UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi पद्य Chapter 6 बादल-राग / सन्ध्या सुन्दरी

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Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 6
Chapter Name बादल-राग / सन्ध्या सुन्दरी
Number of Questions Solved 2
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi पद्य Chapter 6 बादल-राग / सन्ध्या सुन्दरी

बादल-राग / सन्ध्या सुन्दरी – जीवन/साहित्यिक परिचय

(2018, 17)

प्रश्न-पत्र में संकलित पाठों में से चार कवियों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं। जिनमें से एक का उत्तर: देना होता है। इस प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ
महाकवि निराला का जन्म बंगाल के महिषादल राज्य के मेदिनीपुर जिले में 1899 ई. में हुआ था। माँ द्वारा सूर्य का व्रत रखने तथा निराला के रविवार के दिन जन्म लेने के कारण इनका नाम सूर्यकान्त रखा गया, परन्तु बाद में साहित्य के क्षेत्र में आने के कारण इनका उपनाम ‘निराला’ हो गया।

इनके पिता पण्डित रामसहाय त्रिपाठी उत्तर: प्रदेश के बैसवाड़ा क्षेत्र के जिला उन्नाव के गोला ग्राम के निवासी थे था महिषादल राज्य में रहकर राजकीय सेवा में कार्य कर रहे थे। माता-पिता के असामयिक निधन, फिर पत्नी की अचानक मृत्यु, पुत्री सरोज की अकाल मृत्यु आदि ने निराला के जीवन को करुणा से भर दिया। बेटी की असामयिक मृत्यु की अवसादपूर्ण घटना से व्यथित होकर ही इन्होंने ‘सरोज स्मृति’ नामक कविता लिखी। कबीर का फक्कड़पन एवं निर्भीकता, सूफियों का सादापन, सूर-तुलसी की प्रतिभा और प्रसाद की सौन्दर्य-चेतना का मिश्रित रूप निराला के व्यक्तित्व में झलकता है।

इन्होंने कलकता में अपनी रुचि के अनुरूप रामकृष्ण मिशन के पत्र ‘समन्वय’ का सम्पादन-भार सँभाला। इसके बाद ‘मतवाला’ के सम्पादक मण्डल में भी सम्मिलित हुए। इसके बाद लखनऊ में ‘गंगा पुस्तकमाला’ का सम्पादन तथा ‘सुधा’ पत्रिका के लिए सम्पादकीय भी लिखने लगे। जीवन के उत्तर:ार्द्ध में ये इलाहाबाद चले आए। इनकी आर्थिक स्थिति अत्यन्त विषम हो गई। आर्थिक विपन्नता भोगते हुए 15 अक्टूबर, 1961 को ये चिरनिद्रा में लीन हो गए।

साहित्यिक गतिविधियाँ
छायावाद के प्रमुख स्तम्भों में से एक कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की उपन्यास, कहानी, आलोचना, निबन्ध आदि सभी क्षेत्रों में ही रचनाएँ मिलती हैं, तथापि यह कवि के रूप में अधिक विख्यात हुए।

कृतियाँ
प्रमुख काव्य-ग्रन्थों में अनामिका, परिमल, गीतिका, अणिमा, नए पत्ते, आराधना आदि उल्लेखनीय हैं।
लम्बी कविताएँ तुलसीदास, राम की शक्ति पूजा, सरोज-स्मृति आदि।
गद्य रचनाएँ चतुरी-चमार, बिल्लेसुर बकरिहा, प्रभावती, निरूपमा आदि उल्लेखनीय हैं।

काव्यगत विशेषताएँ
भाव पक्ष
विद्रोहशील व्यक्तित्व वाले निराला ने जब मन की प्रबल भावनाओं को वाणी दी, तो छन्द के बन्धन सहज ही विच्छिन्न हो गए तथा मुक्त छन्द का आविर्भाव हुआ। इनकी कविताओं में छायावादी, रहस्यवादी और प्रगतिवादी विचारधाओं का भरपूर समावेश हुआ है। इनके काव्य में क्रान्ति की आग एवं पौरुष के दर्शन होते हैं।

  1. मानवतावाद निराला मानवतावाद के घोर समर्थक थे। समाज के हाशिये पर खड़ा समुदाय हमेशा इनकी सहानुभूति का पात्र रहा। समानता एवं बन्धुत्व की भावना इनकी रचनाओं में सर्वत्र बिखरी पड़ी है।
  2. रस योजना निराला जी की कविताओं में श्रृंगार, वीर, रौद्र, करुण आदि रसों का सुन्दर परिपाक हुआ है, लेकिन प्रधानता पौरुष एवं ओज की है। राम की शक्ति पूजा में वीर और रौद्र रस की प्रधानता है तो सरोजस्मृति में कण रस प्रधान हैं।
  3. प्रकृति चित्रण निराला जी का प्रकृति से विशेष अनुराग होने के कारण उनके काव्य में स्थान-स्थान पर प्रकृति के मनोहारी चित्र मिलते हैं; जैसे
    दिवावसान का समय,
    मेघमय आसमान से उतर रही है,
    वह सन्ध्या-सुन्दरी परी-सी
    धीरे-धीरे-धीरे।
  4. रहस्यवाद अद्वैतवादी सिद्धान्त के समर्थक निराला के स्वस्थ चिन्तन में रहस्यवाद प्रस्तुत हुआ है। ये सर्वत्र आभासित होने वाली चेतन सत्ता में विश्वास रखते थे।
  5. नारी चित्रण इनके काव्य में नारी का नित्य नया एवं उदात्त रूप चित्रित हुआ हैं। इन्होंने नारी का उज्वल, सात्विक एवं शक्तिमय रूप प्रस्तुत किया है।
  6. शोषित वर्ग के प्रति सहानुभूति प्रगतिवादी कवि निराला स्वभाव से ही विद्रोही एवं सामाजिक असमानता के घोर विरोधी थे। इनके काव्य में शोषित वर्ग के प्रति अथाह करुणा एवं सहानुभूति थी।

कला पक्ष

  1. भाषा निराला जी की भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली है। कोमल कल्पना के अनुरूप इनकी भाषा की पदावली भी कोमलकान्त है। भाषा में खड़ी बोली की नीरसता नहीं, बल्कि उसमें संगीत की मधुरिमा विद्यमान है। इन्होंने मुहावरों के प्रयोग द्वारा भाषा को नई व्यंजनाशक्ति प्रदान की है। जहाँ दर्शन, चिन्तन एवं विचार-तत्त्व की प्रधानता हैं, वहीं इनकी भाषा दुरूह भी हो गई है। इन्होंने उर्दू, अंग्रेजी आदि के शब्दों का बेधड़क प्रयोग किया है।
  2. शैली निराला जी एक और कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति में सिद्धहस्त हैं, तो दूसरी ओर कतर एवं प्रचण्ड भावों की व्यंजना में भी। दार्शनिक एवं राष्ट्रीय विचारों की अभिव्यक्ति सरल एवं मुहावरेदार शैली में हुई है। शैली में प्रयोगधर्मिता अनेक जगह दिखती है।।
  3. छन्द योजना अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए निराला जी ने प्रायः मुक्त छन्द का प्रयोग किया। इन्होंने अपनी रचना क्षमता से यह सिद्ध कर दिया कि छन्दों का बन्धन व्यर्थ है। इन्होंने मुक्त छन्द की नूतन परम्परा को स्थापित किया।
  4. अलंकार योजना अलंकारों को काव्य का साधन मानते हुए इन्होंने अनुपास, यमक, उपमा, रूपक, सन्देह आदि अलंकारों का सफल प्रयोग किया। नवीन अलंकारों में मानवीकरण, ध्वन्यर्थ-व्यंजना, विशेषण-विपर्यय आदि की सार्थक योजना प्रस्तुत की।

हिन्दी साहित्य में स्थान
निराला जी बहुमुखी प्रतिभासम्पन्न कलाकार थे। ये छायावाद के प्रतिनिधि कवि हैं। इन्होंने देश के सांस्कृतिक पतन की और खुलकर संकेत किया। हिन्दी काव्य को नूतन पदावली और नूतन छन्द देकर इन्होंने बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इनके द्वारा रचित छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता की रचनाएँ हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं।

पद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-पत्र में पद्य भाग से दो पद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर: देने होंगे।

बादल राग

प्रश्न 1.
झूम-झूम मृदु गरज-गरज घन घोर!
राग-अमर! अम्बर में भर निज रोर!
झर झर झर निर्झर-गिरि-सर में,
घर, मरु तरु-मर्मर, सागर में,
सरित-तड़ित-गति-चकित पवन में
मन में, विजन-गहन कानन में,
आनन-आनन में, रव घोर कठोर—
राग–अमर! अम्बर में भर निज रोर!
अरे वर्ष के हर्ष!
बरस तू बरस-बरस रसधार!
पार ले चल तू मुझको
बहा, दिखा मुझको भी निज
गर्जन-भैरव-संसार!

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश के शीर्षक तथा कवि का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश ‘बादल-रोग’ कविता से उद्धृत है तथा इसके कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ हैं।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने बादल के किस रूप का वर्णन किया है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने बादल के लोक कल्याणकारी रूप का वर्णन किया है। कवि ने बादलों से बरसकर सम्पूर्ण प्रकृति को कोमलता एवं गम्भीरता से भर देने का आग्रह किया है तथा उनसे सृष्टि को नवीन शक्ति प्रदान करने की अपेक्षा की हैं।

(iii) “पार ले चल तू मुझको’, ‘बहा दिखा मुझको भी निज” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवि बादलों से इतना अधिक बरसने के लिए कह रहा है कि वह भी उसके साथ बह चले। फलस्वरूप इस भीषण संसार में जगत् के उस पार पहुँचकर मैं भी तुम्हारे गर्जना भरे उस संसार को देखें जिसे भयावह कहा गया है। तुम बरसकर मेरे अस्तित्व को अपने में विलीन कर दो।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने बादलों से क्या आह्वान किया हैं?
उत्तर:
कवि ने बादलों से आह्वान करते हुए कहा है कि तुम मन्द मन्द झूमते हुए अपनी घनघोर गर्जना से सम्पूर्ण वातावरण को भर दो। अपने शौर से आकाश में एक ऐसा संगीत छोड़ दो, जो अमर हो जाए।

(v) ‘निर्भर’ और ‘संसार’ शब्द में से उपसर्ग शब्दांश छाँटकर लिखिए।
उत्तर:
निर्झर-निर् (उपसर्ग)
संसार–सम् (उपसर्ग)

सन्ध्या सुन्दरी

प्रश्न 2.
दिवसावसान का समय मेघमय आसमान से उतर रही है
वह सन्ध्या -सुन्दरी परी-सी धीरे धीरे धीरे।
तिमिरांचल में चंचलता का नहीं कहीं आभास,
मधुर-मधुर हैं दोनों उसके अधर,
किन्तु जरा गम्भीर, नहीं है उनमें हास-विलास।
हँसता है तो केवल तारा एक
गुंथा हुआ उन घंघराले काले काले बालों से
हृदयराज्य की रानी का वह करता हैं अभिषेक।
अलसता की-सी लता किन्तु कोमलती की वह कली
सखी नीरवता के कन्धे पर डाले बाँह,
छाँह-सी अम्बर पथ से चली।
नहीं बजती उसके हाथों से कोई वीणा,
नहीं होता कोई अनुराग-रोग-आलाप,
नूपुरों में भी रुनझुन-रुनझुन नहीं,
सिर्फ एक अव्यक्त शब्द-सा “चुप, चुप, चुप
है गूंज रहा सब कहीं—

उपरोक्त पद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर: दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश के शीर्ष तथा कवि का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश ‘सन्ध्या-सुन्दरी’ कविता से उद्धृत है तथा इसके कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’ हैं।

(ii) सन्ध्यारूपी सुन्दरी का चित्रण कवि ने कैसे किया हैं?
उत्तर:
सन्ध्यारुपी सुन्दरी का चित्रण कवि ने इस प्रकार किया है कि सन्यारूपी सुन्दरी के अधराधरं मधुर हैं, किन्तु उसकी मुखमुद्रा गम्भीर है। उसमें प्रसन्नता को व्यक्त करने वाली चेष्टाओं का अभाव है। सन्ध्या के समय सुन्दरी के काले होते बालों में गुँथा एक तारा है। वह उसके सौन्दर्य को और अधिक बढ़ा देता है। इसी प्रकार कवि ने सन्ध्यारूपी सुन्दरी का मनोहारी चित्रण किया हैं।

(iii) प्रस्तुत पद्यांश में गूंथा हुआ तारा’ किसका प्रतीक है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में ‘गूंथा हुआ तारा’ सन्ध्या सुन्दरी के बालों में सुशोभित है जो ऐसा प्रतीत हो रहा है, मानो वह अपने हृदय-राज्य की रानी का अभिषेक कर रहा हो।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने सन्ध्या सुन्दरी को किसके समान बताया है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने सन्ध्या-सुन्दरी को आलस्य के समान बताया है, फिर भी वह कोमलता की कली है अर्थात् आलस्य विद्यमान होते हुए भी उसमें कोमलता का गुण विद्यमान है।

(v) “किन्तु कोमलता की वह कली।” पंक्ति में कौन सा अलंकार है?
उत्तर:
“किन्तु कोमलता की वह कली’ पंक्ति में ‘क’ वर्ण की आवृत्ति होने के कारण यहाँ अनुप्रास अलंकार है।

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UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 11 एकाकी तथा संयुक्त परिवार के सम्बन्धों का मनोविज्ञान

UP Board Solutions for Class 12  Home Science Chapter 11 एकाकी तथा संयुक्त परिवार के सम्बन्धों का मनोविज्ञान are part of UP Board Solutions for Class 12  Home Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 12  Home Science Chapter 11 एकाकी तथा संयुक्त परिवार के सम्बन्धों का मनोविज्ञान.

Board UP Board
Class Class 12
Subject Home Science
Chapter Chapter 11
Chapter Name एकाकी तथा संयुक्त परिवार के
सम्बन्धों का मनोविज्ञान
Number of Questions Solved 31
Categorie UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 11 एकाकी तथा संयुक्त परिवार के सम्बन्धों का मनोविज्ञान

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
परिवार का लक्षण है 
(2018)
(a) सदस्यों का एक सम्बन्ध से जुड़े होना
(b) सदस्यों का एक ही गाँव का होना
(c) सदस्यों को आपस में मित्र होना
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(a) सदस्यों का एक सम्बन्ध से जुड़े होना

प्रश्न 2.
एकाकी परिवार में पाई जाती है 
(2013)
(a) दो पीदियों

(b) तीन पीदियों
(c) तीन से अधिक पवियाँ हैं।
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) दो पौड़यो। 

प्रश्न 3.
एकल (एकाकी) परिवार में (2008, 11, 17)
(a) केवल ए मत होता है।
(b) पति-नी के रिश्तेदार भी होते हैं।
(c) केवल प-िपत्नी होते हैं।
(d) पति-नी और उनके अविवाति मध्ये होते हैं।
उत्तर:
(d) पति-पत्नी और उनके अविवाहित बने होते हैं।

प्रश्न 4.
संयुक्त परिवार में
(a) यह एक व्यक्ति होता है।
(b) पति-पत्नी और उनके बचे होते हैं।
(c) कई पीढ़ियों के लोग एक साथ रहते हैं
(d) परोक्त सभी
उत्तर:
(c) कई पीढ़ियों के लोग एक साथ रहते हैं।

प्रश्न 5.
“संयुक्त परिवार की भावना बड़ी मज़बूत है।” यह कथन है (2010)
(a) टीबी, बॉटमोर
(b) के. एस. कपाडिया
(c) डॉ. आई.पी. देसाई
(d) श्यामाचरण दुवै 4.
अत्तर:
(c) डॉ. आई.पो. देसाई

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से कौन-सी विशेषता संयुक्त परिवार की नहीं है? (2010)
(a) सामान्य निवास तथा सामान्य रसोईघर
(b) व्यक्तिगत स्वतन्त्रता अवा आरमनिर्भरता के प्रौसाहन के लिए। अवसर है।
(c) परिवार के सभी सदस्यों का अति धन एवसाय ए होता है।
(d) पारस्परिक अधिकार और कर्तव्य
उत्तर:
(b) व्यक्तिगत स्वतन्त्रता अथवा आत्मनिर्भरता के प्रोत्साहन के 
लिए अगर है।

प्रश्न 7.
पारिवारिक संरचना में होने वाले परिवर्तन हैं। (2018)
(a) संयुक्त परिवार का विघटन ।
(a) परिवार का आकार छोटा होना।
(c) परिवार के पारम्परिक कार्यों में कमी
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
एकाळी परिवार का क्या आशय है? (2007, 17)
उत्तर:
पति-पत्नी तथा उनके अविवाहित बच्चों के योग से बनने जाले परिणार को एकाको परिवार कहते हैं। लोवी के अनुसार, “एकाको परिवार में प्रत्येक पति-पानी और अपरिपक्व आयु के बच्चे समुदाय के शेष लोगों से अलग एक इकाई का निर्माण करते हैं।”

