (आषाढ़) की वर्षा से पुनः पल्लवित (हरे-भरे) हो उठते हैं।
(iii) पति-वियोग से पीड़ित नागमती को उनकी सखियाँ यह धीरज बँधाती हैं कि महारानी आप निराश मत होइए। महाराज आपके पूर्व स्नेह को स्मरण करके पुन: वापस आ जाएँगे।
(iv) आकाश पृथ्वी से मेधों की वर्षा की बूंदों के रूप में वापस आ मिलता है।
(v) पपीहा स्वाति नक्षत्र का जल पीकर अपनी प्यास बुझाता है।

प्रश्न 3:
चढ़ा असाढ़ गगन घन गाजा । साजा बिरह दुद दल बाजा ।।
धूम, साम, धौरे घन धाए । सेत धजा बग पाँति देखाए ।।
खड़ग ‘बीजु चमकै चहुँ ओरा। बुंद बान बरसहिं घनघोरा ।।
ओनई घटा आइ चहुँ फेरी । कंत ! उबारु मदन हौं घेरी ।।
दादुर मोर कोकिला पीऊ। गिरै बीजु घट रहै न जीऊ ।।
पुष्य नखत सिर ऊपर आवा । हौं बिनु नाह मंदिर को छावा ?
अद्रा लाग लागि भुईं लेई । मोहिं बिनु पिउ को आदर देई ?

जिन्ह घर कंता ते सुखी, तिन्ह गारौ औ गर्ब ।
कंत पियारा बाहिरै, हम सुख भूला सबै ॥

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) आषाढ़ के महीने में नागमती को बिजली की चमक तथा मेघों की गड़गड़ाहट कैसी प्रतीत होती
(iv) आषाढ़ माह में चारों ओर किनकी आवाजें सुनायी पड़ती हैं?
(v) आषाढ़ माह में कौन-सी स्त्रियाँ गर्व का अनुभव करती हैं?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – राजा रत्नसेन पद्मावती को पाने के लिए योगी बनकर सिंहलगढ़ की ओर चले गये हैं। लम्बे समय तक न लौटने पर रानी नागमती शंकित होती है तथा विरह की अग्नि में जलने लगती है। आर्द्रा नक्षत्र के उदय होने पर घनघोर वर्षा होती है। ऐसे वातावरण में उसकी विरह-वेदना और बढ़ जाती है। वह अनुभव करती है कि जिन स्त्रियों के पति घर पर होते हैं। वे ही सुखी होती हैं। उन्हीं को पत्नी होने का गौरव प्राप्त होता है। विरहिणियों को तो दु:खी जीवन ही बिताना पड़ता है। मेरा पति बाहर है तो मैं तो सभी सुख भूल गयी हूँ।
(iii) आषाढ़ के महीने में नागमती को बिजली की चमक तलवार जैसी दिखाई पड़ती है तथा मेघों की गड़गड़ाहट युद्ध के जुगाड़ों के समान प्रतीत होती है।
(iv) आषाढ़ माह में चारों ओर मेंढ़क, मोर तथा कोयलों की आवाजें सुनायी पड़ती हैं।
(v) आषाढ़ माह में जिन स्त्रियों के पति घर पर हैं, वे गर्व का अनुभव करती हैं।

प्रश्न 4:
भा बैसाख तपनि अति लागी । चोआ चीर चॅदन भा आगी ।।
सुरुज जरत हिवंचल तांका । बिरह बजागि सौंह रथ हाँका ।।
जरत बजागिनि करु पिउ छाहाँ ।आइ बुझाउ अँगारन्ह माहाँ ।।
तोहि दरसन होइ सीतल नारी । आइ आगि ते करु फलवारी ।।
लागिउँ जरै जरै जस भारू | फिर फिर पूँजेसि, तजेउँ न बारू ।।
सरवर हिया घटती निति जाई । टूक टूक , होइ के बिहराई ।।
बिहरत हिया करहु पिउ ! टेका।’ दीठि दवॅगरा मेरवहु एका ।।

कॅवल जो बिगसा मानसर, बिनु जल गयउ सुखाइ।
कबहुँ बेलि फिरि पलुहै, जौ पिउ सींचै आइ॥

(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) वैशाख माह में कौन भाड़ में पड़े दाने के समान भुन रहा है?
(iv) विरह के ताप में कौन उत्तरोत्तर सूखता जा रहा है?
(v) किसके सींचने पर बेल फिर से हरी हो सकती है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – वैशाख मास की प्रचण्ड गर्मी में अपनी दशा का वर्णन करती हुई विरहिणी नागमती कहती है कि मानसरोवर में जो कमल खिला था, वह जल के अभाव में सूख गया। आपके सम्पर्क में आकर मुझे जो प्रेम मिला था, अब वही विरह के कारण नष्ट होता जा रहा है। वह बेल फिर हरी-भरी हो सकती है, यदि प्रिय स्वयं आकर उसे सींचें।
(iii) वैशाख माह में नागमती विरह वेदना के कारण भाड़ में पड़े चने के समान भुन रही है?
(iv) विरह के ताप में नागमती का हृदयरूपी सरोवर उत्तरोत्तर सूखता जा रहा है।
(v) पिय के स्वयं आकर सींचने पर बेल फिर से हरी हो सकती है।

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UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 10 Mechanical Properties Of Fluids

UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 10 Mechanical Properties Of Fluids (तरलों के यान्त्रिक गुण) are part of UP Board Solutions for Class 11 Physics . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 10 Mechanical Properties Of Fluids (तरलों के यान्त्रिक गुण)

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Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Physics
Chapter Chapter 10
Chapter Name Mechanical Properties Of Fluids
Number of Questions Solved 150

UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 10 Mechanical Properties Of Fluids (तरलों के यान्त्रिक गुण)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
स्पष्ट कीजिए क्यों
(a) मस्तिष्क की अपेक्षा मानव का पैरों पर रक्त चाप अधिक होता है।
(b) 6 km ऊँचाई पर वायुमण्डलीय दाब समुद्र-तल पर वायुमण्डलीय दाब का लगभग आधा हो जाता है, यद्यपि वायुमण्डल का विस्तार 100 km से भी अधिक ऊँचाई तक है। |
(c) यद्यपि दाब, प्रति एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाला बल होता है तथापि द्रवस्थैतिक दाब एक अदिश राशि है।
उत्तर-
(a) पैरों के ऊपर रक्त स्तम्भ की ऊँचाई मस्तिष्क के ऊपर रक्त स्तम्भ की ऊँचाई से अधिक होती है। चूंकि द्रव स्तम्भ का दाब गहराई के अनुक्रमानुपाती होता है; अत: पैरों पर रक्त दाब मस्तिष्क पर रक्त दाब की तुलना में अधिक होता है।
(b) पृथ्वी के गुरुत्वीय प्रभाव के कारण वायु के अणु पृथ्वी के समीप बने रहते हैं अधिक ऊँचाई तक नहीं जा पाते। इसी कारण 6:km से अधिक ऊँचाई पर जाने पर वायु बहुत ही विरल हो जाती है और घनत्व बहुत कम हो जाता है। चूँकिं तरल-दाब, तरल के घनत्व के अनुक्रमानुपाती होता है; अतः 6 km से ऊपर की वायु का कुल दाब अत्यन्त कम होता है; अत: पृथ्वी-तल से 6 km की ऊँचाई पर वायुमण्डलीय दाबं समुद्र तल पर वायुमण्डलीय दाब का आधा रह जाता है।
(c) पास्कल के नियम के अनुसार किसी बिन्दु पर द्रव-दाब सभी दिशाओं में समान रूप से लगता है, अर्थात् दाब के साथ कोई दिशा नहीं जोड़ी जा सकती; अत: दाब एक अदिश राशि है।।

प्रश्न 2.
स्पष्ट कीजिए क्यों
(a) पारे का काँच के साथ स्पर्श कोण अधिककोण होता है जबकि जल का काँच के साथ स्पर्श कोण न्यूनकोण होता है।
(b) काँच के स्वच्छ समतल पृष्ठ पर जल फैलने का प्रयास करता है जबकि पारा उसी पृष्ठ पर बूंदें | बनाने का प्रयास करता है। (दूसरे शब्दों में जल काँच को गीला कर देता है जबकि पारा ऐसा नहीं करता है।)
(c) किसी द्रव का पृष्ठ-तनाव पृष्ठ के क्षेत्रफल पर निर्भर नहीं करता है।
(d) जल में घुले अपमार्जकों के स्पर्श कोणों का मान कम होना चाहिए।
(e) यदि किसी बाह्य बल का प्रभाव न हो तो द्रव बूंद की आकृति सदैव गोलाकार होती है।
उत्तर-
(a) पारे के अणुओं के बीच ससंजक बल, पारे व काँच के अणुओं के बीच आसंजक बल से अधिक होता है, इस कारण काँच व पारे का स्पर्श कोण अधिककोण होता है।
इसके विपरीत जल के अणुओं के बीच ससंजक बल, काँच व जल (UPBoardSolutions.com) के अणुओं के बीच आसंजक बल से कम होता है, इस कारण जल तथा काँच के बीच स्पर्श कोण न्यूनकोण होता है। |
(b) खण्ड (a) के उत्तर में वर्णित कारण यहाँ भी लागू होता है।
(c) रबड़ की झिल्ली को खींचने पर उसमें तनाव बढ़ जाता है परन्तु किसी द्रव के मुक्त पृष्ठ का क्षेत्रफल बढ़ा देने पर उसके तनाव में कोई परिवर्तन नहीं आता; अत: द्रव का पृष्ठ-तनाव उसके मुक्त क्षेत्रफल पर निर्भर नहीं करता।।
(d) अपसार्जक घुले होने पर जल का पृष्ठ-तनाव कम हो जाता है; अतः स्पर्श कोण भी कम हो जाता है।
(e) बाह्य बल की अनुपस्थिति में बूंद की आकृति केवल पृष्ठ-तनाव द्वारा निर्धारित होती है। पृष्ठ-तनाव के कारण बूंद न्यूनतम मुक्त क्षेत्रफल वाली आकृति ग्रहण करना चाहती है। चूंकि एक दिए गए आयतन के लिए गोले का मुक्त पृष्ठ न्यूनतम होता है; अतः बूंद की आकृति पूर्ण गोलाकार हो जाती

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प्रश्न 3.
प्रत्येक प्रकथन के साथ संलग्न सूची में से उपयुक्त शब्द छाँटकर उस प्रकथन के रिक्त स्थान की पूर्ति कीजिए
(a) व्यापक रूप में व्रवों का पृष्ठ-तनाव ताप बढने पर…….है। (बढ़ता/घटता)
(b) गैसों की श्यानता ताप बढ़ने पर………है, जबकि द्रवों की श्यानता ताप बढने पर……..है। (बढ़ती/घटती)।
(c) दृढ़ता प्रत्यास्थता गुणांक वाले ठोसों के लिए अपरूपण प्रतिबल……….के अनुक्रमानुपाती होता है, जबकि द्रवों के लिए वह……….के अनुक्रमानुपाती होता है। (अपरूपण विकृति/अपरूपण विकृति की दर) ।
(d) किसी तरल के अपरिवर्ती प्रवाह में आए किसी संकीर्णन पर प्रवाह की चाल में वृद्धिमें…….. का अनुसरण होता है। (संहति का संरक्षण/बरनौली सिद्धान्त)
(e) किंसी वायु सुरंग में किसी वायुयान के मॉडल में प्रक्षोभ की चाल वास्तविक वायुयान के प्रक्षोभ के लिए क्रांतिक चाल की तुलना में………होती है। (अधिक/कम)
उत्तर-
(a) घटता
(b) बढ़ती, घटती,
(c) अपरूपण विकृति, अपरूपण विकृति की दर,
(d) संहति को संरक्षण,
(e) अधिक।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित के कारण स्पष्ट कीजिए
(a) किसी कागज़ की पट्टी को क्षतिज रखने के लिए आपको उस कागज़ पर ऊपर की ओर हवा फेंकनी चाहिए, नीचे की ओर नहीं।
(b) जब हम किसी जल टोंटी को अपनी उँगलियों द्वारा बन्द करने का प्रयास करते हैं तो उँगलियों के बीच की खाली जगह से तीव्र जल धाराएँ फूट निकलती हैं।
(c) इंजेक्शन लगाते समय डॉक्टर के अंगूठे द्वारा आरोपित दाब की अपेक्षा सुई का आकार दवाई की बहिःप्रवाही धारा को अधिक अच्छा नियन्त्रित करता है।
(d) किसी पात्र के बारीक छिद्र से निकलने वाला तरल उस पर पीछे की ओर प्रणोद आरोपित करता है।
(e) कोई प्रचक्रमान क्रिकेट की गेंद वायु में परवलीय प्रपथ का अनुसरण नहीं करती।
उत्तर-
(a) कागज़ के ऊपर फेंक मारने से ऊपर वायु का वेग अधिक हो जाएगा। क्षैतिज प्रवाह के लिए बरनौली प्रमेय [latex s=2]\left( P+\frac { 1 }{ 2 } { \rho \nu }^{ 2 } \right) [/latex] = नियत के अनुसार कागज़ के ऊपर वायु दाब, नीचे की तुलना में कम हो जाएगा। इससे कागज़ पर उत्थापक बल लगेगा जो कागज़ को नीचे नहीं गिरने देगा। |
(b) टोंटी को उँगलियों द्वारा बन्द करने पर जल उँगलियों के बीच की खाली जगह से निकलने लगता है। यहाँ धारा का अनुप्रस्थ क्षेत्रफल टोंटी के अनुप्रस्थ क्षेत्रफल से कम होता है; अतः अविरतता के सिद्धान्त (A1ν1 = A2ν2) से जल का वेग अधिक हो जाता है। |
(c) अविरतता के सिद्धान्त से, समान दाब आरोपित किए जाने पर भी, सुई बारीक होने पर (अनुप्रस्थ क्षेत्रफल कम होने पर) बहि:प्रवाही धारा का प्रवाह वेग बढ़ जाता है; अत: बहि:प्रवाह वेग सुई के आकार से अधिक नियन्त्रित होता है।
(d) जब कोई तरल किसी पात्र में बने बारीक छिद्र से बाहर आता है तो अविरतता के सिद्धान्त से वह उच्च बहि:स्राव वेग प्राप्त कर लेता है। बाह्य बल की अनुपस्थिति में पात्र + तरल का संवेग संरक्षित रहता है; अतः पात्र विपरीत दिशा में संवेग प्राप्त करता है, अर्थात् बाहर निकलता हुआ द्रव पात्र पर : विपरीत दिशा में प्रणोद आरोपित करता है।
(e) घूमती हुई गेंद अपने साथ वायु को खींचती है; अतः गेंद के ऊपर तथा नीचे वायु के वेग में अन्तर आ जाता है; अतः दाबों में भी अन्तर आ जाता है। इसके कारण गेंद पर भार के अतिरिक्त एक अन्य बल भी लगने लगता है और गेंद को पथ परवलयाकार नहीं रह जाता।।

प्रश्न 5.
ऊँची एड़ी के जूते पहने 50 kg संहति की कोई बालिका अपने शरीर को 1.0 cm व्यास की एक ही वृत्ताकार एड़ी पर सन्तुलित किए हुए है। क्षैतिज फर्श पर एड़ी द्वारा आरोपित दाब ज्ञात कीजिए।
हल-
वृत्ताकार एड़ी की त्रिज्या R = व्यास /2 = 1.0 सेमी/2
= 0.5 सेमी = 5 x 10-3 मीटर
वृत्ताकार एड़ी का क्षेत्रफल A = πR2 =3.14 (5 x 10-3 मी)2
= 78.50 x 10-6 मी2
एड़ी पर पड़ने वाला बल F = बालिका का भार = mg
= 50 किग्रा x 9.8 मी/से2 =490 न्यूटन
क्षैतिज फर्श पर एड़ी द्वारा आरोपित दाब = एड़ी पर आरोपित दाब
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प्रश्न 6.
टॉरिसेली के वायुदाबमापी में पारे का उपयोग किया गया था। पास्कल ने ऐसा ही वायुदाबमापी 984 kg m-3 घनत्व की फ्रेंच शराब का उपयोग करके बनाया। सामान्य वायुमण्डलीय दाब के लिए शराब-स्तम्भ की ऊँचाई ज्ञात कीजिए।
हल-
h ऊँचाई के शराब स्तम्भ का दाब P = h.ρ.g
शराब स्तम्भ की ऊँचाई h = [latex s=2]\frac { P }{ \rho .g } [/latex]
यहाँ P = 1 वायुमण्डलीय दाब
= 1.013 x 105Pa = 1.013 x 105 न्यूटन/मी2
शराब का घनत्व ρ = 984 किग्रा/मी3 तथा g = 9.8 मी/से2
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प्रश्न 7.
समुद्र तट से दूर कोई ऊध्र्वाधर संरचना 109 Pa के अधिकतम प्रतिबल को सहन करने के लिए बनाई गई है। क्या यह संरचना किसी महासागर के भीतर किसी तेल कूप के शिखर पर रखे जाने के लिए उपयुक्त है? महासागर की गहराई लगभग 3km है। समुद्री धाराओं की उपेक्षा कीजिए।
हल-
यदि समुद्र के जल द्वारा आरोपित दाब, संरचना द्वारा सहन किये जा सकने वाले अधिकतम प्रतिबल से कम होगा तो संरचना महासागर के भीतर तेल कूप के शिखर पर रखे जाने के लिए उपयुक्त होगी। समुद्र जल द्वारा आरोपित दाब
P = hρg
यहाँ h = 3 किमी = 3 x 103 मीटर,
जल का घनत्व = 103 किग्रा – मी-3 तथा g = 9.8 मी/ से2
P =3 x 103 मी x 103 किग्रा -मी3 x 9.8 मी-से-2
= 2.94 x 107 न्यूटन /मी2 = 2.94 x 107 Pa
चूँकि P < अधिकतम प्रतिबल 109 Pa; अत: संरचना आवश्यक कार्य के लिए उपयुक्त है।

प्रश्न 8.
किसी द्रवचालित आटोमोबाइल लिफ्ट की संरचना अधिकतम 3000 kg संहति की कारोंको उठाने के लिए की गई है। बोझ को उठाने वाले पिस्टन की अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल 425 cm2 है। छोटे पिस्टन को कितना अधिकतम दाब सहन करना होगा?
हल-
पास्कल के नियम के अनुसार,
छोटे पिस्टन पर अधिकतम दाब = बोझ उठाने वाले बड़े पिस्टन पर दाब
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प्रश्न 9.
किसी U-नली की दोनों भुजाओं में भरे जल तथा मेथेलेटिड स्पिरिट को पारा एक-दूसरे से पृथक् करता है। जब जल तथा पारे के स्तम्भ क्रमशः 10 cm तथा 12.5 cm ऊँचे हैं तो दोनों भुजाओं में पारे का स्तर समान है। स्पिरिट का आपेक्षिक घनत्व ज्ञात कीजिए।
हल-
U-नली की एक भुजा में जल स्तम्भ के लिए,
h1 = 10.0 सेमी; ρ1 (घनत्व) = 1 g-cm-3
U-नली की दूसरी भुजा में मेथेलेटिड स्प्रिट के लिए,
h2 =12.5 सेमी; ρ2 =?
चूंकि दोनों भुजाओं में पारे का तल समान है अत: इस तल पर दोनों भुजाओं के स्तम्भों के दाब भी समान होंगे। अर्थात् ।
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प्रश्न 10.
यदि प्रश्न 9 की समस्या में, U-नली की दोनों भुजाओं में इन्हीं दोनों द्रवों को और उड़ेल कर दोनों द्रवों के स्तम्भों की ऊँचाई 15 cm और बढ़ा दी जाए तो दोनों भुजाओं में पारे के स्तरों में क्या अन्तर होगा? (पारे का आपेक्षिक घनत्व = 13.6)
हल-
माना कि U-नली की दोनों भुजाओं में पारे के तलों का अन्तर h है तथा ρ पारे का घनत्व है, तो ,
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प्रश्न 11.
क्यो,बरनौली समीकरण का उपयोग किसी नदी की किसी क्षिपिका के जल-प्रवाह का विवरण देने के लिए किया जा सकता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
बरनौली प्रमेय का समीकरण केवल धारारेखी प्रवाह पर लागू होता है। चूंकि नदी की क्षिफ्रिका (UPBoardSolutions.com) का जल-प्रवाह धारारेखी प्रवाह नहीं होता; अत: इसका विवरण देने के लिए बरनौली समीकरण का प्रयोग नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 12.
बरनौली समीकरण के अनुप्रयोग में यदि निरपेक्ष दाब के स्थान पर प्रमापी दाब (गेज़ दाब) का प्रयोग करें तो क्या इससे कोई अन्तर पड़ेगा? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
बरनौली समीकरण के अनुसार,
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माना दो बिन्दुओं पर वायुमण्डलीय दाब Pq तथा Pq हैं व गेज दाब क्रमशः P’ व P; हैं तब
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अर्थात् यदि दोनों बिन्दुओं के वायुमण्डलीय दाबों में बहुत कम अन्तर है तो परम दाब के स्थान पर गेज़ दाब का प्रयोग करने से कोई, अन्तर नहीं पड़ेगा।

प्रश्न 13.
किसी 1.5 m लम्बी 10 cm त्रिज्या की क्षैतिज नली से ग्लिसरीन का अपरिवर्ती प्रवाह हो रहा है। यदि नली के एक सिरे पर प्रति सेकण्ड एकत्र होने वाली ग्लिसरीन का परिमाण 4.0 x 10-3 kg s-1 है तो नली के दोनों सिरों के बीच दाबान्तर ज्ञात कीजिए। (ग्लिसरीन का घनत्व = 1.3 x 103 kg m-3 तथा ग्लिसरीन की श्यानता = 0.83 Pas) आप यह भी जाँच करना चाहेंगे कि क्या इस नली में स्तरीय प्रवाह की परिकल्पना सही है?
हल-
धारा-रेखीय प्रवाह मानते हुए नली में ग्लिसरीन के प्रवाह की दर के प्वॉइजली के सूत्र [latex s=2]Q=\frac { \pi \rho { r }^{ 4 } }{ 8\eta { l }^{ 4 } } [/latex]
से नली के सिरों के बीच दाबान्तर
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यह धारा-रेखी प्रवाह के लिए मान्य अधिकतम मान 2000 से काफी कम है। अतः नली में ग्लिसरीन को प्रवाह धारा-रेखी है।।

प्रश्न 14.
किसी आदर्श वायुयान के परीक्षण प्रयोग में वायु-सुरंग के भीतर पंखों के ऊपर और नीचे के पृष्ठों पर वायु-प्रवाह की गतियाँ क्रमशः 70 ms-1 तथा 63 ms-1 हैं। यदि पंख का क्षेत्रफल 2.5 m2 है तो उस पर आरोपित उत्थापक बल परिकलित कीजिए। वायु का घनत्व 1.3 kg m-3 लीजिए।
हल-
बरनौली प्रमेय के अनुसार, वायु के. क्षैतिज प्रवाह के लिए
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जहाँ P1 = वायुयान पंख के ऊपर दाब तथा P2 = पंख के नीचे दाब
υ1 = पंख की ऊपरी सतह पर वायु का वेग तथा υ2 = निचली सतह पर वायु का वेग
∴  पंख की ऊपरी सतह की तुलना में निचली सतह पर दाब आधिक्य अर्थात् पंखों की सतहों के बीच दाबान्तर
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प्रश्न 15.
चित्र-10.1 (a) तथा (b) किसी द्रव (श्यानताहीन) का अपरिवर्ती प्रवाह दर्शाते हैं। इन दोनों चित्रों में से कौन-सही नहीं है? कारण स्पष्ट कीजिए।
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उत्तर-
चित्र-10.1 (a) सही नहीं है। नलिका की ग्रीवा में अनुप्रस्थ क्षेत्रफल कम है; अत: अविरतता के सिद्धान्त से यहाँ वेग अधिक होगा; अत: बरनौली प्रमेय से यहाँ जल का दाब कम होगा जबकि चित्र (a) में ग्रीवा पर जल दाब अधिक दिखाया गया है।

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प्रश्न 16.
किसी स्प्रे पम्प की बेलनाकार नली की अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल 8.0 cm2 है। इस नली के एक सिरे पर 1.0 mm व्यास के 40 सूक्ष्म छिद्र हैं। यदि इस नली के भीतर द्रव के प्रवाहित होने की दर 1.5 m min-1 है तो छिद्रों से होकर जाने वाले द्रव की निष्कासन-चाल ज्ञात कीजिए।
हल-
नली की अनुप्रस्थ-काट का क्षेत्रफल A1 = 8 x 10-4 मी2
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प्रश्न 17.
U-आकार के किसी तार को साबुन के विलयन में डुबोकर बाहर निकाला गया जिससे उस पर एक पतली साबुन की फिल्म बन गई। इस तार के दूसरे सिरे पर फिल्म के सम्पर्क में एक फिसलने वाला हलका तार लगा है जो 1.5 x 10-2 N भार (जिसमें इसका अपना भार भी सम्मिलित है) को सँभालता है। फिसलने वाले तार की लम्बाई 30 cm है। साबुन की फिल्म का पृष्ठ-तनाव कितना है?
हल-
तार की लम्बाई l = 30 cm = 0.3 m
तार पर लटका भार W = 1.5 x 10-2 N
माना फिल्म का पृष्ठ-तनाव S है, तब फिल्म के एक ओर के पृष्ठ (UPBoardSolutions.com) के कारण तार पर F1 = S x l बल लगेगा।
∴ दोनों पृष्ठों के कारण तार पर बल
F = 2F1 = 2sl
यह बल भार को सन्तुलित करता है; अतः
2Sl = W
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प्रश्न 18.
निम्नांकित चित्र-10.2 (a) में किसी पतली द्रव-फिल्म को 4.5 x 10-2 N का छोटा भार सँभाले दर्शाया गया है। चित्र (b) तथा (c) में बनी इसी द्रव की फिल्में इसी ताप पर कितना भार सँभाल सकती हैं? अपने उत्तर को प्राकृतिक नियमों के अनुसार स्पष्ट कीजिए।
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उत्तर-
चित्र-10.2 (a), (b) व (c) प्रत्येक में फिल्म के नीचे वाले किनारे की लम्बाई 40 cm (समान) है।
इस किनारे पर फिल्म के पृष्ठ-तनाव S के कारण समान बल F = S x 2l लगेगा।
यही बल लटके हुए भार को साधता है। चूंकि साधने वाला बल प्रत्येक दशा में समान है; अतः चित्र-10.2 (b) व (C) में भी वही भार 4.5 x 10-2 N सँभाला जा सकता है।

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प्रश्न 19.
3.00 mm त्रिज्या की किसी पारे की बूंद के भीतर कमरे के ताप पर दाब क्या है? 20°C ताप पर पारे का पृष्ठ तनाव 4.65 x 10-1 N m-1 है। यदि वायुमण्डलीय दाब 101 x 105 Pa है तो पारे की बूंद के भीतर दाब-आधिक्य भी ज्ञात कीजिए।
हल-
दिया है : त्रिज्या r =3.00 mm = 3.00 x 10-3m,
वायुमण्डलीय दाब Pa = 1.01 x 105 Pa
20°C पर पारे का पृष्ठ-तनाव S =4.65 x 10-1Nm-1
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प्रश्न 20.
5.00 mm त्रिज्या के किसी साबुन के विलयन के बुलबुले के भीतर दाब-आधिक्य क्या है? 20°C ताप पर साबुन के विलयन का पृष्ठ-तनाव 2.50 x 10-2 Nm-1 है। यदि इसी विमा का कोई वायु का बुलबुला 1.20 आपेक्षिक घनत्व के साबुन के विलयन से भरे किसी पात्र में 40.0 cm गहराई पर बनता तो इस बुलबुले के भीतर क्या दाब होता, ज्ञात कीजिए। (1 वायुमण्डलीय दाब = 101 x 105 Pa)
हल-
(a) बुलबुले की त्रिज्या r = 5.00 mm = 5.0 x 10-3 m,
विलयन का पृष्ठ-तनाव S = 2.50 x 10-2 Nm-1
साबुन के घोल का बुलबुला वायु में बनता है; अतः इसके दो मुक्त पृष्ठ होंगे।
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अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 21.
1.0 m2 क्षेत्रफल के वर्गाकार आधार वाले किसी टैंक को बीच में ऊर्ध्वाधर विभाजक दीवार द्वारा दो भागों में बाँटा गया है। विभाजक दीवार के नीचे 20 cm2 क्षेत्रफल का कब्जेदार दरवाजा है। टैंक का एक भाग जल से भरा है तथा दूसरा भाग 1.7 आपेक्षिक घनत्व के अम्ल से भरा है। दोनों भाग 40 m ऊँचाई तक भरे गए हैं। दरवाजे को बन्द रखने के लिए आवश्यक बल परिकलित कीजिए।
हुल-
दरवाजे को बन्द रखने के लिए आवश्यक बल
F = विभाजक दीवार के दोनों ओर का दाबान्तर x दरवाजे का क्षेत्रफल
= (अम्ल स्तम्भ का दाब – जल स्तम्भ का दाब) x A
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प्रश्न 22.
चित्र-10.3 (a) में दर्शाए अनुसार कोई मैनोमीटर किसी बर्तन में भरी गैस के दाब का पाठ्यॉक लेता है। पम्प द्वारा कुछ गैस बाहर निकालने के पश्चात मैनोमीटर चित्र 10.3 (b)] में दर्शाए अनुसार पाठ्यांक लेता है। मैनोमीटर में पारा भरा है तथा वायुमण्डलीय दाब का मान 76 cm मरकरी (Hg) है।
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(i) प्रकरणों (a) तथा (b) में बर्तन में भरी गैस के निरपेक्ष दाब तथा प्रमापी दाब cm (Hg) के मात्रक में लिखिए।
(ii) यदि मैनोमीटर की दाहिनी भुजा में 13.6 cm ऊँचाई तक जल (पारे के साथ | अमिश्रणीय) उड़ेल दिया जाए तो प्रकरण (b) में स्तर में क्या परिवर्तन होगा? (गैस के आयतन में हुए थोड़े परिवर्तन की उपेक्षा कीजिए।)
हस-
वायुमण्डलीय दाब P0 = 76 सेमी पारा ।
(i) चित्र 10.3 (a) में
निरपेक्ष दाब P = P0 + 20 सेमी पारा ।
= 76 सेमी पारा + 20 सेमी पारा = 96 सेमी पारा
‘प्रमापी (गेज) दाब = (P – P0) = 20 सेमी पारा
चित्र 10.3 (b) में,
निरपेक्ष दाब P = P0 – 18 सेमी पारा
= 76 सेमी पारा – 18 सेमी पारा
= 58 सेमी पारा
प्रमापी (गेज) दाब = (P – P0) = -18 सेमी पारा
यह ऋणात्मक (-) चिह्न यह दर्शाता है कि बर्तन में भरी गैस का दाब वायुमण्डलीय दाब से कम है।
(ii) यदि मैनोमीटर की दाहिनी भुजा में 13.6 सेमी ऊँचाई तक जल उड़ेल दिया जाता है, तो चित्र 10.4 के अनुसार मैनोमीटर की दाहिनी भुजा में पारे। का तल नीचे गिरता है तथा बायीं भुजा में यह ऊपर उठता है ताकि तली पर दोनों ओर के दाब समान हो जायें। माना पारे का दाहिनी भुजा से बायीं भुजा में स्थानान्तरण x सेमी है। अत: दोनों भुजाओं में पारे। के स्तम्भ का अन्तर 2x सेमी होगा।
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प्रश्न 23.
वो पात्रों के आधारों के क्षेत्रफल समान हैं परन्तु आकृतियाँ भिन्न-भिन्न हैं। पहले पात्र में दूसरे पात्र की अपेक्षा किसी ऊँचाई तक भरने पर दोगुना जल आता है। क्या दोनों प्रकरणों में पात्रों के आधारों पर आरोपित बल समान हैं? यदि ऐसा है तो भार मापने की मशीन पर रखे एक ही ऊँचाई तक जल से भरे दोनों पात्रों के पाठ्यांक भिन्न-भिन्न क्यों होते हैं?
हल-
माना प्रत्येक पात्र में जल-स्तम्भ की ऊँचाई h तथा आधार का क्षेत्रफल A है तो
आधार पर बल = जल-स्तम्भ का दाब x क्षेत्रफल
= h ρ g × A = A h ρ g
∵A व h दोनों के लिए समान है तथा ρ व g अचर राशियाँ हैं।
∴दोनों पात्रों के आधारों पर समान बल आरोपित होंगे। भार मापने वाली मशीन, पात्र के आधार पर आरोपित बल को मापने के स्थान पर पात्र + जल का भार मापती है।
∵ एक पात्र में दूसरे की अपेक्षा दोगुना जल है; अतः भार मापने की मशीन के पाठ्यांक अलग-अलग होंगे।

प्रश्न 24.
रुधिर-आधान के समय किसी शिरा में, जहाँ दाब 2000 Pa है, एक सुई धेसाई जाती है। रुधिर के पात्र को किस ऊँचाई पर रखा जाना चाहिए ताकि शिरा में रक्त ठीक-ठीक प्रवेश कर सके। (रुधिर का घनत्व = 1.06 x 10kg m-3)
हुल-
शिरा में रक्त दाब P = 2000 Pa, रक्त का घनत्व ρ = 1.06 x 103 kg m-3
माना कि रक्त के पात्र की सुई से ऊँचाई = h
रक्त के शिरा में ठीक-ठीक प्रवेश करने हेतु, h ऊँचाई वाले रक्त स्तम्भ का दाब, (UPBoardSolutions.com) शिरा में रक्त स्तम्भ के दाब के ठीक बराबर होना चाहिए।
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प्रश्न 25.
बरनौली समीकरण व्युत्पन्न करने में हमने नली में भरे तरल पर किए गए कार्य को तरल की गतिज तथा स्थितिज ऊर्जाओं में परिवर्तन के बराबर माना था।
(a) यदि क्षयकारी बल, उपस्थित हैं, तब नली के अनुदिश तरल में गति करने पर दाब में परिवर्तन किस प्रकार होता है?
(b) क्या तरल का वेग बढ़ने पर क्षयकारी बल अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं? गुणात्मक रूप में चर्चा कीजिए।
उत्तर-
(a) क्षयकारी बल की अनुपस्थिति में बहते हुए द्रव के एकांक आयतन की कुल ऊर्जा स्थिर रहती है परन्तु क्षयकारी बल की उपस्थिति में नली में तरल के प्रवाह को बनाए रखने के लिए क्षयकारी बल के विरुद्ध कार्य करना पड़ता है। इस कारण नली के अनुदिश चलने पर तरल का दाब अधिक तेजी से घटता जाता है। यही कारण है कि शहरों में जल की टंकी से बहुत दूरी पर स्थित मकानों की ऊँचाई टंकी से कम होने पर भी जल उनकी ऊपर वाली मंजिल तक नहीं पहुँच पाता। तरलों के यान्त्रिक गुण, 267
(b) हाँ, तरलं का वेग बढ़ने पर तरल की अपरूपण दर बढ़ जाती है; अतः क्षयकारी बल (श्यान बल) और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं।

प्रश्न 26.
(a) यदि किसी धमनी में रुधिर का प्रवाह पटलीय प्रवाह ही बनाए रखना है तो | 2 x 10-3 m त्रिज्या की किसी धमनी में रुधिर-प्रवाह की अधिकतम चाल क्या होनी चाहिए?
(b) तद्नुरूपी प्रवाह-दर क्या है ? (रुधिर की श्यानता 2.084 x 10-3 Pas लीजिए।
हल-
(a) धमनी रुधिर प्रवाह की अधिकतम चाल = क्रान्तिक वेग [latex s=2]{ \nu }_{ c }=\frac { { R }_{ e }\eta }{ \rho d } [/latex]
परन्तु धारा-रेखी प्रवाह के लिए रेनॉल्ड संख्या का अधिकतम मान
Re =2000
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प्रश्न 27.
कोई वायुयान किसी निश्चित ऊँचाई पर किसी नियत चाल से आकाश में उड़ रहा है तथा इसके दोनों पंखों में प्रत्येक का क्षेत्रफल 25 m2 है। यदि वायु की चाल पंख के निचले पृष्ठ पर 180 kmh-1 तथा ऊपरी पृष्ठ पर 234 km h-1 है तो वायुयान की संहति ज्ञात कीजिए। (वायु का घनत्व 1 kgm-3 लीजिए।) ।
हल-
वायुयान के एक पंख पर उत्थापक बल = (P2 – P1) x A
अतः दोनों पंखों पर उत्थापक बल F =2 (P2 – P1) x A
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प्रश्न 28.
मिलिकन तेल की बूंद प्रयोग में, 2.0 x 10-5 m त्रिज्या तथा 1.2 x 103 kg m-3 घनत्व की किसी बूंद की सीमान्त चाल क्या है? प्रयोग के ताप पर वायु की श्यानता 1.8 x 10-5 Pas लीजिए। इस चाल पर बूंद पर श्यान बल कितना है? (वायु के कारण बूंद पर उत्प्लावन बल की उपेक्षा कीजिए।)
हल-
किसी तरल (वायु) में गिरती हुई तेल की बूंद का सीमान्त वेग
[latex s=2]{ \nu }_{ r }=\frac { 2(\rho -\sigma ){ r }^{ 2 }.g }{ 9\eta } [/latex]
यहाँ वायु के कारण उत्प्लावन बल की उपेक्षा की गयी है। अतः σ को नगण्य अर्थात् शून्य मानते हुए
[latex s=2]{ \nu }_{ r }=\frac { 2\rho { r }^{ 2 }.g }{ 9\eta } [/latex]
परन्तु यहाँ बूंद (तेल) का घनत्व ρ = 1.2 x 103 किग्रा-मी-3, बूंद की त्रिज्या
r = 2.0 x 10-5 मीटर, बूंद का श्यानता गुणांक η = 1.8 x 10-5 Pa.s
तथा g = 9.8 मी/से2.
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प्रश्न 29.
सोडा काँच के साथ पारे का स्पर्श कोण 140° है। यदि पारे से भरी द्रोणिका में 1.00 mm त्रिज्या की काँच की किसी नली का एक सिरा डुबोया जाता है तो पारे के बाहरी पृष्ठ के स्तर की तुलना में नली के भीतर पारे का स्तर कितना नीचे चला जाता (पारे का घनत्व = 136 x 103kg m-3)
हल-
केशनली की त्रिज्या r = 1.00 mm = 10-3 m, स्पर्श कोण θ = 140°,
पारे का घनत्व ρ = 13.6 x 103 kg m-3, पृष्ठ-तनाव S = 0.4355 N m-1
माना पारे का स्तर केशनली में h ऊँचाई ऊपर उठता है तो
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प्रश्न 30.
3.0 mm तथा 6.0 mm व्यास की दो संकीर्ण नलियों को एक साथ जोड़कर दोनों सिरों से खुली एक U-आकार की नली बनाई जाती है। यदि इस नली में जल भरा है तो इस नली की दोनों भुजाओं में भरे जल के स्तरों में क्या अन्तर है? प्रयोग के ताप पर जल का पृष्ठ-तनाव 7.3 x 10-2 N m-1 है। स्पर्श कोण शून्य लीजिए तथा जल का घनत्व 10 x 103 kg m-3 लीजिए। (g = 9.8 ms-2)
हल-
त्रिज्याएँ r1 = 1.5 x 10-3 m, r2 = 3.0 x 10-3 m,
जल का पृष्ठ-तनाव S = 7.3 x 10-2 N m-1,
जल का घनत्व ρ = 1.0 x 103 kg m-3, g = 9.8 ms-2
पृष्ठ-तनाव की अनुपस्थिति में दोनों नलिकाओं में जल का तल समान ऊँचाई पर (UPBoardSolutions.com) होता। माना। पृष्ठ-तनाव के कारण जल दोनों ओर क्रमशः h1 व h2 ऊँचाई तक चढ़ता है तो दोनों नलिकाओं में जल के तल का अन्तर
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परिकलित्र/कम्प्यूटर पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 31.
(a) यह ज्ञात है कि वायु का घनत्व ρ, ऊँचाई y (मीटरों में) के साथ इस सम्बन्ध के अनुसार घटता है:
ρ = ρ0e-y/y0
यहाँ समुद्र तल पर वायु का घनत्व ρ0 = 1.25 kg m-3 तथा y0 एक नियतांक है। घनत्व में इस परिवर्तन को वायुमण्डल का नियम कहते हैं। यह संकल्पना करते हुए कि वायुमण्डल का ताप नियत रहता है (समतापी अवस्था) इस नियम को प्राप्त कीजिए। यह भी मानिए कि g का मान नियत रहता है।
(b) 1425 m³ आयतन का हीलियम से भरा कोई बड़ा गुब्बारा 400 kg के किसी पेलोड को उठाने के काम में लाया जाता है। यह मानते हुए कि ऊपर उठते समय गुब्बारे की त्रिज्या नियत रहती है, गुब्बारा कितनी अधिकतम ऊँचाई तक ऊपर उठेगा? . [y0 = 8000 m तथा ρHe = 0.18 kg m-3 लीजिए।]
हल-
(a) समुद्र तल से ऊँचाई पर वायु के एक काल्पनिक बेलन पर विचार कीजिए जिसका अनुप्रस्थ क्षेत्रफल A है। माना बेलन की ऊँचाई dy है। बेलन के निचले तथा ऊपर वाले सिरों पर वायु दाब क्रमशः P तथा P + dP हैं।
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दाब का मात्रक है ।।
(i) न्यूटन
(ii) न्यूटन-मी
(iii) न्यूटन-मी2
(iv) न्यूटन/मी2
उत्तर-
(iv) न्यूटन/मी2

