UP Board Solutions for Class 7 Hindi Chapter 3 वीरों का कैसा हो वसंत (मंजरी)

UP Board Solutions for Class 7 Hindi Chapter 3 वीरों का कैसा हो वसंत (मंजरी)

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समस्त पद्यांश की व्याख्या

आ रही …………………………..कैसा हो वसंत?
संदर्भ एवं प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक ‘मंजरी-7′ में (UPBoardSolutions.com) संकलित कविता “वीरों का कैसा हो वसंत’ कविता से ली गई है जिसकी कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान है। इस कविता में कवयित्री ने प्रश्न किया है कि वीरों का वसंत कैसा हो?
व्याख्या:
हिमाचल पुकार रहा है, उदधि बार-बार गरज रहा है। पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण समेत दसों दिशाएँ यही प्रश्न कर रही है कि वीरों का वसंत कैसा होना चाहिए।

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फूली सरसों ने ……………………. कैसा हो वसंत?
संदर्भ एवं प्रसंग:पूर्ववत्।

व्याख्या:
फूली सरसों अर्थात लहलहाते फसलों ने वीरों के जीवन में रंग भरते हैं। आसमान मानो पुष्परस लेकर आया हो। बसंत के रंगों से दुलहन बनी धरती का अंग-अंग पुलकित यानी प्रसन्न हो रहा है। परंतु उसका कत यानी पति/प्रिय वीर की वेशभूषा में है यानी वह युद्ध के लिए तैयार खड़ा है और फिर यही प्रश्न खड़ा हो जाता है कि वीरों का वसंत कैसा हो।

भर रही कोकिला …………………………………कैसा हो वसंत?
संदर्भ एवं प्रसंग: पूर्ववत्।
व्याख्या:
कवयित्री कहती है कि वीरों के जीवन में बसंत तभी आएगा जब वे शांति से अपने अपनों के साथ खुशियाँ मना पाएँगे अन्यथा उनका वसंत तो युद्ध की तैयारी में ही बीत जाता है। वसंत में कोयल कूकती हैं तो युद्ध के मैदान में बाजे-गाजे, नगाड़े बजते हैं। वीरों के लिए रंग और (UPBoardSolutions.com) रण का विधान कुछ इसी तरह का है। वीर जब युद्ध के मैदान में उतरते हैं तो अपना आदि-अंत यानी जीवन-मृत्यु दोनों को ही हथेली पर रखकर चलते हैं। जीत मिलेगी तो जीवन मिलेगा और पराजय मिली तो मृत्यु। कवयित्री पुनः प्रश्न करती है कि युद्ध पर जाने वाले वीरों को वसंत कैसा हो।

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गलबाँहें हों, या ………….कैसा हो वसंत?
संदर्भ एवं प्रसंग:
पूर्ववत्।

व्याख्या:
कवयित्री एक तरफ वीरों को अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित देखती हैं तो दूसरी उनके गले में उनकी प्रिया के बाँहों के हार देखती हैं। वे दोनों को एक साथ रखकर पूछती हैं कि युद्ध पर जाने वाले वीर कृपाण चुनें या प्रिया की (UPBoardSolutions.com) बाँहों के हार, वे धनुष-बाण सँभालें या प्रिया के नैनों के बाण, वे विलासमय जीवन जो प्रेम और सुख से परिपूर्ण हो, उसका चुनाव करें या दबे-कुचले लोगों की मुक्ति
के लिए युद्ध का रास्ता अपनाएँ। सबसे प्रबल और गंभीर समस्या तो यही है कि इन सब दुख-सुख के बीच इनका वसंत कैसा हो।

कह दे अतीत ……………….कैसा हो वसंत?
संदर्भ एवं प्रसंग: पूर्ववत्।

व्याख्या:
कवयित्री चाहती है कि देशवासियों को युद्ध की सच्चाई ज्ञात हो जाए, अतः अतीत को अपनी चुप्पी तोड़ने के लिए कहती है। युद्ध क्यों होते हैं? उससे किसी का कभी भला नहीं होता, जीतने वाला, हारने वाला दोनों ही खाली हाथ रह जाते हैं। लंका में आग क्यों लगी थी? इस प्रश्न पर विचार करना चाहिए। कुरूक्षेत्र को जागने के लिए कहा जा रहा है ताकि क्ह अपने अनंत अनुभवों को बताकर दुनिया को युद्ध के संकट से बचा सके। (UPBoardSolutions.com)

हल्दीघाटी का शिला ……………….कैसा हो वसंत?
संदर्भ एवं प्रसंग: पूर्ववत्।

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व्याख्या:
कवयित्री चाहती हैं कि युद्ध और वीरता की मिसाल बने हल्दीघाटी और सिंहगढ़ के किले जैसे स्थलों से आह्वान किया जाए और देश के गौरव महाराणा प्रताप, नाना साहब आदि वीरों की. ज्वलंत स्मृतियों को फिर से जगा दिया जाए ताकि देश के (UPBoardSolutions.com) नौजवानों में अपने देश पर कुर्बान होने का नया जोश पैदा हो। आखिर वीरों की वसंत कैसा हो? क्या युद्ध भूमि में शहीद हो जाना ही उनका वसंत है? नहीं, इसलिए कवयित्री अतीत में घटित युद्ध के कड़वे सच को बताते हुए वर्तमान में नरसंहार को रोकना चाहती है।

वीरों का कैसा हो ……………….कैसा हो वसंत?

संदर्भ एवं प्रसंग: पूर्ववत्।
व्याख्या:
कवयित्री दुख प्रकट करते हुए कहती हैं कि आज भूषण और चंद जैसे कवि नहीं रहे। जो छंदों में जान डाल सके। आज कवियों की कलम स्वच्छंद नहीं है बल्कि अंग्रेज शासकों की गुलाम है, इसलिए खुलकर अपने विचार अभिव्यक्त नहीं कर (UPBoardSolutions.com) पाती फिर हमें कौन आकर बताएगा कि वीरों का वसंत कैसा हो?

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प्रश्न-अभ्यास

कुछ करने को

प्रश्न 1:
अपने आस-पास किसी सैनिक से मिलकर उनके कार्य क्षेत्र के बारे में जानकारी , प्राप्त कर, उसे अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
विद्यार्थी स्वयं करें।

प्रश्न 2:
1857 की क्रान्ति के मुख्य केन्द्र दिल्ली, मेरठ, झाँसी, कानपुर, (UPBoardSolutions.com) और लखनऊ आदि थे। इन स्थलों पर स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करने वालों के नामों की सूची बनाइए।
उत्तर:
1857 की क्रांति के मुख्य केंद्र स्थलों पर नेतृत्व करने वाले लोग।

दिल्ली                              –             बहादुरशाह जफर, बख्तखाँ
मेरठ                                –             धनसिंह गुर्जर
कानपुर                            –             नाना साहब, तात्या टोपे
लखनऊ                           –             बेगम हजरत
महल झाँसी                      –             रानी लक्ष्मीबाई ।
इलाहाबाद                       –              लियाकत अली
बिहार (जगदीशपुर)        –              कुँवर सिंह
बरेली                              –              खान बहादुर खाँ
फैजाबाद                         –              मौलवी अहमद उल्ला
फतेहपुर                          –              अजीमुल्ला

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प्रश्न 3:
इस कविता को कई गायकों ने अपना स्वर दिया है। (UPBoardSolutions.com) अपने शिक्षक अथवा बड़ों के मोबाइल फोन पर इस कविता को सुनकर लयबद्धता के साथ याद कीजिए तथा विद्यालय के किसी कार्यक्रम में प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
विद्यार्थी स्वयं करें।

विचार और कल्पना

प्रश्न 1:
एक वीर सैनिक सारी सुख-सुविधा का त्यागकर देश की रक्षा में सन्नद्ध रहता है। दुर्गम बर्फ से घिरी पहाड़ी पर स्थित किसी सैनिक को किन कठिनाइयाँ का सामना करना पड़ता होगा? सोचकर लिखिए।
उत्तर:
देश की सीमाओं पर तैनात सैनिकों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता। बर्फ से घिरी दुर्गम पहाड़ियों पर दिन-रात उन्हें खराब मौसम की मार झेलनी पड़ती है। हमेशा शत्रुओं से चौकस रहना पड़ता है। शून्य डिग्री से नीचे के तापमान में भी वे बिना थके, बिना रुके प्रहरी का कार्य तल्लीनतापूर्वक करते हैं। सर्दियों में हड्डियों को जमा देने वाली ठंड की रात में भी वे बंदूक लेकर सीमा पर तैनात रहते हैं ताकि (UPBoardSolutions.com) देशवासी चैन की नींद सो सकें।

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प्रश्न 2:
सेना के तीन अंग हैं- थल सेना, वायु सेना, जल सेना। सैनिक के रूप में सेना के किस अंग में आप भाग लेना चाहेंगे और क्यों ?
उत्तर:
विद्यार्थी स्वयं करें।

कविता से:

प्रश्न 1:
‘वीरों का कैसा हो वसंत ?’ कविता में कौन-कौन पूछ रहा है?
उत्तर:
हिमालय, सागर, धरती, आसमान, पूरब, पश्चिम-दसों (UPBoardSolutions.com) दिशाएँ पूछ रही हैं कि- वीरों को कैसा हो वसंत?

प्रश्न 2:
वीरों के लिए वसंत के रंग और रण का क्या स्वरूप है?
उत्तर:
वीरों के लिए वसंत के रंग और रण का स्वरूप यह है कि वीर वसंत ऋतू के रंगोत्सव से। परे वसंती चोला पहनकर देश की रक्षा व स्वतंत्रता हेतु रण के लिए रणभूमि की ओर निकल पड़े हैं। उनका चोला वसंती रंग का है जो वीरता और बलिदान का प्रतीक है।

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प्रश्न 3:
निम्नलिखित पंक्तियों के आशय स्पष्ट कीजिए
(क) सब पूछ रहे हैं दिग्-दिगन्त,
वीरों का कैसा हो वसंत?
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री कह रही हैं कि वीरों का (UPBoardSolutions.com) वसंत कैसा होना चाहिए। वे वीर जो सर्वस्व त्याग कर देश की रक्षा हेतु तन-मन बलिदान करने चल पड़ा है, उसके लिए वसंत कैसा हो।

(ख) है रंग और रण का विधान,
मिलने आये हैं आदि-अन्त,
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्तियों से कवयित्री का आशय है कि वीरों के लिए रंग और रण का विधान ऐसा । है कि वीर वसंती चोला पहनकर अपने देश की रक्षा के मैदान में जब उतरते हैं तो वे अपनी जीवन-मृत्यु को अपने हाथ में लेकर चलते हैं।

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(ग) बिजली भर दे वह छन्द नहीं,
है कलम बंधी स्वच्छन्द नहीं,
उत्तर:
इन पंक्तियों में कवयित्री दुख व्यक्त करते हुए कहती हैं कि (UPBoardSolutions.com) अब वीरों को जोश दिलाने वाले छंदों की कमी पड़ गई है। क्योंकि दुष्ट अंग्रेज शासकों ने कवियों की लेखनी पर प्रतिबंध लगा दिया है। उनकी कलम से स्वच्छंदता छीन ली गई है।

प्रश्न 4:
कविता में कवि अतीत से मौन त्यागने के लिए क्यों कह रहे हैं ?
उत्तर:
कवयित्री अतीत से मौन त्यागने को इसलिए कह रही है क्योंकि अतीत में जितने भी युद्ध हुए हैं उनके परिणाम में किसी-न-किसी का विनाश अवश्य हुआ है। खासकर अधर्म और अन्याय की राह पर चलने वालों का अंत ही हुआ है। अतीत इस बात का साक्षी रहा है। सीता का अपहरण करने वाले रावण की लंका का जलना हो या पांडवों द्वारा कौरवों का सर्वनाश। यहाँ कवयित्री द्वारा अतीत से मौन त्यागने की बात करने का (UPBoardSolutions.com) तात्पर्य यह है कि वे वर्तमान पीढ़ी को अतीत से सीख लेने को प्रेरित कर रही हैं और लोगों को युद्ध की विभीषिका से बचाना चाहती हैं।

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भाषा की बात

प्रश्न 1:
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची लिखिए (UPBoardSolutions.com)
भू, नभ, पुष्प, मधु, बिजली
उत्तर:
भू             –         धरी, पृथ्वी, वसुधा, अवनि, भूमि
नभ          –         आकाश, गगन, व्योम, अंबर, अभ्र
पुष्य         –          फूल, कुसुम, सुमन, प्रसून, गुल
मधु          –          शहद, मकरंद, पुष्परस, माक्षिक
बिजली    –          विद्युत, दामिनी, चंचला, चपला

प्रश्न 2. निम्नलिखित समस्त पदों का विग्रह करें
शिलाखण्ड, सिंहगढ़, हिमाचल, गलबाँहें, धनुषबाण
उत्तर:
शिलाखण्ड        –           शिला का खण्ड
सिंहगढ़             –           सिंह को गढ़।
हिमाचल            –          हिम का आँचल
गलबाहें              –          गले में बाँहें ।
धनुषबाण            –        धनुष और बाण

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प्रश्न 3:
दिये गये मुहावरों के अर्थ लिखकर उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिएदाँत खट्टे करना, (UPBoardSolutions.com) ईट से ईंट बजाना, छक्के छुडाना, अंगारों पर चलना, खेत रह जाना ।
उत्तर:
दाँत खट्टे करना (पराजित करना): रानी लक्ष्मीबाई ने प्रारंभिक युद्ध में अंग्रेजों के दाँत खट्टे कर दिए थे।
ईंट से ईंट बजाना (विनाश करना): हमारे सैनिकों ने पाकिस्तान की ईंट से ईंट बजा दी।
छक्के छुड़ाना (करारा जबाब देना): कारगिल युद्ध में भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी सैनिकों के छक्के छुड़ा दिए थे।
अंगारों पर चलना (जोखिम से भरे काम करना): देश की आजादी के लिए क्रांतिकारी अंगारों पर चलते थे बेहिचक।
खेत रह जाना (रणभूमि में मारा जाना): चीन की लड़ाई में हमारे सैकड़ों जवान खेत रहे।

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 (Section 4)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का स्थान (अनुभाग – चार)

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में भूमि-सुधार कार्यक्रमों की कमियों का उल्लेख कीजिए तथा सुधार हेतु सुझाव दीजिए। [2014]
उत्तर :
भारत में भूमि-सुधार कार्यक्रम की कमियाँ – भारत में भूमि सुधार कार्यक्रमों की प्रमुख कमियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. भारत के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग भूमि-सुधार कानून हैं जिससे भूमि सुधार कार्यक्रम सन्तोषजनक ढंग से लागू नहीं किया जा सका।
  2. भू-जोतों की सीमा का उचित निर्धारण नहीं हो सका क्योंकि जमींदारों ने अनियमित रूप से भूमि स्थानान्तरित की है।
  3. भूमि-सुधार कार्यक्रमों में काश्तकारों से ऊँची दर पर लगान (UPBoardSolutions.com) वसूल किया जाता है जिसका प्रभाव कृषि की उत्पादकता पर पड़ता है।
  4. भारत में भूमि सम्बन्धी दस्तावेज अधूरे हैं। भूमि स्वामित्व को लेकर चकबन्दी के दौरान नये-नये विवादों ने जन्म लिया है।
    भूमि-सुधार हेतु सुझाव–[संकेत–विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 7 देखें।

प्रश्न 2.
भारतीय कृषि में किन्हीं पाँच कृषि निविष्टियों के महत्त्व पर प्रकाश डालिए। [2012, 15]
या
कृषि निविष्टियों से क्या तात्पर्य है? भारतीय कृषि के लिए किन्हीं पाँच निविष्टियों की विस्तृत विवेचना कीजिए। [2011, 15, 17]
या
कृषि निविष्टियों से क्या तात्पर्य है ? कृषि उत्पादन बढ़ने में किन्हीं चार निविष्टियों का महत्त्व बताइए। [2010]
या
कृषि की किन्हीं छः निविष्टियों की विवेचना कीजिए। [2011, 16]
या
कृषि की किन्हीं तीन निविष्टियों का महत्त्व बताइए। [2016]
उत्तर :

कृषि निविष्टियाँ (इन्पुट्स)

कृषि भारत का प्रधान व्यवसाय है। अत: भारतीय कृषकों को कृषि उत्पादन को सम्पन्न क़रने में जिन वस्तुओं तथा सेवाओं की आवश्यकता पड़ती है, उन्हें कृषि निविष्टियाँ (Inputs) कहा जाता है। प्रमुख कृषि निविष्टियों का विवरण इस प्रकार है –

1. तकनीकी जानकारी – कृषि-कार्य की यह महत्त्वपूर्ण निविष्टि है। कृषि करने की सही तकनीकी की जानकारी शिक्षा के अनौपचारिक तरीकों से ही प्राप्त की जा सकती है। तकनीकी जानकारी के अन्तर्गत बीजों के प्रकार, उर्वरक, फसल-प्रबन्ध, भण्डारण, फसल बीमा, विपणन आदि की जानकारी आती है। खेती की आधुनिक विधियों का प्रयोग करने के लिए किसान को इन सभी की पर्याप्त जानकारी होनी आवश्यक है।

2. स्वयं का श्रम – किसान का निजी एवं उसके परिवार के सदस्यों का (UPBoardSolutions.com) श्रम भी कृषि की महत्त्वपूर्ण निविष्टि है। कभी-कभी इनकी संख्या कार्य की आवश्यकता से भी अधिक हो जाती है।

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3. भाड़े का श्रम – मजदूरी पर रखे गये श्रम को भाड़े का श्रम कहते हैं। कृषि-कार्य में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। ऐसे श्रमिकों का भारत में कोई संगठित बाजार नहीं है। फलत: भाड़े के श्रमिकों को उनके श्रम के लिए मजदूरी कम दी जाती है तथा अधिकांशतः मुद्रा के रूप में नहीं दी जाती।

4. पशुधन – बैल, गाय, भैंस आदि पशुधन हैं। पशुधन खेती के लिए बहुत ही मूल्यवान समझा जाता है। ये भी कृषि की एक महत्त्वपूर्ण निविष्टि हैं। जिस कृषक-परिवार के पास जितना अधिक पशुधन होता है, वह उतना ही अधिक सम्पन्न परिवार माना जाता है।

5. कृषि-उपकरण – कृषि-उपकरण में खेती में प्रयुक्त उपस्कर तथा मशीनें आती हैं। इस श्रेणी में लकड़ी एवं लोहे के हल जैसे परम्परागत उपकरण तथा बैलगाड़ी; जैसे-यातायात उपकरण, आधुनिक उपकरण तथा मशीनें; जैसे—नलकूप, ट्रैक्टर, यातायात के लिए तेज गति से चलने वाले ट्रक तथा तीन पहियों वाले वाहन सम्मिलित किये जाते हैं। ये भी कृषि-क्षेत्र की एक महत्त्वपूर्ण निविष्टि हैं।

6. सिंचाई – इसमें परम्परागत एवं आधुनिक दोनों प्रकार के साधन सम्मिलित हैं। यद्यपि सिंचाई के साधनों का प्रयोग सभी प्रकार की खेती के तरीकों तथा फसलों के लिए महत्त्वपूर्ण है, परन्तु विशिष्ट फसलों के उगाने में इनका बहुत अधिक महत्त्व है। खेती के परम्परागत तरीकों की अपेक्षा आधुनिक तरीके सिंचाई पर अधिक निर्भर करते हैं।

7. बीज – बीज कृषि के लिए एक महत्त्वपूर्ण निविष्टि है। कृषि में उत्पादन बीज की किस्मों पर निर्भर करता है। बीजों की कई किस्में होती हैं। कुछ बीज अधिक उपज देने वाले होते हैं। बीजों का चुनाव उनकी कीमतों तथा अन्य निविष्टियों (जल, उर्वरक आदि) पर निर्भर करता है।

