UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 4 गृह-सज्जा (घर की सजावट)

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
घर की सजावट से क्या तात्पर्य है? घर की सजावट में आप किन-किन बातों को ध्यान में रखेंगी? सजावट के महत्त्व का वर्णन कीजिए। [2007, 10, 17]
गृह-सज्जा केवल धन पर ही निर्भर नहीं करती, गृहिणी की कलात्मक रुचि पर मुख्य रूप से निर्भर करती है। इस पर अपने विचार स्पष्ट कीजिए। [2013]
गृह-सज्जा से क्या तात्पर्य है? गृह-सज्जा की क्या उपयोगिता है?
घर की सजावट (गृह-सज्जा) के बारे में लिखिए। घर की सजावट करते समय आप किन बातों को ध्यान में रखेंगी? [2008, 09, 10]
सुव्यवस्था एवं सजावट से क्या तात्पर्य है? सजावट के समय किन उद्देश्यों को ध्यान में रखेंगी? [2016]
घर की सजावट करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखेंगी? [2016, 17, 18]
सजावट से क्या तात्पर्य है? [2016]
या
गृह-सज्जा क्या है? गृह-सज्जा क्यों आवश्यक है? उदाहरण सहित समझाइए। [2016]
उत्तर:

घर की सजावट से तात्पर्य

प्रत्येक वस्तु के सौन्दर्य एवं आकर्षण पक्ष का सम्बन्ध ‘कला’ से होता है। यह मनुष्य की विशिष्ट रुचि अथवा रुचियों की अभिव्यक्ति है। घर की सजावट का तात्पर्य इस बात से नहीं है कि घर में कीमती-से-कीमती वस्तुओं को इकट्ठा कर दिया जाए। (UPBoardSolutions.com) वास्तव में, घर की सजावट तो एक रचनात्मक कला है जो एक साधारण घर की भी कायाकल्प कर देती है। सजावटे ‘कला’ के नियमों पर ही आधारित होती है, क्योंकि सजावट में प्रयुक्त होने वाले साधनों में आकार, रंग एवं प्रकाश का ही महत्त्व होता है। अतः कला के मौलिक सिद्धान्तों का पालन करते हुए घर में विभिन्न वस्तुओं की रुचिपूर्ण व्यवस्था को गृह-सज्जा अथवा घर की सजावट कहते हैं।

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इस प्रकार स्पष्ट है कि घर की सजावट में कला तथा कल्पनाशीलता के समावेश की अवहेलना नहीं की जा सकती है। गृह-सज्जा के अर्थ को स्पष्ट करते हुए सुन्दरराज ने इन शब्दों में एक परिभाषा प्रस्तुत की है, “आन्तरिक सज्जा एक सृजनात्मक कला है जो कि एक साधारण घर की काया पलट कर सकती है…… यह घर में रहने वालों की मूलभूत तथा सांस्कृतिक आवश्यकताओं एवं घर में उपलब्ध स्थान एवं उपकरणों के मध्य समायोजन करने की कला है और इस प्रकार घर में एक सुखद वातावरण बनाने का प्रयास है।” प्रस्तुत परिभाषा द्वारा स्पष्ट है कि गृह-सज्जा द्वारा घर की दशा में उल्लेखनीय परिवर्तन हो जाता है। इसके माध्यम से (UPBoardSolutions.com) घर का वातावरण अच्छा बन जाता है, घर आकर्षक प्रतीत होने लगता है। तथा घर को देखकर घर में रहने वालों की रुचि, कलात्मक दृष्टिकोण तथा सांस्कृतिक मूल्यों का अनुमान भी सहज ही लगाया जा सकता है।

सजावट की उपयोगिता एवं महत्त्व

घर की सजावट की उपयोगिता एवं महत्त्व को वर्णन हम निम्नलिखित प्रकार से कर सकते हैं

(1) घर के आकर्षण में वृद्धि--सुसज्जित एवं सुव्यवस्थित घर अतिथियों एवं घर के सदस्यों-दोनों ही के लिए प्रसन्नता एवं आकर्षण का केन्द्र होता है। यह भी कहा जा सकता है कि गृह-सज्जा से घर के आकर्षण में वृद्धि होती है।

(2) कलात्मक रुचि की अभिव्यक्ति सुसज्जित घर गृहिणी की कलात्मक रुचि का परिचायक होता है।

(3) सुख एवं सन्तोष की प्राप्ति-सुसज्जित घर की गृहिणी एवं परिवार के सभी सदस्य सदैव सुख एवं सन्तोष का अनुभव करते हैं।

(4) स्वास्थ्य लाभ में सहायक-स्वच्छ एवं सुसज्जित घर में कीटाणुओं के पनपने की सम्भावना अत्यन्त कम होती है तथा घर के सभी सदस्य प्रायः स्वस्थ रहते हैं।

(5) वस्तुओं की सुरक्षा–सुव्यवस्थित एवं सुसज्जित घर में सभी वस्तुएँ उचित एवं 35 स्थान पर रखी रहती हैं, जिसके फलस्वरूप इनकी टूट-फूट की सम्भावना लभग नगण्य रहती है।

(6) समय एवं श्रम की बचत-एक सुव्यवस्थित एवं सुसज्जित घर में (UPBoardSolutions.com) वस्तुओं के : समय व्यर्थ नहीं करना पड़ता हैं। आवश्यकता पड़ने पर इच्छित वस्तु तुरन्त मिल जाते है। इन ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि उचित गृह-सज्जा से समय एवं श्रम की बचत होतो है।

(7) सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि–घर की सजावट से गृहिण व घर के अन्य सदस्यों की कलात्मक रुचि, विवेक एवं कार्यक्षमता का पता चलता है। इस प्रकार एक सुत्ररित एवं सुसज्जित घर की गृहिणी एवं परिवारजन समाज में सदैव प्रशंसा एवं प्रतिष्ठा के पा रहे हैं।

सजावट करते समय ध्यान देने योग्य बातें

घर की सजावट एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य है, परन्तु सजावट करते समय अन एवं समय का विवेकपूर्ण उपयोग, अपनी आर्थिक क्षमता का ज्ञान, कला के भौलिक सिद्धान्तों का पालन इत्यादि अनेक कारकों को दृष्टिगत रखना भी अत्यन्त आवश्यक है, अन्यथा (UPBoardSolutions.com) अनेक असुविधाओं का सामना कर, सकता है। सामान्यत: घर की सजावट करते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना आवश्यक है

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(1) आर्थिक क्षमता का ज्ञान-प्रत्येक गृहिणी को घर की सजावट करते समय पारिवारिक आय का ध्यान रखना चाहिए। उसे सजावट पर केवल उतना ही धन व्यय करना चाहिए जिससे कि परिवार की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाए तथा बचत पर कुप्रभाव न पड़े। उसे सजावट के लिए आय के अनुसार ही मूल्यवान सामग्री खरीदनी चाहिए।

(2) कला के मौलिक सिद्धान्तों का पालन–प्रत्येक गृहिणी को सजावट की वस्तुओं का प्रयोग करते समय उनके आकार, रंग, अनुरूपता, अनुपात इत्यादि पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

(3) सजावट की शैली का ध्यान–गृहिणी को अपनी रुचि अथवा आवश्यकता के आधार पर सजावट की देशी अथवा विदेशी शैली को अपनाना चाहिए।

(4) सजावट की सामग्री का विवेकपूर्ण क्रय-सजावट की वस्तुएँ खरीदते समय उनकी मजबूती तथा उत्तमता का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

(5) सजावट की सामग्री का उचित चुनाव-प्राय: घर की आवश्यकता एवं (UPBoardSolutions.com) उपलब्ध स्थान के अनुसार ही सजावट की सामग्री खरीदनी चाहिए। इसके अतिरिक्त सजावट की सामग्री; जैसे—सोफा, फर्नीचर, परदे इत्यादि के डिजाइन वे रंगों का रुचिपूर्ण एवं उपयुक्त चयन करना चाहिए।

(6) व्यवस्था का क्रम-सजावट की सामग्री को उचित स्थान पर रखना चाहिए; जैसे, सोफा, कलात्मक तस्वीरें इत्यादि बैठक अथवा ड्राइंग-रूम में रखी जानी चाहिए टी०वी० आदि का सयन कक्ष में रखा जा सकता है।

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प्रश्न 2.
घर की सजावट के मूलभूत सिद्धान्त कौन-कौन से हैं? संक्षेप में वर्णन कीजिए।
घर की आन्तरिक सजावट के क्या सिद्धान्त हैं? इनकी क्या उपयोगिता है? [2012, 14]
या
घर की आन्तरिक सजावट से क्या तात्पर्य है? घर की सजावट के लिए किन-किन सिद्धान्तों को ध्यान में रखना चाहिए और क्यों? [2008, 11, 12]
या
भीतरी सजावट के प्रमुख सिद्धान्त लिखिए। [2007, 17, 18]
उत्तर:
घर की सजावट के सिद्धान्त जैसा कि हम जानते हैं कि गृह-सज्जा अपने (UPBoardSolutions.com) आप में एक व्यवस्थित कला एवं विज्ञान है; अतः गृह-सज्जा का कुछ सिद्धान्तों पर आधारित होना स्वाभाविक है। विद्वानों ने गृह-सज्जा के तीन मुख्य
गृह-सज्जा (घर की सजावट) 55 सिद्धान्तों का उल्लेख किया है। ये सिद्धान्त क्रमश:
इस प्रकार हैं–

  1. सुन्दरता,
  2. अभिव्यक्ति तथा
  3. उपयोगिता। गृह-सज्जा के इन तीनों सिद्धान्तों का संक्षिप्त परिचय निम्नवर्णित है-

(1) सुन्दरता--गृह-सज्जा का मूलभूत तथा मुख्य सिद्धान्त है–सुन्दरता। आदिकाल से ही व्यक्ति सुन्दरता का उपासक है। व्यक्ति स्वभाव से ही सौन्दर्यप्रिय है तथा अपनी प्रत्येक वस्तु एवं पर्यावरण को सुन्दर एवं आकर्षक देखना चाहता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है। कि गृह-सज्जा को उद्देश्य घर को सुन्दर एवं आकर्षक बनाना होता है। सुन्दरता के अभाव में किसी भी घर को सुसज्जित नहीं माना जा सकता, भले ही घर में असंख्य बहुमूल्य वस्तुएँ क्यों न एकत्र कर दी जाएँ।
सैद्धान्तिक रूप से यह स्वीकृत है कि सुसज्जित गृह को सुन्दर एवं आकर्षक होना चाहिए, (UPBoardSolutions.com) पत। प्रश्न यह उठता है कि सुन्दरता से क्या आशय है? सुन्दरता के अर्थ को प्रस्तुत करना इतना सरल नई है। यह एक जटिल प्रश्न है तथा भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से इसकी व्याख्या की जाती रही है। भिन्न-भिन्न कालों में सुन्दरता के प्रतिमान बदलते रहे हैं।

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इस कठिनाई के होते हुए भी सुन्दरता को परिभाषित करने के प्रयास सदैव होते रहे हैं। ए० एच० रट (A. H. Rutt) के शब्दों में, “सुन्दरता गुणों का वह संयोजन है, जो पारखी आँखों या कानों को सुखद लगे।” इसी से मिलती-जुलती परिभाषा सुन्दरराज ने इन शब्दों में प्रस्तुत की है, “सुन्दरता वह तत्त्व अथवा गुण है, जो इन्द्रियों को आनन्दित करता है तथा आत्मा को उच्च अनुभूति देता है।” इस कथन के आधार पर कहा जा सकता है कि सुन्दरता का सम्बन्ध हमारे शरीर तथा आत्मा दोनों से होता है। सुन्दरता सदैव आनन्ददायक होती है तथा उसका प्रभाव प्रत्येक व्यक्ति पर पड़ता है। गृह-सज्जा में निहित सुन्दरता का अच्छा प्रभाव घर में रहने वाले समस्त व्यक्तियों पर पड़ता है।

घर की आन्तरिक सुन्दरता व्यक्ति एवं परिवार को सुख देने में सहायक होती है। अब प्रश्न उठता है कि गृह-सज्जा में सौन्दर्य का समावेश कैसे हो? इस विषय में रट महोदय का कहना है कि गृह-सज्जा में सौन्दर्य का विकास अध्ययन, निरीक्षण तथा अनुभव द्वारा किया जा सकता है। आजकल प्राय: सभी पत्र-पत्रिकाओं में गृह-सज्जा सम्बन्धी अनेक लेख प्रकाशित होते रहते हैं। इसी प्रकार दूरदर्शन तथा फिल्मों के माध्यम से भी गृह-सज्जा में सौन्दर्य के तत्त्व को जाना जा सकता है। गृहिणी अपने अनुभवों द्वारा भी गृह-सज्जा को अधिक सुन्दर एवं आकर्षक बना सकती है। वर्तमान समय में दूरदर्शन के प्रायः सभी धारावाहिक अपने मूल (UPBoardSolutions.com) कथानक के प्रदर्शन के साथ-ही-साथ गृह-सज्जा एवं उत्तम जीवन-शैली को भी दर्शाया करते हैं।

(2) अभिव्यक्ति-गृह-सज्जा का एक सिद्धान्त अभिव्यक्ति या अभिव्यंजकता भी है। गृह-सज्जा के माध्यम से कुछ-न-कुछ स्पष्ट अभिव्यक्ति होती है। इसी अभिव्यक्ति के आधार पर गृह-सज्जा का मूल्यांकन किया जाता है। अभिव्यक्ति एक व्यक्तिगत विशेषता मानी जा सकती है, जो गृह-सज्जा द्वारा प्रकट होती है। इस तथ्य को सुन्दरराज ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है, “यह वह गुण है, जो एक घर को दूसरे से भिन्न बनाता है। यह घर में रहने वाले सदस्यों के व्यक्तित्व को स्पष्टतः प्रतिबिम्बित करता है।”

अब प्रश्न उठता है कि गृह-सज्जा के सन्दर्भ में अभिव्यक्ति का क्या स्थान एवं महत्त्व है? इस विषय में टी० एफ० हेमलिन (T. F. Hamlin) ने स्पष्ट किया है, “प्रत्येक भवन, प्रत्येक सुनियोजित कक्ष में यह सामर्थ्य होनी चाहिए कि वह हमें आनन्द, शान्ति अथवा शक्ति का सन्देश दे सके।” स्पष्ट है कि गृह-सज्जा से भावनाओं एवं विचारों की अभिव्यक्ति होती है। गृह-सज्जा के माध्यम से विश्रांति, जीवन्तता, स्वाभाविकता, आत्मीयता, औपचारिकता तथा दृढ़ता आदि भावनाएँ प्रकट होती हैं।

इस प्रकार की भावनाओं को अभिव्यक्त करने वाली गृह-सज्जा को उत्तम गृह-सज्जा माना जाता है। इससे भिन्न यदि किसी गृह-सज्जा से भड़कीलापन या सुरुचि एवं स्वच्छता की कमी अभिव्यक्त होती हो तो उस गृह-सज्जा को उत्तम नहीं माना जाएगा। (UPBoardSolutions.com) उत्तम गृह-सज्जा से औपचारिकता, अनौपचारिकता, स्वाभाविकता तथा आधुनिकता के गुणों की भी अभिव्यक्ति होनी चाहिए।

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(3) उपयोगिता-गृह-सज्जा का एक मूल सिद्धान्त है–गृह-सज्जा का उपयोगी होना। भवननिर्माण के सन्दर्भ में एक अमेरिकी वास्तुकार लुई सलीवन का कथन है कि भवन की आकृति को
व्यावहारिक होना चाहिए। इस मान्यता के अनुसार गृह-सज्जा को उपयोगी होना चाहिए। निरर्थक एवं कोरी सजावट उचित नहीं होती। इस सिद्धान्त के अनुसार घर का निर्माण तथा उसकी सज्जा वैज्ञानिक तथा एक सुनिश्चित दृष्टिकोण के अनुसार होनी चाहिए।

जिस प्रकार किसी यन्त्र या उपकरण से हम अधिकतम कार्यशीलता की अपेक्षा करते हैं, उसी प्रकार घर से भी अधिकतम सुविधा तथा उपयोगिता की अपेक्षा की जाती है। यह तभी सम्भव है, जब कि गृह-सज्जा में उपयोगिता के सिद्धान्त का समावेश हो। इस सिद्धान्त को महत्त्व देते हुए यह ध्यान रखा जाता है कि गृह-सज्जा के लिए केवल उन्हीं वस्तुओं एवं उपकरणों को चुना जाए जो उपयोगी हों। जो वस्तुएँ या उपकरण उपयोगी नहीं होते, उन्हें एकत्र करना उचित नहीं माना जाता। इस मान्यता के अनसार घर के प्रत्येक कक्ष में उपयोगिता को ध्यान में रखकर ही वस्तुओं को रखा जाता है। गृह-सज्जा के लिए अपनाई जाने (UPBoardSolutions.com) वाली प्रत्येक वस्तु की उपयोगिता की भली – भाँति परख कर लेनी चाहिए।

उदाहरण के लिए-सोफा एवं सोफे का कवर ऐसा । होना चाहिए, जो अधिक मजबूत, टिकाऊ एवं सुविधाजनक हो। अनावश्यक मीनाकारी, कढ़ाई एवं कृत्रिम सुन्दरता को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। इसी प्रकार परदे तथा कालीन भी मजबूत एवं पक्के रंग के होने चाहिए। जो वस्तुएँ किसी प्रकार की असुविधा उत्पन्न करती हों, उन्हें गृह-सज्जा में स्थान नहीं दिया जाना चाहिए।
यहाँ यह स्पष्ट कर देना अनिवार्य है कि उपयोगिता के सिद्धान्त को मानते हुए गृह-सज्जा में सुन्दरता एवं आकर्षकता के तत्त्व की पूर्ण अवहेलना नहीं की जानी चाहिए। वास्तव में सुन्दरता तथा उपयोगिता, कला तथा विज्ञान का समन्वय होना चाहिए। गृह-सज्जा में समन्वयात्मक सिद्धान्त को ही अपनाया जाना चाहिए, जिसमें सुन्दरता, अभिव्यक्ति तथा उपयोगिता का समुचित समावेश हो।

प्रश्न 3
गृह-सज्जा के कलात्मक सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
या
सजावट के मूलभूत आधार क्या हैं? सजावट में रंग-व्यवस्था का क्या महत्त्व है? स्पष्ट कीजिए।
या गृह-सज्जा के मूलभूत कलात्मक सिद्धान्त कौन-से हैं? किन्हीं दो सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
गृह-सज्जा के कलात्मक सिद्धान्त (आधार) कला किसी सुन्दर विषय-वस्तु के प्रति मनुष्य की अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति है। इसके उदाहरण हैं–प्रकृति, संगीत, गीत, मूर्ति निर्माण, चित्रकला, सुन्दर-सुन्दर भवनो के निर्माण इत्यादि। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कला का अपना अलग महत्त्व है। कला के निर्माण के चार मुख्य तत्त्व हैं-रेखाएँ, आकार, बनावट की विधियाँ तथा रंग। गृह-सज्जा में कला के इन मूल तत्त्वों के आधार पर कुछ मूलभूत सिद्धान्तों का पालन किया जाता है। गृह-सज्जा के प्रमुख मूलभूत सिद्धान्त निम्नलिखित हैं-

  1.  समानुपात,
  2.  लय,
  3. सबलता या क्रम,
  4. सन्तुलन तथा
  5. अनुकूलन।।

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(1) समानुपात-गृह-सज्जा का एक प्रमुख सिद्धान्त है-समानुपात का सिद्धान्त। कमरे में फर्नीचर व्यवस्थित करने, पुष्प एवं चित्र लगाने, दीवारों की सजावट इत्यादि में वस्तु एवं पृष्ठभूमि में समानुपात का ध्यान रखना चाहिए। समानुपात डिजाइन बनाने का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है। इसमें किसी वस्तु की लम्बाई, चौड़ाई एवं ऊँचाई के तुलनात्मक सम्बन्धों का ध्यान रखना होता है। उदाहरण के लिए—मकान के कमरों व उनके (UPBoardSolutions.com) दरवाजो एवं खिड़कियों की लम्बाई, चौड़ाई व ऊँचाई समानुपात के नियमों के अनुसार रखने पर उनकी शोभा बढ़ जाती है। एक बड़े कमरे में उसी अनुपात में रखा बड़ी सोफा तथा उसके पीछे दीवार पर समानुपात मे लगा बड़े आकार का चित्र अधिक अच्छे लगते हैं। इसी प्रकार फूलदान व फूलों में नियमित समानुपात रखने पर पुष्प-सज्जा अधिक आकर्षक प्रतीत होती है।

(2) लय-आकृतियों, नापों, रेखाओं तथा रंगों के सम्बन्ध को लय कहते हैं। इसका गति से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। इसमें रेखाओं, आकृतियों व रंगों आदि का प्रयोग बार-बार एक निश्चित क्रम में किया जाता है। घर की सजावट में प्रत्येक स्थान पर लय का होना आवश्यक है।

(3) सबलता या क्रम-दृश्य-कला; जैसे—चित्र, मूर्ति, कशीदाकारी, आदि; में कुछ अंश प्रमुख होते हैं। ये आकर्षण बिन्दु होते हैं तथा सबल अंश कहलाते हैं। सबलता का यह सिद्धान्त गृह-सज्जा में
भी प्रयुक्त होता है। घर के किसी भी कमरे में खिड़की के परदे, अच्छे चित्र, दरी-कालीन आदि में से कोई भी एक आकर्षण का केन्द्र हो सकता है, परन्तु कमरे की सजावट में आकर्षण बिन्दु एक अथवा . दो से अधिक नहीं होने चाहिए।

