UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 4 अर्थव्यवस्था : परिवार की मूलभूत आवश्यकताएँ

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
गृह-अर्थव्यवस्था का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। गृह-अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
गृह विज्ञान’ घर तथा परिवार सम्बन्धी व्यवस्था का अध्ययन है। घर तथा परिवार की व्यवस्था के अनेक पक्ष हैं। इन पक्षों में ‘अर्थव्यवस्था एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। अन्य समस्त पक्षों में गृहिणी एवं परिजनों के दक्ष होते हुए भी, यदि घर की अर्थव्यवस्था सुचारु न हो, तो परिवार की सुख-शान्ति एवं (UPBoardSolutions.com) समृद्धि संदिग्ध हो जाती है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए गृह विज्ञान में अर्थव्यवस्था का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है तथा प्रत्येक सुगृहिणी से आशा की जाती है कि वह गृह-अर्थव्यवस्था को उत्तम बनाए रखने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान करेगी। गृह-अर्थव्यवस्था के अर्थ, परिभाषा तथा उसे प्रभावित करने वाले कारकों का विवरण निम्नवर्णित है

गृह-अर्थव्यवस्था का अर्थ एवं परिभाषा

सार्वजनिक जीवन में अर्थव्यवस्था’ एक विशिष्ट प्रकार की व्यवस्था है जिसका सम्बन्ध मुख्य रूप से धन-सम्पत्ति से होता है। रुपए-पैसे की योजनाबद्ध व्यवस्था ही अर्थव्यवस्था है। प्रत्येक संस्था एवं संगठन के सुचारू संचालन के लिए स्पष्ट एवं सुदृढ़ अर्थव्यवस्था आवश्यक होती है। जब अर्थव्यवस्था को अध्ययन घर-परिवार के सन्दर्भ में किया जाता है, तब इसे गृह-अर्थव्यवस्था कहा जाता है। अर्थव्यवस्था के अर्थ को जान (UPBoardSolutions.com) लेने के उपरान्त गृह-अर्थव्यवस्था का वैज्ञानिक अर्थ भी स्पष्ट किया जा सकता है। घर-परिवार के आय-व्यय को अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों के आधार पर नियोजित करना तथा इस नियोजन के माध्यम से परिवार को अधिक-से-अधिक आर्थिक सन्तोष प्रदान करना ही गृह-अर्थव्यवस्था है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए निकिल तथा डारसी ने गृह-अर्थव्यवस्था को इन शब्दों में परिभाषित किया है, “परिवार की आय तथा व्यय पर नियन्त्रण होना तथा आय को गृह के सृजनात्मक कार्यों में व्यय करना गृह-अर्थव्यवस्था कहलाता है।” इस प्रकार स्पष्ट है कि गृह-अर्थव्यवस्था का सम्बन्ध, परिवार की आर्थिक क्रियाओं से होता है। इस स्थिति में यह भी जानना आवश्यक है कि आर्थिक क्रियाओं से क्या आशय है? आर्थिक क्रियाएँ व्यक्ति या परिवार की उन क्रियाओं को कहा जाता है, जिनका धन के उपभोग, उत्पादन, विनिमय अथवा वितरण से होता है। परिवार की विभिन्न आर्थिक गतिविधियाँ ही परिवार की आर्थिक पूर्ति में सहायक होती हैं। इस दृष्टिकोण से परिवार की आर्थिक गतिविधियों का विशेष महत्त्व होता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि प्रत्येकै परिवार निरन्तर रूप से असंख्य आवश्यकताओं को महसूस करता है तथा चाहता है कि उसकी समस्त आवश्यकताएँ पूरी होती रहें। परन्तु समस्त आवश्यकताओं को पूरा कर पाना प्रायः सम्भव नहीं होता। इस स्थिति में व्यक्ति अथवा परिवार की आवश्यकताओं की प्राथमिकता को निर्धारित किया जाता है। यह कार्य भी (UPBoardSolutions.com) गृह-अर्थव्यवस्था के ही अन्तर्गत किया जाता है। परिवार का अर्थ-व्यवस्थापक परिवार की आवश्यकताओं की प्राथमिकता को निर्धारित करता है तथा प्राथमिकता के आधार पर विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समुचित प्रयास किए जाते हैं। इस प्रकार की दृष्टिकोण अपना लेने से गृह-अर्थव्यवस्था उत्तम बनी रहती है। सफल गृह-अर्थव्यवस्था के लिए परिवार की आर्थिक गतिविधियों को सुनियोजित बनाना नितान्त आवश्यक है। किसी भी स्थिति में पारिवारिक व्यय को पारिवारिक आय से अधिक नहीं होना चाहिए। आय की तुलना में व्यय के अधिक हो जाने की स्थिति में पारिवारिक अर्थव्यवस्था डगमगा जाती है तथा परिवार को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ जाता है।

गृह-अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक

घर-परिवार की सुख-शान्ति तथा समृद्धि के लिए गृह-अर्थव्यवस्था का उत्तम होना नितान्त आवश्यक है। गृह-अर्थव्यवस्था को विभिन्न कारक प्रभावित करते हैं। गृह-अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों को संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है

(1) गृह-अर्थव्यवस्था की सुचारू प्रक्रिया:
परिवार की सम्पूर्ण आय को ध्यान में रखते हुए पारिवारिक व्यय की व्यवस्थित योजना तैयार करना ही, गृह-अर्थव्यवस्था की प्रक्रिया कहलाती है। इस योजना के अन्तर्गत आय तथा व्यय में सन्तुलन बनाए रखना आवश्यक होता है। इसके लिए पारिवारिक-बजट का निर्धारण तथा उसका पालन करना सहायक सिद्ध होता है। आय एवं व्यय में परस्पर सन्तुलन रखने की यह योजना गृह-अर्थव्यवस्था को गम्भीर रूप से प्रभावित करती है।

(2) पारिवारिक आय:
गृह-अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले कारकों में पारिवारिक आय एक अति महत्त्वपूर्ण कारक है। पारिवारिक आय के अर्जन में प्रमुख योगदान परिवार के मुखिया का होता है। वास्तव में धनोपार्जन का दायित्व मुख्य रूप से परिवार के मुखिया का ही माना जाता है। मुखिया की आय परिवार की अर्थव्यवस्था को विशेष रूप से प्रभावित करती है। यदि मुखिया के अतिरिक्त परिवार का कोई अन्य सदस्य भी धनोपार्जन करता हो, तो उसकी आय को भी गृह-अर्थव्यवस्था के लिए प्रभावकारी कारक माना जाता है।

(3) गृहिणी की कुशलता:
निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि गृहिणी की कुशलता भी गृह-अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है। कुशल गृहिणी परिवार की आवश्यकताओं की प्राथमिकता को निर्धारित करके आय के अनुसार व्यय करती है। मितव्ययिता ही अच्छी गृहिणी का आवश्यक गुण है। कुशल गृहिणी गृह-अर्थव्यवस्था के लिए जहाँ एक ओर बचत का बजट निर्धारित करती है, वहीं दूसरी
ओर परिवार की आय में यथासम्भव वृद्धि के उपाय भी करती है।

(4) पारिवारिक व्यय का नियोजन:
यह सत्य है कि गृह-अर्थव्यवस्था को परिवार की आय मुख्य रूप से प्रभावित करती है, परन्तु आय के साथ-साथ व्यय का नियोजन भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। भले ही परिवार की आय कितनी भी अधिक क्यों न हो, यदि आय से व्यय अधिक हो जाए तो समस्त प्रयास करने के उपरान्त भी (UPBoardSolutions.com) परिवार की अर्थव्यवस्था सन्तुलित नहीं रह पाती। इस प्रकार कहा जा सकता है कि उत्तम गृह-अर्थव्यवस्था के लिए पारिवारिक व्यय का नियोजन भी एक महत्त्वपूर्ण कारक है। यदि नियोजित ढंग से व्यय नहीं किया जाता, तो परिवार की अर्थव्यवस्था के बिगड़ जाने की आशंका रहती है।

(5) परिवार के रहन-सहन का स्तर:
गृह-अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला एक अन्य कारक है-परिवार के रहन-सहन का स्तर। प्रत्येक परिवार चाहती है कि उसका रहन-सहन का स्तर उन्नत हो। रहन-सहन के स्तर को ऊँचा उठाने के लिए पर्याप्त धन व्यय करना पड़ता है। इस स्थिति में यदि इस प्रकार से किया जाने वाला (UPBoardSolutions.com) व्यय पारिवारिक आय के अनुरूप नहीं होता, तो निश्चित रूप से गृह-अर्थव्यवस्था बिगड़ जाती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि रहन-सहन के स्तर को पारिवारिक आय को ध्यान में रखकर ही निर्धारित किया जाना चाहिए।

(6) निरन्तर होने वाले सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन:
समाज में निरन्तर रूप से होने वाले सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन भी परिवार की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं। फैशन, नवीन प्रचलन, मनोरंजन के नए-नए साधन आदि कारक परिवार के व्यय को बढ़ाते हैं। इस प्रकार यदि आय में वृद्धि नहीं होती तो परिवार का व्यय बढ़ जाने पर परिवार की अर्थव्यवस्था क्रमशः बिगड़ने लगती है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सुझाव दिया जाता है कि अपनी आय को ध्यान में रखते हुए ही फैशन, मनोरंजन एवं सामाजिक उत्सवों आदि पर व्यय करना चाहिए।

(7) परिवार का आकार:
परिवार के आकार से आशय है-परिवार के सदस्यों की संख्या। परिवार के सदस्यों की संख्या भी परिवार की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला एक उल्लेखनीय कारक है। यदि परिवार की आय सीमित हो तथा उस आय पर ही निर्भर रहने वाले परिवार के सदस्यों की संख्या अधिक हो, तो निश्चित रूप से परिवार के रहन-सहन का स्तर निम्न होगी तथा गृह-अर्थव्यवस्था भी संकट में रहेगी। इससे भिन्न यदि (UPBoardSolutions.com) किसी परिवार में धनोपार्जन करने वाले सदस्यों की संख्या अधिक हो तथा उन पर निर्भर रहने वाले सदस्यों की संख्या कम हो तो निश्चित रूप से परिवार की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ बनी रहती है तथा रहन-सहन का स्तर भी उन्नत बन सकता है। आधुनिक दृष्टिकोण से ‘छोटा-परिवार, सुखी-परिवार’ की धारणा को ही उत्तम माना जाता है।

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प्रश्न 2:
‘आवश्यकता’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए। परिवार की मूलभूत आवश्यकताओं को संक्षेप में वर्णन कीजिए।
या
परिवार की मूल आवश्यकताएँ कौन-सी हैं? उनकी पूर्ति क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
आवश्यकता का अर्थ

परिवार एक ऐसी सामाजिक संस्था है, जो अपने सदस्यों की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यापक प्रयास करती है। आवश्यकताओं को अनुभव करना तथा उनकी पूर्ति करना ही जीवन है। अब प्रश्न उठता है कि आवश्यकता से क्या आशय है? व्यक्ति की आवश्यकताएँ मूल रूप से व्यक्ति की कुछ विशिष्ट इच्छाएँ ही होती हैं, परन्तु व्यक्ति की समस्त इच्छाओं को उसकी आवश्यकताएँ नहीं माना (UPBoardSolutions.com) जा सकता। इच्छाएँ हमारी भावनाओं से पोषित होती हैं। वे भौतिक जगत् की यथार्थताओं से दूर होती हैं, परन्तु आवश्यकताओं का सीधा सम्बन्ध भौतिक यथार्थताओं से होता है। आवश्यकताएँ हमारे भौतिक साधनों के अनुरूप होती हैं। इस प्रकार हमारी प्रबल इच्छाएँ तथा साधनानुकूल इच्छाएँ ही हमारी आवश्यकताएँ बन जाती हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि हम उस इच्छा को आवश्यकता कह सकते हैं जिसमें कल्पना के अतिरिक्त अन्य तीन तत्त्व भी विद्यमान हैं। ये तत्त्व हैं क्रमशः इच्छा की प्रबलता, इच्छा को पूर्ण करने के लिए समुचित प्रयास तथा इच्छापूर्ति के लिए सम्बन्धित त्याग के लिए तत्परता। इस प्रकार से हम व्यक्ति की उस इच्छा को आवश्यकता कह सकते हैं जिस इच्छा को पूरा करने के लिए उस व्यक्ति के पास समुचित साधन हैं तथा साथ-ही-साथ वह व्यक्ति उस इच्छा को पूरा करने के लिए सम्बन्धित साधन को इस्तेमाल करने के लिए तत्पर भी हो। आवश्यकता के अर्थ को पेन्शन ने इन शब्दों में स्पष्ट (UPBoardSolutions.com) किया है, “आवश्यकता विशेष वस्तुओं की पूर्ति हेतु एक प्रभावपूर्ण इच्छा है जो उन्हें प्राप्त करने के लिए आवश्यक प्रयत्न अथवा त्याग के रूप में प्रकट होती है।” आवश्यकता के अर्थ एवं प्रकृति को ध्यान में रखते हुए स्मिथ तथा पैटर्सन ने स्पष्ट किया है, ”आवश्यकता किसी वस्तु को प्राप्त करने की वह इच्छा है जिसे पूरा करने के लिए मनुष्य में योग्यता है और वह उसके लिए व्यय करने के लिए तैयार हो।”

परिवार की मूल आवश्यकताएँ

मनुष्य की विभिन्न आवश्यकताएँ होती हैं। आज के वैज्ञानिक युग में निरन्तर बढ़ती हुई आवश्यकताओं ने मानव-जीवन को बड़ा जटिल बना दिया है। आज किसी के पास कितना ही धन हो, वह उसकी आवश्यकता के अनुपात में कम ही प्रतीत होता है। अतः कुशल संचालन के लिए आवश्यक है कि गृहिणी को आवश्यकताओं की जानकारी हो, जिससे वह कुशलतापूर्वक उनकी पूर्ति कर सके।
अनिवार्य आवश्यकताएँ ही मूल आवश्यकताएँ कहलाती हैं, जो प्रत्येक परिवार में प्राय: निम्नलिखित होती हैं

(1) भोजन:
पोषक तत्वों से युक्त सन्तुलित भोजन परिवार की प्रथम मूल आवश्यकता है। परिवार के सभी सदस्यों (बच्चे, स्त्री व पुरुष) को पोषणयुक्त भोजन पर्याप्त मात्रा में मिलना चाहिए।

(2) वस्त्र:
परिवार के सभी सदस्यों को पर्याप्त एवं उपयुक्त वस्त्र उपलब्ध होने चाहिए। उपयुक्त वस्त्रों से हमारा तात्पर्य है कि ये मौसम, व्यक्तिगत रुचि, सामाजिक स्थिति, रीति-रिवाजों आदि के अनुरूप होने चाहिए।

(3) आवासीय व्यवस्था:
परिवार के सदस्यों की आवश्यकताओं के अनुसार उचित आवास का होना एक अनिवार्य आवश्यकता है। पर्याप्त एवं शुद्ध जल, वायु, सूर्य का प्रकाश इत्यादि का उपलब्ध होना उचित आवास की आवश्यक विशेषताएँ हैं।

(4) शिक्षा:
बच्चों की अच्छी शिक्षा की व्यवस्था करना परिवार की मूल एवं अनिवार्य आवश्यकता है। उपयुक्त शिक्षा से व्यक्तित्व का विकास होता है। अतः बालक-बालिकाओं की शिक्षा का प्रबन्ध करना अति आवश्यक है। इसके अतिरिक्त उपयोगी सूचना देने वाली पत्र-पत्रिकाओं का भी प्रत्येक परिवार के लिए अलग महत्त्व है, क्योंकि ये सदस्यों के स्वास्थ्य, मनोरंजन, राजनीतिक, धार्मिक एवं सामाजिक ज्ञान में वृद्धि करती हैं।

(5) चिकित्सा एवं स्वास्थ्य रक्षा:
पोषणयुक्त भोजन, आवश्यक व्यायाम, मौसम के अनुरूप वस्त्र एवं घर व आस-पास की स्वच्छता आदि परिवार के सदस्यों को स्वस्थ रखने के लिए अति आवश्यक हैं। इनका विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। किसी भी सदस्य के बीमार पड़ने पर उसे उपयुक्त चिकित्सा उपलब्ध होनी चाहिए।

(6) बच्चों की देखभाल:
बच्चे परिवार एवं देश का भविष्य होते हैं। अतः स्वास्थ्य, विकास, शिक्षा व आचार-व्यवहार के दृष्टिकोण से उनकी देखभाल अति आवश्यक है। बच्चों की उचित देखभाल को परिवार की मूल आवश्यकताओं में सम्मिलित किया जाता है।

(7) मनोरंजन:
मानसिक स्वास्थ्य के लिए स्वस्थ मनोरंजन अति आवश्यक है। अतः परिवार में मनोरंजन के यथा योग्य साधन अवश्य उपलब्ध होने चाहिए।

(8) प्रेम, स्नेह एवं सहयोग:
एकाकी परिवार में प्राय: पति-पत्नी एवं उनके अविवाहित बच्चे होते हैं। संयुक्त परिवार पति-पत्नी, उनके माता-पिता व भाई-बहनों के संयुक्त रूप से रहने के कार अधिक बड़ा हो जाता है। परिवार छोटा हो या फिर बड़ा, दोनों ही में सदस्यों के स्नेह व परस्पर सह की भावना का होना (UPBoardSolutions.com) आवश्यक है। परिवाररूपी सामाजिक संस्था का कुशल संचालन प्रेम, स्नेह एवं सहयोग पर ही निर्भर करता है। यह प्रवृत्ति भी परिवार की मूल आवश्यकता है।

(9) आय:
यह परिवार की सबसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। धन से प्रायः सभी भौतिक आवश्यकताएँ क्रय की जा सकती हैं। परिवार में धन का प्रमुख स्रोत पारिवारिक आय होती है। प्रत्येक परिवार की आय प्राय: सभी सदस्यों की मूल आवश्यकताओं को पूर्ण करने के योग्य होनी चाहिए।