8. उर्वरक एवं कीटनाशी दवाइयाँ – आधुनिक दृष्टि से ये दो महत्त्वपूर्ण निविष्टियाँ हैं। उर्वरक भूमि का उपजाऊपन बढ़ा देता है और कीटनाशी दवाइयाँ फसलों को कीड़े आदि लगने से बचाती हैं। जब इन्हें सिंचाई तथा उत्तम बीज जैसी अन्य निविष्टियों के साथ उचित मात्रा में प्रयोग किया जाता है तो ये भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाकर उत्पादन में तीव्र गति से वृद्धि करते हैं।

9. भण्डारण –भण्डारण की सुविधा से अनाज को कीड़ों तथा मौसम से नष्ट होने से बचाया जा सकता है। यह भी कृषि-क्षेत्र की एक महत्त्वपूर्ण निविष्टि है। इसकी उचित सुविधाओं के अभाव में भारत में उत्पन्न अनाज का एक बड़ा भाग प्रति वर्ष नष्ट (UPBoardSolutions.com) हो जाता है।

10. विपणन –कृषि के उत्पादन के लिए सामयिक वसूली एवं विपणन की सुविधाओं की उचित व्यवस्था करना आवश्यक है। अतः विपणन-सुविधा भी एक महत्त्वपूर्ण निविष्टि है।

11. बीमा और साख – फसलों का बीमा करवाने से फसलों की चोरी, नुकसान अथवा अन्य हानियों से पर्याप्त सीमा तक बचा जा सकता है। अत: कृषि के लिए बीमा और साख भी आवश्यक निविष्टियाँ हैं। इससे कृषि उत्पादन की अनिश्चितता पर नियन्त्रण पाया जा सकता है।

12. वित्त – कृषि में भी उत्पादक को अन्य उत्पादक क्रियाओं की तरह अपने उत्पादन के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है। उत्पादन के बाद भी उसे प्रतीक्षा करनी पड़ती है जब तक कि वह बिक नहीं जाता। प्रतीक्षा की इस अवधि के दौरान उसे वित्त (साख) की आवश्यकता पड़ती है। प्रायः वित्त के लिए उसे सहकारी समितियों, साहूकारों, व्यावसायिक बैंकों व ग्रामीण बैंकों से ऋण लेना पड़ता है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि कृषि निविष्टियों के अन्तर्गत तकनीकी जानकारी तथा कृषि उपकरण सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनके अभाव में कृषि उत्पादन सम्भव नहीं है।

प्रश्न 3.
कृषि हेतु साख के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए कृषि साख के संस्थागत स्रोतों की विवेचना कीजिए।
या
भारत में कृषि वित्त के किन्हीं पाँच स्रोतों का वर्णन कीजिए।
या
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि वित्त के प्रमुख स्रोत कौन-कौन से हैं ?
उत्तर :
कृषि में भी उत्पादक (कृषक) को अन्य उत्पादक क्रियाओं की तरह अपने उत्पादन के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है। उत्पादन के बाद भी उसे तब तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है जब तक कि उत्पादन बिक नहीं जाता। प्रतीक्षा की इस अवधि के दौरान उसे सब खर्चे; जैसे—बीज, सिंचाई, उर्वरक, भण्डारण एवं व्यक्तिगत खर्च आदि, के लिए वित्त का प्रबन्ध करना पड़ता है। इस वित्त के पाँच स्रोत निम्नलिखित हैं

1. भूस्वामी एवं व्यावसायिक साहुकार – हमारी अर्थव्यवस्था की एक समस्या यह है कि हमारे अधिकांश कृषक आर्थिक दृष्टि से इतने कमजोर हैं कि संगठित बैंक प्रणाली द्वारा सामान्य व्यावसायिक स्तर पर इन्हें ‘साख के योग्य नहीं माना जाता। किसानों का यह वर्ग बैंकिंग प्रणाली आसानी से सुलभ न हो पाने पर, भूस्वामियों और व्यावसायिक साहूकारों से अत्यन्त अनुचित शर्तों पर ऋण लेता है। सन् 1950 के दशक तक (UPBoardSolutions.com) किसानों को अपने कुल ऋण का 70% गाँव के परम्परागत साहूकारों से मिलता था, परन्तु अब यह स्थिति बदल गयी है। किसान अब सहकारी समितियों और दूसरे विकल्पों का लाभ उठा रहे हैं।

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2. व्यावसायिक बैंक – हमारे व्यावसायिक बैंकों का परम्परागत ढाँचा तो मूर्त जमानत के बदले तथा उन लोगों को ऋण देने के लिए बना है जिन्हें उनकी आय और सम्पत्ति के आधार पर ‘साख के योग्य माना जाता है। इसीलिए, बैंकिंग कभी भी ग्रामीण क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर पायी। लेकिन अब स्थिति बदल गयी है। सन् 1950 के दशक तक ऋण-प्रवाह में इनका हिस्सा 1% भी नहीं था। लेकिन यह हिस्सा अब लगभग 52% हो गया है।

3. सहकारी बैंक – सहकारी बैंकों की रचना मूलत: किसानों एवं अन्य सहकारिता की भावना पर आधारित संस्थाओं की वित्त समस्याओं के लिए की गयी थी। सन् 1950 के दशक तक इनका ऋण-प्रवाह में हिस्सा 7% से भी कम था। इन बैंकों की स्थापना ग्रामीण क्षेत्रों में सघन रूप से की गयी

4. क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक – सन् 1975 ई० में भारत सरकार द्वारा यह तय किया गया कि क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की एक कड़ी का निर्माण किया जाए। इनको विशेष रूप से पिछड़े एवं उन क्षेत्रों में स्थापित किया जाए जहाँ सहकारी एवं व्यावसायिक बैंक पर्याप्त रूप से नहीं पहुँच पाये हैं। इन बैंकों का झुकाव विशेष रूप से गरीब वर्ग के लोगों की साख की आवश्यकताओं को पूरा करने की ओर था। यह प्रयास भी सफल रहा और कृषि वित्त जुटाने में सहायक हुआ।

5. सहकारी समितियाँ – देश के कई भागों में किसानों की पंजीकृत समितियों ने गति पकड़ी है। ये समितियाँ अपने सदस्यों को साख-सुविधा प्रदान करती हैं। अब इनकी संख्या कई गुना बढ़ गयी है। और इन्होंने साहूकारों का स्थान भी ले लिया है। (UPBoardSolutions.com) इनकी स्थिति में इतना सुधार हुआ है कि अब सहकारी एजेन्सियों, सहकारी भूमि विकास बैंकों एवं व्यावसायिक बैंकों से मिलने वाली कुल संस्थागत साख का हिस्सा किसानों को दी जाने वाली कुल अल्पकालीन और मध्यकालीन साख में लगभग एक-तिहाई हो गया है।

प्रश्न 4.
कृषि निविष्टियों में वित्त के पाँच योगदान लिखिए।
उत्तर :
कृषि निविष्टियों में वित्त के प्रमुख योगदान निम्नलिखित हैं –

1. भाड़े का श्रम – कृषि का कार्य मौसमी होता है। किसान को खेत जोतने, बीज बोने, गुड़ाई- सिंचाई करने, फसल काटने आदि सभी कार्य समय-बद्धता के साथ करने पड़ते हैं। प्रायः ये सभी कार्य वह स्वयं नहीं कर पाता और इसके लिए भाड़े के श्रमिकों से काम लेता है। श्रमिकों को भाड़ा या मजदूरी देने में उसे वित्त-सुविधा का योगदान प्राप्त होता है।

2. कृषि-उपकरण – अब कृषि एक व्यवसाय बन गयी है। किसान अब पशुओं पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है और कृषि-उपकरण पशु-शक्ति का स्थान ले रहे हैं। इनमें टिलर, हैरो, ट्रैक्टर, थ्रेसर आदि प्रमुख हैं। इनको खरीदने में भी किसान को वित्त का योगदान प्राप्त होता है।

3. सिंचाई – सिंचाई के उपयुक्त साधन आज के किसान की आवश्यकता बन गये हैं। वर्षा पर निर्भर खेती मात्र एक जूआ साबित हुई है। अब किसान की प्राथमिकता सिंचाई की एक विश्वसनीय व्यवस्था करने में है। इसके लिए वह ट्यूबवेल या उससे पानी खींचने के लिए जेनरेटर को प्राथमिकता देता है। यह प्रबन्ध विशेषकर उन किसानों के लिए आवश्यक है जो सघन तथा द्विफसली खेती करते हैं या जिनके क्षेत्र में सिंचाई की पर्याप्त सुविधा नहीं होती। सिंचाई के प्रभावी एवं विश्वसनीय साधनों को जुटाने के लिए भी वित्त का योगदान वांछित होता है।

4. उर्वरक एवं कीटनाशी – सघन तथा द्विफसली खेती के लिए भूमि की उर्वरा शक्ति को बनाये रखना। अति आवश्यक है। किसान को अपनी आवश्यकतानुसार उर्वरक व कीटनाशक दवाइयों को क्रय करना होता है। ये वस्तुएँ महँगी होती हैं और (UPBoardSolutions.com) इनके बिना किसान का काम भी नहीं चल सकता। प्राय: ये दोनों वस्तुएँ किसान को सहकारी समितियों द्वारा वित्त (साख) के रूप में उपलब्ध करायी जाती हैं।

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5. भण्डारण – किसान के उत्पाद सदैव तुरन्त ही नहीं बिक पाते। कीड़ों एवं मौसम से बचाव कर सकने वाले भण्डारण के तरीकों का लाभ उसे बाध्ये होकर उठाना पड़ता है। यहाँ उसे भण्डार-गृह का किराया देना होता है तथा वित्ते का योगदान लेना पड़ता है।

प्रश्न 5.
भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के क्या कारण हैं ? इसे सुधारने के लिए क्या उपाय किये गये हैं ?
या
भारतीय कृषि में उत्पादकता बढ़ाने के किन्हीं चार उपायों को लिखिए। [2010, 14, 15]
या
भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के पाँच कारण लिखिए। भारतीय कृषि की न्यून उत्पादकता की समस्या को दूर करने के लिए उपाय सुझाइए। [2012]
या
भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के छः कारणों को स्पष्ट कीजिए। [2012, 18]
या
भारत में कृषि उत्पादकता बढ़ाने के छः उपाय लिखिए। [2012, 15, 17]
या
भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के कोई तीन कारण लिखिए। [2013]
या
भारतीय कृषि की किन्हीं दो प्रमुख समस्याओं का उल्लेख कीजिए। [2015]
या
भारतीय कृषकों की किन्हीं छः समस्याओं का वर्णन कीजिए। [2016]
या
भारतीय कृषकों की किन्हीं चार समस्याओं का उल्लेख कीजिए। [2016, 17]
उत्तर :

भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के कारण

भारत एक कृषिप्रधान देश है। देश की लगभग 58% जनसंख्या अपनी जीविका के लिए आज भी कृषि पर आश्रित है। भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान होने के बावजूद यह पिछड़ी हुई अवस्था में है। अन्य देशों की तुलना में भारत में प्रति हेक्टेयर कृषि-उत्पादन बहुत कम है। इसके लिए मुख्यतया निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं –

1. कृषि जोतों का छोटा होना – भारत में कृषि जोतों का आकार बहुत छोटा है। लगभग 57% जोतों का आकार एक हेक्टेयर से भी कम है। इसके अतिरिक्त कृषि जोत विभाजित अवस्था में अर्थात् एक-दूसरे से दूर-दूर हैं। छोटी जोतों पर वैज्ञानिक ढंग (UPBoardSolutions.com) से खेती करना सम्भव नहीं होता तथा न ही सिंचाई की समुचित व्यवस्था हो पाती है।

2. कृषि का वर्षा पर निर्भर होना – आज भी भारतीय कृषि को लगभग 50% भाग वर्षा पर निर्भर करता है। वर्षा की अनिश्चितता एवं अनियमितता के कारण भारतीय कृषि ‘मानसून का जूआ’ कहलाती है। देश के कुछ क्षेत्रों में अतिवृष्टि तथा बाढ़ों के कारण फसलें बह जाती हैं तथा कुछ भागों में अनावृष्टि से सूख जाती हैं।

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3. भूमि पर जनसंख्या का अत्यधिक भार – जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण भूमि पर जनसंख्या का भार निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है। परिणामतः प्रति व्यक्ति उपलब्ध भूमि का क्षेत्रफल घटता गया है। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में अदृश्य बेरोजगारी तथा अल्प रोजगार की समस्याएँ बढ़ी हैं और किसानों की गरीबी तथा ऋणग्रस्तता में वृद्धि हुई है।

4. सिंचाई सुविधाओं का अभाव – भारत में सिंचित क्षेत्र केवल 40% है। असिंचित क्षेत्रों में किसान अपनी भूमि में एक ही फसल उगा पाते हैं, जिस कारण भारतीय कृषि की उत्पादकता बहुत कम है।

5. प्राचीन कृषि-यन्त्र – पाश्चात्य देशों में आज कृषि के आधुनिक यन्त्रों का प्रयोग किया जा रहा है, जबकि भारत के अनेक क्षेत्रों में आज भी हल, पटेला, दराँती, कस्सी आदि अत्यधिक प्राचीन यन्त्रों द्वारा कृषि की जाती है। इनसे गहरी जुताई नहीं हो पाती; फलतः उत्पादन कम होता है।

6. दोषपूर्ण भूमि-व्यवस्था – भारत में अनेक वर्षों तक देश की लगभग 40% भूमि जमींदार, जागीरदार, इनामदार आदिं मध्यस्थों के पास रही। किसान इन मध्यस्थों के काश्तकार होते थे। स्वतन्त्रता- प्राप्ति के बाद इन मध्यस्थों के उन्मूलन के बाद भी छोटे किसानों की दशा में विशेष सुधार नहीं हो पाया है। आज भी ऐसे असंख्य किसान हैं जो दूसरों की भूमि पर खेती करते हैं।

7. कृषकों की अशिक्षा तथा निर्धनता – निर्धनता के कारण देश के कृषक आधुनिक यन्त्र, उत्तम बीज, खाद आदि खरीदने तथा उनका प्रयोग करने में असमर्थ हैं। शिक्षा के अभाव के कारणं वे आधुनिक कृषि–विधियों का प्रयोग नहीं कर पाते। वे रूढ़िवादिता से ग्रस्त हैं, भाग्य में विश्वास करते हैं तथा मुकदमेबाजी में ही अपना अत्यधिक धन बर्बाद कर देते हैं।

8. उत्तम बीज व खाद का अभाव – भारत में अधिक उपज देने वाले उन्नत बीजों की कमी है। कृषि-भूमि के केवल 25% भाग पर ही उत्तम बीजों का प्रयोग किया जा रहा है, जबकि 75% भूमि पर किसान आज भी परम्परागत बीज बोता है। इसके अतिरिक्त, गोबर का केवल 40% भाग खाद के रूप में प्रयोग किया जाता है। पश्चिमी देशों में प्रति हेक्टेयर 300 किग्रा से अधिक रासायनिक खाद प्रयोग की जाती है, जबकि भारत में मात्र 65 किग्रा।

9. वित्तीय सुविधाओं का अभाव – किसानों को उचित ब्याज पर ऋण प्रदान करने वाली संस्थाओं की देश में आज भी कमी है। इस कारण किसानों को ऊँची ब्याज दरों पर महाजनों से ऋण लेने पड़ते हैं, जिससे उनकी ऋणग्रस्तता बढ़ती जाती है। अत्यधिक ऋणग्रस्त होने के कारण किसान अपना समय, शक्ति तथा धन कृषि की उन्नति में नहीं लगा पाते।

10. अन्य कारण – भूमि कटाव, जलाधिक्य, नाइट्रोजन की कमी, फसल (UPBoardSolutions.com) सम्बन्धी विभिन्न बीमारियाँ, अच्छे पशुओं का अभाव, दोषपूर्ण बिक्री व्यवस्था आदि के कारण भी भारतीय कृषि की उत्पादकता कम है।

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कृषि-क्षेत्र में सुधार के उपाय

भारतीय कृषि विश्व के अन्य देशों की तुलना में अत्यधिक पिछड़ी अवस्था में है। प्रति हेक्टेयर भूमि से कम उपज प्राप्त होती है; अतः कृषि उत्पादकता में वृद्धि हेतु निम्नलिखित प्रयास किये जाने चाहिए –

1. कृषि पर जनसंख्या का दबाव कम होना चाहिए – जोतों के उपविभाजन को रोकने तथा कृषि उत्पादन में वृद्धि हेतु यह आवश्यक है कि कृषि पर जनसंख्या का दबाव कम किया जाए। यह तभी सम्भव है जब जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण किया जाए तथा ग्रामीण क्षेत्रों में लघु व कुटीर उद्योग स्थापित किये जाएँ।

2. कृषि की नयी तकनीकी का प्रचार व प्रसार – आज इस बात की आवश्यकता है कि भारतीय कृषकों को नये व आधुनिक कृषि-यन्त्रों से अवगत कराया जाए तथा उन्नत प्रजातियों के बीज उपलब्ध कराये जाएँ, तभी भारतीय कृषि के पिछड़ेपन को दूर करके उत्पादन-क्षमता में वृद्धि की जा सकती है।

3. सिंचाई सुविधाओं का उचित विकास एवं बाढ़-नियन्त्रण – भारतीय कृषि की मानसून पर निर्भरता को समाप्त करने के लिए सिंचाई-सुविधाओं का व्यापक विस्तार किया जाना चाहिए तथा बाढ़-नियन्त्रण के उपाय अपनाये जाने चाहिए, जिससे भू-क्षरण को रोका जा सके तथा फसलों की सुरक्षा की जा सके।

4. साख-सुविधाओं का विस्तार – कृषि-क्षेत्र में नवीन तकनीकों को प्रोत्साहन देने, विपणन व्यवस्था में सुधार करने तथा उन्नत बीजों एवं उर्वरकों का प्रयोग करने के लिए उचित शर्तों पर पर्याप्त साख-सुविधाओं की आपूर्ति की जानी चाहिए। इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाओं का विस्तार किया जाना चाहिए।

5. भू-सुधार कार्यक्रमों का प्रभावी क्रियान्वयन – कृषि उत्पादकता में वृद्धि के लिए यह आवश्यक है। कि भू-धारण व्यवस्था में सुधार किया जाए, कृषकों को भू-स्वामी बनाया जाए तथा अलाभकारी जोतों को समाप्त किया जाए।

6. विपणन व्यवस्था में सुधार – विपणन व्यवस्था में सुधार किया जाना चाहिए, जिससे किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य प्राप्त होता रहे और किसान अधिक परिश्रम से कार्य करने के लिए प्रोत्साहित होते रहें।

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7. कृषि आगतों की उचित व्यवस्था – खाद एवं उर्वरक, कीटनाशक औषधियाँ एवं सुधरे बीजों को उचित मूल्य पर पर्याप्त मात्रा में वितरित किये जाने की उचित व्यवस्था की जानी चाहिए। कृषि अनुसन्धान संस्थाओं द्वारा उन्नत और उत्कृष्ट बीजों के प्रयोग के लिए अनुसन्धान किये जाने चाहिए।

8. परस्पर समन्वय एवं सहयोग – कृषि से सम्बन्धित विभिन्न संस्थाओं एवं सरकार के मध्य, कृषि से सम्बन्धित अधिकारियों एवं कृषकों के मध्य तथा. बड़े एवं छोटे कृषकों के मध्य परस्पर समन्वय एवं सहयोग की भावना रहनी चाहिए।

9. कृषि का यन्त्रीकरण – कृषि उत्पादकता में वृद्धि के लिए कृषि का यन्त्रीकरण (UPBoardSolutions.com) अब आवश्यक हो गया है, अतः कृषि-कार्य में अधिकाधिक ट्रैक्टरों, पम्पों, आधुनिक हलों, श्रेसिंग मशीनों आदि का व्यापक प्रयोग किया जाना चाहिए।

10. अन्य सुझाव – उपर्युक्त के अतिरिक्त कुछ अन्य सुझाव निम्नलिखित हैं –

  1. शिक्षा के प्रसार द्वारा किसानों के परम्परावादी दृष्टिकोण में परिवर्तन किया जाए।
  2. गहन कृषि एवं बहुफसली कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया जाए।
  3. सहकारी कृषि सुविधाओं का विस्तार किया जाए।
  4. फसल बीमा योजना को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।

