UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 14 Oscillations

UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 14 Oscillations (दोलन) are part of UP Board Solutions for Class 11 Physics . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 14 Oscillations (दोलन)

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Physics
Chapter Chapter 14
Chapter Name Oscillations
Number of Questions Solved 76

UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 14 Oscillations (दोलन)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
नीचे दिए गए उदाहरणों में कौन आवर्ती गति को निरूपित करता है?
(i) किसी तैराक द्वारा नदी के एक तट से दूसरे तट तक जाना और अपनी एक वापसी यात्रा पूरी करना।
(ii) किसी स्वतन्त्रतापूर्वक लटकाए गए दण्ड चुम्बक को उसकी N-S दिशा से विस्थापित कर छोड़ देना।
(iii) अपने द्रव्यमान केन्द्र के परितः घूर्णी गति करता कोई हाइड्रोजन अणु।
(iv) किसी कमान से छोड़ा गया तीर।
उत्तर-
(i) यह आवश्यक नहीं है कि तैराक को प्रत्येक बार वापस लौटने में समान समय ही लगे; अत: यह गति आवर्ती गति नहीं है।
(ii) दण्ड चुम्बक को विस्थापित करके छोड़ने पर उसकी गति आवर्ती गति होगी।
(iii) यह एक आवर्ती गति है।
(iv) तीर छूटने के बाद कभी-भी वांपस प्रारम्भिक स्थिति में नहीं लौटता; अत: यह आवर्ती गति नहीं है।

प्रश्न 2.
नीचे दिए गए उदाहरणों में कौन (लगभग) सरल आवर्त गति को तथा कौन आवर्ती परन्तु सरल आवर्त गति निरूपित नहीं करते हैं?
(i) पृथ्वी की अपने अक्ष के परितः घूर्णन गति।।
(ii) किसी U-नली में दोलायमान पारे के स्तम्भ की गति।
(iii) किसी चिकने वक्रीय कटोरे के भीतर एक बॉल बेयरिंग की गति जब उसे निम्नतम बिन्द से कुछ ऊपर के बिन्दु से मुक्त रूप से छोड़ा जाए।
(iv) किसी बहुपरमाणुक अणु की अपनी साम्यावस्था की स्थिति के परितः व्यापक कम्पन।
उत्तर-
(i) आवर्ती गति परन्तु सरल आवर्त गति नहीं।
(ii) सरल आवर्त गति।
(iii) सरल आवर्त गति।
(iv) आवर्ती गति परन्तु सरल आवर्तः गति नहीं।

प्रश्न 3. चित्र-14.1 में किसी कण की रैखिक गति के लिए चार x-t आरेख दिए गए हैं। इनमें से कौन-सा आरेख आवर्ती गति का निरूपण करता है? उस गति का आवर्तकाल क्या है? (आवर्ती गति वाली गति का)।
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उत्तर-
(a) ग्राफ से स्पष्ट है कि कण कभी भी अपनी गति की पुनरावृत्ति नहीं करता है; अत: यह गति, आवर्ती गति नहीं है।
(b) ग्राफ से ज्ञात है कि कण प्रत्येक 2 s के बाद अपनी गति की पुनरावृत्ति करता है; अतः यह गति एक आवर्ती गति है जिसका आवर्तकाल 2 s है।
(c) यद्यपि कण प्रत्येक 3 s के बाद अपनी प्रारम्भिक स्थिति में लौट रहा है परन्तु दो क्रमागत प्रारम्भिक स्थितियों के बीच कण अपनी गति की पुनरावृत्ति नहीं करता; अत: यह गति आवर्त गति नहीं है।
(d) कण प्रत्येक 2 s के बाद अपनी गति को दोहराता है; अत: यह गति एक आवर्ती गति है जिसका आवर्तकाले 2 s है।

प्रश्न 4. नीचे दिए गए समय के फलनों में कौन (a) सरल आवर्त गति (b) आवर्ती परन्तु सरल आवर्त गति नहीं, तथा (e) अनावर्ती गति का निरूपण करते हैं। प्रत्येक आवर्ती गति का आवर्तकाल ज्ञात कीजिए: (ω कोई धनात्मक अचर है)
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उत्तर-
(a) दिया गया फलन x = sin ωt – cos ωt
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(e) तथा (f) में दिए गए दोनों फलन न तो आवर्त गति निरूपित करते हैं और न ही सरल आवर्त गति निरूपित करते हैं।

प्रश्न 5.
कोई कण एक-दूसरे से 10 cm दूरी पर स्थित दो बिन्दुओं A तथा B के बीच रैखिक सरल आवर्त गति कर रहा है। A से B की ओर की दिशा को धनात्मक दिशा मानकर वेग, त्वरण
तथा कण पर लगे बल के चिह्न ज्ञात कीजिए जबकि यह कण
(a) A सिरे पर है,
(b) B सिरे पर है।
(c) A की ओर जाते हुए AB के मध्य बिन्दु पर है,
(d) A की ओर जाते हुए 8 से 2 cm दूर है,
(e) B की ओर जाते हुए से 3 cm दूर है, तथा
(f) A की ओर जाते हुए 8 से 4 cm दूर है।
उत्तर-
स्पष्ट है कि बिन्दु A तथा बिन्दु B अधिकतम विस्थापन की स्थितियाँ हैं तथा इनका मध्य बिन्दु O (मोना), सरल आवर्त गति का केन्द्र है।
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(a) ∴ बिन्दु A पर कण का वेग शून्य होगा।
कण के त्वरण की दिशा बिन्दु A से साम्यावस्था O की ओर होगी; अतः त्वरण धनात्मक होगा।
कण पर बल, त्वरण की ही दिशा में होगा; अत: बल धनात्मक होगा।
(b) बिन्दु B पर भी कण का वेग शून्य होगा।
कण का त्वरण B से साम्यावस्था O की ओर दिष्ट होगा; अतः त्वरण ऋणात्मक होगा।
बल भी ऋणात्मक होगा।
(c) AB का मध्य बिन्दु 0 सरल आवर्त गति का केन्द्र है।
∴ कण B से A की ओर चलते हुए 0 से गुजरता है; अत: वेग BA के अनुदिश है, अर्थात् वेग ऋणात्मक है।
बिन्दु ०पर त्वरण तथा बल दोनों शून्य हैं।
(d) B से 2 cm दूरी पर कण B तथा 0 के बीच होगा।
∴ कण B से A की ओर जा रहा है; अतः वेग ऋणात्मक होगा।
यहाँ त्वरण भी B से O की ओर दिष्ट है; अतः त्वरण भी ऋणात्मक है।
‘बले भी ऋणात्मक है।
(e) ∴ कण-B की ओर जा रहा है; अतः वेग धनात्मक है।
∴ कण A व O के बीच है; अत: त्वरण A से O की ओर दिष्ट है; अत: त्वरण भी धनात्मक है।
बल भी धनात्मक है।
(f) ∴ कण A की ओर जा रहा है; अत: वेग ऋणात्मक है।
कण B तथा O के बीच है तथा त्वरण B से O की ओर (अर्थात् B से A की ओर दिष्ट है; अतः त्वरण ऋणात्मक है।
बल भी ऋणात्मक है।

प्रश्न 6.
नीचे दिए गए किसी कण के त्वरण तथा विस्थापन के बीच सम्बन्धों में से किससे सरल आवर्त गति सम्बद्ध है:
(a) a = 0.7 x
(b) a = -200x²
(c) a = -10
(d) a = 100x³
उत्तर-
उपर्युक्त में से केवल सम्बन्ध (c) में a =-10x अर्थात् त्वरण विस्थापन के अनुक्रमानुपाती है तथा विस्थापन के विपरीत दिशा में है; अत: केवल यही सम्बन्ध सरल आवर्त गति को निरूपित करता है।

प्रश्न 7.
सरल आवर्त गति करते किसी कण की गति का वर्णन नीचे दिए गए विस्थापन फलन द्वारा किया जाता है। x(t) = A cos (ωt + φ) यदि कण की आरम्भिक (t = 0) स्थिति 1 cm तथा उसका आरम्भिक वेग πcms-1 है। तो कण का आयाम तथा आरम्भिक कला कोण क्या है? कण की कोणीय आवृत्ति π-1 है। यदि सरल आवर्त गति का वर्णन करने के लिए कोज्या (cos) फलन के स्थान पर हम ज्या (sin) फूलन चुनें; x = B sin (ωt + α), तो उपर्युक्त आरम्भिक प्रतिबन्धों में कण का आयाम तथा आरम्भिक कला कोण क्या होगा?
हल-
दिया है : कोणीय आवृत्ति ω = r rad s-1, t = 0 पर x = 1 cm
तथा प्रारम्भिक वेग u = πcm s-1
सरल आवर्त गति की समीकरण x = A cos (ωt + φ)
x = A cos (πt + φ)
t = 0 तथा x = 1 रखने पर, 1 = A cos φ ..(1)
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प्रश्न 8.
किसी कमानीदार तुलां का पैमानी 0 से 50 kg तक अंकित है और पैमाने की लम्बाई 20 cm है। इस तुला से लटकाया गया कोई पिण्ड, जब विस्थापित करके मुक्त किया जाता है, 0.6 s के आवर्तकाल से दोलन करता है। पिण्ड का भार कितना है?
हल-
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प्रश्न 9.
1200 Nm-1 कमानी-स्थिरांक की कोई कमानी चित्र-14.3 में दर्शाए अनुसार किसी क्षैतिज मेज से जड़ी है। कमानी के मुक्त। सिरे से 3kg द्रव्यमान का कोई पिण्ड जुड़ा है। इस पिण्ड को एक ओर 2.0 cm दूरी तक खींचकर मुक्त किया जाता है,
(i) पिण्ड के दोलन की आवृत्ति,
(ii) पिण्ड का अधिकतम त्वरण, तथा ।
(iii) पिण्ड की अधिकतम चाल ज्ञात कीजिए।
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हल-
यहाँ बृल नियतांक k = 1200 न्यूटन-मीटर-1, m = 3 किग्रा; कमानी का अधिकतम विस्तार अर्थात् आयाम a = 2.0 सेमी = 2 x 10-2 मीटर
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प्रश्न 10.
अभ्यास प्रश्न 9 में, मान लीजिए जब कमानी अतानित अवस्था में है तब पिण्ड की स्थिति x = 0 है तथा बाएँ से दाएँ की दिशा x-अक्ष की धनात्मक दिशा है। दोलन करते पिण्ड के विस्थापन x को समय के फलन के रूप में दर्शाइए, जबकि विराम घड़ी को आरम्भ (t = 0) करते समय पिण्ड,
(a) अपनी माध्य स्थिति,
(b) अधिकतम तानित स्थिति, तथा
(c) अधिकतम सम्पीडन की स्थिति पर है।
सरल आवर्त गति के लिए ये फलन एक-दूसरे से आवृत्ति में, आयाम में अथवा आरम्भिक कला में किस रूप में भिन्न है ।
हल-
उपर्युक्त प्रश्न में आयाम a = 0.20 मीटर =2 सेमी।
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प्रश्न 11.
चित्र-14.4 में दिए गए दो आरेख दो वर्तुल गतियों के तद्नुरूपी हैं। प्रत्येक आरेख पर वृत्त की त्रिज्या परिक्रमण-काल, आरम्भिक स्थिति और परिक्रमण की दिशा दर्शाई गई है। प्रत्येक प्रकरण में, परिक्रमण करते कण के त्रिज्य-सदिश के x-अक्ष पर प्रक्षेप की तदनुरूपी सरल आवर्त गति ज्ञात कीजिए।
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हल-
(a) माना वृत्त पर गति करता हुआ कण किसी समय । पर P से स्थिति A में पहुँच जाता है।
माना ∠POA = θ
AB, बिन्दु A से x-अक्ष पर लम्ब है।
तब ∠ BAO = θ
आवर्तकाल T = 2s
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प्रश्न 12.
नीचे दी गई प्रत्येक सरल आवर्त गति के लिए तदनुरूपी निर्देश वृत्त का आरेख खींचिएं। घूर्णी कण की आरम्भिक (t = 0) स्थिति, वृत्त की त्रिज्या तथा कोणीय चाल दर्शाइए। सुगमता के लिए प्रत्येक प्रकरण में परिक्रमण की दिशा वामावर्त लीजिए। (x को cm में तथा t को s में लीजिए।)।
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हल-
(a) दिया है : सरल आवर्त गति का समीकरण [latex s=2]x=-2sin\left( 3t+\frac { \pi }{ 3 } \right) [/latex]
यह गति समय का ज्या (sine) फलन है;
अतः कोणीय विस्थापन, y-अक्ष से नापा जाएगा।
दिए गए समीकरण में t = 0 रखने पर,
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प्रश्न 13.
चित्र-14.7(a) में k बल-स्थिरांक की किसी कमानी के । एक सिरे को किसी दृढे आधार से जकड़ा तथा दूसरे मुक्त। सिरे से एक द्रव्यमान m जुड़ा दर्शाया गया है। कमानी के मुक्त सिरे पर बल F आरोपित करने से कमानी तन जाती है चित्र-14.7 (b) में उसी कमानी के दोनों मुक्त सिरों से द्रव्यमान जुड़ा दर्शाया गया है। कमानी के दोनों सिरों को चित्र-14.7 में समान बल F द्वारा तानित किया गया है।
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(i) दोनों प्रकरणों में कमानी का अधिकतम विस्तार क्या है?
(ii) यदि (a) का द्रव्यमान तथा (b) के दोनों द्रव्यमानों को मुक्त छोड़ दिया जाए, तो प्रत्येक प्रकरण में दोलन का आवर्तकाल ज्ञात कीजिए।
हल-
(i) माना कमानी का अधिकतम विस्तार xmax है, तब
चित्र (a)
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(b) में-चूँकि इस बार कमानी किसी स्थिर वस्तु से सम्बद्ध नहीं है; अतः दूसरे पिण्ड पर लगे बल का कार्य केवल कमानी को स्थिर रखना है।
अतः विस्तार अभी भी केवल एक ही बल के कारण होगा।
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(ii) चित्र (a) में माना कि पिण्ड को खींचकर छोड़ने पर, वापसी की गति करता पिण्ड किसी क्षण साम्यावस्था से x दूरी पर है तब कमानी में प्रत्यानयन बल F = -kx होगा।
यदि पिण्ड का त्वरण ‘a है तो F = ma
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चित्र (b) में-इस दशा में, निकाय का द्रव्यमान केन्द्र अर्थात् कमानी का मध्य बिन्दु स्थिर रहेगा और दोनों पिण्ड दोलन करेंगे।
इस अवस्था में हम मान सकते हैं कि प्रत्येक पिण्ड मूल कमानी की आधी लम्बाई से जुड़ा है तथा ऐसे प्रत्येक भाग का कमानी स्थिरांक 2k होगा। यदि किसी क्षण, कोई पिण्ड साम्यावस्था से x दूरी पर है तो कमानी के संगत भाग में प्रत्यानयन बल F = -2kx होगा। यदि पिण्ड का त्वरण a है तो
ma = F => ma = -2kx या ।
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प्रश्न 14.
किसी रेलगाड़ी के इंजन के सिलिण्डर हैड में पिस्टन का स्ट्रोक (आयाम को दोगुना) 1.0 m का है। यदि पिस्टन 200 rad/min की कोणीय आवृत्ति से सरल आवर्त गति करता है तो उसकी अधिकतम चाल कितनी है?
हल-
पिस्टन का आयाम a = स्ट्रोक/2 = 1.0 मी/2 = 0.5 मीटर तथा
इसकी कोणीय आवृत्ति ω = 200 रेडियन/मिनट = (200/60) रे/से = 10/3 रे/से
पिस्टन की अधिकतम चाल umax = aω = 20 = 0.5 मीटर x (10/3) रे/से
=1.67 मी-से-1

प्रश्न 15.
चन्द्रमा के पृष्ठ पर गुरुत्वीय त्वरण 1.7 ms-2 है। यदि किसी सरल लोलक का पृथ्वी के पृष्ठ पर आवर्तकाल 3.5 s है तो उसका चन्द्रमा के पृष्ठ पर आवर्तकाल कितना होगा? (पृथ्वी के पृष्ठ पर g = 9.8 ms-2)
हल-
सरल लोलक का आवर्तकाल [latex s=2]T=2\pi \sqrt { \frac { l }{ g } } [/latex] लोलक विशेष के लिए नियत; अत: T ∝1/√g इसलिए यदि पृथ्वी एवं चन्द्रमा पर गुरुत्वीय त्वरण क्रमशः ge व gm एवं आवर्तकाल क्रमश: Te व Tm हो
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प्रश्न 16.
नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए
(a) किसी कण की सरल आवर्त गति के आवर्तकाल का मान उस कण के द्रव्यमान तथा बल-स्थिरांक पर निर्भर करता है: [latex s=2]T=2\pi \sqrt { \frac { m }{ k } } [/latex]। कोई सरल लोलक सन्निकट सरल आवर्त गति करता है। तब फिर किसी लोलक का आवर्तकाल लोलक के द्रव्यमान पर निर्भर क्यों नहीं करता?
(b) किसी सरल लोलक की गति छोटे कोण के सभी दोलनों के लिए सन्निकट सरल आवर्त गति होती है। बड़े कोणों के दोलनों के लिए एक अधिक गूढ विश्लेषण यह दर्शाता है कि का मान [latex s=2]2\pi \sqrt { \frac { l }{ g } } [/latex] से अधिक होता है। इस परिणाम को समझने के लिए किसी गुणात्मक कारण का चिन्तन कीजिए।
(c) कोई व्यक्ति कलाई घड़ी बाँधे किसी मीनार की चोटी से गिरता है। क्या मुक्त रूप से गिरते समय उसकी घड़ी यथार्थ समय बताती है?
(d) गुरुत्व बल के अन्तर्गत मुक्त रूप से गिरते किसी केबिन में लगे सरल लोलक के दोलन की आवृत्ति क्या होती है?
उत्तर-
(a) जब दोलन स्प्रिंग के द्वारा होते हैं तो बल नियंताक k का मान केवल स्प्रिंग पर निर्भर करता है। न कि गतिमान कण के द्रव्यमान पर। इसके विपरीत सरल लोलक के लिए बल नियतांक
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कण के द्रव्यमान के अनुक्रमानुपाती होता है; अत: [latex s=2]\frac { m }{ k }[/latex] का मान नियत बना रहता है।
इसलिए आवर्तकाल m पर निर्भर नहीं करता।
(b) सरल लोलक के लिए प्रत्यानयन बल F =- mg sin θ
यदि θ छोटा है तो sin θ ≈ θ = [latex s=2]\frac { x }{ l }[/latex]
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अर्थात् यह गति सरल आवर्त होगी तथा आवर्तकाल [latex s=2]2\pi \sqrt { \frac { l }{ g } } [/latex]
यदि θ छोटा नहीं है तो हम sin θ ≈ θ नहीं ले सकेंगे तब गति सरल आवर्त नहीं रहेगी; अत: आवर्तकाल [latex s=2]2\pi \sqrt { \frac { l }{ g } } [/latex] से बड़ा होगा।
(c) हाँ, क्योकि कलाई घड़ी का आवर्तकाल गुरुत्वीय त्वरण के मान में परिवर्तन से प्रभावित नहीं होता।
(d) मुक्त रूप से गिरते केबिन में गुरुत्वीय त्वरण का प्रभावी मान g’.= 0 होगा।
∴ लोलक का आवर्तकाल [latex s=2]2\pi \sqrt { \frac { l }{ g } } [/latex] अनन्त हो जाएगा तथा आवृत्ति शून्य हो जाएगी।

प्रश्न 17.
किसी कार की छत से l लम्बाई का कोई सरल लोलक, जिसके लोलक का द्रव्यमान M है, लटकाया गया है। कार R त्रिज्या की वृत्तीय पथ पर एकसमान चाल u से गतिमान है। यदि लोलक त्रिज्य दिशा में अपनी साम्यावस्था की स्थिति के इधर-उधर छोटे दोलन करता है तो इसका आवर्तकाल क्या होगा?
उत्तर-
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कार जब मोड़ पर मुड़ती है तो उसकी गति में त्वरण, [latex s=2]\frac { { \upsilon }^{ 2 } }{ R } [/latex] (अभिकेन्द्र त्वरण) होता है। इस प्रकार कार एक अजड़त्वीय निर्देश तन्त्र है। इसलिए गोलक पर एक छद्म बल [latex s=2]\frac { m{ \upsilon }^{ 2 } }{ R } [/latex] वृत्तीय पथ के बाहर की ओर लगेगा जिसके कारण लोलक ऊर्ध्वाधर रहने के स्थान पर थोड़ा तिरछा हो जाएगा।
इस समय गोलक पर दो बले क्रमशः भार mg तथा अपकेन्द्र बल [latex s=2]\frac { m{ \upsilon }^{ 2 } }{ R } [/latex] लगेंगे।
यदि गोलक के लिए g का प्रभावी मान g’ है तो गोलक पर प्रभावी बल mg’ होगा जो कि उक्त दो बलों का परिणामी है।।
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प्रश्न 18.
आधार क्षेत्रफल A तथा ऊँचाई h के एक कॉर्क का बेलनाकार टुकड़ा ρ1 घनत्व के किसी द्रव में तैर रहा है। कॉर्क को थोड़ा नीचे दबाकर स्वतन्त्र छोड़ देते हैं, यह दर्शाइए कि कॉर्क
ऊपर-नीचे सरल आवर्त दोलन करता है जिसका आवर्तकाल [latex s=2]T=2\pi \sqrt { \frac { h\rho }{ { \rho }_{ 1 }g } } [/latex] है।
यहाँ ρ कॉर्क का घनत्व है (द्रव की श्यानता के कारण अवमन्दन को नगण्य मानिए।)
उत्तर-
द्रव में तैरते बेलनाकार बर्तन के दोलन—माना कॉर्क के टुकड़े का द्रव्यमान m है। माना साम्यावस्था में इसकी l लम्बाई द्रव में डूबी है। (चित्र-14.9)।
तैरने के सिद्धान्त से, कॉर्क के डूबे भाग द्वारा हटाए गए द्रव का भार कॉर्क के भार के बराबर होगा,
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जब कॉर्क को द्रव में नीचे की ओर दबाकर छोड़ा जाता है तो यह ऊपर-नीचे दोलन करने लगता है। माना किसी क्षण इसका साम्यावस्था से नीचे की ओर विस्थापन y है। इस स्थिति में, इसकी y लम्बाई द्वारा विस्थापित द्रव का उत्क्षेप बेलनाकार बर्तन को प्रत्यानयन बल (F) प्रदान करेगा।
अतः F = – A y ρ1 g
यहाँ पर ऋण चिह्न यह प्रदर्शित करता है कि प्रत्यानयन बल F, कॉर्क के टुकड़े के विस्थापन के विपरीत दिशा में लग रहा है; अतः टुकड़े का त्वरण
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प्रश्न 19.
पारे से भरी किसी U नली का एक सिरा किसी चूषण पम्प से जुड़ा है तथा दूसरा सिरा वायुमण्डल में खुला छोड़ दिया गया है। दोनों स्तम्भों में कुछ दाबान्तर बनाए रखा जाता है। यह दर्शाइए कि जब चूषण पम्प को हटा देते हैं, तब U नली में पारे का स्तम्भ सरल आवर्त गति करता है।
उत्तर-
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सामान्यत: U नली में द्रव (पारा) भरने पर उसके दोनों स्तम्भों व में पारे का तल समान होगा। परन्तु चूषण पम्प द्वारा दाबान्तर बनाये रखने की स्थिति में यदि स्तम्भ में पारे का तल सामान्य स्थिति से y दूरी नीचे है । तो दूसरे स्तम्भ में यह सामान्य स्थिति से y दूरी ऊपर होगा। अत: दोनों । । स्तम्भ में पारे के तलों का अन्तर = 2y, चूषण पम्प हटा लेने पर U नली के दायें स्तम्भ में पारे पर नीचे की ओर कार्य करने वाला बल = 2y ऊँचाई के पारा स्तम्भ का भार = 2y ρga.
जहाँ a = U नली स्तम्भों की अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल
ρ = पारे का घनत्व; g = गुरुत्वीय त्वरण
अत: बायीं भुजा में पारा ऊपर की ओर चढ़ेगा तथा इस पर कार्य करने वाला प्रत्यानयन बल (जिसके अन्तर्गत यह गति करेगा)
F = -2yρga, दोनों स्तम्भों में पारे के स्तम्भ की ऊँचाई समान होने की स्थिति में यदि ऊँचाई h हो तो U नली में भरे पारे के स्तम्भ की कुल लम्बाई = 2h अतः पारे का कुल द्रव्यमान m = 2h x ρ x a
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अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 20.
चित्र-14.11 में दर्शाए अनुसार V आयतन के किसी वायु कक्ष की ग्रीवा (गर्दन) की अनुप्रस्थ कोर्ट का क्षेत्रफल a है। इस ग्रीवा में m द्रव्यमान की कोई गोली बिना किसी घर्षण के ऊपर-नीचे गति कर सकती है। यह दर्शाइए कि जब गोली को थोड़ा नीचे दबाकर मुक्त छोड़ देते हैं तो वह सरल आवर्त गति करती है। दाब-आयतन विचरण को समतापी मानकर दोलनों के आवर्तकाल का व्यंजक ज्ञात कीजिए (चित्र-14.11 देखिए)। वायु ।
उत्तर-
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माना साम्यावस्था में जब गैस का आयतन V है तो इसका दाब P है। साम्यावस्था से गेंद को अल्पविस्थापन x देने पर माना गैस का दाब बढ़कर (P + ∆P) तथा आयतन घटकर V – ∆V रह जाता है। समतापीय परिवर्तन के लिए बॉयल के नियम से ।
P x V = (P + ∆P)(V – ∆V)
अथवा PV = PV – P.∆V + ∆P.V – ∆P.∆V
चूँकि ∆P व ∆V अल्प राशियाँ हैं, अतः ∆P, ∆V को नगण्य मानते हुए 0 = -P ∆V + ∆P.V
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प्रश्न 21.
आप किसी 3000 kg द्रव्यमान के स्वचालित वाहन पर सवार हैं। यह मानिए कि आप इस । वाहन की निलम्बन प्रणाली के दोलनी अभिलक्षणों का परीक्षण कर रहे हैं। जब समस्त | वाहन इस पर रखा जाता है, तब निलम्बन 15 cm आनमित होता है। साथ ही, एक पूर्ण दोलन की अवधि में दोलन के आयाम में 50% घटोतरी हो जाती है, निम्नलिखित के मानों को आकलन कीजिए
(a) कमानी स्थिरांक तथा
(b) कमानी तथा एक पहिए के प्रघात अवशोषक तन्त्र के लिए अवमन्दन स्थिरांक b. यह मानिए कि प्रत्येक पहिया 750 kg द्रव्यमान वहन करता है।
हल-
(a) दिया है : वाहन का द्रव्यमान, M = 3000 kg, निलम्बन का झुकाव x = 15 cm
वाहन में चार कमानियाँ होती हैं; अत: प्रत्येक कमानी पर कुल भार को एक-चौथाई भार पड़ेगा।
अतः . एक कमानी हेतु [latex s=2]F=\frac { 1 }{ 4 }[/latex]
F = kx से,
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प्रश्न 22.
यह दर्शाइए कि रैखिक सरल आवर्त गति करते किसी कण के लिए दोलन की किसी अवधि की औसत गतिज ऊर्जा उसी अवधि की औसत स्थितिज ऊर्जा के समान होती है।
उत्तर-
माना m द्रव्यमान का कोई कण ω कोणीय आवृत्ति से सरल आवर्त गति कर रहा है जिसका आयाम a है।
माना गति अधिकतम विस्थापन की स्थिति से प्रारम्भ होती है तब t समय में कण का विस्थापन
x = a cos ωt …(1)
इस क्षण कण की गतिज ऊर्जा ।