प्रश्न 2.
एकाकी परिवार की दो विशेषताएँ लिखिए। 
(2015)
उत्तर:
एकाको परिवार की दो विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

  1. परिवार का छोटा आकार
  2. निजी सम्पत्ति की अवधारणा

प्रश्न 3.
एकाकी परिवार के पाँच दोष लिखिए। 
(2014)
धनी एकाकी परिवार से होने वाली दो हानियाँ लिखिए। (2016)
उत्तर:
एकाको परिवार की हानि एवं दोष निम्नलिखित हैं।

  • कार्यक्षमता में कमी
  • नन्हें शिशुओं की समस्या
  • बच्चों में अनुशासनहीनता का विकास।
  • नौकरों पर निर्भरता का बढ़ना
  • स्वयं की भावना का विकास

प्रश्न 4.
संयुक्त परिवार प्रणाली से क्या अभिप्राय है? (2017)
अथवा
संयुक्त परिवार से क्या आशय है? (2006)
उत्तर:
संयुक्त परिवार प्रणाली से तात्पर्य, एक ऐसी पारिवारिक व्यवस्था से हैं, जिसमें निकट के रिश्तेदारों को शामिल किया जाता है (दादा-दादी, चाचा-चाची इत्यादि) तथा जिसमें सम्पत्ति, वास, अषकारों एवं कर्तव्यों का 
समिति रूप से समावेश होता है।

प्रश्न 5.
संयुक्त परिवार की चार प्रमुख विशेषताओं को बताइए। (2008)
उत्तर:
संयुक्त परिवार की प्रमुख चार विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

  • परिवार का बड़ा आकार
  • सामान्य नियम
  • सम्मिलित सम्पत्ति में आय
  • कर्ता का सर्वोच्च स्थान

प्रश्न 6.
संयुक्त परिवार के क्या लाभ है? है (2004, 14)
उत्तर:
संयुक्त परिवार में सभी सदस्यों को सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त अनेक प्रकार की सुविधाएँ; जैसे–मनोरंजन का उत्तम साधन, श्रम विभाजन, सामान्य हितों की रक्षा इत्यादि प्राप्त होती हैं।

प्रश्न 7.
संयुक्त परिवार में स्त्रियों की स्थिति का उल्लेख कीजिए। (2009)
उत्तर:
संयुक्त परिवार में स्त्रियों को दशा बहुत दयनीय होती हैं। इस व्यवस्था में स्त्रियों को अपने व्यक्तित्व के विकास का कोई असर नहीं मिलता तथा उनके जोवन का प्रमुख लक्ष्य सन्तानोत्पति एवं पूरे दिन रसोई में व्यतीत करना हो जाता है, इसमें स्त्रियों को अपनी इच्छाओं का दमन करना पड़ता है। इस प्रकार इस व्यवस्था में उनका जीवन लगभग नौरस हो जाता है।

प्रश्न 8.
संयुक्त परिवार में वृद्धजनों (दादा-दादी के मनोवैज्ञानिक सम्बन्धों 
पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
संयुक्त परिवार में वृक्ष जन अपनी उपयोगिता को सुनिश्चित करते हुए अपनी सत्ता को सुरक्षित रखना चाहते हैं। दूसरी ओर ये परिवार के अन्य सदस्यों से स्नेह एवं समन प्राप्ति की आकांक्षा भी रखते हैं। परिवार के छोटे बच्चे दादा-दादी के संरक्षण में समाजीकरण की प्रक्रिया से गुजरते हैं यद्यपि दादा-दादी 
का अधिक लाड़-प्यार उनके विकास को प्रभावित भी करता है।

प्रश्न 9.
संयुक्त परिवार में प्राचीन एवं नवीन मूल्यों में संघर्ष की सम्भावना 
विद्यमान रहती है, स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
संयुक्त परिवार में सामान्यतः तीन अथवा तीन से अधिक पोटो के सदस्य एकसाथ वास करते हैं। ऐसी स्थिति में पीडी-अन्तराल के कारण प्राचीन एवं नवोन मूल्यों में संघर्ष विकसित होना स्वाभाविक परिणाम है। आवश्यक है कि पुरानी एवं नवीन दोनों पीढ़ी के सदस्य परस्पर बातचीत करें एवं आपस के पौड़ी अनाराल को समझने की कोशिश करे।

लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1.
परिवार की चार विशेषताएँ लिखिए 
(2018)
उत्तर:
मैकाइवर एवं पेश ने परिवार की निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख लिया है।

  1. सार्वभौमिकता परिवार की उपस्थिति सार्वभौमिक होती है, अत् शहर हों, म ग हो; यह सभी जगह उपस्थित होता है और प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी परिवार का सदस्य होता है।
  2. सीमित और बड़ा आकार परिवार सीमित आकार या बड़े आकार का भी हो सकता है अर्थात परिवार में दो पी मों के सदस्य भी हो सकते है और तौन-या-तीन से अधिक पीढ़ियों के सदस्य भी हो सकते हैं।
  3. भावात्मक आधार परिवार के सदस्य परस्पर भावात्मक बन्धनों से बँधे होते हैं। परिवार में प्रेम, त्याग, सहयोग, दया तथा बलिदान आदि की भावनाएँ विद्यमान रहती हैं।
  4. सदस्यों का उत्तरदायित्व प्रत्येक परिवार अपने-अपने सदस्यों से कुछ उत्तरदायित्व निभाने की अपेक्षा रखता है। संकट के समय प्रत्येक सदस्य परिवार के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने को तत्पर रहता है।

प्रश्न 2.
एकाकी परिवार के क्या लाभ हैं? 
(2005, 06, 13, 13, 18)
उत्तर:
सामान्य रूप से एकाको परिवार में केवल दो पीढ़ियों के सदस्य पाए जाते है अर्थात् पति-पत्नी एवं उनके अविवाहित बच्चे ही एकाकी परिवार का निर्माण करते हैं। 
एकाकी परिवार के लाभ एकाकी परिवार के साथ या विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

  1. पति-पत्नी संयुक्त रूप से परिवार का संचालन करते हैं। इसमें पति-पत्नी को अपनी गृङ्गस्थी को संचालित करने की पूर्ण स्वतन्त्रता रहती हैं।
  2. सभी प्रकार के रिश्तेदारों व सम्बन्धियों में एकाको परिवार के प्रति सहानुभूति का व्यवहार रहता है। सम्बन्धियों के साथ प्रेमपूर्ण सम्बन्ध होता है।
  3. एकाको परिवार में पति-पत्नी अपनी सन्तान को समुचित शिक्षा का प्रबन्ध करते हैं तथा उनके उज्ज्वल भविष्य हेतु सदैव प्रयासरत् रहते हैं। अतः बच्चों के व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास होता है।
  4. एकाको परिवार में स्त्रियों की स्थिति मजबूत होती है। एक ही स्त्री होने के | कारण कोई भी एकाही परिवार में इसकी अवहेलना नहीं कर सकता। पत्नी द्वारा पिक सहायता करना भी सम्भव होता है।
  5. एकाको परिवार में पारिवारिक गोपनीयता बनी रहती है।
  6. एकाकी परिसर में प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास सही प्रकार से होता है। परिवार का आकार छोटा होने के कारण शोषण व फतह का पूर्णतः अभाव होता है।
  7. एकाकी परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने-अपने कार्य को पूर्ण उत्तरदायित्व के अनुसार का है, जिससे भालस्य और कामचोरी की भावना विकसित नहीं हो पाती।

प्रश्न 3.
एकाकी परिवार में कौन-कौन सी व्यावहारिक कठिनाइयाँ उपस्थित होती हैं? (2006, 17)
उत्तर:
एकाकी परिवार की कुछ नयाँ व कठिनाइयों निम्नलिखित हैं

  1. नन्हें शिशुओं की समस्या ज्यादातर एकाकी परिवार में पति-पत्नी दोनों नौकरी करते हैं, ऐसे में नन्हें शिशुओं को कहाँ छोड़ा जाए, यह एक बहुत बड़ी समस्या होती है।
  2. कार्यक्षमता में कमी एकाको परिवार में सदस्यों की सागा कम होती है। यदि पत्नी नौकरी करती है, जो थर का सारा कार्य भी जो करना पड़ता है। अतः उसकी कार्यक्षमता में कमी आ जाती है।
  3. नौकरों पर निर्भरता पति-पत्नी दोनों को नौकरी करने के कारण प्रायः उन्हें | नौकरों पर निर्भर रहना पड़ता हैं। नौकर पर विश्वास करना कभी-कभी पाकि भी हो जाता है। अत: पति-पत्नी दोनों मानसिक परेशानी में रहते है।
  4. बच्चों में अनुशासनहीनता पति फनी दोनों के नौकरी पर चले जाने के कारण बच्चों के क्रियाकलापों की देखभाल करने के लिए घर पर कोई नहीं होता, इसलिए कभी-कभी उनमें बुरी आदतें भी जम ले लेती हैं। अतः बच्चे अनुशासनहीन हो जाते हैं। बच्चे एकता की भावना से ग्रसित हो जाते हैं।
  5. स्वार्थ की भावना का विकास एकाकी परिवार में पति पत्नी केवल अपने बारे में सोचते हैं। अत: उनमें स्वार्थ की भावना बढ़ती जाती है। वृद्ध माता-पिता तथा भाई बहन के लिए कार्य करने का उन्हें अक्सर ही नहीं मिल पाता। अतः ये स्वार्थी व निष्ठुर हो जाते हैं।
  6. उचित निर्देशन एवं परामर्श का अभाव एकाकी परिवार के सदस्यों को दादा-दादी एवं अन्य बुजुर्ग सदस्यों का उचित निर्देशन एवं परामर्श उपलब्ध नहीं हो पाता है। इस प्रकार वे बुजुर्ग सदस्यों के जीवन के अनुभवों का लाभ नहीं उठा पाते हैं।
  7. व्यय साध्य एकाकी परिवार के आय के स्रोत सीमित होते हैं, जबकि उन्हें समस्त संसाधनों को व्यय प्रबन्धन बिना किसी सहायता के स्वयं करना

प्रश्न 4.
संयुक्त परिवार के विघटन के दो मुख्य कार्य लिखिए। (2018)
उत्तर:
संयुक्त परिवार के विघटन के दो कार्य निम्न प्रकार हैं
1. स्त्रियों में आन्तरिक कलह संयुक्त परिवार की स्त्रियों में आपस में कलह 
परिवार के लिए हानिकारक होता है। संयुक्त परिवार में झगड़े तथा मानसिक इह एवं संघर्ष छोटी-छोटी बातों पर चलते राहते हैं, जो आगे चलकर एक समस्या का रूप धारण कर लेते हैं। जिससे पूरे परिवार तथा बच्चों पर बुरा प्रभव पता है, इससे बचने के लिए अनेक दम्पति अपना एक अलग एकाकी परिवार बस्सा लेते हैं।

2. व्यावसायिक विजातीयता 20वीं शताब्दी में भारतीय समाज को परिवर्तित करने वाले अनेक सामाजिक आर्थिक क्रियाओं के फलस्वरूप नए-नए व्यवसाय व रोजगारों के वक्त आने से लोग इन गामाया अशा अवसरों को ओर आकर्षित हुए हैं। संयुक्त परिवार के सदस्य भी परम्परागत व्यवसाय को इछोड़कर नए साय अपनाने लगे हैं। इसके परिणामस्वरुप संयुका परिवारों के विघटन को प्रक्रिया तेज हुई हैं।

प्रश्न 5
“आधुनिक युग में संयुक्त परिवार लुप्त होता जा रहा है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए। 
(2016)
उत्तर:
औद्योगीकरण के इस युग में संयुक्त परिवार व्यक्ति या समाज की माँगों को पूर्णरूप से सना नहीं कर पा रहा है, इसलिए मशः संयुमा परिवार का या तो विघटन ही होता जा रहा है या फिर इसके स्वरूप में अत्यधिक पस्मि स्वीकार किए जा रहे हैं। संयुक्त परिवार के लुप्त होते जाने की पुष्टि के समर्थन में निम्नलिखित कारणों को प्रस्तुत किया जा सकता है। प्रथमत: औद्योगीकरण एवं नगरीकरण की प्रक्रियाओं में रोगों के कारण गाँव के लोगों में नगरों की ओर प्रवसन करने की प्रवृत्ति में वृद्धि हुई है। अतः क्षेत्रीय गतिशीलता में वृद्धि के परिणामस्वरूप संयुक्त परिवार का विघटन स्वाभाविक हो जाता है।

उल्लेखनीय है कि संयुक्त परिवार समष्टिवादिता की धारणा पर आधारित होते हैं, परन्तु आणुनिक भौतिकवादी युग में सामूहिकता के स्थान पर व्यक्तिवादिता का अधिक बोलबाला हो गया है। इसके अतिरिक्त पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति के प्रभाव से उन लोगों का झुकाव कर्तव्यों की ओर न होका अधिकारों की ओर है। इन नवीन मूल्यों के प्रभाव र संयुक्त परिवार का महत्त्व कम हो रहा है।

इसके अतिरिक्त कमान आधुनिक तकनीकी युग में नए-नए व्यवसायों व रोजगारों को सावनाओं का विस्तार भी है। संयुक्त परिवार के सदस्य भी परम्परागत व्यवसाय को छोड़कर नए व्यवसाय अपनाने लगे हैं। इसके परिणामस्वरूप संयुक्त परिवारों में घिरन की प्रक्रिया तेज हुई है। संयुक्त परिवार में अधिक सदस्यों के निर्वहन का बोझ भी छोटे या बड़े सदस्यों को जविकोपार्जन के लिए नए व्यवसाय खोजने हेतु प्रेरित करता है। फलत: परम्परागत व्यवसाय की भिन्तरता बाधित होती है।

इसके अतिरिक्त वर्तमान आधुनिक युग में नए कानूनों; जैसे हिन्दू स्त्रियों का सम्मति अधिकार अनियम आदि के प्रभाव के कारण भी संयुक्त परिवार के विघटन की प्रक्रिया भी हुई है। दूसरी ओर वर्तमान आधुनिक समाज में उद्भूत नवीन सामाजिक संस्थाओं के संयुक्त परिवार द्वारा सम्पादित काय के लिए नए विकल्प प्रस्तुत किए हैं। अतः संयुक्त परिवार का महत्व एवं आवश्यकता दिन प्रतिदिन घटती जा रही है।

प्रश्न 6.
संयुक्त परिवार के अस्तित्व को बचाने के लिए सुझाव दीजिए। 
(2013)
उत्तर:
वर्तमान परिवतियों में संयुक्त परिवार के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए व्यावहारिक सुझाव निम्नलिखित है।

  1. संयुक्त पीवार में सभी स्त्रियों को विशेष रूप से पुत्र-वधुओं को समुचित सम्मान प्रदान किया जाना चाहिए।
  2. परिवार के मुखिया को अधिक उदार तथा न्यायप्रिय होना चाहिए।
  3. संयुक्त परिवार में मारपती एवं योग्य व्यक्तियों को अधिक सम्मान एवं सुविधा प्रदान की जानी चाहिए।
  4. संयुक्त परिवार में सभी सदस्यों के लिए आवास की आवश्यक सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए।
  5. संयुक्त परिवार में प्रत्येक सदस्य को अपने कर्तव्यों तथा अन्य सदस्यों के अपकारों के प्रति आगरूक होना चाहिए।

प्रश्न 7.
एकावी परिवार के सम्बन्धों के मनोविज्ञान पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उत्तर:
एकाकी परिवार में सदस्यों के मनोवैज्ञानिक सम्बन्धों की दृष्टि से निम्नलिखित तथ्य महत्त्वपूर्ण हैं।

1. बच्चों- का मनोवैज्ञानिक सम्वन्य एकाकी परिवार में बच्चे अपनी मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं; जैसे-स्नेह, ममता, सुरक्षा आदि की पूर्ति हेतु पूर्णत: माता-पिता पर निर्भर रहते हैं। माता-पिता को व्यस्तता अथवा अन्य किसी कारण। इन आवश्यकताओं की पूर्ति न होने पर बच्चों के व्यक्तित्व का उचित विकास नहीं हो पाता है।

2. पति- पत्नी का मनोवैज्ञानिक सम्बन्ध एकाही परिवार में पति-पत्नी को भूमिका गाढ़ी के दो पहिए के समान होती है। अत: जीवन के सुचारु संचालन के लिए इनमें परस्पर सामंजस्य एवं सनसन स्थापित होना अति आवश्यक है। किसी एक में भी सवोच्चता का भाव, परिवार को विटित करने की क्षमता रखता है। आवश्यक है कि पति-पत्नी में परस्पर विश्वास हो, दोनों एक-दूसरे की सुरक्षा एवं प्रतिष्ठा के प्रति संवेदनशील हो और * दोनों एक-दूसरे को भूमिका के महत्व को समझें।

