UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi सफाई हेतु सम्बन्धित अधिकारी को प्रार्थना-पत्र

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Samanya Hindi
Chapter Name सफाई हेतु सम्बन्धित अधिकारी को प्रार्थना-पत्र
Number of Questions 14
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi सफाई हेतु सम्बन्धित अधिकारी को प्रार्थना-पत्र

सफाई हेतु सम्बन्धित अधिकारी को प्रार्थना-पत्र

प्रश्न 1.
अपने क्षेत्र में मच्छरों के प्रकोप का वर्णन करते हुए उचित कार्यवाही के लिए स्वास्थ्य अधिकारी को पत्र लिखिए।
या
अपने क्षेत्र में मलेरिया फैलने की सम्भावना को देखते हुए स्वास्थ्य अधिकारी को एक पत्र लिखिए।
या
अपने मुहल्ले में वर्षा के कारण उत्पन्न हुई जल-भराव की समस्या की ओर ध्यान आकृष्ट कराने के लिए नगरपालिका अधिकारी/जिलाधिकारी को पत्र लिखिए। [2011, 12]
या
नगर निगम के स्वास्थ्य अधिकारी को अपने मुहल्ले में विद्यमान गन्दगी के विषय में एक पत्र लिखिए। [2012]
या
नगर की स्वच्छता हेतु नगरपालिका अध्यक्ष को आवेदन देते हुए उनका ध्यान गन्दगी से होने वाली बीमारियों की ओर आकृष्ट कीजिए। [2015]
या
ग्राम प्रधान की ओर से अपने जनपद के जिलाधिकारी को एक पत्र लिखिए, जिसमें गाँव की सफाई व्यवस्था हेतु अनुरोध किया गया हो। [2013, 15, 18]
या
अपने ग्राम प्रधान को एक पत्र लिखकर गाँव की सफाई हेतु अनुरोध कीजिए। [2013]
या
अपने नगर में बाढ़ एवं घनघोर वर्षा के बाद गन्दगी के कारण फैलने वाले संक्रामक रोगों की आशंका को दृष्टिगत करते हुए रोकथाम के उपायों हेतु जिलाधिकारी को एक पत्र लिखिए। [2014,16]
या
अपने क्षेत्र में प्रदूषण से उत्पन्न स्थिति का वर्णन करते हुए किसी दैनिक समाचार-पत्र के सम्पादक को एक पत्र लिखिए। [2017]
या
अपने मुहल्ले में फैली गन्दगी की सफाई कराने हेतु नगरपालिका अध्यक्ष को एक शिकायती पत्र लिखिए। (2017)
या
बरसात में बढ़ रहे संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिए अपने नगर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी को पत्र लिखिए। (2017)
उत्तर
सेवा में,
स्वास्थ्य अधिकारी,
…………….. नगर निगम।
………………… नगर।

विषय-मच्छरों का बढ़ता हुआ प्रकोप

महोदय,
मैं आपका ध्यान बढ़ते हुए मच्छरों के प्रकोप की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। मैं सुभाष नगर क्षेत्र का निवासी हूँ। पूरे सुभाष नगर क्षेत्र में आजकल मच्छरों का भयंकर आतंक छाया हुआ है। दिन हो यो रात, मच्छरों के झुंड सदा घूमते नज़र आ जाते हैं। रात को तो वे सोना दूभर कर देते हैं। जब सुबह उठते हैं। तो बच्चों के मुंह लाल-लाल दानों से भरे होते हैं। मच्छरों के कारण घर-घर में मलेरिया फैला हुआ है। प्रायः सभी घरों में कोई-न-कोई मलेरिया का रोगी मिल जाएगा। इन मच्छरों के कारण स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ा है।

हमारे क्षेत्र में मच्छरों की अधिकता का बड़ा कारण है–पानी के जमे हुए तालाब और गली-मुहल्लों में फैली चौड़ी-चौड़ी खुली नालियाँ। उन कच्ची नालियों को व्यवस्थित करने की कोई व्यवस्था नहीं हुई है। मुहल्ले के जमादार सफाई की ओर ध्यान नहीं देते, इसलिए नालियों में सदा मल जमा पड़ा रहता है। लोग अपने घरों के गन्दे जल को बाहर यूं ही बिखरा देते हैं, जिससे मार्गों के गड्ढे भर जाते हैं। हमने कई बार निवेदन किया है कि हमारे क्षेत्र के तालाब को भरवा दिया जाए, जिससे मच्छरों का मुख्य अड्डा समाप्त हो जाए, किन्तु इस ओर कभी ध्यान नहीं दिया गया।

इस बार अत्यधिक वर्षा के कारण जगह-जगह जल का जमाव हो गया है। सभी जगह कीचड़, मल और बदबूदार जल का प्रकोप है। अत: मैं पुनः सुभाष नगर के निवासियों की ओर से आपसे अनुरोध करता हूँ कि मच्छरों को समाप्त करने के लिए सार्वजनिक रूप से क्षेत्र में मच्छरनाशक दवाई छिड़कवाने की व्यवस्था की जाए। मलेरिया से बचने के लिए कुनीन बाँटने तथा पूरे क्षेत्र की सफाई के व्यापक प्रबन्ध किये जाएँ। आशा है आप शीघ्र कार्यवाही करेंगे।
धन्यवाद सहित।

भवदीय
क ख ग
मंत्री, मुहल्ला सुधार समिति
……………………. सुभाष नगर।

दिनांक : 19 जुलाई, 2017

प्रश्न 2.
दिल्ली नगर निगम के स्वास्थ्य अधिकारी को एक पत्र लिखकर उनसे अपने मुहल्ले की सफाई कराने का अनुरोध कीजिए। [2013, 14]
या
अपने क्षेत्र की गन्दगी की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए स्वास्थ्य अधिकारी/ उपजिलाधिकारी को एक पत्र लिखिए। [2012, 13]
या
अपने गली-मुहल्ले की नालियों की समुचित सफाई के लिए नगरपालिका के अध्यक्ष को एक पत्र लिखिए। [2011, 13, 18]
या
नगर की सफाई हेतु नगरपालिका को एक पत्र लिखिए। [2015]
या
अपने घर के आस-पास फैली गन्दगी के कारण संक्रामक रोग फैलने की आशा व्यक्त करते हुए उप-जिलाधिकारी को सम्बोधित कर एक शिकायती-पत्र लिखिए। [2018]
उत्तर
सेवा में,
स्वास्थ्य अधिकारी,
दिल्ली नगर निगम, दिल्ली।

विषय-मुहल्ले की सफाई कराने हेतु प्रार्थना-पत्र

श्रीमान,
हम आपका ध्यान मुहल्ले की सफाई सम्बन्धी दुरवस्था की ओर खींचना चाहते हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हमारे मुहल्ले की सफाई हेतु नगर निगम का कोई सफाई-कर्मचारी गत दस दिनों से काम पर नहीं आ रहा है। घरों की सफाई करने वाले कर्मचारियों ने भी मुहल्ले में स्थान-स्थान पर गन्दगी और कूड़े-कर्कट के ढेर लगा दिये हैं। इसका कारण सम्भवत: यह भी है कि आसपास कूड़ा-करकट तथा गन्दगी डालने के लिए कोई निश्चित स्थान नहीं है।

आज स्थिति यह है कि मुहल्ले का वातावरण अत्यन्त दूषित तथा दुर्गन्धमय हो गया है। मुहल्ले से गुजरते हुए नाक बन्द कर लेनी पड़ती है। चारों ओर मक्खियों की भिनभिनाहट है। रोगों के कीटाणु प्रतिदिन बढ़ रहे हैं। नालियों की सफाई न होने के कारण मच्छरों का प्रकोप इस सीमा तक बढ़ गया है कि दिन का चैन और रात की नींद हराम हो गयी है।

वर्षा पाँच-सात दिनों में प्रारम्भ होनी सम्भावित है। यथासमय मुहल्ले की सफाई न होने पर मुहल्ले की दुरवस्था का अनुमान लगाना कठिन है। अतः आपसे हम मुहल्ले वालों का निवेदन है कि आप यथाशीघ्र मुहल्ले का निरीक्षण करें तथा सफाई का नियमित प्रबन्ध करवाएँ, अन्यथा मुहल्ला निवासियों के स्वास्थ्य पर उसका कुप्रभाव पड़ने की आशंका है।
आपकी ओर से उचित कार्यवाही के लिए हम प्रतीक्षारत हैं।
दिनांक : 5 जून, 2014

प्रार्थी
………………… नगर
ब्लॉक-डी के निवासी।

प्रश्न 3.
आपके नगर में प्रदूषित पानी पीने से दस्त व हैजे के रोगी बढ़ रहे हैं। नगरपालिका के स्वास्थ्य अधिकारी को पत्र लिखकर स्थिति से अवगत कराएँ। [2009]
उत्तर
सेवा में,
स्वास्थ्य अधिकारी,
कटनी नगरपालिका,
कटनी।

विषय-प्रदूषित पानी से महामारी की आशंका

महोदय,
पिछले कुछ समय से हमारे क्षेत्र में पीने का शुद्ध पानी नहीं आ रहा है। पानी का स्वाद भी कुछ बदला हुआ-सा है। इस पानी को पीने से लोगों को कई तरह के रोगों का सामना करना पड़ रहा है तथा दस्त व हैजे की आम शिकायत बनी हुई है। पानी को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि इसका रंग कुछ मटमैला-सा है। हमारे क्षेत्र से एक सीवरेज पाइप भी गुज़रती है। इस बात की सम्भावना है कि पानी की पाइप में सीवरेज का गन्दा पानी मिल रहा हो। लोगों को पीने के पानी के लिए इसी पाइप लाइन का सहारा लेना पड़ता है। अगर इसी तरह प्रदूषित जल की आपूर्ति होती रही तो किसी महामारी की समस्या खड़ी हो सकती है। बीमारों की निरन्तर बढ़ती संख्या चिन्ता का कारण है। आपसे अनुरोध है कि हमारे क्षेत्र की पानी के पाइप लाइन की जाँच करवाएँ तथा. उसे अति शीघ्र ठीक करवाएँ।।

आशा है, आप हमारी समस्या को गम्भीरता से लेंगे।
धन्यवाद !
दिनांक : 10 जून, 2014

भवदीय
असलम, रहीम, रहमान,
कादिर, मनीष, कल्पना

प्रश्न 4.
अपने क्षेत्र में व्याप्त गन्दगी के कारण उत्पन्न डेंगू व मलेरिया जैसी भयंकर बीमारियों की जानकारी किसी दैनिक पत्र के सम्पादक को देते हुए पत्र लिखिए।
या
स्वास्थ्य विभाग द्वारा आपके क्षेत्र की गन्दगी की ओर कोई ध्यान न दिये जाने पर किसी दैनिक पत्र के सम्पादक को पत्र लिखिए।
उत्तर

राकेश शुक्ला
प्रधान
‘मेरा मेरठ : स्वच्छ मेरठ
जागृति विहार, मेरठ
दिनांक : 19 सितम्बर, 2017

श्रीमान सम्पादक महोदय,
दैनिक जागरण,
मोहकमपुर, दिल्ली रोड
मेरठ-250 002

विषय-क्षेत्र की गन्दगी से उत्पन्न समस्याओं तथा स्वास्थ्य विभाग की उपेक्षा के सम्बन्ध में

महोदय,
आपके लोकप्रिय समाचार-पत्र के माध्यम से मैं मेरठ प्रशासन तथा उसके वरिष्ठ अधिकारियों का ध्यान मेरठ के नगरीय क्षेत्र मलियाना, कासमपुर, तारापुरी, ब्रह्मपुरी में व्याप्त गन्दगी तथा इसके दुष्प्रभाव की ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ। आपसे अनुरोध है कि मेरे इस पत्र को ‘जनवाणी’ शीर्षक स्तम्भ में प्रकाशित करने का कष्ट करें। ये सभी ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ मध्यम तथा निम्न आय वर्ग एवं गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोग रहते हैं। ये चारों ही क्षेत्र प्रत्येक स्तर पर उपेक्षित रहे हैं। इस बार वर्षा की अधिकता के कारण इन क्षेत्रों में स्थान-स्थान पर पानी भर गया है तथा इनके पास बहने वाला नाला भी पानी से भर गया है। पानी के इस भराव के कारण चारों ओर गन्दगी तथा दुर्गन्ध व्याप्त हो गयी है तथा मच्छरों के पनपने के कारण मलेरिया और डेंगू फैल रहा है। आये दिन इन रोगों से ग्रस्त रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है। खेद का विषय है कि अधिकारियों का ध्यान इस ओर आकृष्ट कराये जाने पर भी उनकी ओर से इस समस्या के समाधान के लिए गम्भीरतापूर्वक कोई प्रयास नहीं किये गये। प्रशासन की इस उपेक्षा के कारण इन क्षेत्रों में रहने वाले निवासियों को अपने स्वास्थ्य को लेकर चिन्तित होना स्वाभाविक है।

अपनी संस्था की ओर से मेरा नगर के उच्च पदाधिकारियों तथा नगर निगम के वरिष्ठ अधिकारियों से आग्रह है कि इससे पूर्व कि स्थिति अत्यन्त भयावह होकर अनियन्त्रित हो जाए, इस समस्या को अत्यन्त गम्भीरता से लेते हुए तत्काल इसके समाधान के लिए आवश्यक कदम उठाये जाएँ।
सधन्यवाद!
दिनांक : ……………..

भवदीय
राकेश शुक्ला

प्रश्न 5.
शुल्क मुक्ति हेतु अपने विद्यालय के प्रधानाचार्य को एक आवेदन-पत्र लिखिए। (2015)
उत्तर
सेवा में,
श्रीयुत् प्रधानाचार्य,
जवाहर पब्लिक स्कूल,
जनकपुरी, दिल्ली-18
मान्यवर महोदय,
सविनय निवेदन यह है कि मैं आपके विद्यालय की कक्षा 12 (B) का विद्यार्थी हूँ। मेरे पिताजी अपने छोटे से व्यवसाय द्वारा बड़ी कठिनाई से परिवार का पालन-पोषण करते हैं। कमरतोड़ महँगाई के कारण काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। घर में प्राय: आवश्यक वस्तुओं का अभाव रहता है। मेरे 4 भाई-बहन विभिन्न स्कूलों में पढ़ रहे हैं, उनकी पढ़ाई-लिखाई आदि के खर्चे का मानसिक बोझ पिताजी के सिर पर सदा रहता है।

मैं अपनी कक्षा का परिश्रमी छात्र हूँ और कक्षा में सदा प्रथम स्थान प्राप्त करता रहा हूँ। खेलकूद में भी मेरी अच्छी रुचि है। मैं सीनयर ग्रुप फुटबॉल का कप्तान भी हूँ।
अतः आपसे निवेदन है कि मुझे विद्यालय शुल्क से पूर्ण मुक्ति प्रदान करें, जिससे मैं अध्ययनरत रहकर अपने भविष्य को सँवार सकें। मेरे अभिभावक आपके अत्यन्त आभारी रहेंगे।

आपका आज्ञाकारी शिष्य
सतीश शर्मा
कक्षा-12 (B)

दिनांक : …………………….

प्रश्न 6.
बिजली-समस्या के निराकरण हेतु अपने जिले के बिजली विभाग को एक शिकायती पत्र लिखिए। [2015]
उत्तर
सेवा में,
बिजली विभाग,
मेरठ।

विषय-बिजली की अनियमित आपूर्ति

मान्यवर,
हम ‘जैन नगर कालोनी के निवासी आपका ध्यान बिजली समस्या की ओर आकर्षित कराना चाहते हैं। पानी तथा अन्य कार्यों के लिए बिजली की सर्वाधिक आवश्यकता ग्रीष्म काल में ही होती है और हम सब अप्रैल के प्रारम्भ से ही अनुभव कर रहे हैं कि भरपूर गर्मी प्रारम्भ होने से पूर्व ही बिजली की आपूर्ति कम हो गई है। बिजली जीवन की मूलभूत आवश्यकता है। कोई भी लोकप्रिय सरकार इसकी उपेक्षा नहीं करती।

हमारी कालोनी में बिजली आपूर्ति प्रारम्भ और बन्द होने का कोई समय भी निर्धारित नहीं है। हमारी कालोनी से एक प्रतिनिधि मण्डल इस सम्बन्ध में बिजली आपूर्ति अधिकारी से भी मिला था और उन्होंने एक सप्ताह में बिजली आपूर्ति बढ़ाने का वचन दिया था। खेद है कि आज तीन सप्ताह व्यतीत हो जाने पर भी कोई कार्यवाही इस सम्बन्ध में नहीं हुई है।

इस स्थिति में आपसे हमारा निवेदन है कि कृपया हमारी समस्या की ओर ध्यान दें और इसका शीघ्र समाधान करायें। यदि बिजली-आपूर्ति तुरन्त बढ़ाना सम्भव नहीं हो तो कम से कम उसका समय तो निर्धारित किया जा सकता है।
शीघ्र कार्यवाही की आशा में।

हम हैं आपके जैन नगर निवासी

(1) ……………….
(2) ……………….
(3) ……………….
(4) ……………….

दिनांक : …………..

प्रश्न 7.
किसी समाचार-पत्र के सम्पादक को अपने मुहल्ले में लाउडस्पीकर के कारण पढ़ाई में आने | वाले व्यवधान की ओर अधिकारियों का ध्यान आकर्षित करते हुए पत्र लिखिए।
[2015]
उत्तर
सेवा में,
सम्पादक महोदय,
दैनिक जागरण, मेरठ।

विषय-परीक्षा के समय लाउडस्पीकर आदि पर रोक

मान्यवर,
निवेदन यह है कि प्रायः सभी विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों की परीक्षाओं का आयोजन मार्च और अप्रैल माह में होता है। विद्यार्थी अपने भविष्य को दाँव पर लगाने के लिए बड़ी लगन वे उत्साह से अध्ययनरत रहते हैं। थोड़ी-सी अशान्ति और शोरगुल से वे अधीर और आतुर हो उठते हैं। परीक्षा की तैयारी के समय वे एकान्त, शान्त व एकाग्रचित रहना चाहते हैं।

देखा गया है कि उक्त दोनों महीनों में वातावरण बड़ा अस्थिर व अशान्त रहता है। विवाह-लग्नों की धूम के कारण लाउडस्पीकर और वाद्य-यन्त्रों का शोर मच जाता है। बैण्ड-बाजों की कर्कश ध्वनि मानो पागल-सा बना देती है। विद्यार्थी अपना सिर थाम लेते हैं। फलस्वरूप झगड़े और फसाद खड़े हो जाते हैं।

इस वर्ष भी मार्च और अप्रैल महीनों में बहुत शादियाँ हैं। अत: प्रशासन को शीर्घ सतर्क और सावधान होकर लाउडस्पीकर और वाद्ययन्त्रों पर प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए, अन्यथा गत वर्ष की तरह हिंसा की वारदातें पुनर्जीवित हो सकती हैं।

जिला प्रशासन से हमारा अनुरोध है कि परीक्षा की इन अमूल्य घड़ियों में शोरगुल व बैण्ड-बाजों की कर्कश कटु ध्वनि पर प्रतिबन्ध लगा दें और विवाह-लग्न के अवसर पर धीमा संगीत रखने के आदेश जारी किये जाएँ।

मोहन लाल गुप्त
अध्यक्ष,
भारतीय विद्यार्थी परिषद्
मेरठ।

दिनांक : ………….

प्रश्न 8.
छात्रवृत्ति प्राप्त करने हेतु अपने विद्यालय के प्रधानाचार्य को एक आवेदन-पत्र लिखिए। [2016]
उत्तर
सेवा में,
श्रीमान प्रधानाचार्य,
आदर्श माध्यमिक विद्यालय
सिद्धार्थ नगर, झाँसी।

विषय-छात्रवृत्ति प्राप्त करने के लिए प्रार्थना-पत्र

मान्यवर,
सविनय निवेदन यह है कि मैं बारहवीं कक्षा का छात्र हूँ। मैं सदा विद्यालय में अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण होता रहा हूँ। पिछले कई वर्षों से मैं लगातार प्रथम आ रहा हूँ। इसके अलावा मैं भाषण-प्रतियोगिताओं, वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में कई बार विद्यालय के लिए जोनल एवं राष्ट्रीय स्तर पर इनाम जीतकर लाया हूँ। खेल-कूद में भी मेरी गहन रुचि है। मैं स्कूल की कबड्डी टीम का कप्तान भी हूँ। सभी अध्यापक मेरी प्रशंसा करते हैं।

अत्यन्त दु:ख के साथ आपको बताना पड़ रहा है कि पिताजी को एक असाध्य रोग ने आ घेरा है। जिसके कारण घर की आर्थिक दशा डगमगा गई है। पिताजी स्कूल से मेरा नाम कटवाना चाहते हैं। वे मेरा मासिक-शुल्क देने में असमर्थ हैं। मैंने अपनी पाठ्य-पुस्तकें तो जैसे-तैसे खरीद ली हैं, लेकिन शेष व्यय के लिए आपसे नम्र निवेदन है कि मुझे तीन सौ रुपये मासिक की छात्रवृत्ति देने की कृपा करें, ताकि मैं अपनी पढ़ाई सूचारु रूप से चला सकें। यह छात्रवृत्ति आपकी मेरे प्रति विशेष कृपा होगी। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं खूब मेहनत से पढ़ेगा और इस स्कूल का नाम रोशन करूंगा।

आपका आज्ञाकारी शिष्य
हस्ताक्षर

दिनांक :…………………
कक्षा-12
रोल नं०-20

प्रश्न 9.
अपने विद्यालय में कम्प्यूटरों के अभाव की ओर विद्यालय के प्रधानाचार्य का ध्यान आकृष्ट कराते हुए कम्प्यूटर की पूर्ति हेतु उन्हें एक प्रार्थना-पत्र लिखिए। [2016]
उत्तर
सेवा में,
श्रीमान प्रधानाचार्य,
रा०उ०मा० बाल विद्यालय,
बेगमपुल, मेरठ।

विषय-कम्प्यूटर पूर्ति की व्यवस्था हेतु प्रार्थना-पत्र

महोदय,
सविनय निवेदन है कि हम बाहरवीं कक्षा के छात्र यह अनुभव करते हैं कि आज के कम्प्यूटर युग में प्रत्येक व्यक्ति को कम्प्यूटर की जानकारी होनी चाहिए। क्योंकि दिनोंदिन कम्प्यूटर शिक्षा की माँग बढ़ती जा रही है। ऐसे में हमारे उज्ज्वल भविष्य के लिए भी कम्प्यूटर को ज्ञान होना अपरिहार्य है। हालाँकि, विद्यालय में कम्प्यूटर विषय बढ़ाया जाता है और प्रयोगशाला कम्प्यूटर भी उपलब्ध है। लेकिन कम्प्यूटरों की संख्या सीमित होने के कारण हम छात्र निरन्तर अभ्यास नहीं कर पाते हैं। कभी-कभी तो अभ्यास किए बिना दो-दो हफ्ते बीत जाते हैं जिस कारण कक्षा में पढ़ाया गया अध्याय हम भली-भाँति नहीं समझ पाते हैं।

अतः आपसे प्रार्थाना है कि विद्यालय की प्रयोगशाला में कम्प्यूटरों की संख्या को पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध करवाने की कृपा करें। हम आपके प्रति कृतज्ञ होंगे। आशा है, आप हमारे अनुरोध को स्वीकार करेंगे।
धन्यवाद!

