UP Board Solutions for Class 10 Hindi प्रमुख काव्य-ग्रन्थ और उनके रचयिता

UP Board Solutions for Class 10 Hindi प्रमुख काव्य-ग्रन्थ और उनके रचयिता

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प्रमुख काव्य-ग्रन्थ और उनके रचयिता

रचना            –        रचयिता
खुमान रासो – दलपति विजय
बीसलदेव रासो – नरपति नाल्ह
हम्मीर रासो – शारंगधर
रमाल रासो (आल्हा खण्ड) – पजगनिक
पृथ्वीराज रासो [2009] – चन्दबरदाई
विजयपाल रासो – नल्लसिंह
कीर्तिलता – विद्यापति
सन्देशरासक – अब्दुल रहमान
भरतेश्वर बाहुबली रास – शालिभद्र सूरि
पउमचरिङ – स्वयम्भू
रचना – रचयिता
जयचन्द प्रकाश – केदार भट्ट
जयमयंक जस-चन्द्रिका – मधुकर भट्ट
मृगावती – कुतुबन
मधुमालती – मंझन
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माधवानल कामकंदला – गणपति
रूपमंजरी – नन्ददास (अष्टछाप)
रसरतन – (UPBoardSolutions.com) पुहकर
नलदमन – सूरदास लखनवी
अनुराग बाँसुरी – नूर मुहम्मद
इन्द्रावती – नूर मुहम्मद
यूसुफ जुलेखा – शेख निसार
चित्रावली – उस्मान
ज्ञानदीप – शेख नबी
हंसजवाहिर – कासिमशाह
बीजक – कबीरदास
पद्मावत [2009] – मलिक मुहम्मद जायसी
अखरावट – मलिक मुहम्मद जायसी
आखिरी कलाम – मलिक मुहम्मद जायसी
नरसीजी का मायरा – मीराबाई
रागगोविन्द – मीराबाई
गीतगोविन्द की टीका – मीराबाई
राग सोरठ के पद – मीराबाई
सुदामाचरित – नरोत्तमदास
ध्रुवचरित – नरोत्तमदास
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विचारमाला – नरोत्तमदास
रहीम सतसई – रहीम
श्रृंगार सतसई – रहीम
रहीम रत्नावली – रहीम
बरवै नायिका भेद – रहीम
मदनाष्टक – रहीम
रास पंचाध्यायी – रहीम
रामचन्द्रिका [2012] – केशवदास
रसिकप्रिया [2015, 16] – केशवदास
कविप्रिया – केशवदास
नखशिख – केशवदास
रतनबावनी – केशवदास
वीरसिंह देव चरित – केशवदास
जहाँगीर जस-चन्द्रिका – केशवदास
विज्ञान गीता – केशवदास
शिवराजभूषण – भूषण
शिवाबावनी (2015) – भूषण
छत्रसाल दशक – भूषण
कवित्त रत्नाकर – चिन्तामणि
कवि कल्पतरु – चिन्तामणि
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श्रृंगार मंजरी [2014] – चिन्तामणि
पिंगल – चिन्तामणि
मतिराम सतसई – मतिराम
अलंकार पंचाशिका – मतिराम
रसराज – मतिराम
ललित ललाम [2012, 15] – मतिराम
भाव-विलास – देव
रस विलास – देव
देव-चरित्र – देव
अंगदर्पण – सैयद गुलाम नबी
रस प्रबोध – सैयद गुलाम नबी
श्रृंगार बतीसी – मानसिंह ‘द्विजदेव’
श्रृंगार लतिका – मानसिंह ‘द्विजदेव’
हिम्मतबहादुर बिरुदावली – पद्माकर
जयसिंह बिरुदावली – पद्माकर
गंगालहरी – पद्माकर
जगद्विनोद (2015) – पद्माकर
प्रबोधिनी – भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
प्रेम फुलवारी – भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
सतसई श्रृंगार –  (UPBoardSolutions.com) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
प्रेम-प्रलाप – भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
प्रेम-माधुरी – भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
प्रेममालिका – भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
प्रेमाश्रुवर्णन – भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
प्रेमतरंग – भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
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प्रेमघनसर्वस्व – बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’
काव्य-मंजूषा – महावीरप्रसाद द्विवेदी
सुमन – महावीरप्रसाद
द्विवेदी कश्मीर सुषमा (2013) – श्रीधर पाठक
स्वर्गीय-वीणा – श्रीधर पाठक
वनाष्टक – श्रीधर पाठक
जगत् सच्चाई सार – श्रीधर पाठक
भारतगीत – श्रीधर पाठक
हेमन्त – श्रीधर पाठक
मनोविनोद – श्रीधर पाठक
शृंगारलहरी – जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’
गंगालहरी – ‘रत्नाकर
विष्णुलहरी – ‘रत्नाकर
गंगावतरण – रत्नाकर
उद्धव-शतक – ‘रत्नाकर
पारिजात – अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
वैदेही वनवास – ‘हरिऔध’
प्रियप्रवास [2011, 14, 15] – ‘हरिऔध’
प्रेमाम्बु वारिधि – ‘हरिऔध’
प्रेमप्रपंच – ‘हरिऔध’
प्रेम-प्रश्रवण – ‘हरिऔध’
प्रेमाम्बु प्रवाह – ‘हरिऔध’
रस कलश – ‘हरिऔध’
चोखे चौपदे – ‘हरिऔध’
चुभते चौपदे – ‘हरिऔध’
रुक्मिणी-परिणय – ‘हरिऔध’
प्रद्युम्न-विजय – ‘हरिऔध’
धरती – त्रिलोचन
गुलाब और बुलबुल – त्रिलोचन
दिगन्त – त्रिलोचन
ताप के ताए हुए दिन – त्रिलोचन
शब्द – त्रिलोचन
उस जनपद का कवि हूँ – त्रिलोचन
अरधान – त्रिलोचन
तुम्हें सौंपता हूँ। – त्रिलोचन
जीने की कला – त्रिलोचन
कामायनी – जयशंकर
प्रसाद आँसू [2018] – जयशंकर
प्रसाद लहर – जयशंकर
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प्रसाद झरना 2017 – जयशंकर
प्रसाद प्रेम-पथिक – जयशंकर
प्रसाद चित्राधार [2009] – जयशंकर
प्रसाद कानन कुसुम – जयशंकर
प्रसाद करुणालय [2012, 13] – जयशंकर
प्रसाद महाराणा का महत्त्व – जयशंकर
प्रसाद शोकोच्छ्वास – जयशंकर
प्रसाद अनामिका (2012) – सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’
आराधना – ‘निराला’
परिमल – ‘निराला’
गीतिका – ‘निराला’
कुकुरमुत्ता – ‘निराला’
अणिमा – ‘निराला’
अर्चना – ‘निराला’
अपरा तुलसीदास [2012] – ‘निराला’
नये पत्ते – ‘निराला’
गीत-गूंज – ‘निराला’
सरोज-स्मृति – “निराला’
राम की शक्ति-पूजा – ‘निराला’
अंजलि – रामकुमार वर्मा
अभिशाप – रामकुमार वर्मा
रूपराशि – रामकुमार वर्मा
जौहर – रामकुमार वर्मा
एकलव्य – रामकुमार वर्मा
उत्तरायण (2016) – (UPBoardSolutions.com) रामकुमार वर्मा
तुलसीदास [2012] – रामकुमार वर्मा
चित्ररेखा – रामकुमार वर्मा
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चन्द्रकिरण – रामकुमार वर्मा
रत्नराशि – रामकुमार वर्मा
संकेत – रामकुमार वर्मा
आकाशगंगा (2016) – रामकुमार वर्मा
उर्मिला – बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’
प्राणार्पण – ‘नवीन’
कुंकुम – ‘नवीन’
रश्मिरेख – ‘नवीन’
अपलक – ‘नवीन’
देश-प्रेम – ‘नवीन’
क्वासि – ‘नवीन’
विनोबा-स्तवन – ‘नवीन’
हम विषपायी जनम के – ‘नवीन’
रेणुका – रामधारी सिंह ‘दिनकर’
हुंकार [2015] – ‘दिनकर’
कुरुक्षेत्र – ‘दिनकर
उर्वशी (2014) – ‘दिनकर’
रश्मिरथी – ‘दिनकर’
रसवन्ती [2014, 18] – ‘दिनकर’
सामधेनी – ‘दिनकर’
हारे को हरिनाम [2014] – ‘दिनकर
द्वन्द्वगीत – ‘दिनकर’
परशुराम की प्रतीक्षा (2011, 15) – ‘दिनकर’
धूप और धुवाँ – ‘दिनकर’
इतिहास के आँसू – ‘दिनकर’
नील कुसुम – ‘दिनकर’
भैरवी – सोहनलाल द्विवेदी
पूजागीत – सोहनलाल द्विवेदी
प्रभाती – सोहनलाल द्विवेदी
चेतना – सोहनलाल द्विवेदी
युगाधार – सोहनलाल द्विवेदी
वासन्ती – सोहनलाल द्विवेदी
दूध बताशा – सोहनलाल द्विवेदी
बच्चों के बापू – सोहनलाल द्विवेदी
झरना – सोहनलाल द्विवेदी
कुणाल – सोहनलाल द्विवेदी
वासवदत्ता – सोहनलाल द्विवेदी
विषपान – सोहनलाल द्विवेदी
चित्रा – सोहनलाल द्विवेदी
बाँसुरी – सोहनलाल द्विवेदी
बिगुल – सोहनलाल द्विवेदी
आँगन के पार द्वार [2013] – सही० वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
तार सप्तक – ‘अज्ञेय
सुनहरे शैवाल – ‘अज्ञेय
हरी घास पर क्षण भर – ‘अज्ञेय
इन्द्रधनु रौंदे हुए ये । – “अज्ञेय
भग्नदूत – ‘अज्ञेय
चिंता  –  ‘अज्ञेय’
इत्यलम् – ‘अज्ञेय’
बावरा अहेरी – ‘अज्ञेय’
अरी ओ करुणा प्रभामय – ‘अज्ञेय’
कितनी नावों में कितनी बार – ‘अज्ञेय
सागर मुद्रा – ‘अज्ञेय
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महावृक्ष के नीचे – ‘अज्ञेय
नदी के बाँक पर छाया – ‘अज्ञेय
पूर्वा – ‘अज्ञेय’
मधुकलश – हरिवंशराय बच्चन
सतरंगिणी – बच्चन
मधुबाला – बच्चन
मधुशाला [2013, 15] – बच्चन
निशा-निमन्त्रण – बच्चन
मिलन-यामिनी – बच्चन
एकान्त-संगीत – बच्चन
बंगाल का अकाल – बच्चन
प्रणय पत्रिका – बच्चन
आकुल अन्तर – बच्चन
हलाहल – बच्चन
त्रिभंगिमा – बच्चन
चार खेमे चौंसठ बँटे – बच्चन
सूत की माला युगधारा – नागार्जुन
भस्मांकुर – नागार्जुन
सतरंगे पंखों वाली – नागार्जुन
तालाब की मछलियाँ – नागार्जुन
तुमने कहा था – नागार्जुन
खिचड़ी विप्लव देखा हमने – नागार्जुन
हजार-हजार बाहों वाली – नागार्जुन
प्यासी पथरायी आँखें – नागार्जुन
खून और शोले – नागार्जुन
जीवन के गान। – शिवमंगल सिंह ‘सुमन
प्रलय सृजन – ‘सुमन’
विश्वास बढ़ता ही गया – ‘सुमन’
हिल्लोल – ‘सुमन’
पर आँखें भरी नहीं – ‘सुमन’
विन्ध्य हिमालय – ‘सुमन’
मिट्टी की बलात् – ‘सुमन
युग की गंगा – केदारनाथ अग्रवाल
नींद के बादल – केदारनाथ अग्रवाल
लोक और आलोक – केदारनाथ अग्रवाल
आग का आइना – केदारनाथ अग्रवाल
पंख और पतवार – केदारनाथ अग्रवाल
हे मेरी तुम – केदारनाथ अग्रवाल
कनुप्रिया [2013] – धर्मवीर भारती
सात गीत वर्ष – धर्मवीर भारती
अन्धी युग (2009) – धर्मवीर भारती
ठण्डा लोहा (2015) – धर्मवीर भारती
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भूरी भूरी खाक धूल – गजानन माधव मुक्तिबोध’
चाँद का मुँह टेढ़ा – ‘मक्तिबोध’
प्रेम-पथिक – वियोगी हरि
प्रेमशतक – वियोगी हरि
प्रेमांजलि – वियोगी हरि
वीर सतसई – वियोगी हरि
धूप के धान (2012) – गिरिजाकुमार माथुर
मंजीर – गिरिजाकुमार माथुर
नाश और निर्माण – गिरिजाकुमार माथुर
छाया मत छूना – (UPBoardSolutions.com) गिरिजाकुमार माथुर
भीतरी नदी की यात्रा – गिरिजाकुमार माथुर
साक्षी रहे वर्तमान – गिरिजाकुमार माथुर
पृथ्वीकल्प – गिरिजाकुमार माथुर
शिलाखण्ड चमकीले – गिरिजाकुमार माथुर
गीत फरोश [2015, 18] – भवानीप्रसाद मिश्र
खुशबू के शिलालेख – भवानीप्रसाद मिश्र
चकित है दुःख – भवानीप्रसाद मिश्र
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अँधेरी कविताएँ – भवानीप्रसाद मिश्र
बुनी हुई रस्सी – भवानीप्रसाद मिश्र
फसलें और फूल – भवानीप्रसाद मिश्र
सम्प्रति – भवानीप्रसाद मिश्र
कर्णफूल [2014] – नरेन्द्र शर्मा

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UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 10 कपड़े के तन्तु : प्रकार एवं दैनिक जीवन में इनका प्रयोग

UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 10 कपड़े के तन्तु : प्रकार एवं दैनिक जीवन में इनका प्रयोग

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
‘तन्तु’ (Fibers) से आप क्या समझती हैं? वस्त्रोपयोगी तन्तुओं का एक वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।
या
विभिन्न प्रकार के वस्त्रोपयोगी तन्तुओं का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
या
वनस्पतियों से प्राप्त होने वाले वस्त्रोपयोगी तन्तुओं का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
या
जन्तुओं से प्राप्त होने वाले वस्त्रोपयोगी तन्तुओं का सामान्य परिचय प्रस्तुत कीजिए।
या
कृत्रिम अथवा मानव-निर्मित वस्त्रोपयोगी तन्तुओं का सामान्य परिचय दीजिए।
उत्तर:
तन्तु का अर्थ