(4) सन्तुलन--विभिन्न आकारों, डिजाइनों व रंगों इत्यादि के मध्य व्यवस्थित सम्बन्ध सन्तुलन कहलाता है। सन्तुलन दो प्रकार का होता है–
(अ) औपचारिक-यह नियमित सन्तुलन होता है। इसमें प्रमुख केन्द्रबिन्दु के दोनों ओर समान भार व समान आकृतियों की वस्तुओं को समान दूरी पर व्यवस्थित किया जाता है।
(ब) अनौपचारिक–यह अनियमित सन्तुलन अधिक प्रभावशाली माना जाता है। इसमें किसी असमान भार वाली वस्तुओं को केन्द्र-बिन्दु के दोनों ओर असमान दूरियों पर व्यवस्थित किया जाता है।

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(5) अनुकूलन-जब वस्तुओं में पर्याप्त आपसी समानता दिखाई देती है तो इसे अनुकूलन अथवा अनुरूपता कहते हैं। गृह-सज्जा में अनुकूलता के सिद्धान्त को कला के चारों प्रमुख तत्त्वों; रेखा, आकार, बनावट तथा रंग; के प्रयोग में लागू कर सकते हैं।
| गृह-सज्जा में रंग व्यवस्था का महत्त्व उचित रंग कमरे की शोभा को (UPBoardSolutions.com) जहाँ चार-चाँद लगा सकते हैं, वहीं अनुचित रंग उसको भद्दा भी बना सकते हैं। बढ़िया कपड़े का परदा कलात्मक दृष्टि से किसी काम का नहीं यदि उसका रंग कमरे के अनुकूल नहीं बैठता। कभी-कभी साधारण-सी वस्तु से उपयुक्त रंग के कारण कमरे की सज्जा का प्रभाव कहीं अधिक बढ़ जाता है।

प्रश्न 4
गृह को सुसज्जित करने के क्या-क्या साधन हैं? सविस्तार वर्णन कीजिए। 2018, 10, 11]
या
घर के पर्दे एवं चित्रों का चुनाव किस प्रकार करेंगी? समझाइए। 2011]
फूलों तथा चित्रों का दैनिक जीवन में क्या महत्त्व है? 2008, 11, 12]
या
घर की आन्तरिक सज्जा से आप क्या समझती हैं? गृह-सज्जा के लिए उपयोगी साधनों के बारे में लिखिए। 2007, 12, 14]
फूलों एवं चित्रों का गृह-सज्जा में महत्त्व लिखिए। [2011, 12, 13, 14, 15, 16, 17}
घर की सजावट में फर्नीचर का क्या महत्त्व है? (2015
या
गृह-सज्जा में पदें व पुष्प का क्या महत्त्व है? 2018
उत्तर:
(संकेत-घर की आन्तरिक सज्जा के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 का आरम्भिक भाग देखें। गृह-सज्जा के साधन घर की सजावट के प्रमुख साधन निम्नलिखित हैं
(1) फर्नीचर-कुर्सियां, मेजें, डेस्कें, सोफे, पलंग, तख्त, दीवाने, चौकियाँ, अलमारियाँ, रैके, शैल्फ इत्यादि प्रमुख प्रकार के फर्नीचर हैं। प्रायः फर्नीचर लकड़ी, स्टील व ऐलुमिनियम के बनते हैं। लकड़ी के फर्नीचर अधिक मूल्यवान होते हैं। फर्नीचर (UPBoardSolutions.com) खरीदते समय इसकी आवश्यकता, टिकाऊपन व अपनी आर्थिक स्थिति का विशेष ध्यान रखनी चाहिए। सजावट के लिए फर्नीचर खरीदते समय घर में इसके लिए उपलब्ध स्थान का भी ध्यान रखना चाहिए। महानगरों में प्रायः स्थान बचाऊ फर्नीचर; जैसे–फोल्डिग कुर्सियाँ, मेज व पलंग आदि; का प्रयोग किया जाता है।

(2) परदे-खिड़कियों एवं दरवाजों पर आर्थिक स्थिति के अनुसार मूल्य के रंग-बिरंगे परदे लगाए जाते हैं। परदे का उपयोग गोपनीयता के लिए तथा वायु, प्रकाश, गर्मी एवं ठण्ड से बचाव केलिए किया जाता है। परदे कमरे को सुन्दर एवं आकर्षक बनाते हैं; अत: घर के विभिन्न कमरों के लिए परदों के डिजाइन व रंगों का चयन करते समय विवेक का प्रयोग करना चाहिए। परदे घर की सजावट का महत्त्वपूर्ण साधन हैं।

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(3) दरी एवं कालीन-इनका उपयोग ठण्डे प्रदेशों में ठण्ड से बचाव के लिए तथा कच्चे एवं सीमेण्ट के फर्श को ढकने के लिए होता है। आजकल दरी के स्थान पर जूट की बनी चटाई प्रयोग में
लाई जाती हैं। कालीन एक मूल्यवान वस्तु है; अत: इनको खरीदते समय अपनी आर्थिक क्षमता को विशेष ध्यान रखना चाहिए। इसके अतिरिक्त कालीन का नाप, रंग व डिजाइत परदों के डिजाइन व रंग से समन्वित एवं सन्तुलित होना चाहिए।

(4) चित्र एवं मूर्तियाँ-घर की सजावट के लिए यह सबसे अधिक उपयोग में आने वाला साधन है। तैलचित्र हों अथवा पेन्टिग्स, विभिन्न कमरों को सजाते समय इनकी विशेषताओं को ध्यान में रखना चाहिए। उदाहरण के लिए-ड्राइंग-रूम में महापुरुषों के चित्र तथा शयन-कक्ष में शृंगारिक चित्रों को लगाना उचित रहता है। कहने का तात्पर्य यह है कि कौन-सा कमरा किस उपयोग का है। उसमें उसी के अनुरूप चित्र लगाने चाहिए। मूर्तियों एवं खिलौनों का उपयोग भी उपर्युक्त नियमों के अनुसार ही किया जाना चाहिए।

(5) पुष्प-सज्जा-फूल एवं साज-सज्जा वाले पौधे भी चित्र एवं मूर्तियों के समान सजावट का प्रमुख साधन हैं। इनके द्वारा घर की बाह्य एवं आन्तरिक दोनों प्रकार की सजावट की जा सकती है। उदाहरण के लिए भूमि अथवा गमलों में लगे फूल वाले तथा साज-सज्जा वाले पौधे घर की बाह्य सजावट के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं तथा फूलों को फूलदान व अन्य पात्रों में लगाकर घर की
आन्तरिक सजावट की जाती है। घर की सजावट में फूलों को विविध प्रकार से उपयोग में लाया जाता। है। उदाहरण के लिए—इन्हें ड्राइंग-रूम में, पढ़ने के कमरे अर्थात् स्टडी में, किताबों की शेल्फ पर रखे फूलदान में तथा भोजन-कक्ष में भोजन की मेज आदि पर सजाया जाता है।

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प्रश्न 5
बैठक (ड्राइंग-रूम) से क्या आशय है? घर के इस कमरे के महत्त्व एवं सजावट की विभिन्न शैलियों का वर्णन कीजिए। घर में बैठक का क्या महत्त्व है? अपने घर की बैठक को आप किस प्रकार सजाएँगी? स्पष्ट कीजिए। [2018]
या
बैठक की सजावट के उपकरण तथा विधि लिखिए।
या
बैठक की सजावट में किन-किन वस्तुओं का होना आवश्यक है? [2011, 12, 13, 14, 16]
उत्तर:
बैठक (ड्राइंग-रूम) से आशय

प्रत्येक व्यक्ति के घर पर किसी-न-किसी प्रयोजन से समय-समय पर कुछ लोग मिलने के लिए अवश्य आया करते हैं। इनमें से कुछ व्यक्तियों के साथ तो घनिष्ठ मित्रता के सम्बन्ध होते हैं तथा कुछ के साथ केवल औपचारिक सम्बन्ध ही होते हैं। औपचारिक सम्बन्ध वाले व्यक्तियों को हम हर समय अपने शयन-कक्ष में या भोजन के कमरे में नहीं बैठा सकते। स्पष्ट है कि इस प्रकार के आगन्तुकों के स्वागत एवं बैठाने के लिए एक कमरा अलग से होना (UPBoardSolutions.com) चाहिए। इसी कमरे को बैठक या ड्राइंग रूम कहा जाता है। आजकल प्रायः सभी घरों में ड्राइंग-रूम बनाने का प्रचलन है। ड्राइंग-रूम में प्रत्येक बाहर से आने वाले व्यक्ति को बैठाया जाता है। सामान्य रूप से यह कमरा घर के मुख्य द्वार के निकट ही बनाया जाता है, ताकि बाहर से आने वाले व्यक्तियों को सुविधापूर्वक वहीं बैठाया जा सके। बैठक का महत्त्व ड्राइंग-रूम अथवा बैठक प्रत्येक घर का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भाग होता है, क्योंकि

  1. इसमें बाहर से आने वाले व्यक्तियों एवं अतिथियों का स्वागत किया जाता है। अतः इस कमरे की सजावट अन्य कमरों से अधिक सुरुचिपूर्ण एवं विवेकपूर्ण होती है।
  2. यह घर के मुख्य द्वार का निकटतम कमरा होता है। घर के अन्य कमरों में चाहे सजावट न हो, परन्तु ड्राइंग-रूम को सदैव सजावट द्वारा सुरुचिपूर्ण बनाया जाता है।
  3.  आगन्तुक प्रायः इसी कमरे में बैठते हैं; अत: इससे घर की गोपनीयता बनी रहती है।
  4.  बैठक की साज-सज्जा घर के रहन-सहन के स्तर एवं संस्कृति की परिचायक होती है।
  5. बैठक की सजावट-मुख्य शैलियों द्वारा पूरे घर में बैठक को रहन-सहन के स्तर के अनुरूप पूर्ण सूझ-बूझ के साथ सजाया जाता है।

सजावट करने की विभिन्न विधियों को तीन प्रमुख शैलियों में विभाजित किया जाता है-

  1. परम्परागत देशी शैली,
  2.  विदेशी शैली तथा
  3.  मिश्रित शैली।

(1) सजावट की परम्परागत देशी शैली-यह मूल रूप से भारतीय शैली की सजावट की पद्धति है। इसमें एक तख्त या दीवान बिछाया जाता है जिस पर एक सुन्दर चादर बिछाई जाती है। दीवान पर मसनद या गाव तकिए रखे जाते हैं। बैठक के आकार एवं उपलब्ध स्थान के अनुसार मूढ़े भी रखे जाते हैं। मूढ़ों पर आकर्षक गद्दियाँ रखी जाती हैं। बैठक के फर्श पर दरी बिछाई जाती है। कमरे के केन्द्रीय भाग में दरी पर कालीन बिछाया जाता है। कमरे के सिरे पर एक सुन्दर अलमारी रखी जाती है। इस पर रेडियो अथवा टी० वी० भी रखा जा सकता है। इसके अन्य खानों में सजावट की वस्तुएँ अथवा उच्चकोटि की पुस्तकें रखी जा सकती हैं। दीवारों की सजावट आकर्षक चित्रों एवं अन्य सामग्रियों द्वारा की जाती है।
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(2) सजावट की विदेशी शैली—इस शैली में दीवान व मूढ़ों के स्थान पर सोफा लगाया जाता है। कमरे के आकार एवं उपलब्ध स्थान के आधार पर सोफे संख्या में दो अथवा अधिक भी हो सकते हैं। फर्श पर आवश्यकतानुसार दरी व कालीन बिछाए जा सकते हैं। प्रत्येक सोफे के सामने एक सेण्टर-टेबल रखी जा सकती है। यह सनमाइका या काँच की। हो सकती है, अन्यथा इस पर कपड़े या प्लास्टिक का सुन्दर कवर भी भाग बिछाया जा सकता है। दो छोटी मेजें भी रखी जा सकती हैं, जिन्हें साइड टेबिल कहा जाता है। इन पर ऐश-ट्रे आदि रखी जा सकती हैं। कमरे में एक ओर एक आकर्षक कैबिनेट में टी० वी० रखा जा सकता है। दीवारों (UPBoardSolutions.com) पर साधारण अथवा तैल-चित्र सजाए जा सकते हैं। दरवाजों एवं खिड़कियों पर आकर्षक परदे लगाए जा सकते हैं। परदों, दीवारों व अन्य सामग्रियों का चयन करते समय विरोधी एवं सहयोगी रंगों का ध्यान रखना चाहिए। रंगों का उपयुक्त चुनाव सजावट के आकर्षण को कई गुना बढ़ा देता है।

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(3) सजावट की मिश्रित शैली– इसमें देशी एवं विदेशी दोनों शैलियों का उपयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए-दीवान तथा सोफा दोनों का उपयोग किया जाता है। इसी प्रकार विभिन्न प्रकार की कुर्सियाँ तथा मूढ़े दोनों ही रखे जाते हैं। यद्यपि इस शैली में कोई मौलिकता नहीं होती फिर भी यह शैली”अधिक लोकप्रिय एवं सुविधाजनक है।

प्रश्न 6
खाने के कमरे (डाइनिंग रूम) की सजावट आप कैसे करना पसन्द करेंगी और क्यों?
देशी तथा विदेशी शैली के अनुसार खाने के कमरे (भोजन-कक्ष) की साज-सज्जा आप किस प्रकार करेंगी?
भारतीय तथा पाश्चात्य शैली के भोजन-कक्ष में क्या अन्तर है? विस्तारपूर्वक लिखिए। भोजन-कक्ष की सजावट की विधि लिखिए। [2013]

उत्तर:
मानव जीवन में भोजन ग्रहण करने का विशेष महत्त्व है। व्यक्ति भोजन जुटाने के लिए ही अनेक परेशानियाँ उठाता है। एक समय था, जब लोग पाकशाला या रसोईघर में ही बैठकर शान्त भाव से भोजन ग्रहण किया करते थे। उस समय जीवन सादा एवं सरल तथा कर्म व्यस्त था। आज जीवन बदल गया है। आज पाकशाला में बैठकर भोजन ग्रहण करने की सुविधा नहीं है। आधुनिक घरों में प्रायः रसोईघर काफी छोटे होते हैं; अत: वहाँ बैठकर भोजन ग्रहण करना कठिन होता है। इसके अतिरिक्त जीवन व्यस्त होने के कारण अनेक बार जूते-मोजे तथा पैंट-कोट पहने हुए ही भोजन ग्रहण करना पड़ता है। इस दशा में रसोईघर में बैठकर भोजन (UPBoardSolutions.com) नहीं किया जा सकता। इन समस्त परिस्थितियों पर विचार करते हुए आजकल प्रायः सभी घरों में भोजन को अलग कमरा बनाया जाता है। इस कमरे को ही भोजन का कमरा’ या ‘डाइनिंग रूम’ (Dining room) कहा जाता है।

खाने के कमरे की सजावट

खाने के कमरे की सजावट में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है-सफाई। खाने का कमरा हर प्रकार से स्वच्छ होना चाहिए। इस कमरे में संवातन तथा प्रकाश की भी समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। खाने के कमरे की सजावट की मुख्य शैलियों या विधियों का संक्षिप्त विवरण निम्नवर्णित है

(1) परम्परागत देशी शैली-भारतीय शैली में भोजन ग्रहण करने के लिए चौकी, पटरी अथवा आसन का उपयोग किया जाता है। देशी शैली में भोजन-कक्ष में सुविधाजनक चौकी, पटरी अथवा आसन की व्यवस्था की जाती है। चौकियों पर सुन्दर-सुन्दर मेजपोश बिछाए जाते हैं। भोजन करते समय रेक्सिन अथवा प्लास्टिक के कपड़े चौकियों पर बिछाए जाते हैं। ये सुन्दर तथा आकर्षक डिजाइनों व रंगों के होते हैं और भोजन गिरने पर स्थायी रूप से गन्दे नहीं होते। दीवारों की सजावट बैठक के कमरे की अपेक्षा साधारण होती है। भोजन कक्ष में रेफ्रिजेरेटर या पानी रखने का कोई अन्य साधन भी रखा जाता है। भोजन-कक्ष प्रायः रसोईघर से जुड़ा होता है, ताकि भोजन लाने-ले-जाने की सुविधा रहे। देशी शैली में भोजन थालियों एवं कटोरियों में परोसा जाता है; अत: भोजन-कक्ष में बर्तन रखने के लिए अलमारी भी रखी जा सकती है।

(2) विदेशी शैली—इस शैली में भोजन-कक्ष में एक बड़ी मेज (डाइनिंग टेबल) तथा इसके चारो ओर बिना हत्थे वाली चार अथवा छ: कुर्सियाँ (डाइनिंग चेयर्स) लगाई जाती हैं। डाइनिंग टेबल की ऊपरी सतह पर रेक्सिन, शीशा अथवा सनमाइका लगी होती है। इसका लाभ यह होता है कि भोजन इत्यादि गिरने पर डाइनिंग टेबल को सरलतापूर्वक साफ किया जा सकता है। रेफ्रिजरेटर अथवा पानी के किसी अन्य साधन की व्यवस्था भी भोजन-कक्ष में ही की जानी चाहिए।

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(3) भोजन-कक्ष निश्चित रूप से रसोईघर से जुड़ा होना चाहिए। भोजन-कक्ष में एक ओर हाथ-मुँह धोने के लिए एक वाशबेसिन लगा होना चाहिए। इसमें साबुन व स्वच्छ तौलिए की व्यवस्था होनी चाहिए। भोजन-कक्ष के दरवाजे एवं खिड़कियों पर साधारण, परन्तु स्वच्छ एवं आकर्षक परदे लगे होने चाहिए। भोजन-कक्ष की खिड़कियों पर लोहे के तार की जाली लगानी आवश्यक है। यह भोजन-कक्ष में मक्खियों को प्रवेश नहीं करने देती। दीवारों पर अच्छे-अच्छे चित्र व डाइनिंग टेबल पर पुष्पों से सज्जित फूलदान भोजन प्राप्त करने वालों के मन को प्रसन्न करते हैं।

प्रश्न 7
शयन-कक्ष की सजावट का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
या
घर में शयन-कक्ष कहाँ होना चाहिए तथा उसकी सजावट में किन बातों का ध्यान रखना आप आवश्यक समझती हैं? स्पष्ट कीजिए।
या
शयन-कक्ष की सजावट की वस्तुओं की सूची बनाइए। [2013
उत्तर:
घर में शयन-कक्ष विश्राम के लिए नींद सर्वाधिक आवश्यक है। नींद के लिए शान्त एवं एकान्त वातावरण आवश्यक होता है; अतः सोने के लिए अलग से एक कमरा निर्धारित किया जाता है। इस कमरे को ही ‘शयन- कक्ष’ कहा जाता है। मकान में शयन-कक्ष के लिए ऐसे कमरे का चुनाव करना चाहिए जहाँ अधिक शोर की सम्भावना न हो तथा जिस कमरे में से होकर आना-जाना आवश्यक न हो। जहाँ तक सम्भव हो बाहरी द्वार से पीछे हटकर ही शयन-कक्ष होना चाहिए। शयन-कक्ष हवादार एवं साफ होना चाहिए।

शयन-कक्ष की सजावट में ध्यान रखने योग्य बातें

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शयन-कक्ष की सजावट विशेष रुचिपूर्वक करनी चाहिए। शयन-कक्ष में सर्वाधिक आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण वस्तु है—पलंग। पलंग अधिक-से-अधिक आरामदायक होना चाहिए। पलंग पर अच्छी-से-अच्छी चादर बिछाई जानी । चाहिए। पलंग के अतिरिक्त शयन-कक्ष में एक (UPBoardSolutions.com) या दो साइड-टेबिल भी होने चाहिए। इन पर पानी-दूध आदि रखे जा सकते हैं। शयन-कक्ष में ही श्रृंगार-मेज भी रखी जाती है। श्रृंगार-मेज के दर्पण पर अच्छे कपड़े का कवर डाला जा सकता है।

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शयन-कक्ष को सुसज्जित करने के लिए गहरे रंग के मोटे कपड़े के परदे लगाए जा सकते हैं। इससे एकान्त प्राप्त होता है तथा बाहरी धूप, चौंध आदि से भी बचा जा सकता है। शयन-कक्ष में अन्य प्रकाश के अतिरिक्त नाइट बल्ब अवश्य लगाया जाता है। शयन-कक्ष को सुसज्जित करने के लिए कुछ कलाकृतियाँ भी रखी जा सकती हैं। यदि इस कक्ष में केवल पति-पत्नी को ही सोना हो, तो कुछ शृंगारिक चित्र एवं मूर्तियाँ भी रखी जा सकती हैं। शयन-कक्ष की सजावट में कमरे में सोने वालों की रुचि का सर्वाधिक महत्त्व होता है। इसमें दिखावट या प्रदर्शन के दृष्टिकोण से सज्जा नहीं की जाती। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि शयन-कक्ष की सजावट की प्रमुख विशेषता है-विश्राम में सहायक होना।

प्रश्न 8
रसोईघर की सजावट आप किस प्रकार करेंगी? समझाइए।
उत्तर:
रसोईघर प्रत्येक घर का एक महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। यहाँ से परिवार के सभी सदस्यों एवं अतिथियों को भोजन सुलभ होता है। अत: इसका स्वच्छ तथा कीटाणु एवं कीट-पतंगों रहित रहना स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से अत्यन्त आवश्यक है। प्रत्येक घर में गृहिणी प्रायः रसोईघर की संचालिका होती है। उसे परिवार के लिए अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य भी करने होते हैं। इसलिए रसोईघर का गृहिणी के लिए सुविधाजनक होना अत्यावश्यक है। धुओं व गन्दे पानी के निकलने की (UPBoardSolutions.com) व्यवस्था, पानी, प्रकाश एवं वायु की उचित व्यवस्था, बर्तन एवं खाद्य पदार्थ रखने की व्यवस्था तथा व्यवस्थित प्रकार से रखे हुए यन्त्र एवं उपकरण गृहिणी की कार्यकुशलता में अपार वृद्धि करते हैं। गृहिणी रसोईघर की सजावट प्राय: निम्नलिखित शैलियों द्वारा करती है

