UP Board Solutions for Class 8 Maths Chapter 18 क्षेत्रमिति (मेंसुरेशन)

UP Board Solutions for Class 8 Maths Chapter 18 क्षेत्रमिति (मेंसुरेशन)

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क्षेत्रमिति (मेंसुरेशन)

अभ्यास 18 (a)

प्रश्न 1.
एक समलम्ब की समांतर भुजाएँ 3 सेमी और 4 सेमी है। इनके बीच की दूरी 3 सेमी है। क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 2.
3 सेमी ऊँचाई के समलम्ब का क्षेत्रफल 36 वर्ग सेमी है। इसकी समांतर भुजाओं में से एक भुजा की लम्बाई 9 सेमी सेमी है। दूसरी समांतर भुजा की लम्बाई ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 3.
निम्नांकित चतुर्भुज ABCD में AB || CD और AD ⊥ AB, AB = 8 सेमी, BC = DC=5 सेमी। समलम्ब ABCD का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 4.
एक समलम्ब की समांतर भुजाएँ 8 मी० और 6 मी० हैं और इसकी ऊँचाई 4 मी० है। समलम्ब का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 5.
एक समलम्बाकार क्षेत्र का क्षेत्रफल 270 मी’ है और उसकी ऊँचाई 15 मीटर है। यदि समान्तर भुजाओं में से एक, दूसरी की दो गुनी हो, तो दोनों समान्तर भुजाओं की लम्बाई ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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अभ्यास 18 (b)

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What is the greatest common factor of 12 and 18? Answer: 6.

प्रश्न 1.
लोहे के पतले तार से समान व्यास वाले 8 छल्ले बनाए जाते हैं। यदि एक छल्ले का व्यास 22.75 सेमी हो, तो छल्लों को बनाने में कितना मीटर तार लगेगा?
उत्तर
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प्रश्न 2.
हॉकी के डंडे (स्टिक) पर पतली डोरी लपेटनी है। यदि डंडे का व्यास 4.9 सेमी हो और 250 फेरे लगाने हों, तो कितनी लम्बी डोरी की आवश्यकता होगी?
उत्तर
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प्रश्न 3.
एक साइकिल के पहिए का व्यास 77 सेमी है। 2.42 किमी० चलने में पहिया कितने चक्कर लगाएगा?
उत्तर
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प्रश्न 4.
दौड़ के लिए एक वृत्ताकार पथ बनाना है, जिससे कि 8 चक्कर में एक किलोमीटर पूरा हो जाए। निकटतम डेसीमी तक पथ का व्यास ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 5.
66 सेमी चाँदी के तार से बराबर नाप के 10 छल्ले बनाता है। प्रत्येक छल्ले का व्यास क्या होगा?
उत्तर
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Try arranging 18 marbles in rows and find the factors of 18.

प्रश्न 6.
पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी लगभग 384000 किमी है। यदि पृथ्वी के चारों ओर इसका पथ वृत्ताकार हो, तो चंद्रमा के पथ की परिधि ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 7.
दो वृत्तों की त्रिज्याओं का अनुपात 2:3 है। इनके परिधियों का अनुपात ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 8.
एक वृत्ताकार घास के मैदान के आर पार जाने के दो रास्ते हैं। एक व्यास से होकर और दूसरा परिधि से होकर। यदि इन दोनों रास्तों में 16.4 मीटर का अंतर हो, तो घास के मैदान का व्यास और परिधि ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 9.
पृथ्वी की भूमध्य रेखा की लम्बाई (परिधि) 40040 किमी है। यदि इस रेखा के ऊपर 7000 किमी की ऊँचाई पर एक स्पुतनिक लगातार उड़े तो पृथ्वी का एक चक्कर करने में उसे कितनी दूरी तय करनी पड़ेगी?
उत्तर
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अभ्यास 18 (c)

The prime factors of 84 are 2, 3 and 7.

प्रश्न 1.
उस वृत्त का क्षेत्रफल बताइए जिसको व्यास 14 डेसीमी० है।
उत्तर
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प्रश्न 2.
एक वृत्ताकार दफ्ती का क्षेत्रफल [latex]9\frac { 5 }{ 8 } [/latex] वर्ग डेसीमी० है। उनका व्यास बताइए।
उत्तर
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प्रश्न 3.
28 सेमी भुजा की लोहे की वर्गाकार चादर से दयाराम लोहार बड़े से बड़ा वृत्ताकार संमतलीय तवा तैयार करता है। तवे का क्षेत्रफल बताइए। कितनी चादर बची रहेगी?
उत्तर
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calculate Prime factorization of 84 numbers.

प्रश्न 4.
एक अर्द्ध वृत्ताकार साइनबोर्ड की रँगाई का खर्च 15 पैसा प्रति वर्ग सेमी की दर से रु० 49.50 है। यदि भीतरी अर्द्धवृत्त का व्यास 28 सेमी हो, तो बोर्ड की चौड़ाई बताइए।
उत्तर
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प्रश्न 5.
एक वर्ग और एक वृत्त के परिमाप, समान हैं। यदि दोनों के परिमाप 44 सेमी हों, तो किसका क्षेत्रफल अधिक होगा और कितना?
उत्तर
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प्रश्न 6.
एक वृत्त का क्षेत्रफल दूसरे वृत्त के क्षेत्रफल का 100 गुना है। उनकी परिधियों का अनुपात ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 7.
एक प्लास्टिक की आयताकार शीट 36 सेमी x 24 सेमी माप की है। इसमें से 1 सेमी व्यास के 864 वृत्ताकार बटन काट कर निकाल लिए गए है। बची शीट का क्षेत्रफल बताइए।
उत्तर
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प्रश्न 8.
एक वृत्ताकार थाली का व्यास 28 सेमी है। उस वृत्ताकार तश्तरी का व्यास बताइए जिसको क्षेत्रफल इसका आधा हो।
उत्तर
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अभ्यास 18 (d)

प्रश्न 1.
एक लम्ब वृत्तीय बेलन के आधार का क्षेत्रफल 100 वर्ग सेमी है। यदि बेलन की ऊँचाई 10 सेमी है, तो आयतन ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 2.
एक वर्गाकार कागज जिसकी भुजा 25 सेमी है, उसको मोड़ कर बेलन बनाया गया है। बने बेलन का वक्र पृष्ठ ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 3.
एक लम्ब वृत्तीय बेलनकार ड्रम का व्यास 55 सेमी तथा लम्बाई 120 सेमी है। उस ड्रम में कितने लीटर पानी आएगा?
उत्तर
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प्रश्न 4.
यदि एक रोलर का व्यास 70 सेमी तथा लम्बाई 2 मीटर है, तो बताइए कि 50 चक्कर में रोलर कितने वर्ग मीटर चलेगा?
उत्तर
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प्रश्न 5.
3 मीटर व्यास का 14 मीटर गहरा कुआँ 30 रुपया प्रति घन मीटर की दर से खोदने में कितना रुपया खर्च होगा?
उत्तर
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प्रश्न 6.
एक 11 सेमी व्यास वाले बेलनाकार बरतन में कुछ पानी भरा है। यदि 5.5 सेमी भेजा का एक घनाकार ठोस पूरी तरह पानी में डुबो दिया जाए, तो बर्तन में पानी की सतह कितनी ऊपर उठ जाएगी?
उत्तर
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प्रश्न 7.
एक 17 सेमी लम्बे और 7 सेमी चौड़े आयत को चौड़ाई के परितः घुमाने पर बने बेलन का आयतन और वक्र पृष्ठ ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 8.
यदि एक लम्बवृत्तीय बेलन के आधार की त्रिज्या 7 सेमी तथा ऊँचाई 14 सेमी हो, तो बेलन का सम्पूर्ण पृष्ठ ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 9.
एक लम्बवृत्तीय बेलन का वक्रपृष्ठ 1320 वर्ग सेमी है। यदि बेलन की ऊँचाई 15 सेमी. हो, तो बेलन के आधार की त्रिज्या ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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अभ्यास 18 (e)

प्रश्न 1.
पाश्र्वांकित चित्र में दिए गये शंकु का वक्र पृष्ठ ज्ञात कीजिए, जबकि v0 = 15 सेमी और OB = 8 सेमी है।
उत्तर
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प्रश्न 2.
एक शंकु का आयतन 100 घन सेमी है। यदि आधार की त्रिज्या 5 सेमी हो, तो उसका वक्रपृष्ठ ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 3.
किसी शंक्वाकार तंबू के निर्माण के लिए 264 वर्ग मी किरमिच की आवश्यकता पड़ती है। यदि शंकु की तिरछी ऊँचाई 12 मी हो, तो उसकी ऊँचाई ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 4.
एक जोकर की टोपी शंक्वाकार है। यदि उसमें 840 वर्ग सेमी कपड़ा लगा हो और उसके गोल सिर का परिमाप 56 सेमी हो, तो टोपी की तिरछी ऊँचाई ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 5.
उस बड़े से बड़े शंकु का आयतन ज्ञात कीजिए, जो उस घन से काटा जाए जिसकी प्रत्येक कोर 12 सेमी सेमी लम्बी हो।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 8 Maths Chapter 18 क्षेत्रमिति (मेंसुरेशन) img-40
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प्रश्न 6.
यदि एक लम्बवृत्तीय शंकु के आधार की त्रिज्या 3 सेमी तथा ऊँचाई 4 सेमी है, तो उसका सम्पूर्ण पृष्ठ ज्ञात कीजिए।
उत्तर
UP Board Solutions for Class 8 Maths Chapter 18 क्षेत्रमिति (मेंसुरेशन) img-42

प्रश्न 7.
एक लम्बवृत्तीय शंकु का सम्पूर्ण पृष्ठ 301 वर्ग मीटर तथा उसके आधर की त्रिज्या 6 मीटर है। शंकु की ऊँचाई ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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दक्षता अभ्यास -18

प्रश्न 1.
निम्नांकित कथनों में रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-
उत्तर

  1. समलम्ब का क्षेत्रफल का सूत्र =
    [latex]\frac { 1 }{ 2 } [/latex] x (समान्तर भुजाओं का योग) x उनके बीच की दूरी |
  2. एक वृत्त की त्रिज्या : सेमी० है। इस वृत्त की परिधि = 2πr तथा क्षेत्रफल = πr2
  3. एक बेलन के आधार की त्रिज्या r सेमी तथा ऊँचाई h सेमी है। इस बेलन का आयतन = πr2h तथा वक्र पृष्ठ = 2πrh
  4. एक शंकु की त्रिज्या r सेमी, ऊँचाई h सेमी और तिरछी ऊँचाई / सेमी है। इस शंकु का आयतन = [latex]\frac { 1 }{ 3 } [/latex]πr2h, वक्रपृष्ठ = πrl तथा संपूर्ण पृष्ठ = π r (l+r)

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प्रश्न 2.
निम्नांकित चित्र में बनी आकृति का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 3.
5 सेमी आधार त्रिज्या के शंकु के संपूर्ण पृष्ठ और वक्रपृष्ठ का अंतर ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 4.
एक शंकु की ऊँचाई 48 सेमी और आधार का व्यास 28 सेमी है। इस शंकु का आयतन, वक्र पृष्ठ और संपूर्ण पृष्ठ ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 5.
एक वृत्ताकार पार्क का व्यास 84 मीटर है। 3.5 मीटर चौड़ी सड़क, पार्क से बाहर चारों ओर बनी हुई है। सड़क का 20 रुपए प्रति वर्ग मीटर की दर से मरम्मत कराने का व्यय ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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UP Board Solutions for Class 8 Maths Chapter 18 क्षेत्रमिति (मेंसुरेशन) img-48UP Board Solutions for Class 8 Maths Chapter 18 क्षेत्रमिति (मेंसुरेशन) img-53

प्रश्न 6.
चित्र में 28 सेमी भुजा का एक वर्ग है। इसमें भुजाओं को स्पर्श करता हुआ वृत्त बना है। वृत्त का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
उत्तर
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प्रश्न 7.
3.5 मीटर त्रिज्या तथा 20 मीटर गहराई के कुएँ से निकाली गई मिट्टी को 25 मीटर लम्बे और 16 मीटर चौड़े आयताकार मैदार में फैला दिया जाता है। बताइए मैदान कितनी ऊँचाई तक पट जाएगा, जबकि मिट्टी के आयतन में कोई परिवर्तन नहीं होता है।
उत्तर
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प्रश्न 8.
एक रोलर का व्यास 2.4 मी तथा लम्बाई 1.68 मी है। यदि किसी मैदान को समतल कराने के लिए उस को 1000 पूर्ण चक्कर लगाने पड़ते हैं, तो मैदान का क्षेत्रफल होगा –
(क) 126720 वर्ग मी
(ख) 12672 वर्ग मी
(ग) 1267.2 वर्ग मी
(घ) 12.672 हेक्टेयर
उत्तर
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प्रश्न 9.
वर्षा जल संग्रह के लिए एक लम्बवृत्तीय पक्की टंकी बनायी गयी है, जिसके आधार का व्यास 14 मीटर तथा गहराई 9 मीटर है। इस टंकी में कितना लीटर वर्षा का जल एकत्रित होगा?
उत्तर
UP Board Solutions for Class 8 Maths Chapter 18 क्षेत्रमिति (मेंसुरेशन) img-51

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प्रश्न 10.
एक शंक्वाकार तम्बू के आधार की त्रिज्या 3.5 मीटर तथा ऊँचाई 12 मीटर है। कपड़े की दीवार की मोटाई को नगण्य मानते हुए ज्ञात कीजिए कि तम्बू के बाहरी एवं भीतरी दीवारों का फर्श पर कीटाणुनाशक दवाओं का छिड़काव कराने पर कुल कितना व्यय होगा यदि प्रति वर्ग मीटर र 2.5 खर्च होते हैं।
उत्तर
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UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 17 Breathing and Exchange of Gases

UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 17 Breathing and Exchange of Gases (श्वसन और गैसों का विनिमय)

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अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जैव क्षमता की परिभाषा दीजिए और इसका महत्त्व बताइए।
उत्तर :
जैव क्षमता। अन्त:श्वास आरक्षित वायु (Inspiratory Reserve Air Volume, IRV), प्रवाही वायु (Tidal Air Volume, TV) तथा उच्छ्वास आरक्षित वायु (Expiratory Reserve Air Volume, ERV) का योग (IRV + TV + ERV- 3000 + 500 + 1100 = 4600 मिली) फेफड़ों की जैव क्षमता होती है। यह वायु की वह कुल मात्रा होती है जिसे हम पहले पूरी चेष्टा द्वारा फेफड़ों में भरकर पूरी चेष्टा द्वारा शरीर से बाहर निकाल सकते हैं। जिस व्यक्ति की जैव क्षमता जितनी अधिक होती है, (UPBoardSolutions.com) उसे शरीर की जैविक क्रियाओं के लिए उतनी ही अधिक ऊर्जा प्राप्त होती है। खिलाड़ियों, पर्वतारोही, तैराक आदि की जैव क्षमता अधिक होती है। युवक की जैव क्षमता प्रौढ़ की अपेक्षा अधिक होती है। पुरुषों की जैव क्षमता स्त्रियों की अपेक्षा अधिक होती है। यह उनकी कार्य क्षमता को प्रभावित करती है।

प्रश्न 2.
सामान्य निःश्वसन के उपरान्त फेफड़ों में शेष वायु के आयतन को बताएँ।
उत्तर :
वायु की वह मात्रा जो सामान्य नि:श्वसन (उच्छ्वास) के उपरान्त फेफड़ों में शेष रहती है, कार्यात्मक अवशेष सामर्थ्य (Functional Residual Capacity, FRC) कहलाती है। यह उच्छ्वास आरक्षित वायु (Expiratory Reserve Air Volume, ERV) तथा अवशेष वायु (Residual Air Volume, RV) के योग के बराबर होती है। इसकी सामान्यतया मात्रा 2300 मिली होती है।