प्रश्न 6.
हरित क्रान्ति क्या है ? हरित क्रान्ति के लाभों तथा हानियों का उल्लेख कीजिए।
या
हरित क्रान्ति को परिभाषित कीजिए एवं इसके कोई चार लाभ लिखिए। [2011]
या
हरित क्रान्ति किसे कहते हैं? भारत में हरित क्रान्ति के कोई दो लाभ बताइए। [2015]
या
हरित क्रान्ति से आप क्या समझते हैं? भारत में हरित क्रान्ति को सफल बनाने के लिए सुझाव दीजिए। [2018]
उत्तर :

हरित क्रान्ति

हरित क्रान्ति का सम्बन्ध खेती की हरियाली और कृषि उत्पादकता को बढ़ाने से है। भारत की चौथी पंचवर्षीय योजना में देश को खाद्यान्नों के लिए आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य स्वीकार करते हुए हरित क्रान्ति का शुभारम्भ किया गया। हरित क्रान्ति का सम्बन्ध ऐसी रणनीति से है, जिसमें कृषि की परम्परागत तकनीक के स्थान पर आधुनिक तकनीक का प्रयोग करते हुए कृषि उत्पादन में वृद्धि के प्रयास किये गये। आधुनिक कृषिगत उपकरणों, (UPBoardSolutions.com) उन्नत बीजों, रासायनिक खादों, सिंचाई सुविधाओं का तेजी से प्रयोग बढ़ाते हुए कृषि क्षेत्र में उत्पादकता की दृष्टि से क्रान्ति लाने के प्रयास किये गये। उत्पादन तकनीक में सुधार करते हुए हल के स्थान पर ट्रैक्टर, गोबर खाद के स्थान पर रासायनिक खाद, परम्परागत घरेलू बीजों के स्थान पर उन्नत उर्वरता वाले बीज और मानसून पर सिंचाई की निर्भरता के स्थान पर ट्यूबवेल, पम्प आदि से सिंचाई करने के प्रयास हरित क्रान्ति के दौर से आरम्भ किये गये।

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हरित क्रान्ति के लाभ

भारतीय कृषि पर हरित क्रान्ति के सफल प्रभावों में निम्नलिखित बिन्दु महत्त्वपूर्ण हैं –

  1. हरित क्रान्ति से विभिन्न कृषि-फसलों का उत्पादन तेजी से बढ़ा है। गेहूँ, ज्वार, बाजरा आदि खाद्य फसलों के उत्पादन में हुई तीव्र वृद्धि के कारण भारत आज खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हो चुका है।
  2. हरित क्रान्ति ने कृषि को एक सफल व्यवसाय के रूप में स्थापित किया है। आज कृषि किसान के लिए केवल पेट भरने की एक साधन मात्र नहीं है, वरन् आय-अर्जन का एक प्रमुख स्रोत बन चुकी है।
  3. कृषि-क्षेत्र के विकास ने देश के औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया है। वर्तमान में कृषि का देश के पूँजी-निर्माण एवं बचतों में पर्याप्त योगदान है।
  4. हरित क्रान्ति के कारण खाद्यान्नों की दृष्टि से भारत आत्मनिर्भर हो चुका है, जिससे देश में खाद्यान्नों के आयात में तेजी से कमी आयी है और भुगतान-सन्तुलन की प्रतिकूलता को कम करने में कृषि क्षेत्र ने पर्याप्त योगदान दिया है।
  5. हरित क्रान्ति ने कृषि एवं सम्बन्धित क्रियाओं में रोजगार के पर्याप्त अवसर सृजित किये हैं, जिससे देश की व्यावसायिक संरचना विस्तृत एवं आय-अर्जक बन गयी है।
  6. हरित क्रान्ति से कृषि श्रमिकों की आर्थिक दशा में सुधार आ गया है तथा यन्त्रों की सहायता मिलने से उनका कार्य भी सरल हो गया है।

हरित क्रान्ति के दोष (हानियाँ)

भारतीय कृषि पर हरित क्रान्ति के कुछ दोष भी हैं, जो निम्नवत् हैं –

1. कुछ फसलों तक सीमित – हरित क्रान्ति का प्रमुख दोष यह है कि यह गेहूँ, चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा आदि फसलों तक ही सीमित है। सभी फसलों को इसका लाभ नहीं मिल सका। व्यावसायिक फसलें इससे अछूती रही हैं।

2. कुछ राज्यों तक सीमित – हरित क्रान्ति कार्यक्रम केवल उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु राज्यों तक ही सीमित रहा, जिससे राष्ट्र का सन्तुलित विकास नहीं हो पाया। अन्य प्रदेश इससे वंचित रह गये, जिससे प्रादेशिक विषमताएँ बढ़ गयीं।

3. बड़े कृषकों को लाभ – हरित क्रान्ति से केवल बड़े कृषकों को ही लाभ (UPBoardSolutions.com) हुआ है, क्योंकि छोटे किसान साधनहीन होने के कारण इस कार्यक्रम का लाभ नहीं उठा सके हैं।

4. लक्ष्य से कम उत्पादन – हरित क्रान्ति का एक दोष यह है कि इसके आधार पर आशानुरूप उत्पादन की दिशा में सफलता प्राप्त नहीं हो सकी। अत: लोगों का विश्वास इस कार्यक्रम से हट गया।

5. पर्यावरण विघटन – हरित क्रान्ति के अनेक पर्यावरणीय दुष्परिणाम हुए हैं। अत्यधिक सिंचाई के कारण भूमिगत जल-स्तर नीचा हो गया है तथा मृदा अपरदन और भूमि उत्पादकता का ह्रास हुआ है। एक ही फसल लगातार बोने तथा उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से भूमि के प्राकृतिक तत्त्व विनष्ट हो जाते हैं। इनक दीर्घकालीन दुष्परिणाम होते हैं।

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हरित क्रान्ति की सफलता सम्बन्धी सुझाव

हरित क्रान्ति को सफल बनाने के उपाय/सुझाव निम्नलिखित हैं –

  1. किसानों को उन्नत बीज तथा उर्वरक सस्ते दामों में मिलने चाहिए।
  2. उपज का पर्याप्त मूल्य मिले तथा उसके भण्डारण की व्यवस्था होनी चाहिए।
  3. फसलों को आपदा से नुकसान की दशा में किसानों को मुआवजा मिलना चाहिए।
  4. कृषि शिक्षा तथा उन्नत प्रौद्योगिकी का प्रसार होना चाहिए।
  5. शोध व अनुसन्धान केन्द्रों की वृद्धि की जानी चाहिए।
  6. चकबन्दी जैसे भूमि सुधार कार्यक्रम पुनः चलाए जाने चाहिए।

प्रश्न 7.
भूमि-सुधार कार्यक्रम क्या है ? भारत में भूमिसुधार तथा उत्पादन वृद्धि के लिए किये गये प्रयासों का वर्णन कीजिए। [2010, 14]
या
भारत में कृषि विकास के लिए किये जाने वाले प्रयासों का उल्लेख कीजिए।
या
भूमि-सुधार से क्या तात्पर्य है ? भारत में भूमि-सुधार कार्यक्रमों का उल्लेख कीजिए तथा इन कार्यक्रमों की सफलता के लिए सुझाव दीजिए।
या
भूमि-सुधार के अन्तर्गत लागू किन्हीं दो कार्यक्रमों का वर्णन कीजिए। [2011] भूमि-सुधार से आप क्या समझते हैं? भारत में भूमि सुधार के उद्देश्य तथा कोई दो कार्यक्रम बताइट। [2013, 16, 18]
या
भारत में भूमि-सुधार के तीन उद्देश्य बताइए। [2016]
उत्तर :

भूमि-सुधार

‘भूमि-सुधार’ से अभिप्राय उन संस्थागत परिवर्तनों से है जिनसे भूमि का वितरण खेती करने वाले किसानों के पक्ष में होता है जिनसे जोतों के आकार में वृद्धि होने से खेत आर्थिक दृष्टि से लाभदायक बन जाते हैं। दूसरे शब्दों में, भूमिसुधार में वे सभी कार्य सम्मिलित किये जाते हैं जिनका सम्बन्ध भूमि-स्वामित्व एवं भूमि जोत दोनों में होने वाले सुधारों से है; जैसे—मध्यस्थों को उन्मूलन, जोतों की सुरक्षा, चकबन्दी, जोतों की उच्चतम सीमा का निर्धारण, सहकारी (UPBoardSolutions.com) खेती आदि।

(क) भारत में भूमि-सुधार के लिए किये गये प्रयास
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् भारत सरकार ने यह अनुभव किया कि देश के आर्थिक विकास के लिए कृषि का विकास परमावश्यक है और कृषि का विकास भूमि-सुधारों के बिना सम्भव नहीं है। अतः गत वर्षों मेंभारत में अनेक भूमि-सुधार किये गये हैं, जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं –

1. जमींदारी उन्मूलन – देश की लगभग 40% कृषि योग्य भूमि पर मध्यस्थ या जमींदार कब्जा किये हुए थे। ये मध्यस्थ कृषि-कार्य कृषि-श्रमिकों द्वारा करवाते थे। सन् 1952 तक लगभग सभी राज्यों में जमींदारी प्रथा का उन्मूलन कर दिया गया था, जिसके फलस्वरूप 2 करोड़ काश्तकारों को भू-स्वामित्व के अधिकार प्राप्त हो गये।

2. लगान का नियमन – विभिन्न कानूनों के माध्यम से देश में लगान की राशि निश्चित कर दी गयी है, जिससे किसानों को आर्थिक भार घट गया है। पहले काश्तकारों को कुल उपज का लगभग आधा भाग भू-स्वामी को लगान के रूप में देना पड़ता था, किन्तु अब देश के किसी भी राज्य में लगान की दर उपज के 2.5% से अधिक नहीं है।

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3. भूमि की बेदखली पर रोक – विभिन्न राज्यों में अधिनियम पारित करके भू-स्वामियों द्वारा पट्टेदारों को मनमाने ढंग से बेदखल करने के अधिकार को समाप्त कर दिया गया है।

4. जोतों की अधिकतम सीमा का निर्धारण (हदबन्दी) – विभिन्न राज्यों में वहाँ की परिस्थितियों के अनुसार जोतों की अधिकतम सीमा का निर्धारण किया जा चुका है। अधिकतम सीमा से अधिक भूमि का सरकार अधिग्रहण कर लेती है और ऐसी भूमि को भूमिहीन किसानों में बाँट दिया जाता है। अब तक देश में 30 लाख हेक्टेयर भूमि अतिरिक्त घोषित की जा चुकी है, जिसमें से अधिकांश भूमि भूमिहीन किसानों में बाँटी जा चुकी है।

5. चकबन्दी – चकबन्दी का अर्थ है-एक ही परिवार के बिखरे हुए खेतों को एक स्थान पर संगठित करना। अब तक देश में लगभग 592 हेक्टेयर भूमि की चकबन्दी की जा चुकी है।

6. सहकारी खेती – इस व्यवस्था के अन्तर्गत एक गाँव के किसान अपनी भूमि को एकत्रित करके उसे बड़े-बड़े फार्मों में बाँट लेते हैं। भूमि पर किसानों का व्यक्तिगत स्वामित्व बना रहता है, किन्तु कृषि-कार्य के प्रबन्ध के लिए किसान सहकारी समिति गठित कर लेते हैं, (UPBoardSolutions.com) समस्त कृषि-कार्यों को मिलकर करते हैं तथा लाभ को भूमि के मूल्य के आधार पर सदस्यों में बाँट दिया जाता है।

7. भूदान आन्दोलन – भूदान का अर्थ है-स्वेच्छा से भूमि दान में देना। भूमि-सुधार के इस ऐच्छिक आन्दोलन के प्रवर्तक आचार्य विनोबा भावे थे जो भूमि के असमान वितरण को समाप्त करना चाहते थे। इस आन्दोलन के फलस्वरूप 45 लाख एकड़ भूमि तथा 39,672 गाँव दान में मिल चुके हैं। 12 लाख एकड़ भूमि का भूमिहीन किसानों में वितरण भी किया जा चुका है।

(ख) उत्पादन में वृद्धि के लिए किये गये प्रयास

भारत सरकार द्वारा किये गये प्रयासों की अपनी महत्ता है, जो निम्नवत् है –

1. सिंचाई और जल संसाधन – भारत सरकार सिंचाई क्षमता को निरन्तर बढ़ाने का प्रयास कर रही है। मार्च 2010 तक 9.82 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षमता सृजित की गयी है। सरकार को प्रयास है कि सृजित क्षमता और उसके उपभोग के बीच के अन्तर को पूरा किया जाए।

2. बीज – कृषि में प्रति एकड़ उच्च उत्पादकता के लिए अच्छी किस्म के बीजों का प्रयोग महत्त्वपूर्ण है। राष्ट्रीय बीज नीति, किसानों को बीज की श्रेष्ठ किस्में और पौधारोपण सामग्री पर्याप्त मात्रा में प्रदान करती है।

3. उर्वरक – उर्वरक (एन०पी०के०) की खपत में निरन्तर वृद्धि हो रही है। वर्ष 2009-10 में इसकीखपत 264.86 लाख टन तक पहुँच गयी। उर्वरकों पर सरकार अनुदान भी दे रही है, जिससे किसान लोग अधिक-से-अधिक इसका प्रयोग करें।

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4. कृषि यान्त्रिकीकरण – कृषि में अब पशु-शक्ति का योगदान घटता जा रहा है। सन् 1971 में 45.30% से घटकर चालू वर्ष 2001-02 के दौरान यह 9.89% ही रह गया। सिंचाई और फसल काटने तथा ग्राहकों के प्रचालनों में भी पर्याप्त यान्त्रिकीकरण की ओर प्रगति की गयी है।

5. कृषि ऋण का प्रवाह – कृषि और सम्बद्ध कार्यकलापों के लिए संस्थागत ऋण का प्रवाह वर्ष 2001-02 में हैं ₹ 66.771 करोड़ के स्तर तक पहुँच गया।

किसान क्रेडिट कार्ड योजना वर्ष 1998 में प्रारम्भ की गयी। इस योजना ने बड़ी लोकप्रियता प्राप्त की और 27 वाणिज्यिक बैंकों, 373 जिला केन्द्रीय सहकारी बैंकों, राज्य सहकारी बैंकों और 196 ग्रामीण बैंकों द्वारा इसको प्रारम्भ किया गया है। 30 नवम्बर, 2001 ई० की स्थिति के अनुसार 20.4 मिलियन किसान क्रेडिट कार्ड, जिनमें ₹ 43,392 करोड़ की ऋण मंजूरियाँ सम्मिलित हैं, जारी किये गये थे। देश में 31 मार्च, 2011 तक बैंक द्वारा (UPBoardSolutions.com) ₹ 1038 करोड़ किसान क्रेडिट कार्ड जारी किए जा चुके हैं। किसान क्रेडिट कार्ड धारकों के लिए दुर्घटना से होने वाली मृत्यु अथवा स्थायी अपंगता के लिए ₹ 50,000 तथा ₹ 2,50,000 के व्यक्तिगत बीमा कवच को भी अन्तिम रूप दे दिया गया है।

6. कृषि बीमा – किसानों के हित और कृषि को एक व्यवसाय का रूप प्रदान करने की दिशा में राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना’ एक सराहनीय कदम है। यह योजना कृषि-मन्त्रालय की ओर से साधारण बीमा निगम द्वारा लागू की जा रही है। इस योजना का उद्देश्य सूखे, बाढ़, ओलावृष्टि, चक्रवात, आग, कीट, बीमारियों जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण फसल को हुई क्षति से किसानों का संरक्षण करना है।

7. कृषि-शिक्षण एवं अनुसन्धान – देश में कृषि–शिक्षण के लिए 21 विश्वविद्यालय खोले गये हैं। इसके अतिरिक्त रेडियो तथा दूरदर्शन पर भी प्रतिदिन कृषि-उत्पादन बढ़ाने के उपाय बताये जाते हैं। कृषि सम्बन्धी शोध तथा अनुसन्धानों पर बल दिया जा रहा है।

8. कृषि उपज की बिक्री में सुधार – कृषक को उसकी उपज का उचित मूल्य दिलवाने के लिए कई प्रयत्न किये गये हैं –

  • नियमित मण्डियाँ – अब तक 7000 से अधिक मण्डियों को नियमित किया जा चुका है।
  • मूल्य समर्थन नीति – इसमें सरकार किसानों को उनकी उपज की न्यूनतम कीमत देने का विश्वास दिलाती है। यह नीति गेहूं, चावल, कपास, चना आदि उपजों पर लागू की गयी है।
  •  सहकारी विपणन समितियाँ – ये समितियाँ अपने सदस्यों की उपज को उचित मूल्यों पर बेचती हैं, जिससे किसानों के आर्थिक लाभ में वृद्धि होती है।

9. भण्डारण एवं वितरण की व्यवस्था – अन्न के भण्डारण के लिए गोदाम बनाये गये हैं तथा उनका समुचित वितरण किया जाता है।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में से किन्हीं दो पर टिप्पणियाँ लिखिए – (क) जमींदारी उन्मूलन, (ख) चकबन्दी तथा (ग) हदबन्दी।
या
भूमि-सुधारों का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए (क) जमींदारी उन्मूलन, (ख) चकबन्दी। [2012, 16]
या
चकबन्दी किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार की होती है ?
या
निम्नलिखित का संक्षिप्त विवरण दीजिए (क) जमींदारी उन्मूलन, (ख) चकबन्दी। [2016]
उत्तर :
(क) जमींदारी उन्मूलन – देश की लगभग 40 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि पर मध्यस्थ या जमींदार कब्ज़ा किये हुए थे। ये मध्यस्थ कृषि-कार्य कृषि-श्रमिकों द्वारा करवाते थे। स्वतन्त्रता के पश्चात् सन् 1952 तक लगभग सभी राज्यों में जमींदारी प्रथा का उन्मूलन कर दिया गया, जिसके फलस्वरूप 2 करोड़ काश्तकारों को भू-स्वामित्व के अधिकार प्राप्त हो गये। इसके अतिरिक्त जमींदारों द्वारा किया जाने वाला काश्तकारों का शोषण भी समाप्त हो गया और वे मन लगाकर खेती करने लगे, जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई। किसानों का सरकार से सीधा सम्बन्ध स्थापित हो जाने के कारण अब किसानों को सरकारी सहायता प्राप्त करने (UPBoardSolutions.com) में भी कोई कठिनाई नहीं रही है।

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(ख) चकबन्दी – चकबन्दी का अर्थ है एक ही परिवार के बिखरे हुए खेतों को एक स्थान पर संगठित करना। अब तक देश में लगभग 592 हेक्टेयर भूमि की चकबन्दी की जा चुकी है चकबन्दी के दो रूप हैं-ऐच्छिक चकबन्दी एवं अनिवार्य चकबन्दी। ऐच्छिक चकबन्दी की प्रक्रिया में किसानों पर बिखरे हुए खेतों की चकबन्दी कराने के लिए कोई दबाव न डालकर किसान की इच्छा पर छोड़ दिया जाता है, जब कि अनिवार्य चकबन्दी की प्रक्रिया में किसानों की इच्छा को ध्यान में नहीं रखा जाता, वरन् किसानों को अनिवार्य रूप से चकबन्दी करानी पड़ती है। भारत में चकबन्दी का कार्य प्रगति पर है। पंजाब और हरियाणा में चकबन्दी का कार्य पूरा किया जा चुका है। उत्तर प्रदेश में भी 90% कार्य पूरा हो चुका है।

