UP Board Solutions for Class 6 Hindi Chapter 8 हार की जीत (मंजरी)

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महत्वपूर्ण गद्यांश की व्याख्या

माँ को अपने …………………… प्रसन्न होते थे।

संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘मंजरी’ के ‘हार की जीत’ नामक पाठ से लिया गया है। इस कहानी के लेखक सुदर्शन जी हैं।

प्रसंग इसमें बाबा भारती के सुल्तान के प्रति प्रेम की भावना का वर्णन किया गया है।

व्याख्या – बाबा भारती अपने घोड़े सुल्तान को देखकर उसी प्रकार प्रसन्न हुआ करते थे, जिस प्रकार कोई माँ अपने बढ़ते हुए पुत्र, किसान अपने हरे-भरे खेत तथा साहूकार अपने देनदार को देखकरे प्रसन्न हुआ करते। हैं। यद्यपि बाबा भारती भगवान का भजन करते थे, परन्तु भजन से बचे हुए समय में वे अपने घोड़े की देखभाल करते थे। वे उसके दाने-पानी, हाथ से खरहरा करने एवं अन्य प्रत्येक सुख-सुविधा का ध्यान रखते थे।

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पाठ का सार (सारंश)

इस पाठ में सुदर्शन जी ने बहुत ही प्रभावशाली ढंग से बताया है कि परोपकारियों और सज्जनों की सदा जीत होती है।

बाबा भारती नाम के एक साधु थे। उनके पास सुल्तान नाम का एक घोड़ा था, जो बहुत ही सुन्दर और ताकतवर था। बाबा उस घोड़े से बहुत प्यार करते थे और उसकी सेवा करते थे एक दिन सुल्तान के बारे में सुनकर उस इलाके का डाकू खड्गसिंह बाबा भारती के पास आया और उसने सुल्तान को देखने की इच्छा जताई। बाबा भारती ने गर्व के साथ खड्गसिंह को अपना घोड़ा दिखाया और उसके गुणों का बखान किया। खड्गसिंह घोड़े को देखकर आश्चर्य करने लगा, क्योंकि उसने इतना सुन्दर (UPBoardSolutions.com) और ताकतवर घोड़ा अब से पहले कभी नहीं देखा था। उसे बाबा के भाग्य से ईर्ष्या हुई और वह सोचने लगा कि ऐसा घोड़ा तो मेरे पास होना चाहिए।

उसने बाबा भारती से घोड़ी छीन ले जाने की बात कही। खड्गसिंह की इस बात से बाबा डर गए। वे रातभर बैठकर घोड़े की रखवाली करने लगे। उन्हें हर समय खड्गसिंह के आने का डर सताने लगा। एक दिन शाम के समय वे घोड़े पर बैठकर कहीं घूमने जा रहे थे कि रास्ते में उन्हें एक गरीब अपाहिज पेड़ के नीचे बैठा मिला। बाबा के पूछने पर उसने कहा कि मुझे तीन मील दूर एक गाँव में जाना है, लेकिन मैं चलने में लाचार हूँ; आप मुझे अपने घोड़े पर बैठाकर वहाँ पहुँचा दें। बाबा ने उस अपाहिज को घोड़े पर बैठा लिया और वे स्वयं घोड़े की लगाम पकड़कर पैदल चलने लगे। अचानक बाबा को एक झटका देकर वह अपाहिज, घोड़े को दौड़ाने लगा।

बाबा ने देखा, तो वे चीख उठे; क्योंकि वह अपाहिज़ डाकू खड्गसिंह था। बाबा ने उसे रोकना चाहा, लेकिन वह न रुका। बाबा ने उससे फिर कहा कि घोड़ा नहीं चाहिए, परन्तु यह प्रार्थना है कि तुम किसी को इस घटना के बारे में मत बताना; क्योंकि इस घटना के बारे में सुनने के बाद लोग किसी गरीब पर भरोसा नहीं करेंगे। बाबा की यह बात सुनकर (UPBoardSolutions.com) खड्गसिंह के मन पर उनकी सज्जनता और महानता का इतना प्रभाव पड़ा कि उसे अपनी भूल पर पश्चात्ताप हुआ और रात के अँधेरे में वह घोड़े को बाबा के मन्दिर में उसी जगह बाँधकर चला गया, जहाँ वह बँधा रहता था।

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प्रश्न-अभ्यास

कुछ करने को –
नोट –
विद्यार्थी स्वयं करें।

विचार और कल्पना

प्रश्न 1.
बताइये आपको कहानी का कौन सा पात्र सबसे अच्छा लगा, और क्यों?
उत्तर :
मुझे बाबा भारती का किरदार बहुत अच्छा लगा। उनका सुल्तान के प्रति प्रेम, गरीबों के प्रति दया, उनकी सज्जनता सभी कुछ अनुकरण करने योग्य है।

प्रश्न 2.
यदि बाबा भारती और खड्गसिंह की मुलाकात अगली बार होगी तो उनके बीच क्या-क्या बातें होंगी? लिखिए।
उत्तर :
यदि बाबा भारती और खड्गसिंह की मुलाकात अगली बार होगी तो सबसे पहले खड्गसिंह बाबा भारती से माफी माँगेगा। क्योंकि उसने बाबा भारती को बहुत दुखी किया था। साथ ही बाबा भारती खड्गसिंह से यह पूछेगे कि उसने उनसे छल क्यों किया।

प्रश्न 3.
विद्यार्थी स्वयं करें।

कहानी से

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प्रश्न 1.
बाबा भारती ने खडूगसिंह से उस घटना को किसी के सामने प्रकट न करने के लिए क्यों कहा?
उत्तर :
खड्गसिंह ने अपाहिज और असहाय का वेश बनाकर बाबा भारती से उनका घोड़ा छीना था। यदि इस घटना का जिक्र किसी से भी किया जाता, तो लोग अपाहिजों, गरीबों और असहायों की सच्ची (UPBoardSolutions.com) बातों पर भी विश्वास= नहीं करते, जिससे परोपकार या सेवा भाव के मिट जाने का भयं था।

प्रश्न 2.
बाबा भारती द्वारा की गई प्रार्थना का डाकू खड्गसिंह पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर :
बाबा भारती द्वारा की गई प्रार्थना से डाकू खड्गसिंह का कठोर हृदय पिघल गया और उसकी मानवता मानवता जाग उठी। उसने घोड़ा लौटा दिया।

प्रश्न 3.
कहानी के आधार पर नीचे दी गई घटनाओं को सही क्रम दीजिए (क्रम देकर) –
उत्तरं :

  1. माँ को अपने बेटे और किसान को लहलहाते खेत को देखकर जो आनन्द आता है, वही बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था।
  2. बाबा भारती और खंड्गसिंह अस्तबल में पहुँचे।
  3. घोड़े की चाल देखकर खड्गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया।
  4. खड्गसिंह जाते-जाते कह गया- “बाबा जी यह घोड़ा मैं आपके पास न रहने दूंगा।”
  5. बाबा भारती की सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी।
  6. अपाहिज वेश में खड्गसिंह घोड़े को दौड़ाकर जाने लगा।
  7. खड्गसिंह ने बाबा भारती की आवाज सुनकर घोड़ा रोक लिया और कहा- “बाबा जी यह घोड़ा अब न दूंगा।’
  8. बाबा ने कहा- “इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना, नहीं तो वे किसी गरीब पर विश्वास न करेंगे।”
  9. खड्गसिंह ने सुल्तान को उसके स्थान पर बाँध दिया।
  10. बाबा भारती घोड़े के गले से लिपटकर रोने लगे।

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प्रश्न 4.
इस कहानी के अन्त में किसकी जीत और किसकी हार हुई?
उत्तर :
बाबा भारती अपना घोड़ा छिन जाने के कारण हार गए थे, किंतु उनके शब्दों का खड्गसिंह पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि वह उनके घोड़े को चुपचाप उनके घर लौटा गया और अन्त में बाबा भारती हारकर भी जीत गए तथा खड्गसिंह जीतकर भी हार गया।

प्रश्न 5.
इस कहानी द्वारा लेखक हमें क्या बताना चाहता है?
उत्तर :
इस कहानी द्वारा लेखक हमें बताना चाहता है कि व्यक्ति जन्म से बुरा नहीं होता; परिस्थितियाँ उसे बुरा बना देती हैं। यदि ऐसे व्यक्तियों को अनुकूल परिवेश मिले, तो सुधरते देर नहीं लगती।

प्रश्न 6.
इस कहानी में तीन मुख्य पात्र हैं- बाबा भारती, सुल्तान और खड्गसिंह। कहानी के आधार पर इन ती पात्रों की विशेषताओं को स्पष्ट करने वाली तीन-तीन बातें लिखिए।
उत्तर :

(क) बाबा भारती –

  1. वे अपने घोड़े सुल्तान को बेटे से भी ज्यादा प्यार करते थे।
  2. उनके मन मे गरीबों और लाचारों के लिए बहुत दया थी।
  3. वे अपने घोड़े की सेवा तन-मन करते थे।

(ख) सुल्तान –

  1. सुल्तान बहुत सुंदर था।
  2. इसके जोड़ का जोड़ा सारे इलाके में न था।
  3. सुल्तान बहुत बलवान था।

(ग) खड्गसिंह –

  1. खड्गसिंह इलाके का मशहूर डाकू था।
  2. लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे।
  3. खड्गसिंह डाकू होते हुए भी एक अच्छा इंसान था।

प्रश्न 7.
उस संवाद को छाँट कर लिखिए जिसने डाकू खड्गसिंह का हृदय परिवर्तन कर दिया।
उत्तर :
यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका मैं तुमसे वापस करने के लिए न कहूँगा। परंतु खड्गसिंह, केवल एक प्रार्थना करता हूँ। उसे अस्वीकार न करना नहीं तो मेरा दिल टूट जाएगा। मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। ‘लोगों को यदि इस घटना का पता चल गया तो वे गरीब पर विश्वास न करेंगे।

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प्रश्न 8.
कहानी के किस पात्र ने आपको सबसे ज्यादा प्रभावित किया और क्यों?
उत्तर :
‘मुझे बाबा भारती के किरदार ने बहुत प्रभावित किया। बाबा भारती अपने जिस घोड़े को अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करते थे उसको डाकू खडुर्गासह द्वारा धोखे से चुरा लेने के बाद भी बाबा भारती को अपने (UPBoardSolutions.com) प्यारे घोड़े से अधिक चिंता गरीबों एवं असहायों की है। उनकी बातों से उनकी महानता और सज्जनता का पता चलता है। उनका चरित्र मुझे बहुत प्रभावित करता है।

प्रश्न 9.
कहानी का शीर्षक है- ‘हार की जीत’ आपके अनुसार इस काहनी के और क्या-क्या शीर्षक हो सकते हैं? लिखिए।
उत्तर :
मेरे विचार से इस कहानी का शीर्षक होना चाहिए – ‘सच्चे संत बाबा भारती’ या सबका प्यारा सुल्तान।

भाषा की बात

प्रश्न 1.
नीचे लिखे मुहावरों का प्रयोग करके वाक्य बनाइए (वाक्य बनाकर) –
वायु तेग से उड़ना (बहुत तेज चलना) : वाक्य प्रयोग – बाबा भारती का घोड़ा वायु वेग से उड़ता था।
आँखों में चमक होना (बहुत खुशी होगा) : वाक्य प्रयोग – अपनों को देखकर आँखों में चमक होना स्वाभाविक है।
दिल टूट जाना (दुखी होना) : वाक्य प्रयोग – इच्छा पूरी न होने से दिल टूट जाता है।
मुँह न मोड़ना (साथ निबाहना) : वाक्य प्रयोग – मुसीबत में मुँह न मोड़ना ही मित्रता है।
सिर मारना (समझाने की कोशिश करना) : वाक्य प्रयोग – मूर्ख के सामने सिर मारना बेकार होता है।
लट्टू होना (मोहित होना) : वाक्य प्रयोग – गोपियाँ श्री कृष्ण पर लट्टू हो जाती थीं।
मन भारी होना (उदास हो जाना) : वाक्य प्रयोग – अनावश्यक डाँट-डपट से किसी का भी मन भारी हो जाता है।

