UP Board Solutions for Class 11 History Chapter 11 Paths to Modernisation

UP Board Solutions for Class 11 History Chapter 11 Paths to Modernisation (आधुनिकीकरण के रास्ते)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर
संक्षेप में उत्तर दीजिए

प्रश्न 1.
मेजी पुनस्र्थापना से पहले की वे अहम घटनाएँ क्या थीं, जिन्होंने जापान के तीव्र आधुनिकीकरण को सम्भव किया?
उत्तर :
जापान में शोगुनों को तोकुगावा शासन प्रणाली के पूर्व समस्त राजसत्ता जापान के सम्राटों के हाथों में केन्द्रित थी। बाद में शोगुनों की शक्ति बढ़ जाने के कारण जापान में दोहरा शासन स्थापित हो गया। अब वास्तविक शक्ति शोगुनों के हाथों में में आ गई थी और वे सम्राट के नाम पर राज्य के समस्त कार्यों को संचालन करते थे परन्तु 250 वर्ष के दीर्घकालीन इस शासनतन्त्र में अनेक दोष उत्पन्न हो गए थे।

1. जापान की पृथक्ता का प्रभाव :
विदेशियों की शक्ति के समक्ष जापानी शासन को झुकना | पड़ा था और उसे अपने द्वार विदेशी व्यापार के लिए खोलने पड़े थे, इस कारण अब शोगुन सत्ता तथा जापानी सरकार के लिए एक गम्भीर समस्या उत्पन्न हो गई। जापान का प्रभावशाली तथा समुराई वर्ग दो गुटों में विभाजित हो गया। 1858 से 1868 ई० के दस वर्षों में एक ओर तो विदेशी विरोध की भावनाओं ने इतना उग्र रूप धारण कर लिया कि जापानी सरकार के लिए कानून और व्यवस्था बनाए रखना असम्भव हो गया और दूसरी ओर उसे विदेशियों के क्रोध का भय लगने लगा था। शोगुनों की शक्ति निरन्तर कम होती जा रही थी और सम्राट की शक्ति को महत्त्व मिलने लगा था।

जापान की पृथक्ता की नीति के प्रणेता शोगुन ही थे किन्तु 250 वर्षों से लागु रहने के कारण यह नीति बन गई थी। 1845 ई० में नए जापानी सम्राट कोमई ने पृथक्ता की नीति को मान्यता भी प्रदान कर दी थी लेकिन जब शोगुन ने पेरी तथा हैरिस से सन्धि की तो क्योटो में स्थित सम्राट और उसके दरबारियों ने इस नीति की कटु आलोचना की किन्तु विदेशी शक्ति के सामने शोगुन विवश थे और उसने विदेशियों के लिए जापान के द्वार खोलकर सम्राट लथा सामन्तों का विरोध सहने का निश्चय कर लिया। विदेशियों के लिए देश के द्वार खुलते ही दोहरी शासन प्रणाली के दोष स्पष्ट होने लगे।

विदेशी शक्तियाँ शोगुन को ही जापान का सर्वोच्च शासक समझती थीं लेकिन जब विदेशियों तथा शोगुन शासक के मध्य कठिन प्रश्न उत्पन्न हो गए तब शोगुन ने यह तर्क प्रस्तुत किया कि इन प्रश्नों पर निर्णय लेने से पहले क्योतो में सम्राट से अनुमति लेनी आवश्यक है। विदेशी सोचते थे कि शोगुन का यह तर्क उनको धोखा देने या टाल-मटोल करने के लिए था। दूसरी ओर, जेब प्रश्नों को क्योटों में सम्राट का निर्णय जानने के लिए भेजा जाता तो जापानी जनता यह समझने लगी। कि सम्राट के वास्तविक अधिकारों का प्रयोग शोगुन करते हैं। सदियों बाद जटिल तथा महत्त्वपूर्ण प्रश्नों का निर्णय के लिए जाना शोगुनों की दुर्बलता का प्रतीक था।

यदि शोगुन ने विदेशियों से सन्धि करने से पहले सम्राट का ऐसे महत्त्वपूर्ण विषयों पर विश्वास प्राप्त कर लिया  होता तो शोगुनों की सत्ता समाप्त न होती। यथार्थ में शोगुन इतने निर्बल और शक्तिहीन हो चुके थे। इसके साथ-साथ शोगुनों के दुर्भाग्य से क्योतो राजदरबार में जापान के पश्चिमी कुलीनों विशेषकर ‘सत्सुमा’ तथा ‘चीशू कुलों के नेताओं का भारी प्रभाव था जो तोकुगावा शोगुनों से। ईष्र्या रखते थे; अत: उनके लिए यह सुनहरा अवसर था। इसी समय जापान की आन्तरिक घटनाओं ने आन्तरिक और बाह्य परिस्थितियों पर बहुत गहरा प्रभाव डाला। शोगुन विरोधी सामन्तों तथा कुलों ने शोगुनों को अपमानित करने के विदेशी विरोध की भावनाओं को बड़ी तेजी से फैलाना शुरू कर दिया।

इसी बीच स्वयं तोकुगावा कुल में तात्कालिक शोगुन की मृत्यु के बाद नए उत्तराधिकारी के चुनाव तथा पृथक्ता की नीति का परित्याग करने के प्रश्नों पर आपसी मतभेद उत्पन्न हो गया। आन्तरिक विद्रोह तथा विदेशी दबाव के कारण शोगुन शासक को उचित तथा अनुचित का ध्यान नहीं रहा और उसने तुष्टिकरण की नीति अपनानी प्रारम्भ कर दी। शोगुन शासन के विरोधी सामन्तों तथा कुलों के लोग विदेशी विरोध की भावनाओं के कारण अनेक स्थानों पर विदेशियों पर आक्रमण कर चुके थे; अत: जापानी इस हिंसा तथा प्रतिहिंसा के कारण शीघ्र ही विदेशी विरोध की नीति को छोड़ने के लिए बाध्य हुए।
2. शोगुन शासन प्रणाली का पतन :
तोकुगावा शोगुन की निर्बलता के कारण जापान की शासन-व्यवस्था अत्यन्त अस्त-व्यस्त हो गई थी। स्वामिभक्त सेवकों का अभाव, रिक्त राजकोष, दुर्बल रक्षा व्यवस्था आदि अनेक कारणों से शोगुन शासन व्यवस्था दिन-प्रतिदिन कमजोर होती जा रही थी और उसमें इतनी शक्ति नहीं रह गई थी कि वह जापान में विदेशियों के प्रवेश को रोक सके; अतः समय की धारा के सम्मुख शोगुनों को झुकने के लिए बाध्य होना पड़ा और यह समर्पण ही अन्ततः शोगुन के पतन का मूल कारण बना। शोगुन शासन के पतन के प्रमुख कारणों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित हैं

  1.  आन्तरिक असन्तोष :
    पश्चिमी राज्यों के जापान में प्रवेश के समय देश में चारों ओर आन्तरिक अव्यवस्था और असन्तोष फैला हुआ था। जापान के अनेक सामन्ती परिवार तोकुगावा शोगुन के परिवार के विरुद्ध हो गए थे। शोगुन ने अपने दण्डात्मक कार्यों से अन्य सामन्त परिवारों को कष्ट पहुँचाया। जापान के एक कानून ‘सान्किन कोताई’ के अनुसार सामन्तों से राजाज्ञा के बिना किले बनाने का अधिकार छीन लिया गया। साथ ही जहाज बनाने और सिक्के ढलवाने के अधिकार से भी उन्हें वंचित कर दिया। विवाह करने के लिए भी उन्हें शोगुन की पहले आज्ञी लेनी पड़ती थी। इन कारणों और कुछ अन्य कारणों से सामन्तों ने शोगुन शासन का विरोध करना शुरू कर दिया।
  2.  कृषक वर्ग का असन्तोष :
    जापान का कृषक वर्ग करों के अत्यधिक भार से दबे होने के कारण अपनी वर्तमान स्थिति से असन्तुष्ट था। सामन्ती व्यवस्था और करों के भार से उसकी दिशा निरन्तर गिरती जा रही थी। साथ-ही पश्चिमी सभ्यता के सम्पर्क के कारण उनमें जागरूकता आने लगी थी। अतः उन्होंने अनेक स्थानों पर विद्रोह करने शुरू कर दिए थे। वे शोगुन शासन को उखाड़कर अपनी स्थिति को सुधारना चाहते थे।
  3.  अन्य सामन्तों द्वारा शोगुन शासन का विरोध :
    पश्चिम के देशों के जापान में प्रवेश से उत्पन्न खतरे से मुक्ति पाने के लिए अन्य सामन्तों ने शोगुन शासन व्यवस्था को समाप्त करने का प्रयत्न करना शुरू कर दिया। उनका विचार था कि जापान पर आने वाली सारी विपत्तियों का प्रमुख कारण शोगुन व्यवस्था की अदूरदर्शिता और दुर्बलता है; अत: इसका अन्त किया जाना अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि इसी के कारण जापान की स्वतन्त्रता को खतरा उत्पन्न हो रहा है। सामन्तों ने जनता को शोगुनों के विरुद्ध भड़काना शुरू कर दिया। उनको विचार था कि यदि जनमत शोगुन के विरुद्ध हो जाएगा, तब उसका अंकुश अन्य सामन्तों पर ढीला पड़ जाएगा और वे शोगुन की शक्ति को समाप्त कर सकेंगे।
  4.  चोशू सामन्तों और शोगुन सामन्तों में संघर्ष :
    चोशू सामन्तों के विदेशियों के प्रति विरोधी , दृष्टिकोण को देखते हुए शोगुन ने उनकी शक्ति को कुचलने का निश्चय किया और एक विशाल सेना की सहायता से उनके विद्रोह का अन्त कर दिया परन्तु सत्सुमा सामन्तों के आड़े आ जाने के कारण शोगुन को अपने रुख को बदलना पड़ा। फिर भी चोशू सामन्तों से यह शर्त रखी गई कि वह अपनी नवगठित सैनिक शक्ति को भंग कर देगा परन्तु जब इन सैनिक दस्तों को भंग करने का प्रयत्न किया गया तो उन्होंने विद्रोह कर दिया तथा राजधानी पर अधिकार कर चोशू में क्रान्ति को भड़का दिया। अतः शोगुन ने फिर से चोशू शक्ति को कुचलने का प्रयास किया। परन्तु शोगुन पर विदेशी प्रभुत्व बढ़ जाने के कारण उसे किसी अन्य सामन्त का समर्थन प्राप्त नहीं था; अत: चोशू सामन्तों के साथ संघर्ष में शोगुन को पराजित होना पड़ा। 7 मार्च, 1866 ई० को विजयी चोशू और सत्सुमा के मध्य एक सन्धि हो गई जिसमें उन्होंने शोगुन शासन को नष्ट करने का निश्चय किया। एक महीने बाद पुत्रविहीन शोगुन की मृत्यु हो गई। तोकुगावा वंश की शाही मितो शाखा का एक बहुत योग्य व्यक्ति नया शोगुन बना। उधर 1867 ई० में विदेश विरोधी सम्राट की भी मृत्यु हो। गई और विगत शत्रुता और परम्पराओं से मुक्त नया सम्राट गद्दी पर बैठा। इस प्रकार वित्तीय समस्याओं से दुःखी, विदेशियों द्वारा प्रताड़ित, आन्तरिक विद्रोह तथा अशान्ति को रोकने में असमर्थ, राजकीय दरबार तथा सामन्तों के सहयोग और समर्थन से वंचित नए शोगुन ने 9 नवम्बर, 1867 ई० को त्याग-पत्र दे दिया। इस प्रकार 250 वर्ष पुराने शोगुन शासन को जापान में अन्त हो गया।
  5. 3. मेजी पुनस्र्थापना :
    1868 ई० में तोकुगावा शोगुनों के शासन का अन्त हो गया और केन्द्रीय शक्ति पुनः सम्राट के हाथों में आ गई। जापान के सम्राट मुत्सुहितो के शासन काल में यह क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ था। सम्राट मुत्सुहितो 1867 ई० में जापान के सिंहासन पर आसीन हुआ। सम्राट बनने पर उसने मेजी की उपाधि धारण की जिसका अर्थ ‘प्रबुद्ध शासन’ है और वह इसी नाम से जापान के इतिहास में प्रसिद्ध हुआ।

प्रश्न 2.
जापान के विकास के साथ-साथ वहाँ की रोजमर्रा की जिन्दगी में किस तरह बदलाव आए? चर्चा कीजिए।
उत्तर :
जापान के विकास के साथ-साथ वहाँ की प्रतिदिन की जिन्दगी में निम्नलिखित बदलाव आए

  1.  1870 के दशक में नवीन विद्यालयी व्यवस्था का निर्माण हुआ। लड़के-लड़कियों के लिए विद्यालय जाना अनिवार्य कर दिया गया।
  2.  पाठ्यपुस्तकों में माता-पिता का सम्मान करने, राष्ट्र के प्रति निष्ठा और अच्छे नागरिक बनने कीप्रेरणा दी गई।
  3.   आधुनिक कारखानों में 50 प्रतिशत महिलाएँ कार्यरत थीं।
  4.  जापान में इकाई परिवार की अवधारणा का विकास हुआ जिसमें पति-पत्नी और बच्चे होते थे।
  5. नए प्रकार के घर, रसोई के उपकरण और मनोरंजन के साधनों का विकास हुआ।

प्रश्न 3.
पश्चिमी शक्तियों द्वारा पेश की गई चुनौतियों का सामना छींग राजवंश ने कैसे किया?
उत्तर :
पश्चिमी शक्तियों द्वारा प्रस्तुत की गई चुनौतियों का सामना करने के लिए छींग राजवंश ने एक आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था, नई सेना और शैक्षणिक व्यवस्था के निर्माण के लिए नीति बनाई। संवैधानिक सरकार की स्थापना के लिए स्थानीय विधायिकाओं का गठन किया। चीन को उपनिवेशीकरण से बचाने के प्रयास किए।

प्रश्न 4.
सन यात-सेन के तीन सिद्धान्त क्या थे?
उत्तर :

सन यात-सेन 

सन यात-सेन जन्म से ही क्रान्तिकारी थे। उन्होंने मंचू सरकार को हटाकर चीन में गणतन्त्र की स्थापना की थी। वे लोकतन्त्र के समर्थक थे। यह सही है कि डॉ० सेन की राजनीतिक विचारधारा रूस के साम्यवादी दर्शन से बहुत अधिक प्रभावित थी और उन्होंने अपने देश में साम्यवादी ढंग से परिवर्तन लाने का प्रयास भी किया था। फिर भी वे साम्यवादी दर्शन के अन्धभक्त नहीं थे। वे यह अच्छी तरह से जानते थे कि रूस श्रमिकों का देश है और उनका देश चीन किसानों का, इसलिए उन्होंने अपने राजनीतिक विचारों को अपने देश की परिस्थितियों के अनुकूल ही बनाया।

डॉ० सेन के तीन सिद्धान्त

डॉ० सन यात-सेन ने अपने क्रान्तिकारी जीवन के प्रारम्भ से ही अपने राजनीतिक विचारों को तीन सिद्धान्तों के रूप में रख दिया था। ये सिद्धान्त निम्नलिखित थे

  1. राष्ट्रीयता :
    चीन में सदियों से जहाँ एक ओर सांस्कृतिक एकता तो मौजूद थी, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक एकता को पूर्ण अभाव था। यह अभाव बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में भी विद्यमान था। जनता में स्थानीय तथा प्रान्तीय भावनाएँ शक्तिशाली थीं। यही कारण था कि विदेशी साम्राज्यवादी शक्तियाँ चीन में अपना प्रभाव स्थापित करने में सफल हो रही थीं। डॉ० सन यात-सेन
  2.  राजनीतिक लोकतन्त्र :
    डॉ० सन यात-सेन लोकतन्त्र के पक्के समर्थक थे। इसी कारण उन्होंने चीन में सदियों से चले आ रहे मंचू राजवंश को समाप्त करके राजवंश की प्राचीन परम्परा को समाप्त कर दिया था। उन्हें जनता की शक्ति में विश्वास था और यही कारण था कि वे लोकतन्त्र के समर्थक थे। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन विदेशों के गणतन्त्रीय वातावरण में व्यतीत किया था और स्वयं वहाँ के विकास को देखा था। यही कारण था कि उन्होंने चीन में क्रान्ति करके गणतन्त्र की स्थापना को अपने जीवन का पवित्र लक्ष्य बना लिया था। 1924 ई० में लोकतन्त्र के विषय में उनके विचार बहुत अधिक मजबूत हो गए थे। उनका विचार था “सफल लोकतन्त्र में सरकार की शासन प्रणाली, कानून, कार्य, न्याय, परीक्षा तथा नियन्त्रण के पंच शक्ति विधान पर आधारित होनी चाहिए।’ लोकतन्त्र को सफलता की अन्तिम चोटी पर पहुँचने के लिए सेन ने तीन बातों पर विशेष बल दिया था। सबसे पहले देश में सैनिक शक्ति के प्रभुत्व की स्थापना करके देश में पूरी शान्ति तथा व्यवस्था स्थापित की जाए। इसके बाद देश में राजनीतिक चेतना का प्रसार किया जाए और अन्त में वैधानिक तथा लोकतन्त्रीय सरकार को निर्माण करके देश अपने लक्ष्यों को प्राप्त करें।
  3. जनता की आजीविका :
    सन यात-सेन ने मानव जीवन में भोजन की भारी आवश्यकता का अच्छी तरह से अनुभव कर लिया था और यही कारण था कि उन्होंने कृषक वर्ग के उत्थान की ओर अधिक ध्यान दिया। उनका मत था कि ‘भूमि उसकी है जो उसे जोतता है। समाज के अन्य वर्गों की जीविका के प्रश्न का समाधान वे सामाजिक विकास के साथ करना चाहते थे। वे साम्यवादियों के समान भूमि के समान वितरण के सिद्धान्त के पक्ष में थे। इस समय उनकी नीति एक प्रबल साम्यवादी की न होकर एक समाज-सुधारक की नीति थी परन्तु वे मार्क्स के भौतिकवाद के विरोधी थे और अच्छी तरह से यह अनुभव करते थे कि मार्क्स के सिद्धान्तों को चीन में लागू नहीं किया जा सकता है। सन यात-सेन के तीन सिद्धान्तों पर विचार करने के पश्चात् यह स्पष्ट होता है कि डॉ० सेन के सिद्धान्त माक्र्सवाद से बिल्कुल भिन्न थे। सेन के राष्ट्रीयता, लोकतन्त्र और जनता की जीविका के सिद्धान्तों में मार्क्स के वर्ग संघर्ष का कोई स्थान नहीं है और न ही इन सिद्धान्तों में मार्क्स के समाजवादी अर्थतन्त्र की स्थापना के लिए कोई विशेष बल दिया गया है। इससे स्पष्ट हो जाता है। कि सन यात-सेन न तो मार्क्स की शुद्ध समाजवादी विचारधारा के समर्थक थे और न ही साम्यवादी नीति का अन्धानुकरण करने वाले थे। इस प्रकार सन यात-सेन को साम्यवाद का कट्टर समर्थक नहीं कहा जा सकता है।

संक्षेप में निबन्ध लिखिए

प्रश्न 5.
क्या पड़ोसियों के साथ जापान के युद्ध और उसके पर्यावरण का विनाश तीव्र औद्योगीकरण की जापानी नीति के चलते हुआ?
उत्तर :
जापानी तीव्र औद्योगीकरण की नीति के चलते पड़ोसियों के साथ युद्ध और उसके पर्यावरण के विनाश के कारण निम्नलिखित थे

  1.  जापान तेजी से औद्योगीकरण करना चाहता था। इसके लिए उसे कच्चे माल की आवश्यकता थी। उसे प्राप्त करने के लिए वह उपनिवेश बसाने का इच्छुक था। इस दृष्टि से जापान ने 1895 ई० में ताइवाने पर आक्रमण किया और उसे अपने साम्राज्य में मिला लिया। इसी प्रकार 1910 ई० में कोरिया पर भी अधिकार स्थापित कर लिया। वह इतने से ही सन्तुष्ट नहीं हुआ। उसने 1894 ई० में चीन को पराजित किया और 1905 ई० में रूस से टक्कर ली।
  2.  उद्योगों के तीव्र और अनियन्त्रित विकास और लकड़ी जैसे प्राकृतिक संसाधनों की माँग से पर्यावरण का विनाश हुआ। प्रथम संसद में प्रतिनिधि चुने गए तनाको शोजे ने 1897 ई० में औद्योगिक प्रदूषण के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ दिया जिसमें लगभग 800 लोगों ने भाग लिया।

प्रश्न 6.
क्या आप जानते हैं कि माओत्सेतुंग और चीन के साम्यवादी दल ने चीन को मुक्ति दिलाने और इसकी मौजूदा कामयाबी की बुनियादी डालने में सफलता प्राप्त की?
उत्तर :
जिस समय चीन में साम्यवाद के उदय की भूमिका तैयार थी, उसी समय चीनियों को माओत्सेतुंग जैसा क्रान्तिकारी नेता प्राप्त हुआ। माओ में मजदूर वर्ग तथा निम्न वर्ग को संगठित करने की असाधारण क्षमता विद्यमान थी। उसके प्रयासों से वास्तव में चीन में साम्यवाद का उदय और प्रसार हुआ। माओत्सेतुंग ने 1928-1934 के मध्य कुओमीनतांग के आक्रमणों से सुरक्षा के लिए शिविर लगाए। उन्होंने किसान परिषद् का गठन किया और भूमि पर कब्जा किया तथा उसे पुनः लोगों में बाँट दिया। इससे चीन का एकीकरण हुआ। स्वतन्त्र सरकार और सेना पर जोर दिया गया। उसने महिलाओं के कल्याण के लिए अनेक कार्य किए। ग्रामीण महिला संघों की स्थापना पर जोर दिया, विवाह के नए नियम बनाए, विवाह के समझौते, खरीदने और बेचने पर रोक लगा दी। तलाक पद्धति को सरल रूप दिया।

परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
मेजी संविधान कब पारित हुआ?
(क) 1884 ई० में
(ख) 1872 ई० में
(ग) 1889 ई० में
(घ) 1842 ई० में
उत्तर :
(ग) 1889 ई० में

प्रश्न 2.
जापान में मेजी संविधान में सम्राट की स्थिति कैसी थी?
(क) सर्वोच्च
(ख) सर्वश्रेष्ठ
(ग) सर्वोपरि
(घ) सर्वाधिकारवादी
उत्तर :
(क) सर्वोच्च

प्रश्न 3.
जापान में शोगुनों का पतन कब हुआ?
(क) 1867 ई० में
(ख) 1868 ई० में
(ग) 1872 ई० में
(घ) 1894 ई० में
उत्तर :
(क) 1867 ई० में

प्रश्न 4.
मेजी सरकार ने सर्वप्रथम देश में किस ओर ध्यान दिया?
(क) आर्थिक विकास
(ख) औद्योगिक विकास
(ग) उद्योगों की स्थापना
(घ) कपड़ा व्यापार
उत्तर :
(ख) औद्योगिक विकास

प्रश्न 5.
जापान में रेलवे लाइन बिछाने का कार्य कब आरम्भ हुआ?
(क) 1892 ई० में
(ख) 1872 ई० में
(ग) 1897 ई० में
(घ) 1894 ई० में
उत्तर :
(ख) 1872 ई० में

प्रश्न 6.
योगो के कारखाने में भाप से चलने वाले जहाज कब से तैयार होने लगे?
(क) 1872 ई० से
(ख) 1886 ई० से
(ग) 1883 ई० से
(घ) 1882 ई० से
उत्तर :
(ग) 1883 ई० से

प्रश्न 7.
सन यात-सेन का जन्म कब हुआ था?
(क) 1866 ई० में
(ख) 1872 ई० में
(ग) 1884 ई० में
(घ) 1892 ई० में
उत्तर :
(क) 1866 ई० में

प्रश्न 8.
आधुनिक चीन का निर्माता किसे माना जाता है?
(क) ली चुंग
(ख) सन यात-सेन
(ग) युआन-शी-काई
(घ) च्यांग-काई-शेक
उत्तर :
(ख) सन यात-सेन

प्रश्न 9.
डॉ० सर्ने यात-सेन का मूल नाम क्या था?
(क) यू-शू-कुल
(ख) सन यात-ली
(ग) ली-फाग
(घ) ताइ-चियांग
उत्तर :
(घ) ताइ-चियांग

प्रश्न 10.
सिंग-चुंग हुई नामक गुप्त संस्था की स्थापना कब हुई?
(क) 1894 ई० में
(ख) 1895 ई० में
(ग) 1901 ई० में
(घ) 1905 ई० में
उत्तर :
(क) 1894 ई० में

प्रश्न 11.
सन यात-सेन को चीनी गणतन्त्र का राष्ट्रपति कब चुना गया?
(क) दिसम्बर 1911 ई० में
(ख) मार्च 1919 ई० में
(ग) जनवरी 1912 ई० में
(घ) दिसम्बर 1921 ई० में
उत्तर :
(क) दिसम्बर 1911 ई० में

प्रश्न 12.
सन यात-सेन का प्रमुख सिद्धान्त क्या था?
(क) राष्ट्रीयता
(ख) समाजवाद
(ग) लोकतन्त्र
(घ) ये तीनों
उत्तर :
(घ) ये तीनों

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सन यात-सेन कौन थे?
उत्तर :
सन यात-सेन आधुनिक चीन के निर्माता और चीनी राष्ट्रवाद के उन्नायक थे।

प्रश्न 2.
सन यात-सेन का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तर :
सन यात-सेन का जन्म 2 नवम्बर, 1866 ई० को चीन के क्वांगुतुंग प्रदेश के चुयुङ नामक ग्राम में हुआ था।

प्रश्न 3.
सन यात-सेन ने हांगकांग में कौन-सी संस्था स्थापित की?
उत्तर :
सन यात-सेन ने हांगकांग में ‘तुंग-मिंग-हुई’ नामक क्रान्तिकारी संस्था स्थापित की।

प्रश्न 4.
चीन में तुंग-मिंग-हुई नामक क्रान्तिकारी संस्था की स्थापना कब हुई?
उत्तर :
चीन में तुंग-मिंग-हुई नामक क्रान्तिकारी संस्था की स्थापना सितम्बर, 1905 ई० में हुई।

प्रश्न 5.
डॉ० सन यात-सेन का निधन कब हुआ?
उत्तर :
डॉ० सन यात-सेन का निधन 12 मार्च, 1925 ई० को हुआ।

प्रश्न 6.
डॉ० सेन के तीन सिद्धान्त बताइए।
उत्तर :
डॉ० सेन के तीन सिद्धान्त थे

  1.  राष्ट्रीयता
  2. राजनीतिक लोकतन्त्र तथा
  3.  समाजवाद

प्रश्न 7.
डॉ० सन यात-सेन के दो कार्य बताइए।
उत्तर :

  1.  सन यात-सेन ने क्रान्तिकारी संस्था ‘तुंग-मिंग’ हुई की स्थापना की
  2.  उन्होंने चीन में कुओमीनतांग दल की नींव डाली

प्रश्न 8.
च्यांग-काई-शेक का जन्म कब हुआ था?
उत्तर :
च्यांग-काई-शेक का जन्म 30 अक्टूबर 1887 ई० में चेकियांग प्रान्त के फेंगुवा जिले के चिको नामक स्थान पर हुआ था।

प्रश्न 9.
च्यांग-काई-शेक ने सैनिक प्रशिक्षण कहाँ प्राप्त किया?
उत्तर :
च्यांग-काई-शेक ने जापान के ‘सैनिक स्टाफ कॉलेज में सैनिक प्रशिक्षण प्राप्त किया।

प्रश्न 10.
जापान के कृषक वर्ग में असन्तोष का कारण लिखिए।
उत्तर :
करों की अधिकता ने जापान के कृषक वर्ग में असन्तोष फैलाया।

प्रश्न 11.
तोकुगावा शोगुनों के शासन का अन्त कब हुआ?
उत्तर :
तौकुगावा शोगुनों के शासन का अन्त 9 नवम्बर, 1867 ई० में हुआ।

प्रश्न 12.
मेजी संविधान की एक विशेषता बताइए।
उत्तर :
मेजी संविधान की एक विशेषता जनता के मौलिक अधिकार से सम्बन्धित थी।

प्रश्न 13.
मेजी पुनस्र्थापना से जापान के किन क्षेत्रों में प्रगति हुई?
उत्तर :
मेजी पुनस्र्थापना से जापान के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक सभी क्षेत्रों में प्रगति हुई।