चकबन्दी के मार्ग में आने वाली कठिनाइयाँ निम्नलिखित हैं –

  1. किसानों का पैतृक भूमि के प्रति लगाव एवं मोह चकबन्दी के प्रयासों की दिशा में अनेक अवरोध खड़े करता है।
  2. किसान की बिखरी हुई भूमियाँ भिन्न-भिन्न उर्वरता वाली होती हैं, जिनका स्थिति के अनुसार भिन्न-भिन्न मूल्य होता है। चकबन्दी में किसानों को अपनी भूमि का उचित मूल्य नहीं मिलता और प्रायः भूमि की कम उर्वरता की समस्या चकबन्दी कार्य में आड़े आती है।
  3. पक्षपात एवं अविवेकपूर्ण ढंग से की गयी चकबन्दी प्रशासन तन्त्र की विश्वसनीयता पर प्रश्न- चिह्न लगाती है। इस पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण के कारण किसान चकबन्दी का विरोध करते हैं।
  4. चकबन्दी में बहुत कम किसानों को अनेक खेतों के बदले एक खेत मिलता है। (UPBoardSolutions.com) अधिकांश किसानों को उनके बिखरे हुए खेतों के बदले दो या तीन चक आवण्टित किये जाते हैं, जो चकबन्दी उद्देश्यों के विपरीत हैं।

चकबन्दी में अनेक कठिनाइयाँ निहित होते हुए भी यह किसानों को अनेक दृष्टि से लाभ पहुँचाती है –

  1. छोटे-छोटे खेतों की मेड़ों में भूमि का अपव्यय नहीं होता।
  2. बड़े चक के रूप में खेत का आकार बड़ा हो जाने के कारण आधुनिक उपकरणों; जैसे—ट्रैक्टर आदि का उपयोग आसान हो जाता है।
  3. एक स्थान पर भूमि हो जाने के कारण कृषि क्रियाकलापों की उचित देखभाल सम्भव हो पाती है।
  4. कृषि उत्पादन द्वारा आय और किसान के रहन-सहन के स्तर में सुधार होता है।
  5. खेत का आकार अधिक हो जाने से औसत उत्पादन लागत घट जाती है।
  6. कानूनी रूप से चक बन जाने के कारण भूखण्डों की सीमा को लेकर उत्पन्न होने वाले विवादों की समाप्ति हो जाती है।

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(ग) हदबन्दी – एक किसान को उतनी ही भूमि का स्वामी होना चाहिए जितनी भूमि को वह स्वयं जोत सकता हो। इससे अधिक भूमि पर वह मध्यस्थ का ही कार्य करेगा, अतः भू-जोतों की अधिकतम सीमा (हदबन्दी) लागू की जानी चाहिए। इस अतिरिक्त भूमि को भूमि जोतनेवाले अन्य कृषि श्रमिकों में वितरित कर देना चाहिए। भारत के राज्यों में भूमि की हदबन्दी के कानूनों को लागू करने के परिणामस्वरूप लगभग 30 लाख हेक्टेयर भूमि को अतिरिक्त घोषित कर दिया गया है। भूमि जोतों की हदबन्दी करने के चार उद्देश्य है।

  1. बड़े-बड़े भूखण्डों को प्रबन्ध योग्य छोटे भूखण्डों में बदलना ताकि उत्पादकता में वृद्धि की जा सके।
  2. किसानों की आवश्यकता से अधिक भूमि को भूमिहीन किसानों में वितरित करके सामाजिक न्याय की स्थापना करना।
  3. इस योजना द्वारा अधिक-से-अधिक व्यक्तियों को रोजगार की (UPBoardSolutions.com) सुविधाएँ उपलब्ध कराना।
  4. अतिरिक्त बंजर भूमि पर कमजोर वर्ग के लोगों को घर बसाने की सुविधा देना।

प्रश्न 9.
भारतीय कृषि का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए
(क) कृषि निविष्टियाँ और उनका महत्त्व [2014] तथा (ख) भावी सम्भावनाएँ।
उत्तर :
(क) कृषि निविष्टियाँ और उनका महत्त्व –
[संकेत–इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 2 का उत्तर देखें।]

(ख) भावी सम्भावनाएँ – कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय कृषि की भावी सम्भावनाएँ पर्याप्त उज्ज्वल हैं, क्योंकि भारतीय कृषि में सुधार आरम्भ हो चुके हैं और कई दिशाओं में उनके विस्तार की सम्भावनाएँ हैं। ये दिशाएँ निम्नलिखित हैं –

  1. उर्वरक उपभोग की खपत लगभग 50 किग्रा प्रति हेक्टेयर है। इसका अर्थ है कि किसान उन्नत बीजों और विकसित उत्पादन तकनीकी का प्रयोग कर रहे हैं। यह इस बात का सूचक है कि नयी प्रौद्योगिकी के विस्तार से कृषि उत्पादन एवं उत्पादकता में पर्याप्त वृद्धि होगी। इसी अधिक उपज देने वाली तकनीकी का विस्तार करके अन्य फसलों के उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि करना सम्भव है।
  2. लघु, मध्यम एवं विशाल स्तरीय सिंचाई परियोजनाओं का विस्तार करके दूर-दराज के क्षेत्रों में सिंचाई के लिए जल उपलब्ध कराकर कृषि उत्पादकता में वृद्धि करना सम्भव है।
  3. ऐसे क्षेत्रों में, जहाँ सिंचाई के लिए जल पहुँचाना सम्भव नहीं है, शुष्क कृषि-भूमि में उचित प्रकार के प्रौद्योगिकीय सुधारों को लागू करने की भी सम्भावनाएँ हैं।
  4. देश में भूमि-सुधार कार्यक्रमों को कठोरता से लागू करके कृषि के दोषों से छुटकारा पाना सम्भव है। भारत में परती भूमि तथा अन्य भूमियाँ पर्याप्त मात्रा में ऐसी हैं, जिनमें सुधार करके कृषि भूमि में वृद्धि की जा सकती है और कृषि उत्पादकता बढ़ायी जा सकती है।

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प्रश्न 10.
कृषि श्रमिक किसे कहते हैं ? कृषि श्रमिकों की किन्हीं चार प्रमुख समस्याओं का वर्णन कीजिए। इन समस्याओं के समाधान के लिए उपाय सुझाइए। [2014]
या
कृषि श्रमिकों की समस्याएँ हल करने के कोई चार उपाय बताइए। [2010]
या
भारत में कृषि श्रमिकों की समस्याओं का उल्लेख कीजिए। [2010]
या
कृषि श्रमिकों का क्या तात्पर्य है? उनकी दो प्रमुख समस्याओं का उल्लेख कीजिए। [2015]
या
कृषि श्रमिक से क्या तात्पर्य है? भारत में उनकी दशा सुधारने के लिए चार उपाय सुझाइए। [2016]
उत्तर :

कृषि श्रमिक

कृषि श्रमिक से अभिप्राय ऐसे व्यक्तियों से है, जो अपनी आजीविका के लिए कृषि पर आश्रित हैं। दूसरे शब्दों में, जिनकी आय का अधिकांश भाग कृषि में मजदूरी करने से ही प्राप्त होता है। भारत एक कृषिप्रधान देश है। जहाँ 70% लोग कृषि से सम्बद्ध कार्यों में लगे हुए हैं, परन्तु सभी को कृषक नहीं कहा जा सकता। कुछ व्यक्ति भूमिहीन हैं और वे दूसरों की भूमि पर काम करते हैं। ये अपनी स्वयं की शारीरिक शक्ति, हल-बैल तथा अन्य उपकरणों से दूसरों (UPBoardSolutions.com) की भूमि जोतते हैं और उत्पन्न फसल में से एक निश्चित हिस्सा प्राप्त करते हैं। वे कहीं-कहीं बँधुआ मजदूरों के रूप में भी कार्य करते हैं। ऐसे व्यक्ति कृषि श्रमिक की श्रेणी में आते हैं।

कृषि जाँच समिति के अनुसार, “कृषि श्रमिक वह व्यक्ति है, जो वर्ष-पर्यन्त अपने कार्य के समस्त दिनों में आधे से अधिक दिन किराये के श्रमिक के रूप में कृषि-कार्यों में लगा रहता है।

भारतीय कृषि श्रमिकों की समस्याएँ

भारतीय कृषि श्रमिकों के सम्मुख प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं –

1. मौसमी रोजगार एवं बेरोजगारी – अधिकांश कृषि श्रमिकों को वर्षभर कार्य नहीं मिल पाता है। 7.46 करोड़ कृषि श्रमिकों को वर्ष में 197 दिन अर्थात् साढ़े छ: महीने काम मिल पाता है। 40 दिन वह अपना कार्य करता है तथा शेष 128 दिन अर्थात् लगभग 4 महीने वह बेकार रहता है। बाल श्रमिकों को। वर्ष में केवल 204 दिन व स्त्री श्रमिकों को 141 दिन रोजगार मिलता है। शेष समय में ये लोग बेरोजगार रहते हैं।

2. ऋणग्रस्तता – भारतीय कृषि श्रमिकों को कम मजदूरी मिलती है। वह वर्ष में कई महीने बेरोजगार रहते हैं। इस कारण उनकी निर्धनता बढ़ जाती है। अपने सामाजिक कार्यो; अर्थात् विवाह, जन्म, मरण आदि के खर्चे की पूर्ति वे महाजनों से ऋण लेकर करते हैं। परिणामस्वरूप ऋणग्रस्तता अधिक होती जाती है और वे महाजन के चंगुल से कभी भी नहीं छूट पाते।

3. निम्न मजदूरी तथा निम्न जीवन-स्तर – भारत में कृषि श्रमिकों की मजदूरी इनकी आयु, लिंग आदि से निर्धारित होती है। साधारणत: स्त्रियों, बच्चों व बूढ़ों को कम मजदूरी दी जाती है। औसत दैनिक मजदूरी की दर इतनी कम होती है कि उस कम आय से कृषि श्रमिकों की आवश्यक आवश्यकताओं की भी पूर्ति नहीं हो पाती। इस कारण उनका जीवन-स्तर अत्यधिक निम्नकोटि का हो जाता है।

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4. बेगार की समस्या – ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ बड़े भू-स्वामी कृषि श्रमिकों को ऋण देते हैं। जब तक श्रमिक उस ऋण को वापस नहीं लौटाते तब तक वे श्रमिकों को कम मजदूरी देकर काम लेते हैं तथा कभी-कभी बिना मजदूरी दिये बेगार के रूप में भी काम कराते हैं।

5. आवास की समस्या – कृषि श्रमिकों की आवासीय स्थिति दयनीय होती है। इनके मकान प्रायः मिट्टी के कच्चे या झोंपड़ियाँ होती हैं, जिनमें सर्दी, गर्मी व वर्षा ऋतु में सुरक्षा का अभाव होता है। प्रायः समस्त परिवार एवं पशु रात के समय एक ही मकान में रहते हैं, जिससे वातावरण भी दूषित रहता है।

6. सहायक धन्धों की कमी – भारतीय कृषि श्रमिक वर्ष में लगभग 4 माह (UPBoardSolutions.com) बेकार रहते हैं। इस बेकार समय में उन्हें कोई और कार्य नहीं मिल पाता, क्योंकि पूँजी के अभाव में वे सहायक कुटीर-धन्धों की भी स्थापना नहीं कर पाते।

7. मशीनीकरण के द्वारा उत्पन्न समस्या – आज कृषि के क्षेत्र में अनेक नवीन उपकरणों एवं मशीनों का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। परिणामस्वरूप कृषि श्रमिकों के सामने और भी अधिक बेकारी की ” समस्या उत्पन्न होती जा रही है।

कृषि श्रमिकों की समस्याओं के समाधान हेतु सुझाव

भारतीय कृषि श्रमिकों की दशा में सुधार करने के लिए निम्नलिखित सुझाव भी दिये जा सकते हैं –

1. जनसंख्या पर नियन्त्रण – कृषि श्रमिकों की दशा में सुधार करने के लिए आवश्यक है कि जनसंख्या-वृद्धि पर नियन्त्रण किया जाए। इसके लिए परिवार नियोजन कार्यक्रम के प्रति श्रमिकों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

2. न्यूनतम मजदूरी कानून का प्रभावशाली क्रियान्वयन – कृषि श्रमिकों हेतु जो मजदूरी अधिनियम सरकार द्वारा बनाया हुआ है, उस नियम का क्रियान्वयन कड़ाई से किया जाना चाहिए।

3. काम करने की परिस्थितियों में सुधार – मौसम की दृष्टि से श्रमिक को किसी भी प्रकार की सुविधा नहीं होती, जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। अत: कृषि श्रमिकों की कार्य करने की परिस्थितियों में परिवर्तन किया जाना चाहिए।

4. शिक्षा का प्रसार – अधिकांश कृषि श्रमिक अशिक्षित हैं। उन्हें अपने अधिकार एवं कर्तव्यों के विषय में उचित जानकारी नहीं है। इसके लिए कृषि श्रमिकों को शिक्षित करना अनिवार्य है।

5. कृषि श्रमिकों का दृढ़ संगठन – औद्योगिक श्रमिकों की भाँति कृषि श्रमिकों को भी अपने अधिकारों की रक्षा एवं विकास के लिए दृढ़ श्रमिक संगठन बनाने चाहिए।

6. वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था – कृषि श्रमिकों की समस्याओं के समाधान हेतु आवश्यक है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि व्यवसाय के अतिरिक्त कुटीर उद्योग, लघु उद्योग एवं अन्य ग्रामीण व्यवसायों का अधिक-से-अधिक विकास किया जाए।

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7. भूमिहीन श्रमिकों के लिए भूमि की व्यवस्था – भूमिहीन श्रमिकों की दशा में सुधार करने एवं उन्हें शोषण से मुक्त कराने के लिए यह आवश्यक है कि उनके लिए भूमि की व्यवस्था की जाए।

8. आवास की व्यवस्था – कृषि श्रमिकों को मकान के लिए नि:शुल्क भूमि (UPBoardSolutions.com) तथा बनाने के लिए आर्थिक सहायता भी उपलब्ध करायी जानी चाहिए।

9. कृषि श्रमिकों के लिए वित्त की व्यवस्था – कृषि श्रमिकों को ऋण से मुक्ति दिलाने के लिए पुराने ऋण पूर्णतः समाप्त किये जाएँ तथा भविष्य में श्रमिकों की आवश्यकताओं को दृष्टिगत रखकर एक दीर्घकालीन वित्त-व्यवस्था की जाए, जो श्रमिकों के संकट के समय उन्हें सहायता प्रदान कर सके।

समस्या के निवारण हेतु सरकार द्वारा किये गये प्रयास

कृषि श्रमिकों की समस्या के निवारण हेतु सरकार ने निम्नलिखित कदम उठाये हैं –

1. बँधुआ मजदूरी प्रथा का अन्त – ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिहीन मजदूरों की एक बड़ी संख्या ऐसी है जो बँधुआ मजदूरों के रूप में काम करती थी। जुलाई, 1975 ई० में प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने 20 सूत्री कार्यक्रम के अन्तर्गत यह घोषित किया कि अगर कहीं बँधुआ मजदूर हैं तो उन्हें मुक्त कर दिया जाए। केन्द्रीय श्रम मन्त्रालय ने एक अध्यादेश जारी करके बँधुआ मजदूरी प्रथा को समाप्त कर दिया।

2. न्यूनतम मजदूरी अधिनियम – सन् 1948 ई० में भारत सरकार ने कृषि श्रमिकों पर न्यूनतम मजदूरी कानून लागू किया था। इस कानून में सन् 1951, 54, 59, 60 तथा 75 में संशोधन किये गये। इस कानून द्वारा मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी की दर निर्धारित कर दी गयी है।

3. भूमिहीन श्रमिकों के लिए भूमि की व्यवस्था – सरकार ने जोतों की सीमा का निर्धारण करके अतिरिक्त भूमि को भूमिहीन कृषि श्रमिकों में बाँटने की व्यवस्था की तथा भूदान (भूदान आन्दोलन का प्रारम्भ 1952 ई० में किया गया), ग्रामदान आन्दोलनों आदि से प्राप्त भूमि को भूमिहीन कृषि श्रमिकों में बाँटा गया। लगभग सभी राज्य सरकारों ने इस प्रकार से प्राप्त भूमि के हस्तान्तरण व प्रबन्ध के लिए आवश्यक कानून बनाये हैं।

4. भूमिहीन कृषि श्रमिकों के लिए आवास-व्यवस्था – भूमिहीन कृषि श्रमिकों को मकान बनाने के लिए नि:शुल्क भूमि की व्यवस्था कराने की योजना को 1971 ई० से आरम्भ किया गया है। निर्धन परिवारों को आवास-सुविधा उपलब्ध करने के लिए निर्बल वर्ग आवास योजना तथा इन्दिरा आवास योजनाएँ चल रही हैं।

5. ग्रामीण कार्य योजना – कृषि श्रमिकों की बेरोजगारी दूर करने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा ग्रामीण कार्य योजना आरम्भ की गयी। इसके अन्तर्गत लघु और मध्यम सिंचाई साधनों का विकास, भूमि संरक्षण आदि कार्य सम्मिलित हैं।

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6. कृषि श्रमिक सहकारिता संगठन – कृषि श्रमिक सहकारी समितियाँ, लघु एवं सीमान्त कृषकों, ग्रामीण दस्तकारों तथा श्रमिकों को सुविधाएँ देने के उद्देश्य से स्थापित की गयी हैं। ऐसी समितियाँ नहरों एवं तालाबों की खुदाई, सड़कों के निर्माण आदि कार्यों का ठेका लेती हैं, जिससे श्रमिकों को रोजगार के अवसर मिलते हैं। अब तक लगभग ऐसी 213 समितियों की स्थापना हो चुकी है।

7. कुटीर एवं लघु उद्योगों का विकास – कृषि पर बढ़ती हुई जनसंख्या के भार को कम करने के लिए सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर एवं लघु उद्योगों के विकास को महत्त्व दिया है।

8. सीमान्त कृषक और कृषि श्रमिक योजना – सीमान्त कृषकों तथा कृषि श्रमिकों की सहायता के लिए सरकार ने देश के 87 जिलों में पायलट प्रोजेक्ट्स चलाये हैं। इस कार्यक्रम के अन्तर्गत प्रत्येक जिले में 20 हजार सीमान्त कृषकों तथा कृषि श्रमिकों को वित्तीय सहायता दी गयी है।

9. ऋण-मुक्ति कानून – कृषि श्रमिकों को ऋण से मुक्ति दिलाने के लिए उत्तर प्रदेश तथा कई अन्य राज्यों ने अध्यादेश के माध्यम से कानून बनाया है। सन् 1975 में लघु कृषकों, भूमिहीन कृषकों व कारीगरों को महाजनों के ऋणों से मुक्ति की (UPBoardSolutions.com) घोषणा की गयी है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के योगदान पर प्रकाश डालिए। [2015]
या
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के छः महत्त्वों का वर्णन कीजिए। [2014, 15]
उत्तर :

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान

भारत एक कृषि-प्रधान देश है। यहाँ की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यहाँ 70% लोग कृषि और कृषि से सम्बद्ध कार्यों में लगे हुए हैं। कृषि ही देश की अधिकांश जनसंख्या को आजीविका प्रदान करती है। राष्ट्रीय उत्पाद में कृषि का एक बड़ा अंश है। हमारे देश के अधिकतर उद्योग-धन्धे कृषि पर आधारित हैं। इस प्रकार भारतीय अर्थव्यवस्था का ताना-बाना कृषि पर ही बुना हुआ है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के महत्त्व व योगदान को निम्नवत् स्पष्ट किया गया है –

1. राष्ट्रीय आय का प्रमुख आधार – भारत के 58% से अधिक लोग कृषि और कृषि से सम्बद्ध कार्यों में लगे हुए हैं। स्पष्ट है कि कृषि राष्ट्रीय आय का प्रमुख आधार है। वर्ष 2000-01 में, जब कृषि-क्षेत्र में वृद्धि-0.2% थी तो सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर भी घट कर 4% रह गयी थी। इसी आधार पर कहा जा सकता है कि कृषि-क्षेत्र राष्ट्रीय आय का मुख्य स्रोत और आधार है। राष्ट्रीय आय को लगभग 28% भाग कृषि-आय से प्राप्त होता है।