तैयार वस्त्र की साज-सज्जा तथा प्रयोग आदि से प्रत्येक व्यक्ति परिचित है, परन्तु इस बात का ज्ञान प्रत्येक व्यक्ति को नहीं है कि वस्त्र कैसे तथा किससे-तैयार किए जाते हैं। वस्त्रों का निर्माण अनेक प्रकार के तन्तुओं से होता है। अब प्रश्न उठता है कि तन्तु किसे कहते हैं? वस्त्र-विज्ञान की भाषा में वस्त्र-निर्माण की सबसे छोटी इकाई को तन्तु या रेशा कहते हैं। तन्तुओं से धागा तैयार किया जाता है तथा धागों से वस्त्र का निर्माण किया (UPBoardSolutions.com) जाता है। इस प्रकार वस्त्र-निर्माण के लिए अपनाए जाने वाले विभिन्न तन्तुओं के आकार, शक्ल, गुण, लम्बाई तथा स्रोत भिन्न-भिन्न होते हैं। प्रारम्भ में व्यक्ति केवल प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त होने वाले तन्तुओं से ही वस्त्र तैयार करता था, परन्तु आधुनिक युग में मनुष्य ने कृत्रिम रूप से भी वस्त्रोपयोगी तन्तु तैयार कर लिए हैं।

वस्त्रोपयोगी तन्तुओं का वर्गीकरण

तन्तुओं के विभिन्न स्रोत निम्नलिखित हैं
UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 10 कपड़े के तन्तु प्रकार एवं दैनिक जीवन में इनका प्रयोग

उपर्युक्त वर्णित तालिका के आधार पर कहा जा सकता है कि वस्त्रोपयोगी तन्तु मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं-प्राकृतिक तन्तु तथा कृत्रिम तन्तु। प्राकृतिक तन्तु उन तन्तुओं को कहा जाता है जिन्हें प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त किया जाता है। इन तन्तुओं को पुनः तीन उपवर्गों में बाँटा जा सकता है-वनस्पति-जगत् से प्राप्त होने वाले तन्तु, प्राणी या जन्तु-जगत् से प्राप्त होने वाले तन्तु तथा खनिज स्रोतों से प्राप्त होने वाले तन्तु। वस्त्रोपयोगी कृत्रिम तन्तु मानव-निर्मित हैं। इन्हें यान्त्रिक तथा रासायनिक विधियों द्वारा बनाया जाता है। विभिन्न प्रकार के वस्त्रोपयोगी तन्तुओं का सामान्य परिचय निम्नवर्णित है

(1) वनस्पति-जगत् से प्राप्त होने वाले तन्तु:
पेड़-पौधों के विभिन्न भागों से अनेक प्रकार के महत्त्वपूर्ण वस्त्रोपयोगी तन्तु प्राप्त होते हैं। इनमें से मुख्य कपास, जूट, लिनेन तथा हैम्प के तन्तु हैं। वनस्पति-जगत् से प्राप्त (UPBoardSolutions.com) होने वाले तन्तुओं में सेल्यूलोस की सर्वाधिक मात्रा पाई जाती है। अतः इन तन्तुओं को ‘सेल्यूलोस तन्तु’ भी कहा जाता है। इन तन्तुओं का संक्षिप्त विवरण निम्नवर्णित है

(क) कपास अथवा रूई ( कॉटन):
कपास के पौधे के बीजों की सतह पर पाए जाने वाले रेशों से वस्त्रोपयोगी तन्तु प्राप्त किए जाते हैं। इन तन्तुओं को ही कपास के तन्तु कहा जाता है। इन तन्तुओं से सूती वस्त्रों (जैसे-खद्दर, हथकरघा वस्त्र व मिल-निर्मित वस्त्र आदि) का निर्माण किया जाता है। कपास के तन्तु की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. एक पाउण्ड कपास में लगभग 9,00,00,000 (नौ करोड़) तन्तु होते हैं।
  2. कपास के तन्तु आधार पर चौड़े तथा नुकीले सिरों के होते हैं।
  3.  प्रत्येक तन्तु में लगभग 90% सेल्यूलोस, 2-3% प्रोटीन, 0.6% जल व 0.3% शर्करा होती है।
  4.  ये अत्यधिक मजबूत व टिकाऊ होते हैं।
  5.  ये अत्यधिक ताप सह सकते हैं।
  6. इनमें जल सोखने की क्षमता होती है। अतः इनसे बने वस्त्र ग्रीष्म ऋतु में (पसीना सोख पाने के कारण) अत्यन्त उपयोगी होते हैं।
  7. सूती वस्त्रों को धोना सरल होता है। इन्हें किसी भी साबुन से सरलता से धो सकते हैं।
  8.  सूती वस्त्रों में प्रत्यास्थता तथा प्रतिस्कन्दता का गुण नहीं पाया जाता; अतः इनमें सामान्य लचक नहीं होती तथा शीघ्र ही सलवटें पड़ जाती हैं।
  9.  सूती वस्त्रों पर कोई भी रंग आसानी से चढ़ाया जा सकता है।
  10.  सूती वस्त्रों पर क्षार का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता, परन्तु सान्द्र अम्लों के सम्पर्क से ये नष्ट हो जाते हैं।
  11. सूती वस्त्रों को यदि नम अवस्था में कुछ समय तक रख लिया जाए, तो इनमें फफूदी लग जाती है।

(ख) अन्य वानस्पतिक तन्तु:
ये प्रायः पौधों के स्तम्भ अथवा तने से प्राप्त किए जाते हैं। इनके उदाहरण निम्नलिखित हैं

  1. फ्लैक्स: लाइनम नामक पौधों से प्राप्त ये तन्तु लाइनिन-वस्त्र, कालीन व कागज आदि के निर्माण में प्रयुक्त होते हैं।
  2. हैम्प: एक विशेष पौधे से प्राप्त ये तन्तु निम्न श्रेणी के वस्त्र, रस्सियों व थैलों के निर्माण में प्रयुक्त होते हैं।
  3.  जूट: कोरकोरस नामक पौधे से प्राप्त इस तन्तु का उपयोग रस्सियाँ, कालीन, परदे व कागज आदि बनाने में होता है।
  4.  कौइर: नारियल के मध्य भाग से कौइर अथवा जटा प्राप्त होती है। इसका उपयोग रस्सियाँ, दरवाजों के पायदान, फर्श की चटाई इत्यादि बनाने में होता है।

(2) जन्तुओं से प्राप्त तन्तु

रेशम एवं ऊन दो महत्त्वपूर्ण तन्तु हैं जो हमें जन्तुओं से प्राप्त होते हैं। प्राणी-जगत् से प्राप्त होने वाले इन तन्तुओं में प्रोटीन की अधिकता होती है; अतः इन तन्तुओं को प्रोटीन तन्तु’, भी कहा जाता है।

(क) रेशम:
रेशम का कीट प्रायः शहतूत के पौधे की पत्तियों पर अपना जीवन व्यतीत करता है। इसके लारवा शहतूत की पत्तियों पर एक लसदार पदार्थ अपने चारों ओर निर्मित कर (UPBoardSolutions.com) एक संरचना बनाते हैं, जिसे कोया या ‘कोकून’ कहते हैं। इन संरचनाओं को गर्म पानी में डालने पर इनके अन्दर के कीट मर जाते हैं तथा बाह्य खोलों से रेशम के लम्बे तथा महीन तन्तु प्राप्त किए जाते हैं।

रेशम के तन्तु की विशेषताएँ

  1. यह एक लम्बा, समान मोटाई का तथा चिकना एवं चमकदार तन्तु होता है।
  2. ये सफेद अथवा क्रीम रंग के होते हैं।
  3.  इनकी जल-अवशोषण क्षमता लगभग शून्य होती है।
  4. हल्के अम्ल के प्रयोग से रेशम के तन्तु अधिक चमकदार हो जाते हैं।
  5.  कास्टिक सोडे के हल्के घोल में डालने पर इनकी चमक नष्ट हो जाती है तथा इनके गलने की सम्भावना रहती है।
  6.  रगड़ने व मलने से रेशम के तन्तुओं की कोमलता के नष्ट होने की सम्भावना रहती है।
  7.  अधिक गर्म वायु अथवा धूप में रखने से रेशम की गुणवत्ता कम हो जाती है।
  8.  रेशम के तन्तु जलाने पर बालों के जलने के समान गन्ध देते हैं।
  9.  जलाने पर रेशम के तन्तुओं की काली गोली बन जाती है।
  10.  रेशम का तन्तु पानी में गीला करने पर न तो फैलता है और न ही सिकुड़ता है।

(ख) ऊन:
यह मुख्यतः भेड़ों के बालों से निर्मित की जाती है। भारतवर्ष में पाई जाने वाली मैरीनो जाति की भेड़ों से सर्वोत्तम प्रकार की ऊन प्राप्त होती है। भेड़ के मेमनों से प्राप्त ऊन (UPBoardSolutions.com) अति कोमल व उच्च गुणवत्ता की होती है। भेड़ों के अतिरिक्त ऊँट, बकरी व खरगोश आदि प्राणियों के बालों से भी ऊन प्राप्त की जाती है। काश्मीर में पाई जाने वाली बकरियों से प्राप्त ऊन भी सर्वोच्च श्रेणी की होती है।

ऊन के तन्तु की विशेषताएँ:

  1.  उत्तम ऊनी तन्तु लम्बाई में 5-15 सेमी तक होता है।
  2.  यह लगभग गोलाकार तथा लहरियापन लिए होता है।
  3. रेशम के तन्तु के समान इसमें चमक पाई जाती है।
  4. धुलाई व रँगाई में प्रयुक्त होने वाले सामान्य व हल्के अम्लीय घोलों को ऊन पर कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता है।
  5. कपड़े धोने के सोडे (कास्टिक सोडे) के प्रयोग से ऊन के तन्तु परस्पर चिपक जाते हैं तथा उनकी कोमलता नष्ट हो जाती है, परन्तु सुहागा व अमोनिया अथवा उत्तम साबुन के प्रयोग से ऊन की गुणवत्ता नष्ट नहीं होती है।
  6. उच्च ताप अथवा तीव्र धूप में ऊन का रंग हल्का पड़ जाता है तथा इसकी गुणवत्ता भी कुप्रभावित होती है।
  7. भीगे हुए तन्तुओं को मलने से वे नरम पड़ जाते हैं।
  8. ऊन वायु से सहज ही नमी को सोख लेती है।
  9.  अनुपयुक्त ताप व असावधानीपूर्वक धोने से ऊन के तन्तु सिकुड़ जाते हैं।
  10.  जलाने पर ऊन चिड़िया के पंखों के जलने जैसी गन्ध देती है तथा सज्जी के घोल में 5-6 मिनट तक उबालने पर ऊन पूर्ण रूप से घुलकर अदृश्य हो जाती है।
  11.  ऊन ऊष्मा की कुचालक होती है; अत: शारीरिक ऊष्मा को बाहर नहीं जाने देती। इसलिए शरद ऋतु में ऊनी वस्त्रों का उपयोग लाभकारी होता है।

(3) खनिज पदार्थों से निर्मित तन्तु

(क) सोने-चाँदी से निर्मित तन्तु:
इनका निर्माण मशीनों द्वारा किया जाता है। इन तन्तुओं (महीन तारों) को रेशमी अथवा सूती तन्तुओं के साथ मिश्रित कर वस्त्रों का निर्माण किया जाता है। इन वस्त्रों का जरीदार अथवा किमखाब कहा जाता है। ये बहुमूल्य होते हैं। आजकल इनके स्थान पर ऐलुमिनियम के तन्तुओं का प्रयोग कर कृत्रिम जरीदार एवं सस्ते मूल्य के वस्त्रों का निर्माण किया जाने
लगा है।

(ख) ऐस्बेस्टॉस से निर्मित तन्तु:
इन पर अग्नि का कोई प्रभाव नहीं होता है; अतः इनसे अग्नि शमकों के वस्त्र व अन्य प्रकार के अग्नि से सुरक्षित रखने वाले वस्त्र निर्मित किए जाते हैं।

(4) कृत्रिम अथवा मानव-निर्मित तन्तु
मनुष्य ने अनेक यान्त्रिक एवं रासायनिक विधियों द्वारा कई प्रकार के तन्तुओं का आविष्कार किया है। ये कृत्रिम अथवा मानव-निर्मित तन्तु कहलाते हैं। सामान्यत: आधुनिक समय में निम्न प्रकार के कृत्रिम तन्तु प्रचलित हैं

(क) रेयॉन:
सामान्यतः लकड़ी, बॉस अथवा रूई की लुग्दी बनाकर उसे द्रव में परिवर्तित किया जाता है। इस द्रव को मशीन के महीन छिद्रों में से निकालकर व शुष्क करके लम्बे व चमकदार तन्तु प्राप्त किए जाते हैं। रेयॉन के तन्तु समान व्यास के तथा सेलुलोस के बने होते हैं। अधिक गर्म जल में धोने से अथवा अधिक ताप पर ये कमजोर पड़ जाते हैं। अम्लों व क्षारों का इन पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।

(ख) नायलॉन:
यह तन्तु कोयला, जल व वायु के संयोग से रासायनिक विधियों द्वारा निर्मित किया जाता है। नायलॉन ताप को सुचालक है। अत्यधिक ताप पर यह पिघलकर नष्ट हो जाता है; अतः नायलॉन के वस्त्रों पर अत्यधिक गर्म इस्तरी (प्रेस) का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसको जलाने पर प्लास्टिक के जलने (UPBoardSolutions.com) जैसी गन्ध आती है। हल्के अम्लों का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। क्षारों से अप्रभावित रहने के कारण इसे अनेक बार धोया जा सकता है।

(ग) पोलिएस्टर तन्तु:
डैकरॉन एवं टेरीलीन मुख्य पोलिएस्टर तन्तु हैं। हल्के अम्लों को इन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। क्षारों से ये अप्रभावित रहते हैं। अत्यधिक ताप पर ये नष्ट हो जाते हैं। ज्वलनशील होने के कारण इनसे निर्मित वस्त्रों को अग्नि से दूर रखना चाहिए।

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प्रश्न 2:
वस्त्रों का हमारे जीवन में क्या उपयोग तथा महत्त्व है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
वस्त्रों का जीवन में उपयोग तथा महत्त्व