प्रश्न 2.
नीचे बाईं ओर कुछ विशेषण दिए गए हैं और दाईं ओर कुछ विशेष्य। प्रत्येक विशेषण के साथ उपयुक्त विशेष्य मिलाकर लिखिए –
उत्तर :
UP Board Solutions for Class 6 Hindi Chapter 8 हार की जीत (मंजरी) 1

प्रश्न 3.
नीचे दिए गए अनुच्छेद में उपयुक्त स्थान पर उद्धरण चिह्न तथा अन्य विराम-चिह्न लगाइए (विराम-चिह्न लगाकर) –
अपाहिज ने हाथ जोड़ कर कहा, “बाबा मैं दुखिया हूँ। मुझ पर दया करो। रामावाला यहाँ से तीन मील दूर है, मुझे वहाँ जाना है। घोड़े पर चढ़ा लो, परमात्मा भला करेगा। वहाँ तुम्हारा कौन है? दुर्गादत्त वैद्य का नाम सुना होगा। उनका सौतेला भाई हूँ।

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प्रश्न 4.
‘अ’ उपसर्ग लगाने से कुछ शब्दों के अर्थ विपरीत हो जाते हैं; जैसे-थीर से अधीर, स्वीकार से अस्वीकार । अ उपसर्ग लगाकर इसी तरह से अन्य पाँच शब्द लिखिए (लिखकर) –
अ – असीमित, अशिक्षित, अयोग्य, अकारण, असमर्थ
अवधारणा चित्र-किसी पात्र अथवा विषयवस्तु के बारे में उसकी विशेषता, गुण, लाभ, अथवा घटना के क्रमों के प्रमुख बिन्दुओं का चित्रण करना।
उत्तर :
संत, सच्चा मानवतावादी, गरीबों के मसीहा, निश्चल स्वभाव, परोपकारी।

इसे भी जानें –
नोट – विद्यार्थी स्वयं पढ़े।

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UP Board Solutions for Class 6 Hindi Chapter 6 क्यों – क्यों लड़की (मंजरी)

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महत्त्वपूर्ण गद्याश की व्याख्या

और वाकई, वह अक्टूबर ……………. मिलते हैं।

संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘मंजरी’ में लेखिका महाश्वेता देवी द्वारा लिखित पाठ ‘क्यों-क्यों लड़की से लिया गया है।

प्रसंग – इसमें लेखिका ने एक आदिवासी लड़की मोइना, जो एक अच्छी किन्तु जिद्दी लड़की है, के विषय में लिखा है। मोइना अपनी एक पोशाक लेकर समिति में लेखिका के साथ रहने पहुँच जाती है। समिति की शिक्षिका ने लेखिका को बताया कि मोइना क्यों-क्यों कहने की आदत के कारण बार-बार प्रश्न पूछेगी और आपको तंग करेगी।

व्याख्या – लेखिका अक्टूबर के पूरे महीने में मोइना के प्रश्न पूछने के ढंग ‘क्यों-क्यों से परेशान हो उठी। मोइना पूछती कि मैं अपने मालिक की बकरियाँ क्यों चराती हूँ; जबकि वह स्वयं यह काम कर सकता है। उसमें (UPBoardSolutions.com) जिज्ञासा है, जिसे शांत करने के लिए वह पूछती है कि मछलियाँ बोलती क्यों नहीं, तारे छोटे क्यों नजर आते हैं और तुम (लेखिका) रात में किताबें क्यों पढ़ती हो आदि। लेखिका ने उसे बताया कि किताबों में तुम्हारे ‘क्यों-क्यों’ के उत्तर मिलते हैं।

विशेष – लेखिका ने अपनी रचनाओं की कथावस्तुओं में आदिवासियों का जीवन संघर्ष और उनकी पीड़ा का सजीव वर्णन किया है।

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पाठका सारांश

मोइना शबर जाति की आदिवासी लड़की थी। शबर लोग यद्यपि गरीब थे, फिर भी कभी शिकायत नहीं करते थे। सिर्फ मोइना सवाल पर सवाल करती थी। गाँव के पोस्टमास्टर ने उसे ‘क्यों-क्यों लड़की का नाम दे रखा था। उसकी माँ खीरी उसे अजीब और जिद्दी लड़की कहती थी।

मोइना गाँव के बाबुओं की बकरी चराती थी। वह बाकी कार्य जैसे नदी से पानी लाना, लकड़ी लाना, चिड़िया पकड़ने के लिए फंदा लगाना आदि करती थी। शबर लोग लड़कियों को काम पर नहीं भेजते। मोइना की माँ एक पैर से अपाहिज थी इसलिए मोइना को कार्य पर जाना पड़ता था।

अक्टूबर मास में लेखिका एक महीने समिति के स्कूल में रुकी। मोइना अपने एक जोड़ी कपड़े और नेवले का बच्चा लेकर समिति में रहने के लिए जा पहुँची। समिति की शिक्षिका मालती बोनाल ने लेखिका को बताया कि मोइना का ‘क्यों-क्यों’ सुनकर आपको परेशानी होगी। सचमुच वह अजीब प्रश्न पूछती है- तारे क्यों छोटे दिखते हैं? तुमे रात में किताबें क्यों (UPBoardSolutions.com) पढ़ती हो? लेखिका ने मोइना को बताया कि किताबों में तुम्हारे ‘क्यों-क्यों’ के जवाब मिलते हैं। अब मोइना ने निश्चय कर लिया कि वह पढ़ना सीखेगी और अपने सारे सवालों के जवाब ढूंढेगी।

मोइना ने स्कूल का समय, जो नौ से ग्यारह बजे तक था, बदलवाने की कोशिश की; क्योंकि वह ग्यारह के बाद ही पढ़ सकती थी। एक शाम लेखिका मोइना के घर गई। मोइना भाई-बहन से कह रही थी कि एक पेड़ काटो, तो दो पेड़ लगाओ। खाने से पहले मुँह-हाथ धोओ। जो इन बातों को नहीं जानते, वे मोइना के विचार में समिति की कक्षा में नहीं जाते। गाँव में प्राइमरी स्कूल खुलने पर मोइना दाखिला लेने वालों में पहली लड़की थी।

अब अठारह साल की मोइना समिति के स्कूल में पढ़ती है। (UPBoardSolutions.com) वह पढ़ने में तेज है और सवालों के जवाब देने में आलस्य नहीं करती। अन्य बच्चे भी क्यों का जवाब पूछना सीख रहे हैं। लेखिका मोइना की कहानी लिख रही है। यदि मोइना को पता चल जाए, तो वह पूछेगी- ‘क्यों?

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प्रश्न-अभ्यास

कुछ करने को – नोट – विद्यार्थी स्वयं करें ।

प्रश्न 1.
मोइना अपने छोटे भाई और बहिन को बताती है कि- “एक पेड़ काटो तो दो पेड़ लगाओ”, खाने के पहले हाथ धो लो।” आप भी कम से कम तीन बातें लिखिए जो करनी चाहिए।
उत्तर :
प्रतिदिन सुबह उठने के बाद और रात को सोने से पहले दाँतों की सफाई करनी चाहिए।

  • बालें में नियमित रूप से कंघी करनी चाहिए।
  • हमेशा धुले हुए वस्त्र ही पहनना चाहिए।

प्रश्न 2.
विद्यार्थी स्वयं करें।

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प्रश्न 3.
पृथ्वी देखने में चिपटी दिखाई देती है किन्तु वह गोल है। इसके साथ-साथ यह अपने अक्ष पर भी घूमती है। अक्ष पर घूमने के कारण दिन और रात होते हैं। सूर्य के चारों ओर घूमने के कारण ऋतुएँ बदलती हैं। अब तक पृथ्वी ही ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन पाया जाता है। पृथ्वी पर जीवन के लिए पेड़-पौधों का होना अतिआवश्यक है। पेड़-पौधों के बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती।
उपर्युक्त अंश को पढ़िए तथा इसके आथार पर पाँच प्रश्न बनाइए।
उत्तर :

  1. पृथ्वी कैसी है?
  2. दिन और रात कैसे बनते हैं?
  3. ऋतुएँ कैसे बदलती हैं?
  4. पृथ्वी पर जीवन के लिए किनका होना अति आवश्यक है।
  5. किसके बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती।

विचार और कल्पना

प्रश्न 1.
शिक्षा के माध्यम से समाज में व्याप्त गरीबी को कैसे दूर किया जा सकता है? इस विषय पर अपने विचार प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
शिक्षा से मनुष्य का मानसिक विकास होता है शिक्षा के माध्यम से समाज में व्याप्त गरीबी को दूर किया जा सकता है। शिक्षा प्राप्त करने के बाद रोजगार के अनेक अवसर प्राप्त होते हैं अतः शिक्षा प्राप्ति के बाद (UPBoardSolutions.com) रोजगार प्राप्त कर समाज में व्याप्त गरीबी को दूर किया जा सकता है।

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प्रश्न 2.
प्रश्नों के द्वारा हम किसी व्यक्ति या वस्तु के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं। यदि आप किसी अपरिचित स्थान पर जाते हैं, तो वहाँ आपके मन में कौन-कौन से प्रश्न आयेंगे?
उत्तर :
किसी अपरिचित स्थान पर जाने पर मेरे मन में अनेक प्रश्न आएँगे; जैसे- यहाँ घूमने और देखने के लायक कौन-कौन से स्थान हैं। यहाँ कौन-कौन सी चीजें सस्ती हैं, यहाँ की कौन सी वस्तु प्रसिद्ध है, आदि।

पाठ से

प्रश्न 1.
मोइना का नाम ‘क्यों-क्यों लड़की’ क्यों पड़ा?
उत्तर :
मोइना सवाल बहुत पूछती थी तथा उससे कुछ भी कहने पर उसका सिर्फ एक ही जवाब होता था। क्यों? अतः उसका नाम ‘क्यों-क्यों लड़की पड़ गया।

प्रश्न 2.
शबर जाति के लोग आमतौर पर अपनी लड़कियों को काम पर नहीं भेजते, पर मोइना को काम पर जाना पड़ता था, क्यों?
उत्तर :
माँ के अपाहिज होने के कारण मोइना को काम पर जाना पड़ता था।

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प्रश्न 3.
मोइना ने समिति वाली झोंपड़ी में रहने के लिए अपने साथ नेवला को ले जाने का क्या लाभ बताया?
उत्तर :
मोइना ने नेवले को ले जाने से होने वाले लाभ के बारे में बताया कि यह बहुत कम खाता है। और भयानक साँपों को दूर भगा देता है।

प्रश्न 4.
“हर रात तुम सोने के पहले किताब क्यों पढ़ती हो?” मोइना के इस प्रश्न पर लेखिका ने क्या उत्तर दिया?
उत्तर :
मोइना के प्रश्न पर लेखिका ने उत्तर दिया कि किताबों में तुम्हारे ‘क्यों-क्यों के जवाब मिलते हैं।

प्रश्न 5.
वे कौन-कौन-सी बातें थीं, जो मोइना बकरियाँ चराते समय दूसरे बच्चों को बताती थी?
उत्तर :
मोइना बकरियाँ चराते समय दूसरे बच्चों को बताती- कई तारे तो सूरज से भी बड़े हैं। सूरज पास है, इसलिए बड़ा दिखता है। मछलियाँ हमारी तरह बातें नहीं करतीं। मछलियों की अपनी भाषा है, जो सुनाई नहीं देती। तुम्हें पता है, पृथ्वी गोल है।

प्रश्न 6.
चौके के अंगार के पास बैठी मोइना ने अपनी छोटी बहिन और बड़े भाई को क्या बताया?
उत्तर :
मोइना ने अपनी छोटी बहन और बड़े भाई को बताया कि एक पेड़ काटो, तो दो लगाओ। खाने से पहले हाथ धो लो, नहीं तो पेट में दर्द होने लगेगा। तुम कुछ नहीं जानते; क्योंकि समिति की कक्षा में नहीं जाते।

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प्रश्न 7.
विद्यार्थी स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 8.
सोचकर लिखिए-अगर मोइना ‘क्यों-क्यों जैसे सवाल न करती तो इसका उस पर क्या प्रभाव पड़ता?
उत्तर :
अगर मोइना ‘क्यों-क्यों’ जैसे सवाल न करती तो वह कुछ भी नहीं जान पाती। मोइना में सभी चीजों के बारे में जानने की जिज्ञासा है। वह जो कुछ भी जानती है इस ‘क्यों-क्यों’ के कारण ही जानती है। वह (UPBoardSolutions.com) अगर ‘क्यों-क्यों’ जैसे सवाल न करती तो वह जितना कुछ जानती है वह नहीं जान पाती और वह एक बेवकूफ लड़की रहती।