प्रश्न 2.
एक व्यक्ति द्वारा भूमि पर सर्वाधिक दाब तब लगेगा, जब वह
(i) लेटा हो ।
(ii) बैठा हो
(iii) एक पैर पर खड़ा हो।
(iv) दोनों पैरों पर खड़ा हो
उत्तर-
(iii) एक पैर पर खड़ा हो

प्रश्न 3.
यदि क्षेत्रफल एक-चौथाई हो जाए, तो दाब
(i) दोगुना हो जायेगा ।
(ii) चौथाई रह जायेगा।
(iii) चार गुना हो जायेगा
(iv) वही रहेगा
उत्तर-
(iii) चार गुना हो जायेगा।

प्रश्न 4.
द्रव दाब निर्भर करता है।
(i) केवल द्रव की गहराई पर
(ii) केवल द्रव के घनत्व पर
(iii) केवल गुरुत्वीय त्वरण पर ,
(iv) गहराई, घनत्व तथा गुरुत्वीय त्वरण तीनों पर
उत्तर-
(iv) गहराई, घनत्व तथा गुरुत्वीय त्वरण तीनों पर

प्रश्न 5.
वायुमण्डलीय दाब का अचानक गिर जाना प्रदर्शित करता है।
(i) तूफान
(ii) वर्षा
(iii) स्वच्छ मौसम
(iv) शीत लहर
उत्तर-
(i) तूफान

प्रश्न 6.
बल F, दाब P तथा क्षेत्रफल A में सम्बन्ध है।
(i) F = [latex s=2]\frac { P }{ A }[/latex]
(ii) A = F x P
(iii) F = A x P
(iv) F² = P x A
उत्तर-
(i) F = A x P

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प्रश्न 7.
एक गोताखोर समुद्र में 30 मी की गहराई पर तैर रहा है उस पर लगने वाला कुल दाब का मान होगा (समुद्री जल का घनत्व) = 1000 किग्रा/मी3, 1 वायुमण्डलीय दाब = 10 x 105 न्यूटन/मी2
(i) 4 वायुमण्डलीय दाब
(ii) 10 वायुमण्डलीय दाब
(iii) 12 वायुमण्डलीय दाब
(iv) 5 वायुमण्डलीय दाब ।
उत्तर-
(i) 4 वायुमण्डलीय दाब

प्रश्न 8.
हाइड्रोलिक ब्रेक का कार्य सिद्धान्त आधारित है।
(i) चार्ल्स नियम पर ।
(ii) पास्कल नियम पर
(iii) बॉयल नियम पर
(iv) इनमें से किसी पर भी नहीं
उत्तर-
(i) पास्कल नियम पर

प्रश्न 9. एक जहाज समुद्र पर तैरता है क्योंकि
(i) जहाज द्वारा विस्थापित पानी का भार जहाज के भार के बराबर है।
(ii) जहाज द्वारा विस्थापित पानी का भार जहाज के भार से अधिक है।
(iii) जहाज द्वारा विस्थापित पानी का भार जहाज के भार से कम है।
(iv) प्रत्येक पिण्ड अवश्य ही तैरता है।
उत्तर-
(ii) जहाज द्वारा विस्थापित पानी का भार जहाज के भार से अधिक है।

प्रश्न 10.
लकड़ी का एक टुकड़ा जल में पूरा डुबोकर रखा गया है। टुकड़े पर जल का उत्क्षेप, टुकड़े के भार की अपेक्षा होगा ।
(i) अधिक
(ii) बराबर
(iii) कम
(iv) शून्य
उत्तर-
(i) अधिक

प्रश्न 11.
जल में किसी पत्थर के टुकड़े का भार उसके वायु में वास्तविक भार की तुलना में होगा
(i) बराबर :
(ii) भारी
(iii) हल्का
(iv) शून्य
उत्तर-
(iii) हल्का

प्रश्न 12. बरनौली प्रमेय पूर्णतया सत्य है।
(i) आदर्श द्रव के धारा-रेखी प्रवाह के लिए।
(ii) आदर्श द्रव के विक्षुब्ध’ प्रवाह के लिए।
(iii) वास्तविक द्रव के धारा-रेखी प्रवाह के लिए
(iv) किसी भी द्रव के किसी भी प्रकार के प्रवाह के लिए
उत्तर-
(i) आदर्श द्रव के धारा-रेखी प्रवाह के लिए

प्रश्न 13. बरनौली प्रमेय आधारित है।
(i) संवेग संरक्षण पर
(ii) ऊर्जा संरक्षण पर
(iii) द्रव्यमान संरक्षण पर
(iv) वेग संरक्षण पर,
उत्तर-
(ii) ऊर्जा संरक्षण पर

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प्रश्न 14. एक वायुयान कार्य करता है।
(i) आर्किमिडीज के सिद्धान्त पर
(ii) पास्कल के नियम पर
(iii) बरनौली सिद्धान्त पर
(iv) स्टोक्स के नियम पर
उत्तर-
(iii) बरनौली सिद्धान्त पर

प्रश्न 15. जल से भरे बर्तन में मुक्त तल से 3.2 मीटर गहराई पर एक छिद्र है। यदि गुरुत्वीय त्वरण 10 मी/से2 हो तो जल का बहिसाव वेग होगा।
(i) 5.7 मी/से
(ii) 5.7 सेमी/से
(iii) 8.0 मी/से
(iv) 32 मी/से
उत्तर-
(iii) 8.0 मी/से ।

प्रश्न 16..किसी असमान त्रिज्या वाली नली में जल बह रहा है। नली में प्रविष्टि तथा निकासी सिरों की त्रिज्याओं का अनुपात 3:2 है। नली में प्रविष्ट करने वाले तथा निकलने वाले जल के वेगों का अनुपात होगा
(i) 8:27
(ii) 4:9
(iii) 1:1
(iv) 9:4
उत्तर-
(ii) 4:9

प्रश्न 17. ताप के बढ़ने पर श्यानता गुणांक ।
(i) गैसों तथा द्रवों दोनों का बढ़ता है।
(ii) गैसों तथा द्रवों दोनों का घटता है।
(iii) गैसों का बढ़ता है तथा द्रवों का घटता है।
(iv) गैसों का घटता है तथा द्रवों का बढ़ता है।
उत्तर-
(ii) गैसों का बढ़ता है तथा द्रवों का घटता है।

प्रश्न 18. दो छोटी गोलियाँ जिनकी त्रिज्याओं का अनुपात 1:2 है, किसी श्याने द्रव से होकर गिर रही हैं। उनकी सीमान्त चालों का अनुपात होगा।
(i) 1:2
(ii) 1:4
(iii) 2:1
(iv) 4:1
उत्तर-
(ii) 1:4 .

प्रश्न 19.
श्यान द्रव में सीमान्त वेग से गिरने वाले पिण्ड का त्वरण होता है
(i) शून्य
(ii) g
(iii) g से अधिक
(iv) g से कम
उत्तर-
(i) शून्य ।

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प्रश्न 20. वर्षा की एक छोटी बूंद सीमान्त चाल से नीचे गिर रही है। इस बूंद से दोगुनी त्रिज्या वाली दूसरी बूंद का सीमान्तवेग होगा
(i) ν
(ii) 2ν
(iii) 8ν
(iv) 4ν
उत्तर-
(iv) 4ν

प्रश्न 21.
वर्षा की बूंद की वायु में सीमान्त चाल थे बराबर है।
(i) ν = krη
(ii) ν = kr²η
(iii) ν = krη²
(iv) ν = kr²/η
उत्तर-
(iv) ν = kr²/η

प्रश्न 22.
द्रव का पृष्ठ तनाव
(i) पृष्ठ क्षेत्रफल के साथ बढ़ता है।
(ii) पृष्ठ क्षेत्रफल के साथ घटता है।
(iii) ताप के साथ बढ़ता है।
(iv) ताप के साथ घटता है।
उत्तर-
(iv) ताप के साथ घटता है।

प्रश्न 23. पृष्ठ तनाव का विमीय सूत्र है।
(i) [MLT²]
(ii) [ML²T²]
(iii)[MT-2]
(iv) [MLT-1]
उत्तर-
(iii) [MT-2]

प्रश्न 24.
किसी केशनली में जल 4 सेमी की ऊँचाई तक चढ़ता है। यदि नली की अनुप्रस्थ-काट का क्षेत्रफल एक-चौथाई कर दिया जाये तो जल किस ऊँचाई तक चढेगा?
(i) 2 सेमी :
(ii) 4 सेमी
(iii) 8 सेमी
(iv) 12 सेमी
उत्तर-
(iii) 8 सेमी

प्रश्न 25.
साबुन के घोल के बुलबुले की त्रिज्या R तथा पृष्ठ तनाव T है, बुलबुले के भीतर आधिक्य दाब का सूत्र है।
(i) T/R
(ii) 2T/R
(iii)4T/R
(iv) T/2R
उत्तर-
(iii) 4T/R

प्रश्न 26. वर्षा की बूंद की वायु में सीमान्त चाल है।
(i) ν =krη
(ii) ν = kr²η
(iii) ν = krη²
(iv) ν = kr²η
जहाँ r, जल की बूंद की त्रिज्या, η वायु का श्यानता. गुणांक तथा k नियतांक है।.
उत्तर-
(iv) ν = kr²/η

प्रश्न 27.
2 x 10-6 मी2 पृष्ठ क्षेत्रफल की एक गोलाकार बूंद है, जिसके द्वेव का पृष्ठ-तनाव 7.5 x 10-2 न्यूटन/मी है। यह समान त्रिज्या की 8 गोलाकार बूंदों में विभक्त हो जाती है। इस प्रक्रिया में किया गया कार्य होगा ।
(i) 0.75 x 10-7 जूल
(ii) 1.5 x 10-7 जूल
(iii) 4.5 x 10-7 जूल।
(iv)3.0 x 10-7 जूल
उत्तर-
(ii) 1.5 x 10-7 जूल ।

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प्रश्न 28. जल की एक बड़ी बूंद को 27 छोटी बूंदों में स्प्रे किया गया है। छोटी बूंद के भीतर दाब आधिक्य बड़ी बूंद की अपेक्षा कितना होगा?
(i) दोगुना ।
(ii) तीन गुना
(iii) आधा
(iv) एक-तिहाई
उत्तर-
(ii) तीन गुना ।

प्रश्न 29. एक ऊर्ध्वाधर केशनली में जल 10 सेमी लम्बाई तक चढ़ता है। यदि नली को 45° झुका दिया जाये तो नली के चढ़े हुए जल की लम्बाई होगी।
(i) 10 सेमी.
(ii) 10√2 सेमी
(iii) [latex s=2]\frac { 10 }{ \sqrt { 2 } } [/latex] सेमी
(iv) 5 सेमी
उत्तर-
(ii) 10√2 सेमी :

प्रश्न 30. साबुन के दो बुलंबुलों के अन्दर आधिक्य दाब क्रमशः 1.01 वायुमण्डल और 1.02 वायुमण्डल हैं। इन बुलबुलों के आयतनों का अनुपात है।
(i) 102 : 101
(ii) (102)2 : (101)3
(iii) 8:1
(iv) 2:1
उत्तर-
(ii) (102)2 : (101)3

प्रश्न 31.
साबुन के दो बुलबुलों की त्रिज्याएँ 2:1 के अनुपात में हैं। उनके भीतर आधिक्य दाब को अनुपात है।
(i) 1: 2
(ii) 2:1
(ii) 4:1
(iv) 1:4
उत्तर-
(i) 1: 2

प्रश्न 32.
लोहे की एक सूई पानी की सतह पर तैरती है। इस परिघटना का कास्ण है।
(i) द्रव का उत्प्लावन
(ii) श्यानता
(iii) पृष्ठ तनाव
(iv) गुरुत्वीय त्वरण
उत्तर-
(ii) पृष्ठ तनाव

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दाब से क्या तात्पर्य है। इसका मात्रक लिखिए।
उत्तर-
द्रव द्वारा सम्पर्क सतह के प्रति एकांक क्षेत्रफल पर आरोपित (UPBoardSolutions.com) अभिलम्बवत् बल को दाब कहते हैं। दाब का मात्रक न्यूटन/मी अथवा पास्कल होता है।

प्रश्न 2.
बल तथा दाब में सम्बन्ध का सूत्र लिखिए।
उत्तर-
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प्रश्न 3.
द्रव में किसी गहराई hपर द्रव-दाब क्या होगा?
उत्तर-
P= hdg

प्रश्न 4.
यदि बल को चार गुना तथा तल के क्षेत्रफल को आधा कर दें तो दोब, प्रारम्भिक दाब का कितने गुना हो जायेगा?
उत्तर-
आठ गुना।

प्रश्न 5.
द्रव का दाब किस पर निर्भर करता है?
उत्तर-
द्रव स्तम्भ की ऊँचाई पर।

प्रश्न 6.
तरल दाब से क्या तात्पर्य है। इसके लिए सूत्र बताइए।
उत्तर-
किसी पात्र या बर्तन में उपस्थित तरल द्वारा पात्र या बर्तन की दीवारों के प्रति एकांक क्षेत्रफल पर आरोपित बल को तरल दाब कहते हैं। द्रव के स्वतन्त्र तल से h गहराई पर द्रव के दाब, P = hρg यहाँ, ρ = द्रव का घनत्व, g = गुरुत्वीय त्वरण

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प्रश्न 7.
कील एक सिरे से नुकीली क्यों बनाते हैं?
उत्तर-
जिससे कम बल लगाकर भी दाब अधिक लगे।

प्रश्न 8.
यदि बल को नियत रखा जाए तथा क्षेत्रफल आधा कर दिया जाए तो दाब पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर-
हम जानते हैं कि, दाब
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दाब, क्षेत्रफल के व्युत्क्रमानुपाती होता है। अत: क्षेत्रफल आधा कर देने पर दाब दोगुना हो जाएगा।

प्रश्न 9.
हमें वायुमण्डलीय दाब का अनुभव क्यों नहीं होता?
उत्तर-
रक्त दाब के कारण हमें वायुमण्डलीय दाब का अनुभव नहीं होगा।

प्रश्न 10.
वायुमण्डल में बहुत अधिक ऊपर जाने पर रक्तनलिकाओं के फटने का डर क्यों रहता है?
उत्तर-
वायुदाब कम होने के कारण तथा रक्तदाब से सन्तुलन बिगड़ने के कारण।”

प्रश्न 11.
स्पिन करती टेनिस की गेंद एक सरल रेखा पर नचलकर वक्राकार पथ पर क्यों चलती है?
उत्तर-
गेंद के ऊपर वायु-दाब अधिक तथा गेंद के नीचे कम होता है। इस दाबान्तर के कारण गेंद सरल रेखा में न चलकर, नीचे की ओर झुकते हुए वक्राकार पथ पर चलती है।

प्रश्न 12.
पास्कल नियम के दो अनुप्रयोग बताइए।
उत्तर-
द्रवचालित ब्रेक, द्रवचालित लिफ्ट।

प्रश्न 13.
आर्किमिडीज के सिद्धान्त के आधार पर द्रव के आपेक्षिक घनत्व का सूत्र लिखिए।
उत्तर-
द्रव का आपेक्षिक घनत्व
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प्रश्न 14.
किसी ठोस को किसी द्रव में डुबोने पर ठोस के भार में कितनी कमी होती है?
उत्तर-
उसके द्वारा हटाये गये द्रव के भार के बराबर

प्रश्न 15.
एक कॉर्क जल पर तैर रही है। इसका आभासी भार क्या है?
उत्तर-
शून्य, क्योंकि कॉर्क का भार कॉर्क पर जल के (UPBoardSolutions.com) प्रणोद (Upthrust) द्वारा सन्तुलित हो जाता है।

प्रश्न 16.
गेज दाब को समझाइए। उत्तर-द्रव के अन्दर किसी बिन्दु पर द्रव स्थैतिक दाब (p’) तथा वायुमण्डलीय दाब (PA) का अन्तर उस बिन्दु पर
गेज दाब कहलाता है।
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 10 Mechanical Properties Of Fluids 34

प्रश्न 17.
धारा रेखीय प्रवाह से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
यदि द्रव के प्रवाह में किसी एक बिन्दु से होकर गुजरने वाले द्रव के सभी कण एक ही वेग से, एक ही मार्ग से होकर गुजरें, तब यह प्रवाह धारा रेखीय प्रवाह कहलाता है।

प्रश्न 18.
आदर्श द्रव के धारा रेखीय प्रवाह के अविरतता के सिद्धान्त का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
इस सिद्धान्त के अनुसार, यदि कोई द्रव किसी असमान अनुप्रस्थ-परिच्छेद की नलिका में धारा रेखीय प्रवाह में बह रहा हो, तब प्रत्येक बिन्दु पर नली के अनुप्रस्थ-काट का क्षेत्रफल (A) तथा द्रव के वेग (ν) का गुणनफल नियत रहता है, अर्थात् A x ν = नियतांक

प्रश्न 19.
आदर्श द्रव के धारा रेखीय प्रवाह के लिए बरनौली का प्रमेय समीकरण प्रयुक्त चिह्नों का अर्थ । बताते हुए लिखिए।
उत्तर-
बरनौली का समीकरण p = [latex s=2]\frac { 1 }{ 2 }[/latex]ρν² + ρgh नियतांक
जहाँ p = दाब, ρ = द्रव का घनत्व, ν = द्रव प्रवाह का वेग, g = गुरुत्वीय त्वरण, h = पृथ्वी तल से स्थान की ऊँचाई ।
इसके अतिरिक्त p,[latex s=2]\frac { 1 }{ 2 }[/latex]ρν² (UPBoardSolutions.com) तथा ρgh क्रमशः दाब ऊर्जा, गतिज ऊर्जा तथा स्थितिज ऊर्जा को व्यक्त करते हैं।

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प्रश्न 20.
बरनौली प्रमेय में दाब शीर्ष, वेग शीर्ष तथा गुरुत्वीय शीर्ष के लिए सूत्र लिखिए।
उत्तर-
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प्रश्न 21.
एक टंकी की ऊँचाई hहै। टंकी की दीवार में नीचे से hऊँचाई पर एक सूक्ष्म छिद्र है। जब टंकी को पानी से पूरा भर लिया जाता है, तो छिद्र से पानी कितने वेग से निकलेगा तथा कितनी क्षैतिज दूरी पर गिरेगा?
हल-
चित्र 10.6 में A तथा B बिन्दुओं पर बरनौली प्रमेय लगाने पर,
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 10 Mechanical Properties Of Fluids 36

प्रश्न 22.
क्रिकेट तथा टेनिस के खेल में चक्रण (spin) करती हुई गेंद अपने मार्ग से घूम जाती है, इसकी व्याख्या किस सिद्धान्त या प्रमेय के आधार पर की जा सकती है?
उत्तर-
बरनौली प्रमेय के आधार पर।

प्रश्न 23.
ऊँचाई के साथ जाने पर वायु के घनत्व पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
वायु का घनत्व कम होता जाता है।

प्रश्न 24.
लकड़ी के एक पिण्ड का भार w तथा आयतन v है। जल पर तैराने पर पिण्ड का भार कितना होगा?
उत्तर-
शून्य।

प्रश्न 25.
जब गुब्बारा उड़ता हुआ किसी निश्चित ऊँचाई पर पहुँच कर रुक जाता है तो उस स्थान की वायु तथा गुब्बारे में भरी गैस के घनत्व में क्या सम्बन्ध होगा?
उत्तर-
दोनों के घनत्व बराबर होंगे।

प्रश्न 26. सन्तुलित भौतिक तुला के एक पलड़े के नीचे तेजी से हवा चलाने पर तुला के सन्तुलन पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उतर-
पलड़े के नीचे वायु-वेग बढ़ने से दाब कम हो (UPBoardSolutions.com) जायेगा। अत: पलड़ा कुछ नीचे झुक जायेगा।

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प्रश्न 27.
गहरा जल सदैव शान्त होता है, कारण बताइए।
उत्तर-
गहरे जल का द्रवस्थैतिक दाब अधिक होता है इसलिए वहाँ जल का वेग कम होगा अर्थात् जल शान्त होगा।

प्रश्न 28.
नदी के किनारे जल का वेग कम तथा बीच में अधिक होता है?
उत्तर-
नदी के किनारे जल का वेग कम तथा बीच में अधिक इसलिए होता है क्योंकि स्थिर पृष्ठ से दूर जाने पर जल की परतों का वेग बढ़ता है।

प्रश्न 29.
श्यानता गुणांक को परिभाषित कीजिए। इसकी विमा और मात्रक भी लिखिए।
उत्तर-
किसी द्रव का श्यानता गुणांक उस द्रव की एकांक सम्पर्क क्षेत्रफल वाली दो परतों के बीच कार्यरत् । श्यान बल के परिमाण के बराबर होता है, जबकि परतों के मध्य वेग-प्रवणता एकांक होती है। इसका SI मात्रक किग्रा/मी-से तथा विमा [ML-1T-1] होती है।

प्रश्न 30.
जल, वायु, रक्त तथा शहद में कौन सबसे अधिक श्यान होता है तथा कौन सबसे कम?
उत्तर-
शहद, वायु।

प्रश्न 31.
श्यान बल से सम्बन्धित स्टोक का सूत्र लिखिए।
उत्तर-
श्यान बल F = 6πηrν.

प्रश्न 32.
श्यान व्रव में गिरती हुई गोली की सीमान्त चाल के लिए सूत्र लिखिए।
उत्तर-
सीमान्त चाल [latex s=2](\nu )=\frac { 2 }{ 9 } \frac { { r }^{ 2 }(\rho -\sigma ) }{ \eta } g[/latex]
जहाँ, r = गोली की त्रिज्या, g = गुरुत्वीय त्वरण, (UPBoardSolutions.com) σ = श्यान द्रव का घनत्व, ρ = गोली के पदार्थ का घनत्व,η = द्रव का श्यानता गुणांक

प्रश्न 33.
किसी व्रव का क्रान्तिक वेग किन-किन बातों पर निर्भर करता है?
उत्तर-
द्रव की श्यानता पर, द्रव के घनत्व पर तथा नली की त्रिज्या पर
[latex s=2]\left( { \nu }_{ c }=\frac { k\eta }{ \rho a } \right) [/latex]

प्रश्न 34.
क्या वर्षा की गिरती बूंदों की चाल लगातार बढ़ती जाती है? क्या बड़ी व छोटी बूंदें पृथ्वी पर एक ही चाल से पहुँचती हैं?
उत्तर-
नहीं, वे एक सीमान्त चाल से नीचे गिरती हैं। नहीं, बड़ी बूंद की सीमान्त चाल अधिक होती है।

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प्रश्न 35.
किसी श्यान द्रव में गिरती हुई गोली का त्वरण शून्य कब होता है?
उत्तर-
जब गोली पर लगने वाला नेट बल शून्य हो।

प्रश्न 36.
आकाश में बादल तैरते क्यों दिखाई देते हैं? ।
उत्तर-
जब जल की वाष्प धूल के कणों पर संघनित्र होती है, तो शुरू में बूंदें बहुत छोटी होती हैं तथा वायु की श्यानता के कारण यह सीमान्त चाल प्राप्त कर लेती हैं तथा नीचे की ओर बहुत धीमी चाल से चलती हैं, क्योंकि यह चाल बूंदों की त्रिज्या जो कि बहुत छोटी है, के वर्ग के अनुक्रमानुपाती होती है; इन्हें ही बादल कहते हैं तथा ये आकाश में तैरते प्रतीत होते हैं।

प्रश्न 37.
किसी द्रव के पृष्ठ-तनाव की परिभाषा दीजिए।
उत्तर-
किसी द्रव का पृष्ठ-तनाव वह बल है जो कि द्रव के पृष्ठ पर खींची गई किसी काल्पनिक रेखा की एकांक लम्बाई पर पृष्ठ के तेल में तथा रेखा के लम्बवत् कार्य करता है। इसका S.I. मात्रक न्यूटन/मीटर है।

प्रश्न 38.
किसी द्रव में बने हुए वायु के बुलबुले के भीतर दाब-आधिक्य का सूत्र लिखिए।
उत्तर-
p = [latex s=2]\frac { 2T }{ R }[/latex]

प्रश्न 39.
पृष्ठ-तनाव की परिभाषा पृष्ठीय ऊर्जा के पदों में दीजिए।
उत्तर-
T पृष्ठ-तनाव वाले द्रव के पृष्ठीय क्षेत्रफल में ΔA की वृद्धि करने में किया गया कार्य अर्थात् | पृष्ठीय ऊर्जा w = T x ΔA अथवा  [latex s=2]T=\frac { W }{ \Delta A } [/latex] यदि ΔA = 1, तो W = T, अत: किसी द्रव का पृष्ठ-तनाव उस कार्य के बराबर होता है जो (UPBoardSolutions.com) नियत ताप पर उस द्रव के पृष्ठ के क्षेत्रफल में एकांक वृद्धि कर दे। अत: पृष्ठ-तनाव का मात्रक जूल/मी² भी लिखा जा सकता है।

प्रश्न 40.
गर्म सूप ठण्डे सूप की अपेक्षा अधिक स्वादिष्ट लगता है। क्यों?
उत्तर-
ठण्डे सूप की अपेक्षा गर्म सूप का पृष्ठ-तनाव कम होता है। अतः गर्म सूप ठण्डे सूप की अपेक्षा जीभ का अधिक क्षेत्रफल घेरता है जिससे कि वह ठण्डे सूप की तुलना में अधिक स्वादिष्ट लगता है।।

प्रश्न 41.
पृष्ठ ऊर्जा में क्या परिवर्तन होगा, यदि जल की एक बड़ी बूंद को अनेक छोटी-छोटी बूंदों में विभक्त किया जाये?
उत्तर-
पृष्ठ ऊर्जा बढ़ जाएगी।

प्रश्न 42.
किसी केशिका नली में जल के उन्नयन का सूत्र लिखिए।
उत्तर-
h =2T cos θ/rρg.

प्रश्न 43.
दो साबुन के बुलबुलों की त्रिज्याओं का अनुपात 1:4है। उनके आधिक्य दाबों का अनुपात क्या होगा?
उत्तर-
p ∝ 1/R ⇒ p: p2 = R2: R1 = 4 : 1

प्रश्न 44.
द्रव की छोटी बूंदें लगभग गोल आकार क्यों धारण कर लेती हैं? समझाइए।
उत्तर-
पृष्ठ-क्नाव के कारण द्रव का स्वतन्त्र तल सिकुड़कर न्यूनतम क्षेत्रफल ग्रहण करने की प्रवृत्ति रखता है। चूंकि किसी दिये हुए आयतन के लिए गोले के पृष्ठ का क्षेत्रफल (surface area) न्यूनतम (minimum) होता है। इसलिए द्रव की छोटी बूंदें लगभग गोल आकार धारण कर लेती हैं।

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प्रश्न 44.
साबुन के घोल का पृष्ठ-तनाव 30 x 10-2 न्यूटन/मी है। इसका क्या अर्थ है?
उत्तर-
इसका अर्थ है कि साबुन के घोल के पृष्ठ पर खींची गयी काल्पनिक रेखा की एक मीटर लम्बाई पर इसके लम्बवत् 3.0 x 10-2 न्यूटन स्पर्शरेखीय बल कार्य करेगा।

प्रश्न 46.
स्पर्श कोण क्या है?
उत्तर-
“द्रव व ठोस के स्पर्श बिन्दु से द्रव के पृष्ठ पर खींची गयी स्पर्श रेखा तथा ठोस के (UPBoardSolutions.com) पृष्ठ पर द्रव के अन्दर की ओर खींची गयी स्पर्श रेखा के बीच बने कोण को उस ठोस व द्रव के लिए स्पर्श कोण कहते हैं।” चित्र 10.7 में स्पर्श कोण को θ से प्रदर्शित किया गया है।
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प्रश्न 47.
खेत की जुताई करने से उसकी नमी रुकती है। भौतिक सिद्धान्त की सहायता से व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
फसल में पानी देने के बाद गुड़ाई कर दी जाती है और वर्षा के बाद किसान खेत की जुताई कर देता है। पानी देने के बाद मिट्टी में केशिकाएँ बन जाती हैं जिनमें पानी का वाष्पीकरण होता रहता है परन्तु गुड़ाई या जुताई करने के बाद ये केशिका नलियाँ टूट जाती हैं जिससे पानी का वाष्पीकरण नहीं हो पाता है। अतः मिट्टी में नमी बनी रहती है।

प्रश्न 48.
लोहे का घनत्व जल की अपेक्षा अधिक होता है, फिर भी लोहे की । पतली सूई जल पर तैर सकती है। क्यों?
उत्तर-
एक स्वच्छ पतली सूई को स्याही सोखते पर रखकर धीरे से पानी की सतह पर रखते हैं। सोखता कुछ देर तक पानी को सोखकर गीला होता रहता है। और अन्त में डूब जाता है, परन्तु सुई पानी पर तैरती रहती है। इसका कारण जल का पृष्ठ-तनाव ही है। चित्र 10.8 में जल के (UPBoardSolutions.com) पृष्ठ पर तैरती हुई सूई का ॐ अनुप्रस्थ-काट दिखाया गया है। जल के पृष्ठ पर तैरती हुई सूई पर दो बल लगते (i) पृष्ठ-तनाव बल T, (ii) सूई का भार W। पृष्ठ-तनाव का परिणामी बल । ऊर्ध्वाधर दिशा में ऊपर की ओर लगता है जो सूई के भार W को सन्तुलित करता है। फलस्वरूप सूई तैरती है।
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 10 Mechanical Properties Of Fluids 38

प्रश्न 49.
समुद्र की लहरों को शान्त करने के लिए लहरों पर तेल डाल देते हैं; क्यों?
उत्तर-
तेल डाल देने पर, तेज हवा तेल को जल के पृष्ठ पर हवा की दिशा में दूर तक फैला देती है। बिना तेल वाले जल का पृष्ठ तनाव तेल वाले जल से अधिक होता है। अत: बिना तेल वाला जल तेल वाले जल । को वायु की विपरीत दिशा में खींचता है जिससे की लहरें शान्त हो जाती हैं।

प्रश्न 50.
पृष्ठ-तनाव पर किन बातों का प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
पृष्ठ-तनाव पर निम्नलिखित बातों को प्रभाव पड़ता है
1. ताप का प्रभाव Effect of temperature ताप बढ़ने से संसंजक बल का मान घट जाता है। | जिसके फलस्वरूप पृष्ठ-तनाव घट जाता है। क्रान्तिक ताप पर पृष्ठ-तनाव शून्य होता है।
2. संदूषण का प्रभाव Effect of contamination यदि द्रव के तल पर धूल, कोई चिकनाई; जैसे- ग्रीस या तेल हो, तो इससे द्रव का पृष्ठ-तनाव घट जाता है।
3. विलेय का प्रभाव Effect of solute प्रयोगों से ज्ञात होता है कि जल का पृष्ठ तनाव उसमें घोले गये पदार्थ व उसकी घुलनशीलता पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, जल में नमक घोलने पर जल का पृष्ठ-तनाव बढ़ जाता है। इसके विपरीत जल में साबुन घोलने पर जल को पृष्ठ-तनाव घट जाता

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. द्रव दाब के नियम लिखिए।
उत्तर-
द्रव दाब के नियम-ये नियम निम्नलिखित हैं
1. किसी द्रव के भीतर एक ही क्षैतिज तल में स्थित सभी बिन्दुओं पर दाब समान होता है।
2. द्रव से भरे बीकर में डूबे पिण्ड अथवा उसकी दीवारों पर द्रव द्वारा आरोपित दाब पिण्ड के पृष्ठ के प्रत्येक बिन्दु के लम्बवत् कार्य करता है।
3. स्थिर द्रव के भीतर किसी बिन्दु पर दाब द्रव के मुक्त पृष्ठ से उस बिन्दु की गहराई के अनुक्रमानुपाती है।
4. किसी द्रव का दाब उसके घनत्व के अनुक्रमानुपीती होता है।
5. द्रव दाब बीकर के क्षेत्रफल पर निर्भर नहीं करता। अतः दाब परिकलन के लिए द्रव के स्तम्भ की । ऊँचाई व घनत्व महत्त्वपूर्ण हैं। पात्र की आकृति व आधार का अनुप्रस्थ-काट द्रव दाब की गणना में महत्त्व नहीं रखता है।

प्रश्न 2.
एक द्रव स्तम्भ द्वारा उत्पन्न दाब का व्यंजक प्राप्त कीजिए। या तरल स्तम्भ के कारण दाबे का व्यंजक प्राप्त कीजिए।
उत्तर-
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 10 Mechanical Properties Of Fluids 39
तरल स्तम्भ के कारण दाब Pressure due to fluid column- द्रव के भीतर स्थित किसी बिन्दु पर दाब माना कि किसी द्रव में उसके स्वतंत्र तल से h गहराई पर कोई बिन्दु B स्थित है, जहाँ पर हमें द्रव के दाब का मान ज्ञात करना है। बिन्दु B को केन्द्र मानकर कोई वृत्त खींचो। माना कि इस वृत्त का क्षेत्रफल A है। इस क्षेत्रफल पर द्रव द्वारा आरोपित बल, इस पर खड़े h ऊँचाई के बेलनाकार द्रव स्तम्भ के भार के बराबर होगा।
अब द्रव स्तम्भ का आयतन V= क्षेत्रफल x ऊँचाई = A x h
यदि द्रव का घनत्व ρ हो, तो द्रव स्तम्भ का द्रव्यमान |
m = V x ρ = A x H x ρ
तथा द्रव का स्तम्भ का भार W = mg = Ahρg
जहाँ g गुरुत्वीय त्वरण है।
यह लम्बवत् भार (बल) w बिन्दु B के चारों ओर A क्षेत्रफल पर आरोपित रहता है। अतः बिन्दु B पर द्रव का दाब
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अत: द्रव के अन्दर किसी बिन्दु पर द्रव के कारण दाब द्रव की सतह से उस बिन्दु तक की गहराई, द्रव के घनत्व तथा गुरुत्वीय त्वरण के गुणनफल के बराबर होता है।
अतः उपर्युक्त सूत्र किसी तरल (द्रव अथवा गैस) के h ऊँचाई के स्तम्भ के कारण दाब का सूत्र है। इस सूत्र में एक ही द्रव के लिए ρ नियत तथा स्थान विशेष के लिए g नियत होता है अत: P ∝ h. अतः दिए गये द्रव के अन्दर किसी बिन्दु पर दांब, द्रव के स्वतन्त्र तल से उस बिन्दु की गहराई के अनुक्रमानुपाती होता है। यह उस बर्तन के आकार अथवा आकृति पर निर्भर नहीं करता जिसमें द्रव रखा जाता है।

प्रश्न 3.
आर्किमीडिज का सिद्धान्त लिखिए।
उत्तर-
आर्किमीडिज का सिद्धान्त–इसके अनुसार, “जब कोई वस्तु किसी द्रव में (UPBoardSolutions.com) पूरी अथवा आंशिक रूप से डुबोई जाती है तो उसके भार में कमी प्रतीत होती है। भार में यह आभासी कमी उस वस्तु द्वारा हटाये गये द्रव के भार के बराबर होती है।”
माना किसी वस्तु का वायु में भार W1, तथा द्रव में डुबोने पर वस्तु का भार W2 है;
अत: द्रव में डूबने से वस्तु के भार में आभासी कमी = W1 – W2,
यदि वस्तु के द्रव में डूबे भाग का आयतन V हो तो इसके द्वारा हटाये गये द्रव का आयतन भी v ही होगा। यदि द्रव का घनत्व d हो तो ।
वस्तु. द्वारा हटाये गये द्रव का द्रव्यमान = V x d
हटाये गये द्रव का भार = V x d x g
अत: आर्किमिडीज के सिद्धान्त से, वस्तु के भार में कमी
(W1-W2) = V x d x g

प्रश्न 4.
उत्प्लावन (उत्क्षेप) से क्या तात्पर्य है? उत्प्लावन का सूत्र प्राप्त कीजिए।
उत्तर-
उत्प्लावन बल अथवा उत्क्षेप तथा उत्प्लावन केन्द्र प्रत्येक द्रव अपने अन्दर पूर्ण अथवा आंशिक रूप से डूबी वस्तु पर ऊपर की ओर एक बल लगाता है। इस बल को उत्प्लावन बल अथवा. उत्क्षेप कहते हैं। किसी वस्तु पर द्रव का उत्क्षेप वस्तु द्वारा हटाए गए भार के बराबर होता है। यह बल वस्तु द्वारा हटाए गए द्रव के गुरुत्व केन्द्र पर कार्य करता है, इसे उत्प्लावन केन्द्र कहते हैं। उत्प्लावन बल के कारण ही द्रव में डूबी वस्तुएँ अपने वास्तविक भार से हल्की लगती हैं। यदि ρ घनत्व वाले किसी द्रव में किसी वस्तु का V आयतन डूबा है तो वस्तु पर द्रव का उत्क्षेप = हटाए गए द्रव का भार
= वस्तु का डूबा हुआ आयतन x द्रव का घनत्व x g = Vρg

प्रश्न 5.
प्लवन या तैरने का नियम लिखिए।
उत्तर-
तैरनेका नियम-जब कोई वस्तु किसी द्रव में आंशिक या पूर्ण रूप से डूबी या तैरती है तो वस्तु का कुल भार डूबे हुए भाग द्वारा हटाये गये द्रव के भार के बराबर होता है।

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प्रश्न 6.
भारी वाहनों के पहियों के टायर काफी चौड़े क्यों बनाये जाते हैं?
उत्तर-
भारी वाहनों के पहियों के टायर चौड़े होने से (क्षेत्रफल A अधिक है) सड़क अथवा जमीन पर लगने वाला दाब (P = F / A) कम हो जाता है, क्योंकि वाहन का भार अधिक क्षेत्रफल पर लगता है, इसीलिए वाहन के पहिये सड़क में धंसने से बच जाते हैं।

प्रश्न 7
ऊँट रेगिस्तान में आसानी से क्यों चल लेता है?
उत्तर-
सूत्र दाब =बल/क्षेत्रफल से, ऊँट के पैर चौड़े होने के कारण इनका क्षेत्रफल अधिक होता है, अतः पृथ्वी पर दाब कम लगता है। इस कारण पैरों के नीचे की पृथ्वी धंसती नहीं है, अतः ऊँट रेगिस्तान में आसानी से चल लेता है।