(10) बचते:
आकस्मिक संकटों (बीमारी आदि) का सामना करने के लिए अतिरिक्त धन की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त लड़के-लड़कियों के विवाह, लड़कों के व्यवसाय एवं धार्मिक कार्यों आदि में भी अकस्मात् ही धन की आवश्यकता पड़ती है। धन की इस आकस्मिक आवश्यकता की पूर्ति एक (UPBoardSolutions.com) बुद्धिमान् गृहिणी नियमित बचत द्वारा करती है। अतः प्रत्येक गृहिणी का कर्तव्य है कि वह आय-व्यय में सन्तुलन रखकर परिवार के भविष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उचित एवं अधिक-से-अधिक बचत करे। प्राथमिक एवं गौण आवश्यकताओं में भिन्नता लाना इतना सरल नहीं है जितना हम समझते हैं। वास्तव में जो वस्तु एक परिवार के लिए विलासिता की श्रेणी में है, वह वस्तु किसी अन्य परिवार के लिए अनिवार्य आवश्यकता की श्रेणी में मानी जा सकती है। अतः विभिन्न आवश्यकताएँ परिवार की आर्थिक दशा, रहन-सहन एवं समाज में स्तर तथा प्रतिष्ठा के अनुसार प्राथमिक अथवा गौण हो सकती हैं। परिवार के मुखिया तथा अन्य सदस्यों का दायित्व है कि वे पारिवारिक परिस्थितियों एवं उपलब्ध साधनों को ध्यान में रखते हुए पारिवारिक आवश्यकताओं की प्राथमिकता को निर्धारित कर लें तथा उनकी क्रमिक पूर्ति के लिए प्रयास करें।

प्रश्न 3:
परिवार की मूल आवश्यकताओं पर प्रभाव डालने वाले कारक कौन-कौन से हैं? विस्तारपूर्वक समझाइए।
या
आवश्यकताओं की वृद्धि एवं तीव्रता को प्रभावित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
किसी भी परिवार के सफल संचालन के लिए उसकी मूल आवश्यकताओं की पूर्ति अति आवश्यक है। परन्तु बढ़ती हुई महँगाई एवं वैज्ञानिक आविष्कारों के आज के युग में यह कोई सरल कार्य नहीं है। इसके लिए यह जानना आवश्यक है कि मूल आवश्यकताएँ किन-किन कारकों से प्रभावित होती हैं। परिवार की मूल आवश्यकताओं को प्रायः निम्नलिखित कारक प्रभावित करते हैं
(क) व्यक्तिगत कारक,
(ख) वस्तुगत कारक,
(ग) पारिस्थितिक कारक।

(क) व्यक्तिगत कारक:
ये निम्नलिखित प्रकार के होते हैं

(1) आर्थिक स्थिति:
एक व्यक्ति अथवा परिवार की आय के अनुसार ही उसकी आवश्यकताएँ होती हैं। आय में वृद्धि के साथ-साथ आवश्यकताओं में भी वृद्धि होती है। उदाहरण के लिए-एक
पवर्गीय परिवार की आवश्यकताएँ कम होती हैं, जबकि एक धनी परिवार की आवश्यकताएँ विलासिताओं की सीमा तक बढ़ जाती हैं।

(2) रहन-सहन का स्तर:
रहन-सहन का स्तर आवश्यकताओं के वर्गीकरण को बदल देता है। उदाहरण के लिए एक मध्यमवर्गीय परिवार की आवश्यकता बिजली के पंखे से भी पूर्ण हो जाती है,
जबकि एक धनी परिवार वातानुकूलन को आवश्यक समझता है।

(3) रुचि एवं आदत:
रुचि के अनुसार वस्तुओं को रखना आवश्यकता है; जैसे कि संगीत में रुचि रखने वाली गृहिणी के लिए वाद्य यन्त्र आवश्यक है, जबकि किसी अन्य रुचि वाली महिला के लिए यह अनुपयोगी है। इसी प्रकार पान, चाय, कॉफी इत्यादि की जिन्हें आदत है उनके लिए ये आवश्यकताएँ हैं, जबकि अन्य के लिए ये धन के अपव्यय की वस्तुएँ हैं।

(4) सामाजिक स्तर:
यह भी आवश्यकताओं का अर्थ बदल देता है। एक उच्चवर्गीय परिवार के लिए वैभवशाली आवासीय व्यवस्था व मोटरकार इत्यादि यदि एक ओर आवश्यकताएँ हैं, तो दूसरी ओर साधारण मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए विलासिता की वस्तुएँ हैं। इसी प्रकार निम्नवर्गीय परिवारों के लिए कच्चे मकान व झोपड़े आदि आवश्यकताओं की श्रेणी में आते हैं।

(5) शरीर-रचना एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी कारक:
मानवीय आवश्यकताओं को व्यक्ति की अपनी शरीर-रचना तथा स्वास्थ्य भी प्रभावित करते हैं; उदाहरण के लिए—यदि किसी व्यक्ति की टाँग में कोई विकृति या दोष हो, तो उनके लिए छड़ी या बैसाखी एक प्रबलतम आवश्यकता होती है। इसी प्रकार जिसकी नजर या दृश्य-क्षमता कमजोर हो, उसके लिए चश्मा अति आवश्यक या अनिवार्य आवश्यकता माना जाता है।

(6) व्यक्ति का जीवन के प्रति दृष्टिकोण:
प्रत्येक व्यक्ति का जीवन के प्रति दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न होता है। कुछ व्यक्ति भौतिकवादी होते हैं। ऐसे व्यक्ति के लिए भौतिक सुख-सुविधा सम्बन्धी आवश्यकताएँ अधिक महत्त्वपूर्ण होती हैं। ऐसा व्यक्ति घर में सुन्दर सोफा, कलर टी० वी०, डायनिंग टेबल आदि अनिवार्य समझता है। इससे भिन्न (UPBoardSolutions.com) एक धार्मिक दृष्टिकोण वाले व्यक्ति के लिए सोफा खरीदने की तुलना में तीर्थ-यात्रा का महत्त्व अधिक हो सकता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि जीवन के प्रति दृष्टिकोण भी एक ऐसा कारक है जो मानवीय आवश्यकताओं को गम्भीरता से प्रभावित करता है।

(ख) वस्तुगत कारक
आवश्यकताओं को सीधे ही प्रभावित करती हैं; जैसे कि

(1) वस्तुओं का मूल्य:
साधारण मूल्यों वाली वस्तुओं को प्रायः आवश्यकताओं के वर्ग में तथा अत्यधिक मूल्य वाली वस्तुओं को विलासिता की श्रेणी में रखा जाता है। इस प्रकार वस्तुओं का मूल्य आवश्यकताओं से सीधा सम्बन्ध रखता है।

(2) वस्तुओं की संख्या:

उपभोग की प्रेरक वस्तुओं के सन्दर्भ में उनकी प्रति व्यक्ति अथवा : परिवार के अनुसार संख्या सदैव महत्त्वपूर्ण होती है। उदाहरण के लिए–एक परिवार में एक कार आवश्यकता हो सकती है, जबकि एक से अधिक कारें होना विलासिता कहलाएँगी। इसी प्रकार एक व्यक्ति के पास दो या चार जोड़ी अच्छे वस्त्र होना आवश्यकता है, जबकि अत्यधिक संख्या में वस्त्रों को होना विलासिता माना जाएगा।

(ग) पारिस्थितिक कारक:
मैं परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं; जैसे कि

(1) देश एवं काल:
प्रत्येक देश की भौगोलिक परिस्थितियों पर उसकी आवश्यकताएँ निर्भर करती हैं। उदाहरण के लिए-उष्ण देशों में आवास, वस्त्र एवं भोजन आदि की आवश्यकताएँ ठण्डे देशों से भिन्न होती हैं। इसी प्रकार किसी भी देश में ग्रीष्म ऋतु की आवश्यकताएँ शीत ऋतु से सदैव भिन्न होती हैं।

(2) फैशन एवं रीति-रिवाज:

प्रत्येक देश एवं प्रदेश में रीति-रिवाज प्रायः भिन्न होते हैं। इसके अनुसार ही भोजन, वस्त्र एवं आवास जैसी मूल आवश्यकताएँ भी प्रायः बदल जाया करती हैं।

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प्रश्न 4:
परिवार की आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने में गृहिणी का क्या योगदान है? विस्तारपूर्वक लिखिए।
या
एक कुशल गृहिणी अर्थव्यवस्था को किस प्रकार व्यवस्थित कर सकती है? समझाइए।
उत्तर:
गृहिणी गृह-संचालिका होती है। उसकी बुद्धिमत्ता, व्यवहार-कुशलता एवं सूझ-बूझ पर ही उत्तम पारिवारिक व्यवस्था एवं सुदृढ़ अर्थव्यवस्था निर्भर करती है। वह पारिवारिक आय के अनुसार ही व्यय करती है। पारिवारिक आय से हमारा अभिप्राय निम्नलिखित है

(1) प्रत्यक्ष आय:
सदस्यों के वेतन एवं व्यापार आदि से अर्जित आय। इसके अतिरिक्त सम्पत्ति का किराया व ब्याज आदि से प्राप्त धन भी इसमें सम्मिलित है।
(2) अप्रत्यक्ष आय:
यह सुख-सुविधाओं के रूप में होती है; जैसे कि नि:शुल्क शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा तथा पैतृक मकान, जिसका किराया नहीं देना होता है इत्यादि। । पारिवारिक आय प्रायः घटती-बढ़ती रहती है। एक कुशल गृहिणी इसका सदैव ध्यान रखती है। वह निम्नलिखित तथ्यों के आधार पर अर्थव्यवस्था का संचालन करती है

(i) मूल आवश्यकताओं को प्राथमिकता:
भोजन, वस्त्र एवं मकान जीवनरक्षक मूल आवश्यकताएँ हैं, जिन्हें प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इनके लिए यह भी आवश्यक है कि इन पर पारिवारिक आय के अनुसार ही व्यय हो।

(ii) आवश्यकताओं में समन्वय:
विभिन्न आवश्यकताओं को सन्तुलित रूप से पूरा किया जाना चाहिए। आवश्यकताओं की पूर्ति उनके महत्त्व के क्रम में प्राथमिकता के सिद्धान्त के अनुसार की जानी चाहिए। उदाहरण के लिए–जीवनरक्षक आवश्यकताओं में भोजन सर्वप्रथम आता है तथा वस्त्र एवं मकान बाद में। अतः गृहिणी को सर्वप्रथम यह देखना चाहिए कि परिवार के सभी सदस्यों को आवश्यक पौष्टिक भोजन मिले, इसके पश्चात् ही आय का व्यय वस्त्र व मकान की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया जाना चाहिए।

(ii) आय के अनुसार व्यय:
जिस प्रकार धन का अपव्यय करना अनुचित है, उसी प्रकार धन का आवश्यकता से कम व्यय करना भी कोई अच्छी बात नहीं है। एक कुशल गृहिणी अर्थव्यवस्था का संचालन रहन-सहन के सामाजिक स्तर के अनुसार करती है। यदि पारिवारिक आय कम है, तो इसका व्यय केवल मूल (UPBoardSolutions.com) आवश्यकताओं की पूर्ति में ही करती है। इसके विपरीत यदि आय अधिक है, तो वह स्तर के अनुरूप विलासिता की वस्तुओं (जैसे कि वातानुकूलन, टेलीविजन, गृह सज्जा की वस्तुएँ इत्यादि) पर भी धन व्यय कर सकती है अर्थात् एक कुशल गृहिणी को आय के अनुसार ही व्यय करना चाहिए।

(iv) मुद्रा की क्रय-शक्ति:
आज महँगाई के युग में मुद्रा की क्रय-शक्ति प्रायः घटती रहती है। एक कुशल गृहिणी मुद्रा की क्रय-शक्ति का विशेष ध्यान रखती है तथा इसके अनुसार ही अपने परिवार की अर्थव्यवस्था का संचालन करती है।

(v) पारिवारिक सन्तोष:
पारिवारिक आय एवं परिवार के सदस्यों की संख्या में सीधा सम्बन्ध होता है। कम सदस्यों के परिवार में अर्थव्यवस्था के संचालन में कोई विशेष कठिनाई नहीं होती, परन्तु यदि परिवार में सदस्यों की संख्या अधिक है तो गृहिणी की व्यवहार-कुशलता एवं सूझ-बूझ के द्वारा ही अर्थव्यवस्था का संचालन सम्भव है। एक कुशल गृहिणी परिवार के सभी सदस्यों के सुख, सन्तोष एवं रुचि का ध्यान रखती है तथा आवश्यकता पड़ने पर पारिवारिक आय में वृद्धि के उपाय अपनाती है।

(vi) भविष्य के लिए बचत:
एक कुशल गृहिणी कभी भी धन का अनुचित व्यय नहीं करती है। वह अर्थव्यवस्था का संचालन योजना बनाकर करती है। वह प्रत्येक परिस्थिति में भविष्य की योजनाओं व आकस्मिक कार्यों (बीमारी व विवाह आदि) के लिए धन की बचत का प्रावधान रखती है। प्रत्येक कुशल गृहिणी पारिवारिक स्तर के अनुरूप धन का व्यय करती है तथा एक निश्चित मात्रा में धन की बचत कर उसको सुरक्षित एवं अधिक लाभप्रद राष्ट्रीय बचत योजनाओं में लगाती है। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि परिवार की बढ़ती आवश्यकताओं की सन्तुष्टि तभी सम्भव हो सकती है जब विभिन्न आवश्यकताओं तथा उनकी तीव्रता को ध्यान में (UPBoardSolutions.com) रखकर सीमित साधनों से सन्तुष्ट किया जाए। इस उद्देश्य के लिए आय-व्यय का सन्तुलन अत्यन्त आवश्यक है। यदि पारिवारिक आय-व्यय का सन्तुलन न किया जाए, तो गृह की अर्थव्यवस्था अव्यवस्थित हो जाएगी और यह भी सम्भव है कि परिवार की आय से व्यय अधिक हो जाए। परिवार की आय से अधिक व्यय हो जाने पर परिवार पर ऋण का बोझ हो जाएगा और ऋण से परिवार की सुख-शान्ति समाप्त हो जाएगी।
वास्तव में, एक सुव्यवस्थित या कुशल अर्थव्यवस्था ही इस उद्देश्य की पूर्ति में सहायक हो सकती है। अतः एक आदर्श गृह-व्यवस्था में कुशल अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण स्थान है। गृहिणी को इस बात की पूर्ण जानकारी होनी चाहिए कि मानव की किस-किस अवस्था की । कौन – कौन सी आवश्यकताएँ महत्वपूर्ण हैं; (UPBoardSolutions.com) जैसे-शिशु की आवश्यकता, भूख व सुरक्षा। उसके। पश्चात् बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था एवं वृद्धावस्था की आवश्यकताएँ भिन्न-भिन्न हैं। सभी बातों को ध्यान में रखते हुए अपना पूर्ण उत्तरदायित्व निभाएँ।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
सफल गृह-अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
यह सत्य है कि परिवार की सुख-शान्ति एवं समृद्धि के लिए गृह-अर्थव्यवस्था का उत्तम एवं सुनियोजित होना आवश्यक है। अब प्रश्न उठता है कि किस प्रकार की गृह-अर्थव्यवस्था को उत्तम या सफल कहा जा सकता है, अर्थात् सफल गृह-अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ या लक्षण क्या हैं? सफल गृह-अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित मानी जाती हैं ।

  1.  सफल गृह-अर्थव्यवस्था में परिवार की मूलभूत आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी जाती है।
  2. सफल गृह-अर्थव्यवस्था में परिवार की विभिन्न आवश्यकताओं में समन्वय स्थापित किया जाता है।
  3.  सफल गृह-अर्थव्यवस्था में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की प्राथमिकता को निर्धारित कर लिया जाता है।
  4.  सफल गृह-अर्थव्यवस्था के अन्तर्गत आय के अनुसार व्यय का निर्धारण किया जाता है।
  5.  सफल गृह-अर्थव्यवस्था के अन्तर्गत अनिवार्य रूप से बचत का प्रावधान होता है।
  6. सफल गृह-अर्थव्यवस्था में पारिवारिक सन्तोष का ध्यान रखा जाता है। प्रश्न 2-गृह-अर्थव्यवस्था के मुख्य सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर:
किसी भी परिवार की उत्तम गृह-अर्थव्यवस्था को बनाए रखने के लिए निम्नलिखित सिद्धान्तों को ध्यान में रखना चाहिए

  1.  पारिवारिक लक्ष्यों के निर्धारण का सिद्धान्त,
  2. आय के विश्लेषण का सिद्धान्त,
  3.  विभिन्न पारिवारिक योजनाओं सम्बन्धी सिद्धान्त,
  4.  पारिवारिक भविष्य की सुरक्षा सम्बन्धी सिद्धान्त,
  5. परिवार के सदस्यों की सन्तुष्टि का सिद्धान्त।

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प्रश्न 3:
आवश्यकताएँ कितने प्रकार की होती हैं?
या
अनिवार्य आवश्यकताएँ किन्हें कहा जाता है?
या
आरामदायक आवश्यकताओं से आप क्या समझती हैं?
या
विलासात्मक आवश्यकताओं से क्या आशय है?
उत्तर:
व्यक्ति की आवश्यकताएँ अनन्त होती हैं तथा वे कभी भी पूर्ण नहीं होतीं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए मानवीय आवश्यकताओं का एक व्यवस्थित वर्गीकरण किया गया है। इस वर्गीकरण के अन्तर्गत समस्त मानवीय आवश्यकताओं को तीन वर्गों में रखा गया है। ये वर्ग हैं-अनिवार्य आवश्यकताएँ, आरामदायक आवश्यकताएँ तथा विलासात्मक आवश्यकताएँ। इन तीनों प्रकार की आवश्यकताओं का संक्षिप्त परिचय निम्नवर्णित है

(1) अनिवार्य आवश्यकताएँ:
मानव जीवन के लिए अत्यधिक अनिवार्य आवश्यकताओं को इस वर्ग में सम्मिलित किया जाता है। इस वर्ग की मानवीय आवश्यकताओं को व्यक्ति की मौलिक आवश्यकताएँ भी कहा जाता है। इस वर्ग की आवश्यकताओं की पूर्ति के अभाव में मनुष्य का जीवन भी कठिन हो जाता है। मुख्य रूप से (UPBoardSolutions.com) भोजन, वस्त्र तथा आवास को इस वर्ग की आवश्यकताएँ माना गया है। व्यापक रूप से इस वर्ग में भी तीन प्रकार की आवश्यकताओं को सम्मिलित किया जाता है, जिन्हें क्रमशः जीवनरक्षक अनिवार्य आवश्यकताएँ, कार्यक्षमतारक्षक अनिवार्य आवश्यकताएँ तथा प्रतिष्ठारक्षक
अनिवार्य आवश्यकताएँ कहा जाता है।