भाषा की बात

प्रश्न 1.
(क) नोट- विद्यार्थी शिक्षक की सहायता से स्वयं प्रश्न बनाएँ।
(ख) इनमें से कुछ शब्दों का प्रयोग कभी-कभी दो बार भी होता है, जैसे- क्या-क्या, कौन-कौन, कब-कब, कैसे-कैसे, किस-किस, और किन-किन। इन पर आधरित प्रश्न बनाइए। जैसे-आपके साथ कौन-कौन विद्यालय जाते हैं?
नोट- विद्यार्थी स्वयं करें।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यांशों से एक शब्द बनाइए (शब्द बनाकर) –
उत्तर :

(क) लिखने वाला – लेखक
(ख) चिकित्सा करने वाला – चिकित्सक
(ग) नृत्य करने वाला – नर्तक
(घ) सेवा करने वाला – सेवक
(छ) पढ़ने वाला – पाठक
(च) पर्यटन करने वाला पर्यटक

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प्रश्न 3.
व्याकरण की दृष्टि से निम्नलिखित को अलग-अलग वर्गो – विशेषण, भाववाचक संज्ञा तथा क्रिया विशेषण में बाँटिए –
बचपन, बढ़िया, बड़ा, कायरता, दिन भर, तेज-तेज, ज्यादा।
उत्तर :

  • विशेषण – बढ़िया, बड़ा, ज्यादा
  • क्रिया विशेषण – दिनभर, तेज-तेज
  • भाव वाचक संज्ञा – बचपन, कायरता, जलाऊ

प्रश्न 4.
नीच दिए योजक शब्दों की सहायता से वाक्य बनाइए (बनाकर)
उत्तर :

(क) नमन आज आने वाला था किंतु आया नहीं।
(ख) श्रुति और रमा दोनों बहनें हैं।
(ग) रमण पढ़ रहा है तथा राहुल खेल रहा है।
(घ) यदि वर्षा हुई तो फसल नष्ट हो जाएगी।
(ङ) जल्दी चलो वरना ट्रेन छूट जाएगी।
(च) चुप-चाप बैठो या बाहर चले जाओ।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित शब्दों में ‘ता’ प्रत्यय जोड़कर भाव वाचक संज्ञा बनाईए –
यथा –

  • कायर – कायरता
  • सफल – सफलता
  • योग्य – योग्यता
  • मेलिन – मलिनता
  • उदार – उदारता

संज्ञा के पाँच भेद होते हैं –

  1. जातिवाचक
  2. व्यक्ति वाचक
  3. गुण वाचक
  4. भाव वाचक
  5. द्रव्य वाचक।

इसे भी जानें –
नोट – विद्यार्थी ध्यान से पढ़ें।

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UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi शैक्षिक निबन्ध

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Board UP Board
Textbook NCERT
Class Class 11
Subject Samanya Hindi
Chapter Name शैक्षिक निबन्ध
Category UP Board Solutions

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नयी शिक्षा-नीति

सम्बद्ध शीर्षक

  • आधुनिक शिक्षा-प्रणाली : एक मूल्यांकन
  • वर्तमान शिक्षा-प्रणाली के गुण और दोष
  • बदलती शिक्षा-नीति का छात्रों पर प्रभाव
  • शिक्षा का गिरता मूल्यगत स्तर
  • वर्तमान शिक्षा-प्रणाली में सुधार

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छात्र और अनुशासन

सम्बद्ध शीर्षक

  • छात्रों में अनुशासनहीनता : कारण और निदान
  • जीवन में अनुशासन का महत्त्व
  • विद्यार्थी-जीवन में अनुशासन
  • अनुशासन और हम
  • विद्यार्थी जीवन के सुख-दुःख
  • छात्र जीवन में अनुशासन का महत्त्व

प्रमुख विचार विन्दु

  1. प्रस्तावना,
  2. विद्याथी और वि
  3. अनुशासन का स्वरूप और महत्त्व,
  4. अनुशासनहीनता के कारण—
    (क) पारिवारिक कारण;
    (ख) सामाजिक कारण;
    (ग) राजनीतिक कारण;
    (घ) शैक्षिक कारण,
  5.  निवारण के उपाय,
  6. उपसंहार

प्रस्तावना विद्यार्थी देश का भविष्य हैं। देश के प्रत्येक प्रकार का विकास विद्यार्थियों पर ही निर्भर है। विद्यार्थी जाति, समाज और देश का निर्माता होता है, अत: विद्यार्थी का चरित्र उत्तम होना बहुत आवश्यक है। उत्तम चरित्र अनुशासन से ही बनता है। अनुशासन जीवन का प्रमुख अंग और विद्यार्थी-जीवन की आधारशिला है। व्यवस्थित जीवन व्यतीत करने के लिए मात्र विद्यार्थी ही नहीं प्रत्येक मनुष्य के लिए अनुशासित होना अति आवश्यक है। अनुशासनहीन विद्यार्थी व्यवस्थित नहीं रह सकता और न ही उत्तम शिक्षा ग्रहण कर सकता है। आज विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता की शिकायत सामान्य-सी बात हो गयी है। इससे शिक्षा-जगत् ही नहीं, अपितु सारा समाज प्रभावित हुआ है और निरन्तर होता ही जा रहा है। अतः इस समस्या के सभी पक्षों पर विचार करना उचित होगा।

विद्यार्थी और विद्या-‘विद्यार्थी’ का अर्थ है–विद्या का अर्थी’ अर्थात् विद्या प्राप्त करने की कामना करने वाला। विद्या लौकिक या सांसारिक जीवन की सफलता का मूल आधार है, जो गुरुकृपा से प्राप्त होती है। इससे विद्यार्थी-जीवन के महत्त्व का भी पता चलता है, क्योंकि यही वह समय है, जब मनुष्य अपने समस्त भावी जीवन की सफलता की आधारशिला रखता है। यदि यह काल व्यर्थ चला जाये तो सारा जीवन नष्ट हो जाता है।

संसार में विद्या सर्वाधिक मूल्यवान् वस्तु है, जिस पर मनुष्य के भावी जीवन को सम्पूर्ण विकास-तथा सम्पूर्ण उन्नति निर्भर करती है। इसी कारण महाकवि भर्तृहरि विद्या की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि “विद्या ही मनुष्य का श्रेष्ठ स्वरूप है, विद्या भली-भाँति छिपाया हुआ धन है (जिसे दूसरा चुरा नहीं सकता)। विद्या ही सांसारिक भोगों को, यश और सुख को देने वाली हैं, विद्या गुरुओं की भी गुरु है। विदेश जाने पर विद्या ही बन्धु के सदृश सहायता करती है। विद्या से श्रेष्ठ देवता है। राजदरबार में विद्या ही आदर दिलाती है, धन नहीं; अतः जिसमें विद्या नहीं, वह निरा पशु है।”

फलत: इस अमूल्य विद्यारूपी रत्न को पाने के लिए इसका मूल्य भी उतना ही चुकाना पड़ता है और वह है तपस्या। इस तपस्या का स्वरूप स्पष्ट करते हुए कवि कहता है

सुखार्थिनः कुतो विद्या, कुतो विद्यार्थिनः सुखम्।
सुखार्थी वा त्यजेद् विद्या, विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम् ॥

तात्पर्य यह है कि सुख की इच्छा वाले को विद्या कहाँ और विद्या की इच्छा वाले को सुख कहाँ ? सुख की इच्छा वाले को विद्या की कामना छोड़ देनी चाहिए या फिर विद्या की इच्छा वाले को सुख की कामना छोड़ देनी चाहिए।

अनुशासन का स्वरूप और मंहत्त्व-‘अनुशासन’ का अर्थ है बड़ों की आज्ञा (शासन) के पीछे (अनु) चलना। जिन गुरुओं की कृपा से विद्यारूपी रत्न प्राप्त होता है, उनके आदेशानुसार कार्य किये बिना विद्यार्थी की उद्देश्य-सिद्धि भला कैसे हो सकती है ? ‘अनुशासन’ का अर्थ वह मर्यादा है जिसका पालन ही विद्या प्राप्त करने और उसका उपयोग करने के लिए अनिवार्य होता है। अनुशासन का भाव सहज रूप से विकसित किया जाना चाहिए। थोपा हुआ अथवा बलपूर्वक पालन कराये जाने पर यह लगभग अपना उद्देश्य खो देता है। विद्यार्थियों के प्रति प्रायः सभी को यह शिकायत रहती है कि वे अनुशासनहीन होते जा रहे हैं, किन्तु शिक्षक वर्ग को भी इसका कारण ढूंढ़ना चाहिए कि क्यों विद्यार्थियों की उनमें श्रद्धा विलुप्त होती जा रही है।

अनुशासन का विद्याध्ययन से अनिवार्य सम्बन्ध है। वस्तुतः जो महत्त्व शरीर में व्यवस्थित रुधिर-संचार का है, केही विद्यार्थी के जीवन में अनुशासन का है। अनुशासनहीन विद्यार्थियों को पग-पग पर ठोकर और फटकार सहनी पड़ती है।

अनुशासनहीनता के कारण-वस्तुत: विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता एक दिन में पैदा नहीं हुई है। इसके अनेक कारण हैं, जिन्हें मुख्यत: निम्नलिखित चार वर्गों में बाँटा जा सकता है

(क) पारिवारिक कारण—बालक की पहली पाठशाला उसका परिवार है। माता-पिता के आचरण का बालक पर गहरा प्रभाव पड़ता है। आज बहुत-से ऐसे परिवार हैं, जिनमें माता-पिता दोनों नौकरी करते हैं या अलग-अलग व्यस्त रहते हैं. और अपने बच्चों की ओर ध्यान देने हेतु उन्हें अवकाश नहीं मिलता। इससे बालक उपेक्षित होकर विद्रोही बन जाता है। दूसरी ओर अधिक लाड़-प्यार से भी बच्चा बिगड़कर निरंकुश या स्वेच्छाचारी हो जाता है। कई बार पति-पत्नी के बीच कलह या पारिवारिक अशान्ति भी बच्चे के मन पर बहुत बुरा प्रभाव डालती है और उसका मन अध्ययन-मनन से विरक्त हो जाता है। इसी प्रकार बालक को विद्यालय में प्रविष्ट कराकर अभिभावकों का निश्चिन्त हो जाना, उसकी प्रगति या विद्यालय में उसके आचरण की खोज-खबर न लेना भी बहुत घातक सिद्ध होता है।

(ख) सामाजिक कारण—विद्यार्थी जब समाज में चतुर्दिक् व्याप्त भ्रष्टाचार, घूसखोरी, सिफारिशबाजी, भाई-भतीजावाद, चीजों में मिलावट, फैशनपरस्ती, विलासिता और भोगवाद, अर्थात् प्रत्येक स्तर पर व्याप्त अनैतिकता को देखता है तो उसका भावुक मन क्षुब्ध हो उठता है, वह विद्रोह कर उठता है। और अध्ययन की उपेक्षा करने लगता है।

(ग) राजनीतिक कारण—छात्र-अनुशासनहीनता का एक बहुत बड़ा कारण राजनीति है। आज राजनीति जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर छा गयी है। सम्पूर्ण वातावरण को उसने इतना विषाक्त कर दिया है कि स्वस्थ वातावरण में साँस लेना कठिन हो गया है। नेता लोग अपने दलीय स्वार्थों की पूर्ति के लिए विद्यार्थियों को नौकरी आदि के प्रलोभन देकर पथभ्रष्ट करते हैं, छात्र-यूनियनों के चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दल पैसा खर्च करते हैं तथा विद्यार्थियों को प्रदर्शन और तोड़-फोड़ के लिए उकसाते हैं। विद्यालयों में हो रहे इस राजनीतिक हस्तक्षेप ने अनुशासनहीनता की समस्या को और भी बढ़ा दिया है।