(1) परम्परागत देशी शैली–इस शैली में व्यवस्थित रसोईघर में गृहिणी भोजन बनाना, बर्तन धोना आदि सभी कार्य बैठकर करती है। इसमें एक ओर चूल्हा अथवा अँगीठी होती है जिसका धुआँ बाहर जाने के लिए रसोईघर की छत में व्यवस्था होती है। रसोईघर में पानी की व्यवस्था के लिए एक नल लगा होता है। एक सुव्यवस्थितं एवं सुसज्जित रसोईघर में नल के पास ही एक अलमारी अथवा रैक होती है, ताकि साफ करने के बाद बर्तन इसमें सुविधापूर्वक रखे जा सकें। अलमारी में सभी खाद्य पदार्थ एवं मिर्च-मसाले अलग-अलग बन्द डिब्बों में उनके नाम की चिटें लगाकर रखे जाते हैं। रसोईघर से गन्दे पानी के निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।

(2) विदेशी शैली–इस शैली में व्यवस्थित रसोईघर में गृहिणी भोजन बनाना, बर्तन साफ करना आदि सभी कार्य खड़े होकर करती है। इसके लिए रसोईघर का आकार थोड़ा बड़ा तथा उपलब्ध स्थान अधिक होना चाहिए। रसोईघर के दरवाजे के सामने व दोनों ओर खड़े होकर कार्य करने योग्य ऊँचे सीमेण्ट के चबूतरे अथवा टेबल लगाए जाते हैं। इस प्रकार बने ऊँचे आधार पर गैस का चूल्हा रखा जाता है तथा आधार के नीचे गैस-सिलेण्डर रखने की व्यवस्था होती है। दीवार पर लगे रैक पर चिमटा, सन्डासी, कद्दूकस इत्यादि रखे होते हैं।

दोनों ओर लगी अलमारियों में बर्तन तथा नामांकित खाद्य-पदार्थ एवं मिर्च-मसाले रखे जाते हैं। रसोईघर में एक ओर बर्तन इत्यादि धोने के लिए सिंक लगा होता है। सिंक के पास कूड़ादान, झाड़न व झाड़ रखी होती है। विदेशी शैली के अनुसार व्यवस्थित रसोईघर में निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं

  1. यह सजावट की एक आधुनिक शैली है
  2. सफाई में सुविधा के कारण रसोईघर स्वच्छ व सुन्दर बना रहता है।
  3. खड़े रहकर कार्य करने की सुविधा के कारण गृहिणी को थकान कम होती है।
  4.  गृहिणी के वस्त्र न तो मुड़ते-सिकुड़ते हैं और न ही गन्दे होते हैं।

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प्रश्न 9
फूलों से सजावट किस प्रकार की जाती है? इसमें किन-किन बातों का ध्यान रखा जाता है? या गृह-सज्जा में पुष्प-सज्जा के महत्त्व को लिखिए।[2011]
उत्तर:
पुष्प-सज्जा के प्रकार
फूलों द्वारा घर की सजावट निम्नलिखित दो प्रकार से की जा सकती है

(1) बाह्य सजावट-घर के आगे और पीछे दोनों ओर खाली भूमि में पुष्प वाले पौधे उगाए जा सकते हैं। पुष्प वाले पौधों के अतिरिक्त साज-सज्जा वाले पौधे; जैसे-कैक्टस, क्रोटन, कोलियस, रबर-प्लाण्ट इत्यादि; रिक्त भूमि व गमलों में लगाए जा सकते हैं। दीवारों (UPBoardSolutions.com) एवं खिड़कियों आदि से लगी हुई अनेक प्रकार की आकर्षक बेलें; जैसे-बोगेनवेलिया, रेलवे-क्रीपर, सतावर आदि; उगाई जा सकती हैं।

(2) आन्तरिक सजावट-घर के अन्दर की सजावट बोतलों, गिलासों, डिब्बों और विशेष रूप से विभिन्न आकार एवं प्रकार के फूलदानों में पुष्प लगाकर की जाती है। पुष्प युक्त पौधों को भी गमलों सहित कभी-कभी ड्राइंग-रूम में रख दिया जाता है।
पुष्प-सज्जा की विभिन्न शैलियाँ

  1. परम्परागत देशी शैली–इससे विभिन्न रंगों, आकार एवं प्रकार के पुष्पों का गुलदस्ता बनाकर किसी पात्र अथवा फूलदान में लगाया जाता है। इसमें फूलों व फूलदान के रंगों व आकार पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है।
  2. विदेशी शैली—इसमें पुष्पों को विदेशी ढंग से सजाया जाता है। इस प्रकार की पुष्प-व्यवस्था में अनियमित सन्तुलन पर बल दिया जाता है। इसमें सन्तुलन की व्यवस्था 3, 5, 7, 9 फूलों से की जाती है और तीन टहनियों का प्रयोग होता है। पुष्प-सज्जा की इस शैली को इकेबाना कहा जाता है तथा यह मूल रूप से एक जापानी शैली है।।
  3. आधुनिक शैली—यह उपर्युक्त दोनों शैलियों का मिश्रित रूप है। इस शैली के अन्तर्गत पुष्पों को परम्परागत शैली के अनुसार गुलदस्ते के रूप में न बाँधकर पिन होल्डर की सहायता से पात्रे में लगाया जाता है।

ध्यान रखने योग्य बातें

  1. फूलों को सदैव प्रात:काल अथवा सूर्यास्त होने पर काटना चाहिए।
  2. फूलों को काटकर पानी से नम बनाए रखना चाहिए। ऐसा करने से फूल अधिक समय तक ताजा रहते हैं।
  3. फूलों को तोड़ना नहीं चाहिए। इन्हें कैंची या छुरी से काटना चाहिए।
  4.  फूलदान में पानी इतना रहना चाहिए कि फूलों की टहनियाँ इसमें डूबी रहें।
  5.  फूलदान अथवा अन्य पुष्प पात्रों को समय-समय पर साफ करके चमकाना चाहिए।
  6.  फूलों को उनकी पत्तियों के साथ फूलदान में लगाना चाहिए। इससे स्वाभाविकता दिखाई पड़ती है।
  7. फूलों को मौसम के अनुसार सजाना चाहिए।
  8.  पानी में नमक डालने से पुष्प देर से मुरझाते हैं।

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गृहसज्जा में पुष्प-सज्जा का महत्त्व गृह-सज्जा के सन्दर्भ में पुष्प-सज्जा का विशेष महत्त्व है। फूल सुन्दरता के प्रतीक तथा गृह-सज्जा के प्रकृति-प्रदत्त साधन हैं। फूलों का सौन्दर्य बच्चों, बूढ़ों तथा स्त्री-पुरुष सभी के लिए विशेष आकर्षक होता है। एक कवि बिशप कॉक्स ने कहा है, “पुष्प ऐसी भाषा है, जिसे एक बच्चा भी समझता है।” फूलों से वातावरण में ताजगी, उल्लास एवं उत्साह का संचार होता है। फूल वातावरण की नीरसता को (UPBoardSolutions.com) समाप्त करते हैं। फूल व्यक्ति के मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य पर भी अच्छा प्रभाव डालते हैं। फूलों के इन बहुपक्षीय लाभों एवं अद्वितीय सौन्दर्य के कारण गृह-सज्जा में इन्हें विशेष महत्त्व दिया गया है। रट के शब्दों में, “एक चिन्तित और दु:खी व्यक्ति को पुष्प-व्यवस्था से अपने दुःखों से छुटकारा तथा तसल्ली मिलती है।”

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
‘घर की सफाई तथा ‘गृह-सज्जा’ के सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘घर की सफाई’ तथा ‘गृह-सज्जा’ का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। गृह-सज्जा के लिए अनिवार्य है कि घर में सफाई भी हो। सफाई से आशय है-गन्दगी का अभाव, जबकि सजावट का अर्थ है-घर की वस्तुओं की सुन्दर एवं कलात्मक व्यवस्था। सजावट के अभाव में भी घर की सफाई रह सकती है, परन्तु घर की सफाई के अभाव में घर को सुसज्जित नहीं माना जा सकता। इस प्रकार कहा जा सकता है कि सजावट के अभाव में सफाई रह सकती है, परन्तु सफाई के अभाव में सजावट सम्भव नहीं है।

प्रश्न 2
घर में बच्चों के कमरे की उचित सजावट आप किस प्रकार करेंगी? या स्कूल जाने वाले बालक के कमरे की व्यवस्था आप किस प्रकार करेंगे? [2011]
उत्तर:
पढ़ने वाले बच्चों का कमरा खुला, हवादार, प्रकाशमय तथा गृहिणी के कमरे के पास होता है। यह बच्चों के अध्ययन के लिए उपयुक्त रहता है। इस कमरे की सजावट एवं व्यवस्था करते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखा जाता है

  1. बच्चों के लिए अलग-अलग आवश्यक ऊँचाई की डेस्क व कुर्सियों की व्यवस्था।
  2.  बिजली के बल्ब, ट्यूब व टेबल लैम्प द्वारा उपयुक्त प्रकाश की व्यवस्था।
  3.  समय देखने के लिए तथा सुबह उठने के लिए अलार्म घड़ी।
  4. दिनांक देखने के लिए कमरे में एक कैलेण्डर होना चाहिए।
  5. कमरे के दरवाजे और खिड़कियों आदि पर उचित रंग के परदे होने चाहिए।
  6. दीवारों पर शिक्षाप्रद चित्र तथा बच्चों की रुचि के अनुसार प्रसिद्ध खिलाड़ियों के चित्र होने चाहिए।
  7. पुस्तकें तथा स्कूल बैग रखने के लिए अलमारी की व्यवस्था।
  8. कपड़े रखने की अलमारी की व्यवस्था।
  9. सोने के लिए पलंग व बिस्तर आदि की व्यवस्था।

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प्रश्न 3
टिप्पणी लिखिए-घर के बरामदे का महत्त्व एवं सजावट।
उत्तर:
भारतीय घरों में बरामदे का अधिक उपयोग होता है। ग्रीष्म ऋतु में सुबह और शाम तथा वर्षा ऋतु में बरामदे में बैठना बड़ा रुचिकर लगता है। सर्दियों में दिन के समय कमरे बहुत ठण्डे रहते हैं। अत: बरामदा धूप और प्रकाश के कारण अधिक भाता है। बरामदा एक बहुउद्देशीय कक्ष या अनौपचारिक बैठक का काम करता है। बहुधा आगन्तुकों एवं मित्र वर्ग के साथ गप्पे मारने का भी यही स्थान होता है। इसीलिए बेंत को हल्का फर्नीचर व दो-चार गमले बरामदे में अवश्य लगाने चाहिए। बरामदे में क्रोटन, पाम, डिफनबेकिया तथा मनी-प्लाण्टे के गमले भी रखे जा सकते हैं। इनके अतिरिक्त दीवार पर एक-दो चित्र भी लगाए जा सकते हैं।

प्रश्न 4:
टिप्पणी लिखिए-संयुक्त स्नान-गृह एवं शौचालय।
उत्तर:
वर्तमान भारतीय जीवन में पाश्चात्य प्रभाव एवं प्रचलन क्रमशः बढ़ रहे हैं। पाश्चात्य प्रचलन के ही अनुसार अब हमारे देश में भी स्नान-गृह एवं शौचालय संयुक्त रूप से बनाए जाने लगे हैं। इस व्यवस्था के अन्तर्गत एक ही कमरे में नहाने की व्यवस्था के साथ-ही-साथ शौच का भी प्रावधान होता है। इस व्यवस्था के अनुसार कमरे में एक ओर कमोड अर्थात् शौच का स्थान तथा दूसरी ओर नहाने का स्थान होता है। इस प्रकार के स्नान–गृह एवं शौचालय सामान्य रूप से शयन-कक्ष के साथ जुड़े रहते हैं।

इन्हें अत्यधिक स्वच्छ रखना अनिवार्य होता है। अतः यदि घर में फ्लश सिस्टम का प्रावधान न हो तो यह व्यवस्था उत्तम नहीं मानी जाती। वैसे व्यावहारिक दृष्टिकोण से इस प्रकार के संयुक्त स्नान-गृह एवं शौचालय काफी सुविधाजनक होते हैं। व्यक्ति एक साथ ही शौच एवं स्नान (UPBoardSolutions.com) कार्य से निवृत हो सकता है। इस प्रावधान के होने की स्थिति में रात्रि में अथवा ठण्ड के समय व्यक्ति को अपने शयन-कक्ष से दूर नहीं जाना पड़ता।

प्रश्न 5
घर के लिए फर्नीचर खरीदते समय मुख्य रूप से किन-किन बातों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है? [2012, 13, 14, 16, 17]
उत्तर:
फर्नीचर खरीदते समय ध्यान रखने योग्य बातें फर्नीचर आजकल काफी महँगा मिलता है; अत: रोज-रोज फर्नीचर नहीं खरीदा जाता। कपड़ों की तरह फर्नीचर रोज-रोज बदला भी नहीं जा सकता। अत: फर्नीचर खरीदते समय विशेष सूझ-बूझ एवं समझदारी से काम लिया जाना चाहिए। फर्नीचर खरीदते समय मुख्य रूप से निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए-

(1) सर्वप्रथम यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि केवल उपयोगी फर्नीचर ही खरीदना चाहिए। कुछ लोग केवल दिखावे के लिए ही या स्थान भरने के लिए ही फर्नीचर खरीदते रहते हैं। यह प्रवृत्ति अच्छी नहीं है।

(2) दूसरी बात यह है कि वही फर्नीचर खरीदना चाहिए, जो आपके घर के अनुरूप हो अर्थात् जिस स्तर एवं प्रकार का मकान हो, उसी प्रकार का फर्नीचर खरीदना चाहिए। यदि आपका कमरा छोटा हो तो फर्नीचर भी छोटे साइज का ही खरीदना चाहिए।

(3) सामान्य रूप से फर्नीचर एक ही बार खरीदा जाता है; अतः फर्नीचर खरीदते समय फर्नीचर की मजबूती एवं कोटि को विशेष ध्यान रखना चाहिए। घटिया अथवा कच्ची लकड़ी का फर्नीचर नहीं खरीदना चाहिए।

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(4) फर्नीचर की पॉलिश अथवा रंग-रोगन का भी ध्यान रखना चाहिए।

(5) सामान्य रूप से सादे डिजाइन का फर्नीचर ही लेना चाहिए। नक्काशी अथवा खुदाई वाले डिजाइन का फर्नीचर नहीं खरीदना चाहिए। ऐसे फर्नीचर की सफाई नहीं हो पाती तथा उसमें धूल आदि भी भर जाती है जिससे बाद में वह भद्दा प्रतीत होने लगता है।

(6) अधिक भारी फर्नीचर भी नहीं खरीदना चाहिए, क्योंकि ऐसे फर्नीचर को एक स्थान से दूसरे स्थान पर रखना मुश्किल हो जाता है। जिन लोगों का समय-समय पर तबादला होता हो, उन्हें तो ऐसा भारी फर्नीचर बिल्कुल नही खरीदना चाहिए।

(7) फर्नीचर खरीदते समय अपनी आर्थिक स्थिति का भी ध्यान अवश्य रखना चाहिए। (UPBoardSolutions.com) केवल देखा-देखी की भावना से अधिक महँगा फर्नीचर नहीं खरीदना चाहिए। अन्य फैशनों के ही समान फर्नीचर का फॅशन भी बदलता रहता है। अतः इस दिशा में सुगृहिणियों को सूझ-बूझ से काम लेना चाहिए।

प्रश्न 6
घर के फर्नीचर की देखभाल और सफाई आप किस प्रकार करेंगी? [2010, 17] या लकड़ी के फर्नीचर की देखभाल और सफाई का वर्णन संक्षेप में कीजिए। [2007, 10, 11, 12, 17]
उत्तर
फर्नीचर की देखभाल प्रत्येक घर में सुविधा और सजावट के लिए किसी-न-किसी प्रकार का फर्नीचर अवश्य होता है। परन्तु फर्नीचर गन्दा एवं अस्त-व्यस्त होगा, तो न तो उससे घर की शोभा बढ़ेगी और न ही वह किसी प्रकार की सुविधा प्रदान करेगा। यदि फर्नीचर की देखभाल एवं सफाई न की जाए, तो वह शीघ्र ही टूट-फूट जाता है तथा बेकार हो जाता है। अत: फर्नीचर की देखभाल एवं सफाई अनिवार्य है।
सफाई-साधारण घरों में अधिकांश फर्नीचर लकड़ी का होता है। इसकी सफाई निम्नलिखित ढंग से की जानी चाहिए

  1. लकड़ी की बनी हुई सभी वस्तुओं को नित्य साफ कपड़े अथवा नरम ब्रश से झाड़ना एवं पोछना चाहिए। कीमती फर्नीचर को साफ करने के लिए मुलायम चमड़े का प्रयोग भी किया जा सकता है। चमड़े से रगड़कर साफ करने से पॉलिश में चमक आ जाती है।
  2. कभी-कभी फनीचर को गीले कपड़े अथवा साबुन से भी साफ किया जा सकता है। इस प्रकार से साफ करने के बाद तुरन्त सूखे कपड़े से पोंछकर सुखा देना अनिवार्य है।
  3. पानी में सिरका मिलाकर, घोल से फर्नीचर को साफ किया जा सकता है।
  4.  पुराने फर्नीचर में कुछ दरारें पड़ जाती हैं अथवा जोड़ खुल जाते हैं। इन दरारों को भरना आवश्यक होता है अन्यथा इनमें गन्दगी भरती रहती है। दरारों को भरने के लिए पोटीन अथवा मोम का प्रयोग किया जा सकता है।
  5. समय-समय पर सामान्यतः प्रतिवर्ष फर्नीचर पर यदि रंग-रोगन अथवा पॉलिश करा दी जाए तो फर्नीचर की उम्र भी बढ़ती है तथा शोभा भी।

प्रश्न 7
प्लास्टिक के फर्नीचर की देखभाल तथा सफाई का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए। [2017, 18]
उत्तर:
वर्तमान युग प्लास्टिक का युग है। अब जीवनोपयोगी अधिकांश वस्तुएँ प्लास्टिक से ही बनाई जा रही हैं। इसी श्रृंखला में प्लास्टिक के फर्नीचर का भी अत्यधिक प्रचलन हो गया है। प्लास्टिक का फर्नीचर सस्ता तथा सुविधाजनक होता है। इस फर्नीचर की देखभाल तथा सफाई प्रायः आसान होती है। सामान्य रूप से प्लास्टिक के फर्नीचर को किसी भी कपड़े से झाड़-पोंछ कर साफ किया जा सकता है। इससे उसकी धूल-मिट्टी का निवारण हो जाता है।

यदि प्लास्टिक के फर्नीचर पर चिकनाई, मैले या धब्बे लग जाएँ तो उस स्थिति में गीले कपड़े एवं साबुन द्वारा इसे सरलता से साफ किया जा सकता है। गीली सफाई के उपरान्त सूखे कपड़े से पोंछकर सुखा देना ही पर्याप्त होता है। प्लास्टिक के फर्नीचर की सफाई के समान देखभाल भी सरल है। प्लास्टिक के फर्नीचर को तेज धूप एवं ताप से बचाना अति आवश्यक होता है। यह ज्वलनशील भी होता है। अत: आग से इसे सदैव दूर रखना चाहिए। (UPBoardSolutions.com) इसके अतिरिक्त यह भी आवश्यक है कि प्लास्टिक के फर्नीचर पर अधिक दबाव एवं वजन न डाला जाए।

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प्रश्न 8
परदे क्यों लगाए जाते हैं? परदे खरीदते समय आप किन-किन बातों का ध्यान रखेंगी? [2009, 10, 12]
गृह-सज्जा में परदों का क्या महत्त्व है? समझाइए। [2010, 11, 12]
कमरे के लिए परदे का चुनाव करते समय ध्यान रखने योग्य चार सावधानियाँ लिखिए। [2011]
कमरे में परदे लगाने से क्या लाभ हैं? या घर में परदे क्यों लगाये जाते हैं? [2013]
उत्तर:

परदों की उपयोगिता निम्नलिखित है–

  1.  परदे कमरों की सजावट का महत्त्वपूर्ण साधन होते हैं।
  2.  ये तीव्र प्रकाश एवं वायु तथा तेज गर्मी एवं ठण्ड से बचाव करते हैं।
  3. परदे एकान्त (प्राइवेसी) बनाए रखने का महत्त्वपूर्ण साधन हैं।
  4. परदों से खिड़की व दरवाजों के दोषों को भी छिपाया जा सकता है।

परदे खरीदते समय ध्यान देने योग्य बातें निम्नलिखित हैं

  1. परदे पारिवारिक आय के अनुकूल होने चाहिए।
  2. परदे मोटे व टिकाऊ होने चाहिए।
  3. परदे खरीदते समय उनके आकार एवं माप का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
  4. परदों के रंग व डिजाइन कमरों के रंग एवं आवश्यकताओं के अनुकूल होने चाहिए।
  5. परदे धुलने पर अधिक सिकुड़ने वाले नहीं होने चाहिए।
  6. परदों के रंग पक्के होने चाहिए, ताकि धुलने के बाद हल्के न हो पाएँ।

प्रश्न 9
रंग-व्यवस्था से आप क्या समझती हैं? स्पष्ट कीजिए। या घर की सजावट में रंगों का महत्त्व लिखिए। [2008, 10, 12, 13, 16, 17]
उत्तर:
रंगों का परस्पर तालमेल अथवा समन्वय रंग-व्यवस्था कहलाता है। रंग-व्यवस्था के सामान्य लक्षण निम्नलिखित हैं-

  1.  कुछ रंग एक-दूसरे की निकटता से शोभा बढ़ाने में सहायक सिद्ध होते हैं। इन्हें सहयोगी रंग कहते हैं; जैसे पीला व नारंगी, लाल व नारंगी, नीला व हरा तथा हरा व पीला इत्यादि।
  2. कुछ रंग एक-दूसरे के विरोधी माने जाते हैं; जैसे—लाल व हरा, पीला व नीला इत्यादि।
  3.  कुछ रंग गर्म प्रकृति के होते हैं; जैसे—लाल, नारंगी तथा पीला।
  4.  कुछ रंग; जैसे कि हरा व नीला; ठण्डी प्रकृति के होते हैं।
  5.  प्रकाशयुक्त कमरों को सदैव गहरे रंग से पेन्ट कराना चाहिए।
  6. कम प्रकाश वाले या अँधेरे कमरों को सफेद अथवा हल्के रंगों से पेन्ट कराना चाहिए।
  7. कुछ रंगों में सफेद रंग का टिण्ट देने से उनके आकर्षण में वृद्धि होती है। रंग-व्यवस्था का उपयुक्त ज्ञान घर की रंगों द्वारा सजावट करने के लिए अति आवश्यक है।