2. विदेशी व्यापार में महत्त्व व विदेशी मुद्रा की प्राप्ति – कृषि निर्यात देश के कुल वार्षिक निर्यात का 13 से 18% भाग है। वर्ष 2011-12 में यह 27.68% था। इस वर्ष देश से १ 3.804 करोड़ से अधिक मूल्य के कृषि उत्पादों का निर्यात किया गया, जिनमें 23% (UPBoardSolutions.com) हिस्सा समुद्री उत्पादों का था। अनाज (अधिकांश चावल), खली, चाय, कॉफी, काजू एवं मसाले अन्य महत्त्वपूर्ण उत्पाद हैं, जिनमें से प्रत्येक का देश के कुल कृषि निर्यातों में लगभग 5 से 15% हिस्सा है। मांस एवं मांस उत्पाद, फलों एवं सब्जियों के निर्यात में भी वृद्धि हुई है।

3. उद्योगों का आधार – भारत के प्रमुख उद्योग-धन्धे कच्चे माल के लिए कृषि पर ही आधारित हैं। सूती वस्त्र, जूट, चीनी, वनस्पति तेल, हथकरघा, खाद एवं पेय पदार्थ आदि धन्धे कृषि पर आधारित हैं। इसके अतिरिक्त कृषि में प्रयोग होने वाले यन्त्र; जैसे-ट्रैक्टर, टिलर, उर्वरक आदि बनाने वाले उद्योगों की तो कृषि ही जननी है। कीटनाशक दवाइयाँ बनाने का उद्योग भी कृषिजनित ही है।

4. राजस्व की प्राप्ति – कृषि से राज्य सरकारों को लगान के रूप में राजस्व की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त विभिन्न मण्डी समितियों को भी कृषि से आये प्राप्त होती है। कहीं पर स्थानीय निकाय भी कृषि उत्पादों के आवागमन पर चुंगी कर की वसूली करते हैं।

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5. रोजगार के अवसर – देश की लगभग 58% से अधिक जनसंख्या कृषि कार्य में लगी हुई है, जिसको कृषि से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्राप्त होता है। अन्यथा भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में इतने अधिक रोजगार के अवसर सम्भव नहीं हो पाते।

6. पूँजी संचय में योगदान – कृषि देश के आर्थिक विकास के लिए पूँजी जुटाने में सहायक होती है, क्योकि कृषि द्वारा उत्पादन तथा आय में वृद्धि होती है।

7. खाद्य पदार्थों की प्राप्ति – भारतीय जनसंख्या को भोज्य पदार्थ कृषि से ही प्राप्त होते हैं। पहले भारत खाद्य-पदार्थों का आयात करता था, जिसका हमारी आर्थिक व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता था। परन्तु आज जनसंख्या बढ़ जाने पर भी कृषि में हरित क्रान्ति के कारण भारत खाद्य पदार्थों में आत्मनिर्भर हो गया है।

8. आजीविका का आधार – भारत की लगभग तीन-चौथाई आबादी गाँवों में रहती है, जिसकी आजीविका का प्रमुख स्रोत कृषि है। देश की लगभग दो-तिहाई जनसंख्या कृषि-कार्य से आजीविका प्राप्त करती है। भू-स्वामियों तथा कृषकों के अतिरिक्त भूमिहीन कृषक, कृषि मजदूरी द्वारा आजीविका प्राप्त करते हैं।

9. बाजार के विस्तार में सहायक – कृषि उत्पादन में वृद्धि होने से वस्तुओं की माँग बढ़ती है, जिससे बाजार का विस्तार होता है।

10. परिवहन का विकास – कृषि उत्पादों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने में रेल एवं सड़क परिवहन का उल्लेखनीय योगदान है। इस प्रकार कृषि परिवहन सेवाओं का भी विकास करती है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था (UPBoardSolutions.com) में कृषि का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसी के माध्यम से ही उसे अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई है।

प्रश्न 2.
भूमि-सुधार से किसानों को मिलने वाले चार लाभों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
भूमि सुधार से किसानों को मिलने वाले चार लाभ निम्नलिखित हैं –

  1. छोटे-छोटे खेतों की मेड़ों में भूमि का अपव्यय नहीं होता।
  2. बड़े चक के रूप में खेत का आकार बड़ा हो जाने के कारण आधुनिक उपकरणों; जैसे-ट्रैक्टर आदि का उपयोग आसान हो जाता है।
  3. एक स्थान पर भूमि हो जाने के कारण कृषि क्रियाकलापों की उचित देखभाल सम्भव हो पाती है।
  4. कृषि उत्पादन द्वारा आय और किसान के रहन-सहन के स्तर में सुधार होता है।

प्रश्न 3.
भारत की राष्ट्रीय आय में कृषि का क्या योगदान है ?
उत्तर :
भारत की सकल घरेलू उत्पाद दर 2009-10 में 8.4 प्रतिशत से घटकर 2011-12 में 6.9 प्रतिशत हो गयी जो 6.5 प्रतिशत अनुमानित थी। यद्यपि सकल घरेलू उत्पाद में हो रही धीमी बढ़ोत्तरी का मुख्य कारण 2011-12 में हुआ औद्योगिक विकास रहा लेकिन हम निर्यात में हो रही कमी को भी अनदेखा नहीं कर सकते। इसी आधार पर कहा जा सकता है कि कृषि-क्षेत्र राष्ट्रीय आय का मुख्य स्रोत और आधार है। राष्ट्रीय आय का लगभग एक-तिहाई भाग कृषि-क्षेत्र से प्राप्त होता है। यह एक विकासशील अर्थव्यवस्था की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। जब आर्थिक विकास की प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो कृषि का योगदान घटता जाता है और उद्योगों का बढ़ता जाता है। ऐसा ही भारत में भी हो रहा है और अनुमान है कि आगे आने वाले समय में भी भारत की राष्ट्रीय आय में कृषि सबसे बड़े घटक की भूमिका निभाती रहेगी।

प्रश्न 4.
भूमि के उपविभाजन तथा अपखण्डन से क्या अभिप्राय है ? भारत में भूमि के अपखण्डन के क्या कारण हैं ?
उत्तर :
उपविभाजन – भूमि को किन्हीं कारणों से दो या दो से अधिक भागों में बाँटना अर्थात् विभाजन करना, भूमि का उपविभाजन कहलाता है। यह विभाजन उत्तराधिकार के नियमों या अन्य कारणों से भी हो सकता है, क्योंकि जब परिवार के मुखिया की मृत्यु हो जाती है तो उसकी भूमि को उसके पुत्रों में बाँट दिया जाता है।

अपखण्डन – भूमि के अपखण्डन का अर्थ है-कृषि की उस समस्त भूमि (UPBoardSolutions.com) से जो एक स्थान पर न होकर अनेक स्थानों पर छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखरी हुई होती है और उन सभी में से प्रत्येक हिस्सेदार को अपना हिस्सा प्राप्त करना होता है।

भारत में भूमि के अपखण्डन के निम्नलिखित कारण पाये जाते हैं –

  1. उत्तराधिकार के नियम।
  2. जनसंख्या की तीव्र गति से वृद्धि।
  3. पैतृक भूमि के प्रति लगाव।
  4. भारतीय कृषकों की ऋणग्रस्तता।
  5. ग्रामीण उद्योगों को पतन।
  6. कृषकों की अज्ञानता एवं शिक्षा का अभाव।
  7. संयुक्त परिवार प्रणाली का ह्रास।

प्रश्न 5.
हरित क्रान्ति ने भारत की खाद्य समस्या को हल करने में क्या योगदान दिया है ?
उत्तर :
भारत की लगातार बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए खाद्य पदार्थ अथवा अन्न का अधिक-से-अधिक उत्पादन करना आवश्यक था, अत: सरकार ने खाद्यान्नों के उत्पादन में वृद्धि के लिए कृषि में उन्नत बीज, खाद, रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया, सुनिश्चित जलपूर्ति की व्यवस्था की तथा नवीन उपकरणों का प्रयोग किया। परिणामस्वरूप गेहूँ तथा चावल के उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि हुई। खाद्यान्नों के उत्पादन में लायी गयी इस क्रान्ति को ही (UPBoardSolutions.com) हरित क्रान्ति कहते हैं। हरित क्रान्ति कार्यक्रम से देश के कृषि उत्पादन में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है। सन् 1977 से पूर्व भारत खाद्यान्नों का आयात करता था, अब वह इस क्षेत्र में लगभ आत्मनिर्भर बन गया है। डॉ० सी०एच० हनुमन्तराव के शब्दों में, “हरित क्रान्ति के लाभों में गाँव के सभी वर्गों को हिस्सा मिला है और इससे वास्तविक मजदूरी तथा रोजगार में वृद्धि हुई है।” यदि हरित क्रान्ति को लगन तथा हृदय से लागू किया जाए तो यह कृषि जगत् के लिए वरदान सिद्ध होगी।

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प्रश्न 6.
भारत में कृषि के विकास में प्रयोग की जाने वाली नवीन तकनीकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
भारत में अब कृषि के क्षेत्र में उत्पादन के पुराने और परम्परागत तरीकों के स्थान पर नयी टेक्नोलॉजी का प्रयोग किया जाने लगा है। भूमि-सुधार से अब भू-धारण प्रणाली में परिवर्तन लाने, भू-जोत की अधिकतम सीमा निर्धारित करने, चकबन्दी आदि पर बल दिया जाता है। इसी प्रकार आधुनिक टेक्नोलॉजी से अधिक उपज वाले बीजों, उर्वरकों, कीटनाशकों व पानी के नियन्त्रित प्रयोग पर अधिक बल दिया जाता है। इस प्रकार नयी कृषि टेक्नोलॉजी ‘पैकेज दृष्टिकोण’ पर जोर देती है, क्योंकि इसमें पैकेज के सभी तत्त्वों को एक साथ प्रयोग करना होता है। नयी टेक्नोलॉजी के प्रयोग से भारतीय कृषि का आधुनिकीकरण हो गया है। अधिक उपज वाले बीजों के प्रयोग के फलस्वरूप भारत में गेहूँ और चावल की खेती के क्षेत्रफल में तो वृद्धि हुई ही है, लेकिन इनके उत्पादन में गत वर्षों की तुलना में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। नयी टेक्नोलॉजी के फलस्वरूप कृषि-उत्पादन में होने वाली अधिक वृद्धि को हरित क्रान्ति का नाम दिया जाता है। यह वृद्धि अधिक भूमि पर खेती कर, अच्छे बीजों, खादों और पानी के नियन्त्रित प्रयोग के कारण सम्भव हो पायी है। फलस्वरूप भारत खाद्यान्नों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने में सफल हुआ है।

उन्नत किस्म के बीजों में भारतीय भूमि तथा दशाओं के अनुसार सुधार करके विभिन्न फसलों की कृषि उत्पादकता में वृद्धि की जा सकती है। उदाहरण के लिए-रूस के कृषि वैज्ञानिक ने उन्नत बीजों की एक नयी विधि का आविष्कार किया है जिसके द्वारा आलू व टमाटर दोनों एक ही पौधे से तैयार किये जाएँगे। इस नयी विधि से पौधे की जड़ में आलू और ऊपर टहनियों में टमाटर पैदा होगा। इस नयी किस्म के पौधे का नाम आलू और टमाटर के नामों का मिला-जुला नाम पोमेटो (Pomato) रखा गया है।

केन्द्रीय आलू अनुसन्धान संस्थान, शिमला ने आलू के बहुत छोटे आकार के बीज का (UPBoardSolutions.com) आविष्कार किया है, जिसे ‘सूक्ष्म कन्द’ कहा जाता है। वर्तमान में आलू की औसत उपज 15 टन प्रति हेक्टेयर है किन्तु इस नये बीज ‘सूक्ष्म कन्द’ से आलू की औसत उपज 25 टन प्रति हेक्टेयर प्राप्त हुई है जो कि अमेरिका व जर्मनी की औसत उपज के बराबर है।

उन्नत बीजों व उर्वरकों के अधिक प्रयोग की स्थिति में खेती को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। अतः सिंचाई के साधनों में वृद्धि तथा सुधार करके कृषि उत्पादकता में वृद्धि की जा सकती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्व दर्शाने वाले दो प्रमुख बिन्दु लिखिए।
उत्तर :
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्व दर्शाने वाले दो प्रमुख बिन्दु निम्नलिखित हैं –

  1. राजस्व की प्राप्ति
  2. उद्योगों का आधार।

प्रश्न 2.
भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के तीन प्रमुख कारण लिखिए। [2013, 14]
उत्तर :
भारतीय कृषि के पिछड़ेपन के तीन प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

  1. कृषि जोतों का छोटा होना
  2. सिंचाई-सुविधाओं का अभाव।
  3. उत्तम बीज व खाद का अभाव।

प्रश्न 3.
भारत में किन्हीं दो प्रमुख भूमि-सुधारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
भारत के दो प्रमुख तथा प्रभावी भूमि-सुधार हैं –

  1. जमींदारी उन्मूलन व मध्यस्थों की समाप्ति तथा
  2. चकबन्दी व भूमि की अधिकतम जोत का निर्धारण अर्थात् हदबन्दी।

प्रश्न 4.
भारत में कृषि का राष्ट्रीय आय में कितना योगदान है ?
उत्तर :
भारत में कृषि का राष्ट्रीय आय में (UPBoardSolutions.com) लगभग 28% का योगदान है।

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प्रश्न 5.
भारत में मुख्यतः कितने प्रकार की फसलें होती हैं ?
उत्तर :
भारत में मुख्यत: दो प्रकार की फसलें होती हैं—

  1. रबी की फसल तथा
  2. खरीफ की फसल।

प्रश्न 6.
भारत की दो नकदी फसलों का उल्लेख कीजिए। (2018)
उत्तर :

  1. गन्ना तथा
  2. जूट भारत की दो नकदी फसलें हैं।

प्रश्न 7.
जमींदारी उन्मूलन के एक प्रमुख प्रभाव को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
जमींदारी के उन्मूलन से काश्तकार भू-स्वामी बन गये।

प्रश्न 8.
चकबन्दी से होने वाले एक प्रमुख लाभ का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
चकबन्दी द्वारा अपखण्डित जोतों (खेतों) को एक स्थान पर लाया जा सका, (UPBoardSolutions.com) जिससे उन पर कृषि निविष्टियों के प्रयोग में सुविधा हो गयी।

प्रश्न 9.
भूमि की चकबन्दी का एक प्रमुख उद्देश्य लिखिए।
या
जोतों की चकबन्दी का क्या अर्थ है ?
उत्तर :
अपखण्डित जोतों (खेतों) को एक स्थान पर लाना ही चकबन्दी का प्रमुख उद्देश्य और अर्थ है।

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प्रश्न 10.
कृषि के उत्पादन में वृद्धि के लिए कोई दो महत्वपूर्ण उपाय लिखिए।
उत्तर :
कृषि के उत्पादन में वृद्धि के लिए दो महत्त्वपूर्ण उपाय निम्नलिखित हैं –

  1. किसानों को कृषि शिक्षा एवं प्रशिक्षण देना।
  2. कृषि सुविधाओं को पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराना।

प्रश्न 11.
कृषि उत्पादों पर आधारित दो उद्योगों के नाम लिखिए। [2014]
उत्तर :
कृषि उत्पादों पर आधारित दो उद्योगों के नाम हैं—

  1. चीनी उद्योग तथा
  2. सूती वस्त्र उद्योग।

प्रश्न 12.
भूमिहीन श्रमिक से आप क्या समझते हैं?
उत्तर :
भूमिहीन श्रमिक वह है जो दूसरों की भूमि पर मजदूर के रूप में कृषि-कार्य करता है।

प्रश्न 13.
कृषि श्रमिक से क्या आशय है ?
उत्तर :
कृषि श्रमिक से आशय ऐसे व्यक्ति से है जो अपनी (UPBoardSolutions.com) आजीविका के लिए कृषि पर आश्रित है।

प्रश्न 14.
आश्रित जनसंख्या से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
वह जनसंख्या जो किसी भी उत्पादन क्रिया में लीन नहीं है तथा अपनी आजीविका के लिए दूसरों पर निर्भर है, आश्रित जनसंख्या कहलाती है।

प्रश्न 15.
भारत में भूमि-सुधार के कोई दो उद्देश्य लिखिए।
उत्तर :
भारत में भूमि सुधार के दो उद्देश्य हैं –

  1. उत्पादन में वृद्धि तथा
  2. सामाजिक न्याय दिलाना।

UP Board Solutions

प्रश्न 16.
भारत में नीची कृषि उत्पादकता के कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर :
भारत में नीची कृषि उत्पादकता के दो कारण हैं –

  1. उत्पादन की परम्परागत तकनीक तथा
  2. अपवाही सिंचाई एवं वित्त सुविधाओं का अभाव।

प्रश्न 17.
भारत में भूमि-सुधार कार्यक्रमों की सफलता के लिए दो सुझाव दीजिए। [2018]
उत्तर :
भूमि-सुधार कार्यक्रमों की सफलता के लिए दो सुझाव निम्नलिखित हैं –

  1. भूमि-सुधार कार्यक्रम को समन्वित रूप में लागू किया जाना चाहिए।
  2. भूमि सम्बन्धी अभिलेखों को पूर्ण किया (UPBoardSolutions.com) जाना चाहिए।

प्रश्न 18.
गहन कृषि पर टिप्पणी लिखिए। [2014]
उत्तर :
कृषि की वह पद्धति जिसके अन्तर्गत कृषक सापेक्षतः एक छोटे क्षेत्र पर अधिक श्रम व पूँजी की सहायता से कृषि करते हैं, गहन कृषि कहलाती है। इस पद्धति में भूमि में परती न छोड़कर लगातार फसलें उत्पन्न की जाती हैं। इसीलिए अधिक श्रम व पूँजी की आवश्यकता पड़ती है। गहन खेती के अन्तर्गत मुख्यतः नकदी फसलें उगायी जाती हैं जिससे कृषकों को अधिक-से-अधिक लाभ प्राप्त होता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. भारत से निर्यात होने वाले प्रमुख कृषि पदार्थ हैं –

(क) गेहूँ, चावल; चाय, कहवा
(ख) चाय, कहवा, कपास, जूट
(ग) चाय, मसाले, काजू, तम्बाकू
(घ) गन्ना, फल, सब्ज़ियाँ, जूट

2. भारतीय कृषि में निम्न उत्पादकता का कारण है –

(क) पिछड़ी तकनीकी
(ख) जोत का छोटा आकार
(ग) साख का अभाव
(घ) ये सभी

3. हरित क्रान्ति सम्बन्धित है – [2013]

(क) कृषि के व्यापारीकरण से
(ख) कृषि उत्पादन में आत्मनिर्भरता से
(ग) पशुधन विकास से
(घ) कृषि उत्पादन में वृद्धि से

4. हरित क्रान्ति का आधार है –

(क) उन्नत बीज, सिंचाई, उर्वरक, कीटनाशक
(ख) पशुधन, उर्वरक, उन्नत कृषि-उपकरण, भण्डारण
(ग) मानव-श्रम, पशुधन, उर्वरक, कृषि-उपकरण
(घ) सिंचाई, मानव-श्रम, कृषि-उपकरण, उर्वरक

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5. भारतीय कृषि के पिछड़ेपन का/के कारण है / हैं –

(क) कृषकों की निर्धनता
(ख) अपखण्डित कृषि-जोत
(ग) सिंचाई तथा उर्वरकों की कमी।
(घ) ये सभी

6. भारत में कृषि भूमि का प्रतिशत क्या है? [2012]

(क) 19.27%
(ख) 18%
(ग) 21.4%
(घ) 20%

7. भू-दान आन्दोलन कब प्रारम्भ किया गया?

(क) 1951 ई० में
(ख) 1952 ई० में
(ग) 1953 ई० में
(घ) 1954 ई० में

8. अन्त्योदय कार्यक्रम क्रियान्वित करने में अग्रणी राज्य है –

(क) उत्तर प्रदेश
(ख) राजस्थान
(ग) हिमाचल प्रदेश
(घ) बिहार

9. भारत में भूमि-सुधार के अन्तर्गत सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम है –

(क) चकबन्दी
(ख) मेंड़बन्दी
(ग) वृक्षारोपण
(घ) यन्त्रीकरण

10. भारत में हरित क्रान्ति का सूत्रपात बीसवीं शताब्दी के किस दशक में हुआ?

