UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 8 विश्ववन्द्याः कवयः

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 8
Chapter Name विश्ववन्द्याः कवयः
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 8 विश्ववन्द्याः कवयः

श्लोकों का ससन्दर्भ अनुवाद

वाल्मीकिः

(1) कवीन्दं नौमि ……………………… कोविदाः।।

[ कवीन्दु (कवि +इन्दुम्) = कविरूपी चन्द्रमा क़ो। नौमि – नमस्कार करता हूँ। चन्द्रिकामिव (चन्द्रिकाम् + इव) = चाँदनी के सदृश। चिन्वन्ति = चुनते हैं, चुगते हैं। कोविदाः = विद्वान् लोग।]

सन्दर्भ – प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘विश्ववन्द्याः कवयः’ नामक पाठ के ‘वाल्मीकिः’ शीर्षक से उधृत है। इसमें आदिकवि वाल्मीकि की वन्दना की गयी है।

[विशेष – इस पाठ के ‘वाल्मीकिः’ शीर्षक के अन्तर्गत आने वाले सभी श्लोकों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

अनुवाद – मैं कवियों में चन्द्रमा के सदृश वाल्मीकि को नमस्कार करता हूँ, जिनकी रामायण की कथा का विद्वान् लोग उसी प्रकार रसपान करते हैं, जैसे चकोर चाँदनी का (रसपान) करते हैं।

(2) वाल्मीकिकविसिंहस्य ………………………. पदम् ।।

[ कवितावनचारिणः = कवितारूपी वन में विचरण करने वाले (सिंह)। शृण्वन् = सुनते हुए। याति = प्राप्त होता है। परं पदम् = मोक्ष को।]

अनुवाद – कवितारूपी वन में विचरण करने वाले कवि वाल्मीकिरूपी सिंह की रामकथारूपी गर्जन (घोष) को सुनकर कौन (ऐसा व्यक्ति है, जो) मोक्ष प्राप्त नहीं करता (अर्थात् रामकथा सुनकर सभी लोग मोक्ष के अधिकारी बन जाते हैं)।

(3) कूजन्तं ………………………. वाल्मीकिकोकिलम् ।।

[कूजन्तम = कूजते (बोलते) हुए। रामरामेति (राम-राम +इति) = राम-राम यह (कूजते हुए)| आरुह्य = चढ़कर। कोकिल = पुस्कोकिल (नर कोयल, इसी का कण्ठ मधुर होता है, मादा का नहीं। मादा को
‘कोकिला’ कहते हैं।)]

अनुवाद – कवितारूपी शाखा (डाली) पर चढ़कर मधुर-मधुर अक्षरों में (मधुर ध्वनि से) ‘राम-राम’ शब्द का कूजन करते हुए वाल्मीकिरूपी कोकिल (नर कोयल) की मैं वन्दना करता हूँ।

विशेष – आशय यह है कि महर्षि वाल्मीकि-रचित ‘रामायण’ कोकिल स्वर के समान मधुर है, जिसमें ‘श्रीराम के नाम-स्मरणपूर्वक उनके सुन्दर चरित्र का गायन किया गया है (कोकिल जिस प्रकार वृक्ष की शाखा पर बैठकर पंचम स्वर में बोलता है, वैसे ही वाल्मीकि ने कवितारूपी शाखा पर बैठकर कूजन किया।)

व्यासः

(1) श्रवणाञ्जलिपुटपेयं ………………………. वन्दे।।

[ श्रवणाञ्जलिपुटपेयम् (श्रवण +अञ्जलिपुट +पेयम्) = कानरूपी अंजलिपुट (दोनों हाथों को मिलाकर बड़े दोने के आकार का रूप देना, जिससे जल आदि पीते हैं) से पीने योग्य विरचितवान् = रचा। भारताख्यममृतम् (भारत + आख्यम् + अमृतम्) – महाभारत नामक अमृता तमहमरागमकृष्णम् (तम् +अहम् +अरागम् +अकृष्णम्) =राग (आसक्ति) और कल्मष या पाप (कृष्णम्) से रहित उन (व्यास) को मैं।]

सन्दर्भ – यह श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘विश्ववन्द्याः कवयः’ नामक पाठ के ‘व्यासः’ शीर्षक से उद्धृत है। इसमें कृष्णद्वैपायन व्यास की वन्दना की गयी है।

अनुवाद – मैं उन कृष्णद्वैपायन (व्यासदेव) की वन्दना करता हूँ, जो राग (द्वेष) और पाप से रहित हैं तथा जिन्होंने कानरूपी अञ्जलि द्वारा पीये जाने योग्य महाभारत नामक अमृत की सृष्टि की है। (आशय यह है कि जिस प्रकार प्यासा आदमी अंजलि से पानी पीकर पूर्ण तृप्त हो जाता है, उसी प्रकार निष्पाप व्यास जी द्वारा रचित महाभारत भी ऐसा अमृतमय है कि उसे कानों से मन भरकर सुनने से हृदय परम तृप्ति का अनुभव करता है।)

विशेष – कवि ने ‘अकृष्णं कृष्णद्वैपायनं’ में जो कृष्ण (काला या कल्मषयुक्त) नहीं है, फिर भी कृष्ण नामधारी है, में विरोधाभास का चमत्कार प्रदर्शित किया है।

(2) नमः सर्वविदे तस्मै …………………… भारतम्।।

[सर्वविदे = सब कुछ जानने वाले (सर्वज्ञ) को। कविवेधसे = कविरूपी ब्रह्मा को (वेधस् = ब्रह्मा)। सरस्वत्या = वाणी द्वारा, सरस्वती नदी द्वारा (सरस्वती नदी का वेदों में उत्कृष्ट वर्णन है। वह अतीव पुण्यमयी मानी गयी है)। वर्षमिव (वर्षम् +इव) = भारतवर्ष के सदृश। भारतम् = महाभारत को।]

सन्दर्भ – पूर्ववत्।।

अनुवाद – मैं उन सर्वज्ञ कवि ब्रह्मा श्री व्यास जी को नमने करता हूँ, जिन्होंने अपनी वाणी से पुण्यतम ‘महाभारत’ की रचना उसी प्रकार की है, जिस प्रकार ब्रह्मा ने सरस्वती नदी द्वारा भारत को पुण्यभूमि बना दिया है। ( भाव यहें है कि ब्रह्माजी ने जिस प्रकार पुण्यतोया सरस्वती की सृष्टि द्वारा भारत देश को पुण्यभूमि बना दिया, उसी प्रकार व्यास जी ने भी अपनी वाणी के बल पर महाभारत काव्य को पुण्यमय बना दिया।)

विशेष – महर्षि वेदव्यास ने ‘महाभारत’ में धर्म के सच्चे स्वरूप का उद्घाटन किया है, जिसे पढ़कर लोग धर्माचरण करना सीखें और पुण्यसंचय द्वारा मोक्ष प्राप्त करें।

(3) नमोस्तु ते ……………………… प्रदीपः।।

[फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्रः (फुल्ल +अरविन्द +आयत +पत्रनेत्रः) = खिले हुए कमल की चौड़ी पंखुड़ी के सदृश (विशाल) नेत्र वाले (हे व्यासदेव)! भारत= महाभारत प्रज्वालितः = जलाया। ज्ञानमयः = ज्ञान से परिपूर्ण।]

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

अनुवाद – खिले हुए कमल की चौड़ी पंखुड़ियों के सदृश (विशाल) नेत्र वाले विराट् बुद्धि वाले हे व्यासदेव! आपको नमस्कार है, जिन आपने ‘महाभारत’ रूपी तेल से पूर्ण ज्ञानमय दीपक जलाया है। (आशय यह है कि दीपक जिस प्रकार अन्धकार को दूर करके मनुष्य को रास्ता दिखाता है, दीपक में भरा तेल ही उस दीपक द्वारा प्रकाश देता है, उसी प्रकार महाभारत में ज्ञानरूपी तेल है, जो लोगों का हमेशा मार्गदर्शन करता रहेगा। उसी प्रकार बुद्धि वाले श्री व्यासदेव ने ‘महाभारत’ के रूप में सदा तेल से भरे रहने वाले ऐसे दीपक को जलाया है, जो मनुष्यों के अज्ञानान्धकार को दूर कर उन्हें निरन्तर ज्ञानरूपी प्रकाश देता रहेगा)।

विशेष – ‘महाभारत’ एक ऐसे विशाल महासागर के समान है, जिसमें विश्व का सारा ज्ञान भर दिया गया है, इसीलिए इसके विषय में कहा गया है कि यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्’ (जो इसमें नहीं है, वह कहीं नहीं है), अर्थात् संसार में जो कुछ भी जानने योग्य है, वह सब इसमें है। यह दावा विश्व के किसी भी अन्य ग्रन्थ के लिए नहीं किया जा सकता।

कालिदासः

(1) पुरा कवीनां ………………………… बभूव ।।

[पुरा = प्राचीनकाल में। कवीनां गणनाप्रसङ्ग – कवियों की गिनती के प्रसंग में (अर्थात् कौन कवि सर्वश्रेष्ठ है और कौन द्वितीय स्थान पर है, कौन तृतीय स्थान पर-इस प्रकार की गणना या कवियों के वरिष्ठता-क्रम को तय करने के अवसर पर)। कनिष्ठिकाधिष्ठितकालिदासः (कनिष्ठिका +अधिष्ठित +कालिदासः) = सबसे छोटी अँगुली पर कालिदास का नाम रखा गया (किसी वस्तु की गणना करते समय सबसे पहली गिनती सबसे छोटी अँगुली पर अँगूठा रखकर ही होती है कि पहला अमुक और तब दूसरे स्थान के लिए अनामिका पर अँगूठा छुआया जाता है। तीसरे के लिए मध्यमा और चौथे के लिए तर्जनी का प्रयोग किया जाता है। यह लोक-व्यवहार से सिद्ध है)। अद्यापि (अद्य + अपि) = आज तक भी। ततुल्यकवेरभावादनामिका (तत् +तुल्य कवेः +अभावात् +अनामिका) =उसके (कालिदास के) तुल्य (बराबरी के) कवि के अभाव के कारण (कनिष्ठिका से अगली अँगुली का नाम) अनामिका (अर्थात् बिना नाम वाली)। सार्थवती = सार्थक। बभूव = हुआ।]

सन्दर्भ – यह श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के विश्ववन्द्याः कवयः’ नामक पाठ के ‘कालिदासः’ शीर्षक खण्ड से उद्धृत है। इसमें कालिदास की श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया गया है।

अनुवाद – (कभी) प्राचीनकाल में कवियों की ( श्रेष्ठता की) गणना के अवसर पर (सबसे पहले) कनिष्ठिका पर कालिदास का नाम गिना गया। आज तक उनके जोड़ के दूसरे कवि के अभाव के कारण (कनिष्ठिका से अगली अँगुली का नाम) अनामिका (बिना नाम वाली) पड़ना सार्थक हुआ अर्थात् आज भी कालिदास के समान दूसरा कवि नहीं है।

विशेष – कनिष्ठिका से अगली अँगुली का नाम ‘अनामिका’ तो प्राचीनकाल से ही चला आ रहा है। कवि की सूझ इसमें है कि उसने कालिदास की सर्वश्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए कवियों की गणना के प्रसंग में इस अँगुली का नाम ‘अनामिका’ पड़ने की कल्पना की। यह हेतूत्प्रेक्षा का चमत्कार है।

(2) कालिदासगिरां …………………….. मादृशाः ।।

[कालिदासगिराम = कालिदास की वाणी (या कविता) को। विदुः = जानते हैं। नान्ये (न +अन्ये) = दूसरे नहीं। मादृशाः = मुझ सदृश (अल्पज्ञ)। ]

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

अनुवाद – कालिदास की वाणी के सारे (अर्थात् मर्म) को या तो स्वयं कालिदास जानते हैं या (भगवती) सरस्वती या चतुर्मुख (चार मुख वाले) ब्रह्मा। मुझ जैसे अन्य (अल्पज्ञ) नहीं जानते।

विशेष – कालिदास इतनी अलौकिक प्रतिभा से सम्पन्न कवि थे कि उनकी सरल-सी दिखाई पड़ने वाली कविता भी इतने गूढ़ और नित्य नवीन अर्थों की व्यंजना करती है कि उसके मर्म को (अर्थात् कवि के मन्तव्य को) स्वयं कालिदास अथवा सरस्वती या ब्रह्मा ही समझ सकते हैं। वह अन्य किसी के सामर्थ्य की बात नहीं।

(3) निर्गतासु …………………….. जायते।।

[ मधुरसान्द्रासु-मधुर (प्रिय लगने वाली) और सान्द्र (मृदु, कोमल)। मञ्जरीष्विव (मञ्जरीषु +इव)= आम्रमंजरियों के सदृश। सूक्तिषु = सुन्दर वचनों के निर्गतासु = निकलने पर, उच्चरित होने पर।
कस्य वा प्रीतिः न जायते = भला किसको आह्लाद उत्पन्न नहीं होता ? (अर्थात् सभी को होता है।)]

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

अनुवाद – नयी निकली हुई (निर्गताः) मधुर (मकरन्द से पूरित) और सान्द्र (घनी सुगन्ध वाली) आम्रमंजरियों के सदृश कालिदास की मधुर (कर्णप्रिय) और सान्द्र (सरस) सूक्तियाँ उच्चारणमात्र से (निर्गतासु) किसे आनन्दित नहीं करतीं। जिस प्रकार सुगन्धित मंजरियाँ; मधुर मकरन्द से पूरित होकर निकलते ही सर्वत्र सुगन्धि फैला देती हैं, वैसे ही कालिदास की मधुर सूक्तियों के उच्चारणमात्र से ही जनसामान्य आनन्दित हो उठता है।

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UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 19 Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (MGNREGA)

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 19 Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (MGNREGA) (महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम) are part of UP Board Solutions for Class 12 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 19 Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (MGNREGA) (महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम).