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प्रश्न 23.
10 kg द्रव्यमान की कोई वृत्तीय चक्रिका अपने केन्द्र से जुड़े किसी तार से लटकी है। चक्रिका को घूर्णन देकर तार में ऐंठन उत्पन्न करके मुक्त कर दिया जाता है। मरोड़ी दोलन का आवर्तकाल 1.5 s है। चक्रिका की त्रिज्या 15 cm है। तार का मरोड़ी कमानी नियतांक ज्ञात कीजिए। [मरोड़ी कमानी नियतांक α सम्बन्ध J = -αθ द्वारा परिभाषित किया जाता है, यहाँ J प्रत्यानयन बल युग्म है तथा θ ऐंठन कोण है।
हल-
दिया है : चक्रिका का द्रव्यमान m = 10 kg, मरोड़ी दोलन का आवर्तकाल T = 1.5 s,
चक्रिका की त्रिज्या = 0.15 m
केन्द्र से जाने वाली तथा तेल के लम्बवत् अक्ष के परितः चक्रिका का
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प्रश्न 24.
कोई वस्तु 5 cm के आयाम तथा 0.2 सेकण्ड के आवर्तकाल से सरल आवर्त गति करती है। वस्तु का त्वरण तथा वेग ज्ञात कीजिए जब वस्तु का विस्थापन
(a) 5 cm,
(b) 3 cm,
(c) 0 cm हो।
हल-
यहाँ वस्तु का आयाम a = 5 सेमी = 0.05 मीटर, आवर्तकाल T = 0.2 सेकण्ड
∴कोणीय आवृत्ति ω = 2π/T = 2π/0.2 सेकण्ड
= 10π रे/से = 10π से-1
(a) यहाँ विस्थापन y = 5 सेमी = 5 x 10-2 मीटर = 0.05 मीटर
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प्रश्न 25.
किसी कमानी से लटका एक पिण्ड एक क्षैतिज तल में कोणीय वेग ω से घर्षण या अवमन्दन रहित दोलन कर सकता है। इसे जब x0 दूरी तक खींचते हैं और खींचकर छोड़ देते हैं तो यह सन्तुलन केन्द्र से समय t = 0 पर v0 वेग से गुजरता है। प्राचल ω,x0, तथा v0 के पदों में परिणामी दोलन का आयाम ज्ञात कीजिए।(संकेतः समीकरण x = acos (ωt + θ) से प्रारंभ कीजिए। ध्यान रहे कि प्रारम्भिक वेग ऋणात्मक है।)
हल-
माना सरल आवर्त गति का समीकरण ।
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सरल आवर्त गति करते हुए कण का आवर्तकाल होता है।
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उत्तर-
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प्रश्न 2.
सरल लोलक का आवर्तकाल दोगुना हो जायेगा जब उसकी प्रभावी लम्बाई कर दी जाती है
(i) दोगुनी।
(ii) आधी
(iii) चार गुनी
(iv) चौथाई
उत्तर-
(iii) चार गुनी ।

प्रश्न 3.
सरल लोलक के आवर्तकाल का सूत्र है [latex s=2]T=2\pi \sqrt { \left( l/g \right) } [/latex] जहाँ संकेतों के अर्थ सामान्य हैं। l तथा T के बीच खींचा गया ग्राफ होगा
(i) सरल रेखा
(ii) परवलय
(iii) वृत्त
(iv) दीर्घवृत्त
उत्तर-
(ii) परवलय

प्रश्न 4.
अनुनाद के लिए बाह्य आवर्ती बल की आवृत्ति तथा कम्पन करने वाली वस्तु की स्वाभाविक आवृत्ति का अनुपात होगा।
(i) 1
(ii) शून्य
(iii)1 से अधिक
(iv) 1 से कम
उत्तर-
(i) 1

प्रश्न 5.
अनुनाद की दशा में दोलनों का आयाम
(i) न्यूनतम होता है।
(ii) अधिकतम होता है।
(ii) शून्य होता है।
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(i) अधिकतम होता है ।

प्रश्न 6.
एक कण सरल आवर्त गति कर रहा है जिसका आयाम A है। एक पूर्ण दोलन में कण द्वारा चली गयी दूरी है।
(i) 2A
(ii) 0
(iii) A
(iv) 4A
उत्तर-
(iii) A

प्रश्न 7.
किसी सरल आवर्त गति का आयाम a है तथा आवर्तकाल T है। अधिकतम तात्कालिक वेग होगा
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उत्तर-
(iii) [latex s=2]\frac { 2\pi a }{ T } [/latex]

प्रश्न 8.
सरल आवर्त गति करते कण का अधिकतम विस्थापन की स्थिति में त्वरण होता है।
(i) अधिकतम
(ii) न्यूनतम
(iii) शून्य
(iv) न अधिकतम और न न्यूनतम
उत्तर-
(i) अधिकतम

प्रश्न 9.
सरल आवर्त गति करते हुए कण की साम्य स्थिति से दूरी पर स्थितिज ऊर्जा होती है।
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उत्तर-
(ii) [latex s=2]\frac { 1 }{ 2 } m{ \omega }^{ 2 }{ a }^{ 2 }[/latex]

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आवर्ती गति से क्या तात्पर्य है?
उत्तर-
जब कोई वस्तु एक निश्चित समयान्तराल में एक निश्चित पथ पर बार-बार अपनी गति को दोहराती है, तो उसकी गति आवर्ती गति कहलाती है।

प्रश्न 2.
सरल आवर्त गति की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर-
(i) यह गति एक निश्चित बिन्दु (कण की माध्य स्थिति) के इधर-उधर होती है।
(ii) कण पर कार्यरत् प्रत्यानयन बल अर्थात् कण का त्वरण सदैव माध्य स्थिति से कण के विस्थापन के अनुक्रमानुपाती होता है।
(iii) प्रत्यानयन बल (अर्थात् त्वरण) की दिशा सदैव माध्य स्थिति की ओर दिष्ट रहती है।

प्रश्न 3.
संरल लोलक के अलावा सरल आवर्त गति के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर-
(1) स्प्रिंग से लटके द्रव्यमान की गति तथा
(2) जल पर तैरते लकड़ी के बेलन को थोड़ा जल में दबाकर छोड़ देने पर उसकी गति।

प्रश्न 4.
सेकण्ड पेण्डुलम क्या होता है?
उत्तर-
वह सरल लोलक जिसका आवर्तकाल 2 सेकण्ड होता है, सेकण्ड लोलक (पेण्डुलम) कहलाता है।

प्रश्न 5.
आवर्तकाल किसे कहते हैं?
उत्तर-
एक दोलन पूरा करने में कोई वस्तु जितना समय लेती है उसे उसका आवर्तकाल कहते हैं। इसे T से प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 6.
आवृत्ति तथा आवर्तकाल में सम्बन्ध लिखिए।
उत्तर-
आवृत्ति = 1/ आवर्तकाल

प्रश्न 7.
सरल आवर्त गति करते हुए कण का साम्य स्थिति से 5 सेमी की दूरी पर त्वरण 20 सेमी/से² है। इसका आवर्तकाल ज्ञात कीजिए।
हल-
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प्रश्न 8.
एक कण सरल आवर्त गति कर रहा है तथा उसका त्वरण [latex s=2]\overrightarrow { a } =-{ 4\pi }^{ 2 }\overrightarrow { X } [/latex], जहाँ [latex s=2]\overrightarrow { X } [/latex] कण की साम्य स्थिति से उसका विस्थापन है। कण का आवर्तकाल निकालिए।
हल-
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प्रश्न 9.
सरल आवर्त गति करते हुए किसी कण का आयाम 5 सेमी तथा आवर्तकाल 2 सेकण्ड है। कण के त्वरण का अधिकतम मान निकालिए।
हल-
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प्रश्न 10.
सरल आवर्त गति का समीकरण y = 2sin 200πt है। दोलन की आवृत्ति का मान ज्ञात कीजिए।
हल-
दिया है, y = 2sin 200πt
सरल आवर्त गति के समीकरण [latex s=2]y=asin\left( \frac { 2\pi }{ T } \right) t[/latex] से उपर्युक्त समीकरण की तुलना करने पर
[latex s=2]\frac { 2 }{ T }=200[/latex] ⇒ 2n = 200 [latex s=2]\left( \because \frac { 1 }{ T } =n \right) [/latex]
n = 100

प्रश्न 11.
सरल आवर्त गति करने वाले कण का विस्थापन समीकरण लिखिए तथा इसके दो चक्करों के लिए समय-विस्थापन वक्र खींचिए।
उत्तर-
सरल आवर्त गति करने वाले कण का विस्थापन समीकरण
y = asin ωt …(1)
समी० (1) में, ω = 2π/T रखने पर
[latex s=2]y=asin\left( \frac { 2\pi t }{ T } \right) [/latex]
इस समीकरण की सहायता से हमेसरले आवर्त गति करते किसी कण के विस्थापन y तथा समय t है के बीच ग्राफ खींच सकते हैं। इसके लिए हम समीकरण (1) के द्वारा विभिन्न समयों पर विस्थापन ज्ञात करते हैं।
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प्रश्न 12.
सरल आवर्त गति करने वाले कण के वेग का सूत्र लिखिए तथा इसका समय-वेग वक्र खींचिए।
या सरल आवर्त गति के लिए समय और वेग में ग्राफ प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर-
सरल आवर्त गति करने वाले कण के वेग का सूत्र
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प्रश्न 13.
एक कण ‘r” त्रिज्या के वृत्त की परिधि पर ‘V’ चाल से गति करता है। आधे तथा पूरे आवर्तकाल के बाद इसका विस्थापन ज्ञात कीजिए।
उत्तर-
आधे आवर्तकाल के कण का विस्थापन r+r = 2r होगा तथा पूरे आवर्तकाल के बाद इसका विस्थापन शून्य होगा।

प्रश्न 14.
सरल आवर्त गति के लिए समय और विस्थापन में ग्राफ प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 15.
सरल आवर्त गति करने वाले कण के वेग का सूत्र लिखिए तथा इसका समय-त्वरण ग्राफ खीचिए।
उत्तर-
सरल आवर्त गति करने वाले कण के वेग का सूत्र,
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प्रश्न 16.
पृथ्वी पर सेकण्ड लोलक की लम्बाई की गणना कीजिए। पृथ्वी पर g का मान 9.8 मी/से² है। (π = 3.14)
हल-
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अत: पृथ्वी तल पर सेकण्ड लोलक की लम्बाई लगभग 1 मीटर होती है।

प्रश्न 17.
500 ग्राम का एक गोला, 1.0 मीटर लम्बी डोरी से लटका है। क्षैतिज स्थिति से मुक्त करने पर यह ऊर्ध्वतल में दोलन करने लगता है। दोलनों के दौरान जब डोरी ऊर्ध्व से 60° कोण पर है। तब डोरी में तनाव ज्ञात कीजिए।
हल-
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दिया है,
गोले का द्रव्यमान (m) = 500 ग्राम
= 0.5 किग्रा
∵ डोरी क्षैतिज स्थिति में है, अत: डोरी में तनाव
T = mg cos θ
T = 0.5 x 10 x cos60 = 0.5 x 10 x [latex s=2]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] = 2.5 न्यूटन

प्रश्न 18.
एक कण सरल आवर्त गति कर रहा है। किसी क्षण इसका विस्थापन y = a/2 है। कण मध्यमान स्थिति से गति प्रारम्भ करता है। इस स्थिति के लिए कला की गणना कीजिए।
हल-
कला-विस्थापन का समीकरण ।
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प्रश्न 19.
किसी लिफ्ट में लटकाये गए एक सरल लोलक के दोलन के आवर्तकाल पर क्या प्रभाव पड़ता है जब लिफ्ट एक त्वरण α से ऊपर चढ़ रही है?
उत्तर-
जब लिफ्ट α त्वरण से ऊपर की ओर त्वरित होती है तो प्रभावी α का मान बढ़कर (α + α) हो जाता है। अतः आवर्तकाल T घट जाता है।

प्रश्न 20.
किसी स्प्रिंग के बल नियतांक की परिभाषा दीजिए।
हल-
यदि किसी स्प्रिंग पर F बल लगाने से उसकी लम्बाई में x वृद्धि हो जाए तो
F ∝ x या F = kx
जहाँ k = स्प्रिंग का बल नियतांक। यदि x = 1 तो k = F,
अत: किसी स्प्रिंग का बल नियतांक उस बल के बैराबर है जो उसकी लम्बाई में एकांक वृद्धि कर दे। इसका मात्रक न्यूटन/मीटर है।

प्रश्न 21.
प्रणोदित दोलन क्या होते हैं? उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए। या प्रणोदित कम्पन क्या है? इनके दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर-
प्रणोदित दोलन (Forced oscillations)-जब किसी दोलन करने वाली वस्तु पर कोई ऐसा बाह्य आवर्त बल लगाते हैं जिसकी आवृत्ति, वस्तु की स्वाभाविक आवृत्ति से भिन्न हो, तो वस्तु आवर्त बल की आवृत्ति से दोलन करने लगती है। ऐसे दोलनों को प्रणोदित दोलन (forced oscillations) कहते हैं।
उदाहरणार्थ-(i) जब तने हुए पतले तार में प्रत्यावर्ती धारा प्रवाहित की जाती है और तार को चुम्बक के ध्रुवों के बीच रखते हैं तो तार प्रत्यावर्ती धारा की आवृत्ति से कम्पन करने लगता है।
(ii) सितार, वायलिन व स्वरमापी के तार पर जब किसी आवृत्ति का स्वर उत्पन्न किया जाता है तो इसके कम्पन, सेतु द्वारा खोखले ध्वनि बोर्ड में पहुँच जाते हैं। इससे बोर्ड के अन्दर की वायु में प्रणोदित दोलन उत्पन्न हो जाते हैं।

प्रश्न 22.
प्रणोदित तथा अनुनादी कम्पनों में क्या अन्तर है?
उत्तर-
अनुनादी कम्पन प्रणोदित कम्पनों की ही एक विशेष अवस्था है। प्रणोदित कम्पन में वस्तु पर आरोपित आवर्त बल की आवृत्ति कम्पन करने वाली वस्तु की स्वाभाविक आवृत्ति से भिन्न होती है तथा कम्पन का आयाम छोटा होता है, जबकि अनुनादी कम्पन से आरोपित आवर्त बल की आवृत्ति वस्तु की स्वाभाविक आवृत्ति के बराबर होती है तथा कम्पनों का आयाम महत्तम होता है।

प्रश्न 23.
मुक्त तथा प्रणोदित दोलनों में प्रत्येक का एक-एक उदाहरण देकर अन्तर समझाइए।
उत्तर
मुक्त तथा प्रणोदित दोलन में अन्तर । मुक्त दोलन
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प्रश्न 24.
तार वाले वाद्य-यन्त्रों में प्रधान तार के साथ अन्य तार क्यों लगाये जाते हैं?
उत्तर-
प्रधान तार से उत्पन्न आवृत्ति के साथ अनुनादित होकर स्वर की तीव्रता बढ़ाने के लिए प्रधान तार के साथ अन्य तार लगाये जाते हैं जो विभिन्न आवृत्तियों के लिए समस्वरित (tuned) रहते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
एक सरल लोलक का गोलक एक जल से भरी गेंद है। गेंद की तली में एक बारीक छेद कर देने पर गोलक के आवर्तकाल पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर-
जैसे-जैसे जल बाहर निकलेगा, लोलक का गुरुत्व केन्द्र नीचे आता जाएगा और लोलक की प्रभावी लम्बाई बढ़ती जाएगी, जिससे आवर्तकाल बढ़ता जाएगा। जब गेंद आधे से अधिक खाली हो जाएगी तब लोलक का गुरुत्व केन्द्र पुनः ऊपर उठने लगेगा और लोलक की प्रभावी लम्बाई पुनः घटने लगेगी तथा आवर्तकाल भी घटने लगेगा। जब गेंद पूरी खाली हो जाएगी, तब लोलक का गुरुत्व केन्द्र पुनः गेंद के केन्द्र पर आ जाएगा तथा आवर्तकाल को मान प्रारम्भिक मान के बराबर हो जाएगा।

प्रश्न 2.
एक कण 6.0 सेमी आयाम तथा 6.0सेकण्ड के आवर्तकाल से सरल आवर्त गति कर रहा है। अधिकतम विस्थापन की स्थिति से आयाम के आधे तक आने में यह कितना समय लेगा?
हल-
अधिकतम विस्थापन की स्थिति में कण का विस्थापन समीकरण :
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प्रश्न 3.
सरल आवर्त गति करते हुए एक कण का साम्य स्थिति में 4 सेमी दूरी पर त्वरण 16 सेमी सेकण्ड² है। इसका आवर्तकाल ज्ञात कीजिए।
हल-
∵सरल आवर्त गति करते हुए कण का आवर्तकाल
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प्रश्न 4.
सरल आवर्त गति करते हुए किसी कण का अधिकतम वेग 100 सेमी/से तथा अधिकतम त्वरण 157 सेमी/से² है। कण का आवर्तकाल ज्ञात कीजिए।
हल-
अधिकतम वेग aω = 100 सेमी/से ।
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प्रश्न 5.
एक सेकण्ड लोलक को ऐसे स्थान पर ले जाया जाता है जहाँg का मान 981 सेमी/से² के स्थान पर 436 सेमी/से² है। लोलक का उस स्थान पर आवर्तकाल ज्ञात कीजिए।
हल-
सेकण्ड लोलक का आवर्तकाल [latex s=2]T=2\pi \sqrt { \frac { l }{ g } } [/latex] …(1)
स्थान बदलने पर आवर्तकाल [latex s=2]{ T }^{ ‘ }=2\pi \sqrt { \frac { l }{ { g }^{ ‘ } } } [/latex] ….(2)
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प्रश्न 6.
2 किग्रा द्रव्यमान का एक पिण्ड भारहीन स्प्रिंग जिसका बल नियतांक 200 न्यूटन/मी है, से लटका है। पिण्ड को नीचे की ओर 20 सेमी विस्थापित करके छोड़ दिया जाता है। ज्ञात कीजिए
(i) पिण्ड की अधिकतम चाल,
(ii) पिण्ड-स्प्रिंग निकाय की कुल ऊर्जा।
हल-
(i) स्प्रिंग में अधिकतम खिंचाव xmax = 20 सेमी = 0.20 मी पिण्ड को नीचे की उपर्युक्त दूरी से विस्थापित करके छोड़ देने पर यदि इसकी अधिकतम चाल υmax हो तो।
पिण्ड की अधिकतम गतिज ऊर्जा = स्प्रिंग के अधिकतम खिंचाव पर प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा
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(ii) स्प्रिंग से लटके पिण्ड को खींचकर छोड़ देने पर स्प्रिंग की प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा पिण्ड की गतिज ऊर्जा तथा स्थितिज ऊर्जा परस्पर परिवर्तित होती रहती है।
पिण्ड-स्प्रिंग निकाय की कुल ऊर्जा = अधिकतम खिंचाव पर स्प्रिंग की स्थितिज ऊर्जा
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प्रश्न 7.
जब एक भारहीन स्प्रिंग से 0.5 किग्रा का बाट लटकाया जाता है, तो उसकी लम्बाई में 0.02 मीटर की वृद्धि हो जाती है। स्प्रिंग का बल नियतांक एवं उसमें संचित ऊर्जा की गणना कीजिए। G = 9.8 मी/से2)
हल-
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प्रश्न 8.
एक स्प्रिंग पर 0.60 किग्रा का पिण्ड लटकाने पर उसकी लम्बाई 0.25 मी बढ़ जाती है। यदि स्प्रिंग से 0.24 किग्रा का एक पिण्ड लटकाकर नीचे खींचकर छोड़ दिया जाए तो स्प्रिंग का आवर्तकाल कितना होगा? (g = 10 मी/से2)
हल-
M=0.60 किग्रा, g = 10 मी/से2
स्प्रिंग की लम्बाई में वृद्धि ∆x = 0.25 मी
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प्रश्न 9.
0.25 किग्रा द्रव्यमान की एक वस्तु जब किसी स्प्रिंग से लटकायी जाती है तो स्प्रिंग की। लम्बाई 5 सेमी बढ़ जाती है। जब 0.4 किग्रा की वस्तु इससे लटकांयी जाती है तब स्प्रिंग के दोलन का आवर्तकाल ज्ञात कीजिए। (g = 10 मी/से2)
हल-
वस्तु को द्रव्यमान (M) = 0.25 किग्रा, g = 10 मी/से2
स्प्रिंग की लम्बाई में वृद्धि ∆x = 5 सेमी = 5 x 10-2 मीटर
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प्रश्न 10.
0.40 किग्रा द्रव्यमान के एक पिण्ड को एक आदर्श स्प्रिंग से लटकाने पर स्प्रिंग की लम्बाई 2.0 सेमी बढ़ जाती है। यदि इस स्प्रिंग से 2.0 किग्रा द्रव्यमान के पिण्ड को लटकाया जाए तो दोलन का आवर्तकाल क्या होगा? (g = 10 मी/से2)
हल-
पिण्ड का द्रव्यमान (M) = 0.40 किग्रा, g = 10 मी/से2
स्प्रिंग की लम्बाई में वृद्धि Δx = 2 सेमी = 2 x 10-2 मीटर
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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सरल आवर्त गति से आप क्या समझते हैं। सरल लोलक के आवर्तकाल के लिए व्यंजक प्राप्त कीजिए।
उत्तर-
सरल आवर्त गति-जब किसी कण की अपनी साम्य स्थिति के इधर-उधर एक सरल रेखा में गति इस प्रकार की होती है कि इस पर लग रहा त्वरण (अथवा बल) प्रत्येक स्थिति में कण के विस्थापन के अनुक्रमानुपाती रहती है तथा सदैव साम्य स्थिति की ओर दिष्ट होता है तो कण की गति को सरल आवर्त गति कहते हैं।
सरल लोलक के आवर्तकाल का व्यंजक-चित्र 14.18 में एक सरल लोलक दर्शाया गया है जिसकी प्रभावी लम्बाई 1 है तथा उसके गोलक का द्रव्यमान m है। गोलक को बिन्दु S से लटकाया गया है तथा गोलक की साम्य स्थिति O है। मान लीजिए दोलन करते समय गोलक किसी क्षण स्थिति A में है, जबकि
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 14 Oscillations 68
इसका विस्थापन OA = x है। इस स्थिति में धागा ऊर्ध्वाधर से θ कोण बनाता है तथा गोलक पर । निम्नलिखित दो बल लगते है– .
1. गोलक का भार mg जो उसके गुरुत्व केन्द्र पर ठीक नीचे की ओर ऊध्र्वाधर दिशा में लगता है।
2. धागे में तनाव का बल T’ जो धागे के अनुदिश निलम्बन बिन्दु S की ओर लगता है।
भार mg को दो भागों में वियोजित किया जा सकता है : घटक mg Cos θ जो कि धागे के अनुदिश T’ की विपरीत दिशा में लगता है तथा घटक mg sin θ जो कि धागे की लम्बवत् दिशा में लगता है। धागे में तनाव T’ तथा घटक mg cos θ का परिणामी (T’ – mg cos θ), गोलक को l त्रिज्या के वृत्तीय पथ पर चलने के लिए आवश्यक अभिकेन्द्र बल (mv²/l) प्रदान करता है; जबकि घटक mg sin θ गोलक को साम्य स्थिति O में लौटाने का प्रयत्न करता है। यही गोलक पर कार्य करने वाला प्रत्यानयन बल (restoring force) है।
अतः गोलक पर प्रत्यनियन बल F = – mg sin θ
(जबकि θ, कोणीय विस्थापन से छोटा है एवं इसे रेडियन में नापा जाता है।)
ऋण चिह्न यह व्यक्त करता है कि बल F, विस्थापन θ के घटने की दिशा में है अर्थात् साम्य स्थिति की ओर को दिष्ट है।
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 14 Oscillations 69
समीकरण (1) में (g/l) किसी निश्चित स्थान पर किसी दी हुई प्रभावी लम्बाई के सरल लोलक के लिए नियतांक है; अत: त्वरण ∝ – (विस्थापन) स्पष्ट है कि गोलक का त्वरण विस्थापन के अनुक्रमानुपाती है तथा उसकी दिशा विस्थापन x के विपरीत है। क्योंकि θ का मान कम रखा जाता है, अत: चाप OA लगभग ऋजु-रेखीय होगा। इस प्रकार लोलक सरल रेखा में गति करेगा। अतः गोलक की गति सरल आवर्त गति है।
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 14 Oscillations 70

प्रश्न 2.
सरल आवर्त गति करते हुए किसी कण के वेग का सूत्र प्राप्त कीजिए।
उत्तर-
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 14 Oscillations 71
सरल आवर्त गति में कण का वेग (Velocity of a particle in S.H.M.)—निर्देश वृत्त की परिधि पर चलते कण P के वेग v को परस्पर दो लम्बवत् घटकों में वियोजित करने पर (चित्र 14.19);
v का PN के समान्तर घटक = v sin θ
v का PN के लम्बवत् घटक = v cos θ
घटक v cos θ, कण P से वृत्त के व्यास पर खींचे गये लम्ब के पाद N की गति की दिशा OA के समान्तर है। अत: यह पाद N के वेग के बराबर है। इस प्रकार, पाद N का वेग u = v cos θ
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 14 Oscillations 72
इस समीकरण से यह पता चलता है कि सरल आवर्त गति करते हुए किसी कण का वेग (u) उसके विस्थापन (y) के साथ-साथ बदलता है। जब विस्थापन शून्य होता है (y = 0) अर्थात् जब । कण अपनी साम्य स्थिति से गुजरता है तब वेग अधिकतम होता है (umax = aω) तथा जब विस्थापन अधिकतम होता है (y = a) तब वेग शून्य होता है (u = 0).

प्रश्न 3.
यदि पृथ्वी के केन्द्र से होकर पृथ्वी के आर-पार एक सुरंग बनाई जाए तथा उस सुरंग में एक पिण्ड छोड़ा जाए तो दिखाइए कि पिण्ड का त्वरण सदैव सुरंग के मध्य बिन्दु (अर्थात पृथ्वी के केन्द्र) से विस्थापन के अनुक्रमानुपाती होता है। यह भी सिद्ध कीजिए कि इसका आवर्तकाल पृथ्वी के समीप परिक्रमा करते हुए उपग्रह के आवर्तकाल के बराबर होगा।
उत्तर-
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 14 Oscillations 73
चित्र 14.20 में पृथ्वी के केन्द्र से गुजरने वाली एक सुरंग AB को प्रदर्शित किया गया है तथा O पृथ्वी का केन्द्र है। m द्रव्यमान के एक पिण्ड को इस सुरंग के भीतर गति करने के लिए छोड़ा गया है। माना किसी क्षण पिण्ड बिन्दु P पर है, जहाँ इसका पृथ्वी के केन्द्र O से विस्थापन x है। इस समय पिण्डे x त्रिज्या के ठोस गोले के बाह्य पृष्ठ पर स्थित है। अत: पिण्ड पर पृथ्वी का गुरुत्वीय बल x त्रिज्या के गोले के गुरुत्वीय बल के बराबर होगा, जो P से O की दिशा में कार्य करेगा।
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 14 Oscillations 74
इस प्रकार, पिण्ड का त्वरण α, विस्थापन x के अनुक्रमानुपाती है तथा इसकी दिशा विस्थापन x के विपरीत है। अतः पिण्ड की गति सरल आवर्त गति है।
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प्रश्न 4.
एक कण सरल आवर्त गति कर रहा है। यदि माध्य स्थिति से x1 तथा x2 दूरियों पर कण का वेग क्रमशः u1 तथा u2 हैं, तो सिद्ध कीजिए कि इसका आवर्तकाल [latex s=2]T=2x\sqrt { \left[ \frac { { { x }^{ 2 } }_{ 2 }-{ { x }^{ 2 } }_{ 1 } }{ { { u }^{ 2 } }_{ 1 }-{ { u }^{ 2 } }_{ 2 } } \right] } [/latex] होगा।
हल-
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 14 Oscillations 76

प्रश्न 5.
सरल आवर्त गति करते हुए पिण्ड की दोलन गतिज ऊर्जा, स्थितिज ऊर्जा तथा सम्पूर्ण ऊर्जा के लिए व्यंजक प्राप्त कीजिए।
उत्तर-
गतिज ऊर्जा (Kinetic energy)-सरल आवर्त गति करते हुए कण को जब किसी क्षण उसकी साम्य स्थिति से विस्थापन y हो तो उस क्षण उसका वेग latex s=2]u=\omega \sqrt { \left( { a }^{ 2 }-{ y }^{ 2 } \right) } [/latex]
जहाँ a = कण का आयाम तथा ) ω = कण की कोणीय आवृत्ति। यदि पिण्ड (कण) का द्रव्यमान m हो
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 14 Oscillations 77
स्थितिज ऊर्जा (Potential energy)-सरल आवर्त गति करते हुए कण । का जब किसी क्षण उसकी साम्य स्थिति से विस्थापन y है तो उस क्षण ||
उसका त्वरण α =- ω²y (जहाँ ω = कोणीय आवृत्ति)।
यदि कण का द्रव्यमान m हो तो इस क्षण कण पर लगने वाला प्रत्यानयन बल F = द्रव्यमान x त्वरण
F = m x α = m x (-ω²y) =-mω²y
ऋण चिह्न केवल बल की दिशा (विस्थापन y के विपरीत) का प्रतीक है।’
अतः बल का परिमाण F = mω²y
यदि हम कण पर लगे बल F तथा कण के विस्थापन y के बीच एक ग्राफ खींचे तो चित्र 14.21 की भाँति एक सरल रेखा प्राप्त होती है। यह एक बल विस्थापन ग्राफ है। अत: इस ग्राफ (सरल रेखा) तथा विस्थापन अक्ष के बीच घिरा क्षेत्रफल कण पर किये गये कार्य अर्थात् कण की स्थितिज ऊर्जा को व्यक्त करेगा।
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इस प्रकार समी० (4) से स्पष्ट है कि सरल आवर्त गति करते कण (पिण्ड) की कुल ऊर्जा आयाम के वर्ग (a²) के तथा आवृत्ति के वर्ग (n²) के अनुक्रमानुपाती होती है।

