UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 4 Indian Education during British Period

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 4 Indian Education during British Period (ब्रिटिश काल में भारतीय शिक्षा) are part of UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 4 Indian Education during British Period (ब्रिटिश काल में भारतीय शिक्षा) .

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 4
Chapter Name Indian Education during British Period (ब्रिटिश काल में भारतीय शिक्षा)
Number of Questions Solved 40
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 4 Indian Education during British Period (ब्रिटिश काल में भारतीय शिक्षा)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
ब्रिटिशकालीन शिक्षा के आरम्भ एवं विकास का सविस्तार वर्णन कीजिए।
या
भारतीय शिक्षा के लिए वुड-डिस्पैच की सिफारिशों का वर्णन कीजिए।
उत्तर
ब्रिटिशकालीन शिक्षा का आरम्भ व विकास भारत में आधुनिक शिक्षा का प्रारम्भ ब्रिटिश शासन काल में हुआ था। ईसाई मिशनरियों ने देश में आधुनिक शिक्षा की नींव डाली। उन्होंने शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य ईसाई धर्म का प्रचार और प्रसार रखा था, लेकिन ब्रिटिश काल में मैकाले के घोषणा-पत्र के बाद शिक्षा का व्यवस्थित रूप से विकास किया गया। ब्रिटिशकालीन शिक्षा 1947 ई० तक कायम रही। इसे स्वतन्त्रता से पूर्व शिक्षा का काल भी कहे। सकते हैं।
ब्रिटिशकालीन या आधुनिक भारतीय शिक्षा के विकास को निम्नलिखित शीर्षकों में रखा जा सकता
1. ईसाई मिशनरियों द्वारा शिक्षा का प्रसार-भारत में आधुनिक शिक्षा का प्रारम्भ ईसाई मिशनरियों द्वारा किया गया। वे समझते थे कि शिक्षा द्वारा लोग ईसाई धर्म को स्वीकार कर लेंगे। इसीलिए वे भारत में शिक्षा प्रचार के कार्य में लग गए। इस क्षेत्र में पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी, डेन एवं अंग्रेज धर्म-प्रचारकों ने प्रमुख कार्य किया। ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने इस कार्य में अत्यधिक योगदान दिया। वे भारत में ईसाई प्रचारकों को कम्पनी के कर्मचारियों में धार्मिक भावना बनाए रखने तथा भारतीय लोगों को ईसाई बनाने के लिए भेजते थे। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए देश में अनेक स्थानों पर मिशनरी स्कूलों की स्थापना की गई।

2. भारतीय समाज-सुधारकों द्वारा शिक्षा का प्रसार-ईसाई मिशनरियों के साथ-साथ राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, राधाकान्त देव आदि समाज-सुधारकों ने शिक्षा के प्रचार और प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इस कार्य को पूरा करने के लिए उन्होंने जनता का सहयोग प्राप्त करके अनेक विद्यालयों की स्थापना की।

3. सन् 1798 का आज्ञा-पत्र-इस आज्ञा–पत्र के अनुसार कम्पनी ने अपने कर्मचारियों तथा सैनिकों को निःशुल्क शिक्षा देने के लिए अनेक विद्यालयों की स्थापना की। कम्पनी ने बम्बई (मुम्बई), मद्रास (चेन्नई) और बंगाल में अठारहवीं शताब्दी में बहुत-से विद्यालयों की स्थापना कर दी। अंग्रेजों की देखा-देखी हिन्दू तथा मुसलमानों ने भी अपने विद्यालय खोलने आरम्भ कर दिए।

4. सन 1813 का आज्ञा-पत्र-इस आज्ञा-पत्र ने भारतीय शिक्षा को ठोस और व्यवस्थित रूप प्रदान किया। ब्रिटिश संसद में यह प्रस्ताव रखा गया कि कम्पनी की सरकार भारतवासियों की शिक्षा में रुचि ले और इस कार्य के लिए धन व्यय करे। कम्पनी के संचालकों ने इस प्रस्ताव का बहुत विरोध किया, लेकिन ब्रिटिश संसद ने एक आज्ञा-पत्र पास कर दिया, जिसे सन् 1813 का आज्ञा-पत्र कहा जाता है। इसमें निम्नलिखित बातें थीं—

  • ईसाई पादरियों को भारत में धर्म-प्रचार के लिए छूट दे दी गई।
  • शिक्षा को कम्पनी का उत्तरदायित्व माना गया।
  • भारत में शिक्षा के प्रचार के लिए प्रतिवर्ष एक लाख रुपए की धनराशि व्यय करने की अनुमति दे दी गई।

5. सन् 1814 का कम्पनी का आदेश-कम्पनी ने अपने प्रथम आदेश में शिक्षा की उन्नति, देशी , शिक्षा तथा प्राच्य भाषाओं की उन्नति, भारतीय विद्वानों को प्रोत्साहन व विज्ञान के प्रचार आदि पर ब्र दिया, परन्तु इस आदेश से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ।

6. लॉर्ड मैकाले का विवरण-पन्न-सन् 1835 में लॉर्ड मैकाले ने एक विवरण-पत्र प्रस्तुत किया, जिसमें शिक्षा सम्बन्धी निम्नलिखित सुझाव सम्मिलित थे

  • अंग्रेजी को ही शिक्षा का माध्यम बनाना चाहिए। ब्रिटिशकालीन शिक्षा का आरम्भ
  • अंग्रेजी पढ़ा-लिखा व्यक्ति ही विद्वान् माना जाए और साहित्य का अर्थ केवल अंग्रेजी साहित्य होना चाहिए।
  • विद्यार्थियों को रुझान फारसी और अरबी की अपेक्षा अंग्रेजी पर अधिक हो।
  • अनेक भारतीय भी अंग्रेजी भाषा को ही ज्ञान का भण्डार शिक्षा का प्रसार मान चुके हैं।

7. छनाई का सिद्धान्त-मैकाले के विवरण-पत्र ने शिक्षा के क्षेत्र में एक विवाद खड़ा कर दिया। इसी सन्दर्भ में छनाई का सन् 1814 का कम्पनी का सिद्धान्त सामने आया। इस सिद्धान्त के अनुसार यदि शिक्षा समाज में आदेश उच्च वर्ग को प्रदान की जाएगी तो वह उच्च वर्ग से निम्न वर्ग में स्वत: चली जाएगी। दूसरे शब्दों में, सरकार का कर्तव्य है कि वह केवल उच्च वर्ग के लिए शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था करे, निम्न । वर्ग तो उसके सम्पर्क में आकर स्वयं शिक्षित हो जाएगा। आर्थर मैथ्यू के शब्दों में, “सर्वसाधारण में शिक्षा ऊपर से भारतीय शिक्षा आयोग या हण्टर छन-छन कर पहुँचती थी। बूंद-बूंद करके भारतीय जीवन के हिमालय से लाभदायक शिक्षा नीचे बहे, जिससे वह कुछ समय में चौड़ी और विशाल धारी में परिवर्तित होकर शुष्क मैदानों का सिंचन प्रचार करे।” इस सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक पाश्चात्यवादी थे।

ईसाई मिशनरियों ने भी इस सिद्धान्त का समर्थन किया। लॉर्ड मैकाले ने भी इस सिद्धान्त का प्रबल समर्थन करते हुए कहा, “हमें इस समय एक ऐसे वर्ग का निर्माण करने की चेष्टा करनी चाहिए जो हमारे और उन लाखों व्यक्तियों के मध्य जिन पर हम शासन करते हैं, दुभाषिए का कार्य करे।” इस सिद्धान्त को स्वीकार करके 1844 ई० में लॉर्ड हार्डिज ने घोषणा की कि “अंग्रेजी स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता दी जाएगी। इस घोषणा के बाद शिक्षा की प्रगति तीव्रता से हुई और स्थान-स्थान पर विद्यालयों की स्थापना होने लगी।

8. वुड की घोषणा-पत्र-सन् 1854 में चार्ल्स वुड ने शिक्षा सम्बन्धी एक घोषणा-पत्र बनाया। इस घोषणा-पत्र में शिक्षा सम्बन्धी निम्नलिखित प्रस्ताव रखे गए थे

  • भारतीय शिक्षा का उद्देश्य अंग्रेजी साहित्य और पाश्चात्य ज्ञान का प्रचार होना चाहिए।
  • भारत में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होना चाहिए।शिक्षा विभाग में शिक्षा सचिव एवं शिक्षा निरीक्षकों की नियुक्ति की जानी चाहिए, जिससे विभाग का कार्य सुचारु रूप से चल सके।
  • समस्त व्यय बड़े विद्यालयों में ही नहीं खर्च करना चाहिए। भारतीयों को शिक्षा देने से वह अपने अन्य सम्बन्धियों को शिक्षा देने में समर्थ हो सकेंगे।
  • नए विद्यालयों की स्थापना की जाए, जिनमें शिक्षा को माध्यम भी भारतीय भाषाएँ हों।

9. थॉमस और स्टैनले के प्रयास-थॉमस और स्टैनले ने भी भारत में शिक्षा की उन्नति के लिए प्रयास किया। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप तहसीलों एवं ग्रामों में भी हल्काबन्दी के विद्यालय खोले गए। इसके साथ ही प्राथमिक शिक्षा के लिए प्रत्येक राज्य में विद्यालय स्थापित किए गए। इसके फलस्वरूप सभी प्रान्तों में निम्नलिखित शिक्षा संस्थाएँ हो गयीं

  • राजकीय शिक्षा संस्थाएँ,
  • मान्यता प्राप्त शिक्षा संस्थाएँ,
  • व्यक्तिगत शिक्षा संस्थाएँ।

10. भारतीय शिक्षा आयोग या हण्टर कमीशन (1882 ई०)-इस आयोग की नियुक्ति विशेष रूप से प्राथमिक शिक्षा पर विचार करने के लिए की गई थी, लेकिन उसने शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक सुझाव दिए। इस आयोग द्वारा प्राथमिक शिक्षा से उच्च शिक्षा तक में सरकारी और व्यक्तिगत प्रयासों के मिश्रण
की बात की गई और भारतीयों को शिक्षा के क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित किया गया। इस आयोग ने निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किए-

  1. प्राथमिक शिक्षा का विकास करना आवश्यक है, क्योंकि वर्तमान स्थिति बहुत असन्तोषजनक है।
  2. जिला परिषद् एवं नगरपालिका को यह आदेश दिया जाए कि वे विद्यालयों के लिए एक निश्चित. संख्या में धन रखें।
  3. भारतीय भाषा एवं अंग्रेजी भाषा के विद्यालयों को अन्तर समाप्त किया जाए।
  4. प्राथमिक शिक्षा भारतीय भाषाओं में दी जाए।
  5. सरकारी विद्यालयों में धार्मिक शिक्षा बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। गैर-सरकारी विद्यालयों में प्रबन्धकों की इच्छानुसार धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था की जा सकती है।
  6. स्त्री-शिक्षा की विशेष व्यवस्था की जाए।

11. स्वदेशी आन्दोलन एवं शिक्षा का प्रचार-उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना का प्रादुर्भाव हुआ। राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत समाज-सुधारकों का मत था कि भारतीय विद्यालयों में ही भारत के नवयुवकों का चारित्रिक निर्माण हो सकता है। देश में राष्ट्रीय भावना के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी भारतीयता लाने पर बल दे रहे थे। ब्रह्म समाज, आर्य समाज, थियोसोफिकल सोसायटी जैसी संस्थाएँ स्वदेशी भावना का प्रचार एवं प्रसार कर रही थीं; अतः स्वदेशी आन्दोलन के फलस्वरूप अनेक शिक्षा संस्थाओं की स्थापना की गई। इनमें दयानन्द वैदिक कॉलेज, लाहौर; सेण्ट्रल हिन्दू कॉलेज, बनारस; फग्र्युसन कॉलेज, पूना विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

12. भारतीय विश्वविद्यालय आयोग (1904 ई०)-लॉर्ड कर्जन ने शिक्षा के क्षेत्र में सुधार करने के उद्देश्य से 1901 ई० में शिमला में एक शिक्षा सम्मेलन आयोजित करवाया। इस सम्मेलन के निर्णय के अनुसार भारतीय विश्वविद्यालय आयोग की नियुक्ति की गई। लॉर्ड कर्जन की नीति थी कि भारत में शिक्षा का अधिक-से-अधिक प्रचार और प्रसार हो। उसने गैर-सरकारी संस्थाओं को अनुदान देने की प्रथा का प्रचलन किया। इसके साथ ही उसने शिक्षा के विभिन्न स्तरों के विकास तथा प्रसार का भी प्रशंसनीय प्रयास किया।

13. राष्ट्रीय शिक्षा का विकास-लॉर्ड कर्जन की उग्र राष्ट्रीयता से सशंकित होकर तथा बंगाल के विभाजन को देखकर अनेक भारतीयों ने राष्ट्रीय शिक्षा के प्रचार और प्रसार में द्रुत गति से कार्य करना आरम्भ कर दिया। बंगाल में गुरुदास बनर्जी की अध्यक्षता में स्थापित समिति में बहुत-से ‘राष्ट्रीय हाईस्कूलों की स्थापना की। इसी समय कलकत्ते (कोलकाता) में नेशनल कॉलेज की स्थापना हुई। गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शान्ति निकेतन में एक ब्रह्मचर्य आश्रम खोला, जो आज विश्व भारती विश्वविद्यालय का रूप धारण कर चुका है। आर्य समाज ने गुरुकुलों की स्थापना करके प्राचीन वैदिक शिक्षा को प्रोत्साहन दिया।

14. गोपालकृष्ण गोखले का प्रस्ताव-मार्च, 1911 ई० में उदार दल के नेता गोपालकृष्ण गोखले ने केन्द्रीय व्यवस्थापिका सभा में प्राथमिक शिक्षा सम्बन्धी एक प्रस्ताव रखा, जो अस्वीकृत हो गया। इस प्रस्ताव की प्रमुख बातें निम्नलिखित थीं–

  • शिक्षा का पुनर्गठन होना चाहिए।
  • प्रत्येक प्रान्त प्राथमिक शिक्षा की एक योजना तैयार करे।
  • प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य एवं नि:शुल्क हो।
  • जिला बोर्ड एवं म्युनिसिपल बोर्डों को शिक्षा सम्बन्धी कार्य अवश्य करना चाहिए।

15. कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग-सन् 1917 ई० में सैडलर की अध्यक्षता में एक आयोग की नियुक्ति की गई, जिसका मूल उद्देश्य कलकत्ता विश्वविद्यालय के सम्बन्ध में अपने सुझाव देना तथा उच्च शिक्षा के सन्दर्भ में कुछ विचार प्रस्तुत करना था। इस आयोग ने देश के सभी विश्वविद्यालयों, माध्यमिक शिक्षा, स्त्री-शिक्षा एवं व्यावसायिक शिक्षा के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए। इस आयोग ने अन्त:विश्वविद्यालय परिषद् की स्थापना का भी सुझाव दिया। आज का विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग उसी का विकसित रूप है।

16. हर्टाग समिति-सन् 1927 में श्री फिलिप हर्टाग ने प्राथमिक शिक्षा के सम्बन्ध में एक कमेटी नियुक्त की, जिसने निम्नलिखित सुझाव दिए-

  1. नए विद्यालयों को खोलने की अपेक्षा पुराने विद्यालयों का ही सुधार किया जाए।
  2. प्राथमिक शिक्षा नि:शुल्क एवं अनिवार्य होनी चाहिए।
  3. प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने की आयु 6 से 10 वर्ष निश्चित की गई।
  4. पाठ्यक्रम में सुधार किया जाए।
  5. निरीक्षण कार्य अधिकं कर दिया जाए तथा पढ़ाई का समय भी निश्चित किया जाए।

17. व्यावसायिक शिक्षा तथा वुड-एबट प्रतिवेदन-प्रथम विश्वयुद्ध के अनुभवों ने ब्रिटिश सरकार को इस बात को सोचने के लिए प्रेरित किया कि भारत में औद्योगिक शिक्षा का प्रचार और प्रसार होना चाहिए। इसी के फलस्वरूप सन् 1936-37 में श्री एबट और श्री वुड ने व्यावसायिक शिक्षा की समस्याओं पर विचार किया। इन्होंने भारत में व्यावसायिक शिक्षा के प्रचार एवं प्रसार के सम्बन्ध में व्यापक सुझाव दिए। इन्होंने सामान्य शिक्षा के सन्दर्भ में भी अनेक सुझाव प्रस्तुत किए, जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लागू किया गया।

18. बेसिक शिक्षा-या वर्धा योजना महात्मा गाँधी ने 1937 ई० में वर्धा में हुए एक शिक्षा सम्मेलन में बेसिक शिक्षा की एक योजना प्रतिपादित की। इसमें 7 से 10 वर्ष के बालक-बालिकाओं की नि:शुल्क व अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था थी। बेसिक शिक्षा आज देश की राष्ट्रीय प्राथमिक शिक्षा बन गई है। श्री टी० एम० निगम के अनुसार, “बेसिक शिक्षा महात्मा गाँधी द्वारा दिया गया अन्तिम एवं सबसे अधिक मूल्यवान उपहार है। इस शिक्षा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी आधारभूत शिल्प को केन्द्र मानकर सम्पूर्ण शिक्षा प्रदान की जाती है।”

19. सार्जेण्ट योजना-सन् 1944 में भारतीय शिक्षा सलाहकार जॉन सार्जेण्ट को भारत में युद्धोत्तर शिक्षा विकास पर एक स्मृति-पत्र तैयार करने का आदेश दिया गया। उन्होंने शिक्षा के विभिन्न स्तर और विभिन्न पक्षों के सम्बन्ध में व्यापक सुझाव दिए, जिनमें से प्रमुख सुझाव निम्नलिखित थे

  1. तीन से छह वर्ष के बालकों के लिए नर्सरी विद्यालयों की स्थापना की जाए और यह शिक्षा निःशुल्क हो।
  2. छह से चौदह वर्ष के बालकों की शिक्षा बेसिक शिक्षा के सिद्धान्तों के आधार पर की जाए।
  3. हाईस्कूल शिक्षा के पाठ्यक्रम को साहित्यिक और औद्योगिक दो भागों में बाँटा जाए।
  4. बी० ए० का पाठ्यक्रम तीन वर्ष का हो।

इस प्रकार स्वतन्त्रता से पूर्व इन सुझावों को लागू करने का प्रयास किया गया, किन्तु ब्रिटिश सरकार के पैर अब भारत की पृथ्वी पर लड़खड़ा रहे थे। भारत-विभाजन सम्बन्धी समस्या के कारण शिक्षा सम्बन्धी सुझावों के प्रति लोगों का ध्यान न रहा और स्वतन्त्रता-प्राप्ति तक शिक्षा के क्षेत्र में कोई महत्त्वपूर्ण सुधार ने हो सका।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
हमारे देश में आधुनिक शिक्षा के आरम्भ होने में ईसाई मिशनरियों की क्या भूमिका थी?
उत्तर
पन्द्रहवीं शताब्दी में यूरोप से अनेक व्यापारिक कम्पनियाँ भारत में व्यापार के लिए आने लगी थीं। इनके साथ-ही-साथ यूरोप की अनेक ईसाई मिशनरियों का भी भारत में आगमन होने लगा। इन ईसाई मिशनरियों का भारत आगमन का मुख्यतया उद्देश्य तो ईसाई धर्म का प्रचार एवं प्रसार करना था परन्तु इस मुख्य उद्देश्य की निश्चित एवं शीघ्र प्राप्ति के लिए इन ईसाई मिशनरियों ने शिक्षा की व्यवस्था को एक प्रबल साधन के रूप में इस्तेमाल करना प्रारम्भ कर दिया। इन ईसाई मिशनरियों ने भारतीय जनता से प्रत्यक्ष सम्पर्क स्थापित करने के लिए तथा अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए देश के विभिन्न भागों में शिक्षण संस्थाएँ स्थापित करना प्रारम्भ कर दिया।

इन शिक्षण संस्थाओं में सामान्य शिक्षा के साथ-ही-साथ ईसाई धर्म के प्रचार एवं प्रसार का कार्य भी किया जाने लगा। इन शिक्षण संस्थाओं में मिशनरियों द्वारा शिक्षा के पाश्चात्य प्रारूप को अपनाया गया। इस प्रयास से हमारे देश में आधुनिक शिक्षा का सूत्रपात हुआ। इस तथ्य को ही ध्यान में रखते हुए विभिन्न विद्वान ईसाई मिशनरियों को ही भारत में आधुनिक शिक्षा का प्रवर्तक मानते हैं। स्पष्ट है कि हमारे देश में आधुनिक शिक्षा को आरम्भ करने में ईसाई मिशनरियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका तथा उल्लेखनीय योगदान है।

प्रश्न 2
ब्रिटिशकालीन शिक्षा के सन्दर्भ में लॉर्ड मैकाले के विवरण-पत्र का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
सन् 1835 में लॉर्ड मैकाले ने एक विवरण-पत्र प्रस्तुत किया, इस विवरण-पत्र के माध्यम से मैकाले ने भारतीय शिक्षा में अंग्रेजी की प्राथमिकता प्रदान करने की प्रबल सिफारिश की थी। इस सन्दर्भ में उसने भारतीय भाषाओं और साहित्य को अनुपयोगी तथा निरर्थक बताया। उसका कहना था, एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की एक अलमारी को भारत और अरब के सम्पूर्ण साहित्य से कम महत्त्व नहीं है। इस प्रकार के पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण से मैकाले ने भारतीय शिक्षा के लिए निम्नलिखित सिफारिशें या सुझाव प्रस्तुत किये

  1. अंग्रेजी को ही शिक्षा का माध्यम बनाना चाहिए।
  2. अंग्रेजी पढ़े-लिखे व्यक्ति को विद्वान् माना जाए और साहित्य का अर्थ केवल अंग्रेजी साहित्य ‘ होना चाहिए।
  3. विद्यार्थियों का रुझान फारसी और अरबी की अपेक्षा अंग्रेजी पर अधिक हो।
  4. अनेक भारतीय अंग्रेजी भाषा को ही ज्ञान का भण्डार मान चुके हैं।
  5. मैकाले ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीयों को अंग्रेजी की शिक्षा प्रदान करके, उन्हें अंग्रेजी का अच्छा विद्वान बनाना सम्भव है; अतः इस दिशा में समुचित प्रयास अवश्य किये जाने चाहिए।
  6. मैकाले ने अंग्रेजों के स्वार्थ को भी विशेष महत्व दिया तथा इस दृष्टिकोण से भी एक तर्क प्रस्तुत किया, “अंग्रेजी की शिक्षा द्वारा इस देश में एवं ऐसे वर्ग का निर्माण किया जा सकता है जो रक्त और रंग से भले ही भारतीय हो परन्तु रुचियों, विचारों, नैतिकता और विद्वता से अंग्रेज होगा।

लॉर्ड मैकाले द्वारा प्रस्तुत किया गया ‘‘विवरण-पत्र’ तत्कालीन गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक द्वारा स्वीकार कर लिया गया तथा सरकार ने 7 मार्च, 1835 में एक विज्ञप्ति जारी करके भारत में अंग्रेजी शिक्षा को लागू कर दिया। इस निर्देश के बाद ब्रिटिशकालीन भारतीय शिक्षा का आगामी स्वरूप निश्चित हो गया। इस तथ्य को टी० एन० सिक्वेस ने इन शब्दों में स्पष्ट किया था, “इस विज्ञप्ति ने भारत में शिक्षा के इतिहास को एक नया मोड़ दिया। यह उस दिशा के विषयँ में, जो सरकार सार्वजनिक शिक्षा को देना चाहती थी, निश्चित नीति की प्रथम सरकारी घोषणा की थी।

प्रश्न 3
टिप्पणी लिखिए-वुड का घोषणा-पत्र
उत्तर
सन् 1854 में चार्ल्स वुड्ने शिक्षा सम्बन्धी एक घोषणा-पत्र बनाया। इस घोषणा-पत्र में शिक्षा सम्बन्धी निम्नलिखित प्रस्ताव रखे गए थे

  1. भारतीय शिक्षा का उद्देश्य अंग्रेजी साहित्य और पाश्चात्य ज्ञान का प्रचार होना चाहिए।
  2. भारत में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होना चाहिए।
  3. शिक्षा विभाग में शिक्षा सचिव एवं शिक्षा-निरीक्षकों की नियुक्ति की जानी चाहिए, जिससे विभाग | का कार्य सुचारु रूप से चल सके।
  4. समस्त व्यय बड़े विद्यालयों में ही नहीं खर्च करना चाहिए। भारतीयों को शिक्षा देने से वह अपनेb अन्य सम्बन्धियों को शिक्षा देने में समर्थ हो सकेंगे।
  5. नए विद्यालयों की स्थापना की जाए, जिनमें शिक्षा का माध्यम भी भारतीय भाषाएँ हों।
  6. “वुड के घोषणा-पत्र में जन-सामान्य की शिक्षा को प्राथमिकता दी गई थी। इस योजना को
    सफल बनाने के लिए इस घोषणा-पत्र में शिक्षा संस्थाओं को आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए सहायता अनुदान प्रणाली को लागू करने की सिफारिश की गई थी। इस योजना के अन्तर्गत शिक्षा-संस्थाओं के भवन निर्माण के लिए, पुस्तकालयों के लिए, अध्यापकों के वेतन के लिए तथा छात्रों को दी जाने वाली छात्रवृत्तियों के लिए अलग-अलग अनुदान की सिफारिश की गई थी।

उपर्युक्त वर्णित्न सिफारिशों के कारण वुड के घोषणा-पत्र को विशेष महत्त्वपूर्ण माना जाता है। कुछ विद्वानों ने तो इसे भारतीय शिक्षा का ‘महाधिकार-पत्र’ (Magnakarta) की संज्ञा दी है।

प्रश्न 4
ब्रिटिशकालीन शिक्षा के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
भारत में ब्रिटिशकालीन शिक्षा के प्रमुख गुण निम्नलिखित थे

  1. इस शिक्षा के अन्तर्गत भारतीय पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान के सम्पर्क में आए और उनका वैज्ञानिक, | राजनीतिक तथा औद्योगिक क्षेत्र में ज्ञान विकसित हुआ।
  2. अंग्रेज भारतीय सभ्यता और संस्कृति से बहुत प्रभावित थे। अत: उन्होंने प्राचीन भारतीय ग्रन्थों का अंग्रेजी में अनुवाद कराया और उनका अध्ययन किया। इसके फलस्वरूप भारतीयों को भी अपनी | प्राचीन संस्कृति के गौरव का ज्ञान हुआ और उनमें राजनीतिक चेतना का जन्म हुआ।
  3. इस शिक्षा के अन्तर्गत भारत की प्रान्तीय भाषाओं का समुचित विकास हुआ।
  4. ब्रिटिशकालीन शिक्षा ने भारतीयों के अन्धविश्वास और सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  5. अंग्रेजों ने स्त्री-शिक्षा के विकास के लिए काफी प्रयास किए, फलस्वरूप देश में स्त्रियों की दशा | में विशेष सुधार आया।
  6. अंग्रेजी शिक्षा ने भारतीयों में राजनीतिक पुनर्जागरण किया, फलस्वरूप भारतीय ब्रिटिश दासता से
    मुक्त होने में सफल हो सके।
  7. ब्रिटिश काल में शिक्षा के प्रचार व प्रसार के अनेकानेक साधनों का भी विकास हुआ।
  8. ब्रिटिश शिक्षा के कारण विश्व की विभिन्न देशों की सभ्यताओं और संस्कृतियों का भारतीयों को
    ज्ञान प्राप्त हुआ।

प्रश्न 5
ब्रिटिशकालीन शिक्षा के मुख्य दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
ब्रिटिशकालीन शिक्षा के प्रमुख मेषों का विवेचन निम्नलिखित है-

  1. अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाया गया, फलस्वरूप भारतीय भाषाओं का समुचित विकास ने हो सका।
  2. ब्रिटिशकालीन शिक्षा ने भारतीयों को पाश्चात्य संस्कृति के रंग में रँग दिया। वे अपनी संस्कृति को भूलकर भौतिकता के सागर में डूज़ गए।
  3. इस शिक्षा ने समाज में ‘बाबू वर्ग नामक एक नए वर्ग को जन्म दिया था। इस वर्ग ने ब्रिटिश सरकार को सहयोग देकर राष्ट्रीय हितों पर कुठाराघात किया।
  4. ब्रिटिश शिक्षा ने भारतीयों को अधार्मिक, अनैतिक तथा भौतिकवादी बना दिया तथा उन्हें प्राचीन भारतीय आध्यात्मिकता के महत्त्व का ज्ञान न रहा।
  5. ब्रिटिश शिक्षा ने जनसाधारण की शिक्षा की पूर्ण उपेक्षा की और देश में निरक्षरता का बोलबाला ही रहा।।
  6. ब्रिटिशकालीन शिक्षा भारतीय हितों के प्रतिकूल रही। इस शिक्षा का मूल उद्देश्य भारत में अंग्रेजी शासन को स्थायी और सुदृढ़ बनाना ही था।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
लॉर्ड मैकाले द्वारा प्रतिपादित निस्यन्दन सिद्धान्त का सामान्य विवरण संक्षेप में लिखिए।
उत्तर
लॉर्ड मैकाले ने भारत में शिक्षा की व्यवस्था के विषय में एक विवरण-पत्र प्रस्तुत किया था, जिसके आधार पर शिक्षा के क्षेत्र में पूर्व-पश्चिम सम्बन्धी विवाद उठ खड़ा हुआ। इसी सन्दर्भ में मैकाले ने निस्यन्दन सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इस सिद्धान्त की मान्यता के अनुसार, यदि समाज के उच्च वर्ग को समुचित शिक्षा प्रदान कर दी जाए तो उस स्थिति में शिक्षा उच्च वर्ग से स्वतः ही निम्न वर्ग तक पहुँच जाएगी। इस तथ्य को आर्थर मैथ्यू ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “सर्वसाधारण में शिक्षा ऊपर से छन-छन कर पहुँचानी थी। बूंद-बूंद करके भारतीय जीवन के हिमालय से लाभदायक शिक्षा नीचे बहे, जिससे वह कुछ समय में चौड़ी और विशाल धारा में परिवर्तित होकर शुष्क मैदानों का सिंचन करे।” मैकाले के निस्यन्दन सिद्धान्त के अनुसार सरकार का दायित्व केवल उच्च वर्ग को शिक्षित करना था तथा निम्न वर्ग स्वत: ही उच्च वर्ग के सम्पर्क में आकर क्रमशः शिक्षित हो जाएगा।

प्रश्न 2
टिप्पणी लिखिए-भारतीय शिक्षा आयोग या हण्टर कमीशन।
उत्तर
भारतीय शिक्षा आयोग या हण्टर कमीशन की नियुक्ति विशेष रूप से प्राथमिक शिक्षा पर विचार करने के लिए की गई थी, लेकिन उसने शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक सुझाव दिए। इस आयोग द्वारा प्राथमिक शिक्षा से उच्च शिक्षा तक में सरकारी और व्यक्तिगत प्रयासों के मिश्रण की बात की गई और भारतीयों को शिक्षा के क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित किया गया। इस आयोग ने निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किए.

  1. प्राथमिक शिक्षा का विकास करना आवश्यक है, क्योंकि वर्तमान स्थिति बहुत असन्तोषजनक है।
  2. जिला परिषद् एवं नगरपालिका को यह आदेश दिया दिया जाए कि वे विद्यालयों के लिए एक निश्चित संख्या में धन रखें।।
  3. भारतीय भाषा एवं अंग्रेजी भाषा के विद्यालयों को अन्तर समाप्त किया जाए।
  4. प्राथमिक शिक्षा भारतीय भाषाओं में दी जाए।
  5. सरकारी विद्यालयों में धार्मिक शिक्षा बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। गैर-सरकारी विद्यालयों में प्रबन्धकों की इच्छानुसार धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था की जा सकती है।
  6. स्त्री-शिक्षा की विशेष व्यवस्था की जाए।

प्रश्न 3
भारतीय शिक्षा-व्यवस्था में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लॉर्ड मैकाले का तटस्थ मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर
भारत में आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था स्थापित करने में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका लॉर्ड मैकाले की रही है। लॉर्ड मैकाले प्रशंसा एवं निन्दा दोनों के ही पात्र रहे हैं। लॉर्ड मैकाले के प्रशंसक उन्हें आधुनिक भारतीय शिक्षा के पथ-प्रदर्शक स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार मैकाले द्वारा की गई। शिक्षा-व्यवस्था के ही परिणामस्वरूप भारतीय जनता उन्नति एवं प्रगति के मार्ग पर अग्रसर हुई। इसके विपरीत लॉर्ड मैकाले के चिन्दकों का कहना है कि मैकाले ने अपनी शैक्षिक नीतियों के माध्यम से भारतीय जनता का घोर अहित किया है। मैकाले ने भारतीय जनता को मानसिक रूप से गुलाम बना दिया। उसके द्वारा की गई अंग्रेजी शिक्षा की व्यवस्था से भारतीय संस्कृति को गहरी ठेस पहुँची। भारतीय भाषाओं का विकास रुक गया तथा एक अलग से ‘बाबू वर्ग का प्रादुर्भाव हुआ।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न1
भारत में आधुनिक शिक्षा-प्रणाली को आरम्भ करने के लिए सर्वप्रथम किन संस्थाओं द्वारा सफल प्रयास किए गए?
उत्तर
भारत में आधुनिक शिक्षा-प्रणाली को आरम्भ करने के लिए सर्वप्रथम ईसाई मिशनरियों द्वारा सफल प्रयास किए गए।

प्रश्न 2
भारत में आधुनिक शिक्षा का सूत्रपात किस शासनकाल में हुआ?
उत्तर
भारत में आधुनिक शिक्षा का सूत्रपात मुख्य रूप से अंग्रेजों के शासनकाल में हुआ।

प्रश्न 3
ईसाई मिशनरियों के अतिरिक्त किन भारतीय समाज-सुधारकों ने देश में आधुनिक शिक्षा के विकास में योगदान प्रदान किया?
उत्तर
आधुनिक शिक्षा को आरम्भ करने में राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, गोपालकृष्ण गोखले, सर सैयद अहमद खाँ आदि समाज-सुधारकों ने उल्लेखनीय योगदान प्रदान किया।

प्रश्न 4
लॉर्ड मैकाले द्वारा प्रतिपादित शिक्षा सम्बन्धी सिद्धान्त को किस नाम से जाना जाता
उत्तर
लॉर्ड मैकाले द्वारा प्रतिपादित शिक्षा सम्बन्धी सिद्धान्त को निस्यन्दन सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 5
‘छनाई के सिद्धान्त का सुझाव किसने दिया था ?
उत्तर
छनाई के सिद्धान्त’ का सुझाव लॉर्ड मैकाले ने दिया था।

प्रश्न 6
आधुनिक भारतीय शिक्षा-व्यवस्था में लॉर्ड कर्जन के योगदान को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
आधुनिक भारतीय शिक्षा-व्यवस्था में लॉर्ड कर्जन ने संख्यात्मक एवं गुणात्मक विकास के लिए उल्लेखनीय प्रयास किए।

प्रश्न 7
1854 की शिक्षा नीति की घोषणा किसने की ?
उत्तर
चार्ल्स वुड ने।

प्रश्न 8
किस अभिलेख को अंग्रेजी शिक्षा का महाधिकार पत्र’ के नाम से जाना जाता है?
उत्तर
‘वुड के घोषणा-पत्र’ को अंग्रेजी शिक्षा का महाधिकार पत्र के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 9
शिक्षा में सहायता अनुदान प्रणाली की घोषणा किसने की थी?
उत्तर
शिक्षा में सहायता अनुदान प्रणाली’ की घोषणा चार्ल्स वुड ने सन् 1854 के घोषणा-पत्र में की थी।

प्रश्न 10
भारतीय शिक्षा आयोग या हण्टर कमीशन का गठन कब तथा किसलिए किया गया था?
उत्तर
भारतीय शिक्षा आयोग या हण्टर कमीशन का गठन सन् 1882 ई० में किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य प्राथमिक शिक्षा-व्यवस्था पर विचार करना था।

प्रश्न 11
स्वदेशी आन्दोलन के अन्तर्गत मुख्य रूप से कौन-कौन-से कॉलेज स्थापित किए गए थे?
उत्तर
स्वदेशी आन्दोलन के अन्तर्गत स्थापित किए गए मुख्य कॉलेज थे—दयानन्द वैदिक कॉलेज-लाहौर, सेण्ट्रल हिन्दू कॉलेज–बनारस, फग्र्युसन कॉलेज-पूना।

प्रश्न 12
कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग किस सन में गठित किया गया तथा इसका अध्यक्ष कौन था?
उत्तर
कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग 1917 ई० में गठित किया गया तथा इसका अध्यक्ष माइकेल सैडलर था।

प्रश्न 13
सार्जेण्टे योजना के अन्तर्गत छोटे बच्चों की शिक्षा के लिए मुख्य रूप से क्या सुझाव दिया गया था?
उत्तर
सार्जेण्ट योजना के अन्तर्गत सुझाव दिया गया कि 3 से 6 वर्ष के बालकों के लिए नर्सरी विद्यालय स्थापित किए जाएँ तथा यह शिक्षा नि:शुल्क हो।

प्रश्न 14
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. भारत में आधुनिक शिक्षा को आरम्भ करने में ईसाई मिशनरियों का कोई योगदान नहीं था।
  2. सन् 1813 के आज्ञा-पत्र में भारत में शिक्षा को कम्पनी का उत्तरदायित्व माना गया।
  3. लॉर्ड मैकाले के अनुसार समाज के उच्च एवं निम्न दोनों ही वर्गों के लिए शिक्षा की समान व्यवस्था की जानी चाहिए।
  4. लॉर्ड कर्जन ने शिक्षा के क्षेत्र में सुधार करने के उद्देश्य से सन् 1901 में शिमला में एक शिक्षा सम्मेलन आयोजित किया था।
  5. भारत में औद्योगिक शिक्षा की व्यवस्था का सुझाव वुड-एबट प्रतिवेदन में दिया गया था।

उत्तर

  1. असत्य,
  2. सत्य,
  3. असत्य,
  4. सत्य,
  5. सत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए-
प्रश्न 1
भारत में आने वाला प्रथम यूरोपियन था
(क) अंग्रेज
(ख) डच
(ग) पुर्तगाली
(घ) फ्रांसीसी
उत्तर
(ग) पुर्तगाली

प्रश्न 2
वास्कोडिगामा कालीकट के बन्दरगाह पर कब उतरा?
(क) अप्रैल, 1492 ई०
(ख) मई, 1498 ई०
(ग) दिसम्बर, 1599 ई०
(घ) जून, 1613 ई०
उत्तर
(ख) मई, 1498 ई०

प्रश्न 3
यूरोपियनों के आगमन के समय भारत की देशी शिक्षा की क्या दशा थी?
(क) सामान्य
(ख) उच्चतर
(ग) उन्नतशील
(घ) दयनीय
उत्तर
(घ) दयनीय

प्रश्न 4
वारेन हेस्टिग्स ने कलकत्ता दरसा की स्थापना कब की?
(क) 1685 ई०
(ख) 1774 ई०
(ग) 1780 ई०
(घ) 1791 ई०
उत्तर
(ग) 1780 ई०

प्रश्न 5
कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज का संस्थापक कौन था?
(क) वारेन हेस्टिग्स
(ख) लॉर्ड वेलेजली
(ग) लॉर्ड विलियम बैंटिंक
(घ) लॉर्ड डलहौजी
उत्तर
(ख) लॉर्ड वेलेजली

प्रश्न 6
ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत में शिक्षा प्रसार हेतु कब से अनुदान देना आरम्भ किया?
(क) 1798 ई०
(ख) 1813 ई०
(ग) 1833 ई०
(घ) 1853 ई०
उत्तर
(ख) 1813 ई०

प्रश्न 7
भारत में अंग्रेजी शिक्षा का आरम्भ हुआ था
(क) लॉर्ड कर्जन द्वारा।
(ख) लॉर्ड ऑकलैण्ड द्वारा।
(ग) लॉर्ड मैकाले द्वारा
(घ) विलियम हण्टर द्वारा
उत्तर
(ग) लॉर्ड मैकाले द्वारा

प्रश्न 8
“एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की अलमारी भारत और अरबी के सम्पूर्ण देशी साहित्य के बराबर होगी।” यह कथन किसका है?
क) लॉर्ड विलियम बैंटिंक
(ख) लॉर्ड आर्कलैण्ड
(ग) लॉर्ड मैकाले
(घ) लॉर्ड कर्जन
उत्तर
(ग) लॉर्ड मैकाले

प्रश्न 9
ब्रिटिश काल में भारतीय शिक्षा का माध्यम था
(क) हिन्दी,
(ख) अंग्रेजी
(ग) फारसी
(घ) संस्कृत
उत्तर
(ख) अंग्रेजी

प्रश्न 10
चार्ल्स वुड का शिक्षा घोषणा-पत्र कब प्रकाशित हुआ?
(क) 1813 ई०
(ख) 1835 ई०
(ग) 1854 ई०
(घ) 1882 ई०
उत्तर
(ग) 1854 ई०

प्रश्न 11
अंग्रेजी शिक्षा का मैग्नाकार्टा किसे कहा जाता है?
(क) ऑकलैण्ड का विवरण-पत्रे
(ख) लॉर्ड मैकाले का विवरण-पत्र
(ग) वुड का विवरण-पत्र ।
(घ) हण्टर कमीशन की रिपोर्ट
उत्तर
(ग) वुड का विवरण-पत्र

प्रश्न 12
भारत में आधुनिक विश्वविद्यालय की स्थापना का सुझाव दिया गया था
(क) 1813 के आज्ञा-पत्र द्वारा
(ख) 1833 के आज्ञा-पत्र द्वारा
(ग) 1837 के मैकाले के विवरण-पत्र द्वारा।
(घ) 1854 के वुड के घोषणा-पत्र द्वारा
उत्तर
(घ) 1854 के वुड के घोषणा-पत्र द्वारा

प्रश्न 13
भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम किसने पारित करवाया?
(क) लॉर्ड डलहौजी
(ख) लॉर्ड लिटन
(ग) लॉर्ड रिपन :
(घ) लॉर्ड कर्जन
उत्तर
(घ) लॉर्ड कर्जन

प्रश्न 14
भारत में प्राथमिक शिक्षा के विकास और समस्याओं पर विचार करने वाला पहला आयोग था
(क) सैडलर आयोग।
(ख) हण्टर आयोग
(ग) सार्जेण्ट आयोग ।
(घ) हर्टाग समिति
उत्तर
(ख) हण्टर आयोग

प्रश्न 15
भारत में पहला विश्वविद्यालय कहाँ पर खोला गया था?
(क) कोलकाता
(ख) बनारस
(ग) आगरा
(घ) मुम्बई
उत्तर
(क) कोलकाता

प्रश्न 16
भारत में केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड की स्थापना कब हुई?
(क) 1932 ई०
(ख) 1935 ई०
(ग) 1940 ई०
(घ) 1944 ई०
उत्तर
(ख) 1935 ई०

प्रश्न 17
भारतीय स्कूलों के लिए सहायता अनुदान प्रणाली कब प्रारम्भ हुई?
(क) 1814 ई० में
(ख) 1834 ई० में
(ग) 1854 ई० में ।
(घ) 1864 ई० में
उत्तर
(ग) 1854 ई० में

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter  4 Indian Education during British Period (ब्रिटिश काल में भारतीय शिक्षा) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 4 Indian Education during British Period (ब्रिटिश काल में भारतीय शिक्षा) , drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 19 Motivation and Education

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 19 Motivation and Education (प्रेरणा एवं शिक्षा) are part of UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 19 Motivation and Education (प्रेरणा एवं शिक्षा).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 19
Chapter Name Motivation and Education (प्रेरणा एवं शिक्षा)
Number of Questions Solved 34
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 19 Motivation and Education (प्रेरणा एवं शिक्षा)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
प्रेरणा का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। प्रेरणा के मुख्य स्रोतों का भी उल्लेख कीजिए।
या
अभिप्रेरणा से आप क्या समझते हैं? [2011, 13, 14]
उत्तर :
प्रेरणा का अर्थ एवं परिभाषा
रेरणा या अभिप्रेरणा वह मानसिक क्रिया है, जो किसी प्रकार के व्यवहार को प्रेरित करती है। दूसरे शब्दों में, प्रेरणा मानसिक तत्परता की वह स्थिति है, जो व्यक्ति को कार्य में नियोजित करती है और किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अग्रसर करती है। इस प्रकार मनोवैज्ञानिक अर्थ में प्रेरणा एक प्रकार की आन्तरिक उत्तेजना है,

जिस पर हमारा व्यवहार आधारित रहता है अथवा जो हमें कार्य करने के लिए प्रेरित करती है और लक्ष्य प्राप्ति तक चलती रहती है। कोई व्यक्ति कार्य क्यों करता है ? भोजन क्यों करता है ? प्रेम या घृणा क्यों करता है ? आदि प्रश्नों का सम्बन्ध प्रेरणा से है। इस प्रकार प्रेरणा एक प्रकार की आन्तरिक शक्ति है, जो हमें कार्य करने के लिए प्रेरित को बाध्य करती है।

विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने प्रेरणा की परिभाषा इस प्रकार दी है

1. गिलफोर्ड :
(Guilford) के अनुसार, “प्रेरणा एक कोई भी विशेष आन्तरिक कारक अथवा दशा है, जो क्रिया को प्रारम्भ करने अथवा बनाये रखने को प्रवृत्त होती है।”

2. वुडवर्थ :
(woodworth) के अनुसार, “प्रेरणा व्यक्तियों की दशा का वह समूह है, जो किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए निश्चित व्यवहार स्पष्ट करती है।”

3. मैक्डूगल :
मैक्डूगल के अनुसार, “प्रेरणा वे शारीरिक तथा मानसिक दशाएँ हैं, जो किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित करती हैं।”

4. जॉनसन :
जॉनसन के अनुसार, “प्रेरणा सामान्य क्रियाकलापों का प्रभाव है, जो मानव के व्यवहार को उचित मार्ग पर ले जाती हैं।”

5. बर्नार्ड :
(Bernard) के अनुसार, “प्रेरणा द्वारा उन विधियों का विकास किया जाता है, जो व्यवहार के पहलुओं को प्रमाणित करती हैं।”

6. थॉमसन :
थॉमसन के अनुसार, “प्रेरणा प्रारम्भ से लेकर अन्त तक मानव व्यवहार के प्रत्येक प्रतिकारक को प्रभावित करती है।”

7.शेफर :
(Shaffar) व अन्य के अनुसार, “प्रेरणा क्रिया की एक ऐसी प्रवृत्ति है जो कि चालक द्वारा उत्पन्न होती है एवं समायोजन द्वारा समाप्त होती है।”