प्रश्न 8.
रेलगाड़ी की पटरियों के नीचे लकड़ी या लोहे के चौड़े स्लीपर क्यों लगाये जाते हैं?
उत्तर-
यदि पटरियों के नीचे चौड़े स्लीपर न लगाये जायें तो पटरियाँ अधिक दबाव के कारण जमीन में धंस सकती हैं। पटरियों के नीचे स्लीपर लगाने से क्षेत्रफल अधिक हो जाता है जिसके कारण दाब कम पड़ता है और पटरी जमीन में नहीं धंसती।

प्रश्न 9.
लोहे से बना जहाज समुद्र में तैरता है, परन्तु लोहे का ठोस टुकड़ा (कील) डूब जाता है, क्यों? सम्बन्धित नियम देते हुए कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
लोहे की कील की बनावट इस प्रकार की होती है कि उसका भार, उसके द्वारा हटाये गये जल के भार से बहुत अधिक होता है। इसी कारण वह जल में डूब जाती है। इसके विपरीत, लोहे का जहाज तैरता रहता है। इसका कारण यह है कि जहाज का ढाँचा अवतल होता है तथा अन्दर से खोखला बनाया जाता है। जैसे ही जहाज समुद्र में प्रवेश करता है तो उसके द्वारा (उसकी बनावट के कारण) इतना जल हटा दिया जाता है कि उसके द्वारा हटाये गये जल का भार, जहाज (जहाज व उसके समस्त समान सहित) के कुल भार के बराबर हो जाता है। इसी कारण पास्कल के सिद्धान्त के अनुसार, जहाज तैरता रहता है।

प्रश्न 10.
हिमखण्ड जल पर क्यों तैरता है?
उत्तर-
हिमखण्ड का घनत्व, जल के घनत्व से कम होता है, जिससे हिमखण्ड के आयतन के बराबर जल का उत्क्षेप-बल हिमखण्ड के भार से अधिक हो जाता है और हिमखण्ड जल पर तैरता रहता है। तैरते समय हिमखण्ड का केवल उतना आयतन ही जल में डूबता है, जितने आयतन के द्वारा हटाये गये जल का भार हिमखण्ड के भार के बराबर होता है।

प्रश्न 11.
0.02 मी2 तथा 0.04 मी2 परिच्छेद क्षेत्रफल के दो क्षैतिज पाइप एक-दूसरे से जुड़े हैं, जिसमें जल बह रहा है। पहले पाइप में जल की चाल 16 मी/से तथा दाब 2.0 x 104 न्यूटन/मी2 है। दूसरें पाइप में जल की चाल तथा दाब की गणना कीजिए।
हल-
दिया है, पहले पाइप के परिच्छेद का क्षेत्रफल (A1) = 0.02 मी2
दूसरे पाइप के परिच्छेद का क्षेत्रफल (A1) = 0.04 मी2
पहले पाइप में जल की चाल = (ν1) = 16 मी/से
पहले पाइप में जल का (UPBoardSolutions.com) दाब (ρ1) = 2 x 104 न्यूटन/मी2
अविरतता के सिद्धान्त से, A1ν1 = A2ν2
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प्रश्न 12.
असमान परिच्छेद की एक बेलनाकार पाइप में जल प्रवाहित हो रहा है। एक स्थान पर नली की त्रिज्या 0.3 मी है तथा जल का वेग 1.0 मी/से है। दूसरे स्थान पर जहाँ नली की त्रिज्या 0.15 मी है, वहाँ पर जल के वेग की गणना कीजिए।
हल-
यहाँ, नली के पहले स्थान की त्रिज्या (r1) = 0.3 मी,
नली के दूसरे स्थान की त्रिज्या (r2) = 0.15 मी
नली के पहले स्थान पर जल का वेग (ν1) = 1.0 मी/से
नली के दूसरे स्थान पर जल का वेग (ν2)) = ?
अविरतता के सिद्धान्त से,
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अतः जल का वेग = 4 मी/से है।

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प्रश्न 13.
हवाई जहाज में पंखों के सामने के किनारे गोलाई में तथा पीछे के किनारे चपटे क्यों होते हैं?
उत्तर-
हवाई जहाज के पंख की आकृति इस प्रकार रखी जाती है कि उसकी ऊपरी सतह की वक्रता निचली सतह की वक्रता से अधिक होती है। तथा, सामने का किनारा गोल तथा पीछे का किनारा चपटा रखा जाता है (चित्र 10.10)। जब हवाई जहाज दौड़ लगाता है तब पंख के ऊपुर तथा नीचे से होकर वायु की धारा बहती है। (चित्र’10.10) से स्पष्ट है कि पंख के ऊपर का पृष्ठ कुछउभरा तथा ।
नीचे का पृष्ठ सीधा है। अत: वायु को पंख के ऊपर, नीचे की अपेक्षा अधिक दूरी तय करनी पड़ती है, फलतः वायु की धारा का वेग ऊपरी पृष्ठ पर अधिक तथा निचले पृष्ठ पर कम होता है। इस कारण ऊपरी पृष्ठ पर कम दाब तथा निचले पृष्ठ पर अधिक दाब कार्य करता है तथा वायुयान के पंख पर इन दोनों दाबों के अन्तर (P2 – P1) के बराबर एक प्रणोद (thrust) L कार्य करता है तथा पंख ऊपर को उठने लगता है।
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प्रश्न 14.
श्यानता-गुणांक की परिभाषा दीजिए। इसका विमीय सूत्र तथा M.K.S. मात्रक लिखिए। या श्यानता-गुणांक की परिभाषा दीजिए।
उत्तर-
श्यानता-गुणांक-धारा-रेखीय प्रवाह के लिए द्रव की किन्हीं दो पर्तों के मध्य लगने वाला (UPBoardSolutions.com) श्यान-बल निम्नलिखित बातों पर निर्भर करता है–
1. यह पर्तों के सम्पर्क क्षेत्रफल (A) के अनुक्रमानुपाती होता है, अर्थात् ।
F∝A
2. यह पर्यों के बीच की वेग-प्रवणत Δνx/Δy के अनुक्रमानुपाती होता है, अर्थात्
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जहाँ η (ईटा) एक नियतांक है, जिसे द्रव का श्यानता-गुणांक (coefficient of viscosity) कहते हैं। यदि A = 1 तथा 20/Δνx/Δy = 1 हो, तो η = ± F, अर्थात् किसी द्रव का श्यानता-गुणांक उस श्यान बल के बराबर है जो एकांक क्षेत्रफल वाली पर्तों के बीच कार्य करता है, जबकि पर्तों के बीच एकांक वेग-प्रवणता हो।
उपर्युक्त सूत्र में ± चिह्न का अर्थ है कि बल F दो पर्यों के बीच अन्योन्य बल है। द्रव की किसी पर्त पर उससे ऊपर वाली पर्त आगे की ओर बल लगाती है, जबकि उससे नीचे वाली पर्त उस पर पीछे की ओर बल लगाती है।
श्यानता-गुणांक की विमा एवं मात्रक
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 10 Mechanical Properties Of Fluids 45
η का मात्रक (M.K.S. में) किग्रा/मीटर-सेकण्ड है। इसका एक अन्य मात्रक प्वॉइज है।
1 किग्रा/(मीटर-सेकण्ड) = 10 प्वॉइज

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प्रश्न 15.
200 वर्ग सेमी क्षेत्रफल की एक समतल प्लेट तथा एक और बड़ी प्लेट के बीच ग्लिसरीन की 1 मिमी मोटी तह है। यदि ग्लिसरीन का श्यानता-गुणांक 1.0 किग्रा/मीटर-सेकण्ड हो, तो प्लेट को 9 सेमी/सेकण्ड के वेग से चलाने के लिए कितना बल चाहिए?
हल-
प्रश्नानुसार, η = 1.0 किग्रा/(मीटर-सेकण्ड),
A = 200 वर्ग सेमी = 2 x 10-2 वर्ग मीटर,
Δνx = 9 x 10-2 मीटर/सेकण्ड
तथा Δy = 1 मिमी = 10-3 मीटर
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 10 Mechanical Properties Of Fluids 46

प्रश्न 16.
स्टोक्स के सूत्र का प्रयोग कर किसी श्यान द्रव में गिरते हुए एक गोलीय पिण्ड के सीमान्त वेग के लिए सूत्र प्राप्त कीजिए।
उत्तर-
स्टोक्स का नियम–स्टोक्स ने सिद्ध किया कि यदि r त्रिज्या की गोली किसी पूर्णत: समांग वे अनन्त विस्तार वाले तरल माध्यम में वेग ν से गति करे तो गोली पर कार्य करने वाला श्यान बल । F = 6πηrν होता है जो सदैव गोलीं की गति की विपरीत दिशा में लगता है, (UPBoardSolutions.com) जहाँ η उस द्रव का श्यानता-गुणांक है।।
सीमान्त वेग की गणना-माना कोई गोली जिसकी त्रिज्या r तथा घनत्व ρ है, σ घनत्व वाले द्रव में गिर रही है, जबकि द्रव का श्यानता-गुणांक η है। जब गोली सीमान्त वेग प्राप्त कर लेती है तो इस पर निम्नलिखित दो बल कार्य करते हैं—
1. नीचे की ओर कार्य करने वाला प्रभावी बल = [latex s=2]V(\rho -\sigma )g=\frac { 4 }{ 3 } \pi { r }^{ 3 }(\rho -\sigma )g[/latex]
2. ऊपर की ओर कार्य करने वाला श्यान बल = 6πηrν
चूँकि गोली नियत वेग से चल रही है अर्थात् त्वरण शून्य है। अतः इस पर लगने वाला नेट बल। शून्य होना चाहिए; अर्थात् उपर्युक्त दोनों बल बराबर होने चाहिए।
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अतः गोली की सीमान्त चाल गोली की त्रिज्या के वर्ग के अनुक्रमानुपाती होती है।

प्रश्न 17.
किसी द्रव की पृष्ठ-ऊर्जा की व्याख्या कीजिए। द्रव के मुक्त पृष्ठ के क्षेत्रफल प्रसार में किए गए कार्य का व्यंजक प्राप्त कीजिए।
उत्तर-
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द्रव की पृष्ठ-ऊर्जा जब द्रव के पृष्ठ का क्षेत्रफल बढ़ाया जाता है तो द्रव के कुछ अणु उसके अन्दर से मुक्त पृष्ठ पर आते हैं। इन अणुओं को मुक्त पृष्ठ के ठीक नीचे वाले अणुओं के आकर्षण-बल के विरुद्ध कुछ कार्य करना पड़ता है। यह कार्य, निर्मित हुए नवीन पृष्ठ में स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित हो जाता है। इस अतिरिक्त पृष्ठ-क्षेत्रफल के बढ़ने पर शीतलन (cooling) भी होता है। अत: बाहर से कुछ ऊष्मा पृष्ठ में आकर इसे पुन: प्रारम्भिक ताप पर ले आती है। इस प्रकार पृष्ठ को कुछ ऊर्जा बाहर से भी प्राप्त हो जाती है। इससे स्पष्ट है कि द्रव-पृष्ठ में स्थित अणु अपनी स्थिति के कारण कुछ अतिरिक्त (additional) ऊर्जा (UPBoardSolutions.com) रखते हैं। अत: द्रव के मुक्त पृष्ठ के प्रति एकांक क्षेत्रफल की इस अतिरिक्त ऊर्जा को ‘द्रव की पृष्ठ-ऊर्जा’ (surface energy of liquid) कहते हैं। द्रव के पृष्ठ का क्षेत्रफल बढ़ाने में किये गये कार्य व पृष्ठ-तनाव में सम्बन्ध माना एक मुड़े हुए तार ABC तथा उस पर बिना घर्षण खिसकने वाले सीधे तार PQ के बीच किसी द्रव की फिल्म । बनी है (चित्र 10.11)। हम जानते हैं कि पृष्ठ तनाव के कारण फिल्म का मुक्त पृष्ठ सिकुड़ने की चेष्टा करता है, अत: तार PQ ऊपर की ओर (फिल्म की ओर) चलेगा। तार PQ को साम्यावस्था में रखने के लिए इस पर एकसमान बल F नीचे की ओर लगाना होगा।
प्रयोगों से ज्ञात होता है कि बल F को मानतार PQ के सम्पर्क में A फिल्म की लम्बाई l के अनुक्रमानुपाती होता है। चूंकिं फिल्म में । दो मुक्त पृष्ठ होते हैं (एक बाहर वाला तथा दूसरा अन्दर वाला),
अतः F ∝ 2l
अथवा F = T x 2l = 2Tl
जहाँ T एक नियतांक है जो कि द्रव का पृष्ठ-तनाव कहलाता है।
माना तार PQ को ∆x दूरी से नीचे खिसकाया जाता है जिससे यह नवीन स्थिति P’ Q’ में आ जाता है। इस क्रिया में द्रव की फिल्म के क्षेत्रफल में वृद्धि होती है। फिल्म के क्षेत्रफल में वृद्धि के लिए किया गया यान्त्रिक कार्य W = बल x दूरी
= F x ∆x = (2Tl) ∆x =T x (2l∆x)
परन्तु 2l ∆x = फिल्म के दोनों पृष्ठों के क्षेत्रफल में होने वाली कुल वृद्धि = ∆A
अत: W = T x ∆A अथवा [latex s=2]T=\frac { W }{ \Delta A } [/latex]
यदि ∆A = 1; तब T = w, अतः द्रव के पृष्ठ के एकांक क्षेत्रफल को बढ़ाने में किया गया कार्य पृष्ठ-तनाव T के बराबर है। इस आधार पर हम पृष्ठ-तनाव की परिभाषा निम्न प्रकार कर सकते हैं
“नियत ताप पर द्रव के मुक्त पृष्ठ के क्षेत्रफल में एकांक वृद्धि करने के लिए किया गया कार्य द्रव को पृष्ठ-तनाव कहलाता है।”
इस परिभाषा के आधार पर पृष्ठ-तनाव के मात्रक को जूल/मी² से भी व्यक्त कर सकते हैं।
ताप बढ़ाने पर पृष्ठ-तनाव का मान घटता है।

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प्रश्न 18.
पारे की एक बूंद की कमरे के ताप पर त्रिज्या 3 मिमी है। उसी ताप पर पारे का पृष्ठ तनाव 0.465 न्यूटन/मी है। बूंद के भीतर आधिक्य दाब तथा कुल दाब ज्ञात कीजिए। वायुमण्डलीय दाब 1.01 x 105 न्यूटन/मी2 है।
हल-
माना कि पारे का पृष्ठ-तनाव = T, बूंद की त्रिज्या = R
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 10 Mechanical Properties Of Fluids 49

प्रश्न 19.
पानी की 1000 छोटी बूंदों को, जिनमें प्रत्येक की त्रिज्या 0.01 मिमी है, मिलाकर एक बड़ी बूंद बनाने में मुक्त ऊर्जा की गणना कीजिए। पानी का पृष्ठ-तनाव =7 x 10-2 न्यूटन/मी।
हल-
माना बड़ी बूंद की त्रिज्या R = 0.01 मिमी तथा छोटी बूंद की त्रिज्या r है,
अतः एक बड़ी बूंद का आयतन = 1000 (UPBoardSolutions.com) छोटी बूंदों का आयतन
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प्रश्न 20.
एक केशनली में जल 5.0 सेमी ऊपर चढ़ता है। यदि एक अन्य केशनली की त्रिज्या इसकी आधी हो तो उसमें जल की ऊँचाई क्या होगी?
हल-
चूँकि किसी केशनली में चढ़े द्रव-स्तम्भ की ऊँचाई उसकी नली की त्रिज्या के व्युत्क्रमानुपाती होती है अर्थात् h∝1/r अर्थात् hr = नियतांक
∴ यदि r1 वा r2 त्रिज्या वाली केशनलियों में द्रव-स्तम्भ की ऊँचाइयाँ क्रमश: h1 व h2 हों, तो
h1r1 = h2r2
अथवा
h2 = h1(r1/r2) …(1)
परन्तु यहाँ दूसरी केशनली की त्रिज्या = [latex s=2]\frac { 1 }{ 2 }[/latex](पहली केशनली की त्रिज्या)
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प्रश्न 21.
एक केशनलिका जिसकी त्रिज्या 0.4 मिमी है, जल में ऊध्र्वाधर डुबाई जाती है। ज्ञात कीजिए कि केशनलिका में जल कितनी ऊँचाई तक चढेगा? यदि इस केश नलिका को ऊध्र्वाधर रेखा से 60° झुका दें तो नली की कितनी लम्बाई तक जल चढेगा? जल का पृष्ठ-तनाव 7.0 x 10-2 न्यूटन/मी है।
हल-
दिया है, r = 0.4 मिमी = 0.4 x 10-3 मी,
T = 7.0 x 10-2 न्यूटन/मी,
θ = 0° अर्थात् cos θ = cos 0° = 1 एवं g = 9.8 मी/से2,
जल का घनत्व ρ = 103 किग्रा/मी3
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प्रश्न 22.
साबुन के घोल से 2.0 सेमी त्रिज्या का बुलबुला फेंककर बनाने में कितना कार्य करना पड़ेगा? साबुन के घोल का पृष्ठ तनाव 0.03 न्यूटन/मी है।
हल-
साबुन के घोल का पृष्ठ तनाव T = 0.03 न्यूटन/मी
बुलबुले की त्रिज्या R =2 सेमी या 2 x 10-2 मीटर
साबुन के घोल के बुलबुले में 2 मुक्त पृष्ठ होते हैं।
अत: घोल से R मीटर त्रिज्या का बुलबुला फेंककर बनाने में इसके पृष्ठीय क्षेत्रफल में कुल वृद्धि
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प्रश्न 23.
किसी द्रव के एक बूंद की त्रिज्या 5 x 10-3 मीटर है। द्रव बूंद के भीतर आधिक्य दाब की गणना कीजिए। द्रव का पृष्ठ तनाव 0.5 न्यूटन/मीटर है।
हल-
बूंद की त्रिज्या = R = 5 x 10-3 मीटर,
द्रव का पृष्ठ तनाव T = 0.5 न्यूटन/मीटर
द्रव की बूंद के भीतर आधिक्य दाब,
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 10 Mechanical Properties Of Fluids 54

प्रश्न 24.
एक केशनली में पानी 2.0 सेमी ऊपर चढ़ता है। यदि एक अन्य केशनली की त्रिज्या उसकी एक-तिहाई हो, तो उसमें पानी कितना चढेगा?
हल-
किसी केशनली में चढ़े स्तम्भ की ऊँचाई उसकी नली की त्रिज्या (UPBoardSolutions.com) के व्युत्क्रमानुपाती होती है अर्थात् । h ∝ [latex s=2]\frac { 1 }{ r }[/latex] अर्थात् hr = नियतांक।
माना r1 वे r2 त्रिज्या वाली केशनलियों में द्रव-स्तम्भ की ऊँचाइयाँ क्रमश: h1 व h2 हों, तो
h1 r1 = h2 r2
या, h2 = h1 (r1/r2) …(1)
परन्तु दूसरी केशनली की त्रिज्या = [latex s=2]\frac { 1 }{ 3 }[/latex](पहली केशनली की त्रिज्या)
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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
तरल दाब के पास्कल का नियम लिखिए। हाइड्रोलिक लिफ्ट के सिद्धान्त और कार्यविधि की व्याख्या कीजिए। या पास्कल का नियम लिखिए।
उत्तर-
पास्कल का नियम-द्रव में दाब के संचरण के सम्बन्ध में वैज्ञानिक पास्कल ने सन् 1653 में एक नियम प्रतिपादित किया था जो पास्कल का नियम कहलाता है। इसे द्रव के दाब संचरण का नियम भी कहा जाता है।
इस नियम के अनुसार, “किसी बर्तन में रखे द्रव की संतुलन अवस्था में द्रव के किसी भाग पर आरोपित दाब (बिना क्षय हुए) द्रव द्वारा सभी दिशाओं में समान रूप से ( परिमाण में) संचरित कर दिया जाता है।”
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 10 Mechanical Properties Of Fluids 56
द्रव चालित लिफ्ट (Hydraulic lift)-यह भारी वस्तुओं; जैसे-कार, मोटरगाड़ी, ट्रक आदि को ऊपर उठाने के प्रयोग में लायी जाती है। इसका कार्य सिद्धान्त पास्कल के नियम पर आधारित है।

सिद्धान्त (Principle)– पास्कल के नियम के अनुसार, द्रव के किसी स्थान पर आरोपित दाब अन्य सभी स्थानों पर समान परिमाण में संचरित होता है। अतः कम परिमाण के दाब को अपेक्षाकृत बहुत बड़े क्षेत्रफल पर संचरित करके उस क्षेत्रफल पर (UPBoardSolutions.com) कार्यरत अधिक बल प्राप्त किया जा सकता है। यह तथ्य निम्न प्रकार समझा जा सकता हैं —
उपर्युक्त चित्र 10.13 में A तथा B दो बेलनाकार बर्तन हैं जिनकी अनुप्रस्थ-काट क्रमश: A1 तथा A2 है एवं A2 > A1। इनको परस्पर क्षैतिज नली C द्वारा जोड़ दिया गया है। माना बर्तन A में लगे पिस्टन P1 पर भार W1 रखने पर इस पर लगाया गया बल F1 है।
अत: इसके द्वारा A में भरे द्रव पर आरोपित दाब P = [latex s=2]P=\left( \frac { { F }_{ 1 } }{ { A }_{ 1 } } \right) [/latex]
पास्कल के नियम के अनुसार यही दाब नली C से संचरित होकर बर्तन B में भरे द्रव के प्रत्येक बिन्दु पर संचरित हो जाता है। इसलिए B में लगे पिस्टन P2 पर भी P दाब लगेगा।
अतः इसे पर ऊपर की ओर कार्यरत् बल ।
F2 = P x A2 = (F1/A1 ) x A2
अथवा [latex s=2]{ F }_{ 2 }={ F }_{ 1 }\left( \frac { A_{ 2 } }{ { A }_{ 1 } } \right) [/latex] …(1)
∵ A2 > A1 अत: F2 > F1 अतः A2, क्षेत्रफल A1 से जितना गुना बड़ा होगा पिस्टने P2, पर उतने गुना अधिक बल लगेगा जिससे कि P2 पर रखे भार W2(> W1) को P1 पर बहुत कम बल लगाकर उठाया जा सकता है।
F2/F1 को इस मशीन का यांत्रिक लाभ कहते हैं।
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रचना तथा कार्यविधि—इसमें दो खोखले बेलनाकार बर्तन A तथा B होते हैं। A का परिच्छेद क्षेत्रफल A1,B के परिच्छेद क्षेत्रफल A2 से बहुत कम होता है। इन बर्तनों की तली में क्रमश: वाल्व V1 तथा V2, लगे होते हैं। बर्तन A को वाल्व V1 द्वारा तेल के एक टैंक से जोड़ दिया जाता है। इस बर्तन में लगे पिस्टन P1 को ऊपर-नीचे करने के लिए एक लीवर की व्यवस्था होती है। बर्तन B को वाल्व V2, के द्वारा नली T के माध्यम से बर्तन A से जोड़ दिया जाता है तथा इसको वाल्व V3 के द्वारा तेल टैंक से जोड़ दिया जाता है (चित्र 10.14)।
जब पिस्टन P1 को लीवर द्वारा ऊपर उठाया जाता है तो बर्तन A में पिस्टन P1 के नीचे दाब कम हो जाता है। अत: वाल्व V1 द्वारा टैक से तेल बर्तन A में चढ़ जाता है। अब लीवर के द्वारा पिस्टन P1 को नीचे गिरा देते हैं जिससे द्रव का दाब बढ़ जाता है। दाब में यह वृद्धि नली T द्वारा बर्तन B में संचरित हो जाती है जिससे इसमें लगे पिस्टन P2, पर (A2/A1) गुना बड़ा बल कार्य करता है। इसके कारण पिस्टन P2, ऊपर उठता है जिससे कि उस पर रखा हुआ भार (जैसे- मोटरगाड़ी) भी ऊपर उठ जाता है। जब काम पूरा हो जाता है तो वाल्व V3, द्वारा बर्तन B के अतिरिक्त तेल को तेल टैंक में वापस भेज दिया जाता है और पिस्टन P2 नीचे होकर अपनी पूर्वावस्था में आ जाता है।

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प्रश्न 2.
किसी 3000 किग्रा द्रव्यमान के वाहन को उठाने के लिए एक हाइड्रॉलिक पम्प का निर्माण किया गया है, जिसके बड़े पिस्टन का क्षेत्रफल 900 सेमी2 है। यदि छोटे पिस्टन का क्षेत्रफल 10 सेमी2 हो तो बताइए इस कार्य के लिए उस पर कितना बल आरोपित करना पड़ेगा?
उत्तर
दिया है, वाहन का द्रव्यमान (m) = 3000 किग्रा
छोटे पिस्टन का क्षेत्रफल, (A1) = 10 सेमी2 = 10 x 10-4 मी2
बड़े पिस्टन का क्षेत्रफल (A2) = 900 सेमी2 = 900 x 10-4 मी2
बड़े पिस्टन के लिए, (F2) = mg = 3000 x 9.8 = 29400 न्यूटन
छोटे पिस्टन के लिए, F1 = ?
पास्कल के नियम से, [latex s=2]\frac { { F }_{ 1 } }{ { A }_{ 1 } } =\frac { { F }_{ 2 } }{ { A }_{ 2 } } [/latex]
छोटे पिस्टन के लिए आरोपित बल,
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प्रश्न 3.
आदर्श द्रव किसे कहते हैं? सिद्ध कीजिए कि किसी नली में आदर्श द्रव का धारारेखीय प्रवाह होने पर नली के अनुप्रस्थ-परिच्छेद एवं द्रव के वेग का गुणनफल स्थिर रहता है। या आदर्श द्रव के धारा-रेखीय प्रवाह की अविरतता के सिद्धान्त का उल्लेख कीजिए। या आदर्श द्रवों के सांतत्य प्रवाह का समीकरण स्थापित कीजिए।
उत्तर-
आदर्श द्रव-वह द्रव जिसमें
(i) शून्य सम्पीड्यता तथा
(ii) शून्य श्यानता होती है; आदर्श द्रव कहलाता है।
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उपपत्ति—मान लीजिए कि एक असम्पीड्य तथा अश्यान द्रव एक असमान अनुप्रस्थ-काट की नली XY में होकर बह रहा है। माना कि नली के X व Y सिरों पर अनुप्रस्थ-काट के क्षेत्रफल क्रमशः A1 व A2 हैं तथा द्रव का वेग ν1 व ν2 है। (UPBoardSolutions.com) माना कि द्रव का घनत्व ρ है। सिरे X से प्रवेश करने वाला द्रव एक सेकण्ड में ν1 दूरी तय करता है। अतः एक सेकण्ड में सिरे X पर क्षेत्रफल A1 से गुजरने वाले द्रव का आयतन = A1 x ν1
∴1 सेकण्ड में सिरे x से गुजरने वाले द्रव का द्रव्यमान = ρ x A1 x ν1
इसी प्रकार, 1 सेकण्ड में सिरे Y से गुजरने वाले द्रव का द्रव्यमान = ρ x A2 x ν2
अब, क्योंकि सिरे X में जो भी द्रव प्रवेश करता है वह दूसरे सिरे Y से बाहर निकल जाता है, उपर्युक्त दोनों द्रव्यमान बराबर हैं,
अर्थात् ρ x A1 x ν1 = ρ x A2 x ν2
अर्थात् A1 x ν1 = A2 x ν2
या। A x ν = नियतांक
स्पष्ट है कि नली में प्रत्येक स्थान पर नली के अनुप्रस्थ-काट के क्षेत्रफल तथा द्रव के वेग का गुणनफल एक नियतांक होता है। उपर्युक्त समीकरण को सांतत्य समीकरण (Equation of continuity) भी कहते हैं।
इस सिद्धान्त को द्रवों के बहने का अविरतता का सिद्धान्त’ भी कहते हैं।

प्रश्न 4.
बरनौली के प्रमेय का उल्लेख कर उसको सिद्ध कीजिए। या बरनौली के प्रमेय के कथन को लिखिए तथा सम्बन्धित समीकरण को स्थापित कीजिए।
उत्तर-
बरनौली की प्रमेय-जब कोई असम्पीड्य तथा अश्यान द्रव (अथवा गैस) एक स्थान से दूसरे स्थान तक धारा-रेखीय प्रवाह में बहता है तो इसके मार्ग के प्रत्येक बिन्दु पर इसके एकांक आयतन की कुल ऊर्जा अर्थात् दाब ऊर्जा, गतिज ऊर्जा तथा स्थितिज ऊर्जा का योग एक नियतांक होता है। अर्थात्
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इस प्रकार बरनौली प्रमेय बहते हुए द्रव (अथवा गैस) के लिए ऊर्जा-संरक्षण का सिद्धान्त है।
उपपत्ति-चित्र 10.16 में एक असमान अनुप्रस्थ-काट की नली में एक असम्पीड्य तथा अश्यान द्रव प्रवाहित हो रहा है। द्रव का प्रवाह धारा-रेखीय है। माना पृथ्वी तल से h1, ऊँचाई पर नली की अनुप्रस्थ-काट का क्षेत्रफल A1, द्रव का वेग ν1, व दाब P1 है तथा पृथ्वी तल से h2; ऊँचाई पर नली की अनुप्रस्थ-काट का क्षेत्रफल A2, द्रव का वेग ν2, व दाब P2 है। यहाँ A2 < A1 है। इसलिए । ν1 < ν2 होगा।
अनुप्रस्थ परिच्छेद A1 पर प्रवेश करने वाले द्रव पर P1 x A1 बल कार्य करता है। इस बल के अन्तर्गत द्रवे 1 सेकण्ड में ν1 दूरी तय करता है; अत: 1 सेकण्ड में A1 सिरे पर प्रवेश करने वाले द्रव पर
किया गया कार्य = बेल x दूरी = P1 x A1 x ν1
इसी प्रकार अनुप्रस्थ-परिच्छेद A2, पर निकलने वाला द्रव, बल = P2 x A2, के विरुद्ध कार्य करता है।
तथा 1,सेकण्ड में ν2 दूरी तय करता है।
अतः 1 सेकण्ड में A2 सिरे से निकलने वाले द्रव द्वारा किया गया कार्य
= P2 x A2 x ν2
द्रव पर किया गया नेट कार्य = P1 x A1 x ν1 – P2 x A2 x ν2 …(1)
परन्तु A1 x ν1 तथा A2 x ν2 , क्रमशः एक (UPBoardSolutions.com) सिरे से प्रवेश करने वाले व दूसरे सिरे से निकलने वाले द्रव का आयतन है जो आपस में बराबर होंगे।
अतः A1 ν1 = A2 ν2 = m/ρ
जहाँ एक सेकण्ड में प्रवेश करने वाले द्रव का द्रव्यमान m तथा द्रव का घनत्व ρ है।
द्रव पर किया गया नेट कार्य = (P1 – P2)m/ρ
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अत: किसी द्रव के क्षैतिज व धारा-रेखीय प्रवाह के लिए प्रत्येक बिन्दु पर दाब तथा द्रवे के एकांक आयतन की गतिज ऊर्जा का योग एक नियतांक होता है।
बरनौली प्रमेय समीकरण से यह स्पष्ट है कि किसी प्रवाहित द्रव (अथवा गैस) में जिस स्थान पर द्रव का वेग कम होता है, वहाँ दाब अधिक हो जाता है तथा जिस स्थान पर वेग अधिक होता है, वहाँ दाब कम हो जाता है। यदि हम द्रव को किसी ऐसी नली में प्रवाहित (UPBoardSolutions.com) करें जिसके बीच का भाग संकीर्ण हो, तो इस भाग में द्रव का वेग सबसे अधिक होगा तथा दाब सबसे कम होगा। प्रवाहित द्रव के दाब-शीर्ष, वेर्ग-शीर्ष तथा गुरुत्वीय-शीर्ष- बरनौली की समीकरण (6) को ρg से भाग देने पर,
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इसमें P/ρg को ‘दाब-शीर्ष’ (pressure head), ν²/2g को ‘वेग-शीर्ष’ (velocity head) तथा h को ‘गुरुत्वीय-शीर्ष’ (gravitational head) कहते हैं। इन तीनों की विमाएँ ऊँचाई की विमा [L] के समतुल्य हैं। इनके योग को ‘सम्पूर्ण शीर्ष’ (total head) कहते हैं। अत: बरनौली प्रमेय को निम्न प्रकार भी कहा जा सकता है —
आदर्श द्रव के धारा-रेखा प्रवाह में द्रव के किसी बिन्दु पर दाब-शीर्ष, वेग-शीर्ष तथा गुरुत्वीय-शीर्ष का योग सदैव नियत रहता है। यह यांत्रिक ऊर्जा संरक्षण को व्यक्त करती है।

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प्रश्न 5.
बरनौली के प्रमेय के आधार पर कणित्र की कार्यविधि समझाइए।
उत्तर-
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कणित्र (Atomizer)-यह रंग अथवा सुगन्धित द्रव को छिड़कने, कार, स्कूटर पर पेण्ट करने, नाइयों द्वारा सिर पर जल फुहारने, डॉक्टरों द्वारा नाक, कान को धोने व गले में दवाई को छिड़कने के काम आता है। इसमें एक साधारण पिचकारी होती है, जिसके मुख पर एक केशनली (capillary tube) लगा दी जाती है। केशनली का निचला सिरा बर्तन में भरे द्रव में डूबा रहता है। जब पिचकारी की गेंद को दबाते हैं, तो वायु अत्यधिक वेग से निकलती है, जिससे पिचकारी के मुँह पर दाब गतिज ऊर्जा बढ़ने से (बरनौली प्रमेय के आधार पर) घट जाता है। दाब के घटने से केशिका नली में द्रव चढ़कर पिचकारी के मुँह तक आ जाता है और दोबारा पिचकारी की गेंद को दबाने पर यह वायु के साथ मिलकर फव्वारे के रूप में बाहर निकलता है।।

प्रश्न. 6.
आदर्श द्रवों के प्रवाह से सम्बन्धित बरनौली की प्रमेय लिखिए। जल से भरे एक बर्तन की दीवार में बने एक छिद्र से जल का स्वतन्त्र तल h ऊँचाई पर है। छिद्र से निकलने वाले जल के बहिःस्राव वेग के लिए व्यंजक स्थापित कीजिए।
उत्तर-
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बहिःस्राव वेग के लिए व्यंजक–चित्र 10.18 में एक बर्तन दर्शाया गया है जिसमें H ऊँचाई तक द्रव भरा है। माना द्रव का घनत्व p है। बर्तन द्रव के स्वतन्त्र तल से h गहराई पर एक छिद्र A है। माना A से निकलने वाले द्रव का बहि:स्राव वेग » है। द्रव के स्वतन्त्र तल पर गतिज ऊर्जा शून्य है, केवल स्थितिज ऊर्जा है। परन्तु A से निकलने वाले द्रव में स्थितिज तथा गतिज दोनों ही प्रकार की ऊर्जाएँ हैं। बरनौली प्रमेय के अनुसार, द्रव के स्वतन्त्र तल पर तथा छिद्र A पर द्रव के एकांक आयतन की कुल ऊर्जा अर्थात् दाब ऊर्जा,
गतिज ऊर्जा तथा स्थितिज ऊर्जाओं का योग बराबर होना चाहिए। । यदि वायुमण्डलीय दाब P हो, तो
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अत: यदि छिद्र बर्तन की दीवार के ठीक बीच में है तो द्रव की धार सबसे अधिक दूर (बर्तन में द्रव की ऊँचाई के बराबर दूरी पर) गिरती है।

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प्रश्न 7.
चित्र 10.19 के अनुसार एक क्षैतिज नलिका में जल प्रवाहित होता है। बिन्दु A व B के मध्य 5 मिमी पारे का दाब परिवर्तन है जहाँ अनुप्रस्थ परिच्छेद 20 सेमी2 तथा 10 सेमी2 है। नलिका में जल प्रवाह की दर ज्ञात कीजिए। (पारे का घनत्व = 1.36 x 103 किग्रा/मी3, जल का घनत्व = 1.0 x 103 किग्रा/मी)
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हल-
दिया है, A1 = 20 सेमी2 = 20 x 10-4 मी2
A2 = 10 सेमी2 = 10 x 10-4 मी2
प्रश्नानुसार, दाब में परिवर्तन P1 – P2 = 5 मिमी
पारा स्तम्भ पर दाब = hdg = 5 x 10-3 x 13.6 x 103 x 9.8
= 666.4 न्यूटन/मी2
अविरतता के सिद्धान्त से,
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प्रश्न 8.
एक क्षैतिज पाइप में जल बहता है, जिसका एक सिरा वाल्व द्वारा बन्द है और पाइप में लगे दाबमापी का पाठ्यांक 5.5 x 105 न्यूटन/मी2 है। पाइप में लगे वाल्व को खोल देने पर दाबमापी का पाठ्यांक 10 x 105 न्यूटन/मी2 रह जाता है। पाइप में प्रवाहित जल के वेग की गणना कीजिए।
उत्तर-
दिया है, जल का घनत्व, (ρ) = 1.0 x 10किग्रा/मी3  
बन्द सिरे के कारण दाबमापी का पाठ्यांक (P1) = 5.5 x 105 न्यूटन/मी2  
न्यूटन/मी खुले सिरे के कारण दाबमापी का पाठ्यांक (P) = 1.0 x 105 न्यूटन/मी2
बरनौली प्रमेय से,
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चूंकि प्रारम्भिक अवस्था में वाल्व बन्द होता है इसलिए ν1 = 0 होगा।
अत: समीकरण (1) से
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प्रश्न 9.
एक छोटा गोला जिसका द्रव्यमान M व घनत्व d1 है। एक ग्लिसरीन भरे पात्र में डाला जाता है। कुछ समय पश्चात् गोले का वेग स्थिर हो जाता है। यदि ग्लिसरीन का घनत्व d2 है, तो गोले पर लगने वाले श्यान बल की गणना कीजिए।
उत्तर-
यहाँ गोले का द्रव्यमान = M, गोले का घनत्व = d1
ग्लिसरीन का घनत्व = d2
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प्रश्न 10.
पृष्ठ-तनाव तथा केशिकात्व की परिभाषा दीजिए। इसका एस० आई० मात्रक बताइए। काँच की केशनली में चढे द्रव-स्तम्भ की ऊँचाई, त्रिज्या तथा द्रव के पृष्ठ-तनाव में सम्बन्ध का सूत्र स्थापित कीजिए।
उत्तर-
पृष्ठ-तनाव (Surface tension)-प्रत्येक द्रव में मुक्त पृष्ठ पर एक तनाव बल कार्य करता है; जिसके कारण उसका स्वतन्त्र पृष्ठ एक तनी झिल्ली की भाँति व्यवहार करता है। यदि इस मुक्त पृष्ठ में चित्र 10.20 की भाँति किसी भी दिशा में एक सरल रेखा AB (UPBoardSolutions.com) की कल्पना की जाये तो रेखा के किसी भी ओर का पृष्ठ रेखा के अपने विपरीत ओर के पृष्ठ पर कर्षण (pulling) बल F लगाता है। यह बल पृष्ठ के तल में तथा इस रेखा के लम्बवत् कार्य करता है। इस रेखा AB की एकांक लम्बाई पर कार्य करने वाले बल का परिमाण ही द्रव के पृष्ठ-तनाव की माप है।
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यदि रेखा AB की लम्बाई । हो और इसके किसी ओर भी कार्य करने वाला सम्पूर्ण बल F हो, तो पृष्ठ तनाव T = [latex s=2]\frac { F }{ l }[/latex].
यदि l = 1, तो T = F
अत: किस द्रव का पृष्ठ-तनाव वह बल है जो द्रव के पृष्ठ पर खींची गयी काल्पनिक रेखा की एकांक लम्बाई पर पृष्ठ के तल में तथा कल्पित रेखा के लम्बवत् कार्य करता है।
पृष्ठ-तनाव का एस० आई० मात्रक न्यूटन/मीटर है।
केशिकात्व Capillarity द्रव का वह गुण-धर्म जिसके कारण किसी केशनली को इसमें खड़ा करने पर यह नली के बाहर द्रव के तल की तुलना में नली में ऊपर चढ़ता है या नीचे उतरता है, केशिकात्व कहलाता है।
काँच की केशनली में चढ़े द्रव-स्तम्भ की ऊँचाई, त्रिज्या तथा द्रव के पृष्ठ-तनाव में सम्बन्ध चित्र 10.21 (a) में जल के एक बीकर में काँच की केशनली खड़ी की गई है जिसमें जल के तल से h ऊँचाई तक जल चढ़ता है। माना कि जल की पृष्ठ-तनाव T है। नली में जल का अवतल-पृष्ठ AEB है। इसकी परिधि 2πr नली की दीवारों के सम्पर्क में है, जहाँ r केशनली की त्रिज्या है। इसकी एकांक लम्बाई पर जल के पृष्ठ-तनाव के कारण बल T नली की दीवार से θ कोण पर जल के अन्दर की ओर लगता है, θ जल-काँच के लिए स्पर्श कोण है।
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नली की दीवार भी प्रतिक्रिया के कारण उतना ही बल T जल के वक्र पृष्ठ की परिधि पर बाहर की ओर लगाती है। इस बल को ऊर्ध्व और क्षैतिज दो घटेकों, T cos θ और T sin θ में वियोजित करते हैं। T cos θ ऊर्ध्व दिशा में परिधि 2πr की प्रत्येक एकांक लम्बाई (UPBoardSolutions.com) पर ऊपर की ओर कार्य करता है; अत: प्रतिक्रिया बल का मान 2πr x T cos θ के बराबर होता है जो नली में चढ़े जल के स्तम्भ के भार को साधता है। चूंकि T sin θ परिधि पर बाहर की ओर लगता है, अतः पूरी परिधि के लिए उनका परिणामी बेल शून्य होगा। यदि जल का घनत्व ρ हो, तो जल के स्तम्भ का भार = πr²h x ρ x g
सन्तुलन की अवस्था में । 2πr x T cos θ =πr²h x ρ x g
[latex s=2]T=\frac { rhg\rho }{ 2cos\theta } [/latex]
उपर्युक्त सूत्र से स्पष्ट है कि यदि जल काँच का स्पर्श-कोण θ ज्ञात हो, तो h तथा r के मान ज्ञात करके जल के पृष्ठ-तनाव T की गणना की जा सकती है।
शुद्ध जल एवं साफ काँच के लिए स्पर्श कोण θ लगभग शून्य है; अत: cos θ = 1, इस प्रकार
[latex s=2]T=\frac { rhg\rho }{ 2 } [/latex]