प्रार्थी
क.ख.ग.
कक्षा-बारह ‘सी’।

दिनांक …………

प्रश्न 10.
पेयजल अधिकारी को पत्र लिखिए, जिसमें अनिवार्य रूप से जल प्राप्त होने की शिकायत की गई हो। (2016)
या
पानी की समस्या का निराकरण के लिए नगरपालिका के अध्यक्ष को एक आवेदन पत्र लिखिए। [2016]
या
अपने नगर में युद्ध पेयजल आपूर्ति कराने हेतु जल स्थान के प्रबन्धक को पत्र लिखिए। [2017]
उत्तर
सेवा में,
श्रीमान निदेशक,
मेरठ जल बोर्ड,
मेरठ।

विषय-पेयजल अधिकारी को जलापूर्ति हेतु प्रार्थना-पत्र

संजय नगर,
पांडव नगर
10 मई, 2016

महोदय,
मैं आपका ध्यान संजय नगर, पांडव नगर, मेरठ में पेयजल की अनियमित जल-आपूर्ति की ओर आकर्षित कराना चाहता हूँ। इस क्षेत्र में प्रात: केवल 35 मिनट ही नलों में पानी आता है। पानी का दबाव बहुत कम होता है, मोटर का प्रयोग करने पर भी ऊपर की मन्जिलों में पानी चढ़ नहीं पाता। सायंकाल भी पेयजल की आपूर्ति अनियमित है। कई बार शाम को दो-दो दिन पानी की आपूर्ति नहीं होती। पानी की इस अनियमित आपूर्ति से क्षेत्र के नागरिकों में रोष है। इससे पूर्व भी अनेक बार स्थानीय अधिकारियों को मैं इस समस्या से अवगत करा चुका हूँ, परन्तु स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है।

अतः आपसे प्रार्थना है कि इस क्षेत्र में पेयजल की समुचित व्यवस्था कराने हेतु उचित कदम उठाने की कृपा करें।
मैं और मेरा पूरा क्षेत्र सदैव आपके आभारी रहेंगे।
धन्यवाद!

भवदीय
हस्ताक्षर ……………
संजय नगर, पांडव नगर

प्रश्न 11.
अपने नगर की सार्वजनिक भूमि पर हुए अवैध कब्जे को हटाने के लिए नगरपालिका अध्यक्ष को एक शिकायती पत्र लिखिए। [2016]
उत्तर
सेवा में,
नगरपालिका अध्यक्ष,
मेरठ।

विषय–अवैध कब्जे को हटाना।

मान्यवर,
हम ‘लोहिया नगर कॉलोनी के निवासी आपका ध्यान कॉलोनी और उसके आसपास हो रहे अवैध कब्जों की तरफ आकर्षित कराना चाहते हैं। यहाँ सावर्जनिक भूमि पर कुछ शरारती तत्वों ने कब्जा कर लिया है और वो वहाँ पर गैर-कानूनी कार्यों को बढ़ावा दे रहे हैं। इन गैर-कानूनी कार्यों में जुआ, नशाखोरी, शराब का अवैध व्यापार और कुछ हद तक वैश्यावृत्ति भी शामिल हैं। इन शरारती तत्त्वों और इनके द्वारा किए जा रहे कार्यों के कारण कालोनी की शान्ति और सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न लगने लगा है। आए दिन यहाँ पर लड़ाई-झगड़ा, मारपीट व कॉलोनीवासियों के साथ गाली-गलौज की स्थिति उत्पन्न होती रहती है। इस कारण बच्चों और महिलाओं का घर से निकलना मुश्किल होता जा रहा है। इन शरारती तत्वों को कुछ राजनीतिक संरक्षण मिला होने के कारण हममें से कोई भी इनके खिलाफ ज्यादा नहीं बोल पाते हैं। अत: आपसे हमारा निवेदन है कि हमारी समस्या पर ध्यान देते हुए इसका अतिशीघ्र समाधान कराएँ।
शीघ्र कार्यवाही की आशा में
दिनांक : …………..

समस्त लोहिया नगर निवासी
(1) ……………….
(2) ……………….
(3) ……………….
(4) ……………….
(5) ……………….

प्रश्न 12.
प्राथमिक स्वास्थ्य-केन्द्र पर संक्रामक बीमारियों की रोक-थाम के लिए समुचित दवाइयों की उपलब्यता हेतु जिले के मुख्य चिकित्साधिकारी को एक पत्र लिखिए। [2016]
उत्तर
सेवा में,
मुख्य चिकित्साधिकारी,
मेरठ।

विषय-प्राथमिक स्वास्थ्य-केन्द्र पर संक्रामक बीमारियों की दवाइयों को अभाव

महोदय,
मैं आपका ध्यान क्षेत्र के प्राथमिक स्वास्थ्य-केन्द्र पर संक्रामक बीमारियों से बचाव के लिए इस्तेमाल की जाने वाली जरूरी दवाइयों की कमी की ओर आकर्षित कराना चाहता हूँ। पूरे क्षेत्र में हैजा, डेंगू ज्वर, मलेरिया, टी०बी० (क्षय रोग) तथा पीत ज्वर जैसे संक्रामक रोग अपने चरम-बिन्दु पर हैं। इस कारण प्राथमिक स्वास्थ्य-केन्द्र पर पीड़ितों की संख्या निरन्तर बढ़ रही है। लेकिन आवश्यक दवाइयों के अभाव में डॉक्टर उचित इलाज नहीं कर पा रहे हैं। वहीं, डॉक्टरों द्वारा पीड़ितों को इलाज हेतु बाहर से लिखी जा रही दवाइयाँ इतने ऊँचे मूल्य पर मिल रही हैं जो आम जन की पहुँच से बाहर है। इस कारण पीड़ितों की संख्या में कमी नहीं आ पा रही है।

अतः आपसे अनुरोध है कि इस मामले को संज्ञान में लेते हुए यथाशीघ्र समुचित दवाइयों को उपलब्ध कराने का कष्ट करें ताकि पीड़ितों को जरूरी इलाज समय पर मिल सके और समय रहते स्वास्थ्य लाभ ले सकें।
धन्यवाद सहित।
दिनांक : …………..

भवदीय
मदनगोपाल
खैरनगर, मेरठ

प्रश्न 13.
नेपाल-भूकम्प पीड़ितों की सहायतार्थ अपने गाँव द्वारा संचित धनराशि को यथात्यान पहुँचाने हेतु अपने जिलाधिकारी को एक पत्र लिखिए। (2016)
या
उज्जैन में बाढ़ पीड़ितों की सहायतार्थ अपने ग्राम द्वारा संचित धनराशि को पहुँचाने हेतु जिलाधिकारी को एक पत्र लिखिए। [2016, 17]
उत्तर
सेवा में,
श्रीमान जिलाधिकारी महोदय,
मेरठ।।

विषय-भूकम्प पीड़ितों की सहायता हेतु धनराशि का संचय

मान्यवर,
मैं आपको ध्यान विगत माह हमारे पड़ोसी देश नेपाल में आए विनाशकारी भूकम्प की ओर आकर्षित कराना चाहता हूँ। इस विनाशकारी भूकम्प में नेपाल को अत्यधिक जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा है। एक ओर जहाँ इसके कारण हजारों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी, वहीं दूसरी ओर इसने लाखों लोगों को बेघर कर दिया। इस आपदा के कारण नेपाल की आर्थिक स्थिति डॉवाँडोल हो गई है। साथ-ही, कुछ ऐतिहासिक इमारतों सहित बहुत-से पर्यटन स्थल भी तहस-नहस हो गए हैं। पीड़ितों को देनिक जरूरतों के सामान के साथ खाने-पीने की चीजों की कमी का भी सामना करना पड़ रहा है। इस भयावह आपदा ने मुझे और मेरे पूरे गाँववासियों (लावड़) को झकझोर दिया। इस हादसे के पीड़ित लोगो को मानवीय सहायता के तौर पर समस्त गाँववासियों ने जितना सम्भव हो सका उतनी दैनिक जरूरतों का सामान, कपड़े व दवाइयों के साथ ₹50,000/- का इंतजाम किया है।

अतः आपसे अनुरोध है कि इस सहायता राशि और सामान को स्वीकार कर नेपाल पहुँचाने का यथाशीघ्र प्रबन्ध करें। आपदा की घड़ी से निकलने व पुन:निर्माण के क्रम में हम सम्पूर्ण देश सहित समस्त गाँववासी नेपाल के साथ हैं।

धन्यवाद सहित।
दिनांक ……………….

भावदीय
समस्त ग्रामवासी

प्रश्न 14.
अपने गाँव में सूखा पीडित राहत योजना के अन्तर्गत किसानों को भुगतान में की जा रही अनियमितताओं के सम्बन्ध में एक शिकायती पत्र अपने जिलाधिकारी को लिखिए।
[2016]
उत्तर
सेवा में,
श्रीमान जिलाधिकारी महोदय,
मेरठ।

विषय-सूखा पीड़ित राहत योजना’ के अन्तर्गत भुगतान में की जा रही अनियमितता

मान्यवर,
मैं आपका ध्यान अपने गाँव चौबला में ‘सूखा पीड़ित राहत योजना के अन्तर्गत किसानों को भुगतान में की जा रही अनियमितताओं की ओर आकर्षित कराना चाहता हूँ। फसली वर्ष 2014-15 में पर्याप्त बारिश न होने तथा नहर द्वारा समय पर पानी न उपलब्ध हो पाने के कारण गाँव की करीब अस्सी फीसदी फसल सूखे की चपेट में आ गई थी। कुछ किसानों की तो सौ फीसदी फसल नष्ट हो गई थी। सूखे की चपेट में आने के कारण किसानों के सामने आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया था। हालाँकि, राज्य सरकार द्वारा समय रहते शुरू की गई ‘सूखा पीड़ित राहत योजना’ ने किसानों को एक नई आशा की किरण दिखाई और मायूस चेहरों पर मुस्कान लाने का कार्य किया, परन्तु यह मुस्कान खिलने से पहले ही मुरझाने लगी। किसानों को इस योजना के नाम पर जो धनराशि चैक प्रदान किए गए वो अधिकांश किसानों का मजाक उड़ा रहे हैं। धनराशि के वितरण में बड़े स्तर पर अनियमितता बरती गई। उदाहरणार्थ, एक किसान जिसकी बीस बीघा फसल पूर्ण रूप से सूखे की चपेट में आ गई, उसे मात्र ₹5,000/- को चैक प्रदान किया गया, वहीं दूसरे किसान, जिसकी मात्र पाँच बीघा फसल बरबाद हुई, को ₹7,000/- का चैक मिला। बड़े स्तर पर पहुँच रखने वाले कुछ बड़े किसानों ने अधिकारियों के साथ साँठगाँठ कर इस पूरे खेल को अंजाम दिया है। इन लोगों ने अधिकारियों को स्वेच्छानुसार आँकड़े उपलब्ध कराए और अधिकारीगण भी बिना निरीक्षण किए ही नाममात्र की कागजी खानापूर्ति कर चले गए।

अतः आपसे अनुरोध है कि इस मामले को अपने संज्ञान में लेकर यथासमय उचित कार्यवाही करें ताकि पीड़ित किसानों को उनका वाजिब मुआवजा मिल सके और वे अपना जीवन सुचारू रूप से यापन कर सकें।

धन्यवाद सहित।
दिनांक ……………..

भावदीय
मनोज चौधरी
गाँव : चौबला

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UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 4 Rights and Duties of Citizens

UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 4 Rights and Duties of Citizens (नागरिकों के अधिकार तथा कर्तव्य) are part of UP Board Solutions for Class 12 Civics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 4 Rights and Duties of Citizens (नागरिकों के अधिकार तथा कर्तव्य).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Civics
Chapter Chapter 4
Chapter Name Rights and Duties of Citizens (नागरिकों के अधिकार तथा कर्तव्य)
Number of Questions Solved 47
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 4 Rights and Duties of Citizens (नागरिकों के अधिकार तथा कर्तव्य)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1.
अधिकार से क्या तात्पर्य है? लोकतन्त्र में उपलब्ध नागरिकों के अधिकारों का वर्णन कीजिए।
या
अधिकारों का वर्गीकरण कीजिए।
या
अधिकारों के विभिन्न प्रकार बताइए और सामाजिक तथा राजनीतिक अधिकारों में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2015]
या
किन्हीं चार राजनीतिक अधिकारों का वर्णन कीजिए। [2008, 11, 12, 13, 14]
उत्तर
प्रजातान्त्रिक राज्यों में अधिकार को मानव-जीवन का आधार माना जाता है, क्योंकि व्यक्ति के आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक और व्यक्तिगत जीवन का विकास अधिकारों पर ही निर्भर करता है। सामान्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि “अधिकार समाज द्वारा स्वीकृत तथा राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त व्यक्ति को दी जाने वाली वे सुविधाएँ हैं जो उसके व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक होती हैं।

अधिकार की परिभाषा
विभिन्न विचारकों ने अपने-अपने दृष्टिकोण के आधार पर अधिकार की निम्नलिखित परिभाषाएँ दी हैं-

  1. लॉस्की के अनुसार, “अधिकार सामाजिक जीवन की वे परिस्थितियाँ हैं जिनके बिना सामान्यतः कोई भी व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास नहीं कर सकता।”
  2. वाइल्ड के अनुसार, “अधिकार कुछ विशेष कार्यों को करने की स्वाधीनता की उचित माँग है।”
  3. बोसांके के शब्दों में, “अधिकार वे माँग हैं जिन्हें समाज स्वीकार तथा राज्य लागू करता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं का विश्लेषण करने पर अधिकार के निम्नलिखित तत्त्व अथवा लक्षण स्पष्ट होते हैं-

  • व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक सुविधाएँ,
  • समाज की स्वीकृति,
  • राज्य द्वारा मान्यता एवं संरक्षण,
  • सार्वभौमिकता तथा
  • लोक-कल्याण की भावना से प्रेरित।

अधिकारों का वर्गीकरण
अधिकार सामान्य रूप में दो प्रकार के होते हैं-

  1. नैतिक अधिकार तथा
  2. कानूनी या वैधानिक अधिकार।

1. नैतिक अधिकार
नैतिक अधिकार वे अधिकार होते हैं जिनका सम्बन्ध मनुष्य के नैतिक आचरण से होता है। उनके पीछे राज्य की कानूनी शक्ति नहीं होती है। अतएव इनको मानना या न मानना व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता है। इन्हें प्राप्त करने के लिए किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता। इन अधिकारों में शिष्ट व्यवहार, नैतिक मान्यताएँ और चारित्रिक नियम सम्मिलित होते हैं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि नैतिक अधिकारों का राज्य अथवा कानून से कोई सम्बन्ध नहीं होता है। उदाहरण के लिए, वृद्ध और असहाय माता-पिता अपनी सन्तान से जीवन-यापन के लिए सहायता पाने के नैतिक रूप से अधिकारी हैं, परन्तु यदि सन्तान उनकी सहायता नहीं करती तो वह दण्ड की भागी नहीं हो सकती।

2. कानूनी या वैधानिक अधिकार
कानूनी अधिकार वे अधिकार हैं जिनकी व्यवस्था राज्य द्वारा कानून के अनुसार की जाती है। इन अधिकारों में बाधा डालने वाले दण्ड के भागी होते हैं।
कानूनी या वैधानिक अधिकार दो प्रकार के होते हैं-
(क) सामाजिक अधिकार तथा (ख) राजनीतिक अधिकार।

(क) सामाजिक अधिकार – सामाजिक अधिकार वे अधिकार हैं जो मानवीय आधार पर प्रायः राज्य के नागरिक तथा विदेशी सभी को प्राप्त होते हैं। प्रमुख सामाजिक अधिकार निम्नलिखित हैं-

  1. जीवन का अधिकार – प्रत्येक व्यक्ति को जीवन का अधिकार प्राप्त होता है। यह अधिकार मनुष्य के अस्तित्व से सम्बन्धित होता है। जीवन के अधिकार में यह बात भी उल्लेखनीय है कि कोई व्यक्ति स्वयं अपना जीवन समाप्त नहीं कर सकता। आत्महत्या करना दण्डनीय अपराध है।
  2. धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार – इस अधिकार का अर्थ है कि मनुष्य को किसी भी धर्म को मानने व उसका प्रचार करने का अधिकार है। राज्य द्वारा उसकी इच्छा के विरुद्ध उसके ऊपर कोई धर्म थोपा नहीं जा सकता।
  3. शिक्षा एवं संस्कृति का अधिकार – शिक्षा राष्ट्रीय जीवन की आधारशिला है। व्यक्ति के व्यक्तित्व, समाज और राष्ट्र का विकास सब कुछ शिक्षा पर निर्भर करता है। शिक्षा के अभाव में कोई भी मनुष्य उत्तम नागरिक नहीं बन सकता। अरस्तू का तो यह कहना था कि “नागरिक बनने के लिए शिक्षित होना अनिवार्य है। आज के लोकतन्त्रात्मक युग में तो यह अधिकार अत्यन्त अनिवार्य है। संस्कृति के अधिकार का अर्थ है कि व्यक्ति को अपनी भाषा, लिपि, साहित्य, कला एवं परम्पराओं को अपनाने तथा उन्हें सुरक्षित रखने की सुविधा प्राप्त होनी चाहिए।
  4. सम्पत्ति का अधिकार – सम्पत्ति के अधिकार का अर्थ यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन-यापन के लिए वैध उपायों द्वारा धन अर्जित करने, एकंत्रं करने एवं खर्च करने का अधिकार होना चाहिए। उसके इस अधिकार में किसी को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होता। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक होगा कि राज्य सार्वजनिक हित के लिए क्षतिपूर्ति देकर किसी व्यक्ति की सम्पत्ति का अधिग्रहण कर सकता है। साम्यवादी राज्य इस अधिकार के विरुद्ध हैं।
  5. विचार व्यक्त करने का अधिकार – प्रत्येक व्यक्ति को लेखन, भाषण आदि के द्वारा अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का अधिकार होना चाहिए। परन्तु व्यक्ति को अपने विचारों की अभिव्यक्ति का अधिकार उसी सीमा तक होना चाहिए जहाँ तक कि उससे सामाजिक अहित न होता हो। लोकतन्त्र में इस अधिकार का बहुत अधिक महत्त्व है।
  6. समुदाय बनाने का अधिकार – इस अधिकार के अन्तर्गत व्यक्ति को समुदाय बनाने और उसका सदस्य बनाने का अधिकार दिया जाता है। विभिन्न राजनीतिक दलों, विविध प्रकार के समुदाय इसी अधिकार के आधार पर जन्म लेते हैं।
  7. परिवार का अधिकार – परिवार सामाजिक जीवन की प्रथम इकाई तथा नागरिकता का प्रथम विद्यालय है। इस अधिकार के अन्तर्गत विवाह करने, यौन–सम्बन्धों की शुद्धता बनाये रखने, सन्तान व माता-पिता के पारस्परिक सम्बन्ध, उत्तराधिकार आदि के अधिकार सम्मिलित हैं। प्रत्येक व्यक्ति का यह अधिकार है कि वह बिना किसी हस्तक्षेप या प्रतिबन्ध के अपने पारिवारिक जीवन का सुख भोग सके।
  8. न्याय का अधिकार – न्याय के अधिकार से आशय यह है कि न्यायालयों में धनी, निर्धन, साधारण नागरिक और उच्च अधिकारी में कोई अन्तर नहीं होना चाहिए। कानून के सामने छोटे-बड़े का कोई भेद नहीं होना चाहिए। ऐसा तभी हो सकता है जब देश में विधि-विहित शासन हो।
  9. रोजगार का अधिकार – प्रत्येक नागरिक को राज्य की ओर से उसकी योग्यता और शक्ति के अनुसार काम दिया जाए और उसे उसके परिश्रम के अनुरूप वेतन मिले। समाजवादी देशों में इस अधिकार का विशेष महत्त्व है।
    इस अधिकार के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के कोई भी वैध व्यवसाय करने तथा योग्यतानुसार सरकारी नौकरी प्राप्त करने का अधिकार होता है।
  10. समानता का अधिकार – इस अधिकार के अन्तर्गत राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक समानता के अधिकार प्रमुख हैं। ये लोकतन्त्र के प्राण हैं। इनके अभाव में लोकतन्त्र की कल्पना ही अधूरी रह जाती है।

(ख) राजनीतिक अधिकार – राजनीतिक अधिकार नागरिक को देश के शासन में भाग लेने का अवसर प्रदान करते हैं। ये निम्नलिखित हैं-

  1. मतदान का अधिकार – लोकतन्त्र में यह अधिकार राज्य के समस्त वयस्क नागरिकों को प्रतिनिधि संस्थाओं के लिए सदस्यों को चुनने का अधिकार देता है। नागरिकों का यह अधिकार देश के भाग्य का निर्णय करता है।
  2. चुनाव लड़ने का अधिकार – मतदान के साथ ही लोकतन्त्र में प्रत्येक नागरिक को यह भी अधिकार होता है कि वह स्वयं भी प्रतिनिधि संस्थाओं की सदस्यता के लिए चुनाव लड़ सके। किसी व्यक्ति को रंग, जाति, लिंग अथवा सम्पत्ति के आधार पर इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है।
  3. सरकारी पद प्राप्त करने का अधिकार – इस अधिकार के अन्तर्गत सभी नागरिकों को योग्यता के अनुरूप सरकारी पदों पर नियुक्त होने का अधिकार प्राप्त रहता है। कोई भी नागरिक धर्म, जाति, लिंग अथवा सम्पत्ति के आधार पर सरकारी पद पाने से वंचित नहीं होना चाहिए।
  4. सरकार की आलोचना करने का अधिकार – सभी लोकतान्त्रिक राज्यों के नागरिकों को सरकार की दोषपूर्ण नीतियों की आलोचना करने का अधिकार प्राप्त होता है। यदि लोग सरकार के कार्यों व नीतियों से सन्तुष्ट नहीं हैं तो वे उसकी खुलकर आलोचना कर सकते हैं, परन्तु सरकार का विरोध शान्तिपूर्ण ढंग से एक संवैधानिक प्रक्रिया के द्वारा ही किया जा सकता है।
  5. आवेदन-पत्र देने का अधिकार – प्रायः प्रत्येक सभ्य एवं लोकतन्त्रात्मक राज्य में नागरिकों को आवेदन-पत्र देने का अधिकार प्राप्त होता है। इस आवेदन-पत्र के द्वारा लोग सरकार का ध्यान अपने कष्टों की ओर आकृष्ट करते हैं। यह अधिकार सरकार पर अंकुश रखता है और इसके कारण सरकार जनता के कष्टों की उपेक्षा नहीं कर सकती।

UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 4 Rights and Duties of Citizens

प्रश्न 2.
कर्तव्य का अर्थ बताइए तथा उसका वर्गीकरण कीजिए। [2007]
या
नागरिकों के कर्तव्यों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट कीजिए कि लोकतन्त्र में किन कर्तव्यों पर अधिक बल देना चाहिए ? [2007]
या
एक आदर्श नागरिक के अधिकार तथा कर्तव्यों का विवेचन कीजिए। [2008, 10]
या
नागरिकों के अधिकारों एवं कर्तव्य का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। [2010, 12, 14]
[संकेत- अधिकार’ हेतु विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 1 में अधिकारों सम्बन्धी शीर्षक का अध्ययन करें।]
उत्तर
कर्तव्य – भारतीय प्राचीन विचारकों ने अधिकार की अपेक्षा कर्तव्यपालन पर अधिक जोर दिया है। कौटिल्य ने कर्तव्य को स्वधर्म कहा है। कर्त्तव्य अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘ड्यूटी’ (Duty) का हिन्दी अनुवाद है। ‘ड्यूटी’ शब्द की उत्पत्ति ‘Due’ से हुई है, जिसका अर्थ ‘उचित होता है। अतः कर्त्तव्य से तात्पर्य ऐसे कार्य से है जिसे कोई व्यक्ति स्वाभाविक, नैतिक तथा कानूनी दृष्टि से करने हेतु बाध्य हो। लैड के शब्दों में, “करना चाहिए की भावना ही कर्तव्य है।” राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के शब्दों में, “कर्त्तव्य अधिकार का सच्चा स्रोत है। यदि हम अपने कर्तव्यों का पालन करते रहें तो अधिकार हमसे दूर न रहेंगे।”
डॉ० जाकिर हुसैन के मतानुसार, “अपने दायित्वों एवं सेवाओं का सक्रिय इच्छा द्वारा निर्वाह करना ही कर्तव्य है।”

संक्षेप में, किसी विशेष कार्य के करने अथवा न करने के सम्बन्ध में व्यक्ति के उत्तरदायित्व को ही कर्तव्य कहा जा सकता है। अन्य शब्दों में, जिन कार्यों के सम्बन्ध में समाज एवं राज्य सामान्य रूप से व्यक्ति से यह आशा करते हैं कि उसे वे कार्य करने चाहिए, उन्हीं को व्यक्ति के कर्तव्य की संज्ञा दी जा सकती है।