इन परिभाषाओं का विश्लेषण करने पर निम्नांकित तथ्यों का ज्ञान होता है

  1. प्रेरणा साध्य नहीं साधन है। यह साध्य तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त करती है।
  2. प्रेरणा व्यक्ति के व्यवहार को स्पष्ट करती है।
  3. प्रेरणा से क्रियाशीलता व्यक्त होती है।
  4. प्रेरणा पर शारीरिक तथा मानसिक और बाह्य एवं आन्तरिक परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता है।
  5. प्रेरणा सीखने का प्रमुख अंग न होकर सहायक अंग है।

प्रेरणा के स्रोत
मनोवैज्ञानिकों ने प्रेरणा के निम्नांकित स्रोतों का उल्लेख किया है

1. आवश्यकताएँ :
अपने जीवन को बनाये रखने के लिए मनुष्य की कुर्छ अनिवार्य आवश्यकताएँ होती हैं; जैसे वायु, जल और भोजन आदि। जब मनुष्य की इन आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती तो शारीरिक तनाव उत्पन्न हो जाता है और वह उनकी प्राप्ति के लिए किसी-न-किसी रूप में क्रियाशील हो जाता है। उदाहरण के लिए, ज़ब किसी व्यक्ति को प्यास लगती है, तो वह पानी की खोज के लिए तत्पर हो जाता है और जब तक उसे पानी प्राप्त नहीं हो जाती, तब तक उसका शारीरिक तनाव बना रहता है।

प्राप्त हो जाने पर उसका शारीरिक तनाव भी समाप्त हो जाता है। इस सम्बन्ध में बोरिंग और लैंगफील्ड (Boring and Langfield) ने लिखा है-“आवश्यकता शरीर की अनिवार्यता या अभाव है, जिसके परिणामस्वरूप शारीरिक अस्थिरता या तनाव उत्पन्न हो जाता है। इस तनाव में ऐसा व्यवहार करने की प्रवृत्ति होती है, जिससे आवश्यकता के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाला तनाव समाप्त हो जाता है।”

2. चालक :
चालक (Driver) की उत्पत्ति आवश्यकताओं के द्वारा होती है। उदाहरण के लिए, पानी व्यक्ति की आवश्यकता है। यह पानी की आवश्यकता ही ‘प्यास चालक को जन्म देती है। इस प्रकार चालक प्राणियों को एक निश्चित प्रकार की क्रियाएँ या व्यवहार के लिए प्रेरित करते हैं।

3. उद्दीपन :
उद्दीपन वे वस्तुएँ हैं, जिनके द्वारा चालकों की सन्तुष्टि होती। है। उदाहरण के लिए, प्यास चालक की सन्तुष्टि पानी के द्वारा होती है। अत: यहाँ पानी उद्दीपन (Incentives) कहलाएगा। इसी प्रकार काम चालक’ का उद्दीपन विपरीत लिंगीय प्राणी होगा। बोरिंग व लैंगफील्ड के अनुसार, “उद्दीप्त को उस वस्तुस्थिति या क्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो व्यवहार को उद्दीप्त और निर्देशित करता है।”

इस प्रकार स्पष्ट है कि आवश्यकता, चालक एवं उद्दीपन का घनिष्ठ सम्बन्ध है। हिलगार्ड (Hilgard) के शब्दों में, “आवश्यकता से चालक का जन्म होता है। चालक बढ़े हुए तनाव की स्थिति है, जो कार्य और आरम्भिक व्यवहार की ओर अग्रसर रहता है। उद्दीपन बाह्य वातावरण की कोई वस्तु होती है, जिससे आवश्यकता की सन्तुष्टि की प्रक्रिया द्वारा चालक की गति मन्द कर देती है।”

4. प्रेरक :
प्रेरक के अन्तर्गत उद्दीपन चालक, आवश्यकता तथा तनाव आदि सभी आ जाते हैं। प्रेरकों (Motives) के सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिकों के विभिन्न मत हैं। कुछ मनोवैज्ञानिक प्रेरकों को जन्मजात शक्तियों मानते हैं तो कुछ इन्हें मुक्ति की शारीरिक या मनोवैज्ञानिक स्थिति मानते हैं। परन्तु अधिकांश मनोवैज्ञानिक प्रेरक को वह शक्ति मानते हैं, जो व्यक्ति को कार्य करने के लिए उत्तेजित करती है। दूसरे शब्दों में, प्रेरक व्यक्ति के व्यवहार की दिशाओं को निर्धारित करते हैं। विभिन्न विद्वानों ने प्रेरकों की परिभाषा निम्नलिखित शब्दों में दी है

  • ब्लेयर, जेम्स व शिसन के अनुसार, “प्रेरक हमारी मौलिक आवश्यकता से उत्पन्न होने वाली वे शक्तियाँ हैं, जो व्यवहार को दिशा और प्रयोजन प्रदान करती हैं।”
  • शेफर तथा अन्य के अनुसार, “प्रेरक क्रिया की एक ऐसी प्रवृत्ति है, जो कि चालक द्वारा उत्पन्न होती है और समायोजन द्वारा समाप्त होती है।”

प्रश्न 2
सीखने में प्रेरणा के स्थान एवं महत्त्व का उल्लेख कीजिए। या प्रेरणा क्या है ? सीखने के लिए प्रेरणा आवश्यक है। इस कथन की पुष्टि कीजिए। [2007, 08]
या
प्रेरणा की उपयुक्त परिभाषा दीजिए। सीखने में प्रेरणा का क्या योगदान है? [2007, 08]
या
प्रेरणा सीखने के लिए अनिवार्य है।” इस कथन की विवेचना कीजिए। [2009, 10]
उत्तर :
[संकेत : प्रेरणा की परिभाषा का अध्ययन उपर्युक्त प्रश्न संख्या 1 के उत्तर के अन्तर्गत करें।]

सीखने में प्रेरणा का स्थान (महत्त्व)
सीखने में प्रेरणा का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है। बिना प्रेरणा के हम कुछ सीख ही नहीं सकते। थॉमसन के अनुसार, “बालक की मानसिक क्रिया के बिना विद्यालय में सीखना बहुत कम होता है। सर्वश्रेष्ठ सीखना उस समय होता है, जबकि मानसिक क्रिया सर्वाधिक होती है। अधिकतम मानसिक क्रिया प्रबल प्रेरणा के फलस्वरूप होती है।”

डॉ० सीताराम जायसवाल के अनुसार, “व्यक्ति के अन्दर कुछ ऐसे तत्त्व होते हैं, जिनके कारण व्यक्ति प्रक्रिया करता है। वातावरण के साथ क्रिया किसी विशेष प्रेरक द्वारा प्रेरित होती है। इसी क्रिया के फलस्वरूप सीखना होता है। इस प्रकार सीखने के लिए अभिप्रेरणा अनिवार्य है।”

वास्तव में सीखने में प्रेरणा की प्रमुख भूमिका रहती है। प्रेरणा सीखने में किस प्रकार सहायक हो सकती है, यह निम्नांकित शीर्षकों से स्पष्ट हो जाएगा

1. ध्यान का केन्द्रीकरण :
सीखने में ध्यान का केन्द्रित होना अत्यन्त आवश्यक है। अध्यापक बालकों को विभिन्न ढंग से प्रेरित करके उन्हें अपने पाठ पर ध्यान केन्द्रित करने में सहायता दे सकता है। इसलिए कैली ने लिखा है कि, “सीखने की प्रक्रिया में प्रेरणा का एक केन्द्रीय स्थान है।”

2. रुचि का विकास :
बालक बिना रुचि के अध्ययन नहीं करते। जब बालक में रुचि जाग्रत हो। जाती है, तो वह किसी विषय या तथ्य को तुरन्त समझ जाता है। ध्यान की एकाग्रता और रुचि में परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। ऐसी दशा में अध्यापक का कर्तव्य है कि वह प्रेरणा का उचित प्रयोग करके बालकों में अध्ययन के प्रति रुचि जाग्रत करे। थॉमसन के कवि अनुसार, प्रेरणा छात्रों में रुचि जाग्रत करने की कला हैं।”

3. सीखने की इच्छा का विकास :
प्रेरणा से बालकों में सीखने की इच्छा को बलवली बनाया जा सकता है। इसके लिए अध्यापक को छात्रों की समस्या की जानकारी करा देनी चाहिए तथा उनके लक्ष्य का महत्त्व बता देना चाहिए और साथ-ही-साथ उसमें आत्मविश्वास की भावना जाग्रत करनी चाहिए।

4. लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक :
यदि बालकों को लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रेरित किया जाए तो वे अपने कार्य में विशेष लगन और श्रम से जुट जाते हैं। वास्तव में किसी लक्ष्य को प्राप्त करने में प्रेरणा का विशेष हाथ रहता है। अतः अध्यापक को इस दिशा में विशेष ध्यान देना चाहिए।

5. अच्छी आदतों के विकास में सहायक :
अच्छी आदतें नवीन ज्ञान को विकसित करने में सहायक होती हैं। यदि अध्यापक बालकों को श्रेष्ठ आदतें डालने के लिए प्रेरित करें तो उन्हें अनेक लाभ होंगे। यदि उनमें सीखने तथा पढ़ने की आदतों का निर्माण कर दिया जाए तो स्वयं अध्ययन में ध्यान लगाएँगे।

6. ज्ञान की प्राप्ति में सहायक :
प्रेरणा द्वारा बालकों को अधिक ज्ञानार्जन के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। अध्यापकों को चाहिए कि वह प्रभावशाली शिक्षण विधियों का प्रयोग करके बालकों को तीव्र गति से ज्ञानार्जन के लिए प्रेरित करे। इसके लिए वे प्रतियोगिता का सहारा ले सकते हैं।

7. अभिवृत्ति के विकास में सहायक :
प्रेरणा बालकों में अभिवृत्ति का विकास करने में सहायक होती है। अध्यापक उचित ढंग से प्रेरित करके बालकों में श्रेष्ठ अभिवृत्तियों का विकास कर सक अभिवृत्तियों का विकास हो जाने से बालक सरलता से कार्य को सीख जाते हैं।

8. सामाजिक गुणों का विकास :
यदि अध्यापक बालकों को सामुदायिक कार्यों में भाग लेने के लिए प्रेरित करता है तो उनमें सामाजिकता तथा सामुदायिकता का विकास सरलता से किया जा सकता है। विभिन्न सामाजिक प्रेरकों के द्वारा बालकों को सामाजिक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

9. चरित्र के निर्माण में सहायक :
शिक्षा की दृष्टि से चरित्र-निर्माण का विशेष महत्त्व है। एक आदर्श चरित्र वाले व्यक्ति की संकल्पशक्ति तथा चित्त को एकाग्र करने की शक्ति अत्यन्त दृढ़ होती है।  प्रेरणा द्वारा बालकों में विभिन्न सद्गुण उत्पन्न किये जा सकते हैं तथा उनकी इच्छाशक्ति को दृढ़ बनाया जा सकता है।

10. अनुशासन स्थापना में सहायक :
अनुशासनहीन बालक पढ़ने-लिखने के प्रति लापरवाह होते हैं। प्रेरणा के माध्यम से बालकों में अनुशासन की भावना विकसित की जा सकती है। अध्यापक उन्हें सकार्यों के लिए प्रेरित कर सकते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रेरणा सीखने तथा शिक्षण प्रक्रिया का मुख्य आधार है।

प्रेरणा का प्रभावशाली प्रयोग करके अध्यापक बालकों को उनके लक्ष्य तक पहुँचा सकता है तथा उनमें सद्गुणों का विकास कर चारित्रिक दृढ़ता उत्पन्न कर सकता है। हैरिस के अनुसार, “प्रेरणा की समस्या शिक्षा मनोविज्ञान और कक्षा-भवन की प्रक्रिया, दोनों के लिए केन्द्रीय महत्त्व की है।”

प्रश्न 3
बालकों को प्रेरित करने की मुख्य विधियों का उल्लेख कीजिए।
या
शिक्षा में प्रेरणा प्रदान करने की विधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
बालक को प्रेरित करने की विधियाँ
सीखने में प्रेरणा का विशेष योगदान रहता है। बालकों को सिखाने में प्रेरणा को एक साधन के रूप में प्रयोग करना प्रत्येक अध्यापक का कर्तव्य है। उसका कर्तव्य है कि बालकों को नवीन ज्ञान प्राप्त करने के लिए अधिक-से-अधिक प्रेरित करे। यहाँ पर हम कुछ ऐसी विधियों का उल्लेख करेंगे, जिनके द्वारा छात्रों को समुचित तरीके से प्रेरित किया जा सकता है

1. आवश्यकताओं का ज्ञान :
प्रत्येक व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं के वशीभूत होकर कार्य करता है। अध्यापक का कर्तव्य है कि बालकों को पाठ्य-सामग्री की आवश्यकता का ज्ञान कराये। वह बताये कि अमुक विषय का अध्ययन किस आवश्यकता की पूर्ति करता है।

2. संवेगात्मक स्थिति का ध्यान :
अध्यापक को बालकों की संवेगात्मक स्थिति का भी ध्यान रखना चाहिए। यदि अध्यापक सिखाये जाने वाले विषय का सम्बन्ध बालकों के संवेगों से स्थापित कर देता है। तो उन्हें प्रेरित करने में उसे पूर्ण सफलता मिलेगी। इसके अतिरिक्त प्रत्येक तथ्य का प्रतिपादन इस ढंग से किया जाना चाहिए कि बालक उससे घृणी न करके प्रेम करे।

3. रुचि :
प्रेरणा प्रदान करने के लिए पाठक में रुचि उत्पन्न करना अत्यन्त आवश्यक है। रुचि से सम्बन्धित करके यदि पाठ पढ़ाया। जाएगा तो बालकों को इच्छानुसार प्रेरित करने में सुगमता होगी।

4. खेल – विधि का प्रयोग :
छोटे बालक खेल में विशेष रुचि लेते हैं। यदि बालकों को खेल के माध्यम से ज्ञान प्रदान किया जाएगा तो वे अधिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित होंगे। छोटे-बालकों के यथासम्भव खेल-विधि द्वारा ही ज्ञान प्रदान किया जाए।

5. कक्षा का वातावरण :
कक्षा का वातावरण भी प्रेरणामय होना चाहिए। प्रत्येक कक्षा का वातावरण विषय और शिक्षण के अनुकूल होना चाहिए। यदि विज्ञान-कक्षा विभिन्न वैज्ञानिक उपकरणों तथा यन्त्रों से सुसज्जित है तो छात्र वैज्ञानिक अध्ययन के लिए सरलता से प्रेरित हो जाएँगे।

6. विद्यालय का वातावरण :
कक्षा के समान सम्पूर्ण विद्यालय का वातावरण भी प्रेरणामय होना चाहिए। विद्यालय में स्थान-स्थान पर विभिन्न विषयों सम्बन्धी सूचनात्मक घट तथा महापुरुषों के चित्र लगे हों, छात्रों को विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के अध्ययन की सुविधाएँ प्राप्त हो, विद्यालय में सुन्दर .. पुस्तकालय हो तथा अध्यापक बालकों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करते हों और उन्हें हर प्रकार की सूचना देने में आनन्द का अनुभव करते हों, तो ऐसे विद्यालय के छात्र शीघ्रता से प्रेरणा प्राप्त करेंगे।

7. प्रगति का ज्ञान :
जब बालक को यह ज्ञात हो जाता है कि वह अपने कार्य में पर्याप्त प्रगति कर ‘ रहा है तो वह आगे कार्य करने की प्रेरणा ग्रहण करता है। अतः अध्यापक को चाहिए कि वे बालकों को उनकी प्रगति का भी ज्ञान कराते रहें।

8. सफलता :
जब बालक अपने किसी कार्य में सफलता प्राप्त कर लेता है, तो उसे आगे कार्य करने की प्रेरणा मिलती है। फ्रेण्डसन (Frandson) के अनुसार, “सीखने के सफल अनुभव अधिक सीखने की प्रेरणाएँ प्रदान करते हैं। ऐसी दशा में अध्यापक को अपना शिक्षण इस ढंग से करना चाहिए, जिससे कि बालक अपने कार्य में पूर्ण सफलता प्राप्त कर सकें।

9. परिणाम का ज्ञान :
वुडवर्थ (Wood worth) के अनुसार, “प्रेरणा परिणामों की तात्कालिक जानकारी से प्राप्त होती है। अतः अध्यापक को चाहिए कि वह बालकों को पाठ्य-विषयं की जानकारी भली प्रकार करा दे और शिक्षण प्रारम्भ करने के पूर्व ही उन्हें यह बता दे कि अमुक पाठ्य-विषय के अध्ययन से उन्हें क्या लाभ होगा?

10. विचार गोष्ठी:
विचार गोष्ठियों द्वारा बालकों को प्रभावशाली तरीके से प्रेरित किया जा सकता है। अतः कक्षा में अध्यापक को समय-समय पर विचार गोष्ठियों (Seminars) का आयोजन करना चाहिए।

11. प्रतियोगिता :
बालकों में स्वभावतः प्रतियोगिता एवं प्रतिस्पर्धा की भावनाएँ पायी जाती हैं। इस भावना का प्रयोग करके बालकों को प्रभावशाली ढंग से प्रेरित किया जा सकता है। अतः विद्यालय में प्रतिस्पर्धा की क्रियाओं को पर्याप्त संख्या में आयोजित किया जाए, जिससे कि समस्त छात्र किसी-न-किसी रूप में सफलता प्राप्त कर सकें। इन प्रतियोगिताओं में असफल छात्रों को डॉटा-फटकारा भी न जाए; परन्तु प्रतियोगिता को इतना अधिक महत्त्व न दिया जाए कि विद्यालय की सामूहिकता की भावनां नष्ट हो जाएं।

12. सामाजिक तथा सामुदायिक कार्यों में भाग लेना :
बालकों को सामाजिक तथा सामुदायिक कार्यों में भाग लेने के पर्याप्त अवसर मिलने चाहिए। इन कार्यों में भाग लेने से उनके अहम् की सन्तुष्टि होती है और वे आत्म-सम्मान तथा आत्म-प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए प्रेरित होते हैं।

13. प्रशंसा :
हरलॉक के अनुसार, प्रशंसां एक प्रभावशाली प्रेरक है। अच्छे कार्य की प्रशंसा करके बालकों को प्रेरित किया जा सकता है। अतः अध्यापक को बालकों की समय-समय पर अच्छे कार्यों के लिए प्रशंसा करनी चाहिए।

14. पुरस्कार :
पुरस्कार द्वारा भी बालकों को प्रोत्साहित तथा प्रेरित किया जा सकता है। पुरस्कार पाकर बालक प्रफुल्लित होते हैं और वे कार्य करने के लिए प्रेरित होते हैं। पुरस्कार बालकों के मनोबल को भी ऊँचा उठाते हैं। इसमें बालकों में प्रतिस्पर्धा की भावना का भी विकास होता है और वे अधिक लगन तथा उत्साह से कार्य करते हैं। इसके साथ-ही-साथ पुरस्कार बालकों के अहम् की भी सन्तुष्टि करते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
प्रेरकों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
विभिन्न विद्वानों ने प्रेरकों का वर्गीकरण निम्नवत् किया है
1. थॉमसन (Thomson) के अनुसार

  • स्वाभाविक प्रेरक तथा
  • कृत्रिम प्रेरक

2. गैरेट के अनुसार

  • जैविक व मनोवैज्ञानिक प्रेरक तथा
  • सामाजिक प्रेरक

3. मैस्लो (Maslow) के अनुसार

  • जन्मजात प्रेरक तथा
  • अर्जित प्रेरका

प्रेरकों के मुख्य प्रकारों का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित हैं

1. जन्मजात प्रेरक :
ये प्रेरक जन्मजात होते हैं। इसके अन्तर्गत भूख, प्यास, सुरक्षा, यौन आदि प्रेरक आते हैं।

2. अर्जित प्रेरक :
ये प्रेरक वातावरण से प्राप्त होते हैं और इनको अर्जित किया जाता है। आदत्, रुचि, सामुदायिकता आदि अर्जित प्रेरकों के स्वरूप हैं।

3. सामाजिक प्रेरक :
इनका व्यक्तियों के व्यवहार पर विशेष प्रभाव पड़ता है। ये मुख्य रूप से सामाजिक आदर्शो, स्थितियों तथा परम्पराओं के कारण उत्पन्न होते हैं। आत्म-प्रदर्शन, आत्म-सुरक्षा, जिज्ञासा तथा रचनात्मकता सामाजिक प्रेरक हैं।

4. मनोवैज्ञानिक प्रेरक :
इनका जन्म प्रबल मनोवैज्ञानिक दशाओं के कारण होता है। इन प्रेरकों में प्रेम, दुःख, भय, क्रोध तथा आनन्द आते हैं।

5. स्वाभाविक प्रेरक :
स्वाभाविक प्रेरक व्यक्ति के स्वभाव में ही पाये जाते हैं। खेल, सुझाव, अनुकरण, सुख प्राप्ति और प्रतिष्ठा आदि ऐसे ही प्रेरक हैं।

6. कृत्रिम प्रेरक :
कृत्रिम प्रेरक मुख्यतया स्वभाविक प्रेरकों के पूरक के रूप में कार्य करते हैं। सहयोग, व्यक्तिगत तथा सामूहिक कार्य, पुरस्कार, दण्ड व प्रशंसा आदि इन प्रेरकों के रूप हैं। ये व्यक्ति के कार्य तथा व्यवहार को नियन्त्रित तथा प्रोत्साहित करते हैं।

प्रश्न 2
जन्मजात तथा अर्जित प्रेरकों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
जन्मजात एवं अर्जित दोनों ही प्रकार के प्रेरक मनुष्य की आन्तरिक स्थिति से सम्बन्ध रखते हुए उसमें ऐसी क्रियाशीलता पैदा करते हैं जो लक्ष्य की प्राप्ति तक चलती रहती है। इस मौलिक समानता के बावजूद इनके मध्य निम्नलिखित अन्तर दृष्टिगोचर होते हैं
UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 19 Motivation and Education image 1

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
सकारात्मक प्रेरणा तथा नकारात्मक प्रेरणा से क्या आशय है ?
उत्तर :
प्रेरणा मुख्यतः दो प्रकार की होती है सकारात्मक प्रेरणा तथा नकारात्मक प्रेरणा, इन दोनों प्रकार की प्रेरणाओं का सामान्य परिचय निम्नवर्णित है

1. सकारात्मक प्रेरणा :
इसे आन्तरिक प्रेरणा भी कहते हैं। इस प्रेरणा में व्यक्ति किसी कार्य को अपनी इच्छा से करता है।

2. नकारात्मक प्रेरणा :
इसमें व्यक्ति किसी कार्य को स्वयं अपनी इच्छा से न करके अन्य व्यक्तियों की इच्छा या बाह्य प्रभाव के कारण करता है। यह बाह्य प्रेरणा भी कहलाती है। अध्यापक पुरस्कार, प्रशंसा, निन्दा आदि का प्रयोग करके अपने छात्रों को नकारात्मक प्रेरणा प्रदान करता है।

शिक्षक को चाहिए कि वह यथासम्भव सकारात्मक प्रेरणा का प्रयोग करके बालकों को अच्छे कार्यों में लगाये। परन्तु जब सकारात्मक प्रेरणा से प्रयोजन सिद्ध न हो सके, तभी उसे नकारात्मक प्रेरणा का प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 2
प्रेरणायुक्त व्यवहार के मुख्य लक्षण क्या हैं ?
उत्तर :
प्रेरणायुक्त व्यवहार के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं

1. अधिक शक्ति का संचालन :
प्रबल प्रेरणा की दशा में व्यक्ति के शरीर में शक्ति को अधिक संचालन हो जाता है। ऐसे में व्यक्ति के समस्त कार्य भी कर सकता है जो सामान्य दशा में उनके लिए कठिन होते हैं।

2. परिवर्तनशीलता :
प्रबल प्रेरणा की दशा में व्यक्ति अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति करने के लिए किये  जाने वाले प्रयासों में बार-बार परिवर्तन भी करता है।

3. निरन्तरता :
प्रबल प्रेरणा की दशा में जब तक लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो जाती तब तक व्यक्ति निरन्तर प्रयास करता रहता है।

4. लक्ष्य प्राप्त करने की व्याकुलता :
प्रबल प्रेरणा की दशा में व्यक्ति को लक्ष्य को प्राप्त करने की व्याकुलता रहती है।

5. लक्ष्य-प्राप्ति :
जब लक्ष्य-प्राप्ति हो जाती है तब व्यक्ति की व्याकुलता समाप्त हो जाती है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
किसी कार्य को करने के लिए सर्वाधिक अनिवार्य कारक को क्या कहते हैं ?
उत्तर :
किसी कार्य को करने के लिए सर्वाधिक अनिवार्य कारक को प्रेरणा कहते हैं।

प्रश्न 2
प्रेरणा के नितान्त अभाव का व्यक्ति के कार्यों पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर :
प्रेरणा के नितान्त अभाव में व्यक्ति द्वारा कोई कार्य सम्पन्न हो ही नहीं सकता।

प्रश्न 3
प्रेरणा की एक स्पष्ट परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
“प्रेरणा वे शारीरिक तथा मानसिक दशाएँ हैं, जो किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित करती हैं।” [मैक्डूगल]

प्रश्न 4
“अभिप्रेरणा किसी कार्य को प्रारम्भ करने, जारी रखने और नियन्त्रित करने की प्रक्रिया है।” यह कथन किसका है? [2007]
उत्तर :
अभिप्रेरणा सम्बन्धी प्रस्तुत कथन गुड (Good) का है।

प्रश्न 5
प्रेरणायुक्त व्यवहार का मुख्य लक्षण क्या होता है?
उत्तर :
प्रेरणायुक्त व्यवहार का मुख्य लक्षण है अतिरिक्त शक्ति का संचालन।

प्रश्न 6
अभिप्रेरणा (प्रेरणा) का कोई एक वर्गीकरण बताइए।
उत्तर :
अभिप्रेरणा के एक वर्गीकरण के अन्तर्गत प्रेरणा को दो वर्गों में बाँटा जाता है

  1. जन्मजात प्रेरक तथा
  2. अर्जित प्रेरक

प्रश्न 7
मुख्य जन्मजात प्रेरक कौन-कौन-से हैं?
उत्तर :
मुख्य जन्मजात प्रेरक हैं-भूख, प्यास, निद्रा तथा काम।

प्रश्न 8
प्रशंसा एवं निन्दा किस प्रकार के प्रेरक है?
उत्तर :
प्रशंसा एवं निन्दा सामान्य अर्जित प्रेरक हैं।

प्रश्न 9
अभिप्रेरणा का सीखने पर क्या प्रभाव पड़ता है ? [2008]
उत्तर :
अभिप्रेरणा की दशा में सीखने की प्रक्रिया सुचारु तथा अच्छे रूप में सम्पन्न होती है।

प्रग 10
प्रेरणा के प्रारम्भ के लिए कौन उत्तरदायी होता है?
उत्तर :
प्रेरणा के प्रारम्भ के लिए आवश्यकता की अनुभूति उत्तरदायी होती है।

न 11
प्रेरणा की उत्पत्ति का स्वाभाविक कारण क्या है ? [2011]
उत्तर :
प्रेरणा की उत्पत्ति का स्वाभाविक कारण है-आवश्यकताओं को अनुभव करना एवं आदत।

प्रश्न 12
भूख कैसा प्रेरक है? [2015]
उत्तर :
भूख एक प्रमुख जन्मजात प्रेरक है।

प्रश्न 13
“अभिप्रेरणा सीखने के लिए राजमार्ग है।” किसने कहा है? [2011, 13, 14, 16]
उत्तर :
स्किनर (Skinner) ने।

प्रश्न 14
अभिप्रेरणा से क्या आशय है? [2016]
उत्तर :
अभिप्रेरणा वह मानसिक क्रिया है, जो किसी प्रकार के व्यवहार को प्रेरित करती है।

प्रश्न 15
निम्नलिखित कथन सत्य हैं
या
असत्य

  1. व्यक्ति के समस्त व्यवहार के पीछे निहित मुख्य कारक प्रेरणा ही है।
  2. प्रेरणाओं के नितान्त अभाव में व्यक्ति पूर्ण रूप से निष्क्रिय हो जाता है।
  3. भूख एवं प्यास मुख्य अर्जित प्रेरक हैं।
  4. शिक्षा के क्षेत्र में प्रेरणा का विशेष महत्त्व है।
  5. जीवन में सूफलता प्राप्ति के लिए प्रेरणाओं का विशेष योगदान होता है।

उत्तर :

  1. सत्य
  2. संय
  3. असत्य
  4. सत्य
  5. सत्य।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1
किसी भी व्यवहार के सम्पन्न होने के लिए अनिवार्य कारक है
(क) चिन्तन
(ख) लाभ प्राप्ति की आशा
(ग) प्रेरणा
(घ) संवेग
उत्तर :
(ग) प्रेरणा

प्रश्न 2
“अभिप्रेरणा एक ऐसी मनोदैहिक प्रक्रिया है, जो किसी आवश्यकता की उपस्थिति में  उत्पन्न होती है। वह ऐसी प्रक्रिया की ओर गतिशील होती है, जो आवश्यकता को सन्तुष्ट करती है। यह परिभाषा किसकी है?
(क) लावेल की
(ख) वुडवर्थ की
(ग) गिलफोर्ड की
(घ) शेफर की
उत्तर :
(क) लावेल की

प्रश्न 3
“प्रेरक कोई एक विशेष आन्तरिक कारक यो दशा है, जिसमें किसी क्रिया को आरम्भ करने और बनाये रखने की प्रवृत्ति होती है।” यह परिभाषा किसने दी है ?
(क) मैक्डूगल ने
(ख) वुडवर्थ ने
(ग) गिलफोर्ड ने।
(घ) हिलगार्ड ने
उत्तर :
(ग) गिलफोर्ड ने

प्रश्न 4
प्रेरणा का स्वाभाविक कारण है [2015]
(क) आदत
(ख) संस्कार
(ग) रुचि
(घ) संवेग
उत्तर :
(घ) संवेग

प्रश्न 5
प्रेरणा की उत्पत्ति को अर्जित कारण है
(क) आत्मरक्षा की भावना
(ख) मूल-प्रवृत्तियाँ
(ग) अचेतन मन
(घ) रुचि
उत्तर :
(घ) रुचि

प्रश्न 6
भूख और प्यास कैसे प्रेरक हैं ? [2013]
(क) व्यक्तिगत
(ख) सामाजिक
(ग) जन्मजात
(घ) अर्जित
उत्तर :
(ग) जन्मजात

प्रश्न 7
प्रेरणा छात्र में रुचि उत्पन्न करने की कला है।” यह किसका मत है ?
(क) गेट्स का
(ख) वुडवर्थ का
(ग) थॉमसने का
(घ) जे० एस० रॉस का
उत्तर :
(ग) थॉमसन का ।

प्रश्न 8
प्रेरणा परिणामों के तत्कालिक ज्ञान से प्राप्त होती है।” यह कथन किसका है?
(क) वुडवर्थ का
(ख) मैक्डूगल को
(ग) हिलगार्ड का
(घ) कोहलर का
उत्तर :
(क) वुडवर्थ को

प्रश्न 9
शिक्षा के प्रति प्रेरित बालक के लक्षण हैं
(क) अनुशासन के प्रति ईमानदार
(ख) अध्ययन में एकाग्रता
(ग) सद्गुणों तथा अच्छी आदतों से युक्त
(घ) ये सभी लक्षण
उत्तर :
(घ) ये सभी लक्षणे

प्रश्न 10
व्यक्ति की जन्मजात प्रेरणा है [2012, 14]
(क) आदत
(ख) मनोरंजन
(ग) भूख
(घ) महत्त्वाकांक्षा का स्तर
उत्तर :
(ग) भूख

प्रश्न 11
गैरेट के अनुसार प्रेरणा के कितने प्रकार हैं? [2016]
(क) 5
(ख) 3
(ग) 8
(घ) 6
उत्तर :
(ख) 3

प्रश्न 12
‘प्यास किस प्रकार का प्रेरक है? [2016]
(क) अजित
(ख) जन्मजात
(ग) सामाजिक
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) जन्मजात

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 19 Motivation and Education (प्रेरणा एवं शिक्षा) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 19 Motivation and Education (प्रेरणा एवं शिक्षा), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 18 Learning Meaning, Process, Laws and Methods

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 18 Learning Meaning, Process, Laws and Methods (सीखना-अर्थ, प्रक्रिया, नियम एवं विधियाँ) are part of UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 18 Learning Meaning, Process, Laws and Methods (सीखना-अर्थ, प्रक्रिया, नियम एवं विधियाँ).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Pedagogy
Chapter Chapter 18
Chapter Name Learning Meaning, Process, Laws and Methods
(सीखना-अर्थ, प्रक्रिया, नियम एवं विधियाँ))
Number of Questions Solved 76
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 18 Learning Meaning, Process, Laws and Methods (सीखना-अर्थ, प्रक्रिया, नियम एवं विधियाँ)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
सीखने का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। सीखने की विशेषताओं का सामान्य विवरण भी प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
सीखने का अर्थ व परिभाषा जीवन की आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने के लिए गते अनुभवों की सहायता से व्यवहार में परिवर्तन लाने की प्रक्रिया को हम सीखना कहते हैं। वास्तव में, ‘सीखना किसी स्थिति के प्रति एक सक्रिय प्रतिक्रिया है। इस प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप ही व्यक्ति के व्यवहार में प्रगतिशील परिवर्तन होते हैं। प्रत्येक प्रतिक्रिया एक अनुभव देती है और यह अनुभव व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन लाता है। इस सम्पूर्ण प्रतिक्रिया को ही हम सीखना कहते हैं। सीखने की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं।

1. वुडवर्थ :
(Woodworth) के अनुसार, “नवीन ज्ञान और प्रतिक्रियाओं को करने की प्रक्रिया, सीखने की प्रक्रिया है।”

2. गेट्स :
व अन्य के अनुसार, “अनुभवों और प्रशिक्षण द्वारा अपने व्यवहारों का संशोधन करना ही सीखना है।”

3. स्किनर :
(Skinner) के अनुसार, “सीखना व्यवहार में प्रगतिशील सामंजस्य की प्रतिक्रिया

4. क्रॉनबैक :
(Cronback) के अनुसार, “सीखना, अनुभव के फलस्वरूप व्यवहार में परिवर्तन द्वारा अभिव्यक्त होता है।”

5. कॉलविन :
(Colvin) के अनुसार, “अनुभव के आधार पर हमारे पूर्व-निर्मित व्यवहार में परिवर्तन की प्रक्रिया ही सीखना है।”

6. गिलफोर्ड :
(Guilford) के अनुसार, “व्यवहार के कारण, व्यवहार में परिवर्तन ही सीखना

7. जी० डी० बॉज :
(G. D. Boaz) के अनुसार, “सीखना एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति विभिन्न आदतों, ज्ञान एवं दृष्टिकोण सामान्य जीवन की माँगों की पूर्ति के लिए अर्जित करता है।

8. क्रो व क्रो :
(Crow & Crow) के अनुसार, “ज्ञान और अभिवृत्ति की प्राप्ति ही सीखना है।”

9. प्रेसी :
(Pressy) के अनुसार, “सीखना एक अनुभव है, जिसके द्वारा कार्य में परिवर्तन या समायोजन होता है तथा व्यवहार की गयी विधि प्राप्त होती है।”

10. हिलगार्ड :
(Hilgard) के अनुसार, “सीखना एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा कोई प्रक्रिया आरम्भ होती है या सामना की गयी परिस्थिति द्वारा परिवर्तित की जाती है। इसके लिए आवश्यक है कि क्रिया के परिवर्तन की विशेषताओं, मूल-प्रवृत्तियों की प्रक्रिया, परिपक्वता या प्राणी की अस्थायी आवश्यकताओं के आधार पर उस प्रक्रिया को समझाया न जा सके।”

उपर्युक्त परिभाषाओं का विश्लेषण करने से यह निष्कर्ष निकलता है कि

  • सीखने का अर्थ व्यवहार में परिवर्तन है।
  • सीखना व्यवहार का संगठन है।
  • सीखना नवीन प्रक्रिया की पुष्टि है।

सीखने की प्रमुख विशेषताएँ
सीखने की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. सीखना परिवर्तन है :
अनुभव जन्म से लेकर मृत्यु तक चलता रहता है। हर समय व्यक्ति कुछ-न-कुछ सीखता रहता है और इसके लाभ उठाकर व्यक्ति अपने सीखने की प्रमुख विशेषताएँ व्यवहार में परिवर्तन करता है। अतः सीखना परिवर्तन है।

2. सीखना खोज करना है :
मर्सेल (Mursell) के अनुसार, “सीखना उसे तथ्य खोजने और जानने का कार्य है, जिसे व्यक्ति खोजना और जानना चाहता है। वास्तव में, सीखना एक प्रकार से खोज करना है। आज मानव ने जो प्रगति की है, उसको मूल आधार इस प्रकार का सीखना ही है।

3. सीखना जीवन-पर्यन्त चलता है :
अनुभव का जीवन में विशेष महत्त्व हैं, और यह जन्म से लेकर मृत्यु तक निरन्तर चलता रहता है। व्यक्ति जीवनभर कुछ-न-कुछ सीखता ही रहता है और यह प्रक्रिया निरन्तर मृत्यु तक चलती ही रहती है।

4.सीखना सक्रिय है :
सीखना बिना सक्रियता के सम्भव नहीं है। बालक सक्रिय होकर ही सीखता है।

5. सीखना विकास है :
सीखना एक विकास है, जिसका कभी अन्त नहीं होता है। प्रत्येक पल व्यक्ति कुछ-न-कुछ सीखती रहता है, जिसके परिणामस्वरूप उसका मानसिक विकास होता रहता है।

6.सीखना अनुभवों का संगठन है :
एक व्यक्ति जैसे-जैसे अपने अनुभवों के आधार पर नवीन बातें सीखता है, वैसे-ही-वैसे वह आवश्यकतानुसार अपने अनुभवों को संगठित करता जाता है।

7. सीखना सार्वभौमिक है :
सीखना एक सार्वभौमिक क्रिया है, जो समस्त प्राणियों में पायी जाती है। विकास की श्रेणियों के आधार पर प्राणियों के सीखने में अन्तर होता है। पशु-पक्षी कम सीखते हैं, क्योंकि उनमें अपने अनुभव से लाभ उठाने की क्षमता कम होती है। सीखने की प्रवृत्ति मनुष्य में सबसे अधिक पायी जाती है।

8. सीखना उद्देश्यपूर्ण है :
सीखना उद्देश्यपूर्ण होता है। बिना उद्देश्य के सीखना सफल नहीं हो सकता। उद्देश्य की प्रबलता ही सीखने की क्रिया तीव्र करती है।

9. सीखना समायोजन है :
सीखकर मनुष्य अपने को वातावरण से समायोजित करता है। इस प्रकार का समायोजन करना ही सीखना है।

प्रश्न 2
सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
या
सीखने को प्रभावित करने वाले कारकों को बताइए। [2016]
उत्तर :
सीखने को प्रभावित करने वाले कारक
सीखने की प्रक्रिया में अनेक बातें सहायक और बाधक होती हैं। यहाँ हम उन कारकों का अध्ययन करेंगे, जिनसे सीखने की क्रिया प्रभावित होती है।

1. वातावरण :
वातावरण प्रमुख कारक है, जो सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है। यदि कक्षा का वातावरण शोरगुलयुक्त है, तो छात्र अपना ध्यान एकाग्र नहीं कर सकेंगे। परिणामस्वरूप वे ठीक प्रकार से सीख भी नहीं सकेंगे। उसके अतिरिक्त यदि छात्रों के बैठने की व्यवस्था उचित प्रकार से नहीं है, प्रकाश और वायु के आवागमन की भी उचित व्यवस्था नहीं है तो भी छात्र ठीक प्रकार से नहीं सीख सकेंगे। मौसम का प्रभाव भी सीखने पर पड़ता है। अत्यधिक ठण्डक और अत्यधिक गर्मी दोनों ही सीखने में बाधा पहुँचाती हैं।

2. शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य :
यदि बालकों को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य ठीक होगा तो वह किसी भी बात को शीघ्रता से सीख जाएगा। शारीरिक और मानसिक दृष्टि से पिछड़े बालक प्रायः पढ़ने-लिखने में कमजोर रहते हैं और वे बहुत देर से सीख पाते हैं।

3.सीखने का समय :
बालक अधिक समय तक किसी विषय पर अपना ध्यान केन्द्रित नहीं कर सकती, क्योंकि अधिक समय तक ध्यान केन्द्रित करने में उनमें थकावट आ जाती है और उनका ध्यान इधर-उधर भटकने लगता है। दूसरी ओर प्रात:काल छात्र अधिक स्फूर्ति का अनुभव करते हैं। अत: इस समय उन्हें सीखने में सुगमता होती है। दोपहर अथवा शाम को वह इतना अधिक नहीं सीख पाते। इसी प्रकार विद्यालय के प्रथम घण्टे में जो सीखने की गति होती है, वह अन्त के घण्टों में बहुत कम हो जाती है।

4. विषय-सामग्री :
कठिन, नीरस तथा अर्थहीन विषय-सामग्री की अपेक्षा सरल, रोचक तथा अर्थपूर्ण विषय-सामग्री अधिक सुगमता से सीख ली जाती है।

5. सीखने की अवस्था :
प्रौढ़ व्यक्तियों की अपेक्षा छोटे पाक से बालक किसी बात को शीघ्र समझ जाते हैं। भाषा और कला के विषय में यह बात मुख्य रूप से लागू होती है, परन्तु कुछ बातें बालकों की । अपेक्षा प्रौढ़ जल्दी समझते हैं।

6. सीखने की इच्छा :
सीखना बहुत कुछ व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता है। जिस बात को सीखने की बालकों की प्रबल इच्छा होती है, उसे वे प्रत्येक परिस्थिति में सीख लेते हैं। उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें कुछ भी नहीं सिखाया जा सकता है। अतः किसी तथ्य को सीखने के लिए छात्रों की इच्छा को उसके अनुकूल बनाना परम आवश्यक है।

7. सीखने की विधियाँ :
सीखने की विधि जितनी ही अधिक सरल, आकर्षक तथा रुचिपूर्ण होगी, उतनी ही सरलता तथा शीघ्रता से बालक सीखेगा।

8. पूर्व अनुभव :
बालक जो कुछ भी सीखता है, वह प्रायः अपने पूर्व अनुभव के आधार पर ही सीखता है। यदि सीखने का सम्बन्ध बालक के पूर्व अनुभव से कर दिया जाए तो वह नवीन बात शीघ्रता तथा सरलता से समझ जाएगा।

9. प्रेरणा :
सीखने की प्रक्रिया में प्रेरणा की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि बालकों को प्रशंसा तथा प्रतियोगिता के आधार पर सिखाया जाए तो वे सुगमता से सीख जाते हैं। सीखने के लिए बालक को प्रेस्ति करना अति आवश्यक है।

10. संवेगात्मक स्थिति :
यदि बालक अत्यधिक क्रोध या भय से ग्रस्त है तो वह ऐसी दशा में कुछ नहीं सीख सकता। संवेगात्मक अस्थिरता सीखने की प्रक्रिया में बाधा डालती है। अत: बालक को संवेगात्मक असन्तुलन या अस्थिरता की दशा में सीखना पूर्णतया असम्भव है।

11. सफलता का ज्ञान :
जब बालक को इस बात का ज्ञान हो जाता है कि उसे अपने कार्यों में सफलता मिल रही है तो उसका उत्साह बढ़ जाता है और उसे कार्य को शीघ्र समझे जाता है।

प्रश्न 3
थॉर्नडाइक के सीखने के नियम क्या हैं? पावलोव के प्रयोग द्वारा सम्बन्ध प्रत्यावर्तन, का सिद्धान्त समझाइए। [2007]
या
प्रयास एवं त्रुटि द्वारा सीखने की प्रक्रिया का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए। [2007]
या
अधिगम के प्रयास एवं भूल सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए। [2014]
उत्तर :
प्रयास एवं त्रुटि द्वारा सीखना
इस विधि या सिद्धान्त के प्रतिपादक थॉर्नडाइक हैं और मैक्डूगल ने इसका समर्थन किया है।
थॉर्नडाइक के अनुसार जब हम किसी कार्य को सीखते हैं तो हमारे सामने एक विशेष उद्दीपक (Stimulus) होता है। यह उद्दीपक हमें एक विशेष प्रकार की प्रतिक्रिया (Response) करने के लिए प्रेरित करता है। इस प्रकार उद्दीपक और प्रतिक्रिया के सम्बन्ध की स्थापना हो जाती है। थॉर्नडाइक ने इसे उद्दीपक-क्रिया-सम्बन्ध बताया है।

उनके अनुसार उद्दीपक-प्रतिक्रिया सम्बन्ध के परिणामस्वरूप जब हम भविष्य के उसी उद्दीपक का पुनः अनुभव करते हैं, तब हम उससे सम्बन्धित उस प्रकार की प्रतिक्रिया करते हैं। यही हमारे सीखने का आधार है। थॉर्नडाइक के अनुसार, “सीखना, सम्बन्ध स्थापित करना है। सम्बन्ध स्थापित करने का कार्य मस्तिष्क करता है।

1. थॉर्नडाइक :
थॉर्नडाइक के इस सिद्धान्त का सार यह है कि जब हम किसी नवीन बात को सीखते हैं, तो हम तत्काल ही उसे नहीं सीख पाते, वरन् हमें उस बात को सीखने के लिए अनेक प्रयास करने पड़ते हैं और इन प्रयासों के दौरान हम कई त्रुटियाँ भी कर सकते हैं। धीरे-धीरे हमारी त्रुटियों में कमी होती जाती है और हम तथाकथित बात को सीख जाते हैं। उदाहरण के लिए—जब एक बालक प्रारम्भ में पढ़ना-लिखना सीखता है

तो आरम्भ में तो एक अक्षर भी ठीक प्रकार से नहीं लिख पाता और न ही वह शब्दों का सही उच्चारण ही कर पाता है, लेकिन ज्यों-ज्यों वह प्रयास करता है, उसकी त्रुटियों या भूलों में कमी आती जाती है और अन्ततः वह अक्षरों का लिखना और शब्दों का सही उच्चारण करना सीख जाता है। इस विधि से मनुष्य और पशु ही अधिक सीखते हैं। थॉर्नडाइक, मैक्डूगल आदि मनोवैज्ञानिकों ने पशुओं पर भी प्रयोग करके इसका सत्यापन किया

2. थॉर्नडाइक का प्रयोग :
थॉर्नडाइक ने प्रयास एवं त्रुटि या भूल एवं प्रयत्न विधि का सत्यापन करने के लिए एक बिल्ली पर प्रयोग किया। उसने एक भूखी बिल्ली को पिंजरे में बन्द कर दिया। इस पिंजरे में एक बटन लगा था जिसके दबाने पर पिंजरे का दरवाजा झटके के साथ खुल जाता था। उसने पिंजरे के बाहर कुछ भोजन रख दिया। भूखी बिल्ली के लिए भोजन उद्दीपक था। अत: भोजन को देखकर बिल्ली में प्रतिक्रिया हुई।