(क) पाँचवें
(ख) छठवें
(ग) सातवें
(घ) आठवें

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11. निम्नलिखित में से कौन कृषि निविष्टि है? [2016]

(क) बीज
(ख) शक्ति
(ग) सिंचाई
(घ) ये सभी

12. ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका का मुख्य स्रोत क्या है? [2010, 18]

(क) नौकरी
(ख) व्यापार
(ग) उद्योग
(घ) कृषि

13. निम्नलिखित में से कौन कृषि निविष्टि नहीं है? [2013]

(क) बीज
(ख) पूँजी
(ग) लगान
(घ) व्यापार

14. कौन कृषि आगत नहीं है? [2014]

(क) बीज
(ख) सिंचाई
(ग) उद्योग
(घ) उर्वरक

उत्तरमाला

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 (Section 4)

Hope given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 4 are helpful to complete your homework.

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UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 8 वायु : शुद्ध वायु का महत्त्व एवं संवातन

UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 8 वायु : शुद्ध वायु का महत्त्व एवं संवातन

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
वायु क्या है? इसमें सम्मिलित तत्त्वों का वर्णन कीजिए। शुद्ध वायु स्वास्थ्य के लिए क्यों आवश्यक है?
या
वायु के प्राकृतिक संगठन का विस्तार से वर्णन कीजिए।शुद्ध वायु के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
वायु से प्रत्येक व्यक्ति भली-भाँति परिचित है। भले ही वायु को हम देख नहीं सकते परन्तु प्रत्येक व्यक्ति वायु का अनुभव एवं सेवन करता रहता है। प्राणी-मात्र के जीवन का आधार वायु ही है। वायु के अभाव में किसी प्रकार के जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अब प्रश्न उठता है कि वैज्ञानिक (UPBoardSolutions.com) दृष्टिकोण से वायु क्या है? वायु वास्तव में कुछ गैसों का मिश्रण है। गैसों का यह मिश्रण रंगहीन, स्वादहीन तथा गन्धहीन होता है। वायु में भार होता है तथा यह दबाव डालती है। वायु फैल सकती है तथा संकुचित हो सकती है। इसमें विसरण का गुण भी पाया जाता है। वायु हमारी पृथ्वी के चारों ओर एक व्यापक क्षेत्र में हर समय रहती है। इस क्षेत्र को वायुमण्डल कहा जाता है।

वायू का संगठन

एक समय था जब वायु को एक तत्त्व समझा जाता था। उस समय वायु की गिनती पाँच मुख्य तत्त्वों में की जाती थी, परन्तु विभिन्न वैज्ञानिक खोजों के परिणामस्वरूप इस धारणा को बदलना पड़ा। वर्तमान ज्ञान के अनुसार वायु विभिन्न गैसों का मिश्रण मात्र है। वायु में विद्यमान मुख्य गैसें हैं-ऑक्सीजन (UPBoardSolutions.com) तथा नाइट्रोजन। इन दो मुख्य गैसों के अतिरिक्त वायु में कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, ओजोन, हाइड्रोजन, ऑर्गन तथा जलवाष्प भी विद्यमान रहती है। वायु में लगभग पाँचवा भाग ऑक्सीजन होता है। वायु में विद्यमान गैसों का संगठन निम्नवर्णित तालिका द्वारा स्पष्ट हो जाएगा।
UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 8 वायु  शुद्ध वायु का महत्त्व एवं संवातन
वायु के इस संगठन को चित्र द्वारा भी दर्शाया गया है। वायु में विद्यमान विभिन्न गैसों का सामान्य परिचय निम्नवर्णित है
UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 8 वायु  शुद्ध वायु का महत्त्व एवं संवातन
ऑक्सीजन:
वायु में ऑक्सीजन का आयतन लगभग 21% होता है। ऑक्सीजन जीवन के लिए . अति आवश्यक है। इसे प्राण-वायु भी कहते हैं। ऑक्सीजन प्रायः सभी जीवधारियों की श्वसन क्रिया के लिए आवश्यक है। प्राणी हों अथवा पौधे, सभी श्वसन क्रिया के लिए ऑक्सीजन लेते हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड का निष्कासन करते हैं। श्वसन क्रिया में नासिका द्वारा शुद्ध वायु हमारे फेफड़ों में पहुँचती है। फेफड़ों की रुधिर कोशिकाओं में ऑक्सीजन का अवशोषण होता है तथा कार्बन डाइऑक्साइड वायु में छोड़ दी जाती है ताकि बाह्य-श्वसन (UPBoardSolutions.com) द्वारा वायुमण्डल में मुक्त हो जाए। रुधिर द्वारा ऑक्सीजन विभिन्न ऊतकों एवं केशिकाओं में पहुँचती है। यहाँ यह खाद्य के ज्वलन अथवा ऑक्सीकरण में सहायता करती है। इस क्रिया में ऊर्जा उत्पन्न होती है जोकि हमारे शरीर की विभिन्न जैविक क्रियाओं का मूल आधार है। इसके अतिरिक्त वायुमण्डल में उपस्थित ऑक्सीजन अन्य ज्वलन क्रियाओं में भी सहायता करती है। कोयला, लकड़ी, तेल, कपड़ा, कागज आदि सभी पदार्थ ऑक्सीजन की उपस्थिति में ही जलते हैं। इन क्रियाओं में ऑक्सीजन प्रयोग में आती है तथा कार्बन डाइऑक्साइड बनती है। आग के धुएँ में प्राय: कार्बन डाइऑक्साइड व कार्बन मोनोऑक्साइड गैसें होती हैं।

कार्बन डाइऑक्साइड:
वायु में कार्बन डाइऑक्साइड का आयतन लगभग 0.03% होता है। वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा पौधों एवं प्राणियों की श्वसन क्रिया द्वारा तथा वस्तुओं के जलने के फलस्वरूप बढ़ती रहती है। अन्तः श्वसन (प्रश्वसित वायु) तथा बाह्य श्वसन (उच्छ्वसित वायु) क्रिया में वायु की प्रतिशत मात्रा में परिवर्तन निम्न प्रकार से होता है| इस प्रकार हम देखते हैं कि जैसे-जैसे वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि होती है उसी अनुपात में ऑक्सीजन की मात्रा घटती है। यह स्थिति जीवधारियों के लिए घातक हो सकती है। (UPBoardSolutions.com) इससे बचाव करते हैं हरे पौधे। हरे पौधे सूर्य के प्रकाश में कार्बन डाइऑक्साइड व जल को प्रयोग कर अपने भोजन का निर्माण करते हैं। इस क्रिया को प्रकाश-संश्लेषण कहते हैं। इस क्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड प्रयुक्त होती है तथा ऑक्सीजन बाहर निकलती है। इस प्रकार हरे पौधे प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया द्वारा वायुमण्डल में ऑक्सीजन व कार्बन डाइऑक्साइड गैसों की मात्रा में सन्तुलन बनाए रखते हैं।

नाइट्रोजन:
वायुमण्डल में इसकी मात्रा सर्वाधिक (लगभग 78.08%) होती है। प्रत्यक्ष रूप में यह गैस अधिक उपयोगी नहीं है। न तो यह गैस स्वयं जलती है और न ही वस्तुओं के जलने में सहायता करती है। अतः यह एक प्रकार से निष्क्रिय गैस है, परन्तु परोक्ष रूप से यह एक अति महत्त्वपूर्ण गैस है। यह (UPBoardSolutions.com) ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण अथवा ज्वलनशील प्रक्रिया की तीव्रता पर अंकुश लगाती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वायुमण्डल में यदि नाइट्रोजन न हो, तो ऑक्सीजन की उपस्थिति में संसार की सभी वस्तुएँ जलकर राख हो जाएँगी।

ओजोन:
यह अन्य गैसों (हाइड्रोजन, ऑर्गन, जलवाष्प आदि) के साथ मिलकर वायु का लगभग 0.94% भाग होती है। यह गैस सूर्य की हानिकारक किरणों का अधिकांश भाग सोखकर पृथ्वी तक नहीं पहुँचने देती है। यह फलों एवं सब्जियों को सड़ने से बचाती है। कुछ रोगों में भी यह लाभकारी पाई गई है। कुल मिलाकर यह गैस मानव जीवन के लिए उपयोगी सिद्ध हुई है।

जलवाष्प:
यह वायु को नम एवं ठण्डा बनाती है। वायुमण्डल में इसकी प्रतिशत मात्रा स्थान विशेष के तापक्रम पर निर्भर करती है। कम ताप पर इसकी मात्रा अधिक व अधिक ताप पर इसकी मात्रा कम होती है। इसकी वायुमण्डल में प्रतिशत मात्रा को आपेक्षिक आर्द्रता कहते हैं। अधिक आर्द्रता वातावरण को भारी व सीलनयुक्त बनाती है। ऐसा वातावरण (जैसे कि वर्षा ऋतु) स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है, क्योंकि (UPBoardSolutions.com) इसमें मक्खी, मच्छर व अनेक रोगाणु आसानी से पनपते हैं। समुद्रतल से ऊँचाई की ओर (जैसे कि ऊँची पर्वत-श्रृंखलाएँ) बढ़ने पर वायु की संरचना बदलने लगती है। अधिक ऊँचाई पर वायुमण्डल में ऑक्सीजन की प्रतिशत मात्रा घट जाती है। यही कारण है कि ऊँचाई पर पहुँचकर साँस लेने में कठिनाई अनुभव होती है। उपर्युक्त गैसों के अतिरिक्त वायुमण्डल में धूल के कण, रेडियोधर्मी तत्त्वे व अनेक प्रकार के कीटाणु भी पाए जाते हैं।

शुद्ध वायु का महत्त्व

शुद्ध वायु संसार के सभी प्राणियों एवं पेड़-पौधों के अस्तित्व के लिए आवश्यक है। सभी जीवधारी शुद्ध वायु की उपस्थिति में ही जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण श्वसन क्रिया सम्पादित करते हैं। इसके अतिरिक्त भी शुद्ध वायु से अनेक लाभ हैं, जिनका विस्तृत विवरण अग्रलिखित है

मनुष्यों के लिए उपयोगिता

हमारे जीवन में शुद्ध वायु अनेक रूप में उपयोगी है; जैसे कि

(1) श्वसन क्रिया:
प्रश्वसन क्रिया में हम शुद्ध वायु को नासिका छिद्रों द्वारा फेफड़ों तक खींचते हैं। फेफड़ों में रक्त-केशिकाओं का जाल बिछा होता है। केशिकाओं में उपस्थित रक्त द्वारा वायु से (UPBoardSolutions.com) ऑक्सीजन का अवशोषण होता है तथा कार्बन डाइऑक्साइड का निष्कासन होता है जो कि नि:घसन द्वारा वायुमण्डल में पहुँच जाती है। रक्त संचरण के द्वारा ऑक्सीजन विभिन्न कोशिकाओं तथा ऊतकों तक पहुँचती है तथा खाद्य के ऑक्सीकरण द्वारा ऊर्जा मुक्त करती है। यह मुक्त ऊर्जा मानव शरीर में होने वाली विभिन्न जैविक क्रियाओं के लिए आवश्यक है।

(2) शरीर के ताप को नियमन:
स्वस्थ शरीर का तापमान प्राय: 37° से० के लगभग होता है, जबकि कमरे का तापमान 15°-20° से० तक होता है। अत: कम तापमान वाली वायु जब शरीर को स्पर्श करती है, तो शरीर से कुछ गर्मी लेकर जाती है। इस प्रकार लगातार शरीर की गर्मी अथवा ऊष्मा कम होती रहती है। इसी प्रकार शरीर की त्वचा से पसीने का जब वाष्पीकरण होता है, तो भी शरीर के तापमान में कमी आती है।

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प्रश्न 2:
संवातन से क्या तात्पर्य है? प्राकृतिक साधनों पर आधारित संवातन के विभिन्न उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संवातन का अर्थ घर के वायुमण्डल में उत्पन्न हो जाने वाली गर्मी, नमी तथा स्थिरता को समाप्त अथवा कम कर देने की प्रक्रिया को संवातन कहते हैं। इस क्रिया के अन्तर्गत घर के कमरों से गर्म, नम व अशुद्ध स्थिर वायु का निष्कासन तथा शुद्ध, शुष्क व शीतल वायु का प्रवेश होता है। इस (UPBoardSolutions.com) प्रकार हम कह सकते हैं कि किसी आवासीय स्थल से अशुद्ध वायु के निष्कासन तथा बाहर से शुद्ध वायु के आगमन की समुचित व्यवस्था ही संवातन है। संवातन के परिणामस्वरूप ही किसी आवासीय स्थल में निरन्तर शुद्ध वायु उपलब्ध होती रहती है। व्यक्तिगत स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से संवातन की समुचित व्यवस्था अति आवश्यक है।

प्राकृतिक साधनों पर आधारित संवतन

प्रकृति ने हमारे वातावरण में संवतन की समुचित व्यवस्था की है। प्राकृतिक संवातन मुख्य रूप से वायुमण्डल में होने वाली चूषण, संनयन तथा विसरण नामक क्रियाओं द्वारा सम्पन्न होता है। इन तीनों क्रियाओं का सामान्य विवरण निम्नवर्णित है।

(1) चूषण–प्रायः
सभी गैसों का संवहन सिद्धान्त रूप से कम दबाव वाले क्षेत्र की ओर होता है। इसे चूषण क्रिया कहते हैं। फुटबॉल का उदाहरण देखें। हवा भरने वाले पम्प से दबाव के साथ फुटबॉल में हवा भरी जाती है। पूरी हवा भर जाने पर फुटबॉल के अन्दर वायु का दबाव वायुमण्डल में उपस्थित वायु के दबाव से अधिक हो जाता है। अब फुटबॉल का वाल्व ढीला करने पर इसके भीतर की वायु कम दबाव वाले वायुमण्डल (UPBoardSolutions.com) में तेजी से संवहन करती है और तब तक करती रहती है जब तक कि फुटबॉल के भीतर की वायु का दबाव वायुमण्डल के दबाव के समान नहीं हो जाता। इस सिद्धान्त का उपयोग घर की संवातन व्यवस्था में किया जाता है।

(2) संनयन-यह प्रक्रिया प्रायः
द्रव पदार्थों व गैसों में होती है। हल्के पदार्थों में यह प्रक्रिया तीव्र होती है। उदाहरण के लिए किसी द्रव पदार्थ को गर्म करने पर इसका प्रथम कण अथवा अणु गर्म होते ही फैलकर व हल्का होकर ऊपर की ओर प्रसारित हो जाता है तथा इसका स्थान अपेक्षाकृत ठण्डा कण ले लेता है। फिर यह भी गर्म होकर प्रसारित हो जाता है। यह क्रम लगातार चलता रहता है। इसी सिद्धान्त के अनुसार गर्म होने पर कमरे की वायु हल्की होकर ऊपर उठ जाती है तथा इसके द्वारा रिक्त किए गए स्थान की पूर्ति शीतल वायु द्वारी (कमरे के बाहर से) होती है। इस प्रकार संनयन प्रक्रिया द्वारा कमरे में लगातार शीतल एवं शुद्ध वायु का प्रवेश होता रहता है।

(3) विसरण:
इस प्रक्रिया में पदार्थ अधिक सान्द्रता अथवा मात्रा वाले स्थान से कम सान्द्रता अथवा मात्रा वाले स्थान की ओर विसरित करते हैं; उदाहरणार्थ-एक सेण्ट अथवा इत्र की शीशी कमरे के एक कोने में खोलने पर धीरे-धीरे इत्र की सुगन्ध पूरे कमरे में फैल जाती है। इसी प्रकार एक गिलास पानी में स्याही की एक बूंद डालकर हिलाने पर पूरा पानी ही रंगीन हो जाता है। ठोस, द्रव तथा गैस तीनों ही प्रकार के पदार्थों में विसरण (UPBoardSolutions.com) की यह प्रक्रिया पाई जाती है। विसरण की प्रक्रिया संवातन के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। कमरे की वायु नमी व बाह्य श्वसन की – कार्बन डाइऑक्साइड गैस के कारण सान्द्र हो जाती है; अत: यह बाहर (कम सान्द्र वायु) की ओर विसरण करती है तथा कम सान्द्रता वाली शुद्ध व शीतल वायु कमरे में अन्दर की ओर विसरण करती है। यह क्रिया तब तक चलती रहती है जब तक कि कमरे के अन्दर व बाहर की वायु की सान्द्रता समान नहीं हो जाती।

संवातन की प्राकृतिक व्यवस्था के लिए उपयोगी उपाय

व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए उपयुक्तं संवातन व्यवस्था का होना आवश्यक है।
अतः संवातन की उपयुक्त व्यवस्था के लिए निम्नलिखित उपायों को प्रयोग में लाना विवेकपूर्ण है

(1) मकान की व्यवस्था:
नियोजित बस्तियों में आवास-गृहों का निर्माण परस्पर पर्याप्त दूरी पर होना चाहिए, एक-दूसरे से मिले हुए मकानों में वायु का प्रवेश स्वतन्त्र रूप से नहीं हो पाता, जबकि दूर-दूर बने मकानों में वायु का संवातन भली प्रकार से होता है।

(2) दरवाजे एवं खिड़कियाँ:
मकान में दरवाजे एवं खिड़कियाँ पर्याप्त संख्या में होनी आवश्यक हैं। कमरों में दरवाजों एवं खिड़कियों की व्यवस्था इस प्रकार होनी चाहिए कि जिससे वायु आमने-सामने
आर-पार सरलता से आ-जा सके।

(3) रोशनदान:
गर्म होने से वायु हल्की हो जाती है तथा ऊपर की ओर उठती है। अतः गर्म एवं अशुद्ध वायु के निष्कासन के लिए कमरे में रोशनदान का होना अनिवार्य है। रोशनदान का एक लाभ यह भी है कि सूर्य की किरणें इससे कमरे में प्रवेश पाकर हानिकारक कीटाणुओं को नष्ट करती रहती हैं।

(4) चिमनी:
यह प्राय: रसोई-गृह में निर्मित की जाती हैं। ईंधन के जलने से उत्पन्न धुआँ चिमनी द्वारा ही रसोई-गृह से निष्कासित होता है। इसका लाभ यह है कि गृहिणी न तो घुटन महसूस करती है। और न ही उसके नेत्रों पर धुएँ का कुप्रभाव पड़ता है। आधुनिक युग में धुआँ उत्पन्न करने वाले ईंधन का प्रयोग धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है तथा इसके स्थान पर कुकिंग गैस व विद्युत चूल्हों का उपयोग होने लगा है। अतः अब रसोई-गृह में चिमनी के निर्माण की आवश्यकता लगभग नगण्य हो गई है।

प्रश्न 3:
संवातन के लिए प्रयोग में लाई जाने वाली कृत्रिम विधियों का वर्णन कीजिए।
या
सामान्य विद्युत पंखों, निर्वातक पंखों एवं वातानुकूलन संयन्त्रों का संवातन के लिए उपयोग किन-किन पद्धतियों के आधार पर किया जाता है?
उत्तर:
संवातन के प्राकृतिक साधनों के अनुसार मकान में कमरे पर्याप्त लम्बे, चौड़े व ऊँचे होने चाहिए तथा कमरों में पारगमन संवातन के लिए दरवाजे व खिड़कियाँ अधिक संख्या में तथा उपयुक्त स्थानों पर बनी होनी चाहिए, परन्तु इसमें प्रायः निम्नलिखित दो कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है

  1.  स्थान के अभाव के कारण प्राय: पर्याप्त लम्बाई, चौड़ाई व ऊँचाई वाले कमरों के मकानों का निर्माण करना सम्भव नहीं हो पाता है।
  2. वर्ष में अनेक बार (जैसे कि ग्रीष्म ऋतु में) वायु अत्यन्त मन्द गति से संचरण करती है, जिसके फलस्वरूप मकानों में शुद्ध एवं शीतल वायु का उपयुक्त संवातन नहीं हो पाता है; अतः मकानों में घुटन भरा गर्म वातावरण रहता है।
    उपर्युक्त कठिनाइयों से निपटने के लिए आज के आधुनिक युग में अनेक प्रकार के विद्युत उपकरणों (संवातन के कृत्रिम साधन) का उपयोग किया जाता है। मकानों एवं सार्वजनिक भवनों में संवातन की उत्तम व्यवस्था के लिए प्रयोग में लाए जाने वाले प्रमुख विद्युत संयन्त्र निम्नलिखित हैं

