UP Board Class 7 Sports and Fitness Model Paper खेलकूद : खेल और स्वास्थ्य

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Board UP Board
Class Class 7
Subject Sports and Fitness
Model Paper Paper 1
Category UP Board Model Papers

UP Board Class 7 Sports and Fitness Model Paper खेलकूद : खेल और स्वास्थ्य

सत्र परीक्षा प्रश्न पत्र
कक्षा-7
विषय-खेल और स्वास्थ्य

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-1.
शरीर फुर्तीला तथा नीरोगी कैसे बनता है?
उत्तर:
व्यायाम करने से।

प्रश्न-2.
व्यायाम कहाँ करना चाहिए?
उत्तर:
खुले स्थान में।

प्रश्न-3.
किस आसन से कद की वृद्धि होती है?
उत्तर:
पश्चिमोत्तनासन से।

प्रश्न-4.
राष्ट्रगान किसका प्रतीक है?
उत्तर:
राष्ट्रगान राष्ट्र की एकता का प्रतीक हैं।

प्रश्न-5.
हमारे राष्ट्रध्वज में उपस्थित चक्र में कितनी तीलियाँ होती हैं?
उत्तर:
24 तीलियाँ।

प्रश्न-6.
राष्ट्रगान की रचना किसने की थी?
उत्तर:
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने।

प्रश्न-7.
राष्ट्रध्वज कब फहराया जाता है?
उत्तर:
15 अगस्त एवं 26 जनवरी को।

प्रश्न-8.
मार्किंग से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर:
मार्चिग से हमें अनुशासन में रहने की शिक्षा मिलती है।

प्रश्न-9.
देश में राष्ट्रीय शोक के समय राष्ट्रध्वज का क्या किया जाता है?
उत्तर:
राष्ट्रध्वज को नियमानुसार झुकाया जाता है।

प्रश्न-10.
राष्ट्रगान कितने सेकंड में पूरा होना चाहिए?
उत्तर:
52 सेकंड में।

प्रश्न-11.
राष्ट्रध्वज किसका प्रतीक होता है?
उत्तर:
राष्ट्रध्वज देश की पहचान का प्रतीक होता है।

प्रश्न-12.
अंगों के सुधार हेतु क्या करना चाहिए?
उत्तर:
अंगों के सुधार हेतु नियमित योग, प्राणायाम, व्यायाम या पी०टी० करनी चाहिए।

प्रश्न-13.
जीतने या हारने पर अपने ऊपर नियन्त्रण रखने से कौन-सा गुण विकसित होता है?
उत्तर:
अनुशासन का।

प्रश्न-14.
सबसे लम्बी दौड़ कितने मीटर की होती है?
उत्तर:
600 मीटर की।

प्रश्न-15.
कौन-सा आसन सभी आसनों का राजा है?
उत्तर:
शीर्षासन।

प्रश्न-16.
ओलम्पिक खेलों को प्रारम्भ कहाँ हुआ?
उत्तर:
यूनान में।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-17.
शारीरिक शिक्षा की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर:

  1. शारीरिक अंगों के सुधार हेतु
  2. अपनी रक्षा हेतु
  3. शरीर को फुर्तीला बनाने हेतु
  4. मनोरंजन हेतु

प्रश्न-18.
माचिंग क्या है?
उत्तर:
मार्चिग वह क्रिया है, जिसे एक निश्चित क्रम से किया जाता है। इसमें आदेशों को सुनते हुए ध्यान से क्रियाकलाप किए जाते हैं।

प्रश्न-19.
प्राथमिक चिकित्सा क्या है?
उत्तर:
जब कोई घटना घटती है, तब डॉक्टर के आने से पहले घायल व्यक्ति का जो उपचार किया जाता है, उसे प्राथमिक चिकित्सा कहते हैं।

प्रश्न-20.
राष्ट्रगान की रचना किसने की थी? यह कब स्वीकार किया गया?
उत्तर:
राष्ट्रगान की रचना गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने की थी। राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ 24 जनवरी सन 1950 को स्वीकार किया गया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-21.
राष्ट्रगान गाते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:
राष्ट्रगान गाते समय निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. राष्ट्रगान के समय सावधान की मुद्रा में खड़ा होना चाहिए।
  2. राष्ट्रगान गाते समय न हिले-डुलें और न बात करें।
  3. राष्ट्रगान को सही-सही गाएँ।
  4. राष्ट्रगान का सम्मान करें।
  5. राष्ट्रगान 52 सेकंड में पूरा होना चाहिए।

प्रश्न-22.
शारीरिक शिक्षा से क्या लाभ है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा से निम्नलिखित लाभ हैं

  1. यह शरीर और मस्तिष्क को स्वस्थ व मजबूत बनाती है।
  2. इसके द्वारा स्फूर्ति, आनन्द व ऊर्जा प्राप्त होती है।
  3. हार-जीत के द्वारा अपने पर नियन्त्रण व अनुशासन का गुण उत्पन्न होता है।
  4. नैतिक मूल्यों जैसे सहयोग, दृढ़ता, संयम आदि का विकास होता है।
  5. शारीरिक शिक्षा से समय के सदुपयोग की प्रेरणा मिलती है।

प्रश्न-23.
मार्चिग क्या है? मार्चिग करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:
मार्चिग वह क्रिया है, जिसमें आदेशों को सुनते हुए ध्यान से मार्च किया जाता है, जैसे सेना व पुलिस के जवानों का कदम-ताल करते हुए चलना व विद्यालयों में बच्चों की ड्रिल। माचिंग करते समय निम्न बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है-सावधान की मुद्रा में खड़ा होना, गर्दन सीधी व आँखें सामने की ओर खुली रखना। विश्राम की अवस्था में दोनों हाथ पीछे करना, हाथों और पैरों को ढीला छोड़ना। बात करना, पीछे मुड़ना व रूमाल प्रयोग करना मना है।

प्रश्न-24.
शारीरिक शिक्षा क्यों आवश्यक हैं?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा शरीर को स्वस्थ और मजबूत बनाने के साथ-साथ बालक के मानसिक, सामाजिक तथा नैतिक मूल्यों के विकास के लिए आवश्यक है। यह शिक्षा शारीरिक अंगों के विकास के साथ, खेल व तैराकी सिखाने, अपनी रक्षा करने, शरीर को स्वस्थ रखने, फुर्तीला बनाने तथा मनोरंजन हेतु आवश्यक है।

प्रश्न-25.
‘किसी कार्य को करने के लिए शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ होना आवश्यक है।’ इस कथन की पुष्टि कीजिए। उत्तर शरीर और मस्तिष्क को स्वस्थ रखने के लिए जो सीख, ज्ञान और क्रियाएँ कराई जाती हैं, वही शारीरिक शिक्षा कहलाती है। पढ़ना और ज्ञान प्राप्त करना मानसिक कार्य के अन्तर्गत आते हैं। शरीर को मजबूत बनाने के लिए जो व्यायाम किए जाते हैं, वे सब शारीरिक कार्य के अन्तर्गत आते हैं। किसी भी कार्य को करने के लिए शारीरिक एवं मानसिक रूप से विकसित होना आवश्यक है। पढ़ने लिखने आदि सभी कार्यों में हमारा मस्तिष्क और शरीर दोनों एक साथ कार्य करते हैं। जैसे क्रिकेट में गेंद को पकड़ने (कैच) के लिए मस्तिष्क और शरीर दोनों का प्रयोग करते हैं।

अर्धवार्षिक परीक्षा प्रश्न पत्र
कक्षा-7
विषय-खेल और स्वास्थ्य

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-1.
किस आसन को करने से स्मरण शक्ति का विकास होता है?
उत्तर:
शीर्षासन को।

प्रश्न-2.
शारीरिक तथा मानसिक विकास कैसे होता है?
उत्तर:
शरीरिक क्रियाओं द्वारा।

प्रश्न-3.
पोस्ट लाइन किस खेल से सम्बन्धित है?
उत्तर:
खो-खों से।

प्रश्न-4.
योग के कितने अंग होते हैं?
उत्तर:
आठ

प्रश्न-5.
गले सम्बन्धी रोगों में कौन-सा आसन उपयोगी है?
उत्तर:
सिंहासन

प्रश्न-6.
प्राण किसे कहते हैं?
उत्तर:
श्वास को

प्रश्न-7.
मनुष्य एक बार में कितनी बार श्वास लेता है?
उत्तर:
सोलह से अट्ठारह बार

प्रश्न-8.
फेफड़े कैसे मजबूत होते हैं?
उत्तर:
प्राणायाम करने से।

प्रश्न-9.
राष्ट्र ध्वज का केसरिया रंग किसका प्रतीक है?
उत्तर:
त्याग तथा बलिदान का।

प्रश्न-10.
ऊँची कूद में प्रत्येक खिलाड़ी द्वारा कितने प्रयास किए जाते हैं?
उत्तर:
तीन

प्रश्न-11.
सिगरेट में कौन-सा विषैला रासायनिक तत्व पाया जाता है?
उत्तर:
निकोटिन

प्रश्न-12.
ओलम्पिक खेल कितने वर्षों के अन्तराल में आयोजित होता है?
उत्तर:
चार वर्षों के

प्रश्न-13.
डिस्कस किस आकार का होता है?
उत्तर:
वृत्ताकार

प्रश्न-14.
मल्ल युद्ध को वर्तमान में किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
कुश्ती

प्रश्न-15.
ओलम्पिक के ध्वज में कितने गोले हैं?
उत्तर:
पाँच

प्रश्न-16.
‘रूस्तम-ए-जहाँ’ किसे कहा जाता है?
उत्तर:
गामा पहलवान को

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-17.
व्यायाम से आप क्या समझते हैं ।
उत्तर:
मनुष्य की ऐसी क्रियाएँ, जिनसे शरीर की मांसपेशियाँ अच्छी तरह विकसित और मजबूत हो जाती हैं तथा शरीर निरोग हो जाता है, व्यायाम कहलाता है। खेलकूद व विभिन्न आसन इसके अन्तर्गत आते हैं।

प्रश्न-18.
योग का क्या अर्थ है?
उत्तर:
योग शब्द युज’ से बना है। युज का अर्थ होता है जोड़ना या मिलाना। योग के द्वारा कार्य करते समय शरीर व मन में ताल-मेल बैठता है। योग एक प्रकार का आसन करने का अभ्यास है। योगाभ्यास करने से शरीर और मस्तिक दोनों स्वस्थ रहते हैं।

प्रश्न-19.
भस्त्रिका प्राणायाम कैसे किया जाता हैं? इसके चरण बताएँ।
उत्तर:
भस्त्रिका प्राणायाम 3 से 5 मिनट तक किया जाता है। इसे करने के लिए सर्वप्रथम वज्रासन में बैठ जाएँ, दोनों नासिकाओं से साँस अन्दर खींचे तथा बिना अन्दर रोके पूरी ताकत से बाहर निकालें।

प्रश्न-20.
अन्तरराष्ट्रीय खेल से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
राष्ट्रीय स्तर पर योग्य खिलाड़ी अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर खेलों में भाग लेकर खेलते हैं, उन्हें अन्तरराष्ट्रीय खेल कहते हैं। अन्तरराष्ट्रीय खेलों में ओलम्पिक, एशियाड एवं सैफ खेल प्रमुख हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-21.
व्यायाम करते समय कौन-कौन सी सावधानियाँ बरतनी चाहिए?

प्रश्न-22.
किन्हीं दो व्यायाम के विभिन्न चरणों को लिखिए?

प्रश्न-23.
प्राणायाम किसे कहते हैं? प्राणायाम के कोई पाँच लाभ बताएँ।

प्रश्न-24.
खेल भावना से आप क्या समझते हैं?

प्रश्न-25.
नशीले पदार्थों का सेवन करने से शरीर पर क्या दुष्प्रभाव पड़ता है?

वार्षिक परीक्षा प्रश्न पत्र
कक्षा-7
विषय-खेल और स्वास्थ्य

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-1.
क्रिकेट की गेंद को पकड़ने के लिए किसका प्रयोग होता है?
उत्तर:
शरीर तथा मस्तिष्क का।

प्रश्न-2.
रक्त संचार कैसे बढ़ता है?
उत्तर:
अंगों की गति से।

प्रश्न-3.
कौन-सा आसान थायराइड को सक्रिय एवं स्वस्थ बनाता है?
उत्तर:
सवांगासन

प्रश्न-4.
किस आसन से मोटापा दूर होता है?
उत्तर:
पद्ममयूरासन

प्रश्न-5.
किस प्राणायाम से हृदय रोग दूर हो जाते हैं?
उत्तर:
भ्रामरी प्राणायाम

प्रश्न-6.
भारतीय संविधान ने राष्ट्रध्वज का प्रारूप कब अपनाया था?
उत्तर:
22 जुलाई 1947 की।

प्रश्न-7.
कुश्ती के गब्वे की ऊँचाई कितने मीटर होती है?
उत्तर:
मीटर

प्रश्न-8.
डिस्कस किस चीज का बना होता है?
उत्तर:
फाइबर या लकड़ी का

प्रश्न-9.
वालीबॉल में एक टीम के कितने खिलाड़ी होते हैं?
उत्तर:
बारह

प्रश्न-10.
राष्ट्रकुल खेल कितने वर्ष में अन्तराल पर आयोजित होते हैं?
उत्तर:
चार वर्ष के

प्रश्न-11.
टेक ऑफ किस खेल से सम्बन्धित है?
उत्तर:
लम्बी कूद

प्रश्न-12.
अर्जुन पुरस्कार किसे दिया जाता है?
उत्तर:
अच्छे खिलाड़ियों को।

प्रश्न-13.
द्रोणाचार्य पुरस्कार किस वर्ष से प्रारम्भ किया गया?
उत्तर:
वर्ष 1985 से

प्रश्न-14.
राष्ट्रीय स्तर का सर्वोच्च पुरस्कार कौन-सा है?
उत्तर:
राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार

प्रश्न-15.
खो-खो में एक पाली कितने मिनट की होती हैं?
उत्तर:
7 मिनट की।

प्रश्न-16.
उत्तर प्रदेश शासन द्वारा महिला खिलाड़ियों को दिए जाने वाले पुरस्कार का नाम लिखिए।
उत्तर:
रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-17.
योग के कितने अंग होते हैं?
उत्तर:
योग के आठ अंग होते हैं

  1. यम
  2. नियम
  3. आसन
  4. प्राणायाम
  5. प्रत्याहार
  6. धारणा
  7. ध्यान
  8. समाधि।

प्रश्न-18.
चक्रासन से होने वाले लाभ बताइए।
उत्तर:
चक्रासन से निम्नलिखित लाभ होते हैं

  1. यह रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाकर वृद्धावस्था नहीं आने देता तथा दाँतों को सक्रिय बनाता है।
  2. शरीर में स्फूर्ति एवं शक्ति बढ़ाता है।
  3. यह श्वास रोग, सिरदर्द, नेत्र विकार, सर्वाइकल तथा स्पोंडोलाइसिस में विशेष हितकारी हैं।
  4. यह हाथों तथा पैरों की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है।

प्रश्न-19.
सिंहासन या व्याघ्रासन की स्थिति समझाइए।
उत्तर:
सिंहासन या व्याघ्रासन करते समय यदि सम्भव हो तो सूर्य की ओर मुख करके वज्रासन में बैठकर घुटनों को थोड़ा खोलकर रखें। हाथों की अंगुलियाँ पीछे की ओर करके पैरों के बीच सीधा रखें। श्वास अन्दर भरकर जिह्वा को बाहर निकाले। सामने देखते हुए श्वास को बाहर निकालते हुए सिंहवत् गर्जना कीजिए। यह क्रिया 3-4 बार करनी चाहिए।

प्रश्न-20.
खेल उपकरण समिति क्या कार्य करती हैं?
उत्तर:
खेल उपकरण समिति सहायक समिति होती है। यह खेल के मैदान को सही तरीके से व्यवस्थित कराती है। मैदान को साफ-सुथरा तथा खेलने योग्य बनाती है। यह खिलाड़ियों के लिए सभी उपकरणों की व्यवस्था भी करती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-21.
किन्हीं दो व्यायाम के विभिन्न चरणों को लिखिए।

प्रश्न-22.
सर्वाग आसन करने का तरीका बताइए।

प्रश्न-23.
प्राणायाम करने के सामान्य नियम क्या हैं? किन्हीं पाँच नियमों को बताइए।

प्रश्न-24.
खेल प्रबन्धन से तुम क्या समझते हो?

प्रश्न-25.
अन्तर विद्यालयीय प्रतियोगिता से होने वाले लाभ बताइए।

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UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 14 Social Change

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 14 Social Change (सामाजिक परिवर्तन) are part of UP Board Solutions for Class 12 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 14 Social Change (सामाजिक परिवर्तन).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 14
Chapter Name Social Change (सामाजिक परिवर्तन)
Number of Questions Solved 74
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 14 Social Change (सामाजिक परिवर्तन)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
सामाजिक परिवर्तन का क्या अर्थ है ? सामाजिक परिवर्तन के प्रमुख कारकों (कारणों) का उल्लेख कीजिए। [2007, 08, 09, 10, 11, 13, 15, 16]
या
सामाजिक परिवर्तन की अवधारणा स्पष्ट कीजिए। [2007]
या
सामाजिक परिवर्तन के कारकों की विवेचना कीजिए। [2017]
या
सामाजिक परिवर्तन के दो कारकों को बताइए। [2013, 14, 15]
या
सामाजिक परिवर्तन को परिभाषित कीजिए तथा इसके प्रमुख कारकों को स्पष्ट कीजिए।  [2015, 16]
उत्तर:
सामाजिक परिवर्तन की अवधारणा
मैरिल का कथन है कि मानव-सभ्यता का सम्पूर्ण इतिहास सामाजिक परिवर्तन का ही इतिहास है। इसका तात्पर्य यह है कि सामाजिक परिवर्तन प्रत्येक समाज की एक आवश्यक विशेषता ही नहीं बल्कि परिवर्तन के द्वारा ही मानव-समाज असभ्यता और बर्बरता के विभिन्न स्तरों. को पार करते हुए सभ्यता के वर्तमान स्तर तक पहुँच सका है। यह सच है कि किसी समाज में परिवर्तन की गति बहुत धीमी होती है, जब कि कुछ समाजों में यह गति बहुत तेज हो सकती है। लेकिन संसारे का कोई भी समाज ऐसा नहीं मिलेगा जिसमें परिवर्तन न होता रहा हो।

इसके बाद भी यह ध्यान रखना आवश्यक है कि सभी तरह के परिवर्तनों को हम सामाजिक परिवर्तन नहीं कहते। किसी समुदाय के लोगों की वेशभूषा, खान-पान, मकानों की बनावट अथवा परिवहन के साधनों में होने वाले विकास को सामाजिक परिवर्तन नहीं कहा जाता। संक्षेप में, सामाजिक परिवर्तन का तात्पर्य लोगों के सामाजिक सम्बन्धों, समाज के ढाँचे अथवा सामाजिक मूल्यों में होने वाले परिवर्तन से है। इसका तात्पर्य यह है कि जब किसी समाज में लोगों की प्रस्थिति और भूमिका, विचार करने के ढंगों तथा जीवन की स्वीकृत विधियों में परिवर्तन होने लगता है, तब इसे हम सामाजिक परिवर्तन कहते हैं।

सामाजिक परिवर्तन का अर्थ
इतिहास, दर्शन, राजनीतिशास्त्र तथा अनेक दूसरे समाज विज्ञानों से सम्बन्धित विद्वानों ने सामाजिक परिवर्तन के अर्थ को अपने-अपने दृष्टिकोण से स्पष्ट किया है। इस दशा में सामाजिक परिवर्तन की वास्तविक अवधारणा को समझने से पहले यह आवश्यक है कि परिवर्तन तथा ‘सामाजिक परिवर्तन के अन्तरे को स्पष्ट किया जाये। परिवर्तन क्या है ? इसे स्पष्ट करते हुए फिचर (Fichter) ने लिखा है, “संक्षिप्त शब्दों में, किसी पूर्व अवस्था या अस्तित्व के प्रकार में पैदा होने वाली भिन्नता को ही परिवर्तन कहा जाता है।
इस कथन के द्वारा फिचर ने यह बताया कि परिवर्तन में तीन प्रमुख तत्त्वों का समावेश होता है

  1.  एक विशेष दशा,
  2.  समय तथा
  3. भिन्नता।

सर्वप्रथम, जब हमें यह कहते हैं कि परिवर्तन हो रहा है तो हमारा उद्देश्य यह स्पष्ट करना होता है कि परिवर्तन किस दशा, वस्तु अथवा तथ्य में हो रहा है। दूसरे, समय के दृष्टिकोण से परिवर्तन एक तुलनात्मक दशा है। किसी वस्तु या दशा में एक समय की तुलना में दूसरे समय पैदा होने वाली नयी विशेषताओं को ही हम परिवर्तन कहते हैं। तीसरे, परिवर्तन का तात्पर्य किसी दशा अथवा वस्तु के रूप में इस तरह भिन्नता उत्पन्न होना है जो उसे पहले की तुलना में एक नया आकार-प्रकार दे दे। स्पष्ट है कि यदि समय के अन्तराल के साथ लोगों की वेशभूषा बदल जाये, मकानों की निर्माण-शैली में भिन्नता आ जाये अथवा परिवहन के साधन अधिक विकसित हो जायें तो इन सभी दशाओं को हम ‘परिवर्तन’ के नाम से सम्बोधित करेंगे।

‘सामाजिक परिवर्तन’ की अवधारणा परिवर्तन से भिन्न है। संक्षेप में, कहा जा सकता है कि जब दो विशेष अवधियों के बीच व्यक्तियों के सामाजिक सम्बन्धों, सामाजिक ढाँचे तथा सामाजिक मूल्यों में भिन्नता उत्पन्न होती है, तब इसी भिन्नता को हम सामाजिक परिवर्तन कहते हैं। इस प्रकार सामाजिक परिवर्तन का सम्बन्ध समाज के मुख्यत: तीन पक्षों में होने वाले परिवर्तन से होता है। ये पक्ष हैं

  1. व्यक्तियों के सामाजिक सम्बन्धों में परिवर्तन,
  2.  समाज की संरचना को बनाने वाली इकाइयों में परिवर्तन तथा
  3.  सामाजिक तथा सांस्कृतिक मूल्यों में परिवर्तन। इसका अर्थ है।

कि जब व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्धों, उनकी प्रस्थिति और भूमिका तथा जीवन की स्वीकृत विधियों में परिवर्तन होने लगता है, तब इसी दशा को हम सामाजिक परिवर्तन कहते हैं। इस तथ्य को समाजशास्त्रियों द्वारा दी गयी कुछ प्रमुख परिभाषाओं के आधार पर सरलता से समझा जा सकता है।

सामाजिक परिवर्तन की परिभाषाएँ

सामाजिक परिवर्तन का सही अर्थ क्या है, यह जानने के लिए हमें इसकी परिभाषाओं का अध्ययन करना होगा। विभिन्न समाजशास्त्रियों ने सामाजिक परिवर्तन को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया है

  • किंग्सले डेविस के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन केवल वे ही परिवर्तन समझे जाते हैं जो कि सामाजिक संगठन अर्थात् समाज के ढाँचे और कार्य में घटित होते हैं।’
  • मैकाइवर तथा पेज के अनुसार, “समाजशास्त्री होने के नाते हमारी विशेष रुचि प्रत्यक्ष रूप से सामाजिक सम्बन्धों से है। केवल इन सामाजिक सम्बन्धों में होने वाले परिवर्तन को ही हम सामाजिक परिवर्तन कहते हैं।”
  • गिलिन और गिलिन के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन का अर्थ जीवन के स्वीकृत प्रकारों में परिवर्तन है। भले ही यह परिवर्तन भौगोलिक दशाओं के परिवर्तन में हुए हों या सांस्कृतिक साधनों पर, जनसंख्या की रचना या सिद्धान्तों के परिवर्तन से, या प्रसार से या समूह के अन्दर ही आविष्कार से हुए हों।”

सामाजिक परिवर्तन के कारक
सामाजिक परिवर्तन के पीछे कोई-न-कोई कारक अवश्य रहता है। इसके विभिन्न अंगों में परिवर्तन लाने के लिए विभिन्न कारक ही उत्तरदायी हैं। अतः सामाजिक परिवर्तन भी अनेक कारकों का परिणाम होता है। सामाजिक परिवर्तन के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित कारक उत्तरदायी होते

1. प्राकृतिक या भौगोलिक कारक – प्राकृतिक या भौगोलिक कारक सामाजिक परिवर्तन लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्राकृतिक शक्तियाँ समाज के प्रतिमानों के रूपान्तरण में अधिक उत्तरदायी होती हैं। भौगोलिक कारकों में भूमि, आकाश, चाँद-तारे, पहाड़, नदी, समुद्र, जलवायु, प्राकृतिक घटनाएँ, वनस्पति आदि सम्मिलित हैं। प्राकृतिक कारकों के समग्र प्रभाव को ही प्राकृतिक पर्यावरण कहा जाता है। प्राकृतिक पर्यावरण का मानव-जीवन पर प्रत्यक्ष और गहरा प्रभाव पड़ता है। बाढ़, भूकम्प व घातक बीमारियाँ मानव सम्बन्धों को प्रभावित करते हैं। लोग घर-बार छोड़कर अन्यत्र प्रवास कर जाते हैं। नगर और गाँव वीरान हो जाते हैं। लोगों के सामाजिक जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन उत्पन्न हो जाते हैं। जलवायु सामाजिक परिवर्तन का प्रमुख कारक है। जलवायु सभ्यता के विकास और विनाश में प्रमुख भूमिका निभाती है। भौगोलिक कारक ही मनुष्य के आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन का निर्धारण करते हैं। कहीं मनुष्य प्रकृति के समक्ष नतमस्तक होकर उसी के अनुरूप कार्य करता है और कहीं प्रकृति की उदारता का भरपूर लाभ उठाकर सांस्कृतिक उन्नति के साथ विज्ञान और प्रौद्योगिकी में अग्रणी बन जाता है।

2. प्राणिशास्त्रीय कारक – प्राणिशास्त्रीय कारक भी सामाजिक परिवर्तन के लिए पूरी तरह उत्तरदायी होते हैं। प्राणिशास्त्रीय कारकों को जैविकीय कारक भी कहा जाता है। प्राणिशास्त्रीय कारक जनसंख्या के गुणात्मक पक्ष को प्रदर्शित करते हैं। इनसे प्रजातीय सम्मिश्रण, मृत्यु एवं जन्म-दर, लिंग अनुपात और जीवन की प्रत्याशी का बोध होता है। प्रजातीय मिश्रण से व्यक्ति के व्यवहार, मूल्य, आदर्श और विचारों में परिवर्तन आता है। प्रजातीय मिश्रण से समाज की प्रथाएँ, रीति-रिवाज, रहन-सहन का ढंग और सामाजिक सम्बन्ध बदल जाने के कारण सामाजिक परिवर्तन उत्पन्न होता है। जन्म-दर और मृत्यु-दर सदस्यों में सामाजिक अनुकूलन का भाव जगाते हैं। जन्म-दर और मृत्यु-दर में परिवर्तन होने से सामाजिक प्रवृत्तियाँ और मृत्यु-दर अधिक होने से समाज में व्यक्तियों की औसत आयु घट जाती है। समाज में क्रियाशील व्यक्तियों की संख्या घटने से नये आविष्कार बाधित होने लगते हैं। समाज में स्त्रियों की संख्या पुरुषों से अधिक होने पर बहुपत्नी प्रथा का प्रचलन हो जाता है, इसके विपरीत स्थिति में बहुपति प्रथा चलन में आ जाती है। नयी परम्पराएँ समाज की संरचना और मूल्यों में परिवर्तन उत्पन्न कर सामाजिक परिवर्तन का कारण बनती हैं। समाज में स्वास्थ्य सेवाओं में कमी आने से स्वास्थ्य में गिरावट होने लगती है।

3. सामाजिक परिवर्तन के आर्थिक कारक – सामाजिक परिवर्तन के लिए आर्थिक कारक सबसे अधिक उत्तरदायी हैं। आर्थिक कारक सामाजिक संस्थाओं, परम्पराओं, सामाजिक मूल्यों और रीति-रिवाजों को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं। औद्योगिक विकास ने भारतीय सामाजिक संरचना को आमूल-चूल परिवर्तित कर दिया है।
मार्क्स ने वर्ग-संघर्ष तथा भौतिक द्वन्द्ववाद के आधार पर सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या करके इसमें आर्थिक कारकों को निर्णायक माना है। मार्क्स का कहना है कि व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति प्राकृतिक साधनों से कितनी कर पाएगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि प्रौद्योगिकीय विकास का स्तर क्या है। प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों से विभिन्न वर्गों में पाये जाने वाले आर्थिक सम्बन्ध बदल जाते हैं। आर्थिक सम्बन्ध बदलते ही समाज की सामाजिक संरचना परिवर्तित हो जाती है। यह आर्थिक संरचना अन्य सभी संरचनाओं (जैसे-धार्मिक, राजनीतिक, नैतिक आदि) में परिवर्तन की श्रृंखला प्रारम्भ कर देती है। इस प्रकार सामाजिक परिवर्तन के लिए मार्क्स ने आर्थिक कारकों की भूमिका को अधिक महत्त्वपूर्ण बताया है।

4. सामाजिक परिवर्तन के सांस्कृतिक कारक – सांस्कृतिक कारक भी सामाजिक विघटन के महत्त्वपूर्ण कारक हैं। सोरोकिन का मत है कि सांस्कृतिक विशेषताओं में होने वाले परिवर्तन ही सामाजिक परिवर्तन लाने में सक्षम हैं। संस्कृति मानव-जीवन की जीवन-पद्धति है। इसमें रीतिरिवाज, सामाजिक संगठन, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था, विज्ञान, कला, धर्म, विश्वास, परम्पराएँ, मशीनें तथा नैतिक आदर्श सम्मिलित हैं। इसमें समस्त भौतिक और अभौतिक पदार्थ सम्मिलित होते हैं। वास्तव में, संस्कृति वह सीखा हुआ व्यवहार है जो सामाजिक जीवन को व्यवस्थित रूप से चलाने की एक शैली है। जैसे ही समाज के सांस्कृतिक तत्त्वों में परिवर्तन आता है, वैसे ही सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है।

वर्तमान में विवाह एक धार्मिक संस्कार न रहकर, समझौता मात्र रह गया है, जिसे कभी भी तोड़ा जा सकता है। बढ़ते हुए विवाह-विच्छेदों के कारण समाज में परिवर्तन आना स्वाभाविक ही। है। समाज में सामाजिक मूल्यों, संस्थाओं और प्रथाओं में जैसे ही बदलाव आता है, वैसे ही सांस्कृतिक प्रतिमान बदल जाते हैं जो सामाजिक परिवर्तन को जन्म देते हैं। सामाजिक परिवर्तन में सांस्कृतिक कारकों की भूमिका को प्रभावशाली बनाने के लिए ऑगबर्न ने सांस्कृतिक विलम्बना का सिद्धान्त प्रस्तुत किया। भौतिक और अभौतिक दोनों ही संस्कृतियाँ मानव के जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। एक पहलू में परिवर्तन आने से दूसरा पहलू स्वतः बदल जाता है।

5. सामाजिक परिवर्तन के जनसंख्यात्मक कारक – जनसंख्या समाज का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। एक-एक व्यक्ति मिलकर ही समाज बनता है। जनसंख्यात्मक कारक भी सामाजिक परिवर्तन लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं; क्योंकि किसी समाज की रचना को जनसंख्या प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। जनसंख्या की रचना, आकार, जन्म-दर, मृत्यु-दर, जनसंख्या की कमी एवं अधिकता, देशान्तरगमन, स्त्री-पुरुषों का अनुपात, बालकों, युवकों एवं वृद्धों की संख्या आदि सभी जनसंख्यात्मक कारक माने जाते हैं।

6. सामाजिक परिवर्तन के प्रौद्योगिकीय कारक – वर्तमान युग प्रौद्योगिकी का युग है। नये-नये आविष्कार, उत्पादन की विधियाँ अथवा यन्त्र सामाजिक परिवर्तन लाने में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रौद्योगिकी अथवा तकनीकी भी सामाजिक परिवर्तन का एक महत्त्वपूर्ण कारक है। जैसे-जैसे किसी समाज की प्रौद्योगिकी में परिवर्तन होते रहते हैं, वैसे-वैसे समाज के विभिन्न पहलुओं तथा संस्थाओं में परिवर्तन होते रहते हैं। प्रौद्योगिकी एक सामान्य शब्द है, जिसके अन्तर्गत समस्त यान्त्रिक उपकरणों तथा इनसे वस्तुओं के निर्माण की प्रक्रियाओं को सम्मिलित किया जाता है। अन्य शब्दों में, यह मशीनों और औजारों तथा उनके प्रयोग से सम्बन्धितं है।