उसने अनेक प्रकार से निकलने का प्रयास किया। अचानक उसका पंजा बटन पर पड़ गया। पिंजरे का दरवाजा झटके के साथ खुल गया और उसने बाहर आकर भोजन चट कर लिया। कुछ काल के बाद जब बिल्ली को पुनः पिंजरे में बन्द किया गया तो वह बिना कोई त्रुटि किये बटन दबाकर दरवाजा खोलने लगी। इस प्रकार उद्दीपक तथा प्रतिक्रिया में सम्बन्ध की स्थापना से बिल्ली ने बटन दबाकर दरवाजा खोलना सीखा।

(संकेत : पावलोव के सम्बन्ध प्रत्यावर्तन के सिद्धान्त को विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 4 के (ब) में देखें।)

प्रश्न 4
सम्बद्ध प्रत्यावर्तन द्वारा सीखने का प्रयोग सहित वर्णन कीजिए और इसकी शैक्षिक उपयोगिता बताइए। [2012, 13]
या
आई० पी०पावलोव द्वारा किये गये प्रयोग को लिखिए और इसकी सहायता से ‘अनुकूलित अनुक्रिया सिद्धान्त का विवेचन कीजिए। इसकी शैक्षिक उपयोगिता भी लिखिए। [2007, 15]
या
कोहलर द्वारा किये गये किसी एक प्रयोग को लिखिए और इसकी सहायता से अन्तर्दृष्टि से सीखने के सिद्धान्त का विवेचन कीजिए।
या
अन्तर्दृष्टि अधिगम सिद्धान्त के प्रयोग द्वारा स्पष्ट कीजिए और इसके शैक्षिक निहितार्थ की भी चर्चा कीजिए। [2007]
या
सूझ द्वारा सीखने की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए और शिक्षा में इसकी उपयोगिता बताइए। [2011]
या
सूझ द्वारा सीखने का अर्थ किसी प्रयोग की सहायता से स्पष्ट कीजिए और उसके शैक्षिक निहितार्थ बताइए। [2007, 09, 10]
या
अधिगम के सम्बन्ध में प्रत्यावर्तन सिद्धान्त की विवेचना कीजिए तथा इसके शैक्षिक निहितार्थों पर प्रकाश डालिए। [2012]
या
शिक्षा में अनुबन्धित प्रतिक्रिया की क्या उपयोगिता है? [2015]
या
सीखने के सूझ सिद्धान्त को समझाइए। [2009, 13]
या
सूझ द्वारा सीखने के सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए और प्रयास तथा त्रटि के सिद्धान्त से इसका अन्तर बताइए। [2016]
उत्तर :
(अ)
सूझ या अन्तर्दृष्टि का सिद्धान्त
सूझ के सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक गेस्टाल्टवादी (Gestaltist) हैं। उनके अनुसार पशु और मनुष्य ‘सम्बन्ध प्रतिक्रिया’ तथा ‘प्रयास एवं त्रुटि’ से न सीखकर सूझ या अन्तर्दृष्टि (Insight) द्वारा सीखते हैं। उनके मतानुसार सर्वप्रथम प्राणी अपने आस-पास की परिस्थिति के विभिन्न क्षेत्रों में पारस्परिक सम्बन्धों की स्थापना करता है और सम्पूर्ण परिस्थिति को समझने का प्रयास करता है। तत्पश्चात् उसके अनुसार अपनी प्रतिक्रिया करता है। दूसरे शब्दों में, ‘सुझ’ द्वारा सीखने का तात्पर्य परिस्थिति को पूर्णतया समझकर सीखना है। गुड (Good) के अनुसार, “समझ, यथार्थ स्थिति का आकस्मिक, निश्चित और तत्कालीन ज्ञान है।”

कोहलर का प्रयोग :
सूझ द्वारा सीखने के सिद्धान्त का प्रतिपादन करने के लिए कोहलर (Kohler) ने छह वनमानुषों को एक कमरे में बन्द कर दिया। कमरे की छत पर केलों का एक गुच्छा लटका दिया गया तथा कमरे के एक कोने में एक बॉक्स भी रख दिया गया। समस्त वनमानुष केलों को प्राप्त करने के प्रयास करने लगे, परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली। उनमें से एक वनमानुष इधर-उधर घूमकर बॉक्स के पास पहुँच गया। तत्पश्चात् उसने बॉक्स को पकड़कर खींचा और उसे केलों के नीचे ले जाकर रख दिया तथा बॉक्स के ऊपर खड़े होकर उसने केलों के गुच्छे को उतार कर खा लिया।

इस प्रकार वनमानुष अपनी सूझ के आधार पर सीखते हैं। प्रत्येक कार्य या क्रिया के सीखने में हमें सूझ का प्रयोग करना पड़ता है। विभिन्न समस्याओं का हल भी सूझ के माध्यम से होता है। प्रायः देखा गया है कि किसी ऊँचे स्थान पर रखी मिठाई को बालक वनमानुष की विधि द्वारा ही प्राप्त करते हैं। कोफ्का के अनुसार, “सूझ में व्यक्ति चिन्तन, तर्क तथा कल्पना शक्ति से विशेष काम लेता है, जिस व्यक्ति में जितनी कल्पना-शक्ति होगी, उतनी ही उसमें सूझ होगी।” अल्प स्थान में ही एक इंजीनियर अपनी सूझ से विशाल भवन निर्मित कर देता है।

[संकेत : सीखने के सूझ-सिद्धान्त के शैक्षिक महत्त्व का विवरण अतिलघु उत्तरीय प्रश्न संख्या 5 में तथा प्रयास तथा त्रुटि के महत्त्व का विवरण भी अतिलघु उत्तरीय प्रश्न 4 में देखें।]

(ब)
सम्बन्ध प्रतिक्रिया का सिद्धान्त
जब स्वाभाविक उत्तेजक या उद्दीपक (Stimulus) को देखकर प्रतिक्रिया होती है, तब वह सहज क्रिया (Reflex Action) कहलाती है, परन्तु जब अस्वाभाविक उत्तेजक के कारण प्रतिक्रिया होती है तो उसे सम्बन्ध सहज क्रिया या सम्बन्ध प्रतिक्रिया कहा जाता है। उदाहरण के लिए, थाली में रखे भोजन को देखकर कुत्ते के मुख से लार टपकना एक प्रकार की सहज क्रिया है, परन्तु जब किसी अन्य अस्वाभाविक उत्तेजक के कारण लार टपकने लगे तो यह सम्बन्ध प्रतिक्रिया है। लैडेल (Ledell) के अनुसार, “सम्बन्ध सहज क्रिया में कार्य के प्रति स्वाभाविक उत्तेजक के स्थान पर एक प्रभावहीन उत्तेजक होता है, जो कि स्वाभाविक उत्तेजक से सम्बन्धित किये जाने के कारण प्रभावपूर्ण हो जाता है।

इस प्रकार सम्बन्ध प्रतिक्रिया के सिद्धान्त में अस्वाभाविक उत्तेजक के प्रति स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है।

पावलोव का प्रयोग :
पावलोव (Pavlov) रूस का प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक था। उसी ने सम्बन्ध प्रतिक्रिया के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। इस विषय में उसके द्वारा कुत्ते पर किया गया परीक्षण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह हम सब जानते हैं कि भोजन को देखकर कुत्ते की लार टपकने लगती है। पॉवलोव ने भोजन देते समय घण्टी बजवाई। भोजन और घण्टी की प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप कुत्ते के मुख से लार टपकने लगी। इसी प्रकार घण्टी के प्रति कुत्ते की प्रतिक्रिया सम्बन्ध सहज क्रिया कहलाई। इसे निम्नलिखित ढंग से समझाया जा सकता है

भोजन (स्वाभाविक उत्तेजक) – प्रतिक्रिया → “लार टपकना”
भोजन (स्वाभाविक उत्तेजक), घण्टी बजाना (अस्वाभाविक उत्तेजक) – प्रतिक्रिया → “लार टपकना”।
कुत्ते के समान ही मनुष्य भी ‘सम्बन्ध प्रतिक्रिया द्वारा सीखता है। उदाहरण के लिए-हम वुडवर्ड (woodword) द्वारा किया गया परीक्षण प्रस्तुत करते हैं। एक वर्ष के बालक को खरगोश दिखाया गया। बालक खरगोश को देखकर प्रसन्न होकर उसे पकड़ने के लिए लपका। जैसे ही वह खरगोश के निकट आया, एक जोरदार धमाका किया गया। परिणामस्वरूप बालक भयभीत होकर पीछे हट गया। इस प्रयोग को अनेक बार दोहराया गया। बाद में बिना धमाके की आवाज के केवल खरगोश को देखकर ही बालक डरने लगा।

सिद्धान्त का महत्त्व शिक्षा के क्षेत्र में इस सिद्धान्त के महत्त्व से सम्बन्धित निम्नलिखित तथ्य प्रस्तुत किये जा सकते हैं

  1. पावलोव के अनुसार, “विभिन्न प्रकार की आदतें, जो कि प्रशिक्षण, शिक्षा और अनुशासन पर निर्भर प्रतिक्रिया की श्रृंखला मात्र हैं।”
  2. व्यक्ति का प्रत्येक व्यवहार सम्बन्ध प्रतिक्रिया के सिद्धान्त पर आधारित है। हमारी दैनिक आदतें भी इसी सिद्धान्त पर निर्भर करती हैं।
  3. इस सिद्धान्त के आधार पर बालकों में अच्छी आदतों का विकास किया जा सकता है।
  4. यह सिद्धान्त सीखने की स्वाभाविक विधि पर प्रकाश डालता है।
  5. इस सिद्धान्त के द्वारा बालकों को वातावरण के अनुकूल सामंजस्य स्थापित करने की शिक्षा दी जा सकती है।
  6. इस सिद्धान्त की सहायता से बालकों के भय सम्बन्धी रोगों का निदान किया जा सकता है।
  7. इस सिद्धान्त के द्वारा बालकों की संवेगात्मक अस्थिरता दूर की जा सकती है।
  8. यह सिद्धान्त उन बालकों के लिए उपचार प्रस्तुत करता है, जो मानसिक रूप से अस्वस्थ होते हैं।
  9. जिन विषयों में चिन्तन की आवश्यकता नहीं पड़ती है, उनके लिए यह सिद्धान्त बहुत उपयोगी है; जैसे—अक्षर विन्यास, सुलेख आदि।

आलोचना :
अनेक मनोवैज्ञानिकों ने निम्नलिखित तर्कों के आधार पर इस सिद्धान्त की आलोचना की है

  1. सम्बन्ध प्रतिक्रिया में अस्थायित्व होता है।
  2. इस सिद्धान्त को प्रतिष्ठदन मुख्यतया बालकों और पशुओं पर किये गये प्रयोगों के आधार पर किया गया है। वयस्क व्यक्तियों के सम्बन्ध में यह मौन है।
  3. यह सिद्धान्त यान्त्रिकता पर अधिक बल देता है और व्यक्ति को केवल एक यन्त्र मानकर चलता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
सीखने की प्रक्रिया के मुख्य तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
सीखने की प्रक्रिया सरल नहीं होती है। इसलिए इसे आसानी से समझना सम्भव नहीं है। विश्लेषण करने पर सीखने की प्रक्रिया में निम्नलिखित तत्त्व मिलते हैं

1. उत्तेजना-अनुक्रिया :
सीखना अर्जित होता है। इस दृष्टि से व्यक्ति को अपने पर्यावरण में कुछ उत्तेजना अवश्य मिलती है और उसके प्रति अनुक्रिया होती है। इस प्रकार सीखने की प्रक्रिया में उत्तेजना तथा अनुक्रिया होती है।

2. उद्देश्य और लक्ष्य :
सीखना एक सोद्देश्य प्रक्रिया है। जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति तथा समाज में सम्मान आदि पाने के उद्देश्य से व्यक्ति सीखता है।

3. अभिप्रेरणा :
सीखना अर्जित अवश्य होता है, परन्तु इसके लिए कुछ-न-कुछ अभिप्रेरण होना। चाहिए। छात्र सीखने के लिए प्रयत्न इसलिए करता है कि उसे परीक्षा पास करने पर नौकरी और सम्मान मिल सकता है।

4. प्रत्यक्षीकरण :
सीखने में प्रत्यक्षीकरण होना आवश्यक है। यदि छात्र को अपने लक्ष्य एवं प्रयत्न के परिणाम स्पष्ट दिखलाई देने लगते हैं तो सीखना सरल और सफल भी होता है और छात्र उसमें लगा रहता है।

5. पुनर्बलन :
पुनर्बलन की क्रिया से व्यक्ति सीखने के लिए बाध्य हो जाता है और उसे बल भी प्राप्त होता है। छात्र को शिक्षक का आदेश, दूसरों की प्रतिस्पर्धा, सामाजिक प्रतिष्ठा आदि से शक्ति मिलती है।

6. एकीकरण :
सीखने में व्यक्ति को अपने ध्यान को विभिन्न वस्तुओं में एकीकृत करना पड़ता है। और किसी प्रयोजन के साथ उनको ग्रन्थित करना पड़ता है, जिससे सफलता मिलती है।

7. साहचर्य :
सीखने की प्रक्रिया में व्यक्ति अपने पूर्व अनुभव ज्ञान से नये अनुभव ज्ञान का साहचर्य कर लेता है। हरबर्ट ने अपने प्रशिक्षण में इसे अपनाया है।

8. अनुकूलन :
सीखने की प्रक्रिया में अनुकूलन एक आवश्यक तत्त्व होता है। छात्र की प्रकृति का सीखने की सामग्री के साथ अनुकूलन होना चाहिए, अन्यथा सीखना सम्भव नहीं होगा। छात्र की क्षमता सीखने की सामग्री को भी अपने अनुकूल बना लेती है, यदि छात्र प्रयत्न करता है।

9. संपरिवर्तन :
सीखने की प्रक्रिया के फलस्वरूप संपरिवर्तन होता है और मूल व्यवहार शिष्ट एवं परिमार्जित हो जाते हैं।

प्रश्न 2
परिपक्वता तथा सीखने में क्या सम्बन्ध है ?
उत्तर :
हमें बात है कि सीखना, व्यवहारे परिवर्तन या व्यवहार अर्जन की एक प्रक्रिया है। किसी व्यक्ति का व्यवहार परिवर्तन या तो परिपक्वता के कारण होता है या किसी नयी बात को ग्रहण करने के कारण। परिवर्तन की प्रक्रिया में नयी-नयी क्रियाएँ और व्यवहार प्रदर्शित तथा विकसित होते रहते हैं। परिपक्वता शारीरिक विकास की प्रक्रिया है, जिसके अन्तर्गत बढ़ती हुई आयु के साथ, शरीर व स्नायुमण्डल का विकास, सीखने की सामर्थ्य को जन्म देता है।

स्पष्टतः सीखने के परिणामस्वरूप व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन आता है। परिपक्वता की प्रक्रिया सीखने से पूर्व की स्थिति है तथा यह सीखने का आधार है। परिपक्वता के अभाव में किसी क्रिया को सीखना न केवल दुष्कर अपितु असम्भव है। वस्तुतः परिपक्वता किसी व्यवहार को अर्जित करने (सीखने) की एक पूर्व आवश्यकता है।

मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से ज्ञात होता है कि मानव के विकास की प्रक्रिया में परिपक्वता और सीखना दोनों की सशक्त भूमिका है। यदि परिपक्वता के अभाव में सीखना सम्भव नहीं है तो सीखने के अभाव में व्यक्ति की परिपक्वता भी निरर्थक है। समुचित परिपक्वता ग्रहण कर यदि कोई मनुष्य व्यक्तिगत या सामाजिक जीवन के लिए उपयोगी व्यवहार या क्रियाएँ सीखता है तो इसे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण समझा जाएगा। इस भाँति परिपक्वता और सीखने में गहरा सम्बन्ध है।

प्रश्न 3
परिपक्वता तथा सीखने में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
परिपक्वता तथा सीखने में अन्तर को निम्नलिखित तालिका के माध्यम से दर्शाया जा सकता है।
UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 18 Learning Meaning, Process, Laws and Methods image 1
UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 18 Learning Meaning, Process, Laws and Methods image 2

प्रश्न 4
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के नियमों की विवेचना कीजिए। उपयुक्त उदाहों सहित अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए।
या
थॉर्नडाईक के सीखने के मुख्य नियमों का वर्णन कीजिए। [2007, 11, 12, 13, 15, 16]
उत्तर :
सीखने के नियमों को सर्वप्रथम व्यवस्थित ढंग से थॉर्नडाइक ने प्रस्तुत किया था, इसीलिए इन्हें थॉर्नडाइक के सीखने के नियमों के रूप में जाना जाता है। थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के मुख्य नियम तीन हैं

  1. सीखने का तत्परता का नियम्
  2. सीखने का अभ्यास का नियम तथा
  3. सीखने का प्रभाव का नियम।

सीखने का तत्परता को नियम
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित तत्परता का नियम बताता है कि जब कोई भी व्यक्ति सीखने के लिए मानसिक रूप से तत्पर होता है (अर्थात् तैयार रहता है) तो सीखने की क्रिया सरलता और शीघ्रता से सम्पन्न होती है। व्यक्ति जिसे समय किसी कार्य को सीखने की धुन में रहता है तो वह सीखने में आनन्द का अनुभव करता है। बांलक में किसी नवीन ज्ञानं या क्रिया को सीखने की तत्परता तभी आती है जब उसमें रुचि होती है और उसके अन्दर सीखने के लिए प्रेरणा उत्पन्न कर दी जाए।

अतः शिक्षक को पाठ शुरू करने से पूर्व बालक की रुचि और जिज्ञासा पर ध्यान देना चाहिए तथा उन्हें सीखने के लिए प्रेरित करना चाहिए। कुछ विद्यार्थियों की किसी विशेष विषय में रुचि नहीं होती जिसकी वजह से तत्परता के नियम की अवहेलना हो सकती है। तत्परता का नियम कुछ निष्कर्षों को महत्त्व देता हैं। प्रथम, इस नियम के अनुसार सीखने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहने की दशा में विद्यार्थी को अधिक प्रयास नहीं करना पड़ता और सीखने की प्रक्रिया सन्तोषजनक रहती है।

द्वितीय, यदि व्यक्ति सीखने के लिए विवश नहीं है और पूर्णरूप से भी तत्पर है तो सीखने में अत्यधिक सन्तुष्टि प्राप्त होगी। तृतीय, सीखने के लिए बलपूर्वक विवश किये जाने पर अरुचि के कारण कार्य असन्तोषजनक होगा। इस भाँति कहा जा सकता है कि “जब कोई बन्धन किसी कार्य को करने के लिए नहीं होता है तो वह प्रक्रिया आनन्द देती है। और जब सीखने की इच्छा नहीं होती तो व्यक्ति सीखने को तैयार नहीं होता तथा उसे बाध्य किया जाता है, तब क्रोध उत्पन्न होता है।”

[संकेत : सीखने के द्वितीय एवं तृतीय नियम का विवरण अगले प्रश्नों (प्रश्न सं० 5 व 6) में देखिए।]

प्रश्न 5
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के ‘अभ्यास के नियम का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने का दूसरा मुख्य नियम है-अभ्यास का नियम। इसे उपयोग-अनुपयोग का नियम (Law of Use-Disuse) भी कहते हैं। थॉर्नडाइक का विचार है कि अन्य बातें समान रहने पर सीखने की प्रक्रिया में अभ्यास के द्वारा शक्ति में वृद्धि होती है, जबकि अभ्यास की कमी स्थिति और प्रतिक्रिया के सम्बन्ध को कमजोर बना देती है।

हमारी बहुत-सी प्रतिक्रियाओं में उपयोग तथा अनुपयोग के नियम साथ-साथ कार्य करते हैं। हम स्वतन्त्र भाव से उन्हीं उपयोगी क्रियाओं को दोहराते हैं जिनसे हमें आनन्द मिलता है तथा उन अनुपयोगी क्रियाओं को नहीं दोहराते जिनसे हमें दुःख होता है।

अभ्यास के नियम से स्पष्ट है कि जिस काम को जितना अधिक दोहराया जाएगा, जितनी ही उसकी पुनरावृत्ति की जाएगी, उतनी ही दृढ़ता से वह हमारे मन में बैठ जाता है और उसके करने में उतनी ही कुशलता आ जाती है। गायन, खेल, कविता, पहाड़े तथा गणित आदि से सम्बन्धित नियम सिखाने के उपरान्त बालकों को उनका अभ्यास अवश्य करा देना चाहिए।

प्रश्न 6
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के प्रभाव के नियम का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने का तीसरा मुख्य नियम है 
प्रभाव का नियम (Law of effect)। प्रभाव के नियम को सन्तोष और असन्तोष का नियम भी कह्ते हैं। थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित इस नियम में प्रभावे से तात्पर्य ‘परिणाम’ से है। जिन कार्यों का परिणाम व्यक्ति को सन्तोष प्रदान करता है। तथा उसे सुखद अनुभव देता है-उन कार्यों को मनुष्य सरलता से एवं शीघ्र ही सीख जाता है। इसके विपरीत जिन कार्यों का परिणाम असन्तोषजनक तथा दु:खद अनुभव वाला होता है, उन्हें व्यक्ति भुला, देना चाहता है और बार-बार दोहराना नहीं चाहता।

इसी सन्दर्भ में जिस कार्य को करने से व्यक्ति को प्रशंसा एवं पुरस्कार मिले यानि जिस कार्य का अच्छा प्रभाव (परिणाम) निकले, उसे बालक शीघ्रतापूर्वक सीख जाता है। इसी कारण से शिक्षा में दण्ड एवं पुरस्कार को बहुत अधिक महत्त्व है। बुरा कार्य करने पर बालक दण्ड पाता है किन्तु अच्छे कार्य के लिए उसे पुरस्कृत किया जाता है। प्रभाव का नियम विद्यालय तथा परिवार में पर्याप्त रूप से प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 7
सीखने के पठार से आप क्या समझते हैं।
उत्तर :
जब बालक किसी क्रिया को सीखता है तो उसके सीखने की गति सदा एक-सी नहीं रहती, उसमें उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। सीखते समय कुछ काल तक तो ऐसा लगता है कि उस क्रिया को सीखने में पर्याप्त प्रगति हो रही है, परन्तु कुछ काल के पश्चात् ऐसा ज्ञान होने लगता है कि मानो सीखने की प्रगति में बाधा आ गयी है। सीखने में इस प्रकार की अवस्था को ही पठार कहते हैं।

दूसरे शब्दों में, सीखने की प्रक्रिया के बीच में प्रगति का रुक जाना पठार कहलाता है। इस प्रकार का अवरोध प्रायः संगीत, चित्रकला, टंकण आदि सीखने में आता है। रॉस (Ross) के अनुसार, “सीखने की प्रक्रिया की एक प्रमुख विशेषता पठार है। पठार उस अवधि की ओर संकेत करते हैं, जब सीखने की प्रक्रिया में कोई प्रगति नहीं होती है।”

प्रश्न 8
सीखने के पठार के उत्पन्न होने के कारणों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
सीखने में पठारों के आने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं

  1. जब शारीरिक क्षमता कम हो जाती है, तब सीखने में पठार बन जाता है।
  2. जब उत्साह कम हो जाता है, तब उसके सीखने की प्रगति में अवरोध हो जाता है।
  3. जब बालकों का ध्यान इधर-उधर भटकने लगता है, तब पठार बनने लगते हैं।
  4. लगातार कार्य करते रहने से थकान उत्पन्न हो जाती है और पठार बन्ने लगते हैं।
  5. सीखने की विधि में निरन्तर परिवर्तन करते रहने से भी पठार बन जाते हैं।
  6. दूषित वातावरण भी पठारों के बनने का एक प्रमुख कारण है।
  7. जब बालक सम्पूर्ण कार्य पर ध्यान न देकर उसके एक भाग पर ही ध्यान देने लगता है, तब उसके सीखने में पठार आ जाता है।
  8. जब कोई क्रिया आरम्भ में सरल होती है, परन्तु बाद में कठिन तथा जटिल हो जाती है, तब सीखने में पठार आ जाता है।
  9. सीखने की अनुचित विधि भी पठारों का कारण होती है। जब प्रभावहीन विधियों का प्रयोग किया जाता है, तब सीखने में पठार पैदा होने लगते हैं।
  10. जब पुरानी आदतों को नयी आदतों में संघर्ष प्रारम्भ हो जाता है, तब भी सीखने में पठार बन जाते हैं।
  11. रायबर्न (Ryburm) के अनुसार, “प्रत्येक व्यक्ति में अधिकतम कुशलता होती है, जिससे आगे वह अग्रसर नहीं हो सकता। यही शारीरिक सीमा कहलाती है। जब व्यक्ति इस सीमा पर पहुँच जाता है, तब उसके सीखने के पठार बन जाते हैं।”

प्रश्न 9
सीखने के पठार के निराकरण के उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
पठार सीखने वाले व्यक्ति की प्रगति में बाधा डालकर उसके समय को नष्ट करते हैं। ऐसी दशा में उनके निराकरण पर विचार करना अत्यन्त आवश्यक है।

पठारों के निराकरण के लिए। निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना आवश्यक है

  1. शिक्षक का कर्तव्य है कि जब बालक सीखने में उत्साह को प्रदर्शन न कर रहे हों, तो उन्हें उचित तरीके से सीखने के लिए प्रेरित किया जाए।
  2. पठार का कारण विषय को कठिन व गहन होना भी है। अत: विषय को यथासम्भव सरल बनाकर प्रस्तुत किया जाए।
  3. कार्य को सीखने की उचित विधि अपनायी जाए।
  4. सीखने की क्रिया के बीच में विषयान्तर न किया जाए।
  5. सीखने के लिए उचित वातावरण सृजन किया जाए।
  6. सीखने वाले बालकों के वैयक्तिक भेद या क्षमताओं पर ध्यान दिया जाए तथा उसी के अनुसार उन्हें प्रेरणा तथा विश्राम दिया जाए।
  7. जब एक विधि से बालकों की सीखने की प्रगति रुक जाए तो शिक्षक को उसी के अनुकूल नवीन विधि का प्रयोग करना चाहिए।
  8. किसी प्रबल प्रेरक को अपनाकर भी सीखने के पठार का निराकरण किया जा सकता है। प्रेरण एक ऐसा कारक है जो सीखने को गति प्रदान कर सकता है।

प्रश्न 10
सीखने के अनुकरण के सिद्धान्त का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर :
1. अनुकरण के सिद्धान्त का तात्पर्य है :
‘अन्य व्यक्तियों के कार्यों को देखकर वैसा ही करके, सीखना।’ दूसरे शब्दों में, हम अनेक बातें अनुकरण के द्वारा सीखते हैं। जब व्यक्ति एक-दूसरे का अनुकरण करके सीखता है तो उसे अनुकरण का सिद्धान्त कहते हैं। बालक अनेक बातें अनुकरण के द्वारा ही सीखता है। बोलना, चलना तथा अनेक बातें अनुकरण के द्वारा ही सीखी जाती हैं।

2. हेगार्टी :
(Hagarty) ने बन्दरों पर प्रयोग करके यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि अनुकरण द्वारी सीखना, प्रयास एवं त्रुटि द्वारा सीखने की अपेक्षा उच्चकोटि का है, परन्तु थॉर्नडाइक के इस सिद्धान्त की कटु आलोचना की है। उनके अनुसार इसका प्रयोग सभी प्रकार के पशुओं पर नहीं किया जा सकता है।

3. सिद्धान्त का महत्त्व :
शिक्षा के क्षेत्र में इस सिद्धान्त का महत्त्व इस प्रकार है।

  • रचनात्मक कार्यों को सीखने के लिए यह सिद्धान्त बहुत उपयोगी है।
  • बालकों में अनुकरण की प्रवृत्ति तीव्र होती है। अत: अनुकरण द्वारा उन्हें अच्छी-अच्छी बातें सिखायी जा सकती हैं।
  • चेतन-मन से किया गया अनुकरण अच्छी आदतों के निर्माण में सहायक होता है।
  • यह सिद्धान्त बालकों के बौद्धिक विकास में सहायक है।
  • शिक्षकों तथा अभिभावकों के आदर्श चरित्र का अनुकरण करके बालक अपने चरित्र का निर्माण करते हैं।
  • मन्दबुद्धि बालकों की शिक्षा में यह सिद्धान्त बहुत उपयोगी है।

प्रश्न 11
सीखने के ‘अन्तसँझ सिद्धान्त को परिभाषित कीजिए! [2016]
उत्तर :
गैस्टाल्टवादी मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, प्राणी अपनी सूझ या अन्तर्दृष्टि (Insight) के द्वारा ही सीख पाता है और सूझ के अभाव में वह सीखने में असफल रहता है। उविकास की प्रक्रिया के अन्तर्गत सूझ निम्न स्तर के प्राणियों से उच्च स्तर के प्राणियों की ओर वृद्धि करती है। चूहे, बिल्ली, कुत्ते की अपेक्षा वनमानुष में तथा इने सबसे ज्यादा मनुष्य में सूझ पायी जाती है। सूझ के कारण ही उच्च स्तर के प्राणी जटिल कार्य करने में समर्थ होते हैं।

गैस्टाल्टवादियों का कहना है कि सीखने की प्रक्रिया प्रयत्न एवं भूल अथवा सम्बद्ध प्रत्यावर्तन के अनुसार न होकर सूझ द्वारा होती है। इस विचारधारा के प्रवर्तके कोहलर (Kohler) तथा कोफ्का (Koffika) थे। सूझ या अन्तर्दृष्टि मनुष्य जैसे विकसित प्राणी का प्रमुख लक्षण है। मानव के निकटवर्ती विकसित प्राणियों तथा वनमानुष और चिम्पैन्जी में भी सूझ की क्षमता निहित होती है। कोहलर तथा कोफ्का के अनुसार हमारा सीखना सूझ के द्वारा होता है और सीखने की लगभग सभी प्रतिक्रियाओं में सूझ की आवश्यकता पड़ती है।

इस सिद्धान्त की प्रमुख विशेषता यह है कि सीखने की प्रत्येक क्रिया का कुछ-न-कुछ उद्देश्य अवश्य होता है तथा सीखने के समस्त प्रयास लक्ष्य द्वारा निर्देशित होते हैं। लक्ष्य में विविध बाधाएँ उत्पन्न होने पर सूझ की आवश्यकता होती है।प्रत्येक बाधा व्यक्ति को नवीन परिस्थिति से अवगत कराती है और वह उस परिस्थिति के विभिन्न अंगों में परस्पर सम्बन्ध स्थापित करता है उन्हें समझने की कोशिश करता है।

तत्पश्चात् व्यक्ति समूची परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए उसके अनुसार प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। किसी परिस्थिति विशेष को समझकर उसके अनुसार प्रतिक्रिया करना ही व्यक्ति की सूझ का द्योतक है। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप व्यक्ति जो व्यवहार सीखता है, उसे सूझ या अन्तर्दृष्टि द्वारा सीखना (Learning by Insight) कहते हैं।

प्रश्न 12
सीखने की प्रयत्न (प्रयास) एवं भूल (त्रुटि) विधि तथा सूझ विधि के अन्तर को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
सीखने की प्रयत्न एवं भूल विधि तथा सूझ विधि का अन्तर निम्नलिखित तालिका में वर्णित हैं।
UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 18 Learning Meaning, Process, Laws and Methods image 3
UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 18 Learning Meaning, Process, Laws and Methods image 4

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
सीखना किसे कहते हैं? [2010, 15]
उत्तर :
व्यक्ति के व्यवहार में होने वाले ऐच्छिक परिवर्तन को सीखना कह सकते हैं। सीखने की प्रक्रिया को सम्बन्ध नयी क्रियाओं से होता है तथा इस क्रिया द्वारा सीखी गयी बातों का अन्य बातों पर भी प्रभाव पड़ता है। सीखने की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप व्यक्ति के व्यवहार में एक प्रकार की परिपक्वता भी आती है। इन्हीं तथ्यों को गिलफोर्ड ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “हम इस शब्द की परिभाषा विस्तृत रूप में यह कहकर कर सकते हैं कि सीखना व्यवहार के परिणामस्वरूप, व्यवहार में कोई भी परिवर्तन है।”

प्रश्न 2
सीखने की प्रक्रिया पर व्यक्ति के शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य का क्या प्रभाव प्रड़ता है?
उत्तर :
सीखने की तीव्रता व्यक्ति के शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य अच्छा न होने पर ज्ञानेन्द्रियाँ ठीक काम नहीं कर पातीं, व्यक्ति रुचि लेकर कार्य नहीं करता और जल्दी ही थक जाता है। जो व्यक्ति देखने, सुनने, बोलने आदि क्रियाओं में निर्बल होते हैं, वे सीखने में पर्याप्त उन्नति नहीं कर पाते। वस्तुतः सीखने की प्रक्रिया का भौतिक और शारीरिक आधार स्नायु संस्थान है।

स्नायु संस्थान के अन्तर्गत मस्तिष्क और स्नायु आते हैं जिनके कार्य करने की शक्ति पर सीखने की प्रक्रिया निर्भर करती है। मस्तिष्क और स्नायु की शक्ति, व्यक्ति के स्वास्थ्य पर निर्भर है। स्पष्टतः सीखने की क्रिया शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के सीधे रूप में प्रभावित होती है।

प्रश्न 3
सीखने में प्रेरणा का क्या योगदान है? [2007, 08, 09]
उत्तर :
सीखने में प्रेरणा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। सीखने में उन्नति लाने की दृष्टि से उसे प्रेरणायुक्त एवं प्रयोजनशील बना देना चाहिए। प्रेरणायुक्त व्यवहार उत्साह के कारण सीखने की प्रक्रिया को तीव्र कर देता है। अतः शीघ्र प्रेरणा से सीखने की गति में तीव्रता आती है। प्रेरणा का सम्बन्ध लक्ष्य या प्रयोजन । से है। यदि सीखने का लक्ष्य अच्छा है तो व्यक्ति उसे शीघ्र सीखने के लिए प्रेरित होता है। अतएव सीखने की प्रक्रिया को त्वरित करने के लिए उसे उद्देश्यपूर्ण एवं प्रेरणायुक्त कर देना उचित है।

प्रश्न 4
प्रयास एवं त्रुटि द्वारा सीखने के महत्व को स्पष्ट कीजिए।
या
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने की विधि की शैक्षिक उपयोगिता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के सिद्धान्त एवं विधि का विशेष शैक्षिक महत्त्व है। इस विधि के महत्त्व का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है।

  1. इस सिद्धान्त को अपनाकर बालक को परिश्रमी बनाया जा सकता है।
  2. यह सिद्धान्त बालकों में धैर्य का पाठ पढ़ाता है।
  3. मन्दबुद्धि के बालकों के लिए यह सिद्धान्त बहुत उपयोगी है।
  4. इस सिद्धान्त के आधार पर बालक जो कुछ भी सीखता है, वह उसके मस्तिष्क में स्थायी हो जाता है।
  5. गणित और विज्ञान जैसे विषयों के लिए इसका प्रयोग सफलतापूर्वक किया जा सकता है।
  6. इस सिद्धान्त के आधार पर सीखने से बालक विभिन्न समस्याओं का समाधान करना सीखते हैं।

प्रश्न 5
सूझ द्वारा सीखने के सिद्धान्त के शैक्षिक महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
शिक्षा में ‘सूझ द्वारा सीखने के सिद्धान्त का निम्नलिखित कारणों से विशेष महत्त्व है।

  1. यह सिद्धान्त बालकों की कल्पना-शक्ति और तर्क-शक्ति का विकास करता है।
  2. विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए इस सिद्धान्तं का प्रयोग प्रभावशाली तरीके से किया जा सकता है।
  3.  यह सिद्धान्त बालकों को स्वयं ज्ञान को खोजने के लिए प्रेरित करता है।
  4. गणित के शिक्षण में भी इस सिद्धान्त का प्रयोग विशेष उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
  5. ड्रेवर (Drever) के अनुसार, यह सिद्धान्त बालकों को निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति में उचित व्यवहार की चेतना प्रदान करता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
सीखने से क्या आशय है?
उत्तर :
व्यक्ति के व्यवहार में होने वाले प्रत्येक परिवर्तन को सीखना माना जाता है।

प्रश्न 2
सीखने की स्किनर द्वारा प्रतिपादित परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
“सीखना व्यवहार में प्रगतिशील सामंजस्य की प्रक्रिया है।” [ स्किनर ]

प्रश्न 3
सीखने की प्रक्रिया की चार मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. सीखना व्यवहार में होने वाला परिवर्तन है
  2. सीखने की प्रक्रिया जीवनपर्यन्त चलती है
  3. सीखना सक्रिस होता है तथा
  4. सीखना अनुभवों का संगठन है।

प्रश्न 4
सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले चार मुख्य कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक हैं

  1. वातावरण
  2. शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य
  3. सीखने की इच्छा तथा
  4. प्रबल प्रेरणा।

प्रश्न 5
सीखने के मुख्य नियम किसने प्रतिपादित किये हैं। [2007]
उत्तर :
सीखने के मुख्य नियम थॉर्नडाइक ने प्रतिपादित किये हैं।

प्रश्न 6
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के मुख्य नियम कौन-कौन-से है।
उत्तर :
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के मुख्य नियम हैं

  1. तत्परता का नियम
  2. अभ्यास का नियम तथा
  3. प्रभाव का नियम

प्रश्न 7
शारीरिक परिपक्वता का क्या अर्थ है?
उत्तर :
शरीर के अंगों को विकसित तथा सुदृढ़ या पुष्ट होना ही शारीरिक परिपक्वता है।

प्रश्न 8
सीखने की प्रक्रिया पर परिपक्वता का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
सीखने की प्रक्रिया के लिए शरीर का परिपक्व होना अति आवश्यक है।

प्रश्न 9
थॉर्नडाइक ने सीखने की किस विधि का समर्थन किया है?
उत्तर :
थॉर्नडाइक ने सीखने का प्रयास एवं त्रुटि विधि’ का समर्थन किया है।

प्रश्न 10
थॉर्नडाइक ने पिंजरे में अपना प्रयोग किस पर किया ? [2007, 11]
उत्तर :
बिल्ली, पर।

प्रश्न 11
सीखने के सूझ अथवा अन्तर्दृष्टि के सिद्धान्त के मुख्य प्रतिपादक कौन थे? [2014]
उत्तर :
सीखने के सूझे अथवा अन्तर्दृष्टि के सिद्धान्त के मुख्य प्रतिपादक कोहलर थे।

प्रश्न 12
सीखने के सम्बन्ध प्रतिक्रिया सिद्धान्त के मुख्य प्रतिपादक कौन थे?
उत्तर :
सीखने के सम्बन्ध प्रतिक्रिया सिद्धान्त के मुख्य प्रतिपादक रूसी विद्वान पावलोव थे।

प्रश्न 13
सामान्य जीवन में व्यक्तियों द्वारा सीखने के लिए किस विधि को सर्वाधिक अपनाया जाता है?
उत्तर :
सामान्य जीवन में व्यक्तियों द्वारा सीखने के लिए अनुकरण विधि’ को सर्वाधिक अपनाया जाता है।

प्रश्न 14
सीखने के पठार से क्या आशय है।
उत्तर :
व्यक्ति के सीखने की दर का स्थिर हो जाना अर्थात् सीखने के दर में वृद्धि न होना ही सीखने का पठार कहलाता है।

प्रश्न 15
सीखने के पठार के निराकरण का सर्वाधिक प्रभावकारी उपाय क्या है?
उत्तर :
सीखने के पठार के निराकरण का सर्वाधिक प्रभावकारी उपाय है-किसी प्रबल प्रेरणा को उत्पन्न करना।

प्रश्न 16
सीखने का मुख्य कारण क्या है? [2015]
उत्तर :
सीखने का मुख्य कारण प्रेरणा है।

प्रश्न 17
“व्यवहार के अर्जन में उन्नति की प्रक्रिया को सीखना कहते हैं।” यह परिभाषा किसने दी है ? [2011]
उत्तर :
प्रस्तुत परिभाषा स्किनर द्वारा प्रतिपादित है।

प्रश्न 18
थॉर्नडाइक ने अधिगम के कितने नियम प्रतिपादित किये हैं। [2014]
उत्तर :
थॉर्नडाइक ने अधिगम के तीन मुख्य नियम प्रतिपादित किये हैं

  1. तत्परता का नियम
  2. अभ्यास का नियम तथा
  3. प्रभाव का नियम

प्रश्न 19
“हम झरके सीखते हैं।” यह किसने कहा है? [2014, 15]
उत्तर :
थॉर्नडाइक ने।

प्रश्न 20
थॉर्नडाइक के अभ्यास के नियम के कितने उपनियम हैं ? [2007]
उत्तर :
थॉर्नडाइक के अभ्यास के नियम के तीन उपनियम हैं

  1. पुनरावृत्ति का नियम
  2. नवीनता का नियम तथा
  3. अनुपयोग का नियम।

प्रश्न21
“व्यवहार के कारण व्यवहार में परिवर्तन ही सीखना है।” यह परिभाषा किसने दी है? [2009]
उत्तर :
गिलफोर्ड ने।

प्रश्न 22
सीखने की प्रक्रिया में उस दशा को क्या कहते हैं, जब व्यक्ति की सीखने की दर स्थिर हो जाती है? [2009]
उत्तर :
सीखने का पठार।

प्रश्न 23
अधिगम में चिम्पैंजी पर किसने प्रयोग किया? [2018]
उत्तर :
कोहलर ने।

प्रश्न 24
सीखने का प्रमुख कारक क्या है? [2009, 15]
उत्तर :
सीखने का प्रमुख कारक “अनुकरण” है।

प्रश्न 25
सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले चार प्रमुख शारीरिक कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :

  1. आयु एवं परिपक्वता
  2. लिंग-भेद
  3. स्वास्थ्य तथा
  4. संवेगात्मक स्थिति।

प्रश्न 26
सीखने तथा परिपक्वता में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर :
परिपक्वता सीखने के लिए अनिवार्य शर्त है।

प्रश्न 27
अभिप्रेरणा का सीखने पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
अभिप्रेरणा से सीखने की प्रक्रिया सुचारु एवं सरल हो जाती है।

प्रश्न 28
सीखने के तत्परता के नियम से क्या अभिप्राय है? [2008]
उत्तर :
सीखने के तत्परता के नियम के अनुसार कुछ भी सीखने के लिए व्यक्ति को सर्वप्रथम मानसिक रूप से तैयार होना अनिवार्य है। इस नियम के अनुसार तैयारी या तत्परता सदैव सीखने में सहायक होते हैं।

प्रश्न 29
सीखने के लिए मनुष्यों द्वारा सर्वाधिक किस विधि को अपनाया जाता है?
उत्तर :
अनुकरण विधि।

प्रश्न 30
सीखने की कौन-सी विधि ऐसी है, जिसे प्रमुख रूप से केवल मनुष्यों द्वारा ही अपनाया जाता है?
उत्तर :
सूझ अथवा अन्तर्दृष्टि द्वारा सीखने की विधि।

प्रश्न 31
सीखने की कौन-सी विधि ऐसी है जिसे मनुष्य तथा पशु समान रूप से अपनाते हैं?
उत्तर :
प्रयास एवं त्रुटि द्वारा सीखना

प्रश्न 32
सूझ द्वारा सीखने की विधि को दर्शाने के लिए किस मनोवैज्ञानिक ने महत्त्वपूर्ण प्रयोग किया था तथा उसने यह प्रयोग किस पशु पर किया था?
उत्तर :
सूझ द्वारा सीखने की विधि को दर्शाने के लिए कोहलर नामक मनोवैज्ञानिक ने वनमानुष पर महत्त्वपूर्ण प्रयोग किया था।

प्रश्न 33
कोहलर ने अपना प्रयोग किस पर किया?
उत्तर :
कोहलर ने अपना प्रयोग चिम्पैंजी (वनमानुष) पर किया था।

प्रश्न 34
सम्बद्ध-प्रत्यावर्तन द्वारा सीखने की विधि को सर्वप्रथम किसने दर्शाया था?
उत्तर :
रूस के प्रसिद्ध शरीरशास्त्री पावलोव ने।

प्रश्न 35
पावलोव ने अफ्ना महत्त्वपूर्ण प्रयोग किस पशु पर किया था?
उत्तर :
कुत्ते पर।

प्रश्न 36
निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य

  1. सीखने की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप व्यक्ति के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं होता।
  2. सीखने की प्रक्रिया केवल शैक्षिक-काल में ही होती है।
  3. सीखने की प्रक्रिया जीवन-पर्यन्त चलती रहती है।
  4. प्रेरणा का सीखने की प्रक्रिया पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
  5. परिपक्वता का सीखने की प्रक्रिया से कोई सम्बन्ध नहीं है।

उत्तर :

  1. असत्य
  2. असत्य
  3. सत्य
  4. सत्य
  5. असत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1
“सीखना व्यवहार के परिणामस्वरूप व्यवहार में कोई परिवर्तन है।” यह परिभाषा किसने दी है?
(क) वुडवर्थ ने
(ख) चार्ल्स स्किनर ने
(ग) कॉलविन ने
(घ) गिलफोर्ड ने
उत्तर :
(घ) गिलफोर्ड ने

प्रश्न 2
सम्बद्ध प्रतिक्रिया सिद्धान्त के प्रतिपादक हैं
(क) कोहलर
(ख) स्किनर
(ग) पावलोव
(घ) थॉर्नडाइक
उत्तर :
(ग) पावलोव

प्रश्न 3
बिल्लियों पर प्रयोग किसने किया ?
(क) थॉर्नडाइक ने
(ख) स्किनर ने।
(ग) कोहलर ने
(घ) टरमन ने
उत्तर :
(क) थॉर्नडाइक ने

प्रश्न 4
नवीन अनुबन्धन सिद्धान्त के प्रवर्तक हैं
(क) पावलोव
(ख) थॉर्नडाइक
(ग) कोहलर
(घ) चाल्र्स स्किनर
उत्तर :
(घ) चार्ल्स स्किनर

प्रश्न 5
प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धान्त किसने प्रतिपादित किया ? [2015]
(क) कोहलर ने
|(ख) थॉर्नडाइक ने
(ग) टरमन ने
(घ) स्किनर ने
उत्तर :
(ख) थॉर्नडाइक ने

प्रश्न 6
प्रयास एवं त्रुटि द्वारा सीखना ही
(क) सूझ का सिद्धान्त है
(ख) सम्बन्ध प्रतिक्रिया को सिद्धान्त है
(ग) अनुकरण का सिद्धान्त है
(घ) उद्दीपक प्रतिक्रिया को सिद्धान्त है
उत्तर :
(घ) उद्दीपक प्रतिक्रिया का सिद्धान्त है

