UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 16 सोना (मंजरी)

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समस्त गद्याथों की व्याख्या

पर हिरन यह …………………………………………….. चेष्टाएँ हैं।

संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘मंजरी’ के ‘सोना’ नामक पाठ से लिया गया है। इसकी लेखिका ‘महादेवी वर्मा’ हैं।

प्रसंग – लेखिका का कथन है कि कुत्ता, स्वामी और सेवक का अन्तर जानता है। वह प्यार से बुलाने पर पूँछ हिलाता है और डाँटने पर दयनीय बनकर दुबकता है।

व्याख्या – हिरन कुत्ते के मालिक या पालने वाले के क्रोध को नहीं पहचानता। उसका पालने वाले से डरना मुश्किल होता है। वह अपनी चकित आँखों से पालने वाले से दृष्टि मिलाए रहता है, मानो वह नाराजगी (UPBoardSolutions.com) का कारण पूछता हो। हिरन केवल मालिक या पालनकर्ता को अपने प्रति प्रेम ही पहचानता है। जिसकी। अभिव्यक्ति वह अपनी विशेष चेष्टाओं, जैसे-सटकर खड़ा होना, सिर के ऊपर उछल-कूद आदि से करता है।

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पाठ का सर (राशि)

लेखिका ने हिरन न पालने का निश्चय किया था। परन्तु एक परिचित से प्राप्त अनाथ हिरन-शावक को पालना पड़ा। उसने इसका नाम सोना रखा। सोना लेखिका के पलंग के पाए से सटकर बैठना सीखे। गई थी। दूध पीकर और चने खाकर वह छात्रावास में जाकर उछलकूद भी करती थी। लेखिका के खाना खाने के समय वह सटकर खड़ी रहती थी। उसे छोटे बच्चे अधिक प्रिय थे। लेखिका के प्रति स्नेह-प्रदर्शन में वह उसके सिर के ऊपर से छलाँग लगा देती थी। सोना हिलमिल गई थी। एक वर्ष बाद हिरनी बन जाने पर, सोना की आँखों में विशेष आकर्षण उत्पन्न हो गया। एक दिन सोना ने फ्लोरा को अपने चार पिल्लों के साथ विस्मय से देखा।

फ्लोरा सोना के संरक्षण में पिल्लों को छोड़कर आश्वस्त भाव से इधर-उधर चली जाती थी। आँखें खुलने पर पिल्ले भी सोना के पीछे चौकड़ी भरने लगे थे। गर्मी के दिनों में लेखिका बद्रीनाथ की यात्रा पर गई। पालतू जीवों में केवल फ्लोरा ही साथ गई। छात्रावास के सन्नाटे और फ्लोरा के अभाव में सोना अस्थिर हो गई थी। कोई उसका शिकार न कर ले, (UPBoardSolutions.com) इस आशंका से माली ने उसे रस्सियों से बाँध दिया। एक दिन सोना जोर से उछली और रस्सी में बँधे होने के कारण मुँह के बल गिरकर मर गई।

प्रश्न-अभ्यास

कुछ करने को
प्रश्न 1.
अपने आस-पास के पालतू पशुओं के स्वभाव की जानकारी प्राप्त कीजिए। यह भी बताइए कि किन-किन जंगली जानवरों को पालतू बनाया जा सकता है।
उत्तर :
अपने आस-पास के पालतू जानवरों के विषय में विद्यार्थी स्वयं लिखें। जंगली जानवरों में हाथी को पालतू बनाया जा सकता है।

प्रश्न 2.
आपके घर में कोई पालतू जानवर होगा। उसकी बहुत सी आदतें आप को बहुत अच्छी लगती होंगी, जबकि कुछ आदतों पर आप नाराज हो जाते होंगे। उन आदतों को लिखिए और अपने साथियों को बताइए।
उत्तर :
हाँ मेरा एक पालतू कुत्ता है-लियो। जब मैं विद्यालय से लौटकर आता हैं तो वह दौड़कर मेरे पास आ जाता है, मुझसे लिपट जाता है। अगर कोई बाहर का व्यक्ति मुझसे डाँट कर बात करे तो वह उस पर भौंकने लगता है। उसका यह स्नेहपूर्ण व्यवहार मुझे बहुत अच्छा लगता है। उसकी एक ही आदत बुरी है। वह है-रात को सोफे पर आकर (UPBoardSolutions.com) सो जाना जबकि उसके लिए एक अलग कमरा और बिस्तर है लेकिन वह वहाँ कभी नहीं सोता।

विचार और कल्पना

प्रश्न 1.
नोट- विद्यार्थी स्वयं करें।

प्रश्न 2.
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उन अन्तरों को बताइए जो मनुष्य को अन्य जीवों से अलग करते हैं।
उत्तर :
मनुष्य तथा अन्य जीवों में खास अन्तर यह होता है कि मनुष्य के पास सोचने-समझने की शक्ति होती है, जबकि अन्य जीवों के पास यह नहीं होती है। मनुष्य वस्तुओं का आदान-प्रदान करते हैं, जबकि अन्य जीव नहीं। मनुष्य खेती करके जीवन-यापन कर सकता है, जबकि अन्य जीव खेती नहीं कर सकते।

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रेखाचित्र से

प्रश्न 1.
सोना जंगल के परिवेश से गाँव में कैसे आ गई?
उत्तर :
सोना को जंगल के परिवेश से शिकारी लोग उठा लाए थे।

प्रश्न 2.
सोनी को छोटे बच्चे क्यों अधिक प्रिय थे?
उत्तर :
सोना को छोटे बच्चे अधिक प्रिय इसलिए थे क्योंकि उनके साथ खेलने का अधिक अवकाश रहता था।

प्रश्न 3.
लेखिका के अन्य पालतू पशु कौन-कौन थे? वे सोना के प्रति क्या भाव रखते थे?
उत्तर :
लेखिका के अन्य पालतू पशु थे-एक बिल्ली गोधूली, कुतिया फ्लोरा, दो कुत्ते- हेमन्त, और बसन्त। बाद में इस पालतू परिवार में फ्लोरा के चार पिल्ले भी शामिल हो गए। वे सब सोना के प्रति प्रेमभाव रखते थे। ।

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प्रश्न 4.
“मैंने निश्चय किया था कि अब हिरन नहीं पालुंगी पर संयोग से फिर हिरन पालना पड़ रहा है।” वे कौन-सी परिस्थितियाँ थी, जिनके कारण महादेवी जी को अपना निश्चय बदलना पड़ा?
उत्तर :
लेखिका ने हिरन न पालने का निश्चय किया था लेकिन एक परिचित महिला सुस्मिता के आग्रह पर उसे हिरन पालना पड़ा। सुस्मिता ऐसे व्यक्ति को ही अपना हिरन देना चाहती थी जो उसकी भली-भौति देखभाल कर सके। लेखिका इस कार्य में अनुभवी थी।

प्रश्न 5.
फ्लोरा, सोना के संरक्षण में अपने बच्चों को सुरक्षित क्यों मानती थी?
उत्तर :
फ्लोरा सोना के संरक्षण में पिल्लों को सुरक्षित मानती थी क्योंकि वह सोना को अपने जैसा जानकर शायद उस पर विश्वास रखती थी।

भाषा की बात
प्रश्न 1.
ग्रीष्मावकाश शब्द ग्रीष्म + अवकाश की सन्धि से बना है। इसमें अ + अ = आ होया है। नीचे लिखे गए शब्दों का सन्धि-विच्छेद कीजिए।
उत्तर :
UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 16 सोना (मंजरी) 1

प्रश्न 2.

‘भीतर-बाहर’ और …………………………………………….. = तत्पुरुष समास।

निम्नलिखित शब्दों का विग्रह कर समास का नाम लिखिए।
उत्तर :
UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 16 सोना (मंजरी) 2

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प्रश्न 3.
‘कौतुक’ में प्रियं’ शब्द जोड़कर ‘कौतुकप्रिय’ शब्द बनता है। इसी प्रकार नीचे लिखे शब्दों में ‘प्रिय’ शब्द जोड़कर अन्य शब्द बनाइए और उनके अर्थ भी लिखिए।
उत्तर :
UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 16 सोना (मंजरी) 3

प्रश्न 4.
‘प्रत्यावर्तन’ शब्द प्रति + आवर्तन की सन्धि से बना है। इ+आ= या हो गया है। इसी प्रकार नीचे लिखे शब्दों में सन्धि करके नया शब्द बनाइए।
उत्तर :
UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 16 सोना (मंजरी) 4

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UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 15 भोजन पकाना और परोसना तथा तत्त्वों की सुरक्षा

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 15 भोजन पकाना और परोसना तथा तत्त्वों की सुरक्षा

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
भोजन पकाने के मुख्य उद्देश्य क्या हैं? आप भोजन पकाते समय किन-किन बातों का ध्यान रखेंगी? [2009, 10, 11, 13, 14]
या
भोजन पकाते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए जिससे कि भोजन के तत्त्व नष्ट न हो सकें ? [2008]
या
भोजन पकाकर खाना क्यों आवश्यक है ? [2016, 37, 18]
या
भोजन पकाने के क्या उद्देश्य हैं ? पौष्टिक तत्त्वों की उन पकाते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ? [2016]
या
पाक-क्रिया के लाभ या उद्देश्य स्पष्ट कीजिए। [2018]
उत्तर:
भोजन पकाने के मुख्य उद्देश्य

आदि-मानव क्षुधापूर्ति के लिए तत्कालीन भोज्य-पदार्थों का प्राकृतिक रूप में ही उपयोग करता था। उसकी खोजी प्रवृत्ति ने उसे शिकार करने के लिए अस्त्रों, अग्नि तथा नाना प्रकार के भोज्य-पदार्थों का ज्ञान प्राप्त कराया। वह धीरे-धीरे अग्नि का प्रयोग भोजन पकाने में करने लगा। आहार एवं पोषण-विज्ञान के विकास एवं अध्ययन ने आधुनिक मानव को भोजन को पकाने के महत्त्व तथा इसकी वैज्ञानिक विधियों की उपयोगिता की शिक्षा दी है। भोजन पकाने के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं

(1) भोज्य-पदार्थों को सुपाच्य बनाना:
आहार को ग्रहण करने से पूर्ण लाभ तभी प्राप्त होता है जबकि उसका अच्छी प्रकार से पाचन हो जाए। पाक-क्रिया या भोजन को पकाने का एक मुख्य उद्देश्य भोज्य-पदार्थों को सुपाच्य बनाना होता है। बिना पकाए भोज्य-पदार्थों को यदि (UPBoardSolutions.com) ग्रहण किया जाता है, तो इस दशा में उनका पाचन प्रायः असम्भव ही होता है। अतः भोज्य-पदार्थों को सुपाच्य बनाने के उद्देश्य से उन्हें अनिवार्य रूप से पकाया जाता है।

(2) आहार को अधिकाधिक स्वादिष्ट बनाना:
पाक-क्रिया का एक उल्लेखनीय उद्देश्य खाद्य सामग्री को अधिकाधिक स्वादिष्ट बनाना भी है। विभिन्न खाद्य-सामग्रियाँ कच्ची अवस्था में स्वादिष्ट नहीं होतीं, बल्कि उनका स्वाद अरुचिकर ही होता है। इन खाद्य-सामग्रियों को यदि सही पाक-क्रिया द्वारा तैयार किया जाता है, तो ये स्वादिष्ट बन जाती हैं तथा रुचिपूर्वक खाई जा सकती हैं।

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(3) आकर्षक बनाना:
खाद्य-सामग्री को पकाने का एक उद्देश्य उसे आकर्षक बनाना भी होता है। पकने पर आहार का स्वाद अच्छा हो जाता है, उसका रूप आकर्षक हो जाता है तथा उसमें एक प्रकार की मनभावन सुगन्ध उत्पन्न हो जाती है। अनेक खाद्य व्यंजनों को मसालों एवं रंगों से विशेष आकर्षक बना दिया जाता है। उदाहरण के लिए-चावल से जब पुलाव या बिरयानी तैयार की जाती है, तो उसमें एक मनोहारी सुगन्ध उत्पन्न हो जाती है तथा उसका रूप भी आकर्षक हो जाता है।

(4) आहार को विविधता प्रदान करना:
पाक-क्रिया का एक उद्देश्य खाद्य-सामग्री को विविधता प्रदान करना भी है। पाक-क्रिया के माध्यम से एक ही खाद्य सामग्री को भिन्न-भिन्न व्यंजनों के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। आहार की विविधता व्यक्ति को अधिक सन्तोष प्रदान करती है। तथा आहार के प्रति रुचि बनी रहती है।

(5) खाद्य-सामग्री को कीटाणुरहित बनाना:
विभिन्न शाक-सब्जियों तथा भोज्य-पदार्थों पर नाना प्रकार के फफूद एवं जीवाणु होते हैं। वर्षा ऋतु में तो इनकी संख्या अत्यधिक होती है। बिना पके भोज्य-पदार्थों का सेवन करने से ये कीटाणु शरीर में प्रवेश करके अनेक रोगों की उत्पत्ति का कारण बन सकते हैं। भोज्य-पदार्थों को पकाते समय उच्च ताप पर ये कीटाणु लगभग समूल नष्ट हो जाते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि भोज्य-पदार्थों को पकाने का एक उद्देश्य आहार को कीटाणुरहित बनाना भी होता है। जीव जगत से प्राप्त भोज्य सामग्री (दूध, मांस-मछली एवं अण्डे) में कीटाणुओं की अधिक आशंका रही है अतः इन्हे आहार के रूप में ग्रहण करने से पूर्व उच्च ताप पर पकाना अति आवश्यक होता है।

(6) आहार का संरक्षण:
खाद्य-सामग्री को पकाने का एक उद्देश्य उसे अधिक समय तक सुरक्षित रखना भी है। कच्ची खाद्य-सामग्री शीघ्र ही सड़ने लगती है, परन्तु समुचित पाक-क्रिया द्वारा तैयार खाद्य-सामग्री बहुत समय तक सुरक्षित रह सकती है। उदाहरण के लिए-अचार, मुरब्बे, जैम, सॉस आदि के रूप में खाद्य-सामग्री (UPBoardSolutions.com) को बहुत अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इसी प्रकार कच्चा दूध शीघ्र ही फट जाता है, परन्तु यदि उसे पका लिया जाए, तो काफी समय तक ठीक हालत में रखा जा सकता है।

भोजन पकाते समय ध्यान देने योग्य बातें

भोजन पकाने से जहाँ एक ओर अनेक ल हैं, वहीं दूसरी ओर लापरवाही व असावधानीपूर्वक भोजन पकाने से अनेक हानियाँ भी सम्भव हैं। उदाहरण के लिए-गलत विधि से भोजन पकाने पर उसके पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। अतः भोजन पकाते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए

(1) स्वच्छ एवं कीटाणुरहित भोजन:
भोजन पकाते समय स्वच्छता का सर्वाधिक ध्यान रखना चाहिए। इसके लिए ध्यान रखें कि

(क) गन्दे बर्तनों में कीटाणु उपस्थित रहते हैं; अतः भोजन सदैव स्वच्छ बर्तनों में पकाना चाहिए।
(ख) भोजन बनाने में प्रयुक्त पीतल के बर्तन कलई किए हुए होने चाहिए, अन्यथा भोजन के विषैला होने का भय रहता है।
(ग) भोजन बनाते समय गृहिणी के नाखून साफ-स्वच्छ होने चाहिए, क्योंकि नाखूनों की गन्दगी में अनेक कीटाणु होते हैं, जोकि अनेक रोगों को कारण बन सकते हैं।
(घ) खाना पकाते समय गृहिणी को अपने बाल बँधे व कसे हुए रखने चाहिए, ताकि उनके भोजन में गिरने की सम्भावना ही न रहे।
(ङ) रसोईघर में बर्तन पोंछते समय स्वच्छ कपड़ा प्रयुक्त करना चाहिए।

(2) स्वादिष्ट एवं पोषक तत्वों से युक्त भोजन:
भोजन पकाने का मुख्य उद्देश्य स्वादिष्ट एवं पौष्टिक भोजन तैयार करना होता है; अत:

(क) भोजन को पकाते समय बर्तन को खुला नहीं रखना चाहिए। खुला रहने से भोजन वायु के सम्पर्क में आता है, जिससे इसमें कीटाणुओं व धूल गिरने की सम्भावना बनी रहती है तथा भोजन की सुगन्ध भी कम हो जाती है।
(ख) निश्चित अवधि से अधिक देर तक पकाने से भोजन का स्वाद नष्ट हो जाता है तथा उसके पोषकतत्त्वों के नष्ट होने की भी सम्भावना रहती है। अत: खाद्य-सामग्री को केवल उतने ही समय तक पकाना चाहिए जितना आवश्यक हो।।
(ग) भोजन को बार-बार गर्म करने से उसके पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं।
(घ) खाने का सोडा विटामिन ‘बी’ को नष्ट करता है; अत: इसका उपयोग सोच-समझकर करना चाहिए।
(ङ) चावल व शाक-सब्जियों को पकाते समय उनमें अधिक पानी नहीं डालना चाहिए। इनके पानी में पोषक तत्त्व होते हैं; अतः इसे फेंकना नहीं चाहिए।
(च) आवश्यकता से अधिक मसालों का उपयोग करने से भोजन का स्वाभाविक स्वाद नष्ट हो जाता है तथा स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
(छ) सब्जियों को अच्छी तरह से धोकर ही काटना चाहिए। छीलने एवं काटने के बाद नहीं । धोना चाहिए। इससे कुछ पोषक तत्त्व पानी में बह जाते हैं।

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प्रश्न 2:
जल, भाप, चिकनाई तथा वायु के माध्यम से की जाने वाली पाक-क्रिया की विभिन्न विधियों का वर्णन कीजिए।
या
भोजन बनाने की कौन-कौन सी विधियाँ हैं? भोजन बनाने की सर्वोत्तम विधि का वर्णन कीजिए। [2007, 11, 12, 13, 14, 15, 16]
या
भोजन पकाने की विभिन्न विधियों का वर्णन संक्षेप में कीजिए। [2010, 11, 16, 17, 18]
या
भोजन के पोषक तत्वों की सुरक्षा को ध्यान रखते हुए भोजन पकाने की विधियाँ लिखिए। [2007, 09, 10, 13, 16]
या
भोजन पकाना क्यों आवश्यक है? भोजन पकाने की प्रमुख विधियाँ कौन-कौन सी हैं? स्वास्थ्य की दृष्टि से उत्तम विधि कौन-सी है? वर्णन कीजिए। [2008, 10, 11, 12, 14]
या
भोजन पकाने की मुख्य विधियों का वर्णन कीजिए। इनके गुण व दोष लिखिए। [2007, 09]
या
जल के माध्यम से भोजन पकाने की दो विधियों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।[2016]
या
भाप से पकाया गया भोजन पौष्टिक और सुपाच्य क्यों होता है? [2018]
या
तलने की किन्हीं दो विधियों का वर्णन कीजिए। [2018]
उत्तर:
भोजन पकाना

भोजन को स्वादिष्ट, कीटाणुरहित व सुपाच्य बनाने की दृष्टि से भोजन को पकाने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है। आहार को अधिक समय तक संरक्षित रखने के लिए भी उसे पकाकर रखना जरूरी है। कच्ची खाद्य-सामग्री जल्दी ही सड़ने या गलने लगती है।

भोजन पकाने की विभिन्न विधियाँ

सभ्यता एवं आहार सम्बन्धी ज्ञान के विकास के साथ-साथ मनुष्य ने पाक-क्रिया अर्थात् भोज्यपदार्थों को पकाने की विभिन्न विधियों को भी खोज लिया है। अब भिन्न-भिन्न भोज्य पदार्थों से भिन्नभिन्न स्वादिष्ट व्यंजन तैयार किए जाते हैं। इसके लिए भिन्न-भिन्न विधियों को भी अपनाया जाता है। यह सत्य है कि भोजन पकाने की प्रत्येक विधि में ताप की आवश्यकता होती है। ताप प्रत्येक पाक-क्रिया का एक आवश्यक कारक होता है, परन्तु (UPBoardSolutions.com) पाक-क्रिया में ताप के अतिरिक्त एक अन्य कारक भी आवश्यक होता है। यह कारक होता है-पाक-क्रिया का माध्यम अर्थात् खाद्य-सामग्री को किस माध्यम से पकाया जाता है। यह माध्यम जल, वाष्प, चिकनाई (तेल या घी) तथा वायु में से कोई भी एक हो सकता है। इन माध्यमों के आधार पर ही पाक-क्रिया की विभिन्न विधियों का निर्धारण होता है। इस प्रकार भोज्य सामग्री को पकाने की विधियों को मुख्य रूप से निम्नलिखित चार वर्गों में विभक्त किया जाता है

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  1. जल के माध्यम से पकाना,
  2. वाष्प के माध्यम से पकाना,
  3. चिकनाई के माध्यम से पकाना तथा
  4. वायु के माध्यम से पकाना।
    पाक-क्रिया की इन चारों विधियों का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है

(1) जल के माध्यम से पकाना:
इस विधि में गर्म जल में भोजन को पकाया जाता है। इसे दो प्रकार से पकाया जा सकता है-..

