UP Board Solutions for Class 11 History Chapter 8 Confrontation of Cultures

UP Board Solutions for Class 11 History Chapter 8 Confrontation of Cultures (संस्कृतियों का टकराव)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर
संक्षेप में उत्तर दीजिए

प्रश्न 1.
एजटेक और मेसोपोटामियाई लोगों की सभ्यता की तुलना कीजिए।
उत्तर :
एजटेक और मेसोपोटामियाई लोगों की सभ्यता की तुलना निम्नलिखित तथ्यों के आधार पर की जा सकती है

  1.  एजटेक सभ्यता के लोगों को कृषि का ज्ञान तो था परन्तु पशुपालन का ज्ञान नहीं था। मेसोपोटामिया के लोग कृषि और पशुपालन दोनों करते थे।
  2. एजटेक सभ्यता के लोगों की भाषा नाहुआट थी। उन्होंने चित्रात्मक ढंग से इतिहास की घटनाओं का अभिलेखों के रूप में वर्णन किया है। मेसोपोटामिया के लोग कलाकार लिपि का प्रयोग करते थे। एक प्रकार से यह भी चित्रात्मक लिपि थी।
  3. एजटेक सभ्यता वालों के पंचांग के अनुसार एक वर्ष में 260 दिन होते थे। उनका पंचांग धार्मिक समारोहों से जुड़ा था। मेसोपोटामिया वालों ने चन्द्रमा पर एक पंचांग का निर्माण किया। उसमें 30-30 दिनों के बारह महीने होते थे।
  4.  एजटेक सभ्यता के समान मेसोपोटामिया का समाज भी अनेक वर्गों में विभाजित था।

प्रश्न 2.
ऐसे कौन-से कारण थे जिनसे 15वीं शताब्दी में यूरोपीय नौचालन को सहायता मिली?
उत्तर :
निम्नलिखित कारणों से यूरोपीय नौचालन में सहायता प्राप्त हुई

  1.  नौका का आकार बड़ा हो गया था और इसमें अधिक सामान भरा जा सकता था।
  2.  नौकाएँ शस्त्रों से सुसज्जित थीं ताकि आक्रमण के समय स्वयं की रक्षा कर सकें।
  3. 15वीं सदी में यात्रा-साहित्य का खूब प्रचार-प्रसार हुआ।।
  4. विश्व की रचना पर जानकारी प्राप्त होने लगी थी और भूगोल विषय उन्नति पर था। इससे लोगों | की रुचि में वृद्धि हुई।

प्रश्न 3.
किन कारणों से स्पेन और पुर्तगाल ने पन्द्रहवीं शताब्दी में सबसे पहले अटलाण्टिक महासागर के पार जाने का साहस किया?
उत्तर :
निम्नलिखित कारणों से स्पेन और पुर्तगाल ने 15वीं सदी में सबसे पहले अटलाण्टिक महासागर के पार जाने का साहस किया

  1.  स्पेन और पुर्तगाल के लोग अन्य देशों में ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे।
  2.  वे विभिन्न देशों के साथ व्यापार करना चाहते थे।
  3. इन देशों की आर्थिक स्थिति विभिन्न कारणों से दयनीय हो गई थी। विशेष रूप से सोने-चाँदी की कमी हो गई थी। इन धातुओं से सिक्के बनाए जाते थे। दूसरे देशों की यात्राओं से ये धातुएँ । प्राप्त की जा सकती थीं।

प्रश्न 4.
कौन-सी नई खाद्य वस्तुएँ दक्षिणी अमेरिका से बाकी दुनिया में भेजी जाती थीं?
उत्तर :
दक्षिणी अमेरिका से बाकी दुनिया को भेजी जाने वाली खाद्य वस्तुएँ निम्नलिखित थीं आलू, तम्बाकू, गन्ने से बनी चीनी, रबड़, लाल मिर्च, इमारती लकड़ी, कोको और चॉकलेट बनाने के लिए ककाओ।

प्रश्न 5.
गुलाम के रूप में पकड़कर ब्राजील ले जाए गए एक सत्रह वर्षीय अफ्रीकी लड़के की यात्रा का वर्णन करें।
उत्तर :
अफ्रीका से जहाज द्वारा ब्राजील की यात्रा एक 17 वर्षीय लड़के को गुलाम के रूप में अफ्रीका से पकड़ा जाता है। वह सहम जाता है। जिसने उसे पकड़ा था वह अब उसका मालिक हो गया था। लड़का मालिक के साथ चल देता है। मालिक उसे इबोलैण्ड ले जाता है। वहाँ से उसे कैरीबियन द्वीप समूह और उत्तरी अमेरिका के लिए भेजा जाता है। रास्ते में जहाज में बालक को विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उसे अपने घर की याद आती है, किन्तु वह स्वतन्त्र नहीं था इसलिए कुछ नहीं कर सकता था।UP Board Solutions for Class 11 History Chapter 8 Confrontation of Cultures image 1

प्रश्न 6.
दक्षिणी अमेरिका की खोज ने यूरोपीय उपनिवेशवाद के विकास को कैसे जन्म दिया?
उत्तर :
अटलाण्टिक महासागर के तट पर स्थित ऐसे अनेक देश थे; विशेष रूप से इंग्लैण्ड, फ्रांस, बेल्जियम और हॉलैण्ड, जिन्होंने इन खोजों का लाभ उठाया और उनके उपनिवेश स्थापित किए। इन देशों के व्यापारियों ने संयुक्त पूँजी कम्पनियाँ बनाईं और बड़े-बड़े व्यापारिक अभियान चलाए। यूरोप में अमेरिका से आए सोने-चाँदी ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार और औद्योगीकरण का भरपूर विस्तार किया। यूरोपवासियों को नई दुनिया में पैदा होने वाली नई-नई वस्तुओं; जैसे तम्बाकू, आलू, गन्ने से बनी चीनी, रबड़ आदि का ज्ञान हुआ जिसे वे उपनिवेशों से प्राप्त करने का प्रयास करने लगे।

परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
डच्च इण्डिया की स्थापना किस वर्ष हुई थी?
(क) 1602 ई० में
(ख) 1603 ई० में
(ग) 1604 ई० में
(घ) 1605 ई० में
उत्तर :
(क) 1602 ई० में

प्रश्न 2.
पिजारों ने इंका राज्य को जीता
(क) 1532 ई० में
(ख) 1533 ई० में
(ग) 1534 ई० में
(घ) 1535 ई० में
उत्तर :
(क) 1532 ई० में

प्रश्न 3.
माया लोगों के पंचांग में वर्ष में कितने होते थे?
(क) 365
(ख) 365
(ग) 366
(घ) 368
उत्तर :
(क) 365

प्रश्न 4.
माया पंचांग में प्रत्येक मास कितने दिन का होता था?
(क) 20 दिन
(ख) 24 दिन
(ग) 21 दिन
(घ) 22 दिन
उत्तर :
(क) 20 दिन

प्रश्न 5.
सूडानी सभ्यता का केन्द्र नहीं था
(क) घाना
(ख) माली
(ग) बोनू
(घ) डेन्यूब
उत्तर :
(घ) डेन्यूब

प्रश्न 6.
स्वाहिली क्या है?
(क) तटबन्ध
(ख) राज्य
(ग) भाषा
(घ) संस्कृति
उत्तर :
(ग) भाषा

प्रश्न 7.
झुलते बाग किस सभ्यता की विशेषता थी?
(क) पेरू
(ख) हड़प्पा
(ग) इंका
(घ) आर्य
उत्तर :
(ग) इंका

प्रश्न 8.
वास्कोडिगामा कालीकट किस वर्ष में पहुँचा था?
(क) 1498 ई० में
(ख) 1460 ई० में
(ग) 1475 ई० में
(घ) 1480 ई० में
उत्तर :
(क) 1498 ई० में

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्तमाशा अन्तरीप की खोज किसने की थी?
उत्तर :
उत्तमाशा अन्तरीप की खोज बारथोलोम्यु डियाज नामक एक पुर्तगाली नाविक ने की थी।

प्रश्न 2.
वास्कोडिगामा कालीकट कब आया था?
उत्तर :
वास्कोडिगामा 1498 ई० में कालीकट (भारत) आया था

प्रश्न 3.
विश्व की जलमार्ग द्वारा प्रथम परिक्रमा किसने की थी?
उत्तर :
विश्व की जलमार्ग द्वारा प्रथम परिक्रमा मैगलेन नामक नाविक ने की थी?

प्रश्न 4.
अमेरिका की खोज किसने की थी?
उत्तर :
अमेरिका की खोज सर्वप्रथम कोलम्बस ने की थी।

प्रश्न 5.
भौगोलिक खोजों के दो।रिणाम लिखिए।
उत्तर :

  1.  उपनिवशवाद का विस्तार और
  2.  विश्व व्यापार में वृद्धि

प्रश्न 6.
उपनिवेशवाद का क्या अर्थ है?
उत्तर :
उपनिवेशवाद उन राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक नीतियों का नाम है, जिनके आधार पर कोई भी साम्राज्यवादी शक्ति दूसरे देशों पर अपना प्रभुत्स बनाए रखना अथवा इसका विस्तार करना चाहती है।

प्रश्न 7.
रोम के पोप ने विश्व का विभाजन किन दो देशों के मध्य किया था?
उत्तर :

  1. पुर्तगाल और
  2.  स्पेन

प्रश्न 8.
भारत में दो पुर्तगाली उपनिवेशों के नाम बताइए।
उत्तर :

  1.  गोवा और
  2. दादरा

प्रश्न 9.
अरावाकी लुकायो समुदायों के लोग कहाँ निवास करते थे?
उत्तर :
अरावाकी लुकायो कैरीबियन सागर, कैरीबियन प्रदेश और ब्राजील के बहामा, ग्रेटर ऐण्टिलीज में रहते थे।

प्रश्न 10.
तुपिनांबा कौन थे?
उत्तर :
तुपिनांबा दक्षिणी अमेरिका के पूर्वी तट और ब्राजील नामक पेड़ के जंगलों के निवासी थे।

प्रश्न 11.
नई दुनिया की खोज कब तथा किसने की? इसका नाम अमेरिका किसने रखा?
उत्तर :
नई दुनिया की खोज 1492 ई० में कोलम्बस ने की। इसका अमेरिका नाम एक जर्मन प्रकाशक द्वारा 1507 ई० में रखा गया।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
माया लोगों की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ क्या थी?
उत्तर :
माया लोगों की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ निम्नलिखित थीं

  1.  माया सभ्यता के लोगों ने अनेक इमारतें; जैसे-वैधशालाएँ तथा पिरामिड आदि बनवाए।
  2.  माया लोगों के पंचांग में वर्ष 365 दिन का था परन्तु उनके वर्ष का विभाजन 18 महीनों में होता था। प्रत्येक महीना 20 दिन का होता था।
  3.  माया सभ्यता के लोगों को गणित का ज्ञान था तथा उनके पास शून्य के लिए भी प्रतीक चिह्न था
  4. माया लोगों की लिपि अंशत: चित्रात्मक थी।
  5.  माया के लोग लिखने के लिए भोजपत्रों या एक प्रकार के कागज का प्रयोग करते थे।

प्रश्न 2.
एजटेक लोगों के सामाजिक वर्गीकरण का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
एजटेक समाज अनेक उच्च और निम्न श्रेणियों में विभाजित था। सर्वोच्च वर्ग सामन्ती वर्ग था जो जन्म से सामन्त और पुरोहित होते थे। ये लोग सरकार, सेना और पुरोहित के कार्य के उच्च पदों पर आसीन थे। इनका समाज में सर्वाधिक सम्मान था। इसके बाद व्यापारियों का महत्त्व था। ये गुप्तचरों , और राजदूतों के रूप में भी कार्य करते थे। प्रतिभाशाली शिल्पियों, कलाकारों, चिकित्सकों और विशिष्ट अध्यापकों को भी सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था।

प्रश्न 3.
इंका लोगों के आर्थिक जीवन के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर :
इंका सभ्यता की जीविका का आधार कृषि था किन्तु उनके यहाँ कृषि योग्य उपजाऊ भूमि नहीं थी। उन्होंने पहाड़ी क्षेत्रों में जमीन को समतल बनाकर सीढ़ीदार खेत तैयार किए। उन्होंने सिंचाई की प्रणाली और जल निकासी विकसित की। इंका लोग अनाज में मक्को और आलू उगाते थे, भोजन तथा श्रम के लिए लोग लामा पालते थे।

प्रश्न 4.
इंका सभ्यता की कला के विषय में आप क्या जानते हैं? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर :

इंका लोगों की कला

  1. इंका लोगोंकी मिट्टी के बर्तन बनाने और बुनाई की कला उच्चकोटि की थी।
  2.  इंका लोगों ने लेखन की किसी प्रणाली का विकास नहीं किया था, किन्तु उनके पास हिसाब लगाने की एक प्रणाली अवश्य थी।
  3. वे क्विपु या डोरियों पर गाँठे लगाकर गणितीय इकाइयों का हिसाब रखते थे। कुछ इतिहासकारों का मत है कि इंका लोग इन धागों में एक प्रकार का गुप्त संकेत बुनते थे।
  4. उन्होंने चट्टानों से सुन्दर भवनों का निर्माण किया। राजमिस्त्री पथरों को सुन्दर रूप देने के लिए शल्कल पद्धति का उपयोग करते थे।

प्रश्न 5.
उत्तमाशा अन्तरीप की खोज किस प्रकार हुई थी?
उत्तर :
उत्तमाशा अन्तरीप की खोज एक समुद्र-यात्री बारथोलोम्युडियाज ने की थी। 1486 ई० में बारथोलोम्यु अनेक कठिनाइयाँ सहन करने के बाद अफ्रीका के दक्षिणी तट पर पहुँचा, जिसे उसने ‘तुफानों का अन्तरीप’ नाम दिया। बाद में पुर्तगाल के शासक ने इसका नाम ‘उत्तमाशा अन्तरीप’ (Cape of Good Hope) रख दिया।

प्रश्न 6.
कोलम्बस की भौगोलिक खोजों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
स्पेनिश राजा फड़नेण्ड की सहायता पाकर साहसी नाविक कोलम्बस 1492 ई० में तीन समुद्री जहाजों को लेकर भारत की खोज के लिए निकला। परन्तु तैंतीस दिन की समुद्री यात्रा के पश्चात् (वास्तव में उचित मार्ग से भटककर) वह एक नई भूमि पर पहुंच गया। पहले वह समझा कि यह भारत भूमि ही है, परन्तु वास्तव में यह नई दुनिया थी। बाद में इटली का एक नाविक अमेरिगो भी यहीं पर पहुंचा। उसी के नाम पर इसका नाम ‘अमेरिका’ पड़ा।

प्रश्न 7.
न्यूफाउण्डलैण्ड और लेब्रेडोर की खोज किसने की?
उत्तर :
यूरोप महाद्वीप के लिए न्यूफाउण्डलैण्ड की खोज इंग्लैण्ड के नाविक जॉन कैबेट की देन थी। 1497 ई० में जॉन कैबेट इंग्लैण्ड के राजा हेनरी सप्तम की सहायता से पश्चिमी समुद्र की ओर निकला। साहसी नाविक जॉन कैबेट उत्तरी अटलाण्टिक महासागर को पार कर कनाडा के समुद्रतट पर पहुँच गया और उसने न्यूफाउण्डलैण्ड की खोज की। त्र सेबासटियन कैबेट ने लेब्रेडोर की खोज की।

प्रश्न 8.
वास्कोडिगामा भारत किस प्रकार पहुँचा?

उत्तर :
यूरोप और भारत के मध्य समुद्री मार्ग की खोज पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा ने की थी। वास्कोडिगामा पुर्तगाल के राजा से आर्थिक सहायता प्राप्त कर इस अभियान पर निकला था। यह नाविक अफ्रीका के पश्चिमी तट से होता हुआ उत्तमाशा अन्तरीप पहुँचा, फिर हिन्द महासागर से होते हुए जंजीबार और वहाँ से पूर्व की ओर बढ़ा। यहाँ से वह भारत के पश्चिमी तट पर स्थित कालीकट के , बन्दरगाह पर पहुँचा।

प्रश्न 9.
भौगोलिक खोजों का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर :
भौगोलिक खोजों के द्वारा समुद्री मार्ग ढूंढ़ निकालने के कारण यूरोपीय लोगों ने व्यापारिक और औद्योगिक क्षेत्रों में विशेष प्रगति की। इससे उन्हें विश्व की उन्नत सभ्यताओं का ज्ञान ही प्राप्त नहीं हुआ। वरन् उन्होंने अन्य देशों में अपनी सभ्यता एवं संस्कृति का प्रचार और प्रसार भी किया। इससे विश्व में पुनर्जागरण की प्रक्रिया तीव्र हो गई। कोपरनिकस और गैलीलियो की खोजों ने मानव को विश्व के प्रति नई संकल्पना प्रदान की। इस ज्ञान ने मानव के अन्धविश्वासों के भ्रमजाल को तोड़ दिया और उसमें नवीन विचारों और दृष्टिको प्रों को विकसित किया। पृथ्वी को गोल सिद्ध करके भूगोलविदों ने विश्व-परिक्रमा के द्वार खोल दिए। इन्हीं खोजों ने यूरोपवासियों को साम्राज्य विस्तार के लिए प्रेरित किया। इन्हीं खोजों के कारण यूरोपीय सभ्यता अमेरिका तथा पूर्वी देशों तक पहुँचने में सफल हुई। इन खोजों के कारण मानव मध्य युग के अन्धविश्वासों को त्यागकर नवयुग के प्रकाश की ओर बढ़ चल’

प्रश्न 10.
भौगोलिक खोजों के परिणामों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
भौगोलिक खोजों के अनेक महत्त्वपूर्ण परिणाम भी हुए, जिनका विवरण इस प्रकार है

  1. भौगोलिक खोजों के परिणामस्वरूप भारत जाने का छोटा और नया मार्ग खुल गया।
  2. नए व्यापारिक मार्गों की खोज के कारण विश्व के व्यापार में तेजी के साथ वृद्धि होने लगी।
  3.  यूरोप में बड़े-बड़े व्यापारिक केन्द्रों का विकास होने लगा और इंग्लैण्ड, फ्रांस, स्पेन तथा पुर्तगाल देश धनी और शक्तिशाली होने लगे।
  4.  यूरोपीय देशों में अपने उपनिवेश बनाने और अपना साम्राज्य बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा प्रारम्भ हो गई।
  5.  यूरोप के शरणार्थी अमेरिका में आकर बसने लगे ओर वहाँ अपनी सभ्यता एवं संस्कृति को विकास करने लगे।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कैरीबियन द्वीपसमूह की अरावाक संस्कृति और ब्राजील के तुपिनांबा लोगों के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर :
अरावाकी लुकायो समुदाय के लोग कैरीबियन सागर में स्थित छोटे-बड़े सैकड़ों द्वीपसमूहों (जिन्हें आज बहामा कहा जाता है) और वृहत्तर ऐण्टिलीज में निवास करते थे। कैरिब नाम के एक खुखार कबीले ने उन्हें लघु ऐण्टिलीज प्रदेश से भगा दिया था। इसके विपरीत, अरावाक लोग लड़ने की बजाय बातचीत से झगड़ा निपटाना अधिक पसन्द करते थे। वे कुशल नौका-निर्माता थे (वे पेड़ के खोखले तनों सेअपनी डोंगियाँ बनाते थे) और डोंगियों में बैठकर खुले समुद्र की यात्रा किया करते थे। वे खेती, शिकार और मछली पकड़कर अपना जीवन-निर्वाह करते थे। खेती में वे मक्का, मीठे आलू और अन्य किस्म के कन्द-मूल और कसावा उगाते थे। अरावाक संस्कृति के लोगों के मुख्य सांस्कृतिक मूल्य थे कि वे सब एक साथ मिलकर खाद्य उत्पादन करें जिससे समुदाय के प्रत्येक सदस्य को भोजन प्राप्त हो। वे अपने वंश के वृद्धों के अधीन संगठित रहते थे। उनमें बहुविवाह प्रथा प्रचलित थी। वे जीववादी थे।

अन्य अनेक समाजों के समान अरावाक समाज में भी शमन लोग कष्ट निवारकों और इहलोक तथा परलोक के बीच मध्यस्थों के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते थे। अरावाक लोग सोने से बने आभूषण पहनते थे पर यूरोपवासियों की तरह सोने को उतना महत्त्व नहीं देते थे। उन्हें अगर कोई यूरोपवासी सोने के बदले काँच के मनके दे देता था तो वे प्रसन्न होते थे क्योंकि उन्हें कॉच का मनका अधिक सुन्दर दिखाई देता था। उनमें बुनाई की कला बहुत विकसित थी-हैमक यानी झूले का इस्तेमाल उनकी एक विशेषता थी जिसे यूरोपीय लोगों ने बहुत पसन्द किया। अरावाकों का व्यवहार अत्यन्त उदारतापूर्ण होता था और वे सोने की तलाश में स्पेनी लोगों का साथ देने के लिए सदैव तत्पर रहते थे। लेकिन कालान्तर में जब स्पेन की नीति क्रूरतापूर्ण हो गई तब उन्होंने उनका विरोध किया परन्तु उन्हें उसके विनाशाकरी परिणाम भुगतने पड़े। स्पेनी लोगों के सम्पर्क में आने के बाद लगभग पच्चीस वर्ष के भीतर ही अरावाकों और उनकी जीवन शैली का लगभग परिवर्तन ही हो गया।
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‘तुपिनांबा’ कहे जाने वाले लोग दक्षिणी अमेरिका के पूर्वी समुद्रतट पर और ब्राजील नामक पेड़ों के जंगलों में बसे हुए गाँवों में रहते थे। (ब्राजील पेड़ के नाम पर ही इस प्रदेश का नाम ब्राजील पड़ा)। वे खेती के लिए घने जंगलों का सफाया नहीं कर सके क्योंकि पेड़ काटने का कुल्हाड़ा बनाने के लिए उनके पास लोहा नहीं था। लेकिन उन्हे बहुतायत से फल, सब्जियाँ और मछलियाँ मिल जाती थीं जिससे उन्हें खेती पर निर्भर नहीं रहना पड़ता था। जो यूरोपवासी उनसे मिले, वे उनकी खुशहाल आजादी को देखकर उनसे ईर्ष्या करने लगे, क्योंकि वहाँ न कोई राजा था, न सेना और न ही कोई चर्च था जो उनके जीवन को नियन्त्रित कर सके।

प्रश्न 2.
एजटेक संस्कृति के विषय में आप क्या जानते हैं? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर :
बारहवीं शताब्दी में एजटेक लोग उत्तर से आकर मेक्सिको की मध्यवर्ती घाटी में बस गए थे। (इस घाटी का यह नाम उनके मेक्सिली नामक देवता के नाम पर पड़ा था) उन्होंने अनेक जनजातियों को परास्त करके अपने साम्राज्य का विस्तार कर लिया और उन पराजित लोगों से कर वसूल करने लगे एजटेक समाज श्रेणीबद्ध था। अभिजात वर्ग में वे लोग सम्मिलित थे जो उच्च कुलोत्पन्न, पुरोहित, अथवा जिन्हें बाद में यह प्रतिष्ठा प्रदान कर दी गई थी। पुश्तैनी अभिजातों की संख्या बहुत कम थी और वे सरकार, सेना तथा पौरोहित्य कर्म से उच्च पदों पर आसीन थे। अभिजात लोग अपने में से एक सर्वोच्च नेता चुनते थे जो आजीवन शासक बना रहता था। राजा पृथ्वी पर सूर्य देवता का प्रतिनिधि माना जाता था। योद्धा, पुरोहित और अभिजात वर्गों को सर्वाधिक सम्मान दिया जाता था, लेकिन व्यापारियों को भी अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे और उन्हें अक्सर सरकारी राजदूतों और गुप्तचरों के रूप में सेवा करने का अवसर दिया जाता था।

प्रतिभाशाली शिल्पियों, चिकित्सकों और विशिष्ट अध्यापकों को भी सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। चूंकि एजटेक लोगों के पास भूमि की कमी थी इसलिए उन्होंने भूमि उद्धार (reclamation, ज ल में से जमीन लेकर इस कमी को पूरा करना) किया। सरकण्डे की बहुत बड़ी चटाइयाँ बुनकर और उन्हें मिट्टी तथा पत्तों से ढककर उन्होंने मैक्सिको झील में कृत्रिम टापू तैयार किए, जिन्हें चिनाम्पा कहते थे। इन अत्यन्त उपजाऊ द्वीपों के बीच नहरें बनाई गईं जिन पर 1325 में एंजटेक राजधानी टेनोक्टिटलान का निर्माण किया गया, जिसके राजमहल और पिरामिड झील के बीच में खड़े हुए बड़े अद्भुत लगते थे। चूंकि एजटेक शासक अक्सर युद्ध में लगे रहते थे, इसलिए उनके सर्वाधिक भय मन्दिर भी युद्ध के देवताओं और सूर्य भगवान को ही समर्पित थे। साम्राज्य ग्रामीण आधार पर टिका हुआ था। लोग मक्का, फलियाँ, कुम्हड़ा, कद्दू, कसावा, आलू और अन्य फसलें उगाते थे।

भूमि का स्वामित्व किसी व्यक्ति विशेष का न होकर कुल के पास होता था जो सार्वनिक निर्माण कार्यों को सामूहिक रूप से पूरा करवाता था। यूरोपीय कृषिदासों जैसे खेतिहर लोग अभिजातों की जमीनों से जुड़े रहते थे और फसल में से कुछ हिस्से के बदले, उनके खेत जोतते थे, गरीब लोग कभी-कभी अपने बच्चों को भी गुलामी के रूप में बेच देते थे, लेकिन यह बिक्री साधारणतया कुछ वर्षों के लिए ही की जाती थी और गुलाम अपनी आजादी फिर से खरीद सकते थे। एजटेक लोग इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखते थे कि उनके सभी बच्चे शिक्षा अवश्य पाएँ।

कुलीन वर्ग के बच्चे कालमेकाक में भर्ती किए जाते थे जहाँ उन्हें सेना अधिकारी और धार्मिक नेता बनने के लिए प्रशिक्षित किया जाता था। शेष बच्चे पड़ोस के तेपोकल्ल स्कूल में पढ़ते थे जहाँ उन्हें इतिहास, पुराण-मिथकों, धर्म और उत्सवी गीतों की शिक्षा दी जाती थी। लड़कों को सैन्य प्रशिक्षण, खेती और व्यापार करना सिखाया जाता था और लड़कियों को घरेलू काम-धन्धों में कुशलता प्रदान की जाती थी। सोलहवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में, एजटेक साम्राज्य में अस्थिरता के लक्षण दिखाई देने लगे।

प्रश्न 3.
इंका संस्कृति पर संक्षेप में प्रकाश डालिए
उत्तर :
दक्षिणी अमेरिकी देशज संस्कृतियों में से सबसे बड़ी पेरू में  क्वेचुआ या इंका लोगों की संस्कृति महासागर थी। बारहवीं शताब्दी में प्रथम इंका सांता फे शासक मैंको कपाक ने कुजको में अपनी राजधानी स्थापित की थी। नवें इंका शासक के काल में राज्य का इक्वेडोर विस्तार शुरू हुआ और अन्तत: इंका साम्राज्य इक्वेडोर से चिली तक ब्राजील 3,000 मील में फैल गया। इंका साम्राज्य अत्यन्त केन्द्रीकृत था। राजा में ही सम्पूर्ण शक्ति निहित थी और वही सत्ता का उच्चतम स्रोत था। नए जीते गए कबीलों और जनजातियों को पूरी तरह अपने भीतर मिला लिया गया। प्रत्येक प्रजाजन को प्रशसन की भाषा क्वेचुआ बोलनी प्रशान्त महासागर अनिवार्य थी। प्रत्येक कबीला स्वतन्त्र रूप से वरिष्ठों की एक सभा द्वारा शासित होता था, लेकिन पूरा कबीला अपने आप में शासक के प्रति निष्ठावान था। साथ-ही-साथ स्थानीय शासकों को उनके सैनिक सहयोग के लिए पुरस्कृत किया जाता। था। इस प्रकार, एजटेक साम्राज्य की।
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ही तरह इंका साम्राज्य इंकाइयों के नियन्त्रण वाले एक संघ के समान था। जनसंख्या के निश्चित आँकड़े तो उपलब्ध नहीं हैं लेकिन ऐसा लगता है कि 10 लाख से ज्यादा लोग इस साम्राज्य में थे। एजटेक लोगों की तरह इंका भी उच्चकोटि के भवन-निर्माता थे। उन्होंने पहाड़ों के बीच इक्वेडोर से चिली तक अनेक सड़कें निर्मित की थीं। उनके किले शिलापट्टियों को इतनी बारीकी से तराशकर बनाए जाते थे कि उन्हें जोड़ने के लिए गारे जैसी सामग्री की आवश्यकता नहीं होती थी। वे निकटवर्ती इलाकों में टूटकर गिरी हुई चट्टानों से पत्थरों को तराशने और ले जाने के लिए श्रम-प्रधान प्रौद्योगिकी का उपयोग करते थे जिसमें अपेक्षाकृत अधिक संख्या में श्रमिकों की आवश्यकता पड़ती थी।

राज-मिस्त्री खण्डों को सुन्दर रूप देने के लिए शल्क पद्धति (फ्लेकिंग) का प्रयोग करते थे जो प्रभावकारी होने के साथ-साथ सरल होती थी। अनेक शिलाखण्ड वजन में 100 मीट्रिक टन से भी अधिक भारी होते थे, लेकिन उनके पास इतने बड़े शिलाखण्डों को ढोने के लिए पहियेदार गाड़ियाँ नहीं थीं। यह सब काम मजदूरों को जुटाकर बड़ी सावधानी से करवाया जाता था। इंका सभ्यता का मुख्य आधार कृषि था। उनके यहाँ जमीन खेती के लिए बहुत उपजाऊ नहीं थी इसलिए उन्होंने पहाड़ी इलाकों में सीढ़ीदार खेत बनाए और जल-निकासी तथा सिंचाई की प्रणालियाँ विकसित कीं। हाल ही मेंकिए गए अध्ययन से पता चला है कि पन्द्रहवीं शताब्दी में एंडियाई अधिपत्यकाओं (ऊँची भूमियों) में खेती आज की तुलना में काफी अधिक परिमाण में की जाती थी।

इंको लोग मक्का और आलू उगाते थे और भोजन तथा श्रम के लिए लामा पालते थे। उनकी बुनाई और मिट्टी के बर्तन बनाने की कला उच्चकोटि की थी। उन्होंने लेखन की किसी प्रणाली का विकास नहीं किया था। किन्तु उनके पास हिसाब लगाने की एक प्रणाली वश्य थी—यह थी क्विपु, यानी डोरियों पर गाँठे लगाकर गणितीय इकाइयों का हिसाब रखना। कुछ इतिहासकारों का विचार है कि इंका लोग इन धागों में एक किस्म का संकेत (Code) बुनते थे। इंका साम्राज्य का ढाँचा पिरामिडनुमा था जिसका मतलब था कि जब एक बार इंका प्रधान पकड़ लिया जाता था तो उसके शासन की सारी श्रृंखला तुरन्त टूट जाती थी और उस समय भी ऐसा ही हुआ जब स्पेनी सैनिकों ने उनके देश पर आक्रमण करने का निश्चय किया।

एजटेक तथा इंका संस्कृतियों में कुछ समानताएँ थीं, और वे यूरोपीय संस्कृति से बहुत भिन्न थीं। समाज श्रेणीबद्ध था, लेकिन वहाँ यूरोप की तरह कुछ लोगों के हाथों में संसाधानों का निजी स्वामित्व नहीं था। पुरोहितों और शमनों को समाज में उच्च स्थान प्राप्त था। यद्यपि भव्य मन्दिर बनाए जाते थे, जिनमें परम्परागत रूप से सोने का प्रयोग किया जाता था, लेकिन सोने या चाँदी को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था। तत्कालीन यूरोपीय समाज की स्थिति इस मामले में बिल्कुल विपरीत थी।

प्रश्न 4.
भौगोलिक खोजों के परिणामस्वरूप किस प्रकार पुर्तगाली उपनिवेश स्थापित किए गए?