प्रश्न 7
अनुकरण का सिद्धान्त किसने प्रतिपादित किया ?
(क) बुडवर्थ ने
(ख) हिलगार्ड ने
(ग) स्किनर ने
(घ) कोहलर ने
उत्तर :
(ख) हिलगार्ड ने

प्रश्न 8
‘करके सीखने की क्रिया से सीखने का कौन-सा नियम सर्वाधिक प्रभावी है ? [2007]
(क) तत्परता का नियम
(ख) अभ्यास का नियम
(ग) प्रभाव का नियम
(घ) मनोवृत्त का नियम
उत्तर :
(क) तत्परता का नियम

प्रश्न 9
कोहलर ने सीखने के निम्नलिखित में से किस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया ? [2007, 09, 11]
(क) प्रयास एवं त्रुटि’ द्वारा सीखने का सिद्धान्त
(ख) ‘सूझ’ द्वारा सीखने का सिद्धान्त
(ग) सम्बन्ध प्रत्यावर्तन का सिद्धान्त
(घ) अनुकरण का सिद्धान्त
उत्तर :
(ख) ‘सूझ’ द्वारा सीखने का सिद्धान्त

न 10
थॉर्नडाइक के सीखने के नियम हैं
(क) एक
(ख) तीन
(ग) दो
(घ) चार
उत्तर :
(ख) तीन

प्रश्न 11
“अधिगम जिसमें व्यक्ति किसी समाधान या हल की जाँच करता है कि कहाँ गलतियाँ हैं, उनकी पुनः जाँच कर ठीक करता है और तब तक ठीक करता है जब तक सफल नहीं हो जाता।” यह कथन किसकी विशेषता है? [2015]
(क) प्रयास और त्रुटि द्वारा सीखना
(ख) सूझ द्वारा सीखना
(ग) सम्बन्ध प्रतिक्रिया द्वारा सीखना
(घ) अनुकरण द्वारा सीखना
उत्तर :
(क) प्रयास और त्रुटि द्वारा सीखना

प्रश्न 12
अन्तर्दृष्टि या सूझ द्वारा सीखने के सिद्धान्त के जनक हैं [2009, 14]
(क) मैक्डूगल
(ख) कोहलर
(ग) थॉर्नडाइक
(घ)पावलोव
उत्तर :
(ख) कोहलर

प्रश्न 13
सीखने के उद्दीपक-अनुक्रिया सिद्धान्त के जनक हैं [2011]
या
अधिगम के उद्दीपन-अनुक्रिया सिद्धान्त के प्रतिपादक हैंसीखने के प्रमुख नियमों के प्रतिपादक हैं [2008, 11]
(क) कोहलर
(ख) स्किनर
(ग) थॉर्नडाइक
(घ) पावलोव
उत्तर :
(ग) थॉर्नडाइक

प्रश्न 14
प्रारम्भ में बालक किस प्रकार सीखता है ?
(क) परीक्षण द्वारा
(ख) सूझ द्वारा
(ग) विभेदकरण द्वारा
(घ) प्रयत्न एवं त्रुटि द्वारा
उत्तर :
(धे) प्रयत्न एवं त्रुटि द्वारा

प्रश्न 15
“समस्यात्मक परिस्थिति को समग्र में समझा जाता है और तुरन्त ही हल स्पष्ट रूप से पूर्व-दृष्टि से मन में आ जाता है।” यह कथन किसकी विशेषता है ? [2008]
(क) सूझ द्वारा सीखने की
(ख) प्रयास एवं भूल द्वारा सीखने की
(ग) अनुकरण द्वारा सीखने की
(घ) सम्बन्धीकरण द्वारा सीखने की
उत्तर :
(क) सूझ द्वारा सीखने की।

प्रश्न 16
अधिगम, जो बिना किसी पूर्व-नियोजन के तर्कहीन, यान्त्रिकीय और बिना किसी क्रम के जहाँ हल आकस्मिक होता है, को जाना जाता है [2012]
(क) प्रयास और त्रुटि द्वारा अधिगम
(ख) सूझ द्वारा अधिगम
(ग) सम्बद्ध प्रत्यावर्तन द्वारा अधिगम
(घ) अनुकरण द्वारा अधिगम
उत्तर :
(ख) सूझ द्वारा अधिगम

प्रश्न 17
“प्रगतिशील व्यवहार व्यवस्थापन की प्रक्रिया को अधिगम कहते हैं।” यह कथन किसका है?
(क) थॉर्नडाइक
(ख) स्किनर
(ग) क्रो एवं क्रो
(घ) पारीक
उत्तर :
(ख) स्किनर

प्रश्न 18
सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले शारीरिक कारक हैं
(क) आयु एवं परिपक्वता
(ख) लिंग-भेद
(ग) स्वास्थ्य
(घ) ये सभी कारक
उत्तर :
(घ) ये सभी कारक

प्रश्न 19
सीखने के नियम आधारित हैं
(क) उद्दीपक प्रतिक्रिया सिद्धान्त पर
(ख) सम्बद्ध प्रतिक्रिया सिद्धान्त पर
(ग) सूझ के सिद्धान्त पर
(घ) प्रयास और त्रुटि की विधि पर
उत्तर :
(क) उद्दीपक प्रतिक्रिया सिद्धान्त पर

प्रश्न 20
सूझ द्वारा समस्या का समाधान प्राप्त होता है [2008]
(क) एकाएक
(ख) समस्या उत्पन्न होने के एक घण्टे बाद
(ग) निद्रा के बाद
(घ) कभी नहीं।
उत्तर :
(क) एकाएक

प्रश्न 21
कोहलर ने अपना मुख्य प्रयोग किस पर किया था?
(क) कुत्ते पर
(ख) बन्दर पर
(ग) चिम्पैंजी पर
(घ) बिल्ली पर
उत्तर :
(ग) चिम्पैंजी पर

प्रश्न 22
किस विधि द्वारा विषय को सीखने में समय की बचत होती है?
(क) प्रयास एवं त्रुटि विधि द्वारा
(ख) सूझ विधि द्वारा।
(ग) सम्बद्ध-प्रत्यावर्तन विधि द्वारा
(घ) उपर्युक्त सभी विधियों द्वारा
उत्तर :
(ख) सूझ विधि द्वारा

प्रष्टग 23
छोटे बच्चे एवं मन्दबुद्धि बालक मुख्य रूप से किस विधि द्वारा कार्य करना सीखते हैं?
(के) सूझ विधि द्वारा
(ख) सम्बद्ध-प्रत्यावर्तन विधि द्वारा
(ग) प्रयास एवं त्रुटि विधि द्वारा
(घ) इन सभी विधियों द्वारा
उत्तर :
(ग) प्रयास एवं त्रुटि विधि द्वारा

प्रश्न 24
सीखने के पठार की दशा में  [2012]
(क) सीखने की गति घट जाती है।
(ख) सीखने की गति बढ़ जाती है।
(ग) सीखने की गति में वृद्धि नहीं होती।
(घ) सब कुछ भूल जाता है।
उत्तर :
(ग) सीखने की गति में वृद्धि नहीं होती।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Pedagogy Chapter 18 Learning Meaning, Process, Laws and Methods (सीखना-अर्थ, प्रक्रिया, नियम एवं विधियाँ) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 18 Learning Meaning, Process, Laws and Methods (सीखना-अर्थ, प्रक्रिया, नियम एवं विधियाँ), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 17 Independent India

UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 17 Independent India (स्वतन्त्र भारत) are the part of UP Board Solutions for Class 12 History. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 17 Independent India (स्वतन्त्र भारत).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject History
Chapter Chapter 17
Chapter Name Independent India
(स्वतन्त्र भारत)
Number of Questions Solved 27
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 17 Independent India (स्वतन्त्र भारत)

अभ्यास

प्रश्न 1.
निम्नलिखित तिथियों के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख कीजिए
1. 15 अगस्त, 1947 ई०
2. 13 अगस्त, 1948 ई०
3. 18 सितम्बर, 1948 ई०
4. 1950 ई०
5. 26 जनवरी, 1950 ई०
6. 1954ई०
7. अगस्त, 1961 ई०
उतर.
दी गई तिथियों के ऐतिहासिक महत्व के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 251 पर तिथि सार का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 2.
सत्य या असत्य बताइए-
उतर.
सत्य-असत्य प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 252 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 3.
बहुविकल्पीय प्रश्न
उतर.
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 252 का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न 4.
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
उतर.
अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर के लिए पाठ्य-पुस्तक के पृष्ठ संख्या- 252 व 253 का अवलोकन कीजिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के चार प्रमुख उद्देश्य लिखिए।
उतर.
ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के चार प्रमुख उद्देश्य निम्नवत् हैं

  1. 2012 ई० तक सभी भूमिहीनों को घर और जमीन उपलब्ध कराना।
  2. 3 वर्ष तक के बच्चों में कुपोषण को घटाकर आधा करना।
  3. वर्ष 2009 ई० तक सभी को पीने का पानी उपलब्ध कराना।
  4. 5.8 करोड़ नए रोजगार के अवसर पैदा करना।

प्रश्न 2.
डॉ० भीमराव अम्बेडकर की भारत के संविधान निर्माण में क्या भूमिका थी?
उतर.
डॉ० भीमराव अम्बेडकर संविधान निर्माण प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। इन्हें संविधान निर्माता कहा जाता है।

प्रश्न 3.
देशी रियासतों के विषय में सरदार पटेल के योगदान का मूल्यांकन कीजिए।
उतर.
स्वतन्त्र भारत के प्रथम उपप्रधानमन्त्री सरदार पटेल के सुझाव पर एक रियासती मन्त्रालय’ का गठन किया गया। सरदार पटेल  को इस मन्त्रालय का मन्त्री बनाया गया। सरदार पटेल ने बड़ी सूझ-बूझ के साथ देशी रियासतों के विलय का संचालन किया। उपप्रधानमन्त्री एवं रियासती मन्त्रालय के मन्त्री की हैसियत से सरदार पटेल ने रियासतों से भारत संघ में अपना विलय करने की अपील की और उनकी मार्मिक अपील का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। देशी राजाओं ने भी राष्ट्र की आवश्यकता का अनुभव किया। 15 अगस्त, 1947 ई० को 562 देशी रियासतों का भारतीय संघ में विलय हो गया। यह पटेल की एकनिष्ठ दृढ़ता का परिचय था कि उन्होंने जूनागढ़, हैदराबाद, और कश्मीर जैसी रियासतों का बुद्धिमता एवं ताकत के बल पर भारत में विलय किया।

प्रश्न 4.
राज्य नीति के पाँच निर्देशक तत्व लिखिए।
उतर.
राज्य नीति के पाँच निर्देशक तत्व निम्नवत हैं

  1.  कल्याणकारी समाज की रचना
  2. जन स्वास्थ्य का उन्नयन
  3. एक ही आचार-संहिता
  4.  बेकारी के अन्त का प्रयास
  5. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा का प्रयत्न

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान की चार विशेषताएँ लिखिए।
उतर.
भारतीय संविधान की चार विशेषताएँ निम्नवत् हैं

  1. संविधान की प्रस्तावना
  2. लिखित, निर्मित और विस्तृत संविधान
  3. राज्य के नीति-निर्देशक तत्व
  4. नागरिकों के मूल अधिकार

प्रश्न 6.
भारतीय शिक्षा की चार नवीन प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए।
उतर.
भारतीय शिक्षा की चार नवीन प्रवृत्तियाँ निम्नवत् हैं

  1. राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली 
  2. विज्ञान की शिक्षा पर बल
  3. सैनिक शिक्षा पर बल
  4. भावनात्मक एवं राष्ट्रीय एकीकरण के लिए पाठ्यक्रम का नवीनीकरण

प्रश्न 7.
स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय की भारत की आर्थिक स्थिति का वर्णन कीजिए।
उतर.
अंग्रेजों के लगभग दो सौ साल के शोषण के बाद 15 अगस्त, 1947 ई० को भारत स्वतन्त्र हुआ। इस दौरान भारतीय 
अर्थव्यवस्था निरन्तर उपेक्षा का शिकार रही थी। शताब्दियों से चले आ रहे आर्थिक शोषण व लूट के कारण स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत की आर्थिक स्थिति पहले से ही जर्जर अवस्था में थी, पाकिस्तान के निर्माण के कारण भारत अनेक प्राकृतिक संसाधनों से वंचित हो गया। भारत एक निर्धन देश बन गया और इसकी प्रति व्यक्ति आय विश्व के निम्नतम के समतुल्य हो गई।

प्रश्न 8.
स्वतन्त्र भारत की समस्याओं पर सारगर्भित लेख लिखिए।
उतर.
भारत की स्वतन्त्रता के साथ ही कठिनाइयों एवं कष्टों का काल भी आरम्भ हो गया था। देश के विभाजन के बाद दंगों, हत्याओं व लूटमार का भयंकर दौर आरम्भ हुआ। विभाजन की त्रासदी के कारण लाखों की संख्या में शरणार्थी, रियासतों के रूप में बिखरा हुआ अज्ञात भारत का ढाँचा, जर्जर अर्थव्यवस्था, अस्थिर राजनीति यह सब स्वतन्त्र भारत को विरासत में मिला। तत्कालीन भारत के महापुरुषों व राजनीति-वेत्ताओं के अथक परिश्रम ने इन सभी समस्याओं से लोहा लिया और उन्हें एक-एक करके सुलझाना आरम्भ किया।

प्रश्न 9.
दसवी पंचवर्षीय योजना के बारे में टिप्पणी कीजिए।
उतर.
दसवीं पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल 1 अप्रैल, 2002 ई० से 31 मार्च, 2007 ई० था। इसमें आर्थिक विकास का लक्ष्य 80% वार्षिक रखा गया, जबकि वर्तमान में विकास दर 5.5% वार्षिक थी। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दस सूत्रीय एजेण्डा तैयार किया गया। इस एजेण्डे में अन्य बातों के अतिरिक्त विनिवेशीकरण कर एवं श्रम-सुधार और वित्तीय समझदारी वाली बातों पर विशेष बल दिया। दसवीं पंचवर्षीय योजना में सर्वाधिक बल कृषि सुधार व वृद्धि दर पर दिया गया। औद्योगिक क्षेत्र के लिए प्रस्तावित औसत दर 8.5% निर्धारित की गई। सार्वजनिक क्षेत्र के लिए निर्धारित कुल परिव्यय (15,92,300 करोड़ रुपए) में से उद्योग एवं खनिज के लिए 58,939 करोड़ रुपए व्यय करने का प्रावधान था। उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू व कश्मीर तथा पूर्वोत्तर राज्यों के लिए औद्योगिक नीति कारगर साबित हुई। प्रसंस्करण उद्योग काफी आगे बढ़ गया।

प्रश्न 10.
डॉ० भीमराव अम्बेडकर के कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उतर.
डॉ० भीमराव अम्बेडकर ‘दलीतों के मसीहा’ के रूप में प्रसिद्ध हैं। आजादी से पूर्व 1942-46 ई० तक डॉ० भीमराव अम्बेडकर वायसराय के एक्जीक्यू काउंसिल के सदस्य रहे। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद उनको भारत सरकार का कानून मंत्री बनाया गया। भारतीय संविधान के निर्माण में डॉ० भीमराव अम्बेडकर ने अविस्मरणीय कार्य किया। वे संविधान सभा के सदस्य और संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष रहे। उन्होंने अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और राजनीति शास्त्र पर अनेक पुस्तकों की रचना की। ‘द प्राब्लम ऑफ रुपीज’ तथा ‘रिडल्स ऑन हिन्दुइज्म’ इनके द्वारा रचित महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं।

प्रश्न 11.
द्वितीय पंचवर्षीय योजना के दो प्रावधानों का उल्लेख कीजिए।
उतर.
द्वितीय पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल अप्रैल, 1956 ई० से मार्च 1961 ई० तक था। इस योजना में विकास के ऐसे ढाँचे को बढ़ावा दिया गया जिससे देश में समाजवादी स्वरूप के समाज का निर्माण हो सके। इस योजना के दो प्रमुख प्रावधान रोजगार में वृद्धि एवं उद्योगीकरण थे।

प्रश्न 12.
स्वतन्त्र भारत की कोई तीन तात्कालिक समस्याएँ लिखिए?
उतर.
स्वतन्त्र भारत की तीन तात्कालिक समस्याएँ निम्न प्रकार हैं

  1. हिन्दू-मुस्लिम दंगे और विस्थापितों की समस्या
  2. राजनीतिक एकीकरण की समस्या
  3. जर्जर आर्थिक स्थिति

प्रश्न 13.
भारतीय संविधान की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उतर.

  1. लिखित, निर्मित और विस्तृत संविधान ।
  2. सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न लोकतन्त्रात्मक गणराज्य |

प्रश्न 14.
भारतीय संविधान कितने समय में निर्मित किया गया?
उतर.
भारतीय संविधान के निर्माण में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन का समय लगा।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
“सुनियोजित अर्थतन्त्र( अर्थव्यवस्था) आधुनिक भारत का आधार है।” टिप्पणी कीजिए।
उतर.
दो सौ वर्षों तक अंग्रेजी शासन के अधीन रहने के बाद 15 अगस्त, 1947 ई० को भारत स्वतन्त्र हुआ। उस समय भारत का
अर्थतन्त्र बहुत ही दयनीय स्थिति में था। जहाँ एक ओर कृषि उत्पादन, भारी और आधारभूत उद्योगों तथा शहरीकरण का निम्न स्तर था, वहीं जनसंख्या भी अत्यधिक थी। स्वतन्त्रता के समय हमारी शिक्षा और अर्थव्यवस्था इतनी पिछड़ी स्थिति में थी कि इनका विकास करना अत्यन्त दुष्कर था। परन्तु स्वतन्त्रता अपने साथ आशा की किरण भी लाई।

स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू की आवश्यक प्राथमिकताओं में से पहली प्राथमिकता आर्थिक तंत्र को सुनियोजित ढंग से मजबूत बनाना था। इसके लिए उन्होंने 1950 ई० में राष्ट्रीय योजना आयोग की स्थापना कर देश के आर्थिक विकास हेतु पंचवर्षीय योजनाओं को आरम्भ किया। उत्पादन की अधिकतम सीमा बढ़ाना, पूर्ण रोजगार प्राप्त करना, आय व सम्पत्ति की असमानताओं को कम करना, तथा सामाजिक न्याय उपलब्ध कराना आदि नीति-निर्माताओं द्वारा पंचवर्षीय योजनाओं को निर्धारित कर आधुनिक भारत का मार्ग प्रशस्त किया। आधुनिक भारत को आधार प्रदान करने के लिए स्वतन्त्रता प्राप्ति से अब
तक ग्यारह पंचवर्षीय योजनाएँ पूर्ण हो चुकी हैं। कुछ प्रमुख पंचवर्षीय योजनाओं के उद्देश्य निम्नवत् हैं-

  • प्रथम पंचवर्षीय योजना में कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई जो अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल रही।
  • द्वितीय पंचवर्षीय योजना में औद्योगीकरण पर विशेष बल दिया गया। औद्योगिक उत्पादन में 4.5% वृद्धि हुई तथा लगभग 66 लाख व्यक्तियों को रोजगार प्राप्त हुआ।
  • चौथी पंचवर्षीय योजना का लक्ष्य कृषि एवं औद्योगिक उत्पादन बढ़ाना तथा जनसंख्या वृद्धि को रोकना निर्धारित किया।
  • पाँचवी एवं छठी पंचवर्षीय योजना में गरीबी उन्मूलन एवं आत्मनिर्भरता प्राप्त करने पर बल दिया गया।
    सातवीं एवं आठवीं पंचवर्षीय योजनाओं में क्रमश: ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में वृद्धि एवं आर्थिक ढाँचे को मजबूत बनाए रखने के लिए क्रियान्वित की गई।
  • नवीं व दसवीं पंचवर्षीय योजनाओं में सर्वाधिक जोर क्रमशः सामाजिक व बुनियादी ढाँचे और सूचना तकनीक के विकास तथा खेती में सुधार व वृद्धि दर पर दिया गया।
  • ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में कृषि, सिंचाई, जल संसाधनों का विकास एवं दोहन मुख्य लक्ष्य निर्धारित किया। 
  • बारहवीं पंचवर्षीय योजना में कृषि, उद्योग एवं सेवा में वृद्धि दर पर विशेष बल दिया गया है। इस प्रकार उपरोक्त पंचवर्षीय योजनाओं के द्वारा सुनियोजित अर्थतन्त्र आधुनिक भारत की आधार शिला है।

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों का संक्षेप में विश्लेषण कीजिए।
उतर.
भारतीय संविधान के तृतीय भाग में अनुच्छेद 12 से 35 तक मौलिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। मूल अधिकार 
वे अधिकार होते हैं जिन्हें देश के सर्वोच्च कानून में स्थान प्राप्त होता है तथा जिनका उल्लंघन कार्यपालिका तथा विधायिका भी नहीं कर सकती है। मूलतः संविधान द्वारा नागरिकों को सात मौलिक अधिकार प्रदान किए गये, परन्तु 44 वें संवैधानिक संशोधन के अनुसार ‘सम्पत्ति के अधिकार’ को मौलिक अधिकारों की श्रेणी से निकाल दिया गया है, अब यह अधिकार एक कानूनी अधिकार रह गया है। भारतीय संविधान में निम्नलिखित छ: मौलिक अधिकारों का समावेश है]

  1. समानता का अधिकार
  2. स्वतन्त्रता का अधिकार
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार
  4. धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार
  5. संस्कृति और शिक्षा-सम्बन्धी अधिकार ।
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार भारतीय संविधान में उपरोक्त मौलिक अधिकारों का समावेश कर एक प्रगतिशील कदम उठाया गया है। इससे सरकार की

निरकुंशता पर नियन्त्रण किया गया है। जहाँ तक मौलिक अधिकारों पर लगे प्रतिबन्धों या आपातकाल में उनके स्थगन का प्रश्न है, हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि वे प्रतिबन्ध राष्ट्र-हित, सार्वजनिक कल्याण तथा भारतीय लोकतंत्र के स्वरूप को विकृतियों से बचाने के लिए लगाये गये हैं। परन्तु न्याय पालिका के स्वतन्त्र होने के कारण नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा के लिए इस पर विश्वास कर सकते हैं।” मौलिक अधिकारों का संविधान में उल्लेख कर देने से उनके महत्व और सम्मान में वृद्धि होती है। इससे उन्हें साधारण कानून से अधिक उच्च स्थान और पवित्रता प्राप्त हो जाती है। इससे वे अनुल्लंघनीय होते हैं। व्यवस्थापिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका के लिए उनका पालन आवश्यक हो जाता है।

प्रश्न 3.
“सरदार पटेल भारतीय एकीकरण के स्थापत्यकार थे।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
उतर.
स्वतन्त्रता के पूर्व भारत में लगभग 600 से अधिक देशी रियासतें थीं। स्वतन्त्र होने के उपरान्त भारत की सरकार के सामने देशी रियासतों को भारत संघ में विलय कराने की गम्भीर चुनौती थी। राष्ट्र की सुरक्षा के लिए इन सबको भारत संघ में विलय होना आवश्यक था। ये रियासतें सम्पूर्ण भारत के क्षेत्रफल का 48 प्रतिशत और जनसंख्या का 20 प्रतिशत थीं। यद्यपि ये रियासतें अपने आन्तरिक मामलों में स्वतन्त्र थीं, किन्तु वास्तविक रूप में इन सभी रियासतों पर अंग्रेजी शासन का नियन्त्रण स्थापित था। भारतीय देशी रियासतों में राजकीय जागरण 1921 ई० में प्रारम्भ हुआ। सरदार पटेल के सुझाव पर एक रियासती मन्त्रालय बनाया गया। सरदार पटेल को ही इस विभाग का मन्त्री बनाया गया।

सरदार पटेल ने बड़ी सूझ-बूझ के साथ देशी रियासतों के विलय के कार्य का संचालन किया। 1926 ई० में अखिल भारतीय देशी राज्य प्रजा परिषद का जन्म हुआ, जिसका पहला अधिवेशन एलौट के प्रसिद्ध नेता दीवान बहादुर एम० रामचन्द्र राय की अध्यक्षता में 1927 ई० में हुआ। 1934 ई० में डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने रियासतों में उत्तरदायी शासन की बात कही। 1935 ई० के अधिनियम में देशी रियासतों को मिलाकर एक संघ बनाने की बात कही गई। 1936 ई० के बाद देशी रियासतों में जन आन्दोलन तेजी से बढ़ा। कैबिनेट मिशन, एटली की घोषणा और लॉर्ड माउण्टबेटन की योजना में देशी राजाओं के बारे में विचार रखे गए और प्रायः कहा गया कि अंग्रेजों के चले जाने के बाद वे स्वतन्त्र होंगे। अपनी इच्छानुसार वे भारत या पाकिस्तान में सम्मिलित हों अथवा स्वतन्त्र रहें। उपप्रधानमन्त्री एवं रियासती मन्त्रालय के मन्त्री की हैसियत से सरदार पटेल ने रियासतों से भारत संघ में अपना विलय करने की अपील की और इस मार्मिक अपील का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। देशी राजाओं ने भी राष्ट्र की आवश्यकता का अनुभव किया। अतः 15 अगस्त, 1947 ई० को जूनागढ़, हैदराबाद तथा कश्मीर को छोड़कर छत्तीसगढ़ सहित 562 रियासतों ने भारतीय संघ में विलय की घोषणा कर दी।

सरदार वल्लभ भाई पटेल की कूटनीतिज्ञता और दूरदर्शिता का ही परिणाम था कि उन्होंने इस समस्या को सुलझाने का प्रयास किया। हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर का भारत में विलय प्रमुख कठिनाइयों के रूप में उभरकर सामने आया। जूनागढ़ एक छोटी सी रियासत थी और यहाँ नवाब का शासन था। यहाँ की अधिकांश जनता हिन्दू थी और वह जूनागढ़ का भारत में विलय करने के पक्ष में थी, जबकि नवाब जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाना चाहता था। जब नवाब ने जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाने की घोषणा की तो वहाँ की जनता ने इसका विरोध किया। इसी समय सरदार पटेल ने जूनागढ़ की जनता की सहायता के लिए सेना भेज दी। भारतीय सेना से भयभीत होकर नवाब पाकिस्तान भाग गया। फरवरी 1948 ई० में जनमत संग्रह के आधार पर जूनागढ़ का भारत में विलय कर लिया गया। हैदराबाद की जनता भी जूनागढ़ के समान ही हैदराबाद को भारत में सम्मिलित करना चाहती थी, जबकि निजाम सीधे ब्रिटिश साम्राज्य से साँठगाँठ कर एक स्वतन्त्र राज्य का स्वप्न देख रहा था। उसकी पाकिस्तान से भी गुप्त वार्ताएँ चल रही थीं।

अक्टूबर, 1947 में उसके साथ एक विशेष समझौता किया गया, जिसमें उसे एक वर्ष तक यथावत् स्थिति की बात कही गई, लेकिन उस पर किसी भी प्रकार की सैन्य वृद्धि या बाहरी मदद लेने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। निजाम की कुटिल चालें चलती रहीं। उसने पाकिस्तान से हथियार मँगवाए तथा रजाकारों की मदद से मनमानी करनी चाही। परिणामत: हैदराबाद की जनता ने निजाम के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। निजाम ने जनता पर अत्याचार करने प्रारम्भ कर दिए। इसी समय सरदार पटेल ने हैदराबाद की जनता का रुख भारत की ओर देखकर सितम्बर 1948 में निजाम को चेतावनी दी। निजाम के न मानने पर 13 सितम्बर, 1948 को हैदराबाद में कार्यवाही की गई और पाँच दिन में न केवल रजाकारों को खदेड़ दिया गया, बल्कि निजाम ने भी विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। 18 सितम्बर, 1948 को हैदराबाद का भारत में विलय हो गया। इस प्रकार उपरोक्त विवरण के अनुसार सरदार पटेल ने भारतीय एकीकरण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। मृत्यु उपरान्त उन्हें ‘भारत रत्न’ प्रदान किया गया।

प्रश्न 4.
“भारत का विकास वस्तुतः पंचवर्षीय योजनाओं से प्रारम्भ हुआ था।” टिप्पणी कीजिए।
उतर.
स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत की आर्थिक व्यवस्था अत्यन्त जर्जर थी। भारत की स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् अर्थव्यवस्था की पुननिर्माण प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। इस उद्देश्य से विभिन्न नीतियाँ और योजनाएँ बनाई गईं। और पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से क्रियान्वित की गई। स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की प्राथमिकताओं में से पहली प्राथमिकता भारत के आर्थिक ढाँचे को मजबूत करना था। इसके लिए उन्होंने 1950 ई० में राष्ट्रीय योजना आयोग की स्थापना की। इस आयोग के अन्तर्गत 16 माह के गहन विचार-विमर्श के पश्चात् देश के आर्थिक विकास हेतु पंचवर्षीय योजनाकाल का जन्म हुआ। प्रथम पंचवर्षीय योजना का प्रारम्भ 1 अप्रैल, 1951 ई० को हुआ। अब तक ग्यारह पंचवर्षीय योजनाएँ पूरी हो चुकी हैं। वर्तमान में बारहवीं पंचवर्षीय योजना जारी है जिसका कार्यकाल 2012-2017 है। भारत में विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में रखे गए उद्देश्यों को मुख्य रूप से चार भागों में विभाजित किया जा सकता है-

  • विकास
  • आधुनिकरण
  • आत्मनिर्भरता, तथा
  • सामाजिक न्याय।

पंचवर्षीय योजनाओं की विकास सम्बन्धी उपलब्धियाँ- पंचवर्षीय योजनाओं की विकास उपलब्धि को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है
1. विकास दर- आर्थिक प्रगति का महत्त्वपूर्ण मापदण्ड विकास की दर के लक्ष्य की प्राप्ति है। प्रथम योजना में आर्थिक 
विकास की दर 3.6% थी, जो बढ़कर आठवीं योजना में 6.5% हो गई। नवीं पंचवर्षीय योजना में यह 5.5% रही। दसवीं पंचवर्षीय योजना में विकास दर 9% रही। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में 12% का लक्ष्य रखा गया तथा 12 वीं योजना (2012-2017) में 9 प्रतिशत का लक्ष्य है।

2. राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय- योजनाकाल में राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हुई है। भारत में 1950 51 ई० में चालू मूल्यों के आधार पर शुद्ध राष्ट्रीय आय 8,525 करोड़ रुपए थी, जो कि 2001-02 में बढ़कर 19,51,935 करोड़ रु०,2002-03 में 19,95,229 करोड़ रु०, 2009-10 में 51,88,361 करोड़ रु० हो गई, जबकि प्रति व्यक्ति आय 237.5 रु० से बढ़कर 2009-10 में 44,345 रु० हो गई।

3. कृषि उत्पाद- योजनाकाल में कृषि उत्पादन में तीव्र गति से वृद्धि हुई है। सन् 1950-51 में खाद्यान्नों का कुल उत्पादन मात्र 50.8 मिलियन टन था, जो 2010-11 में बढ़कर 241.56 मिलियन टन हो गई।

4. औद्योगिक उत्पादन- योजनकाल में औद्योगिक उत्पादन में तीव्र गति से वृद्धि हुई। 1950-51 ई० में, 1993-94 ई० की कीमतों पर औद्योगिक उत्पादन सूचकांक 7.9 था जो बढ़कर 167 हो गया। दसवीं पंचवर्षीय योजना की समाप्ति पर उद्योग उत्पादन क्षेत्र में 8.75% की वृद्धि हो गई।

5. बचत एवं विनियोग- योजनाकाल में भारत में बचत एवं विनियोग की दरों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। चालू मूल्य पर | सकल राष्ट्रीय आय के प्रतिशत के रूप में 1950-51 ई० में सकल विनियोग और बचत की दरें क्रमशः 10.4% और 9.3% थीं, दसवीं पंचवर्षीय योजना के अन्त में ये क्रमश: 7.8% और 26.62% थीं। निवेश 28.10% रहा।

6. यातायात एवं संचार- यातायात एवं संचार के क्षेत्र में योजनाकाल में उल्लेखनीय प्रगति हुई। रेलवे लाइनों की लम्बाई 53,596 किलोमीटर से बढ़कर 31 मार्च, 2010 को 63,974 किलोमीटर हो गई। सड़कों की लम्बाई 1,57,000 किलोमीटर से बढ़कर 32 लाख किलोमीटर हो गई। हवाई परिवहन, बन्दरगाहों की स्थिति एवं आन्तरिक जलमार्ग का भी विकास किया गया। संचार-व्यवस्था के अन्तर्गत विकास के क्षेत्रों में डाकखानों, टेलीग्राफ, रेडियो-स्टेशन एवं प्रसारण केन्द्रों की संख्या में भी पर्याप्त वृद्धि हुई।

7. शिक्षा- योजनाकाल में शिक्षा का भी व्यापक प्रसार हुआ है। इस अवधि में स्कूलों की संख्या 2,30,683 से बढ़कर  8,21,988 तथा विश्वविद्यालयों और समान संस्थाओं की संख्या 27 से बढ़कर 315 हो गई।

8. विद्युत उत्पादन क्षमता- योजनाकाल में विद्युत उत्पादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। अगस्त 2004 ई० के आँकड़ोंके अनुसार उत्तर प्रदेश में विद्युत की प्रति व्यक्ति वार्षिक खपत केवल 188 यूनिट है, जो राष्ट्रीय औसत का 50 प्रतिशत है। सन् 2012 ई० की समाप्ति तक नाभकीय विद्युत उत्पादन 10 हजार मेगावाट होने की सम्भावना है।

9. बैंकिग संरचना- प्रथम योजना के आरम्भ  में देश में बैंकिग क्षेत्र अपर्याप्त और असन्तुलित था, परन्तु योजनाकाल में और विशेष रूप से बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पश्चात् देश की बैंकिग संरचना में उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ है। 30 जून, 1969 ई० को व्यापारिक बैंकों की शाखाओं की संख्या 8,262 थी, जो कि 31 मार्च, 2009 ई० में बढ़कर 80,547 हो गई।

10. स्वास्थ्य सुविधाएँ- योजनाकाल में देश में स्वास्थ्य सुविधाओं में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। टी० बी०, कुछ महामारियों आदि के उन्मूलन तथा परिवार कल्याण कार्यक्रमों में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई।

11. आयात एवं निर्यात- केन्द्र सरकार ने 31 अगस्त, 2004 ई० को विदेशी नीति 2004-09 ई० की घोषणा कर दी है। वर्ष 2010-11 ई० में भारत का निर्यात 11,42,649 करोड़ रुपए तथा आयात 16,83,467 करोड़ रुपए रहा।

पंचवर्षीय योजनाओं द्वारा भारत का आधुनिकीकरण- आधुनिककरण के क्षेत्र में प्रमुख उपलब्धियों को इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

1. कृषि का आधुनिकीकरण- भारत एक कृषि प्रधान देश है; अत: कृषि-संरचना में व्यापक सुधार एवं आधुनिकीकरण पर विशेष ध्यान दिया गया। योजनाकाल में भूमिसुधार कार्यक्रमों का विस्तार किया गया है। रासायनिक खाद व उन्नत बीजों का प्रयोग भी बढ़ा है। कृषि क्षेत्र में आधुनिक कृषि-यन्त्रों एवं उपकरणों को प्रोत्साहन मिला है। इसके अतिरिक्त, सिंचाई सुविधाओं में भी पर्याप्त मात्रा में वृद्धि हुई है। कृषि उपजों की विपणन व्यवस्था तथा कृषि वित्त-व्यवस्था में भी उल्लेखनीय सुधार हुए हैं।

2. राष्ट्रीय आय की संरचना में परिवर्तन- राष्ट्रीय आय की संरचना में योजनाकाल में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। राष्ट्रीय आय में प्राथमिक क्षेत्र का अनुपात निरन्तर घट रहा है, जबकि द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्र का अनुपात निरन्तर बढ़ रहा है।

3. औद्योगिक संरचना में परिवर्तन- योजनाकाल में औद्योगिक संरचना में भी उल्लेखनीय परिवर्तन हुए है। आधारभूत एवं पूँजीगत उद्योगों की स्थापना की गई है, सार्वजनिक उपक्रमों की संख्या में वृद्धि हुई है, उद्योगों का विविधीकरण हुआ है। तथा उत्पादन तकनीक में व्यापक सुधार हुआ है।

4. बैंकिग संरचना में परिवर्तन- योजनाकाल में बैंकिग व्यवस्था को सुव्यवस्थित, सुगठित एवं विस्तृत किया गया है। ग्रामीण और बैंकरहित क्षेत्रों में बैंकिग सुविधाओं का विस्तार किया गया है, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना की गई है, बैंक साख के वितरण में व्यापक सुधार तथा बैंकिग सुविधाओं में गुणात्मक परिवर्तन किए गए हैं।

  • आत्मनिर्भरता- हमारा देश आर्थिक नियोजन के काल में आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हुआ है। पहले जिन वस्तुओं का आयात किया जाता था, आज वे वस्तुएँ हमारे ही देश में निर्मित होने लगी हैं तथा उनका निर्यात भी किया जा रहा है। देश में भारी मशीनें व विद्युत उपकरण आदि भी पर्याप्त मात्रा में तैयार होने लगे हैं। खाद्यान्नों के सम्बन्ध में देश आत्मनिर्भरता प्राप्त कर चुका है। विदेशी सहायता भी पहले की अपेक्षा कम ही ली जा रही है।
  • सामाजिक न्याय- योजनाकाल में सामाजिक न्याय की दृष्टि से मुख्य रूप से दो पहलुओं पर ध्यान दिया गया है- प्रथम, समाज के निर्धन वर्ग के जीवन-स्तर में सुधार किया जाए तथा द्वितीय, धन एवं सम्पत्ति के वितरण में समानता लाई जाए। इस दृष्टि से विभिन्न प्रेरणात्मक एवं संवैधानिक उपाय किए गए हैं, यद्यपि उनसे आशातीत परिणामो की प्राप्ति तो नहीं हो पाई है, परन्तु कुछ सुधार अवश्य हुए हैं।उपरोक्त विवेचना के आधार पर हम कह सकते हैं कि भारत का विकास वास्तविक रूप से पंचवर्षीय योजनाओं के द्वारा आरम्भ हुआ।

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उतर.
संविधान एक महत्वपूर्ण प्रलेख है, जिसमें ऐसे नियमों का संग्रह होता है जिसके आधार पर किसी देश का शासन संचालित होता
है। संविधान किसी देश में दीपशिखा का काम करता है, जिसके प्रकाश में देश का शासन संचालित होता है। भारत के संविधान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. संविधान की प्रस्तावना-
प्रत्येक देश के संविधान के प्रारम्भ में सामान्यतया एक प्रस्तावना होती है, जिसमें संविधान के 
मूल उद्देश्यों व लक्ष्यों को स्पष्ट किया जाता है। वास्तव में, प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं होता है। बल्कि इसके द्वारा संविधान के स्वरूप का आभास हो जाता है। वस्तुतः इस प्रस्तावना में भारतीय संविधान का मूल दर्शन निहित है। संविधान के 42 वें संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा प्रस्तावना में समाजवादी, पंथनिरपेक्ष तथा अखण्डता शब्द जोड़कर इसकी गरिमा को और भी अधिक बढ़ा दिया गया है।

2. लिखित, निर्मित और विस्तृत संविधान- भारतीय संविधान अनेक प्रगतिशील देशों कनाडा, फ्रांस, अमेरिका आदि की भाँति एक लिखित संविधान है। इसका निर्माण एक संविधान सभा द्वारा किया गया था। यह विश्व का सबसे बड़ा संविधान है। डॉ० जेनिंग्स के अनुसार, “भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा, विशाल और व्यापक संविधान है।

3. सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न लोकतन्त्रात्मक गणराज्य- संविधान की प्रस्तावना में भारत को सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न लोकतन्त्रात्मक गणराज्य घोषित किया गया है। सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न का अर्थ है कि भारत अब बाह्य एवं आन्तरिक क्षेत्र में सभी प्रकार से पूर्ण स्वतन्त्र है। भारतवर्ष में लोकतन्त्रात्मक शासन भी है।

4. संघात्मक संविधान- संविधान द्वारा भारत में संघात्मक शासन की स्थापना की गई है। संविधान के अनुसार, भारत राज्यों का एक संघ है।” अत: इसमें संघात्मक संविधान के सभी तत्व विद्यमान हैं। यद्यपि संविधान का ढाँचा संघात्मक बनाया गया है, परन्तु उसकी आत्मा एकात्मक है, क्योंकि संविधान में अनेक ऐसे एकात्मक तत्व विद्यमान हैं जो एकात्मक शासन-व्यवस्था में ही पाए जाते हैं।

5. धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना- संविधान की प्रस्तावना में 42 वें संवैधानिक संशोधन के द्वारा ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़ा गया है। धर्मनिरपेक्ष का तात्पर्य है कि राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होगा। जनता के लोग अपना धर्म चुनने या धर्म परिवर्तन करने के लिए स्वतन्त्र होंगे, और किसी भी पूजा-पद्धति को अपना सकेंगे।

6. संसदात्मक शासन-प्रणाली- भारत ने संसदात्मक प्रणाली को अपनाया है। इसमें शासन करने की वास्तविक शक्ति राष्ट्रपति में नहीं अपितु उसके द्वारा नियुक्त मन्त्रिपरिषद् में हित होती है।

7. राज्य के नीति-निदेशक तत्व- ये तत्व सरकार को दिशा-निर्देश देने और उसका मार्गदर्शन करने वाले बिन्दु हैं, जिनका अनुसरण करना प्रजातान्त्रिक सरकारों का दायित्व होता है। ये नीति-निदेशक तत्व आयरलैण्ड के संविधान से ग्रहण किए गए हैं।

8. नागरिकों के मूल अधिकार- भारत के संविधान में नागरिकों के मूल अधिकारों की समुचित रूप से व्यवस्था की गई है। न्यायपालिका (उच्चतम न्यायालय) को इनका संरक्षक बनाया गया है, परन्तु ये अधिकार पूर्णतया असीमित तथा अनियन्त्रित नहीं हैं। संविधान द्वारा नागरिकों को सात मौलिक अधिकार प्रदान किए गए थे, परन्तु 44 वें संविधान संशोधन  द्वारा ‘सम्पत्ति के अधिकार’ को मौलिक अधिकार की श्रेणी से अलग कर दिया गया है और अब सम्पत्ति का अधिकार केवल एक कानूनी अधिकार रह गया है। इस प्रकार नागरिकों को अब छह मौलिक अधिकार प्राप्त हैं।

9. मूल कर्तव्यों का वर्णन- मूल कर्तव्यों की धारणा भारत के संविधान में पूर्व सोवियत संघ के संविधान से ली गई है। इनमें नागरिकों से अपील की गई है कि वे संविधान का पालन करें, देश की रक्षा करें, राष्ट्र-सेवा करें, हिंसा से दूर रहें तथा सार्वजनिक सम्पत्ति को सुरक्षित रखें आदि।

10. अस्पृश्यता का अन्त- संविधान के भाग III अनुच्छेद 17 के आधार पर अस्पृश्यता का अन्त कर दिया गया है। अत: अब छुआछूत की दूषित मनोवृत्ति पर आधारित आचरण करने वाला व्यक्ति अपराधी समझा जाएगा और दण्ड का भागीदार होगा। इस प्रकार संविधान ने देश में सामाजिक समानता स्थापित करने का प्रयत्न किया है।

11. महिलाओं को समान अधिकार- भारतीय संविधान ने नारियों को पुरुषों के समान आदर व सम्मान प्रदान किया है। उन्हें वे समस्त अधिकार प्रदान किए गए हैं, जो पुरुषों को प्राप्त हैं। ऊँचे पदों पर काम करने, मतदान करने, स्वयं चुनाव लड़ने आदि कई अधिकार संविधान ने उन्हें प्रदान किए हैं। सार्वभौमिक अथवा वयस्क मताधिकार- भारतीय संविधान के 61 वें संविधान संशोधन के अनुसार 18 वर्ष की आयु प्राप्त नागरिकों को बिना जाति, धर्म, लिंग, वर्ण के भेदभाव के मतदान का अधिकार प्रदान किया गया है। स्वतन्त्र, निष्पक्ष एवं शक्तिसम्पन्न न्यायपालिका- संविधान में एक सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई है, जो संविधान के रक्षक के रूप में कार्य करता है। स्वतन्त्र और निष्पक्ष न्याय के लिए न्यायपालिका को कार्यपालिका के नियन्त्रण से मुक्त रखा गया है।

12.संकटकालीन उपबन्ध- भारतीय संविधान में कुछ आपातकालीन नियम भी उल्लिखित हैं, जिनके आधार पर संकटकाल में समस्त शक्तियाँ केन्द्र के पास आ जाती हैं अर्थात् संघीय शासन एकात्मक शासन में परिवर्तित हो जाता है। इससे देश की असामान्य स्थिति पर शीघ्र नियन्त्रण कर लिया जाता है। कठोर एवं लचीले संविधान का सम्मिश्रण- भारतीय संविधान कठोर तथा लचीलेपन का सुन्दर समन्वय है। भारतीय संविधान के कुछ अनुच्छेद ऐसे हैं, जिनमें अकेले संसद साधारण कानून की भाँति ही संशोधन कर सकती है तथा कुछ अनुच्छेद ऐसे हैं, जिनमें संशोधन करने के लिए संसद के दो-तिहाई बहुमत के साथ-साथ राज्यों के कम-से-कम आधे विधानमण्डलों की सहमति भी आवश्यक है।

13. विश्व- शान्ति व सार्वभौमिक मैत्री का पोषक- संविधान के 51 वें उपबन्ध के अन्तर्गत यह भी उल्लेख किया गया है कि भारत विश्व के अन्य राष्ट्रों के साथ सह-अस्तित्व की भावना रखते हुए विश्व-शान्ति और सुरक्षा में सकारात्मक सहयोग देगा।

14.अल्पसंख्यक वर्गों के हितों की पूरी सुरक्षा- संविधान में अल्पसंख्यकों के हितों तथा जनजातियों और आदिवासियों की उन्नति हेतु भी विशेष संवैधानिक व्यवस्थाएँ की गई हैं। भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों तथा जनजाति के नागरिकों को सेवाओं, विधानसभाओं तथा अन्य क्षेत्रों में विशेष संरक्षण प्रदान किया गया है।

15. कानून का शासन- भारत के संविधान में कानून के शासन की व्यवस्था की गई है। विधि के शासन की अवधारणा ग्रेट ब्रिटेन के संविधान से ली गई है। भारत में कानून के समक्ष सभी नागरिक एकसमान हैं। कानून व दण्ड विधान की पद्धति सभी के लिए एक जैसी है।

16. बहुदलीय संसदीय व्यवस्था- भारत ने द्वि-दलीय पद्धति अथवा एकल-पद्धति को न अपनाकर बहुदलीय पद्धति पर आधारित संसदीय व्यवस्था को अपनाया गया है। बहुदलीय व्यवस्था होने के कारण संसद में समाज के सभी वर्गों के प्रतिनिधित्व की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं तथा जनता को अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए अनेक विकल्प भी मिलते हैं।