(क) उबालकर पकाना:
यह भोजन पकाने की अत्यन्त प्राचीन एवं सरल विधि है। पकाये जाने वाले भोज्य-पदार्थों को किसी भगोने अथवा डेगची में पानी डालकर चूल्हे अ थवा अँगीठी पर चढ़ा दिया जाता है। उबलने पर पानी का ताप लगभग 100° सेण्टीग्रेड रहता है। कुछ समय बाद भोजन पकाना और परोसना तथा तत्त्वों की सुरक्षा 211 भोज्य पदार्थ भली प्रकार गल जाते हैं। इस विधि द्वारा प्राय: दालें व चावल तथा आलू, अरवी व इसी प्रकार की अन्य सब्जियाँ पकाई जाती हैं। सब्जियों को छिलके सहित उबालकर पानी फेंक देने से इनके पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते, परन्तु चावल पकाते समय पानी का कम प्रयोग करना चाहिए तथा पकने के बाद पानी को फेंकना नहीं (UPBoardSolutions.com) चाहिए क्योंकि इसमें पोषक तत्त्व विद्यमान रहते । हैं। उबालकर पकाया गया भोजन हल्का, सुपाच्य व गुणवत्तापूर्ण होता है।
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(ख) धीमी आँच पर पकाना:
इसमें भोज्य-पदार्थों को मसालों सहित थोड़े पानी में डालकर मन्द आँच (लगभग 82° सेण्टीग्रेड) पर पकाया जाता है साबुत दाल, सब्जियाँ व मांस आदि पकाने की यह एक उत्तम विधि है। जिनमें भोजन के पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते तथा भोजन भी सुपाच्य एवं स्वादिष्ट बनती है।

(2) वाष्प के माध्यम से पकाना:
भोजन पकाने की यह एक आधुनिक विधि है जिसमें भोजन के अधिकांश पौष्टिक तत्त्व सुरक्षित रहते हैं। भाप द्वारा भोजन पकाने के लिए प्रेशर कुकर नामक उपकरण का प्रयोग किया जाता है। यह भगोने के आकार का होता है जिसमें थोड़े से पानी के साथ भोज्य-पदार्थ डालकर वायु अवरोधक ढक्कन लगा दिया जाता है। इसे अँगीठी अथवा गैस बर्नर पर रखने से पानी गर्म होकर भाप में परिवर्तित हो जाता है। भाप के दबाव व ताप के द्वारा अपेक्षाकृत कम समय में भोजन पक जाता है। विभिन्न प्रकार की दालें, सब्जियाँ व मांस आदि पकाने की यह सर्वोत्तम विधि है। इस विधि में ईंधन व समय की बचत होती है, भोजन के पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते तथा भोजन स्वादिष्ट एवं सुपाच्य बनता है।

(3) चिकनाई के माध्यम से पकाना:
इस विधि में भोजन पकाने के लिए तेल व घी को माध्यम के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। तेल (UPBoardSolutions.com) अथवा घी में भोज्य पदार्थों को पकाने की विधि को तलना कहते हैं। भोज्य-पदार्थों को तलने की निम्नलिखित तीन विधियाँ प्रचलित हैं।

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(क) उथली विधि:
इस विधि में चौड़ी व उथली कड़ाही अथवा तवे को प्रयोग में लाया जाता है। कड़ाही में थोड़ा तेल अथंवा घी डालकर उसे आग पर चढ़ा दिया जाता है। घी अथवा तेल के अच्छी तरह गर्म हो जाने पर इसमें भोज्य पदार्थों को तला जाता है। आलू की टिकिया, कटलेट्स, पराँठे, चीले, आमलेट इत्यादि इसी विधि से बनाए जाते हैं। कई बार इस विधि से मसाला डोसा जैसे व्यंजन तलने के लिए कड़ाही के स्थान पर सपाट तवे का प्रयोग किया जाता है।
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(ख) गहरी विधि:
इस विधि में गहरी कड़ाही प्रयोग में लाई जाती है। कड़ाही में तेल अथवा घी पर्याप्त मात्रा में डालकर उसे खौलने तक गर्म (लगभग 175°सेण्टीग्रेड ताप) किया जाता है। अब भोज्य-पदार्थों को इसमें अच्छी प्रकार तला जाता है। इस विधि से प्रायः सभी प्रकार के पकवान; जैसे-पूड़ी-कचौड़ी, समोसे, पकौड़ियाँ तथा विभिन्न प्रकार की मिठाइयाँ इत्यादि बनाए जाते हैं। तलने की विधि द्वारा भोजन (पकवान) पकाने की विधि अत्यन्त प्राचीन है। इसकी अपनी लोकप्रियता (UPBoardSolutions.com) अलग ही प्रकार की है। इस विधि से भोजन स्वादिष्ट तो बनता है, परन्तु गरिष्ठ होने के कारण सुपाच्य नहीं होता।

(ग) शुष्क विधि:
इस विधि द्वारा केवल कुछ विशेष प्रकार की खाद्य सामग्री को ही पकाया जा सकता है। कुछ खाद्य-सामग्री ऐसी होती है जिनमें से ताप पाकर स्वतः ही चिकनाई निकलती है। उदाहरण के लिए-चर्बीयुक्त सूअर का मांस या बेकन आदि। इन खाद्य-सामग्रियों को तलने के लिए अतिरिक्त चिकनाई की आवश्यकता नहीं होती।

ध्यान रखने योग्य बातें:
चिकनाई के माध्यम से भोजन पकाने या तलने के समय कुछ बातों को अनिवार्य रूप से ध्यान में रखना चाहिए। कड़ाही में घी या तेल डालकर तब तक गर्म करना चाहिए, जब तक उसमें से कुछ-कुछ धुआँ-सा न उठने लगे तब उसमें तलने वाली सामग्री डालनी चाहिए। इस सामग्री को हिलाते तथा उलटते-पलटते रहना चाहिए। समुचित ढंग से पक जाने पर सामग्री को निकाल लेना चाहिए। निकालकर कुछ समय तक उसे पोनी में ही रखना चाहिए, जिससे कि फालतू घी या तेल निकल जाए। तलते समय सामग्री के छोटे-छोटे टुकड़े टूट-टूटकर घी में गिरते रहते हैं। इन्हें मुख्य सामग्री के साथ-साथ निकालते रहना चाहिए अन्यथा ये जल कर अप्रिय गन्ध छोड़ देते हैं। इसके अतिरिक्त तलते समय इस बात की विशेष सावधानी रखनी चाहिए कि गर्म घी या तेल में पानी के छींटे न पड़े। इससे गर्म घी छिटक कर, तलने वाले के शरीर पर पड़ सकता है।

(4) वायु के माध्यम से पकाना:
वायु अग्नि प्रज्वलित करती है तथा अग्नि के सम्पर्क में आकर स्वयं भी गर्म हो जाती है। वायु का यह गुण ही भोजन पकाने की इस विधि का आधार है। वायु द्वारा भोजन पकाने की प्रचलित विधियाँ निम्नलिखित हैं

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(क) भूनना (रोस्टिग):
इस विधि के अन्तर्गत बालू या राख को गर्म करके उसमें सम्बन्धित वस्तु को भून कर पकाया जाता है। इस विधि से बैंगन आदि का भुर्ता बनाया जा सकता है। आलू, शंकरकन्द, मक्का, बाजरा या चने आदि भूने जा सकते हैं। इस प्रकार से भूनी हुई वस्तुएँ काफी स्वादिष्ट व पाचक होती हैं। किसी प्रकार की चिकनाई आदि का प्रयोग न होने के कारण ये सामग्री सुपाच्य होती है।

(ख) सेंकना:
सामान्य रूप से भूनना एवं सेंकना एक ही समझा जाता है, परन्तु वास्तव में इन दोनों क्रियाओं में पर्याप्त । अन्तर है। सेंकने की क्रिया के अन्तर्गत सम्बन्धित खाद्य-सामग्री को आग के सम्पर्क में लाया जाता है। सामान्य रूप से धुआँरहित, जलते हुए अंगारों पर वस्तुओं (UPBoardSolutions.com) को सेंका जाता है। भुट्टे, कबाब
आदि इसी विधि से सेंके जाते हैं।
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(ग) तन्दूर अथवा भट्टी में पकाना (बेकिंग):
रोटी, डबलरोटी, बन व बिस्कुट आदि इस विधि द्वारा ही पकाये जाते हैं। चित्र 15.4-सेंकना मिट्टी का बना हुआ तन्दूर रोटी सेंकने के लिए तथा ओवन अथवा विशिष्ट भट्टी में बिस्कुट, डबल रोटी, बन, पेस्टी, नानखताई आदि पकाए जाते हैं।

पाक-क्रिया की सर्वोत्तम विधि

भाप देकर भोजन पकाने की कुकर्स की विधि बहुत अच्छी है। इस रीति से भोजन पकाने में पौष्टिक तत्त्व नष्ट नहीं होने पाते तथा हल्के व सरलता से पंचने योग्य हो जाते हैं। इस रीति से कार्य करने में समय कम लगता है। जलने का भय नहीं रहता और ईंधन भी कम मात्रा में व्यय होता है। अतः मितव्ययिता तथा समय की बचत–सभी दृष्टियों से यह विधि श्रेष्ठ है।

प्रश्न 3:
भोजन परोसने की शैलियों का वर्णन करते हुए अपनी दृष्टि में उपयुक्त शैली का उल्लेख कीजिए। [ 2007, 08,10,11]
या
भोजन परोसने की विभिन्न शैलियों का संक्षेप में वर्णन कीजिए। आवश्यक हो तो चित्र भी बनाइए।
या
“भोजन परोसना एक-कला है।” स्पष्ट कीजिए। भोजन परोसने की देशी, विदेशी विधियों के बारे में भी लिखिए। [2018, 10, 11]
या
भोजन परोसने की देशी व विदेशी शैली में अन्तर स्पष्ट कीजिए। [2016]
या
भोजन परोसना एक कला है। क्यों ? [2011, 14]
या
भोजन परोसने की कौन-सी विधियाँ हैं? भारतीय ढंग से भोजन परोसने की विधि लिखिए। [2015, 16 ]
उत्तर:
भोजन परोसना

पौष्टिक भोजन तैयार करना गृहिणी का एक महत्त्वपूर्ण दायित्व है, परन्तु परिवार के सदस्यों एवं अतिथियों की भोजन के प्रति रुचि उत्पन्न करना भी गृहिणी का उतना ही महत्त्वपूर्ण दायित्व है। अतः भोजन परोसना पौष्टिक व स्वादिष्ट भोजन तैयार करने के समान (UPBoardSolutions.com) ही महत्त्व रखता है। इसके लिए गृहिणी को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए-

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  1. भोजन परोसने वाले का व्यवहार विनम्र, मनोहारी तथा कुशल होना चाहिए।
  2. भोजन परोसने का स्थान व बर्तन स्वच्छ होने चाहिए।
  3. भोज्य-पदार्थों को विधि के अनुसार उपयुक्त स्थान पर ही रखना चाहिए।
  4. भोजन परोसने के स्थान अथवा मेज पर फूलदान व अन्य अनेक प्रकार की कलात्मक सजावट करने से भोजन के आकर्षण में कई गुना वृद्धि हो जाती है। । उपर्युक्त वर्णन से स्पष्ट हो जाता है कि भोजन परोसना एक कला है, जो कि भोजन के प्रति रुचि एवं आकर्षण में वृद्धि करती है।

भोजन परोसने की विभिन्न शैलियाँ (विधियाँ)

प्रायः भोजन परोसने की तीन निम्नलिखित शैलियाँ (विधियाँ) प्रचलित हैं
(क) देशी शैली,
(ख) विदेशी अथवा पाश्चात्य शैली तथा
(ग) बुफे शैली।

(क) देशी शैली :
यह अति प्राचीन भारतीय शैली है जिसमें भोजन ग्रहण करने वालों के लिए भूमि पर आसन बिछाए जाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को अलग थाली में भोजन परोसा जाता है। थाली में शुष्क भोज्य-पदार्थ तथा कटोरियों में तरल भोज्य-पदार्थ परोसे जाते हैं। प्रारम्भ में थोड़ी मात्रा में भोजन परोसा जाता है तथा फिर भोजन ग्रहण करने वाले की आवश्यकतानुसार और भोजन परोसा जाता है।

विशेषताएँ:
देशी शैली में भोजन परोसने की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. भोजन परोसते समय प्रत्येक खाद्य-पदार्थ के लिए अलग-अलग चम्मच, चमचा व कल्छी आदि होने चाहिए।
  2. प्रथम बार कम भोजन परोसना चाहिए तथा फिर खाने वालों से पूछ-पूछ कर विभिन्न खाद्य पदार्थ परोसने चाहिए। इससे भोजन व्यर्थ नहीं जाता।
  3. तरल पदार्थों को कटोरियों में ही परोसना चाहिए।
  4. थाली में चपातियाँ, पूड़ी व चावल आदि अलग-अलग परोसे जाने चाहिए।
  5. भोजन का स्थान व बर्तन स्वच्छ होने चाहिए।
  6. भोजन परोसने से पूर्व गृहिणी को स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहन लेने चाहिए।

(ख) विदेशी अथवा पाश्चात्य शैली:
यह शैली परम्परागत शैली से सर्वथा विपरीत है। इस शैली में भोजन एक विशिष्ट मेज (डाइनिंग टेबल) पर परोसा जाता है तथा खाने वाले कुर्सियों (डाइनिंग चेयर्स) पर बैठते हैं। इस शैली में भोजन एक ही बार में परोस दिया जाता है। इस शैली की अन्य विशिष्ट बातें हैं

  1. मेज के केन्द्र में प्लेट में चपातियाँ, एक विशिष्ट रचना की प्लेट (राइस प्लेट) में चावल तथा डोंगों में सब्जियाँ प्रायः एक ही बार में परोस दी जाती हैं।
  2. प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक बड़ी प्लेट, एक छोटी प्लेट, छुरी, काँटा तथा चम्मच रखी जाती है।
  3.  तरल पदार्थों के लिए बाउल प्रयुक्त किए जाते हैं। बाउल को प्लेट के दाईं (UPBoardSolutions.com) ओर रखना चाहिए।
  4. छुरी, प्लेट के दाईं ओर तथा उसकी धार प्लेट की ओर होनी चाहिए। काँटा प्लेट के बाईं ओर रखा जाना चाहिए।
  5. मेज पर आवश्यकतानुसार मसालेदानियाँ, अचार वे मुरब्बे आदि केन्द्रीय भाग में रखे जा सकते हैं।
  6. प्रत्येक व्यक्ति के लिए इस विधि में गिलास में सजाकर एक नेपकिन भी रखा जाता है।

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(ग) बुफे शैली:
भोजन करने वालों की संख्या अधिक होने पर प्रायः इस शैली को प्रयोग में लाया जाता है। सामाजिक आयोजनों, विवाह आदि बड़ी दावतों के लिए यह एक सर्वोत्तम आदर्श विधि है। इस विधि में. एक बड़े हॉल अथवा पंडाल में एक ओर लम्बी मेजें लगा दी जाती हैं। इन्हें विधिपूर्वक सजाया जाता है। मेजों पर निश्चित दूरियों पर प्लेटें, छुरियाँ, काँटे व चम्मच आदि सेट कर रख दिए जाते हैं। प्रत्येक सेट के पास में डोंगों में सब्जियाँ तथा अलग-अलग प्लेट में चपातियाँ, पूड़ियाँ, चावल आदि रख दिए जाते हैं। पंडाल के एक कोने में जल की व्यवस्था कर दी जाती है। बुफे शैली में भोजन औपचारिक, अर्द्ध-औपचारिक तथा अनौपचारिक विधि से परोसा जाता है। औपचारिक ढंग में अतिथि स्वयं खाना परोसकर एक ओर खड़े होकर खाते हैं। अर्द्ध-औपचारिक विधि में मेजबान अपने मित्रों अथवा रिश्तेदारों के सहयोग से अतिथियों को भोजन परोसता है। (UPBoardSolutions.com) अनौपचारिक विधि में वेटर अतिथियों को
भोजन परोसते हैं।

विशेषताएँ: इस प्रकार इस शैली में

(1) अतिथि खड़े होकर भोजन करते हैं।
(2) अतिथियों की संख्या अधिक होती है।
(3) मेजों की एक लम्बी कतार की व्यवस्था में भोजन प्रायः एक से अ सेटों में सजाकर एक साथ परोसा जाता है।
(4) सामान्यतः अतिथि अपने लिए स्वयं ही भोजन परोसते हैं।

प्रश्न 4:
खाद्य-पदार्थों के संरक्षण से आप क्या समझते हैं? खाद्य-पदार्थों के संरक्षण के कतिपय उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
खाद्य-पदार्थों का संरक्षण व उसके लाभ

खाद्य-पदार्थों को एक लम्बी अवधि तक फफूदी एवं जीवाणुओं से सुरक्षित रखने की विधियों को खाद्य-पदार्थों का संरक्षण कहते हैं। इससे होने वाले लाभ निम्नलिखित हैं

  1. प्रायः गृहिणियाँ फसल के समय पूरे वर्ष के लिए सस्ता अनाज खरीदकर रख लेती हैं। यदि यह अनाज संग्रह काल में सुरक्षित रहे, तो गृहिणी को धन की पर्याप्त बचत होती है तथा उसे अनाज खरीदने के लिए बार-बार बाजार जाने की परेशानी नहीं उठानी पड़ती।
  2. मौसम की सब्जियों को यदि सुरक्षित रूप से संगृहीत कर लिया जाए, तो उन्हें विपरीत मौसम में उपयोग में लाया जा सकता है।
  3.  महँगे भोज्य-पदार्थों के शेष बचकर व्यर्थ होने पर पर्याप्त आर्थिक हानि होती है जिसका निराकरण खाद्य-संरक्षण के उपाय अपनाकर किया जा सकता है। संरक्षण की विधियाँ

प्रमुख खाद्य-पदार्थों के संरक्षण की प्रचलित विधियाँ निम्नलिखित हैं

(1) स्वच्छता से संग्रह करके:
प्रायः गन्दे स्थानों व बर्तन आदि में फफूदी व जीवाणुओं की उपस्थिति की सम्भावना अधिक रहती है; अत: भोज्य पदार्थों का संग्रह स्वच्छ स्थान एवं स्वच्छ बर्तनों में करना चाहिए।

(2) सुखाकर:
नमी व सीलन में फफूदी व जीवाणु आसानी से पनपते हैं। अतः खाद्य-पदार्थों को शुष्क स्थान में रखना चाहिए। कुछ खाद्य-पदार्थ; जैसे- आलू, मेथी, गाजर, पोदीना, मटर, चना, फल व मेवे आदि; शुष्क अवस्था में हर प्रकार से सुरक्षित रहते हैं। मटर, चना, गोभी आदि को तो सामान्यतः शुष्कीकरण या निर्जलीकरण (डी-हाइड्रेशन) द्वारा पूर्णरूप से जलरहित कर डिब्बों आदि में बन्द कर संगृहीत कर लिया जाता है तथा विपरीत मौसम में इन सब्जियों का आनन्द लिया जाता है।

(3) उबालकर:
अनेक खाद्य-पदार्थों को उबालकर जीवाणुरहित कर लिया जाता है। अब इन्हें वायुरोधक डिब्बों में भरकर काफी समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

(4) चाशनी में रखकर:
अनेक फलों को शक्कर की चाशनी में पकाकर मुरब्बों के रूप में सुरक्षित रखा जा सकता है।

(5) अचार, सॉस आदि बनाकर:
प्रायः सभी घरों में आम, गोभी, गाजर, मिर्च आदि का अचार डाला जाता है, जो कि एक लम्बी अवधि तक सुरक्षित रहता है। इसका कारण है नमक व सरसों के तेल का प्रयोग जो फफूदी व जीवाणुओं से अचार को सुरक्षित रखते हैं। टमाटर की चटनी व सॉस को सुरक्षित रखने के लिए इनमें उपयुक्त मात्रा में सोडियम बेन्जोएट तथा साइट्रिक अम्ल मिलाना सर्वोत्तम रहता है।

(6) ठण्डा रखकर:
आलू व अन्य अनेक प्रकार की सब्जियों को शीतगृह में सुरक्षित रखना एक लोकप्रिय (UPBoardSolutions.com) व्यापारिक विधि है। इस विधि का प्रयोग घरों में रेफ्रिजेरेटर के रूप में किया जाता है। रेफ्रिजेरेटर में विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ, भोज्य सामग्री, दूध, अण्डे व मांस आदि को काफी समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

(7) विकिरण विधि द्वारा:
अनेक खाद्य-पदार्थों को विकिरण उपचार द्वारा जीवाणुरहित कर सुरक्षित रखा जाता है।

(8) अनाजों के संरक्षण की विधि:
अनाजों को प्रायः शुष्क स्थानों पर टंकियों में भरकर रखा जाता है। विभिन्न कीटनाशकों का प्रयोग कर इन्हें घुन जैसे हानिकारक कीड़ों से सुरक्षित रखा जाता है। अनाज को सुरक्षित रखने के लिए विभिन्न विधियों द्वारा इसे चूहों से बचाना चाहिए।

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(9) दुध को सुरक्षित रखने की विधि:
कम ताप पर दूध प्राय: सुरक्षित रहता है। अधिक समय तक दूध को सुरक्षित रखने के लिए पाश्चुरीकरण की विधि अपनाई जाती है। इसमें दूध को 65° सेण्टीग्रेड ताप पर आधा घण्टा रखकर उसे किसी बोतल अथवा बन्द बर्तन में शीतल स्थान पर रख दिया जाता है।

(10) अण्डा, मांस व मछली को सुरक्षित रखनी:
अण्डे को अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। इसके लिए कम तापक्रम ही एकमात्र उपाय है। मांस को मक्खियों से बचाना चाहिए। इसे सुरक्षित रखने के लिए बर्फ के तापक्रम पर रखना चाहिए। मछली को सुरक्षित रखना कठिन कार्य है। कम ताप पर भी मछली केवल कुछ समय तक ही सुरक्षित रहती है। व्यापारिक स्तर पर मछलियों को शुष्क अवस्था में डिब्बों में बन्द कर सुरक्षित रखा जाता है।

प्रश्न 5:
भोजन में मिलावट से क्या अभिप्राय है? शुद्ध भोजन को किन पदार्थों की मिलावट से अशुद्ध किया जाता है?
या
मिलावटी खाद्य-पदार्थों से क्या हानियाँ होती हैं? मिलावटी पदार्थों से बचने के उपाय बताइए।
उत्तर:
भोजन में मिलावट का अर्थ

खाद्य-पदार्थों में मिलावट का अर्थ है “शुद्ध भोज्य-पदार्थों में अन्य सस्ते खाने या न खाने योग्य पदार्थों को मिलाकर उनके गुणों में कमी करना या उन्हें हानिकारक बनाना।”
आजकल अधिकांश वस्तुएँ मिलावटयुक्त ही मिल रही हैं। दूध में पानी तथा अनाजों, मसालों में कुछ रासायनिक या वनस्पति पद के छिलके, धूल-गर्द मिलना साधारण-सी बात है। अब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि भोज्य-पदार्थों में इतनी मिलावट का कारण क्या है? (UPBoardSolutions.com) इसका एक स्पष्ट कारण विक्रेता द्वारा धन-लाभ को प्राथमिकता दिया जाना है।
मुख्य वस्तुओं के ही दाम पर असली पदार्थों के समान रूप-गुण वाली सस्ती या खराब वस्तुएँ बेचने के लिए उन्हें मुख्य पदार्थों के साथ मिलाकर बेचा जाता है, अज्ञानतावश लोग उन वस्तुओं को खरीद लेते हैं, जिससे उसके धन एवं स्वास्थ्य दोनों की हानि होती है। अत: मिलावटी वस्तुओं से बहुत सावधान रहना चाहिए।
मिलावटी वस्तुओं को लोग बड़ी चालाकी से बेचते हैं। फिलहाल तो ब्राण्डेड पैक वस्तुएँ भी बाजार में मिलावटी उपलब्ध हैं। अत: इससे बचने के लिए आपको इस बात का भी ज्ञान होना चाहिए कि किन-किन वस्तुओं में प्रायः मिलावट की जाती है।

विभिन्न भोज्य-पदार्थों में मिलावट:
व्यापारी भिन्न-भिन्न खाद्य-पदार्थों में निम्न प्रकार की सस्ती व हानिकारक वस्तुओं की मिलावट करते हैं

  1. अनाज: सस्ते व सड़े-गले अनाज, कंकड़, मिट्टी तथा टूटे हुए अनाज।
  2. आटा, मैदा: पुराना सड़ा आटा या मैदा कभी-कभी खड़िया मिट्टी।
  3.  घी: वनस्पति घी, चर्बी।
  4.  दूध: पानी, अरारोट, अन्य पशुओं का दूध मिलाना अथवा उसमें से वसा निकाल लेना। अब तो यूरिया, रिफाइण्ड तेल आदि से सिन्थेटिक दूध भी तैयार किया जाने लगा है, जिसे दूध में मिलाकर बेचा जा रहा है।
  5.  तेल: अखाद्य-पदार्थों; जैसे–अरण्डी आदि का तेल मिलाना।
  6. टमाटर की चटनी (Sauce) में कद्दू या अन्य सड़ी सब्जी का प्रयोग।
  7. काली मिर्च: पपीते के बीज।
  8. लौंग: तेल निकाल कर सुकड़ी हुई छोटी-छोटी लौग मिलाना।
  9. जीरा: जीरे के पौधे का बीज, कंकड़, मिट्टी या सीके मिलाना।
  10.  पिसा धनिया: धनिये की भूसी, राँगा हुआ लकड़ी का बुरादा, घोड़े की सूखी हुई लीद।
  11. पिसी लाल मिर्च: गेरु, लाल ईंट का चूरा, सूखी (UPBoardSolutions.com) लाले बेर के छिलके का बुरादा।
  12. पिसी हल्दी: पीली मिट्टी या रंगा हुआ अरारोट।
  13.  पिसी खटाई: पीली आम की गुठली।
  14.  चाय: प्रयोग की हुई चाय की पत्ती, पुरानी या खराब पत्तियाँ, चाय की पत्ती का चूरा तथा मिट्टी।
  15. मिठाइयाँ: मैदा, अरारोट, मिलावटी खोया व वर्जित रंग।
  16. शर्बत: चीनी के बजाय सैक्रीन (एक रासायनिक मीठा पदार्थ)।
  17. शहद: गुड़ की चाशनी।।
  18.  केसर: पीली रँगी मुँज या भुट्टे के रंगे हुए छोटे-छोटे रेशे।

इस प्रकार उपर्युक्त तरीकों से अनाजों व मसालों में मिलावट करके अपनी अशुद्ध वस्तुओं को बेचकर लोगों को बेवकूफ बनाया जाता है।

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मिलावटी खाद्य-पदार्थों से हानियाँ

मिलावटी खाद्य-पदार्थों के सेवन से निम्नलिखित हानियाँ होने की प्रबल सम्भावना होती है

  1. मिलावटी खाद्य पदार्थों का प्रयोग करते रहने से शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम होने लगती है।
  2. मिलावटी व अशुद्ध भोजन से हैजा, पेचिश, गले की खराबियाँ आदि रोग हो सकते हैं।
  3. खाने वाले रंग कैन्सरं का. कारण भी बन जाते हैं।
  4. ऐसे भोजन से कभी-कभी ‘फुड प्वायजनिंग’ से लोगों की मृत्यु तक होती देखी जाती है।
  5.  मिलावटी वस्तुएँ खरीदने से क्रेता को निश्चित रूप से आर्थिक लाभ के स्थान पर हानि होती है।

मिलावट से बचाव के उपाय
मिलावट से बचाव के लिए निम्नलिखित उपाय काम में लाए जाते हैं