वेबलन ने सामाजिक परिवर्तन लाने में प्रौद्योगिकी को प्रमुख स्थान दिया है। उन्होंने मनुष्यों को आदतों का दास माना है। आदतें स्थिर नहीं होतीं और प्रौद्योगिकी में परिवर्तन के साथ आदतें भी बदल जाती हैं। इससे सामाजिक परिवर्तन होता है। प्रौद्योगिकी विकास के साथ ही नगरीकरण और औद्योगीकरण की गति तीव्र होती है। बड़े-बड़े नगर तथा औद्योगिक केन्द्र विकसित होने से समाज में अनेक समस्याएँ जन्म लेने लगती हैं, जिससे समाज में परिवर्तन आ जाता है। भौतिकवादी प्रवृत्ति का उदय होने से धन व्यक्ति की प्रतिष्ठा का मापदण्ड बन जाता है। मनोरंजन के साधनों का व्यवसायीकरण होने तथा मानसिक संवेग तनाव और रोग को जन्म देकर सामाजिक परिवर्तन लाते हैं।

प्रश्न 2
सामाजिक परिवर्तन की विशेषताएँ क्या हैं? इसकी व्याख्या कीजिए। [2013]
या
सामाजिक परिवर्तन की दो विशेषताएँ लिखिए। [2013]
उत्तर:
सामाजिक परिवर्तन यद्यपि एक तुलनात्मक अवधारणा है, लेकिन कुछ प्रमुख विशेषताओं के आधार पर इसकी सामान्य प्रकृति को स्पष्ट किया जा सकता है

1. सामाजिक परिवर्तन सामुदायिक जीवन में होने वाला परिवर्तन है – यदि दो-चार व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्धों अथवा व्यवहार करने के ढंगों में परिवर्तन हो जाये तो इसे सामाजिक परिवर्तन नहीं कहा जा सकता। इसके विपरीत, जब किसी समुदाय के अधिकांश व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्धों, सामाजिक नियमों तथा विचार करने के तरीकों में परिवर्तन हो जाता है, तभी इसे हम सामाजिक परिवर्तन कहते हैं।

2. सामाजिक परिवर्तन की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती – कोई भी व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता कि किसी समाज में भविष्य में कौन-कौन से परिवर्तन होंगे और कब होंगे। हम अधिक-से-अधिक परिवर्तन की सम्भावना मात्र कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, हम केवल इतना ही कह सकते हैं कि आगामी कुछ वर्षों में औद्योगीकरण के कारण अपराधों की मात्रा में वृद्धि हो जायेगी अथवा किसी प्रकार के अपराध बढ़ सकते हैं, लेकिन हम निश्चित रूप से भविष्य में अपराधों की संख्या तथा स्वरूप के बारे में कुछ नहीं कह सकते।

3. सामाजिक परिवर्तन एक जटिल तथ्य है – सामाजिक परिवर्तन की प्रकृति इस प्रकार की है कि इसकी निश्चित माप नहीं की जा सकती। मैकाइवर का कथन है कि सामाजिक परिवर्तन का अधिक सम्बन्ध गुणात्मक परिवर्तनों (Qualitative changes) से है और गुणात्मक तथ्यों की माप न हो सकने के कारण इसकी जटिलता बहुत अधिक बढ़ जाती है। भौतिक वस्तुओं में होने वाले परिवर्तन को सरलता से समझा जा सकता है, लेकिन सांस्कृतिक मूल्यों (Cultural values) और विचारों में होने वाला परिवर्तन इतना जटिल हो जाता है कि सरलता से उसको समझ सकना बहुत कठिन है। सामाजिक परिवर्तन में जितनी वृद्धि होती जाती है, इसकी जटिलता भी उतनी ही बढ़ जाती है।

4. सामाजिक परिवर्तन की गति तुलनात्मक है – किसी एक समाज में होने वाले परिवर्तन को दूसरे समाज से उसकी तुलना करने पर ही समझा जा सकता है। एक ही समाज के विभिन्न भागों में परिवर्तन की गति भिन्न-भिन्न हो सकती हैं, अथवा विभिन्न समाजों में परिवर्तन की | मात्रा में अन्तर हो सकता है। सामान्य रूप से सरल और आदिवासी समाजों में परिवर्तन बहुत कम और धीरे-धीरे होता है, जब कि जटिल और सभ्य समाजों में हमेशा नये परिवर्तन होते रहते हैं। यही कारण है कि ग्रामों में परिवर्तन की गति धीमी और नगरों में बहुत तेज (rapid) होती है।

5. सामाजिक परिवर्तन का चक्रवत और रेखीय रूप – सामान्य रूप से सामाजिक परिवर्तन के दो स्वरूप होते हैं-चक्रवत और रेखीय। चक्रवत परिवर्तन का तात्पर्य है कि परिवर्तन कुछ विशेष दशाओं के बीच ही होता रहता है। लौट-बदलकर वही स्थिति फिर से आ जाती है जो कुछ समय पहले विद्यमान थी। फैशन या पहनावे के क्षेत्र में चक्रवत परिवर्तन सबसे अधिक देखने को मिलता है। रेखीय परिवर्तन हमेशा एक ही दिशा में आगे की ओर होता रहता है। ऐसे परिवर्तन अधिकतर प्रौद्योगिकी व शिक्षा के क्षेत्र में देखने को मिलते हैं।

6. सामाजिक परिवर्तन अनिवार्य नियम है – सामाजिक परिवर्तन एक अनिवार्य और आवश्यक घटना है। परिवर्तन चाहे नियोजित रूप से किया गया हो अथवा स्वयं हुआ हो, यह अनिवार्य रूप से सामाजिक जीवन को प्रभावित करता है। विभिन्न समाजों में परिवर्तन की मात्रा में अन्तर हो सकता है, लेकिन इसके न होने की सम्भावना नहीं की जा सकती। इसका कारण यह है कि समाज की आवश्यकताएँ हमेशा बदलती रहती हैं तथा व्यक्तियों की मनोवृत्तियों और रुचियों में भी परिवर्तन होता रहता है।

7. सामाजिक परिवर्तन सर्वव्यापी है – मानव-समाज के आरम्भिक इतिहास से लेकर आज तक परिवर्तन की प्रक्रिया सभी व्यक्तियों, समूहों और समाजों को प्रभावित करती रही है। बीरस्टीड का कथन है कि “परिवर्तन का प्रभाव इतना सर्वव्यापी रहा है कि कोई भी दो व्यक्ति एक समान नहीं हैं। उनके इतिहास और संस्कृति में इतनी भिन्नता पायी जाती है कि * किसी व्यक्ति को भी दूसरे का प्रतिरूप (Replica) नहीं कहा जा सकता।” इससे सामाजिक परिवर्तन की सर्वव्यापी प्रकृति स्पष्ट हो जाती है।

प्रश्न 3
सामाजिक परिवर्तनों से आप क्या समझते हैं। इसमें आर्थिक कारकों की भूमिका की विवेचना कीजिए।
या
आर्थिक कारक तथा सामाजिक परिवर्तन में सम्बन्ध स्थापित कीजिए। [2009]
(संकेत – सामाजिक परिवर्तन के अर्थ के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (1) का अध्ययन करें]
उत्तर:
सामाजिक परिवर्तनों के आर्थिक कारक
सामाजिक परिवर्तन के आर्थिक कारकों को समझने से पहले यह जानना आवश्यक है कि आर्थिक कारकों को अभिप्राय किन दशाओं अथवा विशेषताओं से है ? साधारणतया यह समझा जाता है कि प्रति व्यक्ति आय, लोगों का जीवन-स्तर, आर्थिक समस्याएँ, आर्थिक आवश्यकताएँ तथा सम्पत्ति का संचय आदि वे दशाएँ हैं जिन्हें आर्थिक कारक कहा जा सकता है। वास्तव में, ये दशाएँ स्वयं आर्थिक कारक न होकर आर्थिक कारकों के प्रभाव से उत्पन्न होने वाली कुछ प्रमुख घटनाएँ हैं। आर्थिक कारकों का तात्पर्य उन आर्थिक संस्थाओं तथा शक्तियों से होता है जो किसी समाज की आर्थिक संरचना का निर्माण करती हैं। इस दृष्टिकोण से उपभोग की प्रकृति, उत्पादन का स्वरूप, वितरण की व्यवस्था, आर्थिक नीतियाँ, श्रम-विभाजन की प्रकृति तथा आर्थिक प्रतिस्पर्धा वे प्रमुख आर्थिक कारक हैं, जो व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्धों को एक विशेष ढंग से प्रभावित करते हैं। मार्क्स के अनुसार केवल उत्पादन का स्वरूप अथवा उत्पादन का ढंग अकेले इतना महत्त्वपूर्ण आर्थिक कारक है जिसमें होने वाला कोई भी परिवर्तन सम्पूर्ण सामाजिक संरचना को बदल देता है। सामाजिक परिवर्तन से सम्बन्धित विभिन्न आर्थिक कारकों की प्रकृति को अग्रलिखित रूप से समझा जा सकता है

1. उपभोग की प्रकृति – किसी समाज में व्यक्ति किन वस्तुओं का उपभोग करते हैं तथा उपभोग का स्तर क्या है, यह तथ्य एक बड़ी सीमा तक सामाजिक जीवन को प्रभावित करता है। किसी समाज में जब अधिकांश व्यक्तियों को एक न्यूनतम जीवन-स्तर बनाये रखने के लिए उपभोग की केवल सामान्य सुविधाएँ ही प्राप्त होती हैं तो वहाँ परिवर्तन की गति बहुत सामान्य होती है। इसके विपरीत, यदि अधिकांश व्यक्ति उपभोग की सामान्य सुविधाएँ पाने से भी वंचित रहते हैं तो धीरे-धीरे जनसामान्य का असन्तोष इतना बढ़ जाता है कि वे सम्पूर्ण सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन लाने का प्रयत्न करने लगते हैं। व्यक्तियों का जीवन-स्तर यदि सामान्य से अधिक ऊँचा होता है तो अधिकांश व्यक्ति परम्परागत व्यवहार-प्रतिमानों, प्रथाओं और धार्मिक नियमों को अपने लिए आवश्यक नहीं समझते। इसके फलस्वरूप वहाँ परिवर्तन की प्रक्रिया बहुत तेज हो जाती है।

2. उत्पादन की प्रणालियाँ – उत्पादन की प्रणाली का तात्पर्य मुख्य रूप से उत्पादन के साधनों, उत्पादन की मात्रा तथा उत्पादन के उद्देश्य से है। मार्क्स के अनुसार, उत्पादन की प्रणाली सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रमुख कारण है। उत्पादन के साधन अथवा उपकरण जब बहुत सरल और परम्परागत प्रकृति के थे, तब समाजों की प्रकृति भी सरल थी। अनेक प्रकार के शोषण और आर्थिक कठिनाइयों के बाद भी व्यक्ति अपनी दशाओं से सन्तुष्ट रहते थे। जैसे-जैसे परम्परागत प्रविधियों की जगह उन्नत ढंग की मशीनों के द्वारा उत्पादन किया जाने लगा, समाज के उच्च और निम्न वर्ग की आर्थिक असमानताएँ बढ़ने लगीं। ये आर्थिक असमानताएँ वर्ग-संघर्ष को जन्म देकर सामाजिक परिवर्तन का ही नहीं बल्कि क्रान्ति तक का कारण बन जाती हैं।

3. वितरण की व्यवस्था – प्रत्येक समाज में वितरण की एक ऐसी व्यवस्था अवश्य पायी जाती है जिसके द्वारा राज्य अथवा समूह अपने साधन विभिन्न व्यक्तियों को उपलब्ध करा सकें। वितरण की यह व्यवस्था या तो राज्य के नियन्त्रण में होती है अथवा व्यक्तियों को इस बात की स्वतन्त्रता होती है कि वे प्रतियोगिता के द्वारा अपनी कुशलता के अनुसार स्वयं ही विभिन्न , साधन प्राप्त कर लें। वितरण की इन दोनों में से किसी भी एक व्यस्था के रूप में होने वाला परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया पैदा करता है। रॉबर्ट बीरस्टीड का विचार है कि यदि हवा और पानी की तरह सभी व्यक्तियों को भोजन और वस्त्र भी बिना किसी बाधा के मिल जाएँ तो समाज में कोई समस्या न रहने के कारण सामाजिक परिवर्तन की दशा भी उत्पन्न नहीं होती। इसके विपरीत, व्यवहार में प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में अनेक आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिसके फलस्वरूप सामाजिक परिवर्तन उत्पन्न हो जाना भी बहुत स्वाभाविक है। उदाहरण के लिए, प्राचीन समय में वस्तु-विनिमय का प्रचलन था जिसके फलस्वरूप व्यक्तियों के बीच प्राथमिक सम्बन्ध थे तथा लोगों की आवश्यकताएँ बहुत कम थीं।

4. आर्थिक नीतियाँ – प्रत्येक राज्य कुछ ऐसी आर्थिक नीतियाँ बनाता है जिनके द्वारा उपभोग, उत्पादन तथा वितरण की व्यवस्था को सन्तुलित बनाया जा सके। आर्थिक नीतियाँ केवल आर्थिक सम्बन्धों को ही व्यवस्थित नहीं बनातीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन को रोकने अथवा उसमें वृद्धि करने में भी इनका महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। उदाहरण के लिए, यदि राज्य स्वतन्त्र अर्थव्यवस्था पर नियन्त्रण लगाकर श्रमिकों की मजदूरी, कार्य की दशाओं तथा कल्याण सुविधाओं के बारे में कानून बनाकर श्रमिकों को संरक्षण प्रदान करता है तो समाज । में स्तरीकरण की व्यवस्था बदलने लगती है। पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की जगह राज्य द्वारा यदि सार्वजनिक उद्योगों की स्थापना की जाने लगती है तो इससे भी आर्थिक संरचना में और फिर सामाजिक संरचना में परिवर्तन होने लगते हैं।

5. श्रम-विभाजन – श्रम-विभाजन एक विशेष आर्थिक कारक है, जिसका सामाजिक परिवर्तन से प्रत्यक्ष सम्बन्ध है। समाज में जब किसी तरह का श्रम-विभाजन नहीं होता तो प्रत्येक व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को स्वयं पूरा करता है। इसके फलस्वरूप लोगों का जीवन आत्मनिर्भर अवश्य बनता है लेकिन लोग अपने धर्म, जाति और समुदाय के बन्धनों से बाहर नहीं निकल पाते। श्रम-विभाजन एक ऐसी दशा है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति से एक विशेष कार्य के द्वारा। आजीविका उपार्जित करने की आशा की जाती है। इसका तात्पर्य है कि श्रम-विभाजन में सभी व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक-दूसरे पर निर्भर हो जाते हैं। दुर्वीम — ‘ ने इस दशा को ‘सावयवी एकता’ कहा है।

6. आर्थिक प्रतिस्पर्दा – प्रतिस्पर्धा यद्यपि एक सामाजिक प्रक्रिया है लेकिन जब यह प्रक्रिया आर्थिक क्रियाओं से सम्बन्धित हो जाती है, तब इसी को हम आर्थिक प्रतिस्पर्धा कहते हैं। जॉनसन का कथन है कि आर्थिक प्रतिस्पर्धा व्यक्तियों में तनाव और संघर्ष की दशा उत्पन्न करके सामाजिक परिवर्तन को प्रोत्साहन देती है। आर्थिक प्रतिस्पर्धा के फलस्वरूप प्रत्येक व्यक्ति दूसरे की तुलना में अधिक-से-अधिक लाभ प्राप्त करने का प्रयत्न करने लगता है। इसके फलस्वरूप व्यक्तियों की कार्यकुशलता अवश्य बढ़ती है, लेकिन पारस्परिक द्वेष और । विरोध में भी बहुत वृद्धि हो जाती है।

7. औद्योगीकरण – अनेक विद्वान् औद्योगीकरण को सामाजिक परिवर्तन का सबसे महत्त्वपूर्ण आर्थिक कारक मानते हैं। औद्योगीकरण से छोटे-छोटे कस्बे बड़े औद्योगिक नगरों में परिवर्तित होने लगते हैं। उद्योगों में काम करने वाले लाखों श्रमिकों की मनोवृत्तियों, व्यवहारों और रहन-सहन के तरीकों में परिवर्तन होने लगता है। नये व्यवसायों में वृद्धि होने से सभी धर्मों, जातियों और वर्गों के लोमों द्वारा किये जाने वाले कार्य की प्रकृति में परिवर्तन होने लगता है।

प्रश्न 4
सामाजिक परिवर्तन क्या है? इसके जनसंख्यात्मक कारक की विवेचना कीजिए। [2011]
या
सामाजिक परिवर्तन के जनसांख्यिकीय कारकों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
संकेत – सामाजिक परिवर्तन के अर्थ के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (1) की हैडिंग सामाजिक परिवर्तन का अर्थ देखें।

जनसंख्यात्मक कारक भी सामाजिक परिवर्तन लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, क्योंकि किसी समाज की रचना को जनसंख्या प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। जनसंख्या की रचना, आकार, जन्म-दर, मृत्यु-दर, देशान्तरगमन, जनसंख्या की कमी एवं अधिकता, स्त्री-पुरुषों का – अनुपात, बालकों, युवकों एवं वृद्धों की संख्या आदि सभी जनसंख्यात्मक कारक माने जाते हैं। हम यहाँ सामाजिक परिवर्तन के जनसंख्यात्मक कारकों की भूमिका का उल्लेख करेंगे।

1. जनसंख्या के आकार को प्रभाव – जनसंख्या का आकार भी समाज को प्रभावित करता है। समाज का जीवन-स्तर, गरीबी, बेकारी, अशिक्षा, स्वास्थ्य एवं अनेक अन्य सामाजिक समस्याओं का जनसंख्या के आकार से घनिष्ठ सम्बन्ध है। हमारे सामाजिक मूल्य, आदर्श, मनोवृत्तियाँ, जीवन-यापन का ढंग सभी कुछ जनसंख्या के आकार पर भी निर्भर हैं। राजनीतिक व सैनिक दृष्टि से भी जनसंख्या का आकार महत्त्वपूर्ण है। जिन देशों में जनसंख्या अधिक होती है, वे राष्ट्र शक्तिशाली माने जाते हैं; चीन इसका उदाहरण है। जिन देशों की जनसंख्या … कम होती है, वे राष्ट्र कमजोर समझे जाते हैं। इसी प्रकार जिन देशों की जनसंख्या कम है। वहाँ के लोगों का जीवन-स्तर अपेक्षाकृत ऊँचा होता है। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, कनाडा और अमेरिका के लोगों का जीवन-स्तर चीन व भारत के लोगों से काफी ऊँचा है, क्योंकि वहाँ की जनसंख्या कम है। ग्राम और नगर का भेद भी जनसंख्या के कारक पर ही निर्भर है।

2. जन्म तथा मृत्यु-दर – जन्म और मृत्यु-दर जनसंख्या के आकार को प्रभावित करते हैं। जब किसी देश में मृत्यु-दर की अपेक्षा जन्म-दर अधिक होती है तो जनसंख्या में वृद्धि होती। है। इसके विपरीत स्थिति में जनसंख्या घटती है। जब जन्म-दर और मृत्यु दर में कमी होती है या दोनों में सन्तुलन होता है तो उस देश की जनसंख्या में स्थिरता पायी जाती है। जिन देशों में जनाधिक्य होता है, वहाँ इस प्रकार की प्रथाएँ एवं रीति-रिवाज पाये जाते हैं जिनके द्वारा जन्म-दर को कम किया जा सके। उदाहरण के लिए, वहाँ गर्भपात की छूट होती है तथा – जन्मनिरोध एवं परिवार नियोजन पर अधिक जोर दिया जाता है। ऐसे देशों में छोटे परिवारों पर : बल दिया जाता है। उदाहरण के लिए, भारत में जनाधिक्य होने के कारण परिवार नियोजन है। कार्यक्रम को तीव्र गति से लागू किया गया है। इसके विपरीत, जिन देशों में जनसंख्या कम होती है वहाँ स्त्रियों की सामाजिक प्रतिष्ठी-ऊँची होती है और जन्म-निरोध, परिवार नियोजन तथा गर्भपात के विपरीत धारणाएँ पायी जाती हैं। साथ ही वहाँ जन्म-दर को बढ़ाने के लिए समय-समय पर प्रोत्साहन दिया जाता है; जैसे-रूस में जनसंख्या को बढ़ाने के लिए कई प्रलोभन दिये जाते रहे हैं।

3. आप्रवास एवं उत्प्रवास – जनसंख्या की गतिशीलता भी सामाजिक परिवर्तन के लिए उत्तरदायी है। जब किसी देश में विदेश से आकर बसने वालों की संख्या अधिक होती है। तो वहाँ जनसंख्या में वृद्धि होती है और यदि किसी देश के लोग अधिक संख्या में विदेशों में जाकर रहने लगते हैं तो उस देश की जनसंख्या घटने लगती है। विदेशों से अपने देश में जनसंख्या के आने को आप्रवास (Immigration) तथा अपने देश से विदेशों में जनसंख्या के निष्क्रमण को उत्प्रवास (Emigration) कहते हैं। आप्रवास एवं उत्प्रवास के कारण विभिन्न संस्कृतियों के व्यक्ति सम्पर्क में आते हैं। वे एक-दूसरे के विचारों, भाषा, प्रथाओं, रीतिरिवाजों, कला, ज्ञान, आविष्कार, खान-पान, पहनावा, रहन-सहन, धर्म आदि से परिचित होते हैं। सम्पर्क के कारण एक संस्कृति दूसरी संस्कृति को प्रभावित एवं परिवर्तित करती है।

4. आयु – यदि किसी देश में वृद्ध लोगों की तुलना में युवक और बच्चे अधिक हैं तो वहाँ परिवर्तन को शीघ्र स्वीकार किया जाएगा। इसका कारण यह है कि वृद्ध व्यक्ति सामान्यतः रूढ़िवादी एवं परिवर्तन-विरोधी होते हैं तथा प्रथाओं के कठोर पालन पर बल देते हैं। वृद्ध लोगों की अधिक संख्या होने पर सैनिक दृष्टि से वह समाज कमजोर होता है। युवा लोगों की अधिकता होने पर वह देश और समाज नवीन आविष्कार करने में सक्षम होता है। ऐसे समाज में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक क्रान्तियाँ आने के अवसर मौजूद रहते हैं, किन्तु दूसरी ओर जनसंख्या में युवा लोगों का अधिक अनुपात होने पर अनुभवहीन लोगों की संख्या भी बढ़ जाती है।

5. लिंग – समाज में स्त्री-पुरुषों का अनुपात भी सामाजिक परिवर्तन को प्रभावित करता है। जिन समाजों में पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की संख्या अधिक होती है, उनमें स्त्रियों की सामाजिक स्थिति निम्न होती है और वहाँ बहुपत्नी प्रथा का प्रचलन होता है। दूसरी ओर, जहाँ पर स्त्रियों की तुलना में पुरुषों की संख्या अधिक होती है वहाँ बहुपति प्रथा का प्रचलन होता है तथा कन्या-मूल्य की प्रथा पायी जाती है।

प्रश्न 5
सामाजिक परिवर्तन में प्रौद्योगिकी की भूमिका का विवेचन कीजिए। [2012, 15, 16]
या
सामाजिक परिवर्तन में प्राविधिक कारक के चार प्रभावों को लिखिए। [2010]
उत्तर:
आज के युग में प्रौद्योगिकी सामाजिक परिवर्तन का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कारक है। यदि यह कहा जाए कि पिछले करीब पाँच सौ वर्षों में जितने भी परिवर्तन हुए हैं, उनके पीछे सबसे प्रमुख कारक प्रौद्योगिक है, तो इसमें किसी प्रकार की कोई अतिशयोक्ति नहीं हैं। यह वास्तविकता है कि विज्ञान के क्षेत्र में होने वाली प्रगति ने अनेक आविष्कारों को जन्म दिया है। आविष्कारों से यन्त्रीकरणं बढ़ा है और यन्त्रीकरण के फलस्वरूप उत्पादन की प्रणाली में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए हैं। थर्स्टन वेबलन सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रौद्योगिक दशाओं को उत्तरदायी मानते हैं। यहाँ हम प्रौद्योगिकीय कारकों और सामाजिक परिवर्तन के सम्बन्ध पर विचार करेंगे और यह जानने का प्रयत्न करेंगे कि प्रौद्योगिक कारक किस प्रकार जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में परिवर्तन लाने में योग देते है।

1. यन्त्रीकरण एवं सामाजिक परिवर्तन – विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के इस युग में आज आविष्कारों वे खोजों का विशेष महत्त्व है। वर्तमान में प्रेस, पहिया, भाप-इंजन, जहाज, मोटर-कार, वायुयान, ट्रैक्टर, टेलीफोन, रेडियो, टेलीविजन, बिजली, टाइपराइटर, कम्प्यूटर, गनपाउडर, अणुबम आदि के आविष्कार ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में आमूल-चूल परिवर्तन ला दिये हैं। मैकाइवर का कहना है कि भाप के इंजन के आविष्कार ने मानव के सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन को इतना प्रभावित किया है जितना स्वयं उसके आविष्कारक ने भी कल्पना नहीं की होगी। ऑगबर्न ने रेडियो के आविष्कार के कारण उत्पन्न 150 परिवर्तनों को उल्लेख किया। स्पाइसर ने अनेक ऐसे अध्ययनों का उल्लेख किया है जिनसे यह पता चलता है कि छोटे यन्त्रों के प्रयोग से ही मानवीय सम्बन्धों में विस्तृत एवं अनपेक्षित परिवर्तन हुए हैं। कार में स्वचालित यन्त्र (Self-starter) के लग जाने से ही कई सामाजिक परिवर्तन हुए। हैं। इससे स्त्रियों की स्वतन्त्रता बढ़ी, अब उनके लिए कार चलाना आसान हो गया, वे क्लब जाने लगीं, उनकी गतिशीलता में वृद्धि हुई और इसका प्रभाव उनके पारिवारिक जीवन पर भी पड़ा। भारत में नये कारखानों के खुलने और मशीनों की सहायता से उत्पादन होने से लोगों को विभिन्न स्थानों पर काम करने हेतु जाना पड़ा, विभिन्न जातियों के लोगों को साथ-साथ काम करना पड़ा। इससे जाति-प्रथा एवं संयुक्त परिवार प्रणाली का विघटन हुआ, छुआछूत कम हुई, वर्ग-व्यवस्था पनपी तथा स्त्रियों की स्वतन्त्रता में वृद्धि हुई।।

2. यन्त्रीकरण तथा सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन – यन्त्रीकरण ने सामाजिक मूल्यों को परिवर्तित करने में योग दिया है। सामाजिक मूल्यों का हमारे जीवन में विशेष महत्व होता है और हम अपने व्यवहार को उन्हीं के अनुरूप ढालने का प्रयत्न करते हैं। वर्तमान में व्यक्तिगत सम्पत्ति एवं शक्ति का महत्त्व बढ़ा है एवं सामूहिकता के मूल्य कमजोर पड़े हैं। अब धन और राजनीतिक शक्ति के बढ़ते हुए प्रभाव एवं महत्त्व के कारण उन लोगों को समाज में ज्यादा सम्मान या प्रतिष्ठा दी जाती है जो धनी हैं, बड़े व्यापारी या उद्योगपति हैं, राजनेता या प्रशासक हैं। यन्त्रीकरण ने प्रदत्त के बजाय अर्जित गुणों के महत्त्व को बढ़ाने में योगदान दिया है।

3. संचार के उन्नत साधन एवं सामाजिक परिवर्तन – संचार के नवीन उन्नत साधनों जो कि एक प्रभावशाली प्रौद्योगिकीय कारक हैं, ने विकास के अनेक जटिल सामाजिक फेरवर्तनों को जन्म दिया। संचार की अनेक प्रविधियाँ हैं, जिनमें तार, टेलीफोन, रेडियो, टेलीविजन आदि प्रमुख हैं। संचार ही तो सामाजिक सम्बन्धों का आधार है। सिनेमा यो चलचित्रों ने लोगों के विचारों, विश्वासों एवं मनोवृत्तियों को बदलने में काफी योग दिया है। साथ ही इसने पारिवारिक, सामाजिक एवं जातिगत सम्बन्धों को भी प्रभावित किया है। अब रेडियो की सहायता से कोई भी बात, सूचना एवं विचार कुछ ही क्षणों में लाखों-करोड़ों व्यक्तियों तक पहुँचाए जा सकते हैं। रेडियो मनोरंजन का स्वस्थ साधन भी है। रेडियो और टेलीविजन ने परिवार के सदस्यों को एक-साथ बैठकर अवकाश का समय बिताने को प्रेरित किया है। इससे सदस्यों को अपने मनोरंजन के लिए इधर-उधर भटकना नहीं पड़ता और साथ ही उनके पारिवारिक सम्बन्धों में दृढ़ता आयी है। संचार के विभिन्न साधनों के माध्यम से भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक समूह के लोगों को एक-दूसरे को समझने का मौका मिला है, जिसके परिणामस्वरूप उनमें सांस्कृतिक दूरी कुछ कम हुई है तथा सात्मीकरण हुआ है।

4. कृषि क्षेत्र में नवीन प्रविधियाँ एवं सामाजिक परिवर्तन – कृषि क्षेत्र में नवीन प्रविधियों का प्रयोग एक ऐसा प्रौद्योगिक कारक है जिसने जीवन में अनेक परिवर्तन लाने में योग दिया है। पशुओं की नस्ल, उर्वरकों के प्रयोग, बीजों की किस्मे तथा श्रम बचाने वाली मशीनों सम्बन्धी मामलों में सुधार हो जाने से कृषि उत्पादन में मात्रा एवं गुण दोनों ही दृष्टि से वृद्धि हुई है। सिंचाई के उन्नत साधनों ने भी कृषि-उत्पादन बढ़ाने में काफी योग दिया है। इसका प्रभाव न केवल आर्थिक जीवन पर बल्कि सामाजिक जीवन पर भी पड़ा। पहले कृषि-कार्यों के ठीक से संचालन के लिए अन्य व्यक्तियों के सहयोग की आवश्यकता पड़ती थी जिससे ग्रामों में सामूहिकता का महत्त्व बना हुआ था। अब श्रम की बचत करने वाली मशीनों के प्रयोग से व्यक्ति को कृषि-कार्यों में अन्य व्यक्तियों के सहयोग की आवश्यकता बहुत कम पड़ती है। इससे सामूहिकता की बजाय व्यक्तिवादिता का महत्त्व बढ़ा है। साथ ही मशीनों के प्रयोग से कृषि-कार्यों में कम व्यक्तियों की आवश्यकता ने संयुक्त के बजाय नाभिक परिवारों के महत्त्व को बढ़ाया है। कृषि के क्षेत्र में प्रयोग में लायी जाने वाली नवीन प्रविधियों ने सामाजिक सम्बन्धों, लोगों के दृष्टिकोण और मनोवृत्तियों को काफी कुछ बदल दिया है। अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी सम्बन्धों में घनिष्ठता और आत्मीयता के बजाय औपचारिकता और कृत्रिमता बढ़ती जा रही है।

5. उत्पादन प्रणाली और सामाजिक परिवर्तन – उत्पादन प्रणाली भी एक प्रमुख प्रौद्योगिक कारक है, जिसने समय-समय पर सामाजिक सम्बन्धों और सामाजिक संरचना को काफी कुछ बदला है। पहले जब मशीनों का आविष्कार नहीं हुआ था तब लोग अपने हाथों से काम करते थे और परिवार ही उत्पादन की इकाई था। ऐसी स्थिति में परिवार के सभी सदस्यों के हित एवं रुचियाँ समान थीं. और सम्बन्धों में घनिष्ठता थी। उस समय छोटे पैमाने पर उत्पादन होने से औद्योगिक समस्याएँ और श्रम-समस्याएँ नहीं थीं। लोग अपने घरों पर उत्पादित वस्तुओं को अन्य व्यक्तियों को उनके द्वारा उत्पादित वस्तुओं के बदले में देकर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। इसी प्रकार वे अपनी सेवाओं का भी आदान-प्रदान करते थे। इससे ग्रामीण समुदायों में एकता और दृढ़ता बनी हुई थी, लेकिन अब उत्पादन प्रणाली बदल गयी है। वर्तमान में नगरीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर फैक्ट्रियों में मशीनों की सहायता से उत्पादन होने लगा है। अब हाथ से काम करने वालों का महत्त्व कम हुआ है और मशीनें चलाने वाले प्रशिक्षित व्यक्तियों का महत्त्व बढ़ा है। श्रम-विभाजन और विशेषीकरण अधिक हुआ है। उत्पादन की नवीन प्रणाली ने सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और यहाँ तक कि सांस्कृतिक जीवन तक को भी बहुत कुछ बदल दिया है। इस नयी प्रणाली ने विभिन्न सामाजिक संस्थाओं, विवाह, परिवार, जाति आदि को अनेक रूपों में प्रभावित किया है और सामाजिक परिवर्तन की गति को तेज किया है।