सभ्य मानव का वस्त्रों से घनिष्ठ सम्बन्ध है। वस्त्रविहीन मनुष्य को मानव समाज में कदापि सम्मिलित नहीं किया जा सकता। वस्त्रों से मनुष्य अपने शरीर को प्राकृतिक कारकों से बचाता है। वस्त्रों से ही वह अपने शरीर को सजाता-सँवारता है। वेशभूषा के अतिरिक्त व्यक्ति के दैनिक जीवन में वस्त्रों के अन्य अनेक उपयोग भी हैं। मनुष्य के लिए वस्त्रों के उपयोग एवं महत्त्व का संक्षिप्त विवरण निम्नवर्णित है

(1) शरीर को सुरक्षा प्रदान करना:
वस्त्र हमें विभिन्न प्राकृतिक कारकों से सुरक्षा प्रदान करते हैं। सर्दी-गर्मी तथा बरसात आदि कारकों से बचने के लिए वस्त्र धारण किए जाते हैं। गर्मी में लू से बचने में वस्त्र (UPBoardSolutions.com) सहायक होते हैं। वस्त्रविहीन शरीर सूर्य की तेज किरणों से झुलस सकता है। सर्दी से बचने के लिए ऊनी वस्त्र धारण किए जाते हैं। बरसात से बचने के लिए जल अवरोधक वस्त्र तथा छाते आदि इस्तेमाल किए जाते हैं।

(2) शरीर को छिपाने में सहायक:
सभ्य समाज में मनुष्य द्वारा शरीर की गोपनीयता को बनाए रखने के लिए वस्त्र धारण किए जाते हैं। वस्त्रविहीन अर्थात् नग्न व्यक्ति को असभ्य अथवा पागल ही माना जाता है।

(3) वस्त्र शरीर को सजाने सँवारने में सहायक होते हैं:
मनुष्य के लिए वस्त्रों का एक विशिष्ट महत्त्व है–शरीर को सजाना तथा सँवारना। विभिन्न प्रकार की आकर्षक एवं उत्तम वेशभूषा धारण करके स्त्री-पुरुष अपने शरीर को अधिक-से-अधिक सजाते-सँवारते हैं। उत्तम वेशभूषा से व्यक्तित्व में अतिरिक्त निखार आ जाता है।

(4) वस्त्र सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि करते हैं:
वस्त्र व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि करने वाले कारक भी हैं। धनवान् लोग अधिक-से-अधिक कीमती तथा उत्तम वस्त्र धारण करके समाज में प्रतिष्ठा (UPBoardSolutions.com) अर्जित करते हैं। कीमती वस्त्रों के अतिरिक्त उचित ढंग से वस्त्र धारण करना, सौम्य वस्त्र धारण करना आदि भी प्रतिष्ठा के चिह्न माने जाते हैं। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति भद्दे ढंग से वस्त्र धारण करता है तो समाज में उसकी प्रतिष्ठा घट भी सकती है।

(5) वस्त्र व्यक्ति को विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं:
वस्त्रों को देखकर अनेक व्यक्तियों को सरलता से पहचान लिया जाता है। सामान्य रूप से स्कूल के बच्चों, सेना, पुलिस, डाक-तार विभाग, रेलवे तथा अस्पताल के कर्मचारियों आदि की वेशभूषा निर्धारित होती है। ऐसे व्यक्ति की वेशभूषा को देखकर ही उसकी पहचान की जा सकती है।

(6) वस्त्रों के कुछ अन्य उपयोग:
वेशभूषा के अतिरिक्त वस्त्रों के कुछ अन्य उपयोग भी हैं। घर को सजाने-सँवारने तथा उपयोग की अनेक वस्तुओं के निर्माण में वस्त्रों की मुख्यतम भूमिका होती है। परदे, कालीन, बिस्तर, दरियाँ आदि इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं। वस्त्रों से ही तम्बू तथा शामियाने बनाए जाते हैं। विभिन्न उद्योगों (UPBoardSolutions.com) में भी वस्त्रों का अत्यधिक उपयोग होता है। दैनिक जीवन में विभिन्न वस्तुओं को लाने-ले जाने के लिए कपड़ों से निर्मित थैले, बोरियाँ तथा रस्सियाँ आदि इस्तेमाल होते हैं। इसके अतिरिक्त चिकित्सा के क्षेत्र में भी कपड़े का भरपूर इस्तेमाल होता है। घाव हो जाने पर, शल्य चिकित्सा होने पर, हड्डी टूट जाने अथवा मोच आ जाने पर उपचार के लिए कपड़ों से निर्मित पट्टियाँ ही सर्वाधिक उपयोगी सिद्ध होती हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
कपड़ा बनाने के लिए किन स्रोतों से तन्तु प्राप्त किए जाते हैं?
उत्तर:
कपड़ा बनाने के लिए दो प्रमुख स्रोतों से तन्तु प्राप्त किए जाते हैं

(1) प्राकृतिक स्रोत तथा
(2) कृत्रिम अथवा मानव-निर्मित स्रोत। प्राकृतिक स्रोत के अन्तर्गत

तन्तु:
(क) वनस्पतियों,
(ख) जन्तुओं तथा
(ग) खनिज पदार्थों से प्राप्त किए जाते हैं। कृत्रिम तन्तुओं
में: (क) रेयॉन,
(ख) नायलॉन तथा
(ग) पोलिएस्टर आते हैं।

 

प्रश्न 2:
तन्तुओं के आधार पर वस्त्र कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
विभिन्न स्रोतों से प्राप्त तन्तुओं से निम्न प्रकार के वस्त्र निर्मित किए जाते हैं

(क) वानस्पतिक तन्तुओं से निर्मित वस्त्र

  1.  सूती वस्त्र-कपास के तन्तुओं से धागे (सूत) तैयार कर इन वस्त्रों का निर्माण किया जाता है।
  2.  लिनेन वस्त्र–फ्लैक्स के पौधों से प्राप्त तन्तुओं से धागा तैयार कर इन्हें निर्मित किया जाता है।

(ख) जन्तुओं से प्राप्त अथवा जान्तव तन्तुओं से निर्मित वस्त्र

  1.  रेशमी वस्त्र:
    रेशम के कीड़ों द्वारा निर्मित तन्तुओं से इन वस्त्रों को तैयार किया जाता है।
  2. ऊनी वस्त्र:
    ये ऊन से तैयार किए जाते हैं तथा ऊन के तन्तु प्रायः ऊँट, खरगोश, भेड़ों व बकरियों के शरीर में उगने वाले बालों से प्राप्त होते हैं।

(ग) खनिज पदार्थों से प्राप्त तन्तुओं से निर्मित वस्त्र

  1. जरीदार वस्त्र:
    ये मूल्यवान् वस्त्र चाँदी-सोने अथवा ऐलुमिनियम के महीन तारों को रेशमी अथवा सूती तन्तुओं के साथ मिश्रित करे तैयार किए जाते हैं।
  2.  अग्निप्रतिरोधक वस्त्र:
    ऐस्बेस्टॉस से निर्मित तन्तुओं से इस प्रकार के वस्त्र तैयार किए जाते हैं।

(घ) कृत्रिम तन्तुओं से निर्मित वस्त्र

मनुष्य द्वारा रासायनिक विधियों के प्रयोग से निर्मित तन्तुओं से तैयार किए जाने वाले वस्त्र हैं

  1.  रेयॉन,
  2.  नायलॉन एवं
  3.  पोलिएस्टर वस्त्र इत्यादि।

प्रश्न 3:
प्राकृतिक तन्तु तथा कृत्रिम तन्तु में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वस्त्रोपयोगी तन्तु मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं—प्राकृतिक तन्तु तथा कृत्रिम तन्तु। इन दोनों प्रकार के तन्तुओं में विद्यमान अन्तर को निम्नलिखित तालिका के माध्यम से प्रस्तुत किया जा सकता है ।
UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 10 कपड़े के तन्तु प्रकार एवं दैनिक जीवन में इनका प्रयोग
UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 10 कपड़े के तन्तु प्रकार एवं दैनिक जीवन में इनका प्रयोग image - 1

प्रश्न 4:
ऊन की शुद्धता आप किस प्रकार निश्चित करेंगी?
उत्तर:
ऊन की शुद्धता के लिए ऊन की निम्नलिखित विशेषताओं का निरीक्षण आवश्

  1.  ऊन का धागा लगभग गोलाकार तथा लहरियापन लिए होता है।
  2.  कास्टिक सोडे के प्रयोग से ऊन के तन्तु परस्पर चिपक जाते हैं।
  3.  जलाने पर ऊन चिड़िया के पंखों के जलने के समान गन्ध देती है।
  4.  सज्जी या क्षार घोल में 5-6 मिनट तक उबालने पर ऊन इसमें पूर्णरूप से घुलकर अदृश्य हो जाती है।

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प्रश्न 5:
सूती वस्त्रों की क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर:
सूती वस्त्रों की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

  1.  अपेक्षाकृत कम मूल्य के होते हैं।
  2.  हल्के अम्लों व क्षारों से अप्रभावित रहने के कारण इन्हें सहज ही व अनेक बार साबुन से धोया जा सकता है।
  3.  इनमें पसीना सोखने की क्षमता अधिक होती है।
  4.  ये शीघ्र सूख जाते हैं।
  5.  अधिक ताप सहन-शक्ति के कारण इन पर सरलतापूर्वक इस्तरी की जा सकती है।
  6.  जल शोषण करने की अधिक क्षमता के कारण तौलिये व झाड़न आदि के लिए सूती वस्त्र सर्वोत्तम होते हैं।
  7.  सूती वस्त्रे शरीर की गर्मी को सहज ही बाहर निकलने देते हैं; अत: ग्रीष्म ऋतु के लिए ये सर्वोत्तम वस्त्र होते हैं। ।
  8.  सूती वस्त्र प्रायः प्रथम बार धोने पर अधिक सिकुड़ते हैं; अतः वस्त्र-विशेष को निर्मित कराने से पूर्व इन्हें धोकर सुखा लेना चाहिए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
तन्तु से क्या आशय है?
उत्तर:
वस्त्र-निर्माण की सबसे छोटी इकाई को तन्तु कहते हैं।

प्रश्न 2:
वस्त्रोपयोगी तन्तुओं के दो प्रमुख वर्ग कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
वस्त्रोंपयोगी तन्तुओं के दो प्रमुख वर्ग हैं
(क) वस्त्रोपयोगी प्राकृतिक तन्तु तथा
(ख) वस्त्रोंपयोगी कृत्रिम तन्तु।

प्रश्न 3:
तन्तु तथा धागे में क्या अन्तर है?
उत्तर:
तन्तु वस्त्र निर्माण की सबसे छोटी एवं स्वतन्त्र इकाई है। अनेक तन्तुओं को निश्चित विधि द्वारा परस्पर सम्बद्ध करके धागे का निर्माण होता है। तन्तु सामान्य रूप से प्रकृतिजन्य होते हैं जबकि धागे विधिवत् तैयार किए जाते हैं।

प्रैश्न 4:
वस्त्रोपयोगी प्राकृतिक तन्तुओं की प्राप्ति के स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
वस्त्रोपयोगी प्राकृतिक तन्तुओं की प्राप्ति के स्रोत हैं-वनस्पति-जगत्, प्राणी-जगत् तथा खनिज स्रोत।।

प्रश्न 5:
वनस्पतिजन्य तन्तुओं को अन्य किस नाम से जाना जाता है? कारण भी बताइए।
उत्तर:
वनस्पतिजन्य तन्तुओं में अधिकांश भाग सेलुलोस का होता है। अत: इन तन्तुओं को सेलुलोस तन्तु भी कहा जाता है।

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प्रश्न 6:
सूती रेशे की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
कपास के बीज रोमों से प्राप्त सूती रेशे अधिक मजबूत व टिकाऊ होते हैं। इनमें अधिक ताप सहने व जल सोखने की क्षमता होती है।

प्रश्न 7:
प्राणिजन्य तन्तुओं को अन्य किस नाम से जाना जाता है? कारण भी बताइए।
उत्तर:
प्राणिजन्य तन्तुओं में अधिकांश भाग प्रोटीन का पाया जाता है; अत: इन तन्तुओं को ‘प्रोटीन तन्तु’ भी कहा जाता है।

प्रश्न 8:
कृत्रिम तन्तुओं से प्रायः कौन-कौन से वस्त्र बनते हैं?
उत्तर:
कृत्रिम तन्तुओं से निर्मित होने वाले प्रमुख प्रकार के वस्त्र हैं

  1.  रेयॉन,
  2.  नायलॉन,
  3.  डैकरॉन,
  4. टेरीलीन।

प्रश्न 9:
रेयॉन किस प्रकार को तन्तु है?
उत्तर:
रेयॉन यान्त्रिक विधि से निर्मित कृत्रिम तन्तु है।

प्रश्न 10:
ऊनी तन्तु किस वर्ग के तन्तु हैं?
उत्तर:
ऊनी तन्तु प्राणिजन्य प्राकृतिक तन्तु हैं।

प्रश्न 11:
जरीदार वस्त्र किस प्रकार निर्मित किए जाते हैं?
उत्तर:
सोने, चाँदी अथवा ऐलुमिनियम के महीन तारों को सूती अथवा रेशमी धागों के साथ मिश्रित करे जरीदार वस्त्र निर्मित किए जाते हैं।

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प्रश्न 12:
शुद्ध रेशम की क्या पहचान है?
उत्तर:

  1.  रेशम के तन्तु जलाने पर बालों के जलने के समान गन्ध देते हैं तथा इनकी काली-सी गोली बन जाती है।
  2.  पानी में धोने पर रेशम न तो फैलता है और न ही सिकुड़ता है।

प्रश्न 13:
बर्तन पोंछने के तौलिए (डस्टर)प्रायः सूती ही क्यों प्रयोग किए जाते हैं?
उत्तर:
क्योंकि सूती डस्टर अधिक गर्मी सहन कर लेते हैं तथा बर्तनों की नमी सोख लेते हैं। ये शीघ्र ही आग को नहीं पकड़ते।

प्रश्न 14:
गर्म जलवायु में सूती वस्त्र अधिक सुविधाजनक क्यों प्रतीत होते हैं?
उत्तर:
गर्म जलवायु में शरीर से अधिक पसीना निकलता है। सूती वस्त्रे इस पसीने को शीघ्र ही सोख लेते हैं तथा चिपचिपाहट नहीं होती। अतः ये अधिक सुविधाजनक प्रतीत होते हैं।