(1) सामान्य विद्युत पंखे:
सामान्य पंखे प्लीनम पद्धति पर आधारित होते हैं। इनके द्वारा वायु की गति अधिक संवहनशील हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप दूषित वायु की निकासी शीघ्र होती रहती है।

(2) निर्वातक पंखे (एक्जॉस्ट फैन):
ये पंखे निर्वात पद्धति पर आधारित होते हैं। इस पद्धति में कमरे की अशुद्ध गर्म वायु को पंखों द्वारा बाहर धकेल दिया जाता है, जिसका स्थान शुद्ध एवं शीतल वायु लेती रहती है, परिणामस्वरूप कमरे में संवतन की व्यवस्था ठीक बनी रहती है। निर्वातक पंखे प्रायः प्रयोगशालाओं, अस्पतालों, छविगृहों व घुटन भरे कमरों में लगाए जाते हैं।

(3) सामान्य व निर्वातक पंखों का मिश्रित उपयोग:
इन दोनों प्रकार के पंखों का एक साथ उपयोग मिश्रित अथवा मिली-जुली पद्धति पर आधारित है। इस पद्धति का उपयोग विशाल भवनों, छविगृहों एवं अस्पतालों आदि में किया जाता है। इसके अनुसार निर्वातक पंखे अशुद्ध एवं गर्म वायु को बाहर फेंकते हैं तथा सामान्य पंखे अन्दर की वायु को गति प्रदान करते हैं। इस प्रकार यह पद्धति संवात्नन व्यवस्था को अत्यन्त प्रभावी बना देती है।

(4) वातानुकूलन:
आदर्श संवातन की यह आधुनिकतम पद्धति है। इस पद्धति में वायु को उचित तापमान, वांछित स्वच्छता तथा उपयुक्त आर्द्रता प्रदान की जाती है। कमरे में श्वसन क्रिया के कारण उत्पन्न हुई अशुद्ध वायु वातानुकूलन संयन्त्र के शुद्धिकरण भाग में पहुँचकर शुद्ध हो जाती है। बाहर से आने वाली वायु भी सर्वप्रथम शुद्धिकरण भाग में प्रवेश करती है, जिससे यह धूल के कणों एवं कीटाणुओं से मुक्त हो जाती है।
UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 8 वायु  शुद्ध वायु का महत्त्व एवं संवातन
संयन्त्र के शीतलीकरण भाग द्वारा कमरे में वांछित तापमान बनाए रखा जाता है। इस प्रकार इस विधि द्वारा कमरे की संवातन व्यवस्था अत्यन्त प्रभावी बनी रहती है। इस विधि की एकमात्र कमी यह है कि अत्यधिक महँगी होने के कारण यह जनसाधारण की पहुँच से बाहर है। वातानुकूलन यन्त्रों का उपयोग प्रायः धनी परिवारों, छविगृहों, बड़े-बड़े राजकीय अस्पतालों, सार्वजनिक व राजकीय भवनों तथा उच्च श्रेणी के रेल के डिब्बों इत्यादि में किया जाता है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
वायु के कौन-कौन से चार प्रमुख कार्य हैं?
उत्तर:
वायु के महत्त्वपूर्ण कार्य निम्नलिखित हैं

  1.  समस्त जीवधारियों की श्वसन क्रियों का मूल आधार होना,
  2.  प्राणियों में शारीरिक तापमान का नियमन करना,
  3. जल की उत्पत्ति करना तथा
  4.  हरे पौधों में भोजन-निर्माण की प्रक्रिया का मूल आधार होना।

प्रश्न 2:
वर्षा ऋतु की नमी से हमें क्या हानियाँ हैं?
उत्तर:
वर्षा ऋतु में नमी होने के कारण वायु में जलवाष्प (आर्द्रता) की मात्रा में वृद्धि हो जाती है। इस प्रकार के वातावरण में फफूदी, कीटाणु व कीट-पतंगे अधिक पनपते हैं। इसके हानिकारक परिणाम निम्नलिखित हैं

  1. फफूदी के कारण भोज्य पदार्थ शीघ्र ही सड़ने लगते हैं तथा खाने योग्य नहीं रहते।
  2. चमड़े, लकड़ी व कागज की वस्तुएँ फफूदी के पनपने के कारण अपनी गुणवत्ता खो देती हैं।
  3.  कीटाणुओं के वातावरण में पनपने के कारण विभिन्न रोगों के होने की सम्भावनाएँ बन जाती हैं।
  4. वस्तुओं पर फफूदी व अन्य सूक्ष्मजीवियों के पनपने के कारण वातावरण में सड़न की दुर्गन्ध उत्पन्न हो जाती है।

प्रश्न 3:
प्रकृति वायुमण्डल में प्राण-वायु( ऑक्सीजन) की मात्रा का सन्तुलन किस प्रकार कर पाती है?
या
वायु को शुद्ध करने में प्रकृति किस प्रकार सहायता करती है?
उत्तर:
वायुमण्डल में ऑक्सीजन की मात्रा लगभग 21 प्रतिशत होती है। ऑक्सीजन समस्त प्राणियों को उनकी श्वसन क्रिया के लिए आवश्यक है। श्वसन क्रिया में प्राणी वायु से ऑक्सीजन लेते हैं। तथा कार्बन डाइऑक्साइड गैसे निष्कासित करते हैं। इसके अतिरिक्त लगभग सभी वस्तुएँ; जैसे लकड़ी, कोयला, कागज आदि ऑक्सीजन की उपस्थिति में ही जलती हैं तथा धुएँ के रूप में कार्बन मोनोऑक्साइड व कार्बन डाइऑक्साइड गैसों को वायुमण्डल में निष्कासित करती हैं। परिणाम यह होता है कि वायुमण्डल में ऑक्सीजन की मात्रा घटने (UPBoardSolutions.com) लगती है। प्रकृति इस स्थिति से निपटने के लिए पूर्णरूप से सक्षम है। हरे पेड़-पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड व पानी का उपयोग कर अपने लिए भोजन का निर्माण करते हैं। इस क्रिया के फलस्वरूप वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड गैस की मात्रा घटती है तथा इसे क्रिया में ऑक्सीजन गैस उत्पन्न होती है। इस प्रकार हरे पौधे वायुमण्डल में ऑक्सीजन गैस निष्कासित कर इसकी मात्रा का सन्तुलन बनाए रखते हैं।

प्रश्न 4:
अच्छे स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से आप अपने मकान में किस प्रकार के कमरे बनवाएँगी?
उत्तर:
सामान्यतः मनुष्य एक घण्टे में लगभग 100 घन मीटर वायु ग्रहण करता है। यदि उस वायु का एक घण्टे में तीन बार भी परिवर्तन हो, तो एक मनुष्य के लिए लगभग 33 घन मीटर स्थान की आवश्यकता पड़ेगी। अतः मकान में लम्बे, चौड़े व ऊँचे कमरों का होना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद रहता है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए घर के अन्दर व बाहर उत्तम संवातन व्यवस्था का होना भी आवश्यक है। अतः कमरों में दरवाजे व खिड़कियाँ इस प्रकार से होनी चाहिए कि वायु का पारगमन सरलतापूर्वक हो सके।

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प्रश्न 5:
घर से बाहर की संवातन व्यवस्था के सम्भावित उपायों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
घर के अन्दर वायु का प्रवेश सदैव बाहर से ही होता है। अत: घर की अच्छी-से-अच्छी आन्तरिक संवातन व्यवस्था भी तब तक अप्रभावी ही रहेगी जब तक कि बाहर की संवातन व्यवस्था ठीक प्रकार की न हो। बाहर की. संवातन व्यवस्था को उत्तम बनाने के लिए निम्नलिखित उपाय करने चाहिए

  1.  सड़कें तथा गलियाँ चौड़ी होनी चाहिए।
  2.  बस्ती अथवा मौहल्ले में मकानों के बीच पर्याप्त दूरी होनी चाहिए।
  3.  सड़कों व नालियों की सफाई की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।
  4. मकानों के आस-पास पार्क व क्रीड़ास्थल होने चाहिए।
  5.  मकानों के आस-पास व सड़कों के दोनों ओर हरे पेड़-पौधे लगे होने चाहिए।

प्रश्न 6:
घर के अन्दर संवातन के मुख्य साधन कौन-कौन से हैं?
UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 8 वायु  शुद्ध वायु का महत्त्व एवं संवातन

प्रश्न 7:
संवातन का क्या महत्त्व है? समझाइए।
उत्तर:
संवातन वह व्यवस्था है जिसके माध्यम से किसी आवासीय स्थल पर निरन्तर वायु का आवागमन होता रहता है। संवातन की व्यवस्था का विशेष महत्त्व है। इस व्यवस्था के परिणामस्वरूप सम्बन्धित स्थल पर शुद्ध एवं स्वच्छ वायु उपलब्ध होती रहती है। इस स्थिति में कमरे की दूषित, गर्म एवं दुर्गन्धयुक्त वायु बाहर निकल जाती है तथा उसके स्थान पर शीतल, शुद्ध वायु प्रवेश कर जाती है। अवासीय स्थल पर संवातन की (UPBoardSolutions.com) उचित व्यवस्था होने की दशा में विभिन्न रोगों के जीवाणुओं को पनपने का अवसर उपलब्ध नहीं होता, कमरे में नमी या घुटन नहीं होती तथा वहाँ का तापमान भी सामान्य बना रहता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि संवतन की व्यवस्था सम्बन्धित व्यक्तियों के सामान्य स्वास्थ्य में सहायक होती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
वायु अपने आप में क्या है?
उत्तर:
वायु अपने आप में विभिन्न गैसों की एक मिश्रण है।

प्रश्न 2:
वायु-रूपी गैसीय मिश्रण में विद्यमान मुख्य गैसों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
वायु-रूपी गैसीय मिश्रण में विद्यमान मुख्य गैसें हैं ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोजन, ओजोन तथा ऑर्गन आदि।

प्रश्न 3:
वायु जीवन के लिए क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
वायु निम्नलिखित दो रूपों में जीवन के लिए आवश्यक है
(1) जीवधारियों में श्वसन क्रिया वायु की उपस्थिति में ही होती है।
(2) यह हमारे शरीर के ताप को नियन्त्रित करने में सहायता करती है।

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प्रश्न 4:
वस्तुओं के जलने से कौन-सी गैस बनती है?
उत्तर:
वस्तुओं के जलने से कार्बन डाइऑक्साइड गैस बनती है।

प्रश्न 5:
संवातन क्या है?
उत्तर:
किसी आवासीय स्थान पर शुद्ध वायु के प्रवेश एवं अशुद्ध वायु के बाहर जाने की व्यवस्था को संवातन कहते हैं।

प्रश्न 6:
रोशनदानों का संवातन में क्या महत्त्व है?
उत्तर:
अशुद्ध वायु गर्म होकर हल्की हो जाती है तथा ऊपर उठकर कमरे में बने रोशनदानों से बाहर निकल जाती है।

प्रश्न 7:
कृत्रिम संवतन के मुख्य साधन क्या हैं?
उत्तर:
कृत्रिम संवातन के मुख्य साधन है

  1.  सामान्य विद्युत पंखे,
  2.  निर्वातक पंखे,
  3.  वातानुकूलन संयन्त्र।

प्रश्न 8:
पारगाम संवातन को प्रभावी बनाने का क्या उपाय है?
उत्तर:
इसके लिए दरवाजों एवं खिड़कियों को ठीक आमने-सामने स्थित होना चाहिए।

प्रश्न 9:
रात्रि में पेड़ के नीचे सोना क्यों हानिकारक है?
उत्तर:
रात्रि में पेड़-पौधों में श्वसन क्रिया अधिक होती है जिसके फलस्वरूप कार्बन डाइऑक्साइड का निष्कासन भी अधिक होता है।
अतः रात्रि में पेड़ के नीचे सोना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

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प्रश्न 10:
पृथ्वी पर वायुमण्डल का क्षेत्र कितना विस्तृत है?
उत्तर:
पृथ्वी पर लगभग 400 किलोमीटर ऊपर तक वायु पाई जाती है।

प्रश्न 11:
वायु को शुद्ध करने में सूर्य के प्रकाश तथा पेड़-पौधों की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में पेड़-पौधे प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया सम्पन्न करते हैं। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत पेड़-पौधे वायुमण्डल से कार्बन डाइऑक्साइड गैस ग्रहण कर लेते हैं तथा
ऑक्सीजन विसर्जित करके वायु को शुद्ध करते हैं।

प्रश्न 12:
वायु में पाई जाने वाली सक्रिय गैस कौन-सी है?
उत्तर:
वायु में पाई जाने वाली मुख्य सक्रिय गैस है-ऑक्सीजन।

प्रश्न 13:
वायु में पाई जाने वाली मुख्य निष्क्रिय गैस कौन-सी है?
उत्तर:
वायु में पाई जाने वाली मुख्य निष्क्रिय गैस है-नाइट्रोजन।

प्रश्न 14:
वर्षा ऋतु में वायु में मुख्य रूप से क्या परिवर्तन होते हैं?
उत्तर:
वर्षा ऋतु में वायु में नमी की दर बढ़ जाती है तथा धूल-कणों एवं अन्य लटकने वाली अशुद्धियाँ घट जाती हैं।

प्रश्न 15:
प्राणवायु अथवा जीवन-रक्षक गैस कौन-सी है?
उत्तर:
ऑक्सीजन गैस, जो कि प्राणियों में श्वसन क्रिया के लिए आवश्यक होती है।

प्रश्न 16:
वायु संगठन में ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का प्रतिशत क्या है?
उत्तर:
वायु संगठन में ऑक्सीजन 20.95% तथा कार्बन डाइऑक्साइड 0.03% होती है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न:
प्रत्येक प्रश्न के चार वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। इनमें से सही विकल्प चुनकर लिखिए

(1) प्रकृति में ऑक्सीजन का सन्तुलन बनाए रखते हैं
(क) मनुष्य,
(ख) कीट-पतंगे,
(ग) वन्य जीव-जन्तु,
(घ) पेड़-पौधे।

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(2) वायु को दूषित करने वाला कारक है
(क) प्राणियों की श्वसन क्रिया,
(ख) जैविक पदार्थों का विघटन,
(ग) दहन की व्यापक प्रक्रिया,
(घ) ये सभी कारक।

(3) वायु में विद्यमान गैसों में से सर्वाधिक सक्रिय गैस है
(क) नाइट्रोजन,
(ख) हाइड्रोजन,
(ग) कार्बन डाइऑक्साइड,
(घ) ऑक्सीजन।

4. वायु में विद्यमान मुख्य निष्क्रिय गैस है
(क) ऑक्सीजन,
(ख) ओजोन,
(ग) नाइट्रोजन,
(घ) कार्बन मोनोऑक्साइड।

(5) संवातन का मुख्य उद्देश्य है
(क) कमरे से दुर्गन्ध को हटाना,
(ख) कमरे में सुगन्ध को बढ़ाना,
(ग) कमरे में शुद्ध वायु प्राप्त करना,
(घ) कमरे को ठण्डा रखना।

(6) कमरे में उत्तम संवातन व्यवस्था के लिए आवश्यक है
(क) दरवाजे,
(ख) खिड़कियाँ,
(ग) रोशनदान,
(घ) पारगामी व्यवस्था।

(7) विद्युत पंखों द्वारा वायु को प्रदान की जाती है
(क) स्थिरता,
(ख) स्थायित्व,
(ग) गति,
(घ) आर्द्रता।

(8) दीवारों में बनी चिमनियों से कमरे की वायु
(क) बाहर निकलती है,
(ख) बाहर भी जाती है तथा अन्दर भी जाती है,
(ग) बाहर से अन्दर आती है,
(घ) कोई प्रभाव नहीं होता।

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(9) श्वसन क्रिया में रक्त का शुद्धिकरण करती है
(क) नाइट्रोजन,
(ख) हाइड्रोजन,
(ग) ऑक्सीजन,
(घ) कार्बन मोनोऑक्साइड।

उत्तर:
(1) (घ) पेड़-पौधे,
(2) (घ) ये सभी कारक,
(3) (घ) ऑक्सीजन,
(4) (ग) नाइट्रोजन,
(5) (ग) कमरे में शुद्ध वायु प्राप्त करना,
(6) (घ) पारगामी व्यवस्था,
(7) (ग) गति,
(8) (क) बाहर निकलती है,
(9) (ग) ऑक्सीजन।

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UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 23 सन्त गाडगे बाबा (महान व्यक्तित्व)

UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 23 सन्त गाडगे बाबा (महान व्यक्तित्व)

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पाठ का सारांश

सन्त गाडगे बाबा का पूरा नाम देव ‘डेबू जी’ झिंगराजी जाणोरकर था। इनका जन्म 23 फरवरी, सन् 1876 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के शेणगाँव में हुआ था। इनके पिता का

नाम झिंगराजी जाणोरकर और माता सखूबाई थीं। ये हमेशा मिट्टी का गडुआ या मटका रखते थे, इस कारण इनको लोग गाडगे बाबा कहते थे। 8 वर्ष की आयु में इनके पिता का देहान्त हो गया। इनका पालन-पोषण बहुत गरीबी में हुआ। एका विवाह 16 वर्ष की आयु में कुन्ताबाई से हुआ। एक साहूकार की धोखाधड़ी के कारण इनके मामा का देहान्त हो गया। तब इन्होंने संकल्प लिया कि गरीब लोगों की सहायता करेंगे और उन्हें शिक्षित करेंगे ताकि गाँव वाले किसी के धोखे के शिकार न हों। इन्होंने मांस-मदिरा का सेवन करने वाले अन्धविश्वासी लोगों का अन्धविश्वास दूर किया। लोगों को अच्छे-बुरे का ज्ञान कराया।

इन्होंने 30 वर्ष की अवस्था में घर परिवार छोड़कर संन्यास ले लिया। 12 वर्ष तक उन्होंने साधना की। कबीर, तुकाराम, ज्ञानदेव, नामदेव, नानक, स्वामी विवेकानन्द, जैसे सन्तों के उदाहरणों को देकर वे अपने प्रवचन में साधारण बोल-चाल की भाषा का प्रयोग करते थे, जिस कारण लोग उनसे बहुत प्रभावित हुए। सन्त गाडगे बाबा ने मूर्ति पूजा का विरोध किया और कहा मन्दिर बनवाने से अच्छा धर्मशाला बनवाएँ, जहाँ लोग ठहर सकते हैं और भोजन प्राप्त कर सकते हैं। इन्होंने सैकड़ों स्कूल बनवाए। विद्यार्थियों को प्रभु की मूर्तियों की उपाधि दी। ये समाज की कुव्यवस्था और कुरीतियों से बहुत दुखी थे। इन्होंने दहेज प्रथा, बाल विवाह, छुआछूत जैसी बुराइयों को दूर करने के लिए संघर्ष किए। इनका कहना था “सच्चा ईश्वर दरिद्र नारायण के रूप में तुम्हारे सामने खड़ा है, उसकी सेवा करो।”

सन्त गाडगे की मुलाकात डॉ० भीमराव अम्बेडकर और गांधी जी से भी हुई। बाबा मधुमेह की बीमारी से पीड़ित थे। सन् 1955 में बाबा को अस्पताल में भर्ती कराया। अस्पताल का खर्च उठाना मुश्किल हो गया और (UPBoardSolutions.com) वे बिना बताए ही रात को अस्पताल से निकल गए। 6 दिसम्बर, 1956 को डॉ० भीमराव अम्बेडकर की मृत्यु का समाचार पाकर वे रो पड़े और खाना-पीना छोड़ दिया। 20 दिसम्बर, 1956 को सन्त गाडगे बाबा का स्वर्गवास हो गया।