3. माता- पिता एवं पुत्र/पुत्री का मनोवैज्ञानिक सम्बन्ध बाल्यावस्था तक सन्तान माता के संरक्षण में अधिक रहती हैं, किन्तु इसके पश्चात् की। अवस्था में पुत्र, पिता के मार्गदर्शन में स्वयं को अधिक सुरक्षित महसूस करता है। पिता भी पुत्र को अपना सहयोगी मानते हैं एवं उसके भावी जीवन को निर्देशित करते हैं। दूसरी ओर पुत्रियां माता के ऑपक नगदक होती है। एवं माता के साथ प्रई, कोमल व ममतापूर्ण सम्बन्ध विकसित करती हैं। पुत्रियों के पराया धन होने की भावना भी माता में उनके प्रति विशेष लगाव उत्पन्न करती है। वस्तुतः माता एवं पुत्री के मध्य मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध एक आदर्श स्थिति को इंगित करते हैं। एकाकी परिवार का अस्तित्व उपरोक्त वर्णित मनोवैज्ञानिक बन्यों की गहन समझ पा निर्भर करता है। इनकी समझ के अभाव में पारिवारिक सम्बन्धों में तनाव ापन होने की सम्भावना चत तो है

प्रश्न 8.
सास-बहू के सम्बन्ध में संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2008)
अशा बहू के सुखद वैवाहिक जीवन में सास की क्या भूमिका है? 
(2005, 09, 10, 16)
उत्तर:
बहू के सुखद वैवक जीवन में सास की भूमिका अत्यन्त निर्णायक होती है, चूंकि पी के घर में आने पर बहू का सर्वाधिक काम मास में ही पड़ता है, इसलिए इन दोनों के शवों में सौहार्द्रता होनी अतिभाश्यक है। चूक सास घर में बड़ी और ज्यादा अनुभव हो है, इसलिए उन्हें बड़ी सूझ बूझ व दायित्वपूर्ण वेग से व्यवहार करना चाहिए तथा बहू को की भी बात समझाते हुए मपुर एवं स्नेहपूर्ण ढंग से व्यवहार करना चाहिए। इससे बहू को नए परिवार में अनुकूलन करने या उलने में मदद मिलती है। दूसरी ओर बहू को सास के प्रति माता का भाव रखना चाहिए, उन्हें आदर-सम्मान तथा स्नेह देना चाहिए, इससे सास बहू के रिश्तों में मधुरता आएगी और बहू का वैवाहिक जीवन सुखद होने के साथ ही परिवार का वातावरण भी शान्तिपूर्ण व खुशहाल होगा, साथ ही सास-बहू के समय अड़े होने से बहू का अपने पति से भी रिता मजबुत होगा।

प्रश्न 9.
संयुक्त परिवार तथा एकाकी परिवार में अन्तर स्पष्ट कीजिए। 
(2005, 17, 18)
उत्तर:
संयुक्त परिवार एवं एकाकी परिवार में अन्तर निम्नलिखित हैं
UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 11 एकाकी तथा संयुक्त परिवार के सम्बन्धों का मनोविज्ञान 1
UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 11 एकाकी तथा संयुक्त परिवार के सम्बन्धों का मनोविज्ञान 2

प्रश्न 10.
समाज व परिवार को कोर्ट परिवार से क्या लाभ हैं? (2017)
उत्तर:
भारतीय विचारधारा के अनुसार प्राचीनकाल से पारिवारिक संस्था का अत्यधिक महत्त्व रहा है। यह समाज को एक महत्वपूर्ण इकाई मानी जाती है, जो समाज के स्थायित्व, वृद्धि और अत्रि का प्रमुख आधार है। मैकावर और पेज ने परिवार को समाज की सबसे महत्वपूर्ण संस्था माना। बड़ा परिवार होने पर इसमें कई प्रकार की कठिनाई आप्त रहती है। यहाँ आमदनी कम तथा खर्च अधिक होते हैं। इसके विपरीत छोटा परिवार सौमित आवश्यकताओं वाला होता है तथा इसके सदस्य भी सीमित होते हैं।

इनकी आवश्यकताएँ छोट एवं कम् खर्च वाली होती हैं, क्योंकि इस परिवार की आय भी कम होती हैं। संख्या के सीमित रहने पर एक एक आवश्यकताओं को ठीक से पूर्ण किया जाता है। इस लाह के परिवारों में एक रोती है, जिसका कारण पापा एक-दूसरे के सुख बाँटना, उसे समझना और उसमें हाथ बँटाना शामिल होता है। छोटे परिवारों में जीवन को मूल आवश्यकताएँ रोटी, कपड़ा और मकान की समस्याएँ इतनी ची नहीं होती हैं, जिनमें बड़े परिवारों को। अतः समाव व परिवार की दृष्टि से बड़े परिवार की तुलना में छोटे परिवार श्रेष्ठ है।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)

प्रश्न 1.
संयुक्त परिवार की विशेषताएँ लिखिए। (2014, 17)
उत्तर:

संयुक्त परिवार का तात्पर्य

भारतीय समाज में पारम्परिक रूप से पाए जाने वाले परिवारों को समाजशास्त्रीय भाषा में ‘संयुक्त परिवार’ कहा जाता है। संयुक्त परिवार प्रत्यक्ष वा परोक्ष रूप से परस्पर सम्बन्धित भिभिन्न गीवियों (सामान्य रूप से तीन या उससे अधिक) के सदस्यों का एक प्रामक समूह है, जिसके सदस्य समान्य आम व्यय में योगदान देते हैं। एक धर्म के अनुयायी बनकर सामान्यतः एकसाथ निवास संयुक्त परिवार की विशेषताएँ संयुक्त परिवार की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित है।

1. परिवार का बड़ा आकार संयुक्तपरिवार में सामान्यतः न या तीन से अधिक जोड़ो के सदस्य एकसाथ रहते फलस्वरूप संयुक्त परिवार का आकार वृहद् होना इसकी आधारभूत है। इस परिवार में सामान्यत: 20 से 25 सदस्य होते हैं।

2. सामान्य निवास स्थान संयुक्त 
परिवार में तीन या तीन से अधिक कि निरन्तरता पीढ़ी के लोगों का एक घर होता है। यदि कोई सदस्य या परिवार भ्रमण, नौकरी, शिक्षा या अन्य किसी काण से दूर में रहता है, भी उसे उसी सामान्य निवास का सदस्य माना जाता है। इस परिवार के सदस्य एक ही मकान में रहते हैं।

3. निश्चित संरचना भारतीय संयुक्त परिवारों में परिवार के सभी सदस्यों की एक प्रकार से निश्चित संरचना होती है। इस संरचना के अन्तर्गत परिवार के मुनगा या स्। का रान निश्चित होता है। कर्ता को उसकी स्थिति के अनुसार ही अधिकारों का प्रयोग एवं कर्तव्यों का पालन करना पड़ता हैं। दूसरे स्थान पर उसकी स्त्री होती है, तीसरे स्थान पर परिवार के सभी भाई एवं लड़के होते हैं, चौथे स्थान पर परिवार की सभी स्त्रिों आती हैं।

4.धार्मिक आधार संयुक्त परिवार में सभी कार्य पार्मिक विचारों को ध्यान में रखकर किए जाते हैं; जैसे-कर्मकाण्डों से सम्बन्ध रखने से कार्य, त्यौहारों को मनाना एवं प्रत इत्यादि रखना। सामूहिक पृ-पाठ करना भी संयुक्त परिवार की एक प्रमुख विशेषता है।

5. आर्थिक स्थिरता संयुक्त परिवार में सभी सदस्यों द्वारा अर्जित धन एक ही कोष में एकत्र होने और सभी सदस्यों के लिए सामान्य रूप से आवश्यकतानुसार व्यय होने के कारण परिवार की आर्थिक स्माित धक दयनीय नहीं होतो, क्योकि कर्ता या गृहपति सयो धक आयु वाला व्यक्ति होता है। अतः यह पैसा सोच-समझकर ही सर्व करता है।

6. सामान्य सम्पत्ति संयुक्त परिवार के अन्तर्गत परिका को सम्पति का व्यक्तिगत उपग या लाभ न होकर परिवार के सभी सदस्यों के लिए उपग एवं लाभ होता है। परिवार की सम्पूर्ण सापशि पर संयुक्त अधिकार होता है।

7. सदस्यों की सुरक्षा ऐसा देखा जाता है कि एकाकी परिवार में कम सदस्य होते हैं। यदि उनमें से कोई सदस्य बीमार हो जाता है अथवा कहीं चला आता है, तो परिवार के कार्यों में बाधा ही हो जाती है परन यदि परिवार संगत है, तो उसके अन्दर हम प्रकार की छोटी छोटी समस्याएं परिवार के कार्यों में कोई विशेष बाधक नहीं होती है।

8. सांस्कृतिक निरन्तरता संयुक्त परिवार में तीन या इससे अधिक पौड़ी के लोग रहते हैं। पुरानी पीढ़ी के लोगों द्वारा नई पीढ़ी के लोगों को सांस्कृतिक परम्पराओं को हस्ताक्षरित किया जाता है। भर के बुजुर्ग यति छोटे बच्चों को कहानियां सुनाकर, अपने धन के उदाहरण देकर, अपने साथियों के व्यवहारों एवं अनुभवों को बताकर इस कार्य को पूरा करते हैं। परिणामस्वरूप नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी के आचार-विचार, प्रथा, परम्पराएँ, धर्म और कर्म, हार इत्यादि को प्रहण काके अपने में आत्मसात् करती है, इससे सांस्कृतिक निरन्तरता बनी रहती हैं।

प्रश्न 2.
संयुक्त परिवार के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: 

संयुक्त परिवार के गुण

संयुक्त परिवार के गुण निम्नलिखित हैं।
1. बच्चों का उचित पालन-पोषण संयुक्त परिवार में छोटे-बड़े सभी प्रकार के सदस्य राहते हैं। वृद्ध व्यक्तियों को दोटे पत्थों के पालन पोषण का अधिक ध्यान राता है। यदि परिवार के अन्य सदस्य विभिन्न कार्यों में सलान राहते है, तो वृद्ध लोग बच्चों की देखभाल का कार्य संभाल लेते हैं।
2. सुरक्षा की भावना संयुक्त परिवार। 
के सदस्य आपस में प्रेम ए सहयोग के बयान में हैं, जिसके इति पालन पोषण कारण सभी सदस्य शारीरिक, सुरक्षा की भावना मन्तबज्ञानिक आर्थिक तथा सामाजिक सुरत का अनुभव करते हैं। मामूकता रै भवन विनाशमन में बधों, पण सामाजिक निम्। वृद्धों एवं विधाओं की भा के पारिकि वर्ष में बचाअम-विभाजन समस्या का इल स्वयं परिवार में ही भि अनुभव प्राप्त करने का हो जाता है।
3. मनोरंजन का साधन संयुक्त परिवार में छोटे-बड़े सभी तरह के सदस्य होते हैं। ये सभी सदस्य जब आपस में मैठकर विचार विनिमय तथा हँसी मजाक करते हैं, तो एक प्रकार से सभी लोगों का मनोरंजन होता है।
4. सामूहिकता की भावना संयुक्त परिवार में सभी सदस्यों के साथ में रहने, आपस में विचार-विमर्श करने, उठने-बैठने इत्यादि कार्यों से उनमें सामूहिक भावना का विकास होता है। इस भन्। से व्यक्ति में सुरक्षा की भाषा तथा धैर्य का विकास होता है। याही सामूहिकता को 
भावना परिवारवाद को बढ़ावा देती है।
5. सामाजिक नियन्त्रण संयुक्त परिवार में सामाजिक नियन्त्रण का कार्य 
परिवार के सदस्यों द्वारा ही किया जाता है। परिवार के सभी सदस्य एक-दूसरे से पारस्परिक कर्तव्य से बंधे रहते हैं, यही कारण है कि सभी सदस्य एक प्रकार से नियन्त्रित जोधा बताते हैं।
6. पारिवारिक मार्च में अस्रत संयुक्त परिवार में पारिवारिक खर्च भी संयुक्त होता है। पूरे परिवार के लिए आवश्यक वस्तुएँ एक साथ ही खरीदी जाती हैं। एकसाथ काफी मात्रा में पाएं खरीदने पर अपेक्षाकृत गरी मिलती है। इसके अतिरिक्त एकसाथ संयुक्त परिवार बसाकर रहने की स्थिति में बहुत-से खर्च एक ही जगह होते हैं, जबकि एकाकी परिवारों में उतने ही खर्च अलग-अलगजगह होते हैं।
7. म-विभाग संयुक्त परिका के सभी सदस्य कार्य को आपस में बाँटकर 
करते हैं। संयुक्त परिवार का मुखिया, की या गृहस्वामी परीजा के सभी सदस्यों को उनकी योग्यता एवं क्षमताओं के अनुसार अलग-अलग कार्य सौंपता हैं। विभिन्न अनुभव करने का स्थान संयुक्त परिवार में व्यक्ति विभिन्न ऑक्तचों के सदस्यों के मध्य रहता है। इसके अतिरिका उसे विभिन्न आयु के लोगों के अनुभवों एवं विचारों को जानने का अवसर मिलता है। इस रूप में संयुक्त परिवार व्यक्ति को उसके आगामी जीवन के लिए तैयार करता है।

प्रश्न 3.
संयुक्त परिवार के मुख्य दोषों का उल्लेख कीजिए। (2006, 14)
उत्तर:
संयुक्त परिवार के दोष संयुका परिवार के दोष या हानिन निम्नलिखित हैं।

  1. वेग तथा कलह का केन्द्र संयुक्त परिवार कलई एवं द्वेष का केन्द्र होता है। यदि संयुक्त परिवार में कता अपने हित पर ध्यान देना प्रारम्भ कर दे, तब स्थिति और भी बिगड़ जाती है।
  2. स्त्रियों की सराब स्थिति संयुक्त। परिवार का एक दोष यह भी है कि संयुक्त परिवार के दोष इन परिवारों में स्त्रियों की दशा बहुत निन एवं दयनीय होती है। सुनान पति विशेषकर बधुओं को बहुत अधिक वर्ग या परम करना पता है। अधिक जानोत्पति उनको । एवं मनद के कोप। अकर्मण माने पात्र बनना पड़ता है। संयुक्त परिवार के पापा का व में आ स्वावलम्बन के के भय का वातावरण प्राप्त । हो पाने के कारण स्त्रियाँ भिक रिता सदैव दूसरों पर निर्भर रहती हैं।
  3. बुद्धि का अनुपयोगः संयुक्त परिवार में सभी सदस्य एक कता की आज्ञानुसार कार्य करते हैं। इस स्थिति में उन्हें अपनी बुद्धि का प्रयोग करने का अवसर प्राप्त नहीं होता, जब कोई व्यक्ति अपनी बुद्धि का प्रयोग नहीं करता, तो उसकी बुद्धि का कुण्ठित हो जाना स्वाभाविक हैं।
  4. अधिक सन्तानोत्पनि संयुक्त परिवार में जहाँ बाल विवाह को प्रोत्साहन मिलता है एवं विवादी जियारों को वर्चस्व प्राप्त होता है। वहीं पुत्र सनान की कामना को विशेष मात्र प्राप्त होता है। संयुक्त परिवार में परिवार की स्त्रियों भी यह सोचने लगती हैं कि जितने अधिक बच्चे पैदा किए जाएंगे, उतना ही अधिक उनको परिवार की सामान्य सम्पत्ति का भाग पैटधार के समय मिलेगा।
  5. अकर्मण्य व्यमियों की वृद्धि संयुक्त परिवार में परिवार के सभी सदस्यों के भरण-पोषण का दायित्व पूरी परिवार पर ही होता हैं। इस सुविधा का साथ जताकर का सदस्य अकर्मण्य, आलसी या निकम्मे। आते हैं। ये सदस्य बिना कुछ कार्य किए हैं। खाते-पीते तथा मौज करते हैं, इससे पूरे परिवार का जीवन-स्तर निम हो जाता है। साथ ही इससे आम अर्गन करने वालों में असन्तोष उत्पन्न होता है।
  6. गोपनीयता का अभाव संयुक्त परिबार में अधिक सदस्य होने के कारण नव-विवाहिती अथवा पति-पत्नी को एकान्त यांनीय स्वतन्त्रता उपलब्ध नहीं हो पाती है। अनेक अवसरों पर यह वचन परिपत्नी के बन्यो में कुण्ठा को जन्म देती है एवं उनके वैवाहिक जीवन को प्रभावित करती हैं।
  7. भय का वातावरण संयुक्त परिवारों में पवार के वृद्धजनों के संयों को ही प्रमुखता प्राप्त होती है। उनकी सहमति के बिना किसी नए विचार का अनुपालन परिवार में सम्पन्न नहीं होता है। अत: नई पी के सदस्यों में अपने नए रचनात्मक विचारों को आगे रखने का संकोच सर्द। विद्यमान रहता हैं।
  8. आर्थिक निर्भरता उल्लेखनीय है कि संयुक्त परिवारों में प्रायः सभी वयस्के सदस्य जीविकोपार्जन में संलग्न राहते हैं, किन्तु परिवार के आय-व्यय का ले-जोखा के परिवार के मुखिया के हाथों में रहता है। फलतः सभी सदस्यों को अपने जरूरतों को पूरा करने के लिए एक व्यक्ति पर निर्भर रहना पड़ता हे।