(2) आरामदायक आवश्यकताएँ:
इस वर्ग में उन आवश्यकताओं को सम्मिलित किया जाता है। जिनकी पूर्ति से व्यक्ति का जीक्न निश्चित रूप से अधिक सुखी तथा सुविधामय हो जाता है। उदाहरण के
लिए – विभिन्न घरेलू उपकरण इसी वर्ग की आवश्यकताएँ हैं। इन उपकरणों को अपनाकर जीवन अधिक सरल हो जाता है।

(3) विलासात्मक आवश्यकताएँ:
इस वर्ग में उन आवश्यकताओं को सम्मिलितं किया जाता है। जो व्यक्ति की विलासात्मक इच्छाओं से सम्बन्धित होती हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के अभाव में न तो व्यक्ति के जीवन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और न ही व्यक्ति की कार्यक्षमता ही घटती है। विलासात्मक आवश्यकताएँ भिन्न-भिन्न समाज में भिन्न-भिन्न होती हैं। विलासात्मक आवश्यकताएँ भी तीन प्रकार की होती हैं, जिन्हें क्रमशः हानिरहित विलासात्मक आवश्यकताएँ, हानिकारक विलासात्मक आवश्यकताएँ तथा सुरक्षा सम्बन्धी विलासात्मक आवश्यकताएँ कहा (UPBoardSolutions.com) जाता है। अधिक महँगी कार, आलीशान भवन, महँगे तथा अधिक संख्या में वस्त्र रखना हानिरहित विलासात्मक आवश्यकताओं की श्रेणी में आते हैं। भोग-विलास के साधने नशाखोरी तथा नैतिक एवं चारित्रिक पतन के साधनों को अपनाना हानिकारक विलासात्मक आवश्यकताओं से सम्बद्ध हैं। जहाँ तक सुरक्षात्मक विलासात्मक आवश्यकताओं का सम्बन्ध है, इनमें बहुमूल्य गहनों तथा विभिन्न सम्पत्तियों को सम्मिलित किया जाता है। ये वस्तुएँ व्यक्ति के संकट-काल में सहायक होती हैं।

प्रश्न 4:
आरामदायक तथा विलासात्मक आवश्यकताओं में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मानवीय आवश्यकताओं के वर्गीकरण में आरामदायक तथा विलासात्मक आवश्यकताओं को अलग-अलग वर्ग में प्रस्तुत किया गया है। स्थूल रूप से देखने पर इन दोनों प्रकार की आवश्यकताओं में कोई स्पष्ट अन्तर दिखाई नहीं देता। एक ही आवश्यकता एक व्यक्ति के लिए विलासात्मक आवश्यकता हो सकती है और वही आवश्यकता किसी अन्य व्यक्ति के लिए आरामदायक आवश्यकता हो सकती है। वास्तव (UPBoardSolutions.com) में, ये दोनों सापेक्ष हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि जिस आवश्यकता से सम्बन्धित व्यक्ति का किसी प्रकार अहित होने की आशंका हो, वह आवश्यकता विलासात्मक आवश्यकता की श्रेणी में आएगी। इससे भिन्न जो आवश्यकता केवल जीवन की सुख-सुविधा में वृद्धि करती है, वह आरामदायक आवश्यकता की श्रेणी में आएगी।

प्रश्न 5:
मानवीय आवश्यकताओं की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मानवीय आवश्यकताओं की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित होती हैं ।

  1. मानवीय आवश्यकताएँ असीमित होती हैं।
  2. मानवीय आवश्यकताओं में पुनरावृत्ति होती है। उदाहरण के लिए–एक बार भोजन ग्रहण कर लेने के उपरान्त कुछ समय बाद पुनः भोजन की आवश्यकता महसूस होने लगती है।
  3. आवश्यकताओं की एक विशेषता यह है कि इनमें विकल्प भी सम्भव होते हैं। उदाहरण के लिए–प्रकाश की आवश्यकता के लिए साधन के रूप में लैम्प, मोमबत्ती, वैद्युत-बल्ब आदि में विकल्प हो सकता है।
  4. कुछ आवश्यकताएँ परस्पर पूरक होती हैं। उदाहरण के लिए मोटर की पूरक आवश्यकता पेट्रोल है।
  5. मानवीय आवश्यकताओं में प्रतिस्पर्धा होती है तथा उनकी प्रबलता में अन्तर होता है।
  6. वर्तमान सम्बन्धी मानवीय आवश्यकताएँ अधिक प्रबल होती हैं।
  7. कुछ मानवीय आवश्यकताएँ आदत का रूप ले लेती हैं।
  8. जानकारी बढ़ने के साथ-साथ आवश्यकताएँ बढ़ती हैं।
  9. आवश्यकताओं पर विज्ञापन एवं प्रचार का भी प्रभाव पड़ता है।
  10. मानवीय आवश्यकताओं की एक विशेषता यह है कि इन पर प्रचलित रीति-रिवाजों तथा फैशन का भी प्रभाव पड़ता है।

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प्रश्न 6:
आवश्यकता की अनिवार्यता आप किस प्रकार निर्धारित करेंगी?
उत्तर:
आवश्यकता की अनिवार्यता निम्नलिखित आधारों पर निर्भर करती है

(1) कुशलता में वृद्धि का आधार:
यदि किसी आवश्यकता की पूर्ति से परिवार की कार्य-कुशलता में वृद्धि होती है, तो वह आवश्यकता अति अनिवार्य हो जाती है।

(2) सुख-सन्तोष का आधार:
जिन आवश्यकताओं की पूर्ति से पारिवारिक सदस्यों को सुख एवं सन्तोष की प्राप्ति होती है, वे अनिवार्यता की श्रेणी में आती हैं।

(3) मूल्य एवं माँग का आधार:
यदि किसी आवश्यक वस्तु के मूल्य में वृद्धि की आशंका हो तो वह अनिवार्यता की श्रेणी में आ जाती है।

प्रश्न 7:
आवश्यकताओं के महत्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। विज्ञान के विभिन्न आविष्कारों के अन्वेषण का आधार सदैव मनुष्य की आवश्यकताएँ ही रही हैं। आदि मानव से आज के मानव का सामाजिक विकास समय-समय पर आवश्यकताओं की उत्पत्ति एवं तुष्टि के कारण ही सम्भव हुआ है। आधुनिक युग में आवश्यकताओं की पूर्ति का सर्वश्रेष्ठ साधन धन है। आवश्यकताओं में वृद्धि होने पर परिवार के (UPBoardSolutions.com) सदस्य पारिवारिक आय में वृद्धि का प्रयास करते हैं, जिसके फलस्वरूप रहन-सहन का स्तर ऊँचा होता है। सम्मिलित आर्थिक प्रयासों से पारिवारिक सदस्यों में स्नेह, सहयोग एवं दायित्व की भावना में वृद्धि होती है तथा परिवार की उन्नति होती है।

प्रश्न 8:
परिवार की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना कठिन होता है। क्यों?
उत्तर:
आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धन मुख्य साधन है। परिवार में धन का मुख्य स्रोत पारिवारिक आय होती है। आवश्यकताएँ अनन्त होती हैं और आय प्रायः सीमित। अतः आवश्यकताओं की पूर्ति अनिवार्यता के क्रम में की जाती है। सर्वप्रथम मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है और यदि धन शेष बचता है तो कुछ और आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है। शेष आवश्यकताओं की पूर्ति का (UPBoardSolutions.com) एकमात्र उपाय पारिवारिक सदस्यों के सम्मिलित प्रयासों से ही सम्भव हो सकता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि परिवार की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना एक कठिन कार्य है।

प्रश्न 9:
आवश्यकता एवं आर्थिक क्रियाओं को सम्बन्ध बताइए।
उत्तर:
आवश्यकता आविष्कार की जननी है। यदि आवश्यकताएँ न होतीं तो किसी प्रकार के आर्थिक प्रयास आदि का प्रश्न ही नहीं उठता। अतः आर्थिक प्रयत्न की जननी आवश्यकता ही है। इस प्रकार आर्थिक क्रियाओं एवं आवश्यकताओं में अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। वास्तव में, आवश्यकताएँ ही (UPBoardSolutions.com) मनुष्य को आर्थिक प्रयत्न करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं। आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए मनुष्य विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाएँ करता है। इन आर्थिक क्रियाओं में उत्पादन, विनिमय, वितरण आदि को सम्मिलित किया जा सकता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
गृह-अर्थव्यवस्था की एक सरल एवं स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
‘परिवार की आय तथा व्यय पर नियन्त्रण होना तथा आय का गृह के सृजनात्मक कार्यों में व्यय करना गृह-अर्थव्यवस्था कहलाता है।” निकिल तथा डारसी

प्रश्न 2:
गृह-अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला मुख्यतम कारक क्या है?
उत्तर:
गृह-अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला मुख्यतम कारक है-धन या आय।

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प्रश्न 3:
गृह-अर्थव्यवस्था के किन्हीं दो सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
गृह-अर्थव्यवस्था के दो सिद्धान्त है

  1. आय के विश्लेषण का सिद्धान्त तथा
  2.  पारिवारिक भविष्य की सुरक्षा सम्बन्धी सिद्धान्त।

प्रश्न 4:
सफल गृह-अर्थव्यवस्था की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
सफल गृह-अर्थव्यवस्था की दो विशेषताएँ हैं

  1.  परिवार की आवश्यकताओं की प्राथमिकता को निर्धारित करना तथा
  2.  गृह-अर्थव्यवस्था में बचत का प्रावधान रखना।

प्रश्न 5:
परिवार की अति अनिवार्य मूलभूत आवश्यकता क्या है?
उत्तर:
भोजन परिवार की अति अनिवार्य मूलभूत आवश्यकता है।

प्रश्न 6:
जीवनरक्षक आवश्यकता से आप क्या समझती हैं?
उत्तर:
भोजन एवं वस्त्र मानव अस्तित्व की जीवनरक्षक आवश्यकताएँ हैं।

प्रश्न 7:
विलासिता सम्बन्धी आवश्यकताओं से आप क्या समझती हैं?
उत्तर:
ये सामाजिक प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य एवं दिखावे सम्बन्धी आवश्यकताएँ हैं; जैसे कि रंगीन टी० वी०, वातानुकूलित यन्त्र आदि।

प्रश्न 8:
आधुनिक समाज के विभिन्न परिवारों को आप कौन-कौन सी श्रेणियों में वर्गीकृत करेंगी?
उत्तर:
आधुनिक समाज को प्रायः तीन-उच्च, मध्यम व निम्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है।

प्रश्न 9:
गृह-अर्थव्यवस्था को उत्तम बनाने में सर्वाधिक योगदान परिवार के किस सदस्य का होता है?
उत्तर:
गृह-अर्थव्यवस्था को उत्तम बनाने में सर्वाधिक योगदान परिवार के मुखिया का होता है।

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प्रश्न 10:
उत्तम एवं सुचारु गृह-अर्थव्यवस्था को विकसित करने के लिए परिवार का आकार किस प्रकार का होना चाहिए?
उत्तर:
उत्तम एवं सुचारु गृह-अर्थव्यवस्था को विकसित करने के लिए परिवार का आकार छोटा होना चाहिए।

प्रश्न 11:
परिवार के बच्चों की शिक्षा की समुचित व्यवस्था किस प्रकार की पारिवारिक आवश्यकता है?
उत्तर:
परिवार के बच्चों की शिक्षा की समुचित व्यवस्था परिवार की मूलभूत आवश्यकता है।

प्रश्न 12:
कपड़े धोने की मशीन किस प्रकार की आवश्यकता है?
उत्तर:
कपड़े धोने की मशीन एक आरामदायक आवश्यकता है।

प्रश्न 13:
बहुमूल्य गहने किस प्रकार की आवश्यकता है?
उत्तर:
बहुमूल्य गहने सुरक्षात्मक विलासात्मक आवश्यकता है।

प्रश्न 14:
एक डॉक्टर के लिए कार किस प्रकार की आवश्यकता है?
उत्तर:
एक डॉक्टर के लिए कार अनिवार्य आवश्यकता है।

प्रश्न 15:
सिगरेट या शराब पीना कैसी आवश्यकता है?
उत्तर:
सिगरेट या शराब पीना आदत सम्बन्धी आवश्यकता के उदाहरण हैं।

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प्रश्न 16:
आपके अनुसार परिवार के सदस्यों के लिए स्वस्थ मनोरंजन की व्यवस्था परिवार की किस प्रकार की आवश्यकता है?
उत्तर:
हमारे अनुसार परिवार के सदस्यों के लिए स्वस्थ मनोरंजन की व्यवस्था परिवार की मूलभूत आवश्यकता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न:
प्रत्येक प्रश्न के चार वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। इनमें से सही विकल्प चुनकर लिखिए

(1) किसी परिवार द्वारा अपनी आय-व्यय तथा धन-सम्पत्ति के लिए की जाने वाली व्यवस्था को कहते हैं
(क) अनिवार्य व्यवस्था,
(ख) पारिवारिक व्यवस्था,
(ग) गृह-अर्थव्यवस्था,
(घ) अनावश्यक व्यवस्था।

(2) कुशल अर्थव्यवस्था का आधार है
(क) पारिवारिक आय,
(ख) सीमित आवश्यकताएँ,
(ग) विवेकपूर्ण व्यय,
(घ) पैतृक सम्पत्ति।

(3) यदि गृह-अर्थव्यवस्था सुचारू हो, तो
(क) परिवार के सदस्यों की प्रमुख आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है,
(ख) परिवार के रहन-सहन के स्तर में सुधार होता है,
(ग) परिवार आर्थिक संकट का शिकार नहीं होता,
(घ) उपर्युक्त सभी लाभ प्राप्त होते हैं।

(4) पारिवारिक आय को मितव्ययिता से व्यय करने के लाभ हैं
(क) सुख-सुविधाओं की प्राप्ति,
(ख) भविष्य के लिए बचत,
(ग) सुदृढ़ अर्थव्यवस्था,
(घ) ये सभी।

(5) व्यक्ति की सर्वाधिक अनिवार्य आवश्यकता है
(क) सभी इच्छाओं की पूर्ति,
(ख) सन्तुलित एवं पौष्टिके भोजन,
(ग) नींद,
(घ) भव्य एवं आकर्षक भवन।

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(6) मानवीय आवश्यकताएँ होती हैं
(क) दो,
(ख) चार,
(ग) सीमित,
(घ) असीमित।

(7) सबसे अधिक सुखी होता है
(क) धनी वर्ग,
(ख) नियन्त्रित आवश्यकताओं वाला वर्ग,
(ग) श्रमिक वर्ग,
(घ) मध्यम श्रेणी का वर्ग।

(8) जीवनरक्षक आवश्यकता होती है
(क) जिसकी पूर्ति मानव अस्तित्व के लिए की जाती है,
(ख) जो रहन-सहन के स्तर को ऊँचा उठाती है,
(ग) जिसकी पूर्ति से कार्य-कुशलता बढ़ती है,
(घ) जिसकी पूर्ति से अत्यधिक सुख का अनुभव होता है।

उत्तर:
(1) (ग) गृह-अर्थव्यवस्था,
(2) (ग) विवेकपूर्ण व्यय,
(3) (घ) उपर्युक्त सभी लाभ प्राप्त होते हैं,
(4) (घ) ये सभी,
(5) (ख) सन्तुलित एवं पौष्टिक भोजन,
(6) (घ) असीमित,
(7) (ख) नियन्त्रित आवश्यकताओं वाला वर्ग,
(8) (क) जिसकी पूर्ति मानव अस्तित्व के लिए की जाती है।

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UP Board Solutions for Class 6 Hindi Chapter 4 सत्यवादी हरिश्चन्द्र (महान व्यक्तिव)

UP Board Solutions for Class 6 Hindi Chapter 4 सत्यवादी हरिश्चन्द्र (महान व्यक्तिव)

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पाठ का सारांश

महाराज हरिश्चन्द्र सत्यवादी थे। इनको जन्म सतयुग में हुआ था। इनकी पत्नी का नाम तारामती और पुत्र का नाम रोहिताश्व था। एक बार राजा ने स्वप्न में अपना सारा राज्य महर्षि विश्वामित्र को दान में दे दिया। दूसरे दिन महर्षि विश्वामित्र इनके दरबार में आए। उन्होंने महाराज को स्वप्न में दान की बात याद दिलाई। महाराज ने (UPBoardSolutions.com) प्रसन्नता से सारा राज्य विश्वामित्र को दान कर दिया। दान करने के बाद दक्षिणा दी जाती है। सारा राज्य तो वे दान कर ही चुके थे। अब दक्षिणा के लिए धन कहाँ से आए! हरिश्चन्द्र ने विश्वामित्र को दक्षिणा देने के लिए अपने को बेचने का निश्चय किया। ये काशी की ओर चल पड़े। वहाँ जाकर इन्होंने अपने-आप को बेचने की पूरी-पूरी कोशिश की। शाम को रानी तथा पुत्र को एक व्यक्ति ने मोल ले लिया तथा हरिश्चन्द्र को श्मशान के स्वामी ने मोल ले दिया।

महाराज हरिश्चन्द्र को श्मशान की रखवाली का काम मिला और तारामती को घर का चौका-बर्तन करने का। एक दिन रोहिताश्व को एक सर्प ने डस लिया। तारामती उसे लेकर रोते हुए श्मशान जा पहुँची। उसे पता नहीं था कि पति श्मशान में ही हैं। हरिश्चन्द्र ने तारामती से श्मशान का कर माँगा। तारामती के पास उस समय कुछ न था। हरिश्चन्द्र ने कहा- “मैं बिना कर लिए तुम्हें यह मुर्दा नहीं जलाने दूंगा, ऐसा करना अपने मालिक के प्रति विश्वासघात होगा।” लाचार होकर तारामती ने श्मशान का कर चुकाने के लिए अपनी साड़ी फाड़ना शुरू कर दिया।

उसी समय आकाश में घोर गर्जन हुआ, विश्वामित्र प्रकट हो गए, रोहिताश्व भी जीवित हो उठा। विश्वामित्र ने कहा- “हे राजा! तुम धन्य हो। यह सब तुम्हारी परीक्षा हो रही थी। तुम श्रेष्ठ, सत्यवादी और धार्मिक हो।” वास्तव में, (UPBoardSolutions.com) हरिश्चन्द्र हमारे ऐसे पूर्वज हैं, जिन पर प्रत्येक भारतवासी को गर्व है।

शिक्षा- सत्य बोलने, धर्मपालन और कर्तव्यनिष्ठा से सभी कठिन कार्य सरल हो जाते हैं।

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अभ्यास

प्रश्न 1.
राजा हरिश्चन्द्र ने स्वप्न में अपना राज्य किसे दान में दिया?
उत्तर :
राजा हरिश्चन्द्र ने स्वप्न में अपना राज्य महर्षि विश्वामित्र को दान में दिया।