6. अणु-शक्ति पर नियन्त्रण एवं सामाजिक परिवर्तन – अणु-शक्ति का प्रयोग रचनात्मक एवं विनाशक दोनों ही प्रकार के कार्यों के लिए किया जा सकता है। शान्ति के अभिकर्ता के रूप में अणु-शक्ति समृद्धि का अभूतपूर्व युगे ला सकती है। जहाँ इस शक्ति का प्रयोग मानव की सुख-समृद्धि को बढ़ाने और जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने में किया जा सकता है, वहीं इसका प्रयोग मानव और उसकी कृतियों को नष्ट करने के लिए भी किया जा सकता है। जैसे-जैसे जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अणु-शक्ति का प्रयोग बढ़ता जाएगा, वैसे-वैसे ही सामाजिक परिवर्तन की गति भी तीव्र होती जाएगी।

प्रश्न 6
सामाजिक परिवर्तन का क्या अर्थ है। सामाजिक परिवर्तन के सांस्कृतिक कारकों की भूमिका स्पष्ट कीजिए। [2009, 10, 13]
या
सामाजिक परिवर्तन की विभिन्न सांस्कृतिक दशाओं का विवेचन कीजिए। [2012, 17]
उत्तर:
सामाजिक परिवर्तन के अनेक कारक हैं। इनमें से एक सांस्कृतिक कारक अथवा सांस्कृतिक दशाएँ हैं। अनेक विद्वानों ने एक तर्क दिया है कि सांस्कृतिक कारक सामाजिक परिवर्तन लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इन विद्वानों में मैक्स वेबर, स्पेंग्लर तथा सोरोकिन प्रमुख हैं।

सामाजिक परिवर्तन के सांस्कृतिक कारकों की भूमिका
सामाजिक परिवर्तन के सांस्कृतिक कारकों की भूमिका को निम्नलिखित विद्वानों के विचारानुसार स्पष्ट किया जा सकता है

(क) मैक्स वैबर
मैंक्स वैबर ने संस्कृति एवं धर्म के सम्बन्ध को व्यक्त करने के लिए संसार के सभी प्रमुख धर्मों का अध्ययन किया। इन धर्मों में ईसाई धर्म की एक प्रमुख शाखा प्रोटेस्टैण्ट धर्म को उसने विशेष रूप से अध्ययन किया और उसी के आधार पर मैक्स वेबर ने यह निष्कर्ष निकाला कि धर्म का सामाजिक व्यवस्था; विशेष रूप से आर्थिक संरचना पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इन सम्बन्ध में मैक्स वेबर ने पूँजीवाद का प्रोटेस्टैण्ट धर्म से सम्बन्ध स्थापित किया। मैक्स वैबर ने अपने सिद्धान्त में यह दिखाया है कि प्रोटेस्टेण्ट धर्म में पूँजीवाद को प्रोत्साहित करने वाले तत्त्व निहित हैं। इस प्रकार के तत्त्व अन्य धर्मों में नहीं पाए जाते। इसलिए पूँजीवाद की भावना का विकास केवल पश्चिमी यूरोप के देशों में ही हुआ यहाँ पर प्रोटैस्टैण्ट लोगों की संख्या अधिक है। मैक्स वैबर के अनुसार धर्म व संस्कृति ही यह निश्चय करते हैं कि देश में किस प्रकार की प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहन मिलता है।

(ख) स्पेंग्लर
स्पेंग्लर ने अपनी पुस्तक ‘दि डिक्लाइन ऑफ दि वेस्ट’ (The decline of the waste) में लिखा है कि ऋतुओं की भाँति ही विश्व की संस्कृति समय-समय पर परिवर्तित होती रहती है। यह परिवर्तन कुछ निश्चित नियमों के अनुसार ऋतुओं की भाँति चक्रवत् होता रहता है। इसी परिवर्तन के कारण सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया चलती रहती है। एक संस्कृति के बाद दूसरी संस्कृति आती है और उससे पूर्व संस्कृति के नियमों में प्ररवर्तन हो जाता है। इस परिवर्तन का क्रम चक्रवत् चलता रहता है और सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया भी सदैव चलती रहती है।

(ग) सोरोकिन
सोरोकिन ने संस्कृति को ही सामाजिक परिवर्तन का मुख्य कारण माना है। उनका कहना है कि जो लोग सैदव ऊर्ध्वगामी विकास देखते हैं, वे सहीं नहीं हैं; औन न ही वे व्यक्ति सही हैं जो सामाजिक परिवर्तन को चक्रीय गति से देखते हैं। सामाजिक परिवर्तन की गति चक्रीय तो है परन्तु वास्तव में यह सांस्कृतिक तत्त्वों के उतार-चढ़ाव के कारण होता है। उसका विचार है कि संस्कृति दो प्रकार की होती है – प्रथम चेतनात्मक संस्कृति है, जिसमें भौतिक सुख को प्रदान करने वाले आविष्कार व उपकरणों को महत्त्व दिया जाता है। ये संस्कृति के भौतिक तथा मूर्त पक्ष हैं जिनको हम चेतनात्मक संस्कृति के नाम से पुकारते हैं। संस्कृति के दूसरे स्वरूप को सोरोकिन विचारात्मक संस्कृति के नाम से पुकारता है। इसमें भौतिक समृद्धि की अपेक्षा आध्यात्मिक विकास पर अधिक बल दिया जाता है। संस्कृति का यह अभौतिक तथा अमूर्त पक्ष होता है जिसका सम्बन्ध हमारे विचारों, हमारी भावनाओं से होता है। सोरोकिन का मत है कि इन दोनों प्रकार की संस्कृतियों में उतार-चढ़ाव होता रहता है। कभी चेतनात्मक संस्कृति ऊपर उन्नति की ओर पहुँचती है और फिर विचारात्मक संस्कृति की ओर झुक जाती है। इन दोनों संस्कृतियों के बीच उतार-चढ़ाव की प्रक्रिया से सामाजिक परिवर्तन का जन्म होता है।

सोरोकिने का मत है कि दोनों प्रकार की संस्कृतियों में से जब कोई भी संस्कृति अपनी चरम सीमा पर पहुँचती है तो वह और आगे न बढ़कर पुनः पीछे की ओर लौटने लगती है। आज हम भौतिकवाद की चरम सीमा पर हैं किन्तु व्यक्ति बनाव-सिंगार से तंग आकर सरल जीवन तथा सादगी की ओर बढ़ता नजर आता है। आविष्कारों के भयंकर परिणामों से तंग आकर विश्व शान्ति के प्रयासों को तीव्र करने के लिए विविध प्रकार के संगठनों का निर्माण होने लगा है। इन सब बातों से यही निष्कर्ष निकलता है कि एक चरम सीमा के बिन्दु पर पहुँचकर कोई भी संस्कृति पीछे की ओर लौटती है।

संस्कृति तथा सामाजिक परिवर्तन के सम्बन्ध में उपर्युक्त विद्वानों के विचारों की विवेचना के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि संस्कृति सामाजिक परिवर्तन की दिशा को निश्चित करती है। संस्कृति इस बात को निर्धारित करती है कि कौन-सा आविष्कार किस सीमा तक लोकप्रिय होगा। जो आविष्कार सांस्कृतिक तत्त्वों के अनुरूप नहीं होते है उनको समाज में सफलता नहीं मिलती है।

प्रश्न 7
ऑगबर्न के सांस्कृतिक विलम्बना के सिद्धान्त की विवेचना कीजिए। [2007, 09, 11]
या
सांस्कृतिक विलम्बना की अवधारणा की विस्तृत व्याख्या कीजिए। [2015]
या
सांस्कृतिक विलम्बना पर एक लेख लिखिए। [2013]
उत्तर:
उक्ट ऑगबर्न का सांस्कृतिक विलम्बना का सिद्धान्त

विलियम एफ० ऑगबर्न (w. F. Ogburn) ने संस्कृति और सामाजिक परिवर्तन के सम्बन्ध को स्पष्ट करने के लिए सर्वप्रथम 1922 ई० में अपनी पुस्तक ‘Social Change’ में सांस्कृतिक पिछड़’ अथवा ‘सांस्कृतिक विलम्बना’ के सिद्धान्त को प्रस्तुत किया। आपके अनुसार, संस्कृति का तात्पर्य मनुष्य द्वारा निर्मित सभी प्रकार के भौतिक और अभौतिक (Material and non-material) तत्त्वों से है। ‘lag’ का तात्पर्य ‘लँगड़ाना’ अथवा ‘पीछे रह जाना होता है। इस प्रकार संस्कृति के भौतिक पक्ष की तुलना में जब अभौतिक पक्ष पीछे रह जाता है, तब सम्पूर्ण संस्कृति में असन्तुलन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इसी स्थिति को हम ‘सांस्कृतिक विलम्बना’ अथवा ‘सांस्कृतिक पिछड़’ कहते हैं। यही स्थिति सामाजिक परिवर्तन का आधारभूत कारण है। ऑगबर्न ने स्वयं इस स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा है कि “…………………. आधुनिक संस्कृति के विभिन्न भाग समान गति से नहीं बदल रहे हैं, कुछ भागों में दूसरी की अपेक्षा अधिक तेजी से परिवर्तन हो रहा है और क्योंकि संस्कृति के सभी भाग एक-दूसरे पर निर्भर और एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं, इसलिए संस्कृति के एक भाग में होने वाले तीव्र परिवर्तन से दूसरे भागों में भी अभियोजन की आवश्यकता हो जाती है।”

ऑगबर्न का तर्क है कि संस्कृति के विभिन्न भागों में होने वाले परिवर्तनों की असमान दर ही सांस्कृतिक पिछड़ का कारण है। हम किसी भी प्रगतिशील अथवा आदिम समाज का उदाहरण क्यों न ले लें, अधिकांश आधुनिक समाजों में हमें यह स्थिति देखने को मिलती है। एक ओर, हमारी भौतिक संस्कृति में क्रान्तिकारी परिवर्तन हो गये हैं। हम आधुनिक ढंगों से खेती करते हैं, मशीनों के द्वारा उत्पादन कार्य करते हैं, चिकित्सा विज्ञान की प्रगति से मृत्यु को भी कुछ समय तक रोकने में समर्थ हो गये हैं, परिवहन के साधनों से हजारों मील की दूरी कुछ घण्टों में ही तय करने लगे हैं और संचार के साधनों से हजारों मील दूर की आवाज को कुछ सेकण्डों में ही सुन सकते हैं; लेकिन दूसरी ओर, हमारे विश्वास और लोकाचार आज भी हजारों वर्ष पुराने हैं। व्यक्ति कितना ही प्रगतिशील और शिक्षित क्यों न हो गया हो, वह काली बिल्ली द्वारा रास्ता काटे जाने अथवा टूटे हुए शीशे को देखना अशुभ समझता है और पितृ-आत्माओं की तृप्ति के लिए कुछ व्यक्तियों को भोजन कराने में विश्वास करता है। इसी प्रकार हजारों विश्वास हमारे जीवन को आज भी अपनी सम्पूर्ण शक्ति से प्रभावित कर रहे हैं। तात्पर्य यह है कि संस्कृति का भौतिक पक्ष कहीं आगे बढ़ चुका है, जब कि अभौतिक पक्ष बहुत पीछे है। इसी स्थिति को हम ‘सांस्कृतिक पिछड़’ कहते हैं।

सन् 1947 में अपनी एक अन्य पुस्तक ‘A Handbook of Sociology’ में ऑगबर्न ने ‘सांस्कृतिक पिछड़’ की परिभाषा में कुछ संशोधन करते हुए कहा है कि “सांस्कृतिक पिछड़ वह तनाव है जो तीव्र और असमान गति से परिवर्तन होने वाली संस्कृति के दो परस्पर सम्बन्धित भागों में विद्यमान होता है। इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि भौतिक संस्कृति की अपेक्षा अभौतिक संस्कृति में होने वाले कम परिवर्तन को ही हम सांस्कृतिक पिछड़ नहीं कहते, बल्कि संस्कृति के दोनों भागों में से किसी भी एक भाग के दूसरे से आगे निकल जाने की स्थिति को सांस्कृतिक पिछड़ कहा जाता है। उदाहरण के लिए, हम भारतीय समाज को ले सकते हैं, जहाँ नगरों और ग्रामीण समुदायों में यह स्थिति भिन्न-भिन्न रूपों में पायी जाती है। नगरों में भौतिक संस्कृति अभौतिक संस्कृति की अपेक्षा बहुत आगे है, जब कि ग्रामीण समुदाय में भौतिक संस्कृति की अपेक्षा अभौतिक संस्कृति का महत्त्व कहीं अधिक है। तात्पर्य यह है कि संस्कृति का कोई भी पक्ष दूसरे की अपेक्षा यदि अधिक परिवर्तित हो जाये तो यह स्थिति ‘सांस्कृतिक पिछड़’ की स्थिति उत्पन्न कर देती है।

सांस्कृतिक विलम्बना के कारण तथा परिणाम
सांस्कृतिक विलम्बना के सिद्धान्त में ऑगबर्न ने इस तथ्य को भी स्पष्टं किया कि संस्कृति के भौतिक तथा अभौतिक पक्षों के बीच यह असन्तुलन क्यों पैदा होता है तथा सांस्कृतिक विलम्बना की दशी से सम्बन्धित कौन-से परिणाम सामाजिक परिवर्तन को जन्म देते हैं ? जहाँ तक सांस्कृतिक विलम्बना के कारण का प्रश्न है, इसे पाँच प्रमुख दशाओं के आधार पर समझा जा सकता है

  1. रूढ़िवादी मनोवृत्तियाँ संस्कृति के अभौतिक पक्ष में परिवर्तन लाने में बाधक होती हैं। अधिकांश व्यक्ति नयी प्रौद्योगिकी को आसानी से ग्रहण कर लेते हैं, लेकिन वे अपने विचारों, विश्वासों तथा सामाजिक मूल्यों को बदलना नहीं चाहते।
  2. अधिकांश लोगों में नये विचारों यो नयी वस्तु के प्रति भय की भावना होती है।
  3.  अतीत के प्रति निष्ठा होने के कारण हम प्रत्येक उसे व्यवहार अथवा विचार को अधिक अच्छा समझते हैं जिनको परम्पराओं के रूप में हमारे पूर्वजों द्वारा स्थापित किया जाता है।
  4. समाज के कुछ विशेष वर्गों के निहित स्वार्थ (Vested interests) भी संस्कृति के भौतिक तथा अभौतिक पक्ष के बीच पैदा होने वाले सन्तुलन का एक प्रमुख कारण हैं। समाज का पूँजीपति वर्ग, बुद्धिजीवी वर्ग तथा अधिकारी वर्ग अपने-अपने स्वार्थों के कारण अक्सर नयी प्रौद्योगिकी, नवाचारों, व्यवहार के नये तरीकों अथवा नये विचारों का इसलिए विरोध करता है जिससे उसका पारम्परिक महत्त्व कम न हो जाए।
  5. नये विचारों की परीक्षा में कठिनता होने के कारण उनकी उपयोगिता की जाँच करना भी अक्सर सम्भव नहीं हो पाता। यही दशाएँ संस्कृति के विभिन्न पक्षों में असन्तुलन पैदा करती हैं।

किसी समाज में जब सांस्कृतिक विलम्बना की दशा उत्पन्न होती है, तब इसके अनेक परिणाम स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। जब संस्कृति का एक पक्ष दूसरे से पिछड़ जाता है, तब

  1.  व्यक्तियों के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वे अपनी दशाओं से नये सिरे से अनुकूलन करें।
  2. इसके फलस्वरूप परम्परागत संस्थाओं के कार्य दूसरी संस्थाओं को हस्तान्तरित होने लगते हैं।
  3. यही दशा सांस्कृतिक मूल्यों के प्रभाव में कमी पैदा करती है।
  4. यदि सांस्कृतिक विलम्बना की दशा लम्बे समय तक बनी रहती है तो सामाजिक सन्तुलन बिगड़ जाने के कारण सामाजिक समस्याओं में वृद्धि होने लगती है। ये सभी दशाएँ सामाजिक परिवर्तन में वृद्धि करती हैं।

सिद्धान्त की समालोचना यद्यपि यह सच है कि संस्कृति के सभी भाग समान गति से नहीं बदलते, लेकिन जिस रूप में ऑगबर्न ने सांस्कृतिक पिछड़’ को सिद्धान्त प्रस्तुत किया है, उसमें बहुत-सी कमियाँ हैं

  1. यह विश्वास नहीं किया जा सकता कि अभौतिक संस्कृति की तुलना में भौतिक संस्कृति सदैव ही आगे बढ़ जाती है। मैक्स मूलर जैसे प्रसिद्ध विद्वान् ने भारत का उदाहरण देते हुए बताया है कि भारत ज्ञान और त्याग में अत्यधिक प्रगतिशील है, जब कि भौतिक संस्कृति का यहाँ न तो अधिक महत्त्व है और न ही इस क्षेत्र में प्रगति करने का प्रयत्न किया जा सकता है।
  2.  ऑगबर्न ने सांस्कृतिक पिछड़’ को ही सामाजिक परिवर्तन का एकमात्र कारण मान लिया है, लेकिन यह सदैव सत्य नहीं है। मैकाइवर का कथन है कि संस्कृति का असन्तुलन सदैव भौतिक और अभौतिक पक्षों के बीच में नहीं होता, बल्कि संस्कृति के एक पक्ष में ही सन्तुलन की स्थिति हो सकती है।
  3.  कभी-कभी अभौतिक और भौतिक संस्कृति के विकास की दर में ही भिन्नता होने से सांस्कृतिक पिछड़ की स्थिति उत्पन्न नहीं होती, बल्कि अभौतिक संस्कृति के विभिन्न अंगों का असन्तुलन भी पिछड़ की स्थिति उत्पन्न करता है। उदाहरण के लिए, हम एक समय पर यह विश्वास दिलाते हैं कि दहेज-प्रथा असंगत और असामयिक है और दूसरे समय पर हम स्वयं दहेज लेते और देते हैं। हम अन्धविश्वासों की आलोचना करते हैं और स्वयं ही अन्धविश्वासों के अंनुसार व्यवहार करते हैं। इस स्थिति में हम अभौतिक संस्कृति में होने वाले परिवर्तन की वास्तविक सीमा को नहीं समझ पाते।
  4. हमारे सामने मुख्य कठिनाई यह आती है कि संस्कृति के अभौतिक पक्ष में होने वाले परिवर्तनों को किस प्रकार मापा जाए ? भौतिक वस्तुओं के परिवर्तनों को हम माप सकते हैं लेकिन अभौतिक पक्ष से सम्बन्धित परिवर्तन का केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है। इस प्रकार भौतिक संस्कृति के तनिक-से परिवर्तन को प्रगति कह देना और अभौतिक संस्कृति में अनेक परिवर्तनों के बाद भी उसे ‘स्थायी’ मान लेना हमारी सबसे बड़ी भूल है।
  5.  ऑगबर्न के इस सिद्धान्त का एक बड़ा दोष यह है कि आपने इस सिद्धान्त को केवल पश्चिमी समाज की परिस्थितियों में ही प्रस्तुत किया है। इस प्रकार यदि हम कहें कि आपने केवल औद्योगीकरण को ही अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक परिवर्तन का एकमात्र कारक मान लिया है तो यह गलत नहीं होगा।

प्रश्न 8
सामाजिक परिवर्तन के प्रमुख सिद्धान्तों की विवेचना कीजिए। या सोरोकिन के सामाजिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए। [2014, 16]
या
सामाजिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धान्त का वर्णन कीजिए। [2011, 12, 16, 17]
या
सामाजिक परिवर्तन के रेखीय सिद्धान्त की विवेचना कीजिए। [2012, 14]
या
‘सामाजिक परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है।’ स्पष्ट करते हुए इसके चक्रीय सिद्धान्त की विवेचना कीजिए। [2012]
उत्तर:
सामाजिक परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया
सामाजिक परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है। असभ्यता और बर्बरता के युग में जब मानव का जीवन पूरी तरह प्राकृतिक था, तब भी समाज में परिवर्तन की प्रक्रिया चलती रही। यदि संसार के इतिहास को उठाकर देखा जाए तो ज्ञात होता है कि जब से समाज का प्रादुर्भाव हुआ है, तब से समाज के रीति-रिवाज, परम्पराएँ, रहन-सहन की विधियाँ, पारिवारिक, वैवाहिक व्यवस्थाओं आदि में निरन्तर परिवर्तन होता आया है। इस परिवर्तन के फलस्वरूप ही वैदिक काल के समाज में और वर्तमान समाज में आकाश-पाताल का अन्तर पाया जाता है। वास्तविकता यह है कि मनुष्य की
आवश्यकताएँ हमेशा बदलती रहने के कारण वह उसकी पूर्ति के नये-नये तरीके सोचता रहता है। इसके फलस्वरूप उसके कार्य और विचार करने के तरीकों में परिवर्तन होता रहता है। इस प्रकार सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया सतत अथवा निरन्तर क्रम में स्वाभाविक रूप से चलती रहती है।

सामाजिक परिवर्तन के प्रमुख सिद्धान्त
सामाजिक परिवर्तन के आरम्भिक सिद्धान्तों में उविकास की प्रक्रिया को अधिक महत्त्व दिया गया, जब कि बाद के सामाजिक विचारकों ने रेखीय अथवा चक्रीय आधार पर सामाजिक परिवर्तन की विवेचना की। आज अधिकांश समाजशास्त्री संघर्ष सिद्धान्त के आधार पर सामाजिक परिवर्तन की विवेचना करने के पक्ष में हैं। वास्तव में, सामाजिक परिवर्तन के बारे में दिये गये सिद्धान्तों की संख्या इतनी अधिक है कि यहाँ पर इन सभी का उल्लेख करना सम्भव नहीं हैं; अत: हम यहाँ केवलु प्रमुख रूप से सामाजिक परिवर्तन के रेखीय और चक्रीय सिद्धान्त का ही वर्णन करेंगे।

सामाजिक परिवर्तन के रेखीय सिद्धान्त
समाजशास्त्र को जब एक व्यवस्थित विज्ञान के रूप में विकसित करने का कार्य आरम्भ हुआ तो आरम्भिक समाजशास्त्री उविकास के सिद्धान्त से अधिक प्रभावित थे। फलस्वरूप कॉम्टे, स्पेन्सर, मॉर्गन, हेनरीमैन तथा वेबलन जैसे अनेक विचारकों ने यह स्पष्ट किया कि सामाजिक परिवर्तन एक क्रमिक प्रक्रिया है, जो विकास के अनेक स्तरों में से गुजरती हुई आगे की ओर बढ़ती है। परिवर्तन के इस क्रम में आगे आने वाला प्रत्येक स्तर अपने से पहले के स्तर से अधिक स्पष्ट लेकिन जटिल होता है। दूसरे शब्दों में, सामाजिक परिवर्तन की प्रवृत्ति एक निश्चित दशा में आगे की ओर बढ़ने की होती है। उदाहरण के लिए, समाजशास्त्र के जनक कॉम्टे ने यह स्पष्ट किया कि सामाजिक परिवर्तन का प्रमुख कारण मनुष्य के बौद्धिक स्तर अथवा उसके विचारों में परिवर्तन होते रहना है। यह बौद्धिक विकास तीन स्तरों के द्वारा होता है। पहले स्तर में व्यक्ति के विचार धार्मिक विश्वासों से प्रभावित होते हैं। दूसरे स्तर पर मनुष्य तात्विक अथवा दार्शनिक विधि से विचार करने लगता है। अन्तिम स्तर प्रत्यक्ष अथवा वैज्ञानिक ज्ञान का स्तर है जिसमें तर्क और अवलोकन की सहायता से विभिन्न घटनाओं के कारणों और परिणामों की व्याख्या की जाने लगती है।

इस प्रकार सामाजिक परिवर्तन ऊपर की ओर उठती हुई एक सीधी रेखा के रूप में होता है। हरबर्ट स्पेन्सर ने भी सामाजिक परिवर्तन को समाज के उविकास की चार अवस्थाओं के रूप में स्पष्ट किया। इन्हें स्पेन्सर ने सरल समाज (Simple society), मिश्रित समाज (Compound society), दोहरे मिश्रित समाज (Double compound society) तथा अत्यधिक मिश्रित समाज (Terribly compound society) का नाम दिया। समाज की प्रकृति में होने वाले इन प्रारूपों के आधार पर स्पेन्सर ने बताया कि आरम्भिक समाज आकार में छोटे होते हैं, इसके सदस्यों में पारस्परिक सम्बद्धता कम होती है, यह समरूप होते हैं लेकिन लोगों की भूमिकाओं में कोई निश्चित विभाजन नहीं होता।

इसके बाद आगे होने वाले प्रत्येक परिवर्तन के साथ समाज का आकार बढ़ने लगता है, सदस्यों में पारस्परिक निर्भरता बढ़ती जाती है, लोगों की प्रस्थिति और भूमिका में एक स्पष्ट अन्तर दिखायी देने लगता है तथा सामाजिक संरचना अधिक व्यवस्थित बनने लगती है। इस तरह समाज में होने वाला प्रत्येक परिवर्तन सरलता से जटिलता की ओर एक रेखीय क्रम में होता है। मॉर्गन ने मानव-सभ्यता के विकास को जंगली युग, बर्बरता का युग तथा सभ्यता का युग जैसे तीन भागों में विभाजित करके स्पष्ट किया। कार्ल मार्क्स ने आर्थिक आधार पर तथा वेबलन ने प्रौद्योगिक आधार पर सामाजिक परिवर्तन के रेखीय सिद्धान्त प्रस्तुत किये। स्पष्ट है कि जिन सिद्धान्तों के द्वारा सामाजिक परिवर्तन को अनेक स्तरों के माध्यम से विकास की दिशा में होने वाले परिवर्तन के रूप में स्पष्ट किया गया, उन्हें हम परिवर्तन के रेखीय सिद्धान्त कहते हैं।

सामाजिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धान्त
रेखीय सिद्धान्तों के विपरीत सामाजिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित हैं। कि सामाजिक परिवर्तन कुछ निश्चित स्तरों के माध्यम से एक विशेष दिशा की ओर नहीं होता बल्कि सामाजिक परिवर्तन एक चक्र के रूप में अथवा उतार-चढ़ाव की एक प्रक्रिया के रूप में होता है। इतिहास बताता है कि पिछले पाँच हजार वर्षों में संसार में कितनी ही सभ्यताएँ बनीं, धीरे-धीरे उनका विकास हुआ, कालान्तर में उनका पतन हो गया तथा इसके बाद अनेक सभ्यताएँ एक नये रूप में फिर से विकसित हो गयीं। सभ्यता की तरह सांस्कृतिक विशेषताओं में होने वाले परिवर्तन भी उतार-चढ़ाव की एक प्रक्रिया के रूप में होते हैं। एक समय में जिन व्यवहारों, मूल्यों तथा विश्वासों को बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण समझा जाता है, कुछ समय बाद उन्हें अनुपयोगी और रूढ़िवादी समझकर छोड़ दिया जाता है।

तथा अनेक ऐसे सांस्कृतिक प्रतिमान विकसित होने लगते हैं जिनकी कुछ समय पहले तक कल्पना भी नहीं की गयी थी। इसका तात्पर्य है कि जिस तरह मनुष्य का जीवन जन्म, बचपन, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और मृत्यु के चक्र से गुजरता है, उसी तरह विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों में भी एक चक्र के रूप में उत्थान और फ्तन होता रहता है। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ऋतुओं अथवा मनुष्य के जीवन से सम्बन्धित परिवर्तन जिस तरह एक निश्चित चक्र के रूप में होते हैं, समाज में होने वाले परिवर्तन सदैव एक गोलाकार चक्र के रूप में नहीं होते। जिन सामाजिक प्रतिमानों, विचारों, विश्वासों तथा व्यवहार के तरीकों को हम एक बार छोड़ देते हैं, समय बीतने के साथ हम उनमें से बहुत-सी विशेषताओं को फिर ग्रहण कर सकते हैं, लेकिन उनमें कुछ संशोधन अवश्य हो जाता है। इस दृष्टिकोण से अधिकांश सामाजिक परिवर्तन घड़ी के पैण्डुलम की तरह होते हैं जो दो छोरों अथवा सीमाओं के बीच अपनी जगह निरन्तर बदलते रहते हैं। स्पेंग्लर, पैरेटो, सोरोकिन तथा टॉयनबी वे प्रमुख विचारक हैं जिन्होंने सामाजिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धान्त प्रस्तुत किये।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
सामाजिक परिवर्तन के सन्दर्भ में महान लोगों की भूमिका पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
इतिहास में सामाजिक परिवर्तन की राजनीतिक व्याख्या महान लोगों के सन्दर्भ में की गयी है। ऐसा कहा जाता है कि इतिहास कभी भी महान लोगों के प्रभाव से विमुक्त नहीं रहा। हिटलर, मुसोलिनी, चांग- काई-शेक, चर्चिल, रूजवेल्ट, गांधी आदि महापुरुषों ने समाज को परिवर्तित करने में अपनी-अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है। अछूतोद्धार तथा आजादी के संघर्ष के लिए महात्मा गांधी की भूमिका अविस्मरणीय है। भारत की विदेश नीति में पं० नेहरू की महत्त्वपूर्ण देन है। राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, केशवचन्द्र सेन, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द सरस्वती आदि महापुरुषों ने भारतीय समाज में सुधार के अनेक प्रयत्न किये। श्रीमती गांधी का नेतृत्व भी चमत्कारिक रहा, उन्होंने भी अपने बीस सूत्रीय एवं गरीबी हटाओ’ कार्यक्रमों के द्वारा भारतीय समाज में परिवर्तन एवं सुधार के प्रयास किये।

प्रश्न 2
सामाजिक परिवर्तन के सन्दर्भ में संचार के उन्नत साधन एवं सामाजिक परिवर्तन पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
संचार के नवीन उन्नत साधनों, जो कि एक प्रभावशाली प्रौद्योगिकीय कारक है, ने विकास के अनेक जटिल सामाजिक परिवर्तनों को जन्म दिया। संचार की अनेक प्रविधियाँ हैं जिनमें तार; टेलीफोन, रेडियो, टेलीविजन आदि प्रमुख हैं। संचार ही तो सामाजिक सम्बन्धों का आधार है। सिनेमा यो चलचित्रों ने लोगों के विचारों, विश्वासों एवं मनोवृत्तियों को बदलने में पर्याप्त योग दिया। है। साथ ही इसने पारिवारिक, सामाजिक एवं जातिगत सम्बन्धों को भी प्रभावित किया है। अब रेडियो की सहायता से कोई भी बात, सूचना एवं विचार कुछ ही क्षणों में लाखों-करोड़ों व्यक्तियों तक पहुँचाए जा सकते हैं। रेडियो मनोरंजन का स्वस्थ साधन भी है। रेडियो और टेलीविजन ने परिवार के सदस्यों को एक-साथ बैठकर अवकाश का समय बिताने को प्रेरित किया है। इससे सदस्यों को अपने मनोरंजन के लिए इधर-उधर भटकना नहीं पड़ता और साथ ही उनके पारिवारिक सम्बन्धों में भी दृढ़ता आयी है। संचार के विभिन्न साधनों के माध्यम से भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक समूह के लोगों को एक-दूसरे को समझने का मौका मिला है, जिसके परिणामस्वरूप उनमें सांस्कृतिक दूरी कुछ कम हुई है और सात्मीकरण हुआ है।

प्रश्न 3
सामाजिक परिवर्तन के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद सिद्धान्त का वर्णन कीजिए। [2009]
या
माक्र्स के सामाजिक परिवर्तन के सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
कार्ल मार्क्स का सामाजिक परिवर्तन का सिद्धान्त
मार्क्स ने उत्पादन की नयी प्रविधियों के आधार पर सामाजिक परिवर्तन के रेखीय-प्रक्रम की व्याख्या की है, जिसके कारण उनके सिद्धान्त को रेखीय होने के साथ-साथ ‘प्राविधिक सिद्धान्त (Technological Theory) भी कहा जाता है। माक्र्स के अनुसार प्रकृति की प्रत्येक वस्तु द्वन्द्व है। उत्पादन की नवीन शक्तियों के उत्पन्न होते ही पुरानी शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं। अतः स्पष्ट है कि सम्पूर्ण प्रकृति में द्वन्द्वरत की अनवरत प्रक्रिया जारी रहती है, जिसे मार्क्स ने ‘द्वन्द्ववाद’ क़ी संज्ञा दी है। द्वन्द्ववाद के माध्यम से उसने यह निष्कर्ष प्राप्त किया है कि प्रकृति में कोई भी वस्तु/पदार्थ/विचार स्थिर नहीं है, सभी गतिशील हैं, सभी वस्तुएँ परिवर्तनशील हैं। मार्क्स ने द्वन्द्वात्मक पद्धति का प्रयोग विचारों के क्षेत्र के साथ-साथ समाज के भौतिक विकास पर भी किया है। हीगल (Hegel) की मान्यता है कि इतिहास मन का अनवरत आत्मानुभव है तथा घटनाएँ उसकी बाह्य अभिव्यक्ति। वहीं मार्क्स की मान्यता है कि घटनाएँ ही प्रधान हैं, उनके बारे में हमारे विचार गौण ही हैं। द्वन्द्वात्मक प्रणाली के माध्यम से मार्क्स ने जिस रूप में भौतिक जगत का विश्लेषण किया, उसे ही द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद’ (Dialectic Materialism) कहा जाता है। मार्क्स के सामाजिक परिवर्तन के सिद्धान्त की विवेचना निम्नवत् की जा सकती है