प्रश्न 4.
संयुक्त परिवार टूटने के क्या कारण है? (2006, 10)
अथवा
भारतीय समाज में संयुक्त परिवार के निरन्तर विघटन के 
कारणों को स्पष्ट कीजिए। इन VImp (2003, 04, 06, 11, 12)
अथवा
“संयुक्त परिवार का भविष्य उज्ज्वल नहीं है।” क्यों? (2016)
उत्तर:
संयुक्त परिवार के विघटन के कारण औद्योगीकरणा के इस युग में संयुक्त परिवार व्यक्किा एवं समाज को माँगों को पूर्ण रूप से मनुष्ट नहीं कर पा रहा है, इसलिए क्रमशः संयुक्त परिवार का या तो विघटन ही होता जा रहा है या फिर इसके स्वरूप में अत्यधिक परिवर्तन स्वीकार किए जा रहे हैं। संयुक्त परिवार के विघटन के निम्नलिखित कारण हैं।
1. औद्योगीकरण एवं नगरीकरण 
संयुका परिवार के विपरन् का प्रभाव औद्योगीकरण एवं नगरीकरन की प्रक्रियाओं में छोरीकरण एवं नगरीकरण व के कारण गाय के लोगों का प्रभाव में नगरों की ओर प्रवसन की शरदत्य पति का प्रभाव प्रवृत्ति में है। अव आमसवम एवं आत्मत्याग की कमी गांव के लोग नए रोजगार एवं प्रभात व्यावसायिक अवसरों के लिए उनमा वृद्धि का प्रय नगरों की ओर आकर्षित हुए नए कानूनों का प्रव हैं।

इन लोगों ने गांव के संयुक्त परिवार से आकर नगरों में अपने लिए मकान बना लिए हैं। तथा व्यवसाय भी खोना लिए हैं, परिणामस्वरूप संयुक्त परिवारों में अब पहले जैसी बात नहीं ह गई है। अनेक व्यक्ति अपने पारिवारिक व्यवसाय को छोड़कर अन्य व्यवसायों को अपने लगे हैं। अत: क्षेत्रीय गतिशीलता में वृद्धि हुई है, इसमें संयुक्त परिवार का विघटन स्वाभाविक हो जाता है।

2. पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव भारतीय संस्कृति के अनुसार, संयुक्त परिवारों में परिवार के सदस्यों के कर्तव्यों पर विशेष बल दिया जाता था, परन्तु वर्तमान स्थिति ठीक इसके विपरीत है। पश्चिमी सभ्यता एवं संस्कृति के प्रभाव से अब लोगों का झुकाव करियों की ओर न होकर अष्किारों की ओर है। पाश्चात्य दृष्टिकोण व्यक्तवादी है। अत: इस दृष्टिकोण के प्रबल होने की स्थिति में संयुक्त परिवार का महत्व घट रहा है।

3. आत्मसंयम एवं आत्मत्याग की कमी वर्तमान समय में लोगों में आत्मसंयम एवं आत्मत्याग । भाषा में कमी आई है या उनका एकदम से लोग ही होता चला जा रहा है। दूसरी ओर लोगों के निजी स्वार्थ एवं भौतिहाद तथा गतिवादिता की भावनाएं बड़ती जा रही है। इस कारण थोड़ी-सी परेशानी का संकट का अनुभव करते हैं। अब लोग संयुक्त परियार को छोड़कर एकाकी परिवार बसाने को तत्पर हो जाते हैं।

4. स्त्री-शिक्षा का प्रभाव आज की शिक्षित स्त्री अपने चारों और के ताबरण की जानकारी रखती है। वह संयुक्त परिसर के घुटन भरे जीवन को, जिसमें से कर्ता के निरंकुश शासन में रहना पड़ता है, अपने अधिकारों का हनन समझती हैं। ऐसी स्थिति में सभी आधुनिक वातावरण की चाह में संयुक्त परिशा की अपेक्षा एकाकी परिवार को अधिक पसन्द करती है।

5. जनसंख्या वृद्धि का प्रभाव जनसङ्ख्या में वृद्धि न केवल संयुक्त परिवारों के लिए ही भयानक परिणाम पैदा करने वाली है, अपितु कभी-कभी सम्पूर्ण समाज के लिए भी ऐसी समस्या बन जाती है, जिसका समाधान खोजना कठिन हो जाता हैं। 

संयुक्त परिवार का भविष्य

उपरोक्त कारणों के विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है कि संयुका परिवार को अवधारणा वर्तमान आधुनिक युग में संक्रमण के दौर से गुजर रही है। संयुक्त परिवार की मूलभूत विशेषताओं; जैसे–सामूहिक, सांस्कृतिक निरन्तरता आदि को आधुनिक युग की संकल्पनाएँ प्रभावित कर रही हैं। 

अत: संयुक्त परिवारों में विपटन की सम्भावनाएँ दृष्टिगोचर हो रही हैं। समकालीन सामाजिक संरचना में संयुक्त परिवार छिन-भिन्न होकर एकाकी परिशों का रूप ले रहे हैं। यद्यपि संयुक्त परिवार के भविष्य के विषय में दो विचारधाराएँ सामने आती हैं ।

  1. प्रथम विचारधारा संयुक्त परिवार के उज्ज्वल भविष्य के प्रति आशान्वित हैं। इसके समर्थक के, एम, कपाडिया है। उनके अनुसार, संयुक्त परिवार ने अभी तक जिस कमय समय को पार किया है, उसका भविष्य पुरा नहीं है। इसके अतिरिक्त हिन्दू मनोवृत्तियाँ आज भी संयुक्त परिवार के पक्ष में हैं।
  2. दूसरी विचारधारा संयुक्त परिवार के भविष्य को अन्धकारमय मानती है। इस विचारधारा के समक्षक कोलण्ड़ा के अनुसार अधिकांश भारत में संयुक्त परिवारों की संख्या प्रतिदिन कम होती जा रही है अर्घात् उनका विघटन हो निष्कर्ष जो भी हो, इतना तो हम कह सकते हैं कि वर्तमान परिस्थितियों में संयुक्त परियार के स्वरूप में परिवर्तन हो रहा है।

प्रश्न 5.
“परिवार समाजीकरण की प्रथम पाठशाला है” इस कथन को स्पष्ट कीजिए। 
(2018)
उत्तर:
समाजीकरण की प्रक्रिया बहुत जटिल प्रक्रिया है, जो बालक के विकास को प्रभावित करती है जिसका वर्णन निम्न प्रकार से हैं। परिवार का योगदान समाजीकरण की सबसे महत्वपूर्ण संस्था है, वहीं से बालक सर्वप्रथम समाजीकरण आरम्भ करता है। इसी कारण से परिवार को बालक की सपशम पाठशाला’ कहा गया है। परिवार हो वो गह है जहाँ में शतक आदर्श नागरिकता का पाठ सीखा है। चालक के समाजीकरण को प्रभावित करने वाले तत्व निम्नलिखित है।
1. माँ की भूमिका चालक का परिवार में सबसे घनिष्ठ सम्बन्। माँ से होता हैं। माँ 
उसे दूध पिलाती है और उसकी देखभाल भी करती है और यदि म बालक को देखभाल अच्छे से न करती तो उसका प्रभाव यह होता है कि चालक का। समाजीकरण उचित प्रकार से नहीं होता।
2. अधिक लाड़-प्यार बालक को परिवार द्वारा आवश्यकता से अधिक प्रेम करने 
प्रकार का कार्य न करने देने पा, आम कारण से उनका समाजीकरण रुक जाता है या ठक ढंग से नहीं हो पाता है, जिसके परिणामस्वरुप बालक बिगड़ जाता है।
3. माता-पिता का आपसी सम्बन्धी बालक के साम्राज्ञीकरण में माता-पिता का विशेष महत्व होता है। जिन परिवार में मात-पिता के आपको सम्बन्धी अन् होते हैं उन परिवार का समाजीकरण उचित ढंग से होता है। इसके विपरीत विन परिवार में माता-पिता आपस में झगड़ते हैं उन परिवार के बच्चों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है और इससे उनका सामाजीकरण विकृत हो जाता है, क्योंकि आपसी लड़ाई-झगड़े के कारण माता-पिता बच्चों पर अधिक ध्यान नहीं दे
4. माता-पिता के बच्चे के साथ सम्बन्ध माता-पिता जय बन्यों को उचित स्नेह देते हैं तो उनमें अहें सामाजिक गुण पैदा हो जाते है और यदि बच्चों को माता-पिता का उचित प्यार और सुरक्षा नहीं मिलती है, तो उनका सामाजिक विकास अच्छे ढंग से नहीं होता। वे पूर्ण रूप से माता-पिता पर निर्भर हो जाते हैं। इसके विपरीत यदि बच्चों को कम स्नेह या प्यार मिलता है, तो उनमें बदला देने की भावना विकसित हो जाती है। इस कारण से बालक कई यर बात-अपराधी भी बन जाते हैं।
5. बच्चों का अन्य सम्बन्धियों के साथ सम्बन्ध बों के परिवार के सम्बन्धियों का भी बच्चे के अपर गहरा प्रभाव पड़ता है। जैसे—वर का दादा-दादी, चाचा-चाची, मौसा मी तथा अन्य परिवार सगे सम्बन्धियों के साथ सम्बन्ध कैसा है? ये भी बालक के समानीकरण में मुख्य भूमिका निभाते हैं।
6. परिवार की आर्थिक स्थिति यह भी देखा गया है कि यदि पारिवारिक आर्थिक स्थिति ठीक न हो तो ये भी बालक के समाजीकरण में बाधा पहुंचाती है, क्योंकि बालक के पालन पोषण में बच्चों को वे सभी आर्थिक सुख-सुविधाएँ नहीं मिल पाती, जो एक अच्छे परिमार के बच्चों को मिलती हैं। अत: इनसे 
बालक में सहनशीलता, परिश्रम करने वाले गुण विकसि होते हैं।
7. परिवार की बनावट परिवार दो प्रकार के होते हैं।

  • एकाकी परिवार
  • संयुक्त परिवार

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UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 10 कण्ट्रोल स्टेटमेण्ट्स

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Computer
Chapter Chapter 10
Chapter Name कण्ट्रोल स्टेटमेण्ट्स
Number of Questions Solved 35
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 10 कण्ट्रोल स्टेटमेण्ट्स

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
if, if-else तथा switch स्टेटमेण्ट्स हैं।
(a) ब्रांचिंग
(b) जम्पिंग
(c) लूपिंग
(d) कण्डीशन
उत्तर:
(a) ब्रांचिंग

प्रश्न 2
निम्न में से कौन-सा लूप स्टेटमेण्ट नहीं है? [2013]
(a) if
(b) do-while
(c) while
(d) for
उत्तर:
(a) if एक ब्रांचिंग स्टेटमेण्ट है, जो प्रोग्राम में निर्णय लेने के लिए प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 3
default की-वई किसमें प्रयोग किया जाता है?
(a) goto
(b) if
(c) if-else
(d) switch
उत्तर:
(d) switch

प्रश्न 4
break स्टेटमेण्ट का प्रयोग निम्न में से किससे बाहर जाने में किया जा सकता है?
(a) for लूप
(b) while लूप
(c) Switch स्टेटमेण्ट
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 5
निम्न में से कौन-सा प्रोसेस संख्याओं को निश्चित अंक तक चलाने के लिए उच्चतम है?
(a) for
(b) while
(c) do-while
(d) ये सभी
उत्तर:
(a) for लूप अन्य सभी स्टेटमेण्ट से उच्चतम है।

प्रश्न 6
निम्न में से i++; स्टेटमेण्ट किसके समान है?
(a) i = i +i;
(b) i = i+1;
(c) i = i-1;
(d) i–;
उत्तर:
(b) i++; स्टेटमेण्ट से तात्पर्य है कि उसमें 1 अंक जुड़ जाए, इसलिए 1 = 1+ 1; इसके समान है।

प्रश्न 7. Unconditional branching statement का उदाहरण है [2007]
(a) if else
(b) go to
(c) switch
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) go to

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
कोई नम्बर 2 से विभाजित है अथवा नहीं इसके लिए स्टेटमेण्ट लिखिए।
उत्तर:
if (n%2 == 0)

प्रश्न 2
switch स्टेटमेण्ट का प्रयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर:
switch स्टेटमेण्टे का प्रयोग प्रोग्राम में दिए गए अनेक मार्गों में से किसी एक का चयन करने में किया जाता है।

प्रश्न 3
लूपिंग किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी प्रोग्राम में निर्देश या निर्देशों के समूहों को एक से अधिक बार एक्जीक्यूट करने को लूपिंग कहते हैं।

प्रश्न 4
जब हमें एक निश्चित संख्या में दोहराव (Repetition) करना हो, तो किस लूप का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
for लूप द्वारा निश्चित संख्या में दोहराव लाया जाता है।

प्रश्न 5
while लूप और do-while लूप में क्या अन्तर है? [2007]
उत्तर:
while लूप में पहले कण्डीशन चैक की जाती है। इसके बाद लूप की बॉडी एक्जीक्यूट होती है, जबकि do-while में पहले लूप की बॉडी एक्जीक्यूट होती है फिर कण्डीशन चैक की जाती है।

प्रश्न 6. किस स्टेटमेण्ट का प्रयोग किसी लूप के शेष स्टेटमेण्टों को छोड़कर
आगे बढ़ जाने के लिए किया जाता है? उत्तर continue स्टेटमेण्ट का प्रयोग किया जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न I (2 अंक)

प्रश्न 1
ब्रांचिंग पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए। [2003]
उत्तर:
जब C++ प्रोग्राम में किसी स्टेटमेण्ट पर ऐसी स्थिति आती है कि वहाँ से आगे बढ़ने के लिए एक से अधिक मार्ग होते हैं, तो ऐसी स्थिति ब्रांचिंग कहलाती है। ब्रांचिंग स्थिति को हल करने के लिए ब्रांचिंग कण्ट्रोल स्टेटमेण्ट का प्रयोग किया जाता है, जो निम्न है।

  1. if स्टेटमेण्ट
  2. if-else स्टेटमेण्ट
  3. switch स्टेटमेण्ट
प्रश्न 2
लूप्स की नेस्टिंग उपयुक्त उदाहरण देकर व्याख्या कीजिए। [2018]
उत्तर:
जब हम एक लूप के अन्दर दूसरी लुप लगाते हैं, तो इस प्रकार की लूप नेस्टिड लूप या लूप्स की नेस्टिंग कहलाती है।
उदाहरण
#include<iostream.h>
void main( )
{
int n, i;
for (n = 1; n< = 10; n = n+ 1)
cout <<"Table is : "<<endl;
for (1 = 1; i< = 10; i ++)
{
cout <<n*i <<endl;
}
cout <<endl;
}
}

प्रश्न 3
break एवं continue स्टेटमेण्ट की उपयोगिता को उदाहरण सहित समझाइए। [2006]
अथवा
break व continue में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2007]
अथवा
उपयुक्त उदाहरण देकर break व countinue स्टेटमेण्ट्स में भेद करें। [2018]
उत्तर:
break व continue में अन्तर निम्न हैं।

break लूप से बाहर निकलने के लिए break स्टेटमेण्ट का प्रयोग होता है।
continue लूप के शेष स्टेटमेण्टों को छोड़कर आगे बढ़ जाने के लिए continue स्टेटमेण्ट का प्रयोग होता है।
उदाहरण
for
(inti = 1; i<= 5; i ++)
{
if(1%2==0)
break;
cout<<i;

उदाहरण
for(inti=1; i<= 5; 1 ++)
{
if(i%2= =0)
continue;
cout<<i;
}
प्रश्न 4
किसी संख्या का फैक्टोरियल निकालने हेतु C++ में प्रोग्राम लिखिए। [2011]
उत्तर:
#include<iostream.h>
void main( )
int num, i, f = 1;
cout<<"Enter the number:";
cin>>num;
for(i = num; i > 0; i--)
{
f=f*i;
}
cout<<"Factorial of the number:"<<f;
}