प्रश्न 2.
राजा हरिश्चन्द्र ने स्वयं को क्यों बेचा?
उत्तर :
महर्षि विश्वामित्र को दक्षिणा देने के लिए राजा हरिश्चन्द्र ने स्वयं को बेचा।

प्रश्न 3.
राजा हरिश्चन्द्र अपने पुत्र के शव का बिना ‘कर’ लिए अंतिम संस्कार क्यों नहीं करने दे रहे थे?
उत्तर :
क्योंकि राजा हरिश्चन्द्र अपने मालिक के साथ विश्वासघात नहीं करना चाहते थे।

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प्रश्न 4.
विश्वामित्र ने हरिश्चन्द्र को उनका राज्य क्यों लौटा दिया?
उत्तर :
राजा हरिश्चन्द्र ने सत्य और धर्म का पालन सीमा से भी बढ़कर किया और महर्षि विश्वामित्र की परीक्षा में पूर्णतः खरे उतरे। इस कारण उन्होंने उनका राज्य लौटा दिया।

प्रश्न 5.
हरिश्चंद्र का नाम अमर क्यों है ?
उत्तर :
क्योंकि हरिश्चंद्र जैसा दूसरा सत्यवादी आज तक जन्म नहीं लिया। अत: हरिश्चन्द्र का नाम अमर है।

प्रश्न 6.
बातचीत को आगे बढ़ाइए –
शिवानी : कल मेरे स्कूल में ‘सत्यवादी हरिश्चंद्र’ नाटक खेला गया।
पंकज : अरे! हमारे स्कूल में तो नहीं हुआ। तुमने पहले क्यों नहीं बताया? अच्छा, यह बताओ यह नाटक खेला किसने?
शिवानी : यही तो मजेदार बात है। मेरी कक्षा के बच्चों ने यह नाटक खेला।
पंकज : किसका अभिनय सबसे अच्छा था? (UPBoardSolutions.com)
शिवानी : क्या बताऊँ? सभी एक से बढ़ कर एक थे।
पंकज : फिर भी सबसे अच्छा अभिनय किसका था?
शिवानी : सबसे अच्छा अभिनय नमन का था।

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UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 13 गुरु गोविन्द सिंह (महान व्यक्तित्व)

UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 13 गुरु गोविन्द सिंह (महान व्यक्तित्व)

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पाठ का सारांश

गुरु तेगबहादुर के पुत्र तथा उत्तराधिकारी गुरु गोविन्द सिंह का जन्म सन् 1666 ई० में पटना (बिहार) में हुआ। उन्हें दस वर्ष की अवस्था में गुरु की गद्दी मिली। वे सैनिकों की भाँति घुड़सवारी करते और तलवार चलाते थे। इतना ही नहीं कुछ राजकाज भी होने लगा। इनके शिष्य इन्हें भेट देते थे। इनके शिष्य तथा दरबारी उन्हें ‘सच्चे बादशाह’ (UPBoardSolutions.com) कहते थे। गुरु गोविन्द सिंह: सिखों के आग्रह पर आनन्दपुर आ गए जो गुरु तेगबहादुर की राजधानी थी। यहाँ 20 वर्ष तक रहकर धर्मग्रन्थों , को अध्ययन किया। ये अच्छे कवि और विचारक थे। इनके द्वारा रचित ‘चंडी-चरित्र’ और ‘चंडी का वार’ वीररस के सुन्दर काव्य हैं। इन्होंने एक पुस्तक ‘विचित्र नाटक’ भी लिखी, जिसके द्वारा लोगों में . उत्साह भरने की चेष्टा की।

सन् 1699 ई० में बैसाखी के दिन इन्होंने खालसा पंथ अथवा सिख धर्म की स्थापना की। गुरु गोविन्द सिंह ने सिखों को पाँच वस्तुओं को धारण करना जरूरी बताया। ये वस्तुएँ हैं–

  1. केश,
  2. कड़ा
  3. कंघा,
  4. कच्छा और
  5. कृपाण ये ‘पाँच ककार’ कहे जाते हैं।

गुरु ने अपने शिष्यों से जाति सूचक शब्द छोड़कर प्रत्येक सिख के नाम के साथ ‘सिंह’ जोड़ना जरूरी समझा। इस प्रकार सिख संगठित सैनिक बन गए। इससे औरंगजेब, जो दक्षिण में था, ने गुरु पर आक्रमण करने का आदेश दिया। गुरु अपने कुछ साथियों सहित बच निकले। गुरु औरंगजेब से छह-सात वर्ष तक युद्ध करते रहे। इन युद्धों (UPBoardSolutions.com) में उनके दो पुत्रे मारे गए और दो को सरहिंन्द के सूबेदार ने दीवार चिनवा दिया। गुरु ने फिर भी साहस और धैर्य नहीं छोड़ा। औरंगजेब ने गुरु को कैद करने का आदेश दिया लेकिन इसी बीच औरंगजेब की मृत्यु हो गई।

गुरु गोविन्द सिंह जी ने अपने 42 वर्ष के अल्प जीवन में अनेक कार्य किए। भेद-भाव मिटाकर और खालसा पंथ को संगठित करके उन्होंने देशवासियों को नई स्फूर्ति और प्रेरणा दी। नि:सन्देह वे हमारे देश के अमूल्य रत्न थे।

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अभ्यास-प्रश्न

प्रश्न 1.
गुरु गोविन्द सिंह ने सिखों को अपने नाम में सिंह लगाने का आदेश क्यों दिया?
उत्तर :
गुरु गोविन्द सिंह ने जाति-पाँति का भेदभाव समाप्त करने और एकता पर आधारित सैनिक संगठन बनाने के लिए सिखों के नाम के साथ ‘सिंह’ लगाने का आदेश दिया।

प्रश्न 2.
सिखों को किन पाँच वस्तुओं को धारण करना अनिवार्य है?
उत्तर :
सिखों को पाँच ककार- केश, कंघा, कड़ा, कच्छा और कृपाण धारण करना अनिवार्य है।

प्रश्न 3.
पंच प्यारे कौन कहलाए? (UPBoardSolutions.com)
उत्तर :
पंच प्यारे वे व्यक्ति कहलाए जो मृत्यु का डर छोड़कर अपनी बलि देने को तैयार हो गए थे।

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प्रश्न 4.
खालसा पंथ की स्थापना कब और किसने की?
उत्तर :
सन् 1699 ई० में वैसाखी के दिन गुरु गोविन्द सिंह जी ने ‘खालसा पंथ’ अथवा सिख धर्म स्थापना की थी।

प्रश्न 5.
रिक्त स्थानों की पूर्ति निम्नांकित में से उचित शब्दों के द्वारा कीजिए (पूर्ति करके)
उत्तर :
नान्दे (हैदराबाद), 1708, पुत्र, 1666,’मुगलों, पिता, 1699

  1. गुरु गोविन्द सिंह के जन्म के समय भारत में मुगलों का शासन था।
  2. गुरु गोविन्द सिंह की मृत्यु नान्दे ( हैदराबाद) स्थान में हुई थी।
  3. गुरु तेगबहादुर गुरुगोविन्द सिंह के पिता थे।
  4. गुरु गोविन्द सिंह का जन्म 1666 ई० में हुआ था।
  5. गुरु गोविन्द सिंह ने वर्ष 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की थी।

प्रश्न 6.
संक्षेप में उत्तर दीजिए
(1).
‘सच्चे बादशाह’ सम्बोधन किसके लिए किया गया था?
उत्तर :
‘सच्चे बादशाह’ सम्बोधन गुरु गोविन्द सिंह के पितामह गुरु हरगोविन्द के लिए किया गया था।

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(2).
‘मसन्द’ किसे कहते हैं?
उत्तर :
‘मसन्द’ उन शिष्यों को कहते हैं जो गुरु को स्थान-स्थान पर खड़े होकर भेंट देते थे।

(3).
गुरु गोविन्द सिंह द्वारा रचित पुस्तकों के नाम लिखिए।
उत्तर :
गुरु गोविंद सिंह द्वारा रचित पुस्तकों के नाम हैं- ‘चंडी चरित्र’, ‘चंडी का वार’ और ‘विचित्र नाटक’।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित के बारे में लिखिए- चंडी चरित्र, विचित्र नाटक, पाँचककार
उत्तर :
चंडी-चरित्र – यह गुरु गोविन्द सिंह द्वारा रचित वीररस का सुन्दर काव्य है। गुरु ने इसके माध्यम से शिष्यों में अदम्य साहस और वीरता का संचार किया।

विचित्र नाटक – गुरु गोविन्द सिंह द्वारा रचित इस नाटक के द्वारा लोगों में उत्साह भरने की चेष्टा की गई। इसमें गुरु ने लिखा है, “तुम हमारे पुत्रों के समान हो, नया पंथ चलाओ। लोगों से (UPBoardSolutions.com) कहो कि, सत्यमार्ग पर चलकर नासमझी से दूर रहें।”

पाँच ककार – केश, कंघा, कड़ा, कच्छा और कृपाण सिखों को धारण करना अनिवार्य है।

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UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 3 (Section 4)

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 3 आर्थिक विकास हेतु राजस्व की आवश्यकता (अनुभाग – चार)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 10 Social Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 3 आर्थिक विकास हेतु राजस्व की आवश्यकता (अनुभाग – चार)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राजस्व किसे कहते हैं ? इसके महत्त्व को लिखिए।
उत्तर :

राजस्व

राजस्व सार्वजनिक वित्त अथवा लोक-सत्ताओं के आय-व्यय से सम्बन्धित बातों का अध्ययन है। डाल्टन के अनुसार, “राजस्व के अन्तर्गत लोक-सत्ताओं के आय-व्यय तथा उनके पारस्परिक समायोजन । और समन्वय का अध्ययन किया जाता है।”

राजस्व का महत्त्व

आज के युग में राज्यों एवं सरकारों (UPBoardSolutions.com) के कार्यों में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है; अतः सार्वजनिक राजस्व का महत्त्व भी बढ़ रहा है। सार्वजनिक राजस्व के महत्त्व को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है –

1. आर्थिक विषमता को दूर करना – प्रत्येक देश की सरकार करों के माध्यम से देश की आर्थिक विषमता को कम करने का प्रयास करती है। सरकार धनी वर्ग पर अधिक कर लगाकर तथा करों से प्राप्त आय को निर्धनों के कल्याण के कार्यों पर व्यय करके राष्ट्रीय आय का समान वितरण करती है, जिससे समाज में धनी व निर्धन वर्ग में गहरी खाई न बन सके।

2. देश की आर्थिक विकास – आर्थिक नियोजन के माध्यम से देश का आर्थिक विकास किया जाता है। आर्थिक नियोजन को सफल बनाने के लिए ही राजस्व की आवश्यकता होती है। यदि सरकार के आय के स्रोत अधिक हैं और सरकार को आय निश्चित समय पर उचित मात्रा में प्राप्त होती रहती है तब सरकार आर्थिक नियोजन के द्वारा देश का आर्थिक विकास तीव्र गति से कर सकती है; अत: देश के आर्थिक विकास में राजस्व की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

3. अधिकतम सामाजिक कल्याण – वह सरकार देश के नागरिकों का अधिक कल्याण कर सकती है, जिस देश की सरकार के आय के स्रोत अधिक होंगे तथा सरकार की आय अधिक होगी। सरकार सार्वजनिक राजस्व से प्राप्त आय को जनता के सामाजिक कल्याण पर व्यय करती है; अतः शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, मनोरंजन आदि की व्यवस्था के लिए सार्वजनिक आय का अधिक होना आवश्यक

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4. उपभोग की हानिकारक वस्तुओं पर नियन्त्रण – सरकार करों की मात्रा में वृद्धि करके इस प्रकार की उपभोग की वस्तुओं के प्रयोग को हतोत्साहित कर सकती है, जिनका समाज पर कुप्रभाव पड़ता है; जैसे-शराब, गाँजा, अफीम आदि मादक पदार्थों पर अधिक कर लगाकर इनके उपभोग को कम किया जा सकता है।

5. आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन को प्रोत्साहन – आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन में वृद्धि को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार उद्योगों को संरक्षण प्रदान करती है, उनके करों को समाप्त करती है। तथा उन्हें आर्थिक सहायता भी देती है। इससे उत्पादन तथा राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है।

6. देश में आर्थिक स्थिरता – सरकार राजस्व के द्वारा मन्दी और तेजी की अवस्था में देश को आर्थिक स्थिरता प्रदान करती है। सरकार तेजी के समय अधिकं कर लगाकर या ऋण लेकर मूल्यों में स्थिरता लाने का प्रयास करती है तथा मन्दी के समय (UPBoardSolutions.com) सार्वजनिक व्यय में वृद्धि करके क्रय-विक्रय को बढ़ाती है।

7. सामरिक क्षेत्र में महत्त्व – आज विश्व में अशान्ति के बादल मँडरा रहे हैं। प्रत्येक देश युद्ध के लिए नये-नये वैज्ञानिक अस्त्र-शस्त्र तैयार करने में लगा हुआ है। बाह्य आक्रमणों से देश की सुरक्षा के लिए सैन्य शक्ति व हथियारों पर व्यय करना आवश्यक है। आज वही सरकार सामरिक क्षेत्र में सबल है, जिसकी सार्वजनिक आय अधिक है; अतः राजस्व का महत्त्व आज और भी बढ़ गया है।

प्रश्न 2.
केन्द्रीय सरकार की आय के स्रोतों का वर्णन कीजिए। [2014]
          या
केन्द्र सरकार द्वारा लगाये जाने वाले किन्हीं तीन करों का वर्णन कीजिए। [2013, 17, 18]
उत्तर :

केन्द्रीय सरकार की आय के स्रोत

केन्द्रीय सरकार की आय के स्रोतों को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा जा सकता है – (i) कर राजस्व अर्थात् कर क्षेत्र से प्राप्त आय तथा (ii) कर भिन्न राजस्व अर्थात् गैर-कर क्षेत्र से प्राप्त आय। इसके अतिरिक्त केन्द्र सरकार की आय के स्रोतों में पूँजी प्राप्तियाँ भी हैं। पूँजी प्राप्तियों के अन्तर्गत ऋणों की वसूलियाँ, अन्य प्राप्तियाँ (विदेशी सहायता), उधार व अन्य देयताएँ, हुण्डियाँ आदि सम्मिलित रहती हैं। प्रस्तुत प्रश्न के अन्तर्गत कर व गैर-कर से प्राप्त आय का ही वर्णन किया जाएगा –

कर राजस्व से प्राप्त आय कर राजस्व के अन्तर्गत आने वाले प्रमुख करों का विवरण निम्नलिखित है –

1. आयकर – आयकर केन्द्र सरकार की आय का महत्त्वपूर्ण स्रोत है, परन्तु वित्त आयोग की सिफारिश के अनुसार इसका एक निश्चित भाग राज्य सरकारों में वितरित किया जाता है। भारत में सर्वप्रथम 1950 ई० में आयकर लगाया गया था। कर की छूट सीमा उस समय र 2,000 वार्षिक थी। वर्ष 2012-13 के बजट में है 2,00,000.00 तक की वार्षिक आय को कर-मुक्त रखा गया है।

2. निगम कर – कम्पनियों पर लगे आयकर को ‘निगम कर’ कहते हैं। निगम कर में आय की भाँति छूट की कोई सीमा नहीं होती। इसके अतिरिक्त इसकी दरें प्रायः समानुपातिक होती हैं। वर्ष 2012-13 के लिए यह दर 30% है तथा इस पर 10 प्रतिशत अधिभार भी देय होगा।

3. केन्द्रीय उत्पादन कर – ये कर केन्द्र सरकार द्वारा देश में उत्पादित वस्तुओं पर लगाये जाते हैं। यह सीमेण्ट, कपड़ा, बिजली का सामान, मिट्टी का तेल, पेट्रोल, डीजल, रेफ्रीजरेटर, टेलीविजन, तम्बाकू, चाय, कॉफी, जूट व रेशम के सामान (UPBoardSolutions.com) आदि के उत्पादन पर लगाया जाता है। वर्तमान समय में यह केन्द्रीय सरकार की आय का सबसे महत्त्वपूर्ण साधन है। इस कर-प्रणाली के अन्तर्गत पहले केवल 15 वस्तुओं पर कर लगाया जाता था, परन्तु वर्तमान समय में 1,300 से अधिक वस्तुओं को इस करे-व्यवस्था के अन्तर्गत लाया गया है।

4. सीमा-शुल्क – सीमा शुल्क में आयात-कर व निर्यात-कर आते हैं। आयात-कर विदेशों से मँगाये गये माल पर तथा निर्यात-कर अपने देश से बाहर वस्तु को भेजने पर लगाया जाता है। सीमा-शुल्क केन्द्र सरकार की आय का महत्त्वपूर्ण स्रोत होता है।

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5. सम्पत्ति कर – भारत में यह कर प्रो० कॉल्डर की सिफारिश पर 1 अप्रैल, 1957 ई० में लगाया गया था। सम्पत्ति कर का प्रशासन आयकर विभाग द्वारा ही चलाया जाता है। यह कर व्यक्तियों की है 10 लाख से अधिक की सम्पत्ति पर लगाया जाता है। इस कर से कृषि भूमि, धार्मिक स्थानों की सम्पत्ति, बीमा व विकास बॉण्ड, प्रॉविडेण्ट फण्ड आदि को मुक्त रखा गया है।

6. सेवा कर – यह कर विभिन्न प्रकार की प्रत्त सेवाओं पर लगाया जाता है। इसकी दर 12% है। वर्ष 2006-07 के बजट में चार लाख रुपये तक के वार्षिक टर्न ओवर को इससे मुक्त रखा गया है। उपर्युक्त मुख्य करों के अतिरिक्त केन्द्रीय सरकार को –

  1. ब्याज कर
  2. व्यय कर
  3. आस्ति कर या मृत्यु कर (सन् 1953 में आरोपित और 1985-86 ई० में समाप्त)
  4. उपहार कर (सन् 1958 में आरोपित और 1999-2000 ई० में समाप्त, वर्तमान में प्राप्तकर्ता की आय में सम्मिलित)
  5. अन्य कर और शुल्क
  6. संघ-राज्य क्षेत्रों के कर से भी आय प्राप्त होती है।

गैर – कर राजस्व से प्राप्त आय – इनके अन्तर्गत आने वाले प्रमुख करों का विवरण निम्नलिखित है –