प्रश्न 6.
बल नियतांक k की भारहीन स्प्रिंग से लटके हुए एक द्रव्यमान m के पिण्ड के ऊध्र्वाधर दोलनों के आवर्तकाल के लिए व्यंजक प्राप्त कीजिए।
उत्तर-
स्प्रिंग से लटके पिण्ड की गति (Motion of a body suspended by a spring)—चित्रं 14.22 (a) में एक हल्की (भारहीन) स्प्रिंग दर्शायी गई है, जिसकी सामान्य लम्बाई L है तथा यह एक दृढ़ आधार से लटकी है। जब इसके निचले सिरे पर m द्रव्यमान का एक पिण्ड लटकाया जाता है तो पिण्ड के भार से इसमें खिंचाव उत्पन्न होता है। माना यह खिंचाव अथवा स्प्रिंग की लम्बाई में वृद्धि l है। चित्र 14.22 (b) में स्प्रिंग अपनी प्रत्यास्थता के कारण द्रव्यमान m पर एक प्रत्यानयन बल F ऊपर ऊर्ध्व दिशा में लगाती है। हम जानते हैं कि स्प्रिंग के लिए हुक का नियम सत्य होता है। अतः हुक के नियम से F = – kl.
जहाँ k स्प्रिंग का बल नियतांक है। इसे स्प्रिंग नियतांक (spring constant) भी कहते हैं। इसका मात्रक ‘न्यूटन/मीटर’ होता है। उपर्युक्त समीकरण में ऋण चिह्न इस बात का संकेत करता है कि प्रत्यानयन बल F विस्थापन के विपरीत दिशा में है। इस स्थिति में पिण्ड पर लगने वाला एक दूसरा बल पिण्ड का भार mg है। चूंकि इस स्थिति में पिण्ड स्थायी सन्तुलन अवस्था में है, अतः इस पर परिणामी बल शून्य होना चाहिए।
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अत: F + mg = 0
-kl + mg = 0
mg = kl …(1)
अब, यदि पिण्डे को थोड़ा नीचे खींचकर छोड़ दिया जाये तो यह अपनी साम्य स्थिति के ऊपर-नीचे दोलन करने लगता है। माना दोलन करते समय किसी क्षण पिण्ड का
साम्य स्थिति से विस्थापन y दूरी नीचे की ओर है [चित्र 14.22 (c)]। इस क्षण स्प्रिंग की लम्बाई (L + l) से करता हुआ बढ़कर (L + l + y) हो जाती है; अर्थात् स्प्रिंग की लम्बाई में कुल वृद्धि (l + y) ह्येगी। अतः इस देशा में स्प्रिंग द्वारा पिण्ड पर लगाया गया प्रत्यानयन बल
F’ = – k(l + y) = – kl – ky
पिण्ड पर दूसरा बल अब भी उसका भार mg ही है। चूंकि इस दशा में पिण्ड गतिशील है। अत: इस पर लगने वाला परिणामी बल
F” = F’ + mg = (- kl – ky) + mg
परन्तु समी० (1) से, mg = kl
∴ F” = -kl – ky + kt या F” = – ky
अत: पिण्ड में उत्पन्न त्वरण α = बल/द्रव्यमान = F”/m
α = -(ky/m) ,[latex s=2]\alpha =-\left( \frac { k }{ m } \right) y[/latex] …(2)
चूँकि पिण्ड विशेष के लिए m नियत तथा स्प्रिंग के लिए k नियत है, अत: समी० (2) में राशि (k/m) नियतांक है।
अतः α ∝ -y
इस प्रकार स्प्रिंग से लटके पिण्ड के दोलन करते समय इसमें त्वरण α पिण्ड की साम्य स्थिति से उसके विस्थापन y के अनुक्रमानुपाती है, तथा ऋण चिह्न (-) इस तथ्य का प्रतीक है कि त्वरण की दिशा विस्थापन की दिशा के विपरीत है। अंतः पिण्ड की गति सरल आवर्त है।
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 14 Oscillations 80

प्रश्न 7.
आरेख की सहायता से अवमन्दित कम्पन को समझाइए। अवमन्दित कम्पन के दो उदाहरण दीजिए। अवमन्दित कम्पन को प्रणोदित कम्पन में बदलने के लिए क्या करना पड़ता है?
उत्तर-
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 14 Oscillations 81
अवमन्दित कम्पन (Damped Vibrations)-किसी वस्तु के कम्पन करते समय कोई-न-कोई बाह्य अवमन्दक बल (damping force) अवश्य विद्यमान रहता है जिसके कारण कम्पन करती वस्तु की ऊर्जा लगातार घटती रहती है, इसके परिणामस्वरूप वस्तु के कम्पन का आयाम भी निरन्तर घटता जाता है या कुछ समय पश्चात् वस्तु कम्पन करना बन्द कर देती है। यह वह स्थिति है जब वस्तु को दी गयी कुल ऊर्जा समाप्त हो चुकी होती है।
इस प्रकार बाह्य अवमन्दक बलों के विरुद्ध दोलन करने, वाली वस्तु की ऊर्जा का निरन्तर कम होते रहना ऊर्जा क्षय कहलाता है। इस ऊर्जा क्षय के कारण ही कम्पित वस्तु के कम्पनों का आयाम धीरे-धीरे घटता जाता है। ऐसे कम्पन को जिनका ओयार्म समय के साथ घटता जाता है, अवमन्दित कम्पन (damped vibrations) कहते है।
उदाहरणार्थ- (i) सरल लोलक के गोलक के दोलन करते समय लोलक को लटकाने वाले दृढ़ आधार का घर्षण तथा वायु की श्यानता बाह्य अवमन्दक का कार्य करते हैं जिससे इसके दोलनों का आयाम धीरे-धीरे घटता जाता है तथा अन्त में गोलक दोलन करना बन्द कर देता है।
(ii) ऊध्र्वाधर स्प्रिंग से लटके पिण्ड को थोड़ा नीचे खींचकर छोड़ देने पर पिण्ड के दोलन अवमन्दित दोलन हैं। यहाँ पिण्ड का वायु के साथ घर्षण (श्यानता) अवमन्दक-बल का कार्य करता है। अवमन्दित कम्पन को प्रणोदित कम्पन में बदलने के लिए कम्पित ‘वस्तु पर बाह्य आवर्त बल आरोपित करना होता है।

प्रश्न 8.
अनुनाद से क्या तात्पर्य है? व्याख्या कीजिए। ध्वनि अनुनाद, यान्त्रिक अनुनाद तथा विद्युत चुम्बकीय अनुनाद के एक-एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर-
जब किसी दोलन करने वाली वस्तु पर कोई बाह्य आवर्त बल लगाया जाता है तो वस्तु बल की आवृत्ति से प्रणोदित दोलन करने लगती है। यदि बाह्य बल की आवृत्तिवस्तु की स्वाभाविक आवृत्ति के बराबर (अथवा इसकी पूर्ण गुणज) हो तो वस्तु के प्रणोदित दोलनों का आयाम बहुत बढ़ जाता है। इस घटना को अनुनाद (resonance) कहते हैं। बाह्य बल और वस्तु की आवृत्ति में थोड़ा-सा ही अन्तर होने पर आयाम बहुत कम हो जाता है। स्पष्ट है कि अनुनाद, प्रणोदित दोलनों की ही एक विशेष अवस्था है।
अनुनाद की व्याख्या-जब बाह्य बल की आवृत्ति वस्तु की स्वाभाविक आवृत्ति के बराबर होती है तो दोनों समान कला में कम्पन करते हैं। अतः आवर्त बल द्वारा लगाये गये उत्तरोत्तर आवेग वस्तु की ऊर्जा लगातार बढ़ाते जाते हैं और वस्तु का आयाम लगातार बढ़ता जाता है। सिद्धान्त रूप से वस्तु का आयाम अनन्त तक बढ़ता रहना चाहिए, परन्तु व्यवहार में दोलन करती हुई वस्तु में वायु के घर्षण तथा ध्वनि विकिरण के कारण ऊर्जा-क्षय होता रहता है। दोलन आयाम बढ़ने के साथ-साथ ऊर्जा-क्षय भी बढ़ता जाता है और एक ऐसी स्थिति आ जाती है कि बाह्य बल द्वारा प्रति दोलन दी गई ऊर्जा, वस्तु द्वारा प्रति । दोलन में ऊर्जा-क्षय के बराबर हो जाती है। इस स्थिति में आयाम का बढ़ना रुक जाता है।
उदाहरणार्थ
1. ध्वनि अनुनाद
(i) डोरियों में कम्पन-यदि समान आवृत्ति की दो डोरियाँ एक ही बोर्ड पर तनी हों तथा उनमें से एक को कम्पित किया जाये तो दूसरी स्वयं कम्पन करने लगती है।
(ii) बर्तन में जल भरना-काँच के एक लम्बे जार के मुँह पर किसी स्वरित्र को बजाकर रखने पर एक धीमी ध्वनि सुनाई देती है। जार में पानी भरना शुरू कर देने पर जार के वायु-स्तम्भ की लम्बाई कम होने लगती है एवं एक निश्चित लम्बाई पर तेज ध्वनि सुनाई पड़ती है। इसका कारण यह है कि एक निश्चित लम्बाई पर वायु स्तम्भ की स्वाभाविक आवृत्ति, स्वरित्र की आवृत्ति के बराबर हो जाती है और अनुनाद के कारण वायु स्तम्भ में बड़े आयाम के कम्पन होते हैं जिससे ध्वनि तेज सुनाई देती है।
(iii) वातावरण के कम्पन-कान के ऊपर खाली गिलास रखने पर गुनगुन की ध्वनि सुनाई पड़ती है। इसका कारण यह है कि वातावरण में अनेक प्रकार के कम्पन उपस्थित रहते हैं। इन कम्पनों में से जिसकी आवृत्ति गिलास के भीतर वायु की स्वाभाविक आवृत्ति के बराबर होती है, वे वायु को अनुनादित करते हैं।

2. यान्त्रिक अनुनाद
सेना का पुल पार करना-जब सेना किसी पुल को पार करती है तब सैनिक कदम मिलाकर नहीं चलते। इसका कारण यह है कि यदि सैनिकों के कदमों की आवृत्ति, पुल की स्वाभाविक आवृत्ति के बराबर हो जायेगी तो पुल में बड़े आयाम के कम्पन होने लगेंगे और पुल के टूटने का खतरा हो जाएगा।

3. विद्युत-चुम्बकीय अनुनाद
रेडियो-यह विद्युत अनुनाद का उदाहरण है। विभिन्न प्रसारण केन्द्रों से अलग-अलग आवृत्तियों पर तरंगें प्रसारित की जाती हैं। रेडियो पर एक L-C परिपथ लगा होता है। इसमें लगे संधारित्र की धारिता (C) बदलने पर L-C परिपथ की आवृत्ति [latex s=2]\left( t=\frac { 1 }{ 2\pi \sqrt { LC } } \right) [/latex] बदल जाती है। जब इस विद्युत परिपथ की का आवृत्ति किसी प्रसारण केन्द्र (स्टेशन) की आवृत्ति के बराबर हो जाती है तो विद्युत परिपथ उन तरंगों को ग्रहण कर लेता है और स्टेशन से प्रोग्राम सुनाई देने लगती है।

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UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 13 Kinetic Theory

UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 13 Kinetic Theory (अणुगति सिद्धान्त) are part of UP Board Solutions for Class 11 Physics . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 13 Kinetic Theory (अणुगति सिद्धान्त)

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Physics
Chapter Chapter 13
Chapter Name Kinetic Theory
Number of Questions Solved 58

UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 13 Kinetic Theory (अणुगति सिद्धान्त)

अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
ऑक्सीजन के अणुओं के आयतन और STP पर इनके द्वारा घेरे गए कुल आयतन का अनुपात ज्ञात कीजिए। ऑक्सीजन के एक अणु का व्यास 3Å लीजिए।
हल-
आवोगाद्रो की परिकल्पना के अनुसार S T P पर गैस के 1 मोल द्वारा घेरा गया आयतन
V = 22.4 लीटर = 22.4 x 10-3 मी3
तथा 1 ग्राम मोल में अणुओं की संख्या = आवोगाद्रो संख्या
N = 6.02 x 1023
ऑक्सीजन के एक अणु की त्रिज्या
r = व्यास/2 = 3 Å/2= 1.5 x 10-10 मी
∴ ऑक्सीजन के एक अणु का आयतन
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प्रश्न 2.
मोलर आयतन, STP पर किसी गैस (आदर्श) के 1 मोल द्वारा घेरा गया आयतन है। (STP:1 atm दाब, 0°C ताप)। दर्शाइए कि यह 22.4 लीटर है।
हल-
S.T.P. का अर्थ P = 1 वायुमण्डलीय दाब = 1.013 x 105 न्यूटन-मीटर-2
तथा T = 0+273 = 273 K है तथा R = 8.31 जूल/मोल-K
∴ (1 मोल के लिए) आदर्श गैस समीकरण PV = RT से ।
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= 22.395 x 10-3 मी-3 ≈ 22.4 लीटर

प्रश्न 3.
चित्र-13.1 में ऑक्सीजन के 100 x 10-3kg द्रव्यमान के लिए PV/T एवं P में, दो अलग-अलग तापों पर ग्राफ दर्शाए गए हैं।
(a) बिन्दुकित रेखा क्या दर्शाती है?
(b) क्या संत्य है : T1 > T2 अथवा T1 < T2?
(c) y-अक्ष पर जहाँ वक्र मिलते हैं वहाँ [latex s=2]\frac { PV }{ T }[/latex] का मान क्या है?
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(d) यदि हम ऐसे ही ग्राफ 100 x 10-3 kg हाइड्रोजन के लिए बनाएँ तो भी क्या उस बिन्दु पर जहाँ वक़ y-अक्ष से मिलते हैं [latex s=2]\frac { PV }{ T }[/latex] का मान यही होगा? यदि नहीं, तो हाइड्रोजन के कितने द्रव्यमान के लिए [latex s=2]\frac { PV }{ T }[/latex] का मान (कम दाब और उच्च ताप के क्षेत्र के लिए वही होगा? H2 का अणु द्रव्यमान = 2.02 u, O2 का अणु द्रव्यमान = 32.0 u, R = 8.31 J mol-1K-1)
उत्तर-
(a) बिन्दुकित रेखा यह दर्शाती है, कि राशि [latex s=2]\frac { PV }{ T }[/latex] नियत है। यह तथ्य केवल आदर्श गैस के लिए सत्य है; अतः बिन्दुकित रेखा आदर्श गैस का ग्राफ है।
(b) हम देख सकते हैं कि ताप T2 पर ग्राफ की तुलना में ताप T1 पर गैस का ग्राफ आदर्श गैस के ग्राफ के अधिक समीप है अर्थात् ताप T2 पर ऑक्सीजन गैस का आदर्श गैस के व्यवहार से विचलन अधिक है।
हम जानते हैं कि वास्तविक गैसें निम्न ताप पर आदर्श गैस के व्यवहार से अधिक विचलित होती है।
अतः T1 > T2
(c) जिस बिन्दु पर ग्राफ y-अक्ष पर मिलते हैं ठीक उसी बिन्दु से आदर्श गैस का ग्राफ भी गुजरता है;
अतः इस बिन्दु पर ऑक्सीजन गैस, आदर्श गैस समीकरण का पालन करेगी।
अत: PV = µRT से, [latex s=2]\frac { PV }{ T }[/latex] = µR
∵ गैस का द्रव्यमान m= 1.00 x 10-3 kg जबकि गैस का ग्राम अणुभार M = 32g
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(d) इस बिन्दु पर गैस, आदर्श गैस समीकरण का पालन करेगी; अतः [latex s=2]\frac { PV }{ T }[/latex] = µR होगा। परन्तु समान द्रव्यमान हाइड्रोजन गैस में ग्राम-अणुओं की संख्या भिन्न होगी; अत: हाइड्रोजन गैस के लिए [latex s=2]\frac { PV }{ T }[/latex] का मान भिन्न होगा।
H2 गैस के लिए [latex s=2]\frac { PV }{ T }[/latex] = µR का वही मान प्राप्त करने के लिए हमें ग्राम-अणुओं की संख्या वही [latex s=2]\left( \mu =\frac { 1 }{ 32 } \right) [/latex] लेनी होगी।
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प्रश्न 4.
एक ऑक्सीजन सिलिण्डर जिसका आयतन 30 L है, में ऑक्सीजन का आरम्भिक दाब 15 atm एवं ताप 27°c है। इसमें से कुछ गैस निकाल लेने के बाद प्रमापी (गेज) दाब गिरकर 11 atm एवं ताप गिरकर 17°C हो जाता है। ज्ञात कीजिए कि सिलिण्डर से ऑक्सीजन की कितनी मात्रा निकाली गई है? (R = 8.31 J mol-1K-1, ऑक्सीजन का अणु द्रव्यमान O2 = 32u )
हल-
μ ग्राम मोल के लिए आदर्श गैस समीकरण
PV = μ RT (जहाँ μ = m/M)
अतः PV= (m/M) RT
(जहाँ m= ग्राम में द्रव्यमान, M = ग्राम में अणुभार)
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प्रश्न 5.
वायु का एक बुलबुला, जिसका आयतन 1.0 cm3 है, 40 m गहरी झील की तली से जहाँ ताप 12°c है, उठकर ऊपर पृष्ठ पर आता है जहाँ ताप 35°c है। अब इसका आयतन क्या होगा?
हल-
दिया है : बुलबुले का आयतन V1 = 1.0 cm3 = 1.0 x 10-6m3
अन्तिम आयतन V2 = ?
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प्रश्न 6.
एक कमरे में, जिसकी धारिता 25.0 m3 है, 27°C ताप और 1 atm दाब पर, वायु के कुल अणुओं (जिनमें नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, जलवाष्प और अन्य सभी अवयवों के कण सम्मिलित हैं) की संख्या ज्ञात कीजिए।
हल-
दिया है : कमरे की धारिता V = 25.0 m3, ताप T = 27 + 273 = 300K,
दाब P = 1 atm = 1.01 x 105 N m-2
कुल अणुओं की संख्या = ?
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प्रश्न 7.
हीलियम परमाणु की औसत तापीय ऊर्जा का आकलन कीजिए-
(i) कमरे के ताप (27°C) पर।
(ii) सूर्य के पृष्ठीय ताप (6000 K) पर।
(iii) 100 लाख केल्विन ताप (तारे के क्रोड का प्रारूपिक ताप) पर।
हल-
हीलियम एक परमाणु गैस है। अत: परमाणु की औसत तापीय ऊर्जा अणु की औसत तापीय ऊर्जा ही होगी। किसी गैस के एक अणु की औसत तापीय ऊर्जा (गतिज ऊर्जा) [latex s=2]\overline { E } =\frac { 3 }{ 2 } K.T[/latex] (जहाँ T = परमताप,
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प्रश्न 8.
समान धारिता के तीन बर्तनों में एक ही ताप और दाब पर गैसे भरी हैं। पहले बर्तन में निऑन (एकपरमाणुक) गैस है, दूसरे में क्लोरीन (द्विपरमाणुक) गैस है और तीसरे में यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड (बहुपरमाणुक) गैस है। क्या तीनों बर्तनों में गैसों के संगत अणुओं की संख्या समान है? क्या तीनों प्रकरणों में अणुओं की υr.m.s (वर्ग-माध्य-मूल चाल) समान है?
उत्तर-
(i) हाँ, चूँकि आवोगाद्रो परिकल्पना के अनुसार समान परिस्थितियों में गैसों के समान आयतन में अणुओं की संख्या समान होती है। (ii) नहीं,
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तीनों गैसों के ग्राम-अणु भार अलग-अलग हैं; अतः अणुओं की वर्ग-माध्य-मूल चाल भी अलग-अलग होगी।

प्रश्न 9.
किस ताप पर ऑर्गन गैस सिलिण्डर में अणुओं की υr.m.s,-20°C पर हीलियम गैस परमाणुओं की υr.m.s के बराबर होगी? (Ar का परमाणु द्रव्यमान = 39.9u एवं हीलियम का परमाणु द्रव्यमान = 4.0u)
हल-
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प्रश्न 10.
नाइट्रोजन गैस के एक सिलिण्डर में, 2.0 atm दाब एवं 17°C ताप पर, नाइट्रोजन अणुओं के माध्य मुक्त पथ एवं संघट्ट आवृत्ति का आकलन कीजिए। नाइट्रोजन अणु की त्रिज्या लगभग 1.0 Å लीजिए। संघट्ट-काल की तुलना अणुओं द्वारा दो संघट्टों के बीच स्वतन्त्रतापूर्वक चलने में लगे समय से कीजिए। (नाइट्रोजन का आणविक द्रव्यमान = 28.0u)
हल-
P = 2.0, वायुमण्डलीय = 2 x 1.013 x 105 = 2.026 x 105 न्यूटन मीटर-2,
T = 17°C = 17 + 273 = 290 K
1 मोल गैस के लिए, PV = RT
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अतिरिक्त अभ्यास

प्रश्न 11.
1 मीटर लम्बी संकरी (और एक सिरे पर बन्द) नली क्षैतिज रखी गई है। इसमें 76 cm लम्बाई भरा पारद सूत्र, वायु के 15 cm स्तम्भ को नली में रोककर रखता है। क्या होगा यदि खुला सिरा नीचे की ओर रखते हुए नली को ऊर्ध्वाधर कर दिया जाए?
हल-
प्रारम्भ में जब नली क्षैतिज है, तब बन्द सिरे पर रोकी गई वायु का दाब वायुमण्डलीय दाब के बराबर होगा क्योंकि यह वायु, वायुमण्डलीय दाब के विरुद्ध पारे के स्तम्भ को पीछे हटने से रोकती है।
∴ P1 = वायुमण्डलीय दाब
= 76 सेमी पारद स्तम्भ का दाब
यदि नली का अनुप्रस्थ क्षेत्रफल A सेमी² है तो वायु का आयतन V1 = 15 सेमी X A सेमी² = 15A सेमी3 । जब नली का खुला सिरा नीचे की ओर रखते हुए ऊध्र्वाधर करते हैं तो खुले सिरे पर बाहर की ओर से वायुमण्डलीय दाब (76 सेमी पारद स्तम्भ का दाब) काम करता है जब कि ऊपर की ओर से 76 सेमी पारद सूत्र का दाब तथा बन्द सिरे पर एकत्र वायु की दाब काम करते हैं। चूँकि खुले सिरे पर पारद स्तम्भ + वायु का दाब अधिक है अतः पारद स्तम्भ सन्तुलन में नहीं रह पाता और नीचे गिरते हुए, वायु को बाहर निकाल देता है।
माना पारद स्तम्भ की h लम्बाई नली से बाहर निकल जाती है।
तब, पारद स्तम्भ की शेष ऊँचाई = (76 – h)
सेमी जबकि बन्द सिरे पर वायु स्तम्भ की लम्बाई = (15 + 9 + h) सेमी
= (24 + h) सेमी
वायु का आयतन V2 = (24 + h) A सेमी3
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अतः h = 23.8 सेमी अथवा – 47.8 सेमी (जो अनुमान्य है।)
इसलिए h = 23.8 सेमी ≈ 24 सेमी ।
अतः लगभग 24 सेमी पारा बाहर निकल जायेगा। शेष पारे का 52 सेमी ऊँचा स्तम्भ तथा 4.8 सेमी वायु स्तम्भ इसमें जुड़कर बाह्य वायुमण्डल के साथ संतुलन में रहते हैं। (यहाँ पूरे प्रयोग की अवधि में ताप को नियत माना गया है तब ही बॉयल के नियम का प्रयोग किया है।)

प्रश्न 12.
किसी उपकरण से हाइड्रोजन गैस 28:7 सेमी3/से की दर से विसरित हो रही है। उन्हींस्थितियों में कोई दूसरी गैस 7.2 सेमी3/से की दर से विसरित होती है। इस दूसरी गैस
को पहचानिए।
[संकेत-ग्राहम के विसरण नियम R1/R2 = (M2 /M1)1/2 का उपयोग कीजिए, यहाँ R1, R2 क्रमशः गैसों की विसरण दर तथा M1 एवं M2 उनके आणविक द्रव्यमान हैं। यह नियम अणुगति सिद्धान्त का एक सरल परिणाम है।]
हल-
किसी गैस के विसरण की दर । गैस अणुओं के वर्ग माध्य मूल वेग के अनुक्रमानुपाती होती है अर्थात्
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अतः दूसरी गैस ऑक्सीजन है। (चूंकि ऑक्सीजन का अणुभार 32 होता है।)

प्रश्न 13.
साम्यावस्था में किसी गैस का घनत्व और दाब अपने सम्पूर्ण आयतन में एकसमान हैं। यह पूर्णतया सत्य केवल तभी है जब कोई भी बाह्य प्रभाव न हो। उदाहरण के लिए गुरुत्व से प्रभावित किसी गैस स्तम्भ का घनत्व (और दाब) एकसमान नहीं होता है। जैसा कि आप आशा करेंगे इसका घनत्व ऊँचाई के साथ घटता है। परिशुद्ध निर्भरता ‘वातावरण के नियम
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से दी जाती है, यहाँ n2, n1 क्रमशः h2 व h1 ऊँचाइयों पर संख्यात्मक घनत्व को प्रदर्शित करते हैं। इस सम्बन्ध का उपयोग द्रव-स्तम्भ में निलम्बित किसी कण के अवसादने साम्य के लिए समीकरण
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को व्युत्पन्न करने के लिए कीजिए, यहाँ ρ निलम्बित कण का घनत्व तथा ρ’ चारों तरफ के माध्यम का घनत्व है। NA आवोगाव्रो संख्या तथा R सार्वत्रिक गैस नियतांक है। (संकेतः निलम्बित कण के आभासी भार को जानने के लिए आर्किमिडीज के सिद्धान्त का उपयोग कीजिए)
उत्तर-
वातावरण के नियम के अनुसार,
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जबकि m द्रव्यमान का कण वायु में साम्यावस्था में तैर रहा है। यदि कण ρ’ वाले किसी द्रव में छोड़ा गया है तो इस कण पर द्रव के कारण उत्क्षेप भी कार्य करेगा। ऐसी स्थिति में हमें उक्त सूत्र में mg के स्थान पर कण का आभासी भार रखना होगा।
माना कण का आयतन V तथा घनत्व ρ है तब ।
कण का आभासी भार = mg – उत्क्षेप
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प्रश्न 14.
नीचे कुछ ठोसों व द्रवों के घनत्व दिए गए हैं। उनके परमाणुओं की आमापों का आकलन (लगभग) कीजिए।
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[ संकेतः मान लीजिए कि परमाणु ठोस अथवा द्रव प्रावस्था में दृढ़ता से बँधे हैं, तथा आवोगाव्रो संख्या के ज्ञात मान का उपयोग कीजिए। फिर भी आपको विभिन्न परमाणवीय आकारों के लिए अपने द्वारा प्राप्त वास्तविक संख्याओं का बिल्कुल अक्षरशः प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि दृढ़ संवेष्टन सन्निकटन की रूक्षता के परमाणवीय आकार कुछ Å के पास में हैं ]
हल-
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परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
27°C ताप पर एक बर्तन में भरी हुई एक मोल हाइड्रोजन गैस का दाब P है। उसी आयतन के दूसरे बर्तन में 127°C ताप पर एक मोल हीलियम गैस भरी है। इसका दाब होगा
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उत्तर-
(iii) [latex s=2]\frac { 4 }{ 3 }p[/latex]

प्रश्न 2.
किसी बर्तन में P0 दाब पर गैस है। यदि सभी अणुओं के द्रव्यमान आधे और उनकी चाल दोगुनी कर दी जाये तो परिणामी दाब होगा
(i) 4P0
(ii) 2P0
(iii) P0
(iv) P0/2
उत्तर-
(ii) 2P0

प्रश्न 3.
सामान्य ताप एवं दाब पर 1 सेमी3 हाइड्रोजन एवं 1 सेमी3 ऑक्सीजन गैसें ली गयी हैं। हाइड्रोजन के अणुओं की संख्या n1 तथा ऑक्सीजन के अणुओं की संख्या n2 है। सही विकल्प होगा
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उत्तर-
(i) [latex s=2]\frac { { n }_{ 1 } }{ { n }_{ 2 } } =\frac { 1 }{ 16 } [/latex]

प्रश्न 4.
एक आदर्श गैस का दाब P और इसके एकांक आयतन की गतिज ऊर्जा E में परस्पर सम्बन्ध है।
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उत्तर-
(iii)[latex s=2]P=\frac { 2 }{ 3 }E[/latex]

प्रश्न 5.
एक ग्राम-अणु गैस की गतिज ऊर्जा सामान्य ताप तथा दाब पर E है। 273°C पर इसकी गतिज ऊर्जा होगी।
(i) [latex s=2]\frac { E }{ 4 }[/latex]
(ii) [latex s=2]\frac { E }{ 2 }[/latex]
(iii) 2E
(iv) 4E
उत्तर-
(iii) 2E

प्रश्न 6.
किसी वास्तविक गैस के लिए P तथा v में परिवर्तन चार विभिन्न तपों T1, T2, T3 व T4 पर प्रदर्शित है। गैस का क्रान्तिक ताप है। विभिन्न तापों T1, T2, T3 तथा T4 पर किसी वास्तविक गैस का दाब P बढ़ाने पर आयतन v में परिवर्तन चित्र 13.3 में प्रदर्शित है। गैस का क्रान्तिक ताप है।
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(i) T1
(ii) T2
(iii) T3
(iv) T4
उत्तर-
(ii) T2

प्रश्न 7.
40°C पर किसी गैस के अणुओं की औसत गतिज ऊर्जा है। वह ताप, जिस पर यह ऊर्जा 2E हो जाएगी, है।
(i) 80°C
(ii) 160° C
(ii) 273°C
(iv) 353°C
उत्तर-
(i) 80°C