कर्तव्यों का वर्गीकरण अथवा प्रकार
नागरिकों के कर्तव्यों का क्षेत्र अत्यधिक व्यापक है, क्योंकि उसको एक साथ अनेक प्रकार के कर्तव्यों का पालन करना पड़ता है। एक नागरिक के प्रमुख कर्तव्य निम्नलिखित हैं-

1. नैतिक कर्तव्य – नैतिक कर्तव्य उसे कहते हैं जिसका सम्बन्ध व्यक्ति की नैतिक भावना, अन्त:करण तथा उचित कार्य की प्रवृत्ति से होता है। वस्तुतः नैतिक कर्तव्य का सम्बन्ध व्यक्ति के अन्त:करण से होता है। इन कर्तव्यों को राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं होती। नागरिक के नैतिक कर्तव्य निम्नलिखित हैं

(i) परिवार के प्रति कर्तव्य – व्यक्ति, राज्य और समाज के विकास में कुटुम्ब का प्रमुख स्थान है। परिवार में ही मनुष्य को सर्वप्रथम शिक्षा मिलती है और उसमें नागरिक गुणों का बीजारोपण होता है। श्रेष्ठ नागरिक और स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए स्वस्थ परिवार का होना भी आवश्यक है। यह तभी सम्भव है जब नागरिक परिवार के अनुशासन और आचरण का पालन करे।

(ii) अपने प्रति कर्त्तव्य – राज्य या समाज अन्ततः नागरिकों को संगठन है। नागरिकों की उन्नति पर ही उसकी उन्नति निर्भर है। स्वस्थ, चरित्रवान, परिश्रमी तथा स्वावलम्बी नागरिक एक स्वस्थ समाज और राज्य का निर्माण कर सकते हैं। अत: प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह अपने विकास पर पूर्ण ध्यान दे। इसके लिए उसे स्वस्थ, संयमी, अनुशासनप्रिय, शिक्षित और परोपकारी होना चाहिए। यदि कोई नागरिक अपने शारीरिक और मानसिक विकास के प्रति उदास रहता है तो वह अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता।

(iii) ग्राम, नगर, जाति तथा समाज के प्रति कर्तव्य – परिवार के अतिरिक्त नागरिक को भी अपने ग्राम, नगर, जाति एवं समाज से भी सहायता मिलती है; अतः इन संगठनों के प्रति भी उसके कुछ कर्तव्य हैं। उसका कर्तव्य है कि इन संगठनों की उन्नति में सहायता पहुँचाये।

2. कानूनी कर्तव्य अथवा राज्य के प्रति कर्तव्य – ये नागरिक के वे कर्तव्य होते हैं जिन्हें राज्य निर्धारित करता है। नागरिक को इनका पालन अनिवार्य रूप से करना होता है। इनके उल्लंघन करने पर राज्य द्वारा दण्ड दिया जाता है। नागरिक के प्रमुख कानूनी कर्तव्य निम्नलिखित हैं-

(i) राज्य के प्रति निष्ठा – राज्य के प्रति निष्ठा और भक्ति की भावना नागरिक का प्रथम कर्तव्य होता है। उसे शत्रुओं से देश को बचाने के लिए देश के अन्दर शान्ति और सुव्यवस्था बनाये रखने में राज्य की सहायता करनी चाहिए। आपातकाल में अनिवार्य सैनिक सेवा इसी प्रकार के कर्तव्य का फल है।

(ii) कानूनों का पालन – कानून का निर्माण समाज के कल्याण के लिए होता है। अत: प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह राज्य-निर्मित नियमों का पालन करे। ऐसा करके वह राज्य के लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक सिद्ध होगा।

(iii) करों का भुगतान – शासन-संचालन और नागरिकों की उन्नति के लिए प्रत्येक राज्य को आर्थिक शक्ति की आवश्यकता होती है। इस आर्थिक शक्ति को प्राप्त करने के लिए राज्य विविध प्रकार के कर लगाता है। अतः प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह समय से सभी प्रकार के करों का भुगतान करे।

(iv) मत का उचित प्रयोग – लोकतन्त्र को चलाने के लिए जनता के प्रतिनिधियों की आवश्यकता होती है और उन प्रतिनिधियों पर ही देश का भविष्य निर्भर करता है। इसलिए नागरिकों का कर्तव्य है कि वे जनता के प्रतिनिधियों का चुनाव पर्याप्त सोच-समझकर करें। जाति, धर्म अथवा धन को मत का अधिकार नहीं बनाना चाहिए।

(v) सार्वजनिक पद ग्रहण करना – प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह सार्वजनिक पद ग्रहण करने के लिए सदैव तत्पर रहे, साथ ही समाज द्वारा सौंपे गये उत्तरदायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वाह करे।

प्रश्न 3.
अधिकारों से सम्बन्धित विभिन्न सिद्धान्तों की विवेचना कीजिए।
उत्तर
अधिकार सम्बन्धी विभिन्न सिद्धान्त
अधिकारों के सम्बन्ध में विभिन्न सिद्धान्त प्रचलित हैं, जिनका विवेचन निम्नलिखित है-

1. अधिकारों का प्राकृतिक सिद्धान्त – हॉब्स, लॉक, रूसो आदि विद्वानों ने अधिकारों के प्राकृतिक सिद्धान्त का समर्थन किया है। यह सिद्धान्त अति प्राचीन है। इसके अनुसार अधिकार प्रकृति-प्रदत्त हैं और वे व्यक्ति को जन्म के साथ ही प्राप्त हो जाते हैं। व्यक्ति प्राकृतिक अधिकारों का प्रयोग राज्य के उदय के पूर्व से ही करता आ रहा है। राज्य इन अधिकारों को न तो छीन सकता है और न ही वह इनका जन्मदाता है। टॉमस पेन के अनुसार, “प्राकृतिक अधिकार वे अधिकार हैं जो मनुष्य के अस्तित्व को स्थायित्व प्रदान करने के लिए आवश्यक हैं।’ इस दृष्टिकोण से अधिकार असीमित, निरपेक्ष तथा स्वयंसिद्ध हैं। राज्य इन अधिकारों में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता है।
आलोचना- इस सिद्धान्त में कतिपय दोष निम्नलिखित हैं-

  • यह सिद्धान्त अनैतिहासिक है, क्योंकि जिस प्राकृतिक व्यवस्था के अन्तर्गत इन अधिकारों के प्राप्त होने का उल्लेख किया गया है, वह काल्पनिक है।
  • ग्रीन का मत है कि समाज से पृथक् कोई भी अधिकार सम्भव नहीं है।
  • यह सिद्धान्त राज्य को कृत्रिम संस्था मानता है, जो अनुचित है।
  • प्राकृतिक अधिकारों में परस्पर विरोधाभास पाया जाता है।
  • यह सिद्धान्त कर्तव्यों के प्रति मौन है, जबकि कर्तव्य के अभाव में अधिकारों का अस्तित्व सम्भव नहीं है।

2. अधिकारों का कानूनी या वैधानिक सिद्धान्त – इस सिद्धान्त के प्रवर्तक बेन्थम, हॉलैण्ड, आँ स्टिन आदि विचारक हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार, अधिकार राज्य की इच्छा के परिणाम हैं और राज्य ही अधिकारों का जन्मदाता है। यह सिद्धान्त प्राकृतिक सिद्धान्त के विपरीत है। व्यक्ति राज्य के संरक्षण में रहकर ही अधिकारों का प्रयोग कर सकता है। राज्य ही कानून द्वारा ऐसी परिस्थितियों को उत्पन्न करता है, जहाँ व्यक्ति अपने अधिकारों का स्वतन्त्रतापूर्वक प्रयोग कर सके। राज्य ही अधिकारों को वैधता प्रदान करता है। यह सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि अधिकारों का अस्तित्व केवल राज्य के अन्तर्गत ही सम्भव है।
आलोचना- इस सिद्धान्त में कतिपय दोष निम्नलिखित हैं-

  • इस सिद्धान्त से राज्य की निरंकुशता का समर्थन होता है।
  • राज्य नैतिक बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
  • अधिकारों में स्थायित्व नहीं रहता है।

3. अधिकारों का ऐतिहासिक सिद्धान्त – इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकारों की उत्पत्ति प्राचीन रीति-रिवाजों के परिणामस्वरूप होती है। जिन रीति-रिवाजों को समाज स्वीकृति दे देता है, वे अधिकार का रूप धारण कर लेते हैं। इस सिद्धान्त के समर्थकों के अनुसार, अधिकार परम्परागते हैं तथा सतत विकास के परिणाम हैं। इसके अतिरिक्त इनका आधार ऐतिहासिक है। इंग्लैण्ड के संवैधानिक इतिहास में परम्परागत अधिकारों को बहुत अधिक महत्त्व रहा है।
आलोचना- इस सिद्धान्त के आलोचकों का मत है कि अधिकारों का आधार केवल रीतिरिवाज तथा परम्पराएँ नहीं हो सकतीं, क्योंकि कुछ परम्पराएँ तथा रीति-रिवाज समाज के कल्याण में बाधक होते हैं। अतः इस दृष्टि से यह सिद्धान्त तर्कसंगत नहीं है।

4. अधिकारों का समाज – कल्याण सम्बन्धी सिद्धान्त-जे०एस० मिल, जेरमी बेन्थम, पाउण्ड, लॉस्की आदि ने इस सिद्धान्त का समर्थन किया है। इस सिद्धान्त का प्रमुख लक्ष्य उपयोगिता या समाज-कल्याण है। प्रो० लॉस्की के अनुसार-“अधिकारों का औचित्य उनकी उपयोगिता के आधार पर ऑकना चाहिए। इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकार वे साधन हैं, जिनसे समाज का कल्याण होता है। लॉस्की का मत है-“लोक-कल्याण के विरुद्ध मेरे अधिकार नहीं हो सकते क्योंकि ऐसा करना मुझे उस कल्याण के विरुद्ध अधिकार प्रदान करता है जिसमें मेरा कल्याण घनिष्ठ तथा अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।”
इस सिद्धान्त की निम्नलिखित मान्यताएँ हैं-

  • अधिकार समाज की देन हैं, प्रकृति की नहीं।
  • अधिकारों का अस्तित्व समाज-कल्याण पर आधारित है।
  • व्यक्ति केवल उन्हीं अधिकारों का प्रयोग कर सकता है, जो समाज के हित में हों।
  • कानून, रीति-रिवाज तथा अधिकार सभी का उद्देश्य समाज-कल्याण है।

आलोचना- यह सिद्धान्त तर्कसंगत और उपयोगी तो है, किन्तु इसका सबसे बड़ा दोष यह है कि यह सिद्धान्त समाज-कल्याण की ओट में राज्य को व्यक्तियों की स्वतन्त्रता का हनन करने का अवसर प्रदान करता है, लेकिन समीक्षात्मक दृष्टि से यह दोष महत्त्वहीन है।

5. अधिकारों का आदर्शवादी सिद्धान्त – इस सिद्धान्त की मान्यता है कि अधिकार वे बाह्य साधन तथा दशाएँ हैं, जो व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक होती हैं। इस सिद्धान्त का समर्थन थॉमस हिल ग्रीन, हीगल, बैडले, बोसांके आदि विचारकों ने किया है।
आलोचना- इस सिद्धान्त के कतिपय दोष निम्नलिखित हैं-

  • यह सिद्धान्त व्यावहारिक नहीं है क्योंकि व्यक्तित्व का विकास व्यक्तिगत पहलू है तथा राज्य एवं समाज जैसी संस्थाओं के लिए यह जानना बहुत कठिन है कि किसके विकास के लिए क्या अनावश्यक है?
  • यह व्यक्ति के हितों पर अधिक बल देता है तथा समाज का स्थान गौण रखता है। अतः व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए समाज के हितों के विरुद्ध कार्य कर सकता है।
  • मानव-जीवन के विकास की आवश्यक परिस्थितियाँ कौन-सी हैं, इनका निर्णय कौन करेगा तथा किस-किस प्रकार उपलब्ध होंगी-इन बातों को स्पष्टीकरण नहीं होता है। अतः इस सिद्धान्त का आधार ही अवैधानिक है।

समीक्षा – उपर्युक्त सभी सिद्धान्तों में आदर्शवादी सिद्धान्त सर्वमान्य और तर्कसंगत है, क्योंकि इसके आधार पर यह स्पष्ट होता है कि-

  • अधिकार व्यक्ति की माँग है।
  • अधिकारों की माँग समाज द्वारा स्वीकृत होती है।
  • अधिकारों का स्वरूप नैतिक होता है।
  • अधिकारों का उद्देश्य समाज का वास्तविक हित है।
  • अधिकार व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक साधन हैं।

निष्कर्ष- अधिकारों के उपर्युक्त सिद्धान्तों के अध्ययन के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि अधिकारों का आदर्शवादी सिद्धान्त ही सर्वोपयुक्त है क्योंकि यह इस अवधारणा पर आधारित है कि अधिकारों की उत्पत्ति व्यक्ति के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के लिए है। राज्य तथा समाज तो केवल व्यक्ति के अधिकारों की सुरक्षा तथा व्यवस्था करने के साधन मात्र हैं। व्यक्ति समाज के कल्याण में ही अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (शब्द सीमा : 150 शब्द) (4 अंक)

प्रश्न 1.
“अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।” इस कथन को सिद्ध कीजिए। (2007, 15)
या
अधिकार और कर्तव्यों के बीच सम्बन्ध स्थापित कीजिए। [2007, 09, 11]
या
अधिकार और कर्त्तव्य एक-दूसरे के पूरक हैं।” इस कथन की व्याख्या कीजिए। [2011, 13, 15]
उत्तर
अधिकार और कर्तव्यों का सम्बन्ध
अधिकार और कर्तव्य दोनों ही सार्वजनिक जीवन के प्रमुख पक्ष हैं। अधिकारों का महत्त्व कर्तव्य के संसार में ही है। अधिकार और कर्तव्य पर बल देते हुए कहा गया है कि दोनों ही सामाजिक हैं और दोनों ही सफल जीवन की शर्ते हैं, जो समाज के सभी व्यक्तियों को प्राप्त होनी चाहिए। अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।”
एक के समाप्त होते ही दूसरा स्वयं समाप्त हो जाता है, दोनों एक साथ चलते हैं। इसमें से कोई भी एक-दूसरे के बिना नहीं रह सकता। अधिकार और कर्तव्यों के सम्बन्ध का विवरण निम्नलिखित है-

1. अधिकारों के अस्तित्व के लिए कर्तव्यों का होना अनिवार्य है- अधिकारों का अस्तित्व कर्तव्यों पर निर्भर होता है। अधिकार वे माँगें हैं, जिन्हें समाज ने कर्तव्य के रूप में स्वीकार कर लिया है। किसी व्यक्ति का अधिकार तब तक अधिकार नहीं कहला सकता जब तक कि समाज उसे कर्तव्य मानकर अपनी स्वीकृति न दे दे। उदाहरणार्थ-एक व्यक्ति को यह अधिकार है कि उसका जीवन सुरक्षित रहे, तो अन्य मनुष्यों का यह कर्तव्य बन जाता है कि वे उसके जीवन पर आघात न करें। इसलिए एक विद्वान् ने कहा है कि “कर्तव्यों के संसारे में ही अधिकारों का जन्म होता है।”

2. कर्तव्य अधिकार पर अवलम्बित हैं- जिस प्रकार अपने अस्तित्व के लिए अधिकार सदैव कर्तव्यों पर निर्भर है, उसी प्रकार कर्तव्य भी अधिकारों पर निर्भर है। कर्तव्यपालने के लिए यह परमावश्यक है कि मनुष्य कर्तव्यपालने की आवश्यक क्षमता रखता हो। दूसरे शब्दों में, मनुष्य को ऐसे अधिकार प्राप्त हों जिनके द्वारा वह अपना शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास कर सके। इस विकास के द्वारा ही वह कर्तव्यपालन के योग्य बन सकता है। यदि उसे ऐसे अधिकार प्राप्त नहीं हैं, जिनके द्वारा वह अपने को सभी दृष्टियों से योग्य बना ले तो उसमें कर्तव्यपालन की क्षमता नहीं आएगी।

3. एक व्यक्ति का अधिकार दूसरे व्यक्ति का कर्तव्य है- समाज में एक वर्ग का जो अधिकार है वही दूसरे को कर्तव्य है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति को जीवित रहने का अधिकार है तो दूसरे लोगों का यह कर्तव्य हो जाता है कि वे उन कार्यों को करें जिनसे वह व्यक्ति अपने जीवित रहने के अधिकार का उपयोग कर सके। इसलिए कहा गया है कि ‘मेरा अधिकार तुम्हारा कर्तव्य है।

4. सुखी सामाजिक जीवन के लिए दोनों आवश्यक हैं- अधिकार और कर्तव्यों का एकमात्र उद्देश्य मनुष्य के सामाजिक जीवन को सुखी बनाना है। ये दोनों व्यक्ति के बहुमुखी विकास के लिए आवश्यक हैं। दोनों के बिना व्यक्ति को शारीरिक, बौद्धिक और मानसिक विकास रुक जाएगा।

5. कर्तव्य अधिकार का सदुपयोग है- अधिकारों के सदुपयोग का दूसरा नाम कर्तव्य है। यदि एक व्यक्ति अपने अधिकारों का समुचित ढंग से पालन कर रहा है तो दूसरे रूप में वह अपने कर्तव्य की पूर्ति कर रहा है। उदाहरण के लिए, सम्पत्ति की सुरक्षा और जीविकोपार्जन हमारा अधिकार है, परन्तु हमारा यह कर्त्तव्य भी है कि हम ऐसा कोई कार्य न करें जिससे दूसरों के इस अधिकार पर कोई आघात हो।

6. अधिकार और कर्तव्य जीवन के दो पक्ष हैं- यदि अधिकार जीवन के भौतिक पक्ष का प्रतीक है तो कर्तव्य जीवन के नैतिक पक्ष का। यदि अधिकार का सम्बन्ध मनुष्य के शरीर से है। तो कर्तव्य का सम्बन्ध मनुष्य की आत्मा से। यदि अधिकार मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं; यथा–भोजन, वस्त्र इत्यादि की पूर्ति करता है तो कर्त्तव्य आत्मा का परिष्कार कर उसे अलौकिक आनन्द प्रदान करता है। इस प्रकार अधिकार और कर्तव्य जीवन के दो पक्ष हैं।

प्रश्न 2.
अधिकारों के प्रमुख लक्षण लिखिए।
उत्तर
अधिकार के प्रमुख लक्षण
लॉस्की, वाइल्ड और श्रीनिवास शास्त्री ने अधिकार की जो परिभाषाएँ दी हैं उन परिभाषाओं और अधिकार की सामान्य धारणा के आधार पर अधिकार के निम्नलिखित प्रमुख लक्षण कहे जा सकते हैं

1. सामाजिक स्वरूप – अधिकार का सर्वप्रथम लक्षण यह है कि अधिकार के लिए सामाजिक स्वीकृति आवश्यक है, सामाजिक स्वीकृति के अभाव में व्यक्ति जिन शक्तियों का उपभोग करता है वे उसके अधिकार न होकर प्राकृतिक शक्तियाँ हैं। अधिकार तो राज्य द्वारा नागरिकों को प्रदान की गयी स्वतन्त्रता और सुविधा का नाम है और इस स्वतन्त्रता एवं सुविधा की आवश्यकता तथा उपभोग समाज में ही सम्भव है। इसके अतिरिक्त, राज्य के द्वारा व्यक्ति को जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अधिकार प्रदान किये जाते हैं, उसकी सिद्धि समाज में ही सम्भव है। इस दृष्टि से भी अधिकार समाजगत ही होते हैं।
2. कल्याणकारी स्वरूप – अधिकारों का सम्बन्ध आवश्यक रूप से व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास से होता है। इस कारण अधिकार के रूप में केवल वे ही स्वतन्त्रताएँ और सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं जो व्यक्तित्व के विकास हेतु आवश्यक या सहायक हों। व्यक्ति को कभी भी वे अधिकार नहीं मिलते हैं जो व्यक्ति के विकास में बाधक हों। इसी कारण मद्यपान, जुआ खेलना या आत्महत्या अधिकार के अन्तर्गत नहीं आते हैं।

3. लोकहित में प्रयोग – व्यक्ति को अधिकार उसके स्वयं के व्यक्तित्व के विकास और सम्पूर्ण समाज के सामूहिक हित के लिए प्रदान किये जाते हैं। अतः यह आवश्यक होता है कि अधिकारों का प्रयोग इस प्रकार किया जाए कि व्यक्ति की स्वयं की उन्नति के साथ-साथ सम्पूर्ण समाज की भी उन्नति हो। यदि कोई व्यक्ति अधिकार का इस प्रकार से उपयोग करता है कि अन्य व्यक्तियों या सम्पूर्ण समाज के हित साधन में बाधा पहुँचती है तो व्यक्ति के अधिकारों को सीमित किया जा सकता है।

4. राज्य का संरक्षण – अधिकार का एक आवश्यक लक्षण यह भी है कि उसकी रक्षा का दायित्व राज्य अपने ऊपर लेता है और इस सम्बन्ध में राज्य आवश्यक व्यवस्था भी करता है। उदाहरणार्थ, व्यक्ति को रोजगार प्राप्त होना चाहिए, यह बात व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक है और समाज भी इंसे स्वीकार करता है, लेकिन राज्य जब तक आवश्यक संरक्षण की व्यवस्था न करे, उस समय तक परिभाषित अर्थ में इसे अधिकार नहीं कहा जा सकता है।

5. सार्वभौमिकता या सर्वव्यापकता – अधिकार का एक अन्य लक्षण यह भी है कि अधिकार समाज के सभी व्यक्तियों को समान रूप से प्रदान किये जाते हैं और इस सम्बन्ध में जाति, धर्म, लिंग और वर्ण के आधार पर कोई भेद नहीं किया जाता है। अधिकार के उपर्युक्त लक्षणों के आधार पर सामान्य शब्दों में अधिकार की परिभाषा करते हुए कहा जा सकता है कि अधिकार समाज के सभी व्यक्तियों के व्यक्तित्व के उच्चतम विकास हेतु आवश्यक वे सामान्य सामाजिक परिस्थितियाँ हैं जिन्हें समाज स्वीकार करता है और राज्य लागू करने की व्यवस्था करता है।’

प्रश्न 3.
नागरिकों के दो राजनीतिक अधिकार लिखिए। [2016]
उत्तर
राजनीतिक अधिकार नागरिकों के दो राजनीतिक अधिकार निम्नवत् हैं-

  1. मतदान का अधिकार – किसी भी प्रजातान्त्रिक या लोकतान्त्रिक राष्ट्र में राज्य के सभी वयस्क (भारत में 18 वर्ष) नागरिकों को प्रतिनिधित्वमूलक संस्थाओं के लिए अपना मत देने का अधिकार होता है, जिसके माध्यम से जनता अपना प्रतिनिधि चुनती है।
  2. चुनाव लड़ने का अधिकार – यह अधिकार एक प्रमुख राजनीतिक अधिकार है, जिसके अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार प्राप्त होता है कि वह स्वयं प्रतिनिधि संस्थाओं की सदस्यता के लिए चुनाव में खड़ा हो सके। इसके लिए उसको किसी भी रंग, जाति, लिंग अथवा सम्पत्ति के आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न 4.
राज्य के विरुद्ध विद्रोह का अधिकार पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
राज्य के विरुद्ध विद्रोह का अधिकार
राज्य के प्रति भक्ति और राज्य की आज्ञाओं का पालन व्यक्ति का कानूनी कर्तव्य होता है। और इसलिए व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध विद्रोह का कानूनी अधिकार तो प्राप्त हो ही नहीं सकता, लेकिन व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध विद्रोह का नैतिक अधिकार अवश्य ही प्राप्त होता है। इसका कारण यह है कि शासन के अस्तित्व का उद्देश्य जन-इच्छा को कार्यरूप में परिणत करते हुए सामान्य कल्याण होता है और यदि शासन सामान्य कल्याण की साधना में असफल हो जाता है। या शासन जन-इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं करता तो उस शासन को अस्तित्व में बने रहने का कोई नैतिक अधिकार शेष नहीं रह जाता है। नागरिकों को इस प्रकार की सरकार को पदच्युत करने का अधिकार होता है और यदि संवैधानिक मार्ग से इच्छित परिवर्तन न किया जा सके तो व्यक्ति को अधिकार है कि वह शक्ति के आधार पर वांछित परिवर्तन करने का प्रयत्न करे।

