UP Board Solutions for Class 6 Hindi Chapter 1 श्री रामचन्द्र (महान व्यक्तिव)

UP Board Solutions for Class 6 Hindi Chapter 1 श्री रामचन्द्र (महान व्यक्तिव)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 6 Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 6 Hindi Chapter 1 श्री रामचंद्र (महान व्यक्तिव)

पाठ का सारांश

श्री रामचन्द्र जी के कार्य श्रेष्ठ और लोक कल्याणकारी थे। इनका व्यक्तित्व उच्च मानवीय गुणों से सम्पन्न था। राम अयोध्या नरेश दशरथ के सबसे बड़े पुत्र थे। राम गुरुजनों की आज्ञा का पालन निष्ठापूर्वक करते थे। पिता की आज्ञा से राम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ ऋषि विश्वामित्र के आश्रम में जाकर उनके यज्ञ को हानि पहुँचाने वाले राक्षसों का वध किया। यहीं से ये सीता जी के स्वयंवर में गए। वहाँ शिव जी का धनुष तोड़ने के पश्चात् सीता जी के साथ श्री राम का विवाह हुआ।

जब राजा दशरथ वृद्ध हो चले, तब उन्होंने राम को शासन का भार सौंपना चाहा। परन्तु मंथरा दासी के बहकावे में आकर कैकेयी ने राजा दशरथ से दो वरदान माँगे। ये वर दशरथ ने देवासुर संग्राम में कैकेयी के असीम शौर्य और सहायता से प्रसन्न होकर उसे माँगने को कहा था। कैकेयी ने भविष्य में कभी माँगने की बात कही थी। उसने (UPBoardSolutions.com) पहले वर में अपने पुत्र भरत के लिए राजगद्दी तथा दूसरे में राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास माँगा। श्री राम सीता और लक्ष्मण के साथ वन चले गए।

उनके वियोग में दशरथ जी स्वर्ग सिधार गए। वन में श्री राम की पत्नी सीता का रावण ने छलपूर्वक अपहरण कर लिया। श्री राम अपने भाई के साथ सीता की खोज में निकले। फिर इन्होंने सुग्रीव, अंगद, हनुमान आदि की सहायता से सेना तैयार कर रावण को परास्त किया। चौदह वर्ष का वनवास पूरा कर सीता और लक्ष्मण के साथ श्री राम वापस अयोध्या आए। श्री राम ने शासन की उत्तम व्यवस्था की। इनके राज्य में जनता सुख और आनन्द से जीवन व्यतीत करती थी। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में राम-राज्य का विशद वर्णन किया है।

UP Board Solutions

अभ्यास

प्रश्न 1.
रामचन्द्र जी के जीवन के कौन-कौन से गुण आपको प्रिय लगते हैं? उन गुणों को आप क्यों अच्छा समाते हैं?
उत्तर :
श्री रामचन्द्र जी माता-पिता और गुरु के परमभक्त, आज्ञाकारी, आदर्शवादी, परोपकारी, सहनशील, धैर्यवान, वीर, साहसी, प्रजापालक तथा मर्यादापुरुषोत्तम थे। इन गुणों से ही जीवनमूल्य तथा मानवता सार्थक होती है।

प्रश्न 2.
श्री राम के राज्याभिषेक के समय कौन-सी घटना घटी?
उत्तर :
श्री राम के राज्यभिषेक के समय दासी मंथरा ने कैकेयी के कान भरे। मंथरा के बहकावे में आकर कैकेयी ने राजा से दो वर माँगे जिनके लिए राजा वचन दे चुके थे। एक बर में उसने अपने पुत्र भरत के (UPBoardSolutions.com) लिए अयोध्या का राज्य माँगा और दूसरे में राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास।।

प्रश्न 3.
रामराज्य को आदर्श राज्य क्यों कहा गया है?
उत्तर :
रामचंद्र जी ने शासन की उत्तम व्यवस्था की। उन्होंने जनता की सुख-सविधा का इतना प्रबन्ध किया कि किसी व्यक्ति को कोई कष्ट नहीं था। सब स्वस्थ तथा सुखी थे और आनंदपूर्ण जीवन व्यतीत करते थे। इसीलिए रामराज्य को आदर्श राज्य कहा गया है।

UP Board Solutions

प्रश्न 4.
इस पाठ में श्री राम के अतिरिक्त और कौन-कौन से पात्र हैं जो आपको पसंद हैं और क्यों?
उत्तर :
इस पाठ में श्री राम के अतिरिक्त भ्राता लक्ष्मण, सुग्रीव और हनुमान मुझे पसंद हैं। क्योंकि उन्होंने मुश्किल समय में श्रीराम का साथ दिया।

प्रश्न 5.
अपने गुरु जी से रामचंद्र जी के पुत्रों के बारे में कहानी सुनिए।
नोट – विद्यार्थी अपने शिक्षक से कहानी सुनें।

We hope the UP Board Solutions for Class 6 Hindi Chapter 1 श्री रामचन्द्र (महान व्यक्तिव) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 6 Hindi Chapter 1 श्री रामचन्द्र (महान व्यक्तिव), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 6 Hindi हिन्दी व्याकरण

UP Board Solutions for Class 6 Hindi हिन्दी व्याकरण

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 6 Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 6 Hindi हिन्दी व्याकरण

व्याकरण – व्याकरण उन नियमों का समूह है जो हमें किसी भाषा को शुद्ध बोलना, लिखना और पढ़ना सिखाता है।
भाषा – जिस साधन के द्वारा हम अपने मन के भावों को प्रकट करते हैं, उसे भाषा कहते हैं।
लिपि – मुखे से निकली ध्वनियों को लिखने के ढंग को लिपि कहते हैं। जिस लिपि में हिन्दी भाषा लिखी जाती है, उसे देवनागरी लिपि कहते हैं।

व्याकरण के तीन प्रमुख भाग हैं –

  1. वर्ण विभाग- इसमें वर्षों के उच्चारण, उनके एक-दूसरे से मिलने (संधि) के, नियम, उनकी बनावट तथा लिखने आदि पर विचार किया जाता है। (UPBoardSolutions.com)
  2. शब्द विभाग- इसमें शब्दों के भेद, अवस्था, प्रयोग, बनावट आदि पर विचार किया जाता है।
  3. वाक्य विभाग- इसमें वाक्यों के भेद तथा उनके पारस्परिक सम्बन्धों पर विचार किया जाता है।

UP Board Solutions

1. वर्ण विभाग

वर्ण – भाषा की सबसे छोटी ध्वनि को (जिसके टुकड़े न हो सकें) वर्ण या अक्षर कहते हैं। भाषा में अलग-अलग ध्वनियों के लिए अलग-अलग चिह्न होते हैं, जैसे – अ, इ, उ, लु, ट् आदि।

भाषा के वर्षों से ही शब्द बनते हैं। हिन्दी भाषा की वर्णमाला में मूल वर्ण 44 हैं। वर्ण दो प्रकार के होते हैं – 1. स्वर, 2. व्यंजन

UP Board Solutions for Class 6 Hindi व्याकरण 1
UP Board Solutions for Class 6 Hindi व्याकरण 2

संधि

UP Board Solutions for Class 6 Hindi व्याकरण 3
UP Board Solutions for Class 6 Hindi व्याकरण 4
UP Board Solutions for Class 6 Hindi व्याकरण 5
UP Board Solutions for Class 6 Hindi व्याकरण 6

2. शब्द विभाग

शब्द – एक या अधिक वर्षों के सार्थक योग से शब्द बनता है; जैसे- कमल, पानी, रोटी, मोहन, गणेश, मेरठ आदि।
शब्दों के प्रकार – हिन्दी भाषा में साधारणतया चार प्रकार के शब्द प्रयोग में आते हैं

(क) तत्सम शब्द – संस्कृत भाषा के वे शब्द जो ज्यों के त्यों हिन्दी भाषा में प्रयोग में आते हैं, उन्हें तत्सम शब्द कहते हैं, जैसे- भ्राता, मित्र, सूर्य, पुत्र, अद्भुत, शैल, सरिता, शिखर आदि।
(ख) तद्भव शब्द – संस्कृत भाषा के वे शब्द जो बोल-चाल में प्रयुक्त होने के कारण बिगड़े हुए रूप में प्रयोग में आते हैं, उन्हें तद्भव शब्द कहते हैं; जैसे – भाई, मीत, सूरज, पूत आदि
(ग) विदेशी शब्द – संस्कृत भाषा के अतिरिक्त अन्य विदेशी भाषाओं के वे शब्द जिनका प्रयोग हिन्दी में होता हो, विदेशी शब्द कहलाते हैं; जैसे- बटन, कोट, लालटेन, स्कूल, स्टेशन, इम्तहान, नोटिस, कैंची, सीमेंट, कारीगर, फाइल, बुखार आदि।
(घ) देशज शब्द – ऐसे शब्द जिनको निर्माण भावों को (UPBoardSolutions.com) प्रकट करने के लिए किया जाता है, वे देशज शब्द कहलाते हैं, जैसे- खटपट, आटा, घोंसला, बिल्ली, खर्राटा, मिर्च, कड़क, कूटना आदि।

UP Board Solutions

रूपान्तर के अनुसार शब्दों के भेद – रूपान्तर के अनुसार शब्द दो प्रकार के होते हैं –

  1. विकारी शब्द – जिन शब्दों का रूप अर्थ के अनुसार बदलता रहता है, उन्हें विकारी शब्द कहते हैं; जैसे – बालक से बालकों, पढ़ा से पढ़ी, आया से आएँगे आदि।
  2. अविकारी शब्द – जिन शब्दों का रूप कभी नहीं बदलता वे अविकारी या अव्यय कहलाते हैं, जैसे- ने, अरे, पर आदि।

अर्थ के आधार पर शब्दों के भेद –

  1. एकार्थी शब्द – जिस शब्द का प्रयोग केवल एक ही अर्थ के लिए होता है, वे एकार्थी शब्द कहलाते हैं, जैसे- घर, पीला, मनुष्य, ताँबा आदि।।
  2. अनेकार्थी शब्द – जिस शब्द के एक से अधिक अर्थ होते हैं, उसे अनेकार्थी शब्द कहते हैं; जैसे- पत्र- पत्ता, चिट्ठी; द्विज- ब्राह्यण, पक्षी, वृक्ष; अंक- गिनती, भाग्य, गोद आदि।

रचना के आधार पर शब्दों के भेद – रचना के आधार पर शब्द दो प्रकार के होते हैं –

  1. रूढ़ शब्द – जो शब्द स्वयं में पूर्ण होते हैं और अन्य शब्दों या शब्दांशों के मेल से नहीं बनते, उन्हें रूढ़ शब्द कहते हैं, जैसे- पुस्तक, सेना, गाड़ी आदि।
  2. यौगिक शब्द – जो शब्द अन्य शब्दों या शब्दांशों के मेल से (UPBoardSolutions.com) बनते हैं, उन्हें यौगिक शब्द कहते हैं; जैसे- पुस्तकालय, सेनापति, गाड़ीवान आदि।

व्याकरण की दृष्टि से शब्दों के भेद – व्याकरण की दृष्टि से शब्द आठ प्रकार के होते हैं –

  1. संज्ञा
  2. सर्वनाम
  3. विशेषण
  4. क्रिया
  5. क्रियाविशेषण
  6. सम्बन्धबोधक
  7. समुच्चयबोधक
  8. विस्मयादिबोधक।

इनमें से प्रथम चार प्रकार के शब्द, विकारी शब्द माने जाते हैं तथा शेष चार प्रकार के शब्द, अविकारी शब्द माने जाते हैं।

संज्ञा संज्ञा की परिभाषा – किसी प्राणी, स्थान, वस्तु, अवस्था, भाव तथा गुण के नाम बताने वाले शब्दों को संज्ञा कहते हैं, जैसे- ‘राम’, ‘कृष्ण’, लखनऊ’, ‘पुस्तक’ आदि। यहाँ ‘राम’ और ‘कृष्ण’ प्राणी के नाम हैं। लखनऊ’ एक नगर का नाम है तथा ‘पुस्तक’ एक वस्तु का नाम है। अतः ये सब शब्द संज्ञाएँ हैं।

UP Board Solutions

संज्ञा के भेद – संज्ञा शब्द तीन प्रकार के होते हैं

1. व्यक्तिवाचक संज्ञा – वे संज्ञा शब्द जिनमें किसी व्यक्ति, स्थान या वस्तु का बोध हो, व्यक्तिवाचक संज्ञा कहलाते हैं; जैसे- राम, गांधी, दिल्ली। ‘राम’ या ‘गांधी’ शब्द किसी विशेष व्यक्ति के ही नाम हैं। सब व्यक्तियों को हम ‘राम’ या ‘गांधी’ नहीं कह सकते। इसी प्रकार ‘दिल्ली एक नगर विशेष का नाम है। प्रत्येक नगर को हम ‘दिल्ली’ नहीं (UPBoardSolutions.com) कह सकते। अतः ये शब्द व्यक्तिवाचक संज्ञा हैं।
2. जातिवाचक संज्ञा – वे संज्ञा जिनसे एक ही प्रकार या जाति की सभी वस्तुओं का बोध हो, जातिवाचक संज्ञा कहलाते हैं, जैसे- हाथी, मनुष्य, कुत्ता, बालक, घोड़ा आदि।

जातिवाचक तथा व्यक्तिवाचक संज्ञा में अन्तर – व्यक्तिवाचक संज्ञा के शब्द किसी एक ही विशेष व्यक्ति या वस्तु के लिए प्रयोग में आते हैं, किंतु जातिवाचक संज्ञा के शब्द उस प्रकार की सभी वस्तुओं के लिए प्रयोग में आते हैं, जैसे- ‘बालक’ शब्द प्रत्येक बालक के लिए आता है। अतः बालक शब्द जातिवाचक संज्ञा है, किंतु ‘राम’ शब्द विशेष बालक के लिए प्रयोग में आता है। अतः ‘राम’ शब्द व्यक्तिवाचक संज्ञा है।

3. भाववाचक संज्ञा – जिस संज्ञा शब्द से किसी व्यक्ति या वस्तु के गुण-दोष, अवस्था, स्वभाव आदि का बोध हो, उसे भाववाचक संज्ञा कहते हैं; जैसे- साहस, बचपन, मिठास आदि।

भाववाचक संज्ञा निम्नलिखित प्रकार के शब्दों से बनती है –
UP Board Solutions for Class 6 Hindi व्याकरण 7

सर्वनाम

सर्वनाम की परिभाषा – जो शब्द संज्ञा के स्थान पर प्रयोग किए जाते हैं, वे सर्वनाम कहलाते हैं; जैसे- मैं, हम, तुम, आप, वे, वह आदि।

सर्वनाम के भेद – सर्वनाम के छह भेद होते हैं –

1. पुरुषवाचक सर्वनाम – जिससे किसी व्यक्ति का बोध हो, वे शब्द ‘पुरुषवाचक सर्वनाम कहलाते हैं; जैसे- मैं, तुम, वह आदि। पुरुषवाचक सर्वनाम के तीन भेद होते हैं

(क) उत्तम पुरुष – जिससे बात के कहने वाले का बोध हो, उसे उत्तम पुरुष कहते हैं; जैसे- मैं, हम आदि।
(ख) मध्यम पुरुष – जिससे बात कही जाए, उसे मध्यम पुरुष कहते हैं; जैसे- तुम, आप आदि।
(ग) अन्य पुरुष – जिसके बारे में बातें की जाएँ, वह अन्य पुरुष कहलाता है; जैसे- वे, वह आदि।

2. निश्चयवाचक सर्वनाम – वे शब्द जिनसे किसी वस्तु का निश्चयात्मक ज्ञान हो, निश्चयवाचक सर्वनाम कहलाते हैं; जैसे- वह पुरुष था। इस वाक्य में ‘वह’ से पुरुष का निश्चित बोध होता है। अतः यहाँ ‘वह’ शब्द निश्चयवाचक सर्वनाम है।
3. अनिश्चयवाचक सर्वनाम – वे शब्द जिनसे किसी (UPBoardSolutions.com) वस्तु का निश्चित ज्ञान न हो, अनिश्चयवाचक सर्वनाम कहलाते हैं; जैसे- ‘कोई पढ़ रहा है।’ इस वाक्य में कोई’ शब्द से पढ़ने वाले का निश्चित ज्ञान नहीं होता। अतः यहाँ ‘कोई’ शब्द अनिश्चयवाचक सर्वनाम है।
4. सम्बन्धवाचक सर्वनाम – जो शब्द एक वाक्य या शब्द का सम्बन्ध दूसरे वाक्य या शब्द से प्रकट करते हैं, वे सम्बन्धवाचक सर्वनाम कहलाते हैं; जैसे – यह वही लड़का है, जो कल मिला था। इस वाक्य में ‘जो’ शब्द प्रस्तुत लड़के और कल वाले लड़के में सम्बन्ध स्थापित करता है। अतः यहाँ ‘जो’ शब्द सम्बन्धवाचक सर्वनाम है।
5. प्रश्नवाचक सर्वनाम – जिस सर्वनाम से प्रश्न का बोध होता है, उसे प्रश्नवाचक सर्वनाम कहते हैं; जैसे- कौन रो रहा है? इस वाक्य में ‘कौन’ शब्द से प्रश्न का बोध होता है। अतः यहाँ ‘कौन’ शब्द प्रश्नवाचक सर्वनाम है।
6. निजवाचक सर्वनाम – जो सर्वनाम अपने लिए प्रयोग (UPBoardSolutions.com) में आते हैं, वे निजवाचक सर्वनाम कहलाते हैं; जैसे- ‘मैं स्वयं ही आ जाऊँगा।’ इस वाक्य में स्वयं’ शब्द अपने ही लिए आया है। अतः यहाँ ‘स्वयं’ शब्द निजवाचक सर्वनाम है।

UP Board Solutions

संज्ञा तथा सर्वनाम के रूपान्तर

संज्ञा तथा सर्वनाम शब्दों में लिंग, वचन तथा कारकों के कारण उनके रूप में अन्तर हो जाता है। अतः उनका ज्ञान होना अत्यन्त आवश्यक है। छात्र निम्नलिखित को ध्यान से पढ़ें –

लिंग की परिभाषा – लिंग के जिस रूप से किसी वस्तु की जाति (पुरुष या स्त्री) का बोध होता है, उसे लिंग कहते हैं।
लिंग के भेद – लिंग के दो प्रमुख भेद माने गए हैं

  1. पुल्लिगे – जिस शब्द से पुरुष जाति का बोध होता है, उसे पुल्लिग कहते हैं; जैसे- राम जाता है। सिंह दौड़ता है। यहाँ ‘राम’ और ‘सिंह’ शब्दों से पुरुष जाति का बोध होता है। अतः ये पुल्लिगे हैं।
  2. स्त्रीलिंग – जिस शब्द से स्त्री जाति का बोध होता है, उसे स्त्रीलिंग कहते हैं; जैसे- शीला जाती है। गाड़ी दौड़ती है। इन वाक्यों में ‘शीला’ और ‘गाड़ी’ शब्दों से स्त्री जाति का बोध होता है। अतः ये शब्द स्त्रीलिंग हैं।