प्रश्न 8.
1 मोल नाइट्रोजन गैस के दाब व ताप बदल जाते हैं । जब प्रयोग को उच्च दाब तथा उच्च ताप पर किया 2.0 जाता है। प्राप्त परिणाम चित्र 13.4 में प्रदर्शित है। [latex s=2]\frac { PV }{ RT }[/latex] का P के साथ सही परिवर्तन प्रदर्शित होगा
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(i) वक्र 1 से
(ii) वक्र 4 से।
(iii) वक्र 3 से
(iv) वक्र 2 से
उत्तर-
(ii) वक्र 4 से

प्रश्न 9.
कमरे के ताप पर हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के अणुओं की वर्ग-माझ्य-मूल चालों का अनुपात है
(i) 4:1
(ii) 8:1
(iii) 12:1
(iv) 16:1
उत्तर-
(i) 4:1

प्रश्न 10.
किसी गैस का परमताप चार गुना बढ़ा दिया जाता है। गैस के अणुओं की वर्ग-माध्य-मूल चाल हो जायेगी।
(i) 4 गुना
(ii) 16 गुना
(iii) 1/4 गुना
(iv) 2 गुना
उत्तर-
(iv) 2 गुना

प्रश्न 11.
दो आदर्श गैसों के अणुओं के वर्ग-माध्य-मूल वेग समान हैं। गैसों के अणुभार क्रमशः M1 और M2 एवं परमताप क्रमशःT1 और T2 हैं तो,
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 13 Kinetic Theory 28
उत्तर-
(ii) [latex s=2]\frac { T_{ 1 } }{ T_{ 2 } } =\frac { M_{ 1 } }{ M_{ 2 } } [/latex]

प्रश्न 12.
समान ताप पर दो गैसों के वाष्प घनत्वों का अनुपात 4 : 5 है। इनके अणुओं के वर्ग-माध्य-मूल वेगों का अनुपात होगा।
(i) 1 : 2.25
(ii) 2:3
(iii)3:2
(iv) 4:9
उत्तर-
(iii) 3 : 2

प्रश्न 13.
एक पक्षी आकाश में उड़ रहा है। इसके गति की स्वातन्त्र्य कोटि की संख्या है।
(i) 3
(ii) 2
(iii) 1
(iv) 0
उत्तर-
(i) 3

प्रश्न 14.
किसी द्विपरमाणविक अणु की स्थानान्तरीय तथा घूर्णीय स्वातन्त्र्य कोटियों की कुल संख्या होगी
(i) 2
(ii) 3
(iii) 4
(iv) 5
उत्तर-
(iv) 5

प्रश्न 15.
किसी एकपरमाणविक गैस के एक अणु की स्वातन्त्र्य कोटियों की संख्या होगी।
(i) 1
(ii) 2
(iii) 3
(iv) 4
उत्तर-
(iii) 3

प्रश्न 16.
एक चींटी मेज के पृष्ठ पर चल रही है। इसके चलने की स्वातन्त्रय कोटि है।
(i) शून्य
(ii) 1
(iii) 2
(iv) 3
उत्तर-
(iii) 2

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आदर्श गैस का अवस्था समीकरण किसे कहते हैं?
उत्तर-
किसी आदर्श गैस के निश्चित द्रव्यमान के आयतन, ताप व दाब में सम्बन्ध बताने वाले समीकरण को आदर्श गैस समीकरण या आदर्श गैस को अवस्था समीकरण कहते हैं।

प्रश्न 2.
वास्तविक गैसों के लिए वाण्डरवाल्स समीकरण लिखिए तथा प्रमुख प्रतीकों के अर्थ बताइए।
उत्तर-
वास्तविक गैसों के लिए वाण्डरवाल्स समीकरण निम्न है।
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जहाँ P = दाब, V = आयतन, R = सार्वत्रिक गैस नियतांक
a तथा b = त्रुटि सुधार नियतांक

प्रश्न 3.
अणुगति सिद्धान्त के आधार पर गैस के दाब का सूत्र लिखिए। प्रयुक्त संकेतांकों का अर्थ लिखिए।
उत्तर-
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जहाँ m = एक अणु का द्रव्यमान,n = V आयतन में अणुओं की संख्या तथा [latex s=2]{ \overline { \nu } }^{ 2 }[/latex] = अणुओं का वर्ग-माध्य-मूल वेग।

प्रश्न 4.
दो गैसें समान ताप, दाब तथा आयतन पर मिश्रित की गयी हैं। यदि तप्प और आयतन में । परिवर्तन न हो तो मिश्रण का परिणामी दाब क्या होगा?
उत्तर-
डाल्टने के आंशिक दाब के अनुसार परिणामी दाब = P1 + P2
परन्तु यहाँ P1 = P2 = P (माना) अतः परिणामी दाब = P+ P = 2P
अतः मिश्रण का दाब एक गैस के दाब का दोगुना होगा।

प्रश्न 5.
1 सेमी3 ऑक्सीजन और 1 सेमी3 नाइट्रोजन सामान्य ताप एवं दाब पर हैं। इन गैसों में अणुओं की संख्याओं का अनुपात क्या है?
हल-
अणुगति सिद्धान्त से,
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चूँकि दोनों एक ही ताप पर हैं, अत: अणुओं की माध्य गतिज ऊर्जाएँ बराबर होंगी। तब
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प्रश्न 6.
किसी ठोस को दबाने पर उनके परमाणुओं की स्थितिज ऊर्जा घटती है अथवा बढ़ती है।
उत्तर-
बढ़ती है।

प्रश्न 7.
किसी गैस के दाब तथा प्रति एकांक आयतन की गतिज ऊर्जा में सम्बन्ध स्थापित कीजिए।
उत्तर-
गैसों के अणुगति सिद्धान्त के अनुसार
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प्रश्न 8.
किस ताप पर किसी गैस के अणुओं की माध्य गतिज ऊर्जा 27°C ताप पर गतिज ऊर्जा की 1/3 होगी?
हल-
चूँकि
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प्रश्न 9.
किसी गैस के परमताप को चार गुना बढ़ा दिया गया। इसके अणुओं के वर्ग-माध्य-मूल वेग में क्या परिवर्तन होगा?
उत्तर-
∴ νrms ∝ √t; यदि परमताप को 4 गुना बढ़ा देने से वर्ग-माध्य-मूल वेग √4 गुना अर्थात् 2 गुना बढ़ जायेगा।

प्रश्न 10.
किसी गैस में ध्वनि की चाल तथा उसकी गैस के अणुओं की वर्ग-माध्य-मूल चाल (νrms) में सम्बन्ध का सूत्र लिखिए।
उत्तर-
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लनु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अणुगति सिद्धान्त के आधार पर बॉयल तथा चाल्र्स के नियमों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
बॉयल के नियम की व्याख्या-अणुगति सिद्धान्त से एक निश्चित द्रव्यमान की गैस द्वारा आरोपित दाब
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प्रश्न 2.
किसी गैस को सम्पीडित करने में किये गये कार्य को समझाइए।
उत्तर-
गैस को सम्पीडित करने में किया गया कार्य-माना एक आदर्श गैस एक पिस्टन लगे सिलिण्डर में भरी है, गैस का दाब P, आयतन V तथा ताप T है, जब गैस को सम्पीडित किया जाता है, तो उसके लिए μ मोलों के लिए आदर्श गैस समीकरण । PV = μT से,[latex s=2]\frac { PV }{ T }[/latex] = μR का मान नियत रहता है। गैस को सम्पीडित करने में गैस पर कुछ कार्य करना पड़ता है। यदि P दाब पर गैस का आयतन dV कम हो जाये, तो गैस पर कृत कार्य,
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dw = PdV
गैस का आयतन V1 से V2 तक सम्पीडित करने में गैस पर किया गया कार्य
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कृत कार्य का मान गैस को सम्पीडित करने के प्रक्रम पर भी निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, समदाबी, समतापी व रुद्धोष्म प्रक्रमों में कृत कार्य भिन्न-भिन्न होते हैं। यदि गैस वास्तविक है, तो गैस को सम्पीडित करने में अन्तरआण्विक बलों के विरुद्ध भी कार्य करना पड़ता है।

प्रश्न 3.
अन्तरिक्ष के किसी क्षेत्र में प्रति घन सेमी में औसतन केवल 5 अणु हैं तथा वहाँ ताप 3 है। उस क्षेत्र में गैस का दाब क्या है? बोल्ट्ज मैन नियतांक R= 1.38 x 10-23 जूल/K
हल-
यदि गैस के किसी द्रव्यमान में n अणु हों तब गैस के इस द्रव्यमान के लिए निम्नलिखित समीकरण होगी
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प्रश्न 4.
एक बर्तन में भरी गैस का ताप 400 Kहै और दाब 2.78 x 10-3 न्यूटन/भी2 है। बर्तन के 1 सेमी3 आयतन में अणुओं की संख्या ज्ञात कीजिए। बोल्ट्जमैन नियतांक K = 1.38 x 10-23 जूल/केल्विन।
हल-
आदर्श गैस समीकरण PV = nKBT से,
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प्रश्न 5.
वायु से भरे हुए एक कमरे का आयतन 41.4 मी3 है। वायु का ताप 27°C तथा दाब 1.0 x 105 न्यूटन/मी2 है। वायु के कुल अणुओं की संख्या ज्ञात कीजिए।
हल-
आदर्श गैस समीकरण PV = nKBT से,
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प्रश्न 6.
क्रान्तिक ताप के आधार पर वाष्प तथा गैस में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
वाष्प तथा गैस दोनों ही किसी पदार्थ की गैसीय अवस्था के दो नाम हैं। इनमें अन्तर यह है कि जो पदार्थ साधारण ताप व दाब पर द्रव या ठोस अवस्था में होते हैं उनके गैसीय अवस्था में आ जाने पर उनको वाष्प कहते हैं; जैसे—कपूर की वाष्प, जलवाष्प आदि। परन्तु जो पदार्थ साधारण ताप व दाब पर ही गैसीयं अवस्था में होते हैं, वे गैस कहलाते हैं। उदाहरणार्थ-वायु, ऑक्सीजन आदि। गैस को दाब डालकर द्रवित करने के लिए पहले उसे क्रान्तिक ताप तक ठण्डा करना पड़ता है, परन्तु वाष्प को केवल दाब डालकर ही द्रवित किया जा सकता है। अतः क्रान्तिक ताप से ऊपर पदार्थ गैस तथा नीचे वाष्प की भाँति व्यवहार करता है।

प्रश्न 7.
दिखाइए कि गैस के अणुओं का वर्ग-माध्य-मूल वेग गैस के परमताप के वर्गमूल के अनुक्रमानुपाती होता है।
हल-
गैस के अणुओं के वेगों के वर्गों का माध्य का वर्गमूल, गैस के अणुओं का वर्ग-माध्य-मूल वेग कहलाता है। उसे νrms से प्रदर्शित करते हैं।
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अत: किसी गैस के अणुओं का वर्ग-माध्य-मूल वेग गैस के परमताप के वर्गमूल के अनुक्रमानुपाती होता है।

प्रश्न 8.
27°C पर ऑक्सीजन (आणविक भार = 32) के लिए अणुओं का वर्ग-माध्य-मूल वेग तथा 4 ग्राम गैस की गतिज ऊर्जा भी ज्ञात कीजिए। (गैस नियतांक R = 8.31 जूल/मोल-K)
हल-
T = 27°C = 27 + 273 = 300 K, M = 32
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प्रश्न 9.
किसी गैस का प्रारम्भिक ताप – 73°c है। इसे किस ताप तक गर्म करना चाहिए जिससे
(i) गैस के अणुओं का वर्ग-माध्य-मूल वेग दोगुना हो जाये?
(ii) अणुओं की औसत गतिज ऊर्जा दोगुनी हो जाए?
हल-
प्रारम्भिक परमताप T1 = (-73 + 273) K = 200 K; माना इसको t2°C तक गर्म किया जाना चाहिए जिसका संगत परमताप T2K.
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प्रश्न 10.
यदि किसी गैस का ताप 127°C से बढ़ाकर 527°C कर दिया जाये तो उसके अणुओं का वर्ग-माध्य-मूल वेग कितना हो जायेगा?
हल-
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प्रश्न 11.
किस ताप पर ऑक्सीजन के अणुओं का औसत वेग पृथ्वी से पलायन कर जाने के लिए पर्याप्त होगा? पृथ्वी का पलायन वेग = 11.2 किमी/से, ऑक्सीजन के एक अणु का द्रव्यमान = 5.34 x 10-26 किग्रा, बोल्ट्जमैन नियतांक K = 1.38 x 10-23 जूल/K
हल-
माना ऑक्सीजन के एक अणु का द्रव्यमान m है। अणु की पलायन ऊर्जा [latex s=2]\frac { 1 }{ 2 } m{ { v }_{ e } }^{ 2 }[/latex] होगी, जहाँ vपृथ्वी से पलायन करने का वेग है।
अणुगति सिद्धान्त के अनुसार, TK ताप पर एक अणु की माध्य गतिज ऊर्जा [latex s=2]E=\frac { 3 }{ 2 } K{ _{ B } }T[/latex] होती है, जहाँ KB बोल्ट्जमैन नियतांक है।

प्रश्न 12.
4.0 ग्राम ऑक्सीजन गैस की 27°C ताप पर कुल आन्तरिक ऊर्जा की गणना कीजिए। (ऑक्सीजन गैस की स्वातन्त्रय कोटियों की संख्या 5 तथा गैस नियतांक R = 2.0 कैलोरी/मोल-केल्विन है)
हल-
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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आदर्श गैस समीकरण PV = RT स्थापित कीजिए तथा R का विमीय सूत्र एवं मात्रक ज्ञात कीजिए।
आदर्श गैस के अवस्था समीकरण की सहायता से गैस नियतांक (R) का विमीय-सूत्र ज्ञात कीजिए।
उत्तर-
आदर्श गैस समीकरण—किसी आदर्श गैस के निश्चित द्रव्यमान के आयतने, ताप व दाब में सम्बन्ध बतलाने वाले समीकरण को आदर्श गैस समीकरण अथवा आदर्श गैस का अवस्था समीकरण (equation of state) कहते हैं।
माना आदर्श गैस की प्रारम्भिक अवस्था में इसके निश्चित द्रव्यमान के दाब, आयतन व ताप क्रमशः P1 V1 तथा T1 हैं। किसी अन्य अवस्था में इनके मान बदलकर माना P2, V2 तथा T2 हो जाते हैं। गैस की अवस्था में होने वाले इस परिवर्तन को निम्न दो पदों में पूर्ण हुआ माना जा सकता है|
(i) ताप नियत रखते हुए यदि ताप T1 स्थिर रखते हुए दाब P1 से बदलकर P2 कर दिया जाए। तथा आयतन V1 से बदलकर V’ हो जाए तो बॉयल के नियम से
P1V1 = P2V’
अथवा V’= P1V1/P2 …(1)
(ii) दाब नियत रखते हुए-यदि दाब P2 नियत रखते हुए परमताप T1 से बदलकर T2 कर दिया जाये तो आयतन V’ से बदलकर V2 हो जायेगा। अत: चार्ल्स के नियम के अनुसार,
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 13 Kinetic Theory 47
यही गैस समीकरण है। नियतांक । को विशिष्ट गैस नियतांक (specific gas constant) कहते हैं। इसका मान गैस की प्रकृति तथा द्रव्यमान पर निर्भर करता है, अर्थात् भिन्न-भिन्न गैसों के एक ही द्रव्यमान के लिए अथवा एक ही गैस के भिन्न-भिन्न द्रव्यमानों के लिए इसका मान भिन्न-भिन्न होता है। यदि हम एक ग्राम-अणु अर्थात् 1मोल गैस लें तो गैस-नियतांकr का मान सभी गैसों के लिए बराबर होगा। तब इसको सार्वत्रिक-गैस-नियतांक (universal gas constant) कहते हैं तथा । इसे R से व्यक्त करते हैं।
अतः 1 मोल अर्थात् 1 ग्राम-अणु गैस के लिए समीकरण (3) को नया रूप निम्नलिखित होगा
PV = RT …(4)
समीकरण (4) गैस-नियमों के आधार पर प्राप्त की गयी है। चूंकि गैस के नियम एक आदर्श गैस के लिए पूर्णत: सत्य हैं; अतः समीकरण PV = RT भी एक आदर्श गैस के 1 ग्राम मोल के लिए पूर्णतः सत्य होगी। अतः इसको आदर्श गैस समीकरण कहते हैं। R का विमीय सूत्र तथा मात्रक,
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 13 Kinetic Theory 48

प्रश्न 2.
गैस के अणुगति सिद्धान्त की परिकल्पनाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
गैस के अणुगति सिद्धान्त की परिकल्पनाएँ-गैसों का अणुगति सिद्धान्त निम्नलिखित परिकल्पनाओं पर आधारित है–
1. प्रत्येक गैस छोटे-छोटे कणों से मिलकर बनी होती है जिन्हें अणु कहते हैं।
2. किसी गैस के अणु दृढ़, पूर्णतः प्रत्यास्थ (perfectly elastic), गोलाकार व सभी प्रकार से एकसमान होते हैं।
3. अणुओं का आकार अत्तराणुक अन्तराल की तुलना में नगण्य होता है। अतः अणुओं का अपना आयतन गैस के आयतचे की तुलना में नगण्य होता है।
4. साधारणत: अणुओं के बीच किसी प्रकार का बल नहीं लगता; अत: ये नियत चाल से ऋजु-रेखीय पथों पर गति करते हैं। परन्तु जब दो अणु एक-दूसरे के अत्यन्त निकट आ जाते हैं तो उनके बीच प्रतिकर्षण बल कार्य करने लगता है जिससे उनकी चाल तथा गति की दिशा बदल जाती है। फलस्वरूप, अणु नये सरल रेखीय पथ पर गति प्रारम्भ करते हैं। इस घटना को दो अणुओं के बीच ‘टक्कर’ (collision) कहते हैं। अत: दो क्रमागत टक्करों के बीच गैस के अणु सरल रेखा में गति करते हैं। दो क्रमागत टक्करों के बीच गैस के अणु द्वारा तय की गयी औसत दूरी को ‘औसत मुक्त पथ’ (mean free path) कहते हैं। इस प्रकार अणु सभी सम्भव वेग से सभी सम्भव दिशाओं में अनियमित गति करते हैं।
5. ये अणु बर्तन की दीवारों से टकराते हैं किन्तु इन टक्करों से गैस का आयतन नहीं बदलता अर्थात् गैस के प्रति एकांक आयतन में अणुओं की संख्या स्थिर रहती है।
6. दो अणुओं की टक्कर पूर्णतः प्रत्यास्थ होती है। टक्कर के समय उनके मध्य आकर्षण या प्रतिकर्षण बल नहीं लगता जिससे टक्कर में गतिज ऊर्जा संरक्षित रहती है।
7. दो अणुओं की टक्कर क्षणिक होती है अर्थात् टक्कर का समय उनके द्वारा स्वतन्त्रतापूर्वक चलने | में लिए गये समय की तुलना में नगण्य होता है।
8. अणुओं की गति पर गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव को नगण्य माना जा सकता है। अतः गुरुत्वाकर्षण बल के कारण भी अणुओं के वितरण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

प्रश्न 3.
आदर्श गैस समीकरण लिखिए। वास्तविक गैसों के लिए वाण्डर वाल्स के संशोधनों को समझाइए तथा इससे संशोधित गैस समीकरण प्राप्त कीजिए।
उत्तर-
आदर्श गैस समीकरण-1 मोल गैस के लिए आदर्श गैस समीकरण है PV = RT, जहाँ P = दाब,V = आयतन, R = गैस नियतांक तथा T = परमताप है।
वाण्डर वाल्स गैस समीकरण-बॉयल के नियमानुसार, स्थिर ताप पर गैस के एक निश्चित द्रव्यमान के लिए दाब (P) व्र आयतन (V) का गुणनफल PV एक नियतांक होता है। प्रयोगों द्वारा देखा गया है। कि कोई भी वास्तविक गैस इस नियम का पूर्णतः पालन नहीं करती। उच्च दाबों तथा निम्न तापों पर गैस बॉयल के नियम से बहुत अधिक विचलित हो जाती है। अतः वाण्डर वाल्स ने वास्तविक गैसों के इस व्यवहार की व्याख्या करने के लिए आदर्श मॉडल में निम्न लिखित दो संशोधन किये
1. अणुओं का अशून्य आकार (Finite size of molecules)–आदर्श गैस समीकरण PV = RT को प्राप्त करने में यह माना गया था कि गैस के अणुओं का आयतन, गैस के आयतन V की तुलना में नगण्य है तथा गैस का सम्पूर्ण आयतन अणुओं की गति के लिए उपलब्ध है। परन्तु सभी अणुओं का आयतन कुछ स्थान घेरता है जिससे आदर्श गैस के आयतन का प्रभावी आयतन (V – b) होगा, जहाँ । एक नियतांक है। अत: हम आदर्श गैस समीकरण PV = RT में v के स्थान पर (V – b) रखेंगे।
2. अन्तरा-अणुक बल (Inter-molecular force)–आदर्श गैस मॉडल में यह भी माना गया था कि गैस के अणुओं के मध्ये कोई बल आरोपित नहीं होता। यह मान्यता वास्तविक गैसों पर लागू नहीं होती है। गैस का प्रत्येक अणु दूसरे अणु पर बल लगाता है जिसे अन्तर आणविक बल कहते हैं। साधारण दाबों पर गैस के अणु बहुत दूर-दूर होते हैं; अत: उनके बीच अन्तर आणविक बल लगभग शून्य होता है। दाब बढ़ने के साथ-साथ अणु भी पास-पास आ जाते हैं और वे एक-दूसरे को आकर्षित करने लगते हैं। बर्तन के मध्य स्थित अणु (जैसे P) पर चारों ओर से आकर्षण बल कार्य करते हैं; अत: उस पर कोई प्रभावी बल नहीं लगता। जो अणु दीवार के पास होता है उस पर एक बल अन्दर की ओर लगता है, जिससे दीवार के टकराते समय उसके संवेग में कुछ कमी आ जाती है। अतः अणु द्वारा दीवार पर आरोपित बल आदर्श गैस मॉडल में प्राप्त बल से कम होता है। इसके फलस्वरूप दीवार पर वास्तविक गैस का दाब, आदर्श गैस के दाब से कम होता है। यदि यह कमी β है तो आदर्श गैस समीकरण में P के स्थान पर (P + β) रखेंगे। β का मान दीवार के समीप अंणु को आकर्षित करने वाले अणुओं की प्रति एकांक आयतन में संख्या पर तथा दीवार के प्रति एकांक क्षेत्रफल पर प्रति सेकण्ड टकराने वाले अणुओं की संख्या पर निर्भर करता है। ये दोनों ही गैस के घनत्व के अनुक्रमानुपाती होते हैं।
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प्रश्न 4.
गैसों के अणु गतिज सिद्धान्त के आधार पर किसी आदर्श गैस के दाब का सूत्र लिखिए और इसके आधार पर बॉयल के नियम की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
गैसों के गतिज सिद्धान्त के आधार पर किसी आदर्श गैस का दाब सूत्र निम्नवत् है
[latex s=2]P=\frac { 1 }{ 3 } e{ v }^{ 2 }[/latex]
बॉयल का नियम इस नियम के अनुसार, नियत ताप पर किसी गैस के एक निश्चित द्रव्यमान का आयतन V उसके दाब P के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
[latex s=2]V=\propto \frac { 1 }{ P } [/latex]
PV = नियतांक …(1)
इस प्रकार, यदि हम किसी गैस के ताप को नियत रखते हुए उसके दाब को दोगुना कर दें तो उसका आयतन आधा रह जायेगा अथवा दाब को आधा कर देने पर आयतन दोगुना हो जायेगा।
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 13 Kinetic Theory 50
व्यापक रूप में, नियत ताप पर किसी दिये गये द्रव्यमान की गैस के प्रारम्भिक दाब व आयतन P1 व V1 हों तथा अन्तिम दाब व आयतन P2 व V2 हों, तो बॉयल के नियम से, P1V1 = P2V2, चित्र 13.7 में किसी गैस के लिए विभिन्न नियत तापों T1, T2, व T3 (T1 > T2 > T3) पर P तथा v के बीच प्रायोगिक वक्र तथा सैद्धान्तिक वक्र तुलना के लिए साथ-साथ दर्शाये गये हैं। बिन्दुकित वक्र समीकरण (1) के आधार पर खींचे गये हैं जो सैद्धान्तिक वक्र दर्शाते हैं, जबकि चिकने (smooth line) वक्र प्रायोगिक रूप से P तथा V के प्राप्त मानों के आधार पर खींचे गये हैं। इनसे यह स्पष्ट है कि निम्न दाब तथा उच्च ताप पर सैद्धान्तिक तथा प्रायोगिक वक्रों में संगति स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है, परन्तु उच्च दाबों तथा निम्न तापों पर उनमें बहुत अधिक विचलन पाया जाता है। इसका कारण यह है कि निम्न दाबों तथा उच्च तापों पर गैस के अणु दूर-दूर होते हैं और उनके बीच अन्तरआणविक बल उपेक्षणीय होते हैं। अन्तरआणविक बलों की अनुपस्थिति में गैस आदर्श गैस की तरह व्यवहार करती है। इस प्रकार, दाब व ताप की सभी अवस्थाओं में गैसें बॉयल के नियम का पूर्ण रूप से पालन नहीं करती , हैं, केवल निम्न दाब तथा उच्च ताप पर ही वे ऐसा करती हैं।

प्रश्न 5.
गैसों के अणुगति सिद्धान्त के आधार पर किसी आदर्श गैस के दाब का व्यंजक लिखिए तथा इसकी सहायता से अणुओं की गतिज ऊर्जा तथा गैस के ताप में सम्बन्ध स्थापित कीजिए।
उत्तर-
दाब
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आणविक गतिज ऊर्जा एवं ताप में सम्बन्ध–माना किसी गैस के 1 ग्राम-अणु (1 मोल) का द्रव्यमान अर्थात् अणुभार M तथा इसके अणुओं का वेग-वर्ग-माध्य [latex s=2]{ \overline { v } }^{ 2 }[/latex] है तो 1 ग्राम-अणु गैस की गतिज ऊर्जा
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अर्थात् औसत गतिज ऊर्जा प्रारम्भिक औसत गतिज ऊर्जा की दोगुनी हो जायेगी।

प्रश्न 6.
माध्य-मुक्त पथ के लिए व्यंजक का निगमन कीजिए।
उत्तर-
माध्य-मुक्त पथ के लिए व्यंजक-माना कि किसी बर्तन में एक अणु के अतिरिक्त अन्य सभी अणु स्थिर हैं। माना कि प्रत्येक अणु d व्यास का गोला है। गतिशील अणु उन सभी अणुओं से टकरायेगा जिनके केन्द्र इसके केन्द्र से d दूरी पर स्थित होंगे [चित्र-13.8 (a)]।
UP Board Solutions for Class 11 Physics Chapter 13 Kinetic Theory 53
माना कि एक बर्तन में गैस भरी है तथा उसके प्रति एकांक आयतन में n अणु हैं। प्रत्येक अणु का व्यास d है। माना इस गैस का केवल एक अणु ७ वेग से गतिमान है तथा शेष सभी अणु स्थिर हैं। गतिमान अणु उन सभी अणुओं से टकरायेगा जिनके केन्द्र इसके केन्द्र से d दूरी पर हैं [चित्र 13.8 (b)]। ∆t समय में इस अणु द्वारा चली दूरी = v ∆t. अतः ∆t समय में यह अणु उन सभी अणुओं से टकराएगा जो d त्रिज्या तथा ) v ∆t लम्बाई के सिलिण्डर में हैं।
सिलिण्डर का आयतन = πd²v∆t
सिलिण्डर में अणुओं की संख्या = (πd²v∆t) x n
यह गतिशील अणु द्वारा ∆t समय में अन्य अणुओं से टक्करों की संख्या है। गतिशील अणु ∆t समय में v∆t दूरी तय करता है। अतः अणु का ।
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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य गरिमा Chapter 5 शिक्षा का उद्देश्य

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 5
Chapter Name शिक्षा का उद्देश्य (डॉ० सम्पूर्णानन्द)
Number of Questions 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य गरिमा Chapter 5 शिक्षा का उद्देश्य (डॉ० सम्पूर्णानन्द)

लेखक का साहित्यिक परिचय और भाषा-शैली

प्रश्न:
डॉ० सम्पूर्णानन्द का जीवन-परिचय लिखते हुए उनकी कृतियाँ भी लिखिए तथा भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
या
डॉ० सम्पूर्णानन्द का साहित्यिक परिचय दीजिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय: डॉ० सम्पूर्णानन्द राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संग्राम के प्रथम पंक्ति के सेनानी, प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री, कुशल राजनीतिज्ञ, भारतीय दर्शन और संस्कृति के उद्भट विद्वान् एवं हिन्दी-साहित्य के महान्
साहित्यकार थे। ये गम्भीर विचारक और प्रौढ़ लेखक थे।