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FRC = ERV + RV
= 1100 + 1200 मिली
= 2300 मिली।

प्रश्न 3
गैसों का विसरण केवल कूपकीय क्षेत्र में होता है, श्वसन तन्त्र के किसी अन्य भाग में नहीं, क्यों?
उत्तर :
गैसीय विनिमय मनुष्य के फेफड़ों में लगभग 30 करोड़ वायु कोष्ठक या कूपिकाएँ (alveoli) होते हैं। इनकी पतली भित्ति में रक्त केशिकाओं को घना जाल फैला होता है। श्वासनाल (trachea), श्वसनी (bronchus), श्वसनिका (bronchiole), कूपिका नलिकाओं (alveolar duct) आदि में रक्त केशिकाओं का जाल फैला हुआ नहीं होता। इनकी भित्ति मोटी होती है। अत: कूपिकाओं (alveoli) को छोड़कर अन्य श्वसन भागों में गैसीय विनिमय नहीं होता। सामान्यतया ग्रहण की गई 500 मिली प्रवाही वायु में से लगभग 350 मिली कूपिकाओं में पहुँचती है, शेष श्वास मार्ग में ही रह जाती है। वायु कोष्ठकों की भित्ति तथा रक्त केशिकाओं की भित्ति (UPBoardSolutions.com) मिलकर श्वसन कला (respiratory membrane) बनाती हैं। इससे O2 तथा C का विनिमय सुगमता से हो जाता है। गैसीय विनिमय सामान्य विसरण द्वारा होता है। इसमें गैसें उच्च आंशिक दबाव से कम आंशिक दबाव की ओर विसरित होती हैं। वायुकोष्ठकों में O2 का आंशिक दबाव 100 -104 mm Hg और CO2) को आंशिक दबाव 40 mm Hg होता है। फेफड़ों में रक्त केशिकाओं में आए अशुद्ध रुधिर में 0 का आंशिक दबाव 40 mm Hg और CO2) का आंशिक दबाव 45-46 mm Hg होता है।
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ऑक्सीजन वायुकोष्ठकों की वायु से विसरित होकर रक्त में जाती है और रक्त से CO2 विसरित होकर वायुकोष्ठकों की वायु में जाती है। इस प्रकार वायुकोष्ठकों से रक्त ले जाने वाली रक्त केशिकाओं में रक्त ऑक्सीजनयुक्त (Oxygenated) होता है। फेफड़ों से निष्कासित वायु में O2 लगभग 15.7% और CO2 लगभग 3.6% होती है।

प्रश्न 4.
CO2 के परिवहन (ट्रांसपोर्ट) की मुख्य क्रियाविधि क्या है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
कार्बन डाइऑक्साइड का रुधिर द्वारा परिवहन ऊतकों में संचित खाद्य पदार्थों के ऑक्सीकरण से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड विसरण द्वारा रुधिर केशिकाओं में चली जाती है। रुधिर केशिकाओं द्वारा इसकापरिवहन श्वसनांगों तक निम्नलिखित तीन प्रकार से होता है
(1) प्लाज्मा में घुलकर (Dissolved in Plasma) :
लगभग 7% कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन प्लाज्मा में घुलकर कार्बोनिक अम्ल के रूप में होता है।

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(2) बाइकार्बोनेट्स के रूप में (In the form of Bicarbonates) :
लगभग 70% कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन बाइकार्बोनेट्स के रूप में होता है। प्लाज्मा के अन्दर कार्बोनिक अम्ल का निर्माण धीमी गति से होता है। अत: कार्बन डाइऑक्साइड का अधिकांश भाग (93%) लाल रुधिराणुओं में विसरित हो जाता है। इसमें से 70% कार्बन डाइऑक्साइड से (UPBoardSolutions.com) कार्बोनिक अम्ल व अन्त में बाइकार्बोनेट्स का निर्माण हो जाता है। लाल रुधिराणुओं में कार्बोनिक एनहाइड्रेज एन्जाइम की उपस्थिति में कार्बोनिक अम्ल का निर्माण होता है।
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प्लाज्मा में, कार्बोनिक एनहाइड्रेज एन्जाइम अनुपस्थित होता है; अत: प्लाज्मा में बाइकार्बोनेट कम मात्रा में बनता है। बाइकार्बोनेट आयन UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 17 Breathing and Exchange of Gases image 3 लाल रुधिराणुओं के पोटैशियम आयन (K+) तथा प्लाज्मा के सोडियम आयन (Na+) से क्रिया करके क्रमशः पोटैशियम तथा सोडियम बाइकार्बोनेट बनाता है।
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क्लोराइड शिफ्ट या हैम्बर्गर परिघटना (Chloride Shift or Hambergur Phenomenon) सामान्य pH तथा विद्युत तटस्थता (electric neutrality) बनाए रखने के लिए जितने बाइकार्बोनेट आयन रुधिर कणिकाओं से प्लाज्मा में आते हैं, उतने ही क्लोराइड आयन (Cl) रुधिर कणिकाओं में जाकर उसकी पूर्ति करते हैं। इस क्रिया के फलस्वरूप प्लाज्मा में बाइकार्बोनेट तथा लाल रुधिरे कणिकाओं में क्लोराइड आयनों का जमाव हो जाता है। इस क्रिया को क्लोराइड शिफ्ट (chloride shift) कहते हैं। श्वसन तल पर प्रक्रियाएँ विपरीत दिशा में होती हैं जिससे CO2 मुक्त होकर वायुमण्डल में चली जाती है।

(3) कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन के रूप में (In the form of Carboxyhaemoglobin) :
कार्बन डाइऑक्साइड का लगभग 23% भाग लाल रुधिर कणिकाओं के हीमोग्लोबिन से मिलकर अस्थायी यौगिक बनाता है
UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 17 Breathing and Exchange of Gases image 4
सोडियम तथा पोटैशियम के बाइकार्बोनेट्स तथा कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन आदि पदार्थों से युक्त रुधिर अशुद्ध होता है। यह रुधिर ऊतकों और अंगों से शिराओं द्वारा हृदय में पहुँचता है। हृदय से यह रुधिर फुफ्फुस धमनियों द्वारा फेफड़ों में शुद्ध होने के लिए जाता है। फेफड़ों में ऑक्सीजन की अधिक मात्रा होने के कारण रुधिर की हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन से मिलकर ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाती है। ऑक्सीहीमोग्लोबिन, हीमोग्लोबिन की अपेक्षा अधिक अम्लीय होता है। (UPBoardSolutions.com) ऑक्सीहीमोग्लोबिन के अम्लीय होने के कारण श्वसन सतह पर कार्बोनेट्स तथा कार्बोनिक अम्ल का विखण्डन (decomposition) होता है
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कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन तथा प्लाज्मा प्रोटीन के रूप में बने अस्थायी यौगिक भी ऑक्सीजन से संयोजित होकर कार्बन डाइऑक्साइड को मुक्त कर देते है
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उपर्युक्त प्रकार से मुक्त हुई कार्बन डाइऑक्साइड रुधिर केशिकाओं तथा फेफड़ों की पतली दीवारों से विसरित होकर फेफड़ों में पहुँचती है जहाँ से यह उच्छ्वास द्वारा बाहर निकाल दी जाती है।

प्रश्न 5.
कूपिका वायु की तुलना में वायुमण्डलीय वायु में pO2 तथा pCO2 कितनी होगी? मिलान कीजिए।
(i) pO2 न्यून, pCO2 उच्च
(ii) pO2 उच्च, pCO2 न्यून
(iii) pO2 उच्च, pCO2 उच्च
(iv) pO2 न्यून, pCO2 न्यून
उत्तर :
(ii) pO2 उच्च, pCO2 न्यून। (वायुमण्डलीय वायु में O2 का आंशिक दाब 159 तथा CO2 का आंशिक दाब 0.3 होता है, जबकि कूपिका वायु में O2 का आंशिक दाब 104 तथा CO2 का आंशिक दाब 40 होता है।)

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प्रश्न 6.
सामान्य स्थिति में अन्तःश्वसन प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
सामान्य श्वासोच्छ्वास (breathing) या श्वासन अनैच्छिक होता है। इसमें पसलियों की गति की भूमिका 25% और डायफ्राम की भूमिका 75% होती है।

अन्तःश्वास या प्रश्वसन (Inspiration) :
सामान्य स्थिति में अन्त:श्वास में गुम्बदनुमा डायफ्राम पेशियों में संकुचन के कारण चपटा सा हो जाता है। डायफ्राम की गति के साथ बाह्य अन्तरापर्शक पेशियों (external intercostal muscles) में संकुचने से पसलियाँ सीधी होकर ग्रीवा की तथा बाहर की तरफ खिंचती है। इससे उरोस्थि (sternum) ऊपर और आगे की ओर उठ जाती है। इन गतियों के कारण वक्षगुहा का आयतन बढ़ जाता है और फेफड़े फूल जाते हैं। वक्ष गुहा और फेफड़ों में वृद्धि के कारण वायुकोष्ठकों या कूपिकाओं (alveoli) में वायुदाब लगभग 1 से 3mm Hg कम हो जाता है। इसकी पूर्ति के लिए वायुमण्डलीय वायु श्वास मार्ग से कूपिकाओं में पहुँच जाती है। इस क्रिया को (UPBoardSolutions.com) अन्तःश्वास कहते हैं। इसके द्वारा मनुष्य (अन्य स्तनी) वायु ग्रहण करते हैं।

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प्रश्न 7.
श्वसन का नियमन कैसे होता है?
उत्तर :
श्वसन का नियमन मस्तिष्क के मेड्यूला (medulla) एवं पोन्स वैरोलाइ (Pons varolii) में स्थित श्वास केन्द्र (respiratory centre) पसलियों तथा डायफ्राम से सम्बन्धित पेशियों की क्रिया का नियमन करके श्वासोच्छ्वास (breathing) या श्वसन (respiration) का नियमन करता है। श्वास क्रिया तन्त्रिकीय नियन्त्रण में होती है। यही कारण है कि हम अधिक देर तक श्वास नहीं रोक पाते हैं। फेफड़ों की भित्ति में ‘स्ट्रेच संवेदांग’ (stretch receptors) होते हैं। फेफड़ों के आवश्यकता से अधिक फूल जाने पर ये संवेदांग पुनर्निवेशन नियन्त्रण (feedback control) के अन्तर्गत नि:श्वसन को तुरन्त रोकने के लिए हेरिंग बुएर रिफ्लेक्स चाप (Hering-Bruer Reflex Arch) की स्थापना करके श्वास केन्द्र को उद्दीपित करते हैं, जिससे श्वास दर बढ़ जाती है। यह नियन्त्रण प्रतिवर्ती क्रिया के अन्तर्गत होता है।

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शरीर के अन्त:वातावरण में CO2 की सान्द्रता के कम या अधिक हो जाने से श्वास केन्द्र स्वतः उद्दीपित होकर श्वास दर को बढ़ाता या घटाता है। O2 की अधिकता कैरोटिको सिस्टैमिक चाप (Carotico systemic arch) में उपस्थित सूक्ष्म रासायनिक संवेदांगों को प्रभावित करती है। ये संवेदांग श्वास केन्द्र को प्रेरित करके श्वास दर को घटा या बढ़ा देते हैं।

प्रश्न 8.
pCO2 का ऑक्सीजन के परिवहन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
कूपिकाओं में जहाँ pO2 उच्च तथा pCO2 न्यून होता है H+ सांद्रता कम तथा ताप कम होने पर ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनता है। ऊतकों में जहाँ pO2 न्यून तथा pCO2 उच्च होता है H+ सांद्रता अधिक तथा ताप अधिक होता है। ऑक्सीहीमोग्लोबिन का विघटन होता है तथा 0, मुक्त हो जाती है। (UPBoardSolutions.com) इसका अर्थ है O2 फेफड़े की सतह पर हीमोग्लोबिन के साथ मिलती है तथा ऊतकों में अलग हो जाती है। सामान्य परिस्थिति में 5 मिली O2 ऊतकों को प्रति 100 मिली ऑक्सीजनित रक्त से मिलता है।

प्रश्न 9.
पहाड़ पर चढ़ने वाले व्यक्ति की श्वसन प्रक्रिया में क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
पहाड़ पर ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ वायु में O2 का आंशिक दाब कम हो जाता है; अत: मैदान की अपेक्षा ऊँचाई पर श्वासोच्छ्वास क्रिया अधिक तीव्र गति से होगी। इसके निम्नलिखित कारण होते हैं

  1.  रुधिर में घुली हुई ऑक्सीजन का आंशिक दाब कम हो जाता है। O2 रक्त में सुगमता से विसरित होती है। अतः शरीर में ऑक्सीजन परिसंचरण कम हो जाता है। इसके फलस्वरूप सिरदर्द तथा उल्टी (वमन) का आभास होता है।
  2. अधिक ऊँचाई पर वायु में ऑक्सीजन की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है; अत: वायु से अधिक O2 प्राप्त करने के लिए श्वासोच्छ्वास क्रिया तीव्र हो जाती है।
  3. कुछ दिनों तक ऊँचाई पर रहने से रुधिर में लाल रुधिराणुओं की संख्या बढ़ जाती है और श्वास क्रिया सामान्य हो जाती है।

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प्रश्न 10.
कीटों में श्वास क्रियाविधि कैसे होती है?
उत्तर :

कीटों में श्वास क्रियाविधि

कीटों में श्वसन हेतु ट्रैकिंया (trachea) पाए जाते हैं। कीटों के शरीर में ट्रैकिया का जाल फैला होता है। ट्रैकियो पारदर्शी, शाखामय, चमकीली नलिकाएँ होती हैं। ये श्वास रन्ध्रों (spiracles) द्वारा वायुमण्डल से सम्बन्धित रहती हैं। श्वास रन्ध्र छोटे वेश्म (atrium) में खुलते हैं। (UPBoardSolutions.com) श्वास रन्ध्रों पर रोमाभ सदृश शूक तथा कपाट पाए जाते हैं। कुछ श्वास रन्ध्र सदैव खुले रहते हैं। शेष अन्तःश्वसन (inspiration) के समय खुलते हैं और उच्छ्व सन (expiration) के समय बन्द रहते हैं।
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ट्रैकियल वेश्म (atrium) से शाखाएँ निकलकर एक पृष्ठ तथा अधर तल पर ‘ट्रैकिया का जाल बना लेती हैं। ट्रैकिया से निकलने वाली ट्रैकिओल्स (tracheoles) ऊतक या कोशिकाओं तक पहुँचती हैं। कीटों में गैसों का विनिमय बहुत ही प्रभावशाली होता है और O2 सीधे कोशिकाओं तक पहुँचती है। इसी कारण कीट सर्वाधिक क्रियाशील होते हैं।

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The partial pressure formula of one gas in a mixture of gases is equal to the amount of pressure that would of the other gases were removed.