लॉस्की ने कहा है कि “नागरिकता व्यक्ति के विवेकपूर्ण निर्णय का जनकल्याण में प्रयोग है।” ऐसी परिस्थितियों में यदि व्यक्ति को इस बात का विश्वास हो जाए कि विद्यमान शासन-व्यवस्था सामान्य जनता के हित में कार्य नहीं कर सकती तो राज्य के विरुद्ध विद्रोह व्यक्ति का एक नैतिक अधिकार ही नहीं वरन् एक नैतिक कर्तव्य भी हो जाता है। महात्मा गांधी ने कहा है कि व्यक्ति का सर्वोच्च कर्त्तव्य अपनी अन्तरात्मा के प्रति होता है। अतः अन्तरात्मा की पुकार पर सरकार का विरोध किया जा सकता है।

ग्रीन, महात्मा गांधी, लॉस्की आदि विद्वानों द्वारा व्यक्त किये गये विचारों के आधार पर कहा जा सकता है कि निम्नलिखित शर्तों के पूरा होने पर ही विद्रोह के अधिकार का प्रयोग किया जा सकता है-

  1. स्थिति को सुधारने और वांछित परिवर्तन लाने के लिए विद्रोह के पूर्व सभी संवैधानिक साधनों का प्रयोग किया जाना चाहिए और संवैधानिक साधनों की असफलता के बाद ही विद्रोह के सम्बन्ध में सोचा जाना चाहिए।
  2. विद्रोह की भावना वैयक्तिक न होकर सामाजिक होनी चाहिए। विद्रोह की बात तभी सोची जा सकती है जबकि सरकार के द्वारा किये जाने वाले अन्याय साधारण प्रकृति के न होकर गम्भीर प्रकृति के हों और विद्रोह करने वाली जनता विद्रोह के उद्देश्यों से पूर्ण परिचित हो।

लघु उत्तरीय प्रश्न (शब्द सीमा : 50 शब्द) (2 अंक)

प्रश्न 1.
सम्पत्ति के अधिकार पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
आधुनिक काल में सम्पत्ति का अधिकार बड़े वाद-विवाद वाला अधिकार बन गया है। अरस्तू तथा लॉक इसे प्राकृतिक अधिकार मानते हैं। इसके विपरीत, प्लेटो सम्पत्ति के अधिकार का विरोध करते हैं। कार्ल मार्क्स ने सम्पत्ति को ‘लूट के माल’ की संज्ञा दी है। इसी कारण समाजवादी राष्ट्र रूस, चीन इत्यादि सम्पत्ति के अधिकार के विरोधी हैं।

राज्य अथवा सरकार को किसी व्यक्ति की निजी सम्पत्ति को समुचित मुआवजा दिये बिना छीनने का अधिकार नहीं है, क्योंकि सम्पत्ति ही वह प्रेरणा-स्रोत है जो मानव को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।

वर्तमान समय में सम्पत्ति के अधिकार को अनियमित एवं अनियन्त्रित रूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि जहाँ एक ओर सम्पत्ति व्यक्ति की प्रेरणा-स्रोत है वहीं दूसरी ओर सम्पत्ति घमण्ड, शोषण, उत्पीड़न एवं अकर्मण्यता को प्रोत्साहित करती है। लॉस्की ने उचित ही लिखा है, धनवान तथा निर्धन में विभाजित समाज रेत की नींव पर टिका होता है।”

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प्रश्न 2.
अधिकारों के प्राकृतिक सिद्धान्त पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
हॉब्स, लॉक तथा रूसो आदि विद्वानों ने अधिकारों के प्राकृतिक सिद्धान्त का समर्थन किया है। यह सिद्धान्त अति प्राचीन है। इस सिद्धान्त की मान्यता है कि अधिकार प्रकृति-प्रदत्त हैं। तथा व्यक्ति को जन्म लेते ही प्राप्त हो जाते हैं। राज्य इन अधिकारों को नहीं छीन सकता, क्योंकि एक तो वह इनका जन्मदाता नहीं है और दूसरे व्यक्ति राज्य के उदय से पूर्व से ही इन अधिकारों का प्रयोग करता आ रहा है।
इस सिद्धान्त में निम्नलिखित दोष पाये गये हैं-

  • यह सिद्धान्त काल्पनिक है न कि ऐतिहासिक।
  • ग्रीस का मत है कि समाज से पृथक् किसी अधिकार की कल्पना नहीं की जा सकती।
  • यह सिद्धान्त राज्य को अनुचित रूप से कृत्रिम संस्था मानता है।
  • यह सिद्धान्त कर्तव्यों के प्रति मौन है, जब कि कर्तव्य के अभाव में अधिकारों का अस्तित्व सम्भव नहीं है।

प्रश्न 3.
अधिकारों के वैधानिक सिद्धान्त पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
इस सिद्धान्त की मान्यता है कि अधिकार राज्य की इच्छा के परिणाम हैं और राज्य ही अधिकारों का स्रोत है। यह सिद्धान्त प्राकृतिक सिद्धान्त के एकदम विपरीत है। इस सिद्धान्त को मानने वालों में बेन्थम, हॉलैण्ड, ऑस्टिन आदि विद्वान् हैं। इन विद्वानों के अनुसार व्यक्ति राज्य के संरक्षण में रहकर भी अधिकारों का प्रयोग करता है और राज्य ही अधिकारों को मान्यता प्रदान करता है।
इस सिद्धान्त में निम्नलिखित दोष पाये जाते हैं-

  • यह सिद्धान्त राज्य की निरंकुशता का समर्थक है।
  • राज्य नैतिक बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
  • अधिकारों में स्थायित्व नहीं रहता है।

प्रश्न 4.
‘अधिकार केवल समाज में ही सम्भव है, परन्तु असीमित नहीं।’ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
अधिकार सिर्फ समाज में ही सम्भव–अधिकार की प्रथम विशेषता यह है कि इन्हें व्यक्ति सिर्फ समाज में ही प्राप्त कर सकता है। यदि समाज नहीं है तो व्यक्ति अधिकारों को प्राप्त नहीं कर सकता। एकाकी व्यक्ति को अधिकारों की आवश्यकता नहीं होती है।

अधिकार असीमित नहीं – समाज में एक व्यक्ति के अधिकार दूसरे व्यक्ति के अधिकारों से सीमित हो जाते हैं। एक व्यक्ति अपने अधिकारों का उपभोग तभी कर सकता है जब कि वह दूसरे के अधिकारों को मान्यता प्रदान करे। ऐसा न होने पर समाज में अराजकता फैल सकती है।

प्रश्न 5.
मौलिक अधिकार से क्या आशय है?
उतर
वे अधिकार जो मानव-जीवन के लिए मौलिक तथा अपरिहार्य होने के कारण संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किये जाते हैं, मौलिक अधिकार कहे जाते हैं। इन अधिकारों का राज्यों के संविधान में वर्णन कर दिया जाता है। न्यायपालिका इन अधिकारों की रक्षा करती है। सर्वप्रथम मौलिक अधिकार अमेरिकी संविधान में सम्मिलित किये गये। भारतीय संविधान द्वारा भी मौलिक अधिकार प्रदान किये गये हैं।

प्रश्न 6.
कानूनी अधिकार से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
ये वे अधिकार हैं जिन्हें राज्य मान्यता प्रदान करता है तथा जिनकी रक्षा राज्य के कानूनों द्वारा होती है। कानूनी अधिकारों का उल्लंघन करने वाले को राज्य द्वारा दण्डित किया जाता है। लीकॉक के शब्दों में, “कानूनी अधिकार वे विशेषाधिकार हैं जो एक नागरिक को अन्य नागरिकों के विरुद्ध प्राप्त होते हैं तथा जो राज्य की सर्वोच्च शक्ति द्वारा प्रदान किये जाते हैं तथा रक्षित होते हैं।”

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
लॉक द्वारा बताये गये कोई दो प्राकृतिक अधिकार बताइए।
उत्तर

  1. जीवन का अधिकार तथा
  2. स्वतन्त्रता का अधिकार।

प्रश्न 2.
नागरिकों के कोई दो सामाजिक अधिकार लिखिए। [2014]
उत्तर

  1. जीवन का अधिकार तथा
  2. समानता का अधिकार

प्रश्न 3
नागरिक के दो नैतिक कर्तव्य लिखिए।
उत्तर

  1. अपने प्रति कर्त्तव्य (चरित्र-निर्माण) तथा
  2. समाज के प्रति कर्तव्य (कुरीतियों का उन्मूलन)।

प्रश्न 4.
नागरिकों के दो कानूनी कर्तव्य लिखिए।
उत्तर

  1. राज्य के कानूनों का पालन करना तथा
  2. राज्य के प्रति भक्ति।

प्रश्न 5.
कानूनी अधिकार के सिद्धान्त के दो समर्थकों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. बेन्थम तथा
  2. ऑस्टिन।

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प्रश्न 6.
अधिकार के किन्हीं दो सिद्धान्तों के नाम लिखिए।
उत्तर

  1. प्राकृतिक सिद्धान्त तथा
  2. आदर्शवादी सिद्धान्त।

प्रश्न 7.
अधिकारों के दो प्रमुख प्रकार बताइए।
उत्तर

  1. सामाजिक या नागरिक अधिकार तथा
  2. राजनीतिक अधिकार।

प्रश्न 8.
नागरिक के कोई दो प्राकृतिक अधिकार बताइए।
उत्तर

  1. जीवन का अधिकार तथा
  2. स्वतन्त्रता का अधिकार।

प्रश्न 9.
विदेशियों को राज्य में प्राप्त होने वाले कोई दो अधिकार लिखिए।
उत्तर

  1. जीवन-रक्षा का अधिकार तथा
  2. पारिवारिक जीवन व्यतीत करने का अधिकार।

प्रश्न 10.
अधिकारों के आदर्शवादी सिद्धान्त के किन्हीं दो समर्थकों के नाम बताइए।
उत्तर

  1. थॉमस हिल ग्रीन एवं
  2. बोसांके।

प्रश्न 11.
दो मानव अधिकार बताइए।
उत्तर

  1. जीवन का अधिकार तथा
  2. स्वतन्त्रता का अधिकार।

प्रश्न 12.
कर्तव्यों के दो प्रमुख भेद बताइए।
उत्तर
कर्तव्यों के दो प्रमुख भेद हैं-

  1. नैतिक कर्तव्य तथा
  2. कानूनी कर्तव्य।

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प्रश्न 13.
नागरिक के दो प्रमुख कर्तव्य बताइए।
उत्तर

  1. समाज के प्रति कर्त्तव्य तथा
  2. राज्य के प्रति कर्तव्य।

प्रश्न 14.
मूल कर्तव्य की धारणा भारत के परिप्रेक्ष्य में किस देश की संवैधानिक व्यवस्था से प्रेरित है?
उत्तर
मूल कर्त्तव्य की धारणा भारत के परिप्रेक्ष्य में रूस की संवैधानिक व्यवस्था से प्रेरित तथा गृहीत है।

प्रश्न 15.
राज्य के प्रति नागरिक के दो कर्तव्य बताइए।
उत्तर

  1. राज्य के कानूनों का पालन करना तथा
  2. लगाये गये करों का भुगतान करना।

प्रश्न 16.
“यदि हम कर्तव्यपालन करें तो अधिकार स्वतः प्राप्त हो जाएँगे।” यह कथन किसका है?
उत्तर
यह कथन गाँधी जी का है।

प्रश्न 17.
अधिकार के किन्हीं दो तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर

  1. सार्वभौमिकता तथा
  2. राज्य का संरक्षण।

प्रश्न 18.
अधिकारों का कौन-सा सिद्धान्त सबसे अधिक मान्य है?
उत्तर
अधिकारों का आदर्शवादी सिद्धान्त सबसे अधिक मान्य है।

प्रश्न 19.
वयस्क मताधिकार से क्या तात्पर्य है?
उत्तर
सामान्यतया 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके नागरिक को जो मताधिकार प्राप्त होता है, उसे वयस्क मताधिकार कहते हैं।

प्रश्न 20.
नैतिक और कानूनी अधिकारों में क्या अन्तर है? [2007]
उत्तर
नैतिक अधिकारों के पीछे राज्य की कानूनी शक्ति नहीं होती। कानूनी अधिकारों की व्यवस्था राज्य द्वारा कानून के अनुसार की जाती है।

प्रश्न 21.
भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद द्वारा अस्पृश्यता को समाप्त किया गया है? (2007)
उत्तर
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 द्वारा अस्पृश्यता को समाप्त किया गया है।

प्रश्न 22.
नागरिकों के दो राजनीतिक अधिकार लिखिए। [2013, 16]
उत्तर

  1. मतदान का अधिकार तथा
  2. चुनाव लड़ने का अधिकार।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

1. निम्नलिखित में से कौन-सा अधिकार का तत्त्व है?
(क) सार्वभौमिकता
(ख) मानवता
(ग) स्वतन्त्रता
(घ) निष्पक्षता

2. निम्नलिखित में कौन-सा सामाजिक अधिकार नहीं है?
(क) शिक्षा का अधिकार
(ख) सम्पत्ति रखने का अधिकार
(ग) समानता का अधिकार
(घ) मताधिकार

3. निम्नलिखित में से कौन-सा राजनीतिक अधिकार है?
(क) शिक्षा का अधिकार
(ख) धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार
(ग) मतदान का अधिकार
(घ) जीवन-रक्षा का अधिकार

4. निम्नांकित में से कौन कानूनी अधिकार का समर्थक है?
(क) प्रो० बार्कर
(ख) प्रो० लॉस्की
(ग) गाँधी जी
(घ) ऑस्टिन

5. निम्नलिखित में से कौन-सा नागरिक का कर्तव्य है?
(क) कानून का पालन करना
(ख) करों का भुगतान करना
(ग) राज्य के प्रति भक्ति
(घ) ये सभी

6. अधिकारों के समाज-कल्याण सम्बन्धी सिद्धान्तों का समर्थक था-
(क) लॉस्की
(ख) प्लेटो
(ग) रूसो
(घ) मॉण्टेस्क्यू

7. “अधिकार सामाजिक जीवन की वे परिस्थितियाँ हैं जिनके अभाव में सामान्यतया कोई व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास नहीं कर पाता है।” यह कथन किस विचारक का है? [2008, 16]
(क) लॉस्की
(ख) प्लेटो
(ग) बेन्थम
(घ) जे० एस० मिल

8. प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त का समर्थन किसने किया था? [2008, 13]
(क) हीगल ने
(ख) बर्क ने।
(ग) लॉक ने
(घ) बेन्थम ने

9. निम्नलिखित में से कौन एक राजनीतिक अधिकार की श्रेणी में नहीं आता है? (2012, 14)
(क) मत देने का अधिकार
(ख) काम का अधिकार
(ग) निर्वाचित होने का अधिकार
(घ) सार्वजनिक पद ग्रहण करने का अधिकार

10. निम्नलिखित में से कौन-सा कानूनी कर्तव्य नहीं है? (2015)
(क) कानूनों का पालन करना
(ख) सत्य बोलना
(ग) राज्य के प्रति कर्तव्य
(घ) कर अदा करना

11.“अधिकार वह माँग है जिसे समाज स्वीकार करता है और राज्य लागू करता है।” यह कथन निम्न में से किस विचारक का है? (2016)
(क) टी०एच० ग्रीन
(ख) अरस्तू
(ग) बोसांके
(घ) रूसो

12. भारतीय संविधान में नागरिकों को कितने मौलिक कर्तव्य निर्धारित किये गये हैं? [2016]
(क) 10
(ख) 11
(ग) 9
(घ) 15

उत्तर

  1. (क) सार्वभौमिकता,
  2. (घ) मताधिकार,
  3. (ग) मतदान का अधिकार,
  4. (घ) ऑस्टिन,
  5. (घ) ये सभी,
  6. (घ) मॉण्टेस्क्यू,
  7. (क) लॉस्की
  8. (ग) लॉक ने,
  9. (ख) काम का अधिकार,
  10. (ख) सत्य बोलना,
  11. (ग) बोसांके,
  12. (ख) 11

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UP Board Solutions for Class 12 Geography Practical Work Chapter 5 Surveying

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Geography (Practical Work)
Chapter Chapter 5
Chapter Name Surveying (सर्वेक्षण)
Number of Questions Solved 22
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Geography Practical Work Chapter 5 Surveying (सर्वेक्षण)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
सर्वेक्षण से क्या अभिप्राय है? जरीब एवं फीते (Chain and Tape) द्वारा सर्वेक्षण किन-किन परिस्थितियों में किया जाता है तथा इसमें कौन-कौन से उपकरण प्रयोग में लाये जाते हैं?
उत्तर

सर्वेक्षण का अर्थ
Meaning of Surveying

सामान्य बोलचाल की भाषा में सर्वेक्षण का अर्थ धरातल का ध्यानपूर्वक निरीक्षण करना होता है। जिससे आवश्यक तथ्यों की जानकारी प्राप्त कर उन्हें मानचित्र पर निरूपित किया जा सके। सर्वेक्षण को निम्न प्रकार परिभाषित किया जा सकता है –
“सर्वेक्षण एक ऐसी कला है जिससे विभिन्न बिन्दुओं की आनुपातिक स्थिति का ज्ञान होता है। बिन्दुओं की स्थिति, दूरी व कोण नापकर तथा कई बार ऊँचाई नापकर भी ज्ञात की जाती है।”
सर्वेक्षण क्षैतिज धरातल के बिन्दुओं की स्थिति के निर्धारण करने की क्रिया है।”
“सर्वेक्षण वह कला है जिसके द्वारा धरातल के बिन्दुओं की सापेक्षिक स्थिति मानचित्र पर ठीक-ठीक प्रदर्शित की जाती है।”
इस प्रकार सामान्य रूप से सर्वेक्षण द्वारा किसी क्षेत्र-विशेष में पायी जाने वाली प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक स्थितियों का मापन करते हैं। इन मापों के आधार पर एक निश्चित मापक द्वारा समतल कागज पर मानचित्र की रचना करते हैं। सर्वेक्षण करने से पूर्व निर्धारित क्षेत्र को ध्यानपूर्वक देख लेना चाहिए जिससे सर्वेक्षण के समय कोई बाधा उपस्थित न हो तथा क्षेत्र को एक रेखाचित्र तैयार कर लेना चाहिए।

जरीब (चेन) एवं फीता सर्वेक्षण
Chain and Tape Surveying

चेन व टेप द्वारा सर्वेक्षण सरल तथा कम व्यय वाला है। यह सर्वेक्षण की प्राचीन विधि है। इससे धरातल पर क्षैतिज दूरियाँ नापी जाती हैं। इस विधि का उपयोग प्रमुख रूप से क्षेत्रफल ज्ञात करने के लिए किया जाता है। क्षेत्रों की सीमा निर्धारित करने में भी इस विधि को अपनाया जाता है। उदाहरण के लिए, जब भूमि का बँटवारा करना होता है तो यही विधि प्रयुक्त की जाती है।

चेन-टेप सर्वेक्षण के उपयोग के लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ
Favourable Conditions for Chain and Tape Surveying

चेन-टेप द्वारा सर्वेक्षण निम्नलिखित परिस्थितियों में अधिक उपयोगी रहता है –

  1. क्षेत्रीय सीमा निर्धारण में।
  2. भूमि के विभाजन में।
  3. जब अधिक शुद्धता की आवश्यकता हो।
  4. विकास योजनाओं हेतु आँकड़ों के संग्रहण में।
  5. जब समय की अधिकता हो।
  6. अन्य सर्वेक्षण यन्त्र एवं उपकरण उपलब्ध न हों।
  7. जब मानचित्र में कुछ ही विवरण प्रदर्शित किये जाने हों।
  8. जब विस्तृत भू-भागों का शीघ्र सर्वेक्षण करना हो।

चेन-टेप सर्वेक्षण में प्रयुक्त किये जाने वाले उपकरण
Equipments Used in Chain and Tape Surveying

(1) चेन या जरीब (Chain) – जरीब इस्पात की बनी होती है जो विभिन्न लम्बाई की होती है। यह छोटे-छोटे भागों में विभक्त होती है। सबसे छोटे भाग को कड़ी कहते हैं। ये कड़ियाँ एक-दूसरे से छल्लों द्वारा जुड़ी होती हैं। जरीब के दोनों किनारों पर पीतल की मुठियाँ लगी होती हैं, जिन्हें पकड़कर जरीब को खींचते हैं। जरीब में विभिन्न दूरियों पर विभिन्न प्रकार के सूचक लगे होते हैं जिससे दूरियाँ पढ़ने में आसानी रहती है। जरीब निम्नलिखित प्रकार की होती है –

(i) इन्जीनियर्स जरीब (Engineer’s Chain) – यह जरीब 100 फीट लम्बी होती है जिसमें 100 ही कड़ियाँ होती हैं जिसमें प्रत्येक कड़ी की लम्बाई 1 फुट होती है। प्रत्येक 10 कड़ी के बाद पीतल का एक सूचक लगा होता है जिससे कड़ियाँ गिनने में आसानी रहती है।
UP Board Solutions for Class 12 Geography Practical Work Chapter 5 Surveying 1
(ii) गण्टर्स जरीब (Gunter’s Chain) – यह जरीब 66 फीट लम्बी होती है। जिसमें 100 कड़ियाँ होती हैं। प्रत्येक कड़ी की लम्बाई 0.66 फुट या 7.92 इंच होती है। प्रत्येक 10वीं कड़ी पर पीतल का एक सूचक लगा होता है। इस जरीब द्वारा खेतों का क्षेत्रफल सुगमता से नापा जा सकता है, क्योंकि 10 वर्ग जरीब एक एकड़ के बराबर होती है। हमारे देश में लेखपाल भूमि की नाप के लिए इसी जरीब को उपयोग में लाते हैं।

(iii) रेवेन्यू जरीब (Revenue Chain) – यह जरीब 33 फीट लम्बी होती है जिसमें केवल 16 कड़ियाँ होती हैं तथा प्रत्येक कड़ी 21 फीट के बराबर होती है। पहले लेखपालों द्वारा इसी जरीब का प्रयोग खेतों की नाप के लिए किया जाता था, परन्तु छोटी होने के कारण इसका प्रयोग बन्द कर दिया गया है।

(iv) मीट्रिक जरीब (Metric Chain) – मीट्रिक प्रणाली के प्रचलन के कारण इस जरीब का प्रयोग किया जाने लगा है। यह 30 मीटर लम्बी होती है जिसमें प्रत्येक कड़ी 0.3 मीटर अथवा 30 सेमी की होती है। प्रत्येक 10 कड़ियों के बाद पीतल का एक सूचक लगा होता है।

(2) फीता (Tape) – इस सर्वेक्षण में फीता एक आवश्यक उपकरण है। यह कपड़े, प्लास्टिक, धातु आदि के बने होते हैं। फीतों की लम्बाई भिन्न-भिन्न होती है; जैसे—25 फीट, 50 फीट, 100 फीट अथवा 15 मीटर, 30 मीटर आदि। भार में हल्का होने के कारण जरीब के स्थान पर फीते का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। यह चमड़े के एक गोल डिब्बे में लिपटा होता है। इसके एक सिरे पर पीतल की एक घुण्डी लगी होती है जिसकी सहायता से इसे दूर तक फैलाया जा सकता है।
UP Board Solutions for Class 12 Geography Practical Work Chapter 5 Surveying 2
(3) लक्ष्य दण्ड (Ranging Rod) – लक्ष्य दण्ड का उपयोग धरातलीय बिन्दुओं की ओर अधिक दृष्टिगोचर करने के लिए किया जाता है। इनकी लम्बाई 6 से 10 फीट तक होती है। इसके प्रत्येक फीट के भाग को विरोधी रंग से रँग दिया जाता है जिससे दूरी स्पष्ट दिखलाई पड़े। इन्हें रंगने में लाल, हरे, काले तथा सफेद रंग का प्रयोग किया जाता है। यह लकड़ी अथवा लोहे के बने होते हैं। कभी-कभी इनके ऊपरी सिरे पर लाल रंग की झण्डियाँ भी लगा दी जाती हैं।