डॉ० सम्पूर्णानन्द का जन्म सन् 1890 ई० में काशी के एक सम्भ्रान्त कायस्थ परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम विजयानन्द थी। इन्होंने वाराणसी से बी० एस-सी० तथा इलाहाबाद से एल० टी० की परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। इन्होंने सर्वप्रथम प्रेम विद्यालय, वृन्दावन में अध्यापक तथा बाद में डूंगर कॉलेज, डूंगर में प्रधानाचार्य के पद पर कार्य किया। सन् 1921 ई० में ये राष्ट्रीय आन्दोलन से प्रेरित होकर काशी में ‘ज्ञानमण्डल’ में कार्य करने लगे। इन्होंने हिन्दी की ‘मर्यादा’ मासिक पत्रिका तथा ‘टुडे’ अंग्रेजी दैनिक का सम्पादन किया और काशी नागरी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष तथा संरक्षक भी रहे। वाराणसी में स्थित सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय इनकी ही देन है।

डॉ० सम्पूर्णानन्द सन् 1937 ई० में कांग्रेस मन्त्रिमण्डल में शिक्षामन्त्री, सन् 1955 ई० में उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री तथा सन् 1962 ई० में राजस्थान के राज्यपाल नियुक्त हुए। राज्यपाल के पद से सेवामुक्त होकर आप काशी विद्यापीठ के कुलपति बने और अन्तिम समय तक इसी पद पर कार्यरत रहे। 10 जनवरी, 1969 ई० को काशी में इनका स्वर्गवास हो गया।

साहित्यिक सेवाएँ:
डॉ० सम्पूर्णानन्द भारतीय दर्शन और संस्कृति के प्रकाण्ड विद्वान् एवं हिन्दी व संस्कृत के महान् ज्ञाता थे। इनका हिन्दी से विशेष प्रेम था। इन्होंने भारतीय दर्शन एवं धर्म के गूढ़ तत्त्वों को समझकर सुबोध शैली में उच्चकोटि के लेख लिखे। ये समाजवादी विचारधारा से प्रभावित थे। इन्होंने भारतीय दर्शन, धर्म, संस्कृति, राजनीति, इतिहास, ज्योतिष आदि विविध विषयों पर उच्चकोटि के निबन्ध लिखे और उत्कृष्टं साहित्य का सृजन किया। इनकी रचनाओं में इनके प्रकाण्ड पाण्डित्य के दर्शन होते हैं। इन्होंने दर्शन की गूढ़ गुत्थियों को सुलझाते हुए ‘चिद्विलास’ नामक ग्रन्थ की रचना की। इनकी कृतियों में शिक्षा सम्बन्धी मौलिक चिन्तन तथा शिक्षा-जगत् की गम्भीर समस्याओं का समाधान पाया जाता है।

रचनाएँ:
डॉ० सम्पूर्णानन्द ने साहित्य, दर्शन, राजनीति, इतिहास तथा अन्य विषयों पर उच्चकोटि के ग्रन्थों की। रचना की। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-

(1) निबन्ध-संग्रह-भाषा की शक्ति तथा पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित अनेक फुटकर निबन्ध।
(2) दर्शन – चिद्विलास, जीवन और देर्शन।
(3) जीवनी – देशबन्धु चित्तरंजनदास, महात्मा गांधी आदि।
(4) राजनीति और इतिहास – चीन की राज्यक्रान्ति, अन्तर्राष्ट्रीय विधान, मिस्र की राज्यक्रान्ति, समाजवाद, आर्यों का आदिदेश, सम्राट हर्षवर्धन, भारत के देशी राज्य आदि।
(5) धर्म – गणेश, नासदीय-सूक्त की टीका, पुरुष-सूक्त, ब्राह्मण सावधान।
(6) ज्योतिष – पृथ्वी से सप्तर्षि मण्डल।
(7) सम्पादन – मर्यादा’ मासिक, टुडे’ अंग्रेजी दैनिक।
(8) अन्य प्रमुख रचनाएँ – इन रचनाओं के अतिरिक्त व्रात्यकाण्ड, भारतीय सृष्टि-क्रेम विचार, हिन्दू देव परिवार का विकास, वेदार्थ प्रवेशिका, अन्तरिक्ष यात्रा, स्फुट विचार, ज्योतिर्विनोद, अधूरी क्रान्ति आदि इनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ हैं।
इन्होंने विविध विषयों पर लगभग 25 ग्रन्थों की तथा अनेक स्वतन्त्र लेखों की रचना की। इनकी ‘समाजवाद नामक कृति पर इन्हें हिन्दी-साहित्य सम्मेलन द्वारा मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्रदान किया गया।

भाषा और शैली

(अ) भाषागत विशेषताएँ
डॉ० सम्पूर्णानन्द हिन्दी और संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे। इनकी रचनाओं में गम्भीर चिन्तन पाया जाता है। इनकी भाषा भी गम्भीर और प्रौढ़ है। भाषा में संस्कृत के शुद्ध तत्सम शब्दों का प्रयोग हुआ है। सामान्य रूप से उर्दू-फारसी के शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया है। संस्कृत के तत्सम शब्दों की बहुलता होने पर भी भाषा में प्रवाह, प्रांजलता, स्पष्टता और बोधगम्यता के गुण पाये जाते हैं। मुहावरों का प्रायः अभाव पाया जाता है, परन्तु कहीं-कहीं सामान्य मुहावरों; जैसे-‘गम गलत करना’, ‘धर्मसंकट में पड़ना आदि का प्रयोग किया गया है।

(ब) शैलीगत विशेषताएँ
डॉ० सम्पूर्णानन्द गम्भीर विचारक और प्रौढ़ लेखक थे। इनके गम्भीर स्वभाव, व्यक्तित्व और प्रकाण्ड पाण्डित्य की स्पष्ट छाप इनकी शैली पर है। इन्होंने हिन्दी भाषा और शैली को नयी दिशा प्रदान की है। विषयानुरूप परिवर्तित होती रहने वाली इनकी शैली की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

(1) विचारात्मक शैली – डॉ० सम्पूर्णानन्द का व्यक्तित्व गम्भीर और चिन्तनशील है। इनके दार्शनिक ग्रन्थों और निबन्धों में गम्भीर विचारात्मक शैली के दर्शन होते हैं। इस शैली में मौलिक चिन्तन, प्रवाह और ओज विद्यमान है।
(2) गवेषणात्मक शैली – सम्पूर्णानन्द जी ने नवीन विषयों की खोज और मौलिक चिन्तन सम्बन्धी निबन्धों तथा धर्म, दर्शन और समीक्षात्मक विषयों में गवेषणात्मक शैली अपनायी है। इस शैली की भाषा में दुरूहता के साथ-साथ लेखक के गम्भीर और चिन्तनशील व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं। इस शैली में ओज की प्रधानता है।
(3) व्याख्यात्मक शैली – सम्पूर्णानन्द जी ने दार्शनिक विषयों को स्पष्ट करने के लिए व्याख्यात्मक शैली का प्रयोग किया है। इसमें भाषा सरल, संयत और वाक्य छोटे हैं। इसमें उदाहरण देकर विषय को सरलता से समझाने का प्रयत्न किया गया है।
(4) ओजपूर्ण शैली – यह शैली सामान्य विषयों पर लिखे गये निबन्धों में अपनायी गयी है। इस शैली में ओज गुण पाया जाता है। वाक्यों का गठन सुन्दर और भाषा व्यावहारिक है।
उपर्युक्त शैली के अतिरिक्त इनकी रचनाओं में सूक्ति-कथन, उद्धरण शैली और आलंकारिक शैली के भी दर्शन होते हैं।
साहित्य में स्थान – डॉ० सम्पूर्णानन्द ने हिन्दी में गम्भीर विषयों पर निबन्धों और ग्रन्थों की रचना की। उनकी रचनाओं में मौलिक चिन्तन, गम्भीरता और उच्च स्तर का पाण्डित्य पाया जाता है। सम्पादन के क्षेत्र में भी इन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया है। एक मनीषी साहित्यकार के रूप में हिन्दी-साहित्य में उनका महत्त्वपूर्ण स्थान सदा बना रहेगा।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न – दिए गए गद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1:
पुरुषार्थ दार्शनिक विषय है, पर दर्शन का जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है। वह थोड़े-से विद्यार्थियों का पाठ्य विषय मात्र नहीं है। प्रत्येक समाज को एक दार्शनिक मत स्वीकार करना होगा। उसी के आधार पर उसकी राजनैतिक, सामाजिक और कौटुम्बिक व्यवस्था का व्यूह खड़ा होगा। जो समाज अपने वैयक्तिक और सामूहिक जीवन को केवल प्रतीयमान उपयोगिता के आधार पर चलाना चाहेगा उसको बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। एक विभाग के आदर्श दूसरे विभाग के आदर्श से टकरायेंगे। जो बात एक क्षेत्र में ठीक हुँचेगी वही दूसरे क्षेत्र में अनुचित कहलायेगी और मनुष्य के लिए अपना कर्तव्य स्थिर करना कठिन हो जायेगा। इसका तमाशा आज दीख पड़ रहा है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) किसके आधार पर राजनैतिक, सामाजिक और कौटुम्बिक व्यवस्था का व्यूह खड़ा होगा?
(iv) किस समाज को बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा?
(v) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक ने क्या प्रेरणा दी है?
उत्तर:
(i) प्रस्तुत गद्यावतरण भारतीय दर्शन और संस्कृति के प्रकाण्ड विद्वान्, प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री एवं महान् साहित्यकार डॉ० सम्पूर्णानन्द द्वारा लिखित हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित ‘शिक्षा का उद्देश्य’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिखिए-
पाठ का नाम – शिक्षा का उद्देश्य।
लेखक का नाम-डॉ० सम्पूर्णानन्द।
[संकेत-इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – लेखक का विचार है कि मानव-जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य पुरुषार्थ की प्राप्ति है। पुरुषार्थ चार माने गये हैं-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इनमें सबसे बड़ा पुरुषार्थ मोक्ष है; अतः मानव-जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति करना है। पुरुषार्थ का सम्बन्ध दर्शन से है और दर्शन का जीवन से गहरा सम्बन्ध है। जीवन से सम्बन्ध रखने वाला दर्शन थोड़े-से विद्यार्थियों द्वारा पढ़ने
योग्य विषय नहीं है, अपितु वह जीवन की प्रत्येक विचारधारा का नाम है।
(iii) दार्शनिक मत के आधार पर राजनैतिक, सामाजिक और कौटुम्बिक व्यवस्था का व्यूह खड़ा होगा।
(iv) जो समाज अपने वैयक्तिक और सामूहिक जीवन को केवल प्रतीयमान उपयोगिता के आधार पर चलाना चाहेगा उसको बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।
(v) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक ने मानव-जीवन के पुरुषार्थ को जानने से पहले, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में एक व्यापक दार्शनिक मत स्वीकार करने की प्रेरणा दी है।

प्रश्न 2:
आत्मसाक्षात्कार का मुख्य साधन योगाभ्यास है। योगाभ्यास सिखाने का प्रबन्ध राज्य नहीं कर सकता, न. पाठशाला का अध्यापक ही इसका दायित्व ले सकता है। जो इस विद्या का खीजी होगा वह अपने लिए गुरु ढूंढ़ लेगा। परन्तु इतना किया जा सकता है-और यही समाज और अध्यापक का कर्तव्य है कि व्यक्ति के अधिकारी बनने में सहायता दी जाय, अनुकूल वातावरण उत्पन्न किया जाय।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) आत्मसाक्षात्कार का मुख्य साधन किसे बताया गया है?
(iv) समाज और अध्यापक का क्या कर्तव्य है?
(v) योगाभ्यास का खोजी किसे हूँढ़ लेगा?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – इन पंक्तियों में लेखक ने स्पष्ट किया है कि शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य छात्रों को आत्म-साक्षात्कार के योग्य बनाना होता है। यहाँ पर आत्म-साक्षात्कार से तात्पर्य है कि छात्रों को अपने ज्ञानमयस्वरूप का सही ज्ञान हो जाए। उसे अपने स्वरूप की पहचान आवश्यक है और इसके लिए योगाभ्यास मुख्य साधन है। योगाभ्यास व्यक्ति को स्वयं करना पड़ता है; अर्थात् इसके लिए उसे स्वयं परिश्रम करना पड़ता है। इसे सिखाने का प्रबन्ध कोई विद्यालय, शिक्षक, समाज अथवा राज्य सरकार नहीं कर सकती; क्योंकि यह बाजार में बिकने वाला भौतिक साधन नहीं है। योगाभ्यास सीखने के लिए तो व्यक्ति के मन में लगन होनी चाहिए। यदि व्यक्ति के मन में सीखने की लगन है तो योग की बारीकियों को बताने वाले गुरु की कमी कभी भी बाधा नहीं बनेगी। कहने का तात्पर्य यह है कि जब व्यक्ति में लगन होती है तो वह अपने लिए आवश्यक साधनों को स्वयं ढूंढ़ निकालता है।
(iii) आत्मसाक्षात्कार का मुख्य साधन योगाभ्यास को बताया गया है।
(iv) समाज और अध्यापक का कर्तव्य है कि व्यक्ति के अधिकारी बनने में सहायता दी जाए तथा अनुकूल वातावरण भी तैयार किया जाए।
(v) योगाभ्यास का खोजी अपने लिए गुरु ढूंढ़ लेगा।

प्रश्न 3:
यह आदर्श बहुत ऊँचा है, पर अध्यापक का पद भी कम ऊँचा नहीं है। जो वेतन का लोलुप है और वेतन की मात्रा के अनुसार ही काम करना चाहता है, उसके लिए इसमें जगह नहीं है। अध्यापक की जो कर्तव्य है उसका मूल्य रुपयों में नहीं आँका जा सकता। किसी समय जो शिक्षक होता-था, वही धर्म-गुरु
और पुरोहित भी होता था और जो बड़ा विद्वान् और तपस्वी होता था, वही इस भार को उठाया करता था। शिष्य को ब्रह्म विद्या का पात्र और यजमान को दिव्यलोकों का अधिकारी बनाना सबका काम नहीं है। आज न वह धर्म-गुरु रहे न पुरोहित। पर क्या हम शिक्षक भी इसीलिए कर्तव्यच्युत हो जायें? हमको अपने सामने वही आदर्श रखना चाहिए और अपने को उस दायित्व का बोझ उठाने योग्य बनाने का निरन्तर अथक प्रयत्न करना चाहिए।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कैसे व्यक्ति को अध्यापक बनने का कोई अधिकार नहीं है?
(iv) पहले के समय में शिक्षक का पदभार कौन धारण करता था?
(v) शिंष्य को किसका पात्र बनाना सबके बस की बात नहीं है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – लेखक वर्तमान व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए कहता है कि आज वैसे तपस्वी नहीं रहे, जो निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर सकें, किन्तु इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि आज के शिक्षक अपने कर्तव्यों से मुख मोड़ लें। हम शिक्षकों को आज भी शिक्षक के प्राचीन आदर्श को अपने सामने रखकर ही अपने दायित्वों का निर्वाह करने का निरन्तर प्रयत्न करते रहना चाहिए।
(iii) ऐसे व्यक्ति को अध्यापक बनने का कोई अधिकार नहीं है जो वेतन का लोलुप है और वेतन के अनुसार ही काम करना चाहता है।
(iv) पहले के समय में जो शिक्षक होता था वही धर्मगुरु और पुरोहित भी होता था और जो विद्वान तथा तपस्वी होता था वही इस पदभार को धारण करता था।
(v) शिष्य को ब्रह्म विद्या का पात्र बनाना सबके बस की बात नहीं है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi गद्य गरिमा Chapter 4 आचरण की सभ्यता

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name आचरण की सभ्यता (सरदार पूर्णसिंह)
Number of Questions 4
Category UP Board Solutions

लेखक को साहित्यिक परिचय और भाषा-शैली

प्रश्न:
सरदार पूर्णसिंह का साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी भाषा-शैली की विशेषताओं पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
या
सरदार पूर्णसिंह का साहित्यिक परिचय दीजिए।
या
सरदार पूर्णसिंह का जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों तथा भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय: सरदार पूर्णसिंह हिन्दी-साहित्य में द्विवेदी युग के श्रेष्ठ निबन्धकारों में गिने जाते हैं। भावात्मक और लाक्षणिक शैली में केवल छ: निबन्धों की रचना करके ही ये हिन्दी-साहित्य जगत् में अमर हो गये। इनके निबन्ध इनकी मनोलहरी से जुड़े हुए हैं और ये सच्चे अर्थों में एक आत्म-व्यंजक निबन्धकार कहे जा सकते हैं।

अध्यापक पूर्णसिंह का जन्म सन् 1881 ई० में सीमा प्रान्त के एबटाबाद जिले के सलहडू नामक ग्राम में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। पिता के सरकारी नौकरी में रहने के कारण बालक पूर्णसिंह का बचपन धर्मपरायण । माता की सात्त्विकता की छाया में व्यतीत हुआ। इनकी आरम्भिक शिक्षा रावलपिण्डी में हुई और फिर इण्टरमीडिएट की परीक्षा लाहौर से उत्तीर्ण करके ये रसायनशास्त्र के विशेष अध्ययन के लिए जापान चले गये। वहाँ इन्होंने टोकियो की इम्पीरियल युनिवर्सिटी में रसायनशास्त्र का अध्ययन किया। वहाँ ‘विश्व धर्म सभा में भाग लेने पहुँचे स्वामी रामतीर्थ से भेंट होने पर संन्यास की दीक्षा लेकर ये भारत लौट आये।

भारत लौटने पर स्वामी जी की मृत्यु के पश्चात् इनके विचारों में परिवर्तन आये और इन्होंने विवाह करके गृहस्थ जीवन व्यतीत किया तथा देहरादून के इम्पीरियल फॉरेस्ट इंस्टीट्यूट में अध्यापक हो गये। कुछ समय उपरान्त वहाँ से नौकरी छोड़कर ग्वालियर चले गये और जीवन के अन्तिम दिनों में पंजाब में जड़ाँवाला ग्राम में खेतीबारी करने लगे। खेती में नुकसान होने से अर्थ-संकट से पीड़ित हो ये निरन्तर कष्ट उठाते रहे। अन्तत: मार्च सन् 1931 ई० में स्वतन्त्र व्यक्तित्व का यह साधु-साहित्यकार मात्र पचास वर्ष की आयु में ही देहरादून में दिवंगत हो गया।
साहित्यिक सेवाएँ – उत्कृष्ट निबन्धकार एवं शैलीकार अध्यापक पूर्णसिंह की मातृभाषा पंजाबी थी, फिर भी इन्होंने हिन्दी में श्रेष्ठ निबन्धों की रचना की। ये भारतीय संस्कृति, दर्शन और अध्यात्म से बहुत प्रभावित थे, जिसका प्रभाव इनके निबन्धों में भी स्पष्ट परिलक्षित होता है। इनके निबन्धों में नयी विचार-सामग्री, लाक्षणिकता और भावात्मकता पायी जाती है। इन्होंने मुख्य रूप से नैतिक विषयों पर निबन्धों की रचना की है। श्रम, सदाचार, समता, ममता और आत्मिक उन्नति इनके निबन्धों के विषय रहे हैं। ये निबन्ध सत्य, अहिंसा, सादगी और लोकमंगल की भावना से परिपूरित हैं। इन निबन्धों में भावों का आवेग, कल्पना की उड़ान और स्वच्छन्दतावादी प्रवृत्ति के दर्शन होते हैं। सच्चे मानव की खोज और सच्चे हृदय की तलाश करने वाले इस साहित्यकार ने अपनी निजी निबन्ध-शैली के कारण केवल छ: निबन्ध लिखकर ही हिन्दी-साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया। विचारों और भावों की अभिव्यक्ति के क्षेत्र में ये किसी सम्प्रदाय से बँधकर नहीं चले।।

रचनाएँ:
पूर्णसिंह जी के निबन्ध ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित होते रहे। इन्होंने केवल छ: निबन्धों की रचना की
(1) कन्यादान,
(2) मजदूरी और प्रेम,
(3) सच्ची वीरता,
(4) पवित्रता,
(5) आचरण की सभ्यता,
(6) अमेरिका का मस्त योगी वॉल्ट ह्विटमैन। इसके अतिरिक्त इन्होंने सिक्खों के दस गुरुओं और स्वामी रामतीर्थ की जीवनी अंग्रेजी में लिखी।

भाषा और शैली

(अ) भाषागत विशेषताएँ :
सरदार पूर्णसिंह जी ने अपने निबन्धों में प्रवाहमयी एवं लाक्षणिक शुद्ध साहित्यिक परिमार्जित खड़ी बोली का प्रयोग किया है। इन्होंने अपनी भाषा को शुद्ध और परिमार्जित रखने के लिए संस्कृत के तत्सम शब्दों तथा भाषा में सरलता, सरसता तथा सजीवता के लिए उर्दू, फारसी और अंग्रेजी की विदेशी शब्दावली का नि:संकोच प्रयोग किया है। इन्होंने कहावतों और मुहावरों को सुललित प्रयोग किया है। इनकी वाक्य-रचना सरल, व्यवस्थित और सुगठित है।

(ब) शैलीगत विशेषताएँ:
अध्यापक पूर्णसिंह जी के निबन्धों में विचारों और भावों की गतिशीलता मिलती है। इनकी शैली पग-पग पर परिवर्तित होती हुई दिखाई देती है, जिसमें नवीनता के साथ-साथ इनके सन्त-हृदय की स्पष्ट छाप भी परिलक्षित होती है। सरदार पूर्णसिंह की गद्य-शैली के मुख्य रूप निम्नलिखित हैं

(1) भावात्मक शैली – पूर्णसिंह जी के अधिकांश निबन्ध भावात्मक शैली में लिखे गये हैं। इनकी इस शैली में अनुभूति की तीव्रता, अभिव्यंजना की कुशलता और चित्रोपम सजीवता विद्यमान रहती है। इनके निबन्धों को पढ़कर पाठक आत्म-विभोर होकर काव्य जैसा आनन्द प्राप्त करता है।
(2) वर्णनात्मक शैली – लेखक ने वर्णनात्मक शैली का प्रयोग सीधे-सादे सामान्य वर्णनों और प्रसंगों में किया है। इस शैली की भाषा सरल और सुबोध है। इसमें लेखक ने सामान्य रूप में प्रचलित सभी भाषाओं के शब्दों का प्रयोग किया है, जिनमें रचित छोटे-छोटे वाक्य विषय का चित्र उपस्थित कर देते हैं। इस शैली में वे अपनी बात की पुष्टि के लिए राजाओं, फकीरों और विविध घटनाओं के दृष्टान्त देते चलते हैं।
(3) विचारात्मक शैली  – लेखक ने गम्भीर विषयों पर लिखते समय विचारात्मक शैली को अपनाया है। इस शैली की भाषा गम्भीर और संस्कृत के तत्सम शब्दों से युक्त है। इसमें वाक्य लम्बे हो गये हैं।
(4) सूत्र-शैली – पूर्णसिंह जी अपनी बात को स्पष्ट करने से पूर्व उसे सूत्र के रूप में कह देते हैं और फिर उसे समझाते हैं। उनके ये सूत्र सूक्ति जैसा आनन्द प्रदान करते हैं।
(5) आंशापरू शैली – पूर्णसिंह जी गम्भीर विषयों के विवेचन के समय कभी-कभी व्यंग्य के छींटे भी छोड़ते चलते हैं। इनके व्यंग्य अत्यन्त सटीक, तर्कपूर्ण, तीखे और हृदय पर प्रभाव डालने वाले होते हैं।
(6) संलाप शैली – इस शैली में लेखक पाठकों से बातचीत करते प्रतीत होते हैं। इस शैली में लिखे गये निबन्धों की भाषा सरल और सरस है।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि पूर्णसिंह जी के निबन्धों में भावुकतापूर्ण कथ्य के साथ-साथ विविध शैलियों के दर्शन होते हैं। हिन्दी में भावात्मक शैली के तो ये मानो जन्मदाता ही हैं।
साहित्य में स्थान: हिन्दी के निबन्धकारों में पूर्णसिंह जी का स्थान विषय, भाषा तथा शैली की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

गद्यांशों पर आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न – दिए गए गद्यांशों को पढ़कर उन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए

प्रश्न 1:
विद्या, कला, कविता, साहित्य, धन और राजत्व से भी आचरण की सभ्यता अधिक ज्योतिष्मती है। आचरण की सभ्यता को प्राप्त करके एक कंगाल आदमी राजाओं के दिलों पर भी अपना प्रभुत्व जमा  सकता है। इस सभ्यता के दर्शन से कला, साहित्य और संगीत को अद्भुत सिद्धि प्राप्त होती है। राग अधिक मृदु हो जाता है; विद्या का तीसरा शिव-नेत्र खुल जाता है; चित्र कला का मौन राग अलापने लग जाता है; वक्ता चुप हो जाता है; लेखक की लेखनी थम जाती है; मूर्ति बनाने वाले के सामने नये कपोल, नये नयन और नयी छवि का दृश्य उपस्थित हो जाता है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) आचरण की सभ्यता किससे अधिक ज्योतिष्मती है?
(iv) किसके द्वारा विद्या का तीसरा शिव-नेत्र खुल जाता है?
(v) प्रस्तुत पंक्तियों में किसका प्रतिपादन किया गया है?
उत्तर:
(i) प्रस्तुत अवतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य-गरिमा’ में संकलित एवं सरदार पूर्णसिंह द्वारा लिखित ‘आचरण की सभ्यता’ शीर्षक निबन्ध से उद्धृत है।
अथवा निम्नवत् लिख़िए:
पाठ का नाम –आचरण की सभ्यता।
लेखक का नाम – सरदार पूर्णसिंह।
[संकेत-इस पाठ के शेष सभी गद्यांशों के लिए प्रश्न (i) का यही उत्तर लिखना है।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – आचरण की सभ्यता को प्राप्त करने वाला एक निर्धन मनुष्य भी राजाओं पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लेता है; अर्थात् अपने सदाचरण से उन्हें प्रभावित करता है और
सम्मान का पात्र बन जाता है।
(iii) आचरण की सभ्यता विद्या, कला, साहित्य, धन और राजस्व से भी अधिक ज्योतिष्मती है।
(iv) आचरण की सभ्यता के द्वारा विद्या का तीसरा शिव-नेत्र खुल जाता है।
(v) प्रस्तुत पंक्तियों में आचरण की सभ्यता का प्रतिपादन किया गया है।

प्रश्न 2:
प्रेम की भाषा शब्दरहित है। नेत्रों की, कपोलों की, मस्तक की भाषा भी शब्दरहित है। जीवन को तत्त्व भी शब्द से परे है। सच्चा आचरण-प्रभाव, शील, अचल-स्थित संयुक्त आचरण- न तो साहित्य के लंबे व्याख्यानों से गठा जा सकता है; न वेद की श्रुतियों के मीठे उपदेश से; न इंजील से; न कुरान से; न धर्मचर्चा से; न केवल सत्संग से। जीवन के अरण्य में धंसे हुए पुरुष के हृदय पर प्रकृति और मनुष्य के जीवन के मौन व्याख्यानों के यत्न से सुनार के छोटे हथौड़े की मंद-मंद चोटों की तरह आचरण को रूप प्रत्यक्ष होता है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) लेखक ने प्रेम की भाषा को कैसा बताया है?
(iv) उपर्युक्त पंक्तियों में आचरण की सभ्यता की उपमा किससे दी गई है?
(v) मनुष्य के मौन व्याख्यानों के यत्न से किसका रूप प्रत्यक्ष होता है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – जो आचरण प्रभावकारी, स्थायी और शील से युक्त होता है, वही सभ्य आचरण है। संभ्य आचरण साहित्य के लम्बे-लम्बे व्याख्यानों से प्रकट नहीं हो सकता है। वह वेद, कुरान आदि धार्मिक ग्रन्थों या धर्मोपदेशों से भी व्यक्त नहीं होता है। धर्म-चर्चा करने या केवल सत्संग करने से भी सभ्य आचरण नहीं मिलता। अर्थात् इसे प्राप्त करने के लिए जीवन की गहराई में प्रवेश करना पड़ता है।
(iii) लेखक ने प्रेम की भाषा को शब्दरहित बताया है।
(iv) उपर्युक्त पंक्तियों में आचरण की सभ्यता की उपमा सुनार के छोटे हथौड़े की मंद-मंद चोटों से दी गई है।
(v) मनुष्य के मौन व्याख्यानों के यत्न से आचरण का रूप प्रत्यक्ष होता है।

प्रश्न 3:
आचरण का विकास जीवन का परमोद्देश्य है। आचरण के विकास के लिए नाना प्रकार की सामग्रियों का, जो संसार-संभूत शारीरिक, प्राकृतिक, मानसिक और आध्यात्मिक जीवन में वर्तमान हैं, उन सबकी (सबका) क्या एक पुरुष और क्या एक जाति के आचरण के विकास के साधनों के सम्बन्ध में विचार करना होगा। आचरण के विकास के लिए जितने कर्म हैं उन सबको आचरण के संघटनकर्ता धर्म के अंग मानना पड़ेगा।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) व्यक्ति के जीवन का परम उद्देश्य क्या है?
(iv) उपर्युक्त गद्यांश के माध्यम से लेखक किस बात को उजागर करना चाहता है?
(v) लेखक ने आचरण का संघटनकर्ता किसे बताया है?
उत्तर:
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या – प्रत्येक मनुष्य का कुछ-न-कुछ कर्त्तव्य होता है, लेकिन उस कर्तव्य को धर्म से जोड़ना परमावश्यक है। जङ्ग कर्त्तव्यपालन में शिथिलता नहीं होगी तो मनुष्य जो कुछ करेगा, वह सदाचार ही होगा; अर्थात् आचरण को विकास करने के लिए व्यापक दृष्टिकोण रखकर धर्म में उन सभी बातों को सम्मिलित करना चाहिए, जो चरित्र के विकास में सहायक हों।
(iii) व्यक्ति के जीवन का परम उद्देश्य आचरण का विकास करना है।
(iv) उपर्युक्त गद्यांश के माध्यम से लेखक इस बात को उजागर करना चाहता है कि मनुष्य का आचरण उसके सम्पूर्ण पर्यावरण से प्रभावित होता है।
(v) धर्म को लेखक ने आचरण की संघटनकर्ता बताया है।

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UP Board Solutions for Class 11 Sociology Understanding Society Chapter 3 Environment and Society

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Understanding Society Chapter 3 Environment and Society (पर्यावरण और समाज) are part of UP Board Solutions for Class 11 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 11 Sociology Understanding Society Chapter 3 Environment and Society (पर्यावरण और समाज).