वचन

वचन की परिभाषा – शब्द के जिस रूप से यह ज्ञात होता है कि वह किसी एक के लिए प्रयोग में आया है या एक से अधिक के लिए, उस रूप को वचन कहते हैं।
वचन के भेद – हिन्दी में वचन दो प्रकार के माने गए हैं

  1. एकवचन – इससे केवल एक वस्तु, स्थान या प्राणी का बोध होता है; जैसे- राम जाता है। लड़की जाती है। इन वाक्यों में ‘राम’ और ‘लड़की’ एकवचन है क्योंकि ये (UPBoardSolutions.com) एक के लिए आए हैं।
  2. बहुवचन – इससे एक से अधिक वस्तुओं, स्थानों या प्राणियों का बोध होता है; जैसेलड़के जाते हैं। नदियाँ बहती हैं। इन वाक्यों में लड़के’ और ‘नदियाँ’ बहुवचन हैं क्योंकि ये एक से अधिक हैं।

नोट – सम्मान सूचित करने के लिए एकवचन संज्ञा को बहुवचन में प्रयोग किया जाता है; जैसे- मेरे पिता जी बैठे हैं।

UP Board Solutions

कारक

कारक की परिभाषा – किसी वाक्य में संज्ञा या सर्वनाम का वह रूप जिससे उसका सम्बन्ध उस वाक्य की क्रिया से जाना जाए, कारक कहलाता है; जैसे – मोहन गुरु से पाठ पढ़ता है इस वाक्य में ‘मोहन’ क्रिया का कर्ता है।
कारक के भेद – कारक आठ प्रकार के होते हैं। उनके भेद, चिह्न और उदाहरण दिए जा रहे हैं। छात्र इन्हें ध्यान से पढ़ें –
UP Board Solutions for Class 6 Hindi व्याकरण 8

  1. कर्ता कारक – काम के करने वाले को ‘कर्ता’ कहते हैं; जैसे- राम ने पढ़ा। इस वाक्य में काम करने वाला ‘राम’ है। अतः इस वाक्य में ‘राम’ शब्द का कारक, कर्ता कारक है।
  2. कर्म कारक – जिस पर क्रिया के व्यापार का फल पड़े, उसे ‘कर्म’ कहते हैं; जैसे- राम ने पाठ पढ़ा। इसे वाक्य में पढ़ना’ क्रिया है और उसका फल ‘पाठ’ पर पड़ रहा है। अतः इस वाक्य में ‘पाठ’ शब्द का कारक, कर्म कारक है।
  3. करण कारक – जिसकी सहायता से काम किया जाए, उसे ‘करण’ कारक कहते हैं; जैसे- ‘वह लेखनी से लिखता है। यहाँ लिखने का कार्य लेखनी की सहायता से हो रहा है। अतः इस वाक्य में ‘लेखनी’ शब्द का कारक, करण कारक है।
  4. संप्रदान कारक – जिसके लिए कर्ता काम करता है, उसे संप्रदान कारक कहते हैं; जैसेराम बच्चों के लिए मिठाई लाता है। इस वाक्य में बच्चों’ शब्द का कारक संप्रदान कारक है।
  5. अपादान कारक – जहाँ अलग होने का भाव पाया जाए, वहाँ ‘अपादान’ कारक होता है; जैसे- वृक्ष से फल गिरता है। इस वाक्य में फल का वृक्ष से अलग होना पाया गया है (UPBoardSolutions.com) इसलिए इस वाक्य में ‘वृक्ष’ शब्द का कारक अपादान कारक है।
  6. सम्बन्ध कारक – जहाँ शब्द का सम्बन्ध किसी संज्ञा से दिखाया जाता है, वहाँ सम्बन्ध कारक . होता है; जैसे- यह आम का पेड़ है। इसे वाक्य में ‘आम’ शब्द का सम्बन्ध पेड़’ से दर्शाया गया है।
  7. अधिकारण कारक – इससे किसी संज्ञा का आधार प्रकट होता है; जैसे- वृक्ष पर पक्षी हैं। इस वाक्य में पक्षी का आधार वृक्ष है। अतः इस वाक्य में ‘वृक्ष’ शब्द अधिकरण कारक में है।
  8. संबोधन कारक – किसी को पुकारने के लिए संबोधन कारक का प्रयोग किया जाता है; जैसे- हे राम! यहाँ आओ। अतः इस वाक्य में ‘हे राम’ शब्द संबोधन कारक में है।

UP Board Solutions

विशेषण

विशेषण की परिभाषा – जो शब्द संज्ञा शब्दों की विशेषता प्रकट करते हैं, वे ‘विशेषण कहलाते हैं; जैसे- काली गाय ने सूखी घास नहीं खाई। इस वाक्य में ‘काली’ शब्द से गाय की विशेषता प्रकट होती है। अतः ‘काली’ शब्द विशेषण है। इसी प्रकार ‘सूखी’ शब्द भी विशेषण है। विशेषण के चार भेद होते हैं

1. गुणवाचक विशेषण – इससे किसी संज्ञा के गुण, अवस्था आदि का बोध होता है; जैसेअच्छा, बुरा, पुराना, नीचा आदि। उदाहरण- काली गाय ने दूध दिया। इस वाक्य में ‘काली’ शब्द गाय के रंग को प्रकट करता है। अतः ‘काली’ शब्द गुणवाचक विशेषण है। इसी प्रकार लाल कपड़ा, काला आदमी, छोटा बन्दर, स्वादिष्ट आम में क्रमशः ‘लाल’, ‘काला’, ‘छोटा’, ‘स्वादिष्ट गुणवाचक विशेषण हैं।
2. संख्यावाचक विशेषण – जो शब्द किसी शब्द की संख्या बताते हैं, वे संख्यावाचक विशेषण कहलाते हैं; जैसे- मेरा तीसरा पत्र आपको मिला होगा। इस वाक्य में तीसरा’ शब्द पत्र की (UPBoardSolutions.com) संख्या बता रहा है। अतः ‘तीसर शब्द संख्यावाचक विशेषण है।
3. परिमाणवाचक विशेषण – जिससे किसी वस्तु का परिमाण (नाप-तोल आदि) जाना जाए, वह परिमाणवाचक विशेषण होता है; जैसे- थोड़ा दूध लाओ। यहाँ ‘थोड़ा’ शब्द से दूध की नाप का ज्ञान होता है। अतः ‘थोड़ा’ शब्द परिमाणवाचक विशेषण है।
4. संकेतवाचक विशेषण – जो सर्वनाम शब्द किसी संज्ञा शब्द की तरफ संकेत करते हैं, वे संकेतवाचक या सार्वनामिक विशेषण कहलाते हैं; जैसे- यह बालक सुन्दर है। इस वाक्य में यह शब्द बालक की ओर संकेत करता है। अतः ‘यह’ शब्द संकेतवाचक विशेषण है। इसी प्रकार ये, वे, वह आदि शब्द संकेतवाचक विशेषण हैं।

क्रिया

क्रिया की परिभाषा – जिन शब्दों से किसी काम को करना या होना पाया जाए, उसे क्रिया कहते हैं; जैसे राम पढ़ता है। इस वाक्य में पढ़ता है’ शब्द से काम का होना पाया जा रहा है। अतः ‘पढ़ता है’ शब्द क्रिया है।

क्रिया के भेद – क्रिया के दो भेद होते हैं –

1, सकर्मक क्रिया – जिस क्रिया के साथ उनका कर्म भी हो वह ‘सकर्मक क्रिया’ होती। है; जैसे – श्याम पुस्तक पढ़ता है। इस वाक्य में पढ़ता है’ क्रिया सकर्मक है क्योंकि इसका कर्म ‘पुस्तक’ इस वाक्य में दिया हुआ है।
2. अकर्मक क्रिया – जिस क्रिया के साथ उनका कर्म नहीं दिया होता, उसे ‘अकर्मक क्रिया’ कहते हैं; जैसे -श्याम पढ़ता है। इस वाक्य में पढ़ता है’ क्रिया का कर्म नहीं दिया हुआ है। अतः ‘पढ़ता है’ क्रिया वाक्य में अकर्मक क्रिया है।

काल

काल की परिभाषा – जिससे क्रिया के होने के समय का ज्ञान हो, उसे ‘कोल’ कहते हैं।
काले के भेद – काल तीन प्रकार के होते हैं

  1. भूतकाल – यह बीते हुए समय का बोध कराता है; जैसे- वह खाना खा चुका था। यहाँ खाना खाने की क्रिया समाप्त हो चुकी है। अतः ‘खो चुका’ शब्द भूतकाल है।
  2. वर्तमानकाल – यह वर्तमान समय का बोध करता है; जैसे- वह खाना खा रहा है। इस वाक्य में खाना खाने की क्रिया वर्तमानकाल में हो रही हैं।
  3. भविष्यत्काल – यह आगे आने वाले समय में होने वाली क्रिया का बोध कराती है; जैसेवह खाना खाएगा। इस वाक्य में खाना खाने की क्रिया भविष्यकाल में है।

क्रियाविशेषण

क्रियाविशेषण की परिभाषा- वे शब्द जो क्रिया की विशेषता प्रकट करते हैं, ‘क्रियाविशेषण कहलाते हैं; जैसे – वह तेजी से दौड़ा। इस वाक्य में ‘दौड़ा’ क्रिया की विशेषण ‘तेजी शब्द से प्रकट हो रही है। अतः ‘तेजी शब्द क्रियाविशेषण है।

UP Board Solutions

समुच्चयबोधक

परिभाषा – समुच्चयबोधक शब्द वाक्यों को यो शब्दों को एक-दूसरे से जोड़ते या अलग करते हैं; जैसे – राम और श्याम गए। इस वाक्य में ‘और’ शब्द ‘राम’ और ‘श्याम’ शब्दों को जोड़ता है। अतः ‘और’ शब्द समुच्चयबोधक है।

सम्बन्धबोधक

परिभाषा – जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम शब्दों के साथ आकर उनका सम्बन्ध वाक्य के अन्य शब्दों के साथ बताते हैं, वे सम्बन्धबोधक कहलाते हैं; जैसे- दवात मेज पर है। इस वाक्य में ‘पर’ शब्द ‘दवात’ (UPBoardSolutions.com) का ‘मेज’ से सम्बन्ध बता रहा है। अतः ‘पर’ शब्द सम्बन्धबोधक है।

विस्मयादिबोधक

परिभाषा – जो शब्द हर्ष, विस्मय आदि का भाव प्रकट करते हैं, वे ‘विस्मयादिबोधक’ कहलाते हैं; जैसे- हे। अरे! आह! छि! आदि।

3. वाक्य विभाग

वाक्य की परिभाषा – शब्दों के उस समूह को वाक्य कहते हैं, जिससे पूरी बात समझ में आती है; जैसे- महाराणा प्रताप के घोड़े को नाम चेतक था।
वाक्य के अवयव – किसी भी वाक्य के दो भाग किए जा सकते हैं

  1. उद्देश्य – जिसके विषय में कुछ कहा जाए, उसे उद्देश्य कहते हैं; जैसे – ‘हरिश्चन्द्र सत्यवादी राजा थे।’ इस वाक्य में ‘हरिश्चन्द्र’ उद्देश्य है क्योंकि उन्हीं के सम्बन्ध में यहाँ कुछ कहा गया है।
  2. विधेय – उद्देश्य के बारे में जो कुछ कहा जाए, वह विधेय कहलाता है; जैसे – ऊपर के वाक्य में हरिश्चन्द्र के विषय में कहा गया है- सत्यवादी राजा थे। अतः ‘सत्यवादी राजा थे’ विधेय है।

रचना के आधार पर वाक्य तीन प्रकार के होते हैं –

1. साधारण वाक्य – जिस वाक्य में एक उद्देश्य तथा एक विधेय होता है, उसे साधारण वाक्य कहते हैं; जैसे- राम विद्यालय जाता है।
2. संयुक्त वाक्य – जिस वाक्य में दो या दो से अधिक साधारण तथा स्वतंत्र वाक्य समुच्चयबोधक शब्द से जुड़े हों, उसे संयुक्त वाक्य कहते हैं; जैसे उसने राम को मारा और वह भाग गया। इसमें दो (UPBoardSolutions.com) साधारण उपवाक्यों को ‘और’ समुच्चयबोधक शब्द द्वारा जोड़ा गया है।
3. मिश्रित वाक्य – इसमें एक प्रधान वाक्य होता है तथा शेष अधीन उपवाक्य होते हैं; जैसेउसने राम से कहा कि आप ही मेरठ चले जाइए। इस वाक्य में उसने राम से कहा’ प्रधान वाक्य है तथा कि ‘आप ही मेरठ चले जाइए’ अधीन उपवाक्य है।

अर्थ के आधार पर वाक्य – भेद – अर्थ के आधार पर वाक्य आठ प्रकार के होते हैं –

  1. विधिवाचक वाक्य – जिन वाक्यों में काम का होना या करना सामान्य रूप से प्रकट हो, उन्हें विधिवाचक वाक्य कहते हैं; जैसे – रवि घर गया। घूमना लाभप्रद है। इन वाक्यों में कार्य सामान्य रूप से हुआ है। अतः ये विधिवाचक वाक्य हैं।
  2. निषेधवाचक वाक्य – जिस वाक्य से कार्य का न होना प्रकट हो, उसे ‘निषेधवाचक वाक्य’ कहते हैं; जैसे- रवि घर नहीं गया।
  3. आज्ञावाचक वाक्ये – जिन वाक्यों से आज्ञा या परामर्श का बोध हो, वे आज्ञावाचक वाक्य होते हैं; जैसे- छात्रो! बैठ जाओ।
  4. प्रश्नवाचक वाक्य – जिस वाक्य से प्रश्न पूछने का बोध हो, वह ‘प्रश्नवाचक वाक्य’ होता है; जैसे- आपकी घड़ी में क्या बजा है? प्रश्नवाचक वाक्य है।
  5. विस्मयादिवाचक वाक्य – जिन वाक्यों में हर्ष, शोक या विस्मय आदि का बोध हो, उन्हें विस्मयादिवाचक वाक्य कहते हैं; जैसे हाय! बुरा हुआ।, अहा! आम मीठे हैं।
  6. संदेहवाचक वाक्य – जिस वाक्य से कार्य के होने में संदेह प्रकट होता है, वह संदेवाचक वाक्य कहलाता है; जैसे- शायद वह उत्तीर्ण हो जाए।
  7. इच्छावाचक वाक्य – जिस वाक्य से शुभकामना या अन्य इच्छा प्रकट होती है, उसे इच्छावाचक वाक्य कहते हैं; जैसे- भगवान आपका भला करे।
  8. संकेतवाचक वाक्य – जिस वाक्य में किसी कार्य का होना किसी अन्य कारण पर निर्भर हो, उसे ‘संकेतवाचक वाक्य’ कहते हैं; जैसे- यदि आप पढ़े तो मैं चुप रहूँ।

UP Board Solutions

विराम निर्धारण तथा अनुच्छेदीकरण

विराम की परिभाषा – वाक्य के अन्त में या बड़े-बड़े वाक्यों के बीच में हम थोड़ी देर के लिए रुकते हैं। इन रुकने के स्थानों पर जो चिह्न लगाए जाते हैं, उन्हें विराम चिह्न कहते हैं।
विराम चिह्नों का महत्त्व – भाषा में विराम चिहनों का बड़ा महत्व होता है। ये लेखक के भावों को पाठक तक सही रूप में पहुँचाते हैं। कहीं-कहीं तो विराम चिहनों के अभाव में पूरी बात समझ में ही नहीं (UPBoardSolutions.com) आती, जैसे- रोको मंत जाने दो। इस वाक्य से कहने वाले की बात स्पष्ट नहीं होती।

इसके दो अर्थ लगाए जा सकते हैं।

  • रोको, मत जाने दो।
  • रोको मत, जाने दो।

इस प्रकार विराम चिह्नों के हेर-फेर से वाक्य को अर्थ बदल जाता है। अतः भाषा में इनका उचित प्रयोग अत्यन्त आवश्यक है।

विराम चिह्नों के भेद – हिन्दी भाषा में प्रयोग में आने वाले प्रमुख विराम चिह्न निम्नलिखित हैं –

1. पूर्ण विराम – इसका प्रयोग वाक्य के पूर्णतः समाप्त होने पर होता है, इसका चिह्न खड़ी पाई (।) है।
2. अद्र्ध विराम – इसमें बोलने वाले को पूर्ण विराम से कुछ कम देर ठहरना पड़ता है। इसका चिहन (;) है। अर्ध विराम का एक उदाहरण देखिए- मैं स्टेशन पर गया; मुझे ट्रेन दिखाई दी किंतु मैं सवार न हो सका। इस प्रकार अर्ध विराम के द्वारा एक वाक्य का दूसरे वाक्य से सम्बन्ध दिखाया जाता है।
3. अल्प विराम – इसे (,) इस प्रकार लिखा जाता है। इस स्थान पर अर्द्ध विराम से भी कम देर ठहरना पड़ता है। इसका प्रयोग एक ही शब्द-भेद के दो शब्दों के बीच में होता है; जैसे- मैं अँग्रेजी, हिन्दी, गणित, इतिहास तथा भूगोल पढ़ता हूँ।
कहीं-कहीं वाक्य के खण्ड करने के लिए भी अल्प विराम का (UPBoardSolutions.com) प्रयोग किया जाता है; जैसेपरिश्रम करने से मन प्रसन्न रहता है, शरीर पुष्ट होता है और जीवन में सफलता मिलती है।
4. प्रश्नबोधक चिह्न – इसका प्रयोग प्रश्नबोधक वाक्य के अन्त में किया जाता है। इसका चिह्न (?) है। एक उदाहरण देखिए- आज आपने क्या-क्या किया है?
5. विस्मयादिबोधक चिह्न – विस्मय, आश्चर्य, हर्ष, भय, करुणा तथा किसी को पुकारने आदि के लिए विस्मयादिबोधक चिह्न (!) लगाया जाता है; जैसे- हे राम! तुमने यह क्या कर डाला।
6. अवतरण चिह्न – इसका प्रयोग किसी अन्य व्यक्ति की कही हुई अथवा लिखी हुई बात को बताने के लिए किया जाता है। इसका चिह्न (” “) है। एक उदाहरण देखिए- मेरे गुरु जी ने कहा था, “पृथ्वी गोल है।”
7. विवरण चिह्न – जिस वाक्य के बाद कोई सूचना देनी हो या किसी बात का वर्णन करना हो तो उसके पहले विवरण चिह्न (:-) का प्रयोग होता है; जैसे- हमारे नगर के निम्नलिखित स्थल दर्शनीय हैं :- चौक बाजार, गांधी उद्यान, देवी मन्दिर आदि।