प्रश्न 6.
देशी रियासतों ( रजवाड़ों ) के एकीकरण में सरदार पटेल की उपलब्धियों की विवेचना कीजिए।
उतर.
देशी रियासतों का एकीकरण- स्वतन्त्र होने के उपरान्त भारत की सरकार के सामने देशी रियासतों को भारत संघ में विलय करने की गम्भीर चुनौती थी। भारत में 600 से अधिक रियासतें विद्यमान थीं। राष्ट्र की सुरक्षा के लिए इन सबका भारत संघ में विलय होना आवश्यक था। देशी रियासतों के एकीकरण में सरदार पटेल की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
1. रियासतों के विलय के लिए मन्त्रालय की स्थापना- सरदार पटेल के सुझाव पर एक रियासती मन्त्रालय बनाया गया। 
सरदार पटेल को ही इस विभाग का मन्त्री बनाया गया। सरदार पटेल बड़ी सूझ-बूझ के साथ देशी रियासतों के विलय के कार्य का संचालन किया।

2. रियासतों को भारत में विलय- उपप्रधानमंत्री एवं रियासती मन्त्रालय के मन्त्री की हैसियत से सरदार पटेल ने रियासतों से भारत संघ में अपना विलय करने की अपील की और इस मार्मिक अपील का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। देशी राजाओं ने भी राष्ट्र की आवश्यकता का अनुभव किया। अतः 15 अगस्त, 1947 ई० को जूनागढ़, हैदराबाद तथा कश्मीर को छोड़कर छत्तीसगढ़ सहित 562 रियासतों ने भारतीय संघ में विलय की घोषणा कर दी। ये रियासतें भारतीय संघ में विलीन हो गईं। जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर का भारत में विलय प्रमुख कठिनाइयों के रूप में उभरकर सामने आया। जूनागढ़ एक छोटी रियासत थी और यहाँ नवाब का शासन था। यहाँ की अधिकांश जनता हिन्दू थी और वह जूनागढ़ का भारत में विलय  करने के पक्ष में थी, जबकि नवाब जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाना चाहता था।

जब नवाब ने जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाने की घोषणा की तो वहाँ की जनता ने इसका विरोध किया। इसी समय सरदार पटेल ने जूनागढ़ की जनता की सहायता के लिए सेना भेज दी। भारतीय सेना से भयभीत होकर नवाब पाकिस्तान भाग गया। फरवरी 1948 ई० में जनमत संग्रह के आधार पर जूनागढ़ का भारत में विलय कर लिया गया। जूनागढ़ के समान हैदराबाद की जनता भी हैदराबाद रियासत का भारत में विलय कराना चाहती थी। इसके विपरित, हैदराबाद का निजाम हैदराबाद को एक स्वतन्त्र राज्य बनाए रखना चाहता था।

परिणामत: हैदराबाद की जनता ने निजाम के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। निजाम ने जनता पर अत्याचार करने प्रारम्भ कर दिए। इसी समय सरदार पटेल ने हैदराबाद की जनता का रुख भारत की ओर देखकर 13 सितम्बर, 1948 ई० को वहाँ पुलिस कार्यवाही के द्वारा हैदराबाद का भारत में विलय करा लिया। कश्मीर के राजा हरिसिंह पहले सम्मिलित होने में हिचकिचाते रहे, लेकिन बाद में पाकिस्तानी आक्रमण से विचलित होकर उन्होंने भी भारतीय संघ में मिलने की घोषणा कर दी। भारतीय सेना ने उन्हें तुरन्त संरक्षण देना स्वीकार कर लिया।

प्रश्न 7.
स्वतन्त्र भारत की तात्कालिक समस्याओं पर एक विस्तृत लेख लिखिए।
उतर.
भारत की स्वतन्त्रता के साथ ही कठिनाइयों व कष्टों का काल भी प्रारम्भ हो गया था। देश के विभाजन के बाद दंगों, हत्याओं व लूटमार का भयंकर दौर प्रारम्भ हुआ। तत्कालीन भारत में देशी रियासतों की संख्या 600 से अधिक थी। विभाजन की त्रासदी के कारण लाखों की संख्या में शरणार्थी, रियासतों के रूप में बिखरा हुआ अज्ञात भारत का ढाँचा, जर्जर अर्थव्यवस्था, अस्थिर राजनीति यह सब भारत को विरासत के रूप में मिला। परन्तु तत्कालीन भारत के महापुरूषों व राजनीति-वेत्ताओं के अथक परिश्रम ने इन सभी समस्याओं से लोहा लिया और उन्हें एक-एक करके सुलझाना आरम्भ कर दिया। स्वतन्त्र भारत की प्रमुख तात्कालिक समस्याएँ निम्नवत थीं
(1) राजनीतिक एकीकरण- स्वतन्त्रता के पूर्व भारत में लगभग 600 से अधिक देशी रियासतें थीं। स्वतन्त्र होने के उपरान्त 
भारत की सरकार के सामने देशी रियासतों को भारत संघ में विलय कराने की गम्भीर चुनौती थी। राष्ट्र की सुरक्षा के लिए इन सबको भारत संघ में विलय होना आवश्यक था।। ये रियासतें सम्पूर्ण भारत के क्षेत्रफल का 48 प्रतिशत और जनसंख्या का 20 प्रतिशत थीं। यद्यपि ये रियासतें अपने आन्तरिक मामलों में स्वतन्त्र थीं, किन्तु वास्तविक रूप में इन सभी रियासतों पर अंग्रेजी शासन का नियन्त्रण स्थापित था। भारतीय देशी रियासतों में राजकीय जागरण 1921 ई० में प्रारम्भ हुआ। सरदार पटेल के सुझाव पर एक ‘रियासती मन्त्रालय बनाया गया। सरदार पटेल को ही इस विभाग का मन्त्री बनाया गया।

सरदार पटेल ने बड़ी सूझ-बूझ के साथ देशी रियासतों के विलय के कार्य का संचालन किया। 1926 ई० में अखिल भारतीय देशी राज्य प्रजा परिषद् का जन्म हुआ, जिसका पहला अधिवेशन एलौट के प्रसिद्ध नेता दीवान बहादुर एम० रामचन्द्र राय की अध्यक्षता में 1927 ई० में हुआ। 1934 ई० में डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने रियासतों में उत्तरदायी शासन की बात कही। 1935 ई० के अधिनियम में देशी रियासतों को मिलाकर एक संघ बनाने की बात कही गई। 1936 ई० के बाद देशी रियासतों में जन आन्दोलन तेजी से बढ़ा। कैबिनेट मिशन, एटली की घोषणा और लॉर्ड माउण्टबेटन की योजना में देशी राजाओं के बारे में विचार रखे गए और प्राय: कहा गया कि अंग्रेजों के चले जाने के बाद वे स्वतन्त्र होंगे। अपनी इच्छानुसार वे भारत या पाकिस्तान में सम्मिलित हों अथवा स्वतन्त्र रहें।

उपप्रधानमन्त्री एवं रियासती मन्त्रालय के मन्त्री की हैसियत से सरदार पटेल ने रियासतों से भारत संघ में अपना विलय करने की अपील की और इस मार्मिक अपील का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। देशी राजाओं ने भी राष्ट्र की आवश्यकता का अनुभव किया। अतः 15 अगस्त, 1947 ई० को जूनागढ़, हैदराबाद तथा कश्मीर को छोड़कर छत्तीसगढ़ सहित 562 रियासतों ने भारतीय संघ में विलय की घोषणा कर दी। सरदार वल्लभ भाई पटेल की कूटनीतिज्ञता और दूरदर्शिता का ही परिणाम था कि उन्होंने इस समस्या को सुलझाने का प्रयास किया।

हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर का भारत में विलय प्रमुख कठिनाइयों के रूप में उभरकर सामने आया। जूनागढ़ एक छोटी सी रियासत थी और यहाँ नवाब का शासन था। यहाँ की अधिकांश जनता हिन्दू थी और वह जूनागढ़ का भारत में विलय करने के पक्ष में थी, जबकि नवाब जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाना चाहता था। जब नवाब ने जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाने की घोषणा की तो वहाँ की जनता ने इसका विरोध किया। इसी समय सरदार पटेल ने जूनागढ़ की जनता की सहायता के लिए सेना भेज दी। भारतीय सेना से भयभीत होकर नवाब पाकिस्तान भाग गया। फरवरी 1948 ई० में जनमत संग्रह के आधार पर जूनागढ़ का भारत में विलय कर लिया गया।

हैदराबाद की जनता भी जूनागढ़ के समान ही हैदराबाद को भारत में सम्मिलित करना चाहती थी, जबकि निजाम सीधे ब्रिटिश साम्राज्य से साँठगाँठ कर एक स्वतन्त्र राज्य का स्वप्न देख रहा था। उसकी पाकिस्तान से भी गुप्त वार्ताएँ चल रही थीं। अक्टूबर, 1947 में उसके साथ एक विशेष समझौता किया गया, जिसमें उसे एक वर्ष तक यथावत् स्थिति की बात कही गई, लेकिन उस पर किसी भी प्रकार की सैन्य वृद्धि या बाहरी मदद लेने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। निजाम की कुटिल चालें चलती रहीं। उसने पाकिस्तान से हथियार मँगवाए तथा रजाकारों की मदद से मनमानी करनी चाही। परिणामतः हैदराबाद की जनता ने निजाम के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। निजाम ने जनता पर अत्याचार करने प्रारम्भ कर दिए। इसी समय

सरदार पटेल ने हैदराबाद की जनता का रुख भारत की ओर देखकर सितम्बर 1948 में निजाम को चेतावनी दी। निजाम के न मानने पर 13 सितम्बर, 1948 को हैदराबाद में कार्यवाही की गई और पाँच दिन में न केवल रजाकारों को खदेड़ दिया गया, बल्कि निजाम ने भी विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। 18 सितम्बर, 1948 को हैदराबाद का भारत में विलय हो गया। कश्मीर के भारत में विलय पर भी पाकिस्तान से संघर्ष की स्थिति बनी। प्रारम्भ में कश्मीर के राजा हरिसिंह कश्मीर के भारत में सम्मिलित होने में असमंजस की स्थिति में थे। जून, 1947 में माउण्टबेटन कश्मीर गए और उन्होंने वहाँ के महाराजा हरिसिंह से विलय के बारे में शीघ्र आत्मनिर्णय पर जोर दिया और जनमत संग्रह की बात भी कही। महात्मा गाँधी भी महाराजा से मिले, परन्तु अगस्त, 1947 में पाकिस्तानियों ने कबाइलियों के वेश में जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ करनी प्रारम्भ की। पाकिस्तान द्वारा आक्रमण किए जाने से विचलित होकर उन्होंने भी भारतीय संघ में मिलने की घोषणा कर दी।

भारतीय सेना ने उन्हें तुरन्त संरक्षण देना स्वीकार कर लिया। महाराजा हरिसिंह ने 26 अक्टूबर को अपने प्रधानमन्त्री मेहरचन्द महाजन को विलय के पत्रों पर हस्ताक्षर करने दिल्ली भेजा। ये पत्र स्वीकृत कर लिए गए, लेकिन इसी बीच 21-22 अक्टूबर, 1947 को पाकिस्तान ने पठान कबाइलियों सहित कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। 26 अक्टूबर को कश्मीर के महाराजा के कहने पर भारतीय सेनाओं ने 27 अक्टूबर को पाकिस्तान के आक्रमणकारियों को रोका और उन्हें पीछे खदेड़ते हुए जवाबी कार्यवाही की। भारत के प्रधानमन्त्री पं० नेहरू ने पाकिस्तान की इस घुसपैठ के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में अपील की। सुरक्षा परिषद् ने सोच-विचार में लम्बा समय लिया।

13 अगस्त, 1948 को दोनों सेनाओं को युद्धविराम करने, अपनी-अपनी सेनाएँ हटाने और जनमत संग्रह करने को कहा। अभी तक भी कश्मीर की एक तिहाई भूमि पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा है। अर्द्धशताब्दी से अधिक गुजर जाने के पश्चात् भी कश्मीर को लेकर आज भी दोनों में विवाद बना हुआ है। 1954 ई० तक विदेशी फ्रांसीसी उपनिवेशों पाण्डिचेरी, कराईकल, यमन, माही तथा चन्द्रनगर को भारत संघ में शामिल कर लिया गया। गोवा, दमन व दीव जिन पर पुर्तगालियों का प्रभुत्व था, सैनिक कार्यवाही द्वारा 1961 ई० में भारत संघ में सम्मिलित किए जा सके। दादर व नगर हवेली के दोनों स्थलों को जनता ने 1954 में पुर्तगालियों से स्वतन्त्र कराया, लेकिन ये भारत संघ का अंग न बन सके। 1961 तक यहाँ ‘स्वतन्त्र दादर व नगर हवेली प्रशासन ने कार्यभार सँभाला। 11 अगस्त, 1961 को ये दोनों स्थल भारत के केन्द्रशासित प्रदेश बने।

(2) हिन्दू-मुस्लिम दंगे और विस्थापितों की समस्या- भारत के विभाजन से जनसंख्या में हुई अदला-बदली विश्व इतिहास में एक अनूठी और वीभत्स घटना थी। दुनिया के इतिहास में कभी भी जनसंख्या की इतनी बड़ी अदली-बदली पहले कभी नहीं हुई थी। इससे पूर्व 1923 ई० में लोसान की सन्धि में ग्रीक व टर्की में जनसंख्या में अदला-बदली हुई थी, जो लगभग एक लाख पच्चीस हजार की थी और जिसे बदलने में 18 महीने लगे थे, जबकि भारत-पाकिस्तान में लगभग एक करोड़ बीस लाख जनसंख्या का आवागमन हुआ और यह केवल तीन महीने में किया गया। एक अन्य आँकड़े के अनुसार 49 लाख भारतीय पश्चिमी पाकिस्तान से और 25 लाख पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) से उजड़कर भारत आए। स्वभावत: इस जनसंख्या की अदली-बदली में भयंकर रक्तपात, खून-खराबा और साम्प्रदायिक दंगे हुए। सामूहिक हत्याएँ, लूट, अपहरण, बलात्कार की हजारों घटनाएँ हुईं। बंगाल में नोआखाली, यूनाइटेड प्रोविंसेस में गढ़मुक्तेश्वर और पंजाब में लाहौर, रावलपिण्डी, मुल्तान, अमृतसर तथा गुजरात में भयंकर लूटमार हुई, अनेक लोग मारे गए। इसके अतिरिक्त 150 करोड़ से अधिक की सम्पत्ति की हानि हुई।

3. जर्जर आर्थिक व्यवस्था- अंग्रेजों ने लगभग दो सौ साल बाद अगस्त, 1947 में भारत छोड़ा। इस दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था निरन्तर उपेक्षा की शिकार रही थी। शताब्दियों से चले आ रहे आर्थिक शोषण व लूट के कारण भारत की आर्थिक व्यवस्था पहले से ही जर्जर अव्यवस्था में थी, पाकिस्तान के निर्माण के कारण भारत अनेक प्राकृतिक संसाधनों से वंचित हो गया। भारत एक निर्धन देश बन गया और इसकी प्रति व्यक्ति आय विश्व के निम्नतम के समतुल्य हो गई। इसे 1948 ई० में 246 रुपए प्रति व्यक्ति माना गया है, जो ब्रिटेन की आय का कुल 10 प्रतिशत और अमेरिका का केवल 5 प्रतिशत थी।। पाकिस्तान के निर्माण से भारत में आर्थिक असन्तुलन उत्पन्न हो गया। भारतीय उद्योग, कृषि व व्यापार इस विभाजन के कारण अत्यधिक प्रभावित हुए। आर्थिक क्षेत्र के असन्तुलित विभाजन के कारण भारत में कच्चे माल की कमी हो गई, जिससे वस्त्र उद्योग ठप्प और अन्न की कमी हो गई।

1947-48 ई० के भारत-पाक संघर्ष ने भारतीय व्यापार को भी बुरी तरह प्रभावित किया। विस्थापितों के आर्थिक झगड़ों ने इसमें और कटुता ला दी। इस काल में उद्योगों के उत्पादन में लगभग 30 प्रतिशत की कमी हो गई। उत्पादन कम होने से बेकारी और बेरोजगारी तेजी से बढ़ी। भारत की आर्थिक नीति की घोषणा 1948 ई० में की गई थी, इस नीति में कई योजनाएँ रखी गई। श्री जय प्रकाश नारायण द्वारा जनवरी, 1950 ई० में ‘सर्वोदय योजना की घोषणा की गई, जिसका उद्देश्य अहिंसा द्वारा शोषणरहित समाज का निर्माण करना बताया गया। इस योजना आयोग के अध्यक्ष पं० जवाहरलाल नेहरू थे। 1 अप्रैल, 1951 ई० से 31 मार्च 1956 ई० तक के लिए प्रथम पंचवर्षीय योजना बनी। वर्तमान में बारहवीं पंचवर्षीय योजना चल रही है, ऐसी 11 योजनाएँ अब तक पूर्ण हो चुकी हैं।

प्रश्न 8.
“सरदार वल्लभभाई पटेल भारतीय गणतन्त्र के सफल निर्माता थे।” इस कथन के आलोक में उनके द्वारा देशी राज्यों के भारतीय राष्ट्र में विलय के प्रयासों का वर्णन कीजिए।
उतर.
स्वतन्त्र भारत के पहले तीन वर्ष सरदार पटेल उप-प्रधानमन्त्री, गृह मन्त्री, सूचना मन्त्री और राज्य मन्त्री रहे। इस सबसे भी बढ़कर  
उनकी ख्याति भारत के रजवाड़ों को शान्तिपूर्ण तरीके से भारतीय संघ में शामिल करने तथा भारत के राजनीतिक एकीकरण के कारण है। 5 जुलाई, 1947 को सरदार पटेल ने रियासतों के प्रति नीति को स्पष्ट करते हुए कहा कि- “धीरे-धीरे बहुत-सी देशी रियासतों के शासक भोपाल के नवाब से अलग हो गये और इस तरह नवस्थापित रियासती विभाग की योजना को सफलता मिली। भारत के तत्कालीन गृहमन्त्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने भारतीय संघ में उन रियासतों का विलय किया, जो स्वयं में सम्प्रभुता प्राप्त थीं। उनका अलग झंडा और अलग शासक था।

सरदार पटेल ने आज़ादी के ठीक पूर्व (संक्रमण काल में) ही पी.वी.मेनन के साथ मिलकर कई देशी राज्यों को भारत में मिलाने के लिए कार्य आरम्भ कर दिया था। पटेल और मेनन ने देशी राजाओं को बहुत समझाया कि उन्हें स्वायत्तता देना सम्भव नहीं होगा। इसके परिणामस्वरूप तीन रियासतें- हैदराबाद, कश्मीर और जूनागढ़ को छोड़कर शेष सभी राजवाड़ों ने स्वेच्छा से भारत में विलय का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। 15 अगस्त, 1947 तक हैदराबाद, कश्मीर और जूनागढ़ को छोड़कर शेष भारतीय रियासतें ‘भारत संघ’ में सम्मिलित हो चुकी थीं, जो भारतीय इतिहास की एक बड़ी उपलब्धि थी। जूनागढ़ के नवाब के विरुद्ध जब बहुत विरोध हुआ तो वह भागकर पाकिस्तान चला गया और इस प्रकार जूनागढ़ भी भारत में मिला लिया गया।

जब हैदराबाद के निजाम ने भारत में विलय का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया तो सरदार पटेल ने वहाँ सेना भेजकर निजाम का आत्मसमर्पण करा लिया। भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को वैचारिक एवं क्रियात्मक रूप में एक नई दिशा देने के कारण सरदार पटेल ने राजनीतिक इतिहास में एक गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त किया। वास्तव में वे आधुनिक भारत के शिल्पी थे। उनके कठोर व्यक्तित्व में विस्मार्क जैसी संगठन कुशलता, कौटिल्य जैसी राजनीति सत्ता तथा राष्ट्रीय एकता के प्रति अब्राहम लिंकन जैसी अटूट निष्ठा थी। जिस अदम्य उत्साह असीम शक्ति से उन्होंने नवजात गणराज्य की प्रारम्भिक कठिनाइयों का समाधान किया, उसके कारण विश्व के राजनीतिक मानचित्र में उन्होंने अमिट स्थान बना लिया। भारत के राजनीतिक इतिहास में सरदार पटेल के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। सरदार पटेल के ऐतिहासिक कार्यों और किये गये राजनीतिक योगदान निम्नवत् हैंद्वीपसमूह भारत के साथ मिलाने में भी पटेल की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।

इस क्षेत्र के लोग देश की मुख्यधारा से कटे हुए थे और उन्हें भारत की आजादी की जानकारी 15 अगस्त, 1947 के कई दिनों बाद मिली। हालांकि यह क्षेत्र पाकिस्तान के नजदीक नहीं था, लेकिन पटेल को लगता था कि इस पर पाकिस्तान दावा कर सकता है। इसलिए ऐसी किसी भी स्थिति को टालने के लिए पटेल ने लक्षद्वीप में राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए भारतीय नौसेना का एक जहाज भेजा। इसके कुछ घंटे बाद ही पाकिस्तान नौसेना के जहाज लक्षद्वीप के पास मंडराते देखे गए, लेकिन वहाँ भारत का झंडा लहराते देख उन्हें वापिस कराची लौटना पड़ा।

प्रश्न 9.
भारत प्रभुत्वसम्पन्न लोकतन्त्रात्मक गणराज्य है”इस तथ्य की समीक्षा कीजिए।
उतर.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना से यह बात स्पष्ट रूप से घोषित की गई है कि भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, लोकतन्त्रात्मक, धर्मनिरपेक्ष समाजवादी गणराज्य है। इसका अर्थ यह है कि अब भारत पर्ण रूप से स्वतन्त्र है और वह किसी भी बह्य सत्ता के अधीन नहीं है। सम्पूर्ण भारतीय जनता ही शक्ति का स्रोत है। इसका विवेचन निम्नलिखित रूप से किया जा सकता है

1. सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न- हमारे संविधान में यह पूर्ण रूप से स्पष्ट है कि भारत अपने आन्तरिक तथा बाह्य दोनों क्षेत्रों में
पूर्णतया स्वतन्त्र है। वह किसी भी अन्तर्राष्ट्रीय सन्धि को मानने के लिए बाध्य नहीं है। भारतीय संविधान में कहीं भी ब्रिटिश शासन का उल्लेख नहीं है। यद्यपि भारत राष्ट्रमण्डल का सदस्य है, किन्तु वह अपनी इच्छानुसार उससे पृथक भी हो सकता है। श्री जी० एन० जोशी के अनुसार, “भारत राष्ट्रमण्डल का सदस्य इसलिए बना है, क्योंकि ऐसा करना उसके हित तथा लाभ में है।

2. लोकतान्त्रिक- भारतीय संविधान के अनुसार भारतीय शासन लोकतन्त्रात्मक है। समस्तमहत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर अन्तिम निर्णय जनता का होगा। शासन की वास्तविक शक्ति जनता में निहित है। भारत की स्वर्गीया प्रधानमन्त्री श्रीमति इन्दिरा गाँधी ने पुनः सत्ता में आने के बाद कहा था, “लोकतन्त्र हमारे लिए केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। लोकतन्त्र सिर्फ बहुमत के लिए नहीं सभी के लिए है। आज लोकतन्त्र को बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय से बढ़कर सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय तक ले जाना है।”

3. धर्मनिरपेक्ष- भारत में सभी व्यक्तियों को धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की गयी। राज्य किसी विशेष धर्म का संरक्षण नहीं करता, अपितु उसकी दृष्टि में सभी धर्म समान है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार किसी भी धर्म को ग्रहण कर सकता है। इस प्रकार भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है। संविधान संशोधन द्वारा इसे और स्पष्ट कर दिया है।

4. समाजवादी- कांग्रेस का उद्देश्य प्रारम्भ से ही भारत में समाजवाद की स्थापना करना रहा है। उसका उद्देश्य धर्मनिरपेक्षता पर आधारित समाजवादी समाज की रचना के लिए प्रयत्नशील रहना पड़ा है। संविधान के निर्माताओं का अभिप्राय था कि भारतीय समाज की परम्परागत विषमताओं को दूर करके आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक समता के आधार पर एक प्रगतिशील समाज की स्थापना करें। विषमताओं तथा शोषण से मुक्ति का एकमात्र उपाय समाजवादी समाज की स्थापना भी हो सकता है। संविधान में प्रयुक्त समाजवादी एवं धर्मनिरपेक्ष राज्य का यही अर्थ है। भारतीय संविधान में समाजवाद शब्द के साथ लोकतन्त्रात्मक शब्द को भी रखा गया है। इससे यह स्पष्ट है कि भारतीय संविधान एक लोकतान्त्रिक समाजवाद की परिकल्पना करता है।

(5) गणराज्य- भारतीय राज्य गणराज्य इसलिए है, क्योंकि भारत का प्रावधान वंशानुगत शासन नहीं है, अपितु वह अप्रत्यक्ष | रूप से जनता द्वारा निर्वाचित राष्ट्रपति है। वह जनता के प्रतिनिधि मन्त्रिमण्डल के परामर्श से शासन करता है। जनता के प्रतिनिधियों को समस्त शक्तियाँ प्रदान की गई हैं।

We hope the UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 17 Independent India (स्वतन्त्र भारत) help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 History Chapter 17 Independent India (स्वतन्त्र भारत), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi सामाजिक व सांस्कृतिक निबन्ध

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi सामाजिक व सांस्कृतिक निबन्य are part of UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi सामाजिक व सांस्कृतिक निबन्य.

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Name सामाजिक व सांस्कृतिक निबन्य
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi सामाजिक व सांस्कृतिक निबन्य

सामाजिक व सांस्कृतिक निबन्ध

भारतीय समाज में नारी का स्थान [2009]

सम्बद्ध शीर्षक

  • भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति [2012]
  • आधुनिक भारत में नारी का स्थान
  • आधुनिक नारी का स्थान
  • स्वातन्त्र्योत्तर भारत में महिलाओं की स्थिति
  • भारतीय नारी : आज और कल [2013]
  • नारी सम्मान : भारतीय संस्कृति की पहचान [2014]
  • नारी-चिन्तन का बदलता स्वरूप (2015)

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2. भारतीय नारी का अतीत,
  3. मध्यकाल में भारतीय नारी,
  4. आधुनिक युग में नारी,
  5. पाश्चात्य प्रभाव एवं जीवन-शैली में परिवर्तन,
  6. उपसंहार

प्रस्तावना-गृहस्थीरूपी रथ के दो पहिये हैं—नर और नारी। इन दोनों के सहयोग से ही गृहस्थ जीवन सफल होता है। इसमें भी नारी का घर के अन्दर और पुरुष का घर के बाहर विशेष महत्त्व है। फलतः प्राचीन काल में ऋषियों ने नारी को अतीव आदर की दृष्टि से देखा। नारी पुरुष की सहधर्मिणी तो है ही, वह मित्र के सदृश परामर्शदात्री, सचिव के सदृश सहायिका, माता के सदृश उसके ऊपर अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाली और सेविका के सदृश उसकी अनवरत सेवा करने वाली है। इसी कारण मनु ने कहा है, ”यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता” अर्थात् जहाँ नारियों का आदर होता है वहाँ देवता निवास करते हैं। फिर भी भारत में नारी की स्थिति एक समान न रहकर बड़े उतार-चढ़ावों से गुजरी है, जिसका विश्लेषण वर्तमान भारतीय समाज को समुचित दिशा देने के लिए आवश्यक है।

भारतीय नारी का अतीत-वेदों और उपनिषदों के काल में नारी को पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त थी। वह पुरुष के समान विद्यार्जन कर विद्वत्सभाओं में शास्त्रार्थ करती थी। महाराजा जनक की सभा में हुआ याज्ञवल्क्य-गार्गी शास्त्रार्थ प्रसिद्ध है। मण्डन मिश्र की धर्मपत्नी भारती अपने काल की अत्यधिक विख्यात विदुषी थीं, जिन्होंने अपने दिग्गज विद्वान् पति की पराजय के बाद स्वयं आदि शंकराचार्य से शास्त्रार्थ किया। यही नहीं, स्त्रियाँ युद्ध-भूमि में भी जाती थीं। इसके लिए कैकेयी का उदाहरण प्रसिद्ध है। उस काल में नारी को अविवाहित रहने या स्वेच्छा से विवाह करने का पूरा अधिकार था। कन्याओं का विवाह उनके पूर्ण यौवनसम्पन्न होने पर उनकी इच्छा व पसन्द के अनुसार ही होता था, जिससे वे अपने भले-बुरे का निर्णय स्वयं कर सकें।

मध्यकाल में भारतीय नारी-मध्यकाल में नारी की स्थिति अत्यधिक शोचनीय हो गयी; क्योंकि मुसलमानों के आक्रमण से हिन्दू-समाज का मूल ढाँचा चरमरा गया और वे परतन्त्र होकर मुसलमान शासकों का अनुकरण करने लगे। मुसलमानों के लिए स्त्री मात्र भोग-विलास और वासना-तृप्ति की वस्तु थी। फलत: लड़कियों को विद्यालय में भेजकर पढ़ाना सम्भव न रहा। हिन्दुओं में बाल-विवाह का प्रचलन हुआ, जिससे लड़की छोटी आयु में ही ब्याही जाकर अपने घर चली जाए। परदा-प्रथा का प्रचलन हुआ और नारी घर में ही बन्द कर दी गयी। युद्ध में पतियों के पराजित होने पर यवनों के हाथ न पड़ने के लिए नारियों ने अग्नि का आलिंगन करना शुरू किया, जिससे सती–प्रथा का प्रचलन हुआ। इस प्रकार नारियों की स्वतन्त्रता नष्ट हो गयी और वे मात्र दासी या भोग्या बनकर रह गयीं। नारी की इसी असहायावस्था का चित्रण गुप्त जी ने निम्नलिखित पंक्तियों में किया है-

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी।
आँचल में है दूध और आँखों में पानी ।।

आधुनिक युग में नारी-आधुनिक युग में अंग्रेजों के सम्पर्क से भारतीयों में नारी-स्वातन्त्र्य की चेतना जागी। उन्नीसवीं शताब्दी में भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन के साथ सामाजिक आन्दोलन का भी सूत्रपात हुआ। राजा राममोहन राय और महर्षि दयानन्द जी ने समाज-सुधार की दिशा में बड़ा काम किया। सती–प्रथा कानून द्वारा बन्द करायी गयी और बाल-विवाह पर रोक लगी। आगे चलकर महात्मा गाँधी ने भी स्त्री-सुधार की दिशा में बहुत काम किया। नारी की दीन-हीन दशा के विरुद्ध पन्त का कवि हृदय आक्रोश प्रकट कर उठता है-

मुक्त करो नारी को मानव
चिरबन्दिनी नारी को।

आज नारियों को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त हैं। उन्हें उनकी योग्यतानुसार आर्थिक स्वतन्त्रता भी मिली हुई है। स्वतन्त्र भारत में आज नारी किसी भी पद अथवा स्थान को प्राप्त करने से वंचित नहीं। धनोपार्जन के लिए वह आजीविका का कोई भी साधन अपनाने के लिए स्वतन्त्र है। फलतः स्त्रियाँ अध्यापिका, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, वकील, जज, प्रशासनिक अधिकारी ही नहीं, अपितु पुलिस में नीचे से ऊपर तक विभिन्न पदों पर कार्य कर रही हैं। स्त्रियों ने आज उस रूढ़ धारणा को तोड़ दिया है कि कुछ सेवाएँ पूर्णत: पुरुषोचित होने से स्त्रियों के बूते की नहीं। आज नारियाँ विदेशों में राजदूत, प्रदेशों की गवर्नर, विधायिकाएँ या संसद सदस्याएँ, प्रदेश अथवा केन्द्र में मन्त्री आदि सभी कुछ हैं। भारत जैसे विशाल देश का प्रधानमन्त्रित्व तक एक नारी कर गयी, यह देख चकित रह जाना पड़ता है। श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित ने तो संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्षता कर सबको दाँतों तले अँगुली दबवा दी। इतना ही नहीं, नारी को आर्थिक स्वतन्त्रता दिलाने के लिए उसे कानून द्वारा पिता एवं पति की सम्पत्ति में भी भाग प्रदान किया गया है।

आज स्त्रियों को हर प्रकार की उच्चतम शिक्षा की सुविधा प्राप्त है। बाल-मनोविज्ञान, पाकशास्त्र, गृह-शिल्प, घरेलू चिकित्सा, शरीर-विज्ञान, गृह-परिचर्या आदि के अतिरिक्त विभिन्न ललित कलाओं; जैसे—संगीत, नृत्य, चित्रकला, छायांकन आदि में विशेष दक्षता प्राप्त करने के साथ-साथ वाणिज्य और विज्ञान के क्षेत्रों में भी वे उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं।

स्वयं स्त्रियों में भी अब सामाजिक चेतना जाग उठी है। प्रबुद्ध नारियाँ अपनी दुर्दशा के प्रति सचेत हैं। और उसके सुधार में दत्तचित्त भी। अनेक नारियाँ समाज-सेविकाओं के रूप में कार्यरत हैं। आशा है कि वे भारत की वर्तमान समस्याओं; जैसे-भुखमरी, बेकारी, महँगाई, दहेज-प्रथा आदि के सुलझाने में भी अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएँगी।

पाश्चात्य प्रभाव एवं जीवन-शैली में परिवर्तन–किन्तु वर्तमान में एक चिन्ताजनक प्रवृत्ति भी नारियों में बढ़ती दीख पड़ती है, जो पश्चिम की भौतिकवादी सभ्यता का प्रभाव है। अंग्रेजी शिक्षा के परिणामस्वरूप अधिक शिक्षित नारियाँ तेजी से भोगवाद की ओर अग्रसर हो रही हैं। वे फैशन और आडम्बर को ही जीवन का सार समझकर सादगी से विमुख होती जा रही हैं और पैसा कमाने की होड़ में अनैतिकता की ओर उन्मुख हो रही हैं। यही बहुत ही कुत्सित प्रवृत्ति है, जो उन्हें पुन: मध्यकालीन-हीनावस्था में धकेल देगी। इसी बात को लक्ष्य कर कवि पन्त नारी को चेतावनी देते हुए कहते हैं-

तुम सब कुछ हो फूल, लहर, विहगी, तितली, मार्जारी,
आधुनिके ! कुछ नहीं अगर हो, तो केवल तुम नारी ।

प्रसिद्ध लेखिका श्रीमती प्रेमकुमारी’ दिवाकर’ को कथन है कि, “आधुनिक नारी ने नि:सन्देह बहुत कुछ प्राप्त किया है, पर सब-कुछ पाकर भी उसके भीतर का परम्परा से चला आया हुआ कुसंस्कार नहीं बदल रहा है। वह चाहती है कि रंगीनियों से सज जाए और पुरुष उसे रंगीन खिलौना समझकर उससे खेले। वह अभी भी अपने-आपको रंग-बिरंगी तितली बनाये रखना चाहती है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि जब तक उसकी यह आन्तरिक दुर्बलता दूर नहीं होगी, तब तक उसके मानस का नव-संस्कार न होगा। जब तक उसका भीतरी व्यक्तित्व न बदलेगा तब तक नारीत्व की पराधीनता एवं दासता के विष-वृक्ष की जड़ पर कुठाराघात न हो सकेगा।”

उपसंहार-नारी, नारी ही बनी रहकर सबकी श्रद्धा और सहयोग अर्जित कर सकती है, तितली बनकर वह स्वयं तो डूबेगी ही और समाज को भी डुबाएगी। भारतीय नारी पाश्चात्य शिक्षा के माध्यम से आने वाली यूरोपीय संस्कृति के व्यामोह में न फंसकर यदि अपनी भारतीयता बनाये रखे तो इससे उसका और समाज दोनों का हितसाधन होगा और वह उत्तरोत्तर प्रगति करती जाएगी। वर्तमान में कुरूप सामाजिक समस्याओं; जैसे-दहेज प्रथा, शारीरिक व मानसिक हिंसा की शिकार स्त्री को अत्यन्त सजग होने की आवश्यकता है। उसे भरपूर आत्मविश्वास एवं योग्यता अर्जित करनी होगी, तभी वह सशक्त व समर्थ व्यक्तित्व की स्वामिनी हो सकेगी अन्यथा उसकी प्राकृतिक कोमल स्वरूप-संरचना तथा अज्ञानता उसे समाज के शोषण का शिकार बनने पर विवश कर देगी। नारी के इसी कल्याणमय रूप को लक्ष्य कर कविवर प्रसाद ने उसके प्रति इन शब्दों में श्रद्धा-सुमन अर्पित किये-

नारी! तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत-नभ-पग-तल में,
पीयूष-स्रोत-सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में ।

भारतीय नारी की समस्याएँ

सम्बद्ध शीर्षक

  • कामकाजी महिलाओं की समस्याएँ
  • आधुनिक समाज में नारी की समस्याएँ

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना : वैदिक काल में नारी,
  2. मध्यकाल में नारी,
  3. आधुनिक काल में नारी,
  4. संविधान द्वारा दिये गये अधिकार,
  5. कामकाजी महिलाओं की समस्याएँ,
  6. कामकाज से इतर महिलाओं की समस्याएँ,
  7. उपसंहार

प्रस्तावना : वैदिक काल में नारी—भारत में महिलाओं का स्थान कुछ वर्षों पहले तक घर-परिवार की सीमाओं तक ही सीमित माना जाता रहा है। प्राचीन भारत में नारी के पूर्ण स्वतन्त्र तथा सभी प्रकार के दबावों से पूर्ण मुक्त रहने के विवरण मिलते हैं। उस समय वे अपनी पारिवारिक स्थिति के अनुसार इस प्रकार की शिक्षा प्राप्त किया करती थीं; क्योंकि तब शिक्षा प्रणाली आश्रम-व्यवस्था पर आधारित थी। इस कारण नारियाँ भी उन आश्रमों में पुरुषों के समान रहकर ही शिक्षा प्राप्त किया करती थीं। गार्गी, मैत्रेयी, अरुन्धती जैसी महिलाओं के विवरण भी मिलते हैं कि वे मन्त्र-द्रष्टा थीं। अपने पतियों के साथ आश्रमों में रहकर वहाँ की सम्पूर्ण व्यवस्था की, वहाँ रहने वाले अन्य स्त्री-पुरुष व विद्यार्थियों, यहाँ तक कि आश्रमवासी पशु-पक्षियों तक की वे देखभाल किया करती थीं। महर्षि वाल्मीकि और कण्व के आश्रमों में भी नारियों के निवास के विवरण मिलते हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि वैदिक काल में नारी सुरक्षित तो होती ही थी, प्रत्येक प्रकार से स्वतन्त्र भी हुआ करती थी। फिर भी ऐसे विवरण कहीं नहीं मिलते कि घर-गृहस्थी चलाने के लिए उसे कहीं काम करके धनोपार्जन भी करना पड़ता था। गृहस्वामिनी एवं माँ के रूप में उसे पिता एवं आचार्य से भी उच्च स्थान प्राप्त था। महाभारत में उल्लेख भी है कि “गुरुणां चैव सर्वेषां माता परमं को गुरुः।”

मध्यकाल में नारी–इतिहास के अध्ययन से स्पष्ट है कि मध्यकाल में आकर नारी पूर्णरूपेण घरपरिवार की चारदीवारी में बन्द होकर रह गयी थी। यह काल नारियों के लिए अवनति का काल था। भोग-विलास की प्रवृत्ति बढ़ जाने के कारण नारी के शारीरिक पक्ष को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा। मध्यकालीन कुरीतियों में सती–प्रथा, बाल-विवाह और विधवाओं को हेय दृष्टि से देखना प्रमुख थीं । इस काल के सन्तों एवं सिद्ध कवियों ने भी नारी के प्रति अत्यन्त कटु दृष्टिकोण अपनाया-

नारी तो हम भी करी, जाना नहीं बिचार।
जब जाना तब परिहरी, नारी बड़ा बिकार ॥
नारी की झाँई परत, अंधा होत भुजंग।।
कबिरा तिन की कौन गति, जेनित नारी के संग ।। (कबीरदास)

आधुनिक काल में नारी–अंग्रेजों के आगमन के बाद, कुछ उनके और कुछ उनकी चलाई शिक्षादीक्षा के, कुछ यहाँ चलने वाले अनेक प्रकार के शैक्षणिक, सामाजिक और राजनीतिक आन्दोलनों के प्रभाव से भारतीय नारी को घर-परिवार से बाहर कदम रखने का अवसर मिला। इस काल में महान् समाज-सुधारक राजा राममोहन राय ने सती–प्रथा की समाप्ति, विधवाओं के पुनर्विवाह, स्त्री-शिक्षा आदि पर जोर दिया। महात्मा गाँधी ने अछूतोद्धार की भाँति नारी मुक्ति के लिए भी प्रयास किया। समाज-सुधारकों के सामूहिक प्रयास, देश में सामाजिक और राजनीतिक चेतना के प्रादुर्भाव, पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव तथा प्रगतिशील विचारधारा ने नारी दासता की बेड़ियों को काटा और वह मुक्ति की ओर अग्रसर हुई। आज नारी जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त है। वह राजनीतिज्ञ, राजनयिक, विधिवेत्ता, न्यायाधीश, प्रशासक, कवि, चिकित्सकै आदि के रूप में समाज को अपना योगदान दे रही है।

संविधान द्वारा दिये गये अधिकार-स्वतन्त्रता मिलने के पश्चात् लागू भारतीय संविधान में (अनुच्छेद 14 और 15) पुरुषों और स्त्रियों की पूर्ण समानता की गारण्टी दी गयी तथा लैंगिक आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव न करने की बात कही गयी। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 में लड़की को लड़के के समान सह-उत्तराधिकारी बना दिया गया। हिन्दू विवाह अधिनियम, 1956 ने विशेष आधारों पर विवाह के सम्बन्ध को समाप्त करने की अनुमति दी। दहेज को अवैध घोषित किया गया तथा इसके लिए सजा की व्यवस्था की गयी। दहेज की विकरालता को देखते हुए सन् 1961 में एक दहेज विरोधी कानून बनाया गया।

बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में नारी ने लगभग प्रत्येक आन्दोलन में पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर योगदान दिया है तथा समाज की प्रत्येक समस्या के विरुद्ध अपनी आवाज उठायी है। शोषण की घटनाओं के विरुद्ध तो उसने शक्तिशाली प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की हैं। यह इस बात का संकेत है कि महिलाओं में पर्याप्त जागरूकता आयी है। नारियों को विभिन्न स्तरों पर आरक्षण देने की बातें हो रही हैं, परन्तु संविधान में यह व्यवस्था अभी तक नहीं की जा सकी है।

कामकाजी महिलाओं की समस्याएँ-अभाव और महँगाई से दो-चार होने के लिए महिलाओं को कुछ मात्रा में स्वतन्त्रता-प्राप्ति से पहले और अधिकतर स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद कई तरह के काम-काज का भी सहारा लेना पड़ा। पुरुषों एवं महिलाओं का एक वर्ग यह समझता है कि कामकाजी नारी की समस्त समस्याएँ समाप्त हो जाती हैं। नौकरी मिलते ही नारी नारीत्व के अभिशापों से मुक्त हो जाती है, परन्तु वस्तुस्थिति सर्वथा भिन्न है, यथा–

(1) नारी कामकाजी महिला बनने का निर्णय लेने में स्वतन्त्र नहीं होती है। विवाह के पहले माता-पिता और बाद में ससुरालीजनों की इच्छा पर निर्भर रहता है कि वह कामकाजी बनी रहे अथवा नहीं।

(2) कामकाजी होने पर भी महिला आर्थिक दृष्टि से स्वतन्त्र नहीं बन पाती है। उसको अपनी कमाई का हिसाब घरवालों को देना पड़ता है। प्रायः यह भी देखने में आता है कि ससुराल वाले विवाह के पूर्व की जाने वाली उसकी कमाई का भी हिसाब माँगते हैं।

(3) दोहरी जिम्मेदारी-कामकाजी महिलाओं को नौकरी से लौटकर घरेलू कार्य करने पड़ते हैं। अत: एक अतिरिक्त जिम्मेदारी सँभालकर भी कामकाजी महिलाएँ अपनी पूर्व जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो पायी हैं।।

(4) बच्चों की परवरिश-कामकाजी महिलाओं के पास बच्चों को देने के लिए समय का अभाव होता है। फलतः उनके बच्चे संस्कारित नहीं हो पाते और उनका भविष्य बिगड़ जाने की सम्भावना रहती है।

(5) समाज में बदनामी-आधुनिक युग में भी स्त्रियों का नौकरी करना उचित नहीं माना जाता। बहू को नौकरी नहीं करने देने के लिए सास-ससुर, देवर-ज्येष्ठ और पति तक भी तनकर खड़े हो जाते हैं।

(6) परिजनों का शक-नौकरी-पेशा करने वाली महिलाएँ चरित्र के प्रति सन्देह की समस्या से कभी नहीं उबर पाती हैं। कार्यालय में किसी भी कारण से थोड़ी भी देर हो जाए तो परिजनों, विशेषकर पति की शक की निगाहें उसे अन्दर तक बेध डालती हैं। यह समस्या उस वक्त और भी बढ़ जाती है, जब महिला कोई स्टेनो या सेक्रेटरी हो।

(7) यौन शुचिता–आज भी स्त्री की सबसे बड़ी समस्या उसकी यौन शुचिता है। ऑफिस में किसी भी मुस्कराहट या स्पर्श से भी वह दूषित हो जाती है। यौन शुचिता का यह परिवेश नारी को खुलकर कार्य करने से रोकता है तथा उसकी प्रतिभा को कुण्ठित करता है।

(8) यौन-शोषण-सरकारी कार्यालयों में कार्य करने वाली महिलाएँ पूर्ण तो नहीं, किन्तु अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं। सरकारी कार्यालयों में कार्यरत महिलाओं के भी यौन-शोषण होते हैं, किन्तु निजी संस्थानों में अथवा मजदूरी करने वाली महिलाओं की दशा तो अत्यधिक दारुण है।

(9) वरीयता का मापदण्ड योग्यता नहीं–प्राइवेट संस्थानों के रोजगार विज्ञापनों में स्मार्ट, सुन्दर व आधुनिक महिलाओं की वरीयता यह प्रश्न खड़ा करती है कि कार्यक्षमता के आधार पर आगे बढ़ने वाले निजी संस्थानों का काम क्या स्मार्ट, सुन्दर व आधुनिक महिलाएँ ही सँभाल सकती हैं ? योग्यता कोई मापदण्ड नहीं? यह भी एक बीमार मानसिकता की परिचायक है।