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प्रश्न 11.
काँच की नली में द्रव के मुक्त पृष्ठ की आकृति की व्याख्या कीजिए। द्रव के वक्र पृष्ठ के दो पाश्र्वो के बीच दाबान्तर क्यों होता है?
उत्तर-
काँच की नली में द्रव के मुक्त पृष्ठ की आकृति जब कोई द्रव किसी ठोस के स्पर्श में आता है तो स्पर्श-तल के समीप द्रव का पृष्ठ वक्रीय हो जाता है। वक्रता की प्रकृति द्रव के अणुओं के बीच संसंजक-बल तथा द्रव व ठोस के अणुओं के बीच आसंजक-बल के सापेक्ष परिणामों पर निर्भर करती है।
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चित्र 10.22 (a) में जल एक काँच की नली की दीवार के सम्पर्क में दिखाया गया है। माना कि काँच के समीप द्रव के मुक्त पृष्ठ पर एक अणु A है तथा इस अणु पर दो आकर्षण-बल कार्य करते हैं।
(i) परिणामी आसंजक-बल P, जो A के समीप वाले ठोस के अणुओं के आकर्षण के कारण A पर कार्य करता है। इसकी दिशा ठोस के पृष्ठ के लम्बवत् है।।
(ii) परिणामी संसंजक-बल Q, जो A के समीप द्रव के अन्य अणुओं के आकर्षण के कारण A पर द्रव के अन्दर की ओर एक दिशा में कार्य करता है।
जल व काँच के अणुओं के बीच लगेने वाला आसंजक-बल, जल के ही अणुओं के बीच परस्पर लगने वाले संसंजक-बल से बड़ा होता है। अत: बेल P, बल Q से बड़ा होगा। चित्र 3.7(a) से स्पष्ट है कि इन दोनों बलों का परिणामी बल R, जल से बाहर की ओर को होगा।
चित्र 10.22 (b) में पारे को काँच की नली की दीवार के सम्पर्क में दिखाया गया है। पारे के अणुओं के बीच संसंजक-बल, पारे व काँच के अणुओं के बीच लगने वाले आसंजक-बल से कहीं अधिक बड़ा होता है। अत: इस दशा में पारे के मुक्त पृष्ठ पर अणु A पर बल Q, बल P से बड़ा होगा तथा इनका परिणामी बल R पारे के भीतर की ओर को होगा। परिणामी बल R, जल अथवा पारे के मुक्त पृष्ठ के सभी अणुओं पर कार्य करता है। दीवार से दूर स्थित अणुओं के लिए आसंजक-बल P घटता जाता है तथा संसंजक-बल Q अधिकाधिक ऊध्वधर होता जाता है। अतः परिणामी बल R भी अधिकाधिक उध्वधर होता जाता है। मुक्त पृष्ठ के बीच वाले भाग में P लगभग शून्य हो जाता है तथा Q ऊर्ध्वाधर हो जाता है। अतः परिणामी बल बिल्कुल ऊर्ध्वाधर हो जाता है। [चित्र 10.23 (a), (b)]
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यदि द्रव का मुक्त पृष्ठ साम्यावस्था में है तो पृष्ठ के किसी अणु पर कार्य करने वाला परिणामी बल पृष्ठ के लम्बवत् होना चाहिये। अत: द्रव का पृष्ठ प्रत्येक स्थान पर परिणामी बल के लम्बवत् हो जाता है। यही कारण है कि काँच की नली में जल का मुक्त पृष्ठ अवतल आकृति धारण कर लेता है तथा पारे का मुक्त पृष्ठ उत्तल आकृति। प्रत्येक दशा में बीच में परिणामी बल ऊर्ध्वाधर होता है, अतः बीच में मुक्त पृष्ठ क्षैतिज होता है [चित्र 10.23 (a), (b)]।
द्रव के वक्र पृष्ठ के पाश्व के बीच दाबान्तर
किसी द्रव के पृष्ठ में स्थित कोई अणु, पृष्ठ के दूसरे अणुओं द्वारा सभी दिशाओं में आकर्षित होता है। यदि द्रव का पृष्ठ समतल हो [चित्र 10.24 (a)] तो अणु सभी दिशाओं में समान रूप से आकर्षित होता है। अतः अणु पर पृष्ठ-तनाव के कारण परिणामी बल शून्य होता है। परन्तु यदि द्रव का पृष्ठ उत्तल हो तो प्रत्येक अणु पर लगने वाले आकर्षण-बलों को एक परिणामी घटक पृष्ठ के लम्बवत् अन्दर की ओर होता है [चित्र 10.24 (b)]। इसी प्रकार, यदि द्रव का पृष्ठ अवतल हो तो प्रत्येक अणु पर पृष्ठ-तनाव के कारण एक परिणामी बल पृष्ठ के लम्बवत् बाहर की ओर को लगता है [चित्र 10.24 (c)]। अत: वक्र पृष्ठ के सन्तुलन के लिये, पृष्ठ के दोनों पार्यों के बीच दाबान्तर होना चाहिये जिससे कि आधिक्य-दाब (excess of pressure) के कारण लगने वाला बल पृष्ठ-तनाव के कारण उत्पन्न परिणामी बल को सन्तुलित कर सके। स्पष्ट है कि पृष्ठ के अवतल पाश्र्व पर दाब उत्तल पाश्र्व की अपेक्षा अधिक होना चाहिये। दाबों पर यह अन्तर 2T/R के बराबर होता है, जहाँ T द्रव का पृष्ठ-तनाव है तथा R पृष्ठ की त्रिज्या है।
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प्रश्न 12.
किसी साबुन के बुलबुले के भीतर आधिक्य-दाब के लिए व्यंजक प्राप्त कीजिए।
उत्तर-
साबुन के घोल के बुलबुले के भीतर आधिक्य-दाब माना कि त्रिज्या R का एक बुलबुला, पृष्ठ-तनाव T के साबुन के घोल से बना है (चित्र 10.25)। माना बुलबुले के बाहर दाब P है तथा भीतर P + p है। इस प्रकार बुलबुले के भीतर आधिक्य-दाब p है। माना कि यह आधिक्य-दाब बुलबुले के पृष्ठ को अभिलम्बवत् बाहर की ओर दूरी ∆R धकेलता है, जहाँ ∆R इतना सूक्ष्म है कि बुलबुले के भीतर दाब अपरिवर्तित रहता है। अतः आधिक्य-दाब के कारण उत्पन्न बल द्वारा किया गया कार्य
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w = बल x विस्थापन ।
= (आधिक्य-दाब x क्षेत्रफल) x विस्थापन
= (p x 4πR²) x ∆R …(1)
साबुन के घोल के बुलबुले के दो पृष्ठ वायु के सम्पर्क में हैं, एक बुलबुले के भीतर तथा एक बुलबुले के बाहर। अतः उपरोक्त विस्थापन के कारण बुलबुले के पृष्ठ-क्षेत्रफल में कुल वृद्धि
∆A = 2[4π(R + ∆R)²-4πR²]
= 8π[R + (∆R)²+ 2R∆R – R²]
= 16πR(∆R)
अल्प पद (∆R)² को छोड़ने पर
अतः ‘पृष्ठ ऊर्जा में वृद्धि = पृष्ठ-क्षेत्रफल में वृद्धि x पृष्ठ तनाव
= 16πR(∆R) x T …(2)
ऊर्जा में वृद्धि, आधिक्य-दाब के कारण किये गये कार्य से होती है।
अत: समीकरण (1) तथा (2) को बराबर रखने पर,
(p x 4πR²) x ∆R= 16 πR(∆R)xT
अथवा
[latex s=2]p=\frac { 4T }{ R } [/latex]

प्रश्न 13.
द्रव की बूंद के भीतर आधिक्य-दाब का व्यंजक निगमित कीजिए।
उत्तर-
द्रव की बूंद के भीतर आधिक्य-दाब माना कि द्रव की एक बूंद की त्रिज्या R है तथा द्रव का पृष्ठ-तनाव T है (चित्र 10.26)। बूंद के पृष्ठ पर स्थित द्रव के अणुओं पर, पृष्ठ-तनाव के कारण, एक परिणामी बल पृष्ठ के अभिलम्बवत् ‘भीतर की ओर को’ कार्यरत् है। अत: बूंद के (UPBoardSolutions.com) भीतर दाब, बाह्य दाब से अधिक होना चाहिए। बूंद के भीतर यह आधिक्य-दाब बाहर की
ओर को एक बल लगाता है जो पृष्ठ तनाव के बल को सन्तुलित करता है तथा बूंद साम्यावस्था में बनी रहती है।
माना कि बूंद के बाहर दाब P है तथा भीतर P+p है। इस प्रकार, बूंद के भीतर आधिक्य-दाब p है। माना कि यह आधिक्य-दाब बूंद के पृष्ठ को अभिलम्बवत् बाहर की ओर दूरी ∆R तक धकेलता है, जहाँ ∆R इतना सूक्ष्म है कि बूंद के भीतर दाब अपरिवर्तित रहता है। आधिक्य-दाब p के कारण उत्पन्न बल द्वारा किया गया यान्त्रिक कार्य
w = बल x विस्थापन
= (आधिक्य दाब x क्षेत्रफल) x विस्थापन
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UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 8 Index Numbers

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Economics
Chapter Chapter 8
Chapter Name Index Numbers (सूचकांक)
Number of Questions Solved 51
Category UP BoardSolutions

UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics Chapter 8 Index Numbers (सूचकांक)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मदों के सापेक्षिक महत्त्व को बताने वाले सूचकांक को
(क) भारित सूचकांक कहते हैं।
(ख) सरल समूहित सूचकांक कहते हैं।
(ग) सरल मूल्यानुपातों का औसत कहते हैं।
उत्तर
(क) भारित सूचकांक कहते हैं।

प्रश्न 2.
अधिकांश भारित सूचकांकों में भार का सम्बन्ध
(क) आधार वर्ष से होता है।
(ख) वर्तमान वर्ष से होता है।
(ग) आधार एवं वर्तमान वर्ष दोनों से होता है।
उत्तर
(ख) वर्तमान वर्ष से होता है।

प्रश्न 3.
ऐसी कंस्तु जिसका सूचकांक में कम भार है, उसकी कीमत में परिवर्तन से सूचकांक में कैसा परिवर्तन होगा
(क) कस
(ख)
अधिक
(ग)
अनिश्चित
उत्तर
(क)
कम 

प्रश्न 4.
कोई उपभोक्ता सूचकांक किस परिवर्तन को मापता है?
(क)
खुदरा कीमत ।
(ख) थोक कीमत
(ग)
उत्पादकों की कीमत
उत्तर
(क)
खुदरा कीमत

प्रश्न 5.
औद्योगिक श्रमिकों के लिए उपभोक्ता कीमत सूचकांक में किस मद के लिए उच्चतम भार होता है?
(क) खाद्य पदार्थ
(ख)
आवास
(ग)
कपड़े
उत्तर
(क)
खाद्य पदार्थ

प्रश्न 6.
सामान्यतः मुद्रा-स्फीति में परिकलन में किसका प्रयोग होता है?
(क)
थोक कीमत सूचकांक
(ख) उपभोक्ता कीमत सूचकांक
(ग) उत्पादक कीमत सूचकांक
उत्तर
(क) थोक कीमत सूचकांक

प्रश्न 7.
हमें सूचकांक की आवश्यकता क्यों होती है?
उतर
सूचकांक सम्बन्धित चरों के समूह के परिमाण में परिवर्तनों को मापने का एक सांख्यिकीय साधन है। ये अर्थव्यवस्था के लिए बहुत उपयोगी होते हैं। निम्नलिखित कारणों से हमें सूचकांक की आवश्यकता होती है

  1. मजदूरी तय करने, लगान, कर, आय नीति का निर्धारण, कीमत-निर्धारण एवं आर्थिक नीति बनाने | के लिए सूचकांक का प्रयोग किया जाता है।
  2. उपभोक्ता कीमत सूचकांक (CPI) फुटकर (retail)-कीमतों में औसत परिवर्तन मापने के लिए आवश्यक होता है।
  3. औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IPI) अनेक उद्योगों के औद्योगिक उत्पादन के स्तर में परिवर्तन को मापने में सहायक होता है।
  4. थोक कीमत सूचकांक (WPI) सामान्य कीमत स्तर में परिवर्तन का संकेत देता है।
  5. कृषि क्षेत्र की प्रगति का जायजा लेने के लिए कृषि उत्पादन सूचकांक (API) आवश्यक होता है।

प्रश्न 8.
आधार अवधि (आधार वर्ष) के वांछित गुण क्या होते हैं?
उत्तर
आधार अवधि (आधार वर्ष) के वांछित गुण निम्नलिखित होने चाहिए|

  1. आधार वर्ष एक सामान्य वर्ष होना चाहिए, इस वर्ष असाधारण प्राकृतिक अथवा राजनीतिक घटनाएँ घटित न हुई हों।
  2. आधार वर्ष में कीमत स्तर में असाधारण परिवर्तन न हुए हों।
  3. यह वर्ष न तो अत्यधिक पुराना हो और न ही अत्यधिक नया।।
  4. इस वर्ष में पर्याप्त एवं विश्वसनीय आँकड़े उपलब्ध होने चाहिए।


प्रश्न 9.
भिन्न उपभोक्ताओं के लिए भिन्न उपभोक्ता कीमत सूचकांकों की अनिवार्यता क्यों होती
उत्तर
भिन्न उपभोक्ताओं के उपभोग में व्यापक भिन्नताएँ पाई जाती हैं। इसलिए भिन्न उपभोक्ताओं के लिए भिन्न उपभोर्ग कीमत सूचकांक बनाए जाते हैं। भारत में तीन उपभोक्ता कीमत सूचकांक बनाए जाते

  1. औद्योगिक श्रमिकों के लिए उपभोक्ता कीमत सूचकांक (आधार वर्ष 1982)
  2. शहरी गैर-शारीरिक (मजदूर) कर्मचारियों के लिए उपभोक्ता कीमत सूचकांक (आधार वर्ष | 1984-85)
  3. कृषि श्रमिकों के लिए उपभोक्ता कीमत सूचकांक (आधार वर्ष 1986-87)।

प्रश्न 10.
औद्योगिक श्रमिकों के लिए उपभोक्ता कीमत सूचकांक क्या मापता है?
उत्तर
भारत के औद्योगिक श्रमिकों के लिए अलग से उपभोक्ता कीमत सूचकांक बनाया जाता है। इसे 1982 को आधार वर्ष मानकर बनाया जाता है। इसका नियमित रूप से हर महीने परिकलन किया जाता है। यह सूचकांक औद्योगिक श्रमिकों के जीवन-निर्वाह पर फुटकर कीमतों में आए परिवर्तनों के प्रभावों को मापता है। इनका प्रकाशन श्रमिक केन्द्र शिमला द्वारा किया जाता है। इसका निर्माण करते समय औद्योगिक श्रमिकों के लिए मुख्य वस्तु समूहों को उपयुक्त भार दिया जाता है।

प्रश्न 11.
कीमत सूचकांक तथा मात्रा सूचकांक में क्या अन्तर है?
उत्तर
कीमत सूचकांक एक अभारित सूचकांक है। यह वस्तु की वर्तमान वर्ष की कीमत एक आधार वर्ष की कीमत का सरल अनुपात होता है। सूत्र रूप में,
[latex] { p }_{ 01 }=\cfrac { { \Sigma p }_{ 1 } }{ { \Sigma p }_{ 0 } } \times 100 [/latex]
यहाँ, P01= कीमत सूचकांक
P1 = वर्तमान वर्ष की कीमत
P0 = आधार वर्ष की कीमत
मात्रा सूचकांक कीमत के स्थान पर उत्पादन की मात्रा का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। इस प्रकार के सूचकांक की रचना करते समय सर्वप्रथम मात्रा अनुपात ज्ञात किए जाते हैं। सूत्रानुसार,
[latex] \cfrac { q1 }{ q0 } \times 100 [/latex]
यहाँ, Q.R. = मात्रानुपात
q = वर्तमान वर्ष में उत्पादन की मात्रा
qo = आधार वर्ष में उत्पादन की मात्रा
इसके बाद प्रचलित वर्ष के सभी मात्रानुपातों का समान्तर माध्य निकाल लिया जाता है। यही मात्रा सूचकांक है।।

प्रश्न 12.
क्या किसी भी तरह की कीमत परिवर्तन एक कीमत सूचकांक में प्रतिबिम्बित होता है?
उत्तर
कीमत सूचकांक फुटकर कीमतों में परिवर्तनों के औसत को मापता है। यह किसी विशिष्ट कीमत परिवर्तन को प्रदर्शित नहीं करता है, जबकि प्रत्येक प्रकार की कीमत में परिवर्तन कीमत सूचकांक के मान को प्रभावित करता है।

प्रश्न 13.
क्या शहरी गैर-शारीरिक कर्मचारियों के लिए उपभोक्ता कीमत सूचकांक भारत के राष्ट्रपति के निर्वाह लागत में परिवर्तन का प्रतिनिधित्व कर सकता है?
उत्तर
नहीं, शहरी गैर-शारीरिक कर्मचारियों के लिए उपभोक्ता कीमत सूचकांक भारत के राष्ट्रपति के निर्वाह लागत में परिवर्तन का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है।

प्रश्न 14.
नीचे एक औद्योगिक केन्द्र के श्रमिकों द्वारा 1980 एवं 2005 के दौरान निम्न मदों पर प्रति
व्यक्ति मासिक व्यय को दर्शाया गया है। इन मदों का भार क्रमशः 75, 10, 5, 6 तथा 4 है। 1980 को आधार मानकर 2005 के लिए जीवन-निर्वाह लागत का एक भारित सूचकांक तैयार कीजिए।
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 1
हल
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 2
[latex] CPI=\cfrac { \Sigma wR }{ \Sigma W } =\cfrac { 18459.47 }{ 100 } =184.59 [/latex]

प्रश्न 15.
निम्नलिखित सारणी को ध्यानपूर्वक पढिए एवं अपनी टिप्पणी कीजिए।
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 3
उत्तर
उपर्युक्त तालिका से निम्नलिखित बातें प्रतिबिम्बित होती हैं

  1. विभिन्न उद्योगों, खनन एवं उत्खनन, विनिर्माण एवं विद्युत की संवृद्धि दरें भिन्न-भिन्न हैं। इनमें विनिर्माण क्षेत्र की संवृद्धि दर सबसे अधिक है, जबकि खनन एवं उत्खनन क्षेत्र की संवृद्धि दर सबसे कम है।
  2. विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों को भिन्न-भिन्न भार दिए गए हैं। इनमें सबसे अधिक भार विनिर्माण क्षेत्र को तथा सबसे कम भार विद्युत क्षेत्र को दिया गया है।
  3. सामान्य संवृद्धि दर खनन एवं उत्खनन तथा विद्युत क्षेत्र से अधिक है किन्तु विनिर्माण क्षेत्र से कम

प्रश्न 16.
अपने परिवार में उपभोग की जाने वाली महत्त्वपूर्ण मदों की सूची बनाने का प्रयास कीजिए।
उत्तर
हमारे परिवार में उपभोग की जाने वाली महत्त्वपूर्ण मदों की सूची
1. ईंधन एवं प्रकाश,
2. वस्त्र,
3. खाद्य-पदार्थ,
4. शिक्षा,
5. मकान का किरायी,
6. परिवहन,
7. मनोरंजन,
8. जूते-चप्पल,
9. फर्नीचर,
10. विविध

प्रश्न 17.
यदि एक व्यक्ति का वेतन आधार वर्ष में 4000 प्रतिवर्ष था और उसका वर्तमान वर्ष में वेतन १6000 है। उसके जीवन-स्तर को पहले जैसा ही बनाए रखने के लिए उसके वेतन में कितनी वृद्धि होनी चाहिए, यदि उपभोक्ता कीमत सूचकांक 400 हो।
उतर
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 4
वेतन में प्रतिशत बढ़ोतरी  [latex]\cfrac { 10000\times 100 }{ 6000 } =166.67 [/latex]%
जीवन-स्तर का समान स्तर कायम रखने हेतु वेतन में 166.67% वृद्धि होनी चाहिए।

प्रश्न 18.
जून 2005 में उपभोक्ता कीमत सूचकांक 125 था। खाद्य सूचकांक 120 तथा अन्य मदीं का सूचकांक 135 था। खाद्य-पदार्थों को दिया जाने वाला भार कुल भार का कितना प्रतिशत है? ।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 5

प्रश्न 19.
किसी शहर में एक मध्यवर्गीय पारिवारिक बजट में जाँच-पड़ताल से निम्नलिखित जानकारी प्राप्त होती है|
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 6
1995 की तुलना में 2004 में निर्वाह सूचकांक का मान क्या होगा?
हल
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 7
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 8
प्रश्न 20.
दो सप्ताह तक अपने परिवार के (प्रति इकाई) दैनिक व्यय, खरीदी गई मात्रा तथा दैनिक खरीददारी को अभिलेखित कीजिए। कीमत में आए परिवर्तन आपके परिवार को किस तरह से प्रभावित करते हैं?
उत्तर
स्वयं करें।

प्रश्न 21.
निम्नलिखित आँकड़े दिए गए हैं।
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 9

रस्रोत- आर्थिक सर्वेक्षण, भारत सरकार, 2004-2005.
(क) विभिन्न सूचकांकों को प्रयुक्त करते हुए मुद्रास्फीति की दर का परिकलन कीजिए।
(ख) सूचकांकों के सापेक्षिक मानों पर टिप्पणी कीजिए।
(ग) क्या ये तुलना योग्य हैं?
उत्तर
(क)(i)
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UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 11

UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 12
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 13
(iv)
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 14
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 15

(ख) औद्योगिक श्रमिकों के लिए आधार वर्ष 1982 के साथ उपभोक्ता कीमत सूचकांक सबसे अधिक है। थोक मूल्य सूचकांक पूरी अवधि में सबसे कम है। (1993-96 से 2003-04 तक)
(ग) तालिका में दिए गए सूचकांक निम्नलिखित कारणों से तुलनात्मक नहीं हैं

  1. आधार वर्ष अलग-अलग हैं।
  2.  विभिन्न सूचकांकों की मदें भिन्न हो सकती हैं।
  3. अलग-अलग सूचकांकों के लिए विभिन्न मदों को भिन्न भार प्रदान किए जा सकते हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
“कीमत क्य सूचकांक आधार-वर्ष की तुलना में किसी अन्य समय में कीमतों की औसत ऊँचाई को प्रकट करने वाली संख्या है।” यह परिभाषा दी है
(
क) प्रो० चैण्डलर ने
(ख) प्रो० बाउले ने
(ग) किनले ने ।
(घ) हार्पर ने
उत्तर—
(क)
प्रो० चैण्डलर ने

प्रश्न 2. सूचकांक की विशेषता नहीं है
(क) सूचकांक मुद्रा के मूल्य का निरपेक्ष माप न होकर सापेक्ष माप है।
(ख) सूचकांकों को प्रतिशतों में व्यक्त नहीं किया जाता है।
(ग) यह एक विशेष प्रकार का माध्य ही है।
(घ) सूचकांक आर्थिक पहलू के उच्चावचनों को संख्यात्मक रूप में ही माप सकता है।
उत्तर
(ख) सूचकांकों को प्रतिशतों में व्यक्त नहीं किया जाता है।

प्रश्न 3.
“सूचकांक की श्रेणी एक ऐसी श्रेणी होती है, जो अपने झुकाव तथा उच्चावचनों द्वारा जिस परिमाण से संबंधित है, में होने वाले परिवर्तनों को स्पष्ट करती है।”
(क) डॉ० बावले ने
(ख) चैण्डलर ने
(ग) होरेस सेक्राइस्ट ने
(घ) किनले ने
उत्तर
(ग) होरेस सेक्राइस्ट ने

प्रश्न 4.
श्रृंखला मूल्यानुपात
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 16

UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 17
उत्तर
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 18

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सूचकांक क्या है?
उत्तर
सूचकांक सम्बन्धित चरों के समूह के परिमाण में परिवर्तनों को मापने की एक सांख्यिकी विधि है।

प्रश्न 2.
सूचकांकों को किस रूप में व्यक्त किया जाता है?
उत्तर
सूचकांकों को प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जाता है।

प्रश्न 3.
आधार-वर्ष क्या है?
उत्तर
दो वर्षों में से जिस वर्ष को आधार मानकर तुलना की जाती है, उसे आधार-वर्ष कहते हैं।

प्रश्न 4.
कीमत सूचकांक का क्या उपयोग है?
उत्तर
कीमत सूचकांक कुछ वस्तुओं की कीमतों की माप करता है जिससे उनकी तुलना सम्भव हो जाती

प्रश्न 5.
परिमाणात्मक सूचकांक क्या मापते हैं? उत्तर–परिमाणात्मक सूचकांक उत्पादन की भौतिक मात्रा, निर्माण तथा रोजगार में परिवर्तन को मापते हैं। प्रश्न 6. उत्पार्दन सूचकांक किसका सूचक है?
उत्तर
उत्पादन सूचकांक अर्थव्यवस्था में उत्पादन के स्तर का सूचक होता है।

प्रश्न 7.
एक सरल समूहित कीमत सूचकांक का सूत्र बताइए।
उत्तर
[latex]{ p }_{ 01 }=\cfrac { { \Sigma }p_{ 1 } }{ { \Sigma p }_{ 2 } } \times 100 [/latex]

प्रश्न 8.
एक भारित समूहित कीमत सूचकांक का सूत्र बताइए।
उत्तर
[latex]{ p }_{ 01 }=\cfrac { { \Sigma }p_{ 1 }{ q }_{ 1 } }{ { \Sigma p }_{ 2 }{ q }_{ 2 } } \times 100 [/latex]

प्रश्न 9.
मूल्यानुपातों के भारित सूचकांक का सूत्र बताइए।
उत्तर
[latex]{ p }_{ 01 }=\cfrac { \Sigma W(\cfrac { { P }_{ 1 } }{ { P }_{ 2 } } )\times 100 }{ \Sigma w } [/latex]

प्रश्न 10.
उपभोक्ता कीमत सूचकांक क्या मापता है?
उत्तर
यह फुटकर कीमतों में औसत परिवर्तन को मापता है।

प्रश्न 11.
उपभोक्ता कीमत सूचकांक बनाने की क्या उपयोगिता है?
उत्तर
उपभोक्ता कीमत सूचकांक (CPI) मजदूरी समझौता, आय-नीति, कीमत-नीति, किराया नियन्त्रण, कराधान तथा सामान्य आर्थिक नीतियों के निर्माण में सहायक होते हैं।

प्रश्न 12.
थोक कीमत सूचकांक का प्रयोग सामान्यतः किसलिए किया जाता है?
उत्तर
थोक कीमत सूचकांक (WPI) का प्रयोग सामान्य रूप से मुद्रा स्फीति को मापने के लिए किया जाता है।

प्रश्न 13.
मुद्रा की क्रय शक्ति एवं वास्तविक मजदूरी के परिकलन के लिए किस सूचकांक का प्रया किया जाता है?
उत्तर
उपभोक्ता कीमत सूचकांक।

प्रश्न 14.
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक की क्या उपयोगिता है?
उत्तर
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक हमें औद्योगिक क्षेत्र में उत्पादन में परिवर्तन के बारे में परिमाणात्मक अंक प्रदान करता है।

प्रश्न 15.
कृषि उत्पादन सूचकांक का क्या उपयोग है।
उत्तर
कृषि उत्पादन सूचकांक हमें कृषि क्षेत्र के निष्पादन के बारे में बताते हैं।

प्रश्न 16.
सेंसेक्स क्या है?
उत्तर
सेंसेक्स वह सूचक है जो कि भारतीय स्टॉक बाजार में होने वाले परिवर्तनों को दर्शाता है। इसका आधार-वर्ष 1978-79 है।

प्रश्न 17.
सूचकांकों की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर

  1. सूचकांक मुद्रा के मूल्य का निरपेक्ष माप न होकर सापेक्ष माप है।
  2. सूचकांकों को प्रतिशतों में व्यक्त किया जाता है।

प्रश्न 18.
सूचकांकों के दो लाभ बताइए।
उत्तर

  1. सामान्य मूल्य-स्तर में होने वाले परिवर्तनों को मापने के लिए सूचकांकों का प्रयोग किया जाता
  2. सूचकांक वास्तविक आय में होने वाले परिवर्तन का सूचक होता है।

प्रश्न 19.
सूचकांकों की दो सीमाएँ बताइए।
उत्तर

  1. सूचकांके निरपेक्ष परिवर्तनों की मापों की अपेक्षा सापेक्ष परिवर्तनों की ही माप करता है।
  2. विभिन्न सूचकांक अलग-अलग उद्देश्यों को पूरा करते हैं।

प्रश्न 20.
फिशर का आदर्श सूचकांक का सूत्र बताइए।
उत्तर
Fisher’s Ideal index
[latex]No.\sqrt { \cfrac { { \Sigma p }_{ 1 }{ q }_{ 0 } }{ \Sigma { p }_{ 0 }{ q }_{ 0 } } \times \cfrac { { \Sigma { p }_{ 1 } }{ q }_{ 1 } }{ \Sigma { p }_{ 0 }{ q }_{ 1 } } } \times 100 [/latex]

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सूचकांकों की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
सूचकांकों की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं

  1. सूचकांक मुद्रा के मूल्य का निरपेक्ष माप न होकर सापेक्ष माप है।
  2.  सूचकांकों को प्रतिशतों में व्यक्त किया जाता है।
  3. इनका प्रयोग ऐसे तथ्यों के परिवर्तनों को मापने के लिए किया जाता है, जिन्हें प्रत्यक्ष माप से नहीं मापा जा सकता।
  4. यह एक विशेष प्रकार का माध्य ही है।
  5. सूचकांक आर्थिक पहलू के उच्चावचों को संख्यात्मक रूप में ही माप सकता है।

प्रश्न 2.
सूचकांकों के प्रमुख लाभ (उपयोगिता) बताइए।
उत्तर
सूचकांकों के कुछ महत्त्वपूर्ण लाभ निम्नलिखित हैं-

  1. सूचकांकों द्वारा समय-समय पर कीमत स्तर में होने वाले परिवर्तन या मुद्रा के मूल्य की क्रय शक्ति में होने वाले परिवर्तन को मापा जा सकता है।
  2. सूचकांकों की सहायता से समाज में जीवन-स्तर के परिवर्तन का ज्ञान होता है। ये वास्तविक आय में परिवर्तन के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं।
  3. इनकी सहायता से वेतन-भत्तों में परिवर्तन करके वास्तविक आय को स्थिर रखने का प्रयास किया जाता है।
  4. व्यापारी व उत्पादक़ कीमत स्तर के परिवर्तन के अनुसार ही अपने उत्पादन तथा व्यापार की योजनाएँ तैयार करते हैं।
  5. आर्थिक स्थिति को ज्ञान प्राप्त करके ही आर्थिक नीतियों का निर्धारण किया जाता है। “
  6. सूचकांकों के आधार पर ही सरकार मौद्रिक व राजकोषीय नीति का प्रारूप तैयार करती है।

प्रश्न 3.
‘फिशर का सूचकांक एक आदर्श सूचकांक है।’ इस कथन के समर्थन में अपने तर्क दीजिए।
उत्तर
‘फिशर का सूचकांक एक आदर्श सूचकांक है। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते 
हैं

  1. यह परिवर्तनशील भारों पर आधारित है।
  2. इसमें आधार-वर्ष व चालू वर्ष दोनों की मात्राओं तथा मूल्यों को शामिल किया जाता है।
  3. यह गुणोत्तर माध्य पर आधारित है।
  4. यह ‘समय व्युत्क्रम परीक्षण’ तथा ‘तत्त्व व्युत्क्रम परीक्षण’ दोनों को पूरा करता है।

प्रश्न 4.
सूचकांक कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर
उद्देश्य के आधार पर सूचकांकों को दो भागों में बाँटा जा सकता है
1. थोक मूल्य सूचकांक तथा
2. जीवन-निर्वाह व्यय सूचकांक।
1. थोक मूल्य सूचकांक-
ये सूचकांक थोक मूल्यों के परिवर्तनों को प्रकट करने के लिए बनाए 
जाते हैं। इसमें किसी भी सामान्य वर्ष को आधार मानकर किसी भी अन्य चालू अवधि या अवधियों के मूल्यों में परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है। कुछ प्रतिनिधि वस्तुओं को चुनकर उनके थोक मूल्य लिए जाते हैं, आधार-वर्ष के मूल्यों को 100 मानकर चालू वर्ष या वर्षों के मूल्यानुपात (Price Relatives) निकाले जाते हैं तथा उनका माध्य ज्ञात किया जाता है। औसत मूल्यानुपात में परिवर्तन सामान्य मूल्य-स्तर में परिवर्तन को प्रदर्शित करते हैं।

2. जीवन-
निर्वाह व्यय सूचकांक-जीवन-निर्वाह व्यय सूचकांक किसी स्थान विशेष पर वर्ग विशेष के व्यक्तियों के निर्वाह व्यय में होने वाले परिवर्तनों की दिशा व मात्रा को प्रकट करते हैं। अत: इस सूचकांक को बनाने में उस विशिष्ट वर्ग द्वारा प्रयोग की जाने वाली प्रतिनिधि वस्तुओं को लेते हैं तथा उने सही फुटकर मूल्य ज्ञात करते हैं। विभिन्न वस्तुओं को उनके जीवन-निर्वाह में महत्त्व के अनुसार उचित भारांकन भी किया जाता है।

प्रश्न 5.
सूचकांक की रचना करते समय किन-किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए?
उत्तर
सूचकांक की रचना करते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए

  1. सूचकांक का उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए।
  2. सूचकांक के लिए मदों का चयन सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए ताकि ये उनका प्रतिनिधित्व कर सकें।
  3. आधार-वर्ष एक सामान्य वर्ष होना चाहिए और इसे नियमित रूप से अद्यतन किया जाना चाहिए।
  4. उद्देश्य के अनुरूप सूत्र को चयन किया जाना चाहिए।
  5. आँकड़ों के संग्रह में उचित सावधानी बरती जानी चाहिए।

प्रश्न 6.
संवेदी सूचकांक (Sensex) क्या है?
उत्तर
संवेदी सूचकांक (Sensex) वह सूचक है जो कि भारतीय स्टॉक बाजार में होने वाले परिवर्तनों को दर्शाता है। यह मुम्बई स्टॉक एक्सचेंज संवेदी सूचकांक का संक्षिप्त रूप है। इसका आधार वर्ष 1978-79 है। संवेदी सूचकांक का मान इस अवधि के सन्दर्भ में होता है। इसके अन्तर्गत 30 स्टॉक हैं जो अर्थव्यवस्था .
के 13 क्षेत्रकों का प्रतिनिधित्व करते हैं। संवेदी सूचकांक का ऊपर चढ़ना यह बताता है कि अर्थव्यवस्था की दशा अच्छी है, बाजार ठीक चल रहा है और निवेशकों के लाभ बढ़ रहे हैं। इसके विपरीत, सूचकांक का नीचे आना शेयर धारकों की हानि का सबब बनता है।

प्रश्न 7.
फिशर का आदर्श सूचकांक ‘समय उत्क्राम्यता परीक्षण पर कैसे खरा उतरता है?
उत्तर
समय उत्क्राम्यता परीक्षण के अनुसार यदि आधार-वर्ष के आधार पर प्रचलित वर्ष का सूचकांक (Poi) निकाला जाए और फिर प्रचलित वर्ष के आधार पर प्रचलित वर्ष का सूचकांक (Po) ज्ञात किया जाए तो ये दोनों एक-दूसरे के व्युत्क्रम होंगे अर्थात् इन दोनों का गुणनफल 1 होगा। सूत्रानुसार,
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 19

प्रश्न 8.
फिशर का आदर्श सूचकांक ‘तत्त्व उत्क्राम्यता परीक्षण पर कैसे खरा उतरता है?
उत्तर
तत्त्व क्राम्यता परीक्षण-इस परीक्षण के अनुसार, यदि ‘मूल्य’ के स्थान पर ‘मात्रा’ और ‘मात्रा के स्थान पर ‘मूल्य’ रखकर सूचकांक (q01) तैयार किया जाए तो उसका और मूल्य सूचकांक poi का गुणनफल चालू वर्ष के कुल मूल्य (Σp1q1) और आधार-वर्ष के कुल मूल्य (Σp0q0) के अनुपात के बराबर होना चाहिए।
सूत्रानुसार,
UP Board Solutions for Class 11 Economics Statistics for Economics 20

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सूचकांक क्या है? इनकी उपयोगिता तथा सीमाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर
सूचकांक : अर्थ एवं परिभाषाएँ
समाज में वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतों में सदैव परिवर्तन होते रहते हैं। वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में परिवर्तन होने के कारण मुद्रा का मूल्य भी परिवर्तित होता रहता है, जिससे समाज का प्रत्येक वर्ग प्रभावित होता है, फलस्वरूप कीमत-स्तर, उपभोग, जनसंख्या, बचत, निवेश, राष्ट्रीय आय, आयात-निर्यात, मजदूरी, ब्याज, किराया व लगान आदि चरों में सदैव परिवर्तन होते रहते हैं। अत: मुद्रा-मूल्य में हुए परिवर्तनों का माप करना व्यावहारिक दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण व उपयोगी है। इन परिवर्तनों को निरपेक्ष रूप से मापने का कोई साधन नहीं है; अतः इनको सापेक्ष माप लिया जाता है। सूचकांक विशिष्ट प्रकार के सापेक्ष माप होते हैं, जिनके आधार पर समंकों की उचित एवं स्पष्ट तुलना की जा सकती है।