प्रश्न 15:
उत्तम ऊन किस प्रकार की भेड़ों से प्राप्त होती है?
उत्तर:
उत्तम ऊन प्रायः मैरीनो जाति की जीवित भेड़ों से प्राप्त होती है।

प्रश्न 16:
ऊनी वस्त्र गर्म क्यों माने जाते हैं? या ऊनी कपड़ों की विशेषता लिखिए।
उत्तर:
ऊनी तन्तुओं के ऊष्मा के कुचालक होने के कारण ऊनी वस्त्र शरीर की गर्मी को बाहर नहीं निकलने देते, जिससे ये शीत ऋतु में ठण्डे स्थानों के लिए गर्म व उपयुक्त वस्त्र माने जाते हैं।

प्रश्न 17:
जान्तव तन्तु कौन-से होते हैं? किसी एक के बारे में बताइए।
उत्तर:
जन्तुओं से प्राप्त होने वाले तन्तु को जान्तव तन्तु या प्राणिजन्य तन्तु कहते हैं। रेशम एवं ऊन इसके प्रमुख उदाहरण हैं।।

प्रश्न 18:
नायलॉन, डैकरॉन, आरलॉन तथा एक्रीलॉन नामक वस्त्रोपयोगी तन्तु किस वर्ग के तन्तु हैं? इन्हें किस विधि द्वारा तैयार किया जाता है?
उत्तर:
नायलॉन, डैकरॉन, आरलॉन तथा एक्रीलॉन नामक वस्त्रोपयोगी तन्तु कृत्रिम वर्ग के तन्तु हैं? इन्हें रासायनिक विधि द्वारा तैयार किया जाता है।

प्रश्न 19:
क्षार का नायलॉन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
त्तर:
क्षार का नायलॉन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

प्रश्न 20:
गन्धक के तेजाब के गाढ़े घोल का ऊनी वस्त्रों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
गन्धक के तेजाब (सल्फ्यूरिक अम्ल) के गाढ़े घोल से ऊनी तन्तु नष्ट हो जाते हैं।

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प्रश्न 21:
दैनिक उपयोग के लिए किस प्रकार के वस्त्र सुविधाजनक हैं?
उत्तर:
दैनिक उपयोग के लिए सूती वस्त्र उपयोगी हैं और इसमें भी खादी के वस्त्र सर्वश्रेष्ठ ।

प्रश्न 22:
वस्त्रों का व्यक्ति के जीवन में उपयोग एवं महत्त्व बताइए।
उत्तर:

  1.  वस्त्र शरीर को प्राकृतिक कारकों से सुरक्षा प्रदान करते हैं,
  2.  वस्त्र शरीर को गोपनीयता प्रदान करते हैं,
  3. वस्त्र शरीर को सजाने एवं सँवारने में सहायक होते हैं,
  4. वस्त्र व्यक्ति को सामाजिक प्रतिष्ठा एवं विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं तथा
  5. वस्त्र दैनिक जीवन के अनेक कार्यों में उपयोगी हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न:
प्रत्येक प्रश्न के चार वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। इनमें से सही विकल्प चुनकर लिखिए

(1) वस्त्र विज्ञान के अनुसार वस्त्र-निर्माण की सबसे छोटी इकाई है
(क) कपास,
(ख) ऊन,
(ग) तन्तु,
(घ) धागा।

(2) सूती वस्त्र के लिए तन्तु प्राप्त किए जाते हैं
(क) रासायनिक पदार्थों से,
(ख) प्राणी-जगत् से,
(ग) व्यर्थ पदार्थों से,
(घ) वनस्पति-जगत् से।

(3) भारतवर्ष में प्रायः सूती वस्त्र अधिक पहने जाते हैं, क्योंकि ये
(क) बहुमूल्य होते हैं,
(ख) सहज ही उपलब्ध हैं,
(ग) वातावरण के अनुरूप हैं,
(घ) ऊष्मा के कुचालक हैं।

(4) नायलॉन के तन्तु हैं
(क) प्राकृतिक तन्तु,
(ख) प्राणिजन्य तन्तु,
(ग) यान्त्रिक विधि से निर्मित तन्तु ,
(घ) रासायनिक विधि द्वारा निर्मित कृत्रिम तन्तु।

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(5) ऊन प्राप्त की जा सकती है
(क) भेड़ों से,
(ख) बकरियों से,
(ग) ऊँटों से,
(घ) इन सभी से।

(6) उच्च गुणवत्ता की ऊन प्राप्त की जाती है
(क) बकरियों से,
(ख) भेड़ों से,
(ग) मेमनों से,
(घ) ऊँट से।

(7) निम्नलिखित में मानव-निर्मित तन्तु नहीं है।
(क) रेयॉन,
(ख) रेशम,
(ग) पोलिएस्टर,
(घ) नायलॉन।

(8) निम्नलिखित में पौधों से न प्राप्त होने वाली तन्तु है
(क) टेरीलीन,
(ख) सूत,
(ग) लिनन,
(घ) जूट।

(9) निम्नलिखित में से किस तन्तु पर आग का प्रभाव नहीं पड़ता है
(क) खनिज ( धातुमय) तन्तु ,
(ख) वनस्पति तन्तु,
(ग) जान्तव तन्तु,
(घ) कृत्रिम तन्तु।

(10) निम्नलिखित में से प्राकृतिक स्रोत से प्राप्त तन्तु निर्मित वस्त्र है
(क) नायलॉन,
(ख) पोलिएस्टर,
(ग) खद्दर,
(घ) डैकरॉन।

(11) रेयॉन नामक कृत्रिम तन्तु बनाया जाता है
(क) नितान्त सरल विधि द्वारा,
(ख) रासायनिक विधि द्वारा,
(ग) जटिल विधि द्वारा,
(घ) यान्त्रिक विधि द्वारा।

(12) ग्रीष्म ऋतु के लिए वस्त्र होता है
(क) सूती,
(ख) लिनन,
(ग) रेशमी,
(घ) टेरीलीन।

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(13) हमारे लिए वस्त्रों की उपयोगिता है
(क) प्राकृतिक कारकों से सुरक्षा प्रदान करना,
(ख) शरीर को सजाना-सँवारना,
(ग) सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदान करना,
(घ) ये सभी।

उत्तर:
(1) (ग) तन्तु,
(2) (घ) वनस्पति-जगत् से,
(3) (ग) वातावरण के अनुरूप हैं,
(4) (घ) रासायनिक विधि द्वारा निर्मित कृत्रिम तन्तु,
(5) (घ) इन सभी से,
(6) (ग) मेमनों से,
(7) (ख) रेशम,
(8) (क) टेरीलीन,
(9) (क) खनिज (धातुमय) तन्तु,
(10) (ग) खद्दर,
(11) (घ) यान्त्रिक विधि द्वारा,
(12) (क) सूती,
(13) (घ) ये सभी।

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UP Board Solutions for Class 6 History Chapter 12 दक्षिण भारत (छठी से ग्यारहवीं शताब्दी)

UP Board Solutions for Class 6 History Chapter 12 दक्षिण भारत (छठी से ग्यारहवीं शताब्दी)

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अभ्यास

प्रश्न 1.
राष्ट्रकूट वंश की राजधानी कहाँ थी?
उत्तर :
राष्ट्रकूट वंश की राजधानी मान्यखेट थी।

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प्रश्न 2.
किस चोल शासक ने श्रीलंका को जीता?
उत्तर :
चोल शासक राजेन्द्र प्रथम ने सम्पूर्ण श्रीलंका को जीत लिया था।

प्रश्न 3.
दक्षिण भारतीय मन्दिरों की विशेषताएँ लिखिए?
उत्तर :
दक्षिण भारतीय शासकों की मन्दिर निर्माण में विशेष रुचि थी। इन शासकों ने एलोरा का कैलाश मन्दिर, विरुपाक्ष मन्दिर, बृहदेश्वर मन्दिर, महाबलीपुरम् का रथ मन्दिर जैसे (UPBoardSolutions.com) विश्व प्रसिद्ध मन्दिरों का निर्माण कराया। इन्होंने भारतीय कला एवं संस्कृति को दूर दराज के देशों तक फैलाया।

प्रश्न 4.
दक्षिणी भारत के राज्यों का किन-किन देशों से व्यापारिक सम्बन्य था।
उत्तर :
दक्षिणी भारत के राज्यों का यूनान, रोम, मिश्र, मलय द्वीप समूह और चीन के साथ व्यापारिक सम्बन्ध था।

प्रश्न 5.
चोलों के शासन व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
चोलों की शासन व्यवस्था बहुत विकसित और सुव्यवस्थित थी। समस्त साम्राज्य को ‘राष्ट्रम’ कहते थे। प्रांतों को ‘मण्डलम’, जनपद को ‘नाडू’ और गाँवों को ‘कुर्रम’ कहा जाता था। कुर्रम अपनी बैठकों में समस्याओं का समाधान करते थे। वे सिंचाई के लिए तालाब बनवाते थे, कर वसूलते थे। वे आर्थिक (UPBoardSolutions.com) रूप से स्वावलम्बी थे। यहीं से स्थानीय स्वशासन यानी आज से मिलती-जुलती पंचायती राज व्यवस्था की शुरुआत हुई।

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प्रश्न 6.
दक्षिण पूर्व एशिया के देशों पर भारतीय संस्कृति के प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
दक्षिण पूर्व एशिया के देशों पर भारतीय संस्कृति का व्यापक प्रभाव दिखाई देता है। कम्बोडिया और चंपा में भारतीय कला, साहित्य व भाषा का विस्तार हुआ। इंडोनेशिया में रामायण की कहानी लोकप्रिय है, जिसमें अनेक संस्कृत शब्द हैं। संसार में सबसे विशाल बौद्धमन्दिर बोरोबुदूर में है। (UPBoardSolutions.com) कम्बोडिया में अंकोरवाट मन्दिर विश्व की धरोहर है।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित के विषय में लिखिए –

(क) अंकोरवाट
(ख) शंकराचार्य
(ग) रामानुजाचार्य
(घ) एलोरा मन्दिर

उत्तर :

(क) अंकोरवाट – अंकोरवाट का बहुत विशाल मन्दिर कम्बोडिया में स्थित है। यह मन्दिर विश्व की धरोहर है। इसकी दीवारों पर रामायण-महाभारत की कहानियाँ उभरी हुई मूर्तियों में अंकित हैं।

(ख) शंकराचार्य – शंकराचार्य ने उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम क्षेत्रों में चार मठों की स्थापना की। इन्होंने आत्मा और परमात्मा को एक बताकर एकेश्वरवाद का प्रचार किया। इससे लोगों में राष्ट्रीय एकता की भावना को विकास हुआ।

(ग) रामानुजाचार्य – 11वीं सदी में दक्षिण के सन्त रामानुजाचार्य ने शक्ति और ज्ञान को ईश्वर प्राप्ति का साधन बताया।

(घ) एलोरा मन्दिर – राष्ट्रकूट शासक, कृष्ण प्रथम ने एलोरा में विशाल चट्टान को काटकर कैलाश मन्दिर बनवाया। यह कई मंजिलों वाला है।

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प्रश्न 8.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए –

(क) एलोरा का कैलाश मन्दिर दन्ति दुर्ग राष्ट्रकूट शासक ने बनवाया।
(ख) चोल काल में गाँव को कुर्रम कहा जाता था।
(ग) अंकोरवाट मन्दिर कम्बोडिया देश में स्थित है।
(घ) पल्लव शासकों ने रथ मन्दिर का निर्माण कराया।

गतिविधियाँ – मानचित्र में देखकर निम्नलिखित को पूराः करिए –
UP Board Solutions for Class 6 History Chapter 12 दक्षिण भारत (छठी से ग्यारहवीं शताब्दी) 1

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UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 17 सामान्य घरेलू देशज औषधियाँ तथा सामान्य विषों के प्रतिकारक पदार्थ

UP Board Solutions for Class 9 Home Science Chapter 17 सामान्य घरेलू देशज औषधियाँ तथा सामान्य विषों के प्रतिकारक पदार्थ

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
सामान्य घरेलू देशज औषधियों से क्या आशय है? कुछ मुख्य घरेलू औषधियों का सामान्य परिचय दीजिए।
या
कुछ घरेलू देशज औषधियों के नाम एवं उपयोगिता बताइए।
उत्तर:
सामान्य देशज औषधियाँ
रोग एवं दुर्घटनाएँ घरेलू अथवा पारिवारिक जीवन की सामान्य घटनाएँ हैं जो कि प्रायः पीड़ित व्यक्ति के साथ-साथ परिवार के अन्य सदस्यों को भी अनेक प्रकार की शारीरिक एवं मानसिक कठिनाइयों में डाल देती हैं। प्राथमिक चिकित्सा तथा घरेलू औषधियों के ज्ञान का धैर्यपूर्वक उपयोग कर इन कठिनाइयों की गम्भीरता को न केवल कम किया जा सकता है, वरन् कई बार इनका सहज ही निवारण भी किया जा सकता है। सामान्यतः घरों में प्रयुक्त होने वाले मसालों, तरकारियों एवं फलों तथा सहज ही उपलब्ध सामान्य औषधियों का देशज घरेलू औषधियों के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि घर पर उपलब्ध होने वाले सामान्य पदार्थों को घरेलू देशज औषधियाँ कहा जाता है। ये पदार्थ विभिन्न शारीरिक विकारों में कष्ट-निवारक के रूप में इस्तेमाल किए (UPBoardSolutions.com) जाते हैं। इन घरेलू देशज औषधियों की जानकारी मनुष्य ने अपने दीर्घकालिक अनुभवों द्वारा प्राप्त की है तथा यह जानकारी पीढ़ी दर-पीढ़ी इसी रूप में हस्तान्तरित होती रहती है; उदाहरण के लिए–प्रायः सभी परिवारों के पेट दर्द में अजवाइन का प्रयोग किया जाता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए अजवाइन को घरेलू देशज औषधि की श्रेणी में रखा जाता है। वैसे सामान्य रूप से अजवाइन एक मसाले के रूप में इस्तेमाल होती है। मुख्य सामान्य घरेलू देशज औषधियों तथा उनकी उपयोगिता का सामान्य परिचय निम्नर्णित है

(क) कुछ मसाले घरेलू औषधियों के रूप में
मसालों के रूप में इस्तेमाल होने वाले विभिन्न पदार्थ, कई छोटे-छोटे रोगों और कष्टों के लिए लाभप्रद गुण रखते हैं। उदाहरण के लिए निम्नलिखित सूची देखिए