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अभ्यास-प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्न प्रश्नों के उत्तर लिखो
(क) सन्त गाडगे जी का नाम क्या था?
उत्तर :
सन्त गाड़गे जी का नाम देव डेबू जी झिंगराजी जाणोरकर था।

(ख)
डेबूजी के पिता ने अन्तिम समय में डेबूजी की माँ से क्या कहा?
उत्तर :
डेबू जी के पिता ने अन्तिम समय में डेबू जी की माँ से कहा कि मैं कुछ दिन का मेहमान हूँ। डेबू जी का ध्यान रखना और मांस-मदिरा से दूर रहने की सलाह देना।

(ग)
मामा की मृत्यु के बाद डेबूजी ने क्या संकल्प किया? (UPBoardSolutions.com)
उत्तर :
मामी की मृत्यु के बाद डेबू जी ने संकल्प लिया कि गरीब लोगों की सहायता करेंगे और शिक्षित करेंगे ताकि गाँव वाले किसी के धोखे के शिकार न हो सकें।

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(घ) संत गाडगे बाबा ने कौन-कौन से कार्य किए ?
उत्तर :
सन्त गाडगे बाबा ने निम्न कार्य किए- उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया, दहेज प्रथा, बाल विवाह, छुआछूत जैसी बुराइयों को दूर करने के लिए उन्होंने बहुत संघर्ष किया।

प्रश्न 2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति करो (पूर्ति करके)
(क) डेबूजी के पिता झिंगराजी जाणोरकर और माता सखूबाई थीं।
(ख) इनका विवाह 18 वर्ष की आयु में कुन्ताबाई से हो गया।
(ग) उनके पिता की मृत्यु का मुख्य कारण मदिरा थी।
(घ) भोजन में शुद्ध शाकाहारी भोजन परोसा गया। (UPBoardSolutions.com)
(ङ) वे मन्दिर बनवाने की अपेक्षा धर्मशाला बनवाना अच्छा समझते थे।

प्रश्न 3.
सही वाक्य के सामने सही (✓) तथा गलत वाक्य के सामने गलत (✗) का निशान लगाइए (निशान लगाकर)
उत्तर :
(क) सन्त गाडगे जी के पिता का नाम झिंगराजी जाणोरकर और माता सखूबाई थीं। (✓)
(ख) 20 दिसम्बर, 1956 को सन्त गाडगे बाबा की मृत्यु हो गई। (✓)
(ग) डेबू जी आँत की बीमारी से पीड़ित थे। (✗)
(घ) सन्त गाडगे बाबा मूर्ति पूजा के विरोधी थे। (✓)

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UP Board Solutions for Class 10 Hindi प्रमुख लेखक एवं उनकी रचनाएँ

UP Board Solutions for Class 10 Hindi प्रमुख लेखक एवं उनकी रचनाएँ

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प्रमुख लेखक एवं उनकी रचनाएँ

S.No.     लेखक   –    रचना   –    विधा

1. गोकुलनाथ – चौरासी वैष्णवन की वार्ता – वार्ता साहित्य

2. गोकुलनाथ – दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता – वार्ता साहित्य

3. बिट्ठलनाथ – शृंगार रस मण्डन (2015) – ब्रजभाषा गद्य

4. बैकुण्ठमणि शुक्ल – वैशाख माहात्म्य -ब्रजभाषा गद्य

5. बैकुण्ठमणि शुक्ल – अगहन माहात्म्य – ब्रजभाषा गद्य

6. नाभादास – अष्टयाम -ब्रजभाषा गद्य

7. बनारसीदास – बनारसी विलास – ब्रजभाषा गैद्य

8. वैष्णवदास – भक्तमाल प्रसंग – (UPBoardSolutions.com) ब्रजभाषा गद्य

9. कवि गंग – चंद छंद बरनन की महिमा – खड़ी बोली गद्य

10. रामप्रसाद निरंजनी – भाषा योग-वाशिष्ठ (2012] – खड़ी बोली गद्य

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11. दौलतराम – पद्मपुराण- भाषानुवाद

12. मथुरानाथ शुक्ल – पंचांग दर्शन[2013] – ज्योतिष ग्रन्थ का भाषानुवाद

13. मुंशी इंशा अल्ला खाँ – रानी केतकी की कहानी – कहानी

14. मुंशी सदासुखलाल – सुखसागर (2015) – खड़ी बोली गद्य

15. लल्लूलाल – प्रेमसागर (2009) – कहानी

16. लल्लूलाल – माधव विलास – ब्रजभाषी गद्य

17. सदल मिश्र । – नासिकेतोपाख्यान (2009) – आख्यान

18. देवकीनन्दन खत्री – चन्द्रकान्ता [2012] – उपन्यास

19. राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द’ – राजा भोज का सपना – कहानी

20. राजा लक्ष्मणसिंह।-  शकुन्तला – नाटक

21. गोपालचन्द्र गिरधरदास – नहुष : – नाटक

22. किशोरीलाल गोस्वामी – इन्दुमती (2014, 15) – कहानी

23. किशोरीलाल गोस्वामी – सुल्ताना (2018) – उपन्यास

24. श्रीनिवासदास । – परीक्षा-गुरु [2013]– उपन्यास

25. स्वामी दयानन्द – सत्यार्थ प्रकाश (2009) – धार्मिक ग्रन्थ

26. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र – अंधेर नगरी – नाटक

27. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र – सत्य हरिश्चन्द्र – नाटक

28. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र – भारत दुर्दशा- नाटक

29. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र – वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति – नाटक ।

30. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र – दिल्ली दरबार दर्पण – (UPBoardSolutions.com) निबन्ध-संग्रह

31. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र – मदालसा – निबन्ध-संग्रह

32. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र  – सुलोचना – निबन्ध-संग्रह

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33. प्रतापनारायण मिश्र – भारत दुर्दशा- नाटक

34. प्रतापनारायण मिश्र – हठी हम्मीर – नाटक

35. प्रतापनारायण मिश्र – कलि कौतुक – पद्य नाटक ।

36. प्रतापनारायण मिश्र – संगीत शाकुन्तल – नाटक

37. प्रतापनारायण मिश्र – हमारा कर्तव्य और युग-धर्म – निबन्ध

38. श्यामसुन्दर दास – रूपक-रहस्य – आलोचना

39. श्यामसुन्दर दास – साहित्यालोचन[2015,17] – आलोचना

40. श्यामसुन्दर दास – हिन्दी भाषा और साहित्य का इतिहास – इतिहास

41. श्यामसुन्दर दास – भाषा-विज्ञान – भाषा-विज्ञान

42. श्यामसुन्दर दास – भाषा-रहस्य – भाषा-विज्ञान

43. श्यामसुन्दर दास – वैज्ञानिक कोश – कोश

44. श्यामसुन्दर दास दास – हिन्दी शब्दसागर – कोश

45. प्रेमचन्द – गोदान [2012] – उपन्यास

46. प्रेमचन्द – गबन [2011,15) – उपन्यास

47. प्रेमचन्द कर्मभूमि [2011] – उपन्यास

48. प्रेमचन्द रंगभूमि – उपन्यास प्रेमचन्द सेवासदन [2011,17] – उपन्यास

50. प्रेमचन्द प्रेमाश्रम – उपन्यास

51. प्रेमचन्द निर्मला- उपन्यास

52. प्रेमचन्द कर्बला – नाटक

53. प्रेमचन्द प्रेम की वेदी – नाटक

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54. प्रेमचन्द – संग्राम – नाटक

55. प्रेमचन्द – मानसरोवर (आठ भाग) – कहानी-संग्रह।

56. प्रेमचन्द – पूस की रात – कहानी

57. प्रेमचन्द – प्रेमांजलि – कहानी

58. प्रेमचन्द – कुछ विचार – निबन्ध

59. वियोगी हरि – प्रार्थना – गद्य काव्य

60. वियोगी हरि – श्रद्धाकण – गद्य काव्य

61. वियोगी हरि – अन्तर्नाद – गद्य काव्य

62. वियोगी हरि – उद्यान – उपदेश

63. वियोगी हरि- गाँधी जी का आदर्श – उपदेश

64. वियोगी हरि – भावना – उपदेश

65. वियोगी हरि – बुद्धवाणी – उपदेश

66. वियोगी हरि – तरंगिणी – गद्य गीत

67. वियोगी हरि – पावभर आटा – (UPBoardSolutions.com) गद्य गीत

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68. वियोगी हरि – मन्दिर प्रवेश – धर्म

69. वियोगी हरि – पगली – गद्य गीत

70. वियोगी हरि – वीर हरदौल – नाटक

71. वियोगी हरि – छद्मयोगिनी – नाटक

72. वियोगी हरि – मेरा जीवन-प्रवाह – आत्मकथा

73. वियोगी हरि – विश्व-धर्म – निबन्ध

74. हरिभाऊ उपाध्याय – बापू के आश्रम में [2010] – संस्मरण

75. हरिभाऊ उपाध्याय – सर्वोदय की बुनियाद – निबन्ध

76. हरिभाऊ उपाध्याय – पुण्य स्मरण[2010] – संस्मरण

77. हरिभाऊ उपाध्याय – साधना के पथ पर [2008,09] – जीवनी

78. हरिभाऊ उपाध्याय – स्वतन्त्रता की ओर – निबन्ध

79. हरिभाऊ उपाध्याय हमारा कर्तव्य और युग-धर्म – निबन्ध

80. गुलाबराय – मेरे निबन्ध – निबन्ध

81. गुलाबराय – नर से नारायण (2017) – निबन्ध

82. गुलाबराय – ठलुआ क्लब [2009, 15] – निबन्ध

83. गुलाबराय – मेरी असफलताएँ [2009, 10, 11, 14, 16] – आत्मकथा

84. गुलाबराये – मन की बातें – निबन्ध

85. गुलाबराय – काव्य के रूप – आलोचना

86. गुलाबराय – सिद्धान्त और अध्ययन – आलोचना

87. गुलाबराय – राष्ट्रीयता – आलोचना

88. गुलाबराय – हिन्दी नाट्य-विमर्श – आलोचना

89. गुलाबराय – अध्ययन और आस्वाद – आलोचना

90. गुलाबराय – हिन्दी काव्य-विमर्श – आलोचना

91. गुलाबराय – नवरस – आलोचना

92. गुलाबराय – हिन्दी-साहित्य का सुबोध इतिहास – इतिहास

93. गुलाबराय – आलोचक रामचन्द्र शुक्ल – आलोचना

94. विनोबा भावे – गीता प्रवचन – निबन्ध

95. विनोबा भावे – गंगा – निबन्ध

96. विनोबा भावे – स्थितप्रज्ञ दर्शन – निबन्ध

97. विनोबा भावे – भूदान यज्ञ – निबन्ध

98. विनोबा भावे – जीवन और शिक्षण – निबन्ध

99. विनोबा भावे – गाँव सुखी हम सुखी – निबन्ध

100. विनोबा भावे – आत्मज्ञान और विज्ञान – उपदेश

101. विनोबा भावे – विनोबा के विचार – उपदेश

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102. विनोबा भावे – राजघाट की सन्निधि में – संस्मरण

103. विनोबा भावे – चिरतारुण्य की साधना – निबन्ध

104. हजारीप्रसाद द्विवेदी – अशोक के फूल [2018] – निबन्ध

105. हजारीप्रसाद द्विवेदी – विचार-प्रवाह – निबन्ध

106. हजारीप्रसाद द्विवेदी – कुटज (2015) – निबन्ध

107. हजारीप्रसाद द्विवेदी – कल्पलता। – निबन्ध

108. हजारीप्रसाद द्विवेदी – पुनर्नवा – उपन्यास

109. हजारीप्रसाद द्विवेदी – बाणभट्ट की आत्मकथा (2011, 13, 17] – उपन्यास

110. हजारीप्रसाद द्विवेदी – चारुचन्द्रलेख – उपन्यास

111. हजारीप्रसाद द्विवेदी – अनामदास का पोथा [2010,15] – उपन्यास

112. हजारीप्रसाद द्विवेदी – हिन्दी-साहित्य की भूमिका – इतिहास

113. हजारीप्रसाद द्विवेदी – हिन्दी-साहित्य का आदिकाल – इतिहास

114. हजारीप्रसाद द्विवेदी – सूर साहित्य – आलोचना

115. हजारीप्रसाद द्विवेदी – कबीर – आलोचना

116. हजारीप्रसाद द्विवेदी – गुरु नानकदेव – आलोचना

117. हजारीप्रसाद द्विवेदी – हिन्दी साहित्य – आलोचना

118. हजारीप्रसाद द्विवेदी – नाथ सिद्धों की बानियाँ – आलोचना

119. महादेवी वर्मा – श्रृंखला की कड़ियाँ [2013] – निबन्ध

120. महादेवी वर्मा – क्षणदा – निबन्ध

121. महादेवी वर्मा – विवेचनात्मक (UPBoardSolutions.com) गद्य – निबन्ध

122. महादेवी वर्मा – अतीत के चलचित्र [2013,15,17] संस्मरण और रेखाचित्र –

123. महादेवी वर्मा – स्मृति की रेखाएँ। – संस्मरण और रेखाचित्र

124. महादेवी वर्मा – मेरा परिवार – संस्मरण और रेखाचित्र

125. महादेवी वर्मा – पथ के साथी (2017) – संस्मरण और रेखाचित्र

126. रामवृक्ष बेनीपुरी – पतितों के देश में [2017] – उपन्यास

127. रामवृक्ष बेनीपुरी – चिता के फूल – | कहानी

128. रामवृक्ष बेनीपुरी – माटी की मूरतें (2015) – रेखाचित्र

129. रामवृक्ष बेनीपुरी – अम्बपाली नाटक

130. रामवृक्ष बेनीपुरी – जंजीरें और दीवारें – संस्मरण

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131. रामवृक्ष बेनीपुरी – गेहूँ और गुलाब [2016] – निबन्ध

132. रामवृक्ष बेनीपुरी – पैरों में पंख बाँधकर [2016] – यात्रा-वर्णन

133. श्रीराम शर्मा – सेवाग्राम की डायरी – संस्मरण

134. श्रीराम शर्मा – सन् बयालीस के संस्मरण – संस्मरण

135. श्रीराम शर्मा – शिकार – शिकार साहित्य

136. श्रीराम शर्मा – प्राणों का सौदा – शिकार साहित्य

137. श्रीराम शर्मा – बोलती प्रतिमा – शिकार साहित्य

138. श्रीराम शर्मा जंगल के बीच – शिकार साहित्य

139. काका कालेलकर – जीवन का काव्य – निबन्ध

140. काका कालेलकर – सर्वोदय । – निबन्ध

141. काका कालेलकर – जीवन-लीला – आत्मचरित

142. काका कालेलकर  -हिमालय प्रवास (2015) – यात्रावृत्त

143. काका कालेलकर – लोकमाता – संस्मरण

144. काका कालेलकर – यात्रावृत्त

145. काका कालेलकर – उस पार के पड़ोसी – यात्रावृत्त

146. काका कालेलकर – संस्मरण – संस्मरण

147. काका कालेलकर  – बापू की झाँकियाँ – संस्मरण

148. विनयमोहन शर्मा – साहित्यावलोकन [2017] – निबन्ध

149. विनयमोहन शर्मा  – दृष्टिकोण – निबन्ध

150. विनयमोहन शर्मा – दक्षिण भारत की एक झलक [2011,18] – निबन्ध

151. विनयमोहन शर्मा – साहित्य-शोध समीक्षा – आलोचना

152. विनयमोहन शर्मा – भाषा-साहित्य समीक्षा – आलोचना

153. विनयमोहन शर्मा – रेखाएँ और रंग। – संस्मरण और रेखाचित्र

154. विनयमोहन शर्मा – कवि, प्रसादकृत आँसू और अन्य कृतियाँ आलोचना

155. विनयमोहन शर्मा  – हिन्दी को मराठी सन्तों की देन । – शोध

156. विनयमोहन शर्मा – शोध-प्रविधि – शोध

157. विनयमोहन शर्मा – व्यावहारिक समीक्षा । – शोध

158. विनयमोहन शर्मा  -हिन्दी गीत-गोविन्द – शोध

159. लक्ष्मीसागर वाष्र्णेय – आधुनिक हिन्दी-साहित्य – आलोचना

160. लक्ष्मीसागर वाष्र्णेय  -भारतेन्दु हरिश्चन्द्र । – आलोचना

161. लक्ष्मीसागर वाष्र्णेय  -बीसवीं शताब्दी : हिन्दी-साहित्य : नये सन्दर्भ आलोचना

162. लक्ष्मीसागर वाष्र्णेय  -फोर्ट विलियम कॉलेज – आलोचना

163. लक्ष्मीसागर वाष्र्णेय  -हिन्दी-साहित्य का इतिहास । – इतिहास

164. लक्ष्मीसागर वाष्र्णेय  -आधुनिक हिन्दी-साहित्य की भूमिका – इतिहास

165. धर्मवीर भारती  – गुनाहों का देवता [2011] – उपन्यास

166. धर्मवीर भारती – सूरज का सातवाँ घोड़ा[2010, 11, 15, 16] उपन्यास

167. धर्मवीर भारती – नदी प्यासी थी[2010,11] – नाटक

168. धर्मवीर भारती  -अन्धा युग [2011] – नाटक

169. धर्मवीर भारती – कहनी-अनकहनी

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170. धर्मवीर भारती – ठेले पर हिमालय – निबन्ध

171. धर्मवीर भारती – पश्यन्ती – निबन्ध

172. धर्मवीर भारती  – नीली झील – एकांकी

173. धर्मवीर भारती – मानव मूल्य और साहित्य – आलोचना

174. धर्मवीर भारती  -चाँद और टूटे हुए लोग – कहानी-संग्रह

175. वृन्दावनलाल वर्मा – मृगनयनी [2011, 13] – उपन्यास

176. विष्णु प्रभाकर – आवारा (UPBoardSolutions.com) मसीहा [2013, 15, 16] – जीवनी

177. भगवतीचरण वर्मा – चित्रलेखा – उपन्यास

178. मोहन राकेश – लहरों के राजहंस [2014,17] – नाटक

179. मोहन राकेश – आषाढ़ का एक दिन [2013] – नाटक

180. माखनलाल चतुर्वेदी – साहित्य देवता – निबन्ध-काव्य

181. सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’ । –  कुल्ली भाट

182. अमृतराय – कलम का सिपाही [2012, 15, 16, 17, 18] जीवनचरित

183. डॉ० रामविलास शर्मा – निराला की साहित्य-साधना – समालोचना

184. पाण्डेय बेचन – शर्मा ‘उग्र’ अपनी खबर (2009) – आत्मकथा

185. हरिवंशराय बच्चन – क्या भूलें क्या याद करू[2012,13,14,15, 17, 18] आत्मकथा

186. हरिवंशराय बच्चन – नीड़ का निर्माण फिर [2013, 15] – आत्मकथा

187. डॉ० रामकुमार वर्मा – पृथ्वीराज की आँखें [2009,14] – एकांकी

188. देवकीनन्दन खत्री – भूतनाथ (2017) – तिलिस्मी उपन्यास

189. सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन – ‘अज्ञेय शेखर : एक जीवनी [2011, 12, 13] – उपन्यास

190. सही०वा ‘अज्ञेय – आत्मनेपद (2013) – निबन्ध-संग्रह

191. चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी – उसने कहा था [2013,15] – कहानी

192. डॉ० नामवर सिंह – कविता के नये प्रतिमान[2013] – आलोचना

193. जैनेन्द्र कुमार – (UPBoardSolutions.com) त्यागपत्र [2013,14,16] – उपन्यास

194. राहुल सांकृत्यायन – मेरी लद्दाख यात्रा [2014, 15] – यात्रावृत्त

195. सत्येन्द्र नाथ दत्ता – तीर्थ सलिल [2014, 11, 18] – अनूदित काव्य

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196. सियारामशरण गुप्त – दैनिकी [2014, 15] – डायरी

197. फणीश्वरनाथ रेणु – मैला आँचल [2015,17] – उपन्यास

198. इलाचन्द्र जोशी – जहाज का पंछी – उपन्यास

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