(घ) शैक्षिक कारण—छात्र-अनुशासनहीनता का कदाचित् सबसे बड़ा कारण यही है। अध्ययन के लिए आवश्यक अध्ययन-सामग्री, भवन, सुविधाजनक छात्रावास एवं अन्यान्य सुविधाओं का अभाव, सिफारिश, भाई-भतीजावाद या घूसखोरी आदि कारणों से योग्य, कर्तव्य-परायण एवं चरित्रवान् शिक्षकों के स्थान पर अयोग्य, अनैतिक और भ्रष्ट अध्यापकों की नियुक्ति, अध्यापकों द्वारा छात्रों की कठिनाइयों की उपेक्षा करके ट्यूशन आदि के चक्कर में लगे रहना यो आरामतलबी के कारण सनमाने ढंग से कक्षाएँ लेना या न लेना, छात्र और अध्यापकों की संख्या में बहुत बड़ा अन्तर होना, जिससे दोनों में आत्मीयता का सम्बन्ध स्थापित न हो पाना; परीक्षा प्रणाली को दूषित होना, जिससे विद्यार्थी की योग्यता का सही मूल्यांकन नहीं हो पाना आदि छात्र-अनुशासंघहीनता के प्रमुख कारण हैं। परिणामस्वरूप अयोग्य विद्यार्थी योग्य विद्यार्थी पर वरीयता प्राप्त कर लेते हैं। फलत: योग्य विद्यार्थी आक्रोशवश अनुशासनहीनता में लिप्त हो जाते हैं।

निवारण के उपाय—यदि शिक्षकों को नियुक्त करते समय सत्यता, योग्यता और ईमानदारी का आंकलन अच्छी प्रकार कर लिया जाये तो प्रायः यह समस्या उत्पन्न ही न हो। प्रभावशाली, गरिमामण्डित, विद्वान् और प्रसन्नचित्त शिक्षक के सम्मुख विद्यार्थी सदैव अनुशासनबद्ध रहते हैं, क्योंकि वह उस शिक्षक के हृदय में अपना स्थान एक अच्छे विद्यार्थी के रूप में बनाना चाहते हैं।

पाठ्यक्रम को अत्यन्त सुव्यवस्थित वे सुनियोजित, रोचक, ज्ञानवर्धक एवं विद्यार्थियों के मानसिक स्तर के अनुरूप होना चाहिए। पाठ्यक्रम में आज भी पर्याप्त असंगतियाँ विद्यमान हैं, जिनका संशोधन अनिवार्य है; उदाहरणार्थ-इण्टरमीडिएट हिन्दी काव्यांजलि की कविताएँ ही बी० ए० द्वितीय वर्ष के हिन्दी पाठ्यक्रम में भी हैं। क्या कवियों का इतना अभाव है कि एक ही रचना वर्षों तक पढ़ने को विवश किया जाये।

छात्र-अनुशासनहीनता के उपर्युक्त कारणों को दूर करके ही हम इस समस्या का समाधान कर सकते हैं। सबसे पहले वर्तमान पुस्तकीय शिक्षा को हटाकर प्रत्येक स्तर पर उसे इतना व्यावहारिक बनाया जाना चाहिए कि शिक्षा पूरी करके विद्यार्थी अपनी आजीविका के विषय में पूर्णतः निश्चिन्त हो सके। शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी के स्थान पर मातृभाषा हो। ऐसे योग्य, चरित्रवान् और कर्तव्यनिष्ठ अध्यापकों की नियुक्ति हो, जो विद्यार्थी की शिक्षा पर समुचित ध्यान दें। विद्यालय या विश्वविद्यालय प्रशासन विद्यार्थियों की समस्याओं पर पूरा ध्यान दें तथा विद्यालयों में अध्ययन के लिए आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध करायी जाये। विद्यालयों में प्रवेश देते समय गलत तत्त्वों को कदापि प्रवेश न दिया जाये। किसी कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या लगभग 50-55 से अधिक न हो। शिक्षा सस्ती की जाये और निर्धन, किन्तु योग्य छात्रों को नि:शुल्क उपलब्ध करायी जाये। परीक्षा-प्रणाली स्वच्छ हो, जिससे योग्यता का सही और निष्पक्ष मूल्यांकन हो सके। इसके साथ ही राजनीतिक हस्तक्षेप बन्द हो, सामाजिक भ्रष्टाचार मिटाया जाये, सिनेमा और दूरदर्शन पर देशभक्ति की भावना जगाने वाले चित्र प्रदर्शित किये जाएँ तथा माता-पिता बालकों पर समुचित ध्यान दें और उनका आचरण ठीक रखने के लिए अपने आचरण पर भी दृष्टि रखें।

उपसंहार—छात्रों के समस्त असन्तोषों का जनक अन्याय है, इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से अन्याय को मिटाकर ही देश में सच्ची सुख-शान्ति लायी जा सकती है। छात्र-अनुशासनहीनता का मूल भ्रष्ट राजनीति, समाज, परिवार और दूषित शिक्षा प्रणाली में निहित है। इनमें सुधार लाकर ही हम विद्यार्थियों में व्याप्त अनुशासनहीनता की समस्या का स्थायी समाधान ढूंढ़ सकते हैं; क्योंकि विद्यार्थी विद्यालय में पूर्णत: विद्यार्जन के लिए ही आते हैं, मात्र हुल्लड़बाजी के लिए नहीं।

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UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 14 विवाह के कानूनी तथा जीवशास्त्रीय गुण

UP Board Solutions for Class 12  Home Science Chapter 14 विवाह के कानूनी तथा जीवशास्त्रीय गुण are part of UP Board Solutions for Class 12  Home Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 12  Home Science Chapter 14 विवाह के कानूनी तथा जीवशास्त्रीय गुण.

Board UP Board
Class Class 12
Subject Home Science
Chapter Chapter 14
Chapter Name विवाह के कानूनी तथा जीवशास्त्रीय गुण
Number of Questions Solved 24
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 12 Home Science Chapter 14 विवाह के कानूनी तथा जीवशास्त्रीय गुण

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
विवाह का शाब्दिक अर्थ है।
(a) वधू को घर के घर ले जाना
(b) वर को बापू के घर से जाना
(c) ‘a’ और दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) वधू को वर के घर से जाना

प्रश्न 2.
विवाह की विशेषताओं में शामिल हैं।
(a) आर्थिक सहयोग
(b) वैघ सन्तानोत्पत्ति का माध्यम
(c) धार्गिक एवं सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

प्रश्न 3.
अन्तर्विवाह ग आशय है।
(a) अपने समूह में विवाह करना
(b) समूह से बाहर विवाह 
‘ना।
(c) गाँव की सीमा से बार विवाह करना
(d) जमरो में से कोई नहीं ।
उत्तर:
(a) अपने समूह में विवाह करना

प्रश्न 4.
गोत्र शब्द के अर्थ हैं।
(a) गौशाता
(b) मा क गर
(c) किना या पर्गत 
में सभी
(d) ये सभी
उत्तर:
(d) ये सभी

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से किस अधिनियम के द्वारा सपिण्ड बहिर्विवाह को। 
मान्यता प्रदान की गई है।
(a) धनियम, 1955
(b) अधिनियम, 1955
(c) अधिनियम, 1954
(d) अधिनियम, 1961
उत्तर:
(b) अधिनियम, 1955

प्रश्न 6.
अनुलोम विवाह में लइका विन्स कुत से सम्वन्ध रखता है?
(a) उच्च
(b) निम्न्
(c) उच्च या निम्न में से कोई भी
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) उच्च

प्रश्न 7.
बाल विवाह निरोधक अधिनियम का पारित किया गया?
(a) वर्ष 1896
(b) वर्ष 1829
(c0 वर्ष 1929
(d) वर्ष 1937
उत्तर:
(c) वर्ष 1929

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
उसी मेयर ने विवाह को किस प्रकार परिभाषित किया है?
उत्तर:
लुसी मेयर ने विवाह को परिभाषित करते हुए लिखा है कि विवाह स्त्री-पुरुष 
का ऐसा योग है, जिससे जमी सन्तान वैध मानी जाती है।

प्रश्न 2.
बहिर्विवाह से क्या तात्पर्य है? ।
उत्तर:
बहिर्विवाह से तात्पर्य है एक व्यक्ति जिस समूह का सदस्य है इससे बाहर विवाह को अद। म विवाह में परिवार, गोत्र, प्रर, पिण्ड शम, डोटम आदि में चार विवाह करना पड़ता है।

प्रश्न 3.
ग्राम बहिर्विवाह का प्रचलन किन क्षेत्रों में पाया जाता है? गाँवों में ये क्या कहलाते हैं?
उत्तर:
शाम बहिर्विवाह का प्रचलने उत्तरी भारत और पुतः पंजाब एवं दिल्ली के आस-पास है। गाँवों में इस प्रकार के विवाह को ‘खेड़ा बहिर्विवाह 
के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 4.
1937 का अधिनियम किस उद्देश्य से बना था?
उत्तर:
हिन्दू जी के विधवा होने पर मृत्त पति की सम्पत्ति में अधिकार प्रदान 
करने की दृष्टि से वर्ष 1997 में यह अधिनियम पारित किया गया है।

प्रश्न 5.
किस अधिनियम में हिन्दु विवाह-विच्छेद की व्यवस्था है?
उत्तर:
सामाजिक एवं कानूनी रूप से पति-पत्नी के विवाह सम्बन्धों को समाप्ति ही विवाह-विच्छेद कहलाता है। हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 में 
विवाह-विच्छेद की व्यस्था की गई है।

प्रश्न 6.
हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1966 किसलिए पारित किया गया 
था?
उत्तर:
स्त्रियों को पुरुष के समान अधिकार प्रदान करने की दृष्टि से हिन्दू 
उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 पारित किया गया।

प्रश्न 7.
दहेज़ निरोधक अधिनियम कब पारित हुआ?
उत्तर:
दहेज निरोधक अधिनियम 1961 में पारित किया गया। इस नियम के अनुसार दहेज लेना और देना दण्डनीय अपराध है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (3 अंक)

प्रश्न 1.
अनुलोम विवाह किस प्रकार सम्पन्न किया जाता है?
उत्तर:
जब एक उच्च वर्ण, जाति, उपजाति, कुल एवं गोत्र के लड़के का विवाह ऐसी हड़की से किया जाए, जिसका वर्ण, जाति, उपजात, कुल लड़के से नीचा हो तो ऐसे विवाह को अनुलोम विवाह कहते हैं। अन्य शब्दों में, इस प्रकार के विवाह में लड़का उच्च सामाजिक समूह का होता है और लड़की निम्न सामाजिक समूह को। उदाहरण के लिए, एक प्राण लवे का विवाह एक अत्रिय या वैश्य लड़की से होता है, तो इसे हम अलोम विवाह कहेंगे। वैदिककाल से लेकर स्मृतिकाल तक अनुलोम विवाहों का प्रचलन रहा है। मनुस्मृति में लिखा है कि एक ब्राह्मन को अपने से मि तन व अत्रिय, वैश्य एवं शुद की कन्या से, क्षत्रिय को अपने से निम दी य वैश्य एवं शूद से और वैश्य अपने वर्ग के अतिरिक्त शुद्र कन्या से भी विवाह कर सकता है, किन्तु मनु नपण संस्कार करने की स्वीकृति के गवर्ण विवाह के लिए ही देते हैं। याङ्गषम्य ने ब्राह्मण को चार, क्षत्रिय को तीन, वैश्य को दो एवं 
शूद्र को एक विवाह करने की बात कही है।

प्रश्न 2.
प्रतिलोम विवाह क्या है?
उत्तर:
प्रतिलोम विवाह अनुलोम विवाह का विपरीत रुप प्रतिलोम विवाह है। इस प्रकार के विवाह में लड़को उच्च वर्ण, आति, उपजाति, कुल या वेश की होती है और लड़का निम्न वर्ण, जाति, उपजाति, कुल या वंश का होता है। इसे परिभाषित करते हुए कपाडिया लिखते हैं, “एक मि पण के व्यक्ति का जय वर्ग को स्त्री के साक्ष वितार प्रतिलोम कालात का।” उदाहरण के लिए, यदि एक ब्राह्मण सड़की का विवाह किसी क्षत्रिय, वैश्य अपणा शूद्र सड़के से होता है, तो ऐसे विवाह को प्रतिलोम विवाह कहा जाता है। इस प्रकार के विवाह में स्त्री की स्थिति निम्न हो जाती है। स्मृतिकारों ने ऐसे विवाह को क्यु आलोचना की है। ऐसे विवाह को पन मान को ‘चाहत’ अथवा ‘निषाद कहा जाता हो। दू विवाह वैधता अधिनियम, 11 एवं हिन्दू विवाह अधिनियम, 1965 में अनुलोम एवं प्रतिलोम विवाह दोनों को ही वैध माना गया है।