अनुच्छेदीकरण

अनुच्छेदीकरण की परिभाषा – जब लेखक को एक विषय पर बहुत कुछ कहना होता है तो वह अपने विषय को अनेक खण्डों में बाँट लेता है और प्रत्येक बात को एक खंड या अनुच्छेद में लिखता है तथा दूसरा खण्ड नई पंक्ति से प्रारम्भ करता है। खण्डों में विभाजित करने की इस रीति को अनुच्छेदीकरण कहते हैं।
अनुच्छेदीकरण करते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए –

  1. एक अनुच्छेदीकरण (परिच्छेद) में एक ही बात कहनी चाहिए।
  2. नई बात के लिए दूसरी पंक्ति से नया अनुच्छेद प्रारम्भ करना चाहिए किंतु उनका आपस में सम्बन्ध बना रहना चाहिए।
  3. अनुच्छेद करने से विषय के तारतम्य में बाधा नहीं पड़नी चाहिए अपितु विषय का स्पष्टीकरण होना चाहिए।
  4. एक ही बात के लिए अनेक अनुच्छेद नहीं बनाने चाहिए।

UP Board Solutions

अलंकार

कक्षा 6 के लिए केवल अनुप्रास अलंकार का ज्ञान होना आवश्यक है। अतः यहाँ उसी का वर्णन किया जा रहा है –
अलंकार क्या है? – काव्य की शोभा बढ़ाने वाले शब्दों को अलंकार कहते हैं। जिस प्रकार
आभूषणों से शरीर की शोभा बढ़ जाती है, उसी प्रकार अलंकारों के प्रयोग से काव्य का सौंदर्य बढ़ जाता है। इस प्रकार वे स्वर, व्यंजन अथवा शब्द जिनसे काव्य की शोभा बढ़ जाए, अलंकार माने। जाते हैं। (UPBoardSolutions.com) एक उदाहरण देखिए-तरनि तनुजा तट तमाल तरुवर बहु छाये। इस वाक्य में ‘त’ वर्ण अनेक बार आया है। इसलिए यह पंक्ति पढ़ने में अच्छी लग रही है। इसी को यदि इस प्रकार कर दें- यमुना के किनारे पर तमाल के बहुत वृक्ष छाये हुए हैं तो इस वाक्य में पहले जैसी सुन्दरता नहीं रही। इस प्रकार काव्य में सुन्दरता बढ़ाने वाले शब्द ही अलंकार कहलाते हैं।

‘अलंकार के भेद – अलंकारों द्वारा काव्य की शोभा दो प्रकार से बढ़ाई जाती है –

  1. शब्दों में चमत्कार उत्पन्न करके।
  2. अर्थ में चमत्कार उत्पन्न करके।

इसी आधार पर अलंकारों के भी दो प्रमुख भेद माने गए हैं –

  • शब्दालंकार
  • अर्थालंकार

अनुप्रास अलंकार की परिभाषा – जहाँ वाक्य के शब्दों में व्यंजनों की समता होती है, वहाँ, अनुप्रास अलंकार होता है; जैसे-तरनि तनुजा तट तमाल तरुवर बहु छाए। इस वाक्य में ‘त’ व्यंजन बार-बार आया है। इसलिए यहाँ अनुप्रास अलंकार हुआ।

अनुप्रास अलंकारे के कुछ अन्य उदाहरण देखिए –

(क) “काम कितना ही कठिन हो किंतु उकताते नहीं।”
(ख) “कूलन में, केलिन में, कछारन में, कुंजन में,
क्यारिन में, कलिन में, कलीन किलकंत हैं।”
इन पंक्तियों में ‘क’ वर्ण बार-बार आया है। इसीलिए यहाँ भी अनुप्रास अलंकार हुआ। इसी प्रकार नीचे के उदाहरण को देखिए –
(ग) “बीथिन में, ब्रज में, नवेलिनं में, बेलिन में,
बनन में, बागन में, बगरो बसन्त है।”
इन पंक्तियों में ‘ब’ वर्ण अनेक बार आया है। इसीलिए यहाँ भी अनुप्रास अलंकार हुआ।
(घ) जियत जग में जस लीजै। इस वाक्य में ‘ज’ वर्ण अनेक बार आया है। इसलिए यहाँ भी अनुप्रास अलंकार है।
(ङ) “गरज गगन के घोर गान गम्भीर स्वरों में।” इस वाक्य में ‘ग’ वर्ण बार-बार आयो है, अतः यहाँ भी अनुप्रास अलंकार है।

विलोम शब्द

विलोम का अर्थ – किसी शब्द का विलोम उसके विपरीत भाव को प्रकट करता है। छात्रों के ज्ञान के लिए कुछ उपयोगी विलोम शब्द नीचे दिए जा रहे हैं। छात्र समझें और कंठस्थ करें।
UP Board Solutions for Class 6 Hindi व्याकरण 9

पर्यायवाची शब्द

परिभाषा – समान अर्थ वाले शब्द पर्यायवाची या समानार्थी शब्द कहलाते हैं। कुछ उदाहरण देखिए –

अग्नि – पावक, अनल, आग, दहन, दव, हुताशन, जातवेदा
अमृत – सुधा, अमिय, सोम, मधु, अमी, पीयूष
असुर – राक्षस, दानव, दैत्य, दनुज, निशाचर, तमचर, रजनीचर
आकाश – नभ, अम्बर, व्योम, गगन, शून्य, अन्तरिक्ष
आँख – नेत्र, लोचन, नयन, दृग, चख, चक्षु, अक्षि
इन्द्र – देवराज, सुरेश, सुरपति, देवेंद्र, मधवा, देवेश, शक्र
कमल – सरोज, जलज, पंकज, राजीव, अरविंद, वारिज
कपड़ा – वस्त्र, वसन, चीर, पट, दुकूल, अंबर
गंगा – देवनदी, सुरसरी, भागीरथी, देवापगा, त्रिपथगा, विष्णुपदी
गणेश – गजानन, लम्बोदर, विनायक, गजबदन, गौरीसुत, गणपति
घर – गृह, गेह, निकेतन, आवास, सदन, धाम, भवन
चन्द्रमा – शशि, चन्द्र, राकेश, इंदु, राकापति, हिमांशु, विधु, मयंक
जल – पानी, नीर, जीवन, तोय, वारि, अंबु, सलिल, उदक
जग – जगत, संसार, विश्व, लोक, भव
तालाब – सरोवर, सर, तड़ाग, जलाशय, पुष्कर, ताल, सरसी
देवता – सुर, अमर, देव, आदित्य, विबुध
नदी – सरिता, तटनी, सरि, सलिला, अपगा, तरंगिणी
नारी – स्त्री, अबला, महिला, कामिनी, ललना, कांता
पवन – वायु, समीर, मारुत, वात, अनिल, बयार, पवमान
पक्षी – खंग, विहंगम, विहम, पतंग, नभचर, अंडज, द्विज
पिता – जनक, जन्य, तात, बाप
पुत्र – पूत, नन्द, बेटा, सुत, तनय, आत्मज, लड़का
पृथ्वी – भू, भूमि, धरा, मही, वसुधा, धरती, वसुंधरा, अवनी
पुष्प – फूल, कुसुम, सुमन, प्रसून, पुहुप
बिजली – विद्युत, चपला, तड़ित, दामिनी, चंचला, धनबल्ली
माता – माँ, मातु, माय, जननी, माई :
मित्र – साथी, स्वजन, सखा, व्यस्य, स्नेही, सुहृद
मेघ – बादल, घन, जलधर, नीरद, जलद, पयोद, वारिद, पयोधरे
राजा – नृप, रजनी, भूप, भूपाल, महीप, सम्राट, नरपति, भूपति
रात – रात्रि, रजनी, निशा, तमसा, तमी, यामिनी, विभावरी
वन – जंगल, कानन, विपिन, गहन
विष्णु – चतुर्भुज, जनार्दन, अच्युत, केशव, गोविंद, मुकुंद, चक्रपाणि
समुद्र – सागर, सिंधु, पयोधि, जलधि, उदधि, रत्नाकर, नदीश
सर्प – अहि, साँप, नाग, उरग, विषधर, भुजंग, व्याल, पन्नग
सिंह – शेर, केहरी, नाहर, मृगराज, केशरी, वनराज, शार्दूल
सूर्य – सूरज, रवि, अर्क, भानु, आदित्य, दिनकर, भास्कर, सविता
सोना – स्वर्ण, कंचन, हेम, हाटक, सुवर्ण, कनक

UP Board Solutions

शब्दों के तत्सम रूप

परिभाषा- किसी शब्द के शुद्ध रूप को तत्सम रूप कहते है। कुछ शब्दों के शुद्ध रूप दिए जा रहे हैं। विद्यार्थी इन्हें भली प्रकार पढ़े –

UP Board Solutions for Class 6 Hindi व्याकरण 10
UP Board Solutions for Class 6 Hindi व्याकरण 11

मुहावरे और उनका प्रयोग

मुहावरे शब्द का अर्थ – कोई भी ऐसा वाक्यांश जिसका शब्दार्थ ग्रहण न करके कोई अन्य अर्थ ग्रहण किया जाए, वह मुहावरा कहलाता है, जैसे- ऊँट-पटाँग का शब्दार्थ होता है- ऊँट पर टाँग रखना, जो कि असम्भव है। इस प्रकार ऊँट-पटाँग का तात्पर्य बेकार या व्यर्थ की बात से लिया जाता है। नीचे कुछ मुहावरों के अर्थ तथा उन्हें वाक्यों में प्रयोग करके दिखाया जा रहा है। छात्र इन्हें भली प्रकार पढे और समझें

  1. आँखें गड़ाना – (एक टंक देखते रहना) तुम तो इस हिरन पर ऐसे आँखें गड़ाए हो जैसे कभी हिरन देखा ही न हो।
  2. आँखों का तारा – (अत्यन्त प्रिय) मोहन अपनी बूढी माँ की आँखों का तारा है।
  3. आँखों में धूल झोंकना – (धोखा देना) आँखों में धूल झोंककर धन ले जाना केवल ठग का ही काम है।
  4. ईद का चाँद होना – (दर्शन दुर्लभ होना) मैं तो आपकी बहुत दिनों से प्रतीक्षा कर रहा था किंतु आप तो ईद के चाँद हो गए।
  5. काया पलट होना – (बदल जाना) लाटरी का धन मिलने से रमेश की काया पलट हो गई।
  6. कलेजा धक-धक करना – (भयभीत होना) कमरे में सर्प को देखकर मेरा कलेजा धक-धक करने लगा।
  7. घी के दिए जलाना – (प्रसन्न होना) लाटरी का धन मिलने पर राकेश घी के दिए जला रहा है।
  8. चक्कर में पड़ना – (धोखे में आना) भूल-भूलैया में पहुँचकर मैं तो चक्कर में ही पड़ गया।
  9. छक्के छुड़ाना – (हराना) युद्ध के मैदान में भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानियों के छक्के छुड़ा दिए।
  10. जी-जान से जुट जाना – (मन लगाकर कोई काम करना) तुम केवल परीक्षा के दिनों में ही पढ़ाई में जी-जान से जुट जाने से वास्तविक ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते।
  11. जम जाना – (उत्साह से कार्य में लग जाना) उत्तीर्ण होने के लिए पढ़ाई में जम जाओ अन्यथा अनुत्तीर्ण हो जाओगे।
  12. जहर उगलना – (झूठा प्रचार करना) जो देश भारत के विरुद्ध जहर उगलते हैं, उन्हें एक-न-एक दिन पछताना ही पड़ता है।
  13. टका-सा जवाब देना – (बिल्कुल मना कर देना) जब मैंने राम से दस रुपये उधार माँगे तो उसने टका-सा जवाब दे दिया।
  14. धाक जमाना – (प्रभाव डालना) हाईस्कूल में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होकर राम ने सारे विद्यालय में अपनी धाक जमा ली है।
  15. पत्थर पिघलना – (कठोर हृदय में दया उत्पन्न होना) उत्तरा के हृदय विदारक विलाप को सुनकर पत्थर भी पिघल उठे।
  16. प्राणों की बाजी लगाना – (घोर संकट में कार्य करना) अब्दुल हमीद ने प्राणों की बाजी लगाकर शत्रु को नष्ट कर दिया।
  17. फूले न समाना – (बहुत प्रसन्न होना) अपने उत्तीर्ण होने का समाचार सुनकर मुकेश फूला न समाया।
  18. मौत से लड़कर आना – (बहुत दिनों तक जीवित रहना) सबको एक न एक दिन भगवान के पास जाना पड़ता है, कोई भी मौत से लड़कर नहीं आता है।
  19. लट्टू होना – (ललचा जाना) सेठ जी की सुन्दर कोठी को देखकर नेता जी लट्टू हो गए।
  20. सिर नीचा होना – (लज्जित होना) चोरी की पुस्तक पकड़े जाने पर मोहन का सिर नीचा हो गया।
  21. हृदय में हलचल होना – (मन में अनेक प्रकार के विचार आना) कमरे में चोर को देखकर मेरे हृदय में हलचल होने लगी।

UP Board Solutions

लोकोक्तियाँ (कहावतें)

लोकोक्ति का अर्थ – संसार में प्रचलित उक्ति। लोगों के अनुभव से पूर्ण लोकोक्तियों का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया जाता है। अपने कथनों को प्रभावशाली बनाने के लिए इनका स्वतंत्र वाक्य के रूप में प्रयोग करना चाहिए।
नीचे कुछ कहावतों के अर्थ तथा प्रयोग उदाहरण स्वरूप दिए जा रहे हैं।

  1. अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग – (सबकी अलग-अलग बात) आज की सभा में अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग’ के कारण कोई निर्णय न हो सका।
  2. ऊँट के मुँह में जीरा – (अधिक आवश्यकता में थोड़ी-सी वस्तु प्राप्त होना) बीस कचौड़ी खाने वाले को चार कचौड़ी देते हो। वाह! ‘ऊँट के मुँह में जीरा’ जैसी बातें करते हो।
  3. खोदा पहाड़ निकली चुहिया – (बहुत परिश्रम करने पर भी लाभ थोड़ा) एम०ए० उत्तीर्ण करने पर भी 2000/- रुपये माहवार की नौकरी मिली है। ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’।
  4. जो गरजते हैं बरसते नहीं – (कथनी और करनी में अन्तर) राजेश वैसे तो बड़ी डींग मारता है परन्तु काम पड़ने पर मुँह छिपाता है। सच है जो गरजते हैं वे बरसते नहीं।
  5. घर खीर तो बाहर भी खीर – (धनी का सब जगह आदर) पिता जी ने सेठ जी के आदर-सत्कार में पाँच सौ रुपए खर्च किए। सच है “घर खीर तो बाहर भी खीर’।
  6. अकेला चना क्या भाड़ फोड़ेगा – बिना दूसरे की सहायता के अकेला मनुष्य कुछ भी काम नहीं कर सकता है।
  7. अक्ल बड़ी या भैंस – बली की अपेक्षा बुद्धिमान उत्तम काम कर सकता है।
  8. आम के आम गुठलियों के दाम – दूना लाभ होना।
  9. एक पंथ दो काज – दोहरा लाभ होना।
  10. ऊँची दुकान फीके पकवान – गुण थोड़ा अभिमान अधिक।
  11. एक अनार सौ बीमार – एक वस्तु के कई ग्राहक।
  12. काला अक्षर भैंस बराबर – अनपढ़ होना।
  13. दूध का दूध, पानी का पानी – पूरा न्याय करना।
  14. घर की मुर्गी दाल बराबर – घर की वस्तु मुफ्त समझना
  15. घर का भेदी लंका ढाए – आपसी फूट का परिणाम।
  16. जिसकी लाठी उसकी भैंस – शक्तिशाली का किसी वस्तु पर अधिकार होना, शक्ति की विजय होना।

We hope the UP Board Solutions for Class 6 Hindi हिन्दी व्याकरण help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 6 Hindi हिन्दी व्याकरण, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 11 अबुल फजल (महान व्यक्तित्व)

UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 11 अबुल फजल (महान व्यक्तित्व)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 8 Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 11 अबुल फजल (महान व्यक्तित्व).

पाठ का सारांश

अबुल फजल के पिता मुबारक आगरे के पास रहते थे। इनका जन्म सन् 1551 ई० में हुआ था। ये फारसी और संस्कृत के अच्छे विद्वान थे। इन्होंने फारसी में लिखी हुई उस पुस्तक को पूरा किया जो आधी जल गई थी। पूरा करने की विशेषता यह थी कि विचारों में परिवर्तन नहीं हुआ। चौबीस वर्ष की अवस्था में इनकी भेंट अकबर से हुई। वह इनकी विद्वता (UPBoardSolutions.com) से इतना प्रभावित हुआ कि इनको अपने दरबार में रख लिया। एक बार जहाँगीर ने अकबर के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। अकबर ने इनको दक्षिण से बुलवाया। दक्षिण से आते समय जहाँगीर ने शत्रुतावश इनको मरवा दिया।

अबुल फजल का चरित्र बहुत ऊँचा था। ये कभी किसी के साथ शत्रुता का व्यवहार नहीं करते थे।
शिक्षा – हमें जाति-पाँति और धर्म के भेद-भाव को भुलाकर सबके साथ प्रेम का व्यवहार करना चाहिए।

UP Board Solutions

अभ्यास-प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए
प्रश्न 1.
अबुल फजल का जन्म कब और कहाँ हुआ?
उत्तर :
अबुल फजल का जन्म 14 जनवरी, 1551 ई० को आगरा के पास हुआ था।

प्रश्न 2.
अबुल फजल की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
अबुल फजल विद्वान के साथ-साथ एक कुशल सैनिक थे और कई युद्धों में सम्राट अकबर की ओर से गए और युद्ध का संचालन भी किया था। अबुल फजल शत्रु से भी कठोर वचन नहीं बोलते थे। सत्य को वे सबसे बड़ा धर्म (UPBoardSolutions.com) मानते थे। इनका किसी धर्म से विरोध नहीं रहा। अबुल फजल एक सज्जन व्यक्ति थे।

UP Board Solutions

प्रश्न 3.
अबुल फजल की हत्या की योजना किसने और कैसे बनायी?
उत्तर :
अबुल फजल की हत्या की योजना जहाँगीर ने, उनके दक्षिण से लौटने की खबर सुनकर बनाई।

प्रश्न 4.
अबुल फजल ने कौन-कौन से ग्रन्थ लिखे?
उत्तर :
अबुल फजल ने ‘आईने अकबरी’ तथा ‘अकबरनामा’ ग्रन्थ लिखे।

UP Board Solutions

We hope the UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 11 अबुल फजल (महान व्यक्तित्व) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 11 अबुल फजल (महान व्यक्तित्व), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 10 मैथिलीशरण गुप्त (काव्य-खण्ड)

UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 10 मैथिलीशरण गुप्त (काव्य-खण्ड)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 10 मैथिलीशरण गुप्त (काव्य-खण्ड).