(10) परिधान-कामकाजी महिलाओं के लिए परिधान (ड्रेस) बहुत बड़ी समस्या रहती है। वह जरा-सी भी सज-सँवर करके चले तो उस पर फब्तियाँ कसी जाती हैं, उसको तितली अथवा फैशन परेड की नारी कहा जाता है।

(11) पुरुषों की अपेक्षा सौतेला व्यवहार-महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा कम वेतन दिया जाता है। तथा पुरुषों की तुलना में इनके साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है। पहले विमान परिचारिकाओं के गर्भवती होते ही उन्हें सेवा-मुक्त कर दिया जाता था। लम्बे संघर्ष के उपरान्त अब विमान परिचारिकाओं ने माँ बनने का अधिकार पाया है।

(12) बाहरी दौरे-कार्य के लिए अपने गृह जिले के बाहर जाना भी कामकाजी महिलाओं की एक प्रमुख समस्या है। घर की जिम्मेदारी, शील व गरिमा की चिन्ता, पति व बच्चों से आत्मीयता आदि उसे दौरे पर जाने से रोक देते हैं।

(13) रात्रि ड्यूटी-कामकाजी महिलाओं के लिए रात्रि ड्यूटी करना बहुत कठिन होता है। लोगों की शक की निगाहें मुसीबत कर देती हैं। अस्पतालों में रात्रि की पारी में काम करने वाली नर्से, बड़े होटलों में काम करने वाली महिलाएँ अपनी ड्यूटी सुरक्षित निकालकर सुकून का अनुभव करती हैं।

(14) नारी की नौकरी यदि पति की अपेक्षा श्रेष्ठ होती है तो उसको पति की हीन भावना का भी शिकार होना पड़ता है।

(15) नौकरी करते हुए पति-पत्नी एक ही स्थान पर कार्यरत रहें, तब तो कुछ ठीक है, अन्यथा उनका दाम्पत्य तथा गृहस्थ जीवन समाप्त हो जाते हैं, वैसे भी कामकाजी महिलाओं की गृहस्थी अव्यवस्थित तो हो ही जाती है।

(16) कुछ कामकाजी महिलाओं के लिए तो नौकरी अभिशाप बन जाती है। ऐसा प्रायः उन महिलाओं के साथ होता है, जिनके पतियों की आमदनी कम होती है, अथवा पति शराबी व कुमार्गी होते हैं। ऐसे पति अपनी पत्नी की आमदनी को भी उड़ाने के लिए पत्नी को भाँति-भाँति से उत्पीड़ित एवं प्रताड़ित करते हैं।

कामकाज से इतर महिलाओं की समस्याएँ-सुधारों की गर्जना तथा संवैधानिक प्रयास नारी की मौलिक समस्याओं को सुलझा नहीं सके हैं। संविधान ने नारी को मताधिकार एवं सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार प्राप्त करने का अधिकार दे दिया है, परन्तु समाज की दृष्टि में नारी को आज भी पुरुष की अंकशायिनी और दासी ही माना जाता है। हम आज भी अनेकानेक नारियों के उत्पीड़न, आत्मदाह तथा उनकी हत्या के समाचार सुनते रहते हैं। इनमें नौकरी करने वाली यानी कामकाजी महिलाएँ भी सम्मिलित हैं। आज भी दहेज का दानव नारी के जीवन को त्रस्त किये हुए है। विधवा-विवाह के नाम पर आज भी लोग नाक-भौंह सिकोड़ते हैं। नारी की उन्नति के नाम पर हम कितनी भी बातें करें, परन्तु नारी आज भी उपेक्षित है। वह घर-परिवार में एक सामान्य नारी से अधिक कुछ नहीं है। आज भी गर्भ में बच्ची (लड़की) को मार दिया जाता है तथा प्रसूति के समय दूषित प्रकृति का शिकार होना पड़ता है। अपनी रक्षा के लिए मुस्तैद नारी पर लोग तरह-तरह की फब्तियाँ कसते हैं।

उपसंहार-महिला हो या पुरुष, काम करना किसी के लिए भी अनुचित या बुरा नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि समाज की मानसिकता, घर-परिवार और समूचे जीवन की परिस्थितियाँ ऐसी बनायी जाएँ, ऐसे उचित वातावरण का निर्माण किया जाए कि कामकाजी महिला भी पुरुष के समान व्यवहार और व्यवस्था पा सके। नारियों की समस्याओं के निराकरण के लिए फैमिली कोर्ट बनाये जाने चाहिए और उनके प्रति किये जाने वाले आपराधिक मामलों में तकनीकी नहीं, व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। दहेज, बलात्कार, अपहरण आज की नारी के सामने बहुत बड़ी चुनौतियाँ हैं। नारियों के समर्थन में किये जाने वाले हमारे आन्दोलन पश्चिम के अन्धानुकरण को लेकर नहीं होने चाहिए। उनको भारतीय गृहिणी के आदर्शों के अनुरूप ढालने का प्रयास करना चाहिए। पाश्चात्य चिन्तन के अन्धानुकरण से इस देश की नारियों को भी जल्दी-जल्दी तलाक, अवैध शिशु-जन्म आदि समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि जब तक नारी के प्रति समाज के दृष्टिकोण में बदलाव नहीं आएगा, तब तक नारी का जीवन त्रस्त ही बना रहेगा। भारतीय नारी की मुक्ति के लिए सांस्कृतिक आन्दोलन की आवश्यकता है, संविधान और कानून तो उसमें सिर्फ मुददगार हो सकते हैं।

महिला सशक्तीकरण (2017)

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2. सशक्तीकरण का अर्थ,
  3. महिला सशक्तीकरण अभियान,
  4. महिला सशक्तीकरण अभियान के उद्देश्य- (क) महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा को समाप्त करना, (ख) लिंगानुपात को सन्तुलित करना, (ग) लिंग-आधारित आर्थिक असमानता को समाप्त करना, (घ) बाल-विवाह पर रोक लगाना, (ङ) लड़कियों को शिक्षित करना, (च) सीमान्त तथा शोषित महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में लाना, (छ) महिलाओं की खरीद-फरोख्त पर रोक लगाना,
  5. महिलाओं की संवैधानिक स्थिति,
  6. महिला सशक्तीकरण अधिनियम,
  7. महिला सशक्तीकरण और समाज,
  8. उपसंहार।

प्रस्तावना-भारतीय समाज में नारियों को शक्तिस्वरूपा मानते हुए उनकी पूजा होती रही है। प्राचीन भारत के इतिहास के पृष्ठ भारतीय नारियों की गौरवगाथा से भरे हुए हैं।‘मनुस्मृति’ में कहा गया है

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते तत्र देवताः

अर्थात् जहाँ नारी की पूजा की जाती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। भारतीय समाज में नारियों की दशा और दिशा में काल परिवर्तन के साथ परिवर्तन होता रहा है। किसी युग में नारी को पूजा गया तो किसी युग में उसके अपमान, उत्पीड़न और अत्याचार की सीमाएँ पार कर दी गईं। महिलाएँ समाज में अनेक कुरीतियों एवं कुप्रथाओं का भी शिकार होती रहती हैं। भारतीय समाज का ताना-बाना ऐसा है, जिसमें अधिकांश महिलाएँ पिता, पति या पुत्र पर ही आर्थिक रूप से निर्भर होती हैं। निर्णय लेने का अधिकार भी पुरुषों का ही होता है। उनके इन अधिकारों की रक्षा के लिए ही महिला सशक्तीकरण की अवधारणा का जन्म हुआ, जिससे महिलाएं अपने जीवन से जुड़ी प्रत्येक निर्णय स्वयं ले सकें और परिवार तथा समाज में अच्छी प्रकार रह सकें। महिलाओं के वास्तविक अधिकारों के विषय में जानकारी देकर उन्हें सक्षम बनाना ही महिला सशक्तीकरण है। पं० जवाहरलाल नेहरू ने भी महिलाओं की स्थिति को सशक्त बनाने के उद्देश्य से कहा था- “लोगों को जगाने के लिए महिलाओं का जाग्रत होना जरूरी है। एक बार जब वो अपना कदम उठा लेती है, परिवार आगे बढ़ता है, गाँव आगे बढ़ता है और राष्ट्र विकास की ओर उन्मुख होता है।”

सशक्तीकरण का अर्थ–सशक्तीकरण अर्थ है-शक्तिशाली बनाना। वर्तमान में महिला सशक्तीकरण को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक असमानताओं से पैदा हुई समस्याओं के सन्दर्भ में देखा जा रहा है। इसमें जागरूकता, अधिकारों को जानने, सहभागिता और निर्णय लेने के अधिकार जैसे घटक को सम्मिलित किया गया है। लीला मीहेनडल के अनुसार-“निडरता, सम्मान और जागरूकता तीनों शब्द महिला सशक्तीकरण में सहायक हैं।

महिला सशक्तीकरण अभियान–सरकार द्वारा महिलाओं को विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए सन् 2001 ई० में महिला सशक्तीकरण की राष्ट्रीय नीति लागू की गई। इसके अन्तर्गत सरकारी नीति तथा कल्याणकारी योजनाओं में महिलाओं के विधिक अधिकारों को सशक्त करने तथा स्वास्थ्य सुविधाओं को दृढ़ बनाने के उद्देश्य को ध्यान में रखा गया है। महिलाओं के उत्थान हेतु किए जा रहे शासकीय प्रयासों में कुछ सामाजिक और संस्थानात्मक अवरोध सामने आए हैं। इन अवरोधों का उन्मूलनकर महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक सशक्तीकरण के उद्देश्य से 8 मार्च, 2010 ई० को राष्ट्रीय महिला सशक्तीकरण अभियान नामक कार्यक्रम आरम्भ किया गया। भारत में सभी राज्यों एवं सभी केन्द्रशासित प्रदेशों में महिला सशक्तीकरण कार्यक्रम को लागू कर दिया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य महिला विकास से सम्बन्धित कार्यक्रमों को निचले स्तर तक पहुँचाना है।

महिला सशक्तीकरण अभियान के उद्देश्य-महिला सशक्तीकरण अभियान के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
(क) महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा को समाप्त करना-महिलाओं को सुरक्षा और स्वायत्तता प्रदान करने की दिशा में अनेक महत्त्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। महिलाओं के प्रति हिंसा के अन्तर्गत अनेक प्रकार की प्रताड़नाएँ आती हैं; जैसे-मानसिक, शारीरिक और यौन उत्पीड़न एवं दहेज-सम्बन्धी प्रताड़ना आदि। महिला सशक्तीकरण का दृष्टिकोण यह है कि महिलाएँ इन उत्पीड़नरूपी हिंसा व भेदभाव से मुक्त होकर सम्मान के साथ जीवन व्यतीत कर सकें।

(ख) लिंगानुपात को सन्तुलित करना—लैंगिक असमानता भारत का प्रमुख सामाजिक मुद्दा है, जिसमें महिलाएँ निरन्तर पिछड़ती जा रही हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 1000 पुरुषों पर 943 महिलाएँ हैं। इस असमानता को समाप्त करने के लिए महिला सशक्तीकरण में तेजी लाने की आवश्यकता है।

(ग) लिंग-आधारित आर्थिक असमानता को समाप्त करना-महिलाएँ किसी प्रकार भी पुरुषों से कम नहीं हैं। यदि वे वही कार्य करती हैं जो पुरुष करते हैं तो उन्हें पुरुषों के समान ही पारिश्रमिक मिलना चाहिए, जबकि समाज में ऐसा नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 में समान काम, समान वेतन’ की व्यवस्था की गयी है। महिला सशक्तीकरण में इस आर्थिक असमानता को समाप्त करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

(घ) बाल-विवाह पर रोक लगाना-राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, स्वामी दयानन्द सरस्वती आदि के अथक प्रयासों द्वारा बाल-विवाह निरोधक अधिनियम (1955) बना, परन्तु आज भी कई पिछड़े क्षेत्रों में माता-पिता की अशिक्षा, असुरक्षा और गरीबी के कारण बाल-विवाह का प्रचलन है। इस विवाह से अवयस्क माता और शिशु के व्यक्तित्व और स्वास्थ्य में गिरावट आती है। महिला सशक्तीकरण द्वारा इस पर रोक लगाई जा रही है।

(ङ) लडकियों को शिक्षित करना--शिक्षा अज्ञानतारूपी अंधकार को दूर करके विकास और उन्नति के मार्ग खोलती है। भारतीय समाज में लड़की को पराया धन मानकर उसी शिक्षा एवं अन्य सुख-सुविधाओं की उपेक्षा की जाती है, परन्तु आज महिला सशक्तीकरण आन्दोलन के कारण इस दिशा में भी परिवर्तन हो रहा है। आज लड़कियों के स्कूल में पंजीकरण एवं उनकी उपस्थिति में तेजी से वृद्धि हुई है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के अनुसार-“महिलाओं की शिक्षा व्यवस्था, स्वतन्त्र आय तथा सामाजिक परिस्थिति में सुधार ने परिवार में उनकी निर्णय क्षमता को बढ़ाया है और महिलाओं के समावेशन (सशक्तीकरण) के मार्ग को प्रशस्त किया है।”

(च) सीमान्त तथा शोषित महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में लाना–महिला सशक्तीकरण अभियान के अन्तर्गत सीमान्त महिलाओं (वेश्याओं) को वेश्यालयों से रिहा कराना, यौन शोषित एवं एड्स से पीड़ित, विधवाओं, बेसहाराओं, आतंकवाद की शिकार तथा विक्षिप्त महिलाओं के लिए स्वास्थ्य, देखभाल, परामर्श, रोजगारपरक प्रशिक्षण, जागरूकता, पुनर्वास आदि की सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं और उन्हें देश की मुख्य धारा में जोड़ने को साहसपूर्ण एवं सराहनीय कदम उठाया जाता है। इस प्रयास से अनेक महिलाओं का जीवन सुधारा जा सका है।

(छ) महिलाओं की खरीद-फरोख्त पर रोक लगाना–स्वार्थी तत्त्वों द्वारा महिलाओं की खरीद-फरोख्त के अवैध व्यपार को रोकने के लिए अनेक योजनाएँ बनाई जा रही हैं। उज्ज्वला योजना के अन्तर्गत महिलाओं के अवैध व्यापार को रोकने से लेकर उनकी रिहाई, पुनर्वास, पुन:एकीकरण और पुनस्र्थापन का प्रयास किया जा रहा है। इस दिशा में अनेक एन०जी०ओ० तथा हेल्पलाइनें महिला उन्नयन का कार्य कर रही हैं।

महिलाओं की संवैधानिक स्थिति-भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 19, 21, 23, 24, 37, 39 (बी), 44 तथा अनुच्छेद 325 के अनुसार स्त्रियों को भी पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त हैं। संविधान की दृष्टि में स्त्री-पुरुष में कोई भेद नहीं किया गया है। समाज में जो भेद दृष्टिगोचर होते हैं, वह सब अशिक्षा, संकीर्णता और स्वार्थलिप्सा आदि के कारण ही समाज में विद्यमान हैं।

महिला सशक्तीकरण अधिनियम–संवैधानिक अधिकारों के साथ-साथ महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए संसद द्वारा कुछ अधिनियम पास किए गए हैं; जैसे–एक बराबर पारिश्रमिक ऐक्ट, दहेज रोक अधिनियम, अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, मेडिकल टर्मनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी ऐक्ट, बाल-विवाह रोकथाम ऐक्ट, लिंग परीक्षण तकनीक (लड़का-लड़की जाँच पर रोक) ऐक्ट, कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन-शौषण रोकने तथा उन्हें सुरक्षा देने सम्बन्धी ऐक्ट आदि। इन अधिनियमों का सही उपयोग कर महिलाएँ अपना शोषण रोकने में समर्थ हो रही हैं।

महिला सुरक्षा के अन्तर्गत उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 1090 शक्ति-योजना का शुभारम्भ किया गया है। यह महिलाओं की सुरक्षा हेतु एक बहुआयामी योजना है। इसके अन्तर्गत मोबाइल द्वारा मात्र एक बटन दबाते ही पुलिस नियन्त्रण कक्ष को सूचना मिल जाती है और संकटग्रस्त महिला की स्थिीत (स्थान की पहचान) की सही जानकारी पुलिस को हो जाती है, जिससे पुलिस उस महिला की तुरन्त सहायता करती है।

महिला सशक्तीकरण और समाज-भूमण्डलीकरण के इस दौर में स्त्री-पुरुष समानता की दुहाई के साथ-साथ अनेक संगठन, स्वयंसेवी संस्थाएँ, हेल्पलाइनें महिलाओं के सशक्तीकरण और उत्थान में जुटे हुए हैं; फिर भी समाज में महिलाओं की स्थिति में पर्याप्त सुधार नहीं आया है। इसका मुख्य कारण यह है कि स्वयं महिलाओं में आज भी अन्धविश्वास एवं रूढ़िवादिता की प्रवृत्ति कूट-कूटकर भरी है। निरक्षर अथवा अल्पशिक्षित महिलाओं की तो बात ही छोड़िए, सैकड़ों पढ़ी-लिखी महिलाएँ भी पुत्र-रत्न की प्राप्ति के लिए तन्त्र-मन, झाड़-फेंक और ढोंगी बाबाओं के जाल में फंसी हैं। रोजगार के क्षेत्र में भी पर्याप्त सुधार नहीं हो पाया है। उच्च पदों पर महिलाओं की नियुक्ति अभी 2 या 3 प्रतिशत ही है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रत्येक वर्ष एक करोड़ पच्चीस लाख लड़कियाँ जन्म लेती हैं, लेकिन तीस प्रतिशत लड़कियाँ 15 वर्ष से पूर्व ही मृत्यु का शिकार हो जाती हैं। राजनीति में भी महिलाओं का प्रवेश हो गया है, संसद में उनकी संख्या भी बढ़ी है। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, राष्ट्रपति, न्यायाधीश जैसे उच्च पदों को महिलाओं ने सुशोभित किया है। खेलों, फिल्मों, लेखन, पत्रकारिता तथा सौन्दर्य प्रतियोगिताओं में भी महिलाओं ने नये कीर्तिमान स्थापित किए हैं, परन्तु अभी भी समाज में नारी को वह स्थान नहीं मिल पाया है, जिसकी वह अधिकारी है।

उपसंहार-अन्त में कहा जा सकता है कि महिलाओं को सशक्त करने के लिए कोई ईश्वर या मसीहा अवतरित नहीं होगा और न ही समाज द्वारा नारीवाद की परिभाषा गढ़ने से कोई बात बनेगी। यह तभी सम्भव होग जब महिलाएं अपने अधिकारों के लिए स्वयं आगे आएँ, अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करें। सरकारें भी केवल महिला अधिकारों और कानूनों की संख्या में वृद्धि न करें, बल्कि व्यावहारिकता को ध्यान में रखते हुए ऐसे अधिकार और कानून बनाएँ, जिससे वास्तविक सशक्तीकरण की अवधारणा को साकार किया जा सके।

नारी स्वातंत्र्य : उच्छंखलता या प्रगतिशीलता

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2. राष्ट्र की प्रगति में नारी की भूमिका,
  3. नारी स्वातंत्र्य के विरुद्ध घृणित षड्यंत्र,
  4. स्वतन्त्रता का दुरुपयोग,
  5. नारी के बढ़ते कदम,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना-आज की नारी स्वतंत्र है। सत्ता की कुर्सी हो अथवा खेल का मैदान, वैज्ञानिक अनुसंधानों की प्रयोगशाला हो या कला-साहित्य का संसार, आज नारी के लिए प्रत्येक क्षेत्र का द्वार पूर्ण रूप से खुला है। भारत में उपनिवेशवादरूपी राक्षस से लड़ने के लिए उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से ही नारी की दशा में सुधार के प्रयास आरम्भ हो गए थे। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पश्चात् तो संवैधानिक रूप से भी उन्हें स्वावलम्बी तथा सर्वाधिकारसम्पन्न बना दिया गया। समय-समय पर विभिन्न प्रकार के कानून बनाकर भी उनके स्वातंत्र्य तथा हितों की रक्षा की गई है। विश्व के कई अन्य राष्ट्रों में भी आज नारी को समुचित स्थान प्राप्त है। वस्तुतः ‘स्वतन्त्र और सबल प्रस्थितिवाली नारी’ ही 21वीं सदी को 20वीं सदी की सबसे बड़ी देन है।

किन्तु पिछले कुछ समय से यह विवाद का विषय बन गया है कि नारी स्वातंत्र्य प्रगतिशीलता का पोषक है अथवा उच्छंखलता का। हमारे समक्ष कई उदाहरण हैं कि महिलाओं ने अपनी स्वतन्त्रता का सदुपयोग कर विश्व के सामने विकास को ऊँचा कीर्तिमान प्रस्तुत किया। इसके विपरीत कई ऐसे प्रमाण भी हैं। कि स्त्रियों ने अपने स्वातंत्र्य अधिकारों का दुरुपयोग कर समाज में उच्छृखलता और संस्कारहीनता को बढ़ावा दिया। जहाँ एक ओर संतोष यादव, अरुणिमा सिन्हा और कल्पना चावला जैसी नारियों ने प्रगति की ऊँचाइयों को छुआ है, वहीं दूसरी ओर कुछ युवतियों ने मॉडलिंग के बहाने अपनी देह प्रदर्शन जैसे घृणित कार्य कर समाज के संस्कार को गर्त में गिराया है। वास्तव में नारी स्वातंत्र्य पर चल रहा यह विवाद गम्भीर रूप से विचारात्मक तथा विश्लेषणात्मक है।

राष्ट्र की प्रगति में नारी की भूमिका–इतिहास साक्षी है कि जब-जब समाज या राष्ट्र ने नारी को अवसर तथा अधिकार दिया है, तब-तब नारी ने विश्व के समक्ष श्रेष्ठ उदाहरण ही प्रस्तुत किया है। मैत्रेयी, गार्गी, आंडाल, विश्वपारा, केशा आदि विदुषी स्त्रियाँ शिक्षा के क्षेत्र में अपने बहुमूल्य योगदान के लिए आज भी पूजनीय हैं। आधुनिक काल में महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, महाश्वेता देवी, अमृता प्रीतम, अरुन्धती राय आदि स्त्रियों ने साहित्य तथा राष्ट्र की प्रगति में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। चेनम्मा, रानी दुर्गावती, माँ जीजाबाई, देवी अहिल्याबाई, रजिया सुल्तान, लक्ष्मीबाई, शिरिमाओ भण्डारनायके, इन्दिरा गांधी, आंग सान सू की और एंजेला मार्केल आदि स्त्रियाँ प्रगति के मार्ग पर संघर्ष और सुनेतृत्व की स्पष्ट मूर्तियों के रूप में स्थापित हुईं। कला के क्षेत्र में एम०एस० सुब्बुलक्ष्मी, लता मंगेशकर, देविका रानी, वैजन्तीमाला, सुधा चन्द्रन, सोनाल मानसिंह, मीरा नायर, सरोज खान और फराह खान आदि स्त्रियों का योगदान वास्तव में प्रशंसनीय है। इनके अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों; जैसे—चिकित्सा, अभियान्त्रिकी, बैंकिंग, प्रशासन आदि में भी स्त्रियाँ अपनी सक्रिय तथा विकासोन्मुखी भूमिका निभा रही हैं। इनमें से किसी ने भी उच्छृखलता का मार्ग नहीं अपनाया।

नारी स्वातंत्र्य के विरुद्ध घृणित षड्यंत्र–इन प्रगतिशील तथा उत्तरदायित्वपूर्ण भूमिकाओं के बावजूद नारियों पर यह आरोप लगाया जाता है कि वे अपनी स्वतन्त्रता का गलत फायदा उठा रही हैं तथा समाज में अनुशासनहीनता फैला रही हैं, ऐसे आरोप कुछ तो सत्य होते हैं, किन्तु कुछ पूर्वाग्रह और दुराग्रह से ग्रसित। आज के युग में मध्यमवर्गीय परिवारों में कामकाजी महिलाओं का प्रचलन बढ़ गया है। ऐसी कामकाजी महिलाओं को अपने कार्यालय तथा घर में सामंजस्य बनाए रखना पड़ता है। कार्यालयों में स्त्रियों को लिंग-भेद के पक्षपातपूर्ण व्यवहार का सामना करना पड़ता है। उच्चस्थ अधिकारी तथा साथी कर्मचारी उनके कार्य के नहीं, बल्कि सौन्दर्य के प्रशंसक होते हैं। असभ्य और असम्मानजनक टिप्पणियों का सामना करना आज महिलाओं के लिए दिनचर्या का अभिन्न अंग-सा बन गया है।

यदि स्त्रियाँ इस प्रकार की असभ्यता का विरोध करती हैं तो उन्हें विभिन्न प्रकार से प्रताड़ित किया जाता है-यहाँ तक कि उन्हें सेवा से निष्कासन तक की धमकी दी जाती है और यदि वे अपने उच्चस्थ अधिकारियों को प्रसन्न रखने का प्रयास करती हैं तो उन्हें पुंश्चली (वेश्या) और उच्छंखल की संज्ञा मिल जाती है। वस्तुत: नारी की ऐसी उच्छृखंलता के पीछे पुरुष की ही घृणित मंशा छिपी होती है। बाहर की इन परिस्थितियों से जूझते हुए महिलाएँ जब घर लौटती हैं तो घर के सभी काम उन्हें ही करने पड़ते हैं। इस घोर थकावट के बावजूद उनसे आशा की जाती है। कि वे सदा मुस्कराती रहें। ऐसे में यदि कभी उनके चेहरे पर तनाव या चिन्ता की कोई रेखा पड़ जाती है, तो उन्हें असभ्य और उच्छृखल घोषित कर दिया जाता है। वस्तुत: पुरुष का दम्भ यह स्वीकार ही नहीं कर पा रहा कि जो नारी कल तक उसकी दासी-स्वरूपा थी, वह आज उसकी सहचरी बन गई है। इसलिए नारी-स्वतंत्रता के विरुद्ध घृणित षड्यंत्र रचे जा रहे हैं।

स्वतंत्रता का दुरुपयोग-कई ऐसे प्रमाण भी हैं कि स्त्रियों ने अपनी स्वतंत्रता का गलत उपयोग कर उच्छंखलता का ही परिचय दिया है। ‘रानी मेरी’ की उच्छंखलता (क्रूरता) ने ही उन्हें इतिहास में ‘खूनी मेरी के नाम से कुख्यात किया। इन्दिरा गांधी द्वारा अधिरोपित दो वर्षों का आपातकाल आज तक उनके सफल व्यक्तित्व एवं स्वर्णिम शासनकाल पर बदनुमा दाग है। आज फिल्मोद्योग की कई अभिनेत्रियाँ सोचती हैं कि अंग-प्रदर्शन द्वारा वे दर्शकों के बीच अधिक लोकप्रिय हो सकती हैं और इसलिए वे सामाजिक एवं सांस्कृतिक मर्यादा को लाँघकर अंग-प्रदर्शन करती हैं। मॉडलिंग के क्षेत्र में तो स्थिति और भी बदतर है। फिल्म तथा मॉडलिंग से सम्बन्धित अधिकतर कार्यक्रमों एवं पत्रिकाओं में इस तरह की उच्छंखलता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। नारियों में ऐसी उच्छृखलता सामान्य घरों में भी पाई जाती है। मध्यमवर्गीय परिवारों की लड़कियाँ ऊँचे सपने देखती हैं और उन्हें साकार करने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती हैं। कुछ वर्ष पहले मुम्बई की व्यस्त सड़क पर मात्र पन्द्रह सौ रुपये तथा थोड़ी-सी लोकप्रियता के लिए दो लड़कियों ने बिना किसी झिझक के अपने कपड़े उतार दिए। यह घटना वास्तव में नारी-स्वतंत्रता पर उपादेयता का एक बड़ा प्रश्नचिह्न है और उच्छृखलता की पराकाष्ठा भी।

स्त्रियों द्वारा अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग वास्तव में दु:खद है। यह पुरुष-प्रधान समाज सदा से ही नारी-स्वतंत्रता का विरोधी रहा है। ऐसे में महिलाओं द्वारा अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग तथा उच्छृखलता का। प्रदर्शन पुरुषों को उनके विरुद्ध षड्यन्त्र रचने के अवसर प्रदान करते हैं। महिलाओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि स्वतंत्रता का दुरुपयोग उन्हें नष्ट कर देगी। ऊंचे सपने देखना कदापि गलत नहीं है, किन्तु उन्हें साकार करने के लिए निम्नस्तरीय व्यवहार सदा ही गलत है। ‘नारी’ ही सम्पूर्ण विश्व की जननी है। विश्व की संस्कृति, प्रगति आदि सब उसी के गर्भ से उत्पन्न होती हैं। अत: आज नारी को विश्व के समक्ष ऐसा प्रतिमान स्थापित करना है कि उसकी अनिवार्यता और अपरिहार्यता को समग्र रूप से स्वीकार किया जा सके।

नारी के बढ़ते कदम-स्वतंत्रता का सदुपयोग तथा दुरुपयोग व्यक्तिगत मनोवैज्ञानिक प्रयोग है। कुछ लोग अपनी स्वतंत्रता को अपना अधिकार समझते हैं और इसका प्रयोग स्वार्थ-सिद्धि तथा निजी महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति हेतु करते हैं और कुछ लोग अपनी स्वतंत्रता को अपना उत्तरदायित्व मानते हैं और इसका निर्वहन अपने समाज तथा राष्ट्र के विकास के लिए करते हैं। महिलाओं में भी ये दो श्रेणियाँ पाई जाती हैं, किन्तु अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने वाली महिलाओं की संख्या अपेक्षाकृत अत्यन्त कम है। महिलाओं ने अपनी कर्तव्यनिष्ठा से यह सिद्ध किया है कि वे किसी भी स्तर पर पुरुषों से कम नहीं हैं, बल्कि उन्होंने तो प्रगति के मार्ग पर अपनी श्रेष्ठता ही प्रदर्शित की है।

शारीरिक एवं मानसिक कोमलता के कारण पहले महिलाओं को रक्षा-सम्बन्धी सेवाओं के उपयुक्त नहीं माना जाता था, किन्तु भारत की पहली महिला भारतीय आरक्षी सेवा अधिकारी श्रीमती किरण बेदी ने ही अपनी कर्तव्यनिष्ठा से इस मिथक को पूरी तरह तोड़ दिया। आज देश की आन्तरिक एवं बाह्य सुरक्षा में महिलाएँ समान रूप से संलग्न हैं। नारी-समुदाय पर यह आरोप लगाया जाता था कि वे पुरुषों की अपेक्षा कम बुद्धिमान होती हैं। संघ लोक सेवा आयोग की सर्वप्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा में भावना गर्ग और विजयलक्ष्मी बिदारी जैसी नारियों ने इतिहास रचकर पुरुष के इस दंभ को भी तोड़ा है। पुरुष-वर्चस्व वाले फिल्मोद्योग में सर्वप्रतिष्ठित दादा साहेब फाल्के पुरस्कार की पहली विजेता देविका रानी थीं। सितम्बर, 2001 में आयोजित 58वें वेनिस फिल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का गोल्डन लायन पुरस्कार भारत की प्रसिद्ध फिल्म निर्मात्री मीरा नायर की फिल्म ‘मानसून वेडिंग’ को मिला। भारत के लिए सम्मान की बात यह है कि मीरा नायर यह प्रतिष्ठित पुरस्कार पाने वाली पहली महिला हैं। जुलाई, 2016 में भारतीय वायुसेना के इतिहास में पहली बार तीन महिला लड़ाकू पायलटों ( भावना कान्त, अवनी चतुर्वेदी व मोहना सिंह) को शामिल किया गया। इस प्रकार, नारी को जिस क्षेत्र में अवसर तथा स्वातंत्र्य मिला, उसने अपने उच्चश्रेणी के कर्त्तव्य से वहीं विकास का नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया।

वस्तुत: किसी देश की अन्त:संरचना तथा प्रगति नारी-स्वातंत्र्य के समानुपाती होती है, अर्थात् जिस देश में नारी की सहभागिता जितनी अधिक है, वहाँ की अन्त:संरचना उतनी ही मजबूत तथा प्रगति-दर उतनी ही तीव्र है।

उपसंहार–भारतीय जीवन का आधार वेद एवं शास्त्र हैं। शास्त्रों में लिखी बातें ही हमारे लिए प्रामाणिक होती हैं। नारी की स्वतंत्रता को प्रगति का आवश्यक तत्त्व मानकर ही शास्त्रों में लिखा गया है-

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता”

(नारी की पूजा का अर्थ है–नारी की स्वतंत्रता और उसको प्राप्त सम्पूर्ण अधिकार देवता सम्पन्नता के सूचक हैं।) इस प्रकार शास्त्रों में भी स्पष्ट है कि जहाँ नारी स्वतंत्र है वहाँ सम्पन्नता निश्चित है। उच्छंखलता व्यक्तिगत दोष है जो किसी भी अवस्था में पाया जा सकता है, इसे स्वतंत्रता का परिणाम नहीं कहा जा सकता। दूसरी तरफ विकास स्वतंत्रता का ही परिणाममात्र है।

नारी एवं पुरुष राष्ट्र के आधार हैं। दोनों ही विकासरूपी गाड़ी के दो पहिये हैं। यदि किसी एक पहिये में किसी भी प्रकार का कोई अवरोध होगा तो गाड़ी का आगे बढ़ पाना असम्भव होगा; अतः आवश्यक है कि पहिए आगे बढ़ने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हों।

वर्तमान समाज पर दूरदर्शन का प्रभाव [2009]

सम्बद्ध शीर्षक

  • दूरदर्शन : एक वरदान अथवा अभिशाप
  • मेरे जीवन पर दूरदर्शन का प्रभाव
  • दूरदर्शन : गुण एवं दोष
  • दूरदर्शन और भारतीय समाज [2009]
  • दरदर्शन : लाभ-हानि
  • दूरदर्शन और आधुनिक जीवन
  • दूरदर्शन का शैक्षिक उपयोग [2013, 14]

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2. दूरदर्शन का आविष्कार,
  3. विभिन्न क्षेत्रों में योगदान.
  4. दूरदर्शन से हानियाँ,
  5. उपसंहार।

प्रस्तावना-विज्ञान द्वारा मनुष्य को दिया गया एक सर्वाधिक आश्चर्यजनक उपहार दूरदर्शन है। आज व्यक्ति जीवन की आपाधापी से त्रस्त है। वह दिनभर अपने काम में लगा रहता है, चाहे उसका कार्य शारीरिक हो या मानसिक। शाम को थककर चूर हो जाने पर वह अपनी थकावट और नियों से मुक्ति के लिए कुछ मनोरंजन चाहता है। दूरदर्शन मनोरंजन का सर्वोत्तम साधन है। आज यह जनसामान्य के जीवन का केन्द्रीय अंग हो चला है। दूरदर्शन पर हम केवल कलाकारों की मधुर ध्वनि को ही नहीं सुन पाते वरन् उनके हाव-भाव और कार्यकलापों को भी प्रत्यक्ष देख पाते हैं। दूरदर्शन केवल मनोरंजन का ही साधन हो, ऐसा भी नहीं है। यह जनशिक्षा का एक सशक्त माध्यम भी है। इससे जीवन के विविध क्षेत्रों में व्यक्ति का ज्ञानवर्द्धन हुआ है। दूरदर्शन के माध्यम से व्यक्ति का उन सबसे साक्षात्कार हुआ है जिन तक पहुंचना सामान्य व्यक्ति के लिए कठिन ही नहीं, वरन् असम्भव भी था। दूरदर्शन ने व्यक्ति में जनशिक्षा का प्रसार करके उसे समय के साथ चलने की चेतना दी है। यूरोपीय देशों के साथ भारत में भी दूरदर्शन इस ओर महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह रेडियो, सिनेमा और समाचार-पत्रों से अधिक अच्छा और प्रभावी माध्यम सिद्ध हुआ है।

दूरदर्शन का आविष्कार-दूरदर्शन का आविष्कार अधिक पुराना नहीं है। 25 जनवरी, सन् 1926 ई० में इंग्लैण्ड के एक इंजीनियर जॉन बेयर्ड ने इसको रॉयल इंस्टीट्यूट के सदस्यों के सामने पहली बार प्रदर्शित किया। उसने रेडियो-तरंगों की सहायता से कठपुतली के चेहरे का चित्र बगल वाले कमरे में बैठे वैज्ञानिकों के सम्मुख दिखाकर उन्हें आश्चर्य में डाल दिया। विज्ञान के क्षेत्र में यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटना थी। भारत में दूरदर्शन का पहला केन्द्र सन् 1959 ई० में नयी दिल्ली में चालू हुआ था। आज तो सारे देश में दूरदर्शन का प्रसार हो गया है और इसका प्रसारण क्षेत्र धीरे-धीरे बढ़ता ही जा रहा है। कृत्रिम उपग्रहों ने तो दूरदर्शन के कार्यक्रमों को समस्त विश्व के लोगों के लिए और भी सुलभ बना दिया है।

विभिन्न क्षेत्रों में योगदान–दूरदर्शन अनेक दृष्टियों से हमारे लिए लाभकारी सिद्ध हो रहा है। कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में दूरदर्शन के योगदान, महत्त्व एवं उपयोगिताओं का संक्षिप्त विवरण आगे दिया जा रहा है।

(1) शिक्षा के क्षेत्र में दूरदर्शन से अनेक शैक्षिक सम्भावनाएँ हैं। वह कक्षा में प्रभावशाली ढंग से पाठ की पूर्ति कर सकता है। विविध विषयों में यह विद्यार्थी की रुचि विकसित कर सकता है। यह कक्षा में विविध घटनाओं, महान् व्यक्तियों तथा अन्य स्थानों के वातावरण को प्रस्तुत कर सकता है। दृश्य होने के कारण इसका प्रभाव दृढ़ होता है। इतिहास-प्रसिद्ध व्यक्तियों के जीवन की घटनाओं को दूरदर्शन पर प्रत्यक्ष देखकर चारित्रिक विकास होता है। देश-विदेश के अनेक स्थानों को देखकर भौगोलिक ज्ञान बढ़ता है। अनेक पर्वतों, समुद्रों और वनों के दृश्य देखने से प्राकृतिक छटा के साक्षात् दर्शन हो जाते हैं।

(2) वैज्ञानिक अनुसन्धान तथा अन्तरिक्ष के क्षेत्र में वैज्ञानिक अनुसन्धान की दृष्टि से भी दूरदर्शन का विशेष महत्त्व रहा है। चन्द्रमा, मंगल व शुक्र ग्रहों पर भेजे गये अन्तरिक्ष यानों में दूरदर्शन यन्त्रों का प्रयोग किया गया था, जिनसे उन्होंने वहाँ के बहुत सुन्दर और विश्वसनीय चित्र पृथ्वी पर भेजे। बड़े देशों द्वारा अरबों रुपयों की लागत से किये गये विभिन्न वैज्ञानिक अनुसन्धानों को प्रदर्शित करके दूरदर्शन ने विज्ञान का उच्चतर ज्ञान कराया है तथा सैद्धान्तिक वस्तुओं का स्पष्टीकरण किया है।

(3) तकनीक और चिकित्सा के क्षेत्र में-तकनीक और चिकित्सा के क्षेत्र में भी दूरदर्शन बहुत शिक्षाप्रद रहा है। दूरदर्शन ने एक सफल और प्रभावशाली प्रशिक्षक की भूमिका निभायी है। यह अधिक प्रभावशाली और रोचक विधि से मशीनी प्रशिक्षण के विभिन्न पक्ष शिक्षार्थियों को समझा सकता है। साथ ही यह लोगों को औद्योगिक एवं तकनीकी विकास के विभिन्न पहलू प्रत्यक्ष दिखाकर उनसे परिचित कराता है।

(4) कृषि के क्षेत्र में–भारत एक कृषिप्रधान देश है। यहाँ की तीन-चौथाई जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। यहाँ अधिकांश कृषक अशिक्षित हैं। वे कृषि उत्पादन में पुरानी तकनीक को ही अपनाने के कारण अपेक्षित उत्पादन नहीं कर पाते। दूरदर्शन पर कृषि-दर्शन आदि विविध कार्यक्रमों से भारतीय कृषकों में जागरूकता आयी है।।

(5) सामाजिक चेतना की दृष्टि से-सामाजिक चेतना की दृष्टि से तो दूरदर्शन निस्सन्देह उपयोगी सिद्ध हुआ है। इसने विविध कार्यक्रमों के माध्यम से समाज में व्याप्त कुप्रथाओं और अनेक बुराइयों पर कटु प्रहार किया है। लोगों को ‘छोटा परिवार सुखी परिवार की ओर आकर्षित किया है। इसने बाल-विवाह, दहेज-प्रथा, छुआछूत व साम्प्रदायिकता के विरुद्ध जनमत तैयार किया है। इसके अतिरिक्त दूरदर्शन बाल-कल्याण और नारी-जागरण में भी उपयोगी सिद्ध हुआ है। यह दर्शकों को स्वास्थ्य और स्वच्छता के नियमों, यातायात के नियमों, अल्प बचत, जीवन बीमा तथा कानून और व्यवस्था के विषय में भी शिक्षित करता है।

(6) राजनीतिक दृष्टि से दूरदर्शन राजनीतिक दृष्टि से भी जनसामान्य को शिक्षित करता है। वह प्रत्येक व्यक्ति को एक नागरिक होने के नाते उसके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक करता है। तथा मताधिकार के प्रति रुचि जाग्रत करके उसमें राजनीतिक चेतना लाता है। आजकल दूरदर्शन पर आयकर, दीवानी और फौजदारी मामलों से सम्बन्धित जानकारी भी दी जाती है, जिनके परिणामस्वरूप व्यक्ति का इस ओर ज्ञानवर्द्धन हुआ है।

(7) स्वस्थ रुचि के विकास की दृष्टि से--कवि सम्मेलन, मुशायरों, साहित्यिक प्रतियोगिताओं का आयोजन करके, नये प्रकाशनों का परिचय देकर तथा साहित्यकारों से साक्षात्कार प्रस्तुत करके दूरदर्शन ने साहित्य के प्रति स्वस्थ रुचि का विकास किया है। इसी प्रकार बड़े-बड़े कलाकारों की कलाओं की कला को परिचय देकर कला के प्रति लोगों में जागरूकता और समझ बढ़ायी है। यही नहीं, नये उभरते हुए साहित्यकारों, कलाकारों (चित्रकार, संगीतकार, फोटोग्राफर आदि) एवं विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे कारीगरों के कृतित्व का परिचय देकर न केवल उनको प्रोत्साहित किया है, वरन् उनकी वस्तुओं की बिक्री के लिए व्यापक क्षेत्र भी प्रस्तुत किया है। इससे विभिन्न कलाओं को जीवित रखने और विकसित होने में महत्त्वपूर्ण योगदान मिला है।

इतना ही नहीं, दूरदर्शन अन्य अनेक दृष्टिकोणों से जनसाधारण को जागरूक और शिक्षित करता है, वह चाहे खेल का मैदान हो या व्यवसाय का क्षेत्र। दूरदर्शन खेलों के प्रति रुचि जाग्रत करके खेल और खिलाड़ी की सच्ची भावना पैदा करता है। दूरदर्शन के सीधे प्रसारण ने कुश्ती, तैराकी, बैडमिण्टन, फुटबॉल, हॉकी, क्रिकेट, शतरंज आदि को लोकप्रियता की बुलन्दियों पर पहुँचा दिया है। दूरदर्शन के इस सुदृढ़ प्रभाव को देखते हुए उद्योगपति और व्यवसायी अपने उत्पादन के प्रचार और प्रसार के लिए इसे प्रमुख माध्यम के रूप में अपना रहे हैं।

दूरदर्शन से हानियाँ-दूरदर्शन से होने वाले लाभों के साथ-साथ इससे होने वाली कुछ हानियाँ भी हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। कोमल आँखें घण्टों तक टी० वी० स्क्रीन पर केन्द्रित रहने से अपनी स्वाभाविक शोभा क्षीण कर लेती हैं। इससे निकलने वाली विशेष प्रकार की किरणों का प्रतिकूल प्रभाव नेत्रों के साथ-साथ त्वचा पर भी पड़ता है, जो कि कम दूरी से देखने पर और भी बढ़ जाता है। इसके अधिक प्रचलन के परिणामस्वरूप विशेष रूप से बच्चों एवं किशोर-किशोरियों की शारीरिक गतिविधियाँ एवं खेलकूद कम होने लगे हैं। इससे उनके शारीरिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इस पर प्रसारित होते कार्यक्रमों को देखते रहकर हम अपने अधिक आवश्यक कार्यों को या तो भूल जाते हैं या उनका करना टाल देते हैं। समय की बरबादी करने के साथ-साथ हम आलसी और कामचोर भी हो जाते हैं तथा हमें अपने आवश्यक कार्यों के लिए भी समय का प्रायः अभाव ही बना रहता है।

केबल टी०वी० पर प्रसारित होने वाले कुछ कार्यक्रमों ने तो अल्पवयस्क बुद्धि के किशोरों को वासना के तूफान में ढकेलने का कार्य किया है। इनसे न केवल हमारी युवा पीढ़ी पर विदेशी अप-संस्कृति का प्रभाव पड़ता है अपितु हमारे अबोध और नाबालिग बच्चे भी इसके दुष्प्रभाव से बच नहीं पा रहे हैं। । साथ ही विज्ञापनों के सम्मोहन ने धन के महत्त्व को धर्म और चरित्र से कहीं ऊपर कर दिया है। हानिकारक वस्तुओं को भी धड़ल्ले से बेचने का कार्य व्यापारी वर्ग लुभावने विज्ञापनों के माध्यम से खूब कर रहा है।

उपसंहार-इस प्रकार हम देखते हैं कि दूरदर्शन मनोरंजन के साथ-साथ जनशिक्षा का भी एक सशक्त माध्यम है। विभिन्न विषयों में शिक्षा के उद्देश्य के लिए इसका प्रभावशाली रूप में प्रयोग किया जा सकता है। आवश्यकता है कि इसे केवल मनोरंजन का साधन ही न समझा जाए, वरन् यह जनशिक्षा एवं प्रचार का माध्यम भी बने। इस उद्देश्य के लिए इसके विविध कार्यक्रमों में अपेक्षित सुधार होने चाहिए। इसके माध्यम से तकनीकी और व्यावहारिक शिक्षा का प्रसार किया जाना चाहिए। सरकार दूरदर्शन के महत्त्व को दृष्टिगत रखते हुए देश के विभिन्न भागों में इसके प्रसारण-केन्द्रों की स्थापना कर रही है। दूरदर्शन से होने वाली हानियों के लिए एक तन्त्र एवं दर्शन जिम्मेदार है। इसके लिए दूरदर्शन के निर्देशकों, सरकार एवं सामान्यजन को संयुक्त रूप से प्रयास करने होंगे, जिससे दूरदर्शन के कार्यक्रमों को दोषमुक्त बनाकर उन्हें वरदान के रूप में ग्रहण किया जा सके।