प्रश्न 11.
ऑक्सीजन वियोजन वक्र की परिभाषा दीजिए। क्या आप इसकी सिग्माभ आकृति का कोई कारण बता सकते हैं?
उत्तर :

ऑक्सीजन वियोजन वक्र

हीमोग्लोबिन द्वारा ऑक्सीजन ग्रहण करने की क्षमला ऑक्सीजन के आंशिक दबाव (partial pressure) अर्थात् pO2 पर निर्भर करती है। हीमोग्लोबिन-क़ी वह प्रतिशत मात्रा जो ऑक्सीजन ग्रहण करती है, इसकी प्रतिशत संतृप्ति (percentage saturation of haemoglobin) कहलाती है; जैसेफेफड़ों में रक्त के ऑक्सीजनीकृत होने पर O2 का आंशिक दबाव pO2) लगभग 97 mm Hg होता है। इस pO2 पर हीमोग्लोबिन की प्रतिशत संतृप्ति लगभग 98% होती है।

ऊतकों से वापस आने वाले रक्त में O2 का आंशिक दबाव pO2 लगभग 40 mm Hg होता है, इस pOपर हीमोग्लोबिन की प्रतिशत संतृप्ति लगभग 75% होती है। pO2 तथा हीमोग्लोबिन की प्रतिशत संतृप्ति के सम्बन्ध को ग्राफ पर अंकित करने पर एक सिग्माभ वक्र (sigmoid curve) प्राप्त होता है।  इसे ऑक्सीजन वियोजन वक्र कहते हैं। ऑक्सीजन हीमोग्लोबिन वियोजन वक्र पर शरीर ताप एवं रक्त के pH का प्रभाव पड़ता है। ताप के बढ़ने या pH के कम होने (UPBoardSolutions.com) पर यह वक्र दाहिनी ओर खिसकता है। इसके विपरीत ताप के कम होने या pH के अधिक होने से ऑक्सीजन हीमोग्लोबिन वक्र बाईं ओर खिसकता है। रक्त में CO2 की मात्रा बढ़ने या इसका pH घटने (H’ आयन की संख्या बढ़ने से) पर O2 के प्रति हीमोग्लोबिन की आकर्षण शक्ति कम हो जाती है। इसी को बोहर प्रभाव (Bohr effect) कहते हैं। यह क्रिया ऊतकों में होती है। इस प्रकार बोहर प्रभाव का योगदान हीमोग्लोबिन को फेफड़ों से ऊतकों तक ऑक्सीजन के परिवहन को प्रोत्साहित करता है।
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फेफड़ों में हीमोग्लोबिन को O2 मिलते ही CO2 के प्रति इसका आकर्षण कम हो जाता है और कार्बोमिनोहीमोग्लोबिन COत्यागकर सामान्य हीमोग्लोबिन बन जाता है। अम्लीय हीमोग्लोबिन H+ आयन मुक्त करता है जो बाइकार्बोनेट (HCO3) से मिलकर कार्बोनिक अम्ल बनाते हैं। यह शीघ्र ही CO2) तथा H2Oमें टूटकर CO2 को मुक्त कर देता है। इसे हैल्डेन प्रभाव (Haldane effect) कहते हैं। हैल्डेन प्रभाव फेफड़ों में CO2 के बहिष्कार को और ऊतकों में O2 के बहिष्कार को प्रेरित करता है।

प्रश्न 12.
क्या आपने अव-ऑक्सीयता (हाइपोक्सिया) (न्यून ऑक्सीजन) के बारे में सुना है। इस सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने की कोशिश कीजिए व साथियों के बीच चर्चा कीजिए।
उत्तर :
अव-ऑक्सीयता (Hypoxia) :
इस स्थिति का सम्बन्ध शरीर की कोशिकाओं/ऊतकों में ऑक्सीजन के आंशिक दबाव में कमी से होता है। यह ऑक्सीजन की कम आपूर्ति के कारण होता है। वायुमण्डल में पहाड़ों पर 8000 फुट से अधिक ऊँचाई पर वायु में O2 का दबाव कम हो जाता है। इससे सिरदर्द, वमन, चक्कर आना, मानसिक थकान, श्वास लेने में कठिनाई आदि लक्षण प्रदर्शित होते हैं। इसे कृत्रिम हाइपोक्सिया (artificial hypoxia) कहते हैं। यह रोग प्रायः पर्वतारोहियों को हो। जाता है। शरीर में (UPBoardSolutions.com) हीमोग्लोबिन की कमी के कारण रक्त की ऑक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता प्रभावित होती है। इसे एनीमिया हाइपोक्सिया (anaemia hypoxia) कहते हैं।

प्रश्न 13.
निम्न के बीच अन्तर करें
(क) IRV, ERV
(ख) अन्तः श्वसन क्षमता और निःश्वसन क्षमता
(ग) जैव क्षमता तथा फेफड़ों की कुल धारिता
उत्तर :

(क)
IRV व ERV में अन्तर

1. IRV :
अन्त:श्वसन सुरक्षित आयतन (inspiratory reserve volume) वायु आयतन की वह अतिरिक्त मात्रा है जो एक व्यक्ति बलपूर्वक अन्त:श्वासित कर सकता है। यह औसतन 2500 मिली से 3000 मिली होती है।

2. ERV :
नि:श्वसन सुरक्षित आयतन (expiratory reserve volume) वायु आयतन की वह अतिरिक्त मात्रा है जो एक व्यक्ति बलपूर्वक नि:श्वासित कर सकता है। यह औसतन 1000 मिली से 1100 मिली होता है।

(ख)
अन्तःश्वसन क्षमता व निःश्वसन क्षमता में अन्तर

1. अन्तःश्वसन क्षमता (Inspiratory Capacity, IC) :
सामान्यतः नि:श्वसन उपरान्त वायु की कुल मात्रा (आयतन) जिसे एक व्यक्ति अन्त:श्वासित कर सकता है। इसमें ज्वारीय आयतन तथा अन्तः श्वसन सुरक्षित आयतन सम्मिलत होते हैं (TV + IRV)।

2. निःश्वसन क्षमता (Expiratory Capacity, EC) :
सामान्यतः अन्तः श्वसन उपरान्त वायु की कुल मात्रा (आयतन) जिसे एक व्यक्ति नि:श्वासित कर सकता है। इसमें ज्वारीय आयतन और नि:श्वसन सुरक्षित आयतन सम्मिलित होते हैं (TV + ERV)।

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(ग)
जैव क्षमता तथा फेफड़ों की कुल धारिता में अन्तर

1. जैव क्षमता (Vital Capacity) :
बलपूर्वक नि:श्वसन के बाद वायु की वह अधिकतम मात्रा जो एक व्यक्ति अन्त:श्वासित कर सकता है अथवा वायु की वह अधिकतम मात्रा जो एक व्यक्ति बलपूर्वक अन्त:श्वसन के पश्चात् नि:श्वासित कर सकता है।

2. फेफड़ों की कुल धारिता (Total Lung Capacity) :
बलपूर्वक नि:श्वसन के पश्चात् । फेफड़ों में समायोजित (उपस्थित) वायु की कुल मात्रा। इसमें RV, ERV, TV  तथा IRV सम्मिलित हैं। यानि जैव क्षमता + अवशिष्ट आयतन (VC + RV)।

प्रश्न 14.
ज्वारीय आयतन क्या है? एक स्वस्थ मनुष्य के लिए एक घण्टे के ज्वारीय आयतन (लगभग मात्रा) को आकलित करें।
उत्तर :

1. ज्वारीय आयतन (Tidal Volume, TV) :
सामान्य श्वसन क्रिया के समय प्रति अन्त:श्वासित या नि:श्वासित वायु का आयतन ज्वारीय आयतन कहलाता है। (UPBoardSolutions.com) यह लगभग 500 मिली होता है अर्थात् स्वस्थ मनुष्य लगभग 6000 से 8000 मिली वायु प्रति मिनट की दर से अन्त:श्वासित/ नि:श्वासित कर सकता है।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
श्वसन भागफल का अर्थ है।
(क) ऑक्सीजन की प्रति मिनट ग्रहण (व्यय) मात्रा
(ख) कार्बन डाइऑक्साइड के उत्पादन एवं ऑक्सीजन के ग्रहण का अनुपात
(ग) प्रति मिनट कार्बन डाइऑक्साइड का ग्रहणे
(घ) ताप एवं ऑक्सीजन ग्रहण का अनुपात
उत्तर :
(ख) कार्बन डाइऑक्साइड के उत्पादन एवं ऑक्सीजन के ग्रहण का अनुपात

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ब्रोंकाई को एक वाक्य में परिभाषित कीजिए।
उत्तर :
ब्रोंकाई (bronchi) श्वसन नली (trachea) की वक्ष गुहा में पाई जाने वाली दो शाखाएँ हैं।

प्रश्न 2.
एपिग्लॉटिस का क्या कार्य है?
उत्तर :
एपिग्लॉटिस कण्ठद्वार को ढक्कन की भाँति बन्द करने का कार्य करता है।

प्रश्न 3.
“आणविक ऑक्सीजन जीवन हेतु नितान्त आवश्यक है।” कैसे? अति संक्षेप में समझाइए।
उत्तर :
आणविक ऑक्सीजन के द्वारा ही कोशिकाओं में आवश्यक ऊर्जा उत्पादन के लिए (UPBoardSolutions.com) ऑक्सी श्वसन होता है जो बिना ऑक्सीजन के नहीं हो सकता। अतः जीवन को चलाये रखने के लिए आणविक ऑक्सीजन अत्यन्त आवश्यक है।

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प्रश्न 4.
ग्लाइकोलाइसिस क्रिया के अन्त में ग्लूकोज के प्रत्येक अणु से पाइरुविक अम्ल के कितने अणु बनते हैं? इस क्रिया में O2 की क्या उपयोगिता है?
उत्तर :
ग्लाइकोलाइसिस क्रिया के अन्त में ग्लूकोज के प्रत्येक अणु से दो पाइरुविक अम्ल (pyruvic acid) अणु बनते हैं। इस क्रिया में O2 की कोई आवश्यकता नहीं होती है।

प्रश्न 5.
ATP तथा NADP का पूरा नाम लिखिए।
उत्तर :

  1. ATP–एडीनोसीन ट्राइफॉस्फेट।
  2. NADP-निकोटिनामाइड ऐडीनीन डाइन्यूक्लियोटाइड फॉस्फेट।

प्रश्न 6.
श्वसन क्रिया में हीमोग्लोबिन के महत्त्व पर प्रकाश डालिए। या मानव रुधिर में पाये जाने वाले श्वसन रंजक (वर्णक) का नाम तथा रासायनिक संघटन बताइए। या हीमोग्लोबिन के महत्त्वपूर्ण कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
मनुष्य सहित सभी कशेरुकियों (vertebrates) के तरल संयोजी ऊतक रुधिर (blood) की विशेष कोशिकाओं, जिन्हें लाल रुधिर कणिकाएँ (red blood corpuscles = RBCs) कहते हैं, में एक लोहयुक्त रंगा पदार्थ (pigment) पाया जाता है। यह हीमोग्लोबिन (haemoglobin) कहलाता है। हीमोग्लोबिन में लगभग 5% लोहा (Fe++) तथा शेष ग्लोबिन नामक प्रोटीन (protein) होती है।

हीमोग्लोबिन नामक इस पदार्थ में ऑक्सीजन (O2) तथा कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) के संयोजन की अत्यधिक क्षमता होती है। इसीलिए श्वसन की क्रिया में यह इन गैसों के परिवहन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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प्रश्न 7.
प्राणियों में पाये जाने वाले दो श्वसनी वर्णकों के नाम लिखिए।
उत्तर :

  1. हीमोग्लोबिन
  2. हीमोसायनिन

प्रश्न 8.
वयस्क मनुष्य सामान्यतः एक मिनट में कितनी बार श्वसन करता है? वायु संचालन कौन-सी क्रिया है?
उत्तर :
सामान्य वयस्क मनुष्य एक मिनट में लगभग 12-20 बार श्वसन करता है। श्वसन एक भौतिक क्रिया है।

प्रश्न 9.
श्वास रोध और श्वास क्षिप्रता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
(i) श्वास रोध :
इस रोग के अन्तर्गत श्वसन क्रिया में मांसपेशियाँ सुचारु रूप से कार्य नहीं कर पाती हैं तथा फेफड़ों का आयतन भी लगभग अपरिवर्तित रहता है।

(ii) श्वास क्षिप्रता :
इस रोग में श्वास दर तीव्र हो जाती है। एक सामान्य वयस्क मनुष्य की आराम की अवस्था में श्वास दर लगभग 12-20 है, परन्तु श्वास क्षिप्रता से ग्रस्त व्यक्ति की श्वास दर 20 से ऊपर होती है।

प्रश्न 10.
श्वसन तन्त्र के निम्नलिखित विकारों के कारण लिखिए
(i) एम्फिसीमा
(ii) अस्थमा
उत्तर :

(i) एम्फिसीमा :
इस रोग में कूपिका भित्ति क्षतिग्रस्त हो जाती है जिससे गैस विनिमय की सतह घट जाती है। वायु प्रदूषण, धूम्रपान आदि इसके प्रमुख कारण हैं।

(ii) अस्थमा :
इस रोग में श्वसनी और श्वसनिकाओं की शोथ के कारण श्वसन के समय घरघराहट होती (UPBoardSolutions.com) है तथा श्वास लेने में कठिनाई होती है। वायु प्रदूषण, धूलयुक्त वायु, धूम्रपान आदि इसके प्रमुख कारण हैं।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ATP का पूरा नाम लिखिए तथा इसके कार्य बताइए। या कोशिकीय श्वसन में माइटोकॉण्डूिया की क्या भूमिका है?
उत्तर :
कोशिकीय श्वसन के अन्तर्गत क्रेब्स चक्र माइटोकॉण्ड्रिया में सम्पन्न होता है। इसके फलस्वरूप हाइड्रोजन परमाणु (2H) मुक्त होते हैं। इन्हें हाइड्रोजनग्राही NAD, NADP या FAD ग्रहण करके अपचयित हो जाते हैं। इन्हें पुनः ऑक्सीकृत स्थिति में लाने का कार्य इलेक्ट्रॉन परिवहन तन्त्र करता है। (UPBoardSolutions.com) इसमें उच्च ऊर्जा इलेक्ट्रॉन मुक्त होता है। मुक्त इलेक्ट्रॉन जब एक इलेक्ट्रॉनग्राही से दूसरे इलेक्ट्रॉनग्राही पर ट्रान्सफर होता है तो ऊर्जा मुक्त होती है। मुक्त ऊर्जा की कुछ मात्रा ATP के रुप में संचित हो जाती है। यह क्रिया माइटोकॉण्ड्रिया के क्रिस्टी पर स्थित ऑक्सीसोम्स या F, कण पर होती है।

ATP (एडीनोसीन ट्राइफॉस्फेट) में संचित ऊर्जा पेशीय गति, अपेशीय क्रियाओं, सक्रिय गमन, ऊष्मा। उत्पादन, जैव-संश्लेषण, जैव-विद्युत, जैव-प्रकाश उत्पादन आदि क्रियाओं में प्रयुक्त होती है। माइटोकॉण्ड्रिया को कोशिका का विद्युत गृह तथा ATP को उपापचय जगत का सिक्का कहते हैं।

प्रश्न 2.
ए०टी०पी० क्या है? यह ए०डी०पी० से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर :
ए०टी०पी० (ATP) :
कोशिकीय श्वसन के फलस्वरूप मुक्त गतिज ऊर्जा ATP में संचित हो जाती है। यह ट्राइफॉस्फेट न्यूक्लिओटाइड (एडीनोसीन ट्राइफॉस्फेट) है।
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प्रश्न 3.
निःश्वसन तथा उच्छ्वसन में अन्तर लिखिए।
उत्तर :
निःश्वसन तथा उच्छ्वसन में अन्तर
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प्रश्न 4.
रुधिर में ऑक्सीजन गैस के संवहन का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