कार्ल मार्क्स ने भी सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या रेखीय आधार पर की है। उसने समस्त सामाजिक परिवर्तन को आर्थिक या प्रौद्योगिक आधार पर स्पष्ट किया है। अतः उसके सामाजिक परिवर्तन के सिद्धान्त को निर्णयवादी (Deterministic Theory) भी कहा जाता है। उसके विचार से धर्म, राजनीति, भौगोलिक दशाएँ अथवा अन्य कारण सामाजिक परिवर्तन को जन्म नहीं देते हैं, केवल आर्थिक कारक ही सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था को बदलता है। मार्क्स ने आर्थिक कारक को उत्पादन की प्रणाली अथवा प्रौद्योगिकी (Technology) के रूप में स्पष्ट किया है। किसी समाज में प्रचलित प्रौद्योगिकी या उत्पादन प्रणाली ही उस समाज की पारिवारिक, धार्मिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक व्यवस्थाओं के स्वरूप को निश्चित करती है। जब किसी समाज में प्रचलित उत्पादन की प्रणाली में परिवर्तन हो जाता है तो उसकी सामाजिक व्यवस्था के समस्त अंगों में भी परिवर्तन हो जाता है। माक्र्स ने आर्थिक व्यवस्था या प्रौद्योगिकी को अर्थात् उत्पादन की प्रणाली को समाज की रचना ‘अधिसंरचना’ (Substructure) तथा सामाजिक व्यवस्था को ‘अतिसंरचना (Superstructure) कहा है। प्रत्येक समाज की अतिसंरचना उसकी अधिसंरचना अर्थात् उत्पादन प्रणाली के अनुसार ही परिवर्तित होती रहती है।

प्रश्न 4
कार्ल मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
या
मार्क्स के सामाजिक परिवर्तन के सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए। [2009]
उत्तर:
मार्क्स का समाजवाद वैज्ञानिक समाजवाद’ (Scientific Socialism) कहलाता है। उनकी विचारधारा को वैज्ञानिक कहे जाने के वैसे तो कई कारण हैं, पर उनमें सबसे बड़ा कारण : उनकी द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद’ (Dialectical Materialism) की धारणा है। यद्यपि मार्क्स आदर्शवादी विचारक हीगल (Hegel) की द्वन्द्वात्मक प्रणाली में विश्वास रखते थे और उन्होंने अपनी द्वन्द्वात्मक धारणा को हीगल से ही ग्रहण किया है। परन्तु हीगल के द्वन्द्ववाद का आधार ‘विचार’ था, जब कि मार्क्स ने उसमें संशोधन करके उसे ‘भौतिकवाद’ पर आधारित कर दिया। हीगल का कहना था कि “विचारों के संघर्ष के परिणामस्वरूप ही नयी विचारधाराएँ जन्म लेती हैं। परन्तु मार्क्स ने वर्तमान सामाजिक तथा आर्थिक परिस्थितियों के लिए भौतिक (आर्थिक) परिस्थितियों को सर्वोच्च माना है। मार्क्स के अनुसार, “बाह्य जगत का प्रभाव आन्तरिक विचारों का निर्माण करता है।” जो नये विचार उत्पन्न होते हैं, वे किसी विचार से सम्बन्धित विरोधी तत्त्वों के पारस्परिक टकराव से उत्पन्न होते हैं।

द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की आलोचना

1. भौतिकता पर अत्यधिक बल – मार्क्स ने अपने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के सिद्धान्त में केवल भौतिकता को ही महत्त्व प्रदान किया है तथा आध्यात्मिकता की पूर्णतः उपेक्षा की है। मानव
जीवन का उद्देश्य केवल भौतिक नहीं हो सकता।

2. संघर्ष की अनिवार्यता पर बल – मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद में विकास की प्रक्रिया में संघर्ष की अनिवार्यता पर बल दिया गया है। उनका कहना है कि प्रत्येक उच्चतर अवस्था क्रान्ति के पश्चात् ही प्राप्त होती है। उनके इसी विचार के कारण आज के युवक साम्यवादी क्रान्ति की आराधना करते हैं।

3. पदार्थ को चेतनाहीन मानना उचित नहीं –  मार्क्स का यह मत भी उचित नहीं जान पड़ता कि पदार्थ चेतनाहीन होता है और अपने निहित विरोधी तत्त्वों में संघर्ष के फलस्वरूप उसका विकास होता है। सत्य तो यह है कि किन्हीं बाह्य शक्तियों के कारण उसका विकास होता है।

4. स्पष्टता का अभाव – कुछ विद्वानों का कहना है कि द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की व्याख्या स्पष्ट रूप से नहीं की गयी है। वेबर महोदय का कहना है कि मार्क्स अपने द्वन्द्ववादी भौतिकवाद की व्याख्या अधिक स्पष्ट रूप में नहीं कर पाये; अतः इनकी धारणा अत्यन्त गूढ़ एवं अस्पष्ट है। प्रसिद्ध साम्यवादी अधिनायक लेनिन का भी यही कहना है कि हीगल के द्वन्द्ववाद को समझे बिना मार्क्स के द्वन्द्ववाद को नहीं समझा जा सकता।

5. विकास से सम्बन्धित अनुचित धारणा – द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के सम्बन्ध में मार्क्स का कहना है कि पूँजीवाद (Capitalism) द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के नियम के अनुसार इतिहास की उपज है। वे कहते हैं कि जिस देश में पूंजीवाद अपने सर्वोच्च शिखर पर पहुँच जाएगा, उस देश में उसका विरोधी तत्त्व ‘समाजवाद’ भी उसी के पेट से उत्पन्न होगा। परन्तु यदि इस बात को स्वीकार कर लिया जाये, तो इंग्लैण्ड में (जहाँ सबसे पहले पूँजीवाद अपने सर्वोच्च शिखर पर पहुँचा) सबसे पहले समाजवाद का उदय होना चाहिए था, जो कि नहीं हुआ। इसके विपरीत रूस और चीन में (जहाँ पूँजीवाद अपनी निम्नतर स्थिति में था) समाजवाद का सबसे अधिक विकास हुआ। उपर्युक्त आलोचनाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि मार्क्स का द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद सत्य की खोज करने की एकमात्र विधि नहीं है, सत्य की खोज तो अन्य विधियों से भी की जा सकती है।

प्रश्न 5
सामाजिक परिवर्तन में मनोवैज्ञानिक कारकों की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
चूँकि समस्त मानव-सम्बन्ध मानव-मस्तिष्क की उपज हैं अतः सामाजिक सम्बन्धों में परिवर्तन मानव-मस्तिष्क में परिवर्तन के कारण होते हैं। मानव में जिज्ञासा की प्रवृत्ति पायी जाती है। इस प्रवृत्ति ने ही मानव को आविष्कार करने एवं अज्ञात को खोजने की प्रेरणा दी। मानव ने अनेक ऐसे आविष्कार किये जिन्होंने उसके जीवन को ही बदल दिया। जिज्ञासा के कारण ही वह चन्द्रमा पर पहुँचा, समुद्र की गहराई तक गया और दूर देशों की यात्रा की। मानव-मस्तिष्क नवीनता चाहता है, वह एक ही स्थिति से ऊब जाता है। इस ऊब से मुक्ति पाने के लिए ही मानव ने नये फैशने को जन्म दिया। मानसिक असन्तोष एवं संघर्ष सामाजिक सम्बन्धों को प्रभावित करते हैं। पारिवारिक विघटने एवं विवाह-विच्छेद का कारण परिवार के सदस्यों तथा पति-पत्नी का मानसिक अनुकूलन न हो पाना भी है। मानसिक तनाव सामाजिक सम्बन्धों को तोड़ देते हैं तथा लोगों में निराशा पैदा करते हैं। यह हत्या, आत्महत्या तथा अपराध के लिए भी उत्तरदायी है।

प्रश्न 6
सामाजिक अनुकूलन पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
सामाजिक अनुकूलन सामाजिक परिवर्तन की विभिन्न प्रक्रियाओं में से एक है। अनुकूलन में एक व्यक्ति दूसरे से समायोजन करने का प्रयत्न करता है। अनुकूलन किस सीमा तक होता है, इस बात को प्रकट करने के लिए कुछ शब्दों; जैसे-अभियोजन, समायोजन, सात्मीकरण तथा एकीकरण आदि; का प्रयोग किया जाता है। अनुकूलन की क्रिया दो बातों की ओर संकेत करती है

  1. व्यक्ति अपने को परिस्थिति के अनुसार ढाल ले तथा
  2. पर्यावरण या परिस्थितियों को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार संशोधित कर ले। इस प्रकार अनुकूलन भी एक प्रकार का परिवर्तन है। जो सभी समाजों में पाया जाता है। किसी व्यक्ति द्वारा विदेश में जाकर रहने पर स्वयं को वहाँ के समाज के अनुसार ढाल लेना अनुकूलन का उदाहरण है।

प्रश्न 7
सामाजिक परिवर्तन के रेखीय और चक्रीय सिद्धान्तों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक परिवर्तन से सम्बन्धित रेखीय तथा चक्रीय सिद्धान्तों में निम्नलिखित अन्तर

  1. चक्रीय सिद्धान्त के अनुसार परिवर्तन का एक चक्र चलता है। हम जहाँ से प्रारम्भ होते हैं, घूम-फिरकर पुनः उसी स्थिति में आ जाते हैं, जब कि रेखीय सिद्धान्त यह विश्वास करता है। कि परिवर्तन एक सीधी रेखा में होता है। हम क्रमशः आगे बढ़ते जाते हैं और जिस चरण को हम त्याग चुके होते हैं, पुनः वहाँ कभी नहीं लौटते हैं।
  2. चक्रीय सिद्धान्त में परिवर्तन उच्चता से निम्नता और निम्नता से उच्चता की ओर होता है, जब कि रेखीय सिद्धान्त विश्वास करता है कि परिवर्तन सदैव निम्नता से उच्चता की ओर तथा
    अपूर्णता से पूर्णता की ओर ही होता है।
  3. चक्रीय सिद्धान्त के अनुसार परिवर्तन का चक्र तेज व मन्द दोनों हो सकता है, जब कि रेखीय सिद्धान्त परिवर्तन की मन्द गति में विश्वास करता है।
  4.  रेखीय सिद्धान्त चक्रीय सिद्धान्त की अपेक्षा उविकासवादियों से अधिक प्रभावित होता है।
  5. चक्रीय सिद्धान्तकारों ने परिवर्तन के चक्र को ऐतिहासिक एवं अनुभवसिद्ध प्रभावों के आधार पर प्रकट करने का प्रयास किया है, जब कि रेखीय सिद्धान्तकारों ने रेखीय परिवर्तन को एक सैद्धान्तिक रूप दिया है।
  6.  रेखीय सिद्धान्तकारों की मान्यता है कि सामाजिक परिवर्तन मानवीय प्रयत्न व इच्छा से स्वतन्त्र हैं तथा ऐसे परिवर्तन स्वत: उत्पन्न होते हैं, जब कि चक्रीय सिद्धान्तकार मानते हैं कि परिवर्तन का चक्र मानवीय प्रयत्नों एवं प्राकृतिक प्रभावों का परिणाम है।
  7.  रेखीय सिद्धान्तकार परिवर्तन के किसी एक प्रमुख कारण पर अधिक बल देते हैं तथा वे निर्धारणवादियों के निकट हैं, जब कि चक्रीय सिद्धान्तकार परिवर्तन को अनेक कारकों का प्रतिफल मानते हैं तथा कहते हैं कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है। अत: यह स्वयं घटित होता है। 8. रेखीय सिद्धान्तकार मानते हैं कि परिवर्तन के चरण एवं क्रम विश्व के सभी समाजों में एकसमान रहते हैं, जब कि चक्रीय सिद्धान्तकारों की मान्यता है कि विभिन्न सामाजिक संगठनों व संरचनाओं की सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया एवं प्रकृति में अन्तर पाया जाता है।

प्रश्न 8
सामाजिक परिवर्तन क्या है ? यह सांस्कृतिक परिवर्तन से किस प्रकार भिन्न है ? [2007, 08, 13, 16]
या
सामाजिक परिवर्तन का सांस्कृतिक परिवर्तन से अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2016]
या

सामाजिक परिवर्तन क्या है? सामाजिक परिवर्तन एवं सांस्कृतिक परिवर्तन में भेद कीजिए। [2013, 16]
उत्तर:
सामाजिक परिवर्तन – सामान्यतः सामाजिक परिवर्तन का अर्थ समाज में घटित होने वाले परिवर्तनों से है। कुछ विद्वानों ने सामाजिक ढाँचे में होने वाले परिवर्तनों को सामाजिक परिवर्तन कहा है तो कुछ ने सामाजिक सम्बन्धों में होने वाले परिवर्तनों को। सम्पूर्ण समाज अथवा उसके किसी पक्ष में होने वाले परिवर्तन को हम सामाजिक परिवर्तन कहते हैं।

सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन में

क्र०सं० सामाजिक परिवर्तन सांस्कृतिक परिवर्तन
1. सामाजिक परिवर्तन का सम्बन्ध सामाजिक, ढाँचे तथा सामाजिक अन्तक्रियाओं में होने वाले परिवर्तनों से है। सांस्कृतिक परिवर्तन संस्कृति के विभिन्न पक्षों के परिवर्तन से सम्बन्धित हैं।
2. सामाजिक परिवर्तन एक प्रक्रिया है। सांस्कृतिक परिवर्तन इस प्रक्रिया की उपज है।
3. सांस्कृतिक परिवर्तन प्रमुख रूप से नये आविष्कारों और सांस्कृतिक विशेषताओं के प्रसार से उत्पन्न होता है। सांस्कृतिक परिवर्तन प्रमुख रूप से नये आविष्कारों और सांस्कृतिक विशेषताओं के प्रसार से उत्पन्न होता है।
4. सामाजिक परिवर्तन सांस्कृतिक परिवर्तन की तुलना में कुछ तेजी से होता है। अभौतिक संस्कृति के विभिन्न अंगों; जैसे – धर्म, नैतिकता, प्रथाओं, परम्पराओं और सांस्कृतिक मूल्यों में परिवर्तन धीमी गति से आते हैं।
5. सामाजिक परिवर्तन का क्षेत्र अधिक व्यापक है। सांस्कृतिक परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन के अन्दर ही एक विशेष रूप ग्रहण करता है।
6. सामाजिक परिवर्तन अनिवार्य रूप से सामाजिक परिवर्तन का उत्पन्न करता है। सांस्कृतिक परिवर्तन के फलस्वरूप सांस्कृतिक परिवर्तन उत्पन्न होना सदैव आवश्यक नहीं होता, यद्यपि इसकी सम्भावना अवश्य की जा सकती है।

प्रश्न 9
सामाजिक विघटन एवं सामाजिक परिवर्तन के बीच सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक परिवर्तन एवं सामाजिक विघटन के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। सामाजिक परिवर्तन एक सार्वभौम क्रिया है जो प्रत्येक समाज में लगातार चलती रहती है। इतना अवश्य है कि किसी समाज में इसकी गति तीव्र होती है और किसी में धीमी गतिशील समाजों में सामाजिक परिवर्तन की तीव्रता सामाजिक विघटन को प्रोत्साहित करती है।।

गिलिन, डिटमर, कोलबर्ट एवं अन्य विद्वानों की मान्यता है कि सामाजिक परिवर्तन समाज में असामंजस्य की समस्या पैदा करके सामाजिक विघटन को जन्म देता है। सामाजिक परिवर्तन की विभिन्न प्रवृत्तियों में चार प्रवृत्तियाँ प्रमुख हैं, जो साधारणतः विघटन को बढ़ावा देती हैं। ये प्रवृत्तियाँ

  1. धार्मिकता से धर्म-निरपेक्षता की ओर परिवर्तन;
  2.  समरूपता से विभिन्नता या विजातीयता की ओर परिवर्तन;
  3.  लोकगाथाओं से वैज्ञानिक निष्कर्षों की ओर परिवर्तन तथा ।
  4. प्राथमिक समूह के प्रभाव में कमी के कारण उत्पन्न परिवर्तन।

उपर्युक्त परिवर्तनों की तीव्र गति के कारण समाज में अनेक सामाजिक समस्याएँ तथा विघटनकारी प्रवृत्तियाँ उत्पन्न हो जाती हैं।
विभिन्न प्रामाणिक तत्त्वों में परिवर्तन की असमान दर के कारण समाज विघटन की ओर अग्रसर होता है। वे संस्थाएँ जो समाज को स्थिरता प्रदान करती हैं अक्सर परिवर्तन विरोधी प्रवृत्ति के कारण सामाजिक विघटन में सहायक होती हैं। होता यह है कि उन भौतिक दशाओं जिनमें एक विशिष्ट संस्था का विकास हुआ, के बदल जाने पर स्वयं संस्था में आवश्यक परिवर्तन नहीं आता। जो संस्था मनुष्य की विविध आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विकसित हुई, वही अपनी अपरिवर्तनीय प्रवृत्ति के कारण मनुष्य के सामने बदली हुई परिस्थितियों में समायोजन की कठिन समस्या उत्पन्न कर देती है। ऐसी स्थिति में सामाजिक विघटन विभिन्न रूपों में दिखाई देने लगता है।

सामाजिक विघटन का एक कारण संस्कृति के भौतिक एवं अभौतिक पक्षों में परिवर्तन की असमान दर है। आविष्कार एवं प्रसार के कारण भौतिक संस्कृति में तेजी से परिवर्तन आता है। इसके विपरीत, अभौतिक संस्कृति में बहुत धीमी गति से परिवर्तन होते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि भौतिक संस्कृति आगे बढ़ जाती है और अभौतिक संस्कृति पीछे छूट जाती है। ऐसा होने पर सामाजिक अव्यवस्था या असन्तुलन की स्थिति पैदा हो जाती है। इसी को ऑगबर्न ने सांस्कृतिक विलम्बना नाम दिया है जो सामाजिक विघटन के लिए उत्तरदायी है।

प्रश्न 10
सामाजिक परिवर्तन के सन्दर्भ में प्राणिशास्त्रीय या जैविकीय कारकों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
प्राणिशास्त्रीय या जैविकीय कारकों से तात्पर्य उन कारकों से है जो हमें अपने माता-पिता द्वारा वंशानुक्रमण में प्राप्त होते हैं। प्राणिशास्त्रीय कारक जनसंख्या के प्रकार को निर्धारित करते हैं। हमारा स्वास्थ्य, शारीरिक एवं मानसिक क्षमता एवं योग्यता, विवाह की आयु, प्रजनन दर, हमारा कद एवं शारीरिक गठन आदि सभी वंशानुक्रमण एवं जैविकीय कारकों से प्रभावित होते हैं। किसी समाज के लोगों की जन्म-दर एवं मृत्यु-दर, औसत आयु आदि पर भी प्राणिशास्त्रीय कारकों को प्रभाव पड़ता है। जन्म-दर, मृत्यु-दर एवं औसत आयु में परिवर्तन होने से समाज पर भी प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, किसी समाज में पुरुषों की मृत्यु-दर अधिक है तो वहाँ विधवाओं की संख्या में वृद्धि होगी एवं विधवा-विवाह की समस्या पैदा होगी तथा स्त्री की सामाजिक प्रस्थिति एवं बच्चों की शिक्षा-दीक्षा एवं समाजीकरण भी प्रभावित होगा।

दुर्बल एवं कमजोर शारीरिक एवं मानसिक क्षमता वाले लोग आविष्कार एवं निर्माण का कार्य नहीं कर पाएँगे। अतः आविष्कारों के कारण होने वाले परिवर्तन नहीं होंगे। इसकी तुलना में योग्य व्यक्ति नव-निर्माण एवं आविष्कार के द्वारा समाज में परिवर्तन लाने में सक्षम होंगे। किसी समाज में पुरुषों की तुलना में स्त्रियाँ अधिक होने पर बहुपत्नी-विवाह प्रथा एवं स्त्रियों की कमी होने पर बहुपति प्रथा तथा दोनों की समान संख्या होने पर एक-विवाह प्रथा का प्रचलन होगा। सामान्यतः यह माना जाता है कि अन्तर्जातीय एवं अन्तर्रजातीय विवाह से प्रतिभाशाली सन्तानें पैदा होती हैं, जो आविष्कारों द्वारा नवीन परिवर्तन लाने में सक्षम होती हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
निम्नलिखित पुस्तकें एवं अवधारणाएँ किन समाजशास्त्रियों से सम्बन्धित हैं। [2007]
(1) सांस्कृतिक विलम्बना,
(2) वर्ग-चेतना,
(3) चेतनात्मक संस्कृति,
(4) वर्ग-संघर्ष,
(5) आर्थिक निर्धारणवाद,
(6) अतिरिक्त मूल्य,
(7) प्रौद्योगिक विलम्बना,
(8) आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन तथा
(9) अभिजात वर्ग का परिभ्रमण।
उत्तर:
(1) ऑगबर्न,
(2) कार्ल मार्क्स,
(3) सोरोकिन,
(4) कार्ल मार्क्स,
(5) कार्ल मार्क्स,
(6) कार्ल मार्क्स,
(7) मैकाइवर एवं पेज,
(8) एम० एन० श्रीनिवास तथा
(9) पैरेटो।

प्रश्न 2
सामाजिक परिवर्तन की किन्हीं चार विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। [2007, 17]
उत्तर:
सामाजिक परिवर्तन की चार विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(i) सामाजिक परिवर्तन की प्रकृति सामाजिक होती है।
(ii) सामाजिक परिवर्तन आवश्यक एवं स्वाभाविक है।
(iii) सामाजिक परिवर्तन की गति असमान तथा तुलनात्मक है।
(iv) सामाजिक परिवर्तन एक जटिल तथ्य है।।

प्रश्न 3
सामाजिक परिवर्तन के दो परिणाम लिखिए। [2010, 13, 15, 16, 17]
उत्तर:
सामाजिक परिवर्तन के दो स्वाभाविक परिणाम निम्नलिखित हैं

  1. सामाजिक परिवर्तन के परिणामस्वरूप किसी समुदाय के अधिकांश व्यक्तियों के पारस्परिक । सम्बन्धों, सामाजिक नियमों तथा विचार करने के तरीकों में परिवर्तन हो जाता है।
  2. सामाजिक परिवर्तन के परिणामस्वरूप सामाजिक गतिशीलता में वृद्धि होती है। उदाहरण के लिए, परिवहन और संचार के साधनों में वृद्धि होने से सामाजिक गतिशीलता में भी वृद्धि होती है ।

प्रश्न 4
सामाजिक परिवर्तन के दो कारक लिखिए। (2007)
उत्तर:
सामाजिक परिवर्तन के दो कारक निम्नलिखित हैं

  1.  सामाजिक परिवर्तन के विभिन्न कारकों में भौतिक यो भौगोलिक तत्त्वों या परिस्थितियों का विशेष योगदान रहा है। हंटिंग्टन के मतानुसार, जलवायु का परिवर्तन ही सभ्यताओं और संस्कृति के उत्थान एवं पतन का एकमात्र कारण है।
  2. सामाजिक परिवर्तनों में मनोवैज्ञानिक कारकों को विशेष हाथ रहता है। मनुष्य का स्वभाव परिवर्तनशील है। वह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सदा नवीन खोजें किया करता है और नवीन अनुभवों के प्रति इच्छित रहता है। मनुष्य की इस प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप ही मानव समाज की रुढ़ियों, परम्पराओं तथा रीति-रिवाजों में परिवर्तन होते रहते हैं।

प्रश्न 5
आर्थिक कारक सामाजिक संस्थाओं में क्या परिवर्तन लाते हैं ?
उत्तर:
आर्थिक कारक सामाजिक संस्थाओं में भी परिवर्तन लाते हैं। भारत में औद्योगीकरण व नगरीकरण के परिणामस्वरूप संयुक्त परिवार व्यवस्था का विघटन हुआ, जाति-पाँति के भेदभाव, छुआछूत आदि समाप्त हुए, शिक्षा का प्रसार हुआ, स्त्रियों को रोजगार के अवसर प्राप्त हुए, अन्तर्जातीय विवाह, प्रेम-विवाह, विधवा-पुनर्विवाह आदि आरम्भ हुए, जाति सम्बन्धी प्रतिबन्ध शिथिल हुए, व्यवसाय में परिवर्तन आया, ग्रामीणों में शिक्षा का प्रसार हुआ, जनसंख्या की गतिशीलता बढ़ी तथा बैंकों की स्थापना हुई।

प्रश्न 6
कार्ल मार्क्स का द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद’ का सिद्धान्त क्या है? [2007]
उत्तर:
मार्क्स द्वन्द्व को ही परिवर्तन की प्रक्रिया का आधार मानता है। माक्र्स ने ‘द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद’ के द्वारा समाज के विकास को समझने का प्रयत्न किया है। मार्क्स ने इस बात पर बल दिया कि समाज के विकास के कुछ नियम होते हैं तथा उन नियमों के अनुरूप ही समाज में परिवर्तन होते रहते हैं। मार्क्स के अनुसार पूँजीवादी वर्ग एक ‘वाद’ है, सर्वहारा वर्ग ‘प्रतिवाद’ है। और इन दोनों के संघर्ष से संवाद के रूप में वर्गहीन समाज की स्थापना होगी। मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का अन्तिम लक्ष्य वर्गविहीन समाज की स्थापना है जिसमें न कोई वर्ग-भेद होगा और न किसी प्रकार का शोषण।

प्रश्न 7
प्रौद्योगिकी के दो प्रत्यक्ष प्रभावों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्रौद्योगिकी के दो प्रत्यक्ष प्रभाव निम्नवत् हैं

  1. नगरीकरण – जब उत्पादन फैक्ट्री प्रणाली द्वारा होने लगा तो ग्रामों से बहुत-से लोग काम की तलाश में नगरों में आने लगे। परिणामस्वरूप नगरों की जनसंख्या तेजी के साथ बढ़ती गयी। जनसंख्या के तीव्र गति से बढ़ने के कारण अनेक नगरीय समस्याएँ उत्पन्न हुईं।
  2.  गतिशीलता का बढ़ना – प्रौद्योगिकीय परिवर्तन ने स्थानीय और सामाजिक दोनों ही प्रकार की गतिशीलता को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है। स्थानीय गतिशीलता का अर्थ एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की प्रवृत्ति का बढ़ना है। सामाजिक गतिशीलता का अर्थ एक सामाजिक स्थिति से दूसरी सामाजिक स्थिति प्राप्त कर लेना है, एक समूह या वर्ग से दूसरे समूह या वर्ग में पहुँच जाना है।

प्रश्न 8
क्षेत्रीयतावाद किस तरह राष्ट्रहित में बाधक है ?
उत्तर:
क्षेत्रवाद के कारण देश का प्रत्येक क्षेत्र स्वयं को एक पृथक् इकाई मान लेता है। प्रत्येक क्षेत्र के निवासी अधिकाधिक अधिकारों तथा सुविधाओं की माँग को लेकर एक-दूसरे के विरोधी बन जाते हैं। धीरे-धीरे क्षेत्रवाद की भावना के कारण केन्द्र सरकार में लोगों की निष्ठा कम होने लगती है। इससे केन्द्र व राज्य सरकारों के सम्बन्ध बिगड़ने लगते हैं। व्यवस्था और प्रशासन तब एक समस्या का रूप ले लेती है। ये सभी वे परिस्थितियाँ हैं जो राष्ट्रीय एकता को चुनौती देकर देश की सम्पूर्ण प्रगति को अवरुद्ध कर देती हैं।

प्रश्न 9
क्या सामाजिक परिवर्तन की भविष्यवाणी की जा सकती है ?
उत्तर:
सामाजिक परिवर्तन के बारे में निश्चित रूप से पूर्वानुमान लगाना कठिन है; अत: उसके बारे में भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। इसका यह तात्पर्य नहीं है कि हम सामाजिक परिवर्तन के बारे में बिल्कुल ही अनुमान नहीं लगा सकते अथवा सामाजिक परिवर्तन का कोई नियम ही नहीं है। इसका केवल यह अर्थ है कि कई बार आकस्मिक कारणों से भी परिवर्तन होते हैं, जिनके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता।

प्रश्न 10
सामाजिक परिवर्तन के रेखीय सिद्धान्त के दो सिद्धान्तकारों का नामोल्लेख कीजिए। [2008]
उत्तर:
सामाजिक परिवर्तन का रेखीय सिद्धान्त के अनुसार परिवर्तन एक सीधी रेखा में होता है। रेखीय सिद्धान्त के दो सिद्धान्तकारों का नाम मॉर्गन तथा कॉम्टे है।

प्रश्न 11
सांस्कृतिक परिवर्तन के दो उदाहरण दीजिए। [2013]
उत्तर:
सांस्कृतिक परिवर्तन के उदाहरण निम्न हैं

  1. सांस्कृतिक परिवर्तन संस्कृति के विभिन्न पक्षों के परिवर्तन से सम्बन्धित है।
  2.  सांस्कृतिक परिवर्तन इस प्रक्रिया की उपज है।
  3.  सांस्कृतिक परिवर्तन प्रमुख रूप से नये आविष्कारों और सांस्कृतिक विशेषताओं के प्रसार से उत्पन्न होता है।
  4.  अभौतिक संस्कृति के विभिन्न अंगों; जैसे – धर्म, नैतिकता, प्रथाओं, परम्पराओं और सांस्कृतिक मूल्यों में परिवर्तन धीमी गति से आते हैं।
  5.  सांस्कृतिक परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन के अन्दर ही एक विशेष रूप ग्रहण करता है।

प्रश्न 12
संस्कृति की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए। [2016]
उत्तर:
संस्कृति की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. सीखा हुआ व्यवहार – व्यक्ति समाज की प्रक्रिया में कुछ-न-कुछ सीखता ही रहता है। ये सीखे हुए अनुभव, विचार-प्रतिमान आदि की संस्कृति के तत्त्व होते हैं। इसलिए संस्कृति को सीखा हुआ व्यवहार कहा जाता है।
  2. हस्तान्तरण की विशेषता – संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित हो जाती है। संस्कृति का अस्तित्व हस्तान्तरण के कारण ही स्थायी बना रहता है। हस्तान्तरण की यह प्रक्रिया निरन्तर होती रहती है। समाजीकरण की प्रक्रिया संस्कृति के हस्तान्तरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

निश्चित उत्तीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
सामाजिक परिवर्तन के दो कारणों को बताइए। [2011, 12]
उत्तर:
(1) प्राकृतिक या भौगोलिक कारक तथा
(2) प्राणिशास्त्रीय कारक।

प्रश्न 2
किसने सामाजिक परिवर्तन को सामाजिक सम्बन्धों में परिवर्तन के रूप में परिभाषित किया? [2011, 17]
उत्तर:
मैकाइवर एवं पेज ने।

प्रश्न 3
संस्कृतिकरण की अवधारणा किसने दी है? [2013]
उत्तर:
एम० एन० श्रीनिवास।

प्रश्न 4
“सामाजिक परिवर्तन एक सार्वभौमिक घटना है।” (सत्य/असत्य) [2013, 14, 17]
उत्तर:
सत्य।

प्रश्न 5
भौतिक तथा अभौतिक संस्कृति की अवधारणा किसने दी? [2011, 14, 16]
उत्तर:
ऑगबर्न ने।

प्रश्न 6
भौतिक और अभौतिक संस्कृति में असमान गति के परिवर्तन से जो स्थिति उत्पन्न होती है, उसे ऑगबर्न क्या कहते हैं ? [2012]
उत्तर:
सांस्कृतिक विलम्बना।

प्रश्न 7
अभिजात वर्ग को परिभ्रमण सिद्धान्त की अवधारणा किसने दी है? [2013]
या
संभ्रांत वर्ग के परिभ्रमण का सिद्धान्त किसका है? [2013]
या
सामाजिक परिवर्तन में किसने ‘अभिजात वर्ग के परिभ्रमण का सिद्धान्त दिया है? [2015]
उत्तर:
पैरेटो महोदय।