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Class Class 11
Subject Sociology
Chapter Chapter 3
Chapter Name Environment and Society
Number of Questions Solved 45
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sociology Understanding Society Chapter 3 Environment and Society (पर्यावरण और समाज)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पारिस्थितिकी से आपका क्या अभिप्राय है? अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।
उत्तर
पारिस्थितिकी शब्द से अभिप्राय एक ऐसे जाल से है जहाँ भौतिक एवं जैविक व्यवस्थाएँ तथा प्रक्रियाएँ घटित होती हैं और मनुष्य भी इसका एक अंग होता है। पर्वत तथा नदियाँ, मैदान तथा सागर और जीव-जंतु ये सब पारिस्थितिकी के अंग हैं। पारिस्थितिकी प्राणि-मात्र और उसके पर्यावरण के मध्य अंत:संबंध का अध्ययन है। इसे विज्ञान का एक ऐसा बहुवैषयिक क्षेत्र माना है जिसमें आनुवंशिकी, समाजशास्त्र, विज्ञान आदि अनेक विषयों से सुव्यवस्थित रूप से ज्ञान लिया जाता है। समाजशास्त्री होने के नाते हमारी रुचि मानव और उसके पर्यावरण के मध्य अंत:संबंध में है। यहाँ पर्यावरण से तात्पर्य प्राकृतिक पर्यावरण से है जिसमें वन, नदियाँ, झील, समुद्र, पहाड़, पौधे आदि आते हैं। चूंकि पारिस्थितिकीय परिवर्तन मानव जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है, इसलिए समाजशास्त्र में इसका अध्ययन किया जाता है।

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प्रश्न 2.
पारिस्थितिकी सिर्फ प्राकृतिक शक्तियों तक ही सीमित क्यों नहीं है?
उत्तर
सामान्य अर्थों में पारिस्थितिकी को भौतिक या प्राकृतिक शक्तियों तक ही सीमित रखा जाता है। यह सही नहीं है। पारिस्थितिकी केवल प्राकृतिक शक्तियों तक सीमित न होकर प्राकृतिक एवं जैविक व्यवस्थाओं में अंत:संबंध पर बल देती है। क्योंकि मानवीय समाज पर पारिस्थितिकी का गहरा प्रभाव पड़ता है इसलिए इसे केवल प्राकृतिक शक्तियों तक सीमित करना उचित नहीं है। बहुत बड़ी सीमा तक किसी समाज की संस्कृति मानवीय विचारों तथा व्यवहार पर पारिस्थितिकी के गहन प्रभाव को प्रतिबिंबित करती है। व्यवसाय, भोजन, वस्त्र, आवास, धर्म, कला, आचार, विचार एवं इसी प्रकार के मानव निर्मित अनेक सांस्कृतिक निर्माण पारिस्थितिकी से ही प्रभावित होते हैं।

किसी स्थान की पारिस्थितिकी पर वहाँ के भूगोल तथा जलमंडल की अंत:क्रियाओं को भी प्रभाव पड़ता है। उदाहरणार्थ-मरुस्थलीय प्रदेशों में रहने वाले जीव-जंतु अपने आपको वहाँ की परिस्थितियों (न्यून वर्षा, पथरीली अथवा रेतीली मिट्टी तथा अत्यधिक तापमान) के अनुरूप अपने आप को ढाल लेते हैं। इसी प्रकार, पारिस्थितिकीय कारक स्थान विशेष पर व्यक्तियों के रहने का निर्धारण भी करते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि पारिस्थितिकी केवल प्राकृतिक शक्तियों तक ही सीमित नहीं है।

प्रश्न 3.
उस दोहरी प्रक्रिया का वर्णन करें जिसके कारण सामाजिक पर्यावरण का उद्भव होता है?
उत्तर
सामाजिक पर्यावरण का उद्भव जैव भौतिक पारिस्थितिकी तथा मनुष्य के लिए हस्तक्षेप की अंत:क्रिया के द्वारा होता है। यह प्रक्रिया दोनों ओर से होती है। जिस प्रकार से प्रकृति समाज को आकार देती है, ठीक उसी प्रकार से समाज भी प्रकृति को रूप देता है। उदाहरणार्थ-सिंधु-गंगा के बाढ़ के मैदान की उपजाऊ भूमि गहन कृषि के लिए उपयुक्त है। इसकी उच्च उत्पादन क्षमता के कारण यह घनी आबादी का क्षेत्र बन जाता है। ठीक इसके विपरीत, राजस्थान के मरुस्थल केवल पशुपालकों को सहारा देते हैं जो अपने पशुओं के चारे की खोज में इधर-उधर भटकते रहते हैं। इन उदाहरणों से पता चलता है कि किस प्रकार पारिस्थितिकी मनुष्य के जीवन और उसकी संस्कृति को रूप देती है।

दूसरी ओर, पूँजीवादी सामाजिक संगठनों ने विश्व भर की प्रकृति को आकार दिया है। निजी परिवहन पूँजीवादी वस्तु का एक ऐसा उदाहरण है जिसने जीवन तथा भू-दृश्य को बदला है। नगरों में वायु प्रदूषण तथा जनसंख्या वृद्धि, प्रादेशिक झगड़े, तेल के लिए युद्ध तथा विश्वव्यापी तापमान वृद्धि आदि पर्यावरण पर होने वाले प्रभावों के कुछ उदाहरण हैं। इसीलिए यह माना जाता है कि बढ़ता हुआ मानवीय हस्तक्षेप पर्यावरण को पूरी तरह से बदलने में समर्थ है।

प्रश्न 4.
सामाजिक संस्थाएँ कैसे तथा किस प्रकार से पर्यावरण तथा समाज के आपसी रिश्तों को आकार देती हैं?
उत्तर
सामाजिक संगठन में विद्यमान संस्थाओं द्वारा पर्यावरण तथा समाज के आपसी संबंधों को आकार प्रदान किया जाता है। उदाहरणार्थ- यदि वनों पर सरकार का आधिपत्य है तो यह निर्णय लेने का अधिकार भी सरकार के पास होता है कि वह वनों को लकड़ी के किसी व्यापारी को पट्टे पर दे अथवा ग्रामीणों को वन उत्पादों को संग्रहीत करने का अधिकार दे। यदि भूमि तथा जल संसाधनों पर व्यक्तिगत स्वामित्व है तो मालिक ही यह निर्धारित करेंगे कि अन्य लोगों का किन नियमों एवं शर्तों के अंतर्गत इन संसाधनों के उपयोग का अधिकार होगा। इस प्रकार, सामाजिक संस्थाएँ पर्यावरण तथा समाज के आपसी संबंधों को निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

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प्रश्न 5.
पर्यावरण व्यवस्था समाज के लिए एक महत्त्वपूर्ण तथा जटिल कार्य क्यों है?
उत्तर
पर्यावरण का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसीलिए पर्यावरण व्यवस्था समाज के लिए। महत्त्वपूर्ण मानी जाती है परंतु पर्यावरण प्रबंधन एक कठिन कार्य है। औद्योगीकरण के कारण संसाधनों के बड़े पैमाने पर दोहन ने पर्यावरण के साथ मनुष्य के संबंध और जटिल बना दिए हैं। इसलिए यह माना जाता है कि आज हम जोखिम भरे समाज में रह रहे हैं जहाँ ऐसी तकनीकों तथा वस्तुओं का हम प्रयोग करते हैं जिनके बारे में हमें पूरी समझ नहीं है। नाभिकीय विपदा (जैसे-चेरनोबिल कांड, भोपाल गैस कांड, यूरोप में फैली ‘मैड काऊ’ बीमारी आदि) औद्योगिक पर्यावरण में होने वाले खतरों को दिखाते हैं। संसाधनों में निरंतर होने वाली कमी, प्रदूषण, वैश्विक तापमान वृद्धि, जैनेटिकली मोडिफाइड, ऑर्गेनिज्म, प्राकृतिक एवं मानव निर्मित पर्यावरण विनाश आदि पर्यावरण की प्रमुख समस्याओं एवं जोखिमों ने पर्यावरण व्यवस्था को समाज के लिए न केवल महत्त्वपूर्ण बना दिया है, अपितु इसे ऐसी जटिल व्यवस्था बना दिया है कि इसका प्रबंधन अधिकांश समाज उचित प्रकार से नहीं कर पा रहे हैं।

प्रश्न 6.
प्रदूषण संबंधित प्राकृतिक विपदाओं के मुख्य रूप कौन-कौन से हैं?
उत्तर
प्रदूषण संबंधित प्राकृतिक विपदाओं के अनेक रूप होते हैं। भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट, बाढ़ अथवा ज्वारभाटीय लहरें (जैसे सुनामी लहरें) इत्यादि प्राकृतिक विपदाएँ समाज को पूर्ण रूप से बदलकर रख देती हैं। यह बदलाव, अपरिवर्तनीय अर्थात् स्थायी होते हैं तथा चीजों को वापस अपनी पूर्वावस्था में नहीं आने देते। साथ ही, प्रदूषण से संबंधित अनेक प्राकृतिक विपदाओं के उदाहरण आज हमारे सामने हैं। इन सब में वायु प्रदूषण से संबंधित विपदाएँ; जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण तथा ध्वनि प्रदूषण की तुलना में कहीं अधिक हुई हैं। पूर्व सोवियत संघ के यूक्रेन प्रांत में हुए चेरनोबिल काण्ड तथा भारत में भोपाल गैस कांड वायु प्रदूषण से संबंधित प्रमुख विपदाओं के उदाहरण हैं।

3 दिसम्बर, 1984 ई० की रात को भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड कीटनाशक फैक्ट्री से मिथाइल आइसोसाइनेट नामक गैस के रिसाव से 4,000 लोगों की मृत्यु हो गई तथा 2,00,000 व्यक्ति हमेशा के लिए अपंग हो गए। इस प्रकार की दुर्घटना रोकने हेतु इस फैक्ट्री में कंप्यूटरीकृत अग्रिम चेतावनी व्यवस्था नहीं थी जो अमेरिका स्थित इसी कंपनी के प्रत्येक प्लांट का एक अनिवार्य हिस्सा है। ध्वनि प्रदूषण बहरेपन को तो मृदा प्रदूषण अनेक रोगों को जन्म देता है। इसीलिए प्रदूषण से संबंधित प्राकृतिक विपदाओं के सभी रूप विनाशकारी होते हैं। भारत में प्रतिवर्ष घरेलू वायु प्रदूषण से मरने वाले लोगों की संख्या लाखों में है।

प्रश्न 7.
संसाधनों की क्षीणता से संबंधित पर्यावरण के प्रमुख मुद्दे कौन-कौन से हैं?
उत्तर
संसाधनों की क्षीणता से संबंधित पर्यावरण के अनेक प्रमुख मुद्दे हैं। इससे न केवल वन्य जीवों की अनेक किस्में खत्म हो चुकी हैं तथा अनेक अन्य समाप्त होने के कगार पर हैं, अपितु आने वाले वर्ष मानव के लिए भी संघर्षमय हो सकते हैं। जैव ऊर्जा (मुख्यतः पेट्रोलियम) की कमी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। यदि इसका कोई विकल्प शीघ्र सामने नहीं आया तो पेट्रोलियम इतने महगे हो जाएँगे कि सामान्य जनता की पहुँच उन तक नहीं हो पाएगी। पानी तथा भूमि में क्षीणता तेजी से बढ़ रही है। भू-जल के स्तर में लगातार कमी वैसे तो पूरे भारत में है पर मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, पंजाब तथा हरियाणा में इसे स्पष्ट देखा जा सकता है। कुछ ही दशकों में कृषि, उद्योग तथा नगरीय केंद्रों की बढ़ती माँगों के कारण पानी खत्म होने के कगार पर है।

नदियों के बहाव को मोड़े जाने के कारण जल बेसिन को भी नुकस्मन पहुँचा है जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती। भू-जल की भाँति हजारों वर्षों से मृदा की ऊपरी परत को होने वाला निर्माण भी पर्यावरण के कुप्रबंधन (भू-कटाव, पानी का जमाव, पानी का खारा होना आदि) के कारण नष्ट होता जा रहा है। भवन निर्माण के लिए ईंटों का उत्पादन भी मृदा की ऊपरी सतह के नाश के लिए जिम्मेदार है। जंगल, घास के मैदान तथा आर्द्रभूमि आदि दूसरे मुख्य संसाधन भी समाप्ति के कगार पर खड़े हैं। यदि वृक्षारोपण द्वारा पर्यावरण के संतुलन के प्रयास नहीं किए गए तो आने वाले वर्षों में पर्यावरणीय संसाधनों की क्षीणता मानव के सामने सबसे गंभीर चुनौती होगी।

प्रश्न 8.
पर्यावरण की समस्याएँ सामाजिक समस्याएँ भी हैं। कैसे? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
पर्यावरण से संबंधित अनेक सामाजिक समस्याएँ हैं। इससे जनता का स्वास्थ्य प्रभावित होता है। आर्सेनिक कैंसर, टाइफाइड, हैजा एवं पीलिया जैसी बीमारियाँ प्रदूषित जल से फैलती हैं तथा गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न कर देती हैं। वायुमंडलीय प्रदूषण से विश्व तापमान में वृद्धि हो रही है। मृदा का कटाव होने से उपज कम हो जाती हैं जिससे महँगाई बढ़ती है तथा निर्धन लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में असमर्थ होने लगते हैं। ध्वनि प्रदूषण न केवल सिरदर्द अपितु बेचैनी बढ़ने, हृदय की गति तीव्र होने, ब्लड प्रेशर बढ़ने आदि अनेक अन्य बीमारियों के लिए भी उत्तरदायी है। पर्यावरणीय असंतुलन के कारण अपंगता में वृद्धि होती है। अध्ययनों से पता चला है कि रेडियोधर्मी पदार्थों से उत्पन्न प्रदूषण का परिणाम अपंग संतान का उत्पन्न होना है।

प्रदूषण स्वस्थ शरीर में रोग निवारक शक्ति को कम करता है। प्रदूषण का जीवन-प्रक्रम तथा मानवीय गतिविधियों पर काफी प्रभाव पड़ता है। अत्यधिक प्रदूषण शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है जिससे बच्चों का विकास ठीक प्रकार से नहीं हो पाता। पर्यावरणीय प्रदूषण के कारण फसलें भी नष्ट हो जाती हैं। जलीय जीवों के नष्ट हो जाने से खाद्य पदार्थों की हानि होती है। बड़ी संख्या में मछलियों आदि का मरना, बीमार होना आदि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होने के साथ-साथ मछलियों के व्यापार से जुड़े लोगों के सामने अनेक आर्थिक समस्याएँ भी उत्पन्न कर देता है।

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प्रश्न 9.
सामाजिक पारिस्थितिकी से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
सामाजिक पारिस्थितिकी वह विचारधारा है जो यह बताती है कि सामाजिक संबंध, मुख्य रूप से संपत्ति तथा उत्पादन के संगठन, पर्यावरण की सोच तथा कोशिश को एक आकार देते हैं। पारिस्थितिकी की चुनौतियों का सामना करने हेतु विकसित ‘सामाजिक पारिस्थितिकी’ समाज पर पड़ने वाले प्रभावों के मद्देनजर पर्यावरण को नियंत्रित करने पर बल देती है। समाज के विभिन्न वर्ग पर्यावरण से संबंधित मुद्दों को भिन्न प्रकार से देखने एवं समझने का प्रयास करते हैं। उदाहरणार्थ-वन विभाग अधिक राजस्व प्राप्ति हेतु अधिक मात्रा में बाँस का उत्पादन करता है। बाँस का कारीगर इसका उपयोग कैसे करेगा। यह वन्य विभाग की चिंता का विषय नहीं है। दोनों द्वारा बॉस से संबंधित होने के बावजूद दोनों के दृष्टिकोण अलग-अलग हैं।

इसीलिए विभिन्न रुचियाँ एवं विचारधाराएँ पर्यावरण संबंधी मतभेद उत्पन्न कर देती हैं। इस अर्थ में पर्यावरण संकट की जड़ें सामाजिक असमानताओं में देखी जा सकती हैं। वस्तुत: आज की परिस्थितिकी से संबंधित सभी समस्याएँ कहीं-न-कहीं सामाजिक समस्याओं से उत्पन्न हुई हैं। इसलिए आर्थिक, नृजातीय, सांस्कृतिक, लैंगिक मतभेद तथा अन्य बहुत-सी समस्याओं के केंद्र में पर्यावरण की व्यवस्था स्थित है। पर्यावरण से संबंधित समस्याओं को सुलझाने का एक तरीका पर्यावरण तथा समाज के आपसी संबंधों में परिवर्तन है और इसका अर्थ है– विभिन्न समूहों (स्त्री तथा पुरुष, ग्रामीण तथा शहरी लोग, जमींदार तथा मजदूर आदि) के बीच संबंधों में बदलाव। सामाजिक संबंधों में परिवर्तने विभिन्न ज्ञान व्यवस्थाओं और भिन्न ज्ञान तंत्र को जन्म देगा जो पर्यावरण का प्रबंधन सुचारु रूप से कर सकेगा।

प्रश्न 10.
पर्यावरण संबंधित कुछ विवादास्पद मुद्दे जिनके बारे में आपने पढ़ा या सुना हो (अध्याय के अतिरिक्त) उनका वर्णन कीजिए।
उत्तर
पर्यावरण से संबंधित अनेक विवादास्पद मुद्दे हैं। वस्तुतः मनुष्यों और प्रकृति के बीच का संबंध तथा प्रकृति पर मानव कार्यों के हानिकारक प्रभाव, जो कि अभी तक एक उपेक्षित क्षेत्र रहा है, आज मुख्य मुद्दे के रूप में उभरा है। पर्यावरणीय राजनीति/आंदोलनों की वृद्धि सर्वाधिक चिंता का मुद्दा है। पूर्व-औद्योगिक समाजों में प्राकृतिक आपदाओं से उत्पन्न जोखिम और उसकी गूढ़ प्रकृति को स्वैच्छिक निर्णयन के लिए उत्तरदायी नहीं माना जा सकता। औद्योगिक समाजों में जोखिम की प्रकृति बदल गई है। कार्यस्थल पर होने वाली दुर्घटनाओं और औद्योगिक जोखिमों या बेरोजगारी के बढ़ते खतरे हेतु प्रकृति को दोषी नहीं माना जा सकता।

26 अप्रैल, 1986 ई० को बेलोरशियन सीमा से 12 किमी दूर हुई चैरनोबिल नाभिकीय पावर स्टेशन की एक पावर इकाई में घोर संकट पैदा हो गया। परमाणविक ऊर्जा प्रयोग के समग्र विश्व इतिहास में यह सर्वाधिक भीषण महाविपत्ति मानी जाती है। बंद रियेक्टर के धमाके के परिणामस्वरूप रेडियोऐक्टिव पदार्थों की भारी मात्रा पर्यावरण में घुल-मिल गई। दुर्घटना से बेलारूस क्षेत्र के 23 प्रतिशत भाग पर रेडियोऐक्टिव प्रभाव का भारी असर पड़ा जहाँ पर 2 मिलियन से अधिक लोगों की 3,778 बस्तियाँ थीं। प्रभावित कुल क्षेत्र यूक्रेन का 4.8 प्रतिशत भाग था। इस महाविपत्ति से वहाँ रहने वाले लाखों लोगों के भाग्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

पर्यावरण संबंधित एक प्रमुख विवादास्पद मुद्दा पारिस्थितिकीय आंदोलनों का है। ऐसे आंदोलन हमें आधुनिकता के ऐसे आयामों का मुकाबला करने के लिए विवश करते हैं जिन्हें अभी तक अनदेखा किया गया है। इसके अतिरिक्त ये प्रकृति एवं मनुष्यों के बीच के सूक्ष्म संबंधों के प्रति हमें संवेदनशील बनाते हैं जिन्हें कि अन्यथा छोड़ दिया जाता है। भारत में टिहरी जलविद्युत परियोजना, नर्मदा नदी घाटी परियोजना, भोपाल गैस त्रासदी, चिल्का झींगा उत्पादन जैसे विवादास्पद मुद्दे पर्यावरण से ही संबंधित हैं। आज पर्यावरणीय मुद्दों का अंतर्राष्ट्रीयकरण होता जा रहा है। इसीलिए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में स्थायी विकास के नियोजन में पर्यावरणीय संतुलन पर बल दिया जाता है।

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क्रियाकलाप आधारित प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
क्या आप जानते हैं कि रिज इलाके के जंगल में पायी जाने वाली वनस्पति क्षेत्रीय नहीं है। बलिक अंग्रेजों द्वारा लगभग सन 1915 में लगाई गई थी? (क्रियाकलाप 1)
उत्तर
यह सही है कि रिज इलाके के जंगल में पायी जाने वाली वनस्पति क्षेत्रीय नहीं है बल्कि अंग्रेजों द्वारा लगभग 1915 ई० में लगाई गई थी। इस इलाके में मुख्य रूप से विलायती कीकर अथवा विलायती बबूल के वृक्ष पाए जाते हैं जो दक्षिणी अमेरिका से लाकर यहाँ लगाए गए थे और अब संपूर्ण उत्तरी भारत में ऐसे वृक्ष प्राकृतिक रूप में पाए जाते हैं।

प्रश्न 2.
क्या आप जानते हैं कि ‘चोरस,-जहाँ उत्तराखंड स्थित कार्बेट नेशनल पार्क के वन्य जीवन की अद्भुत छटा को देखा जा सकता है, कभी वहाँ किसान खेती किया करते थे? (क्रियाकलाप 1)
उत्तर
उत्तराखंड में कार्बेट नेशनल पार्क एक प्रमुख आकर्षण का स्थल है जहाँ वन्य जीवन की अद्भुत छटा को देखा जा सकता है। जिस स्थान पर यह पार्क बनाया गया है वहाँ पहले किसान खेती करते थे। इस क्षेत्र के गाँवों को पुनस्र्थापित किया गया ताकि यहाँ वन्य जीवन को अपने प्राकृतिक रूप में देखा जा सके। यह ‘प्राकृतिक रूप से देखी जाने वाली चीज वास्तव में मनुष्य के सांस्कृतिक हस्तक्षेप का उदाहरण है। मनुष्य के सांस्कृतिक हस्तक्षेप के ऐसे अनगिनत अन्य उदाहरण भी हैं। जलरहित विदर्भ क्षेत्र में भारत का पहला हिम गुंबद’ तथा ‘फन एण्ड फूड विलेज’ वाटर एंड एम्युजमेंट पार्क’ आदि उदाहरण लगभग सभी प्रदेशों में देखे जा सकते हैं। वन्य जीवों के संरक्षण तथा लुप्तप्राय होती वन्य जीवों की प्रजातियों को बनाए रखने हेतु सरकार ने अनेक स्थानों का अधिग्रहण किया है।

प्रश्न 3.
पता कीजिए कि आपके परिवार में रोजाना कितना पानी इस्तेमाल किया जाता है। यह जानने का प्रयास कीजिए कि विभिन्न आय समूहों के परिवारों में तुलनात्मक रूप से कितना पानी इस्तेमाल होता है। विभिन्न परिवार पानी के लिए कितना समय और पैसा खर्च करते हैं? परिवार में पानी भरने का काम कौन करता है? सरकार विभिन्न वर्ग के लोगों के लिए कितना पानी मुहैया करवाती है? (क्रियाकलाप 2)
उत्तर
परिवार के सदस्यों की संख्या तथा उसके निवास स्थान से पानी को व्यय ज्ञात होता है और उसके घर में यदि पेड़-पौधे भी हैं या और कोई अतिरिक्त उपयेाग है तब उसके अनुसार ज्ञात किया जाता है। एक मध्यम आकार का परिवार प्रतिदिन कम-से-कम 150 से 250 लीटर पानी का प्रयोग करता है। यदि पेड़-पौधों को भी पानी देता है तो यह 500 लीटर तक भी हो सकता है। गर्मियों में पानी का अधिक उपयोग होता है, जबकि सर्दियों में कम। कम आय समूह के परिवारों में उच्च समूह के परिवारों की तुलना में पानी कम खर्च होता है। नगरों में पानी भरने के लिए बहुत कम समय देना पड़ता है, जबकि गाँव में इसके लिए एक घंटा तक लग सकता है।

यदि नगरों में पानी का प्रेशर ठीक है तो मकानों में रखी टंकियाँ अपने आप भर जाती हैं तथा किसी भी सदस्य को इसके लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता। जिन स्थानों पर प्रेशर कम है अथवा कुछ नियत समय के लिए ही पानी आता है वहाँ पर काफी समय पानी के लिए खर्च करना पड़ सकता है। गाँव में पानी भरने का काम अधिकतर महिलाएँ ही करती हैं। कई बार उन्हें काफी दूर से पानी लाना पड़ता है। कुछ नगरों में पानी के मीटर लगे रहते हैं। तथा परिवार जितना पानी इस्तेमाल करेंगे उतना ही उन्हें बिल देना पड़ेगा। एक मध्यम आकार के मकान एवं मध्यम वर्ग के परिवार में पानी का खर्चा लगभग 100 महीना होता है। अनेक नगरों में मकानों के क्षेत्रफल के आधार पर पानी के लिए प्रतिमाह एक निश्चित धनराशि वसूल की जाती है।

यदि कोई व्यक्ति नगर विकास निगम द्वारा बनाई गई कॉलोनी में रहता है तो उसके मकान की श्रेणी (आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्ग, निम्न वर्ग, मध्यम वर्ग एवं उच्च वर्ग) के अनुरूप पानी का मासिक किराया निर्धारित कर दिया जाता है। ऐसी कालोनियों में पानी की सप्लाई हेतु काफी बड़ी टंकियों का निर्माण भी भवनों के निर्माण के साथ ही कर दिया जाता है। पहले कभी परिवारों को पानी के लिए बहुत कम पैसा व्यय करना पड़ता था, लेकिन अब यह व्यय निरंतर बढ़ता जा रहा है। महानगरों में बड़े भवनों में रहने वाले लोगों को र 300 से भी अधिक का खर्चा प्रतिमाह पानी पर करना पड़ता है।

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प्रश्न 4.
कल्पना कीजिए कि आप 14-15 साल के झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाले लड़का/लड़की हैं। आपका परिवार क्या काम करता है और आप कैसे रहते हैं? अपनी दिनचर्या का वर्णन करते हुए उस पर एक छोटा निबंध लिखिए। (क्रियाकलाप 3)
उत्तर
यदि आपने कोई झुग्गी-झोपड़ी देखी है तो आप वहाँ रहने वाले परिवार का वर्णन सरलता से कर सकते हैं। प्रायः झुग्गी-झोंपड़ी नगर में बड़ी-बड़ी इमारतों, होटलों एवं सरकारी कार्यालयों, पुलों, रेल की पटरियों के किनारों, रेलवे स्टेशनों के नजदीक, नगर के बाहरी इलाकों में स्थित होती हैं। झुग्गी-झोपड़ियाँ प्रायः छप्पर की या खपरैल की होती हैं तथा पूरा परिवार इसी में निवास करता है। पुरुष काम के लिए (रिक्शा चलाने, किसी निर्माण स्थल पर मजदूरी करने, कूड़ा बीनने या कोई अन्य कार्य करने हेतु) बाहर चला जाता है।

कई बार परिवार की स्त्री भी अपने छोटे बच्चे के साथ मजूदरी करने चली जाती है। ऐसे परिवार में दिन में कोई भी नहीं रहता। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते जाते हैं, वैसे-वैसे बच्चों को भी मजदूरी या अन्य किसी ऐसे काम (जैसे-पास के मुहल्ले में कारों की सफाई करना, पास के घरों में सफाई करना) में लगा दिया जाता है जिससे वह परिवार के लिए कुछ पैसे प्रतिदिन कमाकर लाएँ तथा परिवार का बोझ कम करें। 14-15 साल के लड़के/लड़कियाँ घरों में सारा दिन अथवा सुबह-शाम काम करते हैं तथा अपने हमउम्र साथियों के साथ बैठकर अपना समय बिताते हैं।