ऑक्सीजन का परिवहन

हीमोग्लोबिन लाल रक्त कणिकाओं में स्थित एक लाल रंग को लौहयुक्त वर्णक है। हीमोग्लोबिन के साथ उत्क्रमणीय (reversible) ढंग से बँधकर ऑक्सीजन ऑक्सीहीमोग्लोबिन (oxyhaemoglobin) का गठन कर सकता है। प्रत्येक हीमोग्लोबिन अणु अधिकतम चार O2 अणुओं को वहन कर सकते हैं। हीमोग्लोबिन के साथ ऑक्सीजन का बँधना प्राथमिक तौर पर O2 के आंशिक दाब से सम्बन्धित है। CO2 का आंशिक दाब, हाइड्रोजन आयन सांद्रता और तापक्रम कुछ अन्य कारक हैं जो इस बन्धन को बाधित कर सकते हैं। हीमोग्लोबिन की ऑक्सीजन से प्रतिशत संतृप्ति को pO2 के सापेक्ष आलेखित ।

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करने पर सिग्माभ वक्र (sigmoid curve) प्राप्त होता है। इस वक्र को वियोजन वक्र (dissociation curve) कहते हैं जो हीमोग्लोबिन से 0, बंधन को प्रभावित करने वाले pCO2; H+ आयन सांद्रता आदि घटकों के अध्ययन में अत्यधिक सहायक होता है। कूपिकाओं में जहाँ उच्च pO2, निम्न pCO2; कम H+सांद्रता और निम्न तापक्रम होता है, वहाँ ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाने के लिए ये सभी घटक अनुकूल साबित होते हैं जबकि ऊतकों में निम्न pO2 उच्च pCO2 उच्च H+ सांद्रता और उच्च तापक्रम की स्थितियाँ ऑक्सीहीमोग्लोबिन से ऑक्सीजन के वियोजन के लिए अनुकूल होती हैं। इससे स्पष्ट है कि O2 हीमोग्लोबिन से फेफड़ों की सतह पर बँधती है और ऊतकों में वियोजित हो जाती है। प्रत्येक 100 मिली ऑक्सीजनित रक्त सामान्य शरीर की क्रियात्मक स्थितियों में ऊतकों को लगभग 5 मिली O2 प्रदान करता है।

प्रश्न 5.
ऑर्निथीन चक्र को रेखाचित्र की सहायता से समझाइए। या ऑर्निथीन-आर्जिनीन चक्र को रेखीय चित्र द्वारा प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर :

यूरिया का निर्माण या ऑर्निथीन चक्र

विभिन्न जैव-रासायनिक (bio-chemical) क्रियाओं के अन्तर्गत यकृत कोशिकाओं में अमोनिया को कार्बन डाइऑक्साइड के साथ मिलाकर यूरिया (urea) का निर्माण किया जाता है। ये क्रियाएँ एक चक्र के रूप में होती हैं जिसे ऑर्निथीन चक्र (ormithine cycle) अथवा क्रेब-हेन्सलीट चक्र (Kreb-Henseleit cycle) कहते हैं। इस चक्र में डीएमीनेशन से प्राप्त अमोनिया का एक अणु कार्बन डाइऑक्साइड के एक अणु से मिलकर कार्बमोइल फॉस्फेट (UPBoardSolutions.com) (carbamoyl phosphate) बनाता है। इसमें दो ATP अणुओं का भी उपयोग होता है। काबेंमोइल फॉस्फेट उपलब्ध ऑर्निथीन के साथ ट्रान्सकाबेंमिलेज एन्जाइम की उपस्थिति में संयोग कर लेता है, इससे साइट्रलिन (citrulline) बनता है। साइट्रलिन ए०टी०पी० (ATP) की उपस्थिति में एस्पार्टिक अम्ल (aspartic acid) के साथ संयोग कर आर्जिनोसक्सीनिक अम्ल (arginosuccinic acid) बनाता है। आर्जिनोसक्सीनिक अम्ल का एन्जाइम की उपस्थिति में आर्जिनीन (arginine) तथा फ्यूमैरिक अम्ल (fumaric acid) में विघटन हो जाता है। अब एन्जाइम आर्जिनेज (arginase) की उपस्थिति में आर्जिनीन का विघटन होता है और यूरिया (urea) तथा ऑर्निथीन (ornithine) का निर्माण होता है। इस प्रकार ऑर्निथीन अगले चक्र के लिए वापस मिल जाती है। ऑर्निथीन की इस प्रकार की उपस्थिति के कारण ही इसको ऑर्निथीन चक्र (ornithine cycle) कहते हैं।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कोशिकीय श्वसन से आप क्या समझते हैं? इससे सम्बन्धित विभिन्न पदों (steps) का उल्लेख कीजिए। या निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए
(क) ग्लाइकोलिसिस (glycolysis)
(ख) कोशिकीय श्वसन (cellular respiration) या कोशिकीय श्वसन क्या है? ग्लाइकोलिसिस को अनॉक्सी श्वसन क्यों कहा जाता है? ग्लाइकोलिसिस प्रक्रम का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

कोशिकीय श्वसन

भोज्य पदार्थों को विखण्डित कर उनसे रासायनिक ऊर्जा को, उपयोग के लिए, विमुक्त करने वाली अपंचयिक (catabolic) व पूर्णतः नियन्त्रित (controlled) क्रिया श्वसन (respiration) कहलाती है।”

सामान्यत: सभी जन्तुओं में भोज्य पदार्थों में उपस्थित, रासायनिक ऊर्जा धीरे-धीरे एक श्रृंखला में होने वाली अभिक्रियाओं (reactions) के द्वारा स्वतन्त्र की जाती है। अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पदार्थ, ऐडीनोसीन डाइफॉस्फेट या ए०डी०पी० (adenosine diphosphate or ADP) स्वतन्त्र की गयी इस ऊर्जा को अपने साथ जोड़कर एक अस्थायी यौगिक ऐडीनोसीन ट्राइफॉस्फेट या ए०टी०पी० (adenosine triphosphate or ATP) का निर्माण कर लेता है। ए०टी०पी० (UPBoardSolutions.com) को किसी भी स्थान या उसी या अन्य किसी कोशिका में ऊर्जा के लिए उपयोग में लाया जा सकता है और फिर से ए०डी०पी० प्राप्त हो जाता है। जीवित कोशिका (living cell) में इस प्रकार की क्रिया अत्यन्त नियन्त्रित विधियों से विशेष व्यवस्था के अन्तर्गत, अनेक एन्जाइम, सहएन्जाइम एवं अन्य पदार्थों एवं तन्त्रों (systems) के अन्तर्गत की जाती है। यही नहीं, क्रियाओं के फलस्वरूप जो गतिज ऊर्जा (kinetic energy) निष्कासित होती है उसके अधिकांश भाग को विशेष पदार्थ ए०टी०पी० (ATP) में इस प्रकार संचित किया जाता है

कि उपयोग की आवश्यकता के समय यह तुरन्त अपघटित होकर ऊर्जा को उपलब्ध करा देता है और स्वयं ऊर्जा उत्पादन के स्थान पर ए०डी०पी० (ADP) के रूप में पहुँचकर नयी ऊर्जा ग्रहण करता है अर्थात् उसका कुछ बिगड़ता भी नहीं। बस, यही समस्त क्रियाएँ अर्थात् खाद्य पदार्थ के ऑक्सीकरण से लेकर उपभोग के लिए ऊर्जा उपलब्ध कराने की नियन्त्रित क्रियाओं को हम श्वसन (respiration) कहते हैं।

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कोशिकीय श्वसन से सम्बन्धित दो प्रमुख पद

(i) ग्लाइकोलिसिस (Glycolysis) :
श्वसन की यह सामान्य क्रिया प्रारम्भ में कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) में होती है और इसमें ऑक्सीजन के बिना ही, केवल आन्तरिक परिवर्तनों के द्वारा, कार्बोहाइड्रेट को अपूर्ण रूप से ऑक्सीकृत करके थोड़ी-सी ऊर्जा निकाल ली जाती है। इस प्रकार के श्वसन को
जिसमें ऑक्सीजन अनुपस्थित होती है, अनॉक्सी या अवायवीय (anaerobic) श्वसन कहते हैं।

(ii) क्रेब्स चक्र (Kreb’s Cycle) :
अधिक दक्षश्वसन की यह क्रिया ऑक्सीजन की उपस्थिति में सामान्य कोशिका में माइटोकॉण्ड्रिया (mitochondria) पर होती है और ऑक्सीश्वसन या वायवीय श्वसन (aerobic respiration) कहलाती है।

ग्लाइकोलिसिस या ई०एम०पी० पथ

ग्लाइकोलिसिस की अभिक्रियाएँ कोशिका के कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) में होती हैं जिसमें 6 C वाला ग्लूकोज का एक अणु विघटित होकर 3 C वाले दो पाइरुविक अम्ल (pyruvic acid) अणु बनाता है। क्रम से एन्जाइम (enzymes) तथा सह-एन्जाइम्स (co-enzymes) की सहायता से शृंखलाबद्ध रूप में, ये क्रियाएँ इस प्रकार घटित होती हैं

पद I :
ग्लूकोज के अणु का फॉस्फोराइलेशन
इस क्रिया के अन्त में फ्रक्टोज 1, 6-डाइफॉस्फेट (fructose 1, 6-diphosphate) का निर्माण होता है। इस क्रिया में पहले ग्लूकोज अणु एक ATP अणु से ऊर्जा तथा एक फॉस्फेट गुट्ट (PO4 ) प्राप्त करता है तथा ग्लूकोज 6-फॉस्फेट (glucose 6-phosphate) बनाता है। ग्लूकोज 6-फॉस्फेट समावयवीकरण (isomerization) के द्वारा फ्रक्टोज 6-फॉस्फेट (fructose 6-phosphate) में बदल जाता है। फ्रक्टोज 6-फॉस्फेट का अणु अब एक ATP अणु से एक फॉस्फेट गुट्ट ऊर्जा की उपस्थिति में प्राप्त करता है और इससे फ्रक्टोज 1, 6-डाइफॉस्फेट बनता है।

पद II :
फॉस्फोराइलेटेड शर्करा का विदलन
इस पद में फ्रक्टोज 1, 6-डाइफॉस्फेट का विदलन (splitting) होता है जिससे दो ट्रायोज (trioses) बनते हैं-एक, 3-फॉस्फोग्लिसरैल्डिहाइड (3-phosphoglyceraldehyde) तथा दूसरा डाइहाइड्रॉक्सी-एसीटोन फॉस्फेट (dihydroxyacetone phosphate)। बाद में, दूसरा ट्रायोज भी एक आइसोमेरेज (isomerase) एन्जाइम की उपस्थिति में 3-फॉस्फोग्लिसरैल्डिहाइड में ही बदल जाता है। इस प्रकार, इस परिवर्तन के बाद, दो अणु (UPBoardSolutions.com) 3-फॉस्फोग्लिसरैल्डिहाइड के उपलब्ध होते हैं। 3- फॉस्फोग्लिसरैल्डिहाइड, अकार्बनिक फॉस्फेट (H3PO4 से) प्राप्त करके 1, 3-डाइफॉस्फोग्लिसरैल्डिहाइड का निर्माण करता है जो दो H+ आयन तथा इलेक्ट्रॉन देकर ऑक्सीकृत हो जाता है। यह क्रिया डिहाइड्रोजिनेज (dehydrogenase) एन्जाइम तथा NAD सह-एन्जाइम की उपस्थिति में होती है तथा 1, 3-डाइफॉस्फोग्लिसरिक अम्ल (1, 3-diphosphoglyceric acid) का निर्माण होता है।

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1, 3-डाइफॉस्फोग्लिसरिक अम्ल (1, 3-diphosphoglyceric acid) का डीफॉस्फोराइलेशन (dephosphorylation) होता है तथा एक फॉस्फेट गुंट्ट अलग होकर उपस्थित ADP के साथ संयुक्त होकर ATP का निर्माण करता है। इस प्रकार दो अणुओं से दो ATP अणु और दो अणु 3-फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल (3-phosphoglyceric acid) बनते हैं। जिसमें एन्जाइम, फॉस्फोग्लिसरोम्यूटेज की सहायता से फॉस्फेट गुट्ट का फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल में स्थान परिवर्तन हो जाने से फॉस्फेट अब 2 स्थिति में आ जाता है। अब,प्रत्येक अणु से एक अणु जल निकल जाने से 2-फॉस्फोइनॉल पाइरुविक अम्ल (2-phosphoenol pyruvic acid) का निर्माण होता है। 2-फॉस्फोइनॉल पाइरुविक अम्ल के डीफॉस्फोराइलेशन (dephosphorylation) के द्वारा पाइरुविक अम्ल (pyruvic acid) को निर्माण होता है। इस प्रकार प्राप्त फॉस्फेट गुट्ट 2ADP अणुओं के साथ मिलकर 2ATP अणुओं का निर्माण करते हैं।
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ग्लाइकोलिसिस की सम्पूर्ण क्रियाओं में जहाँ अम्ल बनते हैं; जैसे- फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल, पाइरुविक अम्ल इत्यादि, ये सब लवणों के रूप में हो सकते हैं। अतः इन्हें फॉस्फोग्लिसरेट, पाइरुवेट (phosphoglycerate, pyruvate) इत्यादि भी लिखा जाता है। ग्लाइकोलिसिस (glycolysis) में ATP के कुल चार अणुओं का निर्माण होता है, किन्तु प्रारम्भिक अभिक्रियाओं में दो ATP अणु काम में आ जाते हैं। अतः शुद्ध लाभ केवल दो अणुओं का ही होता है

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(net gain) = 4 ATP – 2 ATP = 2 ATP
दो स्वतन्त्र H+ आयन (ions) भी प्राप्त होते हैं जो प्राय: NAD या NADP पर चले जाते हैं।

क्रेब्स चक्र या ट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल चक्र

पाइरुविक अम्ल का ऑक्सीकरण ऑक्सीजन की उपस्थिति में क्रमबद्ध तथा चक्र में होने वाली अभिक्रियाओं द्वारा होता है। यह चक्र ही क्रेब्स चक्र (Krebs cycle) कहलाता है। इसकी सम्पूर्ण अभिक्रियाएँ माइटोकॉण्ड्रिया (mitochondria) में होती हैं जहाँ सभी प्रकार के आवश्यक एन्जाइम्स (enzymes) व सह-एन्जाइम्स (co-enzymes) मिलते हैं। पाइरुविक अम्ल, एसीटिल को एन्जाइम-‘ए’ (acetyl co-enzyme-A) बनाने के बाद क्रेब्स चक्र में साइट्रिक अम्ल (UPBoardSolutions.com) (citric acid) के रूप में दिखायी पड़ता है; अत: इस चक्र को ट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल चक्र या साइट्रिक अम्ल चक्र (tricarboxylic acid cycle or citric acid cycle) कहते हैं। क्रेब्स चक्र में प्रवेश से पूर्व पाइरुविक अम्ल एक जटिल प्रक्रिया से निकलता है। इस क्रिया में कम-से-कम पाँच को-फैक्टर (co-factor) तथा एक एन्जाइम-समूह (enzyme-complex) की आवश्यकता होती है। क्रेब्स चक्र में तो एसीटिल को-एन्जाइम-‘ए’ (acetyl co-enzyme-A) ही प्रवेश करता है। ये क्रियाएँ निम्नलिखित पदों में सम्पन्न होती हैं