प्रश्न 8
किसने सामाजिक परिवर्तन की विवेचना संस्कृति में परिवर्तन के रूप में की है? [2011]
उत्तर:
ऑगबर्न ने।

प्रश्न 9
प्रौद्योगिकी द्वारा सामाजिक परिवर्तन की धारणा किस विद्वान् की है ?
या
“प्रौद्योगिकीय प्रविधियाँ सामाजिक परिवर्तन को जन्म देती हैं।” यह मत किसका है?
उत्तर:
प्रौद्योगिकी द्वारा सामाजिक परिवर्तन की धारणा थर्स्टन वेबलन की है।

प्रश्न 10
सोरोकिन के सामाजिक परिवर्तन के सिद्धान्त का दूसरा नाम क्या है ?
उत्तर:
सोरोकिन के सामाजिक परिवर्तन के सिद्धान्त का दूसरा नाम ‘सांस्कृतिक गतिशीलता है।

प्रश्न 11
“भौतिक संस्कृति में अभौतिक संस्कृति की अपेक्षा तीव्र गति से परिवर्तन होता है।” यह कथन किसका है ?
उत्तर:
यह कथन ऑगबर्न का है।

प्रश्न12
प्राविधिक निर्णयवाद के निर्माता कौन हैं ?
उत्तर:
प्राविधिक निर्णयवाद के निर्माता थर्स्टन वेबलन हैं।

प्रश्न 13
निम्नलिखित पुस्तकों के लेखकों के नाम लिखिए
(क) आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन।
(ख) इण्डियाज चेन्जिग विलेजेज।
(ग) डिस्कवरी ऑफ इण्डिया।
उत्तर:
(क) डॉ० एम०एन० श्रीनिवास,
(ख) एस०सी० दुबे,
(ग) जवाहरलाल नेहरू।

प्रश्न 14
आर्थिक निर्णायक की अवधारणा किसने दी ? [2007]
या
आर्थिक निर्धारणवाद सिद्धान्त के प्रवर्तक कौन हैं ? [2009]
या
सामाजिक परिवर्तन के आर्थिक कारक का समर्थक कौन है ? [2007]
उत्तर:
आर्थिक निर्णायक की अवधारणा कार्ल मार्क्स ने दी।

प्रश्न 15
सामाजिक परिवर्तन के प्रतिमानों की संख्या लिखिए। [2011]
उत्तर:
सामाजिक परिवर्तन के प्रतिमानों की संख्या 2 है।

प्रश्न 16
‘प्रौद्योगिक विलम्बना’ की धारणा किसने दी ? [2011]
उत्तर:
मैकाइवर तथा पेज ने।

प्रश्न 17
“सामाजिक परिवर्तन का एक प्रकार लहर की तरह वक्र रेखा प्रस्तुत करता है।” इसका समर्थक कौन है ?
उत्तर:
इस अवधारणा के समर्थक हैं-ओस्वाल्ड स्पेंग्लर।

प्रश्न 18
कम्यूनिस्ट मैनिफेस्टो किस वर्ष प्रकाशित हुआ ?
उत्तर:
कम्यूनिस्ट मैनिफेस्टो का प्रकाशन 1948 ई० में हुआ।

प्रश्न 19
“जनसंख्या ज्यामितिक क्रम में बढ़ती है। यह किसने कहा ?
उत्तर:
माल्थस ने।

प्रश्न 20
सामाजिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक कौन हैं ? [2007]
उत्तर:
ओस्वाल्ड स्पेंग्लर।।

प्रश्न 21
सामाजिक परिवर्तन के रेखीय सिद्धान्त के दो सिद्धान्तकारों का नामोल्लेख कीजिए। [2008]
उत्तर:
मॉर्गन तथा हेनरीमैन।

प्रश्न 22
‘वर्ग-संघर्ष के सिद्धान्त के प्रवर्तक कौन हैं ?
उत्तर:
वर्ग-संघर्ष के सिद्धान्त’ के प्रवर्तक कार्ल मार्क्स हैं।

प्रश्न 23
किसने सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या भावनात्मक, चेतनात्मक और आदर्शात्मक अवधारणाओं से की है? [2015]
उत्तर:
चार्ल्स कूले ने।।

प्रश्न 24
सांस्कृतिक विलम्बना का सिद्धान्त किसने प्रस्तुत किया? [2016]
उत्तर:
ऑगबर्न ने।

प्रश्न 25
ऐतिहासिक भौतिकवाद की अवधारणा किसने दी है? [2016]
उत्तर:
कार्ल मार्क्स ने।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
निरन्तर एक ही दिशा में आगे की ओर होने वाले परिवर्तन को कहते हैं [2007]
(क) चक्रीय
(ख) प्रगतिशील
(ग) क्रान्तिकारी
(घ) उविकासीय

प्रश्न 2
निम्नलिखित में से कौन-सा सामाजिक परिवर्तन नहीं है ?
(क) विवाह के उत्सव को साधारण बनाना
(ख) संयुक्त परिवार का विघटन
(ग) धार्मिक विश्वासों का प्रभाव कम होना
(घ) मोटर-कार के मॉडल में परिवर्तन हो जाना

प्रश्न 3
“सामाजिक परिवर्तन प्रौद्योगिकी में परिवर्तन होने के कारण होता है।” यह कथन किसका
(क) वेबलन का
(ग) टॉयनबी का
(ख) ऑगबर्न का
(घ) सोरोकिन का

प्रश्न 4
कार्ल मार्क्स के अनुसार सामाजिक परिवर्तन का मुख्य कारण
(क) यान्त्रिक प्रयोग
(ख) आर्थिक कारक
(ग) धार्मिक कारण
(घ) राजनीतिक कारण

प्रश्न 5
निम्नलिखित में से किस विद्वान् ने सामाजिक परिवर्तन को बौद्धिक विकास का परिणाम माना है ?
(क) जॉर्ज सी० होमन्स ने
(ख) बीसेज एवं बीसेंज ने
(ग) आगस्त कॉम्टे ने
(घ) रॉबर्ट बीरस्टीड ने।

प्रश्न 6
निम्नलिखित किस सिद्धान्त के अनुसार सामाजिक परिवर्तन जैविकीय आधार पर होता है ?
(क) प्राणिशास्त्रीय सिद्धान्त
(ख) जनसंख्यात्मक सिद्धान्त
(ग) समाजशास्त्रीय सिद्धान्त
(घ) विकासवादी सिद्धान्त ।

प्रश्न 7
मैक्स वेबर ने सामाजिक परिवर्तन के लिए किसे अधिक महत्त्व दिया है ?
(क) पूँजी को
(ख) शिक्षा को
(ग) धर्म को
(घ) संस्कृति को

प्रश्न 8
भारत में सामाजिक परिवर्तन विषय पर किस विद्वान् ने सबसे अधिक अध्ययन किया ?
(क) डॉ० नगेन्द्र ने
(ख) सच्चिदानन्द ने
(ग) एम० एन० श्रीनिवास ने
(घ) डॉ० राधाकृष्णन ने

प्रश्न 9
ऑगबर्न तथा निमकॉफ ने सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या किस आधार पर की है ?
(क) सामाजिक असन्तुलन
(ख) नैतिक पतन।
(ग) सांस्कृतिक विलम्बना
(घ) प्रौद्योगिकीय कारक

प्रश्न 10
निम्नलिखित समाजशास्त्रियों में से किस विद्वान् ने सामाजिक परिवर्तन को चक्रवत माना है?
(क) ओस्वाल्ड स्पैंग्लर ने
(ख) हॉबहाउस ने ।
(ग) शुम्पीटर ने
(घ) इमाइल दुर्चीम ने

प्रश्न 11
संस्कृति की विशेषताओं में होने वाले परिवर्तनों को सामाजिक परिवर्तन का सर्वप्रमुख कारण कौन मानता है ?
(क) सोरोकिन
(ख) मैक्स वेबर
(ग) सिमैले
(घ) मॉण्टेस्क्यू

प्रश्न 12
सांस्कृतिक विलम्बना का सिद्धान्त किसने प्रस्तुत किया ? या सांस्कृतिक विलम्बना की अवधारणा किसने दी है? [2015, 16]
(क) जिन्सबर्ग ने
(ख) ऑगबर्न ने
(ग) कार्ल मार्क्स ने
(घ) इमाइल दुर्चीम ने

प्रश्न 13
‘ऐतिहासिक भौतिकवाद’ का प्रतिपादक कौन था ? या निम्नलिखित में से किसने ‘ऐतिहासिक भौतिकवाद’ की अवधारणा प्रस्तुत की? [2016]
(क) मार्क्स
(ख) महात्मा गांधी
(ग) स्पेन्सर
(घ) ऑगबर्न

प्रश्न 14
टॉयनबी (Toynbee) के सामाजिक परिवर्तन के सिद्धान्त को किस नाम से जाना जाता है ?
(क) अभिजात वर्ग का सिद्धान्त
(ख) चक्रीय सिद्धान्त
(ग) चुनौती एवं प्रत्युत्तर का सिद्धान्त
(घ) सामाजिक गतिशीलता का सिद्धान्त

प्रश्न 15
सामाजिक परिवर्तन के सांस्कृतिक कारक का समर्थक कौन है ?
(क) कार्ल मार्क्स
(ख) वेबलन
(ग) जॉर्ज लुण्डबर्ग
(घ) मैक्स वेबर

प्रश्न 16
निम्नांकित में से किसने सामाजिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है? [2012, 16]
(क) कार्ल मार्क्स
(ख) विल्फ्रेडो पैरेटो
(ग) आगस्त कॉम्टे
(घ) थॉर्टन वेबलन

प्रश्न 17
‘ए हैण्ड बुक ऑफ सोशियोलॉजी’ के लेखक हैं [2017]
(क) किंग्सले डेविस
(ख) चार्ल्स होर्टन कूले
(ग) ऑगबर्न एवं निमकॉफ
(घ) गुन्नार मिर्डल।

प्रश्न 18
कौन-सी पुस्तक एफ० एच० गिडिंग्स द्वारा लिखी गयी है ? [2009]
(क) सोसायटी
(ख) पॉजिटिव पॉलिटी
(ग) इण्डक्टिव सोशियोलॉजी
(घ) सोशियल कण्ट्रोल

प्रश्न 19
‘कल्चरल डिस ऑर्गेनाइजेशन’ पुस्तक के लेखक कौन हैं? [2015]
(क) के० डेविस
(ख) इलियट एण्ड मैरिल
(ग) कूले
(घ) स्पेन्सरं

उत्तर:
1. (घ) उदूविकासीय, 2. (घ) मोटर-कार के मॉडल में परिवर्तन हो जाना, 3. (क) वेबलन का, 4. (ख) आर्थिक कारक, 5. (ग) आगस्त कॉम्टे ने, 6. (घ) विकासवादी सिद्धान्त, 7. (ग) धर्म को, 8. (ग) एम० एन० श्रीनिवास ने, 9. (ग) सांस्कृतिक विलम्बना, 10. (क) ओस्वाल्ड स्पैंग्लर ने, 11. (क) सोरोकिन, 12. (ख) ऑगबर्न ने, 13. (क) मार्क्स, 14. (ग) चुनौती एवं प्रत्युत्तर का सिद्धान्त, 15. (घ) मैक्स वेबर, 16. (ख) विल्फ्रेडो पैरेटो, 17. (ग) ऑगबर्न एवं निमकॉफ, 18. (ग) इण्डक्टिव सोशियोलॉजी, 19. (ख) इलियट एण्ड मैरिल।।

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 27 Storing of Rainwater and Rearing of Water Table

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography
Chapter Chapter 27
Chapter Name Storing of Rainwater and Rearing of Water Table (वर्षाजल संचयन एवं भू-गर्भ जल संवर्द्धन)
Number of Questions Solved 19
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 27 Storing of Rainwater and Rearing of Water Table (वर्षाजल संचयन एवं भू-गर्भ जल संवर्द्धन)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
देश में जल संसाधनों की उपलब्धता की विवेचना कीजिए और इसके स्थानिक वितरण के लिए उत्तरदायी निर्धारित करने वाले कारक बताइए।
उत्तर

भारत में जल संसाधन और इसके स्थानिक वितरण के लिए उत्तरदायी कारक

धरातलीय जल संसाधन
धरातलीय जल के चार मुख्य स्रोत हैं-नदियाँ, झीलें, तलैया और तालाब। देश में कुल नदियों तथा उन सहायक नदियों, जिनकी लम्बाई 1.6 किमी से अधिक है, को मिलाकर 10,360 नदियाँ हैं। भारत में सभी नदी बेसिनों में औसत वार्षिक प्रवाह 1,869 घन किमी होने का अनुमान किया गया है। फिर भी स्थलाकृतिक, जलीय और अन्य दबावों के कारण प्राप्त धरातलीय जल का केवल लगभग 690 घन किमी (32%) जल को ही उपयोग किया जा सकता है। नदी में जल प्रवाह इसके जल ग्रहण क्षेत्र के आकार अथवा नदी बेसिन और इस जल ग्रहण क्षेत्र में हुई वर्षा पर निर्भर करता है। भारत में वर्षा में अत्यधिक स्थानिक विभिन्नता पाई जाती है और वर्षा मुख्य रूप से मानसूनी मौसम संकेद्रित है।

भारत में कुछ नदियाँ, जैसे-गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु के जल ग्रहण क्षेत्र बहुत बड़े हैं। गंगा, ब्रह्मपुत्र और बराक नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा अपेक्षाकृत अधिक होती है। ये नदियाँ यद्यपि देश के कुल क्षेत्र के लगभग एक-तिहाई भाग पर पाई जाती हैं जिनमें कुछ धरातलीय जल संसाधनों का 60 प्रतिशत जल पाया, जाता है। दक्षिणी भारतीय नदियों, जैसे-गोदावरी, कृष्णा और कावेरी में वार्षिक जल प्रवाह का अधिकतर भाग काम में लाया जाता है, लेकिन ऐसा ब्रह्मपुत्र और गंगा बेसिनों में अभी भी सम्भव नहीं हो सका है।

भौम जल संसाधन
देश में कुल पुनः पूर्तियोग्य भौम जल संसाधन लगभग 432 घन किमी है। कुल पुनः पूर्तियोग्य भौम जल संसाधन का लगभग 46 प्रतिशत गंगा और ब्रह्मपुत्र बेसिनों में पाया जाता है। उत्तर-पश्चिमी प्रदेश और दक्षिणी भारत के कुछ भागों के नदी बेसिनों में भौम जल उपयोग अपेक्षाकृत अधिक है।

पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और तमिलनाडु राज्यों में भौम जल का उपयोग बहुत अधिक है। परन्तु कुछ राज्य; जैसे-छत्तीसगढ़, ओडिशा, केरल अतिद अपने भौम जल क्षमता का बहुत कम उपयोग करते हैं। गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, त्रिपुरा और महाराष्ट्र अपने भौम जल संसाधनों का मध्यम दर से उपयोग कर रहे हैं।

यदि वर्तमान प्रवृत्ति जारी रहती है तो जल की माँग की आपूर्ति करने की आवश्यकता होगी। ऐसी स्थिति विकास के लिए हानिकारक होगी और सामाजिक उथल-पुथल एवं विघटन का कारण हो. सकती है।

लैगून और पश्च जल
भारत की समुद्र तट रेखा विशाल है और कुछ राज्यों में समुद्र तट बहुत दतुंरित (indented) है। इसी कारण बहुत-सी लैगून और झीलें बन गई हैं। केरल, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में इन लैगूनों और झीलों में बड़े धरातलीय जल संसाधन हैं। यद्यपि सामान्यतः इन जलाशयों में खारा जल है, इसका उपयोग मछली पालन और चावल की कुछ निश्चित किस्मों, नारियल आदि की सिंचाई में किया जाता है।

प्रश्न 2
नगरीय क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन की प्रक्रिया एवं प्रकार का विवरण प्रस्तुत कीजिए। [2016]
या
भारत में वर्षा जल संचयन का विवरण निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत प्रस्तुत
कीजिए (अ) जल संचयन की प्रक्रिया, (ब) जल संचयन के प्रकार, (स) जल संचयन के लाभ।
उत्तर

वर्षा-जल संचयन की प्रक्रिया

नगरीय क्षेत्रों में वर्षा-जल संचयन की प्रक्रिया एवं प्रकार सामान्य उपयोग के लिए घरों में वर्षाजल संचयन के प्रति चेतना नहीं है, वर्षाजल व्यर्थ ही चला जाता है। प्रतिदिन के उपयोग के लिए बहुमंजिला इमारतों में पानी की टंकी का उपयोग किया जाता है। एक पानी की टंकी सामान्यतया एक कंटेनर होती है। यह प्लास्टिक, सीमेण्ट, पत्थर, लोहे, स्टेनलेस स्टील आदि की बनी होती है। बहुमंजिली इमारतों में इलेक्ट्रिक मोटर के माध्यम से इसमें जल संचय किया जाता है। पानी की टंकी से पाइप लाइन जोड़कर घरों में पानी पहुँचाया जाता है।
वर्षाजल के संचयन में पानी की टंकी का उपयोग वर्षा होने पर किया जा सकता है। टंकी के अतिरिक्त भूमिगत टैंक या टंकी का प्रयोग वर्षाजल संग्रह में अधिक लाभकारी रहता है। वर्षाजल संचयन की कुछ प्रमुख प्रक्रियाएँ निम्नलिखित हैं –

टाँका वर्षा-जल संचयन प्रक्रिया राजस्थान के अर्द्ध-शुष्क और शुष्क क्षेत्रों विशेषकर बीकानेर, फलोदी और बाड़मेर में लगभग हर घर में पीने के पानी का संग्रह करने के लिए भूमिगत टैंक अथवा टाँका’ हुआ करते थे। इसका आकार लगभग एक बड़े कमरे जितना होता था। सर्वे करने पर फलोदी के एक घर में 6.1 मीटर गहरा, 4.27 मीटर लम्बा और 2.44 मीटर चौड़ा टाँका देखने को मिला। टॉका यहाँ सुविकसित छत वर्षाजल संग्रहण तन्त्र का अभिन्न हिस्सा माना जाता है जिसे घर के मुख्य क्षेत्र या आँगन में बनाया जाता था। वे घरों की ढलवाँ छतों से पाइप द्वारा जुड़े हुए होते थे। छत से वर्षा का जल इन नलों से होकर भूमिगत टाँका तक पहुँचता था जहाँ इसे एकत्रित किया जाता था। वर्षा का पहला जल छत और नलों को साफ करने में प्रयोग होता था और उसका संग्रह नहीं किया जाता था। इसके बाद होने वाली वर्षा के जल का संग्रह किया जाता था।

टाँका में वर्षाजल अगली वर्षा ऋतु तक के लिए संग्रह किया जा सकता है। यह इसे जल की कमी वाली ग्रीष्म ऋतु तक पीने का जल उपलब्ध करवाने वाला जल स्रोत बनाता है। वर्षाजल अथवा पालर पानी’ जैसा कि इसे इन क्षेत्रों में पुकारा जाता है, प्राकृतिक जल का सर्वाधिक शुद्ध रूप समझा जाता है। कुछ घरों में तो टॉकों के साथ भूमिगते कमरे भी बनाए जाते हैं क्योंकि जल का यह स्रोत इन कमरों को भी ठण्डा रखता था जिससे ग्रीष्म ऋतु में गर्मी से राहत मिलती है।

कूल प्रणाली यह प्रणाली मुख्यत: जम्मू-कश्मीर, उत्तराखण्ड तथा हिमाचल प्रदेश में प्रचलित है। इसे नहरी तन्त्र के समान विकसित किया जाता है। पहाड़ी धाराएँ प्रायः 15 किमी तक लम्बी होती हैं। हिमनद का पिघला जल एवं अन्य जलधाराओं का जल बहकर तालाबों में संचित होता है। यह हिमपात के समय तीव्र गति से बहते हैं तथा ठण्डे समय में इसमें पानी की कम मात्री आती है। इसके जल के उपयोग हेतु बँटवारा निश्चित कर दिया जाता है।

झरना प्रणाली पूर्वी हिमालय में दार्जिलिंग नगर में झोरों (झरनों) से सिंचाई होती है। इनसे बॉस के पाइपों द्वारा पानी को सीढ़ीदार खेतों तक पहुँचाया जाता है। झोरा विधि को लेप्या, भोटिया एवं गुरूंग लोगों ने जीवित रखा है। सिक्किम में पेयजल के लिए झरनों एवं खोलों (तालाबों) का जल उपयोग में लाया जाता है। इन तालाबों में बाँस के पाइपों से जल पहुँचाया जाता है। पेयजल हेतु घरों के अहातों में जल कुण्डियाँ बनाते हैं जिन्हें खूप कहा जाता है। अरुणाचल प्रदेश में बाँस की नालियों के माध्यम से सिंचाई की जाती है। यहाँ अपर सुबनसिरी जिले में केले नदी पर अपतानी आदिवासियों द्वारा परम्परागत प्रणाली से बाँध बनाए गए हैं। यहाँ झरनों के पानी का संचय किया जाता है जिनमें मछली पालन भी किया जाता है।

उपर्युक्त दी गई प्रणालियों के अलावा नगरों में वर्षा के जल को मकानों की छतों पर एकत्रित कर लिया जाता है।
नगरों में छतों पर रखी पानी की टंकियों के द्वारा भी वर्षा जल संचयन किया जाता है।
नगरों में छतों के अलावा बड़े टेंकों को भी वर्षा के पानी संचयन के लिए बना लिया जाता है।
जल संचयन के लाभ-लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या 3 का उत्तर देखें।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
जल के गुणों का ह्रास क्या है? जल प्रदूषण का निवारण किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर

जल के गुणों का ह्रास

जल गुणवत्ता से तात्पर्य जल की शुद्धता अथवा अनावश्यक बाहरी पदार्थों से रहित जल से है। जल बाह्य पदार्थों; जैसे— सूक्ष्म जीवों, रासायनिक पदार्थों, औद्योगिक और अन्य अपशिष्ट पदार्थों से प्रदूषित होता है। इस प्रकार के पदार्थ जल के गुणों में कमी लाते हैं और इसे मानव उपयोग के योग्य नहीं रहने देते हैं। जब विषैले पदार्थ झीलों, सरिताओं, नदियों, समुद्रों और अन्य जलाशयों में प्रवेश करते हैं, वे जल में घुल जाते हैं अथवा जल में निलंबित हो जाते हैं। इससे जल प्रदूषण बढ़ता है और जल के गुणों में कमी आने से जलीय तंत्र (aquatic system) प्रभावित होते हैं। कभी-कभी प्रदूषक नीचे तक पहुँच जाते हैं। और भौम जल को प्रदूषित करते हैं। देश में गंगा और यमुना दो अत्यधिक प्रदूषित नदियाँ हैं।

जल प्रदूषण का निवारण

उपलब्ध जल संसाधनों का तेज़ी से निम्नीकरण हो रहा है। देश की मुख्य नदियों के प्रायः पहाड़ी क्षेत्रों के ऊपरी भागों तथा कम बसे क्षेत्रों में अच्छी जल गुणवत्ता पाई जाती है। मैदानों में नदी जल का उपयोग गहन रूप से कृषि, पीने, घरेलू और औद्योगिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है। अपवाहिकाओं के साथ कृषिगत (उर्वरक और कीटनाशक), घरेलू (ठोस और अपशिष्ट पदार्थ) और औद्योगिक बहिःस्राव नदी में मिल जाते हैं। नदियों में प्रदूषकों को संकेन्द्रण गर्मी के मौसम में बहुत अधिक होता है। क्योंकि उस समय जल का प्रवाह कम होता है।

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सी०पी०सी०बी०), राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एस०पी०सी०) के साथ मिलकर 507 स्टेशनों की राष्ट्रीय जल संसाधन की गुणवत्ता को मॉनीटरन किया जा रहा है। इन स्टेशनों से प्राप्त किया गया आँकड़ा दर्शाता है कि जैव और जीवाणविक संदूषण नदियों में प्रदूषण का मुख्य स्रोत है। दिल्ली और इटावा के बीच यमुना नदी देश में सबसे अधिक प्रदूषित नदी है। दूसरी प्रदूषित नदियाँ अहमदाबाद में साबरमती, लखनऊ में गोमती, मदुरई में कली, अड्यार, कूअम (संपूर्ण विस्तार), वैगई, हैदराबाद में मूसी तथा कानपुर और वाराणसी में गंगा है। भौम जल प्रदूषण देश के विभिन्न भागों में भारी/विषैली धातुओं, फ्लुओराइड और नाइट्रेट्स के संकेंद्रण के कारण होता है।

वैधानिक व्यवस्थाएँ; जैसे-जल अधिनियम 1974 (प्रदूषण का निवारण और नियंत्रण) और पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1986, प्रभावपूर्ण ढंग से कार्यान्वित नहीं हुए हैं। परिणाम यह है कि 1997 में प्रदूषण फैलाने वाले 251 उद्योग, नदियों और झीलों के किनारे स्थापित किए गए थे। जल उपकर अधिनियम 1977, जिसका उद्देश्य प्रदूषण कम करना है, उसके भी सीमित प्रभाव हुए। जल के महत्त्व और जल प्रदूषण के अधिप्रभावों के बारे में जागरूकता का प्रसार करने की आवश्यकता है। जन जागरूकता और उनकी भागीदारी से, कृषिगत कार्यों तथा घरेलू और औद्योगिक विसर्जन से प्राप्त प्रदूषकों में बहुत प्रभावशाली ढंग से कमी लाई जा सकती है।

प्रश्न 2
जल-संभर प्रबंधन क्या है? क्या आप सोचते हैं कि यह सतत पोषणीय विकास में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है।
उत्तर

जल संभर प्रबंधन

जल संभर प्रबंधन से तात्पर्य, मुख्य रूप से, धरातलीय और भौम जल संसाधनों के दक्ष प्रबंधन से है। इसके अंतर्गत बहते जल को रोकना और विभिन्न विधियों; जैसे– अंत:स्रवण तालाब, पुनर्भरण, कुओं आदि के द्वारा भौम जल का संचयन और पुनर्भरण शामिल हैं। तथापि, विस्तृत अर्थ में जल संभर प्रबंधन के अंतर्गत सभी संसाधनों–प्राकृतिक (जैसे-भूमि, जल, पौधे और प्राणियों) और जल संभर सहित मानवीय संसाधनों के संरक्षण, पुनरुत्पादन और विवेकपूर्ण उपयोग को सम्मिलित किया जाता है। जल संभर प्रबंधन का उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों और समाज के बीच संतुलन लाना है। जल-संभर व्यवस्था की सफलता मुख्य रूप से संप्रदाय के सहयोग पर निर्भर करती है।

केन्द्रीय और राज्य सरकारों ने देश में बहुत-से जल-संभर विकास और प्रबंधन कार्यक्रम चलाए हैं। इनमें से कुछ गैर-सरकारी संगठनों द्वारा भी चलाए गए हैं। ‘हरियाली’ केन्द्र सरकार द्वारा प्रवर्तित जल-संभर विकास परियोजना है जिसका उद्देश्य ग्रामीण जनसंख्या को जल पीने, सिंचाई, मत्स्य पालन और वन रोपण के लिए जल संरक्षण करना है। परियोजना लोगों के सहयोग से ग्राम पंचायतों द्वारा निष्पादित की जा रही है।

नीरू-मीरू (जल और आप) कार्यक्रम (आंध्र प्रदेश में) और अरवारी पानी संसद (अलवर राजस्थान में) के अंतर्गत लोगों के सहयोग से विभिन्न जल संग्रहण संरचनाएँ; जैसे–अत:स्रवण तालाब ताल (जोहड़) की खुदाई की गई है और रोक बाँध बनाए गए हैं। तमिलनाडु में घरों में जल संग्रहण संरचना को बनाना आवश्यक कर दिया गया है। किसी भी इमारत का निर्माण बिना जल संग्रहण सरंचना बनाए नहीं किया जा सकता है।

कुछ क्षेत्रों में जल-संभर विकास परियोजनाएँ पर्यावरण और अर्थव्यवस्था कायाकल्प करने में सफल हुई हैं। फिर भी सफलता कुछ की ही कहानियाँ हैं। अधिकांश घटनाओं में, कार्यक्रम अपनी उदीयमान अवस्था पर ही हैं। देश में लोगों के बीच जल-संभर विकास और प्रबंधन के लाभों को बताकर जागरूकता उत्पन्न करने की आवश्यकता है और इस एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन उपागम द्वारा जल उपलब्धता सतत पोषणीय आधार पर निश्चित रूप से की जा सकती है।

प्रश्न 3
वर्षा-जल प्रबन्धन के लाभों का वर्णन कीजिए। (2016)
उत्तर

वर्षा-जल प्रबन्धन के लाभ

  1. जहाँ जल की अपर्याप्त आपूर्ति होती है या सतही संसाधन का-या तो अभाव होता है या पर्याप्त मात्रा हमें उपलब्ध नहीं है, वहाँ यह जल समस्या का आदर्श समाधान है।
  2. वर्षा-जल जीवाणुरहित, खनिज पदार्थ मुक्त तथा हल्का होता है।
  3. यह बाढ़ जैसी आपदा को कम करता है।
  4. भूमि जल की गुणवत्ता को विशेष तौर पर जिसमें फ्लोराइड तथा नाइट्रेट हो, ध्रुवीकरण के द्वारा सुधारता है।
  5. सीवेज तथा गन्दे पानी में उत्पन्न जीवाणु अन्य अशुद्धियों को समाप्त/कम करता है जिससे जल पुनः उपयोगी बनती है।
  6. वर्षा-जल का संचयन आवश्यकता पड़ने वाले स्थान पर किया जा सकता है, जहाँ आवश्यकतानुसार इसका प्रयोग कर सकते हैं।
  7. शहरी क्षेत्रों में जहाँ पर शहरी क्रियाकलापों में वृद्धि के कारण भूमि जल के प्राकृतिक पुनर्भरण में , तेजी से कमी आई है तथा कृत्रिम पुनर्भरण उपायों को क्रियान्वित करने के लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध नहीं है, भूमि जल भण्डारण का यह एक सही विकल्प है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
धरातलीय जल के चार मुख्य स्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तर
धरातलीय जल के चार मुख्य स्रोत हैं-नदियाँ, झीलें, तलैया और तालाब।

प्रश्न 2
जल संरक्षण और प्रबन्धन की आवश्यकता क्यों है?
उत्तर
जल संरक्षण और प्रबन्धन की आवश्यकता अलवणीय जल की घटती हुई उपलब्धता और बढ़ती माँग के कारण है।

प्रश्न 3
वर्षा जल संग्रहण क्या है? [2016]
उत्तर
वर्षा जल संग्रहण विभिन्न उपयोगों के लिए वर्षा जल को रोकने और एकत्र करने की विधि है।

प्रश्न 4
भारतीय राष्ट्रीय जल नीति, 2002 की तीन मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर
भारतीय राष्ट्रीय जल नीति, 2002 की तीन मुख्य विशेषताएँ निम्नवत् हैं –

  1. पेयजल सभी मानव जाति और प्राणियों को उपलब्ध कराना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
  2. भौमजल के शोषण को सीमित और नियमित करने के लिए उपाय करने चाहिए।
  3. जल के सभी विविध प्रयोगों में कार्यक्षमता सुधारनी चाहिए।

प्रश्न 5
लोगों पर संदूषित जल/गंदे पानी के उपभोग के क्या सम्भव प्रभाव हो सकते हैं?
उत्तर
संदूषित जल का उपभोग करने में मनुष्यों में हैजा, पीलिया, टाइफाइड, डायरिक आदि रोग ही सकते हैं। इसके अतिरिक्त अमीबीज पेलिस, ऐस्केरियासिस आदि रोग भी हो सकते हैं।

प्रश्न 6
यह कहा जाता है कि भारत में जल संसाधनों में तेजी से कमी आ रही है। जल संसाधनों की कमी के लिए उत्तरदायी कारकों की विवेचना कीजिए।
उत्तर
जनसंख्या बढ़ने से जल की प्रति व्यक्ति उपलब्धता दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है। इसके अतिरिक्त उपलब्ध जल संसाधन भी औद्योगिक, कृषि और घरेलू क्रिया-कलापों के कारण प्रदूषित होता जा रहा है। इस कारण उपयोगी जल संसाधनों की उपलब्धता सीमित होती जा रही है।

प्रश्न 7
भारत में वर्षा-जल संचयन की किन्ही दो विधियों की विवेचना कीजिए। (2016)
या
ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन की विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
वर्षा-जल संचयन की विधियाँ ‘निम्नलिखित हैं –

  1. भूमि सतह पर जल संचयन इस विधि में वर्षा के जल को झीलों व तालाबों आदि में एकत्रित किया जाता है तथा बाद में इसको सिंचाई आदि के लिए प्रयोग में लाया जाता है।
  2. वर्षा-जल का घरों की छतों तथा टंकियों में एकत्रण इस विधि में वर्षा-जल को मकानों की छतों तथा टंकियों आदि में एकत्रित कर लिया जाता है। यह विधि कम खर्चीली व बहुत प्रभावी है।

प्रश्न 8
पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश राज्यों में सबसे अधिक भौम जल विकास के लिए कौन-से कारक उत्तरदायी हैं?
उत्तर
पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में निवल बोए गए क्षेत्र का 85 प्रतिशत भाग सिंचाई के अन्तर्गत है। इन राज्यों में गेहूँ और चावल मुख्य रूप से सिंचाई की सहायता से उगाए जाते हैं। निवल सिंचित क्षेत्र का 76.1 प्रतिशत पंजाब में, 51.3 प्रतिशत हरियाणा में तथा 58.21 प्रतिशत पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुओं और नलकूपों द्वारा सिंचित है। इस प्रकार इन राज्यों में सबसे अधिक भौम जल को प्रयोग कृषि कार्य के लिए किया जाता है।

UP Board Solutions for Class 12 Geography Chapter 27 Storing of Rainwater and Rearing of Water Table

प्रश्न 9
देश में कुल उपयोग किए गए जल में कृषि क्षेत्र का हिस्सा कम होने की सम्भावना क्यों है?
उत्तर
वर्तमान में हमारे देश में उद्योगों का विकास बड़ी तीव्रता से हो रहा है। इन उद्योगों को लगाने वे बढ़ती जनसंख्या को मकान बनाने के लिए भूमि की आवश्यकता पड़ती है, जिसके कारण कृषि भूमि कम होती जा रही है। हम जानते हैं कि उद्योगों एवं घरेलू कार्यों में बहुत अधिक जल व्यय होता है। इसीलिए हम यह मानते हैं कि भविष्य में देश में कुल उपयोग किए गए जल में कृषि का हिस्सा कम होने की सम्भावना है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1
निम्नलिखित में से जल किस प्रकार का संसाधन है?
(क) अजैव संसाधन
(ख) अनवीकरणीय संसाधन
(ग) जैव संसाधन
(घ) चक्रीय संसाधन
उत्तर
(घ) चक्रीय संसाधन।

प्रश्न 2
निम्नलिखित नदियों में से, देश में किस नदी में सबसे ज्यादा पुनः पूर्तियोग्य भौम जल संसाधन है?
(क) सिंधु
(ख) ब्रह्मपुत्र
(ग) गंगा
(घ) गोदावरी
उत्तर
(ग) गंगा।

प्रश्न 3
घन किमी में दी गई निम्नलिखित संख्याओं में से कौन-सी संख्या भारत में कुल वार्षिक वर्षा दर्शाती है?
(क) 2,000
(ख) 3,000
(ग) 4,000
(घ) 5,000
उत्तर
(ग) 4,000.