उत्तर :
पुर्तगाली उपनिवेश तत्कालीन समुद्री खोजों में पुर्तगाल और स्पेन ने सबसे अधिक भाग लिया। स्पेनवासियों ने मैक्सिको, मध्य अमेरिका और दक्षिणी अमेरिका में उपनिवनेशों की स्थापना की। पुर्तगाल निवासियों ने अफ्रीका के तट पर, फारस की खाड़ी में तथा भारतवर्ष में उपनिवेश स्थापित किए। पुर्तगाल का साम्राज्य औपनिवेशिक की अपेक्षा व्यापारिक अधिक था। इससे अरब और वेनिस के व्यापार को अधिक धक्का पहुँचा और उन लोगों ने पुर्तगाल को बहुत विरोध किया। पुर्तगाल ने उनका सफल प्रतिद्वन्द्वी बनने के लिए अपनी जल-शक्ति में वृद्धि की और धीरे-धीरे पूर्व में एक साम्राज्य भी स्थापित कर लिया। भारतवर्ष में पुर्तगाल साम्राज्य की स्थापना का श्रेय अल्मोड़ा और अलबुकर्क को प्राप्त है। पुर्तगाल के गवर्नर अलबुकर्क ने भारत के पश्चिमी समुद्रतट पर गोवा को अपना प्रधान केन्द्र बनाया और अनेक तटीय नगरों पर अधिकार कर लिया। फारस की खाड़ी में ओर्मज पर भी उसने अधिकार किया।

उसके और उसके उत्तराधिकारियों के शासनकाल में बहुत-से पुर्तगाली पश्चिमी समुद्र-तट पर आ बसे, जिन्होंने अन्तर्जातीय विवाह आदि द्वारा अपना प्रभाव बढ़ाया। ईसाई धर्म के विस्तार में पादरियों ने विशेष योग दिया। भारत के अतिरिक्त चीन, जापान और पूर्वी द्वीपसमूह में भी पुर्तगाल के व्यापारिक क्षेत्र स्थापित हुए। परन्तु समस्त एशिया पर अधिकार करना या उसका यूरोपीयकरण करना उसकी शक्ति की परिधि के बाहर था। वह स्वयं एक छोटा देश था और इसके विपरीत एशिया के अनेक देश बहुत शक्तिशाली और साधन-सम्पन्न थे। दूसरे, एशिया की सभ्यता, यूरोपीय सभ्यता और संस्कृति से कहीं अधिक प्राचीन, प्रौढ़ और सबल थी। संस्कृति के क्षेत्र में इन देशों को पुर्तगाल की अपेक्षा न थी, जहाँ के निवासियों ने धार्मिक क्षेत्र में घोर असहिष्णुता और क्षुद्र हृदय का परिचय दिया था। साथ ही पुर्तगाल को व्यापारिक क्षेत्र में अरबों और वेनिस से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ी और इन देशों ने उसका उग्र विरोध किया। अपनी समस्त कठिनाइयों के होते हुए भी पुर्तगाल ने व्यापार के क्षेत्र में पूर्वी देशों में बहुत अधिक लाभ उठाया और उसकी राजधानी लिस्बन तो यूरोप का व्यापारिक केन्द्र बन गई।

इसका परिणाम यह हुआ कि यूरोप की दूसरी शक्तियाँ भी इस क्षेत्र में उतरने लगीं और पोप के विश्व-विभाजन आदेश (1494 ई०) की उपेक्षा करके उन्होंने भी एशिया में अपने व्यापारिक केन्द्र खोलने प्रारम्भ किए। इस प्रयत्न में नीदरलैण्ड का प्रमुख हाथ रहा, जिसने पुर्तगाली जहाजों को लूटनी भी प्रारम्भ कर दिया। स्पेन ने भी फिलिपीन्स पर अधिकार कर लिया। पुर्तगाल ने अफ्रीका के समुद्र-तट पर भी अपनी बस्तियाँ बसानी प्रारम्भ कीं। यूरोप निवासी अफ्रीका को भूत-प्रेत एवं जादूगरों का देश समझते थे। अतएव उन्होंने इसके तट पर उपनिवेश और कोठियाँ स्थापित तो कीं, किन्तु जलवायु के प्रतिकूल होने से यूरोप निवासियों में इस ‘अन्धमहाद्वीप’ के आन्तरिक भागों में प्रवेश करने का साहस तथा सामर्थ्य न थी। अफ्रीका के उत्तर-पश्चिमी कोने में स्पेन और पुर्तगाल के नाविकों ने अफ्रीका के मूरों को परास्त करके कुछ उपनिवपेश स्थापित किए परन्तु वे स्थायी न हो सके।

अफ्रीका के दक्षिण में भी हॉलैण्ड के निवासियों ने एक उपनिवेश स्थापित किया, परन्तु मूल निवासियों के विरोध के कारण वे भी भीतरी भागों में प्रवेश पाने में असफल रहे। हॉलैण्डवासियों के समान पुर्तगाली भी अफ्रीका के भीतरी भागों में प्रवेश पाने में असमर्थ रहे और कुछ समय पश्चात् अबीसीनियों से उनको निकाल भी दिया गया। इस अन्धमहाद्वीप’ (अफ्रीका) से यूरोप वालों को एक विशेष लाभ यह हुआ कि उन्होंने लाखों हब्शियों को दास बनाकर अमेरिका में बेच दिया और उनको इस व्यापार से अतुल धनराशि प्राप्त हुई तथा अमेरिका के उपनिपवेशों को बसाने में बहुत सहायता मिली। दक्षिणी अमेरिका के ब्राजील देश में पुर्तगालियों को पर्याप्त सफलता मिली।

यहाँ के आदि-निवासियों पर इन्होंने अपना अधिकार कर लिया, साथ ही अन्य यूरोपीय देशों को इस पर अधिकार स्थापित करने से वंचित रखा। पुर्तगाली शासकों और ईसाई पादरियों ने यहाँ पर पुर्तगाल के साम्राज्य की स्थापना की और इसके शासन के लिए पुर्तगाल से गवर्नर भेजे जाने लगे। साम्राज्य-स्थापना का प्रभाव पुर्तगाल पर अन्ततोगत्वा अच्छा नहीं पड़ा। एक तो यह देश छोटा था और दूसरे उसकी जनसंख्या भी कम थी, जो विस्तृत साम्राज्य स्थापना के कार्य को सफल नहीं बना सकती थी। पुर्तगाल की असहिष्णु एवं संकुचित नीति उसके विकास में बाधक थी। साथ ही धन की अधिकता ने उनमें विलासिता भी उत्पन्न कर दी थी। 16वीं शताब्दी के अन्त में पुर्तगाल स्पेन के अधीन हुआ तो पुर्तगाल का ह्रास प्रारम्भ हो गया।

प्रश्न 5.
स्पेन के उत्कर्ष पर संक्षेप में प्रकाश डालिए
उत्तर :
स्पेन का उत्कर्ष स्पेन ने ‘नई दुनिया’ (अमेरिका) में ‘सैन डोमिनिगो के द्वीप में अपना प्रथम उपनिपवेश स्थापित किया और वहीं से उसने अनेक कैरीबियन द्वीपों तथा फ्लोरिडा से वेनेजुएला तक के देशों को अधिकृत किया। स्पेनवासियों ने धन के लालच में ही मध्य और दक्षिणी अमेरिका के भीतरी प्रदेशों में प्रवेश प्रारम्भ किया। उन्होंने पेरू और मैक्सिको की प्राचीन सभ्यता तथा वहाँ के अपार धन (सोना-चाँदी) की अनेक कहानियाँ सुन रखी थीं। इन देशों पर झूठ, निर्दयता और विश्वासघात के आधार पर स्पेन ने विजय प्राप्त कर अपने साम्राज्य की वृद्धि की। स्पेनवासियों ने अपनी बर्बरता तथा नृशंस व्यवहार द्वारा  हूणों तथा मंगोलों के समान रक्तरंजित इतिहास की पुनरावृत्ति की, वहाँ के निवासियों को निर्धन एवं निर्बल बनाकर अमेरिका का धन लूटा, आदिम निवासी दास बनाकर खानों में काम करने के लिए बाध्य किए  गए।

अनेक गाँवों के लोगों ने तो सामूहिक रूप से आत्महत्या करके दासता से मुक्ति प्राप्; की। 1519 ई० में स्पेन के एक साहसी सैनिक हर्नेडो कोर्टिज ने थोडे-से सिपाहियों और तोपों की सहायता से धोखे और विश्वासघात, परन्तु अपूर्व साहस के साथ मैक्सिको पर अधिकार करके उसे स्पेन के साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया। कोर्टिज के एक साथी, जिसका नाम फ्रांसिस्को पिजारो था, ने 1531 ई० में पूरे के इंका वंश पर प्रभुत्व स्थापित किया। मैक्सिको की भाँति यहाँ पर भी लूट में स्पेनियों को अपार धनराशि प्राप्त हुई। उदाहरणार्थ-जब पिजारो ने पेरू के अन्तिम सम्राट को बन्दी बनाया तब उसने उसके स्वतन्त्र स्वर्ण से भरा हुआ एक कमरा माँगा। इतना स्वर्ण उसे दिया गया, परन्तु स्वर्ण लेकर भी उसने सम्राट का वध कर डाला। मैक्सिको, मध्य अमेरिका, पश्चिमी द्वीपसमूह और पेरू आदि लैटिन अमेरिका के नाम से सम्बोधित किए जाते हैं क्योंकि उन पर लैटिन अथवा रोमन चर्च के अनुयायियों ने अधिकार किया था।

व्यापार के साथ चर्च ने भी साम्राज्यवाद की सहायता की। चर्च के द्वारा ‘नई दुनिया को सभ्य बनाने का प्रयत्न किया गया, यद्यपि ‘नई दुनिया’ पहले से ही सभ्य एवं सम्पन्न थी। इसका परिणाम यह हुआ कि मैक्सिको तथा पेरू की फलती-फूलती सभ्यता नष्ट हो गई और कला-कौशल तथा वैभवपूर्ण स्थान ऊसर तथा श्मशान में परिणत हो गया। स्पेन के विजेताओं का उद्देश्य उन देशों में रोमन कैथोलिक धर्म का प्रचार करना भी था। इन्हें नास्तिकों की एक बड़ी दुनिया ही मिल गई थी जहाँ धर्म-प्रचार का कार्य सफलतापूर्वक हो सकता था। कुछ अंशों में चर्च ने लोगों की कठिनाइयाँ दूर करने में सहायता भी पहुँचाई। धन की लालसा स्पेनी औपनिवेशिकों के लिए उत्साहवर्द्धक सिद्ध हुई और उन्होंने उपनिवेशों की स्थापना एवं विस्तर को शीघ्रतापूर्वक सम्पन्न किया।

एक स्पेनी सरदार पेड्रो ने अर्जेण्टीना और पैराग्वे की स्थापना की। पिजारो के एक साथी ने चिली के तटीय प्रदेश को और दूसरे ने इक्वेडोर को अधिकृत किया। इसी समय कोलम्बिया पर भी स्पेन का अधिकार हुआ। उन्होंने जिस देश को अधिकृत किया उसमें ईसाई धर्म तथा स्पेनी भाषा का प्रचार किया और व्यापार तथा कृषि को प्रोत्साहन दिया। सोलहवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में स्पेनी साम्राज्य शासन की सुविधा के लिए दो भागों में विभक्त था, जिनमें अलग-अलग वाइसराय नियुक्त थे। एक भाग तो नया स्पेन कहलाता था, जिसमें मैक्सिको, वेस्टइण्डीज मध्य अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका का उत्तरी भाग और एशियाई द्वीप फिलीपीन्स आदि थे। जो एक वाइसराय के अधीन थे। पेरू के वाइसराय के अधीन पेरू, चिली, इक्वेडोर और अर्जेण्टीना के देश थे।

ये सभी देश धर्म-प्रचार के लिए अनेक धार्मिक क्षेत्रों में विभक्तथे जहाँ पर स्पेन के राजकीय आश्रय प्राप्त बहुसंख्यक धर्मप्रचारक (Monk) पादरी धर्म-प्रचार के कार्य में संलग्न थे। दो नगरों में विश्वविद्यालयों की भी स्थापना की गई थी। इस प्रकार स्पेन की अधीनता में बड़ी शीघ्रता के साथ अमेरिका या पश्चिमी गोलार्द्ध का यूरोपीयकरण हो रहा था। सोलहवीं शताब्दी में स्पेन ने केवल बाह्य दुनिया में ही एक विस्तृत औपनिवेशिक साम्राज्य की स्थापना । नहीं की, वरन् यूरोप में भी वह सबसे अधिक शक्तिशाली राज्य बन गया था। सम्राट चार्ल्स पंचम केवल स्पेन का राजी नहीं, अपितु पवित्र रोम सम्राट भी था। उसका पुत्र और उत्तराधिकारी फिलिप द्वितीय पवित्र रोमन सम्राट तो न था, परन्तु स्पेन के भावी राजा के रूप में वह इस विशाल स्पेन साम्राज्य का स्वामी था, जो दोनों गोलार्द्ध में फैला हुआ था और जिसके अधीन असीम धनराशि थी। उसके आतंक से यूरोप के प्रायः सभी राज्य भयभीत थे। उसने 1580 ई० में पुर्तगाल पर भी विजय प्राप्त की, जिससे स्पेन तथा पुर्तगाल का संयुक्त राज्य गठित हुआ।

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UP Board Solutions for Class 11 History Chapter 7 Changing Cultural Traditions

UP Board Solutions for Class 11 History Chapter 7 Changing Cultural Traditions (बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर
संक्षेप में उत्तर दीजिए

प्रश्न 1.
चौदहवीं और पन्द्रहवीं शताब्दियों में यूनानी और रोमन संस्कृति के किन तत्त्वों को पुनजीवित किया गया? 
उत्तर :
चौदहवीं और पन्द्रहवीं सदी में यूरोप में परिवर्तनों का दौर चल रहा था। इससे यूनान और रोम भी अछूते नहीं रहे। चौदहवीं और पन्द्रहवीं सदी में लोगों में रोम और यूनानी सभ्यता को जानने की इच्छा बढ़ी। इन सदियों में शिक्षा में उन्नति हो ही चुकी थी। लोगों ने यूनानी और रोम सभ्यताओं पर खोज कार्य प्रारम्भ कर दिए। धर्म, शिक्षा, समाज के प्रति लोग अधिक जागरूक हो गए। नए व्यापारिक मार्ग भी सामने आए। यूरोप में तथा यूरोप के बाहर अनेक खोजे हुईं जिससे अनेक सांस्कृतिक रूपों और समूह सभ्यताओं का पता चला और इन सभ्यताओं के सभी आवश्यक सांस्कृतिक तत्त्वों को पुनजीवित किया गया।

प्रश्न 2.
इस काल की इटली की वास्तुकला और इस्लामी वास्तुकला की विशिष्टताओं की तुलना कीजिए।
उत्तर :
15वीं सदी में रोम नगर को अत्यन्त भव्य रूप में तैयार किया गया। वास्तुकला की इस शैली को ‘क्लासिकी’ कहा गया। क्लासिकी वास्तुविद् भवनों में चित्र बनाते, मूर्ति बनाते तथा अनेक प्रकार की आकृतियाँ उकेरते थे। इटली की वास्तुकला की प्रमुख विशेषता थी– भव्य गोलाकार गुम्बद, भवनों की आन्तरिक सजावट, गोल मेहराबदार दरवाजे आदि। दूसरी ओर अरब वास्तुकला भी अपने चरम पर थी। विशाल भवनों में बल्ब के आकार जैसे—गुम्बद, छोटी मीनारें, घोड़े के खुरों के आकार के मेहराब और मरोड़दार स्तम्भ देखते ही बनते थे। इटली और अरब की वास्तुकला तुलनात्मक दृष्टि से लगभगे समान ही प्रतीत होती थी।

प्रश्न 3.
मानवतावादी विचारों का अनुभव सबसे पहले इतालवी शहरों में क्यों हुआ?
उत्तर :
इटली के नगर निवासी यूनानी और रोम के विद्वानों की कृतियों से परिचित थे पर इन लोगों ने इन रचनाओं का प्रचार-प्रसार नहीं किया। चौदहवीं सदी में अनेक लोगों ने प्लेटो और अरस्तू के ग्रन्थों के अनुवादों को पढ़ा। साथ ही प्राकृतिक विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान, औषधि विज्ञान सहित अनेक विषय लोगों के समक्ष आए। इटली में मानवतावादी विषय पढ़ाए जाने लगे। इस प्रकार इटली के नगरवासियों ने मानवतावादी विचारों का अनुभव किया।

प्रश्न 4.
वेनिस और समकालीन फ्रांस में अच्छी सरकार’ के विचारों की तुलना कीजिए।
उत्तर :
इटली में 13वीं सदी में स्वतन्त्र नगर-राज्यों के समूह बन गए थे। इन महत्त्वपूर्ण नगरों में फ्लोरेन्स और वेनिस भी थे। ये गणराज्य थे। वेनिस नगर में धर्माधिकारी और सामन्त वर्ग राजनीतिक दृष्टि से शक्तिशाली नहीं थे। नगर के धनी व्यापारी और महाजन नगर के शासन में सक्रिय रूप से भाग लेते थे। लोगों में नागरिकता की भावना को विकास होने लगा था। दूसरी ओर फ्रांस में नगर राज्य तो थे किन्तु वहाँ निरंकुश शासन तन्त्र का बोलबाला था। र्माधिकारी और लॉर्ड राजनीतिक दृष्टि से शक्तिशाली थे। नागरिकों का शोषण साधारण बात थी। फ्रांस के नगर-राज्यों को इसलिए क्रान्ति का सामना करना पड़ा।

संक्षेप में निबन्ध लिखिए।

प्रश्न 5.
मानवतावादी विचारों के क्या अभिलक्षण थे?
उत्तर :

मानववाद

प्राचीन यूनानी दर्शन और साहित्य के अध्ययन के फलस्वरूप लोगों का जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलने लगा। उनकी रुचियों में अच्छे और बुरे के सम्बन्धों के मानदण्डों में भारी परिवर्तन हो गया। यही परिवर्तन मानवतावादी विचारों के अभिलक्षण कहे जा सकते हैं। प्राचीन यूनानी विद्वान मानवता का अध्ययन करते थे। इन यूनानी विद्वानों को मानव रुचि के विषयों का अध्ययन करने में आनन्द आता था, परन्तु इसके विपरीत मध्यकाल में देवत्व (Divinity) या ध्यात्मिक ज्ञान, शिक्षा का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग था और आध्यात्मिक उन्नति उनका एकमात्र लक्ष्यथा। पुनर्जागरण काल में लोग प्राचीन यूनानी साहित्य की ओर आकर्षित हुए तथा उसके आगे मध्यकालीन आत्म-निग्रह तथा वैराग्य के आदर्श फीके पड़ गए एवं मानवता को प्रधानता दी जाने लगी। आत्म-निग्रह की बजाय आत्म-विकास, आत्म-विश्वास और मानव जीवन के सुखों पर जोर दिया जाने लगा, फलस्वरूप व्यक्तिवाद और वैयक्तिक हित की भावना का विकास हुआ। पुनर्जागरण आन्दोलन के इसी रूप को मानववाद (Humanism) कहते हैं। मानववाद का जन्मदाता पेट्रार्क (Petrarch) था, जिसने मानव हितों को विशेष प्रोत्साहन दिया। पेट्रार्क पुराने प्रतिष्ठित साहित्य को इतना अधिक पसन्द करता था कि वह उसका प्रशंसक बन गया। मानववाद का दूसरा बड़ा मर्थक इरास्मस (Erasmus) था। जिसने अपनी पुस्तक ‘Praise of Folly’ में संन्यासियों के अज्ञान तथा अन्धविश्वासों पर कटाक्ष किया। इस प्रकार मानववाद ने प्रत्यक्ष रूप में प्रोटेस्टेण्ट आन्दोलन के लिए मार्ग तैयार कर दिया।

प्रश्न 6.
सत्रहवीं शताब्दी के यूरोपियों को विश्व किस प्रकार भिन्न लगा? उसका एक सुचिन्तित विवरण दीजिए।
उत्तर :
सत्रहवीं शताब्दी ईसवी के यूरोपवासियों को विश्व निम्नलिखित प्रकार से भिन्न लगा

  1.  तत्कालीन विभिन्न ग्रन्थों में बताया गया कि ज्ञान-विश्वास पर नहीं टिका रहता बल्कि अवलोकन और परीक्षण पर आधारित होता है।
  2.  वैज्ञानिकों के प्रयासों के फलस्वरूप भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान के क्षेत्र में अनेक अन्वेषण थे जो सर्वथा नए और सुविधाजनक थे।
  3. सन्देहवादियों और नास्तिकों के मन में ईश्वर का स्थान प्रकृति ने ले लिया जो सम्पूर्ण सृष्टि का रचना-स्रोत है।
  4. विभिन्न संस्थाओं ने जनता को जाग्रत करने के लिए अनेक नवीन प्रयोग किए और व्याख्यानों का आयोजन किया।

परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
यूरोप में पुनर्जागरण का प्रारम्भ किस देश में हुआ?
(क) इंग्लैण्ड
(ख) जर्मनी
(ग) फ्रांस
(घ) इटली
उत्तर :
(घ) इटली

प्रश्न 2.
‘दि प्रिन्स ग्रन्थ का लेखक था
(के) दान्ते
(ख) सर्वेण्टीज
(ग) मैकियावली
(घ) बुकेशियो
उत्तर :
(ग) मैकियावली

प्रश्न 3.
टॉमस मूर ने कौन-सी पुस्तक लिखी?
(क) यूटोपिया
(ख) मोनार्कियो
(ग) हेमलेट
(घ) दि प्रिन्स
उत्तर :
(क) यूटोपिया

प्रश्न 4.
‘नई दुनिया की खोज किसने की थी
(क) वास्कोडिगामा
(ख) कोलम्बस
(ग) मैगलेन
(घ) पिजारो
उत्तर :
(ख) कोलम्बस

प्रश्न 5.
गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त के प्रतिपादक थे
(क) कोपरनिकस
(ख) न्यूटन
(ग) आर्किमिडीज
(घ) रोजर बेकन
उत्तर :
(ख) न्यूटन

प्रश्न 6.
भारत के मार्ग की खोज किसने की थी
(क) कोलम्बस
(ख) वास्कोडिगामा
(ग) अमेरिगो
(घ) मैगलेन
उत्तर :
(ख) वास्कोडिगामा

प्रश्न 7.
‘लैटिन साहित्य का पिता किसे कहा जाता है?
(क) दान्ते
(ख) पेट्रार्क
(ग) बुकेशियो
(घ) शेक्सपीयर
उत्तर :
(ग) बुकेशियो

प्रश्न 8.
दूरबीन का आविष्कार किसने किया था
(क) गैलीलियो
(ख) आर्किमिडीज
(ग) न्यूटन
(घ) विलियम हार्वे
उत्तर :
(क) गैलीलियो।

प्रश्न 9.
जलमार्ग द्वारा पृथ्वी की परिक्रमा करने वाला नाविक था
(क) कोलम्बस
(ख) वास्कोडिगामा
(ग) मैगलेन
(घ) अमेरिगो
उत्तर :
(ग) मैगलेन

प्रश्न 10.
प्रोटेस्टैण्ट धर्म का संस्थापक था
(क) मार्टिन लूथर
(ख) ऑगस्टाइन
(ग) हेनरी चतुर्थ
(घ) जॉन हस
उत्तर :
(क) मार्टिन लूथर

प्रश्न 11.
पहली मुद्रित पुस्तक कौन-सी थी?
(क) गुटेनबर्ग की ‘बाइबिल’
(ख) कोपरनिकस को ग्रन्थ ‘खगोलीय पिण्डों के परिभ्रमण पर विचार
(ग) वेसिलियस का ग्रन्थ ‘दि ह्युमनी कार्पोरिस फाबरिका’
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर :
(क) गुटेनबर्ग की ‘बाइबिल’

प्रश्न 12.
राफेल कहाँ के चित्रकार थे?
(क) रोम
(ख) फ्रांस
(ग) इटली
(घ) अमेरिका
उत्तर :
(ग) इटली

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रोटेस्टेण्ट सुधार आन्दोलन के दो उद्देश्य लिखिए।
उत्तर :
प्रोटेस्टैण्ट सुधार आन्दोलन 1517 में मार्टिन लूथर ने शुरू किया था। इसके दो उद्देश्य थे

  1.  चर्च और मठों में फैले भ्रष्टाचार को दूर करना।
  2.  पोप और पादरियों के जीवन में सुधार करना।

प्रश्न 2.
लियोनार्डो द विन्ची कौन था?
उत्तर :
लियोनार्डो द विन्ची एक महान् कलाकार था। वह अपने दो बहुचर्चित चित्रों ‘द लास्ट सपर और ‘मोनालिसा’ के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध था।

प्रश्न 3.
‘यूटोपिया’ किसकी रचना थी?
उत्तर :
‘यूटोपिया’ टॉमस मूर की रचना थी।

प्रश्न 4.
‘पुनर्जा.रण’ का क्या अर्थ है?
उत्तर :
‘पुनर्जागरण’ को अर्थ विद्या का पुनर्जन्म तथा कला, विज्ञान, साहित्य और यूरोपीय भाषाओं का विकास है।

प्रश्न 5.
पुनर्जागरण का प्रारम्भ सर्वप्रथम कब और किस देश में हुआ?
उत्तर :
पुनर्जागरण का प्रारम्भ 1300 ई० में इटली में हुआ।

प्रश्न 6.
छापेखाने का आविष्कार सबसे पहले कब और किस व्यक्ति ने किया?
उत्तर :
जर्मनी के निवासी गुटेनबर्ग ने सबसे पहले 1465 ई० में छापेखाने का आविष्कार किया था।

प्रश्न 7.
डिवाइन कॉमेडी’ नामक पुस्तक किसने लिखी?
उत्तर :
‘डिवाइन कॉमेडी’ नामक पुस्तक दान्ते ने लिखी।

प्रश्न 8.
अमेरिका की खोज किसने की थी?
उत्तर :
अमेरिका की खोज कोलम्बस ने की थी।

प्रश्न 9.
भौगोलिक खोजों के दो परिणाम लिखिए।
उत्तर :
भौगोलिक खोजों के दो परिणाम हैं

  1.  व्यापार व वाणिज्य का विकास, तथा
  2. औपनिवेशिक विस्तार।

प्रश्न 10.
पुनर्जागरण का आरम्भ इटली में ही क्यों हुआ?
उत्तर :
पुनर्जागरण का आरम्भ इटली में ही इसलिए हुआ, क्योंकि तुर्की की कुस्तुनतुनिया विजय के बाद यूनान के विद्वान अपनी रचनाओं सहित इटली चले आए थे और उन्होंने इसी देश में अध्ययन-अध्यापन करना आरम्भ कर दिया था।

प्रश्न 11.
यूरोप में पुनर्जागरण के कोई दो प्रमुख कारण लिखिए।
उत्तर :
यूरोप में पुनर्जागरण के दो प्रमुख कारण थे

  1. भौगोलिक खोजें तथा
  2. वैज्ञानिक आविष्कार।

प्रश्न 12.
इटली के किन्हीं दो चित्रकारों के नाम लिखिए।
उत्तर :
इटली के दो प्रमुख चित्रकारों के नाम हैं

  1. माइकेल एंजिलो तथा
  2. रफेल।

प्रश्न 13.
पुनर्जागरण काल के किन्हीं दो वैज्ञानिकों के नाम बताइए।
उत्तर :
पुनर्जागरण काल के दो प्रमुख वैज्ञानिकों के नाम हैं

  1. कोपरनिकस तथा
  2. गैलीलियो।

प्रश्न 14.
निम्नलिखित में से किसी एक का संक्षिप्त परिचय दीजिए

  1. पेट्रार्क
  2.  माइकेल एंजिलो
  3.  रफेल
  4.  टॉमस मूर
  5.  मैकियावली
  6.  लियोनार्डो द विन्ची
  7. गुटेनबर्ग
  8.  गैलीलियो
  9.  कोपरनिकस
  10.  दान्ते
  11. फ्रांसिस बेकन
  12. हेनरी सप्तम

उत्तर :

  1.  पेट्रार्क :
    यह इटली का महान् कवि तथा मानववाद का संस्थापक था। उसने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में व्याप्त दोषों को कटु आलोचना की थी।
  2.  माइकेल एंजिलो :
    यह इटली का एक प्रसिद्ध कलाकार था। उसके बनाए चित्रों में ‘द लास्ट
    जजमेण्ट’ तथा ‘द फॉल ऑफ मैन’ विशेष उल्लेखनीय हैं।
  3. रफेल :
    यह इटली का एक प्रतिभाशाली चित्रकार था। इसकी गणना विश्व के उच्चकोटि के
    कलाकारों में की जाती है। ‘मेडोना’ के चित्र, रफेल की चित्रकारी का सर्वश्रेष्ठ नमूना हैं।
  4. टॉमस मूर :
    यह उच्चकोटि का साहित्यकार था। इसकी कृतियों में ‘यूटोपिया’ विशेष . उल्लेखनीय है। इसमें तत्कालीन समाज की कुरीतियों पर व्यंग्य किया गया है।
  5. मैकियावली :
    मैकियावली को आधुनिक राजनीतिक दर्शन का जनक माना जाता है। यह | फ्लोरेन्स का एक महान् इतिहासकार था। अपनी रचना ‘द प्रिन्स’ में उसने एक नए राज्य के स्वरूप की कल्पना की है।
  6. लियोनार्डो द विन्ची :
    यह इटली का एक प्रसिद्ध चित्रकार था। उसके चित्रों में ‘द लास्ट सपर’ तथा ‘मोनालिसा’ प्रमुख हैं। चित्रकार होने के अतिरिक्त यह एक उच्चकोटि का मूर्तिकार, दार्शनिक, वैज्ञानिक, इन्जीनियर, गायक तथा कवि भी था।इस प्रकार लियोनार्डो द विन्ची अपने बहुमुखी गुणों के लिए जग प्रसिद्ध है।
  7.  गुटेनबर्ग :
    जर्मनी, निवासी गुटिनबर्ग ने यूरोप में छापेखाने का आविष्कार किया था। ‘बाइबिल’ इसके द्वारा मुद्रित पहली पुस्तक थी, जो 1465 ई० में प्रकाशित हुई थी।
  8. गैलीलियो :
    यह इटली का प्रसिद्ध वैज्ञानिक था। उसने दूरबीन की सहायता से नक्षत्रों के सम्बन्ध में अनेक तथ्यों का पता लगाया था।
  9. कोपरनिकस :
    यह एक प्रसिद्ध खगोलशास्त्री था। ‘खगोलीय पिण्डों के परिभ्रमण परे विचार’ नामक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ इसी की देन है। कोपरनिकस ने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमते हुए सूर्य की परिक्रमा करती है।
  10. दान्ते :
    यह इटली का एक प्रसिद्ध कवि था। इसने लैटिन भाषा में अनेक पुस्तकें लिखीं जिनमें ‘डिवाइन कॉमेडी’ विशेष उल्लेखनीय है। इसमें उसकी कविताओं का संकलन हैं।
  11. फ्रांसिस बेकन :
    यह पुनर्जागरण काल का अंग्रेजी राजनीतिज्ञ और साहित्यकार था। इसने उच्चकोटि के निबन्धों की रचना की थी।
  12.  हेनरी सप्तम :
    यह इंग्लैण्ड में ट्यूडर वंश का संस्थापक था। उसने ‘गुलाबों के युद्ध’ में विजय प्राप्त की थी।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जैकब बर्कहार्ट कौन था? इतिहास पर उसके क्या विचार थे?
उत्तर :
जैकब बर्कहार्ट स्विट्जरलैण्ड के ब्रेसले विश्वविद्यालय के इतिहासकार थे और जर्मन इतिहासकार लियोपोल्ड वॉन रांके के शिष्य थे। वे अपने गुरू के इस कथन—“एक इतिहास राज्यों एवं राजनीति का अध्ययन करता है”–से सहमत नहीं थे। उनके अनुसार इतिहास लेखन के लिए राजनीति ही सब कुछ नहीं है। इतिहास का सम्बन्ध संस्कृति और राजनीति दोनों से है। उन्होंने अपने अध्ययन द्वारा स्पष्ट किया है कि 14वीं से 17वीं सदी तक इटली के नगरों में मानवतावादी संस्कृति का विकास हुआ था। उनका मत था कि संस्कृति इस नए विश्वास पर आधारित थी कि व्यक्ति एक इकाई के रूप में स्वयं के बारे में निर्णय लेने और अपनी दक्षता को आगे बढ़ाने में समर्थ थे।

प्रश्न 2.
धर्म-सुधार क्या था? इसके क्या उद्देश्य थे? 
उत्तर :
सोलहवीं शताब्दी से पूर्व तक ईसाई धर्म के दो प्रकार के चर्च थे-ऑर्थोडॉक्स चर्च (Orthodox) तथा रोमन कैथोलिक चर्च। ऑर्थोडॉक्स चर्च पूवी देशों में थे और इन चर्चा का प्रमुख केन्द्र कुस्तुनतुनिया था, लेकिन धीरे-धीरे ऑर्थोडॉक्स चर्चे की महत्ता घटने लगी और रोमन कैथोलिक चर्चा की महत्ता बढ़ने लगी, क्योंकि ये चर्च ज्यादातर पश्चिम यूरोप में थे। रोमन कैथोलिक चर्चा की शक्ति भी अत्यधिक थी इसलिए ये विद्रोह मुख्यतया रोमन कैथोलिक चर्चा के विरुद्ध ही थे। इस विद्रोह के परिणामस्वरूप चर्च में अनेक सुधार हुए और कई नए प्रगतिशील चर्च संगठित हुए।इसलिए इस विद्रोह को धर्म-सुधार (The Reformation) कहते हैं। धर्म-सुधार के दो मुख्य उद्देश्य थे—(1) ईसाई धर्म में पनपे पाखण्ड का परिमार्जन कर उसे पुनः शुद्ध रूप प्रदान करना, तथा (2) पोप के धार्मिक और राजनीतिक प्रभुता सम्बन्धी अधिकारों को ठुकराना। इस प्रकार धर्म-सुधार आन्दोलन धार्मिक और राजनीतिक दोनों ही प्रकार का आन्दोलन था।

प्रश्न 3.
जॉन विकलिफ कौन था? धर्म सुधार में उसने क्या योगदान दिया? 
उत्तर :
पोप के अधिकारों का विरोध 14वीं  शताब्दी से ही प्रारम्भ हो गया था। सर्वप्रथम अंग्रेज पादरी जॉन विकलिफ (1320-1384 ई०) ने रोमन कैथोलिक चर्च के दोषों को जनसाधारण के सम्मुख रखा। वह ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के पद पर कार्य करता था। उसको विद्वानों ने ‘धर्म-सुधार का प्रभात नक्षत्र’ (The Morning Star of Reformation) कहकर गौरव प्रदान किया। उसने ‘बाइबिल’ का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद प्रस्तुत किया जिससे इंग्लैण्ड की जनता को ईसा मसीह का धर्म-सन्देश प्राप्त करना सुगम हो गया। विकलिफ एक महान् विचारक एवं सुधारक था। उसका कथन था कि पोप पृथ्वी पर ईसा मसीह का प्रतिनिधि नहीं है वरन् वह एक महान् आत्मा के सिद्धान्तों के विरुद्ध आचरण करता है। मिशनरी में जीवन व्यतीत करना धार्मिक दृष्टिकोण से आवश्यक नहीं है। ईसाइयों को केर्पल “बाइबिल’ के सिद्धान्तों का पालन करना चाहिए और चर्च को सम्राट के अधीन होना चाहिए। इसके अतिरिक्त उसने पादरियों के वासनासिक्त एवं धन-लोलुप जीवन की कटु आलोचना कर पाखण्ड और भ्रष्टाचार में लिप्त धर्म के ठेकेदारों को आवरणरहित किया।

प्रश्न 4.
मार्टिन लुथर कौन था?
उत्तर :
मार्टिन लूथर का जन्म यूरिन्ज्यिा नामक स्थान पर 1483 ई० में हुआ था। उसने एरफर्ट के विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। 1505 ई० में वह धर्म प्रचारक बन गया। मठ में अपने को कड़े अनुशासन में रखने के बावजूद लूथर को आन्तरिक शक्ति न मिली। लूथर ने मठ छोड़ दिया और विटनबर्ग के विश्वविद्यालय में ब्रह्मविद्या (Theology) का प्रोफेसर हो गया। धर्मशास्त्र के अध्ययन और अध्यापन के दौरान रोमन कैथोलिक चर्च के कई मन्तव्यों के बारे में लूथर के मन में अनेक शंकाएँ पैदा हो गईं। इसी कारण 1510 ई० में अपनी जिज्ञासा शान्त करने के लिए उसने रोम का भ्रमण किया। रोम में उसने अपनी आँखों से पोप तथा पादरियों का भ्रष्ट जीवन देखा। उस समय पोप अपने धार्मिक कर्तव्य भूलकर भोग-विलास में लिप्त रहते थे। यह देखकर लूथर पोप के विरुद्ध हो गया तथा उसे धर्म से ग्लानि हो गई। उसने 95 सिद्धान्तों की एक सूची प्रस्तुत की जिसमें पोप के सिद्धान्तों का विरोध किया गया था। यह सूची उसने गिरजाघर के मुख्य द्वार पर टाँग दी। इसमें तर्क द्वारा पोप के धर्म का विरोध किया गया था लूथर का यह कथन था कि इस विषय में कोई भी व्यक्ति उससे तर्क कर सकता है। पोप के धर्म का विरोध करने के कारण लूथर द्वारा प्रचलित यह धर्म ‘प्रोटेस्टैण्ट धर्म’ (Protestant Religion) के नाम से सम्बोधित किया गया। जर्मनी में इस धर्म का प्रचार तीव्रता से हुआ। जर्मनी में प्रोटेस्टैण्ट चर्च की स्थापना की गई तथा उत्तरी जर्मनी की अधिकांश जनता लूथर के नवीन धर्म की अनुयायी बन गई।

प्रश्न 5.
प्रोटेस्टैण्ट धर्म की सफलता के क्या कारण थे?
उत्तर :
मार्टिन लूथर द्वारा प्रचलित प्रोटेस्टैण्ट धर्म का जर्मनी में शीघ्रतापूर्वक प्रचार हुआ। इस धर्म-प्रसार की सफलता के अग्रलिखित कारण थे

  1.  पोप एवं उच्च पादरियों के भ्रष्ट जीवन को देखकर अनेक जिज्ञासु व्यक्तियों को प्रचलित धर्म के विषय में सन्देह होने लगा था; अतः जब लूथर ने धर्म-सुधार आरम्भ किया तो अधिकांश जनता ने उसका धर्म स्वीकार कर लिया। लूथर से पूर्व भीशिक्षित वर्ग को धर्म के विषय में अविश्वास प्रकट होने लगा था।
  2. चर्च के अन्धविश्वासपूर्ण, भ्रष्ट तथा अनैतिक जीवन के विपरीत लूथर ने सरलता एवं पवित्रता का जीवन व्यतीत करने की शिक्षा दी जिसके कारण उसके असंख्य अनुयायी बन गए।
  3.  लूथर जिस समय जर्मनी में धर्म प्रसार का कार्य कर रहा था, उस समय पवित्र रोमन सम्राट चार्ल्स पंचम अन्य समस्याओं के समाधान में संलग्न था। यद्यपि उसने लूथर को नास्तिक | घोषित कर दिया किन्तु उसके विरुद्ध वह कोई प्रतिकारात्मक कार्यवाही करने में असमर्थ रही।
  4.  लूथर ने अपने धर्म का प्रचार जर्मन भाषा में किया जिसे जर्मन लोग सरलतापूर्वक समझ सकते थे। इस प्रकार राष्ट्र-भाषा के प्रसार द्वारा उसने जर्मनों में राष्ट्र-भक्ति की भावना जाग्रत कर दी तथा विदेशी पोप के स्थान पर जर्मनों ने अपने राष्ट्र के नेता का अनुसरण आरम्भ कर दिया।

प्रश्न 6.
लियोनार्डो द विन्ची क्यों प्रसिद्ध था?
उत्तर :
लियोनाड द विन्ची रूपचित्र का विशेषज्ञ था। उसने चित्रों को यथार्थवादी रूप देने का प्रयास किया। इसकी आश्चर्यजनक अभिरुचि वनस्पति विज्ञान, शरीर रचना विज्ञान से लेकर गणितशास्त्र और कला तक विस्तृत थी। उसके प्रसिद्ध चित्र ‘मोनालिसा’ और ‘द लास्ट सपर’ थे। उसकी आकाश में उड़ने की प्रबल इच्छा प्रबल इच्छा थी। वह वर्षों तक पक्षियों के उड़ने का निरीक्षण करता रहा और एक उड़ने वाली मशीन का डिज़ाइन बनाया।