प्रश्न 14.
जापान में रेलवे लाइनें बिछाने का कार्य कब प्रारम्भ किया गया?
उत्तर :
जापान में रेलवे लाइनें बिछाने का कार्य 1872 ई० में प्रारम्भ किया गया।

प्रश्न 15.
जापान ने बैंकों की समस्या का क्या हल निकाला?
उत्तर :
जापान ने बैंकों की समस्या का हल अमेरिकन प्रणाली के आधार पर राष्ट्रीय बैंकों का विनिमय करके किया।

प्रश्न 16.
बैंक ऑफ जापान की स्थापना कब हुई?
उत्तर :
बैंक ऑफ जापान की स्थापना 1882 ई० में हुई।

प्रश्न 17.
जापान में कृषि क्षेत्र की प्रगति कब से आरम्भ हुई?
उत्तर :
जापान में कृषि क्षेत्र की प्रगति 1868 ई० से आरम्भ हुई।

प्रश्न 18.
जापान में पश्चिमी भाषाओं के ग्रन्थों का अनुवाद कब से प्रारम्भ हुआ?
उत्तर :
जापान में पश्चिमी भाषाओं के ग्रन्थों का अनुवाद 1811 ई० से प्रारम्भ हुआ।

प्रश्न 19.
जापान के प्राथमिक विद्यालयों का पंचवर्षीय पाठ्यक्रम कब प्रारम्भ किया गया?
उत्तर :
जापान के प्राथमिक विद्यालयों का पंचवर्षीय पाठ्यक्रम 1899 ई० में प्रारम्भ किया गया।

प्रश्न 20.
जापान के धार्मिक क्षेत्र के दो सुधार बताइए।
उत्तर :

  1. जापान में बौद्ध धर्म के स्थान पर शिन्तो धर्म का प्रचार हुआ और यह जापान का राजधर्म बन गया।
  2.  इसके परिणामस्वरूप जापानी लोगों में राष्ट्रीय चेतना तथा एकता की भावना का उदय हुआ।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शोगुन प्रणाली के पतन के प्रमुख कारण लिखिए।
उत्तर :
शोगुन प्रणाली के पतन के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

  1. आन्तरिक असन्तोष-शोगुन ने अपने दण्डात्मक कार्यों से सामन्त परिवारों को कष्ट पहुँचाया था। यहाँ तक कि उन्हें विवाह करने के लिए भी पहले आज्ञा लेनी पड़ती थी। इसके अतिरिक्त अन्य अनेक कारणों से भी सामन्तों में असन्तोष था।
  2. समुराइयों का विरोध-शोगुन शासन में आर्थिक स्थिति खराब होने से समुराई सैनिकों को नौकरी से निकाल दिया गया। इससे इन सैनिकों में असन्तोष फैल गया था और वे शोगुनों के विरोधी बन बैठे थे।
  3.  सामन्तों द्वारा शोगुन शासन का विरोध-सामन्तों का विचार था कि जापान पर आने वाली विपत्तियों का प्रमुख कारण शोगुन शासन प्रणाली है: अतः सामन्तों ने जनता को शोगुनों के विरुद्ध कर दिया था।
  4.  कृषक वर्ग का असन्तोष-जापान का कृषक वर्ग भी करों के कारण शोगुनों से असन्तुष्ट था।  चोशू सामन्तों और शोगुन सामन्तों में संघर्ष-चोशू सामन्तों के विदेशियों के प्रति विरोध दृष्टिकोण को देखते हुए शोगुन ने उनकी शक्ति को कुचलने का निश्चय किया; अतः उनके ” मध्य संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में शोगुनों की सहायता किसी ने नहीं की।

प्रश्न 2.
मेजी सरकार ने सामन्त प्रथा का अन्त करने के लिए क्या कार्य किए?
उत्तर :
सामन्त प्रथा का अन्त करने के लिए मेजी सरकार ने निम्नलिखित कार्य किए

  1. 1868 ई० में सरकार ने यह व्यवस्था की कि प्रत्येक सामन्त की जागीर में एक राजकर्मचारी की नियुक्ति हो।
  2.  1869 ई० में नेताओं की प्रेरणा पर अनेक सामन्तों ने अपनी जागीरें मेजी सम्राट को लौटा दी। सम्राट ने इन सामन्तों को अपनी-अपनी जागीर का सूबेदार बना दिया।
  3.  सम्राट ने अन्य सामन्तों को भी आदेश दिया कि वे जागीरें सम्राट को लौटा दें। देश-प्रेम की भावना के कारण किसी सामन्त ने आदेश का उल्लंघन नहीं किया।
  4.  1871 ई० में सम्राट ने सभी सामन्तों को मासिक पेन्शन देने की सुविधा दी। परन्तु इससे राजकोष पर भार अधिक बढ़ गया; अतः 1873 ई० में मासिक पेन्शन की जगह एक निश्चित रकम देने की आज्ञा दी गई।

प्रश्न 3.
मेजी संविधान की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर :
मेजी संविधान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

  1. सम्राट की सर्वोच्चता-मेजी संविधान पूँजीवाद सामन्तवाद का अद्भुत मिश्रण था। यह सम्राट की ओर से उपहार था और इसमें परिवर्तन भी सम्राट ही कर सकते थे।
  2.  परामर्शदात्री परिषद्-संविधान के अनुसार दो परामर्शदात्री परिषदों
    (1) मन्त्रिपरिषद् तथा
    (2) प्रीवि-परिषद्
    का गठन किया गया। मन्त्रिपरिषद् का कार्य शासन सम्बन्धी कार्यों का संचालन करना था। प्रीवि-परिषद् का निर्माण स्वयं सम्राट करता था।
  3.  द्विसदनीय संसद-इस संसद में दो सदन रखे गए। उच्च सदन में धनी-मानी व्यक्ति होते थे तथा निम्न सदन में सारे देश की जनता के प्रतिनिधि थे।
  4.  संसद का अधिवेशन-जापानी संसद का प्रमुख अधिवेशन प्रतिवर्ष तीन माह का होता था। इसके सदस्यों को वाद-विवाद करने का अधिकार था।
  5.  मौलिक अधिकार-मेजी संविधान की एक अन्य विशेषता यह थी कि इसके अन्तर्गत जनता को कुछ मौलिक अधिकार दिए गए थे।

प्रश्न 4.
मेजी संविधान में निहित मूल अधिकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
जापान की जनता को मेजी संविधान में कुछ मौलिक अधिकार दिए गए थे। जापान के प्रत्येक नागरिक को भाषण करने, लिखने, सभा करने, संस्था बनाने और इच्छानुसार किसी भी धर्म को स्वीकार करने की स्वतन्त्रता प्राप्त होगी। वे अपनी योग्यतानुसार सरकारी पद को प्राप्त करने का अधिकार रखते थे। वे अपना निवास स्थान बदल सकते थे। राजकर्मचारी बिना आज्ञा के किसी व्यक्ति के घर में घुसकर तलाशी नहीं ले सकते थे। जनता को सम्पत्ति रखने में बेचने ी पूरी स्वतन्त्रता थी। उन पर बिना मुकदमा चलाए दण्ड नहीं लगाया जा सकता था।

प्रश्न 5.
जापान में मेजी की सरकार ने औद्योगिक प्रगति किस प्रकार की?
उत्तर :
जापान में मेजी सरकार ने सर्वप्रथम देश के औद्योगिक विकास की ओर ध्यान दिया। जापानी यह अनुभव करते थे कि विकास के लिए पाश्चात्य औद्योगीकरण आवश्यक है; अतः जापान में नए-नए उद्योगों की स्थापना होने लगी। वहाँ यूरोप तथा अमेरिका से मशीने मँगाई जाने लगी। जापान सरकार ने भी इसे बहुत प्रोत्साहन दिया। कुछ ही वर्षों में जापान एक औद्योगिक देश बन गया। जापान के कारखानों में कपड़ा, रेशम तथा लोहे का सामान भारी मात्रा में तैयार होने लगा। सैनिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण लोहे के व्यवसाय के लिए खाने खोदी गईं। लोहा-इस्पात उद्योग का काफी विकास किया गया। भाप-शक्ति के विकास पर विशेष बल दिया गया। अब औद्योगिक क्षेत्र में जापान किसी भी यूरोपीय देश का सामना कर सकता था।

प्रश्न 6.
डॉ० सन यात-सेन के राजनीतिक आदर्श क्या थे?
उत्तर :
डॉ० सन यात-सेन की राजनीतिक विचारधारा रूस के साम्यवादी दर्शन से प्रभावित थी और उन्होंने अपने देश में साम्यवादी ढंग से परिवर्तन लाने का प्रयत्न भी किया, फिर भी वे साम्यवादी दर्शन के अन्धभक्त नहीं थे। उन्होंने अपने राजनीतिक विचारों में निम्नलिखित आदर्शों को रखा था

  1. राष्ट्रीयता-चीन में सदियों से जहाँ एक ओर सांस्कृतिक एकता मौजूद थी, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक एकता का अभाव था। इस अभाव का अनुभव करके उन्होंने देश में राष्ट्रीयता का बिगुल बजाया।
  2.  राजनीतिक लोकतन्त्र-डॉ० सन यात-सेन लोकतन्त्र के पक्के समर्थक थे। उन्होंने चीन में क्रान्ति करके गणतन्त्र की स्थापना को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।
  3.  जनता की आजीविका-सन यात-सेन ने मानव जीवन में भोजन की भारी आवश्यकता का अच्छी तरह अनुभव कर लिया था और यही कारण था कि उन्होंने कृषक वर्ग के उत्थान की ओर अधिक ध्यान दिया। उनका मत था कि भूमि उसकी हो, जो भूमि जोतता और बोता है।

प्रश्न 7.
सन यात-सेन के प्रमुख कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
चीन में सन यात-सेन ने निम्नलिखित कार्य किए

  1. चीन में शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार किया।
  2. सन यात-सेन ने जापान के याकोहामा को अपना कार्य-क्षेत्र बनाकर प्रवासी चीनी क्रान्तिकारियों को जाग्रत किया।
  3.  1905 ई० में सन यात-सेन ने चीन में ‘तुंग-मिंग-हुई’ नामक क्रान्तिकारी संस्था की स्थापना की।
  4.  सन यात-सेन ने 1906, 1907 तथा 1910 के छुटपुट विद्रोहों की भूमिका तैयार की और 1911 ई० की क्रान्ति को सम्भव बनाया।
  5. चीन में गणतन्त्र की स्थापना के लिए वे निरन्तर संघर्ष करते रहे और अन्ततः असफलता प्राप्त की।
  6. आधुनिक चीन में जागरण लाने के लिए उन्होंने बड़ी योग्यता के साथ देश को एकीकरण के धरातल पर लाने का प्रयास किया।

प्रश्न 8.
च्यांग-काई-शेक के उत्तरी अभियान का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :
कुछ योद्धा सरदार (War Lords) अपनी शक्ति का उत्तर-चीन में दुरुपयोग कर चीन की राष्ट्रीय एकता को नष्ट कर रहे थे। सन यात-सेन कुछ परिस्थितियों के कारण उनके विरुद्ध कोई सक्रिय कदम नहीं उठा पाए थे। अत: इसकी जिम्मेदारी उन्होंने च्यांग-काई-शेक को सौंप दी। च्यांग ने राष्ट्रीय एकता की स्थापना करने के लिए सैनिक अभियान प्रारम्भ करने की योजना बनाई। चीन की राष्ट्रीय एकता स्थापित करने तथा जापानी साम्राज्यवाद की कठपुतली बने उत्तरी योद्धा सरदारों द्वारा चीन की अखण्डता तथा सार्वभौमिकता को दी जा रही चुनौती एवं उनका प्रभाव नष्ट करने के लिए च्यांग-काई-शेक की अध्यक्षता में राष्ट्रीय सेना ने कैण्टन से उत्तर की ओर प्रस्थान किया। 60 हजार सैनिकों की यह सेना राष्ट्रीय भावनाओं से परिपूर्ण थी। च्यांग-काई-शेक के नेतृत्व में राष्ट्रीय सेना ने सर्वप्रथम हैंको (Hankow) पर अधिकार कर लिया फिर नानकिंग और शंघाई पर उनका अधिकार हो। गया। जून 1928 ई० में पीकिंग शासन समाप्त कर दिया और कुओमीनतांग दल की सरकार चीन की सर्वेसर्वा बन गई।

प्रश्न 9.
च्यांग-काई-शेक का साम्यवादियों से संघर्ष क्यों हुआ?
उत्तर :
1927 ई० में च्यांग-काई-शेक ने हैंकों पर विजय प्राप्त की और बोरोडिन (Borodin) के प्रभांव से वहाँ पर साम्यवादी ढंग की सरकार स्थापित की गई। इस प्रकार ‘कुओमीनतांग में वामपक्ष का उदय हुआ। दक्षिणपन्थी दल की दृष्टि में वह डॉ० सन यात-सेन के राष्ट्रीयता के सिद्धान्त की अपेक्षा आर्थिक समानता को अधिक महत्त्वपूर्ण समझता था। विचारों की इस भिन्नता ने धीरे-धीरे गृहयुद्ध का रूप धारण कर लिया। च्यांग ने हैंको की वामपन्थी सरकार को भंग कर दिया और उसके स्थान पर नानकिंग में राष्ट्रीय सरकार की स्थापना कर दी।

उसने व्यापारियों और पूँजीपतियों के सहयोग से, देश को साम्यवादी प्रभाव से मुक्त करने का निश्चय किया। इस कार्य में जापान ने भी सहयोग दिया साम्यवादियों ने च्यांग के साथ अनेक युद्ध किए, परन्तु अन्त में उन्हें क्वांगसी प्रान्त छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा। च्यांग-काई शेक ने चार बार साम्यावादियों पर भारी क्रमण किए परन्तु उनकी गुरिल्ला नीति व लाल सेना के उत्साह के कारण ये आक्रमण विफल रहे। उसके पाँचवें विशाल व भयंकर आक्रमण के फलस्वरूप साम्यवादियों को क्वांगसी प्रान्त छोड़कर शैन-सी-जाने का निश्चय करना पड़ा। इस आक्रमण में चीन के अपार धन और जन की हानि हुई।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मेजी युग में जापान की प्रगति की विवेचना कीजिए। अथवा “जापान के इतिहास में मेजी युग सुधारों के लिए विख्यात है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
मेजी युग में जापान की प्रगति मेजी पुनस्र्थापना से जापान में एक नए युग का आरम्भ हुआ। इस युग में जापान के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक सभी क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति हुई और जापान, जो कि एक पिछड़ा हुआ देश था, विश्व का एक शक्तिशाली देश बन गया। मेजी युग में जापान ने निम्नलिखित क्षेत्रों में अत्यधिक प्रगति की
1. औद्योगिक प्रगति :
मेजी सरकार ने सर्वप्रथम देश के औद्योगिक विकास की ओर ध्यान दिया। जापानी यह अनुभव कर रहे थे कि इस क्षेत्र में वे पश्चिमी देशों की तुलना में बहुत पिछड़े हुए हैं और जब तक वे अपना पर्याप्त आर्थिक विकास नहीं कर लेते तब तक वे पश्चिमी देशों का सामना नहीं कर सकते, इसीलिए उन्होंने तीव्र गति से पाश्चात्य औद्योगीकरण को अपनाना प्रारम्भ कर दिया। जापान में नए-नए उद्योगों की स्थापना की जाने लगी और यूरोप तथा अमेरिका से नई-नई मशीनें मॅगाई जाने लगीं। सरकार की ओर से जापान में उद्योग-धन्धे स्थापित करने के लिए बहुत प्रोत्साहन दिया गया। इसके परिणामस्वरूप कुछ ही वर्षों के अन्दर जापान में औद्योगिक क्रान्ति’ हो गई और जापान एक औद्योगिक देश बन गया।
2. यातायात व संचार के साधनों का विकास :
मेजी सरकार ने यातायात और संचार के साधनों के विकास की ओर भी विशेष ध्यान दिया। 1872 ई० में जापान में रेलवे लाइनें बिछाने का कार्य प्रारम्भ हुआ और 1894 ई० तक सम्पूर्ण देश में रेलवे लाइनों का जाल बिछ गया। 1872 ई० में टोकियो तथा याकोहामा के बीच 19 मील लम्बी रेलवे लाइन बिछाई गई। 1874 ई० में कोबा तथा ओसाका के मध्य रेलगाड़ी चलने लगी। 1893 ई० में जापान में 1,500 मील लम्बी रेलवे लाइनें बिछा दी गईं। इस रेलवे मार्ग ने देश के आन्तरिक व्यवसाय तथा व्यापार की उन्नति में काफी सहायता पहुँचाई। इसके फलस्वरूप जापान में राष्ट्रीयता के विकास में भी काफी सहायता मिली।

इसके साथ ही सरकार ने डाक विभाग का भी संगठन किया। 1868 ई० में पहली बार टेलीग्राफ का प्रयोग किया गया। कुछ वर्षों में ही जापान में अनेक डाकघरों की स्थापना हो गई। रेलवे तथा डाक के विकास के साथ-साथ मेजी सरकार ने जहाजों के निर्माण की ओर ध्यान दिया तथा 19वीं सदी के अन्त तक नौ-सैनिक शक्ति में आश्चर्यजनक प्रगति कर ली। 1870 ई० के लगभग जापान में सौ-सौ टन के जहाजों का निर्माण होने लगा। 1883 ई० में नागासाकी के कारखाने में 10 और हयोगो के कारखाने में 23 भाप से चलने वाले जहाज तैयार हुए। 1890 ई० तक जापान विश्व की एक प्रमुख सामुद्रिक शक्ति वाला देश बन गया।
3. मुद्रा सुधार :
मेजी सरकार ने मुद्रा विनिमय में भी सुधार किया। अब तक जापान में विनिमय के लिए सोना तथा चाँदी का प्रयोग होता था और इसके साथ-साथ शोगुन शासन तथा अनेक सामन्तों ने अपने-अपने सिक्के चला रखे थे। इसके अतिरिक्त सोने तथा चाँदी के सिक्कों का ऐसा सम्बन्ध था कि विदेशी अपने देश से चाँदी मँगा लेते थे और 1858 ई० को सन्धि तथा बाद में हुए जापानी सरकार के साथ अन्य समझौते के अनुसार उसे जापान की चाँदी से बदल लेते थे और बाद में इस जापानी चाँदी को सोने में बदलकर उसका निर्यात करते थे।

इसके परिणामस्वरूप जापान का सोना विदेशों को चला जाता था। सन्धि परिवर्तन तथा विनिमय नियन्त्रण के द्वारा ही इस स्थिति में सुधार और निराकरण हो सकता था। सरकार के सामने ऐसी कागजी मुद्रा चलाने के अतिरिक्त और कोई चारा ही न था जो मुद्रा सोने-चाँदी में न बदली जा सके।
4. बैंकिंग सुविधाओं का विकास :
मुदा-विनिमय तथा बैंकों की समस्या को हल करने की दिशा में पहला कदम मेजी सरकार ने 1872 ई० में उठाया। ईतो ने अमेरिकन विनिमय मुद्रा तथा बैंकिंग प्रणाली का विशेष अध्ययन कर यह सुझाव दिया कि अमेरिकन प्रणाली के आधार पर राष्ट्रीय बैंकों का विनिमय कर दिया जाए। 1873 ई० में जापान में पहला राष्ट्रीय बैंक (National Bank) स्थापित किया गया और दो धनी परिवारों को आदेश दिया गया कि वे बैंक को चलाने के लिए आवश्यक धन लगाएँ। प्रारम्भ में बैंकिंग का विकास काफी धीमा था और 1876 ई० तक जापान में केवल 4 बैंक थे। इसी वर्ष बैंकों के नियमन में संशोधन किया गया। और नोटों को mमुद्रा में बदलने की अनुमति दे दी गई।

इसके बाद जापान में बैंकिंग का बड़ी तेजी के साथ विकास हुआ। 1879 ई० तक जापान में 151 राष्ट्रीय बैंकों की स्थापना हो गई थी। बैंकिंग के विकास के साथ ही अपरिवर्तनीय नोटों की संख्या में वृद्धि हुई। इन नोटों की संख्या-वृद्धि और 1877 ई० के सत्सुमा विद्रोह के प्रसार के फलस्वरूप जापान में कीमतें असाधारण रूप से बढ़ गईं और जनता को अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा।
5. कृषि का विकास :
क्लाइड के अनुसार, “आरम्भिक मेजी कालीन जापान में औद्योगीकरण की यह प्रणाली ऐसे समाज में चलाई गई जो अधिकांशतः कृषिप्रधान था, इसलिए यह आश्चर्यजनक नहीं कि मेजी के नेता उसी क्रान्तिकारी उत्साह से कृषि की नई व्यवस्था में जुट गए जो उन्होंने राजनीति और उद्योग में दिखाया था। इस काल में कृषि का भी खूब विकास हुआ।
6. शिक्षा के क्षेत्र में सुधार :
मेजी शासनकाल में जापान में शिक्षा के क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण सुधार किए गए। जापान प्रारम्भ से ही पश्चिम के ज्ञान-विज्ञान का अध्ययन करने के लिए बहुत उत्सुक था। 1811 ई० में शोगुन शासन ने पश्चिमी भाषाओं के ग्रन्थों की जापानी भाषा में अनुवाद करने के लिए जो ‘बाशो शीराबेशी’ नामक संस्था स्थापित की थी, उसे 1857 ई० में एक शिक्षण संस्था का रूप दे दिया गया, जिसमें पश्चिमी भाषाओं और विज्ञानों की शिक्षा दी जाती थी। कुछ जापानियों ने इसी उद्देश्य से पश्चिमी देशों की यात्रा भी की थी।

अतः पुनस्र्थापना के बाद शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी तेजी के साथ प्रगति हुई। 1868 ई० की शाही शपथ घोषणा में कहे गए इस वाक्य कि ‘हर स्थान से ज्ञान प्राप्त किया जाए’ के अनुसार 1871 ई० में शिक्षा विभाग की स्थापना की गई। एक कानून बनाकर यह व्यवस्था कर दी गई कि प्रत्येक व्यक्ति ऊँचा और नीचा, स्त्री और पुरुष शिक्षा प्राप्त करे जिससे कि सारे समाज में कोई परिवार और परिवार का कोई भी व्यक्ति अशिक्षित और अज्ञानी न रह जाए।”
7. सामाजिक क्षेत्र में सुधार :
मेजी युग में जापान के सामाजिक जीवन में, पश्चिमी सम्पर्क के कारण आश्चर्यजनक परिवर्तन हुए। जापानी लोगों ने विदेशी कपड़ों को पहनना शुरू कर दिया। तिनका का हैट लगाए, बेंत लिए, सफेद सूती दस्ताने और एड़ीदार जूते पहले व्यक्ति याकोहामा के बाजारों में गर्मी की शाम को घूमते हुए नजर आने लगे। वे अमेरिकी नमूने के सूट पहनने लगे। 1872 ई० में सभी सरकारी अधिकारियों के लिए पाश्चात्य वेशभूषा धारण करना अनिवार्य कर दिया गया। सूट पहनने का फैशन इतना अधिक बढ़ गया कि लन्दन की उत्तम दर्जियों की गली ‘साबिलटो की नकल कर जापान में दर्जियों का भी सोबिटो’ मुहल्ला बस गया। जापानी लोग हाथ मिलाकर अभिवादन करने लगे। स्त्रियों ने भी विक्टोरियन ढंग के कपड़े पहनने शुरू कर दिए।

1887 ई० में जापान में सबसे पहले बिजली का प्रयोग शुरू हुआ और तब से बिजली का प्रयोग निरन्तर बढ़ता गया। इसके साथ ही जापान में यूरोपीय ढंग पर मकान बनने लगे और उनकी सजावट भी यूरोपीय शैली के आधार पर की जाने लगी। नगरों में बहुत अधिक संख्या में सवारियाँ चलने लगी। 869 ई० में हाथ में चलने वाली एक हल्के पहियों की गाड़ी का प्रचलन हुआ। इसे ‘जीनरो केशा’ (मनुष्य की शक्ति से चलने वाली गाड़ी) कहते थे। आधुनिक रिक्शा इसी का विकसित रूप है।
8. धार्मिक क्षेत्र में सुधार :
मेजी पुनस्र्थापना के बाद जापान में धार्मिक जीवन में भी परिवर्तन हुआ। बौद्ध धर्म के स्थान पर शिन्तों धर्म का विशेष प्रचार हुआ और यह जापान का राजधर्म बन । गया। इस धर्म ने राष्ट्रीयता के विकास में काफी सहायता पहुँचाई। जापानी जनता अपने सम्राट के प्रति असीम श्रद्धा और अटूट राजभक्ति रखने लगी। इसके परिणामस्वरूप जापानी लोगों में राष्ट्रीय चेतना तथा एकता की भावना का उदय हुआ। इस प्रकार मेजी पुनस्र्थापना के बाद जापान के लगभग सभी क्षेत्रों में क्रान्तिकारी परिवर्तन और प्रगति हुई। इस युग में ही आधुनिक जापान का जन्म हुआ जो शीघ्र ही अपनी उच्चता के चरम शिखर पर पहुँच गया। वस्तुत: जापान के इतिहास में मेजी युग’ सुधारों का महत्त्वपूर्ण काल था।

प्रश्न 2.
जापान के आधुनिकीकरण का संक्षेप में वर्णन कीजिए। या “जापान का आधुनिकीकरण दक्षिण-पूर्वी एशिया के इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना
थी।” व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
जापान का आधुनिकीकरण मेजी पुनस्र्थापना के बाद जापान में आधुनिकीकरण की भावना का बड़ी तेजी के साथ विकास हुआ। जापान ने राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक आदि सभी क्षेत्रों के पश्चिमी विचारों और सिद्धान्तों को अपना लिया। इस प्रकार जापान का आधुनिकीकरण विश्व के इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना बन गई। जापान में आधुनिकीकरण की भावना का प्रसार होने का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि जापानी लोग पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान को सीखकर अपने देश को इतना अधिक शक्तिशाली बनाना चाहते थे जिससे वह पश्चिमी देशों का सामना कर सकें। जापान अपने को चीन के समान केवल भाग्य पर छोड़ने के लिए तैयार नहीं था, इसलिए जापान ने बड़ी तेजी के साथ अपना आधुनिकीकरण किया।

1. सेना का आधुनिकीकरण :
मेजी युग से पूर्व जापान की सेना का संगठन समुराई लोगों द्वारा | होता था और ये समुराई विभिन्न सामन्तों की सेवा में रहकर कार्य किया करते थे। मेजी युग में शाही उद्घोषणा में इस प्राचीन प्रणाली का परित्याग कर दिया गया और सभी व्यक्तियों को सेना में भर्ती होने का अवसर प्रदान किया गया। सन् 1872 ई० में जापान में अनिवार्य सैनिक सेवा लागू कर दी गई और सभी के लिए यह आवश्यक कर दिया गया कि वे सैनिक शिक्षा प्राप्त करें और एक निश्चित अवधि तक सैनिक जीवन व्यतीत करें। वास्तव में, यह एक क्रान्तिकारी कदम था। इसके द्वारा सभी व्यक्तियों को सेना में बिना किसी भेदभाव के उच्च पद प्राप्त करने का ‘अवसर प्राप्त हुआ।
2. शिक्षा का आधुनिकीकरण :
जापान में शिक्षा का भी आधुनिकीकरण हुआ। लाखों की संख्या में जापानी छात्र शिक्षा प्राप्त करने के लिए यूरोप तथा अमेरिका गए। उन्होंने अपने देश लौटकर शिक्षा के क्षेत्र में क्रान्ति उत्पन्न कर दी। अभी तक जापान में मुख्य रूप प्राचीन साहित्य व धर्म ग्रन्थों की शिक्षा प्रदान की जाती थी परन्तु अब जापानी शिक्षा में पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान को भी स्थान दिया जाने लगा। लगभग सभी जापानी स्कूलों में अंग्रेजी भाषा अनिवार्य रूप से पढ़ाई जाने लगी। 1872 ई० में जापान में अनिवार्य शिक्षा पद्धति को लागू किया गया और इसकी पूर्ति के लिए जापान के प्रत्येक ग्राम तथा नगर में प्राथमिक स्कूलों की स्थापना की गई।