सूचकांकों की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

  1. चैण्डलर के अनुसार-“कीमत का सूचकांक आधार-वर्ष की तुलना में किसी अन्य समय में कीमतों की औसत ऊँचाई को प्रकट करने वाली संख्या है।”
  2. डॉ० बाउले के शब्दों में- “सूचकांक की श्रेणी एक ऐसी श्रेणी होती है, जो अपने झुकाव तथा उच्चावचनों द्वारा जिस परिमाण से संबंधित है, में होने वाले परिवर्तनों को स्पष्ट करती है।”
  3. किनले के शब्दों में- “सूचकांक वह अंक है, जो किसी पूर्व निश्चित तिथि को चुनी वस्तुओं या | वस्तु-समूह के मूल्य का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे प्रामाणिक मानते हुए किसी बाद की तिथि को | उन्हीं वस्तुओं के मूल्य से तुलना करते हैं।”
  4. क्रॉक्सटन व काउडेन के अनुसार- “सूचकांक, संबंधित चर-मूल्यों के आकार में होने वाले |. अंतरों की माप करने के साधन हैं।”
  5. होरेस सेक्राइस्ट के शब्दों में- “सूचकांक अंकों की एक ऐसी श्रेणी है, जिसके द्वारा किसी भी तथ्य के परिमाण में होने वाले परिवर्तनों का समय या स्थान पर मापन किया जा सकता है।”

सूचकांकों की विशेषताएँ
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर सूचकांकों की निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं-

  1. सूचकांक मुद्रा के मूल्य का निरपेक्ष माप न होकर सापेक्ष माप है। ”
  2. सूचकांकों को प्रतिशतों में व्यक्त किया जाता है।
  3. इनका प्रयोग ऐसे तथ्यों के परिवर्तनों को मापने के लिए किया जाता है, जिन्हें प्रत्यक्ष माप से नहीं मापा जा सकता।
  4. यह एक विशेष प्रकार का माध्य ही है।
  5. सूचकांक आर्थिक पहलू के उच्चावचनों को संख्यात्मक रूप में ही माप सकता है।

सूचकांक की उपयोगिता 

सूचकांकों की सार्वभौमिक उपयोगिता है। ये व्यापारी, अर्थशास्त्री व राजनीतिज्ञों का पथ-प्रदर्शन करते हैं। और उन्हें भावी प्रवृत्तियों का अनुमान लगाने में सहायता करते हैं। कीमत, जीवन-निर्वाह, औद्योगिक उत्पादन, खाद्यान्न उत्पादन, निर्यात, आयात, लाभ, मुद्रा-पूर्ति, जनसंख्या, राष्ट्रीय आय, बजट घाटा अथवा आधिक्य आदि से संबंधित सूचकांक विभिन्न घटनाओं का सापेक्षिक माप प्रस्तुत करते हैं, इसीलिए सूचकांक ‘आर्थिक वायुमापक यंत्र’ (Economic Barometers) कहलाते हैं। व्यावहारिक रूप में सूचकांकों से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं

  1. मुद्रा के मूल्य की माप- सामान्य मूल्य-स्तर में होने वाले परिवर्तनों को मापने के लिए सूचकांकों का प्रयोग किया जाता है। सामान्य मूल्य-स्तर में होने वाले परिवर्तन से मुद्रा की क्रय-शक्ति में होने वाले परिवर्तनों का अनुमान लगाया जा सकता है।
  2. आर्थिक स्थिति की तुलना—रहन-सहन संबंधी सूचकांकों की तुलना करके समाज के किसी | वर्ग के रहन-सहने में होने वाले परिवर्तनों का अनुमान लगाया जा सकता है।
  3. मजदूरी निर्धारण में उपयोगिता– सूचकांक वास्तविक आय में होने वाले परिवर्तन का सूचक होता है। अतः मजदूरी व वेतन के निर्धारण में इनसे बहुत अधिक सहायता मिलती है। ”
  4. ऋणों के न्यायपूर्ण भुगतान का आधार- सूचकांकों की सहायता से मूल्य-स्तर में परिवर्तन का अनुमान लगाया जा सकता है और इसी आधार पर ऋणों की मात्रा में परिवर्तन करके उनका न्यायपूर्ण भुगतान किया जा सकता है। इससे किसी भी पक्ष को असंगत लाभ या हानि नहीं होती।
  5. अंतर्राष्ट्रीय तुलना करने में सहायक- सूचकांकों की सहायता से विभिन्न प्रकार की अंतर्राष्ट्रीय तुलनाएँ करना संभव है। विभिन्न देशों की मुद्राओं की क्रय-शक्ति में क्या परिवर्तन जहुए हैं, इसकी जानकारी व तुलना सूचकांकों की सहायता से की जा सकती है।
  6. देश के आर्थिक विकास का अनुमान- उत्पादन सुचकांक देश में उत्पादन संबंधी जानकारी देते हैं, जिनके आधार पर सरकार अपनी औद्योगिक नीति का निर्माण करती हैं सूचकांकों की सहायता से ही विदेशी व्यापार की स्थिति व देश में पूँजी व विनियोग की मात्रा को ज्ञान होता है।
  7. भावी प्रवृत्तियों का अनुमान- सूचकॉक न केवल वर्तमान परिवर्तनों को बताते हैं बल्कि इनकी सहायता से भविष्य के संबंध में भी महत्त्वपूर्ण अनुमान लगाए जा सकते हैं।
  8. जटिल तथ्यों को सरल बनाना– सूचकांकों की सहायता से ऐसे जटिल तथ्यों में होने वाले परिवर्तनों की माप भी की जा सकती है, जिनकी माप किसी अन्य साधन से संभव नहीं है।
  9. नियंत्रण एवं नीतियाँ- सूचकांकों के आधार पर ही सरकार आर्थिक नियोजन व नियंत्रण संबंधी नीतियाँ बनाती है। 

सूचकांकों की सीमाएँ

सबसे अधिक उपयोगी सांख्यिकीय विधि होते हुए भी सूचकांक परिवर्तनों की एक अपूर्ण माप है। इसकी प्रमुख सीमाएँ निम्मलिखित हैं

  1. सापेक्ष परिवर्तनों की अनुमानित माप- सूचकांक निरपेक्ष परिवर्तनों की मापों की अपेक्षा सापेक्ष परिवर्तनों की ही माप करता है और वह भी मात्र अनुमान के रूप में। वास्तव में, सूचकांक केवल सामान्य प्रवृत्तियों की ओर ही संकेत करते हैं।
  2. शुद्धता की कमी- सूचकांक बनाते समय समूह की प्रत्येक इकाई को शामिल नहीं किया जाता है। वरन् इसके लिए कुछ प्रतिनिधि इकाइयों का ही चयन किया जाता है। इससे प्रतिदर्श अपर्याप्त और अप्रतिनिधि परिणामों की सत्यता कम हो जाती है।
  3. उद्देश्य में अंतर- विभिन्न सूचकांक अलग-अलग उद्देश्यों को पूरा करते हैं। एक सूचकांक, जो एक उद्देश्य के लिए उपयुक्त हो सकता है, अन्य उद्देश्यों के लिए अनुपयुक्त हो सकता है।कोई भी सूचकांक सार्व-उद्देशीय नहीं होता।
  4. अंतर्राष्ट्रीय तुलना कठिन- सूचकांकों की सहायता से दो देशों के संबंध में किसी प्रकार की तुलना करना काफी कठिन होता है क्योंकि सूचकांकों की निर्माण-विधि, उनका आधार-वर्ष तथाप्रतिनिधि वस्तुओं की सूची विभिन्न देशों में भिन्न-भिन्न होती है।
  5. विभिन्न समय में तुलना करना कठिन– लोगों के द्वारा उपभोग की जाने वाली वस्तुओं में | परिवर्तन होता रहता है। अतः सूचकांकों की सहायता से विभिन्न समयों में तुलना करना संभव नहींहोता है।
  6. भार निर्धारण अवैज्ञानिक- भारित सूचकांकों में भार निर्धारण मनमाना तथा अवैज्ञानिक होता है। भिन्न-भिन्न वर्षों में एक ही वस्तु के भार बदल जाते हैं, जिसके कारण परिणामों में अंतर आ जाता है।

प्रश्न 2.
सूचकांक रचना संबंधी समस्याओं का विवेचन कीजिए।
उत्तर
सूचकांक रचना संबंधी प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं
1. सूचकांक का उद्देश्य,
2. पदों या वस्तुओं का चुनाव,
3. मूल्य उद्धरण,
4. आधार-वर्ष का चुनाव और सूचकांकों का परिगणन,
5. माध्य का चुनाव,
6. भारांकन विधि।।
1. सूचकांक का उद्देश्य
सूचकांक रचना से पूर्व उसके उद्देश्य को निश्चित कर लेना चाहिए क्योंकि वस्तुओं के चुनाव, उनके मूल्य उद्धरण तथा भारांकन आदि का निर्धारण सूचकांक के उद्देश्य पर ही निर्भर करता है। उदाहरण के लिए एक सूक्ष्मग्राही मूल्य सूचकांक में केवल उन वस्तुओं का समावेश किया जाना चाहिए, जिनके मूल्यों में तेजी से परिवर्तन होते रहते हैं। इसके विपरीत, सामान्य उद्देश्य वाले मूल्य सूचकांक में अधिकाधिक वस्तुओं का समावेश किया जाना चाहिए ताकि वह समाज में सभी वर्गों का सही-सही प्रतिनिधित्व कर सके।

2. पदों या वस्तुओं का चुनाव
चूंकि किसी भी एक सूचकांक में समस्त पदों या वस्तुओं का चुना जाना संभव नहीं है; अत: कुछ प्रतिनिधि वस्तुओं का चुनाव कर लिया जाना चाहिए। इस संबंध में उठने वाले स्वाभाविक प्रश्न इस प्रकार हैं
(अ) कौन-सी वस्तुएँ चुनी जाएँ- चुनी जाने वाली वस्तुओं में निम्नलिखित गुण होने चाहिए|

  1.  वस्तुएँ ऐसी होनी चाहिए, जो अपने वर्ग का सच्चे अर्थों में प्रतिनिधित्व कर सकें।
  2. वस्तुएँ ऐसी होनी चाहिए, जो सरलता से पहचानी जा सकें तथा जिनका स्पष्ट रूप से वर्णन किया | जा सके।
  3. चुनी हुई वस्तुएँ प्रमापित व एकरूप होनी चाहिए।
  4. वस्तुएँ लोकप्रिय होनी चाहिए।

(ब) वस्तुओं की संख्या कितनी हो-सामान्यत:
सूचकांक में जितनी अधिक वस्तुएँ सम्मिलित की जाएँगी, वह उतना ही अधिक शुद्ध व विश्वसनीय माना जाएगा, परंतु बहुत अधिक वस्तुओं को सूचकांक में सम्मिलित करना भी संभव नहीं है। वास्तव में, संख्या का निर्धारण सूचकांक के उद्देश्य, उपलब्ध समय, धन तथा वांछित शुद्धता पर अधिक निर्भर करता है। सामान्य परम्परा यह है कि सूचकांक में 25 से 50 वस्तुओं तक का चयन किया जाता है।

(स) वस्तुएँ किस किस्म की हों
सूचकांकों में ऐसी किस्म की वस्तुएँ शामिल की जानी चाहिए, जो सबसे अधिक प्रचलित हों; प्रमापित हों तथा गुणों में स्थिर हों।

(द) वस्तुओं का किस प्रकार वर्गीकरण किया जाए-
चुनी हुई वस्तुओं को सजातीयता के आधार पर कुछ निश्चित वर्गों और उपवर्गों में विभाजित कर देना चाहिए, जिससे सम्पूर्ण मूल्य सूचकांक के साथ-साथ वर्ग सूचकांक भी ज्ञात हो जाए।

3. मूल्य उद्धरण
मूल्य उद्धरण लेते समय निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए
(अ) थोक या फुटकर मूल्य सामान्यतः
मूल्य सूचकांकों की रचना में वस्तुओं के थोक मूल्य ही लिए जाते हैं क्योंकि वे फुटकर मूल्यों की अपेक्षा कम परिवर्तनशील होते हैं, स्थान-स्थान के आधार पर उनमें कम अंतर होते हैं और उन्हें ज्ञात करना भी सरल होता है।

(ब) द्रव्य-मूल्य अथवा वस्तु-मूल्य-
सूचकांकों के लिए मूल्य उद्धरण द्रव्य के रूप में ही व्यक्त किए। जाने चाहिए, वस्तुओं के परिमाण के रूप में नहीं। यदि मूल्य उद्धरण वस्तु-मूल्य के रूप में हों तो उन्हें पहले द्रव्य-मूल्यों के रूप में बदल लेना चाहिए।

(स) मूल्य उद्धरणों की संख्या व आवृत्ति– सूचकांक निर्माण से पूर्व यह भी तय कर लेना चाहिए,कि मूल्य कितनी बार और किस अंतराल में लिए जाने हैं। मूल्य उद्धरणों की आवृत्ति सूचकांक के उद्देश्य, अवधि, उपलब्ध साधन व शुद्धता के स्तर पर निर्भर होती है।

(द) मूल्य उद्धरण प्राप्ति के स्थान व साधन- मूल्य उन मण्डियों से प्राप्त किए जाने चाहिए, जहाँ पर वस्तुओं का बड़ी मात्रा में क्रय-विक्रय होता हो लेकिन जीवन-निर्वाह व्यय सूचकांक बनाने के लिए उसी स्थान के मूल्यों को प्राप्त करना चाहिए। मूल्य उद्धरण के स्रोत निष्पक्ष, विश्वसनीय तथा उपयुक्त होने चाहिए।

4. आधार-वर्ष का चुनाव और सूचकांकों का परिगणन
आधार-वर्ष से हमारा आशय उस वर्ष विशेष से होता है, जिसको आधार मानकर हम आर्थिक क्रियाकलापों की तुलना करते हैं। अतः आधार-वर्ष का चुनाव अत्यंत सतर्कतापूर्वक करना चाहिए। यथासंभव आधार-वर्ष

  1. सामान्य होना चाहिए,
  2. वास्तविक होना चाहिए,
  3. उस काल की समस्त सूचनाएँ उपलब्ध होनी चाहिए तथा
  4. वह वर्ष अधिक पुराना नहीं होना चाहिए। आधार वर्ष निश्चित करने की निम्नलिखित दो रीतियाँ हैं

(अ) स्थिर आधार रीति,
(ब) श्रृंखला आधार रीति।
(अ) स्थिर आधार रीति–इस रीति के अनुसार सर्वप्रथम एक सामान्य वर्ष चुन लिया जाता है और फिर अन्य वर्षों के मूल्य-स्तर की तुलना उस स्थिर वर्ष के आधार पर की जाती है। स्थिर आधार-वर्षे दो प्रकार का हो सकता है

  1. एकवर्षीय आधार-एकवर्षीय आधार में जो वर्ष आधार-वर्ष के रूप में चुना जाता है, अन्ये वर्षों के मूल्यों की तुलना उस स्थिर वर्ष के आधार पर की जाती है।
  2. बहुवर्षीय मध्य आधार-कभी-कभी कोई अंक वर्ष ऐसा नहीं होता, जो सामान्य हो और जिसे स्थिर आधार माना जा सके। ऐसी दशा में अनेक ऐसे वर्ष छाँट लिए जाते हैं, जिनमें कम उतार-चढ़ाव हुए हों और फिर उन वर्षों के मूल्य-स्तर का समान्तर माध्य निकालकर उन माध्य मूल्यों को आधार माना जाता है।

आधार- वर्ष को निश्चित कर लेने के उपरांत चालू वर्ष के सूचकांक तैयार करने के लिए मूल्यानुपात निकाले जाते हैं। इसके लिए आधार-वर्ष के मूल्य को 100 मानकर, चालू वर्ष के मूल्यों का निकाला गया प्रतिशत मूल्यानुपात’ कहलाता है।
सूत्रानुसार,
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 5. माध्य का चुनाव
सूचकांक विभिन्न वस्तुओं के मूल्यानुपातों का माध्य है। अतः यह निर्धारित करना आवश्यक है कि सूचकांक रचना में किस माध्ये का प्रयोग किया जाए। व्यवहार में माध्यिका समान्तर माध्य अथवा गुणोत्तर माध्य में से किसी एक का प्रयोग करना उपयुक्त रहता है।

6. भारांकन विधि
व्यवहार में भिन्न-भिन्न वस्तुओं का भिन्न-भिन्न सापेक्षिक महत्त्व होता है। उदाहरण के लिए उपभोग के क्षेत्र में लोहे की तुलना में नमक का महत्त्व अधिक है। इसी प्रकार उत्पादन के क्षेत्र में टी०वी० की तुलना में कपड़े का महत्त्व अधिक है। अत: विभिन्न वस्तुओं अथवा पदों के तुलनात्मक महत्त्व को प्रकट करने के लिए किसी सुनिश्चित आधार पर भारों का प्रयोग किया जाता है। ऐसे सूचकांक ‘भारित सूचकांक कहलाते हैं।

प्रश्न 3.
साधारण सूचकांक रचना की

  1. सरल समूहीकरण विधि व
  2. सरल मूल्य अनुपात माध्य विधि को उदाहरणों की सहायता से समझाइए।

उत्तर
साधारण सूचकांक बनाने की दो मुख्य विधियाँ हैं|
1. सरल समूहीकरण विधि (Simple Aggregative Method),
2. सरल मूल्य अनुपात विधि (Simple Average of Price Relative Method)। 1. सरल समूहीकरण विधि-इस विधि में प्रचलित वर्ष के विभिन्न वस्तुओं के मूल्यों के जोड़ को आधार वर्ष के जोड़ से भाग देकर 100 से गुणा कर दिया जाता है। सूत्र रूप में,
[latex]{ p }_{ 01 }=\cfrac { \Sigma { p }_{ 1 } }{ { \Sigma p }_{ 0 } } \times 100 [/latex]

यहाँ, P01 = वर्तमान वर्ष का मूल्य सूचकांक |
∑P1 = वर्तमान वर्ष की विभिन्न वस्तुओं के मूल्यों का योग
P0= आधारे-वर्ष की उन्हीं वस्तुओं के मूल्यों का योग
उदाहरण
1. निम्नांकित आँकड़ों से सरल समूहीकरण विधि द्वारा 2011 को आधार-वर्ष मानकर वर्ष 2015 के मूल्य सूचकांक तैयार कीजिए।
वस्तुएँ :
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यह विधि अत्यंत सरल है किंतु इस विधि का प्रयोग तभी किया जाना चाहिए जब सभी वस्तुओं के मूल्य एक ही इकाई के रूप में व्यक्त किए गए हों। अन्यथा निकाले गए निष्कर्ष भ्रामक होंगे।

2. सरल मूल्य अनुपात माध्य विधि— इस विधि के अनुसार सबसे पहले प्रत्येक वस्तु का मूल्य अनुपात निकाला जाता है। किसी वस्तु का मूल्य अनुपात चालू वर्ष तथा आधार-वर्ष की कीमत का प्रतिशत अनुपात है। इसमें सभी वस्तुओं को शामिल नहीं किया जाता अपितु केवल उन्हीं वस्तुओं का न्यादर्श लिया जाता है जो समग्र (Variance) की विशिष्टता को दर्शाते हैं।
स्थिर आधार के मूल्य को 100 मानकर निकाला गया प्रचलित वर्ष का प्रतिशत ही मूल्यानुपात कहलाता है। अतः
[latex]{ p }_{ 01 }=\cfrac { { p }_{ 1 } }{ { p }_{ 0 } } \times 100 [/latex]
यहाँ, P01= मूल्य अनुपात
P1 = वर्तमान वर्ष की कीमत
P0= आधार-वर्ष की कीमत
निम्नलिखित सूत्र की सहायता से वर्तमान वर्ष का कीमत सूचकांक ज्ञात किया जा सकता है-
[latex]{ p }_{ 01 }=\cfrac { \Sigma (\cfrac { { p }_{ 1 } }{ { p }_{ 2 } } \times 100) }{ N } [/latex]
यहाँ, R x 100 = मूल्य अनुपात
N = वस्तुओं की संख्या
P1 = चालू वर्ष के मूल्य
P0= आधार-वर्ष के मूल्य
उदाहरण
1.निम्नांकित आँकड़ों की सहायता से सरल मूल्यानुपात माध्य विधि द्वारा 2011 को आधार-वर्ष मानते हुए 2015 के लिए मूल्य सूचकांक ज्ञात कीजिए
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प्रश्न 4.
भारित सूचकांक से क्या आशय है? भारित सूचकांक के निर्माण की विधियों को उदाहरण की सहायता से समझाइए।
उत्तर

भारित सूचकांक का अर्थ

भारित सूचकांक वे सूचकांक हैं जिनमें श्रृंखला के विभिन्न मदों को उनके सापेक्षिक महत्त्व के आधार पर विभिन्न भार दिए जाते हैं। इसलिए भारित सूचकांक विभिन्न वस्तुओं की कीमतों का भारित औसत है। उदाहरण-मानी एक उपभोक्ता खाद्यान्नों पर कपड़े की तुलना में तीन गुणा अधिक व्यय करता है तो कपड़े को 1 व खाद्यान्नों को 3 भार दिया जाएगा।

भारित सूचकांक के निर्माण की विधियाँ

भारित सूचकांक के निर्माण की दो विधियाँ हैं
1. भारित औसत मूल्य अनुपात माध्य विधि
2. भारित समूही विधि ।

1. भारित औसत मूल्य अनुपात माध्य विधि— इस विधि द्वारा भारित सूचकांक को ज्ञात करने के लिए, विभिन्न वस्तुओं के मूल्य अनुपातों को उनके भार से गुणा करके गुणनफल के योग को भार के योग से भाग दे दिया जाता है। वस्तुओं को भार उनकी मात्रा के आधार पर दिया जाता है। सूत्र रूप में,
[latex]{ p }_{ 01 }=\cfrac { \Sigma RW }{ \Sigma W } [/latex]

यहाँ,
P01 = आधार-वर्ष के मूल्यों के आधार पर वर्तमान वर्ष के मूल्यों का सूचकांक
w = भार
R = मूल्य अनुपात

उदाहरण 1. निम्नलिखित आँकड़ों की सहायता से मूल्य अनुपात विधि से 2011 को आधार-वर्ष मानकर 2016 का भारित सूचकांक ज्ञात करेंवस्तुएँ
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2. भारित समूही विधि— इस विधि में विभिन्न वस्तुओं को उनकी खरीदी हुई मात्राओं के आधार पर भार प्रदान किया जाता है। विभिन्न विद्वानों ने सूचकांकों का निर्माण करने के लिए भार देने की अलग-अलग विधियों का वर्णन किया है। कुछ प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं|
(i) लास्पीयर की विधि (Laspeyre’s Method)-लास्पीयर के आधार-वर्ष की मात्रा (q0) के आधार पर भार प्रदान किए हैं। सूत्रानुसार,
[latex]{ p }_{ 01 }=\cfrac { { \Sigma }p_{ 1 }{ q }_{ 0 } }{ { \Sigma p }_{ 0}{ q }_{ 0 } } \times 100 [/latex]

(ii) पाश्चे की विधि (Paasche’s Method)- पाश्चे ने चालू वर्ष की मात्रा (q1) के आधार पर भार प्रदान किए हैं। सूत्रानुसार,
[latex]{ p }_{ 01 }=\cfrac { { \Sigma }p_{ 1 }{ q }_{ 1 } }{ { \Sigma p }_{ 0}{ q }_{ 1 } } \times 100 [/latex]

(iii) फिशर की विधि (Fisher’s Method)- फिशर ने आधार-वर्ष तथा चालू वर्ष दोनों की मात्राओं (q0 व q1) के आधार पर भार प्रदान किए हैं। सूत्रानुसार,
p01 [latex]\sqrt { \cfrac { { \Sigma p }_{ 1 }{ q }_{ 0 } }{ \Sigma { p }_{ 0 }{ q }_{ 0 } } \times \cfrac { { \Sigma { p }_{ 1 } }{ q }_{ 1 } }{ \Sigma { p }_{ 0 }{ q }_{ 1 } } } \times 100 [/latex]

उदाहरण-2011 को आधार-वर्ष मानते हुए निम्नांकित आँकड़ों के कीमत सूचकांक वर्ष 2016 ज्ञात कीजिए-
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प्रश्न 5.
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक अथवा निर्वाह व्यय सूचकांक से क्या आशय है? इसके निर्माण की विधि उदाहरण की सहायता से समझाइए।
उत्तर
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक अथवा निर्वाह व्यय सूचकांक का अर्थ उपभोक्ता मूल्य सूचकांक वह सूचकांक है जो विशिष्ट वर्ग के उपभोक्ताओं द्वारा उपभोग की जाने वाली वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतों में आधार-वर्ष की तुलना में चालू वर्ष में होने वाले परिवर्तन को मापता है। इनका निर्माण विभिन्न स्थानों में रहने वाले उपभोकॅता वर्गों पर फुटकर मूल्यों में होने वाले औसत परिवर्तनों के प्रभावों को मापने के लिए किया जाता है। चूंकि ये किसी वर्ग विशेष के लोगों की निर्वाह लागत में होने वाले परिवर्तन की दिशा तथा मात्रा को प्रकट करते हैं, इसलिए इन्हें निर्वाह व्यय सूचकांक कहा जाता है। भारत में मुख्यत: निम्नलिखित समूहों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक बनाए जाते हैं

  • औद्योगिक श्रमिक,
  • शहरी गैर-शारीरिक कर्मचारी तथा
  • कृषि श्रमिक

जीवन-निर्वाह व्यय सूचकांकों की रचना

जीवन-निर्वाह व्यय सूचकांकों की रचना में निम्नलिखित प्रमुख कार्य करने पड़ते हैं

1. सजातीय वर्ग का चुनाव- सर्वप्रथम यह निश्चित किया जाता है कि सूचकांक किस विशेष वर्ग के लिए बनाए जाते हैं। वर्ग सजातीय होना चाहिए। सजातीय वर्ग का चुनाव मुख्यत: निम्नलिखित आधारों पर किया जाता है-

  • आय की समानता,
  • पेशे की समानता,
  • स्थान की समानता।

2. वस्तुओं का चुनाव- विभिन्न वर्गों के लोग विभिन्न प्रकार की वस्तुओं का प्रयोग करते हैं। अत:
जीवन-निर्वाह व्यय सूचकांक बनाने के लिए वस्तुएँ वही होनी चाहिए, जिनका उपभोग उस वर्ग के लोग करते हैं, जिनके लिए जीवन-निर्वाह व्यय सूचकांक बनाना है। वस्तुओं को मुख्यत: निम्नलिखित वर्गों में बाँट लेते हैं

  • खाद्य-पदार्थ,
  • वस्त्र,
  • ईंधन तथा प्रकाश,
  • मकान किराया,
  • अन्य।

3. मूल्य उद्धरण– प्रायः चुनी हुई वस्तुओं के फुटकर मूल्य प्राप्त करने पड़ते हैं। ये मूल्य उस स्थान के बाजार मूल्य होने चाहिए, जहाँ से वह वर्ग उन वस्तुओं को खरीदता है। चूंकि स्थान-स्थान पर फुटकर मूल्यों में बहुत अंतर होता है; अत; उन्हें उस स्थान की उच्चकोटि की पत्रिकाओं, सरकारी एवं अर्द्ध-सरकारी प्रकाशनों, व्यापार परिषदों अथवा प्रतिष्ठित व्यापारियों की सहायता से प्राप्त करना चाहिए।

4. भारांकन- विभिन्न वस्तुओं को उनके महत्त्व के अनुसार भारांकित करना चाहिए। वास्तव में,सभी वस्तुएँ बराबर महत्त्व की नहीं होतीं। भार निम्नलिखित दो प्रकारों में से किसी एक प्रकार से दिया जा सकता है-
(अ) समूही आय विधि- भार देने की इस रीति की प्रमुख प्रक्रियाएँ निम्नलिखित हैं|

  1. प्रत्येक वस्तु से चालू वर्ष के मूल्य में आधार-वर्ष की मात्रा का गुणा करते हैं।
    (p1 q0
    )
  2. प्रत्येक वस्तु के आधार-वर्ष के मूल्य में आधार-वर्ष की मात्रा का गुणा करते हैं।
    (p0 q0)
  3. दोनों वर्षों के गुणनफलों को अलग-अलग जोड़ लेते हैं।
  4. चालू वर्ष के गुणनफलों के योग में आधार-वर्ष के गुणनफलों के योग का भाग दे देते हैं।
  5. प्राप्त भजनफल में 100 का गुणा कर देते हैं।
    सूत्रानुसार,

[latex]{ p }_{ 01 }=\cfrac { { \Sigma }p_{ 1 }{ q }_{ 0 } }{ { \Sigma p }_{ 0}{ q }_{ 0 } } \times 100 [/latex]

उदाहरण
1. प्रदत्त आँकड़ों की सहायता से 2011 को आधार-वर्ष मानकर 2016 के लिए जीवन-निर्वाह व्यय सूचकांक (Cost of Living Indexed Number) तैयार कीजिए ।
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हल
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(ब) पारिवारिक बजट या भारित मूल्यानुपात विधि-इस विधि के अनुसार भार देने की प्रक्रिया निम्नलिखित है
(i) प्रत्येक वस्तु के आधार- वर्ष के मूल्य और आधार-वर्ष में उपभोग की गई मात्रा का गुणा करते हैं।
[latex](\cfrac { { p }_{ 1 } }{ { p }_{ 0 } } \times 100) [/latex]
(ii) प्रत्येक वस्तु के आधार-वर्ष के मूल्य और आधार-वर्ष में उपभोग की गई मात्रा का गुणा करते हैं।
(p0 q0)
(iii) प्रत्येक मूल्यानुपात को उसके भार से गुणा करते हैं। (RW)।
(iv) इन गुणनफलों का योग कर लेते हैं (ΣRW)।
(v) भारों का योग निकाल लेते हैं (Σw)।
(vi) गुणनफलों के योग में भारों के योग का भाग दे देते हैं।
[latex](\cfrac { \Sigma RW }{ \Sigma W } )[/latex]
प्राप्त भजनफल सूचकांक होता है। सूत्र रूप में,
Index No.[latex]\cfrac { \Sigma RW }{ \Sigma W } [/latex]

उदाहरण
2.
निम्नलिखित आँकड़ों की सहायता से 2011 को आधार-वर्ष मानकर 2015 और 2016 के लिए जीवन-निर्वाह व्यय सूचकांक तैयार कीजिए
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प्रश्न 6.
औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक क्या है? इसकी निर्माण विधि समझाइए।
उत्तर-

औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक का अर्थ

औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक एक देश में किसी आधार-वर्ष की तुलना में चालू वर्ष में औद्योगिक उत्पादन की मात्रा में होने वाली वृद्धि या कमी का माप करता है। इनकी सहायता से हम औद्योगिक उत्पादन की मात्रा में होने वाले परिवर्तनों को मापते हैं, मूल्यों में होने वाले परिवर्तनों को नहीं।

औद्योगिक उत्पादन के सूचकांक की रचना

औद्योगिक उत्पादन के सूचकांक की रचना निम्नलिखित चरणों में की जाती है
1. उद्योगों को समान्यतया तीन वर्गों में बाँट लिया जाता है
(i) खनन,
(ii) विनिर्माण तथा
(iii) विद्युत।
2. उत्पादन संबंधी आँकड़े मासिक, त्रैमासिक या वार्षिक आधार पर एकत्र कर लिए जाते हैं।
3. विभिन्न वर्गों को उपयुक्त भार दिया जाता है। भारत में वर्तमान में इस प्रकार भार दिए गए हैं
(i) खनन = 10.47;
(ii) विनिर्माण = 79.36 तथा
(iii) विद्युत = 10.17
4. निम्नांकित सूत्र का प्रयोग किया जाता है-
[latex]IP=\left[ \cfrac { \Sigma (\cfrac { { q }_{ 1 } }{ { q }_{ 2 } } )W }{ \Sigma w } \right] [/latex]
यहाँ, IP = औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक |
q1 = चालू वर्ष में उत्पादन का स्तर ।
q0= आधार-वर्ष में उत्पादन का स्तर
W = भार।
उदाहरण-निम्नलिखित आँकड़ों की सहायता से औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक ज्ञात कीजिए
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हल
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UP Board Solutions for Class 11 Sociology Understanding Society Chapter 5 Indian Sociologists

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Understanding Society Chapter 5 Indian Sociologists (भारतीय समाजशास्त्री) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sociology Understanding Society Chapter 5 Indian Sociologists (भारतीय समाजशास्त्री).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sociology
Chapter Chapter 5
Chapter Name Indian Sociologists
Number of Questions Solved 57
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Understanding Society Chapter 5 Indian Sociologists (भारतीय समाजशास्त्री)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अनन्तकृष्ण अय्यर तथा शरतचंद्र रॉय ने सामाजिक मानवविज्ञान के अध्ययन का अभ्यास कैसे किया?
उत्तर
एल० के० अनन्तकृष्ण अय्यर (1861-1937 ई०) तथा शरदचंद्र रॉय (1871-1942 ई०) को भारत के अग्रणी विद्वानों में माना जाता है जिन्होंने समाजशास्त्रीय प्रश्नों को आकार प्रदान किया। उन्होंने एक ऐसे विषय पर कार्य करना प्रारंभ किया जो भारत में न तो अभी तक विद्यमान था और न ही कोई ऐसी संस्था थी जो इसे किसी विशेष प्रकार का संरक्षण देती। अय्यर ने अपने व्यवसाय की शुरुआत एक क्लर्क के रूप में की; फिर स्कूली शिक्षक और उसके बाद कोचीन रजवाड़े के महाविद्यालय में शिक्षक के रूप में नियुक्त हुए।

यह रजवाड़ा आज केरल राज्य का एक भाग है। 1902 ई० में कोचीन के दीवान द्वारा उन्हें राज्य के नृजातीय सर्वेक्षण में सहायता के लिए कहा गया। ब्रिटिश सरकार इसी प्रकार के सर्वेक्षण सभी रजवाड़ों तथा अन्य इलाकों में कराना चाहती थी जो प्रत्यक्ष रूप से उनके नियंत्रण में आते थे। अय्यर ने यह कार्य पूर्णरूपेण एक स्वयंसेवी के रूप में अवैतनिक सुपरिंटेंडेंट के रूप में संपन्न किया। उनके इस कार्य की काफी सराहना की गई तथा तत्पश्चात् उन्हें मैसूर रजवाड़े के इसी प्रकार के सर्वेक्षण हेतु नियुक्त किया गया। इन सर्वेक्षणों से वे राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान् बन गए।

कानूनविद् शरत्चंद्र रॉय भी अग्रणी समाज-वैज्ञानिक माने जाते हैं। उन्होंने कुछ अवधि तक कानून की प्रैक्टिस करने के पश्चात् 1898 ई० में राँची के एक ईसाई मिशनरी विद्यालय में अंग्रेजी के शिक्षक के रूप में कार्यभार सँभाला। कुछ वर्षों पश्चात् उन्होंने पुनः राँची की अदालत में कानून की प्रैक्टिस प्रारंभ कर दी। 44 वर्ष राँची में निवास के दौरान उन्होंने छोटा-नागपुर प्रदेश (आज को झारखंड) में रहने वाली जनजातियों की संस्कृति तथा समाज का अध्ययन किया तथा वे इसके विशेषज्ञ बन गए। रॉय की रुचि जनजातीय समाज में, अदालत में दुभाषिए के रूप में उनकी नियुक्ति के कारण भी हुई। अदालत में वे जनजातियों की परंपरा तथा कानूनों को दुभाषित करते थे। उन्होंने जनजातीय क्षेत्रों का व्यापक भ्रमण किया तथा जनजातियों को गहराई से समझने का प्रयास किया। उन्होंने ओराँव, मुंडा तथा खरिया जनजातियों पर भी काफी कुछ लिखा तथा रॉय भारत तथा ब्रिटेन के छोटा-नागपुर के मानवविज्ञानी विशेषज्ञ माने जाने लगे।

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प्रश्न 2.
जनजातीय समुदायों को कैसे जोड़ा जाए’-इस विवाद के दोनों पक्षों के क्या तर्क थे?
उत्तर
1930 एवं 1940 के दशकों में भारत में इस विषय पर वाद-विवाद प्रारंभ हुआ कि भारत में जनजातीय समाज का क्या स्थान हो और राज्य उनसे किस प्रकार का व्यवहार करे। एक तरफ अंग्रेज प्रशासक एवं मानव-वैज्ञानिक थे जिनका मत था कि जनजातियों को संरक्षण देने में राज्य को आगे आना चाहिए ताकि वे अपनी जीवन-पद्धति तथा संस्कृति को बनाए रख सकें। ऐसे विचारकों को यह तर्क था कि यदि सीधे-सादे जनजातीय लोग हिंदू समाज तथा संस्कृति की मुख्य धारा में सम्मिलित हो जाएँगे तो उनका न केवल सांस्कृतिक रूप से पतन होगा, अपितु वे शोषण से भी नहीं बच पाएँगे। इसलिए ऐसे विचारक जनजातियों को अलग-थलग रखने के पक्ष में थे ताकि उन्हें अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने का अवसर मिलता रहे।

जनजातियों को अलग-थलग रखने के विरुद्ध दूसरी तरफ ऐसे राष्ट्रवादी भारतीय भी थे जिनका यह मत था कि जनजातियों के पिछड़ेपन को आदिम संस्कृति के संग्रहालय’ के रूप में ही बनाए नहीं रखा जाना चाहिए। घूर्ये राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक थे तथा उन्होंने जनजातियों को ‘पिछड़े हिंदू समूह’ के रूप में पहचाने जाने पर बल दिया। उन्होंने अनेक ऐसे साक्ष्य भी दिए जिनसे यह प्रमाणित होता था कि वे लंबे समय तक हिंदुत्व से आपसी अंत:क्रिया द्वारा जुड़े हुए थे। घूयें जैसे राष्ट्रवादी विचारकों का मत था कि जनजातियों को राष्ट्रीय विचारधारा में सम्मिलित किया जाना चाहिए। ऐसा करने में होने वाले दुष्परिणाम मात्र जनजातीय संस्कृति तक ही सीमित न होकर भारतीय समाज के सभी पिछड़े तथा दलित वर्गों में समान रूप से देखे जा सकते हैं। विकास के मार्ग में आने वाली ये वे आवश्यक कठिनाइयाँ हैं जिनसे बचा नहीं जा सकता।

प्रश्न 3.
भारत में प्रजाति तथा जाति के संबंधों पर हरबर्ट रिजले तथा जी०एस० घूर्ये की स्थिति की रूपरेखा दें।
उत्तर
ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारी हरबर्ट रिजले मानवविज्ञान के मामलों में अत्यधिक रुचि रखते थे। उन्होंने प्रजातियों का विभाजन उनकी विशिष्ट शारीरिक विशेषताओं के आधार पर किया। उनके अनुसार भारत विभिन्न प्रजातियों के उविकास के अध्ययन की एक विशिष्ट प्रयोगशाला’ था तथा काफी लम्बे समय तक इन प्रजातियों में परस्पर विवाह सम्भव नहीं था क्योकि प्रत्येक प्रजाति अंतर्विवाह पर बल देती थी। जैसे-जैसे विवाह संबंधी यह नियम शिथिल हुआ, वैसे-वैसे विभिन्न प्रजातियों में विवाह होने लगे तथा जाति प्रथा की उत्पत्ति इसी का परिणाम है। अन्य शब्दों में यह कहा जा सकता है कि रिजले के अनुसार जाति व्यवस्था की उत्पत्ति प्रजातीय कारकों में निहित है। उन्होंने अपने मत की पुष्टि में यह तर्क दिया कि उच्च जातियाँ आर्य प्रजाति की विशिष्टताओं से मिलती हैं, जबकि निम्न जातियों में मंगोल तथा अन्य प्रजातियों के गुण देखे जा सकते हैं।