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प्रश्न 4
निम्नलिखित दक्षिण भारतीय राज्यों में से किस राज्य में भौम जल उपयोग (% में)। इसके कुल भौम जल संभाव्य से ज्यादा है?
(क) तमिलनाडु
(ख) कर्नाटक
(ग) आन्ध्र प्रदेश
(घ) केरल
उत्तर
(क) तमिलनाडु।

प्रश्न 5
देश में प्रयुक्त कुल जल का सबसे अधिक समानुपात निम्नलिखित सेक्टरों में से किस सेक्टर में है?
(क) सिंचाई
(ख) उद्योग
(ग) घरेलू उपयोग
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(क) सिंचाई।

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UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 15 Role of Women Entrepreneurship in Social Development

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 15 Role of Women Entrepreneurship in Social Development (सामाजिक विकास में महिला उद्यमिता की भूमिका) are part of UP Board Solutions for Class 12 Sociology. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 15 Role of Women Entrepreneurship in Social Development (सामाजिक विकास में महिला उद्यमिता की भूमिका).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Sociology
Chapter Chapter 15
Chapter Name Role of Women Entrepreneurship in Social Development (सामाजिक विकास में महिला उद्यमिता की भूमिका)
Number of Questions Solved 21
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sociology Chapter 15 Role of Women Entrepreneurship in Social Development (सामाजिक विकास में महिला उद्यमिता की भूमिका)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
महिला उद्यमिता से आपका क्या आशय है ? सामाजिक विकास में महिला उद्यमिता की भूमिका की समीक्षा कीजिए। [2009, 10, 15, 16]
या
सामाजिक पुनर्निर्माण में महिला उद्यमियों के योगदान का क्या महत्त्व है ? [2011]
या
भारत में सामाजिक विकास के क्षेत्र में महिलाओं के योगदान की विवेचना कीजिए। [2010, 11]
या
सामाजिक विकास में महिला उद्यमिता का महत्त्व दर्शाइए। [2014, 16]
या
महिला उद्यमिता तथा सामाजिक विकास को आप एक-दूसरे से कैसे सम्बन्धित करेंगे ? भारत में महिला सशक्तीकरण पर एक निबन्ध लिखिए। [2011, 14]
या
उद्यमिता से आप क्या समझते हैं? अपने देश के सामाजिक विकास में महिला उद्यमिता के महत्त्व को समझाइए। [2012, 13]
या
महिला उद्यमिता एवं सामाजिक विकास का विश्लेषण कीजिए। [2015]
उत्तर:
महिला उद्यमिता से आशय
नारी समाज का एक महत्त्वपूर्ण और अभिन्न अंग है। वर्तमान काल में उसकी भूमिका बहुआयामी हो गयी है। वह परिवार, समाज, धर्म, राजनीति, विज्ञान और प्रौद्योगिकी से लेकर व्यवसाय और औद्योगिक क्षेत्र में अपनी पूरी भागीदारी निभा रही है। आज एक उद्यमी के रूप में उसका विशेष योगदान है। औद्योगिक और व्यावसायिक क्षेत्र में अब नारी पुरुष के समकक्ष है। व्यवसाय और उद्योग को नारी की सूझबूझ और कौशल ने नयी दिशाएँ प्रदान की हैं।

उद्यमिता शब्द की व्युत्पत्ति उद्यमी’ शब्द से हुई है। उद्यमिता का अर्थ किसी व्यवसाय या उत्पादन-कार्य में लाभ-हानि के जोखिम को वहन करने की क्षमता है। प्रत्येक व्यवसाय या उत्पादनकार्य में कुछ-न-कुछ जोखिम या अनिश्चितता अवश्य होती है। यदि व्यवसायी या उत्पादक इस जोखिम का पूर्वानुमान लगाकर ठीक से कार्य करता है तो उसे लाभ होता है अन्यथा उसे हानि भी हो सकती है। किसी भी व्यवसाय के लाभ-हानि को जोखिम अथवा अनिश्चितता ही उद्यमिता कहलाती है। इसे वहन करने वाले को; चाहे वह स्त्री हो या पुरुष; ‘उद्यमी’ या ‘साहसी’ कहते हैं। विभिन्न समाजशास्त्रियों ने उद्यमी को निम्नलिखित रूप से परिभाषित किया है

शुम्पीटर के अनुसार, “एक उद्यमी वह व्यक्ति है जो देश की अर्थव्यवस्था में उत्पादन की किसी नयी विधि को जोड़ता है, कोई ऐसा उत्पादन करता है जिससे उपभोक्ता पहले से परिचित न हो। किसी तरह के कच्चे माल के नये स्रोत अथवा नये बाजारों की खोज करता है अथवा अपने अनुभवों के आधार पर उत्पादन के नये तरीकों को उपयोग में लाता है।

नॉरमन लॉन्ग के अनुसार, “कोई भी व्यक्ति जो उत्पादन के साधनों के द्वारा नये रूप में लाभप्रद ढंग से आर्थिक क्रिया करता है, उसे एक उद्यमी कहा जाएगा।” उद्यमी की उपर्युक्त परिभाषाओं के प्रकाश में महिला उद्यमी की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है कि “महिला उद्यमी वह स्त्री है जो एक व्यावसायिक या औद्योगिक इकाई का संगठन

तथा संचालन करती है और उसकी उत्पादन-क्षमता को बढ़ाने का प्रयास करती है। इस प्रकार महिला उद्यमिता से आशय, “किसी महिला की उस क्षमता से है, जिसका उपयोग करके वह जोखिम उठाकर किसी व्यावसायिक अथवा औद्योगिक इकाई को संगठित करती है तथा उसकी उत्पादनक्षमता बढ़ाने का भरपूर प्रयास करती है।” वास्तव में, महिला उद्यमिता वह महिला व्यवसायी है, जो व्यवसाय के संगठन व संचालन में लगकर जोखिम उठाने के कार्य करती है। भारत में महिला उद्यमिता से आशय किसी नये उद्योग के संगठन और संचालन से लगाया जाता है।

सामाजिक विकास में महिला उद्यमिता की भूमिका
सामाजिक विकास से अभिप्राय उस स्थिति से है, जिसमें समाज के व्यक्तियों के ज्ञान में वृद्धि हो और व्यक्ति प्रौद्योगिकीय आविष्कारों के कारण प्राकृतिक पर्यावरण पर अपना नियन्त्रण स्थापित कर ले तथा आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर हो जाए। समाज का विकास करने में सभी वर्गों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। यदि महिलाएँ इसमें सक्रिय योगदान नहीं देतीं, तो समाज में विकास की गति अत्यन्त मन्द हो जाएगी।

महिलाएँ विविध रूप से सामाजिक विकास में योगदान दे सकती हैं। इनमें से एक अत्यन्त नवीन क्षेत्र, जिस पर अब भी पुरुषों का ही अधिकार है, उद्यमिता का है। प्रत्येक व्यवसाय या उत्पादनकार्य में कुछ जोखिम या अनिश्चितता होती है। इस जोखिम व अनिश्चितता की स्थिति को वहन करने की क्षमता को उद्यमिता कहते हैं और इसे सहन करने वाली स्त्री को महिला उद्यमिता कहते हैं।

भारतीय समाज में महिला उद्यमिता की अवधारणा एक नवीन अवधारणा है, क्योंकि परम्परागत रूप से व्यापार तथा व्यवसायों में महिलाओं की भूमिका नगण्य रही है। वास्तव में, पुरुष प्रधानता एवं स्त्रियों की परम्परागत भूमिका के कारण ऐसा सोचना भी एक कल्पना मात्र था। ऐसा माना जाता था कि आर्थिक जोखिमों से भरपूर जीवन केवल पुरुष ही झेल सकता है, परन्तु आज भारतीय महिलाएँ इस जोखिम से भरे जीवन में धीरे-धीरे सफल और सबल कदम रखने लगी हैं। नगरों में आज सफल या संघर्षरत महिला उद्यमियों की उपस्थिति दृष्टिगोचर होने लगी है।

दिल्ली नगर के निकटवर्ती क्षेत्रों में महिला व्यवसायियों और उद्यमियों में से 40% ने गैरपरम्परागत क्षेत्रों में प्रवेश करके सबको आश्चर्यचकित कर दिया है। ये क्षेत्र हैं

  1. इलेक्ट्रॉनिक,
  2. इन्जीनियरिंग,
  3. सलाहकार सेवा,
  4. रसायन,
  5. सर्किट ब्रेकर,
  6.  एम्प्लीफायर, ट्रांसफॉर्मर, माइक्रोफोन जैसे उत्पादन,
  7.  सिले-सिलाये वस्त्र उद्योग,
  8.  खाद्य-पदार्थों से सम्बन्धित उद्योग,
  9. आन्तरिक घरेलू सजावट के व्यवसाय तथा
  10.  हस्तशिल्प व्यवसाय।

बिहार जैसे औद्योगिक रूप से पिछड़े राज्य में भी करीब 30 से 50 महिला उद्यमी हैं, जिनमें से दो तो राज्य के चैम्बर ऑफ कॉमर्स की सदस्या भी रही हैं। उत्तरी भारत में भी महिला उद्यमियों की संख्या बढ़ रही है। सरकार और निजी संस्थानों द्वारा इन्हें पर्याप्त सहायता और प्रोत्साहन भी दिये जा रहे हैं।
पर्याप्त आँकड़े न उपलब्ध हो पाने के कारण महिला उद्यमियों की बदलती हुई प्रवृत्ति के आयामों और सामाजिक विकास में इनकी भूमिका का पता लगाना कठिन है, परन्तु महानगरों में यह परिवर्तन स्पष्ट देखा जा सकता है और पहले की अपेक्षाकृत छोटे नगरों में भी अब इनकी झलक स्पष्ट दिखायी देने लगी है।

सामाजिक पुनर्निर्माण में महिला उद्यमियों का योगदान (महत्त्व)
सामाजिक विकास में महिला उद्यमिता के योगदान का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के माध्यम से किया जा सकता है

1. आर्थिक क्षेत्र में योगदान – महिला उद्यमिता उत्पादन में वृद्धि करके राष्ट्रीय आय में वृद्धि करती है। व्यवसाय और उद्योगों की आय बढ़ने से प्रति व्यक्ति आय बढ़ती है, जिससे आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त होता है। इस प्रकार महिला उद्यमिता राष्ट्र के आर्थिक क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देकर राष्ट्र का नवनिर्माण कर रही है।

2. रोजगार के अवसरों में वृद्धि – महिला उद्यमिता द्वारा जो व्यवसाय, उद्योग तथा प्रतिष्ठान स्थापित किये जाते हैं उनमें कार्य करने के लिए अनेक व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। इनमें लगकर महिलाएँ तथा पुरुष रोजगार प्राप्त करते हैं। भारत जैसे विकासशील देशों में महिला उद्यमिता का यह योगदान बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो रहा है।

3. उत्पादन में वृद्धि – भारत में महिला उद्यमिता की संख्या लगभग 18 करोड़ है। यदि यह समूचा समूह उत्पादन में लग जाए तो राष्ट्र के सकल उत्पादन में भारी वृद्धि होने लगेगी। यह उत्पादक श्रम निर्यात के पर्याप्त माल जुटाकर राष्ट्र को विदेशी मुद्रा दिलाने में भी सफल हो सकता है। इस प्रकार राष्ट्र की सम्पन्नता में इनकी भूमिका अनूठी कही जा सकती है।

4. सामाजिक कल्याण में वृद्धि – महिला उद्यमिता द्वारा उद्योगों और व्यवसायों में उत्पादन बढ़ाने से वस्तुओं के मूल्य कम हो जाएँगे। उनकी आपूर्ति बढ़ने से जनसामान्य के उपभोग में वृद्धि होगी। उपभोग की मात्रा बढ़ने से नागरिकों के रहन-सहन का स्तर ऊँचा उठेगा, जो सामाजिक कल्याण में वृद्धि करने में अभूतपूर्व सहयोग देगा।

5. स्त्रियों की दशा में सुधार – भारतीय समाज में नारी को आज भी हीन दृष्टि से देखा जाता है। आर्थिक दृष्टि से वे आज भी पुरुषों पर निर्भर हैं। महिला उद्यमिता महिलाओं को क्रियाशील बनाकर उन्हें आर्थिक क्षेत्र में सबलता प्रदान करती है। महिला उद्यमिता समाज में एक स्वस्थ वातावरण का निर्माण करके महिला-कल्याण और आर्थिक चेतना का उदय कर सकती है। इस प्रकार महिलाओं की दशा में सुधार लाने में इसकी भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो सकती

6. विकास कार्यक्रमों में सहायक – महिला उद्यमिता राष्ट्र के विकास-कार्यों में अपना अभूतपूर्व योगदान दे सकने में सहायक है। बाल-विकास, स्त्री-शिक्षा, परिवार कल्याण, स्वास्थ्य तथा समाज-कल्याण के क्षेत्र में इसका अनूठा योगदान रहा है।

7. नवीन कार्यविधियों का प्रसार – परिवर्तन और विकास के इस युग में उत्पादन की नयी-नयी विधियाँ और तकनीक आ रही हैं। महिला उद्यमिता ने व्यवसाय और उद्योगों को नवीनतम कार्य-विधियाँ तथा तकनीकी देकर अपना योगदान दिया है। उत्पादन की नवीनतम विधियों ने स्त्रियों के परम्परावादी विचारों को ध्वस्त कर उन्हें नया दृष्टिकोण प्रदान किया है।

8. आन्तरिक नेतृत्व का विकास – व्यवसाय तथा उद्योगों में लगी महिलाओं को गलाघोटू स्पर्धाओं से गुजरना पड़ता है। इससे उनमें आत्मविश्वास और आन्तरिक नेतृत्व की भावना बलवती होती है। यह नेतृत्व सामाजिक संगठन, सामुदायिक एकता और राष्ट्र-निर्माण में सहायक होता है। नैतिकता के मूल्यों पर टिका नेतृत्व समाज की आर्थिक और राजनीतिक दशाओं को बल प्रदान करता है। महिला उद्यमिता समाज में आन्तरिक नेतृत्व का विकास करके स्त्री जगत् में नवचेतना और जागरूकता का प्रचार करती है।

प्रश्न 2
भारतीय समाज में कामगार स्त्रियों की परिस्थिति में हो रहे परिवर्तनों को बताइए। [2011, 16]
या
समाज में कामकाजी महिलाओं की परिस्थिति में हो रहे परिवर्तनों की व्याख्या कीजिए। [2015]
या
भारत में महिला उद्योग किन क्षेत्रों में विकसित हो रहा है ?
उत्तर:
कामगार स्त्रियों की परिस्थितियों में हो रहे परिवर्तन
आधुनिक युग में भारत में महिला उद्यमिता को पर्याप्त प्रोत्साहन मिला है। अब महिला उद्यमियों को केवल समान अधिकार ही प्राप्त नहीं हैं, बल्कि कुछ अतिरिक्त सुविधाएँ भी प्रदान की गयी हैं। उदाहरण के लिए, महिला उद्यमियों को प्रत्येक विभाग में मातृत्व-अवकाश की अतिरिक्त सुविधा उपलब्ध है। सरकार द्वारा निजी उद्योग या व्यवसाय स्थापित करने के लिए भी महिलाओं को अतिरिक्त सुविधाएँ एवं अनुदान प्रदान किये जाते हैं। इन सुविधाओं के कारण तथा सामान्य दृष्टिकोण के परिवर्तित होने के परिणामस्वरूप भारत में महिला उद्यमिता के क्षेत्र में तेजी से वृद्धि हुई है। आज लगभग प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं का सक्रिय योगदान है। शिक्षित एवं प्रशिक्षित महिलाएँ जहाँ सरकारी, अर्द्ध-सरकारी तथा गैर-सरकारी प्रतिष्ठानों में विभिन्न पदों पर कार्यरत हैं, वहीं अनेक महिलाओं ने निजी प्रतिष्ठान भी स्थापित किये हैं। अनेक महिलाएँ सिले-सिलाये वस्त्रों के आयातनिर्यात का कार्य कर रही हैं, प्रकाशन संस्थानों का संचालन कर रही हैं, रेडियो तथा टेलीविजन बनाने वाली इकाइयों का कार्य कर रही हैं।

एक सर्वेक्षण के अनुसार नगरों में महिलाएँ जिन व्यवसायों तथा कार्यों से मुख्य रूप से सम्बद्ध हैं, वे निम्नलिखित हैं।

  1. स्कूलों व कॉलेजों/विश्वविद्यालयों में शिक्षण कार्य।
  2.  अस्पतालों में डॉक्टर तथा नर्स का कार्य।
  3.  सामाजिक कार्य।
  4. कार्यालयों एवं बैंकों में नौकरी सम्बन्धी कार्य।
  5. टाइपिंग तथा स्टेनोग्राफी सम्बन्धी कार्य।
  6. होटलों व कार्यालयों में स्वागती (Receptionist) का कार्य।
  7. सिले-सिलाए वस्त्र बनाने के कार्य।
  8. खाद्य पदार्थ बनाने, संरक्षण एवं डिब्बाबन्दी के कार्य।
  9. आन्तरिक गृह-सज्जा सम्बन्धी कार्य।
  10. हस्तशिल्प जैसे परम्परागत व्यवसाय।
  11. ब्यूटी पार्लर तथा आन्तरिक सजावट उद्योग।
  12. घड़ी निर्माण तथा इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग।
  13. पत्रकारिता, मॉडलिंग एवं विज्ञापन क्षेत्र।
  14. इंजीनियरिंग उद्योग।
  15. रसायन उद्योग आदि।

भारत में महिला उद्यमिता निरन्तर बढ़ रही है। सन् 1988 में किये गये एक सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि दिल्ली तथा आसपास के क्षेत्र में महिला व्यावसायियों तथा उद्यमियों में से लगभग 40% महिलाओं ने गैर-परम्परागत व्यवसायों का वरण किया है। भारत सरकार भी महिला उद्यमियों को आर्थिक तथा तकनीकी सहायता प्रदान कर रही है। भारत में जितने भी बड़े घराने हैं उनकी महिलाएँ अब महिला उद्यमिता के रूप में रुचि लेकर प्रमुख भूमिका निभाने लगी हैं। पहले महिला उद्यमी कुटीर उद्योग तथा लघु उद्योगों के साथ ही जुड़ी थीं, परन्तु अब वे बड़े पैमाने के संगठित उद्योगों में भी अपनी सहभागिता जुटाने लगी हैं। वर्तमान समय में महिला उद्यमियों ने गुजरात में सोलर कुकर बनाने, महाराष्ट्र में ढलाई-उद्योग चलाने, ओडिशा में टेलीविजन बनाने तथा केरल में इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण बनाने में विशेष सफलता प्राप्त की है।

1983 ई० में महिला उद्यमिता से सम्बन्धित प्रशिक्षण सुविधाएँ प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय संस्थान’ की स्थापना की गयी थी। अनेक राज्यों में वित्तीय निगम, हथकरघा विकास बोर्ड तथा जिला उद्योग केन्द्र महिला उद्यमियों को ऋण तथा अनुदान देने की व्यवस्था कर रहे हैं। महिला उद्यमियों द्वारा उत्पादित वस्तुएँ सस्ती और श्रेष्ठ होती हैं, जो महिला उद्यमिता की सफलता और उपयोगिता की प्रतीक हैं।

भारत में महिला उद्यमियों के विषय में अलग से आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। इसीलिए महिला उद्यमियों की परिवर्तित प्रवृत्ति के विषय में तथा इनके विस्तार के विषय में कुछ भी कह पाना कठिन है। हाँ, इतना अवश्य है कि आज महानगरों तथा नगरों में महिला उद्यमियों के परिवर्तित लक्षण स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं। आज महिला को प्रत्येक क्षेत्र में कार्यरत देखा जा सकता है।

प्रश्न 3
भारत में महिला उद्यमिता को प्रोत्साहित करने वाले उपायों की चर्चा कीजिए। [2010, 11, 12]
उत्तर:
महिला उद्यमिता को प्रोत्साहित करने हेतु उपाय
जब हम भारत में महिला उद्यमिता के विकास के प्रश्न पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था में स्त्रियों की सहभागिता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उन्हें शिक्षा और प्रशिक्षण के माध्यम से तथा सुगम-ऋण, कच्चे माल की सप्लाई, माल के विपणन की तथा अन्य सुविधाएँ देकर उनकी क्षमता को बढ़ाया जा रहा है। इस कार्य में केन्द्रीय समाज-कल्याण मण्डल अग्रणी रहा है। यह मण्डल स्वयंसेवी संगठनों को स्त्रियों के लिए आय उपार्जन हेतु इकाई स्थापित करने में तकनीकी और आर्थिक सहायता देता है। महिला और बाल-विकास विभाग स्त्रियों को खेती, डेयरी, पशुपालन, मछली-पालन, खादी और ग्रामोद्योग, हथकरघा, रेशम प्रयोग के लिए प्रशिक्षण देने की कार्य योजनाओं, ऋण विपणन तथा तकनीकी सुविधा देकर उनकी सहायता करता है। विभाग की अन्य योजनाओं के अन्तर्गत कमजोर वर्ग की महिलाओं को इलेक्ट्रॉनिक्स घड़ियाँ तैयार करने, कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग, छपाई और जिल्दसाजी, हथकरघा, बुनाई जैसे आधुनिक उद्योगों में प्रशिक्षण दिया जाता है।

कृषि मन्त्रालय स्त्रियों को कृषक प्रशिक्षण केन्द्र के माध्यम से भू-संरक्षण, डेयरी विकास आदि में प्रशिक्षण प्रदान करता है। समन्वित ग्रामीण विकास योजना की एक उपयोजना ग्रामीण क्षेत्रों में महिला और बाल-विकास कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य स्त्रियों को समूहों में संगठित करना, उन्हें आवश्यक प्रशिक्षण और रोजी-रोटी कमाने में सहायता देना है।

श्रम मन्त्रालय ऐसे स्वयंसेवी संगठनों को सहायता देता है जो महिलाओं को रोजी-रोटी कमाने वाले व्यवसायों का प्रशिक्षण देते हैं। राष्ट्रीय और छ: क्षेत्रीय व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थाओं द्वारा महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। महिलाओं के लिए विभिन्न राज्यों में अलग से औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (I.T.I.) चलाए जा रहे हैं। खादी और ग्रामोद्योग निगम ने भी अपने संस्थान में प्रबन्ध कार्य में महिलाओं को सम्मिलित करने के उपाय किये हैं।

सहकारी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर महिलाओं को शामिल करने के उद्देश्य से उनके लिए अलग से दुग्ध सहकारी समितियाँ चलायी जा रही हैं। जवाहर रोजगार योजना के अन्तर्गत लाभ प्राप्तकर्ताओं में 30 प्रतिशत महिलाएँ होंगी। अनेक राज्यों में महिला विकास निगम’ (W.D.C.) स्थापित किये गये हैं, जो महिलाओं को तकनीकी परामर्श देने तथा बैंक और अन्य वित्तीय संस्थाओं से ऋण दिलाने एवं बाजार की सुविधा दिलाने का प्रबन्ध करेंगे। महिलाओं में उद्यमशीलता को बढ़ावा देने के लिए औद्योगिक विकास विभाग उन्हें शेड और भूखण्ड देने की सुविधा देता है। हाल ही में महिला उद्यमियों को परामर्श देने के लिए अलग से एक व्यवसाय संचालन खोला गया है। जिनकी प्रधान एक महिला अधिकारी होती है। राष्ट्रीय स्तर पर एक स्थायी समिति गठित की गई है जो महिलाओं के उद्यमशीलता के विकास हेतु सरकार को सुझाव देगी। लघु उद्योग संस्थानों और देशभर में फैली उनकी शाखाओं की मार्फत उद्यमशीलता विकास कार्यक्रमों का आयोजन कर रहा है।

‘राष्ट्रीय उद्यमशीलता संस्थान और लघु व्यवसाय विकास द्वारा महिलाओं के लिए प्रशिक्षण शुरू किया गया है। लघु उद्योग विकास संगठन 1983 ई० से सर्वोत्तम उद्यमियों को राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान करता है। शिक्षित बेरोजगारों को अपना उद्योग-धन्धा शुरू करने की योजना में महिलाओं को प्राथमिकता दी जाएगी। छोटे-छोटे उद्योगों में स्त्रियों की सहभागिता को बढ़ाने के लिए महिला औद्योगिक सहकारी समितियों को गठित किया गया। इन समितियों के प्रयत्नों के परिणामस्वरूप स्त्रियों ने मधुमक्खियों को पालने, हाथ से चावल कूटने व देशी तरीके से तेल निकालने आदि के उद्योग प्रारम्भ किये। इन प्रयत्नों के बावजूद प्रगति नहीं हुई। भारत में वर्ष 1973 को ‘अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष’ के रूप में मनाया गया। उस समय स्त्रियों की प्रस्थिति का मूल्यांकन करने के उद्देश्य से एक राष्ट्रीय समिति का गठन किया गया। इस समिति की सिफारिशों को ध्यान में रखकर ही सातवीं पंचवर्षीय योजना में एक ओर महिला रोजगार को प्रमुखता दी गयी और दूसरी ओर उद्योग की एक ऐसी सूची भी तैयार की गयी जिनके संचालन का कार्य महिलाओं को सौंपने की बात कही गयी। इस सूची में वर्णित उद्योगों में महिलाओं को प्राथमिकता दी गयी।

वर्तमान में भारत में महिलाओं द्वारा चलायी जाने वाली औद्योगिक इकाइयों की संख्या 4,500 से अधिक है। इनमें से केवल केरल में 800 से अधिक इकाइयों का संचालन महिलाओं द्वारा किया जा रहा है। आज तो महिला उद्यमिता का क्षेत्र काफी विस्तृत हो गया है। महिला उद्यमियों द्वारा चलाये जाने वाले प्रमुख उद्योग इस प्रकार हैं-इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, रबड़ की वस्तुएँ, सिले हुए वस्त्र, माचिस, मोमबत्ती तथा रासायनिक पदार्थ, घरेलू उपकरण आदि। महिलाओं को उद्योग लगाने की दृष्टि से प्रोत्साहित करने हेतु सरकार वित्तीय सहायता और अनुदान तो देती ही है, साथ ही इन उद्योगों में निर्मित वस्तुओं की बिक्री में भी सहायता करती है।

उद्यमिता से सम्बन्धित प्रशिक्षण देने के उद्देश्य से 1983 ई० में राष्ट्रीय संस्थान की स्थापना की गयी। इस संस्थान द्वारा महिला उद्यमियों के प्रशिक्षण पर विशेष जोर दिया गया। महिला उद्यमियों को विभिन्न राज्यों में प्रोत्साहन देने के लिए वित्तीय निगम, जिला उद्योग केन्द्र एवं हथकरघा विकास बोर्ड भी स्थापित किये गये हैं। साधारणतः यह पाया गया है कि महिलाओं द्वारा संचालित उद्योगों में श्रमिक एवं मालिकों के बीच सम्बन्ध अपेक्षाकृत अधिक मधुर हैं एवं उत्पादित वस्तुएँ तुलनात्मक दृष्टि से अधिक अच्छी हैं। इससे स्पष्ट है कि भारत में महिला उद्यमिता सफल होती जा रही है।
इन सभी उपायों का एक नतीजा यह निकला है कि काफी संख्या में स्त्रियाँ न केवल पारिवारिक उद्योगों को चलाने में सहयोग दे रही हैं, वरनु वे स्वयं अपने उद्योग-धन्धे चला रही हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
महिला उद्यमिता की परिभाषा देते हुए भारत में इसके वर्तमान स्वरूप का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
अक्षर महिला उद्यमी वह स्त्री है जो एक व्यावसायिक या औद्योगिक इकाई का संगठनसंचालन करती है और उसकी उत्पादन-क्षमता को बढ़ाने का प्रयास करती है। दूसरे शब्दों में, महिला उद्यमिता से आशय किसी महिला की उस क्षमता से है, जिसका उपयोग करके वह जोखिम उठाकर किसी व्यावसायिक अथवा औद्योगिक इकाई को संगठित करती है तथा उसकी उत्पादनक्षमता बढ़ाने का भरपूर प्रयास करती है।”
वास्तव में, महिला उद्यमिता वह महिला व्यवसायी है जो व्यवसाय के संगठन व संचालन में लगकर जोखिम उठाने के कार्य करती है। भारत में महिला उद्यमिता से आशय किसी नये उद्योग के संगठन और संचालन से लगाया जाता है।

महिला उद्यमिता का वर्तमान स्वरूप

वर्तमान युग में नारी की स्थिति में महत्त्वपूर्ण सुधार हुआ है। शिक्षा-प्रसार के लिए लड़कियों की शिक्षा को अनिवार्य बनाया गया और हाईस्कूल तक की शिक्षा को नि:शुल्क रखा गया। बालिकाओं के अनेक विद्यालय खोले गये। सह-शिक्षा का भी खूब चलन हुआ। स्त्रियाँ सार्वजनिक चुनावों में निर्वाचित होकर एम० एल० ए०, एम० पी० तथा मन्त्री और यहाँ तक कि प्रधानमन्त्री भी होने लगी हैं। उन्हें पिता की सम्पत्ति में भाइयों के बराबर अधिकार प्राप्त करने की कानूनी छूट मिली है। पति की क्रूरता के विरोध में या मनोमालिन्य हो जाने पर तलाक प्राप्त करने का भी वैधानिक अधिकार उन्हें प्रदान किया गया है। विधवा-विवाह की पूरी छूट हो गयी है; हालाँकि व्यवहार में अभी इनका चलन कम है।