प्रत्येक बालक व बालिका के लिए कम-से-कम 4 वर्ष तक शिक्षा प्राप्त करना अनिवार्य कर दिया गया। जापानी स्कूलों में राष्ट्र-प्रेम की शिक्षा देने की विशेष व्यवस्था की गई। 1902 ई० के बाद स्त्रियों की उच्च शिक्षा की पर्याप्त व्यवस्था की गई। क्लाइड के अनुसार, पुरुषों के लिए विश्वविद्यालय आरम्भ करने में जापान ने फ्रांसीसी नमूना अपनाने की प्रवृत्ति दिखाई और सारी शिक्षा प्रणाली पर रोजगार सम्बन्धी प्रशिक्षण के जर्मन सिद्धान्त की छाप पड़ गई थी। किसी भी दृष्टि से देखने पर यह निश्चित है कि वह शिक्षा में एक बड़ी क्रान्ति थी। 1867-71 ई० की राजनीति और आर्थिक क्रान्ति से इसका महत्त्व कुछ कम नहीं है।

जापानी शिक्षा के सम्बन्ध में क्लाइड ने आगे लिखा है-“इसलिए शिक्षा निश्चित प्रयोजनों तक सीमित रही। राष्ट्रीय एकता, निर्विवाद निष्ठा, आधुनिक वैज्ञानिक और आर्थिक प्रणालियों के ज्ञान और राष्ट्रीय सुरक्षा की पूर्णता।” इस प्रकार राष्ट्रीय एकता एवं सुरक्षा, देशभक्ति, आर्थिक तथा व्यावसायिक उन्नति जापान की शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य था। इस प्रकार शिक्षा के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन करके जापान आधुनिकीकरण की ओर अग्रसर हुआ।
3. राजनीति का आधुनिकीकरण :
राजनीतिक जीवन में भी जापान ने आधुनिकीकरण का अनुसरण 1868 ई० में शोगुनों के शासन का अन्त करके शासन सत्ता को अपने हाथ में लेकर किया। सम्राट मेजी ने जो घोषणा-पत्र प्रकाशित किया था, उसमें शासन के नवीन सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया था और यह भी कहा गया था कि शासन की समस्त शक्ति सम्राट के हाथ में रहेगी परन्तु जापान में एक विचार सभा’ की स्थापना की जाएगी, जिसकी सम्मति और परामर्श के अनुसार राज्य की नीति का निर्धारण किया जाएगा। इस सभा में लोकमत को विशेष स्थान दिया जाएगा।

इसके बाद जापान में शासन में सुधार करने के लिए आन्दोलन होने लगे और वैधानिक शासन की स्थापना करने का प्रयास किया जाने लगा। 1874 ई० में इतागाकी और उसके समर्थकों ने सम्राट की सेवा में एक आवेदन-पत्र भेजा, जिसमें यह प्रार्थना की गई कि 1868 ई० की घोषणा के अनुसार जापान में एक विचार सभा की स्थापना की जाए और यह सभा लोकमत का प्रतिनिधित्व करे। इतागाकी के उदार दल ने जापान में संसद की स्थापना और पश्चिमी देशों के अनुकरण पर लोकतन्त्रवाद के विकास का समर्थन किया। 1881 ई० में काउण्ट तोकूमी ने जापान में एक नए दल को संगठन किया और वैधानिक शासन स्थापित करने की जोरदार माँग की।

इस स्थिति में जापान के सम्राट ने यह अनुभव किया कि देश में शासन सुधार करना आवश्यक है; अतः 1881 ई० में सम्राट ने एक घोषणा प्रकाशित करवाई जिसमें यह आश्वासन दिया गया कि 1890 ई० तक जापान में संसद की स्थापना कर दी जाएगी। 1889 ई० में सम्राट ने जापान के नए संविधान की घोषणा कर दी। इस संविधान के अनुसार सम्राट को शासन का प्रधान बनाया गया और उसे विस्तृत अधिकार दिए गए। एक मन्त्रिमण्डल के गठन की व्यवस्था की गई, जिसे सम्राट के प्रति उत्तरदायी बनाया गया। एक संसद की स्थापना की गई, जिसके दो सर्दन रखे गए और जिसकी अवधि 7 वर्ष निश्चित की गई। 1889 ई० के संविधान द्वारा जापान को शासन काफी आधुनिक हो चुका था।
4. औद्योगिक क्षेत्र का आधुनिकीकरण :
उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक जापान के उद्योगों की स्थापना आदि की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था और इस कारण इस क्षेत्र में वह कोई विशेष उन्नति न कर सका था। मेजी सरकार ने जापान का औद्योगीकरण करने की दिशा में विशेष ध्यान दिया। 1890 ई० में जापान में भाप-शक्ति से चलने वाले कारखानों की संख्या 250 तक पहुँच गई। इसके बाद जापान का तेजी के साथ औद्योगीकरण प्रारम्भ हुआ। 1905 ई० तक जापान औद्योगीकरण के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ गया। 1905 ई० तक जापान संसार के सबसे उन्नत व्यवसाय और व्यापार प्रधान देशों में स्थान प्राप्त कर चुका था। अब जापान औद्योगिक क्षेत्र में बहुत तेजी के साथ आधुनिकीकरण की ओर बढ़ने लगा था।
5. सामाजिक क्षेत्र का आधुनिकीकरण : 
जापान के सामाजिक जीवन में भी आधुनिकीकरण का प्रवेश हुआ। जापान के लोगों ने अपने समाज का संगठन यूरोपीय ढंग पर करना शुरू कर दिया। उन्होंने पाश्चात्य लोगों के रहन-सहन, व्यवहार तथा पहनावे की नकल करनी आरम्भ कर दी। सामन्तशाही, जोकि जापान की प्राचीन व्यवस्था की प्रतीक थी, का अन्त कर दिया गया। सरकार ने समाज-सुधार की ओर विशेष ध्यान दिया। 1905 ई० में एक खान नियम पारित किया गया। 1911 ई० में एक फैक्टरी नियम पारित किया गया। इसके अनुसार, रोजगार प्राप्त करने की आयु 12 वर्ष निश्चित कर दी गई। 1921 ई० में सामाजिक ब्यूरो की गृह विभाग के अन्तर्गत स्थापना की गई।

कारखानों में स्त्रियों और बच्चों के कार्य करने के 10 घण्टे निश्चित कर दिए। गए। 1929 ई० में 11 बजे रात के बाद स्त्रियों तथा बच्चों का काम करना अवैध घोषित कर दिया गया। इसके साथ-ही-साथ जापान के समाचार-पत्रों ने समाज का आधुनिकीकरण करना शुरू कर दिया सिविल तथा सैनिक न्यायिक नियमों को पश्चिमी ढंग पर निर्मित किया गया। इसके अतिरिक्त, धार्मिक जीवन का भी आधुनिकीकरण आरम्भ हुआ। 19वीं शताब्दी के अन्त तक जापान में ईसाई धर्म का व्यापक प्रचार हुआ। इस प्रकार स्पष्ट है कि जापान का आधुनिकीकरण दक्षिण-पूर्वी एशिया के इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना है।”

प्रश्न 3.
“सन यात-सेन आधुनिक चीन के निर्माता थे।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।(या) क्या आप सन यात-सेन को आधुनिक चीन का कल्पनावादी (या) थार्थवादी निर्माणकर्ता मानते हैं? (या) सन यात-सेन के कार्यों और उपलब्धियों का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर :

सन यात-सेन के कार्यों का मूल्यांकन

सन यात-सेन को आधुनिक चीन का जन्मदाता, निर्माता तथा महान् क्रान्तिकारी माना जाता है। आधुनिक चीन के निर्माता डॉ० सन यात-सेन की 1925 ई० में मृत्यु के समय ऐसा लगता था कि उनके द्वारा क्रान्ति के प्रति किए गए सभी प्रयास असफल हो गए हैं परन्तु शीघ्र ही उनके विचारों ने सफलता प्राप्त की। आज चीन का प्रत्येक राजनीतिक दल अपने को सन यात-सेन का सच्चा अनुयायी समझ कर गौरव का अनुभव करता है। चीन के विशाल और बड़े भू-भाग पर मार्शल च्यांग काई शेक ने अनेक वर्षों तक डॉ० सन यात-सेन के नाम पर इस प्रकार राज्य किया जिस प्रकार खलीफा मुहम्मद उमर ने पैगम्बर मुहम्मद के नाम पर राज्य किया था। इतना ही नहीं, चीन के साम्यवादी नेता माओ-त्से-तुंग ने भी अपनी सफलता के लिए डॉ० सन यात-सेन के नाम का उपयोग किया। इस प्रकार सन यात-सेन का चरित्र और व्यक्तित्व महान् था। चीन उनकी अमूल्य सेवाओं को कभी भुला नहीं पाएगा। संक्षेप में उनका मूल्यांकन इस प्रकार से किया जा सकता है
1. महान संगठनकर्ता :
संन यात-सेन एक उच्च संगठनकर्ता थे। उन्होंने मंचू राजवंश का अन्त करने और चीन में गणतंन्त्र की स्थापना करने के लिए क्रान्तिकारी संस्था तुंग-मिंग-हुई का संगठन किया था और बाद में उन्होंने कुओमीनतांग दल का पुनर्गठन किया था।
2. महान् देशभक्त :
सन यात-सेन एक सच्चे देशभक्त थे। उन्होंने देश के एकीकरण और संगठन के लिए अपना सब कुछ बलिदान कर दिया था। 1911 ई० में वे राष्ट्रपति चुने गए थे। लेकिन उन्होंने देश की एकता को बनाए रखने के लिए युआन शी-काई के पक्ष में राष्ट्रपति पद से त्याग-पत्र दे दिया था। इसी प्रकार 1924 ई० में वे चीन की एकता के लिए ही अस्वस्थ होने पर भी पीकिंग वार्ता में भाग लेने गए थे और जब उन्हें सफलता न मिली तो उनको गहरा आघात पहुँचा और उसी से नका निधन हो गया। इसके साथ-ही-साथ उन्होंने देश में राष्ट्रीय एकता की स्थापना के लिए राष्ट्रीयता की भावना का प्रचार अपने सिद्धान्तों से किया और देश की जनता में राष्ट्रीयता की भावना जाग्रत की।
3. परम लोकतन्त्रवादी : 
डॉ० सेन के आधुनिक चीन में जागरण को लाने के लिए बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। वे लोकतन्त्र के कट्टर समर्थक थे और जनता की शक्ति में उनका पूर्ण विश्वास था। उन्होंने राजनीतिक लोकतन्त्र के सिद्धान्त पर प्रतिपादन कर देश का एकीकरण करने का प्रयास किया था।
4. दो विरोधी गुणों का चरित्र :
सन यात-सेन के विषय में मुख्य रूप से दो प्रकार की विचारधाराएँ पाई जाती हैं। कुछ आलोचकों को कहना है कि सेन कल्पना की उड़ान भरने वाले राष्ट्रवादी थे। व्यक्ति कल्पना के संसार में जीवन की वास्तविकता तथा यर्थाथता से दूर चला जाता है। इस प्रकार का मत सेन के विषय में प्रस्तुत किया जाता है कि उनकी क्रान्तिकारी योजनाएँ परिस्थितियों के प्रतिकूल होती थीं, जिसके कारण उन्हें अपने जीवन में अनेक बार सफलताओं का सामना करना पड़ा। वे लोकतन्त्र के पक्के समर्थक थे परन्तु यह समझ में नहीं आता कि वे चीन की जनता को किस प्रकार लोकतन्त्र स्थापित करने और उसे कायम रखने के लिए तैयार समझते थे।

देश में गणतन्त्र स्थापित करने के मार्ग में अनेक कठिनाइयाँ थीं। देश की अधिकांश जनता अशिक्षित थी, एकता की प्रतीक राष्ट्रीय भावना का देश में पूर्ण अभाव था, देश की भाषा की लिपि बहुत कठिन और न समझने योग्य थी, यातायात के साधनों की भारी कमी थी, लोगों में गरीबी और भुखमरी फैली हुई थी तथा वे हमेशा अपने भोजन की चिन्ता में लीन रहते थे। इतना सब कुछ होने पर सेन चीन में गणतन्त्र की स्थापना के समर्थक थे जबकि गणतन्त्र की सफलता के लिए देश में शिक्षित तथा जनहित और राष्ट्र-निर्माण के कार्यों में रुचि लेने वाली जनता का होना आवश्यक होता है। कुछ आलोचकों का मत इसके ठीक विपरीत है। उनका कहना है कि सेन कल्पना के संसार में विचरण करने वाले विचारक न होकर एक सच्चे क्रान्तिकारी थे। उन्होंने हमेशा ही क्रान्ति के लिए सक्रिय कार्य किया।

देश के विभिन्न दलों को एकता के सूत्र में बाँधकर राजवंश विरोधी विद्रोहों का आयोजन किया। देश की जनता में नई चेतना और नए जागरण का संदेश प्रसारित किया। विदेशों में निवास करने वाले चीनियों को संगठित किया तथा चीन में गणतन्त्र की स्थापना कराई। जब गणतन्त्र के प्रथम राष्ट्रपति युआन शी-काई ने लोकतन्त्र के साथ विश्वासघात किया तो सबसे पहले युआन को राष्ट्रपति पद दिलवाने वाले सन यात-सेन ने ही उसका कड़ा विरोध किया और देश में पुन: राजतन्त्र स्थापित न होने दिया। उन्होंने देश का पथ-प्रदर्शन करने के लिए देश की एकमात्र राष्ट्रीय संस्था कुओमीनतांग का पुनर्गठन किया।

इसके अतिरिक्त उन्होंने देश को एकता के सूत्र में बाँधने के लिए राष्ट्रीय की पवित्र भावनाओं का प्रचार किया। चीनी जनता को विकास के मार्ग पर ले जाने के लिए उन्होंने देश को इतिहास-प्रसिद्ध अपने तीन सिद्धान्तों का मूल मन्त्र दिया जिसे चीनी जनता ने अपने धर्मग्रन्थ के रूप में स्वीकार किया। इन दोनों विचारधाराओं का अध्ययन करने के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वास्तव में डॉ० सन यात-सेन असाधारण व्यक्तित्व में आदर्शवाद और यथार्थवाद का सुन्दर सम्मिश्रण था।
5. सन यात-सेन का मूल्यांकन :
डॉ० सन यात-सेन को अपने जीवन में सफलताओं की अपेक्षा असफलताओं का अधिक सामना करना पड़ा। फिर भी उनके महान् कार्यों को नहीं भुलाया जा सकता। वास्तव में, सन यात-सेन ने चीन के लिए वही किया जो जर्मनी के एकीकरण के लिए बिस्मार्क ने, इटली के लिए मैजनी और कावूर, रूस के लिए लेनिन और अमेरिका के लिए जॉर्ज वाशिंगटन ने किया था। वे चीन के राष्ट्रपिता तथा आधुनिक चीन के निर्माता और विश्व के महान क्रान्तिकारी थे। क्लाइड ने भी उनकी मृत्यु के सम्बन्ध में लिखा है-“सेन राष्ट्रवादी आन्दोलन के सम्पूर्ण आदर्शवाद के प्रतीक बन गए। पुनर्गठित कुओमीनतांग का सारा क्रान्तिकारी उत्साह उनमें मूर्तिमान हो गया।

कन्फ्यूशियस पुरातन चीन का दार्शनिक सन्त था। 20वीं सदी के चीन में वही भूमिका सन यात-सेन को मिल कन्फ्यूशियसवाद का स्थान सन यात-सेनवाद को मिला।” फ्रेंज शर्मन ने भी लिखा है-“सन यात-सेन ने 40 वर्षों तक चीनी लोगों की स्वाधीनता के लिए क्रान्तिकारी कार्य किए और अपना सर्वस्य बलिदान कर दिया।” इसी प्रकार विनायके का मत है-“उनके सम्बन्ध में उनके विरोधियों को जो भी शंकाएँ थीं,  वह रातों-रात भुला दी गईं। मृत्यु से पूर्व अनेक लोग उन्हें स्वप्नद्रष्टा एवं उत्पाती मानते थे परन्तु अब वह सम्पूर्ण ज्ञान एवं विवेक के स्रोत बन गए।

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UP Board Solutions for Class 11 History Chapter 2 Writing and City Life

UP Board Solutions for Class 11 History Chapter 2 Writing and City Life (लेखन कला और शहरी जीवन)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर
संक्षेप में उत्तर दीजिए

प्रश्न 1.
आप यह कैसे कह सकते हैं कि प्राकृतिक उर्वरता तथा खाद्य उत्पादन के उच्च स्तर ही आरम्भ में शहरीकरण के कारण थे?
उत्तर :
प्राकृतिक उर्वरता तथा खाद्य-उत्पादन के नए स्तर आरम्भ में शहरीकरण के कारण थे। इस तथ्य की पुष्टि मेसोपोटामिया की भौगोलिक परिस्थितियों से होता है

  1. यहाँ पूर्वोत्तर भाग में हरे-भरे, ऊँचे-नीचे मैदान हैं। यहाँ अच्छी फसल के लिए पर्याप्त वर्षा होती है। पशुपालन के लिए घास के विस्तृत क्षेत्र हैं।
  2. इन क्षेत्रों में शहरों के लिए भरण-पोषण का साधन बन सकने की क्षमता थी। दजल-फरात
    नदियाँ उपजाऊ बारीक मिट्टी लाती थीं जिससे यहाँ पर्याप्त अनाज पैदा होता था।

प्रश्न 2.
आपके विचार से निम्नलिखित में से कौन-सी आवश्यक दशाएँ थीं जिनकी वजह से प्रारम्भ में शहरीकरण हुआ था और निम्नलिखित में से कौन-कौन सी बातें शहरों के विकास के फलस्वरूप उत्पन्न हुई?
(क) अत्यन्त उत्पादक खेती
(ख) जल परिवहन
(ग) धातु और पत्थर की कमी
(घ) श्रम-विभाजन
(ङ) मुद्राओं का प्रयोग
(च) राजाओं की सैन्यशक्ति जिसने श्रम को अनिवार्य बना दिया।
उत्तर :

  1. निम्नलिखित आवश्यक दशाएँ थीं जिनकी वजह से प्रारम्भ में शहरीकण हुआ था
    (क) अत्यन्त उत्पादक खेती
    (ख) जल-परिवहन
    (घ) श्रम-विभाजन
    (च) राजाओं की सैन्यशक्ति जिसने श्रम को अनिवार्य बना दिया
  2. निम्नलिखित बातें शहरों के विकास के फलस्वरूप उत्पन्न हुईं
    (ग) धातु और पत्थर की कमी
    (ङ) मुद्राओं का प्रयोग

प्रश्न 3.
यह कहना क्यों सही होगा कि खानाबदोश पशुचारक निश्चित रूप से शहरी जीवन के लिए खतरा थे?
उत्तर :
खानाबदोश पशुचारक निश्चित रूप से शहरी जीवन के लिए खतरा थे,यह निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट होता है

  1.  मारी नगर के दक्षिण के मैदान के खानाबदोश पशुचारक या गड़रिये किसानों के लिए खाद्य का प्रबन्ध करते थे परन्तु कई बार दोनों के मध्य झगड़े हो जाते थे। गड़रिये कई बार भेड़-बकरियों को पानी पिलाने के लिए बोए गए खेतों से गुजर जाते थे जिससे किसान की फसल को हानि पहुँचती थी।
  2.  खानाबदोश गड़रिये कई बार किसानों के गाँवों पर हमला बोल देते थे। वे उनका एकत्र धन-धान्य लूट लेते थे।
  3.  पश्चिमी मरुस्थल से गर्मियों में खानाबदोश गड़रिये अपने साथ मेसोपोटामिया में बोए हुए खेतों में अपनी भेड़-बकरियाँ ले आते थे। ये समूह गड़रियों, फसल काटने वाले मजदूरों अथवा भाड़े के सैनिकों के रूप में आए और समृद्ध होकर यहीं बस गए तथा शासन शक्ति भी प्राप्त कर ली।

प्रश्न 4.
आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि पुराने मन्दिर बहुत कुछ घर जैसे ही होंगे?
उत्तर :
कुछ प्राचीन मन्दिर साधारण घरों से अलग किस्म के नहीं होते थे क्योंकि मन्दिर में किसी स्थानीय देवता का वास होता था। मन्दिरों की बाहरी दीवारें विशेष अन्तरालों के बाद भीतर और बाहर की ओर मुड़ी होती थीं। यही इन मन्दिरों की मुख्य विशेषता थी। सामान्य घरों की दीवारें ऐसी नहीं होती थीं
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संक्षेप में निबन्ध लिखिए

प्रश्न 5.
शहरी जीवन शुरू होने के बाद कौन-कौन सी नई संस्थाएँ अस्तित्व में आईं? आपके विचार से उनमें से कौन-सी संस्थाएँ राजा के महल पर निर्भर थीं?
उत्तर :
शहरी जीवन शुरू होने के बाद निम्नलिखित संस्थाएँ अस्तित्व में आईं

  1. व्यापार
  2.  विनिर्माण
  3.  सेवाएँ
  4. श्रम-विभाजन
  5. खाद्य-पदार्थों का संग्रहण एवं वितरण
  6. मुद्रा-निर्माण
  7. लेखा-विभाग
  8. आयात-निर्यात
  9. परिवहन व्यवस्था
  10. लेखन प्रणाली
  11. साक्षरता
  12. मन्दिर
  13.  युद्धबन्दी
  14. परिवार
  15. विवाह
  16. वास्तुकला
  17. पशुचारक
  18. कब्रिस्तान

इनमें से निम्नलिखित संस्थाएँ राजा के महल पर निर्भर थीं

  1.  व्यापार
  2. सेवाएँ
  3. श्रम-विभाजन
  4. खाद्य-पदार्थों का संग्रहण एवं वितरण
  5. मुद्रा-निर्माण
  6. आयात-निर्यात
  7. युद्धबन्दी
  8.  कब्रिस्तान

प्रश्न 6.
किन पुरानी कहानियों में हमें मेसोपोटामिया की सभ्यता की झलक मिलती है?
उत्तर : 
मेसोपोटामिया की सभ्यता की झलक देने वाली कुछ पुरानी कहानियाँ निम्नलिखित हैं

  1.  यूरोप के निवासियों के लिए मेसोपोटामिया अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था। बाइबिल के प्रथम भाग ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ की ‘बुक ऑफ जेनेसिस’ में ‘शिमार’ अर्थात् सुमेर का वर्णन किया गया है। उसके अनुसार वहाँ ईंटों से बने अनेक नगर हैं। यूरोप के यात्री और विद्वान् मेसोपोटामिया को किस प्रकार से अपने पूर्वजों की भूमि मानते थे और जब इस क्षेत्र में पुरातत्त्वीय खोज प्रारम्भ हुई तो ओल्ड टेस्टामेंट के शाब्दिक सत्य को प्रमाणित करने का प्रयास किया गया।
  2.  एक अन्य कहानी जलप्लावन से जुड़ी है। बाइबिल के अनुसार यह जलप्लावन पृथ्वी पर सम्पूर्ण जीवन को नष्ट करने वाला था। किन्तु ईश्वर ने जलप्लावन के बाद भी जीवन को पृथ्वी पर सुरक्षित रखने के लिए ‘नोआ’ नामक एक मानव को चुना। नोआ ने एक बड़ी नाव बनाई और उसमें सभी जीव-जन्तुओं का एक-एक जोड़ा रख लिया और जब जलप्लावन हुआ तो शेष सब. कुछ नष्ट हो गया। नाव में रखे संभी जोड़े बच गए।
  3. ऐसी ही एक कहानी ‘गिल्गेमिश’ महाकाव्य के अन्त में मिलते हैं। इससे पता चलता है कि मेसोपोटामिया के लोगों को अपने नगरों पर बहुत गर्व था। ऐसा कहा जाता है कि ‘गिल्गेमिश ने एनमर्कर के कुछ समय बाद उरुक मगर पर शासन किया था। वह एक महान् योद्धा था जिसने दूर-दूर तक के प्रदेशों को अपने अधीन कर लिया था, लेकिन उसे उस समय गहरा झटका लगा जब उसका वीर मित्र अचानक, मर गया। इससे दु:खी होकर वह अमरत्व की खोज में निकल पड़ा। उसने सागरों-महासागरों को पार किया और दुनिया का चक्कर लगाया। मगर उसे अपने साहसिक कार्य में सफलता नहीं मिली। हारकर गिल्गेमिश अपने नगर उरुक लौट आया। वहाँ जब वह अपने को सन्तुष्ट करने के लिए शहर की प्राचीर के आसपास चहलकदमी कर रहा था तब उसकी दृष्टि उन शानदार ईंटों पर पड़ी जिनसे उसकी नींव डाली गई थी। वह भाव-विभोर हो उठा। इस प्रकार उरुक नगर की विशाल प्राचीर पर पहुँचकर उस महाकाव्य की लम्बी वीरतापूर्ण और साहसभरी कथा का अन्त हो गया।

परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मेसोपोटामिया की सभ्यता का सर्वाधिक प्रसिद्ध केन्द्र था
(क) सुमेरिया
(ख) बेबीलोनिया
(ग) असीरिया
(घ) निनवेह
उत्तर :
(ख) बेबीलोनिया

प्रश्न 2.
मेसोपोटामिया में सुमेरियन साम्राज्य का संस्थापक था
(क)सारगन प्रथम
(ख) सारगन द्वितीय
(ग) हेम्मूराबी
(घ) असुरबनीपाल
उत्तर :
(क) सारगन प्रथम

प्रश्न 3.
विश्व की पहली विधि संहिता का निर्माण करवाया था
(क) हेम्मूराबी
(ख) सारगन द्वितीय
(ग) सेनाक्रीब
(घ) जस्टीनियन
उत्तर :
(क) हेम्मूराबी। प्रश्न

प्रश्न 4.
कुम्हार के चाक का सर्वप्रथम प्रयोग हुआ था

(क) सुमेरिया में
(ख) बेबीलोन में
(ग) मिस्र में
(घ) चीन में
उत्तर :
(क) सुमेरिया में

प्रश्न 5.
संसार में चाँदी के सिक्के चलाने वाला पहला राजा कौन था?
(क) हेम्मूराबी
(ख) सेनाक़ीब
(ग) डेरियस
(घ) असुरबनीपाल
उत्तर :
(ख) सेनाक्रीब

प्रश्न 6.
कांस्य युग में सर्वप्रथम किस धातु का प्रयोग औजार बनाने में किया गया?
(क) ताँबा
(ख) सोना
(ग) लोहा
(घ) पीतल
उत्तर :
(क) ताँबा

प्रश्न 7.
जिगुरत का सम्बन्ध किससे है?
(क) हड़प्पा
(ख) मिस्र
(ग) मेसोपोटामिया
(घ) चीन
उत्तर :
(ग) मेसोपाटामिया

प्रश्न 8.
मेसोपोटामिया की सभ्यता का जन्म हुआ था
(क) नील नदी की घाटी :
(ख) सिन्धु नदी की घाटी
(ग) यांग-टिसीक्यांग नदी की घाटी
(घ) दजला-फरात नदी की घाटी
उत्तर :
(घ) दजला-फरात नदी की घाटी

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मेसोपोटामिया की सभ्यता के दो प्रमुख केन्द्रों के नाम बताइए
उत्तर :
मेसोपोटामिया की सभ्यता के दो प्रमुख केन्द्र थे

  1. सुमेरिया तथा
  2.  बेबीलोन

प्रश्न 2.
कुम्हार के चाक का प्रयोग सर्वप्रथम कहाँ हुआ था?
उत्तर :
कुम्हार के चाक का प्रयोग सर्वप्रथम मेसोपोटामिया की सभ्यता में हुआ था।

प्रश्न 3.
हेम्मूराबी की विधि-संहिता की एक विशेषता बताइए।
उत्तर :
हेम्मूराबी की विधि-संहिता की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें अधिकारों के साथ-साथ मनुष्य के उत्तरदायित्व सम्बन्धी कानूनों का भी उल्लेख किया गया है।

प्रश्न 4.
मेसोपोटामिया के दो प्रमुख देवताओं के नाम बताइए।
उत्तर :
मेसोपोटामिया के दो प्रमुख देवता थे

  1.  एनलिल (वायु देवता) और
  2.  शम्स (सूर्य देवता)

प्रश्न 5.
जिग्गूरात का क्या अर्थ है?
उत्तर :
मेसोपोटामिया के लोग नगर की पहाड़ी पर मन्दिर बनाते थे। इन मन्दिरों को जिग्गूरात या जिगुरत कहा जाता था।

प्रश्न 6.
मेसोपोटामिया में ‘पित्तेसी’ किसे कहते थे?
उत्तर :
मेसोपोटामिया में प्रधान मन्दिरों के वे पुजारी, जो शासन का कार्य करते थे, ‘पित्तेसी’ कहलाते थे।

प्रश्न 7.
षट्दाशमिक प्रणाली का आविष्कार किस सभ्यता में हुआ था?
उत्तर :
षट्दाशमिक प्रणाली का आविष्कार मेसोपोटामिया की सभ्यता में हुआ था।