आउटपुट:
Enter the number: 5
Factorial of the number : 120

प्रश्न 5
C++ में प्रारम्भिक 10 संख्याओं का औसत मान ज्ञात करने के लिए प्रोग्राम लिखिए।
उत्तर:
#include<iostream.h>.
void main( )
int sum=0,n, i=1;
float avg;
cout<<"\n Enter the value of n:";
cin>>n;
do
{
sum = sum + i ;
i = i + 1;
}
while (i <= n);
cout<<"\n Sum is: "<<sum;
avg=(float) sum/n;
cout<<"\n Average is :"<<avg;
}

आउटपुट:
Enter the value of n: 10
Sum is: 55
Average is; 5.5

प्रश्न 6
एक C++ प्रोग्राम लिखिए, जो A से H तक सीरीज प्रिण्ट करे, परन्तु उसमें c तथा F उपस्थित न हो।
उत्तर:
#include<iostream.h>
void main( )
{
for (char i='A';i<='H'; ++i)
{
if (i == "c' ।। i == 'F')
{
continue;
}
cout<<<<"\t";
}
}

आउटपुट:
A B D E G H

लघु उत्तरीय प्रश्न II (3 अक)

प्रश्न 1
उदाहरण सहित do-while व for लूप में भेद करें। [2016, 14]
उत्तर:
do-tuhile व for लूप में निम्न अन्तर हैं।

do-while लूप do-while लूप
इस लूप में लूप काउण्टर, असाइनमेण्ट, कण्डीशन की जाँच तथा लूप काउण्टर में दृद्धि या कमी एक साथ नहीं लिखे जा सकते। इस लूप में लूप काउण्टर, असाइनमेण्ट, कण्डीशन की जाँच तथा लूप काउण्टर में दृद्धि या कमी एक साथ नहीं लिखे जा सकते।

उदाहरण
do-while की सहायता से 1 से 20 तक की संख्याओं का योग निकालना।

#include<iostream.h>
void main( )
{
int i= 1, sum = 0;
do
{
sum = sum + i;
i++;
} while(i<=20);
cout<<"The sum is:"<< sum;
}

आउटपुट:
The sum is : 210

उदाहरण
for लूप की सहायता से 1 से 20 तक की संख्याओं का योग निकालना।

#include<iostream.h>
void main( )
{
int i, sum = 0;
for(s = 1 ; i <= 20 : i++)
{
sum = sum + i;
}
cout<<"The sum is :" << sum;
}

आउटपुट:
The sum is : 210

प्रश्न 2
for लूप का प्रयोग करके प्रथम 1000 पूर्णांकों का योगफल ज्ञात - करने हेतु एक प्रोग्राम लिखिए। [2013]
उत्तर:
#include<iostream.h>
void main( )
{
int i;
long sum = 0;
for(i = 0; i < 1000; i++)
{
sum = sum + i;
}
cout<<"The sum is:"<<sum;
}

आउटपुट:
The sum is : 500500

प्रश्न 3
do-while लूप का प्रयोग करके प्रथम एक सौ विषम संख्याओं का योगफल छापने हेतु C++ भाषा में एक प्रोग्राम लिखिए। [2013, 03]
उत्तर:
#include<iostream.h>
void main( )
{
int i = 1, sum = 0;
do
{
if(1%2 ! = 0)
{
Sum=sum + 1;
}
1++;
} whi1e(i < = 100);
cout<<"The sum is :"<<sum;
}

आउटपुट:
The sum is : 2500

प्रश्न 4
goto, break व continue स्टेटमेण्ट्स को समझाइए। [2016]
उत्तर:
goto स्टेटमेण्ट इस स्टेटमेण्ट का प्रयोग प्रोग्राम के एक्जीक्यूशन का सामान्य क्रम बदलने के लिए किया जाता है, जिससे प्रोग्राम का नियन्त्रण प्रोग्राम में किसी अन्य स्थान पर बिना शर्त अन्तरित हो जाता है।
प्रारूप label:
goto label name;

break स्टेटमेण्ट इस स्टेटमेण्ट का प्रयोग किसी भी प्रकार के लूप से बाहर निकलने के लिए किया जा सकता है। यह केवल सबसे भीतरी लुप के लिए लागू होगा, जिसमें इसका प्रयोग किया गया हो।
प्रारूप break;

continue स्टेटमेण्ट इस स्टेटमेण्ट का प्रयोग किसी लुप के शेष स्टेटमेण्टो को छोड़कर आगे बढ़ जाने के लिए किया जाता है। इस स्टेटमेण्टो के प्रयोग से लूप समाप्त नहीं होता, बल्कि उस पास (Pass) में लूप के आगे के स्टेटमेण्ट को छोड़ दिया जाता है। अगले पासों में लूप सामान्य रूप में चलता रहता है।
प्रारूप continue;

प्रश्न 5
C++ में एक प्रोग्राम लिखिए, जो किसी दो अंकीय पूर्णांक का पहाड़ा छापे। [2016]
उत्तर:
#include<iostream.h>
void main( )
{
int n, i, table;
cout<<"Enter the number:";
cin>>n;
cout<<"Table\n";
for(i = 1; i< = 10; i++)
{
table = n* i;
cout<< table << endl;
}
}

आउटपुट
Enter the number: 12
Table
12
24
36
48
60
72
84
96
108
120

प्रश्न 6
C++ में तीन संख्याएँ इनपुट कीजिए तथा फिर उनमें से सबसे बड़ी को बताइए।
उत्तर:
#include<iostream.h>
void main( )
{
int a, b, C;
cout<<"Enter the value of a, b. and c\n";
cina >>b>>c;
if( (a > b) && (a > c))
cout<< "a is the largest number";
{
else if ((b> a) && (b> c))
{
cout<<"b is the largest number";
}
else
cout<<"c is the largest number";
}

आउटपुट
Enter the value of a, b and c
12
34
54
c is the largest number

प्रश्न 7
C++ में एक पाँच अंकीय संख्या के समस्त अंकों का योग प्रदर्शित करने हेतु एक प्रोग्राम लिखिए। [2008]
उत्तर:
#include<iostream.h>
void main( )
{
unsigned long i,pin, sum = 0;
cout<<"Enter any number:";
cin>>n;
while(n!=0)
{
p = n %10;
sum + = p;
n = n/10;
}
cout<<endl<<"Sum of digits is:"<<sum;
}

आउटपुट
Enter any number: 36768
Sum of digits is : 30

प्रश्न 8
किसी दी हुई संख्या को उलट कर लिखने के लिए एक C++ प्रोग्राम forced [2009]
उत्तर:
#include<iostream.h>
void main( )
{
int n, rev = 0, rem;
cout<< "Enter an integer:";
cin>>n;
while(n! = 0)
{
rem = n$10;
rev = rev * 10+rem;
n = n/10;
}
cout<<"Reversed number=" <<rev;
}

आउटपुट
Enter an integer : 4567
Reversed number = 7654

प्रश्न 9
do-while लूप की सहायता से 8 व 11 का पहाड़ा लिखने हेतु C++ भाषा में एक प्रोग्राम लिखिए। (2003)
उत्तर:
#include<iostream.h>
void main( )
{
int n,m;
cout<<"Enter n:";
cin>>n;
cout<<"Enter m:";
cin>>m;
int i = 1;
do
{
cout<<n*i<<"\t"<<m*i<<end1
i++;
} while (i< = 10);
}

आउटपुट
Enter n: 8
Enter m: 11
8        11
16      22
24     33
32     44
40    55
48    66
56     77
64    88
72    99
80   110

प्रश्न 10
- 100 व 100 के बीच पड़ने वाली सभी विषम संख्याओं का योग निकालने के लिए C++ में एक प्रोग्राम लिखिए। [2018]
उत्तर:
#include<iostream.h>
void main( )
{
int i, sum=0;
for (1= -100; 1<=100; 1< = 100; i=1+2)
{
if (i%2!=0)
{
sum = sum + i;
}
}
cout<<"The sum is:" <<sum;
}

आउटपुट
The sum is : 0
प्रश्न 11
for लूप का प्रयोग करते हुए 5 का पहाड़ा छापने के लिए C++ में एक प्रोग्राम लिखिए। [2018]
उत्तर:
#include<iostream.h>
void main( )
{
int i, n=5;
cout<< "The table is:" <<endl;
for (i=1; i<=10; i++)
{
cout<<n*i<<end1;
}
}

आउटपुट
The table is
5
1o
15
20
25
30
35
40
45
50

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)

प्रश्न 1
ब्रांचिंग का संक्षिप्त विवरण दीजिए। दी गई संख्या सम है या विषम, जानने के लिए C++ में प्रोग्राम लिखिए। [2012, 03]
उत्तर
जब C++ प्रोग्राम में किसी स्टेटमेण्ट पर ऐसी स्थिति आती है कि वहाँ से आगे बढ़ने के लिए एक से अधिक मार्ग होते हैं तो ऐसी स्थिति ब्रांचिंग कहलाती है। ब्रांचिंग स्थिति को हल करने के लिए ब्रांचिंग कण्ट्रोल स्टेटमेण्ट का प्रयोग किया जाता है, जो निम्न हैं।

  1. if स्टेटमेण्ट
  2. if-else स्टेटमेण्ट
  3. switch स्टेटमेण्ट

दी गई संख्या सम है या विषम, जानने के लिए प्रोग्राम

#include<iostream.h>
void main( )
{
int num;
cout<<"Enter the number:";
cin>>num;
if (nurm2 == 0)
cout<<"The number is Even";
else
cout<<"The number is Odd";
}

आउटपुट
Enter the number : 25
The number is Odd

प्रश्न 2
C++ में, for तथा while loops का वर्णन कीजिए। C++ में, स्क्रीन पर निम्न चित्र को दर्शाने हेतु प्रोग्राम लिखिए। [2014, 12]
* * * * * *
* * * *
* * *
* *
*
उत्तर:
for लूप इस लूप का प्रयोग प्रोग्राम में ऐसे स्थानों पर किया जाता हैं। जब हमें किसी स्टेटमेण्ट या स्टेटमेण्ट के समूह का एक्जीक्यूशन एक निश्चित बार कराना हो।
while लूप इस लूप का प्रयोग प्रोग्राम में ऐसे स्थानों पर किया जाता है, जहाँ हमें यह पता नहीं होता कि लूप का एक्जीक्यूशन कितनी बार किया जाएगा। इसमें प्रत्येक बार लूप का एक्जीक्यूशन करने से पहले एक शर्त की जाँच की जाती है, जिसके सत्य होने पर ही लूप के स्टेटमेण्टों को एक्जीक्यूट किया जाता है अन्यथा कण्ट्रोल लूप से बाहर आ जाता है।

#include<iostream.h>
void main( )
{
int i, j, rows=5;
for(i=rows; i>= 1; --i)
{
for(j=1; j<=i ; ++j)
{
cout«"* ";
}
cout<<"\n";
}
}
प्रश्न 3
1 से 10 तक का पहाड़ा लिखने के लिए C++ में while लूप का प्रयोग करते हुए एक प्रोग्राम लिखिए। [2014]
उत्तर:
#include<iostream.h>
void main( )
{
int i, j;
for(i = 1; i <=10 : i + + )
{
j = 1;
while(i <=10)
{
cout<<i*j<<"\t";
j++;
}
cout<< endl;
}
}

आउटपुट
UP Board Solutions for Class 12 Computer Chapter 10 कण्ट्रोल स्टेटमेण्ट्स img-1

प्रश्न 4
C++ में किन्हीं दस संख्याओं का योग एवं औसत प्रदर्शित करने हेतु प्रोग्राम लिखिए। (अपनी इच्छानुसार अंक ले) (2008)
उत्तर:
#include<iostream.h>
void main( )
{
int i, sum = 0, avg, num;
cout<<"Enter the numbers"<< endl;
for(i = 0; i < 10 ; i++)
{
cin>>num;
sum = sum + num;
}
avg = sum/10;
cout<<"The sum is:"<<sum <<endl;
cout<<"The average is:"<<avg;
}

आउटपुट
Enter the numbers
3
4
5
7
4
9
8
5
4
9
The sum is : 58
The average is : 5

प्रश्न 5:
निम्न श्रेणी का योग ज्ञात करने के लिए C++ में एक प्रोग्राम लिखिए। 1 + [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] + [latex]\frac { 1 }{ 3 }[/latex] + [latex]\frac { 1 }{ 4 }[/latex] +.......+[latex]\frac { 1 }{ n }[/latex] [2009]
उत्तर:
#include<iostream.h>
void main( )
{
int n;
double i, sum = 0;
cout<<"1 + [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] + [latex]\frac { 1 }{ 3 }[/latex] + [latex]\frac { 1 }{ 4 }[/latex] +.......+[latex]\frac { 1 }{ n }[/latex]"<<end1;
cout<<"Enter the value of n:"<<end1;
cin >>n;
for(i = 1; i <=n; i++)
{
sum = sum (1/i);
}
cout<< "The sum of series is:"<< sum;
}

आउटपुट
1 + [latex]\frac { 1 }{ 2 }[/latex] + [latex]\frac { 1 }{ 3 }[/latex] + [latex]\frac { 1 }{ 4 }[/latex] +…….+[latex]\frac { 1 }{ n }[/latex]
Enter the value of n:5
The sum of series is : 2.283333

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi नाटक Chapter 3 गरुड़ध्वज

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi नाटक Chapter 3 गरुड़ध्वज part of UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi नाटक Chapter 3 गरुड़ध्वज.

Board UP Board
Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 3
Chapter Name गरुड़ध्वज
Number of Questions Solved 13
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi नाटक Chapter 3 गरुड़ध्वज

कथावस्तु पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1.
‘गरुड़ध्वज’ नाटक का कथानक संक्षेप में लिखिए। (2016)
अथवा
‘गरुड़वज़’ नाटक की कथावस्तु अपने शब्दों में लिखिए। (2016)
अथवा
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के कथानक पर प्रकाश डालिए। (2016)
अथवा
‘गरुड़ध्वज़”नाटक के प्रथम अंक की कथा का सार अपने शब्दों में लिखिए।
अथवा
किसी एक अंक की कथा पर संक्षिप्त चर्चा कीजिए। (2017, 10)
उत्तर:
प, लमीनारायण मिश्र द्वारा रचित नाटक ‘गरुड़ध्वज’ के प्रथम अंक की कहानी का प्रारम्भ विदिशा में कुछ प्रहरियों के वार्तालाप से होता है। पुष्कर नामक सैनिक, सेनापति विक्रममित्र को महाराज शब्द से सम्बोधित करता है, तब नागसेन उसकी भूल की ओर संकेत करता है। वस्तुतः विक्रममित्र स्वयं को सेनापति के रूप में ही देखते हैं और शासन का प्रबन्ध करते हैं। विदिशा शृंगवंशीय विक्रममित्र की राजधानी है, जिसके वह योग्य शासक हैं। उन्होंने अपने साम्राज्य में सर्वत्र सुख-शान्ति स्थापित की हुई है और वृहद्रथ को मारकर तथा गरुड़ध्वज की शपथ लेकर राज-काज सँभाला है।

काशीराज की पुत्री वासन्ती मलयराज की पुत्री मलयवती को बताती है कि उसके पिता उसे किसी वृद्ध यवन को सौंपना चाहते थे, तब सेनापति विक्रममित्र ने ही उसका उद्धार किया था। वासन्ती एकमोर नामक युवक से प्रेम करती हैं और वह आत्महत्या करना चाहती है, लेकिन विक्रममित्र की सतर्कता के कारण वह इसमें सफल नहीं हो पाती।

श्रेष्ठ कवि एवं योद्धा कालिदास विक्रममित्र को आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने की प्रतिज्ञा के कारण भीष्म पितामह’ कहकर सम्बोधित करते हैं और इस प्रसंग में एक कथा सुनाते हैं। 87 वर्ष की अवस्था हो जाने के कारण विक्रममित्र वृद्ध हो गए हैं। वे वासन्ती और एकमोर को महल में भेज देते हैं। मलयवती के कहने पर पुष्कर को इस शर्त पर क्षमादान मिल जाता है कि उसे राज्य की ओर से युद्ध लड़ना होगा। उसी समय साकेत से एक यवन-श्रेष्ठि की कन्या कौमुदी का सेनानी देवभूति द्वारा अपहरण किए जाने तथा उसे लेकर काशी चले जाने की सूचना मिलती है। सेनापति विक्रममित्र कालिदास को काशी पर आक्रमण करने के लिए भेजते हैं और यहीं पर प्रथम अंक समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 2.
‘गरुड़ध्वज’ के द्वितीय अंक का कथा सार लिखिए। (2017, 14, 12, 11, 10)
अथवा
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के दूसरे सर्ग की कथा अपने शब्दों में लिखिए। (2018)
उत्तर:
नाटक का द्वितीय अंक राष्ट्रहित में धर्म-स्थापना के संघर्ष का है। इसमें विक्रममित्र की दृढ़ता एवं वीरता का परिचय मिलता है, साथ ही उनके कुशल नीतिज्ञ एवं एक अच्छे मनुष्य होने का भी बोध होता है।