  1.  बाजार के पिसे मसालों की अपेक्षा घर में पिसे मसाले प्रयुक्त कीजिए अथवा चक्की पर पिसवा लीजिए।
  2. सदैव कम्पनी संस्तुत विश्वसनीय दुकान से ही स्टैण्डर्ड कम्पनी का माल खरीदिए।
  3.  दूध को अपने सामने ही दुहकर लीजिए अथवा विश्वसनीय डेरी से खरीदिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
पाक-क्रिया का अर्थ स्पष्ट कीजिए। [2008, 10]
उत्तर:
प्राकृतिक अवस्था में उपलब्ध खाद्य-सामग्री को आहार के रूप में ग्रहण करने के लिए कृत्रिम रूप से तैयार करने की व्यवस्थित क्रिया को ही पाक-क्रिया कहते हैं। पाक-क्रिया के अन्तर्गत प्राकृतिक अवस्था में उपलब्ध खाद्य-सामग्री को जल, ताप, चिकनाई तथा भाप एवं वायु आदि द्वारा ऐसा रूप दिया जाता है जो इस सामग्री को अधिक स्वादिष्ट, नर्म एवं सुपाच्य बना देता है। जब हम किसी सब्जी को लेकर उसे धोते, छीलते एवं काटते हैं या उबालते एवं छोंकते हैं, तब इन समस्त क्रियाओं को सम्मिलित रूप से पाक-क्रिया ही कहा जाता है। इसी प्रकार से जब हमें गेहूं को पीसते, आटा गूंथते तथा रोटी बेलकर उसे तवे पर सेंकते हैं, (UPBoardSolutions.com) तो ये समस्त क्रियाएँ भी पाक-क्रिया की ही उप-क्रियाएँ होती हैं। इस प्रकार पाक-क्रिया अपने आप में एक विस्तृत एवं व्यवस्थित क्रिया है। विभिन्न प्रकार के बर्तनों के निर्माण से भी पाक-क्रिया के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान मिला है। इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण प्रेशर कुकर है।

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प्रश्न 2:
तलने के लाभ एवं हानियाँ लिखिए।
उत्तर:
तलने के लाभ-तलकर भोजन पकाने के मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं

  1. तलकर पकाया गया भोजन अधिक स्वादिष्ट एवं रुचिकर होता है।
  2. तले हुए भोजन में एक प्रकार की मनमोहक सुगन्ध एवं आकर्षक रंग आ जाता है, जिसका खाने वाले पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
  3. तलकर पकाया गया भोजन खा लेने के बाद काफी समय तक पुनः भूख नहीं लगती।

तलने की हानियाँ:
तलकर भोजन बनाने से निम्नलिखित हानियाँ होती हैं

  1. चिकनाई के माध्यम से तलकर पकाया गया भोजन गरिष्ठ हो जाता है तथा शीघ्र नहीं पचता।
  2. तल कर पकाए गए भोजन के विटामिन तथा कुछ पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं।
  3. अधिक तला हुआ भोजन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। इससे पेट व गले में जलन हो सकती है।

प्रश्न 3:
पाक-क्रियाओं का पौष्टिक तत्त्वों पर क्या प्रभाव पड़ता है? [2011]
या
प्रोटीन पर पाक-क्रिया का क्या प्रभाव पड़ता है? स्पष्ट कीजिए। [2014]
उत्तर:
प्रोटीन पर पकाने का प्रभाव:
जन्तुजन्य प्रोटीन पकाने पर प्रायः कठोर हो जाने के कारण सुपाच्य नहीं रहती। वनस्पतिजन्य प्रोटीन पकाने पर कोशा-भित्तियों से बाहर आ जाती है; अतः अधिक सुपाच्य हो जाती है। भोज्य-पदार्थों को तलकर पकाने से उनमें उपस्थित प्रोटीन अत्यधिक कड़ी तथा अपाच्य हो जाती है; अत: प्रोटीनयुक्त भोज्य-पदार्थों को तलना नहीं चाहिए।

विटामिन पर पकाने का प्रभाव:
विटामिन ‘ए’ व ‘डी’ अत्यधिक उच्च ताप पर नष्ट हो जाते हैं, परन्तु भोज्य-पदार्थों को सामान्य विधि के अनुसार पकाने पर इन विटामिनों पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है। विटामिन ‘बी’ पर भी ताप का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, परन्तु जल में विलेय होने के कारण भोज्य-पदार्थों (UPBoardSolutions.com) को अधिक पकाने पर इसका कुछ भाग जल के साथ ही नष्ट हो जाता है। सब्जी का हरा रंग बनाये रखने के लिए प्रयुक्त सोडा बाइकार्बोनेट विटामिन ‘बी’ को नष्ट कर देता है। इसलिए हरी सब्जियों को पकाते समय खाने के सोडे का प्रयोग नहीं करना चाहिए। विटामिन ‘सी’ भी जल में घुलनशील होता है तथा उच्च ताप पर यह नष्ट हो जाता है।

नोट- अन्य पोषक तत्त्वों पर पाक-क्रियाओं के प्रभाव का विवरण आगामी प्रश्नों में वर्णित है।

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प्रश्न 4:
तरकारियों को छीलने से क्या हानि होती है?
उत्तर:
पाक-क्रिया के लिए तरकारियों को छीला तथा काटा भी जाता है। तरकारियों के छिलकों में विटामिन व खनिज लवण पाए जाते हैं। अतः तरकारियों को छीलने से इन पोषक तत्त्वों की हानि होती है, जिनसे बचने के लिए

  1. तरकारियों को भली प्रकार धोकर छिलकायुक्त ही काटकर पकाना चाहिए। इससे छिलके में उपस्थित पोषक तत्त्व सुरक्षित रहते हैं।
  2. मोटे छिलके वाली तरकारियों के छिलके अधिक गहरे नहीं छीलने चाहिए, क्योंकि पोषक तत्त्वों की छिलकों के साथ ही निकल जाने की सम्भावना रहती है।

प्रश्न 5:
पाक-क्रिया का वसा पर क्या प्रभाव पड़ता है? [2008, 11, 12, 14]
उत्तर:
साधारणतः पाक-क्रिया का वसा पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता, परन्तु अधिक ताप पर निरन्तर गर्म करने से वसा का एक नया यौगिक बन जाता है, जिसे एक्रोलीन कहा जाता है। इस यौगिक की एक विशेष गन्ध होती है; अतः इस अवस्था में वसायुक्त भोजन में एक तीखी गन्ध आने लगती है। यह एक्रोलीन नामक यौगिक खाने योग्य नहीं होता। अत: इससे युक्त आहार ग्रहण करने से हानि हो। सकती है। यदि वसायुक्त भोजन को बार-बार गर्म किया जाए तो वह सरलता से पचने योग्य नहीं रह जाता। वसा अधिक ताप के प्रभाव से ग्लिसरॉल तथा स्निग्ध के रूप में विघटित भी हो जाती है।

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प्रश्न 6:
पाक-क्रिया का कार्बोहाइड्रेट्स पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
पाक-क्रिया का कार्बोहाइड्रेट्स पर विभिन्न प्रकार से प्रभाव पड़ता है। हम भोजन में सामान्य रूप से स्टार्च एवं शर्करा के रूप में कार्बोहाइड्रेट्स ग्रहण करते हैं। स्टार्च को जब पकाया जाता है तो वे पककर मुलायम हो जाते हैं तथा कुछ फूल जाते हैं। इस अवस्था में इनका पाचन सरल हो जाता है। यदि स्टार्च को क्वथनांक तक उबाला जाए तो इसका सेल्यूलोज वाला भाग फट जाता है। यदि इस प्रकार से पकते हुए स्टार्च में कुछ मात्रा में ठण्डा पानी मिला दिया जाए तो स्टार्च के कण अलग-अलग हो जाते हैं तथा भोज्य-पदार्थ लेई के समान हो जाता है। इससे भिन्न, यदि स्टार्च को जलरहित ही शुष्क विधि से पकाया जाए, तो स्टार्च का रंग हल्का बादामी हो जाता है। यदि कुछ अधिक ताप पर स्टार्च को गर्म किया जाए, तो उसका रंग काला हो जाता है। ताप पाकर यह स्टार्च डैक्स्ट्रीन का रूप ग्रहण कर लेता है। इस रूप में स्टार्च अधिक सुपाच्य हो जाता है। इसी प्रकार, यदि शर्करा को शुष्क अवस्था में गर्म किया जाए, तो उसका रंग भूरा हो जाता है। परन्तु यदि शर्करा को जल के साथ गर्म किया जाए, तो वह घुल जाती है तथा एक प्रकार से शर्बत का रूप ग्रहण कर लेती है।

प्रश्न 7:
पाक-क्रिया का खनिज-लवणों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
पाक-क्रिया का खनिज-लवण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। जब विभिन्न खाद्य-सामग्रियों को जल के साथ पकाया जाता है, तो विभिन्न खनिज-लवण जल में आ जाते हैं। इस अवस्था में यदि पकी हुई खाद्य-सामग्री में से अतिरिक्त पानी बहा दिया जाए तो विभिन्न खनिज लवणों के नष्ट हो जाने की सम्भावना रहती है। अतः इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि खाद्य-सामग्री को केवल उतने ही जल में उबाला जाए जितना पकाने में प्रयुक्त हो जाए। (UPBoardSolutions.com) इसके अतिरिक्त इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि सब्जियों को पकाने से पूर्व अधिक समय तक काटकर नहीं रखना चाहिए। सब्जियों को काटने एवं छीलने से पहले ही अच्छी तरह से धो लेना। चाहिए। छीलकर एवं काटकर धोने से बहुत-से खनिज-लवण नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि यदि खाद्य सामग्री को सावधानीपूर्वक पकाया जाए, तो खनिज लवणों को नष्ट होने से बचाया जा सकता है।

प्रश्न 8:
घर में अनाजों की सुरक्षा आप कैसे करेंगी?
उत्तर:
घर में अनाजों की सुरक्ष: के लिए निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए

  1. खुले हुए अनाज को समय-समय पर सुखाना चाहिए।
  2.  अनाजों को घुन, सुरसुरी आदि से बचाने के लिए उसमें कोई दवा; जैसे-गोलियाँ आदि; रखनी चाहिए।
  3. अनाजों को सीलबन्द बर्तनों में रखना चाहिए विशेषकर धातु के बने ड्रम आदि इस कार्य के लिए अधिक उपयुक्त रहते हैं।
  4. अनाजों में जल की मात्रा कम-से-कम रहनी चाहिए, ताकि उन पर फफूद, घुन आदि न लग सकें। इसके लिए उन्हें पूर्णतः सूखा हुआ रखना चाहिए।

प्रश्न 9:
सब्जियों का हमारे जीवन में क्या महत्त्व है? सब्जियों को काटते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? [2009, 10, 11]
उत्तर:
सब्जियाँ हमारे भोजन का अनिवार्य अंग मानी जाती हैं। सब्जियों को सुरक्षात्मक खाद्यसामग्री माना जाता है। सब्जियाँ विभिन्न विटामिन्स एवं खनिज लवणों की उत्तम स्रोत होती हैं। ये विटामिन एवं खनिज-लवण हमारे स्वास्थ्य में विशेष रूप से सहायक होते हैं। सब्जियों में रेशों की भरपूर मात्रा होती है; अतः सब्जियाँ कब्ज-निवारक होती हैं। सब्जियाँ मल-विसर्जन में सहायक होती हैं। सब्जियाँ शरीर में अम्ल एवं क्षार के सन्तुलन को बनाये रखने में सहायक होती हैं। सब्जियाँ भूख बढ़ाती हैं। सब्जियों के समावेश से हमारा भोजन अधिक रुचिकर एवं विविधतापूर्ण बनता है।
सब्जियों को काटते एवं पकाते समय कुछ बातों को अनिवार्य रूप से ध्यान में रखना चाहिए

  1. सब्जियों को सदैव अच्छी तरह से धोकर एवं साफ करके ही छीलना या काटना चाहिए। यदि आवश्यक न हो तो सब्जियों का छिलका नहीं उतारना चाहिए।
  2. सब्जियों को छीलने एवं काटने के उपरान्त बिल्कुल नहीं धोना चाहिए।
  3.  सब्जियों को सदैव ढककर पकाना चाहिए।
  4. सब्जियों को केवल उतने ही जल में पकाना चाहिए जितना जल उन्हें गलाने के लिए आवश्यक हो।
  5. सब्जियों को अधिक भूनना या तलना नहीं चाहिए। तैयार सब्जियों को बार-बार गरम भी नहीं करना चाहिए।

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प्रश्न 10:
भोजन पकाने से पहले, पकाते समय और परोसते समय किस प्रकार की स्वच्छता रखनी चाहिए और क्यों ? [2009, 12, 13, 15, 18]
उत्तर:
भोजन पकाने से पहले हमें देखना चाहिए कि जिस बर्तन में भोजन पकाया जाना है वह अच्छी तरह साफ है या नहीं। अगर किसी प्रकार की गन्दगी उसे बर्तन में लगी हुई हो तो उसे अच्छी तरह साफ कर लेना चाहिए। भोजन पकाते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि (UPBoardSolutions.com) भोजन आवश्यकता से अधिक न गल जाए क्योंकि भोजन पकाते समय अगर अधिक गल जाता है तो उसके पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार भोजन परोसते समय हमारे हाथ एवं बर्तन अच्छी तरह साफ होने चाहिए।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
खाद्य सामग्री को क्यों पकाया जाता है? [2011, 13, 14, 15]
या
भोजन पकाने के प्रमुख उद्देश्य क्या हैं? [2007, 10, 11]
उत्तर:
खाद्य-सामग्री को स्वादिष्ट, सुपाच्य एवं रोगाणुमुक्त बनाने हेतु तथा विविधता प्रदान करने के लिए पकाया जाता है।

प्रश्न 2:
भोजन पकाने की विधियों के नाम लिखिए। [2007, 09, 10, 17, 18]
उत्तर:
उबालना, तलना, वाष्प द्वारा पकानां तथा भूनना एवं सेंकना भोजन पकाने की मुख्य विधियाँ हैं।

प्रश्न 3:
भोजन को उबालने से अच्छा भाप द्वारा पकाना होता है क्यों? दो कारण लिखिए।
यो
भोजन पकाने की कौन-सी विधि सर्वोत्तम है और क्यों? [2008]
उत्तर:
भोजन पकाने की सर्वोत्तम विधि उसे भाप द्वारा पकाना होती है। इसके दो मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

  1. भोजन सुपाच्य तथा स्वादिष्ट रहता है।
  2. भोजन के पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते।

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प्रश्न 4:
भोजन को बार-बार गर्म करने से क्या हानि होती है?
उत्तर:
बार-बार गर्म करने से भोजन के पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 5:
धीमी आग पर भोजन पकाने से क्या लाभ हैं?
उत्तर:
धीमी आग पर पकाए गए भोजन के पोषक तत्त्व सुरक्षित रहते हैं।

प्रश्न 6:
भाप के दबाव से भोजन कैसे पकता है?
उत्तर:
भाप के दबाव के कारण प्रेशर कुकर में उष्णता का घनत्व बढ़ जाने के कारण (UPBoardSolutions.com) भोजन कम समय में ही भली-भाँति पक जाता है।

प्रश्न 7:
भूनने व सेंकने में क्या अन्तर है? [2015, 16, 17]
उत्तर:
भूनते समय भोज्य वस्तु आग के प्रत्यक्ष सम्पर्क में नहीं आती, जबकि सेंकने में उसे सीधे अंगारों अथवा विद्युत सलाखों के ऊपर सेंका जाता है।

प्रश्न 8:
भाप द्वारा भोजन पकाने से क्या लाभ हैं? [2008]
उत्तर:
भाप द्वारा भोजन पकाने से उसके अधिकांश पौष्टिक तत्त्व सुरक्षित रहते हैं।

प्रश्न 9:
तले हुए भोजन का अधिक सेवन करने से क्या हानि है?
उत्तर:
तला हुआ भोजन गरिष्ठ एवं कुपाच्य होता है। अतः अधिक सेवन करने पर अपच एवं कब्ज़ उत्पन्न करता है।

प्रश्न 10:
दूध को पकाने से क्या लाभ है?
उत्तर:
पकाए जाने पर दूध रोगाणुमुक्त तथा सुपाच्य हो जाता है।

प्रश्न 11:
मक्खन को गर्म करने से क्या हानि सम्भव है?
उत्तर:
गर्म करने पर मक्खन में प्राकृतिक रूप से उपस्थित विटामिन ‘ए’ नष्ट हो जाता है।

प्रश्न 12:
गृहिणी के लिए हाथ व नाखून स्वच्छ रखना क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
हाथ वे नाखूनों की गन्दगी में रोगाणु उपस्थित रहते हैं, जो कि भोजन पकाते एवं  (UPBoardSolutions.com) परोसते समय भोजन में मिल सकते हैं। अत: प्रत्येक गृहिणी को अपने हाथ व नाखून अच्छी तरह साफ रखने चाहिए।

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प्रश्न 13:
आलू को बिना छीले पकाने से क्या लाभ हैं?
उत्तर:
आलू के छिलके के कारण उसका विटामिन ‘सी’ सुरक्षित रहता है।

प्रश्न 14:
हरी शाक-सब्जियों को काटने से पूर्व धोना चाहिए। क्यों? [2007, 11, 15, 18]
उत्तर:
यदि सब्जियों को छीलकर एवं काटकर धोया जाता है, तो उनके कुछ विटामिन एवं खनिज-लवण पानी में बह जाते हैं। अतः इन खनिज तत्त्वों की सुरक्षा के लिए सब्जियों को छीलने एवं काटने से पहले उन्हें धो लेना चाहिए।

प्रश्न 15:
कच्चा भोजन खाने से क्या हानि हो सकती है?
उत्तर:
कच्चा भोजन खाने से खाद्य-पदार्थों के साथ आये हुए रोगों के जीवाणु शरीर में पहुँचेंगे।

प्रश्न 16:
खाद्य-सामग्री को पकाते समय ढककर रखना क्यों आवश्यक होता है?
उत्तर:
खाद्य सामग्री के पोषक तत्त्वों एवं सुगन्ध को नष्ट होने से बचाने के लिए तथा शीघ्र पकाने के लिए उसे ढककर रखना आवश्यक होता है।

प्रश्न 17:
भोजन पकाने की प्रक्रिया में पौष्टिक तत्त्वों की सुरक्षा के उपाय लिखिए।
उत्तर:
भोजन पकाने की प्रक्रिया में पौष्टिक तत्त्वों की सुरक्षा हेतु उपाय अग्रलिखित हैं

  1. भोजन पकाते समय बर्तन को खुला न रखें। बर्तन खुला रखने पर भोजन वायु के सम्पर्क में आने से कीटाणु व धूल का प्रवेश होता है।
  2. भोजन देर तक न पकाएँ। इससे भोजन के पौष्टिक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं।
  3. आवश्यकता से अधिक मसालों का प्रयोग कदापि न करें।

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प्रश्न 18:
गहरी चिकनाई और उथली चिकनाई में तलने की विधियों के बारे में लिखिए। [2007]
उत्तर:
तलने की गहरी चिकनाई विधि:
इस विधि में गहरी कड़ाही प्रयोग में लाई जाती है और काफी मात्रा में घी या तेल में भोज्य-पदार्थ को डालकर तला जाता है; जैसे-पूड़ी-कचौरी, पकौड़ी, समोसे आदि।

तलने की उथली चिकनाई विधि:
इस विधि में चौड़ी व उथली कंड़ाहीं या तवा प्रयोग में लाया जाता है जिसमें (UPBoardSolutions.com) थोड़ी-सी ही चिकनाई डालकर तला जाता है; जैसे—पराँठे, आलू की टिकिया, आमलेट, चीले आदि।

प्रश्न 19:
भोजन परोसने की दो मुख्य शैलियाँ कौन-सी हैं ? [2008, 10]
उत्तर:
भोजन परोसने की दो मुख्य शैलियाँ हैं

  1. देशी शैली तथा
  2. विदेशी या परम्परागत शैली।

प्रश्न 20:
जल में घुलनशील विटामिनों के नाम लिखिए। [2011]
उत्तर:
जल में घुलनशील विटामिन हैं-विटामिन ‘बी’ कॉम्प्लेक्स, विटामिन ‘सी’ तथा विटामिन ‘पी।

प्रश्न 21:
वसा में घुलनशील विटामिनों के नाम लिखिए। [2011, 13]
उत्तर:
जल में घुलनशील विटामिन हैं विटामिन ‘ए’, विटामिन ‘डी’, विटामिन ‘ई’ तथा विटामिन ‘के’।

प्रश्न 22:
किन-किन फलों में विटामिन ‘सी’ प्रचुर मात्रा में पाया जाता है? [2009, 11]
उत्तर:
समस्त खट्टे फलों अर्थात् नींबू, नारंगी, सन्तरा, अमरूद, अनन्नास तथा तरबूज में विटामिन ‘सी’ प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

प्रश्न 23:
कच्ची सब्जियों के खाने से शरीर को कौन-से पोषक तत्त्व अधिक मात्रा में मिलेंगे ? [2009, 13, 15]
उत्तर:
कच्ची सब्जियों के खाने से शरीर को खनिज, विटामिन्स आदि पोषक तत्त्व प्राप्त होते हैं।

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प्रश्न 24:
शरीर के लिए भोजन क्यों आवश्यक है? [2015, 17]
उत्तर:
जीवित प्राणियों के लिए भोजन ग्रहण करना अनिवार्य है। शरीर की वृद्धि एवं विकास के लिए, ऊर्जा प्राप्त करने के लिए, रोगों से मुकाबला करने की शक्ति प्राप्त करने के लिए तथा नियमित रूप से भूख शान्त करने के लिए भोजन ग्रहण करना आवश्यक है।

प्रश्न 25:
भोजन में कौन-से आवश्यक पोषक तत्त्व पाये जाते हैं? [2015]
या
भोजन के पौष्टिक तत्त्वों के नाम बताइए। [2016]
उत्तर:
भोजन के आवश्यक पोषक तत्त्व हैं–प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, (UPBoardSolutions.com) विटामिन, खनिज तथा जल।

प्रश्न 26:
पौष्टिक भोजन से क्या तात्पर्य है? [2016]
उत्तर:
जो भोजन हमारे शरीर को पुष्ट कर रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ाता है, पौष्टिक भोजन कहलाता है।

प्रश्न 27:
हमारे शरीर में विटामिन ‘सी’ के दो कार्य लिखिए। [2016]
उत्तर:
1. रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।
2. दाँतों तथा मसूड़ों को स्वस्थ रखता है।

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बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न:
निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

1. पाक-क्रिया द्वारा खाद्य सामग्री बन जाती है
(क) अपाच्य
(ख) सुपाच्य (ग) कुपाच्य
(घ) कोई प्रभाव नहीं पड़ता

2. भोजन बनाने की सर्वोत्तम विधि है [2015]
(क) उबालना
(ख) भूनना
(ग) तलना
(घ) सिझाना (स्ट्यू करना)

3. दूध को गर्म करने से नष्ट होते हैं [2008]
या
दूध को उबालने पर निम्नलिखित में से क्या नष्ट हो जाते हैं? [2014, 17]
(क) उसके पोषक तत्त्वे
(ख) उसके कीटाणु
(ग) उसका स्वाद
(घ) कुछ भी नहीं

4. दूध बैक्टीरिया रहित हो जाता है
(क) गर्म करने पर
(ख) ठण्डा करने पर
(ग) उबालने पर
(घ) पानी मिलाने पर

5. सब्जियों को लोहे की कड़ाही में पकाने से
(क) लौह तत्त्व की प्राप्ति होती है।
(ख) विषैलापन आ जाता है।
(ग) स्वाद नष्ट हो जाता है।
(घ) पौष्टिक तत्त्वों की प्राप्ति होती है।

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6. डबलरोटी व बिस्कुट बनाने की विधि कहलाती है
(क) ग्रिलिंग
(ख) रोस्टिग
(ग) बेकिंग
(घ) टोस्टिंग

7. भोजन को पकाने से नष्ट न होने वाला विटामिन कौन-सा है?
(क) ‘बी’
(ख) ‘सी’
(ग) “के
(घ) ‘ए’

8. सब्जियों को कब धोना चाहिए ?
(क) काटने के बाद
(ख) छीलने के बाद
(ग) छीलने से पहले
(घ) कभी भी

9. सब्जी को बार-बार गर्म करने से नष्ट हो जाता है, उसका
(क) थायमीन
(ख) एस्कॉर्बिक एसिड
(ग) रिबोफ्लेविन
(घ) निकोटिनिक एसिड

10. बेकिंग पाउडर अथवा खाने का सोडा मिलाकर पकाने से तरकारियों का नष्ट होने वाला पोषक तत्त्व है
(क) विटामिन ‘बी’
(ख) प्रोटीन
(ग) कार्बोज
(घ) खनिज-लवण

11. भोजन पकाने में किसका प्रयोग हानिकारक होता है? [2007, 16, 18]
(क) घी
(ख) मसाले
(ग) सोडा
(घ) इनमें से किसी को नहीं