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
गृह-सज्जा की प्रमुख शैलियाँ कौन-कौन सी हैं? (2013)
या
गृह-सज्जा के प्रकार बताइए। (2017)
उत्तर:
गृह-सज्जा की तीन प्रमुख शैलियाँ हैं

  1. परम्परागत देशी शैली,
  2. विदेशी शैली तथा
  3.  मिश्रित शैली।

प्रश्न 2
शयन-कक्ष एवं अध्ययन-कक्ष का स्थान कैसा होना चाहिए?
उत्तर:
दोनों के लिए स्वच्छ एवं शान्त स्थान होना चाहिए।

प्रश्न 3
गृह-सज्जा का प्रमुख साधन किसे माना जाता है?
उत्तर:
फर्नीचर को गृह-सज्जा का प्रमुख साधन माना जाता है।

प्रश्न 4
घरेलू फर्नीचर कैसा होना चाहिए? [2011]
उतर:
घरेलू फर्नीचर आकर्षक होने के साथ-साथ मजबूत, टिकाऊ तथा आवश्यकतानुसार अधिक-से-अधिक उपयोगी होना चाहिए।

प्रश्न 5
लकड़ी के फर्नीचर की देख-रेख कैसे करेंगी?
उतर:
उम्र लकड़ी के फर्नीचर की देख-रेख के लिए उन पर समय-समय पर पॉलिश तथा प्रतिदिन सफाई करनी अति आवश्यक है।

प्रश्न 6
संयुक्त स्नानघर से आप क्या समझती हैं?
उत्तर:
संयुक्त स्नानघर में स्नानघर व शौचालय साथ-साथ होते हैं। यह प्राय: कमरों से संलग्न होते हैं।

प्रश्न 7
फूलदान में फूल जल्दी न सूखे, इसके लिए आप क्या उपाय करेंगी?
उतर:
उम्र फूलों को अधिक समय तक ताजा रखने के लिए फूलदान का पानी प्रतिदिन (UPBoardSolutions.com) बदल दिया जाना चाहिए तथा इस पानी में थोड़ा-सा नमक मिला देना चाहिए।

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प्रश्न 8
‘इकेबाना’ पुष्प-सज्जा से आप क्या समझती हैं?
उतर:
उक्ट इस आधुनिक पुष्प-सज्जा में फूल-पत्तियों के साथ छोटी-छोटी सूखी टहनियों, घास-फूस एवं छोटी-छोटी कलात्मक वस्तुओं का भी प्रयोग किया जाता है। यह मूल रूप से पुष्प-सज्जा की एक जापानी शैली है।।

प्रश्न 9
“घर की अच्छी सजावट अर्थव्यवस्था से नहीं, परन्तु गृहिणी की अभिरुचि से होती है।” स्पष्ट कीजिए। या । अधिक धन के खर्च के बिना घर की सजावट कैसे कर सकते हैं ? [2009, 18]
उत्तर:
आदर्श गृहिणी मितव्ययिता के साथ अपनी कलात्मक अभिरुचि के आधार पर घर की अच्छी सजावट कर सकती है।

प्रश्न 10
घर की उपयुक्त सजावट गृहिणी के किन गुणों की परिचायक है?
उत्तर:
घर की उपयुक्त सजावट गृहिणी की सूझ-बूझ, सुरुचि एवं सुघढ़ता की परिचायक होती है।

प्रश्न 11
घर की सजावट के लिए अपने आप से तैयार की जाने वाली दो सजावट की वस्तुओं के नाम लिखिए। [2010]
उत्तर:
स्वयं तैयार की जा सकने वाली सजावट की वस्तुएँ हैं-लैम्पशेड तथा फोटोफ्रेम।

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प्रश्न 12
सजावट की कला के प्रमुख सिद्धान्त कौन-कौन से हैं? [2011, 12, 16]
उत्तर:
सजावट की कला के तीन प्रमुख सिद्धान्त हैं

  1. अनुरूपता,
  2. सन्तुलन तथा
  3. समानुपात।।

प्रश्न 13
घर की सज्जा में फूलों का क्या महत्त्व है? [2011, 12, 13, 14]
या
घर में पुष्प सज्जा के दो महत्त्व लिखिए। [2012, 13]
उत्तर:
अपने आकर्षक रंगों एवं सुगन्ध के कारण फूल घर की सजावट में अपना विशेष महत्त्व रखते हैं। इनका गुच्छा आदि बनाकर फूलदानों व अन्य पात्रों में घर के विभिन्न भागों में सजाया जाता है।

प्रश्न 14
गृह-सज्जा के लिए अपनाई जाने वाली पुष्प-व्यवस्था की जापानी शैली को क्या कहते हैं?
उत्तर:
इकेबाना।

प्रश्न 15
कमरे के लिए परदे का चुनाव कैसे करेंगी? [2012, 13]
उत्तर:
कमरे की दीवारों का रंग एवं कालीन के रंग एवं डिजाइन को ध्यान में रखते हुए उनके अनुरूप ही परदों के रंग व डिजाइन का चुनाव करना चाहिए।

प्रश्न 16
कमरे में परदे लगाने के दो प्रमुख उद्देश्य लिखिए। [2010, 11, 12, 13]
उत्तर:

  1. तेज रोशनी, लू एवं ठण्डी हवा से बचाव करना तथा
  2. कमरे के अन्दर एकान्तता प्रदान करना और कमरे (UPBoardSolutions.com) की सज्जा में वृद्धि करना।

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प्रश्न 17
फर्नीचर कितने प्रकार के होते हैं ? [2014, 17]
उत्तर:
फर्नीचर अनेक प्रकार के होते हैं; जैसे-लकड़ी का फर्नीचर, पाइप का फर्नीचर, माइका लगा फर्नीचर, प्लास्टिक का फर्नीचर, फोम का फर्नीचर तथा रेक्सीन लगा फर्नीचर। अब फाइबर-ग्लास का भी फर्नीचर बनने लगा है।

प्रश्न 18
गृह-व्यवस्था किसे कहते हैं ? [2017]
उत्तर:
गृह के सभी कार्य पूर्ण रूप से होना, आय और व्यय में ताल-मेल बनाए रखना तथा घर की सफाई का भी ध्यान रखना गृह-व्यवस्था कहलाती है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न-निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

प्रश्न 1.
सजावट का क्या अर्थ है? । [2016]
(क) परदे लगाना
(ख) चित्रों से घर सजाना
(ग) फूलों से घर सजाना
(घ) घर सुव्यवस्थित रखना

प्रश्न 2.
सजावट से पूर्व आवश्यक है- [2011, 16]
(क) चित्र एकत्र करना
(ख) कालीन खरीदना
(ग) फूलों का चुनाव करना
(घ) कमरे की सफाई करना

प्रश्न 3.
घर की सजावट के लिए सबसे अधिक आवश्यक है {3}
(क) सफाई
(ख) मूल्यवान कालीन
(ग) दुर्लभ कलाकृतियाँ
(घ) विदेशी फर्नीचर

प्रश्न 4.
गृह-सज्जा का आवश्यक तत्त्व है [2008, 15, 17]
(क) उपयोगिता
(ख) सुन्दरता
(ग) अभिव्यक्ति
(घ) ये सभी

प्रश्न 5.
फूलों को अधिक समय तक ताजा बनाए रखने के लिए फूलदान के पानी में क्या डालना चाहिए? [2009, 12]
(क) सोडा
(ख) नमक
(ग) साबुन
(घ) दूध

प्रश्न 6.
बच्चों के कमरे में चित्र लगाने चाहिए|
(क) फूलों के ।
(ख) बालोपयोगी
(ग) कलात्मक
(घ) श्रृंगारिक

प्रश्न 7.
घरेलू फर्नीचर का मुख्यतम गुण है उसका
(क) नक्काशीदार होना
(ख) अधिक-से-अधिक सजावटी होना
(ग) उपयोगी होना
(घ) सस्ता होना

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प्रश्न 8.
सामान्य रूप से घर के किस भाग की सज्जा को सर्वाधिक महत्त्व दिया जाता है?
(क) रसोईघर की
(ख) भोजन के कमरे की
(ग) ड्राइंग-रूम की
(घ) शयन-कक्ष की

प्रश्न 9.
घर की सजावट के लिए किस वस्तु का प्रयोग किया जाता है? [2015]
(क) ईंट
(ख) बालू
(ग) सीमेन्ट
(घ) फूलदान

प्रश्न 10.
घर की सजावट के लिए किस वस्तु का प्रयोग नहीं किया जाता है? [2017]
(क) फूलदान
(ख) चित्र
(ग) हथौड़ा
(घ) कालीन

उतर:

  1.  (घ) घर सुव्यवस्थित रखना,
  2.  (घ) कमरे की सफाई करना,
  3. (क) सफाई,
  4.  (घ) ये सभी,
  5.  (ख) नमक,
  6. (ख) बालोपयोगी,
  7.  (ग) उपयोगी होना,
  8. (ग) ड्राइंग-रूम की,
  9. (घ) फूलदान,
  10.  (ग) हथौड़ा।

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UP Board Solutions for Class 9 Social Science History Chapter 1 फ्रांसीसी क्रान्ति

UP Board Solutions for Class 9 Social Science History Chapter 1 फ्रांसीसी क्रान्ति

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 9 Social Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Social Science History Chapter 1 फ्रांसीसी क्रान्ति.

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
फ्रांस में क्रान्ति की शुरुआत किन परिस्थितियों में हुई?
उत्तर:
फ्रांस में क्रान्ति की शुरुआत निम्न परिस्थितियों में हुई-
1. राजनैतिक कारण-तृतीय स्टेट के प्रतिनिधियों ने मिराब्यो एवं आबेसिए के नेतृत्व में स्वयं को राष्ट्रीय सभा घोषित कर इस बात की शपथ ली कि जब तक वे लोग सम्राट की शक्तियों को सीमित करने तथा अन्यायपूर्ण विशेषाधिकारों वाली सामंतवादी प्रथा को समाप्त करने वाला संविधान नहीं बना लेंगे तब तक राष्ट्रीय सभा को भंग नहीं करेंगे। राष्ट्रीय सभा जिस समय संविधान बनाने में व्यस्त थी, उस समय (UPBoardSolutions.com) सामंतों को विस्थापित करने के लिए अनेक स्थानीय विद्रोह हुए। अपने पिता की मृत्यु के बाद सन् 1774 ई. में ‘लुईस सोलहवाँ ‘ फ्रांस का राजा बना था। वह एक सज्जन परन्तु अयोग्य शासक था। राजा पर उसकी पत्नी ‘मैरी एंटोइनेट’ को भारी प्रभाव था।

प्रांतीय प्रशासन दो भागों में बँटा हुआ था जिन्हें क्रमशः ‘गवर्नमेंट’ तथा ‘जनरेलिटी’ के नामों से जाना जाता था। फ्रांसीसी शासन में एकरूपता का अभाव था। देश के भिन्न-भिन्न भागों में भिन्न-भिन्न प्रकार के कानून लागू थे। इसी बीच खाद्य संकट गहरा गया तथा जनसाधारण का गुस्सा गलियों में फूट पड़ा। 14 जुलाई को सम्राट ने सैन्य टुकड़ियों को पेरिस में प्रवेश करने के आदेश दिये। इसके प्रत्युत्तर में सैकड़ों क्रुद्ध पुरुषों एवं महिलाओं ने स्वयं की सशस्त्र टुकड़ियाँ बना लीं। ऐसे ही लोगों की एक सेना बास्तील किले की जेल (सम्राट की निरंकुश शक्ति का प्रतीक) में जा घुसी और उसको नष्ट कर दिया। इस प्रकार फ्रांसीसी क्रांति का प्रारंभ हुआ और व्यवस्था बदलने को आतुर लोग क्रांति में शामिल हो गए।

2. फ्रांस की आर्थिक परिस्थितियाँ-बूळू वंश का लुई सोलहवाँ 1774 में फ्रांस का राजा बना। उसने ऑस्ट्रिया की राजकुमारी मैरी एंटोइनेट से विवाह किया। उसके सत्तासीन होने के समय फ्रांस का कोष रिक्त था। राज्य पर कर्ज का बोझ निरंतर बढ़ रहा था। राज्य की कर (UPBoardSolutions.com) व्यवस्था असमानता और पक्षपात के सिद्धांत पर निर्मित होने के कारण अत्यंत दूषित थी। कर दो प्रकार के थे- प्रत्यक्ष कर (टाइल) और धार्मिक कर (टाइद)। पादरी वर्ग और कुलीन वर्ग जिनका फ्रांस की लगभग 40% भूमि पर स्वामित्व था, प्रत्यक्ष करों से पूर्ण मुक्त थे तथा अप्रत्यक्ष करों से भी प्रायः मुक्त थे। ऐसे समय में अमेरिका के ब्रिटिश उपनिवेशों के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के सरकारी निर्णय ने स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया।

सेना का रखरखाव, दरबार का खर्च, सरकारी कार्यालयों या विश्वविद्यालयों को चलाने जैसे अपने नियमित खर्च निपटाने के लिए सरकार कर बढ़ाने पर बाध्य हो गई। कर बढ़ाने के प्रस्ताव को पारित करने के लिए फ्रांस के सम्राट लुई सोलहवें ने 5 मई, 1789 ई. को एस्टेट के जनरल की सभा बुलाई। प्रत्येक एस्टेट को सभा में एक वोट डालने की अनुमति दी गई। तृतीय एस्टेट ने इस अन्यायपूर्ण प्रस्ताव का विरोध किया। उन्होंने सुझाव रखा कि प्रत्येक सदस्य का एक वोट होना चाहिए। सम्राट ने इंस अपील को ठुकरा दिया तथा तृतीय एस्टेट (UPBoardSolutions.com) के प्रतिनिधि सदस्य विरोधस्वरूप सभा से वाक आउट कर गए। फ्रांसीसी जनसंख्या में भारी बढ़ोत्तरी के कारण इस समय खाद्यान्न की माँग बहुत बढ़ गई थी। परिणामस्वरूप, पावरोटी (अधिकतर लोगों के भोजन का मुख्य भाग) के भाव बढ़ गए। बढ़ती कीमतों व अपर्याप्त मजदूरी के कारण अधिकतर जनसंख्या जीविका के आधारभूत साधन भी वहन नहीं कर सकती थी। इससे जीविका संकट उत्पन्न हो गया तथा अमीर और गरीब के मध्य दूरी बढ़ गई।

3. दार्शनिकों का योगदान- इस काल में फ्रांसीसी समाज में मांटेस्क्यू, वोल्टेयर तथा रूसो आदि विचारकों के विचारों के कारण तर्कवाद का प्रसार आरम्भ हुआ। इन विचारकों ने अपने साहित्य द्वारा पादरियों, चर्च की सत्ता तथा सामंती व्यवस्था की जड़ों को हिला दिया। अठारहवीं सदी के दौरान मध्यम वर्ग शिक्षित एवं धनी बन कर उभरा। सामंतवादी समाज द्वारा प्रचारित विशेषाधिकार प्रणाली उनके हितों के विरुद्ध थी। शिक्षित होने के कारण इस वर्ग के सदस्यों की पहुँच फ्रांसीसी एवं अंग्रेज राजनैतिक एवं सामाजिक दार्शनिकों (UPBoardSolutions.com) द्वारा सुझाए गए समानता एवं आजादी के विभिन्न-विचारों तक थी। ये विचार सैलून एवं कॉफीघरों में जनसाधारण के बीच चर्चा तथा वाद-विवाद के फलस्वरूप पुस्तकों एवं अखबारों के द्वारा लोकप्रिय हो गए। दार्शनिकों के विचारों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। जॉन लॉक, जीन जैक्स रूसो एवं मांटेस्क्यू ने राजा के दैवीय सिद्धान्त को नकार दिया।

4. सामाजिक परिस्थितियाँ- फ्रांस में सामंतवादी प्रथा प्रचलित थी, जो तीन वर्गों में प्रचलित थी। इन वर्गों को एस्टेट कहते थे। प्रथम एस्टेट में पादरी वर्ग आता था। इनका देश की 10% भूमि पर अधिकार था। द्वितीय एस्टेट में फ्रांस का कुलीन वर्ग सम्मिलित था। इनका देश की 30% भूमि पर अधिकार था। तृतीय एस्टेट में फ्रांस की लगभग 94% जनसंख्या आती थी। इस वर्ग में मध्यम वर्ग (लेखक, डॉक्टर, जज, वकील, अध्यापक, असैनिक अधिकारी आदि), किसानों, मजदूरों और दस्तकारों को सम्मिलित किया जाता था। यह (UPBoardSolutions.com) केवल तृतीय एस्टेट ही थी जो सभी कर देने को बाध्य थी। पादरी एवं कुलीन वर्ग के लोगों को सरकार को कर देने से छूट प्राप्त थी परन्तु सरकार को कर देने के साथ-साथ किसानों को चर्च को भी कर देना पड़ता था। यह एक अन्यायपूर्ण स्थिति थी जिसने तृतीय एस्टेट के सदस्यों में असंतोष की भावना को बढ़ावा दिया।

5. तात्कालिक कारण- लुई सोलहवें ने 5 मई, 1789 ई. को नए करों के प्रस्ताव हेतु 1614 ई. में निर्धारित संगठन के आधार पर तीनों एस्टेट की एक बैठक बुलाई। तृतीय एस्टेट की माँग थी कि सभी एस्टेट की एक संयुक्त बैठक बुलाई जाए तथा ‘एक व्यक्ति एक मत’ के आधार पर मतदान कराया जाए। लुई सोलहवें ने ऐसा करने से मना कर दिया। अतः 20 जून को तृतीय एस्टेट के प्रतिनिधि टेनिस कोर्ट में एकत्रित हुए तथा नवीन संविधान बनाने की घोषणा की।

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प्रश्न 2.
फ्रांसीसी समाज के किन तबकों को क्रान्ति का फायदा मिला? कौन-से समूह सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर हो गए? क्रांति के नतीजों से समाज के किन समूहों को निराशा हुई होगी?
उत्तर:
फ्रांसीसी क्रान्ति से सर्वाधिक लाभ तृतीय एस्टेट के धनी सदस्यों को हुआ। तृतीय एस्टेट में किसान, मजदूर, वकील, छोटे अधिकारीगण, अध्यापक, डॉक्टर एवं व्यवसायी शामिल थे। क्रांति से पहले इन्हें सभी कर अदा करने पड़ते थे। साथ ही इन लोगों को पादरियों और कुलीनों के द्वारा अपमानित भी किया जाता था। लेकिन क्रांति के बाद उनके साथ समाज के उच्च वर्ग के समान व्यवहार किया जाने लगा। (UPBoardSolutions.com) पादरियों एवं कुलीन वर्ग के लोगों को अपने विशेषाधिकारों को त्यागने पर विवश होना पड़ा। क्रान्ति के परिणामों से महिलाओं को निराशा हुई क्योंकि वे लैंगिक आधार पर पुरुषों की समानता का अधिकार हासिल नहीं कर सकीं।

प्रश्न 3.
उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की दुनिया के लिए फ्रांसीसी क्रान्ति कौन-सी विरासत छोड़ गई?
उत्तर:
इस क्रान्ति से विश्व के लोगों को निम्न विरासत प्राप्त हुई-

  1. फ्रांसीसी क्रान्ति वैश्विक स्तर पर मानव इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से एक है।
  2. यह विश्व का पहला ऐसा राष्ट्रीय आंदोलन था जिसने स्वतंत्रता, समानता और भाई-चारे जैसे विचारों को अपनाया।
    19वीं व 20वीं सदी के प्रत्येक देश के लोगों के लिए ये विचार आधारभूत सिद्धान्त बन गए।
  3. राजा राममोहन राय जैसे नेता फ्रांसीसियों द्वारा राजशाही एवं उसके निरंकुशवाद के विरुद्ध प्रचारित विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे।
  4. इस क्रान्ति ने जनता की आवाज को प्रश्रय दिया। जनता उस समय दैवी अधिकार की धारणा, सामंती विशेषाधिकार, दास प्रथा एवं नियंत्रण को समाप्त करके योग्यता को सामाजिक उत्थान का आधार बनाना चाहती थी।
  5. इसने यूरोप के लगभग सभी देशों सहित दक्षिण अमेरिका में प्रत्येक क्रान्तिकारी आंदोलन को प्रेरित किया।
  6. इसने ‘राष्ट्रवादी आंदोलन को बढ़ावा दिया। इस क्रांति ने पोलैण्ड, जर्मनी, नीदरलैण्ड तथा इटली के लोगों को अपने देशों में राष्ट्रीय राज्यों की स्थापना हेतु प्रेरित किया।
  7. इसने राजतंत्रात्मक स्वेच्छाचारी शासन का अन्त कर यूरोप तथा विश्व के अन्य भागों में गणतंत्र की स्थापना को बढ़ावा दिया।
  8. इसने देश के सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार की अवधारणा का प्रचार किया जो बाद में कानून के सम्मुख लोगों की समानता की धारणा का आधार बना।

प्रश्न 4.
उन जनवादी अधिकारों की सूची बनाएँ जो आज हमें मिले हुए हैं और जिनका उद्गम फ्रांसीसी क्रान्ति में है।
उत्तर:
ऐसे लोकतांत्रिक अधिकार जिनका हम आज सरलता से प्रयोग करते हैं तथा जिनका उद्भव फ्रांस की क्रान्ति के फलस्वरूप हुआ था, उनका विवरण इस प्रकार है-