इसमें मान्धाता सेनापति विक्रममित्र को अतिलिक के मन्त्री हलोघर के आगमन की सूचना देता है। कुरु प्रदेश के पश्चिम में तक्षशिला राजधानी वाला यवन प्रदेश का शासक शृंगवंश से भयभीत रहता है। उसका मन्त्री हलधर भारतीय संस्कृति में आस्था रखता था

वह राज्य की सीमा को वार्ता द्वारा सुरक्षित करना चाहता है। विक्रममित्र देवभूति को पकड़ने के लिए कालिदास को काशी भेजने के बाद बताते हैं कि कालिदास का वास्तविक नाम मेघरुद्र था, जो 10 वर्ष की आयु में ही बौद्ध भिक्षुक बन गया था। उन्होंने उसे विदिशा के महल में रखा और उसका नया नाम कालिदास रख दिया। काशी का घेरा डालकर कालिदास काशीराज के दरबार के बौद्ध आचार्यों को अपनी विद्वत्ता से प्रभावित कर लेते हैं तथा देवभूति एवं काशीराज को बन्दी बनाकर विदिशा ले आते हैं। विक्रममित्र एवं हलधर के बीच सन्धि वार्ता होती है, जिसमे हलधर विक्रममित्र की सारी शर्ते स्वीकार कर लेता है तथा अतिलिक द्वारा भेजी गई मॅट विक्रममित्र को देता हैं। भेट में स्वर्ण निर्मित एवं रत्नजड़ित गरुड़ध्वज भी हैं। वह विदिशा में एक शान्ति स्तम्भ का निर्माण करवाता है। इसी समय कालिदास के आगमन पर वासन्ती उसका स्वागत करती है तथा वीणों पर पड़ी पुष्पमाला कालिदास के गले में डाल देती है। इसी समय द्वितीय अंक का समापन हो जाता है।

प्रश्न 3.
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के तृतीय अंक की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए। (2016)
अथवा
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के तृतीय अंक की कथा संक्षेप में लिखिए। (2014, 11)
अथवा
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के तृतीय अंक की कथा अपने शब्दों में प्रस्तुत कीजिए। (2018)
उत्तर:
नाटक के तृतीय अंक की कथा अवन्ति में घटित होती है। गर्दभिल्ल के वंशज महेन्द्रादित्य के पुत्र कुमार विषमशील के नेतृत्व में अनेक चोरों ने शकों के हाथों से मालवा को मुक्त कराया। अवन्ति में महाकाल के मन्दिर पर गरुध्वज फहरा रहा है तथा मन्दिर का पुजारी वासन्ती एवं मलयवती को बताता है कि युद्ध की सभी योजनाएं इसी मन्दिर में बनी हैं। राजमाता से विषमशील के लिए चिन्तित न होने को कहा जाता है, क्योंकि सेना का संचालन स्वयं कालिदास एवं मान्धाता कर रहे हैं। काशीराज अपनी पुत्री वासन्ती का विवाह कालिदास से करना चाहते हैं, जिसे विक्रममित्र स्वीकार कर लेते हैं। विषमशील का राज्याभिषेक किया जाता है और कालिदास को मन्त्रीपद सौंपा जाता है। राजमाता जैनाचार्यों को क्षमा-दान देती हैं और जैनाचार्य अवन्ति का पुनर्निर्माण करते हैं।

कालिदास की मन्त्रणा से विषमशील का नाम आचार्य विक्रममित्र के नाम के पूर्व अंश ‘विक्रम’ तथा पिता महेन्द्रादित्य के नाम के पश्च अंश ‘आदित्य’ को मिलाकर विमादित्य’ रखा जाता है। विक्रममित्र काशी एवं विदिशा राज्यों का भार भी विक्रमादित्य को सौंप कर स्वयं संन्यासी बन जाते हैं। कालिदास अपने स्वामी ‘विक्रमादित्य’ के नाम पर उसी दिन से ‘विक्रम संवत्’ का प्रवर्तन करते हैं। नाटक की कथा यहीं पर समाप्त हो जाती हैं।

प्रश्न 4.
‘गरुड़ध्वज’ नाटक राष्ट्र की एकता और संस्कृति का संदेश अपनी घटनाओं में अभिव्यक्त करता है। इस कथन को सोदाहरण सिद्ध कीजिए। (2018)
अथवा
‘राष्ट्रीय एकता और समरसता की दृष्टि से गरुड़ध्वाज नाटक सफल है। स्पष्ट कीजिए। (2018)
अथवा
‘गरुड़ध्वज़ नाटक राष्ट्रीय एकता एवं संस्कृति का संदेश देता है।’ इस कथना के आधार पर इस नाटक की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। (2018)
अथवा
गरुड़ध्वज़’ नाटक के कथानक में न्याय और राष्ट्रीय एकता पर विचार व्यक्त कीजिए। (2015)
अथवा
‘गरुड़ध्वज़’ नाटक के शीर्षक की सार्थकता को स्पष्ट कीजिए। (2013)
अथवा
‘गरुड़ध्वज़’ नाटक में ‘राष्ट्र की एकता और संस्कृति की गरिमा’ का सन्देश है। नाटक की इस विशेषता पर प्रकाश डालिए। (2014)
उत्तर:
पण्डित लक्ष्मीनारायण मिश्र द्वारा रचित नाटक ‘गरुड़ध्वज’ में ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी के भारतीय इतिहास के युग के एक महत्त्वपूर्ण स्वरूप को चित्रित किया गया है, जो भारत की राष्ट्रीय एकता और प्राचीन संस्कृति को प्रस्तुत करता है। इसमें तत्कालीन न्यायिक-व्यवस्था के स्वरूप को भी दर्शाया गया है।

राष्ट्रीय एकता और भारतीय संस्कृति प्रस्तुत नाटक में मगध, साकेत, अवन्ति एवं मलय देश के एकीकरण की घटना वस्तुत: सुदृढ़ भारत राष्ट्र के निर्माण, उसकी एकता एवं अखण्डता का प्रतीक है। नाटक में प्रस्तुत किए गए विक्रममित्र एवं विषमशील के चरित्र सशक्त भारत के निर्माता एवं राष्ट्रीय एकता व अखण्डता के सन्देशवाहक हैं। नाटककार ने इसमें धार्मिक संकीर्णता एवं स्वार्थपूर्ण भावनाओं के कारण अध:पतन की ओर जा रही देश की स्थिति की ओर ध्यान आकृष्ट किया है तथा इसके माध्यम से वह राष्ट्र की एकता को सुदृढ़ करने का सन्देश भी देता है। नाटक के नायक विक्रममित्र वैदिक संस्कृति एवं भागवत् धर्म के उन्नायक हैं। विष्णु भगवान का उपासक होने के कारण उनका राजचिह्न गरुड़ध्वज है, जो उनके लिए सर्वाधिक पवित्र एवं पूज्य है। वह सर्वत्र सनातन भागवत् धर्म की ध्वजा फहरते देखना चाहते हैं। इस दृष्टि से नाटक का शीर्षक ‘गरुड़ध्वज’ भी पूर्णतः सार्थक सिद्ध होता है।

न्यायिक-व्यवस्था प्राचीन भारत की न्यायिक व्यवस्था अपनी निष्पक्षता के लिए प्रसिद्ध ही है। अपने परिजनों एवं मित्रों को भी किसी अपराध के लिए समान रूप से कठोर दण्ड दिया जाता था। नाटक के प्रथम अंक की घटना इसका उत्तम उदाहरण है, जिसमें शुगवंश के कुमार सेनानी देवभूति द्वारा श्रेष्ठ अमोघ की कन्या कौमुदी का अपहरण विवाह-मण्डप से कर लिए जाने के समाचार से विक्रममित्र अत्यन्त दुःखी हो जाते हैं तथा अपने सैनिकों को तुरन्त काशी का घेरा डालने एवं देवभूति को पकड़ने का आदेश देते हैं। कालिदास के नेतृत्व में भेजी गई सेना उसे बन्दी बनाकर विक्रममित्र के सामने प्रस्तुत कर देती हैं। आंग साम्राज्य में ही शासक हे देवभूति के प्रति किया गया व्यवहार तत्कालीन निष्पक्ष एवं सुदृढ़ न्यायिक-व्यवस्था को स्पष्ट प्रमाण है।

प्रश्न 5.
‘गरुड़ध्वज़’ नाटक एक ऐतिहासिक नाटक है। समीक्षा कीजिए। (2016)
अथवा
‘गरुड़ध्वज’ नाटक एक ऐतिहासिक नाटक है। कथन की समीक्षा कीजिए। (2016)
अथवा
‘गरुड़ध्वज़’ नाटक के कथानक में ऐतिहासिकता एवं काल्पनिकता का अद्भुत सामंजस्य है। स्पष्ट कीजिए। (2016)
अथवा
‘नाट्यकला की दृष्टि से ‘गरुड़ध्वज’ की समीक्षा कीजिए। अथना ‘गरुड़ध्वज’ नाटक की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2018, 17, 14, 12)
अथवा
‘गरुड़ध्वज’ नाटक की कथावस्तु को संक्षेप में लिखिए। (2014, 13, 12, 11, 10)
उत्तर:
नाट्यकला की दृष्टि से पण्डित लक्ष्मीनारायण मिश्र की रचना ‘गरुड़ध्वज’ एक उत्कृष्ट कोटि की रचना है, जिसका तात्विक विवेचन निम्नलिखित है।

‘गरुड़ध्वज’ नाटक की कथावस्तु ऐतिहासिक है, जिसमें इंसा से एक शताब्दी पूर्व के प्राचीन भारत का सांस्कृतिक, सामाजिक एवं राजनीतिक परिवेश चित्रित किया गया है। प्रथम अंक में विक्रममित्र के चरित्र, काशीराज का अनैतिक चरित्र तथा वासन्ती की असन्तुलित मानसिक दशा के साथ ही समाज में बौद्ध भिशुओं द्वारा किए जा रहे अनाचार का चित्रण किया गया हैं। इसमें विदेशियों के आक्रमण तथा बौद्ध धर्मावलम्बियों द्वारा राष्ट्रहित को तिलांजलि देकर उनकी सहायता किए जाने को वर्णित एवं चित्रित किया गया है।

दूसरे अंक में राष्ट्रहित में किए जाने वाले धर्म की स्थापना से सम्बन्धित संघर्ष को दर्शाया गया है। तीसरे अंक के अन्तर्गत युद्ध में विदेशियों की पराजय, कालकाचार्य एवं काशीराज का पश्चाताप, विक्रममित्र की उदारता तथा आक्रमणकारी हूणों की क्रूर जातिगत प्रकृति को चित्रित किया गया है। इस नाटक का कथानक राज्य के संचालन, धर्म, अहिंसा एवं हिंसा के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डालता है। नाटक में वर्णित घटनाओं को तत्कालीन समय की समस्याओं से जोड़ने के लिए नाटककार ने नाटक में काल्पनिकता का सुन्दर प्रयोग किया है। उसने धार्मिक संकीर्णता व कट्टरता को त्यागकर उदार व्यक्तित्व का निर्माण करके, देश के प्रति अपने कर्तव्यों को समझने, राष्ट्रीय एकता को बनाने व महिलाओं का सम्मान करने इत्यादि उद्देश्यों को ऐतिहासिक पात्रों के संवादों में अपनी कल्पनाशक्ति का प्रयोग करके उनसे कहलवाया है, जिसने नाटक की रोचकता के स्तर में वृद्धि कर दी है और नाटक को बोझिल होने से बचाया है।

देशकाल और वातावरण

प्रस्तुत नाटक में देशकाल एवं वातावरण के तत्त्व का निर्वाह समुचित ढंग से हुआ है। ईसा पूर्व की सांस्कृतिक, धार्मिक एवं राजनीतिक हलचलों का सुन्दर एवं उचित प्रस्तुतीकरण नाटक में हुआ है। नाटककार ने तत्कालीन सामाजिक वातावरण का चित्रण बड़े ही जीवन्त ढंग से किया है। लगता है जैसे तत्कालीन समाज आँखों के सामने जी उठा है। तत्कालीन समाज में राजमहल, युद्ध भूमि, पूजागृह, सभामण्डल आदि का वातावरण अत्यन्त कुशलता के साथ चित्रित हुआ है। नाम, स्थान एवं वेशभूषा के अन्तर्गत भी देशकाल एवं वातावरण का सुन्दर सामंजस्य देखने को मिलता है। उपरोक्त विश्लेषण के आधार पर सारांश स्वरूप कहा जा सकता है कि नाटक में ऐतिहासिक तथ्यों का व घटनाओं का भली-भाँति उपयोग किया है, जिनके कारण इसे ऐतिहासिक नाटकों की श्रेणी में सहजता से रखा जा सकता है। साथ ही नाटककार द्वारा काल्पनिकता का प्रयोग करने से नाटक में रोचकता उत्पन्न हुई है।

प्रश्न 6.
‘गरुड़ध्वज’ नाटक की रचना नाटककार ने किन उद्देश्यों से प्रेरित होकर की है? (2014, 13, 12, 11, 10)
उत्तर:
ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी के भारतीय इतिहास पर आधारित नाटक ‘गरुड़ध्वज’ में आदियुग या प्राचीन भारत के एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्वरूप को उजागर करने का प्रयास किया गया है। इसमें धार्मिक संकीर्णताओं एवं स्वार्थों के कारण विघटित होने वाले देश की एकता एवं नैतिक पतन की ओर नाटककार ने ध्यान आकृष्ट किया है। इसके अतिरिक्त, वह राष्ट्र को एकता के सूत्र में भी बाँधने का सन्देश भी देता है। इस नाटक के निम्नलिखित उद्देश्य है—

  1. नाटककार धार्मिक संकीर्णता एवं कट्टरता से बाहर निकलकर जन-कल्याण की ओर उन्मुख होता है।
  2. नाटककार स्पष्ट सन्देश देना चाहता है कि देश की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।
  3. नाटक का मूल स्वर धार्मिक भावना की उदारता में निहित है।
  4. राष्ट्रीय एकता एवं जनवादी विचारधारा का समर्थन किया गया है।
  5. नारी के शील एवं सम्मान की रक्षा के लिए प्रेरणा दी गई है।
  6. नाटक में स्वस्थ गणराज्य की स्थापना पर बल दिया गया है।
  7. राष्ट्रहित हेतु एवं अत्याचारों का विरोध करने के उद्देश्य से शस्त्रों के प्रयोग को उचित ठहराया गया है।

प्रश्न 7.
‘गरुड़ध्वज’ की अभिनेयता या रंगमंचीयता पर प्रकाश डालिए। (2012, 11)
उत्तर:
‘गरुड़ध्वज’ नाटक में कुल तीन अंक हैं, जिन्हें सुगमतापूर्वक मंच पर अभिनीत किया जा सकता है। इसमें पात्रों एवं चरित्रों की वेशभूषा का प्रबन्ध भी सहज है, जिसके कारण किसी प्रकार की कठिनाई या समस्या का सामना नहीं करना पड़ता हैं। प्रस्तुत नाटक की रंगमंचीयता के सम्बन्ध में सारी परिस्थितियाँ अनुकूल हैं, लेकिन एक समस्या नाटक की भाषा की दुरूहता एवं इसके पात्रों के कठिन नामों को लेकर हैं, जो कहीं-कहीं सफल संवाद सम्प्रेषण में कठिनाई उत्पन्न करती हैं, लेकिन नाटक की ऐतिहासिकता को ध्यान में रखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रामाणिकता को बनाए रखने तथा, देशकाल एवं वातावरण के. सजीव चित्रण के लिए ऐसा करना आवश्यक था।

प्रश्न 8.
संवाद योजना (कथोपकथन) की दृष्टि से ‘गरुड़ध्वज़’ नाटक की विवेचना कीजिए। (2011, 10)
उत्तर:
किसी भी नाटक का सबसे सबल तत्त्व उसकी संवाद योजना होती है। संवादों के द्वारा ही पात्रों का चरित्र चित्रण किया जाता है। इस दृष्टि से नाटककार ने संवादों का उचित प्रयोग किया है। प्रस्तुत नाटक के संवाद सुन्दर, सरल, संक्षिप्त तथा पात्रों के चरित्र एवं व्यक्तित्व के अनुकूल हैं। प्रायः सभी संवाद सम्बन्धित पात्रों के मनोभावों को प्रकट करने में सफल रहे हैं। इसमें । तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप संवादों की रचना की गई है। संक्षिप्त संवाद अत्यधिक प्रभावशाली बन पड़े हैं।