  1. अजवाइन: यह पेट के दर्द को कम करती है। अफारा और गैस में भी लाभदायक है।
  2. सोंठ: यह वायु के रोगों के लिए अत्यन्त उपयोगी है।
  3.  हींग: यह पेट के रोगों के लिए अत्यधिक लाभप्रद है। गैस, अफारा आदि में इसे पानी में घोलकर पेट पर लगाने से भी आराम मिलता है। अन्य पदार्थ; जैसे-अजवाइन, सोंठ, नमक आदि के साथ मिलाकर देने से पेट का दर्द, गैस, अफारे की शिकायत दूर हो जाती है।
  4.  काली मिर्च: यह गले को साफ करती है और कफ को हटाती है।
  5.  जीरा: यह पाचन क्रिया के लिए बहुत अच्छां पदार्थ है। भूख को बढ़ाता है।
  6.  मेथी: यह भूख को बढ़ाती है। इसके बने लड्डू वायु के दर्द में लाभप्रद हैं।
  7.  हल्दी: यह रक्त को शुद्ध करती है। इसका प्रयोग त्वचा को साफ करने में किया जाता है। यह कीटाणुनाशक है। छोटे-मोटे पेट के कीड़े इससे नष्ट हो जाते हैं।
  8.  लोंग: यह दाँत के दर्द के लिए एक अच्छी औषधि है। इसे पीसकर लगाने से दर्द बन्द हो जाता है। गले की खराश में भी लोग चूसी जाती है।
  9.  राई: मिरगी के रोगी को बारीक पिसी हुई राई सुंघाने से मूच्र्छा दूर हो जाती है।
  10.  अदरक: यह पाचन-क्रिया में सहायक है तथा वायु के रोगों को ठीक करता है।
  11.  नमक: यह घाव को साफ करने के लिए एक अच्छा पदार्थ है। गरम पानी में मिलाकर सिकाई करने से सूजन ठीक हो जाती है। गरम पानी में घोलकर गरारे करने से गला साफ होता है, कफ हटता है और सूजन कम हो जाती है।
  12.  सौंफ: यह खुनी पेचिश के लिए अत्यधिक लाभप्रद दवा है। पानी में उबालकर अर्क देने से यह बीमारी ठीक हो जाती है। इसका पानी अधिक प्यास को कम करता है तथा गर्मी के कारण होने वाले सिर दर्द को ठीक करता है।।
  13.  दाल: चीनी-दस्त और मरोड़ों में कत्था के साथ प्रयोग की जाती है।
  14.  पोदीना: सूखा हुआ पोदीना तथा उसका अर्क उल्टियों को बन्द करता है। पोदीना पाचन क्रिया में भी सहायक है।

(ख) कुछ सामान्य घरेलू उपयोग के पदार्थ

  1. आमाहल्दी: पिसी हुई अवस्था में चोट या मोच के रोगी को दी जाती है जो कि काफी आरामदायक है।
  2.  चूना: चोट, मोच इत्यादि पर आमाहल्दी चूने के साथ लगाने से दर्द में कमी होती है तथा मोच ठीक हो जाती है। बरौं के डंक मारने पर भी चूना लगाया जा सकता है।
  3. फिटकरी: रक्त-स्राव को रोकती है। गुलाब जल में मिलाकर आँख में डालने से दुखती हुई आँखें ठीक हो जाती हैं।
  4. कत्था: इसका चूरा मुँह के छालों को ठीक करता है।
  5.  तुलसी: तुलसी की पत्तियाँ जुकाम, बुखार आदि के लिए आराम देने वाली हैं। शहद के साथ प्रयोग करने से खाँसी ठीक हो जाती है।
  6. गोले का तेल: जले हुए स्थान पर लगाने से जलन कम होती है। घाव भी जल्दी ठीक हो जाता है।
  7.  गुलाब जल: अनेक नेत्र रोगों के लिए शान्तिदायक है।
  8.  मुलहटी: खाँसी को ठीक करती है। मुँह में डालने से खाँसी बन्द हो जाती है।
  9.  ईसबगोल: इसकी भूसी कब्जनाशक है। पानी या दूध के साथ लेने पर कब्ज-निवारक होती है तथा दही में अच्छी तरह से मिला कर लेने पर दस्त को रोकती है।
  10.  नीम की पत्तियाँ: कीटाणुनाशक हैं, चर्म रोगों के लिए अति गुणकारी हैं। इनके पानी से नहाने से चर्म रोग ठीक हो जाते हैं। सर्पदंश में इसको खिलाने से विष का प्रभाव कम हो जाता है। पानी में उबाल कर बालों को धोने से जुएँ नष्ट हो जाती हैं।

(ग) कुछ औषधियाँ तथा रासायनिक पदार्थ

  1.  पोटैशियम परमैंगनेट या लाल दवा:
    अनेक कीट पतंगों के काटने, बिच्छू के डंक मारने तथा सर्पदंश के घाव में भरने से विष को नष्ट कर देती है। संक्रामक रोगों के फैलने के समय इसे पानी में मिलाकर पीना चाहिए।
  2. स्प्रिट: घाव साफ करने तथा अन्य कामों के लिए उपयोगी है।
  3. बोरिक एसिड: घाव धोने के काम आता है। यह कीटाणुनाशक है। इसका हल्का घोल आँख । धोने के काम में लाया जाता है।
  4.  मरक्यूरोक्रोम: जल के साथ इसका घोल घाव पर लगाने से घाव शीघ्र भर जाता है तथा इस
    पर अन्य विषों का प्रभाव नहीं होता है।
  5.  अमोनिया: इसे सुंधाने से मूच्र्छा दूर हो जाती है। इसे विषैले कीट द्वारा काटने पर अथवा डंक मारने पर प्रयोग में लाया जाता है।
  6.  अमृत धारा: जी मिचलाना, दस्त, उल्टी (वमन) आदि में महत्त्वपूर्ण घरेलू औषधि है।
  7. डिटॉल: यह कीटाणुनाशक है। घाव धोने के काम आता है।
  8.  बरनॉल:  जले स्थान पर लगाने के लिए एक अच्छी क्रीम है।
  9. आयोडेक्स: यह एक सूजन कम करने वाली औषधि है, जो मोच एवं दर्द में आराम देती है।
  10.  कुनैन: यह शुद्ध अथवा रासायनिक पदार्थों के साथ मिश्रित रूप में प्रायः गोलियों के आकार में सहज ही उपलब्ध हो जाती है। मलेरिया ज्वर के लिए यह एक उत्तम औषधि है।

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प्रश्न 2:
विष कितने प्रकार के होते हैं? विषपान किए व्यक्ति का सामान्य उपचार आप किस प्रकार करेंगी?
या
यदि किसी बच्चे ने कोई विषैला पदार्थ खा लिया है, तो उसे किस प्रकार का प्रतिकारक पदार्थ दिया जाएगा? उदाहरण दीजिए। क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए?
या
टिप्पणी लिखिए-विष कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
विष के प्रकार

सामान्यतः शरीर को हानि पहुँचाने वाले पदार्थ विष कहलाते हैं। ये पदार्थ प्रायः मुँह के द्वारा अथवा विषैले जीव-जन्तुओं के काटने पर शरीर में अन्दर प्रवेश करते हैं। विषपान करने पर शरीर में प्रवेश करने वाले विषैले पदार्थों को निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है

(1) जलन उत्पन्न करने वाले विष:
ये विष शरीर के जिस भाग में प्रवेश करते हैं उसे या तो जला देते हैं अथवा उसमें जलन उत्पन्न करते हैं। कास्टिक सोडा, अमोनिया, कार्बोलिक एसिड तथा खनिज अम्ल आदि इस वर्ग के प्रमुख विष हैं। इस प्रकार के विष से प्रायः जीभ, गले तथा मुखगुहा में भयंकर जलन होती है तथा श्वास लेने में कठिनाई का अनुभव होता है।

(2) उदर अथवा आहारनाल को हानि पहुँचाने वाले विष:
इस प्रकार के विष उदर में पहुंचकर भयंकर उथल-पुथल पैदा करते हैं। ये कण्ठ, ग्रासनली, आमाशय एवं आँतों में जलन एवं दर्द उत्पन्न करते हैं। इनके शिकार व्यक्ति उदरशूल अनुभव करते हैं तथा उन्हें मतली आने लगती है। इस वर्ग के अन्तर्गत आने वाले प्रमुख विष हैं संखिया, पारा, पिसा हुआ शीशा तथा विषैले एवं सड़े-गले खाद्य पदार्थ।

(3) निद्रा उत्पन्न करने वाले विष:
इस प्रकार के विष को खाने पर नींद आने लगती है जो कि विष की अधिकता होने पर प्रगाढ़ निद्रा अथवा संज्ञा-शून्यता में परिवर्तित हो जाती है। इस प्रकार के विष का अत्यधिक सेवन करने से कई बार रोगियों की मृत्यु भी हो जाती है। अफीम, मॉर्फिन तथा डाइजीपाम (कम्पोज, वैलियम आदि) इत्यादि इस वर्ग के प्रमुख विष हैं।

(4) तन्त्रिका-तन्त्र को हानि पहुँचाने वाले विष:
इनका प्रभाव प्रायः स्नायुमण्डल अथवा विभिन्न नाड़ियों पर होता है; जिसके फलस्वरूप नेत्रों की पुतलियाँ फैल जाती हैं, मस्तिष्क चेतना शून्य हो सकता है अथवा शरीर के विभिन्न अंगों में पक्षाघात हो सकता है। भाँग, धतूरा, क्लोरोफॉर्म तथा मदिरा इसी प्रकार के प्रमुख विष हैं।

विषपान करने पर उपचार

विषपाने एक गम्भीर दुर्घटना है, जिसके परिणामस्वरूप प्रतिदिन अनेक व्यक्ति अनेक प्रकार के कष्ट भोगते हुए अकाल ही मृत्यु की गोद में चले जाते हैं। इस समस्या का समाधान करना सम्भव है, यदि पीड़ित व्यक्ति को तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध हो जाए तथा कुछ सुरक्षात्मक उपायों का (UPBoardSolutions.com) कठोरतापूर्वक पालन किया जाए। चिकित्सा सहायता सदैव समय पर उपलब्ध होनी सम्भव नहीं है; अतः विषपान करने वाले व्यक्तियों के सामान्य उपचार के उपायों की जानकारी प्राप्त करना अति आवश्यक

(क) सुरक्षात्मक उपाय:
कई बार अनेक व्यक्ति (विशेष रूप से बच्चे) अज्ञानतावश अथवा नादानी में विषपान का शिकार हो जाते हैं। इस प्रकार की दुर्घटनाओं को निम्नलिखित उपायों का कठोरतापूर्वक पालन कर सहज ही टाला जा सकता है

  1.  घर में प्रयुक्त होने वाले सभी क्षारों एवं अम्लों को नामांकित कर यथास्थान रखें। ध्यान रहे कि ये स्थान बच्चों की पहुँच से सदैव दूर हों।
  2.  पुरानी तथा प्रयोग में न आने वाली औषधियों को घर में न रखें।
  3.  सभी औषधियों को उनकी मूल शीशी अथवा डिब्बी में रखें।
  4. कभी भी अन्धकार में कोई औषधि प्रयोग न करें।
  5.  चिकित्सक के पूर्व परामर्श के बिना कोई जटिल औषधि न प्रयोग करे।
  6.  पेण्ट वाले पदार्थ प्रायः विषैले होते हैं; अत: इनका प्रयोग सावधानीपूर्वक करें।
  7.  कीटाणुनाशक (स्प्रिट व डिटॉल, फिनाइल) आदि तथा कीटनाशक (फ्लिट व बेगौन स्प्रे आदि) पदार्थ विषैले होते हैं। इन्हें सावधानीपूर्वक प्रयोग करें तथा प्रयोग करते समय कम-से-कम श्वालें।
  8. खाना पकाने से पूर्व दाल, शाक-सब्जियों एवं फलों को अच्छी प्रकार से धोएँ ताकि ये पूर्णरूपसे कीटनाशक रासायनिक पदार्थों के प्रभाव से मुक्त हो जायें।
  9.  बच्चों को समय-समय पर प्रेमपूर्वक उपर्युक्त बातों की जानकारी दें।

(ख) प्राथमिक चिकित्सा सहायता:
योग्य चिकित्सक अथवा अस्पताल से चिकित्सा सहायता प्रायः विलम्ब से प्राप्त होती है, जबकि विषपान किए व्यक्ति का उपचार तत्काल होना आवश्यक है। अतः विषपान सम्बन्धी प्राथमिक चिकित्सा का ज्ञान होना अति आवश्यक है। इसके लिए कुछ महत्त्वपूर्ण बातों को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए

  1. रोगी के आस-पास विष की शीशी अथवा पुड़िया की खोज करें जिससे कि विष का प्रकार ज्ञात हो सके तथा उसके अनुसार उपयुक्त उपचार प्रारम्भ किया जा सके।
  2.  विष का प्रभाव कम करने के लिए रोगी को वमन कराकर उसके उदर से विष दूर करने का प्रयास करें।
  3.  यदि रोगी क्षारक अथवा अम्लीय विष से पीड़ित है, तो वमन न कराएँ। इस प्रकार के रोगियों को विष-प्रतिरोधक देना ही उचित रहता है।
  4.  क्षारीय विष से पीड़ित व्यक्ति को नींबू का रस अथवा सिरका पिलाना लाभप्रद रहता है। अम्लीय विष से पीड़ित व्यक्तियों को चूने का पानी, खड़िया, मिट्टी अथवा मैग्नीशियम का घोल देना उत्तम रहता है।
  5. आस्फोटक विष के उपचार के लिए रोगी को गरम पानी में नमक मिलाकर वमन कराना चाहिए। कई बार वमन कराने के बाद उसे अरण्डी का तेल पिलाना चाहिए।
  6. निद्रा उत्पन्न करने वाले विष के उपचार में रोगी को जगाए रखने का प्रयास करें। वमन कराने के उपरान्त उसे तेज चाय अथवा कॉफी पीने के लिए देना लाभप्रद रहता है।
  7. रोगी के हाथ व पैर सेंकते रहना चाहिए। रोगी को गुदा द्वारा नमक का पानी चढ़ाना लाभप्रद रहता है।
  8. आवश्यकता पड़ने पर रोगी को कृत्रिम उपायों से श्वास दिलाने का प्रयास करना चाहिए।
  9.  रोगी को अस्पताल भिजवाने का तुरन्त प्रबन्ध करें। रोगी के साथ उसके वमन अथवा लिए गए विष का नमूना अवश्य ले जाएँ। इससे विष के सम्बन्ध में शीघ्र जानकारी प्राप्त होने से उपयुक्त चिकित्सा तत्काल आरम्भ हो सकती है।