प्रश्न 8.
हेम्मूराबी कौन था? वह अपने किस उलेखनीय कार्य के लिए प्रसिद्ध है?
उत्तर :
हेम्मूराबी बेबीलोन का एक महान् शासक था। वह बेबीलोन में पूर्व-प्रचलित तथा अनेक नवीन कानूनों का संग्रह कराने के लिए प्रसिद्ध है।

प्रश्न 9.
मेसोपोटामिया में कॉसे का उपयोग कब आरम्भ हुआ?
उत्तर :
मेसोपोटामिया में काँसे का उपयोग 3000 ई०पू० में प्रारम्भ हो गया था।

प्रश्न 10.
लेखन का प्रयोग किस कार्य में होता था?
उत्तर :
लेखन का प्रयोग हिसाब-किताब रखने में किया जाता था।

प्रश्न 11.
डैगन कौन थे?
उत्तर :
डैगन स्टेपी क्षेत्र के देवता थे। एमोराइट समुदाय के लोगों ने डैगन के लिए मारी नगर में एक मन्दिर बनवाया था।

प्रश्न 12.
मारी में राजाओं का क्या भोजन होता था?
उत्तर :
मारी के राजाओं के भोजन में विविधता होती थी जिसमें रोटी, मांस, मछली, फल, जौ और अंगूर की शराब शामिल थी।

प्रश्न 13.
अलाशिया क्यों प्रसिद्ध था?
उत्तर :
लाशिया अपने ताँबे के लिए प्रसिद्ध था।

प्रश्न 14.
मेसोपोटामिया की पहली पट्टिका का काल क्या है?
उत्तर :
मेसोपोटामिया की पहली पट्टिकाएँ 3200 ई० पू० की हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘जिगुरत क्या है? इस पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
मेसोपोटामिया की सभ्यता के अन्तर्गत, नगर के संरक्षक देवता हेतु नगर के पवित्र क्षेत्र में एक मन्दिर का निर्माण कराया जाता था, जिसे ‘जिगुरत’ या ‘जिग्गूरात’ कहा जाता था। यह मन्दिर किसी पहाड़ी पर या ईंटों के बने ऊँचे चबूतरे पर निर्मित किया जाता था। मन्दिर के साथ ही कुछ अन्य भवनों का निर्माण भी कराया जाता था, जो भण्डार-गृह तथा कार्यालयों के रूप में प्रयुक्त किए जाते थे। यह भवन कई मंजिले होते थे। इन भवनों की सबसे ऊँची मंजिल पर देवता का निवास माना जाता था तथा यहाँ बैठकर ज्योतिषियों द्वारा ग्रहों एवं नक्षत्रों का अध्ययन किया जाता था।

प्रश्न 2.
“हेम्मूराबी की विधि-संहिता ने ही आधुनिक संविधान को जन्म दिया।” स्पष्ट कीजिए। या हेम्मूराबी कौन था? इसके बारे में जानकारी दीजिए। | या हेम्मूराबी की विधि-संहिता का परिचय दीजिए।
उत्तर :
सम्राट हेम्मूराबी (2123-2081 ईसा पूर्व), बेबीलोन का एक महान् शासक था। उसने एक वृहद् कानून-संहिता का निर्माण कराया था। उसने बेबीलोन में प्रचलित कानूनों को संकलित करके तथा स्वयं कई उपयोगी कानून बनाकर उन्हें 285 धाराओं के रूप में एक विशाल पत्थर की शिला पर अंकित करवा दिया था। इस 8 फुट ऊँचे पत्थर के ऊपरी भाग में कानून खुदे हुए हैं। ये कानून विवाह, चोरी, हत्या आदि से सम्बन्धित हैं। हेम्मूराबी की इस कानून संहिता का ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष महत्त्व है और इसे संसार की सबसे पहली ‘लिखित विधि संहिता’ माना जाता है।

प्रश्न 3.
मेसोपोटामिया का अन्य प्राचीन सभ्यताओं से क्या सम्बन्ध था?
उत्तर :
मेसोपोटामिया की सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता थी या नहीं, यह एक विवादग्रस्त प्रश्न है। अधिकांश विद्वानों का मत है कि मेसोपोटामिया की सभ्यता ही सबसे प्राचीन सभ्यता थी, जबकि पेरी का कहना है कि पृथ्वी पर मिस्र में ही सर्वप्रथम सभ्यता का विकास हुआ और वहाँ से संसार के अन्य लोगों ने सभ्यता सीखी थी। नील नदी की घाटी और दजला-फरात की घाटी में बहुत-सी मुहरें, मिट्टी के बर्तन तथा पशुओं की मूर्तियाँ मिली हैं, जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि मेसोपोटामिया (सुमेरिया) में चाक पर बर्तन बनाने का काम पहले प्रारम्भ हो चुका था, लेकिन चित्रकला और मूर्तिकला के क्षेत्र में मेसोपोटामिया की सभ्यता मिस्र की सभ्यता से पीछे थी। स्थापत्य-कला के क्षेत्र में मिस्रवासी मेसोपोटामिया के लोगों से बढ़-चढ़े थे और उनका जीवन-स्तर भी उच्चकोटि का था। ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में दोनों  सभ्यताएँ उन्नति के शिखर पर थीं। कानून के क्षेत्र में हेम्मूराबी की संहिता के समान कोई संहिता भारत और मिस्र में उपलब्ध नहीं है। मेसोपोटामिया की सभ्यता व्यापार-प्रधान थी और मिस्र तथा भारत के साथ इसके घनिष्ठ व्यापारिक सम्बन्ध थे।

प्रश्न 4.
मेसोपोटामिया के लोगों के आर्थिक जीवन का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

  1. कृषि एवं पशुपालन :
    मेसोपाटामिया के अधिकांश नागरिक कृषि कार्य करते थे। कृषि के लिए यहाँ की मिट्टी उपजाऊ थी। खेतों की सिंचाई के लिए नहर और तालाब बनाए गए थे। पशुपालन भी होता था। लोग भेड़-बकरियाँ पालते थे। इनसे दूध व ऊन प्राप्त होता था।
  2. उद्योग :
    धन्धे-मेसोपोटामिया के निवासी सन और भेड़ के बाल से कपड़े तैयार करते थे। सूत कातना, कपड़े बुनना व रँगना, मूर्तियाँ बनाना, चाँदी, सोने और लकड़ी के सामान तैयार करना आदि जीविका के अन्य साधून थे।
  3. व्यापार :
    यहाँ के निवासी बड़े पैमाने पर विदेशी व्यापार करते थे। वे पत्थर, लकड़ी, सोना, चाँदी और अन्य धातुएँ विदेशों से मँगाते थे तथा उनके बदले में अनाज भेजते थे।

प्रश्न 5.
सुमेर में व्यापार किस प्रकार प्रारम्भ हुआ?
उत्तर :
सुमेर में व्यापार : 
व्यापार की पहली घटना को एनमर्कर के साथ जोड़ा जाता है जो उरुक का शासक था। एनमर्कर अपने शहर के एक सुन्दर मन्दिर को सजाने के लिए लाजवर्द और अन्य बहुमूल्य रत्न तथा धातुएँ मँगाना चाहता था। इस काम के लिए उसने अपना एक दूत अरट्टा नाम के एक सुदूर देश क शासक के पास भेजा। दूत ने काफी परिश्रम किया, कठिन यात्रा की परन्तु वांछित सामग्री लाने में सफल न हुआ। अन्त में राजा ने हाथ से मिट्टी की पट्टिका बनाई और अरट्टा के पास भेजी तब सभी वांछित वस्तुएँ प्राप्त हो गईं।

प्रश्न 6.
‘अबू सलाबिख’ की खुदाई में पुरातत्त्वविदों को क्या-क्या प्राप्त हुआ?
उत्तर :
अबू सलाबिख एक छोटा कस्बा था। यह कस्बा 2500 ई० पू० में लगभग 10 हेक्टेयर जमीन पर बसा हुआ था और इसकी आबादी 10,000 से कम थी। इसकी दीवारों की रूपरेखा की ऊपरी सतहों को सर्वप्रथम खरोंचकर निकाला गया। इस प्रक्रिया में टीले की ऊपरी सतह को किसी बेलचे, फावड़े या अन्य जार के धारदार चौड़े सिरे से कुछ मिलीमीटर तक खरोंचा गया। नीचे की मिट्टी तब भी कुछ नम पाई गई और पुरातत्त्वविदों ने भिन्न-भिन्न रंगों, उसकी नावट तथा ईंटों की दीवारों की स्थिति तथा गड्ढों और अन्य विशेषताओं का पता लगा लिया। जिन थोड़े-से घरों की खोज की गई उन्हें खोदकर निकाला गया।पुरातत्त्वविदों ने पौधों और पशुओं के अवशेषों को प्राप्त करने के लिए टनों मिट्टी की छानबीन की। इसके चलते उन्होंने पौधों और पशुओं की अनेक प्रजातियों का पता लगाया। उन्हें बड़ी मात्रा में जली हुई मछलियों की हड्डियाँ भी मिलीं जो बुहारकर बाहर गलियों में डाल दी गई थीं। वहाँ गोबर के उपलों के ले हुए ईंधन में से निकले हुए पौधों के बीच और रेशे मिले थे, इससे इस स्थान पर रसोई घर होने का पता चला। घरों में रहने के कमरे कौन-से थे, यह जाननेके संकेत बहुत कम मिले हैं। वहाँ की गलियों में सूअरों के छोटे बच्चों के दाँत पाए गए हैं, जिन्हें देखकर पुरातत्त्वविदों ने यह निष्कर्ष निकाला कि अन्य किसी भी मेसोपोटामियाई नगर की तरह यहाँ भी सूअर छुट्टे घूमा कस्ते थे। वस्तुतः एक घर में तो आँगन के नीचे, जहाँ किसी मृतक को दफनाया गया था, सूअर की कुछ हड्डियों के अवशेष मिले हैं जिससे प्रतीत होता है कि व्यक्ति के मरणोपरान्त जीवन में खाने के लिए सूअर का कुछ मांस रखा गया था। पुरातत्त्वविदों ने कमरों के फर्श का बारीकी से अध्ययन यह जानने के लिए किया कि घर के कौन-से कमरों पर पोपलार (एक लम्बा पतला पेड़) के लट्ठों, खजूर की पत्तियों और घासफूस की छतें थीं और कौन-से कमरे बिना छत के खुले आकाश के नीचे थे।

प्रश्न 7.
गणित के क्षेत्र में मेसोपोटामिया की क्या देन है?
उत्तर :
गणित के क्षेत्र मे मेसोपोटामिया की देन मेसोपोटामिया के निवासी 60-60 की इकाइयाँ में गणना किया करते थे। उनकी गणना प्रणाली षट्दाशमिक प्रणाली कही जाती थी। उन्होंने एक, दस और साठ के लिए विशेष चिह्नों की खोज कर ली थी। वे अंकों को अपनी आवश्यकतानुसार दुहराते थे। वे अगर दो लिखना चाहते थे तो एक के अंक को दो बार लिख देते थे। यदि बीस लिखना चाहते थे तो दस के अंक को दो बार दुहरा देते थे। यद्यपि उनके द्वारा खोजी गई साठ पर आधारित यह गिनती अब कहीं भी प्रयोग में नहीं लाई जाती लेकिन हम जानते हैं कि समय का विभाजन जैसे 60 सेकण्ड का एक मिनट, 60 मिनटों का एक घण्टा आदि के लिए हम षट्दाशमिक प्रणाली का ही प्रयोग करते हैं। मैसोपोटामियावासियों ने रेखागणित के कुछ सिद्धान्त बनाए जो आज भी विद्यार्थियों को पढ़ाए जाते हैं।

प्रश्न 8.
कलाकार लिपि के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर :
मेसोपोटामिया के प्राचीन निवासियों की लिपि को कलाकार लिपि कहा जाता है। यह लिपि सुमेर के लोगों द्वारा बनाई गई। इस लिपि को कील या नहनी जैसे तज औजार से चिकनी मिट्टी की पट्टियों पर लिखते थे, जिन्हें बाद में आग में पकाया जाता था। इसमें विचारों को प्रकट करने के लिए चित्रलेख, चिह्नों, संकेतों और चित्रों का प्रयोग किया जाता था। इसे हेनरी रॉलिन्सन नामक अंग्रेज अधिकारी ने पूरे 12 वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद पढ़ने में सफलता पाई। उनकी इसी सफलता से मेसोपोटामिया की सभ्यता के बारे में हमारी जानकारी में वृद्धि हुई है।

प्रश्न 9.
गिलोमिश महाकाव्य किस प्रकार मेसोपोटामिया संस्कृति में शहरों के महत्त्व पर प्रकाश डालता है?
उत्तर :
मेसोपोटामियावासी शहरी जीवन को महत्त्व देते थे जहाँ अनेक समुदायों और संस्कृतियों के लोग साथ-साथ रहा करते थे। युद्ध में शहरों के नष्ट हो जाने के बाद वे अपने काव्यों के माध्यम से उन्हें याद किया करते थे। मेसोपोटामिया के लोगों को अपने नगरों पर कितना अधिक गर्व था, इस बात का सर्वाधिक मर्मस्पर्शी वर्णन हमें गिल्गेमिश (Gilgamesh) महाकाव्य के अन्त में मिलता है। यह काव्य 12 पट्टिकाओं पर लिखा गया था। ऐस कहा जाता है कि गिल्गेमिश ने एनमर्कर के कुछ समय बाद उरुक नगर पर शासन किया था। वह एक महान् योद्धा था जिसने दूर-दूर तक के प्रदेशों को अपने अधीन कर लिया था, लेकिन उसे उस समय गहरा झटका लगा जब उसका वीर मित्र अचानक मर गया। इससे दु:खी होकर वह अमरत्व की खोज में निकल पड़ा। उसने सागरों-महासागरों को पार किया, और दुनियाभर का चक्कर लगाया। मगर उसे अपने साहसिक कार्य में सफलता नहीं मिली। हारकर गिल्गेमिश अपने नगर उरुक लौट आया। वहाँ जब वह अपने आपको सांत्वना देने के लिए शहर की चहारदीवारी के पास टहल रहा था तभी उसकी नजर उन पकी ईंटों पर पड़ी जिनसे नगर की नींव डाली गई थी। वह भावविभोर हो उठा। इस प्रकार उरुक नगर की विशाल प्राचीर पर आकर उस महाकाव्य की लम्बी वीरतापूर्ण और साहस भरी कथा का अन्त हो गया। यहाँ गिल्गेमिश, एक जनजातीय योद्धा की तरह यह लेखन कला और शहरी जीवन 35 नहीं कहता कि उसका अन्त निश्चित है पर उसके पुत्र तो जीवित रहेंगे और इस नगर का आनन्द लेंगे। इस प्रकार उसे अपने नगर में ही सांत्वना मिली है जिसे उसकी प्यारी प्रजा ने बनाया था।

प्रश्न 10.
बेबीलोन के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर :
दक्षिणी कछार के एक शूरवीर नैबोपोलास्सर (Nabopolassar) ने बेबीलोनिया को 625 ई० पू० में असीरियाई आधिपत्य से मुक्त किया। उसके  त्तराधिकारियों ने अपने राज्यक्षेत्र का विस्तार किया और बेबीलोन में भवन-निर्माण की परियोजनाएँ पूरी की। उस समय से लेकर 539 ई० पू० में ईरान के  केमेनिड लोगों (Achaemenids) द्वारा विजित होने के बाद और 331 ई० पू० में सिकन्दर से पराजित होने तक बेबीलोन दुनिया का एक प्रमुख नगर बना हा। इसका क्षेत्रफल 850 हेक्टेयर से अधिक था, इसकी चहारदीवारी तिहरी थी, इसमें बड़े-बड़े राजमहल और मन्दिर मौजूद थे, एक जिगुरात (Ziggurat) यानी सीढ़ीदार मीनार थी और नगर के मुख्य अनुष्ठान केन्द्र तक शोभायात्रा के लिए एक विस्तृत मार्ग बना हुआ था। इसके व्यापारिक घराने दूर-दूर तक अपना कारोबार करते थे और इसके गणितज्ञों तथा खगोलविदों ने अनेक नई खोजें की थीं। नैबोनिडस (Nabonidus) स्वतन्त्र बेबीलोन का अन्तिम शासक था।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मेसोपोटामिया की विश्व सभ्यता को क्या देन है?
उत्तर :
मेसोपोटामिया की विश्व सभ्यता को निम्नलिखित देन हैं

  1.  कुम्हार के चाक का प्रयोग मेसोपोटामिया के लोगों ने सम्भवतया सर्वप्रथम किया था।
  2.  काँच के बर्तन भी मेसोपोटामिया के लोगों ने सम्भवत: पहले बनाए।
  3. षट्दाशमिक प्रणाली को मेसोपोटामिया के लोगों ने सबसे पहले विकसित किया जो आज भी  समय : विभाजन करने के लिए विश्व में हर जगह प्रयोग में लाई जाती है।
  4.  लिखित विधि संहिता सर्वप्रथम बेबोलोनिया के शासक हेम्मुराबी द्वारा विश्व को दी गई।
  5. मेसोपोटामिया के लोगों ने विश्व में सर्वप्रथम नहरें बनवाई जो वर्ष भर सिंचाई, बाढ़ नियन्त्रण एवं जल परिवहन के लिए प्रयोग में लाई जा सकती थीं।
  6. चार पहियों वाली गाड़ी या रथ एवं जहाजी बेड़े मेसोपोटामिया के लोगों ने सर्वप्रथम बनाए।
  7. लेखन पद्धति का विकास सम्भवत: मेसोपोटामिया के लोगों ने (कोलीकार नामक व्यवस्थित लिपि) सबसे पहले किया।
  8. मेसोपोटामिया के लोगों ने चन्द्रमा की गति पर आधारित पंचांग का आविष्कार किया। यद्यपि इस पंचांग में कुछ दोष थे लेकिन समय-विभाजन एवं कैलेण्डर बनाने का विचार सम्भवतः यहीं के लोगों में आया।
  9. बैंक प्रणाली, व्यापारिक समझौते एवं हुण्डी प्रणाली का विकास सर्वप्रथम यहीं हुआ था।
  10. वृत्त विभाजन का विचार भी मेसोपोटामिया के लोगों को ही आया। उन्होंने वृत्त को 360 श्रेणियों में विभाजित किया। उनका यह ज्ञान भूगोल, रेखागणित एवं अन्य विषयों में हमारी बड़ी सहायता कर रहा है।
  11. नगर, राज्यों एवं संस्कृति के राज्यों की स्थापना सम्भवतः मेसोपोटामिया में ही सर्वप्रथम हुई।

प्रश्न 2.
“जमीन में प्राकृतिक उपजाऊपन के बाद भी मेसोपोटामिया में कृषि प्राकृतिक तथा मानव-निर्मित संकटों से घिर जाती थी। संक्षेप में बताइए।
उत्तर :
मेसोपोटामिया की जमीन प्राकृतिक उपजाऊपन के बावजूद भी अनेक बार प्राकृतिक तथा मानव-निर्मित संकटों से घिर जाती थी। इसके निम्नलिखित कारण थे

  1. फरात नदी की प्राकृतिक धाराएँ कभी-कभी अत्यधिक जलप्रवाह के कारण फसलों को डुबो देती थीं।
  2. कभी-कभी धाराएँ अपना मार्ग बदल लेती थीं, जिससे सूखे की स्थिति बन जाती थी।
  3. विपदाएँ केवल प्राकृतिक ही नहीं थीं। अनेक बार मानव-निर्मित विपदाएँ भी समस्याएँ उत्पन्न कर देती थीं। प्रायः जो लोग इन धाराओं के ऊपरी भाग में रहे थे, वे अपने निकट की धारा से इतना अधिक पानी अपने खतों में खींच लेते थे कि धारा के नीचे बसे लोगों के खेतों को पानी नहीं मिल पाता था। इससे पानी के अभाव में इन स्थानों में फसलों के खराब होने का खतरा बना रहता था।
  4. इसके अलावा ऊपरी धारा के लोग अपने यहाँ बहने वाली धारा में से गाद नहीं निकालते थे, जिससे नीचे की ओर पानी का बहाव रुक जाता था। यही कारण था कि मेसोपोटामिया के गाँवों में जमीन तथा पानी के प्रश्न पर प्रायः संघर्ष होते रहते थे।

प्रश्न 3.
मेसोपोटामिया की मुद्रा की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर :
पहली सदी ई०पू० के अन्त तक मेसोपोटामिया में पत्थर की बेलनाकार मुद्राएँ होती थीं। इन मुद्राओं के आर-पार छेद होते थे। एक तीली फिट करके इन्हें गीली मिट्टी के ऊपर घुमाया जाता था। इन्हें अत्यधिक कुशल कारीगरों द्वारा उकेरा जाता था। इन मुद्राओं पर तीन प्रकार के लेख लिखे होते थे

  1.  स्वामी का नाम
  2. उसके इष्टदेव का नाम
  3. उसकी आधिकारिक स्थिति आदि। मुद्राओं पर लेख लिखने की भी एक प्रक्रिया थी। जिस मुद्रा पर कुछ लिखना होता था उसे किसी कपड़े की गठरी में लपेटकर चिकनी मिट्टी से लीप-पोतकर घुमाया जाता था। इस प्रकार उस पर अंकित लिखावट मिट्टी की सतह पर छप जाती थी। जब इस मोहर को मिट्टी की बनी पट्टिका पर लिखे पत्र पर घुमाया जाता था तो वह मोहर उस पत्र की प्रामाणिकता की प्रतीक बन जाती थी।
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प्रश्न 4.
मेसोपोटामिया में शहरीकरण किस प्रकार सम्पन्न हुआ? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर :
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5000 ई० पू० के लगभग दक्षिणी मेसोपोटामिया में बस्तियों का विकास होने लगा था। इन बस्तियों में से कुछ ने प्राचीन नगरों का रूप ले लिया था। नगर कई प्रकार के थे। पहले वे जो मंदिर के चारों ओर विकसित हुए और शेष वेदिका शाही नगर थे। बाहर से आकर बसने वाले लोगों ने (उनके मूल स्थान की जानकारी नहीं) अपने गाँवों में कुछ चुने हुए स्थानों या मंदिरों को बनाना या उसका पुनर्निर्माण करना प्रारम्भ किया। सर्वप्रथम ज्ञात मंदिर एक छोटा-सा देवालय था। यह कच्ची भट्ठी । ईंटों को बना हुआ था। मंदिर विभिन्न प्रकार के प्रवेशद्वार देवी-देवताओं के निवास स्थान थे जैसे उर जो चन्द्र देवता था और इन्नाना जो प्रेम व युद्ध की देवी थी। ये ईंटों से बने मंदिर समय के साथ बड़े हो गए क्योंकि उनके खुले आँगनों दक्षिणी मेसोपोटामिया का सबसे प्राचीन ज्ञात के चारों ओर कई कमरे बने होते थे। कुछ प्रारम्भिक मंदिर मन्दिर लगभग 5000 ई०पू० (नक्शा) साधारण किस्म के घरों के समान ही होते थे। इसका कारण यह था कि मंदिर भी किसी देवता का घर ही होता था। मंदिरों की बाहरी दीवारें कुछ विशिष्ट अंतरालों के बाद भीतर और बाहर की ओर मुड़ी हुई थीं। यही मंदिरों की विशेषता थी। साधारण घरों की दीवारें ऐसी नहीं होती थीं। देवता पूजा का केंद्र-बिंदु होता था। लोग देवी-देवता के लिए अन्न, दही, मछली लाते थे। आराध्य देव सैद्धान्तिक रूप से खेतों, मत्स्य क्षेत्रों और स्थानीय लोगों के पशुधन का स्वामी माना जाता था। समय आने पर उपज को उत्पादित वस्तुओं में बदलने की प्रक्रिया यहीं सम्पन्न की जाती थी। घर-परिवार के उच्च स्तर के व्यवस्थापक, व्यापारियों के नियोक्ता, अन्न, हल जोतने वाले पशुओं, रोटी, जौ की शराब, मछली आदि के आवंटन और वितरण लिखित अभिलेखों के पालक के रूप में मंदिर ने धीरे-धीरे अपने क्रिया-कलाप बढ़ा लिए और मुख्य नगरीय-संस्था का रूप ले लिया

प्रश्न 5.
उरुक में 3000 ई० पू० के लगभग प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में युगान्तकारी परिवर्तन किस प्रकार शहरी अर्थव्यवस्था के लिए अत्यन्त उपयुक्त सिद्ध हुआ?
उत्तर :
पुरातत्त्वीय सर्वेक्षणों से ज्ञात होता है कि 3000 ई० पू० के आसपास जब उरुक नगर का 250 हेक्टेयर भूमि में विस्तार हुआ तो mइसके लिए दर्जनों छोटे-छोटे गाँव उजड़ गए। बड़ी संख्या में जनसंख्या का विस्थापन हुआ। उसका यह विस्तार शताब्दियों तक विकसित रहे मोहनजोदड़ो नगर से दो-गुना था। यह भी उल्लेखनीय है कि उरुक नगर की रक्षा के लिए उसके चारों ओर एक सुदृढ़ दीवार बना दी गई थी। उरुक नगर 4200 ई० पू० से 400 ईसवी तक निरन्तर अपने अस्तित्व में बना रहा। इस अवधि में वह 400 हेक्टेयर क्षेत्र में विस्तृत हो गया। स्थानीय लोगों और युद्धबन्दियों को अनिवार्य रूप से मंदिर का अथवा प्रत्यक्ष रूप से शासक का काम करना पड़ता था। जिन्हें काम पर लगाया जाता था उन्हें काम के बदले अनाज दिया जाता था। शासक के आदेश से लोग पत्थर खोदने, धातु खनिज लाने, मिट्टी से ईंट तैयार करने और मंदिर में लगाने, और सुदूर देशों में जाकर मंदिर के लिए उपयुक्त सामान लाने के कामों में जुटे रहते थे। इस कारण 3000 ई० पू० के आसपास उरुक में खूब तकनीकी प्रगति भी हुई। अनेक प्रकार के शिल्पों के लिए काँसे के औजारों का प्रयोग किया जाता था। वास्तुविदों ने ईंटों के स्तम्भों का निर्माण करना सीख लिया था। सैकड़ों लोगों को चिकनी मिट्टी के शंकु (कोन) बनाने और पकाने के काम में लगाया जाता था जिससे वे दीवारें विभिन्न रंगों से सुशोभित हो जाती हैं। मूर्तिकला के क्षेत्र में भी उच्चकोटि की सफलता प्राप्त की गई, इस कला के सुंदर नमूने पत्थरों पर तैयार किए जाते थे। इसी समय औद्योगिकी के क्षेत्र में एक युगान्तरकारी परिवर्तन आया जो शहरी अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत उपयुक्त सिद्ध हुआ। वह था– कुम्हार के चाक का निर्माण। आगे चलकर इस चाक से कुम्हार की कार्यशाला में एक साथ बड़े पैमाने पर दर्जनों एक जैसे बर्तन एक साथ बनाए जाने लगे।