कवि-परिचय

प्रश्न 1.
कवि मैथिलीशरण गुप्त का जीवन परिचय दीजिए एवं उनकी काव्य-कृतियों (रचनाओं) के नाम लिखिए।
उत्तर
जीवन-परिचय-राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त हिन्दी काव्य-जगत् के अनुपम रत्न हैं। इनका जन्म सन् 1886 ई० में चिरगाँव (झाँसी) में हुआ था। इनके पिता सेठ रामचरण गुप्त बड़े ही धार्मिक, काव्यप्रेमी और निष्ठावान् व्यक्ति थे। पिता के संस्कार पुत्र को पूरी तरह प्राप्त थे। बाल्यावस्था में ही एक छप्पय की रचना कर इन्होंने अपने पिता से सुकवि होने का आशीर्वाद प्राप्त किया था। इनकी शिक्षा का विधिवत् प्रबन्ध घर पर ही किया गया, जहाँ इन्होंने अंग्रेजी, संस्कृत और हिन्दी का अध्ययन किया। इनकी आरम्भिक रचनाएँ कलकत्ता (वर्तमान में कोलकाता) से प्रकाशित होने वाले ‘वैश्योपकारक’ पत्र में छपती थीं। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में आने के बाद इनकी प्रतिभा प्रस्फुटित हुई और इनकी रचनाएँ। ‘सरस्वती’ में छपने लगीं। ‘साकेत’ महाकाव्य के सृजन पर इनको (UPBoardSolutions.com) ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ द्वारा ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ से सम्मानित किया गया। इनकी साहित्यिक उपलब्धियों के कारण ही आगरा तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा इनको डी० लिट्० की मानद उपाधि से विभूषित किया गया था। इनकी साहित्य-सेवा के कारण ही भारत सरकार ने इन्हें ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया था। ये राज्यसभा के लिए दो बार मनोनीत किये गये। जीवन के अन्तिम समय तक ये साहित्य-सृजन करते रहे। सरस्वती का यह महान् साधक 12 दिसम्बर, 1964 ई० को पंचतत्त्व में विलीन हो गया।

UP Board Solutions

रचनाएँ-गुप्त जी की चालीस मौलिक तथा छः अनूदित पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। उनमें से प्रमुख हैं-‘भारत भारती’, ‘रंग में भंग’, ‘जयद्रथ वध’, ‘पंचवटी’, ‘अनघ’, ‘हिन्दू’, ‘गुरुकुल’, ‘अलंकार’, ‘साकेत’, ‘यशोधरा’, ‘मंगल घट’, ‘नहुष’, ‘कुणाल गीत’, ‘द्वापर’, ‘विष्णुप्रिया’, दिवोदास’, ‘मेघनाद वध’, ‘विरहिणी ब्रजांगना’,’जय भारत’, ‘सिद्धराज’, ‘झंकार’,’पृथिवीपुत्र’, ‘प्लासी का युद्ध’ आदि।।

साहित्य में स्थान--मैथिलीशरण गुप्त भारतीय संस्कृति के अमर गायक, उद्भट प्रस्तोता और सामाजिक चेतना के प्रतिनिधि कवि थे। इन्हें राष्ट्रकवि होने का गौरव प्राप्त है। गुप्त जी खड़ीबोली के उन्नायकों में प्रधान हैं। इन्होंने खड़ीबोली को काव्य के अनुकूल भी बनाया और जनरुचि को भी उसकी ओर प्रवृत्त किया। अपनी रचनाओं में गुप्त जी ने खड़ीबोली के शुद्ध, परिष्कृत और तत्सम-बहुल रूप को ही अपनाया है। इनकी भाषा भावों के अनुकूल है तथा काव्य में अलंकारों के सहज-स्वाभाविक प्रयोग हुए हैं। सादृश्यमूलक अलंकार इनके सर्वाधिक प्रिय अलंकार हैं। हिन्दी की आधुनिक युग की समस्त काव्य-धाराओं को गुप्त जी ने अपने साहित्य में अपनाया है। इनके द्वारा प्रयुक्त की गयी प्रमुख शैलियाँ । हैं—विवरणात्मक, प्रबन्धात्मक, उपदेशात्मक, गीति तथा नाट्य। मुक्तक एवं प्रबन्ध दोनों (UPBoardSolutions.com) काव्य-शैलियों का इन्होंने सफल प्रयोग किया है। इनकी रचनाओं में छन्दों की विविधता दर्शनीय है। सभी प्रकार के प्रचलित छन्दों; जैसे-हरिगीतिका, वसन्ततिलका, मालिनी, घनाक्षरी, द्रुतविलम्बित आदि में इनकी रचनाएँ उपलब्ध

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में आप “निस्सन्देह हिन्दी-भाषी जनता के प्रतिनिधि कवि कहे जा सकते हैं।’

पद्यांशों की सुन्दर्भ व्याख्या

भारत माता का मंदिर यह
प्रश्न 1.
भारत माता का मंदिर यह
समता का संवाद जहाँ,
सबका शिव कल्याण यहाँ है।
पावें सभी प्रसाद यहाँ।
जाति-धर्म या संप्रदाय का,
नहीं भेद-व्यवधान यहाँ,
सबका स्वागत, सबका आदर
सबका सम सम्मान यहाँ।
राम, रहीम, बुद्ध, ईसा की,
सुलभ एक सा ध्यान यहाँ,
भिन्न-भिन्न भव संस्कृतियों के
गुण गौरव का ज्ञान यहाँ।
उत्तर
[ शिव = मंगलकारी। संप्रदाय = धार्मिक मत या सिद्धान्त। स्वागत = किसी के आगमन पर कुशल-प्रश्न आदि के द्वारा हर्ष प्रकार, अगवानी। भव = संसार।]

सन्दर्भ-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘काव्य-खण्ड’ में संकलित एवं मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘भारत माता का मंदिर यह’ शीर्षक से उधृत है।

[विशेष—इस शीर्षक के अन्तर्गत आने वाले सभी पद्यांशों के लिए यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।

UP Board Solutions

प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने समस्त भारतभूमि को भारत माता का मंदिर (पवित्र स्थल) बताते हुए उसकी विशेषताओं का वर्णन किया है।

व्याख्या-इन पंक्तियों में कवि अपने देश (भारतभूमि) को भारत माता का मंदिर बताते हुए कहता है कि भारत माता का यह ऐसा मंदिर है जिसमें समानता की ही चर्चा होती है। यहाँ पर सभी के कल्याण की वास्तविक कामना की जाती है और यहीं पर सभी को (UPBoardSolutions.com) परम सुख रूपी प्रसाद की प्राप्ति होती है।

इस मंदिर की यह विशेषता है कि यहाँ पर जाति-धर्म या संप्रदाय वाद का कोई भेदभाव नहीं है यानि इस मंदिर में ऐसा कोई व्यवधान या समस्या नहीं है कि कौन किस वर्ग का है। सभी समान हैं। सभी का स्वागत है और सभी को बराबर सम्मान है। कोई किसी भी सम्प्रदाय को मानने वाला हो; चाहे वह हिन्दुओं के इष्टदेव राम हों, मुस्लिमों के इष्ट रहीम हों, चाहे बौद्धों के इष्ट बुद्ध हों या चाहे ईसाइयों के इष्ट ईसामसीह हों यानि इस मंदिर में सभी को बराबर सम्मान है, सभी के स्वरूप का बराबर-बराबर चिन्तन किया जाता है। सभी की ही बराबर पूजा की जाती है। ।

अलग-अलग संस्कृतियों के जो गुण हैं, जिनके द्वारा सम्पूर्ण संसार के मर्म को अलग-अलग रूपों में संचित किया गया है वे सभी इस भारत माता के मंदिर में एकत्र हैं अर्थात् भारत माता के इस पावन मंदिर में सम्पूर्ण संस्कृतियों का समावेश है।

कहने का तात्पर्य यह है कि चाहे कोई भी देश हो सभी के अपने-अपने अलग-अलग धर्म, अलगअलग सम्प्रदाय, अलग-अलग सिद्धान्त तथा अलग-अलग पवित्र स्थल होते हैं किन्तु हमारा भारत देश एक ऐसी पवित्र तीर्थ स्थल है जहाँ निवास करने वाला (UPBoardSolutions.com) प्रत्येक प्राणी सभी धर्मों को मानने वाला तथा सबको सम. भाव से समझने वाला है। हमारा देश अनेकता में एकता का देश है। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ इसकी भावना है। |

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. अनेकता में एकता का अद्वितीय चित्रण किया गया है।
  2. राष्ट्रप्रेम और स्वदेशाभिमान की भावना को प्रेरित किया गया है।
  3. भाषा–खड़ी बोली।
  4. गुण–प्रसाद।
  5. अलंकार-रूपक, अनुप्रास।
  6. छन्द-गेय।
  7. शैली-मुक्तक।
  8. भावसाम्य-वियोगी हरि द्वारा रचित ‘विश्व मंदिर’।

प्रश्न 2.
नहीं चाहिए बुद्ध बैर की ।
भला प्रेम का उन्माद यहाँ
सबका शिव कल्याण यहाँ है,
पावें । सभी प्रसाद यहाँ।
सब तीर्थों का एक तीर्थ यह.
हृदय पवित्र बना : लें हम
आओ यहाँ अजातशत्रु बन,
सबको मित्र बना लें हम।।
उत्तर
[ उन्माद = अत्यधिक अनुराग। अजातशत्रु = जिसका कोई शत्रु न हो।]

प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि ने लोगों से भारत माता मंदिर के गुणों को अपने जीवन-चरित्र में उतारने की बात कही है।

व्याख्या-उक्त पंक्तियों में कवि कह रहा है कि हमें ऐसी उन्नति कदापि प्रिय नहीं है जो ईष्र्या से युक्त हो। इस भारत माता के मंदिर में सबके कल्याण और प्रेम का अत्यधिक अनुराग भरा पड़ा है। यहाँ पर सभी का मंगल कल्याण है और (UPBoardSolutions.com) यहीं पर सभी को परम सुखरूपी प्रसाद की प्राप्ति होती है।

UP Board Solutions

यह भारत माता का मंदिर सभी तीर्थों में उत्तम तीर्थ है क्योंकि यह किसी एक संप्रदाय या किसी धर्म से जुड़ा तीर्थ नहीं है। यद्यपि इसमें सभी तीर्थों का समावेश है, इसलिए इस तीर्थ का तीर्थाटन करके अपने हृदय को हम पवित्र बना लें। यह ऐसा पवित्र व उत्तम स्थान है जहाँ पर कोई किसी का शत्रु नहीं है इसलिए यहाँ बसकर हम सबको अपना मित्र बना लें। यहाँ पर रेखाओं के रूप में कल्याणकारी व मंगलकारी कामनाओं (UPBoardSolutions.com) (इच्छाओं) के चित्रों को उकेरकर उनको साकार रूप देकर हम अपने मनोभावों को पूर्ण कर लें। अर्थात् यह भारत माता का मंदिर ऐसा पवित्र स्थल है जहाँ ईष्र्या-द्वेष लेश मात्र भी नहीं है। ऐसे पावन मंदिर में बसकर हम अपने जीवन को धन्य बना सकने में और अपनी मानवता को साकार रूप दे पाने में सफल हो पाएँगे।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. भारत माता के मंदिर के रूप में मानवता की साकार मूर्ति का चित्रांकन।
  2. कवि की शब्द-शक्ति के द्वारा प्रेम से परिपूर्ण दुनिया का निर्माण करना।
  3. भाषा-खड़ी बोली।
  4. गुण–प्रसाद।
  5. छन्द-गेय।
  6. शैली मुक्तक
  7. अलंकार-रूपक।
  8. भाव-साम्यवियोगी हरि द्वारा रचित ‘विश्व मंदिर।। |

प्रश्न 3.
बैठो माता के आँगन में
नाता भाई-बहन का।
समझे उसकी प्रसव वेदना
वही लाल है माई का
एक साथ मिल बाँट लो।
अपनी हर्ष विषाद यह है ।
सबका शिव कल्याण यह है,
पावें सभी प्रसाद यहाँ।
उत्तर
[आँगन = घर। लाल = पुत्र। विषाद = कष्ट।]

प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि ने भारत माता के इस पवित्र सदन में निवास करने वाले सभी लोगों के बीच वास्तविक रिश्ते को उजागर किया है।

UP Board Solutions

व्याख्या-प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि यहाँ (भारत में) निवास करने वाले लोगों से कहता है। कि आइए माँ के इस पवित्र सदन में बैठिए। हम सबका यहाँ पर भाई-बहन का रिश्ता है अर्थात् एक घर (भारत) में निवास करने वाले हम सभी आपस में भाई-बहन के समान हैं और हमारा कर्तव्य है कि हम सब अपनी माँ (भारत माता) के कष्टों को महसूस करें; क्योंकि सच्चा पुत्र वही होता है जो अपनी माता के कष्टों को समझता (UPBoardSolutions.com) है तथा उसके लिए हर क्षण समर्पण की भावना अपने मन में रखता है। हम सभी भाई-बहनों का यह उद्देश्य होना चाहिए कि किसी-को-किसी प्रकार का कष्ट न हो। सभी एक-दूसरे के सहयोग के लिए तैयार रहें। क्योंकि यह भारत माता का मंदिर है इसलिए यहीं पर हम सबका मंगल कल्याण है और यहीं पर सभी को परम सुख रूपी प्रसाद भी प्राप्त है। कहने का तात्पर्य यह है कि हम सब भारतवासी एक माँ (भारत माता) की सन्तानें हैं और आपस में सभी भाई-बहन के समान हैं। हमें आपस में मिल-जुलकर रहना चाहिए। और एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. समस्त भारतवासियों का भाई-बहन के रूप में वास्तविक चित्रण किया गया है।
  2. सम्पूर्ण भारत देश का एक सदन के सदृश सुन्दर चित्रण हुआ है।
  3. भाषा-खड़ी बोली।
  4. शैली-मुक्तक।
  5. अलंकार-रूपक
  6. भावसाम्य-महान संत तिरुवल्लुवर ने भी अपने एक कुरले. (दोहे) के माध्यम से ऐसे ही भाव प्रकट किए हैं—

कपट, क्रोध, छल, लोभ से रहित प्रेम-व्यवहार।
सबसे मिल-जुलकर रहो, सकल विश्व परिवार॥

प्रश्न 4.
मिला सेव्य का हमें पुजारी
सकल काम उस न्यायी का
मुक्ति लाभ कर्त्तव्य यहाँ है।
एक-एक अनुयायी का
कोटि-कोटि कंठों से मिलकर
उठे एक जयनाद यहाँ
सबका शिव कल्याण यहाँ है
पावें सभी प्रसाद यहाँ।
उत्तर
[सेव्य = सेवा करने वाला। अनुयायी = किसी मत का अनुसरण करने वाला। जयनाद = जयघोष।]

प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने भारतवासियों को भारतभूमि में जन्म लेने पर धन्य होने की बात । कही है।

UP Board Solutions

व्याख्या—इन पंक्तियों के माध्यम से कवि मैथिलीशरण गुप्त जी कह रहे हैं कि हमारा परम सौभाग्य है जो हमें इस पावन भूमि (भारत) में जन्म मिला और भारत माता की सेवा करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। यह ईश्वर की हमारे ऊपर बहुत बड़ी (UPBoardSolutions.com) कृपा है। यहाँ के प्रत्येक अनुयायी का यह कर्तव्य बनता है कि वह इस मौके का सम्पूर्ण लाभ उठाकर मुक्ति प्राप्त करें। भारत माता के इस पावन मंदिर में करोड़ों स्वर एक साथ मिलकर जयघोष करते हैं अर्थात् यहाँ निवास करने वाले सभी लोग एक स्वर में जय-जयकार करते हैं। भारत माता के इस पावन मंदिर में सबके मंगलकारी कल्याण की कामना की जाती है और सभी को यहाँ परमसुख रूपी प्रसाद की प्राप्ति होती है। कहने का तात्पर्य है कि जिसने भारत में जन्म लिया है उसका यह सौभाग्य है कि उसने मोक्ष के मार्ग को खोज लिया है।

काव्यगत सौन्दर्य-

  1. प्रस्तुत पंक्तियों में देशभक्ति का सच्चा अनुराग दर्शाया गया है।
  2. भाषा-सरल, सहज एवं प्रवाहयुक्त खड़ी बोली।
  3. शैली-मुक्तक।
  4. अलंकार–रूपक।
  5. भाव-साम्य-ऐसी ही भाव-व्यंजना सुभद्राकुमारी चौहान ने अपनी इन पंक्तियों के द्वारा व्यक्त की है

सुनूंगी माता की आवाज,
रहूंगी मरने को तैयार,
कभी भी उस वेदी पर देव,
न होने देंगी अत्याचार।
न होने देंगी अत्याचार,
चलो मैं हो जाऊं बलिदान,
मातृ-मन्दिर में हुई पुकार,
चढ़ा दो मुझको हे भगवान!

काव्य-सौदर्य एवं व्याकरण-बोध

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों में कौन-सा अलंकार है
(क) सबका स्वागत, सबको आदर
सबको सर्म सम्मान यहाँ।
(ख) बैठो माता के आँगने में
नाता भाई-बहन का
समझे उसकी प्रसव वेदना
वही लाल है. माई का।
उत्तर
(क) अनुप्रास अलंकार।
(ख) रूपक अलंकार।

UP Board Solutions

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पदों में प्रत्ययों को मूल शब्द से अलग करके लिखिए-
समता, संस्कृति, पुजारी
उत्तर
समता = सम् + ता।
संस्कृति = संस्कृत + इ।
पुजारी = पूजा + आरी।।

UP Board Solutions

प्रश्न 3.
निम्नलिखित पदों का सनाम सन्धि-विच्छेद कीजिए-
संवाद, सम्मान, पवित्र
उत्तर
UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 10 मैथिलीशरण गुप्त (काव्य-खण्ड) img-1

We hope the UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 10 मैथिलीशरण गुप्त (काव्य-खण्ड) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 10 Hindi Chapter 10 मैथिलीशरण गुप्त (काव्य-खण्ड), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

 

UP Board Solutions for Class 9 Social Science Geography Chapter 4 जलवायु

UP Board Solutions for Class 9 Social Science Geography Chapter 4 जलवायु

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 9 Social Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Social Science Geography Chapter 4 जलवायु.