(ग) सामान्य विषों के प्रतिकारक पदार्थों का उपयोग:
विषपान किए व्यक्ति द्वारा प्रयुक्त विष एवं उसके प्रतिरोधक पदार्थ की जानकारी होने से विषपान के रोगी का उपचार सहज ही सम्भव है। सामान्य विषों के प्रतिकारक पदार्थ प्रायः निम्नलिखित प्रकार के होते हैं

(1) जलन पैदा करने वाले विषों के प्रतिकारक पदार्थ

(अ) क्षारीय विष:
क्षारीय विषों के प्रभाव को समाप्त करने के लिए अम्लों का प्रयोग करना चाहिए। उदाहरण-नींबू का रस एवं सिरका।
(ब) अम्लीय विष:
इनके प्रतिकारक पदार्थ क्षारीय होते हैं। गन्धक, शोरे व नमक के अम्लों को प्रभावहीन करने के लिए

  1.  चूना या खड़िया मिट्टी पानी में मिलाकर दें।
  2. जैतून का तेल पानी में मिलाकर दें।
  3. पर्याप्त मात्रा में दूध दें।

(2) आहार नाल को हानि पहुँचाने वाले विषों के प्रतिकारक पदार्थ

  1. संखिया: यह एक भयानक विष है। टैनिक अम्ल के प्रयोग द्वारा इस विष के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
  2. गन्धक: कार्बोनेट एवं मैग्नीशिया गन्धक के विष को प्रभावहीन करने के लिए उत्तम रासायनिक पदार्थ हैं।

(3) निद्रा उत्पन्न करने वाले विषों के प्रतिकारक पदार्थ

  1. अफीम: इस विष से पीड़ित व्यक्ति को गरम पानी में नमक मिलाकर वमन कराना चाहिए।
  2. निद्रा की गोलियाँ: इनसे प्रभावित व्यक्ति का उपचार अफीम के समान ही किया जाता है। रोगी को नमक के गरम पानी द्वारा वमन कराया जाता है तथा उसके उदर की सफाई की जाती है।

(4) तन्त्रिका-तन्त्र को हानि पहुँचाने वाले विषों के प्रतिकारक पदार्थ

  1. तम्बाकू: इसमें निकोटीन नामक विष होता है। गरम पानी में नमक डालकर रोगी को वमन करायें तथा तेज चाय व कॉफी पीने के लिए दें।
  2.  मदिरा: मदिरा के प्रभाव को नष्ट करने के लिए रोगी को वमन कराएँ तथा उसके उदर की पानी द्वारा सफाई करें। नींबू व नमक मिला गरम पानी पिलाने से लाभ होता है।
  3. भाँग एवं गाँजा: पीड़ित व्यक्ति को वमन कराकर खट्टी वस्तुएँ खिलानी चाहिए। यदि रोगी होश में है, तो उसे गरम दूध पिलाया जा सकता है।
  4. क्लोरोफॉर्म: इस विष का प्रतिकारक है एमाइल नाइट्राइट जो कि इसके प्रभाव को कम करता है।
  5. धतूरा: धतूरे के बीजों में घातक विष होता है। इस विष से पीड़ित व्यक्ति को होश में लाकर वमने कराना चाहिए। इसके बाद उसे गर्म दूध में एक चम्मच ब्राण्डी मिलाकर दी जा सकती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
घरेलू औषधियों का महत्त्व बताइए।
या
गृहिणी के लिए घरेलू औषधियों का ज्ञान क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
घरेलू देशज औषधियों का महत्त्व

प्रत्येक घर-परिवार में रोगों एवं दुर्घटनाओं का होना सामान्य बातें हैं। परन्तु ये सामान्य बातें ही कई बार गम्भीर समस्याओं को जन्म दे सकती हैं। उदाहरण के लिए-रोग की प्रारम्भिक अवस्था में चिकित्सक के पास न जाने पर रोग गम्भीर रूप धारण कर लेता है। अथवा किसी रोग एवं दुर्घटना में (UPBoardSolutions.com) तत्काल चिकित्सा सहायता न उपलब्ध हो पाने पर रोगी की हालत गम्भीर हो सकती है। उपर्युक्त दोनों ही प्रकार की समस्याओं के निदान के लिए घरेलू देशजे औषधियों का व्यावहारिक ज्ञान होना आवश्यक है। इससे प्रत्येक गृहिणी निम्नलिखित प्रकार से लाभान्वित हो सकती है—

(1) तत्काल उपचार:
घरेलू देशज औषधियों का व्यावहारिक ज्ञान होने पर गृहिणी किसी भी सामान्य रोग का तत्काल उपचार कर सकती है, जिसके फलस्वरूप रोग एवं दुर्घटनाएँ गम्भीर रूप नहीं ले पाते।

(2) समय एवं धन की बचत:
घरेलू देशज औषधियों से परिचित होने पर गृहिणी को घर-परिवार में होने वाले छोटे-छोटे रोगों के लिए चिकित्सक तक दौड़ने की आवश्यकता नहीं होती, जिससे (UPBoardSolutions.com) उसके समय की पर्याप्त बचत होती है। घरेलू औषधियाँ प्रायः अपेक्षाकृत संस्ती एवं सहज ही उपलब्ध होती हैं। इनका समय-समय पर उपयोग करने से अपेक्षाकृत कम व्यय होता है अर्थात् धन की. पर्याप्त बचत होती है।

(3) साहस एवं आत्मविश्वास में वृद्ध:
घरेलू औषधियों से भली प्रकार परिचित गृहिणी परिवार के किसी सदस्य के रोग अथवा दुर्घटनाग्रस्त होने पर अपना धैर्य नहीं खोती तथा उत्पन्न समस्या का साहसपूर्वक एवं आत्मविश्वास से सामना करती है।

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प्रश्न 2:
तीन घरेलू दवाइयों के नाम एवं उपयोग बताइए।
या
दो घरेलू दवाइयों के नाम एवं उपयोग बताइए।
उत्तर:
कुछ महत्त्वपूर्ण घरेलू दवाइयों के नाम एवं उपयोग अग्रलिखित हैं

(1) हींग:
यह पेट के रोगों में बहुत लाभ पहुँचाती है। गैस व अफारा आदि में पानी में घोलकर पेट | पर लगाने से रोगी को पर्याप्त लाभ होता है। अजवाइन, सौंठ वे नमक के साथ मिलाकर देने से यह
अधिक प्रभावी हो जाती है।

(2) नमक:
सामान्य नमक (सोडियम क्लोराइड) घावों को साफ करने के लिए एक अच्छी औषधि का कार्य करता है। गरम पानी में मिलाकर सिकाई करने पर यह पर्याप्त आराम पहुँचाता है। जल-अल्पता या निर्जलीकरण होने पर इसे उबाल कर ठण्डा किए हुए पानी में चीनी के साथ मिलाकर बार-बार (UPBoardSolutions.com) पिलाने पर रोगी को अत्यधिक लाभ होता है। गरम पानी में नमक डालकर गरारे करने से गले के रोगों में विशेष लाभ होता है।

(3) सौंफ:
खुनी पेचिश के लिए सौंफ एक उत्तम औषधि है। इस रोग में सौंफ को पानी में उबालकर उसका अर्क दिया जाता है। यह प्यास को कम करती है तथा गर्मी के कारण होने वाले सिर दर्द में आराम पहुँचाती है।

प्रश्न 3:
कृमि रोग का उपचार आप कैसे करेंगी?
उत्तर:
इस रोग में पेट में विभिन्न प्रकार के बड़े-बड़े कीड़े हो जाते हैं, जिनके कारण रोगी के पेट में दर्द रहता है, उसके मुँह से लार टपकती है तथा वह सोते समय दाँत किटकिटाता है। इस प्रकार के रोगी को पपीते के बीज (ताजे अथवा सूखे) पीसकर खिलाने से उसके पेट के कीड़े मरकर मल के साथ बाहर निकल जाते हैं। एक से दो माशे तक अजवाइन का चूर्ण गुड़ के साथ दिन में दो या तीन बार देने से कीड़े नष्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 4:
हैजा रोग का उपचार आप किस प्रकार करेंगी?
उत्तर:
हैजा रोग में दस्त एवं वमन के कारण पीड़ित व्यक्ति के शरीर में पानी की कमी हो जाती है; अत: उसे एक लीटर उबले हुए पानी में आधा चम्मच नमक, आधा चम्मच खाने का सोडा तथा एक चम्मच चीनी अथवा गुड़ मिलाकर बार-बार पिलाना चाहिए। अब रोगी को अमृतधारा की 10-15 बूंदें पानी में (UPBoardSolutions.com) डालकर देनी चाहिए जिससे कि रोगी की वमन रुक सकें। अब हरा धनिया, पुदीना और सौंफ को समान मात्रा में लेकर तथा इसमें सेंधा नमक मिलाकर चटनी की तरह पीस लें। इसके सेवन से रोगी को पर्याप्त आराम मिलता है। समय मिलते ही रोगी को किसी योग्य चिकित्सक को दिखाएँ।

प्रश्न 5:
निमोनिया रोग का उपयक्तु उपचार लिखिए।
उत्तर:
इस रोग में सामान्यतः ज्वर के साथ रोगी शीत का अनुभव करता है। उसके सीने में कफ एकत्रित हो जाता है, खाँसी रहती है तथा पसलियों में दर्द रहता है। पीड़ित व्यक्ति को गर्म स्थान में रखकर उसकी पसलियों के दोनों ओर पिसी हुई अलसी लगी रुई के पैड लगाने चाहिए। फूला हुआ सुहागा, फूली हुई फिटकरी, तुलसी की पत्तियाँ, अदरक पीसकर पान के रस एवं शहद में मिलाकर रोगी को दिन में चार या पाँच बार देना चाहिए।

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प्रश्न 6:
जुकाम अथवा नजले का घरेलू उपचार बताइए।
उत्तर:
जुकाम एवं नजला सामान्य रोग हैं जो कि प्रायः ऋतु परिवर्तन के समय अथवा शीत ऋतु में अधिक होते हैं। छींक आना, आँखों एवं नाक से पानी जाना, कान बन्द हो जाना तथा खाँसी व कफ निकलना आदि रोग के सामान्य लक्षण हैं।
शीत ऋतु में हुई खाँसी एवं श्वास रोग में सहजन की जड़ की छाल को घी या तेल में मिलाकर धूम्रपान करने से लाभ होता है। जुकाम के प्रारम्भ में दूध में हल्दी डालकर (UPBoardSolutions.com) उबालकर पीने से लाभ होता हैं। अधिक सिर दर्द व नाक से पानी बहने पर लौंग का दो बूंद तेल शक्कर अथवा बताशे के साथ खाने से अत्यधिक लाभ होता है। नए जुकाम में पीपल का चूर्ण शहद में अथवा चाय में मिलाकर सेवन करने से शीघ्र आराम होता है। चाय में काली मिर्च का चूर्ण डालकर पीने से भी जुकाम में पर्याप्त लाभ होता है?

प्रश्न 7:
बिच्छू एवं शहद की मक्खी के काटने पर आप क्या उपचार करेंगी?
उत्तर:
बिच्छू के काटने पर उपचार-बिच्छू द्वारा काटने पर निम्नलिखित उपचार करने चाहिए

  1. काटने के स्थान के थोड़ा ऊपर टूर्नीकेट बाँधना चाहिए।
  2.  काटे हुए स्थान पर बर्फ रखने पर तथा नोवोकेन का इन्जेक्शन लगाने पर पीड़ा में कमी आती है।
  3.  रोग नियन्त्रित न होने पर योग्य चिकित्सक से परामर्श लें।

शहद की मक्खी के काटने पर उपचार:
पीड़ित व्यक्ति को काटने के स्थान पर सूजन आ जाती है। तथा भयंकर जलन होती है। इसके लिए निम्नलिखित उपचार करने चाहिए

  1.  काटे स्थान को दबाकर डंक निकालना चाहिए।
  2.  घाव पर अमोनिया अथवा नौसादर एवं चूने की सम मात्रा मिलाकर लगानी चाहिए।
  3. काटे हुए स्थान पर स्प्रिट लगानी चाहिए।
  4. एण्टी-एलर्जी की गोलियाँ (एविल आदि) लेने से लाभ होता है।

प्रश्न 8:
विष कितने प्रकार से शरीर में पहुँचता है?
उत्तर:
प्राय: निम्नलिखित चार प्रकार से विष हमारे शरीर में प्रवेश करता है

  1. मुँह द्वारा-खाने-पीने की वस्तुओं में मिलाकर खाने अथवा खिलाने से विष शरीर में प्रवेश कर सकता है।
  2.  सँघने से कुछ विशेष प्रकार के विष पूँघने पर श्वास क्रिया के साथ शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। उदाहरण-पेन्ट्स, फिनिट आदि।
  3.  विषैले जीव-जन्तुओं के काटने पर-अनेक जीव-जन्तु (बिच्छू, साँप, मधुमक्खी आदि) विषैले होते हैं। ये काटने अथवा डंक मारने पर अपने विष को हमारे शरीर में प्रवेश करा देते हैं।
  4. सामान्य घाव या इन्जेक्शन के घाव द्वारा इस विधि द्वारा अनेक विषैले कीटाणु एवं विष – हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
घरेलू देशज औषधियों से क्या आशय है?
उत्तर:
जब किसी रोग या कष्ट के निवारण के लिए घर पर सामान्य इस्तेमाल की वस्तुओं को उपयोग में लाया जाता है तो उन सामान्य वस्तुओं को घरेलू देशज औषधि कहा जाता है। जैसे कि पेट-दर्द के निवारण के लिए अजवाइन एक घरेलू औषधि है।

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प्रश्न 2:
गुलाब जल का क्या प्रयोग है? .
उत्तर:
यह नेत्रों की अत्यन्त उपयोगी औषधि है। यह नेत्र रोगों को ठीक करता है तथा नेत्रों को ठण्डक व शान्ति देने वाला होता है।

