UP Board Solutions for Class 8 Agricultural Science Chapter 7 सिंचाई की विधियाँ तथा जल निकास

UP Board Solutions for Class 8 Agricultural Science Chapter 7 सिंचाई की विधियाँ तथा जल निकास

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इकाई-7    सिंचाई की विधियाँ तथा जल निकास
अभ्यास

प्रश्न 1.
निम्नलिखित प्रश्नों के सही उत्तर पर सही (✔) का निशान लगाइए (निशान लगाकर)
उत्तर :

  1. सरसों की सिंचाई किस विधि से की जाती है
    (क) नाली विधि
    (ख) थाला विधि  (✔)
    (ग) क्यरी विधि
    (घ) जल-वन विधि
  2. आलू की फसल की सिंचाई किस विधि से की जाती है
    (क) क्यारी विधि
    (ख) छिड़काव विधि
    (ग) थाला विधि
    (घ) कँड़ विधि (✔)
  3. ऊँची-नीची भूमि की सिंचाई किस विधि से करते हैं
    (क) क्यारी विधि
    (ख) थाला विधि
    (ग) छिड़काव विधि (✔)
    (घ) कँड़ विधि
  4. खेत में जल भराव से मृदा ताप
    (क) घटता है (✔)
    (ख) बढ़ता है
    (ग) स्थिर रहता है
    (घ) उपरोक्त में कोई नहीं

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प्रश्न 2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए (पूर्ति करके)
उत्तर :

  1. क्यारी विधि सिंचाई की उत्तम विधि है। (क्यारी/थाला)
  2. नमी की कमी के कारण अंकुरण अच्छा नहीं होता। (नमी/सूखा)
  3. कैंड़ विधि से आलू के खेत की सिंचाई की जाती है। (कूड़/थाला)
  4.  ड्रिप विधि में अधिक धन तथा कुशल श्रम की आवश्यकता होती है। (ड्रिप/प्रवाह)

प्रश्न 3.
निम्नलिखित कथनों में सही के सामने (✔)  तथा गलत के सामने (✘) का निशान लगाए (निशान लगाकर)

उत्तर :

  1. प्रवाह विधि से आलू की सिंचाई की जाती है।                          (✘)
  2. प्रवाह विधि में कम श्रम की आवश्यकता होती है।               (✔)
  3. क्यारी विधि से गेहूं की सिंचाई नहीं की जाती।                     (✘)
  4. कॅड़ विधि से गन्ने की सिंचाई की जाती है।                            (✘)
  5. थाला विधि से पपीते के बाग की सिंचाई की जाती है।          (✔)

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में स्तम्भ ‘क’ का स्तम्भ ‘ख’ से सुमेल कीजिए (सुमेल करके)

उत्तर :
UP Board Solutions for Class 8 Agricultural Science Chapter 7 सिंचाई की विधियाँ तथा जल निकास image 1

प्रश्न 5.
सिंचाई देर से करने पर फसलों पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर :
सिंचाई देर से करने पर फसलों पर कुप्रभाव पड़ता है और पौधों का समुचित विकास नहीं हो पाता, जिससे उत्पादन पूरा नहीं मिल पाता।

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प्रश्न 6.
जल भराव से पौधों पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर :
जड़ों की वृद्धि पर बुरा प्रभाव पड़ता है, पौधे मुरझाने लगते हैं। जड़ों द्वारा भूमि से पोषक तत्वों के अवशोषण की क्रिया रुक जाती है। रासायनिक पदार्थ विषैले पदार्थों में बदल जाते हैं। जिससे (UPBoardSolutions.com) फसलों की वृद्धि तथा विकास प्रभावित होता है।

प्रश्न 7.
छिड़काव विधि क्या है? भारत में यह विधि अभी तक अधिक लोकप्रिय क्यों नहीं हुई?

उत्तर :
छिड़काव विधि में पानी को पाइपों के द्वारा खेत तक लाया जाता है और स्वचालित यन्त्रों द्वारा छिड़काव करके सिंचाई की जाती है। कृषि कार्य में छिड़काव विधि सिंचाई की उत्तम विधि मानी जाती है। इस विधि में महँगे यन्त्रों का प्रयोग किया जाता है। भारतीय किसान इन महँगे यन्त्रों को खरीद पाने में समर्थ नहीं है, इसलिए यह विधि भारत में लोकप्रिय नहीं हो सकी।

प्रश्न 8.
थाला विधि से सिंचाई के दो लाभ बताइए।

उत्तर :
थाला विधि के दो लाभ

  1. इस विधि से सिंचाई करने पर जल की बचत होती है क्योंकि पानी पूरे क्षेत्र में देने के बजाय प्रत्येक पौधे की जड़ के पास बने थालों में दिया जाता है।
  2. पौधे की जड़-तना सीधे जल सम्पर्क में नहीं आते, जिससे पौधे को कोई हानि नहीं होती।

प्रश्न 9.
जल जमाव से होने वाली दो हानियाँ बताइए।
उत्तर :
जल जमाव से होने वाली दो हानियाँ निम्नलिखित हैं

  1. मृदा वायु संचार और मृदा ताप में कमी होना।
  2. भूमि का दलदली होना और हानिकारक लवण इकट्ठे होना।

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प्रश्न 10.
उचित जल-निकास का मिट्टी पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :

  1. भूमि का ताप सन्तुलित हो जाता है, जिससे बीजों का अंकुरण अच्छा होता है।
  2. हानिकारक लवण बह जाते हैं। मृदा संरचना में सुधार हो जाता है।
  3. मृदा में जीवाणु क्रियाशीलता बढ़ जाती है, जिससे भूमि की उर्वरता बढ़ जाती है।

प्रश्न 11.
थाला विधि की सिंचाई का चित्र बनाइए।
उत्तर :
UP Board Solutions for Class 8 Agricultural Science Chapter 7 सिंचाई की विधियाँ तथा जल निकास image 2

प्रश्न 12.
आवश्यकता से अधिक सिंचाई करने से फसल पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
आवश्यकता से अधिक सिंचाई करने से फसल पीली पड़ कर नष्ट होने लगती है। जड़ों द्वारा जल का अवशोषण कम हो जाता है और पौधे मुरझाने लगते हैं।

प्रश्न 13.
सिंचाई का अर्थ समझाइए। सिंचाई की कितनी विधियाँ हैं? किन्हीं दो विधियों सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर :
फसलों और बागों में पानी देने की प्रक्रिया को (UPBoardSolutions.com) सिंचाई करना कहा जाता है। सिंचाई की निम्नलिखित विधियाँ हैं

  1. जल-प्लवन या प्रवाह विधि
  2. क्यरी विधि
  3. कॅड़ विधि
  4. थाला विधि
  5. छिड़काव विधि
  6. ड्रिप (टपक) विधि

प्रवाह विधि : खेत में पलेवा करने व धान में सिंचाई हेतु काम में लाई जाती है। इस विधि में सिंचाई आसानी से होती है। समय की बचत होती है। गन्ना, धान जैसी फसलों को पर्याप्त पानी मिल जाता है।
हानि : इसमें पानी बहुत बेकार में खर्च होता है। जल का असमान वितरण होता है, ढालू खेतों के लिए अनुपयुक्त है।
ड्रिप (टपक) विधि : इसमें जल को पौधों की जड़ में बूंद-बूंद करके दिया जाता है। यह विधि ऊसर, बलुई तथा बाग के लिए उपयुक्त है। पी0वी0सी0 पाइप लाइन खेत में बिछाकर जगह-जगह नोजिल लगाए जाते हैं। इन पाइपों में 2.5 किग्रा वर्ग सेमी दबाव से जल छोड़ा जाता है जो धीरे-धीरे भूमि को नम करता है। (UPBoardSolutions.com)
लाभ : कम वर्षा वाले क्षेत्रों में कम पानी से ज्यादा क्षेत्रफल में सिंचाई हो जाती है। जलहानि न्यूनतम होती है। भूमि समतलीकरण जरूरी नहीं।
हानि : शुरू में अधिक लागत आती है। स्वच्छ जल व तकनीकी ज्ञान की जरूरत होती है।

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प्रश्न 14.
प्रवाह तथा ड्रिप विधि के गुण और दोष लिखिए।

उत्तर :
प्रश्न 13 का उत्तर देखिए।

प्रश्न 15.
फलदार वृक्षों के लिए आप सिंचाई की किस विधि को अपनाएँगे और क्यों? वर्णन कीजिए।

उत्तर :
फलदार वृक्षों की सिंचाई के लिए थाला विधि अपनाई जाती है। इस विधि से सिंचाई करने पर जल की बचत होती है और पौधे पानी का समुचित उपयोग करते हैं, क्योंकि पानी जड़ों के पास थाला में दिया जाता है।

प्रश्न 16.
जल निकास का अर्थ समझाइए। जल जमाव से होने वाली हानियों का वर्णन कीजिए।

उत्तर :
जल निकास का अर्थ :
खेतों से अतिरिक्त पानी निकालकर बहा देना जल निकास कहा जाता है। कृषि विज्ञान में इसका विशेष अर्थ है। जल निकास की निम्न विशेषताएँ हैं

  1. खेत में आवश्यकता से अधिक पानी भरने से रोकना ।
  2. खेत के अतिरिक्त पानी को बाहर निकालना।

जल जमाव से हानियाँ :
जल की अधिकता से निम्न हानियाँ होती हैं

  1. मृदा वायु संचार में नमी।
  2. मृदा ताप में कमी।
  3. मिट्टी में हानिकारक लवणों का इकट्ठा होना।
  4. भूमि का दलदली होना।
  5. लाभदायक मृदा जीवाणुओं के कार्यों में बाधा।

प्रश्न 17.
मृदा से जल निकास कितने प्रकार से किया जाता है? जल निकास की एक विधि का सचित्र वर्णन कीजिए।

उत्तर :
जल निकास की दो विधियाँ हैं

  1. सतही खुली नालियों द्वारा।
  2. भूमिगत बन्द नालियों द्वारा

खुली निकास नालियों में खेत सतह से 30 सेमी गहरी तथा लगभग 75 सेमी ऊँची और सीधी नालियाँ बनाई जाती । हैं। इन्हें आगे बड़ी नाली में मिलाया जाता है। बड़ी नानी को (UPBoardSolutions.com) प्राकृतिक नाले या नदी में डाला जाता है।

भूमिगत बन्द नालियाँ : ये वहाँ बनाई जाती हैं,जहाँ भूजल स्तर ऊँचा होता है। ये नालियाँ तीन प्रकार की होती हैं

  1. पोल जल निकास नालियाँ : लकड़ी के टुकड़ों को तिकोने आकार में रखकर ये जल निकास नालियाँ 80 से 90 सेमी गहरी, 30 सेमी चौड़ी बनाई जाती हैं।
  2. स्टोन जल निकास नाली : इनमें पत्थरों का प्रयोग किया जाता है।
  3. टाइल डेन्स : टाइल्स से बनी नालियाँ सर्वोत्तम होती हैं।

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प्रोजेक्ट कार्य :
नोट : विद्यार्थी स्वयं करें।

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 2 (Section 3)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 2 जलवायु (अनुभाग – तीन)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Social Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 2 जलवायु (अनुभाग – तीन).

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जलवायु से आप क्या समझते हैं ? जलवायु को प्रभावित करने वाले कारकों (परिघटनाओं) का वर्णन कीजिए। [2006, 11, 13]
या

भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले किन्हीं दो तत्त्वों का वर्णन कीजिए। [2007, 08, 10]
या

भारत की जलवायु पर हिमालय की स्थिति (उच्चावच) के दो प्रभावों का उल्लेख कीजिए। [2010]
या

भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले तीन कारकों को स्पष्ट कीजिए। [2013]
या
भारतीय जलवायु को प्रभावित करने वाले किन्हीं पाँच कारकों का उल्लेख कीजिए। [2011, 13]
या

भारत की स्थिति का उसकी जलवायु पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
या
भारत की जलवायु पर हिमालय पर्वत का क्या प्रभाव पड़ता है ?
या
भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले तीन कारकों को बताइए। [2015, 16]
उत्तर :

जलवायु

लम्बी अवधि (30 से 50 वर्षों) के दौरान मौसम सम्बन्धी दशाओं के साधारणीकरण को जलवायु कहते हैं, अर्थात् भू-पृष्ठ के विस्तृत क्षेत्र में मौसम की दशाओं की समग्र जटिलता, उसके औसत लक्षण और परिवर्तन का परिसर जलवायु कहलाता है। सामान्यतः (UPBoardSolutions.com) ये दशाएँ अनेक वर्षों की दशाओं का परिणाम होती हैं और ताप, वायुमण्डलीय दाब, वायु आर्द्रता, मेघ, वर्षण तथा अन्य मौसम तत्त्वों के कारण उत्पन्न होती हैं।

भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक

विभिन्न स्थानों पर भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं
1. अवस्थिति- भारत भूमध्य रेखा के उत्तर में 8°4′ तथा 37°6′ उत्तर अक्षांश तथा 68°7′ से 97°25 पूर्वी देशान्तर के बीच स्थित है। कर्क वृत्त रेखा देश के लगभग मध्य से होकर गुजरती है। इसीलिए देश का उत्तरी भाग उपोष्ण कटिबन्ध में तथा दक्षिणी भाग उष्ण कटिबन्ध में पड़ता है। इस कटिबन्धीय स्थिति के कारण दक्षिणी भाग में ऊँचे तापमान तथा उत्तरी भाग में विषम तापमान पाये जाते हैं। भारत हिन्द महासागर, अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी से घिरा एक प्रायद्वीपीय देश है। इस प्रायद्वीपीय स्थिति का प्रभाव तापमानों तथा वर्षा पर पड़ता है। समुद्रतटीय भागों की जलवायु सम रहती है, जब कि आन्तरिक भागों में विषम जलवायु पायी जाती है। वर्षा की मात्रा भी तटीय भगों से आन्तरिक भागों की ओर घटती है।

2. पृष्ठीय पवनें- उपोष्ण कटिबन्धीय स्थिति के कारण भारत शुष्क व्यापारिक पवनों के क्षेत्र में पड़ता है, किन्तु भारत की विशिष्ट प्रायद्वीपीय स्थिति, तापमानों-वायुदाब की भिन्नता आदि कारणों से भारत में मानसूनी पवनें सक्रिय रहती हैं। ये पवनें ऋतु-क्रम से अपनी दिशा बदलती रहती हैं। तदनुसार भारत में ग्रीष्मकालीन (दक्षिण-पश्चिमी) मानसून तथा शीतकालीन (उत्तर-पूर्वी) मानसून सक्रिय होते हैं। इन्हीं मानसूनों से भारत को अधिकांश वर्षा प्राप्त होती है। अत: भारतीय मानसून के अध्ययन के बिना उसकी जलवायु के विषय में नहीं जाना जा सकता।

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3. उच्चावच (हिमाचल)– भारत के उत्तर में हिमालय पर्वत-श्रेणी एक प्रभावशाली जलवायु विभाजक का कार्य करती है। यह उत्तरी बर्फीली पवनों को भारत में प्रवेश करने से रोकती है तथा दक्षिण की ओर से आने वाली मानसूनी पवनों को रोककर देश में व्यापक वर्षा कराती है। इसी प्रकार पश्चिमी घाट की पहाड़ियाँ भी अरबसागरीय मानसूनों को रोककर पश्चिमी ढालों पर भारी वर्षा कराती हैं। हिमालय रूपी पर्वत-श्रृंखला के कारण ही उत्तरी भारत में उष्ण-कटिबन्धीय जलवायु पायी जाती है। इस जलवायु की दो विशेषताएँ हैं—(i) पूरे वर्ष में अपेक्षाकृत उच्च तापमान तथा (ii) शुष्क शीत ऋतु। कुछ क्षेत्रों को छोड़कर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में ये दोनों ही विशेषताएँ पायी जाती हैं।

4. उपरितन वायु- उपरितन वायु से अभिप्राय ऊपरी वायुमण्डल में चलने वाली वायुधाराओं से है। ये भूपृष्ठ से बहुत ऊँचाई पर (9 किमी से 12 किमी तक) तीव्र गति से चलती हैं। इन्हें जेट वायुधाराएँ भी कहते हैं। ये बहुत सँकरी पट्टी में चलती हैं। (UPBoardSolutions.com) शीत ऋतु में हिमालय के दक्षिणी भाग के ऊपर स्थित समताप मण्डल में पश्चिमी जेट वायुधारा चलती है। जून में यह उत्तर की ओर खिसक जाती है तथा 15° उत्तरी अक्षांश के ऊपर चलने लगती है। उत्तरी भारत में मानसून के अचानक विस्फोट के लिए यही वायुधारा उत्तरदायी मानी जाती है। इसके शीतल प्रभाव से बादल उमड़ने लगते हैं, फिर बरसते हैं। आठ-दस दिनों में ही पूरे देश में मानसून का प्रसार हो जाता है। ग्रीष्म ऋतु की अपेक्षा शीत ऋतु में इनका वेग दोगुना हो जाता है। साधारणत: इनको वेग लगभग 500 किमी प्रति घण्टा होता है तथा ध्रुवों की ओर बढ़ने पर इनके वेग में कमी आ जाती है।

5. अलनिनो- यह एक ऐसी मौसमी परिघटना है, जिसका प्रभाव समूचे विश्व पर पड़ता है। भारत की मानसूनी जलवायु भी इस परिघटना से प्रभावित होती है। इस तन्त्र में पूर्वी प्रशान्त महासागर के पीरू तट पर गर्म धारा प्रकट होने पर हिन्द महासागर में स्थित भारत में अकाल या वर्षा की कमी की स्थिति हो जाती है। अलनिनो के समाप्त होने पर प्रशान्त महासागर की सतह पर तापमान तथा वायुदाब की स्थिति पहले जैसी हो जाती है। इन उतार-चढ़ावों को दक्षिणी दोलन’ (Southern Oscillation) कहा जाता है। मानसूनों के प्रबल या दुर्बल होने में ‘दक्षिणी दोलन’ का बहुत प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 2.
भारत की ग्रीष्मकालीन एवं शीतकालीन जलवायु का वर्णन कीजिए।
या
भारतीय जलवायु का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए
(क) शीत ऋतु तथा (ख) ग्रीष्म ऋतु।
या
शीत ऋतु में दक्षिण भारत में वर्षा क्यों होती है ?
उत्तर :
भारत की ग्रीष्मकालीन जलवायु भारत में ग्रीष्मकालीन जलवायु मार्च से मध्य जून तक रहती है। इस ऋतु में देश में मौसम की सामान्य दशाएँ निम्नलिखित होती हैं

1. तापमान– 
सूर्य के उत्तरायण होने के कारण ऊष्मा की पेटी दक्षिण से उत्तर की ओर खिसकने लगती है। सम्पूर्ण देश में तापमान बढ़ने लगता है। अप्रैल में, गुजरात तथा मध्य प्रदेश में तापमान 42° से 43° सेल्सियस तक पहुँच जाता है। मई में, तापमान की वृद्धि 48° सेल्सियस तक हो जाती है तथा मरुस्थलीय क्षेत्र में 50° सेल्सियस तक तापमान पहुँच जाता है।

2. वायुदाब तथा पवनें– 
उत्तरी भारत में तापमानों की वृद्धि होने से वायुदाब घट जाता है। मई के अन्त तक एक लम्बा सँकरा निम्न वायुदाब गर्त थार मरुस्थल से लेकर बिहार में छोटा नागपुर के पठार तक विस्तृत हो जाता है। इस निम्न वायुदाब (UPBoardSolutions.com) गर्त के चारों ओर वायु का संचरण होने लगता है। दोपहर के बाद शुष्क और गर्म ‘लू (पवने) चलने लगती हैं। पंजाब, हरियाणा, पूर्वी राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश में सायंकाल को धूलभरी आँधियाँ आती हैं। यदा-कदा आँधियों के बाद हल्की वर्षा हो जाती है तथा मौसम सुहाना हो जाता

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3. वर्षण– 
यदा-कदा आर्द्रता से लदी पवनें मानसून के निम्न दाब गर्त की ओर खिंच आती हैं। तब शुष्क और आर्द्र वायु-राशियों के मिलने से स्थानीय तूफान आते हैं। तेज पवनें, मूसलाधार वर्षा और कभी-कभी ओले भी पड़ते हैं।

केरल तथा कर्नाटक के तटीय भागों में ग्रीष्म ऋतु के अन्त में तथा मानसून से पूर्व कुछ वर्षा होती है, जिसे स्थानीय रूप से ‘आम्रवर्षा’ कहते हैं। यह वर्षा आम के फल को शीघ्र पकाने में सहायक होती है, इसीलिए इसे ‘आम्रवृष्टि’ नाम दिया गया है। अप्रैल में, बंगाल और असोम में उत्तर-पश्चिमी तथा उत्तरी पवनों द्वारा मेघ गर्जन, तड़ित-झंझा के साथ तेज बौछारें पड़ती हैं। इन्हें ‘काल-बैसाखी’ कहते हैं। कभी-कभी इन पवनों के द्वारा इन क्षेत्रों को भारी हानि भी उठानी पड़ जाती है।

भारत की शीतकालीन जलवायु

भारत में शीतकालीन जलवायु दिसम्बर से फरवरी तक रहती है। इस जलवायु की सामान्य दशाएँ निम्नलिखित हैं

1. तापमान– सामान्यतः देश में तापमान दक्षिण से उत्तर की ओर तथा समुद्र तट से आन्तरिक भागों की ओर घटते हैं। तिरुवनन्तपुरम् तथा चेन्नई में दिसम्बर में औसत तापमान 25°से 27°C के लगभग रहते हैं। दिल्ली और जोधपुर में तापमान 15° से 16°C तक रहते हैं। लेह में औसत तापमान -6°C तक गिर जाते हैं। उत्तरी मैदान में व्यापक रूप से पाला पड़ता है। इस ऋतु में दिन सामान्यतः कोष्ण (कम उष्ण) एवं रातें ठण्डी होती हैं।

2. वायुदाब- देश के उत्तर-पश्चिमी भाग में उच्च वायुदाब क्षेत्र स्थापित होता है। यहाँ से पवनें बाहर की ओर 3 किमी से 5 किमी प्रति घण्टा के वेग से चलने लगती हैं। इस क्षेत्र की स्थलाकृति का प्रभाव भी इन पवनों पर पड़ता है। समुद्रवर्ती भागों में कम वायुदाब रहता है; अतः पवनें स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं। गंगा घाटी में इन पवनों की दिशा पश्चिमी या उत्तर-पश्चिमी होती है। गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा में इनकी दिशा उत्तरी हो जाती है। स्थलाकृति के प्रभाव से मुक्त होकर बंगाल की खाड़ी के ऊपर इनकी दिशा उत्तर- पूर्वी हो जाती है।

3. वर्षा- स्थलीय पवनें शुष्क होती हैं; अतः प्राय: सम्पूर्ण देश में मौसम शुष्क रहता है। भूमध्य सागर की ओर से आने वाले पश्चिमी विक्षोभों से कुछ वर्षा देश के उत्तर-पश्चिमी भागों में होती है। हिमालय श्रेणी में हिमपात होता है। तमिलनाडु तट पर भी शीतकाल में वर्षा होती है। उत्तर-पूरब की ओर से चलने वाली स्थलीय मानसूनी पवनें जब बंगाल की खाड़ी को पार कर तमिलनाडु तट पर पहुँचती हैं, तो ये कुछ आर्द्रता ग्रहण (UPBoardSolutions.com) कर लेती हैं तथा तटों पर वर्षा करती हैं।

प्रश्न 3.
भारत में वर्षा के वार्षिक वितरण को स्पष्ट कीजिए तथा अपने उत्तर की पुष्टि रेखाचित्र से कीजिए।
या
भारतीय वर्षा के वितरण पर एक लेख लिखिए।
उत्तर :

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भारत में वर्षा का वार्षिक वितरण

भारत में वर्षा का वितरण बहुत विषम है। देश में कुल वर्षा का औसत लगभग 110 सेमी (40 इंच) है किन्तु इस सामान्य से वर्षा का विचलन 10% से 40% तक हो जाता है। सामान्यतः 85% वर्षा दक्षिण-पश्चिमी मानसूनों (जुलाई-सितम्बर) से प्राप्त होती है, लगभग 10% ग्रीष्मकालीन मानसूनों से, 5% लौटते हुए मानसूनों से (अक्टूबर-दिसम्बर) तथा 5% शीतकाल में होती है। देश में वर्षा का प्रादेशिक वितरण भी बहुत असमान रहता है। सामान्य रूप से भारत में वर्षा की निश्चितता तथा अनिश्चितता के आधार पर उसे दो भागों में विभाजित किया जा सकता है
1. निश्चित वर्षा के प्रदेश- इस प्रदेश के अन्तर्गत हिमालय को तराई प्रदेश, पश्चिमी बंगाल, असोम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, नागालैण्ड, मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुर, पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढाल, ऊपरी नर्मदा घाटी तथा मालाबार तट सम्मिलित किये जाते हैं।
2. अनिश्चित वर्षा के प्रदेश- अनिश्चित वर्षा के प्रदेश में उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात के मध्यवर्ती भाग, पूर्वी घाट, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश के दक्षिणी और पश्चिमी भाग, कर्नाटक, बिहार तथा ओडिशा सम्मिलित हैं। अनिश्चित वर्षा वाले प्रदेशों को निम्नलिखित भागों में बाँटा गया है

  • अधिक वर्षा वाले क्षेत्र– इसके अन्तर्गत पश्चिमी तट के कोंकण, मालाबार, दक्षिणी कनारा तथा उत्तर में हिमालय के दक्षिणी क्षेत्र में उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, मेघालय, असोम, नागालैण्ड, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर तथा (UPBoardSolutions.com) त्रिपुरा राज्य सम्मिलित हैं। इन क्षेत्रों में वर्षा का औसत 200 सेमी से अधिक रहता है।
  • साधारण वर्षा वाले क्षेत्र– इन क्षेत्रों में बिहार, ओडिशा, पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी घाट के पूर्वोत्तर ढाल, पश्चिम बंगाल, दक्षिणी उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश सम्मिलित हैं। यहाँ वर्षा का औसत 100 से 200 सेमी के मध्य रहता है। इन क्षेत्रों में वर्षा की विषमता 15 से 20% तक पायी जाती है। कभी-कभी इन क्षेत्रों में अधिक वर्षा होने से बाढ़ आ जाती है, जबकि कभी वर्षा
    UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 2 जलवायु 1
    की कमी से अकाल पड़ जाते हैं। इस प्रकार इन क्षेत्रों में वर्षा की अधिकता एवं कमी में मानसूनों का प्रमुख योगदान होता है। इसी कारण यहाँ बड़ी-बड़ी बहुउद्देशीय नदी-घाटी परियोजनाएँ क्रियान्वित की गयी हैं।
  • न्यून वर्षा वाले क्षेत्र– इन क्षेत्रों में वर्षा की कमी अनुभव की जाती है। यहाँ पर वर्षा का वार्षिक औसत 50 से 100 सेमी तक रहता है। इस प्रदेश के अन्तर्गत दक्षिण का प्रायद्वीप, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी मध्य प्रदेश, उत्तरी एवं दक्षिणी आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, पूर्वी राजस्थान, दक्षिणी पंजाब तथा दक्षिणी उत्तर प्रदेश राज्यों के भाग सम्मिलित हैं। वर्षा की विषमता 20 से 25 सेमी तक तथा अपर्याप्त व अनिश्चित रहती है। इन प्रदेशों में अकाल की सम्भावना बनी रहती है। अतः यहाँ सिंचाई के सहारे गेहूँ, कपास, ज्वार, बाजरा, तिलहन आदि फसलें उत्पन्न की जाती हैं।
  • अपर्याप्त वर्षा के क्षेत्र अथवा मरुस्थलीय क्षेत्र- ये भारत के शुष्क क्षेत्र हैं, जहाँ पर 50 सेमी से भी कम वर्षा होती है। वर्षा की कमी के कारण यहाँ सदैव सूखे की समस्या बनी रहती है। बिना सिंचाई के कृषि कार्य इन क्षेत्रों में बिल्कुल असम्भव है। (UPBoardSolutions.com) पश्चिमी राजस्थान के सम्पूर्ण क्षेत्र इसके अन्तर्गत आते हैं। तमिलनाडु का रायलसीमा क्षेत्र भी इसके अन्तर्गत आता है।

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प्रश्न 4.
भारत की अधिकांश वर्षा गर्मियों में होती है-कारणों का उल्लेख करते हुए भारत में वर्षा का वितरण लिखिए।
या
भारत की मानसून ऋतु का वर्णन कीजिए।
या
दक्षिण-पश्चिमी मानसून की वर्षा से प्रभावित किन्हीं दो क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए। [2010]
या
भारत में दक्षिण-पश्चिमी मानसून द्वारा होने वाली वर्षा का वर्णन कीजिए।
या
आगे बढ़ता हुआ मानसून’-भारत की इस ऋतु का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

भारत की वर्षा ऋतु (मानसून ऋतु)