1. ब्याज प्राप्तियाँ – केन्द्र सरकार राज्यों, केन्द्रशासित प्रदेशों एवं केन्द्रीय प्रतिष्ठानों को ऋण देती है। इन ऋणों पर ब्याज की प्राप्ति होती है, जो उसकी आय का एक स्रोत है।

2. मुद्रा, सिक्का ढलाई एवं टकसाल – केन्द्र सरकार को नोट छापने एवं सिक्का ढलाई का एकाधिकार प्राप्त है। इससे भी उसको आय प्राप्त होती है।

3. लाभांश व लाभ – इसके अन्तर्गत भारतीय रिजर्व बैंक, अन्य राष्ट्रीयकृत (UPBoardSolutions.com) व्यापारिक बैंक व केन्द्र सरकार के व्यावसायिक उपक्रमों से प्राप्त लाभ को सम्मिलित किया जाता है।

4. सामान्य सेवाओं से आय – इस मद के अन्तर्गत लोक सेवा आयोग, पुलिस, रेल, रक्षा-सेवाएँ आदि | मदों से प्राप्त आय सम्मिलित की जाती है।

5. सार्वजनिक उपक्रमों से आय – इसमें सार्वजनिक प्रतिष्ठानों से प्राप्त आय सम्मिलित होती हैं; जैसे–इण्डियन ऑयल, प्राकृतिक तेल एवं गैस आयोग, राज्य व्यापार निगम, डाक तार, रेल आदि से प्राप्त आय।

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6. सामाजिक एवं सामुदायिक सेवाएँ – सामाजिक व सामुदायिक सेवाओं में मुख्य हैं – शिक्षा, चिकित्सा, परिवार नियोजन, सफाई व जल आपूर्ति, आवास, नगर विकास, सूचना एवं प्रसार, सामाजिक सुरक्षा व कल्याण आदि। इनसे भी केन्द्र सरकार को आय प्राप्त होती है।

7. आर्थिक सेवाएँ – इनमें मुख्य रूप से सहकारिता, कृषि, लघु सिंचाई, भू-संरक्षण, पशुपालन, डेयरी विकास, मत्स्य उद्योग, ग्रामोद्योग व लघु उद्योग, खनन व खनिज पदार्थ, बहुउद्देशीय नदी-घाटी योजनाएँ, विद्युत विकास सेवाएँ, सड़कें, पुल आदि आते हैं। इन सेवाओं से भी केन्द्र सरकार को आय प्राप्त होती है।

प्रश्न 3.
केन्द्रीय सरकार के व्यय की मुख्य मदों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

केन्द्रीय सरकार के व्यय की मदें

स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत सरकार के व्यय में पर्याप्त वृद्धि हुई है। केन्द्रीय सरकार के व्यय को मुख्यत: दो भागों में बाँटा जा सकता है –

  1. विकास व्यय तथा
  2. गैर-विकास व्यय।

1. विकास व्यय – इनमें मुख्य हैं—शिक्षा, वैधानिक सेवाएँ, अनुसन्धान, कला, संस्कृति, चिकित्सा, परिवार कल्याण तथा स्वास्थ्य, श्रम एवं रोजगार, प्रसारण, कृषि एवं सम्बद्ध सेवाएँ, उद्योग व खनिज, विदेशी व्यापार व निर्यात प्रोत्साहन, जल व (UPBoardSolutions.com) शक्ति का विकास, परिवहन एवं संचार, राज्यों को विकास अनुदान, सामान्य सेवाएँ व अन्य व्यय आदि। इन्हें आयोजना व्यय भी कहा जाता है।

2. गैर-विकास व्यय – इनमें मुख्य हैं—सुरक्षा व्यय, प्रशासनिक सेवाएँ, राज्यों को गैर-विकास
अनुदान, स्थानीय संस्थाओं को क्षतिपूर्ति, अन्य देशों के साथ तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग, ऑडिट, करों व शुल्कों के एकत्रीकरण पर व्यय, करेन्सी, टकसाल एवं ब्याज भुगतान आदि। इन्हें आयोजना-भिन्न व्यय भी कहा जाता है।

संक्षेप में, केन्द्र सरकार की व्यय की मुख्य मदों का विवरण निम्नलिखित है –

1. सुरक्षा या प्रतिरक्षा व्यय – इसके अन्तर्गत जल सेना, थल सेना व वायु सेना पर किया जाने वाला व्यय सम्मिलित होता है। गत वर्षों में सुरक्षा व्यय में तेजी से वृद्धि हुई है। देश की एकता व अखण्डता को बनाये रखने के लिए सरकार इस मद में पर्याप्त राशि व्यय करती है।

2. विकास योजनाओं पर व्यय – आर्थिक विकास के विभिन्न कार्यक्रमों को चलाने के लिए केन्द्र सरकार को बहुत अधिक व्यय करना पड़ता है। व्यय की मुख्य मदें हैं—शिक्षा, कला, संस्कृति, अनुसन्धान, चिकित्सा, परिवार कल्याण एवं स्वास्थ्य, श्रम व रोजगार, उद्योग व खनिज, विदेशी व्यापार व निर्यात, जल व शक्ति विकास, राज्यों को अनुदान, रेलें, डाक व तार, कृषि व सम्बद्ध सेवाएँ आदि

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3. प्रशासनिक सेवाएँ – प्रशासनिक व्यय के अन्तर्गत केन्द्र सरकार के प्रशासनिक कर्मचारियों के वेतन, भत्ते, विभिन्न मन्त्रालयों के खर्चे, सामान्य प्रशासन, पुलिस, न्याय इत्यादि क्षेत्रों पर किये जाने वाले व्यय सम्मिलित किये जाते हैं। विभिन्न देशों में (UPBoardSolutions.com) स्थित भारतीय दूतावासों के व्यय भी इसी के अन्तर्गत आते हैं। इस मद में केन्द्रीय सरकार को बड़ी राशि व्यय करनी पड़ती है।

4. ऋण सेवाएँ – केन्द्र सरकार विभिन्न देशी व विदेशी ऋणों पर ब्याज का भुगतान करती है।

5. राज्यों के अनुदान – केन्द्र सरकार राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों को विकासात्मक एवं गैर-विकासात्मक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अनुदान देती है। संघ राज्य क्षेत्रों के विकास के लिए जो योजनाएँ निर्मित की जाती हैं, उनके क्रियान्वयन के लिए भी केन्द्र सरकार ही अपने वित्तीय साधनों से व्यय करती है।

6. करों व शुल्क-संग्रह पर व्यय – केन्द्र सरकार को करों व शुल्कों की वसूली हेतु भी पर्याप्त व्यय करना पड़ता है।

7. करेन्सी व टकसाल – केन्द्र सरकार करेन्सी के छापने व सिक्कों को ढालने पर भी बहुत अधिक व्यय करती है।

8. स्थानीय निकायों की सहायता – केन्द्र सरकार स्थानीय निकायों, नगर निगम, नगर महापालिका, नगरपालिका, जिला प्रशासन आदि की सहायता हेतु भी पर्याप्त धनराशि का व्यय करती है।

9. पेंशन तथा आकस्मिक व्यय – केन्द्र सरकार अवकाश प्राप्त कर्मचारियों, अधिकारियों एवं स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों की पेंशन पर पर्याप्त व्यय करती है। इसके अतिरिक्त सरकार को कभी-कभी ऐसे आकस्मिक व्यय भी करने पड़ते हैं, जिनका उसे पहले से पता नहीं होता। उपर्युल्लिखित मदों के अतिरिक्त केन्द्र सरकार–

  1. विज्ञान-प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण
  2. परिवहन
  3. ग्रामीण विकास
  4. राज्यों को अंशदान
  5. सरकारी उद्यमों को ऋण
  6. विदेशी सरकारों को अनुदान
  7. किसानों को ऋण-राहत
  8. आर्थिक सहायता आदि के व्यय की मदें हैं। इन मदों पर (UPBoardSolutions.com) भी सरकार पर्याप्त राशि का व्यय करती है।

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प्रश्न 4.
प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष करों को परिभाषित कीजिए एवं उनके गुण-दोष लिखिए।
          या
अप्रत्यक्ष करों के चार गुणों का वर्णन कीजिए। [2011]
          या
परोक्ष कर क्या है ? इनके तीन दोष लिखिए।
          या
प्रत्यक्ष कर को परिभाषित कीजिए तथा उसके गुण एवं दोषों की समीक्षा कीजिए। [2016]
उत्तर :
‘कर’ सरकारी अधिकारियों द्वारा वसूल किये जाने वाले वे अनिवार्य अंशदान हैं, जो सार्वजनिक व्यय को पूरा करने के लिए किये जाते हैं। ये (कर) दो प्रकार के होते हैं—

  1. प्रत्यक्ष कर तथा
  2. अप्रत्यक्ष कर।

प्रत्यक्ष कर

प्रत्यक्ष कर जिस व्यक्ति पर लगाये जाते हैं, उसका भुगतान उसी व्यक्ति द्वारा किया जाता है; अर्थात् जो कर व्यक्तियों पर सीधे लगाये जाते हैं, उन्हें प्रत्यक्ष कर कहते हैं। करदाता इसका भार दूसरों पर नहीं टाल सकता। ये परोक्ष कर भी कहलाते हैं।

गुण – प्रत्यक्ष करों के गुण निम्नलिखित हैं

1. न्यायपूर्ण – प्रत्यक्ष कर न्यायपूर्ण होते हैं, क्योंकि ये व्यक्तियों की करदान क्षमता के आधार पर लगाये जाते हैं। इन करों का भार धनी वर्ग पर अधिक तथा निर्धन पर कम पड़ता है।

2. मितव्ययता – प्रत्यक्ष करों में मितव्ययता पायी जाती है, (UPBoardSolutions.com) क्योंकि इन करों को वसूल करने में राज्य को अधिक व्यय नहीं करना पड़ता है। करदाता इन्हें सीधे राजकोष में जमा करता है।

3. निश्चितता – प्रत्यक्ष करों में निश्चितता का गुण भी पाया जाता है, क्योंकि इन करों के सम्बन्ध में करदाता को पूर्ण जानकारी रहती है कि उसे कितनी मात्रा में कर देना है।

4. लोचता – प्रत्यक्ष कर लोचदार होते हैं। सरकार इन करों में आवश्यकतानुसार परिवर्तन कर सकती है।

5. नागरिक चेतना – प्रत्यक्ष कर नागरिक स्वयं जमा करता है। अतः वह यह जानने का प्रयास करता है कि दिये गये कर का उपयोग सार्वजनिक हित के कार्यों में हो रहा है अथवा नहीं। इस प्रकार कर का भुगतान करने से व्यक्ति में आदर्श नागरिकता एवं कर्तव्यपरायणता की भावना जाग्रत होती है।

6. उत्पादकता – प्रत्यक्ष कर उत्पादक होते हैं। करों की मात्रा में थोड़ी-सी वृद्धि से ही अधिक आय प्राप्त हो जाती है, जिसका उपयोग देश के आर्थिक विकास में किया जा सकता है।

7. समानता – प्रत्यक्ष कर आर्थिक असमानता को दूर करने का प्रयास करते हैं।

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दोष – प्रत्यक्ष करों के दोष निम्नलिखित हैं –

1. करों की चोरी – प्रत्यक्ष करों का भुगतान व्यक्ति ईमानदारी के साथ नहीं करते। समाज में अधिक आय प्राप्त करने वाले वर्ग झूठे हिसाब-किताब बनाकर व अपनी आय कम प्रदर्शित करके करों से बचने का प्रयास करते हैं।

2. असुविधाजनक – प्रत्यक्ष कर असुविधाजनक व कष्टप्रद होते हैं। करदाता को आय-व्यय का विवरण तैयार कर अधिकारी के सम्मुख प्रस्तुत करना पड़ता है तथा उसे पूर्णरूप से सन्तुष्ट करना पड़ता है।

3. बेईमानी को प्रोत्साहन – प्रत्यक्ष कर का भार सच्चे व ईमानदार व्यक्तियों पर (UPBoardSolutions.com) अधिक पड़ता है, क्योंकि बेईमान व्यक्ति झूठे हिसाब-किताब व रिश्वत द्वारा इन करों से बच जाते हैं इस प्रकार इन करों से बेईमानी व भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन मिलता है।

4. करों की मनमानी दरें – प्रत्यक्ष करों की दरें सरकार स्वेच्छापूर्वक निर्धारित करती है। इन करों के निर्धारण में किसी प्रकार का वैधानिक आधार नहीं होता है। राज्य या सरकार द्वारा करारोपण की उच्च दरों से प्रभावित होकर लोग अपने उत्पादन-कार्य को सीमित कर देते हैं।

5. प्रत्यक्ष कर निर्धन वर्ग पर नहीं लगाये जा सकते – प्रत्यक्ष कर सभी नागरिकों के ऊपर नहीं लगाये जाते। एक निश्चित सीमा से कम आय वाले लोग इन करों से मुक्त रहते हैं  नैतिक दृष्टि से यह उचित नहीं है, क्योंकि इससे समाज धनी एवं निर्धन वर्ग में विभक्त हो जाता है।

6. सीमित क्षेत्र – प्रत्यक्ष कर कुछ व्यक्तियों से लिया जाता है। इस प्रकार आय के लिए समाज के कुछ थोड़े-से व्यक्तियों (धनी वर्ग) पर ही निर्भर रहना पड़ता है।

7. अफसरशाही – प्रत्यक्ष करों के सम्बन्ध में अधिकांश निर्णय अधिकारियों द्वारा (UPBoardSolutions.com) लिये जाते हैं। निर्णय करने में अधिकारीगण भ्रष्ट तरीके अपनाते हैं, जिससे समाज में भ्रष्टाचार का बोलबाला हो जाता है।

अप्रत्यक्ष कर

अप्रत्यक्ष कर वे कर होते हैं, जिनका कराधान एक व्यक्ति पर तथा कर भार दूसरे व्यक्ति पर पड़ता है; अर्थात् सरकार द्वारा जिस व्यक्ति पर कर लगाया जाता है, वह केर के भार को दूसरे व्यक्ति के ऊपर टाल देता है। ये अपरोक्ष कर भी कहलाते हैं।

गुण – अप्रत्यक्ष करों के गुण निम्नलिखित हैं –

1. सुविधाजनक – अप्रत्यक्ष कर सुविधाजनक होते हैं, क्योंकि करदाता को भुगतान करते समय इस बात का आभास नहीं होता कि वह कर का भुगतान कर रहा है। ये वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य में ही सम्मिलित रहते हैं। सरकार के लिए भी ये सुविधाजनक रहते हैं, क्योंकि वह इन करों को उत्पादकों या व्यापारियों से एकमुश्त सरलतापूर्वक प्राप्त कर लेती है।

2. करवंचन कठिन होता है – करदाता अप्रत्यक्ष करों की चोरी नहीं कर पाता, क्योंकि ये वस्तुओं के मूल्य में सम्मिलित होते हैं। जब कोई उपभोक्ता वस्तुएँ खरीदता है, तो उसे ये आवश्यक रूप से देने पड़ते हैं।

3. न्यायपूर्ण – ये कर न्यायपूर्ण होते हैं, क्योंकि समाज का प्रत्येक व्यक्ति इन (UPBoardSolutions.com) करों का भुगतान करता है। जो व्यक्ति अधिक वस्तुओं एवं सेवाओं का उपयोग करता है, उसे अधिक तथा जो वस्तुओं एवं सेवाओं का कम प्रयोग करता है, उसे कम भुगतान करना पड़ता है।

4. सामाजिक हित की दृष्टि से उत्तम – अप्रत्यक्ष कर सामाजिक लाभ की दृष्टि से उत्तम होते हैं, क्योंकि सरकार करों की मात्रा में वृद्धि करके उस प्रकार की उपभोग वस्तुओं के प्रयोग को हतोत्साहित करे सकती है, जिनका समाज पर कुप्रभाव पड़ता है।

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5. लोचदार – अप्रत्यक्ष करों की प्रकृति लोचदार होती है। आवश्यक वस्तुओं पर कर में थोड़ी-सी वृद्धि करके सरकार अपनी आय में वृद्धि कर सकती है।

6. विस्तृत आधार – अप्रत्यक्ष करों का आधार विस्तृत होता है, क्योंकि सरकार अनेक मदों पर थोड़ी-थोड़ी मात्रा में कर लगाकर अधिक आय प्राप्त करने में सफल होती है।

दोष – अप्रत्यक्ष करों के दोष निम्नलिखित हैं

1. कर-भार परिवर्तन से हानि – अप्रत्यक्ष करों में कर का भार एक-दूसरे पर टालने का प्रयास किया जाता है, जिसके कारण अन्तिम व्यक्ति पर इन करों का भार अधिक पड़ता है उदाहरण के लिएबिक्री-कर फर्म देती है। फर्म इसका भार थोक व्यापारियों पर, थोक व्यापारी फुटकर व्यापारी पर तथा फुटकर व्यापारी मूल्य-वृद्धि करके उपभोक्ताओं पर टाल देता है।

2. मितव्ययिता का अभाव – इन करों को वसूल करने में सरकार को अधिक व्यय करना पड़ता है। इस कारण ये मितव्ययी नहीं होते।

3. न्यायसंगत नहीं – अप्रत्यक्ष कर प्रायः वस्तुओं एवं सेवाओं के उपभोग पर (UPBoardSolutions.com) लगाये जाते हैं। इसलिए इनको भार निर्धन वर्ग पर अधिक पड़ता है।

4. ये कर अनिश्चित होते हैं – परोक्ष करों से होने वाली आय अनिश्चित होती है, क्योंकि अप्रत्यक्ष कर वस्तुओं की बिक्री की मात्रा पर निर्भर होते हैं। उपभोक्ताओं की माँग का पूर्वानुमान प्राय: लगाना कठिन होता है; अतः यह कहा जा सकता है कि अप्रत्यक्ष कर अनिश्चित होते हैं।

5. करों की चोरी का प्रयास – अप्रत्यक्ष करों की चोरी का प्रयास भी किया जाता है। उदाहरण के लिए–सरकार बिक्री-कर लगाती है। विक्रेता वस्तुओं की बिक्री का झूठा लेखा-जोखा रखता है तथा बिक्री-कर को राजकोष में जमा नहीं करता है, जब कि उपभोक्ताओं से यह वसूल कर लिया जाता है।

6. नागरिकता की भावना का अभाव – करदाताओं को अप्रत्यक्ष करों का भुगतान करते समय कर-भार अनुभव नहीं होता है। इसलिए उन्हें इस विषय में किसी प्रकार की रुचि नहीं होती है कि कर का उपभोग जनहित की दृष्टि से हो रहा है या नहीं।