यदि परिवार कोई अपना कार्य (जैसे-लोहे, लकड़ी या मिट्टी की कोई वस्तु बनाना) करता है तो बच्चे इस कार्य में परिवार की सहायता करते हैं। यदि झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाले परिवार मध्यम स्थिति में है तो वह बच्चों को शिक्षा के लिए सरकारी स्कूल में भी भेज सकता है। ऐसी स्थिति में 14-15 साल के लड़के/लड़कियाँ पढ़ाई के अतिरिक्त अन्य घरों में काम करके अथवा पारिवारिक काम में हाथ बँटाकर परिवार को सहयोग देते हैं। चूंकि झुग्गी-झोंपड़ियों में न तो पानी का इंतजाम होता है और न ही सार्वजनिक शौचालयों का, अतः इस आयु के बच्चे आस-पास से पानी भरकर लाने का भी काम करते हैं।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
“पर्यावरण किसी भी उस बाह्य शक्ति को कहते हैं जो हमें प्रभावित करती है। यह परिभाषा किस विद्वान ने प्रस्तुत की है?
(क) जिसबर्ट
(ख) रॉस
(ग) मैकाइवर
(घ) डेविस
उत्तर
(ख) रॉस

प्रश्न 2.
प्रकृति द्वारा मनुष्य को प्रदत्त दशाओं से निर्मित पर्यावरण को क्या कहा जाता है?
(क) भौगोलिक
(ख) सामाजिक
(ग) सांस्कृतिक
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ख) सामाजिक

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से किस विद्वान ने भौगोलिक निश्चयवाद का समर्थन किया है?
(क) बकल
(ख) लीप्ले
(ग) हटिंग्टन
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी

प्रश्न 4.
भौगोलिक पर्यावरण किन तत्त्वों से बनता है?
(क) मनुष्य
(ख) प्राकृतिक दशाएँ
(ग) धार्मिक विश्वास
(घ) प्रथाएँ।
उत्तर
(ख) प्राकृतिक दशाएँ

प्रश्न 5.
वह कौन-सा सिद्धांत है जो सम्पूर्ण मानवीय क्रियाओं को भौगोलिक पर्यावरण के आधार पर स्पष्ट करने का प्रयास करता है?
(क) भौगोलिक निर्णायकवाद
(ख) तकनीकी निर्णायकवाद
(ग) सांस्कृतिक निर्णायकवाद
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(क) भौगोलिक निर्णायकवाद

प्रश्न 6.
हंटिंग्टन किस सम्प्रदाय का समर्थक है?
(क) भौगोलिक निर्णायकवाद
(ख) तकनीकी निर्णायकवाद
(ग) सांस्कृतिक निर्णायकवाद
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(क) भौगोलिक निर्णायकवाद

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प्रश्न 7.
भारतीय सरकार ने गंगा विकास प्राधिकरण’ की स्थापना किस सन में की थी?
(क) सन् 1984 में
(ख) सन् 1985 में
(ग) सन् 1986 में
(घ) सन् 1987 में
उत्तर
(ख) सन् 1985 में

प्रश्न 8.
पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।
(क) 5 जून को
(ख) 24 जून को
(ग) 6 जून को
(घ) 20 जून को
उत्तर
(क) 5 जून को

निश्चित उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मानवीय गतिविधियों द्वारा पर्यावरण में होने वाले असंतुलन को क्या कहा जाता है?
उत्तर
मानवीय गतिविधियों द्वारा पर्यावरण में होने वाले अवांछनीय परिवर्तन को ‘पर्यावरणीय प्रदूषण’ कहते हैं।

प्रश्न 2.
जल प्रदूषण के दो प्रमुख स्रोत कौन-से हैं?
उत्तर
औद्योगिक अपशिष्ट या जहरीले गौण उत्पाद तथा कृषीय कीटनाशक दवाएँ जल प्रदूषण के दो प्रमुख स्रोत हैं।

प्रश्न 3.
वायु प्रदूषण के दो प्रमुख स्रोत बताइए।
उत्तर
कारखानों से निकलने वाला धुआँ तथा ऑटोमोबाइल से निकलने वाली गैसें वायु प्रदूषण के दो प्रमुख स्रोत हैं।

प्रश्न 4.
जल प्रदूषण का एक प्रभाव बताइए।
उत्तर
जल प्रदूषण के प्रभाव से आर्सेनिक कैंसर, टाइफाइड, हैजा एवं पीलिया जैसे रोगों की आशंका बढ़ जाती है।

प्रश्न 5.
भारत में राष्ट्रीय पारिस्थितिकी बोर्ड की स्थापना किस वर्ष हुई थी?
उत्तर
भारत में राष्ट्रीय पारिस्थितिकी बोर्ड की स्थापना वर्ष 1981 में हुई थी।

प्रश्न 6.
भारत में पर्यावरण और वन्य जीवन मंत्रालय की स्थापना कब की गई?
उत्तर
भारत में पर्यावरण और वन्य जीवन मंत्रालय की स्थापना 1985 ई० में की गई।

प्रश्न 7.
उस बाह्य शक्ति को क्या कहते हैं जो हमें प्रभावित करती है?
उत्तर
पर्यावरण।

प्रश्न 8.
‘भौगोलिक निर्णायकवाद’ की संकल्पना को किसने विकसित किया?
उत्तर
बकल ने।

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प्रश्न 9.
चिपको आन्दोलन किसने चलाया?
उत्तर
सुन्दरलाल बहुगुणा ने।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पर्यावरण क्या है? इसके दो प्रकार बताइए।
या
पर्यावरण क्या है? इसके प्रमुख प्रकार बताइए।
उत्तर
पर्यावरण से अभिप्राय उन सभी वस्तुओं से है जो हमें चारों ओर से घेरे रखती हैं। हमारे चारों ओर की प्राकृतिक वस्तुएँ तथा सांस्कृतिक वातावरण पर्यावरण के अंतर्गत ही आते हैं। पर्यावरण प्रमुख रूप से दो प्रकार का होता है- भौगोलिक (प्राकृतिक) पर्यावरण तथा सांस्कृतिक पर्यावरण।

प्रश्न 2.
भौगोलिक पर्यावरण क्या है? यह किस प्रकार मानव समाज को प्रभावित करता है?
उत्तर
प्रकृति द्वारा निर्मित पर्यावरण को भौगोलिक पर्यावरण कहा जाता है। इसमें वे सभी वस्तुएँ सम्मिलित होती हैं जिनको मानव ने नहीं बनाया है। कुछ विद्वानों का कहना है कि भौगोलिक पर्यावरण मानव समाज को अत्यधिक प्रभावित करता है। जनसंख्या का घनत्व, व्यवसाय, आर्थिक जीवन, धार्मिक जीवन, व्यक्ति की कार्यक्षमता तथा सामाजिक संस्थाओं पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 3.
प्रदूषण किसे कहते हैं?
उत्तर
पर्यावरण की लय एवं संतुलन में होने वाले अवांछनीय परिवर्तन, जो मानव जीवन के लिए हानिकारक होते हैं अथवा जीवनदायिनी शक्तियों को नष्ट करते हैं, प्रदूषण कहलाते हैं।

प्रश्न 4.
पारिस्थितिकीय निर्धारणवाद क्या है?
उत्तर
पारिस्थितिकीय निर्धारणवाद वह विचारधारा है जो सभ्यता के विकास की संभावनाओं में पर्यावरण को मूल कारण मानती है। इस विचारधारा के अनुसार पारिस्थितिकी सभी घटनाओं को नियंत्रित करता है।

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प्रश्न 5.
प्रदूषण के प्रमुख दो सामाजिक प्रभावों को लिखिए।
उत्तर
प्रदूषण मानव तथा अन्य जीवों के जीवन-चक्र पर हानिकारक प्रभाव डालता है। अतः यह मानव तथा समाज दोनों के लिए हानिकारक है। प्रदूषण के दो प्रमुख हानिकारक प्रभाव निम्नलिखिते हैं –

  1. मानव के जीवन-स्तर पर प्रभाव – मानव-जीवन पर प्राकृतिक सम्पदाओं का प्रभाव पड़ता है। यह प्राकृतिक सम्पदाएँ भूमि; पेड़-पौधे, खनिज पदार्थ, जल, वायु आदि के रूप में मनुष्य को उपलब्ध हैं। प्रदूषण के कारण इन सभी पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। प्रदूषण के कारण फसलों, फलों, सब्जियों आदि पर बुरा प्रभाव पड़ता है, जलीय जीव (मछलियाँ आदि) नष्ट हो जाते हैं। इससे वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि हो जाती है तथा लोगों को आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ता है।
  2. प्राणियों के खाद्य-पदार्थों में कमी – वनों की अन्धाधुन्ध कटाई के परिणामस्वरूप | जीव-जन्तुओं को चारा तक उपलब्ध नहीं हो पा रहा है, जिस कारण हमें पशुओं से जो पदार्थ प्राप्त होते हैं, वे नष्ट होते जा रहे हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पर्यावरणीय प्रदूषण क्या है? उत्तर-पर्यावरणीय प्रदूषण से आशय जैवमंडल में ऐसे तत्त्वों के समावेश से है, जो जीवनदायिनी शक्तियों को नष्ट कर रहे हैं। उदाहरणार्थ-रूस में चेरनोबिल के आणविक बिजलीघर से एक हजार किलोमीटर क्षेत्र में रेडियोधर्मिता फैल गई, जिससे मानव जीवन के लिए ही अनेक संकट पैदा हो गए। आज इस दुर्घटना के बाद लोग आणविक बिजलीघर का नाम सुनते ही सिहर उठते हैं। इसी तरह रासायनिक खाद, लुगदी बनाने, कीटनाशक दवाओं के बनाने और चमड़ा निर्माण करने आदि के कुछ ऐसे दुसरे उद्योग हैं, जो वायु प्रदूषण फैलाते हैं। इतना ही नहीं, कई उद्योग तो वायु प्रदूषण के साथ-साथ मिट्टी और पानी का भी प्रदूषण करते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति की विज्ञान सलाहकार समिति के अनुसार, “पर्यावरणीय प्रदूषण मनुष्यों की गतिविधियां द्वारा ऊर्जा स्वरूपों, विकिरण स्तरों, रासायनिक तथा भौतिक संगठनों, जीवों की संख्या में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से परिवर्तन के परिणामस्वरूप उत्पन्न उप-उत्पाद है, जो हमारे परिवेश में पूर्ण अथवा अधिकतम प्रतिकूल परिवर्तन उत्पन्न करता है।”

प्रश्न 2.
प्रदूषण नियंत्रण हेतु चार प्रमुख उपायों की विवेचना करें।
उत्तर
प्रदूषण नियंत्रण हेतु चार प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं –

  1. प्रदूषण नियंत्रण हेतु जनता का सहयोग अनिवार्य है। जनता के सहयोग हेतु प्रदूषण-नियंत्रण के लिए शिक्षा का अभियान चलाया जाना चाहिए। जनसंचार माध्यमों द्वारा जनता में पर्यावरणीय सुरक्षा एवं प्रदूषण के प्रति जागरूकता लाने के प्रयास भी किए जाने चाहिए।
  2. प्रदूषण नियंत्रण हेतु कारखानों को नगरों से दूर स्थापित किया जाना चाहिए जिससे उनसे निकलने वाले धुएँ एवं हानिकारक गैस आदि से बचाव हो सके।
  3. पर्यावरणीय सुरक्षा के क्षेत्र में ऐच्छिक संगठनों का सहयोग लिया जाना चाहिए। वैसे तो हमारे देश में इस क्षेत्र में अनेक ऐच्छिक संगठन क्रियाशील हैं जिनके सामाजिक कार्यकर्ता प्रदूषण के खिलाफ संघर्षरत हैं, तथापि सरकार को भी ऐसे संगठनों को वित्तीय सहायता उपलब्ध करानी चाहिए।
  4. नागरिक दायित्व के निर्वहन हेतु जनता को प्रेरित करना चाहिए जिससे वे खुले में कूड़ा-करकट, मैला तथा अन्य किसी प्रकार का प्रयुक्त पदार्थ न डालें।

प्रश्न 3.
प्रदूषण के स्रोतों की विवेचना कीजिए।
या
प्रदूषण के उत्तरदायी कारणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर
प्रदूषण के उत्तरदायी स्रोत या कारण निम्नलिखित हैं –

  1. उद्योगों से निकलने वाले स्राव (अपशिष्ट) प्रदूषण का प्रमुख कारण हैं। इनसे मुख्य रूप से वायु एवं जल प्रदूषण बढ़ता है।
  2. कीटनाशक दवाएँ भी प्रदूषण का कारण मानी जाती हैं क्योंकि इनके प्रयोग के काफी हानिकारक प्रभाव होते हैं।
  3. प्रदूषित जल तथा वायु प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं। अधिकांशतया इन्हीं के सर्वाधिक हानिकारक प्रभाव आए दिन सामने आते रहते हैं।
  4. आवागमन के साधनों से निकलने वाला धुआँ भी प्रदूषण का एक प्रमुख कारण है।
  5. नगरों में जगह-जगह पर पड़ा कूड़ा-करकट भी प्रदूषण का एक कारण है।
  6. उद्योगों से निकलने वाले स्राव का नदियों के जल में मिल जाने से जल प्रदूषित हो जाता है।
  7. नगरीकरण, औद्योगीकरण एवं आर्थिक विकास हेतु बड़े पैमाने पर वनों का कटाव भी प्रदूषण का एक कारण है।
  8. रसोईघरों, स्वत:चालित वाहनों एवं कारखानों की चिमनियों से निकलने वाला धुआँ भी प्रदूषण फैलाता है।

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प्रश्न 4.
“पर्यावरण प्रदूषण का सर्वप्रथम कारण मानव सभ्यता का विकास ही है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
पहले जब मानव सभ्यता का विकास प्रारंभ नहीं हुआ था तो व्यक्ति प्राकृतिक जीवन व्यतीत करता था। मानव सभ्यता के शनैः शनैः विकास के परिणामस्वरूप मानव ने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु पर्यावरण से छेड़छाड़ करना प्रारंभ कर दिया। जैसे-जैसे मानव सभ्यता का विकास होता गया, मानव की आवश्यकताएँ बढ़ती गईं तथा पर्यावरण से छेड़छाड़ भी उसी अनुपात में अधिक होने लगा। इसी का परिणाम प्रदूषण के रूप में सामने आया है। इसीलिए पर्यावरणीय प्रदूषण को एक नवीन संकल्पना माना जाता है।

भौतिक विकास को अत्यधिक महत्त्व दिया जाने लगा जिसके परिणामस्वरूप फ्रकृति का भंडार समाप्त होने लगा। मानव सभ्यता के विकास के फलस्वरूप ही भारी उद्योगों एवं बड़े-बड़े बाँधों के निर्माण में तेजी आई तथा इनसे प्रकृति के घटकों का संतुलन बिगड़ना प्रारंभ हो गया। ऐसा लगता है कि प्रदूषण वह कीमत है जो मानव सभ्यता के विकास हेतु सभी समाजों को चुकानी पड़ती है। ऊर्जा के स्रोतों के रूप में आज आणविक एवं ताप बिजलीघरों का निर्माण किया जा रहा है जिनसे निकलने वाली गैसें अधिक खतरनाक होती हैं। भोपाल गैस कांड जैसे कई कांड इसके दुष्परिणामों के उदाहरण हैं। कई विद्वान ऐसा भी मानते हैं कि पर्यावरण प्रदूषण मानव सभ्यता के विकास की वह कीमत है जो उसे विकास के नाम पर चुकानी पड़ती है।

प्रश्न 5.
कार्बन मोनो-ऑक्साइड का वायुमंडल में बढ़ता प्रवाह किस प्रकार की सामाजिक समस्याओं को जन्म दे रहा है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
कार्बन मोनो-ऑक्साइड का वायुमंडल में बढ़ता प्रवाह वायु प्रदूषण से संबंधित है। वायु में गैसों की अनावश्यक वृद्धि (केवल ऑक्सीजन को छोड़कर) या उसके भौतिक व रासायनिक घटकों में परिवर्तन वायु प्रदूषण उत्पन्न करता है। वायु में विभिन्न गैसों में संतुलन पाया जाता है, परंतु मोटरगाड़ियों से निकलने वाला धुआँ, कुछ कारखानों से निकलने वाला धुआँ तथा वनों व वृक्षों के काटे जाने से वायु में ऑक्सीजन, नाइट्रोजन व कार्बन डाइऑक्साइड का संतुलन बिगड़ जाता है तथा यह मनुष्यों व अन्य जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने लगता है।

अनेक कारण वायु प्रदूषण के लिए उत्तरदायी माने जाते हैं परंतु इन सभी कारणों में कार्बन मोनो-ऑक्साइड का वायुमंडल में बढ़ती प्रवाह महत्त्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इससे स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। छाती, सॉस, आँखों तथा हड्डियों से संबंधित अनेक बीमारियाँ इसी के परिणामस्वरूप होती हैं। इतना ही नहीं, जब व्यक्ति का स्वास्थ्य ही ठीक नहीं होगा तो निर्धनता एवं बेरोजगारी जैसी समस्याओं में वृद्धि होगी।

प्रश्न 6.
ध्वनि प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? आधुनिक समाज पर इसका कुप्रभाव सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
तीखी आवाज से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण को ध्वनि प्रदूषण कहा जाता है। इस प्रकार का प्रदूषण गाँव की तुलना में नगरों में अधिक पाया जाता है। विभिन्न प्रकार के यंत्रों, वाहनों, मशीनों, जहाजों, रॉकेटों, रेडियो व टेलीविजन, पटाखों, लाउड्स्पीकरों आदि के प्रयोग से ध्वनि प्रदूषण विकसित होता है। ध्वनि प्रदूषण जनसंख्या वृद्धि के कारण निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। ध्वनि प्रदूषण अनेक प्रकार के रोगों का कारण माना जाता है।

इससे सुनने की क्षमता का ह्वास होता है, रुधिर चाप बढ़ जाता है, हृदय रोग की आशंका बढ़ जाती है तथा तंत्रिका तंत्र संबंधी रोग हो सकते हैं। ध्वनि प्रदूषण से व्यक्ति को ठीक प्रकार से नींद नहीं आती तथा वह चिड़चिड़ा हो जाता है। इससे उसमें मानसिक तनाव बढ़ जाता है। साथ ही, कुछ विशेष प्रकार की ध्वनियाँ सूक्ष्म जीवों को नष्ट कर देती है, जिससे जैव अपघटन क्रिया में रुकावट उत्पन्न होती है।

प्रश्न 7.
‘पारिस्थितिकी तंत्र का पतन एवं पर्यावरण प्रदूषण पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
पारिस्थितिकी तंत्र से अभिप्राय किसी समुदाय के निर्जीव पर्यावरण तथा उसमें पाए जाने वाले जीवधारियों की समग्र व्यवस्था से है। संतुलित पर्यावरण को पारिस्थितिकी तंत्र कहते हैं। जब इसमें मानवीय प्रयासों के परिणामस्वरूप अवक्रमण होता है तो इसे पारिस्थितिकी तंत्र का पतन कहते हैं। पारिस्थितिकी तंत्र के पतन का कारण वनों का विनाश, भूमि या मृदा का कटाव, जल स्रोतों की कमी तथा खतरनाक उद्योग (जैसे-दून घाटी में चूना उद्योग) इत्यादि हैं।

यह सब ऐसे कारण हैं जिनसे पर्यावरणीय प्रदूषण में वृद्धि होती है। जैसे-जैसे विकास हेतु पारिस्थितिकी तंत्र का पतन होता है, वैसे-वैसे पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि होती है। वनों के विनाश से वायु प्रदूषण, मृदा के कटाव अथवा मृदा में होने वाले अस्वाभाविक परिवर्तन से मृदीय प्रदूषण तथा जल स्रोतों के दूषित होने से जलप्रदूषण होता है। खतरनाक उद्योगों से पानी का स्तर नीचे पहुँच जाता है, पेड़ धूल से भरे रहते हैं तथा उद्योगों से हानिकारक गैसों का स्राव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। इसीलिए पारिस्थितिकी तंत्र के पतन एवं पर्यावरण प्रदूषण में गहरा संबंध पाया जाता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
पारिस्थितिकी किसे कहते हैं? पारिस्थितिकी एवं समाज में संबंध स्पष्ट कीजिए।
या
पारिस्थितिकी क्या है? पारिस्थितिकीय अवक्रमण के प्रमुख कारण बताइए।
उत्तर

पारिस्थितिकी का अर्थ

पारिस्थितिकी (Ecology) को प्रत्येक समाज का आधार माना जाता है। इससे अभिप्राय किसी समुदाय के निर्जीव पर्यावरण तथा उसमें पाए जाने वाले जीवधारियों की समग्र व्यवस्था का अध्ययन करने वाले विज्ञान से है। इस प्रकार, पारिस्थितिकी का अर्थ एक ऐसे जाल से है जहाँ भौतिक और जैविक व्यवस्थाएँ तथा प्रकियाएँ गठित होती है और मनुष्य भी इसका एक अंग होता है। पर्वत, नदियाँ, मैदान, सागर और जीव-जंतु सभी पारिस्थितिकी के अंग हैं।
संतुलित पर्यावरण को पारिस्थितिकतंत्र (Ecosystem) कहा जाता है। इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम ए० जी० टेन्सले नामक वैज्ञानिक ने 1935 ई० में किया था पर्यावरण के जैविक एवं अजैविक, सभी कारकों के परस्पर संबंधों को पारिस्थितिक तंत्र कहा जाता है। जब इसमें मानवीय प्रयासों के परिणामस्वरूप अवक्रमण होता है तो उसे पारिस्थितिकीय अवक्रमण कहा जाता है।

पारिस्थितिकी एवं समाज का संबंध 

पारिस्थितिकी एवं समाज में गहरा संबंध पाया जाता है। किसी स्थान की पारिस्थितिकी पर वहाँ के भूगोल तथा जलमंडल की अंत:क्रियाओं का प्रभाव पड़ता है। उदाहरणार्थ-मरुस्थलीय प्रदेशों में रहने वाले जीव-जंतु अपने आप को न्यून वर्षा, पथरीली अथवा रेतीली मिट्टी तथा अत्यधिक तापमान के अनुसार अपने आप को ढाल लेते हैं। इसीलिए यह कहा जाता है कि पारिस्थितिकीय कारक यह भी निर्धारित करते हैं कि किसी स्थान विशेष पर लोग कैसे रहेंगे। मरुस्थलीय प्रदेशों, पहाड़ी प्रदेशों, समुद्रतटीय क्षेत्रों, मैदानी प्रदेशों, बर्फीले प्रदेशों आदि में इसीलिए मानवीय जीवन में अंतर देखा जा सकता है। यह अंतर न केवल रहन-सहन, खान-पान एवं पहनावे में ही देखा जा सकता है बल्कि परंपराओं में भी भिन्नताएँ विकसित हो जाती हैं। मनुष्य की क्रियाओं द्वारा पारिस्थितिकी में होने वाले परिवर्तन से मानव समाज में भी परिवर्तन होना प्रारंभ हो जाता है। इसका अर्थ यह है कि जैवभौतिक पारिस्थितिकी सामाजिक पर्यावरण पर गहरा प्रभाव डालती है। एक तरफ प्रकृति समाज को आकार देती है दूसरी ओर समाज भी प्रकृति को आकार देता है।

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पारिस्थितिकीय अवक्रमण के कारण

संपूर्ण विश्व में आर्थिक विकास की जो कीमत चुकानी पड़ी है उसमें विस्थापन के अलावा पारिस्थितिकीय अवक्रमण (जिसे निम्नीकरण भी कहा जा सकता है) की समस्या भी प्रमुख मानी जाती है। पारिस्थितिकीय अवक्रमण वन क्षेत्र में होने वाली कमी, पानी की सतह नीची होने तथा भूमि कटाव के रूप में देखा जा सकता है। प्राकृतिक साधनों का अवक्रमण एक विश्व स्तर की समस्या बन गई है। तीव्र औद्योगीकरण व नगरीकरण, गहन कृषि, जनसंख्या विस्फोट, खनन तथा अन्य मानवीय क्रियाओं के परिणामस्वरूप भूमि तथा पानी के स्रोतों का अवक्रमण हुआ है।

भारत का अधिकतर भौगोलिक क्षेत्र किसी-न-किसी प्रकार के पारिस्थितिकीय अवक्रमण से प्रभावित हुआ है। वनों का बड़ी तेजी से विनाश हुआ है तथा पानी के स्रोत (नदियों, झीलों तथा जमीन के नीचे पानी) सूखते जा रहे हैं तथा पानी की गुणवत्ता प्रभावित होती जा रही है। प्राकृतिक साधनों का अवक्रमण आर्थिक विकास का परिणाम तो है ही यह भारत जैसे विकासशील देश में सामाजिक-आर्थिक विकास तथा विश्व पर्यावरण के लिए खतरा भी बनता जा रहा है। पारिस्थितिकीय अवक्रमण के निम्नलिखित कारण हैं –

1. वनों का विनाश – वनों की लकड़ी व्यवसाय में उपयोग करने तथा जड़ी-बूटियों हेतु किए जाने वाले वनों के कटाव के परिणामस्वरूप भारत में वन क्षेत्र बड़ी तेजी से घटता जा रहा है। जितने पेड़ लगाए जाते हैं उससे कहीं अधिक संख्या में काटे जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि भारत में । वन गाँवों से दूर होते जा रहे हैं। अनेक बार तो निजी स्वार्थों हेतु बड़े पैमाने पर वनों में आग लगा दी जाती है। गर्मियों में ग्रामवासी वनों में आग इसलिए भी लगा देते हैं कि बरसात के बाद अच्छी घास उपलब्ध हो पाएगी। अनेक बार तो विभागीय स्तर पर भी वन के कुछ हिस्से में। आग इसलिए लगा दी जाती है ताकि उसे कृषि योग्य बनाया जा सके और आग के पूरे वन क्षेत्र में फैलने से बचा जा सके। इससे मूल्यवान पेड़ नष्ट हो जाते हैं। विकास के नाम पर बनाए जाने वाले बड़े-बड़े बाँध भी पारिस्थितिकीय अवक्रमण विकसित करते हैं।

2. भूमि या मृदा कटाव – भूमि एक मूल्यवान भौतिक संपदा मानी जाती है। जब तक पारिस्थितिक तन्त्र में कोई छेड़-छाड़ नहीं की जाती या बहुत कम की जाती है जो आवश्यक होती है तब भूमि का निरंतर परिष्करण एवं संपन्नीकरण होता रहता है। जब इस पर, पेड़-पौधों का प्राकृतिक आवरण कम हो जाती है तो भूमि कटाव प्रांरभ हो जाती है। भू-स्खलन (Landslides) एवं गाद भरने (Siltation) के परिणामस्वरूप भी भूमि कटाव से पारिस्थितिकीय अवक्रमण की स्थिति पैदा हो जाती है।

3. जल स्रोतों की कमी – पानी जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक तत्त्व है। भारत में जल स्रोतों की भी निरंतर कमी होती जा रही है तथा भूमि के नीचे पानी का स्तर और नीचा होता जा रहा है। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि अगर यही स्थिति रही तो कुछ ही दशकों में पानी की अत्यधिक कमी हो जाएगी। कृषि उत्पादन बढ़ाने हेतु खादों के प्रयोग से पानी प्रदूषित होता जा रहा है तथा कम वर्षा के परिणामस्वरूप नदियों में पानी का स्तर घटता जा रहा है। मरुस्थल का निंरतर विस्तार होता जा रहा है। यह पारिस्थितिकीय अवक्रमण का ही द्योतक है।

4. खतरनाक उद्योग – अनेक बार औद्योगिक विकास के परिणामस्वरूप भी पारिस्थितिकीय संकट पैदा हो जाता है। उदाहरणार्थ-दून घाटी में चूने के उद्योग के परिणामस्वरूप पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचा है। इससे पानी का स्तर काफी नीचे पहुँच गया है, पेड़ धूल से भरे हुए रहते हैं तथा चूने की भट्टियों से हानिकारक गैसों का स्राव होता रहता है। इसी प्रकार, टिहरी बाँध के परिणामस्वरूप भी उपजाऊ भूमि के बहुत बड़े भाग को नष्ट कर दिया गया है।

सरकार ने भारत में बढ़ते हुए पारिस्थितिकीय अवक्रमण को देखते हुए आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण की दीर्घकालिक नीति बनाई है। इसके अंतर्गत पारिस्थितिकीय अवक्रमण को रोकने एवं प्रदूषण नियंत्रण हेतु चरणबद्ध ढंग से अनेक कार्यक्रम लागू किए गए हैं। अनेक गैर-सरकारी संगठनों को भी इस कार्य में सहयोग देने हेतु आर्थिक सहायता दी जा रही है।

2002 ई० में ‘नवीन राष्ट्रीय जल नीति‘ को स्वीकृति प्रदान की गई। इस योजना के अंतर्गत देश के जल संसाधनों के विकास की ओर विशेष ध्यान दिया जा रही है। राष्ट्रीय जल बोर्ड, राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद्, केंद्रीय भूमिगत जल प्राधिकरण तथा संबंधित जल संसाधन विकास योजना द्वारा इस दिशा में अनेक कदम उठाए गए हैं जिनसे थोड़ी सफलता ही मिल पाई है। पर्यावरणीय शिक्षा एवं सामान्य जागरूकता द्वारा जन-जागृति आने पर मिलने वाला नागरिकों का सहयोग ही इस समस्या के समाधान में सार्थक सिद्ध हो सकता है।