प्रश्न 7.
प्रोटेस्टैण्ट धर्म के उदय के क्या कारण थे?
उत्तर :
यूरोप में धर्म सुधार आन्दोलन, ने चर्च के दोषों का भण्डाफोड़ कर दिया। सारे यूरोप में पोप की प्रभुसत्ता के विरुद्ध आवाजें उठने लगीं। इस प्रकार कैथोलिक धर्म की बुराइयों के विरोध में प्रोटेस्टैण्ट (सुधारवादी) धर्म का उदय हुआ। प्रोटेस्टैण्ट धर्म के उदय के मूल कारण पोप की निरंकुश सर्वोच्च सत्ता, चर्च का भ्रष्टाचार और कैथोलिक धर्म के अन्धविश्वास एवं धार्मिक पाखण्ड थे।

प्रश्न 8.
पुनर्जागरण की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर :
पुनर्जागरण की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार थीं

  1.  पुनर्जागरण ने धार्मिक विश्वास के स्थान पर स्वतन्त्र चिन्तन को महत्त्व देकर तर्क-शक्ति का  विकास किया।
  2.  पुनर्जागरण ने मनुष्य को अन्धविश्वासों, रूढ़ियों तथा चर्च के बन्धनों से छुटकारा दिलाया और उसके व्यक्तित्व का स्वतन्त्र रूप से विकास किया।
  3. पुनर्जागरण ने मानववादी विचारधारा का विकास किया व मानव जीवन को सार्थक बनाने की शिक्षा दी।
  4. पुनर्जागरण ने केवल यूनानी और लैटिन भाषाओं के ग्रन्थों को ही नहीं वरन् देशज भाषाओं के साहित्य के विकास को भी प्रोत्साहन दिया।
  5.  चित्रकला के क्षेत्र में पुनर्जागरण ने यथार्थ चित्रण को प्रोत्साहन दिया।
  6.  विज्ञान के क्षेत्र में पुनर्जागरण ने निरीक्षण, अन्वेषण, जाँच तथा परीक्षण को महत्त्व दिया।

प्रश्न 9.
कैथोलिक धर्म की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
ईसाई धर्म में दो सम्प्रदाय बन गए थे। पहला सम्प्रदाय ‘रोमन कैथोलिक’ और दूसरा ‘प्रोटेस्टेण्ट’ कहलाया। रोमन कैथोलिक सम्प्रदाय प्राचीन ईसाई धर्म के सिद्धान्तों का समर्थक है। इस सम्प्रदाय के अनुयायी रोम के पोप को अपना धर्मगुरु मानते हैं और उसकी प्रत्येक आज्ञा का पालन करना अपना परम कर्तव्य समझते हैं।

प्रश्न 10.
पोप के क्या-क्या धार्मिक अधिकार थे?
उत्तर :
मध्य युग में रोम के पोप के निम्नलिखित अधिकार थे

  1. वह किसी भी ईसाई धर्म के अनुयायी राजा को आदेश दे सकता था तथा उसे धर्म से बहिष्कृत कर उसके राज्याधिकार की मान्यता को समाप्त कर सकता था।
  2.  पोप की अपनी सरकार, अपना कानून, अपने न्यायालय, अपनी पुलिस और अपनी सामाजिक एवं धार्मिक व्यवस्था थी।
  3. पोप रोमन कैथोलिक धर्म के अनुयायी राजाओं के आन्तरिक मामलों में भी हस्तक्षेप कर सकता था।
  4.  पोप रोमन कैथोलिक जनता से कर वसूल किया करता था। वह उन्हें चर्च के नियमों के अनुसार आचरण करने का आदेश भी देता था।
  5.  पोप को रोमन कैथोलिक राज्यों में चर्च के लिए उच्च पदाधिकारियों को नियुक्त और पदच्युत करने का अधिकार प्राप्त था।

प्रश्न 11.
काउण्टर रिफॉर्मेशन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
लूथर द्वारा प्रचलित धर्म-सुधार की लहर ने सम्पूर्ण यूरोप को आश्चर्यचकित कर दिया। लुथर और काल्विन के विचारों ने यूरोप के प्रत्येक देश में धार्मिक उद्धार को प्रसारित कर दिया था। रोमन कैथोलिक धर्म के प्रमुख केन्द्र इटली एवं स्पेन भी इसके प्रभाव से वंचित न रह सके। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि यदि इसे धर्म-सुधार को रोका न गया तो कहीं यह रोमन कैथोलिक धर्म को आत्मसात् न कर ले। धर्म-सुधार आन्दोलन के प्रारम्भ में रोमन चर्च ने अपने दोष दूर करने की चिन्ता नहीं की। लेकिन जब इस आन्दोलन ने जोर पकड़ा तो रोमन चर्चा का ध्यान अपने दोषों की तरफ गया और कैथोलिक धर्म में अनेक सुधार किए गए, यद्यपि शताब्दियों से प्रचलित रोमन कैथोलिक धर्म की नींव इतनी सुदृढ़ थी कि उसका उखड़ना असम्भव था। किन्तु फिर भी प्रोटेस्टैण्ट धर्म को रोकने के लिए पोप और उसके अनुयायियों ने प्रयत्न आरम्भ कर दिए। इसे ही काउण्टर रिफॉर्मेशन (प्रतिसुधार आन्दोलन) कहा जाता है। वे लोग निरन्तर प्रोटेस्टैण्ट धर्म का समूल नाश करने के लिए योजनाएँ बनाते रहे। यद्यपि प्रोटेस्टैण्ट धर्म को समाप्त करने में उन लोगों को सफलता न मिली, किन्तु उसकी प्रगति को अवश्य अवरुद्ध कर दिया गया। इसे ही काउण्टर रिफॉर्मेशन या प्रतिसुधार आन्दोलन कहा जाता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पुनर्जागरण के क्या कारण थे? इसका यूरोप पर क्या प्रभाव पड़ा? या पुनर्जागरण से आप क्या समझते हैं? यूरोप में पुनर्जागरण के क्या कारण थे?
उत्तर :

पुनर्जागरण का अभिप्राय

‘पुनर्जागरण’ शब्द, फ्रांसीसी शब्द ‘रिनेसान्स’ का हिन्दी रूपान्तर है, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘फिर से जीवित हो जाना।’ स्वेन के अनुसार, “पुनर्जागरण एक व्यापक शब्द है जिसका प्रयोग उन सभी बौद्धिक परिवर्तनों के लिए किया जाता है जो मध्य युग के अन्त में तथा आधुनिक युग के प्रारम्भ में दृष्टिगोचर हो रहे थे। दूसरे शब्दों में, पुनर्जागरण से तात्पर्य उस अवस्था से होता है जब मानव समाज अपनी पुरानी सांस्कृतिक और राजनीतिक अवस्थाओं से जागकर नवीन उपयोगी परिवर्तनों के लिए उत्सुक हो जाता है। इस प्रकार जब प्रचलित जीवन-परम्पराओं में क्रान्तिकारी सुधार होने से समाज की कायापलट हो जाती है तो यह स्थिति पुनर्जागरण कहलाती है। इससे राज्य, राजनीति, धर्म, संस्था और भौतिक जीवन में सुधारों की प्रवृत्ति बढ़ जाती है।

यूरोप में पुनर्जागरण के कारण

यूरोप में पुनर्जागरण के निम्नलिखित कारण थे

  1. धर्मयुद्धों का प्रभाव :
    मध्ययुग में तुर्को और ईसाइयों के मध्य इस्लाम धर्म के प्रचार और ईसाईधर्म की सुरक्षा के कारण अनेक धर्मयुद्ध हुए। इन धर्मयुद्धों ने ईसाई संस्कृति को बहुत क्षति पहुँचाई; अतः ईसाई संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए पुनर्जागरण का वातावरण तैयार होने लगा।
  2. धर्म के प्रति नवीनतम मान्यताओं का विकासा :
    यूरोप में अभी तक लोगों की धर्म के प्राचीन सिद्धान्तों में आस्था थी। स्वर्ग और नरक के विचारों से प्रेरित होकर यूरोपीय समाज पुरातन जीवन से जुड़ा आ रहा था, परन्तु अब धर्म के क्षेत्र में नए विचारों का विकास होने लगा। इन नवीन मान्यताओं से ही धार्मिक क्षेत्र में पुनर्जागरण उत्पन्न हुआ।
  3. सामन्तवाद का प्रभाव :
    तत्कालीन राज्य-प्रबन्ध से जनता बहुत दुःखी हो चुकी थी। इसके अन्तर्गत चली आ रही सामन्तवादी प्रथा से जनता को अपार कष्ट हुए। सामन्तवाद के कष्टों से मुक्ति पाने के लिए कृषकों और मजदूरों ने पुनर्जागरण के आन्दोलन को तीव्र कर दिया।
  4.  नवीन क्षेत्रों की खोज :
    यूरोप के नाविकों ने नवीन क्षेत्रों की खोज करना प्रारम्भ कर दिया। इन | नवीन क्षेत्रों की सभ्यताओं के आमेलन से भी पुनर्जागरण को स्वाभाविक रूप से बल मिला।
  5. शिक्षा का बढ़ता हुआ प्रभाव :
    मध्य युग में शिक्षा के क्षेत्र में भी विशेष प्रगति हुई। शिक्षा-जगत में नवीन ज्ञान और विचारों को विकास हुआ। फ्रांस और इंग्लैण्ड के कुछ राजाओं ने भी नवीन विज्ञानों; जैसे-भूगोल, खगोल, गणित, चिकित्सा-विज्ञान आदि के पठन-पाठन पर अधिक बल दिया।
  6.  छापेखाने का आविष्कार :
    1465 ई० में जर्मनी के गुटिनबर्ग नामक व्यक्ति ने छापेखाने का आविष्कार किया। 1476 ई० में विलियम कैक्सटन ने इंग्लैण्ड में अपना छापाखाना खोला। इसके पश्चात छापाखानों की संख्या में तेजी के साथ वृद्धि होने लगी। इसके फलस्वरूप पुस्तकों की छपाई सरल हो गई और ज्ञान की धरा द्रुत गति से प्रवाहित होने लगी।
  7. आविष्कारों का प्रभाव : 
    यूरोप में विभिन्न वैज्ञानिकों ने नए-नए आविष्कार करने प्रारम्भ कर दिए। न्यूटन, गैलीलियो, रोजर बेकन तथा कोपरनिकस जैसे वैज्ञानिकों के आविष्कारों से | विज्ञान के क्षेत्र में क्रान्ति आ गई। विज्ञान ने पुनर्जागरण के प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
  8. कलाओं का प्रभाव :
    कला के विभिन्न क्षेत्रों में भी निरन्तर विकास हो रहा था। चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत कला, भवन-निर्माण कला में उपयोगी परिवर्तन हुए थे। इस युग के प्रमुख कलाकारों में रफेल, माइकल एंजिलो, लियोनार्डो द विन्ची केनाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इस काल के कलाकारों की मानवतावादी कृतियों ने प्रेम, मैत्री और वात्सल्य का भाव प्रस्तुत किया; अतः जनसामान्य में यह भावना जाग्रत हो गई कि मनुष्य को उचित सम्मान मिलना चाहिए। फलतः अब वह धर्म और ईश्वर के स्थान पर मानव-मात्र के प्रति आस्थावान हो उठा। इस प्रकार उसमें एक नए दृष्टिकोण का उदय हुआ।

प्रश्न 2.
यूरोप में पुनर्जागरण के प्रसार का विवरण दीजिए।
उत्तर :
पुनर्जागरण का प्रसार यूरोप में साहित्य, कला एवं विज्ञान के क्षेत्र में पुनर्जागरण का तीव्र गति से प्रसार हुआ, जिसका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है

  1. साहित्य में पुनर्जागरण–सर्वप्रथम इटली में साहित्यिक पुनर्जागरण आरम्भ हुआ। इटली के पहले महान कवि दान्ते (1265-1321 ई०) ने ‘डिवाइन कॉमेडी’ नामक महाकाव्य लिखा। दान्ते के बाद ‘मानववाद के पिता पेट्रार्क ने लैटिन साहित्य पर अनेक पुस्तकें लिखीं जिनमें ‘अफ्रीका’, ‘कैवलियर’,
    ‘लेटर्स’ तथा ‘ओनेट्स’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। पेट्रार्क के शिष्य बुकेशियो (1313-1376 ई०) जिसे लैटिन साहित्य का पिता’ कहा जाता है, ने विश्वप्रसिद्ध पुस्तक ‘डेकामरान की कहानियाँ लिखी। मैकियावली, जिसे इटली का चाणक्य’ माना जाता है, ने ‘दि प्रिन्स’ तथा ‘दि आर्ट वार’ नामक ग्रन्थों की रचना की। लोरेन्जी डी मेडोसी, मिरन डोना, टैसो आदि अन्य महान इटैलियन लेखकों ने अनेक पुस्तकें लिखकर इटली में पुनर्जागरण का प्रसार किया। पुनर्जागरण की भावना से प्रभावित होकर फ्रांस के कई लेखकों, कवियों ने फ्रांसीसी भाषा में अनेक पुस्तकें लिखीं। इनमें फ्रांसिस रबेल
    (Francis Rabelais, 1311-1404 ई०) तथा मॉण्टेन (Montaine) के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। फ्रांस के धर्म सुधारक जॉन काल्विन (1509-1564 ई०) ने फ्रेंच गद्य में अनेक रचनाएँ लिखीं। इंग्लैण्ड में ज्योफ्रे चॉसर (Chaucer, 1340-1440 ई०) ने ‘कैण्टरबरी टेल्स’ नामक विश्वप्रसिद्ध कविताएँ लिखीं। शेक्सपीयर (1564-1661 ई०), जिसे अंग्रेजी कविता का जनक’ कहते हैं, ने ‘रोमियो-जूलियट’, ‘मर्चेण्ट ऑफ वेनिस’, ‘हैमलेट’, ‘मैकबेथ’, ‘ओथेलो’, हेनरी चतुर्थ’, ‘वेल्थनाइट’, ‘दि टेम्पेस्ट’ आदि नाटक लिखे। टॉमस मूर (1478-1535 ई०) ने यूटोपिया’ नामक ग्रन्थ लिखा। जॉन कोलेट (1466-1519 ई०), एडमण्ड स्पेन्सर (Edmund Spenser, 1552-1589 ई०), फ्रांसिस बेकन (1561-1626 ई०), क्रिस्टोफर मार्लो (1564-1593 ई०) आदि ने अनेक पुस्तकों की रचना की। स्पेन, पुर्तगाल, जर्मनी, हॉलैण्ड आदि देशों पर भी पुनर्जागरण का प्रभाव पड़ा। स्पेन में सर्वेण्टीज (1547-1616 ई०), पुर्तगाल में केमोन्स, जर्मनी में मार्टिन लूथर तथा हॉलैण्ड में इरास्मस (1466-1536 ई०) जैसे महान् लेखक उत्पन्न हुए। सर्वेण्टीज ने ‘डॉन क्विकजाट’ (शेखचिल्ली जैसी कहानियाँ) तथा इरास्मस ने ‘दि प्रेज ऑफ फॉली’ नामक विश्वप्रसिद्ध | पुस्तकें लिखीं।
  2. कला में पुनर्जागरण :
    पुनर्जागरण के फलस्वरूप वास्तुकला के क्षेत्र मेंएक नई शैली गॉथिक विकसित हुई। इस शैली के उत्कृष्ट नमूने रोम का ‘सेण्ट पीटर गिरजाघर’, लन्दन का ‘सेण्ट पॉल गिरजाघर’ तथा वेनिस (यूनान) में ‘सेण्ट मार्क का गिरजाघर’ है। इटली के कलाकारोंने ‘स्पेन का राजमहल’ और जर्मनी का ‘हैडलबर्ग का किला’ भी बनाया, जो आज भी दर्शनीय हैं। इटली के विख्यात कलाकार गिबर्टी और डेनेटेलो ने मूर्तिकला में एक नई शैली को जन्म दिया। फ्लोरेंस(इटली) में मूर्तिकला का अत्यधिक विकास हुआ। इटली के सीमव्यू (1240-1302 ई०) तथा गिटो (1276-1337 ई०) ने चित्रकला की एक नई शैली को जन्म दिया। लियोनार्डो दविन्ची (1452-1519 ई०)का चित्र ‘दि लास्ट सपर आज भी विश्व में चित्रकला की एक महान् कृति माना जाता है। इसके मोनालिसा के चित्र बड़े सजीव हैं। माइकल एंजिलो (1475-1564 ई०) द्वारा रोम के महल तथा गिरजाघरमें बनाए गए चित्र, मानव जीवन की साकार प्रतिमा प्रतीत होते हैं। उसके द्वारा निर्मित चित्र ‘दि फाल ऑफ मैन’ को आज भी चित्रकला की महान कृति माना जाता है। रफेल (1483-1520 ई०) का चित्र‘मेडोनाज’ आज भी बहुत प्रसिद्ध है। इटली के अतिरिक्त जर्मनी के ड्यूरर, हंस , हालबेन तथा हॉलैण्ड के ह्यूबर्ट, जॉन आदि चित्रकारों ने बहुमूल्य कृतियों कानिर्माण किया।
  3. विज्ञान में पुनर्जागरण :
    पुनर्जागरण काल में विज्ञान के क्षेत्र में भी अनेक नए आविष्कार हुए। सर्वप्रथम रोजर बेकन (1214-1295 ई०) ने प्रयोगों द्वारा वैज्ञानिक तथ्यों का पता लगाने की परिपाटी डाली। कोपरनिकस (1473-1553 ई०) ने यह सिद्ध कर दिया कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है, न कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर घूमता है, जैसा कि उस समय विश्वास था। फ्रांसिस बेकने तथा देकार्ते ने विज्ञान में विश्लेषण विधि को जन्म दिया। गैलीलियो (1560 1642 ई०) ने दूरदर्शक यन्त्र का आविष्कार किया और गति विज्ञान के अध्ययन की नींव डाली। न्यूटन (1642-1726 ई०) ने गुरुत्वाकर्षण नियम का पता लगाया। हार्वे ने मानव शरीर में रक्त परिवहन एड़ियस बेसालियस ने रसायन विज्ञान तथा शल्य चिकित्सा और लियोनार्डो द विन्ची ने शरीर विज्ञान, जीव विज्ञान, तकनीकी व रेखागणित के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण, निष्कर्ष निकाले।

प्रश्न 3.
पुनर्जागरण के प्रभाव बताइए। पुनर्जागरण के फलस्वरूप मानव-जीवन में क्या परिरर्तन हुए?
उत्तर :
पुनर्जागरण का प्रभाव पुनर्जागरण के प्रसार के फलस्वरूप मानव-जीवन में होने वाले विभिन्न परिवर्तनों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है

  1. आर्थिक दशा और व्यापार में प्रगति :
    पुनर्जागरण काल के कारण ही यूरोपीय नाविक नए-नए भौगोलिक देशों की खोज में सफल हुए। नए देशों के बाजार तथा कच्चे मालों की उपलब्धि के कारण यूरोपीय देशों के व्यापार तथा उद्योगों में बहुत अधिक प्रगति हुई। यूरोप में आर्थिक विकास होने से वहाँ की सम्पन्नता तथा वैभव बढ़ गया। यूरोप के सभी देश व्यापार बढ़ाने तथा धन कमाने में लग गए और उन्होंने अनेक उपनिवेशों की स्थापना की। औद्योगिक नगरों की स्थापना और विकास ने व्यापार तथा उद्योगों को बड़ा प्रोत्साहन दिया। व्यापार की उन्नति के कारण समाज में मध्यम वर्ग का जन्म हुआ। पुनर्जागरण ने यूरोप में ‘वाणिज्यवाद’ को जन्म दिया; अतः यहाँ के देशों में अधिक निर्यात द्वारा स्वर्ण एकत्र करने की प्रवृत्ति बढ़ गई और मध्यम वर्ग धीरे-धीरे प्रभावी होता चला गया।
  2. सामाजिक जीवन में प्रगति :
    पुनर्जागरण के कारण यूरोप के लोगों के जीवन तथा विचारों में व्यापक परिवर्तन हुए। नए विचारों ने अन्धविश्वासों का अन्त करके उन्हें सामाजिक जीवन के प्रति नवीन वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रदान किया। समाज से सामन्तवादी प्रथा समाप्त हो गई। समाज में एक नए वर्ग
    मध्यम वर्ग का उदय होने से लोगों में राष्ट्रीय भावनाओं का तीव्रता से विकास हुआ। शिक्षा के प्रसार ने भी समाज में नए विचारों को जन्म दिया। समाज में नवीन जागृति और चेतना जाग उठी। लोग राजनीतिक अधिकारों के प्रति जागरूक हो गए। लोगों ने सामाजिक कुरीतियों तथा अन्धविश्वासों के गर्त से निकलकर सुसंस्कृत जीवन को ग्रहण किया। भौगोलिक खोजों के कारण विश्व के लोग एक-दूसरे के निकट आ गए। इससे समाज में मैत्री और सहयोग का वातावरण उत्पन्न हो गया। जनसाधारण में विद्याध्ययन की ओर रुचि बढ़ गई तथा समाज से अशिक्षा और अज्ञानता दूर हो गई।
  3. धर्म पर प्रभाव :
    पुनर्जागरण के फलस्वरूप यूरोप के धार्मिक जीवन में भी अनेक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। मध्ययुगीन धार्मिक अन्धविश्वासों और मान्यताओं का खण्डन किया जाने लगा। कैथोलिक धर्म में पर्याप्त सुधार हुआ और प्रोटेस्टेण्ट धर्म की महत्ता बढ़ने लगी। इस्लाम धर्म के बढ़ते प्रसार ने ईसाई समाज को अपने धर्म की रक्षा के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने के लिए बाध्य कर दिया। धर्म सुधार-आन्दोलनों ने आडम्बरों, पाखण्डों, भ्रष्टाचारों तथा अन्याय के विरुद्ध कठोर कदम उठाए। इस प्रकार धर्म के क्षेत्र में व्याप्त कुप्रथाएँ समाप्त हो गईं। इसके फलस्वरूप चर्च की निरंकुशता का भी अन्त हो गया। वस्तुतः पुनर्जागरण के फलस्वरूप धर्म का उज्ज्वल स्वरूप निखकर सामने आया। इस दिशा में मार्टिन लूथर तथा जॉन काल्विन । जैसे समाज-सुधारकों ने धर्म को परिष्कृत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  4. भाषा और साहित्य पर प्रभाव :
    पुनर्जागरण का महत्त्वपूर्ण प्रभाव भाषा और साहित्य के क्षेत्र पर भी पड़ा। पुस्तकों की छपाई के कारण ज्ञान का कार्य तेजी के साथ हुआ और लोगों के
    दृष्टिकोण में तीव्र गति से परिवर्तन आया।
  5. राष्ट्रीयता का विकास :
    पुनर्जागरण के फलस्वरूप यूरोप में नए राज्यों के उत्कर्ष के साथ-साथ राष्ट्रीयता की भावना भी जाग्रत हुई। सामन्तवाद का अन्त हो जाने से जहाँ एक ओर शक्तिशाली राजसत्ता का उदय हुआ, वहीं दूसरी ओर जनता का महत्त्व भी बढ़ा

प्रश्न 4.
पन्द्रहवीं तथा सोलहवीं शताब्दी की भौगोलिक खोजों का संक्षेप में वर्णन कीजिए। या भौगोलिक खोजों के कारण तथा महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :

नवीन स्थानों की खोज तथा खोज-यात्राएँ।

पुनर्जागरण काल में यूरोप के साहसी नाविकों ने लम्बी-लम्बी समुद्री यात्राएँ करके नवीन देशों की खोज की; अतः पुनर्जागरण काल को ‘खोजों का काल’ भी कहा जाता है। भौगोलिक खोजों के लिए सर्वप्रथम पुर्तगाली और स्पेनिश नाविक उतरे, बाद में इंग्लैण्ड, फ्रांस, हॉलैण्ड व जर्मनी के लोग भी खोज कार्य में जुट गए।

पुनर्जागरण काल में नए देशों की खोज

  1. उत्तमाशा अन्तरीप की खोज :
    इसकी खोज एक समुद्र-यात्री बारथोलोम्य डियाज ने की थी। 1486 ई० में बारथोलोम्यु अनेक कठिनाइयाँ सहन करने के बाद अफ्रीका के दक्षिणी तट पर पहुँचा, जिसे उसने ‘तूफानों का अन्तरीप’ नाम दिया। बाद में पुर्तगाल के शासक ने इसका नाम ‘उत्तमाशा अन्तरीप’ (Cape and Good Hope) रख दिया।
  2. अमेरिका तथा पश्चिमी द्वीपसमूह की खोज :
    स्पेनिश राजा फड़नेण्ड की सहायता पाकर साहसी नाविक कोलम्बस, 1492 ई० में तीन समुद्री जहाजों को लेकर भारत की खोज के लिए निकला। परन्तु तैंतीस दिन की समुद्री यात्रा के पश्चात् (वास्तव में उचित मार्ग से भटककर) वह एक नई भूमि पर पहुँच गया। पहले वह समझा कि वह भारत भूमि ही है, परन्तु वास्तव में यह नई दुनिया’ थी। बाद में इटली का एक नाविक अमेरिगो भी यहीं पर पहुंचा। उसी के नाम पर इसका नाम ‘अमेरिका’ पड़ा।
  3. न्यूफाउण्डलैण्ड तथा लेख्नडोर की खोज :
    यूरोप महाद्वीप के लिए न्यूफाउण्डलैण्ड की खोज इंग्लैण्ड के नाविक जॉन कैबेट की देन थी। 1497 ई० में जॉन कैबेट इंग्लैण्ड के राजा हेनरी सप्तम् की सहायता के लिए पश्चिमी समुद्र की ओर निकला। साहसी नाविक जॉन कैबेट उत्तरी अटलाण्टिक महासागर को पार कर कनाडा के समुद्र तट पर पहुंच गया और उसने ‘न्यूफाउण्डलैण्ड’ की खोज की। उसके पुत्र सेबान्सटियन कैबेट ने लेब्रेडोर’ की खोज की।
  4.  भारत के समुद्री मार्ग की खोज :
    यूरोप और भारत के मध्य समुद्री मार्ग की खोज पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा ने की थी। वास्कोडिगामा, पुर्तगाल के राजा से आर्थिक सहायता प्राप्त कर इस अभियान पर निकला था। यह नाविक अफ्रीका के पश्चिमी तट से होता हुआ उत्तमाशा अन्तरीप पहुँचा, फिर हिन्द महासागर से होते हुए जंजीबार और वहाँ से पूर्व की ओर बढ़ा। यहाँ से वह भारत के पश्चिमी तट पर स्थित कालीकट के बन्दरगाह पर पहुँचा।
  5. ब्राजील की खोज :
    1501 ई० में पुर्तगाल के नाविक कैबेल ने एक नए देश ‘ब्राजील की खोज की।
  6. मैक्सिको तथा पेरू की खोज:
    1519 ई० में स्पेनिश नाविक कोर्टिस ने ‘मैक्सिको’ की तथा | 1531 ई० में पिजारो ने ‘पेरू’ की खोज की।
  7. अफ्रीका महाद्वीप की खोज :
    इस महाद्वीप की खोज का श्रेय मार्टन स्टेनली तथा डेविड लिविंग्स्टन को प्राप्त है। इन्होंने अफ्रीका को खोजने के उपरान्त अनेक लेख भी लिखे, जिनको | पढ़कर यूरोपवासियों के मन में अफ्रीका में अपने उपनिवेश बसाने की प्रतिस्पर्धात्मक भावना उत्पन्न हुई।
  8. पृथ्वी की प्रथम परिक्रमा :
    पुर्तगाली नाविक मैगलेन तथा उसके साथियों ने 1519 ई० में समुद्र द्वारा पृथ्वी की प्रथम परिक्रमा करके यह सिद्ध कर दिया कि पृथ्वी गोल है तथा उसकी परिक्रमा सुगमता से की जा सकती है।

भौगोलिक खोजों का कारण

पुनर्जागरण काल यूरोपीय इतिहास का अत्यधिक प्रगतिशील युग था। इसमें साहित्य व ज्ञान के क्षेत्र में नवीन क्षेत्रों की खोजें तीव्र गति से हुईं, जिस कारण व्यावहारिक रूप में संसार का ज्ञान प्राप्त करने की उत्कंठा लोगों के मन में जाग्रत हुई। इसी उत्कंठा को मूर्तरूप देने के लिए साहसिक लोगों ने संसार का परिभ्रमण कर नवीन भौगोलिक खोजों को उद्घाटित किया तथा मानव के ज्ञान को समृद्ध किया।

भौगोलिक खोजों के परिणाम (महत्त्व)

भौगोलिक खोजों के अनेक महत्त्वपूर्ण परिणाम हुए, जिनका विवरण इस प्रकार है

  1. भौगोलिक खोजों के परिणामस्वरूप भारत जाने का छोटा और नया मार्ग खुल गया।
  2. नए व्यापारिक मार्गों की खोज के कारण विश्व व्यापार में तेजी के साथ वृद्धि होने लगी।
  3.  यूरोप में बड़े-बड़े व्यापारिक केन्द्रों का विकास होने लगा और इंग्लैण्ड, फ्रांस, स्पेन तथा | पुर्तगाल जैसे देश धनी और शक्तिशाली होने लगे।
  4.  यूरोपीय देशों में अपने उपनिवेश बनाने और अपना साम्राज्य बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा प्रारम्भ हो गई।
  5. यूरोप के शरणार्थी अमेरिका में आकर बसने लगे और वहाँ अपनी सभ्यता एवं संस्कृति का विकास करने लगे।

प्रश्न 6.
धर्म सुधार आन्दोलन के प्रमुख कारणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
धर्म सुधार आन्दोलन के प्रमुख कारण धर्म सुधार आन्दोलन के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे

  1. पुनर्जागरण का प्रभाव :
    धर्म सुधार आन्दोलन को पुनर्जागरण ने बहुत प्रभावित किया। इसने यूरोप के अन्धकार युग को समाप्त कर नवीन आदर्शों को जन्म दिया। उसने तार्किक प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया और यह स्पष्ट किया कि कोई बात इसलिए सही नहीं है कि वह चर्च का आदेश है तथा वह ईश्वरीय वाक्य है, बल्कि इसलिए सही है, क्योंकि वह तर्क और विचार की कसौटी पर खरी उतरती है। इस प्रवृत्ति के कारण लोगों ने अपने प्राचीन धार्मिक विश्वासों में परिवर्तन करने का निश्चय किया।
  2. राजनीतिक कारण :
    सोलहवीं शताब्दी में यूरोप में इंग्लैण्ड, स्पेन, फ्रांस, हॉलैण्ड, ऑस्ट्रिया आदि राष्ट्रीय राज्यों में निरंकुश राजतन्त्र की स्थापना हो चुकी थी। राष्ट्रीय राज्यों का प्रधान राजा था। रोमन चर्च का प्रधान पोप नहीं चाहता था कि राजा राष्ट्रीय राज्य में सर्वेसर्वा रहे, क्योंकि वह सम्पूर्ण यूरोप के चर्चे का मुखिया स्वयं को मानता था। इसीलिए पोप प्रत्येक राज्य में चर्च के अधिकारियों की नियुक्ति करना अपना एकाधिकार समझता था। लेकिन राजा अपने राज्य में पोप के हस्तक्षेप को सहन करने के लिए तैयार नहीं था। ऐसी स्थिति में राजा और पोप के मध्य तनाव बढ़ने लगा और यह तनाव कालान्तर में धर्म सुधार आन्दोलन का प्रमुख कारण बन गया।
  3. चर्च की अपार सम्पत्ति :
    मध्य युग में चर्च एक धनी संस्था बन गया था। उसके पास अपार सम्पत्ति थी। चर्च कोई कर राज्य को नहीं देता था; अतः राष्ट्रीय राजाओं ने राजकीय व्यय की , पूर्ति के लिए चर्च की सम्पत्ति को जब्त करने के प्रयास किए। ऐसी परिस्थिति में राज्य और चर्च के मध्य संघर्ष अनिवार्य हो गया।
  4. चर्च के दोष : 
    मध्य युग में ही चर्च अनेक दोषों का शिकार हो चुका था। वह अनैतिकता के दलदल में बुरी तरह फंस गया था। पृथ्वी पर ईश्वर के दूत पोप ने अपने उच्च आदर्शों को भुलाकर विलासमय वे अनैतिक जीवन बिताना प्रारम्भ कर दिया था। पोप अलेक्जेण्डर बड़ा ही भ्रष्ट था। पोप लियो दशम ने अपनी विलासमयी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बहुमूल्य धार्मिक मूर्तियों तक को बेच दिया था। इतना ही नहीं, चर्च जनता से धर्म के नाम पर विभिन्न प्रकार के ‘कर वसूल करता था। किसानों को अपनी उपज का 1/10 भाग ‘टिथे’ नामक कर के रूप में चर्च को देना अनिवार्य था। मृतकों को अन्तिम संस्कार तथा अन्य धार्मिक कर्मकाण्डों के लिए पादरी जनता से बहुत ६१ वसूलते थे। पोप लियो दशम ने तो रोम के चर्च के निर्माण के नाम पर भारी धनराशि लेकर चर्च में नए पद बना दिए थे। उसने ‘पापमोचन पत्रों’ (Endulgances) की बिक्री भी प्रारम्भ कर दी थी। इन पत्रों को खरीदकर कोई भी अपराधी अपने अपराध या किए गए पाप से मुक्ति पा सकता था। इतना ही नहीं, पादरियों ने धन लेकर ‘स्वर्ग का टिकट’ तक देना आरम्भ कर दिया था। चर्च की इन बुराइयों ने धर्म सुधार आन्दोलन का मार्ग खोल दिया।
  5. अन्य कारण :
    चर्च द्वारा सूदखोरी का विरोध, चर्च के अधिकारियों का भ्रष्ट जीवन तथा  रिश्वतखोरी, छोटे और बड़े पादरियों में भेदभाव तथा हेनरी अष्टम के तलाक के प्रश्न में धर्म  सुधार आन्दोलन की पृष्ठभूमि तैयार कर दी।

प्रश्न 7.
धर्म सुधार आन्दोलन के प्रभावों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :

धर्म सुधार आन्दोलन के प्रभाव

धर्म सुधार आन्दोलन ने यूरोप पर स्थायी तथा दूरगामी प्रभाव डाला। इसने यूरोप के राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक जीवन को बहुत प्रभावित किया। धर्म सुधार आन्दोलन के परिणामों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित हैं

  1. राजनीतिक परिणाम :
    इसने यूरोप में राष्ट्रीयता की भावना को प्रोतसाहन दिया और राजाओं की निरंकुश सत्ता को मान्यता दे दी। फ्रांस तथा स्पेन को छोड़ कर यूरोप के अधिकांश देशों में प्रोटेस्टैण्ट धर्म की स्थापना हुई। कैथोलिकों तथा प्रोटेस्टैण्टों के बीच धर्म के नाम पर तीस वर्षीय (1618 1648 ई०) युद्ध हुआ।
  2. धार्मिक परिणाम :
    इस आन्दोलन ने यूरोप के ईसाई देशों की एकता नष्ट कर दी। ‘ईसाई जगत’ शब्द का नामोनिशान मिट गया। इंग्लैण्ड, स्कॉटलैण्ड, उत्तरी जर्मनी, डेनमार्क, नावें, स्वीडन, नीदरलैण्ड के कुछ प्रदेश रोम के चर्च से अलग हो गए। यूरोप में धार्मिक सहिष्णुता और वैयक्तिक नैतिकता का उदय हुआ। ईसाई धर्म में तीन सम्प्रदायों का जन्म हुआ—लूथर का सम्प्रदाय ‘लूथेरियन’, ‘ज्विगली’ को सम्प्रदाय ‘विगलीयन’ और काल्विन का सम्प्रदाय ‘प्रेसविटेरियन’।
  3. आर्थिक परिणाम :
    इस आन्दोलन ने यूरोप की अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित किया। रोमन चर्च ने सूदखोरी को अनैतिज और अधार्मिक बताया था, लेकिन प्रोटेस्टेण्ट सम्प्रदाय ने इसे  कानूनी घोषित कर दिया। इससे यूरोप में पूँजीवाद का विकास और व्यापार में वृद्धि हुई।
  4.  राष्ट्रीय भाषा व साहित्य का विकास :
    धर्म सुधार आन्दोलन ने राष्ट्रीय भाषा तथा साहित्य के विकास को प्रोत्साहन दिया। लूथर ने ‘बाइबिल’ का अनुवाद जर्मन भाषा में करके लैटिन भाषा के महत्त्व को कम कर दिया। अब धार्मिक साहित्य राष्ट्रीय भाषाओं में अनुवादित तथा प्रकाशित होने लगा।
  5. धर्म सुधार विरोधी आन्दोलन :
    धर्म सुधार आन्दोलनों ने ‘धर्म सुधार विरोधी आन्दोलन (Counter Reformation) को जन्म दिया। इस धर्म सुधार विरोधी आन्दोलन के फलस्वरूप कैथोलिक धर्म में अनेक सुधार किए गए तथा रोमन चर्च के दोषों को दूर करने का प्रयत्न किया गया। इससे प्रोटेस्टेण्ट धर्म की प्रगति रुक गई। इस प्रकार धर्म सुधार आन्दोलन एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। उसने यूरोप के राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक जीवन को प्रभावित किया। वास्तव में पुनर्जागरण और धर्म सुधार आन्दोलन विश्व-इतिहास की युगान्तरकारी घटनाएँ सिद्ध हुईं। इसके साथ ही मध्य युग का अन्त और आधुनिक युग का आगमन हुआ।