वर्षा ऋतु ( आगे बढ़ते हुए मानसून की ऋतु )–जून से सितम्बर के मध्य सम्पूर्ण देश में व्यापक रूप से वर्षा होती है। वर्षा का 75% से 90% भाग इसी अवधि में प्राप्त हो जाता है।
दक्षिण-पश्चिमी मानसून की उत्पत्ति- ग्रीष्म ऋतु में देश के उत्तर-पश्चिमी मैदानी भागों में निम्न वायुदाब का क्षेत्र विकसित हो जाता है। जून के प्रारम्भ तक निम्न वायुदाब का यह क्षेत्र इतना प्रबल हो जाता है कि दक्षिण गोलार्द्ध की व्यापारिक पवनें भी इस ओर खिंच आती हैं। इन दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनों की उत्पत्ति समुद्र से होती है। हिन्द महासागर में विषुवत् वृत्त को पार करके ये पवनें बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर में पहुँच जाती हैं। इसके बाद ये भारत के वायु-संचरण का अंग बन जाती हैं। विषुवतीय गर्म धाराओं के ऊपर से गुजरने के कारण ये भारी मात्रा में आर्द्रता ग्रहण कर लेती हैं। विषुवत् वृत्त पार करते ही इनकी दिशा दक्षिण-पश्चिम हो जाती है। इसीलिए इन्हें दक्षिण-पश्चिमी मानसून’ कहा जाता है।

मानसून का फटना- वर्षावाहिनी पवनें बड़ी तेज चलती हैं। इनकी औसत गति 30 किमी प्रति घण्टा होती है। उत्तर-पश्चिम के दूरस्थ भागों को छोड़कर ये पर्वनें एक महीने के अन्दर-अन्दर सारे भारत में फैल जाती हैं। आर्द्रता से लदी इन पवनों के साथ ही (UPBoardSolutions.com) बादलों का प्रचण्ड गर्जन तथा बिजली का चमकना शुरू हो जाता है। इसे मानसून का ‘फटना’ अथवा ‘टूटना’ कहते हैं।

दक्षिण-पश्चिमी मानसून की शाखाएँ- भारत की प्रायद्वीपीय स्थिति के कारण मानसून की दो शाखाएँ। हो जाती हैं
(1) अरब सागर की शाखा- अरब सागर की शाखा सबसे पहले पश्चिमी घाट के पर्वतों से टकराकर सह्याद्रि के पवनाभिमुख ढालों पर भारी वर्षा करती है। पश्चिमी घाट को पार करके यह शाखा दकन के पंठार और मध्य प्रदेश में पहुँच जाती है। वहाँ भी इससे पर्याप्त मात्रा में वर्षा होती है। तत्पश्चात् इसका प्रवेश गंगा के मैदानों में होता है, जहाँ बंगाल की खाड़ी की शाखा भी आकर इसमें मिल जाती है। अरब सागर के मानसून की शाखा का दूसरा भाग सौराष्ट्र के प्रायद्वीप तथा कच्छ में पहुँच जाता है। इसके बाद यह पश्चिमी राजस्थान और अरावली पर्वत-श्रेणियों के ऊपर से गुजरता है। वहाँ इसके द्वारा बहुत हल्की वर्षा होती है। पंजाब और हरियाणा में पहुँचकर यह शाखा भी बंगाल की खाड़ी की शाखा में मिलकर हिमालय के पश्चिमी भाग में भारी वर्षा करती है।
(2) बंगाल की खाड़ी की शाखा- बंगाल की खाड़ी की मानसून शाखा म्यांमार (बर्मा) तट की ओर तथा बांग्लादेश के दक्षिण-पूर्वी भागों की ओर बढ़ती है। परन्तु म्यांमार के तट के साथ-साथ फैली अराकान पहाड़ियाँ इस शाखा के बहुत बड़े भाग को भारतीय उपमहाद्वीप की दिशा में मोड़ देती हैं। इस प्रकार यह पश्चिमी दिशा से न आकर दक्षिण तथा दक्षिण-पूर्वी दिशाओं से आती है। विशाल हिमालय तथा उत्तर-पश्चिमी भारत के निम्न वायुदाब के प्रभाव से यह शाखा दो भागों में बँट जाती है। एक शाखा पश्चिम की ओर बढ़ती है तथा गंगा के मैदानों को पार करती हुई पंजाब के मैदानों तक पहुँचती है। इसकी दूसरी शाखा ब्रह्मपुत्र की घाटी की ओर बढ़ती है। यह उत्तर-पूर्वी भारत में भारी वर्षा करती है। इसकी एक उपशाखा मेघालय में गारो और खासी की पहाड़ियों से टकराती है और वहाँ खूब वर्षा करती है। सबसे अधिक वर्षा मॉसिनराम (Mausinram) (मेघालय) में होती है। यहाँ वार्षिक वर्षा को औसत 11,405 मिलीमीटर है।

वर्षा का वितरण– दक्षिण-पश्चिमी मानसून से होने वाली वर्षा के वितरण पर उच्चावच का बहुत प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए-पश्चिमी घाट के पवनविमुख ढालों पर 250 सेमी से अधिक वर्षा होती है। इसके विपरीत पश्चिमी घाट के पवनाभिमुख ढालों पर 50 सेमी से भी कम वर्षा होती है। इसी प्रकार उत्तर-पूर्वी राज्यों में भी भारी वर्षा होती है, परन्तु उत्तरी मैदानों में वर्षा की मात्रा पूर्व से पश्चिम की ओर घटती जाती है। इस विशिष्ट ऋतु में (UPBoardSolutions.com) कोलकाता में लगभग 120 सेमी, पटना में 102 सेमी, इलाहाबाद में 91 सेमी तथा दिल्ली में 56 सेमी वर्षा होती है।

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प्रश्न 5.
भारतीय जलवायु के प्रभावों का वर्णन कीजिए।
या
भारतीय जलवायु में पायी जाने वाली विषमताओं तथा कृषि पर उनके प्रभाव का वर्णन कीजिए।
या
भारत में मानसून के किन्हीं दो प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
भारतीय जलवायु के मुख्य तत्त्व-तापमान तथा वर्षा हैं। समस्त देश में तापमानों तथा वर्षा का वितरण असमान पाया जाता है। इन विषमताओं का प्रभाव भारतीय कृषि पर स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। भारत की जलवायु में बहुत अधिक विषमताएँ पायी जाती हैं। इन विषमताओं को उत्पन्न करने में निम्नलिखित कारक सहायक होते हैं

1. तापमानों की विषमताएँ- देश के विभिन्न भागों में तापमानों की भिन्नता पायी जाती है। दक्षिणी | भारत उष्ण कटिबन्ध में पड़ता है; अत: वहाँ वर्षपर्यन्त ऊँचे तापमान रिकॉर्ड किये जाते हैं। इसके विपरीत, कर्क रेखा के उत्तर के क्षेत्र उपोष्ण कटिबन्धीय स्थिति के कारण ग्रीष्म तथा शीत ऋतु में तापमानों की अतिशयताओं का अनुभव करते हैं। हिमालय के पर्वतीय भागों में तो शीत काल में तापमान शून्य के ऊपर रहते हैं। मरुस्थलीय भागों में शीत काल में बहुत कम तापमान तथा ग्रीष्म काल में बहुत ऊँचे तापमान पाये जाते हैं।

2. वर्षा के वितरण की विषमताएँ- देश में वर्षा का प्रादेशिक वितरण बहुत विषम है। मेघालय, असम, बंगाल आदि में 200 सेमी से अधिक वार्षिक वर्षा होती है, जब कि गुजरात, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश में वार्षिक वर्षा का वितरण औसत 25 सेमी से 100 सेमी तक रहता है। आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक तथा दकन के पठार के आन्तरिक भागों में 50 से 100 सेमी तक वार्षिक वर्षा होती है। इसी प्रकार पूर्वी हिमालय में 200 सेमी से अधिक तथा पश्चिमी हिमालय में 100 से 150 सेमी तक वार्षिक वर्षा होती है। हम जानते हैं कि वायुराशियों द्वारा अवरोधं के सम्मुख वाले भाग में अत्यधिक (UPBoardSolutions.com) वर्षा होती है, जब कि विमुख भागों तक पहुँचते-पहुंचते वायुराशियाँ अपनी आर्द्रता खो देने के कारण शुष्क और उष्ण हो जाती हैं और वहाँ बहुत कम वर्षा ही हो पाती है। इन प्रदेशों को वृष्टिछाया प्रदेश कहते हैं; उदाहरणार्थ-भारत में दक्षिण-पश्चिमी मानसून पवनों की अरब सागरीय शाखा द्वारा पश्चिमी घाट के वायु अभिमुख ढाल पर 640 सेमी (महाबलेश्वर) वर्षा होती है, जब कि इसके विमुख ढाल पर पुणे में 50 सेमी वर्षा भी कठिनाई से हो पाती है; अत: दक्षिणी भारत का यह क्षेत्र-वृष्टिछाया प्रदेश कहलाता है।

3. वर्षा की ऋत्विक विषमताएँ- देश के अधिकांश भागों में जुलाई से सितम्बर के मध्य अधिकांश वर्षा (85% तक) होती है, किन्तु तमिलनाडु में शीतकालीन तथा लौटते हुए मानसूनों से अधिक वर्षा होती है। उत्तरी भारत में चक्रवातों से शीत ऋतु में वर्षा प्राप्त होती है। पर्वतीय क्षेत्रों में हिमपात होता है।

4. वर्षा का सामान्य से विचलन– प्रत्येक वर्ष मानसून एक जैसे सक्रिय नहीं होते। किसी वर्ष सामान्य से अधिक वर्षा होती है तथा किसी वर्ष सामान्य से कम। वर्षा की यह अनियमित तथा अनिश्चित प्रकृति प्रादेशिक रूप से भी दृष्टिगोचर होती है। इसीलिए देश के कुछ भागों में जब बाढ़े आती हैं, तब कुछ भागों में सूखे की स्थिति भी होती है।

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जलवायु की विषमता का कृषि-उपजों या मानव-जीवन पर प्रभाव

भारत की जलवायु मानसूनी है। मानसून की विलक्षणता के कारण इसे ‘भारत के आर्थिक जीवन की धुरी’ कहा गया है। पर्यावरण के सभी अंगों में जलवायु मानव-जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करती है। मनुष्य की वेशभूषा, खान-पान, गृह-प्रकार, जन-स्वास्थ्य आदि सभी पर जलवायु का गहरा प्रभाव पड़ता है। इसके निम्नलिखित प्रभाव उल्लेखनीय हैं

  1. भारत में खरीफ फसलों की बुवाई वर्षा के आरम्भ होने के साथ शुरू हो जाती है। यदि वर्षा समय से प्रारम्भ हो जाती है और नियमित अन्तराल पर होती रहती है तो कृषि उत्पादन पर्याप्त मात्रा में प्राप्त होता है।
  2. जिन भागों में कम वर्षा होती है अथवा सूखा पड़ता है वहाँ कृषि फसलें सिंचाई के बिना पैदा नहीं की जा सकती हैं।
  3. अत्यधिक उष्णता एवं आर्द्रता बीमारियों को जन्म देती हैं। इनसे मनुष्य पुरुषार्थहीन हो जाता है तथा उसकी कार्यक्षमता में कमी आती है।
  4. ग्रीष्म ऋतु में उत्तरी भारत में तापमान बहुत ऊँचे हो जाते हैं और (UPBoardSolutions.com) ‘लू’ चलने लगती है, जिससे खेतों में काम करना भी कठिन हो जाता है।
  5. मूसलाधार वर्षा से बाढ़ आ जाती हैं और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में कृषि-फसलें नष्ट हो जाती हैं।
  6. भीषण गर्मी के बाद वर्षा का मौसम आरम्भ हो जाता है, जो मानव स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालता है। इससे अनेक संक्रामक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। देश के कुछ भागों में मलेरिया व हैजा जैसे रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
  7. मानव की वेशभूषा भी जलवायु से प्रभावित होती है। उत्तर भारत में लोग शीत ऋतु में ऊनी कपड़े पहनते हैं तथा दक्षिण भारत में सफेद हल्के व सूती वस्त्र पहने जाते हैं।
  8. समय से पूर्व वर्षा आरम्भ होने तथा समय से पहले वर्षा समाप्त होने से भी आर्थिक क्रिया- कलाप प्रभावित होते हैं।
  9. जलवायु का प्रभाव घरों के निर्माण पर भी पड़ता है। भारत में मकान हवादार बनाये जाते हैं। उनमें आँगन व बरामदों की अधिक आवश्यकता होती है, क्योंकि भारत में ग्रीष्म काल की अवधि लम्बी होती है, जब कि शीत ऋतु थोड़े समय के लिए ही होती है।
  10. भारत में ग्रीष्म ऋतु में हरे चारे की कमी हो जाती है, जिससे पशुओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  11. भारत के कुछ प्रदेशों; विशेषकर पंजाब में गेहूं व गन्ना की फसलों को लाभ मिलता है।
  12. भारत के वित्तीय बजट को ‘मानसून का जुआ’ कहा गया है, क्योंकि भारत में किसी वर्ष वर्षा बहुत | कम होती है, जिससे फसलें नष्ट हो जाती हैं और देश में अकाल पड़ जाता है तथा कभी-कभी वर्षा अधिक हो जाती है, जिसके (UPBoardSolutions.com) कारण नदियों में बाढ़ आ जाती है। इससे भी फसलें नष्ट हो जाती हैं।
  13. भारत की जलवायु ने कृषकों को भाग्यवादी एवं निराशावादी बना दिया है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि मानसूनी वर्षा के रूप में भारतीय जलवायु कृषि-उपजों को सर्वाधिक प्रभावित करती है।

प्रश्न 6.
भारत की जलवायु की विशेषताओं का वर्णन कीजिए। [2013]
या

भारतीय जलवायु की किन्हीं पाँच विशेषताओं की विवेचना कीजिए। [2013]
या
सम और विषम जलवायु में अन्तर लिखिए।
या
विषम जलवायु से क्या अभिप्राय है ? उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
या
मानसूनी जलवायु की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2016]
उत्तर :
भारत की स्थिति भूमध्य रेखा के उत्तर में है और कर्क रेखा देश के मध्य से गुजरती है। कर्क रेखा देश को दो भागों में विभाजित कर देती है। इस प्रकार भारत का उत्तरी भाग उपोष्ण कटिबन्ध तथा दक्षिणी भाग उष्ण कटिबन्ध में स्थित है। भारत में उत्तर की ओर हिमालय पर्वत-श्रेणी तथा दक्षिण-पूर्वी एवं दक्षिण-पश्चिमी दिशाओं में हिन्द महासागर की स्थिति है, जिन्होंने इसकी जलवायु को बहुत प्रभावित किया है। इसी कारण (UPBoardSolutions.com) भारत में विविध प्रकार की जलवायु दशाएँ पाई जाती हैं। वस्तुतः भारत की जलवायु पूर्णतः मानसूनी वर्षा पर निर्भर करती है। जिन भागों में मानसूनों के मार्ग में कोई अवरोध उपस्थित होता है, उन क्षेत्रों में वर्षा अधिक होती है; जैसे–पश्चिमी घाट तथा हिमालय पर्वत के दक्षिणी ढालों पर।

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एक स्थान से दूसरे स्थान और एक ऋतु से दूसरी ऋतु में तापमान एवं वर्षण में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है। ग्रीष्म ऋतु में भारत के पश्चिम में स्थित थार मरुस्थल में इतनी प्रचण्ड गर्मी पड़ती है कि तापमान प्रायः 55° सेल्सियस तक पहुँच जाता है, जब कि शीत ऋतु में कश्मीर राज्य के लद्दाख क्षेत्र के लेह नगर में इतनी कड़ाके की ठण्ड पड़ती है कि तापमान जमाव बिन्दु से 45° सेल्सियस तक नीचे चला जाता है; अर्थात् -45° सेल्सियस तक चला जाता है। केरल और अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह में दिन और रात के तापमान में 7° या 8° सेल्सियस का अन्तर पाया जाता है। इसके विपरीत थार मरुस्थल में यदि दिन का तापमान 50° सेल्सियस रहता है तो रात में यह जमाव बिन्दु 0° तक पहुँच सकता है। जब हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में हिमपात होता है, तब शेष भारत में वर्षा की बौछारें पड़ती हैं। कुछ विदेशी विद्वानों ने भारत को अनेक जलवायु वाला देश बताया है। ब्लैनफोर्ड (Blanford) का कथन है कि “हम भारत की जलवायुओं के विषय में कह सकते हैं, जलवायु के विषय में (UPBoardSolutions.com) नहीं, क्योंकि सम्पूर्ण विश्व में जलवायु की इतनी विषमताएँ नहीं मिलतीं जितनी अकेले भारत में प्रसिद्ध जलवायु विज्ञानवेत्ता मार्सडेन ने भी कहा है कि “विश्व की समस्त जलवायु की किस्में भारत में पाई जाती हैं।” स्पष्ट है कि भारत में विभिन्न प्रकार की जलवायु दशाएँ पाई जाती हैं। एक स्थान से दूसरे स्थान और एक ऋतु से दूसरी ऋतु में तापमान, वायुदाब तथा पवनें एवं वर्षण में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है। भारत में प्रमुख रूप से दो प्रकार की जलवायु पाई जाती हैं—(1) सम और (2) विषम।

1. समजलवायु- सम जलवायु उस जलवायु को कहा जाता है जहाँ गर्मियों में न अधिक गर्मी पड़ती है। और ने सर्दियों में अधिक सर्दी। जहाँ तापमान वर्षभर लगभग समान रहता है। ऐसी जलवायु प्रायः . समुद्र के तटीय प्रदेशों में पाई जाती है। समुद्र के प्रभाव के कारण तटीय क्षेत्रों में सम जलवायु पाई जाती है। ऐसी जलवायु में दैनिक तथा वार्षिक तापान्तर बहुत ही कम पाया जाता है। केरल के तिरुवनन्तपुरम् में इसी प्रकार की जलवायु पाई जाती है।

2. विषम जलवायु- विषम जलवायु उस जलवायु को कहा जाता है जहाँ गर्मियों में अत्यधिक गर्मी तथा सर्दियों में अधिक सर्दी पड़ती है। जहाँ तापमान वर्षभर असमान रहता है। ऐसी जलवायु महाद्वीपों के आन्तरिक भागों अथवा समुद्र से दूर के भागों में पाई जाती है। सूर्य की किरणों से जल की अपेक्षा धरती दिन में जल्दी गर्म और रात में जल्दी ठण्डी हो जाती है। अत: धरती के प्रभाव के कारण विषम जलवायु का जन्म होता है। ऐसी जलवायु में दैनिक तापान्तर और वार्षिक तापान्तर अपेक्षाकृत अधिक पाया जाता है। जोधपुर (राजस्थान) तथा अमृतसर (पंजाब) में इसी प्रकार की जलवायु पाई जाती है।

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प्रश्न 7.
भारत में मानसून की उत्पत्ति तथा वर्षा का वितरण बताइट। [2013, 14]
या
भारत में मानसून की उत्पत्ति पर प्रकाश डालिए। [2015]
या
निम्नलिखित शीर्षकों में भारत में मानसूनी वर्षा का वर्णन कीजिए [2015]
(क) वायु की दिशा, (ख) वर्षा का वितरण।
उत्तर :
मानसून का अर्थ , मानसून शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के ‘मौसिम’ शब्द से हुई है जिसका तात्पर्य मौसम या ऋतु है। मौसम का आवर्तन मानसूनी जलवायु की प्रमुख विशेषता है। भारत में इस प्रकार की हवाएँ वर्ष में दो बार उच्च वायु भार से (UPBoardSolutions.com) निम्न वायु भार की ओर चलती हैं। ग्रीष्म ऋतु में ये हवाएँ समुद्र से स्थल की ओर चलती हैं, जबकि शीत ऋतु में ये हवाएँ स्थल से समुद्र की ओर बहती हैं। ग्रीष्म ऋतु तथा शीत ऋतु के मौसम के मध्य पवनों की दिशा में 120° का अन्तर पाया जाता है। इन पवनों की न्यूनतम गति तीन मीटर प्रति सेकण्ड होती है, इसलिए इन्हें मानसूनी पवनें कहते हैं।

मानसून की रचना

मानसून की रचना के सम्बन्ध में अनेक मत प्रचलित हैं। इसके लिए सबसे मुख्य और प्राचीन मत है स्थलीय और जलीय हवाएँ जो शीत ऋतु में स्थल की ओर और ग्रीष्म ऋतु में जल की ओर बहती हैं। ग्रीष्म ऋतु में अधिक तापमान के कारण स्थर पर निम्न वायुदाब का केन्द्र बन जाता है जिससे हवाएँ समुद्र से स्थल की ओर चलने लगती हैं, जबकि शीत ऋतु में इसके बिल्कुल विपरीत होता है। समुद्री भाग पर निम्न वायुदाब के केन्द्र के कारण हवाएँ स्थल से समुद्र की ओर बहती हैं। आधुनिक शोधों के कारण अब यह मत मान्य नहीं है। अब वैज्ञानिक मानसून की उत्पत्ति के लिए जेट पवनों को महत्त्वपूर्ण मानते हैं। इस मत के अनुसार । मानसून की उत्पत्ति वायुमण्डलीय पवन के संचार से होती है जिसमें तिब्बत का पठार मुख्य है। ऊँचाई पर स्थित होने के कारण ये पठार गर्म होकर भट्ठी की तरह (UPBoardSolutions.com) काम करता है। इस कारण इन अक्षांशों (20° उत्तरी अक्षांश से 20° दक्षिणी अक्षांश) में धरातल एवं क्षोभमण्डल के बीच वायु का एक आवृत्त बन जाता है।

क्षोभमण्डल में उष्णकटिबन्धीय पुरवा जेट तथा उपोष्ण कटिबन्धीय पछुआ जेट धाराओं के चलने से वायुमण्डल की आर्द्रतायुक्त हवाएँ ऊपर क्षोभमण्डल में पहुँचकर विभिन्न दिशाओं में फैल जाती हैं और निम्न क्षोभमण्डल में बहने लगती हैं। अधिक ऊँचाई पर पहुँचकर यही हवाएँ घनीभूत होकर भारतीय महाद्वीप में मानसूनी पवनों को उत्पन्न करती हैं, जिनसे समस्त भारत में वर्षा होती है।

वर्षा का वितरण- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 3 का उत्तर देखें।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वर्षा और वर्षण में अन्तर लिखिए।
उत्तर :
वर्षा- 
यह वर्षण का एक विशिष्ट रूप है, जिसमें बादलों के जल-वाष्प कण संघनित होकर जल की बूंदों या हिमकणों के रूप में भू-पृष्ठ पर गिरते हैं। जलवर्षा तथा हिमवर्षा इसके दो रूप हैं। वर्षण–यह एक व्यापक प्रक्रिया है, जिसमें वायुमण्डल की आर्द्रता संघनित होकर वर्षा, हिम, ओला, पाला
आदि रूपों में धरातल पर गिरती है। जल-वर्षा, वर्षण का एक साधारण रूप है। हिमवृष्टि, ओलावृष्टि, हिमपात आदि इसके अनेक रूप हैं।

प्रश्न 2.
भारत में कितनी ऋतुएँ होती हैं ? कौन-सी ऋतु कृषि के लिए महत्त्वपूर्ण है और क्यों ?
उत्तर :
भारत की जलवायु मानसूनी है। मानसूनों की प्रगति के आधार पर देश में चार ऋतुएँ होती हैं

  • आगे बढ़ते हुए मानसून (दक्षिण-पश्चिमी मानसून) की ऋतु अर्थात् वर्षा ऋतु,
  • लौटते हुए मानसून की ऋतु अर्थात् शरद् ऋतु,
  • शीत ऋतु (उत्तर-पूर्वी मानसून) तथा
  • ग्रीष्म ऋतु।। देश की कृषि पर ऋतुओं का प्रभाव महत्त्वपूर्ण होता है। कृषि का आधार वर्षा है तथा देश की अधिकांश वर्षा आगे बढ़ते हुए मानसून (जुलाई से सितम्बर के मध्य) द्वारा होती है। इसलिए यह ऋतु, जिसे वर्षा ऋतु भी कहते हैं, कृषि के लिए सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि
  1. इसी ऋतु में देश की 75 से 90% तक वर्षा होती है।
  2. वर्षा की अवधि तथा मात्रा का वितरण देशभर में (UPBoardSolutions.com) असमान है। इसका कृषि पर बहुत प्रभाव पड़ता है। उत्तरी मैदान में वर्षा की मात्रा पूर्व से पश्चिम की ओर घटती है, जबकि प्रायद्वीपीय भारत में पश्चिम से | पूरब की ओर वर्षा की मात्रा घटती है।
  3. वर्षा के वितरण का कृषि के प्रकार तथा फसलों के उत्पादन से गहरा सम्बन्ध है।
  4. आगे बढ़ते हुए मानसून ही देश की कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था की आधारशिला है। इसीलिए भारतीय कृषि को ‘मानसून का जुआ’ कहा जाता है।

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प्रश्न 3.
आम्रवृष्टि’ और ‘काल-बैसाखी’ में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
आम्रवृष्टि-ग्रीष्म ऋतु के अन्त में केरल तथा कर्नाटक के तटीय भागों में मानसून से पूर्व की वर्षा का यह स्थानीय नाम इसलिए पड़ा है; क्योकि यह वर्षा आम के फलों को शीघ्र पकाने में सहायता करती है। काल-बैसाखी-ग्रीष्म ऋतु में बंगाल तथा असोम में भी उत्तर-पश्चिमी तथा उत्तरी पवनों द्वारा वर्षा की तेज बौछारें पड़ती हैं। यह वर्षा प्रायः सायंकाल में होती है। इसी वर्षा को काल-बैसाखी’ कहते हैं। इसका अर्थ है-बैसाख मास की काल।

प्रश्न 4.
भारत में आगे बढ़ते हुए मानसून की ऋतु की तीन विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
भारत में आगे बढ़ते हुए मानसून की ऋतु की तीन विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • भारत में आगे बढ़ते हुए मानसून की ऋतु जून से सितम्बर तक रहती है। इस ऋतु में समस्त भारत में वर्षा होती है।
  • वर्षा ऋतु की अवधि दक्षिण से उत्तर की ओर (UPBoardSolutions.com) तथा पूर्व से पश्चिम की ओर घटती जाती है। देश के सबसे उत्तर-पश्चिमी भागों में यह अवधि केवल दो महीने की होती है।
  • देश की 75 से 90% वर्षा इसी ऋतु में होती है।

प्रश्न 5.
भारत में कम वर्षा वाले तीन क्षेत्र कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
कम वर्षा वाले क्षेत्रों से अभिप्राय ऐसे क्षेत्रों से है, जहाँ 50 सेमी से भी कम वार्षिक वर्षा होती है। ये क्षेत्र हैं

  • पश्चिमी राजस्थान तथा इसके निकटवर्ती पंजाब, हरियाणा तथा गुजरात के क्षेत्र।
  • सह्याद्रि के पूर्व में फैले दकन के पठार के आन्तरिक भाग।
  • कश्मीर में लेह के आस-पास का प्रदेश।

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प्रश्न 6.
जाड़ों में वर्षा वाले भारत के दो क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए। [2018]
उत्तर:
शीत ऋतु में स्थलीय पवनें शुष्क होती हैं; अतः प्रायः सम्पूर्ण देश में मौसम शुष्क रहता है। परन्तु निम्नलिखित दो क्षेत्रों में जाड़ों में भी वर्षा होती है

  • देश के उत्तर-पश्चिमी भाग-भूमध्य सागर की ओर से आने वाले पश्चिमी विक्षोभों से कुछ वर्षा देश के उत्तर-पश्चिमी भागों में होती है।
  • तमिलनाडु तट-तमिलनाडु तट पर भी शीतकाल में वर्षा (UPBoardSolutions.com) होती है। उत्तर-पूरब की ओर से चलने वाली स्थलीय मानसून पवनें जब बंगाल की खाड़ी को पार कर तमिलनाडु तट पर पहुँचती हैं, तो ये कुछ आर्द्रता ग्रहण कर लेती हैं तथा तटों पर वर्षा करती हैं।

प्रश्न 7.
जलवायु का प्राकृतिक वनस्पति व जीव-जन्तुओं पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर :
पर्यावरण के सभी अंगों में जलवायु मानव-जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करती है। भारत में कृषि राष्ट्र के अर्थतन्त्र की धुरी है, जो वर्षा की विषमता से सबसे अधिक प्रभावित होती है। मानसूनी वर्षा बड़ी ही अनियमित एवं अनिश्चित है। जिस वर्ष वर्षा अधिक एवं मूसलाधार रूप में होती है तो अतिवृष्टि के परिणामस्वरूप बाढ़ आ जाती हैं तथा भारी संख्या में धन-जन का विनाश करती हैं। इसके विपरीत जिन क्षेत्रों में वर्षा कम होती है या अनिश्चितता की स्थिति होती है तो अनावृष्टि के कारण सूखा पड़ जाता है, जिससे फसलें सूख जाती हैं तथा पशुधन को भी पर्याप्त हानि उठानी पड़ती है। जलवायु का प्राकृतिक वनस्पति व जीव-जन्तुओं पर प्रभाव निम्नलिखित है-