(4) तीर (Arrows) – यह लोहे के बने होते हैं जिनका एक सिरा मुड़ा हुआ तथा दूसरा सिरा नुकीला होता है जिससे इसे भूमि में आसानी से गाड़ा जा सके। इनकी लम्बाई 1 फीट से 1.5 फीट तक होती है। यह जरीब की दूरियों को गिनने में सहायक होते हैं। जरीबों की संख्या अथवा धरातल की लम्बाई तीर गिनकर करते हैं।

(5) चुम्बकीय दिक्सूचक (Magnetic Compass) – इसे कुतुबनुमा भी कहा जाता है। इसकी सहायता से सर्वेक्षण करते समय उत्तर दिशा निर्धारित की जाती है। जरीब रेखा के सहारे उत्तर दिशा ज्ञात कर ली जाती है। इस यन्त्र में एक सुई लगी होती है जिसके एक सिरे पर N अंकित रहता है जो उत्तर दिशा का संकेतक है।
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(6) समकोणात्मक दर्पण (Optical Square) – यह धातु का बना एक डिब्बेनुमा यन्त्र होता है। इसकी दोनों भुजाओं पर दो शीशे 45° के कोण पर लगे होते हैं। इसका उपयोग जरीब रेखा के ऊपर खड़े होकर लक्ष्य बिन्दु से समकोणात्मक स्थिति ज्ञात करने में होता है।

(7) समकोणमापदण्ड (Cross Staff) – इस यन्त्र का उपयोग भी जरीब रेखा से लक्ष्य बिन्दुओं की संमकोणात्मक स्थिति ज्ञात करने के लिए किया जाता है। इस यन्त्र में एक-दूसरे से समकोण बनाते हुए दो दर्श रेखक दण्ड लगे होते हैं। यह शुद्ध स्थिति का बोध नहीं कर पाता; अत: इसका उपयोग सीमित है।
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(8) क्षेत्र-पुस्तिका (Field-Book) – इसे सर्वेक्षण पुस्तिका भी कहा जाता है। इसमें सर्वेक्षण की गयी सभी मापें अंकित की जाती हैं जिससे प्रयोगशाला में उस क्षेत्र का शुद्ध मानचित्र बनाया जा सके। क्षेत्र-पुस्तिका में जितनी शुद्ध माप अंकित की जाएगी, उतना ही शुद्ध उस क्षेत्र का मानचित्र होगा।
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(9) अन्य उपकरण (Other Instruments) – उपर्युक्त यन्त्रों के अतिरिक्त पेन्सिल, रबड़, मापक, चॉदा आदि की भी जरीब एवं फीते द्वारा सर्वेक्षण में आवश्यकता पड़ती है।

प्रश्न 2
जरीब-फीते (Chain-Tape) द्वारा सर्वेक्षण प्रक्रिया का उल्लेख कीजिए तथा इस विधि के गुण-दोषों का भी वर्णन कीजिए।
उत्तर

चेन-टेप द्वारा सर्वेक्षण प्रक्रिया
Surveying Process by Chain and Tape

चेन-टेप सर्वेक्षण प्रक्रिया निम्नलिखित विधियों द्वारा की जाती है –
(1) उपकरणों की जाँच तथा पर्याप्त सर्वेक्षक दल – सर्वेक्षण प्रक्रिया प्रारम्भ करने से पूर्व सभी यन्त्रों एवं उपकरणों की जाँच कर लेनी चाहिए तथा समस्त आवश्यक उपकरण लेकर ही क्षेत्र में पहुँचना। चाहिए। साथ ही सर्वेक्षण के लिए तीन व्यक्तियों का दल अवश्य होना चाहिए। एक, जरीब को खींचकर आगे-आगे चलने वाला नायक (Leader); दूसरा, उसके पीछे चलने वाला अनुगामी (Follower) और तीसरा, क्षेत्र-पुस्तिका पर नाप लिखने वाला क्षेत्र-पुस्तिका लेखक (Field Book Writer)।

(2) क्षेत्र का निरीक्षण – सर्वप्रथम जिस क्षेत्र का सर्वेक्षण करना होता है, उसका भली-भाँति निरीक्षण कर लेना चाहिए। इसके साथ ही क्षेत्र की बाह्य सीमा पर झण्डियाँ आदि गाड़ देनी चाहिए। सर्वेक्षण क्षेत्र की सीमा को ध्यान में रखते हुए कुछ मुख्य एवं गौण बिन्दुओं का निर्धारण धरातल पर लेते हैं तथा इसी आधार पर क्षेत्र का एक अनुमानित रेखाचित्र बना लेते हैं। यह अनुमानित रेखाचित्र क्षेत्रीय निरीक्षण के आधार पर तैयार किया जाता है।

(3) दिशा निर्धारण – सर्वेक्षण आरम्भ करने से पहले चुम्बकीय दिक्सूचक की सहायता से उत्तर दिशा ज्ञात कर लेनी चाहिए तथा उत्तर की ओर तीर का निशान (↑) बनाकर उस पर उत्तर अथवाN लिख देना चाहिए।

(4) दूरियाँ ज्ञात करना – जरीब पर अवस्थानों की प्रलम्ब दूरियाँ लेनी चाहिए। फीता जब शरीर पर 90° का कोण बनाता है तो वह दूरी प्रलम्बे दूरी (off-sets) कहलाती है। फीते को जरीब पर चापवत् घुमाकर एक दूरी ज्ञात की जा सकती है।

(5) बन्ध रेखा तथा जाँच रेखा (Tie Line and Check Line) – दो जरीब रेखाओं पर निश्चित बिन्दुओं को बन्ध स्टेशन कहते हैं। इन दोनों बिन्दुओं को मिलाने वाली रेखा ही टाइ रेखा या बन्ध रेखा कहलाती है। जब दूरी अधिक होती है तब लम्बवत् दूरी न लेकर प्रमुख बिन्दुओं की दूरी बन्ध रेखा की। सहायता से नापते हैं। इन रेखाओं की आवश्यकता जरीब द्वारा खुले तथा बन्द, दोनों ही प्रकार के सर्वेक्षण में पड़ती है।
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जाँच रेखाएँ कभी-कभी चेन द्वारा सर्वेक्षण का अंकन कागज पर पूर्ण हो जाने के पश्चात् अशुद्धि आदि की जाँच करती है। इसमें त्रिभुज की दो भुजाओं पर दो बिन्दुओं को मिला देते हैं तथा इस रेखा की दूरी मापक द्वारा नाप लेते हैं तथा उसे फीट में परिवर्तित करने के बाद क्षेत्र में नापी गयी दूरी से मिलान करते हैं। यदि दोनों दूरियाँ समान हैं तो सर्वेक्षण कार्य शुद्ध है। भू-मापन की शुद्धि इससे ज्ञात होती जाती है। इसी कारण जाँच रेखाओं को पूफ रेखा (Proof lines) भी कहा जाता है।

(6) क्षेत्र-पुस्तिका लिखना – जरीब द्वारा ज्ञात की हुई भू-मापन की माप को क्षेत्र-पुस्तिका में अंकित करते जाते हैं ताकि प्रयोगशाला में उन आँकड़ों से सर्वेक्षित क्षेत्र का मानचित्र बना सकें। क्षेत्र-पुस्तिका में निम्नलिखित दो प्रकार की मापें लिखी जाती हैं –
(i) नीचे से ऊपर को अर्थात् मध्य में जरीब की क्षैतिज दूरियाँ तथा
(ii) दायें-बायें दोनों ओर लक्ष्य बिन्दुओं की लम्बवत् दूरियाँ।
ऊपर दूरियाँ फीट या मीटर में लिखी जाती हैं। सबसे ऊपर जरीब की कुल दूरी का योग लिखा जाता है। दूरियाँ जरीब फैलाने की दिशा में खड़े होकर तुरन्त एवं शुद्ध लिखनी चाहिए। जितनी सही क्षेत्र-पुस्तिका होगी, मानचित्र उतना ही सही बनेगा।

(7) आलेखन करना (Plotting) – भू-सर्वेक्षण से प्राप्त आँकड़ों के आधार पर एक उचित मापक लेकर समतल कागज पर अंकित करने की प्रक्रिया आलेखन (Plotting) कहलाती है। यह प्रक्रिया सर्वेक्षण की अन्तिम तथा महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसे प्रयोगशाला में सम्पन्न किया जाता है।

सर्वेक्षण की विधियाँ
Methods of Surveying

जरीब-फीते द्वारा सर्वेक्षण की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं –
(I) त्रिभुजीकरण विधि (Triangulation Method) – इस विधि में क्षेत्र को त्रिभुजों में विभाजित करके सर्वेक्षण किया जाता है।
(II) चक्रमण-विधि (Traversing Method) – इस विधि के अन्तर्गत सर्वेक्षण करते हुए धीरेधीरे आगे बढ़ते हैं। इसमें आधार रेखा पर लक्ष्यों की कोणात्मक लम्ब दूरियाँ ली जाती हैं। दिशा और मोड़ को बन्ध रेखाओं की सहायता से निर्धारित करना पड़ता है। यह निम्नलिखित दो प्रकार का होता है

(1) खुला चलन सर्वेक्षण (Open Traverse Survey) – इस विधि में एक स्थान से सर्वेक्षण प्रारम्भ कर उस स्थान पर ही वापस नहीं आते हैं, बल्कि दूसरे बिन्दु पर समाप्त कर देते हैं। इससे जरीब पर लम्बवत् दूरियाँ ज्ञात की जाती हैं। यह विधि लम्बाई में फैले क्षेत्रों-रेलमार्ग, सड़क, नदी अथवा सँकरे क्षेत्रों के लिए प्रयुक्त की जाती है।
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(2) बन्द चलन सर्वेक्षण (Closed Traverse Survey) – इस विधि में जिस स्थान से सर्वेक्षण आरम्भ करते हैं, उसी स्थान पर आकर समाप्त करते हैं। विस्तृत क्षेत्रों के सर्वेक्षण में इस विधि का प्रयोग किया जाता है। प्रत्येक आधार रेखा के लिए पृथक् क्षेत्र-पुस्तिका लिखी जाती है। ऐसी स्थिति का निर्धारण बन्ध रेखा तथा जाँच रेखा द्वारा किया जाता है।
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जरीब-फीते द्वारा सर्वेक्षण में आने वाली बाधाओं का निराकरण
Solution of Problems in Chain and Tapes Surveying

जरीब-फीते द्वारा भू-मापन करते समय अनेक बाधाएँ आ जाती हैं। उनका समुचित निराकरण बहुत आवश्यक होता है। सर्वेक्षण में निम्नलिखित बाधाएँ आती हैं –
(1) ढालू भूमि – ढालू भूमि का सर्वेक्षण करते समय भूमि की क्षैतिज दूरियाँ नापने में कठिनाई होती है। इस कठिनाई का निराकरण निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है –

  1. ढालू भूमि पर सुविधानुसार तीन या । चार लम्बदण्ड गाड़ देने चाहिए।
  2. सबसे आगे वाले लम्बदण्ड के ठीक नीचे जरीब का एक सिरा तीर की सहायता । से स्थिर कर देना चाहिए।
  3. जरीब का सिरा ढालू भूमि पर गडे हुए लम्बदण्ड के साथ ऐसे सटाकर रखना चाहिए कि जरीब लम्बदण्ड के साथ समकोण बनाये।
  4. दोनों लम्बदण्डों की क्षैतिज दूरी ज्ञात कर लेनी चाहिए।
  5. यह प्रक्रिया शेष लम्बदण्डों के साथ करके प्राप्त आँकड़ों को संयुक्त कर लेना चाहिए। ढालू भूमि की यह क्षैतिज दूरी होगी।

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(2) तालाब या भवन – यदि सर्वेक्षण करते समय क्षेत्र के बीच कोई तालाब या भवन की बाधा आ खड़ी हो तो उसका निराकरण निम्नलिखित प्रकार से करना चाहिए –

  1. तालाब या भवन के दो छोरों पर दो अवस्थान अर्थात् स्टेशन निर्धारित कर लेने चाहिए।
  2. समकोण दण्ड की सहायता से उन दोनों अवस्थानों को मिलाने वाली रेखा पर समान दूरी से लम्ब डालने चाहिए।
  3. दोनों समकोणों के बीच की दूरी ज्ञात कर लेनी चाहिए। यही तालाब या भवन की वास्तविक क्षैतिज दूरी होगी।

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(3) नदी या नाला – सर्वेक्षण करते समय किसी नदी या नाले की भी बाधा उत्पन्न हो सकती है। इसकी चौड़ाई को निम्नलिखित प्रकार से ज्ञात करके तालाब या नदी की बाधा का निराकरण हो सकता है –

  1. नदी या नाले के किनारे खड़े होकर समतल स्थान पर एक लम्बदण्ड ‘क’ गाड़ देना चाहिए।
  2. इसके ठीक सामने नदी के दूसरे किनारे पर कोई वृक्ष या टीला ‘ख’ निर्धारित कर लेना चाहिए।
  3. इस ओर लम्बदण्ड से लगभग 20 फीट आगे चलकर दूसरा दण्ड ‘ग’ गाड़ देना चाहिए।
  4. इन दोनों लम्बदण्डों के मध्य में अन्य लम्बदण्ड ‘भ’ गाड़ देना चाहिए।
  5. 20 फीट वाले लम्बदण्ड की सीध में एक अन्य लम्बदण्ड ‘घ’ इस प्रकार गाड़ देना चाहिए कि ‘ख’, ‘भ’ तथा ‘घ’ तीनों एक ही सीध में हो जाएँ।
  6. ग तथा ‘घ के मध्य की दूरी नदी या नाले की चौड़ाई को प्रकट करेगी।

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जरीब-फीते द्वारा सर्वेक्षण के गुण-दोष
Merits and Demerits of Chain and Tape Surveying

गुण – जरीब-फीते द्वारा सर्वेक्षण विधि में निम्नलिखित गुण पाये जाते हैं –

  1. छोटे एवं समतल क्षेत्रों के लिए यह सर्वश्रेष्ठ विधि है।
  2. जरीब-फीते द्वारा सर्वेक्षण करना सरल और सुगम है। इसके लिए अधिक अभ्यास की आवश्यकता नहीं होती है।
  3. जरीब-फीते द्वारा सर्वेक्षण कम खर्चीला होता है, क्योंकि इसमें साधारण उपकरण ही प्रयुक्त किये जाते हैं।
  4. इसमें अन्य उपकरणों की अपेक्षा त्रुटि की सम्भावना बहुत कम है।
  5. इस विधि से क्षेत्र-पुस्तिका के विवरण के आधार पर मानचित्र सरलता से बना लिया जाता
  6. इस विधि में मानचित्र की सहायता से क्षेत्रफल सुगमता से ज्ञात हो सकता है, जबकि अन्य विधियों में ऐसा होना असम्भव है।

दोष – इस विधि द्वारा सर्वेक्षण में निम्नलिखित दोष हैं –

  1. जरीब लोहे की बनी होने के कारण बार-बार खींचने तथा पटकने से टेढ़ी हो जाती है, जिससे माप अर्थात् लम्बाई में कमी आ सकती है।
  2. ऊँचे-नीचे तथा ढालू क्षेत्रों में जरीब द्वारा शुद्ध भू-मापन में कठिनाई आती है।
  3. जरीब-फीते द्वारा भू-मापन में समय अधिक लगता है जिससे यह कार्य थका देने वाला होता है।
  4. बड़े-बड़े क्षेत्रों के लिए यह विधि अनुपयोगी एवं कठिन होती है।
  5. कभी-कभी जरीब की दूरियाँ पढ़ने में त्रुटि भी हो सकती है।
  6. इस विधि द्वारा सर्वेक्षण करने के बाद प्रयोगशाला में मानचित्र बनाने का कार्य अलग से करना पड़ता है।
  7. जरीब की लम्बाई पर तापमान का प्रभाव भी पड़ता है जिससे भू-मापन में त्रुटि आ सकती है।

प्रश्न 3
समतल मेज (Plane Table) सर्वेक्षण में कौन-कौन से उपकरण आवश्यक होते हैं? इस यन्त्र द्वारा सर्वेक्षण विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर

समतल मेज सर्वेक्षण
Plane Table Surveying

सर्वेक्षण की यह एक लेखाचित्रीय विधि (Graphical Method) है। इस विधि में क्षेत्र मापन एवं आलेखन (Plotting) साथ-साथ सर्वेक्षण क्षेत्र में ही हो जाता है।
समतल मेज सर्वेक्षण विधि के निम्नलिखित गुण होते हैं –

  1. यह विधि अधिक शुद्ध एवं सरल होती है।
  2. इस विधि में मानचित्र सर्वेक्षण के साथ-साथ क्षेत्र में ही तैयार हो जाता है। इसी कारण इसमें त्रुटियों की सम्भावना कम रहती है। यदि त्रुटि हो भी जाए तो उसे क्षेत्र में ही दूर कर लिया जाता है।
  3. इसमें सर्वेक्षण कार्य शीघ्रता से सम्पन्न हो जाता है, क्योंकि इसमें केवल आधार रेखा को ही मापना होता है। अन्य क्षैतिज रेखाओं को मापने की आवश्यकता नहीं होती है तथा न ही क्षेत्र-पुस्तिका बनाने की आवश्यकता पड़ती है।
  4. सर्वेक्षण की इस विधि में पूरा कार्य क्षेत्र में ही पूर्ण कर लिया जाता है। अतः सर्वेक्षणकर्ता क्षेत्र में ही तथ्यों की तुलना कर सकता है तथा भूल का सुधार भी क्षेत्र में ही खड़े-खड़े कर लिया जाता है।
  5. इस सर्वेक्षण में आवश्यकतानुसार सर्वेक्षण कार्य कभी भी रोका जा सकता है तथा पुन: प्रारम्भ किया जा सकती है।

समतल मेज सर्वेक्षण में आवश्यक उपकरण
Required Equipments in Plane Table Surveying

समतल मेज सर्वेक्षण में निम्नलिखित उपकरणों की आवश्यकता होती है –
(1) समतल मेज तथा त्रिपाद (Plane Table and Tripod) – समतल मेज लकड़ी से निर्मित एक प्रकार का समतल ड्राइंगबोर्ड होता है जिसे त्रिपाद पर एक पेंच की सहायता से कसा जा सकता है। तथा अलग किया जा सकता है। यह पट्ट 40×25 सेमी या 50×40 सेमी या 75×55 सेमी आदि नाप का होता है। त्रिपाद की तीन समान टाँगें होती हैं जिन्हें आवश्यकतानुसार इधर-उधर हटाया जा सकता है।
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(2) दर्शरेखक (Alidade) – यह एक उपयोगी उपकरण है जो लकड़ी या धातु का बना होता है। इसकी लम्बाई 30 से 45 सेमी तक होती है। इसके एक छोर पर मापक बना होता है। दर्श रेखक के दोनों सिरों पर 8 सेमी लम्बे दो फलक लगे होते हैं जो एक कब्जे द्वारा इससे जुड़े होते हैं, जिन्हें आवश्यकतानुसार ऊपर-नीचे किया जा सकता है। एक फलक में एक लम्बवत् खिड़की बनी होती है, जिसे दृष्टक फलक (Eye vane) कहते हैं तथा दूसरे फलक की खिड़की में एक तार या धागा लगा होता है, जिसे दृश्य फलक (Object vane) कहते हैं। दर्श रेखक का प्रयोग करते समय उसे समतल मेज पर गाड़ी हुई आलपिन से सटाकर रखते हैं तथा दृष्टक फलक, दृश्य फलक के तार एवं धरातल के बिन्दु को। एक सीध में मिलाकर किरणें खींचते हैं।

(3) स्प्रिट लेविल (Spirit Level) – इस यन्त्र का प्रयोग मेज को समतल करने में किया जाता है। यह लकड़ी के एक आयताकार डिब्बे में एक ट्यूब के रूप में होता है जिसमें स्प्रिट भरी होती है। इसमें वायु का एक बुलबुला होता है अर्थात् ट्यूब में कुछ स्थान रिक्त छोड़ दिया जाता है। ट्यूब के ऊपर एक समतलन प्रक्रिया के लिए संकेत बना रहता है। जब बुलबुला इस संकेतक के बीच में आ जाता है, तब मेज समतल हो जाती है।
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(4) दिक्सूचक (Compass) – विस्तृत उत्तरीय प्रश्न 1 देखें।

(5) साहुल एवं चिमटा (Plumb Bob with Fork) – यह एक सामान्य-सा उपकरण होता है जिसका प्रयोग समतल मेज को किसी स्थान पर केन्द्रित करने के लिए किया जाता है। साहुल लोहे का बना होता है जो शंक्वाकार होता है जिसमें ऊपर की ओर धागा बँधा होता है। यह धागा चिमटे से बँधा होता है। इसके द्वारा धरातलीय बिन्दु समतल मेज पर स्थापित ड्राइंगशीट पर निश्चित किया जाता है।
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(6) फीता (Tape) – विस्तृत उत्तरीय प्रश्न 1 देखें।
(7) लक्ष्य दण्ड (Ranging Rod) – विस्तृत उत्तरीय प्रश्न 1 देखें।
(8) तीर (Arrows) – विस्तृत उत्तरीय प्रश्न 1 देखें।
(9) अन्य सामग्री (Other Materials) – उपर्युक्त उपकरणों के अतिरिक्त ड्राइंगशीट, पेन्सिल, रबड़, आलपिन, बोर्ड पिन आदि उपकरण आवश्यक होते हैं।

समतल मेज द्वारा सर्वेक्षण प्रक्रिया
Surveying Process by Plane Table

समतल मेज द्वारा सर्वेक्षण करते समय निम्नलिखित प्रक्रियाएँ करनी आवश्यक होती हैं –

  1. आधार-रेखा का चयन
  2. समतल मेज पर ड्राइंगशीट चढ़ाना
  3. सर्वेक्षण मेज की स्थापना –
    • त्रिपाद पर समतल मेज को स्थिर करना,
    • संकेद्रण (Centering) करना तथा
    • समतलन (Levelling) करना
  4. समतल पट्ट का अभिस्थापन (Orientation)
  5. धरातल के विभिन्न बिन्दुओं के लिए किरणें खींचना

समतल मेज का स्थापन
Setup of Plane Table

समतल मेज का स्थापन सर्वेक्षण क्षेत्र में किसी सुविधाजनक स्थान पर त्रिपाद की सहायता से इस प्रकार किया जाता है कि मेज से सभी धरातलीय बिन्दु स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होते हों। तत्पश्चात् मेज पर बोर्ड पिन की सहायता से ड्राइंगशीट लगायी जाती है। अब स्प्रिट लेविल की सहायता से मेज के त्रिपाद की टाँगों को खिसकाकर समतलन की क्रिया कर लेते हैं। समतल मेज के एक कोने में दिक्सूचक की सहायता से उत्तर दिशा अंकित कर दी जाती है। समतल मेज पर एक बिन्दु ‘क’ लेकर उसका धरातल से। केन्द्रीयकरण साहुल एवं चिमटे की सहायता से कर लेना चाहिए जिससे कागज के ‘क’ बिन्दु की स्थिति धरातल पर ज्ञात हो जाये। इसके बाद धरातल के इस ‘क’ बिन्दु से आधार-रेखा का चुनाव करते हैं। आधार-रेखा का चुनाव करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि ‘क’ ‘ख’ बिन्दुओं से सम्पूर्ण क्षेत्र भली- भाँति दिखाई पड़ता हो। आधार रेखा की लम्बाई सर्वेक्षण किये जाने वाले क्षेत्र के अनुरूप ही होनी चाहिए। आधार-रेखा का स्थापन समतल क्षेत्र में किया जाना चाहिए जिससे दूरियाँ अधिक शुद्ध रूप में नापी जा सकें। अब ‘क’ बिन्दु से दर्श रेखक की सहायता से धरातल के बिन्दुओं की स्थिति देखकर किरणें डाल दी जाती हैं।

समतल मेज का अभिस्थापन
Re-setup of Plane Table

समतल मेज का अभिस्थापन निम्नलिखित दो प्रकार से किया जाता है –
(1) दिक्सूचक की सहायता द्वारा – जब मेज को प्रथम स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर रखा जाता है तो दिक्सूचक की सहायता से पुनः उत्तर दिशा प्राप्त कर ली जाती है।
(2) पश्चावलोकन द्वारा – जब मेज को पहले स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर रखा जाता है तो प्रथम स्थान पर लक्ष्य दण्ड गाड़ देते हैं तथा आधार रेखा के सहारे दर्श रेखक की सहायता से समतल मेज़ को घुमाकर एक सीध में कर लिया जाता है। इस दूसरे स्थान पर समतलीकरण एवं केन्द्रीकरण भी करना आवश्यक होता है।