प्रश्न 8.
विज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में अरबवासियों के योगदान का विवेचन कीजिए।
उत्तर :
सम्पूर्ण मध्यकाल में ईसाई गिरजाघरों और मठों के विद्वान यूनानी और रोमन विद्वानों की कृतियों से परिचित थे। पर इन लोगों ने इन रचनाओं का प्रचार-प्रसार नहीं किया। चौदहवीं सदी में अनेक विद्वानों ने प्लेटो और अरस्तू के ग्रन्थों से अनुवादों को पढ़ना प्रारम्भ किया। इसके लिए वे अपने विद्वानों के ऋणी नहीं थे बल्कि अरब के विद्वानों के ऋणी थे जिन्होंने अतीत की पाण्डुलिपियों का संरक्षण और अनुवाद सावधानीपूर्वक किया था। जबकि एक ओर यूरोप के विद्वान यूनानी ग्रन्थों के अरबी अनुवादों का अध्ययन कर रहे थे दूसरी ओर यूनानी विद्वान अरबी और फारसी विद्वानों की कृतियों को अन्य यूरोपीय लोगों के बीच प्रसार हेतु अनुवाद भी कर रहे थे। ये ग्रन्थ प्राकृतिक विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान, औषधि विज्ञान और रसायन विज्ञान से सम्बन्धित थे। टॉलेमी के ‘अलमजेस्ट’ में अरबी भाषा के विशेष अवतरण ‘अल’ का उल्लेख है जोकि यूनानी और अरबी भाषा के बीच रहे सम्बन्धों को प्रकट करता है। मुस्लिम लेखक, जिन्हें इतालवी दुनिया में ज्ञानी माना जाता था, अरबी के हकीम और मध्य एशिया के बुखारा के दार्शनिक इब्नसिना और आयुर्विज्ञान विश्वकोश के लेखक अल राजी थे। स्पेन के अरबी दार्शनिक इब्नरुश्द ने दर्शनिक ज्ञान और धार्मिक विश्वासों के बीच रहे तनावों को सुलझाने की चेष्टा की। उनकी पद्धति को ईसाई चिन्तकों द्वारा अपनाया गया।

प्रश्न 9.
जर्मनी में धर्म सुधार आन्दोलन का प्रसार किस प्रकार हुआ?
उत्तर :

जर्मनी में धर्म-सुधार

धर्म :
सुधार की लहर ने जर्मनी में विशद् रूप धारण कर लिया। यद्यपि इससे पूर्व कई धर्म-सुधार हो चुके थे, किन्तु इस पथ पर सफलतापूर्वक अग्रसर होने वाला प्रथम देश जर्मनी ही था। जर्मनी में धार्मिक सुधार का सूत्रपात करने का श्रेय महान् सुधारक मार्टिन लूथर को है। मार्टिन लूथर (Martin Luther) एक साधारण परिवार का था और विटनबर्ग (wittenburg) के विश्वविद्यालय में प्राध्यापक था। लूथर का जन्म 10 नवम्बर, 1483 ई० को ‘यूरिन्जिया’ नामक स्थान पर एक कृषक परिवार में हुआ था। बाल्यावस्था से ही धर्म में उसकी विशेष रुचि थी। यद्यपि उसके पिता की इच्छा उसे कानून पढ़ाने की थी किन्तु उसने धर्मशास्त्रों का अध्ययन प्रारम्भ कर दिया और 1505 ई० में वह पादरी (missionary) बन गया। पाँच वर्ष पश्चात् उसने रोम का भ्रमण किया और वहाँ के विलासितापूर्ण जीवन का गहराई से अवलोकन किया। तभी से पोप और धर्माधिकारियों के प्रति उसका विश्वास डगमगाने लगा। रोम से लौटकर उसने विटनबर्ग में प्राध्यापक का पद ग्रहण किया तथा वहाँ पर वह धर्मशास्त्र की शिक्षा देने लगा। उसके साहस और स्पष्टता के कारण उसके शिष्य उसका अत्यधिक सम्मान करते थे। लूथर 1510 ई० में रोम गया। वहाँ उसने पोप के दरबार में भ्रष्टाचार का बोलबाला देखा। वहीं उसने धर्म-सुधार की तीव्र आवश्यकता अनुभव की और उसे पूरा करने का संकल्प लिया। धीरे-धीरे कैथोलिक धर्म पर से उसका विश्वास उठता चला गया; क्योकि कैथोलिक धर्म इस समय भोग-विलास, व्यभिचार, भ्रष्टाचार और बाह्याडम्बरों का अड्डा बना हुआ था। धर्म की पुस्तकों के गहन अध्ययन से लूथर इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि मुक्ति का मार्ग दया एवं क्षमा पर आधारित है। पोप एवं धर्माधिकारी, मनुष्य की इस दिशा में कोई सहायता नहीं कर सकते। प्रारम्भ में तो लूथर को पोप का सक्रिय विरोध करने का साहस नहीं था, किन्तु 1517 ई० में जब पोप ने क्षमा-पत्रों की बिक्री आरम्भ की तो लूथर ने पोप का विरोध प्रारम्भ कर दिया। यह विरोध तीव्र गति से बढ़ता चला गया। क्षमा-पत्रों की बिक्री प्रारम्भ करने वाला पोप लियो दशम (Leo X) था जिसने सेण्ट पीटर का गिरजाघर बनवाने में अपार सम्पत्ति व्यय कर दी और अधिक धन प्राप्त करने के लिए उसने इन क्षमा-पत्रों का निर्माण कराया, जिसका आशय था कि इन पत्रों को खरीदने वाले को ईश्वर के दरबार में पापों से मुक्ति मिल जाएगी तथा उसे कोई दण्ड नहीं भुगतना पड़ेगा। पोप ने विटनबर्ग में भी अपना एक दूत भेजा, जो बड़े उत्साह से इन क्षमा-पत्रों को बेच रहा था। यह देखकर लूथर अत्यधिक दु:खी एवं क्रोधित हुआ और उसने गिरजाघर के द्वार पर एक नोटिस लगा दिया, जिसमें रोमन कैथोलिक धर्म के व्यावहारिक सिद्धान्तों का विरोध किया गया था तथा इन सिद्धान्तों की एक सूची भी प्रस्तुत की गई थी। इस नोटिस में लूशर ने यह भी घोषणा की थी कि इन सिद्धान्तों पर कोई भी व्यक्ति उससे शास्त्रार्थ कर सकता है। इस प्रकार लूथर ने रोमन कैथोलिक धर्म का दृढ़तापूर्वक विरोध प्रारम्भ कर दिया। दो वर्ष उपरान्त चर्च के एक अत्यन्त योग्य पादरी को उसने वाद-विवाद में पराजित किया तथा यह सिद्ध कर दिया कि केवल पोप और चर्च को ही ईसामसीह के सिद्धान्तों के अर्थ समझने 3-६’ उनकी व्याख्या करने का अधिकार प्राप्त नहीं है। विकलिफ एवं जॉन हस के समान लूथर ने इस बात का प्रचार किया कि प्रत्येक व्यक्ति ‘बाइबिल’ पढ़ने और उसे समझने का अधिकार रखता है। लूथर के इस विरोध ने पोप को चौंका दिया क्योंकि अब तक ऐसा प्रबल विरोध करने का साहस किसी ने नहीं किया था। इसके अतिरिक्त जर्मनी की बहुत-सी जनता लूथर को अपना धर्मगुरु मानकर उसकी आज्ञाओं का पालन करने लगी थी और उन्होंने पोप के प्रभुत्व के भार को उतार फेंका था। इन सब बातों के कारण पोप लियो देशम क्रुद्ध हो उठा। उसने लूथर को धर्म से बहिष्कृत किया और पवित्र रोमन सम्राट चार्ल्स पंचम को आदेश दिया कि वह नास्तिक लूथर को दण्ड दे। पोप ने लूथर को नास्तिक कहना आरम्भ कर दिया था। किन्तु इस समय तक जर्मनी की अधिकांश जनता लूथर की अनुयायी बन चुकी थी और उसको इतना बड़ा दण्ड देना सरल न था। उसको दण्ड देने से गृह-युद्ध होने की पूरी आशंका थी। यहाँ तक कि कुछ शासकों ने उसका पक्ष लेना प्रारम्भ कर दिया और सैक्सनी के शासक फ्रेड्रिक ने खुले रूप में लूथर को शरण दी। उसने घोषणा की कि जब तक मेरे महल की एक भी ईंट शेष रहेगी लूथर का कोई बाल भी बाँकी नहीं कर सकता। इस प्रकार उत्तरी जर्मनी की अधिकांश जनता लूथर के पक्ष में हो गई और वे लोग कैथोलिक धर्म के विरुद्ध विद्रोह करने को तत्पर हो गए। दक्षिणी जर्मनी में   किसानों और मजदूरों न विद्रोह कर दिए और धनिक वर्ग इन विद्रोहों से भयभीत हो उठा। लूथर ने विद्रोहों में धनिकों का पक्ष लिया जिसके कारण किसानों ने उसका विरोध प्रारम्भ कर दिया। यद्यपि 1525 ई० में इस विद्रोह का दमन कर दिया गया, किन्तु इस विद्रोह ने जर्मनी को भी दो भागों में विभाजित कर दिया। उत्तरी जर्मनी के राज्यों में जनता अधिकांशत: लूथर की अनुयायी थी और दक्षिणी जर्मनी में कैथोलिक चर्च की। किन्तु डेनमार्क और अन्य स्केण्डिनेवियन राज्यों में भी लूथर का धर्म फैल गया इस प्रकार लूथर को प्रोटेस्टैण्ट धर्म का जन्मदाता माना जाने लगा। जर्मनी में काफी समय तक गृह-युद्ध चलता रहा, किन्तु अन्त में 1515 ई० में ऑग्सबर्ग (Augsburg) के स्थान पर दोनों धर्मावलम्बियों में समझौता हो गया। इस सन्धि के द्वारा पवित्र रोमन सम्राट ने यह बात स्वीकार कर ली कि जर्मनी के विभिन्न प्रदेशों के शासक दोनों धर्मों में से कोई भी धर्म मानने के लिए स्वतन्त्र हैं। इस सन्धि से लूथर द्वारा स्थापित प्रोटेस्टेण्ट धर्म को वैधानिक मान्यता प्रदान कर दी गई किन्तु जनसाधारण को कोई धार्मिक स्वतन्त्रता न थी। उनके शासक जिस धर्म को मानते थे वही धर्म जनता को मानना पड़ता था, अन्यथा शासक लोग विधर्मियों पर भीषण अत्याचार करते थे। यह धार्मिक अत्याचारों का युग सत्रहवीं शताब्दी तक निरन्तर चलता रहा।

प्रश्न 10.
मार्टिन लूथर कौन था? जर्मनी में उसके धर्म सुधार की सफलता के कारण लिखिए।
उत्तर :
मार्टिन लूथर का परिचय धर्म-सुधार का प्रयास चौदहवीं सदी से प्रारम्भ हो गा था, लेकिन अनुकूल परिस्थितियाँ न होने के ” कारण वह विफल रहा। सोलहवीं दी में जर्मनी में अनुकूल परिस्थितियों के बीच इसने सफलता प्राप्त की। सोलहवीं सदी में जर्मनी में धर्म-सुधार आन्दोलन की सफलता के अनेक कारण थे। जर्मनी में शक्तिशाली केन्द्रीय सत्ता का अभाव था। जर्मनी में अनेक स्वतन्त्र रियासतें थीं। इन रियासतों की सुदीर्घ अभिलाषा यह थी कि पोप की राजनीतिक सत्ता समाप्त हो जाए और उन्हें पोप के बन्धनों से मुक्ति मिले। उस समय दो बड़ी कैथोलिक शक्तियाँ-फ्रांस और पवित्र रोमन साम्राज्य-एक-दूसरे के विरुद्ध भीषण युद्धों में लगी हुई थीं। ये दोनों शक्तियाँ संगठित होकर धर्म-सुधार आन्दोलन को दबाने में असमर्थ थीं। पोप के हस्तक्षेप और पोप को दिए जाने वाले करों के कारण अन्य देशों की अपेक्षा जर्मनी को अधिक भार उठाना पड़ रहा था। इन परिस्थितियों के कारण यूरोप में धर्म-सुधार की लहर सबसे पहले जर्मनी में उठी। इस आन्दोलन का मुख्य संचालक मार्टिन लूथर था। मार्टिन लूथर यूरिन्जिया नामक स्थान पर 1483 ई० में हुआ था। उसने एरफ के विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। कानून तथा धर्म के विषय में उसका ज्ञान प्रशंसनीय था। 1505 ई० में वह पारी (missionary) बन गया। गिरजाघर में अपने को कड़े अनुशासन में रखने के बावजूद लूथर को आन्तरिक शान्ति न मिली। लूथर ने गिरजाघर छोड़ दिया और विटनबर्ग के विश्वविद्यालय में धर्मशास्त्र (Theology) का प्रोफेसर हो गया। धर्मशास्त्र के अध्ययन और अध्यापन के दौरान रोमन कैथोलिक चर्च के कई मन्तव्यों के बारे में लूथर के मन में अनेक शंकाएँ पैदा हो गईं। इसी कारण 1510 ई० में अपनी जिज्ञासा शान्त करने के लिए उसने रोम का भ्रमण किया। रोम में उसने अपनी आँखों से पोप तथा पादरियों का भ्रष्ट जीवन देखा। उस समय पोप अपने धार्मिक कर्तव्ये भूलकर भोग-विलास में लिप्त रहते थे। यह देखकर लूथर पोप के विरुद्ध हो गया तथा उसे धर्म से ग्लानि हो गई। वह एक नया धर्म चलाने का विचार करने लगा, जिसमें पोप के समान भ्रष्ट चरित्र वाले व्यक्ति का कोई नेतृत्व न हो। पोप के विरुद्ध भ्रष्टाचार खत्म करने का अवसर भी आ गया। उस समय पोप न ईसाई लोगों में यह विश्वास प्रचलित कर दिया था कि मनुष्य को मृत्यु के बाद पापों का दण्ड भुगतना पड़ता है, लेकिन पुण्य कार्यों में धन देने से उस दण्ड की मात्रा काम हो जाती है। दण्ड की मात्रा कम करने के लिए पोप पापमोचन-पत्र (Indulgences) जारी किया करते थे। ईसाई लोग अपने पापों से छुटकारा के लिए इन्हें खरीद लिया करते थे। इस प्रकार पापमोचन-पत्र धन एकत्रित करने का साधन बन गए। 1517 ई० में लूथर को पापमोचन-पत्रों के बारे में ता चला तो उसके हृदय में जो आग पहले से जल रही थी वह और भड़क उठी। लूथर ने, जो इस समय विटनबर्ग में प्रोफेसर था, पोप का कड़ा विरोध करना शुरू कर दिया। उसने 95 सिद्धान्तों की एक सूची प्रस्तुत की, जिसमें पोप के सिद्धान्तों का विरोध किया गया था। यह सूची उसने गिरजाघर के मुख्य द्वार पर टाँग दी। इसमें तर्क के द्वारा पोप के धर्म का विरोध किया गया था तथा लूथर का यह कथन था कि इस विषय में कोई भी व्यक्ति उससे तर्क कर सकता है। पोप के धर्म का विरोध करने के कारण लूथर द्वारा प्रचलित यह धर्म प्रोटेस्टैण्ट धर्म (Protestant Religion) के नाम से सम्बोधित किया गया। जर्मनी में इस धर्म का प्रचार तीव्र-गति से हुआ। जर्मनी में प्रोटेस्टैण्ट चर्च की स्थापना की गई तथा उत्तरी जर्मनी की अधिकांश जनता लूथर के नवीन धर्म की अनुयायी बन गई। मार्टिन लूथर के इस विरोध के कारण पोप उसका शत्रु बन गया तथा एक घोषणा के द्वारा उसने लूथर तथा उसके अनुयायियों को धर्म से बहिष्कृत कर दिया। तथापि लूथर का उत्साह कम नहीं हुआ और उसने सम्पूर्ण जर्मनी में क्रान्ति की लहर फैला दी। उसने घूम-घूमकर पोप तथा उसके धर्म के विरुद्ध प्रचार आरम्भ कर दिया। यद्यपि इस समय अनेक व्यक्ति लूथर के अनुयायी बन गए तथापि उसके विरोधियों का भी अभाव नहीं था। जो अभी तक रोमन कैथोलिक धर्म के अनुयायी थे, लूथर से घृणा करते थे तथा उसके मार्ग में अवरोध उपस्थित कर रहे थे। स्पेन, ऑस्ट्रिया तथा फ्रांस जैसे शक्तिशाली देशों के सम्राटों की सहायता पोप को ही प्राप्त थी। स्पेन के सम्राट चार्ल्स पंचम ने लूथर को बुलाकर धर्म-सुधार आन्दोलन बन्द करने की आज्ञा दी तथा उसके मना करने पर लूथर को नास्तिक घोषित कर, दिया। वह लूथर को दण्ड भी देना चाहता था, परन्तु कुछ आन्तरिक समस्याओं से घिरे रहने के कारण वह उसको दण्ड न दे सका। लूथर ने सैक्सनी के राजा के यहाँ शरण ली। अन्त में जर्मनी के विभिन्न राज्यों ने लूथर के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया तथा लूथर की रक्षा करने का वचन दिया। इस प्रकार जर्मनी  में लूथर का धार्मिक आन्दोलन एक प्रकार से राष्ट्रीय आन्दोलन के रूप में परिणत हो गया।

प्रश्न 11.
वास्तुकला के क्षेत्र में रोमन लोगों की देन पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
वास्तुकला के क्षेत्र में रोमन लोगों की देन को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

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  1.  रोमन लोगों ने ही सबसे पहले कंक्रीट का प्रयोग आरम्भ किया था।
  2. उन्होंने विश्व को ईंट और पत्थर के टुकड़ों को मजबूती से जोड़ने की कला सिखाई।
  3.  उन्होंने वास्तुकला के क्षेत्र में डाटा और गुम्बद का आविष्कार | करके दो महत्त्वपूर्ण सुधार किए। वे एक डाट के ऊपर एक-एक करके अनेक डाट बना सकते थे। इन डाटों का प्रयोग पुल, द्वार और विजय स्मारकों आदि को बनाने में खूब किया गया।
  4.  वे दीवारों पर संगमरमर की पट्टियाँ लगाकर उन्हें सरलता से ऐसा रूप दे सकते थे मानो वे पूर्ण रूप से संगमरमर की ही बनी हो।
  5.  रोमन लोगों द्वारा निर्मित कोलोजियम और पेथियन नामक वास्तुकला ने रोम साम्राज्यकालीन अनेक भवनों की विशिष्टताओं की भवन वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूने हैं। कोलोजियम एक प्रकार नकल की। का गोलाकार थियेटर (मण्डप) था, जहाँ रोमवासी पशुओं और दासों के दंगल देखा करते थे। पेथियन एक देव मन्दिर । है जिसका गुम्बद लगभग 142 फुट ऊँचा है। यह इतना मजबूत बना हुआ है कि आज भी एक गिरजाघर के रूप में इसका उपयोग किया जा रहा है।
  6. रोमवासी इन्जीनियरिंग कला में भी बहुत पारंगत थे। उन्होंने पानी के पाइपों द्वारा अनेक नगरों में पानी पहुँचाया। उनके द्वारा तैयार किए गए पुल, सड़कें आज भी उपयोग में आ रहे हैं।
  7.  रोमन लोगों द्वारा भित्तिचित्रों को बनाने की कला का भी खूब विकास किया जिसके अन्तर्गत सम्पूर्ण दिवार को चित्रित कर दिया जाता है।

प्रश्न 12.
काल्विन कौन था? काल्विनवाद के प्रमुख सिद्धान्त व विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर :
जिस प्रकार जर्मनी में धर्म-सुधार का नेतृत्व-भार लूथर ने सँभाला था, उसी प्रकार फ्रांस में काल्विन ने रोमन कैथोलिक धर्म के दोषों को दूर करने के लिए प्रोटेस्टैण्ट धर्म को जन्म दिया। वह धर्म-सुधार का दूसरा और अधिक प्रभावशाली नेता था। जन्म से वह फ्रांसीसी था। उसका जन्म 1509 ई० में हुआ तथा उसने पेरिस और ऑरलेयाँ विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की। वह उच्च विचारों वाला व्यक्ति था और धार्मिक कुरीतियों से उसे घृणा थी। लूथर के विचारों से वह अत्यधिक प्रभावित हुआ तथा 1533 ई० में उसने प्रोटेस्टैण्ट धर्म का अवलम्बन किया, किन्तु फ्रांस के कैथोलिक सम्राट फ्रांसिस के अत्याचारों के कारण अपना देश छोड़कर उसे स्विट्जरलैण्ड में शरण लेने के लिए बाध्य होना। पड़ा। स्विट्जरलैण्ड में धर्म-सुधार ज्विगली के सम्पर्क में आकर उसने प्रोटेस्टैण्ट धर्म का प्रचार करना प्रारम्भ कर दिया। 1536 ई० में उसने एक पुस्तक ‘Institute of the Christian Religion प्रकाशित की, जिसमें प्रोटेस्टैण्ट धर्म का वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया था। इस पुस्तक से काल्विन अत्यधिक प्रसिद्ध हो गया। वह अपने सम्राट फ्रांसिस को भी प्रोटेस्टैण्ट बनाना चाहता था। परन्तु इस कार्य में उसे सफलता प्राप्त न हो सकी। 1538 ई० तक उसने जेनेवा में प्रोटेस्टैण्टों का नेतृत्व किया, किन्तु विरोध के कारण 1539 ई० में उसे जेनेवा छोड़ना पड़ा। उसके जाते ही जेनेवा में पुन: कैथोलिकों का बोलबाला हो गया तथा उन्होंने प्रोटेस्टैण्टों का विनाश करने का प्रयास किया। 1541 ई० में अपने अनुयायियों की सुरक्षा के लिए काल्विन पुनः जेनेवा आया। यहाँ उसने कठोर धर्मतन्त्रात्मक व्यवस्था स्थापित करके शासन सूत्र अपने हाथ में ले लिया। गन्दे नृत्य, गीत, त्योहार व थियेटरों को बन्द करा दिया तथा उसने अन्धविश्वासी कैथोलिकों को मृत्युदण्ड देने में भी संकोच नहीं किया। ‘बाइबिल’ का अनेक भाषाओं में अनुवाद कराया गया जिसके कारण यह ग्रन्थ लोकप्रिय हो सका। अपने धर्म-प्रसार के लिए उसने कई प्रोटेस्टैण्ट विद्यालयों की स्थापना की तथा जेनेवा को प्रोटेस्टैण्ट धर्म का केन्द्र बना दिया। अपने विरोधियों का दमन करने के लिए प्रयास करते थे। काल्विन इतना कट्टर प्रोटेस्टैण्ट था कि उसको ‘प्रोटेस्टैण्ट पोप’ की उपाधि प्रदान की गई। परन्तु काल्विन ने अत्यन्त दृढ़तापूर्वक धर्म-प्रसार का कार्य निरन्तर जारी रखा तथा कुछ काल में ही वह प्रसिद्ध धर्म-सुधारक बन गया। देशी भाषा में धर्म प्रचार करने के कारण उसके अनुयायियों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होने लगी तथा उसके धर्म का प्रभाव इंग्लैण्ड, स्कॉटलैण्ड एवं हॉलैण्ड आदि देशों पर पड़ा। काल्विन द्वारा प्रचारित धर्म शीघ्र ही इन देशों में फैलने लगा। नीदरलैण्ड्स के लोकतन्त्र, लोकतन्त्रवादी उच, स्कॉटलैण्ड के कॉन्वेण्टेटर (Conventator) और इंग्लैण्ड के प्यूरिटन इसी धर्म की देन थी। डचों ने फिलिप के अत्याचारी शासन के विरुद्ध विद्रोह कर डच गणतन्त्र की स्थाना करके ही दम लिया। कॉन्वेण्टेटरों ने चार्ल्स प्रथम के विरोध के बावजूद राष्ट्रीय धर्म की सुरक्षा की तथा प्यूरिटनों ने स्टुअर्ट राजाओं के स्वेच्छाचारी शासन का कड़ा विरोध किया। जेनेवा प्रोटेस्टेण्ट लोगों का शरण-स्थल बन गया तथा अनेक देशों के अत्याचार-पीड़ित प्रोटेस्टैण्ट आकर यहाँ शरण प्राप्त करने लगे। ग्राण्ट (Grant) के अनुसार, “महाद्वीप के एक विशेष भाग में काल्विन के नाम एवं प्रभाव का विस्तार कुछ ही वर्षों में हो गया। उसका आन्दोलन केवल जेनेवा तक ही सीमित न रहा अपितु फ्रांस, इंग्लैण्ड, स्कॉटलैण्ड और नीदरलैण्ड में भी उसका प्रचार हुआ।

काल्विनवाद के प्रमुख सिद्धान्त एवं विशेषताएँ

काल्विन रोमन कैथोलिक धर्म के आडम्बर तथा रूढ़ियों में विश्वास नहीं रखता था। उसका धर्म सरल, सदाचारपूर्ण तथा पवित्र जीवन व्यतीत करना सिखाता था। ‘भाग्यवाद’ उसके धर्म का मूल सिद्धान्त था। पोप एवं पादरियों के भ्रष्ट जीवन का भण्डाफोड़ करके उसने जनता को बताया कि इस प्राचीन धर्म पर चलंकर उन्हें मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता। ईश्वर मनुष्य को स्वर्ग एवं मोक्ष देने वाला है। वह इस संसार का सृजन करता है तथा उसी की इच्छा से मनुष्य का भाग्य निर्मित होता है। ईश्वर की सर्वशक्ति में वह पूर्ण विश्वास रखता था। उसका विचार था कि बिना ईश्वर की कृपा के मोक्ष अथवा स्वर्ग की प्राप्ति नहीं हो सकती। उसके विचार में चर्च राज्य था और राज्य चर्च, अर्थात् राज्य और चर्च में कोई अन्तर नहीं था। राज्य की नागरिकता चर्च की सदस्यता पर निर्भर करती थी। काल्विन प्रजातन्त्रात्मक चर्च का पक्षपाती था। उसका विचार स्था कि चर्च की व्यवस्था जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथ में होनी चाहिए। इस प्रकार वह एक चर्च सरकार स्थापित करने का इच्छुक था। ‘बाइबिल’ में काल्विन को पूर्ण विश्वास था तथा वही उसका प्रमुख धर्म-ग्रन्थ था। ‘बाइबिल’ को ईश्वर की वाणी समझकर काल्विन उसकी पूजा करता था। धर्म में राज्य को हस्तक्षेप काल्विन की दृष्टि से अनुचित था। उसका विश्वास था कि प्रजा को धर्म का अनुसरण करने की पूर्ण स्वतन्त्रता होनी चाहिए। धर्म-प्रचार तथा चर्च को अनुशासित रखने के लिए काल्विन ने चर्च के अधिकारियों की एक समिति बनाई तथा कठोर अनुशासन द्वारा पादरियों के भ्रष्टाचारपूर्ण जीवन को रोककर उन्हें पवित्र जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य किया। काल्विन के धार्मिक सिद्धान्त लूथर के सिद्धान्तों से काफी मिलते-जुलते थे। उसने भाग्यवाद, चर्च के प्रजातन्त्रात्मक संगठन तथा कठोर अनुशासन को धर्म का आधार मानकर धर्म-प्रचार किया तथा उसे भी लूथर के समान काफी सफलता मिली।

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UP Board Solutions for Class 11 History Chapter 4 The Central Islamic Lands

UP Board Solutions for Class 11 History Chapter 4  The Central Islamic Lands (इस्लाम का उदय और विस्तार-लगभग 570 – 1200 ई०)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 History . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 History  Chapter 4 The Central Islamic Lands

पाठ्य – पुस्तक के प्रश्नोत्तर
संक्षेप में उत्तर दीजिए

प्रश्न 1.
सातवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों में बेदुइओं के जीवन की क्या विशेषताएँ थीं?
उत्तर :
बेदुइओं के जीवन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

(i) अनेक अरब कबीले बेदूइन या बद्दू या खानाबदोश होते थे।
(ii) ये अपने खाद्य (खजूर) और अपने ऊँटों के लिए चारे की तलाश में रेगिस्तान के सूखे क्षेत्रों से हरे-भरे क्षेत्रों (नखलिस्तान) की ओर जाते रहते थे।
(iii) इनमें से कुछ नगरों में बस गए और व्यापार करने लगे।
(iv) खलीफा के सैनिकों में ज्यादा बदू ही थे। ये रेगिस्तान के किनारे बसे शिविर शहरों; जैसे कुफा तथा बसरा में रहते थे।

प्रश्न 2.
अब्बासी क्रान्ति’ से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर :
उमय्यदों के विरुद्ध ‘दावा’ नामक एक सुसंगठित आंदोलन हुआ, फलस्वरूप उनका पतन हो गया। सन् 1750 में उनके स्थान पर मक्काई मूल के अन्य परिवार (अब्बासिदों) को स्थापित कर दिया गया। वास्तव में अब्बासिदों ने उमय्यद शासन की जमकर आलोचना की और पैगम्बर द्वारा स्थापित मूल इस्लाम को पुनः बहाल कराने का वादा किया। वे उसमें सफल भी रहे। इसे ही अब्बासी । क्रान्तिं की संज्ञा दी गई है। इस क्रान्ति से राजवंश में परिवर्तन के साथ राजनीतिक संरचना में बहुत परिवर्तन हुआ।

प्रश्न 3.
अरबों, ईरानियों व तुर्को द्वारा स्थापित राज्यों की बहुसंस्कृतियों के उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
अरबों, ईरानियों और तुर्को द्वारा स्थापित राज्य जातीय पक्षपातरहित थे। ये राज्य किसी एकल राजनीतिक व्यवस्था या किसी संस्कृति की एकल भाषा (अरबी) के बजाय सामान्य अर्थव्यवस्था व संस्कृति के कारण सम्बद्ध रहे। मध्यवर्ती इस्लामी देशों में व्यापारी, विद्वान् तथा कलाकार स्वतन्त्र रूप से आते जाते थे। इस प्रकार विचारों तथा तौर-तरीकों का प्रसार हुआ।

प्रश्न 4.
यूरोप व एशिया पर धर्मयुद्धों का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर :
यूरोप व एशिया पर धर्मयुद्ध का निम्नलिखित प्रभाव पड़ा
(i) मुस्लिम राज्यों ने अपने ईसाई प्रजाननों के प्रति कठोर रवैया अपनाया। विशेष रूप से यह स्थिति युद्धों में देखी गई।
(ii) मुस्लिम सत्ता की बहाली के पश्चात् भी पूर्व तथा पश्चिम के मध्य इटली के व्यापारिक समुदायों का अपेक्षाकृत अधिक प्रभाव था।

संक्षेप में निबन्ध लिखिए।

प्रश्न 5.
रोमन साम्राज्य के वास्तुकलात्मक रूपों से इस्लामी वास्तुकलात्मक रूप किस प्रकार भिन्न थे?
उत्तर :
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रोमन साम्राज्य के महामंदिरों के अनुरूप ही इस्लामी दुनिया में भी धार्मिक इमारतें इस्लामी दुनिया की सबसे बड़ी बहारी प्रतीक थीं। स्पेन से मध्य एशिया तक फैली हुई मस्जिदें, इबादतगाह और मकबरों का मूल्लू डिजाइन समान था। मेहराबें, गुम्बद, मीनार और खुले सहन आदि इमारतें मुसलमानों की आध्यात्मिकता और व्यावहारिक आवश्यकताओं को अभिव्यक्त करती हैं। इस्लाम की प्रथम सदी में, मस्जिद ने एक विशिष्ट वास्तुशिल्पीय रूप (खम्भों के सहारे वाली छत) प्राप्त कर लिया था जो प्रादेशिक विभिन्नताओं से परे था। मस्जिद में एक खुला प्रांगण या सहन होता जहाँ एक फव्वारा या जलाशय बनाया जाता था। यह प्रांगण एक बड़े कमरे की ओर खुलता, जिसमें नमाज पढ़ने वाले लोगों की लम्बी पंक्तियों और नमाज का नेतृत्व करने वाले इमाम के लिए काफी स्थान होता उमय्यदों ने नखलिस्तानों में ‘मरुस्थली महल’ कल्पना कीजिए कि इस पेड़ पर खलीफा विराजमान है। दिए गए चित्र में शान्ति व युद्ध का चित्रण किया गया है। बनाए। उदाहरण के लिए-फिलिस्तीन ने खिरबत-अल-मफजर और जोर्डन में कैसर अमरा जो विलासपूर्ण निवास स्थानों, शिकार और मनोरंजन के लिए विश्रामस्थलों के रूप में प्रयोग किए गए थे। महल रोमन और सासायनियन वास्तुशिल्प के तरीके से बनाए। गए थे। उन्हें चित्रों, प्रतिमाओं और पच्चीकारी से सजाया जाता था। रोम की वास्तुकला अत्यधिक दक्षपूर्ण थी। उनके द्वारा सर्वप्रथम कंकरीट का प्रयोग प्रारम्भ किया गया था। वे पत्थरों व ईंटों को मजबूती से जोड़ सकते थे। रोम के वास्तुकारों ने दो वास्तुशिल्पीय सुधार किए– (i) डाट, (ii) गुम्बद। रोम में इमारतें दो या तीन मंजिलों वाली होती थीं। इनमें डालें (Arches) ठीक एक के ऊपर । मेसोपोटामिया की का प्रयोग कोलोजियम बनाने में किया था। वास्तुकला की परम्पराओं से प्रेरित यह कई शताब्दियों तक दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिद थी। डाटों का प्रयोग नहर बनाने के लिए भी किया जाता था। रोम के प्रसिद्ध मंदिर पैन्थियन में । औंधे कटोरे की तरह गुम्बद छत थी। यहाँ रोम वास्तुकला के कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं
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प्रश्न 6.
रास्ते पर पड़ने वाले नगरों का उल्लेख करते हुए समरकन्द से दमिश्क तक की यात्रा का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
समरकन्द से दमस्कस के मार्ग पर मर्व खुरसाम, निशापुर दायलाम, इसफाइन, समारा, बगदाद, कुफा, कुसायुर, अमरा, जेरूसलम आदि शहर स्थित हैं। व्यापारी या यात्री दो रास्तों लाल सागर और फारस की खाड़ी से होकर जाते थे। लम्बी दूरी के व्यापार के लिए उपयुक्त और उच्च मूल्य वाली वस्तुओं; यथा-मसालों, कपड़ों, चीनी मिट्टी की वस्तुओं और बारूद को भारत और चीन से लाल सागर के अदन और ऐधाव तक और फारस की खाड़ी के पत्तन सिराफ और बसरा तक जहाज पर लाया जाता था। वहाँ से माल को जमीन पर ऊँटों के काफिलों द्वारा बगदाद, दमिश्क और समरकन्द तक भेजा जाता था।
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परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
इस्लाम धर्म निम्नलिखित में से किसने चलाया था?
(क) मुहम्मद साहब ने
(ख) अब्राहम ने (ग) इस्माइल ने
(घ) खलीफा उमर ने
उत्तर :
(क) मुहम्मद साहब ने

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन-सा इस्लाम धर्म का पवित्र ग्रन्थ है?
(क) कुरान शरीफ
(ख) हदीस
(ग) एन्जील
(घ) ओल्ड टेस्टामेण्ट
उत्तर :
(क) कुरान शरीफ

प्रश्न 3.
अरब में मुस्लिम साम्राज्य के संस्थापक कौन थे?
(क) खलीफा अबू बकर
(ख) खलीफा उमर
(ग) पैगम्बर मुहम्मद
(घ) खलीफा अली
उत्तर :
(ख) खलीफा उमर

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन-सा नगर धर्मनिष्ठ खलीफाओं की राजधानी था?
(क) मक्का
(ख) मदीना
(ग) बगदाद
(घ) कुफा
उत्तर :
(ख) मदीना

प्रश्न 5.
अब्बासी खलीफाओं की राजधानी कौन-सा नगर था? 
(क) जेरूसलम
(ख) बगदाद
(ग) मक्का
(घ) बसरा
उत्तर :
(ख) बगदाद

प्रश्न 6.
मुहम्मद साहब का जन्म कब हुआ था?
(क) 540 ई० में
(ख) 560 ई० में
(ग) 570 ई० में
(घ) 575 ई० में
उत्तर :
(ग) 570 ई० में

प्रश्न 7.
अब्बासी खलीफाओं में सबसे अधिक प्रसिद्ध है
(क) अल मंसूर
(ख) हारून-अल-रशीद
(ग) अल बाथिक
(घ) अल मामून
उत्तर :
(ख) हारून-अल-रशीद

प्रश्न 8.
‘शाहनामा’ का लेखक कौन था?
(क) शेख सादी
(ख) अल राजी
(ग) उमर खय्याम
(घ) फिरदौसी
उत्तर :
(घ) फिरदौसी।

प्रश्न 9.
‘चट्टान को गुम्बद कहाँ पर स्थित है?