प्रश्न 3.
विवाह की शारीरिक योग्यताओं को बताइट।
उत्तर:
विवाह की शारीरिक योग्यताएँ निम्नलिखित हैं।

  1. विवाह की आयु विवाह का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि विशाह के समय वर एवं वम् की आयु परिपक्व होनी चाहिए। हिन्दू धर्म-शास्त्रों में विवाह की आयु को लेकर मतभेद पाया जाता है। वैदिक युग में 15 या 18 वर्ष की कन्या और 30 वर्ष के लड़के का विवाह होता था। गृहसूत्र में ‘नॉमिका’ अथवा ‘ननिका’ के क्विाह का सुझाव दिया गया है। 4 से 12 वीं की कन्या को ‘नन्का ‘ कहा गया है। वर्तमान में एक निश्चित आयु प्राप्त करने के पश्चात् ही वैधानिक रूप से उपयुक्त माना जाता है।
  2. स्वास्थ्य विवाह के पश्चात् दम्पत्ति को सन्तान उत्पत्ति के दायित्व का निर्वहन सना होता है, इसलिए दोनों का स्वस्थ होना अनिवार्य है। स्वास्थ्य खराब होने की स्थिति में परेशानी हो सकती हैं।
  3. संक्रामक रोग विवाह संक्रामक रोगों की जांच करके ही करना चाहिए, क्योकि पति-पत्र दोनों में तो किसी एक को भी यदि कोई संक्रामक रोग होता है तो विष पश्चात् एक-दूसरे को भी हो सकता है। इसके अतिरिक्त रात्र को भी वह रोग हो जाता है।
  4. प्रजनन सम्वन्धी रोग पति-पत्नी में से कोई भी यौन रोग आदि का शिकार नहीं होना चाहिए। इससे पारिवारिक स्थिति दु:खद होने के साथ ही सन्तान प्राप्ति का लक्ष्य पूरा होने में बाधाएँ आ सकता है। अत: दोनों संतान उत्पत्ति के योग्य हों और प्रजनन सम्बन्धी उत्तम स्वास्थ्य रखते हों।
  5. मानसिक रोग मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ होना भी विवाह का एक आवश्यक पास है। इसके अन्त में धात्य और कष्टमय हो सकता है। दोनों में से किसी को भी कोई अंग विकार नहीं होना चाहिए।

प्रश्न 4.
विवाह-विचकुंद क्या है? विवाह किन परिस्थितियों में रद्द किया 
ज्ञा सकता हैं?
उत्तर:
सामाजिक एवं कानूनी रूप से पति-पत्नी के विवाह सम्बन्धों की समाप्ति हो विवाह-विच्छेद कहलाती है। विवाह विच्छेद पति-पत्नी के वैवाहिक एवं पारिवारिक जीवन में असामंजस्य एवं आसप्ता का सूचक है। इसका अर्थ यह है कि जिन उद्देश्यों को लेकर विवाह किया गया वे पूर्ण नहीं हुए हैं। यह एक दुःखद घटना है, विश्वास को समाप्त है, प्रतिज्ञा एवं मोह भंग की रियत है। यद्यपि भारत के विभिन्न प्रान्तों; जैसे- महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात एवं केरल में तक के सम्बन्धित अधिनियम बनते रहे, किन्तु सम्पूर्ण भारत के सन्दर्भ में 1951 में विशेष विवाह अधिनियम तथा 1955 में हिन्दू विवाह 
अधिनियम’ तलाक की व्यवस्था है। विवाह रद्द होना विमांकित इशाओं में विवाह होने पर भी इसे रद्द किया जा सकता है।

  1. विवाह के समय दोनों पक्षों में से किसी एक का भी जीवन-साधी जीवित हो और उससे तलाक नहीं हुआ हो।
  2. विवाह के समय एक पक्ष नपुंसक हो।
  3. विशाह के समय कोई भी एक प जड़-बुद्धि य पागल हो।
  4. विवाह के एक वर्ष के अन्दर यह प्रमाणित हो जाए कि प्राय अपवा उसके संरक्षक की स्यीकृति बलपूर्वक या कपट से ली गई यौ।
  5. विवाह के एक वर्ष के भीतर यह प्रामाणित हो जाए कि विवाह के समय पानी किसी अन्य पुरुष गर्भवती दी और प्रार्थी इस बात से अनभिज्ञ था।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)

प्रश्न 1.
विवाह का अर्थ स्पष्ट करते हुए इसके उद्देश्य एवं विशेषताओं पर प्रकाशा हालिए।
उत्तर:
विवाह का अर्थ एवं परिभाषाएँ विवाह का शाब्दिक अर्थ है ‘उह’ अर्थात् वधू को वर के घर ले जाना। विवाह दो विषमलिगों का पारिवारिक जीवन में प्रवेश करने की सामाजिक, धार्मिक एवं कानूनी स्वीकृति हैं। लूसी मेयर ने विवाह को परिभाषित करते हुए लिखा है कि “शियडू स्त्री-पुरुष का ऐसा योग है, जिससे स्त्री से जन्मो सन्तान वैध मानी जाती है।” इस परिभाषा में विवाह को स्त्री व पुरुष के ऐसे सम्बन्धो के रूप में स्वीकार किया गया है, जो सन्तानों को जन्म देते हैं, उन्हें वैध घोधित करते है तथा इसके फलस्वरूप माता-पिता एवं बच्चों को समाज में कुछ अधिकार एवं प्रस्थितियाँ प्राप्त होती हैं।

बोगार्स के अनुसार, “विवाह स्त्री और पुरुष के पारिवारिक जीवन में प्रवेश करने की संस्था है।” मजूमदार एवं मदान ने लिखा है कि, “विवाह में कानूनी या धार्मिक आयोजन के रूप में उन सामाजिक स्वीकृतियों का समावेश होता है, जो विषमतगयों की यौन-क्रिया और उससे सम्बन्धित सामाजिक-आर्थिक सम्बन्धों में सम्मिलित होने का अधिकार प्रदान करते हैं।”

बिल के अनुसार, “विवाह सामाजिक आदर्श-मनदण्डों की वह समग्रता है, जो विवाहित व्यतियों के आपसी सम्बन्धों को उनके रक्त सम्बन्धियों, सन्तानो तथा सत्र के साथ सम्बन्धों को परिभावित और नियन्त्रित करती है।” अतः विवाह के परिणामस्वरूप माता-पिता एवं बच्चों के बीच कई अधिकारों एवं दायित्वों का जन्म होता है।

विवाह के उददेश्य
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तथा सामाजिक संस्थाएँ, व्यक्ति के सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक इत्यादि पक्षों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका का निवाहन करती हैं। लिहू का उद्देश्य केवल यौन सन्तुष्टि ही नहीं होगा, वरना कभी-कभी तो यह केवल सामाजिक-सांस्कृतिक एवं आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हो किया जाता है।

विवाह के अलग-अलग समजों में अलग-अलग उद्देश्य है; जैसे ईसाई धर्म में प्रमुख उद्देश्य यौन सन्तुष्टि है, तो हिन्दू समाज में धर्म की रक्षा करना या धार्मिक संस्कार करना, मुस्लिम समाजों में विवाह का उद्देश्य वैध सन्तानोत्पत्ति को जन्म देना, वहीं जनजातीय उद्देश्य साथ-साथ रहने का सामाजिक समझौता है, परन्तु समाजशास्त्रीय उद्देश्य स्त्री और पुरुष को एक प्रस्थिति देकर उसके अनुसार, भूमिकाओं का निर्वहन करना है। मजूमदार एवं मदान ने उद्देश्यों की चर्चा करते हुए लिखा है कि, “विवाह से वैयक्तिक स्तर पर या शारीरिक स्तर पर यौन सन्तुष्टि और मनोवैज्ञानिक स्तर पर सन्तान प्राप्त करना और सामाजिक स्तर पर पद की प्राप्ति होती है।

विवाह की प्रारम्भिक विशेषताएँ
विवाह की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिति हैं।

  • विवाह दो विषमलिनियों का सम्बन्ध है।
  • विवाह एक सार्वभौमिक सामाजिक संस्था है।
  • इसके माध्यम से किया सम्बन्धों का नियमन करता है।
  • बच्चों का पालन पोषण एवं समाजीकरण उपयुक्त तरीके से होता है।
  • विवाड़ में परिवार एवं समाज में अधिक सहयोग मिलता है।
  • विवाह मानसिक सुरक्षा प्रदान करता है। इसके साप ही सामाजिक सुरक्षा भौ सम्भव हो पाती है।
  • विवाह द्वारा संस्कृति का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तान्तरण सूत्र हो पाता है।
  • वैद्य सन्तानोत्पत्ति प्राप्त करने का माध्यम है।
  • माता-पिता एवं बच्चों में नवीन अधिकारों, दायित्वों एवं भूमिकाओं को जन्म देना भी विवाह की विशेषता है।
  • यह पार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक उद्देश्यों की पूर्ति करता है। वेटरमार्क ने विवाह को एक सामाजिक संस्था के अतिरिक्त एक आर्थिक संस्था भी मना है।

प्रश्न 2.
विवाह के प्रतिबन्धों में अन्तर्विवाह का क्या आशय है? इसके 
कारण और प्रभाव बताइट।
उत्तर:
विवाह के प्रतिवन्धों में अन्तर्विवाह अन्तर्विवाह का तात्पर्य हैं एक व्यक्ति अपने जीवन साथी का चुनाव अपने ही समूह से करे। इसे परिभाषित करते हुए रियर्स ने लिखा है, “अनार्यवाह से अभिप्राय उन विनिमय से है, जिसमें अपने समूह में से ही विवाह कमायो चुनना अनिवार्य होता है।”

वैदिक एवं उतरवैदिक काल में द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य) का एक ही वर्ग वा और द्विज वर्ग के लोग अपने य (द्विज) में ही विवाह करते थे। शत्र वर्ग पृथक् था। स्मृतिकाल में अन्तर्षियाहों को स्पीकृति प्रदान की गई थी, लेकिन जब एक वर्ण कई जातियों एवं उपजातियों में विभक्त हुआ तो विवाह का दायरा सौमित होता गया और लोग अपनी जाति एवं उपजाति में विवाह करने लगे, इसे ही अन्तबिंबाह माना जाने लगा। 

कुछ उपजातियों में ‘गोल’, ‘एकड़ा’ आदि हैं, जो चुनाव के क्षेत्र को एक स्थानीय सीमा तक संवित कर देते हैं। वर्तमान समय में एक व्यक्ति अपनी ही जाति, उपजाति, प्रजाति, धर्म, क्षेत्र, भषा एवं वर्ग के सदस्यों से ही विवाह करता है। केतकर के अनुसार कुछ हिन्दु जातियाँ ऐसी हैं, जो पन्द्रह परिवारों के बाहर विवाह नहीं करतीं।

अन्तर्विवाह के कारण विवाह के क्षेत्र को इस प्रकार पॉम्ति करने के अनेक सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारक रहे हैं। इनमें प्रमुख कारक निम्नलिखित है

  1. अन्तर्रजातीय मिश्रण को रोकने के लिए अन्तर्वर्ण विवाहों पर प्रतिबन्ध लगाए गए। विशेषतः आर्य एवं इविड़ प्रजातियों के बीच रस्त मिश्रण को रोकने के लिए ऐसा किया गया।
  2. प्रत्येक जाति और उपजाति अपनी सांस्कृतिक विशेषता को बनाए रखना चाहती थी, अल; न्। अ चाह पर बल दिया।
  3. जैन एवं बौद्ध धर्म में शिथिलता आने से ब्राह्मणों ने अपनी लोई प्रतिष्ठ को पुनः प्राप्त करने के लिए कठोर जातीय नियम बनाए।
  4. मध्य युग में बाल विवाह में वृद्धि के कारण जातीय नियमों पर बल दिया आने लगा।
  5. प्रत्येक गति का एक परम्परात्मक व्यवसाय पाया जाता है। अपने व्यावसायिक ज्ञान को गुप्त रखने की इच्छा ने भी अन्तर्निवाह को प्रोत्साहित किया।