12. भोजन परोसने की किस शैली में खड़े-खड़े भोजन किया जाता है?
(क) पाश्चात्य शैली
(ख) भारतीय शैली
(ग) बुफे शैली
(घ) इनमें से कोई नहीं

13. भोजन को स्वास्थ्यवर्द्धक बनाने के लिए गृहिणी को विशेष जानकारी होनी चाहिए
(क) भोजन को पकाने की
(ख) भोजन को तलने की
(ग) भोजन में पाए जाने वाले तत्त्वों की
(घ) भोजन परोसने की

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14. किस प्रकार भोजन पकाने से पोषक तत्त्व सुरक्षित रहते हैं ? [2009, 10, 15, 18]
(क) उबालकर
(ख) भूनकर
(ग) तलकर
(घ) भाप द्वारा

15. विटामिन ‘डी’ का स्रोत है [2008]
(क) दालें
(ख) सूर्य किरणें
(ग) खट्टे फल
(घ) सब्जियाँ

16. स्कर्वी रोग किस विटामिन की कमी से होता है? [2008]
(क) विटामिन ‘ए’
(ख) विटामिन ‘डी’
(ग) विटामिन ‘सी’
(घ) विटामिन ‘बी’

17. दूध में किस विटामिन का अभाव रहता है? [2008, 16]
(क) ‘ए’
(ख) ‘डी’
(ग) ‘सी’
(घ) ‘के’

18. विटामिन डी की कमी से बच्चों में कौन-सा रोग हो जाता है ? [2009, 17]
(क) खुजली
(ख) पेचिस
(ग) रतौंधी
(घ) रिकेट्स

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19. खट्टे फलों में कौन-सा विटामिन अधिक मात्रा में पाया जाता है? [2009, 10, 13, 14]
(क) विटामिन ‘ए’
(ख) विटामिन ‘बी’
(ग) विटामिन ‘सी’
(घ) विटामिन ‘डी’

20. प्रोटीन का मुख्य स्रोत है [2009, 12]
(क) चावल
(ख) चीनी
(ग) दूध
(घ) अंगूर

21. रतौंधी किस विटामिन की कमी से होता है ? [2009, 17]
(क) विटामिन ‘ए’
(ख) विटामिन ‘बी’
(ग) विटामिन ‘सी’ ।
(घ) विटामिन ‘डी’

22. विटामिन का कौन-सा समूह वसा में घुलनशील है ? [2009]
(क) ए, बी, सी, डी
(ख) ए, बी, ई, के
(ग) ए, सी, ई, के
(घ) ए, डी, ई, के

23. भोजन पकाने में समय की बचत होती है [2009]
(क) तलकर
(ख) उबालकर
(ग) प्रेशर कुकरे द्वारा
(घ) भूनकर

24. विटामिन ‘ए’ को उत्तम स्रोत है [2011, 13, 16]
(क) दाल
(ख) दूध
(ग) खट्टे फल
(घ) पीली और हरी सब्जियाँ

25. भोज्य पदार्थों में ऊर्जा का प्रमुख साधन है [2011]
(क) प्रोटीन
(ख) विटामिन
(ग) कार्बोहाइड्रेट
(घ) खनिज लवण

26. लौह तत्त्व की कमी से कौन-सा रोग हो जाता है? [2011, 12, 15 ]
(क) बेरी-बेरी
(ख) एनीमिया
(ग) मरास्मस
(घ) तपेदिक

27. भोजन पकाने की विधि है [2014]
(क) उबालना
(ख) तलनी
(ग) भाप द्वारा
(घ) ये सभी

28. जल में घुलनशील विटामिन हैं [2013, 15, 16, 17]
(क) विटामिन A, B, C
(ख) विटामिन B, C
(ग) विटामिन A, D.
(घ) विटामिन E, K

29. वसा में कौन-सा विटामिन घुलनशील नहीं है? [2013]
(क) विटामिन-ए
(ख) विटामिन-ई
(ग) विटामिन-बी
(घ) विटामिन-के

30. शरीर-निर्माण में सहायक है [2014, 16]
(क) प्रोटीन
(ख) वसा
(ग) विटामिन
(घ) कार्बोहाइड्रेट

31. प्रोटीन पाया जाता है [2012, 14]
(क) मिठाई में
(ख) दालों/सोयाबीन में
(ग) सन्तरा में
(घ) आलू में

32. प्रोटीन का मुख्य कार्य है [2018]
(क) शरीर की वृद्धि तथा विकास
(ख) ऊर्जा प्रदान करना
(ग) अस्थि-निर्माण करना
(घ) हृदय गति सामान्य रखना

33. प्रोटीन की कमी से कौन-सा रोग हो जाता है? [2018]
(क) बेरी-बेरी
(ख) एनीमिया
(ग) मरास्मस
(घ) तपेदिक

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34. खाना खाने से पहले हाथ धोने चाहिए [2013]
(क) राख से
(ख) अपमार्जक से
(ग) पानी से
(घ) साबुन एवं पानी से

35. किस प्रकार के भोज्य पदार्थ हमें रोगों से बचाते हैं? [2009, 16, 17]
(क) बिस्कुट
(ख) चावल
(ग) ताजे मौसमी फल एवं हरी सब्जियाँ
(घ) चीनी

36. सूर्य की रोशनी हमें देती है [2016]
(क) विटामिन ‘सी’
(ख) विटामिन ‘डी’
(ग) विटामिन ‘ए’
(घ) इनमें से कोई नहीं

37. विटामिन ‘सी’ का सबसे अच्छा स्रोत है [2015, 15, 17, 18]
(क) मूंग दाल
(ख) आँवला
(ग) दही
(घ) चावल

38. गाजर, पपीता और आम से मिलता है [2016, 17]
(क) कैल्सियम
(ख) प्रोटीन
(ग) विटामिन ‘ए’
(घ) लौह तत्त्व

39. किसके प्रयोग से तुरन्त ऊर्जा मिलती है? [2016, 17, 18]
(क) विटामिन
(ख) प्रोटीन
(ग) ग्लूकोज
(घ) खनिज लवण

40. खाद्य-पदार्थों का संरक्षण किया जा सकता है [2016]
(क) सुखाकर
(ख) चाशनी में रखकर
(ग) तेल व नमक द्वारा
(घ) इन सभी के द्वारा

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उत्तर:
1. (ख) सुपाच्य,
2. (क) उबालना,
3. (ख) उसके कीटाणु,
4. (ग) उबालने पर,
5. (क) लौह तत्व की प्राप्ति होती है,
6. (ग) बेकिंग,
7, (ख) ‘सी’,
8. (ग) छीलने से पहले,
9. (ख) एस्कॉर्बिक एसिड,
10. (क) विटामिन ‘बी’,
11. (ग) सोडा,
12. (ग) बुफे शैली,
13. (ग) भोजन में पाये जाने वाले तत्वों की,
14. (घ) भाप द्वारा,
15. (ख) सूर्य किरणें,
16. (ग) विटामिन ‘सी’,
17. (ग) ‘सी’,
18. (घ) रिकेट्स,
19. (ग) विटामिन ‘सी’,
20. (ग) दूध,
21. (क) विटामिन ‘ए’,
22. (घ) ए, डी, ई, के,
23. (ग) प्रेशर कुकर द्वारा,
24. (ख) दूध,
25. (ग) कार्बोहाइड्रेट,
28 (ख) एनीमिया,
27. (घ) ये सभी,
28. (ख) विटामिन B,C.
29. (ग) विटामिन-बी,
30. (क) प्रोटीन,
31. (ख) दालों/सोयाबीन में,
32. (क) शरीर की वृद्धि तथा विकास,
33. (ग) मरास्मस,
34. (घ) साबुन एवं पानी से,
35. (ग) ताजे मौसमी फल एवं हरी सब्जियां,
36. (ख) विटामिन डी’,
37. (ख) आँवला,
38. (ग) विटामिन ‘ए’,
39. (ग) ग्लूकोज,
40. (घ) इन सभी के द्वारा।

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UP Board Solutions for Class 9 Science Chapter 15 Improvement in Food Resources

UP Board Solutions for Class 9 Science Chapter 15 Improvement in Food Resources (खाद्य संसाधनों में सुधार)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 9 Science. Here we have given UP Board Solutions for Class 9 Science Chapter 15 Improvement in Food Resources (खाद्य संसाधनों में सुधार).

पाठ्य – पुस्तक के प्रश्नोत्तर

पाठगत प्रश्न (पृष्ठ संख्या – 229)

प्रश्न 1.
अनाज, दाल, फल तथा सब्जियों से हमें क्या प्राप्त होता है?
उत्तर-

  1. अनाज – जैसे गेहूँ, चावल, मक्का, बाजरी तथा ज्वार से कार्बोहाइड्रेट प्राप्त होता है जो हमें ऊर्जा प्रदान करता है।
  2. दालें – जैसे चना, मटर, मूंग, उड़द, अरहर और मसूर इत्यादि सभी दालें हैं जो हमें प्रोटीन प्रदान करती हैं। जो हमारे शरीर की टूट-फूट की मरम्मत में मुख्य भूमिका निभाते हैं।
  3. फल तथा सब्जियाँ – जैसे घीया, तोरी, गोभी, मटर, आलू अंगूर, आम, अनार, अनन्नास इत्यादि हमें विटामिन. खनिज व कुछ मात्रा में प्रोटीन इत्यादि प्रदान करते हैं।

पाठगत प्रश्न (पृष्ठ संख्या – 230)

प्रश्न 1.
जैविक तथा अजैविक कारक किस प्रकार फसल उत्पादन को प्रभावित करते हैं?
उत्तर-
जैविक कारक – जैसे कीट, नेमेटोड, केंचुआ व अन्य जीवाणु इत्यादि सभी जैविक कारक में आते हैं। ये फसलों के उत्पादन में भी सहायता करते हैं, जैसे- फलीदार पौधों की जड़ों में पाए जाने वाले जीवाणु जो वायुमण्डले की नाइट्रोजन से यौगिक बनाते हैं, केंचुआ भी मिट्टी को पोली (सरन्ध्र व नरम) बनाकर उपजाऊ बनाता है जिससे फसल उत्पादन बढ़ता है परन्तु कुछ कीट व नेमेटोड फसल उत्पादन को कम करते हैं। (UPBoardSolutions.com) अतः हमें इन परिस्थितियों को सहन करने वाली किस्में प्रयोग करनी चाहिए जैसे कम परिपक्व काल वाली फसलें आर्थिक दृष्टि से अच्छी होती हैं।

अजैविक कारक – जैसे वायु, तापमान, मिट्टी, जल इत्यादि अजैविके कारक में गिने जाते हैं। भूमि की अम्लीयता या क्षारकता, गर्मी, ठण्ड तथा पाला इत्यादि फसल उत्पादन को कम करते हैं। अतः हमें ऐसी फसलों को उपयोग करना चाहिए जो इन सभी परिस्थितियों को अच्छी प्रकार सहन कर सकें। इसके लिए मिश्रित फसलें वे अन्तर-फसली विधियाँ अपनानी चाहिए।

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प्रश्न 2.
फसल सुधार के लिए ऐच्छिक सस्य विज्ञान गुण क्या हैं?
उत्तर-
पशुओं के लिए चारा प्राप्त करने के लिए ऐसी फसलें अधिक उपयुक्त होती हैं जिनमें पौधे लंबे तथा सघन शाखाओं वाले हों, अर्थात् यह फसल का ऐच्छिक सस्य विज्ञान गुण है। इसी प्रकार अनाज उत्पादन के लिए बौने पौधे उपयुक्त ऐच्छिक सस्य विज्ञान गुण है, क्योंकि इनको उगाने के (UPBoardSolutions.com) लिए कम पोषक तत्वों की आवश्यकता होगी। इनके गिरने की संभावनाएँ भी कम होंगी। फसलों के उगने से लेकर कटाई तक कम समय लगना आदि उपयुक्त ऐच्छिक सस्य विज्ञान गुण कहलाते हैं। ऐच्छिक सस्य विज्ञान गुणों वाली किस्में अधिक उत्पादन करने में सहायक होती हैं।

पाठगत प्रश्न (पृष्ठ संख्या – 231)

प्रश्न 1.
वृहत् पोषक क्या हैं और इन्हें वृहत्पोषक क्यों कहते हैं?
उत्तर-
वे तत्त्व जो पौधों की वृद्धि के लिए अत्यन्त आवश्यक होते हैं उन्हें वृहत् पोषक तत्त्व कहते हैं। ये पोषक तत्त्व बहुत अधिक मात्रा में आवश्यक होते हैं अतः इन्हें पोषक तत्त्व कहते हैं।

प्रश्न 2.
पौधे अपना पोषक कैसे प्राप्त करते हैं?
उत्तर-
पौधे पोषक तत्त्वों को खाद तथा उर्वरकों से प्राप्त करते हैं।

पाठगत प्रश्न (पृष्ठ संख्या – 232)

प्रश्न 1.
मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने के लिए खाद तथा उर्वरक के उपयोग की तुलना किजिए।
उत्तर-
मिट्टी की उर्वरता की दृष्टि से खाद तथा उर्वरक के उपयोग की तुलनाः
खाद व उर्वरक दोनों के प्रयोग में निम्नलिखित अन्तर है :
UP Board Solutions for Class 9 Science Chapter 15 Improvement in Food Resources

पाठगत प्रश्न (पृष्ठ संख्या – 235)

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सी परिस्थिति में सबसे अधिक लाभ होगा? क्यों?
(a) किसान उच्चकोटि के बीज का उपयोग करें, सिंचाई ना करें अथवा उर्वरक का उपयोग ना करें।
(b) किसान सामान्य बीजों का उपयोग करें, सिंचाई करें तथा उर्वरक का उपयोग करें।
(c) किसान अच्छी किस्म के बीज का प्रयोग करें। सिंचाई करें, उर्वरक का उपयोग करें तथा फसल सुरक्षा की विधियाँ अपनाएँ।
उत्तर-
परिस्थिति (c) में सबसे अधिक लाभ होगा। अच्छी किस्म के बीजों का चयन परिस्थितियों के अनुसार, उनकी रोगों के प्रति प्रतिरोधकता, उत्पादन की गुणवत्ता एवं उच्च उत्पादन क्षमता के अनुसार करने से उत्पादन अच्छा होता है। गुणवत्ता के कारण फसल का अच्छा मूल्य मिलता है। समय-समय पर सिंचाई करने और उर्वरकों का उपयोग करने से फसल अच्छी होती है। फसल को कीटों, पीड़कों तथा खरपतवार (UPBoardSolutions.com) से बचाने के लिए कीटनाशको पीड़कनाशकों, खरपतवारनाशकों का उपयोग करना चाहिए। उचित फसल-चक्र अपनाकर भी खरपतवार और पीड़कों से फसल की सुरक्षा की जा सकती है।

पाठगत प्रश्न (पृष्ठ संख्या – 235)

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प्रश्न 1.
फसल की सुरक्षा के लिए निरोधक विधियाँ तथा जैव नियंत्रण क्यों अच्छा समझा जाता है?
उत्तर-
फसलों की सुरक्षा के लिए बचाव की विधियों तथा जैविक विधियों का प्रयोग किया जाता है क्योंकि ये न तो फसलों को न ही वातावरण को हानि पहुँचाती हैं। पीड़कनाशी व अन्य रासायनिक पदार्थ फसलों को हानि पहुँचाते हैं तथा वातावरण को प्रदूषित करते हैं।

प्रश्न 2.
भंडारण की प्रक्रिया में कौन-से कारक अनाज की हानि के लिए उत्तरदायी हैं?
उत्तर-
अनाज के भण्डारण में बहुत हानि हो सकती है। इस हानि के लिए जैविक तथा अजैविक दोनों कारक उत्तरदायी हैं।
जैविक कारक – जैविक कारकों में कीट, केतक, कवक, चिंचड़ी तथा जीवाणु आते हैं।
अजैविक कारक – अजैविक कारकों में भण्डारण के स्थान पर उपयुक्त नमी व ताप का अभाव है। ये दोनों प्रकार के कारक फसल की गुणवत्ता को कम करते हैं। और वजन भी कम करते हैं। बीजों के अंकुरण की क्षमता कम हो जाती है और उत्पाद बदरंग हो जाते हैं। अतः इन कारकों (UPBoardSolutions.com) पर नियंत्रण पाने के लिए अनाज को धूप व छाया में सुखाना चाहिए और फिर धूमक का प्रयोग करना चाहिए ताकि उसमें पीड़क उत्पन्न न हो सके।

पाठगत प्रश्न (पृष्ठ संख्या – 236)

प्रश्न 1.
पशुओं की नस्ल सुधार के लिए प्रायः कौन-सी विधि का उपयोग किया जाता है और क्यों?
उत्तर-
विदेशज नस्लों (Foreign or Exotic Breeds) में दुग्ध स्रवणकाल देशज नस्लों (desi breeds) की अपेक्षा अधिक लंबा होता है। देशज एवं विदेशज नस्लों के बीच संकरण कराने पर संकर नस्लें उत्पन्न होती हैं। इन्हें प्राकृतिक (Natural) क्रॉस (Cros8) अथवा कृत्रिम वीर्यसेचन (Artificial Insemination) द्वारा उत्पन्न किया जाता है। कृत्रिम वीर्यसेचन से अनेकों लाभ हैं, जैसे-

  • एक बैल से प्राप्त शुक्राणु द्वारा 3000 तक गायों को निषेचित कर सकते हैं।
  • हिमशीतित वीर्य को लंबे काल तक संचित रखा जा सकता है।
  • इसे देश के सुदूर भागों तक पहुँचाया जा सकता है।
  • सफल निषेचन एवं आर्थिक दृष्टि से यह उपयोगी तथा लाभकारी है।

पाठगत प्रश्न (पृष्ठ संख्या – 237)

प्रश्न 1.
निम्नलिखित कथन की विवेचना कीजिए-
”यह रुचिकर है कि भारत में कुक्कुट, अल्प रेशे के खाद्य पदार्थों को उच्च पोषकता वाले पशु प्रोटीन आहार में परिवर्तन करने के लिए सबसे अधिक सक्षम है। अल्प रेशे के खाद्य पदार्थ मनुष्यों के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं।”
उत्तर-
कुक्कुट विशेषकर किसान पालता है या मुर्गीपालन घरों में किया जाता है जहाँ खाली स्थान ज्यादा हो और पशु भी पाले जा रहे होते हैं। मुर्गी को मांस (ब्रौलर) व अण्डे प्राप्त करने के लिए पाला जाता है। ये अण्डे देने वाले पक्षी (कुक्कुट) कृषि के उपोत्पाद से प्राप्त सस्ते रेशेदार पदार्थों को भोजन के रूप में उपयोग करते हैं और उसे प्रोटीन आहार के रूप में परिवर्तित करते हैं अर्थात् इनके अण्डों में व मांस में (UPBoardSolutions.com) प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है।
अत: यह ठीक है कि कुक्कुट कम रेशेदार को उच्चकोटि के पशु प्रोटीन आहार में परिवर्तित कर देते हैं।

पाठगत प्रश्न (पृष्ठ संख्या – 238)

प्रश्न 1.
पशुपालन तथा कुक्कुट पालने के प्रबंधन प्रणाली में क्या समानता है?
उत्तर-
दोनों के पालन के लिए निम्नलिखित बातें आवश्यक हैं-

  • उचित आवास व्यवस्था
  • उचित प्रकाश की व्यवस्था स्था
  • उचित पोषण व्यवस्था
  • समय पर टीकाकरण
  • विकसित नस्लों का उपयोग
  • सफाई तथा स्वच्छता का प्रबन्ध।

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प्रश्न 2.
ब्रौलर तथा अंडे देने वाली लेयर में क्या अंतर है? इनके प्रबंधन के अन्तर को भी स्पष्ट करो।
उत्तर-
अंडों के उत्पादन के लिए पाली गयी कुक्कुट लेयर व मांस उत्पादन के लिए पाले गये कुक्कट ब्रौलर कहलाते हैं। कुक्कुट अनाज, कीड़े-मकोड़े, सब्जियों के अपशिष्ट तथा कुछ कंकड़ आदि पर पोषित किये जाते हैं। ब्रौलर के आहार में प्रोटीन तथा वसा प्रचुर मात्रा में होनी चाहिए।
इनके आवास में उचित ताप तथा स्वच्छता रखनी भी आवश्यक है। स्वच्छता के साथ नियमित रूप से रोगाणुनाशक का छिड़काव करना चाहिए। इनमें जीवाणु, विषाणु, कवक, परजीवी आदि से कई प्रकार के रोग हो सकते हैं अतः रोगों से बचाने के लिए टीका लगवाना चाहिए।

पाठगत प्रश्न (पृष्ठ संख्या – 239)

प्रश्न 1.
मछलियाँ कैसे प्राप्त करते हैं?
उत्तर-
मछली को समुद्र से या अलवणीय जल में से जाल द्वारा पकड़कर प्राप्त किया जाता है। मछली को पकड़ने के लिए विभिन्न प्रकार के जालों का उपयोग नाव से किया जाता है। सैटेलाइट तथा प्रति ध्वनि गंभीरतामापी से खुले समुद्र में मछलियों के बड़े समूह का पता लगाया जाता है जिससे मछली का उत्पादन बढ़ जाता है। अधिक आर्थिक महत्त्व वाली समुद्री मछलियों का समुद्री जल में संवर्धन भी किया जाता है। समुद्र में मछली संवर्धन को मैरीकल्चर कहते हैं।

प्रश्न 2.
मिश्रित मछली संवर्धन के क्या लाभ हैं?
उत्तर-
मिश्रित मछली संवर्धन, अधिक मछली संवर्धन की विधि है। इसमें देशी तथा विदेशी प्रकार की मछलियों | का उपयोग किया जाता है। ऐसे तंत्र में अकेले तालाब में 5 या 6 मछली स्पीशीज का उपयोग किया जाता है। इनमें ऐसी मछलियों को चुना जाता है जिनमें आहार के लिए। प्रतिस्पर्धा न हो और उनके आहार की आदत अलग-अलग हों। इसके फलस्वरूप तालाब के हर भाग में स्थित प्राप्त आहार का उपयोग हो जाता है, जैसे-कटला मछली पानी की सतह से अपना भोजन लेती है। मृगल तथा कॉमन कार्प तालाब की तली से (UPBoardSolutions.com) भोजन लेती है। रोहू मछली तालाब के मध्य क्षेत्र से अपना भोजन लेती है। ग्रास कार्य खरपतवार खाती है। इस प्रकार ये सभी मछलियाँ साथ-साथ रहते हुए भी बिना स्पर्धा से अपना-अपना आहार लेती हैं, जिससे मछली के उत्पादन में वृद्धि होती है।

पाठगत प्रश्न (पृष्ठ संख्या – 240)

प्रश्न 1.
मधु उत्पादन के लिए प्रयुक्त मधुमक्खी में कौन-कौन से ऐच्छिक गुण होने चाहिए?
उत्तर-
मधु उत्पादन के लिए प्रयुक्त मधुमक्खी में निम्नलिखित ऐच्छिक गुण होने चाहिए-

  1. इनमें मधु इकट्ठा करने की क्षमता अधिक होनी चाहिए।
  2. डंक कम मारने का स्वभाव।
  3. छत्ते में काफी समय तक रहे।
  4. प्रजनन तीव्रता से करें।
    इन सब गुणों के लिए इटेलियन मधुमक्खी का उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 2.
चरागाह क्या है और ये मधु उत्पादन से कैसे सम्बन्धित है?
उत्तर-
वह वनस्पति क्षेत्र जहाँ से मधुमक्खियाँ मकरन्द तथा परागकण एकत्रित करती है, चरागाह कहलाता है। ये क्षेत्र भौगोलिक स्थिति व क्षेत्र के आधार पर भिन्न-भिन्न होते हैं इसी कारण शहद (मधु) की गुणवत्ता व स्वाद चरागाह | में मधुमक्खी को उपलब्धं फूलों की किस्मों पर आधारित होता है। क्योंकि ये मधुमक्खियाँ मकरंद तथा पराग को फूलों से एकत्रित करती हैं। कश्मीर का बादामी शहद स्वाद में उत्तम होता है। मधुमक्खियाँ चरागाह में बादाम, महुआ, आम, नारियल, इमली, लीची, सेब, अमरूद, सूरजमुखी व बेर इत्यादि के फूलों का मकरन्द वे परागकण इकट्ठा करती हैं। और भिन्न-भिन्न प्रकार का शहद उत्पन्न करती हैं।

अभ्यास प्रश्न (पृष्ठ – 241)