प्रश्न 6.
मेसोपोटामिया में लेखन कला के विकास पर एक लघु लेख लिखिए।
उत्तर :
मेसोपोटामिया में जो लिखी हुई पट्टिकाएँ खुदाई में प्राप्त हुई हैं, वे लगभग 3200 ई० पू० की हैं। उनमें चित्र जैसे चिह्न और संख्याएँ दी गई हैं। वहाँ बैलों, मछलियों और रोटियों आदि की लगभग पाँच हजार सूचियाँ प्राप्त हुईं, जो वहाँ के दक्षिणी शहर उरुक के मंदिरों में आने वाली और वहाँ से बाहर जाने वाली चीजों की होंगी। स्पष्टतः लेखन कार्य तभी शुरू हुआ जब समाज को अपने लेन-देन का स्थायी हिसाब रखने की आवश्यकता पड़ी क्योंकि शहरी जीवन में लेन-देन अलग-अलग समय पर होते थे। उन्हें करने वाले भी कई लोग होते थे और सौदा भी कई प्रकार के माल के बारे में होता था। मेसोपोटामिया के लोग मिट्टी की पट्टिकाओं पर लिखा करते थे। लिपिक चिकनी मिट्टी को गीला करता था और फिर उसे गूंधकर और थापकर एक ऐसे आकार की पट्टी का रूप दे देता था जिसे वह आसानी से अपने एक हाथ में पकड़ सके। वह सावधानीपूर्वक उसकी सतह को चिकना बना लेता था फिर सरकण्डे की तीली की तीखी नोक से वह उसकी नम चिकनी सतह पर कीलाकार चिह्न बना देता था। जब ये पट्टिकाएँ धूप में सूख जाती थीं तो पक्की हो जाती थीं और वे मिट्टी के बर्तनों जैसी मजबूत हो जाती थीं। जब उन पर लिखा हुआ कोई हिसाब असंगत हो जाता था तो उस पट्टिका को
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फेंक दिया जाता था। इस प्रकार प्रत्येक सौदे के लिए चाहे वह कितना ही छोटा हो, एक अलग पट्टिका की आवश्यकता होती थी। इसलिए मेसोपोटामिया के खुदाई स्थलों पर बहुत-सी पट्टिकाएँ मिली हैं, इसी सम्पदा के कारण आज हम मेसोपोटामिया के विषय में इतना कुछ जानते हैं। लगभग 2600 ई० पू० के आस-पास अनाज वर्ण कीलाकार हो गए और भाषा मछली सुमेरियन थी। अब लेखन का प्रयोग हिसाब-किताब रखने के लिए ही नहीं, बल्कि शब्दकोष बनाने, भूमि के | हस्तांतरण को कानूनी मान्यता प्रदान करने, राजाओं के कार्यों का वर्णन करने और कानून में उन परिवर्तनों को प्रकट करने के लिए किया जाने लगा जो जन-साधारण के लिए बनाए जाते कीलाकार अक्षर संकेत। ज्ञात भाषा सुमेरियन का स्थानं, 2400 ई० पू० के पश्चात् धीरे-धीरे
अक्कादी भाषा ने ले लिया। अक्कादी भाषा में कीलाकार लेखन की परम्परा ईसवी सन् की प्रथम सदी तक अर्थात् 2000 से अधिक वर्षों तक चलती रही।

लेखन पद्धति

जिस ध्वनि के लिए कीलाक्षर या कलाकार चिह्न का प्रयोग किया जाता था वह एक अकेला व्यंजने या स्वर नहीं होता था (जैसे अंग्रेजी वर्णमाला में m या a), लेकिन अक्षर (Syllables) होते थे (जैसे अंग्रेजी में -put:, या -la- या -in-)। इस प्रकार, मेसोपोटामिया के लिपिक को बहुत-से चिह्न सीखने पड़ते थे और उसे गीली पट्टी पर उसके सूखने से पहले ही लिखना होता था। लेखन कार्य के लिए अत्यन्त कुशलता की आवश्यकता होती थी, इसलिए लिखने का कार्य अत्यन्त महत्त्व रखता था।
UP Board Solutions for Class 11 History Chapter 2 Writing and City Life image 5UP Board Solutions for Class 11 History Chapter 2 Writing and City Life image 6

प्रश्न 7.
उर’ नगर की सभ्यता पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उत्तर :
उर’ उन नगरों में से एक था जहाँ सर्वप्रथम खुदाई की गई थी। उर, मेसोपोटामिया का एक ऐसा नगर था जिसके साधारण घरों की खुदाई सन् 1930 के दशक में सुव्यवस्थित रूप से की गई थी। नगर में टेढ़ी-मेढ़ी व सँकरी गलियाँ पाई गईं जिससे यह पता चलता है कि पहिये वाली गाड़ियाँ वहाँ के अनेक घरों तक नहीं पहुँच सकती थीं। अनाज के बोरे और ईंधन के गट्ठे संभवत: गधे पर लादकर घर तक लाए। जाते थे। पतली व घुमावदार गलियों तथा घरों के भूखण्डों का एकसमान आकार न होने से यह निष्कर्ष निकलता है कि नगर नियोजन की पद्धति का अभाव था। वहाँ गलियों के किनारे जल-निकासी के लिए उस तरह की नालियों की पद्धति का अभाव था, जैसी कि उसके समकालीन नगर । मोहनजोदड़ो में पाई गई है। जलनिकासी की नालियाँ और मिट्टी की नलिकाएँ उर नगर के घरों के भीतरी आँगन में पाई गई हैं, जिससे यह चित्र-उस नगर का एक रिहायशी इलाका (लगभग 2000 ई०पू०)। समझा जाता है कि घरों की छतों का ढलान भीतर की ओर होता था। वर्षा का पानी निकास नालियों के माध्यम से बने हुए हौजों में ले जाया जाता था। फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि लोग अपने घर का सारा कूड़ा-कचरा बुहारकर गलियों में डाल देते थे, जहाँ वह आने-जाने वाले लोगों के पैरों के नीचे आता रहता था। इस प्रकार बाहर कूड़ा डालते रहने से गलियों की सतहें ऊँची उठ जाती थीं जिसके कारण कुछ समय बाद घरों की दहलीजों को भी ऊँचा उठाना पड़ता था जिससे वर्षा के पश्चात् कीचड़ बहकर घरों के भीतर न आ सके। कमरों के अंदर रोशनी खिड़कियों से नहीं, बल्कि उन दरवाजों से होकर आती थी जो आँगन में खुला करते थे। इससे घरों में रहने वाले परिवारों में गोपनीयता भी बनी रहती थी। घरों के बारे में विभिन्न अंधविश्वास प्रचलित थे, जिनके विषय में उर में पाई गई शकुन-अपशकुन संबंधी बातें पट्टिकाओं पर लिखी मिली हैं; जैसे-घर की देहली ऊँची उठी हुई हो तो वह धन-दौलत लाती है, सामने का दरवाजा अगर किसी दूसरे के घर की ओर न खुले तो वह सौभाग्य प्रदान करता है; लेकिन अगर घर की लकड़ी का मुख्य दरवाजा (भीतर की ओर न खुलकर) बाहर की ओर खुले तो पत्नी अपने पति लिए के यंत्रणा का कारण बनेगी। उर में नगरवासियों के लिए एक कब्रिस्तान भी था, जिसमें शासकों तथा जन-साधारण की समाधियाँ पाई गईं, लेकिन कुछ लोग साधारण घरों के फर्शों के नीचे भी दफनाए हुए पाए गए।

प्रश्न 8.
उपयुक्त उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए कि ‘मारी एक नगरीय केन्द्र और व्यापारिक स्थल था।
उत्तर :
मारी नगर एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण व्यापारिक स्थल पर स्थित था जहाँ से होकर लकड़ी, ताँबा, राँगा, तेल, मदिरा और अन्य कई वस्तुओं को नावों के माध्यम से फरात नदी के रास्ते दक्षिण और उत्तर में तुर्की, सीरिया और लेबनान लाया-ले जाया जाता था। मारी नगर व्यापार के आधार पर समृद्ध हुए नगरीय केंद्र का एक अच्छा उदाहरण है। दक्षिणी नगरों को घिसाई-पिसाई के पत्थर, लकड़ी और शराब तथा तेल के पीपे ले जाने वाले जलपोत मारी में रुका करते थे। मारी नगर के राजकीय अधिकारी जहाज पर जाकर लदे हुए सामान की जाँच करते थे तथा उसमें लदे माल की कीमत का 10 प्रतिशत अधिभार वसूलते थे। जौ विशेष प्रकार की नौकाओं में आता था। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कुछ पट्टिकाओं में साइप्रस के द्वीप ‘अलाशिया’ से आने वाले ताँबे का भी उल्लेख मिला है। यह द्वीप उन दिनों अपने ताँबे तथा टिन के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। यहाँ राँगे का भी व्यापार होता था। क्योंकि काँसा औजार और हथियार बनाने के लिए मुख्य व्यापारिक वस्तु था अतः इसके व्यापार का अत्यधिक महत्त्व था। यद्यपि मारी राज्य सैन्य दृष्टि से अधिक शक्तिशाली नहीं था किन्तु व्यापार और समृद्धि की दृष्टि से बेजोड़ था।

प्रश्न 9.
राजा जिमरीलिम के मारी स्थित राजमहल के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर :
मेसोपोटामिया में मारी स्थित राजा जिमरीलिम (1810-1760 ई० पू०) को राजमहल शाही परिवार का निवास स्थान था। यह प्रशासन तथा उत्पादन का प्रमुख केंद्र था। इसके अतिरिक्त यह मूल्यवान धातुओं के आभूषणों के निर्माण का भी प्रमुख केंद्र था। मारी स्थित जिमरीलिम का महल अपने समय में इतना अधिक प्रसिद्ध था कि उत्तरी सीरिया का एक छोटा राजा उसे देखने के लिए आया था। वह मारी के राजा जिमरीलिम के शाही मित्र का परिचय-पत्र लाया था। खुदाई में प्राप्त दैनिक सूचियों में ज्ञात होता है कि राजा की भोजन की मेज पर प्रतिदिन अत्यधिक मात्रा में खाद्य पदार्थ रखे जाते थे। इसमें रोटी, मांस, मछली, फल तथा बीयर और शराब सम्मिलित थे। सम्भवतः राजा अपने अन्य मित्रों के साथ भोजन करता था। राजमहल में केवल एक ही प्रवेशद्वार था। यह प्रवेशद्वार उत्तर की ओर बना हुआ था। उसके बड़े खुले सहन सुंदर पत्थरों से जड़े हुए थे। राजा विदेशी अतिथियों तथा अपने लोगों से सभागृह में मिलता था। वहाँ के भित्तिचित्रों को देखकर आगंतुक आश्चर्य में पड़ जाते थे। यह राजमहल एक विशाल क्षेत्र में था जो 2.4 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ था। इसमें 260 कक्ष थे

मारी स्थित जिमरीलिम का महल (1810-1760 ई०पू०UP Board Solutions for Class 11 History Chapter 2 Writing and City Life image 7

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प्रश्न 10.
मेसोपोटामिया की सभ्यता का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए

(क) सामाजिक जीवन
(ख) आर्थिक जीवन
उत्तर :

(क) मेसोपोटामिया सभ्यता में सामाजिक जीवन

मेसोपोटामिया के लोगों के सामाजिक जीवन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

  1. समाज के विभिन्न वर्ग :
    मेसोपोटामिया का समाज तीन प्रमुख वर्गों में बँटा हुआ था। प्रथम वर्ग में, जिसे उच्च वर्ग कहा जाता था, राजवंश के सदस्य, उच्च पदाधिकारी, पुरोहित व सामंत सम्मिलित थे। इस वर्ग के लोगों का जीवन बड़ा वैभवशाली और ऐश्वर्य से परिपूर्ण था। इनके पास धन व सम्पत्ति की कभी नहीं थी और इन्हें समाज में अत्यधिक सम्मान प्राप्त था। द्वितीय वर्ग मध्यम वर्ग कहलाता था, जिसमें छोटे जमींदार, व्यापारी आदि आते थे। इनका जीवन भी सुखमय और संतोषजनक था। तीसरा वर्ग निम्न श्रेणी के लोगों का था, जिसमें प्रमुखतः दास सम्मिलित थे। दासों का जीवन कष्टमय था, लेकिन हेम्मूराबी के काल में उनके साथ कठोरता का व्यवहार नहीं किया जाता था।
  2. भोजन, वस्त्र व आभूषण :
    मेसोपोटामिया के लोग अपने भोजन में गेहँ तथा जौ की रोटी, दूध, दही, मक्खन, फल आदि का प्रयोग करते थे। वे खजूर से आटा, चीनी तथा पीने के लिए शराब तैयार करते थे। वे मांस-मछली का भी सेवन करते थे। मेसोपोटामिया के लोग सूती, ऊनी तथा भेड़ की खाल के बने वस्त्रों का प्रयोग करते थे। पुरुषों के वस्त्रों में लुंगी प्रमुख थी। उच्च वर्ग की स्त्रियाँ विलासिता का जीवन व्यतीत करती थीं। सोने-चाँदी के आभूषण भी प्रयोग में जाए जाते थे। आभूषणों में हार, कंगन तथा बालियाँ आदि , प्रमुख थे, जिनका स्त्रियाँ रुचिपूर्वक प्रयोग करती थीं।
  3. आवास :
    यहाँ के लोग रहने के लिए पक्की ईंटों के मकान बनाते थे। ईंटें चिकनी मिट्टी की बनी होती थीं। मकानों का गन्दा पानी निकालने के लिए बनी नालियाँ मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के नगरों के समान थीं। मेसोपोटामिया के लोग मकानों को सुंदर बनाते थे। मकानों की दीवारों पर उभरे हुए चित्र भी बनाए जाते थे।
  4. समाज में नारी का स्थान :
    समाज में स्त्रियों को बहुत सम्मान प्राप्त था। सामान्यतः एक-पत्नी विवाह की प्रथा प्रचलित थी। पर्दा प्रथा तथा राज-परिवारों तक ही सीमित थी। दहेज का प्रचलन था, किन्तु विवाह में पिता से प्राप्त दहेज पर वधू का ही अधिकार होता था। विंधवा को पति की सम्पत्ति बेचने का अधिकार था। वेश्यावृत्ति और बहुविवाह भी प्रचलित थे।

(ख) मेसोपोटामिया सभ्यता में आर्थिक जीवन

मेसोपोटामिया के लोगों के आर्थिक जीवन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

  1.  कृषि :
    मेसोपोटामिया के लोगों का आर्थिक जीवन संतोषप्रद था। यहाँ की भूमि बहुत उपजाऊ थी, इसलिए यहाँ के लोगों का प्रमुख व्यवसाय कृषि था। गेहूँ, जौ और मक्का की खेती अधिक की जाती थी। नहरों और नदियों से सिंचाई की जाती थी तथा फल और सब्जियों का उत्पादन भी पर्याप्त मात्रा में होताथा।
  2. पशुपालन :
    मेसोपोटामिया में लोगों का दूसरा प्रमुख व्यवसाय पशुपालन था। ये लोग विभिन्न प्रकार के पशु पालते थे। पशुओं से इन्हें उपयोगी सामग्री प्राप्त होती थी। बैल रथ खींचते थे और भेड़ों से ऊन प्राप्त की जाती थी।
  3. उद्योग-धंधे एवं व्यापार :
    मेसोपोटामिया के दस्तकार लोग लकड़ी, धातु, हाथीदाँत तथा मिट्टी की अनेक कलात्मक वस्तुएँ बनाते थे। इनका भारत व चीन के साथ घनिष्ठ व्यापारिक संबंध था।

मेसोपोटामिया के लोग देश-विदेश से व्यापार करते थे। सम्भवतः इस युग में सिक्कों का प्रचलन नहीं था। चॉदी या सोने के टुकड़े; सिक्कों के स्थान पर प्रयोग में लाए जाते थे। जल तथा थल दोनों मार्गों का व्यापार हेतु प्रयोग किया जाता था। उस समय बेबीलोन पश्चिमी देशों का एक प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र था। मेसोपोटामिया के निवासियों ने पहिये का आविष्कार करके रथों व गाड़ियों का निर्माण किया, जो व्यापार में विशेष सहायक सिद्ध हुए थे। यहाँ के लोगों ने लेन-देन व व्यापार के लिए सिक्के बनाए और नाप-तोल के लिए अनेक प्रकार के बाटों का आविष्कार किया।

प्रश्न 11.
मेसोपोटामिया की सभ्यता का वर्णन निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर कीजिए
(क) धार्मिक जीवन
(ख) लेखन कला व साहित्य
(ग) विज्ञान
(घ) कलाएँ
उत्तर :

(क) मेसोपोटामिया की सभ्यता में धार्मिक जीवन

मेसोपोटामिया के लोगों के धार्मिक जीवन की विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

  1.  अनेक देवी-देवताओं में विश्वास :
    मेसोपोटामिया के लोगों का अनेक देवी-देवताओं में विश्वास था। उनमें शम्स (सूर्य देवता), अनु (आकाश देवता), एनलिल (वायु देवता) तथा नन्नार चंद्र देवता) आदि प्रमुख थे। बेबीलोन के निवासी विशेष रूप से ‘माईक’ और असीरिया के लोग ‘असुर’ (अस्सुर) नामक देवता की उपासना करते थे।
  2. भव्य मंदिरों का निर्माण :
    प्रत्येक नगर में एक प्रधान मन्दिर होता था। वहाँ का देवता नगर का संरक्षक देवता माना जाता था। नगर के संरक्षक देवता के लिए नगर के पवित्र क्षेत्र में किसी पहाड़ी पर या ईंटों के बने चबूतरे पर मंदिर का निर्माण किया जाता था, जिसे जिगुरत’ या “जिग्गूरात’ कहते थे।
  3.  बलि प्रथा :
    लोग देवताओं को प्रसन्न करने के लिए भेड़-बकरी आदि पशुओं की बलि चढ़ाते थे। उनकी पूजा स्वार्थ-प्रेरित होती थी। उसमें श्रद्धा का अभाव पाया जाता था।
  4. भौतिकवाद में आस्था : 
    इस सभ्यता के लोग अपने जीवनकाल में अधिक-से-अधिक सुख भोगना चाहते थे। अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे देवी-देवताओं की उपासना करते थे। उनका विश्वास था कि देवताओं को प्रसन्न रखकर भौतिक सुख प्राप्त किया जा सकता है।
  5. अंधविश्वास :
    इस सभ्यता के लोग अंधविश्वासी होते थे। वे ज्योतिषियों, पुरोहितों, भविष्यवाणियों, जादू-टोनों तथा भूत-प्रेत आदि पर बहुत विश्वास रखते थे। बाढ़, अकाल तथा महामारी को वे देवता का प्रकोप मानते थे।
  6. नैतिकता :
    इस सभ्यता के लोग नैतिकतापूर्ण जीवन व्यतीत करते थे। झूठ बोलना, घमण्ड करना तथा दूसरे को अप्रसन्न करने इत्यादि दुर्गुणों से वे दूर रहते थे।
  7. वर्तमान का महत्त्व :
    इस सभ्यता के लोग परलोक के स्थान पर इहलोक की चिंता अधिक करते थे। उनका विश्वास था कि परलोक अंधकार और दुर्भिक्ष (अकाल) का डेरा है, जहाँ पेट भरने के लिए केवल मिट्टी मिलती है।

(ख) मेसोपोटामिया की सभ्यता में लेखन कला व साहित्य

लेखन कला का आविष्कार मेसोपोटामिया की सभ्यता की संसार को सबसे बड़ी देन मानी जा सकती है। यहाँ के लोगों ने लिखने के लिए कीलाकार लिपि का
विकास किया था। इस लिपि में 250 से भी अधिक अक्षर थे। प्रारम्भ में इनकी लिपि चित्रों पर आधारित थी, जो बाद में ध्वनि पर आधारित हो गई। यहाँ के लोग नर्म मिट्टी की बनी स्लेटों पर सरकण्डे की कलम से लिखा करते थे, जिन्हें पकाकर सुरक्षित रख लिया जाता था। हजारों की संख्या में ऐसी अनेक मिट्टी की पट्टिकाएँ या तख्तियाँ निनवेह नगर की खुदाई में मिली हैं। मेसोपोटामिया के निवासी साहित्य-प्रेमी थे। बेबीलोन व निनवेह नगरों की खुदाई में मिट्टी की जो पट्टियाँ मिली हैं, उनमें कहानियाँ, महाकाव्य, गीतिकाव्य तथा धार्मिक उपदेश संकलित हैं।

(ग) मेसोपोटामिया की सभ्यता में विज्ञान (वैज्ञानिक प्रगति)

मेसोपोटामिया के लोगों ने विज्ञान के कुछ क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की थी। गणित, ज्योतिष और औषधि-विज्ञान के क्षेत्रों में उनका योगदान बड़ा
उल्लेखनीय है। गणित के क्षेत्र में सर्वप्रथम उन्होंने 1, 10 और 100 के चिह्न की खोज की थी। उनके गणितशास्त्र में 12 और 60 की संख्याओं का विशेष महत्त्वं था। उन्होंने वर्ष, माह, दिन, घण्टे, मिनट व सेकण्ड का विभाजन इसी आधार पर किया था। ज्योतिष के क्षेत्र में इन लोगों ने अनेक महत्त्वपूर्ण सफलताएँ अर्जित कर ली थीं। इन्होंने नक्षत्रों की गति के आधार पर मौसम संबंधी भविष्यवाणियाँ कीं और बुध, शुक्र, मंगल, गुरु तथा शनि ग्रहों का भी पता लगाया। उन्होंने आकाश को 12 राशियों में बाँटा और उनके नाम भी रखे। उन्होंने एक पंचांग भी बनाया और सूर्यग्रहण तथा चंद्रग्रहण के कारणों की खोज की। औषधि-विज्ञान के क्षेत्र में उन्होंने अनेक भयावह रोगों के निदान के लिए कुछ रसायन (दवाएँ) भी बना लिए थे। इतना ही नहीं, धूपघड़ी व सूर्यघड़ी के आविष्कारक भी यही लोग थे।

(घ) मेसोपोटामिया की सभ्यता में कलाओं का विकास

मेसोपोटामिया में पत्थर तथा धातुओं का अभाव था, इसलिए भवननिर्माण कला के क्षेत्र में यहाँ के, निवासियों ने कोई विशेष उन्नति नहीं की, फिर भी यहाँ के
कुछ शासकों ने सुंदर मंदिरों वे महलों का निर्माण अवश्य कराया। इन्हें सुंदर चित्रों से सजाया भी जाता था। यही नहीं, मेहराबों, स्तम्भों और गुम्बदों के निर्माण में यहाँ के लोगों ने संसार को एक नई दिशा प्रदान की। इनकी कला के नमूनों में ‘बेबीलोन का बुर्ज’ और ‘जिगुरत’ या ‘जिग्गूरात’ विश्व भर में प्रसिद्ध हैं। इस सभ्यता के अन्तर्गत विशाल आकार की मूर्तियों का निर्माण भी हुआ। इसके अतिरिक्त बेबीलोन में चित्रकला भी अपने विकास के शिखर पर थी। यहाँ के लोग पशु-पक्षियों के व धर्म सम्बन्धी चित्र अधिक बनाते थे। इस समय संगीत कला, फर्नीचर निर्माण कला और मुद्रण कला भी विकसित हो चुकी थी।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्य सौन्दर्य के तत्त्व छन्द

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 2
Chapter Name काव्य सौन्दर्य के तत्त्व छन्द
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्य सौन्दर्य के तत्त्व छन्द

छन्द

छन्द का अर्थ है – ‘बन्धन’। ‘बन्धनमुक्त’ रचना को गद्य कहते हैं और बन्धनयुक्त को पद्य। छन्द प्रयोग के कारण ही रचना पद्य कहलाती है और इसी कारण उसमें अद्भुत संगीतात्मकता उत्पन्न हो जाती है। दूसरे शब्दों में, मात्रा, वर्ण, यति (विराम), गति (लय), तुक आदि के नियमों से बंधी पंक्तियों को छन्द कहते हैं।
छन्द के छः अंग हैं – (1) वर्ण, (2) मात्रा, (3) पाद या चरण, (4) यति, (5) गति, (6) तुका

(1) वर्ण – वर्ण दो प्रकार के होते हैं – (क) लघु और (ख) गुरु। ह्रस्व वर्ण (अ, इ, उ, ऋ, चन्द्रबिन्दु UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्य सौन्दर्य के तत्त्व छन्द 18  को लघु और दीर्घ वर्ण आ, ई, ऊ, अनुस्वार UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्य सौन्दर्य के तत्त्व छन्द 19, विसर्ग ( : ) ] को गुरु कहते हैं। इनके अतिरिक्त संयुक्त वर्ण से पूर्व का और हलन्त वर्ण से पूर्व का वर्ण गुरु माना जाता है। हलन्त वर्ण की गणना नहीं की जाती। कभी-कभी लय में पढ़ने पर गुरु वर्ण भी लघु ही प्रतीत होता है। ऐसी स्थिति में उसे लघु ही माना जाता है। कभी-कभी पाद की पूर्ति के लिए अन्त के वर्ण को गुरु मान लिया जाता है। लघु वर्ण का चिह्न खड़ी रेखा ‘ । ‘ और दीर्घ वर्ण का चिह्न अवग्रह ‘ ऽ’ होता है।

(2) मात्रा – मात्राएँ दो हैं – ह्रस्व और दीर्घ। किसी वर्ण के उच्चारण में लगने वाले समय के आधार पर मात्रा का निर्धारण होता है। ह्रस्व वर्ण (अ, इ, उ आदि) के उच्चारण में लगने वाले समय को एक मात्राकाल तथा दीर्घ वर्ण आदि के उच्चारण में लगने वाले समय को दो मात्राकाल कहते हैं। मात्रिक छन्दों में ह्रस्व वर्ण की एक और दीर्घ वर्ण की दो मात्राएँ गिनकर मात्राओं की गणना की जाती है।

(3) पाद या चरण – प्रत्येक छन्द में कम-से-कम चार भाग होते हैं, जिन्हें चरण या पाद कहते हैं। कुछ ऐसे छन्द भी होते हैं, जिनमें चरण तो चार ही होते हैं, पर लिखे वे दो ही पंक्तियों में जाते हैं; जैसे—दोहा, सोरठा, बरवै आदि। कुछ छन्दों में छह चरण भी होते हैं; जैसे—कुण्डलिया और छप्पय।

(4) यति (विराम) – कभी-कभी छन्द का पाठ करते समय कहीं-कहीं क्षणभर को रुकना पड़ता है, उसे यति कहते हैं। उसके चिह्न ‘,’, ‘।’, ‘।।’, ‘?’ और कहीं-कहीं विस्मयादिबोधक चिह्न ‘!’ होते हैं।

(5) गति ( लय) – पढ़ते समय कविता के कर्णमधुर प्रवाह को गति कहते हैं।

( 6) तुक – कविता के चरणों के अन्त में आने वाले समान वर्गों को तुक कहते हैं, यही अन्त्यानुप्रास होता है।
गण – लघु-गुरु क्रम से तीन वर्षों के समुदाय को गण कहते हैं। गण आठ हैं – यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण, सगण। ‘यमाताराजभानसलगा’ इन गणों को याद करने का सूत्र है। इनका स्पष्टीकरण अग्रवत् है
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छन्दों के प्रकार – छन्द दो प्रकार के होते हैं – (1) मात्रिक तथा (2) वर्णिक। जिस छन्द में मात्राओं की संख्या का विचार होता है वह मात्रिक और जिसमें वर्गों की संख्या का विचार होता है, वह वर्णिक कहलाता है। वर्णिक छन्दों में वर्गों की गिनती करते समय मात्रा-विचार (ह्रस्व-दीर्घ का विचार) नहीं होता, अपितु वर्गों की संख्या-भर गिनी जाती है, फिर चाहे वे ह्रस्व वर्ण हों या दीर्घ; जैसे-रम, राम, रामा, रमा में मात्रा के हिसाब से क्रमशः 2, 3, 4, 3 मात्राएँ हैं, पर वर्ण के हिसाब से प्रत्येक शब्द में दो ही वर्ण हैं।

मात्रिक छन्द

1. चौपाई।
लक्षण (परिभाषा) – चौपाई एक सम-मात्रिक छन्द है। इसमें चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 16 : मात्राएँ होती हैं। अन्त में जगण (। ऽ।) और तगण (ऽऽ।) के प्रयोग का निषेध है; अर्थात् चरण के अन्त में गुरु लघु (ऽ।) नहीं होने चाहिए। दो गुरु (ऽ ऽ), दो लघु (।।), लघु-गुरु (। ऽ) हो सकते हैं।
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2. दोहा
लक्षण (परिभाषा) – यह अर्द्धसम मात्रिक छन्द है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके पहले और तीसरे (विषम) चरणों में 13, 13 मात्राएँ और दूसरे तथा चौथे (सम) चरणों में 11, 11 मात्राएँ होती हैं। अन्त के वर्ण गुरु और लघु होते हैं; यथा
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3. सोरठा
लक्षण (परिभाषा) – यह भी अर्द्धसम मात्रिक छन्द है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके पहले और तीसरे चरण में 11 तथा दूसरे और चौथे चरण में 13 मात्राएँ होती हैं। यह दोहे का उल्टा होता है; यथा
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4. रोला
लक्षण (परिभाषा) – रोला एक सम मात्रिक छन्द है, इसके प्रत्येक चरण में 11 और 13 के विराम (यति) से 24 मात्राएँ होती हैं; यथा
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्य सौन्दर्य के तत्त्व छन्द 5