जैसे–
वासन्ती— ………. नहीं ………. नहीं, बस दो शब्द पूछूगी कवि! लौट आओ ……….
कालिदास–(विस्मय से) क्या है राजकुमारी?
वासन्ती–यहाँ आइए! आज मैं कुमार कार्तिकेय का स्वागत करूगी। उनका वाहन मोर भी यहीं है।
संवादों में कहीं-कहीं हास्य, व्यंग्य, विनोद तथा संगीतात्मकता का पुट भी मिलता है।

प्रश्न 9.
‘गरुड़ध्वज’ नाटक की भाषा-शैली की दृष्टि से समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
लक्ष्मीनारायण मिश्र द्वारा रचित नाटक ‘गरुड़ध्वज’ की भाषा सुगम, सहज एवं सुपरिचित है। हालाँकि इसकी भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली है, लेकिन पाठक की। सुबोधता का लेखक ने पर्याप्त ध्यान रखा है। सुबोध एवं सहज शैली में लिखे गए इस नाटक में मुहावरों एवं लोकोक्तियों का सफलतापूर्वक प्रयोग किया गया है। भाषा में । कहीं-कहीं क्लिष्टता हैं, लेकिन वह ऐतिहासिकता को देखते हुए उचित प्रतीत होता है। नाटक की भाषा की स्वाभाविकता पाठकों को अत्यधिक आकर्षित करती है; जैसे-“उसके भीतर जो देवी अंश था, उसी ने उसे कालिदास बना दिया। उसकी । शिक्षा और संस्कार में मैं प्रयोजन मात्र बना था। उसका पालन मैंने ठीक इसी तरह। किया, जैसे यह मेरे अंश का ही नहीं, मेरे इस शरीर का हो।’

पात्र एवं चरित्र-चित्रण पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 10.
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के नायक की चारित्रिक विशेषताओं को संक्षेप में लिखिए। (2018)
अथवा
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के आधार पर विक्रममित्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2018)
अथवा
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के प्रमुख पात्र के चरित्र की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2016)
अथवा
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के मुख्य पात्र का चरित्रांकन/चरित्र-चित्रण कीजिए। (2018, 16)
अथवा
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के प्रमुख पुरुष पात्र (नायक) विक्रममित्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2014, 13, 12, 11, 10)
अथवा
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2017)
उत्तर:
ऐतिहासिक नाटक ‘गरुड़ध्वज’ के नायक तेजस्वी व्यक्तित्व वाले आचार्य विक्रममित्र हैं। नाटक में उनकी आयु 87 वर्ष दर्शायी गई है। उनके चरित्र एवं व्यक्तित्व की निम्नलिखित विशेषताएँ है-

  1. तेजस्वी एवं ओजस्वी व्यक्तित्व आचार्य विक्रममित्र के तेजस्वी एवं ओजस्वी व्यक्तित्व के कारण ही मन्त्री हलोधर विक्रममित्र से आतंकित दिखाई देता है।
  2. अनुशासनप्रियता स्वयं अनुशासित जीवन जीने वाले विक्रममित्र अन्य लोगों को भी अनुशासित रखने के पक्ष में है। इसी अनुशासन का डर पुष्कर में उनके द्वारा ‘महाराज’ शब्द का प्रयोग करने के समय दिखाई देता है।
  3. देशभक्ति महान् देशभक्त विक्रममित्र का सम्पूर्ण जीवन राष्ट्रीय गौरव को बनाए रखने के लिए समर्पित था। वे राष्ट्रहित के लिए शास्त्र एवं शस्त्र दोनों का प्रयोग करते हैं। देशभक्ति की भावना के कारण ही उन्होंने अनेक राज्यों को संगठित किया।
  4. भागवत् धर्म के उन्नायक विक्रममित्र भागवत् धर्म के अनुयायी थे तथा जीवनभर उसके प्रति समर्पित रहे। इसी कारण उन्हें पूजा-पाठ एवं यज्ञ-अनुष्ठान विशेष रूप से प्रिय थे।
  5. दृढ़प्रतिज्ञ विक्रममित्र एक दृढ़प्रतिज्ञ शासक थे। भीष्म पितामह के समान आजीवन ब्रह्मचारी रहने की अपनी प्रतिज्ञा को उन्होंने दृढ़ता के साथ पूरा किया।
  6. न्यायप्रियता विक्रममित्र एक न्यायप्रिय शासक हैं, जो न्याय के सामने सभी को समान समझते हैं, चाहे वह शुगवंश से जुड़ा हुआ देवभूति ही क्यों न हो? वे न्याय के सम्बन्ध में किसी भी तरह का पक्षपात नहीं होने देते।
  7. विनम्रता एवं उदारता विक्रममित्र एक अनुशासनप्रिय एवं दृढ़ प्रकृति के शासक होने के साथ-साथ विनम्र एवं उदार व्यक्ति भी हैं। वे अपनी विनम्रता एवं उदारता का अनेक जगह प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।
  8. जनसेवक विक्रममित्र स्वयं को सत्ता का अधिकारी या सत्तासम्पन्न शासक न मानकर जनसेवक ही समझते हैं। यही कारण है कि वह ‘महाराज’ कहलाना पसन्द नहीं करते तथा स्वयं को सेनापति के सम्बोधन में ज्यादा सन्तुष्टि पाते हैं।

प्रश्न 11.
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के आधार पर वासन्ती की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2017)
अथवा
‘गरुड़ध्वज’ नाटक की नायिका का चरित्रांकन /चरित्र-चित्रण कीजिए।
अथवा
नाटक गरुड़ध्वज के आधार पर वासन्ती का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2018, 16, 15, 14, 13, 12)
अथवा
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के प्रमुख स्त्री पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए। (2014, 13, 10)
उत्तर:
ऐतिहासिक नाटक ‘गरुड़ध्वज’ की प्रमुख नारी पात्र वासन्ती है। अतः इसे ही नाटक की नायिका माना जा सकता है। वासन्ती के पिता द्वारा वृद्ध यवन से उसका विवाह कराए जाने के विरोध में विक्रममित्र वासन्ती को विदिशा के महल ले आते हैं तथा उसे सम्मान के साथ सुरक्षा प्रदान करते हैं। बाद में, वासन्ती कालिदास की प्रेमिका के रूप में प्रस्तुत होती है, जिसके चरित्र की उल्लेखनीय विशेषताएँ इस प्रकार हैं

  1. धार्मिक संकीर्णता की शिकार नाटक के कथानक के काल में भारत में एक विशेष प्रकार की धार्मिक संकीर्णता मौजूद थी, जिसकी शिकार वासन्ती भी होती हैं। उसके व्यक्तित्व में एक अवसाद के साथ-साथ ओज का गुण भी। मौजूद रहता है।
  2. विशाल एवं उदार हृदयी वासन्ती का हृदय अत्यन्त विशाल एवं उदार है, जिसके कारण वह मानव-मात्र के प्रति ही नहीं, अपितु जीव मात्र के प्रति भी अत्यन्त स्नेह एवं सहानुभूति रखती है। उसमें बड़े-छोटे, अपने पराए सभी के लिए समान रूप से प्रेमभाव भरा हुआ है।
  3. आत्मग्लानि से विक्षुब्ध वह आत्मग्लानि से विक्षुब्ध होकर अपने जीवन से छुटकारा पाना चाहती है। इसी क्रम में वह आत्महत्या का प्रयास भी करती है, | परन्तु विक्रममित्र के कारण उसका यह प्रयास असफल हो जाता है।
  4. स्वाभिमानी वासन्ती अनेक विषम परिस्थितियों के पश्चात् भी अपना स्वाभिमान नहीं खोती। वह किसी भी ऐसे राजकुमार के साथ विवाह करने को राजी नहीं है, जो विक्रममित्र के दबाव के कारण ऐसा करने के लिए विवश हो।
  5. सहदयी एवं विनोदप्रिय वासन्ती निराश एवं विक्षुब्ध होने के पश्चात् भी सहृदयी एवं विनोदप्रिय नजर आती है। वह कालिदास के काव्य-रस का पूरा आनन्द उठाती है।
  6. आदर्श प्रेमिका वासन्ती एक सहृदया, सुन्दर एवं आदर्श प्रेमिका सिद्ध होती हैं। वह निष्कलंक एवं पवित्र है। वह अपने उज्वल चरित्र एवं शुद्ध विशाल हृदय के साथ कालिदास को प्रेम करती हैं।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि वासन्ती एक आदर्श नारी पात्र एवं नाटक की। नायिका है, जिसका चरित्र अनेक आधुनिक स्त्रियों के लिए भी अनुकरणीय है।

प्रश्न 12.
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के आधार पर नायिका ‘मलयवती’ का चरित्रांकन कीजिए।
उत्तर:
प, लक्ष्मीनारायण लाल द्वारा रचित ‘गरुड़ध्वज’ नाटक के नारी पात्रों में मलयवती एक प्रमुख महिला पात्र है। इसका चरित्र अत्यधिक आकर्षक, सरल एवं विनोदप्रिय है। मलयवती के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

  1. रूपवती मलयवती मलय देश की राजकुमारी है। वह अत्यधिक रूपवती हैं एवं उसका व्यक्तित्व सरल, सहज एवं आकर्षक है। उसके रूप-सौन्दर्य को देखकर ही कुमार विषमशील विदिशा के राजप्रसाद के उपवन में उसके सौन्दर्य पर मुग्ध हो गए थे।
  2. आदर्श प्रेमिका मलयवती एक आदर्श प्रेमिका है। कुमार विषमशील के प्रति उसके हदय में अत्यधिक प्रेम है। वह उसका मन से वरण करने के उपरान्त एकनिष्ठ भाव से उसके प्रति आसक्त है। उसके प्रति उसका प्रेम सच्चा है, उसे स्वयं पर पूर्ण विश्वास है कि वह उसे प्राप्त कर लेगी। कुमार विषमशील को प्राप्त करने की अपनी दृढ़ इच्छा प्रकट करते हुए वह कहती है “तब मुझे अपने आप में पूर्ण विश्वास है। मैं उन्हें अपनी तपस्या से खोजेंगी…. निर्विकार शंकर प्राप्त हो गए और वे प्राप्त न होंगे।”
  3. विनोदप्रिय स्वभाव राजकुमारी मलयवती प्रसन्नचित्त एवं विनोदी स्वभाव की है। वह अपनी प्रिय सखी वासन्ती से अनेक अवसरों पर हास-परिहास करती है। राजभृत्य द्वारा उसे महाकवि के द्वारा कही गई बातों के बारे में बताने पर वह महाकवि पर व्यंग्य करते हुए कहती हैं क्यों महाकवि को यह सूझी है? इस पृथ्वी की सभी कुमारियाँ कुमार हो जाएँ तब तो अच्छी रही। कह देना महाकवि से इस तरह की उलट-फेर में कुमारों को कुमारियाँ होना होगा और महाकवि भी कहीं उस चक्र में न आ जाएँ।”
  4.  ललित कलाओं में रुचि मलयवती की संगीत, चित्रकला इत्यादि ललित कलाओं में रुचि है। वह ललित कलाओं को सीखने व उनमें निपुण होने के लिए विदिशा जाती है। जहाँ वह मलय देश की चित्रकला व संगीत कला को भी सीखती है।

स्पष्टतः मलयवती के चरित्र एवं व्यक्तित्व में सद्गुणों का समावेश है। अपने इन्हीं गुणों एवं स्वभाव के कारण मलयवती की एक आदर्श राजकुमारी के रूप में छवि मिलती है। मलयवती का सरल, सहज और आकर्षक व्यक्तित्व उसे और अधिक आकर्षक बनाता है।

प्रश्न 13.
‘गरुड़ध्वज’ नाटक के आधार पर ‘काशिराज’ की चारित्रिक विशेषताएँ उद्घाटित कीजिए।
उत्तर:
‘आन का मान’ नाटक के पुरुष पात्रों में ‘काशिराज’ काशी प्रदेश का राजा है, जो स्वार्थी व अवसरवादी है। काशिराज की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. कायर काशिराज भवनों के साथ युद्ध न करके सन्धि प्रस्ताव में अपनी पुत्री को मेनेन्द्र के पुत्र को दान में दे देता है, जिसकी आयु पचास वर्ष की थी।
  2. स्वार्थी व अवसरवादी काशिराज कालिदास द्वारा बन्दी बनाकर विक्रममित्र के पास विदिशा लाया गया। जहाँ उसने अपनी पुत्री के साथसाथ कालिदास को भी माँग लिया। वह जनता था कि विक्रममित्र कालिदास के पुत्र वात्सल्य रखते हैं। फिर भी उसने अवसर का लाभ उठाया।
  3. आत्मग्लानि वह वासन्ती के समक्ष पश्चाताप करता है और कहता है। युद्ध क्या कर सकेंगा अब … जब असकी अवस्था थी, तब तो मैं भिक्षु मण्डली में धर्मालाप करता रहा। इस देश के सभी माण्डलीक और गुण मुख्य आज युद्ध में हैं, मैं ही तो ऐसा हूँ जो इस कर्तव्य से वंचित हूँ। मैं बड़ा अभागा हूँ, किन्तु तुम्हारे आँसू इस हृदय को छेद देंगे … हाय।”
  4. विलापी तथा देश प्रेमी काशिराज अपने देश व मातृ भूमि के लिए अत्यन्त चिन्तित हैं, जिस पर किसी समय बौद्धों का आधिपत्य था, आज उस भूमि पर भवनों का अधिकार है, जिसके लिए वह विलाप करता हुआ कहता है कि “मातृ भूमि और जातीय गौरव के प्रति निष्ठा बौद्धों में नहीं होती वत्स। वे किसी भी संकीर्ण घेरे में रहना नहीं चाहते … इस देश और जाति के जितने भी बन्न थे, एक-एक करके सभी काटते गए।” वह अपने देश को बचाने के लिए अपनी जन्म भूमि तथा कन्या (घासन्ती) को भी विदेशी को देने से पीछे नहीं हटता।।

निष्कर्षस्वरूप कहा जा सकता हैं कि काशिराज स्वार्थी कायर राजा होने के साथ साथ उसमें अपने देश के प्रति प्रेम च देशभक्ति जैसे गुण भी निहित हैं।

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi पद्य Chapter 10 मैंने आहुति बनकर देखा / हिरोशिमा

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Textbook SCERT, UP
Class Class 12
Subject Sahityik Hindi
Chapter Chapter 10
Chapter Name मैंने आहुति बनकर देखा / हिरोशिमा
Number of Questions Solved 4
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi पद्य Chapter 10 मैंने आहुति बनकर देखा / हिरोशिमा

मैंने आहुति बनकर देखा / हिरोशिमा – जीवन/साहित्यिक परिचय

(2018, 17, 16, 15, 14, 13, 12, 11, 10)

प्रश्न-पत्र में संकलित पाठों में से चार कवियों के जीवन परिचय, कृतियाँ तथा भाषा-शैली से सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं।
जिनमें से एक का उत्तर देना होता हैं। इस प्रश्न के लिए 4 अंक निर्धारित हैं।

जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ
सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का जन्म वर्ष 1911 में हुआ था। इनके पिता पण्डित हीरानन्द शास्त्री पंजाब के करतारपुर (तत्कालीन जालन्धर जिला) के निवासी और वत्स गोत्रीय सारस्वत ब्राह्मण थे। अज्ञेय का जीवन एवं व्यक्तित्व बचपन से ही अन्तर्मुखी एवं आत्मकेन्द्रित होने लगा था। भारत की स्वाधीनता की लड़ाई एवं क्रान्तिकारी आन्दोलन में भाग लेने के कारण इन्हें 4 वर्षों तक जेल में तथा 2 वर्षों तक घर में नजरबन्द रखा गया। इन्होंने बी.एस.सी. करने के बाद अंग्रेजी, हिन्दी एवं संस्कृत का गहन स्वाध्याय किया। सैनिक’, ‘विशाल भारत’, ‘प्रतीक’ और अंग्रेजी त्रैमासिक ‘वा’ का सम्पादन किया। इन्होंने समाचार साप्ताहिक ‘दिनमान’ और ‘नया भती’ पत्रों का भी सम्पादन किया। तकालीन प्रगतिवादी काव्य का ही एक रुप ‘प्रयोगवाद’ काव्यान्दोलन के रूप में प्रतिफलित हुआ।

इसका प्रवर्तन ‘तार सप्तक’ के माध्यम से ‘अज्ञेय’ ने किया। तार सप्तक की भूमिका इस नए आन्दोलन का घोषणा-पत्र सिद्ध हुई। हिन्दी के इस महान् विभूति का स्वर्गवास 4 अप्रैल, 1987 को हो गया।