प्रश्न 1.
फसल उत्पादन की एक विधि का वर्णन करो जिससे अधिक पैदावार प्राप्त हो सके।
उत्तर-
फसल उत्पादन की फसल किस्मों में सुधार विधि’ एक ऐसी विधि है जिससे अधिक पैदावार प्राप्त होती है। “फसल किस्मों में सुधार-इसमें किसान को विभिन्न गुणों, जैसे रोग प्रतिरोधिता, उर्वरक के प्रति अनुरूपता, उत्पादन की गुणवत्ता तथा उच्च उत्पादन क्षमता के लिए फसलों की किस्मों का चुनाव प्रजनन द्वारा करना चाहिए। फसलों में ऐच्छिक गुण संकरण द्वारा भी डाले जा सकते हैं। संकरण की यह विधि अन्तराकिस्मीय (विभिन्न किस्मों), अन्तरास्पीशीज (विभिन्न स्पीशीज) और अन्तरावंशीय (विभिन्न जैनरा) भी हो सकता है। फसल (UPBoardSolutions.com) सुधार की दूसरी विधि है, ऐच्छिक गुणों वाले जीन का डालना। इससे आनुवंशकीय रूपांतरित फसल प्राप्त होती है। इस कार्य के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले विशेष बीज अपनाने चाहिए, और बीज उसी किस्म के होने चाहिए जो अनुकूल परिस्थिति में उग सके। कृषि प्रणाली व फसल उत्पादन मौसम, पानी तथा मिट्टी की गुणवत्ता पर निर्भर होती है। फसलें ऐसी हों जो प्रत्येक प्रकार की मिट्टी व जलवायु की विभिन्न परिस्थितियों में भी उग सकें।

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प्रश्न 2.
खेतों में खाद तथा उर्वरक का उपयोग क्यों करते हैं?
उत्तर-
खेतों में खाद तथा उर्वरक का उपयोग भूमि की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने के लिए किया जाता है। फसल के उगने में अर्थात् बीज बोने से परिपक्वन काल तक पौधे भूमि के 13 प्रकार के पोषक तत्त्व ग्रहण करते हैं जिससे ये तत्त्व भूमि में कम हो जाते हैं। भूमि में खाद मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाती है और मिट्टी की रचना व पानी धारण करने की क्षमता बढ़ जाती है। उर्वरक पौधे की कायिक वृद्धि में सहायक होते हैं और पौधों को स्वस्थ रखने में सहायक होते हैं।

प्रश्न 3.
अन्तराफसलीकरण तथा फसल-चक्र के क्या लाभ हैं?
उत्तर-
अन्तराफसलीकरण तथा फसल-चक्र खरपतवार को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं। इन विधियों द्वारा पीड़कों पर भी नियंत्रण किया जा सकता है, फसलों की उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है और भूमि की उपजाऊ शक्ति भी बनी रहती है।

प्रश्न 4.
आनुवंशिक फेरबदल क्या हैं? कृषि प्रणालियों में यह कैसे उपयोगी हैं?
उत्तर-
आनुवंशिक फेरबदल फसल सुधार की एक नई विधि हैं जिसमें ऐच्छिक गुणों वाले जीन का डालना, इसके परिणामस्वरूप, आनुवंशिक रूपांतरित फसल प्राप्त होती है। इसमें उच्च तापमान, विशेष विकिरण या रासायनिक पदार्थों द्वारा पौधे के जीन में ऐसे उत्प्रेरित परिवर्तन लाए (UPBoardSolutions.com) जाते हैं ताकि उत्पन्न होने वाली जीनों में इच्छित गुण आ जायँ।
उपयोग- इस प्रणाली द्वारा ऐच्छिक गुणों वाली फसलें तैयार कर सकते हैं।

प्रश्न 5.
भण्डारगृहों (गोदामों) में अनाज की हानि कैसे होती है?
उत्तर-
भण्डारगृह में अनाज की हानि के दो प्रकार के कारक उत्तरदायी हैं, जैसे-
1. जैविक
2. अजैविक।

  1. जैविक कारक – कीट, कुंतक, कवक, चिंचडी तथा जीवाणु जैविक कारक हैं।
  2. अजैविक कारक – उपयुक्त नमी व ताप का अभाव अजैविक कारक हैं। ये दोनों कारक अनाज की गुणवत्ता को खराब कर देते हैं, उनका वजन कम कर देते हैं, अंकुरण करने की क्षमता कम करते हैं, उत्पाद बदरंग हो जाती है। जैविक कारक अनाज को कुतर देते हैं या भीतर घुस जाते हैं। ये कीट कभी-कभी पौधों की वृद्धि के समय प्रवेश कर जाते हैं।

प्रश्न 6.
किसानों के लिए पशुपालन प्रणालियाँ कैसे लाभदायक हैं?
उत्तर-
किसानों के लिए पशुपालन प्रणाली लाभदायक है, क्योंकि पशुपालन के दो उद्देश्य हैं- (1) दूध देने वाले (2) कृषि कार्य के लिए जैसे-हल चलाना, सिंचाई तथा माल ढोने के लिए इन पशुओं को ड्राफ्ट पशु कहते हैं। किसानों के कृषि उत्पाद ही पशुओं के भोजन, जैसे-रुक्षांश व सान्द्र भोजन के रूप (UPBoardSolutions.com) में प्रयोग होते हैं। पशुपालन में इनके अतिरिक्त मुर्गी पालन और मधुमक्खी पालन भी किया जा सकता है। ये सभी पशुपालन प्रणाली किसानों को आय के साधनों में वृद्धि करने में सहायक है।

प्रश्न 7.
पशुपालन के क्या लाभ हैं?
उत्तर-
पशुपालन के लाभ-

  1. दुधारू पशुओं जैसे गाय, भैंस, भेड़, बकरी आदि से दूध प्राप्त होता है। इसमें सभी पोषक तत्त्व पाए जाते हैं। दूध में विटामिन ‘A’ तथा ‘D’, कैल्सियम तथा फॉस्फोरस आदि खनिज पाए जाते हैं।
  2. पशुओं से मांस प्राप्त होता है। मांस उच्च प्रोटीन का स्रोत है।
  3. बैल, भैंसा, ऊँट, घोड़ा खच्चर आदि पशु बोझ ढोने के काम में लाए जाते हैं।
  4. पशुओं का उपयोग कृषि कार्यों (हल चलाना, सिंचाई कार्य, अनाज की श्रेसिंग आदि) में किया जाता है।
  5. भेड़ बकरी, ऊँट से हमें ऊन प्राप्त होती है। इसका विविध उपयोग किया जाता है।
  6. जंतु अपशिष्ट से खाद तैयार की जाती है।

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प्रश्न 8.
ज्पादन बढ़ाने के लिए कुक्कुट पालन, मत्स्य पालन तथा मधुमक्खी पालन में क्या समानताएँ हैं?
उत्तर-
कुक्कुट पालन, मत्स्य पालन तथा मधुमक्खी पालन में उत्पादन बढ़ाने के लिए अच्छी प्रबंधन प्रणालियाँ आवश्यक हैं, जैसे-

  • उपयुक्त आवास, आवास की स्वच्छता, उपयुक्त ताप एवं स्वच्छता।
  • उचित आहार, आहार की गुणवत्ता।
  • रोगों तथा पीड़कों पर नियंत्रण तथा उनसे बचाव।

प्रश्न 9.
प्रग्रहण मत्स्यन, मेरीकल्चर तथा जल संवर्धन में क्या अंतर है?
उत्तर-
प्रग्रहण मत्स्यन, मेरीकल्चर तथा जल संवर्धन में प्रमुख अन्तर निम्नलिखित हैं-
UP Board Solutions for Class 9 Science Chapter 15 Improvement in Food Resources

अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भोजन के उस संघटक का नाम लिखिए जो शरीर की वृद्धि एवं क्षतिपूर्ति के लिए आवश्यक है।
उत्तर-
प्रोटीन।

प्रश्न 2.
शरीर की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले भोजन के अवयवों के नाम लिखिए।
उत्तर-
कार्बोहाइड्रेट एवं वसः

प्रश्न 3.
अगर चीनी और मक्खन की समान मात्रा ली जाए, तो इन दोनों में से कौन अधिक ऊर्जा प्रदान करेगा?
उत्तर-
मक्खन।

प्रश्न 4.
कोई चार खरीफ फसलें लिखिए।
उत्तर-
मक्का, बाजरा, धान, कपास, उड़द।

प्रश्न 5.
कोई चार रबी फसलें लिखिए।
उत्तर-
गेहूँ, जौ, चना, मटर, सरसों।

प्रश्न 6.
खरीफ फसलें कब उगायी जाती हैं?
उत्तर-
खरीफ फसलें जून से अक्टूबर तक उगायी जाती हैं।

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प्रश्न 7.
रबी फसलें कब उगायी जाती हैं?
उत्तर-
रबी फसलें नवम्बर से अप्रैल तक उगायी जाती हैं।

प्रश्न 6.
उन्नत खेती को और किन-किन नामों से जाना जाता है?
उत्तर-
उन्नत खेती को निम्न नामों से भी जाना जाता है-

  1. पर्यावरणीय खेती,
  2. कार्बनिक खेती तथा
  3. टिकाऊ खेती।

प्रश्न 9.
उन्नत कृषि को पर्यावरणीय कृषि क्यों कहते हैं?
उत्तर-
उन्नत कृषि से पर्यावरण संरक्षित रहता है, इसलिए इसे पर्यावरणीय कृषि भी कहते हैं।

प्रश्न 10.
उन्नत कृषि को कार्बनिक कृषि क्यों कहा जाता है?
उत्तर-
उन्नत कृषि में पोषक तत्त्व प्रबन्धन का मुख्य स्रोत कार्बनिक पदार्थ होते हैं, इसलिए उन्नत कृषि को कार्बनिक कृषि कहते हैं।

प्रश्न 11.
उचित वृद्धि के लिए निम्नलिखित में से किस फसल के लिए NPK अथवा यूरिया की न्यूनतम मात्रा की आवश्यकता होगी-घास, मटर, गेहूँ, गन्ना?
उत्तर-
मटर।

प्रश्न 12.
एक लेग्यूम फसल का नाम लिखिए।
उत्तर-
मटर, अरहर आदि।

प्रश्न 13.
खाद की दो विशेषतायें लिखिए।
उत्तर-
खाद में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा अधिक होती है और यह मृदा को अल्पमात्रा में पोषक प्रदान करता है।

प्रश्न 14.
उर्वरक क्या है?
उत्तर-
उर्वरक व्यावसायिक रूप से उत्पादित रासायनिक पदार्थ हैं जो पौधों को किसी तत्त्व विशेष की पूर्ति करते हैं।

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प्रश्न 15.
खाद और उर्वरक के उत्पादन में एक अन्तर लिखिए।
उत्तर-
खाद जन्तुओं के अपशिष्ट और पौधों के कचरे के अपघटन से तैयार किया जाता है जबकि उर्वरक का उत्पादन रासायनिक विधियों से किया जाता है।

प्रश्न 16.
दो प्रकार के खाद कौन-से हैं?
उत्तर-

  1. कम्पोस्ट या वर्मी कम्पोस्ट।
  2. हरी खाद।

प्रश्न 17.
अगली फसल के लिए अच्छे बीज तैयार करने के लिए फसल कटाई के बाद किये गये कार्यकलाप क्या हैं?
उत्तर-

  1. उचित रूप में सुखाना अर्थात् बीजों को नमी रहित करना।
  2. बीजों को कीटाणु रहित और अवांछनीय पदार्थों से दूर रखना।

प्रश्न 18.
कोई दो रासायनिक उर्वरक लिखिए।
उत्तर-
यूरिया, सुपर फॉस्फेट।

प्रश्न 19.
गेहूँ तथा धान के साथ उगने वाले किन्हीं दो सामान्य खरपतवारों के नाम बताइये।
उत्तर-
गेहूँ तथा धान के साथ उगने वाले दो खरपतवार-घास, चौलाई, बथुआ, हिरनखुरी आदि।

प्रश्न 20.
गेहूं की फसल के उस खरपतवार को नाम लिखिए जो खाने के लिए प्रयोग किया जाता है।
उत्तर-
बथुआ।

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प्रश्न 21.
गेहूं की फसल में कवक द्वारा होने वाले रोगों के नाम लिखिए।
उत्तर-
गेहूँ में कवक द्वारा दो रोग सामान्यत: हो जाते हैं। ये हैं-

  • किट्ट या रतुआ (rust),
  • कण्ड (smut)।

प्रश्न 22.
धान में कीट द्वारा उत्पन्न रोग क्या है?
उत्तर-
धान में कीट गन्धी द्वारा ब्लास्ट (blast) रोग हो जाता है।

प्रश्न 23.
अन्तराफसलीकरण क्या है?
उत्तर-
दो या अधिक फसलों का एक साथ एक ही खेत में निर्दिष्ट पैटर्न में उगाना, अन्तराफसलीकरण कहलाता है।

प्रश्न 24.
अन्तराफसलीकरण और मिश्रित खेती में, किस विधि में अलग-अलग पैदावार प्रप्त की जा सकती है?
उत्तर-
अन्तराफसलीकरण में।

प्रश्न 25.
बकरियों की कौन-सी नस्ल दूध की रानी कहलाती है?
उत्तर-
सानेन नस्ल की बकरी दूध की रानी कहलाती है।

प्रश्न 26.
भेड़ों को क्यों पाला जाता है?
उत्तर-
भेड़ों को मुख्य रूप से ऊन एवं मांस उत्पादन के लिए पाला जाता है लेकिन इनसे दूध भी प्राप्त होता है।

प्रश्न 27.
भारत की मांस उत्पादक भेड़ों के नाम लिखिए।
उत्तर-
भारत की मांस उत्पादक भेड़ों के नामजालौनी, मेड़िया एवं निल्लोरी।

प्रश्न 28.
भारत की ऊन उत्पादक भेड़ों की नस्लों के नाम लिखिए।
उत्तर-
भारत की ऊन उत्पादक भेड़ों के नामबीकानेरी, मारवाड़ी भाकरवाल, करनाह, भदरवाह, गुरेज, रामपुर-बुशियार, हसन एवं दकनी।

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प्रश्न 29.
मांस एवं ऊन उत्पादक भेड़ों की नस्लों के नाम लिखिए।
उत्तर-
मांस एवं ऊन उत्पादक प्रमुख भारतीय भेड़ों के नाम-हिसार डेल, बेलारी, लोही, कच्छी आदि।

प्रश्न 30.
भेड़ की प्रमुख विदेशी नस्लों के नाम लिखिए।
उत्तर-
भेड़ की प्रमुख विदेशी नस्लों के नाम-मेरीनो, रेम्बा उलेट, साउथ डान, कोरियेल, लीमेस्टर।

प्रश्न 31.
भेड़ की मेरीनो नामक नस्ल किसलिए प्रसिद्ध है?
उत्तर-
भेड़ की मेरीनो नामक नस्ल संसार में सबसे अधिक बारीक एवं मुलायम ऊन के लिए प्रसिद्ध है।

प्रश्न 32.
मुर्गी की प्रमुख मांस उत्पादक नस्लों के नाम लिखिए।
उत्तर-
मुर्गी की प्रमुख मांस उत्पादक (UPBoardSolutions.com) नस्लों के नाम-असील, घाघस, गेम, चिटगाँव, बसरा, कड़कनाथ, जर्सी जाइट।

प्रश्न 33.
मुर्गी की प्रमुख अण्डा उत्पादक विदेशी नस्लों के नाम लिखिए।
उत्तर-
मुगी की प्रमुख अण्डा उत्पादक विदेशी नस्लों के नाम- व्हाइट लैग हार्न, मनोरकर ऐनकोना, कैम्पिनस।

प्रश्न 34.
संसार की सबसे अधिक अण्डा उत्पादक मुर्गी की नस्ल कौन-सी है?
उत्तर-
व्हाइट लैग हार्न संसार की सबसे अधिक अण्डा उत्पादक मुर्गी की किस्म है।

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प्रश्न 35.
मुर्गी की सर्वोत्तम मांस वाली भारतीय नस्ल कौन-सी है?
उत्तर-
असील भारत की सर्वोत्तम मांस वाली मुर्गी की नस्ल है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चरागाह क्या है और ये मधु उत्पादन से कैसे सम्बन्धित हैं?
उत्तर-
मधुमक्खियाँ जिन स्थानों से मधु एकत्र करती हैं, उसे मधुमक्खी का चरागाह कहते हैं। मधुमक्खी पुष्पों से मकरन्द तथा पराग एकत्र करती हैं। चरागाह के पुष्पों की किस्में शहद के स्वाद को प्रभावित करती हैं।

प्रश्न 2.
मकरंद किस प्रकार शहद में परिवर्तित होता है?
उत्तर-
जब मधुमक्खी फूलों से मकरंद चूसती है, यह मकरंद उसके मधुकोष (Honey sac) में पहुँचता है जहाँ वह कुछ इनवर्टेस एन्जाइम की क्रिया द्वारा डेक्सट्रोस तथा लेबुलोस में रूपांतरित हो जाता है। प्रत्यावहम के बाद उपचारित मकरंद आखिरकार शहद में परिवर्तित हो जाता है।

प्रश्न 3.
हरित खाद क्या है? हरित खाद कैसे तैयार की जाती है?
उत्तर-
हरित खाद उत्पन्न करने वाले पादपों तथा सनहेम्प (क्राटोलेरिया जूसिया) ढेचा (सिसबेनिया एक्यूलिएट) एवं ग्वार (स्यामोप्सोस ट्रेआगोनालोबा) से प्राप्त कार्बनिक पदार्थों के पूर्ण अपघटन से प्राप्त खाद हरित खाद कहलाती है।
हरित खाद तैयार करना-

  • हरित खाद उत्पन्न करने वाले पादपों को आरंभिक अवस्था (फूल खिलने की अवस्था) में ही खेत में काटकर गिरा दिया जाता है
  • इनके अवशेषों को 1-2 महीनों के लिए जमीन के नीचे दबा दिया जाता है। अब खेत को अगली फसल के लिए तैयार किया जाता है।
  • प्रायः उच्च पोषक तत्त्व की जरूरत वाली फसलों यथा चावल (धान), मक्का, गन्ना, कपास, गेहूँ आदि को हरित खाद वाले खेतों में बोया जाता है।

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प्रश्न 4.
मछलियों को हानि पहुँचाने वाले कारक क्या हैं? इनकी रोकथाम किस प्रकार की जा सकती है?
उत्तर-
मछलियों को अनेक जन्तु, जैसे शृंग, जलीय शलभ, मेंढक, साँप, पक्षी आदि खा जाते हैं। मछलियों में जीवाणु तथा विषाणुओं के कारण अनेक रोग हो जाते हैं। मछलियों में VHS (वायरल हीमोरे के सेप्टीसेमिया), IPN (इन्फेक्सीयस प्रैक्रियाटिक नेक्रोसिस) आदि सामान्य (UPBoardSolutions.com) संक्रमणीय रोग हैं। जल प्रदायों का प्रदूषण मछलियों को बहुत हानि पहुँचाता है। जल प्रदूषण के कारण मछलियाँ बहुत अधिक संख्या में मर जाती हैं। मत्स्यपालन के लिए जल-प्रदायों का उचित रख-रखाव आवश्यक है।

प्रश्न 5.
रोगों से कुक्कुटों को बचाने के लिए कुछ उपाय बताइए।
उत्तर-

  1. कुक्कुटों के रहने के स्थान को उचित रूप से और नियमित रूप से साफ करना चाहिए।
  2. कुक्कुटों के रहने का स्थान बड़ा, हवादार, उचित प्रकाश और संवातन वाला होना चाहिए। जाड़ों के दिनों में ठण्ड से चिड़ियों को बचाने के लिए कुक्कुट फार्म की खिड़कियों और शेड की जालीदार दीवारों को ढक दिया जाता है।
  3. कुक्कुट फार्म मक्खियों, चुहियों, चूहों, बिल्लियों इत्यादि से मुक्त होना चाहिए।

प्रश्न 8.
वसा क्या हैं? उनके विभिन्न स्रोत क्या हैं?
उतर-
वसा (Fats) – ‘लम्बी श्रृंखला वाले वसीय अम्लों व ग्लिसरॉल (एक प्रकार का एल्कोहॉल) के एस्टर, वसा कहलाते हैं। जैसे–ब्यूटायरिक अम्ल, पॉमीटिक अम्ल, ओक्टानोइक अम्ल। वसा के मुख्य स्रोत हैं-मक्खन, घी, दूध, पनीर, अंडे की जर्दी, गिरी, मांस, तेल आदि। तेलों में नारियल के तेल में 40.1% व तिल के तेल में 43.3% वसा है।

प्रश्न 7.
प्रोटीन क्या हैं? उनके विभिन्न स्रोत क्या हैं?
उत्तर-
प्रोटीन (Protein)- ये कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन व नाइट्रोजन के अत्यन्त जटिल यौगिक हैं। कुछ प्रोटीनों के संघटन में सल्फर (गन्धक) व फॉस्फोरस भी उपस्थित होते हैं। प्रोटीन के मुख्य संघटक अमीनो अम्ल हैं।
प्रोटीन के मुख्य स्रोत हैं-बीन, (UPBoardSolutions.com) सोयाबीन, दूध, पनीर, अंडा, दालें आदि। दालों में मसूर दाल में 25.1%, मूंग दाल में 24.5%, उड़द दाल में 24.0%, अरहर दाल में 22.3%, प्रोटीन की मात्रा होती है। इसी प्रकार मूंगफली (दाने) में 26.7%, मछली में 18.8% व अंडे में 13.3% प्रोटीन की मात्रा उपस्थित है।

प्रश्न 8.
कार्योपयोगी पशु किन्हें कहते हैं? किन्हीं दो के नाम लिखिए।
उत्तर-
वे पालतू पशु जो कृषि करने, बोझा ढोने आदि में प्रयोग किये जाते हैं, कार्योपयोगी पशु कहलाते हैं; जैसे-गधा, घोड़ा, बैल।

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प्रश्न 9.
खाद्य उत्पाद प्राप्त करने हेतु, पशुपालन में आवश्यक पद्धतियों को क्रमबद्ध कीजिए।
उत्तर-
पशुपालन में आवश्यक पद्धतियाँ निम्न प्रकार हैं-

  1. भरण – पशुओं को भोजन दो रूपों में दिया जाता है-(a) ठोस आहार (concentrate) वे (b) मोटा चारा (रुक्षांश)। पशु को उचित आहार पूरी मात्रा में दिया जाये।
  2. आवास – आवास के लिए आश्रय-स्थल स्वच्छ, साफ-सुथरा हो जिसमें प्रकाश, वायु एवं पानी की समुचित व्यवस्था हो । अपशिष्ट पदार्थों के निकास एवं विसर्जन की उचित व्यवस्था हो।
  3. उन्नत नस्लें – पशुओं की उन नस्लों का पालन किया जाये जो अधिक उत्पादन करती हों।

प्रश्न 10.
रुक्षांश किसे कहते हैं? पशु इसे कैसे प्राप्त करते हैं ?
उत्तर-
पशु आहार का रेशेदार व कम पोषण वाला भाग, जो चारे या घास-फूस से मिलता है, रुक्षांश कहलाता है। पशु इसे मोटे चारे, बरसीम, भूसा, रिजका आदि से प्राप्त करते हैं।

प्रश्न 11.
दुग्धधारी पशुओं में आहार उनके उत्पादन को कैसे प्रभावित करता है?
उत्तर-
दुग्धधारी पशुओं का उत्पादन उनके आहार पर बहुत निर्भर करता है। अपुष्ट अथवा अल्पपुष्ट पशु आहार देने से दुग्ध उत्पादन कम होता है। आहार की उचित व्यवस्था न होने के कारण हमारे देश में गाय 0.5 लिटर व भैंस 1.5 लीटर दूध प्रतिदिन कम देती हैं।

प्रश्न 12.
कृषि उत्पादों के भंडारण को हानि पहुँचाने में कौन-से कारक उत्तरदायी हैं? इन्हें किस प्रकार नियंत्रित किया जा सकता है?
उत्तर-
जैविक कारकों के अंतर्गत कुंतक, कीट तथा जीवाणु आदि आते हैं। अजैविक कारकों के अंतर्गत भंडारण के स्थान पर उपस्थित नमी तथा ताप का प्रभाव मुख्य कारक हैं। पीड़कों को नष्ट करने के लिए धूमकों का प्रयोग उचित रहता है।
अनाज के भंडारण से पहले धूप में और फिर छाया (UPBoardSolutions.com) में सुखी लेना चाहिए। अनाज में नमी की मात्रा 12% से अधिक नहीं होनी चाहिए। भंडार-गृह जल तथा नमी के लिए अभेद्य होने चाहिए। भंडारित खाद्य पदार्थों की समय-समय पर निरीक्षण करते रहना चाहिए।