5. कुण्डलिया।
लक्षण (परिभाषा) – कुण्डलिया एक विषम मात्रिक छन्द है जो छः चरणों का होता है। दोहे और रोले को क्रम से मिलाने पर कुण्डलिया बन जाता है। इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। प्रथम चरण के प्रथम शब्द की अन्तिम चरण के अन्तिम शब्द के रूप में तथा द्वितीय चरण के अन्तिम अर्द्ध-चरण की तृतीय चरण, के प्रारम्भिक अर्द्ध-चरण के रूप में आवृत्ति होती है; येथा
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6. हरिगीतिका
लक्षण (परिभाषा) – हरिगीतिका एक सम मात्रिक छन्द है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 16/12 के विराम (यति) से 28 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक चरण के अन्त में रगण (ऽ । ऽ) आना आवश्यक होता है; जैसे
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7. बरवै
लक्षण (परिभाषा) – यह एक अर्द्धसम मात्रिक छन्द है। इसके पहले और तीसरे चरणों में 12-12 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरणों में 7-7 मात्राएँ होती हैं। सम चरणों के अन्त में जगण (IST) आवश्यक होता है; जैसे
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वर्ण-वृत्त (वर्णिक छन्द)

8. इन्द्रवज्रा
लक्षण (परिभाषा) – इन्द्रवज्रा एक सम वर्ण-वृत्त है। इसके प्रत्येक चरण में दो तगण (ऽ ऽ।), एक जगण (।ऽ।) और दो गुरु (ऽऽ) होते हैं। इस प्रकार इसके प्रत्येक चरण में कुल 11 वर्ण होते हैं; जैसे
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9. उपेन्द्रवज्रा
लक्षण (परिभाषा) – उपेन्द्रवज्रा एक सम वर्ण-वृत्त है। इसके प्रत्येक चरण में 11 वर्ण होते हैं और वे जगण (।ऽ।), तगण (ऽ ऽ।), जगण और दो गुरु के क्रम से होते हैं; जैसे
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्य सौन्दर्य के तत्त्व छन्द 11

10. वसन्ततिलका
लक्षण (परिभाषा) – वसन्ततिलका एक सम वर्ण-वृत्त है। इसके प्रत्येक चरण में 14 वर्ण होते हैं और प्रत्येक चरण में एक तगण (ऽ ऽ।), एक भगण (ऽ।।), दो जगण (।ऽ।) और अन्त में दो गुरु होते हैं। इसमें 8, 6 वर्गों पर यति होती है; जैसे
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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्य सौन्दर्य के तत्त्व छन्द 13

11. मालिनी
लक्षण (परिभाषा) – मालिनी एक सम वर्ण-वृत्त है। इसमें 15 वर्ण होते हैं और इसके प्रत्येक चरण में नगण (।।।), नगण, मगण (ऽ ऽ ऽ), यगण (। ऽ ऽ), यगण होते हैं और यति 8-7 वर्गों पर पड़ती है; जैसे
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12. सवैया
लक्षण (परिभाषा) – 22 से 26 वर्षों तक के वर्ण-वृत्त को सवैया कहते हैं। इसके अनेक भेद होते हैं। मत्तगयन्द, सुन्दरी, सुमुखी आदि इसके कुछ प्रमुख भेद हैं, जो आगे दिये जा रहे हैं

(i) मत्तगयन्द (सवैया)
लक्षण (परिभाषा) – यह एक सम वर्ण-वृत्त है। इसके प्रत्येक चरण में सात भगण (ऽ।।) और अन्त में दो गुरु वर्ण होते हैं। इस प्रकार यह 23 वर्णो को छन्द है; जैसे
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्य सौन्दर्य के तत्त्व छन्द 15

(ii) सुमुखी (सवैया)
लक्षण परिभाषा) – यह एक सम वर्ण-वृत्त है। इसके प्रत्येक चरण में सात जगण (। ऽ ।) तथा अन्त में लघु और गुरु होते हैं। यह भी 23 वर्गों को छन्द है; जैसे
UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi काव्य सौन्दर्य के तत्त्व छन्द 16

(iii) सुन्दरी (सवैया)
लक्षण (परिभाषा) – यह एक सम वर्ण-वृत्त है। इसके प्रत्येक चरण में आठ सगण (।।ऽ) और एक गुरु । मिलकर 25 वर्ण होते हैं; जैसे
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(iv) मनहर या मनहरण (सवैया)
लक्षण (परिभाषा) – सवैयों से अधिक अर्थात् 26 से अधिक वर्षों वाले छन्द दण्डक छन्द कहलाते हैं। मनहर एक दण्डक वृत्त है। इसके प्रत्येक चरण में कुल 31 वर्ण होते हैं और 8, 8, 8, 7 अथवा 16, 15 वर्षों पर यति होती है। इसका दूसरा नाम मनहरण भी है। इसका अन्तिम वर्ण दीर्घ होती है; जैसे

कर बिनु कैसे गाय दुहिहै हमारी वह,
पद बिनु कैसे नाचि थिरकि रिझाइहै। (= 31 वर्ण)
कहैं रत्नाकर बदन बिनु कैसे चाखि,
माखन बजाइ बेनु गोधन चराइहै ।।
देखि सुनि कैसे दृग स्रवन बिना ही हाय !
भोर ब्रजवासिन की बिपति बराइहै।
रावरो अनूप कोऊ अलख अरूप ब्रह्म,
ऊधौ कहौ कौन धौं हमारे काम आइहै ।।

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UP Board Solutions for Class 11 History Chapter 9 The Industrial Revolution

UP Board Solutions for Class 11 History Chapter 9 The Industrial Revolution (औद्योगिक क्रांति)

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पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर
संक्षेप में उत्तर दीजिए

प्रश्न 1.
ब्रिटेन 1793 से 1815 तक कई युद्धों में लिप्त रहा, इसका ब्रिटेन के उद्योगों पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर :
ब्रिटेन के युद्धों में लिप्त रहने के कारण निम्नलिखित प्रभाव पड़े

  1. इंग्लैण्ड का अन्य देशों से चलने वाला व्यापार छिन्न-भिन्न हो गया।
  2. विभिन्न कल-कारखाने बन्द हो गए।
  3.  लाखों श्रमिक बेरोजगार हो गए।
  4. रोटी, मांस जैसे आवश्यक खाद्य पदार्थों के मूल्य बढ़ गए।

प्रश्न 2.
नहर और रेलवे परिवहन के सापेक्षिक लाभ क्या-क्या हैं?
उत्तर :
प्रारम्भ में रेलवे का विकास नहीं हुआ था। उस समय नहरों का उपयोग सिंचाई के साथ-साथ मालवाहन के लिए भी किया जाता था। इंग्लैण्ड में कोयला नहरों के रास्ते ले जाया जाता था। नहरों के रास्ते माल ढोना सस्ता पड़ता था और समय भी कम लगता था। समय के साथ नहरों के रास्ते परिवहन में अनेक समस्याएँ दिखाई देनी लगी। नहरों के कुछ भागों में जलपोतों की अधिक संख्या के कारण परिवहन की गति धीमी पड़ गई। बाढ़ या सूखे के कारण इनके उपयोग का समय भी सीमित हो गया ऐसे में रेलमार्ग ही परिवहन का सुविधाजनक विकल्प दिखाई देने लगा।

प्रश्न 3.
इस अवधि में किए गए आविष्कारों की दिलचस्प विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर :
इस अवधि में तेजी से विभिन्न क्षेत्रों में आविष्कार हुए। इन आविष्कारों के कुछ समय पश्चात् इनका उपयोग भी प्रारम्भ हो गया। इन आविष्कारों के कारण प्रौद्योगिकी परिवर्तनों की श्रृंखला दिखाई देने लगी जिसने उत्पादन के स्तरों में अचानक वृद्धि कर दी। रेलमार्गों के निर्माण से एक नवीन परिवहन तन्त्र विकसित हो गया। अधिकांश आविष्कार 1782 से 1800 ई० के मध्य हुए। एक अनुमान के अनुसार केवल 18वीं शताब्दी में ही 26,000 आविष्कार हुए।

प्रश्न 4.
बताइए कि ब्रिटेन के औद्योगीकरण के स्वरूप पर कच्चे माल की आपूर्ति का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर :
कच्चा माल किसी भी उद्योग का आधार होता है यदि कच्चे माल की आपूर्ति कारखाने को समय पर होती रहे तो उत्पादन की नियमित गति बनी रहती है। इसके विपरीत यदि कच्चे माल की आपूर्ति कम या बन्द हो जाती है तो उद्योग का उत्पादन कम हो जाता है और उससे आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगती है। कच्चे माल की आपूर्ति एक ही क्षेत्र में हो तो उद्योग का विकास तेजी से होता है। यह ब्रिटेन का सौभाग्य था कि वहाँ एक द्रोणी क्षेत्र यहाँ तक कि एक ही पट्टियों में उत्तम कोटि का कोयला और उच्च स्तर का लोहा साथ-साथ उपलब्ध था। ।

संक्षेप में निबन्ध लिखिर

प्रश्न 5.
ब्रिटेन में स्त्रियों के भिन्न-भिन्न वर्गों के जीवन पर औद्योगिक क्रान्ति का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर :
ब्रिटेन में स्त्रियों के विभिन्न वर्गों के जीवन पर औद्योगिक क्रान्ति का निम्नलिखित प्रभाव पड़ा

  1.  महिलाएँ प्रायः घर का काम (यथा-खाना बनाना, बच्चों एवं पशुओं का पालन पोषण, लकड़ी इकट्ठी करना आदि) करती थीं। परन्तु औद्योगिक क्रान्ति से इनके इन कार्यों में परिवर्तन आ गए।
  2. कारखानों में काम करना महिलाओं के लिए एक दण्ड के समान बन गया था। वहाँ लम्बे समय तक एक ही प्रकार का काम कठोर अनुशासन में तथा विभिन्न भयावह परिस्थितियों में करना पेड़ता था।
  3. कारखानों में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को अधिक लगाया जाता था, क्योंकि उनकी मजूदरी कम होती थी और वे प्रायः आन्दोलन नहीं करती थीं।
  4. महिलाओं को उद्योगों में प्रत्येक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। उन्हें छेड़छाड़ या बलात्कार का भय रहता था। उनके कपड़े मशीनों में फँस जाते थे जिससे वे घायल हो जाती थीं।

प्रश्न 6.
विश्व के भिन्न-भिन्न देशों में रेलवे आ जाने से वहाँ के जनजीवन पर क्या प्रभाव पड़ा? तुलनात्मक विवेचना कीजिए।
उत्तर :
विश्व के लगभग सभी देशों में रेलगाड़ियाँ परिवहन की महत्त्वपूर्ण साधन बन गईं। ये सम्पूर्ण वर्ष उपलब्ध रहती थीं, तेज और सस्ती भी थीं। रेले माल और यात्री दोनों को ढोती थीं। इससे यात्रा करना सरल हो गया। कोयला और लोहे जैसी वस्तुओं को रेल में ही ढोया जा सकता था। इसलिए सभी देशों के लिए रेलों का विकास अनिवार्य हो गया। 1850 तक आते-आते इंग्लैण्ड के सभी नगर आपस में रेलमार्ग से जुड़ गए थे। परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
इंग्लैण्ड में सर्वप्रथम औद्योगिक क्रान्ति हुई
(क) वस्त्र उद्योग में
(ख) लोहा उद्योग में
(ग) कृषि उद्योग में
(घ) जूट उद्योग में
उत्तर :
(क) वस्त्र उद्योग में

प्रश्न 2.
पावरलूम नामक मशीन का आविष्कार हुआ था
(क) 1768 ई० में
(ख) 1776 ई० में
(ग) 1769 ई० में
(घ) 1785 ई० में
उत्तर :
(घ) 1785 ई० में

प्रश्न 3.
औद्योगिक क्रान्ति ने किस नवीन विचारधारा को जन्म दिया?
(क) पूँजीवाद
(ख) समाजवाद
(ग) उपयोगितावाद
(घ) व्यक्तिवाद
उत्तर :
(ख) समाजवाद

प्रश्न 4.
औद्योगिक क्रान्ति का आरम्भ सर्वप्रथम किस देश में हुआ था?
(क) जर्मनी
(ख) इंग्लैण्ड
(ग) फ्रांस
(घ) संयुक्त राज्य अमेरिका
उत्तर :
(ख) इंग्लैण्ड

प्रश्न 5.
जॉर्ज स्टीफेन्सन का आविष्कार क्या था?
(क) रेडियो
(ख) रेल का इंजन
(ग) टेलीविजन
(घ) मोटरकार
उत्तर :
(ख) रेल का इंजन

प्रश्न 6.
समाजवाद का जनक था
(क) लेनिन
(ख) अरस्तू
(ग) महात्मा गांधी
(घ) कार्ल मार्क्स
उत्तर :
(घ) कार्ल मार्क्स

प्रश्न 7.
लोहा साफ करने की विधि किसने ज्ञात की थी?
(क) हम्फ्री डेवी ने
(ख) जेम्सवाट ने
(ग) हेनरी कार्ट ने
(घ) आर्थर यंग ने
उत्तर :
(ग) हेनरी कार्ट ने

प्रश्न 8.
सर्वप्रथम सूत कातने के थेत्र का आविष्कार किया
(क) आर्कराइट ने
(ख) हरग्रीब्ज ने
(ग) हाइट ने
(घ) टॉमस कोक ने
उत्तर :
(ख) हरग्रीव्ज ने

प्रश्न 9.
अनाज को भूसे से अलग करने वाली मशीन का आविष्कार किया
(क) ह्वाहट ने
(ख) आर्कराइट ने
(ग) टेलफोर्ड ने
(घ) जॉन के ने
उत्तर :
(क) ह्वाइट ने

प्रश्न 10.
‘फ्लाइंग शटल का आविष्कार किसने किया था?
(क) कार्टराइट ने
(ख) आर्कराइट ने
(ग) क्रॉम्पटन ने
(घ) जॉन के ने
उत्तर :
(घ) जॉन के ने

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘औद्योगिक क्रान्ति’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम किसने किया?
उत्तर :
औद्योगिक क्रान्ति’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम फ्रांस में जर्जिया मिचलेट एवं जर्मनी में फ्रेडरिक एंजल्स द्वारा किया गया।

प्रश्न 2.
औद्योगिक क्रान्ति सर्वप्रथम कहाँ आरम्भ हुई?
उत्तर :
औद्योगिक क्रान्ति सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में आरम्भ हुई थी।

प्रश्न 3.
इंग्लैण्ड में लोहा और कोयला कहाँ पाया जाता है?
उत्तर :
इंग्लैण्ड में लोहा तथा कोयला क्रमश: वेल्स, नार्थम्बरलैण्ड और स्कॉटलैण्ड में पाया जाता है।

प्रश्न 4.
फ्लाइंग शटल का आविष्कार कब हुआ और किसने किया?
उत्तर :
फ्लाइंग शटल का आविष्कार जॉन के ने 1733 ई० में किया था।

प्रश्न 5.
जेम्सवाट क्यों प्रसिद्ध है?
उत्तर :
जेम्सवाट 1782 ई० में भाप की शक्ति की खोज के कारण विश्वप्रसिद्ध है।

प्रश्न 6.
जॉर्ज स्टीफेन्सन का आविष्कार क्या था और यह आविष्कार कब हुआ?
उत्तर :
जॉर्ज स्टीफेन्सन का आविष्कार रॉकेट नामक इन्जन था। यह आविष्कार 1820 ई० में हुआ थी।

प्रश्न 7.
सेफ्टी लैम्प किसने बनाया और कब?
उत्तर :
खानों के प्रकाश की व्यवस्था करने के लिए ‘हफ्री डेवी’ नामक व्यक्ति ने 1815 ई० में सेफ्टी लैम्प बनाया था।

प्रश्न 8.
कार्ल मार्क्स ने किस प्रसिद्ध ग्रन्थ की रचना की?
उत्तर :
कार्ल मार्क्स ने ‘दास कैपिटल’ नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ की रचना की थी।

प्रश्न 9.
पहला रेलमार्ग कब तथा कहाँ प्रारम्भ किया गया?
उत्तर :
पहला रेलमार्ग 1825 ई० में हॉलैण्ड में स्टाकटन में डालिंगटन तक प्रारम्भ किया गया था।

प्रश्न 10.
रिचर्ड आर्कराइट क्यों प्रसिद्ध है?
उत्तर :
रिचर्ड आर्कराइट अपने आविष्कार ‘वाटर फ्रेम के कारण प्रसिद्ध है। इसका आविष्कार इसने सन् 1797 ई० में किया था।

प्रश्न 11.
‘बर्सले कैनाल के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर :
‘बर्सले कैनाल इंग्लैण्ड की पहली नहर थी जो जेम्स ब्रिडले द्वारा बनाई गई थी। उसके माध्यम से कोयला भण्डारों से शहर तक कोयला पहुँचता था।

प्रश्न 12.
ब्लूचर क्या था?
उत्तर :
ब्लूचर एक रेल का इन्जन था जिसे रेलवे इन्जीनियर जॉर्ज स्टीफेन्सन ने बनाया था। यह इन्जन 30 टन भार 4 मील प्रति घण्टे की गति से एक पहाड़ी पर ले जा सकता था।

प्रश्न 13.
औद्योगिक क्रान्ति किस सदी में हुई?
उत्तर :
औद्योगिक क्रान्ति 18वीं सदी में हुई।

प्रश्न 14.
समाजवाद का जनक किसे कहा जाता है?
उत्तर :
समाजवाद का जनक कार्ल मार्क्स को कहा जाता है।

प्रश्न 15.
मजदूर संघ सर्वप्रथम किस देश में बने?
उत्तर :
मजदूरों ने अपने हितों की रक्षा के लिए सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में ही ट्रेड यूनियन या मजदूर संघ बनाए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
औद्योगिक क्रान्ति ने इंग्लैण्ड के उद्योगों और समाज पर क्या प्रभाव डाला?
उत्तर :
इंग्लैण्ड की क्रान्ति ने वहाँ के उद्योग-धन्धों व समाज को निम्न प्रकार से प्रभावित किया

  1. उद्योगों पर प्रभाव :
    औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप वस्त्र उद्योग तथा खनन उद्योग का विशेष रूप से विकास हुआ। इस क्रान्ति से वस्त्र उद्योग में भारी परिवर्तन हुआ।फ्लाइंग शटल के आविष्कार से कम समय में बहुत अधिक कपड़ा तैयार होने लगा। स्पिनिंग जेनी, पावरलूम तथा म्यूल नामक यन्त्रों के आविष्कार से उत्तम कपड़ा तैयार किया जाने लगा। आगे चलकर विश्व के प्रत्येक देश में अनेक बड़े-बड़े कारखाने स्थापित हुए। औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप खनन उद्योग का भी बहुत विकास हुआ। खानों से लोहा बड़ी मात्रा में निकाला जाने लगा तथा लोहे से इस्पात बनाया जाने लगा।
  2. समाज पर प्रभाव :
    छोटे किसान या तो फर्म मालिकों के यहाँ मजदूर हो गए या बेकार होकर नगरों के कारखानों में काम करने लगे, जिससे गाँव उजड़ने लगे और औद्योगिक नगर बसने लगे। इसके फलस्वरूप नगरों की जनसंख्या बढ़ने लगी। समाज में जुआखोरी, मद्यपान, हिंसात्मक घटनाएँ बढ़ गईं। औद्योगिक नगरों में स्वच्छता की कमी रहने लगी। चिमनी के धुएँ से प्रदूषण तथा अनेक बीमारियाँ फैलने लगीं। श्रमिक; मनोरंजन के अभाव में मदिरा, जुआ तथा वेश्यागमन जैसे अनैतिक कार्यों में लिप्त हो गए। समाज में पूँजीपति और मजदूर दो वर्ग बन गए। पूँजीपति मजदूरों का शोषण कर अपनी तिजोरियाँ भरने लगे और मजदूरों की दशा दिन-पर-दिन खराब होती गई।

प्रश्न 2.
औद्योगिक क्रान्ति इंग्लैण्ड में ही क्यों हुई?
उत्तर :
इंग्लैण्ड में सर्वप्रथम औद्योगिक क्रान्ति आरम्भ होने के निम्नलिखित कारण थे

  1.  इंग्लैण्ड में लोहे व कोयले के अपार भण्डार थे।
  2.  इंग्लैण्ड को औपनिवेशिक विस्तार के फलस्वरूप स्थापित किए गए अपने उपनिवेशों से ” सरलतापूर्वक कच्चा माल मिल सकता था।
  3.  इंग्लैण्ड को उपनिवेशों से कम मजदूरी पर अधिक संख्या में मजदूर मिल गए थे।
  4.  इंग्लैण्ड में अनेक नए आविष्कार हुए जिन्होंने औद्योगिक क्रान्ति को सफल बनाया।
  5.  इंग्लैण्ड के पूँजीपतियों के पास पर्याप्त मात्रा में पूँजी थी; अतः उन्होंने अनेक उद्योग-धन्धे स्थापित किए।
  6.  इंग्लैण्ड में बने माल के लिए उपनिवेशों में बाजार सुलभ हो जाते थे।

प्रश्न 3.
औद्योगिक विकास का नरों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर :
औद्योगिक विकास से नगरों के वातावरण पर व्यापक प्रभाव पड़ा। इस प्रभाव का उल्लेख निम्नवत् है

  1. कल-कारखानों की स्थापना होने से बड़े-बड़े नगरों की संख्या बढ़ने लगी और उनकी जनसंख्या में भी अत्यधिक वृद्धि हुई।
  2.  नगरों का जीवन अस्त-व्यस्त एवं अशान्त हो गया और वहाँ को सामाजिक जीवन दूषित होने लगा।
  3. नगरों में अनेक श्रमिक बस्तियाँ बनने लगी और चारों ओर श्रमिकों के आन्दोलन होने लगे।
  4.  नगरों में रहने वाले श्रमिकों में मद्यपान, जुआ खेलने और निकृष्ट कोटि को साहित्य पढ़ने के व्यसन उत्पन्न हो गए।
  5.  नगरों में जल-प्रदूषण और वायु-प्रदूषण की समस्याएँ उत्पन्न हो गईं।

प्रश्न 4.
कपड़ा उद्योग में क्रान्ति लाने वाले आविष्कारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
कपड़ा उद्योग में क्रान्ति लाने वाले आविष्कार निम्नलिखित थे

  1.  हरग्रीब्ज ने मशीनी चरखे का आविष्कार किया। इसे स्पिनिंग जेनी कहा गया। इससे तेजी से सूत कातना सम्भव हुआ।
  2. आर्कराइट ने हरग्रीब्ज की मशीन में कुछ ऐसे परिवर्तन किए जिससे इसे पानी की शक्ति से  चलाना सम्भव हो गया। नए चरखे का नाम वाटर फ्रेम रखा गया।
  3. क्रॉम्पटन ने एक ऐसी मशीन का आविष्कार किया, जिसे म्यूल कहते थे।
  4. कार्टराइट ने शक्ति से चलने वाले करघे का आविष्कार किया जिससे बुनाई का काम तेज हो सकाइस मशीन को पहले पशु-शक्ति से चलाया जाता था। बाद में भाप शक्ति से इसे चलाया  जाने लगा। इसे ‘पावरलूम’ का नाम दिया गया।
  5. एलीहिटन नामक अमेरिकी ने रुई एवं बिनौले अलग करने की मशीन का आविष्कार किया। इस । मशीन का नाम ‘जिन’ रखा गया।

प्रश्न 5.
नगरों एवं कारखानों की दशा सुधारने के लिए कौन-कौन से प्रयास किए गए?
उत्तर :
मानववादी और उदार प्रकृति के लोगों के प्रयासों से इंग्लैण्ड में अनेक कानून पास किए गए जिससे नगरों एवं कारखानों की दशा सुधर सके। इनमें से कुछ प्रमुख प्रयास निम्नलिखित थे

  1.  इंग्लैण्ड में प्रथम कारखाना कानून सन् 1802 में पास किया गया जिसमें बाल श्रमिकों के लिए काम के अधिकतम 12 घण्टे निर्धारित किए।
  2.  सन् 1819 में कानून द्वारा नौ वर्ष से कम आयु के बाल श्रमिक से काम कराने पर पाबन्दी लगा दी गई। कुछ समय बाद एक कानून बनाकर स्त्रियों एवं बालकों के खानों में काम करने पर रोक लगा दी गई।
  3.  सन् 1824 में मजदूर संघ बनाने का संवैधानिक अधिकार मजदूरों को प्राप्त हो गया।
  4. कालान्तर में श्रमिकों को मताधिकार भी दिया गया ताकि वे अपनी समस्याओं को आसानी से ” संसद में प्रभाव डालकर हल करवा सकें।
  5.  नगरों की दशा सुधारने के लिए कारखानों को धीरे-धीरे नगरों के बाहर ले जाया गया।
  6.  चिमनियों की ऊँचाई बढ़ा दी गई ताकि उनसे निकलने वाला धुआँ वातावरण एवं वायुमण्डल को खराब न कर सके।
  7. गन्दी बस्तियों को धीरे-धीरे सुधारा गया।
  8.  मजदूरों के लिए साफ एवं अच्छे आवासों का प्रबन्ध किया गया।

प्रश्न 6.
औद्योगिक क्रान्ति के आर्थिक प्रभाव क्या थे?
उत्तर :
औद्योगिक क्रान्ति के आर्थिक प्रभाव निम्नलिखित थे

  1. कुटीर तथा लघु उद्योगों का विनष्टीकरण इसी क्रान्ति के कारण हुआ क्योंकि मशीनों द्वारा | कारखानों में बनाया गया माल बहुत सस्ता होता था जिसकी प्रतिस्पर्धा में कुटीर उद्योगों में बना माल नहीं ठहर सकता था।
  2. बड़े-बड़े कारखानों की स्थापना औद्योगिक क्रान्ति के कारण ही हुई। इन कारखानों में हजारों मजदूर दिन-रात मशीनों की सहायता से बड़े पैमाने पर सस्ती व अच्छी किस्म की वस्तुओं का निर्माण करने लगे।
  3. इस क्रान्ति के पश्चात् बड़ी संख्या में औद्योगिक नगरों की स्थापना हुई। गाँवों के स्थान पर नगर आर्थिक क्रियाओं के प्रमुख केन्द्र बन गए।
  4. मशीनों के अधिक काम करने से कारीगर व शिल्पी बेरोजगार हो गए, बेरोजगारों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हो गई।
  5. औद्योगिक क्रान्ति के कारण धन का विषम बँटवारा सामने आया, पूँजीपति अधिक धनी तथा शिल्पकार गरीब होते चले गए।
  6. औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप कृषिप्रधान देश शीघ्र ही उद्योग प्रधान बन गए। इंग्लैण्ड, फ्रांस, अमेरिका, रूस, जर्मनी तथा जापान की राष्ट्रीय आय बहुत बढ़ गई।

प्रश्न 7.
ट्रेड यूनियन से आप क्या समझते हैं? इसके स्थापित होने के मुख्य उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

ट्रेड यूनियन

औद्योगिक क्रान्ति के आने के पश्चात् उन श्रमिकों की दशा बहुत खराब हो गई जो कारखानों में कार्य किया करते थे। जब सरकार श्रमिकों की कठिनाई दूर करने में कोई सहायता न कर सकी तो उन्होंने ट्रेड यूनियन का संगठन कर लिया। अतः ट्रेड यूनियन्स एक प्रकार के मजदूर संघ थे जो कि मजदूरों की भलाई के लिए बनाए गए।

ट्रेड यूनियन्स बनाने का उद्देश्य

ट्रेड यूनियन बनाने के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे

  1. उद्योगपतियों द्वारा किए जाने वाले अन्याय का विरोध करना।
  2. श्रमिकों के कार्य के घण्टे सुनिश्चित करना।
  3.  श्रमिकों के लिए सम्मानजनक वेतन के लिए प्रयास करना।
  4. कारखानों में काम करने की उचित अवस्थाओं तथा सुविधाओं की माँग करना।

प्रश्न 8.
औद्योगिक क्रान्ति ने साम्राज्यवाद को किस प्रकार जन्म दिया?
उत्तर :
यह कथन बिल्कुल सत्य है कि औद्योगिक क्रान्ति ने ही साम्राज्यवाद को जन्म दिया। औद्योगीकरण में अन्य बातों के अतिरिक्त दो बातों की अधिक आवश्यकता होती है—प्रथम कारखानों के लिए कच्चा माल निरन्तर प्राप्त होता रहे, द्वितीय तैयार सामग्री का तेजी से विक्रय हो। उन देशों ने । जिनका औद्योगीकरण हो चुका था, भारी संरक्षी आयात-कर (हैवी इम्पोर्ट ड्यूटी) लगाकर दूसरे देशों का माल अपने देशों में नहीं घुसने दिया। इसलिए प्रश्न उत्पन्न हुआ कि माल बेचा जाए तो कहाँ बेचा जाए? निश्चित रूप से यह माल उन देशों में बिक सकता था जिनका औद्योगीकरण अभी तक नहीं हुआ था। फिर क्या था, ऐसे देशों को अधिकार क्षेत्र या प्रभाव क्षेत्र में लाने की औद्योगिक देशों में होड़ लग गई। परिणामस्वरूप इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी और जापान आदि देशों ने एशिया, अफ्रीका और द० अमेरिका के अनेक प्रदेशों में अपने उपनिवेश स्थापित कर लिए। उपनिवेशों से दोहरा लाभ रहा-एक तो वहाँ तैयार माल बिक जाता था, दूसरे उद्योगों के लिए कच्चा माल भी मिलता था।