भारत में जी०एस० घुर्ये को जाति तथा प्रजाति का अध्ययन करने वाला प्रमुख विद्वान् माना जाता है। 1932 ई० में प्रकाशित उनकी पुस्तक कास्ट एण्ड रेस इन इंडिया’ इस विषय पर लिखी गई एक आधिकारिक पुस्तक मानी जाती है। इस पुस्तक में उन्होंने जाति तथा प्रजाति के संबंधो पर प्रचलित सिद्धांतों की विस्तारपूर्वक आलोचना की। घूर्ये; रिजले के इन विचारों को अंशत: सत्य मानते थे तथा इसलिए उनसे पूरी तरह से सहमत नहीं थे। उनका मत था कि रिजले द्वारा उच्च जातियों को आर्य तथा निम्न जातियों को अनार्य बताया जाना केवल उत्तरी भारत के लिए ही सही है। भारत के अन्य भागों में विभिन्न प्रजातीय समूहों को आपस में काफी लंबे समय से मेल-मिलाप था। अतः प्रजातीय शुद्धता केवल उत्तर भारत में ही बसी हुई थी क्योंकि वहाँ अंतर्विवाह निषिद्ध था। शेष भारत में अपनी ही जाति या समूह में विवाह करने का प्रचलन उन वर्गों में हुआ जो प्रजातीय स्तर पर वैसे ही भिन्न थे।

प्रश्न 4.
जाति की सामाजिक मानवशास्त्रीय परिभाषा को सारांश में बताएँ।
उत्तर
जाति की कुछ परिभाषाएँ ऐसी हैं जो जाति के साथ-साथ जनजाति पर भी लागू होती हैं। इन परिभाषाओं को ही जाति की सामाजिक मानवशास्त्रीय परिभाषा कहते हैं। उदाहरणार्थ-रिजले ने अपनी पुस्तक ‘दि पीपुल ऑफ इंडिया’ में जाति को इन शब्दों में परिभाषित किया है, “यह परिवार या कई परिवारों का संकलन है जिसको एक सामान्य नाम दिया गया है, जो किसी काल्पनिक पुरुष या देवता से अपनी उत्पत्ति मानता है तथा पैतृक व्यवसाय को स्वीकार करता है और जो लोग विचार कर सकते हैं उन लोगों के लिए एक सजातीय समूह के रूप में स्पष्ट होता है। यह एक ऐसी परिभाषा है। जो दी तो गई है जाति के संदर्भ में, परंतु जनजाति पर भी लागू होती है। जनजाति भी अनेक परिवारों का एक समूह है जिसका एक विशिष्ट नाम होता है। जनजाति के लोग भी अपनी उत्पत्ति किसी देवी-देवता से मानते हैं, निश्चित व्यवसाय करते हैं तथा सजातीय समूह का निर्माण करते हैं।

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प्रश्न 5.
‘जीवंत परंपरा से डी०पी० मुकर्जी का क्या तात्पर्य है? भारतीय समाजशास्त्रियों ने अपनी परंपरा से जुड़े रहने पर बल क्यों दिया?
उत्तर
डी०पी० मुकर्जी समाजशास्त्र के लखनऊ संपद्राय के जाने-पहचाने विद्वान रहे हैं जो शिक्षण के अतिरिक्त बौद्धिक तथा जनजीवन में भी अपने समय के सर्वाधिक प्रभावशाली विद्वान थे। मुकर्जी का मानना था कि भारत की सामाजिक व्यवस्था ही उसका निर्णायक एवं विशिष्ट लक्षण है तथा इसीलिए प्रत्येक सामाजिक विज्ञान के लिए यह आवश्यक है कि वह इस संदर्भ में इससे जुड़ा हो। भारतीय संदर्भ में सामाजिक व्यवस्था का निर्णायक पक्ष इसका सामाजिक पक्ष है क्योंकि इतिहास, राजनीति तथा अर्थशास्त्र पश्चिम की तुलना में भारत में कम विकसित थे।

‘जीवंत परंपरा से अभिप्राय उस परंपरा से है जो भूतकाल तक ही सीमित नहीं है, अपितु परिवर्तन की संवेदनशीलता से भी जुड़ हुई है। अर्थात् यह वह परंपरा है जो भूतकाल से कुछ ग्रहण कर उससे संबंध बनाए रखने के साथ-साथ नई चीजों को भी ग्रहण करती है। अतः जीवंत परंपरा पुराने तथा नए तत्त्वों का मिश्रण है। भारतीय सामाजिक परंपराएँ जीवंत परंपराएँ हैं जिन्होंने अपने आप को भूतकाल से जोड़ने के साथ-ही-साथ वर्तमान के अनुरूप ढाला है और इस प्रकार समय के साथ अपने आप को विकसित कर रही हैं।

भारतीय परंपराओं में श्रुति, स्मृति तथा अनुभव नामक परिवर्तन के तीन सिद्धांत निहित हैं। इसलिए मुकर्जी ने सभी भारतीय समाजशास्त्रियों के लिए जीवंत परंपराओं का अध्ययन आवश्यक माना है। उनका मत था कि भारतीय समाजशास्त्री के लिए केवल समाजशास्त्री होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसकी प्रथम आवश्यकता भारतीय होना है। इस नाते उसके लिए लोकरीतियों, रूढ़ियों, प्रथाओं तथा परंपराओं से जुड़कर ही सामाजिक व्यवस्था के अंदर तथा उसके आगे की वास्तविकता को समझना जरूरी है। मुकर्जी का मानना था कि समाजशास्त्रियों में भाषा को सीखने तथा भाषा की उच्चता-निम्नता और संस्कृति की पहचान करने की क्षमता होनी चाहिए।

प्रश्न 6.
भारतीय संस्कृति तथा समाज की क्या विशिष्टताएँ हैं तथा ये बदलाव के ढाँचे को कैसे प्रभावित करते हैं?
उत्तर
भारतीय संस्कृति तथा समाज का एक लंबा इतिहास है। इसे बनाए रखने में इसकी संरचनात्मक विशिष्टताओं एवं प्रमुख परपंराओं का विशेष योगदान रहा है। प्राचीनता, स्थायित्व, सहिष्णुता, अनुकूलनशीलता, सर्वांगीणता, ग्रहणशीलता एवं आशावादी प्रकृति भारतीय संस्कृति तथा समाज की प्रमुख विशिष्टताएँ हैं। हजारों वर्षों में हुए परिवर्तन के बावजूद ये विशिष्टताएँ यथावत् बनी। हुई हैं। विभिन्न विद्वानों ने भारतीय संस्कृति तथा समाज की अलग-अलग विशिष्टताओं का उल्लेख किया हैं एम०एन० श्रीनिवास ने सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता पर बल दिया है तो ड्युमो ने श्रेणीबद्धता को प्रमुख माना है। योगेन्द्र सिंह ने श्रेणीबद्धता, समग्रवाद, निरंतरता तथा लोकातीतत्व को प्रमुख माना है।

मैंडलबानी ने भारतीय संस्कृति तथा समाज को समझने के लिए दो संकल्पनाओं को। इसकी कुंजी के समान माना है- जाति तथा धर्म। जाति तथा धर्म ने परिवर्तनों के बावजूद न केवल । अपने स्वरूप को बनाए रखा है, अपितु नवीन गुण भी ग्रहण किए हैं। इसी को डी०पी० मुकर्जी ने ‘जीवंत परंपरा’कहा है। भारतीय संस्कृति तथा समाज की विशिष्टताएँ समय के साथ-साथ परिवर्तन की संवेदनशीलता से जुड़ी रही हैं। इसीलिए भारतीय समाज की सभी संरचनात्मक विशिष्टताएँ आज भी किसी-न-किसी रूप में विद्यमान हैं।

प्रश्न 7.
कल्याणकारी राज्य क्या है? ए० आर० देसाई कुछ देशों द्वारा किए गए दावों की आलोचना क्यों करते हैं?
उत्तर
ए० आर० देसाई ने ‘दि मिथ ऑफ दि वेलफेयर स्टेट’ नामक लेख में कल्याणकारी राज्य की विसतृत विवेचना की है। कल्याणकारी राज्य जनता के कल्याण के लिए नीतियों को बनाता तथा लागू करता है। ऐसा राज्य गरीबी, सामाजिक भेदभाव से मुक्ति तथा अपने सभी नागरिकों की सुरक्षा का ध्यान रखता है तथा असमानताओं को दूर करने के लिए तथा सबके लिए रोजगार उपलब्ध कराने हेतु हर संभव कदम उठाता है। देसाई ने कल्याणकारी राज्य की निम्नलिखित तीन प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख किया है –

  1. कल्याणकारी राज्य सकारात्मक राज्य होता है अर्थात् वह कानून एवं व्यवस्था को बनाए रखने के न्यूनतम कार्य ही नहीं करता, अपितु हस्तक्षेपीय राज्य होने के नाते समाज की बेहतरी के लिए सामाजिक नीतियों को तैयार करने तथा लागू करने हेतु भी अपनी शक्तियों का प्रयोग करता है।
  2. कल्याणकारी राज्य लोकतांत्रिक राज्य होता है। बहुदलीय चुनाव इस प्रकार के राज्य की पारिभाषिक विशेषता है। इसी दृष्टि से समाजवादी तथा साम्यवादी राज्यों से भिन्न है।
  3. कल्याणकारी राज्य ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ वाला राज्य होता है अर्थात् ऐसे राज्य की अर्थव्यवस्था में निजी पूँजीवादी कंपनियाँ तथा सार्वजनिक कंपनियों दोनों एक साथ कार्य करती हैं। एक कल्याणकारी राज्य न तो पूँजीवादी बाजार को ही खत्म करना चाहता है और न ही यह उद्योगों तथा दूसरे क्षेत्रों में जनता को निवेश करने से रोकता है। यह जरूरत की वस्तुओं और सामाजिक अधिसंरचना पर ध्यान केंद्रित करता है, जबकि उपभोक्ता वस्तुओं पर निजी उद्योगों का वर्चस्व होता है।

ए०आर० देसाई कल्याणकारी राज्य के द्वारा दिए गए दावों की आलोचना करते हैं। उनका मत है कि ब्रिटेन, अमेरिका तथा यूरोप के अधिकांश राज्य अपने आप को कल्याणकारी राज्य कहते हैं परंतु वे अपने नागरिकों को निम्नतम आर्थिक तथा सामाजिक सुरक्षा देने में असफल रहे हैं। वे आर्थिक असमानताओं को कम करने में भी विफल रहे हैं। तथाकथित कल्याणकारी राज्य बाजार के उतार-चढ़ाव से मुक्त स्थायी विकास करने में भी असफल रहे हैं। अतिरिक्त धन की उपस्थिति तथा अत्यधिक बेरोजगारी इसकी कुछ अन्य असफलताएँ हैं। अपने इन तक के आधार पर देसाई ने यह निष्कर्ष निकाला कि कल्याणकारी राज्य द्वारा मानव कल्याण हेतु किए जाने वाले दावे खोखले हैं तथा कल्याणकारी राज्य की सोच एक भ्रम है।

प्रश्न 8.
समाजशास्त्रीय शोध के लिए गाँव को एक विषय के रूप में लेने पर एम०एन० श्रीनिवास तथा लुईस ड्यूमो ने इसके पक्ष तथा विपक्ष में क्या तर्क दिए हैं?
उत्तर
एम०एन० श्रीनिवास ने अपने पूरे जीवन भर गाँव तथा ग्रामीण समाज के विश्लेषण में अत्यंत रुचि ली। उन्होंने गाँव में किए गए क्षेत्रीय कार्यों का नृजातीय विवरण तथा इस पर परिचर्चा देने के साथ-साथ भारतीय गाँव को सामाजिक विश्लेषण की एक इकाई के रूप में भी स्वीकार किया। उनका मत था कि गाँव एक आवश्यक सामाजिक पहचान है तथा ऐतिहासिक साक्ष्य इस एकीकृत पहचान की पुष्टि करते हैं। श्रीनिवास ने यह दर्शाया कि गाँव में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं तथा गाँव कभी भी आत्म-निर्भर नहीं थे। वे विभिन्न प्रकार के आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक संबंधों से क्षेत्रीय स्तर पर जुड़े हुए थे। इसीलिए उन्होंने उन सभी ब्रिटिश प्रशासकों तथा सामाजिक मानववैज्ञानिकों की आलोचना की है जिन्होंने भारतीय गाँव का स्थिर, आत्म-निर्भर तथा लघु गणतंत्र के रूप में चित्रण किया।

लुईस ड्यूमो गाँव के अध्ययन के पक्ष में नहीं थे। उनका मत था कि जाति जैसी सामाजिक संस्थाएँ गाँव की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण थीं क्योंकि गाँव केवल कुछ लोगों का विशेष स्थान पर निवास करने वाला समूह मात्र था। गाँव बने रह सकते हैं या समाप्त हो सकते हैं और लोग एक गाँव को छोड़ दूसरे गाँव को जा सकते हैं, लेकिन उनकी जाति अथवा धर्म जैसी सामाजिक संस्थाएँ सदैव उनके साथ रहती हैं जहाँ वे जाते हैं वहीं सक्रिय हो जाती हैं। इसीलिए ड्यूमो का मत था कि गाँव को एक श्रेणी के रूप में महत्त्व देना गुमराह करने वाला हो सकता है।

प्रश्न 9.
भारतीय समाजशास्त्र के इतिहास में ग्रामीण अध्ययन का क्या महत्त्व है। ग्रामीण अध्ययन को आगे बढ़ाने में एम०एन० श्रीनिवास की क्या भूमिका रही है?
उत्तर
भारतीय समाजशास्त्र के इतिहास में ग्रामीण अध्ययनों का विशेष महत्त्व है। वस्तुत: भारत में समाजशास्त्र का विकास ही ग्रामीण अध्ययनों से हुआ है। ग्रामीण अध्ययनों के महत्त्व के संबंध में एआर० देसाई का कहना है-“स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात् ग्रामीण सामाजिक संगठन, संरचना, प्रकार्य तथा उविकास का क्रमबद्ध अध्ययन जरूरी ही नहीं अत्यंत जरूरी हो गया है। ग्रामीण पुनर्निर्माण भारतीय सरकार की प्रमुख उद्देश्य रहा है ताकि ग्रामीण समाज से संबंधित समस्याओं का समाधान करके एक शोषण रहित धर्मनिरपेक्ष समाजवादी राज्य बनाया जाए। भारत में ग्रामीण समाजशास्त्र इसलिए आवश्यक तथा महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारत की दो-तिहाई से अधिक जनसंख्या गाँव में ही रहती है।

ए०आर० देसाई ने भारत में ग्रामीण समाज की आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक संरचना आदि के अध्ययन को अति आवश्यक बताते हुए इसके निम्नलिखित तीन कारणों का उल्लेख किया है –

  1. भारत एक कृषि प्रधान देश है। इसके लंबे इतिहास, जटिल सामाजिक संगठन, धार्मिक जीवन, सांस्कृतिक प्रतिमान इत्यादि को अगर सही रूप में समझना है तो ग्रामीण भारत का अध्ययन करना जरूरी है।
  2. भारतीय ग्रामीण समाज भी आधुनिक युग के नवीन विचारों से पूरी तरह प्रभावित है इसलिए अगर विभिन्न सांस्कृतिक स्तरों, जादू-टोने से लेकर तार्किक दृष्टिकोण तक, से अध्ययन करना है तो ग्रामीण समाज को समझना जरूरी है।
  3. अंग्रेजी राज में भारत की ग्रामीण सामाजिक-आर्थिक संरचना में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए जिनके परिणामस्वरूप गाँवों की आत्म-निर्भरता समाप्त हो गई। जजमानी व्यवस्था, संयुक्त परिवार, जाति व्यवस्था इत्यादि में परिवर्तन के कारण एक तरह से असंतुलन-सा पैदा हो गया है। ग्रामीण पुनर्निर्माण करने के लिए भारतीय गाँवों का पर्याप्त ज्ञान होना जरूरी है तथा ग्रामीण समाजशास्त्र इसमें सहायक हो सकता है।

भारत में ग्रामीण अध्ययनों को आगे बढ़ाने में एम०एन श्रीनिवास की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने ग्रामीण अध्ययनों में न केवल नृजातीय शोधकार्य की पद्धति के महत्त्व एवं सार्थकता से अवगत कराया, अपितु भारतीय गाँवों में होने वाले तीव्र सामाजिक परिवर्तन का भी विश्लेषण किया। इस प्रकार के अध्ययन भारतीय नीति-निर्माताओं के लिए काफी उपयोगी सिद्ध हुए। इस प्रकार, ग्रामीण अध्ययनों ने समाजशास्त्र जैसे विषय को स्वतंत्र राज्य के परिप्रेक्ष्य में एक नई भूमिका प्रदान की।

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क्रियाकलाप आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जनजातीय आंदोलन जैसे कितने और संघर्षों के बारे में आप जानते हैं? पता लगाइए कि इन संघर्षों के पीछे कौन-से मुद्दे थे? आप और आपके सहपाठी इन समस्याओं के बारे में ” क्या सोचते हैं? (क्रियाकलाप 1)
उत्तर
भारत में जनजातीय आंदोलनों के अतिरिक्त अनेक समाज-सुधार आंदोलन भी हुए हैं जिनका उद्देश्य समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर कर उनसे प्रभावित वर्गों का उत्थान करना रहा है। ऐसे आंदोलन मुख्य रूप से निम्न जातियों (पूर्व में अस्पृश्य जातियाँ) तथा महिलाओं पर अधिक केंद्रित रहे. हैं। अधिकतर जनजातीय आंदोलन अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक तथा राजनीतिक पहचान पर बल देते हैं। वास्तव में, झारखंड तथा छत्तीसगढ़ राज्यों का निर्माण इसी प्रकार के आंदोलनों का फल है। विकास के नाम पर बड़े-बड़े बाँधों, खदानों एवं फैक्टरियों के निर्माण के कारण जनजातीय वर्गों पर एक असमान दबाव पड़ता है जिससे विस्थापन जैसी गंभीर समस्या विकसित होने लगती है। भारत में पिछले पचास से अधिक वर्षों में 3,300 बड़े बाँध बनाए गए हैं जिनके परिणामस्वरूप लगभग 21 से 33 मिलियन लोग विस्थापित हुए हैं।

जनजातीय एवं दलित वर्गों की स्थिति विस्थापितों में और भी दयनीय है तथा 40-50 प्रतिशत विस्थापित लोग जनजातीय समुदायों के ही हैं। घूर्ये ने जनजातियों को ‘पिछड़े हिंदू समूह’ कहा तथा उन्हें भारत की. मुख्य धारा की संस्कृति में सम्मिलित करने पर बल दिया। ऐसा करने पर जनजातियों में होने वाले आंदोलनों एवं संघर्षों के वैसे ही परिणामों की बात कही जैसे कि अन्य पिछड़े वर्गों में रहे हैं। अस्पृश्यता समाप्त करने हेतु किए गए समाज-सुधार आंदोलनों के पीछे भी इस अमानवीय कुप्रथा को समाप्त कर अस्पृश्यों के स्तों को ऊँचा करना रहा है। इसी भाँति बाल विवाह, सती प्रथा, नरबलि जैसी कुप्रथाओं को लेकर हुए आंदोलनों का लक्ष्य महिलाओं की स्थिति में सुधार करना था। महिला स्वतंत्रता जैसे आंदोलनों के पीछे महिलाओं को समान अधिकार देने जैसा मुद्दा प्रमुख रहा है।

प्रश्न 2.
जीवंत परंपरा से क्या तात्पर्य है? (क्रियाकलाप 2)
उत्तर
डी०पी० मुकर्जी के अनुसार जीवंत परंपरा से तात्पर्य उस परंपरा से है जो भूतकाल से कुछ ग्रहण कर एक ओर उससे अपने संबंध बनाए रखती है तो दूसरी ओर नई चीजों को भी ग्रहण करती है। अत: एक जीवंत परंपरा पुराने तथा नए तत्त्वों का मिश्रण है। जीवंत परंपरा के उदाहरण हमउम्र के बच्चों द्वारा खेले जाने वाले खेलों, पुरुषों एवं स्त्रियों द्वारा पहने जाने वाले पहनावों, जाति एवं धर्म जैसी संस्थाओं में स्पष्ट रूप में देखे जा सकते हैं। आज से 50-60 वर्ष (लगभग दो पीढ़ी) पहले हमउम्र के बच्चे अपने परिवार में ही खेलते थे क्योंकि परिवार में बच्चों की संख्या अधिक होती थी तथा परिवार ही मनोरंजन का एक साधन होता था। आज से 25-30 वर्ष पहले हमउम्र के बच्चे पड़ोसी बच्चों के साथ खेलते थे परंतु इस बात का ध्यान रखा जाता था कि लड़कों के साथ लड़के ही खेलें तथा लड़कियों के साथ लड़कियाँ ही खेलें। आज खेलों में इस प्रकार के प्रतिबंध शिथिल हो गए हैं। न केवल खेल के रूप बदल गए हैं, अपितु लिंग जैसे निषेध समाप्त हो गए हैं। बहुत-से-बच्चों ने अपने मनोरंजन का साधन टेलीविजन के प्रोग्राम अथवा कंप्यूटर गेम्स को बना लिया है जिसमें उन्हें हमउम्र साथियों की आवश्यकता ही नहीं रहती।

जाति जैसी संस्था जीवंत परंपरा का प्रमुख उदाहरण है। आज की जाति व्यवस्था तथा आज से 50 वर्ष पूर्व की जाति व्यवस्था में काफी अंतर है। खान-पान एवं सामाजिक सहवास पर आधारित जातीय निषेध समाप्त हो चुके हैं। अंतर्जातीय विवाह होने लगे हैं तथा जाति का अपने परंपरागत व्यवसाय से संबंध काफी सीमा तक टूट गया है। यद्यपि जाति की अधिकांश विशेषताएँ बदल गई हैं, तथापि जाति आज भी एक नए रूप में हमारे सामने है। जाति ने अपने इस रूप को बनाए रखने के लिए राजनीति जैसे आधुनिक पहलुओं को अपना लिया है। राजनीति में आगे आने तथा सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने अथवा इसे बढ़ाने हेतु जातीय एकता तथा समान स्तर की जातियों में एकीकरण की भावना का विकास हुआ है।

प्रश्न 3.
कल्याणकारी राज्यों ने अपने नागरिकों के लिए जो किया उससे अधिक करना चाहिए अथवा राज्य को अपनी भूमिकाओं को निरंतर कम करके इन्हें स्वतंत्र बाजार के हवाले कर देना चाहिए। इस दृष्टिकोण पर चर्चा कीजिए और दोनों पक्षों को ध्यानपूर्वक सुनिए। (क्रियाकलाप 3)
उत्तर
कल्याणकारी राज्यों ने अपने नागरिकों के लिए जो किया है उससे अधिक करना चाहिए अथवा राज्य को अपनी भूमिकाओं को निरंतर कम करके इन्हें स्वतंत्र बाजार के हवाले कर देना चाहिए। यह एक विवादास्पद मुद्दा है। ए०आर० देसाई जैसे मार्क्सवादी विद्वानों एवं राष्ट्रवादियों द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि कल्याणकारी राज्य लोगों के कल्याण के जो दावे करता है वे खोखले हैं। अमेरिका तथा यूरोप के राज्य, जो अपने आप को तथाकथित कल्याणकारी राज्य कहते हैं, अपने । नागरिकों को न केवल निम्नतम आर्थिक तथा सामाजिक सुरक्षा देने में असफल रहे हैं, अपितु वे आर्थिक असमानताओं को कम करने में भी विफल रहे हैं। वे धन के असमान वितरण तथा अत्यधिक बेरोजगारी रोकने में भी असफल रहे हैं। अत: कल्याणकारी राज्यों को इन सभी कार्यों को भी करना चाहिए तथा वास्तव में कल्याणकारी होने का प्रयास करना चाहिए।

दूसरी ओर, अनेक विद्वान ऐसे हैं जो राज्य के कार्यों को सीमित करने के पक्ष में हैं। उनका तर्क है कि राज्य को केवल कानून बनाने तथा इसे लागू करने पर ही अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि समाज में शांति बनी रहे एवं कानून का शासन स्थापित हो सके। बाकी सभी कार्य राज्य को या तो स्वतंत्र बाजार के हवाले कर देने चाहिए अथवा अन्य संस्थाओं को स्थानांतरित कर देने चाहिए। राज्य से उन सब कल्याणकारी कार्यों की आशा नहीं की जा सकती जो वह कर ही नहीं सकता। इसलिए कल्याणकारी राज्य निर्धनता, बेरोजगारी, सामाजिक भेदभाव, नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करने, पूँजीवादियों की अधिक लाभ कमाने की प्रवृत्ति, श्रमिकों के शोषण आदि समस्याओं का समाधान नहीं कर पाए हैं।

प्रश्न 4.
क्या राज्य पहले की अपेक्षा आज अधिक कार्य कर रहा है या कम? आपको क्या लगता है-यदि राज्य इन कार्यों को करना बंद कर दे तो क्या होगा? (क्रियाकलाप 3)
उत्तर
आज राज्य पहले की अपेक्षा कहीं अधिक कार्य कर रहा है। कानून व्यवस्था बनाए रखने के अतिरिक्त राज्य बाजारी शक्तियों को नियंत्रित एवं नियमित करने तथा सामाजिक समस्याओं के समाधान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। राज्य के कार्यों में निरंतर वृद्धि हुई है। इसका प्रमुख कारण राज्य पर कमजोर वर्गों के हितों को संरक्षण देकर उनका सामाजिक-आर्थिक उत्थान रहा है। साथ ही, परिवर्तन के परिणामस्वरूप जिन संस्थाओं में विकृतियाँ आ गई हैं उन्हें दूर करने हेतु सामाजिक अधिनियम बनाना भी राज्य का कार्य समझा जाने लगा है। यदि राज्य इन सभी कार्यों को करना बंद कर देगा तो अमीर और गरीब में अंतराल अत्यधिक बढ़ने लगेगा तथा समाज के कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा नहीं हो पाएगी। उनका शोषण बढ़ जाएगा तथा जीवनयापन अत्यंत कठिन हो जाएगा। यदि हम अपने पड़ोस में राज्य द्वारा दी गई सुविधाओं एवं सेवाओं की एक सूची बनाएँ तो यह पहले राज्य द्वारा किए जाने वाले कार्यों से अधिक लंबी होगी।

उदाहरणार्थ- इस सूची को विद्यालय से ही प्रारंभ किया जा सकता है। पहले जो विद्यालय थे उनमें निम्न जातियों के बच्चों को प्रवेश नहीं दिया जाता था। अधिक फीस होने के कारण केवल अमीर परिवारों के बच्चे ही शिक्षा ग्रहण कर सकते थे। अब यदि कोई विद्यालय ऐसा करता है तो उसकी न केवल सरकारी सहायता बंद कर दी जाती है, अपितु इस कार्य हेतु उसे बंद भी किया जा सकता है। स्कूलों में भवन का निर्माण सरकारी धन से होता है, प्राध्यापकों एवं अन्य कर्मचारियों का वेतन सरकार देती है, बच्चों से बहुत कम फीस ली जाती है, अनुसूचित जाति/जनजाति के बच्चों को छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है, यदि बुक बैंक योजना है तो छात्र-छात्राओं को पुस्तकें भी उपलब्ध कराई जाती हैं तथा कमजोर वर्गों के छात्रों के लिए मुफ्त में अतिरिक्त कक्षाओं का प्रबंध किया जाता है।

यदि किसी विद्यालय में अनुसूचित जाति/जनजाति हेतु ‘आरक्षित स्थानों का पालन नहीं किया जाता तो उस विद्यालय के विरुद्ध कठोर शासकीय कार्यवाही की जा सकती है। इसी भाँति, यदि हम अपने पड़ोस में सरकार द्वारा किए जाने वाले कार्यों की सूची बनाएँ तो यह पहले की तुलना में काफी लंबी होगी। गलियों में प्रकाश की व्यवस्था, घरों में बिजली-पानी उपलब्ध कराने की व्यवस्था, गंदगी की निकासी हेतु सीवर की व्यवस्था, बच्चों के खेल एवं मनोरंजन के लिए-पार्को की व्यवस्था, समय-समय पर टूटी सड़कों एवं गलियों की मरम्मत करने या उन्हें फिर से नया बनाने की व्यवस्था राज्य द्वारा ही की जाती है। इतना अवश्य है कि सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली सुविधाओं से सभी लोग कभी भी संतुष्ट नहीं होते हैं। कुछ लोग इन्हें अपर्याप्त मानकर सरकार एवं संबंधित सरकारी विभाग की आलोचना भी करते रहते हैं। हो सकता है कि कार्य समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण उनकी आशा के अनुकूल न हो रहा हो।

प्रश्न 5.
मान लीजिए कि आपका कोई मित्र दूसरे ग्रह अथवा सभ्यता का है और पहली बार पृथ्वी पर आया है और उसने कभी गाँव के बारे में नहीं सुना है। आप उन्हें ऐसे कौन-से पाँच सुराग देंगे ताकि वे कभी गाँव को देखें तो उसे पहचान सकें। (क्रियाकलाप 4)
उत्तर
यदि हम अपनी कक्षा में चार-पाँच छात्रों के छोटे समूह बनाकर उन सुरागों की पहचान करने का प्रयास करें जो गाँव के लिए जरूरी होते हैं तो निश्चित रूप से कुछ ऐसे सुराग सामने आ सकते हैं। इन सुरागों में लोगों का मुख्य रूप से कृषि व्यवसाय करना, संयुक्त अथवा विस्तृत परिवारों में रहना, भू-क्षेत्र की दृष्टि से जनसंख्या का सीमित आकार होना, प्रकृति से प्रत्यक्ष संबंध होना तथा सदस्यों की जीवन-पद्धति, विचारधारा एवं रहन-सहन में सजातीयता होना प्रमुख रूप से उभरकर सामने आएँगे। लोगों का रूढ़िवादी होना या धार्मिक मान्यताओं को अधिक महत्त्व देनी अथवा आवास का अनियमित रूप से होने जैसे सुराग भी सामने आ सकते हैं। यदि कोई मित्र दूसरे ग्रह अथवा सभ्यता का है और पहली बार पृथ्वी पर आया है तो वह गाँव में जाकर सरलता से इन सुरागों के माध्यम से इस तथ्य से । संतुष्ट हो सकता है कि वह वास्तव में गाँव में ही है। गाँव भी चूंकि अनेक प्रकार के होते हैं इसलिए उनको पहचानने के सुरागों में थोड़ा-बहुत अंतर हो सकता है।

प्रश्न 6.
टी०वी, फिल्म अथवा अखबारों में गाँव पर कितनी बार चर्चा की जाती है? (क्रियाकलाप 5)
उत्तर
टीवी, फिल्म अथवा अखबारों में पहले गाँव की बहुत चर्चा हुआ करती थी। अनेक टीवी कार्यक्रम अथवा फिल्में ग्रामीण परिवारों के इर्द-गिर्द ही निर्मित होते थे। अब अधिकांश टी०वी० कार्यक्रम एवं फिल्में नगरों में बने स्टूडियों में बनाए जाने लगे हैं जिनमें गाँव की चर्चा कम होने लगी है। इनमें नगरीय परिवारों; विशेष रूप से मध्य एवं उच्च वर्ग के परिवारों का चित्रण अधिक होने लगा है। समाचार-पत्रों में भी अधिकांश घटनाएँ नगरों में संबंधित ही प्रकाशित होती हैं। टी०वी० एवं फिल्मों की भाँति समाचार-पत्रों में भी गाँव की चर्चा कम होने लगी है।

प्रश्न 7.
क्या आपको लगता है कि नगर के लोग आज भी गाँव में रुचि रखते हैं? अगर आप नगर में रहते हैं तो क्या आपका परिवार आज भी अपने गाँव के रिश्तेदार के संपर्क में है? क्या इस प्रकार के संपर्क आपके पिता अथवा दादा की पीढ़ी में थे? (क्रियाकलाप 5)
उत्तर
अनेक नगरीय लोग आज भी गाँव में रुचि रखते हैं। इसका प्रमुख कारण अपने नजदीकी रिश्तेदारों का गाँव में होना है। यदि ऐसा परिवार रोजगार हेतु गाँव छोड़कर नगर में बसा है तो माता-पिता या भाई-बहन हो सकता है अभी गाँव में ही हों। इसलिए नगर में रहते हुए भी ऐसे परिवार गाँव के साथ निरंतर संपर्क बनाए रखते हैं। गाँव से उन्हें गेहूं एवं अन्य वस्तुएँ अपने नातेदारों से मिल जाती हैं तथा ऐसी वस्तुओं को उन्हें नगरों में लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

अधिकांश ग्रामवासी नगरों में चूँकि रोजगार हेतु ही आए हैं इसलिए उनका गाँव से संपर्क बना रहता है। दादा-दादी की पीढ़ी में भी इस प्रकार के संपर्क थे तो परंतु बहुत कम थे। उस समय नगरों में जाकर बसने की प्रवृत्ति बहुत कम थी। आवागमन के साधन भी उपलब्ध नहीं थे। अब इस प्रकार क संपर्क बढ़े हैं। परंतु नगरों में स्थायी रूप से बसने वाले परिवारों की आने वाली पीढ़ी में गाँव से संपर्क आने वाले समय में निश्चित रूप से कम हो जाएगा। वस्तुतः धीरे-धीरे नगरवासियों की व्यक्तिवाद एवं व्यावसायिक प्रतिबद्धता के कारण अपने रिश्तेदारों से गाँव में जाकर मिलने की आवृत्ति कम होती जाती है।

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प्रश्न 8.
क्या आप ऐसे किसी व्यक्ति को जानते हैं जो नगर छोड़ गाँव में जाकर बस गया हो? क्या आप ऐसे किसी व्यक्ति को जानते हैं जो वापस जाना चाहता हो? अगर हाँ, तो वे कौन-से कारण हैं जिनके लिए ये नगर छोड़ गाँव में जाकर बसना चाहते हैं? (क्रियाकलाप 5)
उत्तर
कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो रोजगार की तलाश में बिना सोचे-समझे गाँव छोड़ देते हैं। नगर में उन्हें पहले तो रोजगार मिलता ही नहीं और यदि रोजगार मिल भी जाता है तो वे इससे अपने पूरे परिवार का खर्चा नहीं उठा सकते। नगरों में मकानों के महँगे किराये हैं तथा जीवनयापन हेतु भी अधिक धन की आवश्यकता होती है। हो सकता है कि कोई व्यक्ति इन सबसे निराश होकर पुनः गाँव जाने का निर्णय ले ले। वह यह सोचकर वापस गाँव चला जाए कि इतने पैसे कमाकर तो वह गाँव में ही अपना गुजारा आसानी से कर सकता है।

उसके साथ कोई ऐसी घटना भी घटित हो सकती है जो उसे नगरीय जीवन से विमुख कर दे। पहले कभी फिल्मों में यह दिखाया जाता है था कि जब कोई हीरो गाँव से नगर पहली बार आता है तो या तो उसका सामान चोरी हो जाता है या उसकी जेब काट ली जाती है या उसे कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाता है जो उसके भोलेपन का फायदा उठाने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति वापस जाने को तैयार हो जाते हैं। अधिकांश व्यक्ति, जिन्हें नगरीय जीवन ग्रामीण जीवन से अधिक सुविधा-संपन्न लगता है, कभी भी गाँव वापस जाने के बारे में सोचते ही नहीं हैं। गाँव छोड़ने के कारणों में नगरों में बच्चों हेतु उच्च, तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा की उपलब्धता, रोजगार के अधिक अवसर, नगरीय जीवन का आकर्षण आदि प्रमुख हो सकते हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
भारत में वर्ण का परिवर्तित रूप है –
(क) आश्रम-व्यवस्था
(ख) वर्ग-व्यवस्था
(ग) जाति-प्रथा
(घ) वंशावली
उत्तर
(ग) जाति-प्रथा

प्रश्न 2.
‘संस्कृतिकरण विचारधारा से संबंधित विचारक का नाम है –
(क) चार्ल्स कुले
(ख) एन० के० दत्ता
(ग) पी० एच० प्रभु
(घ) एम० एन० श्रीनिवासन
उत्तर
(घ) एम० एन० श्रीनिवासन

प्रश्न 3.
इनमें से कौन भारतीय समाज का परिवर्तन-बोधक वक्तव्य है ?
(क) संयुक्त परिवार का आजकल विकास हो रहा है।
(ख) भारतीय समाज में जातिवाद बढ़ रहा है।
(ग) वृद्ध व्यक्तियों के प्रति आदर का भाव बढ़ रहा है।
(घ) आजकल व्यक्तिवाद घट रहा है।
उत्तर
(ख) भारतीय समाज में जातिवाद बढ़ रहा है।

प्रश्न 4.
प्रभु जाति की अवधारणा मानसिक उपज है –
(क) हट्टन की
(ख) घुरिये की
(ग) एम० एन० श्रीनिवासन की
(घ) डी० एन० मजूमदार की
उत्तर
(ग) एम० एन० श्रीनिवासन की

प्रश्न 5.
घुरिये ने जाति-व्यवस्था की कितनी विशेषताएँ बतायी हैं ?
(क) 8
(ख) 6.
(ग) 10
(घ) 4
उत्तर
(ख) 6

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से कौन-सा व्यक्ति प्रसिद्ध समाजशास्त्री है ?
(क) डी० एन० मजूमदार
(ख) आर० एस० मजूमदार
(ग) लाल बहादुर शास्त्री
(घ) कपाड़िया राधा कांत
उत्तर
(क) डी० एन० मजूमदार

प्रश्न 7.
‘भारत में जाति एवं प्रजाति नामक पुस्तक के लेखक कौन है?
(क) जी०एस० घूयें।
(ख) एम०एन० श्रीनिवास
(ग) डी०पी० मुकर्जी
(घ) एस०सी० दुबे
उत्तर
(क) जी०एस० घूयें

निश्चित उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भारत में समाजशास्त्र की औपचारिक शिक्षा किस वर्ष प्रारंभ हुई?
उत्तर
भारत में समाजशास्त्र की औपचारिक शिक्षा 1919 ई० में प्रारंभ हुई।

प्रश्न 2.
भारत में सर्वप्रथम समाजशास्त्र का प्रारंभ किस विश्वविद्यालय में हुआ?
उत्तर
भारत में सर्वप्रथम समाजशास्त्र का प्रारंभ बंबई विश्वविद्यालय में हुआ।

प्रश्न 3.
घूर्ये का जन्म कब हुआ था?
उत्तर
घूयें का जन्म 12 दिसम्बर, 1893 को महाराष्ट्र के मालवान क्षेत्र के एक सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ।

प्रश्न 4.
घूर्ये की किसी एक पुस्तक का नाम लिखिए।
उत्तर
1932 ई० में लिखी ‘कास्ट एण्ड रेस इन इंडिया’ घूयें की प्रमुख पुस्तक है।

प्रश्न 5.
‘इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसायटी की स्थापना का श्रेय किसे दिया जाता है?
उत्तर
‘इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसायटी की स्थापना का श्रेय जी०एस० घूयें को दिया जाता है।

प्रश्न 6.
घूर्ये भारत में समाजशास्त्र के किस संप्रदाय से संबंधित रहे हैं?
उत्तर
घ बंबई (मुम्बई) संप्रदाय से संबंधित प्रमुख विद्वान माने जाते हैं।