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर का चयन करें :
(i) नीचे दिए गए स्थानों में किस स्थान पर विश्व में सबसे अधिक वर्षा होती है?
(क) सिलचर
(ख) चेरापूँजी
(ग) मॉसिनराम
(घ) गुवाहाटी

UP Board Solutions

(ii) ग्रीष्म ऋतु में उत्तरी मैदानों में बहने वाली पवन को निम्नलिखित में से क्या कहा जाता है?
(क) काल वैशाखी
(ख) व्यापारिक पवनें
(ग) लू
(घ) इनमें से कोई नहीं

(iii) निम्नलिखित में से कौन-सी कारण भारत के उत्तर-पश्चिम भाग में शीत ऋतु में होने वाली वर्षा के लिए उत्तरदायी है?
(क) चक्रवातीय अवदाब
(ख) पश्चिमी विक्षोभ
(ग) मानसून की वापसी
(घ) दक्षिण-पश्चिम मानसून

(iv) भारत में मानसून का आगमन निम्नलिखित में से कब होता है?
(क) मई के प्रारंभ में
(ख) जून के प्रारंभ में
(ग) जुलाई के प्रारंभ में
(घ) अगस्त के प्रारंभ में

(v) निम्नलिखित में से कौन-सी भारत में शीत ऋतु की विशेषता है?
(क) गर्म दिन एवं गर्म रातें
(ख) गर्म दिन एवं ठंडी रातें
(ग) ठंडा दिन एवं ठंडी रातें
(घ) ठंडा दिन एवं गर्म रातें
उत्तर:
(i) (ग) मॉसिनराम
(ii) (ग) लू
(iii) (ख) पश्चिमी विक्षोभ
(iv) (ख) जून के प्रारंभ में
(v) (ग) ठंडा दिन एवं ठंडी रातें।

प्रश्न 2.
निम्न प्रश्नों के संक्षेप में उत्तर दीजिए-

  1. भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले कौन-कौन से कारक हैं?
  2. भारत में मानसूनी प्रकार की जलवायु क्यों है?
  3. भारत के किस भाग में दैनिक तापमान अधिक होता है एवं क्यों?
  4. किन पवनों के कारण मालाबार तट पर वर्षा होती है?
  5. जेट धाराएँ क्या हैं तथा वे किस प्रकार भारत की जलवायु को प्रभावित करती हैं?
  6. मानसून को परिभाषित करें। मानसून में विराम से आप क्या समझते हैं?
  7. मानसून को एक सूत्र में बाँधने वाला क्यों समझा जाता है?

उत्तर:

  1. भारत की जलवायु को मुख्य रूप से तीन कारक प्रभावित करते हैं। ये हैं-
    1. अक्षांश,
    2. ऊँचाई,
    3. वायुदाब एवं पवनें।
  2. भारत में मानसूनी जलवायु होने के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं
    1. मानसूनी जलवायु में मौसम के अनुसार पवनों की दिशा में परिवर्तन होता है।
    2. भारत की जलवायु में भी पवनें गर्मी में समुद्र से स्थल की ओर तथा शीत ऋतु में स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं।
  3. भारत में सबसे अधिक दैनिक तापमान भारत के मरुस्थल में होता है क्योंकि रेत शीघ्र गर्म होने से दिन में तापमान अधिक होता है।
  4. मालाबार तट पर दक्षिण-पश्चिमी पवनों के कारण वर्षा होती है।
  5. क्षोभमंडल की ऊपरी परत में पश्चिम से पूर्व की ओर तथा पूर्व से पश्चिम की ओर चलने वाली तीव्रगामी वायु धाराओं को जेट प्रवाह कहते हैं। पश्चिमी जेट प्रवाह के मार्ग में हिमालय तथा तिब्बत के पठार अवरोधक का काम करते हैं।
    इस प्रकार यह प्रवाह दो भागों में बँट जाता है-

    1. उत्तरी जेट प्रवाह
    2. दक्षिणी जेट प्रवाह।
      उत्तरी जेट प्रवाह हिमालय के उत्तर में तथा दक्षिणी जेट प्रवाह हिमालय के दक्षिण में बहता है। जेट की दक्षिणी शाखा हमारे देश की जलवायु को प्रभावित करती है। जेट प्रवाह शीतकालीन चक्रवातों को भारत तक पहुँचाने में सहायक होते हैं। भारत की मानसून पवनों की दिशा को निर्धारित करने में जेट प्रवाह प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं।
  6. मानसून अरबी भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ ‘मौसम’ है। मानसूनी जलवायु में मौसम के अनुसार पवनों की दिशा में परिवर्तन आ जाता है-गर्मी में समुद्र से स्थल की ओर सर्दी में स्थल से समुद्र की ओर। मानसून में विराम का अर्थ है वह शुष्क समय जिसमें वर्षा नहीं होती।
  7. विभिन्न अक्षाशों में स्थित होने एवं उच्चावच लक्षणों के कारण भारत की मौसम संबंधी परिस्थितियों में बहुत अधिक भिन्नताएँ पाई जाती हैं। किन्तु ये भिन्नताएँ मानसून के कारण कम हो जाती हैं क्योंकि मानसून पूरे भारत में बहती हैं। सम्पूर्ण भारतीय भूदृश्य, इसके जीव तथा (UPBoardSolutions.com) वनस्पति, इसका कृषि-चक्र, मानव-जीवन तथा उनके त्योहार-उत्सव, सभी इस मानसूनी लय के चारों ओर घूम रहे हैं।

मानसून के आगमन का पूरे देश में भरपूर स्वागत होता है। भारत में मानसून के आगमन का स्वागत करने के लिए विभिन्न त्योहार मनाए जाते हैं। मानसून झुलसाती गर्मी से राहत प्रदान करती है। मानसून वर्षा कृषि क्रियाकलापों के लिए पानी उपलब्ध कराती है। वायु प्रवाह में ऋतुओं के अनुसार परिवर्तन एवं इससे जुड़ी मौसम संबंधी परिस्थितियाँ ऋतुओं का एक लयबद्ध चक्र उपलब्ध कराती हैं जो पूरे देश को एकता के सूत्र में बाँधती है। ये मानसूनी पवनें हमें जल प्रदान कर कृषि की प्रक्रिया में तेजी लाती हैं एवं सम्पूर्ण देश को एकसूत्र (UPBoardSolutions.com) में बाँधती हैं। नदी घाटियाँ जो इन जलों को संवहन करती हैं, उन्हें भी एक नदी घाटी इकाई का नाम दिया जाता है। भारत के लोगों का सम्पूर्ण जीवन मानसून के इर्द-गिर्द घूमता है। इसलिए मानसून को एक सूत्र में बाँधने वाला समझा जाता है।

UP Board Solutions

प्रश्न 3.
उत्तर-भारत में पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा की मात्रा क्यों घटती जाती है?
उत्तर:
हवाओं में निरंतर कम होती आर्द्रता के कारण उत्तर भारत में पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा की मात्रा कम होती जाती है। बंगाल की खाड़ी से उठने वाली आर्द्र पवनें जैसे-जैसे आगे और आगे बढ़ती हुई देश के आंतरिक भागों में जाती हैं, वे अपने साथ लायी गयी अधिकतर आर्द्रता खोने लगती हैं। इसी के परिणामस्वरूप पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा धीरे-धीरे घटने लगती है। राजस्थान एवं गुजरात के कुछ भागों में बहुत कम वर्षा होती है। कोलकाता से दिल्ली की ओर बढ़ने पर वर्षा धीरे-धीरे घटती जाती है। उदाहरण के लिए, (UPBoardSolutions.com) कोलकाता में जहाँ 162 सेमी वर्षा होती है वहीं वाराणसी में 107 सेमी तथा दिल्ली में 56 सेमी वर्षा होती है। मानसून शाखा का दबाव और उसकी आर्द्रता पश्चिम की ओर क्रमशः घटती जाती है। यही कारण है कि मानसून की इस शाखा के दिल्ली तक पहुँचते-पहुँचाते वर्षा करने की क्षमता घटती जाती है।

प्रश्न 4.
कारण बताएँ-

  1. भारतीय उपमहाद्वीप में वायु की दिशा में मौसमी परिवर्तन क्यों होता है?
  2. भारत में अधिकतर वर्षा कुछ ही महीनों में होती है।
  3. तमिलनाडु तट पर शीत ऋतु में वर्षा होती है।
  4. पूर्वी तट के डेल्टा वाले क्षेत्र में प्रायः चक्रवात आते हैं।
  5. राजस्थान, गुजरात के कुछ भाग तथा पश्चिमी घाट का वृष्टि छाया क्षेत्र सूखा प्रभावित क्षेत्र है।

उत्तर:
(1) भारतीय उपमहाद्वीप में वायु की दिशा में मौसमी परिवर्तन-भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून पवनों की दिशा में मौसमी परिवर्तन का मूल कारण स्थल एवं जल पर विपरीत वायुदाब क्षेत्रों को विकसित होना है। यह वायु के तापमान के कारण होता है। स्पष्ट है कि स्थल एवं जल असमान रूप से गर्म होते हैं। ग्रीष्म ऋतु में समुद्र की अपेक्षा स्थल भाग अधिक गर्म हो जाता है। परिणामस्वरूप स्थल भाग के आंतरिक क्षेत्रों में निम्न वायुदाब क्षेत्र विकसित हो जाता है। जबकि समुद्री क्षेत्रों में उच्च वायुदाब का क्षेत्र होता है। अतः समुद्री पवनें समुद्र से स्थल की ओर गतिशील होती हैं। शीत ऋतु में स्थिति इसके विपरीत होती है अर्थात् पवन स्थल से समुद्र की ओर गतिशील होती है।

(2) भारत में अधिकतर वर्षा कुछ ही महीनों में होती है भारत के अधिकांश भागों में जून से सितम्बर के मध्य वर्षा होती है। भारत में मई माह में भारत के उत्तरी भाग में गर्मी बहुत पड़ती है। फलस्वरूप यहाँ की वायु हल्की होकर ऊपर उठ जाती है जिससे यहाँ वायुदाब कम हो जाता है। जबकि हिंद महासागर पर वायुदाब अधिक होता है। पवन प्रवाह का यह सर्वमान्य नियम है कि वह उच्च वायुदाब से निम्न (UPBoardSolutions.com) वायुदाब की ओर संचरित होती है। ऐसे में पवनें हिंद महासागर से भारत के उत्तरी भाग की ओर चलने लगती हैं। जलवाष्प से परिपूर्ण ये पवनें अपनी सम्पूर्ण आर्द्रता भारत में ही समाप्त कर देती हैं। ये पवनें जून से सितंबर तक भारत में सक्रिय रहती हैं। यही कारण है कि भारत में अधिकांश वर्षा जून से सितंबर माह की अवधि में होती है। भारत में मानसून की अवधि 100 से 120 दिन तक होती है।

(3) तमिलनाडु तट पर शीत ऋतु में वर्षा-पीछे हटते मानसून की ऋतु सितंबर से आरंभ हो जाती है। अब पवनें धरातल से समुद्र की ओर बहने लगती हैं। इसलिए ये शुष्क होती हैं और स्थल भाग पर वर्षा नहीं करतीं। जिस समय ये पवनें बंगाल की खाड़ी पर पहुँचती हैं तो वहाँ से ये आर्द्रता ग्रहण कर लेती हैं। अब ये उत्तरी-पूर्वी पवनों के प्रभाव में आकर इनकी दिशा भी उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर हो जाती है। और ये पवनें उत्तरी-पूर्वी मानसून के रूप में तमिलनाडु तट पर पहुँचती हैं। आर्द्रता ग्रहण की हुई ये पवनें तमिलनाडु तट पर शीत ऋतु में वर्षा करती हैं। अक्टूबर-नवंबर में पीछे हटते मानसून और बंगाल की खाड़ी पर उत्पन्न होने वाले उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों के मिले-जुले प्रभाव से पूर्वी तट पर भारी वर्षा होती है। तमिलनाडु तट पर अक्टूबर-नवंबर में भारी वर्षा होती है।

(4) पूर्वी तट के डेल्टा में चक्रवात-बंगाल की खाड़ी में प्रायः निम्न वायुदाब का क्षेत्र बनता रहता है जबकि इस समय पूर्वी तट पर स्थित कृष्णा, कावेरी तथा गोदावरी के डेल्टा प्रदेश में अपेक्षाकृत वायुदाब का उच्च क्षेत्र होता है। पूर्वी तट के डेल्टा वाले क्षेत्र में प्रायः चक्रवात आते हैं। ऐसा इस कारण होता है क्योंकि अंडमान सागर पर पैदा होने वाला चक्रवातीय दबाव मानसून एवं अक्टूबर-नवंबर के दौरान उपोष्ण कटिबंधीय जेट धाराओं द्वारा देश के आंतरिक भागों की ओर स्थानांतरित कर दिया जाता है। ये चक्रवात विस्तृत क्षेत्र में भारी वर्षा (UPBoardSolutions.com) करते हैं। ये उष्ण कटिबंधीय चक्रवात प्रायः विनाशकारी होते हैं। गोदावरी, कृष्णा एवं कावेरी नदियों के डेल्टा प्रदेशों में अक्सर चक्रवात आते हैं, जिसके कारण बड़े पैमाने पर जान एवं माल की क्षति होती है। कभी-कभी ये चक्रवात ओडिशा, पश्चिम बंगाल एवं बांग्लादेश के तटीय क्षेत्रों में भी पहुँच जाते हैं। कोरोमंडल तट पर अधिकतर वर्षा इन्हीं चक्रवातों तथा अवदाबों से होती है।

(5) राजस्थान, गुजरात के कुछ भाग तथा पश्चिमी घाट की वृष्टि छाया क्षेत्र सूखा प्रभावित क्षेत्र है—राजस्थान तथा गुजरात के कुछ क्षेत्र अरबसागरीय मानसून शाखा द्वारा प्रभावित होते हैं–इस शाखा के बीच कोई प्राकृतिक अवरोधक नहीं है जो मानसून पवनों को रोककर राजस्थान तथा गुजरात के कुछ क्षेत्र में वर्षा करा सके। अरावली पर्वतमाला इस मानसून शाखा के समानांतर स्थित होने के कारण यह वर्षा कराने में असमर्थ रहती है। मरुभूमि होने के कारण यहाँ वाष्पीकरण अधिक होता है, संघनन नहीं होता। वनस्पतिविहीन होने के कारण वायुमंडलीय आर्द्रता यहाँ आकर्षित नहीं होती।
पश्चिमी घाट के वृष्टि छाया क्षेत्र सूखा से प्रवाहित होने के कारण-

  1. यह क्षेत्र पश्चिमी घाट के पूर्व में स्थित है।
  2. पश्चिमी घाट के वृष्टि छाया क्षेत्र में स्थित होने के कारण यहाँ वर्षा नहीं होती।
  3. इससे यहाँ प्रायः सूखा पड़ने की संभावना रहती है।

प्रश्न 5.
भारत की जलवायु अवस्थाओं की क्षेत्रीय विभिन्नताओं को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
भारत की उत्तर दिशा में हिमालय पर्वत के निर्णायक प्रभाव तथा दक्षिण में महासागर होने के बावजूद भी तापमान आर्द्रता एवं वर्षा में विविधता विद्यमान है।
जलवायु में इस विभिन्नता के निम्नलिखित कारण हैं-

  1. उदाहरण के लिए, गर्मियों में राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में, उत्तर-पश्चिमी भारत में तापमान 60 डिग्री सेल्सियस होता है जबकि उसी समय देश के उत्तर में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में तापमान 20 डिग्री सेल्सियस हो सकता है।
    सर्दियों की किसी रात में जम्मू-कश्मीर के द्रास में तापमान -45 डिग्री सेल्सियस तक हो सकता है, जबकि तिरुवनंतपुरम् में यह 22 डिग्री सेल्सियस हो सकता है।
  2. अण्डमान व निकोबार एवं केरल में दिन व रात के तापमान में बहुत कम भिन्नता होती है।
  3. एक अन्य विभिन्नता वर्षण में है। जबकि हिमालय के ऊपरी भागों में वर्षण अधिकतर हिम के रूप में होता है, देश के शेष भागों में वर्षा होती है। (UPBoardSolutions.com) मेघालय में 400 सेमी से लेकर लद्दाख एवं पश्चिमी राजस्थान में वार्षिक वर्षण 10 सेमी से भी कम होती है।
  4. देश के अधिकतर भागों में जून से सितंबर तक वर्षा होती है, लेकिन कुछ क्षेत्रों जैसे तमिलनाडु तट पर अधिकतर वर्षा अक्टूबर एवं नवम्बर में होती है।
  5. उत्तरी मैदान में वर्षा की मात्रा सामान्यतः पूर्व से पश्चिम की ओर घटती जाती है।

UP Board Solutions

प्रश्न 6.
मानसूनी अभिक्रिया की व्याख्या करें।
उत्तर:
किसी भी क्षेत्र का वायुदाब एवं उसकी पवनें उस क्षेत्र की अक्षांशीय स्थिति एवं ऊँचाई पर निर्भर करती हैं। भारत की जलवायु में ऋतुओं के अनुसार पवनों की दिशा उलट जाती है। मानसून के रचनातंत्र में भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी पर्वत सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे मानसून पवनों के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं। इसी प्रकार की भूमिका पश्चिमी घाट भी निभाते हैं।

भारत में जलवायु तथा संबंधित मौसमी अवस्थाएँ निम्नलिखित वायुमंडलीय अवस्थाओं से संचालित होती हैं-
(1) पश्चिमी चक्रवाती विक्षोभ – हिमालय पर्वत के दक्षिण में प्रवाहित होने वाली उपोष्ण कटिबन्धीय पश्चिमी जेट धाराएँ जाड़े के महीने में देश के उत्तर एवं उत्तर पश्चिमी भागों में उत्पन्न होने वाले पश्चिमी चक्रवाती विक्षोभों के लिए उत्तरदायी हैं।

(2) वायुदाब एवं धरातलीय पवनें – वायु का संचार उच्च वायुदाब से निम्न वायुदाब की ओर होता है। शीत ऋतु में हिमालय के उत्तर में उच्च वायुदाब क्षेत्र होता है। ठण्डी शुष्क हवाएँ इस क्षेत्र से दक्षिण में सागर के ऊपर कम वायुदाब क्षेत्र की ओर बहती हैं। ग्रीष्म ऋतु के दौरान मध्य एशिया के साथ उत्तर-पश्चिमी भारत के ऊपर कम वायुदाब क्षेत्र विकसित हो जाता है। परिणामस्वरूप, कम वायुदाब प्रणाली दक्षिण गोलार्द्ध की दक्षिणपूर्वी व्यापारिक पवनों को आकर्षित करती है। ये व्यापारिक पवने विषुवत रेखा को पार करने के उपरांत कोरिआलिस बल के कारण दाहिनी ओर मुड़ते हुए भारतीय उपमहाद्वीप पर स्थित निम्न दाब की ओर बहने लगती हैं।

विषुवत् रेखा को पार करने के बाद ये पवनें दक्षिण-पश्चिमी दिशा में बहने लगती हैं और भारतीय प्रायद्वीप में दक्षिण-पश्चिमी मानसून के रूप में प्रवेश करती हैं। इन्हें दक्षिण पश्चिमी मानसून के नाम से जाना जाता है। ये पवनें गर्म महासागरों के ऊपर से बहते हुए आर्द्रता ग्रहण करती हैं और भारत (UPBoardSolutions.com) की मुख्यभूमि पर विस्तृत वर्षण लाती हैं। इस प्रदेश में, ऊपरी वायु परिसंचरण पश्चिमी प्रवाह के प्रभाव में रहता है। भारत में होने वाली वर्षा मुख्यतः दक्षिण-पश्चिमी मानसून पवनों के कारण होती है। मानसून की अवधि 100 से 120 दिनों के बीच होती है। इसलिए देश में होने वाली अधिकतर वर्षा कुछ ही महीनों में केंद्रित है।