(क) बसरा
(ख) दमिश्क
(ग) जेरूसलम
(घ) बगदाद
उत्तर :
(ग) जेरूसलेम

प्रश्न 10.
अरब का प्रसिद्ध संगीतकार कौन था?
(क) अल रेहान
(ख) फिरदौसी
(ग) गजाली
(घ) अल अगानी
उत्तर :
(ग) गजाली

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अरब प्रायद्वीप में कौन-कौन से देश सम्मिलित हैं?
उत्तर :
अरब प्रायद्वीप में टर्की, मिस्र, सीरिया, इराक, ओमान, बहरीन, ईरान आदि देश सम्मिलित हैं।

प्रश्न 2.
अरब के मुस्लिम पंचांग का निर्माण किसने किया था?
उत्तर :
अरब के मुस्लिम पंचांग का निर्माण उमर खैयाम ने किया था।

प्रश्न 3.
रसायनशास्त्र में अरब निवासी क्या-क्या बनाना जानते थे?
उत्तर :
अरब निवासी रसायनशास्त्र में चॉदी का घोल, पोटाश, शोरे एवं गन्धक का तेजाब तथा इत्र आदि बनाना जानते थे।

प्रश्न 4.
इस्लाम धर्म के प्रवर्तक कौन थे?
उत्तर :
इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद साहब थे।

प्रश्न 5.
इस्लाम धर्म की पवित्र पुस्तक का नाम लिखिए।
उत्तर :
इस्लाम धर्म की पवित्र पुस्तक ‘कुरान शरीफ’ है।

प्रश्न 6.
मुहम्मद साहब का जन्म कब तथा किस नगर में हुआ था?
उत्तर :
मुहम्मद साहब का जन्म 570 ई० में अरब देश के मक्का नगर में हुआ था?

प्रश्न 7.
अब्बासी खलीफाओं की राजनधानी कहाँ स्थित थी?
उत्तर :
मध्यकाल में अब्बासी ख़लीफाओं की राजधानी बगदाद में स्थित थी। यह स्थान वर्तमान इराक की राजधानी है।

प्रश्न 8.
मध्यकाल में बगदाद क्यों प्रसिद्ध था?
उत्तर :
मध्यकाल में बगदाद अब्बासी खलीफाओं के वैभव और अरब सभ्यता व संस्कृति तथा व्यापार का प्रमुख केन्द्र होने के कारण प्रसिद्ध था।

प्रश्न 9.
फिरदौसी ने कौन-सी पुस्तक लिखी?
उत्तर :
फिरदौसी ने ‘शाहनामा’ नामक पुस्तक लिखी थी।

प्रश्न 10.
उमर खय्याम क्यों प्रसिद्ध है?
उत्तर :
उमर खय्याम अपनी रूबाइयों के लिए प्रसिद्ध है।

प्रश्न 11.
जेरूसलम कहाँ पर स्थित है और क्यों प्रसिद्ध है?
उत्तर :
जेरूसलम पश्चिमी एशिया (इजराइल राष्ट्र) में स्थित एक धार्मिक नगर है। यह इस्लाम, यहूदी और ईसाई धर्मों का संगम-स्थल व पवित्र तीर्थस्थान तथा ओमर मस्जिद के लिए विश्वप्रसिद्ध है।

प्रश्न 12.
अरबों ने लेखन-कला की किस शैली का आविष्कार किया?
उत्तर :
अरबों ने लेखन-कला की ‘खुशवती’ शैली का आविष्कार किया।

प्रश्न 13.
अलबरूनी ने कौन-सी पुस्तक लिखी थी?
उत्तर :
अलबरूनी ने तहकीके हिन्द’ नामक पुस्तक लिखी थी।

प्रश्न 14.
खिलाफत का क्या अर्थ है?
उत्तर :
मुहम्मद साहब के निधन के बाद इस्लाम के प्रचार व प्रसार का कार्यभार (पद) “खिलाफत कहलाया, जिसका तेतृत्व अबू बकर, उमर, उस्मान तथा अली नामक खलीफाओं ने किया।

प्रश्न 15.
अब्बासी खलीफाओं में सबसे अधिक प्रसिद्ध खलीफा का नाम लिखिए।
उत्तर :
अब्बासी खलीफाओं में सबसे अधिक प्रसिद्ध खलीफा हारून-अल-रशीद था।

प्रश्न 16.
हिजरी सम्वत् कब प्रारम्भ हुआ?
उत्तर :
हिजरी सम्वत् 622 ई० से प्रारम्भ हुआ।

प्रश्न 17.
इस्लाम धर्म ने विश्व की सभ्यता पर क्या प्रभाव डाला?
उत्तर :
इस्लाम धर्म ने विश्व की सभ्यता को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया। कला और धर्म के क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

प्रश्न 18.
‘कीमियागिरी क्या थी? यह कला विलुप्त क्यों हो गई?
उत्तर :
रासायनिक प्रक्रिया द्वारा लोहे या किसी अन्य धातु से स्वर्ण (सोना) बनाने की कला को ‘कीमियागिरी’ कहते थे। वंशानुगत होने के कारण यह कला शीघ्र ही विलुप्त हो गई।

प्रश्न 19.
काबा का क्या महत्त्व था?
उत्तर :
मुहम्मद के कबीले कुरैश का जिस मस्जिद पर नियन्त्रण था, उसे काबा कहा जाता था। यह मस्जिद मक्का में थी। सभी लोग इस जगह को पवित्र मानते थे।

प्रश्न 20.
हिजरी वर्ष की क्या विशेषता है?
उत्तर :
हिजरी वर्ष चन्द्रवर्ष होता है जिसमें 354 दिन अर्थात् 29 या 30 दिनों के 12 महीने होते हैं। प्रत्येक दिन सूर्यास्त के समय शुरू होता है।

प्रश्न 21.
प्रथम चार खलीफाओं के नाम लिखिए।
उत्तर :

  1. अबू बकर,
  2.  उमर,
  3.  उस्मान तथा
  4. अली

प्रश्न 22.
अली के काल में इस्लाम जगत में क्या परिवर्तन आया?
उत्तर :
इस्लाम के चौथे खलीफा अली के शासनकाल में मुसलमान दो सम्प्रदायों-शिक्षा और सुन्नी में विभाजित हो गया।

प्रश्न 23.
अरब में राजतन्त्र की स्थापना किसने और कब की?
उत्तर :
मुआविया ने स्वयं को पाँचवाँ खलीफा घोषित कर उमय्यद वंश की स्थापना की। वह राजतन्त्र का समर्थक था। राजतन्त्र की स्थापना 661 ई० में हुई।

प्रश्न 24.
फातिमिद कौन था?
उत्तर :
फातिमिद शिया सम्प्रदाय से सम्बद्ध था और स्वयं को मुहम्मद की पुत्री फातिमा का वंशज मानता था। 969 ई० में उसने मिस्र को जीतकर फातिमिद खिलाफत की स्थापना की और काहिरा को अपनी राजधानी बनाया।

प्रश्न 25.
धर्मयुद्ध से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर :
जेरूसलम और फिलिस्तीन के अधिकार के प्रश्न पर मुसलमानों और ईसाइयों में दो शताब्दियों (1096-1291) तक युद्ध हुए थे, उन्हें धर्मयुद्ध कहा जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बगदाद कहाँ है और क्यों प्रसिद्ध है?
उत्तर :
बगदाद, अरब प्रायद्वीप के देश इराक की राजधानी है। मध्यकाल में यह नगर अब्बासी खलीफाओं की राजधानी था। बगदाद; अरब सभ्यता एवं संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र तथा व्यापार का भी प्रमुख केन्द्र होने के कारण प्रसिद्ध है।

प्रश्न 2.
अरब निवासियों के प्रमुख उद्योग कौन-कौन से हैं?
उत्तर :
अरब निवासी कृषि योग्य भूमि से वंचित थे; अतः उन्होंने अनेक उद्योग-धन्धे अपना रखे थे। वे कपास से सुन्दर वस्त्र, कालीन, गलीचे आदि बनाते थे। इत्र, अर्क और शर्बत बनाने में वे विशेषकुशल थे। दमिश्क की मलमल, तलवारें एवं युद्ध का सामान, मिट्टी के बर्तन तथा खिलौने, काँच का सामान आदि उस समय सारे संसार में प्रसिद्ध थे। अरब निवासी इनका बड़ी मात्रा में व्यापार किया करते थे।

प्रश्न 3.
मक्का और मदीना क्यों प्रसिद्ध हैं?
उत्तर :
मक्का और मदीना सऊदी अरब के प्रमुख नगर हैं। मक्का में इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद साहब का जन्म हुआ था। हजरत मुहम्मद साहब ने इस्लाम धर्म चलाया था। मदीना में मुहम्मद साहब ने हिजरत की थी। मक्का मुसलमानों का प्रमुख तीर्थस्थल है। प्रतिवर्ष लाखों मुसलमान यहाँ हज करने के लिए आते हैं। ये दोनों नगर इस्लाम धर्म के पवित्र स्थल होने के कारण प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न 4.
विज्ञान के क्षेत्र में अरब निवासियों ने भारत एवं यूनान से क्या-क्या सीखा?
उत्तर :
अरब निवासियों ने विज्ञान के क्षेत्र में भारत और यूनान से बहुत-कुछ सीखा। यूनान से गणित और ज्यामिति का ज्ञान लेकर अरबों ने गोलाकार त्रिकोणमिति की खोज की। भौतिक विज्ञान में उन्होंने पेण्डुलम की खोज की और प्रकाश के सम्बन्ध में अनेक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले। अरबों ने भारतीयों से आयुर्वेद का ज्ञान भी प्राप्त किया और यूनानी पद्धति अपनाकर यूनानी चिकित्सा की परम्परा प्रारम्भ की।

प्रश्न 5.
विज्ञान के क्षेत्र में अरबों की उपलब्धियों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
विज्ञान के क्षेत्र में अरबों की उपलब्धियाँ निम्नलिखित थीं

  1.  अरबों के द्वारा गोलाकार त्रिकोणमिति और अंक प्रणाली की खोज की गई थी। यूरोपवासियों ने अरबों से ही अंक प्रणाली को सीखा था।
  2.  अरब वैज्ञानिकों ने ही सर्वप्रथम यह खोज की थी कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती हुई स्वयं की परिक्रमा करती है।
  3.  अरबों द्वारा अनुसन्धान हेतु अनेक प्रयोगशालाओं की स्थापना की गई थी।
  4.  खगोलशास्त्र के क्षेत्र में उन्होंने अनेक वेधशालाओं का निर्माण किया और नए नक्षत्रों का पता लगाया।
  5. भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में पेण्डुलम की खोज उनके द्वारा ही की गई थी। उन्होंने प्रकाश विज्ञान पर अनेक महत्त्वपूर्ण पुस्तकों की रचना की थी।
  6.  वे चिकित्सा के क्षेत्र में भी बहुत पारंगत थे और शिल्प-क्रिया से भली-भाँति परिचित थे।

प्रश्न 6.
कबीले की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर :
कबीले की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

  1. कबीले रक्त सम्बन्धों पर संगठित समाज होते थे।
  2.  अरब कबीले वंशों से बने हुए होते थे अथवा बड़े परिवारों के समूह होते थे, परन्तु बन्द समाज नहीं थे।
  3. गैर-अरब व्यक्ति कबीलों के प्रमुखों के संरक्षण में सदस्य बन जाते थे।
  4.  गैर-रिश्तेदार वंशों को तैयार किए गए वंशक्रम के आधार पर विलय किया जाता था।

प्रश्न 7.
इस्लाम धर्म के उदय होने से पूर्व अरब लोगों के जीवन की मुख्य विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर :
इस्लाम धर्म से पूर्व अरब लोगों के जीवन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. इस्लाम से पूर्व अरब लोग अनेक छोटे-छोटे कबीलों में बँटे हुए थे।
  2. कबीले परस्पर छोटी-छोटी बातों पर लड़ते रहते थे।
  3. अरब समाज के लोग अनेक अन्धविश्वासों के शिकार थे।
  4. इस समय अरब के लोग अनेक देवी-देवताओं में विश्वास करते थे और मूर्तिपूजा किया करते
  5.  इस समय अरब के लोगों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन था। कालान्तर में व्यापार भी इनकी जीविका का मुख्य साधन बन गया।

प्रश्न 8.
अब्द-थल-मलिक के प्रमुख कार्य लिखिए।
उत्तर :
अब्द-थल-मलिक के प्रमुख कार्य निम्नलिखित थे

  1. उमय्यदवंशीय अब्द-थल-मलिक ने अरबी को प्रशासन की भाषा के रूप में अपनाया और सिक्के जारी किए।
  2.  सिक्कों पर रोमन और ईरानी की नकल समाप्त करके अरबी भाषा में लेख अंकित कराए।
  3.  उसने जेरूसलम में चट्टान के गुम्बद का निर्माण करवाया और अरब-इस्लामी पहचान में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

प्रश्न 9.
इस्लाम धर्म के प्रमुख सिद्धान्त लिखिए।
उत्तर :
इस्लाम धर्म के प्रमुख सिद्धान्त

  1. अल्लाह एक और निराकार-इस्लाम धर्म एक अल्लाह और उसके निराकार स्वरूप के सिद्धान्त को मानता है। उसके अनुसार अल्लाह सर्वज्ञ, सर्वोच्च और निराकार है।
  2. कर्मवाद में विश्वास-इस्लाम धर्म, कर्म के सिद्धान्त का पोषक है। उसके अनुसार कर्मों से ही मनुष्य को जन्नत (स्वर्ग) या नरक (दोजख) प्राप्त होता है। न्याय-दिवस (कयामत) पर जीवों के कर्मों के लेखे-जोखे के आधार पर ही प्रत्येक जीव को उसके कर्मों का फल मिलता है।
  3.  पाँच कर्म सिद्धान्त-इस्लाम धर्म के पाँच कर्म-सिद्धान्त अग्र प्रकार हैं

(क) कलमा : ह इस्लाम धर्म का मूल मन्त्र है, जिसके अनुसार अल्लाह एक है, उसके अतिरिक्त कोई नहीं है और मुहम्मद साहब उसके पैगम्बर हैं।
(ख) रोजा-ईस्लाम धर्म मानता है कि रमजान के पवित्र महीनों में प्रत्येक मुसलमान को प्रातः से सूर्यास्त तक रोजा (व्रत) रखना चाहिए।
(ग) नमाज-प्रत्येक सच्चे मुसलमान को प्रतिदिन पाँच बार नमाज पढ़नी चाहिए।
(घ) जकात–प्रत्येक इस्लाम के अनुयायी को अपनी आय में से एक निश्चित राशि स्वेच्छा से गरीबों में दान देनी चाहिए। दान देना पुण्य का काम है।
(ङ) हज–प्रत्येक मुसलमान को अपने जीवनकाल में एक बार मक्का की तीर्थयात्रा (हज) पर अवश्य जाना चाहिए।

प्रश्न 10.
सामाजिक एकता स्थापित करने के लिए मुहम्मद साहब ने कौन-से नियम बनाए थे?
उत्तर :
मुसलमानों में एकता की भावना का विकास करने के उद्देश्य से मुहम्मद साहब द्वारा निम्नलिखित नियम बनाए गए थे1. इज्मा-सभी मुसलमानों को प्रत्येक क्षण, प्रत्येक स्थान पर, प्रत्येक परिस्थिति में इस्लाम के | सिद्धान्तों पर एकमत रहना चाहिए। 2. सुन्ना-इस्लाम धर्म में निर्धारित कार्यों को आदर्श मानकर उनका पालन करना चाहिए। 3. कयास-इस्लाम धर्म पर आधारित मुहम्मद साहब के उपदेशो के अर्थ एवं भाव को समझकर उन उपदेशों का यथावते पालन करना चाहिए।

प्रश्न 11.
इस्लामी राज्यों में कृषि की उन्नति हेतु क्या प्रसास किए गए?
उत्तर :
इस्लामी राज्यों में कृषि की उन्नति हेतु निम्नलिखित उपाय किए गए

  1.  अनेक क्षेत्रों में विशेषकर नील घाटी, में राज्य ने सिंचाई प्रणालियों, बाँधों और नहरों के निर्माण, कुओं की खुदाई की व्यवस्था कराई।
  2. पानी उठाने के लिए पनचक्कियों की व्यवस्था की गई।
  3. इस्लामी कानून के अन्तर्गत उन लोगों को कर में छूट दी गई जो जमीन को पहली बार खेती के काम में लाते थे।
  4.  अनेक नई फसलों; यथा-कपास, सन्तरा, केला, तरबूज, पालक और बैंगन की खेती की गई और यूरोप को उनका निर्यात किया गया।

प्रश्न 12.
उलेमा कौन थे और उनका क्या कार्य था?
उत्तर :
उमेला धार्मिक विद्वान थे। ये कुरान से प्राप्त ज्ञान (इल्म) पैगम्बर को आदर्श व्यवहार (सुन्ना) का मार्गदर्शन करते थे। मध्यकाल में उलेमा अपना समय कुरान पर टीका (तफसीर) लिखने और मुहम्मद की प्रामाणिक उक्तियों और कार्यों को लेखबद्ध करने में लगाते थे। कुछ उलेमाओं ने कर्मकाण्डों (इबादत) के माध्यम से ईश्वर के साथ मुसलमानों के सम्बन्ध को नियन्त्रित करने और सामाजिक कार्यों (मुआमलात) के लिए शेष इनसानों के साथ मुसलमानों के सम्बन्धों को नियन्त्रित करने के लिए कानून तैयार करने का कार्य किया।

प्रश्न 13.
भारत में इस्लाम का प्रसार किस प्रकार हुआ?
उत्तर :
इस्लाम के इतिहास में वालिद प्रथम का शासनकाल खिलाफत के विस्तार के लिए विख्यात है। इसी के शासनकाल में 711 ई० में बसरा के गवर्नर हेज्जाज और उसके दामाद मुहम्मद इब्न-उल कासिम ने दक्षिणी भारत और बलूचिस्तान से सिन्ध पर आक्रमण किया। इसके पूर्व मुहम्मद बिन कासिम ने 710 ई० में 6000 सीरियाई सैनिकों की सेना लेकर मकराने पर कब्जा जमा लिया। यहीं से इसने बलूचिस्तान होते हुए 711-712 ई० में सिन्धु की निचली घाटी और सिन्धु नदी के मुहाने की भूमि पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। वहाँ जिन नगरों को जीता गया, उनमें समुद्री बन्दरगाह अल-देबुल और अल-नीरून थे। अल-देबुल में चालीस घन फुट वाली एक बुद्ध की प्रतिमा स्थापित थी। मुहम्मद बिन कासिम की यह विजय उत्तर में दक्षिणी पंजाब स्थित मुल्तान तक की गई, जहाँ गौतम बुद्ध का पवित्र तीर्थस्थल है। इस विजय से दक्षिणी पाकिस्तान के सिन्ध पर इस्लाम का स्थायी प्रभुत्व स्थापित हो गया तथा शेष भारत दसवीं शताब्दी के अन्त तक, जबकि महमूद गजनवी ने आक्रमण किया, अप्रभावित रहा। इस तरह सेमेटिक इस्लाम और भारतीय बौद्ध धर्म के बीच उसी प्रकार स्थायी रूप से सम्पर्क स्थापित हो गया, जिस प्रकार उत्तर में इस्लाम का तुर्की संस्कृति के साथ सम्पर्क स्थापित हुआ था। इस प्रकार दक्षिण में सिन्ध और उत्तर में काशगर और ताशकन्द खिलाफत की सुदूरपूर्वी सीमा बन गई और आगे भी बनी रही।

प्रश्न 14.
धर्मयुद्ध का क्या अर्थ है? इसके क्या कारण थे?
उत्तर :
पवित्र युद्ध या जिहाद उन युद्धों को कहते हैं जो मध्यकाल में फिलिस्तीन को प्राप्त करने के लिए यूरोपीय ईसाइयों ने अरबी मुसलमानों से लड़े। इन युद्धों को धर्मयुद्ध इसलिए कहा जाता है कि यह युद्ध धार्मिक स्थानों को प्राप्त करने के लिए ईसाइयों ने अरबों के विरुद्ध लड़े थे। धर्मयुद्ध के तीन प्रमुख कारण थे

  1. पवित्र प्रदेशों को पुनः प्राप्त करना।
  2. सामन्तों का वीरता प्रदर्शन का शौक।
  3.  लाडौँ तथा चर्च के नेताओं का स्वार्थ।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
इस्लाम धर्म से पूर्व अरब सभ्यता एवं संस्कृति का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
इस्लाम धर्म से पूर्व अरब सभ्यता एवं संस्कृति :
इस्लाम धर्म से पूर्व अरब सभ्यता एवं संस्कृति का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के आधार पर किया जा सकता है

प्राचीन अरब के निवासी :
सर्वप्रथम, अरब में बसने वाले कैल्डियन जाति के लोग थे। उनकी सभ्यता उच्चकोटि की थी। बाद में सेमेटिक जनजातियों ने इनकी सभ्यता के अवशेषों को नष्ट कर दिया। सेमेटिक जाति के लोग स्वयं को कहतान (जोकतन) का वंश मानते थे। उन्हीं का आदिपुरुष यारब था, जिसके नाम पर इस देश का नाम ‘अरब’ पड़ा। यारब कहतानी शासक; महान् विजेता और नगरों के निर्माता थे। उन्होंने यमन व अरब के अन्य क्षेत्रों पर सातवीं शताब्दी तक अपनी प्रभुत्व जमाए रखा। अरब के अन्तिम निवासी ‘इस्माइली’ थे।  इस्माइल महान् यहूदी ‘अब्राहम के अनुयायी थे। इन्हें अरब की महानता का संस्थापक और काबा का निर्माता माना जाता है। इस्लामी युग से पूर्व अरब मेंबसने वाले यही लोग थे।

प्राचीन अरबों का राजनीतिक जीवन  :
प्राचीन अरब के निवासी बद्दू कहलाते थे। उनका प्रत्येक तम्बू ‘एक परिवार’ माना जाता था। अनेक तम्बू एक वंश या ‘कौम’ का प्रतिनिधित्व करते थे। एक सौ । वंश मिलकर एक जनजाति’ या ‘कबीले’ का निर्माण करते थे। अरब का यह युग जाहिलिया युग (अज्ञानता और बर्बरता का काल) कहलाता है।

प्राचीन अरबों का सामाजिक एवं आर्थिक जीवन :
प्राचीन अरबवासी खानाबदोश थे। वे तम्बुओं में रहते थे और भेड़, बकरी तथा ऊँट आदि पशुओं को पालते थे। उनका जीवन संघर्षपूर्ण था। प्रत्येक कबीले का एक सरदार होता था, जिसकी आज्ञा कबीले के सभी लोगों को माननी पड़ती थी। अरबवासियों को आर्थिक जीवन व्यापार और लूटमार पर निर्भर था। दक्षिण अरब के लोग विदेशों से व्यापार करते थे।

प्राचीन अरबों का सांस्कृतिक जीवन :
प्राचीन अरब में शिक्षा की कमी थी, लेकिन अरबवासी अपनी भाषा और कविता के लिए विख्यात थे। इस्लाम-पूर्व अरब के साहित्य का पर्याप्त विकास हो चुका था।  इस्लाम-पूर्व अरब के प्रसिद्ध लेखकों में हकीम लुकमान, अख्तम-इब्न-सैफी, हाजी-इब्न-जर्राह, हिद (अलखस की पुत्री, विदुषी), अल मयदानी (‘मजमा-अल-अमथल का लेखक), अल-मुफद्दाल-अल-दब्बी ( ‘अमथल-अल-अरब’ का लेखक) आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इस युग के प्रमुख कवियों में इमारुल केज, तराफा, हरिथ तथा अन्तारा आदि के नाम प्रसिद्ध हैं।

धार्मिक जीवन : इस्लाम पूर्व अरब और जाहिलिया युग  : मुसलमान-विरोधी बद्दुओं की किसी भी धर्म में आस्था नहीं थी। यहूदियों और ईसाइयों को छोड़कर शेष अरब मूर्तिपूजक थे। अरबवासी अनेक देवी-देवताओं की पूजा किया करते थे। अकेले मक्का में ही 360 मूर्तियाँ थीं। बद्द् अधिकतर मूर्तियों और नक्षत्रों की पूजा करते थे। मक्का में ऊँटों और भेड़ों की बलि दी जाती थी। अरबवासी वृक्षों, कुओं, गुफाओं, पत्थर और वायु आदि प्राकृतिक वस्तुओं को पवित्र मानते और उनकी पूजा भी करते थे। प्राचीन अरबों के प्रमुख देवता अल मानहु (सर्वशक्तिमाने शुक्र), देवी अल-लात, अर-राबा और अल-मानह
(भाग्य की देवी), यागुस (गिद्ध), ओफ (एक बड़ी चिड़िया) आदि थे। मक्का के कुरैशियों (प्राचीन अरब का प्रसिद्ध वंश) का देवता ‘अल-हुनल’ था।

प्रश्न 2.
इस्लाम धर्म के प्रवर्तक कौन थे? इस्लाम धर्म की प्रमुख शिक्षाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
इस्लाम धर्म के प्रवर्तक इस्लाम धर्म के प्रवर्तक मुहम्मद साहब थे। संसार उन्हें पैगम्बर मुहम्मद के नाम से पुकारता है। उनका जन्म 570 ई० में मक्का में हुआ था। उनके पिता का नाम अब्दुल्ला और माता का नाम अमीना था। 25 वर्ष की आयु में उन्होंने खदीजी नामक एक विधवा से विवाह किया। 619 ई० में जब खदीजा की मृत्यु हो गई तब उन्होंने आयशा नामक स्त्री से विवाह किया। उनकी छोटी पुत्री फातिमा ( अज-जोहरा या खूबसूरत), इस्लाम के चौथे खलीफा हजरत अली की पत्नी थी। मुहम्मद साहब प्रारम्भ से ही चिन्तनशील थे। 610 ई० में उन्हें दिव्य सन्देश की प्राप्ति हुई। 40 की आयु में मुहम्मद साहब ने अपने धर्म का प्रचार करना आरम्भ कर दिया। अपने विरोधियों से बचने के लिए। मुहम्मद साहब ने ‘मक्का’ छोड़कर ‘मदीना’ की ओर प्रस्थान किया। इस्लाम के इतिहास में इस घटना का बहुत महत्त्व है और इसे “हिजरत’ कहा जाता है। इसी समय (622 ई०) से मुस्लिम पंचांग का पहला वर्ष अर्थात् हिजरी संवत् शुरू होता है। मुहम्मद साहब मदीना के सर्वोच्च शासक बन गए। उन्होंने अपने विरोधियों को परास्त किया और अपने धर्म का सम्पूर्ण अरब में प्रसार किया। 62 वर्ष की आयु में 632 ई० में उनकी मृत्यु हो गई। बाद में उनके अनुयायियों ने सारे संसार में इस्लाम धर्म का प्रचार किया।

इस्लाम धर्म की प्रमुख शिक्षाएँ।

इस्लाम धर्म की प्रमुख शिक्षाएँ निम्नलिखित हैं

  1.  ईश्वर एक है तथा मुहम्मद साहब उसके पैगम्बर हैं।
  2.  सभी मनुष्य एक ही ईश्वर (अल्लाह) की सन्तानें हैं; उनमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए।
  3.  ईश्वर निराकार है और मूर्तिपूजा एक आडम्बर है।
  4. आत्मा अजर और अमर है।
  5. प्रत्येक मुसलमान को अपने धर्म की रक्षा करनी चाहिए।
  6. मादक वस्तुओं, नृत्य, संगीत तथा चित्र-दर्शन आदि से दूर रहना चाहिए।
  7.  इस्लाम धर्म के अनुसार कयामत के दिन अच्छे काम करने वाले को जन्नत (स्वर्ग) तथा बुरे काम करने वाले को दोजख (नरक) में भेज दिया जाएगा।
  8.  इस धर्म के अनुसार ब्याज लेना, जुआ खेलना, सुअर का मांस खाना पाप है।
  9.  अल्लाह अपने पैगम्बरों को सच्चा ज्ञान (इल्हाम) स्वयं देता है।
  10.  प्रत्येक मुसलमान के पाँच अनिवार्य कर्तव्य हैं

 

  1.  कलमा पढ़ना
  2.  प्रतिदिन पाँचों समय नमाज अता करना (पढ़ना)
  3.  रमजान के महीने में रोजे रखना
  4. अपनी आय का चौथा भाग खैरात (दान) में देना तथा
  5.  जीवन में एक बार हज (मक्का-मदीना की तीर्थयात्रा) रना।

प्रश्न 3.
अरब सभ्यता और संस्कृति का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :
अरब सभ्यता एवं संस्कृति मध्य युग में अरब सभ्यता का विकास पश्चिमी एशिया में अधिक हुआ, जिसका संक्षिप्त विवेचन निम्नवत् है
1. शासन व्यवस्था :
इस्लाम के प्रमुख नेता को ‘खलीफा’ कहा जाता था। पहले तीन खलीफाओं की राजधानी मदीना नगर था। उसके बाद यह कूफा नगर ले जाई गई, जो आधुनिक दमिश्क में स्थित था। अब्बासी खलीफाओं ने बगदाद को अपनी राजधानी बनाया। तुर्की ने 1453 ई० में पूर्वी रोमन साम्राज्य का अन्त करके कुस्तुनतुनिया को अपनी राजधानी बनाया। आटोमान तुर्को के समय में खलीफा की शक्ति बहुत कम हो गई थी। खलीफाओं ने निरंकुश तथा स्वेच्छाचारी शासक के रूप में अरब पर शासन किया। अब्बासी  खलीफाओं ने जनहित के बहुत-से कार्य किए।

2. सामाजिक जीवन :
अरब साम्राज्य में चार प्रमुख वर्ग थे। प्रथम वर्ग में खलीफा, द्वितीय वर्ग में कुलीन, तृतीय वर्ग में विद्वान, लेखक, व्यापारी आदि सम्मिलित थे तथा चौथे निम्न वर्ग में किसान, दस्तकार तथा दास आते थे। इस समय दास-दासियों की संख्या बहुत अधिक थी। वे खुले बाजार में बेचे और खरीदे जाते थे। अरब समाज में स्त्रियों की दशा शोचनीय थी और उन्हें पर्दे में रहना पड़ता था। इस समय बहुविवाह, तलाक प्रथा और उपपत्नी प्रथा का प्रचलन था। अरब में पुरुष चौड़े पायजामें, कमीज, बड़ी जाकेट, काली पगड़ी, अंगरखा आदि वस्त्र पहनते थे। स्त्रियाँ रंग-बिरंगे सुन्दर वस्त्र धारण करती थीं। निम्न वर्ग में बुर्का (पूरे शरीर को ढकने वाला चोगा) पहनने की प्रथा थी। अरब लोग विभिन्न प्रकार के भोजन तथा पेयोंः जैसे—बनफशा, फालूदा, अंगूर की बेटी अर्थात् शराब आदि का उपयोग करते थे। शतरंज, चौपड़, पासे, चौगाने, पत्तेबाजी, घुड़दौड़, शिकार आदि उनके मनोरंजन के प्रमुख साधन थे।

3. आर्थिक जीवन :
अरबों का प्रमुख व्यवसाय कृषि और युद्ध करना था। अरब के लोग गेहूँ, चावल, खजूर, कपास, पटुआ, मूंगफली, नारंगी, ईख, गुलाब, तरबूज आदि की खेती करते थे। अरब में कम्बल, कढ़े वस्त्र, सिल्क, सूती व ऊनी वस्त्र, किमखाब, फर्नीचर, काँच के बर्तन, कागज आदि निर्माण के उद्योग-धन्धे प्रचलित थे। अरब कारीगर सोने-चाँदी व कीमती पत्थरों, जवाहरातों से जड़े सुन्दर व कलात्मक आभूषण बनाने में दक्ष थे। इस काल में अरब के भारत, चीन तथा अफ्रीका के देशों से व्यापारिक सम्बन्ध थे। बगदाद, बसरा, काहिरा,  सिकन्दरिया मध्य युग के प्रमुख बन्दरगाह और व्यापारिक केन्द्र थे। मध्य युग में अरब के गलीचे, चमड़े की वस्तुएँ, सुन्दर तलवारें, धातु व काँच के बर्तन सारे संसार में विख्यात थे।

4. सांस्कृतिक जीवन :
इस्लामी अरब में शिक्षा का भी पर्याप्त विकास हुआ। अरब में पहला विद्यालय अबू हातिम ने 860 ई० में स्थापित किया। उस समय शिक्षा मस्जिदों और मदरसों में दी जाती थी। अद्द-अल-दौला ने शिराजी नगर में पहला पुस्तकालय बनवाया। उस समय बगदाद शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था। वहाँ एक सौ से अधिक पुस्तक-विक्रेता थे। खलीफा मामून | ने बगदाद में एक उच्च शिक्षा का केन्द्र ‘बैत-अल-हिकमत’ स्थापित करवाया था। 1065-1067 ई० की अवधि में निजाम-उल-मुल्क ने अरब में ‘निजामिया मदरसे’ की स्थापना की थी। इससमय कुरान, हदीस, कानून, धर्मतन्त्र (कलाम), अरबी भाषा और साहित्य, ललित, साहित्य (अदब), गणित आदि की शिक्षा दी जाती थी। अरबों ने लिखने की एक अलंकृत शैली ‘खुशवती’ का आविष्कार किया था।

5. साहित्य :
उस समय के अरब साहित्यकारों में हमदानी (976-1008 ई०, ‘मकाना’ नाटक का लेखक), थालिवी (961-967 ई०), अगानी (गीतिकार), जहशियारी (‘आलिफ-लैला’ का पहला लेखक, 942 ई०), नवास (व्यंग्यकार, गजलों का लेखक), अबू हम्माम, अल बहुतरी (820-897 ई०), उमर खय्याम (रूबाइयों का रचयिता) जैसे महान् कवि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। मध्यकालीन अरब साहित्य में ‘खलीफा हारून-अल-रशीद की कहानियाँ’, ‘उमर खय्याम की रूबाइयाँ’, ‘आलिफ-लैला’ की कहानी और ‘फिरादौसी का शाहनामा’ आज भी सारे संसार में प्रसिद्ध हैं।