  1. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
  2. शोषण के विरुद्ध अधिकार
  3. संवैधानिक उपचारों का अधिकार
  4. विचार अभिव्यक्ति का अधिकार
  5. समानता का अधिकार
  6. स्वतंत्रता का अधिकार
  7. एकत्र होने तथा संगठन बनाने का अधिकार
  8. सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकार
  9. संपत्ति का अधिकार।

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प्रश्न 5.
क्या आप इस तर्क से सहमत हैं कि सार्वभौमिक अधिकारों के सन्देश में नाना अंतर्विरोध थे?
उत्तर:
विश्व में नागरिक अधिकारों की प्रथम घोषणा का प्रयास संभवतः फ्रांस में ही किया गया। फ्रांस के सार्वभौमिक अधिकारों के संदेश में स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व के तीन मौलिक सिद्धान्तों पर बल दिया गया। वर्तमान में सभी लोकतांत्रिक देशों द्वारा इन सिद्धान्तों को अंगीकार (UPBoardSolutions.com) किया गया है।
लेकिन यह सत्य है कि फ्रांस का सार्वभौमिक अधिकारों का संदेश अनेक विरोधाभासों से घिरा हुआ है जिनका विवरण इस प्रकार है-

  1. व्यापार और कार्य की स्वतंत्रता का कोई उल्लेख नहीं था।
  2. स्वतंत्रता को अधिक प्रोत्साहन दिया गया था।
  3. व्यक्ति के चहुँमुखी विकास को लक्ष्य नहीं बनाया गया।
  4. शिक्षा के अधिकार को कोई महत्त्व नहीं दिया गया।
  5. घोषणा में कहा गया था कि “कानून सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति है। सभी नागरिकों को व्यक्तिगत रूप से या अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से इसके निर्माण में भाग लेने का अधिकार है। कानून की नजर में सभी नागरिक समान हैं।” किन्तु जब फ्रांस एक संवैधानिक राजशाही बना तो लगभग 30 लाख नागरिक जिनमें 25 वर्ष से कम आयु के पुरुष एवं महिलाएँ शामिल थीं, उन्हें बिल्कुल वोट ही नहीं डालने दिया गया।
  6. फ्रांस ने उपनिवेशों पर कब्जा करना व उनकी संख्या बढ़ाना जारी रखा।
  7. फ्रांस में उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक दासप्रथा जारी रही।

प्रश्न 6.
नेपोलियन के उदय को कैसे समझा जा सकता है?
उत्तर:
नेपोलियन का उदय 1796 में निर्देशिका के पतन के बाद हुआ। निदेशकों का प्रायः विधान सभाओं से झगड़ा होता था जो कि बाद में उन्हें बर्खास्त करने का प्रयास करती। निर्देशिका राजनैतिक रूप से अत्यधिक अस्थिर थी; अतः नेपोलियन सैन्य तानाशाह के रूप में सत्तारूढ़ हुआ। सन् 1804 में नेपोलियन बोनापार्ट ने स्वयं को फ्रांस का सम्राट बना लिया। 1799 ई. में डायरेक्टरी के शासन का अंत करके वह फ्रांस का प्रथम काउंसल बन गया। शीघ्र ही शासन की समस्त शक्तियाँ उसके हाथों में केंद्रित हो गईं।

सन् 1793-96 के मध्य फ्रांसीसी सेनाओं ने लगभग सम्पूर्ण पश्चिमी यूरोप पर विजय हासिल कर ली। जब नेपोलियन माल्टा, मिस्र और सीरिया की ओर बढ़ा (1797-99) तथा इटली से फ्रांसीसियों को बाहर ढकेल दिया गया तब सत्ता पर नेपोलियन का कब्जा हुआ, फ्रांस ने अपने खोए हुए भूखण्ड पुनः वापस ले लिए। उसने आस्ट्रिया को 1805 में, प्रशा को 1806 में और रूस को 1807 में परास्त किया। समुद्र के ऊपर ब्रिटिश नौ सेना पर फ्रांसीसी अपना प्रभुत्व कायम नहीं कर सके। अंततः लगभग सारे यूरोपीय देशों ने मिलकर 1813 ई. में लिव्जिंग (UPBoardSolutions.com) में फ्रांस को परास्त किया। बाद में इन मित्र राष्ट्रों की सेनाओं ने पेरिस (फ्रांस की राजधानी) पर अधिकार कर लिया। जून, 1815 ई. में नेपोलियन ने वाटरलू में पुनः विजय प्राप्त करने का असफल प्रयास किया। नेपोलियन ने अपने शासन काल में निजी संपत्ति की सुरक्षा और नाप-तोल की एक समान दशमलव प्रणाली सम्बन्धी कानून बनाए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गिलोटिन किसे कहते हैं?
उत्तर:
यह दो स्तम्भों और एक फरसे से मिलकर बना एक ऐसा यंत्र है जिसमें फरसा ऊपर से नीचे की ओर आता है ओर नीचे लिटाये गए मृत्युदण्ड प्राप्त व्यक्ति का एक ही बार में सिर धड़ से अलग कर देता है। फ्रांसीसी क्रांति के बाद इस यंत्र का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया।

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प्रश्न 2.
आतंक के राज्य से क्या आशय है?
उत्तर:
फ्रांस में क्रान्ति के बाद अस्तित्व में आयी रोब्सपियर सरकार में कुलीन एवं पादरी, दूसरे राजनीतिक दल के सदस्यों, रोब्सपियर की कार्य-पद्धति से असहमत पार्टी के सदस्यों को बंदी बनाकर जेल में डाल दिया जाता था। इन बंदियों पर क्रान्तिकारी अदालत में मुकदमा चलाया जाता था। दोष सिद्ध होने पर इन लोगों को गिलोटिन पर चढ़ा दिया जाता था।

प्रश्न 3.
रोब्सपियर सरकार के दो प्रमुख कार्य बताइए।
उत्तर:
रोब्सपियर सरकार के दो प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं-

  1. खाद्यान्न संकट को देखते हुए मांस और पावरोटी की बिक्री हेतु राशनिंग व्यवस्था लागू कर दी गयी।
  2. मजदूरी और कीमतों की अधिकतम सीमा निर्धारित करने वाला कानून बनाया गया।

प्रश्न 4.
रोब्सपियर को गिलोटिन पर चढ़ाने का कारण बताइए।
उत्तर:
रोब्सपियर की कठोर नीतियों को फ्रांस में निर्ममता से लागू किया गया, जिसमें हजारों निर्दोष लोग भी सन्देह में मारे गए। सन् 1794 में न्यायालय द्वारा रोब्सपियर को उत्पीड़ने का दोषी ठहराया गया और बंदी बना लिया गया तथा अगले ही दिन उसे गिलोटिन पर चढ़ा दिया गया।

प्रश्न 5.
‘सोसाइटी ऑफ रेवोल्यूशनरी एण्ड रिपब्लिकन विमेन’ की प्रमुख माँग बताइए।
उत्तर:
इस क्लब की प्रमुख माँग थी कि फ्रांस के समाज में महिला-पुरुष के बीच लैंगिक आधार पर विभेद न करके उन्हें एक समान माना जाए और समान राजनीतिक अधिकार प्रदान किए जाएँ।

प्रश्न 6.
नेपोलियन बोनापार्ट का उदय किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
डायरेक्टरी शासन के दौरान फ्रांस में डायरेक्टरी के सदस्यों के मध्य परस्पर झगड़ा विधान परिषदों से होता था और विधान परिषद् डायरेक्टरी को बर्खास्त करने का प्रयास करती थी। डायरेक्टरी की राजनीतिक अस्थिरता ने
सेनिक तानाशाह नेपोलियन बोनापार्ट के उद्भव का मार्ग प्रशस्त किया।

प्रश्न 7.
फ्रांस के राष्ट्रीय गान को किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
फ्रांस के राष्ट्रीय गान को ‘मार्सिले’ नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 8.
जैकोबिन क्लब के नेता का नाम लिखिए। उत्तर मेक्समिलियन रोबेस्प्येर।। प्रश्न 9. फ्रांसीसी क्रांति के समय फ्रांस पर किस शासक का शासन था?
उत्तर:
लुईस XVI (सोलहवाँ) का।

प्रश्न 10.
लुईस सोलहवाँ फ्रांस की राजगद्दी पर कब आसीन हुआ था?
उत्तर:
1774 ई. में।

प्रश्न 11.
लुईस XVI किस राजवंश से संबंधित था?
उत्तर:
बूबों राजवंश।

प्रश्न 12.
फ्रांसीसी समाज किन तीन प्रमुख वर्गों में बँटा हुआ था?
उत्तर:

  1. प्रथम एस्टेट,
  2. द्वितीय एस्टेट,
  3. तृतीय एस्टेट।

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प्रश्न 13.
धार्मिक करों को किस नाम से जाना जाता था?
उत्तर:
टाइद।

प्रश्न 14.
एस्टेट जनरल की बैठक में तीनों वर्गों के कितने-कितने प्रतिनिधि आमंत्रित किए गए थे?
उत्तर:
प्रथम एस्टेट (300 प्रतिनिधि), द्वितीय एस्टेट (300 प्रतिनिधि)।

प्रश्न 15.
एस्टेट जनरल की बैठक में किन वर्गों का प्रवेश वर्जित था?
उत्तर:

  1. किसानों,
  2. औरतों,
  3. कारीगरों।

प्रश्न 16.
बास्तील का पतन कब हुआ?
उत्तर:
14 जुलाई, 1789 ई.।

प्रश्न 17.
नेशनल असेम्बली ने सामंती व्यवस्था के उन्मूलन का आदेश कब पारित किया?
उत्तर:
4 अगस्त, 1789 ई.।

प्रश्न 18.
त्रिभुज के अन्दर रोशनी बिखेरती आँख किसका प्रतीक है?
उत्तर:
त्रिभुज के अन्दर रोशनी बिखेरती सर्वदर्शी आँख ज्ञान का प्रतीक है।

प्रश्न 19.
फ्रांस के राष्ट्रीय रंग कौन-से हैं?
उत्तर:

  1. लाल,
  2. सफेद,
  3. नीला।

प्रश्न 20.
प्रारम्भिक वर्षों में क्रांतिकारी सरकार ने महिलाओं के जीवन में सुधार के लिए किस तरह के कानून पास किए?
उत्तर:
सरकारी विद्यालयों की स्थापना के साथ ही सभी (UPBoardSolutions.com) लड़कियों के लिए स्कूली शिक्षा को अनिवार्य बना दिया गया। अब पिता उन्हें उनकी मर्जी के खिलाफ शादी के लिए बाध्य नहीं कर सकते थे।

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प्रश्न 21.
18वीं सदी में फ्रांसीसी समाज कितने एस्टेट्स में बँटा हुआ था?
उत्तर:
18वीं सदी में फ्रांसीसी समाज तीन एस्टेट्स में बँटा हुआ था-

  1. प्रथम एस्टेट-पादरी वर्ग,
  2. द्वितीय एस्टेट–कुलीन वर्ग,
    तृतीय एस्टेट-बड़े व्यवसायी, व्यापारी, अदालती कर्मचारी, वकील, किसान, कारीगर, छोटे किसान, भूमिहीन, मजदूर, नौकर।

प्रश्न 22.
18वीं सदी में फ्रांस में किस नए सामाजिक वर्ग का उदय हुआ?
उत्तर:
मध्यम वर्ग का।

प्रश्न 23.
एस्टेट जनरल (प्रतिनिधि सभा) की अन्तिम बैठक कब हुई थी?
उत्तर:
1614 ई.।

प्रश्न 24.
‘द सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ नामक पुस्तक किसने लिखी थी?
उत्तर:
रूसो।

प्रश्न 25.
जैकोबिन सरकार के पतन के बाद फ्रांस में किस तरह की सरकार स्थापित हुई?
उत्तर:
जैकोबिन सरकार के पतन के उपरान्त एक नया संविधान लागू किया गया जिसने समाज के संपत्तिहीन नागरिकों को मताधिकार से वंचित रखा। संविधान में दो चुनी गई विधान परिषदों का प्रावधान था। इन परिषदों ने पाँच सदस्यों वाली एक कार्यपालिका डाइरेक्ट्री को नियुक्त किया जिसे डाइरेक्ट्री शासन कहा गया।

प्रश्न 26.
तीसरे एस्टेट की अधिकांश महिलाएँ किस तरह के कार्य करती थीं?
उत्तर:
तीसरे एस्टेट की अधिकांश महिलाएँ जीविका निर्वाह के लिए काम करती थीं। वे सिलाई, बुनाई, कपड़ों की धुलाई करती थीं, बाजारों में फल-फूल और सब्जियाँ बेचती थीं अथवा संपन्न घरों में घरेलू काम करती थीं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फ्रांस की क्रान्तिकारी महिला ओलिम्प डि गाजेस (1748-1793) के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
फ्रांस की क्रान्तिकालीन राजनीति में सक्रिय ओलिम्प सबसे महत्त्वपूर्ण महिला थी। उन्होंने फ्रांस के संविधान नथा ‘पुरुष एवं नागरिक अधिकार घोषणापत्र’ का विरोध किया क्योंकि उनमें महिलाओं को मानव मात्र के मूलभूत अधिकारों से वंचित किया गया था। इसलिए उन्होंने 1791 ई. में ‘महिला एवं नागरिक अधिकार घोषणापत्र तैयार किया जिसे महारानी एवं नेशनल असेंबली के सदस्यों पर यह माँग करते हुए (UPBoardSolutions.com) भेजा गया था कि वे इस पर कार्यवाही करें। सन् 1793 में ओलिम्प ने महिला क्लवों को जबरन बंद करने के लिए जैकोबिन सरकार की आलोचना की। उन पर नेशनल कन्वेंशन द्वारा मुकदमा चलाया गया तथा फाँसी पर लटका दिया गया।

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प्रश्न 2.
फ्रांस की क्रान्ति के बाद समता स्थापित करने के लिए रोबेस्प्येर सरकार ने कौन-से नियम बनाए?
उत्तर:

  1. बोलचाल और संबोधन में भी बराबरी का आचार-व्यवहार लागू करने की कोशिश की गई। परंपरागत मॉन्स्यूर (महाशय) एवं मदाम (महोदया) के स्थान पर अब सभी फ्रांसीसी पुरुषों एवं महिलाओं को सितोयेन (नागरिक) एवं सितोयीन (नागरिका) नाम से संबोधित किया जाने लगा।
  2. चर्को को बन्द कर दिया गया और उनके भवनों को बैरक या दफ्तर बना दिया गया।
  3. रोबेस्प्येर सरकार ने कानून बना कर मजदूरी एवं कीमतों की अधिकतम सीमा तय कर दी।
  4. गोश्त एवं पावरोटी की राशनिंग कर दी गई।
  5. किसानों को अपना अनाज शहरों में ले जाकर सरकार द्वारा तय कीमत पर बेचने के लिए बाध्य किया गया।
  6. महँगे सफेद आटे के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई। सभी नागरिकों के लिए साबुत गेहूं से बनी और बराबरी का प्रतीक मानी जाने वाली ‘समता रोटी खाना अनिवार्य कर दिया गया।

प्रश्न 3.
फ्रांस में जून, 1793 ई. से जुलाई, 1794 ई. के बीच के कालखण्ड को ‘आतंक का राज्य’ क्यों कहते हैं?
उत्तर:
फ्रांस में जून, 1793 से जुलाई, 1794 ई. तक के फ्रांसीसी शासन को ‘आतंक का राज्य के नाम से संबोधित किया जाता है। इसके पीछे निम्न तथ्य उत्तरदायी हैं-

  1. चर्चे को बन्द कर दिया गया और उनके भवनों को बैरक या दफ्तर बना दिया गया।
  2. रोब्सपियर ने अपनी नीतियों को सख्ती से लागू किया। उसके लिए दया का अर्थ था देशद्रोह। उसके एक साल के शासन काल में हजारों व्यक्तियों को मृत्यु-दण्ड दिया गया जिसके कारण उसके सहयोगी भी उसके दुश्मन बन गए और 27 जुलाई, 1794 ई. को उसे कैद कर लिया गया।
  3. क्योंकि इस काल में शासन के समस्त सूत्र जैकोबिन क्लब के नेता रोब्सपियर के हाथों में केन्द्रित हो गए थे। उसके अनुसार फ्रांस का कल्याण क्रांति की सफलता में ही निहित है और क्रांति की सफलता आतंक का राज्य स्थापित करके ही प्राप्त की जा सकती है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने सभी असहमत वर्गों के नेताओं तथा व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया तथा दोषी व्यक्तियों को गिलोटिन पर चढ़ाकर मृत्युदण्ड दे दिया गया।
  4. उसने देश की रक्षा के लिए सेना की भर्ती आरंभ की और शीघ्र ही 7,50,000 फ्रेंच सेना तैयार हो गई।
  5. उसने मजदूरी तथा कीमतों की (UPBoardSolutions.com) अधिकतम सीमा निर्धारित की। गोश्त तथा पावरोटी की राशनिंग आरम्भ कर दी गई।
    इस प्रकार उसने महँगाई रोकने के लिए अनेक प्रयास किए।

प्रश्न 4.
जैकोबिन क्लब से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जैकोबिन क्लब की शुरुआत क्रान्ति के आरम्भिक समय में ही हो चुकी थी। शुरुआत में जैकोबिन के अनुयायी उदार तथा सुधारवादी ही थे। लेकिन धीरे-धीरे उसकी नीति उग्र होती गयी, फलस्वरूप मिराबो लाफाएत जैसे नरम विचार वाले सदस्य उससे पृथक् ही हो गए। परिणाम यह हुआ कि क्लब पर रोब्सपियर जैसे उग्र विचारक का नियंत्रण हो गया। इस क्लब का नाम पेरिस के भूतपूर्व कान्वेंट ऑफ सेंट जैकब के नाम पर पड़ा। इस क्लब का प्रधान स्थान पेरिस था। इस क्लब के सदस्य लम्बी धारीदार पतलून पहनते थे इसलिए इन्हें ‘सौं कुलॉत’ भी कहा जाता था। इसकी 400 के लगभग शाखाएँ थीं जो सारे देश में फैली हुई थीं। धीरे-धीरे यह क्लब अधिक शक्तिशाली हो गया और उसका प्रभाव इतना बढ़ गया कि फ्रांसीसी क्रांति के पश्चात् फ्रांस की सत्ता पर जैकोबिनों को नियन्त्रण स्थापित हो गया।

प्रश्न 5.
कुलीन वर्ग के फ्रांस से पलायन के क्या कारण थे?
उत्तर:
14 जुलाई, 1789 ई. को फ्रांस की क्रुद्ध भीड़ बास्तील के किले पर धावा बोलकर उसे नष्ट कर दिया तथा वहाँ के जेल में बन्द कैदियों को मुक्त कर दिया। ग्रामीण क्षेत्रों में यह अफवाह फैल गयी कि जागीरों के मालिक भाड़े पर लठैतोंलुटेरों के गिरोह बुला लिए हैं जो पकी फसलों को नष्ट करने के लिए निकल पड़े हैं। अनेक जिलों में भय से आक्रान्त किसानों ने कुदालों और बेलचों से ग्रामीण किलों पर आक्रमण कर दिए। किसानों ने अन्न भण्डारों को लूट लिया तथा लगान सम्बन्धी दस्तावेजों को आग के हवाले कर दिया। ऐसी अराजक स्थिति में बड़ी संख्या में कुलीन अपनी जागीरें छोड़कर पलायन कर गए।
और उन्होंने पड़ोसी देशों में शरण लेकर अपना जीवन सुरक्षित किया।

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प्रश्न 6:
क्रान्तिकालीन फ्रांस में महिलाओं की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
फ्रांस में सामाजिक परिवर्तन लाने में महिलाओं की उल्लेखनीय भूमिका है। महिलाओं ने अपने जीवन में सुधार लाने के लिए क्रान्तिकारी सरकार पर आवश्यक कदम उठाने के लिए दबाव डाला। तत्कालीन फ्रांसीसी महिलाएँ अपने पतियों एवं परिवार की आर्थिक रूप से सहायता करने के (UPBoardSolutions.com) लिए सिलाई-बुनाई, कपड़े धोने, बाजार में फूल, फल तथा सब्जियाँ बेचने का कार्य करती थीं। अपनी स्थिति में सुधार तथा इस पर चर्चा झुरने के लिए उन्होंने अनेक राजनैतिक क्लब एवं अखबार शुरू किए तथा कई महत्त्वपूर्ण मुद्दे उठाए, जो इस प्रकार हैं-

  1. उनकी माँगों में यह भी शामिल था कि उन्हें भी पुरुषों के समान राजनैतिक अधिकार दिए जाएँ।
  2. उन्होंने मताधिकार, सभा में चुने जाने एवं राजनैतिक पद ग्रहण कर सकने की भी माँग की।
  3. फ्रांस के विभिन्न शहरों में लगभग साठ क्लब अस्तित्व में आए।
  4. सभी वर्गों की महिलाओं को शिक्षा एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाए।
  5. उन्होंने माँग की कि उन्हें भी उन दिनों पुरुषों को दी जा रही उच्च मजदूरी के समान ही मजदूरी मिले।

प्रश्न 7.
फ्रांस की क्रान्ति का फ्रांस पर प्रभाव बताइए।
उत्तर:
फ्रांस की क्रान्ति के फ्रांस पर निम्न महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़े-

  1. फ्रांसीसी क्रांति ने जनता की माँगों का समर्थन किया, दैवीय अधिकार के विचार, सामन्ती विशेषाधिकारों, दासत्व तथा नियंत्रण की समाप्ति तथा सामाजिक उत्थान के लिए योग्यता को आधार बनाया।
  2. फ्रांस में राजशाही का अन्त हो गया। फ्रांस गणतंत्र बन गया।
  3. पुरुष एवं नागरिक अधिकारों की घोषणा भी फ्रांसीसी क्रांति की देन थी जिसने समानता एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे अधिकार दिए।

प्रश्न 8.
फ्रांस के 1791 ई. के संविधान की विशेषता बताइए।
उत्तर:

  1. निर्वाचक की योग्यता पाने के लिए और पुनः सभा का सदस्य बनने के लिए लोगों को उच्च श्रेणी का करदाता होना आवश्यक था।
  2. सभी नागरिकों को वोट देने का अधिकार नहीं था। केवल 25 वर्ष से अधिक आयु के पुरुष जो कि कम से कम एक मजदूर की 3 दिन की मजदूरी के समान कर अदा करते थे उन्हें ही सक्रिय नागरिक का दर्जा प्रदान किया गया अर्थात् उन्हें ही वोट देने का अधिकार था। बचे हुए सभी पुरुषों तथा सभी महिलाओं को निष्क्रिय नागरिक का दर्जा दिया गया था।
  3. सन् 1791 के संविधान ने कानून बनाने की (UPBoardSolutions.com) शक्ति राष्ट्रीय सभा को दे दी जो कि अप्रत्यक्ष रूप से चुनी जाती थी अर्थात् नागरिक किसी चुनने वाले समूह को वोट देते तथा वह समूह फिर सभा को चुनता।।

प्रश्न 9.
फ्रांस में सेंसरशिप की समाप्ति का प्रभाव बताइए।
उत्तर:
1789 ई. में बास्तील के पतन के बाद जो सबसे महत्त्वपूर्ण कानून अस्तित्व में आया, वह ‘सेंसरशिप की समाप्ति’ से सम्बन्धित था। इसके प्रभाव का विवरण इस प्रकार है-

  1. नाटक, संगीत और उसकी जुलूसों में असंख्य लोग जाने लगे।
  2. स्वतंत्रता और न्याय के बारे में राजनीतिज्ञों व दार्शनिकों के पांडित्यपूर्ण लेखन को समझने और उससे जुड़ने का यह लोकप्रिय तरीका था क्योंकि किताबों को पढ़ना तो मुट्ठी भर शिक्षितों के लिए ही संभव था।
  3. अब अधिकारों के घोषणापत्र ने भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नैसर्गिक अधिकार घोषित कर दिया। परिणामस्वरूप फ्रांस के शहरों में अखबारों, पर्चा, पुस्तकों एवं छपी हुई तस्वीरों की बाढ़ आ गई जहाँ से वह तेजी से गाँव-देहात तक जा पहुँची। उनमें फ्रांस में घट (UPBoardSolutions.com) रही घटनाओं एवं परिवर्तनों का ब्यौरा और उन पर टिप्पणी होती थी।
  4. प्रेस की स्वतंत्रता का मतलब यह था कि किसी भी घटना पर परस्पर विरोधी विचार भी व्यक्त किए जा सकते थे।
    प्रिंट माध्यम का उपयोग करके एक पक्ष ने दूसरे पक्ष को अपने दृष्टिकोण से सहमत कराने की कोशिश की।

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प्रश्न 10.
18वीं सदी से पहले फ्रांसीसी उपनिवेशों में दास-प्रथा का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
18वीं सदी से पहले फ्रांसीसी उपनिवेशों में दास प्रथा इस प्रकार थी-
(1) दास-व्यापार सत्रहवीं शताब्दी में शुरू हुआ। फ्रांसीसी सौदागर बोर्दै और नान्ते बंदरगाह से अफ्रीका तट पर जहाज ले जाते थे, जहाँ वे स्थानीय सरदारों से दास खरीदते थे। दासों को दाग कर एवं हथकड़ियाँ डालकर अटलांटिक महासागर के पार कैरिबिआई देशों तक तीन माह की लम्बी समुद्री-यात्रा के लिए जहाजों में ढूंस दिया जाता था। वहाँ उन्हें बागान-मालिकों को बेच दिया जाता था। दास-श्रुम के बल पर यूरोपीय बाजारों में चीनी, कॉफी एवं नील की बढ़ती माँग को पूरा करना संभव हुआ। बोर्दे और नान्ते जैसे बंदरगाह फलते-फूलते दास-व्यापार के कारण। ही समृद्ध नगर बन गए।

(2) फ्रांसीसी उपनिवेशों में से कैरिबिआई उपनिवेश-मार्टिनिक, गॉडेलोप और सैन डोमिंगों-तंबाकू, नील, चीनी एवं कॉफ़ी जैसी वस्तुओं के महत्त्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता थे। अपरिचित एवं दूर देश जाने और काम करने के प्रति यूरोपियों की अनिच्छा का मतलब था–बागानों में श्रम की कमी। इस कमी को यूरोप, अफ्रीका एवं अमेरिका के बीच त्रिकोणीय दास-व्यापार द्वारा पूरा किया गया।

प्रश्न 11. 
फ्रांस में दास प्रथा का उन्मूलन किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
फ्रांस में दास प्रथा का उन्मूलन निम्न प्रकार हुआ-

  1. फ्रांस में दास प्रथा की अधिक निन्दा 18वीं सदी में नहीं हुई। नेशनल असेंबली में लम्बी बहस के बाद भी यह निर्धारित नहीं किया जा सका कि समस्त फ्रांसीसी प्रजा को समान अधिकार प्रदान किया जाए या नहीं। किन्तु दास-व्यापार पर निर्भर व्यापारियों के विरोध के भय के फलस्वरूप नेशनल असेंबली कोई कानून पारित नहीं कर सकी।
  2. 1794 ई. के कन्वेंशन ने फ्रांसीसी उपनिवेशों में स्थित दासों को मुक्त करने सम्बन्धी कानून पारित कर दिया। यह कानून मात्र 10 वर्ष तक लागू रहा। दस वर्ष बाद (UPBoardSolutions.com) नेपोलियन ने दास-प्रथा पुनः शुरू कर दी। अब फ्रांस में सक्रिय बागान मालिकों को अपने आर्थिक हित साधने के लिए अफ्रीकी नीग्रो लोगों को गुलाम बनाने की स्वतंत्रता मिल गयी।
  3. सन् 1848 में फ्रांसीसी उपनिवेशों में दास-प्रथा का पूरी तरह उन्मूलन कर दिया गया।

प्रश्न 12.
18वीं सदी के फ्रांस में महिलाओं की स्थिति स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
18वीं सदी के फ्रांस में महिलाओं की स्थिति निम्न प्रकार थी-

  1. अधिकांश महिलाओं के पास पढ़ाई-लिखाई तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण के मौके नहीं थे। केवल कुलीनों की लड़कियाँ अथवा तीसरे एस्टेट के धनी परिवारों की लड़कियाँ ही कॉन्वेंट में पढ़ पाती थीं, इसके बाद उनकी शादी कर दी जाती थी।
  2. कामकाजी महिलाओं को अपने परिवार का पालन-पोषण भी करना पड़ता था-जैसे खाना पकाना, पानी लाना, लाइन लगाकर पावरोटी लाना और बच्चों की देख-रेख करना आदि। उनकी मजदूरी पुरुषों की तुलना में कम थी।
  3. महिलाएँ शुरू से ही फ्रांसीसी समाज में इतने अहम् परिवर्तन लाने वाली गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल थीं। उन्हें उम्मीद थी कि उनकी भागीदारी क्रांतिकारी सरकार को उनका जीवन सुधारने हेतु ठोस कदम उठाने के लिए प्रेरित करेगी।
  4. तीसरे एस्टेट की अधिकांश महिलाएँ जीविका निर्वाह के लिए काम करती थीं। वे सिलाई-बुनाई, कपड़ों की धुलाई करती थीं, बाजारों में फल-फूल-सब्जियाँ, बेचती थीं अथवा संपन्न घरों में घरेलू काम करती थीं। बहुत सारी महिलाएँ , वेश्यावृत्ति करती थीं।

प्रश्न 13.
फ्रांस में व्याप्त आर्थिक तनाव क्रान्ति में किस प्रकार सहायक बना?
उत्तर:
लुई सोलहवाँ 1774 ई. में फ्रांस का राजा बना। उस समय फ्रांस का राजकोष रिक्त था। सेना का रखरखाव, दरबार का खर्च, सरकारी कार्यालयों या विश्वविद्यालयों को चलाने जैसे अपने नियमित खर्च निपटाने के लिए सरकार कर बढ़ाने पर बाध्य हो गई। कर बढ़ाने के प्रस्ताव को पारित करने के लिए फ्रांस के सम्राट लुई सोलहवें ने 5 मई, 1789 ई. को एस्टेट्स के जनरल की सभा बुलाई। प्रत्येक एस्टेटस को सभा में एक वोट डालने की अनुमति दी गई। तृतीय एस्टेट्स ने इस अन्यायपूर्ण प्रस्ताव का विरोध किया।

उन्होंने सुझाव रखा कि प्रत्येक सदस्य का एक वोट होना चाहिए। सम्राट ने इस अपील को ठुकरा दिया तथा तृतीय एस्टेट्स के प्रतिनिधि सदस्य विरोधस्वरूप सभा से वाक आउट कर गए। फ्रांसीसी जनसंख्या में भारी बढ़ोत्तरी के कारण इस समय खाद्यान्न की माँग बहुत बढ़ गई थी। परिणामस्वरूप, (UPBoardSolutions.com) पावरोटी’ (अधिकतर लोगों के भोजन को मुख्य भाग) के भाव बढ़ गए। बढ़ती कीमतों व अपर्याप्त मजदूरी के कारण अधिकतर जनसंख्या जीविका के आधारभूत साधन भी वहन नहीं कर सकती थी। इससे जीविका संकट उत्पन्न हो गया तथा अमीर और गरीब के मध्य दूरी बढ़ गई।

प्रश्न 14.
फ्रांस में जीविका संकट किन परिस्थितियों में उत्पन्न हुआ?
उत्तर:
फ्रांस की जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हो रही थी। फ्रांस की जनसंख्या 1715 ई. में 2 करोड़ 30 लाख से बढ़कर 1789 ई. में 2 करोड़ 80 लाख हो गयी। फलस्वरूप इससे खाद्यान्न की माँग बहुत तेजी से बढ़ी। इसलिए पावरोटी की कीमत भी तेजी से बढ़ी क्योंकि यह आम आदमी का भोजन थी। बहुत से कामगार कारखानों में मजदूर का काम करते थे जिनके मालिक उनकी मजदूरी निर्धारित करते थे। किन्तु उनकी (UPBoardSolutions.com) मजदूरी बढ़ती कीमतों के हिसाब से नहीं बढ़ रही थी। इसलिए अमीर और गरीब के बीच की दूरी बढ़ गई। जब कभी अकाल पड़ता या ओलावृष्टि होती तो फसल कम होने से स्थिति और बिगड़ जाती। इससे जीविका संकट पैदा हुआ।

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प्रश्न 15.
फ्रांसीसी क्रान्ति में दार्शनिकों का योगदान बताइए।
उत्तर:
फ्रांसीसी क्रान्ति में दार्शनिकों की भूमिका को हम निम्न प्रकार से स्पष्ट कर सकते हैं-

  1. फ्रांसीसी दार्शनिकों ने क्रांतिकारी विचार प्रदान किए एवं फ्रांस के लोगों को अपने अधिकारों के लिए लड़ने हेतु प्रेरित किया। उन्होंने सम्राट की अक्षमता की सफलतापूर्वक कलई खोली और लोगों को उसे चुनौती देने के लिए उकसाया।
  2. इन दार्शनिकों के इन विचारों पर सैलून एवं कॉफी-घरों में गहन चर्चा हुई और ये विचार पुस्तकों एवं अखबारों के द्वारा जनसाधारण के बीच फैल गए। इसने 1789 ई. में होने वाली क्रांति का मार्ग प्रशस्त किया।
  3. जॉन लॉक ने राजा के दैवीय एवं स्वेच्छाचारी सिद्धान्त को नकार दिया।
  4. रूसो ने लोगों एवं उनके प्रतिनिधियों के बीच एक सामाजिक करार पर आधारित सरकार का विचार सामने रखा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फ्रांसीसी क्रान्ति की शुरुआती घटनाओं का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
(i) एस्टेट्स जनरल की बैठक- 5 मई, 1789 ई. को फ्रांस के शासक लुई सोलहवें ने नए करों के प्रस्ताव को 1614 ई. में निर्धारित संगठन के आधार पर वर्साय के महल में एस्टेट्स जनरल की बैठक बुलाई। इस सभा में प्रथम और द्वितीय एस्टेट के 300-300 प्रतिनिधि और तृतीय एस्टेट के 600 प्रतिनिधियों को बुलाया गया। मतदान की प्राचीन पद्धति के अनुसार एस्टेट के प्रत्येक वर्ग को एक मत देने का अधिकार दिया गया था लेकिन लुई सोलहवाँ लोकतांत्रिक सिद्धान्त के आधार पर एक व्यक्ति एक मत’ को अपनाने के स्थान पर (UPBoardSolutions.com) कुलीन-वर्ग और साधारण वर्ग की माँगों के बीच समझौता कराना चाहता था। लुई चाहता था कि वित्तीय प्रश्न पर एक व्यक्ति एक मत’ का सिद्धान्त अपनाया जाए तथा अन्य माँगों पर वर्ग के आधार पर मतदान का सिद्धान्त अपनाया जाए।

(ii) राष्ट्रीय सभा की स्थापना- 6 मई, 1789 ई. को राष्ट्रीय सभा की बैठक के दूसरे दिन यह प्रश्न उपस्थित हुआ कि तीन एस्टेट के सदस्य अलग-अलग भवनों में मतदान करेंगे या एक साथ एक भवन में मतदान करेंगे। सर्वसाधारण वर्ग ने अलग बैठने से मना कर दिया। सरकार ने इस गतिरोध को समाप्त करने का कोई प्रयास नहीं किया। अंततः सर्वसाधारण वर्ग के प्रतिनिधियों ने स्वयं को राष्ट्रीय सभा घोषित करके एक क्रान्तिकारी कदम उठाया। क्रमशः कुलीन व पादरी वर्ग के लोग राष्ट्रीय सभा में सम्मिलित हो गए। अंततः 26 जून को लुई सोलहवें ने विवश होकर कुलीन वर्ग का सर्वसाधारण वर्ग के साथ बैठक का आदेश जारी कर दिया।

(iii) संविधान का प्रारूप- राष्ट्रीय सभा ने संविधान का प्रारूप तैयार कर दिया जिसका प्रमुख उद्देश्य सम्राट की शक्तियों को सीमित करना तथा एक संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना करना था जिसमें शक्तियों को विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका में बाँटा जा सके।

(iv) बास्तील का पतन- किसी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए सम्राट ने पेरिस में सेना को एकत्रित करना आरम्भ कर दिया। सेना को एकत्रित होता देख जन आक्रोश भड़क उठा। पेरिस में आर्थिक असन्तोष को लेकर जगहजगह दंगे भड़क उठे। ये दंगे उस भुखमरी, महँगाई और बेरोजगारी के फलस्वरूप शुरू हुए थे, जो तत्कालीन पेरिस में व्याप्त थी। आक्रोशित जनता ने 14 जुलाई को बास्तील के किले पर धावा बोल दिया। बास्तील का पतन निरंकुश शासन के पतन का प्रतीक था। फ्रांस में प्रत्येक वर्ष 14 जुलाई का दिन राष्ट्रीय (UPBoardSolutions.com) त्योहार के रूप में मनाया जाता है। धीरे-धीरे यह आंदोलन गाँवों में फैल गया। किसानों ने ग्रामीण किलों को नष्ट करके अन्न भंडारों को लूट लिया और लगान संबंधी दस्तावेजों को नष्ट कर दिया गया। कुलीन-वर्ग के लोग बड़ी संख्या में दूसरे क्षेत्रों अथवा देशों में पलायन कर गए।

(v) संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना- जनता की शक्ति को भाँपते हुए फ्रांस के राजा लुई सोलहवें ने संवैधानिक राजतंत्र को मान्यता प्रदान कर दी। इस प्रकार फ्रांस में संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना हो गई। राष्ट्रीय सभा ने एक आदेश पारित किया जिसके द्वारा धार्मिक करों को समाप्त कर दिया गया, चर्च के स्वामित्व वाली जमीन जब्त कर ली गई, पादरी-वर्ग को उसके विशेषाधिकारों को छोड़ने के लिए विवश किया गया तथा सामंती व्यवस्था के उन्मूलन का आदेश पारित किया गया।

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प्रश्न 2.
फ्रांस की क्रान्ति के समय फ्रांस की राजनीतिक स्थिति का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
(i) फ्रांस की क्रान्ति के समय फ्रांस पर लुई सोलहवें को शासन था। 1774 ई. में अपने पितामह की मृत्यु के बाद वह कठिन परिस्थिति में सिंहासनारूढ़ हुआ, उस समय राजकोष रिक्त था। राजा के ऊपर अत्यधिक ऋण भार था। इस परिस्थिति से बाहर निकलने के लिए जिस योग्यता की आवश्यकता थी, वह लुई में नहीं थी।

(ii) दूसरे फ्रांसीसी राजाओं की भाँति उसकी पत्नी मैरी इंटोइनेट का शासन पर अत्यधिक प्रभाव था। उसकी इच्छा शक्ति बड़ी दृढ़ थी, उसमें साहस था और तुरंत निर्णय भी कर सकती थी। इस प्रकार जो गुण राजा में नहीं थे वे उसमें विद्यमान थे परन्तु उसमें भी शासन की समस्याओं को समझने तथा (UPBoardSolutions.com) उनका समाधान करने की योग्यता नहीं थी। उसे अपने आमोद-प्रमोद से मतलब था। वह सदा लोभी, चाटुकारों से घिरी रहती थी जो उस समय की व्यवस्था से लाभ उठाते थे और इसी कारण सुधार के शत्रु थे।

वह शासन-कार्य में हस्तक्षेप करती रहती थी, मंत्रियों की नियुक्ति में दखल देती थी और सदा षड्यंत्रों में लगी रहती थी जिसके परिणाम सदा फ्रांस के हित के विपरीत होते थे। इन कारणों से तथा उसके विलासमय जीवन एवं अत्यधिक खर्चीले रहन-सहन से राज्य की कठिनाइयाँ बढ़ती रहीं। इस काल में फ्रांस का शासन भी बड़ा अक्षम, अव्यवस्थित और खर्चीला था। शासन का प्रमुख राजा था। उसकी सहायता के लिए पाँच समितियाँ होती थीं जो कानून बनाती थीं, राज्यादेश निकालती थीं और राज्य का समस्त
आंतरिक एवं बाह्य कार्य-संचालन करती थीं। यह व्यवस्था राजधानी में थी।

(iii) तत्कालीन फ्रांस के प्रांतीय शासन को दो प्रकार के प्रांतों में बाँटा गया था। एक प्रकार के प्रांत गवर्नमेंट कहलाते थे, जिनकी संख्या 40 थी। इनमें से अधिकांश फ्रांस के प्राचीन प्रांत थे। इनका शासन में कोई सहभागिता नहीं था। इन प्रांतों के गवर्नर उच्च वर्ग के कुलीन लोग होते थे। ये लोग अधिक वेतन पाते थे और राजा के सानिध्य में ऐशो-आराम की जिन्दगी व्यतीत करते थे।

(iv) शासन का वास्तविक कार्य फ्रांस के 36 अन्य प्रान्त करते थे, जिन्हें जेनरेलिटी कहते थे। प्रत्येक जेनरेलिटी में राजा द्वारा नियुक्त एक कर्मचारी होता था जिसे इंटेंडेट कहते थे। ये कर्मचारी मध्यम वर्ग के लोग होते थे तथा राजा के आदेशों का पालन करते थे। इन्हें जन आकांक्षाओं की ओर ध्यान (UPBoardSolutions.com) देने की स्वतंत्रता नहीं थी। इसलिए ये अपने अधीन काम करने वालों में बहुत अलोकप्रिय होते थे।

(v) सरकारी पदों पर नियुक्ति योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि पहुँच के आधार पर होती थी। स्थानीय स्वशासन की कोई व्यवस्था नहीं थी।

(vi) स्थानीय कर्मचारियों को भी छोटी-छोटी बातों के लिए केन्द्र से आदेश प्राप्त करना पड़ता था। इस तरह शासन में जनता की भूमिका नगण्य थी। इसी के परिणामस्वरूप क्रांति के समय जब जनता ने शासन-सूत्र अपने हाथ में लिया तो अनेक गल्तियाँ भी कीं।

प्रश्न 3.
फ्रांस के नए संविधान में शक्तियों का विभाजन किस प्रकार किया गया था? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
फ्रांस में नया संविधान बनाने के लिए राष्ट्रीय सभा ने 6 जुलाई, 1789 को एक समिति गठित की थी। इस नवनियुक्त समिति ने दो आधार पर संविधान तैयार किया-
(i) जनता की प्रभुता और
(ii) शक्ति विभाजन।

इस तरह संविधान पर मांटेस्क्यू का प्रभाव स्पष्ट था। संविधान में शक्तियों का विभाजन-

  1. विधायिका,
  2. कार्यपालिका और
  3. न्यायपालिका के मध्य किया गया जिनका विवरण इस प्रकार है–

(1) विधायिका- नए संविधान के अन्तर्गत एक सदनीय विधान सभा की स्थापना की गयी। इसमें प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित 745 सदस्य रखे गए, जिनका कार्यकाल दो वर्ष निर्धारित किया गया। निर्वाचन के लिए नागरिक दो भागों में विभक्त किए गए। जिन नागरिकों की अवस्था कम से कम 25 वर्ष की थी, जो कम से कम 3 दिन की आय कर के रूप में देते थे और जिनके नाम नगरपालिका के रजिस्टरों में तथा राष्ट्रीय रक्षक-दल में दर्ज थे वे सक्रिय नागरिकों की श्रेणी में रखे गए, शेष निष्क्रिय नागरिक रहे। सक्रिय नागरिक प्रति सौ (UPBoardSolutions.com) नागरिकों के लिए एक फ्रांसीसी क्रान्ति निर्वाचक चुनते थे और इन निर्वाचकों का ‘निर्वाचक-मंडल’ प्रतिनिधि चुनता था। निर्वाचक के लिए यह आवश्यक था कि वह संपत्ति का स्वामी हो और वर्ष में 10 दिन की आय कर के रूप में देता हो।