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Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 19
Chapter Name Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (MGNREGA) (महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम)
Number of Questions Solved 28
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 19 Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (MGNREGA) (महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
मनरेगा कार्यक्रम क्या है? भारत के पुनर्निर्माण में महात्मा गाँधी राष्ट्रीय गारण्टी योजना की भूमिका की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम (नरेगा) का क्रियान्वयन ग्रामीण विकास मन्त्रालय द्वारा किया जाता है जो सरकार के सबसे महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमों में से एक है। इस योजना के तहत सरकार की गरीबों तक सीधे पहुँच रहेगी और विकास के लिए विशेष रूप से प्रोत्साहित किया जाएगा। इस अधिनियम के तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार को 100 दिन का गारण्टीशुदा अकुशल मजदूरी/रोजगार वित्तीय वर्ष में प्रदान किया जाएगा।
यह अधिनियम 2 फरवरी, 2006 को लागू किया गया। पहले चरण में वर्ष 2006-07 में देश के 27 राज्यों के 200 जिलों में इस योजना का कार्यान्वयन किया गया। इसमें चयनित 200 जिलों में 150 जिले ऐसे थे जहाँ काम के बदले अनाज’ कार्यक्रम पहले से चल रहा था। ‘काम के बदले अनाज’ योजना व सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना का विलय अब इस नई योजना में कर दिया गया है। अप्रैल, 2008 से इस योजना को सम्पूर्ण देश में लागू कर दिया गया है।
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहला कानून है। इसमें रोजगार गारण्टी किसी अनुमानित स्तर पर नहीं है, बल्कि इस अधिनियम को लक्ष्य मजदूरी रोजगार को बढ़ाना है। इसका सीधा लक्ष्य है कि प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन द्वारा सही उपयोग और गरीबी के कारण – सूखा, जंगल काटना एवं मिट्टी के कटाव को सही तरीके से विकास में लगाना है।

ज्ञातव्य है कि ‘नरेगा’ का नामकरण महात्मा गाँधी के नाम पर करने की घोषणा 2 अक्टूबर, 2009 को गाँधी जयन्ती के अवसर पर की गई थी। परिणामस्वरूप वर्ष 2005 में बने ‘राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम’ का नाम औपचारिक रूप से ‘महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम (मनरेगा) करने का प्रावधान किया गया।

भारत के पुनर्निर्माण में मनरेगा की भूमिका

भारतीय ग्रामीण क्षेत्र की छिन्न-भिन्न अर्थव्यवस्था को सुधारने तथा सामाजिक, व्यावसायिक तथा राजनीतिक अभ्युदय में समन्वित ग्रामीण कार्यक्रम ने बहुत महत्त्वपूर्ण सहयोग दिया है। यह कार्यक्रम ग्रामीण उत्थान तथा निर्धनता उन्मूलन के क्षेत्र में नये आयाम उत्पन्न करने में सफल सिद्ध हो रहा है। इस चमत्कारी कार्यक्रम ने सदियों से निर्धनता की रेखा के नीचे जीवन व्यतीत करने वाले ग्रामीण लोगों के लिए सुख और सुविधा का नया धरातल प्रस्तुत किया है जिससे यह देश की निर्धन जनसंख्या को गरीबी की रेखा से ऊपर उठाने में सफल होगा। इस कार्यक्रम ने सदियों से गरीबी, भुखमरी, रूढ़िवादी और सड़ी-गली अर्थव्यवस्था से दबी ग्रामीण जनसंख्या को रोजगार की गारण्टी का नया आयाम प्रदान किया है। वास्तव में, जीर्ण-शीर्ण ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सँभालने में तथा ग्रामीण क्षेत्रों का पुनर्निर्माण करने में मनरेगा ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ग्रामीण पुनर्निर्माण के सन्दर्भ में इसके महत्त्व का मूल्यांकन निम्नलिखित रूप में किया जा सकता है

1. निर्धन ग्रामवासियों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना – मनरेगी गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों के युवकों को स्वरोजगार का अवसर प्रदान करता है। इससे गाँवों में रोजगार के अवसरों में वृद्धि होती है और अप्रशिक्षित युवकों को रोजगार भी मिल जाते हैं।

2. निर्धनता कम करने में सहायक – मनरेगा का उद्देश्य ही गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को उस रेखा से ऊपर लाना है अर्थात् उनका सामाजिक, आर्थिक स्तर ऊँचा करना है; अतः निर्धनता को कम करने की दृष्टि से भी मनरेगा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इस कार्यक्रम के अन्तर्गत वर्ष में 100 दिनों का रोजगार दिलाने का लक्ष्य रखा गया है।

3. अनुसूचित जातियों, जनजातियों व महिलाओं के कल्याण में सहायक
मनरेगा कार्यक्रम का लाभ सभी निर्धनों को तो पहुँचा ही है, परन्तु समाज के कमजोर वर्गों, विशेषत: अनुसूचित जातियों/जनजातियों व महिलाओं का कल्याण तथा उन्हें गरीबी की रेखा से ऊपर लाना इसका विशेष उद्देश्य है। इसमें अनुसूचित जातियों व जनजातियों के परिवारों को 150 दिनों तक रोजगार प्रदान किए जाने का प्रावधान तथा 33 प्रतिशत महिलाओं को लाभान्वित करने का प्रावधान है।

4. ग्रामीण क्षेत्रों का विकास
मनरेगा कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्रों के विकास की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम है। यह रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने, निर्धनता कम करने, सूखे के लिए राहत देने, मरुस्थल विकास कार्यक्रमों तथा अनेक अन्य दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण है तथा ग्रामवासियों को विकास सेवाएँ उपलब्ध कराता है। यह कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्रों के सर्वांगीण विकास से जुड़ा है।

5. क्षेत्रीय असन्तुलन कम करने में सहायक
यह कार्यक्रम क्षेत्रीय असन्तुलन, विशेष रूप से आर्थिक असमानता कम करने में भी सहायक है। क्षेत्रीय विकास कार्यक्रम इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

6. सामाजिक न्याय की दृष्टि से महत्त्व
मनरेगा विकास कार्यक्रम का उद्देश्य निर्धनता को दूर कर रोजगार की गारण्टी प्रदान करना है; अत: सामाजिक न्याय की दृष्टि से यह कार्यक्रम अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है तथा इसका लाभ केवल निम्न वर्ग को ही प्रदान किया जाता है।

7. उत्पादन-वृद्धि में सहायक
यह कार्यक्रम स्थानीय संसाधनों तथा मानवीय संसाधनों के समुचित दोहन द्वारा सभी क्षेत्रों में श्रम अवसरों को बढ़ाने पर बल देता है। श्रम के अवसर बढ़ने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण होगा। इसके परिणामस्वरूप प्रति व्यक्ति आय तथा राष्ट्रीय आय में वृद्धि हो जाएगी।

8. अनुदान तथा आर्थिक क्षेत्र में सहायता
यह कार्यक्रम निर्धन परिवारों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाने के लक्ष्य हेतु कटिबद्ध है। कार्य के लिए सरकार ने प्रत्येक निर्धन परिवार को सौ दिनों के रोजगार उपलब्ध कराने का प्रावधान रखा है। सरकार ऐसे परिवारों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराकर उन्हें नवजीवन प्रदान करेगी। इस प्रकार, ग्रामीण पुनर्निर्माण में इस कार्यक्रम की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगी।

9. ग्रामीण जनसंख्या की सहभागिता सुनिश्चित करना
मनरेगा कार्यक्रम ग्रामीण जनता को निश्चित रोजगार के अवसर प्रदान कर नई ग्रामीण अर्थव्यवस्था का निर्माण कर सकेगी। यह कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्रों की ध्वस्त अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण में भी नींव का पत्थर सिद्ध होगा।

10. राष्ट्रीय विकास का आधार
मनरेगा कार्यक्रम राष्ट्र की निर्धनतम जनशक्ति को रोजगार के द्वारा उनके जीवन का पुनर्निर्माण करने में राष्ट्रीय समृद्धि और विकास को एक सुदृढ़ आधार प्रदान करेगा। यह कार्यक्रम निर्धनतारूपी अभिशाप को समाप्त कर निर्धन नागरिकों के जीवनयापन में गुणात्मक सुधार लाएगा तथा सम्पूर्ण राष्ट्र की समृद्धि में आशातीत वृद्धि करने में सफल बन सकेगा।

इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि भारत के गाँवों की अस्त-व्यस्त अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण में मनरेगा कार्यक्रम की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगी। यह कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक विकास की बाधाओं को दूर करके उन्हें सामाजिक और आर्थिक समानताएँ प्रदान कर उनके लिए। सुखी तथा उज्ज्वल भविष्य की नींव रखेगा। इस कार्यक्रम के क्रियान्वयन के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनता, बेरोजगारी, भुखमरी, कुरीतियाँ तथा रूढ़िवादिता पलायन कर जाएँगी।

प्रश्न 2
मनरेगा के मार्गदर्शी सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए। या मनरेगा के मार्गदर्शी सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए तथा इस कार्यक्रम के उद्देश्य बताइए।
उत्तर:
मनरेगा के मार्गदर्शी सिद्धान्त
मनरेगा की माँग प्रेरित विशेषणों को सुदृढ़ करने के लिए मार्गदर्शी सिद्धान्त, जिन्हें बारहवीं योजना के लिए तैयार किया गया है, मिहिर शाह समिति की अनुशंसाओं पर आधारित है। ये इस प्रकार हैं

  1.  ग्राम पंचायत अथवा कार्यक्रम अधिकारी, यथास्थिति, वैध आवेदनों को स्वीकार करने तथा आवेदकों को दिनांकित प्राप्तियाँ जारी करने के लिए बाध्य होंगे।
  2.  आवेदनों को अस्वीकृत करना तथा दिनांकित प्राप्तियों को न देने की प्रक्रिया को मनरेगा की धारा 25 के अधीन उल्लंघन माना जाएगा।
  3.  कार्य हेतु आवेदन प्रस्तुत करने के लिए, प्रावधान को कार्य हेतु आवेदन प्राप्त करने और उनकी ओर से दिनांकित प्राप्तियाँ जारी करने के लिए वार्ड सदस्यों, ऑगनवाड़ी कामगारों, स्कूल अध्यापकों, स्व-सहायता दलों, गाँव स्तर के राजस्व पदाधिकारियों, सामान्य सेवाकेन्द्रों और महात्मा गाँधी नरेगा श्रम दलों को शक्ति प्रदान करने वाली ग्राम पंचायतों द्वारा इस प्रकार पुन:नामित बहुविध चैनलों के जरिए सतत आधार पर उपलब्ध कराया जाएगा।
  4. मनरेगा वेबसाइट के अतिरिक्त मोबाइल फोनों के जरिए कार्य हेतु आवेदन पंजीकृत करने के लिए कामगारों हेतु प्रावधान (व्यवहार्य होने पर) भी किया जाएगा और उसे सीधे ही प्रबन्धन सूचना प्रणाली में भरा जाएगा। मोबाइल फोनों की स्थिति में, इस प्रणाली को निरक्षर कामगारों के लिए सुविधाजनक बनाया जाएगा और उसमें अंत:सक्रिय वॉइस प्रत्युत्तर प्रणाली (आईवीआरएस) तथा वॉइस समर्थित आन्तरिक कार्यों को शामिल किया जाएगा। यह विकल्प स्वतः ही दिनांकित प्राप्तियों को जारी करेगा।
  5.  राज्य सरकारें यह सुनिश्चित करेंगी कि मनरेगा प्रबन्धन सूचना प्रणाली कार्य-माँग को रिकॉर्ड करती है। यह कार्य शुरू होने की तारीख तथा कार्य आवेदन की तारीख के बीच होने वाले अन्तर (प्रत्येक ग्राम पंचायत के लिए) का पता लगाएँगी।
  6.  मनरेगा सॉफ्टवेयर ऐसे मजदूरी प्राप्तिकर्ता, जिनकी कार्य-माँग को माँग के 15 दिनों के भीतर पूरा नहीं किया जाता है, को बेरोजगारी भत्ते का भुगतान करने हेतु स्वतः ही अदायगी आदेश सृजित करेगा। इसके आधार पर तैयार की गई रिपोर्टे राज्य स्तर पर पता लगाए जाने वाली रिपोर्टों के अनिवार्य सेट का भाग होंगी।