1. प्राकृतिक वनस्पति पर प्रभाव- किसी देश की प्राकृतिक वनस्पति न केवल धरातल और मिट्टी के गुणों पर निर्भर करती है, वरन् वहाँ के तापमान और वर्षा का भी उस पर प्रभाव पड़ता है, क्योंकि पौधे के विकास के लिए वर्षा, तापमान, प्रकाश और वायु की आवश्यकता पड़ती है; उदाहरणार्थभूमध्यरेखीय प्रदेशों में निरन्तर तेज धूप, कड़ी गर्मी और अधिक वर्षा के कारण ऐसे वृक्ष उगते हैं; जिनकी पत्तियाँ घनी, ऊँचाई बहुत और लकड़ी अत्यन्त कठोर होती है। इसके विपरीत मरुस्थलों में काँटेदार झाड़ियाँ भी बड़ी कठिनाई से उग पाती हैं; क्योंकि यहाँ वर्षा का अभाव होता है। वास्तव में जलवायु वनस्पति का प्राणाधार है।

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2. जीव-जन्तुओं पर प्रभाव– जलवायु की विविधता ने प्राणियों में भी विविधता स्थापित की है। जिस प्रकार विभिन्न जलवायु में विभिन्न प्रकार की वनस्पतियाँ पायी जाती हैं, वैसे ही विभिन्न जलवायु प्रदेशों में अनेक प्रकार के जीव-जन्तु पाये जाते हैं; उदाहरणार्थ-कुछ जीव-जन्तु वृक्षों की शाखाओं पर रहकर सूर्य की गर्मी और प्रकाश प्राप्त करते हैं; जैसे-नाना प्रकार के बन्दर, चमगादड़ आदि। इसके विपरीत कुछ जीव-जन्तु जल में निवास (UPBoardSolutions.com) करते हैं; जैसेमगरमच्छ, दरियाई घोड़े आदि। ठीक इससे भिन्न प्रकार के प्राणी टुण्ड्री प्रदेश में पाये जाते हैं जिनके शरीर पर लम्बे और मुलायम बाल होते हैं, जिनके कारण वे कठोर शीत से अपनी रक्षा करते हैं।

प्रश्न 8.
अल्पवृष्टि तथा अतिवृष्टि का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

1. अल्पवृष्टि

अल्पवृष्टि का तात्पर्य वर्षा न होने से है जिसके कारण अकाल की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। जलाभाव के कारण फसलें नष्ट हो जाती हैं। नदी, तालाब, कुएँ सूखने लगते हैं। पानी का घोर संकट उत्पन्न हो जाता है। जिससे सभी प्रकार के जीवों का जीवन संकटग्रस्त हो जाता है। पशुओं के लिए पानी तथा चारे की समस्या , पैदा हो जाती है।

2. अतिवृष्टि

अतिवृष्टि का तात्पर्य ऐसी अत्यधिक वर्षा से है जो लाभ की अपेक्षा हानि पहुँचाती है। अतिवृष्टि से नदी, जलाशय, तालाब सभी जल से भर जाते हैं। नदियों में बाढ़ आ जाती है जिससे उनके किनारे बसे गाँव, नगर तथा फसलें प्रभावित हो जाती हैं। अतिवृष्टि से बहुत-से लोग घर-विहीन हो जाते हैं। बाढ़ के बाद अनेक प्रकार के संक्रामक रोग फैलने लगते हैं। अतिवृष्टि का सर्वाधिक प्रभाव फसलों पर पड़ता है। इससे सामान्य जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।

प्रश्न 9.
पीछे हटते हुए मानसून की ऋतु में मौसम की विभिन्न दशाओं तथा वर्षा के वितरण का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अक्टूबर और नवम्बर के महीने में भारत में पीछे हटते हुए मानसून की ऋतु पायी जाती है। इस ऋतु में मानसून का निम्न वायुदाब का गर्त कमजोर पड़ जाता है और इसका स्थान उच्च वायुदाब ले लेता है। परिणामस्वरूप मानसून पीछे हटने लगता है। इस (UPBoardSolutions.com) समय तक इन पवनों में आर्द्रता की मात्रा पर्याप्त कम हो चुकी होती है। अत: इसके द्वारा बहुत कम वर्षा होती है। भारतीय भू-भागों पर इसका प्रभाव-क्षेत्र सिकुड़ने लगता है। और पृष्ठीय पवनों की दिशा उलटनी शुरू हो जाती है। अक्टूबर तक मानसून उत्तरी मैदानों से पीछे हट जाता है।

अक्टूबर-नवम्बर के दो महीने, एक संक्रान्ति काल है। इस काल में वर्षा ऋतु के स्थान पर शुष्क ऋतु का आगमन प्रारम्भ हो जाता है। मानसून के हटने से आकाश साफ हो जाता है और तापमान फिर से बदलने लगता है। परन्तु भूमि अभी भी आर्द्र बनी रहती है। उच्च तापमान तथा आर्द्रता के कारण मौसम कष्टदायक हो जाता है। इस कष्टदायक मौसम को ‘क्वार की उमस’ कहते हैं। अक्टूबर के उत्तरार्द्ध में मौसम बदलने लगता है और विशेषकर उत्तरी मैदानों में तापमान तेजी से गिरने लगता है।

नवम्बर के प्रारम्भ में उत्तर-पश्चिमी भारत के निम्न वायुदाब का क्षेत्र बंगाल की खाड़ी की ओर खिसक जाता है। इस अवधि में अण्डमान सागर में चक्रवात बनने लगते हैं। इनमें से कुछ चक्रवात दक्षिणी प्रायद्वीप के पूर्वी तटों को पार कर जाते हैं और इन क्षेत्रों में भारी तथा व्यापक वर्षा करते हैं। ये उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात अधिकतर गोदावरी, कृष्णा और कावेरी के डेल्टाई प्रदेशों में ही आते हैं। ये बहुत ही विनाशकारी होते हैं। कोई भी वर्ष इनकी विनाशलीला से खाली नहीं जाता। कभी-कभी ये चक्रवात सुन्दरवन और बांग्लादेश में भी पहुँच जाते हैं। कोरोमण्डल तट पर अधिकतर वर्षा इन्हीं चक्रवातों और अवदाबों के कारण होती है।

प्रश्न 10.
भारत की चार प्रमुख ऋतुओं के नाम लिखकर उनका संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत की चार ऋतुओं के नाम तथा उनका संक्षिप्त विवेचन निम्नवत् है

1. शीत ऋतु- लगभग पूरे भारत में दिसम्बर, जनवरी तथा फरवरी के महीनों में शीत ऋतु होती है। इस ऋतु में उत्तर-पश्चिमी मैदानी भागों में उच्च वायुदाब रहता है तथा देश के ऊपरी भागों में उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवने स्थल से सागरों की ओर चलती हैं। पवनों के स्थल भागों से चलने के कारण यह ऋतु शुष्क होती है। इस ऋतु में दक्षिण से उत्तर की ओर जाने में तापमान घटता जाता है। यहाँ दिन ‘ सामान्यत: अल्प उष्ण एवं रातें ठण्डी होती हैं। ऊँचे स्थानों पर पाला भी पड़ जाता है।

2. ग्रीष्म ऋतु- 
21 मार्च के बाद सूर्य की स्थिति उत्तरायण हो जाती है। अब मार्च, अप्रैल और मई के बीच अधिक तापमान की पेटी दक्षिण से उत्तर की ओर खिसक जाती है। इस समय देश के उत्तर-पश्चिमी भांगों में तापमान 48° सेल्सियस तक पहुँच जाता है। फलस्वरूप अत्यधिक गर्मी पड़ने के कारण इस भाग में निम्न वायुदाब के क्षेत्र बन जाते हैं। इसे मानसून का निम्न वायुदाब गर्त’ कहते हैं। इस ऋतु में शुष्क एवं गर्म पवनें चलने लगती हैं, (UPBoardSolutions.com) जिन्हें ‘लू’ कहा जाता है। इन दिनों पंजाब, हरियाणा, पूर्वी राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश में धूलभरी आँधियाँ भी चलती हैं।

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3. आगे बढ़ते हुए मानसून की ऋतु– 
सम्पूर्ण देश में जून, जुलाई, अगस्त और सितम्बर के महीनों में ही अधिकांश वर्षा होती है। वर्षा की अवधि एवं मात्रा उत्तर से दक्षिण तथा पूर्व से पश्चिम की ओर घटती जाती है। भारत के उत्तर-पश्चिमी भागों में यह अवधि केवल दो महीनों की होती है तथा वर्षा का 75% से 90% भाग इसी अवधि में प्राप्त हो जाता है।

4. पीछे लौटते हुए मानसून की ऋतु- 
अक्टूबर और नवम्बर के महीनों में मानसून पीछे लौटने लगता है। अक्टूबर माह के अन्त तक मानसून मैदान से पूर्णतः पीछे हट जाता है। इस समय शुष्क ऋतु का आगमन होता है तथा आकाश स्वच्छ हो जाता है। तापमान (UPBoardSolutions.com) में कुछ वृद्धि होती है। उच्च तापमान और आर्द्रता के कारण मौसम कष्टदायी हो जाता है। निम्न वायुदाब के क्षेत्र बंगाल की खाड़ी में स्थानान्तरित हो जाते हैं। इस अवधि में पूर्वी तट पर व्यापक वर्षा होती है। सम्पूर्ण कोरोमण्डल तट पर अधिकांश वर्षा इन्हीं चक्रवातों और अवदाबों के कारण होती है।

प्रश्न 11.
मानसून से क्या अभिप्राय है ? भष्मकालीन मानसूनी वर्षा की चार विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
मानसून’ शब्द की व्युत्पत्ति अरबी भाषा के ‘मौसिम’ शब्द से हुई है। इनका शाब्दिक अर्थ ऋतु है। इस प्रकार मानसून का अर्थ एक ऐसी ऋतु से है, जिसमें पवनों की दिशा पूरी तरह से उलट जाती है। मानसूनी पवनें हिन्द महासागर में विषुवतं वृत्त पार करने के बाद दक्षिण-पश्चिमी व्यापारिक पवनों के रूप में बहने लगती हैं। इस प्रकार शुष्क तथा गर्म स्थलीय व्यापारिक पवनों का स्थान आर्द्रता से परिपूर्ण समुद्री पवनें ले लेती हैं। मानसूनी पवनों के अध्ययन से पता चला है कि इन पवनों का प्रसार 20° उत्तर तथा 20° दक्षिण अक्षांशों के बीच उष्ण कटिबन्धीय भू-भागों पर होता है। लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून हिमालय की पर्वत-श्रेणी से बहुत अधिक प्रभावित होता है। इन पर्वत-श्रेणियों के कारण पूरा भारतीय उपमहाद्वीप दो से पाँच महीनों तक आई विषुवतीय पवनों के प्रभाव में आ जाता है। अतः जून से लेकर सितम्बर तक ही 75-90% के बीच वार्षिक वर्षा होती है।

ग्रीष्मकालीन मानसूनी वर्षा की चार विशेषताएँ

  • ग्रीष्मकालीन मानसूनी वर्षा की अवधि दक्षिण से उत्तर तथा पूर्व से पश्चिम की ओर घटती जाती है। देश के सबसे उत्तर-पश्चिमी भाग में यह अवधि केवल दो महीने की होती है। इस अवधि में 75% से 90% तक वर्षा हो जाती है।
  • ग्रीष्मकालीन मानसूनी वर्षावाहिनी पवनें बड़ी तेजी से चलती हैं। इनकी औसत गति 30 किलोमीटर प्रति घण्टा होती है। उत्तर-पश्चिमी भागों को छोड़कर ये एक महीने में सारे भारत में फैल जाती हैं। आर्द्रता से भरी इन पवनों के आने के साथ ही (UPBoardSolutions.com) बादलों का प्रचण्ड गर्जन तथा बिजली चमकनी शुरू हो. जाती है। इसे मानसून का ‘फटना’ या टूटना’ कहते हैं।
  • ग्रीष्मकालीन मानसूनी वर्षा लगातार नहीं होती। कुछ दिनों तक वर्षा होने के बाद मौसम सूखा रहता है। मानसून के इस घटते-बढ़ते स्वरूप का कारण चक्रवातीय अवदाब है, जो मुख्य रूप से बंगाल की खाड़ी के शीर्ष भाग में उत्पन्न होते हैं और भारत-भूमि के ऊपर से गुजरते हैं।’
  • ग्रीष्मकालीन मानसूनी वर्षा अपनी स्वेच्छाचारिता के लिए विख्यात है। इससे एक ओर तो कहीं भारी, । वर्षा से भयंकर बाढ़ आ सकती है तो दूसरे स्थान पर सूखा पड़ सकता है। इससे करोड़ों किसानों के खेती के काम प्रभावित होते हैं।

प्रश्न 12.
रतीय मानसूनी वर्षा की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2009]
या
भारत में मानसूनी वर्षा की दो विशेषताएँ बताइए। [2009]
या
मानसूनी वर्षा की किन्हीं छः विशेषताओं का वर्णन कीजिए। [2015, 16, 17]
उत्तर:
भारतीय वर्षा की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. मानसूनी वर्षा- भारतीय वर्षा का लगभग 75% भाग दक्षिण-पश्चिमी मानसूनों द्वारा प्राप्त होता है, अर्थात् कुल वार्षिक वर्षा का 75% वर्षा ऋतु में, 13% शीत ऋतु में, 10% वसन्त ऋतु में तथा 2% ग्रीष्म ऋतु में प्राप्त होता है।

2. वर्षा की अनिश्चितता- 
भारतीय मानसूनी वर्षा का प्रारम्भ अनिश्चित है। मानसून कभी शीघ्र आते हैं। तो कभी देर से। कभी-कभी वर्षा ऋतु में सूखा पड़ जाता है तथा कभी अत्यधिक वर्षा से बाढ़े तक आ जाती हैं। किसी वर्ष वर्षा नियत समय से पूर्व ही आरम्भ हो जाती है एवं निश्चित समय से पूर्व ही समाप्त हो जाती है।

3. वितरण की असमानतो- 
भारतीय वर्षा का वितरण बड़ा ही असमान है। (UPBoardSolutions.com) कुछ भागों में वर्षा 400 सेमी या उससे अधिक हो जाती है, जबकि कुछ भाग ऐसे हैं जहाँ वर्षा का औसत 12 सेमी से भी कम रहता है।

4. मूसलाधार वर्षा– 
भारत में वर्षा अनवरत गति से नहीं होती, वरन् कुछ दिनों के अन्तराल से होती है। कभी-कभी वर्षा मूसलाधार रूप में होती है और एक ही दिन में 50 सेमी तक हो जाती है। यह मिट्टी का अपरदन करती है, जिससे मिट्टी के उत्पादक तत्त्व बह जाते हैं।

5. असमान वर्षा- 
कुछ भागों में वर्षा बड़ी तीव्र गति से होती है तथा कुछ भागों में केवल बौछारों के रूप में। एक ओर मॉसिनराम गाँव (चेरापूंजी) में 1,354 सेमी से भी अधिक वर्षा होती है, तो वहीं राजस्थान में केवल 10 सेमी से भी कम। कुछ स्थामों पर वर्षा की प्राप्ति असन्दिग्ध रहती है। वर्षा हो भी सकती है और नहीं भी। भारत के उत्तरी मैदान में तथा दक्षिणी भागों में ऐसी ही स्थिति पायी जाती है।

6. वर्षा की अल्पावधि- 
भारत में वर्षा के दिन बहुत ही कम होते हैं। उदाहरण के लिए चेन्नई में 50 दिन, मुम्बई में 75 दिन, कोलकाता में 118 दिन तथा अजमेर में केवल 30 दिन।

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7. वर्षा की निश्चित अवधि- 
कुंल वर्षा का लगभग 80% जून से सितम्बर तक प्राप्त हो जाता है, फलत: वर्ष का दो-तिहाई भाग सूखा ही रह जाता है, जिससे फसलों की सिंचाई करनी पड़ती है।

8. पर्वतीय वर्षा- 
भारत की लगभग 95% वर्षा पर्वतीय है, जबकि मात्र 5% वर्षा ही चक्रवातों द्वारा होती है।

9. वर्षा की निरन्तरता- 
भारत में प्रत्येक मास में किसी-न-किसी क्षेत्र में वर्षा होती रहती है। शीतकालीन चक्रवातों द्वारा जनवरी एवं फरवरी महीनों में उत्तरी भारत में वर्षा होती है। मार्च में चक्रवात असोम एवं पश्चिम बंगाल राज्यों में सक्रिय रहते हैं। इनसे तब तक वर्षा होती है जब तक दक्षिण-पश्चिमी मानसून पुनः चलना न आरम्भ कर दें।

प्रश्न 13.
भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में अधिक वर्षा के दो कारणों का उल्लेख कीजिए। [2015]
उत्तर :
भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में अधिक वर्षा के दो कारण निम्नलिखित हैं।

  • बंगाल की खाड़ी की मानसून शाखा का विभाजन, भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश के बाद, उच्च हिमालय तथा उत्तर-पश्चिमी भारत के निम्न वायुभार के प्रभाव से दो भागों में हो जाता है। इस मानसून की दूसरी शाखा उत्तर एवं उत्तर-पूर्व दिशा (UPBoardSolutions.com) से ब्रह्मपुत्र नदी की घाटी में प्रवेश करती है, जिससे भारत के उत्तर-पूर्वी भागों में भारी वर्षा होती है।
  • भारत की 75-90% वर्षा ग्रीष्मकालीन मानसूनों द्वारा प्राप्त होती है। यही कारण है कि वर्षा के वितरण में पर्याप्त असमानताएँ पायी जाती हैं। भारत के उत्तर-पूर्वी भाग में उच्चावचीय लक्षणों के कारण 300 सेमी से भी अधिक वार्षिक वर्षा होती है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मानसून से क्या अभिप्राय है ? [2016]
उत्तर :
मानसून उन पवनों को कहते हैं जो वर्ष में छ: महीने (ग्रीष्म ऋतु) सागरों से स्थल की ओर तथा शेष छः महीने (शीत ऋतु) स्थल से सागरों की ओर चलती हैं।

प्रश्न 2.
भारत में अधिकांश वर्षा किस ऋतु में होती है ?
उत्तर :
भारत में अधिकांश अर्थात् 75% से 90% तक वर्षा आगे बढ़ते हुए मानसूनों द्वारा (जून से सितम्बर माह में) वर्षा ऋतु में होती है।

प्रश्न 3.
थार मरुस्थल में अल्प वर्षा क्यों होती है ? दो कारण लिखिए।
उत्तर :
थार मरुस्थल में अल्प वर्षा होने के दो कारण निम्नलिखित हैं|

  • थार मरुस्थल अरबसागरीय मानसूनों के मार्ग में पड़ता है, किन्तु यहाँ मानसून पवनों को रोकने के लिए कोई ऊँची पर्वत-श्रेणी स्थित नहीं है।
  • अरावली की पहाड़ियाँ नीची हैं तथा पवनों की दिशा के समानान्तर हैं।

प्रश्न 4.
दक्षिण-पश्चिमी मानसून की उत्पत्ति का प्रमुख क्या कारण है ?
उत्तर :
दक्षिण-पश्चिम मानसून की उत्पत्ति के दो प्रमुख कारण हैं|

  • ग्रीष्म काल में देश के उत्तर-पश्चिमी (स्थलीय) भू-भागों में निम्न (UPBoardSolutions.com) वायुदाब तथा समीपवर्ती समुद्री भागों (हिन्द महासागर, अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी) में उच्च वायुदाब का होना।
  • क्षोभमण्डल की ऊपरी परतों में तीव्रगामी पुरवा जेट पवनों का चलना।

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प्रश्न 5.
जेट वायुधाराएँ किन्हें कहते हैं ?
उत्तर :
वायुमण्डल की क्षोभमण्डल नामक परत के ऊपरी भाग में तेज गति से चलने वाली पवनों को जेट वायुधाराएँ कहते हैं। ये बहुत सँकरी पट्टी में चलती हैं।

प्रश्न 6.
भारत में पायी जाने वाली ऋतुओं के नाम लिखिए।
उत्तर :

  • शीत ऋतु,
  • ग्रीष्म ऋतु,
  • वर्षा ऋतु (आगे बढ़ते मानसून की ऋतु) तथा
  • शरद ऋतु (पीछे हटते हुए मानसून की ऋतु।)

प्रश्न 7.
भारत में सर्वाधिक वर्षा किस राज्य में होती है ? [2011]
उत्तर:
भारत में सर्वाधिक वर्षा मेघालय (मॉसिनराम) राज्य में होती है।

प्रश्न 8.
मानसून के ‘फटने’ या ‘टूटने से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर :
आर्द्रता से भरी दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी पवनें बड़ी तेज चलती हैं। इनकी औसत गति 30 किलोमीटर प्रति घण्टा है। उत्तर-पश्चिमी भागों को छोड़कर ये एक महीने की अवधि में सारे भारत में फैल जाती हैं। आर्द्रता से भरी इन पवनों के आने (UPBoardSolutions.com) के साथ ही बादलों का प्रचण्ड गर्जन तथा बिजली का चमकना शुरू हो जाता है। इसे ही मानसून का फटना’ या टूटना’ कहा जाता है।

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प्रश्न 9.
ग्रीष्मकालीन मानसूनी पवनों की दिशा का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
ग्रीष्मकालीन मानसूनी पवनों की दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम होती है।

प्रश्न 10.
भारत में अधिकांश वर्षा किस प्रकार की होती है ?
उत्तर :
भारत की लगभग 95% अधिकांश वर्षा पर्वतीय है।

प्रश्न 11.
लौटते हुए मानसून से भारत के किन दो राज्यों में वर्षा होती है ?
उत्तर :
लौटते हुए मानसून से भारत में तमिलनाडु एवं पॉण्डिचेरी (अब पुदुचेरी) राज्यों में वर्षा होती है।

प्रश्न 12.
मौसम किसे कहते हैं? मौसम और जलवायु में क्या अन्तर है? [2014]
उत्तर:
मौसम-किसी स्थान के वातावरण की सूचना जैसे कि वह गर्म है, ठण्डा है, शुष्क है, आई है। की जानकारी हमें मौसम के द्वारा प्राप्त होती है। यह दिन प्रतिदिन बदल सकता है। जलवायु-किसी स्थान पर लम्बे समय तक पाये जाने (UPBoardSolutions.com) वाले तापमान, वर्षा, आर्द्रता, शुष्कता आदि का औसत उस स्थान की जलवायु कहलाती है।

बहुविकल्पीय

प्रश्न 1. भारत में न्यूनतम तापमान कहाँ पाया जाता है?

क) लेह में ।
(ख) शिमला में
(ग) चेरापूंजी में
(घ) श्रीनगर में

2. भारत में अधिकतम तापमान कहाँ पाया जाता है?

(क) तिरुवनन्तपुरम् में।
(ख) भोपाल में
(ग) जैसलमेर में
(घ) अहमदाबाद में

3. भारत में अधिकतम वर्षा वाला स्थान है [2011]

(क) शिलांग ।
(ख) मॉसिनराम
(ग) गुवाहाटी
(घ) पंजाब

4. भारत का नगर जो वृष्टिछाया प्रदेश में पड़ता है|

(क) मुम्बई
(ख) जोधपुर
(ग) पुणे
(घ) चेन्नई

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5. आम्रवृष्टि कहाँ होती है?

(क) केरल में
(ख) आन्ध्र प्रदेश में
(ग) तमिलनाडु में
(घ) असोम में

6. काल-बैसाखी’ कहाँ प्रचलित है?

(क) केरल में
(ख) असोम में
(ग) उत्तर प्रदेश में
(घ) पंजाब में

7. जेट धाराएँ हैं|

(क) हिन्द महासागरों में चलने वाली
(ख) बंगाल की खाड़ी के चक्रवात
(ग) उपरितन वायु
(घ) मानसूनी पवनें

8. उत्तर भारत में शीतकालीन वर्षा का कारण है

(क) लौटते हुए मानसून
(ख) आगे बढ़ते हुए मानसून
(ग) शीतकालीन मानसून ,
(घ) पश्चिमी विक्षोभ

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9. सम्पूर्ण भारत में सर्वाधिक वर्षा वाला महीना है

(क) जून
(ख) जुलाई
(ग) अगस्त
(घ) ये सभी

10. चेरापूंजी किस राज्य में स्थित है?

(क) असोम में
(ख) मेघालय में
(ग) मिजोरम में
(घ) मणिपुर में

11. भारत में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र कौन-सा है?

(क) उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र
(ख) उत्तर-पूर्वी क्षेत्र
(ग) दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र
(घ) दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र

12. दैनिक तापान्तर निम्नलिखित में से किस क्षेत्र में सर्वाधिक पाया जाता है? [2011]

(क) दक्षिणी पठारी क्षेत्र
(ख) पूर्वी तटवर्ती क्षेत्र
(ग) थार मरुस्थल
(घ) पश्चिमी तटवर्ती क्षेत्र

13. निम्नलिखित में से कौन राज्य भारत के सर्वाधिक वर्षा वाले क्षेत्र में सम्मिलित है? [2012]
या
निम्नलिखित में से किस राज्य में सर्वाधिक वर्षा होती है? [2016]

(क) मेघालय
(ख) मध्य प्रदेश
(ग) ओडिशा
(घ) गुजरात

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14. भारत के किस राज्य में शीत ऋतु में वर्षा होती है? [2014]
या
भारत का कौन-सा राज्य शीत ऋतु में वर्षा प्राप्त करता है? [2016]

(क) गुजरात
(ख) पश्चिम बंगाल
(ग) कर्नाटक
(घ) तमिलनाडु

15. भारत में सबसे कम वर्षा होती है [2017]

(क) तमिलनाडु में
(ख) राजस्थान में
(ग) आन्ध्र प्रदेश में
(घ) कर्नाटक में

उत्तरमाला

1. (क), 2. (ग), 3. (ख), 4. (ग), 5. (क), 6. (ख), 7. (ग), 8. (घ), 9. (ख), 10. (ख), 11. (ख), 12. (ग), 13. (क), 14. (घ), 15. (ख)

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 11 (Section 3)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 11 मानवीय संसाधन : विनिर्माणी उद्योग (अनुभाग – तीन)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Social Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 11 मानवीय संसाधन : विनिर्माणी उद्योग (अनुभाग – तीन).