(3) जेट वायु धाराएँ – जेट वायु धाराएँ क्षोभमण्डल में अत्यधिक ऊँचाई पर एक संकरी पट्टी में स्थित होती हैं। इन हवाओं की गति ग्रीष्म ऋतु में 110 किमी प्रति घण्टा एवं सर्दी में 184 किमी प्रति घण्टा के बीच विचलन करती रहती है। हिमालय पर्वत के उत्तर की ओर पश्चिमी जेट धाराएँ एवं ग्रीष्म ऋतु की अवधि में भारतीय प्रायद्वीप में बहने वाली पश्चिम जेट धाराओं की उपस्थिति मानसून को प्रभावित करती हैं। जब उष्णकटिबंधीय पूर्वी दक्षिण प्रशांत महासागर में उच्च वायुदाब होता है तो उष्णकटिबंधीय पूर्वी हिन्द महासागर में निम्न वायुदाब होता है।

किन्तु कुछ निश्चित वर्षों में वायुदाब परिस्थितियाँ विपरीत हो जाती हैं और पूर्वी प्रशांत महासागर में पूर्वी हिन्द महासागर की अपेक्षाकृत निम्न वायुदाब होता है। दाब की अवस्था में इस नियतकालिक परिवर्तन को दक्षिणी दोलन के नाम से जाना जाता है। एलनीनो, दक्षिणी दोलन से जुड़ा हुआ एक लक्षण है। यह एक गर्म समुद्री जलधारा है, जो पेरू की ठंडी धारा के स्थान पर प्रत्येक 2 या 5 वर्ष के अंतराल में पेरू तट से होकर बहती है। दाब की अवस्था में परिवर्तन का संबंध एलनीनो से है। हवाओं में निरंतर कम होती आर्द्रता के कारण उत्तर भारत में पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा की मात्रा कम होती जाती है।
बंगाल की खाड़ी शाखा से उठने वाली आर्द्र पवनें (UPBoardSolutions.com) जैसे-जैसे आगे, और आगे बढ़ती हुई देश के आंतरिक भागों में जाती हैं, वे अपने साथ लाई गई अधिकतर आर्द्रता खोने लगती हैं। परिणामस्वरूप पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा धीरे-धीरे घटने लगती है। राजस्थान एवं गुजरात के कुछ भागों में बहुत कम वर्षा होती है।

प्रश्न 7.
शीत ऋतु की अवस्था एवं उसकी विशेषताएँ बताएँ।।
उत्तर:
उत्तरी भारत में शीत ऋतु मध्य नवम्बर से शुरू होकर फरवरी तक विद्यमान रहती है। इस मौसम में आकाश मेघरहित एवं स्वच्छ रहता है। तापमान कम रहता है और मन्द गति से हवाएँ चलती हैं। तापमान दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ने पर घटता जाता है। दिसम्बर एवं जनवरी सबसे ठंडे महीने होते हैं। उत्तर में तुषारापात सामान्य है तथा हिमालय के उपरी ढालों पर हिमपात होता है। इस ऋतु में देश में उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवनें प्रवाहित होती हैं। ये स्थल से समुद्र की ओर बहती हैं तथा इसलिए देश के अधिकतर भाग में शुष्क मौसम होता है। इन पवनों के कारण कुछ मात्रा में वर्षा तमिलनाडु के तट पर होती है, क्योंकि वहाँ ये पवनें समुद्र से स्थल की ओर बहती हैं जिससे ये अपने साथ आर्द्रता लाती हैं।

देश के उत्तरी भाग में, एक कमजोर उच्च दाब का क्षेत्र बन जाता है, जिसमें हलकी पवनें इस क्षेत्र से बाहर की ओर प्रवाहित होती हैं। उच्चावच से प्रभावित होकर ये पवन पश्चिम एवं उत्तर-पश्चिम से गंगा घाटी में बहती है। शीत ऋतु में उत्तरी मैदानों में पश्चिम एवं उत्तर-पश्चिम से चक्रवाती विक्षोभ का अंतर्वाह विशेष लक्षण है। यह कम दाब वाली प्रणाली भूमध्यसागर एवं पश्चिमी एशिया के ऊपर उत्पन्न होती है (UPBoardSolutions.com) तथा पश्चिमी पवनों के साथ भारत में प्रवेश करती है। इसके कारण शीतकाल में मैदानों में वर्षा होती है तथा पर्वतों पर हिमपात, जिसकी उस समय बहुत अधिक आवश्यकता होती है। यद्यपि शीतकाल में वर्षा की कुल मात्रा कम होती है, लेकिन ये रबी फसलों के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण होती है।

प्रश्न 8.
भारत में होने वाली मानसूनी वर्षा एवं उसकी विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
भारत में वार्षिक वर्षा की औसत मात्रा 118 सेंटीमीटर के लगभग है। यह समस्त वर्षा मानसूनी पवनों द्वारा प्राप्त होती है।
इस मानसूनी वर्षा की विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

  1. भारत में मानसून की अवधि जून से शुरू होकर सितम्बर के मध्य तक होती है। इसकी औसत अवधि 100 से 120 दिन तक होती है। मानसून के आगमन के साथ ही सामान्य वर्षा में अचानक वृद्धि हो जाती है। यह वर्षा लगातार कई दिनों तक होती रहती है। आर्द्रतायुक्त पवनों के जोरदार गरज व चमक के साथ अचानक आगमन को ‘मानसून प्रस्फोट’ के नाम से जाना जाता है।
  2. मानसून में आई एवं शुष्क अवधियाँ होती हैं जिन्हें वर्षण में विराम कहा जाता है।
  3. वार्षिक वर्षा में प्रतिवर्ष अत्यधिक भिन्नता होती है।
  4. यह कुछ पवनविमुखी ढलानों एवं मरुस्थल को छोड़कर भारत के शेष क्षेत्रों को पानी उपलब्ध कराती है।
  5. वर्षा का वितरण भारतीय भूदृश्य में अत्यधिक असमान है। मौसम के प्रारंभ में पश्चिमी घाटों की पवनमुखी ढालों पर भारी वर्षा होती है अर्थात् 250 सेमी से अधिक। दक्कन के पठार के वृष्टि छाया क्षेत्रों एवं मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, तथा लेह में बहुत कम वर्षा होती हैं। सर्वाधिक वर्षा देश के उत्तरपूर्वी क्षेत्रों में होती है।
  6. उष्णकटिबंधीय दबाव की आवृत्ति एवं प्रबलता मानसून वर्षण की मात्रा एवं अवधि को निर्धारित करते हैं।
  7. भारत के उत्तर पश्चिमी राज्यों से मानसून सितम्बर के प्रारंभ में वापसी शुरू कर देती है। अक्टूबर के मध्य तक यह देश के उत्तरी हिस्से से पूरी तरह लौट जाती है और दिसम्बर तक शेष भारत से भी मानसून लौट जाता है।
  8. मानसून को इसकी अनिश्चितता के कारण भी जाना जाता है। जहाँ एक ओर यह देश के कुछ हिस्सों में बाढ़ ला देता है, वहीं दूसरी ओर यह देश के कुछ हिस्सों में सूखे का कारण बन जाता है।

भारत में मानसूनी वर्षा के प्रभाव को निम्न रूप में देखा जा सकता है-

  1. मानसून भारत को एक विशिष्ट जलवायु पैटर्न उपलब्ध कराती है। इसलिए विशाल क्षेत्रीय भिन्नताओं की उपस्थिति के बावजूद मानसून देश और इसके लोगों को एकता के सूत्र में पिरोने वाला प्रभाव डालती है।
  2. भारतीय कृषि मुख्य रूप से मानसून से प्राप्त पानी पर निर्भर है। देरी से, कम या अधिक मात्रा में वर्षा का फसलों पर नकारात्मक प्रभाव डालती है।
  3. वर्षा के असमान वितरण के कारण देश में कुछ सूखा संभावित क्षेत्र हैं जबकि कुछ बाढ़ से ग्रस्त रहते हैं।

मानचित्र कौशल

प्रश्न 1.
भारत के रेखा मानचित्र पर निम्नलिखित को दर्शाएँ-

  1. 400 सेमी से अधिक वर्षा वाले क्षेत्र
  2. 20 सेमी से कम वर्षा वाले क्षेत्र।।
  3. भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून की दिशा

उत्तर:
UP Board Solutions for Class 9 Social Science Geography Chapter 4 जलवायु

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पीछे हटते हुए मानसून की ऋतु की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  1. पीछे मानसून का निम्न वायुदाब का गर्त कमजोर पड़ जाता है तथा इसका स्थान उच्च वायुदाब ले लेता है।
  2. इस ऋतु में पृष्ठीय पवनों की दिशा उलटनी शुरू हो जाती है। अक्टूबर तक मानसूनी पवनें पीछे हटने लगती

UP Board Solutions

प्रश्न 2.
‘आगे बढ़ते हुए मानसून की ऋतु’ की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  1. आगे बढ़ते हुए मानसून की ऋतु में भारत भर में वर्षा होती है।
  2. मानसून की प्रभावी ऋतु में दक्षिण से उत्तर की ओर तथा पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा की मात्रा घटती जाती

प्रश्न 3.
भारत में सर्वाधिक वर्षा कब और कहाँ होती है?
उत्तर:
भारत में सर्वाधिक वर्षा मेघालय के मॉसिनराम में होती है। यह भारत ही नहीं बल्कि विश्व का सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान है। यह स्थान गारो, खासीं और जैयन्तिया नामक तीन पहाड़ियों से घिरा हुआ है जिसके कारण बंगाल की खाड़ी से चलने वाली मानसूनी पवनें तीनों पहाड़ियों से टकराकर भारी वर्षा करती हैं।

प्रश्न 4.
‘काल वैशाखी’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
मई माह में कभी-कभी तेज हवाओं के साथ गरज व चमक के साथ भारी वर्षा होती है। इसके साथ ही प्रायः हिम वृष्टि भी होती है। वैशाख का महीना होने के कारण पश्चिम बंगाल में इसे ‘काल वैशाखी’ कहते हैं।

प्रश्न 5.
‘क्वार की उमस’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मानसून की वापसी होने से आसमान निर्मल होता है और तापमान में वृद्धि होती है। दिन का तापमान उच्च होता. है जबकि रातें ठण्डी एवं सुहानी होती हैं। स्थल अभी भी (UPBoardSolutions.com) आई होता है। दिन में उच्च तापमान व आर्द्रता वाली अवस्था के कारण दिन का मौसम कष्टकारी होता है। इसे सामान्यतः ‘क्वार की उमस के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 6.
महावट किसे कहते हैं?
उत्तर:
शीत ऋतु में उत्तरी मैदानों में पश्चिम एवं उत्तर-पश्चिम से चक्रवाती विक्षोभ का अंतर्वाह विशेष लक्षण है। यह कम दाब वाली प्रणाली भूमध्य सागर एवं पश्चिमी एशिया के ऊपर उत्पन्न होती है तथा पश्चिमी पवनों के साथ भारत में प्रवेश करती है। इसके कारण शीतकाल में मैदानों में वर्षा होती है तथा पर्वतों पर हिमपात जिसकी उस समय बहुत अधिक आवश्यकता होती है। यद्यपि शीतकाल में वर्षा को स्थानीय तौर पर महावट कहा जाता है।

प्रश्न 7.
दक्षिणी पश्चिम मानसून पवनें किसे कहा जाता है?
उत्तर:
गर्मी के दिनों में वायु की दिशा पूरी तरह से परिवर्तित हो जाती है। वायु दक्षिण में स्थित हिंद महासागर के उच्च दाब वाले क्षेत्र से दक्षिण पूर्वी दिशा में बहते हुए विषुवत् वृत्त को पार कर दाहिनी ओर मुड़ते हुए भारतीय उपमहाद्वीप पर स्थित निम्न दाब की ओर बहने लगती है। इन्हें दक्षिण-पश्चिम मानसून पवनों के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 8.
एलनीनो किसे कहते हैं?
उत्तर:
ठंडी पेरू जलधारा के स्थान पर अस्थायी तौर पर गर्म जलधारा के विकास को एलनीनो का नाम दिया गया है। एलनीनो स्पैनिश शब्द है, जिसका अर्थ होता है बच्चा तथा जो (UPBoardSolutions.com) कि बेबी क्राइस्ट को व्यक्त करता है क्योंकि यह धारा क्रिसमस के समय बहना शुरू करती है। एलनीनो की उपस्थिति समुद्र की सतह के तापमाम को बढ़ा देती है तथा उस क्षेत्र में व्यापारिक पवनों को शिथिल कर देती है।

UP Board Solutions

प्रश्न 9.
कोरिआलिस बल किसे कहते हैं?
उत्तर:
पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने के कारण उत्पन्न आभासी बल को कोरिआलिस बल कहते हैं। कोरिआलिस बल के कारण पवन उत्तरी गोलार्द्ध में दाहिनी ओर और दक्षिणी गोलार्द्ध में बायीं ओर मुड़ जाती है। हवाओं के इस प्रकार मुड़ने को ‘फेरेल का नियम’ कहते हैं।

प्रश्न 10.
पश्चिमी विक्षोभ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान एवं नेपाल में भूमध्य सागर से उत्पन्न होने वाले अतिरिक्त उष्णकटिबंधीय तूफानों को पश्चिमी विक्षोभ कहा जाता है जो सर्दियों के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भागों में अचानक वर्षा एवं हिमपात का कारण बनते हैं।

प्रश्न 11.
अन्तः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र किसे कहते हैं?
उत्तर:
ये विषुवतीय अक्षांशों में विस्तृत गर्त एवं निम्न दाब का क्षेत्र होता है। यहीं पर उत्तर-पूर्वी एवं दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें आपस में मिलती हैं। यह अभिसरण क्षेत्र विषुवत् वृत्त के लगभग समानांतर होता है, लेकिन सूर्य की आभासी गति के साथसाथ यह उत्तर या दक्षिण की ओर खिसकता है।

प्रश्न 12.
भारत में शीत ऋतु की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  1. भारत में शीत ऋतु-नवम्बर, दिसम्बर, जनवरी तथा फरवरी महीने में होती है।
  2. यह ऋतु अत्यन्त सुहानी एवं आनन्दप्रद होती है। दिन के समय शीतल मंद समीर चलती है, लेकिन जाड़े की रातें शीतलहर के दौरान कष्टदायक होती हैं।
  3. पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फवारी होने से वहाँ पर पेयजल तक की समस्या हो जाती है। पीने के लिए भी पानी गर्म करना पड़ता है।

प्रश्न 13.
दक्षिण-पश्चिम मानसून की उत्पत्ति के कारण बताइए।
उत्तर:
इस मानसून की उत्पत्ति देश के उत्तर-पश्चिमी मैदानी भाग में कम वायुदाब उत्पन्न हो जाने के कारण होती है। जून के प्रारंभ तक निम्न वायुदाब का यह क्षेत्र इतना प्रबल हो जाता है कि दक्षिणी गोलार्द्ध की व्यापारिक पवनें भी इस ओर खिंच आती हैं। इन दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक वनों की उत्पत्ति समुद्र से होती है। हिन्द महासागर में विषुवत रेखा को पार करके ये पवनें बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर में आ जाती हैं। (UPBoardSolutions.com) इनकी दिशा दक्षिण-पश्चिम हो जाती है तथा विषुवतीय गर्म धाराओं के ऊपर से गुजरने के कारण ये भारी मात्रा में आर्द्रता ग्रहण कर लेती हैं। इसके बाद ये भारत के वायुसंचरण का अंग बन जाती हैं। दक्षिण-पश्चिम दिशा के कारण इन्हें दक्षिण-पश्चिम मानसून कहा जाता है।

प्रश्न 14.
शीत ऋतु में उत्तरी भारत में होने वाली वर्षा का क्या कारण है? इस वर्षा का महत्त्व भी बताइए।
उत्तर:
शीत ऋतु में उत्तरी भारत में पश्चिमी विक्षोभों द्वारा वर्षा होती है। इनकी उत्पत्ति भूमध्य सागर से होती है। ये विक्षोभ मार्ग में फारस की खाड़ी तथा केस्पियन सागर से कुछ आर्द्रता ग्रहण कर लेते हैं और उत्तरी भारत में पहुँचकर हल्की वर्षा करते हैं।
उत्तरी भारत में होने वाली शीतकालीन वर्षा रबी की फसल, विशेष रूप से गेहूँ के लिए अत्यन्त लाभप्रद होती है।

UP Board Solutions

प्रश्न 15.
यदि अरब सागर, बंगाल की खाड़ी तथा हिमालय पर्वत न होते तो भारत की जलवायु पर क्या प्रभाव पडता?
उत्तर:

  1. यदि हिमालय पर्वत न होता तो भारत मानसूनी वर्षा से वंचित रह जाता क्योंकि मानसूनी हवाएँ हिमालय से टकरा कर वर्षा करने के बजाय उससे आगे निकल जातीं तथा वर्षा कहीं और होती। हिमालय न होता तो उत्तर में चीन से आने वाली भयानक बर्फीली हवाएँ उत्तर-भारत को जमा देतीं।
  2. यदि अरब सागर न होता तो पश्चिमी घाट के पश्चिमी भाग पर अधिक वर्षा न होती। इसके अतिरिक्त पश्चिमी तटीय भागों के तापमान में विषमता आ जाती।
  3. यदि बंगाल की खाड़ी न होती तो देश के पूर्वी तट (तमिलनाडु) पर शीत ऋतु में वर्षा न होती। इसके अलावा यहाँ के तापमान में भी विषमता आ जाती।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मानसून के आगमन की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
मानसून के आगमन की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

  1. मानसून की शुरुआत जून माह में होती है। जून के प्रारंभ में उत्तरी मैदानों में निम्न दाब की अवस्था तीव्र हो जाती है। यह दक्षिणी गोलार्द्ध की व्यापारिक हवाओं को आकर्षित करता है। ये अपने साथ इस महाद्वीप में बहुत अधिक मात्रा में नमी लाती है।
  2. मानसून से संबंधित एक अन्य परिघटना है, ‘वर्षा में विराम’। वर्षा में विराम का अर्थ है कि मानसूनी वर्षा एक समय में कुछ दिनों तक ही होती हैं। मानसून में आने वाले ये विराम मानसूनी गर्त की गति से संबंधित होते हैं।
  3. मानसून को इसकी अनिश्चितता के कारण जाना जाता है। जब यह एक हिस्से में बाढ़ का कारण बनता है, उसी समय यह किसी दूसरे भाग में अकाल का कारण बन सकता है।
  4. मौसम के प्रारंभ में पश्चिम घाट के पवनमुखी भागों में भारी वर्षा लगभग 250 सेमी से अधिक होती है। दक्कन का पठार एवं मध्य प्रदेश के कुछ भागों में भी वर्षा होती है, यद्यपि ये क्षेत्र वृष्टि छाया क्षेत्र में आते हैं।
  5. इस मौसम की अधिकतर वर्षा खासी पहाड़ी के दक्षिणी श्रृंखलाओं में स्थित मॉसिनराम विश्व में सबसे अधिक औसत वर्षा प्राप्त करता है।