मनरेगा कार्यक्रम का उद्देश्य

मनरेगा एक ऐसा कार्यक्रम है जो कि गरीबों को 100 दिन का गारण्टीशुदा रोजगार प्रदान करने हेतु अधिक विस्तृत एवं क्रमबद्ध, तरीकों को अपनाने पर जोर देता है। साथ ही यह प्रत्येक व्यक्ति को समाजोपयोगी तथा सरकारी कार्यों में इस प्रकार लगाने योग्य बनाना चाहता है कि वह अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु पर्याप्त आय अर्जित कर सके। इस प्रकार, इस कार्यक्रम के अन्तर्गत परम्परागत सिद्धान्तों, व्यवहारों तथा प्राथमिकताओं को बहुत कुछ बदला गया है। मनरेगा अधिनियम रोजगार की कानूनी गारण्टी प्रदान करने वाला एक व्यापक कार्यक्रम है।

स्वतन्त्र भारत में पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत ग्रामीण विकास के अनेक कार्यक्रम प्रारम्भ किए गए। ऐसे कार्यक्रमों में सामुदायिक विकास कार्यक्रम प्रमुख हैं। इन विकास कार्यक्रमों के परिणामों के अध्ययन के बाद ज्ञात हुआ कि विभिन्न कार्यक्रमों का लाभ अधिकांशतः उन लोगों को मिला है। जो पहले से ही साधन-सम्पन्न हैं तथा जिनके पास भूमि व उत्पादन के अन्य साधन प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं। अनुभव के आधार पर पाया गया कि विभिन्न-विकास कार्यक्रमों के माध्यम से ग्रामों को समन्वित विकास नहीं हो रहा है। भूमिहीन श्रमिकों तथा दस्तकारों की आर्थिक-सामाजिक स्थिति में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है, उन्हें निर्धनता से छुटकारा नहीं दिलाया जा सका है, उनमें व्याप्त बेकारी व अर्द्ध-बेकारी को समाप्त नहीं किया जा सका है।

साथ ही यह भी पाया गया कि विभिन्न विकास एजेन्सियों के कार्यक्रमों में समन्वय का अभाव है जिसके फलस्वरूप साधनों का दुरुपयोग होता है। इसके अलावा ग्रामीणों के सम्मुख यह समस्या भी बनी रहती है कि किस सरकारी विभाग के किस कार्यक्रम को अपनाया जाए और किसे नहीं। ऐसी स्थिति में वर्ष 2006-07 में एक नवीन कार्यक्रम जिसे मनरेगा कार्यक्रम कहते हैं, की रूपरेखा प्रस्तुत की गयी।

उपर्युक्त कार्यक्रम का एक उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के निर्धनतर्म परिवारों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाना एवं उन्हें आय के साधन प्रदान करना है। ग्रामीण विकास की दृष्टि से अपनाए गए अब तक के सभी कार्यक्रमों की तुलना में यह सबसे बड़ा एवं व्यावहारिक कार्यक्रम है। 2 फरवरी, 2006 से देश के सभी सामुदायिक विकास-खण्डों में मनरेगा कार्यक्रम प्रारम्भ किया जा चुका है। यह कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्रों में बेकारी एवं गरीबी को दूर करने का प्रयत्न करता है।

प्रश्न 3
वन क्षेत्रों में रहने वाले अनुसूचित जनजाति के परिवारों के लिए मनरेगा के अन्तर्गत विशेष लाभ योजनाओं पर प्रकाश डालिए। इनर
उत्तर:
मनरेगा की विशेष लाभ योजनाएँ

ग्रामीण विकास मन्त्रालय ने वन क्षेत्रों में रहने वाले अनुसूचित जनजाति के परिवारों के लिए मनरेगा के अन्तर्गत 150 दिनों का रोजगार प्रदान करने के लिए एक निर्देश जारी किया है। इस कदम से झारखण्ड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और आन्ध्र प्रदेश जैसे राज्यों में लगभग आठ लाख लोगों को फायदा होगा। महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम (मनरेगा) के अन्तर्गत निर्धारित 100 दिनों के रोजगार के अतिरिक्त 50 दिनों का रोजगार उन व्यक्तियों के लिए लागू होगा जिन्हें वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) 2006 के अन्तर्गत सम्बन्धित अधिकार-पत्र दिए गए हैं। इनमें से लगभग 8 लाख व्यक्तिगत अधिकार पत्र आन्ध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड और ओडिशा में दिए गए हैं।

सरकार के अनुसार भूमि को और अधिक उत्पादक बनाने के लिए जमीनों का प्रयोग समतल और बागान और अन्य गतिविधियों के लिए किए जाने की आवश्यकता है। 50 अतिरिक्त दिनों के माध्यम से मनरेगा में परिवारों को अपनी ही जमीन पर अतिरिक्त काम करने की योजना को मंजूरी प्रदान की गई है। उस कार्य की मजदूरी का भुगतान उनको मनरेगा के मद से ही किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, एफआरए लाभार्थियों को पहले ही इन्दिरा आवास योजना के अन्तर्गत सहायता के लिए शामिल किया गया है।

12 नक्सल प्रभावित जिलों में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के सहयोग से त्वरित आजीविका सहायता परियोजना (एएलएसपी) को शुरू किया गया है। परियोजना में इन जिलों में 500 ग्राम पंचायतों में मनरेगा के माध्यम से आजीविका सृजन पर ध्यान दिया जाएगा। इन 12 जिलों में; लातेहार, पलामू, गुमला, पश्चिमी सिंहभूम (झारखण्ड); मलकानगिरी, कोरापुट नुआपाड़ा और कालाहांडी (ओडिशा); सुकमा, बीजापुर, नारायणपुर, बलरामपुर (छत्तीसगढ़) शामिल हैं।

विशेष रूप से कृषि के क्षेत्र में मनरेगा और ग्रामीण आजीविका के बीच तालमेल मजबूत करने पर ध्यान देने के साथ ही मनरेगा के अन्तर्गत हो रहे कार्यों को मौजूदा सूची में जोड़ा गया है। मनरेगा में काम करने से हाशिए पर खड़े समाज के एक वर्ग की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार होने की सम्भावना है। इसके अन्तर्गत अनुसूचित जाति/जनजाति, लघु एवं सीमान्त किसानों, इन्दिरा आवास योजना निर्दिष्ट लाभार्थियों, वन अधिकारियों को भू-अधिकार से सम्पन्न किया जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
मनरेगा कार्यक्रम के उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
इस योजना के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं।

  1. प्रत्येक ग्रामीण परिवार के एक वयस्क सदस्य को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में कम-से-कम 100 दिन गारण्टीशुदा अकुशल मजदूरी/रोजगार माँग के अनुसार उपलब्ध कराना, परिणामस्वरूप । निर्धारित गुणवत्ता और स्थायित्व वाली रचनात्मक परिसम्पत्तियों का निर्माण,
  2. गरीबों को आजीविका का संसाधन आधार सशक्त करना;
  3. असक्रिय रूप से सामाजिक समावेश सुनिश्चित करना और;
  4. पंचायती राज संस्थाओं को मजबूत बनाना।

प्रश्न 2
मनरेगा कार्यक्रम का सामाजिक महत्त्व बताइए।
उत्तर:
मनरेगा का सामाजिक महत्त्व मनरेगा के अन्तर्गत एक वित्तीय वर्ष के दौरान ऐसे सभी ग्रामीण परिवारों को जिनके वयस्क सदस्य अकुशल श्रम करने को तैयार हों। कम-से-कम 100 दिनों का गारण्टी मजदूरी देने का प्रयास किंया जाता है। इस रूप में मनरेगा अन्य श्रमिक रोजगार कार्यक्रमों से अलग किस्म का है क्योंकि इसके द्वारा ग्रामीण लोगों को एक संसदीय अधिनियम के द्वारा रोजगार पाने का वैधानिक अधिकार और गारण्टी प्राप्त है। यह अन्य श्रम रोजगार योजनाओं जैसा नहीं है। अपने अधिकार आधारित ढाँचे तथा माँग-आधारित तरीके द्वारा मनरेगा पिछली रोजगार योजनाओं की तुलना में एक भिन्न परिवर्तन का अग्रदूत है। इस योजना की विशेषताओं में शामिल हैं।

समयबद्ध रोजगार गांरटी और 15 दिनों के अन्दर मजूदरी का भुगतान तथा मजदूर संकेद्रित कार्य पर जोर जिसमें कॉन्टेक्टरों और मशीनरी के प्रयोग का निषेध किया गया है। योजना की कम-से-कम 33 प्रतिशत हितग्राही महिलाएँ होंगी। इस दृष्टि से समाज में महिलाएँ आर्थिक दृष्टि से भी सुदृढ़ होंगी। मनरेगा के अन्तर्गत मजदूरी का भुगतान बैंक एवं डाकघर खाते के माध्यम से किया जाना जरूरी है। इस योजना से गरीबों के आर्थिक समावेश में सहायता मिल रही है।

मनरेगा का मुख्य ध्यान जल संरक्षण, सूखा निवारण (वन संवर्द्धन/वृक्षारोपण सहित), भूमि विकास, बाढ़ नियन्त्रण/सुरक्षा (जल-जमाव वाले क्षेत्रों में नालियों के विकास सहित) तथा सभी मौसमों में गाँवों को सड़क से जोड़ने इत्यादि से सम्बन्धित कार्यों पर है। इन कार्यों से निश्चित रूप से समाज को बड़ा लाभ मिलेगा। भविष्य की योजनाएँ बनाने, प्रोजेक्ट शेल्फ के अनुमोदन तथा लागत के कम-से-कम 50 प्रतिशत तक के अनुपात में कार्यों को लागू किए जाने के माध्यम से मनरेगा के नियोजन, कार्यान्वयन और उनकी निगरानी की दृष्टि से पंचायतों की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इससे यह पता चलता है कि यह अधिनियम विकेन्द्रीकरण को मजबूत बनाने तथा निम्नतम स्तर पर लोकतान्त्रिक संरचना को दृढ़ करने के लिए भी एक महत्त्वपूर्ण साधन है।

प्रश्न 3
मनरेगा अधिनियम के मुख्य प्रावधानों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मनरेगा अधिनियम के मुख्य प्रावधान मनरेगा अधिनियम के मुख्य प्रावधान निम्नलिखित हैं

  1. मनरेगा अधिनियम रोजगार की कानूनी (2008-09) गारण्टी प्रदान करता है।
  2. प्रत्येक विकास खण्ड पर इस कार्यक्रम की गतिविधियों का चयन पंचायत समितियों द्वारा करने का प्रावधान किया गया है।
  3.  पंचायत समितियों द्वारा लोगों को, कार्यक्रम की पारदर्शिता, सामाजिक उत्तरदायित्व तथा सामाजिक सहभागिता का पूर्ण आश्वासन दिया जाएगा।
  4.  कष्ट निवारण समितियाँ हर जगह उपलब्ध होंगी।
  5. 33 प्रतिशत लाभ महिलाओं को होगा तथा उन्हें पुरुषों के बराबर पारिश्रमिक की व्यवस्था की गई है।
  6. रोजगार का इच्छुक कोई भी व्यक्ति, ग्राम पंचायत समिति में पंजीकरण करा सकता है। पंजीकृत होने वाले व्यक्तियों को ग्राम पंचायत द्वारा ‘जॉब गारण्टी कार्ड जारी किया जाएगा। इस कार्ड के अन्तर्गत वैधानिक मान्यता है कि 15 दिनों के अन्दर व्यक्ति को रोजगार मिले।
  7. पंजीकरण कार्यालय वर्ष भर खुला रहेगा।
  8. व्यक्ति को रोजगार उसके घर से 5 किमी के दायरे में मिलेगा तथा साथ में मजदूरी भत्ता भी उपलब्ध कराया जाएगा।

प्रश्न 4
मनरेगा के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम सितम्बर 2005 में बनाया गया और 2 फरवरी, 2006, से इसे क्रमिक रूप से लागू किया गया। प्रथम चरण में इसे देश के अत्यधिक पिछड़े 200 जिलों में लागू किया गया। वहीं दूसरे चरण के दौरान, 2007-08 में, इसे 130 अतिरिक्त जिलों में लागू किया गया। आरम्भिक लक्ष्य के रूप में, मनरेगा को पाँच वर्षों के अन्दर पूरे देश में विस्तारित किया जाना था। किन्तु पूरे देश को इसके सुरक्षात्मक दायरे में लाने और भारी माँग को देखते हुए, चरण 3 के अन्तर्गत, 1 अप्रैल, 2008 से इस योजना को भारत के बाकी 274 जिलों में भी लागू कर दिया गया। इस तरह, अब यह राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम (नरेगा) देश के समस्त ग्रामीण क्षेत्र को आच्छादित करता है। 2 अक्टूबर, 2009 को इसका नाम बदलकर महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम (मनरेगा) रख दिया गया।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
‘मनरेगा राष्ट्रीय विकास का आधार है।’ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मनरेगा अधिनियम अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इस प्रकार का पहला कानून है। इसमें रोजगार गारण्टी किसी अनुमानित स्तर पर नहीं है, बल्कि इस अधिनियम का लक्ष्य मजदूरी रोजगार को बढ़ाना है। इसका सीधा लक्ष्य है कि प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन द्वारा सही उपयोग और गरीबी के कारण-सूखा, जंगल काटना एवं मिट्टी के कटाव को सही तरीके से विकास में लाना है। अतः कहा जा सकता है कि मनरेगा राष्ट्रीय विकास का आधार है।