समतल मेज के अभिस्थापन के बाद निम्नलिखित विधियों द्वारा सर्वेक्षण किया जा सकता है –
(1) विकिरण विधि (Radiation Method) – इस विधि का प्रयोग एक ही बिन्दु से सर्वेक्षण करने में किया जाता है। इसके लिए सर्वेक्षण क्षेत्र छोटा होना चाहिए। सर्वप्रथम क्षेत्र के मध्य में समतल मेज का स्थापन कर लिया जाता है तथा दर्श रेखक की सहायता से सर्वेक्षण बिन्दु से प्रमुख बिन्दुओं की ओर इंगित करते हुए किरणें खींच देते हैं। इसके साथ ही केन्द्रीयकरण बिन्दु से धरातलीय दूरियाँ फीते की सहायता से नाप लेते हैं। एक निश्चित मापक को मानकर ड्राइंगशीट पर इन दूरियों को काट लेते हैं, जो धरातल के बिन्दुओं का मानचित्र पर प्रदर्शन होता है। इन सभी बिन्दुओं को मिलाने से क्षेत्र का मानचित्र तैयार कर लिया जाता है।
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(2) प्रतिच्छेदन विधि (Inter-section Method) – इस विधि द्वारा किरणों के पारस्परिक प्रतिच्छेदन द्वारा विभिन्न धरातलीय स्थानों को ड्राइंगशीट पर अंकित कर लिया जाता है। इसी कारण इसे प्रतिच्छेदन विधि कहा जाता है। इसके लिए सर्वप्रथम एक आधार-रेखा का चुनाव किया जाता है। पुन: इस आधार-रेखा के दोनों बिन्दुओं से सर्वेक्षित क्षेत्र के विभिन्न बिन्दुओं को प्रकट करने वाली किरणों को खींच दिया जाता है। यही ड्राइंगशीट पर सर्वेक्षित बिन्दुओं की स्थिति होगी। यह विधि सर्वोत्तम है तथा सर्वाधिक प्रचलित है। यह ध्यान रखना होता है कि समतलीकरण, केन्द्रीकरण तथा उत्तर दिशा का निर्धारण समतल मेज के स्थापन तथा अभिस्थापन में कर लिया गया है, तत्पश्चात् ही किरणें खींची गयी हैं। इस आधार पर सर्वेक्षण क्रिया से प्राप्त मानचित्र शुद्ध होगा।
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इन विधियों के अतिरिक्त दो विधियाँ और हैं, जो निम्नलिखित हैं –
(3) रेखांकन या चलन विधि (Traverse Method) –
(अ) खुला चलन सर्वेक्षण (Opened Traverse Surveying) एवं
(ब) बन्द चलन सर्वेक्षण (Closed Traverse Surveying)।

(4) स्थिति निर्धारण अथवा परिच्छेदन विधि (Resection Method)
(अ) दो बिन्दु समस्या (Two Point Problem) एवं
(ब) तीन बिन्दु समस्या (Three Point ङ्ग Problem)।
इस समस्या के निदान के लिए स्थिति का निर्धारण तीन प्रकार से किया जा सकता है –

  • लेखाचित्रीय विधि (Graphical Method)
  • यान्त्रिक विधि (Mechanical Method)
  • त्रुटि-त्रिभुज अथवा पुन: परीक्षा की विधि (Triangle of Error Method)

स्थिति निर्धारण अथवा परिच्छेदन विधि-का विस्तृत विवरण पाठ्यक्रम में नहीं दिया गया है।
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मौखिक परिक्षा : सम्भावित प्रश्न

प्रश्न 1
सर्वेक्षण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
सर्वेक्षण वह कला है जिसके द्वारा धरातल के विभिन्न बिन्दुओं की सापेक्षिक दूरी को मापक के अनुसार समतल कागज पर प्रदर्शित किया जाता है।

प्रश्न 2
सर्वेक्षण कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर
सर्वेक्षण दो प्रकार के होते हैं – (अ) भू-पृष्ठीय सर्वेक्षण (Geodetic Survey) तथा
(ब) समतल सर्वेक्षण (Plane Survey)।

प्रश्न 3
सर्वेक्षण का उद्देश्य क्या है?
उत्तर
सर्वेक्षण का प्रमुख उद्देश्य किसी भूभाग का मानचित्र अथवा फोटो तैयार करना है।

प्रश्न 4
जरीब कितने प्रकार की होती हैं?
उत्तर
जरीब चार प्रकार की होती हैं –

  1. इन्जीनियर्स जरीब-100 फीट लम्बी
  2. गण्टर्स जरीब-66 फीट लम्बी
  3. रेवेन्यू जरीब-33 फीट लम्बी तथा
  4. मीटर जरीब-30 मीटर लम्बी।

प्रश्न 5
जरीब एवं फीता सर्वेक्षण से क्या तात्पर्य है? उत्तर जरीब एवं फीते की सहायता से किसी क्षेत्र का भू-मापन जरीब एवं फीता सर्वेक्षण कहलाता है।

प्रश्न 6
सर्वेक्षण में अधिकांशतः किस जरीब का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर
सर्वेक्षण में अधिकांशत: इन्जीनियर्स जरीब का प्रयोग किया जाता है।

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प्रश्न 7
लक्ष्य दण्ड को विभिन्न रंगों से क्यों रँगा जाता है?
उत्तर
जिससे कि दूरवर्ती स्थान भी स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो सके।

प्रश्न 8
चुम्बकीय कम्पास की क्या उपयोगिता है?
उत्तर
इसका उपयोग मानचित्र में उत्तर दिशा का निर्धारण करने में किया जाता है।

प्रश्न 9
जरीब-फीता सर्वेक्षण में चैक लाइन का क्या उपयोग है?
उत्तर
चैक लाइन इस सर्वेक्षण की शुद्धता की जाँच के लिए खींची जाती है।

प्रश्न 10
टाइ लाइन का क्या अर्थ है?
उत्तर
दो जरीब रेखाओं द्वारा निर्मित कोण को सही निर्धारण करने के लिए पहली जरीब रेखा पर दूसरी जरीब रेखा के झुकावे को निश्चित करने वाली रेखा टाइ रेखा कहलाती है।

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प्रश्न 11
समतल मेज सर्वेक्षण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
समतल मेज सर्वेक्षण, सर्वेक्षण की वह आरेखीय विधि है जिसमें सर्वेक्षण तथा आलेखन दोनों कार्य सर्वेक्षण क्षेत्र में ही एक साथ हो जाते हैं।

प्रश्न 12
समतल मेज सर्वेक्षण में स्प्रिट लेविल का क्या उपयोग है?
उत्तर
समतल मेज सर्वेक्षण में स्प्रिट लेविल मेज की समतलीकरण क्रिया करने में उपयोग में लाया जाता है।

प्रश्न 13
समतल मेज द्वारा सर्वेक्षण करने की कौन-कौन-सी विधियाँ हैं?
उत्तर
समतल मेज सर्वेक्षण करने की चार विधियाँ निम्नवत् हैं –

  1. विकिरण विधि (Radiation Method)
  2. प्रतिच्छेदन विधि (Intersection Method)
  3. रेखांकन या चलन विधि (Traverse Method) तथा
  4. स्थिति निर्धारण अथवा परिच्छेदन विधि (Resection Method)।

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प्रश्न 14
किरण किसे कहते हैं?
उत्तर
समतल मेज पर दर्श रेखक की सहायता से किसी लक्ष्य बिन्दु के लिए खींची जाने वाली सरल रेखा को किरणें (Rays) कहते हैं।

प्रश्न 15
केन्द्रीकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
साहुल तथा चिमटे की सहायता से धरातल के निर्धारण बिन्दु को ड्राइंगशीट पर अंकित करने की प्रक्रिया केन्द्रीकरण कही जाती है।

प्रश्न 16
समतल मेज के अभिस्थापन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर
समतल मेज को क्षेत्र में स्थापित कर समतल करना तथा चुम्बकीय उत्तर को निर्धारित करने की क्रिया स्थापन कहलाती है।

प्रश्न 17
समतल मेज का पुनस्र्थापन किसे कहा जाता है?
उत्तर
समतल मेज को प्रथम स्थान से उठाकरे दूसरे अभिस्थापन पर समतलीकरण एवं केन्द्रीकरण क्रिया द्वारा स्थापित करना पुनस्र्थापन कहा जाता है।

प्रश्न 18
समतल मेज सर्वेक्षण विधि की क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर
समतल मेज सर्वेक्षण विधि की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  1. यह विधि अधिक सरल एवं शुद्ध होती है।
  2. इस विधि द्वारा सर्वेक्षण करने में कम समय लगता है।
  3. इसमें केवल आधार-रेखा ही मापी जाती है।
  4. क्षेत्र-पुस्तिका तथा अन्य लक्ष्य स्थानों के कोण आदि बनाने की आवश्यकता नहीं होती है।
  5. इस विधि द्वारा सर्वेक्षण करने में केवल दो व्यक्तियों की ही आवश्यकता होती है।।
  6. इसमें आलेखन का कार्य सर्वेक्षण क्षेत्र में सर्वेक्षण के साथ ही पूरा हो जाता है; अत: त्रुटियाँ कम होने की सम्भावना रहती है।
  7. यह विधि कम थकाने वाली होती है।

प्रश्न 19
समतल मेज सर्वेक्षण विधि के प्रमुख दोष क्या हैं?
उत्तर
समतल मेज सर्वेक्षण विधि के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं –

  1. इस सर्वेक्षण को तेज वायु, धूप एवं वर्षा ऋतु में करना कठिन होता है।
  2. इसका प्रयोग केवल समतल तथा खुले क्षेत्रों में ही ठीक रहता है।
  3. समतल मेज को एक स्थान से दूसरे स्थान तक लाने-ले जाने में कठिनाई होती है।
  4. बड़े क्षेत्रों का सर्वेक्षण करने में यह विधि अनुपयुक्त है।
  5. इस सर्वेक्षण में अनेक उपकरण होने से उनके क्षेत्र में खो जाने का भय रहता है।

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UP Board Class 7 Agricultural Science Model Paper कृषि विज्ञान

UP Board Class 7 Agricultural Science Model Paper are part of UP Board Class 7 Model Papers. Here we have given UP Board Class 7 Agricultural Science  Model Paper.

Board UP Board
Class Class 7
Subject Agricultural Science
Model Paper Paper 1
Category UP Board Model Papers

UP Board Class 7 Agricultural Science Model Paper कृषि विज्ञान

सत्र-परीक्षा प्रश्न पत्र
कक्षा-7
विषय – कृषि विज्ञान

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रकृति में जल किन-किन रूपों में पाया जाता है?
उत्तर:
प्रकृति में जल ठोस (बर्फ), द्रव (पानी) तथा गैस (पाप) के रूप में पाया जाता है।

प्रश्न 2.
उर्वरकों के लगातार अधिक प्रयोग से मृदा ………. हो जाती है। वाक्य पूर्ण कीजिए।
उत्तर:
उर्वरकों के लगातार अधिक प्रयोग से मृदा खराब हो जाती है।

प्रश्न 3.
पहाड़ों पर किस प्रकार की खेती होती है?
उत्तर:
पहाड़ों पर सीढ़ीदार खेती होती है।

प्रश्न 4.
ढालू खेतों में फसलों का उत्पादन कम क्यों होता है?
उत्तर:
ढालू खेतों में भू-क्षरण अधिक होने से उनकी उपजाऊ क्षमता घटती रहती है।

प्रश्न 5.
मृदा संरक्षण का क्या अर्थ है?
उत्तर:
मृदा संरक्षण का अर्थ-मृदा को क्षरण से बचाना है।

प्रश्न 6.
खेत व नालों से बहते पानी को रोकने के हेतु क्या करते हैं?
उत्तर:
खेतों व नालों में बहते हुए पानी को रोकने के लिए रोक बाँध’ (चेक डैम) बनाना पड़ता है, जिससे भू-क्षरण पर रोक लगती है।

प्रश्न 7.
मृदा अपरदन किसे कहते हैं?
उत्तर:
भूमि के कणों का अपने मूल स्थान से हटने एवं दूसरे स्थान पर एकत्र होने की क्रिया को मृदा अपरदन कहते हैं।

प्रश्न 8.
खेत को समतल एवं मेंड़बंदी करने से क्या लाभ होता है?
उत्तर:
खेतों को समतल करके उसके चारों ओर मेड़बंदी करने से खेत का पानी बाहर नहीं जाता है जिससे भू-क्षरण नहीं होता है।

प्रश्न 9.
पौधे ran”को आसानी से ग्रहण करते हैं। वाक्य पूर्ण कीजिए।
उत्तर:
पौधे केशिको जल को आसानी से ग्रहण करते हैं।

प्रश्न 10.
मृदा कणों के वितरण या सजावट को क्या कहते हैं?
उत्तर:
मृदा विन्यास या मृदा संरचना।

प्रश्न 11.
हमारे देश की वार्षिक वर्षा का कितना भाग पानी बहकर नदी-नालों में चला जाता है?
उत्तर:
एक तिहाई भाग।

प्रश्न 12.
किस मृदा में रंध्रावकाश अधिक होता है?
उत्तर:
मोटे कण वाली मृदा में।

प्रश्न 13.
जल विज्ञान में किसका अध्ययन किया जाता है?
उत्तर:
न जल चक्र का।

प्रश्न 14.
मृदा में जल संरक्षित क्यों किया जाता है?
उत्तर:
फसलों की अच्छी पैदावार के लिए।

प्रश्न 15.
सैंडड्यून क्या है?
उत्तर:
रेतीली भूमि में तेज हवा के कारण बने बड़े-बड़े बालू के टीलों को सैंडड्यून कहते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 16.
गहरी जुताई क्यों की जाती है? यदि गहरी जुताई न की जाए तो क्या नुकसान होगा?
उत्तर:
भूमि की 40 सेमी या इससे अधिक गहराई तक की जुताई को गहरी जुताई कहते हैं। इसका उद्देश्य नमी को सुरक्षित रखना एवं भूमि की निचली सतह से कमजोर परत तोड़ना होता है। गहरी जुताई न करने से भूमि में नमी सुरक्षित रखना संभव नहीं हो पाएगा।

प्रश्न 17.
मृदा संरक्षण के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
मृदा की सुरक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है। इसके लिए हमें उचित मृदा संरक्षण विधियाँ अपनाना आवश्यक है। यदि भूमि पर घास वनस्पतियाँ नहीं हैं, तो भू-क्षरण अधिक होता है। जिससे नदी, नालों में मिट्टी जमा होने से उनकी जल धारण क्षमता घटती हैं और बाढ़ का कारण बनती है।

प्रश्न 18.
मृदा विन्यास किस-किस चीजों से प्रभावित होता है?
उत्तर:
भूपरिष्करण (जुताई, गुड़ाई, निराई आदि) से, कार्बनिक खाद (चूना, जिप्सम आदि) से, फसल चक्र द्वारा, मिट्टी की दशा एवं किस्म से, उर्वरकों के प्रयोग तथा जल निकास से आदि।

प्रश्न 19.
रंध्रावकाश पौधों के लिए किस प्रकार महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर.
निम्न कारणों से रंध्रावकाश पौधों के लिए महत्त्वपूर्ण है

  1. रंध्रावकाश पौधों को समुचित जल, वायु एवं पोषक तत्व उपलब्ध कराने में सहायता करता है।
  2. मृदा के लाभदायक जीवों की वृद्धि में सहायक होता है।
  3. पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक घुलनशील तत्वों की वृद्धि में सहायता करता है।
  4. जड़ों के समुचित विकास में सहयोग करता है।

प्रश्न 20.
जल ही जीवन है कैसे? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हमें अपने जीवन के सभी कार्यों के लिए जल की आवश्यकता होती है, जैसे-खाना बनाने, सफाई, सिंचाई, खेती आदि कार्यों में। इसके बिना हम कोई भी कार्य नहीं कर सकते हैं। इसलिए जल हमारे जीवन के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 21.
भू-क्षरण किन-किन कारकों द्वारा होता है? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भू-क्षरण के कारक- भू-क्षरण की क्रिया वर्षा या वायु को मृदा से संपर्क होते ही प्रारंभ होती है। जैसे जैसे वर्षा या वायु वेग घटता-बढ़ता है, वैसे-वैसे भू-क्षरण का रूप और प्रकार बदलता रहता है। भू-क्षरण मुख्य रूप से दो कारकों द्वारा होता है, जल एवं वायु के द्वारा होने वाले भू क्षरण को क्रमश: जलीय भू-क्षरण एवं वायु भू-क्षरण कहते हैं।

प्रश्न 22.
मृदा विन्यास कितने प्रकार का होता है? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मृदा विन्यास चार प्रकार के होते हैं

  1. स्तंभी विन्यास
  2. तिर्यक (तिरछा) विन्यास
  3. संहत (सघन) विन्यास
  4. दानेदार (कणीय) विन्यास

स्तंभी विन्यास वाली मृदा भुरभुरी व मुलायम होती है। यह मृदा खेती के लिए उत्तम व उपजाऊ होती है। तिर्यक विन्यास वाली मृदा में रंध्रावकाश कम होने से पैदावार कम होती है। संहत (सघन) विन्यास वाली मृदा में जल और वायु का संचार मुश्किल से होता है। दानेदार (कणीय) विन्यास सर्वोत्तम होता है। चिकनी दोमट एवं दोमट मृदाओं में यह पाया जाता है।

प्रश्न 23.
उर्वरकों के अधिक प्रयोग से भूमि पर होने वाले हानिकारक प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
उर्वरकों के अधिक प्रयोग से मृदा में असन्तुलन की स्थिति उत्पन्न हो गई जिसका प्रभाव प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से मृदा जल एवं कृषि उत्पादों पर पड़ता है।
प्रत्यक्ष प्रभाव-

  1. मृदा अम्लीय व ऊसर हो जाती है।
  2. लाभदायक जीव जन्तु, जैसेकेंचुए, जीवाणु आदि नष्ट हो जाते हैं।
  3. पोषक तत्वों का सन्तुलन बिगड़ जाता है।
  4. कृषि उत्पादों की गुणवत्ता घट जाती है।
  5. मृदा-विन्यास खराब हो जाता है।
  6. मृदा की जल धारण क्षमता कम हो जाती है।

अप्रत्यक्ष कुप्रभाव-

  1. वर्षा जल के साथ उर्वरकों के अंश नदी, तालाब में चले जाते हैं, जो मत्स्य विकास और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं।
  2. फलों, सब्जियों, दलहनों, अनाजों के पोषक तत्वों पर कुप्रभाव से उनके स्वाद व गुणवत्ता में कमी आ जाती है।
  3. अधिक नमी से उर्वरक के कुछ अंश नीचे चले जाते हैं, जिससे भूमिगत जल की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

प्रश्न 24.
भू-क्षरण की परिभाषा दीजिए। जलीय भू-क्षरण के प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भूमि के कणों का अपने मूल स्थान से हटने एवं दूसरे स्थान पर एकत्र होने की क्रिया को भू-क्षरण या मृदा अपरदन कहते हैं। बरसात में जल के द्वारा होने वाले भू-क्षरण को जलीय भू-क्षरण कहते हैं। यह निम्न प्रकार का होता है-

  1. वर्षा-बूंद भू-क्षरण
  2. परत भू क्षरण
  3. अल्पसरिता भू-क्षरण
  4. खड्ड या अवनालिका भू क्षरण
  5. बीहड़ भू-क्षरण
  6. नदी तट भू-क्षरण
  7. समुद्रतट भू-क्षरण
  8. हिमनद भू-क्षरण
  9. भूस्खलन भू-क्षरण जो पहाड़ों पर चट्टानों के खिसकने से होता है जिससे नीचे के खेत, सड़क व बस्तियाँ दब जाती हैं।

 

अद्र्धवार्षिक परीक्षा प्रश्न-पत्र
कक्षा-7
विषय – कृषि विज्ञान

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भूमि का कटाव किस क्रिया द्वारा कम होता है?
उत्तर:
भूमि का कटाव भू-परिष्करण द्वारा कम होता है।

प्रश्न 2.
राइजोबियम बैक्टीरिया मृदा में …………. स्थिर करता है। वाक्य पूर्ण कीजिए।
उत्तर:
राइजोबियम बैक्टीरिया मृदा में नाइट्रोजन स्थिर करता है।

प्रश्न 3.
कंदवाली फसलों के नाम लिखिए।
उत्तर:
शकरकंद, आलू, अरबी, बंडा आदि कंदवाली फसलें हैं।

प्रश्न 4.
वायुमण्डल में नाइट्रोजन कितने प्रतिशत पाया जाता है?
उत्तर:
वायुमण्डल में नाइट्रोजन 78 प्रतिशत पाया जाता है।

प्रश्न 5.
त्वरित भू-क्षरण किसके द्वारा होता है?
उत्तर:
त्वरित भू-क्षरण मनुष्य द्वारा होता है।

प्रश्न 6.
देशी हल का प्रयोग कहाँ होता है?
उत्तर:
देशी हल का प्रयोग मिट्टी की जुताई के लिए होता है।

प्रश्न 7.
मृदा की जैविक उर्वरता बढ़ाने के लिए क्या प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
मृदा की जैव उर्वरक बढ़ाने के लिए नाइट्रोजन का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 8.
मृदा परीक्षण उर्वरता निर्धारण करने की ……………. विधि है। वाक्य पूर्ण कीजिए।
उत्तर:
मृदा परीक्षण उर्वरता निर्धारण करने की एक रासायनिक विधि है।

प्रश्न 9.
बीहड़ (रेवाइन) किन स्थानों पर पाया जाता है?
उत्तर:
बीहड़ (रेवाइन) नदी या नालों के किनारे व आस-पास पाया जाता है।

प्रश्न 10.
ज्वार की खेती किस भूमि पर की जाती है?
उत्तर:
ज्वार की खेती बलुई-दोमट भूमि पर की जाती है।

प्रश्न 11.
अरहर की पैदावार प्रति हेक्टेयर कितनी होती है?
उत्तर:
अरहर की पैदावार प्रति हेक्टेयर 20-25 कुंतल होती है।

प्रश्न 12.
फूलगोभी की अगेती किस्म की नर्सरी की बुआई किस माह में होती है?
उत्तर:
फूल गोभी की अगेती किस्म की नर्सरी की बुआई जून माह में होती है।

प्रश्न 13.
बाजरे की फसल में दीमक का नियंत्रण किस कीटनाशक से करते हैं?
उत्तर:
बाजरे की फसल में दीमक का नियंत्रण BHC 20 EC नामक कीटनाशक से करते हैं।

प्रश्न 14.
कम समय में पकने वाली अरहर की प्रजातियों के नाम बताइए।
उत्तर:
कम समय में पकने वाली अरहर की प्रजातियाँ-

  1. टाइप-21
  2. यू.पी.ए,एस, 120 तथा
  3. प्रभात।

प्रश्न 15.
अरहर की अच्छी फसल के लिए कितनी खाद देनी चाहिए?
उत्तर:
अरहर की अच्छी फसल के लिए 15-20 किग्रा नाइट्रोजन और 40-50 किग्रा फॉस्फोरस देना चाहिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 16.
मृदा में नाइट्रोजन की कमी का पौधों पर प्रभाव बताइए।
उत्तर:
मृदा में नाइट्रोजन की कमी से पौधों में वृद्धि रुक जाती है। पौधों की पत्तियों पीली पड़ जाती हैं। फल छोटे-छोटे और कम हो जाते हैं और पकने से पूर्व गिर जाते हैं।

प्रश्न 17.
जैव उर्वरक क्या है?
उत्तर:
जैव उर्वरक सूक्ष्म कल्चर होते हैं। जो मृदा में नाइट्रोजन बढ़ाने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। कुछ जीव फॉस्फोरस बढ़ाने के लिए प्रयोग किए जाते हैं, तो कुछ कार्बनिक पदार्थ को शीघ्र सड़ाने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। जैव उर्वरक बहुत सस्ते होते हैं। इनका प्रयोग बहुत आसान होता है और इनके प्रयोग में 50 से 80 रु प्रति हेक्टेयर खर्च होता है।