प्रश्न 7.
डी०पी० मुकर्जी का जन्म कब हुआ था?
उत्तर
डी०पी० मुकर्जी का जन्म 5 अक्टूबर, 1894 ई० को बंगाल में एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

प्रश्न 8.
ए० आर० देसाई का जन्म कब हुआ थ?
उत्तर
ए० आर० देसाई का जन्म बड़ौदा के एक सुप्रसिद्ध परिवार में 1915 ई० में हुआ था।

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प्रश्न 9.
ए० आर० देसाई की किसी एक पुस्तक का नाम लिखिए।
उत्तर
‘सोशल बैकग्राउंड ऑफ इंडियन नेशनलिज्म’ ए० आर० देसाई की सुप्रसिद्ध पुस्तक है।

प्रश्न 10.
एम० एन० श्रीनिवास का जन्म कब हुआ था?
उत्तर
एम० एन० श्रीनिवास का जन्म 16 नवम्बर, 1916 ई० को मैसूर के आयंगार ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

प्रश्न 11.
एम०एन० श्रीनिवास की किसी एक पुस्तक का नाम लिखिए।
उत्तर
‘सोशल चेंज इन मॉडर्न इंडिया’ श्रीनिवास द्वारा रचित प्रमुख पुस्तक है।

प्रश्न 12.
एम०एन० श्रीनिवास ने किस गाँव का अध्ययन किया है?
उत्तर
एम०एन० श्रीनिवास ने मैसूर के रामपुरा गाँव का अध्ययन किया है।

प्रश्न 13.
एम०एन० श्रीनिवास ने गाँव के अध्ययन में किस परिप्रेक्ष्य को अपनाया है?
उत्तर
एम०एन० श्रीनिवास ने गाँव के अध्ययन में संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक परिप्रेक्ष्य को अपनाया है।

प्रश्न 14.
संस्कृतिकरण किस विद्वान द्वारा प्रतिपादित संकल्पना है?
उत्तर
संस्कृतिकरण की संकल्पना का प्रतिपादन एम०एन० श्रीनिवास ने किया है।

प्रश्न 15.
्रभु जाति किस विद्वान द्वारा प्रतिपादित संकल्पना है?
उत्तर
प्रभु जाति की संकल्पना के प्रतिपादक एम०एन० श्रीनिवास हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भारत में जनजातीय समाज का अध्ययन करने वाले किन्हीं दो प्रारंभिक विद्वानों का नाम लिखिए।
उत्तर
एल०के० अनन्तकृष्ण अय्यर तथा शरत्चंद्र रॉय भारत में जनजातीय समाज का अध्ययन करने वाले दो प्रमुख प्रारंभिक विद्वान् थे।

प्रश्न 2.
संस्कृतिकरण किसे कहते हैं?
उत्तर
संस्कृतिकरण वह सांस्कृतिक प्रक्रिया है जिसमें कोई निम्न जाति अपने रीति-रिवाज एवं जीवन-पद्धति को बदलकर तथा किसी उच्च जाति का अनुकरण कर परंपरा से प्राप्त निम्न स्थान को ऊँचा करने का प्रयास करती है।

प्रश्न 3.
अंतःविवाह क्या है?
उत्तर
अपने ही समूह में विवाह करना अंत:विवाह कहलाता है। जाति के संदर्भ में अपनी ही जाति में विवाह अंत:विवाह कहा जाता है।

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प्रश्न 4.
बर्हिविवाह क्या है?
उत्तर
अपने समूह से बाहर विवाह करना बर्हिविवाह कहलाता है। हिन्दू विवाह के संदर्भ में सगोत्र, सपिंड या सप्रवर विवाह वर्जित हैं इसलिए इनसे बाहर अर्थात् अपने गोत्र, पिंड या प्रवर से बाहर विवाह बहिर्विवाह कहलाता है।

प्रश्न 5.
मुक्त व्यापार किसे कहते हैं?
उत्तर
मुक्त व्यापार से अभिप्राय अर्थव्यवस्था अथवा आर्थिक संबंधों में राज्य के कम-से-कम हस्तक्षेप से है। इसका शाब्दिक अर्थ व्यापार को खुला छोड़ देना है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जी०एस० घूर्ये के जीवन के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर
भारत में समाजशास्त्र के साथ गोविंद सदाशिव घूर्ये का नाम बड़े सम्मान के साथ जुड़ा हुआ है। वे भारत की प्रथम पीढ़ी के समाजशास्त्रियों में से हैं जिन्होंने भारत में न केवल समाजशास्त्र को दृढ़ता से स्थापित किया वरन् कई ऐसे छात्र भी प्रदान किए जिन्होंने देश के विभिन्न भागों में समाजशास्त्र विषय की स्थापना की एवं समाजशास्त्रीय शोध एवं सिद्धांतों के द्वारा समाजशास्त्रीय साहित्य को समृद्धि प्रदान की।

घूयें का जन्म 12 दिसम्बर, 1893 ई० को महाराष्ट्र के मालवान क्षेत्र के एक सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनका शैक्षणिक जीवन प्रारंभ से ही उच्च कोटि का रहा। उन्होंने अपनी सभी परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। उन्होंने 1919 ई० में संस्कृत एवं बाद में अंग्रेजी में बंबई के एल्फिन्स्टन कॉलेज से प्रथम श्रेणी में स्वर्ण पदक प्राप्त कर एम०ए० की परीक्षा पास की।

1919 ई० में बंबई विश्वविद्यालय ने समाजशास्त्र विषय पढ़ाने के लिए पैट्रिक गैडिस को आमंत्रित किया। उस समय घूयें एल्फिन्स्टन कॉलेज, बंबंई में संस्कृत के प्राध्यापक थे और यह कोई भी नहीं जानता था कि वे एक दिन भारत के महान् समाजशास्त्री बन जाएँगे। गैडिस के भाषणों को जो लोग सुनते थे, उनमें से घूयें भी एक थे। गैडिस ने ब्रिटिश विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र में प्रशिक्षण पाने के लिए घूयें का चयन किया।

उनकी सिफारिश पर बंबई विश्वविद्यालय ने घूयें को लंदन भेजा। कुछ समय तक एल०टी० हॉबहाउस के साथ अध्ययन के बाद वे डब्ल्यू०आर०एच० रिवर्स के पास अध्ययन के बाद वे डब्ल्यू०आर०एच रिवर्स के पास कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में चले गए। वहाँ घूर्ये ने अनेक लेख लिखे तथा रिवर्स के निर्देशन में “Ethnic Theory of Caste” (जाति का प्रजातीय सिद्धांत) विषय पर अपना शोध कार्य किया। घूयें के कार्यों पर रिवर्स का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता था और उनका झुकाव मानवशास्त्रीय महत्त्व के विषयों; जैसे नातेदारी और प्रसारवाद की ओर था। घूयें के शोध कार्य की समाप्ति के पूर्व ही रिवर्स का देहावसान हो गया।

1923 ई० में घूयें कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से डॉक्ट्रेट की उपाधि ग्रहण कर भारत लौट आए। 1924 ई० में उन्हें बंबई विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के रीडर एवं विभागाध्यक्ष पद पर नियुक्ति प्रदान की गई। 1934 ई० में घूयें को प्रोफेसर के पद पर नियुक्त किया गया तथा 1959 ई० में वे यहाँ से सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद भी उनकी सेवाएँ लेने के लिए बंबई विश्वविद्यालय ने उनके लिए ‘प्रोफेसर एमरीटस’ (Ermeritus Professor) का एक नया पद सृजित किया। घूयें ने 25 से भी अधिक पुस्तकों की रचना की है। उन्होंने 800 एम०ए० छात्रों को शीघ्र कार्य एवं 87 छात्रों को डॉक्टरेट हेतु शोध कार्य के लिए निर्देशित किया।

घूयें के लेखन में इतिहास, मानवशास्त्र और समाजशास्त्रीय परंपराएँ विद्यमान हैं। उन्होंने स्वयं को ही नहीं वरन् अपने छात्रों को भी अनुभवाश्रित अध्ययन एवं अनुसंधान करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने भारत के अनेक समाजशास्त्र के अध्यापकों को शिक्षा प्रदान की। वे Anthropological Society of Bombay’ के 1945-50 तक अध्यक्ष भी रहे। घूर्ये ने ‘इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसायटी’ (Indian Sociological Society) की स्थापना की और इसके तत्वाधान में 1952 ई० में ‘सोशियोलॉजिकल बुलेटिन’ नामक पत्रिका का प्रकाशन भी प्रारंभ किया, जो आज भारत में ही नहीं वरन् विश्व की प्रमुख समाजशास्त्रीय पत्रिकाओं में से एक है। वे 1966 ई० तक इसके प्रथम अध्यक्ष के रूप में कार्य करते रहे। 1983 ई० में 90 वर्ष की आयु में घूयें का निधन हो गया।

प्रश्न 2.
प्रजाति की प्रमुख विशेषताएँ कौन-सी हैं?
उत्तर
प्रजाति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. प्रजाति का अर्थ जन-समूह से होता है; अत: इसमें पशुओं की नस्लों को सम्मिलित नहीं किया जाता है।
  2. इस मानव समूह से तात्पर्य कुछ व्यक्तियों से नहीं है वरन् प्रजाति में मनुष्यों का वृहत् संख्या में होना अनिवार्य है।
  3. इस मानव समूह में एक समान शारीरिक लक्षणों का होना अनिवार्य है। ये लक्षण वंशानुक्रमण के द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होते रहते हैं। शारीरिक लक्षणों के आधार पर इन्हें दूसरी प्रजातियों से पृथक् किया जाता है।
  4. प्रजातीय विशेषताएँ प्रजातीय शुद्धता की स्थिति में अपेक्षाकृत स्थायी होती हैं अर्थात् भौगोलिक पर्यावरण के बदलने से भी किसी प्रजाति के मूल शारीरिक लक्षण नहीं बदलते हैं।

प्रश्न 3.
प्रजाति के प्रमुख तत्त्व बताइए।
उत्तर
प्रजाति कुछ विशेष तत्त्वों से मिलकर बनती है। यह विशेष तत्त्व उसके अस्तित्व को दूसरी प्रजातियों से भिन्न करते हैं। इन विशेष तत्वों के आधार पर ही प्रजाति का वर्गीकरण होता है। सामान्य रूप से प्रजातियों में भी तीन प्रकार के तत्त्व पाए जाते हैं –
1. अंतर्नस्ल के तत्त्व – एक प्रजाति के लोग दूसरी प्रजाति के लोगों से विवाह नहीं करते हैं। इसका कारण पहले काफी सीमा तक भौगोलिक स्थिति रहा है। भौगोलिक स्थितियों के कारण एक प्रजाति के लोग दूसरों से कम मिल पाते हैं। दूसरे, प्रत्येक प्रजाति स्थायित्व रखने का प्रयत्न करती है। गतिशीलता के अभाव में अंतर्नस्ल का तत्त्व उग्र रूप से पाया जाता है; जैसे-टुंड्रा प्रदेश के लैप, सेमॉयड और एस्कीमो मानव। इनमें अंर्तप्रजातीय विवाह होता है। यही कारण है। कि इनमें अंतर्नस्ल के तत्त्व उग्र रूप से मिलते हैं। इस प्रकार के विवाह से रक्त की शुद्धता, संस्कृति की रक्षा तथा समान प्रजातीय लक्षणों का स्थायित्व होता है। ऊँची प्रजातियाँ भी अपनी रक्त की पवित्रता को बनाए रखने के लिए अंर्तप्रजातीय विवाह करती हैं।

2. विशेष शारीरिक लक्षणों के तत्त्व – प्रजातियों का वर्गीकरण शारीरिक लक्षणों के आधार पर भी किया जाता है। प्रत्येक प्रजाति में कुछ विशेष शारीरिक लक्षण पाए जाते हैं; जैसे-शरीर का रंग, बाल, आँख, खोपड़ी, नासिका, कद, जबड़ों की बनावट आदि। वर्तमान समय में यातायात के साधनों में वृद्धि होने से शारीरिक लक्षण धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं।

3. वंशानुक्रमण के लक्षणों के तत्व – मैंडल के सिद्धांत से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सहवास से रक्त में उन्हीं लक्षणों का अस्तित्व होता है जो पैतृक होते हैं या वंश परंपरा से चले आ रहे होते हैं। शारीरिक लक्षण एक श्रृंखला के समान होते हैं जो वंश परंपरा के कारण अनेक पीढ़ियों तक चलते हैं, जैसे कि नीग्रो का पुत्र नीग्रो ही होता है। वह कभी भी श्वेत प्रजाति के लक्षणों से युवत नहीं होता है। प्रजाति की पवित्रता और संस्कृति की रक्षा पतृक गुणों के द्वारा ही होती है।

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प्रश्न 4.
प्रजाति के निश्चित एवं अनिश्चित लक्षण कौन-से माने जाते हैं?
उतर
प्रजाति के निश्चित लक्षण संख्यात्मक अनुमान प्रदान करते हैं जिन्हें अंकगणित की संख्याओं में बताया जा सकता है, जबकि प्रजाति के अनिश्चित लक्षणों को मापा नहीं जा सकता है और न ही अंकगणित की संख्याओं द्वारा अभिव्यक्त किया जा सकता है। इनको केवल अनुमान द्वारा ही ज्ञात किया जा सकता है। प्रजाति के निश्चित एवं अनिश्चित लक्षण निम्न प्रकार हैं –
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प्रश्न 5.
डी०पी० मुकर्जी के जीवन के बारे में आप क्या समझते हैं?
उत्तर
भारतीय समाजशास्त्र को अमूल्य योगदान प्रदान करने वाले एक प्रमुख समाजशास्त्री ध्रुजटि प्रसाद मुकर्जी हैं, जिन्हें प्यार से लोग ‘डी०पी०’ के नाम से पुकारते थे। भारतीय समाज के विश्लेषण में मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य को अपनाने वाले समाजशास्त्रियों में इनका अग्रणी स्थान रहा है। वह अपने समय की एक महान् बौद्धिक विभूति, भारतीय समाजशास्त्र के संस्थापकों में अग्रणी और भारतीय नवजाकरण के क्रांतिदूत माने जाते हैं। डी०पी० मुकर्जी प्रतिष्ठित भारतीय सम्मनस्के जो थे ही, उनकी रुचि अर्थशास्त्र, साहित्य, संगीत और कला के क्षेत्र में भी थी। प्रो० मुकर्जी एक विद्वान, सुसंस्कृत और भावुक प्रकृति के यक्ति थे। उनके संपर्क में आने वाले युवा लोग उनसे अत्यधिक प्रभावित होते थे। और उनसे दिशा निर्देश पाते थे।

डी०पी० मुकर्जी का जन्म 5 अक्टूबर, 1894 ई० को बंगाल में एक मध्यवर्गीय ब्राह्मण परिवार में हुआ था यह वह समय था जब बंगाली साहित्यको पुनर्जागरण हो रहा था उन पर बंकिम चंद्र, रवींद्रनाथ ठाकुर एवं शरत्चंद्र का अत्यधिक प्रभाव पड़ा। उनमें भविष्य को देखने की भी अद्भुत क्षमता थी। उनकी शिक्षा-दीक्षा कलकत्ता (कोलका) में हुई, किंतु अपने जीवन का अधिकांश समय उन्होंने लखनऊ में व्यतीत किया। 1922 ई० में लखनऊ विश्वविद्यालय में वे समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र विभाग में शिक्षक नियुक्त हुए जहाँ ने लगभग 32 वर्ष तक कार्य किया बंगला भाषा में उन्हें विशेष योग्यता प्राप्त थी। उनका दर्शनशास्त्र, इतिहास, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्रीय सिद्धांतों और कला, साहित्य व संगीत के सिद्धांतों पर पूरा-पूरा अधिकार था। उन्होंने ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों का इस प्रकार से समन्वय किया कि वे मानव एवं संस्कृति के समक्ष आने वाली विभिन्न समस्याओं को आलोचनात्मक दृष्टि से देख सकते थे।

लखनऊ से सेवानिवृत्ति के एक वर्ष पूर्व 1953 ई० में उन्होंने अलीगढ़ विश्वविद्यालय के तत्कालीन उपकुलपति डॉ० जाकिर हुसैन के निमंत्रण पर वहाँ अर्थशास्त्र विभाग के अध्यक्ष का पद ग्रहण किया। यहाँ वे पाँच वर्षों तक रहे। इसी काल में वे हेग के अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक अध्ययन संस्थान में समाजशास्त्र के अतिथि आचार्य के रूप में गए। मुकर्जी ‘भारतीय समाजशास्त्रीय परिषद् के संस्थापेक सदस्य थे। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय समाजशास्त्रीय परिषद् में भारत की ओर से प्रतिनिधित्व किया और उसके उपाध्यक्ष भी रहे।

मुकर्जी चूंकि अत्यधिक धूम्रपान करते थे अतः उन्हें गले का कैंसर हो गया तथा 5 दिसम्बर, 1962 ई० को वे स्वर्ग सिधार गए। मुकर्जी समाजवाद के प्रति प्रतिबद्ध थे और नियोजन (Planning) में विश्वास करते थे। वे वर्ग एवं विशेषाधिकारों के भी विरुद्ध थे। डी०पी० मुकर्जी एक बहुत ही प्रभावशाली और सफल प्राध्यापक, महान् सामाजिक विचारक, उपन्यासकार, साहित्य और कला के विवेचक, संगीत पारखी, मानवतावादी दृष्टिकोण से ओतप्रोत मानव और कुशल प्रशासक थे। वे समस्त ज्ञान की एकता और अनुभव के एकीकरण में विश्वास करते थे। वे हठवादी मनोवृत्ति, ‘अन्य पंरपरा और संकुचित दृष्टिकोण के विरोधी थे।

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प्रश्न 6.
भारतीय संस्कृति के बारे में मुकर्जी के विचार बताइए।
उत्तर
मुकर्जी के अनुसार भारतीय संस्कृति का इतिहास सांस्कृतिक समन्वय का इतिहास है। भारत की मौलिक संस्कृति उपनिषदों में वर्णित सिद्धांतों पर आधारित है तथा इसीलिए इसमें सभी क्रियाएँ मनुष्य को मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रेरित करती हैं। रहस्यवादी परिप्रेक्ष्य को मुकर्जी ने भारतीय संस्कृति का मौलिक परिप्रेक्ष्य माना है। उनके विचारानुसार बौद्ध संस्कृति ने भारतीय संस्कृति को लचीला बना दिया। मुस्लिम शासनकाल में भारत की कोई विशेष प्रगति नहीं हुई। परंतु अंग्रेजी शासनकाल में भारतीय समाज की अर्थव्यवस्था में अनेक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए।

नवीन अर्थव्यवस्था, पश्चिमी शिक्षा तथा नवीन व्यवसायों ने भारतीय समाज में गतिशीलता की वृद्धि की तथा परंपरागत मध्यम वर्ग की समाप्ति कर एक ऐसे नवीन व चालाक मध्यम वर्ग का निर्माण किया जिसने सामाजिक-आर्थिक विकास में कोई विशेष भूमिका अदा नहीं की। इस मध्यम वर्ग (मुख्यत: जमींदार) ने भारत में अंग्रेजी शासनकाल की जड़े मजबूत करने में सहायता प्रदान की तथा इसी ने देश का विभाजन करने में भी सहायता दी। यह वर्ग भारत में अंग्रेजों की तरह शोषण करता रहा है और भारत के पुनर्गठन व पुनर्निर्माण की ओर उसने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि अंग्रेजों ने भारतीय समाज का एकीकरण उस पर जबरदस्ती लादी गई बनावटी एकरूपता से किया, इसलिए इसके दूरगामी दृष्टि से अच्छे परिणाम नहीं हुए। उनका विचार था कि क्षेत्रीय संस्कृतियों की विशेषता की एकता से ही भारत । का नवनिर्माण हो सकता है।

प्रश्न 7.
ए० आर० देसाई के जीवन के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर
देसाई का जन्म बड़ौदा के एक सुप्रसिद्ध परिवार में 1915 ई० में हुआ था। उन्होंने कानून की शिक्षा प्राप्त कर बंबई विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में प्रो० घूयें के निर्देशन में पी-एच०डी० की उपाधि प्राप्त की। वे इसी विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्राध्यापक और बाद में विभागाध्यक्ष बन गए। देसाई कुछ समय तक ‘भारतीय साम्यवादी दल के सदस्य भी रहे, किन्तु पार्टी के कुछ मुद्दों पर मतभेद हो जाने के कारण 1939 ई० में उन्होंने दल की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। 1953 ई० में वे ‘ट्राटस्कीवादी क्रांतिकारी समाजवादी दल के सदस्य बन गए, किंतु उनकी समझौतेवादी प्रकृति न होने और खरी बौद्धिक ईमानदारी ने अंततः 1961 ई० में उन्हें इस संगठन को भी छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया। फिर भी, वे आजीवन अपनी मार्क्सवादी विचारधारा के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध रहे। बंबई विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने “स्वंतत्रता के बाद भारतीय विकास की द्वंद्वात्मकता विषय पर गहन शोध कार्य किया।

देसाई ‘भारतीय समाजशास्त्रीय परिषद् के संस्थापक सदस्यों में से रहे हैं। वे इस संस्था के 1978-80 के सत्र में अध्यक्ष थे तथा 1951 ई० में यूनेस्को की एक कार्य योजना ‘भारत में समूह तनाव’ के सह-निदेशक थे। वे इसी संस्था के ‘बंबई के औद्योगिक श्रमिकों की साक्षरता और उत्पादन संबंधी कार्य-योजना के मानद निदेशक भी रहे हैं। देसाई ‘इण्डियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च के राष्ट्रीय शोधार्थी (1981-83) भी रहे हैं। देसाई की प्रथम प्रमुख कृति ‘भारतीय राष्ट्रवाद की सामाजिक पृष्ठभूमि’ (हिन्दी अनुवाद) न केवल अपने मार्क्सवाद शैक्षिक परिप्रेक्ष्य के करण एक नवीन प्रवृत्ति स्थापित करने वाला गौरव ग्रंथ (क्लासिक) रहा है, अपितु इसे भारत में समाजशास्त्र का इतिहास के साथ समागम करने वाली एक उत्कृष्ट प्रथम कृति कहा जा सकता है।

देसाई ने इस ग्रंथ के बाद कई भिन्न विषयों; जैसे भारतीय राज्य, कृषक समाज व्यवस्था, प्रजातंत्रात्मक अधिकार, नगरीकरण, कृषक आंदोलन आदि पर लिखा है। उनकी भारत में ग्रामीण समाजशास्त्र नामक संपादित पुस्तके अपने विषय की एक प्रामाणिक पाठ्य-पुस्तक मानी जाती रही है जिसके अब तक कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होंने इसमें भारतीय कृषक व्यवस्था के सामंती चरित्र को उजागर किया है। 1994 ई० में ए०आर० देसाई स्वर्ग सिधार गए।

प्रश्न 8.
एम० एन० श्रीनिवास के जीवन के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर
एम० एन० श्रीनिवास भारत के एक सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री रहे हैं जिनका जन्म 16 नवंबरं, 1916 ई० को मैसूर के आयंगार ब्राह्मण परिवार में हुआ। उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय से 1936 ई० में सामाजिक दर्शनशास्त्र में बी०ए० (आनर्स) किया। सामाजिक दर्शनशास्त्र में उस समय समाजशास्त्र तथा सामाजिक मानवशास्त्र भी पढ़ाया जाता था। तत्पश्चात् श्रीनिवास उच्च शिक्षा के लिए बंबई विश्वविद्यालय चले गए तथा वहीं 1938 ई० में “Marriage and Family among the Kannada Castes in Mysore State” विषय पर शोध-निबंध लिखकर एम०ए० समाजशास्त्र की उपाधि प्राप्त की।

बाद में यह शोध-प्रबंध 1944 ई० में पुस्तक के रूप में प्रकाशित भी हो गया। 1944 ई० में उन्हें प्रो० जी०एस० घूर्ये के निर्देशन में दक्षिण भारत के कुर्ग लोगों पर थीसिस लिखने के आधार पर पी-एच० डी० की उपाधि प्रदान की गई। इसके पश्चात् वह ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में सामाजिक मानवशास्त्र में उच्च अध्ययन करने के लिए चले गए तथा वहाँ सुप्रसिद्ध सामाजिक मानवशास्त्री ए०आर० रैडक्लिफ-ब्राउन तथा ई०ई० ईवांस-प्रिचार्ड के विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुए।

जिन आँकड़ों को आधार मानकर उन्होंने बंबई में पी-एच०डी० के लिए थीसिस लिखा था उन्हीं आँकड़ों के आधार पर डी० फिल० (D. Phil.) के लिए “Religion and Society among the Coorgs of South India” नामक विषय पर थीसिस लिखा जो कि 1952 ई० में पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में ही उन्होंने सर्वप्रथम ‘संस्कृतिकरण’ की अवधारणा का प्रयोग किया है। श्रीनिवास 1999 ई० में स्वर्ग सिधार गए।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जाति एवं प्रजाति का अर्थ स्पष्ट कीजिए। जाति एवं प्रजाति के बारे में जी०एस० घूर्ये के विचारों की समीक्षा कीजिए।
उत्तर
जाति का अर्थ
हिंदी का ‘जाति’ शब्द, संस्कृत भाषा की ‘जन’ धातु से बना है जिसका अर्थ ‘उत्पन्न होना’ व ‘उत्पन्न करना है। इस दृष्टिकोण से जाति से अभिप्राय जन्म से समान गुण वाली वस्तुओं से है। परंतु समाजशास्त्र में जाति’ शब्द का प्रयोग विशिष्ट अर्थों में किया जाता है। रिजले (Risley) के अनुसार, यह परिवार या कई परिवारों का संकलन है जिसको एक सामान्य नाम दिया गया है, जो किसी काल्पनिक पुरुष या देवता से अपनी उत्पत्ति मानता है तथा पैतृक व्यवसाये को स्वीकार करता है। और जो लोग विचार कर सकते हैं उन लोगों के लिए एक सजातीय समूह के रूप में स्पष्ट होता है।”

प्रजातिको अर्थ

प्रजाति एक जैविक अवधारणा है। यह मानवों के उस समूह को प्रकट करती है जिनमें शारीरिक व मानसिक लक्षण समान होते हैं तथा ये लक्षण उन्हें पैतृकता के आधार पर प्राप्त होते हैं। शरीर के रंग, खोपड़ी और नासिका की बनावट वे अन्य अंगों की बनावट के आधार पर विभिन्न प्रजाति समूहों को देखते ही पहचाना जा सकता है। शारीरिक दृष्टि से विभिन्न प्रजातियाँ परस्पर एक-दूसरे से अलग-अलग रही हैं, परंतु सभी लोग एक-दूसरे का अस्तित्व मानते रहे हैं।

परंतु अमेरिका आदि की तरह यहाँ कभी भी रंगभेद पर आधारित प्रजातीय संघर्ष देखने को नहीं मिलता है। इस प्रकार, जैविक अवधारणा के रूप में प्रजाति का प्रयोग सामान्यतः उस समूह के लिए किया जाता है जिसके अंदर सामान्य गुण होते हैं अथवा जिसे समान शारीरिक लक्षणों से पहचाना जा सकता है। हॉबेल (Hoebel) के अनुसार, “प्रजाति एक प्राणिशास्त्रीय अवधारणा हैं यह वह समूह है जो कि शारीरिक विशेषताओं का विशिष्ट योग धारण करता है।”

जाति एवं प्रजाति के बारे में जी०एस० घूयें के विचार

घूयें की रुचि मां से Pाति और प्रजाति से संबंधित विषयों में रही है। उनका पी-एचडी। विषय भी जाति का नृजातीय सिद्धांत’ था जिसके आधार पर 1932 ई० में उनकी प्रथम पुस्तक ‘भारत में जाति एवं प्रजाति के नाम से प्रकाशित हुई। घूयें ने जाति को एक जटिल घटना बताते हुए इसकी निश्चित शब्दों में कोई सामान्य परिभाषा तो नहीं दी है परंतु इसकी छः विशेषताओं का उल्लेख किया है। जो इसका प्रतिनिधित्व करती हैं। ये विशेषताएँ हैं-समाज का खंडात्मक विभाजन, संस्तरण, सामाजिक अंतःक्रियाओं विशेषकर साथ बैठकर भोजन करने पर प्रतिबंध, विभिन्न जातियों के भिन्न-भिन्न अधिकार तथा कर्तव्य, निर्बाध व्यवसाय के चुनाव का अभाव तथा अंत:विवाह अर्थात् जाति से बाहर विवाह पर प्रतिबंध। घूर्ये ने जाति और उपजातियों के भेद को स्पष्ट करते हुए कहा है। कि जिन्हें हम जातियाँ कहते हैं, वे उपजातियाँ हैं और इन पर ही ये छ: विशेषताएँ लागू होती हैं। जाति के उद्भव के बारे में उन्होंने प्रजातीय सिद्धांत का समर्थन किया है।

उनका यह विचार रिजले से प्रभावित था परंतु उन्होंने रिजले के विचारों और प्रजातियों के वर्गीकरण को यथावत् स्वीकार नहीं किया। जाति और प्रजाति में आंतरिक संबंध मानते हुए उन्होंने हिंदू जनसंख्या को उसकी शारीरिक विशेषताओं के आधार पर छह वर्गों में विभाजित किया- इंडो-आर्यन, पूर्व-द्रविड़, द्रविड़, पश्चिमी, मुंडा एवं मंगोलियन जाति के उद्भव के बारे में घूयें ने कहा है-‘जाति व्यवस्थी इंडो-आर्यन संस्कृति के ब्राह्मणों को शिशु है जिसका पालन-पोषण गंगा के मैदान में हुआ है और वहाँ से इसे देश के दूसरे भागों में लाया गया।” अंतर्विवाह (सजातीय विवाह) की उत्पत्ति, जिससे ‘प्रजातीय शुद्धता के विचार जुड़े हुए हैं, भी सर्वप्रथम गंगा के मैदान में रहने वाले ब्राह्मणों में हुई थी और वहीं से अंतर्विवाह की धारणा और जाति व्यवस्था के अन्य तत्त्व ब्राह्मणों के अनुयायियों ने देश के दूसरे भागों में फैलाए।

प्रश्न 2.
घूर्ये द्वारा प्रतिपादित जाति की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
घूयें ने जाति की कोई औपचारिक परिभाषा न देकर इसकी छह महत्त्वपूर्ण विशेषताओं वाली विस्तृत परिभाषा पर बल दिया है। घूयें ने जाति के प्रमुख लक्षणों का वर्णन निम्नलिखित छह शीर्षकों के अंतर्गत किया है –
1. भारतीय समाज का खंडात्मक विभाजन – जाति व्यवस्था एक ऐसी संस्था है जिससे भारतीय समाज खंडों में विभाजित हो गया है और यह विभाजन सूक्ष्म रूप में हुआ है। प्रत्येक खंड के सदस्यों की स्थिति तथा भूमिका सुस्पष्ट व सुनिश्चित रूप से परिभाषित हुई है। घूर्ये ने इसे सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता माना है। उनके शब्दों में, इससे तात्पर्य यह है कि जाति व्यवस्था द्वारा बँधे समाज में हमारी भावना भी सीमित होती है, सामुदायिक भावना संपूर्ण मनुष्य समाज के प्रति न होकर केवल जाति के सदस्यों तक सीमित होती है तथा जातिगत आधार पर सदस्यों को प्राथमिकता दी जाती है। इस प्रकार, प्रत्येक जाति समाज को एक बंद खंड है क्योंकि जाति का निर्धारण जन्म से होता है। किसी भी व्यक्ति की जाति का निर्धारण जन्म से, जन्म के समय होता है। इससे न तो बचा जा सकता है और न ही इसे बदला जा सकती है।

2. संस्तरण या सौपानिक विभाजन – जाति व्यवस्था में ऊँच-नीच की परंपरा स्थापित होती है। इसी कारण प्रत्येक जाति दूसरी जाति की तुलना में असमान होती है अर्थात् प्रत्येक जाति दूसरी . से उच्च अथवा निम्न होती है। सैद्धांतिक रूप से कोई भी दो जातियाँ समान नहीं होतीं। हम की । भावना सीमित होने से सदस्य केवल अपनी जाति के लोगों को ही महत्त्व देते हैं और उनमें श्रेष्ठता की भावना भी जन्म लेती है। परंतु कुछ ऐसी भी जातियाँ हैं जिनमें सामाजिक दूरी इतनी कम है कि उनमें ऊँच-नीच के आधार पर जो सामाजिक संरचना स्पष्ट हुई है वही संस्तरण परंपरा है। जातीय संस्तरण रक्त की पवित्रता, पूर्वजों के व्यवसाय के प्रति आस्था व अन्यों के साथ भोजन-पानी के प्रतिबंध आदि विचारों पर आधारित होती है।

3. सामाजिक अंतःक्रियाओं विशेषकर साथ बैठकर भोजन करने पर प्रतिबंध – भारतीय जाति व्यवस्था प्रत्येक जाति के सदस्यों के लिए अपने समूह के बाहर भोज़न और सामाजिक सहवास पर नियंत्रण रखती है। इन नियमों का बड़ी. कठोरता से पालन किया जाता है। प्रत्येक जाति में ऐसे नियम बड़े सूक्ष्म रूप से बनाए गए हैं जो यह निर्धारण करते हैं कि किसी जाति के सदस्य को (मुख्यतः जो ऊँची जातियों के हैं) कहाँ कच्चा भोजन करना है, कहाँ पक्का तथा कहाँ केवल जल ग्रहण करना है और जल पीना भी निषिद्ध है ये नियम पवित्रता तथा अपवित्रता के विचार से संचालित होते हैं।

4. विभिन्न जातियों के भिन्न-भिन्न अधिकार तथा कर्तव्य – जिस प्रकार जाति व्यवस्था में संस्तरण है ठीक उसी प्रकार इसमें विभिन्न जातियों के लिए भिन्न-भिन्न अधिकार तथा कर्तव्य निर्धारित होते हैं। उनके अधिकार तथा कर्तव्य केवल धार्मिक क्रियाओं तक ही सीमित न रहकर लौकिक विश्व तक फैले हुए होते हैं। विभिन्न जातियों के मध्य होने वाली अंत:क्रिया इन्हीं नियमों से संचालित होती है।

5. निर्बाध व्यवसाय के चुनाव का अभाव – मुख्यत: सभी जातियों के कुछ निश्चित पेशे होते हैं। और जाति के सदस्य अपने उन्हीं पैतृक पेशों को स्वीकार करते हैं। उन्हें छोड़ना उचित नहीं समझा जाता। कोई भी पेशा, चाहे वह व्यक्ति की आवश्यकता की पूर्ति करे या न करे, उसे । मानसिक संतोष हो या न हो; व्यक्ति को परंपरागत पेशों को ही अपनाना पड़ता है। इस प्रकार, जाति व्यवसाय के चुनाव को भी सीमित कर देती है जो जाति की भाँति जन्म पर आधारित तथा वंशानुगत होता है। समाज के स्तर पर जातिगत श्रम-विभाजन में कठोरता देखी जाती है तथा विशिष्ट व्यवसाय कुछ विशिष्ट जातियों को ही दिए जाते हैं।

6. अंतःविवाह – सभी जातियाँ अंत:विवाही होती हैं अर्थात् जाति के सदस्यों को अपनी ही जाति में विवाह करना पड़ता है। घूयें का भी यहीं मत है कि जाति व्यवस्था का अंत:विवाही सिद्धांत इतना कठोर है कि समाजशास्त्री इसे जाति व्यवस्था का प्रमुख तत्त्व मानते हैं। व्यावहारिक रूप : में यह अंत:विवाह भी भौगोलिक सीमा के अंतर्गत बंधा हुआ है। एक जाति की कई उपजातियाँ होती हैं और प्रायः एक ही प्रांत में रहने वाली उपजातियों में विवाह होते हैं। अंतः विवाह के नियम जाति व्यवस्था को आगे बढ़ाने में सहायता करते हैं।

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प्रश्न 3.
मुकर्जी के परंपरा एवं परिवर्तन के बारे में विचारों की समीक्षा कीजिए।
उत्तर
डी०पी० मुकर्जी मार्क्सवादी थे, किंतु वे स्वयं को मार्क्सवादी के स्थान पर ‘मार्क्सशास्त्री (Marxologist) कहलाना अधिक पसंद करते थे। उन्होंने भारतीय इतिहास का द्वंद्वात्मक प्रक्रिया द्वारा विश्लेषण किया है। उनके अनुसार परंपरा तथा आधुनिकता, उपनिवेशवाद तथा राष्ट्रवाद, व्यक्तिवाद और समूहवाद में द्वंद्वात्मक संबंध हैं। ये एक-दूसरे को प्रभावित करते तथा होते हैं। मुकर्जी का द्वंद्ववाद का आधार मानवतावादे रहा है जो संकुचित नृजातीय एवं राष्ट्रीय विचारों की सीमाओं से परे था। उन्होंने मार्क्स के सिद्धांतों को भारतीय परंपरा के साथ जोड़ने का प्रयत्न किया। मुकर्जी ने ‘भारतीय समाज के अध्ययन के लिए परंपराओं के अध्ययन को आवश्यक बताया।

यही कारण है कि परंपरा का विवेचन मुकर्जी के अध्ययन का मुख्य केंद्र-बिंदु रहा। उन्होंने इसके प्रकारों, स्तरों इनमें आपसी द्वंद्व एवं परिवर्तन का गूढ़ विवेचन किया। यही नहीं, उन्होंने भारतीय परंपरा और परिवर्तन (आधुनिकता) के मध्य संघर्ष की द्वंद्वात्मक व्याख्या कर भारतीय समाजशास्त्र में अपना एक विशिष्ट स्थान बनाया है। मुकर्जी ने भारतीय परंपरा में अनेक प्रकारों के विरोधों का उल्लेख किया और इस आधार पर परंपराओं के द्वंद्वात्मक अध्ययन का सुझाव दिया। मुकर्जी भारतीय परंपरा एवं पश्चिम की परंपरा के संघर्ष के द्वंद्व की चर्चा करते हैं। मुकर्जी के विचारानुसार सामाजिक मूल्यों एवं वर्ग हितों में पहले पारस्परिक संघर्ष एवं अंतरखेल या क्रिया (Interplay) होता है, फिर उनमें समन्वय पैदा होता है। यह प्रक्रिया चलती रहती है और इससे समाज में परिवर्तन होता रहता है।

मुकर्जी के अनुसार, भारत में यह प्रक्रिया मुसलमानों के आगमन एवं उनके प्रभाव से ही प्रारंभ हुई, जो आज तक चली आ रही है। ब्रिटिश शासन के प्रभाव से भारत में एक नवीन मध्यम वर्ग का उदय हुआ जिसकी जड़े न तो परंपरा में थीं और न आधुनिकता में ही, वरन् यह दोनों का समन्वय था। भारतीय परंपरा एवं पश्चिम की परंपरा के संघर्ष के फलस्वरूप अनेक सांस्कृतिक विरोधाभास भी उत्पन्न हुए। सांस्कृतिक विरोधाभासों एवं नवीन वर्गों के उदय के कारण भारत में संघर्ष एवं समन्वय की प्रक्रिया भी प्रारंभ हुई। मुकर्जी के अनुसार, इस संघर्ष एवं समन्वय को भारत में विद्यमान वर्ग संरचना के आधार पर आगे बढ़ाया जाना चाहिए और इसे आगे बढ़ाने के लिए योजना का सहारा लिया जाना चाहिए। मुकर्जी ने परंपराओं के अनेक प्रकार के विरोधों का उल्लेख किया है। उनका मत है कि कस्बों एवं नगरों में स्वेच्छावाद पनप रहा है, व्यक्तिवादी प्रवृत्ति प्रबल होती जा रही है और समूहवादी परंपरा का विरोध हो रहा है।