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों का क्या महत्त्व है ? ‘आधुनिक उद्योगों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव की समीक्षा कीजिए।
या
भारत में कृषि पर आधारित उद्योगों के नाम लिखिए। भारतीय अर्थव्यवस्था में उनका क्या महत्त्व है ?
या
देश के आर्थिक विकास में उद्योगों के योगदान पर एक विशिष्ट लेख लिखिए।
उत्तर :
भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों का महत्त्व आधुनिक अर्थशास्त्री औद्योगिक विकास और आर्थिक विकास को पर्यायवाची मानते हैं। उनका मानना है कि उद्योगों के विकास के बिना आर्थिक विकास में तेजी नहीं आ सकती। उद्योगों के समुचित विकास के बिना राष्ट्रीय आय के प्रति व्यक्ति आय में अपेक्षित वृद्धि करना बड़ा कठिन है। यही कारण है कि भारत जैसे विकासशील देश के लिए बड़े पैमाने के उद्योगों के विकास (UPBoardSolutions.com) का अत्यधिक महत्त्व है। इसी को ध्यान में रखकर भारत सरकार ने पंचवर्षीय योजनाओं में औद्योगिक विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। परिणामस्वरूप भारत ने कृषि के साथ-साथ उद्योग-धन्धों के विकास के क्षेत्र में अत्यधिक उन्नति की।

आधुनिक उद्योगों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

औद्योगिक विकास किसी भी देश के विकास की गति का सूचक होता है। आज कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था वाले देश भी औद्योगिक विकास के लिए प्रयत्नशील हैं। वास्तव में देश की अर्थव्यवस्था के बहुमुखी विकास के लिए औद्योगिक विकास आवश्यक है। आधुनिक उद्योगों का देश की अर्थव्यवस्था पर निम्नलिखित रूपों में प्रभाव पड़ा है

1. कृषि का विकास – 
उद्योगों की स्थापना के पूर्व भारतीय कृषि पिछड़ी दशा में थी। उद्योगों के विकास से विशेषत: उर्वरक, कीटनाशकों, मशीनरी, कृषि उपकरण, टूक निर्माण आदि के कारण कृषि उन्नत हो गयी है। उद्योगों के ही विकास से कृषि में हरित क्रान्ति सम्भव हो सकी है।

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2. नगरीकरण में वृद्धि – 
औद्योगीकरण तथा नगरीकरण साथ-साथ चलते हैं। उद्योगों की स्थापना से अनेक नये नगर स्थापित हो जाते हैं तथा छोटे नगरों के आकार में वृद्धि होती है। भारत के प्रायः सभी महानगर औद्योगिक विकास से ही विकसित हुए हैं।

3. रोजगार के अवसरों में वृद्धि – 
उद्योगों से रोजगार के अवसरों में वृद्धि होती है, पिछड़े हुए क्षेत्रों की निर्धनता दूर होती है तथा उनका आर्थिक विकास होता है।

4. राष्ट्रीय आय में वृद्धि – 
आधुनिक उद्योगों के कारण देश की आय में निरन्तर वृद्धि हो रही है।

5. विदेशी व्यापार में वृद्धि – 
विदेशी व्यापार में वृद्धि तथा विकास उद्योगों के कारण ही सम्भव हुआ है। उद्योगों की स्थापना के पूर्व भारत केवल कृषि-परक वस्तुओं तथा कच्चे माल का निर्यात करता था, किन्तु औद्योगिक विकास के कारण अब वह विनिर्मित वस्तुओं, मशीनरी आदि का भी निर्यात करने लगा है।

6. परिवहन के साधनों में वृद्धि – 
औद्योगिक विकास से (UPBoardSolutions.com) जनसंख्या की सघनता में वृद्धि होती है। उसके आवागमन के लिए परिवहन के साधनों में वृद्धि होती है, जो आर्थिक प्रगति का सूचक है।

7. बहुमुखी विकास –
आर्थिक समृद्धि बढ़ने पर देश में शिक्षा, साहित्य, विज्ञान आदि के क्षेत्र में भी विकास होता है।

कृषि पर आधारित उद्योग एवं भारतीय अर्थव्यवस्था में उनका महत्त्व

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि तथा उद्योग एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों का विकास एक-दूसरे पर निर्भर करता है। कृषि के विकास के लिए आवश्यक वस्तुएँ; जैसे-रासायनिक खाद, औजार, ट्रैक्टर, कीटनाशक आदि उद्योगों से ही प्राप्त होते हैं।

उद्योगों को कच्चा माल; जैसे—कपास, जूट, गन्ना, तिलहन, रबड़ आदि कृषि क्षेत्र से ही प्राप्त होते हैं। ऐसे उद्योग जिनका कच्चा माल कृषि से प्राप्त होता है, कृषि पर आधारित उद्योग कहलाते हैं। सूती वस्त्र उद्योग, चीनी व खाण्डसारी उद्योग, जूट उद्योग, रबड़ उद्योग, चाय उद्योग, तेल उद्योग आदि कृषि पर
आधारित उद्योग हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि पर आधारित उद्योगों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनके महत्त्व को निम्नलिखित बिन्दुओं से स्पष्ट किया जा सकता है–

  • भारत में बेकारी और अर्द्धबेकारी पर्याप्त मात्रा में पायी जाती है। कृषि पर आधारित उद्योग इस बेकारी को कम कर सकते हैं; क्योकि इन उद्योगों को छोटे पैमाने पर भी कम पूँजी लगाकर चलाया जा सकता है।
  • कृषि पर आधारित उद्योग भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के अनुकूल हैं। ये उद्योग देश की राष्ट्रीय आय में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
  • कृषि पर आधारित उद्योगों से कृषि पर जनसंख्या के भार में कमी आती है और बहुत-से लोगों को रोजगार मिलता है।
  • इन उद्योगों से बड़े उद्योगों को सहायता (UPBoardSolutions.com) मिलती है।
  • इन उद्योगों से देश को विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है तथा निर्यातों में वृद्धि के आयातों में कमी होती है।
  • कृषि पर आधारित उद्योगों से देश में औद्योगीकरण के विकास को प्रोत्साहन मिलता है।

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प्रश्न 2.
भारत में इंजीनियरिंग उद्योग के विकास के बारे में आप क्या जानते हैं ? प्रमुख इंजीनियरिंग उद्योगों का विवरण दीजिए।
उत्तर :

इंजीनियरिंग उद्योग

इंजीनियरिंग उद्योगों में अनेक विनिर्माण उद्योग सम्मिलित होते हैं; जैसे-औजार व मशीनें बनाने वाले उद्योग, लोहा व इस्पात उद्योग, परिवहन उपकरण उद्योग; जैसे-रेल इंजन उद्योग, वायुयान उद्योग, जलयान उद्योग, मोटर उद्योग तथा रासायनिक खाद उद्योग आदि। भारत में इन उद्योगों का तेजी से विकास और विस्तार हो रहा है। यहाँ इनमें से अधिकांश उद्योगों को आधारभूत उद्योग की सूची में सम्मिलित किया हुआ है तथा इनमें से अनेक इंजीनियरिंग उद्योग सरकारी क्षेत्र में चलाये जा रहे हैं।

भारी मशीनरी उद्योग
देश में भारी इंजीनियरिंग उद्योग का वास्तविक विकास 1958 ई० में हेवी इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन (राँची) की स्थापना के पश्चात् हुआ। इसकी तीन इकाइयाँ हैं–

  • भारी मशीनरी निर्माण संयन्त्र,
  • फाउण्ड्री फोर्ज संयन्त्र तथा
  • भारी मशीन उपकरण (HMT) संयन्त्र।

विशिष्ट प्रकार के इस्पात के ढाँचों का डिजाइन बनाने का कारखाना 1965 ई० में ऑस्ट्रिया के सहयोग से त्रिवेणी स्ट्रक्चरल्स लि०, नैनी (इलाहाबाद) में स्थापित हुआ। तुंगभद्रा स्टील प्रॉडक्ट्स लि० 1947 ई० में तुंगभद्रा (कर्नाटक) में स्थापित हुआ था। निजी क्षेत्र में मुम्बई में लार्सन एण्ड टुब्रो लि०, गेस्ट-कीन एवं विलियन एण्ड ग्रीव्ज़ कॉटन स्थापित हैं। सन् 1966 ई० में चेकोस्लोवाकिया के सहयोग से भारत हेवी प्लेट एण्ड (UPBoardSolutions.com) वेसल्स लि०, विशाखापत्तनम् स्थापित हुआ। यहाँ उर्वरक, पेट्रो रसायन तथा अनेक सम्बद्ध उद्योगों की मशीनरी तैयार होती है। भारी इंजीनियरिंग उद्योग के अन्तर्गत क्रेन, इस्पात के ढाँचे, ट्रांसमिशन टॉवर, ढलाई में काम आने वाले उपकरण आदि बनाये जाते हैं। दुर्गापुर में स्थापित माइनिंग एण्ड एलाइड मशीनरी कॉर्पोरेशन लि० (MAMC) खनन में काम आने वाली मशीनरी तैयार करता है। औद्योगिक मशीनरी के उत्पादन में भारत अब आत्मनिर्भर हो गया है। टेक्सटाइल मशीनरी का निर्माण करने वाला निजी क्षेत्र का सबसे बड़ा कारखाना टेक्समैको (TEXMACO) मुम्बई में 1939 ई० में स्थापित किया गया था।

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मशीनों के उपकरण उद्योग

भारत में गत वर्षों में मशीनों के औजार बनाने में भी पर्याप्त प्रगति हुई है। इस कार्य में है 700 करोड़ वार्षिक क्षमता की 200 इकाइयाँ संलग्न हैं। बड़े कारखाने हिन्दुस्तान मशीन टूल्स लिमिटेड (HMT) बंगलुरु के अतिरिक्त पिंजौर (हरियाणा), कलामासेरी (केरल), हैदराबाद (आन्ध्र प्रदेश) तथा श्रीनगर (कश्मीर) में हैं। इनमें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की विभिन्न प्रकार की मशीनें तथा सूक्ष्म वैज्ञानिक उपकरणों का निर्माण किया जाता है। सेण्ट्रल मशीन टूल्स इन्स्टीट्यूट, बंगलुरु (UPBoardSolutions.com) की स्थापना 1965 ई० में की गयी थी। यहाँ मशीनरी औजारों के क्षेत्र में अनुसन्धान किये जाते हैं। मशीन टूल कॉर्पोरेशन ऑफ इण्डिया, अजमेर की स्थापना 1967 ई० में की गयी थी। यहाँ घिसाई के काम आने वाले मशीनी औजार तैयार किये जाते हैं। हेवी मशीन टूल प्लाण्ट (राँची) में धुरी तथा पहिये तैयार किये जाते हैं। प्रागा टूल्स कॉर्पोरेशन लि० (सिकन्दराबाद) भी मशीनों के उपकरण तैयार करता है।

परिवहन उपकरण उद्योग 

(i) रेल इंजन उद्योग – स्वतन्त्रता-प्राप्ति से पूर्व भारत रेल इंजनों के लिए विदेशों पर निर्भर था। अतः 1947 ई० के बाद भारत ने देश में ही रेल इंजन बनाने की दिशा में कार्य आरम्भ किये, जिनका विवरण निम्नलिखित है–
चितरंजन–सन् 1948 ई० में भारत सरकार ने रेल के इंजनों का एक बहुत बड़ा कारखाना पश्चिमी बंगाल में चितरंजन नामक स्थान पर लगाया। यहाँ भाप के इंजनों का निर्माण किया जाता था, किन्तु 1981 ई० में इस कारखाने ने भाप के इंजन बनाने (UPBoardSolutions.com) बन्द कर दिये। अब यह कारखाना बिजली तथा डीजल के इंजनों का निर्माण कर रहा है।
वाराणसी-उत्तर प्रदेश के वाराणसी में स्थापित इस कारखाने में केवल डीजल इंजन बनाये जाते हैं। यह कारखाना प्रति वर्ष 150 डीजल इंजन बनाती है।

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(ii) रेल पटरियाँ, वैगन एवं कोच – रेल की पटरियाँ बनाने में हिन्दुस्तान स्टील लि० (HSL), टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी (TISCO), इण्डियन आयरन एण्ड स्टील कम्पनी (ISCO) संलग्न हैं।
वैगन तथा कोच बनाने का कार्य सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रों में किया जाता है। इण्टीग्रल कोच फैक्ट्री, पेराम्बुर (ICF), चेन्नई के निकट 1955 ई० में सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित की गयी। यहाँ विविध प्रकार के कोच (वातानुकूलित, विद्युत तथा डीजल रेल, कार आदि) तैयार किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त रेलकोच फैक्ट्री (कपूरथला) में मार्च, 1988 ई० में रेल के डिब्बे बनाने का कारखाना स्थापित किया गया। डीजल कम्पोनेण्ट वर्क्स (DCw), पटियाला में डीजल इंजनों के पुर्जे आदि तैयार किये जा रहे हैं। इस प्रकार, अब भारत रेल इंजनों के बारे में पूर्णतया आत्मनिर्भर है।

(iii) वायुयान-निर्माण उद्योग – द्वितीय विश्व युद्ध से पूर्व भारत में वायुयान बनाने का कोई भी कारखाना नहीं था। द्वितीय विश्व युद्ध के समय ऐसे कारखानों की आवश्यकता अनुभव की गयी। सन् 1940 ई० में मैसूर सरकार व बालचन्द हीराचन्द नामक एक फर्म की सम्मिलित साझेदारी में हिन्दुस्तान एयरक्राफ्ट कम्पनी’ के नाम से हवाई जहाज बनाने का एक कारखाना बंगलुरु (कर्नाटक) में खोला गया। सन् 1942 ई० में सुरक्षा कारणों से भारत सरकार ने इसका प्रबन्ध अपने हाथ में ले लिया और इसका नाम ‘हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड’ (HAL) रखा गया। इसकी इकाइयाँ बंगलुरु, कानपुर, नासिक, कोरापुट, हैदराबाद तथा कोरवा (लखनऊ) में स्थापित हैं।

पूर्व सोवियत संघ, ब्रिटेन, जर्मनी तथा फ्रांस से तकनीकी जानकारी प्राप्त करके (UPBoardSolutions.com) अब देश में ही मिग, जगुआर, चीता, चेतक जैसे वायुयान, लड़ाकू विमान तथा हेलिकॉप्टर तैयार किये जा रहे हैं।

(iv) जलयान-निर्माण उद्योग – भारत में तीन हजार किलोमीटर लम्बा विशाल समुद्रतट है; अत: देश की सुरक्षा तथा विदेशी व्यापार की दृष्टि से भारत को बड़ी मात्रा में जलयानों की आवश्यकता होती है; किन्तु विदेशी शासन काल में इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। इस समय भारत में पाँच बड़े पोत निर्माण केन्द्र–मुम्बई, कोलकाता, कोचीन, विशाखापत्तनम् तथा गोआ हैं।

विशाखापत्तनम् – सन् 1941 ई० में सिंधिया कम्पनी ने जलयान निर्माण का पहला कारखाना आन्ध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम् बन्दरगाह पर खोला। सन् 1947 ई० में भारत सरकार ने इस कारखाने का राष्ट्रीयकरण कर दिया और इसका नाम हिन्दुस्तान शिपयार्ड रखा। सन् 1948 ई० में इसमें सबसे पहला जलयान बना और अब तक इसमें 86 जलयान बन चुके हैं।

कोच्चि – पश्चिमी तट पर केरल राज्य में कोच्चि बन्दरगाह पर भी जापान के सहयोग से एक जलयान का कारखाना स्थापित किया गया है। सन् 1979 ई० से इसमें जहाज बनने शुरू हो गये हैं। इसके अतिरिक्त पश्चिम बंगाल में ‘गार्डन रीच जहाजी कारखाने में समुद्री व्यापारिक जहाजों तथा मझगाँव (मुम्बई) स्थित जहाजी कारखाने में नौ-सेना के लिए फिगेट जहाजों का निर्माण किया जाता

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प्रश्न 3.
भारत में चीनी उद्योग का सविस्तार वर्णन कीजिए। भारत में किंन्हीं तीन राज्यों के चीनी उद्योग का वर्णन कीजिए। [2014]
या
भारत में चीनी उद्योगं का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए
(क) उत्पादक क्षेत्र/राज्य तथा (ख) उत्पादन एवं व्यापार।
उत्तर :

भारत में चीनी उद्योग

चीनी उद्योग कृषि पर आधारित उद्योगों में प्रमुख स्थान रखता है। भारत में गन्ने से गुड़, शक्कर तथा खाँड बनाने का व्यवसाय (खाँडसारी उद्योग) बहुत प्राचीन काल से प्रचलित रहा है, किन्तु आधुनिक विधि से. चीनी बनाने का उद्योग बीसवीं शताब्दी से ही उन्नत हो पाया है। इससे पूर्व वर्ष 1841-42 में उत्तरी बिहार में डच लोगों तथा सन् 1899 ई० में अंग्रेजों द्वारा चीनी की फैक्ट्रियाँ स्थापित करने के असफल प्रयास किये गये थे। इस उद्योग का वास्तविक आरम्भ सन् 1930 ई० से हुआ।

सन् 1931 ई० तक चीनी उद्योग के विकास की गति बहुत धीमी रही और प्रचुर मात्रा में चीनी का आयात विदेशों से किया जाता रहा। सन् 1931 ई० में केवल 31 चीनी की फैक्ट्रियाँ कार्यरत थीं, जिनको उत्पादन 6.58 लाख टन था। सन् 1932 ई० में इस उद्योग की सरकार द्वारा संरक्षण प्रदान किया गया और तभी से चीनी के उत्पादन में वृद्धि होने लगी। संरक्षण के 4 वर्ष बाद मिलों की संख्या बढ़कर 35 हो गयी और चीनी का उत्पादन बढ़कर 9.19 लाख टन हो गया। वर्ष 1938-39 में इनकी संख्या बढ़कर 132 हो गयी। द्वितीय विश्व युद्ध के समय चीनी की माँग बढ़ जाने के कारण चीनी के मूल्य तेजी से बढ़ने आरम्भ हो गये। अतएव सरकार ने सन् 1942 ई० में इसके मूल्य पर नियन्त्रण लगा दिया तथा इसकी राशनिंग आरम्भ कर दी। सन् 1950 ई० में चीनी पर से नियन्त्रण हटा लिया गया। वर्ष 1991-92 में देश में 370 चीनी के कारखाने थे। वर्ष 1998 में देश में चीनी मिलों की संख्या 465 तक पहुँच गयी, जिनमें से लगभग आधी सहकारी क्षेत्र में हैं, जो कुल उत्पादन का 60% उत्पादन करती हैं। इस उद्योग में लगभग १ 1,500 करोड़ की पूँजी लगी हुई है। और लगभग 3 लाख व्यक्तियों को रोजगार मिला हुआ है। वर्ष 2006-07 में देश में चीनी का उत्पादन 281.99 लाख टेन (अस्थायी) से अधिक हो चुका था।

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उत्पादक राज्य

1. महाराष्ट्र – महाराष्ट्र राज्य ने चीनी के उत्पादन में पिछले कुछ वर्षों में अत्यधिक प्रगति की है। चीनी के उत्पादन में इसका देश में प्रथम स्थान है। यहाँ 129 चीनी मिलें हैं जिनमें देश की लगभग 35% से भी अधिक चीनी उत्पादित की जाती है। गोदावरी, प्रवरा, मूला-मूठा, नीरा एवं कृष्णा नदियों की घाटियों में चीनी मिलें केन्द्रित हैं। मनमाड़, नासिक, पुणे, अहमदनगर, शोलापुर, कोल्हापुर, औरंगाबाद, सतारा एवं साँगली प्रमुख चीनी उत्पादक जिले हैं।

2. उत्तर प्रदेश – 
इस राज्य का चीनी के उत्पादन में द्वितीय तथा गन्ना उत्पादन की दृष्टि से प्रथम स्थान है। इस प्रदेश में 128 चीनी मिले हैं। प्रदेश में उपयुक्त भौगोलिक परिस्थितियों के कारण ही चीनी मिलों का केन्द्रीकरण हुआ है। यह राज्य देश की 24% चीनी का उत्पादन करता है तथा यहाँ देश का सर्वाधिक गन्ना उगाया जाता है।

3. कर्नाटक – 
चीनी के उत्पादन में कर्नाटक राज्य को देश में (UPBoardSolutions.com) तीसरा स्थान है। यहाँ पर चीनी उद्योग के 37 केन्द्र हैं, जिनमें देश की 9% चीनी का उत्पादन किया जाता है। बेलगाम, मांड्या, बीजापुर, बेलारी, शिमोगा एवं चित्रदुर्ग महत्त्वपूर्ण चीनी उत्पादक जिले हैं।

4. तमिलनाडु – 
इस राज्य में 22 चीनी मिलें हैं। यहाँ देश की लगभग 8% चीनी उत्पादित की जाती है। मदुराई, उत्तरी एवं दक्षिणी अर्कोट, कोयम्बटूर एवं तिरुचिरापल्ली प्रमुख चीनी उत्पादक जिले हैं।

5. बिहार – 
बिहार में देश की 5% चीनी का उत्पादन किया जाता है। यहाँ चीनी की 40 मिले हैं, जो विशेष रूप से सारन, चम्पारन, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, पटना, गोपालगंज आदि उत्तरी जिलों के गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में केन्द्रित हैं। उपर्युक्त के अतिरिक्त चीनी उत्पादक अन्य राज्यों में गुजरात, आन्ध्र प्रदेश, पंजाब, केरल, उत्तराखण्ड, मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं पश्चिम बंगाल मुख्य हैं।

व्यापार
भारत चीनी का निर्यातक देश है और विश्व के चीनी निर्यात व्यापार में भारत 0.6% का हिस्सा रखता है। देश की आवश्यकता को पूरी करने के उपरान्त केवल 2 लाख टन चीनी निर्यात के लिए शेष बचती है, जिससे निर्यात की मात्रा घटती-बढ़ती रहती है। चीनी उद्योग को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार ने 20 अगस्त, 1998 ई० को इसे लाइसेन्स व्यवस्था से मुक्त कर दिया है।

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प्रश्न 4.
भारत में कागज उद्योग के उत्पादन एवं वितरण का वर्णन कीजिए।
या
भारत में कागज उद्योग का संक्षिप्त भौगोलिक विवरण दीजिए।
या
भारत में कागज उद्योग के कच्चे माल की उपलब्धता एवं प्रमुख केन्द्रों का वर्णन कीजिए। [2013]
उत्तर :

भारत में कागज उद्योग

भारत को वर्तमान कागज उद्योग 19वीं शताब्दी की देन माना जाता है। आधुनिक ढंग की प्रथम कागज मिल 1816 ई० में ट्रंकुवार (चेन्नई के समीप) नामक स्थान पर खोली गयी, परन्तु इसे सफलता न मिल सकी। हुगली : नदी के किनारे सिरामपुर (UPBoardSolutions.com) (प० बंगाल) में स्थापित मिल को भी असफलता ही मिली। इसके पश्चात् 1867 ई० में बाली (कोलकाता) नामक स्थान पर रॉयल पेपर मिल की स्थापना हुई। इस उद्योग का वास्तविक विकास तब हुआ जब 1879 ई० में लखनऊ में अपर इण्डिया पेपर मिल्स तथा 1881 ई० में पश्चिम बंगाल में टीटागढ़ पेपर मिल्स की स्थापना की गयी। इसके बाद कारखानों की संख्या में वृद्धि होती गयी।

वर्तमान में भारत में गत्ता एवं कागज की 759 इकाइयाँ हैं, जिनमें से केवल 651 चालू हालत में हैं और 2,748 लघु इकाइयाँ उत्पादन में संलग्न हैं। कुल स्थापित क्षमता लगभग 128 लाख टन है, किन्तु रुग्णता (बीमार) के कारणं बहुत-सी कागज मिलें बन्द पड़ी हैं। इसलिए उत्पादन क्षमता घटकर 60 प्रतिशत ही रह गयी है। पेपर और पेपर बोर्ड क्षेत्र में भारत सक्षम है। पारंपरिक तौर पर स्थानीय जरूरतों को पूरा करने के लिए कुछ विशेष प्रकार के कागजों का आयात करना पड़ता है। वर्ष 2010-11 में कागज बोर्ड का उत्पादन 7.37 मिलियन टन रहा जो पिछले वर्ष 7.06 मिलियन टन था।

कागज और कागज बोर्ड का 2010-11 के दौरान कुल आयात (न्यूज प्रिंट छोड़कर) 0.72 मिलियन टन रही। 2011-12 (अप्रैल-दिसम्बर) में यह 0.72 मिलियन टन रहा।

न्यूजप्रिंट नियंत्रण आदेश, 2004 की अनुसूची में 113 मिलें सूचीबद्ध हैं। इन्हें उत्पाद शुल्क से छूट मिली हुई है। इस समय 68 मिलें न्यूजप्रिंट का उत्पादन करती हैं, जिनकी प्रचालन स्थापित क्षमता 1.3 मिलियन टन प्रतिवर्ष है। एनसीओ में सूचीबद्ध किये जाने के बाद 20 मिलों ने काम करना बंद कर दिया है और 25 ने न्यूजप्रिंट का उत्पादन रोक दिया है।

उत्पादन एवं वितरण
कागज के उत्पादन की दृष्टि से भारत की गणना विश्व के मुख्य 15 कागज-निर्माताओं में की जाती है। देश के 70% से भी अधिक कागज का उत्पादन पश्चिम बंगाल, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं मध्य प्रदेश राज्यों में होता है। प्रमुख कागज उत्पादक राज्यों का विवरण इस प्रकार है-

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1. पश्चिम बंगाल – 
यहाँ देश का लगभग 20% कागज का उत्पादन होता है। राज्य में कागज की 19 मिले हैं। टीटागढ़, नैहाटी, रानीगंज, त्रिवेणी, कोलकाता, काकीनाड़ा, चन्द्रहाटी (हुगली), आलम बाजार (कोलकाता), बड़ानगर, बाँसबेरिया तथा शिवराफूली कागज उद्योग के प्रमुख केन्द्र हैं। टीटागढ़ में देश की सबसे बड़ी कागज मिल है, जिसमें बाँस का कागज निर्मित किया जाता है।

2. महाराष्ट्र – 
यहाँ 14 कागज ऐवं 3 कागज-गत्ते के सम्मिलित कारखाने हैं, जो देश के लगभग 13% कागज का उत्पादन करते हैं। यहाँ पर कोमल लकड़ी की लुगदी विदेशों से आयात की जाती है। इसके अतिरिक्त बाँस, खोई एवं फटे-पुराने चिथड़ों का उपयोग कागज (UPBoardSolutions.com) बनाने में किया जाता है। गन्ने की खोई एवं धान की भूसी से गत्ता बनाया जाता है। पुणे, खोपोली, मुम्बई, बलारपुर, चन्द्रपुर, ओगेलवाडी, चिचवाडा, रोहा, कराड़, कोलाबा, कल्याण, वाड़ावाली, काम्पटी, नन्दुरबाद, पिम्परी, भिवण्डी एवं वारसनगाँव कागज उद्योग के प्रधान केन्द्र हैं। बलारपुर एवं साँगली में अखबारी कागज की मिलें भी स्थापित की गयी हैं।

3. आन्ध्र प्रदेश – 
यहाँ देश का 12% कागज तैयार किया जाता है। कागज उद्योग के लिए बाँस इस राज्य का प्रमुख कच्चा माल है। सिरपुर, तिरुपति तथा राजमुन्दरी प्रमुख कागज उत्पादक केन्द्र हैं।

4. मध्य प्रदेश – 
इस राज्य में वनों का विस्तार अधिक है। यहाँ बाँस एवं सवाई घास पर्याप्त मात्रा में उगती है। यहाँ देश का 10% कागज तैयार किया जाता है। इस राज्य में इन्दौर, भोपाल, सिहोर, शहडोल, रतलाम, मण्डीदीप, अमलाई एवं विदिशा प्रमुख कागज उत्पादक केन्द्र हैं। नेपानगर में अखबारी कागज
(1955 ई०) तथा होशंगाबाद में नोट छापने के कागज बनाने का सरकारी कारखाना स्थापित है।

5. कर्नाटक – 
यहाँ देश का 10% कागज बनाया जाता है। इस राज्य में भद्रावती, बेलागुला तथा डाँडली केन्द्रों पर कागज की मिलें हैं।

6. उत्तर प्रदेश – 
इस राज्य का कागज उद्योग शिवालिक एवं तराई क्षेत्रों में सवाई, भाबर एवं मूंज घास तथा बाँस की प्राप्ति के ऊपर निर्भर करता है। यहाँ देश का लगभग 4% कागज उत्पन्न किया जाता है। लखनऊ, गोरखपुर एवं सहारनपुर कागज उत्पादन के प्रमुख केन्द्र हैं। इनके अतिरिक्त मेरठ, मुजफ्फरनगर, उझानी, पिपराइच, मोदीनगर, नैनी, लखनऊ तथा सहारनपुर प्रमुख गत्ता उत्पादक केन्द्र हैं। भारत के अन्य (UPBoardSolutions.com) कागज उत्पादक राज्यों में बिहार, गुजरात, ओडिशा, केरल, हरियाणा एवं तमिलनाडु प्रमुख हैं।

प्रश्न 5.
भारत के सीमेण्ट उद्योग का विस्तपूर्वक वर्णन कीजिए। [2010]
या
भारत में सीमेण्ट उद्योग कहाँ स्थापित हैं ? एक भौगोलिक टिप्पणी लिखिए।
या
भारत में सीमेण्ट उद्योग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए- [2011]
(क) केन्द्र, (ख) उत्पादन तथा (ग) व्यापार
उत्तर :

भारत में सीमेण्ट उद्योग

किसी भी विकासोन्मुख राष्ट्र के लिए सीमेण्ट का अत्यधिक महत्त्व है। प्रत्येक प्रकार के भवन-निर्माण में इसकी आवश्यकता होती है। भारत में संगठित रूप से सीमेण्ट तैयार करने का प्रथम प्रयास चेन्नई में 1904 ई० में किया गया था, परन्तु इसमें पूर्ण सफलता नहीं मिल सकी। इस उद्योग का वास्तविक विकास 1914 ई० में हुआ, जब कि मध्य प्रदेश में कटनी, राजस्थान में लखेरी-बूंदी तथा गुजरात में पोरबन्दर में तीन कारखाने स्थापित किये गये। सीमेण्ट वर्तमान युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए सीमेण्ट उद्योग का विकास अति आवश्यक है। यह अनेक उद्योगों के विकास की कुंजी है। भारत संसार का चौथा बड़ा सीमेण्ट उत्पादक देश है। अप्रैल, 2003 ई० को देश में 124 बड़े सीमेण्ट संयन्त्र थे, जिनकी संस्थापित क्षमता लगभग 14 करोड़ टन (UPBoardSolutions.com) थी। सीमेण्ट अनुसन्धान संस्थान ने देश में लघु सीमेण्ट संयन्त्र लगाने के सुझाव दिये हैं। इससे प्रेरित होकर विभिन्न राज्यों में 300 लघु संयन्त्र स्थापित किये हैं, जिनकी उत्पादन क्षमता 111 लाख टन वार्षिक है। 31 मार्च, 2012 तक प्राप्त आँकड़ों के अनुसार देश में 173 बड़े सीमेंट संयंत्र हैं जिनकी स्थापित क्षमता 294.04 मिलियन टन प्रति वर्ष है, जबकि 350 छोटे सीमेण्ट संयंत्र हैं। जिनकी स्थापित क्षमता 11.10 मिलियन टन/वर्ष है और कुल स्थापित क्षमता 305.14 मिलियन टन प्रतिवर्ष कुछ बड़े सीमेण्ट संयंत्रों का स्वामित्व केन्द्र और राज्य सरकारों के पास है।

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उत्पादन एवं वितरण
सीमेण्ट उद्योग देशभर में विकेन्द्रित है। अधिकांश कारखाने देश के पश्चिमी तथा दक्षिणी भागों में विकसित हुए हैं, जब कि सीमेण्ट की अधिकांश माँग उत्तरी एवं पूर्वी क्षेत्रों में अधिक है। तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, गुजरात, बिहार, राजस्थान, कर्नाटक एवं आन्ध्र प्रदेश राज्य देश का 74% सीमेण्ट उत्पन्न करते हैं, जब कि कुल उत्पादित क्षमता का 86% भाग इन्हीं राज्यों में केन्द्रित है। अग्रलिखित राज्यों का सीमेण्ट उत्पादन में महत्त्वपूर्ण स्थान है