प्रश्न 3:
जल जाने पर कोई दो घरेलु औषधियों के नाम बताए।
उत्तर:
गोले का तेल या बरनॉल।

प्रश्न 4:
साँप के काटने पर अंग में बन्ध क्यों लगाया जाता है?
उत्तर:
अंग में बन्ध लगाने से उस स्थान से रुधिर का तेजी से इधर-उधर बहना बन्द हो जाता है। और विष पूरे शरीर में नहीं फैलता।

प्रश्न 5:
तुलसी के पत्ते का औषधि उपयोग बताइए।
उत्तर:
तुलसी के पत्ते ज्वर तथा जुकाम को शान्त करते हैं। शहद के साथ खाँसी में लाभदायक हैं।

प्रश्न 6:
आमाहल्दी का उपयोग बताइए।
उत्तर:
पिसी हुई आमाहल्दी दूध के साथ देने से चोट तथा मोच में आराम मिलता है।

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प्रश्न 7:
किन्हीं दो घरेलू औषधियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
अजवाइन, हींग, काला नमक आदि।

प्रश्न 8:
नकसीर छूटने पर आप कौन-सी घरेलू औषधिय प्रयोग करेंगी?
उत्तर:
नाक में देशी घी डालने तथा गीली-पीली मिट्टी सुंघाने से नाक द्वारा होने वाले रक्तस्राव में कमी आती है।

प्रश्न 9:
विष की शीशियों को लेबल करने से क्या लाभ है?
उत्तर:
विष की शीशियों को नामांकित (लेबल) कर रखने से भूलवश विषपान का भय नहीं रहता।

प्रश्न 10:
औषधियों का सेवन सदैव पर्याप्त प्रकाश में करना चाहिए। क्यों?
उत्तर:
क्योंकि अन्धकार में गलत औषधियाँ खा लेने की सम्भावना रहती है।

प्रश्न 11:
भाँग पिए व्यक्ति का आप क्या उपचार करेंगी?
उत्तर:
ऐसे व्यक्ति को खटाई (जैसे कि इमली का पानी) पिलाने से भाँग के विषैले प्रभाव को कम किया जा सकता है।

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प्रश्न 12:
जी मिचलाने अथवा उल्टी आने पर प्रयुक्त होने वाली किन्हीं दो घरेलू औषधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जी मिचलाने अथवा वमन रोकने के लिए

  1.  अमृतधारा की 5-6 बूंदें पानी में डालकर पिलायें तथा
  2. पोदीना व प्याज पीसकर तथा उसमें नीबू का रस डालकर रोगी को पिलायें।

प्रश्न 13:
लू लगने पर रोगी को पीने के लिए क्या देना चाहिए?
उत्तर:
लू लगने पर रोगी को पीने के लिए आम का पन्ना देना चाहिए।

प्रश्न 14:
बेल का शर्बत क्यों उपयोगी माना जाता है ?
उत्तर:
बेल का शर्बत पेट सम्बन्धी विकार दूर करता है तथा पेचिश में विशेष लाभदायक होता है।

प्रश्न 15:
दाँतों में दर्द होने पर आप क्या औषधि प्रयोग करेंगी?
उत्तर:
पिसी हुई लौंग अथवा लौंग का तेल प्रभावित दाँत के निचले भाग पर लगाने से दर्द में पर्याप्त लाभ होता है।

प्रश्न 16:
मुँह एवं जीभ पर छाले होने पर आप क्या उपचार करेंगी?
उत्तर:
प्रभावित भाग पर ग्लिसरीन अथवा कत्थे का चूरा लगाने से पर्याप्त लाभ होता है।

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प्रश्न 17:
मलेरिया ज्वर में रोगी को कौन-सी घरेलू औषधि देनी चाहिए?
उत्तर:
तुलसी के पत्ते में काली मिर्च को सम मात्रा में पीसकर दिन में तीन या चार बार देने से मलेरिया के रोगी को लाभ होगा।

प्रश्न 18:
अफीम खा लेने पर चेहरे का रंग कैसा हो जाता है?
उत्तर:
अफीम खा लेने पर चेहरा पीला पड़ जाता है तथा नेत्रों की पुतलियाँ सिकुड़कर छोटी हो जाती हैं।

प्रश्न 19:
विभिन्न दवाएँ घर पर रखते समय आप क्या सावधानियाँ रखेंगी?
उत्तर:

  1.  घर में दवाएँ उनकी मूल शीशियों, डिब्बों अथवा रैपर में रखनी चाहिए।
  2.  दवाइयों को उनके निर्देशानुसार ठण्डे अथवा गरम तथा प्रकाश अथवा अन्धकार आदि निर्दिष्ट स्थान में रखना चाहिए।
  3.  दवाइयाँ सदैव सुरक्षित स्थान पर बच्चों की पहुँच से दूर रखी जानी चाहिए।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न:
प्रत्येक प्रश्न के चार वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। इनमें से सही विकल्प चुनकर लिखिए

(1) घरेलू देशज औषधियों के प्रयोग को उपयोगी माना जाता है
(क) आकस्मिक रोगों या दुर्घटनाओं के तुरन्त उपचार के लिए,
(ख) इनके प्रयोग से धन एवं समय की बचत होती है,
(ग) दुर्घटना घटित होने पर गृहिणी का मनोबल बना रहता है,
(घ) उपर्युक्त सभी उपयोग एवं लाभ।

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(2) सौंफ का प्रयोग किस रोग में किया जाता है?
(क) खूनी पेचिश,
(ख) निमोनिया,
(ग) कृमि रोग,
(घ) जुकाम।

(3) कृमि रोग में दिए जाते हैं
(क) धतूरे के बीज,
(ख) पपीते के बीज,
(ग) टमाटर के बीज,
(घ) खरबूजे के बीज।

(4) अमृतधारा का प्रयोग किया जाता है
(क) मलेरिया में,
(ख) कृमि रोग में,
(ग) खुनी पेचिश में,
(घ) वमन रोकने में।

(5) ईसबगोल की भूसी दी जाती है
(क) श्वास सम्बन्धी रोगों में,
(ख) हृदय रोग में,
(ग) पेचिश में,
(घ) काली खाँसी में।

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(6) जले हुए स्थान पर जलन कम करने के लिए आप क्या लगाएँगी?
(क) लौंग का तेल,
(ख) गोले का तेल,
(ग) सरसों का तेल,
(घ) अमृतधारा।

(7) नींद लाने वाला विष कौन-सा है?
(क) अफीम,
(ख) कास्टिक सोडा,
(ग) धतूरा,
(घ) संखिया।

(8) सबसे अधिक खतरनाक एवं हानिकारक विष कौन-से होता है?
(क) आहारनाल में जल उत्पन्न करने वाले विष
(ख) नींद लाने वाले विष,
(ग) मस्तिष्क तथा तन्त्रिकाओं पर बुरा प्रभाव डालने वाले विष,
(घ) मांसपेशियों में ऐंठन लाने वाले विष।

(9) निमोनिया के रोगी को आप कौन-सा पेय पदार्थ देंगी?
(क) लस्सी,
(ख) शर्बत,
(ग) चाय,
(घ) कोका कोला।

(10) साँप के काटे घाव पर कौन-सी वस्तु लगानी चाहिए?
(क) सल्फर,
(ख) बरनॉल,
(ग) पोटैशियम परमैंगनेट,
(घ) नमक।

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(11) बिच्छू के काटने पर तुरन्त दिया जाता है
(क) गर्म चाय,
(ख) गर्म दूध,
(ग) कहवा,
(घ) ब्राण्डी।

(12) कीटाणुनाशक पदार्थ है
(क) टाटरी,
(ख) अमृतधारा,
(ग) डिटॉल,
(घ) गोले का तेल।

(13) मुलहठी दी जाती है
(क) विष फैलने पर,
(ख) दस्तों के लिए,
(ग) खाँसी होने पर,
(घ) मलेरिया ज्वर में।

(14) पोटैशियम परमैंगनेट काम आता है
(क) चोट पर लगाने के लिए,
(ख) घाव को साफ करने के लिए,
(ग) घाव को भरने के लिए,
(घ) कीड़े-मकोड़ों को मारने के लिए।

(15) मलेरिया ज्वर के लिए एकमात्र दवा है
(क) सौंठ, अजवाइन तथा हींग,
(ख) कुनैन की गोलियाँ,
(ग) लौंग का पान,
(घ) पोदीने का पानी।

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(16) अम्ल तथा क्षार मुख्य रूप से उत्पन्न करते हैं
(क) जलन,
(ख) पीड़ा,
(ग) बेचैनी,
(घ) नींद।

उत्तर:
(1) (घ) उपर्युक्त सभी उपयोग एवं लाभ,
(2) (क) खूनी पेचिश,
(3) (ख) पपीते के बीज,
(4) (घ) वमन रोकने में,
(5) (ग) पेचिश में,
(6) (ख) गोले का तेल,
(7) (क) अफीम,
(8) (ग) मस्तिष्क तथा तन्त्रिकाओं पर बुरा प्रभाव डालने वाले विष,
(9) (ग) चाय,
(10) (ग) पोटैशियम परमैंगनेट,
(11) (क) गर्म चाय,
(12) (ग) डिटॉल,
(13) (ग) खाँसी होने पर,
(14) (ख) घाव को साफ करने के लिए,
(15) (ख) कुनैन की गोलियाँ,
(16) (क) जलन ।

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UP Board Solutions for Class 8 Hindi व्याकरण

UP Board Solutions for Class 8 Hindi व्याकरण

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 8 Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 8 Hindi व्याकरण.

व्याकरण – जिन नियमों के अन्तर्गत किसी भाषा को शुद्ध बोलना, लिखना तथा ठीक प्रकार समझना आता है, उन्हें ही व्याकरण कहते हैं।

भाषा – भाषा के द्वारा मनुष्य अपने मन के विचार प्रकट करता है तथा दूसरों के भावों को स्वयं समझता है। विचारों को प्रकट करने के विभिन्न ढंग हैं किन्तु इनसे भाषा का रूप स्थिर नहीं रहने पाता है। व्याकरण (UPBoardSolutions.com) भाषा के रूप को स्थिर कर देती है।

लिपि – जिन चिह्नों द्वारा मन के विचार को चित्रित किया जाता है, उन्हें ‘लिपि’ कहा जाता है; जैसे-हिन्दी भाषा की लिपि देवनागरी है।

व्याकरण के भाग

1. वर्ण विभाग,
2. शब्द विभाग,
3. वाक्य विभाग।

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(1. वर्ण विभाग)

वर्ण – वर्ण उस छोटी ध्वनि को कहते हैं जिसके टुकड़े नहीं हो सकते। इन्हें अक्षर भी कहते हैं। हिन्दी भाषा में कुल 44 वर्ण (अक्षर) हैं।
वर्गों के भेद-वर्ण दो प्रकार के होते हैं- 1. स्वर, 2. व्यंजन।
1. स्वर – जो वर्ण किसी दूसरे वर्ण की सहायता के बिना बोला जा सकता हो, उसे स्वर कहते हैं। यह 11 होते हैं। स्वर दो प्रकार के होते हैं| (1) ह्रस्व स्वर-जिन स्वरों को बोलने में बहुत कम समय लगता है, (UPBoardSolutions.com) वे ह्रस्व कहलाते हैं, जैसेअ, इ, उ, ए, ओ, ऋ।

(2) दीर्घ स्वर – इन स्वरों को बोलने में ह्रस्व स्वरों की अपेक्षा दुगुना समय लगता है, जैसेआ, ई, ऊ, ऐ, औ। मात्रा-स्वर का वह छोटा रूप जो व्यंजन से जोड़ा जाता है, मात्रा लगता है ‘अ’ स्वर की कोई मात्रा नहीं होती; जैसे
UP Board Solutions for Class 8 Hindi व्याकरण 1
2. व्यंजन – जो वर्ण स्वर की सहायता से बोल जाते हैं, उन्हें व्यंजन कहते हैं। यह 33 होते हैं। हिन्दी में व्यंजनों को पाँच वर्गों में बाँटा गया है।
UP Board Solutions for Class 8 Hindi व्याकरण 2
इनके अतिरिक्त हिन्दी में निम्न वर्ण भी हैं
संयुक्ताक्षर – जब दो वर्षों के बीच में स्वर नहीं रहता, तो उन्हें संयुक्त व्यंजन’ या ‘संयुक्ताक्षर कहते हैं, जैसा- क् + ष् + अ = क्ष, त् + * + अ = त्र, ज् + अ + अ = ज्ञ, श् + र् + अ = श्र।

हलंत – बिना स्वर के व्यंजन के नीचे एक तिरछी रेखा () बना दी जाती है। इसे हलंत कहते हैं, जैसे- ज्, प, ट् आदि।

अनुस्वार (अं) – वर्ण के ऊपर एक बिन्दु (-) को अनुस्वार कहते हैं; जैसे- पंख, शंख आदि।
विसर्ग (अ) – वर्ण के आगे दो बिन्दुओं (:) को ‘विसर्ग’ कहते हैं, जैसे- अतः, फलतः आदि।
अनुनासिक (*) – वर्ण के ऊपर चन्द्रबिन्दु में बिंदु (*) को ‘अनुनासिक’ कहते हैं, जैसे- आँख, आँच, पाँच आदि।

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(उपसर्ग और प्रत्यय)
(उपसर्ग )

उपसर्ग की परिभाषा – उपसर्ग वे शब्दांश हैं जो शब्दों के पूर्व जुड़कर उनके अर्थ बदल देते हैं या उनमें कोई विशेषता उत्पन्न कर देते हैं; जैसे- यश = कीर्ति जब इसके पूर्व में ‘अप’ उपसर्ग जुड़ जाता है। तो अप+यश = अपयश = बुराई का अर्थ हो जाता है। हिन्दी के प्रमुख उपसर्गों के उदाहरण देखिए
आजन्म, आगमन, आकर्षण, आदान, आकण्ठ आदि
उपे उपवन, उपग्रह, उपनाम, उपधर्म, उपयोग, उपसर्ग आदि
परि परिजन, परिच्छेद, परिक्रमा, परितोष, परिवार आदि
अप अपयश, अपवाद, अपमान, अपशब्द, अपकीर्ति आदि –
अव – अवगुण, अवतार, अवनति, अवज्ञा आदि – प्रसिद्ध, प्रयोग, प्रताप, प्रबल, प्रश्वास, प्रवचन आदि
परा – पराजय, पराभव, पराधीप, परास्त आदि अनु – अनुकूल, अनुचर, अनुसार, अनुमान आदि
निर् – निराकार, निर्भय, निर्जीव, निर्दोष, निर्मल आदि
दुर् – दुर्बुद्धि, दुर्गम, दुर्दशा, दुर्लभ, दुर्मति, दुराशा आदि