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7. प्रभावपूर्ण माँग में कमी – अप्रत्यक्ष करों की दरों में वृद्धि करने से वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं, जिनके कारण वस्तुओं की माँग में कमी आती है। माँग में कमी का प्रभाव उत्पादन एवं राष्ट्रीय आय दोनों पर पड़ता है, जिससे राष्ट्र के विकास में बाधा पड़ती है।

प्रश्न 5.
राज्य सरकार की आय के मुख्य स्रोत क्या हैं ? [2014, 15, 17, 18]
उत्तर :
राज्य सरकार को विभिन्न मदों से प्राप्त होने वाली आय को मुख्य रूप से दो भागों में विभक्त किया जा सकता है –

  1. कर-राजस्व तथा
  2. गैर-कर राजस्व। प्रदेश की आय में गैर-करे राजस्व की अपेक्षा कर राजस्व का अधिक योगदान है।

राज्य सरकार की आय की मदों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –

1. भू-राजस्व या मालगुजारी – यह एक अति प्राचीन कर है। सन् 1948 ई० तक कुल आय का लगभग आधा भाग भू-राजस्व या मालगुजारी से प्राप्त होता था। जमींदारी प्रथा के उन्मूलन के बाद इस मद से प्राप्त होने वाली आय में धीरे-धीरे कमी होने लगी। इसका भुगतान फसल के समय किया जाता है। सूखा, बाढ़ या अन्य प्राकृतिक विपदा से फसल नष्ट होने पर भू-राजस्व में उदारतापूर्वक छूट भी दी जाती है। वर्तमान में 6.5 एकड़ से अधिक भूमि पर भू-राजस्व लिया जाता है।

2. व्यापारकर या बिक्री कर – ‘बिक्री कर’ या व्यापार कर राज्य सरकार की आय का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। यह एक अप्रत्यक्ष कर है, जिसे 1948 ई० में उत्तर प्रदेश में लागू किया गया था। यह विभिन्न वस्तुओं की बिक्री पर लगाया जाता है, किन्तु विक्रेता इसके भार को मूल्य में वृद्धि करके क्रेताओं पर टाल देते हैं।

3. राज्य उत्पादन शुल्क – ‘राज्य उत्पादन शुल्क राज्य की आय का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। यह एक परोक्ष कर है, जिसे सामान्यतः ऊँची दरों में मादक वस्तुओं; जैसे-शराब, गाँजा, अफीम, चरस, ताड़ी आदि पर लगाया जाता है। प्रदेश सरकार को इस मद से पर्याप्त आय प्राप्त होती है।

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4. स्टाम्प व पंजीयन शुल्क – ‘स्टाम्प शुल्क’ प्राय: दो प्रकार का होता है –

  • न्यायिक स्टाम्प एवं
  • व्यापारिक स्टाम्प।

न्यायिक स्टाम्प न्यायालय में मुकदमा या अन्य कार्यवाही के लिए लगाया जाता है, जब कि व्यापारिक स्टाम्प सम्पत्ति के हस्तान्तरण, उपहार अथवा व्यापारिक सौदों पर लगाया जाता, है इसी प्रकार पंजीयन शुल्क (रजिस्ट्री शुल्क) भी राज्य सरकार की आय का एक महत्त्वपूर्ण साधन है।

5. कृषि आयकर – कृषि आयकर राज्य सरकार की आय का प्रमुख स्रोत है। भारत के अनेक राज्यों में कृषि को आयकर से मुक्त रखा गया है, किन्तु उत्तर प्रदेश सरकार कृषि क्षेत्र पर कर लगाती है। जमींदारी उन्मूलन के बाद से कृषि आयकर से प्राप्त आय में पर्याप्त कमी (UPBoardSolutions.com) हुई है और अब यह नाममात्र का स्रोत रह गया है। जिन व्यक्तियों की आय आयकर अधिनियम के अन्तर्गत न्यूनतम सीमा से कम होती है, उन्हें कृषि-आय पर कर नहीं देना पड़ता, परन्तु जिनकी आय अधिक होती है उन्हें कृषि आयकर देना पड़ता है।

6. केन्द्र सरकार से अनुदान या सहायता – केन्द्र सरकार आयकर, केन्द्रीय उत्पाद कर, सम्पदा शुल्क आदि से प्राप्त आय का कुछ भाग वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर राज्यों में वितरित करती है। केन्द्र सरकार द्वारा राज्यों को आर्थिक विकास कार्यों के लिए भी सहायता दी जाती है। इसके अतिरिक्त राज्यों को कभी-कभी बाढ़, सूखा या अन्य प्राकृतिक विपदाओं से निपटने के लिए भी केन्द्र द्वारा विशेष सहायता प्रदान की जाती है। ये राज्य सरकार की आय के प्रमुख स्रोत होते हैं।

7. वाहन कर – मोटर, ट्रकों इत्यादि परिवहन वाहनों पर राज्य सरकार द्वारा कर लगाया जाता है। यह राज्य सरकारों विशेषकर उत्तर प्रदेश सरकार की आय का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

8. मनोरंजन कर – राज्य सरकार द्वारा मनोरंजन स्थलों, सिनेमाघर आदि पर मनोरंजन कर लगाया जाता | है। यह भी राज्य सरकारों विशेषकर उत्तर प्रदेश सरकार की आय का एक अच्छा स्रोत है। उपर्युक्त करों के अतिरिक्त राज्य सरकार को माल एवं यात्रियों पर कर, विद्युत कर और शुल्क आदि से भी पर्याप्त आय प्राप्त होती है। ये सभी राज्य सरकार की कर राजस्व की मदे हैं। निम्नलिखित मदें राज्य सरकार की गैर-कर राजस्व प्राप्ति की मदें हैं

9. सरकारी उपक्रमों से आय – राज्य सरकारों (उत्तर प्रदेश सरकार) को सरकारी उपक्रमों; जैसे—वन, सिंचाई, बिजली, सार्वजनिक निर्माण, सार्वजनिक उद्योगों से भी आय प्राप्त होती है। सड़क परिवहन व जल परिवहन भी राज्य की आय के मुख्य स्रोत हैं।

10. सामान्य प्रशासन – सामान्य प्रशासन के अन्तर्गत न्यायालय, जेल, पुलिस, शिक्षा, चिकित्सा, कृषि, सहकारिता इत्यादि क्षेत्र आते हैं। इनसे भी राज्य सरकार को आय प्राप्त होती है।

11. ब्याज प्राप्तियाँ, लाभांश और लाभ – प्रदेश सरकार को अपने द्वारा दिये गये ऋणों पर ब्याज तथा सरकारी क्षेत्र के उद्यमों से लाभांश व लाभ प्राप्त होता है। इस प्रकार ब्याज प्राप्तियाँ, लाभांश और लाभ द्वारा भी प्रदेश सरकार को आय होती है।

12. मूल्य संवद्धित कर – यह वस्तुओं और सेवाओं के आदान-प्रदान के प्रत्येक बिन्दु पर प्राथमिक उत्पादन से लेकर अन्तिम उपभोग पर लगाया जाता है। यह उत्पाद की बिक्री और उनमें प्रयुक्त आदाओं की लागतों के अन्तर पर लगाया जाता है। इक्कीस राज्य एवं सभी केन्द्रशासित प्रदेश 1 अप्रैल, 2005 ई० से इसे लागू करने पर सहमत हुए। उत्तर प्रदेश में इसे कुछ समय पहले ही लागू किया गया है।

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प्रश्न 6.
उत्तर प्रदेश सरकार की व्यय की मदों का उल्लेख कीजिए।
          या
राज्य सरकार की व्यय की किन्हीं तीन मदों का उल्लेख कीजिए। [2013]
उत्तर :
उत्तर प्रदेश सरकार के राजस्व व्यय को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है

(अ) आयोजनागत व्यय – इसके अन्तर्गत मुख्य रूप से करों की वसूली का व्यय, प्रशासनिक सेवाओं पर व्यय एवं सामाजिक, सामुदायिक तथा आर्थिक सेवाओं पर हुए व्यय सम्मिलित किये जाते हैं।
(ब) आयोजनेतर व्यय – इसके अन्तर्गत मुख्य रूप से करों की वसूली, ब्याज को भुगतान, ऋण सेवा, सामान्य प्रशासनिक सेवाएँ एवं सामाजिक, सामुदायिक तथा आर्थिक सेवाओं पर किये जाने वाले व्यय सम्मिलित किये जाते हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार की व्यय की मुख्य मदें निम्नलिखित हैं –

1. कर-शुल्क व अन्य राजस्वों की वसूली – इस मद के अन्तर्गत कृषि आयकर, भू-राजस्व, राज्य उत्पादन कर, वाहन कर, बिक्री कर, स्टाम्प, रजिस्ट्री शुल्क, मनोरंजन कर इत्यादि की वसूली में होने वाले व्ययं सम्मिलित किये जाते हैं। सरकार को इन्हें वसूल करने (UPBoardSolutions.com) में पर्याप्त व्यय.करना पड़ता है।

2. सार्वजनिक या सामान्य प्रशासन पर व्यय – सार्वजनिक प्रशासन के अन्तर्गत न्याय, जेल, पुलिस, चिकित्सा इत्यादि विभागों के प्रशासनिक व्यय सम्मिलित होते हैं। सामान्य प्रशासन में विधानमण्डल, राज्यपाल, मन्त्रिपरिषद् के निर्वाचन एवं वेतन-भत्ते के व्यय, सचिवालय, लोक सेवा आयोग, जिला प्रशासन, कोषागार, सार्वजनिक निर्माण कार्य पर होने वाले मदों को सम्मिलित किया जाता है। पेंशन तथा प्रकीर्ण सेवाओं पर होने वाले व्ययों को भी इसी मद में रखा जाता है।

3. ब्याज भुगतान व ऋण सेवा – सरकार समय-समय पर अपने अतिरिक्त व्ययों की पूर्ति के लिए ऋण लेती है। इन ऋणों के भुगतान एवं ब्याज के भुगतान पर भी सरकार को प्रति वर्ष व्यय करना पड़ता है। उपर्युक्त व्यय प्रदेश सरकार द्वारा गैर-योजनागत मद के अन्तर्गत किये जाते हैं। प्रदेश सरकार द्वारा किये गये अग्रलिखित व्यय योजनागत मदों के अन्तर्गत किये जाते हैं –

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4. सामाजिक, सामुदायिक एवं आर्थिक सेवाएँ तथा सहायक अनुदान – इसके अन्तर्गत मुख्य रूप से शिक्षा, कला, संस्कृति, चिकित्सा, सार्वजनिक स्वास्थ्य व परिवार कल्याण, श्रम और सेवायोजन, सहकारिता, कृषि, सिंचाई, भू-संरक्षण, क्षेत्र विकास, पशुपालन, वन, सामुदायिक विकास, उद्योग व खनिज, जलविद्युत, परिवहन एवं संचार, विशेष व पिछड़े हुए क्षेत्र आदि मदें सम्मिलित की जाती हैं। इन मदों पर सरकार द्वारा पर्याप्त व्यय किया जाता है।

5. शिक्षा, कला एवं संस्कृति – शिक्षा के अन्तर्गत प्राथमिक, माध्यमिक व उच्च शिक्षा, तकनीकी, प्रावैगिक व चिकित्सा शिक्षा आते हैं। इसके अतिरिक्त सांस्कृतिक विकास पर भी सरकार पर्याप्त व्यय करती है।

6. कृषि-सम्बन्धी विकास – कृषि विकास कार्यक्रमों के अन्तर्गत मुख्य रूप से कृषि, पशुपालन, सहकारिता, लघु सिंचाई, भू-संरक्षण, मत्स्यपालन, डेयरी उद्योग इत्यादि मदों को सम्मिलित करते हैं। उत्तर प्रदेश सरकार इन मदों पर प्रति वर्ष अरबों रुपये व्यय करती है।

7. चिकित्सा, सार्वजनिक स्वच्छता, स्वास्थ्य व परिवार कल्याण – उत्तर प्रदेश सरकार चिकित्सा, परिवार नियोजन व सार्वजनिक स्वच्छता एवं स्वास्थ्य व परिवार कल्याण पर प्रति वर्ष पर्याप्त धनराशि व्यय करती है।

8. सामुदायिक विकास सेवाएँ – राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर सामाजिक व आर्थिक असमानताओं को कम करने के लिए अनेक कल्याणकारी कार्यक्रम संचालित किये जाते हैं, जिन पर उसे अत्यधिक धनराशि का व्यय करना पड़ता है।

9. उद्योग व खनिज – उद्योग व खनिज विकास पर उत्तर प्रदेश सरकार प्रति वर्ष करोड़ों रुपये व्यय करती है।

10. जल-विद्युत एवं विकास – राज्य द्वारा ग्रामीण विद्युतीकरण की नीति को लागू करने हेतु तथा पेयजल समस्या को दूर करने के लिए अनेक कार्यक्रम चलाये गये हैं। नदी-घाटी योजनाएँ, नलकूप निर्माण, ताप बिजलीघरों की स्थापना आदि विकास-कार्यक्रमों पर सरकार द्वारा अत्यधिक व्यय किया जाता है।

11. परिवहन व संचार – तार, वायरलेस, राजकीय परिवहन व संचार की मदों पर भी उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पर्याप्त व्यय किया जाता है।

12. विशेष एवं पिछड़े हुए क्षेत्र – प्रदेश के विशेष रूप से पिछड़े या विशेष क्षेत्रों पर भी सरकार अत्यधिक व्यय करती है। इन क्षेत्रों के विभिन्न विकास-कार्यक्रमों पर राज्य सरकार द्वारा अतिरिक्त धनराशि का व्यय किया जाता है।

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प्रश्न 7.
उत्तर प्रदेश में जिला परिषदों की आय के स्रोतों एवं व्यय की प्रमुख मदों का वर्णन कीजिए।
          या
जिला परिषदों के व्यय की तीन मदें लिखिए।
उत्तर :
जिला परिषदों के कार्य-क्षेत्र के अन्तर्गत जिले का सम्पूर्ण ग्रामीण क्षेत्र आता है। इन परिषदों के मुख्य कार्य सड़कों का निर्माण व मरम्मत, शिक्षा की व्यवस्था, मानव, व पशु चिकित्सालयों की व्यवस्था, दुर्भिक्ष निवारण कार्य, विश्रामगृहों की स्थापना, प्रशिक्षण व्यवस्था, (UPBoardSolutions.com) मेलों पर नियन्त्रण, बाजार आदि की व्यवस्था, सफाई आदि हैं।

जिला परिषद् की आय के स्रोत

जिला परिषद् की आय के प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं –

1. भूमि उप-कर – जिला परिषदों की आय का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत भूमि उप-कर है। यह मालगुजारी पर अधिभार होता है, जिसको राज्य सरकारें स्थानीय संस्थाओं के लिए एकत्रित करती हैं। उत्तर प्रदेश में इस उप-कर को मालगुजारी में विलीन कर दिया गया है और इसके बदले में राज्य सरकार जिला परिषदों को क्षतिपूर्ति अनुदान देती है।

2. सम्पत्ति कर – यह मनुष्य की कुल सम्पत्ति अथवा आय के आधार पर लगाया जाता है। इस कर की प्रकृति प्रगतिशील होती है।

3. महसूल या मार्ग शुल्क – जिला परिषद् नदी के घाट, पुल, सड़क एवं तालाबों पर कर (महसूल) | लेती है। जो व्यक्ति अपने पशु अथवा वाहन से इन पुलों, सड़कों या घाटों से आते-जाते हैं, उन्हें यह मार्ग शुल्क देना पड़ता है।

4. काँजी हाउस – आवारा पशुओं को पकड़ने के लिए जिला परिषद् कॉजी हाउस की व्यवस्था करती | है। इसमें आवारा घूमने वाले पशुओं को बन्द कर दिया जाता है और पशु मालिकों से जुर्माना लेकर ही पशुओं को छोड़ा जाता है।

5. किराया व शुल्क – जिला परिषद् सराय, हाट, डाक बंगले, मकान, दुकान आदि से किराये के रूप में तथा संस्थाओं व चिकित्सालयों से फीस के रूप में आय प्राप्त करती है।

6. अनुज्ञा-पत्र शुल्क – जिला परिषद् कसाइयों से, गोश्त की दुकानों से, वनस्पति घी की दुकानों से, आटे की चक्की आदि से अनुज्ञा-पत्र जारी करके शुल्क प्राप्त करती है।

7. मेलों, प्रदर्शनियों व बाजारों से आय – जिला पंचायतों के क्षेत्र में जिन प्रमुख मेलों व प्रदर्शनियों का आयोजन किया जाता है, उसका प्रबन्धन जिला पंचायत को करना पड़ता है। इसके आयोजन से जो आय प्राप्त होती है, वह जिला परिषद् को मिल जाती है।

8. कृषि उपकरणों की बिक्री से आय – जिला परिषद् खाद, बीज, कृषि-यन्त्र आदि की बिक्री की भी व्यवस्था करती है। इनकी बिक्री से भी लाभ के रूप में उसे कुछ आय प्राप्त होती है।

9. सरकारी अनुदान – राज्य सरकार जिला परिषदों को पर्याप्त मात्रा में आर्थिक अनुदान (UPBoardSolutions.com) (Grant) शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा आदि के विकास के लिए देती है। यह जिला परिषदों की कुल आय का40% तक होता है।

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जिला परिषद की व्ययं की मदें

जिला परिषदों के व्यय की प्रमुख मदें निम्नलिखित हैं –

1. शिक्षा – जिला परिष0द् ग्रामीण क्षेत्रों में प्राइमरी तथा जूनियर हाईस्कूल तथा वाचनालयों की व्यवस्था करती है। इस मद पर जिला परिषद् की आय का एक बड़ा भाग व्यय हो जाता है।

2. चिकित्सा एवं स्वास्थ्य पर व्यय – जिला परिषद् ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सालयों एवं जच्चा- बच्चा गृहों की व्यवस्था करती है तथा संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिए नि:शुल्क टीके लगवाती है।

3. पशु चिकित्सालय – जिला परिषद् पशुओं की चिकित्सा के लिए पशु चिकित्सालयों की स्थापना | करती है।

4. सार्वजनिक निर्माण कार्य – जिला परिषद् घाटे व गाँवों में सड़कें बनवाने, तालाब व कुएँ खुदवाने, वृक्ष लगवाने, पुलों का निर्माण करने तथा इन सबकी मरम्मत कराने में पर्याप्त व्यय करती है।