प्रश्न 18.
खाद को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
वे कार्बनिक पदार्थ जिनसे पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति की जाती है, खाद कहलाते हैं। खाद में पौधों के लिए सभी आवश्यक तत्व पाए जाते हैं। कम्पोस्ट की खाद, मल मूत्र व गोबर की सड़ी-गली खाद, जैविक खाद तथा हरी खाद इसके अंतर्गत आती है।

प्रश्न 19.
फूलगोभी के बोने का समय तथा बीज की मात्रा का विवरण दीजिए।
उत्तर:
बुआई का समय तथा बीज की मात्रा-फूलगोभी की विभिन्न किस्मों के बीज की नर्सरी में बुआई का उचित समय निम्न प्रकार है

  1. अगेती किस्में – जून माह में
  2. मध्यम किस्में – जुलाई-अगस्त
  3. पछेती किस्में – सितम्बर-अक्टूबर

अगेती तथा मध्यम किस्मों की एक हेक्टेयर में रोपाई के लिए लगभग 500-600 ग्राम बीज की पौध पर्याप्त होती हैं।

प्रश्न 20.
बाजरे की संकर प्रजातियों, उनके पकने का समय तथा उपज बताइए।
उत्तर:
बाजरे की संकर प्रजातियों में पूसा-322, पूसा-23 व आई. सी. एम. एच. 451 है। इनके पकने में 85-90 दिन लगते हैं। इनसे 25-30 कुंतल उपज प्रति हेक्टेयर होती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 21.
मिश्रित उर्वरक से आप क्या समझते हैं? उसके लाभ एवं हानि बताइए।
उत्तर:
दो या दो से अधिक उर्वरकों के मिश्रण को मिश्रित उर्वरक कहते हैं। मिश्रित उर्वरक तीन मानक (ग्रेड) के होते हैं

(i) कम मानक – इसमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटाश की कम प्रतिशत मात्रा होती है, इसका प्रतिशत योग 14 से कम होता है; जैसे – 2-8 2, 2-4-6 ग्रेड।
(ii) मध्यम मानक – इसमें तीनों को योग 15-25 तक होता है।
(iii) उच्च मानक – इसमें तीनों को योग 25 से अधिक होता है।

लाभ –

  1. किसान सरलता से प्रयोग कर सकता है
  2. इसे सुगमता से रखा जा सकता है।

हानियाँ-

  1. जब मृदा में एक या दो तत्वों की कमी हो, तो प्रयोग लाभकारी नहीं होता है।
  2. इसमें एक तत्व की अधिकता जबकि दूसरे तत्व की कमी होती है।

प्रश्न 22.
नाइट्रोजन उर्वरक का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
नाइट्रोजन उर्वरक का वर्गीकरण- रासायनिक आधार पर नाइट्रोजन उर्वरकों को निम्न वर्गों में बाँटा गया है
(i) नाइट्रेट उर्वरक-

  • (क) सोडियम नाइट्रेट- 16% नाइट्रोजन
  • (ख) कैल्सियम नाइट्रेट 15% नाइट्रोजन उर्वरकों का प्रयोग खड़ी फसल में छिड़काव के रूप में किया जाता है।

(ii) अमोनियम उर्वरक-

  • (क) अमोनियम सल्फेट- 20% नाइट्रोजन
  • (ख) डाई अमोनियम फॉस्फेट 18% नाइट्रोजन। नाइट्रोजन अमोनियम रूप में मिलता है। इन उर्वरकों को मिट्टी में मिलाया जाता है।

(iii) अमोनियम और नाइट्रेट उर्वरक-

  • (क) अमोनियम नाइट्रेट 33.5% नाइट्रोजन
  • (ख) अमोनियम सल्फेट नाइट्रेट-26% नाइट्रोजन। इन उर्वरकों को बोआई के समय खेत में मिलाया जाता है।

प्रश्न 23.
निम्नलिखित का मिलान कीजिए- ( मिलान करके)
(i) ज्वार – (क) वी. के. 560
(ii) बाजरा – (ख) मऊरानीपुर
(iii) उकठा रोग – (ग) सरकोस्पोरा फर्फेद
(iv) पत्ती का धब्बा रोग – (घ) फ्यूजेरियम उडम फर्कैद
(v) अरहर – (ङ) दलहनी फसल
(vi) गेहूँ। – (च) वर्षा ऋतु की फसल
(vii) धान – (छ) रबी की फसल
उत्तर:
(i)  (ख) मऊरानीपुर
(ii) (क) वी. के. 560
(iii) (घ) फ्यूजेरियम उडम फर्कैद
(iv) (ग) सरकोस्पोरा फर्फेद
(v) (ङ) दलहनी फसल
(vi) (छ) रबी की फसल
(vii) (च) वर्षा ऋतु की फसल

 

वार्षिक परीक्षा प्रश्न पत्र
कक्षा-7 
विषय – कृषि विज्ञान

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फल तथा सब्जियों को बिना खराब हुए कितने दिनों तक सुरक्षित रखा जा सकता
उत्तर:
इन्हें परिरक्षक द्वारा बहुत दिनों तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

प्रश्न 2.
प्राकृतिक आपदा किन-किन रूपों में आती हैं?
उत्तर:
प्राकृतिक आपदा बाढ़, सूखा, भू-स्खलन, सुनामी आदि रूपों में आती है।

प्रश्न 3.
बोतल बंदी में पात्र को खौलते पानी में क्यों उबालते हैं?
उत्तर:
उबालने से पात्र के अन्दर और बाहर के जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 4.
किन्हीं तीन लताओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
तीन लताओं के नाम-

  1. वोगन वीलिया
  2. ऐंटीगोनन लेप्टोपस
  3. बिगनोनियां

प्रश्न 5.
स्क्वैश किससे तैयार किया जाता है?
उत्तर:
स्क्वैश नींबू से तैयार किया जाता है।

प्रश्न 6.
बैक्टीरिया तथा कवक किस ताप पर नष्ट हो जाते हैं?
उत्तर:
बैक्टीरिया तथा कवक 71.4°C ताप पर नष्ट हो जाते हैं?

प्रश्न 7.
फलों में रंग परिवर्तन किसके कारण होता है?
उत्तर:
फलों में रंग परिवर्तन एंजाइम के कारण होता है।

प्रश्न 8.
कायिक प्रवर्धन के कितने तरीके हैं?
उत्तर:
कायिक प्रवर्धन के दो तरीके हैं-

  1. कलम लगाना
  2. दाब लगाना।

प्रश्न 9.
केले का जन्म स्थान कहाँ माना जाता है?
उत्तर:
मलाया।

प्रश्न 10.
नाशपाती के लिए कैसी जलवायु होनी चाहिए?
उत्तर:
शीतोष्ण जलवायु।

प्रश्न 11.
फलों और सब्जियों में परिरक्षक के रूप में किस रसायन का उपयोग किया जाता है?
उत्तर:
पोटैशियम मेटाबाईसल्फाइट, सोडियम बेंजोएट, सोडियम मेटाबाई सल्फाइट।

प्रश्न 12.
नाशपाती के वृक्ष पर फल कब लगते हैं?
उत्तर:
5 से 8 वर्ष में।

प्रश्न 13.
प्रत्येक साल फल देने वाली आम की कौन-सी प्रजाति है?
उत्तर:
आम्रपाली और मल्लिका।

प्रश्न 14.
ऊतक कोशिकाएँ विभाजन द्वारा किसका निर्माण करती हैं?
उत्तर:
कैलस (Callus) का।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 15.
बाढ़ आने के क्या कारण हो सकते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वनों की अंधाधुंध कटाई तथा बड़े-बड़े उद्योगों द्वारा अत्यधिक मात्रा में कार्बन डाइ ऑक्साइड गैस छोड़े जाने के कारण पृथ्वी के ताप में अत्यधिक वृद्धि होती है जिससे पहाड़ों की बर्फ पिघलने लगती है और बाढ़ का कारण बनती है।

प्रश्न 16.
पोटैशियम मेटाबाई सल्फाइड क्या है? इसकी प्रयोग विधि बताइए।
उत्तर:
यह एक रवेदार गंधक लवण है, यह अम्लीय व क्षारीय माध्यम से प्रभावित नहीं होता है फलों के रसों में उपस्थित सिट्रिक अम्ल के प्रभाव से पोटैशियम साइट्रेट में बदल जाता हैं। सल्फर डाइऑक्साइड गैस पानी से मिलकर सल्फ्यूरिक अम्ल बनाती है, जो परिरक्षक का कार्य करती है।

प्रश्न 17.
भू-स्खलन के क्या कारण हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कभी-कभी कोयले की खानों से अत्यधिक मात्रा में खनिज पदार्थ निकाल लिए जाते हैं, जिससे उसका आधार समाप्त हो जाता है और जमीन धंसने लगती है। इसके अतिरिक्त वर्षा या बाढ़ आने पर बड़ी-बड़ी नदियों के किनारे भारी मात्रा में कटाव हो जाने से भी भू-स्खलन होता है।

प्रश्न 18.
प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा के क्या उपाय हैं?
उत्तर:
प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा के निम्नलिखित उपाय हैं

  1. अधिकाधिक वृक्षारोपण।
  2. वनों का संरक्षण।
  3. उद्योगों से निकली कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा घटाना।
  4. आपदाओं के संबंध में पूर्व सूचना मिलना।
  5. आपदाओं से संबंधित सूचनाओं को प्रसारण।
  6. सूखा प्रभावित क्षेत्रों में बाँध बनाना, जलाशयों को गहरा करना।
  7. सिंचाई के लिए नहरें बनाना, बिजली पैदा करना।

प्रश्न 19.
निम्नलिखित का मिलान कीजिए
(i) गुलमोहर – (क) लतर
(ii) चमेली – (ख) अलंकृत पौधा
(iii) केला – (ग) मौसमी पौधा
(iv) गेंदा – (घ) फल का पौधा
उत्तर:
(i) (ख) अलंकृत पौधा
(ii) (क) लतर
(iii) (घ) फल का पौधा
(iv) (ग) मौसमी पौधा

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 20.
बीज प्रवर्धन किसे कहते हैं? इन प्रवर्धनों से होनेवाले लाभ तथा हानियों के बारे में लिखिए।
उत्तर:
बीज द्वारा जब बहुत से पौधे तैयार किए जाते हैं, तब हम इस क्रिया को बीज प्रवर्धन कहते हैं।
बीज प्रवर्धन के लाभ

  1. पेड़ अधिक ऊँचे तथा फैलने वाले होते हैं।
  2. पेड़ों की आयु अधिक होती है।
  3. पेड़ बहुत मजबूत होते हैं
  4. बीमारियों तथा मौसम के प्रकोप को सहन करने की इनमें शक्ति होती है।
  5. प्रति पेड़ उपज अधिक होती है।
  6. यह सबसे सरल एवं सस्ती विधि हैं।

बीज प्रवर्धन से हानि

  1. पौधे मातृ वृक्ष के समान नहीं होते हैं।
  2. वृक्ष अधिक ऊँचा होने के कारण फलो की तुड़ाई में कठिनाई होती है।
  3. फल अच्छी गुणवत्ता वाले नहीं होते हैं।
  4. फल देर से लगता है।

प्रश्न 21.
आँवले का मुरब्बा कैसे बनाया जाता है?
उत्तर:
सर्वप्रथम आँवले को धोकर स्टील के काँटों से गोदते हैं। 20% फिटकरी के उबलते घोल में 5-10 मिनट पकाते हैं। भगौने में एक किलोग्राम आँवले के लिए डेढ़ किलोग्राम चीनी डालते हैं। पहले भगौने में चीनी की तह, फिर आँवले की तह लगाते जाते हैं। आँवले को चीनी की तहों में चौबीस घंटे रखते हैं। दूसरे दिन आँवले निकाल कर चीनी की चाशनी बनाकर आँवलों को चौबीस घंटे उसमें छोड़ देते हैं। तीसरे दिन आँवले निकालकर चीनी को 70 % करने के लिए पकाते हैं। आँवले गर्म चाशनी में डाल देते हैं। 20-25 दिन में मुरब्बा खाने योग्य हो जाता है।

प्रश्न 22.
वृक्षारोपण से आप क्या समझते हैं? इसका क्या महत्त्व है?
उत्तर:
वृक्षारोपण के अंतर्गत फलों के अलावा कुछ विशेष स्थानों पर विशेष प्रकार के वृक्ष । लगाए जाते हैं जो उपयोगी होते हैं। वृक्षारोपण को प्रोत्साहन देने के लिए वन महोत्सव जैसे कार्यक्रम प्रचलित किए गए हैं। हमारे जीवन निर्वाह के लिए वृक्षारोपण के महत्त्व
निम्न प्रकार हैं

  • वृक्ष हमें फल देते हैं।
  • वृक्षारोपण से हमें इमारती, फर्नीचर तथा ईंधन की लकड़ी मिलती है।
  • पेड़ हमें हरियाली, छाया व पर्यावरण सुरक्षा देते हैं।
  • प्राकृतिक सौंदर्य की वृद्धि और वर्षा में सहायक है।
  • बाढ़ और भू-क्षरण को रोकते हैं।
  • प्राणवायु (ऑक्सीजन) उपलब्ध कराते हैं।

प्रश्न 23.
नींबू अथवा सन्तरा स्कवैश बनाने की विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
नींबू का स्क्वैश बनाना – ताजे नींबू धोकर, छिलका उतारकर जूसर से जूस निकालते हैं और छलनी से छानते हैं।

आवश्यक सामग्री – नींबू रस – 1 लीटर, पानी – 2 ली, चीनी – 2 किग्रा, सिट्रिक अम्ल – 10 ग्राम, पोटैशियम मेटाबाई सल्फाइट – 3 ग्राम

विधि – स्टील के भगौने में पानी में चीनी डालकर गर्म करते हैं और बीच-बीच में रस को चलाते रहते हैं। एक उबाल पर उतारकर चाशनी ठंडी होने पर नींबू का रस और पौटेशियम मेटाबाई सल्फाइट को मिला दिया जाता है। परिरक्षक पहले थोड़े पानी में घोलते हैं, तब जूस में मिलाते हैं। स्क्वैश तैयार होने पर बोतल में 3 सेमी जगह छोड़कर भरते हैं और ढक्कन लगाकर सील कर देते हैं।

We hope the UP Board Class 7 Agricultural Science Model Paper (कृषि विज्ञान), help you. If you have any query regarding UP Board Class 7 Agricultural Science Model Paper (कृषि विज्ञान), drop a comment below and we will get back to you at the earliest.

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 3 Theory of Price Determination

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 3 Theory of Price Determination (मूल्य-निर्धारण का सिद्धान्त) are part of UP Board Solutions for Class 12 Economics. Here we have given UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 3 Theory of Price Determination (मूल्य-निर्धारण का सिद्धान्त).

Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 12
Subject Economics
Chapter Chapter 3
Chapter Name Theory of Price Determination (मूल्य-निर्धारण का सिद्धान्त)
Number of Questions Solved 24
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 3 Theory of Price Determination (मूल्य-निर्धारण का सिद्धान्त)

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (6 अंक)

प्रश्न 1
“किसी वस्तु का बाजार मूल्य माँग व पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों द्वारा निर्धारित होता है।” रेखाचित्र सहित व्याख्या कीजिए।
या
“जिस प्रकार हम इस बात पर विवाद कर सकते हैं कि कागज के एक टुकड़े को कैंची का ऊपर वाला या नीचे वाला फलक काटता है, उसी प्रकार हम इस बात पर भी विवाद कर सकते हैं कि मूल्य का निर्धारण तुष्टिगुण द्वारा होता है या उत्पादन लागत द्वारा।” मार्शल के इस कथन की व्याख्या कीजिए।
या
रेखाचित्र द्वारा कीमत-निर्धारण के सामान्य सिद्धान्त की विवेचना कीजिए। [2011]
उत्तर:
किसी वस्तु का मूल्य मुद्रा में निर्धारित करने के विषय में विभिन्न अर्थशास्त्रियों में मतभेद रहा है। परम्परावादी अर्थशास्त्री प्रो० एडम स्मिथ, रिकाड, माल्थस व मिल आदि मूल्य के निर्धारण में उत्पादन लागत को तथा ऑस्ट्रियन अर्थशास्त्री प्रो० जेवेन्स, मैन्जर तथा वालरस आदि तुष्टिगुण को अधिक महत्त्व प्रदान करते थे; परन्तु प्रो० मार्शल ने मूल्य के निर्धारण में समन्वयवादी दृष्टिकोण अपनाया तथा मूल्य के निर्धारण का सामान्य सिद्धान्त, जिसे माँग और पूर्ति का नियम (Law of Demand and Supply) या आधुनिक सिद्धान्त (Modern Theory) कहते हैं, प्रस्तुत किया। इस सिद्धान्त के अनुसार, ‘मूल्य के निर्धारण’ में माँग (तुष्टिगुण) और पूर्ति (उत्पादन लागत) दोनों ही शक्तियों का हाथ होता है। इन दोनों के परस्पर प्रभाव द्वारा कीमत का निर्धारण उस बिन्दु पर होता है। जहाँ दोनों की सापेक्ष स्थिति समान होती है अर्थात् जहाँ माँग और पूर्ति मात्रा के बराबर होती हैं। इस बिन्दु को सन्तुलन बिन्दु कहते हैं। इस बिन्दु पर जो कीमत निश्चित होती है उसे सन्तुलित कीमत (Equilibrium Price) कहते हैं।

1. माँग पक्ष की व्याख्या – किसी वस्तु की कीमत के निर्धारण में माँग पक्ष से सम्बन्धित दो प्रश्न उठते हैं

  •  क्रेता किसी वस्तु के लिए कीमत क्यों देता है?
  • क्रेता किसी वस्तु के लिए अधिक-से-अधिक कितनी कीमत दे सकता है?

क्रेता की वस्तु के उपयोग से आवश्यकता की पूर्ति होती है, इसी कारण वह वस्तु के लिए कीमत देने को तैयार रहता है। वस्तु की आवश्यकता जितनी अधिक तीव्र होती है, क्रेता उसके लिए उतनी ही अधिक कीमत देने के लिए तत्पर रहता है, क्योंकि उसे वस्तु से उतना ही अधिक तुष्टिगुण मिलता है। क्रेता किसी वस्तु की अधिक-से-अधिक कितनी कीमत देने को तैयार हो जाएगा, यह आवश्यकता की तीव्रता पर निर्भर करता है; परन्तु सीमान्त तुष्टिगुण ह्रास नियम के अनुसार, किसी वस्तु की अधिकाधिक इकाइयों से मिलने वाला तुष्टिगुण क्रमशः घटता जाता है। अतः कोई भी क्रेता किसी वस्तु की अधिक-से-अधिक सीमान्त तुष्टिगुण के बराबर कीमत दे सकता है। क्रेता वस्तु की जितनी भी इकाइयाँ खरीदता है वे रूप और गुण में समान होती हैं; अत: वह वस्तु की प्रत्येक इकाई के लिए एक ही अर्थात् सीमान्त तुष्टिगुण के बराबर कीमत देता है। इस प्रकार किसी वस्तु की माँग तथा कीमत, सीमान्त तुष्टिगुण द्वारा निश्चित होती है। यह क्रेता द्वारा दी जाने वाली मूल्य की अधिकतम सीमा होती है।

2. पूर्ति पक्ष की व्याख्या – माँग पक्ष की भाँति ही पूर्ति के विषय में भी दो प्रश्न उठते हैं

  •  विक्रेता अपनी वस्तु के लिए कीमत क्यों माँगता है ?
  •  विक्रेता अपनी वस्तु के लिए कम-से-कम कितनी कीमत ले सकता है ?

वस्तुओं के उत्पादन में कुछ-न-कुछ व्यय अवश्य करना पड़ता है। इसलिए विक्रेता अपनी वस्तु के लिए कीमत माँगता है। कोई भी उत्पादक अपंना माल हानि पर अर्थात् उत्पादन व्यय से कम कीमत पर नहीं बेचना चाहता। वह हर सम्भव प्रयास करता है कि उसे अधिकाधिक कीमत मिले, परन्तु किसी भी दशा में वह उत्पादन लागत व्यय से कम कीमत पर अपना माल बेचने के लिए तैयार नहीं होता। उत्पादन लागत से तात्पर्य ।
UP Board Solutions for Class 12 Economics Chapter 3 Theory of Price Determination 121
सीमान्त लागत (Marginal Cost) से है। अत: वस्तु का निम्नतम पूर्ति मूल्य, वस्तु की सीमान्त लागत के बराबर चावल की माँग व पूर्ति की मात्राएँ (क्विटलों में) होगा। यह वस्तु की कीमत की न्यूनतम सीमा होती है। इस कीमत से कम पर विक्रेता अपनी वस्तु बेचने के लिए तैयार नहीं हो सकता।

3. माँग और पूर्ति का सन्तुलन – मॉग पक्ष अथवा क्रेताओं की दृष्टि से किसी वस्तु की कीमत सीमान्त तुष्टिगुण से अधिक नहीं हो सकती। किसी भी दशा में वे सीमान्त तुष्टिगुण से अधिक कीमत देने के लिए तैयार नहीं होते। दूसरी ओर विक्रेता अथवा पूर्ति पक्ष अपनी वस्तु की न्यूनतम कीमत सीमान्त उत्पादन लागत व्यय से कम लेने को तैयार नहीं होते हैं। अत: कीमत दोनों सीमाओं (अधिकतम और न्यूनतम) के बीच माँग और पूर्ति की सापेक्ष शक्तियों के प्रभाव के अनुसार निर्धारित होती है अर्थात् कीमत माँग और पूर्ति की शक्तियों द्वारा सीमान्त तुष्टिगुण द्वारा निर्धारित अधिकतम और सीमान्त लागत व्यय द्वारा निर्धारित न्यूनतम सीमा के बीच कहीं पर निश्चित होगी। क्रेता कम-से-कम कीमत देना चाहेगा और विक्रेता अधिक-से-अधिक कीमत प्राप्त करना चाहेगा। इस क्रम में जिस पक्ष की स्थिति सुदृढ़ होगी, कीमत उसके पक्ष में होगी। इस स्थिति में कीमत ऊपर-नीचे होती रहेगी और अन्त में यह उस बिन्दु पर निश्चित होगी जहाँ माँग और पूर्ति की मात्राएँ बराबर होंगी। यही स्थिति साम्य अथवा सन्तुलन की स्थिति कहलाती है।

इस प्रकार बाजार में कीमत गेंद की तरह इधर-उधर लुढ़कती रहेगी, परन्तु अन्त में वह सन्तुलन बिन्दु पर ही निर्धारित होगी। इस प्रकार पूर्ण प्रतियोगिता की दशा में साम्य की स्थिति में – कीमत = सीमान्त तुष्टिगुण = सीमान्त लागत।

उपर्युक्त विवेचन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वस्तु के मूल्य के निर्धारण में माँग और पूर्ति दोनों का ही महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनमें से कोई एक, दूसरे की सहायता के बिना स्वयं मूल्य निर्धारित नहीं कर सकता। मूल्य-निर्धारण में माँग व पूर्ति के सापेक्षिक महत्त्व को स्पष्ट करते हुए प्रो० मार्शल ने बताया है कि जिस प्रकार हम इस बात पर विवाद कर सकते हैं कि कागज के एक टुकड़े को कैंची को ऊपर वाला या नीचे वाला फलक काटता है, उसी प्रकार हम इस बात पर भी विवाद कर सकते हैं कि मूल्य का निर्धारण तुष्टिगुण द्वारा होता है या उत्पादन लागत द्वारा।”

प्रो० मार्शल के अनुसार, मूल्य-निर्धारण का सामान्य सिद्धान्त यह बताता है कि वस्तु का मूल्य सीमान्त तुष्टिगुण तथा सीमान्त उत्पादन व्यय के बीच में माँग और पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों द्वारा उस स्थान पर निर्धारित होता है जहाँ वस्तु की पूर्ति उसकी माँग के बराबर होती है।
कीमत-निर्धारण के उपर्युक्त सिद्धान्त को एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। किसी समय बाजार में चावल की माँग एवं पूर्ति को निम्नलिखित तालिका में दर्शाया गया है
माँग और पर्ति तालिका