प्रश्न 2.
ग्रीष्म ऋतु की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
ग्रीष्म ऋतु मार्च से जून तक रहती है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

  1. ग्रीष्म ऋतु में धूलभरी गर्म और शुष्क हवाएँ चलती हैं जिन्हें ‘लू’ कहते हैं। ये हवायें दिन के समय उत्तर एवं उत्तर पश्चिम भारत में गतिशील रहती हैं। ये देर शाम तक गतिशील रहती हैं। इस हवा का मानव स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव होता है।
  2. उत्तर भारत में मई के महीने में धूलभरी आँधियाँ चलती हैं। ये धूलभरी आंधियाँ तापमान घटाकर लोगों को राहत पहुँचाती हैं। आँधियों के बाद ठण्डी हवा चलती है और कभी-कभी हल्की वर्षा भी होती है।
  3. ग्रीष्म ऋतु के दौरान कभी-कभी तेज हवाओं के साथ गरजवाली मूसलधारे वर्षा भी होती है। कभी-कभी वर्षा के साथ ओला वृष्टि भी होती है।

प्रश्न 3.
वृष्टि छाया क्षेत्र से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
वह क्षेत्र जो किसी पर्वत की पवनविमुख ढाल पर पड़ता है वृष्टि छाया क्षेत्र कहलाता है। ऊँचे पर्वत ठण्डी व गर्म पवनों के लिए रुकावट का काम करते हैं किन्तु यदि ये वर्षा करने वाली पवनों को रोकने के लिए पर्याप्त ऊँचे होते तो ये वर्षा भी करा सकते थे। पर्वत की पवनविमुख ढाल शुष्क रह जाती है। उदाहरण के लिए, पश्चिमी घाट तथा पूर्वी घाट भारत के प्रमुख वृष्टि छाया क्षेत्र हैं।

प्रश्न 4.
लौटती हुई मानसून के समय मौसमी विशेषताओं को प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
लौटती हुई मानसून के समय मौसम की दशाएँ इस प्रकार होती हैं-

  1. अक्टूबर-नवम्बर को मध्यकाल लौटती हुई मानसून का समय होता है। यह वर्षा ऋतु के गर्म मौसम से सर्दी के शुष्क मौसम में परिवर्तित होने का समय है।
  2. भारत के पूर्वी तट के डेल्टाई क्षेत्र में चक्रवात सामान्यतः आते रहते हैं। गोदावरी, कृष्णा एवं कावेरी नदियों में सघन आबादी वाले डेल्टा प्रदेशों में अक्सर चक्रवात आते हैं, जिसके कारण बड़े पैमाने पर जान एवं माल की क्षति होती है।
  3. कभी-कभी ये चक्रवात ओडिशा, पश्चिम बंगाल एवं बांग्लादेश के तटीय क्षेत्रों में भी पहुँच जाते हैं। कोरोमंडल तट पर अधिकतर वर्षा इन्हीं चक्रवातों तथा अवदाबों से होती हैं।
  4. दिन में आर्द्रता अधिक व तापमान उच्च होता है जबकि रातें ठण्डी, और सुहानी होती हैं। इसे सामान्यतः ‘क्वार की उमस’ के नाम से जाना जाता है।
  5. अक्टूबर के उत्तरार्द्ध में, विशेषकर उत्तरी भारत में तापमान तेजी से गिरने लगता है। नवम्बर के प्रारंभ में, उत्तर पश्चिम भारत के ऊपर निम्न दाब वाली अवस्था बंगाल की खाड़ी पर स्थानांतरित हो जाती है। यह स्थानांतरण चक्रवाती निम्न दाब से संबंधित होता है, जो कि अंडमान सागर के ऊपर उत्पन्न होता है।

UP Board Solutions

प्रश्न 5.
दक्षिणी दोलन को स्पष्ट कीजिए तथा इसकी विशेषताएँ भी बताइए।
उत्तर:
जब उष्णकटिबंधीय पूर्वी-दक्षिणी प्रशान्त महासागर में उच्च वायुदाब होता है तो उष्णकटिबंधीय पूर्वी हिन्द महासागर में निम्न वायुदाब होता है। लेकिन कुछ निश्चित वर्षों में वायुदाब परिस्थितियाँ विपरीत हो जाती हैं तथा पूर्वी प्रशान्त महासागर में हिन्द महासागर की अपेक्षा निम्न वायुदाब होता है। वायुदाब की इस अवस्था में इस नियतकालिक परिवर्तन को दक्षिणी दोलन कहते हैं।

एलनीनो दक्षिणी दोलन से जुड़ी हुई एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। यह एक गर्म समुद्री जलधारा है जो पेरू की ठण्डी धारा के स्थान पर प्रत्येक 2 से 5 वर्ष के अंतराल में पेरू तट (UPBoardSolutions.com) से होकर प्रवाहित होती है। वायुदाब की इस अवस्था में परिवर्तन का सम्बन्ध ‘एलनीनो’ से है। एलनीनो का विपरीत प्रभाव भारत के मानसून पर पड़ता है। एलनीनो के प्रभाव से भारत में वर्षा देर से या फिर कम होती है।

प्रश्न 6.
‘मानसून’ शब्द का अर्थ तथा मानसूनी वर्षा की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
‘मानसून’ शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के शब्द ‘मौसम’ से हुई है। मौसम का शाब्दिक अर्थ ऋतु है। इस प्रकार मानसून का अर्थ ऐसी ऋतु से है, जिसमें पवनों की दिशा पूरी तरह से उलट जाती है। मौसम वैज्ञानिकों के द्वारा मानसून की परिभाषा इस प्रकार की गई है-“शुष्क गर्म वायु को पूरी तरह हटाकर विषुवतीय समुद्री वायु का स्थल भागों तथा सागरीय क्षेत्र में तीन से लेकर पाँच किमी की ऊँचाई तक फैल जाना है।”
मानसूनी वर्षा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. देश के अधिकांश भागों में अधिक वर्षा दक्षिण-पश्चिमी मानसून में होती है। इस अवधि (जून से सितम्बर तक चार महीनों की अवधि) में 90% वर्षा होती है, शेष 10% वर्षा वर्ष के 8 महीनों में होती है।
  2. शीत ऋतु में अधिकतर वर्षा तमिलनाडु तथा आंध्र प्रदेश के तटीय प्रदेशों में होती है। इस अवधि में उत्तर-पश्चिमी भारत में वर्षा पश्चिमी विक्षोभों से होती है।
  3. समस्त देश में वर्षा की अवधि, मात्रा एवं प्रकृति अनिश्चित, अनियमित और असमान है।
  4. सामान्यतः वर्षा पूर्व से पश्चिम तथा दक्षिण से उत्तर की ओर कम होती जाती है।

प्रश्न 7.
शीत ऋतु में पश्चिमी विक्षोभ भारत की जलवायु को किस प्रकार प्रभावित करते हैं? इस सम्बन्ध में तीन तथ्य स्पष्ट करो।
उत्तर:
देश के उत्तरी भागों में तापमान तथा वायु में आर्द्रता शीत ऋतु में कम होती है। शीत ऋतु में आकाश स्वच्छ होता है तथा शीतल-मंद समीर संचरित होती है एवं दिन वर्षारहित होते हैं। इस सुहावने मौसम में कभी-कभी क्षीण चक्रवातीय अवदाबों के आ जाने के कारण मौसम में एकदम परिवर्तन हो जाते हैं। इससे उत्तरी-पश्चिमी भागों में शीत ऋतु में पश्चिमी विक्षोभों से वर्षा होती है।
इसके निम्नलिखित कारण हैं-

  1. इन पश्चिमी विक्षोभों से उत्तरी भारत में हल्की वर्षा होती है क्योंकि इनको भारत में प्रवेश करते ही हिमालय के ढालों पर चढ़कर घनीभूत होना होता है।
  2. इनसे पश्चिमी हिमालय के क्षेत्रों में भारी हिमपात होता है। वर्षा के साथ कभी ओला-वृष्टि भी होती है।
  3. इन चक्रवातीय अवदाबों को पश्चिमी विक्षोभ कहते हैं। इनकी उत्पत्ति पूर्वी भूमध्य सागर में होती है। यहाँ से ये पूर्व की ओर पछुआ हवाओं के प्रभाव में बढ़ते हैं। एशिया, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान को पार करते हुए, देश के उत्तर-पश्चिमी भागों में प्रवेश कर जाते हैं। मार्ग में कैस्पियन सागर तथा फारस की खाड़ी से भी आर्द्रता ग्रहण कर लेते हैं।
  4. पश्चिमी जेट स्ट्रीम इन पवनों को सोखकर (UPBoardSolutions.com) इनकी गति तेज कर देता है।

प्रश्न 8.
भारत की चारों ऋतुओं के नाम उनके महीनों के साथ लिखिए।
उत्तर:

  1. शीत ऋतु-दिसम्बर, जनवरी, फरवरी।
  2. ग्रीष्म ऋतु-मार्च, अप्रैल, मई।
  3. आगे बढ़ते मानसून की ऋतु-जून, जुलाई, अगस्त, सितम्बर।
  4. पीछे हटते मानसून की ऋतु -अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर।

प्रश्न 9.
त्रिवेंद्रम की जलवायु सम क्यों है? दो कारण बताइए।
उत्तर:
समुद्र तटवर्ती स्थानों और क्षेत्रों की जलवायु सम होती है। जल अपना समकारी प्रभाव स्थल पर छोड़ता है। अतः तटवर्ती क्षेत्र गर्मियों में न अधिक गर्म और न ठंड में अधिक ठंडे होते हैं। त्रिवेन्द्रम के तटवर्ती क्षेत्रों का दैनिक तथा वार्षिक तापपरिसर दोनों ही कम होते हैं। त्रिवेन्द्रम का वार्षिक तापक्रम अधिकतम 28° सेन्टीग्रेड व न्यूनतम तापमान 26° सेन्टीग्रेड रहता है। इस तरह त्रिवेन्द्रम का वार्षिक ताप परिसर 28° – 26° = 2° सेन्टीग्रेड है।

UP Board Solutions

प्रश्न 10.
दैनिक ताप परिसर का क्या अर्थ है? उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
किसी स्थान के अधिकतम व न्यूनतम दैनिक तापमान में अंतर को दैनिक ताप परिसर कहते हैं अर्थात् किसी स्थान के पिछले 24 घण्टों के अधिकतम और न्यूनतम तापमान के अंतर को दैनिक ताप परिसर कहते हैं। उदाहरण के लिए 8 अक्टूबर, 2017 ई. को दिल्ली अधिकतम तापमान 33.7° तथा न्यूनतम तापमान 19.1° था। इस प्रकार दिल्ली का दैनिक ताप परिसर 33.7° – 19.1° = 14.6° से हुआ।

प्रश्न 11.
वार्षिक ताप परिसर किसे कहते हैं? इसे एक उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
किसी स्थान पर वर्ष में पाए जाने वाले अधिकतम तापमान और न्यूनतम तापमान के अंतर को वार्षिक ताप परिसर कहते हैं अर्थात् वर्ष के औसत अधिकतम और औसत न्यूनतम वाले महीनों के तापमान के अंतर को वार्षिक तापपरिसर कहते हैं। उदाहरण के लिए दिल्ली के सबसे गर्म महीने का औसत तापमान 33.3° से. तथा सबसे ठंडे महीने का औसत तापमान 14.4° से. है। अतः यहाँ वार्षिक ताप परिसर 33.3° – 14.4° = 18.9° से. है।

प्रश्न 12.
सम जलवायु किसे कहते हैं? भारत में सम जलवायु वाले दो स्थानों के नाम बताइए।
उत्तर:
जब किसी क्षेत्र या देश के सबसे अधिक गर्म तथा सबसे अधिक ठंडे महीने के तापमान में बहुत कम अंतर होता है, तो उस क्षेत्र, स्थान या देश की जलवायु को सम जलवायु कहते हैं अर्थात् जब किसी क्षेत्र या देश में तापमान की परिस्थितियाँ वर्षभर प्रायः समान रहती हैं, तो उसकी जलवायु सम कहलाती है। उदाहरण के लिए त्रिवेंद्रम और मुंबई की जलवायु सम है।

प्रश्न 13.
विषम जलवायु से क्या अभिप्राय है? भारत में विषम जलवायु वाले दो स्थानों के नाम लिखिए।
उत्तर:
किसी देश अथवा क्षेत्र के वार्षिक तापमानों और वर्षा की मात्रा में बहुत अंतर पाया जाता है, वहाँ की जलवायु का स्वरूप विषम होता है। तापमान की विषमता चाहे दैनिक हो अथवा वार्षिक वह विषम जलवायु के निर्धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। उदाहरण के लिए, थार मरुस्थल में दिन का तापमान ग्रीष्म ऋतु में 50° से. को भी पार कर जाता है और रात के समय तापमान हिमांक बिंदु तक गिर जाता है। दिल्ली, जोधपुर, लेह आदि का वार्षिक ताप परिसर अधिक है। अतः इनकी जलवायु विषम है।

प्रश्न 14.
“हिमालय के समकारी प्रभाव के बावजूद तापमान, आर्द्रता एवं वर्षण में भिन्नता बनी रहती है।”
उदाहरण सहित व्याख्या करें।
उत्तर:
भारत में उत्तर में हिमालय तथा दक्षिण में सागर के समकारी प्रभाव के बावजूद तापमान, आर्द्रता एवं वर्षण में क्षेत्रीय भिन्नता बनी रहती है। ऐसा किसी स्थान की जलवायु को प्रभावित करने वाले छह कारकों के कारण है जो इस प्रकार हैं- अक्षांश, तुंगता, ऊँचाई, वायुदाब एवं पवनतंत्र, समुद्र (UPBoardSolutions.com) से दूरी, महासागरीय धाराएँ तथा उच्चावच लक्षण। उदाहरण के लिए गर्मियों में राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में, उत्तर-पश्चिमी भारत में तापमान 50°C होता है जबकि उसी समय देश में उत्तर में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में तापमान 20°C हो सकता है। सर्दियों की किसी रात में जम्मू-कश्मीर के द्रास में तापमान -45 डिग्री सेल्सियस तक हो सकता है, जबकि तिरुवनंतपुरम् में यह 22 डिग्री सेल्सियस हो सकता है।

प्रश्न 15.
भारत के पूर्वी तटीय क्षेत्र के संभावित खतरों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारत के पूर्वी तट के डेल्टाई क्षेत्र में अक्सर चक्रवात आते हैं। ऐसा इस कारण होता है क्योंकि अण्डमान सागर में उत्पन्न होने वाला चक्रवातीय दबाव मानसून एवं अक्टूबर-नवम्बर के दौरान उपोष्ण कटिबंधीय जेट धाराओं द्वारा देश के आंतरिक भागों की ओर स्थानान्तरित कर दिया जाता है। ये चक्रवात बड़े क्षेत्र में भारी वर्षा करते हैं। ये उष्णकटिबंधीय चक्रवात प्रायः विनाशकारी होते हैं। कृष्णा, गोदावरी, कावेरी नदियों के डेल्टा प्रदेशों में प्रायः चक्रवात आते रहते हैं, जिसके कारण बड़े पैमाने पर धन-जन की हानि होती है। ये चक्रवात कभी-कभी ओडिशा एवं पश्चिम बंगाल के तटीय क्षेत्रों में भी पहुँच जाते हैं। इन्हीं चक्रवातों के अवदाबों के चलते कोरोमण्डल तट पर अधिकांश वर्षा होती है।

UP Board Solutions

प्रश्न 16.
दक्षिण-पश्चिम मानसून की अरब सागर शाखा से भारत के किन भागों में वर्षा होती है?
उत्तर:
दक्षिण-पश्चिम मानसून की अरब सागर शाखा को तीन उपशाखाओं में बाँटा जा सकता है-

  1. पश्चिमी घाट को प्रभावित करने वाली शाखा
  2. विंध्या-सर्तपुड़ा मध्य शाखा
  3. सौराष्ट्र-कच्छ शाखा।

1. पश्चिमी घाट शाखा – अरब सागर शाखा जब दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर गतिशील होती है, तो पश्चिमी घाट उसके मार्ग में अवरोधक बन जाते हैं। यहाँ इन पवनों को बाध्य होकर ऊपर चढ़ना पड़ता है। इस प्रक्रिया में संघनन बहुत तेजी से होता है। फलतः पश्चिमी घाट के पवनाभिमुख ढालों पर भारी वर्षा होती है। यह देश के अधिक वर्षा प्राप्त करने वाले क्षेत्रों में गिना जाता है। पश्चिमी घाट के पूर्वी भागों में ये (UPBoardSolutions.com) पवनें बहुत कम वर्षा कर पाती हैं। पश्चिम तटीय भागों में दक्षिण से उत्तर की ओर कम वर्षा होती है। मालाबार तट अधिक वर्षा प्राप्त करता है, जबकि कोंकण तट पर कम वर्षा होती है।

2. विंध्या-सतपुड़ा मध्य शाखा – यह शाखा विंध्या और सतपुड़ा पर्वतों के मध्य में होकर अपना मार्ग बनाती है। नर्मदा घाटी को पार कर छोटानागपुर तथा राजमहल की पहाड़ियों तक पहुँचाती है। इस क्षेत्र में पहुँचकर यहाँ अपेक्षाकृत अधिक वर्षा करने में समर्थ होती है। इस शाखा से पश्चिम से पूर्व की ओर वर्षा कम होती जाती है।

3. सौराष्ट्र-कच्छ शाखा – यह शाखा गुजरात तथा राजस्थान से होकर पंजाब के मैदान तक पहुँचती है। इसके मार्ग में अरावली का विस्तार पवनों के समानांतर है। अतः यह शाखा बेरोक-टोक हिमालय प्रदेश के पर्वतीय भागों तक पहुँचती । है। यहाँ हिमालय से अवरोध पाकर कश्मीर, पंजाब तथा हरियाणा में सामान्य वर्षा करने में समर्थ होती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दक्षिणी-पश्चिमी मानसून उत्तरी-पूर्वी मानसून से किस प्रकार भिन्न है? कोई चार अंतर लिखिए।
उत्तर:
उत्तरी-पूर्वी मानसून एवं दक्षिणी-पश्चिमी मानसून में अंतर-