      1. ऑक्सीजन के सन्तोषप्रद मात्रा में उपलब्ध होने पर ही उपर्युक्त प्रक्रिया होती है और एसीटिल को-एन्जाइम-‘ए’ (acetyl co-enzyme-A) को निर्माण होता है। इस जटिल प्रक्रिया में पाइरुविक अम्ल के तीन कार्बन में से दो कार्बन परमाणु रह जाते हैं जो एसीटिल (acetyl) समूह के रूप में co-A (co-enzyme-A) के साथ जुड़े हुए हैं।
        UP Board Solutions for Class 11 Biology Chapter 17 Breathing and Exchange of Gases image 14
        pyruvic acid + co – A + NAD → CH3CO.co – A + CO2) + NAD. H2

        उपर्युक्त प्रक्रिया में H+ आयन प्राप्त होते हैं (NAD.H2 के रूप में)। NAD.H2 इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण तन्त्र (electron transport system = ETS) में पहुंचकर मुक्त ऊर्जा से तीन ATP अणुओं का निर्माण करते हैं। इस प्रकार, दो अणु पाइरुविक अम्ल से 6ATP अणु प्राप्त होते हैं।
      2. एसीटिल को-एन्जाइम-‘ए’ (acetyl co-A) क्रेब्स चक्र के अन्तिम उत्पाद, चार कार्बन यौगिक (C4), ऑक्सैलोएसीटिक अम्ल (oxaloacetic acid) के साथ मिलकर (condensation) साइट्रिक अम्ल (citric acid) बनाता है। साथ ही को-एन्जाइम-‘ए’ (co-A) स्वतन्त्र हो जाता है। यह क्रिया जल तथा एक कण्डेन्सिंग ऐन्जाइम की उपस्थिति में होती है
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  1. इसके बाद की क्रियाएँ चार ऑक्सीकरण (Oxidation) पदों (steps) में सम्पन्न होती हैं जिनमें होकर साइट्रिक अम्ल (citric acid) से ऑक्सैलोएसीटिक अम्ल (Oxaloacetic acid) फिर से प्राप्त किया जाता है। इन क्रियाओं में चार जोड़ा H-आयन और चार जोड़ा इलेक्ट्रॉन्स (electrons) निकाले जाते हैं। इन पदों की अभिक्रियाएँ जटिल, श्रृंखलाबद्ध व चक्रिक (cyclic) होती हैं तथा विभिन्न एन्जाइम्स, सहएन्जाइम्स, को-फैक्टर्स (co-factors) के (UPBoardSolutions.com) सहयोग से सम्पन्न होती हैं इस प्रकार पाइरुविक अम्ल के दो अणुओं (ग्लूकोज के एक अणु से प्राप्त) से कार्बन डाइऑक्साइड के छह अणु (तीन + तीन) निकलते हैं। इस क्रिया में कुल 30 (तीस) ATP अणु भी बनते हैं। 6 (छह) ATP अणु ग्लाइकोलिसिस तथा क्रेब्स चक्र के मध्य बनते हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अणु से सम्पूर्ण वायवीय श्वसन के बाद एक ग्लूकोज अणु से 38 ATP अणु प्राप्त होते हैं।

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UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 21 Factors of Production: Meaning and Importance

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 21 Factors of Production: Meaning and Importance

Factors of Production: Meaning and Importance Objective Type Questions (1 Mark)

Question 1.
Fairchild says, “Production consists of the creation of utility in ………..”
(a) Capital
(b) Wealth
(c) Capital Formation
(d) Assets
Answer:
(b) Wealth

Question 2.
Economic utilities are created in goods and services mainly in three ways, which are:
(a) Form, time and value
(b) Form, value and place
(c) Value, place, time
(d) Form, time, place
Answer:
(d) Form, time, place

Question 3.
That part of wealth which is used in production is called: (UP 2012, 18)
(a) Savings
(b) Reserve
(c) Capital
(d) None of these
Answer:
(c) Capital

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Question 4.
………. is/are factor/factors of production: (UP 2013)
(a) Land
(b) Labour
(c) Capital
(d) All of these
Answer:
(d) All of these

Question 5.
An individual has ………
(a) Limited Wants
(b) Infinite Wants
(c) Neither (a) or (b)
(d) None of these
Answer:
(b) Infinite Wants

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Factors of Production: Meaning and Importance Definite Answer Type Questions (1 Mark)

Question 1.
Write the factors which are used in production.
Answer:
Land, Labour, capital, organization (UPBoardSolutions.com) and enterprise.

Question 2.
Is Production possible without land? Give answer in Yes or No.
Answer:
No.

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Question 3.
What are the different ways of creating utilities?
Answer:
Form utilities, Time utilities and Place utilities.

Factors of Production: Meaning and Importance Very Short Answer Type Questions (2 Marks)

Question 1.
What is meant by the term production?
Answer:
Production in common language means making, creating, growing and manufacturing. But in economics, the term production refers to the creation of utilities and not to the creation of matter.

Factors are pairs of 96 numbers which, if multiplied together, give the original number. The number 96 is a composite number.

Question 2.
Write the importance of organisation? (UP 2016)
Answer:
Importance of Organisation. In the earlier stages of economic growth, the organisation as a separate and distinct factor did not exist. Production was a simple process. It was carried on in the home of workers who owned their workshops, had their own capital invested and managed the entire production process. But now when the conditions of production and marketing have become complicated, when factors of production lie scattered, the necessity of someone to bring all these factors together, and combine them (UPBoardSolutions.com) in proper proportions has increased tremendously.

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Question 3.
Explain any one factor of production.
Answer:
OrganisationOrganisation: The work of bringing together land, labour and capital at one place, combining them in proper proportion and making them work together for the purpose of production is called the organisation. The man who does this work is called the organiser. The larger the scale of production, the greater is the need for organisation.

Factors of Production: Meaning and Importance Short Answer Type Questions (4 Marks)

Question 1.
Explain the importance of land and capital in production.
Answer:
Importance of Land: No production is possible without land. It is, (UPBoardSolutions.com) therefore, the most indispensable factor of production. Its importance lies in the following ways:

  • The Economic Development of a country depends on land.
  • Development of primary industries.
  • Development of manufacturing industries.
  • Development of means of transport and communication.

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Question 2.
What is the importance of production?
Answer:
Production is important both from the individual and social point of view. An individual has infinite wants. In order to satisfy these wants, he requires a large variety of goods and services for his consumption. These goods and services are produced by a number of people or by himself.

Production is important from the social point of view. If the volume of production is low in the country, the standard of living cannot be high. Production is the basis of the entire economy of the nation. It is on the basis (UPBoardSolutions.com) of production that national income, economic development and industrial progress of a country depends. Thus from the social point of view production has great significance.

Factors of Production: Meaning and Importance Long Answer Type Questions (8 Marks)

Question 1.
What are the different kinds of Production? (UP 2009)
Answer:
Kinds of Production: Production can be of the following kinds:
1. Production by an Addition of Form Utility: When the potter makes an earthenware or when a carpenter makes a table from wood, they create a form of utility in earth or wood.

2. Production by Creating Time Utility: Many things acquire more utility if they are kept aside for some time, for example, vinegar becomes more useful for favouring food and for pickles when kept aside for a long time.

3. Production by Creating Place Utility: When a commodity is taken away from a place where its demand is less to another place where the demand is greater, its utility increases. For example, the wood in the forest areas has less utility there but when it is brought down to someplace in city it acquires more utility. Thus, place utility is created in the wood brought (UPBoardSolutions.com) down to a city for making furniture etc.

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4. Production by Change of Ownership: When the right of ownership is transferred from one person to another, its utility increases for the second person. For example, a book is not so useful to a bookseller who owns the bookstall but when the ownership to the book is transferred to a student, it acquires more utility to him.

5. Production by Increasing Knowledge about a Commodity: Newspaper, films, radio and television increase our knowledge of the usefulness of a commodity. By advertisement, they create utility in it and thus are performing production.

6. Production by Personal Service: Teachers, lawyers, doctors, musicians performs services to society. They create service utility. Thus, the creation of service utilities is also production.

Question 2.
Explain the various factors of production. (UP 2015)
Or
What is meant by Production in Economics? Describe the various factors of production. (UP 2011, 12)
Or
What do you understand by land? (UP 2012)
Answer:
Meaning of Production. Production in common language means making, creating, growing and manufacturing. For example, a conjurer produces a rabbit from his hat; farmers produce good crops; factories produce woollen (UPBoardSolutions.com) goods. But in Economics, the term production refers to the creation of utilities and not to the creation of matter. For example, when a potter produces earthenwares, he creates utility in the damp earth.

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Dr Richard Ely says that production means, “creation of economic utility”
Fairchild says, “production consists of the creation of utility in wealth.”

Let us take more examples and see what these economists mean by the term production in Economics. A mason puts brick and mortar and gets a house built. He simply re-arranges and combines articles of matter and gives (UPBoardSolutions.com) them a form of house which has greater utility for a man than before. Thus, more utility has been created.

A carpenter makes a chair. He changes the form of wood that really exists before. Wood is already there; he makes it more useful for man, i.e., he creates utility in wood.

A tailor does not create a bush-shirt; he simply creates a utility with the help of his needle and thread. Thus, production means the creation of utilities and not matter.

Definition of Production: Let us analyse the definition of production given by Dr Fairchild. He says, “The addition of economic utilities of commodities alone is production.” By the term economic utilities, he means exchange value. Production does not mean the creation of utilities, but on the contrary, it means the creation of economic utilities. Economic utilities are created in goods and services mainly in three ways:

  • Form utilities
  • Time utilities
  • Place utilities.

Thus, the term production in Economics means the creation of goods and services that have exchange value.
In recent years, a new definition of the term ‘Production’ has come up. Prof. J. R. Hicks defines production as, “any activity whether physical or mental which is directed to the satisfaction of other people’s wants through exchange.”

Various Factors of Production. Land, Labour, Capital, Organisation (UPBoardSolutions.com) and Enterprise are the five factors which makes the production possible. The explanation of each factor is as follows:

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1. Land: In economics, land means all the natural resources available not only on land but also in water and air which are given to human beings as free gifts of nature. Thus, by land we do not mean merely soil but it stands for all the free gifts of nature like mountains, hills valleys, rivers, plains, trees, wind, light, etc. The land which forms the original or basic source of all material wealth, thus, is the most important factor of production.

2. Labour: Any type of work undertaken by mind or body with a view to earning an income can be termed as labour. Thus, under the term ‘labour’, we can include not only the labour of unskilled workers but also all those categories of work both mental and physical which are exerted to earn an income.

3. Capital: Capital plays a vital role in the modern productive system. Capital signifies all those physical goods which are used purposely for further production by human beings. But in the ordinary sense of the term, capital is used for money. Whereas in economics, capital stands not only for money but also for tools, instruments, machines, factories, raw materials, transport, equipment etc.
Capital and wealth are two different things. Capital is that part of wealth which is used for further production of wealth. Thus, all wealth is not capital, but all capital is wealth.

4. Organization: A village artisan can perform his work without much organizing skill. This is because his work is quite simple and is done on a small scale. But organization is of supreme importance in the large scale (UPBoardSolutions.com) production of modern times where the division of labour and the use of machines are applied extensively. Land, labour and capital need to be brought up together and put into production effectively. This requires skill and efficiency. A person who has got the skill and organising capacity can make these factors to co-operate effectively in the most harmonious way.

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5. Enterprise: Small scale production, small capital and small output do not involve a greater degree of risk. Industrialisation, large scale production, division of labour have changed the quantum of risk in modern times. The risk element borne by concerns which were quite meagre in the yesteryears has turned out to be greater nowadays. The task of bearing uncertainty or risk is now (UPBoardSolutions.com) borne by the enterprise, and production on a large scale which involves considerable risk and makes it another factor of production.

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UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 12 Heron’s Formula

UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 12 Heron’s Formula (हीरोन सूत्र)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 9 Maths. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Maths Chapter 12 Heron’s Formula (हीरोन सूत्र).

Class 10 maths formulas chapter wise pdf .

प्रश्नावली 12.1

प्रश्न 1. एक यातायात संकेत बोर्ड पर ‘आगे स्कूल है’ लिखा है और यह भुजा ‘a’ वाले एक समबाहु त्रिभुज के आकार का है। हीरोन के सूत्र का प्रयोग करके इस बोर्ड का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए। यदि संकेत बोर्ड पर परिमाप 180 सेमी है तो इसका क्षेत्रफल क्या होगा?
हल :
दिया है, समबाहु त्रिभुज के आकार के बोर्ड की एक भुजा = a
समबाहु त्रिभुज के आकार के बोर्ड का परिमाप = a + a + a = 3a
त्रिभुज का अर्द्धपरिमाप s = [latex]\frac { 3a }{ 2 }[/latex]
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प्रश्न 2. किसी फ्लाईओवर (flyover) की त्रिभुजाकार दीवार को विज्ञापनों के लिए प्रयोग किया जाता है। दीवार की भुजाओं की लम्बाइयाँ 122 मीटर, 22 मीटर और 120 मीटर हैं। इस विज्ञापन से प्रतिवर्ष 5000 प्रति मीटर² की प्राप्ति होती है। एक कम्पनी ने एक दीवार को विज्ञापन देने के लिए 3 महीने के लिए किराए पर लिया। उसने कुल कितना किराया दिया?
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हल :
फ्लाईओवर की त्रिभुजाकार दीवार की मापें 122 मीटर, 22 मीटर तथा 120 मीटर हैं।
माना a = 122 मीटर, b = 22 मीटर, c = 120 मीटर
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प्रश्न 3. किसी पार्क में एक फिसल (slide) पट्टी बनी हुई है। इसकी पाश्र्वीय दीवारों (slide walls) में से एक दीवार पर किसी रंग से पेन्ट किया गया है और उस पर “पार्क को हरा-भरा और साफ रखिए’ लिखा हुआ है। यदि इस दीवार की विमाएँ 15 मीटर, 11 मीटर और 6 मीटर हैं तो रंग से पेन्ट हुए भाग
पार्क को हरा-भरा को क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
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हल :
जिस दीवार पर पेन्ट किया गया है, उसकी विमाएँ माना
15 मीटर a = 15 मीटर, b = 11 मीटर और c = 6 मीटर
आकृति में दीवार त्रिभुजाकार है।
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प्रश्न 4. उस त्रिभुज का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए जिसकी दो भुजाएँ 18 सेमी और 10 सेमी हैं तथा परिमाप 42 सेमी है।
हल :
माना त्रिभुजे की दो भुजाएँ a = 18 सेमी तथा b = 10 सेमी
माना तीसरी भुजा c सेमी है।
तब, त्रिभुज की परिमाप = a + b + c = 18 + 10 + c = 28 + c
परन्तु दिया है कि त्रिभुज का परिमाप 42 सेमी है।
28 + c = 42 ⇒ c = 42 – 28 = 14 सेमी
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प्रश्न 5. एक त्रिभुज की भुजाओं का अनुपात 12 : 17 : 25 है और उसका परिमाप 640 सेमी है। त्रिभुज का क्षेत्रफले ज्ञात कीजिए।
हल :
दिया है, त्रिभुज की भुजाओं का अनुपात 12 : 17 : 25 है।
माना त्रिभुज की भुजाएँ a = 12 x, b = 17 x तथा c = 25 x
त्रिभुज की परिमाप = a + b + c = 12x + 17x + 25x = 54x
तब, प्रश्नानुसार, त्रिभुज का परिमाप = 540 सेमी
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प्रश्न 6. एक समद्विबाहु त्रिभुज का परिमाप 30 सेमी है और उसकी बराबंर भुजाएँ 12 सेमी लम्बी हैं। इस त्रिभुज का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
हल :
माना त्रिभुज की तीसरी भुजा c सेमी है।
समद्विबाहु त्रिभुज की बराबर भुजाएँ a = 12 सेमी तथा b = 12 सेमी।
त्रिभुज की परिमाप = a + b + c = 12 + 12 + c = (24 + c) सेमी
परन्तु प्रश्नानुसार, परिमाप 30 सेमी है।
24 + c = 30 ⇒ c = 30 – 24 = 6 सेमी
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प्रश्नावली 12.2