प्रश्न 9.
समाजवाद से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
समाजवाद का अर्थ न्याय, समानता, वास्तविक लोकतन्त्र, मानवता से प्रेम, परोपकार, आत्म-नियन्त्रण, व्यक्तिगत स्वतन्त्रता, उच्च नैतिक आदर्श, शान्ति, सद्भावना, मानव शोषण तथा उत्पीड़न का अन्त और इनकी प्राप्ति के लिए समाज का पुनर्गठन है। दूसरे शब्दों में, समाजवाद एक जनतन्त्रीय आन्दोलन है, जिसका उद्देश्य एक ऐसा आर्थिक संगठन स्थापित करना है जो एक समय में, एक साथ ही अधिकतम न्याय और स्वतन्त्रता दे सके।

प्रश्न 10.
पश्चिमी देशों का प्रभुत्व एशिया और अफ्रीका के देशों पर आसानी से क्यों स्थापित हुआ?
उत्तर :
एशिया और अफ्रीका के देशों में औद्योगिक क्रान्ति न होने के कारण ये देश आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत पिछड़े हुए थे। इन देशों में अविकसित कृषि, अत्यधिक जनसंख्या, आर्थिक विषमता, गरीबी, बीमारी तथा अन्धविश्वासों का बोलबाला था। इनकी राजनीतिक शक्ति भी बिखरी हुई थी और सैनिक शक्ति बहुत कमजोर हो चुकी थी। ज्ञान-विज्ञान का प्रसार न होने से एशिया और अफ्रीका के अधिकांश देश अविकसित तथा कमजोर थे, जिन पर प्रभुत्व जमा लेना एक सरल कार्य था। इन सब दुर्बलताओं का लाभ उठाकर यूरोप के शक्तिशाली देशों ने एक-एक करके एक शताब्दी के अन्दर ही एशिया और अफ्रीका के अधिकांश देशों को अपने साम्राज्यवाद का शिकार बना लिया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
औद्योगिक क्रान्ति से क्या आशय है? औद्योगिक क्रान्ति के कारण लिखिए। या यूरोप में औद्योगिक क्रान्ति के कारणों की विवेचना कीरिए।
उत्तर :

औद्योगिक क्रान्ति का अर्थ

औद्योगिक क्रान्ति से आशय उद्योगों की प्राचीन, परम्परागत और धीमी गति को छोड़कर; नए वैज्ञानिक तथा तीव्र गति से उत्पादन करने वाले यन्त्रों व मशीनों का प्रयोग किया जाना है। यह क्रान्ति उन महान् परिवर्तनों की द्योतक है जो औद्योगिक प्रणाली के अन्तर्गत हुए। इस प्रकार ‘‘उत्पादन के साधनों में आमूल-चूल परिवर्तन हो जाना ही औद्योगिक क्रान्ति है।” वास्तव में औद्योगिक क्रान्ति से आशय उस क्रान्ति से लगाया जाता है जिसने अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में उत्पादन की तकनीक और संगठन में आश्चर्यजनक परिवर्तन कर दिए। ये परिवर्तन इतने प्रभावी और द्रुत गति से हुए कि इसे ‘क्रान्ति’ कहा गया। औद्योगिक क्रान्ति ने बड़े पैमाने के उद्योगों का सूत्रपात किया। इस क्रान्ति का श्रीगणेश इंग्लैण्ड से ही हुआ।

औद्योगिक क्रान्ति के कारण

औद्योगिक क्रान्ति के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे

  1. उपनिवेशों की स्थापना :
    नवीन भौगोलिक खोजों ने यूरोप के देशों को अपने उपनिवेश स्थापित करने की प्रेरणा दी। अल्प समय में ही इंग्लैण्ड, फ्रांस, स्पेन और हॉलैण्ड आदि कई देशों ने संसार के कोने-कोने में अपने उपनिवेश स्थापित कर लिए। इन उपनिवेशों तक पहुँचने के लिए यूरोप के देशों को आवागमन के साधनों का विकास करना पड़ा। साथ ही इन उपनिवेशों से कच्चे माल की प्राप्ति हुई और पक्के माल के लिए बाजार उपलब्ध हुए। इस प्रकार उपनिवेशों की स्थापना ने औद्योगिक क्रान्ति लाने में विशेष सहायता प्रदान की।
  2.  वस्तुओं की माँग में वृद्धि :
    यूरोप के देशों का व्यापार तेजी से बढ़ रहा था। व्यापारी पूर्व के देशों के साथ खूब व्यापार करते एवं लाभ कमाते थे। उपनिवेशों की स्थापना के बाद वे अपना माल उपनिवेशों में भी बेचने लगे। इस प्रकार उनके माल की माँग बराबर बढ़ रही थी। व्यापारी अधिक-से-अधिक उत्पादन करके अधिक-से-अधिक माल बेचना चाहते थे। किन्तु मात्र कुटीर उद्योगों से अधिक उत्पादन न हो सकता था; अत: बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए विशाल मिलों की स्थापना की गई, जिससे कम मूल्य पर अधिक उत्पादन सम्भव हो सके।
  3.  कच्चे माल का उपयोग :
    यूरोप के देशों में बड़े कारखानों द्वारा बड़े पैमाने के उत्पादन के लिए पहले पर्याप्त कच्चा माल उपलब्ध नहीं था किन्तु उपनिवेशों की स्थापना के बाद इ: देशों को अपने उपनिवेशों से पर्याप्त मात्रा में कच्चा माल मिलने लगा। कच्चे माल का सर्वोत्तम प्रयोग तभी हो सकता था जब उससे बड़े पैमाने पर वस्तुएँ बनाए जाएँ तथा उन्हें दुनिया के बाजारों में बेचा जाए।
  4. सस्ते मजदर :
    यूरोप के अनेक देशों में (विशेषकर इंग्लैण्ड में) कृषि-प्रणाली में पर्याप्तपरिवर्तन हो गया था। इस परिवर्तन के फलस्वरूप कृषि का काम बड़ी-बड़ी मशीनों से होने लगा। खेतों की चकबन्दी, जमींदारों द्वारा जमीन की खरीद और चरागाह की भूमि को खेती के काम में लाने के फलस्वरूप गाँवों में रहने वाले बहुत-से लोग विवश होकर नगरों में मजदूरी करने लगे। वे थोड़ी मजदूरी पर भी काम करने को तैयार थे। फलस्वरूप उद्योगों के लिए सस्ते मजदूर उपलब्ध होने लगे, अत: लोगों को उद्योग-धन्धे एवं कारखाने स्थापित करने के लिए विशेष प्रोत्साहन मिला।
  5. कोयले और लोहे की प्राप्ति :
    जिस प्रकार नई मशीनों व नए यन्त्रों के निर्माण के लिए लोहे की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार कारखानों की मशीनों को चलाने के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है। यह शक्ति कोयले से प्राप्त हो सकती है। इंग्लैण्ड में लोहे और कोयले की खाने पास-पास थी; अतः इंग्लैण्ड के पूंजीपतियों को कारखाने खोलने की विशेष प्रेरणा प्राप्त हुई।
  6. पूँजी की सुलभता : 
    विगत दो-तीन शताब्दियों में यूरोप के लोगों ने अपना व्यापार पर्याप्त बढ़ा लिया था और पूर्व के देशों के साथ व्यापार करके उन्होंने पर्याप्त मात्रा में धन कमाया। इस कारण उनके पास पूँजी की कमी नहीं थी। पूँजी को व्यापार, उद्योग तथा उत्पादन के कार्यों में लगाने के लिए लोग उत्सुक ही नहीं, वरन् तत्पर भी थे।
  7. विज्ञान का विकास :
    पुनर्जागरण और धर्म-सुधार पर आधारित आन्दोलन के साथ ही यूरोप | में बौद्धिक विकास का युग भी प्रारम्भ हो गया था और नवीन आविष्कार व खोजों पर आधारित कार्य होने लगे थे। इसके फलस्वरूप कई प्रकार के विशेष यन्त्र बने, भाप की शक्ति का पता लगाया गया तथा भौतिक विज्ञान एवं रसायन शास्त्र में भी नवीन खोजें की गईं। इन सबकी सहायता से औद्योगिक सभ्यता को आगे बढ़ाने का प्रयास किया गया।
  8. चालक शक्ति का विकास :
    इंग्लैण्ड में कोयला तथा भाप की शक्ति चालक-शक्ति के रूप में विकसित हो जाने से मशीनें चलाने में सुविधा हुई। मशीनों के विकास ने औद्योगिक क्रान्ति को विकसित करने में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन मशीनों के कारण ही बड़े पैमाने पर उत्पादन होने लगा, जिसने औद्योगिक क्रान्ति के विकास के द्वार खोल दिए।
  9. सामन्तवाद का अन्त :
    यूरोप में सामन्तवाद के बाद धनी सामन्तों ने अपना धन उद्योगों में लगाना शुरू कर दिया, जिससे औद्योगिक क्रान्ति को विशेष प्रोत्साहन मिला।

प्रश्न 2.
औद्योगिक क्रान्ति के अन्तर्गत विभिन्न क्षेत्रों में हुए आविष्कारों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :

औद्योगिक क्रान्ति के आविष्कार

इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति के अन्तर्गत विभिन्न क्षेत्रों में अनेक आविष्कार हुए, यथा

  1. वस्त्र उद्योग :
    1733 ई० में जॉन के ने तेज चलने वाली एक फ्लाइंग शटल का आविष्कार किया। इसके द्वारा पहले की अपेक्षा दुगुनी चौड़ाई में कपड़ा पहले से कम समय में बुना जाने लगा। 1766 ई० में जेम्स हरग्रीव्ज़ ने सूत कातने की एक ऐसी मशीन बनाई जिसमें एक साथ आठ तकुए बारीक सूत कातते थे। इसी समय आर्कराइट ने म्यूल नामक एक मशीन बनाई, जो पानी से चलती थी और बारीक सूत कातती थी। हरग्रीब्स की मशीन को ‘स्पिनिंग जैनी’ तथा आर्कराइट की मशीन को ‘वाटर म’ नाम दिया गया। 1776 ई० में क्रॉम्पटन ने ‘म्यूल’ नामक मशीन का आविष्कार किया, इस मशीन में स्पिनिंग जैनी तथा वाटर फ्रेमn दोनों के गुण विद्यमान थे। 1785 ई० में कार्टराइट ने भाप की शक्ति से चलने वाली ‘पावरलूम’ नामक मशीन का आविष्कार किया। इसके अतिरिक्त ऊन साफ करने, रूई की पूनो बनाने, कपड़ों में सफेदी लाने तथा रँगने की मशीनें भी बनाई गईं। 1846 ई० में एलिहास हो ने सिलाई की मशीन का आविष्कार किया। इन मशीनों के आविष्कार के फलस्वरूप वस्त्र उद्योग में एक क्रान्ति आ गई और इंग्लैण्ड के कल-कारखानों में बड़े पैमाने पर भारी मात्रा में वस्त्रों का उत्पादन होने लगा।
  2. कृषि :
    कृषि के क्षेत्र में इंग्लैण्ड में टाउनशैड ने फसलों को हेर-फेर कर बोने के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। बैकवेल ने पशुओं की नस्ल सुधारने की विधियाँ खोज निकालीं। इसी समय भूमि को खोदने, बीज बोने, फसल काटने, भूसे को अनाज से अलग करने के लिए अनेक यन्त्रों का आविष्कार किया गया। इन आविष्कारों के फलस्वरूप कृषि उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हो गई।
  3. भाप की शक्ति :
    न्यूकॉमन ने सर्वप्रथम भाप से चलने वाला इन्जन बनाया, परन्तु जेम्सवाट ने 1782 ई० में भाप की शक्ति का समुचित उपयोग करके उद्योगों के क्षेत्र में एक क्रान्ति उत्पन्न कर दी।
  4. उद्योग :
    उद्योग के क्षेत्र में 1709 ई० में इब्राहीम डर्बी ने जले हुए कोयले द्वारा लोहे को पिघलाने की विधि खोज निकाली। हेनरी कार्ट ने लोहे को गलाने और उसे शुद्ध करने का तरीका बताया। 1856 ई० में हेनरी बेसमर ने लोहे से इस्पात बनाने का तरीका खोज निकाला। 1705 ई० में खानों की खुदाई के समय खानों में भर जाने वाले पानी को निकालने के लिए टामस न्यूकॉमन ने एक इंजने बनाया। 1815 ई० में खानों के प्रकाश के लिए डेवी ने डेवी सेफ्टी लैम्प का आविष्कार किया।
  5. परिवहन :
    परिवहन के क्षेत्र में सर्वप्रथम मैकडम ने पक्की सड़कें बनाने की विधि निकाली। ब्रिटुले नामक इन्जीनियर ने 1761 ई० में मानचेस्टर से बर्सले तक एक नहर का निर्माण किया। जेम्सवाट के बाद 1814 ई० में जॉर्ज स्टीफेन्सन ने ऐसा इंन्जन बनाया जो लोहे की पटरियों पर चलता था। 1825 ई० में स्टाकटन से डालिंगटन के बीच पहली रेलगाड़ी चलाई गई। 1820 ई० में स्टीफेन्सन ने रॉकेट इन्जन बनाया जो 55 किलोमीटर प्रति घण्टे की गति से चल सकता था। 1808 ई० में समुद्री जहाजों का निर्माण हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी में मोटरगाड़ियाँ और हवाई जहाज पेट्रोल तथा डीजल की सहायता से चलने लगे।
  6. संचार के साधन :
    1835 ई० में सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में मोर्स ने तार भेजने की व्यवस्था की। 1857 ई० में इंग्लैण्ड और फ्रांस के बीच तार की लाइनें बिछाई गईं। 1840 ई० में इंग्लैण्ड में ही सर्वप्रथम डाक सेवा शुरू हुई। 1876 ई० में ग्राहम बेल ने टेलीविजन का आविष्कार किया। इन आविष्कारों के फलस्वरूप इंग्लैण्ड के वस्त्र उद्योग, खनन उद्योग, कृषि क्षेत्र, परिवहन तथा संचार के क्षेत्र में एक क्रान्ति-सी आ गई और प्रत्येक क्षेत्र में अभूतपूर्व उन्नति होने लगी। इन क्रान्तिकारी आविष्कारों का श्रेय औद्योगिक क्रान्ति को ही दिया जा सकता है।

प्रश्न 3.
औद्योगिक क्रान्ति से विश्व को क्या लाभ हुए?

उत्तर :

औद्योगिक क्रान्ति से विश्व को लाभ

औद्योगिक क्रान्ति मानव के लिए एक वरदान सिद्ध हुई थी और इससे मानव-जाति को अपार लाभ हुए। वुडवर्ड (Woodword) ने इस क्रान्ति के लाभों को व्यक्त करते हुए लिखा है-“इस क्रान्ति से मनुष्य जाति को चमत्कारिक लाभ हुए। जिन कार्यों को करने में असीमित श्रम और पर्याप्त समय लगता था, अब वे अल्पकाल में मामूली श्रम से ही पूरे हो जाते थे।” संक्षेप में औद्योगिक क्रान्ति के अग्रलिखित लाभ हुए

  1. उत्पादन क्षमता में वृद्धि :
    नयन खोजों के परिणामस्वरूप उत्पादन की नवीन तकनीकों को विकास भी होता रहता था, जिससे उत्पादन क्षमता में निरन्तर वृद्धि होती रहती थी। अतः औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप वस्तुओं की उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ गई।
  2. यातायात के साशनों का विकास :
    औद्योगिक क्रान्ति से यातायात के साधनों का तेजी से विकास हुआ। ऐसे नवीन यातायात के साधनों का निर्माण और खोज होने लगी थी जो तीव्र गति से कार्य करते हों। इस प्रकार इस क्रान्ति के फलस्वरूप यातायात अधिक सुगम और विकसित हो गया।
  3. विज्ञान की प्रगति :
    औद्योगिक साधनों के विकास के लिए विज्ञान के क्षेत्र में निरन्तर ‘खोजें चलती रहीं। वैज्ञानिक नई-नई प्रौद्योगिकी की खोज में प्रयत्नशील रहते थे। इन खोजों और प्रयासों के परिणामस्वरूप विभिन्न विज्ञान निरन्तर प्रगति की ओर बढ़ने लगे।
  4.  कृषि में सुधार :
    औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप कृषि कार्यों के लिए नवीन यन्त्रों को प्रयोग किया जाने लगा। अभी तक कृषि अत्यधिक श्रमसाध्य थी तथा इससे उत्पादन बहुत कम होता था। यन्त्रीकरण से कृषि कार्य सरल हो गया और खाद्यान्नों की उत्पादन क्षमता में कई गुना वृद्धि हो गई। अब कृषि धीरे-धीरे व्यवसाय का रूप लेने लगी।
  5. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार तथा सांस्कृतिक सम्पर्क में वृद्धि :
    औद्योगिक क्रान्ति से अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में भी वृद्धि हुई। व्यापारिक वर्ग के लोग विश्व के सभी देशों में आने-जाने लगे। इससे सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुआ और मानव परम्परागत रूढ़ियों से मुक्त हो गया।
  6.  दैनिक जीवन के लिए उपयोगी साधनों में वृद्धि :
    मानव के दैनिक जीवन में भौतिक साधनों के सुलभ हो जाने से विशेष सुख-सुविधा का वातावरण बना। मानव को दैनिक जीवन के कार्यों की पूर्ति हेतु विशेष सुविधाएँ प्राप्त हुईं, जिन्होंने नागरिकों के जीवन स्तर को परिष्कृत रूप प्रदान किया। अब उनका जीवन सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण होता चला गया।

प्रश्न 4.
औद्योगिक क्रान्ति के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों की विवेचना कीजिए। या औद्योगिक क्रान्ति के प्रभावों की संक्षिप्त विवेचना कीजिए।
उत्तर :

औद्योगिक क्रान्ति के प्रभाव

युरोप महाद्वीप के विभिन्न देशों पर औद्योगिक क्रान्ति के अच्छे एवं बुरे दोनों प्रकार के प्रभाव पड़े। औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप वहाँ के सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन में अनेक क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए। राजनीतिक क्षेत्र में लोकतन्त्रात्मक शासन-व्यवस्था औद्योगिक क्रान्ति से हुए श्रमिकों के आन्दोलनों के फलस्वरूप ही शीघ्रता से स्थापित हो सकी। इस क्रान्ति के विभिन्न प्रभावों का विवेचन निम्नलिखित है

  1. नगरों का विकास :
    औद्योगिक क्रान्ति के कारण नए नगरों की तेजी से स्थापना हुई और पुराने नगरों में भी विकास होने लगा था। विशाल उद्योगों की स्थापना से वहाँ पर कार्य करने वाले श्रमिकों की संख्या तीव्रता से बढ़ी। नगरों का व्यापारिक विकास होने से दैनिक जीवन में अनेक परिवर्तन हुए तथा व्यापार और उद्योगों का तीव्र गति से विकास हो गया।
  2. गन्दी बस्तियों में वृद्धि :
    इस औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप श्रमिकों ने अपने-अपने कारखानों के आस-पास अव्यवस्थित बस्तियों का निर्माण कर लिया। यहाँ पर अनियोजित ढंग से मकान बने, जिनमें गन्दे पानी के निकास के साधन तक नहीं थे। श्रमिकों की ये बस्तियाँ बीमारी और गन्दगी का केन्द्र थी। कालान्तर में इसका यह परिणाम हुआ कि श्रमिकों ने अपनी सुव्यवस्थित आवास की माँगों की पूर्ति के लिए आन्दोलन भी चलाए।
  3. सामाजिक जीवन में परिवर्तन :औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप सामाजिक जीवन में अनेक परिवर्तन हुए। समाज में ‘पूँजीपति’ और ‘श्रमिक’ नामक दो नए वर्गों को उदय हुआ। इन दोनों वर्गों में परस्पर संघर्ष चलता रहता था। सामाजिक जीवन में एक उल्लेखनीय परिवर्तन यह भी हुआ कि श्रमिकों के अपने परिवारों से पृथक् चले जाने के कारण पारिवारिक विघटन प्रारम्भ हो गया। इसके अतिरिक्त, सामाजिक जीवन का मापदण्ड भौतिक साधनों की सम्पन्नता हो गया।
  4. उद्योगपतियों का विलासी जीवन :
    विशाल उद्योगों से उद्योगपतियों को निरन्तर आर्थिक लाभ प्राप्त हो रहा था। इससे उनका जीवन विलासितापूर्ण होता जा रहा था। उनके भौतिक सुख-साधन बढ़ने लगे ओर वे धन के बल पर विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करने लगे।
  5. आर्थिक जीवन पर प्रभाव :
    औद्योगिक क्रान्ति ने मानव के आर्थिक जीवन का रूप ही बदल | दिया, जिससे राज्य की आय भी बढ़ी। उद्योगों के स्वामियों के पास धन की निरन्तर अभिवृद्धि हो रही थी। आर्थिक जीवन में छोटे व्यवसायियों का महत्त्व घट गया और उनके पास धन का अभाव रहने लगा। किसी भी देश के आर्थिक स्तर का मापदण्ड उसके विशाल उद्योगों को ही। स्वीकार किया जाने लगा।
  6.  समाजवाद का विकास :
    औद्योगिक क्रान्ति का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभाव समाजवादी विचारधारा का विकास था। यह एक श्रमिक आन्दोलन था। सम्पूर्ण विश्व में समाजवाद के सिद्धान्त का विकास औद्योगिक क्रान्ति की ही देन था।
  7. कृषि व यातायात के क्षेत्र में क्रान्ति :
    औद्योगिक क्रान्ति का सबसे उपयोगी और व्यावहारिक प्रभाव यह रहा कि इससे कृषि-जगत और यातायात के संसाधनों में क्रान्ति आ गई। कृषि-यन्त्रों की सहायता से खाद्यान्नों के उत्पादन में कई गुना वृद्धि हुई और कृषकों की दशा में विशेष सुधार हुआ।
  8. राष्ट्रीय आय में वृद्धि :
    औद्योगिक क्रान्ति के कारण विभिन्न देशों में तीव्र गति से औद्योगीकरण हुआ। अब देश और विदेशों में बड़े पैमाने पर तैयार माल बेचा जाने लगा। व्यापार में वृद्धि होने से राष्ट्रीय आय में भी भारी वृद्धि हो गई।
  9. रहन :
    सहन के स्तर में वृद्धि औद्योगिक क्रान्ति के कारण आजीविका के साधनों में भारी वृद्धि हो गई, जिससे नागरिकों की आय बढ़ गई। प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हो जाने के कारण मध्यवर्गीय लोग भी महँगी और पहले की अपेक्षा अधिक वस्तुओं का उपभोग करने लगे, जिससे उनके रहन-सहन के स्तर में सुधार आ गया। परिणामतः नागरिकों का जीवन स्तर ऊँचा उठ गया।
  10. जनसंख्या में वृद्धि :
    औद्योगिक क्रान्ति ने आर्थिक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता उत्पन्न कर दी। अब नागरिक सुखी एवं वैभवपूर्ण जीवन-यापन करने लगे। परिणामत: जनसंख्या अबाध गति से बढ़ने लगी। विशेषतः नगरों में श्रमिकों का जमाव हो जाने के काण जनसंख्या अधिक हो गई।
  11.  कुटीर उद्योग :
    धन्धों का विनाश-औद्योगिक क्रान्ति का छोटे-छोटे कुटीर उद्योग-धन्धों पर सर्वाधिक दुष्प्रभाव पड़ा। बड़े पैमाने के उद्योगों की स्थापना की होड़ में कुटीर उद्योग-धन्धों का विनाश हो गया।
  12.  नवीन आविष्कारों का जन्म :
    औद्योगीकरण की प्रक्रिया को सफल बनाने के लिए वैज्ञानिकों ने नई मशीनें, उपकरण तथा नई प्रविधियाँ खोज निकाली, जिससे नए आविष्कारों को प्रोत्साहन मिला। लोग नए आविष्कारों की खोज में दत्तचित्त होकर जुट गए।
  13.  धार्मिक प्रभाव :
    औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप समाज के धार्मिक मूल्यों, विश्वासों और धार्मिक मान्यताओं में अनेक परिवर्तन’ हुए। उत्पादन के विभिन्न साधन सुलभ हो जाने से लोगों की इच्छाएँ असीमित होती चली गई और वे भौतिकवादी होते चले गए। धन के आधार पर ही व्यक्ति का मूल्यांकन किया जाने लगा और नैतिकता, सदाचरण, चरित्र आदि को विस्मृत किया। जाने लगा। धनागम में लिप्त व्यक्ति आत्मापरमात्मा, माया-मोह आदि के प्रति अपनी अनास्था प्रकट करने लगे, यहाँ तक कि धर्म को भी अपना स्वार्थ की पूर्ति का साधन बनाया जाने लगा। इसके फलस्वरूप धर्म का महत्त्व कम होने लगा।

प्रश्न 5.
औद्योगिक क्रान्ति ने समाजवाद को किस प्रकार प्रारम्भ किया ? 
उत्तर :

समाजवाद का अर्थ

समाजवाद की अनेक परिभाषाएँ दी जाती हैं। सामान्य शब्दों में, समाजवाद का अर्थ यह है कि समाज में सभी मनुष्य बराबर हों, सभी के पास धन-सम्पत्ति हो तथा सभी को जीवनोपयोगी सामग्री सुविधाजनक ढंग से उपलब्ध हो। इस तरह समाजवाद का अर्थ व्यवहार में मानवीय अधिकारों की समानता से है। आर्थिक दृष्टि से समाजवाद उस व्यवस्था का नाम है जिसमें उत्पत्ति के साधनों पर किसी व्यक्ति विशेष का अधिकार न होकर, पूरे समाज का अधिकार होता है। रॉबर्ट (Robert) के अनुसार, “समाजवादी कार्यक्रम का यह एक आवश्यक भाग है कि भूमि तथा उत्पादन के अन्य साधनों पर जनता का अधिकार हो तथा उनको प्रयोग और प्रबन्ध जनता द्वारा जनता के लाभ के लिए ही किया जाए।

औद्योगिक क्रान्ति से समाजवाद का प्रारम्भ

औद्योगिक क्रन्ति के फलस्वरूप समाज में दो वर्गों का उदय हुआ। एक वर्ग औद्योगिक संस्थानों के स्वामियों का था जो धीरे-धीरे सम्पन्न होता जा रहा था। इसके सुखों और भोग-विलासों में निरन्तर वृद्धि हो रही थी। यह वर्ग पूँजीपति कहलाने लगा। समाज में दूसरा वर्ग श्रमिकों का था। शोषण के कारण श्रमिक वर्ग की दशा बड़ी दयनीय थी। श्रमिक दिन-रात अथक परिश्रम करके अपने स्वामियों के लिए अपार धन अर्जित कर रहे थे। परन्तु उन्हें इतना पारिश्रमिक भी नहीं मिलता था जिससे ये अपने परिवार के लिए पेटभर भोजन भी जुटा सकें। यहाँ तक कि इनकी बस्तियाँ भी बहुत गन्दी थीं। फलस्वरूप इन श्रमिकों में पूँजीपतियों के विरुद्ध रोष उत्पन्न होने लगा था। धीरे-धीरे कुछ असन्तुष्ट श्रमिकों ने अपने व्यवस्थित श्रमिक संगठन बना लिए। इन्होंने पूँजीपति वर्ग के विरुद्ध अपने जीवन की आवश्यक सुविधाओं की प्राप्ति के लिए संघर्ष प्रारम्भ कर दिए। इनका उद्देश्य समाज के प्रत्येक प्राणी को विभिन्न सुविधाओं के उपभोग के समान अवसर सुलभ कराना था। इसलिए इनके आन्दोलन कोसमाजवादी आन्दोलन कहा जाता है। इन्होंने अपने समाजवाद के आधार पर पूँजीवाद को समाप्त करने का उद्घोष किया, जिसका आशय था कि ‘समस्त साधनों का उपभोग समस्त जनता को मिलना चाहिए। पूँजी पर सभी का समान नियन्त्रण एवं अधिकार हो तथा उत्पादन में भी जनता के सहयोग से ही हो।’ इस तरह समाजवाद में लोकहितकारी भावना अन्तर्निहित थी। इस भावना के कारण ही इसे अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई। फ्रांस में समाजवाद का विकास लुई ब्लाँ और चार्ल्स फोरियर आदि द्वारा किया गया। जर्मनी में कार्ल माक्र्स ने समाजवाद को क्रमबद्ध नियमों के आधार पर अभिव्यक्त कर विश्वव्यापी बना दिया। यह समाजवाद इतना प्रभावशाली सिद्ध हुआ कि आज विश्व के अनेक देशों में समाजवादी सरकारें स्थापित हो गई हैं। यह समाजवाद औद्योगिक क्रान्ति की ही देन है। औद्योगिक क्रान्ति ने जिस पूँजीवादी अर्थव्यवस्था को जन्म दिया, उसी के विरोधस्वरूप समाजवादी अर्थव्यवस्था पनपी। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि समाजवाद औद्योगिक क्रान्ति की ही देन है। यह पूँजीपतियों के शोषण से बचाव का नया शास्त्र था। समाजवाद श्रमिकों के मुक्तिदाता के रूप में प्रकट हुआ। कार्ल मार्क्स का मत है कि पूँजीवाद के विनाश के बीज समाजवाद के गर्भ में ही छिपे हैं। वास्तव में औद्योगिक श्रमिकों ने ही पूँजीवाद का अन्त करने के लिए समाजवाद को जन्म दिया है।