प्रतिनिधि कोई भी सक्रिय नागरिक चुना जा सकता था, उसके लिए भूमि का स्वामी होना और 54 फ्रैंक कर के रूप में देना आवश्यक था। परन्तु न्यायिक अथवा प्रशासनिक पद पर नियुक्त कोई भी व्यक्ति विधान-सभा का सदस्य नियुक्त नहीं हो सकता था। इस विधान सभा को कानून-निर्माण के पूर्ण अधिकार थे। उस पर एकमात्र नियंत्रण राजा के ‘स्थगनकारी निषेध’ (सस्पेंशन वीटो) का था। राजा किसी भी कानून को दो सत्रों के लिए स्वीकार करने से इनकार कर सकता था, परन्तु उसका यह अधिकार आर्थिक बातों में लागू नहीं होता था।

(2) कार्यपालिका- कार्यपालिका प्रमुख के रूप में राजा का अस्तित्व बना रहा। उसे मंत्रियों की नियुक्ति, सेना का नेतृत्व एवं विदेश नीति को निर्धारित करने का अधिकार प्राप्त था, लेकिन विधान सभा उसके प्रभाव से पूरी तरह मुक्त थी। वह विधानसभा के अधिवेशन आमंत्रित नहीं कर सकता था, न उसे भंग कर सकता था और न ही उसके सामने कानून के प्रस्ताव ही प्रस्तुत कर सकता था। उसे केवल स्थगनकारी निषेध का अधिकार मिला। न्यायालयों तथा न्यायाधीशों पर भी उसका कोई अधिकार नहीं रहा। उसके मंत्री विधानसभा (UPBoardSolutions.com) के सदस्य नहीं हो सकते थे और इस तरह उन पर सभा का कोई नियंत्रण नहीं था। इस प्रकार राष्ट्रीय सभा ने इंग्लैण्ड का अनुकरण करके सांविधानिक एकतंत्र स्थापित किया, परन्तु इसके साथ मांटेस्क्यू के सिद्धान्त तथा अमेरिका के उदाहरण के अनुसार कार्यपालिका और विधायिका का परस्पर कोई संबंध नहीं रखा।

(3) न्यायपालिका- फ्रांस की राष्ट्रीय सभा ने देश में प्रचलित प्राचीन न्याय-व्यवस्था के स्थान पर नए केन्द्रीय एवं स्थानीय न्यायालयों का निर्माण किया। इन न्यायालयों के न्यायाधीशों के लिए सक्रिय न्यायाधीशों द्वारा निर्वाचन की व्यवस्था की गयी। मुद्रायुक्त पत्रों का चलन अवरुद्ध कर दिया गया (UPBoardSolutions.com) और जूरी द्वारा मुकदमे पर विचार करने की व्यवस्था की गयी।

प्रश्न 4.
पुरुष एवं नागरिक घोषणा-पत्र के प्रमुख बिन्दुओं को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

  1. मनुष्य स्वतंत्र पैदा होते हैं, स्वतंत्र रहते हैं जो और उनके अधिकार समान होते हैं।
  2. कानून सम्मत प्रक्रिया के बाहर किसी व्यक्ति को न तो दोषी ठहराया जा सकता है और न ही गिरफ्तार या नजरबंद किया जा सकता है।
  3. स्वतंत्रता का आशय ऐसे काम करने की शक्ति से है जो औरों के लिए नुकसानदेह न हो।
  4. समाज के लिए किसी भी हानिकारक कृत्य पर पाबंदी लगाने का अधिकार कानून के पास है।
  5. कानून सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति है। सभी नागरिकों को व्यक्तिगत रूप से या अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से इसके निर्माण में भाग लेने का अधिकार है। कानून की नजर में सभी नागरिक समान हैं।
  6. प्रत्येक नागरिक बोलने, लिखने और छापने के लिए आजाद है। लेकिन कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत ऐसी स्वतंत्रता के दुरुपयोग की जिम्मेदारी भी उसी की होगी।
  7. सार्वजनिक सेना तथा प्रशासन के खर्चे चलाने के लिए एक सामान्य कर लगाना अपरिहार्य था। सभी नागरिकों पर उनकी आय के अनुसार समान रूप से कर लगाया जाना चाहिए।
  8. चूँकि सम्पत्ति का अधिकार एक पावन एवं अनुलंघनीय अधिकार है, अतः किसी भी व्यक्ति को इससे वंचित नहीं किया जा सकता है, जब तक कि विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के तहत सार्वजनिक आवश्यकता के लिए संपत्ति का अधिग्रहण करना आवश्यक न हो। ऐसे मामले में अग्रिम मुआवजा जरूर दिया जाना चाहिए।
  9. प्रत्येक राजनीतिक संगठन का लक्ष्य आदमी के नैसर्गिक एवं अहरणीय अधिकारों को संरक्षित रखना है। ये अधिकार हैं—स्वतंत्रता, संपत्ति, सुरक्षा एवं शोषण के प्रतिरोध का अधिकार।
  10. समग्र सम्प्रभुता का स्रोत राज्य में निहित है; कोई भी समूह या व्यक्ति ऐसा अनधिकार प्रयोग नहीं करेगा जिसे जनता की सत्ता की स्वीकृति न मिली हो।

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प्रश्न 5.
फ्रांस में राजतंत्र का अन्त एवं गणतन्त्र की स्थापना किस प्रकार हुई?
उत्तर:
1791 ई. में फ्रांस की राष्ट्रीय सभा ने संविधान का पूर्ण प्रपत्र तैयार किया। संविधान द्वारा राजा के अधिकार सीमित करते हुए शासन की शक्तियाँ विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका में वितरित की गयीं। इस प्रकार फ्रांस को संवैधानिक राजतंत्र में रूपांतरित किया गया। संविधान का प्रारम्भ (UPBoardSolutions.com) पुरुष एवं नागरिक अधिकारों की घोषणा के साथ हुआ जिन्हें नैसर्गिक एवं अहरणीय रूप में स्थापित किया गया जिन्हें कोई नहीं छीन सकता था। यह सरकार का कर्तव्य था कि वह प्रत्येक नागरिक के प्राकृतिक अधिकारों की रक्षा करे।

यद्यपि लुई सोलहवें ने संविधान पर हस्ताक्षर कर दिए थे बथापि उसने प्रशा के राजा से गुप्त समझौता कर लिया। इससे पहले कि लुई सोलहवाँ सन् 1789 की गर्मियों से चली आ रही घटनाओं को दबाने की अपनी योजनाओं पर अमल कर पाता, राष्ट्रीय सभा ने प्रशा एवं ऑस्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा का प्रस्ताव पारित कर दिया। जनसंख्या के बड़े वर्गों का यह विश्वास था कि क्रांति को आगे बढ़ाने की आवश्यकता थी क्योंकि 1791 ई. के संविधान ने धनी वर्ग को ही राजनैतिक अधिकार प्रदान किए थे।

राजनैतिक क्लब उन लोगों के लिए एक महत्त्वपूर्ण बैठक स्थल बन गए जो सरकार की नीतियों पर चर्चा करना चाहते थे और अपनी रणनीति की योजना बनाई जाती थी। इनमें से एक जैकोबिन क्लब था। जैकोबिन क्लब के सदस्य मुख्यतः समाज के कम समृद्ध वर्ग से सम्बन्ध रखते थे जैसे कि छोटे दुकानदार, कारीगर, जूते बनाने वाले, पेस्ट्री बनाने वाले, घड़ीसाज, छपाई करने वाले, नौकर तथा दैनिक (UPBoardSolutions.com) मजदूर आदि। उनके नेता का नाम मैक्समिलियन रोब्सपियर था। इन जैकोबिन लोगों को सौं कुलॉत के नाम से जाना जाने लगा। सौं कुलॉत लोग इसके अतिरिक्त एक लाल टोपी भी पहनते थे जो आजादी का प्रतीक थी।

1792 ई. की गर्मियों में जैकोबिन लोगों ने प्रशा के विरुद्ध विद्रोह की योजना बनाई जो कि कम आपूर्ति एवं खाने-पीने की चीजों की बढ़ती कीमतों से गुस्साए हुए थे। 10 अगस्त की सुबह उन्होंने ट्यूलेरिए के महल पर आक्रमण कर दिया, राजा के रक्षकों को मार डाला और स्वयं राजा को घण्टों तक बंधक बनाए रखा। बाद में सभा ने शाही परिवार को जेल में डाल देने का प्रस्ताव पारित किया। चुनाव कराए गए तथा तब से 21 वर्ष या उससे अधिक आयु के सभी पुरुष, चाहे उनके पास संपत्ति हो या नहीं, सभी को वोट डालने का अधिकार मिल गया।

फ्रांस में नवनिर्वाचित सभा को कन्वेंशन नाम दिया गया। 21 सितम्बर, 1792 ई. को फ्रांस गणतन्त्र घोषित कर दिया गया। इसी के साथ फ्रांस में वंशानुगत राजतंत्र का अन्त हो गया। (UPBoardSolutions.com) न्यायालय ने राजद्रोह के आरोप में लुई सोलहवें कों मृत्युदण्ड की सजा सुनाई। प्लेस डी ला कन्कोर्ड में 21 जनवरी, 1793 ई. को लुई सोलहवें को फाँसी दे दी गयी और इसके बाद रानी मैरी इंटोइनेट को भी फाँसी दे दी गयी।

प्रश्न 6.
ओलिम्प डि गॉजेस के घोषणा-पत्र में उल्लिखित मूल अधिकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ओलिम्प डि गाँजेस के घोषणा-पत्र में उल्लिखित मूल अधिकारों का वर्णन इस प्रकार है-

  1. कानून सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति होनी चाहिए। सभी महिला एवं पुरुष नागरिकों का या तो व्यक्तिगत रूप से
    या अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से विधि-निर्माण में दखल होना चाहिए। यह सभी के लिए समान होना चाहिए। सभी महिला एवं पुरुष नागरिक अपनी योग्यता एवं प्रतिभा के बल पर समान रूप से एवं बिना किसी भेदभाव के हर तरह के सम्मान वे सार्वजनिक पद के हकदार हैं।
  2. कोई भी महिला अपवाद नहीं है। वह विधिसम्मत प्रक्रिया द्वारा अपराधी ठहराई जा सकती है, गिरफ्तार और नजरबंद की जा सकती है। पुरुषों की तरह महिलाएँ भी इस कठोर कानून का पालन करें।
  3. औरत जन्मना स्वतंत्र है और अधिकारों में पुरुष के समान है।
  4. सभी राजनीतिक संगठनों का लक्ष्य पुरुष एवं महिला के नैसर्गिक अधिकारों को संरक्षित करना है। ये अधिकार हैं स्वतंत्रता, संपत्ति, सुरक्षा और सबसे बढ़कर शोषण के प्रतिरोध का अधिकार।
  5. समग्र संप्रभुता का स्रोत राष्ट्र में निहित है जो पुरुषों एवं महिलाओं के संघ के सिवाय कुछ नहीं है।

प्रश्न 7.
फ्रांस की क्रान्ति के बाद महिलाओं की स्थिति में आए परिवर्तनों का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
फ्रांस की क्रान्ति के बाद महिलाओं की स्थिति में निम्न परिवर्तन घटित हुए-
(i) फ्रांस में आतंक के राज के दौरान देश में सक्रिय महिला अधिकारों के प्रति चेतना का प्रसार करने वाले क्लबों को | बन्द कर दिया गया। साथ ही महिलाओं की राजनीतिक गतिविधियों पर अंकुश लगा दिया गया। अनेक राजनीतिक रूप से सक्रिय महिलाओं को बन्दी बनाया गया तथा उनमें से कुछ को मृत्युदण्ड दे दिया गया।

(ii) मताधिकार और समान वेतन के लिए महिलाओं का आंदोलन अगली सदी में भी अनेक देशों में चलता रहा।
मताधिकार का संघर्ष उन्नीसवीं सदी के अंत एवं बीसवीं सदी के प्रारंभ तक अंतर्राष्ट्रीय मताधिकार आंदोलन के जरिए जारी रहा। क्रांतिकारी आंदोलन के दौरान फ्रांसीसी महिलाओं की (UPBoardSolutions.com) राजनीतिक सरगर्मियों को प्रेरक स्मृति के रूप में जिंदा रखा गया। अंततः सन् 1946 में फ्रांस की महिलाओं ने मताधिकार हासिल कर लिया।

(iii) फ्रांस की क्रांति के काल में ही महिलाओं ने अपने अधिकारों की माँग को लेकर अनेक महिला राजनीतिक क्लबों की स्थापना आरम्भ कर दी थी। ‘द सोसाइटी ऑफ रेवलूशनरी एण्ड रिपब्लिकन विमेन’ सबसे मशहूर क्लब था। उनकी एक प्रमुख माँग यह थी कि महिलाओं को पुरुषों के समान राजनीतिक अधिकार प्राप्त होने चाहिए। महिलाएँ इस बात से निराश हुईं कि 17 ई. के संविधान में उन्हें निष्क्रिय नागरिक का दर्जा दिया गया था। महिलाओं ने मताधिकार, असेंबली के लिए चुने जाने तथा राजनीतिक पदों की माँग रखी। उनका
मानना था कि तभी नई सरकार में उनके हितों का प्रतिनिधित्व हो पाएगा।

(iv) प्रारम्भिक वर्षों में क्रांतिकारी सरकार ने महिलाओं के जीवन में सुधार लाने वाले कुछ कानून लागू किए। सरकारी विद्यालयों की स्थापना के साथ ही सभी लड़कियों के लिए स्कूली शिक्षा को अनिवार्य बना दिया गया। अब पिता उन्हें उनकी मर्जी के खिलाफ शादी के लिए बाध्य नहीं कर सकते थे। शादी को स्वैच्छिक अनुबन्ध माना गया और नागरिक कानूनों के तहत उनका पंजीकरण किया जाने लगा। (UPBoardSolutions.com) तलाक को कानूनी रूप दे दिया गया और मर्द-औरत दोनों को ही इसकी अर्जी देने का अधिकार दिया गया। अब महिलाएँ व्यावसायिक प्रशिक्षण ले सकती थीं, कलाकार
बन सकती थीं और छोटे-छोटे व्यवसाय चला सकती थीं।

प्रश्न 8.
फ्रांसीसी क्रान्ति के लिए प्रथम एस्टेट का उत्तरदायित्व सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
फ्रांस में प्रथम एस्टेट में पादरी वर्ग को शामिल किया जाता था। इस वर्ग में एक लाख तीस हजार के लगभग पादरी थे और इनका देश की 10 प्रतिशत भूमि पर नियंत्रण था। चर्च भी किसानों से टाइद (धार्मिक कर) नामक कर वसूलता था। इन्हें सरकारी करों से मुक्ति प्राप्त थी। साथ ही चर्च राज्य को दिए जाने वाले पंचवर्षीय अनुदान के द्वारा सरकार पर वित्तीय दबाव डालने की स्थिति में थे। फ्रांस की शिक्षा पद्धति, प्रचार के साधन तथा नैतिक व अनैतिक में अन्तर करने का अधिकार भी उन्हीं के हाथ में था।

फ्रांस का चर्च 18वीं सदी में बहुत अधिक बदनाम तथा अलोकप्रिय हो गया था। इस अलोकप्रियता के कारण पादरियों के व्यक्तिगत चरित्र, एवं जीवन से कम तथा तत्कालीन ऐतिहासिक परिस्थितियों से अधिक संबद्ध थे। व्यक्तिगत तौर पर आम पादरी का आचरण अपने युग के अनुकूल ही था, उससे बुरा नहीं। लोगों की नजरों में खटकने वाली बात तो यह थी कि चर्च की बढ़ती हुई सम्पदा के साथ पादरी अपने धार्मिक (UPBoardSolutions.com) कर्तव्यों की उपेक्षा करते जा रहे थे। चर्च की अलोकप्रियता का एक मुख्य कारण फ्रांस, विशेषकर उसके नगरों तथा मध्यम-वर्ग के व्यक्तियों में लोकप्रिय होती हुई संशयवाद की प्रवृत्ति थी जिसके प्रभाव में ईश्वर का अस्तित्व तथा चर्च की उपयोगिता दोनों ही विवाद का विषय बन गए थे।

एक दूसरा कारण चर्च के सामंतीय अधिकार तथा उनका कठोरता के साथ लागू किया जाना था, जिसके कारण किसानों में उसके विरुद्ध असंतोष उत्पन्न होता रहा। अन्त में पादरीवर्ग के अन्दर ही एकता को अभाव था। चर्च के उच्च पदों पर कुलीन-वर्ग के वंशजों का एकाधिकार था और इससे छोटे पादरियों में असंतोष बढ़ा तथा वे चर्च के प्रजातंत्रीय स्वरूप की स्थापना हेतु उत्सुक हो रहे थे।

प्रश्न 9.
फ्रांस का मध्यम वर्ग तत्कालीन व्यवस्था से क्यों असन्तुष्ट था? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
तत्कालीन फ्रांस के मध्यम वर्ग में लेखक, डॉक्टर, वकील, जज, अध्यापक और असैनिक अधिकारी जैसे शिक्षित व्यक्ति तथा व्यापारी, बैंकर और कारखाने वाले धनी व्यक्ति सम्मिलित थे। समाज में इस वर्ग का आर्थिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्व था। मध्यम वर्ग उन लोगों का अग्रगामी था, जिन्होंने 19वीं सदी में आर्थिक व सामाजिक परिवर्तन लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी।
मध्यम वर्ग तत्कालीन व्यवस्था से निम्न कारणों से असन्तुष्ट था-

(i) कुलीन-वर्ग के साथ ही तत्कालीन शासन-पद्धति से भी मध्यम-वर्ग के औद्योगिक एवं व्यावसायिक अंग को शिकायत थी। समाज का यह वर्ग मात्र एक उद्देश्य लेकर चल रहा था–भौतिक सम्पत्ति की वृद्धि; किन्तु तत्कालीन शासन उसके इस उद्देश्य की पूर्ति में अपनी गलत नीतियों के कारण बाधक सिद्ध हो रहा था।

(ii) मध्यम-वर्ग का बुद्धिजीवी भाग आदर्श भावना से भी प्रेरित था। यह आदर्श था विवेक एवं बुद्धि पर आधारित समाज की संरचना जिसमें सभी कुछ तर्कसंगत हो।

(iii) इतिहास में व्यापारियों-उद्योगपतियों के ये समूह बिलकुल नए थे, किन्तु अमेरिका के फ्रांसीसी उपनिवेशों से व्यापार करने के कारण ये बहुत धनी हो गए थे और इनका महत्त्व बहुत बढ़ गया था। इनमें से कुछ ने जमीन खरीद ली थी और उनके पास बड़ी-बड़ी जमींदारियाँ हो गई थीं। इन व्यक्तियों के पास पर्याप्त धन था, इसलिए राज्य, पादरी और अभिजात-वर्ग सभी इनके ऋणी थे।

सामाजिक दृष्टि से वह स्तर पर आधारित श्रेणीबद्ध समाज के विरोधी न होकर समर्थक ही थे और उनकी महत्त्वाकांक्षा थी कि सामाजिक सीढ़ी की ऊँची पदान पर उन्हें स्थान मिले किन्तु रक्त के आधार पर श्रेणीबद्ध फ्रेंच समाज में कुलीन-वर्ग ने उस स्थान से उन्हें वंचित कर रखा था। इस प्रकार 18वीं शताब्दी का फ्रेंच बुर्जुआ (मध्यम-वर्ग) अपने को एक अजीब स्थिति में पाता था। उसके पास धन था, उसके पास (UPBoardSolutions.com) योग्यता थी किन्तु इस धन और योग्यता के अनुरूप समाज में प्रतिष्ठा नहीं थी, सरकारी पद नहीं थे। इस विषमता को तभी दूर किया जा सकता था जब सामंतीय समाज के ढाँचे को नष्ट कर दिया जाए।

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प्रश्न 10.
क्रांति से पहले की फ्रांस की आर्थिक स्थिति का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
क्रान्ति ( 1789 ) से पहले फ्रांस की आर्थिक स्थिति- फ्रांस की आर्थिक स्थिति अत्यन्त कठिन दौर से गुजर रही थी, ऐसे में सरकार की फिजूलखर्ची ने दशा को और भी शोचनीय बना दिया। उस समय फ्रांस में कर दो प्रकार के थेप्रत्यक्ष और परोक्ष। प्रत्यक्ष कर (टाइल) जायदाद, व्यक्तिगत संपत्ति तथा आय पर लिए जाते थे। कुलीन वर्ग और पादरी इनमें से कुछ करों से तो बिल्कुल मुक्त थे और शेष करों से प्रायः मुक्त थे, क्योंकि कर निर्धारण करने वाले राज्य-कर्मचारी डरकर उन पर नाममात्र का कर लगाया करते थे। उसकी सारी कमी शेष जनता पर कर लगाकर पूरी की जाती थी और इस प्रकार उस पर करों का अत्यधिक भार था। कुलीन-वर्ग और पादरी भी सम्पन्न थे, रुपये में तीन आने भी कर नहीं देते थे जबकि मध्यमवर्ग के व्यक्ति से प्रायः दस गुना कर वसूल लिया जाता था। परोक्ष करों में मुख्य रूप से नमक, शराब, तंबाकू आदि पर लिए जाने वाले कर थे।

दूषित कर-व्यवस्था के फलस्वरूप राज्य जनता की सम्पत्ति का राष्ट्रीय कामों के लिए उपयोग नहीं कर सकता था। उसकी वाणिज्य-नीति भी ऐसी थी जिसमें राज्य में सम्पत्ति की उत्पत्ति भी पूरी तरह न हो पाती थी। फ्रेंच व्यापार अभी पूरी तरह से उन्नति नहीं कर पाया था। इस दोषपूर्ण अर्थ-व्यवस्था का परिणाम यह निकला कि राज्य का व्यय सदैव ही उसकी आय से अधिक रहा था तथा इस घाटे की पूर्ति हेतु सरकार को ऋण का आश्रय लेना पड़ा। अमेरिका के ब्रिटिश उपनिवेशों के स्वतंत्रता-संग्राम में भाग लेने के सरकारी निर्णय ने स्थिति को (UPBoardSolutions.com) और अधिक गंभीर बना दिया। अगर इस संघर्ष में सम्मिलित होने के समय को फ्रांस सरकार के संकट का प्रारम्भ-बिन्दु माना जाए तो अत्युक्ति न होगी। इस संघर्ष की सफल समाप्ति ने फ्रांस में स्वतंत्रता की भावना को बल ही प्रदान नहीं किया अपितु उसका आर्थिक भार सरकार के लिए एक असह्य बोझ सिद्ध हुआ जिसे सम्हाल न सकने के कारण वह टूटकर बिखर गई।