1. मध्य प्रदेश – सीमेण्ट उत्पादन की दृष्टि से इस राज्य का भारत में प्रथम स्थान है। यहाँ सीमेण्ट के आठ विशाल कारखाने तथा कई लघु संयन्त्र कार्यरत हैं। मध्य प्रदेश राज्य देश का 15% सीमेण्ट उत्पन्न कर प्रथम स्थान पर है। इस राज्य में सीमेण्ट उद्योग के लिए आधारभूत सामग्री स्थानीय रूप से उपलब्ध है तथा कोयला झारखण्ड से मँगवाया जाता है। इस राज्य के कटनी, कैमूर, सतना, जबलपुर, बनमोर, नीमच एवं दमोह में सीमेण्ट के प्रमुख कारखाने हैं।

2. तमिलनाडु – 
यहाँ सीमेण्ट के 8 बड़े कारखाने हैं, जो देश का 12% सीमेण्ट उत्पन्न करते हैं। सीमेण्ट उत्पादन में इस राज्य का दूसरा स्थान है। चूना-पत्थर की पूर्ति स्थानीय क्षेत्रों के साथ-साथ कर्नाटक एवं आन्ध्र प्रदेश राज्यों से भी की जाती है। तुलुकापट्टी, तिलाईयुथू, तिरुनेलवेली, डालमियापुरम, राजमलायम, संकरी दुर्ग एवं मधुकराई प्रमुख सीमेण्ट उत्पादक केन्द्र हैं।

3. आन्ध्र प्रदेश – 
आन्ध्र प्रदेश में सीमेण्ट के 11 कारखाने एवं 12 लघु संयन्त्र हैं, जो गुण्टूर, कर्नूल, नालगोण्डा, मछलीपत्तनम्, हैदराबाद एवं विजयवाड़ा में केन्द्रित हैं। इस राज्य में चूना-पत्थर के विशाल भण्डार पाये जाते हैं, इसी कारण इस राज्य (UPBoardSolutions.com) की सीमेण्ट उत्पादन क्षमता 45 लाख टन तक पहुँच गयी है। सीमेण्ट उत्पादन में इस राज्य का तीसरा स्थान है।

4. राजस्थान – 
सीमेण्ट के उत्पादन में राजस्थान राज्य का चौथा स्थान है। यहाँ अरावली पहाड़ियों में । चूने-पत्थर व जिप्सम के पर्याप्त भण्डार हैं। ऐसी सम्भावना है कि भविष्य में राजस्थान भारत का सबसे बड़ा सीमेण्ट उत्पादक राज्य हो जाएगा। यहाँ सीमेण्ट उत्पादन के 10 कारखाने हैं, जिनमें देश का 10% सीमेण्ट निर्मित किया जाता है। लखेरी (बूंदी), सवाई माधोपुर, चित्तौड़गढ़, चुरू,. निम्बाहेड़ा एवं उदयपुर सीमेण्ट उत्पादन के प्रमुख केन्द्र हैं।

5. झारखण्ड – 
झारखण्ड सीमेण्ट उत्पादक राज्यों में एक विशेष स्थान रखता है। यहाँ डालमियानगर, सिन्द्री, बनजोरी, चौबासा, खलारी, जापला एवं कल्याणपुर प्रमुख केन्द्र हैं।

6. कर्नाटक – 
इस राज्य में बीजापुर, भद्रावती, गुलर्गा, उत्तरी कनारा, तुमुकुर एवं बंगलुरु प्रमुख सीमेण्ट उत्पादक केन्द्र हैं। यहाँ सीमेण्ट उत्पादन के 6 बड़े संयन्त्र स्थापित किये गये हैं।

7. गुजरात – 
गुजरात राज्य में सीमेण्ट के 8 कारखाने हैं। सीमेण्ट उद्योग का प्रारम्भ इसी राज्य से किया गया था। सिक्का (जामनगर), अहमदाबाद, राणाबाव, बड़ोदरा, पोरबन्दर, सेवालिया, ओखामण्डल एवं द्वारका प्रमुख सीमेण्ट उत्पादक केन्द्र हैं।

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8. छत्तीसगढ़ – 
यहाँ सीमेण्ट के कुछ कारखाने हैं जिनमें दुर्ग व गन्धार के कारखाने मुख्य हैं।

9. अन्य राज्य – 
हरियाणा में सूरजपुर एवं डालमिया-दादरी; केरल (UPBoardSolutions.com) में कोट्टायम; उत्तर प्रदेश में चुर्क एवं चोपन; ओडिशा में राजगंगपुर एवं हीराकुड; जम्मू-कश्मीर में वुयान तथा असम में गौहाटी अन्य प्रमुख सीमेण्ट उत्पादक केन्द्र हैं।

व्यापार
भारत के सीमेण्ट उद्योग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ कुल उत्पादन-क्षमता का 84% सीमेण्ट को उत्पादन किया जाता है। सन् 1965 ई० में इस उद्योग के विकास एवं विस्तार हेतु सीमेण्ट निगम की स्थापना की गयी थी। इस निगम का प्रमुख कार्य कच्चे माल के नये क्षेत्रों का पता लगाना तथा इस उद्योग से सम्बन्धित समस्याओं को हल करना था। वर्तमान समय में हम सीमेण्ट उत्पादन में आत्म-निर्भर हो गये हैं। वर्ष 2004-05 में 78.3 लाख टन सीमेण्ट का निर्यात भी किया गया था। बांग्लादेश, इण्डोनेशिया, मलेशिया, नेपाल, म्यांमार, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान आदि हमारे सीमेण्ट के प्रमुख ग्राहक हैं।

वर्ष 2010-11 के दौरान सीमेंट उत्पादन (अप्रैल, 2011 से मार्च, 2012 तक) 224.49 मिलियन टन हुआ और 2010-11 की इसी अवधि तुलना में 6.55 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। भारत ने अप्रैल, 2011-12 के दौरान 3.86 मिलियन टन सीमेंट और खंगरों का निर्यात किया है। इस क्षेत्र में प्रचुर माँग और ज्यादा लाभ उद्योग के विकास के अनुकूल है। यह उद्योग 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान लगभग 100 मिलियन टन की क्षमता वृद्धि की योजना थी लेकिन इस अवधि के दौरान क्षमता वृद्धि 126.25 मिलियन टन की हुई।

प्रश्न 6.
भारतीय अर्थव्यवस्था में ग्राम उद्योगों की समस्याएँ बताइए तथा उनके हल के लिए उपाय सुझाष्ट।
उत्तर :
भारतीय अर्थव्यवस्था में ग्राम उद्योगों की समस्याएँ ग्रामीण उद्योगों की प्रमुख समस्याएँ अग्र हैं

  • इन उद्योगों के लिए आवश्यक कच्चा माल नहीं उपलब्ध हो पाता। जो माल इन्हें प्राप्त होता है वह अच्छी किस्म का नहीं होता।
  • बैंकों से ऋण मिलने की प्रक्रिया इतनी जटिल हैं कि इन्हें मजबूर होकर स्थानीय साहूकारों से ऋण लेना पड़ता है।
  • उत्पादित वस्तुओं को बेचने के लिए नियमित बाजार न होने से इन उद्योगों का विकास अवरुद्ध हुआ है।
  • ग्रामीण उद्योगों को बड़े उद्योगों में बनी वस्तुओं से प्रतियोगिता करनी पड़ती है, क्योंकि बड़े उद्योगों की वस्तुएँ सस्ती एवं आकर्षक होती हैं, जिससे इन्हें अपनी वस्तुएँ बेचने में कठिनाई होती है।
  • इन उद्योगों को चलाने के लिए कुशल प्रबन्धक नहीं मिल पाते।
  • इन उद्योगों में काम करने वाले कारीगर आज भी पुराने औजारों एवं पुरानी पद्धतियों के अनुसार कार्य करते हैं जिनसे कम उत्पादन प्राप्त होता है।
  • इन उद्योगों के कारीगर इतने गरीब होते हैं कि वे नवीन यन्त्रों और औजारों को नहीं खरीद पाते, जिससे सस्ती एवं अच्छी वस्तु नहीं बन पाती।
  • इनमें काम करने वाले शिल्पकारों का कोई सामूहिक संगठन नहीं है, जिससे इनमें सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति का अभाव पाया जाता है।

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ग्राम उद्योगों की समस्याओं के समाधान के लिए सुझाव

ग्रामीण उद्योगों की समस्याओं के समाधान के लिए निम्न सुझाव दिये जा रहे हैं

  • कच्चे माल की व्यवस्था के लिए पर्याप्त मात्रा में सुख-सुविधाएँ उपलब्ध करायी जाएँ जिसमें सहकारी सहयोग की आवश्यकता होती है।
  • शिल्पकारों को सहकारिता के आधार पर संगठित किया जाए, जिससे उनकी सामूहिक क्रयशक्ति में वृद्धि की जा सके।
  • तैयार माल के क्रय-विक्रय में इन उद्योगों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • उत्पादन विधियों में सुधार करने तथा आधुनिक ढंगों को अपनाने के लिए विशिष्ट प्रशिक्षण एवं तकनीकी शिक्षा की अत्यन्त आवश्यकता है।
  • कारीगरों को आधुनिक यन्त्रों एवं औजारों को उचित मूल्य पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जानी चाहिए।
  • सहकारी विपणन समितियों की स्थापना की जाए।
  • ग्रामीण उद्योगों को बड़े उद्योगों के साथ प्रतिस्पर्धा से बचना आवश्यक है।
  • ग्रामीण उद्योग के विकास की सम्भावनाओं का पता लगाने के लिए व्यापक रूप से सर्वेक्षण कराया जाना चाहिए।
  • इन उद्योगों की सुरक्षा के लिए अनेक बोर्डो और निगमों (UPBoardSolutions.com) की स्थापना की गयी है; जैसे-अखिल भारतीय खादी एवं ग्रामोद्योग निगम, राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम आदि।
  • 2 अप्रैल, 1990 को लघु उद्योगों को ऋण देने के उद्देश्य से भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) की स्थापना की गयी।
  • 2000-01 में नयी ऋण नीति में मिश्रित ऋण सीमा को 25 लाख के ऊपर तक बढ़ाया गया। ऋण गारण्टी योजना को लागू किया गया।

प्रश्न 7.
उत्तर भारत में चीनी उद्योग के स्थानीयकरण के प्रमुख तीन कारणों की समीक्षा कीजिए। मध्य भारत में इस उद्योग के लगाने में प्रमुख दो बाधाओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
उत्तर भारत में चीनी उद्योग के स्थानीयकरण के कारण

  • कच्चे माल के रूप में गन्ने का पर्याप्त उत्पादन।
  • अनुकूल जलवायु
  • शक्ति के संसाधनों की उपलब्धता।
  • सस्ते एवं कुशल श्रम की बहुलता।
  • परिवहन के सस्ते साधनों की उपलब्धता।
  • व्यापक बाजार।

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मध्य भारत में चीनी उद्योग स्थापित करने में आने वाली बाधाएँ मध्य भारत में चीनी उद्योग को स्थापित करने में आने वाली दो प्रमुख बाधाएँ निम्नलिखित हैं
1. श्रमिकों की अनुपलब्धता – गन्ने की एक फसल 10-12 महीनों में तैयार होती है। गन्ने के लिए खेत तैयार करने, बोने, निराई-गुड़ाई करने तथा उन्हें काटकर मिलों तक पहुँचाने के लिए सस्ते एवं कुशल श्रमिकों की पर्याप्त संख्या में आवश्यकता होती है। इसी कारण से गन्ना सघन जनसंख्या वाले क्षेत्रों में ही उगाया जाता है। मध्य भारत के अन्तर्गत आने वाले राज्यों में भौगोलिक स्थितियों के कारण जनसंख्या अत्यधिक विरल है, अतः श्रमिकों की अनुपलब्धता है, जो कि इस उद्योग के स्थापित होने में प्रमुख रूप से बाधक है।

2. उपयुक्त मृदा की अनुपलब्धता – गन्ने की खेती के लिए उपजाऊ दोमट तथा नमीयुक्त गहरी– चिकनी मिट्टी उपयुक्त होती है। यह मिट्टी से अधिक पोषक तत्त्व भी ग्रहण करता है। इसलिए इसे अतिरिक्त खाद की भी आवश्यकता होती है। मध्य भारत (UPBoardSolutions.com) के अन्तर्गत आने वाले राज्यों में न तो गन्ने की उपज के लिए अनुकूल उपजाऊ मृदा उपलब्ध है और न ही खादों की आपूर्ति सुगम है। यही कारण इस उद्योग के स्थापित होने में बाधक हैं।। उपर्युक्त दोनों कारणों से भी अधिक गन्ने की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु, परिवहन के साधन, समुचित वर्षा, सिंचाई के साधनों का अभाव आदि मध्य भारत में इस उद्योग को स्थापित करने में प्रमुख रूप से बाधक हैं।

प्रश्न 8.
भारत में सूती वस्त्र उद्योग के विकास एवं स्थानीयकरण की विवेचना कीजिए। [2018]
या
भारत में तीन प्रदेशों के सूती वस्त्र उद्योग के केन्द्रों का वर्णन कीजिए। [2014, 17]
या
भारत के सूती वस्त्र उद्योग के विकास का कच्चे माल की उपलब्धता एवं उसके प्रमुख केन्द्रों के साथ वर्णन कीजिए।
उत्तर :

भारत में सूती वस्त्र उद्योग

भारत में सूती वस्त्रों के उपयोग की परम्परा बहुत प्राचीन है। सिन्धु सभ्यता में बने वस्त्रों की माँग यूरोपीय और मध्य-पूर्व के देशों में बहुत अधिक थी। उस काल में सूती वस्त्र उद्योग ग्रामीण या कुटीर उद्योग के रूप में संचालित किया जाता था। वस्त्र के (UPBoardSolutions.com) लिए धागा बनाने की मशीन मात्र चरखा थी। उन्नीसवीं शताब्दी के
आरम्भिक वर्षों में कोलकाता के निकट सूती मिल की स्थापना की गई। परन्तु इस उद्योग का वास्तविक विकास सन् 1954 ई० से प्रारम्भ हुआ, जब पूर्ण रूप से भारतीय पूँजी द्वारा मुम्बई में सूती मिल की स्थापना की गई थी।

महत्त्व – सूती वस्त्र उद्योग एक प्रमुख उद्योग है। यह न केवल वस्त्र जैसी अनिवार्य आवश्यकता की पूर्ति करता है वरन् बड़ी मात्रा में रोजगार भी उपलब्ध कराता है। यह निर्यात द्वारा बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भी कमाकर देता है।

स्थानीयकरण के कारण – भारत में सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण के निम्नलिखित कारण हैं

  • पर्याप्त कच्चे माल (कपास) का स्थानीय उत्पादन।
  • अनुकूल नम जलवायु तथा स्वच्छ जल।
  • रासायनिक पदार्थों का सरलता से मिलना।
  • सस्ते एवं कुशल श्रमिकों का मिलना।
  • परिवहन के सस्ते साधनों का मिलना।
  • वस्त्र बनाने वाली मशीनरी की उपलब्धता।
  • वस्त्र उद्योग को सरकारी संरक्षण तथा सहायता प्राप्त होना।
  • उपभोक्ता बाजार निकट स्थित होना।
  • शक्ति के पर्याप्त संसाधन मिलना।
  • विदेशी सूती वस्त्रों पर भारी आयात कर का होना।
  • सूती वस्त्र निर्यात की उदार सरकारी नीति का पालन करना।

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उत्पादन-सूती वस्त्र उद्योग भारत का प्राचीनतम एवं महत्त्वपूर्ण उद्योग है। यह वर्तमान में भारत का सबसे बड़ा तथा विकसित उद्योग है। यह देश के कुल औद्योगिक उत्पादन में लगभग 14% का अंशदान करता है। देश के कुल निर्यात व्यापार में लगभग 23% की हिस्सेदारी रखने वाला निर्यातपरक यह उद्योग लगभग 35 लाख लोगों की जीविका चला रहा है। भारत का विश्व के सूती वस्त्र उत्पादन में चीन के बाद दूसरा स्थान है। (UPBoardSolutions.com) परन्तु तकुओं की दृष्टि से प्रथम स्थान है। भारत में सूती वस्त्र बनाने का कार्य पहले कुटीर उद्योग के रूप में किया जाता था, परन्तु अब यह एक महत्त्वपूर्ण संगठित उद्योग के रूप में विकसित हो गया है। भारत के अनेक राज्यों में सूती वस्त्र उद्योग का स्थानीयकरण हुआ है। यह क्षेत्र हैं-मुम्बई, हैदराबाद, सूरत, शोलापुर, कोयम्बटूर, नागपुर, मदुरै, कानपुर, बंगलुरु, पुणे और चेन्नई।

सूती वस्त्र उद्योग उत्पादन के क्षेत्र एवं महत्त्वपूर्ण केन्द्र

यद्यपि भारत के अनेक राज्यों में सूती वस्त्रों का उत्पादन किया जाता है, परन्तु इसका सर्वाधिक विकास गुजरात एवं महाराष्ट्र राज्यों में हुआ है। मुम्बई तथा अहमदाबाद नगर सूती वस्त्र उद्योग के प्रधान केन्द्र हैं। भारत के प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादन राज्यों का विवरण निम्न प्रकार है

1. गुजरात-
सूती वस्त्र उत्पादन के क्षेत्र में गुजरात राज्य का भारत में प्रथम स्थान है। यह देश का लगभग 33% सूती वस्त्र का उत्पादन करता है। अहमदाबाद महानगर सूती वस्त्र उद्योग का मुख्य केन्द्र है। यही कारण है कि अहमदाबाद को भारत का मानचेस्टर और पूर्व का बोस्टन कहा जाता है। बड़ोदरा, सूरत, भरूच, बिलिमोरिया, मोरवी, सुरेन्द्रनगर, राजकोट, कलोल, भावनगर, नाडियाड, पोरबन्दर तथा जामनगर अन्य प्रमुख सूती वस्त्र बनाने वाले केन्द्र हैं।

2. महाराष्ट्र – 
इस राज्य का भारत के सूती वस्त्र उद्योग में दूसरा स्थान है। मुम्बई महानगर में खटाऊ, फिनले तथा सेंचुरी जैसी प्रसिद्ध सूती वस्त्र मिले हैं। महाराष्ट्र में सूती वस्त्र उद्योग के अन्य केन्द्रों में शोलापुर, कोल्हापुर, पुणे, नागपुर, सतारा, वर्धा, (UPBoardSolutions.com) अमरावती, सांगली, थाणे, जलगाँव, अकोला, सिद्धपुर, चालीसगाँव, धूलिया, औरंगाबाद आदि प्रमुख हैं।

3. तमिलनाडु – 
इस राज्य में कोयम्बटूर सूती वस्त्र का प्रमुख केन्द्र है। सलेम, चेन्नई, रामनाथपुरम, तूतीकोरिन, तंजावूर, मदुरै, पेराम्बूर आदि अन्य प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं।

4. उत्तर प्रदेश – 
यह उत्तर भारत का सबसे बड़ा सूती वस्त्र उत्पादक राज्य है, कानपुर महानगर इस उद्योग का मुख्य केन्द्र है, इसे उत्तर भारत का मानचेस्टर कहा जाता है। अन्य सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्रों में वाराणसी, रामपुर, मुरादाबाद, आगरा, बरेली, अलीगढ़, हाथरस, मोदीनगर, पिलखुवा, सण्डीला, इटावा आदि मुख्य हैं।

5. पश्चिम बंगाल – 
सूती वस्त्र उत्पादन की दृष्टि से इस राज्य का भारत में तीसरा स्थान है। यह राज्य भारत का 15% सूती वस्त्र उत्पादित करता है। कच्चे माल की कमी आयातित कपास से पूरी की जाती है। चौबीस-परगना, हावड़ा एवं हुगली प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादन जिले हैं। कोलकाता, श्रीरामपुर, हुगली, मुर्शिदाबाद, हावड़ा, रिशरा, फूलेश्वर, धुबरी आदि प्रमुख सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र हैं।

अन्य राज्य – भारत के अन्य सूती वस्त्र उत्पादक राज्यों में कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, केरल, बिहार एवं दिल्ली प्रमुख हैं।

व्यापार – भारत सूती वस्त्र का निर्यात मुख्यतः हिन्द महासागर के तटवर्ती देशों-ईरान, इराक, म्यांमार (बर्मा), श्रीलंका, बंगलादेश, संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, इण्डोनेशिया, थाईलैण्ड, मिस्र, सूडान, टर्की, इथोपिया, नेपाल, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड आदि को करता है।

प्रश्न 9.
भारत में लौह-इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण, वितरण एवं भावी सम्भावनाओं का विवरण दीजिए। [2017]
या
भारत में लौह-इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण के कोई तीन कारण बताइए। [2013]
उत्तर :

भारत में लोहा-इस्पात उद्योग

उद्योग का महत्त्व एवं विकास
लोहा-इस्पात उद्योग की गणना भारत के महत्त्वपूर्ण भारी उद्योगों में की जाती है। वर्तमान में भारत में लोहा-इस्पात के 11 कारखाने है, जिनमें से 4 बिल्कुल नए हैं। लोहा-इस्पात उद्योग, औद्योगिक क्रान्ति का जनक है। इस्पात का उपयोग मशीनों, रेलवे (UPBoardSolutions.com) लाइन, परिवहन के साधन, भवन निर्माण, रेल के पुल, जलयान, अस्त्र-शस्त्र तथा कृषि यन्त्र आदि बनाने में किया जाता है अर्थात् इससे एक सुई से लेकर विशालकाय टैंकों तक का निर्माण किया जाता है। वर्तमान में भारत में एक इस्पात कारखाना निजी क्षेत्र में (टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी) तथा शेष 10 सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित किए गए हैं।

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स्थानीयकरण के कारण – भारत में लोहा-इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

  • लौह-अयस्क एवं कोयला जैसे कच्चे माल निकट स्थित होना।
  • अन्य उपयोगी खनिज पदार्थों (मैंगनीज, अभ्रक, डोलोमाइट व चूना पत्थर) का मिलना।
  • सस्ती एवं सुलभ जल विद्युत-शक्ति का मिलना।
  • स्वच्छ जल की आपूर्ति होना
  • विस्तृत उपभोक्ता बाजार की सुविधा प्राप्त होना।
  • सस्ते एवं कुशल श्रमिकों का मिलना।
  • परिवहन के सस्ते साधन का मिलना।
  • पर्याप्त पूँजी की व्यवस्था होना।
  • उद्योग को सरकारी संरक्षण एवं सहायता प्राप्त होना।

उत्पादन एवं उद्योग के प्रमुख केन्द्र
भारत के प्रमुख लोहा-इस्पात कारखानों का विवरण निम्नलिखित है|

1. टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी, जमशेदपुर (TISCO) – 
इसे कम्पनी की स्थापना सन् 1907 में जमशेद जी टाटा द्वारा तत्कालीन बिहार (वर्तमान में झारखण्ड राज्य) के साँकची (वर्तमान में जमशेदपुर) नामक स्थान पर की गई थी। वर्तमान (UPBoardSolutions.com) में यह एशिया महाद्वीप का सबसे बड़ा लोहा-इस्पात कारखाना है। इस कारखाने की उत्पादन क्षमता 20 लाख टन इस्पात पिण्ड तथा 19 लाख टन ढलवाँ लोहा प्रतिवर्ष तैयार करने की है। जमशेदपुर को ही इस्पात नगरी या टाटानगर भी कहा जाता है।

2. इण्डियन आयरन एण्ड स्टील कम्पनी (ISCO) – 
इस कम्पनी के अधीन इस्पात के तीन कारखाने-पश्चिम बंगाल के बर्नपुर, कुल्टी तथा हीरापुर स्थानों पर स्थापित किए गए हैं। सन् 1952 से इन तीनों कारखानों को ‘इण्डियन आयरन एण्ड स्टील कम्पनी के नाम से जाना जाता है। सन् 1976 से सरकार ने इस कम्पनी को अपने अधिकार में ले लिया है। बर्नपुर में इस्पात, हीरापुर में ढलवाँ लोहा तथा कुल्टी में इस्पात पिण्ड बनाए जाते हैं। इस कम्पनी का मुख्य कार्यालय कोलकाता में है। इन तीनों इकाइयों की वार्षिक उत्पादन क्षमता 10 लाख टन इस्पात तथा 13 लाख टन ढलवाँ लोहा तैयार करने की है।

3. विश्वेश्वरैया आयरन स्टील लिमिटेड –
कर्नाटक राज्य के शिमोगा जिले में भद्रा नदी के किनारे भद्रावती नामक स्थान पर सन् 1923 में इस कारखाने की स्थापना की गई थी। इस क्षेत्र में पर्याप्त लौह-अयस्क निकाला जाता है, परन्तु कोयले का अभाव है। अत: कोयले के स्थान पर लकड़ी का कोयला प्रयोग में लाया जाता है। यहाँ लौह-अयस्क केमानगुण्डी तथा बाबाबूदन की पहाड़ियों से प्राप्त होता है। इस कारखाने की उत्पादन क्षमता 85,000 टन ढलवाँ लोहा तथा 2 लाख टन इस्पात तैयार करने की है। सन् 1962 ई० से इस कारखाने पर कर्नाटक सरकार तथा भारत सरकार का संयुक्त अधिकार है।

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4. राउरकेला इस्पात लिमिटेड – 
ओडिशा राज्य में सन् 1955 में जर्मनी की सहायता से सुन्दरगढ़ जिले के राउरकेला नामक स्थान पर इस कारखाने की स्थापना की गई थी। वर्तमान में इसकी उत्पादन क्षमता 18 लाख टन इस्पात तैयार करने की है। इस कारखाने को (UPBoardSolutions.com) लौह-अयस्क क्योंझर तथा गुरुमहिसानी की खदानों से तथा कोयला झरिया, तालचेर एवं कोरबा की खदानों से प्राप्त होता है। हीराकुड बाँध से इसे , सस्ती जलविद्युत शक्ति प्राप्त होती है।

5. भिलाई इस्पात कारखाना – 
इस कारखाने की स्थापना वर्तमान छत्तीसगढ़ (तत्कालीन मध्य प्रदेश) राज्य के दुर्ग जिले में भिलाई नामक स्थान पर सन् 1955 ई० में तत्कालीन सोवियत संघ की सरकार के सहयोग से की गई थी। इस कारखाने में उत्पादन सन् 1962 ई० में आरम्भ हुआ था। इस कारखाने को सभी भौगोलिक सुविधाएँ प्राप्त हैं। इस कारखाने की उत्पादन क्षमता 40 लाख टन इस्पात प्रतिवर्ष तैयार करने की है। यहाँ लोहे की छड़े, शहतीर, रेल की पटरियाँ तथा इस्पात के ढाँचे बनाए जाते हैं।

6. दुर्गापुर इस्पात कारखाना – 
पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर नामक स्थान पर ब्रिटिश सरकार की सहायता से सन् 1956 ई० में इस कारखाने की स्थापना की गई थी परन्तु इस कारखाने से सन् 1962 ई० में उत्पादन प्रारम्भ हो सका। इसमें रेल की पटरियाँ, शहतीर तथा ब्लेड बनाए जाते हैं। इसकी उत्पादन क्षमता 16 लाख टन इस्पात पिण्ड तैयार करने की है।

7. बोकारो इस्पात कारखाना –
वर्तमान झारखण्ड (तत्कालीन बिहार) राज्य के बोकारो नामक स्थान पर चौथी पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत सन् 1964 ई० में सोवियत संघ के सहयोग से इस कारखाने की स्थापना की गई थी। इस कारखाने की उत्पादन क्षमता 40 लाख टन इस्पात प्रतिवर्ष तैयार करने की है।

अन्य प्रतिष्ठान – भारत में इस्पात की बढ़ती हुई माँग की पूर्ति के लिए लोहा-इस्पात के अनेक नए कारखानों की स्थापना की गई है। इनमें कर्नाटक राज्य में बेल्लारी जिले में हॉस्पेट के निकट विजयनगर, आन्ध्र प्रदेश में विशाखापत्तनम, तमिलनाडु में सलेम तथा ओडिशा राज्य में दैतारी नामक स्थानों पर नए इस्पात कारखानों की स्थापना प्रमुख है।

उत्पादन एवं व्यापार – भारत अनेक देशों को इस्पात का निर्यात करता है। न्यूजीलैण्ड, मलेशिया, बांग्लादेश, ईरान, म्यांमार (बर्मा), सऊदी अरब, श्रीलंका, कीनिया आदि देश भारतीय इस्पात के प्रमुख ग्राहक हैं। भविष्य में इस्पात के निर्यात की सम्भावना बढ़ी है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
औद्योगिक ढाँचे का क्या तात्पर्य है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
भारत के औद्योगिक उद्यमों को मुख्य रूप से सार्वजनिक क्षेत्र एवं निजी क्षेत्र में वर्गीकृत किया जा सकता है। वे कम्पनियाँ जिन पर सरकारी विभागों अथवा केन्द्र या राज्यों द्वारा स्थापित संस्थाओं का स्वामित्व होता है, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम कहलाते हैं। (UPBoardSolutions.com) दूसरे निजी क्षेत्र के उद्यम हैं। कुछ उद्यमों का मिश्रित रूप भी है जिन पर सार्वजनिक क्षेत्र की संस्था और निजी उद्यम दोनों का संयुक्त स्वामित्व होता है। संयुक्त क्षेत्र और निजी क्षेत्र के उद्योगों को कभी-कभी निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जाता है