प्रश्न 2
मनरेगा क्या है?
उत्तर:
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) देश के ग्रामीण इलाकों में लागू किया गया अधिकारों पर आधारित रोजगार कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम का लक्ष्य प्रत्येक ग्रामीण परिवार के एक वयस्क सदस्य को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में कम-से-कम 100 दिन का गारंटीशुदा अकुशल मजदूरी-रोजगार उपलब्ध कराते हुए आजीविका सुरक्षा बढ़ाना है।

प्रश्न 3
मनरेगा को किस प्रकार लागू किया गया?
उत्तर:
पहले चरण में 2 फरवरी, 2006 से देश के सबसे पिछड़े 200 जिलों में मनरेगा को लागू किया गया, उसके बाद 1 अप्रैल, 2007 और 15 मई, 2007 को क्रमशः 113 और 17 अतिरिक्त जिलों को भी इसके दायरे में लाया गया। बचे हुए अन्य जिलों को 1 अप्रैल, 2008 से इस अधिनियम के दायरे में लाया गया। इस प्रकार, इस समय देश के सभी ग्रामीण जिले (644) इस अधिनियम के दायरे में हैं।

प्रश्न 4
मनरेगा की प्रमुख उपलब्धियाँ लिखिए।
उत्तर:
इस कार्यक्रम के कार्यान्वयन के पिछले आठ वर्षों के दौरान इसकी प्रमुख उपलब्धियाँ निम्नलिखित हैं

  1.  वर्ष 2006 में लागू होने के बाद से करीब ₹ 1,63,754.41 करोड़ की राशि सीधे तौर पर ग्रामीण कामगार घरों को दिहाड़ी के भुगतान के रूप में प्रदान की गई।
  2. 1,657.45 करोड़ कार्यदिवसों को रोजगार सृजित किया गया।
  3. 2008 से लेकर अब तक औसतन 5 करोड़ ग्रामीण घरों को हर साल रोजगार मुहैया कराया गया है।
  4. 31 मार्च, 2014 तक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की भागीदारी 48 प्रतिशत रही।

निश्चित उत्तीय प्रश्न ( 1 अंक)

प्रश्न 1
मनरेगा योजना का पूरा नाम बताइए।
उत्तर:
मनरेगा योजना का पूरा नाम है-महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोजगार ग्रामीण गारण्टी अधिनियम (मनरेगा) पहले इसका नाम राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी अधिनियम (नरेगा) था।

प्रश्न 2
मनरेगा कार्यक्रम कब से प्रारम्भ किया गया है?
उत्तर:
मनरेगा कार्यक्रम 2 फरवरी, 2006 से (नरेगा के रूप में) प्रारम्भ किया।

प्रश्न 3
नरेगा कार्यक्रम को कब मनरेगा कार्यक्रम के रूप में परिवर्तित किया गया?
उत्तर:
नरेगा कार्यक्रम को 2 अक्टूबर, 2009 को गाँधी जयन्ती के अवसर पर मनरेगा कार्यक्रम के रूप में परिवर्तित किया गया।

प्रश्न 4
मनरेगा कार्यक्रम में महिलाओं को कितने प्रतिशत लाभ प्रदान किया गया है?
उत्तर:
मनरेगा कार्यक्रम में महिलाओं को 33% लाभ प्रदान किया है।

प्रश्न 5
मनरेगा का क्रियान्वयन किसके द्वारा किया जाता है?
उत्तर:
ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा।।

प्रश्न 6
मनरेगा के अन्तर्गत कितने दिनों का रोजगार देने का प्रावधान है?
उत्तर:
100 दिन तक।

प्रश्न 7
मनरेगा की किस धारा के अन्तर्गत आवेदनों को अस्वीकृत करना इसका उल्लंघन माना गया है?
उत्तर:
धारा 25

प्रश्न 8
जवाहर रोजगार योजना में महिलाओं को क्या विशेष लाभ दिया गया है ?
उत्तर:
जवाहर रोजगार योजना के अन्तर्गत लाभ प्राप्तकर्ताओं में 30 प्रतिशत महिलाओं को आरक्षण किया गया है।

प्रश्न 9
मनरेगा का पूरा नाम लिखिए।
उत्तर:
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम।

प्रश्न10
मनरेगा का पूर्व नाम क्या था?
उत्तर:
नरेगा।

प्रश्न 11
मनरेगा में बेरोजगार भत्ते की राशि कौन तय करता है?
उत्तर:
राज्य सरकार।

प्रश्न 12
मनरेगा कहाँ-कहाँ लागू है?
उत्तर:
देश के सभी जिलों में।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
वर्ष 2006-07 में देश के कितने जिलों में मनरेगा का कार्यान्वयन हुआ?
(क) 500
(ख) 200
(ग) 300
(घ) 400

प्रश्न 2
जॉब गारंटी कार्ड जारी होने के कितने दिन के अन्तर्गत व्यक्ति को रोजगार मिल जाना चाहिए?
(क) 25 दिन
(ख) 50 दिन
(ग) 100 दिन
(घ) 15 दिन

प्रश्न 3
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनयम कब लागू किया गया?
(क) 2 फरवरी, 2006
(ख) 1 अप्रैल, 2005
(ग) 31 मार्च, 2007
(घ) 2 अक्टूबर, 2011

प्रश्न 4
निम्न में से रोजगार गारण्टी योजना है।
(क) मनरेगा
(ख) अपर्णा योजना
(ग) अन्नपूर्णा योजना
(घ) ये सभी

प्रश्न 5
नरेगा’ को ‘मनरेगा’ किस वर्ष किया गया
(क) 2009 में
(ख) 2006 में
(ग) 2008 में
(घ) 2010 में

उत्तर:
1. (ख) 200,
2. (घ) 15 दिन,
3. (क) 2 फरवरी, 2006,
4. (क) मनरेगा,
5. (क) 2009 में।

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UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 7 लोभ: पापस्य कारणम्

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 7
Chapter Name लोभ: पापस्य कारणम्
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 11 Sahityik Hindi संस्कृत दिग्दर्शिका Chapter 7 लोभ: पापस्य कारणम्

अवतरणों का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) एको …………………………. पश्यति।।
[ सरस्तीरे (सरः +तीरे) = सरोवर के किनारे बूतेकह रहा था। लोभाकृष्टेन (लोभ +आकृष्टेन) = लोभ से आकृष्ट (पथिक) द्वारा। पान्येनालोचितम (पान्थेन + आलोचितम्) = पथिक ने सोचा। संशयमनारुह्य (संशयम् +अनारुह्य) = सन्देह पर चढ़े बिना (सन्देह किये बिना)। पुनरारुह्य (पुनः + आरुह्य) = फिर चढ़कर।]

सन्दर्भ – यह गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘लोभः पापस्य कारणम्’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है।

[विशेष – इस पाठ के अन्तर्गत आने वाले समस्त अनुच्छेदों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।

अनुवाद – एक बूढ़ा बाघ स्नान करके, कुश हाथ में लेकर, तालाब के किनारे कह रहा था, “अरे, अरे पथिको! यह सोने का कंगन लो।’ तब लोभ से खिंचकर किसी राहगीर ने सोचा, ‘भाग्य से ही ऐसा सम्भव होता है (ऐसा सुअवसर हाथ आता है), किन्तु इस (जैसे) सन्देहास्पद विषय में प्रवृत्त होना ठीक नहीं (अर्थात् जहाँ संकट की आशंका हो, ऐसे कार्य से विरत होना ही अच्छा), फिर भी (कहा गया है कि)संशय (सन्देह) का आश्रय लिये बिना व्यक्ति कल्याण (हित) को प्राप्त नहीं करता, पर सन्देह का आश्रय लेने पर यदि जीवित बच जाता है तो ( भलाई) देखता है (प्राप्त करता है)।

(2) सः आह ………………… लोकप्रवादो दुर्निवारः।।
व्याघ्र उवाच ……………… दातुमिच्छामि।
स आह ………………………. विश्वासभूमिः।

[मारात्मके= हिंसक (जीवघाती) पर। यौवनदशायाम् अतीव = यौवन में बहुत अधिक बधान्मे (बधात् + में) = वध से मरे। दाराश्च (दाराः +च) = पत्नी भी। वंशहनश्चाहम (वंशहीना +च+अहम्) – और मैं वंशहीन (हो गया)| धार्मिकणाहमादिष्टः (धार्मिकण+अहम् +आदिष्टः)- किसी धर्मात्मा ने मुझे उपदेश दिया। तदुपदेशादिदानीमहं (तत् +उपदेशात् +इदानीम् + अहम्) -उस उपदेश से मैं अब। विश्वासभूमिः = विश्वासपात्र। चैतावान् (च + एतावान्) = और (मैं) इतना।]

अनुवाद – वह (पथिक) बोला–“तेरा कंगन कहाँ है ?” बाघ ने हाथ फैलाकर दिखाया। पथिक बोला, “तुझे हिंसक (जीवघाती) पर कैसे विश्वास करू ?’ बाघ बोला – “सुन रे पथिक! पहले ही युवावस्था में मैं बड़ा पापी (दुराचारी) था। अनेक गायों और मनुष्यों को मारने से मेरे पुत्र और पत्नी मर गये और मैं वंशहीन हो गया। तब किसी धर्मात्मा ने मुझे उपदेश दिया–“आप कुछ दान, धर्म आदि कीजिए।” उस उपदेश से नहाने वाला, दान देने वाला, बूढ़ा, टूटे नाखून और दाँतों वाला मैं भला विश्वास योग्य क्यों नहीं हूँ? मैं तो इतना लोभरहित हो गया हूँ कि अपने हाथ से स्वर्णकंकण (सोने का कंगन) को भी जिस किसी को (किसी को भी) देना चाहता हूँ, तो भी बाघ मनुष्य को खाता है, यह लोकनिन्दा दूर करना कठिन है” (अर्थात् लोगों के मन में बाघ के हिंसक होने की धारणा इतने गहरे तक बैठी है कि उसका निराकरण सम्भव नहीं, चाहे मैं कितना ही धर्मात्मा क्यों न हो जाऊँ)।

(3) मया च धर्मशास्त्राणि ……………………… पण्डितः।।
मरुस्थल्यां यथा ………………………….. पाण्डुनन्दन।। 

अधीतानि = पढे हैं। पाण्डुनन्दन = पाण्डव (यहाँ युधिष्ठिर)। लोष्ठवत् = मिट्टी के ढेले के सदृश।]

अनुवाद-और मैंने धर्मशास्त्र भी पढ़े हैं—हे युधिष्ठिर! मरुभूमि (रेगिस्तान) में जैसे वर्षा और जैसे भूखे को दिया भोजन सफल होता है, वैसे ही दरिद्र को दिया दान भी सफल होता है। जो व्यक्ति दूसरे की स्त्री को माता के समान, दूसरे के धन को मिट्टी के ढेले के समान तथा समस्त प्राणियों को अपने समान देखती है (समझता है), वह पण्डित (सच्चा ज्ञानी) है।

(4) त्वं चातीव ……………………… किमौषधैः ।।

[ प्रयच्छेश्वरे (प्रचच्छ+ईश्वरे) = समर्थ को दो। नीरुजस्य = निरोगी की।]

अनुवाद – और तुम बहुत दरिद्र हो, इसलिए तुम्हें यह सोने का कंगन देने को प्रयत्नशील (सचेष्ट) हूँ; क्योंकि-हे कौन्तेय (कुन्ती पुत्र)! दरिद्रों का भरण (पालन-पोषण) करो, धनवान् को धन मत दो। औषध रोगी के लिए है, जो नीरोगी (स्वस्थ) है, उसे औषध से क्या (लाभ) ? (धनवानों के पास तो धन है ही, धन की आवश्यकता उसी को है, जिसके पास धन नहीं है।)

(5) तदत्र …………………………. भक्षितः।।

[ तदत्र (तत् +अत्र) = तो यहाँ (इस)| सरसि = सरोवर में। तदवचः प्रतीतः = उसकी बात पर विश्वास करके। महापङ्के – अत्यधिक कीचड़ में। पलायितुमक्षमः – भागने में असमर्थ। अतस्त्वामहमुत्थापयामि (अतः + त्वाम् +अहम् +उत्थापयामि) = इसलिए तुम्हें मैं निकालता हूँ। शनैः शनैरुपगम्य (शनैः शनैः +उपगम्य) = धीरे-धीरे पास जाकर।]