अत्तर्विवाह का समाज पर प्रभाव

अन्तर्विवाह में समाज पर निम्नलिखित प्रभाव दिखाई दिए

  1. इससे लोगों के सम्पर्क का दायरा समंत हो गया, जिससे उपयुक्त वर-वधु चुनने में ना आने लगी।
  2. संकीर्णता की भावना पनपी, शारिक मृणा, द्वेष एवं कटुता में वृद्धि हुई।
  3. क्षेत्रोक्ता की भावना उत्पन हुई, जातिवाद बढ़ा।
  4. व्यावसायिक ज्ञान एक समूह तक ही सीमित हो गया।
  5. इससे समाज की प्रगति में अवर-द्धता आई।

प्रश्न 3.
बहिर्विवाह के विभिन्न स्वरूपों का ऊत्तेख कीजिए।
उत्तर:
बहिर्विवाह से तात्पर्य है एक व्यक्ति जिस समूह का सदस्य है उससे बाहर विवाह करे। रिवर्स के अनुसार विवाह वह विनिमय है, जिसमें एक सामाजिक समूह के सदस्य के लिए यह अनिवार्य होता है कि वह दूसरे सामाजिक समूह से अपने जीवनसाथी का चुनाव करे। हिन्दुओ में बहिर्विवाह के नियमानुसार एक व्यक्ति को अपने परिवार, गोत्र, प्रर, पिण्ड आदि समूहों से बाहर विवाह करना पड़ता है। जनजातियों में एक ही टोटम को मानने वाले मोगों को भी परस्पर विवाह करने की मनाही हैं। हिन्दुओं में प्रचलित बहिर्विवाह के विभिन्न स्वरूप निम्नलिखित है।

1. गोत्र बहिर्विवाह हिन्दुओं में सगोत्र विवाह निषेध हैं। गोत्र का सामान्य अर्थ उन व्यक्तियों के समूह से है, जिनकी उत्पत्ति एक आणि पर्यज से हुई हो। सवाषाड़ हिरण्यकेशी औतसूत्र के अनुसार, विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप और गस्त्य नामक आठ ऋषियों को सन्तानों को गोत्र के नाम से पुकारा गया।

गोत्र शब्द के तीन या चार अप हैं; जैसे- गौशाला, गाय का समूह, किला तया पर्वत। गोत्र का शाब्दिक अर्थ अर्थात् गायों के बांधने का स्थान (गौशाला या धावा) अथवा गौपालन करने वाले समूह में है। जिन लोगों की गाएँ एक स्थान पर बैधती थी, उनमें नैतिक सम्बन्ध बन आते थे और सम्पतः ये रक्त सम्बन्की भी होते थे, अत; वे परस्पर विवाह नहीं करते थे। विज्ञानेश्वर ने क्षेत्र का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा है कि वंश-परम्परा में जो नाम प्रसिद्ध होता है, उसी को गोत्र कहा जाता है। इस प्रकार एक गोत्र के सदस्यों द्वारा अपने गोत्र से बाहर विवाह करना ही गोत्र बहिनिंबाह कहलाता है।

2. सप्रवर बहिर्विवाह गोत्र से सम्बन्धित ही एक शब्द है प्रगार’ जिसका वैदिक इण्डेक्स के अनुसार शाब्दिक अर्थ है ‘आह्वान करना। (invitation Summon) कर्वे के अनुसार, “श्वर का अर्थ क्षत्रियों में गभग वंशकार वा कुलकर की तरह ही है। प्रवर का अर्थ है ‘महान् (Great on) आहाण लोग हवन-यज्ञ आदि के समय गोत्र व अंशकार के नाम का उच्चारण करते थे। इस अर्थ में प्रवर का तात्पर्य ‘श्रेष्ठ (The Excellent 00) से था। इस प्रकार समान पत्र और अमान मषियों के नाम का अरण करने वाले यति अपने को एक ही प्रवर से सम्बद्ध मानने लगे। एक प्रवर के व्यक्ति अपने को सामान्य आणि पूर्वजों से संस्कारात्मक एवं आध्यात्मिक रूप से सम्बन्धित मानते हैं, अतः वे परस्पर विवाह नहीं करते। हो,कपाडिया लिखते हैं, “प्रवर संस्कार अथवा ज्ञान के उस समुदाय की ओर संकेत करता है, जिसमें एक व्यक्ति सम्बन्धित होता है।” प्रवर आध्यात्मिक दृष्टि से परस्पर सम्बन्धित लोगों के समूह की ओर संकेत करता है न क र जान्थयों की ओर। हिन्दू विवाह अधिनियम द्वारा ‘सप्रखर विवाह सम्बन्धी निषेधों को समाप्त कर दिया गया है ।

3. सपिण्ड हेर्षियाहू सवर और सगोत्र बहिर्विवाह के नियम पिच पक्ष के । सम्यन्मियों में विवाह की स्वीकृति नहीं देते। सपिण्ड विषङ्ग निषेध के नियम मातृ एवं पितृ पक्ष की कुछ पीढ़ियों में विवाह पर रोक लगाते हैं। इरावती – कर्वे सपिण्हता का अर्थ बताती है स + पिण्ड (Together + thall of rice, abody) अर्थात् मृत व्यक्ति को पिण्ड दान देने वाले या उसके रक्त कण से सम्बन्धित लोग। स्मृति में सपिण्ड का प्रयोग दो अर्षों में हुआ है-

  • वे सभी व्यक्ति सपिण्डी है, जो एक व्यक्ति को पिण्ड दान करते हैं
  • मिताक्षरा के अनुसार वे सभी व्यक्ति जो एक ही शरीर में पैदा हुए हैं,

पिता और पुत्र सपिण्डी हैं, क्योंकि पिता के शरीर के अवयव पुत्र में आते हैं। इसी प्रकार से माँ व सन्ताने, दादा-दादी एवं पोते भी सपिण्ड हैं। सपिण्ड विवाह भी निषिद्ध रहे हैं। रामायण एवं महाभारत काल में सपिण्डता का निदम एक स्थान पर निवास करने वाले पितृपय लोगों पर लागू होता था। मध्ययुगीन टोकाकारों के अनुसार पिता की ओर से सात व माता की ओर से पाँच पीदियों में विवाह नहीं किया जाना चाहिए। हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 ने सपिण्ड बहिर्निवाह को मान्यता प्रदान की हैं। माता एवं पिता दोनों पक्षों से तीन तीन पीदियों के सपिडियों में परस्पर विवाह पा रोक लगा दी गई है। फिर भी यदि किमी मह व प्रथा अपना परम्परा इसे निषिद्ध नहीं है, तो सा विवाह भी वैध माना।

4. ग्राम बहिर्विवाड़ उत्तर भारत और प्रमुखत: पंजाब एवं दिल्ली के आस-पास यह नियम है कि एक व्यक्ति अपने ही गांव में विवाह नहीं करेगा। पंजाब में तो उन गाँवों में भी विवाह करने की मनाही है, जिनकी सीमा व्यक्ति के गाँव को सीमा को सूती हो। इस प्रकार के खिलाह का कारण गाँव की जनसंख्या का सीमित होना, उसमें एक ही गोत्र, वंश अथवा परिवार के सदस्यों का निवास होना, आदि रहे हैं। सगोत्री एवं सपड़ियों से विवाह के निषेध के कारण हो ऐसे विवाह प्रक्ष में आए। गांवों में इस प्रकार के विड़ को खेड़ा बहिर्नियाह’ के नाम से जाना जाता है।

5. टोटम बहिर्विवाह इस प्रकार के विवाह का नियम भारतीय जनजातियों में प्रचलित है। टोटम कोई भी एक पशु, पक्षी, पेड़-पौधा अथवा निर्जीव वस्तु हो सकती है, जिसे एक गोत्र के लोग आदर एवं श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं, उससे अपना आध्यात्मिक सम्बन्ध जोड़ते हैं। एक गोत्र का एक टोटन होता है और एक टोटम को मानने से परस्पर भाई-बहन समझे जाते हैं, अत: वे परस्पर विवाह नहीं कर सकते।

प्रश्न 4.
विवाह सम्वन्धी वैधानिक योग्यताओं में ब्रिटिश काल के 
अधिनियमों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
विवाह नामक संस्था प्रत्येक काल में देखने को मिलती है। यद्यपि इसका स्वरूप समय के अनुसार बदला रहा हैं। विशाह से सन्त अधिनियम भी बनाए गए, जिनमें ब्रिटिश काल में बने अधिनियम तथा स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् सरकार द्वारा बनाए गए अधिनियम महत्वपूर्ण हैं। ब्रिटिश काल के विवाह सम्बन्धी वैधानिक प्रमुख अधिनियम इस प्रकार से है।
1. सती–प्रथा निषेध अधिनियम 1829 (Regulation o. XVII, 1529) 
1829 से पूर्व भारत में सती–प्रथा का प्रचलन था। एक ओर हिन्दुओं में बाल-विवाह का प्रचलन था और दूसरी ओर विधवा हो जाने पर स्त्रियों पति के साथ चिता में जल जाने के लिए मजबूर किया जाता था। उन्हें यह प्रलोभन दिया जाता था कि सती होने पर स्वर्ग मिलेगा। कई बार तो विधवाओं को जबरन मृत पति के साथ सती होने के लिए मजबूर किया जाता था और चिता में पकेल दिया जाता था। इस अमानुषिक प्रथा को समाप्त करने के लिए राजा राममोहन राय जैसे समाज सुधारको कठोर परिश्रम और आन्दोलन किया और उनके प्रयासों से 1829 में सती–प्रथा निषेध अपिनियम बना।

2. हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1858 (Hindu Widow marriage Act, 1866) 155 से पूर्व विधाओं को न तो पुननिता को स्वीकृति पी और न उन्हें अपने मूत पति को सम्पनि में कोई असर हो बाल-विवाह एवं बेमेल विवाह के कारण सत्र में विधवाओं की संख्या बढ़ गई थी त उनको दशा बड़ी दयनीय पी। कई विपाएँ तो धर्म परिवर्तन कर मुसलमान या ईसाई बन गई दी। आर्य सामान, ब्रहा सगाज, ईश्वरचन्द्र मिशागर राममोहन राय ने सरकार का इस समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया। इनके प्रयासों से 186 में हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम बना। इस अधिनियम द्वारा हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम बना। इस अधिनियम द्वारा हिन्दु विषयाओं के पुनर्विवाह को कानूनी बाधाओं को समाप्त कर दिया गया।

3. बाल-विवाह निरोधक अधिनियम, 1121 Child Murriat kaistraint Act, 1929 1929 बाल-विवाह रोकने का अधिनियम पारित किया गया। यद्यपि इससे पूर्व भो छोटे छोटे बच्चों के विवाह पर रोक लगाने के लिए 100 1 1881 में यह अधिनियम पारित का विवाह की आयु सङ्गकियों के लिए मशः 10 तथा 12 वर्ष कर दी गई थी, किन्तु 1929 में हरविलास शारदा के प्रयत्नों से बाल-विवाह विरोधक अधिनियम पारित हुआ, जिसे ‘शरदा एक्ट’ के नाम से भी जाना जाता हैं। इस अधिनियम को मुख्य बातें इस प्रकार है-इस अधिनियम के अनुसार विवाह के समय तड़के की आयु 18 वर्ष तथा सड़कों की आयु 15 वर्ष होनी चाहिए। इससे कम आयु के बिगह को बात-वि। माना जाएगा, कना या पनि बाल-विवाह को रोकने में अधिक सफल नहीं रहा। 1978 में इस अधिनियम में शोपन कर दिया गया। यह अधिनियम अन्य बाल-विवाह निरोधक (संशोधित) अधिनियम 1978 के नाम से जाना जाता है। इस नियम के अन्तर्गत सड़कों के लिए 1 का न्यूनतम आयु 21 वर्ष और सकियों के लिए न्यूनतम आयु 18 वर्ष कर दी गई।

4. हिन्दू स्त्रियों को सम्पत्ति पर अधिकार अधिनियम, 1937 (Hindu Wom Rigtit to EProperty Act, 1937) हिन्दू स्त्री के विधवा होने पर मृत पति की सम्पत्ति में अधिकार प्रदान करने की दृष्टि से 1837 में यह अधिनियम पारित किया। गया है।