6. चिकित्सा :
अरबों ने कई महान् चिकित्सक उत्पन्न किए, जिनमें जिबरील (नेत्र विज्ञान की पुस्तक ‘अल-लाइन’ का लेखक), अलराजी (865-925 ई०, तेहरान निवासी, ‘किताब-उल- असरार’ का लेखक), यूरोप में रहैजेस नाम से विख्यात, चेचक के इलाज का आविष्कारक), अली-अब्बास (‘अल-किताब अल मालिकी’ का लेखक, रोगियों के आहार व मलेरिया की चिकित्सा का अन्वेषक), इब्नसिना (950-1037 ई०, यूरोप में एविसेन्ना नाम से प्रसिद्ध, ‘अलशेख अल-रईस’ की उपाधि, 33 गंन्थों का रचयिता, महान चिकित्सक, क्षय रोग का अन्वेषक, दार्शनिक, भाषाशास्त्री, कवि, प्रमुख पुस्तक ‘किताब-उल-शिफा’) तथा याकूब (पशु चिकित्सक) आज भी सम्पूर्ण-जगत में विख्यात

7. खगोल विद्या और गणित :
अरब ने खगोल विद्या और गणित के क्षेत्र में भी विशेष उन्नति की। अरब खगोलशास्त्रियों ने अबू अहमद, अलबरूनी (973-1048 ई०, ‘हयाहब-अल-न जूम’ का लेखक) तथा उमर खय्याम (1048-1124 ई०, पंचांग का निर्माता) विशेष प्रसिद्ध हैं। मध्यकालीन अरब का विख्यात ज्योतिषी बल्ख का मूल निवासी अबू माशार था, जिसने ज्योतिष सम्बन्धी अनेक पुस्तकें लिखी थीं।

8. कलाओं में प्रगति :
अरब लोगों ने अनेक मस्जिदों व मदरसों का निर्माण करवाया। गजबान ने 838 ई० में बसरा में पहली बार मस्जिद बनवाई। जेरूसलम ने चट्टान का गुम्बद, अक्सा मस्जिद (निर्माता अल-मलिक), दमिश्क में उमय्यद मीनार मस्जिद (705 ई० निर्माता अल वालिद), हरा गुम्बद (निर्माता खलीफा मंसूर) आदि अरब स्थापत्य कला के सुन्दर नमूने हैं। अब्बासी खलीफाओं ने अनेक राजमहलों और भवनों का निर्माण करवाया। बगदाद में बने शाही महल उस समय के अरब वैभव की जानकारी देते हैं। अरब में चित्रकला का भी विकास हुआ। उम्मैद तथा अब्बासी खलीफाओं द्वारा शहरी महलों की दीवारों पर कराई गई चित्रकारी दर्शनीय है। शाही गुम्बद पर घुड़सवार की आकृति (खलीफा मंसूर), शेरों, गरुड़ पक्षियों और समुद्री मछलियों के चित्र (खलीफा अमीन), कैसर आमरा के महल की दीवारों पर महिलाओं तथा शिकार के दृश्यों के चित्र आदि अरब चित्रकला के उत्कृष्ट नमूने हैं। इस युग में प्रमुख चित्रकार अल हरीरी और अल-अल-अगानी थे। अल रेहानी इस समय का विख्यात सुलेखनकार था, जिसने ‘मुकलाह’ की रचना की थी। अरब संगीतकारों में इब्राहीम (खलीफा हारून-अल-रशीद का भाई), गजाली (‘अहिया-अल-उलम’ गजलों का संग्रह), खलीफा अल महदी (सियास या संगीत की पुस्तक), खलीफा अल बाथिक (वीणावादक) के नाम प्रमुख हैं। इस काल में सितार या गिटार तथा उरुयान (आर्गन) प्रमुख वाद्य यन्त्र थे। अल फराबी ने किताब उल मुसीफी अल कबीर’ तथा अल गजाली ने ‘अल समां’ नामक संगीत की पुस्तकें लिखी थीं।।

प्रश्न 4.
कागज की उपलब्धता ने इस्लामिक इतिहास को किस प्रकार संजोया? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर :
कागज के आविष्कार के पश्चात् मध्य इस्लामिक भूमि में लिखित रचनाओं को बड़े पैमाने पर प्रसार होने लगा। कागज जो लिनन से बनता था, चीन में कागज बनाने की प्रक्रिया को अत्यन्त गुप्त रखा गया था। समरकन्द के मुस्लिम शासकों ने सन् 750 में 20,000 चीनी हमलावरों को बन्दी बना लिया। इनमें से कुछ कागज बनाने में बहुत कुशल थे। अगली एक सदी के लिए, समरकन्द का कागज निर्यात की एक महत्त्वपूर्ण वस्तु बन गया। इस्लाम एकाधिकार का निषेध करता है; अतः कागज इस्लामी दुनिया के शेष भागों में बनाया जाने लगा। दसवीं सदी के मध्य तक इसने पैपाइरस का स्थान ले लिया। कागज की माँग बढ़ गई। बगदाद का एक डॉक्टर अब्द-अल-लतीफ जो 1193 से 1207 तक मिस्र का निवासी था, लिखता है कि मिस्र के किसानों ने ममियों के ऊपर लपेटे गए लिनन से बने हुए आवरण प्राप्त करने के लिए किस तरह कब्रों को लूटा था जिससे वे यह लिनन कागज के कारखानों को बेच सकें। कागज की उपलब्धता के कारण सभी प्रकार के वाणिज्यिक एवं वैयक्तिक दस्तावेजों को लिखना भी सरल हो गया। सन् 1896 में फुस्ताल में बेन एजरा के यहुदी प्रार्थना भवन के एक सीलबन्द कमरे गेनिजा में मध्यकाल के यहूदी दस्तावेजों का एक विशाल भण्डार प्राप्त हुआ। ये सभी दस्तावेज इस यहूदी प्रथा के कारण सुरक्षित रख गए थे कि ऐसी किसी भी लिखित रचना को नष्ट नहीं किया जाना चाहिए जिसमें ईश्वर का नाम लिखा हुआ हो। गेनिजा में लगभग ढाई लाख पांडुलिपियाँ और उनके टुकड़े थे जिसमें कई आठवीं शताब्दी के मध्यकाल के भी थे। अधिकांश सामग्री दसवीं से तेरहवीं सदी तक की थी अर्थात् फातिमी, अयूबी और प्रारम्भिक मामलुक काल की थी। इनमें व्यापारियों, परिवार के सदस्यों और दोस्तों के बीच लिखे गए पत्र, संविदा, दहेज से जुड़े वादे, बिक्री दस्तावेज, धुलाई के कपड़ों की सूचियाँ और अन्य साधारण वस्तुएँ शामिल थीं।। अधिकांश दस्तावेज यहूदी-अरबी भाषा में लिखे गए थे, जो हिब्रू अक्षरों में लिखी जाने वाली अरबी भाषा का ही रूप था, जिसका उपयोग समूचे मध्यकालीन भूमध्य सागरीय क्षेत्र में यहूदी समुदायों द्वारा साधारण रूप से किया जाता था। गेनिजा दस्तावेज निजी और आर्थिक अनुभवों से भरे हुए हैं और वे भूमध्य सागरीय और इस्लामी संस्कृति की अन्दरूनी जानकारी प्रस्तुत करते हैं। इन दस्तावेजों से यह भी ज्ञात होता है कि मध्यकालीन इस्लामी जगत के व्यापारियों के व्यापारिक कौशल और वाणिज्यिक तकनीक उनके यूरोपीय प्रतिपक्षियों की तुलना में बहुत अधिक उन्नत थीं।

प्रश्न 5.
अरब में दर्शन और इतिहास विषय पर कौन-सी रचनाएँ की गईं? अरबों की विश्व सभ्यता को क्या देन है? 
उत्तर :
अरब दार्शनिकों में अल किन्दी, अल फराबी, इब्नसिना, गजाली, अल-मारी, अलतौहिन्दी के नाम प्रमुख हैं। अरब दर्शन यूनानी दर्शन से प्रभावित था। अरब व यूनान की फिलॉसफी को ‘फलसफा’ कहते थे। अरब में इतिहास-लेखन का भी पर्याप्त विकास हुआ। इस युग के अरब इतिहासकारों में इब्न इशाक (मदीना निवासी, पैगम्बर की जीवनी का पहला लेखक), कृति ‘सिरात रसूल अल्लाह’, अल मुकफा (‘खुदायनामा’ का लेखक), कुतवाह (पहला अरब इतिहासकार, बगदाद निवासी, मृत्यु 889 ई०) कृति ‘किताब उल मारिफ’, अल याकूबी (भूगोलवेत्ता इतिहासकार), अल बालादुरी (‘अल बुल्दान’ तथा ‘अनसाब अल अशरफ’ पुस्तकों का लेखक), अल हकाम (‘फुतुह मित्र’ का लेखक), अल तबरी (838-923 ई०, ‘तारीख अल रसूल’ व अल मुलुक’ का लेखक), अल मसूदी (अरबों का हेरोडोट्स, कृति ‘अल तनवीह’ व ‘अल इशरफ’), अलबरूनी (‘किताब उल हिन्द’ या ‘तहकीके हिन्द’ का लेखक) के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अरब के भूगोलवेत्ताओं में फाह्यान(‘मजम अल बुल्दान’ या ‘भौगोलिक कोष’ का रचयिता), ख्वारिज्मी (‘सूरत अल गर्द’ या ‘पृथ्वी की शक्ल’ का लेखक), अल हमदानी (‘जजीरात अल अरब’ का लेखक) आदि के नाम सारे संसार में प्रसिद्ध हैं। अरबों की देन-अरबों की विश्व सभ्यता को अनेक महत्त्वपूर्ण देन हैं। अरबों ने सर्वप्रथम प्रबुद्ध राजतन्त्र और राष्ट्रीयता की भावना का विकास किया। इस्लाम धर्म का प्रचार तथा प्रसार किया, सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन करने की प्रेरणा दी। संगठित सामाजिक जीवन की नींव डाली। भारत, चीन और अफ्रीका से व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित किए। चीनी, इत्र टिन्चर, कागज, काँच के बर्तन, गलीचे, चमड़े की कलात्मक वस्तुएँ, सुन्दर तलवारें व अन्य हथियार आदि संसार को प्रदान किए। इस्लाम के पवित्र ग्रन्थ कुरान शरीफ’ की रचना की। उन्होंने संसार को अरेबियन नाइट्स (आलिफ लैला की कहानियाँ), गुलिस्तां व बोस्तां (शेख सादी), शाहनामा (फिरदौसी) जैसे ग्रन्थ उपलब्ध कराए और चिकित्सा, दर्शन, खगोलविद्या, ज्योतिष, गणित, बीजगणित, गोलाकार ज्यामिति तथा कीमियागिरी में अनेक उपलब्धियाँ प्राप्त की और उनका ज्ञान संसार को दिया। अरबों ने बगदाद, दमिश्क, काहिरा, जेरूसलम, मक्का व मदीना में अनेक मस्जिदों का निर्माण कराया और चित्रकला तथा संगीत कला का भी पर्याप्त विकास किया।

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UP Board Solutions for Class 11 History Chapter 6 The Three Orders

UP Board Solutions for Class 11 History Chapter 6 The Three Orders (तीन वर्ग)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 11 History . Here we have given UP Board Solutions for Class 11 History  Chapter 6 The Three Orders

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर
संक्षेप में उत्तर दीजिए

प्रश्न 1.
फ्रांस के प्रारम्भिक सामन्ती समाज के दो लक्षणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
फ्रांस के प्रारम्भिक सामन्ती समाज के दो लक्षण निम्नलिखित हैं

  1.  फ्रांस में सामन्तवाद था। कृषक अपने खेतों के साथ-साथ सामन्त के खेतों पर कार्य करते थे। कृषक लॉर्ड को श्रम सेवा प्रदान करते थे और बदले में वे उन्हें सैनिक सुरक्षा देते थे।
  2.  सामन्त और राजाओं के अच्छे सम्बन्ध होते थे। सामन्तों की कई श्रेणियाँ थी; जैसे-ड्यूक या अर्ल, बैरन और नाइट्स।

प्रश्न 2.
जनसंख्या के स्तर में होने वाली लम्बी अवधि के परिवर्तनों ने किस प्रकार यूरोप की अर्थव्यवस्था और समाज को प्रभावित किया?
उत्तर :
जनसंख्या में हो रही निरन्तर वृद्धि ने तत्कालीन यूरोपीय अर्थव्यवस्था को प्रत्येक दृष्टि से प्रभावित किया। यूरोप की जनसंख्या जो 1000 ई० में लगभग 420 लाख थी बढ़कर 1200 ई० में लगभग 620 लाख और 1300 ई० में 730 लाख हो गई। 13वीं सदी तक एक औसत यूरोपीय आठवीं सदी की अपेक्षा 10 वर्ष अधिक लम्बा जीवन जी सकता था। पुरुषों की तुलना में महिलाओं की जीवन अवधि छोटी होती थी। इसका कारणे आहार था। पुरुषों को महिलाओं की तुलना में अच्छा भोजन मिलता था। ग्यारहवीं सदी में जब कृषि का विस्तार हुआ और वह अधिक जनसंख्या का भार सहने में सक्षम हुई तो नगरों में भी वृद्धि होने लगी। नगरों में हाट बाजार, वाणिज्य केन्द्र विकसित हो गए। अर्थव्यवस्था ने गतिशीलता धारण कर ली। लोग आकर नगरों में रहने लगे। कालान्तर में पश्चिम एशिया के साथ व्यापारिक मार्ग स्थापित हो गए।

प्रश्न 3.
नाइट एक अलग वर्ग क्यों बने और उनका पतन कब हुआ?
उत्तर :
नवीं सदी में यूरोप में स्थानीय युद्ध प्रायः होते रहते थे। शौकिया कृषक सैनिक पर्याप्त नहीं थे। और एक कुशल घुड़सवार सेना की आवश्यकता थी। इस आवश्यकता ने ही एक अलग वर्ग ‘नाइट’ को जन्म दिया। लॉर्ड नाइट से जुड़े हुए थे। नाइट अपने लॉर्ड को एक निश्चित राशि प्रदान करता था और युद्ध में उसकी ओर से लड़ने का वचन देता था। 12वीं सदी आते-आते नाइट का पतन हो गया।

प्रश्न 4.
मध्यकालीन मठों का क्या कार्य था?
उत्तर :
मध्यकाल में चर्च के अतिरिक्त धार्मिक गतिविधियों का केन्द्र मठ भी थे। मठ आबादी से दूर स्थापित थे। मठों में भिक्षु रहा करते थे। वे प्रार्थना करते, अध्ययन करते और कृषि का भी कुछ कार्य। करते रहते थे। मठों का मुख्य कार्य धार्मिक प्रचार-प्रसार करना था। मठों ने कला के विकास में भी । योगदान दिया।

संक्षेप में निबन्ध लिखिए

प्रश्न 5.
मध्यकालीन फ्रांस के नगर में एक शिल्पकार के एक दिन के जीवन की कल्पना कीजिए और इसका वर्णन करिए।
उत्तर :
अध्यापक की सहायता से छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 6.
फ्रांस के सर्फ और रोम के दास के जीवन की दशा की तुलना कीजिए।
उत्तर :
फ्रांस के सर्फ और रोम के दास के जीवन की दशा की तुलना

  1.  फ्रांस के सर्फ या कृषि दास को अपने लॉर्ड की जागीर का काम करना होता था। काम करने के दिन निश्चित होते थे। रोम का दास अधिक त्रस्त था। उससे कभी भी कोई-सा भी काम कराया जाता था।
  2. सर्फ प्राय: अपने परिवार के लॉर्ड के यहाँ कार्य करते थे। रोम के दासों के साथ ऐसा नहीं था। उन्हें अन्य स्थानों पर भी काम करना पड़ता था।
  3. सर्फ के पास गुजारे के लिए लॉर्ड का एक भूखण्ड होता था। रोम के दास के पास इस प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं थी।
  4.  सर्फ लॉर्ड की आज्ञा से विवाह कर सकता था किन्तु रोम के दास को विवाह की आज्ञा नहीं थी।
  5.  रोम का दास खरीदा या बेचा जा सकता था किन्तु सर्फ के साथ ऐसा नहीं किया जा सकता था।

परीक्षोपयोगी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मध्यकालीन यूरोप की प्रमुख विशेषता है
(क) सामन्तवाद
(ख) दास प्रथा
(ग) नगरीकरण
(घ) अन्धविश्वास
उत्तर :
(क) सामन्तवाद

प्रश्न 2.
चर्च की सर्वोच्च संता थी
(क) रोम के पोप के पास
(ख) इंग्लैण्ड के सम्राट के पास
(ग) फ्रांस के चर्च के पादरी के पास
(घ) कॉन्स्टेनटाइन के पास
उत्तर :
(क) रोम के पोप के पास

प्रश्न 3.
रोमन साम्राज्य का पतन हुआ
(क) 476 ई० में
(ख) 527 ई० में
(ग) 814 ई० में
(घ) 1453 ई० में
उत्तर :
(क) 476 ई० में

प्रश्न 4.
कजाति का सबसे शक्तिशाली राजा था
(क) जस्टीनियन
(ख) कॉन्स्टेनटाइन
(ग) शार्लमेन
(घ) मैटरनिख
उत्तर :
(ग) शार्लमेन

प्रश्न 5.
गॉथिक शैली का विकास हुआ
(क) चीन में
(ख) जापान में
(ग) इंग्लैण्ड में
(घ) फ्रांस में
उत्तर :
(घ) फ्रांस में

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से कौन-सा वर्ग सर्वाधिक शक्तिशाली था
(क) ईसाई पादरी
(ख) अभिजात वर्ग
(ग) सर्फ
(घ) स्वतन्त्र किसान
उत्तर :
(ख) अभिजात वर्ग

प्रश्न 7.
पोप कहाँ रहता था?
(क) लन्दन
(ख) पेरिस
(ग) रोम
(घ) काहिरा
उत्तर :
(ग) रोम

प्रश्न 8.
भिक्षुणी को निम्नलिखित में से क्या कहते थे?
(क) नन
(ख) नर्स
(ग) श्रेणी
(घ) चॉसक
उत्तर :
(क) नन

प्रश्न 9.
मेनर का नियन्त्रण किस पर होता था?
(क) राज्य पर
(ख) नगरों पर
(ग) ग्रामों पर
(घ) ग्रामीणों पर
उत्तर :
(ग) ग्रामों पर

प्रश्न 10.
आर्थिक संस्था का आधार क्या था?
(क) श्रेणी
(ख) धन
(ग) मेनर
(घ) लॉर्ड
उत्तर :
(क) श्रेणी।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सामन्तवाद का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर :
सामन्तवाद (feudalism) जर्मन के शब्द ‘फ्यूड’ से बना है, जिसका अर्थ ‘एक भूमि का टुकड़ा है।

प्रश्न 2.
मेनर से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
लॉर्ड के घर को ‘मेनर’ कहा जाता था। इसमें उनके घर, उनके निजी खेत, चरागाह और दास होते थे।

प्रश्न 3.
फिफ’ किसे कहते थे?
उत्तर :
लॉर्ड नाइट को खर्चा चलाने के लिए भूमि को एक भाग देता था जिसे ‘फिफ’ कहा जाता था। इसके बदले नाईट लॉर्ड को रक्षा का वचन देते थे।

प्रश्न 4.
टीथे (Tithe) क्या था?
उत्तर :
टीथे एक प्रकार का कर था जिसे चर्च एक वर्ष के अन्तराल में कृषक से उसकी उपज के दसवें भाग के रूप में लेता था।

प्रश्न 5.
सामन्तवाद की परिभाषा दीजिए।
उत्तर :
“सामन्तवाद एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें स्थानीय शासक उन शक्तियों का प्रयोग करते हैं, जो राजा या केन्द्रीय सत्ता को प्राप्त होती हैं।”

प्रश्न 6.
सामन्तवाद की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर-

  1.  जागीर और
  2.  सम्प्रभुता।

प्रश्न 7.
मध्यकालीन सामन्तों की श्रेणियों के नामों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1.  लॉर्ड,
  2. ड्यूक,
  3. बैरन और
  4. नाइट

प्रश्न 8.
सामन्तवाद के दो दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. सामाजिक विषमता तथा
  2.  निम्न वर्ग का शोषण।

प्रश्न 9.
सामन्तवाद के पतन के दो प्रमुख कारण लिखिए।
उत्तर :

  1. राष्ट्रीय राज्यों की स्थापना तथा
  2. बारूद को आविष्कार और प्रयोग।

प्रश्न 10.
मध्यकाल में चर्च की प्रभुसत्ता किसके पास थी?
उत्तर :
मध्यकाल में चर्च की प्रभुसत्ता रोम के पोप के पास थी।

प्रश्न 11.
‘धर्म सुधार आन्दोलन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर :
मध्यकाल में चर्च और पोप के अत्याचारों से असन्तुष्ट होकर मार्टिन लूथर तथा काल्विन जैसे धर्म-सुधारकों ने जो आन्दोलन चलाया, उसे ही ‘धर्म सुधार आन्दोलन’ कहा जाता है। इसी धर्म सुधार आन्दोलन के परिणामस्वरूप प्रोटेस्टेण्ट धर्म की नींव पड़ी थी।

प्रश्न 12.
मध्यकाल की प्रारम्भिक शताब्दियों के काल को ‘अन्धकार का युग क्यों कहा जाता है?
उत्तर :
मध्यकाल की प्रारम्भिक शताब्दियों में सामन्तवाद तथा चर्च की सम्प्रभुता के कारण सभ्यता व संस्कृति के विकास की गति बहुत धीमी हो गई थी। इसीलिए इस काल को ‘अन्धकार का युग’ कहा जाता है।

प्रश्न 13.
मध्य युग में चर्च की सर्वोच्चता के क्या कारण थे?
उत्तर :
मध्य युग में यूरोप की अन्धविश्वासी व अज्ञानी जनता चर्च को सर्वोत्तम सत्ता मानकर उसकी इच्छाओं का पालन करती थी तथा पोप को ईश्वर का प्रतिनिधि मानती थी। फलस्वरूप चर्च को सर्वोच्चता प्राप्त हो गई थी।

प्रश्न 14.
मध्यकाल में धर्मयुद्ध क्यों हुए?
उत्तर :
मध्यकाल में ईसाई तथा इस्लाम धर्म के अनुयायियों के बीच सत्ता संघर्ष ने ही धर्म-युद्धों को जन्म दिया था।

प्रश्न 15.
आज के युग में सामन्तवाद को बुरा क्यों समझा जाता है?
उत्तर :
आज के युग में स्वतन्त्रता और समानता की भावना शक्तिशाली बन चुकी है और मानव द्वारा मानव का शोषण किया जाना अनुचित समझा जाता है। इसी कारण आज सामन्तवाद एक बुरा शब्द बन चुका है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
यूरोप में अभिजात वर्ग की क्या दशा थी?
उत्तर :
यूरोप में अभिजात वर्ग की दशा निम्न प्रकार थी

  1. यूरोप में अभिजात वर्ग राजा के अधीन था जिसका समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान था। वस्तुत: भूमि पर उनका ही अधिकार होता था।
  2. अभिजात वर्ग जागीरदार होता था और दास की रक्षा करता था बदले में वह उसके प्रति निष्ठावान रहता था।
  3. अभिजात वर्ग की एक विशेष स्थिति थी, उसके पास सम्पूर्ण अधिकार होते थे।
  4.  वह अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा सकता था और युद्ध के नेतृत्व का भी उसे अधिकार प्राप्त था।
  5. उसका स्वयं को न्यायालय था। वह अपनी मुद्रा भी प्रचलित कर सकता था।

प्रश्न 2.
मध्यकाल की प्रारम्भिक शताब्दियाँ पश्चिमी यूरोप में ‘अन्धकार युग क्यों कहलाती हैं?
उत्तर :
मध्यकाल की प्रारम्भिक शताब्दियों को पश्चिमी यूरोप में ‘अन्धकार युग’ कहे जाने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

  1.  पोप की निरंकुशता के कारण राजनीति और धर्म के बीच संघर्ष चलता रहता था। इससे लोगों में राष्ट्रीयता की भावना के विकास में बाधा पहुँची।
  2. इस युग में अधिकांश जनसंख्या अशिक्षा व अज्ञानता के अन्धकार में डूबी हुई थी।
  3.  शासन की निरंकुशता के कारण जनता दुःखी थी।
  4.  इस युग में अराजकता व अव्यवस्था की स्थिति बनी रही।

प्रश्न 3.
यूरोप की सामन्तवादी व्यवस्था की क्या विशेषताएँ थीं?
उत्तर :
मध्यकालीन यूरोप की प्रमुख विशेषता सामन्तवादी प्रथा थी। सामन्तवाद के अन्तर्गत राज्य की सम्पूर्ण भूमि पर राजा का अधिकार होता था। राजा राज्य की भूमि को अपने विश्वासपात्र, स्वाभिमानी और कर्तव्यनिष्ठ सामन्तों को दे देता था। ये सामन्त ड्यूक’ या ‘अर्ल’ कहलाते थे। ड्यूक अपनी भूमि का कुछ भाग ‘छोटे लॉ’ को दे देते थे। इन लॉ को ‘बैरन’ भी कहा जाता था। सामन्तवादी प्रथा में निम्नतम श्रेणी में ‘किसान’ आते थे। कृषकों के एक वर्ग को ‘सर्फ’ (कृषि दास) कहा जाता था। इस प्रकार सामन्तवाद में भूमि सम्बन्धी अधिकार वंश-परम्परा पर आधारित थे।

प्रश्न 4.
मठों में भिक्षुओं द्वारा पालन किए जाने वाले मुख्य नियम क्या थे?
उत्तर :
मठों में भिक्षुओं द्वारा पालन किए जाने वाले मुख्य नियम निम्नलिखित थे

  1.  बेनेडेक्टाइन मठों में भिक्षुओं को बोलने की आज्ञा नहीं थी, वे कुछ विशिष्ट अवसरों पर ही बोल सकते थे।
  2.  भिक्षुओं को विनम्रता का व्यवहार अपनाना आवश्यक था।
  3. कोई भिक्षु निजी सम्पत्ति नहीं रख सकता था।
  4. आलस्य आत्मा का शत्रु है। इसलिए भिक्षु और भिक्षुणियों को निश्चित समय में शारीरिक श्रम और निश्चित अवधि में पवित्र पाठ करना होता था।
  5. मठ का निर्माण इस प्रकार किया जाता था कि आवश्यकता की समस्त वस्तुएँ-जल, चक्की, उद्यान, कार्यशाला आदि उसकी सीमा के अन्दर होते थे।

प्रश्न 5.
मध्यकालीन यूरोप में पोप के विशेषाधिकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
मध्य युग में रोम के पोप के निम्नलिखित अधिकार थे

  1. वह किसी भी ईसाई धर्म के अनुयायी राजा को आदेश दे सकता था तथा उसे धर्म से बहिष्कृत कर उसके राज्याधिकार की मान्यता को समाप्त कर सकता था।
  2.  पोप की अपनी सरकार, अपना कानून, अपने न्यायालय, अपनी पुलिस और अपनी सामाजिकता • एवं धार्मिक व्यवस्था थी।
  3. पोप रोमन कैथोलिक धर्म के अनुयायी राजाओं के आन्तरिक मामलों में भी हस्तक्षेप कर सकता था।
  4.  पोप रोमन कैथोलिक जनता से कर वसूल किया करता था और उन्हें चर्च के नियमों के अनुसार, आचरण करने का आदेश भी देता था।
  5. पोप को रोमन कैथोलिक राज्यों में चर्च के लिए उच्च पदाधिकारियों को नियुक्त और पदच्युत करने का अधिकार प्राप्त था।

प्रश्न 6.
मध्य युग में नगरों के विकास के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
मध्य युग में यूरोप के सभी देशों-रूस, फ्रांस, इटली, इंग्लैण्ड आदि में अनेक नगरों का विकास हुआ। मध्यकालीन युग में रोम, वेनिस, जेनेवा, कुस्तुनतुनिया, पेरिस, बर्लिन, म्यूनिख, मैनचेस्टर आदि नगरों का तेजी से विकास हुआ। इन नगरों का महत्त्व इस रूप में बढ़ा कि ये । प्रशासकीय दृष्टि से सत्ता के महत्त्वपूर्ण केन्द्र बन गए थे और इन नगरों का सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व था। ये कला, विज्ञान’ धर्म और शिक्षा के उत्थान के केन्द्र बन गए थे। इनमें दुर्ग, सार्वजनिक भवन, चर्च और शिक्षा संस्थान प्रमुख थे। मध्यकाल में नगरों के माध्यम से व्यापार के क्षेत्र में क्रान्तिकारी प्रगति हुई। नए-नए आवागमन के मार्ग विकसित हुए। व्यापारिक जलमार्ग भी खोजे गए तथा बन्दरगाहों की भी स्थापना की गई। नाप-तौल के नए-नए ढंग विकसित हुए। छोटे एवं बड़े उद्योगों की स्थापना हुई। व्यापार का विकास बड़ी तेजी से हुआ। व्यापार के सन्दर्भ में आर्थिक और अन्य प्रकार की सुरक्षाओं के लिए श्रमिक संघों की स्थापना की जाने लगी।

प्रश्न 7.
कैथोलिक धर्म से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
ईसाई धर्म में दो सम्प्रदाय बन गए थे। पहला सम्प्रदाय रोमन कैथोलिक और दूसरा प्रोटेस्टेण्ट कहलाया। रोमन कैथोलिक सम्प्रदाय ईसाई धर्म के सिद्धान्तों का समर्थक है। इस सम्प्रदाय के अनुयायी रोम के पोप को अपना धर्मगुरु मानते हैं और उसकी प्रत्येक आज्ञा का पालन करना अपना परम कर्तव्य समझते हैं। मध्य युग में रोमन कैथोलिक धर्म की शक्ति चरम सीमा पर पहुँच गई थी। रोमन कैथोलिक धर्म में सुधार कर प्रोटेस्टेण्ट धर्म की नींव रखी गई। प्रोटेस्टैण्ट मत को मानने वाले पोप की सत्ता को स्वीकार नहीं करते हैं। ये अपेक्षाकृत उदारवादी होते हैं।

प्रश्न 8.
यूरोप के सामन्ती समाज में किसान किन वर्गों में विभाजित थे?
उत्तर :
मध्यकाल में सामन्तवाद के अन्तर्गत किसानों के तीन वर्ग थे

  1. स्वतन्त्र किसान-इस वर्ग के किसान सामन्त से भूमि प्राप्त करते थे और बदले में उसे कर (लगान) देते थे।
  2. कृषि दास–इस वर्ग के किसानों को अपनी उपज का एक निश्चित भाग लॉर्डों को देना पड़ता था। कुछ निश्चित दिनों तक सामन्त के खेतों पर मुफ्त काम भी करना पड़ता था।
  3. दास कृषक-यह किसानों का सबसे निम्न वर्ग था। इन्हें अपने स्वामी सामन्त को अपनी उपज का एक भाग देना पड़ता था। उसके खेतों पर मुफ्त काम करना पड़ता था। बिना मजदूरी लिए उसका मकान बनाना, लकड़ी चीरना, पानी भरना आदि गृहकार्य भी करने पड़ते थे। यदि वे स्वतन्त्र होने का प्रयास करते तो उन्हें पकड़कर दण्ड दिया जाता था।

प्रश्न 9.
सामन्तवाद से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
मध्यकालीन यूरोप की एक प्रमुख विशेषता सामन्तवाद थी। रोमन साम्राज्य के पतन के बाद यूरोप में उनके छोटे-छोटे राज्य बन गए, और उनकी शक्ति भी क्षीण हो गई। इन राज्यों के राजाओं ने धन के अभाव में राज्य की भूमि को अपने विश्वासपात्र, सामन्तों में बाँट दिया और युद्ध के समय उनसे सैनिक सहायता लेनी प्रारम्भ कर दी। सामन्तवाद में राज्य की सम्पूर्ण भूमि पर राजा का अधिकार होता था। राजा राज्य की भूमि को अपने विश्वासपात्र, स्वाभिमानी एवं कर्तव्यनिष्ठ सामन्तों को दे देता था। सामन्तों को राजा से जो अधिकार प्राप्त होते थे, उन्हें सामन्ती अधिकार कहा जाता था। भूमि-वितरण की यह व्यवस्था ही यूरोप में सामन्तवाद’ कहलाती थी। यूरोप की सामन्तवादी व्यवस्था, भारत की जमींदारी व्यवस्था के ही समान थी। यह प्रथा परम्परागत थी। सामन्ती प्रथा में राजा का स्थान महत्त्वपूर्ण तथा सर्वोपरि होता था। खेतिहर कृषक ‘सर्फ’ कहलाते थे। सामन्त चर्च के साथ ताल-मेल बनाकर रखते थे। ये सामन्त अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार स्थायी सेना रखते थे और राजा के दरबार में उपस्थित होकर उसे उपहार, भेट आदि दिया करते थे। ये राजा के दरबार में आकर समय-समय पर शासन सम्बन्धी विषयों पर भी परामर्श दिया करते थे।

प्रश्न 10.
सामन्तवाद के उदय के क्या कारण थे?
उत्तर :
सामन्तवादी प्रथा के उदय के लिए निम्नलिखित प्रमुख कारण उत्तरदायी थे

  1. सामन्तवाद का विकास धीरे-धीरे हुआ था।
  2. तत्कालीन परिस्थितियाँ सामन्तवाद के उदय के लिए उत्तरदायी थीं।
  3.  राज्यों में फैलने वाली अशान्ति और अव्यवस्था के कारण सामन्तवाद का उदय हुआ।
  4. सामन्तों को स्थानीय व्यवस्था एवं प्रशासन सौंपना आवश्यक बन गया।
  5. राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों ने सामन्तवाद को मुख्य रूप से जन्म दिया।
  6.  राजा सामन्तों के व्यय पर एक सुव्यवस्थित सेना रखने में समर्थ हो गए।
  7.  चर्च के प्रभाव एवं संगठन तथा सामन्तों और राजाओं के सहयोग से यूरोप में सामन्तवाद का उदय हुआ।
  8.  राज्य के संचालन एवं सुव्यवस्था के लिए भी सामन्तवाद का उदय आवश्यक हो गया था।

प्रश्न 11.
सामन्तवाद के पतन के क्या कारण थे?
उत्तर :
सामन्तवाद के पतन के कारण निम्नलिखित थे

  1.  सामन्तों का पारस्परिक संघर्ष सामन्तवाद के पतन का प्रमुख कारण था।
  2. धर्मयुद्धों के कारण पूर्व तथा पश्चिम के लोग निकट सम्पर्क में आए और व्यापार में वृद्धि होने लगी। व्यापार का विस्तार भी सामन्तवाद के पतन को लाने में सहायक सिद्ध हुआ।
  3. राजाओं की निरंकुशता में वृद्धि भी सामन्तवाद के पतन का कारण बनी।
  4. राष्ट्रीय राज्यों की स्थापना ने यूरोप में सामन्तवाद का पतन सुनिश्चित कर दिया।
  5. आधुनिक हथियारों तथा बारूद के आविष्कार ने यूरोप की युद्ध-प्रणाली में परिवर्तन कर दिया। नई युद्ध-प्रणाली के प्रयोग के फलस्वरूप सामन्तवाद का पतन होने लगा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज के प्रमुख वर्गों का विवरण दीजिए।
उत्तर :
मध्यकालीन यूरोप का समाज मध्य युग के यूरोपीय समाज में निम्नलिखित वर्ग थे

  1. राजा : सामन्तवादी समाज में राजा को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। राजा राज्य की भूमि को सामन्तों में बाँट देते थे।
  2. सामन्त : राजा के बाद सामन्तों का स्थान था। इनकी निम्नलिखित श्रेणियाँ थीं
  • ड्यूक(अर्ल) :
    राजा जिन लॉड को जागीर प्रदान करता था, उन्हें ड्यूक (अर्ल) कहते थे।
  • छोटे लॉर्ड( बैरन) :
    बड़े लॉर्ड राजा से प्राप्त भूमि का वितरण छोटे लॉ अथवा बैरनों में कर देते थे। राजा से इनका प्रत्यक्ष कोई सम्बन्ध नहीं होता था। इनके अधिपति ड्यूक होते थे। आवश्यकता पड़ने पर इन्हें ड्यूकों को सैनिक सहायता देनी पड़ती थी।
  •  नाइट :
    इनके अधिपति छोटे लॉर्ड या बैरन होते थे। इन्हें भूमि बैरनों से प्राप्त होती थी तथा ड्यूक अथवा लॉों से इनका कोई सम्बन्ध नहीं था। ये बैरनों को सैन्य सहायता देते थे।
  1. किसान :
    सामन्तों के बाद किसानों का वर्ग था, जो तीन श्रेणियों में बँटा हुआ था
  • स्वतन्त्र किसान :
    स्वतन्त्र किसानों को भूमि उनके अधिपतियों से प्राप्त होती थी। उन्हें केवल कर देना पड़ता था, परन्तु अधिपति के लिए वे कोई कार्य नहीं करते थे। इसके अतिरिक्त उनसे उपज का कोई अतिरिक्त भाग भी नहीं लिया जाता था।
  •  कृषि दास :
    ये मध्यम श्रेणी के किसान होते थे। उन्हें अधिपतियों के खेतों पर कुछ दिन निःशुल्क कार्य (बेगार) भी करना पड़ता था और उपज का एक भाग भी देना पड़ता था।
  • सर्फ :
    निम्नतम श्रेणी के किसान ‘सर्फ’ कहलाते थे। इनकी दशा अत्यन्त शोचनीय थी। इन्हें अपने अधिपति के लिए बेगार करनी पड़ती थी। अधिपति अपने खेतों पर सफ की भाँति इनसे भी कुछ दिन नि:शुल्क काम करवाते थे तथा उपज का भाग भी लेते थे। मध्यकाल में अन्तिम वर्षों में मध्यम वर्ग’ नामक एक नए वर्ग का विकास हुआ। इस वर्ग के लोगों ने शिक्षा, साहित्य, व्यापार, उद्योग-धन्धों आदि के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। नगरों के विकास में भी इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। ये लोग इतने समृद्ध और सम्पन्न हो गए थे कि राजा भी इनकी आर्थिक सहायता पर निर्भर रहने लगा। इससे सामन्तों का प्रभाव क्षीण हो गया।