प्रश्न 13.
मिश्रित फसलों के कोई दो लाभ लिखिए।।
उत्तर-

  1. अवयवी फसलों के समपूरक प्रभाव के कारण दोनों फसलों की उपज बढ़ जाती है। उदाहरणार्थ गेहूँ और चना
  2. दो फसलों को एक साथ उगाने से भूमि की उर्वरता में सुधार होता हैं।

प्रश्न 14.
किन कारणों से, भारतीय नस्लों से मुर्गे-मुर्गियों की संकर नस्लें क्यों लाभदायक हैं?
उत्तर-

  1. ये अधिक अण्डे देती हैं। (लगभग 700 अण्डे वार्षिक जबकि देशी मुर्गी प्रति वर्ष 60 देती है।
  2. वे अधिक मांस उत्पादित करते हैं। 1 kg मांस के लिए 2.3 kg चारा, जबकि देशी किस्में 1 kg मांस देने के लिए लगभग 5-6 kg चारा खाती हैं।

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प्रश्न 15.
विभिन्न फसलों को अलग-अलग मौसम में क्यों उगाते हैं?
उत्तर-
फसलों को समुचित वृद्धि एवं जीवन चक्र पूरा करने के लिए निम्न कारकों की आवश्यकता होती है

  • जलवायु सम्बन्धी परिस्थितियाँ
  • तापमान
  • दीप्तिकाल (photoperiod)।

कुछ फसलें कम तापमान और कुछ अधिक तापमान पर उगती एवं वृद्धि करती हैं, कुछ फसलों को सूर्य का तेज प्रकाश और कुछ को सामान्य प्रकाश की आवश्यकता होती है, इसीलिए विभिन्न फसलों को अलग-अलग मौसम में उगाया जाता है।

प्रश्न 16.
खाद क्या हैं? इनके मुख्य प्रकार लिखिए।
उत्तर-
वे कार्बनिक पदार्थ जो बहुत अधिक आयतन में होने पर कम मात्रा में पोषक तत्त्व प्रदान करते हैं, खाद कहलाते हैं। ये निम्न प्रकार के होते हैं
1.  गोबर की खाद (Farm Yard Manure) या (FYM) – यह पशुओं के गोबर या अपशिष्ट पदार्थों से बनायी जाती है। कृषि एवं पशुओं के अपशिष्ट जब कुछ दिन के लिए छेड़ दिये जाते हैं तो वे खाद में बदल जाते हैं।
2. हरी खाद – यह हरे पौधों को खेत में दबाकर बनायी जाती है। पटसन, मूंग, ग्वार, ढेचा आदि की फसल को हल चलाकर मिट्टी में दबा देते हैं। कुछ समय पश्चात् । यह खाद में बदल जाती है जिसे हरी खाद कहते हैं। यह मृदा में नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस की भरपूर आपूर्ति करती है।

प्रश्न 17.
कम्पोस्ट खाद कैसे तैयार की जाती है?
उत्तर-
कम्पोस्ट खाद तैयार करने के लिए, 4 से 5 मीटर लम्बा, 1.5 से 1.8 मीटर चौड़ा व 1.0 से 1.8 मीटर गहरा गड्ढा खोदा जाता है। गड्ढे में पशुओं के अपशिष्ट, कृषि के अपशिष्ट, घर का कूड़ा-करकट एवं अपशिष्ट आदि को डालते जाते हैं। जब यह गड्ढा भर जाती है तो इसके ऊपर कुछ पानी डालकर मिट्टी की एक परत से बंद कर दिया जाता है। दो या तीन महीने में यह काले रंग के कार्बनिक पदार्थ में बदल जाता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मिश्रित फसली खेती में फसलों का चयन किस आधार पर करते हैं?
उत्तर-
मिश्रित फसली या बहुफसली खेती में फसलों का चयन निम्न बातों को ध्यान में रखकर करते हैं:

  1. फसल की अवधि – एक फसल लम्बी अवधि की व दूसरी फसल छोटी अवधि की होती है।
  2. वृद्धि की आदत – एक फसल के पौधे लम्बे व दूसरी फसल के छोटे होते हैं।
  3. जड़ों का प्रकार – एक की जड़ें गहराई तक जाने वाली हों।
  4. पानी की आवश्यकता – एक को कम व दूसरी को अधिक पानी की आवश्यकता हो ।
  5. पोषक तत्वों की आवश्यकता – एक को कम व दूसरी को अधिक पोषक तत्वों की आवश्यकता हो।

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प्रश्न 2.
अंतराफसलीकरण (इन्टरक्लोपिंग) क्या है? मिश्रित खेती व अन्तराफसलीकरण में समानता व असमानता बताइये।
उत्तर-
एक ही खेत पर दो या अधिक फसलें पंक्तिबद्ध रूप या निर्दिष्ट पैटर्न में उगाना, अंतराफसलीकरण कहलाता है।
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प्रश्न 3.
शस्यावर्तन (फसल-चक्र) से आप क्या समझते हो? यह उपयोगी क्यों है? इससे फसले को होने वाला एक लाभ लिखिए।
उत्तर-
फसल-चक्र या शस्यावर्तन-किसी भूमि पर फसलों को पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार अदल-बदल कर उगाना, फसल-चक्र या शस्यावर्तन कहलाता है। इस विधि में दो अनाज वाली फसलों के मध्य एक फलीदार (लेग्यूम) फसल जैसे मटर, सोयाबीन, चना, मूंगफली आदि लगायी जाती है।
फसल भूमि से नाइट्रोजन यौगिक अधिकता (UPBoardSolutions.com) से ग्रहण करती है जो भूमि की उर्वरता बढ़ाने के लिए अत्यन्त आवश्यक है। अनाज वाली फसल भूमि से नाइट्रोजन यौगिक अधिकता से ग्रहण करती है जिससे भूमि में नाइट्रोजन की कमी हो जाती है। दाल वाली फसलों के पौधों की जड़ों में एक प्रकार के जीवाणु रहते हैं जो वायुमण्डल की नाइट्रोजन को नाइट्रोजन यौगिकों में बदलकर भूमि को प्रदान करते हैं। इस प्रकार भूमि को आवश्यक पोषक तत्त्व नाइट्रोजन की आपूर्ति से हो जाती है।
इस प्रकार मृदा की उर्वरता बढ़ जाती है तथा यदि फसल-चक्र उचित ढंग से अपनाया जाए तो वर्ष में तीन तक फसलें उगायी जा सकती हैं।

प्रश्न 4.

  1. लेयर किसे कहते हैं?
  2. कुक्कुट के जीवन में अंडे देने की अवधि का वर्णन कीजिए।
  3. दो बाह्य कारकों के नाम बताइए जो मुर्गी के अंडे के उत्पादन पर अनुकूलित प्रभाव डालते हैं।
  4. बौलर किसे कहते हैं? इनकी पोषण की आवश्यकता का वर्णन कीजिए।
  5. कुक्कुट के जीवन में विभिन्न अवस्था के नाम लिखिए।

उत्तर-

  1. मुर्गी की उस अवस्था को जिसमें वह अंडों का उत्पादन करती है लेयिंग (Laying) अवस्था कहते हैं। तथा उसे लेयर (Layer) कहते हैं। एक लेयर 20 सप्ताह की अवस्था में अंडे देना आरंभ करती है।
  2. लैंगिक परिपक्वता से अंडे देने तक की अवधि अण्डे देने की अवधि कहलाती है। इस अवधि में चूजों को लेयर्स कहते हैं। लेयर्स को पर्याप्त स्थान तथा उचित प्रकाश की आवश्यकता होती है।
  3. दो बाह्य कारक जो अंडे के उत्पादन पर अनुकूलित प्रभाव डालते हैं
    • प्रकाश की तीव्रता
    • प्रकाश की अवधि।
  4. मुर्गी मांस उत्पादित नस्ल है। ब्रौलर के भोजन में
    • प्रोटीन अधिक होनी चाहिए।
    • पर्याप्त वसा होनी चाहिए।
    • विटामिन A तथा K की अधिक मात्रा होनी चाहिए।
  5. कुक्कुट के जीवन में दो अवस्थाएँ हैं
    • विकास अवधि।
    • अंडा देने की अवधि।

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प्रश्न 5.
खाद की परिभाषा लिखिए। विभिन्न खाद कौन-कौन-सी होती हैं और ये मिट्टी को किस प्रकार प्रभावित करती हैं?
उसर-
खाद (Manures) – खाद प्राकृतिक पदार्थ है। यह गाय के गोबर, मल-मूत्र, रेशे, पत्तियों आदि से बनती है। इन्हें प्राकृतिक उर्वरक (Natural fertilizers) कहते है। मृदा में कार्बनिक पदार्थों का होना अत्यंत आवश्यक है। इससे मृदा में अमस (humus) उत्पन्न होता है। यूमस से, जो कार्बनिक पदार्थों, जैसे पौधों के विभिन्न भागों, मृत पदार्थों, जीव-जंतुओं आदि के विभिन्न उत्सर्जी अथवा मृदा भागों के (UPBoardSolutions.com) जीवाणुओं आदि की प्रक्रियाओं से बनता है, पौधों को अनेक आवश्यक पदार्थों की प्राप्ति होती है।

हरी खाद के लिए दलहनी फसलें (Legume crops) अधिक उपयोगी होती हैं। दलहनी पौधों की जड़ों में पाई जाने वाली ग्रन्थिकाओं (nodules) में नाइट्रोजन स्थिरीकरण जीवाणु रहता है। इन फसलों के खेत में जोतकर दबा देने से भूमि में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ जाती है तथा साथ-साथ जैविक पदार्थ भी मिल जाता है जिसके कारण भूमि के गठन में सुधार होता है।
खादों के प्रकार-ये गोबर की खाद, एफ वाई एम (FFYM), कंपोस्ट व हरी खाद तथा वर्मीपोस्ट (vermipost) होती है।

प्रश्न 6.
उर्वरक क्या हैं? परम्परागत खाद वे रासायनिक उर्वरकों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
अथवा
उर्वरक एवं खाद में चार भिन्नतायें लिखिए।
उत्तर-
वे पदार्थ जो मृदा की उर्वरक क्षमता को बढ़ाने के लिए बाहर से दिये जाते हैं, उर्वरक कहलाते हैं। उर्वरक दो प्रकार के होते हैं-
(a) परम्परागत खाद,
(b) रासायनिक उर्वरक।

(a) परम्परागत खाद – वह खाद जो वनस्पतिर्यो, कृषि एवं पशु अपशिष्ट के अपघटन से तैयार की जाती है, परम्परागत खाद कहलाती है। जैसे-कम्पोस्ट खाद, हरी खाद।
(b) रासायनिक उर्वरक – वे रासायनिक यौगिक जो आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति करते हैं रासायनिक उर्वरक कहलाते हैं। जैसे-

  • नाइट्रोजन उर्वरक – जो भूमि को नाइट्रोजन की आपूर्ति करते हैं उदाहरणार्थ, यूरिया, अमोनियम नाइट्रेट।
  • पोटाश उर्वरक – जो भूमि को पोटैशियम की आपूर्ति करते हैं उदाहरणार्थ, पोटाश राख, पौटेशियम क्लोराइड।
  • फॉस्फेट उर्वरक – जो भूमि को फॉस्फेट की आपूर्ति करते हैं उदाहरणार्थ, NPK, सुपर फॉस्फेट। [जो उर्वरक दो या अधिक पोषक तत्वों की आपूर्ति करते हैं, मिश्रित उर्वरक कहलाते हैं जैसे-NPK, सुपर फॉस्फेट] मृदा की प्रकृति और फसल की आवश्यकता के अनुसार किसी उर्वरक का चयन किया जाता है।
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प्रश्न 7.
पशु-पक्षियों के पोषण के लिए आहार की क्या-क्या विशेषताएँ होनी चाहिए?
अथवा
पशु-पक्षियों के आहार निर्धारण हेतु किन-किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए?
उत्तर-
पशु-पक्षियों के आहार की विशेषताएँ – पशु पक्षियों के पोषण के लिए आहार की निम्न विशेषताएँ होनी चाहिए अर्थात् उनके आहार निर्धारण हेतु निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए-

  1. गर्भावस्था के दौरान पशु-पक्षियों को भ्रूणीय विकास हेतु अधिक पौष्टिक आहार देना चाहिए।
  2. युवा पशु-पक्षियों को अधिक प्रोटीन युक्त आहार देना चाहिए।
  3. अधिक परिश्रम करने वाले पशुओं को ऊर्जा प्रदान करने वाले अर्थात् अधिक कार्बोज की मात्रा वाले। आहार देने चाहिए।
  4. जो पशु-पक्षी उत्पादन कार्य नहीं कर रहे हों उन्हें केवल निर्वाह आहार देना चाहिए।
  5. पशु-पक्षियों के आहार का निर्धारण उनकी स्वास्थ्य दशा एवं मौसम को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
  6. पशु-पक्षियों के आहार ग्रहण न करने की स्थिति में उन जीवों के स्वास्थ्य का परीक्षण करवाना चाहिए।

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प्रश्न 8.
पशु आहार के विभिन्न घटकों के कार्य एवं स्रोत लिखिए।
उत्तर-
पशु आहार के विभिन्न घटकों के कार्य एवं स्रोत-
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प्रश्न 9.
पशु-पक्षियों को रोगों से बचाने के लिए क्या-क्या प्रयास करने चाहिए?
अथवा
पशु-पक्षियों को रोगों से बचाने के लिए मुख्य उपाय लिखिए।
अथवा
पशु-पक्षियों को विभिन्न बीमारियों से बचाने हेतु प्रमुख उपाय बताइये।
उत्तर-
पशु-पक्षियों को विभिन्न बीमारियों (रोगों) से बचाने के उपाय – पशु-पक्षियों को विभिन्न बीमारियों (रोगों) से बचाने के लिए निम्न उपाय (प्रयास) करने चाहिए-

  1. रोगी पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग रखना चाहिए
  2. पशुशाला एवं कुक्कुटशाला को साफ-सुथरा एवं जीवाणुरहित (संक्रमण रहित) रखना चाहिए।
  3. बिछावन एवं अन्य दूषित पदार्थों को नष्ट कर देना चाहिए।
  4. रोग फैलने की सूचना तुरन्त पशु चिकित्सक को देनी चाहिए।
  5. पशु चिकित्सक द्वारा समय-समय पर परीक्षण करवाते रहना चाहिए।
  6. पशुओं की देखभाल करने वाले व्यक्ति को अपनी साफ-सफाई का ध्यान रखना चाहिए।
  7. नवीन पशुओं को परीक्षण के उपरान्त ही समूह में शामिल करना चाहिए।
  8. चरागाहों को बदलते रहना चाहिए।
  9. पशुओं को पौष्टिक सन्तुलित आहार देना चाहिए।
  10. उचित समय पर विभिन्न रोगों के टीके पशुओं को अवश्य ही लगवाना चाहिए।

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प्रश्न 10.
एक उत्तम पशु आवास कैसा होना चाहिए?
अथवा
एक उत्तम पशु आवास में कौन-कौन-सी सुविधाएँ होनी चाहिए।
अथवा
एक उत्तम पशु आवास में क्या-क्या विशेषताएँ होनी चाहिए?
उत्तर-
एक उत्तम पशु आवास की विशेषताएँ एवं उसमें मिलने वाली सुविधाएँ – एक उत्तम पशु आवास में अग्रलिखित विशेषताएँ एवं उसमें मिलने वाली सुविधाएँ होनी चाहिए

  1. पशु आवास ऊँचाई पर स्थित होना चाहिए जिससे वहाँ जल भराव न हो सके।
  2. आवास स्वच्छ एवं जीवाणु रहित होना चाहिए।
  3. आवास में प्रतिदिन साफ-सफाई की व्यवस्था होनी चाहिए।
  4. आवास हवादार होना चाहिए जहाँ स्वच्छ हवा के आवागमन की व्यवस्था हो।
  5. आवास में सूर्य के प्रकाश को आने की व्यवस्था होनी चाहिए।
  6. आवास में पशुओं के लिए स्वच्छ पेयजल की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।
  7. आवास में मलमूत्र एकत्रित नहीं होना चाहिए। तथा पशुओं को रहने के लिए सूखा स्थान प्राप्त होना चाहिए।
  8. पशु आवास का फर्श पक्का एवं ढालू होना चाहिए।

अभ्यास प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. दुग्ध उत्पादन में अपार वृद्धि कहलाती है
(a) श्वेत क्रान्ति
(b) हरित क्रान्ति
(c) नीली क्रान्ति
(d) ये सभी।

2. मछली उत्पादन में अपार वृद्धि कहलाती है
(a) श्वेत क्रान्ति
(b) हरित क्रान्ति
(c) नीली क्रान्ति
(d) ये सभी।

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3. मधुमक्खी पालन एक अच्छा उद्यम है क्योंकि
(a) शहद का सर्वत्र उपयोग होता है।
(b) इसमें पूँजी निवेश कम है।
(c) किसी विशिष्ट स्थान की आवश्यकता नहीं है।
(d) उपर्युक्त सभी।

4. कुक्कुटों के आहार में उपस्थित अवयव होने चाहिए
(a) कार्बोहाइड्रेट, वसा
(b) कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, लवण
(c) कार्बोहाइड्रेट व प्रोटीन
(d) प्रोटीन व लवण ।

5. यदि कोई पशु अस्वस्थ है तो :
(a) वह आहार लेना बन्द कर देता है।
(b) वह निष्क्रिय हो जाता है।
(c) उसका दुग्ध उत्पादन, अंडे देने या कार्य करने की क्षमता कम हो जाती है।
(d) उपर्युक्त सभी।

6. आवश्यक वृहत् पोषक तत्त्व है|
(a) N, P, K, Ca
(b) N, P, K, Fe
(c) N, P, K, Cu
(d) N, P, K, Cl.

7. सूक्ष्म पोषक तत्त्व है
(a) N, P, K, Ca
(b) Fe, Mg, Cu, Zn
(c) Fe, Mn, Cu, Zn, B, Mo
(d) Ca, Fe, Mn, Cu.

8. एक किसान दो खाद्यान्न फसलों के मध्य मटर की फसल उगाता है, वह अपनाता है-
(a) मिश्रित फसली
(b) फसल चक्र
(c) अंतराफसलीकरण
(d) उपर्युक्त में से कोई भी नहीं।

9. गाय की देशी नस्ल है-
(a) मुर्रा।
(b) फ्रीशवाल
(c) जर्सी
(d) शाहीवाल।

10. गाय की विदेशी नस्ल है-
(a) मुर्रा
(b) फ्रीशवाल
(c) शाहीवाल
(d) जर्सी

11. गाय की संकर नस्ल है-
(a) मुर्रा
(b) शाहीवाल:
(c) फ्रीशवाल
(d) जर्सी।

12. निम्न में से मुर्गियों की देशी नस्ल है:
(a) व्हाइट लेगहार्न
(b) रोडे आइलैंड रैड
(c) ससेक्स
(d) इनमें से कोई भी नहीं।

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13. बसरा, असील मुर्गियों की
(a) विदेशी नस्ल हैं
(b) देशी नस्ल हैं।
(c) संकर नस्ल हैं,
(d) परिवर्तित नस्ल हैं।

14. मुर्गियों की संकर नस्ल है
(a) व्हाइट लेगहार्न
(b) JLS-82
(c) बसरा
(d) असील।

15. कौन-सी मीठे जल की मछली नहीं है
(a) हिल्सा
(b) कटला
(c) रोहू
(d) टीरीका।

16. उन्नत कृषि कहलाती है
(a) पर्यावरणीय कृषि
(b) कार्बनिक कृषि
(c) टिकाऊ कृषि
(d) उपर्युक्त सभी

17. फसल-चक्र के प्रकार होते हैं
(a) एकवर्षीय
(b) द्विवर्षीय
(c) बहुवर्षीय
(d) ये सभी।

18. सर्वाधिक दूध देने वाली गाय की संकर नस्ल
(a) करन स्विस
(b) करन फ्राई
(c) जरसिंध
(d) जर्सी

19. बारीक एवं मुलायम ऊन के लिए प्रसिद्ध भेड़ की नस्ल है-
(a) बीकानेरी
(b) मेरीनो
(c) मारबाड़ी
(d) हिसार।

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20. संसार की सर्वाधिक अण्डा उत्पादक मुर्गी की नस्ल
(a) असील
(b) चिटगांव
(c) कड़कनाथ
(d) ह्वाइट लैग हॉर्न

उत्तरमाला

  1. (a)
  2. (c)
  3. (d)
  4. (b)
  5. (d)
  6. (a)
  7. (c)
  8. (b)
  9. (d)
  10. (d)
  11. (b)
  12. (d)
  13. (b)
  14. (b)
  15. (a)
  16. (d)
  17. (d)
  18. (c)
  19. (b)
  20. (d)

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UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 2 बाल-प्रतिज्ञा (अनिवार्य संस्कृत)

UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 2 बाल-प्रतिज्ञा (भविष्यत्काल विधिलिङ) (अनिवार्य संस्कृत)

These Solutions are part of UP Board Solutions for Class 8 Hindi. Here we have given UP Board Solutions for Class 8 Hindi Chapter 2 बाल-प्रतिज्ञा (भविष्यत्काल विधिलिङ) (अनिवार्य संस्कृत).