प्रश्न 1. एक पार्क चतुर्भुज ABCD के आकार का है, जिसमें ∠C = 90°, AB = 9 मीटर, BC = 12 मीटर, CD = 5 मीटर और AD = 8 मीटर है। इस पार्क का कितना क्षेत्रफल है?
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हल :
पार्क का चित्र संलग्न है।
विकर्ण BD खींचा जिसने चतुर्भुजाकार पार्क ABCD को दो त्रिभुजाकार भागों में विभाजित किया हैं।
पहला समकोण त्रिभुज BCD तथा दूसरा विषमबाहु त्रिभुज ABD समकोण त्रिभुज BCD के आकार वाले भाग का क्षेत्रफल
= [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] x आधार x ऊँचाई
= [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] x BC x CD
= [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] x 12 x 5 = 30 वर्ग मीटर
BD, समकोण त्रिभुज BCD का कर्ण है।
पाइथागोरस प्रमेय से, BD² = BC² + CD² = (12)² + (5)² = 144 + 25 = 169 = (13)²
⇒ BD = (13)²
⇒ BD = 13 मीटर
तब, ΔABD में, माना a = 9 मीटर, b = 8 मीटर व c = 13 मीटर
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प्रश्न 2. एक चतुर्भुज ABCD का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए, जिसमें AB = 3सेमी, BC = 4सेमी, CD = 4सेमी, DA = 5 सेमी और AC = 5 सेमी है।
हल :
चतुर्भुज ABCD बनाया। स्पष्ट है कि विकर्ण AC संलग्न चतुर्भुज को ΔABC व ΔACD में विभक्त करता है।
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प्रश्न 3. राधा ने एक रंगीन कागज से एक हवाईजहाज का चित्र बनाया जैसा कि आकृति में दिखाया गया है। प्रयोग किए गए कागज का कुल क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
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प्रश्न 4. एक त्रिभुज और एक समान्तर चतुर्भुज का एक ही आधार है और क्षेत्रफल भी एक ही है। यदि त्रिभुज की भुजाएँ 26 सेमी, 28 सेमी और 30 सेमी हैं तथा समान्तर चतुर्भुज 28 सेमी के आधार पर स्थित है तो उसकी संगत ऊँचाई ज्ञात कीजिए।
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प्रश्न 5. एक समचतुर्भुजाकार घास के खेत में 18 गायों के चरने के लिए घास है। यदि इस समचतुर्भुज की प्रत्येक भुजा 30 मीटर और बड़ा विकर्ण 48 मीटर है तो प्रत्येक गाय को चरने के लिए इस घास के खेत का कितना क्षेत्रफल प्राप्त होगा?
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प्रश्न 6. दो विभिन्न रंगों के कपड़ों के 10 त्रिभुजाकार टुकड़ों को सी कर एक छाता बनाया गया है। प्रत्येक टुकड़े के माप 20 सेमी, 50 सेमी और 50 सेमी हैं। छाते में प्रत्येक रंग का कितना कपड़ा लगा है?
हल :
छाते में 2 रंग हैं और उसे 10 त्रिभुजाकार टुकड़ों से सिला गया है।
प्रत्येक रंग के [latex]\frac { 10 }{ 2 }[/latex] = 5 टुकड़े होंगे।
प्रत्येक त्रिभुजाकार टुकड़े की माप 20, 50 व 50 सेमी हैं अर्थात प्रत्येक टुकड़ा एक समद्विबाहु त्रिभुज को निरूपित करता है।
माना a = 20 सेमी, b = 50 सेमी तथा c = 50 सेमी
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= 1000 x 2.4494 वर्ग सेमी
= 2449.4 वर्ग सेमी
अतः प्रत्येक रंग का 2449.4 वर्ग सेमी कपड़ा लगेगा।

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प्रश्न 7. एक पतंग तीन भिन्न-भिन्न शेडों (shades) के कागजों से बनी है। इन्हें आकृति में I, II और III से दर्शाया गया है। पतंग का ऊपरी भाग 32 सेमी विकर्ण का एक वर्ग है और निचला भाग 6 सेमी, 6 सेमी और 8 सेमी भुजाओं का एक समद्विबाहु त्रिभुज है। ज्ञात कीजिए कि प्रत्येक शेड का कितना कागज प्रयुक्त किया गया है।
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अतः भाग 1 व भाग II प्रत्येक के कागज का क्षेत्रफल= 256 वर्ग सेमी तथा भाग III के लिए कागज का क्षेत्रफल = 17.88 वर्ग सेमी।।

प्रश्न 8. फर्श पर एक फूलों का डिजाइन 16 त्रिभुजाकार टाइलों से बनाया गया है, जिनमें से प्रत्येक की भुजाएँ 9 सेमी, 28 सेमी और 35 सेमी हैं। इन टाइलों को 50 पैसे प्रति सेमी की दर से पॉलिश कराने का व्ययज्ञात कीजिए।
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कुल 16 त्रिभुजाकार टाइलों का क्षेत्रफल = 16 x एक त्रिभुजाकार टाइल का क्षेत्रफल
= 16 x 36√6 वर्ग सेमी = 5766 वर्ग सेमी
= 576 x 2.45 = 1411.2 वर्ग सेमी
1 वर्ग सेमी पर पॉलिश कराने का व्यय = 50 पैसे
1411.2 वर्ग सेमी पर पॉलिश कराने का व्यय = 1411.2 x 50 = 70560 पैसे
अतः 16 टाइलों पर पॉलिश कराने का व्यय = 70560 पैसे

प्रश्न 9. एक खेत समलम्ब के आकार का है जिसकी समान्तर भुजाएँ 25 मीटर और 10 मीटर हैं। इसकी असमान्तर भुजाएँ 14 मीटर और 13 मीटर हैं। इस खेत का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
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UP Board Solutions for Class 9 Hindi Chapter 3 गुरु नानकदेव (गद्य खंड)

UP Board Solutions for Class 9 Hindi Chapter 3 गुरु नानकदेव (गद्य खंड)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 9 Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Hindi Chapter 3 गुरु नानकदेव (गद्य खंड).

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. निम्नलिखित गद्यांशों में रेखांकित अंशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या और तथ्यपरक प्रश्नों के उत्तर दीजिये-
(1) आकाश में जिस प्रकार षोडश कला से पूर्ण चन्द्रमा अपनी कोमल स्निग्ध किरणों से प्रकाशित होता है, उसी प्रकार मानव चित्त में भी किसी उज्ज्वल प्रसन्न ज्योतिपुंज का आविर्भाव होना स्वाभाविक है। गुरु नानकदेव ऐसे ही षोडश कला से पूर्ण स्निग्ध ज्योति महामानव थे । लोकमानस में अर्से से कार्तिकी पूर्णिमा के साथ गुरु के आविर्भाव को सम्बन्ध जोड़ दिया गया है। गुरु किसी एक ही दिन को पार्थिव शरीर में (UPBoardSolutions.com) आविर्भूत हुए होंगे, पर भक्तों के चित्त में वे प्रतिक्षण प्रकट हो सकते हैं। पार्थिव रूप को महत्त्व दिया जाता है, परन्तु प्रतिक्षण आविर्भूत होने को आध्यात्मिक दृष्टि से अधिक महत्त्व मिलना चाहिए। इतिहास के पण्डित गुरु के पार्थिव शरीर के आविर्भाव के विषय में वादविवाद करते रहें, इस देश का सामूहिक मानव चित्त उतना महत्त्व नहीं देता।
प्रश्न
(1)
उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(3) लेखक की दृष्टि में गुरु के पार्थिव शरीर के आविर्भाव के स्थान पर किसको महत्त्व मिलना चाहिए?
(4) चन्द्रमा कितनी कलाओं से परिपूर्ण होता है?
(5) कार्तिक पूर्णिमा का सम्बन्ध किस महामानव से है?
[शब्दार्थ-लोकमानस = जनता का मन। अर्से से = बहुत समय से। आविर्भाव = उत्पत्ति, जन्म। पार्थिव = पृथ्वी सम्बन्धी, भौतिक स्थूल।]

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ के ‘गुरु नानकदेव’ पाठ से उधृत किया गया है। इसके लेखक संस्कृत एवं हिन्दी के मूर्द्धन्य विद्वान् आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी हैं। नियत गद्यांश में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने गुरु नानकदेव के जन्म-दिन का महत्त्व बताते हुए उनके प्रति भक्तों की असीम श्रद्धा को व्यक्त किया है। गुरु तो भक्तों के हृदय में प्रतिक्षण प्रकट होते रहते हैं-इस भावना का सहज आध्यात्मिक रूप प्रस्तुत किया है। ।
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने यह बताया है कि आकाश में जिस प्रकार सोलह कलाओं से युक्त चन्द्रमा प्रकाशित होता है ठीक उसी प्रकार मानव के मस्तिष्क में किसी ज्योतिपुंज का उत्पन्न होना अत्यन्त स्वाभाविक है। गुरुनानक देव ऐसे ही सोलह कलाओं से युक्त स्निग्ध ज्योति महामानव थे। हमारे देश की जनता बहुत समय से गुरु नानकदेव के जम को कार्तिक महीने की पूर्णिमा के दिन मनाती आ रही है। गुरु नानकदेव तो किसी एक ही दिन अपने भौतिक शरीर से प्रकट हुए होंगे, (UPBoardSolutions.com) किन्तु श्रद्धालु भक्तगणों के हृदय में तो वे सदैव ही आध्यात्मिक रूप से प्रकट होते रहते हैं। यद्यपि भौतिक रूप से जन्म लेने को महत्त्व दिया जाता रहा है, फिर भी प्रतिक्षण आध्यात्मिक दृष्टि से जन्म लेने का अधिक महत्त्व समझा जाना चाहिए-ऐसी लेखक का मत है। यद्यपि इतिहास के विद्वानों के मत में उनकी जन्म-तिथि सम्बन्धी विवाद है, किन्तु इस देश की जनता का सामूहिक मन इस बात पर विशेष ध्यान नहीं देता। उसके मन में जो जन्म सम्बन्धी धारणा बन गयी है, उसके लिए वही सत्य है। उसे तो इसके माध्यम से अपने गुरु को पूजना है, सो वह कार्तिक पूर्णिमा को पूज लेता है।
  3. लेखक की दृष्टि में गुरु के पार्थिव शरीर के आविर्भाव के स्थान पर उनके आध्यात्मिकता को महत्त्व मिलना चाहिए।
  4. चन्द्रमा षोडश कलाओं से परिपूर्ण होता है।
  5. कार्तिक पूर्णिमा का सम्बन्ध महामानव गुरु नानकदेव से है।

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(2) गुरु जिस किसी भी शुभ क्षण में चित्त में आविर्भूत हो जायँ, वही क्षण उत्सव का है, वही क्षण उल्लसित कर देने के लिएपर्याप्त है।
नवो नवो भवसि जायमानः- गुरु, तुम प्रतिक्षण चित्तभूमि में आविर्भूत होकर नित्य नवीन हो रहे हो। हजारों वर्षों से शरत्काल की यह सर्वाधिक प्रसन्न तिथि प्रभामण्डित पूर्णचन्द्र के साथ उतनी ही मीठी ज्योति के धनी महामानव का स्मरण कराती रही है। इस चन्द्रमा के साथ महामानवों का सम्बन्ध (UPBoardSolutions.com) जोड़ने में इस देश का समष्टि चित्त, आह्लाद अनुभव करता है। हम ‘रामचन्द्र’, ‘कृष्णचन्द्र’ आदि कहकर इसी आह्लाद को प्रकट करते हैं। गुरु नानकदेव के साथ इस पूर्णचन्द्र का सम्बन्ध जोड़ना भारतीय जनता के मानस के अनुकूल है। आज वह अपना आह्लाद प्रकट करती है।
प्रश्न
(1)
उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(3) शरदकाल की यह तिथि किसकी याद कराती रही है?
(4) उत्सव का क्षण कौन-सा है?
(5) शरद पूर्णिमा किसका स्मरण कराती है? |
[शब्दार्थ-उत्सव =त्योहार, उल्लास। उल्लसित = हर्षित । नव = नया। जायमानः = जन्म लेनेवाला । चित्तभूमि = चित्त या मन में। नवीन = नया।]

उत्तर- 

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ के ‘गुरु नानकदेव’ नामक पाठ से उद्धृत है। इसके लेखक आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी हैं। प्रस्तुत गद्यांश में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने गुरु की महिमा की ओर संकेत करते हुए कहा है कि मन में जब कभी भी गुरु प्रकट हो जायँ वही क्षण हर्षित कर देनेवाला होता है।
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- लेखक का मत है कि गुरु जिस किसी भी शुभ मुहूर्त में हृदय में उत्पन्न हो जायँ वही समय वही मुहूर्त आनन्द का है, प्रसन्नता का है। वह ऐसा समय है जो जीवन में हर्षोल्लास भर देनेवाला होता है। परमात्मा की ये महान् विभूतियाँ प्रतिक्षण भक्तों के हृदय (UPBoardSolutions.com) में जन्म लेकर नित्य नया रूप धारण करती रहती हैं। सच है कि गुरु तो हर क्षण चित्तभूमि अर्थात् मन में उत्पन्न होकर नये-नये होते रहते हैं। भक्तों के लिए ऐसा हर क्षण उत्सव का है, उल्लास का है। हजारों वर्षों से शरदकाल की यह तिथि प्रभामंडित पूर्णचन्द्र के साथ उस महामानव का याद कराती रही है। इस चन्द्रमा के साथ महामानवों का तादात्म्य करने से इस देश का समष्टि चित्त प्रसन्नता का अनुभव करता है। हम लोग ‘रामचन्द्र कृष्णचन्द्र इत्यादि कहकर इसी प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। गुरु नानकदेव के साथ इस पूर्णचन्द्र का सम्बन्ध जोड़ना भारतीय जन-मानस के अत्यन्त अनुकूल है। आज भारतीय जनता गुरु नानकदेव को स्मरण (UPBoardSolutions.com) करके प्रसन्नता का अनुभव करती है।
  3. शरदकाल की यह तिथि प्रभामंडित पूर्णचन्द्र के साथ गुरुनानक जी की याद कराती रही है।
  4. गुरु जिस किसी भी शुभ क्षण में चित्त में आविर्भूत हो जायँ, वह क्षण उत्सव का है।
  5. शरद पूर्णिमा महामानव गुरु नानकदेव का स्मरण कराती है।

(3) विचार और आचार की दुनिया में इतनी बड़ी क्रान्ति ले आनेवाला यह सन्त इतने मधुर, इतने स्निग्ध, इतने मोहक वचनों को बोलनेवाला है। किसी का दिल दुखाये बिना, किसी पर आघात किये बिना, कुसंस्कारों को छिन्न करने की शक्ति रखनेवाला, नयी संजीवनी धारा से प्राणिमात्र (UPBoardSolutions.com) को उल्लसित करनेवाला यह सन्त मध्यकाल की ज्योतिष्क मण्डली में अपनी निराली शोभा से शरत् पूर्णिमा के पूर्णचन्द्र की तरह ज्योतिष्मान् है। आज उसकी याद आये बिना नहीं रह सकती। वह सब प्रकार से लोकोत्तर है। उसका उपचार प्रेम और मैत्री है। उसका शास्त्र सहानुभूति और हित-चिन्ता है।
प्रश्न
(1)
उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए। |
(2) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
(3) गुरुनानक जी का उपचार क्या है?
(4) क्रान्ति लाने वाले यहाँ किस सन्त का वर्णन है?
(5) शरद पूर्णिमा के पूर्ण चन्द्र की तरह कौन ज्योतिष्मान है?