प्रश्न 2.
मध्य युग में सामन्तवाद के विकास और पतन का विवरण दीजिए। इसके क्या गुण एवं दोष थे?
उत्तर :
मध्यकालीन सामन्तवाद का विकास मध्यकालीन यूरोप की प्रमुख विशेषता सामन्तवाद थी। इस युग में सामन्तवाद का पर्याप्त विकास हुआ। राजाओं की दुर्बलता का लाभ उठाकर सामन्त लोग बड़े शक्तिशाली हो गए। इन सामन्तों ने, जिन्हें लॉर्ड’ कहा जाता था, दासों (सर्फ) पर अत्याचार किए और स्वयं अनेक उपाधियाँ; जैसे-‘ड्यूक’, ‘अर्ल’, बैरन’ तथा ‘नाइट’ आदि; धारण कीं। इन सामन्तों का जीवन युद्ध और विलासितापूर्ण था। रोमन साम्राज्य के पतन के बाद यूरोप में अनेक छोटे-छोटे राज्य बन गए और उनकी शक्ति भी क्षीण हो गई। इन राज्यों के राजाओं ने धन के अभाव में राज्य की भूमि को अपने विश्वासपात्र सामन्तों में बाँट दिया और युद्ध के समय उनसे सैनिक सहायता लेनी प्रारम्भ कर दी। सामन्तवाद में राज्य की सम्पूर्ण भूमि पर राजा का अधिकार होता था। राजा राज्य की भूमि को अपने विश्वासपात्र, स्वामिभक्त एवं कर्तव्यनिष्ठ सामन्तों को देता था। सामन्तों को राजा से जो अधिकार प्राप्त होते थे, उन्हें ‘सामन्ती अधिकार’ कहा जाता था। भूमि-वितरण की यह व्यवस्था ही यूरोप में सामन्तवाद कहलाती थी। यूरोप की सामन्तवादी व्यवस्था भारत की जमींदारी व्यवस्था के ही समान थी। यह प्रथा पम्परागत थी। सामन्ती प्रथा में राजा का स्थान महत्त्वपूर्ण तथा सर्वोपरि होता था। खेतिहर कृषक ‘सर्फ’ कहलाते थे। सामन्त चर्च के साथ ताल-मेल बनाकर रखते थे। ये सामन्त अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार स्थायी सेना रखते थे और राजा के दरबार में उपस्थित होकर उसे उपहार, भेट आदि दिया करते थे। ये राजा के दरबार में आकर समय-समय पर शासन सम्बन्धी विषयों पर भी परामर्श दिया करते थे।

सामन्तवाद के गुण

सामन्तवाद के निम्नलिखित प्रमुख गुण थे

  1. यूरोप में शान्ति एवं व्यवस्था बनाए रखने में सामन्तवादी प्रथा का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। सामन्त अपनी प्रजा को सन्तुष्ट रखते थे।
  2.  सामन्तों के विशेषाधिकारों ने राजाओं पर नियन्त्रण कर उनकी निरंकुशता का अन्त कर दिया।
  3.  इस व्यवस्था ने शासन, सुरक्षा तथा न्याय का एक सरलीकृत ढंग प्रस्तुत किया।
  4. सामन्तवादी व्यवस्था में लोगों को अधिकार व कर्तव्यों का बोध हुआ तथा उनमें नैतिक भावना का प्रादुर्भाव हुआ।

सामन्तवाद के दोष

सामन्तवाद में गुणों की अपेक्षा दोष अधिक थे, जो इस प्रकार हैं

  1. इस प्रथा ने यूरोप की राजनीतिक एकता का अन्त कर दिया।
  2.  सामन्तों की पारस्परिक स्पर्धा व ईष्र्या के कारण अनेक युद्ध हुए।
  3. सामन्तवाद ने यूरोप में दास-प्रथा को जन्म दिया और किसानों की दशा अत्यन्त शोचनीय कर दी।
  4. सामन्तवाद ने सामाजिक असमानताओं को जन्म दिया और यूरोप में क्रान्ति के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
  5. सामन्तों की शक्ति बढ़ जाने से उनका नैतिक स्तर गिर गया और वे विलासी और अत्याचारी । होते चले गए।
  6.  आपसी युद्धों में लगे रहने के कारण सामन्त लोग, कला, व्यापार, साहित्य तथा कृषि आदि के विकास पर पर्याप्त ध्यान न दे सके।

प्रश्न 3.
मध्य युग में राज्य और चर्च के मध्य संघर्ष के क्या कारण थे? इसके क्या परिणाम हुए?
उत्तर :

चर्च और राज्य के मध्य सम्बन्ध

मध्यकालीन यूरोप में चर्च व राज्य के मध्य सम्बन्धों को अग्रलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत स्पष्ट किया जा सकता है

  1. प्रारम्भ में मधुर सम्बन्ध :
    प्रारम्भ में चर्च और राज्य के मध्य मधुर सम्बन्ध थे। दोनों एक-दूसरे का सम्मान करते हुए लोकहितकारी कार्यों से ही जुड़े रहते थे। इनमें किसी प्रकार का पारस्परिक संघर्ष नहीं था।
  2. आदर्श समन्वय पर आधारित सम्बन्ध :
    प्रारम्भ में चर्च और राज्य में अटूट समन्वय था। कभी-कभी कुछ सन्दर्भो में चर्च की उच्चता और सत्ता दिखाई पड़ती थी, जबकि सामान्य रूप से राज्य सर्वोच्च शक्ति के रूप में दृष्टिगोचर होता था। पोप की आज्ञाओं और निर्देशों का पालन करने में राजा धर्मपरायण होकर गौरव का ही अनुभव करते थे। पोप भी राज्य की आज्ञाओं को मानव-समाज के हित के लिए अनिवार्य मानकर उनका सम्मान करते थे। इस अटूट समन्वय की आदर्श समानता को दृष्टिगत रखते हुए एक विद्वान् ने लिखा है कि “यूरोप में चर्च और राज्य पति-पत्नी की भाँति आदर्श दम्पती थे तथा कभी चर्च पति, राज्य पत्नी और कभी राज्य पति तो चर्च पत्नी दिखलाई पड़ता था। दोनों में चोली-दामन का सम्बन्ध था”
  3. चर्च और राज्य के वैमनस्यपूर्ण सम्बन्ध :
    बाद में चर्च और राज्य के सम्बन्ध कटु और वैमनस्यपूर्ण होते चले गए। पोप स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि मानने लगा था और राजा स्वयं को ईश्वर का अंग मानकर तथा उसके द्वारा भेजा गया अग्रदूत मानकर अपने आपको राज्य का सर्वोच्च स्वामी समझता था। उच्चता की भावना को लेकर चर्च और राज्य में वैमनस्य प्रारम्भ हो गया और यूरोप के राजा पोप के महत्त्व को कम करने में सलंग्न हो गए थे; परन्तु व्यवहार में चर्च की ही धार्मिक सत्ता का जनमानस पर छायी रही।

चर्च उस समय धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक क्षेत्रों में खुलकर हस्तक्षेप करता था। रोम के चर्च में पोप सर्वशक्तिमान था। चर्च की अपनी सरकार, अपना कानून, अपने न्यायालय एवं अपनी पृथक् धार्मिक व्यवस्था थी। वह कैथोलिक राजाओं के आन्तरिक मामलों में भी हस्तक्षेप कर सकता था। जनता उस समय चर्च एवं राज्य के दोहरे प्रशासन के बीच पिस रही थी। चर्च चौदहवीं शताब्दी तक राज्य पर छाया रहा। उस समय के शासक राज्य को चर्च के नियन्त्रण में मानते थे। चर्च उनकी शक्ति के विस्तार में बाधक बना हुआ था। जैसे ही चर्च के पादरियों में फूट पड़ी, पोप के पाखण्डों के विरुद्ध यूरोप में आवाज उठने लगी। राज्य ने पोप की सत्ता को नकार दिया। सम्पूर्ण यूरोप पोप की सत्ता के विरुद्ध एकजुट हो गया। यूरोप में धर्मयुद्ध आरम्भ हो गए, जिनमें अन्तिम विजय राज्य को प्राप्त हुई। इन युद्धों के फलस्वरूप पोप की सत्ता केवल रोम के वैटिकन सिटी तक ही सीमित हो गई। राजा के दैवी अधिकार सिद्धान्त ने राजा को असीमित अधिकार देकर पोप की सत्ता को कम कर दिया। अतः यूरोप में मध्य युग से निरंकुश राजाओं का बोलबाला हो गया।

प्रश्न 4.
मध्यकालीन यूरोप में नगरों के विकास पर प्रकाश डालिए। इस युग में शिक्षा, साहित्य व कला की क्या प्रगति हुई?
उत्तर :

मध्यकालीन यूरोप में नगरों का विकास

मध्य युग में यूरोप के रूस, फ्रांस, इटली, इंग्लैण्ड आदि देशो में नगरों का तीव्र विकास हुआ। मध्यकालीन युग में रोम, वेनिस, जेनेवा, कुस्तुनतुनिया, पेरिस, बर्लिन, म्यूनिख, मैनचेस्टर आदि नगरों का बड़ी तेजी से विकास हुआ। इन नगरों का महत्त्व इस रूप में भी बढ़ा कि ये प्रशासकीय दृष्टि से सत्ता के महत्त्वपूर्ण केन्द्र बन गए थे और इन नगरों का सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यधिक महत्त्व था। ये नगर कला, विज्ञान, धर्म और शिक्षा के उत्थान के केन्द्र बनाए गए थे। इन नगरों में दुर्ग, सार्वजनिक भवन, चर्च और शिक्षा संस्थान प्रमुख रूप से स्थापित कर दिए गए थे। मध्यकाल में नगरों के माध्यम से व्यापार के क्षेत्र में क्रान्तिकारी प्रगति हुई। नए-नए आवागमन के मार्ग विकसित हुए। व्यापारिक जलमार्ग भी खोजे गए तथा बन्दरगाहों की भी स्थापना की गई। नाप-तौल के नए-नए ढंग विकसित हुए। विभिन्न छोटे-बड़े उद्योगों की स्थापना हुई। व्यापार का विकास बड़ी तेजी से हुआ। व्यापार के सन्दर्भ में आर्थिक और अन्य प्रकार की सुरक्षाओं के लिए श्रमिक-संघों की स्थापना की जाने लगी।

मध्यकालीन यूरोप में शिक्षा, साहित्य व कला की प्रगति

मध्य युग में यूरोप में शिक्षा का पर्याप्त विकास हुआ। इसी काल में इटली, फ्रांस व इंग्लैण्ड में अनेक विश्वविद्यालय स्थापित हुए। इसी युग में मुसलमानों के भी कुछ विश्वविद्यालय स्पेन में सेदिल, सलामका तथा सारगोसा नामक स्थानों पर स्थापित हुए। इन विश्वविद्यालयों को ‘मूरिश विश्वविद्यालय’ कहा जाता था। इस युग में यूरोप में विभिन्न भाषाओं का भी विकास हुआ। ये भाषाएँ फ्रेंच, जर्मन और अंग्रेजी आदि थी। मध्य युग में सभी प्रकार के साहित्य की रचना भी यूरोपीय विद्वानों द्वारा हुई थी। राज्य, राजनीति एवं दर्शन से सम्बन्धित यूरोप में रचित साहित्य ने समस्त विश्व को प्रभावित किया। यहाँ नाटक, उपन्यास तथा काव्य आदि भी लिखे जाते थे। एक ओर धार्मिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु साहित्य लिखा जाता था तो दूसरी ओर सरस, लौकिक साहित्य की भी रचना की जाती थी। मध्यकालीन यूरोप में स्थापत्य कला, चित्रकला और संगीत कला के क्षेत्र में भी बहुत उन्नति हुई। इस युग में पेरिस, वेनिस तथा लन्दन आदि में अनेक गिरजाघरों का निर्माण हुआ। फ्रांस के मूर्तिकारों ने ‘गॉथिक शैली’ में कलात्मक मूर्तियों का निर्माण किया।

प्रश्न 5.
एबी एवं उसमें रहने वाले भिक्षुओं के जीवन पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उत्तर :
‘एबी’ चर्च के अतिरिक्त कुछ विशेष श्रद्धालु ईसाइयों की एक दूसरी तरह की संस्था थी। कुछ अत्यधिक धार्मिक व्यक्ति, पादरियों के विपरीत जो लोगों के बीच में नगरों और गाँवों में रहते थे, एकान्त जीवन व्यतीत करना पसन्द करते थे। वे धार्मिक समुदायों में रहते थे जिन्हें एबी या मठ कहते थे। दो सर्वाधिक प्रसिद्ध मठों में एक मठ 529 ई० में इटली में स्थापित सैंट बेनेडिक्टथा और दूसरा 910 ई० में बरगण्डी में स्थापित कलूनी था। भिक्षु अपना सारा जीवन एबी में रहने और समय पर प्रार्थना करने, अध्ययन और कृषि जैसे शारीरिक श्रम में लगाने का व्रत लेते थे। प्रादरी-कार्य के विपरीत भिक्षु का जीवन पुरुष और स्त्रियाँ दोनों ही अपना सकते थे-ऐसे पुरुषों को मॉक (Mauk) तथा महिलाओं को नन (Nun) कहते थे। कुछ अपवादों को छोड़कर सभी एबी में एक ही लिंग के व्यक्ति रह सकते थे। पुरुषों एवं महिलाओं के लिए अलग-अलग एबी थे। पादरियों की तरह, भिक्षु और भिक्षुणियाँ भी विवाह नहीं कर सकती थीं। कालान्तर में दस या बीस पुरुष/स्त्रियों के छोटे समुदाय से बढ़कर मठ सैकड़ों की संख्या के समुदाय बन गए जिसमें बड़ी इमारतें और भू-जागीरों के साथ-साथ स्कूल या कॉलेज और अस्पताल सम्बद्ध थे। इन समुदायों ने कला के विकास में योगदान दिया। तेरहवीं सदी में भिक्षुओं के कुछ समूह जिन्हें ‘फायर’ कहते थे, उन्होंने मठों में न रहने का निर्णय लिया। वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूम-घूमकर लोगों को उपदेश देते और दान से अपनी जीविका चलाते

प्रश्न 6.
चर्च और पादरियों की जीवन शैली तथा अधिकारों की विवेचना कीजिए।
उत्तर :
तत्कालीन कैथोलिक चर्च के अपने विशिष्ट नियम थे। उनके पास राजा द्वारा प्रदत्त भूमि थी जिससे वे कर प्राप्त कर सकते थे। इसीलिए यह एक शक्तिशाली संस्था थी जो राजा पर निर्भर नहीं थी। पश्चिमी चर्च के शीर्ष पर पोप था, जो रोम में रहता था। यूरोप में ईसाई समाज का मार्गदर्शन बिशपों तथा पादरियों द्वारा किया जाता था जो प्रथम वर्ग के अंग थे। अधिकांश गाँवों के अपने चर्च हुआ करते थे, जहाँ प्रत्येक रविवार को लोग पादरी का धर्मोपदेश सुनने तथा सामूहिक
प्रार्थना करने के लिए एकत्र होते थे। प्रत्येक व्यक्ति पादरी नहीं बन सकता था। कृषि-दास पर प्रतिबन्ध था। शारीरिक रूप से बाधित व्यक्तियों और स्त्रियों पर प्रतिबन्ध था। जो पुरुष पादरी बनते थे वे शादी नहीं कर सकते थे। धर्म के क्षेत्र में बिशप अभिजात माने जाते थे। बिशपों के पास भी लॉर्ड के समान विस्तृत जागीरें थीं और वे शानदार महलों में निवास करते थे। चर्च को एक वर्ष के अन्तराल में कृषक से उसकी उपज का दसवाँ भाग लेने का अधिकार था जिसे ‘टीथे’ कहते थे। अमीरों द्वारा अपने कल्याण और मरणोपरान्त अपने रिश्तेदारों के कल्याण हेतु दिया जाने वाला दान भी आय का एक प्रमुख स्रोत था। चर्च के औपचारिक रीति-रिवाज की कुछ महत्त्वपूर्ण रस्में, सामन्ती कुलीनों की नकल थी। प्रार्थना करते समय, हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर घुटनों के बल झुकना, नाइट द्वारा अपने वरिष्ठ लॉर्ड के प्रति वफादारी की शपथ लेते समय अपनाए गए तरीके की नकल था। इसी प्रकार से ईश्वर के लिए लॉर्ड शब्द का प्रचलन एक उदाहरण था जिसके द्वारा सामन्तवादी संस्कृति चर्च के उपासना कक्षों में प्रवेश करने लगी। इस प्रकार अनेक सांस्कृतिक सामन्तवादी रीति-रिवाजों और तौर-तरीकों को चर्च की दुनिया में यथावत् स्वीकार कर लिया गया था।

प्रश्न 7.
सामन्तवाद की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर :
सामन्तवाद की निम्नलिखित विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं

  1. सार्वभौमिक सत्ता का अपहरण :
    सामन्तवाद की सर्वप्रमुख विशेषता स्थानीय जागीरदारों द्वारा सार्वभौम सत्ता हस्तगत करना थी। शार्लमेन के साम्राज्य के पतन के पश्चात् स्थानीय  भूपतियों या जमींदारों को हस्तान्तरित कर दिया। स्थिति यह हो गई कि एक जागीरदार, जो सिद्धान्ततः अपने स्वामी और अन्ततः राजा के अधीन था, अपने क्षेत्र में सभी मामलों का स्वामी हो गया। फलतः यूरोप हजारों जागीरदारों के बीच बँट गया।
  2. काश्तकारी व्यवस्था :
    एक दूसरी विशेषता काश्तकारी व्यवस्था (land tenure) थी। इसी पर सामन्तवादी व्यवस्था खड़ी थी। किसी सामन्त की प्रशासनिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति का निर्धारण उसके द्वारा प्राप्त जागीर या भूमि के आधार पर होता था। जागीरदार अपने स्वामी से संविदास्वरूप भूमि प्राप्त करता था। संविदा के अनुसार उसे अपने स्वामी की सेवा करनी पड़ती थी। वह सहायतार्थ सेना भी भेजता था या स्वयं सैनिक के रूप में कार्य करता था। वह उसके दरबार में पुलिस-कार्य, न्याय-कार्य, या शान्ति-व्यवस्था बनाए रखने का कार्य करता था।
  3. सामाजिक विभाजन :
    सामन्तवाद ने समाज को दो वर्गों-शासक और शासित में बाँट दिया। | सामन्त या जमींदार शासक वर्ग के थे और शासित वर्ग वे थे जो खेत जोतते थे। भूमि ही समाज का ढाँचा निर्धारित करती थी।
  4. व्यक्तिगत बन्धन :
    एक अन्य विशेषता व्यक्तिगत बन्धन (personal bond) थी. जो स्वामी और जागीरदार के सम्बन्ध को बताती है। जागीरदार अपने स्वामी के प्रति वफादार रहने के लिए शपथ लेता था। काश्तकार, जागीरदार एवं स्वामी के बीच के सम्बन्ध का निर्धारण शपथ-ग्रहण उत्सव (homage) के साथ होता था, न कि किसी राज्य के कानून द्वारा।

प्रश्न 8.
सामन्तवाद के उदय के राजनीतिक कारण लिखिए।
उत्तर :
पश्चिमी यूरोप में रोमन साम्राज्य का पाँचवीं शताब्दी में पतन हो  गया। इसके साथ ही सामन्तवाद का उदय हुआ और अगले पाँच-सौ वर्षों में इसका विकास हुआ। इसके उदय के निम्नलिखित राजनीतिक कारण थे

राजनीतिक कारण

रोमन साम्राज्य में सम्पूर्ण पश्चिमी यूरोप सम्मिलित था। रोमन सम्राटों ने इस क्षेत्र के अधिकांश भू-भाग को अपने अधिकार में करके बाहरी बर्बर आक्रमणों से इसकी रक्षा की थी और बहुत अंशों में शान्ति-व्यवस्था स्थापित की थी। परन्तु, पाँचवीं शताब्दी में रोमन साम्राज्य के पतन के बाद यूरोप में सर्वत्र अराजकता, अशान्ति एवं अव्यवस्था फैल गई थी। आन्तरिक उपद्रव और बाह्याक्रमणों के कारण स्वतन्त्र किसानों का संकट बढ़ने लगा था। बर्बर जातियों के आक्रमणों ने उपद्रव और अशान्ति को बढ़ा दिया था। चारों ओर लूट-खसोट मची हुई थी। किसानों का कोई रक्षक नहीं था और वे बड़े कष्ट में थे। कोई भी अकेला व्यक्ति सुरक्षित न था। रोमन साम्राज्य के कुलीनवर्गीय सरदार अपने-अपने गाँवों में चले गए जहाँ उनके किले होते थे। इन लोगों ने किसानों पर और भी अत्याचार करना शुरू किया। वे अपने दुर्गों से छापा मारने के लिए निकल पडते थे। गाँव में वे किसानों को लूटते था तथा जमीन पर अपना अधिकार करने के लिए अपनी बराबरी के अन्य बड़े सामन्तों से लड़ते थे। इस प्रकार, सर्वत्र अराजकता का बोलबाला था। किसान और जमींदार सभी इस असह्य स्थिति से ऊब गए थे। न तो किसानों का जान-माल सुरक्षित था और न सामन्तों की जमींदारी ही। इस स्थिति में दोनों एक-दूसरे की सहायता चाहते थे। इसीलिए सब लोग मिलकर ऐसे व्यक्ति की खोज में थे जो उनसे अधिक शक्ति सम्पन्न हो तथा उनके जान-माल की रक्षा कर सके। किसानों की दृष्टि में सामन्त ही ऐसा व्यक्ति दिखलाई पड़ा, क्योंकि उसके पास दुर्ग और हथियार थे। इसीलिए किसानों ने सामन्तों से एक समझौता करके अपनी जमीन उसके हाथ में सौंप दी और यह तय हुआ कि यदि सामन्त किसानों को लूटना बन्द कर दें और आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुओं से उन्हें बचाएँ तो वे अपने खेत की पैदावार का कुछ हिस्सा उन्हें दिया करेंगे और दूसरी तरह की सेवाएँ भी करेंगे। इस तरह की व्यवस्था से किसान अब जमीन के स्वतन्त्र स्वामी नहीं रहे। वे कृषिदास (sert) बन गए। इस प्रक्रिया से अनेक छोटे-छोटे सामन्त बन गए। फिर, ये सामन्त भी अपने को अनारक्षित ही पाते थे, इसलिए इन्होंने अपने को किसी बड़े सामन्त की सेवा में समर्पित कर दिया। बड़े भूमिपति बाहरी हमले से स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकते थे, वे भी छोटे-छोटे सामन्तों की सेवा की अपेक्षा करते थे। इसलिए जागीरों के रूप में अपने विजित प्रदेश के टुकडे उन्होंने छोटे-छोटे सामन्तों को दे दिए। इसके बदले में उन्होंने सैनिक सेवा देने का वचन दिया। इस प्रकार, एक नई सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था उत्पन्न हो गई। इसे ही सामन्तवाद का नाम दिया गया। सामन्तवाद के विकास का एक दूसरा राजनीतिक कारण भी था। रोमन साम्राज्य के अन्तर्गत स्थानीय शासन को भार स्थानीय सरदारों पर रहता था। जब तक केन्द्रीय शासन सुदृढ़ रहा तब तक इन स्थानीय सरदारों को नियन्त्रण में रखा जा सका, लेकिन केन्द्रीय सत्ता के कमजोर होने से स्थानीय सरदार धीरे-धीरे स्वतन्त्र होने लगे। रोमन साम्राज्य के पतन के बाद वे पूर्ण स्वतन्त्र हो गए। जर्मन जातियों के आगमन से भी सामन्तवाद के विकास को प्रश्रय और प्रोत्साहन मिला। पाँचवीं शताब्दी में पश्चिमी यूरोप में रोमन साम्राज्य का अन्त होने पर जर्मन जातियों की शाखाएँ जर्मनी से निकलकर प्रायः सम्पूर्ण यूरोप पर छा गई। ये लोग अपने-अपने कबीलों में बँटे रहते थे। इन कबीलों के नेता होते थे। जब जर्मन लोग प्रदेश जीतते गए तो कबीलों के पास काफी जमीन हो गई। इस जमीन को वे अपने अनुयायियों में इस शर्त पर बाँटने लगे कि सैनिक और राजनीतिक सेवा प्रदान करेंगे। कबीलों का नेता इस प्रकार एक बड़ा सामन्त हो गया।

प्रश्न 9.
सामन्तवाद के उदय के आर्थिक कारणों की विवचेना कीजिए।
उत्तर :
आर्थिक कारण सामन्तवाद के उदय के आर्थिक कारण निम्नलिखित थेरोमन साम्राज्य के उत्कर्ष के दिनों में दास-प्रथा बड़े पैमाने पर प्रचलित थी। दासों का शोषण बड़ी निर्ममता से होता था। इस कारण राज्य की पैदावार घटने लगी। अब समस्या थी उपज बढ़ाने की इसके तीन उपाय हो सकते थे। प्रथम, कोई नया आविष्कार करके अनाज की पैदावार में वृद्धि की जाए। द्वितीय, अनाज पैदा करने वालों की संख्या बढ़ाई जाए। इन दोनों उपायों को प्राप्त करना आसान नहीं था। रोमन साम्राज्य के उत्कर्ष के दिनों में कोई वैज्ञानिक आविष्कार नहीं हुआ था और जब साम्राज्य पतनोन्मुख होने लगा तो दासों की संख्या भी नहीं बढ़ाई जा सकती थी। अतएव अब एक तीसरा उपाय ही शेष रह गया था कि दासों को अधिक सुविधा देकर उन्हें प्रोत्साहन दिया जाए, ताकि वे मन लगाकर काम करें और पैदावार बढ़ा सके। इसलिए, दासत्व से मुक्ति दी जाने लगी और दास-प्रथा का उन्मूलन शुरू हुआ। उन्हें अब थोड़ी जमीन मिली जहाँ वे अपना घर बनाकर परिवार के साथ रह सकते थे। अब वे दास नहीं रह गए। उनकी स्थिति बदल गई और वे कृषिदास या कम्मी कहलाने लगे। कम्मी और दासों में कोई अन्तर नहीं था। वे भी दासों की तरह परतन्त्र थे, लेकिन उन्हें थोड़ी सुविधा अवश्य मिली। यह सुविधा उन्हें अपने मालिक की जमीन जोतने के बदले में मिलती थी। इन कृषिदासों कोअपने-अपने सामन्तों की सेवा भिन्न-भिन्न प्रकार से करनी पड़ती थी। इस कारण भी सामन्तवाद की अनेक प्रवृत्तियों का विकास हुआ। इस प्रकार, सामन्तवाद की रचना किसी व्यक्ति-विशेष द्वारा नहीं हुई,  बल्कि इसका उदय और विकार स्वाभाविक ढंग से हुआ। इसका निर्माण जानबूझकर नहीं किया गया था। यह एक प्रकार का पारस्परिक समझौता था जो युग की परिस्थितियों के अनुकूल था। इसका स्वरूप भी विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न था। इसकी उत्पत्ति तो इटली और जर्मनी में हुई थी, लेकिन इसका पूर्ण विकास फ्रांस में हुआ। यहाँ पर स्मरण रखना चाहिए कि सामन्तवाद प्राचीन रोमन और जर्मन प्रथाओं से प्रभावित था। यह मध्ययुगीन ईसाइयत का एक अंग हो गया। टॉमसन के शब्दों में, “सामन्तवाद में रोमन, ईसाइयत एवं जर्मन तत्त्व थे जो समकालीन जीवन-परिस्थितियों के अनुकूल थे।” प्राचीन रोमन संस्था पैट्रोसिनियम (Patrocinium) या संरक्षण में हम सामन्तवाद के बीज पाते हैं। इसके अनुसार, सम्पन्न और प्रभावशाली व्यक्ति अपने को अनुयायियों से घिरे पाते थे जिन्हें अनुयायीगण (clients) कहते थे। वे अपने आश्रयदाता के समर्थन और सहायता पर आश्रित थे। अराजकता या अशान्ति के काल में ऐसे अनुयायीगणों की संख्या बढ़ जाती थी। भूमिपति आदि शक्तिशाली सामन्तों के संरक्षण में जाने लगे। फ्रांस में केल्टिक वैसस’ (Celtic vessus) और जर्मनी की कॉमिटेटस (Comitatus) रोमन पैट्रोसिनियम की तरह ही थे। ‘जर्मन कॉमिटेटस’ अपने स्वामियों के प्रति योद्धाओं की निर्भरता थी। निर्बल लोग संरक्षण के लिए सबलों या पराक्रमियों की छत्रछाया में आ जाते थे। प्रेकेरियम (Precarium), कमेण्डेशन (Commendation), बेनेफिसियम (Beneficium) आदि अन्य संस्थाएँ थीं जो सामन्तवाद के विकास में सहायक सिद्ध हुईं। चार्ल्स मोटेल (Charles Martle) के अधीन सामन्तवाद का सैनिक पक्ष अधिक उभरा, क्योंकि उसने दक्षिण गॉल (Gaul) में अश्वारोहियों के आक्रमण का प्रायः सामना करना पड़ता था। चाल्र्स ने चर्च की सम्पत्ति जब्त कर अश्वारोहियों को जागीरें दीं और शक्तिशाली घुड़सवार सेना का संगठन कर लिया। इस तरह, सैनिक सेवा के बदले जागीर देने की प्रथा आरम्भ हुई।

प्रश्न 10.
सामन्तवाद के गुणों तथा दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
गुण-सामन्तवाद के निम्नलिखित प्रमुख गुण थे

  1. यूरोप में शान्ति एवं व्यवस्था बनाए रखने में सामन्तवादी प्रथा का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। सामन्त अपनी प्रजा को सन्तुष्ट रखते थे।
  2. सामन्तों के विशेषाधिकारों ने राजाओं पर नियन्त्रण कर उनकी निरंकुशता का अन्त कर दिया।
  3. इस व्यवस्था ने शासन, सुरक्षा तथा न्याय का एक सरलीकृत ढंग प्रस्तुत किया।
  4. सामन्तवादी व्यवस्था से लोगों को अधिकार व कर्तव्यों का बोध हुआ तथा उनमें नैतिक भावना | का प्रादुर्भाव हुआ। दोष-सामन्तवाद में गुणों की अपेक्षा

दोष  :
अधिक थे, जो इस प्रकार हैं

  1. इस प्रथा ने यूरोप की राजनीतिक एकता का अन्त कर दिया।
  2.  सामन्तों की पारस्परिक स्पर्धा व ईष्र्या के कारण अनेक युद्ध हुए।
  3.  सामन्तवाद ने यूरोप में दास-प्रथा को जन्म दिया और किसानों की दशा अत्यन्त शोचनीय कर दी।
  4. सामन्तवाद ने सामाजिक असमानताओं को जन्म दिया और यूरोप में क्रान्ति के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
  5.  सामन्तों की शक्ति बढ़ जाने से उनका नैतिक स्तर गिर गया और वे विलासी और अत्याचारी होते चले गए।
  6. आपसी युद्धों में लगे रहने के कारण सामन्त लोग, कला, व्यापार, साहित्य तथा कृषि आदि के विकास पर पर्याप्त ध्यान न दे सके।

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UP Board Solutions for Class 11 History Chapter 5 Nomadic Empires

UP Board Solutions for Class 11 History Chapter 5 Nomadic Empires (यायावर साम्राज्य)

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर
संक्षेप में उत्तर दीजिए

प्रश्न 1.
मंगोलों के लिए व्यापार क्यों इतना महत्त्वपूर्ण था?
उत्तर :
स्टैपी प्रदेशों में मूल आवश्यकताओं की वस्तुओं के स्रोतों की कमी के कारण मंगोलों और मध्य एशिया के यायावरों को व्यापार और वस्तुओं के विनिमय के लिए चीनवासियों के पास जाना पड़ता था। यह व्यवस्था दोनों पक्षों के लिए लाभकारी थी। यायावर कबीले खेती से प्राप्त उत्पादों और लोहे के उपकरणों को चीन से लाते थे और घोड़े, फर और शिकार का व्यापार (विनिमय) करते थे। जब मंगोल कबीलों के लोगों के साथ मिलकर व्यापार करते थे तो वे अपने चीनी पड़ोसियों से व्यापार में लाभकारी शर्ते और व्यापारिक सम्बन्ध रखते थे। इन सभी परिस्थितियों के कारण मंगोलों के लिए व्यापार महत्त्वपूर्ण था।

प्रश्न 2.
चंगेज खान ने यह क्यों अनुभव किया कि मंगोल कबीलों को नवीन सामाजिक और सैनिक इकाइयों में विभक्त करने की आवश्यकता है?
उत्तर :
मंगोलों के विभिन्न निकायों में अलग-अलग प्रकार के लोगों का एक विशाल समूह सम्मिलित था जिन्होंने चंगेज खान की सत्ता को स्वेच्छा से स्वीकार कर लिया था। इसमें पराजित लोग भी शामिल थे। चंगेज खान इन विभिन्न जनजातीय समूहों की पहचान को क्रमबद्ध रूप से मिटाकर उन्हें एक नई पहचान देना चाहता था। इसलिए उसे मंगोल कबीलों को नवीन सामाजिक और सैनिक इकाइयों में विभक्त करने की आवश्यकता अनुभव दुई।

प्रश्न 3.
यास के बारे में परवर्ती मंगोलों का चिन्तन किस तरह चंगेज खान की स्मृति के साथ जुड़े | हुए उनके तनावपूर्ण सम्बन्धों को उजागर करता है?
उत्तर :
‘यास’ एक प्रकार की नियम-संहिता है। चंगेज खान ने 1206 ई० में यह संहिता किरिलताई में लागू की थी। अपने प्रारम्भिक स्वरूप में यास को यसाक (Yasaq) लिखा जाता था जिसका अर्थ था विधि, आज्ञप्ति व आदेश। वास्तव में जो थोड़ा-बहुत विवरण यसाक के बारे में हमें मिला है उसका सम्बन्ध प्रशासनिक विनियमों से है; जैसे-आखेट, सैन्य और डाक-प्रणाली का संगठन। 13वीं सदी के मध्य तक, किसी तरह से मंगोलों ने ‘यास’ शब्द का प्रयोग अधिक सामान्य रूप से करना प्रारम्भ कर दिया। इसका मतलब था-चंगेज खान की विधि संहिता। 16वीं शताब्दी के अन्त में चंगेज खान के सबसे बड़े पुत्र जोची का एक दूर का वंशज अब्दुल्लाह खान बुखारा के उत्सव मैदान में गया वहाँ उसने छुट्टी की नमाज अदा की और यास के नियमों का उल्लंघन किया। परवर्ती मंगोलों का चिन्तन यास के विषय में बदल गया था।

प्रश्न 4.
यदि इतिहास नगरों में रहने वाले साहित्यकारों के लिखित विवरणों पर निर्भर करता है तो | यायावर समाजों के बारे में हमेशा प्रतिकूल विचार ही रखे जाएँगे। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? क्या आप इसका कारण बताएँगे कि फारसी इतिवृत्तकारों ने मंगोल अभियानों में मारे गए लोगों की इतनी बढ़ा-चढ़ाकर संख्या क्यों बताई है?
उत्तर :
यह सत्य है कि यदि इतिहास लिखित तथ्यों पर विश्वास रखता है तो नगरों में रहने वाले साहित्यकारों के लिखित विवरणों के यायावरों के समाज के बारे में हमेशा ही प्रतिकूल विचार रखे जाएँगे। इन साहित्यकारों ने यायावरों के समाज सम्बन्धी जो सूचनाएँ प्रस्तुत की हैं, वे पक्षपातपूर्ण और विभिन्न दोषों से परिपूर्ण हैं। फारसी इतिहासकारों ने मंगोल अभियान में मारे गए लोगों की संख्या निम्नलिखित कारणों से
बढ़ा-चढ़ाकर बताई है

  1. इतिहासकारों की सोच मंगोलों के प्रति गलत थी। वह उन्हें लुटेरे और हत्यारों के रूप में ही देखते थे।
  2. मारे गए लोगों की संख्या अनुमान पर आधारित है। यथा-इल्खन के फारसी इतिवृत्ताकार जुबैनी ने कहा कि मर्व में 13,00,000 लोगों का वध किया गया, उसने इस संख्या का अनुमान इस प्रकार लगाया कि तेरह दिन तक 1,00,000 शव प्रतिदिन गिने जाते थे।

संक्षेप में निबन्ध लिखिए

प्रश्न 5.
मंगोल और बेदोइन समाज की यायावरी विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए यह बताइए कि आपके विचार में किस तरह उनके ऐतिहासिक अनुभव एक-दूसरे से भिन्न थे? इन भिन्नताओं से जुड़े कारणों को समझाने के लिए आप क्या स्पष्टीकरण देंगे?
उत्तर :
मंगोल और बेदोइन समाज यायावरी समाज था। बेदोइन मंगोलों के समान क्रूर और असभ्य नहीं थे। वे ऊँटों के साथ चारे की तलाश में यहाँ-वहाँ भटकते रहते। कालान्तर में वे शहरों में बस गए। और व्यापार या कृषि कार्य करने लगे, जबकि मंगोल लूटमार कर अपना पोषण करते थे। हालाँकि कालान्तर में ये सभ्य हुए और इन्होंने अपना साम्राज्य स्थापित किया। मंगोलों और बेदोइन की इस भिन्नता का कारण पर्यावरणीय स्थितियाँ और नेतृत्व की विचारधारा को माना जा सकता है।

प्रश्न 6.
तेरहवीं शताब्दी के मध्य में मंगोलिया द्वारा निर्मित ‘पैक्स मंगोलिका’ का निम्नलिखित विवरण उसके चरित्र को किस तरह उजागर करता है?