अनुवाद – तो यहाँ (इस) सरोवर में स्नान करके सोने का कंगन लो। तब जब वह उसकी बात पर विश्वास कर लालच में (पड़कर) सरोवर में स्नान करने के लिए घुसा तो गहरी कीचड़ (दलदल) में फंसकर भागने में असमर्थ हो गया। उसे कीचड़ में पड़ा (फैसा) देख बाघ बोला, ‘ओहो, दलदल में फंस गये। तो तुम्हें निकालता हूँ यह कहकर धीरे-धीरे पास पहुँचकर बाघ ने उसे खा लिया।

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UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 1 Beginning of Mughal Empire in India: Babar and Humayun

UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 1 Beginning of Mughal Empire in India: Babar and Humayun (भारत में मुगल साम्राज्य का प्रारम्भ- बाबर और हुमायूँ) are the part of UP Board Solutions for Class 12 History. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 1 Beginning of Mughal Empire in India: Babar and Humayun (भारत में मुगल साम्राज्य का प्रारम्भ- बाबर और हुमायूँ).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject History
Chapter Chapter 1
Chapter Name Beginning of Mughal Empire in India: Babar and Humayun (भारत में मुगल साम्राज्य का प्रारम्भ- बाबर और हुमायूँ)
Number of Questions Solved 15
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 1 Beginning of Mughal Empire in India: Babar and Humayun (भारत में मुगल साम्राज्य का प्रारम्भ- बाबर और हुमायूँ)

अभ्यास

प्रश्न 1.
निम्नलिखित तिथियों के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख कीजिए|
1. 1526 ई०
2. 1527 ई०
3. 1530 ई०
4. 1540 ई०
5. 1556 ई०
उतर
दी गई तिथियों के ऐतिहासिक महत्व के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 24 पर ‘तिथि सार’ का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 2.
सत्य या असत्य बताइए
उतर.
सत्य-असत्य प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या – 24 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 3.
बहुविकल्पीय
उतर.
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 24 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 4.
अतिलघु उत्तरीय
उतर.
अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 24 व 25 का अवलोकन कीजिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बाबर के समय पंजाब व गुजरात की क्या स्थिति थी?
उतर.
बाबर के समय पंजाब की स्थिति – बाबर के आक्रमण के समय पंजाब का सूबेदार दौलत खाँ था। यद्यपि वह दिल्ली साम्राज्य के अधीन था, लेकिन अपने आपको स्वतंत्र शासक के रूप में देखना चाहता था। इसलिए दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी को समाप्त करने के लिए उसने काबुल के शासक बाबर को पत्र-व्यवहार कर भारत पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया था।  बाबर के समय गुजरात की स्थिति- बाबर के आक्रमण के समय सुदूर पश्चिम में स्थित गुजरात का शासक मुजफ्फरशाहथा। अपने शासनकाल में वह मालवा और मेवाड़ के पड़ोसी राज्यों के साथ युद्ध लड़ता रहता था।

प्रश्न 2.
बाबर के प्रारम्भिक आक्रमणों का विवरण कीजिए।
उतर.
बाबर ने भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना से पहले भारत पर कई आक्रमण किए। इन आक्रमणों से मिली सफलताओं ने बाबर के दिल में यह विश्वास भर कि वह भारत में स्थायी तौर पर अपने राज्य की स्थापना कर सकता है। बाबर के इन प्रारम्भिक आक्रमणों का विवरण निम्न प्रकार है
पहला आक्रमण – बाबर ने भारत पर सर्वप्रथम 1519 ई० में आक्रमण किया। उसने बाजौर और भेरा में कत्ल-ए-आम करके उन्हें अपने कब्जे में ले लिया। भेरा को हिन्दू बेग को सौंपकर उसने काबुल प्रस्थान किया। परन्तु बाद में वहाँ के निवासियों ने हिन्दू बेग को भगा दिया।
दूसरा आक्रमण – सन् 1519 ई० में ही बाबर ने पेशावर पर आक्रमण किया। परन्तु बदख्शाँ के उपद्रवों की वजह से उसे वापस लौटना पड़ा।
तीसरा आक्रमण – सन् 1520 ई० में बाबर ने भारत पर आक्रमण कर पुनः बाजौर और भेरा को अपने कब्जे में ले लिया। फिर स्यालकोट और सैयदपुर जीतने के बाद बाबर ने कन्धार पर कब्जा करके अपने पुत्र कामरान को वहाँ का सूबेदार नियुक्त कर दिया।
चौथा आक्रमण – बाबर के चौथे आक्रमण ने भारत पर उसके साम्राज्य स्थापित करने का रास्ता साफ कर दिया। सन् 1524 ई० में उसने भारत पर आक्रमण करके पंजाब को अपने अधिकार में ले लिया। इस युद्ध में इब्राहीम लोदी की पराजय ने बाबर के लिए दिल्ली विजय का रास्ता खोल दिया।

प्रश्न 3.
पानीपत के युद्ध का क्या परिणाम हुआ?
उतर.
पानीपत के युद्ध से भारत में लोदी वंश के साम्राज्य और प्रभुत्व का अंत हुआ साथ ही भारत में एक नए वंश- मुगल वंश कीस्थापना हुई, जिसका भारत के इतिहास में गौरव पूर्ण स्थान है।

प्रश्न 4.
बाबर की विजय( सन् 1526 ई० ) में किन्हीं तीन कारणों का उल्लेख कीजिए।
उतर.
बाबर की विजय के प्रमुख तीन कारणों का उल्लेख निम्नवत् है
(i) इब्राहीम लोदी की सैनिक कमजोरियाँ – इब्राहीम लोदी अनुभवहीन और अयोग्य सेनापति था। उसे रणक्षेत्र में सेनाओं के कुशल संचालन और संगठन का विशेष ज्ञान नहीं था। इब्राहीम के अन्य सेनापति और सरदार भी विलासी, दम्भी और अनुभवहीन थे। बाबर ने स्वयं अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी’ में लिखा है- “वह (इब्राहीम) अनुभवहीन युवक अपनी गतिविधियों में लापरवाह था, बिना किसी नियम-कायदे के वह आगे बढ़ जाता था, बिना किसी ढंग के रुक जाता अथवा पीछे मुड़ जाता और बिना सोचे-समझे शत्रु से भिड़ जाता।” इब्राहीम लोदी की सैनिक दुर्बलता बाबर जैसे सैनिक
के लिए वरदान सिद्ध हुई।।
(ii) इब्राहीम लोदी की अयोग्यता – इब्राहीम लोदी एक अयोग्य निर्दयी और जिद्दी सुल्तान था। उसमें राजनीतिज्ञता, कूटनीतिऔर दूरदर्शिता नहीं थी। इन गुणों के अभाव के कारण वह दौलत खाँ, आलम खाँ, मुहम्मदशाह और राणा साँगा को बाबर के विरुद्ध अपने पक्ष में नहीं मिला सका।
(iii) बाबर द्वारा तोपों का प्रयोग – पानीपत के युद्ध में इब्राहीम के पास तोपखाना और कुशल अश्वारोही सेना नहीं थी, जबकि बाबर के पास सुदृढ़ तोपखाना था, जिसका संचालन उस्ताद अली और मुस्तफा जैसे अनुभवी सेनानायकों ने किया। इसका परिणाम यह हुआ कि आग उगलने वाली तोपों के सम्मुख साधारण शस्त्रों से युद्ध करने वाले सैनिक नहीं टिक पाए। पानीपत में बाबर की विजय में उसके कुशल अश्वारोही और भारी तोपखाना अत्यन्त सहायक हुए।

प्रश्न 5.
हुमायूँ की शेर खाँ के विरुद्ध हार के किन्हीं तीन कारणों का वर्णन कीजिए।
उतर.
शेर खाँ के विरुद्ध हुमायूँ की हार के तीन कारण निम्नवत् हैं
(i) दोषपूर्ण युद्ध प्रणाली – हुमायूँ की युद्ध प्रणाली दोषपूर्ण थी। वह अपने शत्रुओं को परास्त करने के उपरान्त क्षमा कर दिया करता था, जिससे उन्हें अपनी शक्ति बढ़ाने का अवसर मिल जाता था। अपने महत्वाकांक्षी शत्रुओं को पूरी तरह कुचले बिना छोड़कर हुमायूं ने अपने पतन का मार्ग स्वयं प्रशस्त किया। हुमायूं का यह चारित्रिक दोष था कि वह अपनी विजय पर शीघ्र ही प्रसन्न हो जाता था।
(ii) धन का अपव्यय – बाबर ने युद्धों व खैरात के रूप में धन का अपव्यय करके शाही खजाने को खाली कर दिया था। इसी प्रकार हुमायूँ भी अपनी विजयों के उपलक्ष्य में बड़ी-बड़ी दावतें आयोजित करता था और अपने सरदारों तथा परिवार के सदस्यों को भेंट दिया करता था, अत: हुमायूँ को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा और अन्तत: उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा।
(iii) चारित्रिक अयोग्यता – हुमायूं अपनी असफलता का कारण स्वयं ही था। वह मदिरा-प्रेमी, अयोग्य एवं सैनिक गुणों से रहित एक असफल शासक था। हुमायूँ को अफीम सेवन का भी बहुत शौक था, जिससे वह आलसी हो गया था।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बाबर के आक्रमण के समय भारत की राजनीतिक दशा का वर्णन कीजिए।
उतर.
बाबर के आक्रमण के समय भारत की राजनीतिक दशा- बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी’ अथवा ‘बाबरनामा’ में लिखा है कि उसके आक्रमण के समय भारत में पाँच मुस्लिम राज्य और दो काफिर (हिन्दू) राज्य थे। देहली, मालवा, बंगाल, गुजरात व बहमनी राज्य मुस्लिम शासकों के अधीन थे तथा मेवाड़ व विजयनगर हिन्दू शासकों के अधीन थे। बाबर का यह कथन सही है कि “सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ में भारत केवल ऐसे राज्यों का समूह था, जो किसी भी आक्रमणकारी का, जो उसे विजित करने की शक्ति और इच्छा रखता हो, सरलता से शिकार हो सकता था।”

(i) पंजाब – बाबर के आक्रमण के समय पंजाब का सूबेदार दौलत खाँ लोदी था। यद्यपि वह दिल्ली साम्राज्य के अधीन था, लेकिन अपने आपको स्वतन्त्र शासक के रूप में देखना चाहता था। इतिहासकारों के अनुसार उसने अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी थी और इब्राहीम लोदी को समाप्त करने के लिए काबुल के शासक बाबर से पत्र-व्यवहार कर रहा था। उसने बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमन्त्रित किया था।

(ii) गुजरात – सुदूर पश्चिम में स्थित गुजरात का शासक मुजफ्फरशाह था। उसने गुजरात पर 1511 ई० से लेकर 1526 ई० तक राज्य किया। अपने शासनकाल में वह मालवा और मेवाड़ के पड़ोसी राज्यों के साथ युद्धों में व्यस्त रहा। पानीपत के युद्ध के कुछ ही दिन पूर्व उसका देहान्त हो गया और तब उसका पुत्र बहादुरशाह गुजरात का शासक बना। वह बड़ा योग्य और सफल शासक सिद्ध हुआ। आगे चलकर उसका मुगल सम्राट हुमायूं से काफी संघर्ष हुआ।

(iii) दिल्ली – बाबर के आक्रमण के समय उत्तरी भारत का सबसे प्रसिद्ध राज्य दिल्ली था। इसका सम्पूर्ण वैभव समाप्त हो चुका था। कहने को तो दिल्ली का सुल्तान विशाल साम्राज्य का स्वामी था, किन्तु व्यवहारिक दृष्टि से उसका प्रभाव केवल दिल्ली और उसके आसपास के कुछ प्रदेशों तक ही सीमित रह गया था। बाबर के आक्रमण के समय दिल्ली का सुल्तान इब्राहीम लोदी था। उसके कठोर और मनमाने व्यवहार से उसके सूबेदार, सैनिक, अधिकारी और राज दरबारी तंग आ चुके थे। वे सब उसके पतन के आकाँक्षी थे।

फलस्वरूप दिल्ली राज्य के विभिन्न भागों में विद्रोह हो रहे थे। लाहौर के सूबेदार दौलत खाँ लोदी ने अपने आपको स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया था। वह काबुल के शासक बाबर से भी गठजोड़ कर रहा था और उसे दिल्ली पर आक्रमण के लिए उकसा रहा था। दरिया खाँ लोदी बिहार में स्वतन्त्र शासक बन बैठा था। सारांशतः बाबर के आक्रमण के समय दिल्ली राज्य पूर्णतया अव्यवस्थित था और निरन्तर दुर्बल होता जा रहा था।

(iv) बिहार – फिरोज तुगलक के शासनकाल में बिहार स्वतन्त्र हो गया था। बाबर के आक्रमण के समय बिहार शक्तिशाली मुस्लिम राज्य था।