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UP Board Solutions for Class 7 Hindi Chapter 1 नैनीतालभ्रमणम् (अनिवार्य संस्कृत)

UP Board Solutions for Class 7 Hindi Chapter 1 नैनीतालभ्रमणम् (अनिवार्य संस्कृत)

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एकदा ……………………….. अवसाम।

हिन्दी अनुवाद- एक बार ललिता बगीचे में गई। वहाँ कला और रुचि मिले। वहाँ ललिता ने कला (UPBoardSolutions.com) से पूछा, “कला, तुम कहाँ घूमने गई थी? कौन-कौन तुमको अच्छे लगे।” तब कला ने उससे कहा। मैं गर्मी के अवकाश में माता के साथ नैनीताल नगर गई। वहाँ मेरी छोटी बहन कीर्ति और पिता जी थे। हम वहाँ एक होटल में ठहरे।

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तत्र …………………………………………… अभ्रमाम।

हिन्दी अनुवाद- वहाँ एक बड़ा तालाब है। यहाँ प्रात: मैं और कीर्ति तालाब के चारों ओर घूमे। हम दोनों ने पिता जी से नौका से यात्रा करने के लिए कहा। दोपहर में हम तीनों नौका से तालाब में घूमे।।

तत्र अनेका ………………………………. इच्छामि।
हिन्दी अनुवाद- वहाँ अनेक नाव पर्यटकों को लेकर इधर-उधर जा रही थी। लोग नावों में बैठकर मनोरंजन कर रहे थे। हमने भी नावों से जाकर आनन्द अनुभव किया। पर्वतों के बीच नौका भ्रमण से बहुत आनन्द उत्पन्न हुआ। ललिता ने कहा, “मैं भी नैनीताल (UPBoardSolutions.com) नगर देखने की इच्छा करती हूँ।”

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अभ्यास

प्रश्न 1:
उच्चारण करें।
नोट- विद्यार्थी स्वयं करें।

प्रश्न 2:
एक पद में उत्तर दें
(क) ललिता कुत्र अगच्छत्?                                  वाटिकाम्।
(ख) जनाः नौकासु उपविश्य किम् अकुर्वन्?          मनोरञ्जन।
(ग) ग्रीष्मावकाशे कला कुत्र अगच्छत्?                  नैनीताल।
(घ) नैनीताल-नगरे कला कुत्र अवसत्?              प्रवास भवने (होटलमध्ये)।

प्रश्न 3:
कोष्ठक के उचित शब्दों से रिक्त स्थानों की पूर्ति करें (पूर्ति करके)
(क) एकदा ललिता वाटिकाम् अगच्छत्।।
(ख) तत्र ललिता कलाम् अपृच्छत्
(ग) तदा कलो तात् अवदत्
(घ) वयम् तत्र एकस्मिन् प्रवासभवने (होटलमध्ये) अवसाम्।

प्रश्न 4:
हिन्दी में अनुवाद करें                                                             अनुवाद
(क) बालिका वाटिकाम् अगच्छत्।                           लड़की बगीचे में गई।
(ख) तत्र कला गीता च अमिलताम्।                        वहाँ कला और गीता मिले।
(ग) तत्र ललिता कलां अपृच्छत्।                              वहाँ ललिता ने कला से पूछा।
(घ) तदा कला ताम् अवदत्।                                   तब कला ने उससे कहा।

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प्रश्न 5:
निम्नलिखित धातुओं का लट्, लुट् तथा लङ् लकारों (UPBoardSolutions.com) का रूप प्रथम पुरुष एकवचन में लिखें

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प्रश्न 6:
संस्कृत में अनुवाद करें                                                    अनुवाद|
(क) मैं विद्यालय गयी।                                          अहं विद्यालयं अगच्छत्।
(ख) तुम कहाँ गयी थी?                                             तवं कुत्र अगच्छत्।
(ग) सरोवर में मैंने नौका-भ्रमण किया।              अहं सरोवरे नौकाभ्रमणं अकरोत्।

प्रश्न 7:
रेखांकित पदों के आधार पर संस्कृत में प्रश्न निर्माण करें

(क) एकदा लता वाटिकाम् अगच्छत्।।
उत्तर:
एकदा का वाटिकाम् अगच्छत्?

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(ख) ग्रीष्मावकाशे निखिलः जयपुर-नगरं गमिष्यति।
उत्तर:
कस्मिन् काले निखिलः जयपुर-नगरं (UPBoardSolutions.com) गमिष्यति?

(ग) जनाः नौकासु उपविश्य मनोरञ्जनं कुर्वन्ति।
उत्तर:
काः नौकासु उपविश्य मनोरञ्जनं कुर्वन्ति?

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UP Board Solutions for Class 8 Agricultural Science Chapter 9 फल परिरक्षण

UP Board Solutions for Class 8 Agricultural Science Chapter 9 फल परिरक्षण

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इकाई – 9  फल परिरक्षण
अभ्यास

प्रश्न 1.
सही विकल्प के सामने सही (✔) का चिह्न लगाइये (निशान लगाकर)
उत्तर :

  1. जैम तैयार किया जाता है।
    (क) केली
    (ख) सेब से (✔)
    (ग) नींबू से
    (घ) अंगूर से
  2. जेली बनायी जाती है।
    (क) अमरूद
    (ख) केला
    (ग) पपीता (✔)
    (घ) गाजर
  3. सॉस तैयार किया जाता है।
    (क) नींबू ।
    (ख) आम
    (ग) सेब
    (घ) टमाटर (✔)
  4. अचार तैयार किया जाता है।
    (क) तेल में (✔)
    (ख) पानी में
    (ग) नींबू के शर्बत में
    (घ) इनमें से कोई नहीं

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प्रश्न 2.
नीचे लिखे कथन में सही के सामने(✔) तथा गलत के सामने (✘) का निशान लगाइए (निशान लगाकर)
उत्तर :

  1. जैम कच्चे फलों से बनाया जाता है।                                                 (✘)
  2. जैम पके फलों से बनाया जाता है।                                                 (✘)
  3. जैम अधपके फलों से बनाया जाता है।                                         (✔)
  4. जैम सूखे फलों से बनाया जाता है।                                               (✘)
  5. जेली बनाते समय उसमें चीनी की मात्रा रस की 3/4 होनी चाहिए। (✔)
  6. टमाटर से सॉस बनाते समय फल समूचे रूप में डालना चाहिए।    (✘)

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UP Board Solutions for Class 7 Hindi Chapter 5 निजभाषा उन्नति (मंजरी)

UP Board Solutions for Class 7 Hindi Chapter 5 निजभाषा उन्नति (मंजरी)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 7 Hindi . Here we have given UP Board Solutions for Class 7 Hindi Chapter 5 निजभाषा उन्नति (मंजरी).

समस्त पद्यांशों की व्याख्या

निज भाषा………………………. को शूल।

संदर्भ:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक ‘मंजरी’ के (UPBoardSolutions.com) ‘निजभाषा उन्नति’ नामक कविता से ली गई है। इसके रचयिता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हैं।

प्रसंग:
कवि ने अपनी भाषा की उन्नति के लिए कहा है।

व्याख्या:
कवि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र कहते हैं, कि सब प्रकार की उन्नति का आधार अपनी भाषा (हिन्दी) की उन्नति करना है। अपनी भाषा हिन्दी के ज्ञान के बिना हृदय का दुख (शूल) दूर नहीं हो सकता है।

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करहू विलम्ब न ……………..मुल

संदर्भ:
पूर्ववत्। प्रसंग- कवि ने अपनी भाषा हिन्दी की उन्नति के लिए प्रयत्न करने को कहा है। (UPBoardSolutions.com)

व्याख्या:
हे भाइयो! अब उठो और देर मत करो। अपना काँटा दूर करो। सबसे पहले अपनी भाषा की उन्नति करो। यह सब चीजों की उन्नति की जड़ है।

प्रचलित करहु ………………………… रत्न।

संदर्भ:
पूर्ववत्।

प्रसंग:
कवि ने सरकारी काम-काज में हिन्दी का प्रयोग करने के लिए कहा है।

व्याख्या:
यत्न करके सारे संसार में अपनी भाषा का प्रयोग (UPBoardSolutions.com) प्रचलित कर दो। यह रत्न (निज भाषा) सरकारी कामकाज, कोर्ट (अदालत) आदि में फैला दो।

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सुत सो ……………………………….. बहु बात।
संदर्भ:
पूर्ववत्।

प्रसंग:
कवि ने घरेलू व्यवहार में बातचीत हिन्दी में ही करने के लिए कहा है।

व्याख्या:
अपने मन की अनेक बातों को रात-दिन पुत्र, (UPBoardSolutions.com) पत्नी, मित्र और नौकर आदि के साथ अपनी भाषा के माध्यम से ही करो।

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निजभाषा …………………………………….. पुकार। संदर्भ- पूर्ववत्।
प्रसंग:
कवि ने अपनी भाषा, धर्म, मान-सम्मान और कार्य-व्यवहार को मिलाकर उन्नति करने । के लिए कहा है। |

व्याख्या:
अपनी भाषा, अपना धर्म, अपना मान-सम्मान, अपने कार्य और व्यवहार, इन सबसे मिलकर प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है।

पढ़ो लिखो कोउ ………………………. अनुसार। संदर्भ- पूर्ववत्।
प्रसंग:
अनेक भाषाएँ जान लेने पर भी, सोच-विचार (UPBoardSolutions.com) करने के लिए कवि ने हिन्दी का प्रयोग करने को कहा है।

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व्याख्या:
चाहे अनेक प्रकार से पढ़ाई-लिखाई की जाए, अनेक भाषाएँ सीखी जाएँ, परन्तु जब भी कोई सोच-विचार (UPBoardSolutions.com) किया जाए, वह अपनी भाषा में ही किया जाना चाहिए।

अंग्रेजी ……………………………..हीन।

संदर्भ:
पूर्ववत्।

प्रसंग:
अँग्रेजी पढ़कर सर्वगुण होकर, कवि ने हिन्दी (निज भाषा) के ज्ञान बिना मनुष्य को हीन बताया है।

व्याख्या:
यद्यपि अँग्रेजी भाषा के पढ़ने से मनुष्य सब गुणों में चतुर हो जाता है, फिर भी अँग्रेजी के साथ हिन्दी भाषा का ज्ञान जरूरी है।

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घर की फूट बुरी

जगत में ………………………………….जनि कोय।
संदर्भ:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक ‘मंजरी’ के निजभाषा उन्नति’ (UPBoardSolutions.com) नामक पाठ ‘घर की फूट बुरी’ नामक कविता से ली गई है। इसके रचयिता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हैं।

प्रसंग:
कवि ने अनेक उदाहरण देते हुए घर की फूट को बुरा बताया है। धन, मान और शक्ति की चाह करने वालों को घर में फूट नहीं पड़ने देना चाहिए।

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व्याख्या:
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र कहते हैं कि संसार में घर की फूट बहुत बुरी है। सोने की लंका घर की फूट से ही नष्ट हो गई। फूट के कारण ही सौ कौरव मारे गए और महाभारत का युद्ध हुआ। उससे जो हानि हुई, उसकी पूर्ति भारत में अब तक नहीं हो पाई। फूट के कारण ही जयचन्द ने भारत में अफगानों को बुलाया। उसका फल आर्य लोग गुलाम होकर अब तक भोग रहे हैं। फूट के कारण ही महापद्मनन्द ने मगध के राज्य का नाश कर लिया। (UPBoardSolutions.com) उसने चन्द्रगुप्त मौर्य का विनाश करना चाहा था लेकिन वह राज्य सहित स्वयं ही नष्ट हो गया। अत: यदि संसार में अपने धन, मान और बल की रक्षा करनी है, तो अपने घर में भूल से भी फूट मत डालो।

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प्रश्न-अभ्यास

कुछ करने को

प्रश्न 1:
निम्नांकित स्थितियों पर छोटे समूहों में चर्चा कीजिए और निष्कर्ष को पाँच-सात (UPBoardSolutions.com) पंक्तियों में लिखिए

(क) ऐसा घर जिसमें सब मिलकर कार्य करते हैं।
उत्तर:
विद्यार्थी चर्चा स्वयं करें।
निस्कर्षत :
हमें घर के सभी कार्य मिलजुलकर करने चाहिए। इससे आपसी प्रेम बना रहेगा। काम भी जल्दी निपट जाएगा और सबके पास आराम के लिए बराबर-बराबर समय बचेगा। घर के बड़ों को लगेगा कि बच्चे उनकी फिक्र करते हैं। (UPBoardSolutions.com) बच्चों को भी यह महसूस होगा कि बड़े उनका ख्याल रखते हैं। फलतः घर में हँसी-खुशी का माहौल बना रहेगा।

(ख) ऐसा घर जिसमें फूट है।
उत्तर:
विद्यार्थी चर्चा स्वयं करें।

निस्कर्षत :
यह कहा जा सकता है कि जिस घर में आपस में फूट हो, वह घर कभी उन्नति नहीं कर सकता। ऐसे घर में शांति तो दूर की बात है, हँसी-खुशी का कोई पल भी नहीं ठहरेगा। घर के सभी सदस्य अनमने से रहेंगे। बच्चों का मानसिक विकास प्रभावित होगा। (UPBoardSolutions.com) बड़े-बुजुर्गों की सेवा नहीं होगी और बाहरवाले उनका मजाक उड़ाएँगे।

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प्रश्न 2:
कवि ने फूट के कारण होने वाले विनाश के अनेक उदाहरण दिए हैं, यथा
(क) रावण और विभीषण की फूट के (UPBoardSolutions.com) कारण लंका का नाश।
(ख) कौरव और पाण्डवों की फूट के फलस्वरूप महाभारत युद्ध।
(ग) पृथ्वीराज और जयचन्द की आपसी फूट के कारण यवनों को भारत आगमन।
इन विषयों पर शिक्षक/शिक्षिका के साथ चर्चा करके फूट के कारण और उनके दुष्परिणामों को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
(क) रावण और विभीषण के बीच फूट का कारण था, उनके विचारों और संस्कारों में अंतर होना। रावण को अपनी शक्ति पर बहुत घमंड था। उसने सीता का धोखे से अपहरण कर लिया था, अतः रावण को व्यभिचारी भी कहा जा सकता है। परंतु इसके विपरीत विभीषण धार्मिक प्रवृत्ति का चरित्रवान व्यक्ति था। रावण द्वारा सीता के अपहरण करने पर उसने आपत्ति जताई क्योंकि उसके अनुसार यह कार्य नीति एवं मर्यादा के विरुद्ध था। (UPBoardSolutions.com) इसलिए उसने रावण से अनुरोध किया कि वह सीता को वापस राम के पास भेज दे, परंतु रावण ने उसे कायर कहकर दुत्कार दिया। रावण द्वारा दुत्कारे जाने और अपमानित. किए जाने से आहत विभीषण राम के पास पहुँच जाता है और उन्हें रावण और लंका से जुड़े सारे रहस्य बता देता है, जिसके फलस्वरूप रावण युद्ध में राम द्वारा मारा जाता है। रावण का सर्वनाश ही दोनों भाइयों के बीच के फूट का दुष्परिणाम था।

(ख) कौरव पाण्डवों से ईर्ष्या करते थे। उन्होंने उनके हिस्से का राज्य हड़प लिया, उन्हें तरह-तरह
की तकलीफें दीं। उनका बार-बार अपमान किया। कौरवों के अन्याय की हद तब हो गई जब उनके द्वारा परिश्रम से स्थापित किया गया राज्य भी उन्होंने जुए में धोखे से पांडवों हो हराकर प्राप्त कर लिया और भरे दरबार में द्रौपदी का अपमान किया। फलस्वरूप पांडवों-कौरवों के बीच कुरुक्षेत्र में महाभारत का युद्ध लड़ा गया, जिससे दोनों तरफ के अनेकों शूरवीर मारे गए। अंततः दुर्योधन भी मारा गया। उसके सारे सगे-संबंधी और भाई पहले ही मारे जा चके थे। धृतराष्ट्र और गांधारी के अलावा कुरू-वंश में कोई भी न बचा। कौरवों का सर्वनाश तो इस युद्ध का दुष्परिणाम था ही, पाण्डवों के पुत्रों का भी (UPBoardSolutions.com) कम उम्र में मारा जाना और विश्व के अनेक शूरवीरों को मारा जाना एक और भयावह परिणाम था।

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(ग) पृथ्वीराज और जयचंद के आपसी फूट का कारण था, जयचंद की पृथ्वीराज के बढ़ते शौर्य से ईष्र्या का होना। उनके बीच विद्वेष का मुख्य कारण जयचंद की पुत्री संयोगिता को भी माना जाता है। संयोगिता पृथ्वीराज से प्रेम करती थी। परंतु जयचंद ने उसके स्वयंवर में पृथ्वीराज को आमंत्रित नहीं किया था। पृथ्वीराज ने संयोगिता का अपहरण कर उससे विवाह कर लिया। फलस्वरूपं अब तक जयचंद की नफरत पृथ्वीराज के लिए और भी बढ़ गई। इसका प्रतिशोध उसने इस तरह लिया कि मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज पर आक्रमण किया तो जयचंद ने इस आक्रमण में मुहम्मद गौरी का साथ दिया। गौरी पहले भी (UPBoardSolutions.com) पृथ्वीराज से युद्ध करके दो बार पराजित हो चुका था, परंतु जयचंद की सहायता पाकर इस बार वह पृथ्वीराज को हराने में सफल रहा, जिसका दुष्परिणाम यह हुआ कि भारत के कई हिस्सों पर यवनों का साम्राज्य स्थापित हो गया। यहाँ तक कि गौरी ने जयचंद को भी नहीं छोड़ा और उसके राज्य पर भी आक्रमण किया।

प्रश्न 3.
इस कविता के आधार पर आप भी दो सवाल बनाइए।
उत्तर:
प्र०1. सब प्रकार की उन्नति का आधार क्या है?
प्र०2, कवि के अनुसार घर-परिवार के सदस्यों के साथ हमें किस भाषा में बात करनी चाहिए?

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प्रश्न 1:
यदि आपको अपनी बात हिन्दी, संस्कृत अथवा अंग्रेजी में से किसी एक भाषा में कहने के लिए कहा जाय, तो आप किस भाषा को चुनेंगे ?
उत्तर:
हिन्दी भाषा को, क्योंकि हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है और मुझे इसका ज्ञान है।

कविता से
प्रश्न 1:
निज भाषा की उन्नति से क्या-क्या लाभ होगा ?
उत्तर:
अपनी भाषा उन्नति करने से अपने धर्म, (UPBoardSolutions.com) मान-सम्मान और कार्य-व्यवहार की उन्नति होगी।

प्रश्न 2:
हमें अपनी भाषा का प्रसार कहाँ-कहाँ करना चाहिए ?।
उत्तर:
हमें अपनी भाषा का प्रसार सरकारी काम-काज, अदालत आदि में करना चाहिए। साथ ही यह प्रयास करना चाहिए कि हमारी हिंदी भाषा का विस्तार विदेशों में भी हो सके।

प्रश्न 3:
कवि ने अपनी भाषा के अतिरिक्त किसको-किसको बढ़ाने की बात की है ?
उत्तर:
कवि ने भाषा के अतिरिक्त धर्म, मान-सम्मान, एकता आदि को बढ़ाने की बात की है।

प्रश्न 4:
कवि ने महाभारत के युद्ध का क्या कारण बताया है ?
उत्तर:
कवि ने महाभारत युद्ध का कारण कौरवों और (UPBoardSolutions.com) पांडवों के बीच आपसी फूट को बताया है।

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प्रश्न 5:
निम्नांकित पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए
(क) निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।
उत्तर:
कवि का आशय है कि निजभाषा के प्रचार-प्रसार (UPBoardSolutions.com) से अपने धर्म, मान-सम्मान, कार्य व्यवहार आदि में उन्नति होगी।

(ख) जो जग में धान मान और बल अपुनी राखन होय।
तो अपुने घर में भूले हू फूट करौ जनि कोय।
उत्तर:
कवि कहना चाहता है कि यदि संसार में अपने धन, मान और बल की रक्षा करनी है, तो अपने घर में भूल से भी फूट मत डालो।

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भाषा की बात

प्रश्न 1:
शब्दों के तत्सम रूप लिखिए (UPBoardSolutions.com)
करम, जदपि, सुबरन, हिय, जल, मीत, धरम।
उत्तर:
करम            –         कर्म
जदपि           –          यद्यपि
सुबरन          –          सुवर्ण
आरज          –          आर्य
हिये              –          हृदय
जल              –           नीर
मीत              –          मित्र
धरम             –           धर्म

प्रश्न 2.
निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटै नै हिय को शूल॥

उपर्युक्त पंक्तियों में आये हुए ‘मूल’ और ‘शूल’ शब्द तुकान्त शब्द हैं। (UPBoardSolutions.com) कविता से ऐसे ही तुकान्त शब्द छाँटकर उन शब्दों के आधार पर कुछ पंक्तियाँ रचिए।
उत्तर:
आ गए वे परदेश से अजब अनोखी बात।
मेरे लिए तो आ गई आज दीवाली रात।।

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प्रश्न 3:
इस कविता से मैंने सीखा…………..। – विद्यार्थी स्वयं करें।

प्रश्न 4.
अब मैं करूंगा/करूंगी………………………..। – विद्यार्थी स्वयं करें।

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