प्रत्यय

प्रत्यय की परिभाषा – प्रत्यय वे शब्दांश हैं, जो शब्द के अन्त में जुड़कर उसके अर्थ व अवस्था में परिवर्तन कर देते हैं; ‘प्रभु’ शब्द के अन्त में जब ‘ता’ प्रत्यय लग जाता है तो ‘प्रभुता’ शब्द बन जाता है।
अतः प्रभुता में ‘ता’ प्रत्यय है। कुछ अन्य प्रत्ययों से बने उदाहरण देखिए
ता – पटुता, लघुता, पंशुता, महत्ता, दासता, प्रभुता
त्व, – चुम्बकत्व, पशुत्व, दासत्व, ईश्वरत्व, लघुत्व, महत्त्व
इमा – कालिमा, लालिमा, नीलिमा, हरीतिमा
इक – पारलौकिक, पारिवारिक, तार्किक, मौलिक, भौतिक, नैतिक
इत – पुष्पित, आनन्दित, हर्षित, प्रफुल्लित, मोहित
वान – दयावान, धनवान, बलवान, गाड़ीवान, वेगवान
मान – बुद्धिमान, श्रीमान
पन – बड़प्पन, पागलपन, बचपन, मोटापन, खोटापन
ईय – भारतीय, शासकीय, माननीय, शोचनीय
आहट – कड़वाहट, चिकनाहट, गरमाहट, घबराहट
पा – बुढ़ापा, मोटापा, छोटापा
आवट – लिखावट, बनावट, सजावट, दिखावट
आई – लिखाई, बुनाई, पढाई, सिलाई, मलाई, बुराई
अक – लेखक, पालक, गायक, पाठक, नायक, सेवक
इका – लेखिका, पालिका, गायिका, सेविका।
ना – रोना, खाना, पीना, बेलना, ओढ़ना, बिछौना (UPBoardSolutions.com)
आ – भूखा, सूखा, रूखा, भूसा, मृगया, रूठा

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(विलोम शब्द)

एक – दूसरे का विपरीत अर्थ बताने वाले शब्द विलोम या विपरीतार्थी शब्द कहलाते हैं। किसी शब्द का विलोम उसके भाव को प्रकट करता है। छात्रों के ज्ञान के लिए कुछ उपयोगी, विलोम शब्द नीचे दिए जा रहे हैं। छात्र इन्हें समझें और कण्ठस्थ करें।
UP Board Solutions for Class 8 Hindi व्याकरण 3
UP Board Solutions for Class 8 Hindi व्याकरण 4

(समुच्चरित शब्द-समूह)

भाषा में कुछ ऐसे शब्द भी होते हैं जिनके उच्चारण में बहुत कुछ समानता होती है किन्तु उनके अर्थ में बहुत अन्तर होता है। इस प्रकार के कुछ शब्द नीचे दिए जा रहे हैं। इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िए
UP Board Solutions for Class 8 Hindi व्याकरण 5

(समानार्थक शब्दों में अन्तर)

1. बुख – किसी वस्तु के अभाव में मन में पीड़ा।
शोक-किसी की मृत्यु आदि पर दु:ख।

2. अमूल्य – जिसका कोई मूल्य न हो।
दुर्मूल्य – उचित मूल्य से अधिक मूल्य।
बहुमूल्य – मूल्यवान

3. अस्त्र-
फेंककर प्रहार करने वाला हथियार।
शस्त्र – हाथ में लेकर प्रहार करने वाला हथियार।

4. आयु – 
सम्पूर्ण जीवन।
अवस्था – जन्म से वर्षों की गणना।

5. मित्र – 
सुख-दुख में साथ रहने वाला।
सखा – समाने आयु का मनुष्य व मित्र।

6. सन्देह – किसी भी निश्चय पर नहीं पहुँचना।
भ्रम – असत्य बात में सत्य का आभास होना।

7. आचार – साधारण बर्ताव।
व्यवहार – विशेष बर्ताव।

8. सहानुभूति – 
सुख-दुख में पूर्ण रूप से सहयोग देने की भावना।
संवेदना – दुख से दुखी होकर दूसरे को धैर्य देने की भावना।

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(अनेकार्थक शब्द)

अनेकार्थक शब्द – वे शब्द जिनके एक से अधिक अर्थ होते हैं, वे अनेकार्थक शब्द कहलाते हैं। कुछ उदाहरण देखिए
UP Board Solutions for Class 8 Hindi व्याकरण 6

(शब्द-समूह के लिए एक शब्द)

प्रायः भाषा में अनेक शब्दों के स्थान पर एक शब्द का प्रयोग कर देने से भाषा का सौन्दर्य बढ़ जाता है; जैसे- मांस खाने वाला शब्द-समूह के लिए मांसाहारी’ शब्द अच्छा लगेगा। इसी प्रकार कुछ। अन्य उदाहरण आगे दिए जा रहे हैं। इनका प्रयोग अपनी भाषा में कीजिए।
UP Board Solutions for Class 8 Hindi व्याकरण 7

पर्यायवाची शब्द

समान अर्थ वाले शब्द एक-दूसरे के पर्यायवाची शब्द कहलाते हैं। नीचे कुछ उदाहरण दिए जा रहे। है। छात्र इन्हें भली प्रकार कण्ठस्थ करें
UP Board Solutions for Class 8 Hindi व्याकरण 8
UP Board Solutions for Class 8 Hindi व्याकरण 9

(शब्दों के तत्सम रूप)

तत्सम शब्द का अर्थ – तत्सम शब्द का अर्थ संस्कृत भाषा से लिए गए शब्दों के शुद्ध स्वरूप से है। आगे कुछ तत्सम शब्द एवं उनके तद्भव रूप दिए जा रहे हैं। छात्र इन शब्दों को ध्यानपूर्वक पढ़ें
UP Board Solutions for Class 8 Hindi व्याकरण 10
UP Board Solutions for Class 8 Hindi व्याकरण 11

(मुहावरे और उनका प्रयोग)

भाषा को अधिक सजीव, सुन्दर तथा प्रभावपूर्ण बनाने के लिए उसमें मुहावरों को प्रयोग किया जाता है। इसके अर्थ को ठीक-ठीक समझे बिना वाक्य के अर्थ का उचित ज्ञान नहीं हो पाता है। नीचे कुछ मुहावरों के अर्थ तथा उन्हें वाक्यों में प्रयोग करके दिखाया जा रहा है। छात्र इन्हें भली प्रकार पढ़े और समझें

  1. अगर मगर करना – (टाल मटोल करना) आपस में सन्धि कर लेने के बाद अगर-मगर करना धोखा देना है।
  2. प्रलय ढाना – (बहुत हानि करना) उपद्रवियों को दुकानों पर प्रलय ढाते देखकर मेरा तो हृदय काँप उठा।
  3. हिलोरें मारना – (उत्साहित होना) नेहरू जी के हृदय में देश-प्रेम की भावनाएँ सदा हिलोरें मारती थीं।
  4. अन्धे की लाठी – (गरीबी या बुढ़ापे का सहारा) किसी को सुपुत्र ही अन्धे की लाठी बन सकता है।
  5. अरमान निकालना – (इच्छा पूर्ण करना) वीर सैनिक तो युद्धस्थल पर ही अपने अरमान निकाल सकता है।
  6. आँखें खुल जाना – (होश में आना) परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने पर ही राम की आँखें खुलीं।।
  7. आँख लगी रहना – (आशा बनी रहना) श्रीकृष्ण के लौट आने की प्रतीक्षा में गोपियों की आँखें सदा लगी रहती थीं।
  8. ईंट का जवाब पत्थर से देना – (दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करना) जब शत्रुओं ने . सहसा ही भारत के दो गाँवों पर अपना अधिकार जमा लिया तो भारतीय वीरों ने भी उसके चार गाँव छीन कर ईंट का जवाब पत्थर से दिया।
  9. चादर तानकर सोना – (निश्चित होना) भाई चादर तानकर सोने का समय नहीं रहा, काम करने से ही जीवन सफल हो सकता है।
  10. पर्दा डालना – (बुराइयों को छिपा देना) धूर्त व्यक्ति अपनी वास्तविकता पर पर्दा डालकर अपना भला चाहता है।
  11. पाँव उखड़ जाना – (हार कर भाग जाना) भारतीय सैनिकों के आगे पाकिस्तानियों के पाँव उखड़ गए।
  12. फूटी कौड़ी – (बिल्कुल धन न होना) आज तो मेरे पास (UPBoardSolutions.com) फूटी कौड़ी भी नहीं है।
  13. बाले बाँका होना – (कष्ट होना) यदि अरविन्द का बाल बाँका भी हुआ तो तुम्हारी खैर नहीं।
  14. मिट्टी के मोल – (बहुत सस्ता) आज तो आप दो किलो अंगूर ले आए हो, क्या कहीं मिट्टी के मोल मिल गए थे।
  15. रंग जमाना – (प्रभाव डालना) नेता जी ने अपने भाषण से सभा पर ऐसा रंग जमाया कि सब वाह-वाह करने लगे।
  16. सिर मुड़ाते ही ओले पड़े –  (प्रारम्भ में ही काम बिगड़ना) नेता जी ने अभी प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली ही थी कि पूरे प्रदेश में भूकंप के कारण भयंकर तबाही मच गई। इसी को कहते हैं- सिर मुड़ाते ही ओले पड़ना।
  17. चोर की दाढ़ी में तिनका – (अपराधी का स्वयं ही सशंकित होना) अध्यापक ने कक्षा में कहा कि जिसने भी चोरी की होगी उसके हाथ धूल में गन्दे हो जाएँगे। यह सुनकर रमेश जल्दी-जल्दी । अपने हाथ साफ करने लगा। अध्यापक ने उसे देखकर कहा कि देखो, चोर की दाढ़ी में तिनका।

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(लोकोक्तियाँ (कहावतें))

लोकोक्ति का अर्थ है, संसार में प्रचलित उक्ति। ये लोक प्रचलित वाक्यांश होते हैं। लोगों के अनुभव से पूर्ण लोकोक्तियों का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया जाता है। अपने कथन को प्रभावशाली बनाने के लिए इनका स्वतन्त्र वाक्य के रूप में प्रयोग करना चाहिए। नीचे कुछ कहावतों का अर्थ तथा उनका वाक्य में प्रयोग दिया जा रहा है, इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िए।

  1. अधजल गगरी छलकत जाए – (ओछा व्यक्ति ही डींगे मारता है) भाई, 6000 रुपये की नौकरी में क्यों इतराते हो? सुना नहीं ‘अधजल गगरी छलकत जाए’ व ती बात होगी।
  2. चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरी रात – (सुख के बाद दु:ख आना) राम! धन का घमण्ड मत करो, चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरी रात।’
  3. मान ने मान मैं तेरा मेहमान – (बिना सम्बन्ध के सम्बन्ध दिखाना) मैं तो आपको जानता भी नहीं हूँ और आप मुझे भाई कहते हैं। ठीक है, मान न मान मैं तेरा मेहमान।
  4. ऊँची दुकान फीका पकवान – बाह्य दिखावा कुछ और वास्तविकता कुछ और।
  5. एक पंथ दो काज – दोहरा लाभ होना।
  6. कागज की कोठरी – बदनामी का काम।
  7. तिलों में तेल नहीं – लाभ की आशा नहीं।
  8. नया नौ दिन पुराना सौ दिन – तड़क-भड़क थोड़े ही दिन रहती है। पुरानी वस्तु का अधिक उपयोगी होना।
  9. भैंस के आगे बीन बजाना – मूर्ख के सम्मुख अपनी कला का प्रदर्शन करना।
  10. सोने की चिड़िया – धनवान।
  11. अन्धे के आगे रोना अपना दीदा खोना – सहानुभूति न रखने वाले के सामने अपना दुखड़ा रोना व्यर्थ है।
  12. आगे नाथ न पीछे पगहा – किसी प्रकार का डर न होना।
  13. उलटा चोर कोतवाल को डाँटे – दोषी ही अच्छे व्यक्ति को दोषी बताए।
  14. भागते भूत की लँगोटी भली – पूर्ण लाभ न मिलने पर आंशिक लाभ पर ही सन्तोष करना।
  15. मन चंगा तो कठौती में गंगा – मन शुद्ध होने पर तीर्थयात्रा की आवश्यकता नहीं होती।

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(शब्दों के अर्थ व वाक्य प्रयोग)

  1. उत्तरोत्तर – (क्रमपूर्वक) विषम परिस्थितियों में भी पर्वतारोही उत्तरोत्तर चढ़ते ही चले गए।
  2. आशातीत – (आशा से भी परे) गत चुनावों में काँग्रेस दल को आशातीत सफलता मिली थी।
  3. उपलब्धि – (प्राप्ति) कविवर बिहारी को राजा जयसिंह से अपार धन की उपलब्धि हुई।
  4. रंग जमाना – (प्रभाव जमाना) त्यागी जी के भाषण से सभा में ऐसा रंग जमा कि उनके विरोधी भी देखते रह गए।
  5. अग्रसर – (आगे बढ़ना) विज्ञान के कारण आज हम उन्नति की ओर अग्रसर हो रहे हैं।
  6. तटस्थ – (पक्ष-विपथ से दूर) भारत की तटस्थ रहने की नीति की प्रशंसा सब ओर हो रही है।
  7. संक्रामक – (छूत सम्बन्धी) हैजा एक संक्रामक रोग है।
  8. अस्त्र – (फेंककर चलाया जाने वाला हथियार) बाण, ब आदि प्राचीन अस्त्र हैं।
  9. शस्त्र – (हाथ में थामकर चलाया जाने वाला हथियार) तलवार, छुरी और खड्ग शस्त्र हैं।
  10. अध्ययन – (सामान्य पढ़ाई) मैंने विज्ञान का अध्ययन कभी नहीं किया है।
  11. अनुशीलन – (गहरा अध्ययन) मैं आजकल निबन्ध साहित्य का अनुशीलन कर रहा हूँ।
  12. अन्याय – (नियम विरुद्ध कार्य) अन्याये सब दिन नहीं चल सकता।
  13. अधर्म – (धर्म विरुद्ध कार्य) निर्बल को सताना अधर्म है।

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