(v) मालवा – तैमूर के आक्रमण के तुरन्त बाद मालवा के सूबेदार दिलावर खाँ ने स्वयं को स्वतन्त्र घोषित कर दिया था। | मालवा के शासक महमूद खिलजी द्वितीय के शासनकाल में मेदिनीराय नामक एक राजपूत सरदार का दबदबा बढ़ गया था। उससे अप्रसन्न होकर मुस्लिम सरदारों ने उसका विरोध किया। मेदिनीराय ने महाराणा सांगा की सहायता से उन्हें परास्त | कर दिया। इस प्रकार मालवा के सरदारों में आपसी फूट बढ़ गई।

(vi) उड़ीसा (ओडिशा) – यह राज्य काफी समय से हिन्दू राजाओं के अधीन था। यह समृद्ध एवं शक्तिशाली राज्य था, किन्तु दिल्ली से अत्यधिक दूर स्थित होने के कारण उत्तर भारत की राजनीति में उसकी विशेष भूमिका न थी।
(vii) सिन्ध- महमूद तुगलक की मृत्यु होते ही सिन्ध राज्य स्वतन्त्र हो गया था। बाबर के भारत पर आक्रमण के समय यहाँ अरबों का अधिकार स्थापित हो गया था। सिन्ध पर अरब वालों का प्रभाव था। यहाँ की राजनैतिक व्यवस्था अत्यन्त ही असन्तोषजनक थी।

(viii) बंगाल – बाबर के आक्रमण के समय बंगाल एक स्वतन्त्र राज्य के रूप में स्थापित था, जहाँ का प्रशासक नुसरतशाह था। वह बड़ा योग्य और गुणवान व्यक्ति था। लोग उसके शासनकाल में आर्थिक दृष्टि से समृद्ध और सन्तुष्ट थे।

(ix) कश्मीर – कश्मीर भी एक महत्वपूर्ण राज्य था। यहाँ सत्ता के लिए आन्तरिक संघर्ष चल रहा था। यहाँ के प्रधान वजीर ने अपने स्वामी सुल्तान मुहम्मदशाह को बाबर की सहायता से अपदस्थ कर स्वयं सत्ता हथिया ली।

(x) मेवाड़ – मेवाड़ उत्तरी भारत का सबसे प्रसिद्ध हिन्दू राज्य था, जिस पर राणा साँगा अथवा राणा संग्रामसिंह का शासन था। कर्नल टॉड के अनुसार राणा साँगा का प्रभाव लगभग सम्पूर्ण राजपूताने पर था। राणा साँगा ने मालवा के अनेक भागों पर अधिकार कर लिया था। उसने गुजरात के शासक को भी हराया था। राणा साँगा का उद्देश्य भारत में फिर से हिन्दू राज्य स्थापित करना था। राणा साँगा निःसन्देह उत्तरी भारत का ही नहीं सम्पूर्ण भारत के शक्तिशाली शासकों में से था, जिससे बाबर को टक्कर लेनी थी।

(xi) पुर्तगाल शक्ति – यद्यपि बाबर के आक्रमण के समय पुर्तगालियों की शक्ति अधिक नहीं थी फिर भी उन्होंने गोआ पर अधिकार जमा लिया था। अपनी गतिविधियों के कारण उन्होंने भारत के पश्चिमी समुद्र तट के राजनीतिक एवं व्यापारिक जीवन में अस्थिरता ला दी थी।

(xii) खानदेश – ताप्ती नदी की घाटी में बसा हुआ खानदेश छोटा-सा किन्तु एक समृद्धशाली राज्य था। मलिक राजा फारुकी, मलिक नसीर खाँ तथा आदिल खाँ फारुकी खानदेश के प्रसिद्ध शासक थे। आदिल खाँ फारुकी की मृत्यु के पश्चात् महमूद प्रथम यहाँ का शासक बना। यह बाबर का समकालीन था।

(xiii) बहमनी राज्य – बहमनी राज्य अपने वैभव को खोकर जीर्ण-शीर्ण हो चुका था। उसके स्थान पर अब बीजापुर, बरार, बीदर, अहमदनगर और गोलकुण्डा के पाँच स्वतन्त्र राज्य स्थापित हो चुके थे। इन राज्यों के शासकों में भी परस्पर संघर्ष होता रहता था। इनकी आपसी फूट से उत्साहित होकर विजयनगर का शक्तिशाली हिन्दू राजा कृष्णदेवराय उन्हें अपने आक्रमण का शिकार बनाता रहता था। इस प्रकार बाबर के आक्रमण के समय दक्षिण में मुस्लिम शक्ति अपने अन्तिम दिन गिन रही थी।

(xiv) विजयनगर – यह हिन्दू राज्य सुदूर दक्षिण में स्थित था। बाबर के आक्रमण के समय यहाँ का राजा कृष्णदेवराय था। के०एम० पणिक्कर के शब्दों में वह अशोक, चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, हर्ष और भोज की परम्परा में एक महान् सम्राट था, जिसका राज्य अपने वैभव के शिखर पर था।” बाबर ने भी विजयनगर के बारे में लिखा है कि राज्य एवं सैनिक दृष्टि से काफिर राजकुमारों में विजयनगर का राजा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।”

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि बाबर के आक्रमण के समय केन्द्रीय शक्ति का पतन हो चुका था तथा समस्त देश में स्वतन्त्र शासक अपनी सत्ता बढ़ाने के लिए पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता में लीन थे। उनमें एकता का अभाव था। लेनपूल ने उस समय की दशा का वर्णन करते हुए लिखा है कि विजेता जाति (मुसलमान) अशांतकारियों की एक भीड़ में बदल गई थी। दिल्ली सल्तनत के बड़े-बड़े प्रान्तों के अपने शासक थे। छोटे-छोटे नगरों, जिलों, यहाँ तक कि दुर्गों आदि पर वहाँ के सरदारों ने अधिकार कर लिया था। इस प्रकार बाबर के लिए भारत पर आक्रमण हेतु उपयुक्त परिस्थितियाँ थीं।

प्रश्न 2.
‘हुमायूँ ने सम्पूर्ण जीवन लुढ़कते हुए ही व्यतीत किया व अन्त में लुढ़ककर ही उसकी जीवन लीला समाप्त हो गई। इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उतर.
हुमायूँ का जन्म 6 मार्च, 1508 ई० को काबुल में हुआ था। उसकी माता का नाम माहम सुल्ताना बेगम और पिता का नाम बाबर था। सन् 1520 ई० में हुमायूँ को 12 वर्ष की अवस्था में बदख्शाँ का शासक बनाया गया। बदख्शाँ में हुमायूँ ने लगभग दस वर्ष तक शासन किया। हुमायू ने 18 वर्ष की अवस्था में युद्धों में भाग लेना शुरू कर दिया था। हुमायूँ जिस समय गद्दी पर बैठा उस समय वह चारों ओर से कठिनाइयों और समस्याओं से घिरा हुआ था। पानीपत और खानवाँ के युद्ध में बाबर की क्रूरता के कारण हिन्दू और मुसलमान उसके विरोधी बन गए थे।

अत: जब हुमायूं सिंहासन पर बैठा तब उसे हिन्दुओं और मुसलमानों का सहयोग न मिल सका। बाबर का अधिक समय युद्धों में व्यतीत हुआ था। इन युद्धों में उसे विशाल धनराशि प्राप्त हुई थी, किन्तु उसने यह धन राशि अपने सरदारों और सम्बन्धियों में बाँट दी थी। अत: हुमायूँ को खाली राजकोश विरासत में मिला था। सिंहासन पर बैठते ही हुमायूँ को अपने सम्बन्धियों के षड्यंत्रों तथा अफगान सरदारों के विद्रोहों का सामना करना पड़ा था। सन् 1530 ई० से 1540 ई० तक वह इन समस्याओं में उलझा रहा तथा 1540 ई० में परिस्थितिवश उसे पराजित होकर 15 वर्षों के लिए भारत छोड़कर जाना पड़ा।

हुमायूं में नेतृत्व का अभाव था। जहाँ तक सम्भव होता, वह कठिनाइयों को टालता रहता था। अपने दस वर्षों के शासनकाल उसने नेतृत्व शक्ति तथा अपने सैनिकों एवं अधिकारियों को नियन्त्रण में रखने की योग्यता का अभाव प्रदर्शित किया। उसे न तो सैन्य संगठन का ज्ञान था और न ही सैन्य संचालन का। उसे इस बात का भी ज्ञान नहीं था कि शत्रु पर कब और किस प्रकार आक्रमण करना चाहिए। शेर खाँ की बढ़ती शक्ति का ठीक अनुमान न लगा पाना और उसके विरुद्ध कुशल नेतृत्व के साथ संघर्ष न करना उसकी असफलता के कारण थे।

हुमायूँ का अर्थ होता है – भाग्यशाली, परन्तु वास्तव में हुमायूँ बहुत ही दुर्भाग्यशाली था। कदम-कदम पर उसके भाग्य ने उसे धोखा दिया। यदि भाग्य साथ देता तो उसे कभी पराजय का मुंह न देखना पड़ता। जिस समय हुमायू आगरा पहुँचा वहाँ उसे शेर खाँ के आने का समाचार मिला। कन्नौज नामक स्थान पर दोनों की सेनाओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में हुमायूँ ने एक हाथी पर चढ़कर अपनी जान बचाई। यह युद्ध अफगानों और मुगलों का अन्तिम युद्ध था, जिसमें हुमायूं के विकास का सितारा डूब गया। कन्नौज युद्ध में पराजय के बाद हुमायूँ ने भारत में शरण मिलने की आशा छोड़कर काबुल की ओर प्रस्थान किया; किन्तु वहाँ उसके भाई कामरान ने उसकी सहायता नहीं की। इस प्रकार हुमायूँ को विदेशों में भाग्य आजमाने के लिए भटकना पड़ा इसके बाद के 15 वर्ष हुमायूँ को एक निर्वासित और भगोड़े के रूप में दर-ब-दर की ठोकर खानी पड़ी।

हुमायँ ने फारस के शाह की सहायता से अपने खोए हुए प्रदेशों को प्राप्त करने की कोशिश की। कंधार, काबुल और बदख्शाँ पर विजय प्राप्त करता हुआ दिल्ली की ओर बढ़ा। उस समय दिल्ली पर अयोग्य शासक सिकन्दर सूर का शासन था। सर हिन्द नामक स्थान पर सिकन्दर सूर को हराकर हुमायूं को पुनः सन् 1555 ई० में दिल्ली का शासन प्राप्त हो गया। हुमायूँ अपनी इस विजय का आनन्द अधिक दिनों तक न ले सका। 24 जनवरी, 1556 ई० को अजान की आवाज सुनकर वह जल्दी से अपने पुस्तकालय के जीने की सिढ़ियों से उतरने लगा और पैर फिसल जाने से लुढ़कता हुआ नीचे गिरा, जिससे उसकी खोपड़ी की हड्डी टूट गई। तीन दिन बाद 27 जनवरी, 1556 को उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार हुमायूँ ने सम्पूर्ण जीवन लुढ़कते हुए ही व्यतीत किया और अन्त में लुढ़ककर ही उसकी जीवन लीला समाप्त हो गई।

प्रश्न 3.
हुमायूँ की प्रारम्भिक कठिनाइयों का वर्णन कीजिए।
उतर.
हुमायूँ की प्रारम्भिक कठिनाईयाँ – हुमायूं जिस समय गद्दी पर बैठा, वह चारों ओर से कठिनाइयों और समस्याओं से घिरा हुआ था। ऐसी परिस्थितियों में एक सैनिक प्रतिभा से युक्त, कूटनीतिक चातुर्य और राजनीतिक सूझबूझ से सम्पन्न शासक की आवश्यकता थी, परन्तु हुमायूं में इन सबका अभाव था। अत: वह स्वयं अपना सबसे बड़ा शत्रु सिद्ध हुआ। हुमायूँ के चरित्र में अनेक दुर्बलताओं का सम्मिश्रण था। अत: कुछ विद्वानों का मत है कि हुमायूँ के चरित्र में अनेक दोष थे, जिनके कारण वह असफल रहा। किन्तु यह भी सत्य है कि हुमायूं को अनेक कठिनाइयाँ विरासत में भी मिली थी। अत: हुमायूँ की प्रमुख कठिनाइयों और समस्याओं का वर्णन करना आवश्यक है ।

(i) हिन्दुओं व मुसलमानों का विरोध – बाबर ने पानीपत के युद्ध में मुसलमानों को अपना शत्रु बना लिया था, साथ ही खानवा के युद्ध में हिन्दुओं का क्रूरता से हत्याकाण्ड करके उसने हिन्दुओं को भी अपना विरोधी बना लिया था। अत: उसका पुत्र हुमायूँ जब सिंहासन पर बैठा तब उसे हिन्दुओं व मुसलमानों दोनों का सहयोग न मिल सका।।

(ii) आर्थिक संकट – बाबर का अधिकतम जीवन युद्धों में व्यतीत हुआ था। हालाँकि पानीपत के युद्ध में उसे एक विशाल धनराशि प्राप्त हुई थी, किन्तु उसने वह धनराशि विजय की खुशी में अपने सरदारों, सम्बन्धियों आदि के बीच वितरित कर दी थी। इस प्रकार धन के वितरण तथा युद्धों में धन के अपव्यय के कारण उसका राजकोष खाली हो गया था। अत: जिस समय हुमायूं सिंहासन पर बैठा, उस समय खाली राजकोष उसे विरासत में मिला था।