मानवता का आधार : परोपकार

सम्बद्ध शीर्षक

  • परहित सरिस धरम नहिं भाई [2009,15]
  • परोपकार
  • वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे (2015)
  • परोपकार का महत्त्व
  • परपीड़ा सम नहिं अधमाई

प्रमुख विचार-बिन्दु–

  1. प्रस्तावना,
  2. परोपकार की महत्ता अर्थात् परोपकार मानवीय धर्म,
  3. प्रकृति और परोपकार,
  4. परोपकार : मानवता का परिचायक,
  5. परोपकार के विविध रूप,
  6. परोपकार : आत्म-उत्थान का मूल,
  7. उपसंहार।

प्रस्तावनापरहित सरिस धरम नहिं भाई। परपीड़ा सम नहिं अधमाई” अर्थात् दूसरे की भलाई करने से बढ़कर कोई धर्म नहीं और दूसरे को कष्ट पहुँचाने से बढ़कर कोई नीच काम नहीं। महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी की ये पंक्तियाँ धर्म की सुन्दर परिभाषा प्रस्तुत करती हैं।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, अत: समाज में एक-दूसरे का सहयोग किये बिना वह पूर्ण मानव नहीं बन सकता। कोई भी मनुष्य स्वयं में पूर्ण नहीं है, किसी-न-किसी कार्य के लिए वह दूसरे पर आश्रित रहता ही है। हम दूध-दही के लिए पशुओं पर, फल-फूल तथा अन्नादि के लिए वृक्षों पर, जल के लिए बादल एवं नदियों पर आश्रित हैं। ये सभी बिना किसी स्वार्थ के हमें यही सन्देश प्रदान करते हैं।

परोपकार की महत्ता अर्थात् परोपकार मानवीय धर्म–महर्षि दधीचि ने वृत्रासुर वध के लिए देवताओं द्वारा माँगने पर अपनी हड्डियों को प्रदान करते हुए मानवीय परोपकार का एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया था। उनकी हड्डियों से निर्मित सर्वाधिक कठोर वज्र के निर्माण से ही देवता वृत्रासुर का वध कर सके। मानव द्वारा देवों की रक्षा करने के लिए त्याग-भावना द्वारा मानव देक्ताओं से भी महान् दिखाई देने लगता है। महाराज शिवि ने भी करुणा-भावना के वशीभूत एक कबूतर की प्राण रक्षा के लिए अपने हाथों से अपने शरीर का मांस काट-काट कर कबूतर को खाने के लिए आये बाज को खिलाकर परोपकार के क्षेत्र में प्रतिमान उपस्थित किया। वास्तव में ये महान् पुरुष धन्य हैं, जिन्होंने परोपकार के लिए अपने शरीर व प्राणों की भी चिन्ता नहीं की। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने इनकी वन्दना करते हुए उचित ही कहा है

क्षुधार्त्त रन्तिदेव ने दिया करस्थ थाल भी,
तथा दधीचि ने दिया परार्थ अस्थिजाल भी।
उशीनर क्षितीश ने स्वमांस दान भी किया,
सहर्ष वीर कर्ण ने शरीर चर्म भी दिया ।
अनित्य देह के लिए अनादि जीव क्या डरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे ।

इसी भावना से प्रेरित होकर हमारे हजारों क्रान्तिकारी देशभक्तों ने भी नयी पीढ़ी की स्वतन्त्रता एवं सुख-समृद्धि के लिए परोपकार भावना से अनुप्राणित होकर अपने माता-पिता, पति-पत्नी, पुत्र-पुत्री एवं परिवार की तनिक भी चिन्ता न करते हुए अपने प्राणों को हँसते-हँसते देश की बलिवेदी पर चढ़ा दिया। संसार में उन्हीं व्यक्तियों के नाम अमर होते हैं, जो दूसरों के लिए मरते और जीवित रहते हैं। सीता की रक्षा में अपने प्राणों की बाजी लगा देने वाले गिद्धराज जटायु से श्रीराम कहते हैं, “तुमने अपने सत्कर्म से ही सद्गति का अधिकार पाया है, इसका श्रेय मुझे नहीं है”

परहित बस जिनके मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नहीं ॥

प्रकृति और परोपकार-प्रकृति में परोपकार का नियम अप्रतिहत गति से कार्य करता हुआ दिखाई देता है। सूर्य बिना किसी जाति, देश, वर्ण के भेदभाव के समानता-असमानता की भावना से, बिना किसी प्रत्युपकार की भावना के, समस्त संसार को अपने प्रकाश और उष्णता से जीवन प्रदान करते हैं। वायु सभी को प्राण प्रदान कर रही है। चन्द्रमा अपनी शीतल किरणों से सभी को रस एवं शीतलता प्रदान करता है। पृथ्वी रहने को स्थान देती है। मेघ वर्षा ऋतु में आकर फसलों को हरा-भरा कर देते हैं। वृक्ष तो फूल, फल, छाल, शाखाएँ, ऑक्सीजन, जल, पत्ते, लकड़ियाँ, छाया आदि सर्वस्व प्रदान कर मानव-जीवन को आनन्दित बना देते हैं। झरने, प्रपात और नदियाँ अपने अमृतमय जल से पिपासा शान्त करती हुई, विद्युत एवं तैरने के अवसर, नौकाविहार, जलचरों को जीवन प्रदान करती हुई परोपकार की देवी ही बनी हुई है। कहा भी गया है-

बृच्छ कबहुँ नहिं फल भखें, नदी न संचै नीर।
परमारथ के कारने, साधुन धरा सरीर ॥

अर्थात् सूर्य, चन्द्रमा, वृक्ष, वायु आदि ऐसा किसी प्रतिफल प्राप्ति की भावना से नहीं करते हैं, वे केवल अपने जन्मजात स्वभाववश ही ऐसा करते हैं। तब क्या प्रकृति की ही एक देन, मनुष्य, का यह कर्तव्य नहीं है कि वह दूसरों के हित में अपने जीवन को कुछ समय ही लगा दे।

परोपकार : मानवता का परिचायक–परोपकार ही मानव को महामानव बनाने की सामर्थ्य रखता है। परोपकार से ही हमारी स्वार्थ-भावना नष्ट होती है और हम देवता के समान कहलाने लगते हैं

सूर्य, चन्द्र, बादल, सरिता, भू, पेड़, वायु कर पर उपकार।।
बन जाते हैं देवतुल्य क्या, देवों के सचमुच अवतार ॥

परोपकारी व्यक्ति समाज में सर्वत्र सम्मान प्राप्त कर देश एवं विश्व के पूज्य बन जाते हैं। परोपकार से ही मनुष्य विश्वबन्धुत्व की भावना की ओर अग्रसर होता है। जनकल्याण, प्राणिसेवा में निरत व्यक्ति परम आदरणीय हो जाता है-

जो पराये काम आता, धन्य है जग में वही।
द्रव्य ही को जोड़कर, कोई सुयश पाता नहीं ॥

परोपकार भाईचारे की भावना का विकास करता है। यही घृणा, द्वेष और स्वार्थ का नाशक है। सभी प्राणियों में अपने ईश्वर का अंश देखकर महापुरुष जगत् के कल्याण में प्रवृत्त हो जाते हैं। राजा रन्तिदेव अपना सर्वस्व दान में देकर अड़तालीस दिन तक भूखे रहे। उनचासवें दिन जब भोजन का प्रबन्ध हुआ तो एक याचक आ गया। उन्होंने वह भोजन याचक को खिलाकर सन्तोष धारण किया–

न त्वहं कामये स्वर्ग, न मोक्षं न पुनर्भवम् ।।
कामये दुःखतप्तानां, प्राणिनामार्तनाशनम् ॥

राजा रन्तिदेव ने स्वर्ग-मोक्ष न माँग कर मानव ही नहीं सभी प्राणियों की पीड़ा को दूर करने का वरदान माँगा। परोपकारियों को ही सज्जन एवं महापुरुष की पदवी प्रदान की जाती है, जो युगों तक प्रणम्य हो जाते हैं। अट्ठारह पुराणों के रचयिता व्यास जी ने भी परोपकार को पुण्य एवं परपीड़ा को पाप घोषित किया है-

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥

परोपकारी व्यक्ति नि:स्वार्थ परोपकार कर अलौकिक आनन्द का अनुभव करता है। किसी भूखे को भोजन देते समय, प्यासे को पानी पिलाते समय, ठण्ड से ठिठुरते को वस्त्र देते समय, रोगी की सेवा करते समय मानव को जो अपार आनन्द का अनुभव होता है, वह वर्णनातीत है। उस समय वह स्व-पर के भेद से ऊपर उठकर ब्रह्मानन्द की प्राप्ति करता है। हमारी सांस्कृतिक परम्परा में यज्ञ परोपकार ही है, जिसके द्वारा ‘इदं न मम’ कहते हुए अग्नि में डाली गयी आहुति लाखों लोगों का कल्याण करती हुई विस्तृत हो जाती है।”

परोपकार के विविध रूप-नि:शुल्क लंगर, सदाव्रत, प्याऊ, विद्यालय, धर्मशाला, बगीचा, वृक्षारोपण, जलाशय, औषधालये, वस्त्र-वितरण, निर्धन विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति, पुस्तकालय, गौशाला आदि की व्यवस्था करना परोपकार के ही विविध रूप हैं। परोपकार का क्षेत्र केवल मनुष्यों तक संकुचित नहीं है, उसमें पशु-पक्षी कीट-पतंग सभी सम्मिलित हैं। इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने सभी को प्रणाम करते हुए कहा है-

सियाराममय सब जग जानी। करहुँ प्रणाम जोरि जुग पानी ॥

रहीम ने परोपकार की महिमा का बखान करते हुए लिखा है कि-

रहिमन यों सुख होत है, उपकारी के संग।
बाँटनवारे को लगे, ज्यों मेंहदी को रंग॥

तात्पर्य यह है कि परोपकारी व्यक्ति को उसी प्रकार स्वतः ही आनन्द की उपलब्धि होती है, जिस प्रकार लगाने वाले के हाथों में मेंहदी का रंग स्वतः ही आ जाता है।
जहाँ पुल, सड़कें नहीं वहाँ पुल, सड़कों का निर्माण करना, कन्याओं के लिए रोजगार सीखने के नि:शुल्क प्रशिक्षण देना, उन्हें स्वावलम्बी बनाना, अकाल, भूकम्प, युद्धादि के अवसर पर अन्न, वस्त्र, निवास की व्यवस्था करना परोपकारी कार्यों की श्रेणी में आते हैं।

सामान्य व्यक्ति तर्क दे सकते हैं कि धन से सम्पन्न व्यक्ति ही परोपकार कर सकता है। विचार करने पर हम अनुभव करेंगे कि परोपकार के लिए धन की कोई आवश्यकता नहीं होती, अपितु एक सेवाभावी मन की आवश्यकता होती है। हम राह भटके हुए को राह दिखा सकते हैं, सड़क के बीच में पड़े हुए केले के छिलके, कंकड़-पत्थर आदि को उठाकर एक किनारे पर फेंक सकते हैं। यह परोपकार ही तो है। हम किसी दुखिया के आँसू पोंछ सकें, किसी आहत व्यक्ति की आहों में साझीदार बन सकें, किसी के सिर पर रखे हुए बोझ को हलका कर सकें, किसी प्यासे को पानी पिला सकें आदि, तो हम परोपकार के आनन्द एवं पुण्य-फल का लाभ प्राप्त करने के सहज अधिकारी बन जाएँगे। निर्धन विद्यार्थियों को नि:शुल्क ट्यूशन उत्तम कोटि को परोपकार कहलाएगा।

परोपकार : आत्म-उत्थान का मूल-मनुष्य क्षुद्र से महान् और विरल से विराट् तभी बन सकता है, जब उसकी परोपकार-वृत्ति विस्तृत होती रहेगी। भारतीय संस्कृति की यह विशेषता है कि उसने प्राणि-मात्र के हित को मानव-जीवन का लक्ष्य बताया है। यही व्यक्ति का समष्टिमय स्वरूप भी है। ज्यों-ज्यों आत्मा में उदारता बढ़ती जाती है, उसे उतनी ही अधिक आनन्द की उपलब्धि होती जाती है तथा अपने समस्त कर्म जीवमात्र के लिए समर्पित कर देने की भावना तीव्रतर होती जाती है-

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत् ॥

तात्पर्य यह है कि सभी लोग सुखी हों, निरोगी हों, कल्याणयुक्त हों। कोई भी दु:ख-कष्ट नहीं भोगे। इसी भावना से संचालित होकर सभी जीवों के कल्याण में रत रहना चाहिए। यही सर्वकल्याणमय भावना सन्तों का मुख्य लक्षण है; क्योंकि वे मन, वचन और काया से सदा परोपकार में लगे रहते हैं-

पर उपकार वचन मन काया। सन्त सहज सुभान खगराया ॥

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी के शब्दों में–

यही पशु प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे ,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे ।

अर्थात् जो अपने लिए जीता है वह पशु है, जो अपने साथ-साथ दूसरों के लिए भी जीता है वह मनुष्य है और जो केवल दूसरों के लिए ही जीता है वह महामानव है, महात्मा है।

उपसंहार–परोपकारी अक्षय कीर्ति को धारण करते हैं। प्रत्येक युग में उनको सम्मान वृद्धि को प्राप्त होता रहता है। महात्मा गाँधी, पं० मदनमोहन मालवीय, सुभाषचन्द्र बोस, चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, अशफाक उल्ला खाँ, रामप्रसाद बिस्मिल आदि सदैव ही प्रातः स्मरणीय रहेंगे। तभी तो मैथिलीशरण गुप्त जी ने कहा है कि इस जीवन को अमर बनाने के लिए इसे दूसरों को समर्पित कर दो-

विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी ,
मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करें सभी ।

मानव का जीवन क्षणभंगुर है, किन्तु परोपकार के द्वारा वही अमरता को प्राप्त हो जाता है। भगवान् राम, कृष्ण, महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, दयानन्द सरस्वती, राजा राममोहन राय “सर्वभूत हिते रतः’ रहकर ही अक्षय यश के भागी हैं।

वर्तमान समय में परोपकार का स्वरूप बदलता जा रहा है। परोपकार के आवरण में लोग अपने स्वार्थों की पूर्ति कर रहे हैं। कोई राजनीतिक नेता ‘गरीबी हटाओ’ का नारा लगाकर गरीबों का वोट अपनी ओर खींचता है तो कोई जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित करवाकर अपना वोट बैंक पक्का करता है। कुछ व्यापारी आयकर में छूट पाने के लिए औषधालय खुलवाते हैं तथा पंजीकृत संस्थाओं में दान देते हैं। यह आज के परोपकार का परिवर्तित स्वरूप है। भारतीय संस्कृति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’, ‘सर्वजन सुखाय सर्वजन हिताय’ के सविवेक का सन्देश देती है। आज ऐसी ही भावना की आवश्यकता है। भारतीय संस्कृति के इन सन्देशों को अपनाकर ही हम परोपकार के सर्वाधिक समीप पहुँच सकते हैं।

परोपकार किसी भी समाज एवं देश के सुख-संवर्धन का एकमात्र उपाय है। जिस समाज में परोपकारी लोगों का आधिक्य होगा वही सुखी और समृद्ध होगा। डॉ० हरिदत्त गौतम ‘अमर’ के शब्दों में –

पर उपकार निरत जो सज्जन कभी नहीं मरते हैं।
चन्द्र सूर्य जब तक हैं उन पर यशः पुष्प झरते हैं।

सांस्कृतिक प्रदूषण

सम्बद्ध शीर्षक

  • समाज में नैतिक मूल्यों का विघटन
  • केबिल टी०वी० के माध्यम से फैलता सांस्कृतिक प्रदूषण और हम
  • भारतीय संस्कृति और दूरदर्शन [2010]

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2. सांस्कृतिक प्रदूषण का अर्थ,
  3. सांस्कृतिक प्रदूषण का स्वरूप विचारों में प्रदूषण, कलाओं में प्रदूषण, दृष्टिकोण का प्रदूषण, खान-पान का प्रदूषण, रहन-सहन का प्रदूषण,
  4. उपसंहार।

प्रस्तावना–आज के वैज्ञानिक युग में हर ओर प्रदूषण की ही चर्चा है। खुली हवा, धूलरहित आवास, शान्त इमारतें और शोररहित सड़कें आज एक सपना बन कर रह गयी हैं। आज भी सावन आता है पर घरों में वह वृक्ष ही नहीं होता, जिस पर झूला डाला जा सके। घरों में वह खुला आँगन नहीं होता जहाँ बच्चों को हर्षध्वनि करते, भागते-दौड़ते देखा जा सके। आज द्रुतगति की आलीशान वातानुकूलित कारें तो हैं, परन्तु उसकी खिड़की खोलते ही बाहर का शोरगुल और गर्दगुबार बिना निमन्त्रण अन्दर घुसे आता है। आज बच्चे टी० वी० स्क्रीन का कार्टून अपने सपनों में देखते हैं और लोरी के स्थान पर सी० डी० अथवा ऑडियो टेप सुनते हुए सो जाते हैं। यही है–भौतिक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक प्रदूषण।

कुछ विद्वान् इसे विश्व की गम्भीरतम समस्या कहते हैं तो कुछ इसे मानवता का सबसे बड़ा शत्रु। आज सभी रोगों का मूल कारण प्रदूषण को ही माना जाता है तथा यह कहा जाता है कि इससे बच पाना असम्भव है। प्रदूषण सम्बन्धी कथन वास्तव में भौतिक पर्यावरण के प्रदूषण से ही सम्बन्धित है। भौतिक पर्यावरण प्रदूषण के अन्तर्गत मुख्य रूप से वायु-प्रदूषण, जल-प्रदूषण, मृदा-प्रदूषण, ध्वनि-प्रदूषण, रेडियोधर्मी प्रदूषण, रासायनिक प्रदूषण ही आते हैं। यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि प्रदूषण केवल भौतिक पर्यावरण तक ही सीमित नहीं है, वरन् इसके कुछ अन्य रूप भी अति महत्त्वपूर्ण एवं चिन्ता के विषय हैं। प्रदूषण का एक अति गम्भीर रूप सांस्कृतिक प्रदूषण भी है। आज विश्व के अधिकांश विकासशील देश जहाँ एक ओर भौतिक प्रदूषण के शिकार हैं तो साथ-साथ ही वे गम्भीर सांस्कृतिक प्रदूषण के भी शिकार हो रहे हैं। भौतिक प्रदूषण के कारक, प्रभाव आदि स्पष्ट होते हैं तथा इनकी जाँच भी सरलता से की जा सकती है, परन्तु सांस्कृतिक प्रदूषण पर्याप्त सीमा तक छिपा हुआ होता है तथा यह अपना प्रभाव अप्रत्यक्ष रूप से डालता है। यद्यपि सांस्कृतिक प्रदूषण छिपा हुआ होता है तथा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है, तथापि इसके परिणाम अति गम्भीर, हानिकारक तथा दूरगामी होते हैं।

सांस्कृतिक प्रदूषण का अर्थ-प्रदूषण का सामान्य अर्थ है-किसी स्थापित व्यवस्था के मूल रूप में कुछ इस प्रकार का परिवर्तन होना जो जनसामान्य के लिए सामान्य रूप से हानिकारक हो। इस मापदण्ड के आधार पर वायु में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने या ऑक्सीजन की मात्रा घटने की स्थिति वायु-प्रदूषण की स्थिति होती है। सांस्कृतिक प्रदूषण के सन्दर्भ में कहा जा सकता है कि किसी संस्कृति की मौलिक विशेषताओं एवं लक्षण में उससे भिन्न तत्त्वों का समावेश हो जाना ही सांस्कृतिक प्रदूषण है। सांस्कृतिक प्रदूषण के पूर्व संस्कृति के अर्थ को स्पष्टरूपेण समझना आवश्यक है। संस्कृति की अवधारणा पर्याप्त जटिल है। वास्तव में किसी समाज द्वारा जो कुछ भी अपने पूर्व-पुरुषों के अनुभवों के माध्यम से प्राप्त किया जाता है, वह सब कुछ संस्कृति ही है। संस्कृति में ज्ञान, विश्वास, कलाएँ, नीति, विधि, रीति-रिवाज तथा समाज के सदस्य के रूप में मनुष्य द्वारा अर्जित अन्य योग्यताओं एवं आदतों को सम्मिलित किया जाता है। वस्तुतः संस्कृति जीवन का एक ढंग है, जो सैकड़ों-हजारों वर्षों में धीरे-धीरे विकसित होता है।

वर्तमान वैज्ञानिक युग में विश्व के सभी देशों एवं भागों में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से बहुपक्षीय सम्पर्क स्थापित होने लगे हैं। दूरसंचार के साधनों, यातायात की सुविधाओं, पत्र-पत्रिकाओं, दूरदर्शन, इण्टरनेट आदि के माध्यम से अब विश्व की समस्त संस्कृतियाँ एक-दूसरे को प्रभावित करने लगी हैं। इस स्थिति में विकसित (पाश्चात्य) देशों ने अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से विकासशील देशों पर थोपना प्रारम्भ कर कर दिया है। इसी सांस्कृतिक होड़ से हमारे देश की संस्कृति गम्भीर रूप से प्रभावित हो रही है। हमारी संस्कृति पर जो पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव पड़ रहा है, वह हमारी मूल संस्कृति के लिए हानिकारक सिद्ध हो रहा है। अतः इस प्रकार से होने वाले सांस्कृतिक परिवर्तन को हम सांस्कृतिक प्रदूषण की संज्ञा देते हैं।

सांस्कृतिक प्रदूषण का स्वरूप-वर्तमान परिस्थितियों में सांस्कृतिक प्रदूषण में सर्वाधिक योगदान दूरदर्शन के विदेशी और कुछ-एक देशी चैनेलों का है। एम टी० वी०, वी टी० वी०, जी टी० वी० तथा कुछ अन्य विदेशी चैनेल सांस्कृतिक प्रदूषण के मुख्य माध्यम बने हुए हैं। सांस्कृतिक प्रदूषण के मुख्य रूपों का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है|

(1) विचारों में प्रदूषण–पारम्परिक भारतीय संस्कृति में शुद्ध विचारों को विशेष महत्त्व दिया जाता है, परन्तु वर्तमान परिस्थितियों में पाश्चात्य सांस्कृतिक संघात के कारण यह भारतीय धारणा क्रमश: परिवर्तित हो रही है। अब सामान्य जनमानस की विचारधारा धीरे-धीरे कुत्सित हो रही है, विचारों में तीव्र उथल-पुथल मची हुई है तथा व्यक्ति की विचारशक्ति भ्रमित हो रही है। विचारों का इस प्रकार से विकृत होना सांस्कृतिक प्रदूषण का ही एक रूप है।

(2) कलाओं में प्रदूषण- भारतीय कलाओं की अपनी कुछ विशेषताएँ थीं। ये कलाएँ आदर्शोन्मुखी थीं। पाश्चात्य सांस्कृतिक प्रभाव के कारण भारतीय कलाओं में कुछ ऐसा तीव्र परिवर्तन हो रहा है, जो कि सांस्कृतिक प्रदूषण को ही दर्शाता है। साहित्य में दुःखान्त रचनाओं को महत्त्व देना, अकहानी तथा अकविता का प्रचलन, प्रयोगवादी काव्य का प्रादुर्भाव आदि साहित्य के क्षेत्र में प्रदूषण कहे जा सकते हैं। कला के क्षेत्र में सूक्ष्म कला या एब्स्ट्रैक्ट आदि अपने आप में एक प्रदूषणकारी प्रचलन ही हैं। संगीत के क्षेत्र में भारतीय शास्त्रीय संगीत की अवहेलना करके पॉप संगीत तथा डिस्को संगीत स्पष्ट रूप से भारतीय संगीत के लिए प्रदूषण का ही काम कर रहे हैं। भारतीय शास्त्रीय संगीत का अत्यल्प विकृत रूप सिने-संगीत के रूप में श्रोताओं में पर्याप्त लोकप्रिय था। लेकिन अब इस संगीत के दृश्य-श्रव्य माध्यम को विदेशी वाद्यों तथा पर्याप्त नग्नता का समावेश कर रीमिक्स की नवीन संज्ञा देकर पुन: प्रस्तुत किया जा रहा है। इसे भी सांस्कृतिक प्रदूषण का ही स्वरूप माना जाना चाहिए। नृत्य के क्षेत्र में भी कत्थक, भरतनाट्यम आदि भारतीय नृत्यों को छोड़कर पाश्चात्य नृत्यों को अपनाना प्रदूषणकारी ही है। वर्तमान समय में तो भारतीय लोक-नृत्यों का भी पश्चिमीकरण होता जा रहा है। पंजाब का लोकप्रिय लोक-नृत्य भाँगड़ा आज विदेशी रंग में रँगता दिखाई दे रहा है। यह परिवर्तन सांस्कृतिक प्रदूषण का प्रत्यक्ष प्रमाण है। वाद्य-यन्त्रों में भी अब भारतीय वाद्य-यन्त्र अनावश्यक-से प्रतीत हो रहे हैं तथा पाश्चात्य इलेक्ट्रॉनिक वाद्य-यन्त्र अधिक लोकप्रिय हो रहे हैं।

(3) दृष्टिकोण का प्रदूषण–पारम्परिक रूप से भारतीय दृष्टिकोण आध्यात्मिक तथा नैतिकता की ओर उन्मुख था, परन्तु अब पाश्चात्य सांस्कृतिक संघात ने भारतीय जनसामान्य के दृष्टिकोण को भी भौतिकवादी बना दिया है। सम्मिलित परिवारों की भारतीय अवधारणा अब धीरे-धीरे विघटित परिवारों का रूप लेने लगी है। सांस्कृतिक प्रदूषण के कारण ही नवयुवकों में अब बड़े-बुजुर्गों के प्रति सम्मान की वह भावना नहीं रह गयी, जो पहले पायी जाती थी। आज प्रत्येक बात में भौतिकवादी दृष्टिकोण से लाभ-हानि को ही प्राथमिकता दी जाती है। पारम्परिक दृष्टिकोण में होने वाला यह परिवर्तन स्पष्ट रूप से सांस्कृतिक प्रदूषण ही है।

(4) खान-पान का प्रदूषण-खान-पान को भी सांस्कृतिक मान्यता के अन्तर्गत ही माना जाता है। वर्तमान समय में इस सांस्कृतिक मान्यता में भी तीव्र तथा गम्भीर परिवर्तन परिलक्षित हो रहे हैं। आज हर कोई विदेशी खाद्य-पदार्थों तथा पकवानों को अधिक पसन्द कर रहा है। उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय, पंजाबी, कश्मीरी आदि व्यंजनों के स्थान अब चाइनीज़, फास्ट फूड्स, बर्गर, पिज़ा आदि ने ले लिये हैं। भारतीय परिवारों में विवाह आदि शुभ अवसरों पर विदेशी व्यंजनों का परोसा जाना अब शान की बात समझी जाती है। खान-पान में होने वाला यह परिवर्तन भी सांस्कृतिक प्रदूषण ही है।

(5) रहन-सहन का प्रदूषण–आज हर भारतीय परिवार पाश्चात्य-प्रतिमान को आदर्श रहन-सहन मानता है। पारम्परिक भारतीय रहन-सहन को अब दकियानूसी माना जाने लगा है। रसोईघर, बैठक, शयन-कक्ष, पहनावा, सौन्दर्य प्रसाधन आदि सभी स्थानों पर पाश्चात्य प्रतिमानों को ही अपनाया जा रहा है, यह सांस्कृतिक जीवन का ही प्रदूषण है।

उपसंहार-निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि हमारा समाज घोर सांस्कृतिक प्रदूषण का शिकार हो रहा है। इस सांस्कृतिक प्रदूषण के गम्भीर परिणाम हो रहे हैं। हमारे परिवार विघटित हो रहे हैं, विवाह-विच्छेद हो रहे हैं, मान्यताएँ बदल रही हैं तथा परम्पराएँ छिन्न-भिन्न हो रही हैं। स्वास्थ्य-हीनता और नैतिक मूल्यों-मर्यादाओं के टूटने के दुष्परिणाम स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहे हैं। यदि सांस्कृतिक प्रदूषण की इस आँधी को समय रहते रोका न गया तो निकट भविष्य में हम अपनी पहचान गंवा बैठेंगे। हम ने घर के रहेंगे और न घाट के। अतः भारत के प्रत्येक नागरिक विशेष रूप से युवाओं तथा शिक्षकों का दायित्व है कि वे विदेशियों द्वारा फैलायी जा रही अपसंस्कृति अथवा सांस्कृतिक प्रदूषण का विरोध करें तथा इससे अपने समाज एवं देश को बचाने का प्रयास करें।

नैतिक मूल्यों का हास : कारण एवं निवारण (2016)

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2. प्रतिभा की उपेक्षा,
  3. वैचारिक प्रदूषण,
  4. पश्चिम की नकल,
  5. रोजगार की समस्या,
  6. भ्रष्ट राजनीतिक विरासत,
  7. समस्याओं/कारणों के निवारण के उपाय,
  8. उपसंहार।

प्रस्तावना-चाहे धर्म का क्षेत्र हो या दर्शन का, चाहे कला का क्षेत्र हो या विज्ञान का, शताब्दियों तक हमारा देश, विश्व के मानचित्र पर जगमगाता रहा, और आज भी यह दुनिया के उन महानतम देशों में से एक है, जिनके पास प्राकृतिक संसाधनों और मानवीय शक्ति की कहीं कोई कमी नहीं है। आज विश्वभर में फैले हुए भारतीय वैज्ञानिक और इंजीनियर सफलता के ऊँचे शिखर को नैतिक मूल्यों के कारण छू रहे हैं। और यह भी कि–आज अमेरिका की 70 प्रतिशत सिलीकॉन वैली पर भारतीयों का कब्जा है। लेकिन दूसरा पहलू यह भी है कि आज हमारी राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था गहरे संकट से गुजर रही है। राजनीति का अपराधीकरण हो चुका है। नैतिक मूल्यों के ह्रास के कारण अब हमारी छवि दुनिया में धूमिल होने लगी है। नैतिक मूल्यों के ह्रास के कारण हमारी नई पीढ़ी जब इस प्रकार की विरोधाभासी व्यवस्था के बीच से होकर गुजर रही हो, तो उसकी दशा और दिशा का सही अनुमान लगा पाना तो बहुत कठिन है, परन्तु सम्भावित अनुमान प्रस्तुत किया जा सकता है।

प्रतिभा की उपेक्षा–जाति-आधारित आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था से प्रतिभा और दक्षता का अनादर हो रहा है। प्रोन्नतियों में आरक्षण की कोई आवश्यकता नहीं थी, परन्तु वहाँ भी ऐसी व्यवस्था की गयी। यह प्रतिभा और योग्यता के साथ किया जाने वाला अन्याय है और यह अन्याय केवल वोट बैंक की राजनीति के कारण किया गया है। ठीक है कि गरीबों और पिछड़ों को भी आगे बढ़ने का मौका मिलना चाहिए परन्तु इसके लिए उन्हें योग्य एवं प्रतिभाशाली बनाने के उपाय किये जाने चाहिए। आरक्षण की बैसाखी से नई पीढ़ी की दशा और दिशा नहीं बदलने वाली है और फिर गरीब और पिछड़े तो हर जाति में होते हैं। यदि आरक्षण ही देना है तो फिर उन सभी को देना चाहिए, परन्तु वोट बैंक के लाभ-हानि देखकर चुन-चुनकर अपने पक्ष की कुछ विशेष जातियों के लोगों को ही आरक्षण देना और बाकी गरीबों और पिछड़ों को उनके अपने हाल पर छोड़ देना तनिक भी उचित नहीं है। देखा यह भी गया है कि इस आरक्षण का लाभ, पिछड़ों में जो सम्पन्न लोग हैं, उन्हीं को मिल सका है। शेष की हालत बदस्तूर है। यदि निजीक्षेत्र में भी आरक्षण किया गया, यदि विधानसभाओं और संसद में भी महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण हो गया, तो स्थिति और अधिक विकट हो जाएगी। ऐसा करने से नई पीढ़ी की दशा बदतर होगी और दिशा भयावह।।

वैचारिक प्रदूषण-नई पीढ़ी को जो विचार उत्तराधिकार में मिल रहे हैं, वे सामाजिक एकता और सद्भाव को बनाये रखने वाले अथवा सर्वधर्म समभाव वाले नहीं हैं। समाज को जोड़ने के बदले सर्वत्र अलगाव और बिखराव ही अधिक दिखाई दे रहा है। राजनीतिक दलों द्वारा राष्ट्र की एकता और अखण्डता को जाति, धर्म, सम्प्रदाय, बोली, भाषा और क्षेत्र के आधार पर कई टुकड़ों में बाँटने के प्रयास जारी हैं, और यह सब वोट बैंक की राजनीति के कारण हुआ है। यही कारण है कि अयोध्या में विवादित ढाँचा गिराये जाने के आठ वर्ष बाद भी तेरहवीं लोकसभा का सत्र हफ्ते भर तक नहीं चलने दिया गया। एक ही देश में कहीं शौर्य दिवस और कहीं कलंक दिवस मनाये जाने के पीछे यह वैचारिक प्रदूषण ही मुख्य कारण है। इसी वैचारिक प्रदूषण के कारण राजनीतिक दल अपने स्वार्थ को राष्ट्रीय आवश्यकता से अधिक महत्त्व देते हैं। ऐसे प्रदूषित विचारों के मध्य जी रही नई पीढ़ी की दशा और दिशा उज्ज्वल होने की सम्भावना कम ही है।

पश्चिम की नकल-देश की नई पीढ़ी पश्चिम की नकल करते-करते अपनी अकल भी गॅवाती हुई दीख रही है। भारतीय जीवन-दर्शन, भारतीय जीवन-मूल्य, भारतीय आदर्श और भारतीय संस्कृति से अपना पल्ला झाड़कर, यही पीढ़ी पाश्चात्य भौतिकवादी और भोगवादी संस्कृति की ओर उन्मुख दिखाई देती है। नई पीढ़ी की लड़कियों के शरीर पर कपड़े घटते जा रहे हैं और सौन्दर्य प्रसाधनों के बाजारों में भीड़ उमड़ती जा रही है। सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के नाम पर नग्नता और अश्लीलता परोसी जा रही है। लड़के भी इस दौड़ में कहीं पीछे नहीं हैं। शास्त्रीय संगीत के बदले पॉप म्यूजिक लोकप्रिय होता जा रहा है। खुलेपन और प्रगतिशील होने के नाम पर टी०वी० चैनल भी घर-घर में नग्नता और अश्लीलता ही परोस रहे हैं। यह सब देखकर मुझे तो नहीं लगता कि नई पीढ़ी की दशा और दिशा अच्छी हो सकेगी।

रोजगार की समस्या-यद्यपि नई पीढ़ी सूचना प्रौद्योगिकी के युग में जी रही है, परन्तु उसके लिए साधन जुटाना नई पीढ़ी के लिए आसान काम नहीं है। सरकारी नौकरियाँ बहुत कम हैं क्योंकि अब अधिकतर काम कम्प्यूटर करने लगे हैं। फिर आरक्षण भी इसमें बाधक है और हमारी शिक्षा नीति भी रोजगारपरक नहीं है। राजनीतिज्ञों की सन्तानें तो विदेशों में अच्छी उपयोगी शिक्षा पा रही हैं पर देश की सामान्य जनता के लिए सरकारी स्कूल भी पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं। जो विद्यालय हैं भी वहाँ गणित, विज्ञान और भाषा आदि विषयों के शिक्षकों एवं प्रधानाचार्यों की भारी कमी है। आज की शिक्षा-व्यवस्था स्नातक बनाने के बाद छात्र में शारीरिक परिश्रम के प्रति निष्ठा नहीं जगाती, बल्कि छात्र न घर का रहता है न घाट की। ऐसी दशा में नई पीढ़ी का भविष्य उज्ज्वल नहीं दिखाई देता है। उद्योग लगाने के लिए पूँजी की जरूरत होती है, परन्तु वह पूँजी आयेगी कहाँ से? इस प्रश्न का उत्तर पाना बहुत कठिन है।

भ्रष्ट राजनीतिक विरासत-आजादी के बाद छः दशकों में जैसी धोखाधड़ी भारतीय जनता के साथ की गई, उसकी मिसाल शायद ही कहीं और मिले। जनता के धन को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। इस लूट में राजनेता और नौकरशाह दोनों ही जिम्मेदार रहे हैं। भारत के गृह सचिव एन०एन० बोहरा ने 1995 में अपनी रिपोर्ट में कहा था-“माफिया संगठनों को एक तन्त्र देश में समानान्तर सरकार चला रहा है। और उसने राज्य के उपकरणों को अप्रासंगिक बना दिया है। अपराधी गिरोहों, तस्कर गिरोहों और आर्थिक लॉबियों का तेजी से विस्तार हुआ है।”

समस्याओं/कारणों के निवारण के उपाय-राष्ट्र की भौतिक दशा सुधारने के लिए नैतिक मूल्यों का उपयोग कर हम उन्नति की सही राह चुन सकते हैं। हम जानते हैं कि भारत में लोगों के बीच फैला भ्रष्टाचार किस तरह से विकास की धार को मोथरा (कुंद) किए हुए है।

नैतिक मूल्यों में ह्रास होने से समाज में हर प्रकार के अपराध बढ़ रहे हैं। हम यह भी देखते हैं कि मूल्यविहीन समाज में असन्तोष फैल रहा है। बेकारी के बढ़ने से युवक असन्तोष जैसी कई प्रकार की चुनौतियाँ खड़ी दिखाई देती हैं। छोटे से बड़े नौकरशाह निकम्मेपन और भ्रष्टाचार के अंधकूप में डुबकियाँ लगा रहे हैं, उन्हें समाज या राष्ट्र की कोई परवाह नहीं है। इन परिस्थितियों से देश को उबारने के लिए आत्ममंथन अनिवार्य हो जाता है। नैतिक मूल्यों के द्वारा ही देश को समस्याओं के गर्त से उबारा जा सकता है, क्योंकि नीति से ही नैतिक शब्द बना है जिसका अर्थ है-सोच-समझकर बनाए गए नियम या सिद्धान्त। अतः अपने हृदय से दूषित भावनाओं का त्याग कर तथा सदाचार की वैसी बातें जो सभी धर्मों व सभी सम्प्रदायों को मान्य हैं, समाहित कर हम प्रगतिशील समाज की रचना कर सकते हैं तथा साथ ही नैतिक मूल्यों का उत्थान भी कर सकते हैं। नैतिक मूल्यों के ह्रास का निवारण तभी सम्भव हो सकता है जब हम अपनी संस्कृति को पहचानें, उसे अपने जीवन में उतारे और पश्चिम की ओछी भोगवादी संस्कृति से प्रभावित न हों।

उपसंहार-निश्चय ही जिस समाज में अपराधी लोग, जातीय गौरव के रूप में शोभित हो रहे हैं, तो राजनीतिक दल उनसे वंचित कैसे रह सकते हैं? सवाल यह भी है कि जिन लोगों पर गम्भीर आरोप हैं वे चुनाव कैसे जीत जाते हैं? वास्तव में राजनीतिक भ्रष्टाचार के कारण ही राजनीति के अपराधीकरण की समस्या पैदा हुई है। यदि ऐसा नहीं होता तो चन्दन तस्कर वीरप्पन दो राज्य सरकारों को अपने इशारे पर नाच नहीं नचाता। यही कारण है कि आज तमाम विकास योजनाओं का लाभ नेता, अधिकारी, इंजीनियर, बैंक मैनेजर और दलाल उठा रहे हैं। तात्पर्य यह है कि हमारे शासक जिस दिन भ्रष्टाचार पर रोक लगाने में सफल होंगे, उसी दिन से नई पीढ़ी की दशा और दिशा प्रकाशित होने लगेगी; तभी हमारी संस्कृति और समाज का उत्थान हो सकेगा।

आधुनिक जीवन में संचारमाध्यमों की उपयोगिता

सम्बद्ध शीर्षक

  • शिक्षा के उन्नयन में संचय माध्यमों की उपयोगिता [2010]

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2. संचारमाध्यमों का मानव-जीवन में महत्त्व,
  3. उद्योग और व्यवसाय के क्षेत्र में संचारमाध्यमों का योगदान,
  4. भारत में संचारमाध्यमों का विकास (i) समाचार-पत्र, (ii) रेडियो, (ii) सेल्यूलर मोबाइल टेलीफोन सेवा, (iv) इण्टरनेट सेवा,
  5. उपसंहार

प्रस्तावना--अपने विचारों, भावनाओं व सूचनाओं को सम्प्रेषित करने के लिए मनुष्य को संचारमाध्यम की आवश्यकता पड़ती है। संचार का माध्यम मौखिक एवं लिखित दोनों रूपों में हो सकता है। पहले मनुष्य आपस में बोलकर या इशारे से अपनी अभिव्यक्ति करता था। वैज्ञानिक प्रगति ने उसे संचार-माध्यम के अन्य साधन भी उपलब्ध करवाए। अब मनुष्य दुनिया के एक छोर पर मौजूद व्यक्ति से दुनिया के दूसरे छोर से वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से बात करने में सक्षम है।

ये वैज्ञानिक उपकरण ही संचार के माध्यम कहलाते हैं। टेलीफोन, रेडियो, समाचार-पत्र, टेलीविजन इत्यादि संचार के ऐसे ही माध्यम हैं। टेलीफोन ऐसा माध्यम है, जिसकी सहायता से एक बार में कुछ ही व्यक्तियों से संचार किया जा सकता है, किन्तु संचार के कुछ माध्यम ऐसे भी हैं जिनकी सहायता से एक साथ कई व्यक्तियों से संचार किया जा सकता है। जिन साधनों का प्रयोग कर एक बड़ी जनसंख्या तक विचारों, भावनाओं व सूचनाओं को सम्प्रेषित किया जाता है उन्हें हम संचार के माध्यम कहते हैं।

संचार-माध्यमों का मानव-जीवन में महत्त्व-मानव-जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने में संचारमाध्यम महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। सूचनाओं के आदान-प्रदान करने में समय की दूरी घट गई है। अब क्षणभर में संदेश व विचारों का आदान-प्रदान किया जा सकता है। शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन तथा उद्योग आदि के क्षेत्र में संचारमाध्यम का महत्त्व बढ़ गया है। अपराधों पर नियंत्रण करने तथा शासन-व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने में संचार माध्यम का विशेष योगदान है। संचारमाध्यम के अभाव में देश में शान्ति और सुव्यवस्था करना कठिन कार्य है। व्यावसायिक क्षेत्र में भी सही सूचनाओं का महत्त्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है; अतः कहा जा सकता है कि किसी भी राष्ट्र के लिए वहाँ के संचारमाध्यम की व्यवस्था का विकसित होना अत्यावश्यक है।

उद्योग और व्यवसाय के क्षेत्र में संचारमाध्यमों का योगदान–किसी भी देश का विकास उसकी सुदृढ़ अर्थव्यवस्था पर निर्भर करता है, उद्योग और व्यवसाय के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाता है; लेकिन सफल व्यवसाय और उद्योगों के विकास के लिए संचार माध्यम की अत्यधिक आवश्यकता होती है। भूमण्डलीकरण के इस काल में तो व्यवसायी एवं उद्योगपति सूचनाओं के माध्यम से व्यवसाय एवं उद्योग में नई ऊँचाइयों को छूने के लिए लालायित हैं। सूचनाएँ व्यवसाय का जीवन-रक्त हैं। व्यवसाय के अन्तर्गत माल के उत्पादन से पूर्व, उत्पादन से वितरण तक और विक्रयोपरान्त सेवाएँ प्रदान करने के लिए संचार माध्यम का महत्त्वपूर्ण स्थान है। संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास परिषद् की रिपोर्ट के अनुसार, संचार-माध्यम एवं सूचना-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विदेशी निवेश प्राप्त करने के मामले में भारत अग्रणी देश बनता जा रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2000 में दक्षिण एशिया में हुए कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में भारत का हिस्सा 76 प्रतिशत था। चीन में भारत से ज्यादा मोबाइल फोन हैं, लेकिन इण्टरनेट के क्षेत्र में व्यावसायिक गतिविधियों को लाभ उठाने के लिए भारत का माहौल चीन से कहीं बेहतर है। संचार माध्यम में क्रान्ति ने आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन की नई सम्भावना को जन्म दिया है, जिसका लाभ विकसित और विकासशील देश दोनों ही उठा रहे हैं।

भारत में संचारमाध्यमों का विकास–भारत ने संचार माध्यम के क्षेत्र में असीमित उन्नति की है। भारत का संचार नेटवर्क एशिया के विशालतम संचार नेटवर्कों में गिना जाता है। जून, 2013 के अन्त तक 903.10 मिलियन टेलीफोन कनेक्शनों के साथ भारतीय दूरसंचार नेटवर्क चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा नेटवर्क है। जून, 2013 के अन्त तक 873.37 मिलियन टेलीफोन कनेक्शनों के साथ भारतीय वायरलैस टेलीफोन नेटवर्क भी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा नेटवर्क है। आज लगभग सभी देशों के लिए इण्टरनेशनल सबस्क्राइबर डायलिंग सेवा उपलब्ध है। इण्टरनेट उपभोक्ताओं की संख्या 7 करोड़ 34 लाख है। अन्तर्राष्ट्रीय संचार-क्षेत्र में उपग्रह संचार और जल के नीचे से स्थापित संचार सम्बन्धों द्वारा अपार प्रगति हुई है। ध्वनि वाली और ध्वनिरहित संचार सेवाएँ, जिनमें आँकड़ा प्रेषण, फैसीपाइल, मोबाइल रेडियो, रेडियो पेनिंग और लीज्ड लाइन सेवाएँ शामिल हैं। 31 मार्च, 2013 ई० की स्थिति के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में 357.74 मिलियन फोन हैं।

जनसंचार माध्यमों को कुल तीन वर्गों-मुद्रण माध्यम, इलेक्ट्रॉनिक्स माध्यम एवं नव-इलेक्ट्रॉनिक माध्यम में विभाजित किया जा सकता है। मुद्रण माध्यम के अन्तर्गत समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, पैम्फलेट, पोस्टर, जर्नल पुस्तकें इत्यादि हैं। इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के अन्तर्गत रेडियो, टेलीविजन एवं फिल्में आती हैं। और इण्टरनेट जनसंचार का नव-इलेक्ट्रॉनिक माध्यम है। इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-