साहित्यिक गतिविधियाँ
अग प्रयोगशील नूतन परम्परा के ध्वज वाहक होने के साथ साथ अपने पीछे अनेक कवियों को लेकर चलते हैं, जो उन्हीं के समान नवीन विषयों एवं नवीन शिष्य के समर्थक हैं।

अज्ञेय उन रचनाकारों में से हैं जिन्होंने आधुनिक हिन्दी साहित्य को एक नया आयाम, नया सम्मान एवं नया गौरव प्रदान किया। हिन्दी साहित्य को आधुनिक बनाने का श्रेय अज्ञेय को जाता है। अज्ञेय का कवि, साहित्यकार, गद्यकार, सम्पादक, पत्रकार सभी रूपों में महत्वपूर्ण स्थान है।

कृतियाँ
‘अज्ञेय’ ने साहित्य के गद्य एवं पद्य दोनों विधाओं में लेखन कार्य किए।

  1. कविता संग्रह भग्नदूत, चिन्ता, इत्यलम्, हरी घास पर क्षणभर, बावरा अहेरी, इन्द्र धनुष रौंदे हुए थे, आँगन के पार द्वार, कितनी नावों में कितनी बार, अरी ओं करुणामय प्रभामय।
  2. अंग्रेजी काव्य-कृति ‘प्रिजन डेज एण्ड अदर पोयम्स’
  3. निबन्ध संग्रह सब रंग और कुछ राग, आत्मनेपद, लिखि कागद कोरे आदि।
  4. आलोचना हिन्दी साहित्य : एक आधुनिक परिदृश्य, त्रिशंकु आदि।
  5. उपन्यास शेखर : एक जीवनी (दो भाग), नदी के द्वीप, अपने-अपने अजनबी आदि।
  6. कहानी संग्रह विपथगा, परम्परा, कोठरी की बात, शरणार्थी, जयदोल, तेरे ये प्रतिरूप, अमर वल्लरी आदि।
  7. यात्रा साहित्य अरे यायावर! रहेगा याद, एक बूंद सहसा उछली।

काव्यगत विशेषताएँ
भाव पक्ष

  1. मानवतावादी दृष्टिकोण इनका दृष्टिकोण मानवतावादी था। इन्होंने अपने सूक्ष्म कलात्मक बोध, व्यापक जीवन अनुभूति, समृद्ध कल्पना-शक्ति तथा सहज लेकिन संवेतमयी अभिव्यंजना द्वारा भावनाओं के नूतन एवं अनछुए रूपों को प्रकट किया।
  2. व्यक्ति की निजता को महत्त्व अज्ञेय ने समष्टि को महत्वपूर्ण मानते हुए भी व्यक्ति की निजता या महत्ता को अखण्डित बनाए रखा। व्यक्ति के मन की गरिमा को इन्होंने फिर से स्थापित किया। ये निरन्तर व्यक्ति के मन के विकास की यात्रा को महत्त्वपूर्ण मानकर चलते रहे।
  3. रहस्यानुभूति अज्ञेय ने संसार की सभी वस्तुओं को ईश्वर की देन माना है तथा कवि ने प्रकृति की विराट सत्ता के प्रति अपना सर्वस्व अर्पित किया है। इस प्रकार अज्ञेय की रचनाओं में रहस्यवादी अनुभूति की प्रधानता दृष्टिगोचर होती है।
  4. प्रकृति चित्रण अज्ञेय की रचनाओं में प्रकृति के विविध चित्र मिलते हैं, उनके काव्य में प्रकृति कभी अलिम्बन बनकर चित्रित होती है, तो कभी उद्दीपन बनकर। अज्ञेय ने प्रकृति का मानवीकरण करके उसे प्राणी की भाँति अपने काव्य में प्रस्तुत किया है। प्रकृति मनुष्य की ही तरह व्यवहार करती दृष्टिगोचर होती है।

कला पक्ष

  1. नवीन काव्यधारा का प्रवर्तन इन्होंने मानवीय एवं प्राकृतिक जगत के स्पन्दनों को बोलचाल की भाषा में तथा वार्तालाप एवं स्वगत शैली में व्यक्त किया। इन्होंने परम्परागत आलंकारिकता एवं लाक्षणिकता के आतंक से काव्यशिल्प को मुक्त कर नवीन काव्यधारा का प्रवर्तन किया।
  2. भाषा इनके काव्य में भाषा के तीन स्तर मिलते हैं
    • संस्कृत की परिनिष्ठित शब्दावली
    • ग्राम्य एवं देशज शब्दों का प्रयोग
    • बोलचाल एवं व्यावहारिक भाषा
  3. शैली इनके काव्य में विविध काव्य शैलियाँ; जैसे—छायावादी लाक्षणिक शैली, भावात्मक शैली, प्रयोगवादी सपाट शैली, व्यंग्यात्मक शैली, प्रतीकात्मक शैली एवं बिम्बात्मक शैली विद्यमान हैं।
  4. प्रतीक एवं बिम्ब अज्ञेय जी के काव्य में प्रतीक एवं बिम्ब योजना दर्शनीय है। इन्होंने ब) राजीव एवं हृदयहारी बिम्ब प्रस्तुत किए तथा सार्थक प्रतीकों का प्रयोग किया।
  5. अलंकार एवं छन्द इनके काव्य में उपमा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अंलकार है। इसके साथ-साथ रूपक, उल्लेख, उत्प्रेक्षा, मानवीकरण, विशेषण-विपर्यय अंलकार भी प्रयुक्त हुए हैं। इन्होंने मुक्त छन्दों का खुलकर प्रयोग किया है। इसके अलावा गीतिका, बरवै, हरिगीतिका, मालिनी, शिखरिणी आदि छन्दों का भी प्रयोग किया है।

हिन्दी साहित्य में स्थान
अज्ञेय जी नई कविता के कर्णधार माने जाते हैं। ये प्रत्यक्ष का यथावत् चित्रण करने वाले सर्वप्रथम साहित्यकार थे। देश और समाज के प्रति इनके मन में अपार वेदना थी। ‘नई कविता’ के जनक के रूप में इन्हें सदा याद किया जाता रहेगा।

पद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-पत्र में पद्य भाग से दो पद्यांश दिए जाएँगे, जिनमें से किसी एक पर आधारित 5 प्रश्नों (प्रत्येक 2 अंक) के उत्तर देने होंगे।

मैंने आहुति बनकर देखा

प्रश्न 1.
मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने,
मैं कब कहता हूँ जीवन-मरु नन्दन-कानन का फूल बने?
काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है,
मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रान्तर का ओछा फूल बने?
मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले?
मैं कब कहता हूँ प्यार करूं तो मुझे प्राप्ति की ओट मिले?
मैं कब कहता हूँ विजय करू-मेरा ऊँचा प्रासाद बर्ने?
या पात्र जगत की श्रद्धा की मेरी धुंधली-सी याद बने?
पथ मेरा रहे प्रशस्त सदा क्यों विकले करे यह चाह मुझे?
नेतृत्व न मेरा छिन जावे क्यों इसकी हो परवाह मुझे?

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश के रचनाकार और रचना का नाम बताइए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश के रचनाकार सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन” अज्ञेय’ जी हैं। और रचना ‘मैंने आहुति बनकर देखा’ है।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि कैसा व्यक्ति वास्तविक जीवन जीता है?
उत्तर:
कवि ने मानव जीवन की सार्थकता बताते हुए स्पष्ट किया है कि दुःख के बीच पीड़ा सहकर अपना मार्ग प्रशस्त करने वाला तथा दूसरों की पीड़ा हरकर उनमें प्रेम का बीज बोने वाली व्यक्ति ही वास्तविक जीवन जीता है।

(iii) “काँटा कठोर हैं, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा हैं।” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति का आशय यह है कि जिस प्रकार काँटे की श्रेष्ठता उपवन के तच फल में परिवर्तित हो जाने में नहीं, वरन अपने कठोरपन एवं नुकीलेपन में निहित है, उसी प्रकार जीवन की सार्थकता संघर्ष एवं दुःखों से लड़ने में है।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में दुःख को सुख की तरह, असफलता को सफलता की तरह और हार को जीत की तरह स्वीकार कर कार्य-पथ पर अडिग होकर चलने का भाव व्यक्त किया गया है।

(v) अनुकूल और नेतृत्व शब्दों में क्रमशः उपसर्ग एवं प्रत्यय बताइए।
उत्तर:
अनुकूल – अनु (उपसर्ग), नेतृत्व – त्व (प्रत्यय)।

प्रश्न 2.
मैं प्रस्तुत हुँ चाहे मेरी मिट्टी जनपद की धूल बने—
फिर उस धूली का कण-कण भी मेरा गतिरोधक शुल बने।
अपने जीवन का रस देकर जिसको यत्नों से पाला है—
क्या वह केवल अवसाद-मलिन झरते आँसु की माला हैं?
वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है—
वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहन-कारी हाला है।
मैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया—
मैंने आहुति बनकर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है!
मैं कहता हूँ मैं बढ़ती हूँ मैं नभ की चोटी चढ़ता हूँ।
कुचला जाकर भी धूली-सा आँधी-सा और उमड़ता हूँ।
मेरा जीवन ललकार बने, असफलता ही असि-धार बने
इस निर्मम रण में पग-पग का रुकना ही मेरा वार बने!
भव सारा तुझको है स्वाहा सब कुछ तप कर अंगार बने—
तेरी पुकार-सा दुर्निवार मेरा यह नीरव प्यार बने!

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने अपनी कैसी चाह (इच्छा) को व्यक्त किया है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में कवि को अपने जनपद की धूल बन जाना स्वीकार है, भले ही उस धूल का प्रत्येक कण उसे जीवन में आगे बढ़ने से रोके और उसके लिए पीड़ादायक ही क्यों न बन जाए। इसके पश्चात् भी वह कष्ट सहकर मातृभूमि की सेवा करने या उसके काम आ जाने की चाह व्यक्त करता है।

(ii) प्रेम की वास्तविक अनुभूति से कैसे लोग अनभिज्ञ रह जाते हैं?
उत्तर:
प्रेम को जीवन के अनुभव का कड़वा प्याला मानने वाले लोग सकारात्मक दृष्टिकोण के नहीं होते, अपितु वे मानसिक रूप से विकृत होते हैं, किन्तु वे लोग भी चेतना विहीन निर्जीव की भाँति ही हैं। जिनके लिए प्रेम की चेतना लुप्त करने वाली मदिरा है, क्योंकि ऐसे लोग प्रेम की वास्तविक अनुभूति से अनभिज्ञ रह जाते हैं।

(iii) कवि ने धूल से क्या प्रेरणा ली है?
उत्तर:
कवि धूल से प्रेरणा लेते हुए कहता है कि जिस प्रकार धूल लोगों के पैरों तले रौदी जाती है, परन्तु वह हार न मानकर उल्टे औंधी के रूप में आकर रौंदने वाले को ही पीड़ा पाँचाने लगती है। उसी प्रकार मैं भी जीवन के संघर्षों से पछाड़ खाकर कभी हार नहीं मानता और आशान्वित व होकर आगे की और बढ़ता चला जाता हैं।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश में निहित उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवि ने जीवन में संघर्ष के महत्व पर बल दिया है। यदि हमारे समक्ष कोई जटिल समस्या आ जाए, तो हमें उसका सामना करते हुए उसका समाधान ढूँढना चाहिए। जो लोग इन समस्याओं का सामना करने से घबराते हैं, वास्तव में उनके जीवन को सार्थक नहीं कहा जा सकता।

(v) “इस निर्मम रण में पग-पग का रुकना ही मेरा वार बने।” प्रस्तुत पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति में ‘पग’ शब्द की पुनरावृत्ति हुई है, अतः यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।

हिरोशिमा

प्रश्न 3.
एक दिन सहसा सूरज निकला अरे क्षितिज पर नहीं, नगर के चौक;
धूप बरसी, पर अन्तरिक्ष से नहीं फटी मिट्टी से।
छायाएँ मानव-जन की दिशाहीन, सब ओर पड़ी-वह सूरज
नहीं उगा था पूरब में, वह बरसा सहसा
बीचो-बीच नगर के; काल-सूर्य के रर्थ के
पहियों के ज्यों अरे टूट कर, बिखर गए हों दसों दिशा में!
कुछ क्षण का वह उदय-अस्त!
केवल एक प्रज्वलित क्षण की
दृश्य सोख लेने वाली दोपहरी फिर।।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश के रचनाकार और रचना का नाम बताइए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश के रचनाकार सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ है तथा यद् पद्यांश ‘हिरोशिमा’ कविता से उद्घृत हैं।

(ii) प्रस्तुत पद्यांश में किस समय का वर्णन किया गया है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में द्वितीय विश्वयुद्ध की उस भीषण तबाही का उल्लेख किया गया है, जब अमेरिका द्वारा हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराया गया था।

(iii) हिरोशिमा नगर में परमाणु बम विस्फोट के परिणाम क्या हुए?
उत्तर:
हिरोशिमा नगर के जिस स्थान पर बम गिराया गया था, वहाँ की भूमि बड़े बड़े गड्ढों में परिवर्तित हो गई थी, जिसे फटी मिट्टी कहा गया है। वहाँ बहुत अधिक मात्रा में विषैली गैसें निकल रहीं थीं और उनसे निकलने वाले ताप से समस्त प्रकृति मुलस रही थी। विस्फोट के दौरान निकली विकिरणें मान्य के अस्तित्व को मिटा रही थीं।

(iv) “काल-सूर्य के रथ के पहियों के ज्यों अरे टूट कर, बिखर गए हों” पंक्ति से कवि का क्या आशय है?
उत्तर:
परमाणु विस्फोट के पश्चात् सूर्य का उदय प्रतिदिन की तरह पूर्व दिशा से नहीं हुआ था, वरन् उसका उदय अचानक ही हिरोशिमा के मध्य स्थित भूमि से हुआ था। उस सूर्य को देखकर ऐसा आभास हो रहा था जैसे काल अर्थात् मृत्युरूपी सूर्य रथ पर सवार होकर उदित हुआ हो और उसके पहियों के उड़े टूट-टूटकर इधर-उधर दसों दिशाओं में जा बिखरे हों।

(v) ‘काल’ शब्द के तीन पर्यायवाची शब्द बताइए।
उत्तर:

शब्द पर्यायवाची शब्द
काल समय
क्षण वक्त

प्रश्न 4.
छायाएँ मानव-जन की, नहीं मिटीं लम्बी हो-होकर;
मानव ही सब भाप हो गए। छायाएँ तो अभी लिखीं हैं,
झुलसे हुए पत्थरों पर उजड़ी सड़कों की गच पर।
मानव का रचा हुआ सूरज मानव को भाप बनाकर सोख गया।
पत्थर पर लिखी हुई यह जली हुई छाया मानव की साखी है।

उपर्युक्त पद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

(i) प्रस्तुत पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से मानव द्वारा विज्ञान का दुरुपयोग किए जाने पर दुःख जताया गया है, ताकि परमाणु बम गिराने जैसी मानव-विनाशी गलती की पुनरावृत्ति न हो पाए।

(ii) कवि ने आकाशीय सूर्य की तुलना मानव निर्मित सुर्य से किस प्रकार की है?
उत्तर:
कवि आकाशीय सूर्य से मानव निर्मित सूर्य की तुलना करते हुए कहता है। कि आकाश का सूर्य हमारे लिए वरदान स्वरूप है, उससे हमें जीवन मिलता है, परन्तु मानव निर्मित सूर्य परमाणु बम अति विध्वंसक है, क्योंकि इसने अपनी विकिरणों से मानव को वाष्प में परिणत कर उसकी जीवन लीला ही समाप्त कर दी।

(iii) “आयाएँ तो अभी लिखीं हैं झुलसे हुए पत्थरों पर” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
परमाणु विस्फोट के दुष्परिणाम स्वरूप उत्सर्जित विकिरणों ने मानव को जलाकर वाष्य में बदल दिया, किन्तु उनकी छायाएँ लम्बी होकर भी समाप्त नहीं हुई हैं। विकिरणों से झुलसे पत्थरों तथा क्षतिग्रस्त हुई सड़कों की दरारों पर, वे मानवीय छायाएँ आज भी विद्यमान हैं और मौन होकर उस भीषण त्रासदी की कहानी कह रही हैं।

(iv) प्रस्तुत पद्यांश में कवि अत्यन्त मर्माहित क्यों हुआ है?
उत्तर:
प्रस्तुत पद्यांश में मानव जीवन की त्रासदी का वर्णन किया गया है। यहाँ मानव ही मानव के विध्वंस का कारण हैं। मानव के इस दानव रूप को देखकर कवि अत्यन्त मर्माहित हो उठा है।

(v) प्रस्तुत पद्यांश में कौन-सा रस है?
उत्तर:
मानव जाति के विध्वंस के कारण शोक की स्थिति उत्पन्न हुई है। अतः प्रस्तुत पद्यांश में करुण रस है।

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