(iii) उत्तराधिकार के नियमों का अभाव – मुगल वंश में भी उत्तराधिकार के नियमों का अभाव था, अत: बाबर की मृत्यु के बाद उसके अन्य तीन लड़के- कामरान, अस्करी व हिन्दाल तथा बाबर के अन्य सम्बन्धी भी अपने को सम्राट घोषित करने का प्रयास कर रहे थे। इसके साथ-साथ स्वयं बाबर का यह उपदेश था कि मेरी अन्तिम इच्छा का सार यही है कि अपने भाइयों के विरुद्ध कभी कोई कार्य न करना, चाहे वे उसके योग्य ही क्यों न हों। इस उपदेश के कारण हुमायूँ ने अपने भाइयों के साथ उदारता का व्यवहार करके अपनी कठिनाइयों को और अधिक बढ़ा लिया।

(iv) सम्बन्धियों की समस्या – सम्बन्धियों की समस्या भी हुमायूं के सम्मुख एक प्रमुख कठिनाई थी। इन सम्बन्धियों में उसकी सौतेली बहन मासूमा बेगम का पति मुहम्मद जमान मिर्जा, बाबर का बहनोई मीर मुहम्मद मेहँदी ख्वाजा तथा हुमायूं के भाई कामरान, अस्करी और हिन्दाल मुख्य थे। अस्करी और हिन्दाल दुर्बल व अस्थिर-बुद्धि के थे और वे इसलिए खतरनाक थे कि महत्वाकांक्षी लोग इन्हें अपने हाथों की कठपुतली बना सकते थे।

(v) असंगठित साम्राज्य – बाबर ने हालाँकि अपने सैनिक-बल पर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी, किन्तु न तो उसने उसे संगठित किया तथा न ही शासन-व्यवस्था में कोई सुधार ही किया। अत: विरासत में हुमायूँ को एक असंगठित साम्राज्य मिला था, जो अराजकता से पूर्ण था और ऐसी स्थिति में हुमायूं के लिए कार्य करना कठिन था।

(vi) दोषपूर्ण सैनिक संगठन – बाबर की सेना मुगल, पठान, चगताई आदि अनेक भिन्न-भिन्न जातियों के सैनिकों का सम्मिश्रण थी, जिनमें एकता का अभाव था। अतएव सेना को संगठित रखना भी हुमायूं के लिए बड़ी समस्या थी।

(vii) अफगानों की समस्या – यद्यपि बाबर ने अफगानों को पानीपत के युद्ध में परास्त कर दिया था तथा मुगल साम्राज्य की स्थापना कर दी थी, परन्तु अफगान अभी भी शान्त नहीं बैठे थे। वे बदला लेने के लिए आतुर थे। जिस दौरान हुमायूँ ने सिंहासनारोहण किया, उस समय महमूद लोदी, शेर खाँ जैसे शक्तिशाली किन्तु अत्यन्त महत्वाकांक्षी अफगानों ने उसके | विरुद्ध विद्रोह कर दिया। उसे उनके विरुद्ध लड़ना पड़ा। अतः अफगानों की समस्या हुमायूं को विरासत में प्राप्त हुई थी।

प्रश्न 4. बाबर की विजय के कारणों की व्याख्या कीजिए।
उतर.
भारत में बाबर की विजय के प्रमुख कारणों का विश्लेषण निम्नवत् है
(i) इब्राहीम लोदी की सैनिक कमजोरियाँ – इब्राहीम लोदी अनुभवहीन और अयोग्य सेनापति था। उसे रणक्षेत्र में सेनाओं के कुशल संचालन और संगठन का विशेष ज्ञान नहीं था। इब्राहीम के अन्य सेनापति और सरदार भी विलासी, दम्भी और अनुभवहीन थे। बाबर ने स्वयं अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी’ में लिखा है- “वह (इब्राहीम) अनुभवहीन युवक अपनी गतिविधियों में लापरवाह था, बिना किसी नियम-कायदे के वह आगे बढ़ जाता था, बिना किसी ढंग के रुक जाता अथवा पीछे मुड़ जाता और बिना सोचे-समझे शत्रु से भिड़ जाता।” इब्राहीम लोदी की सैनिक दुर्बलता बाबर जैसे सैनिक
के लिए वरदान सिद्ध हुई।

(ii) इब्राहीम लोदी की अयोग्यता – इब्राहीम लोदी एक अयोग्य निर्दयी और जिद्दी सुल्तान था। उसमें राजनीतिज्ञता, कूटनीति और दूरदर्शिता नहीं थी। इन गुणों के अभाव के कारण वह दौलत खाँ, आलम खाँ, मुहम्मदशाह और राणा साँगा को बाबर के विरुद्ध अपने पक्ष में नहीं मिला सका।

(iii) बाबर द्वारा तोपों का प्रयोग – पानीपत के युद्ध में इब्राहीम के पास तोपखाना और कुशल अश्वारोही सेना नहीं थी, जबकि बाबर के पास सुदृढ़ तोपखाना था, जिसका संचालन उस्ताद अली और मुस्तफा जैसे अनुभवी सेनानायकों ने किया। इसका परिणाम यह हुआ कि आग उगलने वाली तोपों के सम्मुख साधारण शस्त्रों से युद्ध करने वाले सैनिक नहीं टिक पाए। पानीपत में बाबर की विजय में उसके कुशल अश्वारोही और भारी तोपखाना अत्यन्त सहायक हुए।

(iv) बाबर की रणकुशलता और सैन्य संचालन – बाल्यकाल से ही निरंतर संकटों, संघर्षों और युद्ध में भाग लेते रहने से बाबर एक वीर, साहसी, कुशल योद्धा और अनुभवी सैनिक बन गया था। इस प्रकार बाबर एक जन्मजात वीर एवं महान् सेनापति था, इसीलिए उसे पानीपत और खानवा के युद्धों में निर्णायक विजय प्राप्त करने में अधिक कठिनाई नहीं हुई।

(v) राणा साँगा की गलतियाँ – खानवा के युद्ध में राणा साँगा की सबसे बड़ी भूल यह थी कि उन्होंने बाबर पर एकदम आक्रमण नहीं किया, अपितु उसे संगठित और तैयार होने के लिए अवसर दिया। खानवा के समीप की पहली मुठभेड़ में बाबर का सेनापति परास्त हो चुका था और बयाना से उसकी सेना पहले ही हारकर भाग चुकी थी और वह राजपूतों की वीरता व रणकौशल से आतंकित हो गई थी। यदि उसी समय राणा साँगा बाबर पर अपनी पूरी शक्ति से आक्रमण कर देते तो विजय उन्हें ही प्राप्त होती और बाबर भारत से भाग गया होता। राणा साँगा के युद्ध में हारने का एक कारण युद्ध में
हाथियों का प्रयोग भी था।

(vi) बाबर की सैनिक तैयारी तथा तुलगमा रणनीति का प्रयोग – बाबर ने पानीपत और खानवा दोनों ही युद्धों में पूर्ण सैनिक तैयारी की थी। उसने अपनी सेना के सबसे आगे बिना बैल की बैलगाड़ियों की पंक्ति लगाई और इन गाड़ियों को परस्पर जोड़कर एक-दूसरे से लगभग 18 फुट लम्बी लोहे की जंजीरों से बाँध दिया। सेना के जिस भाग में बैलगाड़ियाँ नहीं थीं, उस ओर सुरक्षा के लिए खाइयाँ खुदवा दीं। इनके पीछे बन्दूकची और तोपखाने के गोलन्दाज खड़े किए गए। खानवा के युद्ध में निजामुद्दीन अली खलीफा ने तोपों का नेतृत्व किया। बन्दूकों की व्यवस्था मुस्तफा के अधीन थी और तोपों से गोलाबारी उस्ताद अली ने करवाई। इसके अतिरिक्त बाबर ने पानीपत और खानवा के युद्धों में तुलगमा रणनीति अपनाकर विजय प्राप्त की।

प्रश्न 5.
बाबर के चरित्र का वर्णन कीजिए।
उतर
बाबर के चरित्र में निम्नलिखित विशेषताएँ थीं
(i) व्यक्ति के रूप में – बाबर का व्यक्तित्व बड़ा आकर्षक था। वह अदम्य शारीरिक और आत्मिक शक्ति का स्वामी था। विभिन्न समकालीन एवं आधुनिक विद्वानों ने उसके विभिन्न गुणों की प्रशंसा की है। बाबर के चरित्र की व्याख्या करते हुए एक विद्वान ने लिखा है- “बाबर का चरित्र नारी-दोष से निष्कलंक था, इस सन्दर्भ में तो उसे एक सूफी कहा जा सकता है। वह एक सच्चा मुसलमान था क्योंकि अल्लाह में उसे बड़ा विश्वास था। वह उच्चकोटि का साहित्यकार भी था। उसकी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी’ विश्व के महान ग्रन्थों में गिनी जाती है। बाबर प्रकृति-प्रेमी भी था। मुगल साम्राज्य का संस्थापक सम्राट बाबर अपने मनोरम और सुन्दर व्यक्तित्व, कलात्मक स्वभाव तथा अद्भुत चरित्र के कारण इस्लाम के इतिहास में सदा अमर रहेगा।

(ii) विद्वान शासक के रूप में – बाबर एक जन्मजात सैनिक था और उसे विजेता के रूप में याद किया जाता है, किन्तु यदि बाबर ने भारत ने जीता होता तो भी विद्वान् के रूप में उसे सर्वदा याद किया जाता। उसे पर्शियन और अरबी भाषा का ज्ञान था और वह तुर्की भाषा का विद्वान था। तुर्की भाषा में लिखी हुई उसकी आत्मकथा’ साहित्य और इतिहास दोनों ही दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ मानी गई है, इसमें सभी कुछ इतना सत्य, स्पष्ट, बुद्धिमत्तापूर्ण और रोचक है कि ‘तुजुक-ए-बाबरी’ (बाबरनामा) संसार की श्रेष्ठतम आत्मकथाओं में स्थान रखती है। पद्य की रचनाओं में उसके द्वारा किया गया संकलन ‘दीवारन’ था, जो तुर्की पद्य में श्रेष्ठ स्थान रखता है। न्याय पर भी उसने एक पुस्तक लिखी थी, जिसे सभी ने श्रेष्ठ स्वीकार किया था।

(iii) सेनापति के रूप में – बाबर एक साहसी और कुशल सैनिक था। वह एक प्रशंसनीय घुड़सवार, अच्छा निशानची, कुशल तलवारबाज और जबर्दस्त शिकारी था। सेनापति की योग्यता को बाबर ने अपने संघर्षमय जीवन के अनुभव से प्राप्त किया। वास्तव में बाबर में तुर्को की शक्ति, मंगोलों की कट्टरता और ईरानियों का उद्वेग एवं साहस सम्मिलित था। उसमें नेतृत्व करने का स्वाभाविक गुण था। वह अपनी सेना से बड़ी सेनाओं का मुकाबला करने में डरता न था। अनुशासनहीनता उसे पसन्द न थी और उसकी अवहेलना होने पर वह अपने सैनिकों को कठोर दण्ड देता था। इस प्रकार बाबर एक योग्य
सैनिक और सफल सेनापति था।

(iv) राजनीतिज्ञ और कूटनीतिज्ञ के रूप में – एक राजनीतिज्ञ और कूटनीतिज्ञ के रूप में बाबर पर्याप्त सफल था। अपनी दुर्बल स्थिति को देखकर उसने अपने मामाओं से समझौते के प्रस्ताव किए थे, परन्तु एक राजनीतिज्ञ और कूटनीतिज्ञ की दृष्टि से उसका प्रमुख कार्य भारत में शुरू हुआ। जिस प्रकार उसने भारतीय और अफगान अमीरों में सन्तुलन बनाकर रखा और जिस प्रकार उसने बिहार और बंगाल के शासकों से व्यवहार किया उससे कूटनीतिज्ञ प्रतिभा झलकती है। कम-से-कम छ: हिन्दू राजाओं ने भी स्वेच्छा से उसके आधिपत्य को स्वीकार किया था।

(v) शासन-प्रबन्धक के रूप में – बाबर एक अच्छा शासन-प्रबन्धक नहीं था। यह केवल इसी से स्पष्ट नहीं होता कि उसने भारत के शासन-प्रबन्ध में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं किए बल्कि काबुल के शासक के रूप में भी वह सफल नहीं हुआ था। बाबर ने अपने प्रदेशों में समान शासन-व्यवस्था, लगान-व्यवस्था, कर-व्यवस्था और समुचित न्याय व्यवस्था लागू करने का प्रयत्न नहीं किया। धन सम्बन्धी मामलों में भी बाबर लापरवाह था।