उन्हें कानून के द्वारा सभी अधिकार पुरुषों के बराबर प्राप्त हो गये हैं। आज स्त्रियाँ सभी सेवाओं में जिम्मेदारी के पदों पर कार्य करते हुए देखी जा सकती हैं; जैसे-डॉक्टर, इन्जीनियर, वकील, शिक्षिका, लिपिक, अफसर इत्यादि। बाल-विवाहों पर कठोर प्रतिबन्ध लग गया है। पर्दा-प्रथा काफी हद तक समाप्त हो गयी है। युवक समारोहों, क्रीड़ा समारोहों और राष्ट्रीय खेलों में उनका सहभाग बढ़ा है। वे पढ़ने, नौकरी करने और टीमों के रूप में विदेश भी जाने लगी हैं। अन्तर्जातीय विवाह बढ़े हैं। हिन्दुओं में बहुपत्नी-प्रथा पर रोक लग गयी है। अन्तर्साम्प्रदायिक विवाह भी होने लगे हैं। स्त्रियों को अपने जीवन का रूप निर्धारित करने की अधिक स्वतन्त्रता मिली है।
उपर्युक्त सुधार नगरों में अधिक मात्रा में हुए हैं। गाँवों में अब भी अशिक्षा, अन्धविश्वास, रूढ़िवादिता, पर्दा-प्रथा, परम्पराओं, दरिद्रता व पिछड़ेपन का ही बोलबाला है। इन सुधारों का गाँवों की स्त्रियों की परिस्थितियों पर बहुत कम प्रभाव पड़ा है।

प्रश्न 2
भारत में महिला उद्यमियों के मार्ग में क्या बाधाएँ हैं ? [2010]
उत्तर:
हमारे देश में स्त्रियाँ सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाओं के कारण विकासात्मक गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग नहीं ले पाती हैं, जब कि देश की लगभग आधी जनसंख्या महिलाओं की है। लोगों की आम धारणा है कि स्त्रियाँ अपेक्षाकृत कमजोर होती हैं और उन्हें व्यक्तित्व के विकास के समुचित अवसर नहीं मिल पाते। इसलिए वे शिक्षा, दक्षता, विकास और रोजगार के क्षेत्र में पिछड़ गयी हैं। भारत में महिला उद्यमिता के मार्ग में प्रमुखत: दो प्रकार की बाधाएँ या समस्याएँ हैं – प्रथम, सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याएँ व द्वितीय, आर्थिक समस्याएँ।।

  1. सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याएँ – महिला उद्यमिता के क्षेत्र में सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याएँ हैं–परम्परागत मूल्य, पुरुषों द्वारा हस्तक्षेप सामाजिक स्वीकृति तथा प्रोत्साहन का अभाव।।
  2. आर्थिक समस्याएँ – महिला उद्यमिता के मार्ग में आने वाली प्रमुख आर्थिक कठिनाइयाँ हैं – पंजीकरण एवं लाइसेन्स की समस्या, वित्तीय कठिनाइयाँ, कच्चे माल का अभाव, तीव्र । प्रतिस्पर्धा एवं बिक्री की समस्या। इसके अतिरिक्त महिला उद्यमियों को अनेक अन्य बाधाओं का भी सामना करना पड़ता है; यथा – सृजनता व जोखिम मोल लेने की अपेक्षाकृत कम क्षमता, प्रशिक्षण को अभाव, सरकारी बाबुओं व निजी क्षेत्र के व्यापारियों द्वारा उत्पन्न अनेक कठिनाइयाँ आदि।

प्रश्न 3
महिला उद्यमिता को कैसे प्रोत्साहित किया जा सकता है ? [2007]
उत्तर:
महिला उद्यमिता को प्रोत्साहित करने हेतु कुछ सुझाव निम्नलिखित हैं

  1. महिला उद्यमिता को प्रोत्साहन देने के लिए यह आवश्यक है कि सरकार के द्वारा कुछ ऐसे उद्योगों की सूची तैयार की जाए जिनके लाइसेन्स केवल महिलाओं को ही दिये जाएँ। ऐसा होने पर महिलाएँ बाजार की प्रतिस्पर्धा से बच सकेंगी।
  2. महिलाएँ जिन उद्योगों को स्थापित करना चाहें, उनके सम्बन्ध में उन्हें पूरी औद्योगिक जानकारी दी जानी चाहिए। स्त्रियों को आय प्रदान करने वाले व्यवसायों का प्रशिक्षण दिया जाए।
  3.  महिला औद्योगिक सहकारी समितियों का गठन किया जाए जिससे कम पूँजी में महिलाओं द्वारा उद्योगों की स्थापना की जा सके।
  4.  ऋण सम्बन्धी प्रक्रिया को सरल बनाया जाना चाहिए तथा सुगमता से कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
  5.  महिला उद्यमियों को सरकारी एजेन्सी द्वारा आसान शर्तों पर कच्चा माल उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
  6. इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि महिला उद्यमियों द्वारा जो वस्तुएँ उत्पादि। की जाएँ, वे अच्छी किस्म की हों जिससे प्रतिस्पर्धा में टिक सकें।
  7.  महिला उद्यमियों को अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं को बेचने की समस्या का सामना करना पड़ता है। यदि सरकार स्वयं महिला उद्यमियों से कुछ निर्धारित मात्रा में माल खरीद ले तो उनके माल की बिक्री भी हो सकेगी तथा उन्हें तीव्र प्रतिस्पर्धा से भी बचाया जा सकेगा।

प्रश्न 4
भारत में महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
भारत में वैदिक और उत्तर-वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति पुरुषों के बराबर रही है। तथा उन्हें पुरुषों के समान ही सब अधिकार प्राप्त रहे हैं। धीरे-धीरे पुरुषों में अधिकार-प्राप्ति की लालसा बढ़ती गयी। परिणामस्वरूप स्मृति काल, धर्मशास्त्र काल तथा मध्यकाल में इनके अधिकार छिनते गये और इन्हें परतन्त्र, निस्सहाय और निर्बल मान लिया गया। परन्तु समय ने पलटा खाया। अंग्रेजी शासनकाल में देश में राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में जागृति आने लगी। समाज-सुधारकों एवं नेताओं का ध्यान स्त्रियों की दशा सुधारने की ओर गया। यहाँ पिछले कुछ वर्षों में स्त्रियों की स्थिति में काफी सुधार हुआ है।

विवेकानन्द ने कहा है – ‘स्त्रियों की अवस्था में सुधार हुए बिना विश्व के कल्याण का कोई दूसरा मार्ग नहीं हैं। यदि स्त्री-समाज निर्बल रहा तो हमारा सामाजिक ढाँचा भी निर्बल रहेगा, हमारी सन्तानों का विकास नहीं होगा, समाज में सामंजस्य स्थापित नहीं होगा, देश का विकास अधूरा रहेगा, स्त्रियाँ पुरुषों पर बोझ बनी रहेंगी, देश के विकास में 56 प्रतिशत जनता की भागीदारी नहीं होगी तथा देश में स्त्री-सम्बन्धी अपराधों में वृद्धि होगी। अतः भारत में महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता है।

प्रश्न 5
महिला उद्यमिता के नारी उत्थान पर होने वाले लाभ बताइए। [2009, 10, 11, 12]
या
महिला उद्यमिता एवं नारी उत्थान एक-दूसरे के पूरक हैं। व्याख्या कीजिए। [2015]
उत्तर:
महिला उद्यमिता के नारी उत्थान पर निम्नलिखित लाभ हैं।

1. आत्मनिर्भरता – महिला उद्यमिता के कारण महिलाएँ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हुई हैं, इससे अन्य कार्यों के लिए भी इनकी पुरुष सदस्यों पर निर्भरता कम हुई है।
2. जीवन स्तर में सुधार – परम्परागत संयुक्त परिवारों में महिलाओं की शिक्षा-स्वास्थ्य इत्यादि आवश्यकताओं पर कम ध्यान दिया जाता था, जिससे इनका जीवन स्तर निम्न था। महिला उद्यमिता के कारण इनके जीवन स्तर में गुणात्मक सुधार हुआ है।
3. नेतृत्व क्षमता का विकास – महिलाओं द्वारा उद्यम एवं व्यवसायों के संचालन से उनमें नेतृत्व क्षमता का विकास हुआ है, फलतः महिलाएँ सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्रों में भी नेतृत्व सम्भालने लगी हैं।
4. सामाजिक समस्याओं में कमी – महिला उद्यमिता से महिलाओं की परिवार व समाज में स्थिति सुधरी है, इससे घरेलू हिंसा, बाल विवाह, पर्दा प्रथा जैसी महिला सम्बन्धी समस्याएँ कम होने लगी हैं।
5. नारी सशक्तिकरण – महिला उद्यमिता, महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के साथ ही उनमें संचालन, नेतृत्व, संगठन आदि गुणों का विकास करती है, इससे नारी सशक्तिकरण को बल मिलता है। अत: इन सब कारणों से कहा जा सकता है कि महिला उद्यमिता तथा नारी उत्थान
एक-दूसरे के पूरक हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
डेविड क्लिलैण्ड ने उद्यमी की क्या परिभाषा दी है ?
उत्तर:
डेविड क्लिलैण्ड ने लिखा है कि “उद्यमी व्यक्ति वह है जो किसी व्यापारिक व औद्योगिक इकाई को संगठित करता है या उसकी उत्पादन-क्षमता बढ़ाने का प्रयत्न करता है।” भारतीय सन्दर्भ में उद्यमी की यह परिभाषा अधिक उपयुक्त मालूम पड़ती है, क्योंकि यहाँ अधिकांश उद्यमी किसी औद्योगिक इकाई को संगठित करते हैं, अपनी औद्योगिक इकाई की क्षमता व उत्पादन बढ़ाने का प्रयत्न करते हैं और लाभ कमाते हैं।

प्रश्न 2
देश की आर्थिक प्रगति में महिला उद्यमिता का क्या योग है ?
या
सामाजिक विकास में महिला उद्यमिता की भूमिका का उल्लेख कीजिए। [2008]
उत्तर:
इस देश में 25 वर्ष से 40 वर्ष की आयु समूह में आने वाली स्त्रियों की संख्या करीब 20 करोड़ है। इनमें से करीब 5 करोड़ स्त्रियाँ घरों में ही रहती हैं। इन 5 करोड़ में से अधिकांश स्त्रियाँ शिक्षित हैं। यदि इन सब स्त्रियों में उद्यमिता के प्रति रुचि उत्पन्न की जाए तो देश के कुल उत्पादन में काफी वृद्धि होगी। यदि इस महिला शक्ति का उद्यमिता के क्षेत्र में अधिकतम उपयोग किया जाए तो देश आर्थिक दृष्टि से काफी कुछ प्रगति कर सकता है। यदि महिला उद्यमिता को प्रोत्साहित किया जाए तो महिलाएँ उत्पादक-शक्ति के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में काफी योग दे सकती हैं।

प्रश्न 3
महिला उद्यमिता ने स्त्रियों में आत्मनिर्भरता का विकास किस प्रकार किया है?
उत्तर:
महिला उद्यमिता के जरिए वर्तमान में स्त्रियाँ देश की उत्पादन शक्ति में अहम योगदान कर रही हैं। इसके जरिए वे आर्थिक रूप से मजबूत हुई हैं तथा उनमें नवचेतना और जागरुकता का प्रसार हुआ है। साथ ही उत्पादन की नवीनतम विधियों ने स्त्रियों के परम्परावादी विचारों को ध्वस्त कर उन्हें नया दृष्टिकोण तथा आत्मविश्वास दिया है। इस प्रकार महिला उद्यमिता ने स्त्रियों में आत्मनिर्भरता का विकास किया है।

प्रश्न 4
महिलाओं को उद्यमिता के परामर्श से क्या उनमें आत्मनिर्भरता का विकास हुआ है?
उत्तर:
अनुभव यह बताता है कि आर्थिक अधिकारों से वंचित होने के कारण ही स्त्रियों पर समय-समय पर अनेक प्रकार की निर्योग्यताएँ लाद दी गयीं। यदि उद्योगों के क्षेत्र में स्त्रियों को आगे बढ़ने का अवसर दिया जाए तो उनमें आत्मविश्वास जाग्रत होगा, वे स्वतन्त्र रूप से निर्णय ले सकेंगी और आर्थिक दृष्टि से उनको पुरुषों की कृपा पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। तात्पर्य यह है कि आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर होने पर स्त्रियाँ सामाजिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में भी अपनी स्थिति को ऊँचा उठा सकेंगी। स्त्रियों की आर्थिक आत्मनिर्भरता उनके लिए वरदान सिद्ध होगी और वे स्वयं सामाजिक विकास में बहुत कुछ योग दे सकेंगी।

प्रश्न 5
महिला उद्यमिता द्वारा पारिवारिक एवं सामाजिक समस्याओं का किस प्रकार निराकरण किया जा सकता है ? समझाइए।
उत्तर:
पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन से सम्बन्धित अधिकांश समस्याएँ किसी-न-किसी रूप में स्त्रियों से ही जुड़ी हुई हैं। इन समस्याओं की तह तक जाने पर पता चलता है कि इसका मुख्य कारण स्त्रियों का सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकारों से वंचित रहना है। जब महिला उद्यमिता को प्रोत्साहित किया जाएगा तो इसके परिणामस्वरूप स्त्रियाँ आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर बनेगी और वे कई महत्त्वपूर्ण निर्णय स्वयं ले सकेंगी। विधवा पुनर्विवाह की संख्या बढ़ेगी, पर्दाप्रथा समाप्त होगी और पुरुषों के द्वारा सामान्यत: स्त्रियों का शोषण नहीं किया जा सकेगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि स्त्रियों में सामाजिक एवं आर्थिक चेतना का विकास किया जाए।

प्रश्न 6
एक सफल महिला उद्यमी के किन्हीं दो सामाजिक गुणों पर प्रकाश डालिए। [2012 ]
उत्तर:
1. नेतृत्व कुशलता – नेतृत्व कुशलता सफल उद्यमता का गुण हैं। प्रत्यक सफल उद्यमी महिला इस गुण से परिपूर्ण होती है तथा उद्योग में लगे हुए कर्मचारियों एवं श्रमिकों को अधिक-से-अधिक लगनपूर्वक कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करती है।
2. हम की भावना – सफल उद्यमी में ‘हम’ की भावना अत्यधिक प्रबल होती है। वह स्वयं के स्थान पर संगठन को प्राथमिकता देता है। प्रत्येक सफल महिला उद्यमी में भी यह भावना उसके श्रेष्ठ गुण के रूप में दिखाई देती है।

निश्चित उत्तीय प्रश्न ( 1 अंक)

प्रश्न 1
महिला उद्यमिता को क्या तात्पर्य है ? [2008, 09, 11]
उत्तर:
महिला उद्यमिता का तात्पर्य महिलाओं द्वारा किये जाने वाले किसी नये उद्योग के संचालन तथा व्यवस्था से है।

प्रश्न 2
देश की अर्थव्यवस्था में स्त्रियों की सहभागिता को बढ़ावा देने में कौन-सी संस्था अग्रणी रही है ?
उत्तर:
देश की अर्थव्यवस्था में स्त्रियों की सहभागिता को बढ़ावा देने में केन्द्रीय समाजकल्याण बोर्ड अग्रणी रहा है।

प्रश्न 3
महिला और बाल-विकास विभाग स्त्रियों को प्रशिक्षण देने की कौन-सी कार्य योजनाएँ तैयार करता है ?
उत्तर:
महिला और बाल-विकास विभाग स्त्रियों को खेती, डेयरी, पशुपालन, मछली-पालन, खादी और ग्रामोद्योग, हथकरघा, रेशम उद्योग के लिए प्रशिक्षण देने की कार्य-योजनाएँ तैयार करता है।

प्रश्न 4
महिला उद्यमियों द्वारा चलाये जाने वाले प्रमुख उद्योग कौन-से हैं ?
उत्तर:
महिला उद्यमियों द्वारा चलाये जाने वाले प्रमुख उद्योग इस प्रकार हैं – इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, रबड़ की वस्तुएँ, सिले हुए वस्त्र, माचिस, मोमबत्ती, रासायनिक पदार्थ, घरेलू उपकरण आदि।

प्रश्न 5
राष्ट्रीय संस्थान की स्थापना क्यों की गयी ?
उत्तर:
राष्ट्रीय संस्थान की स्थापना स्त्रियों को उद्यमिता से सम्बन्धित प्रशिक्षण देने के उद्देश्य से की गयी।

प्रश्न 6
‘आँगन महिला बाजार’ क्या है ?
उत्तर:
महिलाओं को उद्यम क्षेत्र में बढ़ावा देने के लिए 1986 ई० में देश में सर्वप्रथम आँगन महिला बाजार की स्थापना की गयी। महिलाएँ इस उद्यम के द्वारा निर्मित अचार, चटनी, घरेलू उपयोग की वस्तुएँ, पौधों की नर्सरी, फोटोग्राफी के सामानों का विक्रय करती हैं।

प्रश्न 7
भारत में ‘अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष कब मनाया गया था ?
या
महिला सशक्तिकरण किस सन में प्रारम्भ हुआ? [2015]
उत्तर:
भारत में अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष 1973 ई० में मनाया गया था।

प्रश्न 8
जवाहर रोजगार योजना में महिलाओं को क्या विशेष लाभ दिया गया है ?
उत्तर:
जवाहर रोजगार योजना के अन्तर्गत लाभ प्राप्तकर्ताओं में 30 प्रतिशत महिलाओं को आरक्षण किया गया है।

बहुविकल्पीय प्रश्न ( 1 अंक)

प्रश्न 1
राष्ट्रीय संस्थान की स्थापना कब की गयी ?
(क) 1983 ई० में
(ख) 1984 ई० में
(ग) 1985 ई० में
(घ) 1986 ई० में

प्रश्न 2
उद्यमिता एक नव प्रवर्तनकारी कार्य है। यह स्वामित्व की अपेक्षा एक नेतृत्व कार्य हो।” यह परिभाषा किसने दी है? [2011]
(क) बी० आर० गायकवाड़
(ख) जोसेफ ए० शुम्पीटर
(ग) ए० एच० कोल
(घ) हिगिन्स

उत्तर:
1. (क) 1983 ई० में,
2. (ख) जोसेफ ए० शुम्पीटर।

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UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 1 Exchange: Exchange System

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Economics
Chapter Chapter 1
Chapter Name Exchange: Exchange System (विनिमय : विनिमय प्रणालियाँ)
Number of Questions Solved 29
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 1 Exchange: Exchange System (विनिमय : विनिमय प्रणालियाँ)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
अर्थशास्त्र में विनिमय से आप क्या समझते हैं ? विनिमय से होने वाले लाभों एवं हानियों का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
प्रो० मार्शल के अनुसार, “दो पक्षों के बीच होने वाले धन के ऐच्छिक, वैधानिक तथा पारस्परिक हस्तान्तरण को ही विनिमय कहते हैं।”
प्रो० जेवेन्स के अनुसार, “कम आवश्यक वस्तुओं से अधिक आवश्यक वस्तुओं की अदल-बदल को ही विनिमय कहते हैं।”
ऐ० ई० वाघ के अनुसार, “हम एक-दूसरे के पक्ष में स्वामित्व के दो ऐच्छिक हस्तान्तरणों को विनिमय के रूप में परिभाषित कर सकते हैं।’
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि वस्तुओं के आदान-प्रदान को विनिमय कहते हैं, परन्तु वस्तुओं के सभी आदान-प्रदान को विनिमय नहीं कहा जा सकता। अर्थशास्त्र में केवल वही आदान-प्रदान विनिमय कहलाता है जो पारस्परिक, ऐच्छिक एवं वैधानिक हो।

विनिमय से लाभ
विनिमय क्रिया से प्राप्त लाभ निम्नवत् हैं

1. आवश्यकता की वस्तुओं की प्राप्ति – आवश्यकताओं में वृद्धि के कारण ही विनिमय का जन्म हुआ। आज व्यक्ति अपनी सभी आवश्यकताओं की वस्तुएँ स्वयं उत्पादित नहीं कर सकता। आवश्यकताओं की वृद्धि के कारण पारस्परिक निर्भरता बढ़ गयी है। विनिमय के माध्यम से व्यक्ति अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ प्राप्त कर सकता है। विनिमय के कारण ही आयात-निर्यात होता है।

2. प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण दोहन –
ज्ञान व सभ्यता के विकास के साथ-साथ आवश्यकताओं में भी तीव्र गति से वृद्धि हुई है तथा वस्तुओं की माँग बढ़ी है। इसीलिए वस्तुओं के . अधिक उत्पादन की आवश्यकता हुई। अधिक उत्पादन संसाधनों के कुशलतम दोहन पर ही निर्भर करता है। विनिमय के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम उपयोग किया जाता है।

3. बड़े पैमाने पर उत्पादन –
वर्तमान प्रतियोगिता व फैशन के युग में वस्तुओं का उत्पादन केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही नहीं, वरन् देश-विदेश के व्यक्तियों की माँग को भी ध्यान में रखकर बड़े पैमाने पर मशीनों द्वारा किया जाता है, जिससे वस्तुओं की बढ़ती हुई माँग को पूरा किया जा सके।

4. बाजार का विस्तार –
विनिमय के कारण ही वस्तुओं का आयात-निर्यात सम्भव हो सका है। विनिमय के क्षेत्र में वृद्धि के साथ-साथ वस्तुओं का बाजार भी विस्तृत होता जाता है। बड़े पैमाने पर वस्तुओं का उत्पादन होने से बढ़े हुए उत्पादन को निर्यात करके बाजार का क्षेत्र विस्तृत किया जा सकता है।

5. जीवन –
स्तर में सुधार विनिमय द्वारा आवश्यकता की वस्तुएँ सरलतापूर्वक कम कीमत पर उपलब्ध हो जाने से लोगों के जीवन-स्तर में सुधार होता है। अपने देश में अप्राप्त वस्तुएँ विदेशों से मँगाई जा सकती हैं। अत: विनिमय के माध्यम से लोगों का जीवन-स्तर ऊँचा होता है।

6. कार्य-कुशलता में वृद्धि –
विनिमय द्वारा लोगों की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है। इसका मुख्य कारण आवश्यक वस्तुओं का सरलता से मिलना तथा उन वस्तुओं का उत्पादन करना है, जिनमें कोई व्यक्ति या राष्ट्र निपुणता प्राप्त कर लेता है। एक कार्य को निरन्तर करने से कार्य-निपुणता में वृद्धि होती है।

7. ज्ञान में वृद्धि –
विनिमय द्वारा मनुष्यों का परस्पर सम्पर्क बढ़ता है। फलस्वरूप व्यक्ति को विभिन्न प्रकार के धर्म, रहन-सहन, भाषा, रीति-रिवाजों आदि का ज्ञान प्राप्त होता है। इस प्रकार विनिमय द्वारा ज्ञान व सभ्यता में वृद्धि होती है।

8. राष्ट्रों में पारस्परिक मैत्री व सद्भावना –
विनिमय के कारण ही वस्तुओं का आयात-निर्यात सम्भव हो सका है; फलस्वरूप विश्व के विभिन्न राष्ट्र परस्पर निकट आये हैं। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर वस्तुओं की प्राप्ति हेतु निर्भर हो गया है। परिणामस्वरूप विभिन्न राष्ट्रों में मित्रता व सद्भावना बलवती हुई है।

9. विपत्तिकाल में सहायता – 
विनिमय द्वारा प्राकृतिक प्रकोप; जैसे – अकाल, बाढ़, भूकम्प, सूखा आदि के समय एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र की सहायता करता है। इस प्रकार विनिमय के कारण परस्पर पास आये राष्ट्र विपत्तिकाल में सहायक सिद्ध होते हैं।

10. विनिमय से दोनों पक्षों को लाभ –
विनिमय द्वारा दोनों पक्षों को कम आवश्यक वस्तुओं के स्थान पर अधिक आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति हो जाती है। इस प्रकार विनिमय से दो व्यक्तियों या दो राष्ट्रों को लाभ मिलता है।

विनिमय से हानियाँ

1. आत्मनिर्भरता की समाप्ति – विनिमय के कारण व्यक्ति एवं राष्ट्र परस्पर निर्भर हो गये हैं, जिसके कारण आत्मनिर्भरता समाप्त हो गयी है। युद्ध या अन्य संकट के समय एक राष्ट्र अन्य राष्ट्र को वस्तुएँ देना बन्द कर देता है। इस स्थिति में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

2. राजनीतिक पराधीनता –
विनिमय के कारण विस्तारवादी नीति का प्रसार होता है। औद्योगिक दृष्टि से सबल राष्ट्र, निर्बल राष्ट्रों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेते हैं। उदाहरणस्वरूप-इंग्लैण्ड भारत में विनिमय (व्यापार) करने के लिए आया था, लेकिन उसने धीरे-धीरे भारत पर अपना अधिकार कर लिया। इस प्रकार विनिमय से राजनीतिक दासता की भय बना रहता है।

3. प्राकृतिक साधनों का अनुचित उपयोग –
विनिमय के कारण विनिमय क्रिया बलवती होती जाती है। आयात-निर्यात अधिक मात्रा में होने लगते हैं। शक्तिशाली राष्ट्र निर्बल राष्ट्रों के प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग अपने हित में करना प्रारम्भ कर देते हैं, जिससे उनका विकास अवरुद्ध होता जाता है।

4. अनुचित प्रतियोगिता –
विनिमय के कारण प्रत्येक राष्ट्र अपनी अतिरिक्त वस्तुओं को विश्व के बाजार में बेचना चाहता है। प्रत्येक राष्ट्र अपने निर्यात में वृद्धि कर अधिक लाभ प्राप्त करना चाहता है। इस प्रकार एक अनुचित व हानिकारक प्रतियोगिता प्रारम्भ हो जाती है और निर्बल राष्ट्रों को अधिक आर्थिक हानि उठानी पड़ती है।

5. युद्ध की सम्भावना –
शक्तिशाली राष्ट्र अपनी आर्थिक उन्नति हेतु बाजार की प्राप्ति तथा कच्चे माल की आपूर्ति हेतु संघर्ष करता है, जिसके कारण युद्ध की सम्भावना बनी रहती है।

6. असन्तुलित आर्थिक विकास –
विनिमय के कारण प्रत्येक देश उन वस्तुओं का अधिक उत्पादन करता है, जिनकी विदेशों में अधिक माँग होती है। इस प्रकार देश का आर्थिक विकास असन्तुलित रूप में होने लगता है। यह आर्थिक संकट में अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न कर देता है जिससे क्षेत्रीय विषमताएँ भी बढ़ने लगती हैं। पर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि विनिमय में दोषों की अपेक्षा गुण अधिक हैं। विनिमय प्रक्रिया में जो दोष दृष्टिगत होते हैं वे मात्र गलत आर्थिक नीतियों के कारण हैं। यदि आर्थिक नीति विश्व-हित को ध्यान में रखकर निर्मित की जाए तो उक्त दोष दूर किये जा सकते हैं। विनिमय एक आवश्यक प्रक्रिया भी है, जिसके अभाव में विश्व की सम्पूर्ण प्रगति की कल्पना नहीं की जा सकती।

प्रश्न 2
वस्तु विनिमय प्रणाली क्या है ? इसके गुण व दोषों का वर्णन कीजिए। [2008, 11, 12]
या
वस्तु विनिमय प्रणाली क्या है ? इसकी कठिनाइयों का उल्लेख कीजिए। [2010]
या
विनिमय पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। [2012]
या
वस्तु विनिमय प्रणाली क्या है? वस्तु विनिमय प्रणाली के लाभों (गुणों) का वर्णन कीजिए। [2014]
या
संक्षेप में विनिमय में लाभ एवं हानियों का वर्णन कीजिए। [2014]
उत्तर:
आवश्यकता आविष्कारों की जननी है। अतः मनुष्य की आवश्यकताओं में वृद्धि के कारण ही ‘विनिमय’ का आविष्कार (जन्म) हुआ। यह विनिमय अब तक दो रूपों में प्रचलित है

  1.  प्रत्यक्ष विनिमय अथवा वस्तु विनिमय तथा
  2. परोक्ष विनिमय अथवा क्रय-विक्रय प्रणाली।

वस्तु विनिमय प्रणाली वस्तु विनिमय प्रणाली को अदला-बदली की प्रणाली भी कहते हैं जो कि विनिमय की प्राचीन पद्धति है। इस प्रणाली में वस्तुओं तथा सेवाओं को प्रत्यक्ष रूप से आदान-प्रदान किया जाता है अर्थात् जब कोई व्यक्ति अपनी किसी वस्तु या सेवा के बदले किसी अन्य व्यक्ति से अपनी आवश्यकता की कोई वस्तु या सेवा प्राप्त करता है तो इस क्रिया को अदल-बदल या वस्तु विनिमय या प्रत्यक्ष विनिमय कहते हैं। इस प्रणाली के अन्तर्गत मुद्रा (द्रव्य) का प्रयोग नहीं होता बल्कि वस्तुओं तथा सेवाओं का आदान-प्रदान होता है। भारत के ग्रामों में आज भी अनाज के बदले सब्जी ली जाती है या ग्रामों में नाई, बढ़ई, धोबी आदि को उनकी सेवाओं के बदले अनाज दिया जाता है।

वस्तु विनिमय की परिभाषा
प्रो० थॉमस के अनुसार-“एक वस्तु से दूसरी वस्तु के प्रत्यक्ष विनिमय को ही वस्तु विनिमय कहते हैं।”
प्रो० जेवेन्स के अनुसार, “अपेक्षाकृत कम आवश्यक वस्तु से अधिक आवश्यक वस्तुओं का आदान-प्रदान ही वस्तु विनिमय है।”

वस्तु विनिमय प्रणाली के गुण/लाभ
वस्तु विनिमय प्रणाली में निम्नलिखित गुण (लाभ) विद्यमान हैं

1. सरलता – वस्तु विनिमय प्रणाली एक सरल प्रक्रिया है, क्योंकि इसमें वस्तु के बदले वस्तु का लेन-देन होता है। एक व्यक्ति अपनी अतिरिक्त वस्तु दूसरे जरूरतमन्द व्यक्ति को देकर उसके बदले अपनी आवश्यकता की वस्तु उस व्यक्ति से प्राप्त कर लेता है।

2. पारस्परिक सहयोग –
वस्तु विनिमय प्रणाली से आपसी सहयोग में वृद्धि होती है, क्योंकि मनुष्य अपनी अतिरिक्त वस्तुओं को अपने समीप के व्यक्ति को देकर उससे अपनी आवश्यकता की वस्तु प्राप्त कर लेता है, जिससे उनमें पारस्परिक सहयोग की भावना बलवती होती है।

3. धन का विकेन्द्रीकरण –
वस्तु विनिमय प्रणाली में मुद्रा पद्धति के अभाव के कारण धन का केन्द्रीकरण कुछ ही हाथों में न होकर समाज के सीमित क्षेत्र के लोगों में बँट जाता है। वस्तुओं के शीघ्र नष्ट होने के भय के कारण वे वस्तुओं का संग्रहण अधिक मात्रा में नहीं कर पाते हैं। अत: वस्तु विनिमय प्रणाली में सभी पारस्परिक सहयोग की भावना से मानव-हित को सर्वोपरि मानकर कार्य करते हैं।

4. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए उपयुक्त –
विभिन्न देशों की मुद्राओं में भिन्नता के कारण अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के भुगतान की समस्या बनी रहती है, जबकि
वस्तुओं के माध्यम से भुगतान सरलता से हो जाता है। वस्तु विनिमय द्वारा इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकती है।

5. मौद्रिक पद्धति के दोषों से मुक्ति –
वस्तु विनिमय प्रणाली मुद्रा-प्रसार व मुद्रा-संकुचन के दोषों से मुक्त है, क्योंकि इसमें वस्तुएँ मुद्रा से नहीं बल्कि वस्तुओं के पारस्परिक आदान-प्रदान से ही प्राप्त की जाती हैं। इससे वस्तुओं के सस्ते या महँगे होने का भय नहीं रहता। परिणामस्वरूप मुद्रा की मात्रा की वस्तुओं के मूल्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

6. दोनों पक्षों को उपयोगिता का लाभ –
वस्तु-विनिमय की क्रिया उन्हीं व्यक्तियों द्वारा की जाती है, जिनके पास वस्तुओं का आधिक्य होता है, जबकि सम्बन्धित वस्तु की उपयोगिता उस व्यक्ति के लिए अपेक्षाकृत कम होती है। यह सर्वमान्य है कि व्यक्ति कम उपयोगी वस्तु को देकर अधिक उपयोगी वस्तुएँ प्राप्त करना चाहता है। इस प्रकार वस्तु विनिमय की क्रिया में दोनों पक्षों को ही उपयोगिता का लाभ प्राप्त होता है।

वस्तु विनिमय की असुविधाएँ या कठिनाइयाँ या दोष
वस्तु विनिमय प्रणाली की प्रमुख कठिनाइयाँ निम्नवत् हैं