(क) गैर-कारखाना विनिर्माण इकाइयाँ – ये दो प्रकार की होती हैं

  • ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में कुटीर उद्योग और
  • अन्य औद्योगिक इकाइयाँ, जो इतनी छोटी होती हैं कि वे कारखाना कहलाने लायक नहीं होतीं और इसलिए उन्हें छोटी विनिर्माण इकाइयाँ कहा जाता है।

(ख) ऐसे उद्यम जिन्हें अधिक मात्रा में विदेशी विनिमय का प्रयोग करना पड़ता है, जो कि भारत के लिए दुर्लभ स्रोत है। ये उद्यम विदेशी विनिमय अधिनियम के प्रावधानों के अन्तर्गत काम करते हैं और फेरा (FERA) कम्पनियाँ कहलाते हैं। वर्तमान में ‘फेरा’ के स्थान पर ‘फेमा’ (FEMA) के नियमों के अन्तर्गत कार्य किया जाता है।

(ग)
ऐसे उद्यम जो इतने बड़े हैं कि जिन्हें एकाधिकार एवं प्रतिबन्धात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम (MRTP Act) के अन्तर्गत काम करना पड़ता है। इन्हें MRTP कम्पनियाँ कहते हैं। प्रश्न

प्रश्न 2.
पेट्रो-रसायन उद्योग पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
पेट्रो-रसायन उद्योग रसायन उद्योग कम ही एक भाग है। इनके अन्तर्गत पेट्रोल, कोयला तथा अनेक रसायनों से विविध प्रकार के पदार्थ; जैसे—प्लास्टिक, कीटनाशक दवाइयाँ, रंग तथा रोगन आदि बनाये जाते हैं। इनके अतिरिक्त पॉलीमर, कृत्रिम कार्बनिक रसायन, कृत्रिम रेशे तथा धागे, पॉलिस्टर, नाइलोन चिप्स, स्पेण्डेक्स धागे (तैराकी की पोशाकों हेतु) आदि भी बनाये जाते हैं। भारत में यह उद्योग स्वतन्त्रता के बाद आरम्भ किया गया। विगत दो दशकों में इसके उत्पादन तथा उपभोग में अत्यधिक वृद्धि हुई है। सरकारी प्रोत्साहन तथा उदारीकरण ने इस उद्योग की प्रगति में विशेष योगदान दिया है।

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प्लास्टिक प्रोसेसिंग मूलत: लघु उद्योग क्षेत्र में है। पेट्रो-रसायन उद्योग में बड़ी-बड़ी वस्तुओं का निर्माण किया जाने लगा है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था में इसका स्थान सर्वोपरि हो गया है। यह एक ऐसा उद्योग है, जिसमें कच्चे माल को पुनः परिष्कृत कर विभिन्न वस्तुओं का निर्माण किया जाता है, जिससे इसकी महत्ता में और भी वृद्धि हो गयी है। पेट्रो-रसायन उद्योग मुम्बई के निकट ट्रॉम्बे एवं कोयली, गुजरात में अंकलेश्वर तथा बड़ोदरा में केन्द्रित हो गया है। इनके अतिरिक्त हल्दिया (प० बंगाल), डिगबोई (असोम), कोचीन (केरल), बरौनी (बिहार), चेन्नई (तमिलनाडु), करनाल (हरियाणा), मथुरा (उत्तर प्रदेश), (UPBoardSolutions.com) मार्मागाओ (गोवा) आदि स्थानों पर पेट्रो-रसायन उद्योग प्रगति पर है। इस उद्योग का प्रसार देश के अन्य भागों में भी होता जा रहा है। वर्ष 2004-05 में पेट्रो-रसायन पदार्थों का उत्पादन 7,018 किलो टन था। वर्ष 2009-10 में पेट्रो रसायन पदार्थों का उत्पादन 8.681 हजार मीट्रिक टन हो गया था।

प्रश्न 3.
पेट्रो-रसायन और रसायन उद्योग में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
पेट्रो-रसायन उद्योग खनिज तेल पर आधारित होते हैं। खनिज तेल को परिष्कृत करके उसमें से स्नेहक तेल, फर्नेस तेल, डीजल, मिट्टी का तेल, सफेद तेल, पेट्रोल, एल०पी०जी० गैस, नेफ्था, रासायनिक गोंद, ग्रीस, मेन्थॉल, नाइलोन, पॉलिस्टर प्राप्त किये जाते हैं। रेयॉन, नाइलोन, टेरीन और डेकरॉन कृत्रिम रेशे पेट्रो-रसायन उद्योग के वे उत्पाद हैं जिनसे आकर्षक, अधिक टिकाऊ वस्त्र बनाये जाते हैं। अपने उत्कृष्ट गुणों के कारण पेट्रो-रसायन उत्पाद, परम्परागत कच्चे माल; जैसे-लकड़ी, शीशा और धातु का स्थान ले रहे हैं। घरों, कारखानों और खेतों में इनका उपयोग हो रहा है। उदाहरण के लिए- प्लास्टिक के उपयोग से जन-जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन आ रहे हैं। सिन्थेटिक डिटर्जेण्ट एक क्रान्तिकारी पेट्रो-रसायन उत्पाद ही है।

रसायन उद्योग – लोहा तथा इस्पात, इंजीनियारिंग और वस्त्र उद्योग के बाद रसायन उद्योग का देश में चौथा स्थान है। पिछले कुछ वर्षों में कार्बनिक तथा अकार्बनिक रसायन उद्योग ने बड़ी तेजी से विकास किया है। ये उद्योग रसायनों पर आधारित होते हैं। इन भारी रसायनों से अनेक उत्पाद बनाये जाते हैं। इनमें औषधियाँ, रँगाई के सामान, नाशकमार (कीटनाशक आदि), पेण्ट, दियासलाई, साबुन आदि उत्पाद उल्लेखनीय हैं। अमेरिका का रसायन उद्योग में विश्व में प्रथम स्थान है।

नाशकमार दवाओं में कीटनाशक, खरपतवारनाशक, फफूदनाशक और कृतंकनाशक, कृषि और जन-स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। डी०डी०टी० बनाने का कारखाना सन् 1954 में दिल्ली में लगाया गया था। सन् 1996-97 में इसका उत्पादन १ 900 अरब मूल्य का था। औषध निर्माण उद्योग में भारत का अब विश्व में श्रेष्ठ स्थान है। देश मूलभूत तथा व्यापक (Bulk) औषधियों के उत्पादन में लगभग आत्मनिर्भर बन गया है।

प्रश्न 4.
सूती वस्त्र उद्योग महाराष्ट्र और गुजरात राज्यों में अधिक केन्द्रित हैं, क्यों ? [2010]
उत्तर :
महाराष्ट्र के सूती वस्त्र उद्योग का सबसे बड़ा एवं प्रमुख केन्द्र मुम्बई है। इस महानगर में सूती वस्त्रों की 71 मिले हैं, जिस कारण इसे ‘सूती वस्त्रों की राजधानी कहा जाता है। इसी प्रकार अहमदाबाद गुजरात राज्य का सूती वस्त्र उद्योग का सबसे बड़ा एवं प्रमुख केन्द्र है। यहाँ सूती वस्त्रों की 81 मिले हैं, जिस कारण इसे भारत का मानचेस्टर’ तथा पूर्व का बोस्टन’ कहा जाता है। इन राज्यों में सूती वस्त्र उद्योग के केन्द्रित होने के लिए (UPBoardSolutions.com) निम्नलिखित भौगोलिक कारण उत्तरदायी रहे हैं
1. कपास का पर्याप्त उत्पादन – महाराष्ट्र एवं गुजरात राज्यों की काली मिट्टी में कपास का पर्याप्त उत्पादन किया जाता है।
2. आर्द्र जलवायु – सागर की निकटता के कारण इन दोनों ही राज्यों की जलवायु आर्द्रता प्रधान है। इस जलवायु में बुनाई के समय धागा नहीं टूटता।
3. पत्तन की सुविधा  मुम्बई तथा काँदला पत्तनों से सूती वस्त्र उद्योग हेतु मशीनें, कल-पुर्जे, रासायनिक पदार्थ, कपास तथा अन्य आवश्यक पदार्थों के विदेशों से आयात करने की सुविधा रहती
4. ऊर्जा के पर्याप्त साधन – इन केन्द्रों के सूती वस्त्र कारखानों को जलविद्युत शक्ति सस्ती दर पर सरलता से उपलब्ध हो जाती है।
5. पर्याप्त पूँजी – महाराष्ट्र तथा गुजरात राज्यों में पूँजीपति निवास करते हैं, जो बहुत ही धनाढ्य हैं; अर्थात् यहाँ इस उद्योग के विकास के लिए पर्याप्त पूँजी उपलब्ध है।
6. पर्याप्त माँग – यहाँ उत्पादित सूती वस्त्रों का उपभोक्ता बाजार बड़ा ही विस्तृत है।
7. सस्ते एवं कुशल श्रमिक – मुम्बई तथा अहमदाबाद महानगरों में परम्परागत, सस्ते तथा कुशल श्रमिक आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।

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प्रश्न 5.
हुगली नदी के किनारे कागज के अनेक कारखाने क्यों स्थापित हो गये हैं ?
उत्तर :
पश्चिम बंगाल राज्य में हुगली नदी के किनारे कागज के अनेक कारखाने स्थापित हुए हैं। यहाँ इस उद्योग की स्थापना के निम्नलिखित कारण हैं

  1. पश्चिम बंगाल तथा उसके समीपवर्ती राज्यों में घास पर्याप्त मात्रा में उगती है, जो कागज उद्योग का प्रमुख कच्चा माल है। यहाँ उत्पादित बॉस का उपयोग भी कच्चे माल के रूप में किया जाता है।
  2. कागज उद्योग में स्वच्छ जल की आवश्यकता होती है। हुगली नदी के सदावाहिनी होने के कारण यहाँ पर्याप्त जल उपलब्ध हो जाता है। यही एक प्रमुख कारण है कि हुगली नदी के किनारे टीटागढ़, रानीगंज, नैहाटी, आलम बाजार, कोलकाता, बाँसबेरिया तथा शिवराफूली में कागज के कारखाने स्थापित किये गये हैं।
  3. कागज उद्योग के लिए आवश्यक शक्ति-संसाधन पश्चिम बंगाल (UPBoardSolutions.com) राज्य में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं।
  4. पश्चिम बंगाल तथा समीपवर्ती राज्यों में पर्याप्त संख्या में कुशल एवं अनुभवी श्रमिक उपलब्ध हो जाते हैं।
  5. कागज उद्योग के विकास के लिए पश्चिम बंगाल राज्य में परिवहन के साधनों का पर्याप्त विकास हुआ है, जिससे कच्चा माल आयात करने तथा तैयार माल देश के विभिन्न भागों में भेजने की सुविधा रहती है।

प्रश्न 6.
भारत में सूती वस्त्र उद्योग की प्रमुख समस्याओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
भारत में सूती वस्त्र उद्योग की प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं

  1. देश में उत्तम कपास की कमी है। देश के विभाजन के कारण अच्छी कपास उत्पन्न करने वाले दो क्षेत्र (पंजाब का पश्चिमी भाग तथा सिन्ध) पाकिस्तान में चले गये।
  2. इस उद्योग को जापान, चीन, पाकिस्तान आदि देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। इन देशों में लम्बे रेशे की कपास सुलभ होने तथा आधुनिक मशीनों एवं विधियों के प्रयोग के कारण उत्पादन लागत बहुत कम है।
  3. सूती वस्त्र उद्योग की अधिकांश मशीनें घिसी हुई तथा पुरानी हैं, जिस कारण देश में वस्त्र की उत्पादन लागत अधिक आती है।
  4. अनेक मिलें अनार्थिक आकार की हैं, जिस कारण इन्हें आन्तरिक किफ़ायत प्राप्त नहीं हो पाती। फलतः उत्पादन-लागत बढ़ जाती है।
  5. सूती वस्त्रों पर सरकार द्वारा आरोपित उत्पादन कर अधिक है।

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प्रश्न 7.
भारत में लौह-इस्पात उद्योग छोटा नागपुर के पठार के आस-पास क्यों केन्द्रित है? दो प्रमुख कारणों का उल्लेख, कीजिए।
उतर :
लोहा-इस्पात उद्योग की दो आधारभूत आवश्यकताएँ होती हैं-लौह-अयस्क तथा कोयला। छोटा नागपुर का पठार इन दोनों आवश्यकताओं की पूर्ति भली प्रकार करता है। यही कारण है कि लौह-इस्पात उद्योग इसके आस-पास ही केन्द्रित हैं। दोनों कारणों का संक्षिप्त उल्लेख आगे किया जा रहा है

  1. लौह-अयस्क की उपलब्धता – भारत के कुल लौह-अयस्क उत्पादन का 40% लौह-अयस्क छोटा नागपुर की खानों से निकाला जाता है। यहाँ लौह-खनिज के लिए सिंहभूम जिला महत्त्व रखता है। सिंहभूम और ओडिशा की सीमा (UPBoardSolutions.com) पर कोल्हन पहाड़ियाँ लोहे की खानों के लिए प्रसिद्ध हैं।
  2. कोयला – भारत का 90% कोकिंग कोयला झरिया की खानों से मिलता है। भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार यहाँ 2,000 लाख टन कोयले के भण्डार हैं। यह कोयला यहाँ के आस-पास स्थित लोहा-इस्पात के उद्योगों को सरलता से बिना अधिक परिवहन व्यय के उपलब्ध है।

उपर्युक्त दो कारणों से अधिकांश लोहा-इस्पात उद्योग छोटा नागपुर के पठार के आस-पास ही स्थित हैं, जिनमें टाटा लोहा-इस्पात कारखाना, जमशेदपुर, बोकारो स्टील प्लाण्ट, दुर्गापुर इस्पात कारखाना आदि मुख्य हैं।

प्रश्न 8.
आधारभूत उद्योग किसे कहते हैं? इनका क्या महत्त्व है? [2009]
उत्तर
लोहा-इस्पात उद्योग को आधारभूत उद्योग कहते हैं। लोहा-इस्पात उद्योग की गणना भारत के महत्त्वपूर्ण भारी उद्योगों में की जाती है। वर्तमान समय में भारत में लोहा-इस्पात के 11 कारखाने हैं। लोहा-इस्पात उद्योग औद्योगिक क्रान्ति का जनक है। इस्पात का उपयोग मशीनों, रेलवे लाइन, परिवहन के साधन, भवन-निर्माण, रेल के पुल, जलयान, अस्त्र-शस्त्र तथा कृषि-यन्त्र आदि के निर्माण में किया जाता है। वर्तमान समय में भारत में एक इस्पात कारखाना निजी क्षेत्र में (टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी) तथा शेष 10 सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित किए गए हैं।

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लौह-इस्पात उद्योग को आधारभूत उद्योग क्यों कहा जाता है ?
उत्तर :
लोहा और इस्पात से भारी मशीनें तथा औजार बनाये जाते हैं। यही मशीनें तथा औजार अन्य उद्योगों के आधार हैं। यही कारण है कि लोहा और इस्पात उद्योग को आधारभूत उद्योग कहा जाता है।

प्रश्न 2 भारत में प्रथम आधुनिक इस्पात कारखाना कहाँ तथा कब स्थापित किया गया ?
उत्तर भारत में प्रथम आधुनिक इस्पात कारखाना 1907 ई० (UPBoardSolutions.com) में जमशेदपुर में (वर्तमान में झारखण्ड राज्य के साँकची नामक स्थान) लगाया गया।

प्रश्न 3.
लौह-इस्पात उद्योग के चार प्रमुख केन्द्रों के नाम लिखिए।
उत्तर :
लोहा-इस्पात उद्योग के चार प्रमुख केन्द्रों के नाम हैं—

  • भिलाई,
  • बोकारो,
  • जमशेदपुर तथा
  • राउरकेला।

प्रश्न 4.
चीनी उद्योग के प्रमुख केन्द्रों के नाम लिखिए।
उत्तर :
चीनी उद्योग के प्रमुख केन्द्र अर्थात् चीनी उत्पादक प्रमुख राज्य निम्नलिखित हैं

  • महाराष्ट्र,
  • उत्तर प्रदेश,
  • कर्नाटक,
  • तमिलनाडु,
  • बिहार,
  • आन्ध्र प्रदेश आदि।

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प्रश्न 5.
भारत में सूती वस्त्रोद्योग किन राज्यों में महत्वपूर्ण है ? कुछ प्रमुख केन्द्रों के नाम लिखिए।
उत्तर :
भारत के गुजरात तथा महाराष्ट्र राज्यों में सूती वस्त्रोद्योग (UPBoardSolutions.com) महत्त्वपूर्ण है। कुछ प्रमुख केन्द्र मुम्बई, अहमदाबाद, इन्दौर, कानपुर आदि हैं।

प्रश्न 6.
भारत में ऊनी वस्त्र उद्योग के प्रमुख केन्द्र लिखिए।
उत्तर :
अमृतसर, लुधियाना, मुम्बई, कानपुर, जामनगर, श्रीनगर आदि भारत में ऊनी वस्त्र उद्योग के प्रमुख केन्द्र हैं।

प्रश्न 7.
भारत के तीन राज्यों के नाम बताइए, जहाँ रेशम अधिक पैदा होता है।
या
भारत में रेशमी वस्त्र उत्पादन के प्रमुख केन्द्र बताइए।
उत्तर :
भारत के वे राज्य; जहाँ रेशम अधिक पैदा होता है; के नाम हैं—

  • कर्नाटक,
  • तमिलनाडु,
  • आन्ध्र प्रदेश,
  • असोम आदि।

प्रश्न 8.
भारत में अखबारी कागज का प्रथम कारखाना कब और कहाँ स्थापित किया गया ?
उत्तर :
भारत में अखबारी कागज का प्रथम कारखाना सन् 1955 ई० में नेपानगर (म० प्र०) में स्थापित किया गया।

प्रश्न 9 .
लेम किसलिए प्रसिद्ध है ?
उत्तर :
सलेम इस्पात संयन्त्र के लिए प्रसिद्ध है। यह तमिलनाडु राज्य में स्थित है।

प्रश्न 10.
बड़ोदरा कहाँ स्थित है ? यह किसलिए प्रसिद्ध है ?
उत्तर  :
ड़ोदरा गुजरात राज्य में स्थित है। यह सूती वस्त्र उत्पादक केन्द्र, सीमेण्ट उद्योग तथा पेट्रो-रसायन के लिए प्रसिद्ध है।

प्रश्न 11.
हिन्दुस्तान मशीन टूल्स के तीन केन्द्रों के नाम लिखिए।
उत्तर :

  • बंगलुरु (कर्नाटक),
  • हैदराबाद (तेलंगाना) तथा
  • पिंजौर (हरियाणा), हिन्दुस्तान मशीन टूल्स के तीन केन्द्र हैं।

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प्रश्न 12.
लोकोमोटिव उद्योग के दो केन्द्रों के नाम लिखिए।
उत्तर :

  • चितरंजन (प० बंगाल) तथा
  • वाराणसी (उत्तर प्रदेश), लोकोमोटिव उद्योग के दो प्रधान केन्द्र हैं।

प्रश्न 13.
पोत (जलयान) निर्माण के चार केन्द्र कौन-कौन से हैं ?
उत्तर :

  • मझगाँव डॉक, मुम्बई,
  • कोचीन शिपयार्ड, केरल,
  • गार्डन रीच, कोलकाता तथा
  • विशाखापत्तनम् पोत-निर्माण के चार केन्द्र हैं।

प्रश्न 14.
भिलाई किस उद्योग से सम्बन्धित है ?
उत्तर :
भिलाई लोहा-इस्पात उद्योग से सम्बन्धित है।

प्रश्न 15.
नेपानगर किस प्रदेश में स्थित है और क्यों प्रसिद्ध है ?
उत्तर :
नेपानगर मध्य प्रदेश में स्थित है। यह अखबारी कागज के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

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प्रश्न 16.
विशाखापत्तनम् किस उद्योग से सम्बन्धित है ?
उत्तर :
विशाखापत्तनम् लोहा-इस्पात उद्योग (UPBoardSolutions.com) और जहाज-निर्माण उद्योग से सम्बन्धित है।

प्रश्न 17.
जमशेदपुर किस राज्य में स्थित है ?
उत्तर :
जमशेदपुर झारखण्ड राज्य में स्थित है।

प्रश्न 18.
कृषि उत्पादों पर आधारित किन्हीं चार उद्योगों के नाम लिखिए। [2010, 14]
उत्तर :
कृषि उत्पादों पर आधारित चार उद्योगों के नाम हैं–

  • सूती वस्त्र उद्योग,
  • चीनी उद्योग,
  • जूट उद्योग तथा
  • चाय उद्योग।

प्रश्न 19.
भारत में कागज उद्योग के दो प्रमुख केन्द्रों के नाम लिखिए।
उत्तर :
भारत में कागज उद्योग के दो प्रमुख केन्द्र हैं-मध्य प्रदेश में अमलाई तथा महाराष्ट्र में बल्लारपुर।

प्रश्न 20.
सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्र के एक-एक लौह-इस्पात कारखाने का नाम लिखिए।
उत्तर :
सार्वजनिक क्षेत्र – 
दुर्गापुर इस्पात कारखाना, दुर्गापुर, पश्चिम बंगाल।
निजी क्षेत्र – टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी, जमशेदपुर, झारखण्ड।

प्रश्न 21.
भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के दो इस्पात कारखानों के नाम लिखिए।
उत्तर :

  • भिलाई इस्पात कारखाना, भिलाई, छत्तीसगढ़ तथा
  • बोकारो इस्पात कारखाना, बोकारो, (UPBoardSolutions.com) झारखण्ड, सार्वजनिक क्षेत्र के दो इस्पात कारखाने हैं।

प्रश्न 22.
भारत के पेट्रो-रसायन के किन्हीं दो उद्योगों के नाम लिखिए।
उत्तर :

  • प्लास्टिक उद्योग तथा
  • सिन्थेटिक डिटर्जेण्ट उद्योग; पेट्रो-रसायन के दो उद्योग हैं।

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प्रश्न 23.
भारत में कौन-सा नगर ‘सूती वस्त्र उद्योग की राजधानी कहा जाता है ?
उत्तर :
महाराष्ट्र के मुम्बई नगर को ‘सूती वस्त्र उद्योग की राजधानी कहा जाता है।

प्रश्न 24.
भारत में रेल के डिब्बों का निर्माण किन दो स्थानों पर होता है ?
उत्तर :
भारत में रेल के डिब्बों का निर्माण–

  • पेराम्बुर (चेन्नई के निकट) तथा
  • कपूरथला, पंजाब नामक दो स्थानों पर होता है।

प्रश्न 25.
भारत में औद्योगिक दृष्टि से विकसित दो राज्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
महाराष्ट्र तथा गुजरात।

प्रश्न 26.
टाटा आयरन स्टील कम्पनी का मुख्यालय कहाँ स्थित है ? [2015]
उत्तर :
टाटा आयरन स्टील कम्पनी का मुख्यालय जमशेदपुर में है।

प्रश्न 27.
सीमेण्ट के निर्माण में किस कच्चे माल का उपयोग किया जाता है ?
उत्तर :
सीमेण्ट के निर्माण में चूना-पत्थर का (UPBoardSolutions.com) उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 28 .
पेट्रो-रसायन उद्योग का सम्बन्ध किस खनिज पदार्थ से है ?
उत्तर :
पेट्रो-रसायन उद्योग का सम्बन्ध गैस, एल्कोहल, कैल्सियम, लकड़ी, शशा और धात्विक खनिजों से है।

प्रश्न 29.
चीनी उद्योग की प्रमुख चार समस्याएँ लिखिए।
उत्तर :
भारत में चीनी उद्योग की चार प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं.

  • उत्तम किस्म के गन्ने की कमी होना।
  • चीनी मिलों द्वारा कुल गन्ना उत्पादन का आंशिक भाग ही प्रयुक्त कर पाना।
  • उत्पादन लागतों में लगातार वृद्धि होना।
  • मिलों में आधुनिक तकनीकी तथा मशीनों के प्रयोग का अभाव होना।

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प्रश्न 30.
कुटीर उद्योग की दो समस्याओं को लिखिए।
उत्तर :
कुटीर उद्योग की दो समस्याएँ निम्नलिखित हैं

  • बैंकों से ऋण मिलने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि इन्हें मजबूर होकर स्थानीय साहूकारों से ऋण लेना पड़ता है।
  • इन उद्योगों को चलाने के लिए कुशल (UPBoardSolutions.com) प्रबन्धक नहीं मिल पाते।

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. लोहा-इस्पात उद्योग कहाँ संकेन्द्रित हैं?

(क) गंगा घाटी में ,
(ख) दामोदर घाटी में
(ग) दकन के पठार में
(घ) बिहार में

2. रेलवे कोच बनाये जाते हैं

(क) पटियाला में
(ख) मेरठ में
(ग) कपूरथला में
(घ) येलाहांका में

3. नेपानगर निम्नलिखित में से किस उद्योग से सम्बन्धित है? [2015]

(क) कागज उद्योग
(ख) चीनी उद्योग
(ग) सीमेण्ट उद्योग
(घ) लोहा तथा इस्पात उद्योग

4. ‘प्लास्टिक’ किस उद्योग का प्रमुख उत्पाद है?

(क) रसायन
(ख) पेट्रो-रसायन,
(ग) सिन्थेटिक वस्त्र
(घ) उर्वरक

5. भारत में कागज का प्रथम कारखाना कहाँ स्थापित किया गया?

(क) कुल्टी में
(ख) नेपानगर में
(ग) टीटागढ़ में
(घ) सिरामपुर में

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6. निम्नलिखित में से कौन-सा नगर कागज उद्योग से सम्बन्धित है? [2013, 15, 17] “

(क) कानपुर
(ख) नेपानगर
(ग) जयपुर
(घ) लखनऊ

7. पेट्रो-रसायन उद्योग का प्रमुख केन्द्र है

(क) बड़ोदरा
(ख) अहमदाबाद
(ग) बंगलुरु
(घ) कानपुर

8. भारत में सबसे अधिक सीमेण्ट कारखाने किस राज्य में हैं?

(क) मध्य प्रदेश में ,
(ख) उत्तर प्रदेश में
(ग) आन्ध्र प्रदेश में
(घ) बिहार में

9. किस राज्य में सर्वाधिक चीनी मिलें हैं?

(क) बिहार में
(ख) उत्तर प्रदेश में
(ग) महाराष्ट्र में।
(घ) मध्य प्रदेश में

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10. निम्नलिखित में कौन-सा उद्योग कृषि पर आधारित है?