प्रश्न 6.
हुमायूँ की असफलताओं के कारणों की विवेचना कीजिए।
उतर
हुमायूँ को शेरशाह के विरुद्ध कई पराजय झेलनी पड़ी। जब तक शेरशाह जीवित रहा, हुमायूँ को दर-दर की ठोकरें खानी पड़ी। विभिन्न भूलें जो हुमायूँ ने अपने शासन के आरम्भ में कीं, वे अन्त में हुमायूँ की पराजय और असफलता के लिए उत्तरदायी हुईं। जिन परिस्थितियों में हुमायूँ को सिंहासन त्यागना पड़ा, उनमें से अधिकांश उसकी मूर्खता और कमजोरियों का परिणाम था, जिसका वर्णन निम्न प्रकार किया जा सकता है

(i) असंगठित शासन-व्यवस्था – यह सही है कि हुमायूं को विरासत में अस्त-व्यस्त प्रशासन-व्यवस्था प्राप्त हुई थी, जिसका कारण बाबर को पर्याप्त समय नहीं मिल पाना था, लेकिन हुमायूँ को तो पर्याप्त समय मिला था। सिंहासन पर आसीन होने के बाद हुमायूँ ने शासन-व्यवस्था पर जरा भी ध्यान नहीं दिया। बाबर ने अपने पुत्र हुमायूँ के लिए ऐसी शासन-व्यवस्था छोड़ी थी, जो केवल युद्धकालीन स्थिति में ही स्थिर रह सकती थी, शांति के समय वह शिथिल और निराधार थी। हुमायूँ इतना योग्य नहीं था कि असंगठित शासन-व्यवस्था को सुसंगठित कर पाता।

(ii) बहादुरशाह के प्रति हुमायूँ की नीति – बहादुरशाह के प्रति अपनाई गई हुमायूं की नीति उसकी असफलता का प्रमुख कारण बनी। हुमायूं को बहादुरशाह पर उसी समय आक्रमण कर देना चाहिए था, जब वह चित्तौड़ में राजपूतों से युद्ध कर रहा था। ऐसा करने पर उसे विजय और राजपूतों की सहानुभूति मिलने की अधिक सम्भावना थी। माण्डु में कई सप्ताह तक विलासिता में डूबे रहने के कारण वह गुजरात और मालवा विजय को स्थिर न रख सका। अवसर मिलते ही बहादुरशाह ने मालवा और गुजरात पर पुन: अधिकार कर लिया।

(iii) हुमायूँ के चारित्रिक दोष – हुमायूं में संकल्प-शक्ति और चारित्रिक बल का अभाव था। डटकर प्रयत्न करना उसकी शक्ति के बाहर था। विजय प्राप्ति के थोड़े समय बाद ही वह अपने हरम में जाकर आनन्द से पड़ा रहता था और अपने समय को अफीमची के सपनों की दुनिया में नष्ट करता था। उसने गुजरात और मालवा विजयों के पश्चात् कई सप्ताह तक रंगरेलियाँ मनाईं। इसी प्रकार गौड़ पर अधिकार करने के पश्चात् वहाँ भोग-विलास में आठ माह से अधिक का समय नष्ट किया। शत्रु की शक्ति का अनुमान न लगा पाना और कठिन परिस्थितियों में तत्काल निर्णय न कर पाना उसकी अन्य कमजोरियाँ थीं। जैसा कि एलफिंस्टन ने लिखा है कि वह वीर अवश्य था, किन्तु स्थिति की गम्भीरता को समझने की योग्यता उसमें नहीं थी। डॉ० ए०एल० श्रीवास्तव ने लिखा है कि “ऐसे अवसर पर जबकि उसे सजग-सचेष्ट होकर सैन्य संचालन में संलग्न रहना चाहिए था तब अपने हरम में रंगरेलियाँ मनाना और आराम करने का हुमायूँ का यह स्वभाव उसकी असफलता का एक प्रमुख कारण बना।”

(iv) हुमायूँ की भूलें – जिन विषम परिस्थितियों में हुमायूँ ने राज्य सम्भाला, अपनी गलतियों से उसने उसे और कठिन बना दिया। हुमायूँ ने अपने भाइयों में साम्राज्य का बँटवारा कर पहली भूल की। काबुल, कंधार और पंजाब कामरान को दे देने से उसकी शक्ति का आधार ही खत्म हो गया तथा अस्करी और हिन्दाल को छोटी जागीरें देने से उनमें असन्तोष बना रहा। द्वितीय, हुमायूं ने कालिंजर का अभियान कर दूसरी भूल की, क्योंकि न तो राजा को पराजित किया जा सका और न उसे मित्र बनाकर अपनी तरफ मिलाया जा सका।

चुनार का दुर्ग शेर खाँ के ही आधिपत्य में रख देना उसकी तीसरी भूल थी, इससे शेरखाँ को अपनी शक्ति बढ़ाने का मौका मिल गया। गुजरात में बहादुरशाह के विरुद्ध चित्तौड़ की मदद न करना उसकी चौथी भूल थी, जिससे उसने राजपूतों की सहानुभूति और सहयोग प्राप्त करने का अवसर खो दिया। जिस प्रकार राजपूतों ने बाद में अकबर का साथ देकर मुगल साम्राज्य को दृढ़ता प्रदान की, उसी प्रकार हुमायूँ भी उनका साथ लेकर अपने साम्राज्य की रक्षा कर सकता था।

पाँचवाँ, गुजरात के शासक बहादुरशाह के विरुद्ध आक्रमण की योजना में अनेक भूलें रह गई थीं, जिनके कारण मालवा और गुजरात से ही उसे हाथ नहीं धोने पड़े, बल्कि इससे उसकी भावी असफलता, अवनति और प्रतिष्ठा के अन्त का संकेत भी प्राप्त हो गया। छठा, कन्नौज की लड़ाई में तो उसने भारी भूल की, जैसे कि सैनिक-शिविर के लिए नीचा स्थान चुना, डेढ़ महीने तक अकर्मण्य बने रहना, शिविर को दूसरे स्थान पर हटाते समय अच्छा प्रबन्ध न करना, तोपखाने का युद्ध में उपयोग न कर पाना आदि बातें उसकी असफलता, पराजय और अन्त में युद्ध क्षेत्र से उसके भागने के लिए भी उत्तरदायी बनी।।

(v) भाइयों के प्रति उदारता – यह सत्य है कि बाबर ने हुमायूँ को अपने भाइयों के प्रति उदार रहने का निर्देश दिया था। लेकिन जब उसे मालूम हो गया था कि उसके भाई उसके प्रति वफादार नहीं है, तब उसे अपने व्यवहार में परिवर्तन लाना चाहिए था। लेकिन इसके बावजूद वह अपने भाइयों के प्रति उदार बना रहा। इसका परिणाम यह हुआ कि हिसार-फिरोजा और पंजाब जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र उसके हाथ से निकल गए और इन क्षेत्रों पर कामरान का अधिकार स्वीकार कर लिया। फिर भी कामरान के विरोधी रुख में कोई परिवर्तन नहीं आया। अस्करी और हिन्दाल भी उसके प्रति वफादार नहीं रहे। उन्हें जब भी अवसर मिला उन्होंने हुमायूं के विरुद्ध विद्रोह कर स्वयं को सम्राट घोषित कर दिया। लेकिन हुमायूं बार-बार अपने भाइयों को माफ करता रहा। अपने भाइयों के प्रति अत्यधिक उदारता हुमायूँ की असफलता में सहायक सिद्ध हुई।।

(vi) शेर खाँ के प्रति नीति – हुमायूँ कभी भी शेर खाँ की शक्ति और योजना का सही आकलन नहीं कर पाया। वह उसको सदैव अक्षम एवं दुर्बल समझता रहा और शेर खाँ अपनी शक्ति को बढ़ाने में जुटा रहा। शेर खाँ की शक्ति का सही आकलन न कर पाने की हुमायूँ को भारी कीमत चुकानी पड़ी।

(vii) हुमायूँ की अपव्ययता – हुमायूँ को विरासत में रिक्त राजकोष मिला था, उस समय एक ऐसे अर्थ-विशेषज्ञ शासक की जरूरत थी, जो साम्राज्य की अर्थव्यवस्था को ठीक करता। लेकिन हुमायूं ने इस पक्ष की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। बाद में हुमायूँ को कालिंजर से युद्ध-क्षति के रूप में बहुत बड़ी धनराशि और चम्पानेर में गुजरात के शासकों का विशाल कोष मिला था, लेकिन उसने इस धन को बड़ी-बड़ी दावतें देने, आनन्द उत्सव मनाने, अपने अनुयायियों को पुरस्कार बाँटने और इमारतें बनाने में खर्च कर दिया। चम्पानेर से प्राप्त कोष को तो उसने खुले हाथों से खर्च किया। इससे साम्राज्य की
आर्थिक स्थिति और खराब हो गई।

(viii) भारतीय जनता का असहयोग – हुमायूँ को भारतीय जनता एक आक्रमणकारी मानती थी। हुमायूँ ने न तो कभी जनकल्याण की ओर ध्यान दिया और न ही जनता को अपनी ओर आकर्षित किया। रचनात्मक कार्यों के स्थान पर उसने साम्राज्यवादी नीति अपनाई जो जनता के असहयोग के कारण सफल न हो सकी।

(ix) हुमायूँ का दुर्भाग्य – हुमायूँ का अर्थ होता है- भाग्यशाली, लेकिन वास्तव में हुमायूँ अत्यन्त ही दुर्भाग्यशाली था। कदम कदम पर उसके भाग्य ने उसे धोखा दिया। यदि भाग्य ने उसका साथ दिया होता तो वह कभी पराजित न होता। कन्नौज के युद्ध में उसकी पराजय के विषय में डॉ० कानूनगो लिखते हैं कि ‘‘बादशाह का दुर्भाग्य था, जो असामयिक वर्षा के रूप में प्रकट हुआ और जिससे गर्मी के दिनों में उस शिविर में पानी घुस आया, यदि यह दुर्घटना न होती तो हुमायूँ अपने दुर्गम्य शिविर से नहीं हटता।”

(x) उचित नेतृत्व की योग्यता का अभाव – हुमायूँ में कुशल नेतृत्व का अभाव था। जहाँ तक सम्भव होता, वह कठिनाइयों को टालता जाता था। अपने दस वर्षों के राज्यकाल में उसने नेतृत्व शक्ति और अपने सैनिकों एवं अधिकारियों को नियन्त्रण में रखने की योग्यता का नितान्त अभाव प्रदर्शित किया। उसे न तो सैन्य संगठन का ज्ञान था और न ही सैन्य संचालन का। चौसा और कन्नौज के युद्ध में वह अपनी सेना पर कुशल नियन्त्रण न रख सका। उसे इस बात का भी ज्ञान नहीं था कि शत्रु पर कब और किस प्रकार आक्रमण करना चाहिए। शेर खाँ की दिन-प्रतिदिन बढ़ती शक्ति का ठीक अनुमान न लगा पाना और उसके खिलाफ कुशल नेतृत्व के साथ संघर्ष न करना उसकी असफलता के कारण थे। इस प्रकार हुमायूँ की असफलता के विभिन्न कारण बताए जाते हैं। इनसे स्पष्ट होता है कि हुमायूँ की विभिन्न दुर्बलताएँ और भूलें तथा इनके विपरीत शेर खाँ की योग्यता और उसका व्यक्तित्व हुमायूँ की असफलता के मुख्य कारण थे।

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UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi अनेक शब्दों के लिए एक शब्द

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Chapter 4
Chapter Name अनेक शब्दों के लिए एक शब्द
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi अनेक शब्दों के लिए एक शब्द

अनेक शब्दों के लिए एक शब्द

नवीनतम पाठ्यक्रम में अनेक शब्दों अर्थात् वाक्य अथवा वाक्य-खण्डों के लिए उपयुक्त एक शब्द लिखने को सम्मिलित किया गया है। इस प्रकार के दो वाक्य-खण्डों के उत्तर लिखने होंगे। इसके लिए कुल 2 अंक निर्धारित हैं।

अनेक साधन (संकेत, लिपि आदि) होते हुए भी ‘भाषा’ ही भावों/विचारों की अभिव्यक्ति का सर्वोत्तम साधन है। ‘भाषा’ में भावों/विचारों की वही अभिव्यक्ति अधिक प्रभावकारी होती है, जिसमें स्पष्टता के साथ-साथ कुशलता भी हो। किसी भाव/विचार की अभिव्यक्ति हम एक व्यंजक शब्द द्वारा भी कर सकते हैं। और एक बड़े वाक्य द्वारा भी। साहित्यिक भाषा में ही नहीं, दैनिक व्यवहार की भाषा में भी ऐसे व्यंजक शब्दों का महत्त्व स्वीकार किया जाता है, जिनका प्रयोग एक वाक्य या वाक्य-खण्ड के लिए सफलतापूर्वक किया जा सकता है। अनेक शब्दों अर्थात् वाक्य अथवा वाक्य-खण्ड के लिए प्रयोग में लाये जा सकने वाले ऐसे व्यंजक और सटीक शब्दों की विस्तृत सूची यहाँ दी जा रही है।

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