 

करिष्यामि …………………………………………. कुमार्गे ॥

हिन्दी अनुवाद – बुरे लोगों की संगति नहीं करूंगा। अच्छे लोगों की सत्संगति करूंगा। हमेशा सच्चे रास्ते पर पैर रखूगा। कभी बुरे रास्ते पर मैं नहीं चलूंगा।

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हरिष्यामि …………………………………………. कदाचित

हिन्दी अनुवाद – मैं किसी का धन हरण नहीं करूंगा और मैं सबके चित्तों को हर लँगा सबका प्यारा बन जाऊँगा। मैं सत्य बोलूंगा, कभी भी झूठ नहीं बोलूंगा। मैं मीठा बोलूंगा, कड़वा कभी नहीं बोलूंगा।

भविष्यामि …………………………………………. वाहम् ॥

हिन्दी अनुवाद – मैं धैर्यवान होऊँगा, मैं वीर होऊँगा। मैं दानी होऊँगा, अपने देश का अभिमानी होऊँगा, मैं हमेशा उत्साहयुक्त होऊँगा और मैं कभी भी आलस्ययुक्त नहीं होऊँगा। सदा

ब्रह्मचर्य …………………………………………. करिष्ये।

हिन्दी अनुवाद – मैं सदा ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करूंगा। मैं सदा देशसेवा का व्रत धारण करूंगा। मैं सत्य, शिव और सुन्दर कार्य में अपने पैरों को पीछे नहीं करूंगा।

सदाऽहं …………………………………………. भवेयम् ॥

हिन्दी अनुवाद – मैं सदा अपने धर्म का अनुरागी बनूं। मैं सदा अपने कार्य का अनुरागी बनूं। मैं सदा स्वदेशानुरागी बनूं। मैं सदा स्ववेषानुरागी बनें।

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अभ्यास

प्रश्न 1.
उच्चारण करेंनोट-विद्यार्थी स्वयं उच्चारण करें।

प्रश्न 2.
एक पद में उत्तर दें
उत्तर :
(क) कस्य सङ्गतिं न करिष्यामि?
उत्तर : दुर्जनानाम्।

(ख)
अहं सदा कुत्र पादौ धरिष्यामि?
उत्तर : सत्यमार्गे।

(ग)
अहं किं न वदिष्यामि?
उत्तर : मिथ्या।

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(घ)
अहं कस्य चित्तानि हरिष्यामि?
उत्तर : सर्वस्य।

(ङ)
अहं किं व्रदिष्यामि?
उत्तर : सत्य।

प्रश्न 3.
कोष्ठक से उचित क्रिया-पदों को चुनकर रिक्त स्थानों की पूर्ति करें (पूर्ति करके)
(क) अहं सज्जनानां सत्सङ्गतिम् करिष्यामि।
(ख) अहं कस्यापि वित्तं न हरिष्यामि।
(ग) अहं सदा उत्साहयुक्तः भविष्यामि।
(घ) अहं सदा स्वधर्मानुरागी भवेयम्।

प्रश्न 4.
रेखांकित पदों के आधार पर प्रश्न-निर्माण करें
(क) लता कदाचित् कुमार्गे न चलिष्यति।                 प्रश्न – का कदाचित् कुमार्गे न चलिष्यति।
(ख) अहं कस्यापि वित्तानि न हरिष्यामि।                  प्रश्न – अहम् कस्यापि वित्तानि किम् न करिष्यामि?
(ग) वयं स्वदेशानुरागी भवेम।                                  प्रश्न – के स्वदेशानुरागी।

प्रश्न 5.
वाक्यों का संस्कृत में अनुवाद करें अनुवाद
(क) मैं सदा सत्य बोलूंगा।
अनुवाद : अहं सदा सत्यं वदिष्यामि।

(ख)
हम सब कड़वी बात नहीं बोलेंगे।
अनुवाद : वयं तिक्तं न वदिष्यामि।

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(ग)
मैं सदा देश-सेवा करूंगा।
अनुवाद : अहं सदा देशसेवाम् भवेयम्।

(घ)
मैं सदा स्वदेशानुरागी होऊँगा।
अनुवाद : अहं सदा स्वदेशानुरागी भवेयम्।

प्रश्न 6.
नीचे दिए गए चक्र को ध्यान से देखिए, बीच के गोले में कुछ क्रियापद दिए गए हैं। उचित क्रिया पदों को लेकर उसमें ऊपर दिए गए अधूरे वाक्यों को पूर्ण कीजिए (चक्र पाठ्यपुस्तक से देखकर )
(क) अहं सदा सत्यं वदिष्यामि।                     (क) अहं सदा स्वदेशानुरागी भवेयम्।
(ख) अहं सर्वदा उत्साहयुक्तः भविष्यामि।      (ख) अहं वीरः भविष्यामि।
(ग) अहम् आलस्ययुक्तः न भविष्यामि।         (ग) अहम् स्वदेशाभिमानी भवेयम्।
(घ) अहं सदा स्वकर्मानुरागी भवेयम्।            (घ) अहं सदा मधुरम् वदिष्यामि।
(ङ) अहं कस्यापि चित्तानि न हरिष्यामि।       (ङ) अहं सज्जनानाम् सत्संगति करिष्यामि।
(च) अहं मिथ्या न वदिष्यामि।                        (च) अहं सदा स्ववेशानुरागी भवेयम्।

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प्रश्न 7 .
नोट –
विद्यार्थी स्वयं करें।

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UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 16 विभिन्न रोगों में रोगी का भोजन

UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 16 विभिन्न रोगों में रोगी का भोजन

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
रोगी के भोजन से क्या तात्पर्य है? रोगी को भोजन देते समय आप किन-किन बातों का ध्यान रखेंगी?
या
रोगी के स्वास्थ्य-लाभ के समय दिये जाने वाले भोजन का विशेष चुनाव करना चाहिए। क्यों?
या
रोगी के आहार कितने प्रकार के होते हैं? रोगी के आहार को तैयार करते समय किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए? [2008]
उत्तर:
रुग्णावस्था में आहार

रुग्णावस्था के परिणाम हैं
(1) शारीरिक दुर्बलता,
(2) पाचन शक्ति का ह्रास,
(3) पोषक तत्त्वों की कमी तथा
(4) शरीर के विभिन्न अंगों में शिथिलता। इन विशेष परिस्थितियों में रोगी को तला, भुना अथवा मसालों युक्त भोजन दिया जाना अनुपयुक्त रहता है। उसे एक विशिष्ट प्रकार के आहार की आवश्यकता होती है। रोगी को दिया जाने वाला भोजन हल्का, (UPBoardSolutions.com) सन्तुलित, ताजा, आवश्यक पोषक तत्वों से युक्त तथा पर्याप्त ऊर्जा एवं ऊष्मा प्रदान करने वाला होना चाहिए। इसके अतिरिक्त रुग्णावस्था में दिया जाने वाला भोजन रोगों पर भी आधारित होता है। सामान्यतः रोगी के आहार में निम्नलिखित

परिवर्तन किए जाने चाहिए

  1. शुद्ध व गाढ़े दूध के स्थान पर पानी मिला अथवा सप्रेटा दूध उपयोग में लाया जाना चाहिए।
  2. आहार में वसा कम होनी चाहिए।
  3.  खाद्यान्नों, आलू व अरवी आदि की मात्रा कम-से-कम होनी चाहिए।
  4. विटामिन व खनिज-लवणयुक्त तरकारियाँ अधिक प्रयोग में लाई जानी चाहिए।
  5. (फलों का सेवन अधिक कराया जाना चाहिए।
  6. आहार हर प्रकार से सुपाच्य होना चाहिए।

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इस प्रकार रुग्णावस्था में आहार को उतना ही महत्त्व है जितना कि रोगोपचार के लिए दी जाने वाली औषधियों का, क्योंकि औषधियाँ यदि रोगी को रोगमुक्त करती हैं, तो उपयुक्त आहार उसे स्वास्थ्य एवं शक्ति प्रदान करता है।

रोगी को भोजन देते समय ध्यान रखने योग्य बातें

रोगी का भोजन क्या और कैसा हो? इसके लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना अत्यधिक आवश्यक है–
(1) सुपाच्य एवं हल्का भोजन:
रोगी को सहज ही पचने वाला भोजन दिया जाना चाहिए जिससे कि उसका (UPBoardSolutions.com) अवशोषण जल्द हो सके। रोगी को सामान्यत: बिस्कुट, साबूदाना, सूजी, दलिया, कस्टर्ड, फल तथा उबली हुई सब्जियाँ दी जानी चाहिए।

(2) उच्च कैलोरीयुक्त आहार:
प्रायः ज्वर की अवस्था में शरीर के तापमान में वृद्धि होती है, जिसके कारण शारीरिक उष्णता एवं शक्ति की हानि होती है; अत: रोगी को 3000-4000 कैलोरी ऊर्जा प्रदान करने वाला आहार देना चाहिए। लम्बी अवधि के रोगी को 2000-3000 कैलोरी ऊर्जा देने वाला भोजन दिया जाना चाहिए। नियमानुसार रोगी को शारीरिक भार की दृष्टि से 80 कैलोरी/किलोग्राम के हिसाब से ऊर्जायुक्त आहार मिलना चाहिए।

(3) अतिरिक्त प्रोटीनयुक्त आहार:
सामान्यत: सभी रोगों में दुर्बलता उत्पन्न होती है तथा आन्तरिक ऊतकों की क्षति होती है जिसका एकमात्र विकल्प प्रोटीनयुक्त आहार है। साधारणत: रोगी को 100-150 ग्राम प्रोटीन प्रतिदिन मिलनी चाहिए। रोगी को भोजन में 300-350 कैलोरी प्रोटीन भोज्यपदार्थों से प्राप्त होनी चाहिए। प्रोटीन-प्राप्त करने के लिए दूध सर्वोत्तम आहार है। यदि वसा की मात्रा कम करनी है तो सप्रेटा दूध प्रयुक्त करना चाहिए। बच्चों को फटे दूध का पानी देना लाभप्रद रहता है। दूध के अतिरिक्त सरलता से पाचनशील दालों के सूप, मटन सूप, अण्डे आदि भी रोगी को दिए जाने । चाहिए। कुछ रोग ऐसे भी होते हैं जिनमें रोगी को बहुत कम प्रोटीनयुक्त आहार ही दिया जाता है।

(4) कार्बोजयुक्त आहार:
सामान्यतः रोगी को वसायुक्त भोज्य-पदार्थ कम-से-कम दिए जाते हैं। अत: रोगी की ऊर्जा पूर्ति के लिए उसके आहार में पर्याप्त कार्बोजयुक्त भोज्य-पदार्थों का होना बहुत आवश्यक है। इसके लिए रोगी को ग्लूकोज वे लैक्टोज के रूप में शक्कर दी जा सकती है। इसका अतिरिक्त लाभ यह है कि यह एन्जाइम क्रिया के बिना ही रक्त प्रवाह में सरलता से अवशोषित
हो जाती है।

(5) विटामिनयुक्त भोजन:
लगभग सभी रोगों में रोगी की पाचन शक्ति कुप्रभावित होती है। चयापचय की क्रिया को प्रोत्साहित करने के लिए विटामिन ‘ए’, ‘बी’ कॉम्पलैक्स तथा एस्कॉर्बिक एसिडयुक्त भोज्य-पदार्थों का सेवन रोगी के लिए आवश्यक होता है। इसके लिए उसे दूध, अण्डा तथा (UPBoardSolutions.com) हरी शाक-सब्जियों का दिया जाना लाभप्रद रहता है।

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(6) खनिज-लवणयुक्त आहार:
नमकीन सूप व रस तथा नमकीन भोज्य-पदार्थों का सेवन कराकर रोगी की नमक की आवश्यकता की पूर्ति की जा सकती है। दूध, हरी शाक-सब्जियों, दालों व अण्डा आदि को देने से रोगी को कैल्सियम, लोहा तथा फॉस्फोरस आदि प्राप्त हो सकते हैं। पोटैशियम की कमी को दूर करने के लिए फलों के रस तथा दूध उत्तम स्रोत हैं। उच्च रक्त चाप जैसे कुछ रोगों में व्यक्ति को नमक बहुत कम दिया जाता है।

(7) तरल पदार्थ:
पेय पदार्थ; जैसे फलों के रस, सूप, चाय इत्यादि; रोगी को 2500 से 5000 मिलीलीटर तक प्रतिदिन दिए जाने चाहिए। ज्वर आदि के कारण रोगी के शरीर से पसीने के द्वारा तथा अन्य उत्सर्जन क्रियाओं के द्वारा पानी की बहुत हानि होती है। इसके लिए रोगी को उबालकर ठण्डा किया हुआ पानी अथवा जीवाणु-रोधक फिल्टर द्वारा छाना हुआ पानी पर्याप्त मात्रा में देना चाहिए।

प्रश्न 2:
रोगी को दिए जाने वाले तरल भोजन कौन-कौन से होते हैं? इन्हें तैयार करने की विधियों का भी वर्णन कीजिए। [2011]
या
फटे दूध का पानी किस रोगी को देते हैं? इसे बनाने की क्या विधि है? [2011, 12, 13, 15, 16]
या
फटे दूध का पानी (whey-water) क्यों उपयोगी है तथा इसे किस रोगी को देंगी?
या
चार तरल आहारों के नाम बताइए।
या
तरल आहार से आप क्या समझते हैं? [2009, 12, 15]
उत्तर:
रोगी के लिए आदर्श तरल आहार

तरल भोजन रोगियों का महत्त्वपूर्ण आहार है। यह हल्का एवं सुपाच्य होता है तथा (UPBoardSolutions.com) रोगी में जलअल्पता (डी-हाइड्रेशन) की स्थिति उत्पन्न नहीं होने देता। तरल भोजन के कुछ मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं

  1. फटे दूध का पानी,
  2.  टोस्ट का पानी,
  3. जौ का पानी,
  4. चावल का पानी,
  5. दाल का सूप,
  6. टमाटर का सूप,
  7. फलों का रस,
  8. आम का पना,
  9.  मांस का सूप तथा
  10.  अण्डे का फ्लिप।

इन तरल आहारों को तैयार करने की विधि तथा उनके उपयोग का विवरण निम्नलिखित है
(1) फटे दूध का पानी:
यह प्रायः बच्चों तथा मोतीझरा अथवा मियादी ज्वर के रोगियों के लिए उपयुक्त रहता है। लगभग 1/2 लीटर दूध साफ बर्तन में उबालें तथा उबाल आते ही उसमें टाटरी अथवा नींबू के रस की कुछ बूंदें डाल दें। दूध के फटने से पानी व छेना अलग-अलग हो जाता है। बर्तन (UPBoardSolutions.com) को अधिक हिलाये बिना पानी को किसी दूसरे साफ बर्तन में छान लेना चाहिए। इसमें स्वाद के अनुसार नमक मिलाया जा सकता है। इसे दिन में 2-3 बार रोगी को देना चाहिए।’

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(2) टोस्ट का पानी:
हल्का एवं कार्बोजयुक्त होने के कारण टोस्ट का पानी लगभग सभी प्रकार के रोगियों को दिया जा सकता है। डबल रोटी के टुकड़ों को धीमी आग पर अच्छी तरह सेकिए। अब इन्हें एक बर्तन में रखकर खोलता हुआ पानी इतना डालिए कि टोस्ट पूरी तरह से डूब जाएँ तथा पानी ऊपर रहे। अब लगभग 15-20 मिनट तक इन्हें पानी में पड़ा रहने दीजिए। अब एक स्वच्छ कपड़े में से पानी छान लें। स्वादानुसार नमक अथवा चीनी मिलाकर रोगी को दीजिए।

(3) जौ का पानी:
एक बड़ी चम्मच पिसी हुई जो लेकर अच्छी तरह साफ कर लें। आधा लीटर पानी एक पतीली में लेकर आग पर चढ़ा दें। पानी उबल जाने पर उसमें जौ डालकर धीमी आग पर अच्छी तरह से पकाएँ। अब एक स्वच्छ कपड़े में पानी को छानकर उसमें नींबू का रस, नमक तथा पिसी हुई काली मिर्च डालकर रोगी को दें। जौ का पानी पेचिश तथा गुर्दे के रोगियों को देना लाभप्रद रहता है।

(4) चावल का पानी:
एक बड़ी चम्मच चावल लेकर अच्छी तरह धोकर साफ कर लें। अब इन्हें आधा लीटर पानी में डालकर आग पर चढ़ा दें। चावलों के गलने पर बर्तन को आग पर से उतार लें। एक स्वच्छ कपड़े में से शेष पानी को छान लें। अब इसमें स्वादानुसार नमक व नींबू का रस डालकर रोगी को दें। चावल का पानी पेचिश, अतिसार तथा टायफाइड के रोगियों को देना अत्यन्त लाभप्रद रहता है।

(5) दाल का सूप:
एक बड़ी चम्मच मूंग की दाल को बीनकर व धोकर साफ कर लें। अब इसे किसी बर्तन में आधा लीटर पानी डालकर आग पर चढ़ा दें। धीमी आग पर इसे 15-20 मिनट तक पकाएँ। दाल के अच्छी तरह गल जाने पर शेष पानी को किसी स्वच्छ कपड़े में छान लें। अब इसमें स्वादानुसार नमक डालकर रोगी को दें। मोतीझरा अथवा मियादी ज्वर के रोगी के लिए दाल का सूप सर्वोत्तम रहता है।

(6) टमाटर का सूप:
250 ग्राम पके टमाटर पानी में अच्छी तरह धोकर किसी बर्तन में आधा लीटर पानी डालकर आग पर चढ़ा दें। जब टमाटर गल जाएँ तो उन्हें कुचल व मसलकर किसी बर्तन में छान लें। यदि रोगी को घी लेने की अनुमति हो, तो घी व जीरे का छौंक लगाएँ। अब स्वादानुसार (UPBoardSolutions.com) नमक व पिसी हुई काली मिर्च डाल दें। यदि रोगी को घी लेना मना हो, तो बिना छौंक लगाए ही सुप देना उचित रहता है। इसी प्रकार अन्य सब्जियों; जैसे–पालक, गाजर, लौकी आदि; का भी सूप तैयार किया जा सकता है। इस प्रकार के सूप विटामिन तथा खनिज लवणों से भरपूर होते हैं।

(7) फलों का रस:
मौसमी, सन्तरा, अनार व अँगुर आदि के रस रोगियों के लिए अत्यधिक उपयोगी रहते हैं। रोगी को सदैव अच्छे व ताजे फलों का रस देना चाहिए, क्योंकि सड़े-गले फलों का रस बेस्वाद तथा हानिकारक होता है। रस निकालने से पूर्व फलों को अच्छी प्रकार पानी में धो लेना चाहिए। हाथ की अथवा बिजली की मशीन द्वारा फलों का रस निकालकर उसे एक स्वच्छ कपड़े में छन लेना चाहिए। अब इसमें स्वादानुसार नमक एवं पिसी हुई काली मिर्च डालकर रोगी को देना चाहिए।

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(8) आम का पना:
कच्चे आम को राख में भूनकर तथा ठण्डा करके उसका छिलका उतार लेते हैं। अब छिले हुए आम को अच्छी तरह मथकर उसका गूदा अलग कर लेते हैं। गूदे को ठण्डे पानी में घोलकर तथा रोगी की रुचि के अनुसार इसमें नमक, पिसी काली मिर्च, भुना हुआ जीरा, हरे पुदीने का रस व चीनी आदि मिला देते हैं। आम का पनी लू से पीड़ित व्यक्तियों के लिए अत्यन्त लाभप्रद रहता है।

(9) मांस (मटन) का सूप:
250 ग्राम बकरे अथवा मुर्गी का मांस अच्छी प्रकार पानी में साफ कर किसी बर्तन में एक लीटर पानी में डालकर धीमी आग पर निरन्तर उबालें। जब यह भली प्रकार न जे.ए, तो बर्तन को ठण्डा करने के लिए रख दें। ठण्डा होने पर पानी की सतह पर आई चिकनाई को दूर कर देना चाहिए। अब इसे ठीक प्रकार से छान लें। इसे रोगी को देने से पूर्व हल्का-सा. गर्म कर लें तथा स्वादानुसार नमक व पिसी काली मिर्च डाल दें।

(10) अण्डे का फ्लिप:
“अण्डे को तोड़कर किसी प्याले में अच्छी तरह से फेंटें। अब एक गिलास दूध गरम करें। (UPBoardSolutions.com) दूध में रोगी की रुचि के अनुसार चीनी मिलाकर फेंटा हुआ अण्डा अच्छी तरह से घोल दें। अण्डा मिला गरम दूध रोगी के लिए अत्यन्त लाभप्रद रहता है।

प्रश्न 3:
निम्नलिखित की उपयोगिता एवं बनाने की विधि लिखिए
(क) कस्टर्ड,
(ख) अरारोट,
(ग) खिचड़ी,
(घ) दलिया तथा
(ङ) साबूदाना
या
रोगी के लिए खिचड़ी बनाने की विधि लिखिए। [2015, 17]
उत्तर:
(क) कस्टर्ड:
यह कम तरल भोजन की श्रेणी में आता है। यह रोगी के लिए सुपाच्य एवं शक्तिवर्द्धक होता है। इसे बनाने के लिए एक ताजे अण्डे को तोड़कर उसकी जर्दी को अच्छी तरह से फेटते हैं। अब इसमें आवश्यकतानुसार चीनी व 250 मिलीलीटर दूध मिलाकर एक कटोरे में डाल देते हैं। एक भगोने में खौलता हुआ पानी लेकर उसके बीच में उपर्युक्त कटोरा रखकर घोल को चम्मच से | तब तक हिलाते हैं जब तक यह गाढ़ा न हो जाए। गाढ़े घोल को हल्का गर्म अथवा ठण्डा करके रोगी
को दिया जाता है।

(ख) अरारोट:
दो छोटे चम्मच अरारोट पाउडर को 50 मिलीलीटर पानी में डालकर घोल बनाएँ। अब इस घोल को 250 मिलीलीटर खौलते दूध में थोड़ा-थोड़ा डालें तथा चम्मच से लगातार चलाते रहें जिससे कि इसमें गाँठे न पड़े। गाढ़ा होने पर उतारकर चीनी मिला दें। इसे रोगी को (UPBoardSolutions.com) गर्म-गर्म परोसा जाता है। पेचिश एवं अतिसार के रोगी को यह नमक मिलाकर देना चाहिए।

(ग) खिचड़ी:
यह एक सुपाच्य हल्का भोजन है। मूंग की दाल की खिचड़ी मलेरिया व पेचिश के रोगियों के लिए अति उपयोगी रहती है। एक भाग चावल व दो भाग मूंग की दाल लेकर दोनों को बीन कर साफ कर लें तथा स्वच्छ पानी में इन्हें दो-तीन बार धो लें। एक भगोने में पानी उबालें तथा उबलते पानी में उपर्युक्त दाल-चावल डालकर आग पर चढ़ा दें। आवश्यकतानुसार इसमें नमक वे हल्दी डाल दें। जब दाल व चावल अच्छी तरह पक जाए तथा खिचड़ी थोड़ी गाढ़ी हो जाए, तो इसे ठण्डा करके रोगी को दिया जा सकता है।

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(घ) दलिया:
दलिये में प्रोटीन, कार्बोज तथा लवण होते हैं। यह हल्का, सुपाच्य तथा पौष्टिक होता है तथा प्रायः सभी प्रकार के रोगियों के लिए उपयोगी रहती है। इसे बनाने के लिए एक बड़ी चम्मच दलिये को दो प्याले पानी में डाल कर उबालें। हल्का गाढ़ा हो जाने पर इसे रोगी की रुचि के अनुसार नमक डालकर परोसे अथवा इसमें चीनी व दूध मिलाकर दें।

(ङ) साबूदाना:
विभिन्न रोगों में पाचन शक्ति कमजोर होने पर साबूदाने का सेवन रोगी के लिए अत्यन्त लाभप्रद रहता है। इसे बनाने के लिए एक बड़ी चम्मच साबूदाना लेकर उसे अच्छी प्रकार से साफ कर लें। अब एक भगोने में 250 मिलीलीटर पानी उबालें। पानी के उबलने पर उसमें साबूदाना डाल दें। थोड़ी देर पकने पर उसमें आवश्यकतानुसार दूध व चीनी डाल दें। इसे रोगी की रुचि के अनुसार गर्म अथवा हल्का गर्म परोसें। यह मलेरिया व टायफाइड के रोगी को दिया जाता है। पेचिश के रोगी को साबूदाना बिना चीनी व दूध डाले देना चाहिए।

प्रश्न 4:
निम्न रोगों के रोगियों के रोग की अवधि तथा स्वास्थ्य लाभ के समय का भोजन क्या होगा और वह कैसे बनेगा
(क)गैस्ट्रोएण्ट्राइटिस तथा
(ख) मियादी बुखार
या
मियादी बुखार के लक्षण लिखिए। किसी एक रोग से ग्रसित रोगी को क्या भोजन देंगे?
या
मियादी बुखार में रोगी को क्या आहार दिया जाना चाहिए? [2018]
उत्तर:

(क) गैस्ट्रोएण्ट्राइटिस:
यह दूषित आहार के कारण होने वाला पेट का रोग है जिसमें आँतों में सूजन आ जाने के फलस्वरूप पेट में दर्द अनुभव होता है तथा अम्लीयता बढ़ जाती है; अतः इस रोग की अवधि में शीघ्र पचने वाले तरल भोज्य-पदार्थों का सेवन अधिक कराया जाता है। इस बात का (UPBoardSolutions.com) विशेष ध्यान रखा जाता है कि आहार में अम्लीय पदार्थ न हों। उदाहरण-टोस्ट का पानी, नींबू रहित चावल का पानी तथा पालक, गाजर वे लौकी आदि सब्जियों का सूप।
स्वास्थ्य लाभ के समय रोगी को हल्के एवं सुपाच्य भोजन; जैसे-खिचड़ी, साबूदाना तथा दलिया; देना चाहिए।

[संकेत: बनाने की विधि हेतु विस्तृत उत्तरीय प्रश्न सं० 3 का उत्तर देखें।)
(ख) मियादी बुखार:
मियादी बुखार या टायफाइड नामक रोग में आहार का विशेष महत्त्व होता है। यह रोग आहार-नाल में जीवाणुओं के संक्रमण से उत्पन्न होता है। इस रोग में आँतों में सूजन एवं घाव हो जाते हैं तथा पाचन शक्ति अत्यधिक क्षीण हो जाती है। इस रोग की अवधि तथा स्वास्थ्य लाभ की अवधि में दिये जाने वाले क्विरण निम्नलिखित हैं

रोग की अवधि में आहार:
मियादी बुखार या टायफाइड रोग की स्थिति में रोगी के शरीर में प्रोटीन की काफी कमी हो जाती है। इसके अतिरिक्त विभिन्न खनिज लवणों तथा ग्लाइकोजन के संग्रह में भी कमी आ जाती है। इस स्थिति में रोगी को ऐसा आहार दिया जाना चाहिए, जिससे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, जल, सोडियम तथा पोटैशियम क्लोराइड की समुचित मात्रा मिलती रहे। इस रोग में ऊर्जा की आवश्यकता भी अधिक होती है। दिन में लगभग 3500 कैलोरी ऊर्जा आवश्यक होती है। (UPBoardSolutions.com) इसके साथ ही प्रतिदिन लगभग 100 ग्राम प्रोटीन भी आवश्यक होती है।

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इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए टायफाइड के रोगी के लिए नियोजित खाद्य-सामग्री में विभिन्न भोज्य-पदार्थों का समावेश होना चाहिए। रोगी को दूध, आधा उबला हुआ अण्डा, ब्रेड, मक्खन तथा सूजी की खीर या कॉर्नफ्लैक्स आदि दिया जा सकता है। फलों का रस, भुना हुआ आलू, हल्की चपाती तथा मसूर की दाल भी दी जा सकती है। टायफाइड के रोगी को दिन में तीन बार मुख्य आहार दिया
जाना चाहिए तथा साथ ही अल्प-मात्रा में मध्य-आहार भी दिए जा सकते हैं। ।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
पेचिश के रोगी के रोग की अवधि और स्वास्थ्य लाभ के समय का भोजन कैसा होना चाहिए?
या
पेचिश के रोगी को कैसा भोजन दिया जाना चाहिए और क्यों? [2008, 11, 12, 13, 16]
उत्तर:
पेचिश की स्थिति में आहार