एक फ्रेन्सिसकन भिक्ष, रूब्रुक निवासी विलियम को फ्रांस के सम्राट लुई IX ने राजदूत बनाकर महान खान मोंके के दरबार में भेजा। वह 1254 में मोंके की राजधानी कराकोरम पहुँचा और वहाँ वह लोरेन, फ्रांस की एक महिला पकेट (Paquette) के सम्पर्क में आया जिसे हंगरी से लाया गया था। यह महिला राजकुमार की पत्नियों में से एक पत्नी की सेवा में नियुक्त थी जो नेस्टोरियन ईसाई थी। वह दरबार में एक फारसी जौहरी ग्वीयोम बूशेर के सम्पर्क में आया, जिसका भाई पेरिस में ग्रेन्ड पोन्ट’ में रहता था। इस व्यक्ति को सर्वप्रथम रानी सोरगकतानी ने और उसके उपरान्त मोंके के छोटे भाई ने अपने पास नौकरी में रखा। विलियम ने यह देखा कि विशाल दरबारी उत्सवों में सर्वप्रथम नेस्टोरियन पुजारियों को उनके चिह्नों के साथ तथा इसके उपरान्त मुसलमान, बौद्ध और ताओ पुजारियों को महान खान को आशीर्वाद देने के लिए आमन्त्रित किया जाता था।…
उत्तर :
तेरहवीं शताब्दी के मध्य में मंगोलिया द्वारा निर्मित ‘पैक्स मंगोलिया’ (मंगोल शान्ति) का । उपर्युक्त विवरण उसकी धर्मसहिष्णुता को प्रकट करता है। मंगोल राजदरबार में किसी प्रकार का जातीय भेदभाव नहीं था। विभिन्न देशों के निवासी राजदरबार में कार्यरत थे। पकेट फ्रांस और हंगरी से सम्बद्ध थी। उसका धर्म ईसाई था। पर्सियन स्वर्णकार भी इस दरबार में था। राजदरबार में शासक सभी धर्मों का सम्मान करता था। वह ईसाई, बौद्ध, इस्लाम, ताओ धर्म के पुजारियों से आशीर्वाद लेता था। इस प्रकार मंगोल राजा का चरित्र धर्मनिरपेक्ष था।

परीक्षोपयोगी अन्य महत्व

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
यायावरी लोगों में कौन-सा गुण नहीं होता?
(क) घुमक्कड़ी
(ख) आखेटक
(ग) संग्रही
(घ) स्थायी निवास
उत्तर :
(घ) स्थायी निवास

प्रश्न 2.
मंगोल मूलतः कहाँ के निवासी थे?
(क) स्टेपी प्रदेश
(ख) भारत
(ग) चीन
(घ) पाकिस्तान
उत्तर :
(क) स्टेपी प्रदेश

प्रश्न 3.
चंगेज खान का प्रारम्भिक नाम था
(क) तेमुजिन
(ख) च्यांग
(ग) बाटू
(घ) ओगोदेई
उत्तर :
(क) तेमुजिन

प्रश्न 4.
मंगोलिया गणराज्य कब बना?
(क) सन् 1921 में
(ख) सन् 1922 में
(ग) सन् 1923 में
(घ) सन् 1924 में
उत्तर :
(क) सन् 1921 में

प्रश्न 5.
चंगेज खान का वंशज था
(क) तैमूर
(ख) अकबर
(ग) जहाँगीर
(घ) औरंगजेब
उत्तर :
(क) तैमूर

प्रश्न 6.
चंगेज खान की मृत्यु कब हुई?
(क) 1224 में
(ख) 1226 में
(ग) 1227 में
(घ) 1238 में
उत्तर :
(ग) 1227 में

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चंगेज खान कौन था और उसका साम्राज्य किन-किन महाद्वीपों में था?
उत्तर :
चंगेज खान मंगोल साम्राज्य का संस्थापक था। उसका साम्राज्य यूरोप और एशिया महाद्वीप तक विस्तृत था।

प्रश्न 2.
मार्को पोलो कौन था?
उत्तर :
मार्को पोलो इटली का यात्री था। इसने अपने यात्रा वृत्तान्तों में मंगोलों के विषय में बहुत कुछ लिखा है।

प्रश्न 3.
बाटू के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर :
बाटू चंगेज खान का पौत्र था जिसने 1236 से 1241 तक शासन किया। उसने अपने अभियान ” में रूस की भूमि को मास्को तक जीत लिया था।

प्रश्न 4.
सुल्तान महमूद कौन था? चंगेज खान उससे क्यों नाराज था?
उत्तर :
सुल्तान महमूद ख्वारिज्म का शासक था। उसने मंगोल दूत की हत्या कर दी थी। इसलिए चंगेज खान उससे नाराज था और उसकी हत्या करने के लिए उसका पीछा करता रहा।

प्रश्न 5.
बाबर का मंगोलों से क्या सम्बन्ध था?
उत्तर :
जहीरुद्दीन बाबर तैमूर और चंगेज खान का वंशज था। उसने तैमूर के राज्य फरगान ओर समरकन्द में सफलता प्राप्त की। वहाँ से उसे निर्वासित किया गया। उसने 1526 ई० में काबुल, दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया और भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना की थी।

प्रश्न 6.
उलुस किसे कहते हैं?
उत्तर :
चंगेज खान ने नवविजित प्रदेशों के शासन का कार्य चार पुत्रों में बाँट दिया प्रत्येक को उलुस कहा जाता था।

प्रश्न 7.
तैमूर ने भारत पर आक्रमण कब किया था?
उत्तर :
तैमूर ने सन् 1398 में भारत पर आक्रमण किया था।

प्रश्न 8.
तैमूर के आक्रमण का घातक प्रभाव किस पर पड़ा?
उत्तर :
तैमूर के भारतीय आक्रमण को सबसे घातक प्रभाव तुगलक वंश पर पड़ा। उसकी शक्ति और प्रतिष्ठा धूल में मिल गई।

प्रश्न 9.
मंगोल कौन थे?
उत्तर :
मंगोल का शाब्दिक अर्थ ‘दिलेर’ या ‘बहादुर’ होता है। मंगोल मध्य एशिया की एक असभ्य और बर्बर जाति थी।

प्रश्न 10.
तैमूर के भारत पर आक्रमण के क्या उद्देश्य थे?
उत्तर :
तैमूर के भारत पर आक्रमण के उद्देश्य निम्नलिखित थे

  1.  ख्याति अर्जित करना।
  2.  धन लूटना।
  3.  इस्लाम धर्म का प्रचार करना।

प्रश्न 11.
क्वारिलताई संस्था क्या थी?
उत्तर :
चंगेज खान के परिवार के सदस्यों में राज्य के उत्तरदायित्व का निर्धारण क्वारिलताई नामक परिषद् करती थी। यह मुखियाओं की परिषद् होती थी। उत्तरदायित्व के अन्तर्गत राज्य के भविष्य के निर्णय, अभियान, लूट के माल का बँटवारा, चरागाह भूमि का प्रबन्ध आदि आता था।

प्रश्न 12.
चंगेज खान किस देश का राष्ट्रनायक है?
उत्तर :
चंगेज खान मंगोलिया का राष्ट्रनायक है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘बर्बर’ से क्या आशय है?
उत्तर :
बर्बर (अंग्रेजी में बारबेरियन) शब्द यूनानी भाषा के बारबरोस (Barbaros) शब्द से उत्पन्न हुआ है, जिसका आशय गैर-यूनानी लोगों से है जिनकी भाषा यूनानियों को बेतरतीब कोलाहल ‘बर-बर’ के समान लगती थी। यूनानी ग्रन्थों में बर्बरों को बच्चों के समान दिखाया गया है जो सुचारू रूप से बोलने या सोचने में असमर्थ, डरपोक, विलासप्रिय, निष्ठुर, आलसी, लालची और स्वशासन चलाने में असमर्थ थे।

प्रश्न 2.
मंगोलों की सामाजिक दशा के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर :
मंगोलों की सामाजिक दशा

  1. नृजातीय सम्बन्धों और एक भाषा ने मंगोल लोगों को आपस में जोड़े रखा था। समाज अनेक पितृवंशीय पक्षों में विभाजित था।
  2. धनी लोगों के परिवार विशाल होते थे। उनके पास अधिक भू-क्षेत्र था, वे स्थानीय राजनीति में भी पर्याप्त दखल रखते थे।
  3. खाद्य-सामग्री की समाप्ति, अकाल या सूखे की स्थिति में मंगोलों को भोजन की तलाश में यहाँ-वहाँ भटकना पड़ता था।
  4.  लूटपाट करने या आक्रमण करने के लिए मंगोल लोग आपस में परिसंघ भी बना लेते थे।

प्रश्न 3.
चंगेज खान के सैन्य संगठन का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
चंगेज खान का सैन्य संगठन

  1. प्रारम्भ में चंगेज खान की सेना स्टैपी मैदानों की पुरानी दशमलव पद्धति के अनुसार गठित की गई थी 10,100,10000,10000 सैनिकों में विभाजित थी।
  2.  चंगेज खान ने बाद में इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया। उसने नवीन सैन्य इकाइयों की स्थापना की।
  3.  उसकी सेना अनुशासित थी। आज्ञा का उल्लंघन करने पर दण्ड दिया जाता था।
  4. चंगेज खान अपने सैनिकों से पुत्रवत् प्रेम करता था।

प्रश्न 4.
‘यास क्या है? इसकी उपयोगिता का वर्णन कीजिए
उत्तर :
‘यास’ को चंगेज खान की विधिसंहिता कहा जाता है। इस बात की पूरी सम्भावना है कि ‘यास मंगोल जाति की ही प्रथागत परम्पराओं का एक संकलन था। ‘यास मंगोलों को समान आस्था रखने के आधार पर संयुक्त करने में सफल हुआ। यास ने मंगोलों को आत्मविश्वास प्रदान किया। निश्चित रूप से यास एक शक्तिशाली सिद्धान्त था जिसने मंगोल साम्राज्य की संरचना में अहम् भूमिका निभाई थी।

प्रश्न 5.
मंगोलों की पराजय के दो प्रमुख कारणों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
मंगोलों की पराजय के क़ई कारण थे, जिनमें से दो प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

  1. मंगोल सेना की निर्बलताएँ—यद्यपि मंगोल सेना संख्या में अधिक होती थी, परन्तु मंगोल सैनिक संगठित एवं नियोजित रूप में युद्ध करने की कला से अनभिज्ञ थे। उनमें धैर्य एवं सहनशीलता का भी पर्याप्त अंभाव था। यही कारण है कि कई बार दिल्ली के समीप आकर भी बिना युद्ध किए ही वापस लौट गए।
  2. मंगोल सेनापतियों में योग्यता का अभाव–अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में भारत पर मंगोलों के जो भी आक्रमण हुए, उन सबका संचालन करने वाले सेनापतियों में युद्ध संचालन करने की योग्यता का पूर्ण अभाव था। वे अपने कुशल नेतृत्व और कूटनीति द्वारा मंगोल सेनाओं को युद्ध में सफलता प्राप्त कराने की दृष्टि से पूर्णत: अयोग्य सिद्ध हुए।

प्रश्न 6.
तैमूर के भारतीय आक्रमण के प्रभावों को रेखांकित कीजिए।
उत्तर :
तैमून के भारतीय आक्रमण के प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित थे

  1. तुगलक वंश पर घातक प्रहार–तैमूर के आक्रमण का सबसे प्रमुख परिणाम यह हुआ कि इससे तुगलक वंश पर घातक प्रहार हुआ और उसका पतन हो गया।
  2. अकाल तथा रोगों का प्रकोप-तैमूर ने लाखों व्यक्तियों को मौत के घाट उतार दिया। उनकी लाशों के सड़ने से महामारी फैल गई और हजारों व्यक्ति मारे गए। तैमूर की. लूटमार से अनेक . गाँव तथा नगर उजड़ गए और वहाँ अकाल की स्थिति पैदा हो गई।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए
(अ) चंगेज खान
(ब) तैमूर
उत्तर :
(अ) चंगेज खान : चंगेज खान मंगोल सरदार हलाकू खान का भतीजा था। वह बड़ा ही क्रूर तथा अत्याचारी था। चंगेज खान ने अपनी वीरता व शौर्य से सम्पूर्ण मध्य एशिया को रौंद डाला।
उसे ‘पृथ्वी का प्रकोप’ कहा जाता था। 1221 ई० में उसने भारत पर भी आक्रमण किया था, लेकिन भीषण गर्मी व इल्तुतमिश की दूरदर्शिता के कारण वह वापस लौट गया था।

(ब) तैमूर :
तैमूर बरलास तुर्क शाखा का एक प्रभावशाली नेता था। उसे बचपन से कुरान पढ़ने, तलवार चलाने और घोड़े पर चढ़ने का शौक था। तैमूर लंग शक्ति और तलवार का धनी था। उसने भारत पर 1398 ई० में आक्रमण करते हुए कहा था, “भारत पर आक्रमण करने का हमारा उद्देश्य काफिरों के विरुद्ध लड़ाई करना, पैगम्बर के आदेशानुसार उन्हें इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए बाध्य करना, उस देश को बहुदेववाद और अन्धविश्वास से छुटकारा दिलाना तथा मंदिरों की मूर्तियों को तोड़-फोड़ करना है।” वस्तुतः तैमूर लंग का मूल उद्देश्य भारत की अपार सम्पत्ति एवं धन लूटना भी था। इसलिए तैमूर ने अपने आक्रमणों के अंतर्गत पंजाब एवं दिल्ली के आस-पास के क्षेत्रों को भी जी-भरकर लूटा था। उसने दिल्ली में तीन दिन तक सामूहिक कत्लेआम करवाया था और इस कत्लेआम में एक लाख सैनिकों को भी मरवा दिया था। तैमूर के आक्रमण के परिणामस्वरूप हिन्दू और मुस्लिमों में विनाशकारी द्वेष की भावना जाग्रत हो गई। हिन्दुओं के मंदिरों को बहुत अधिक क्षति पहुँचाई गई और बहुत-से हिंदुओं को मुसलमान बना दिया गया, जिससे हिन्दू जनता की धार्मिक भावना को बहुत अधिक ठेस पहुँची। तैमूर ने भारत को बुरी तरह लूटा और यहाँ के मन्दिरों को लूटकर देश को निर्धन बना दिया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चंगेज खान का संक्षिप्त जीवन परिचय देते हुए उसके साम्राज्य विस्तार की विवेचना कीजिए।
उत्तर :
चंगेज खान का जन्म 1162 ई० के लगभग आधुनिक मंगोलिया के उत्तरी भाग में ओनोन नदी के निकट हुआ था। उसका प्रारम्भिक नाम तेमुजिन था। उसके पिता कियात कबीले के मुखिया थे। उसके पिता की हत्या कर दी गई थी। तेमुजिन की माता ने उसका तथा उसके अन्य भाइयों का पालन-पोषण बड़ी कठिनाई से किया था। युवा होने पर तेमुजिन ने कैराइटे लोगों के शासक व अपने पिता के सगे भाई जो वृद्ध थे, तुगरिल ऊर्फ ओंग खान के साथ पुराने रिश्तों को स्थापित किया। 1180 और 1190 के दशकों में तेमुजिन और ओंग खाने में मित्रवत् सम्बन्ध रहे। उसने अपने पिता के हत्यारे शक्तिशाली तातार कैराइट और ओंग खान के विरुद्ध 1203 में युद्ध छेड़ा। 1206 तक तमाम शक्तिशाली लोगों को परास्त करने के बाद तेमुजिन स्टेपी प्रदेश की राजनीति में सबसे प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में उभरा। उसकी इस प्रतिष्ठा को मंगोल कबीले के सरदार (कुरिलताई) की एक सभा में मान्यता प्राप्त हुई और उसे चंगेज खान’ की उपाधि के साथ मंगोलों का महानायक घोषित किया गया। 1206 ई० में कुरिलताई में मान्यता मिलने से पूर्व चंगेज खान ने मंगोल लोगों को एक बड़ी सैन्य शक्ति के रूप में संगठित कर लिया था। चंगेज खान की पहली इच्छा चीन पर विजय प्राप्त करने की थी। चीन उस समय तीन भागों में विभक्त था। ये थे-उत्तरी-पश्चिमी प्रान्तों के तिब्बती मूल के सी सिआ लोग, जरचेन लोगों का चिन राजवंश और दक्षिण चीन जिसे पर शुंग राजवंश का शासन था।1209 में सी-सिआ परास्त हो गए। 1213 में चीन की महान् दीवार का अतिक्रमण हो गया। 1215 में पेकिंग नगर को लूटा गया। चिन वंश के विरुद्ध 1234 तक लम्बी लड़ाइयाँ चलीं पर चंगेज खान अपने अभियानों की प्रगति से पूरी तरह सन्तुष्ट था। 1218 तक मंगोलों का साम्राज्य अमू दरिया, तुरान और ख्वारज्म राज्यों तक विस्तृत हो गया था।1219 और 1221 ई० तक के अभियानों में बड़े नगरों ओट्रार, बुखारा, समरकन्द, बल्ख, गुरगंज, मर्व, निशापुर और हेरात ने मंगोल सेनाओं के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। अपने जीवन का अधिकांश भाग युद्धों में व्यतीत कर देने के बाद 1227 में चंगेज खान की मृत्यु हो गई।

प्रश्न 2.
चंगेज खान और मंगोलों का विश्व इतिहास में क्या स्थान है? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर :
तेरहवीं शताब्दी ई० के चीन, ईरान और पूर्वी यूरोप के शहरों के बहुत-से निवासी चंगेज खान द्वारा किए गए स्टैपी के नर-संहारों को भय और घृणा की दृष्टि से देखते थे। फिर भी मंगोलों के लिए चंगेज खान अब तक का सर्वाधिक महान् शासक था। उसने मंगोलों को एकजुट किया। लम्बे समय से चले आ रहे  जनजातीय संघर्षों और चीनियों के शोषण से मुक्ति दिलवाई साथ ही उन्हें समृद्ध बनाया। एक शानदार पार महाद्वीपीय साम्राज्य गठित किया और व्यापार के रास्तों और बाजारों को खोल दिया। मंगोलों और किसी भी घुमक्कड़ शासन प्रणाली से सम्बन्धित जिस तरह के प्रलेख प्राप्त हुए हैं-उनसे यह समझना वास्तव में कठिन है कि वह कौन-सा ऐसा प्रेरणा स्रोत था जिसने व्यक्तियों के विभाजित हुए समूहों को संगठित कर साम्राज्य निर्माण की महत्त्वाकांक्षा को जाग्रत किया। मंगोल साम्राज्य के संस्थापक की प्रेरणा एक प्रभावशाली शक्ति बनी रही। चौदहवीं शताब्दी ई० के अन्त में एक अन्य राजा तैमूर, जो एक विश्वव्यापी राज्य की आकांक्षा रखता था, ने स्वयं को राजा घोषित करने में संकोच का अनुभव किया, क्योंकि वह चंगेज खान का वंशज नहीं था। जब उसने अपने स्वतन्त्र प्रभुत्व की घोषणा की तो स्वयं को चंगेज खान का दामाद बताया। वर्तमान में दो दशकों के रूसी नियन्त्रण के पश्चात् मंगोलिया एक स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान बना चुका है। उसने चंगेज खान को एक राष्ट्र-नायक के रूप में लिया है जिसका जनता सम्मान करती है और जिसकी उपलब्धियों का वर्णन अभिमान के साथ किया जाता है। मंगोलिया के इतिहास में इस निर्णायक समय पर चंगेज खान एक बार फिर मंगोलों के लिए एक आराध्य प्रतिमा के रूप में उभरकर सामने आया है, जो महान् अतीत की स्मृतियों को जाग्रत कर राष्ट्र की पहचान बनाने की दिशा में शक्ति प्रदान करेगा।

प्रश्न 3.
तैमूर के आक्रमण का वर्णन करते हुए उसके प्रभाव का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर :
तैमूर का परिचय तैमूर का जन्म 1336 ई० में ट्रांस ऑक्सियाना प्रदेश के केश नामक स्थान पर हुआ था। उसके पिता का नाम अमीर तुर्गे था जो वरलास शाखा को प्रमुख था। 1369 ई० में तैमूर ने समरकन्द के सिंहासन पर अधिकार कर लिया। सिंहासन पर अधिकार करने के उपरान्त उसने ईरान,  अफगानिस्तान, इराक, ख्वारिज्म आदि देशों को जीत लिया। इसके बाद उसने भारत पर आक्रमण करने की योजना बनाई।

तैमूर के भारत पर आक्रमण के उद्देश्य

तैमूर के भारत पर आक्रमण करने के निम्नलिखित उद्देश्य थे

  1.  ख्याति अर्जित करना : तैमूर अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी था। वह भारत पर विजय प्राप्त करके ख्याति प्राप्त करना चाहता था।
  2.  धन लूटना-तैमूर भारत की धन : सम्पदा की ओर भी आकर्षित हुआ था; अत: धन लूटने की | लालसा से प्रेरित होकर भी उसने भारत पर आक्रमण किया।
  3.  इस्लाम धर्म का प्रसार : तैमूर ने स्वयं ही यह घोषित किया था कि भारत पर आक्रमण करने  का उसका उद्देश्य इस्लाम धर्म को प्रचार करना है।

तैमूर का भारत पर आक्रमण

सन् 1398 ई० में तैमूर ने 92,000 सैनिकों सहित भारत पर आक्रमण किया उस समय दिल्ली का सुल्तान मुहम्मद तुगलक था। उसने तैमूर का सामना किया, परन्तु वह तैमूर से परास्त होकर गुजरात की ओर भाग गया। तैमूर ने इस युद्ध से पूर्व एक लाख युद्धबन्दियों को कत्ल करवा दिया। तैमूर 15 दिन तक दिल्ली में रहा, वहाँ उसने खूब लूटमार मचायी। वह फिरोजाबाद, मेरठ, हरिद्वार होता हुआ काँगड़ा तथा जम्मू को लूटता हुआ समरकन्द लौट गया। इस मध्य उसने हजारों व्यक्तियों को दास बना लिया। वह अनेक कलाकारों को भी पकड़कर अपने साथ समरकन्द ले गया। उसने खिज्र खाँ को मुल्तान, लाहौर तथा दिमालपुर का शासक नियुक्त किया।

तैमूर के आक्रमण का प्रभाव

तैमूर के आक्रमण के प्रभाव निम्नलिखित थे

  1. तुगलक वंश का पतन-तैमूर के भारतीय आक्रमण का सबसे घातक प्रभाव तुगलक वंश पर | पड़ा। उसकी शक्ति और प्रतिष्ठा धूल में मिल गई और 1414 ई० में मुहम्मद तुगलक की मृत्यु के पश्चात् तुगलक वंश का अन्त हो गया।
  2. दिल्ली सल्तनत का विघटन तैमूर का आक्रमण दिल्ली सल्तनत के लिए पक्षाघात का रोग सिद्ध हुआ। दिल्ली सल्तनत को ऐसा धक्का लगा कि इसके बाद उसकी स्थिति में सुधार न हो पाया। जौनपुर, मालवा, गुजरात और अन्य प्रान्त स्वतन्त्र हो गए। सम्पूर्ण भारत छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त हो गया केन्द्रीय शक्ति पूर्णत: नष्ट हो गई तथा सर्वत्र अव्यवस्था फैल गई।
  3. अकाल तथा रोगों का प्रकोप-तैमूर ने कई नगरों तथा गाँवों को लूटा तथा उन्हें उजाड़ दिया। उसने हजारों लोगों को मार डाला जिससे चारों ओर अकाल तथा रोगों का प्रकोप छा गया।
  4.  कला पर प्रभाव-तैमूर के आक्रमण से भारतीय कला और साहित्य की प्रगति अवरुद्ध हो गई। तैमूर अनेक बहुमूल्य कलाकृतियों और शिल्पियों को अपने साथ समरकन्द ले गया, किन्तु इससे भारतीय कला और शैली का विस्तार मध्य एशिया तक अवश्य हुआ।
  5.  आर्थिक प्रभाव-तैमूर के आक्रमण से उत्तरी भारत की आर्थिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई, तैमूर अपने साथ भारत का बहुत-सा धन ले गया। तैमूर के आक्रमण से कृषि की व्यवस्था भी बिगड़ गई थी। इस प्रकार, तैमूर का आक्रमण दिल्ली सल्तनत के लिए पक्षाघात का रोग सिद्ध हुआ। डॉ० आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने तैमूर के आक्रमण के विषय में ठीक ही लिखा है, “भारत को ‘जितनी क्षति और दुःख तैमूर ने पहुँचाया, उतना उससे पहले किसी आक्रमणकारी ने एक आक्रमण में नहीं पहुँचाया।”

प्रश्न 4.
सल्तनत काल में भारत पर मंगोल आक्रमणों तथा उनके परिणामों का वर्णन कीजिए। अथवा अलाउद्दीन खिलजी की मंगोल नीति का परीक्षण कीजिए। अथवा बलबन तथा अलाउद्दीन खिलजी की मंगल नीतियों की तुलना कीजिए।
उत्तर :
मंगोलों का परिचय मंगोल का शाब्दिक अर्थ ‘दिलेर या ‘बहादुर’ होता है। मंगोल मध्य एशिया की एक असभ्य और बर्बर जाति थी। इस जाति के लोग अत्यन्त वीर, लड़ाकू, साहसी, अत्याचारी और निर्दयी होते थे। उन्हें व्यक्तियों के सिरों की मीनार बनाने, नगरों को जलाकर राख करने में बड़ा आनन्द आता था। उनकी आकृति भयानक, रंग पीला, चेहरा चपटा और चौड़ा, बाल काले, आँखे तिरछी, गाल की हड्डियाँ उभरी हुई, कान बड़े और खोपड़ी गोल होती थी। इनका प्रमुख नेता चंगेज खान था जिसके नेतृत्व में  मंगोलों ने कुछ ही वर्षों में बल्ख, बुखारा, समरकन्द चीन तथा मध्य एशिया के अनेक राज्यों को लूटकर और जलाकर पूरी तरह नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था।

दिल्ली सुल्तानों की मंगोल नीति

भारत एक दुर्ग के समान है। इसमें प्रवेश करने का एकमात्र स्थल मार्ग उत्तर-पश्चिम से ही है। इसी मार्ग से भारत पर सिकन्दर, महमूद गजनवी तथा मुहम्मद गोरी आदि ने आक्रमण किए थे। सल्तनत काल का आरम्भ होने के समय से ही इस सीमा से प्रविष्ट होने वाले मंगोलों के आक्रमण होने लगे थे। ख्वारिज्म के शाह ने पंजाब को अपने साम्राज्य का अंग बना लिया था। मंगोलों ने अफगानिस्तान, गजनी तथा पेशावर तक अपनी विजय-पताका फहराकर भारत पर सुनियोजित ढंग से आक्रमण करना आरम्भ कर दिया था। अतएव दिल्ली सल्तनत काल के आरम्भ में ही, मंगोलों के आक्रमण से सीमा को सुरक्षित रखने की समस्या सुल्तानों के समक्ष उत्पन्न हुई। इस समस्या को हल करने के लिए विभिन्न राजवंशों के सुल्तानों ने अपनी विभिन्न नीतियों का प्रयोग किया।

(क)
दास वंश
दास वंश के शासकों के समय हुए मंगोल आक्रमणों और इन आक्रमणों को रोकने हेतु दास वंश के शासकों द्वारा किए गए प्रयासों का संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है

  1. इल्तुतमिश का शासनकाल : दास वंश का प्रथम शासक कुतुबद्दीन ऐबक था। अल्प आयु में ही मृत्यु हो जाने के कारण वह शासन के कार्यों को भली-भाँति न देख सका। उसके उत्तराधिकारी इल्तुतमिश के शासनकाल (1221 ई०) में मंगोल नेता चंगेज खाने, ख्वारिज्म के शाह जलालुद्दीन मगबर्नी का पीछा करता हुआ भारत की ओर आया था। शाह जलालुद्दीन ने सिन्ध को पार करके दोआब प्रदेश को अपना शरण-स्थल बनाना चाहा था, किन्तु दूरदर्शी इल्तुतमिश ने शाह जलालुद्दीन को सहायता नहीं दी। अत: इल्तुतमिश ने कूटनीति से कार्य करते हुए चंगेज खान से शत्रुता मोल नहीं ली थी। अत: चंगेज खान ने सिन्धु नदी को पार नहीं किया और वह वापस लौट गया। इस प्रकार, मंगोलों की भयंकर आँधी टल गई।
  2.  रजिया के उत्तराधिकारियों का शासनकाल : चंगेज खान के चले जाने के बाद मंगोलों ने अफगानिस्तान को केन्द्र बनाकर भारत पर आक्रमण किया। मंगोलों ने सिन्धु नदी के पार स्थित प्रदेशों पर अनेक आक्रमण किए। इन प्रदेशों ने रजिया से समझौता करना चाहा, किन्तु दूरदर्शी सुल्ताना रजिया ने तटस्थ नीति का पालन किया और अपने साम्राज्य को मंगोलों के आक्रमणों से बचाए रखा।
  3.  रजिया के उत्तराधिकारियों का शासनकाल : रजिया का पतन 1240 ई० में अमीरों की दलबन्दी के कारण हुआ। उसके शासनकाल के उपरान्त 1241 ई० में मंगोल सरदार बहादुर ताहिर’ ने लाहौर को लूटा। 1245 ई० में मुल्तान पर हसन कार्लंग’ ने और सिन्ध पर कबीर खाँ के वंशजों ने अधिकार कर लिया। 1247 ई० में मंगोल नेता सली बहादुर ने मुल्तान को घेरकर लाहौर पर आक्रमण किया। लाहौर के अमीरों ने सली बहादुर के सामने आत्म-समर्पण कर दिया। इस प्रकार, मुल्तान व सिन्ध के प्रदेश दिल्ली सल्तनत से कुछ समय तक कट गए। 1250 ई० में इन पर पुन: दासवंशीय शासकों की विजय पताका फहराने लगी, फिर भी प्रान्तीय सूबेदारों के षड्यन्त्र मंगोलों के साहस में निरन्तर वृद्धि करते रहे।
  4. मंगोल सरदार हलाकू का अभियान  :सुल्तान नासिरुद्दीन के शासनकाल में मंगोल नेता हलाकू ने दिल्ली से मित्रता बनाए रखी, किन्तु बलबन के सुल्तान होते ही मंगोलों ने भारत पर पुनः आक्रमण करने आरम्भ कर दिए। बलबन ने हलाकू आक्रमणों को रोकने के लिए सीमान्त प्रदेशों पर छावनियों की व्यवस्था का कार्य अपने पुत्रों को सौंप दिया। उन्होंने इन प्रदेशों में । मंगोलों की गतिविधियों को रोकने के लिए विशाल दुर्गों का निर्माण कराया।
  5. तैमूर खाँ का आक्रमण : 1285 ई० में मंगोल सरदार तैमूर खाँ ने आक्रमण किया। इस | आक्रमण में बलबन का पुत्र मुहम्मद मारा गया था।

(ख)
खिलजी व अन्य वंश

खिलजी वंश तथा तुगलक वंश के शासकों के समय में होने वाले मंगोल आक्रमणों का उल्लेख अग्रवत् । है

  1. खिलजी का शासनकाल–अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में मंगोलों ने बार-बार आक्रमण किए। 1299 ई० में साल्दी व कुतलुग ख्वाजा, 1303 ई० में तार्गी औरी 1305 ई० में अलीबेग, 1306 ई० में कूबक और 1307 ई० में इकबाल मन्दा के नेतृत्व में मंगोलों ने आक्रमण किए, किन्तु अलाउद्दीन की विशाल सेना के सामने इन मंगोल आक्रमणकारियों का सदैव नतमस्तक होना पड़ा।
  2. निर्बल सुल्तानों का काल- अलाउद्दीन खिलजी के बाद दिल्ली सल्तनत का पतन आरम्भ हो गया। तुगलक शासकों के काल में भी मंगोलों के आक्रमण का ताँता बँधा रहा। इस काल में तरमाशीरीन के नेतृत्व में मंगोलों का आक्रमण महत्त्वपूर्ण रहा। कालान्तर में 1398 ई० में तैमूर लंग ने दिल्ली को तहस-नहस कर डाला और वहाँ भयंकर रक्तपात किया। कई महीनों तक दिल्ली उजाड़ श्मशान-सी दिखाई देती रही। अन्ततः मंगोलों के आक्रमण दिल्ली सल्तनत के विघटन का एक महत्त्वपूर्ण कारण सिद्ध हुए।

मंगोलों के आक्रमण का प्रभाव

मंगोलों के आक्रमण के निम्नलिखित प्रभाव हुए

  1.  मंगोलों के आक्रमणों को रोकने में व्यस्त रहने के कारण सुल्तान प्रशासकीय कार्यों के प्रति
    जागरूक न रह सके।
  2. इन्हीं आक्रमणों के कारण प्रान्तीय सूबेदार स्वतन्त्र रूप से विद्रोह करते रहे, क्योंकि सुल्तान इन
    मंगोल आक्रमणों को दबाने में लगे रहते थे।
  3. सुल्तानों को विवश होकर दमेन नीति का आश्रय लेना पड़ा था, जिसके कारण प्रजा सुल्तानों से अप्रसन्न रही।

कुछ सुल्तानों ने सीमा नीति की उपेक्षा भी की, जिससे मंगोलों के आक्रमण निरन्तर जारी रहे और विद्रोहों की भी अधिकता रही। इतना ही नहीं, एक सुल्तान की मृत्यु पर दूसरे सुल्तान का  सिंहासनारोहण तलवार के द्वारा ही सम्भव था। इन कारणों से मंगोलों को भारतीय आक्रमणों के समय कभी-कभी अपार सफलता मिलती थी, जो उन्हें पूर्वी आक्रमण के लिए प्रेरणा देती थी।

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