5. प्रशासन व कर वसूली – जिला परिषद् अपने कार्यालय की व्यवस्था करने, अपने कर्मचारियों को वेतन देने व कर वसूलने में पर्याप्त व्यय करती है।

6. पंचायतों को सहायता – जिला परिषद् अपने क्षेत्र की ग्राम पंचायतों तथा क्षेत्रीय समितियों के कार्यों का निरीक्षण करती है तथा उनके विकास के लिए आर्थिक अनुदान देती है।

7. मेले व प्रदर्शनियाँ – जिला परिषद् अपने क्षेत्र में मेले व प्रदर्शनियों की व्यवस्था पर पर्याप्त व्यय करती है।

8. अन्य मदें – जिला परिषद् दीन-दु:खियों तथा अपाहिजों की सहायता करती है, जन्म-मृत्यु का विवरण रखती है, कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करती है तथा पशुओं के रोगों की रोकथाम की व्यवस्था करती है। जिला परिषद् कभी-कभी जिले के आर्थिक विकास (UPBoardSolutions.com) के लिए ऋण भी ले लेती है, जिस पर उसे ब्याज भी देना पड़ता है।

प्रश्न 8.
उत्तर प्रदेश के नगर निगम या नगरपालिका की आय के स्रोतों तथा व्यय की प्रमुख मदों का वर्णन कीजिए।
          या
नगरपालिका की आय के स्रोत लिखिए।
          या
नगरपालिकाओं के व्यय की तीन मुख्य मदें लिखिए।
          या
नगरनिगमों की आय के स्रोत लिखिए।
उत्तर :
नगर निगम उत्तर प्रदेश के महानगरों (जैसे-लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, आगरा, इलाहाबाद, गोरखपुर, मुरादाबाद, बरेली व मेरठ) की व्यवस्था करते हैं। ये प्राय: वही कार्य करते हैं, जो पूर्व में नगर महापालिकाएँ किया करती थीं; अन्तर केवल इतना ही है कि ये अधिक शक्तिशाली होते हैं, इनका कार्य-क्षेत्र अधिकं विस्तृत होता है, इन्हें कर लगाने तथा वसूल करने के अधिक अधिकार प्राप्त होते हैं तथा इन पर राज्य सरकार का उतना नियन्त्रण नहीं होता जितना नगर महापालिकाओं पर होता है।

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नगर निगम या नगरपालिका की आय के स्रोत

नगर निगम या नगरपालिका की आय के दो प्रमुख साधन हैं –

  • (अ) कर आगम एवं
  • (ब) गैर-कर आगम।

(अ) कर आगम – नगर निगम को निम्नलिखित करों से आय प्राप्त होती है

1. सम्पत्ति कर – यह नगर निगम की आय का प्रमुख स्रोत है। यह कर उसकी सीमा में स्थित भूमि, मकान तथा सम्पत्तियों के स्वामियों पर लगाया जाता है। ये निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं

  1. गृह व भूमि-कर – यह कर मकान व भूमि की वार्षिक आय पर लगाया जाता है और उसके स्वामी से वसूल किया जाता है।
  2. सुधार कर – यह कर नगर सुधार योजनाओं के कारण शहरी भूमि के मूल्य में होने वाली वृद्धि पर लगाया जाता है।
  3. सेवा कर – नगर निगम सेवाओं पर भी कर लगाते हैं; जैसे-जल-कर, माल-वाहन कर, विद्युत व अग्नि कर आदि।

2. चुंगी – नगर निगमों की सीमा में प्रवेश करने वाले माल पर जो कर लगाया जाता है, उसे चुंगी कहते हैं। नगर निगम की आय का यह सबसे बड़ा स्रोत है। चुंगी वस्तुओं की तोल पर या मूल्यानुसार लगायी जाती है। उत्तर प्रदेश में चुंगी समाप्त कर दी गयी है।

3. सीमा कर – यह कर रेल द्वारा किसी स्थानीय क्षेत्र में आने वाले पदार्थों पर लगाया जाता है।

4. मार्ग-कर – यह कर किसी स्थान, पुल या सड़क पर से गुजरने वाले प्रत्येक व्यक्ति, पशु, घोड़ागाड़ी आदि वाहनों से निश्चित दर (भार अथवा संख्या) पर वसूल किया जाता है।

5. तहबाजारी – यह कर अस्थायी अर्थात् ऐसे दुकानदारों से वसूल किया जाता है, (UPBoardSolutions.com) जो सड़क की पटरियों पर रखकर अपना सामान बेचते हैं; जैसे-खोमचेवाले, फेरीवाले, हॉकर्स आदि।

6. शुल्क या अनुज्ञा-पत्र – इसके अन्तर्गत निम्नलिखित प्रकार के शुल्क सम्मिलित हैं

  1. नगर निगमों द्वारा प्रदान की गयी विशेष सेवाओं का शुल्क; जैसे-नोटिस शुल्क, नकल लेने का शुल्क आदि।
  2. विलासिता की सामग्री पर लगाये गये शुल्क; जैसे—मोटरगाड़ियों तथा कुत्ते रखने पर अनुज्ञा-पत्र शुल्क, ताँगा, इक्का, बैलगाड़ी, ठेली-रिक्शा आदि पर अनुज्ञा-पत्र शुल्क।
  3. अन्य मदों पर अनुज्ञा-पत्र।

(ब) गैर-कर आगम – नगर निगम की गैर-कर आगम से प्राप्त आय के प्रमुख साधन निम्नलिखित हैं

  1. भूमि का लगान तथा मकानों, विश्रामगृहों एवं डाक बँगलों का किराया।
  2. भूमि-कंर तथा भूमि की उपज से प्राप्त आय।
  3. बाजारों तथा बूचड़खानों से प्राप्त आय।
  4. विनियोगों पर प्राप्त आय।
  5. वाणिज्य व्यवसायों (जैसे—ट्राम सेवाओं, मोटरगाड़ियों, बिजली व गैस पदार्थों, जल-आपूर्ति सेवाओं आदि) से प्राप्त आय।
  6. राज्य सरकारों से प्राप्त अनुदान। ये दो प्रकार के होते हैं-
    (i) आवर्ती अनुदान, जो प्रति वर्ष दिये जाते हैं तथा
    (ii) अनावर्ती अनुदान, जो किसी विशेष कार्य को सम्पन्न करने के लिए दिये जाते हैं।

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नगर निगम या नगरपालिका की व्यय की प्रमुख मदें

नगर निगम या नगरपालिका की व्यय की प्रमुख मदों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –

1. शिक्षा – नगर निगम प्राथमिक शिक्षा, जूनियर शिक्षा व कभी-कभी माध्यमिक शिक्षा का भी प्रबन्ध करती है। स्कूलों का निर्माण करना, उनके संचालन के लिए आवश्यक सामग्री जुटाना, अध्यापकों को वेतन देना आदि व्यय इस मद में सम्मिलित होते हैं।

2. जन-स्वास्थ्य सेवाएँ – इस मद में ये व्यय सम्मिलित होते हैं-शुद्ध जल की व्यवस्था करना, गन्दे पानी की निकासी की व्यवस्था करना, सफाई का प्रबन्ध करना, महामारियों की रोकथाम करना, टीका लगवाना, खाद्य पदार्थों में मिलावट को रोकना, चिकित्सालयों की व्यवस्था करना आदि। नगर निगमों का पर्याप्त धन इन मदों पर व्यय होता है।

3. सार्वजनिक सुरक्षा – इस मद में ये व्यय आते हैं—आग बुझाने के लिए (UPBoardSolutions.com) फायर ब्रिगेड का प्रबन्ध करना, गलियों में प्रकाश की व्यवस्था करना, हानिकारक पशुओं से रक्षा करना, सड़कों के चौराहों पर पुलिस के खड़े होने के लिए चबूतरे बनवाना, सार्वजनिक स्थानों पर बिजली व प्रकाश का प्रबन्ध करना आदि।

4. जनसाधारण की सुविधा – इस मद में ये व्यय सम्मिलित किये जाते हैं-सड़क, पुल व नाली बनवाना; पुस्तकालय या वाचनालय का प्रबन्ध करना; सड़कों पर पानी छिड़कवाना; सड़कों के दोनों ओर छायादार वृक्ष लगवाना; बाजार, मेले व प्रदर्शनियों आदि का आयोजन करना।

5. प्रशासन और कर-संग्रह पर व्यय – इन्हें अपने प्रशासन हेतु कार्यालयों की व्यवस्था करनी होती है। अत: कार्यालयों के कर्मचारियों के वेतन तथा सामग्री पर व्यय करना पड़ता है। करों को वसूल करने में भी आय का पर्याप्त भाग व्यय हो जाता है।

6. सार्वजनिक निर्माण-कार्य – नगरपालिकाओं को उद्यानों व पार्को की व्यवस्था करनी पड़ती है, खेल के मैदान एवं व्यायामशालाओं आदि का निर्माण भी करना पड़ता है तथा अपने क्षेत्र की टूटी-फूटी सड़कों का निर्माण एवं मरम्मत भी करानी पड़ती है। इन सभी कार्यों को सम्पादित करने में उसे प्रति वर्ष पर्याप्त धन व्यय करना पड़ता है।

7. पेयजल की व्यवस्था पर व्यय – नागरिकों के पीने के लिए शुद्ध जल की व्यवस्था करने के लिए नगरपालिकाएँ नलकूपों का निर्माण कराकर टंकियों के माध्यम से पेयजल की व्यवस्था करती हैं तथा सार्वजनिक स्थानों पर नल भी लगवाती हैं। इस मद पर भी इन्हें धन व्यय करना पड़ता है।

प्रश्न 9.
ग्राम पंचायतों की आय के स्रोत एवं व्यय की प्रमुख मदों का वर्णन कीजिए।
          या
ग्राम पंचायत के किन्हीं दो आय के साधनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
भारत की शासन-प्रणाली प्रजातान्त्रिक है। प्रजातन्त्र को गाँवों तक पहुँचाने के (UPBoardSolutions.com) उद्देश्य से हमारे संविधान में पंचायती राज की व्यवस्था की गयी है। इस दृष्टि से उत्तर प्रदेश सरकार ने सन् 1947 ई० में पंचायती राज अधिनियम पारित करके ग्रामों में तीन प्रकार की संस्थाओं की स्थापना की-

  1. ग्राम सभा
  2. ग्राम पंचायत तथा
  3. न्याय पंचायत।

इस प्रकार ग्राम पंचायत ग्रामीण स्वशासन की दूसरी इकाई है। ग्राम पंचायत ग्राम सभा द्वारा निर्धारित नीतियों को लागू करती है।

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ग्राम पंचायत की आय के स्रोत

ग्राम पंचायतों की आय के प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं –

1. अनिवार्य कर –

  1. सम्पत्ति हस्तान्तरण पर चुंगी
  2. सवारी कर
  3. भूमि कर
  4. पेशा (उद्यम) कर।

2. महसूल –

  1. व्यापारिक फसलों के क्रय-विक्रय पर शुल्क
  2. भूमि उपकर एवं
  3. कृषि योग्य भूमि पर कर।

3. अन्य शुल्क –

  1. बाजारों पर शुल्क
  2. जमीन पर रोजगार शुल्क
  3. दलालों व एजेण्टों पर लाइसेन्स शुल्क
  4. अन्य कार्यों की स्वीकृति पर शुल्क
  5. बूचड़खानों पर शुल्क
  6. बैलगाड़ी ठहरने के स्थानों पर शुल्क
  7. सड़क व सार्वजनिक स्थानों पर शुल्क।

4. जिला बोर्ड से सहायता –

  1. प्राथमिक विद्यालय के व्यय के एक भाग की पूर्ति करना
  2. ग्रामीण बाजारों की व्यवस्था हेतु धनराशि प्राप्त करना
  3. घाटे की व्यवस्था करने पर आय-व्यय का अन्त।

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ग्राम पंचायत की व्यय की मदें

ग्राम पंचायतों की व्यय की मुख्य मदें निम्नलिखित हैं –

  1. सफाई एवं प्रकाश की व्यवस्था पर व्यय।
  2. चिकित्सालय की व्यवस्था एवं संक्रामक रोगों की रोकथाम पर किये जाने वाले व्यय।
  3. शवों के दाह-संस्कार की व्यवस्था पर व्यय।
  4. शिक्षा व्यवस्था पर व्यय।
  5. सार्वजनिक सुविधाएँ; जैसे-तालाब, पोखर, (UPBoardSolutions.com) कुओं आदि उपलब्ध करने पर व्यय।
  6. शुद्ध पेयजल की व्यवस्था पर व्यय।
  7. खेल-कूद व्यवस्था पर व्यय।
  8. बाजार, हाट व मेलों आदि के प्रबन्धं पर व्यय।
  9. पुस्तकालयों एवं वाचनालयों की व्यवस्था पर व्यय।
  10. बंजर एवं चरागाह भूमि के विकास पर व्यय।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कर किसे कहते हैं ? एक अच्छी कर-प्रणाली के लक्षण लिखिए।
उत्तर :

कर

कर एक अनिवार्य अंशदान है, जो करदाता को देना होता है। करदाता को इसके बदले में प्रत्यक्ष लाभ का कोई आश्वासन नहीं दिया जाता, करों का उपयोग सार्वजनिक हित में किया जाता है। डाल्टन के अनुसार, “कर किसी सार्वजनिक सत्ता द्वारा प्राप्त किया हुआ (UPBoardSolutions.com) एक अनिवार्य अंशदान है, चाहे करदाता को बदले में उतनी राशि की सेवा प्राप्त हो या न हो और न यह किसी कानूनी अपराध के लिए दण्डस्वरूप लगाया जाता है।”

अच्छी कर-प्रणाली के लक्षण (विशेषताएँ)

एक अच्छी कर-प्रणाली में निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए –

  1. कर-प्रणाली सरल एवं सुविधाजनक होनी चाहिए जिससे करदाता को कर का भुगतान करने में मानसिक कष्ट न हो।
  2. एक अच्छी कर-प्रणाली अधिकतम सामाजिक लाभ के सिद्धान्त पर आधारित होती है।
  3. कर-प्रणाली प्रगतिशील होनी चाहिए अर्थात् कर-प्रणाली ऐसी हो जिससे कर या भार धनी वर्ग पर अधिक व निर्धन वर्ग पर कम पड़े।
  4. एक अच्छी कर-प्रणाली में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों करों का समावेश होता है।
  5. एक अच्छी कर-प्रणाली में लोच का गुण पाया जाता है, जिससे (UPBoardSolutions.com) आवश्यकतानुसार करों की मात्रा में वृद्धि व कमी की जा सके।
  6. कर-प्रणाली मितव्ययी होनी चाहिए।
  7. एक अच्छी कर-प्रणाली विलासिता एवं मादक वस्तुओं के उपभोग को हतोत्साहित करती है।
  8. बचत एवं पूँजी निर्माण को प्रोत्साहित करना अच्छी कर-प्रणाली का गुण है।
  9. अच्छी कर-प्रणाली आर्थिक विकास को गति प्रदान करती है।
  10. अच्छी कर-प्रणाली में उत्पादकता का गुण होता है।
  11. अच्छी कर-प्रणाली में करों का भार समाज पर कम पड़ता है।
  12. कर-प्रणाली में निश्चितता का गुण होना चाहिए।

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प्रश्न 2.
सार्वजनिक वित्त और निजी वित्त में अन्तर लिखिए।
उत्तर :
सार्वजनिक वित्त और निजी वित्त में निम्नलिखित तीन अन्तर हैं –

  1. व्यक्ति अपना व्यय अपनी आय के अनुसार निर्धारित करता है, जबकि सरकार अपने व्यय के अनुसार आय-प्राप्ति के साधन खोजती है।
  2. व्यक्ति की आय के साधन सीमित होते हैं, जब कि सरकार के पास आय के साधनों की प्रचुरता होती है।
  3. व्यक्ति अपनी आय-व्यय के हिसाब को प्राय: गुप्त रखता है, जबकि सार्वजनिक वित्त का विस्तृत विवरण प्रकाशित किया जाता है।

प्रश्न 3.
प्रत्यक्ष कर वे अप्रत्यक्ष कर में अन्तर स्पष्ट कीजिए। या प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष करों का अन्तर बताइए। प्रत्यक्ष कर के तीन स्रोत बताइट। [2015]
उत्तर :
प्रत्यक्ष कर वह कर है, जिसका भुगतान करदाता प्रत्यक्ष रूप से नकद रूप में कर अधिकारी को करता है। ऐसे करों का भार उन व्यक्तियों द्वारा ही वहन किया जाता है, जिन पर ये लगाये जाते हैं; जैसे-आयकर, निगम कर, मृत्यु कर आदि। इसके विपरीत अप्रत्यक्ष कर वे कर हैं, जिनके भार को करदाता दुसरों पर टालने में सफल हो जाते हैं। इन करों का तात्कालिक एवं अन्तिम भार अलग-अलग व्यक्तियों पर पड़ता है; जैसे–बिक्री कर, उत्पादन कर, सीमा,कर आदि।

प्रश्न 4.
कर के अर्थ एवं महत्त्व को स्पष्ट कीजिए। या ‘कर’ क्या है ? [2010]
उत्तर :
अर्थ – कर एक अनिवार्य अंशदान है, जो करदाता को देना होता है। करदाता को कर के बदले में प्रत्यक्ष लाभ का कोई आश्वासन नहीं दिया जाता। करों का उपयोग सार्वजनिक हित में किया जाता है। महत्त्व-प्रत्येक देश की सरकार करों के माध्यम से देश की (UPBoardSolutions.com) आर्थिक विषमता को कम करने का प्रयास करती है। सरकार धनी वर्ग पर अधिक कर लगाकर तथा करों से प्राप्त आय को निर्धनों के कल्याण-कार्यों पर व्यय करके राष्ट्रीय आय को समान वितरण करती है, जिससे समाज में धनी व निर्धन वर्ग में गहरी खाई न बन सके।

प्रश्न 5.
आर्थिक विकास हेतु सरकार को कर लगाने चाहिए।’ इसके पक्ष में कोई दो तर्क लिखिए।
उत्तर :
वर्तमान युग लोकतन्त्रीय युग है। आज विश्व के अधिकांश देशों में प्रजातन्त्रीय शासन है। प्रजातन्त्रीय शासन में सरकार देश की रक्षा, शान्ति-व्यवस्था की स्थापना, न्याय प्रदानार्थ एवं देश के विकास के अनेक कार्य करती है, जिसके लिए उसे बड़ी मात्रा में धन की आवश्यकता होती है। धन एकत्र करने का एक स्रोत कर है। आर्थिक विकास के लिए सरकार को कर लगाने चाहिए, इसके पक्ष में दो तर्क निम्नलिखित हैं