(i) समाचार-पत्र—मुद्रण माध्यम की शुरुआत गुटेनबर्ग द्वारा 1454 ई० में मुद्रण मशीन के आविष्कार के साथ हुई थी। इसके बाद विश्व के अनेक देशों में समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। आज समाचार-पत्र एवं पत्रिकाएँ विश्वभर में जनसंचार का एक प्रमुख एवं लोकप्रिय माध्यम बन चुके हैं। मैथ्यू अर्नाल्ड ने इसे फटाफट साहित्य का नाम दिया था। समाचार-पत्र कई प्रकार के होते हैं-त्रैमासिक, मासिक, साप्ताहिक एवं दैनिक। इस समय विश्व के अन्य देशों के साथ-साथ भारत में भी दैनिक समाचार-पत्रों की संख्या अन्य प्रकार के पत्रों से अधिक है। भारत का पहला समाचार-पत्र अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित ‘बंगाल गजट’ था। इसका प्रकाशन 1780 ई० में जेम्स ऑगस्टस हिकी ने शुरू किया था। कुछ वर्षों बाद अंग्रेजों ने इसके प्रकाशन पर प्रतिबन्ध लगा दिया। हिन्दी का पहला समाचार-पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ था। इस समय भारत में कई भाषाओं के लगभग तीस हजार से भी अधिक समाचार-पत्र प्रकाशित होते हैं। भारत में अंग्रेजी भाषा का प्रमुख दैनिक समाचार-पत्र ‘द टाइम्स ऑफ इण्डिया’, ‘द हिन्दू’, ‘द : हिन्दुस्तान टाइम्स’ इत्यादि हैं। हिन्दी के दैनिक समाचार-पत्रों में दैनिक जागरण’, दैनिक भास्कर’, ‘हिन्दुस्तान’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘नई दुनिया’, ‘जनसत्ता’ इत्यादि प्रमुख हैं। समाचार-पत्र की उपयोगिता महात्मा गाँधी के इस कथन से भी उजागर होती है-“समाचार-पत्र सच्चाई अथवा वास्तविकता को जानने के लिए पढ़ा जाना चाहिए।’

(ii) रेडियो-आधुनिक काल में रेडियो जनसंचार का एक प्रमुख साधन है, विशेष रूप से दूरदराज के उन क्षेत्रों में जहाँ अभी तक बिजली नहीं पहुंच पाई है या जिन क्षेत्रों के लोग आर्थिक रूप से पिछड़े हैं। भारत में वर्ष 1923 में रेडियो के प्रसारण के प्रारम्भिक प्रयास और वर्ष 1927 में प्रायोगिक तौर पर इसकी शुरुआत के बाद अब तक इस क्षेत्र में अत्यधिक प्रगति हासिल की जा चुकी है और इसका सर्वोत्तम उदाहरण-एफएम रेडियो प्रसारण है। ‘एफएम’ फ्रीक्वेंसी मॉड्यूल का संक्षिप्त रूप है। यह एक ऐसा रेडियो प्रसारण है, जिसमें आवृत्ति को प्रसारण ध्वनि के अनुसार मॉड्यूल किया जाता है। भारत में इसकी शुरुआत 1990 के दशक में हुई थी। स्थानीय स्तर पर ‘एफएम’ प्रसारण के लाभ को देखते हुए देश के कई विश्वविद्यालयों ने इसके माध्यम से अपने शैक्षिक प्रसारण के उद्ददेश्य से अपने-अपने एफएम प्रसारण चैनलों की शुरुआत की है। यही कारण है कि इससे न केवल आम जनता को लाभ पहुँचा है, बल्कि दूरस्थ एवं खुले विश्वविद्यालयों से शिक्षा ग्रहण कर रहे लोगों के लिए भी यह अति लाभप्रद सिद्ध हुआ है। आज एफएम प्रसारण दनियाभर में रेडियो प्रसारण का पसन्दीदा माध्यम बन चुका है, इसका एक कारण इससे उच्च गुणवत्तायुक्त स्टीरियोफोनिक आवाज की प्राप्ति भी है। शुरुआत में इस प्रसारण की देशभर में कवरेज केवल 30% थी, किन्तु अब इसकी कवरेज बढ़कर 60% से अधिक तक जा पहुँची है।

(iii) सेल्यूलर मोबाइल टेलीफोन सेवा–सभी महानगरों और 29 राज्यों के लगभग सभी शहरों के लिए सेवाएँ शुरू हो चुकी हैं। 31 मई, 2013 ई० तक देश में 873.37 मिलियन सेल्यूलर उपभोक्ता थे। नई दूरसंचार नीति के अन्तर्गत सेल्यूलर सेवा के मौजूदा लाइसेंसधारकों को 1 अगस्त, 1999 ई० से राजस्व भागीदारी प्रणाली अपनाने की अनुमति मिल गई। देश के विभिन्न भागों में सेल्यूलर मोबाइल टेलीफोन सेवा चलाने के लिए एम०टी०एन०एल० और बी०एस०एन०एल० को लाइसेंस जारी किए गए। नई नीति के अनुसार सेल्यूलर ऑपरेटरों को यह छूट दी गई कि वे अपने कार्यक्षेत्र में सभी प्रकार की मोबाइल सेवा, जिसमें ध्वनि और गैर-ध्वनि संदेश शामिल हैं, डेटा सेवा और पी०सी०ओ० उपलब्ध करा सकते हैं।

(iv) इण्टरनेट सेवा–नवम्बर, 1998 ई० से इण्टरनेट सेवा निजी भागीदारी के लिए खोल दी गई। इसके बाद सरकार ने देश की प्रत्येक पंचायत में वर्ष 2012 में ब्रॉडबैण्ड की शुरुआत करने का निर्णय लिया। समयानुसार इण्टरनेट आम आदमी की निजी और व्यावसायिक जिन्दगी का अहम हिस्सा बन चुका है। लगभग सभी व्यावसायिक साइटों को इण्टरनेट पर लांच किया जा चुका है। ई-मेल द्वारा मास कैम्पेन चलाना अब एक सामान्य प्रचलन हो चुका है। ‘चैट’ एक ऐसी उपलब्ध सेवा है, जिसके द्वारा इण्टरनेटधारक एक-दूसरे के साथ आपस में ऑनलाइन वार्तालाप कर सकते हैं। ई-गर्वनेंस सरकार की पहली प्राथमिकता है।

उपर्युक्त संचार के माध्यमों के प्रमुख कार्य हैं-लोकमत का निर्माण, सूचनाओं का प्रसार, भ्रष्टाचार एवं घोटालों का पर्दाफाश तथा समाज की सच्ची तसवीर प्रस्तुत करना। इन माध्यमों से लोगों को देश की प्रत्येक गतिविधि की जानकारी तो मिलती ही है, साथ ही उनका मनोरंजन भी होता है। किसी भी देश में जनता का मार्गदर्शन करने के लिए निष्पक्ष एवं निर्भीक संचार माध्यमों का होना आवश्यक है। ये देश की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों की सही तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।

चुनाव एवं अन्य परिस्थितियों में सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों से जन-साधारण को अवगत कराने की जिम्मेदारी भी संचारमाध्यमों को ही वहन करनी पड़ती है। ये सरकार एवं जनता के बीच एक सेतु का कार्य करते हैं। इसे हम मीडिया भी कहते हैं। जनता की समस्याओं को इन माध्यमों से जन-जन तक पहुंचाया जाता है। विभिन्न प्रकार के अपराधों एवं घोटालों का पर्दाफाश कर ये देश एवं समाज का भला करते हैं। इस तरह, ये आधुनिक समाज में लोकतन्त्र के प्रहरी का रूप ले चुके हैं, इसलिए इन्हें लोकतन्त्र के चतुर्थ स्तम्भ की संज्ञा दी गई है। आशा है, आने वाले वर्षों में भारतीय मीडिया अपना कर्तव्य पूरी ईमानदारी के साथ निभाते हुए देश के विकास में और सहयोग करेगा।

उपसंहार–वास्तव में संचारमाध्यम (प्रणाली) ने विश्व की दूरियों को समेटते हुए मानव-जीवन को एक नया मोड़ दिया है। आज हमारा देश संचार टेक्नोलॉजी की दौड़ में निरन्तर आगे बढ़ रहा है। विभिन्न निजी कम्पनियों को भी इसमें विशेष योगदान रहा है, जिसके कारण हम इसे देश के कोने-कोने से जोड़ने में सफल हुए हैं। इस प्रकार संचारमाध्यम के प्रसार ने शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन, व्यवसाय तथा उद्योग के विकास के साथ-साथ मानव-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उन्नति को गति प्रदान की है।

स्वच्छता अभियान की सामाजिक सार्थकता

सम्बद्ध शीर्षक

  • स्वच्छता अभियान [2016, 18]

प्रमुख विचार-बिन्दु–

  1. प्रस्तावना,
  2. मोदी जी की स्वच्छता अभियान की संकल्पना,
  3. स्वच्छता अभियान की शुरुआत,
  4. स्वच्छता अभियान हेतु नवरत्नों की घोषणा,
  5. स्वच्छता अभियान का प्रारूप-(i) शहरी क्षेत्रों के लिए, (ii) ग्रामीण क्षेत्रों के लिए, (ii) विद्यालयों के लिए,
  6. उपसंहार।

प्रस्तावना–‘स्वच्छता अभियान’ एक राष्ट्र स्तरीय अभियान है। गाँधी जी की 145वीं जयन्ती के अवसर पर माननीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने इस अभियान के आरम्भ की घोषणा की। यह अभियान प्रधानमन्त्री जी की महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक है। 2 अक्टूबर, 2014 को उन्होंने राजपथ पर जनसमूह को सम्बोधित करते हुए सभी राष्ट्रवासियों से स्वच्छता अभियान में भाग लेने और इसे सफल बनाने की अपील की। साफ-सफाई के सन्दर्भ में देखा जाए तो यह अभियान अब तक का सबसे बड़ा स्वच्छता अभियान है।

साफ-सफाई को लेकर दुनिया भर में भारत की छवि बदलने के लिए प्रधानमन्त्री जी बहुत गम्भीर हैं। उनकी इच्छा स्वच्छता अभियान को एक जन-आन्दोलन बनाकर देशवासियों को गम्भीरतापूर्वक इससे जोड़ने की है। हमारे नवनिर्वाचित प्रधानमन्त्री जी ने 2 अक्टूबर के दिन सर्वप्रथम गाँधी जी को राजघाट पर श्रद्धांजलि अर्पित की और फिर नई दिल्ली स्थित वाल्मीकि बस्ती में जाकर झाड़ लगाई। कहा जाता है। कि वाल्मीकि बस्ती दिल्ली में गाँधी जी का सबसे प्रिय स्थान था। वे अक्सर यहाँ आकर ठहरते थे।

इसके बाद मोदी जी ने जनपथ जाकर स्वच्छता अभियान की शुरुआत की। इस अवसर पर उन्होंने लगभग 40 मिनट का भाषण दिया और स्वच्छता के प्रति लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया। अपने भाषण के दौरान उन्होंने महात्मा गाँधी और लालबहादुर शास्त्री का जिक्र करते हुए बड़ी ही खूबसूरती से इन दोनों महापुरुषों को इस अभियान से जोड़ दिया। उन्होंने कहा-“गाँधी जी ने आजादी से पहले नारा दिया था, ‘क्विट इण्डिया क्लीन इण्डिया। आजादी की लड़ाई में उनका साथ देकर देशवासियों ने ‘क्विट इण्डिया’ के सपने को तो साकार कर दिया, लेकिन अभी उनका ‘क्लीन इण्डिया का सपना अधूरा है।”

मोदी जी की स्वच्छता अभियान की संकल्पना-माननीय मोदी जी की स्वच्छता अभियान की संकल्पना यह है कि देश के प्रत्येक शहरी और ग्रामीण परिवार में एक स्वच्छ शौचालय हो, जिन घर-परिवारों में स्थानाभाव के कारण शौचालय बनाया जाना सम्भव न हो, वहाँ पर सुलभ सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण किया जाए। देश के प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक के प्रत्येक विद्यालय में छात्र-छात्राओं के लिए स्वच्छ और पृथक्-पृथक् शौचालय हों। उनकी इस संकल्पना से जहाँ सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा समाप्त होगी, वहीं देश की उन करोड़ों महिलाओं को सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर प्राप्त होगा, जिनको खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है। उन बालिकाओं के विद्यालय जाने का मार्ग प्रशस्त होगा, जो विद्यालयों में अलग शौचालयों की व्यवस्था न होने के कारण विद्यालय नहीं जा पातीं।

मोदी जी की स्वच्छता अभियान की संकल्पना केवल शौचालयों के निर्माण तक ही सीमित नहीं है। उनका प्रयास है कि देश का प्रत्येक कोना स्वच्छ हो। इसके लिए देश के प्रत्येक नागरिक की भागेदारी आवश्यक है। उन्होंने देश के सवा सौ करोड़ नागरिकों का आह्वान किया कि देश के प्रत्येक नागरिक को यह संकल्प लेना होगा कि वह न स्वयं गन्दगी फैलाएगा और न दूसरों को फैलाने देगा। यदि देश का प्रत्येक नागरिक अपनी इस जिम्मेदारी को समझे तो देश गन्दा ही न होगा और सारा देश स्वत: ही स्वच्छ हो जाएगा। | स्वच्छता अभियान की शुरुआत-स्वच्छता अभियान की शुरुआत माननीय मोदी जी ने महात्मा गाँधी जी की जयन्ती पर 2 अक्टूबर, 2014 ई० को राजपथ से लोगों को स्वच्छता की शपथ दिलाकर की। इस दिन उन्होंने स्वयं मन्दिर मार्ग, नई दिल्ली स्थित वाल्मीकि बस्ती जाकर झाडू लगाकर फुटपाथ की सफाई की और स्वच्छता अभियान के अन्तर्गत बने पहले जैविक शौचालय (बायो टॉयलेट) को जनता को समर्पित किया।

स्वच्छता अभियान हेतु नवरत्नों की घोषणा–स्वच्छता अभियान से देश के प्रत्येक नागरिक को जोड़ने के लिए माननीय प्रधानमन्त्री जी ने 2 अक्टूबर को ही देश के नौ प्रतिष्ठित लोगों को नवरत्नों के रूप में नामांकित किया, जिनसे प्रेरणा ग्रहण करके देश के लोग स्वच्छता अभियान में पूर्ण मनोयोग से लग जाएँ। उनके ये नवरत्न हैं—अनिल अम्बानी, सचिन तेन्दुलकर, सलमान खान, प्रियंका चौपड़ा, बाबा रामदेव, कमल हसन, मृदुला सिन्हा, शशि थरूर और शाजिया इल्मी। इसके अलावा उन्होंने टी०वी० सीरियल ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ की सम्पूर्ण टीम को भी नामित किया है।

इसी प्रकार, 7 नवम्बर, 2014 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी के असी घाट पर मोदी जी ने स्वच्छता अभियान के लिए उत्तर प्रदेश के नवरत्नों के रूप में भी नौ प्रसिद्ध लोगों को नामांकित किया। इन नौ लोगों में प्रदेश के मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव, क्रिकेटर मुहम्मद कैफ तथा सुरेश रैना, हास्य टी०वी० कलाकार राजू श्रीवास्तव, सूफी गायक कैलाश खेर, भोजपुरी फिल्म अभिनेता मनोज तिवारी, लेखक मनु शर्मा, संस्कृत विद्वान् पद्मश्री प्रोफेसर देवीप्रसाद द्विवेदी, आन्ध्र विश्वविद्यालय चित्रकूट के कुलपति जगद्गुरु रामभद्राचार्य सम्मिलित हैं।

मोदी जी ने इन लोगों के नामांकन के साथ इन सभी का आह्वान किया कि ये सभी लोग अपने स्तर पर नौ-नौ और लोगों को इस अभियान हेतु नामांकित करें, फिर वे लोग दूसरे नौ-नौ लोगों को नामांकित करें। इस प्रकार लोगों की एक श्रृंखला बनती चली जाएगी और देश के सभी लोग इस अभियान से जुड़कर भारत को स्वच्छ बनाने में सफल होंगे।

स्वच्छता अभियान का प्रारूप-स्वच्छता अभियान भारत सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर चलाया गया जन-आन्दोलन है, जिसका प्रयास सन् 2019 तक सम्पूर्ण भारत को स्वच्छ बनाना है। सरकारी सहायता हेतु इस अभियान को तीन क्षेत्रों में विभक्त किया गया है-

(i) शहरी क्षेत्रों के लिए अभियान का उद्देश्य 1.04 करोड़ परिवारों को लक्षित करते हुए 2.5 लाख सामुदायिक शौचालय, 2.6 लाख सार्वजनिक शौचालय और प्रत्येक शहर में एक ठोस अपशिष्ट प्रबन्धन की सुविधा प्रदान करना है। इस कार्यक्रम के तहत आवासीय क्षेत्रों में जहाँ व्यक्तिगत घरेलु शौचालयों का निर्माण करना मुश्किल है वहाँ सामुदायिक शौचालयों का निर्माण करना तथा पर्यटन स्थलों, बाजारों, बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों जैसे प्रमुख स्थानों पर भी सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण करना प्रस्तावित है। यह कार्यक्रम पाँच साल की अवधि में 4401 शहरों में लागू किया जाएगा। इस कार्यक्रम में खुले में शौच करने को रोकना, स्वच्छ शौचालयों को फ्लश शौचालयों में परिवर्तित करने, मैला ढोने की प्रथा का उन्मूलन करने, नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट प्रबन्धन और स्वास्थ्य एवं स्वच्छता से जुड़ी प्रथाओं के सम्बन्ध में लोगों के व्यवहार में परिवर्तन लाने के कार्यक्रम शामिल हैं।

(ii) ग्रामीण क्षेत्रों के लिए स्वच्छता अभियान भारत सरकार द्वारा चलाया जा रहा ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के लिए माँग-आधारित एवं जन-केन्द्रित अभियान है, जिसमें लोगों की स्वच्छता सम्बन्धी आदतों को बेहतर बनाना, स्वसुविधाओं की माँग उत्पन्न करना और स्वच्छता सुविधाओं को उपलब्ध कराना शामिल है, जिससे ग्रामीणों के जीवन-स्तर को बेहतर बनाया जा सके। अभियान का उद्देश्य पाँच वर्षों में भारत को खुला शौच से मुक्त देश बनाना है। अभियान के तहत देश में लगभग 11 करोड़ 11 लाख शौचालयों के निर्माण के लिए एक लाख चौंतीस हजार करोड़ रुपये खर्च किए जाएँगे। बड़े पैमाने पर प्रौद्योगिकी का उपयोग कर ग्रामीण भारत में कचरे को इस्तेमाल उसे पूँजी का रूप देते हुए जैव उर्वरक और ऊर्जा के विभिन्न रूपों में परिवर्तित करे – लिए किया जाएगा। अभियान को युद्ध-स्तर पर प्रारम्भ कर ग्रामीण आबादी और कूल शिक्षकों व छात्रों के बड़े वर्गों के अलावा प्रत्येक स्तर पर इस प्रयास में देश भर की ग्रामीण पंचायत, समिति और जिला परिषद् को भी इससे जोड़ा जाना है।

(iii) विद्यालयों के लिए मानव संसाधन विकास मन्त्रालय के अधीन स्वच्छ विद्यालय अभियान 25 सितम्बर, 2014 से 31 अक्टूबर, 2014 ई० के बीच केन्द्रीय विद्यालयों और नवोदय विद्यालयों में आयोजित किया गया। इस दौरान की जाने वाली गतिविधियाँ इस प्रकार रहीं–

  • शिक्षकगण स्कूल कक्षाओं के दौरान प्रतिदिन बच्चों के साथ सफाई और स्वच्छता के विभिन्न पहलुओं पर, विशेष रूप से महात्मा गाँधी जी की स्वच्छता और अच्छे स्वास्थ्य से जुड़ी शिक्षाओं के सम्बन्ध में बात करें।
  • कक्षा, प्रयोगशाला और पुस्तकालयों आदि की सफाई करना।
  • स्कूल में स्थापित किसी भी मूर्ति या स्कूल की स्थापना करने वाले व्यक्ति के योगदान के बारे में बात करना और इनकी मूर्तियों की सफाई करना।
  • शौचालयों और पीने के पानी वाले क्षेत्रों की सफाई करना।
  • रसोई और भण्डार-गृह की सफाई करना।
  • स्कूल एवं बगीचों का रख-रखाव और सफाई करना।
  • खेल के मैदान की सफाई करना।
  • स्कूल-भवन का वार्षिक रख-रखाव, रँगाई एवं पुताई के साथ।
  • निबन्ध, वाद-विवाद, चित्रकला, सफाई और स्वच्छता पर प्रतियोगिताओं का आयोजन करना।
  • बाल मन्त्रिमण्डलों का निगरानी दल बनाना और सफाई अभियान की निगरानी करना।

इसके अलावा फिल्म-शो, स्वच्छता पर निबन्ध/पेन्टिग और अन्य प्रतियोगिताओं, नाटकों आदि के आयोजन द्वारा स्वच्छता एवं अच्छे स्वास्थ्य का सन्देश प्रसारित करना। मन्त्रालय ने इसके अलावा स्कूलों के छात्रों, शिक्षकों, अभिभावकों और समुदाय के सदस्यों को शामिल करते हुए सप्ताह में दो बार आधे घण्टे सफाई अभियान शुरू करने का प्रस्ताव भी रखा।

उपसंहार—आशा की जा सकती है कि स्वच्छता अभियान की संकल्पना निश्चय ही साकार होगी; क्योंकि जिस अभियान के प्रणेता माननीय नरेन्द्र मोदी जैसे कर्मठ, श्रमशील, ईमानदार और राष्ट्रवादी व्यक्ति हों उसकी सफलता में किसी प्रकार का सन्देह नहीं किया जा सकता है। जिस दिन यह अभियान सफलतापूर्वक सम्पन्न हो जाएगा उस दिन न केवल कश्मीर, वरन् सम्पूर्ण भारत देश धरती का स्वर्ग कहलाएगा।

मानव-जीवन में योग शिक्षा का महत्त्व

सम्बद्ध शीर्षक

  • योग शिक्षा : आवश्यकता और उपयोगिता (2016)

रूपरेखा-

  1. प्रस्तावना,
  2. योग का अर्थ,
  3. योग की आवश्यकता,
  4. योग की उपयोगिता,
  5. योग के सामान्य नियम
  6. योग से लाभ,
  7. उपसंहार।।

प्रस्तावना-योगासन शरीर और मन को स्वस्थ रखने की प्राचीन भारतीय प्रणाली है। शरीर को किसी ऐसे आसन या स्थिति में रखना जिससे स्थिरता और सुख का अनुभव हो, योगासन कहलाता है। योगासन शरीर की आन्तरिक प्रणाली को गतिशील करता है। इससे रक्त-नलिकाएँ साफ होती हैं तथा प्रत्येक अंग में शुद्ध वायु का संचार होता है जिससे उनमें स्फूर्ति आती है। परिणामत: व्यक्ति में उत्साह और कार्य-क्षमता का विकास होता है तथा एकाग्रता आती है।

योग का अर्थ-योग, संस्कृत के यज् धातु से बना है, जिसका अर्थ है, संचालि। ५५ म्वद्ध करना, सम्मिलित करना अथवा जोड़ना। अर्थ के अनुसार विवेचन किया जाए तो शरीर एवं आत्मा का मि : ही योग कहलाता है। यह भारत के छः दर्शनों, जिन्हें षड्दर्शन कहा जाता है, में से एक है। अन्य दर्शन हैं-न्याय, वैशेषिक, सांख्य, वेदान्त एवं मीमांसा। इसकी उत्पत्ति भारत में लगभग 5000 ई०पू० में हुई थी। पहले यह विद्या गुरु-शिष्य परम्परा के तहत पुरानी पीढ़ी से नई पीढ़ी को हस्तांतरित होती थी। लगभग 200 ई०पू० में महर्षि पतञ्जलि ने योग-दर्शन को योग-सूत्र नामक ग्रन्थ के रूप में लिखित रूप में प्रस्तुत किया। इसलिए महर्षि पतञ्जलि को ‘योग का प्रणेता’ कहा जाता है। आज बाबा रामदेव ‘योग’ नामक इस अचूक विद्या का देश-विदेश में प्रचार कर रहे हैं।

योग की आवश्यकता–शरीर के स्वस्थ रहने पर ही मस्तिष्क स्वस्थ रहता है। मस्तिष्क से ही शरीर की समस्त क्रियाओं का संचालन होता है। इसके स्वस्थ और तनावमुक्त होने पर ही शरीर की सारी क्रियाएँ भली प्रकार से सम्पन्न होती हैं। इस प्रकार हमारे शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक विकास के लिए योगासन अति आवश्यक है।

हमारा हृदय निरन्तर कार्य करता है। हमारे थककर आराम करने या रात को सोने के समय भी हृदय गतिशील रहता है। हृदय प्रतिदिन लगभग 8000 लीटर रक्त को पम्प करता है। उसकी यह क्रिया जीवन भर चलती रहती है। यदि हमारी रक्त-नलिकाएँ साफ होंगी तो हृदय को अतिरिक्त मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। इससे हृदय स्वस्थ रहेगा और शरीर के अन्य भागों को शुद्ध रक्त मिल पाएगा, जिससे नीरोग व सबल हो जाएँगे। फलतः व्यक्ति की कार्य-क्षमता भी बढ़ जाएगी।

योग की उपयोगिता-मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए हमारे जीवन में योग अत्यन्त उपयोगी है। शरीर, मन एवं आत्मा के बीच सन्तुलन अर्थात् योग स्थापित करना होता है। योग की प्रक्रियाओं में जब तन, मन और आत्मा के बीच सन्तुलन एवं योग (जुड़ाव) स्थापित होता है, तब आत्मिक सन्तुष्टि, शान्ति एवं चेतना का अनुभव होता है। योग शरीर को शक्तिशाली एवं लचीला बनाए रखता है, साथ ही तनाव से भी छुटकारा दिलाता है। यह शरीर के जोड़ों एवं मांसपेशियों में लचीलापन लाता है, मांसपेशियों को मजबूत बनाता है, शारीरिक विकृतियों को काफी हद तक ठीक करता है, शरीर में रक्त प्रवाह को सुचारु करता है तथा पाचन-तन्त्र को मजबूत बनाती है। इन सबके अतिरिक्त यह शरीर की रोग-प्रतिरोधक शक्तियाँ बढ़ाता है, कई प्रकार की बीमारियों जैसे अनिद्रा, तनाव, थकान, उच्च रक्तचाप, चिन्ता इत्यादि को दूर करता है तथा शरीर को ऊर्जावान बनाता है। आज की भाग-दौड़ भरी जिन्दगी में स्वस्थ रह पाना किसी चुनौती से कम नहीं है। अतः हर आयु-वर्ग के स्त्री-पुरुष के लिए योग उपयोगी है।

योग के सामान्य नियम-योगासन उचित विधि से ही करना चाहिए अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि की सम्भावना रहती है। योगासन के अभ्यास से पूर्व उसके औचित्य पर भी विचार कर लेना चाहिए। बुखार से ग्रस्त तथा गम्भीर रोगियों को योगासन नहीं करना चाहिए। योगासन करने से पहले नीचे दिए सामान्य नियमों की जानकारी होनी आवश्यक है-

  1. प्रातः काल शौचादि से निवृत्त होकर ही योगासन का अभ्यास करना चाहिए। स्नान के बाद योगासन करना और भी उत्तम रहता है।
  2. सायंकाल खाली पेट पर ही योगासन करना चाहिए।
  3. योगासन के लिए शान्त, स्वच्छ तथा खुले स्थान का चयन करना चाहिए। बगीचे अथवा पार्क में योगासन करना अधिक अच्छा रहता है।
  4. आसन करते समय कम, हलके तथा ढीले-ढाले वस्त्र पहनने चाहिए।
  5. योगासन करते समय मन को प्रसन्न, एकाग्र और स्थिर रखना चाहिए। कोई बातचीत नहीं करनी चाहिए।
  6. योगासन के अभ्यास को धीरे-धीरे ही बढ़ाएँ।
  7. योगासन का अभ्यास करने वाले व्यक्ति को हलका, शीघ्र पाचक, सात्विक और पौष्टिक भोजन करना चाहिए।
  8. अभ्यास के आरम्भ में सरल योगासन करने चाहिए।
  9. योगासन के अन्त में शिथिलासन अथवा शवासन करना चाहिए। इससे शरीर को विश्राम मिल जाता है तथा मन शान्त हो जाता है।
  10. योगासन करने के बाद आधे घण्टे तक न तो स्नान करना चाहिए और न ही कुछ खाना चाहिए।

योग से लाभ-छात्रों, शिक्षकों एवं शोधार्थियों के लिए योग विशेष रूप से लाभदायक सिद्ध होता है, क्योंकि यह उनके मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ाने के साथ-साथ उनकी एकाग्रता भी बढ़ाता है जिससे उनके लिए अध्ययन-अध्यापन की प्रक्रिया सरल हो जाती है।

पतञ्जलि के योग-सूत्र के अनुसार आसनों की संख्या 84 है। जिनमें भुजंगासन, कोणासन, पद्मासन, मयूरासन, शलभासन, धनुरासन, गोमुखासन, सिंहासन, वज्रासन, स्वस्तिकासन, पवर्तासन, शवासन, हलासन, शीर्षासन, धनुरासन, ताड़ासन, सर्वांगासन, पश्चिमोत्तानासन, चतुष्कोणासन, त्रिकोणासन, मत्स्यासन, गरुड़ासन इत्यादि कुछ प्रसिद्ध आसन हैं। योग के द्वारा शरीर पुष्ट होता है, बुद्धि और तेज बढ़ता है, अंग-प्रत्यंग में उष्ण रक्त प्रवाहित होने से स्फूर्ति आती है, मांसपेशियाँ सुदृढ़ होती हैं, पाचन शक्ति ठीक रहती है तथा शरीर स्वस्थ और हल्का प्रतीत होता है। योग के साथ मनोरंजन का समावेश होने से लाभ द्विगुणित होता है। इससे मन प्रफुल्लित रहता है और योग की थकावट भी अंनुभव नहीं होती। शरीर स्वस्थ होने से सभी इन्द्रियाँ सुचारु रूप से काम करती हैं। योग से शरीर नीरोग, मन प्रसन्न और जीवन सरस हो जाती है।

उपसंहार-आज की आवश्यकता को देखते हुए योग शिक्षा की बेहद आवश्यकता है, क्योंकि सबसे बड़ा सुख शरीर का स्वस्थ होना है। यदि आपको शरीर स्वस्थ है तो आपके पास दुनिया की सबसे बड़ी दौलत है। स्वस्थ व्यक्ति ही देश और समाज का हित कर सकता है। अत: आज की भाग-दौड़ की जिन्दगी में खुद को स्वस्थ एवं ऊर्जावान बनाए रखने के लिए योग बेहद आवश्यक है। वर्तमान परिवेश में योग न सिर्फ हमारे लिए लाभकारी है, बल्कि विश्व के बढ़ते प्रदूषण एवं मानवीय व्यस्तताओं से उपजी समस्याओं के निवारण के संदर्भ में इसकी सार्थकता और बढ़ गई है।

विज्ञापनों का हमारे जीवन पर प्रभाव

सम्बद्ध शीर्षक

  • विज्ञापन की दुनिया (2016)

प्रमुख विचार-बिन्दु-

  1. प्रस्तावना,
  2. विज्ञापन का उद्देश्य,
  3. विज्ञापन की विशेषताएँ,
  4. विज्ञापन के लाभ व हानियाँ,
  5. पत्रकारिता के मूल्यों का ह्रास,
  6. विज्ञापन के प्रभाव,
  7. उपसंहार।

प्रस्तावना–“विज्ञापन समाज एवं व्यापार जगत् में होने वाले परिवर्तन को प्रदर्शित करने वाला उद्योग है, जो बदलते समय के साँचे में तेजी से ढल जाता है। ऐसा भारत में ‘ऐडगुरु’ के नाम से विख्यात प्रसून जोशी का मानना है। आज हमारे चारों ओर संचार-तन्त्र का जाल-सा बिछा हैं। एक ओर हमारे जीवन में पुस्तकें, पत्रिकाएँ, समाचार-पत्र जैसे प्रिण्ट मीडिया के साधनों की भरमार है, तो दूसरी ओर हम घर से बाहर तक रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा, कम्प्यूटर, मोबाइल जैसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अत्याधुनिक साधनों से घिरे हुए हैं, किन्तु यदि हम कहें कि मीडिया के इन सारे साधनों पर सर्वाधिक आधिपत्य विज्ञापन का है, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी, क्योंकि विज्ञापन न केवल इनकी आय का मुख्य स्रोत है वरन् पूरे संचार-तन्त्र का अपना गहरा प्रभाव भी छोड़ता है। तभी तो मार्शल मैकलुहन ने इसे बीसवीं सदी का सर्वोत्तम कला-विधान की संज्ञा दी है।

विज्ञापन का उद्देश्य–विज्ञापन का मुख्य उद्देश्य उत्पाद को प्रभावी तरीके से आम जन तक पहुँचाना होता है। सचमुच एक छोटा-सा विज्ञापन भला क्या नहीं कर सकता! हिट हो जाए तो एक सामान्य से उत्पाद को आसमान की बुलन्दियों तक पहुँचा सकता है। विज्ञापन की बानगी देखिए-“दो बूंद जिन्दगी की’ (पोलियो उन्मूलन), ‘जागो रे’ (टाटा चाय), ‘दाग अच्छे हैं’ (सर्फ एक्सेल) अथवा ‘नो उल्लू बनाईंग’ (आइडिया मोबाइल) जैसे विज्ञापन इतने प्रचलित हुए कि सहज ही लोगों की जुबान पर चढ़ गए। यद्यपि रेडियो या टेलीविजन के प्रसारण के छोटे-से समय अथवा समाचार-पत्रों के छोटे से हिस्से के द्वारा विज्ञापनों को अपना उद्देश्य पूरा करना पड़ता है, फिर भी इनमें रचनात्मकता देखते ही बनती है। इसमें दो राय नहीं है कि मैगी, साबुन, शैम्पू, मोबाइल जैसे उत्पादों में वृद्धि का कारण इनके रचनात्मक विज्ञापन ही हैं और वर्तमान समय का सच भी यही है कि आज किसी भी उत्पाद के प्रचार-प्रसार का सबसे प्रभावशाली माध्यम विज्ञापन ही है।

प्रसून जोशी के शब्दों में-“विज्ञापन का क्षेत्र अति सृजनात्मक है। मैं विज्ञापन लिखने के दौरान तुकबन्दी न कर पूरी कविता की रचना करता हूँ; जैसे-उम्मीदों वाली धूप, सनशाइन वाली आशा अथवा हाँ मैं क्रेजी हूँ! एक अच्छा विज्ञापन लोगों के दिल में उतर जाता है और वे ब्राण्ड से जुड़ जाते हैं।”

विज्ञापन, उपभोक्ताओं को शिक्षित एवं प्रभावित करने वाले दृष्टिकोण से निर्माताओं, थोक विक्रेताओं और खुदरा विक्रेताओं की ओर विचारों, उत्पादों एवं सेवाओं से सम्बन्धित सन्देशों का अव्यक्तिगत संचार है। यह मुद्रित, ऑडियो अथवा वीडियो रूप में हो सकता है। इसके प्रसारण के लिए समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं, रेडियो, टेलीविजन एवं फिल्मों को माध्यम बनाया जाता है। इनके अतिरिक्त होर्डिंग्स, बिलबोर्ड्स, पोस्टर्स इत्यादि का प्रयोग भी विज्ञापन के लिए किया जाता है। जूते-चप्पल से लेकर लिपस्टिक, पाउडर एवं दूध-दही यानी दुनिया की ऐसी कौन-सी चीज है, जिसका विज्ञापन किसी-न-किसी रूप में कहीं प्रकाशित न होता हो! यहाँ तक कि विवाह के लिए वर या वधू की तलाश हेतु भी विज्ञापन प्रकाशित एवं प्रसारित होते हैं।

विज्ञापन की विशेषताएँ-विज्ञापन की विशेषताओं पर गौर करें, तो पता चलता है कि ये सन्देश के अव्यक्तिगत संचार होते हैं। इनका उद्देश्य वस्तुओं एवं सेवाओं का संवर्द्धन करना होता है। इनके प्रायोजक द्वारा लोगों को वस्तुओं एवं सेवाओं को खरीदने के लिए प्रेरित करने वाला एक सन्देश प्रेषित किया जाता है। इस तरह, विज्ञापन संचार का भुगतान किया हुआ एक रूप है।

विज्ञापन से कई प्रकार के लाभ होते हैं। यह उत्पादों, मूल्यों, गुणवत्ता, बिक्री सम्बन्धी जानकारियों, विक्रय उपरान्त सेवाओं इत्यादि के बारे में उपयोगी सूचनाएँ प्राप्त करने में उपभोक्ताओं की मदद करता है। यह नए उत्पादों के प्रस्तुतीकरण, वर्तमान उत्पादों के उपभोक्ताओं को बनाए रखने और नए उपभोक्ताओं को आकर्षित कर अपनी बिक्री बढ़ाने में निर्माताओं की मदद करता है। यह लोगों को अधिक सुविधा, आराम, बेहतर जीवन-पद्धति उपलब्ध कराने में सहायक होता है।

इन सबके अतिरिक्त, विज्ञापन समाचार-पत्र, रेडियो एवं टेलीविजन की आय का प्रमुख स्रोत होता है। यदि सही मात्रा में इन माध्यमों को विज्ञापन न मिलें, तो इन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जो समाचार-पत्र हम दो या तीन रुपये में खरीदते हैं, उसकी छपाई का ही व्यय दस रुपये से अधिक होता है। फिर प्रश्न उठता है कि हमें कम कीमत पर यह कैसे उपलब्ध हो जाता है। दरअसल, विज्ञापनों से प्राप्त आय से इसकी भरपाई की जाती है। इस तरह स्पष्ट है कि यदि संचार माध्यमों को पर्याप्त विज्ञापन न मिलें, तो इनके बन्द होने का खतरा हो सकता है। बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ ही आज खेल-कूद आयोजनों एवं कार्यक्रमों को प्रायोजित करती हैं। टेलीविजन पर सीधा प्रसारण हो या रेडियो पर ऑखों देखा हाल, इन सबको बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ ही प्रसारित करती हैं और इसका उद्देश्य होता है—उनकी वस्तुओं एवं सेवाओं का विज्ञापन। इस तरह, विज्ञापन के कारण ही लोगों का मनोरंजन भी होता है। आजकल टेलीविजन पर अत्यधिक मात्रा में प्रसारित विज्ञापनों के कारण लोगों को इससे अरुचि होने लगी है। इस बात से कैसे इनकार किया जा सकता है कि यदि विज्ञापन न हों, तो किसी कार्यक्रम का प्रसारण भी नहीं हो पाएगा। इस तरह देखा जाए, तो विज्ञापन के कारण ही लोगों का मनोरंजन हो पाता है। खिलाड़ियों के लिए विज्ञापन कुबेर का खजाना बन चुके हैं।

आजकल तकनीक एवं प्रौद्योगिकी में प्रगति के साथ ही विज्ञापन संचार के सशक्त माध्यम के रूप में उभरे हैं। समाचार-पत्र एवं रेडियो, टेलीविज़न ही नहीं, इण्टरनेट पर भी आजकल विभिन्न प्रकार के विज्ञापनों को देखा जा सकता है। सरकार की विकासोन्मुखी योजनाएँ-साक्षरता अभियान, परिवार नियोजन, महिला सशक्तीकरण, कृषि एवं विज्ञान सम्बन्धी योजनाएँ, पोलियो एवं कुष्ठ निवारण अभियान इत्यादि विज्ञापन के माध्यम से ही त्वरित ति से क्रियान्वित होकर प्रभावकारी सिद्ध होती हैं। इस तरह से विज्ञापन समाजसेवा में भी सहायक होता है। फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन एवं अभिनेत्री ऐश्वर्या राय द्वारा ‘पोलियो मुक्त अभियान के लिए प्रस्तुत किया गया विज्ञापन ‘दो बूंद जिन्दगी की’ इसका जीता-जागता उदाहरण है। इस विज्ञापन का जनमानस पर गहरा प्रभाव पड़ा है।

केवल व्यावसायिक लाभों के लिए कम्पनियों द्वारा ही विज्ञापनों का प्रसारण या प्रकाशन नहीं किया जाता। अब राजनीतिक दल भी अपने विचारों एवं योजनाओं को जन-जन तक पहुँचाने के लिए विज्ञापन का सहारा लेते हैं। इस तरह, चुनावों के समय लोकमत के निर्माण में भी विज्ञापनों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। बिल बर्नबेक के अनुसार, विज्ञापन का सर्वाधिक शक्तिशाली तत्त्व सच है।

विज्ञापन के लाभ व हानियाँ-विज्ञापन से यदि कई लाभ हैं, तो इससे हानियाँ भी कम नहीं हैं। विज्ञापन पर किए गए व्यय के कारण उत्पाद के मूल्य में वृद्धि होती है। उदाहरण के तौर पर ठण्डे पेय पदार्थों को ही लीजिए। जो ठण्डा पेय पदार्थ बाजार में दस रुपये में उपलब्ध होता है, उसका लागत मूल्य मुश्किल से 5 से 7 रुपये के आस-पास होता है, किन्तु इसके विज्ञापन पर करोड़ों रुपये व्यय किये जाते हैं। इसलिए इनकी कीमत में अनावश्यक वृद्धि होती है।

कभी-कभी विज्ञापन हमारे सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों को भी क्षति पहुँचाता है। भारत में पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव एवं उपभोक्तावादी संस्कृति के विकास में विज्ञापनों का भी हाथ है। ‘वैलेण्टाइन डे’ हो यो ‘न्यू ईयर ईव’ बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ इनका लाभ उठाने के लिए विज्ञापनों का सहारा लेती हैं। इण्टरनेट से लेकर गली-मुहल्ले तक में इनसे सम्बन्धित सामानों को बाजार लग जाता है। इस तरह कम्पनियों को करोड़ों को लाभ होता है तथा ग्राहकों को भी उचित मूल्य पर वस्तुएँ प्राप्त हो जाती हैं।

पत्रकारिता के मूल्यों का ह्रास–विज्ञापन से होने वाली एक और हानि यह है कि विज्ञापनदाताओं के विरुद्ध किसी भी प्रकार का भण्डाफोड़ करने से जनसंचार माध्यम बचते हैं। विज्ञापनों से होने वाले आर्थिक लाभ के कारण धन लेकर समाचार प्रकाशित करने की प्रवृत्ति भी आजकल बढ़ रही है। इससे पत्रकारिता के मूल्यों का ह्रास हुआ है। मीडिया को लोकतन्त्र का चतुर्थ स्तम्भ कहा जाता है। विज्ञापनदाताओं के अनुचित प्रभाव एवं व्यावसायिक लाभ को प्राथमिकता देने के कारण मीडिया के उद्देश्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है। कई बार यह भी देखने में आता है कि सरकारी विज्ञापनों के लोभ में समाचार-पत्र एवं टीवी चैनल सरकार के विरोध में कुछ प्रकाशित या प्रसारित नहीं करते।।

विज्ञापन से एकाधिकार की प्रवृत्ति का भी सृजन होता है। माइक्रोसॉफ्ट प्रारम्भ से ही यह प्रयास करती रही है कि कम्प्यूटर की दुनिया में उसका एकाधिकार रहे। इसके लिए वह समस-समय पर विज्ञापनों का सहारा लेती है। विज्ञापनों के माध्यम से एकाधिकार की लड़ाई का सबसे अच्छा उदाहरण कोकाकोला एवं पेप्सी कम्पनियों के बीच विज्ञापनों की होड़ है। यह हमेशा माँग में वृद्धि करवाने में सहायक होता है।

विज्ञापन के प्रभाव-लुभावने विज्ञापनों द्वारा हमारी सोच को बीमार कर दिया जाता है और हम उनकी ओर स्वयं को बँधे हुए पाते हैं। आज मुँह धोने के लिए हजारों किस्म के साबुन और फेशवास तथा मुख की कांति को बनाए रखने के लिए हजारों प्रकार की क्रीम मिल जाएँगे, जिनमें विज्ञापनों द्वारा हमें यह विश्वास दिला दिया जाता है कि यह क्रीम हमें जवान और सुंदर बना देगा। रंग यदि काला है तो वह गोरा हो जाएगा। इन विज्ञापनों में सत्यता लाने के लिए बड़े-बड़े खिलाड़ियों और फिल्मी कलाकारों को लिया जाता है। हम इन कलाकारों की बातों को सच मानकर अपना पैसा पानी की तरह बहाते हैं परन्तु नतीजा कुछ भी सच नहीं निकलता।

हमें विज्ञापन देखकर जानकारी अवश्य लेनी चाहिए परन्तु विज्ञापनों को देखकर वस्तुएँ नहीं लेनी चाहिए। विज्ञापनों में जो दिखाया जाता है, वह शत-प्रतिशत सही नहीं होता। विज्ञापन हमारी सहायता करते हैं कि बाजार में किस प्रकार की सामग्री आ गई है। हमें विज्ञापनों द्वारा वस्तुओं की जानकारियाँ प्राप्त होती हैं। विज्ञापन ग्राहक और निर्माता के बीच कड़ी का काम करते हैं।

ग्राहकों को अपने उत्पादों की बिक्री करने के लिए विज्ञापनों द्वारा आकर्षित किया जाता है। लेकिन इनके प्रयोग करने पर ही हमें उत्पादों की गुणवत्ता का सही पता चलता है। आज आप कितने ही ऐसे साबुन, क्रीम और पाउडरों के विज्ञापनों को देखते होंगे जिनमें यह दावा किया जाता है कि यह साँवले रंग को गोरा बना देता है, परन्तु ऐसा नहीं होता है। लोग अपने पैसे व्यर्थ में बरबाद कर देते हैं। उनके हाथ मायूसी ही लगती है। हमें चाहिए कि सोच-समझकर उत्पादों का प्रयोग करें। विज्ञापन हमारी सहायता अवश्य कर सकते हैं परन्तु कौन-सा उत्पाद हमारे काम का है या नहीं यह हमें तय करना चाहिए।

उपसंहार-विज्ञापन की दुनिया एक रोचक दुनिया है। जहाँ जैसा है, ग्लैमर है, शोहरत है एवं सफलता की ऊँचाइयाँ हैं। कई मॉडलों के प्रसिद्ध होने में विज्ञापनों का योगदान रहा है। कई फिल्मों के हिट होने के पीछे भी विज्ञापन की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। विज्ञापन की दुनिया की सबसे खास बात इसकी रचनात्मकता होती है। कुछ विज्ञापन तो हास्य-व्यंग्य से भी भरपूर होते हैं, जिसके कारण इनसे भी लोगों का अच्छा मनोरंजन हो जाता है। नि:सन्देह जानकारी बढ़ाने, मेल-मिलाप करने जैसे सकारात्मक साधन के रूप में कार्य करने पर विज्ञापन जनकल्याण के साथ-साथ देशहित में भी सहायक होगा। नॉर्मन डगलस से कहा भी है-“आप अपने विज्ञापनों के माध्यम से राष्ट्र के आदर्शों को प्रकट कर सकते हैं।’

We hope the UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi सामाजिक व सांस्कृतिक निबन्य help you. If you have any query regarding UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi सामाजिक व सांस्कृतिक निबन्य, drop a comment below and we will get back to you at the earliest.