पेचिश में बार-बार दस्त लगते हैं तथा पेट में ऐंठन होती है। मल के साथ श्लेष्मा तथा कभी-कभी रक्त भी विसर्जित होता है। पेचिश दो प्रकार की होती है-एक एमीबिक (Amoebic) जो अमीबा नामक सूक्ष्म रोगाणु द्वारा उत्पन्न होती है और दूसरी बैसिलरी। यह पहले प्रकार की पेचिश से अधिक घातक होती है।

इस रोग का उद्भवन काल 1 से 2 दिन होता है। बैसिलरी पेचिश में दस्तों के साथ ज्वर भी (UPBoardSolutions.com) रहता है, परन्तु अमीबिक में ज्वर नहीं होता है। ऐंठन के साथ लाल या सफेद आँव वाले दस्त दोनों में
ही लगते हैं।

रोगी को दही, उबला चावल, मूंग की दाल की खिचड़ी, पानी में पका साबूदाना या अरारोट, केला दिया जा सकता है। गम्भीर अवस्था में केवल चावल का माँड ही दिया जाना चाहिए। ईसबगोल
की भूसी दही में मिलाकर दिन में दो या तीन बार खिलानी चाहिए।
जैसे-जैसे पाचन शक्ति ठीक हो जाए रोटी, फल, तरकारी भी खाने को दे सकते हैं।

प्रश्न 2:
स्वस्थ व्यक्ति और रोगी के भोजन में क्या अन्तर होता है? [2008, 11, 12, 13]
उत्तर:
आहार मनुष्य का सर्वोत्तम डॉक्टर है। यदि स्वस्थ अवस्था में सही, सुपाच्य तथा उचित मात्रा में सन्तुलित भोजन मनुष्य को मिलता रहे तो उसका स्वास्थ्य, संक्रामक रोगों को छोड़कर, सामान्यतः ठीक रहता है। इसी प्रकार, रुग्णावस्था में थोड़ा-सा भी अनियमित भोजन लेने पर रोग की गम्भीरता अत्यधिक बढ़ सकती है।
रुग्णावस्था में भोजन ऐसा होना चाहिए जिसमें आवश्यक पोषक-तत्त्व, जिनकी शरीर में कमी हो सकती है, अधिक मात्रा में हों। रोगी के भोजन में सभी पौष्टिक तत्त्व आवश्यक हैं, किन्त यह सरलत ग्राह्य, सुपाच्य तथा शीघ्र पचने वाला होना चाहिए।

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प्रश्न 3:
विभिन्न रोगियों को दिए जाने वाले भोजन की तालिका बनाइए।
या।
निम्न रोगों के रोगियों का भोजन कैसा होना चाहिए ? ज्वर, अतिसार, टायफाइड। [2009]
उत्तर:
विभिन्न रोगों के रोगियों को दिए जाने वाले भोजन की तालिका (UPBoardSolutions.com) निम्नलिखित है
UP Board Solutions for Class 10 Home Science Chapter 16 विभिन्न रोगों में रोगी का भोजन

प्रश्न 4:
रोगी के भोजन की व्यवस्था करते समय किन-किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए? [2008, 11, 17]
उत्तर:
रोगी के भोजन की व्यवस्था करते समय निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए

  1. भोजन सफाई से स्टील या कलई के बर्तनों में बनाया जाना चाहिए।
  2. भोजन इस प्रकार तैयार होना चाहिए कि उसके पौष्टिक तत्त्व; जैसे—प्रोटीन, खनिज-लवण व विटामिन आदि; नष्ट न होने पाये।।
  3. भोजन डॉक्टर के निर्देशानुसार तैयार करना चाहिए।
  4. रोगी के भोजन में चटपटे मसाले, घी व तेल का कम-से-कम प्रयोग करना चाहिए। जहाँ तक सम्भव हो, उबली हुई सब्जी ही देनी चाहिए।
  5. भोजन को स्वादिष्ट बनाने के लिए आवश्यकतानुसार काला नमक व काली मिर्च का प्रयोग करना चाहिए।
  6.  भोजन के साथ सब्जी में नींबू का प्रयोग आवश्यकतानुसार करना चाहिए।
  7. (रोगी को अधिकतर हल्का भोजन; जैसे-खिचड़ी, डबलरोटी, हल्की-हल्की (UPBoardSolutions.com) फुलकियाँ, पालक की सब्जी इत्यादि; देना चाहिए।
  8. रोगी को जो भी भोजन दिया जा रहा है, वह उन तत्त्वों से परिपूर्ण होना चाहिए जिनकी कमी से वह रोग उत्पन्न हुआ है।

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प्रश्न 5:
रोगी को भोजन कराते समय आप किन-किन बातों का ध्यान रखेंगी? [2011, 13, 14]
उत्तर:
रोगी को भोजन कराते समय ध्यान रखने योग्य मुख्य बातें निम्नलिखित हैं

  1. भोजन सुपाच्य एवं हल्का तथा डॉक्टर की सलाह पर आधारित होना चाहिए।
  2. रोगी को प्रायः दिन में भोजन कराना उपयुक्त रहता है।
  3. रोगी को नींद से जगाकर भोजन न कराएँ।
  4. रोगी को निश्चित कार्यक्रम व समय के अनुसार भोजन कराना चाहिए।
  5.  भोजन सदैव स्वच्छ बर्तनों में देना चाहिए तथा प्रयुक्त बर्तनों को नि:संक्रमित कर साफ करना चाहिए।
  6. रोगी से सदैव प्रेमपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।

प्रश्न 6:
क्षय रोग से ग्रस्त व्यक्ति को रोग की अवधि तथा स्वास्थ्य लाभ के समय क्या आहार दिया जाना चाहिए? [2014]
उत्तर:
क्षय रोग से ग्रस्त व्यक्ति के फेफड़े कुप्रभावित होते हैं जिससे खाँसी व स्थायी ज्वर बना रहता है। इसके अतिरिक्त रोगी को भूख कम लगती है तथा उसका भार नित्यप्रति कम होता रहता है। अतः उसे अतिरिक्त कैलोरीयुक्त भोजन की आवश्यकता होती है। रोग की अवस्था में उसे हल्का, सुपाच्य एवं पौष्टिक भोजन देना चाहिए। इसके लिए उसे दाल, टमाटर व मांस के सूप दिए जाने चाहिए। शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए रोगी को मूंग की दाल की खिचड़ी, दूध का दलिया, दूध, अण्डा, हरी शाक- सब्जियाँ तथा फलों का सेवन कराना उपयुक्त रहता है।

प्रश्न 7:
मलेरिया रोग में दिए जाने वाले आहार का विवरण प्रस्तुत कीजिए। [2010]
उत्तर:
मलेरिया नामक रोग में व्यक्ति को कॅपकपी से तीव्र ज्वर होता है। इस रोग में व्यक्ति का यकृत भी प्रभावित होता है परन्तु व्यक्ति का पाचन क्रिया पर अधिक प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। सामान्य दशाओं में मलेरिया के रोगी को सामान्य पौष्टिक एवं सन्तुलित आहार (UPBoardSolutions.com) दिया जा सकता है, परन्तु यदि ज्वर तीव्र है, तो भोजन देना उचित नहीं होता। इस दशा में रोगी को दूध दिया जाना चाहिए। ज्वर उतर जाने के बाद स्वास्थ्य लाभ के समय सुपाच्य किन्तु पौष्टिक हल्का भोजन देना चाहिए। रोगी को उसकी रुचि के अनुसार खिचड़ी, दलिया, साबूदाना, हरी सब्जियाँ दी जा सकती हैं। रोगी को उबला अण्डा तथा मक्खन भी दिया जा सकता है।

प्रश्न 8:
रोगी के आहार में ग्लूकोज का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
ग्लूकोज अन्य शर्कराओं की अपेक्षा अधिक घुलनशील होती है तथा एन्जाइम क्रिया के बिना ही अवशोषित होकर रक्त प्रवाह में पहुँच जाती है। अत: ग्लूकोज तुरन्त ऊर्जा प्रदान करती है। इस प्रकार ग्लूकोज लेने पर रोगी दुर्बलता से शीघ्र मुक्त होने का अनुभव करता है। हमारे शरीर में ग्लूकोज शर्करा ग्लाइकोजन के रूप में संचित रहती है तथा आवश्यकतानुसार ग्लाइकोजन ग्लूकोज में परिवर्तित होकर रुधिर प्रवाह में मिलती रहती है। रुग्णावस्था में ग्लाइकोजने के संचय में कमी आ जाती है, जिसकी पूर्ति करने के लिए रोगी को ग्लूकोज देना आवश्यक हो जाता है।

प्रश्न 9:
टमाटर सूप कैसे तैयार करेंगी? [2015, 17]
उत्तर:
टमाटर सूप बनाने के लिए सही पके हुए टमाटरों को पहले स्टील या कलई किये बर्तन में उबालते हैं। जब टमाटर भली-भाँति उबल जायें तो इन्हें बड़े चम्मच या कलछी से घोट लिया जाता है। तत्पश्चात् इसका पानी छानकर रोगी की इच्छानुसार नमक, काली मिर्च डालकर ही रोगी को दिया जा सकता है। स्वाद के अनुसार इसमें थोड़ी चीनी भी मिलाई जा सकती है।

प्रश्न 10:
टोस्ट वाटर तैयार करने की विधि लिखिए। [2016]
उत्तर:
सामग्री डबलरोटी का टुकड़ा व पानी।

बनाने की विधि डबलरोटी के टुकड़े को आग पर सेंक लेते हैं। जब वह गुलाबी रंग का हो जाता है तो उसे किसी बर्तन (कटोरा) में रख देते हैं। अब एक बड़े बर्तन में पानी उबालते हैं। जब पानी खूब उबल जाता है तो उसे सिके टोस्ट वाले बर्तन में डाल देते हैं तथा उस पानी (UPBoardSolutions.com) को छान लेते हैं, यही टोस्ट वाटर (टोस्ट का पानी) कहलाता है। इसमें काला नमक तथा काली मिर्च मिलाकर रोगी को देते हैं।
टोस्ट वाटर अधिकतर टायफाइड के रोगी को ज्वर उतरने के पश्चात् दिया जाता है।

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1:
किसी व्यक्ति को रोग की दशा में दिए जाने वाले आहार को क्या कहा जाता है?
उत्तर:
किसी व्यक्ति को रोग की दशा में दिए जाने वाले आहार को उपचारार्थ आहार कहा जाता है।

प्रश्न 2:
रोगी के भोजन को कितनी श्रेणियों में विभालि किया जा सकता है?
उत्तर:
रोगी के भोजन को क्रमश: तरल आहार तथा कम हार के। श्रणियों में बाँटा जा सकता है। तरल आहार को पुन: पूर्ण-तरल तथा अर्द्ध-तरल आहार में बाँटा जाता है।

प्रश्न 3:
रोगी के लिए कार्बोज का सर्वाधिक उपयोगी स्रोत कौन-सा है?
या
फलों का आहार में क्यमहत्त्व है? [2008]
उत्तर:
सेब, अंगर, केला, अमरूद वे आम आदि फल रोगी के लिए कार्बोज प्राप्ति के मुख्य साधन हैं। इनसे रक्त में शर्करा की आवश्यकता की तुरन्त पूर्ति हो जाती है और शारीरिक अंगों को विशेष श्रम नहीं करना पड़ता।

प्रश्न 4:
जौ का पानी किस रोग में दिया जाता है? [2015, 16]
उत्तर:
जौ का पानी गुर्दो के रोग तथा पेचिश में दिया जाना लाभप्रद रहता है।

प्रश्न 5:
‘फटे दूध का पानी में भोजन के कौन-कौन से तत्त्व पाए जाते हैं?
या
फटे दूध के पानी की पौष्टिकता के विषय में लिखिए।
उत्तर:
फटे दूध को पानी में खनिज-लवण, विटामिन, शर्करा तथा प्रोटीन आदि भोजन के पौष्टिक तत्त्व पाए जाते हैं।

प्रश्न 6:
फटे दूध के पानी में कौन-सा तत्त्व नहीं पाया जाता?
उत्तर:
फटे दूध के पानी में वसा नामक तत्त्व नहीं पाया जाता।

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प्रश्न 7:
टोस्ट का पानी’ किस रोगी को दिया जाता है?
उत्तर:
तीव्र ज्वर से पीड़ित रोगी को टोस्ट का पानी दिया (UPBoardSolutions.com) जाता है।

प्रश्न 8:
रुग्णावस्था में रोगी को किस प्रकार का आहार दिया जाना चाहिए?
उत्तर:
साधारणत: रुग्णावस्था में रोगी को हल्का, सुपाच्य एवं पौष्टिक आहार दिया जाना चाहिए।

प्रश्न 9:
क्षय रोग से पीड़ित व्यक्ति को कैसा आहार देना चाहिए?
उत्तर:
क्षय रोगी को अधिक कैलोरी बाला, प्रोटीनयुक्त, सुपाच्य भोजन देना चाहिए।

प्रश्न 10:
रोगी को उबालकर ठण्डा किया हुआ जल देने का क्या लाभ है?
उत्तर:
उबालकर ठण्डा किया हुआ जल रोगाणुमुक्त हो जाता है; अतः यह रोगी को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचाता।

प्रश्न 11:
टायफाइड में ठोस भोजन खिलाना क्यों उपयुक्त नहीं है? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
टायफाइड के रोगी की आँते अत्यधिक कमजोर हो जाती हैं। अतः उसे ठोस भोजन न देकर तरल भोजन देना ही उपयुक्त रहता है।

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प्रश्न 12:
मियादी बुखार के रोगी को आप कैसा आहार देंगी? [2010, 14]
उत्तर:
मियादी बुखार के रोगी को वसारहित, प्रोटीनयुक्त तथा तरल अथवा कम तरल भोजन देना लाभप्रद रहता है।

प्रश्न 13:
एक व्यक्ति के लिए दलिया बनाने में पदार्थों का क्या अनुपात होना चाहिए?
उत्तर:
एक बड़ी चम्मच दलिया, दो प्याले पानी, एक प्याला दूध व दो छोटी चम्मच चीनी एक व्यक्ति के लिए दलिया तैयार करने के लिए पर्याप्त रहते हैं।

प्रश्न 14:
तरल भोजन रोगी के लिए क्यों उपयुक्त रहता है? [2018]
उत्तर:
रोगी को यह सुविधापूर्वक दिया जा सकता है तथा अधिक सुपाच्य होने के कारण शीघ्र ही शरीर में अवशोषित हो जाता है।

प्रश्न 15:
रोगी को देने के लिए नरम आहार के कुछ उदाहरण बताइए।
उत्तर:
दूध, गला हुआ मांस, मछली, अण्डा, कीमा, कस्टर्ड, दही, दलिया, खिचड़ी आदि नरम आहार हैं।

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प्रश्न 16:
पूर्ण-तरल तथा अर्द्ध-तरल भोजन कौन-से हैं?
उत्तर:
नींबू, मांस, जौ आदि का पानी पूर्ण-तरल, जबकि टमाटर, मांस, दाल, सब्जी का सूप, (UPBoardSolutions.com) चाय, दूध आदि अर्द्ध-तरल भोजन हैं। इनसे भी अधिक ठोस दलिया, साग-सब्जियाँ, खट्टे फल, आधा उबला अण्डा आदि कम-तरल भोजन हैं।

प्रश्न 17:
हल्के भोजन से क्या तात्पर्य है? यह कब दिया जाता है?
उत्तर:
हल्के भोजन का अर्थ है अर्द्ध-तरल शीघ्र पचने वाला सुपाच्य भोजन। यह कम तरल पदार्थ देने के पश्चात् तथा ठोस पदार्थ से पूर्व दिया जाता है।

प्रश्न 18:
कब्ज के रोगी के आहार में मुख्यतः किन भोज्य-पदार्थों का समावेश करना चाहिए? [2009, 12, 13, 18]
उत्तर:
कब्ज के रोगी के आहार में मुख्यतः अधिक रेशे युक्त भोज्य पदार्थों का समावेश करना चाहिए जैसे कि सम्पूर्ण अनाज, छिलकायुक्त दालें, सब्जियाँ तथा फल। जल की मात्रा भी अधिक होनी चाहिए।

प्रश्न 19:
लू लगने के लक्षण लिखिए। इस रोगी को किस प्रकार का आहार देना चाहिए? [2007, 18]
उत्तर:
लू लग जाने पर व्यक्ति को तेज ज्वर हो जाता है। चेहरा लाल हो जाता है, होंठ सूखने लगते हैं तथा शरीर में पानी की कमी हो जाती है। इस दशा में रोगी को ठण्डे पेय-पदार्थ अधिक मात्रा में दिए जाने चाहिए। कच्चे आम का पना तथा पुदीने का रस भी दिया जाना चाहिए।

प्रश्न 20:
अतिसार के रोगी को क्या भोजन देते हैं और क्यों ? [2011]
उत्तर:
अतिसार के रोगी को केवल तरल पदार्थ देने चाहिए, यह भी तब जब मल त्याग बार-बार हो रहा हो। रेशे वाले पदार्थ, हरी पत्तेदार सब्जियाँ, अचार, मुरब्बे आदि न दें; क्योंकि इससे रोग की गम्भीरता बढ़ सकती है। रोगी में जल की कमी हो जाती है; अतः जल दें। चाय, (UPBoardSolutions.com) कॉफी दी जा सकती है। क्योंकि यह मल का निर्माण नहीं करती।

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प्रश्न 21:
अतिसार के रोगी के आहार में दही या मटठे का क्या महत्त्व है?
या
अतिसार के रोगी को कैसा आहार देना चाहिए? [2007, 10, 11, 14]
उत्तर:
अतिसार के रोगी के आहार में दही या मट्ठे का विशेष महत्त्व होता है। यदि इसमें ईसबगोल मिला लिया जाए, तो अधिक लाभ होता है।

प्रश्न 22:
मधुमेह के रोगी को कैसा भोजन देना चाहिए? [2008, 12]
उत्तर:
मधुमेह के रोगी को शर्करायुक्त भोजन देना बन्द कर देना चाहिए। ठोस हो या द्रव किसी भी प्रकार का मीठा पदार्थ ऐसे रोगी को न दें। इसके अतिरिक्त अधिक कार्बोहाइड्रेट्स वाले भोजन; चावल, आलू, शकरकन्द आदि; न देकर प्रोटीनयुक्त भोजन; दालें, दाने वाली, फलियों वाली सब्जियां व खट्टे पदार्थ; दिए जाने चाहिए।

प्रश्न 23:
कच्ची सब्जियों को खाने से शरीर को कौन-से पोषक तत्त्व अधिक मात्रा में मिलते हैं? [2009, 13, 14]
उत्तर:
कच्ची सब्जियों को खाने से शरीर को लोहा तथा विटामिन्स भरपूर मात्रा में मिलते हैं।

प्रश्न 24:
जीवन-रक्षक घोल क्या है? इसे कैसे तैयार करते हैं? [2016]
उत्तर:
हमारे शरीर में पानी की कमी की पूर्ति करने के लिए जो पेय तैयार किया जाता है उसे ‘जीवन-रक्षक घोल’ कहते हैं। (UPBoardSolutions.com) विधि इसे तैयार करने की विधि बड़ी आसान है-जल को उबालकर उसमें थोड़ा-सा नमक तथा चीनी मिलाकर एवं इसके साथ में दो-चार बूंद नींबू का रस डालकर इसे तैयार किया जाता है।

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बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न:
निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही विकल्पों का चुनाव कीजिए

1. रोग की अवस्था में कमजोर हो जाती है
(क) स्मरण शक्ति
(ख) नजर
(ग) पाचन शक्ति
(घ) श्रवण शक्ति

2. सामान्य रूप से रोगी को दिया जाना चाहिए
या रोगी का भोजन होना चाहिए
(क) गरिष्ठ आहार
(ख) स्वादिष्ट आहार
(ग) सुपाच्य आहार
(घ) चाहे जैसा आहार

3. लू से पीड़ित व्यक्ति को देना चाहिए [2010, 12, 14, 15]
(क) आम का पना
(ख) प्याज
(ग) हरे पुदीने का रस
(घ) ये सभी

4. मलेरिया के रोगी को देना चाहिए
(क) दूध
(ख) दही
(ग) भोजन
(घ) चाहे कुछ भी हो

5. पेचिश के रोगी को भोजन कैसा होना चाहिए?
(क) केवल फल
(ख) केवल दूध
(ग) दही-चावल
(घ) रोटी-सब्जी

6. रोगी को अधिकतर कैसा भोजन देना चाहिए?
(क) तरल
(ख) गरिष्ठ
(ग) ठोस
(घ) चाहे जैसा

7. निमोनिया के रोगी को कौन-सा पेय पदार्थ देंगी?
(क) लस्सी
(ख) शर्बत
(ग) चाय
(घ) शीतल पेय

8. तरल पदार्थ किस रोग के रोगी को दिया जाता है?
(क) मियादी बुखार
(ख) तपेदिक
(ग) रक्ताल्पता
(घ) सिरदर्द.

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9. क्षय रोग के रोगी को कौन-सी वस्तु हानि पहुँचाती है? [2013]
(क) मौसमी
(ख) रस वाले फल
(ग) मिर्च-मसालेदार भोजन
(घ) दूध

10. अतिसार में क्या देना चाहिए?
(क) रोटी
(ख) द्वे वाटर
(ग) मीट
(घ) पुलाव

11. रुग्णावस्था में पाचन शक्ति हो जाती है
(क) अत्यधिक तीव्र
(ख) कमजोर
(ग) कोई अन्तर नहीं होता
(घ) इनमें से कोई नहीं

12. कब्ज के रोगी को कौन-सा आहार अधिक मात्रा में देना चाहिए? [2012]
(क) वसायुक्त
(ख) ठोस
(ग) पौष्टिक
(घ) रेशेदार

13. क्षय रोग के रोगी को कौन-सा भोजन देना चाहिए?
(क) मिर्च-मसालेदार
(ख) दूध
(ग) उबला हुआ
(घ) स्वादिष्ट

14. कौन-सा पदार्थ लेने से तुरन्त ऊर्जा मिलती है? [2013, 14, 17]
(क) विटामिन
(ख) ग्लूकोज
ग) प्रोटीन
(घ) खनिज-लवण

15. किसी भी भोज्य-पदार्थ से प्राप्त ऊर्जा को नापने की इकाई है [2017]
(क) ग्राम
(ख) आंस
(ग) डिग्री
(घ) कैलोरी

16. आहार में कार्बोहाइड्रेट का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए [2007]
(क) बेरीबेरी में
(ख) मधुमेह में
(ग) तपेदिक में
(घ) एनीमिया में

17. मधुमेह किस तत्त्व की अधिकता से होता है? [2011, 16]
क) प्रोटीन
(ख) वसा
(ग) शर्करा
(घ) विटामिन

18. किस प्रकार के भोजन रोगों से बचाते हैं ? [2009]
(क) बिस्कुट
(ख) चावल
(ग) ताजे मौसमी फल एवं हरी सब्जियाँ
(घ) चीनी

19. अतिसार के रोगी को कैसा भोजन देना चाहिए ? [2010, 11, 12]
(क) तला भोजन
(ख) तरल भोजन
(ग) गरिष्ठ भोजन
(घ) कुछ नहीं

20. नेत्रों के लिए कौन-सा पौष्टिक तत्त्व आवश्यक है? [2014, 17, 18]
(क) कैल्सियम
(ख) विटामिन ‘बी’
(ग) ग्लूकोज
(घ) विटामिन ‘ए’

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उत्तर:
1. (ग) याचन शक्ति,
2. (ग) सुपाच्य आहार,
3. (घ) ये सभी,
4. (क) दूध,
5. (ग) दही-चावल,
6. (क) तरल,
7. (ग) चाय,
8. (क) मियादी बुखार,
9. (ग) मिर्च-मसालेदार भोजन,
10. (ख) हे कटर,
11. (ख) कमजोर,
12. (घ) रेशेदार,
13. (ख) दूध,
14. (ख) ग्लूकोज,
15. (घ) कैलोरी,
16. (ख) मधुमेह में,
17. (ग) शर्करा,
18. (ग) ताजे मौसमी फल (UPBoardSolutions.com) एवं हरी सब्जियाँ,
19. (ख) तरल भोजन,
20. (घ) विटामिन ‘ए

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