चावल की माँग की मात्रा चावल का मूल्य प्रति क्विटल(₹ में) वस्तु की पूर्ति की मात्रा (किंवटल में)
500 1,200 1,300
700 1,000 1,000
900 800 900
1,000 600 700
1,300 400 500

माँग और पूर्ति की दी गयी तालिका मॉग और पूर्ति के नियम के अनुसार है। इस तालिका से स्पष्ट है कि कीमत बढ़ने पर माँग घट जाती है, किन्तु पूर्ति बढ़ जाती है। इसके विपरीत कीमत घट जाने पर माँग बढ़ जाती है और पूर्ति घट जाती है। साम्य की स्थिति में चावल की कीमत में ₹ 800 प्रति क्विटल होगी, क्योंकि इस कीमत पर ही माँग और पूर्ति की मात्राएँ समान हैं। यही कीमत सन्तुलित कीमत है। उपर्युक्त उदाहरण को रेखाचित्र द्वारा भी स्पष्ट किया जा सकता है।

रेखाचित्र द्वारा स्पष्टीकरण
इस रेखाचित्र में अ ब रेखा पर चावल की माँग एवं पूर्ति और अ स रेखा पर चावल की कीमत दिखायी गयी है। उपर्युक्त तालिका में दिये गये आँकड़ों के आधार पर माँग और पूर्ति वक्र खींचे गये हैं। म म’ माँग वक्र और प प पूर्ति वक्र हैं। ये दोनों वक्र एक-दूसरे को स बिन्दु पर काटते हैं। यही सन्तुलन बिन्दु है, क्योंकि इस बिन्दु पर माँग और पूर्ति की मात्राएँ बराबर हैं। कीमत के क’ के बराबर है।

प्रश्न 2
मूल्य के निर्धारण में समय तत्त्व के महत्त्व की व्याख्या कीजिए। विभिन्न समयावधि में मूल्य के निर्धारण में मॉग और पूर्ति की भूमिका की व्याख्या कीजिए।
या
कीमत-निर्धारण में समय तत्त्व की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रो० मार्शल प्रथम अर्थशास्त्री थे जिन्होंने मूल्य के निर्धारण में समय के महत्त्व पर विशेष बल दिया। उनके अनुसार, समयावधि मूल्य के निर्धारण पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालती है। किसी वस्तु का मूल्य उसकी माँग और पूर्ति से निर्धारित होता है। मूल्य के निर्धारण में माँग और पूर्ति दोनों में किसकी महत्त्व अधिक है, यह समय या अवधि पर आधारित होता है। मूल्य के निर्धारण में माँग पक्ष अधिक प्रभावशाली होगा अथवा पूर्ति पक्ष, यह इस बात पर निर्भर होगा कि बाजार में माँग और पूर्ति को एक-दूसरे के साथ समायोजित होने के लिए कितना समय मिलता है। ऐसा इसलिए होता है कि पूर्ति की दशाएँ समयावधि के साथ बदलती रहती हैं। साधारणतया समयावधि जितनी लम्बी होती है, पूर्ति का प्रभाव उतना ही अधिक होता है और समयावधि जितनी छोटी होती है, उतना ही माँग का प्रभाव अधिक होता है।

कीमत के निर्धारण पर समय के प्रभाव को स्पष्ट करने के लिए प्रो० मार्शल ने बाजार का वर्गीकरण इस प्रकार किया है

  1. अति-अल्पकालीन बाजार,
  2. अल्पकालीन बाजार,
  3. दीर्घकालीन बाजार,
  4. अति-दीर्घकालीन बाजार।

1. अति-अल्पकाल में मूल्य-निर्धारण – अति-अल्पकाल उस स्थिति को बताता है जिसमें पूर्ति लगभग स्थिर रहती है। समय इतना कम होता है कि माँग के बढ़ने पर अधिक उत्पादन नहीं किया जा सकता, इसलिए पूर्ति मात्र स्टॉक तक ही सीमित होती है। पूर्ति के लगभग स्थिर होने के कारण कीमत माँग के द्वारा निर्धारित की जाती है। यदि माँग में वृद्धि होती है तो कीमत बढ़ जाती है और यदि माँग घट जाती है तो कीमत कम हो जाती है। अति-अल्पकालीन बाजार में कीमत माँग और पूर्ति के अस्थायी सन्तुलन का परिणाम होती है, इस कारण मूल्य के निर्धारण में ‘माँग’ का प्रभाव अधिक होता है।

2. अल्पकाल में मूल्य-निर्धारण – अल्पकाल वह अवधि है जिसमें पूर्ति पूर्णतया निश्चित नहीं होती। उसमें कुछ परिवर्तन किया जा सकता है, परन्तु उसे माँग के अनुसार नहीं बढ़ाया जा सकता। केवल अल्पकाल में परिवर्तनशील साधन; जैसे – श्रम, कच्चा माल, शक्ति के साधनों आदि की मात्रा में वृद्धि करके उत्पादन में कुछ वृद्धि की जा सकती है, इसलिए पूर्ति पूर्णतया अनिश्चित होती है; अत: उसे माँग के बराबर नहीं बढ़ाया जा सकता, क्योंकि मशीनों की उत्पादन क्षमता निश्चित होती है और इतने कम समय में नई ‘फर्मे भी उद्योग में प्रवेश नहीं कर सकतीं। अत: अल्पकाल में भी कीमत के निर्धारण में मुख्य प्रभाव माँग का रहता है, क्योंकि पूर्ति में अधिक परिवर्तन करना सम्भव नहीं होता।।

3. दीर्घकाल में मूल्य – निर्धारण दीर्घकाल में इतना पर्याप्त समय होता है कि वस्तु की पूर्ति को घटा-बढ़ाकर माँग के अनुसार किया जा सकता है। इसमें इतना समय मिल जाता है कि उत्पत्ति के सभी साधनों में परिवर्तन किया जा सकता है। दीर्घकाल में किसी वस्तु की पूर्ति को वर्तमान मशीनों की क्षमता को बढ़ाकर या उद्योग में नई फर्मों के प्रवेश के द्वारा बढ़ाया जा सकता है। इसी प्रकार मशीनों की क्षमता को कम करके या उद्योगों से कुछ फर्मों के बहिर्गमन के द्वारा पूर्ति को घटाया जा सकता है। इसलिए कीमत पर माँग का प्रभाव बहुत कम हो जाता है तथा कीमत का निर्धारण अधिकांश रूप से पूर्ति की शक्तियों के द्वारा होता है। दीर्घकाल में किसी वस्तु की कीमत उसकी उत्पादन लागत से बहुत ऊपर अथवा बहुत नीचे नहीं रह सकती है। दीर्घकालीन कीमत माँग और पूर्ति के बीच स्थायी और स्थिर सन्तुलन की परिणाम होती है। अत: दीर्घकालीन कीमत को दीर्घकालीन सामान्य कीमत भी कहा जाता है।

4. अति-दीर्घकाल में मूल्य-निर्धारण – जबे समय इतना अधिक लम्बा हो कि उसमें माँग और पूर्ति की परिस्थितियाँ ही बदल जाएँ तो उसे दीर्घकाल कहते हैं। दीर्घकाल में मूल्य के निर्धारण में पूर्ति पक्ष का प्रभाव अधिक रहता है।

प्रो० मार्शल के अनुसार, “सामान्यतः काल जितना अल्प होता है, कीमत पर माँग का प्रभाव उतना ही अधिक होता है और काल जितना ही दीर्घ होता है, कीमत पर लागत (पूर्ति) का प्रभाव उतना ही अधिक होता है।” मत के निर्धारण के सम्बन्ध में यह बात लागू नहीं होती है कि कीमत का निर्धारण कुछ परिनिया में केवल माँग द्वारा होता है और कुछ अन्य परिस्थितियों में अकेले पूर्ति द्वारा।
प्रो० मार्शल के अनुसार, “जिस प्रकार कागज काटने के लिए कैंची के दोनों फलकों का उपयोग आवश्यक है, ठीक उसी प्रकार कीमत-निर्धारण में माँग और पूर्ति दोनों की ही आवश्यकता होती है। यह सत्य है कि समय जितना अल्प होगा, उतना ही मूल्य के ऊपर माँग का प्रभाव अधिक होगा। इसके विपरीत समय जितना अधिक होगा, वस्तु के मूल्य पर पूर्ति का प्रभाव उतना ही अधिक होगा।’

लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1
माँग, मूल्य व पूर्ति की पारस्परिक निर्भरता यो सम्बन्ध को समझाइए।
उत्तर:
माँग, मूल्य और पूर्ति के सम्बन्ध को निम्नवत् स्पष्ट किया जा सकता है

1. मूल्य, माँग व पूर्ति पर निर्भर रहता है – जिस प्रकार कागज काटने के लिए कैंची के दोनों फलकों का उपयोग आवश्यक है, ठीक उसी प्रकार कीमत (मूल्य) के निर्धारण में माँग और पूर्ति दोनों की ही आवश्यकता होती है। उनके परस्पर प्रभाव द्वारा मूल्य का निर्धारण उस बिन्दु पर होता है जहाँ पर दोनों की सापेक्ष स्थिति एक-सी होती है अर्थात् जहाँ पर माँग और पूर्ति दोनों ही मात्रा में बराबर होती हैं। इस प्रकार कहा जाता है कि मूल्य की स्थिति माँग व पूर्ति पर निर्भर करती है।

2. मॉग, मूल्य व पूर्ति पर – माँग और मूल्य में घनिष्ठ सम्बन्ध है। किसी वस्तु को खरीदने और व्यय करने की तत्परता (Willingness) पर मूल्य का बड़ा प्रभाव पड़ता है। कोई व्यक्ति वस्तु की कितनी मात्रा खरीदेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वस्तु का बाजार में कितना मूल्य है। जब हम कहते हैं कि बाजार में गेहूं की माँग एक हजार क्विटल है तो हमें इसके साथ यह भी बताना चाहिए कि यह माँग किस मूल्य पर है। माँग और मूल्य के घनिष्ठ सम्बन्ध के कारण ही यह कहा जाता है कि माँग से अभिप्राय वस्तु की उस मात्रा से है जो किसी निश्चित समय में किसी एक विशेष कीमत पर खरीदी जाएगी। इस प्रकार बिना मूल्य के माँग अर्थहीन है।

माँग, पूर्ति पर भी निर्भर रहती है। माँग और पूर्ति में घनिष्ठ सम्बन्ध है। कोई व्यक्ति वस्तु की कितनी मात्रा खरीदेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वस्तु की बाजार में कितनी पूर्ति है। बिना पूर्ति के माँग का कोई अर्थ नहीं होता। जब हम कहते हैं कि बाजार में गेहूं की माँग एक हजार क्विटल है तो हमें उसके साथ यह भी बताना चाहिए कि इस मूल्य पर वस्तु की कितनी पूर्ति है।
इस प्रकार स्पष्ट है कि वस्तु की माँग, मूल्य व वस्तु की पूर्ति पर निर्भर रहती है कि वस्तु कितनी मात्रा में खरीदी जाएगी।

3. पूर्ति, मूल्य व माँग पर – किसी वस्तु का उत्पादन कितनी मात्रा में किया जाए, यह वस्तु की माँग पर निर्भर करता है। उपभोक्ताओं की रुचि, फैशन तथा आय पर वस्तु की माँग निर्भर रहती है। लोग जितनी अधिक वस्तुओं की माँग करेंगे, वस्तु का मूल्य उतना ही अधिक होगा; अत: उत्पादक लाभ अर्जित करने के उद्देश्य से वस्तुओं का अधिक उत्पादन करेंगे जिसके कारण वस्तुओं की पूर्ति बढ़ेगी। कीन्स का रोजगार सिद्धान्त प्रभावपूर्ण माँग सिद्धान्त पर आधारित है। माँग जितनी अधिक होगी, वस्तुओं का उत्पादन या पूर्ति उतनी ही अधिक होगी। इस प्रकार माँग पूर्ति को प्रभावित करती है।
पूर्ति और मूल्य का घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। किसी वस्तु की पूर्ति साधारणतया कीमत पर निर्भर होती है। कीमत बढ़ने पर पूर्ति भी बढ़ जाती है और कीमत घटने पर पूर्ति भी घट जाती है। अर्थशास्त्र में पूर्ति का अभिप्राय वस्तु की उस मात्रा से होता है जो किसी समय एक मूल्य-विशेष पर बिकने आती है। अंतः बिना मूल्य का उल्लेख किये पूर्ति का कोई अर्थ नहीं होता। इस प्रकार स्पष्ट है कि वस्तु की पूर्ति वस्तु की मॉग व मूल्य पर निर्भर होती रहती है।

प्रश्न 2
सामान्य मूल्य की परिभाषा तथा विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
अर्थशास्त्र में सामान्य मूल्य से आशय है किसी वस्तु का वह मूल्य जो वस्तु की माँग व पूर्ति की। स्थायी शक्तियों द्वारा दीर्घकाल में निश्चित होता है। यह माँग व पूर्ति के स्थायी साम्य का परिणाम होता है। यह मूल्य दीर्घकाल तक रहता है; अत: यह मूल्य स्थिर रहता है तथा लागत मूल्य के बराबर होता है।

परिभाषा – मार्शल के अनुसार, “किसी निश्चित वस्तु का सामान्य मूल्य वह है जो कि अधिक शक्तियों द्वारा दीर्घकाल में निर्धारित होता है। इस मूल्य पर माँग की अपेक्षा पूर्ति का अधिक प्रभाव होता है, क्योंकि दीर्घकाल में पूर्ति में परिवर्तन लाया जा सकता है।

सामान्य मूल्य के निम्नलिखित लक्षण या विशेषताएँ हैं

1. यह दीर्घकाल में होता है – माँग और पूर्ति के सन्तुलन का परिणाम दीर्घकाल में होने के कारण इसे दीर्घकालीन मूल्य कहते हैं।

2. सामान्य मूल्य के निर्धारण में पूर्ति का अधिक महत्त्व होता है – इस पर माँग की अपेक्षा पूर्ति का अधिक प्रभाव हैं, क्योंकि दीर्घकाल में पूर्ति को माँग के अनुसार घटाया-बढ़ाया जा सकता है।

3. मॉग व पूर्ति के सन्तुलन का स्थायी परिणाम होता है – दीर्घकाल में पूर्ति को माँग के साथ समन्वय का पूरा समय मिल जाता है। इस कारण यह माँग व पूर्ति के स्थायी साम्य का परिणाम होता है।

4. यह सीमान्त व औसत लागत के बराबर होता है – दीर्घकाल में समयावधि इतनी लम्बी होती है कि सीमान्त लागत औसत लागत के बराबर हो जाती है। अत: सामान्य मूल्य सीमान्त व औसत दोनों लागतों के बराबर होता है।

5. यह काल्पनिक होता है – यह व्यावहारिक जीवन में सम्भव नहीं होता है। यह केवल काल्पनिक होता है।

6. यह मूल्य स्थिर रहता है – इसके मूल्य में बाजार मूल्य की तरह परिवर्तन नहीं होते। यह स्थायी रहता है।

7. सामान्य मूल्य धुरी के समान होता है – इस मूल्य के चारों ओर बाजार मूल्य चक्कर काटा करता है। अतः यह धुरी के समान होता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1
बाजार मूल्य एवं सामान्य मूल्य में अन्तर बताइए। [2016]
उत्तर:
बाजार मूल्य एवं सामान्य मूल्य में अन्तर

क्र० सं० बाजार मूल्य सामान्य मूल्य
1. अल्पकालीन मूल्य होता है। सामान्य मूल्य दीर्घकालीन मूल्य होता है।
2. इसमें परिवर्तन होते रहते हैं। यह अस्थायी होता है।
3. यह माँग व पूर्ति के अस्थायी प्रभाव का परिणाम होता है। यह माँग और पूर्ति के स्थायी साम्य का परिणाम होता है।
4. यह वास्तविक जीवन में पाया जाता है। यह काल्पनिक होता है।
5. यह पुनरुत्पादनीय और अपुनरुत्पादनीय दोनों प्रकार की वस्तुओं का होता है। यह केवल पुनरुत्पादनीय वस्तुओं का होता है।
6. यह सामान्य मूल्य के चारों ओर चक्कर काटता रहता है। यह मूल्य धुरी के समान होता है और स्थिर रहता है।
7. यह लागत मूल्य से ऊँचा-नीचा होता रहता है। यह सीमान्त व औसत, दोनों लागतों के बराबर होता है।
8. इस पर माँग का व्यापक प्रभाव होता है। इस पर पूर्ति का अधिक प्रभाव होता है।

प्रश्न 2
बाजार और सामान्य मूल्य में क्या सम्बन्ध है ?
उत्तर:
बाजार मूल्य की प्रवृत्ति सदैव सामान्य मूल्य के बराबर होने की होती है। बाजार मूल्य सामान्य मूल्य के चारों ओर चक्कर काटता रहता है। यह अधिक समय तक सामान्य मूल्य से बहुत नीचा या ऊँचा नहीं रह सकता। सामान्य मूल्य लागत मूल्य के बराबर होता है, किन्तु बाजार मूल्य घटता-बढ़ता रहता है। इतना होते हुए बाजार मूल्य की प्रवृत्ति सदा सामान्य मूल्य की ओर बढ़ने लगती है। यदि बाजार मूल्य सामान्य मूल्य से अधिक ऊँचा हो जाता है तो उत्पादकों को असाधारण लाभ होने लगेगा और वे इस वस्तु का उत्पादन बढ़ाएँगे। दूसरे उत्पादक भी इस वस्तु का उत्पादन करने लगेंगे। वस्तु की पूर्ति माँग के बराबर हो जाएगी और मूल्य गिरकर सामान्य मूल्य के बराबर हो जाएगा।

इसी प्रकार, यदि माँग कम हो जाने के कारण किसी वस्तु का बाजार मूल्य सामान्य मूल्य से नीचा होता है तो उत्पादकों को हानि होने लगेगी। वे इस वस्तु का उत्पादन कम कर देंगे तथा कुछ अन्य उत्पादक भी इसका उत्पादन बन्द कर देंगे। इस प्रकार वस्तु की पूर्ति कम होकर माँग के अनुसार हो जाएगी और बाजार मूल्य सामान्य मूल्य के बराबर हो जाएगा। इस प्रकार मूल्य बार-बार सामान्य मूल्य के बराबर होता रहता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
“मूल्य के निर्धारण में उत्पादन लागत का अधिक महत्त्व रहता है। यह मत किन अर्थशास्त्रियों का है ?
उत्तर:
परम्परावादी अर्थशास्त्री प्रो० एडम स्मिथ, रिकाड, माल्थस व मिल आदि अर्थशास्त्रियों का मत है कि मूल्य-निर्धारण में उत्पादन लागत का अधिक महत्त्व रहता है।

प्रश्न 2
“मूल्य के निर्धारण में तुष्टिगुण अर्थात माँग पक्ष का अधिक महत्त्व रहता है। यह मत किन अर्थशास्त्रियों का था ?
उत्तर:
ऑस्ट्रियन अर्थशास्त्री प्रो० जेवेन्स, मैन्जर तथा वालरस आदि मूल्य के निर्धारण में तुष्टिगुण को अधिक महत्त्व प्रदान करते थे।

प्रश्न 3
प्रो० मार्शल के अनुसार मूल्य-निर्धारण का सामान्य सिद्धान्त क्या है ?
उत्तर:
प्रो० मार्शल के अनुसार मूल्य-निर्धारण का सामान्य सिद्धान्त यह बताता है कि, “वस्तु का मूल्य सीमान्त तुष्टिगुण तथा सीमान्त उत्पादन लागत के बीच में माँग और पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों द्वारा उस स्थान पर निर्धारित होता है, जहाँ वस्तु की पूर्ति उसकी माँग के बराबर होती है।”

प्रश्न 4
बाजार मूल्य की सामान्य प्रवृत्ति क्या होती है ?
उत्तर:
बाजार मूल्य की प्रवृत्ति सदैव सामान्य मूल्य के बराबर होने की होती है। बाजार मूल्य सामान्य मूल्य के चारों ओर चक्कर काटता रहता है।

प्रश्न 5
बाजार मूल्य की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  1. बाजार मूल्य माँग वे पूर्ति के अस्थायी प्रभाव का परिणाम होता है।
  2.  यह लागत मूल्य से ऊँचा-नीचा होता रहता है।

प्रश्न 6
किस प्रकार के बाजार में कीमत के निर्धारण में माँग का प्रभाव अधिक होता है ?
उत्तर:
अति-अल्पकालीन बाजार में पूर्ति निश्चित होने के कारण मूल्य मुख्यतया माँग पर आधारित होता है। अत: अति-अल्पकालीन बाजार में कीमत-निर्धारण में माँग का प्रभाव अधिक होता है।

प्रश्न 7
प्रो० मार्शल ने समय को कितने भागों में बाँटा है ?
उत्तर:
प्रो० मार्शल ने समय को चार भागों में बाँटा है।

प्रश्न 8
किसी वस्तु का बाजार मूल्य किन शक्तियों द्वारा निर्धारित होता है ?
उत्तर:
मॉग और पूर्ति की सापेक्ष शक्तियों द्वारा निर्धारित होता है।

प्रश्न 9
बाजार मूल्य किस प्रकार की वस्तुओं का होता है ?
उत्तर:
केवल भण्डार तक रखी वस्तुओं का अर्थात् जिन वस्तुओं की पूर्ति भण्डार की मात्रा तक बढ़ायी जा सकती है।

प्रश्न 10
सब्जियों के मूल्य के निर्धारण में किस पक्ष की प्रधानता होती है, माँग पक्ष की या पूर्ति पक्ष की ?
उत्तर:
माँग पक्ष की।

प्रश्न 11
कीमत-निर्धारण में समय कितने प्रकार का होता है ?
उत्तर:
कीमत-निर्धारण में समय चार प्रकार का होता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1
वस्तु के मूल्य-निर्धारण में उत्पादन लागत को महत्त्व प्रदान करने वाले अर्थशास्त्री हैं
(क) प्रो० एडम स्मिथ
(ख) रिकाड
(ग) माल्थस व मिल
(घ) ये सभी
उत्तर:
(घ) ये सभी।

प्रश्न 2
वस्तु के मूल्य-निर्धारण में तुष्टिगुण को महत्त्व प्रदान करने वाले अर्थशास्त्री हैं
(क) प्रो० जेवेन्स
(ख) मैन्जर तथा वालरस
(ग) (क) तथा (ख) दोनों
(घ) माल्थस व मिल
उत्तर:
(ग) (क) तथा (ख) दोनों।।

प्रश्न 3
वस्तु के मूल्य-निर्धारण में समन्वयवादी दृष्टिकोण अपनाने वाले अर्थशास्त्री हैं
(क) प्रो० जेवेन्स
(ख) प्रो० माल्थस
(ग) प्रो० मार्शल
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) प्रो० मार्शल।।

प्रश्न 4
मार्शल के ‘माँग एवं पूर्ति का नियम’ को इस नाम से भी पुकारते हैं
(क) माँग का सिद्धान्त
(ख) आधुनिक सिद्धान्त
(ग) सीमान्त लागत का सिद्धान्त ।
(घ) ये सभी
उत्तर:
(ख) आधुनिक सिद्धान्त।।

प्रश्न 5
यदि बाजार मूल्य सामान्य से अधिक ऊँचा हो, तो
(क) उत्पादकों को सामान्य हानि होने लगेगी
(ख) उत्पादकों को सामान्य लाभ होने लगेगा
(ग) उत्पादकों को असाधारण लाभ होगा
(घ) उत्पादकों को असाधारण हानि होने लगेगी
उत्तर:
(ग) उत्पादकों को असाधारण लाभ होगा।

प्रश्न 6
कीमत-निर्धारण में समय के महत्त्व को बतलाया था
(क) ए० मार्शल ने
(ख) ए० सी० पीगू ने
(ग) एल० रॉबिन्स ने
(घ) जे० के० मेहता ने
उत्त:
(क) ए० मार्शल ने।

प्रश्न 7
“एक वस्तु की कीमत के निर्धारण में माँग और पूर्ति दोनों का समान महत्त्व होता है।” यह कथन है
(क) ए० सी० पीगू का
(ख) जे० के० मेहता का
(ग) डेविड रिकार्डों का
(घ) ए० मार्शल का
उत्तर:
(घ) ए० मार्शल का।

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