1. दोहरे संयोग का अभाव – वस्तु विनिमय प्रणाली की सबसे बड़ी कठिनाई दोहरे संयोग का अभाव है। इस प्रणाली के अन्तर्गत मनुष्य को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु ऐसे व्यक्ति की खोज में भटकना पड़ता है जिसके पास उसकी आवश्यकता की वस्तु हो और वह व्यक्ति अपनी वस्तु देने के लिए तत्पर हो तथा वह बदले में स्वयं की उस मनुष्य की वस्तु लेने के लिए तत्पर हो। उदाहरण के लिए-योगेश के पास गेहूँ हैं और वह गेहूं के बदले चावल प्राप्त करना चाहता है, तो योगेश को ऐसा व्यक्ति खोजना पड़ेगा जिसके पास चावल हों और साथ-ही-साथ वह बदले में गेहूं लेने के लिए तैयार हो। इस प्रकार दो पक्षों का ऐसा पारस्परिक संयोग, जो एक-दूसरे की आवश्यकता की वस्तुएँ प्रदान कर सके, मिलना कठिन हो जाता है।

2. मूल्य के सर्वमान्य माप का अभाव – इस प्रणाली में मूल्य का कोई ऐसा सर्वमान्य माप नहीं होता जिसके द्वारा प्रत्येक वस्तु के मूल्य को विभिन्न वस्तुओं के सापेक्ष निश्चित किया जा सके। इस स्थिति में दो वस्तुओं के बीच विनिमय दर निर्धारित करना कठिन होता है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी वस्तु को अधिक मूल्य ऑकते हैं तथा वस्तु विनिमय कार्य में कठिनाई होती है।

3. वस्तु के विभाजन की कठिनाई – कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं जिनका विभाजन नहीं किया जा सकता; जैसे – गाय, बैल, भेड़, बकरी, कुर्सी, मेज आदि। वस्तु विनिमय प्रणाली में वस्तुओं की अविभाज्यता भी बहुधा कठिनाई का कारण बन जाती है। उदाहरण के लिए-यदि योगेश के पास एक गाय है और वह इसके बदले में खाद्यान्न, कपड़े तथा रेडियो चाहता है, तो इस स्थिति में योगेश को अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ प्राप्त करना कठिन हो जाएगा। वह ऐसे व्यक्ति को शायद ही खोज पाएगा जो उससे गाय लेकर उसकी सभी आवश्यक वस्तुएँ दे सके। साथ ही योगेश के लिए गाय का विभाजन करना भी असम्भव है, क्योंकि विभाजन करने से गाय का मूल्य या तो बहुत ही कम हो जाएगा या कुछ भी नहीं रह जाएगा।

4. मूल्य संचय की असुविधा – वस्तु विनिमय प्रणाली में वस्तुओं को अधिक समय तक संचित करके नहीं रखा जा सकता, क्योंकि वस्तुएँ नाशवान् होती हैं। वस्तुओं के मूल्य भी स्थिर नहीं रहते हैं; अतः वस्तुओं को धन के रूप में संचित करना कठिन होता है।

5. मूल्य हस्तान्तरण की असुविधा – वस्तु विनिमय प्रणाली के अन्तर्गत वस्तु के मूल्य को हस्तान्तरित करने में कठिनाई उत्पन्न होती है। उदाहरण के लिए-योगेश के पास मेरठ में एक मकान है। यदि वह अब अपने गाँव में रहना चाहता है तो वस्तु विनिमय प्रणाली की स्थिति में वह अपने मकान को न तो बेचकर धन प्राप्त कर सकता है और न ही उस मकान को अपने साथ जहाँ चाहे ले जा सकता है। इस प्रकार उसके सामने बहुत बड़ी असुविधा उत्पन्न हो जाती है।

6. स्थगित भुगतानों में कठिनाई – वस्तु विनिमय प्रणाली में वस्तु के मूल्य स्थिर नहीं होते हैं। तथा वस्तुएँ कुछ समय के पश्चात् नष्ट होनी प्रारम्भ हो जाती हैं। इस कारण उधार लेन-देन में असुविधा रहती है। यदि वस्तुओं के मूल्य का भुगतान तुरन्त न करके कुछ समय के बाद किया जाता है तब सर्वमान्य मूल्य-मापक के अभाव के कारण बहुत बड़ी समस्या उत्पन्न हो जाती है।

प्रश्न 3
द्रव्य के प्रयोग ने वस्तु विनिमय की कठिनाइयों को किस प्रकार दूर कर दिया है ? समझाइए।
उत्तर:
द्रव्य या मुद्रा के प्रादुर्भाव से वस्तु विनिमय की कठिनाइयों का निवारण
वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयों के कारण एक ऐसी वस्तु की आवश्यकता प्रतीत हुई जिसके द्वारा वस्तु विनिमय की कठिनाइयाँ दूर हो सकें तथा विनिमय प्रक्रिया में सुविधा व सरलता हो। इसी आवश्यकता ने मुद्रा (द्रव्य) को जन्म दिया। द्रव्य के माध्यम से अप्रत्यक्ष विनिमय या क्रय-विक्रय प्रणाली प्रारम्भ हुई जिसने वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयों का निवारण किया। हैन्सन का यह कथन सत्य है कि, “मुद्रा का जन्म वस्तु विनिमय की कठिनाइयों से सम्बन्धित है।”
द्रव्य के प्रयोग से वस्तु विनिमय की कठिनाइयों का निवारण हो गया है, जो निम्नवत् है

1. आवश्यकताओं के दोहरे संयोग के अभाव का निवारण – द्रव्य के प्रादुर्भाव से आवश्यकताओं के दोहरे संयोग का अभाव समाप्त हो गया है। अब क्रय-विक्रय प्रणाली के अन्तर्गत ऐसे व्यक्ति की खोज नहीं करनी पड़ती जिसके पास आपकी आवश्यकता की वस्तु हो तथा वह बदले में उस वस्तु को स्वीकार कर सके जो आपके पास हो। द्रव्य के प्रयोग से विनिमय प्रक्रिया दो उपविभागों में बँट जाती है—क्रय तथा विक्रय। अपनी अतिरिक्त वस्तु को बाजार में बेचकर मुद्रा प्राप्त की जा सकती है। और द्रव्य के द्वारा अपनी आवश्यकता की वस्तु सरलतापूर्वक बाजार से क्रय की जा सकती है।

2. मूल्यों के सर्वमान्य माप की समस्या का अन्त – द्रव्य के चलन से प्रत्येक वस्तु को मूल्य द्रव्य में व्यक्त किया जाता है। अतः विनिमय करते समय वस्तु विनिमय की भाँति यह चिन्ता नहीं रहती कि क्रय की जाने वाली वस्तु के लिए हमें कितना मूल्य देना पड़ेगा। द्रव्य के प्रचलन से अब सभी वस्तुओं व सेवाओं का मूल्य द्रव्य के द्वारा निर्धारित किया जा सकता है। द्रव्य में सर्वमान्यता का गुण पाये जाने के कारण अब सभी वस्तुओं एवं सेवाओं का मूल्यांकन द्रव्य के माध्यम से सम्भव हो जाता है; अतः द्रव्य ने वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य मापन की समस्या का अन्त कर दिया है।

3. वस्तु विभाजन की कठिनाई का निवारण – वस्तु विनिमय प्रणाली में अविभाज्य वस्तुओं के विनिमय में कठिनाई उत्पन्न होती थी। द्रव्य ने इस समस्या को दूर कर दिया है। अब अविभाज्य वस्तु को विक्रय करके द्रव्य प्राप्त किया जा सकता है तथा इस द्रव्य के माध्यम से आवश्यकता की विभिन्न वस्तुएँ क्रय की जा सकती हैं।

4. मूल्य के संग्रह का कार्य सरल – द्रव्य के प्रादुर्भाव से मूल्य संचय का कार्य सरल व सुविधाजनक हो गया है। अब आवश्यकता से अधिक वस्तुओं को बेचकर द्रव्य प्राप्त कर लिया जाता है तथा उस द्रव्ये को बैंक, डाकघर आदि में जमा करके लम्बे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। मुद्रा का मूल्य स्थिर रहता है तथा यह शीघ्र नष्ट भी नहीं होता है। अतः मूल्य संग्रह की कोई समस्या उत्पन्न नहीं होती है।

5. मूल्य के हस्तान्तरण में सुविधा – वस्तु विनिमय प्रणाली में एक व्यक्ति अपनी सम्पत्ति को या अपने पास संगृहीत मूल्य को एक स्थान से दूसरे स्थान पर सरलता से नहीं ले जा सकता था। वर्तमान समय में द्रव्य ने इस असुविधा को दूर कर दिया है। अब व्यक्ति अपनी चल वे अचल सम्पत्ति का विक्रय करके प्राप्त द्रव्य को जहाँ चाहे ले जा सकता हैं।

6. भावी भुगतान की समस्या का समाधान – द्रव्य के चलन से भावी भुगतान की समस्या का निराकरण हो गया है। मुद्रा के माध्यम से भुगतानों को भावी समय के लिए स्थगित करना या उधार का लेन-देन करना सरल हो गया है।
उपर्युक्तं विवेचन से स्पष्ट है कि द्रव्य के प्रादुर्भाव से वस्तु विनिमय की समस्त कठिनाइयों का निवारण हो गया है। हैन्सन का यह कथन है कि, “मुद्रा का जन्म वस्तु विनिमय की कठिनाइयों से सम्बन्धित है’, सत्य है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
प्रत्यक्ष एवं परोक्ष विनिमय के अन्तर को स्पष्ट कीजिए।
या
वस्तु विनिमय तथा क्रय-विक्रय में अन्तर बताइए।
उत्तर:
विनिमय के दो रूप होते हैं (1) प्रत्यक्ष विनिमय या वस्तु विनिमय या अल-बदल प्रणाली। (2) अप्रत्यक्ष विनिमय या क्रय-विक्रय प्रणाली।।

1. प्रत्यक्ष विनिमय या वस्तु विनिमय प्रणाली – “जब दो व्यक्ति परस्पर अपनी वस्तुओं तथा सेवाओं का प्रत्यक्ष रूप से आदान-प्रदान करते हैं, तब इस प्रकार की क्रिया को हम अर्थशास्त्र में वस्तु विनिमय (Barter) कहते हैं।” वस्तु विनिमय = वस्तु → वस्तु। उदाहरण के लिए–भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी अनाज देकर सब्जी प्राप्त की जाती है तथा नाई, धोबी, बढ़ई आदि को उनकी सेवाओं के बदले में अनाज दिया जाता है।

2. अप्रत्यक्ष विनिमय या क्रय-विक्रय प्रणाली –
जब विनिमय का कार्य मुद्रा (द्रव्य) के माध्यम द्वारा किया जाता है तो इस प्रणाली को क्रय-विक्रय अथवा अप्रत्यक्ष विनिमय कहते हैं। दूसरे शब्दों में, जब कोई व्यक्ति मुद्रा देकर किसी वस्तु या सेवा को क्रय करता है या किसी वस्तु या सेवा को देकर मुद्रा प्राप्त की जाती है, तब इस क्रिया को अप्रत्यक्ष विनिमय या क्रय-विक्रय प्रणाली कहते हैं।
अप्रत्यक्ष विनिमय = वस्तु → मुद्रा → वस्तु।
विनिमय के इन दोनों प्रकार के अन्तर को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

क्र०सं० प्रत्यक्ष विनिमय या वस्तु विनिमय प्रणाली अप्रत्यक्ष विनिमय या क्रय-विक्रय प्रणाली
1. जब कोई व्यक्ति अपनी किसी वस्तु या सेवा के बदले किसी अन्य व्यक्ति से अपनी आवश्यकता की कोई वस्तु या सेवा प्राप्त करता है तो उसे प्रत्यक्ष विनिमय या वस्तु विनिमय कहते हैं। जब वस्तुओं एवं सेवाओं का मुद्रा (द्रव्य) के माध्यम से विनिमय होता है तब इसे अप्रत्यक्ष विनिमय कहते हैं।
2. प्रत्यक्ष विनिमय, विनिमय की एक पूर्ण प्रक्रिया है। इस प्रणाली में एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को वस्तुएँ या सेवाएँ देता है तथा बदले में उसी समय वस्तुएँ या सेवाएँ प्राप्त करता है। अप्रत्यक्ष विनिमय में विनिमय प्रक्रिया दो उपविभागों-क्रय तथा विक्रय–में विभक्त की जा सकती है। विक्रय तथा क्रय के पश्चात् ही विनिमय प्रक्रिया पूर्ण होती है।
3. प्रत्यक्ष विनिमय में द्रव्य का प्रयोग नहीं होता है। अप्रत्यक्ष विनिमय में द्रव्य का प्रयोग किया जाता है।
4. प्रत्यक्ष विनिमय में आवश्यकता से अतिरिक्त वस्तुओं एवं सेवाओं के बदले आवश्यकता की वस्तुएँ तथा सेवाएँ प्राप्त की जाती हैं। अप्रत्यक्ष विनिमय में वस्तु या सेवा के बदले पहले द्रव्य प्राप्त किया जाता है तथा फिर द्रव्य के बदले आवश्यकता की वस्तुएँ या सेवाएँ प्राप्त की जाती हैं।
5. वस्तु विनिमय प्रणाली को उपयोग केवल सीमित क्षेत्र में ही सम्भव होता है। अप्रत्यक्ष विनिमय का उपयोग विस्तृत क्षेत्र में किया जा सकता है।
6. वस्तु विनिमय का प्रचलन प्रायः उस अवस्था में होता है, जब कि मनुष्य की आवश्यकताएँ बहुत कम, सरल तथा सीमित होती हैं। मनुष्य की आवश्यकताओं की वृद्धि के कारण ही अप्रत्यक्ष विनिमय के द्वारा अधिकाधिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है।
7. वस्तु विनिमय प्रणाली में वस्तु की अदल-बदल एक व्यक्ति के साथ अर्थात् जिसे आप अपनी वस्तु वस्तु देते हैं, बदले में आप उसकी वस्तु को प्राप्त करते हैं, की जाती है। अप्रत्यक्ष विनिमय में वस्तुओं का क्रय-विक्रय एक ही व्यक्ति के साथ नहीं करना पड़ता है। वस्तु का क्रय एक व्यक्ति से तथा विक्रय अन्य व्यक्ति को किया जाता है।
8. वस्तु विनिमय को प्रचलन केवल ऐसे समाज में होता है जो आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा होता है अथवा जिसमें द्रव्य का चलन नहीं होता है। अप्रत्यक्ष विनिमय सभ्य व विकसित समाज में प्रचलित होता है।

प्रश्न 2
आधुनिक युग में वस्तु विनिमय प्रणाली क्यों सम्भव नहीं है? कारण बताइए। [2007]
उत्तर:
आधुनिक युग में वस्तु विनिमय का स्थान प्राचीनकाल में मनुष्य की आवश्यकताएँ कम, सीमित तथा सरल थीं। द्रव्य का प्रचलन नहीं था। इस कारण वस्तु विनिमय प्रणाली प्रचलित थी। ज्ञान व सभ्यता के विकास के साथ-साथ मनुष्य की आवश्यकताओं में निरन्तर वृद्धि होने के कारण इस प्रणाली में असुविधाएँ उत्पन्न होने लगीं तथा वस्तु विनिमय के लिए जो आवश्यक परिस्थितियाँ या दशाएँ होनी चाहिए थीं, प्रायः उनका लोप भी होने लगा। वर्तमान में वस्तु विनिमय प्रणाली सम्भव नहीं है। अब यह समाप्त होती जा रही है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

1. आवश्यकताओं में अत्यधिक वृद्धि – आज समाज की आवश्यकताएँ बहुत अधिक बढ़ गयी हैं। उपभोक्ता-स्तर बढ़ने के कारण अधिक वस्तुएँ और उनके व्यापक विनिमय की प्रणाली प्रारम्भ हो गयी है। ऐसी अवस्था में वस्तु विनिमय से समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं की जा सकती।

2. उत्पादन में निरन्तर वृद्धि –
आज प्रायः प्रत्येक देश में बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा रहा है, जिसके कारण उत्पादन बढ़ रहा है। इस अधिक उत्पादन का विनिमय, वस्तु-विनिमय प्रणाली के माध्यम से होना असम्भव है।

3. तीव्र गति से आर्थिक विकास –
आधुनिक युग में प्रत्येक देश आर्थिक नियोजन के माध्यम से अपने आर्थिक विकास की ओर अग्रसर है। इस स्थिति में वस्तु-विनिमय प्रणाली सर्वथा अनुचित है। वितरण की समस्या, विशाल उत्पादन, राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में प्रतियोगिता के कारण वस्तु-विनिमय प्रणाली असम्भव है।

4. मुद्रा या द्रव्य का प्रचलन –
आज प्रायः संसार के सभी देशों में मुद्रा का प्रचलन है। इस स्थिति में वस्तु विनिमय प्रणाली की बातें करना अज्ञप्नता है।

5. व्यापार का विस्तार –
शनैः-शनैः देशी तथा विदेशी व्यापार में वृद्धि होती जा रही है। ऐसी स्थिति में वस्तु विनिमय प्रणाली का उपयोग नहीं किया जा सकता।

6. यातायात के साधनों का विस्तार –
परिवहन के साधनों में विकास के कारण सम्पूर्ण विश्व एक इकाई बन गया है। उत्पादन तथा व्यापार में वृद्धि होती जा रही है। इस कारण वस्तु विनिमय प्रणाली सफल नहीं है।

7. जीवन-स्तर में वृद्धि –
ज्ञान व सभ्यता के विकास के साथ-साथ मानवीय आवश्यकताएँ तीव्र गति से बढ़ती जा रही हैं। मनुष्यों में उपभोग प्रवृत्ति बढ़ रही है। इस कारण जीवन-स्तर में वृद्धि हो । रही है। शिक्षा का स्तर ऊँचा उठ रहा है। इन परिस्थितियों में आज वस्तु विनिमय प्रणाली की बातें अव्यावहारिक हैं।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अब वस्तु विनिमय प्रणाली समाप्त हो गयी है, परन्तु कुछ पिछड़े हुए तथा अल्प-विकसित क्षेत्रों में इस प्रणाली का प्रचलन आज भी है। भारत के कुछ भागों में अब भी नाई, धोबी, बढ़ई, खेतिहर मजदूर आदि को उनकी सेवाओं के बदले में अनाज दिया जाता है। तथा कुछ वस्तुएँ जैसे सब्जी आदि अनाज के बदले में ही ली जाती हैं। इस कारण आज भी वस्तु विनिमय प्रणाली पूर्णतः समाप्त नहीं हुई है।

प्रश्न 3
भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में वस्तु विनिमय प्रणाली आज भी प्रचलित है, क्यों ? समझाइए।
उत्तर:
ग्रामीण क्षेत्रों में वस्तु विनिमय प्रणाली के प्रचलन के कारण

1. ग्रामीण समाज का पिछड़ापन – भारतीय ग्रामीण समाज आज भी पिछड़ी तथा दीन-हीन अवस्था में है। अधिकांश लोग अशिक्षित हैं। वे द्रव्य द्वारा हिसाब-किताब नहीं लगा पाते हैं। वस्तु विनिमय प्रणाली की सरलता आज भी उन्हें अपनी ओर आकर्षित कर रही है।

2. सीम्मित आवश्यकताएँ – ग्रामीण क्षेत्र आर्थिक दृष्टि से पिछड़ी हुई अवस्था में हैं। ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण लोगों की आवश्यकताएँ कम हैं, जिसके कारण वस्तु-विनिमय प्रथा आज भी प्रचलित है।

3. यातायात के साधनों का अभाव – ग्रामीण क्षेत्रों में यातायात के साधनों की अपर्याप्तता के कारण वे अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ नगरीय बाजारों से प्राप्त करने में असमर्थ हैं। वे अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ अपने गाँव में ही एक-दूसरे से प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। इस कारण वस्तु विनिमय प्रणाली अब भी विद्यमान है।

4. कृषि पर निर्भरता – ग्रामीण समाज कृषि-प्रधान है। किसान को प्रतिमाह या प्रतिदिन आय प्राप्त नहीं होती है। केवल फसल के समय ही किसान को फसल के रूप में अनाज प्राप्त होता है। अत: वह अपने सभी आश्रितों (जैसे-नाई, धोबी, बढ़ई आदि) को फसल के रूप में ही पूरे वर्ष का पारिश्रमिक दे देता है। इस प्रकार किसान द्रव्य के अभाव में अनाज द्वारा ही अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ प्राप्त करता है। इस कारण आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में वस्तु विनिमय प्रणाली विद्यमान है।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में वस्तु विनिमय का प्रयोग आज भी सीमित मात्रा में विद्यमान है; परन्तु यह पूर्ण विनिमय न होकर अल्प मात्रा में ही वस्तु विनिमय है, क्योंकि इस प्रणाली में वस्तुओं के मूल्यांकन का आधार वस्तुतः द्रव्य ही है। अत: वह पूर्ण वस्तु विनिमय नहीं है।

प्रश्न 4
विनिमय से दोनों पक्षों को तुष्टिगुण का लाभ होता है, समझाइए।
उत्तर:
विनिमय से दोनों पक्षों को उपयोगिता तुष्टिगुण का लाभ
विनिमय क्रिया में प्रत्येक पक्ष कम आवश्यक वस्तु देकर अधिक आवश्यक वस्तु प्राप्त करता है। अर्थात् एक पक्ष उस वस्तु को दूसरे व्यक्ति को देता है जो उसके पास आवश्यकता से अधिक है तथा जिसकी कम उपयोगिता है और बदले में उस वस्तु को लेता है जिसकी उसे अधिक आवश्यकता या तुष्टिगुण होता है। अतः विनिमय से दोनों पक्षों को उपयोगिता का लाभ होता है। यदि किसी भी पक्ष को हानि होगी तब विनिमय सम्पन्न नहीं होगा। इस तथ्य का स्पष्टीकरण निम्नलिखित उदाहरण द्वारा किया जा सकता है

उदाहरण द्वारा स्पष्टीकरण – माना प्रिया व अरुणा के पास क्रमशः आम व सेब की कुछ इकाइयाँ हैं। वे परस्पर विनिमय करना चाहते हैं। दोनों को एक-दूसरे की वस्तु की आवश्यकता है। क्रमागत तुष्टिगुण ह्रास नियम के अनुसार, प्रिया व अरुणा की आम व सेब की इकाइयों का तुष्टिगुण क्रमशः घटता जाता है, परन्तु जब विनिमय प्रक्रिया दोनों के मध्य प्रारम्भ होती है तब दोनों के पास आने वाली इकाइयों का तुष्टिगुण अधिक होता है तथा बदले में दोनों अपनी अतिरिक्त इकाइयों का त्याग करती हैं जिनका तुष्टिगुण अपेक्षाकृत कम होता है। यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक दोनों पक्षों को तुष्टिगुण का लाभ मिलता रहता है।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 1 Exchange Exchange System q4
उपर्युक्त तालिका के अनुसार प्रिया व अरुणा में विनिमय प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। प्रिया आम की एक इक देकर अरुणा से सेब की एक इकाई प्राप्त करती है। प्रिया को सेब की प्रथम इकाई से प्राप्त तुष्टिगुण से अधिक होता है। उसे सेब की पहली इकाई से 25 इकाई तुष्टिगुण मिलता है। सेब के बदले उपर्युक्त तालिका के अनुसार प्रिया व अरुणा में विनिमय प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। प्रिया आम की एक इकाई देकर अरुणा से सेब की एक इकाई प्राप्त करती है। प्रिया को सेब की प्रथम इकाई से प्राप्त तुष्टिगुण से अधिक होता है। उसे सेब की पहली इकाई से 25 इकाई तुष्टिगुण मिलता है।

सेब के बदले में वह आम की अन्तिम इकाई, जिसका तुष्टिगुण 6 इकाई है, देती है। इस प्रकार उसे 25 – 6 = 19 तुष्टिगुण का लाभ होता है। इसी प्रकार अरुणा सेब की अन्तिम इकाई, जिसका तुष्टिगुण 4 है, को देकर आम की पहली इकाई जिससे उसे 20 तुष्टिगुण मिलता है, प्राप्त करती है। उसे 20 – 4= 16 तुष्टिगुण के बराबर लाभ मिलता है। विनिमय की यह प्रक्रिया आम व सेब की तीसरी इकाई तक निरन्तर चलती रहती है, क्योंकि विनिमय से दोनों पक्षों को लाभ होता रहता है। परन्तु दोनों पक्ष चौथी इकाई के विनिमय हेतु तैयार नहीं होते हैं, क्योंकि अब विनिमय प्रक्रिया से उन्हें हानि होती है। इस प्रकार दोनों पक्ष उस सीमा तक ही विनिमय करते हैं जब तक दोनों पक्षों को लाभ प्राप्त होता है। अत: यह कथन कि विनिमय से दोनों पक्षों को तुष्टिगुण का लाभ प्राप्त होता है, सत्य है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
विनिमय की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
विनिमय में निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं

  1. दो पक्षों का होना – विनिमय क्रिया के लिए दो या दो से अधिक व्यक्तियों या दो पक्षों का होना आवश्यक है। अकेला व्यक्ति विनिमय प्रक्रिया को सम्पादित नहीं कर सकता।
  2.  वस्तु, सेवा या धन का हस्तान्तरण – विनिमय क्रिया में सदैव वस्तु, सेवा या धन को हस्तान्तरण किया जाता है।
  3.  वैधानिक हस्तान्तरण – विनिमय क्रिया में धन का वैधानिक हस्तान्तरण होता है। धन का अवैधानिक हस्तान्तरण विनिमय नहीं है।
  4.  ऐच्छिक हस्तान्तरण – विनिमय क्रिया में वस्तुओं व सेवाओं अर्थात् धन का हस्तान्तरण ऐच्छिक होता है। किसी दबाव के अन्तर्गत किया गया धन का हस्तान्तरण विनिमय नहीं है।
  5. लेन-देन पारस्परिक होना – धन या वस्तुओं का लेन-देन दो या दो से अधिक पक्षों के बीच पारस्परिक लाभ प्राप्त करने के लिए होता है। विक्रेता वस्तु देकर उसको मूल्य प्राप्त करता है और क्रेता पैसे देकर वस्तु।

उपर्युक्त लक्षणों के आधार पर कहा जा सकता है कि “दो पक्षों के बीच होने वाले धन के ऐच्छिक, वैधानिक तथा पारस्परिक हस्तान्तरण को ही विनिमय कहते हैं।”

प्रश्न 2
विनिमय क्रिया के लिए कौन-कौन से आवश्यक तत्त्व हैं ?
या
विनिमय की शर्ते बताइए।
उत्तर:
विनिमय की शर्ते (तत्त्व) निम्नलिखित हैं

  1. विनिमय क्रिया को सम्पादित करने के लिए दो पक्षों का होना आवश्यक है।
  2.  विनिमय क्रिया तभी सम्भव होगी जब दोनों पक्षों के पास दो या दो से अधिक प्रकार की वस्तुएँ होंगी।
  3. विनिमय तभी सम्भव है जब दोनों पक्षों को एक-दूसरे की वस्तुओं की आवश्यकता हो तथा वे परस्पर विनिमय हेतु स्वेच्छा से तत्पर हों।
  4.  विनिमय क्रिया में दोनों पक्षों को लाभ होना चाहिए, अन्यथा विनिमय सम्भव नहीं होगा।
  5.  विनिमय क्रिया में दो या दो से अधिक वस्तुएँ यथेष्ठ मात्रा में उपलब्ध होनी चाहिए। यदि वस्तुएँ व्यक्ति के पास केवल उसकी आवश्यकता-पूर्ति तक ही सीमित हैं तब विनिमय नहीं हो सकता।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
विनिमय के दो प्रकारों को लिखिए।
उत्तर:
(1) वस्तु विनिमय या प्रत्यक्ष विनिमय तथा
(2) अप्रत्यक्ष विनिमय या क्रय-विक्रय।

प्रश्न 2
वस्तु विनिमय से आप क्या समझते हैं ? [2008, 09, 10, 13, 15]
उत्तर:
“कम आवश्यक वस्तुओं से अधिक आवश्यक वस्तुओं की अदल-बदल को ही वस्तु विनिमय कहते हैं।”

प्रश्न 3
वस्तु विनिमय प्रणाली की दो आवश्यक दशाएँ लिखिए।
उत्तर:
(1) सीमित आवश्यकताएँ तथा
(2) अविकसित अर्थव्यवस्था तथा पिछड़ा समाज।

प्रश्न 4
विनिमय के दो प्रमुख लक्षण बताइए।
उत्तर:
(1) दो पक्षों का होना तथा
(2) वस्तुओं तथा सेवाओं का ऐच्छिक हस्तान्तरण।

प्रश्न 5
आधुनिक युग में वस्तु विनिमय प्रणाली क्यों सम्भव नहीं है ? दो कारण लिखिए। [2007]
उत्तर:
(1) आवश्यकताओं में तीव्र गति से वृद्धि तथा
(2) मुद्रा का प्रचलन।

प्रश्न 6
मौद्रिक विनिमय के दो लाभ बताइए। [2016]
उत्तर:
(1) मूल्य का सर्वमान्य मापन तथा
(2) मूल्य संचय की सुविधा।

प्रश्न 7
प्रत्यक्ष विनिमय एवं अप्रत्यक्ष विनिमय का अर्थ स्पष्ट कीजिए। [2008]
उत्तर:
जब कोई व्यक्ति अपनी किसी वस्तु या सेवा के बदले अन्य व्यक्ति से अपनी आवश्यकता की कोई वस्तु या सेवा प्राप्त करता है, तो उसे प्रत्यक्ष विनिमय कहते हैं। जब वस्तुओं एवं सेवाओं का मुद्रा (द्रव्य) के माध्यम से विनिमय होता है तब इसे अप्रत्यक्ष विनिमय कहते हैं।

प्रश्न 8
विनिमय की आवश्यकता क्यों हुई ?
उत्तर:
मनुष्य की निरन्तर बढ़ती हुई आवश्यकता के कारण उनमें पारस्परिक निर्भरता बढ़ने के फलस्वरूप विनिमय सम्बन्धी क्रियाओं का विकास होता चला गया।

प्रश्न 9
विनिमय के लिए एक आवश्यक शर्त क्या है ?
उत्तर:
विनिमय के लिए दो पक्षों का होना अति आवश्यक है।

प्रश्न 10
विनिमय से प्राप्त किन्हीं दो लाभों को लिखिए।
उत्तर:
(1) आवश्यकता की वस्तुओं की प्राप्ति तथा
(2) बड़े पैमाने पर उत्पादन।

प्रश्न 11
विनिमय से होने वाली किन्हीं दो हानियों को लिखिए। [2016]
उत्तर
(1) आत्मनिर्भरता की समाप्ति तथा
(2) राजनीतिक पराधीनता।

प्रश्न 12
वस्तु विनिमय पद्धति की दो कठिनाइयाँ बताइए। [2014, 16]
उत्तर:
(1) दोहरे संयोग का अभाव तथा
(2) मूल्य-मापन में कठिनाई।

प्रश्न 13
किस विनिमय प्रणाली की कठिनाइयाँ मौद्रिक विनिमय प्रणाली द्वारा दूर हुईं? [2007]
उत्तर:
वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयाँ मौद्रिक विनिमय प्रणाली द्वारा दूर हुईं।

प्रश्न 14
क्रय-विक्रय प्रणाली में विनिमय को माध्यम क्या होता है? [2014]
उत्तर:
क्रय-विक्रय प्रणाली में अप्रत्यक्ष विनिमय होता है अर्थात् मुद्रा का प्रयोग होता है।

प्रश्न 15
एक वस्तु को दूसरी वस्तु से बदलने की प्रणाली ” कहलाती है। [2014]
उत्तर:
वस्तु विनिमय।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
“कम आवश्यक वस्तुओं से अधिक आवश्यक वस्तुओं की अदल-बदल को ही विनिमय कहते हैं।” यह कथन है
(क) प्रो० मार्शल का
(ख) एडम स्मिथ का
(ग) जेवेन्स का
(घ) रॉबिन्स को
उत्तर:
(ग) जेवेन्स का।

प्रश्न 2
“दो पक्षों के मध्य होने वाले धन के ऐच्छिक, वैधानिक तथा पारस्परिक हस्तान्तरण को ही विनिमय कहते हैं।” यह कथन किसका है ?
(क) जेवेन्स का
(ख) मार्शल का
(ग) वाघ का
(घ) टॉमस का
उत्तर:
(ख) मार्शल का।

प्रश्न 3
वस्तुओं तथा सेवाओं का प्रत्यक्ष रूप से आदान-प्रदान किया जाता है
(क) क्रय-विक्रय प्रणाली में
(ख) वस्तु विनिमय में
(ग) अप्रत्यक्ष विनिमय में
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) वस्तु विनिमय में।

प्रश्न 4
द्रव्य के माध्यम से किया जाने वाला विनिमय कहलाता है [2017]
(क) वस्तु विनिमय
(ख) प्रत्यक्ष विनिमय
(ग) क्रय-विक्रय
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) क्रय-विक्रय।

प्रश्न 5
विनिमय के लिए आवश्यक है
(क) दो पक्षों का होना
(ख) ऐच्छिक होना।
(ग) वैधानिक होना
(घ) इन सभी का होना
उत्तर:
(घ) इन सभी का होना।

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