उत्तरी-पूर्वी मानसून

दक्षिणी-पश्चिमी मानसून

1. भारत में दिसंबर से फरवरी तक की अवधि में उत्तर पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर चलने वाली पवनों को उत्तर-पूर्वी मानसून पवनें कहते हैं। 1. भारत में जून से सितंबर तक की अवधि में दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर चलने वाली आर्द्र पवनों को दक्षिण पश्चिम मानसून कहते हैं।
2. ये पवनें शीतकाल में देश के उत्तरी भागों में उच्च दाब की स्थिति पैदा होने के कारण देश के इस भाग से बाहर की ओर बहने लगती हैं। 2. इस अवधि में भारत के उत्तर-पश्चिमी भागों में निम्न दाब क्षेत्र पाया जाता है।
3. ये पवनें शीतकाल में स्थल से चलती हैं। अतः शुष्क एवं ठंडी होती हैं। 3. ये पवनें उष्णकटिबंधीय समुद्री भागों से चलकर आती हैं। अतः ये पवनें गर्म और आई होती हैं।
4. ये पवनें बंगाल की खाड़ी से आर्द्रता ग्रहण कर तमिलनाडु के तट पर वर्षा करती हैं। 4. इन पवनों से देश के अधिकांश भागों में लगभग 90 प्रतिशत वर्षा होती है।
 5. देश के शेष भागों में स्वच्छ आकाश, निम्न तापमान व आर्द्रता, मंद समीर और वर्षारहित मौसम सुहावना होता है। 5. दक्षिण-पश्चिमी मानसून दो शाखाओं-बंगाल की खाड़ी और  अरब सागर में बँट जाता है।

प्रश्न 2.
सम और विषम जलवायु में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सम और विषम जलवायु में अंतर –

सम जलवायु

विषम जलवायु

1. इस प्रकार की जलवायु समुद्र तटवर्ती क्षेत्रों में पाई जाती है। केरल के तटीय भागों में सम जलवायु पाई जाती है। 1. विषम जलवायु महाद्वीपों के आंतरिक भागों में पाई जाती है। भारत के भीतरी भागों की जलवायु विषम है। दिल्ली और  कानपुर क्षेत्रों की जलवायु विषम है।
2. सम जलवायु समुद्र तटवर्ती क्षेत्रों में मिलने के कारण इसे अनुसमुद्री या समुद्री जलवायु कहते हैं। 2. महाद्वीपों के आंतरिक भागों में इस प्रकार की जलवायु मिलने के कारण, इसे महाद्वीपीय जलवायु भी कहते हैं।
3. ग्रीष्म ऋतु में न अधिक गर्मी तथा शीत ऋतु में न अधिक ठंड का पड़ना ही सम जलवायु की विशेषता है। 3. महाद्वीपीय जलवायु को अर्थ ऐसी जलवायु से है, जिसमें ग्रीष्म ऋतु में अधिक गर्मी तथा शीत ऋतु में अधिक ठंड पड़ती है।
4. सम जलवायु वाले क्षेत्रों में वार्षिक ताप परिसर कम होता है। इन भागों में दैनिक ताप परिसर वार्षिक ताप परिसर से अधिक होता है। 4. विषम जलवायु वाले क्षेत्रों में वार्षिक ताप परिसर अधिक पाया जाता है। उच्च वार्षिक ताप परिसर के साथ दैनिक  ताप परिसर भी अधिक होता है।
5. सम जलवायु प्रदेशों में वर्षा की अवधि और वर्षा की मात्रा प्रायः दोनों ही अधिक होते हैं। 5. विषम जलवायु वाले क्षेत्रों में वर्षा की अवधि और वर्षा की मात्रा दोनों ही कम पाई जाती है।

प्रश्न 3.
किसी क्षेत्र की जलवायु को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों को वर्णन कीजिए।
उत्तर:
किसी क्षेत्र की जलवायु को छह प्राकृतिक कारक प्रभावित करते हैं, जिनका विवरण इस प्रकार है-
(1) उच्चावचे – ऊँचे पर्वत शीतल व गर्म वायु को रोकने का कार्य करते हैं। यदि इन पर्वतों की ऊँचाई इतनी हो कि वे वर्षा लाने वाली वायु के मार्ग को रोकने में सक्षम होते हैं तो वे उस क्षेत्र में वर्षा लाने में समर्थ होते हैं। पर्वतों के पवनविमुख ढाल अपेक्षाकृत सूखे रहते हैं।

(2) वायुदाब एवं पवनें – किसी क्षेत्र-विशेष को वायुदाब एवं उसकी पवनें उस क्षेत्र की अक्षांशीय स्थिति एवं ऊँचाई पर निर्भर करती हैं। इस प्रकार यह तापमान एवं वर्षण की प्रवृत्ति को भी प्रभावित करता है।

(3) महासागरीय धाराएँ – समुद्र की ओर से स्थल की ओर आने वाली पवनों के साथ-साथ महासागरीय धाराएँ भी तटीय क्षेत्रों की जलवायु को प्रभावित करती हैं। उदाहरण के लिए, कोई भी तटीय क्षेत्र जहाँ गर्म या ठण्डी जलधाराएँ प्रवाहित होती हैं और वायु की दिशा समुद्र से तट की ओर होती है, तब वह तट गर्म या ठण्डा हो जाएगा।

(4) सागर तट से दूरी – जैसे-जैसे स्थलीय क्षेत्र की सागर से दूरी बढ़ती जाती है, तो इसका समकारी प्रभाव घटने लगता है। इस तरह यह तापमान तथा वर्षा की प्रवृत्ति को प्रभावित करता है। इसे महाद्वीपीय अवस्था कहते हैं। महाद्वीपीय व्यवस्था का आशय है कि गर्मी में बहुत अधिक गर्मी और सर्दी में बहुत अधिक ठण्ड पड़ती है।

(5) स्थलीय क्षेत्र की ऊँचाई – भारत के उत्तर में पर्वत हैं जिनकी औसत ऊँचाई लगभग 6,000 मीटर है। भारत का तटीय क्षेत्र भी विशाल है, जहाँ अधिकतम ऊँचाई लगभग 30 मीटर है। हिमालय पर्वत मध्य एशिया से आने वाली सर्द हवाओं को इस उपमहाद्वीप में आने से रोकता है यही कारण है कि मध्य एशिया की अपेक्षा भारत में ठंड अपेक्षाकृत कम होती है। जैसे-जैसे हम पृथ्वी की सतह से ऊँचे स्थानों (UPBoardSolutions.com) की ओर जाते हैं, वायुमंडल विरल होता जाता है तथा तापमान गिरने लगता है। इसलिए पहाड़ियाँ गर्मियों में अपेक्षाकृत ठण्डी होती हैं।

(6) अक्षांशीय स्थिति – पृथ्वी की गोलाई के कारण, इसे प्राप्त सौर ऊर्जा की मात्रा अक्षांशों के अनुसार अलग-अलग होती है। तापमान विषुवत् वृत्त से ध्रुवों की ओर घटता जाता है। कर्क वृत्त देश के मध्य भाग, पश्चिम में कच्छ के रन से लेकर पूर्व में मिजोरम से होकर गुजरती है। देश का लगभग आधा भाग कर्क रेखा के दक्षिण में स्थित है, जो उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में आता है। कर्क रेखा के उत्तर में स्थित शेष भाग उपोष्ण कटिबंध में आता है। इसलिए भारत की जलवायु में उष्णकटिबंधीय जलवायु एवं उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु दोनों की विशेषताएँ पाई जाती हैं।

UP Board Solutions

प्रश्न 4.
ग्रीष्म ऋतु में भारत की जलवायु-दशा का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
भारत में मार्च, अप्रैल, मई और जून माह को ग्रीष्म काल में शामिल किया जाता है। ग्रीष्मकाल में सम्पूर्ण भारत में उच्च तापमान और निम्न वायुदाब का क्षेत्र बन जाता है। ग्रीष्म ऋतु में देश के उत्तर-पश्चिमी भागों में शुष्क और गर्म हवाएँ चलती हैं। इन शुष्क एवं गर्म पवनों का स्थानीय (UPBoardSolutions.com) नाम ‘लू’ है। मई माह में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में शाम के समय धूलभरी आँधियाँ चलती हैं। कभी-कभी इन आँधियों के पश्चात् हल्की वर्षा होती है, जिससे कष्टदायक गर्मी से कुछ राहत मिलती है।

ग्रीष्म ऋतु के अंत में केरल तथा कर्नाटक के तटीय भागों में मानसून से पूर्व की वर्षा होती है, जिसका स्थानीय नाम आम्रवृष्टि है। इस समय दक्कन के पठार पर अपेक्षाकृत उच्चदाब होने के कारण, मानसून से पूर्व की वर्षा का क्षेत्र आगे । नहीं बढ़ पाता है। इस ऋतु में बंगाल और असोम में भी उत्तर-पश्चिमी तथा उत्तरी पवनों द्वारा वर्षा की तेज बौछारें पड़ती हैं।

प्रश्न 5.
वायुदाब व पवन-तंत्र किसी स्थान की जलवायु को किस प्रकार प्रभावित करते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भूगोल वेत्ताओं के अनुसार पवनें उच्च वायुदाब से निम्न वायुदाब की ओर प्रवाहित होती हैं। सर्दियों में हिमालय के उत्तर में उच्च वायुदाब क्षेत्र बना होता है। इसीलिए ठण्डी शुष्क पवनें इस क्षेत्र से महासागरों की ओर निम्न दाब क्षेत्रों की ओर दक्षिण दिशा में बहती हैं। गर्मियों में भीतरी एशिया तथा उत्तर-पश्चिमी भारत में निम्न वायुदाब क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप, वायु दक्षिण में स्थित हिंद महासागर के उच्च दाब वाले क्षेत्र से दक्षिण-पूर्वी दिशा में बहते हुए विषुवत् वृत्त को पार कर दाहिनी ओर मुड़ते हुए भारतीय उपमहाद्वीप पर स्थित निम्न दाब की ओर बहने लगती है।

इन्हें दक्षिण-पश्चिम मानसून पवनों के नाम से जाना जाता है। ये पवनें कोष्ण महासागरों के ऊपर से बहती हैं, नमी ग्रहण करती हैं तथा भारत की मुख्य भूमि पर वर्षा करती हैं। इस प्रदेश में, ऊपरी वायु परिसंचरण पश्चिमी प्रवाह के प्रभाव में रहता है। भारत में होने वाली वर्षा मुख्यतः दक्षिण-पश्चिमी मानसून पवनों के कारण होती है। मानसून की अवधि 100 से 120 दिन के बीच होती है। इसलिए देश में होने वाली अधिकतर वर्षा कुछ ही महीनों में केंद्रित है।

(1) पश्चिमी चक्रवाती विक्षोभ एवं उष्णकटिबंधीय चक्रवात – हिमालय के दक्षिण से बहने वाली उपोष्ण कटिबंधीय पश्चिमी जेट धाराएँ शीत ऋतु के महीनों में देश के उत्तर एवं उत्तर-पश्चिमी भागों में उत्पन्न होने वाले पश्चिमी चक्रवातीय विक्षोभों के लिए जिम्मेदार हैं। भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान एवं नेपाल में भूमध्यसागर से उत्पन्न होने वाले अतिरिक्त उष्णकटिबंधीय तूफानों का पश्चिमी विक्षोभ कहा जाता है जो (UPBoardSolutions.com) सर्दियों के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भागों में अचानक वर्षा एवं हिमपात का कारण बनते हैं। यह पश्चिमी विक्षोभों के कारण होने वाला गैर-मानसूनी वर्षण है। इन तूफानों को मिलने वाली आर्द्रता का स्रोत भूमध्य सागर एवं अटलांटिक महासागर है।

(2) कोरिआलिस बल – भारतीय उपमहाद्वीप में पवनों की दिशा में मौसम के अनुरूप परिवर्तन कोरिआलिस बल के कारण होता है। भारत उत्तर पूर्वी पवनों के क्षेत्र में स्थित है। ये पवनें उत्तरी गोलार्द्ध के उपोष्ण कटिबंधीय उच्च दाब पट्टियों से उत्पन्न होती हैं। ये दक्षिण की ओर बहती, कोरिआलिस बल के कारण दाहिनी ओर विक्षेपित होकर विषुवतीय निम्न दाब वाले क्षेत्रों की ओर बढ़ती हैं।

(3) जेट धाराएँ – क्षोभमंडल में अत्यधिक ऊँचाई पर एक सँकरी पट्टी में स्थित हवाएँ होती हैं। इनकी गति गर्मी में 110 किमी प्रति घंटा एवं सर्दी में 184 किमी प्रति घंटा के बीच विचलन करती है। हिमालय के उत्तर की ओर पश्चिमी जेट धाराओं की गतिविधियों एवं गर्मियों के दौरान भारतीय प्रायद्वीप पर बहने वाली पश्चिमी जेट धाराओं की उपस्थिति मानसून को प्रभावित करती है। प्रायः जब उष्णकटिबंधीय पूर्वी दक्षिण प्रशांत महासागर में उच्च वायुदाब होता है। तो-उष्णकटिबंधीय पूर्वी हिन्द महासागर में निम्न वायुदाब होता है।

किन्तु कुछ निश्चित वर्षों में वायुदाब परिस्थितियाँ विपरीत हो जाती हैं और पूर्वी प्रशांत महासागर में पूर्वी हिन्द महासागर की अपेक्षाकृत निम्न वायुदाब होता है। दाब की अवस्था में इस नियतकालिक परिवर्तन को दक्षिणी दोलन के नाम से जाना जाता है। एलनीनो, दक्षिणी दोलन । से जुड़ा हुआ एक लक्षण है। यह एक गर्म समुद्री जलधारा है, जो पेरू की ठंडी धारा के स्थान पर प्रत्येक 2 या 5 वर्ष के अंतराल में पेरू तट से होकर बहती है। दाब की अवस्था में परिवर्तन का संबंध एलनीनो से है।

इसलिए इस परिघटना को एंसो-(ENSO) (एलनीनो दक्षिणी दोलन) कहा जाता है। हवाओं में निरंतर कम होती आर्द्रता के कारण उत्तर भारत में पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा की मात्रा कम होती जाती है। बंगाल की खाड़ी शाखा से उठने वाली आर्ट पवनें जैसे-जैसे आगे, और आगे बढ़ती हुई देश के आंतरिक (UPBoardSolutions.com) भागों में जाती हैं, वे अपने साथ लाई गई अधिकतर आर्द्रता खोने लगती हैं। परिणामस्वरूप पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा धीरे-धीरे घटने लगती है। राजस्थान एवं गुजरात के कुछ भागों में बहुत कम वर्षा होती है।

प्रश्न 6.
मानसून की एकता स्थापित करने वाले विभिन्न कारकों को उदाहरण सहित प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
भारत में तापमान और वर्षा के वितरण को देखने एवं स्वरूप को समझने से इस बात का आभास होता है कि भारत की जलवायु में पर्याप्त विषमता है। लेकिन भारत अपनी जलवायु सम्बन्धी एकता के लिए जाना जाता है। इस मानसूनी एकता को प्रदान करने में जिन कारकों का विशेष योगदान है उसमें उत्तर दिशा में स्थित हिमालय पर्वत और वर्षा की प्रवृत्ति का विशेष योगदान है।

(1) हिमालय की विशिष्ट स्थिति – भारत की उत्तरी सीमा पर हिमालय पर्वतमालाओं का विस्तार उत्तर-पश्चिम से उत्तर पूर्व की ओर लगभग 3,000 किमी में है। ये पर्वतमालाएँ भारत के लिए अनेक प्रकार से वरदान सिद्ध हुई हैं। वास्तव में ये जलवायु विभाजक हैं तथा भारत के लिए बंद बक्से का काम करती हैं। शीतकाल में मध्य एशिया से चलने वाली ठंडी और शुष्क पवनों को ये पर्वत, भारत में आने से रोककर उसे ठंडा होने से बचाते हैं। दूसरी ओर दक्षिण-पश्चिमी मानसून पवनें जो उष्णआई होती हैं, उन्हें रोककर ये पर्वतमालाएँ वर्षा करने के लिए बाध्य करती हैं।

इस प्रकार भारत में वर्षा के वितरण को प्रभावित करने में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान है। इन पर्वतों के कारण देश में उष्णकटिबंधीय जलवायु दशाएँ पैदा होती हैं। ग्रीष्म ऋतु में प्रायः सारे देश में जलवायु की समान दशाएँ पाई जाती हैं। जलवायु की विषमताओं तथा एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में परिवर्तनशीलता के होते हुए भी मानसून के कारण प्रतिवर्ष ऋतुओं के चक्र की एक लय बनी रहती है। इस ऋतु लय का प्रभाव भूमि, वनस्पति, प्राणी वर्ग, कृषि कार्य एवं संपूर्ण भारतीय जीवन पर पड़ता है।

(2) भारत में वर्षा की प्रवृत्ति – भारत के विभिन्न भागों में वर्षा की मात्रा उच्चावच पर निर्भर रहती है। फिर भी एक लंबे शुष्क और गर्म मौसम के बाद सारे देश में मानसून की पहली बरसात की तीव्रता से प्रतीक्षा की जाती है। रबी की फसल घर में ले आने के बाद कश्मीर से कन्याकुमारी तथा गुजरात से गुवाहाटी तक का किसान बड़ी बेसब्री के साथ आकाश में बादलों को वर्षा के लिए निहारता रहता है ताकि वर्षा से (UPBoardSolutions.com) उसकी जमीन की प्यास बुझ सके तथा वह अपने कृषि कार्य में लग सके। लेकिन वर्षा की प्रवृत्ति मानसून की सनक पर निर्भर करती है। समय, मात्रा एवं स्थान के अनुसार वर्षा की अनिश्चितता एवं अनियमितता पाई जाती है। इसका प्रभाव सारे देश पर पड़ता है।

UP Board Solutions

मानचित्र कौशल

प्रश्न 1.
भारत के राजनैतिक रेखा मानचित्र पर निम्नलिखित को नामांकित करते हुए स्थिति दर्शाएँ-

  • तिरुवनंतपुरम्
  • चेन्नई
  • जयपुर
  • बंगलुरु
  • मुंबई
  • कोलकाता
  • शिलांग उत्तर
  • नागपुर

उत्तर:
UP Board Solutions for Class 9 Social Science Geography Chapter 4 जलवायु

प्रश्न 2.
नीचे दिए गए मानचित्र का ध्यानपूर्वक अध्ययन कीजिए और उसके नीचे के प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

  1. 1 सितम्बर और 15 सितम्बर के मध्य मानसून वापसी का समय किन दो अक्षरों द्वारा दिखाया गया है?
  2. 1 अक्टूबर और 15 अक्टूबर के मध्य मानसून वापसी का समय किन दो अक्षरों से दिखाया गया है?

उत्तर:

  1. अ तथा ब
  2. स तथा द.
    UP Board Solutions for Class 9 Social Science Geography Chapter 4 जलवायु

Hope given UP Board Solutions for Class 9 Social Science Geography Chapter 4 are helpful to complete your homework.

If you have any doubts, please comment below. UP Board Solutions try to provide online tutoring for you.