(क) सीमेण्ट उद्योग
(ख) सूती वस्त्र उद्योग
(ग) इस्पात उद्योग
(घ) रसायन उद्योग

11. ‘भारत का मैनचेस्टर’ और ‘पूर्व का बोस्टन’ कहलाता है [2012, 14]

(क) कानपुर
(ख) मुम्बई
(ग) अहमदाबाद
(घ) जमशेदपुर

12. निम्नलिखित में से कागज उद्योग से कौन-सा स्थान सम्बन्धित है? (2012)

(क) आगरा।
(ख) फिरोजाबाद
(ग) टीटागढ़
(घ) धनबाद

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13. निम्नलिखित में से कौन-सा नगर सीमेण्ट उद्योग से सम्बन्धित है? [2013]

(क) कटनी
(ख) आगरा।
(ग) भोपाल
(घ) ग्वालियर

14. निम्नलिखित में से कौन-सा उद्योग कृषि आधारित नहीं है? [2013, 15]

(क) सूती वस्त्र उद्योग
(ख) चीनी उद्योग
(ग) सीमेण्ट उद्योग
(घ) जूट उद्योग

15. उत्तर भारत का मैनचेस्टर किसे कहा जाता है? [2014]

(क) लुधियाना
(ख) दिल्ली
(ग) कानपुर
(घ) लखनऊ

16. निम्न में से किसे इस्पात-नगरी कहा जाता है? [2014, 16]

(क) भिलाई
(ख) बोकारो
(ग) जमशेदपुर
(घ) राउरकेला

17. राउरकेला लोहा-इस्पात कारखाना किस राज्य में स्थित है? [2014]

(क) बिहार
(ख) छत्तीसगढ़
(ग) ओडिशा
(घ) उत्तर

प्रदेश 18. भिलाई सम्बन्धित है [2015]

(क) सीमेण्ट उद्योग से
(ख) लौह-इस्पात उद्योग से
(ग) जूट उद्योग से
(घ) ऐलुमिनियम उद्योग से

19. किसी उद्योग की स्थापना के लिए निम्न में से किसकी आवश्यकता होती है? [2015]

(क) कच्चा माल
(ख) जल
(ग) परिवहन
(घ) उपर्युक्त सभी

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20. भिलाई लौह-इस्पात कारखाना किस राज्य में स्थित है? [2017]

(क) बिहार
(ख) छत्तीसगढ़
(ग) ओडिशा
(घ) उत्तर प्रदेश

21. निम्न में से किस राज्य में टाटा लौह-इस्पात संयन्त्र स्थापित है? [2017, 18]

(क) मध्य प्रदेश
(ख) बिहार
(ग) झारखण्ड
(घ) छत्तीसगढ़

उत्तरमाला

1. (ख), 2. (ग), 3. (क), 4. (ख), 5. (घ), 6. (ख), 7. (क), 8. (क), 9. (ग), 10. (ख), 11. (ग), 12. (ग), 13. (क), 14. (ग), 15. (ग), 16. (ग), 17.(ग), 18. (ख), 19. (घ), 20. (ख), 21. (ग)

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UP Board Solutions for Class 6 History Chapter 6 महाजनपद की ओर

UP Board Solutions for Class 6 History Chapter 6 महाजनपद की ओर

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 6 History. Here we have given UP Board Solutions for Class 6 History Chapter 6 महाजनपद की ओर

अभ्यास

प्रश्न 1.
महाजनपद कैसे बने ?
उत्तर :
छोटे-छोटे जनपदों से मिलकर बने बड़े और शक्तिशाली राज्य, महाजनपद कहलाए।

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प्रश्न 2.
सोलह महाजनपदों में से प्रमुख चार महाजनपदों के नाम लिखिए।
उत्तर :
चार प्रमुख महाजनपद- मगध, कौशल, वत्स, अवन्ति।

प्रश्न 3.
राजतंत्र एवं गणतंत्र का अन्तर बताइए ?
उत्तर :
राजतंत्र – देश के उत्तरी भाग में अनेक राज्य बन गए। इन जनपदों में कबीलाई सभा द्वारा चुना हुआ राजा राज्य करता था।

गणतंत्र – कुछ जनपदों में एक वंश के सारे पुरुष मिलकर राज्य करते थे। वे सभा करते, बात-चीत करते और जनपद का कामकाज चलाते थे। इन जनपदों के सब पुरुष स्वयं को राजा कहते थे। एक जनपद में कई राजा थे।

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प्रश्न 4.
अपने राज्य को शक्तिशाली बनाने के लिए राजाओं ने क्या प्रयास किया ?
उत्तर :
अपने राज्यों को शक्तिशाली बनाने के लिए राजाओं ने अनेक तरीके अपनाए। जैसे-दूसरे राज्यों से मित्रता करना, शादी-विवाह से रिश्ते बनाना, संधि करना या फिर सीधे आक्रमण करना। इस प्रकार से छोटे राज्य बड़े राज्यों में मिलते चले गए।

प्रश्न 5.
सिकन्दर ने राजा पुरू के साथ कैसा व्यवहार किया ?
उत्तर :
सिकन्दर ने राजा पुरू के साथ मित्रता का व्यवहार किया और उसने पुरू का राज्य लौटा दिया।

प्रश्न 6.
रिक्त स्थान भरिए –

  • अ. राज्य की सीमा का अत्यधिक विस्तार करने वाले राज्य को साम्राज्य कहा जाता है।
  • ब. महाजनपद काल में राजा समाज का रक्षक था।
  • स. घनानन्द के समय सिकन्दर भारत आया।
  • द. आम्भी तक्षशिला का राजा था।

गतिविधि – शिक्षक की सहायता से अपनी अभ्यास-पुस्तिका में लिखिए कि निम्न महाजनपद वर्तमान के किस राज्य में स्थिति थे –
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प्रोजेक्ट वर्क –
नोट – विद्यार्थी स्वयं करें।

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UP Board Solutions for Class 9 Social Science Geography Chapter 6 जनसंख्या

UP Board Solutions for Class 9 Social Science Geography Chapter 6 जनसंख्या

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
नीचे दिए गए चार विकल्पों में सही विकल्प चुनिए-
(i) निम्नलिखित में से किस क्षेत्र में प्रवास, आबादी की संख्या, वितरण एवं संरचना में परिवर्तन लाता है?
(क) प्रस्थान करने वाले क्षेत्र में
(ख) आगमन वाले क्षेत्र में
(ग) प्रस्थान एवं आगमन दोनों क्षेत्रों में
(घ) इनमें से कोई नहीं

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(ii) जनसंख्या में बच्चों का एक बहुत बड़ा अनुपात निम्नलिखित में से किसका परिणाम है?
(क) उच्च जन्मदर
(ख) उच्च मृत्युदर
(ग) उच्च जीवनदर
(घ) अधिक विवाहित जोड़े

(iii) निम्नलिखित में से कौन-सा एक जनसंख्या वृद्धि का परिणाम दर्शाता है?
(क) एक क्षेत्र की कुल जनसंख्या
(ख) प्रत्येक वर्ष लोगों की संख्या में होने वाली वृद्धि,
(ग) जनसंख्या वृद्धि की दर
(घ) प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या

(iv) 2001 की जनगणना के अनुसार एक साक्षर’ व्यक्ति वह है
(क) जो अपने नाम को पढ़ एवं लिख सकता है।
(ख) जो किसी भी भाषा में पढ़ एवं लिख सकता है।
(ग) जिसकी उम्र 7 वर्ष है तथा वह किसी भी भाषा को समझ के साथ पढ़ एवं लिख सकता है।
(घ) जो पढ़ना-लिखना एवं अंकगणित, तीनों जानता है।
उत्तर:
(i) (ग) प्रस्थान एवं आगमन दोनों क्षेत्र में
(ii) (क) उच्च जन्म दर
(iii) (ग) जनसंख्या वृद्धि की दर
(iv) (ग) जिसकी उम्र 7 साल, किसी भाषा को समझना, पढ़ना तथा लिखना।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित के उत्तर संक्षेप में दें-

  1. जनसंख्या वृद्धि के महत्त्वपूर्ण घटकों की व्याख्या करें।
  2. 1981 से भारत में जनसंख्या की वृद्धि दर क्यों घट रही है?
  3. आयु संरचना, जन्मदर एवं मृत्युदर को परिभाषित करें।
  4. प्रवास, जनसंख्या परिवर्तन का एक कारक।

उत्तर:
(1) जनसंख्या वृद्धि के महत्त्वपूर्ण घटक इस प्रकार हैं-

  1. उच्च जन्म दर,
  2. निम्न मृत्यु दर,
  3. प्रवसन।

(2) 1981 के बाद भारत में जनसंख्या वृद्धि दर में कमी के कारण निम्नलिखित हैं-

  1. परिवार कल्याण विधियों का अपनाया जाना,
  2. स्वास्थ्य के प्रति महिलाओं की अधिक जागरूकता,
  3. महिलाओं में शिक्षा का तेज गति से प्रसार,
  4. सरकारी

(3) आयु संरचना-किसी देश में जनसंख्या की आयु संरचना वहाँ के विभिन्न आयु समूहों के लोगों की संख्या को बताता है। यह जनसंख्या की मूल आवश्यकताओं में से एक है। जन्मदर-एक वर्ष के दौरान 1000 लोगों पर जीवित पैदा हुए बच्चों की संख्या को जन्मदर कहते हैं। मृत्युदर-एक वर्ष की अवधि में 1000 लोगों पर मृत व्यक्तियों की संख्या को मृत्युदर कहते हैं।

(4) प्रवास, जनसंख्या परिवर्तन का एक कारक है लोगों का एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में चले जाने को प्रवास कहते हैं। जनसंख्या वितरण एवं उसके घटकों को परिवर्तित करने में प्रवास की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है क्योंकि यह आगमन तथा प्रस्थान दोनों ही स्थानों के जनसांख्यिकीय आँकड़ों को प्रभावित (UPBoardSolutions.com) करता है। प्रवास आंतरिक (देश के भीतर) या अंतर्राष्ट्रीय (देशों के बीच) हो सकता है। आंतरिक प्रवास जनसंख्या के आकार में परिवर्तन नहीं करता लेकिन देश में जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करता है।

  1. प्रवास जनसंख्या के गठन एवं वितरण में बदलाव में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  2. भारत में अधिकतर प्रवास ग्रामीण क्षेत्रों से ‘अपकर्षण’ कारक प्रभावी होते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी एवं बेरोजगारी की प्रतिकूल अवस्थाएँ हैं तथा नगर का ‘कर्षण’ प्रभाव रोजगार में वृद्धि एवं अच्छे जीवन स्तर को दर्शाता है। 1951 में शहरी जनसंख्या 17.29 प्रतिशत थी जो 2011 में बढ़कर 31.2 प्रतिशत हो गई।
  3. 2001-2011 के बीच एक ही दशक के दौरान ‘‘दस लाख से अधिक की जनसंख्या वाले महानगर 35 से बढ़कर 53 हो गए हैं।

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प्रश्न 3.
जनसंख्या वृद्धि एवं जनसंख्या परिवर्तन के बीच अंतर स्पष्ट करें?
उत्तर:
जनसंख्या वृद्धि एवं जनसंख्या परिवर्तन के बीच निम्नलिखित अंतर हैं-

जनसंख्या वृद्धि

जनसंख्या परिवर्तन

 1. जनसंख्या वृद्धि से तात्पर्य किसी क्षेत्र में निश्चित अवधि के दौरान रहने वाले लोगों की संख्या में  परिवर्तन है। 1. जनसंख्या परिवर्तन से आशय किसी क्षेत्र में निश्चित अवधि के दौरान जनसंख्या वितरण, संरचना या आकार में परिवर्तन से है।
2. इसमें पिछली जनसंख्या को बाद की जनसंख्या से घटाकर ज्ञात किया जाता है। 2. जनसंख्या परिवर्तन तीन प्रक्रियाओं के आपसी संयोजन के कारण आता है- जन्मदर, मृत्युदर और प्रवास।
 3. वृद्धि को संख्या के रूप में प्रकट किया जाता है। 3. जनसंख्या परिवर्तन सापेक्ष वृद्धि और प्रतिवर्ष होने वाले प्रतिशत परिवर्तन के द्वारा देखा जाता है।

प्रश्न 4.
व्यावसायिक संरचना एवं विकास के बीच क्या संबंध है?
उत्तर:
व्यावसायिक संरचना एवं विकास के बीच सम्बन्ध–मुख्य रूप से व्यवसायों को तीन वर्गों में रखा जाता है-प्राथमिक, द्वितीयक तथा तृतीयक व्यवसाय। प्राथमिक व्यवसाय कृषि आदि से संबंधित हैं, द्वितीयक व्यवसाय निर्माण उद्योगों से संबंधित है तथा तृतीयक व्यवसाय सेवाओं से सम्बन्धित होते हैं। विकसित एवं विकासशील देशों में द्वितीयक एवं तृतीयक व्यवसायों में कार्य करने वाले लोगों का अनुपात अधिक (UPBoardSolutions.com) होता है। विकासशील देशों में प्राथमिक क्रियाकलापों में कार्यरत लोगों का अनुपात अधिक होता है। भारत में कुल जनसंख्या का 64 प्रतिशत भाग केवल कृषि कार्य करता है। द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रों में कार्यरत लोगों की संख्या का अनुपात क्रमशः 13 तथा 20 प्रतिशत है। वर्तमान समय में बढ़ते हुए औद्योगीकरण एवं शहरीकरण में वृद्धि होने के कारण

द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रों में व्यावसायिक परिवर्तन हुआ है।
विकास के लिए जनसंख्या का स्वस्थ होना अत्यन्त आवश्यक है।
इस प्रकार स्वस्थ जनसंख्या निम्नलिखित रूप से लाभकारी हो सकती है-

  1. बीमारियों पर कम खर्च होता है। इसके अतिरिक्त धन को विकास कार्यों में लगाया जाता है।
  2. विकास की गति तीव्र होती है।
  3. सरकार को अधिक स्वास्थ्य सेवाएँ बढ़ाने की आवश्यकता नहीं रहती।
  4. लोगों में स्वस्थ वातावरण का संचार होता है।
  5. स्वस्थ जनसंख्या अधिक समय तक काम करती है तथा उत्पादन में वृद्धि होती है।
  6. स्वस्थ जनसंख्या में स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है।
  7. हृष्ट-पुष्ट नागरिक उत्पन्न होते हैं।
  8. अधिक तेज तथा अधिक कार्यक्षम होते हैं।

प्रश्न 5.
राष्ट्रीय जनसंख्या नीति की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:
राष्ट्रीय जनसंख्या नीति वर्ष 2004 में घोषित की गयी।
इसकी प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

  1.  किशोर-किशोरियों को असुरक्षित यौन संबंधों के कुप्रभावों/कुपरिणामों के बारे में जागरूक करना।
  2. गर्भनिरोधक सेवाओं को पहुँच और खरीद के दायरे के भीतर रखना।
  3. खाद्य संपूरक को पोषणिक सेवाएँ उपलब्ध कराना।
  4. बाल विवाह को रोकने के कानून को और अधिक कारगर बनाना।
  5. शिक्षा और स्वास्थ्य की शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार करना।
  6. किशोर-किशोरियों की पहचान जनसंख्या के उस भाग के रूप में करें जिस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
  7. इनकी पोषणिक आवश्यकताओं की ओर ध्यान देना।।
  8. अवांछित गर्भधारण तथा यौन संबंधों से होने वाली बीमारियों से किशोर-किशोरियों की सुरक्षा करना।
  9. किशोर-किशोरियों की अन्य आवश्यकताओं के प्रति विशेष ध्यान देना।
  10. देर से विवाह और देर से संतानोत्पत्ति को प्रोत्साहित करना।

परियोजना कार्य

प्रश्न 1.
एक प्रश्नावली बनाकर कक्षा की जनगणना कीजिए। प्रश्नावली में कम-से-कम पाँच प्रश्न होने चाहिए। ये प्रश्न विद्यार्थियों के परिवारजनों, कक्षा में उनकी उपलब्धि, उनके स्वास्थ्य आदि से संबंधित हों। प्रत्येक विद्यार्थी को वह प्रश्नावली भरनी चाहिए। बाद में सूचना को संख्याओं में (प्रतिशत में) संग्रहीत कीजिए। इस सूचना को वृत्त-रेखा, दंड-आरेख या अन्य किसी प्रकार से प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर:
स्वयं करें।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जनसंख्या का अध्ययन करना क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
किसी देश की जनसंख्या ही उस देश के संसाधनों का विकास करती है और उनका उपभोग करती है। ऐसे में किसी देश के लोगों की संख्या, उनका वितरण एवं विकास तथा गुणवत्ता पर्यावरण को समझने का मूलभूत आधार है। इसलिए जनसंख्या का अध्ययन करना महत्त्वपूर्ण है।

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प्रश्न 2.
अरुणाचल प्रदेश का जनघनत्व कम क्यों है?
उत्तर:
अरुणाचल प्रदेश एक पर्वतीय क्षेत्र है। यहाँ की जलवायु ठण्डी है। यहाँ कृषि तथा उद्योग भी विकसित नहीं है। इसीलिए यहाँ का जनघनत्व कम है।

प्रश्न 3.
भारत में किस राज्य की साक्षरता सबसे अधिक है?
उत्तर:
भारत में केरल राज्य की साक्षरता सबसे अधिक है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार केरल राज्य की साक्षरता दर 94.0% है।

प्रश्न 4.
भारत के अति सघन आबादी वाले दो भागों के नाम बताइए। इनमें सघन जनसंख्या होने के दो कारण बताइए।
उत्तर:
भारत में ऊपरी गंगाघाटी तथा मालाबार क्षेत्र में अति सघन जनसंख्या है।
सघन जनसंख्या के दो कारण इस प्रकार हैं-

  1.  इन प्रदेशों में उद्योगों का अत्यधिक विकास हुआ है।
  2. इन प्रदेशों की भूमि उपजाऊ है।

प्रश्न 5.
लिंगानुपात (स्त्री-पुरुष) से क्या आशय है?
उत्तर:
स्त्री-पुरुष के बीच जनसंख्या के संख्यात्मक अनुपात को स्त्री-पुरुष अनुपात कहते हैं। इसे प्रति हजार पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या के रूप में व्यक्त करते हैं।

प्रश्न 6.
मृत्यु-दर के तेजी से घटने के दो कारण बताइए।
उत्तर:

  1. मृत्यु-दर के तेजी से घटने का मुख्य कारण स्वास्थ्य सेवाओं का प्रसार है।
  2. शिक्षा के प्रसार से भी मृत्यु-दर में अत्यधिक कमी आयी है।

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प्रश्न 7.
भारत में जनसंख्या वृद्धि के कोई दो कारण बताइए।
उत्तर:
भारत में जनसंख्या वृद्धि के दो मुख्य कारण इस प्रकार हैं-

  1. चिकित्सा सुविधाओं के प्रसार के कारण मृत्यु-दर में तो कमी आयी है, लेकिन जन्म-दर में आशा के अनुरूप कमी नहीं आ पाई है।
  2. भारत में अधिकतर लोग निर्धन एवं अनपढ़ हैं। वे छोटे परिवारों के महत्त्व को नहीं समझते हैं। वे सन्तान को ईश्वर की कृपा समझकर गर्भ-निरोध का प्रयास नहीं करते हैं।

प्रश्न 8.
जनसंख्या घनत्व का क्या अर्थ है?
उत्तर:
किसी देश-प्रदेश के प्रति एक वर्ग किलोमीटर में रहने वाले लोगों की औसत जनसंख्या को जनसंख्या घनत्व कहते हैं। इसे व्यक्ति प्रति वर्ग किमी में व्यक्त किया जाता है।

प्रश्न 9.
भारत की लगभग आधी आबादी कितने राज्यों में निवास करती है?
उत्तर:
भारत की लगभग आधी जनसंख्या इन पाँच राज्यों में निवास करती है-उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल एवं आंध्र प्रदेश।

प्रश्न 10.
प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्रियाकलापों के अंतर्गत कौन-कौन से व्यवसाय सम्मिलित हैं?
उत्तर:
प्राथमिक क्षेत्र के अंतर्गत कृषि, पशुपालन, वृक्षारोपण एवं मछली पालन तथा खनन आदि क्रियाएँ शामिल हैं। द्वितीयक क्रियाकलापों में उत्पादन करने वाले उद्योग, भवन एवं निर्माण कार्य आते हैं। तृतीयक क्रियाकलापों में परिवहन, संचार, वाणिज्य, प्रशासन तथा सेवाएँ शामिल हैं।

प्रश्न 11.
भारत सरकार द्वारा जनसंख्या नियंत्रण के क्या उपाय अपनाए गए हैं?
उत्तर:
भारत सरकार ने 1952 में एक व्यापक परिवार नियोजन कार्यक्रम को प्रारंभ किया। 1975 में इंदिरा कांग्रेस सरकार ने परिवार नियोजन कार्यक्रम तथा 1977 में जनता पार्टी की सरकार ने इसे परिवार कल्याण कार्यक्रम नाम रख दिया। परिवार कल्याण कार्यक्रम जिम्मेदार तथा सुनियोजित पितृत्व को बढ़ावा देने के लिए कार्यरत है। राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 कई वर्षों के नियोजित प्रयासों का परिणाम है।

प्रश्न 12.
भारत की जनसंख्या का सबसे महत्त्वपूर्ण लक्षण बताइए।
उत्तर:
भारत की जनसंख्या का सबसे महत्त्वपूर्ण लक्षण इसकी किशोर जनसंख्या का आकार है। यह भारत की कुल जनसंख्या का पाँचवाँ भाग है। किशोर प्रायः 10 से 19 वर्ष की आयु वर्ग के होते हैं। ये भविष्य के सबसे महत्वपूर्ण मानव संसाधन हैं।

प्रश्न 13.
जनसंख्या की सापेक्ष एवं निरपेक्ष वृद्धि किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी विशेष समय के अंतराल में जैसे 10 वर्षों के भीतर, किसी देश/राज्य के निवासियों की संख्या में परिवर्तन सापेक्ष वृद्धि कहलाता है। पहले की जनसंख्या (UPBoardSolutions.com) जैसे 2001 की जनसंख्या को बाद की जनसंख्या जैसे 2011 की जनसंख्या से घटाकर इसे प्राप्त किया जाता है। इसे निरपेक्ष वृद्धि कहा जाता है।

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प्रश्न 14.
आश्रित जनसंख्या के अंतर्गत किन-किन आयु वर्ग के लोगों को सम्मिलित किया जाता है?
उत्तर:
आश्रित जनसंख्या के अंतर्गत बच्चों तथा वृद्ध जिनकी आयु क्रमशः 15 वर्ष से कम और 59 वर्ष से अधिक है, आयु वर्ग के लोग सम्मिलित होते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ग्रामीण जनसंख्या और नगरीय जनसंख्या में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
ग्रामीण जनसंख्या और नगरीय जनसंख्या में प्रमुख अन्तर निम्नलिखित हैं-

नगरीय जनसंख्या

ग्रामीण जनसंख्या

1. भारत की नगरीय जनसंख्या 37.7 करोड़ है, लेकिन 35 महानगरों में 27% से अधिक नगरीय जनसंख्या रहती है। 1. ग्रामीण जनसंख्या 83.32 करोड़ है। इसका बहुत छोटा भाग गौण व तृतीयक व्यवसाय में लगा है।
2. नगरीय जनसंख्या को सर्वाधिक सुविधाएँ सुलभ हैं। 2. ग्रामीण जनसंख्या को सार्वजनिक सेवाएँ बहुत कम सुलभ हैं।
3. नगरीय जनसंख्या का जीवन स्तर सामान्यतः उच्च पाया जाता है। 3. ग्रामीण जनसंख्या का जीवन स्तर सामान्यतः निम्न पाया जाता है।
4. देश की लगभग 31.2% जनसंख्या नगरों में रहती  है। 4. भारत गाँवों का देश है। देश की लगभग 68.8% जनसंख्या गाँवों में रहती है।
 5. नगरीय जनसंख्या का 65 प्रतिशत भाग प्रथम श्रेणी के नगरों में रहता है। प्रथम श्रेणी के नगरों की संख्या 2929 है। 5. ग्रामीण जनसंख्या अधिकतर प्राथमिक व्यवसाय में लगी होती है। जैसे कृषि करना, लकड़ी काटना, मछली पकड़ना,  पशु-पालन, खनन आदि।

प्रश्न 2.
जन्म-दर और वृद्धि-दर में अंतर कीजिए।
उत्तर:
जन्म-दर और वृद्धि-दर में निम्नलिखित अन्तर हैं-

वृद्धि -दर

जन्म-दर

1. विकासशील देशों में वृद्धिदर सामान्य से अधिक है। विकसित देशों में वृद्धि-दर 1 प्रतिशत से कम है । 1. विकसित देशों में जन्म-दर कम होती है और विकासशील देशों में जन्म-दर अधिक होती है।
2. उच्च-वृद्धिदर से प्राकृतिक और मानवीय संसाधनों पर भारी दबाव पड़ता है। 2. उच्च जन्मदर पिछड़ेपन का प्रतीक बन गई है।
3. जन्म-दर और मृत्यु-दर के अंतर को वृद्धि दर कहते हैं। 3. किसी देश या क्षेत्र में वर्ष के मध्य जीवित जन्मे बच्चों की  संख्या को जन्म-दर कहते हैं।
4. वृद्धिदर को प्रतिशत में व्यक्त करते हैं। 4. जन्मदरे प्रति हजार में व्यक्त की जाती है।
 5. आजकल भारत की प्राकृतिक वार्षिक वृद्धि दर 21.3 प्रतिशत है। 5. भारत में जन्म दर 26.1 व्यक्ति प्रति हजार है।

प्रश्न 3.
भारत के मैदानी भागों में सघन आबादी पाए जाने के कारण बताइए।
उत्तर:
भारत के मैदानी भागों में सघन जनसंख्या पाए जाने के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं-

  1. समतल मैदान,
  2. उपजाऊ मिट्टी,
  3. पर्याप्त मात्रा में वर्षा,
  4. सिंचाई के विकसित साधन,
  5. परिवहन के विकसित साधन,
  6. उद्योग एवं कृषि का विकास।

प्रश्न 4.
भारत में राज्यवार जनसंख्या वितरण को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश देश का सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य है। उत्तर प्रदेश की जनसंख्या 19.981 करोड़ है। यहाँ भारत की कुल जनसंख्या का 16.51 प्रतिशत निवास करते हैं।
भारत की सबसे कम जनसंख्या वाला राज्य सिक्किम है तथा लक्षद्वीप केन्द्रशासित प्रदेशों में सबसे कम जनसंख्या वाला क्षेत्र है। सिक्किम की जनसंख्या 6 लाख, 10 हजार है जबकि लक्षद्वीप में जनसंख्या 64,429 है। भारत की जनसंख्या का लगभग 50 प्रतिशत भाग निम्नलिखित पाँच राज्यों में निवास करता है।

  1. उत्तर प्रदेश             16.51%
  2. महाराष्ट्र                    9.28%
  3. बिहार                      8.60%
  4. पश्चिम बंगाल            7.54%
  5. आंध्र प्रदेश              6.99%.

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प्रश्न 5.
नगरों में बढ़ती हुई जनसंख्या ने न केवल नगरीय केन्द्रों में समस्याएँ पैदा की हैं बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों को भी प्रभावित किया है। प्रत्येक के विषय में दो बिन्दु स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण नगरीय केन्द्रों में उत्पन्न समस्यायें इस प्रकार हैं-

  1. लोगों के नैतिक मूल्यों में परिवर्तन और गिरावट।
  2. चोरबाजारी, कालाबाजारी, रिश्वत तथा लूट-पाट का बोलबाला।।
  3. नगरों के संसाधनों तथा जन सुविधाओं पर भारी दबाव पड़ता है।
  4. आवश्यक वस्तुओं की कमी तथा उनके मूल्यों में आशातीत वृद्धि।
  5. वस्तुओं की गुणवत्ता में गिरावट आना।

(ख) नगरीय जनसंख्या में वृद्धि का ग्रामीण क्षेत्रों पर प्रभाव इस प्रकार है-

  1. रोजगार की खोज में लोगों को ग्रामीण क्षेत्र से नगरीय क्षेत्रों की ओर पलायन करना।
  2. भूमिहीन किसानों की निर्धनता में वृद्धि। 3. कृषि जोतों का अलाभकारी होना तथा छोटे किसानों के गाँव में बेकार हो जाने से उनका नगरों में जाकर मजदूरी करना।

प्रश्न 6.
भारत में भूमि की उर्वरता जनसंख्या वितरण को किस प्रकार प्रभावित करती है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जनसंख्या की दृष्टि से भारत विश्व का दूसरा बड़ा देश है। यहाँ की जनसंख्या वितरण बहुत असमान है। सामान्यतः जनसंख्या का वितरण भूमि की उर्वरता के अनुरूप पाया जाता है। जिन क्षेत्रों में मिट्टी अधिक उपजाऊ पाई जाती है, वहाँ जनसंख्या की सघनता अधिक मिलती है और जिन क्षेत्रों में मिट्टी कम उपजाऊ होती है, वहाँ जनसंख्या कम पाई जाती है। भारत कृषि प्रधान देश है। कृषि और मिट्टी का सीधा संबंध है। हमारे भरण-पोषण की अधिकांश सामग्री प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मिट्टी से ही मिलती है।

उदाहरण के लिए उत्तरी मैदान, पूर्व तटीय मैदान, पश्चिम तटीय मैदान, डेल्टाई मैदान एवं घाटी प्रदेश सघन आबादी वाले हैं। यदि इन प्रदेशों का भी अवलोकन करें तो स्पष्ट होता है कि प्रत्येक प्रदेश में जनसंख्या का वितरण संभव नहीं है। उत्तरी मैदान में जनसंख्या पश्चिम से पूर्व की ओर घटती जाती है। हरियाणा राज्य पश्चिमी बंगाल की तुलना में कम सघन है। पश्चिमी बंगाल की मृदा बहुत उर्वरक है। पर्वतीय (UPBoardSolutions.com) प्रदेश में मिट्टी की परत पतली होती है। इन क्षेत्रों में अपेक्षाकृत मिट्टी की परत मोटी और उपजाऊ होती है। अतः घाटी प्रदेशों में पर्वतीय प्रदेशों से अधिक सघन जनसंख्या पाई जाती है।

प्रश्न 7.
भारत में जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के उपाय बताइए।
उत्तर:
भारत की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। जनसंख्या की तीव्र वृद्धि को जन्मदर कम करके ही रोका जा सकता है। जन्मदर को निम्न उपायों के माध्यम से कम किया जा सकता है-

  1. गर्भधारण से लेकर प्रजनन प्रक्रिया से जुड़ी अनेकानेक समस्याओं का ज्ञान होने के कारण शिक्षित महिलाओं की जीवन प्रत्याशा अधिक होती है। वह अपने और अपने बच्चे के स्वास्थ्य के प्रति अधिक सजग होती है।
  2. शिक्षित महिलाओं की दृष्टि व्यापक होती है, उनकी सोच राष्ट्रीय स्तर की होने के कारण बड़े परिवार को राष्ट्रीय संसाधनों पर बोझ मानती हैं।
  3. भारत में दो बच्चों के परिवार को राष्ट्रीय आदर्श माना गया है, उसकी दृढ़ता से पालन कराया जाए।
  4. भारतीय संविधान में निर्धारित शादी की न्यूनतम आयु लड़कियों की 18 तथा लड़कों की 21 वर्ष को व्यावहारिक रूप दिया जाए।
  5. स्त्री शिक्षा पर अधिक बल दिया जाए।
  6. दो या इससे कम बच्चों वाले माता-पिता को सरकारी नियुक्तियों एवं पदोन्नतियों में प्राथमिकता दी जाए। साथ ही विशेष वेतन-वृद्धि का प्रावधान हो।
  7. परिवार कल्याण सुविधाओं का देशभर में विस्तार किया जाए।