उनका कहना है कि परंपराओं में उत्पन्न हो रहे इस प्रकार के विरोधाभासों का अध्ययन किया जाना चाहिए। उन्होंने आंतरिक एवं बाह्य भारतीय पंरपरा का इस्लामिक परंपरा से द्वंद्व सहित भारतीय परंपरा में निहित उच्च परपंरा और स्थानीय परंपरा के द्वंद्व की उदाहरण सहित विवेचना की है। सामाजिक परिवर्तन के संदर्भ में उन्होंने अत्रेय ब्राह्मण ग्रंथ के ‘चरेवेति-चरेवेति’ अर्थात् ‘आगे बढ़ो, आगे बढ़ो’ की धारणा को स्वीकार किया है। मुकर्जी की दृष्टि में धर्म से संबंधित परंपराएँ, जो आज भी अपनी निरंतरता बनाए हुए हैं और नगरीय मध्यम वर्ग की नवीन परंपराओं के बीच द्वंद्व या संघर्ष पाया जाता है। समाजशास्त्री इन पर इस दृष्टि से विचार करता है कि परंपराओं का विकास संघर्ष या द्वंद्व के माध्यम से होता है। स्वेच्छात्मक क्रिया के अभाव के कारण भारतीय समाज को एक लाभ अवश्य मिला है। कुछ मध्यम वर्गों को छोड़कर, भारतीय जीवन की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता लोगों में नैराशय या कुंठा का अभाव है।

यदि हम भारतीय किसान तथा परिवार के मुखिया को देखें तो पाएँगे कि उनमें ‘आकांक्षाओं का स्तर’नीचा पाया जाता है। यह आकांक्षाओं का स्तर परंपराओं द्वारा निर्देशित होता है जो अधिकतर भारतीयों के लिए संस्कृति और मूल्यों का स्तर निर्धारित करते हैं। मुकर्जी ने परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व का भी उल्लेख किया है। इन्होंने इन्हें क्रमश: वाद और प्रतिवाद के रूप में दर्शाया है। दोनों के संघर्ष से ही आधुनिकीकरण पनपता है जो दोनों का समन्वय भी है। उनका मत है कि आधुनिकीकरण को समझने के लिए परंपरा को समझना आवश्यक है क्योंकि वर्तमान का अध्ययन भूतकाल के संदर्भ में ही किया जा सकता है। मुकर्जी के अनुसार हमारी परंपराओं में परिवर्तन के तीन तत्त्वों-श्रुति, स्मृति तथा अनुभव को मान्यता प्रदान की गई है।

अनुभव को विशेषतः अत्यंत महत्त्वपूर्ण तत्त्व माना गया है। कई उपनिषद् तो व्यक्तिगत अनुभवों पर ही आधारित हैं। व्यक्तिगत अनुभव शीघ्र ही सामूहिक अनुभव के रूप में पुष्पित हुआ। सामूहिक अनुभव को ही परिवर्तन का प्रमुख सिद्धांत माना गया है। यदि हम विभिन्न संप्रदायों या पंथों की उत्पत्ति पर विचार करें तो पाएँगे कि उनके संत-संस्थापकों ने उन्हें अपने व्यक्तिगत अनुभव से प्रारंभ किया, उनका अनुष्ठानों, मंदिरों तथा पुजारियों से कोई संबंध नहीं था। उन्होंने जो कुछ कहा, स्थानीय बोली या भाषा में कहा, न कि संस्कृत में। उन्होंने अधिकतर जातियों एवं वर्गों को ही अपने पंथ से संबंधित प्रमुख बातें बताईं। उन्होंने स्त्रियों को समान स्थिति प्रदान की तथा प्रेम, स्नेह एवं सहजता या स्वाभाविकता का उपदेश दिया। इन संतों का लोगों पर व्यापक प्रभाव पड़ा और उन्होंने परंपराओं पर भी काफी प्रभाव छोड़ा।

उच्च परंपराएँ प्रमुखतः बौद्धिक थीं तथा स्मृति और श्रुति में केंद्रित थीं जहाँ परिवर्तन का सिद्धांत द्वंद्वात्मक अर्थनिरूपण या व्याख्या द्वारा उपलब्ध था। यही प्रक्रिया हमें मुसलमानों में भी देखने को मिलती है। उनमें सूफियों के प्रेम और अनुभव पर विशेष जोर दिया गया। परंपराओं के विकास में जहाँ द्वंद्वात्मक योग्यता का काफी प्रभाव रहा है, वहाँ अनुभव का भी प्रभाव रहा है। यहाँ यह मानना या कहना अनुचित होगा कि बुद्धि-विचार ऐतिहासिक दृष्टि से अनुभव, प्रेम, स्नेह आदि की तुलना में परंपराओं में परिवर्तन के अभिकरण के रूप में अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। मुकर्जी ने बताया है कि जब कभी उच्च और निम्न बौद्धिक परंपराओं में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होगी, तब उसका अनुमान लगा लिया जाता है और प्रयत्नपूर्वक उन्हें वैचारिक दृष्टि से एक-दूसरे के निकट ला दिया जाता है।

भारतीय समाज जाति प्रधान समाज रहा है। यह एक ऐसा समाज है जिसने वर्गों के निर्माण को रोका है तथा सब प्रकार की वर्ग-चेतना को दबाया है। यहाँ तो चुनावों में भी वर्ग चेतना; जातीय चेतना यो भावना के अंतर्गत समाहित होती है। भारतीय समाज भी पश्चिमी समाज के समान बदल रही है, परंतु यहाँ पश्चिमी समाज के सम्मुने उतना विघटन नहीं हुआ है। भारतीय सामाजिक व्यवस्था के अध्ययन के लिए भारतीय समाजशास्त्री को समाजशास्त्र में एक भिन्न परिप्रेक्ष्य को अपनाने की आवश्यकता है क्योंकि इसकी विशेष परंपराएँ हैं; इसके विशेष प्रतीक और संस्कृति तथा सामाजिक क्रियाओं के विशेष प्रतिमान हैं। तत्पश्चात् भारतीय परंपराओं, संस्कृति तथा प्रतीकों पर आर्थिक और प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों का प्रभाव पड़ता है। इन सबका अध्ययन भारतीय समाजशास्त्रियों को करना है।

प्रश्न 4.
ए० आर० देसाई के राज्य संबंधी विचारों की विवेचना कीजिए।
उत्तर
समाजशास्त्रीय दृष्टि से राज्य एक ऐसी संस्था है जो कि शक्ति के वितरण तथा इसके प्रयोग के एकाधिकार से संबंधित है। राज्य को समाज की वह संस्था, पहलू या माध्यम कहा जा सकता है जो कि बल प्रयोग की ताकत एवं अधिकार रखती है, अर्थात् जो बलपूर्वक नियंत्रण लागू कर सकती है। यह शक्ति समाज के सदस्यों को नियंत्रित करने के काम भी आ सकती है और अन्य समाजों के विरुद्ध भी। राज्य का काम चलाने के लिए शासनतंत्र या सरकार होती है, जो राज्य का संस्थात्मक पहलू है। राज्य की अपनी प्रभुसत्ता होती है। राज्य के सभी नियमों का पालन करना उस राज्य के सदस्यों के लिए अत्यंत आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति इसका पालन नहीं करता है, तब राज्य अपनी प्रभुसत्ता के आधार पर दंड देने का अधिकार रखता है। सरकार की संस्था बिना राज्य की धारणा के काई वास्तविकता नहीं।

ए०आर० देसाई की रुचि आधुनिक पूँजीवादी राज्य (जो अपने आप को तथाकथित कल्याणकारी राज्य कहने का दावा करता है) के विश्लेषण में थी तथा इसे विश्लेषण में उन्होंने मार्क्सवादी दृष्टिकोण को अपनाया। उन्होंने अपने ‘दि मिथ ऑफ दि वेलफेयर स्टेट’ नामक लेख में कल्याणकारी राज्य की विस्तृत विवेचना की है। कल्याणकारी राज्य जनता के कल्याण के लिए नीतियों को बनाता तथा लागू करंता है। ऐसा राज्य गरीबी, सामाजिक भेदभाव से मुक्ति तथा अपने सभी नागरिकों की सुरक्षा का ध्यान रखता है तथा असमानताओं को दूर करने के लिए तथा सबके लिए रोजगार उपलब्ध कराने हेतु हर संभव कदम उठाता है।
देसाई ने कल्याणकारी राज्य की निम्नलिखित तीन प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख किया है –

1. सकारात्मक राज्य – कल्याणकारी राज्य सकारात्मक राज्य होता है। ऐसा राज्य उदारवादी राजनीति के शास्त्रीय सिद्धांत की ‘लेसेज फेयर’ नीति से भिन्न होता है अर्थात् केवल उदारवादी होने मात्र से किसी राज्य को कल्याणकारी राज्य नहीं कहा जा सकता है। कल्याणकारी राज्य कानून एवं व्यवस्था को बनाए रखने के न्यूनतम कार्य ही नहीं करता, अपितु हस्तक्षेपीय राज्य होने के नाते समाज की बेहतरी के लिए सामाजिक नीतियों को तैयार करने तथा लागू करने हेतु भी अपनी शक्तियों का प्रयोग करता है।

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2. लोकतांत्रिक राज्य – कल्याणकारी राज्य लोकतांत्रिक राज्य होता है। लोकतंत्र कल्याणकारी राज्य के उदय की एक अनिवार्य शर्त है। औपचारिक लोकतांत्रिक संस्थाओं; विशेष रूप से बहुदलीय चुनाव कल्याणकारी राज्य की परिभाषिक विशेषता समझी जाती है। यही कारण है। कि उदारवादी चिंतकों ने समाजवादी तथा साम्यवादी राज्यों को इस परिभाषा से बाहर रखा है।

3. मिश्रित अर्थव्यवस्था वाला राज्य – कल्याणकारी राज्य मिश्रित अर्थव्यवस्था’ वाला राज्य होता है अर्थात् ऐसे राज्य की अर्थव्यवस्था में निजी पूँजीवादी कंपनियाँ तथा सार्वजनिक कंपनियाँ दोनों
एक साथ कार्य करती हैं। एक कल्याणकारी राज्य न तो पूँजीवादी बाजार को ही खत्म करना चाहता है और न ही यह उद्योगों तथा दूसरे क्षेत्रों में जनता को निवेश करने से रोकता है। कमोबेश कल्याणकारी राज्य जरूरत की वस्तुओं और सामाजिक अधिसंरचना पर ध्यान केंद्रित करता है, जबकि उपभोक्ता वस्तुओं पर निजी उद्योगों को वर्चस्व होता है।

ए०आर० देसाई ने कुछ ऐसे तरीके बताए हैं जिनके आधार पर कल्याणकारी राज्य द्वारा किए गए कार्यों का परीक्षण किया जा सकता है। ये कार्य निम्नलिखित हैं –

  1. क्या कल्याणकारी राज्य गरीबी, सामाजिक भेदभाव से मुक्ति तथा अपने सभी नागरिकों की सुरक्षा का ध्यान रखता है?
  2. क्या कल्याणकारी राज्य आय संबंधी असमानताओं को दूर करने के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण कदम उठाता है।
  3. क्या कल्याणकारी राज्य अर्थव्यवस्था को इस प्रकार से परिवर्तित करता है, जहाँ पूँजीपतियों की अधिक-से-अधिक लाभ कमाने की प्रवृत्ति पर, समाज की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए रोक लगाई जा सकती हो?
  4. क्या कल्याणकारी राज्य स्थायी विकास के लिए आर्थिक मंदी तथा तेजी से मुक्त व्यवस्था का ध्यान रखता है?
  5. क्या कल्याणकारी राज्य सबके लिए रोजगार उपलब्ध कराता है?

उपर्युक्त आधारों को ध्यान में रखते हुए देसाई ने उन देशों के प्रदर्शन का परीक्षण किया है जिनको अक्सर कल्याणकारी राज्य कहा जाता है; जैसे-ब्रिटेन, अमेरिका तथा यूरोप के अधिकांश राज्य। अधिकांश आधुनिक पूँजीवादी राज्य अपने आप को कल्याणकारी राज्य कहने हेतु बढ़ा-चढ़ाकर दावे पेश करते हैं, परंतु वे अपने नागरिकों को निम्नतम आर्थिक तथा सामाजिक सुरक्षा देने में असफल रहे हैं। वे आर्थिक असमानताओं को कम करने में भी विफल रहे हैं। तथाकथित कल्याणकारी राज्य बाजार के उतार-चढ़ाव से मुक्त स्थायी विकास करने में भी विफल रहे हैं। अतिरिक्त धन की उपस्थिति तथा अत्यधिक बेरोजगारी इनकी कुछ अन्य असफलताएँ हैं। अपने इन तर्कों के आधार पर देसाई ने यह निष्कर्ष निकाला कि कल्याणकारी राज्य द्वारा मानव कल्याण हेतु किए जाने वाले दावे खोखले हैं तथा कल्याणकारी राज्य की सोच एक भ्रम है। कल्याणकारी राज्यों को इन सभी कार्यों को भी करना चाहिए तथा वास्तव में कल्याणकारी होने का प्रयास करना चाहिए।

प्रश्न 5.
एम०एन० श्रीनिवास के गाँव संबंधी विचारों को संक्षेप में बताइए।
उत्तर
एम०एन० श्रीनिवास ने अपने पूरे जीवन भर गाँव तथा ग्रामीण समाज के विश्लेषण में अत्यंत रुचि ली। उन्होंने गाँव में किए गए क्षेत्रीय कार्यों का नृजातीय विवरण तथा. इस पर परिचर्चा देने के साथ-साथ भारतीय गाँव को सामाजिक विश्लेषण की एक इकाई के रूप में भी स्वीकार किया। 1938 ई० में “Marriage and Family among the Kannada Castes in Mysore State” विषय पर शोध-निबंध लिखकर उन्होंने एम०ए० समाजशास्त्र की उपाधि प्राप्त की। बाद में यह शोध-प्रबंध 1944 ई० में पुस्तक रूप में प्रकाशित भी हो गया। 1944 ई० में उन्हें प्रो०जी०एस० घूर्ये के निर्देशन में दक्षिण भारत के कुर्ग लोगों पर थीसिस लिखने के आधार पर पी-एच० डी० की उपाधि प्रदान की गई।

इसके पश्चात् वह ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में सामाजिक मानवशास्त्र में उच्च अध्ययन करने के लिए चले गए तथा वहाँ सुप्रसिद्ध सामाजिक मानवशास्त्री ए०आर० डिक्लिफ-ब्राउन (A,R.Radcliffe-Brown) तथा ई० ई० ईवांस-प्रिचार्ड (E.E. Evans-Pritchard) के विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुए। जिन आँकड़ों को आधार मानकर उन्होंने बंबई में पी-एच०डी० के लिए थीसिस लिखा था उन्हीं आँकड़ों के आधार पर डी०फिल० (D. Phil.) के लिए “Religion and Society among the Coorgs of South India” नामक विषय पर थीसिस लिखा जो कि 1952 ई० में पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में ही उन्होंने सर्वप्रथम सँस्कृतिकरण’ की अवधारणा का प्रयोग किया है। श्रीनिवास 1999 ई० में स्वर्ग सिधार गए।

एम०एन० श्रीनिवास ने मैसूर के रामपुरा गाँव को अपने अध्ययन को आधार बनाया तथा यह मत प्रकट किया कि गाँव की एक आवश्यक सामाजिक पहचान होती है तथा ऐतिहासिक साक्ष्य इस एकीकृत पहचान की पुष्टि करते हैं। गाँव पर श्रीनिवास द्वारा लिखे गए लेख निम्नलिखित दो प्रकार के हैं –

  1. गाँव में किए गए क्षेत्रीय कार्यों का नृजातीय ब्योरा और इन ब्योरों पर परिचर्चा, तथा
  2. भारतीय गाँव जिस प्रकार सामाजिक विश्लेषण की एक इकाई के रूप में कार्य करते हैं उस पर ऐतिहासिक एवं अवधारणात्मक परिचर्चाएँ।

गाँव की एक संकल्पना के रूप में उसकी उपयोगिता के प्रश्न पर श्रीनिवास का अन्य विद्वानों से विवाद भी हुआ उदाहरणार्थ- लुईसयूमो का मत था कि आति जैसी सामाजिक संस्थाएँ गाँव की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण थीं क्योंकि गाँव केवल कुछ लोगों का विशेष स्थान पर निवास करने वाला समूह मात्र था। गाँव बने रह सकते हैं या समाप्त हो सकते हैं और लोग एक गाँव को छोड़ दूसरे गाँव को जा सकते हैं, लेकिन उनकी जाति अथवा धर्म जैसी सामाजिक संस्थाएँ सदैव उनके साथ रहती हैं और जहाँ वे जाते हैं वहीं सक्रिय हो जाती हैं। इसलिए ड्यूमो का मत था कि गाँव को एक श्रेणी के रूप में महत्त्व देना गुमराह करने वाला हो सकता है।

ड्यूमो जैसे विद्वानों के तर्कों के विपरीत श्रीनिवास ने यह दर्शाया कि गाँव की अपनी एकीकृत पहचान होती है और ग्रामीण एकता ग्रामीण सामाजिक जीवन में काफी महत्त्वपूर्ण है। वह भारतीय गाँव को स्थिर, आत्म-निर्भर एवं छोटे गणतंत्र के रूप में चित्रित करने के विरुद्ध थे। ऐतिहासिक तथा सामाजिक साक्ष्यों द्वारा श्रीनिवास ने यह दर्शाया कि वास्तव में गाँव में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। यहाँ तक कि गाँव कभी भी आत्म-निर्भर नहीं थे और विभिन्न प्रकार के आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक संबंधों से क्षेत्रीय स्तर पर जुड़े हुए थे।

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श्रीनिवास ने एस०सी० दुबे तथा डी०एन० मजूमदार के साथ मिलकर भारतीय समाजशास्त्र में उस समय के ग्रामीण अध्ययन को प्रभावशाली बनाया।.. रामपुरा गाँव के अध्ययन में श्रीनिवास ने संस्कृतिकरण की प्रक्रिया का भी पता लगाया। संस्कृतिकरण वह प्रक्रिया है जिसमें कोई निम्न जाति किसी उच्च जाति; सामान्यतया प्रभु जाति को अपना आदर्श मानकर उसके रीति-रिवाजों को अपनाने लगती है तथा कालांतर में परंपरा से जो स्थान उसे मिला हुआ है उससे ऊँचे स्थान को प्राप्त करने का प्रयास करती है। निम्न जातियाँ संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में मांस भक्षण एवं मदिरापान जैसी खाने की परंपरा को बदलकर शाकाहारी भोजन अपनाने लगती हैं। श्रीनिवास को रामपुरा का अध्ययन संस्कृतिकरण की अवधारणा के कारण ही अत्यधिक प्रसिद्धि प्राप्त कर पाया है।

गाँव के अध्ययन में समाजशास्त्र को नृजातीय शोध कार्य की पद्धति के महत्त्व से परिचय कराने को एक मौका दिया। इस पद्धति पर आधारित अध्ययनों द्वारा भारतीय गाँव में हो रहे परिवर्तनों की जानकारी से विकास की योजनाएँ बनाने में सहायता मिली। ग्रामीण अध्ययनों ने समाजशास्त्र जैसे विषय को स्वतंत्र राज्य के परिप्रेक्ष्य में एक नवीन भूमिका प्रदान की। मात्र आदिम मानव के अध्ययन तक सीमित रहकर, इसे आधुनिकता की ओर आगे बढ़ते समाज के लिए भी उपयोगी बनाया जा सकता है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 1 कबीरदास

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 1
Chapter Name कबीरदास
Number of Questions 6
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्यांजलि Chapter 1 कबीरदास

कवि-परिचय एवं काव्यगत विशेषताएँ

प्रश्न:
कबीरदास का जीवन-परिचय दीजिए।
या
कबीरदास की काव्यगत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
या
सन्त कबीर का जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों का नामोल्लेख कीजिए तथा साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय:
सन्त (ज्ञानाश्रयी निर्गुण) काव्यधारा के प्रवर्तक कबीरदास का जन्म संवत् 1456 (सन् 1399) की ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा, सोमवार को हुआ था। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित दोहा प्रसिद्ध है

चौदह सौ पचपन साल गए, चन्द्रवार एक ठाठ ठए।
जेठ सुदी बरसायत को, पूरनमासी प्रगट भए ॥ (कबीर-चरित-बोध)

बाबू श्यामसुन्दर दास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, श्री हजारीप्रसाद द्विवेदी आदि इसी संवत् को स्वीकार करते हैं। एक जनश्रुति के अनुसार इनका जन्म हिन्दू परिवार में हुआ था। कहते हैं कि ये एक विधवा ब्राह्मणी के पुत्र थे, जिसने इन्हें लोक-लाज के भय से काशी के लहरतारा नामक स्थान पर तालाब के किनारे छोड़ दिया था, जहाँ से नीरू नामक एक जुलाहा एवं उसकी पत्नी नीमा नि:सन्तान होने के कारण इन्हें उठा लाये।

कबीर के जन्म-स्थान के सम्बन्ध में भी विद्वानों में मतभेद हैं, परन्तु अधिकतर विद्वान् इनका जन्म काशी में ही मानते हैं, जिसकी पुष्टि स्वयं कबीर की यह कथन भी करता है – काशी में परगट भये, हैं रामानन्द चेताये। इससे इनके गुरु का नाम भी पता चलता है कि प्रसिद्ध वैष्णव सन्त आचार्य रामानन्द से इन्होंने दीक्षा ग्रहण की। गुरुमन्त्र के रूप में इन्हें ‘राम’ नाम मिला, जो इनकी समग्र भावी साधना का आधार बना।

कबीर की पत्नी का नाम लोई था, जिससे इनके कमाल नामक पुत्र और कमाली नामक पुत्री उत्पन्न हुई। कबीर बड़े निर्भीक और मस्तमौला स्वभाव के थे। व्यापक देशाटन एवं अनेक साधु-सन्तों के सम्पर्क में आते रहने के कारण इन्हें विभिन्न धर्मों एवं सम्प्रदायों का ज्ञान प्राप्त हो गया था। ये बड़े सारग्राही एवं प्रतिभाशाली थे। कबीर की दृढ़ मान्यता थी कि मनुष्य को अपने कर्मों के अनुसार ही गति मिलती है, स्थान-विशेष के प्रभाव से नहीं। अपनी इसी मान्यता को सिद्ध करने के लिए अन्त समय में ये मगहर चले गये; क्योंकि लोगों की मान्यता थी कि काशी में मरने वाले को मुक्ति मिलती है, किन्तु मगहर में मरने वाले को नरक। अधिकतर विद्वानों ने माना है कि कबीर की मृत्यु संवत् 1575 (सन् 1519) में हुई। इसके समर्थन में अग्रलिखित उक्ति प्रसिद्ध है

संवत् पंद्रह सौ पछत्तरा, कियो मगहर को गौन।
माघे सुदी एकादशी, रलौ पौन में पौन ॥

कृतियाँ-कबीर लिखना-पढ़ना नहीं जानते थे। यह बात उन्होंने स्वयं कही है
मसि कागद छूयो नहीं, कलम गयो नहिं हाथ।

उनके शिष्यों ने उनकी वाणियों का संग्रह ‘बीजक’ नाम से किया, जिसके तीन मुख्य भाग हैं – साखी, सबद (पद), रमैनी। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार ‘बीजक’ का सर्वाधिक प्रामाणिक अंश ‘साखी’ है। इसके बाद सबद और अन्त में ‘रमैनी’ का स्थान है।

साखी संस्कृत के ‘साक्षी’ शब्द का विकृत रूप है और ‘धर्मोपदेश’ के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। अधिकांश साखियाँ दोहों में लिखी गयी हैं, पर उनमें सोरठे का प्रयोग भी मिलता है। कबीर की शिक्षाओं और सिद्धान्तों का निरूपण अधिकतर ‘साखी’ में हुआ है।
सबद गेय-पद हैं, जिनमें संगीतात्मकता पूरी तरह विद्यमान है। इनमें उपदेशात्मकता के स्थान पर भावावेश की प्रधानता है; क्योंकि इनमें कबीर के प्रेम और अन्तरंग साधना की अभिव्यक्ति हुई है।
रमैनी चौपाई छन्द में रची गयी है। इनमें कबीर के रहस्यवादी और दार्शनिक विचारों को प्रकट किया गया है।

काव्यगत विशेषताएँ

भावपक्ष की विशेषताएँ

कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे, किन्तु ये बहुश्रुत होने के साथ-साथ उच्च कोटि की प्रतिभा से सम्पन्न थे। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी स्पष्ट कहा है कि ‘‘कविता करना कबीर का लक्ष्य नहीं था, कविता तो उन्हें सेंत-मेंत में मिली वस्तु थी, उनका लक्ष्य लोकहित था।” इस दृष्टि से उनके काव्य में उनके दो रूप दिखाई पड़ते हैं (1) सुधारक रूप तथा (2) साधक (या भक्त) रूप। उनके बाद वाले रूप में ही उनके सच्चे कवित्व के दर्शन होते हैं।

(1) कबीर का सुधारक रूप – कबीरदास के समय में हिन्दुओं और मुसलमानों में कटुता चरम सीमा पर थी। कबीर ने इन दोनों को पास लाना चाहा। इसके लिए उन्होंने सामाजिक और धार्मिक दोनों स्तरों पर प्रयास किया।

(क) सामाजिक स्तर पर कबीर ने देखा कि मुस्लिम समाज में समता का भाव विद्यमान है, परन्तु हिन्दू-समाज में ऊँच-नीच और छुआछूत का भाव बहुत प्रबल है। फलत: हिन्दू समाज में व्याप्त विषमता पर कटु प्रहार करते हुए वे कहते हैं

ऊँचे कुल क्या जनमिया, जे करणी ऊँच न होइ।
सोवन कलस सुरै भया, साधू निंदा सोई॥

(ख) धार्मिक क्षेत्र में भी कबीर का सुधारक रूप उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि सामाजिक क्षेत्र में। उन्होंने देखा कि सारे धर्मों का मूल तत्त्व एक ही है, केवल बाहरी आचार-विचार (जैसे—मूर्तिपूजा, उपवास, तीर्थ, रोजा, नमाज आदि) में भिन्नता के कारण धर्म भी भिन्न दिखाई पड़ते हैं; सर्वत्र पाखण्ड का साम्राज्य है, चाहे हिन्दू हों या मुसलमान, सभी आडम्बर में विश्वास करते हैं। अत: उन्होंने हिन्दू-मुसलमानों में व्याप्त इन बाह्याडम्बरों का डटकर विरोध किया

पाहन पूजे, हरि मिलें, तो मैं पूजू पहार।
ताते यह चाकी भली, पीसि खाय संसार ॥ (मूर्तिपूजा का खण्डन)
काँकर-पाथर जोरि कै, मसजिद लई बनाय।
तो चढि मुल्ला बॉग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाय ॥ (अजान की निरर्थकता)

इस प्रकार सुधारक के रूप में कबीरदास की वाणी कटु लगती है, पर उनके तर्क बड़े सटीक और विरोधी को निरुत्तर करने वाले हैं।

(2) कबीर का साधक( या भक्त )रूप:
सुधारक रूप में यदि कबीर में तर्कशक्ति और बुद्धि की प्रखरता देखने को मिलती है तो साधक रूप में उनके भावुक हृदय से मार्मिक साक्षात्कार होता है। कबीर के अनुसार मानव-जीवन की सार्थकता ईश्वर-दर्शन में है। उस ईश्वर को विभिन्न धर्मों के अनुयायी अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। कबीर ने इसे राम नाम से पुकारा है, पर उनके राम दशरथ-पुत्र श्रीराम न होकर निर्गुण-निराकार राम
कबीर का कहना है कि परमात्मा को प्रेम से ही पाया जा सकता है। प्रेम की साधना वस्तुतः विरह की साधना है। आठों प्रहर राम के ध्यान में डूबे रहना ही सच्चे प्रेम का लक्षण है

चिन्ता तो हरि नाँव की, और न चिन्ता दास।
जो कुछ चितवै राम बिन, सोइ काल के पास ॥

कबीर पर यद्यपि वेदान्त के अतिरिक्त हठयोग का भी प्रभाव परिलक्षित होता है, परन्तु सामान्यतः वे सहज साधना पर ही बल देते हैं। कबीर के काव्य का मुख्य प्रतिपादृा-निर्गुण सत्ता के प्रति ज्ञानपूर्ण भक्ति का निवेदन है। कलापक्ष की विशेषताएँ

(1) अनगढ़, किन्तु सहज-सशक्त भाषा – कबीर ने जो कुछ कहा है, वह स्वानुभूति के बल पर ही कहा है, फलतः उनकी वाणी में बड़ी सहजता और मार्मिकता है, जो हृदय पर सीधी चोट करती है। कुछ लोग उनकी भाषी को अनगढ़ कहते हैं, पर दूसरों की दृष्टि में यह अनगढ़ता ही उनकी सहजता है। व्यापक देशाटन के कारण उनकी भाषा में विभिन्न प्रादेशिक बोलियों का सम्मिश्रण होना स्वाभाविक था। उन्होंने स्वयं अपनी भाषा को ‘पूरबी’ कहा है, किन्तु उसमें अवधी, ब्रज, खड़ी बोली, राजस्थानी, पंजाबी, संस्कृत, फारसी आदि का मिश्रण भी दिखाई पड़ता है। इसी कारण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जैसे विद्वान् उनकी भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ या ‘पंचमेल खिचड़ी’ कहते हैं।

(2) प्रवाहमयी शैली – कबीर की शैली उपदेशात्मक, व्यंग्यात्मक एवं भावात्मक है। उसमें अद्भुत प्रवाह, स्वाभाविकता एवं मार्मिकता है। वह किसी पहाड़ी झरने की भाँति अपने तेज बहाव में हमको बहाती चलती है और हमारे मने पर एक अमिट छाप छोड़ जाती है। उनके पदों में संगीतात्मकता है। रहस्यवादी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के स्थलों पर प्रतीकों का प्रयोग हुआ है और उलटबाँसियों में चमत्कारपूर्ण शैली के कारण कुछ दुर्बोधता भी आ गयी है।

(3) अलंकार – अनुप्रास, यमक, उपमा, रूपक, विरोधाभास, अन्योक्ति, दृष्टान्त आदि अनेक अलंकार स्वाभाविक रूप से उनके काव्य को शोभा प्रदान करते हैं। रूपक का एक उदाहरण प्रस्तुत है
संतौ     भाई      आई     ग्यान    की     आँधी    रे।
भ्रम की.टाटी सबै उड़ाणीं, माया रहै न बाँधी रे॥

(4) छन्द – कबीर ने दोहा, चौपाई तथा गेय-पदों में काव्य-रचना की है। कबीर को दोहा बहुत प्रिय है। इनकी साखियों में दोहा, रमैनी में चौपाई तथा सबद में गेय-पदों का प्रयोग हुआ है, जो भावाभिव्यंजना में पूर्ण समर्थ है।

(5) प्रतीकात्मकता – अपने सिद्धान्त के प्रतिपादन के लिए कबीर ने प्रतीकों का प्रचुरता से प्रयोग किया है। यह उन पर साधनात्मक रहस्यवाद के प्रभाव को भी सूचक है। सामान्यतः इससे उनकी शैली की व्यंजकता बढ़ी है। जैसे – शरीर को ईश्वर रूपी जुलाहे के हाथों बुनी बारीक चादर का प्रतीक बनाना अत्यन्त सारगर्भित है – झीनी झीनी-बीनी चदरिया”
साहित्य में स्थान – आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार, “हिन्दी-साहित्य के हजार वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई लेखक उत्पन्न नहीं हुआ। महिमा में यह व्यक्तित्व केवल एक ही प्रतिद्वन्द्वी जानता है – तुलसीदास।”

पद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न:
निम्नलिखित पद्यांशों के आधार पर उनसे सम्बन्धित दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए

साखी

प्रश्न 1:
दीपक  दीया  तेल भरि,  बाती  दई  अघट्ट ।
पूरा किया बिसाहुणाँ, बहुरि न आवौं हट्ट ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कबीर ने दीपक किसे बताया है?
(iv) कबीर ने बाजार किसे बताया है?
(v) कबीर की आत्मा दोबारा इस संसार में क्यों नहीं आना चाहती?
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘साखी’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है। इसके रचयिता भक्त कवि कबीरदास हैं।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – साखी।
कवि का नाम – कबीरदास।
[संकेत – इस शीर्षक के शेष सभी पद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।]

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – कबीर कहते हैं कि गुरु ने अपने शिष्य को प्रेमरूपी तेल से भरा हुआ ज्ञानरूपी दीपक दिया। उसमें कभी न घटने वाली ईश्वरीय लगनरूपी बत्ती भी दे दी। इस अद्भुत ज्ञानरूपी दीपक के प्रकाश में कबीर ने अपने जीवन को फेरा और तब उसे इस संसाररूपी बाजार में | कुछ भी खरीदने-बेचने के लिए दुबारा नहीं आना पड़ेगा, क्योंकि उसकी जीवात्मा ब्रह्ममय हो जाएगी ‘ और परब्रह्म सनातन है, उसका जन्म-मरण नहीं होता।
(iii) कबीर ने गुरु ज्ञान को दीपक बताया है।
(iv) कबीर ने इस संसार को बाजार बताया है।
(v) कबीर की आत्मा जीवन-मरण का कष्ट भोगने के लिए दोबारा इस संसार में नहीं आना चाहती।

प्रश्न 2:
केसौ कहि कहि कूकिये, ना सोइयै असरार ।
राति दिवस कै कूकणें, कबहूँ लगै पुकार ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कबीर ने ईश्वर-प्राप्ति का अचूक साधन किसे बताया है?
(iv) कबीर ने किंस नींद में सोने से मना किया है?
(v) कबीर प्रभु-स्मरण से क्या प्राप्त करना चाहते हैं?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – राम का नाम बहुत प्यारा नाम है, इसलिए बार-बार राम का नाम लीजिए। हठपूर्वक अज्ञान की नींद में सोते मत रहिए, रात-दिन ईश्वर का नाम जपने से कभी-न-कभी आपकी पुकार की भनक दीन-दयालु के कानों में अवश्य पड़ेगी। फलत: वे तुम पर कृपा करेंगे और तुम्हारा उद्धार होगा।
(iii) कबीर ने ईश्वर-प्राप्ति का अचूक साधन प्रभु-स्मरण को बताया है।
(iv) कबीर ने अज्ञान की नींद सोने से मना किया है।
(v) कबीर प्रभु-स्मरण से मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं।

प्रश्न 3:
पाणी  ही  हैं  हिम भया,  हिम  है  गया  बिलाइ ।
जो कुछ था सोई भया, अब कुछ कहा न जाई ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(ii) कबीर ने पानी और बर्फ का उदाहरण देकर क्या बताया है?
(iv) जल (ब्रह्म) की दूसरी अवस्था कौन-सी है?
(v) जीवात्मा मोक्ष प्राप्त करके किसका रूप धारण करती है?
उत्तर:
(i) रेखांकित अंश की व्याख्या – कबीरदास जी ने यहाँ पानी को परमात्मा और बर्फ को जीवात्मा के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा है कि जिस प्रकार पानी जमकर बर्फ और बर्फ पिघलकर पानी बन जाता है, ठीक उसी प्रकार ईश्वर से साकार जीवात्मा का जन्म होता है और शरीर को त्यागकर वह जीवात्मा पुनः परमात्मा में विलीन हो जाती है। इस प्रकार कबीरदास जी ने इस दार्शनिक तथ्य आत्मा परमात्मा का ही एक अंश है’ को अभिव्यक्ति दी है।
(iii) कबीर ने पानी और बर्फ का उदाहरण देकर जीवात्मा को परमात्मा का ही रूप बताया है।
(iv) जल (ब्रह्म) की दूसरी अवस्था बर्फ (जीव) है।
(v) जीवात्मा मोक्ष प्राप्त करके परमात्मा का रूप धारण करती है।

पदावली

प्रश्न 1:
पंडित बाद बदंते झुठा ।
राम कह्याँ दुनियाँ गति पावै, खाँड कह्याँ मुख मीठा ।।
पावक कह्याँ पाँव जे दाझै, जल कहि त्रिषा बुझाई ।
भोजन कह्याँ भूषि जे भाजै, तो सब कोई तिरि जाई ।।
नर के साथ सूवा हरि बोले, हरि परताप न जाणै ।
जो कबहूँ उड़ि जाइ जंगल मैं, बहुरि न सुर तें आजै ।।
साँची प्रीति बिषै माया हूँ, हरि भगतनि सँ हाँसी ।
कहै कबीर प्रेम नहिं उपज्यौ, बाँध्यौ जमपुरि जासी ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइट।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) पंडित लोग किस बात को निरर्थक बताते हैं ।
(iv) किसकी संगति में तोता राम-नाम का उच्चारण करने लगता है?
(v) यदि राम-नाम का उच्चारण करने वाले व्यक्ति के हृदय में सच्चा प्रेम उत्पन्न नहीं होता तो उसकी क्या दशा होती है?
उत्तर:
(i) प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘पदावली’ शीर्षक काव्यांश से उद्धृत है। इसके रचयितासन्त कवि कबीरदास हैं।
अथवा निम्नवत् लिखिए
शीर्षक का नाम – पदावली।
कवि का नाम – कबीरदास।
[संकेत-इस शीर्षक के शेष सभी पद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – कबीरदास जी का कहना है कि पण्डित लोग ईश्वर के विषय में झूठी
बातें करते हैं; जैसे –  “राम का नाम लेने मात्र से ही मुक्ति मिल जाती हैं। कबीर इसका विरोध करते हैं। उनका तर्क है कि यदि राम का नाम लेने मात्र से मुक्ति मिलती तो पानी का नाम लेने से प्यास बुझ जाती और भोजन कहने मात्र से भूख मिट जाती, पर वास्तव में ऐसा होता नहीं। मुक्ति के लिए हृदय की पवित्रता, साधना, सदाचार एवं ज्ञानपूर्ण भक्ति आवश्यक है।
(iii) पंडित लोग निजी अनुभव के बिना शास्त्र के आधार पर जो तर्क प्रस्तुत करते हैं वे सब निरर्थक हैं।
(iv) मनुष्य की संगति में तोता राम-नाम का उच्चारण करने लगता है।
(v) यदि राम नाम का उच्चारण करने वाले व्यक्ति के हृदय में सच्चा प्रेम उत्पन्न नहीं होता तो उसकी वही दशा होती है जो साधारण जनों की होती है।

प्रश्न 2:
काहे री नलनीं हूँ कुम्हिलानी,
तेरे       ही                नालि                सरोवर          पानी ।
जल में उतपति जल मैं बास, जल मैं नलनी तोर निवास ।।
ना तलि तपति न ऊपरि आगि, तोर हेतु कहु कासनि लागि ।
कहै कबीर जे उदिक समान, ते नहिं मूए हमारे जान ।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के शीर्षक और कवि का नाम बताइए।
(i) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(ii) कबीरदास ने कमलिनी और जल को किसका प्रतीक माना है?
(iv) जीवात्मा क्यों दुःखों का अनुभव करती है?
(v) कैसे साधक कभी नहीं मरते?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – कबीर ने कमलिनी को सम्बोधित करते हुए कहा है कि हे कमलिनी! तेरा जन्म जल में हुआ है और जल में ही तू रहती है। इस रूप में ‘कमलिनी आत्मा का और ‘जल’ परमात्मा का प्रतीक है। कबीर का मत है कि जो स्वयं ब्रह्मस्वरूप हो गये हैं, वे कभी भी मृत्यु को प्राप्त नहीं होते। ब्रह्मस्वरूप हो जाने पर मृत्यु से कैसा भय? ।
(iii) कबीरदास ने कमलिनी को जीवात्मा का और जल को परमात्मा का प्रतीक माना है।
(iv) जीवात्मा सांसारिक विषयों के भ्रम में पड़कर वास्तविक आनन्द न पाकर दु:खों का अनुभव करती है।
(v) जिनकी आत्मा परमात्मा में लीन रहती है ऐसे साधक कभी नहीं मरते।

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