  • सरकार देश में आर्थिक विकास, कृषि व उद्योगों के विकास, व्यापार के विकास तथा परिवहन के साधनों के विकास के लिए योजनाएँ बनाकर करोड़ों रुपये व्यय करती है। इस आर्थिक विकास का लाभ प्रत्येक नागरिक तथा पूरे देश को प्राप्त होता है; अतः सरकार को कर लगाकर आर्थिक विकास के लिए धन एकत्र करना चाहिए।
  • देश में आर्थिक विकास के लिए धन एकत्र करने के अन्य स्रोत हैं-देश-विदेशों से ऋण प्राप्त करना। इन ऋणों पर एक तो ब्याज देना पड़ता है और दूसरे, ये ऋण कभी-कभी ऐसी शर्तों पर दिये जाते हैं। कि इन शर्तों का पालन देश-हित में नहीं होता। अत: यह तर्कसंगत होगा कि विदेशों से ऋण प्राप्त करने के स्थान पर देश के नागरिकों, व्यापारियों आदि पर ही कर लगाकर धन एकत्र किया जाए।

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प्रश्न 6.
राजस्व की एक उचित परिभाषा दीजिए।
उत्तर :
राजस्व राज्य के वित्तीय पक्ष का विधिवत् अध्ययन करता है। आज राजस्व के विस्तृत एवं गहन दोनों ही प्रकार के कार्यों में तेजी से वृद्धि हो रही है। इन कार्यों के संचालन के लिए धन की आवश्यकता होती है। अत: धन कैसे जुटाया जाए और इसका व्यय कैसे किया जाए-इन सभी आय और व्यय से सम्बन्धित प्रक्रियाओं एवं व्यवस्थाओं का अध्ययन राजस्व के अन्तर्गत किया जाता है। संक्षेप में, ‘‘राजस्व अर्थ-विज्ञान का वह अंग है, जिसमें सरकार की आय (UPBoardSolutions.com) और व्यय तथा आय-व्यय सम्बन्धी प्रशासन का अध्ययन किया जाता है। इसके अन्तर्गत मात्र विधियों का अध्ययन’ ही काफी नहीं है, वरन् उन सिद्धान्तों का पर्यवेक्षण भी आवश्यक है, जिनके अनुसार ये विधियाँ अपनाई जाती हैं।”

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राजस्व से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर :
“राजस्व अर्थशास्त्र का वह अंग है, जिसमें सरकार की आय तथा व्यय और आय-व्यय सम्बन्धी प्रशासन का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 2.
जिला परिषद् की आय के दो साधन लिखिए।
उत्तर :
जिला परिषद् की आय के दो साधन हैं—

  1. हैसियत या सम्पत्ति कर तथा
  2. राज्य सरकार से अनुदान।

प्रश्न 3.
इस प्रदेश की जिला परिषद् की व्यय की दो प्रमुख मदों को लिखिए।
उत्तर :
उत्तर प्रदेश की जिला परिषद् की व्यय की दो प्रमुख मदें हैं—

  1. शिक्षा पर व्यय तथा
  2. करों की प्राप्ति पर व्यय।

प्रश्न 4.
जिला परिषद् के दो प्रमुख कार्यों का उल्लेख कीजिए। उत्तर जिला परिषद् के दो प्रमुख कार्य हैं –

  1. शिक्षा तथा
  2. सार्वजनिक स्वास्थ्य और चिकित्सी।

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प्रश्न 5.
नगर निगम की आय के दो साधन लिखिए। [2018]
उत्तर :
नगर निगम की आय के दो साधन हैं—

  1. सम्पत्ति-कर या गृह-कर तथा
  2. जल-कर।

प्रश्न 6.
नगरपालिकाओं की व्यय की दो प्रमुख मदों को लिखिए।
उत्तर :
नगरपालिकाओं की व्यय की दो प्रमुख मदें हैं-

  1. शिक्षा तथा
  2. सार्वजनिक स्वास्थ्य व चिकित्सा।

प्रश्न 7.
राज्य सरकार कौन-कौन से कर लगाती है ?
उत्तर :
राज्य सरकार द्वारा लगाये जाने वाले करों के नाम हैं-

  1. भू-राजस्व
  2. व्यापार कर
  3. राज्य उत्पादन कर तथा
  4. मनोरंजन कर।

प्रश्न 8.
प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कर के दो-दो उदाहरण दीजिए। या प्रत्यक्ष कर के दो उदाहरण लिखिए। [2013]
उत्तर
प्रत्यक्ष कर के दो उदाहरण-आयकर और निगम कर। अप्रत्यक्ष कर के दो उदाहरण–बिक्री कर और उत्पादन कर।

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प्रश्न 9.
प्रत्यक्ष कर से आप क्या समझते हैं ? [2010]
उत्तर :
जो कर व्यक्तियों पर सीधे लगाये जाते हैं, उन्हें प्रत्यक्ष कर कहते हैं; जैसे-आयकर (UPBoardSolutions.com) व सम्पत्ति कर। प्रत्यक्ष करों का भार करदाता दूसरे व्यक्तियों पर नहीं डाल सकता।

प्रश्न 10.
आयकर किसे कहते हैं ?
उत्तर :
व्यक्तियों की आय (Income) पर जो कर लगाया जाता है, उसे आयकर कहते हैं। यह एक प्रत्यक्ष कर है।

प्रश्न 11.
नगर महापालिकाओं की आय के चार स्रोत लिखिए।
उत्तर :
नगर महापालिकाओं की आय के चार स्रोत हैं-गृह कर, सम्पत्ति कर, भूमि कर तथा जल कर।

प्रश्न 12.
ग्राम पंचायत की आय के दो स्रोत लिखिए।
उत्तर :
ग्राम पंचायत की आय के दो स्रोत हैं—

  1. अनिवार्य कर; जैसे—सवारी कर, भूमि कर, पेशा (उद्यम) कर।
  2. जिला पंचायत तथा राज्य सरकार से अनुदान।

प्रश्न 13.
ग्राम पंचायत के व्यय की दो मदें लिखिए।
उतर :
ग्राम पंचायत के व्यय की दो मुख्य मदें हैं—

  1. सफाई एवं प्रकाश की व्यवस्था तथा
  2. चिकित्सालय की व्यवस्था एवं संक्रामक रोगों की रोकथाम।

प्रश्न 14.
राज्य सरकार की आय के दो साधनों का उल्लेख कीजिए। [2014]
उत्तर :

  1. भू-राजस्व की मालगुजारी
  2. व्यापार कर।

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. निम्नलिखित में से कौन-सा कर केन्द्र सरकार द्वारा लगाया जाता है?

(क) व्यापार कर
(ख) मनोरंजन कर
(ग) यात्री कर
(घ) निगम कर

2. आयकर सम्मिलित किया गया है [2014]

(क) संघ सूची में
(ख) राज्य सूची में
(ग) समवर्ती सूची में
(घ) इनमें से किसी में भी नहीं

3. संघीय सूची में कुल कितने विषय रखे गये हैं?

(क) 95
(ख) 96
(ग) 97
(घ) 98

4. समवर्ती सूची में कुल कितने विषय रखे गये थे?

(क) 50
(ख) 49
(ग) 52
(घ) 47

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5. निम्नलिखित में से कौन-सा प्रत्यक्ष कर है? [2011, 12]

(क) व्यापार कर
(ख) उत्पादन कर
(ग) आयकर
(घ) मनोरंजन कर

6. निम्नलिखित में से कौन-सा अप्रत्यक्ष कर है? [2011]

(क) आयकर
(ख) कॉपोरेशन कर
(ग) सीमा शुल्क
(घ) उपहार कर

7. अप्रत्यक्ष कर का उदाहरण है

(क) आयकर
(ख) बिक्री कर
(ग) सम्पत्ति कर
(घ) उपहार कर

8. ‘आयकर’ एक

(क) अप्रत्यक्ष कर है।
(ख) प्रत्यक्ष कर है।
(ग) प्रतिगामी कर है।
(घ) इनमें से कोई नहीं

9. कर है –

(क) अनिवार्य भुगतान
(ख) ऐच्छिक भुगतान
(ग) आर्थिक भुगतान
(घ) गैर-आर्थिक भुगतान

10. ग्राम पंचायत की स्थापना होती है

(क) महानगरों में
(ख) ग्रामीण क्षेत्रों में
(ग) ब्लॉक में
(घ) छोटे शहरों में

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11. निम्नलिखित में से कौन स्थानीय निकाय की आय का स्रोत है?

(क) आयकर
(ख) उत्पादन कर
(ग) चुंगी कर
(घ) व्यापार कर

12. निम्नलिखित में से कौन-सा कर राज्य सरकार लगाती है? [2009]

(क) आयकर
(ख) सेवा कर
(ग) व्यापार कर
(घ) निगम कर

13. इनमें से कौन-सा कर नगर निगम लगाती है?

(क) निगम कर
(ख) उत्पाद कर
(ग) बिजली व पानी कर
(घ) सम्पत्ति कर

14. निम्नलिखित में से कौन-सा कर केन्द्र सरकार द्वारा लगाया जाता है? [2015]

(क) आयात कर
(ख) मनोरंजन कर
(ग) यात्रा करे।
(घ) मार्ग कर

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15. आयकर लगाने का अधिकार किसे है? [2015, 17]

(क) राज्य सरकार को
(ख) केन्द्र सरकार को
(ग) महापालिका को
(घ) नगरपालिका को

16. ‘बिक्रीकर’ आय का साधन है [2016]

(क) केन्द्र सरकार का
(ख) राज्य सरकार का
(ग) जिला पंचायत का
(घ) ग्राम पंचायत का

17. भू-राजस्व आय का साधन है [2017, 18]

(क) केन्द्र सरकार का
(ख) राज्य सरकार का
(ग) ग्राम पंचायतों का
(घ) नगरपालिकाओं का

उत्तरमाला

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 3 (Section 4)

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UP Board Solutions for Class 10 Hindi पाठ्य-पुस्तक में संकलित कवि और उनकी रचनाएँ

UP Board Solutions for Class 10 Hindi पाठ्य-पुस्तक में संकलित कवि और उनकी रचनाएँ

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पाठ्य-पुस्तक में संकलित कवि और उनकी रचनाएँ

रचना           –         रचयिता

सूरसागर – सूरदास
सूर-सारावली – सूरदास
साहित्य-लहरी – सूरदास
श्रीरामचरितमानस – गोस्वामी तुलसीदास
विनयपत्रिका – गोस्वामी तुलसीदास
कवितावली – गोस्वामी तुलसीदास
गीतावली – गोस्वामी तुलसीदास (UPBoardSolutions.com)
दोहावली – गोस्वामी तुलसीदास
रामाज्ञा प्रश्न – गोस्वामी तुलसीदास
रामलला नहछु – गोस्वामी तुलसीदास
बरवै रामायण – गोस्वामी तुलसीदास
जानकी मंगल – गोस्वामी तुलसीदास
वैराग्य-संदीपनी – गोस्वामी तुलसीदास
पार्वती मंगल – गोस्वामी तुलसीदास
श्रीकृष्ण गीतावली – गोस्वामी तुलसीदास
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सुजान रसखान – रसखान
प्रेमवाटिका [2009, 12] – रसखान
बिहारी सतसई – बिहारी
वीणा – सुमित्रानन्दन पन्त
पल्लव – सुमित्रानन्दन पन्त
रश्मिबन्ध – सुमित्रानन्दन पन्त
गुंजन – सुमित्रानन्दन पन्त
युगान्त [2011, 14] – सुमित्रानन्दन पन्त
युगवाणी – सुमित्रानन्दन पन्त
ग्राम्या – सुमित्रानन्दन पन्त
उत्तरा – सुमित्रानन्दन पन्त
लोकायतन [2012, 14] – सुमित्रानन्दन पन्त
कला और बूढ़ा चाँद – सुमित्रानन्दन पन्त
स्वर्णधूलि ग्रन्थि (2009, 11] – सुमित्रानन्दन पन्त
चिदम्बरा [2012, 13, 17] – सुमित्रानन्दन पन्त
स्वर्ण-किरण – सुमित्रानन्दन पन्त
युगान्तर – सुमित्रानन्दन पन्त
शिल्पी – सुमित्रानन्दन पन्त
सौवर्ण – सुमित्रानन्दन पन्त
वाणी – सुमित्रानन्दन पन्त
किरण-वीणा – सुमित्रानन्दन पन्त
पल्लविनी – सुमित्रानन्दन पन्त
युगपथ [2018] – सुमित्रानन्दन पन्त
आधुनिक कवि – सुमित्रानन्दन पन्त
समाधिता – सुमित्रानन्दन पन्त
गीत-हंस – सुमित्रानन्दन पन्त
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पतझर : एक भावक्रान्ति – सुमित्रानन्दन पन्त
गन्धवीथी – सुमित्रानन्दन पन्त
सत्यकाम – सुमित्रानन्दन पन्त
नीहार – महादेवी वर्मा
नीरजा (2016) –  (UPBoardSolutions.com) महादेवी वर्मा
अग्निरेखा (2018) – महादेवी वर्मा
सान्ध्य-गीत [2013] – महादेवी वर्मा
दीपशिखा [2012, 16] – महादेवी वर्मा
यामा – महादेवी वर्मा
रश्मि – महादेवी वर्मा
सप्तपर्णा – महादेवी वर्मा
पथिक[2015] – रामनरेश त्रिपाठी
मिलन [2018] – रामनरेश त्रिपाठी
स्वप्न – रामनरेश त्रिपाठी
मानसी – रामनरेश त्रिपाठी
ग्राम्य गीत – रामनरेश त्रिपाठी
कविता-कौमुदी (2012) – रामनरेश त्रिपाठी
हिमकिरीटिनी [2018] – माखनलाल चतुर्वेदी
हिमतरंगिणी [2017, 18] – माखनलाल चतुर्वेदी
माता – माखनलाल चतुर्वेदी
युगचरण [2012] – माखनलाल चतुर्वेदी
समर्पण – माखनलाल चतुर्वेदी
वेणु लो पूँजे धरा – माखनलाल चतुर्वेदी
मुकुल [2014, 15] – सुभद्राकुमारी चौहान
त्रिधारा [2015] – सुभद्राकुमारी चौहान
साकेत [2014] – मैथिलीशरण गुप्त
नहुष – मैथिलीशरण गुप्त
विष्णुप्रिया – मैथिलीशरण गुप्त
भारत भारती (2013, 14, 15) – मैथिलीशरण गुप्त
यशोधरा – मैथिलीशरण गुप्त
द्वापर – मैथिलीशरण गुप्त
रंग में भंग – मैथिलीशरण गुप्त
जयद्रथ-वध [2012] – मैथिलीशरण गुप्त
किसान – मैथिलीशरण गुप्त
शकुन्तला – मैथिलीशरण गुप्त
त्रिपथगा – मैथिलीशरण गुप्त
शक्ति – मैथिलीशरण गुप्त
अंजलि और अर्थ्य – मैथिलीशरण गुप्त
जय भारत – मैथिलीशरण गुप्त
पंचवटी – मैथिलीशरण गुप्त
सिद्धराज – मैथिलीशरण गुप्त
अनघ – मैथिलीशरण गुप्त
चन्द्रहास – मैथिलीशरण गुप्त
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तिलोत्तमा – मैथिलीशरण गुप्त
अकाल में सारस – केदारनाथ सिंह
अभी बिलकुल अभी – केदारनाथ सिंह
जमीन पक रही है – केदारनाथ सिंह
यहाँ से देखो – केदारनाथ सिंह
बाघ – केदारनाथ सिंह
टाल्स्टॉय और साइकिल – केदारनाथ सिंह
जीने के लिए कुछ शर्ते – केदारनाथ सिंह
प्रक्रिया – केदारनाथ सिंह
विष्णुप्रिया  –  मैथिलीशरण गुप्त
भारत भारती (2013, 14, 15)  –  मैथिलीशरण गुप्त
यशोधरा  –  मैथिलीशरण गुप्त
द्वापर  –  मैथिलीशरण गुप्त
रंग में भंग  –  मैथिलीशरण गुप्त
जयद्रथ-वध [2012]  –  (UPBoardSolutions.com) मैथिलीशरण गुप्त
किसान  –  मैथिलीशरण गुप्त
शकुन्तला  –  मैथिलीशरण गुप्त
त्रिपथगा  –  मैथिलीशरण गुप्त
शक्ति  –  मैथिलीशरण गुप्त
अंजलि और अर्थ्य  –  मैथिलीशरण गुप्त
जय भारत  –  मैथिलीशरण गुप्त
पंचवटी  –  मैथिलीशरण गुप्त
सिद्धराज  –  मैथिलीशरण गुप्त
अनघ  –  मैथिलीशरण गुप्त
चन्द्रहास  –  मैथिलीशरण गुप्त
तिलोत्तमा  –  मैथिलीशरण गुप्त
अकाल में सारस  –  केदारनाथ सिंह
अभी बिलकुल अभी  –  केदारनाथ सिंह
जमीन पक रही है।   –  केदारनाथ सिंह
यहाँ से देखो  –  केदारनाथ सिंह
बाघ  –  केदारनाथ सिंह
टाल्स्टॉय और साइकिल –   केदारनाथ सिंह
जीने के लिए कुछ शर्ते  –  केदारनाथ सिंह
प्रक्रिया   –  केदारनाथ सिंह
सूर्य – केदारनाथ सिंह
एक प्रेम-कविता को पढ़कर – केदारनाथ सिंह
आधी रात – केदारनाथ सिंह
शहर अब भी सम्भावना है। – अशोक वाजपेयी
तत्पुरुष – अशोक वाजपेयी
बाहरी अकेला – अशोक वाजपेयी
इबारत से गिरी मात्राएँ – अशोक वाजपेयी
उम्मीद का दूसरा नाम – (UPBoardSolutions.com) अशोक वाजपेयी
विवक्षा – अशोक वाजपेयी
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एक पतंग अनन्त से 2012] – अशोक वाजपेयी
रिमझिम – श्री श्यामनारायण पाण्डेय
माधव – श्री श्यामनारायण पाण्डेय
हल्दीघाटी – श्री श्यामनारायण पाण्डेय
जौहर – श्री श्यामनारायण पाण्डेय
जय हनुमान – श्री श्यामनारायण पाण्डेय
तुमुलं – श्री श्यामनारायण पाण्डेय
रूपांतर – श्री श्यामनारायण पाण्डेय
आरती – श्री श्यामनारायण पाण्डेय

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