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ के ‘गुरु नानकदेव’ नामक पाठ से उद्धृत है। इसके लेखक आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी हैं। इन पंक्तियों में गुरु नानकदेव के महान् व्यक्तित्व और उनकी महत्ता पर प्रकाश डाला गया है।
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- गुरु नानकदेव एक महान् सन्त थे। उनके समय के समाज में अनेक प्रकार की बुराइयाँ विद्यमान थीं । समाज का आचरण दूषित हो चुका था। इन बुराइयों को दूर करने और सामाजिक आचरणों में सुधार लाने के लिए गुरु नानकदेव ने न तो किसी की निन्दा की और न ही तर्क-वितर्क द्वारा किसी की विचारधारा का खपडन किया। उन्होंने अपने आचरण और मधुर वाणी से ही दूसरों के विचारों और आचरण में परिवर्तन करने का प्रयास किया और इस दृष्टि से उन्होंने आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त की। बिना किसी का दिल दुखाये और बिना किसी को किसी प्रकारे की चोट पहुँचाये, उन्होंने दूसरों के बुरे संस्कारों को नष्ट कर दिया। उनकी सन्त वाणी को सुनकर दूसरों का हृदय हर्षित हो जाता था और लोगों को नवजीवन प्राप्त होता था। लोग उनके उपदेशों को जीवनदायिनी औषध की भाँति ग्रहण करते थे। (UPBoardSolutions.com) मध्यकालीन सन्तों के बीच गुरु नानकदेव इसी प्रकार प्रकाशमान दिखायी पड़ते हैं, जैसे आकाश में आलोक बिखेरने वाले नक्षत्रों के मध्य; शरद पूर्णिमा का चन्द्रमा शोभायमान होता है । विशेषकर शरद पूर्णिमा के अवसर पर ऐसे महान् सन्त का स्मरण हो आना स्वाभाविक है। वे सभी दृष्टियों से एक अलौकिक पुरुष थे। प्रेम और मैत्री के द्वारा ही वे दूसरों की बुराइयों को दूर करने में विश्वास रखते थे। दूसरों के प्रति सहानुभूति का भाव रखना और उनके कल्याण के प्रति चिन्तित रहना ही उनका आदर्श था। गुरु नानकदेव का सम्पूर्ण जीवन, उनके इन्हीं आदर्शों पर आधारित था।
  3. गुरुनानक जी का उपचार प्रेम और मैत्री है।
  4. क्रान्ति लाने वाले यहाँ सन्त गुरु नानकदेव का वर्णन है।
  5. शरद पूर्णिमा पूर्ण चन्द्र की तरह गुरु नानकदेव ज्योतिष्मान हैं?

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(4) किसी लकीर को मिटाये बिना छोटी बना देने का उपाय है बड़ी लकीर खींच देना। क्षुद्र अहमिकाओं और अर्थहीन संकीर्णताओं की क्षुद्रता सिद्ध करने के लिए तर्क और शास्त्रार्थ का मार्ग कदाचित् ठीक नहीं है। सही उपाय है बड़े सत्य को प्रत्यक्ष कर देना। गुरु नानक ने यही किया। उन्होंने जनता को बड़े-से-बड़े सत्य के सम्मुखीन कर दिया, हजारों दीये उस महाज्योति के सामने स्वयं फीके पड़ गये।।
प्रश्न
(1) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(3) हजारो दीये किसके सामने स्वयं फीके पड़ गये?
(4) छोटी लकीर के सामने बड़ी लकीर खींच देने की क्या तात्पर्य है?
(5) अहमिकाओं और कार्यहीन संकीर्णताओं की क्षुद्रता सिद्ध करने का सही उपाय क्या है?
[शब्दार्थ-क्षुद्र = तुच्छ, छोटा। अहमिकाओं = अहंकार की भावनाएँ। संकीर्णता = हृदय का छोटापन। कदाचित् = कभः। सम्मुखीन = सामने।]

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ में संकलित एवं आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित ‘गुरु नानकदेव’ नामक निबन्ध से अवतरित है। इन पंक्तियों में लेखक ने व्यक्त किया है कि गुरु नानकदेव ने महान् सत्य का उद्घाटन करके संसार की भौतिक वस्तुओं को सहज ही तुच्छ सिद्ध कर दिया है।
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- हम किसी रेखा को मिटाये बिना यदि उसे छोटा करना चाहते हैं तो उसका एक ही उपाय है कि उस रेखा के पास उससे बड़ी रेखा खींच दी जाय। ऐसा करने पर पहली रेखा स्वयं छोटी प्रतीत होने लगेगी। इसी प्रकार यदि हम अपने मन के अहंकार और तुच्छ भावनाओं को दूर करना चाहते हैं, तो उसके लिये भी हमें महानता की बड़ी लकीर खींचनी होगी। अहंकार, तुच्छ भावना, संकीर्णता आदि को शास्त्रज्ञान के आधार पर वाद-विवाद करके या तर्क देकर छोटा नहीं किया (UPBoardSolutions.com) जा सकता; उसके लिये व्यापक और बड़े सत्य का दर्शन आवश्यक है। इसी उद्देश्य से मानव-जीवन की संकीर्णताओं और क्षुद्रताओं को छोटा सिद्ध करने के लिए गुरु नानकदेव ने जीवन की महानता को प्रस्तुत किया। गुरु की वाणी ने साधारण जनता को परम सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव कराया। परमसत्य के ज्ञान एवं प्रत्यक्ष अनुभव से अहंकार और संकीर्णता आदि इस प्रकार तुच्छ प्रतीत होने लगे, जैसे महाज्योति के सम्मुख छोटे दीपक आभाहीन हो जाते हैं। गुरु की वाणी ऐसी महाज्योति थी, जिसने जन साधारण के मन से अहंकार, क्षुद्रता, संकीर्णता आदि के अन्धकार को दूर कर उसे दिव्य ज्योति से प्रकाशित कर दिया।
  3. हजारों दीये गुरु नानकदेव की महाज्योति के सामने फीके पड़ गये।
  4. किसी लकीर को मिटाये बिना छोटी बना देने का उपाय है बड़ी लकीर खींच देना।
  5. अहमिकाओं और अर्थहीन संकीर्णताओं की क्षुद्रता सिद्ध करने के लिए सही उपाय है बड़े सत्य को प्रत्यक्ष कर देना।

(5) भगवान् जब अनुग्रह करते हैं तो अपनी दिव्य ज्योति ऐसे महान् सन्तों में उतार देते हैं। एक बार जब यह ज्योति मानव देह को आश्रय करके उतरती है तो चुपचाप नहीं बैठती। वह क्रियात्मक होती है, नीचे गिरे हुए अभाजन लोगों को वह प्रभावित करती है, ऊपर उठाती है। वह उतरती है और ऊपर उठाती है। इसे पुराने पारिभाषिक शब्दों में कहें तो कुछ इस प्रकार होगा कि एक ओर उसका ‘अवतार’ होता है, (UPBoardSolutions.com) दूसरी ओर औरों का उद्धार होता है। अवतार और उद्धार की यह लीला भगवान् के प्रेम का सक्रिय रूप है, जिसे पुराने भक्तजन ‘अनुग्रह’ कहते हैं। आज से लगभग पाँच सौ वर्ष से पहले परम प्रेयान् हरि का यह ‘अनुग्रह’ सक्रिय हुआ था, वह आज भी क्रियाशील है। आज कदाचित् गुरु की वाणी र सबसे अधिक तीव्र आवश्यकता अनुभूत हो रही है।
प्रश्न
(1)
उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(3) भगवान के प्रेम में क्या सक्रिय रूप है?
(4) सन्तजन क्या कार्य करते हैं?
(5) अनुग्रह का क्या तात्पर्य है?
[शब्दार्थ-अनुग्रह = कृपा, उपकार। दिव्य ज्योति = आलोकित प्रकाश। आश्रय = आधार, सहारा। अभाजन = अयोग्य।]

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ में संकलित एवं आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित ‘गुरु नानकदेव’ नामक निबन्ध से अवतरित है। लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि गुरु नानक जैसे महान् सन्तों में ईश्वर अपनी ज्योति अवतरित करते हैं और ये महान् सन्त इस ज्योति के सहारे गिरे हुए लोगों को ऊपर उठाते हैं।
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- द्विवेदी जी का मत है कि जब संसार पर ईश्वर की विशेष कृपा होती है तो उसकी अलौकिक ज्योति किसी सन्त के रूप में इस संसार में अवतरित होती है। तात्पर्य यह है कि ईश्वर अपनी दिव्य ज्योति को किसी महान् सन्त के रूप में प्रस्तुत करके उसे इस जगत् का उद्धार करने के लिए पृथ्वी पर भेजता है। वह महान् सन्त ईश्वर की ज्योति से आलोकित होकर संसार का मार्गदर्शन करता है। ईश्वर निरीह लोगों के कष्टों को दूर करना चाहता है, इसलिए उसकी यह (UPBoardSolutions.com) दिव्य-ज्योति मानव-शरीर प्राप्त करके चैन से नहीं बैठती, वरन् अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए सक्रिय हो उठती है। मानव रूप में जब भी ईश्वर अवतार लेता है, तभी इस विश्व का उद्धार तथा कल्याण होता है। प्राचीन भक्ति-साहित्य में ईश्वर की दिव्य ज्योति का मानव रूप में जन्म ‘अवतार और उद्धार’ कहा गया है। इस दिव्य ज्योति का ‘अवतार’ अर्थात् उतरना होता है और सांसारिक प्राणियों का उद्धार’ अर्थात् ऊपर उठना होता है। आचार्य द्विवेदी अन्त में कहते हैं कि ईश्वर का अवतार लेना और प्राणियों का उद्धार करना ईश्वर के प्रेम का सक्रिय रूप है। भक्तजन इसे ईश्वर की विशेष कृपा मानकर ‘अनुग्रह’ की संज्ञा बताते हैं।
  3. भगवान् के प्रेम में अवतार और उद्धार की यह लीला सक्रिय रूप है।
  4. सन्तजन लोगों का उद्धार करते हैं।
  5. भगवान का अवतार लेकर गिरे जनों का उद्धार करने की लीला को अनुग्रह. करते हैं।

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(6) महागुरु, नयी आशा, नयी उमंग, नये उल्लास की आशा में आज इस देश की जनता तुम्हारे चरणों में प्रणति निवेदन कर रही है। आशा की ज्योति विकीर्ण करो, मैत्री और प्रीति की स्निग्ध धारा से आप्लावित करो। हम उलझ गये हैं, भटक गये हैं, पर कृतज्ञता अब भी हम में रह गयी है। आज भी हम तुम्हारी अमृतोपम वाणी को भूल नहीं गये हैं। कृतज्ञ भारत को प्रणाम अंगीकार करो।
प्रश्न
(1)
उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।
(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(3) ‘कृतज्ञ भारत का प्रणाम अंगीकार करो’ का क्या मतलब है?
(4) कृतज्ञता से आप क्या समझते हैं?
(5) लेखक गुरु से किस प्रकार की ज्योति विकीर्ण करने का निवेदन कर रहा है?
[शब्दार्थ-विकीर्ण = प्रसारित । स्निग्ध = पवित्र। अमृतोपम = अमृत के समान । अंगीकार = स्वयं में समाहित, स्वीकार ।]

उत्तर-

  1. सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ में संकलित एवं आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित ‘गुरु नानकदेव’ नामक निबन्ध से अवतरित है। यहाँ लेखक ने गुरु नानकदेव के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए उनके ति श्रद्धा का भाव व्यक्त किया है।
  2. रेखांकित अंशों की व्याख्या- लेखक गुरु से प्रार्थना करता है कि वे भटके हुए भारतवासियों के हृदय में प्रेम, मैत्री एवं सदाचार का विकास करके उनमें नयी आशा, नये उल्लास व नयी उमंग का संचार करें। इस देश की जनता उनके चरणों में अपना प्रणाम निवेदन करती है। लेखक का कथन है कि वर्तमान समाज में रहनेवाले भारतवासी कामना, लोभ, तृष्णा, ईष्र्या, ऊँचनीच, जातीयता (UPBoardSolutions.com) एवं साम्प्रदायिकता जैसे दुर्गुणों से ग्रसित होकर भटक गये हैं, फिर भी इनमें कृतज्ञता का भाव विद्यमान है। इस कृतज्ञता के कारण ही आज भी ये भारतवासी आपकी अमृतवाणी को नहीं भूले हैं। हे गुरु! आप कृतज्ञ भारतवासियों के प्रणाम को स्वीकार करने की कृपा करें।
  3. कृतज्ञ भारत का प्रणाम अंगीकार करो का मतलब आप कृतज्ञ भारतवासियों के प्रणाम को स्वीकार करने की कृपा करे।
  4. किसी के उपकार को अंगीकार करके सम्मान देना और उसके प्रति न्यौछावर होना कृतज्ञता है।
  5. लेखक गुरु से आशा की ज्योति विकीर्ण करने का निवेदन कर रहा है।

प्रश्न 2. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का जीवन-परिचय बताते हुए उनकी कृतियों पर प्रकाश डालिए।

प्रश्न 3. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के जीवन एवं साहित्यिक परिचय का उल्लेख कीजिए।

प्रश्न 4. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की साहित्यिक विशेषताएँ बताते हुए उनकी भाषा-शैली पर अपने विचार प्रकट कीजिए। अथवा डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी का साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी रचनाओं का उल्लेख कीजिए।

डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी
( स्मरणीय तथ्य )

जन्म-सन् 1907 ई०। मृत्यु-18 मई, 1979 ई० । जन्म-आरत दुबे का छपरा, जिला बलिया (उ० प्र०) में। शिक्षा-इण्टर, ज्योतिष तथा साहित्य में आचार्य।
रचनाएँ-‘हिन्दी साहित्य की भूमिका’, ‘सूर साहित्य’, ‘कबीर’, ‘अशोक के फूल’, ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’, विचार और वितर्क’, ‘विश्व-परिचय’, ‘लाल कनेर’, ‘चारु चन्द्रलेख’।
वर्य-विषय- भारतीय संस्कृति का इतिहास, ज्योतिष साहित्य, विभिन्न धर्म तथा सम्प्रदाय। ।
शैली- सरल तथा विवेचनात्मक।