प्रश्न 2.
पर्यावरणीय प्रदूषण क्या है? यह कितने प्रकार का होता है?
या
पर्यावरणीय प्रदूषण की परिभाषा कीजिए तथा इसके सामाजिक प्रभावों की विवेचना कीजिए।
या
भारत में प्रदूषण नियंत्रण हेतु सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की समीक्षा कीजिए।
या
प्रदूषण नियंत्रण हेतु कुछ उपाय बताइए।
उत्तर
मानव ने अपनी सुख-सुविधाओं में वृद्धि हेतु पर्यावरण में इतना अधिक परिवर्तन कर दिया है। कि इससे पर्यावरणीय प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो गई है। यह समस्या आज किसी एक देश की नहीं, है, अपितु सभी दे, कम या अधिक सीमा में इस समस्या का सामना कर रहे हैं। भारत में यह समस्या एक गंभीर स्थिति बनती जा रही है जिसके अनेक दुष्परिणाम आज हमारे सामने आ रहे हैं। पर्यावरण के विभिन्न घटकों में मानवीय क्रिया-कलापों से जो असंतुलन आता जा रहा है, वही प्रदूषण कहलाता है।

पर्यावरणीय प्रदूषण का अर्थ एवं परिभाषाएँ

‘पर्यावरणीय प्रदूषण का अर्थ समझने के लिए पहले ‘पर्यावरण के अर्थ को समझ लेना अनिवार्य है। ‘पर्यावरण को अंग्रेजी में एनवायरमेंट’ (Environment) कहा जाता है। पर्यावरण’ शब्द दो शब्दों से बना है-‘परि’ + ‘आवरण। ‘परि’ शब्द का अर्थ होता है चारों ओर से’ एवं ‘आवरण’ शब्द का अर्थ होता है ‘ढके या घेरे हुए’। अन्य शब्दों में, पर्यावरण शब्द का अर्थ वह वस्तु है जो हमसे अलग होने पर भी हमें चारों ओर से ढके या घेरे रहती है। इस प्रकार, किसी जीव या वस्तु को जो-जो वस्तुएँ, विषय, जीव एवं व्यक्ति आदि प्रभावित करते हैं वे सब उसका पर्यावरण हैं। पर्यावरण अनुकूल भी हो सकता है और प्रतिकूल भी।

जब पर्यावरण अनुकूल होता है तो उससे प्रभावित होने वाली वस्तु का विकास होता है और जब यह प्रतिकूल होता है तो विकास अवरूद्ध हो जाता है। उदाहरण के लिए एक बीज को यदि उपजाऊ भूमि में डाल दिया जाएगा और पानी नहीं दिया जाएगा तो प्रतिकूल पर्यावरण के कारण वह नष्ट हो जाएगा। इसी प्रकार, मनुष्य का विकास भी अनुकूल व प्रतिकूल पर्यावरण से भिन्न-भिन्न रूप से प्रभावित होता है। जिसबर्ट (Gisbert) के अनुसार, “प्रत्येक वह वस्तु जो किसी वस्तु को चारों ओर से घेरती एवं उस पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालती है, पर्यावरण कही जाती है।” टी०डी० इलियट के अनुसर, चैतन पदार्थ की इकाई के प्रभावकारी उद्दीपन और अन्त: क्रिया के क्षेत्रों को पर्यावरण कहते हैं।

उपर्युक्त परिभाषाओं द्वारा ‘पर्यावरण’ का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। वास्तव में, पर्यावरण एक विस्तृत अवधारणा है। इसके विभिन्न रूप एवं प्रभाव हैं। पर्यावरण जीवन के प्रत्येक पक्ष में अंतर्निहित होता है। यह मानव-शक्तियों को निर्देशित या विमुक्त, उत्साहित या हतोत्साहित कर देता है। यह उसकी वाणी को मोड़ देता है, यह उसके संगठन को सूक्ष्म रूप से परिवर्तित करता है। केवल इतना ही नहीं, बल्कि इससे भी अधिक यह उसके अंदर निवास करता है। यह उसके मस्तिष्क और मांसपेशियों में अंकित है। यह उसके रक्त में भी कार्य करता है।

‘प्रदूषण’ का अर्थ पर्यावरण के किसी एक घटक या संपूर्ण पर्यावरण में होने वाला ऐसा परिवर्तन है जो कि मानव व अन्य प्राणियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। जब पर्यावरण में होने वाले परिवर्तन मानव तथा अन्य सजीवों व निर्जीवों को हानि पहुँचाने की स्थिति में पहुँच जाते हैं तो उसे हम प्रदूषण कहते हैं। मृदा (भूमि), जल एवं वायु भौतिक पर्यावरण के तीन प्रमुख घटक हैं। इनमें होने वाला असंतुलन जब जीवन-प्रक्रम चलाने में कठिनाई उत्पन्न करने लगता है तो उसे हम प्रदूषण कहते हैं। इसे निम्नांकित रूप में परिभाषित किया गया है –

1. अमेरिका के राष्ट्रपति की विज्ञान सलाहकार समिति (Science Advisory Committee to President of U.S.A) के अनुसार – “पर्यावरणीय प्रदूषण मनुष्यों की गतिविधियों द्वारा ऊर्जा स्वरूपों, विकिरण स्तरों, रासायनिक तथा भौतिक संगठनों और जीवों की संख्या में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किए जाने वाले परिवर्तन के परिणामस्वरूप उत्पन्न उप-उत्पाद हैं जो हमारे परिवेश में पूर्ण अथवा अधिकतम प्रतिकूल परिवर्तन उत्पन्न करता है।”

2. अमेरिका की राष्ट्रीय विज्ञान सलाहकार अकादमी (Environmental Committee of Science Advisory Forum of U.S.A) के अनुसार – “चूंकि पृथ्वी अधिक भीड़ युक्त हो रही है अत: प्रदूषण से बचने का कोई रास्ता नहीं है। एक व्यक्ति का कूड़ादान दूसरे व्यक्ति का निवास स्थल है।’

3. ओडम (Odum) के अनुसार – “प्रदूषण हमारी हवा, मृदा एवं जल के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक लक्षणों में अवांछनीय परिवर्तन है जो मानव जीवन तथा अन्य जीवों, हमारी औद्योगिक प्रक्रिया, जीवन दशाओं तथा सांस्कृतिक विरासतों को हानिकारक रूप में प्रभावित करता है अथवा प्रभावित करेगा ‘अथवा जो कच्चे पदार्थों के स्रोतों (संसाधनों) को नष्ट कर सकता है या करेगा।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि पर्यावरणीय प्रदूषण हमारे पर्यावरण में होने वाला ऐसा रासायनिक, भौतिक या अन्य किसी प्रकार का परिवर्तन है जो मानव जीवन व अन्य प्राणियों के जीवन-प्रक्रम पर अवांछनीय या हानिकारक प्रभाव डालता है।

पर्यावरणीय प्रदूषण के प्रकार

पारिस्थितिकीय विज्ञान के अनुसार, पृथ्वी को तीन प्रमुख भागों में बाँटा जा सकता है –

  1. स्थलमण्डल (Lithosphere),
  2. वायुमंडल (Atmosphere) तथा
  3. जलमंडल (Hydrosphere); अत: प्रदूषण मुख्यतः इन्हीं तीन क्षेत्रों में होता है। प्रदूषण के अन्य स्रोतों में हम उन स्रोतों को भी सम्मिलित करते हैं जो अत्यधिक जनसंख्या वृद्धि, वैज्ञानिक आविष्कारों तथा रासायनिक व भौतिक परिवर्तनों के कारण विकसित होते हैं। इनमें
  4. ध्वनि (Sound) तथा
  5. रेडियोधर्मिता (Radioactivity) व तापीय (Thermal) स्रोत प्रमुख हैं। अत: पर्यावरणीय प्रदूषण के प्रमुख प्रकार निम्नांकित हैं –

1. मृदीय प्रदूषण – मृदीय प्रदूषण का कारण मृदा में होने वाले अस्वाभाविक परिवर्तन हैं। प्रदूषित जल व वायु, उर्वरक, कीटाणुनाशक पदार्थ, अपतृणनाशी पदार्थ इत्यादि मृदा को भी प्रदूषित कर देते हैं। इसके काफी हानिकारक प्रभाव होते हैं तथा पौधों की वृद्धि रुक जाती है, कम हो जाती है अथवा उनकी मृत्यु होने लगती है। अगर मृदीय स्वरूप, मृदीय संगठन, मृदीय जल व वायु तथा मृदीय ताप में अस्वाभाविक परिवर्तन लाने का प्रयास किया जाता है तो इसका जीव-जंतुओं पर अत्यंत हानिकारक प्रभाव होता है।

2. जल प्रदूषण – जल में निश्चित अनुपात में खनिज, कार्बनिक व अकार्बनिक पदार्थ तथा गैसे घुली होती है। जब इसमें अन्य अनावश्यक व हानिकारक पदार्थ घुल जाते हैं तो जल प्रदूषित हो जाता है। कूड़ा-करकट, मल-मूत्र आदि का नदियों में छोड़ा जाना, औद्योगिक अवशिष्टों एवं कृषि पदार्थों (कीटाणुनाशक पदार्थ, अपतृणनाशक पदार्थ व रासायनिक खादं आदि) से निकले अनावश्यक पदार्थ जल प्रदूषण पैदा करते हैं। साबुन तथा गैसों के वर्षा के जल में घुलकर अम्ल व अन्य लवण बनाने से भी जल प्रदूषित हो जाता है। भारत में जल प्रदूषण एक प्रमुख समस्या है।

3. वायु प्रदूषण – वायु में गैसों की अनावश्यक वृद्धि (केवल ऑक्सीजन को छोड़कर) या उसके भौतिक व रासायनिक घटकों में परिवर्तन वायु प्रदूषण उत्पन्न करता है। मोटर गाड़ियों से निकलने वाला धुआँ, कुछ कारखानों से निकलने वाला धुआँ तथा वनों व वृक्षों के कटाव से वायु में ऑक्सीजन, नाइट्रोजन व कार्बन डाइऑक्साइड का संतुलन बिगड़ जाता है तथा यह मनुष्यों व अन्य जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने लगता है। दहन, औद्योगिक अवशिष्ट, धातुकर्मी प्रक्रियाएँ, कृषि रसायन, वनों व वृक्षों का काटा जाना, परमाणु ऊर्जा, मृत पदार्थ तथा जनसंख्या विस्फोट इत्यादि वायु प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं। जनसंख्या विस्फोट सबसे मुख्य कारण है। क्योंकि मानव ने अपने रहने तथा उद्योग का निर्माण करने के लिए ही तो वनों को काटा और इसी कारण वायु प्रदूषण बढ़ा है।

4. ध्वनि प्रदूषण – तीखी ध्वनि या आवाज से ध्वनि प्रदूषण पैदा होता है। विभिन्न प्रकार के यंत्रों, वाहनों, मशीनों, जहाजों, रॉकेटों, रेडियो व टेलीविजन, पटाखों, लाउडस्पीकरों के प्रयोग से ध्वनि प्रदूषण विकसित होता है। ध्वनि प्रदूषण प्रत्येक वर्ष दोगुना होता जा रहा है। ध्वनि प्रदूषण से सुनने की क्षमता का ह्रास होता है, रुधिर ताप बढ़ जाता है, हृदय रोग की आशंका बढ़ जाती है तथा तंत्रिका तंत्र संबंधी रोग हो सकते हैं। कुछ विशेष प्रकार की ध्वनियाँ सूक्ष्म जीवों को नष्ट . कर देती है, जिससे जैव अपघटन क्रिया में बांधा उत्पन्न होती है।

5. रेडियोधर्मी व तापीय प्रदूषण – रेडियोधर्मी पदार्थ पर्यावरण में विभिन्न प्रकार के कण और किरणें उत्पन्न करते हैं। इसी प्रकार, तापीय प्रक्रमों से भी कण निकलते हैं। ये कण व किरणे जल, वायु तथा मिट्टी में मिलकर प्रदूषण पैदा करते हैं। इस प्रकार के प्रदूषण से कैंसर, ल्यूकेमिया इत्यादि भयानक रोग उत्पन्न होते हैं तथा मनुष्यों में रोग अवरोधक शक्ति कम हो जाती है। बच्चों पर इस प्रकार के प्रदूषण का अधिक प्रभाव प्रड़ता है। नाभिकीय विस्फोट, आणविक ऊर्जा संयंत्र, परमाणु भट्टियाँ, हाइड्रोजन बम, न्यूट्रॉन व लेसर बम आदि इस प्रकार के प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं।

पर्यावरणीय प्रदूषण के प्रमुख कारण

वैसे तो प्रदूषण अनेक प्रकार का होता है तथा प्रत्येक प्रकार के प्रदूषण के कुछ विशिष्ट कारण हैं, फिर भी पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले अनेक सामान्य कारणों में से प्रमुख कारण अग्रलिखित हैं –

1. कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ती मात्रा – वायुमंडल में प्रमुखतः नाइट्रोजन, ऑक्सीजन तथा कार्बन डाई-ऑक्साइड गैसों का संतुलित अनुपात होता है; किंतु मानव द्वारा विभिन्न प्रकार से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ाई जा रही है। अनुमानतः गत 100 वर्षों में केवल मनुष्य ने ही वायुमण्डल में 36 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ी है। कल-कारखानों, यातायात के साधनों, ईंधन (Fuel) के जलाने आदि से यह कार्य हो रहा है। इस गैस का अनुपात बढ़ने से दोहरी हानि होने की आशंका है—एक तो यह स्वयं हानिकारक है। और दूसरे ऑक्सीजन जैसी प्राणदायक वायु का अनुपात कम होने का खतरा है।

2. घरेलू अपमार्जकों का प्रयोग – घर, फर्नीचर, बर्तन इत्यादि की सफाई के लिए प्रयोग किए जाने वाले तथा कुछ छोटे जीवों; जैसे-मक्खी, मच्छर, खटमल, कॉकरोच, दीमक, चूहे आदि को नष्ट करने के लिए उपयोग में आने वाले पदार्थों; जैसे साबुन, सोडा, विम, पेट्रोलियम उत्पाद, फैटी अम्ल, डी०डी०टी०, गैमेक्सीन, फिनायल आदि को प्रयोग करने के बाद नालियों इत्यादि के द्वारा नदियों, झीलों आदि के जल में मिला दिया जाता है। ये पदार्थ यदि विघटित नहीं होते हैं तो खाद्य श्रृंखलाओं में चले जाते हैं और विषाक्त रूप से प्रदूषण का कारण बन जाते हैं।

3. वाहित मल का नदियों में गिराया जाना – घरों, कारखानों इत्यादि स्थानों से अपमार्जक पदार्थों | (विषैली दवाएँ, मिट्टी का तेल, शैंपू इत्यादि) को बड़े-बड़े शहरों में नालों द्वारा बहाकर करके नदियों, झीलों या समुद्र में डाल दिया जाता है जो जल को प्रदूषित करते हैं। इन पदार्थों के विघटन से फीनोल, क्रोमेट, क्लोरीन, अमोनिया, सायनाइड्स (Cyanides) आदि उत्पन्न होते हैं। जो जल के पारिस्थितिक तंत्र के लिए तरह-तरह से हानिकारक सिद्ध होते हैं।

4. उद्योगों से अपशिष्ट रासायनिक पदार्थों का निकास – विभिन्न प्रकार के उद्योगों से, जिनकी संख्या सभ्यता के साथ-साथ बढ़ रही है, धुआँ इत्यादि के साथ अनेक प्रकार के रासायनिक पदार्थ (जैसे- विभिन्न गैसे, धातु के कण, रेडियोऐक्टिव पदार्थ इत्यादि) अपशिष्ट के रूप में निकलते हैं जो वाहित जलं की तरह जल तथा वायुमंडल को प्रदूषित करते हैं।

5. स्वतः चलित निर्वातक – विभिन्न प्रकार के स्वत:चलित यातायात वाहनों; जैसे-मोटर, रेलगाड़ी, जहाज, वायुयान आदि में कोयला, पेट्रोल, डीजल इत्यादि पदार्थों के जलने से अनेक प्रकार की विषैली गैसें वातावरण में आ जाती हैं। सल्फर डाइऑक्साइड (SO2), कार्बन डाइ-ऑक्साइड (CO2), कार्बन मोनो-ऑक्साइड (CO), क्लोरीन (CI), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NO), हाइड्रोजन फ्लोराइड (HF), फॉस्फोरस पेंटा-ऑक्साइड (P2O5), हाइड्रोजन सल्फाइड (H2S), अमोनिया (NH3) आदि हानिकारक गैसें इसी प्रकार वातावरण में बढ़ती जाती हैं।

6. रेडियोधर्मी पदार्थ – परमाणु बमों के विस्फोट तथा इसी प्रकार के अन्य परीक्षणों से रेडियोऐक्टिव पदार्थ वातावरण में आकर अनेक प्रकार से प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। यहाँ से ये पौधों में, जंतुओं के दूध व मांस में और फिर मनुष्य के शरीर में पहुँच जाते हैं। ये अनेक प्रकार के रोग; विशेषकर कैंसर तथा आनुवंशिक रोग उत्पन्न करते हैं। इनके प्रभाव से, जीन्स (Genes) का उत्परिवर्तन (Mutation) हो जाने से संततियाँ भी रोगग्रस्त या अपंग पैदा होती हैं।

7. कीटाणुनाशक एवं अपतृणनाशक पदार्थ – विभिन्न प्रकार के अवांछनीय जीवों एवं खरपतवारों को नष्ट करने के लिए अनेक प्रकार के रासायनिक पदार्थ काम में लाए जाते हैं। इनमें से कुछ पदार्थ हैं- डी०डी०टी० (D.D.T.), मीथॉक्सीक्लोर, फीनॉल, पोटैशियम परमैंगनेट, चूना, गंधक चूर्ण, सल्फर डाइऑक्साइड, क्लोरीन, फॉर्मेल्डीहाइड, कपूर आदि। ये पदार्थ जिस प्रकार के जीवों को नष्ट करने के काम में लाए जाते हैं। उसी के अनुसार इनका नाम होता है।

ये पदार्थ अवांछित रूप से भूमि, वायु, जल आदि में एकत्रित होकर उन स्थानों को प्रदूषित कर देते हैं। वहाँ से ये पौधों, भोजन, फलों इत्यादि के द्वारा जंतुओं और मनुष्यों के शरीर में पहुँच जाते हैं। इनमें देर से अपघटित (Decompose) होने वाले पदार्थ अधिक, खतरनाक होते हैं। भूमि में इनके एकत्रित होने से ह्युमस बनाने वाले जीव नष्ट हो जाते हैं। अतः भूमि की उर्वरता भी कम हो जाती है। मनुष्यों के शरीर में पहुँचकर ये तरह-तरह की हानियाँ पहुँचाते हैं।

उपर्युक्त कारणों के अतिरिक्त जनसंख्या में अत्यधिक वृद्धि, वनों से वृक्षों का काटा जाना, नाभिकीय ऊर्जा, मृत पदार्थों तथा युद्ध इत्यादि को भी पर्यावरणीय प्रदूषण का कारण माना गया है।

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पर्यावरणीय प्रदूषण के सामाजिक प्रभाव

पर्यावरणीय प्रदूषण के प्रमुख सामाजिक प्रभाव निम्नांकित हैं –

1. जीवन-प्रक्रम पर प्रभाव – प्रदूषण व्यक्तियों के जीवन-प्रक्रम तथा गतिविधियों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों रूपों से प्रभावित करता है। अत्यधिक प्रदूषण शारीरिक स्वास्थ्य तथा मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। बच्चों का विकास ठीक प्रकार से नहीं हो पाता तथा बीमारियों में वृद्धि हो जाती है।

2. रोगों में वृद्धि – प्रदूषण के परिणामस्वरूप रोगों में वृद्धि होती है तथा जन-स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ता है। पक्षाघात, पोलियो, मियादी बुखार, हैजा, डायरिया, क्षय रोग आदि अनेक बीमारियाँ विकसित हो जाती हैं। थकान व सिरदर्द भी काफी सीमा तक ध्वनि प्रदूषण का परिणाम है।

3. अपंगता में वृद्धि – प्रदूषण के बुरे प्रभाव से अपंगता में वृद्धि होती है। अनुसंधानों से ज्ञात हुआ है कि रेडियोधर्मी पदार्थों से उत्पन्न प्रदूषण का परिणाम अपंग संतान का उत्पन्न होना है। वैसे भी प्रदूषण के कारण, स्वस्थ शरीर में भी रोग निवारक क्षमता कम होती है। अपंगता से अप्रत्यक्ष रूप से अनेक सामाजिक समस्याएँ पैदा हो जाती हैं।

4. सामाजिक-आर्थिक समस्याओं में वृद्धि – प्रदूषण के कारण फसलें भी नष्ट हो जाती हैं। जलीय जीवों के मरने से खाद्य पदार्थों की हानि होती है। बड़ी संख्या में मछलियों आदि का मरना, बीमार होना आदि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होने के साथ-साथ अनेक आर्थिक समस्याएँ उत्पन्न कर देती है।

पर्यावरणीय प्रदूषण के निराकरण के उपाय

पर्यावरणीय प्रदूषण आज एक अत्यंत गंभीर समस्या है; अतः केंद्र तथा राज्य सरकारों ने प्रदूषण के नियंत्रण तथा पर्यावरण के संरक्षण के लिए अनेक उपाय किए हैं। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु केंद्र एवं राज्य सरकारों ने लगभग 30 कानून बनाए हैं। इनमें से प्रमुख कानून हैं- जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974; वायु (प्रदूषण और निवारण) अधिनियम, 1981; फैक्ट्री अधिनियम; कीटनाशक अधिनियम आदि। इन अधिनियमों के क्रियान्वयन का दायित्व केंद्रीय एवं राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, कारखानों के मुख्य निरीक्षक और कृषि विभागों के कीटनाशक निरीक्षकों पर है। पर्यावरण संरक्षण के संबंध में सरकारी प्रयासों का संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है –

1. पर्यावरण संगठनों का गठन – सबसे पहले चौथी योजना के प्रारंभ में सरकार का ध्यान पर्यावरण संबंधी समस्याओं की ओर आकर्षित हुआ। इस दृष्टि से सरकार ने सर्वप्रथम 1972 ई० में एक पर्यावरण समन्वय समिति का गठन किया। जनवरी 1980 ई० में एक अन्य समिति का गठन किया जिसे विभिन्न कानूनों तथा पर्यावरण को बढ़ावा देने वाले प्रशासनिक तंत्र की विवेचना करने और उन्हें सुदृढ़ करने हेतु सिफारिशें देने का कार्य सौंपा गया। इस समिति की सिफारिश पर 1980 ई० में पर्यावरण विभाग की स्थापना की गई। परिणामस्वरूप पर्यावरण के कार्यक्रमों के आयोजन, प्रोत्साहन और समन्वय के लिए 1985 ई० में ‘पर्यावरण और वन्य-जीवन मंत्रालय की स्थापना की गई।

2. पर्यावरण (सुरक्षा) अधिनियम, 1986 – यह अधिनियम 19 नवम्बर,1986 ई० से लागू हो गया है। इस अधिनियम की कुछ महत्त्वपूर्ण बातें निम्नांकित हैं –
पर्यावरण की गुणवत्ता के संरक्षण के लिए सभी आवश्यक कदम उठाना,

  1. इससे केंद्र सरकार को निम्नलिखित अधिकार प्राप्त हो गए हैं –
    • पर्यावरण सुरक्षा से संबंधित अधिनियमों के अंतर्गत राज्य सरकारों, अधिकारियों और प्राधिकारियों के काम में समन्वय स्थापित करना,
    • पर्यावरणीय प्रदूषण के निवारण, नियंत्रण और उपशमन के लिए राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम की योजना बनाना और उसे क्रियान्वित करना,
    • पर्यावरणीय प्रदूषण के नि:सरण के लिए मानक निर्धारित करना,
    • किसी भी अधिकारी को प्रवेश, निरीक्षण, नमूना लेने और जाँच करने की शक्ति प्रदान करना,
    • पर्यावरणीय प्रयोगशालाओं की स्थापना करना या उन्हें मान्यता प्रदान करना,
    • सरकारी विश्लेषकों को नियुक्त करना या उन्हें मान्यता प्रदान करना,
    • पर्यावरण की गुणवत्ता के मानक निर्धारित करना,
    • दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए रक्षोपाय निर्धारित करना और दुर्घटनाएँ होने पर उपचारात्मक कदम उठाना,
    • खतरनाक पदार्थों के रखरखाव/सँभालने आदि की प्रक्रियाएँ और रक्षोपाय निर्धारित करना, तथा
    • कुछ ऐसे क्षेत्रों का परिसीमन करना जहाँ किसी भी उद्योग की स्थापना अथवा औद्योगिक गतिविधियाँ संचालित न की जा सकें।
  2. किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार प्राप्त है कि निर्धारित प्राधिकरणों को 60 दिन की सूचना देने के बाद इस अधिनियम के उपबंधों का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध न्यायालयों में शिकायत कर दे।
  3. अधिनियम के अंतर्गत किसी भी स्थान का प्रभारी व्यक्ति किसी दुर्घटना आदि के परिणामस्वरूप प्रदूषकों का रिसाव निर्धारित मानक से अधिक होने या अधिक रिसाव होने की आशंका पर उसकी सूचना निर्धारित प्राधिकरण को देने के लिए बाध्य होगा।
  4. अधिनियम का उल्लंघन करने वालों के लिए अधिनियम में कठोर दंड देने की व्यवस्था की गई है।
  5. इस अधिनियम के अंतर्गत आने वाले मामले दीवानी अदालतों के कार्यक्षेत्र में नहीं आते।

3. जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण बोर्ड – केंद्रीय जल प्रदूषण निवारण और नियंत्रण बोर्ड, जल और वायु प्रदूषण के मूल्यांकन, निगरानी और नियंत्रण की शीर्षस्थ संस्था है। जल (1974) और वायु (1981) प्रदूषण निवारण और नियंत्रण कानूनों तथा जल उपकर अधिनियम (1977) को लागू करने का उत्तरदायित्व बोर्ड पर और इन अधिनियमों के अंतर्गत राज्यों में गठित इसी प्रकार के बोर्डो पर है।

4. केंद्रीय गंगा प्राधिकरण – सरकार ने 1985 ई० में केंद्रीय गंगा प्राधिकरण की स्थापना की थी। गंगा सफाई कार्य-योजना का लक्ष्य नदी में बहने वाली मौजूदा गंदगी की निकासी करके उसे अन्य किन्हीं स्थानों पर एकत्र करना और उपयोगी ऊर्जा स्रोत में परिवर्तित करने का है। इस योजना में निम्नलिखित कार्य शामिल हैं –

  1. दूषित पदार्थों की निकासी हेतु बने नालों और नालियों का नवीनीकरण,
  2. अनुपयोगी पदार्थों तथा अन्य दूषित द्रव्यों को गंगा में जाने से रोकने के लिए नए रोधक नालों का निर्माण तथा वर्तमान पम्पिंग स्टेशनों और जल-मल सयंत्रों का नवीनीकरण,
  3. सामूहिक शौचालय बनाना, पुराने शौचालयों को फ्लश में बदलना, विद्युत शव दाह गृहे बनवाना तथा गंगा के घाटों का विकास करना, तथा
  4. जल-मल प्रबंध योजना का आधुनिकीकरण।

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5. अन्य योजनाएँ – पर्यावरणीय प्रदूषण के निराकरण हेतु जो योजनाएँ बनाई गईं, उनमें से प्रमुख योजनाएँ इस प्रकार हैं –

  1. राष्ट्रीय पारिस्थितिकी बोर्ड (1981) की स्थापना,
  2. विभिन्न राज्यों में जीव-मंडल भंडारों की स्थापना,
  3. सिंचाई भूमि स्थलों के लिए राज्यवार नोडल एकेडेमिक रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना,
  4. राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड (1985) की स्थापना,
  5. वन नीति में संशोधन,
  6. राष्ट्रीय वन्य जीवन कार्य योजनाओं का आरंभ,
  7. अनुसंधान कार्यों के लिए निरंतर प्रोत्साहन,
  8. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करना, तथा
  9. प्रदूषण निवारण पुरस्कारों की घोषणा।

प्रदूषण के निराकरण हेतु सरकार द्वारा उठाए गए कदमों में समाज के व्यक्तियों के साथ की कमी रही। है। इस कारण इन उपायों के उचित परिणाम अभी हमारे सामने नहीं आए हैं। जल, वायु तथा मृदा प्रदूषण के निराकरण हेतु एक ओर जहाँ संतुलित औद्योगिक विकास को बनाए रखा जाना आवश्यक है। तो दूसरी ओर जनसंख्या विस्फोट जैसे सामाजिक कारकों पर नियंत्रण रखना भी जरूरी है। हमारे समाज में बढ़ते हुए ध्वनि प्रदूषण को रोकने हेतु तथा वनों और वृक्षों को काटने से रोकने के लिए भी अधिक कठोर कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।

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