5. अलग रहने और भरण-पोषण हेतु स्त्रियों को अधिकार अधिनियम, 1946 इस अधिनियम के अनुसार हिन्दू स्त्रियों को कुछ परिस्थितियों में पति से अलग रहने पर। भरण-पोषण के अधिकार प्राप्त होते हैं। जौ को पाण-पोषण का अधिकार तभी मिलेगा जब

  • ति किसी ऐसे घृणित रोग से पीड़ित हो जो उसे पत्नी के संसर्ग से न हुआ हो।
  • पति निर्दयता का व्यवहार करता हो अथवा पत्नी पति के साथ रहना। खतरनाक समझी हो।
  • पत्नी को उसके पति ने छोड़ हो।
  • पति ने दूसरा विवाह कर लिया हो।
  • पति ने धर्म परिवर्तन का लिया हो।
  • पति किसी अन्य स्त्री से सम्बन्ध राखता हो।

विवाह के जीवशास्त्रीय योग्यताएँ

बियाह के लिए जीवशास्त्रीय योग्यताएँ निम्नलिखित हैं

  1. विवाह से सम्बन्धित लड़का व लहको दोनों शारीरिक एवं मानसिक रूप से परिपक्व
  2. लड़का एवं लड़की दोनों की आयु 18 अर्ष हों।
  3. विवाह में जाति वन्धन अनिवार्य नहीं है।
  4. जैविक रूप से लड़का एवं सड़की दोनों ही 18 वर्ष की आयु में विवाह के योग्य हो जाते हैं। अतः जैविक रूप से आयु को वन्धन नहीं माना जाता हैं।

प्रश्न 5.
स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात विवाह से सम्बन्धित अधिनियमों का 
उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् विवाह से सम्बन्धित प्राणु अधिनियम निम्नलिखित हैं।
1. विशेष विवाह अधिनियम, 1951 (Special Marrian Act, 1964) किसी भी 
धर्म को मानने वालों को पास्पर मिह को स्वीकृति देने के लिए 1872 ई. में विशेष विवाह अधिनयम पारित किया गया। 1921 में इस अधिनियम को संशोधित कर विभिन शनियों के बीच होने वाले विवाह को वैध घोषित किया गया।1951 के इस अधिनियम द्वारा विभिन्न धर्मों एवं जातियों के रोगों को परस्पर विवाह की स्वीकृति प्रदान कर दी गई। इस अधिनियम में एक-विया की व्यवस्था है तथा 21 वर्ष से कम आयु के लड़के व 18 वर्ष से कम आयु की लड़की का विवाह उनके माता-पिता अशा संरक्षकों की स्वीकृति से होगा।

2. हिन्दू विवाह अधिनियम, 1965 (Hindu Marriage Act. 1955) 18 मई, 1965 से अम्मू और कश्मीर को छोड़कर सम्पूर्ण भारत में निवास करने वाले भो, जिनमें जैन, बौद्ध, सिक्छ । सम्मिलित है, हिन्दू विवाह अधिनियम लागू कर दिया गया। इस अधिनियम के द्वारा विवाह से सम्बन्धित पूर्व में पास किए गए सभी अधिनियम रद्द कर दिए गए और सभी हिंदुओं पर एकसमान कानून सगू किया गया। इस अधिनियम में हिंदू विवाह की प्रचलित विभिन्न विधियों को मान्यता प्रदान की गई है, साथ ही सभी जातियों के स्त्री-पुरुषों को विवाह एवं तलाक के अधिकार प्रदान किए गए। है। इसकी प्रमुख विशेषताओं पर इस अध्याय में पूर्व में विचार किया जा चुका है।

3. हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (Hindu Butteesaian Act, 191sti) 1837 के हिन्दू स्त्रियों को सम्पत्ति पर अधिकार अधिनयम में विधवा को अपने मत पति की सम्पत्ति में समेत अधिकार प्रदा था तथा भिरा र दायभाग ही सम्पत्ति में। उत्तराधिकार के भिन्न-भिन्न नियम । सम्पत्ति अधिकार को बाधाओं को समाप्त करने और स्त्रियों को पुरुष के समान अधिकार प्रदान करने की दृष्टि से हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 पारित किया गया।

4. हिन्दू नाबालिग तथा संरक्षकता अधिनियम, 1956 (The Hindu Minority and Guardianship Act, 1956) अधिनियम के पूर्व नाबालिग बच्चे के पिता की मृत्यु होने पर संरक्षक बनने का अधिकार केवल पितृ पक्ष के लोगों को हो सम्पत्ति का दुरुपयोग होने पर भी मा छ नहीं कर सकती थी। इस अधिनियम ने इस कमी को दूर कर दिया हैं।

5. हिन्दू दत्तक ग्रहण ओर भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (Hindu Adaptation and Maintenance Act, 1956) अधिनियम में गोद ने । त्रों का उनके आश्रितों के भरण पोषण के बारे में विस्तार से व्यवस्था की गई है।

6. स्त्रियों व कन्याओं का अनतिक व्यापार निरोधक अधिनियम, 1956 (Suppression of Immoral Trafic in Women and Girls Act, 1958) वेश्यावृति और अनैतिक व्यवहार को रोकने की दृष्टि से भारत सरकार ने 1955 में यह अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम को मुख्य विशेषतई निम्न प्रकार हैं।

  • वेश्यावृत्ति एक दण्डनीय अपराध हैं। इस अधिनियम के अनुसार, “कोई भी स्त्री जो घन या वस्तु के बदले यौन सम्बन्ध के लिए अपना शरीर अर्पत करती है, वेश्या’ हैं तथा अपने शरीर को इस प्रकार यौनसम्बन्ध के लिए अर्पण करना ‘वेश्यागृति’ है।”
  • वेश्यालयों में रहने वाला व्यक्ति (सन्तान को छोड़कर) यदि यह 18 वर्ष से अधिक का है और वेश्या की आय पर आश्रित रहता है तो उसे दो वर्ष का कारावास अथवा एक हजार रुपये तक का दण्ड़ दिया जा सकता है।
  • वेश्यालय चलाने वाले व्यक्ति को 1 से 15 वर्ष तक का कारावास तथा दो हजार रुपये तक का जुर्माना आदि दड़ दिया जा सकता है।

7. दहेज निरोधक अधिनियम, 1961 (Lowry Prohibition Act, 1961) हिन्दू समाज में दहेज की भीषण समस्या का समाधान करने के लिए मई, 1961 में ‘दहेज निरोधक अधिनियम’ पारित किया गया। इसकी प्रमुख विशेषताओं पर सो अध्याय में पूर्व में विचार किया जा चुका है। 1956 में दहेज निरोधक अधिनियम, 1961 में संशोधन कर इसे और कठोर बनाया गया है। 

प्रश्न 6.
विवाह-विच्छेद किसे कहते हैं? विवाह-विच्छेद के लाभ और हानियों का वर्णन कीजिए। का विवाह विच्छंद से कौन-कौन से लाभ होते हैं?
उत्तर:
विवाह-विच्छेद इसके लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या 4 देखें। विवाह-विच्छेद से लाभ विवाह-विच्छेद में निम्नलिखित लाभ होते हैं।

  1. समानता का अधिकार वर्तमान में स्त्री-पुरुषों को सभी क्षेत्रों में समान अधिकार प्रदान किए गए हैं, ऐसी स्थिति में विवाह-विच्छेद का अधिकार केवल पुरुषों को ही नही वरन् स्त्रियों को भी प्राप्त होना चाहिए। उन्हें भी असाधारण परिस्थितियों में अपने पति को त्यागने का अधिकार होना चाहिए।
  2. पारिवारिक संगठन को सुदृढ़ बनाने के लिए वर्तमान में एकाकी परिवारों में पति के दुराचारी होने या वैवाहिक दायित्व न निभाने पर पत्नी व बच्चों को कोई अन्य सहारा नहीं होता। ऐसी दशा में स्त्री व बच्चों की रक्षा के लिए एवं परिवार को सुसंगठिा बनाने के लिए विशिष्ट परिस्पितियों में विवाह विच्छेद की स्पोति दी उनी चाहिए।
  3. स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए स्त्रियों को विवाह-विच्छेद का अश्किार मिलने पर उनकी पारिवारिक एवं सामवक प्रतिष्ठा में वृद्धि होंगी, साथ ही पुरुषों की मनमानी पर भी अंकुश लगेगा।
  4. वैवाहिक समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए हिन्दू विवाह से सम्बन्धित समस्याओं जैसे—बाल-विवाह, अनमेल विवाह, दहेज, विधवा विवाह निषेध आदि से छुटकारा पाने के लिए विवाह-विच्छेद का अधिकार स्त्री-पुरुषों को समान रूप से दिया जाना चाहिए।
  5. सामाजिक जीव को सन्तुलित बनाने के लिए स्त्रियों को विवाह के क्षेत्र में पुरुषों के समन अधिकार देने से समाज व्यवस्था में असन्तुलन पैदा होगा। इस स्थिति में बचने के लिए एवं मानवीय दृष्टिकोण से भी स्त्रियों को विवाह- विछंद का अधिकार प्राप्त होना चाहिए।
  6. परम्परा व संस्कृति को संरक्षण स्त्रियों को तलाक का अधिकार देने से भारत को प्राचीन परम्परा व संस्कृति को संरक्षण मि। वैदिक . कल और उसके काफी समय बाद तक दोनों पक्षों को तलाक देने के अधिकार थे। मध्य गुग में इन अधिकारों का रोक लगायी गई। इस प्रकार तलाक से हमारी भारतीय परम्परा व संस्कृति को कोई खतरा नहीं होगा, बल्कि इससे तो उनका क्षण ही होग
  7. स्त्रियों को तलाक का अधिकार देने से हिन्दू विवाह पर लगाया जाने वाला यह आरोप कि त एक तर अधध। पों के प में है, भिट जाएगा। यह दोनों पक्षों को समान रूप से सुदृढ़ बनाएगा।

विवाह-विच्छेद से हानियाँ
विवाह विच्छेद से निम्नलिखित हानियाँ होती हैं।

  1. पारिवारिक विघटन की समस्या तलाक से पारिवारिक विघटन व सामाजिक विपटन भी होता है।
  2. स्त्रियों के भरण-पोषण की समस्या तलाक होने पर स्त्रियाँ बेसहारा, बेघर हो जाती है, उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कई आर अनैतिक स्थिति का भी सामान करना पड़ जाता है।
  3. बच्चों की समस्या तलाक के कारण बच्चों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उनके लालन पालन, शिक्षा दीक्षा की समस्या पैदा हो जाती है। माता-पिता के अभाव में उनके व्यक्तित्व का भी समुचित विकास नहीं हो पाता।
  4. तलाक की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन विवाह-विदद से तलाक की प्रवृत्ति बढ़ती है, इससे जीवन में ठहराव नहीं आता और समाज में अनतिका बड़ती है। तलाक से पुनर्बाह में भी वृद्धि होती है।
  5. तलाक के प्रभाव में मंगामक किट पैदा होता हैं नशा पति-पत्नी को आएँ टूट जाती है। उनमें हौन भावना पैदा होती है।

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UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 4 चैक सम्बन्धी साधारण लेख्ने

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Board UP Board
Class Class 10
Subject Commerce
Chapter Chapter 4
Chapter Name चैक सम्बन्धी साधारण लेख्ने
Number of Questions Solved 16
Category UP Board Solutions

UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 4 चैक सम्बन्धी साधारण लेख्ने

बहुविकल्पीय प्रश्न ( 1 अंक)
                   

प्रश्न 1.
चैक पर लेखक के हस्ताक्षर होना। (2012)
(a) आवश्यक नहीं है
(b) वांछनीय है
(c) आवश्यक है
(d) ये सभी
उत्तर:
(c) आवश्यक है

प्रश्न 2.
चैक के मुख्य पृष्ठ पर बाईं ओर कोने पर दो तिरछी समानान्तर रेखाएँ खींच देने को कहते हैं।
(a) पृष्ठांकन
(b) रेखांकन
(C) बेचान
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) रेखांकन

प्रश्न 3.
चैक का रेखांकन………….द्वारा नहीं किया जा सकता है। (2014)
(a) आहर्ता
(b) भुगतान पाने वाला
(c) पृष्ठांकन
(d) बैंक
उत्तर:
(b) भुगतान पाने वाला