  • जीवन-परिचय- डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी का जन्म बलिया जिले के ‘आरत दुबे का छपरा’ नामक ग्राम में एक प्रतिष्ठित सरयूपारीण ब्राह्मण-परिवार में सन् 1907 ई० में हुआ था। इनकी शिक्षा का प्रारम्भ संस्कृत से ही हुआ था। सन् 1930 ई० में इन्होंने काशी विश्वविद्यालय से ज्योतिषाचार्य की परीक्षा उत्तीर्ण की और उसी वर्ष प्रधानाध्यापक होकर शान्ति निकेतन चले गये। सन् 1940 ई० से 1950 ई० तक वे वहाँ हिन्दी भवन के डायरेक्टर के पद पर काम करते रहे; तदुपरान्त वे काशी विश्वविद्यालय (UPBoardSolutions.com) में हिन्दी-विभाग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त हुए। लखनऊ विश्वविद्यालय ने इनकी हिन्दी की महत्त्वपूर्ण सेवाओं के लिए 1949 ई० में इन्हें डी० लिट्० की उपाधि प्रदान की। सन् 1957 ई० में इनकी विद्वत्ता पर इन्हें ‘पद्मभूषण’ की उपाधि से अलंकृत किया गया। 1960 ई० में ये चण्डीगढ़ विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष होकर चले गये और वहाँ से सन् 1968 ई० में पुन: काशी विश्वविद्यालय में ‘डायरेक्टर’ होकर आ गये। कुछ दिन तक उत्तर प्रदेश ग्रन्थ अकादमी के अध्यक्ष पद पर कार्य करने के उपरान्त 18 मई, 1979 ई० को इनका देहावसान हो गया।
  • कृतियाँ
    1. आलोचना- ‘सूर-साहित्य’, ‘हिन्दी-साहित्य की भूमिका’, ‘हिन्दी-साहित्य का आदिकाल’, ‘कालिदास की लालित्ययोजना’, ‘सूरदास और उनका काव्य’, ‘कबीर’, ‘हमारी साहित्यिक समस्याएँ’, ‘साहित्य का मर्म’, ‘भारतीय वाङ्मय’, ‘साहित्यसहचर’, ‘नखदर्पण में हिन्दी-कविता’ आदि।
    2. निबन्ध-संग्रह- अशोक के फूल’, ‘कुटज’, ‘विचार-प्रवाह’, ‘विचार और वितर्क’, ‘कल्पलता’, ‘आलोक-पर्व’ आदि।
    3. उपन्यास- ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, ‘चारु चन्द्रलेख’, ‘पुनर्नवा’ तथा ‘अनामदास का पोथा’।
    4. अनूदित साहित्य- ‘प्रबन्ध-चिन्तामणि’, ‘पुरातन-प्रबन्ध-संग्रह’, ‘प्रबन्ध-कोष’, ‘विश्व-परिचय’, ‘लाल कनेर’, ‘मेरा वचन’ आदि। द्विवेदी जी मूल रूप से शुक्ल जी की परम्परा के आलोचक होते हुए भी आलोचना-साहित्य में अपनी एक मौलिक दिशा प्रदान करते हैं।
    5. साहित्यिक परिचय- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी में मौलिक रूप से साहित्य का सृजन करने की योग्यता बाल्यकाल से ही विद्यमान थी। इन्होंने अपने बाल्यकाल में ही व्योमकेश शास्त्री से कविता लिखने की कला सीखनी प्रारम्भ कर दी थी। धीरे-धीरे साहित्य-जगत् इनकी विलक्षण सृजन-प्रतिभा से परिचित होने लगा। शान्ति-निकेतन पहुँचकर इनकी (UPBoardSolutions.com) साहित्यिक प्रतिभा और भी अधिक निखरने लगी । बंगला साहित्य से भी वे बहुत अधिक प्रभावित थे। इनकी बहुमुखी साहित्यिक प्रतिभा विभिन्न क्षेत्रों में प्रकट हुई । ये उच्चकोटि के शोधकर्ता, निबन्धकार, उपन्यासकार और आलोचक थे । इन्होंने अनेक विषयों पर उत्कृष्ट कोटि के निबन्धों तथा नवीन शैली पर आधारित उपन्यासों की रचना की। विशेष रूप से वैयक्तिक एवं भावात्मक निबन्धों की रचना करने में द्विवेदी जी अद्वितीय थे। ये ‘उत्तर प्रदेश ग्रन्थ अकादमी’ के अध्यक्ष और हिन्दी संस्थान’ के उपाध्यक्ष भी रहे। इनकी सुप्रसिद्ध कृति ‘कबीर’ पर इन्हें ‘मंगला प्रसाद पारितोषिक’ तथा ‘सूर-साहित्य’ पर ‘इन्दौर साहित्य समिति’ से ‘स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ था।
    6. भाषा और शैली- द्विवेदी जी की भाषा संस्कृतनिष्ठ शुद्ध खड़ीबोली है। इनकी भाषा के दो रूप हैं। निबन्ध में जहाँ संस्कृत के सरल तत्सम शब्दों का प्रयोग हुआ है वहीं उर्दू, फारसी, बंगला और देशज शब्दों के भी प्रयोग मिलते हैं। द्विवेदी जी की शैली में अनेकरूपता है। उसमें बुद्धि-तत्त्व के साथ-साथ हृदय–तत्त्व का भी समावेश है। उनकी शैली को गवेषणात्मक शैली (UPBoardSolutions.com) (नाथसम्प्रदाय जैसे सांस्कृतिक निबन्धों में), आलोचनात्मक शैली, व्यावहारिक आलोचनाओं में, भावात्मक शैली (ललित और आत्मव्यंजक निबन्धों में), व्याख्यात्मक शैली (दार्शनिक विषयों के स्पष्टीकरण में), व्यंग्यात्मक शैली (हास्य-व्यंग्य सम्बन्धी निबन्धों में तथा ललित निबन्धों में), कथात्मक शैली (उपन्यासों और संस्मरणात्मक निबन्धों में) आदि छह कोटियों में विभक्त किया जा सकता है।

उदाहरण

  1. गवेषणत्मिक शैली- कार्तिक पूर्णिमा इस देश की बहुत पवित्र तिथि है। इस दिन सारे भारतवर्ष में कोई-न-कोई उत्सव, मेला, स्नान या अनुष्ठान होता है।” – गुरु नानकदेव
  2. आलोचनात्मक शैली- “अद्भुत है गुरु की बानी की सहज बोधक शक्ति। कहीं कोई आडम्बर नहीं, कोई बनाव नहीं, सहज हृदय से निकली हुई सहज प्रभावित करने की अपार शक्ति है।” – गुरु नानकदेव
  3. भावात्मक शैली- “दुरन्त जीवन शक्ति है। कठिन उपदेश है। जीना भी एक कला है लेकिन कला ही नहीं तपस्या है। जियो तो प्राण ढाल दो जिन्दगी में, जीवन रस के उपकरणों में ठीक है।” – कुटज
  4. व्याख्यात्मक शैली- “किसी लकीर को मिटाये बिना छोटी बना देने का उपाय है बड़ी लकीर खींच देना।” – गुरु नानकदेव
  5. व्यंग्यात्मक शैली- “इस गिरिकूट बिहारी का नाम क्या है? मन दूर-दूर तक उड़ रहा है-देश में और काल में-‘मनोरथमनार्नगतिनं विद्यते’ अचानक याद आया-अरे यह तो ‘कुटज’ है।” – कुटज
  6. कथात्मक शैली- ‘यह जो मेरे सामने कुटज का लहराता पौधा खड़ा है वह नाम व रूप दोनों में अपनी अपराजेय जीवनी शक्ति की घोषणा कर रहा है।” – कुटज

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. अपने समकालीन सन्तों से गुरु नानकदेव किस प्रकार भिन्न एवं विशिष्ट हैं?
उत्तर- अपने समकालीन सन्तों से गुरु नानकदेव भिन्न थे। उन्होंने प्रेम का संदेश दिया है। उनके लिए संन्यास तथा गृहस्थ दोनों समान हैं।

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प्रश्न 2. अनुग्रह का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- भगवान् जब अनुग्रह करते हैं तो अपनी दिव्य ज्योति ऐसे महान् सन्तों में उतार देते हैं। एक बार जब यह ज्योति मानव देह को आश्रय करके उतरती है तो चुपचाप नहीं बैठती है। वह क्रियात्मक होती है, नीचे गिरे हुए अभाजन जनों को वह प्रभावित करती है, ऊपर उठाती है।

प्रश्न 3. ‘गुरु नानकदेव’ पाठ की भाषा-शैली पर तीन वाक्य लिखिए। |
उत्तर-
गुरु नानकदेव पाठ की भाषा अत्यन्त सरल एवं प्रवाहमान है। इसमें उर्दू, फारसी, अंग्रेजी एवं देशज शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। यत्र-तत्र मुहावरेदार भाषा का भी प्रयोग हुआ है। भाषा शुद्ध, संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली है। शैली अत्यन्त सरल एवं आकर्षक है।

प्रश्न 4. गुरु नानक की ‘सहज-साधना’ से सम्बन्धित लेखक के विचार संक्षेप में लिखिए।
उत्तर- गुरु नानक जी ‘सहज-साधना’ के पक्षधर थे। वे आडम्बर में विश्वास नहीं करते थे। सहज जीवन बड़ी कठिन साधना है। सहज भाषा बड़ी बलवती आस्था है।

प्रश्न 5. गुरु नानकदेव’ के आविर्भाव काल को दर्शाते हुए उनमें आनेवाली समस्याओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर- गुरु नानकदेव का आविर्भाव आज से लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व हुआ। आज से पाँच सौ वर्ष पूर्व देश अनेक कुसँस्कारों से जकड़ा हुआ था। जातियों, (UPBoardSolutions.com) सम्प्रदायों, धर्मों और संकीर्ण कुलाभिमानों से वह खण्ड-विच्छिन्न हो गया था। इस विषम परिस्थितियों में महान् गुरु नानकदेव ने सुधा लेप का काम किया।

प्रश्न 6. किन तथ्यों के आधार पर लेखक ने कार्तिक पूर्णिमा को पवित्र तिथि बताया है?
उत्तर- कार्तिक पूर्णिमा भारत की बहुत पवित्र तिथि है। इस दिन सारे भारतवर्ष में कोई-न-कोई उत्सव, मेला, स्नान या अनुष्ठान होता है। शरद्काल का पूर्ण चन्द्रमा इस दिन अपने पूरे वैभव पर होता है । आकाश निर्मल, दिशाएँ प्रसन्न, वायुमण्डल शांत, पृथ्वी हरी-भरी, जल प्रवाह मृदु-मन्थर हो जाता है।

प्रश्न 7. गुरु नानकदेव द्वारा दिये गये जनता के सन्देश को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर- गुरु नानक ने प्रेम का सन्देश दिया है। उनका कथन था कि ईश्वर नाम के सम्मुख जाति और कुल के बन्धन निरर्थक हैं क्योंकि मनुष्य जीवन का जो चरम प्राप्तव्य है (UPBoardSolutions.com) वह स्वयं प्रेमरूप है। प्रेम ही उसका स्वभाव है, प्रेम ही उसका साधन है। गुरु नानक जी बाह्य आडम्बर में विश्वास नहीं करते थे। उन्होंने अभिमान से दूर रहने का संदेश दिया।

प्रश्न 8. कार्तिक पूर्णिमा क्यों प्रसिद्ध है? तर्कसंगत उत्तर दीजिए।
उत्तर- कार्तिक पूर्णिमा के दिन महान् गुरु नानकदेव का जन्म-दिवस मनाया जाता है, इसलिए कार्तिक पूर्णिमा प्रसिद्ध है।

प्रश्न 9. गुरु नानकदेव पाठ से दस सुन्दर वाक्य लिखिए। |
उत्तर- कार्तिक पूर्णिमा इस देश की बहुत पवित्र तिथि है। इस दिन सारे भारतवर्ष में कोई-न-कोई उत्सव, मेला, स्नान या अनुष्ठान होता है । शरदकाल का पूर्ण चन्द्रमा इस दिन अपने पूरे वैभव पर होता है। गुरु नानकदेव षोडश कला से पूर्ण स्निग्ध ज्योति महामानव थे! भारतवर्ष की मिट्टी में युग (UPBoardSolutions.com) के अनुरूप महापुरुषों को जन्म देने का अद्भुत गुण है। गुरु नानक ने प्रेम का संदेश दिया है। ईश्वर नाम के सम्मुख जाति और कुल का बन्धन निरर्थक है। प्रेम मानव का स्वभाव है। किसी लकीर को मिटाये बिना छोटी बना देने का उपाय है बड़ी लकीर खींच देना। सहज जीवन बड़ी कठिन साधना है। सहज भाषा बड़ी बलवती आस्था है।

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प्रश्न 10. गुरु नानकदेव के गुणों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- गुरु नानक ने प्रेम का संदेश दिया। नानक जी जाति-पाँति में विश्वास नहीं करते थे। वे बाह्य आडम्बर से दूर थे। उनकी दृष्टि में संन्यास लेना आवश्यक नहीं है। वे अभिमान से दूर रहना चाहते थे। उन्होंने अहंकार से दूर रहने को संदेश दिया।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के दो उपन्यासों के नाम लिखिए।
उत्तर- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के दो उपन्यास-पुनर्नवा और चारुचन्द्र लेख हैं।

प्रश्न 2. निम्नलिखित में से सही वाक्य के सम्मुख सही (√) का चिह्न लगाइए –
(अ) कार्तिक पूर्णिमा के साथ गुरु के आविर्भाव का सम्बन्ध जोड़ दिया गया है।    (√)
(ब) गुरु नानक ने प्रेम का संदेश दिया है।                                                          (√)
(स) आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्विवेदी युग के लेखक हैं।                                 (×)
(द) सीधी लकीर खींचना आसान काम है।                                                         (×)

प्रश्न 3. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी किस युग के लेखक हैं?
उत्तर- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी शुक्लोत्तर युग के लेखक थे।

प्रश्न 4. ‘कबीर’ नामक रचना पर हजारीप्रसाद द्विवेदी को कौन-सा पारितोषिक प्राप्त हुआ?
उत्तर- ‘कबीर’ पर हजारीप्रसाद द्विवेदी को मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्राप्त हुआ।

प्रश्न 5. गुरु नानकदेव का आविर्भाव कब हुआ था?
उत्तर- गुरु नानकदेव का आविर्भाव आज से लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व हुआ था।

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व्याकरण-बोध

प्रश्न 1. निम्नलिखित में सन्धि-विच्छेद करते हुए सन्धि का नाम लिखिए –
उत्तर-  कुलाभिमान, सर्वाधिक, अनायास, लोकोत्तर, अमृतोपम।

कुलाभिमान  –  कुल + अभिमान    –    दीर्घ सन्धि
सर्वाधिक      –   सर्व + अधिक        –   
दीर्घ सन्धि
अनायास      –   अन + आयास       –    
दीर्ध सन्धि
लोकोत्तर      –   लोक + उत्तर         –    
गुण सन्धि
अमृतोपम     –  अमृत + उपम        –   
गुण सन्धि

प्रश्न 2निम्नलिखित समस्त पदों का समास-विग्रह कीजिए तथा समास का नाम लिखिए –
अर्थहीन, महापुरुष, स्वर्णकमल, चित्रभूमि, प्राणधारा।
उत्तर-
अर्थहीन      –  अर्थ से हीन             –   करण तत्पुरुष
महापुरुष    –  महान् है पुरुष जो    –   
कर्मधारय
स्वर्णकमल – स्वर्णरूपी कमल       –   
कर्मधारय
चित्रभूमि     –  चित्रों से युक्त भूमि   –   
करण तत्पुरुष
प्राणधारा    – प्राणरूपी धारा          –   कर्मधारय

प्रश्न 3. निम्नलिखित शब्दों का प्रत्यय अलग कीजिए –
अवतार, संजीवनी, स्वाभाविक, महत्त्व, प्रहार, उल्लसित
उत्तर –
शब्द          –     प्रत्यय
अवतार       –        र
संजीवनी     –      अनी
स्वाभाविक –       इक
महत्त्व        –       त्व
प्रहार         –        र
उल्लसित   –       इत

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