प्रश्न 6.
औद्योगिक 
क्रान्ति यूरोप के किन-किन देशों में फैली है? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर :

औद्योगिक क्रान्ति से प्रभावित यूरोपीय देश

15वीं शताब्दी में विश्व में सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति आरम्भ हुई। यहीं से औद्योगिक क्रान्ति मुख्य रूप से विभिन्न देशों में बहुत तेजी से फैली। औद्योगिक क्रान्ति से प्रभावित विभिन्न यूरोपीय देश इस प्रकार थे

  1. इंग्लैण्ड :
    इंग्लैण्ड स्वयं को यूरोप महाद्वीप से पृथक् रखकर एक अलग महाद्वीप के रूप में स्वीकार करता है। वास्तव में यूरोप की सांस्कृतिक स्थिति का कर्णधार इंग्लैण्ड ही रहा है। विश्व में औद्योगिक क्रान्ति का जन्मदाता भी इंग्लैण्ड ही है। अनेक क्षेत्रों में मशीनी उद्योगों की विशाल स्तर पर स्थापना सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में ही हुई। वस्त्र उद्योग, कृषि उद्योग, यातायात आदि का दुत विकास भी इंग्लैण्ड में ही हुआ। यहीं से इन उद्योगों का फैलाव समस्त यूरोप में हुआ।
  2.  फ्रांस :
    यूरोप महाद्वीप में सम्मिलित फ्रांस देश में भी औद्योगिक विकास बड़ी शीघ्रता से और विशाल पैमाने पर हुआ था। 1830 ई० के बाद सम्राट लुई फिलिप के काल में औद्योगिक क्रान्ति अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई थी। वहाँ रेलमार्गों का विकास हुआ और सड़कों का तेजी से निर्माण हुआ। फ्रांस में औद्योगिक क्रान्ति ने श्रमिकों के आन्दोलनों को भी जन्म दिया।
  3.  जर्मनी और इटली :
    जर्मनी और इटली में भी औद्योगिक विकास तेजी से हुआ। छापेखाने का उद्योग जर्मनी में ही विकसित हुआ। जर्मनी में मशीनों के निर्माण का उद्योग अधिक प्रगति कर गया। इटली में भी एकीकरण के बाद पूँजीपतियों और उद्योगपतियों द्वारा उद्योगों की स्थापना में विशेष रुचि ली गई। इटली में यातायात के साधनों के निर्माण का उद्योग बहुत बड़े पैमाने पर विकसित हुआ।
  4.  रूस :
    यूरोप के विशाल और शक्तिशाली देश रूस में जार सम्राटों की निरंकुशता के कारण औद्योगिक क्रान्ति देर से हो पाई थी। वहाँ जार अलेक्जेण्डर द्वितीय के समय से उद्योगों की स्थापना होनी प्रारम्भ हुई। 1917 ई० की क्रान्ति के बाद रूस में भी औद्योगिक विकास बड़ी शीघ्रता से हुआ था।
    इसके फलस्वरूप रूस औद्योगिक दृष्टि से इतना अधिक विकसित होता गया कि वह विज्ञान और तकनीकी विकास में किसी भी यूरोपीय देश से पीछे नहीं रहा। इस प्रकार औद्योगिक क्रान्ति अपने जन्म-स्थान इंग्लैण्ड से शनैः शनैः यूरोप के अन्य देशों में फैलती चली गई। इसका प्रसारे इतनी तीव्र गति और प्रभावी ढंग से हुआ कि इसने समस्त यूरोपीय देशों को अपने में समेट लिया। सभी यूरोपीय देश औद्योगिक क्रान्ति से प्रभावित हो उठे।

प्रश्न 7.
औद्योगिक क्रान्ति का भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर :
औद्योगिक क्रान्ति के भारतीय अर्थव्यवस्था पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े

  1. औद्योगिक क्रान्ति से पूर्व भारत से अनेक वस्तुओं का निर्यात होता था, परन्तु औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् भारत के इस निर्यात को बड़ा धक्का लगा।
  2.  औद्योगिक क्रान्ति के कारण इंग्लैण्ड में विभिन्न वस्तुओं का उत्पादन तीव्र गति से होने लगा। इस माल के विक्रय के लिए अंग्रेजों को बाजार चाहिए था। भारत की मण्डियों में ब्रिटेन में बना माल भर दिया गया। भारत निर्यात करने वाले देश के स्थान पर आयात करने वाला देश बनकर रह गया।
  3. भारत में विभिन्न लघु उद्योग और दस्तकारियाँ ठप्प हो गईं।
  4.  औद्योगिक क्रान्ति का भारत के कारीगरों और दस्तकारों पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा। वे बेरोजगार हो गए और गरीबी का जीवन व्यतीत करने पर मजबूर हो गए।
  5. देश में कृषि में अनेक लोग लगे हुए थे। परन्तु कारीगरों और दस्तकारों के बेरोजगार हो जाने से कृषि पर और बोझ बढ़ गया। इस प्रकार किसानों का जीवन और भी दूभर हो गया और भारत अब पूर्णतया कृषिप्रधान देश बनकर रह गया।
  6. देश में बनी हुई वस्तुएँ इंग्लैण्ड से आने वाली वस्तुओं का मुकाबला नहीं कर सकीं। देश में बनी  वस्तुओं पर भारी कर लगा दिया गया था।
  7. अधिक लाभ उठाने के उद्देश्य से अंग्रेजी सरकार ने भातीय किसानों को अपना कच्चा माल सस्ते दामों पर बेचने के लिए मजबूर कर दिया। यह लूट-खसोट की नीति औद्योगिक क्रान्ति का ही परिणाम थी।
  8.  अन्त में कहा जा सकता है कि इंग्लैण्ड में होने वाली औद्योगिक क्रान्ति भारत की निर्धनता को एक प्रमुख कारण बनी। इसने भारतीय अर्थव्यवस्था का ढाँचा ही बदल दिया।

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UP Board Solutions for Class 11 History Chapter 10 Displacing Indigenous Peoples

UP Board Solutions for Class 11 History Chapter 10 Displacing Indigenous Peoples (मूल निवासियों का विस्थापन)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर
संक्षेप में उत्तर दीजिए

प्रश्न 1.
दक्षिणी और उत्तरी अमेरिका के मूल निवासियों के बीच के फर्को से सम्बन्धित किसी भी बिन्दु पर टिप्पणी करिए।
उत्तर :
दक्षिणी अमेरिका के मूल निवासी बड़े पैमाने पर कृषि कार्य करते थे। इसलिए परिवार पर होने वाले व्यय के पश्चात् अधिशेष होता था। इस अधिशेष के कारण वहाँ राजशाही और साम्राज्य का विकास हुआ। इसके विपरीत उत्तरी अमेरिका के मूल निवासी कृषि कार्य नहीं करते थे। और न ही वे ऐसा उत्पादन करते थे जिनका अधिशेष रहता हो। इसलिए वहाँ राजशाही व साम्राज्य का विकास नहीं हुआ।

प्रश्न 2.
आप 19वीं सदी के संयुक्त राज्य अमेरिका में अंग्रेजी के उपयोग के अतिरिक्त अंग्रेजों के आर्थिक और सामाजिक जीवन की कौन-सी विशेषताएँ देखते हैं?
उत्तर :
ये विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. वे कुशल कारीगर थे और आकर्षक कपड़े बनाते थे।
  2. लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। संयुक्त रज्य अमेरिका के लोगों ने कृषि क्षेत्र में पर्याप्त विस्तार किया। उन्होंने दूसरे देशों में भी भूमि खरीदी।
  3. वहाँ खनन उद्योग और कारखानों का विकास किया गया।
  4.  वे मछली तथा मांस खाते थे।
  5.  खेतों में सब्जियाँ ओर मकई उगाते थे।
  6. सत्रहवीं सदी में उन्होंने घुड़सवारी आरम्भ कर दी थी।

प्रश्न 3.
अमेरिकियों के लिए फ्रण्टियर के क्या मायने थे?
उत्तर :
अमेरिकियों के लिए ‘फ्रण्टियर’ के मायने उनकी पश्चिमी सीमा से थे। यह सीमा सेटलरों के कारण पीछे खिसकती रहती थी। जैसे-जैसे ये आगे बढ़ती थी मूल निवासी भी पीछे खिसकने के लिए बाध्य किए जाते थे।

प्रश्न 4.
इतिहास की किताबों में ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों को शामिल क्यों नहीं किया गया था?
उत्तर :
इतिहास की किताबों में ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों को इसलिए शामिल नहीं किया गया क्योंकि वे जन्म से यहाँ नहीं थे। वे ऑस्ट्रेलिया के साथ जुड़े एक लम्बे पुल से न्यू गुयाना से आए थे। प्रारम्भिक लोग इन्हें ऐबॉरिजिनीज कंहते थे। देशी लोगों का एक और विशाल समूह उत्तर में निवास करता है। ऐसा माना जाता है कि वे किसी और स्थान से आए थे संक्षेप में निबन्ध लिखिए

प्रश्न 5.
लोगों की संस्कृति को समझने में संग्रहालय की गैलरी में प्रदर्शित चीजें कितनी कामयाब रहती हैं? किसी संग्रहालय को देखने के अपने अनुभव के आधार पर सोदाहरण विचार कीजिए।
उत्तर :
अध्यापक की सहायता से छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 6.
कैलिफोर्निया में चार लोगों के बीच 1880 में हुई किसी मुलाकात की कल्पना करिए। ये चार लोग हैं एक अफ्रीकी गुलाम, एक चीनी मजदूर, गोल्ड रश के चक्कर में आया हुआ एक जर्मन और होपी कबीले का एक मूल निवासी। उनकी बातचीत का वर्णन करिए।
उत्तर :
अध्यापक की सहायता से छात्र स्वयं करें।

परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्तरी अमेरिका के मूल निवासियों ने अपना इतिहास लेखन कब प्रारम्भ किया?
(क) सन् 1740 में
(ख) सन् 1761 में
(ग) सन् 1760 में
(घ) सन् 1861 में
उत्तर :
(क) सन् 1740 में

प्रश्न 2.
कैबॉट न्यूफाउण्डलैण्ड कब पहुँचा?
(क) सन् 1497 में
(ख) सन् 1498 में
(ग) सन् 1530 में
(घ) सन् 1860 में
उत्तर :
(क) सन् 1497 में

प्रश्न 3.
क्यूबेल एक्ट कब पास हुआ?
(क) सन् 1774 में
(ख) सन् 1773 में
(ग) सन् 1781 में
(घ) सन् 1782 में
उत्तर :
(क) सन् 1774 में

प्रश्न 4.
सिडनी कहाँ है?
(क) अमेरिका में
(ख) कनाडा में
(ग) रूस में
(घ) ऑस्ट्रेलिया में
उत्तर :
(घ) ऑस्ट्रेलिया में

प्रश्न 5.
संयुक्त राज्य अमेरिका की कौन-सी सरहद खिसकती रहती थी?
(क) पूर्वी
(ख) पश्चिमी
(ग) उत्तरी
(घ) दक्षिणी
उत्तर :
(ख) पश्चिमी

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सेटलर या आबादकार को क्या अर्थ है?
उत्तर :
सेटलर या आबादकार उपनिवेश स्थापित करने वाले को कहा जाता है। यह शब्द दक्षिण अफ्रीका में डच के लिए, आयरलैण्ड, न्यूजीलैण्ड और ऑस्ट्रेलिया में ब्रिटिश के लिए और अमेरिका में यूरोपीय लोगों के लिए प्रयुक्त होता था। इन उपनिवेशों की राजभाषा अंग्रेजी थी।

प्रश्न 2.
टेरा न्यूलिअस क्या है?
उत्तर :
टेरो न्यूलिअस (Terra Nullius) का अर्थ है जो किसी की नहीं है।’ यूरोपीय लोगों की । सरकार की ऑस्ट्रेलिया के प्रति यह नीति मूल निवासियों के लिए बनी थी।

प्रश्न 3.
कनाडा की खोज किसने की थी?
उत्तर :
जाक कार्टियर ने सन् 1535 ई० में कनाडा की खोज की थी। कनाडा शब्द की उत्पत्ति ‘कनाटा’ से हुई है, स्थानीय भाषा में जिसका तात्पर्य गाँव से था।

प्रश्न 4.
मूल बाशिन्दा (Native) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
मूल बाशिन्दा वह व्यक्ति होता है जो अपने मौजूदा निवास स्थल में ही जन्मा हो। 20वीं सदी के आरम्भिक वर्षों तक यह यूरोपीय लोगों द्वारा अपने उपनिवेशों के बाशिन्दों के लिए प्रयुक्त होता था।

प्रश्न 5.
उत्तरी अमेरिका में बाहर से आने वाले व्यापारी किन वस्तुओं के व्यापार में रुचि रखते थे?
उत्तर :
ये लोगं वहाँ सोना प्राप्त करना चाहते थे, क्योंकि उत्तरी अमेरिका में सोने के भण्डार अधिक थे। ये लोग मछली और रोएँदार खाल के व्यापार के लिए आए थे।

प्रश्न 6.
अमेरिका के मूल निवासियों का यूरोपीयों के प्रति क्या दृष्टिकोण था?
उत्तर :
ये लोग यूरोपियों से घृणा करते थे। उनकी अनेक लोककथाओं में यूरोपीय का मजाक उड़ाया गया है। उनका वर्णन लालची और धूर्त के रूप में किया गया है।

प्रश्न 7.
1934 का रजिस्ट्रेशन एक्ट क्या था?
उत्तर :
यह एक युगान्तकारी एक्ट था जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका के मूल निवासियों को नागरिक अधिकार प्रदान किए गए थे। इसी के द्वारा उन्हें भूमि क्रय करने और ऋण लेने का अधिकार प्राप्त हुआ।

प्रश्न 8.
हेनरी रेनॉल्ड्स कौन था?
उत्तर :
हेनरी रेनॉल्ड्स एक प्रभावशाली इतिहासकार था। उसने ऑस्ट्रेलियाई इतिहास लेखन की नई पद्धति को जन्म दिया। उसकी प्रसिद्ध पुस्तक का नाम ‘why we were not told’ था।

प्रश्न 9.
बहुसंस्कृतिवाद से क्या आशय है?
उत्तर :
बहुसंस्कृतिवाद वह विचारधारा है जिसमें अनेक संस्कृतियों को एक साथ रहने पर जोर दिया जाता है। यह सहिष्णुता की नीति वाली संस्कृति है।

प्रश्न 10.
ज्यूडिथ राइट के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर :
ज्यूडिथ राइट ऑस्ट्रेलिया की प्रसिद्ध लेखिका थी उन्होंने अपनी पुस्तक ‘दो समय’ में मूल निवासियों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई थी।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्तरी अमेरिका की भौगोलिक स्थिति का परिचय दीजिए।
उत्तर :
उत्तरी अमेरिका का महाद्वीप उत्तर ध्रुवीय वृत्त से लेकर कर्क रेखा तक और प्रशान्त महासागर से अटलांटिक महासागर तक विस्तृत है। पथरीले पहाड़ों की श्रृंखला के पश्चिम में अरिजोना और नेवादा की मरुभूमि है। थोड़ा और पश्चिम में सिएरा नेवाडा पर्वत है। पूरब में विस्तृत मैदानी क्षेत्र, विस्तृत झीलें, मिसीसिपी और ओहियो पर्वतों की घाटियाँ हैं। दक्षिण की ओर मेक्सिको है। कनाडा का 40 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है। कई क्षेत्रों में तेल, गैस और खनिज संसाधन पाए जाते हैं जिनके कारण इस क्षेत्र में अनेक बड़े उद्योगों का विकास हुआ है।

प्रश्न 2.
उत्तरी अमेरिका के सबसे पहले मूल निवासियों के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर :
उत्तरी अमेरिका के सबसे पहले मूल निवासी 30,000 साल पहले बोरिंग स्ट्रेट्स के आर-पार फैले भूमि सेतु के मार्ग से एशिया से आए और 10,000 वर्ष पूर्व अन्तिम हिम युग के दौरान वे कुछ . दक्षिण की ओर बढ़े। अमेरिका में मिलने वाली सबसे प्राचीन मानव द्वारा बनाई गई आकृति–एक तीर की नोक-11,000 वर्ष पुरानी है। लगभग 5,000 वर्ष पूर्व जब जलवायु में अधिक स्थिरता आई, तब जनसंख्या बढ़ना प्रारम्भ हुई। ये लोग नदी घाटी के साथ-साथ बने गाँवों में समूह बनाकर निवास करते थे। ये मछली और मांस खाते थे तथा सब्जियाँ और मकई उगाते थे। वे अक्सर मांस की खोज में लम्बी यात्राओं पर जाया करते थे। मुख्य रूप से उन्हें बाइसौन’ नामक जंगली भैंसों की तलाश रहती थी, जो घास के मैदानों में घूमते थे। लेकिन वे उतने ही जानवर मारते थे जितनी कि उन्हें भोजन के लिए आवश्यकता होती थी।

प्रश्न 3.
चिरोकी कबीले का विस्थापन किस प्रकार हुआ?
उत्तर :
संयुक्त राज्य अमेरिका के मूल निवासियों को यूरोपीय प्रवासियों द्वारा तेजी से हटाया जा रहा था। उसमें वहाँ के उच्चाधिकारी भी सहयोग दे रहे थे। चिरोकी कबीला संयुक्त राज्य अमेरिका के एक नगर जॉर्जिया के कानून से शासित था, उन्हें नागरिक अधिकारों का उपयोग नहीं करने दिया जाता था। अधिकारी इसे सही मानते थे। मूल निवासियों में चिरोकी ही ऐसे थे जिन्होंने अंग्रेजी सीखने और अमेरिकी जीवन शैली को समझने का प्रयास किया, फिर भी उन्हें नागरिक अधिकार प्रदान नहीं किए गए। सन् 1832 में संयुक्त राज्य के मुख्य न्यायाधीश ने एक महत्त्वपूर्ण फैसला दिया–“चिरोकी कबीला एक विशिष्ट समुदाय है और उसके स्वत्त्वाधिकार वाले क्षेत्र में जॉर्जिया का कानून लागू नहीं होता और वे कुछ मामलों में सम्प्रभुता सम्पन्न हैं।” संयुक्त राज्य के तत्कालीन राष्ट्रपति एंड्रिड जैक्सन ने न्यायाधीश जॉन मार्शल की बात नहीं मानी और चिरोकियों को हटाने के लिए एक विशाल फौज भेज दी। 15,000 लोगों को उनके क्षेत्रों से हटा दिया गया।

प्रश्न 4.
बस्तियों के आरक्षण से आप क्या समझते हैं? मूल निवासियों पर इसका क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर :
संयुक्त राज्य अमेरिका के मूल निवासियों को स्थायी रूप से पश्चिम में जमीन दे दी गई फिर भी यदि उनकी जमीन में तेल या सोने जैसी किसी चीज के होने का पता चलता तो उन्हें इसी में साझा करना पड़ता। ऐसे में उनके बीच झगड़े उत्पन्न हो जाते थे। मूल निवासी एक छोटे क्षेत्र में कैद कर दिए गए जिन्हें ‘आरक्षित क्षेत्र कहा जाता था। मूल निवासी अपनी जमीन के लिए जीवन भर लड़ते रहे, परन्तु आप्रवासियों ने उनके विद्रोह का दमन कर दिया। संयुक्त राज्य अमेरिका की सेना ने 1865 से 1890 के मध्य विद्रोह की एक पूरी श्रृंखला का दमन किया था। कनाडा में 1869 से 1885 के बीच मेटिसों के विद्रोह हुए किन्तु उन्हें पराजय का मुँह देखना पड़ा।

प्रश्न 5.
ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर :
ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों की विशेषताएँ ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. प्रारम्भ में यहाँ के निवासियों को ऐबॉरीजिनीज कहा जाता था। कई भिन्न-भिन्न समाजों के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला एक सामान्य नाम है। ये लोगे ऑस्ट्रेलिया में 40,000 वर्ष पूर्व आने प्रारम्भ हुए थे।
  2.  ये लोग ऑस्ट्रेलिया के साथ एक लम्बे पुल से जुड़े न्यू गुयाना से आए थे। मूल निवासियों की अपनी परम्परा के अनुसार वे बाहर से नहीं आए थे बल्कि हमेशा से यहीं थे।
  3.  18वीं सदी के अन्त में मूल निवासियों के 350 से 750 समुदाय थे।
  4.  प्रत्येक समुदाय की अपनी भाषा थी। इनमें से 200 भाषाएँ आज भी व्यवहार में हैं।
  5.  मूल निवासियों का एक और समूह उत्तर में रहता है। इसे टॉरस स्ट्रेट कहते हैं। वे ऑस्ट्रेलिया की वर्तमान जनसंख्या का 2.4 प्रतिशत भाग हैं।
  6. ऑस्ट्रेलिया की जनसंख्या विरल है। अधिकांश नगर समुद्रतट के साथ-साथ बसे हैं। बीच का , क्षेत्र शुष्क मरुभूमि है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गोल्ड रश से आप क्या समझते हैं? हजारों लोग क्यों कैलीफोर्निया की ओर दौड़ने लगे थे? इस क्षेत्र में रेलवे लाइनों के पीछे कौन-सा तर्क था?
उत्तर :
यह आशा हमेशा से की जाती रही कि उत्तरी अमेरिका में धरती के नीचे सोना है। 1840 ई० में संयुक्त राज्य अमेरिका के कैलीफोर्निया में सोने के कुछ चिह्न प्राप्त हुए। इसने ‘गोल्ड रश’ को जन्म दिया। यह उस आपाधापी का नाम है जिसमें हजारों की संख्या में आतुर यूरोपीय लोग अपनी किस्मत सँवारने के लिए अमेरिका पहुँचे। इसके चलते पूरे महाद्वीप में रेलवे लाइनों का निर्माण हुआ। संयुक्त राज्य अमेरिका की रेलवे का काम सन् 1870 ई० में पूरा हुआ और कनाडा की रेलवे का 1885 ई० औद्योगिक क्रान्ति के बाद उत्तरी अमेरिका में भी उद्योग कई प्रकार के अलग कारणों से विकसित हुए—एक उद्योग रेलवे के साज-सम्मान बनाने को विकसित हुआ ताकि दूर-दूर के स्थानों को तीव्र परिवहन द्वारा जोड़ा जा सके। संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा दोनों स्थानों पर औद्योगिक नगरों का विकास हुआ और कारखानों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई। सन् 1860 में संयुक्त राज्य अमेरिका का । अर्थतन्त्र अविकसित अवस्था में था। 1890 में वह विश्व की नेतृत्वकारी औद्योगिक शक्ति बन चुका था। वृहद् स्तर पर खेती का भी विस्तार हुआ। बहुत-सा क्षेत्र साफ किया गया और टुकड़ों के रूप में खेत बनाए गए। 1892 में संयुक्त राज्य अमेरिका का महाद्वीप विस्तार पूरा हो चुका था। प्रशान्त महासागर और अटलांटिक महासागर के बीच का क्षेत्र राज्यों में विभाजित किया जा चुका था। कुछ ही वर्षों में संयुक्त राज्य अमेरिका ने हवाई और फिलीपीन्स में अपने उपनिवेश स्थापित कर लिए।

प्रश्न 2.
इतिहास की पुस्तकों में ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों को क्यों नहीं शामिल किया गया है?
उत्तर :
18वीं सदी के अन्तिम दौर में ऑस्ट्रेलिया में मूल निवासियों के समुदाय 350 से 750 के बीच थे। प्रत्येक समुदाय की अपनी भाषा थी। देशी लोगों का एक विशाल समूह उत्तर में रहता था। यह क्षेत्र टॉरस स्ट्रेट आइलैण्ड कहलाता है। ये लोग ऑस्ट्रेलिया की वर्तमान जनसंख्या का 2.4 प्रतिशत हैं।
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ऑस्ट्रेलिया की जनसंख्या बहुत विरल है। आज भी यहाँ के अधिकांश नगर समुद्र तट के साथ-साथ बसे हैं, क्योंकि ऑस्ट्रेलिया के बीच का क्षेत्र शुष्क मरुभूमि है। ऑस्ट्रेलिया में यूरोप आबादकारों, मूल निवासियों और जमीन के बीच आपसी रिश्ते का किस्सा, अमेरिका के किस्से से मिलता-जुलता है, हालाँकि इसका प्रारम्भ 300 वर्षों के बाद हुआ था। मूल निवासियों के साथ हुई भेंट को लेकर कैप्टन कुक और उसके साथियों की प्रारम्भिक रिपोर्ट अत्यन्त उत्साहपूर्ण है और उसमें मूल निवासियों के मित्रवत् व्यवहार का उल्लेख है। लेकिन जब एक मूल निवासी ने कुक की हत्या कर दी यह घटना हवाई में हुई, ऑस्ट्रेलिया में नहीं-तब ब्रिटिशों का व्यवहार पूर्णतः परिवर्तित हो गया। इस कारण इतिहास की पुस्तकों में ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों को स्थान नहीं दिया गया।

प्रश्न 3.
संयुक्त रज्य अमेरिका और कनाड़ा में यूरोपीय आबादकारों के विरुद्ध मूल निवासियों ने अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए किस प्रकार संघर्ष किया?
उत्तर :
संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाड़ा के मूल निवासियों ने अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए निम्नलिखित प्रकार से संघर्ष किया

  1. यूरोपीय आबादकारों द्वारा मूल निवासियों को संस्कृति की रक्षा और नागरिकता के उपभोग से रोका जाता था। इसके विरुद्ध अनेक संघर्ष हुए। यूरोपीय आबादकारों के मन में कुछ सहानुभूति जागी और इसने संयुक्त राज्य में क्रान्तिकारी कानून को जन्म दिया। 1934 के रजिस्ट्रेशन एक्ट के द्वारा आरक्षण पर मूल निवासियों को भूमि क्रय करने और ऋण लेने का अधिकार प्राप्त हुआ।
  2. 1950 और 1960 के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा की सरकारों ने मूल निवासियों के लिए बनाए गए, विशेष अधिनियमों को समाप्त करने का प्रयास किया जिससे उन्हें मुख्य धारा में सम्मिलित किया जाए। मूल निवासियों ने इसका कड़ा विरोध किया।
  3. सन् 1954 में मूल निवासियों ने स्व-रचित ‘अधिकार घोषणा पत्र में इस शर्त के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका की नागरिकता स्वीकार की कि उनके आरक्षण वापस नहीं लिए जाएँगे और उनकी परम्पराओं में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा। इसी प्रकार की कार्यवाही कनाडा में भी हुई।
  4.  सन् 1969 में सरकार ने घोषणा की कि वह आदिवासी अधिकारों को मान्यता नहीं देगी। परिणामस्वरूप मूल निवासियों ने संगठित होकर इसका विरोध किया, धरना-प्रदर्शन किया।
  5.  सन् 1982 में एक संवैधानिक धारा के अन्तर्गत मूल निवासियों के वर्तमान आदिवासी अधिकारों और समझौता आधारित अधिकारों को स्वीकृति प्रदान की गई। 18वीं सदी की अपेक्षा वर्तमान में मूल निवासियों की संख्या बहुत कम हो गई है, किन्तु वे अपने अधिकारों के लिए आज भी संघर्षरत हैं।

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