प्रश्न 8.
भारत के आर्थिक विकास के लिए प्राकृतिक तथा मानवीय संसाधनों का विकास आवश्यक क्यों है?
उत्तर:

  1. प्राकृतिक संसाधनों को संपत्ति में तभी बदला जा सकता है, जब लोगों की गुणवत्ता या उत्पादन क्षमता को बढ़ाया जाए।
  2. देश की प्राकृतिक संपदा के पूर्ण विकास के लिए पर्याप्त संख्या, आवश्यक तकनीकी ज्ञान, पूँजी तथा लोगों का कुशल, क्रियाशील, परिश्रमी व ईमानदार होना आवश्यक है।
  3. अच्छे स्वास्थ्य एवं सुविधाओं की सुलभता भी प्राकृतिक संपदा के विकास पर निर्भर है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि देश के आर्थिक विकास के लिए प्राकृतिक तथा मानव दोनों ही संपदाओं का विकास साथ-साथ होना चाहिए।
  4. किसी देश का आर्थिक विकास प्राकृतिक संसाधनों और मानवीय संसाधनों पर निर्भर करता है। किसी एक के अभाव में विकास की कल्पना नहीं की जा सकती।
  5. प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधनों की विपुलता व संपन्नता, आर्थिक प्रगति की गति तेज करती है।
  6. मानव संसाधनों द्वारा ही प्राकृतिक संपदा को अधिकाधिक मात्रा में उपयोगी वस्तुओं में बदलकर, बड़े पैमाने पर संपदा प्राप्त की जाती है।

प्रश्न 9.
जनसंख्या का गाँवों से नगरों की ओर पलायन क्यों हो रहा है?
उत्तर:
गाँवों से नगरों की ओर जनसंख्या का तेजी से पलायन निम्न कारणों से हो रहा है-

  1. गाँवों में सार्वजनिक सुविधाओं का अभाव – शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन आदि का गाँवों में अभाव है। नगरों में इन सुविधाओं को बराबर आकर्षण है।
  2. गाँवों में रोजगार के अवसरों का अभाव – गाँवों में शिक्षित और अशिक्षित युवकों के लिए रोजगार के साधनों की कमी है। शिक्षित और प्रशिक्षित युवकों के लिए गाँवों में रोजगार का और भी अभाव है। फलतः रोजगार की तलाश में गाँवों से नगरों की ओर पलायन की (UPBoardSolutions.com) स्वाभाविक प्रक्रिया बन गई है। नगरों में रोजगार मिलने के बाद उनकी आश्रित संख्या भी नगरों में आकर बस जाती है।
  3. अलाभकारी जोतों का बढ़ना – छोटे और सीमांत किसान की पैतृक जोतों के बँटवारे होते रहने से उनका छिटका होना तथा भूमि का छोटा टुकड़ा हिस्से में आना, जोत को अलाभकारी बना देता है। अंततः छोटा किसान अपनी भूमि को बेचने के लिए विवश हो जाता है और काम-धंधे की तलाश में वह शहर की ओर चल पड़ता है।

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प्रश्न 10.
जन्म-दर की तुलना में मृत्यु-दर में अधिक कमी का कारण क्या है?
उत्तर:
भारत में जन्म-दर एवं मृत्यु-दर दोनों ही निरंतर घट रही हैं। यह देश के विकास का प्रतीक है। लेकिन इन दोनों के घटने की दर में अंतर है। मृत्यु-दर तो तेजी से नीचे आयी है, लेकिन जन्म-दर में ह्रास मंद गति से हो रहा है। जन्म-दर की तुलना में मृत्यु-दर में अधिक कमी के निम्न कारण हैं-

  1. देश में मलेरिया, हैजा, चेचक, प्लेग जैसी महामारियों को अब नियंत्रित कर लिया गया है। नई और प्रभावशाली ओषधियों का निर्माण व उपयोग किया जा रहा है।
  2. देशभर में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के अधिक प्रसार के कारण वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार जन्म पर प्रत्येक बच्चे की जीवन-प्रत्याशी बढ़कर 64 वर्ष हो गई है, जो इस शताब्दी के प्रारंभ में केवल 27 वर्ष थी।
  3. मृत्यु-दर का तेजी से घटने का मुख्य कारण स्वास्थ्य सेवाओं का प्रसार रहा है।
  4. शिक्षा के प्रसार ने भी मृत्युदर को कम करने में सहायता की है क्योंकि शिक्षित व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के प्रति अधिक जागरुक रहते हैं।

प्रश्न 11.
जनसंख्या वृद्धि किसे कहते हैं? इसे कैसे मापा जाता है?
उत्तर:
जनसंख्या वृद्धि से तात्पर्य किसी क्षेत्र में निश्चित अवधि के दौरान स्हने वाले लोगों की संख्या में परिवर्तन से है। ऐसे परिवर्तन को दो तरीके से व्यक्त किया जा सकता है-

  1. प्रतिवर्ष प्रतिशत वृद्धि के रूप में,
  2. सापेक्ष वृद्धि के रूप में।

प्रत्येक वर्ष या एक दशक में बढ़ी जनसंख्या, केवल संख्या में वृद्धि का परिणाम है। इसकी गणना बाद की जनसंख्या में से पहले की जनसंख्या को साधारण रूप से घटाकर की जाती है। जनसंख्या वृद्धि की दर अथवा गति का अध्ययन प्रतिशत प्रतिवर्ष में किया जाता है। इसे वार्षिक वृद्धि दर कहा जाता है। जैसे-10 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर का अर्थ है कि किसी वर्ष के दौरान प्रत्येक 100 लोगों की मूल जनसंख्या में 10 लोगों की वृद्धि हुई।

प्रश्न 12.
किसी देश की जनसंख्या की तीन प्रमुख श्रेणियों का वर्णन कीजिए। इनमें से कौन-सा समूह पराश्रित है?
उत्तर:
आयु संरचना किसी भी देश की जनसंख्या की मूलभूत विशेषता होती है। जनसंख्या की आयु संरचना से आशय किसी देश में विभिन्न आयु वर्ग के लोगों से है। किसी भी देश की जनसंख्या को सामान्यतः तीन विस्तृत श्रेणियों में बांटा जा सकता है-

  1. बच्चे (सामान्यतः 15 वर्ष से कम आयु वाले)-ये आर्थिक रूप से उत्पादनशील नहीं होते हैं तथा इनको भोजन, वस्त्र एवं स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएँ उपलब्ध कराने की आवश्यकता होती है।
  2. वयस्क (15 वर्ष से 59 वर्ष)-ये आर्थिक रूप से उत्पादनशील तथा जैविक रूप से प्रजननशील होते हैं। यह जनसंख्या का कार्यशील वर्ग है।
  3. वृद्ध ( 59 वर्ष से अधिक)-ये आर्थिक रूप से उत्पादनशील या अवकाश प्राप्त हो सकते हैं। ये स्वैच्छिक रूप से कार्य कर सकते हैं, लेकिन भर्ती प्रक्रिया के द्वारा इनकी नियुक्ति नहीं होती है। भारत में जनसंख्या संरचना-युवा 58.7%, वृद्ध 6.9%, बच्चे 34.4%। बच्चों तथा वृद्धों का प्रतिशत निर्भरता अनुपात को प्रभावित करता है क्योंकि ये समूह उत्पादनशील नहीं होते।

प्रश्न 13.
भारत के लिए स्वास्थ्य का स्तर आज भी चिंता का विषय है।’ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
देश ने अनेक क्षेत्रों में प्रगति की है। स्वास्थ्य स्तर में भी महत्त्वपूर्ण सुधार हुआ, फिर भी इस सम्बन्ध में अधिक प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।
असन्तोषजनक स्वास्थ्य परिस्थितियों के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं-

  1. शुद्ध पीने का पानी तथा मूल स्वास्थ्य रक्षा सुविधाएँ ग्रामीण जनसंख्या के केवल एक-तिहाई लोगों को उपलब्ध हैं।
  2. प्रति व्यक्ति कैलोरी की खपत अनुशंसित स्तर से काफी कम है तथा हमारी जनसंख्या का एक बड़ा भाग कुपोषण से प्रभावित है।

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प्रश्न 14.
क्या स्त्रियों को अच्छी शिक्षा देकर जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया जा सकता है?
उत्तर:
विश्व के विकसित देशों में अशिक्षा को पूर्णतः समाप्त कर दिया गया है। शिक्षा का स्तर बढ़ने से स्त्री-पुरुष अनुपात एवं सन्तानोत्पत्ति को नियंत्रित करने में सहायता मिली है। विकसित देशों में जनसंख्या वृद्धि एक प्रतिशत से भी कम है बल्कि कुछ देशों में यह ऋणात्मक हो गयी है। यह स्थापित तथ्य है कि स्त्रियों को शिक्षित एवं जागरूक करके जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया जा सकता है।
इसके लिए निम्न प्रयास किए जा सकते है-

  1. अच्छी शिक्षा पाने के लिए एक लंबी अवधि की आवश्यकता पड़ती है। अतः शिक्षित लड़कियों की अधिक उम्र में जाकर शादी होती है। तब तक परिवार-दायित्व का ज्ञान आसानी से हो जाता है।
  2. शिक्षित स्त्रियों को रोजगार मिल जाता है। रोजगार प्राप्त महिलाएँ अधिक बच्चे की अच्छी देख-रेख करने में अपने को असमर्थ पाती हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
केरल में जनसंख्या की स्थिति देश के अन्य राज्यों से किस प्रकार भिन्न है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जनसंख्या के विभिन्न पक्षों-घनत्व, स्त्री-पुरुष अनुपात, क्रियाशीलता, साक्षरता, जीवन-प्रत्याशी आदि पर विचार करने पर यह स्पष्ट है कि केरल की जनसंख्या की प्रवृत्ति देश के अन्य राज्यों से निम्न कारणों से भिन्न है-

(1) जीवन – प्रत्याशा सार्वजनिक चिकित्सा सुविधाओं एवं शिक्षा में विस्तार के कारण जीवन-प्रत्याशा में वृद्धि हुई है। भारत में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की जीवन-प्रत्याशा कम रही है। परंतु अब इस प्रवृत्ति में परिवर्तन आ गया है। अतः स्त्रियों की जीवन-प्रत्याशा पुरुषों की अपेक्षा (UPBoardSolutions.com) कुछ अधिक है। जन्म के समय स्त्रियों की औसत जीवनप्रत्याशा 67.7 वर्ष तथा पुरुषों की औसत जीवन-प्रत्याशा 64.6 वर्ष थी। केरल में जीवन-प्रत्याशा अधिक है। यहाँ स्त्रियों की जीवन-प्रत्याशा 72% तथा पुरुषों की 71% है।

(2) क्रियाशीलता – भारत में बड़ी जनसंख्या आश्रितों की है। एक-तिहाई क्रियाशील जनसंख्या पर दो-तिहाई आश्रित जनसंख्या का दबाव है। सामान्यतः क्रियाशील जनसंख्या का अधिक अनुपात दुर्गम क्षेत्रों अथवा विकसित क्षेत्रों में पाया जाता है। इस दृष्टि से केरल विकसित क्षेत्रों में आता है। यहाँ अर्जक जनसंख्या का अनुपात देश के औसत अनुपात से लगभग डेढ़ गुना अधिक है।

(3) साक्षरता – मानवीय संसाधनों के विकास में शिक्षा का भारी महत्त्व है। सन् 2011 में साक्षरता का प्रतिशत 73 रहा है। मनुष्य का दीर्घ आयु होना साक्षरता का सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। साक्षरता से क्रियाशील जनसंख्या का अनुपात बढ़ता है। केरल राज्य साक्षरता में सबसे आगे है। यहाँ 2011 की जनगणना के अनुसार 94% साक्षरता पाई गई है।

(4) घनत्व – केरल में जनघनत्व (पश्चिम बंगाल को छोड़कर) सबसे अधिक है। यहाँ भारत के औसत जनघनत्व से लगभग तीन गुना जनघनत्व पाया जाता है। केरल में जनसंख्या का घनत्व 860 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। केरल में अधिक वर्षा तथा वर्षा की अवधि भी अधिक होने के कारण वर्ष में दो-तीन फसलें उगाई जाती हैं।

यहाँ के पाश्च जलों एवं तटवर्ती सागरों में भारी मात्रा में मछली पकड़ी जाती है, जिससे सघन जनसंख्या की खाद्य-आपूर्ति हो जाती है। स्त्री-पुरुष अनुपात-स्त्री-पुरुष गृहस्थ जीवन की गाड़ी के दो पहिए हैं। एक पहिए के कमजोर या उसके न होने पर गाड़ी का सही चलना संभव नहीं। संसार के (UPBoardSolutions.com) प्रत्येक सभ्य समाज में स्त्री और पुरुषों की संख्या में समानता है। हमारे देश के अनेक क्षेत्रों में स्त्री-पुरुष अनुपात में बहुत अंतर मिलता है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार प्रति हजार पुरुषों पर 943 स्त्रियाँ थीं।

केरल ही एकमात्र ऐसा राज्य है जिसमें पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की संख्या अधिक है। यहाँ स्त्री-पुरुष अनुपात 1084 :1000 हैं। उपर्युक्त विवेचन के आधार पर स्पष्ट है कि केरल एक सघन आबाद क्षेत्र होते हुए भी मानवीय संपदा का अधिक विस्तार कर अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है। यहाँ के लोग परिश्रमी एवं संघर्षशील हैं, ये लोग अपनी कर्तव्यनिष्ठा के आधार पर उपलब्ध प्राकृतिक संपदा का भरपूर उपयोग करते हैं।

प्रश्न 2.
भारत के महानगरों में तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या चिंता का विषय क्यों बन गई है? इससे उत्पन्न परिणामों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वर्ष 2011 में भारत की नगरीय जनसंख्या बढ़कर 37.7 करोड़ हो गयी है, यह कुल जनसंख्या का 27.78 प्रतिशतॆ है। भारत की नगरीय जनसंख्या का 65% प्रथम श्रेणी के नगरों में निवास करता है। भारत की एक तिहाई से भी अधिक जनसंख्या केवल 35 महानगरों में निवास करती है। यह एक चिंता का विषय है। नगरीकरण विकास का प्रतीक है। परंतु महानगरों में तीव्रता से बढ़ती जनसंख्या न केवल (UPBoardSolutions.com) महानगरों में समस्या खड़ी कर रही है, अपितु ग्रामीण क्षेत्रों में भी विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। नगरों में जनसंख्या के तेजी से बढ़ने के कारण, इनके वर्तमान संसाधनों तथा उपलब्ध जन सुविधाओं पर भारी दबाव पड़ रहा है। कभी-कभी तो यहाँ लोगों को आवश्यक सुविधाएँ भी नहीं मिल पातीं।

महानगरों की तेजी से बढ़ती जनसंख्या के प्रमुख परिणाम इस प्रकार हैं-
(1) लिंग-अनुपात का असन्तुलित होना – रोजगार की तलाश में पहले पुरुष वर्ग नगरों की ओर जाता है। फलतः नगरों में लिंग अनुपात में बहुत अंतर पाया जाता है। इस विषम अनुपात से अनेक सामाजिक कुरीतियाँ एवं बुरी आदतें पड़ जाती हैं, जिससे सामाजिक और आर्थिक स्थिति और भी बिगड़ जाती है।

(2) आवास की समस्या – महानगरों की जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ने के कारण आवास की बड़ी गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है। अधिकतर लोग तंग, अँधेरे तथा दूषित वातावरण में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। आवास की समस्या मजदूर वर्ग में तो और भी गंभीर है। झुग्गी-झोपड़ियों में और खुले आकाश के नीचे लोग अपनी रातें बिता रहे हैं।

(3) रोजगार की समस्या – रोजगार पाने के लिए गाँवों से लोग नगरों में आ रहे हैं। जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में रोजगार के साधन नहीं बढ़ रहे हैं। अतः नगरों में रोजगार की समस्या बढ़ रही है। भिखारियों की संख्या बढ़ रही है। चोर-गिरहकटों की संख्या बढ़ रही है। लूट-पाट के मामले बढ़ रहे हैं। उपर्युक्त समस्याओं के अतिरिक्त अति नगरीकरण के कारण नगरों में पेयजल की समस्या, सफाई एवं स्वास्थ्य की (UPBoardSolutions.com) समस्या, वायु प्रदूषण की समस्या, ध्वनि प्रदूषण की समस्या, शिक्षा की समस्या, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धि की समस्या तथा परिवहन की समस्या नगरों से जुड़ गयी है।

प्रश्न 3.
भारत में जनसंख्या घनत्व के वितरण पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
भारत में जनसंख्या का वितरण असमान है। साथ ही भारत विश्व की घनी आबादी वाले देशों में से एक है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत का जनसंख्या घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। जहाँ बिहार का जनसंख्या घनत्व 1106 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है, वहीं अरुणाचल प्रदेश का जनसंख्या घनत्व 17 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है।

पर्वतीय क्षेत्र तथा प्रतिकूल जलवायवी अवस्थाएँ इन क्षेत्रों की विरल जनसंख्या के लिए उत्तरदायी हैं। असोम एवं अधिकतर प्रायद्वीपीय राज्यों का जनसंख्या घनत्व मध्यम है। पहाड़ी, कटे-छैटे एवं पथरीले भूभाग, मध्यम से कम वर्षा, छिछली एवं कम उपजाऊ मिट्टी इन राज्यों के जनसंख्या (UPBoardSolutions.com) घनत्व को प्रभावित करती है। उत्तर मैदानी भाग एवं दक्षिण में केरल का जनसंख्या घनत्व बहुत अधिक है, क्योंकि यहाँ समतल मैदान एवं उपजाऊ मिट्टी पायी जाती है तथा पर्याप्त मात्रा में वर्षा होती है।

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प्रश्न 4.
व्यावसायिक संरचना का अर्थ स्पष्ट कीजिए। विभिन्न व्यवसायों का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
जनसंख्या के वितरण को विभिन्न व्यवसायों के आधार पर वर्गीकृत करना व्यावसायिक ढाँचा कहलाता है। भारत में बड़े पैमाने पर व्यावसायिक विविधता विद्यमान है।
व्यवसायों को प्रायः प्राथमिक, द्वितीयक तथा तृतीयक श्रेणियों में बाँटा गया है जिसका विवरण इस प्रकार है-

  1. प्राथमिक क्रियाकलापों में कृषि, पशुपालन, वृक्षारोपण एवं मछली पालन तथा खनन आदि क्रियाएँ शामिल हैं।
  2. द्वितीयक क्रियाकलापों में उत्पादन करने वाले उद्योग, भवन एवं निर्माण कार्य आते हैं।
  3. तृतीयक क्रियाकलापों में परिवहन, संचार, वाणिज्य, प्रशासन तथा सेवाएँ शामिल हैं।

भाग्त में कुल जनसंख्या का 64 प्रतिशत भाग केवल कृषि कार्य करता है। द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रों में कार्यरत लोगों की संख्या का अनुपात क्रमशः 13 तथा 20 प्रतिशत है। वर्तमान समय में बढ़ते हुए औद्योगीकरण एवं शहरीकरण में वृद्धि होने के कारण द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रों में व्यावसायिक परिवर्तन हुआ है।

प्रश्न 5.
बढ़ती हुई जनसंख्या के दुष्प्रभावों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बढ़ती हुई जनसंख्या के दुष्प्रभाव निम्नलिखित हैं-
(i) बढ़ता पर्यावरण प्रदूषण – देश की जनसंख्या बढ़ने से विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार का प्रदूषण बढ़ रहा है जो भयंकर खतरे का संकेत दे रहा है। जनसंख्या की तीव्र वृद्धि के कारण जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, मृदा प्रदूषण तथा ध्वनि प्रदूषण बढ़ रहा है। वनस्पति व प्राणी जगत के ह्रास (UPBoardSolutions.com) के कारण पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। प्रदूषण की रोक-थाम के साथ-साथ बढ़ती हुई जनसंख्या पर रोक लगाई जाए।

(ii) खनिज संपदा का ह्रास – खनिज संपदा की मात्रा निश्चित है, उसे बढ़ाया नहीं जा सकता। एक बार उसका उपभोग, उतनी ही मात्रा को कम कर देता है। जनसंख्या बढ़ने से खनन काम तेजी से बढ़ रहा है। अतः खनिजों के शीघ्र ही समाप्त होने की समस्या पैदा हो गई है। आवश्यकता इस बात की है कि खनिजों का उपभोग कम किया जाए, पूरक वस्तुओं का विकास किया जाए तथा उनके संरक्षण की विधियाँ अपनाई जाएँ।

(iii) मिट्टी की उर्वरा शक्ति में कमी – भारत में प्राचीनकाल से खेती होते रहने से मृदा की उपजाऊपन की क्षमता कम हो गई है। इधर जनसंख्या के बढ़ने से वर्ष में 2-3 फसलें लेना भी आवश्यक है। यह सिंचाई के साधनों के विस्तार तथा रासायनिक उर्वरकों के भरपूर उपयोग से भी संभव है। ऐसा करने पर मृदा में क्षारीय तत्त्वों का बढ़ना तथा भूमि का जलाक्रान्त होना स्वाभाविक है। इससे मृदा का उपजाऊपन कम हो जाता है और कहीं-कहीं तो मृदा की समाप्ति भी देखी गई है। अतः इस समस्या के निदान के लिए रासायनिक खादों का वैज्ञानिक उपयोग तथा मृदा सर्वेक्षण की आवश्यकता है।

(iv) वनों का तेजी से ह्रास – पेट की भूख मिटाने के लिए कृषि का विकास और विस्तार आवश्यक हो जाता है। खाद्यान्नों की माँग को पूरा करने के लिए वनों को साफ करके खेतों में बदला गया है। फलतः देश में 21 प्रतिशत से भी कम भू-भाग पर वनों का विस्तार रह गया। वनों की कमी से वर्षा से (UPBoardSolutions.com) कभी बाढ़ों का आना, मृदा का अपरदन होना तथा बहुमूल्य वन संपदा के न मिलने से समस्याएँ उठ खड़ी हुई हैं। अतः वनों के विस्तार एवं वृक्षारोपण पर अधिक बल देने की आवश्यकता है।

(v) चरागाह भूमि की कमी – भारत में पशु संपदा संसार में सर्वाधिक है। चरागाह भूमि घटते-घटते केवल 4% रह गई। फलतः पशुओं से अपेक्षित उत्पाद नहीं मिल पाते हैं। वनीय भूमि का पशुचारण के लिए उपयोग किया जा रहा है। इससे समस्या का निदान नहीं, अपितु दूसरे प्रकार की समस्या और उठ खड़ी होती है। अतः योजनाबद्ध तरीकों से चरागाह भूमि का विस्तार कर पशुपालन को सुव्यवस्थित व सुदृढ़ किया जाए।

(vi) कृषि योग्य भूमि का घटना – जनसंख्या के बढ़ने से पैतृक कृषि भूमि का बँटवारा निरंतर होता चला आ रहा है। फलतः कृषि योग्य भूमि का प्रति व्यक्ति अनुपात घटकर 0.29 हेक्टेयर रह गया है। इस समस्या का एक ही हल है कि जनसंख्या की वृद्धि पर नियंत्रण किया जाए।

प्रश्न 6.
भारत के सबसे अधिक तथा सबसे कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों का जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों को ध्यान में रखते हुए विवरण दीजिए।
उत्तर:
भारत में जनसंख्या का वितरण असमान है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में कुल जनसंख्या 121.08 करोड़ है और जनसंख्या का औसत घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। लेकिन दिल्ली में तो घनत्व 11320 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर से भी अधिक है तो अरुणाचल प्रदेश में 17 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। उदाहरण के लिए पश्चिमी बंगाल, केरल, बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, तमिलनाडु में घनत्व 401 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी से 1106 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी तक है। कुछ संघ राज्यों जैसे दिल्ली, चंडीगढ़, (UPBoardSolutions.com) लक्षद्वीप तथा पांडिचेरी में 2547 से 11320 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर तक है। कहीं दूसरे राज्यों जैसे अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, मेघालय, नगालैण्ड, सिक्किम, मणिपुर आदि में घनत्व 17 से लेकर 128 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी ही है।

इस असमान वितरण के लिए निम्नलिखित कारक उत्तरदायी हैं-
(i) औद्योगिक विकास – देश के जिन क्षेत्रों में औद्योगिक विकास अधिक हुआ है, वहाँ रोजगार के अवसर तथा अन्य सुविधाएँ बढ़ जाती हैं। अतः इन क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व बढ़ जाता है। इसके विपरीत जिन क्षेत्रों में औद्योगिक विकास कम हुआ है, वहाँ जनसंख्या का घनत्व कम है।

(ii) प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता – संसाधनों से संपन्न क्षेत्र जनसंख्या को आकर्षित करते हैं। जल, मृदा, खनिज, वन आदि देश की बहुमूल्य प्राकृतिक संपदा है। इसके लिए जनशक्ति चाहिए। दामोदर घाटी खनिज संपदा से संपन्न है। फलतः वहाँ अधिक जनसंख्या पाई जाती है। उपजाऊ मृदा क्षेत्र सघन आबाद हैं। डेल्टाई-क्षेत्र देश के सघनतम जनसंख्या वाले हैं।

(iii) यातायात की सुविधाओं का विकास – जिन क्षेत्रों में नदियों, नहरों, सड़कों व रेल मार्गों का जाल है, वहाँ आवश्यक वस्तुएँ आसानी से उपलब्ध होती हैं। लोग काम के केंद्रों पर आसानी से आ-जा सकते हैं। परिवहन के साधनों के विकास से मैदानी भागों में अधिक जनसंख्या पाई जाती है।
पर्वतीय, मरुस्थलीय तथा वनीय क्षेत्रों में यातायात के साधनों की कमी के कारण विरल आबाद है।

(iv) स्थल का स्वरूप – भारत में पर्वत, पठार एवं मैदान तीनों ही स्थलाकृतियाँ विस्तृत क्षेत्र में फैली हैं। देश की अधिकांश जनसंख्या मैदानी भागों में रहती है, क्योंकि मैदानी भाग में कृषि करना आसान व लाभदायक है, जिससे अधिक लोगों का जीवन निर्वाह होता है। मैदानों में जनसंख्या के वितरण में भी असमानता है। अधिक उपजाऊ मैदानी भागों में अधिक सघन जनसंख्या पाई जाती है।

(v) जलवायु – अधिक गर्म व शुष्क भागों में जनसंख्या कम पाई जाती है। अधिक ठंडे प्रदेश भी विरल जनसंख्या वाले हैं। राजस्थान का पश्चिमी भाग तथा हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व बहुत कम है। देश के समजलवायु वाले क्षेत्रों तथा उष्ण आई भागों में सघन जनसंख्या (UPBoardSolutions.com) पाई जाती है। पश्चिमी बंगाल और केरल क्रमशः सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाले राज्य हैं।

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प्रश्न 7.
भारतीय जनसंख्या से संबंधित पाँच समस्याएँ नीचे दी गई हैं। प्रत्येक समस्या का एक दुष्परिणाम और प्रत्येक समस्या का एक व्यवहारिक समाधान लिखो।

  1. उच्च जनघनत्व
  2. असंतुलित लिंग-अनुपात
  3. सभी को स्वास्थ्य-सुविधाओं को अभाव
  4. बढ़ती जनसंख्या के कारण पर्यावरण संबंधी समस्या
  5. स्त्रियों की आर्थिक भागीदारी।

उत्तर:
1. जनघनत्व

  • दुष्परिणाम : जनघनत्व से प्राकृतिक संसाधनों पर अधिक दबाव पड़ता है तथा पर्यावरण प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो गयी है।
  • समाधान : नए उद्योगों की स्थापना करके रोजगार के नए अवसरों का सृजन करना होगा। अधिक जन-घनत्व वाले क्षेत्रों से कम जनघनत्व वाले क्षेत्रों की ओर उद्योगों तथा कार्यालयों को स्थानान्तरित करना होगा।

2. असंतुलित लिंग-अनुपात

  • दुष्परिणाम : स्त्रियों के प्रति दुर्व्यवहार तथा समाज में स्त्रियों के प्रति प्रतिकूल दृष्टिकोण।
  • समाधान : स्त्रियों में शिक्षा का प्रसार करके उनके हितों की रक्षा करना।

3. सभी को स्वास्थ्य-सुविधाओं का अभाव

  • दुष्परिणाम : प्रति व्यक्ति समुचित स्वास्थ्य-सुविधाओं के न मिलने के कारण स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव।
  • समाधान : स्त्री-बच्चों सहित सबके लिए एकीकृत स्वास्थ्य सुविधाएँ मुहैया कराना।

4. बढ़ती जनसंख्या के कारण पर्यावरण संबंधी समस्या

  • दुष्परिणाम : वायु जल तथा ध्वनि प्रदूषण की समस्या।
  • समाधान : पर्यावरण के संरक्षण के लिए लोगों में जागृति उत्पन्न करना।

5. स्त्रियों की आर्थिक भागीदारी

  • दुष्परिणाम : स्त्रियों में आर्थिक भागीदारी का बहुत कम होना।
  • समाधान : शिक्षा के अवसर प्रदान करके स्त्रियों की आर्थिक भागीदारी बढ़ाना।

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