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प्रश्न 4.
आदाता द्वारा प्राप्त वाहक चैक को रेखांकित (2013)
(a) किया जा सकता है।
(b) नहीं किया जा सकता
(C) पता नहीं
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(a) किया जा सकता है।

प्रश्न 5.
रेखांकित चैक का भुगतान
(a) नकद मिल सकता है
(b) नकद नहीं मिल सकता
(C) ग्राहक के खाते में जमा होता है
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(c) ग्राहक के खाते में जमा होता है।

निश्चित उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
चैक एक शर्तसहित/शर्तरहित आज्ञा-पत्र है।
उत्तर:
शर्तरहित

प्रश्न 2.
चैक की वैधता कितनी होती है?
उत्तर:
3 माह

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प्रश्न 3.
चैक के रेखांकन का क्या उद्देश्य है?
उत्तर:
चैक के भुगतान को सुरक्षित करना।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1.
चैक क्या है? चैक के तीन पक्षकारों के नाम लिखिए। (2013)
उत्तर:
चैक एक शर्तरहित लिखित आज्ञा-पत्र होता है, जिसमें लेखक बैंक को चैक में लिखित व्यक्ति, उसके द्वारा आदेशित व्यक्ति या धारक को चैक में लिखित धनराशि भुगतान करने का आदेश देता है। चैक के निम्नलिखित तीन पक्षकार होते हैं

  1. लेखक या आहर्ता
  2. देनदार या आहर्ती
  3. लेनदार या आदाता

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प्रश्न 2.
एक चैक को रेखांकित कैसे किया जाता है? इसके दो लाभ लिखिए। (2016)
अथवा
चैक को रेखांकित करने की विधि लिखिए। (2014)
उत्तर:
चैक को अत्यन्त सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से उसके मुख्य पृष्ठ पर बाईं ओर दो समानान्तर तिरछी रेखाएँ खींच दी जाती हैं, जिसे चैक का रेखांकन करना कहते हैं एवं इस प्रकार के चैक को रेखांकित चैक’ कहते हैं। चैक का रेखांकन ‘भुगतान (UPBoardSolutions.com) पाने वाला’ द्वारा नहीं किया जा सकता है। परन्तु आदाती द्वारा वाहेक चैक को रेखांकित किया जा सकता है। चैक का रेखांकन निम्नलिखित दो प्रकार से किया जा सकता है

1. साधारण रेखांकन
2. विशेष रेखांकन

इसके दो लाभ निम्नलिखित हैं

1. रेखांकित चैक के द्वारा भुगतान सुरक्षित रूप से किया जा सकता है।
2. रेखांकित चैक से भुगतान को प्रमाणित किया जा सकता है।

प्रश्न 3.
चैक के अनादरण के किन्हीं दो कारणों का उल्लेख कीजिए। (2016)
अथवा
चैक के अनादरण के किन्हीं चार कारणों का उल्लेख कीजिए। (2018)
उत्तर:
निम्नलिखित दशाओं के कारण बैंक चैक का अनादरण कर देता है

  1. यदि चैक पर दिनांक न लिखी हो।
  2. किसी चैक पर आगे (भविष्य) की तारीख लिखी हुई हो।
  3. चैक पर 3 माह पूर्व की तारीख लिखी हुई हो।
  4. किसी व्यक्ति के खाते में चैक की राशि की अपेक्षा पर्याप्त धन न हो।

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लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक)

प्रश्न 1.
चैक का नमूना बनाइए। (2015)
अथवा
चैक से आप क्या समझते हैं? इसका नमूना बनाइए। (2008)
उत्तर:
चैक से आशय चैक एक शर्तरहित लिखित आज्ञा-पत्र होता है, जिसमें लेखक बैंक को चैक में लिखित व्यक्ति, उसके द्वारा आदेशित व्यक्ति या धारक को चैक में लिखित धनराशि भुगतान करने का आदेश देता है। भारतीय विनिमय साध्य विलेख अधिनियम, 1881 (UPBoardSolutions.com) की धारा 6 के अनुसार, “चैक एक ऐसा विनिमय-पत्र है जो किसी बैंक विशेष पर लिखा जाता है तथा जो केवल माँग पर देय होता है।”
चैक का नमूना
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 4 चैक सम्बन्धी साधारण लेख्ने
प्रश्न 2.
चैक की विशेषताएँ बताइए। चैक के विभिन्न भेदों को भी स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
चैक की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. यह एक शर्तरहित लिखित आज्ञा-पत्र होता है।
  2. इसका भुगतान माँगने पर ही दिया जाता है।
  3. इसमें किसी बैंक विशेष को आज्ञा दी जाती है।
  4. धनराशि का भुगतान उसी व्यक्ति को करना पड़ता है, जिसका नाम चैक पर लिखा हो अथवा उसके आदेशानुसार किसी अन्य व्यक्ति को किया जाता है।
  5. इस पर लेखक के हस्ताक्षर अवश्य होते हैं।
  6. इसका भुगतान करने की धनराशि निश्चित होती है।

चैक के मुख्य भेद
चैक मुख्यत: निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं-

1. वाहक चैक इस चैक का भुगतान उसमें उल्लेखित व्यक्ति को या वाहक अर्थात् बैंक की खिड़की पर प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति को कर दिया। जाता है। ऐसे चैक का हस्तान्तरण केवल सुपुर्दगी मात्र से ही हो जाता है। तथा चैक का पृष्ठांकन करने की आवश्यकता नहीं होती है। यदि कोई गलत व्यक्ति ऐसे चैक का भुगतान ले लेता है, तो इसमें बैंक की कोई जिम्मेदारी नहीं होती है। ऐसे चैक को प्राप्त करने वाला व्यक्ति उस चैक का कानूनी अधिकारी बन जाता है। भुगतान प्राप्त करने की दृष्टि से आदेशित चैकों को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा गया है

  • खुला चैक जिस चैक का भुगतान बैंक की खिड़की पर प्रस्तुत करने पर तुरन्त प्राप्त हो जाता है, उसे खुला चैक कहते हैं।
  • रेखांकित चैक यदि किसी चैक को अत्यन्त सुरक्षित बनाने के लिएउसके (UPBoardSolutions.com) मुख्य पृष्ठ पर ऊपर बाईं ओर कोने में दो तिरछी समानान्तर रेखाएँ खींच दी जाती हैं, तो ऐसे चैक को रेखांकित चैक’ कहते हैं।

2. आदेशित चैक इस चैक का भुगतान उसमें उल्लेखित व्यक्ति को या उसके आदेशानुसार अन्य किसी व्यक्ति को ही दिया जाता है तथा इस चैक पर व्यक्ति के नाम के आगे ‘Or Order’ शब्द लिखा रहता है। ऐसे चैक के हस्तान्तरण के लिए चैक की सुपुर्दगी के साथ-साथ उसका पृष्ठांकन करना भी जरूरी होता है। व्यवहार में प्रायः इसी प्रकार के चैकों का प्रयोग होता है।

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प्रश्न 3.
रेखांकन के प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
रेखांकन निम्नलिखित दो प्रकार का होता है-

1. सामान्य रेखांकन जब किसी चैक के मुख्य पृष्ठ पर दो समानान्तर तिरछी रेखाएँ। खींची गयी हों तथा उनके बीच & Co., Not Negotiable, आदि शब्द लिखे गए हों अथवा न लिखे गए हों, तो इसे सामान्य रेखांकन कहा जाता है।
UP Board Solutions for Class 10 Commerce Chapter 4 चैक सम्बन्धी साधारण लेख्ने

2. विशेष रेखांकन जब किसी चैक के मुख्य पृष्ठ पर बैंक का नाम लिख दिया जाता है, (UPBoardSolutions.com) चाहे उसके साथ ‘Not Negotiable’ शब्द लिखा गया हो या नहीं, इसे विशेष रेखांकन कहा जाता है।
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (8 अके)

प्रश्न 1.
चैक से आप क्या समझते हैं? चैक का अनादरण क्या है? चैक के अनादरण के दस कारणों का उल्लेख कीजिए। (2010)
उत्तर:
चैक से आशय इसके लिए लघु उत्तरीय प्रश्न 1 देखें। चैक का अनादरण या चैक को वापस करना जब कोई बैंक किसी कारणवश चैक का भुगतान करने से इन्कार कर देता है, तो इसे चैक का अनादरण, अप्रतिष्ठित या तिरस्कृत होना’ (Dishonour of Cheque) कहते हैं। ग्राहक के द्वारा लिखे गए प्रत्येक चैक का भुगतान करना बैंक के लिए अनिवार्य होता है। यदि ग्राहक के खाते में पर्याप्त धन जमा है, तो बैंक चैक का अनादरण नहीं कर सकता है, परन्तु निम्न कारणों से बैंक चैक का अनादरण कर देता है

  1. दिनांक को न लिखा होना यदि किसी चैक पर दिनांक नहीं लिखी हो, तो बैंक ऐसे चैक पर ‘दिनांक नहीं’ शब्द लिखकर चैक को वापस कर देता है।
  2. आगामी दिनांक का चैक यदि किसी चैक पर आगामी दिनांक लिखी होती है, तो बैंक ऐसे चैक का भुगतान नहीं करता है एवं उस पर ‘आगामी दिनांक का चैक’ शब्द लिखकर चैक को वापस कर देता है।
  3. 3 माह पूर्व की तारीख यदि किसी चैक पर 3 माह पूर्व की तारीख लिखी हुई हो, तो इस दशा में बैंक चैक का भुगतान नहीं कर सकता है।
  4. अपर्याप्त धन का होना यदि किसी ग्राहक के खाते में चैक की राशि से (UPBoardSolutions.com) कम राशि जमा होती है, तो बैंक द्वारा इस दशा में चैक का भुगतान नहीं किया जाता है तथा चैक पर ‘अपर्याप्त धनराशि’ शब्द लिखकर चैक को वापस कर देता है।
  5. अंकों व शब्दों में अन्तर यदि चैक में लिखी गई धनराशि के अंकों व शब्दों में कोई अन्तर होता है, तो बैंक ऐसे चैक का भुगतान नहीं करता तथा चैक पर ‘अंकों वे शब्दों में अन्तर’ शब्द लिखकर चैक को वापस कर देता है।
  6. न्यायालय द्वारा रोक यदि किसी कारणवश न्यायालय द्वारा चैक का भुगतान रोक दिया गया हो, तो इस दशा में बैंक चैक का भुगतान नहीं कर सकता।
  7. विकृत चैक यदि चैक कटा-फटा हो या उसका रूप विकृत हो गया हो, तो ऐसे चैक को बैंक ‘विकृत चैक’ शब्द लिखकर वापस कर देता है।
  8. बेचान में शंका यदि किसी चैक को बेचान करते समय किसी प्रकार की शंका उत्पन्न हो, तो भी बैंक चैक का अनादरण कर देता है।
  9. लेखक की मृत्यु यदि चैक लिखने वाले की मृत्यु हो गई हो या वो पागल या दिवालिया हो गया हो और बैंक को इस बात की जानकारी हो, तो बैंक चैक का भुगतान करने से मना कर सकता है।
  10. हस्ताक्षरों में अन्तर यदि चैक पर किए गए लेखक के हस्ताक्षर उसके नमूने के हस्ताक्षर से भिन्न होते हैं तब बैंक ऐसे चैक को हस्ताक्षरों में अन्तर शब्द लिखकर वापस कर देता है।

क्रियात्मक प्रश्न (8 अंक)

प्रश्न 1.
निम्नलिखित लेन-देन का 31 मार्च, 2007 को मोहन के जर्नल में लेखा कीजिए।

  1. मोहन ने रे 50,000 से चालू खाता खोला।
  2. ₹ 10,000 का माल खरीदा तथा भुगतान चैक से किया।
  3. ₹ 500 मजदूरी का चैक द्वारा भुगतान किया।
  4. निजी व्यय के लिए बैंक से ₹ 200 निकाले।
  5. सोहन को ₹ 6,000 का माल बेचा। (2008)

हल
जर्नल लेखे
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प्रश्न 2.
निम्नलिखित लेन-देनों के लिए जर्नल में प्रविष्टियाँ कीजिए। (2007)
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हल
जर्नल लेखे
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